डॉ. वीरसागर जी के लेख

डॉ. वीरसागर जी के विविध लेख-

  1. सर्वज्ञसिद्धि
  2. जैन धर्म में स्वच्छता की अवधारणा
  3. जैन दर्शन की उदारता
  4. संगीत का महत्त्व
  5. न्यायशास्त्र के अध्ययन की जीवन में उपयोगिता
  6. समयसार में न्यायशास्त्र के प्रयोग
  7. आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान की उपयोगिता
  8. जैनाचार्यों की राष्ट्रिय भावना
  9. जैन अर्थशास्त्र (Jain Economics)
  10. वित्तरागी से वीतरागी बनने की अद्भुत कला सिखाने वाला शास्त्र(जैन अर्थशास्त्र - Jain Economics)
  11. अध्यात्मप्रधान भारतवर्ष
  12. क्यों कहते हैं क्षमावाणी को महापर्व ?
  13. जैन दर्शन की विशेषता
  14. जैन धर्म की प्राचीनता
  15. जैन विद्या की व्यापकता
  16. जैन विद्या के छात्रों को निर्देश
  17. जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान
  18. व्यस्त रहो स्वस्थ रहो / जो व्यस्त है वह स्वस्थ है
  19. लघु कथा - मनमानी या जिनवाणी
  20. सदानन्द नगर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट
  21. उत्तम विद्यार्थी के षट् आवश्यक
  22. ध्यान का फल

डॉ. वीरसागर जी जैन
प्रोफेसर, जैनदर्शन विभाग
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ,
मानित विश्वविद्यालय, नई दिल्ली -110016
फोन- 011-26177207, 9868888607
veersagarjain@gmail.com

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1. सर्वज्ञसिद्धि :arrow_up:

‘सर्वज्ञसिद्धि’ दर्शनशास्त्र का एक अत्यंत प्रमुख विषय है | प्राय: सभी दर्शनों में इस विषय पर थोड़ा-बहुत प्रकाश अवश्य डाला गया है | किन्तु इस विषय को जैसा महत्त्व और विस्तार जैन दर्शन में प्राप्त हुआ है, वैसा अन्यत्र नहीं हो सका | ‘सर्वज्ञसिद्धि’ जैन दर्शन का एक बहुत ही प्रधान विषय बन गया है | वहां इसे न्यायशास्त्र के द्वारा भी बारम्बार अनेकानेक हेतुओं द्वारा विस्तारपूर्वक सिद्ध किया गया है | जैन दर्शन के प्राय: सभी दार्शनिक, आध्यात्मिक और नैयायिक आचार्यों ने इस विषय को विशेष महत्त्व प्रदान किया है और उस पर विस्तारपूर्वक लेखनी चलाई है, क्योंकि उनके अनुसार यह विषय एक बहुत ही प्रयोजनभूत विषय है, मूलभूत विषय है, सभी को सर्वप्रथम अनिवार्यरूप से ज्ञातव्य है, इसके बिना अन्य विषय भी भलीभांति समझ में नहीं आ सकते | सर्वज्ञ तो धर्म का मूल है, उसके श्रद्धान-ज्ञान बिना धर्म की शुरुआत ही नहीं होती |

दरअसल इसमें एक बात यह भी है कि सर्वज्ञता आत्मा का अपना ही स्वभाव है, अतः इस विषय को समझने का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु को समझना नहीं है, अपितु अपने ही आत्मस्वभाव को भलीभांति समझना है | यह आत्मज्ञान का ही एक रूप है | जो सर्वज्ञ को नहीं जानता वह वास्तव में अपने आत्मा को भी नहीं जानता |

आत्मा के ज्ञान-श्रद्धान और सर्वज्ञ के ज्ञान-श्रद्धान का अविनाभाव सम्बन्ध है, सहभाव सम्बन्ध है | जिसे आत्मा का ज्ञान-श्रद्धान होगा, उसे सर्वज्ञ का ज्ञान-श्रद्धान भी नियम से होगा ही और जिसे सर्वज्ञ का ज्ञान-श्रद्धान होगा, उसे आत्मा का ज्ञान-श्रद्धान भी नियम से होगा ही | ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि इनमें से किसी एक का तो ज्ञान-श्रद्धान हो जाए और दूसरे का ज्ञान-श्रद्धान न हो |

यही कारण है कि जैनाचार्यों ने इस विषय (सर्वज्ञसिद्धि) को एक मूलभूत या प्रयोजनभूत विषय कहकर इसे सावधानी से समझने पर बहुत अधिक बल प्रदान किया है |

सर्वज्ञसिद्धि का यह विषय वैसे तो सभी जैन ग्रन्थों में, चारों ही अनुयोगों में, यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जाता है, किन्तु जितने व्यवस्थित रूप से यह विषय जैन-न्याय-ग्रन्थों में मिलता है, उतना अन्यत्र नहीं मिलता; अतः यहाँ इस विषय को जैन-न्याय-ग्रन्थों के आधार पर ही भलीभांति स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं |

जैन-न्याय-ग्रन्थों में सर्वज्ञसिद्धि का यह विषय लगभग सभी न्याय-ग्रन्थों में अनिवार्य रूप से मिलता है | यह बात अलग है कि कहीं इसे बहुत संक्षेप में कह दिया है और कहीं इसे बहुत विस्तार से कहा है | तथा कहीं-कहीं तो स्वतंत्र रूप से ही इस विषय पर प्रकरण-ग्रन्थ का भी निर्माण कर दिया है | जैसे कि आचार्य अनंतवीर्य ने इस विषय पर दो स्वतंत्र ग्रन्थ लिख दिए हैं- लघु सर्वज्ञसिद्धि और बृहत् सर्वज्ञसिद्धि |

सर्वज्ञसिद्धि के इस विषय को स्पष्ट करने के लिए समन्तभद्र, अकलंक, विद्यानंद आदि आचार्यों ने आप्तमीमांसा, अष्टशती, अष्टसहस्री जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ भी लिखे हैं | ये ग्रन्थ सर्वज्ञसिद्धि जैसे विषय को प्रस्तुत करने के कारण ही न्याय-ग्रन्थों की सूची में परिगणित होते हैं और इस विषय को भलीभांति समझने के लिए अत्यंत उपादेय हैं |

यहाँ हम इन्हीं सबके आधार से सर्वज्ञसिद्धि के विषय को सरल-सुबोध शैली में प्रस्तुत करने का एक लघु प्रयास करते हैं | आशा है, सर्वज्ञसिद्धि जैसा गूढ़-गम्भीर विषय कुछ सरलता के साथ स्पष्ट होगा |

सर्वज्ञसिद्धि के इस विषय को जैन-न्याय-ग्रन्थों में दो भागों में विभाजित करके समझाया गया है- सामान्य सर्वज्ञसिद्धि और विशेष सर्वज्ञसिद्धि, अतः यहाँ भी उसे उसीप्रकार दो भागों में विभाजित करके प्रस्तुत करते हैं | सामान्य सर्वज्ञसिद्धि में यह सिद्ध किया जाता है कि कोई सर्वज्ञ हो सकता है, उसमें कोई बाधा नहीं है और विशेष सर्वज्ञसिद्धि में यह सिद्ध किया जाता है कि वह सर्वज्ञ अरिहंत ही है, कपिल-सुगत आदि अन्य कोई नहीं |

दरअसल, सामान्य सर्वज्ञसिद्धि और विशेष सर्वज्ञसिद्धि– ये वास्तव में सर्वज्ञसिद्धि के दो भाग नहीं हैं, अपितु दो सोपान हैं, दो स्तर हैं | पहले सामान्य सर्वज्ञसिद्धि की जाती है और उसके बाद में विशेष सर्वज्ञसिद्धि की जाती है | सामान्य सर्वज्ञसिद्धि में मात्र इतना सिद्ध किया जाता है कि कोई सर्वज्ञ हो सकता है, उसमें किसी प्रकार की कोई तकनीकी बाधा नहीं है; क्योंकि बहुत-से लोग यही नहीं मानते हैं कि कोई सर्वज्ञ हो भी सकता है| उनका मानना है कि सर्वज्ञ अर्थात् सब कुछ/ अनंत द्रव्यों और उनकी अनंतानन्त पर्यायों को जाननेवाला वास्तव में कोई हो ही नहीं सकता है, सम्भव ही नहीं है, यदि कहीं किसी ने ऐसा कहा भी है तो वह केवल कथनमात्र है, अतिशयोक्ति मात्र है, वस्तुस्थिति नहीं है | अत: पहले इस मान्यता का निवारण करने के लिए सामान्य सर्वज्ञसिद्धि की जाती है कि सर्वज्ञ हो तो सकता है, उसमें किसी तरह की कोई बाधा नहीं है | इसके बाद जब यह भलीभांति स्थापित हो जाता है कि कोई सर्वज्ञ हो तो सकता है, उसमें कोई बाधा नहीं है, तब विशेष सर्वज्ञसिद्धि की जाती है | विशेष सर्वज्ञसिद्धि में यह सिद्ध किया जाता है कि सर्वज्ञ हो ही नहीं सकता है, है भी | तथा वह अन्य कोई नहीं, अरिहंत ही है | क्योंकि बहुत-से लोग सर्वज्ञ हो सकता है – इस बात को सिद्धांतत: स्वीकार करके भी यह नहीं स्वीकार कर पाते हैं कि सर्वज्ञ वास्तव में है भी | वे यही कहते रहते हैं कि ठीक है, हो तो सकता है, उसमें सिद्धांतगत कोई बाधा नहीं है, लेकिन प्रायोगिक रूप से ऐसा कोई पुरुष नहीं है | अथवा हम निर्णयपूर्वक नहीं कह सकते हैं कि अरिहंत ही सर्वज्ञ हैं | अत: इस तरह की मान्यता का निराकरण करने के लिए विशेष सर्वज्ञसिद्धि की जाती है | दोनों प्रकार से सर्वज्ञसिद्धि करना अनिवार्य है, मात्र एक पर्याप्त नहीं है |

सामान्य सर्वज्ञसिद्धि
सामान्य सर्वज्ञसिद्धि हेतु जैनाचार्यों ने मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन तर्क दिये हैं, जिन पर हमें बहुत ही गम्भीरता से चिन्तन करना चाहिए –

  1. आत्मा सर्वज्ञ हो सकता है, क्योंकि उसका स्वभाव ज्ञान (जानना) है | स्वभाव में सीमा नहीं होती | जैसे अग्नि सबको जलाती है, पानी सबको भिगोता है, उसी प्रकार ज्ञान सबको जानता है | तथा जिस प्रकार आत्मा में ज्ञातृत्व है, उसी प्रकार जगत् के सर्व पदार्थों में ज्ञेयत्व(प्रमेयत्व) है | ऐसी स्थिति में ज्ञान यदि शुद्ध हो तो सकल ज्ञेयों को अवश्य ही जानेगा | दाहक किस दाह्य को नहीं जलाएगा ? वह तो अनिवार्यत: सबको जलाएगा ही | उसीप्रकार ज्ञायक/ज्ञाता किस ज्ञेय को नहीं जानेगा ? वह तो सबको अनिवार्यत: जानेगा ही |
    सभी पदार्थों का ज्ञेयत्व हमें स्वयं भी अनुभव में आता है | उसे प्रत्यक्ष होने की ही आवश्यकता नहीं है, उसे अनुमान से भी जाना जा सकता है, क्योंकि सभी पदार्थ अनुमेय हैं | तथा जो अनुमेय होता है, वह प्रत्यक्ष भी होता है |
    जगत में दो प्रकार के पदार्थ हैं- प्रत्यक्ष और परोक्ष | प्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष हैं ही, परोक्ष भी किसी न किसी के प्रत्यक्ष सिद्ध होते हैं, क्योंकि वे सभी अनुमेय हैं |
    (सूक्ष्मान्तरितदूरार्था प्रत्यक्षा: कस्यचिद्यथा | अनुमेयत्वतोsग्न्यादिरिति सर्वज्ञसंस्थिति: || - आप्तमीमांसा, 5 )
  2. सर्वज्ञता के बाधक तत्त्व दो हैं- अज्ञान (आवरण) और रागादि (दोष) | इनका उचित साधना द्वारा शनै: शनै: क्षय होता देखा जाता है | इससे सिद्ध होता है कि किसी के इनका पूर्ण क्षय भी हो सकता है | जिसके हो जाए वही सर्वज्ञ है | जिसप्रकार स्वर्ण की अशुद्धि ताव देते-देते अंततोगत्वा पूर्ण क्षय हो ही जाती है और स्वर्ण पूर्ण शुद्ध हो जाता है, उसीप्रकार आत्मा की अशुद्धि भी उचित साधना द्वारा अंततोगत्वा पूर्ण क्षय हो ही जाती है और आत्मा पूर्ण शुद्ध हो जाता है | पूर्ण शुद्ध आत्मा अज्ञान (आवरण) और रागादि से रहित होता है | वही सर्वज्ञ है |
    (दोषावरणयोर्हानिर्नि:शेषास्त्यतिशायनात् |
    क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षय: || -आप्तमीमांसा, 4)
  3. सर्वज्ञ होने में किसी प्रकार का कोई बाधक प्रमाण नहीं मिलता | प्रत्यक्ष या अनुमान – किसी से भी सर्वज्ञ होने में किसी प्रकार की कोई बाधा सिद्ध नहीं होती|
    कोई कहता है कि प्रत्यक्ष से सर्वज्ञ नहीं दिखाई देता -यह बाधा है न ? तो जैनाचार्य उससे पूछते हैं कि सर्वज्ञ इस देश इस काल में नहीं दिखाई देते या सर्व देश सर्व काल में नहीं दिखाई देते ? यदि इस देश इस काल में नहीं दिखाई देते तो यह कोई बात नहीं हुई, यह तो हम भी मानते हैं; किन्तु यदि तू यह कहता है कि सर्वज्ञ सर्व देश सर्व काल में ही नहीं दिखाई देते तो हमें बता कि तू सर्व देश सर्व काल को देखकर कहता है या बिना देखे ? यदि बिना देखे कहता है तो तेरी बात अप्रामाणिक रही और यदि देखकर कहता है तो तू ही सर्वज्ञ सिद्ध हुआ |
    पुनश्च, वह कहता है कि अनुमान से सर्वज्ञ की सिद्धि में बाधा आती है और वह इस प्रकार है- कोई भी पुरुष सर्वज्ञ नहीं हो सकता, क्योंकि वह पुरुष है | उससे पूछते हैं कि पुरुषत्व तीन प्रकार का होता है– रागादि से अदूषित पुरुषत्व, रागादि से दूषित पुरुषत्व और पुरुषत्व सामान्य | तुम किसकी बात कर रहे हो ? यदि प्रथम की बात कर रहे हो तो तुम्हारा हेतु विरुद्ध है, क्योंकि रागादि से अदूषित पुरुषत्व सर्वज्ञता के बिना सम्भव नहीं है | यदि द्वितीय की बात कर रहे हो तो तुम्हारा हेतु सिद्धसाध्य है, क्योंकि रागादि से दूषित पुरुष को हम ही सर्वज्ञ नहीं मानते | और यदि तृतीय की बात कर रहे हो तो तुम्हारा हेतु संदिग्धविपक्षव्यावृत्ति है, क्योंकि सर्वज्ञत्व के साथ पुरुषत्व का कोई विरोध नहीं है |
    इसप्रकार उक्त तर्कों से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि सर्वज्ञ होना सम्भव है, सर्वज्ञ की सत्ता अवश्य ही है, उसमें सिद्धांतत: किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है|

विशेष सर्वज्ञसिद्धि

सामान्य सर्वज्ञसिद्धि के उपरांत विशेष सर्वज्ञसिद्धि हेतु जैनाचार्यों ने मुख्य रूप से एक ही खास बात बहुत जोर देकर कही है कि –

स त्वमेवासि निर्दोषो युक्तिशास्त्राविरोधिवाक् |
अविरोधो यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न बाध्यते || -आप्तमीमांसा, 6
इसका आशय इसप्रकार है कि – अरिहंत ही सर्वज्ञ हैं, क्योंकि वे निर्दोष हैं| कपिलादि सर्वज्ञ नहीं हैं, क्योंकि वे निर्दोष नहीं हैं, सदोष हैं |
अरिहंत निर्दोष हैं, क्योंकि उनके वचन युक्ति-शास्त्र से अबाधित हैं | कपिलादि निर्दोष नहीं हैं, क्योंकि उनके वचन युक्ति-शास्त्र से बाधित हैं |
मैं समझता हूँ कि यह बात बहुत ही ठोस है, अकाट्य है, हमें इस पर बहुत गम्भीरता से बारम्बार चिन्तन करना चाहिए | यह जैनाचार्यों की एक बहुत ही बड़ी देन है | इससे सर्वज्ञसिद्धि जैसा गूढ़-गंभीर विषय हस्तामलकवत् स्पष्ट हो गया है | सर्वज्ञता को वचनों से समझने की यह एक अद्भुत, किन्तु सफल कोशिश है | यथा-
जिसके वचन युक्ति-शास्त्र-विरोधी हैं, वह निर्दोष नहीं हो सकता, वह तो नियम से सदोष (दोषावरण-सहित) ही होगा | और जो सदोष होगा, वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता | कपिलादि इसीलिए सर्वज्ञ नहीं हो सकते, क्योंकि उनके वचन युक्ति-शास्त्र-विरोधी हैं | तथा अरिहंत इसीलिए सर्वज्ञ हैं, क्योंकि उनके वचन युक्ति-शास्त्र-अविरोधी हैं |
अंत में, सर्वज्ञसिद्धि के इस महत्त्वपूर्ण विषय को समझकर हम सब स्वयं भी समस्त दोषावरणों से रहित होकर सर्वज्ञ हो जाएँ – इसी पवित्र भावना के साथ अपनी वाणी को विराम देता हूँ|
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2. जैन धर्म में स्वच्छता की अवधारणा :arrow_up:

स्वच्छता आज का एक ज्वलंत विषय है | भारत सरकार के निर्देशों पर आज सर्वत्र बड़े ही व्यापक स्तर पर स्वच्छता अभियान चल रहा है | विचारणीय है कि स्वच्छता के सम्बन्ध में जैन धर्म क्या कहता है|
वैसे तो सभी चिंतकों की तरह जैन चिंतक भी स्वच्छता को सभी दृष्टियों से बहुत अच्छा कहते-मानते हैं, गंदगी रखने और फ़ैलाने को किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहते-मानते हैं | गंदगी का कथमपि कोई पक्ष जैन चिंतक भी नहीं लेते | जैन चिंतक तो बल्कि स्वच्छता पर कुछ ज्यादा ही जोर देते हैं | जैनों की स्वच्छता या शुद्धता की बातें विश्वप्रसिद्ध हैं | जैन घरों में आज भी जो स्वच्छता-शुद्धता दिखाई देती है, वह अन्यत्र दुर्लभ ही है | तथापि स्वच्छता के सम्बन्ध में जैन चिंतकों की एक बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, एकदम अनूठी है; जिसकी ओर प्राय: लोगों का ध्यान नहीं जाता; अत: आज मैं यहाँ उसी को विशेष रूप से स्पष्ट करना चाहता हूँ | स्वच्छता अभियान से जुड़े हुए सभी लोगों को इस बात की ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान देना चाहिए | इस बात को समझे और अपनाये बिना हमारा स्वच्छता अभियान कभी सफल नहीं हो सकता |
जैन चिंतकों की वह खास बात संक्षेप में यह है कि हमें ‘सफाई करो’ की बजाय ‘सफाई रखो’ की नीति को प्रोत्साहित करना चाहिए | यद्यपि यह बात देखने में एक-सी ही लग रही है, किन्तु गहराई से देखा जाए तो दोनों बातों में बड़ा भारी अंतर है | कैसे – यही यहाँ स्पष्ट किया जा रहा है |
जैन धर्म अहिंसावादी धर्म है | उसका कहना है कि सफाई करने से भी सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है, अत: हमें सफाई करने के बाद प्रायश्चित्त लेना चाहिए, जैसा कि ‘आलोचना-पाठ’ में कहा है –
‘‘झाड़ू ले जांगा बुहारी | चींटी आदिक जीव विदारी ||’’
इसी प्रकार के विचार अन्यत्र भी अनेक स्थानों पर अनेक जैन आचार्यों ने प्रकट किये हैं | इनसे ज्ञात होता है कि जैन धर्म झाड़ू आदि से सफाई करने को अच्छा कार्य नहीं मानता है, अपितु उसकी गणना पापकार्यों में ही करता है और उसका प्रायश्चित्त लेने का विधान भी बनाता है | किन्तु इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि जैन धर्म गंदगी का पक्षधर है | जैन धर्म गंदगी का किंचित् भी पक्षधर नहीं है – यह बात हम ऊपर भलीभांति स्पष्ट कर चुके हैं |
दरअसल, बात यह है कि जैन आचार्य ‘सफाई रखो’ – यह तो कहते हैं, किन्तु ‘सफाई करो’ – यह नहीं कहते हैं | ‘गंदगी मत फैलाओ’ – यह तो कहते हैं, किन्तु ‘झाड़ू आदि से सफाई करके हिंसात्मक कार्य करो’ – यह नहीं कह रहे हैं | तथा उनका यही चिन्तन यहाँ बहुत महत्त्वपूर्ण है, जो बड़े ध्यान से समझने योग्य है | सफाई रखना और सफाई करना – दोनों बातों में बड़ा अंतर है|
जैन आचार्यों के ये विचार ऊपर से देखने पर किसी को कुछ अटपटे-से लग सकते हैं, किन्तु यदि गम्भीरतापूर्वक चिन्तन किया जाए तो बड़े ही काम के सिद्ध होते हैं, क्योंकि इन्हीं से हमारी समस्या समूल समाप्त होगी | जैन आचार्यों के ये विचार स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए बड़े ही काम के हैं, अत्यंत मौलिक एवं अर्थपूर्ण हैं | इनमें बड़ा रहस्य छुपा हुआ है | इसके द्वारा जैन आचार्य कहना यह चाहते हैं कि हमारी जीवन-शैली ऐसी होनी चाहिए कि कूड़ा फैले ही नहीं, क्योंकि यदि कूड़ा उत्पन्न होगा तो वह कहीं-न-कहीं तो रहेगा ही और उससे वातावरण भी गंदा होगा ही |
आज हम देख रहे हैं कि हम अपने घर या कार्यालय को तो जैसे-तैसे स्वच्छ कर लेते हैं, परन्तु वहाँ से जो कूड़ा निकलता है, उससे बड़े-बड़े कूड़े के पहाड़ खड़े हो जाते हैं | उनमें से अनेक दुर्गन्धित गैसें निकलती रहती हैं और नाना प्रकार की भयंकर समस्याएँ खड़ी होती रहती हैं | वर्तमान में दिल्ली को ही देख लीजिए, यहाँ भिलस्वा और गाजीपुर में तो दो बड़े-बड़े कूड़े के पहाड़ बन ही गये हैं, सरकार ने अभी-अभी दो और स्थान इस कार्य के लिए आवंटित कर दिए हैं | समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा कब तक किया जा सकेगा | अभी से ही सारी धरती और सारा आकाश कूड़े से भरता जा रहा है | आगे क्या होगा ? हमारा स्वच्छता अभियान इस विधि से कैसे सफल होगा?
यही कारण है कि आज हमें जैन आचार्यों के इस उपदेश पर ध्यान देना होगा कि ‘सफाई करो, सफाई करो’ – चिल्लाने की बजाय ‘कूड़ा मत पैदा करो, गंदगी मत फैलाओ’ – कहा जाए और साथ में यह भी कहा जाए कि जो अधिक/खतरनाक कूड़ा फैलाएगा उसे प्रायश्चित्त/दंड का भागी बनना होगा|
हम देखते हैं कि प्राचीन काल में भी हमारे देश में प्राय: सर्वत्र ऐसा ही था, प्रथम तो कूड़ा पैदा ही नहीं होता था और जो कुछ होता था तो उसका अन्य उपयोग हो जाता था; पर आज हमारी जीवनशैली बहुत खराब हो गई है और हम विकास, पैकिंग, लुकिंग आदि के नाम पर बहुत अधिक एवं बड़े ही खतरनाक कूड़े का उत्पादन कर रहे हैं | विचारणीय है कि हम इतने सारे एवं खतरनाक कूड़े का नाश कैसे करेंगे? अत: यदि हमें अपने स्वच्छता अभियान को सफल बनाना है तो उन सब कार्यों को हतोत्साहित करना होगा, जिनसे अधिक/खतरनाक कूड़ा फैलता है, गन्दगी फैलती है|
यद्यपि यह सम्भव नहीं है कि कूड़ा बिलकुल ही न पैदा हो; होगा, अवश्य होगा और हमें उसकी सफाई भी अवश्य करनी ही होगी, अन्यथा अधिक गंदगी फैलेगी; परन्तु फिर भी सफाई करने की बजाय सफाई रखने वाली अवधारणा को हमें बहुत अधिक प्रोत्साहित करना होगा, तभी हमारा स्वच्छता अभियान सही अर्थों में सफल होगा | यूँ ही विकास के नाम पर विनाश की आँधी चलाना उचित नहीं है|
सफाई कैसे रखी जाए अथवा गंदगी कैसे कम फैले – इस विषय पर भी जैन आचार्यों का मार्गदर्शन बहुत महत्त्वपूर्ण है | इस सम्बन्ध में उन्होंने अनेक उपाय बताये हैं | यथा –
  1. आरम्भ कार्य (जैसे- पृथ्वी खोदना, पानी फैलाना, अग्नि जलाना, वायु को बाधित करना, पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाना) कम से कम किये जाएँ | ‘आरम्भ’ जैनदर्शन का एक विशेष पारिभाषिक शब्द है | जिन कार्यों से सूक्ष्म जीवों को पीड़ा पहुंचे उन्हें आरम्भ कहते हैं | बहुत आरम्भकार्य करने से बहुत गंदगी फैलती है |
  2. परिग्रह कम से कम इकट्ठा किया जाए | अनावश्यक परिग्रह इकट्ठा करने से बहुत गंदगी फैलती है | अनावश्यक वस्तुएं काम नहीं आ पातीं, खराब हो जाती हैं |
  3. शुद्ध सात्त्विक शाकाहारी भोजन किया जाए | भोजन की कच्ची, पक्की सारी सामग्री अत्यंत सीमित मात्रा में एवं अत्यंत सावधानी से रखी जाए | भोजन वेस्ट न किया जाए |
  4. नदियों को पवित्र रखा जाए | उनमें घुसकर स्नान, धोवन आदि न किया जाए |
    इसी प्रकार के और भी अनेक उपाय बताए हैं | यदि हम सब इन उपायों पर गम्भीरतापूर्वक ध्यान दें तो सहज ही गंदगी कम फैलेगी और हमारा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ पूर्ण सफल होगा|

> सफाई रखना जरूरी है | सफाई करना मजबूरी है ||

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3. जैन दर्शन की उदारता :arrow_up:

जैन दर्शन अपने स्वभाव से ही उदार है, ऊपर से जैनाचार्यों ने भी इसे जन-जन तक पहुंचाने के लिए विशेष उदारता का परिचय दिया है | इसप्रकार जैन दर्शन एक अत्यंत ही उदार दर्शन बन गया है, अतः उसे समझने-समझाने के लिए हमें भी अत्यंत उदार बनना आवश्यक है, संकीर्ण रहकर उसे कथमपि नहीं समझा- समझाया जा सकता |

खेद है कि आजकल इसे समझाने वाले अनेक विद्वान् तक भी अत्यंत संकीर्ण दिखाई देते हैं | यही कारण है कि लोग जैन धर्म-दर्शन को ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं और उसके अनुयायियों की संख्या भी दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है | आवश्यकता है एक सच्चे उदार प्रवक्ता की, जो उदारतापूर्वक जैन दर्शन को समझ सके और फिर उसे जन-जन तक भी कुशलतापूर्वक पहुंचा सके | समन्तभद्र, हेमचन्द्र आदि आचार्यों ने ठीक ही लिखा है कि यदि कोई योग्य वक्ता मिल जाए तो आज भी सारे विश्व में जैन दर्शन का साम्राज्य हो सकता है- ‘त्वच्छासनस्य साम्राज्यमेकच्छत्रं कलावपि’ |
जैन दर्शन की उदारता को समझने के लिए कतिपय निम्नलिखित विषय गम्भीरतापूर्वक विचारणीय हैं-

  1. जैन दर्शन किसी व्यक्ति-विशेष पर आधारित नहीं है- शैव, वैष्णव, बौद्ध, ईसाई आदि की भांति; अपितु ‘जिन’ पर आधारित है और ‘जिन’ किसी व्यक्ति-विशेष का नाम नहीं है, अपितु जो भी व्यक्ति अपने कर्मशत्रुओं को जीते वही जिन है| ‘जयति कर्मारातीन् स जिनः’ |

  2. जैन दर्शन के अन्य सब नाम भी इसी प्रकार के हैं- जिन, जैन, श्रमण, निर्ग्रन्थ, दिगम्बर, आर्हत् आदि |

  3. जैन दर्शन अत्यंत स्पष्ट रूप से बारम्बार कहता है कि व्यक्ति कोई भी हो, उसका ऊपरी नाम-ग्राम आदि कुछ भी हो, परन्तु यदि वह वीतरागी सर्वज्ञ और सर्वसत्त्वहितोपदेशी है, तो वही पूज्य है । यथा- मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् … / भवबीजांकुरजनना: रागाद्या / पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु … / जिसने राग-द्वेष - कामादिक जीते सब जग जन लिया…बुद्ध वीर जिन हरि हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।

  4. जैनाचार्यों ने वीतराग, सर्वज्ञ और सर्वसत्त्वहितोपदेशी जीव को ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश, बुद्ध आदि सिद्ध करके उन नामों से भी पूजा है ।| यथा- ‘बुद्धस्त्वमेव त्वं शंकरोsसि… धाताsसि… पुरुषोत्तमोsसि’।

  5. जैनाचार्यों ने वेद, पुराण आदि शब्दों का भी समीचीन अर्थ करके उनकी प्रशंसा की है | यथा- ‘यो गीयते वेद पुराण शास्त्र यः स देव देवो हृदये ममास्ताम्’।

  6. जैनाचार्यों ने अपने दर्शन को किसी एक जाति, सम्प्रदाय आदि के लिए न बताकर उसे ‘सर्वोदय’ तीर्थ कहा है | यथा- ‘सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव’ (युक्त्यनुशासन) जातिलिंगविकल्पेन येषां च समयाग्रहः’।

  7. जैन दर्शन दशलक्षण आदि को महापर्व मानता है जो सार्वजनिक, सार्वकालिक और सार्वभौमिक हैं | उनकी सीमा किसी एक देश, जाति, लिंग, वर्ण, सम्प्रदाय आदि तक सीमित नहीं है ।

  8. जैन दर्शन का णमोकार महामंत्र भी ऐसा ही अत्यंत उदार है, जिसमें न कोई व्यक्तिवाद है, न ही किसी प्रकार की कोई याचना-कामना है - 'णमो अरिहंताणं … णमो लोए सव्व साहूणं।

  9. जैन दर्शन में धर्म की परिभाषा भी अत्यंत उदार समझाई गई है- ‘वत्थुसहावो धम्मो’ (कार्तिकेयानुप्रेक्षा) अथवा ‘धम्मो मंगलमुद्दिट्टं अहिंसा संजमो तवो’| तात्पर्य यही है कि जैन दर्शन व्यक्तिवादी नहीं, गुणवादी है, वस्तुवादी है।

  10. जैन दर्शन परीक्षा-प्रधानी है, विज्ञान के समान है वहां सही बात सही है, चाहे हमारा दुश्मन ही कहे और गलत बात गलत है, चाहे हमारा पिता ही कहे।

  11. जैन दर्शन में अन्य धर्मों, देवों, जातियों, सभाओं आदि की निन्दा करने का स्पष्ट शब्दों में निषेध किया है ‘धम्म सभा…’ -सुदृष्टितरंगिणी, यहाँ तक कि अन्य धर्म आदि और उसके अनुयायियों के प्रति भी मधुर सम्बन्ध रखने का उपदेश दिया है- ‘यथा स्वं दनामानाद्यै…’ -यशस्तिलक।

  12. जैन दर्शन में किसी एक भाषा विशेष का ही आग्रह नहीं है कि यह एक अमुक भाषा ही दैवी, पवित्र या ईश्वरीय भाषा है और इसके अतिरिक्त अन्य सर्व भाषाएँ भ्रष्ट, अपवित्र एवं हेय हैं; अपितु वह तो जोर देकर कहता है कि ‘सर्व भाषा सरस्वती’ (कातन्त्र)] इस सम्बन्ध में मेरा अन्य निबन्ध ‘जैनाचार्यों का भाषा- दर्शन’ पठनीय है।

  13. जैन दर्शन में किसी प्रकार की ड्रेस कोड, छापा-तिलक, चोटी, दाड़ी, पगड़ी, जनेऊ, कटार, कड़ा, टाई, कुर्ता, धोती, खडाऊं आदि की कट्टरता भी नहीं है (सलवार-कुर्ता पहनकर भी आर्यिका हो सकती है |)

  14. जैन दर्शन में धार्मिक क्रियाओं में भी कोई सांचे जैसा कट्टर आग्रह नहीं है कि यही करना अनिवार्य है अथवा इसे ऐसे ही करना अनिवार्य है अपितु भिन्न-भिन्न साधक अपनी-अपनी शक्ति और परिस्थिति के अनुसार उनका पालन कर सकते हैं | जैन दर्शन प्रत्येक देश-काल के अनुकूल सिद्ध होता है।

  15. जैन दर्शन में सभी आत्माओं को समान, स्वतंत्र माना गया है, यहाँ तक कि प्रत्येक आत्मा को परमात्मा बनने का अधिकार बताया गया है - ‘अप्पा सो परमप्पा’।

  16. जैन दर्शन में चोर, भील, चांडाल क्या, सर्प, सिंह, गज आदि को भी सम्यग्दर्शन की प्राप्ति का अधिकार बताया गया है- ‘सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातंगदेहजम्’ जैन धर्म दलितोद्धारक/पतितोद्धारक है। पंडित आशाधरजी का एक और महत्वपूर्ण श्लोक है- ‘जिनधर्मं जगद्बंधुमनुबद्धुमपत्यवत्’ – जिनधर्म जगतबन्धु है, पुत्रवत उसकी रक्षा करता है (सत्त्वेषु मैत्री…)।

  17. जैन दर्शन में कहा गया है कि निर्गुण अर्थात् नामधारी जैन भी स्नेहपूर्वक अपनाने योग्य है, उसकी भी कभी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए। यथा- ‘सगुण: निर्गुण वापि जैन: पात्रायते तराम् नावज्ञा क्रियते यस्मात्तन्मूला धर्मवर्तना |’ ( - सागार धर्मामृत )। अनेक विद्वानों ने भी इसकी व्याख्या इसप्रकार की है मत ठुकराओ, गले लगाओ, धर्म सिखाओ। हमेशा सुई-धागे का काम करो, कैंची का नहीं। परिष्कार करो, बहिष्कार नहीं। प्रभावना प्रकाश के समान है, उसमें हर टिमटिमाते का योगदान होता है।

  18. इसीप्रकार का एक और भी बहुत महत्त्वपूर्ण कथन जैनाचार्यों ने यह किया है कि -
    “उच्चावचजनप्राय: समयोऽयं जिनेशिनाम्
    नैकस्मिन् पुरुषे तिष्ठेदेकस्तम्भइवालय: ||" (- यशस्तिलक चम्पू ) अर्थात् जिनशासन एक ऐसे विशाल महल के समान है, जो किसी एक ही स्तम्भ पर नहीं टिका हुआ है अपितु छोटे-बड़े असंख्य स्तम्भ लगे हैं |

  19. जैन दर्शन में यह भी कहा गया है कि जिससे आपके सम्यक्त्व और व्रत दूषित न हो, वह समस्त लोकाचार उपादेय है | यथा- 'सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधि: | यत्र सम्यक्त्वहानिर्न न चापि व्रतदूषणम्॥ (-यशस्तिलकचम्पू )

  20. जैन दर्शन में यह भी बार-बार कहा गया है कि आप अपनी शक्ति-अनुसार ही सब कुछ करो, जबरदस्ती से कुछ भी मत करो, चाहे अणु-समान ही करो (‘अणुव्रत’) | यथा- जं सक्कदि तं…।

  21. जैन दर्शन, केवल श्रमण बनकर ही धर्म साधना होगी -ऐसा नहीं कहता, अपितु उसमें श्रावक धर्म का भी विधान किया गया है |

  22. जैन दर्शन केवल निश्चय नय को ही नहीं मानता , व्यवहार नय को भी मानता है दोनों नयों से ही कार्य सिद्धि मानता है स्पष्ट कहता है कि- ‘जइ जिणमयं पवज्जह तो मा ववहारणिच्छह मुयह…।’

  23. जैन दर्शन उभय लोक सुखकारी है उसमें धर्म, अर्थ , काम, मोक्ष - सभी का उपदेश है । यथा- 'कामदं मोक्षदं देवं/ 'धर्म करत संसार सुख, धर्म करत निर्वाण/ ‘भुक्ति-मुक्ति दातार’।

  24. जैन ग्रन्थों में केवल धर्म, दर्शन, अध्यात्म ही नहीं है, अपितु न्याय, व्याकरण, पुराण, इतिहास, गणित, ज्योतिष, भूगोल, खगोल, अर्थ, समाज, राजनीति आदि विविध विषय वर्णित हैं ।

  25. जैन दर्शन में स्याद्वाद जैसा अद्भुत सिद्धांत है, जो सर्व विरोधों को समाप्त करता है | इसी के कारण जैन दर्शन कभी किसी कथन का खंडन नहीं करता, मात्र उस कथन की समीचीन अपेक्षा समझाता है।

उदारता का गलत अर्थ ग्रहण न करें |
"हमें विचारों में उदार और चरित्र में कट्टर होना चाहिए, परन्तु खेद है कि आज हम चरित्र में उदार और विचार में कट्टर हो गये हैं |"

Pdf: जैन दर्शन की उदारता

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4. संगीत का महत्त्व :arrow_up:

संगीत एक अद्भुत कला है| आजकल प्राय: लोग इसे हल्के से लेते हैं, मनोरंजन करना या टाइम पास करना ही इसका उद्देश्य समझते हैं; परन्तु वास्तव में देखा जाए तो लौकिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से संगीत का असाधारण महत्त्व सिद्ध होता है| संगीत की शिक्षा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने बहुत सोच-समझकर प्रजा को दी थी|
आधुनिक युग में तो विज्ञान (science) ने भी अनेकानेक प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर दिया है कि संगीत का मनुष्य के जीवन में अद्भुत महत्त्व है| न केवल मनुष्य के जीवन में, अपितु पशु-पक्षियों के जीवन में भी, यहाँ तक कि पेड़-पौधों पर भी संगीत का आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है| उदाहरणार्थ- एक प्रयोग बताता है कि संगीत से पेड़-पौधे स्वस्थ-सुन्दर एवं सुविकसित होते हैं और प्रचुर फल उत्पन्न करते हैं, दूसरा प्रयोग बताता है कि संगीत से उन्मत्त एवं क्रूर पशु-पक्षी भी शांत हो जाते हैं, विषधर सर्प भी वशीभूत हो जाता है, तीसरा प्रयोग बताता है कि संगीत से व्यक्ति की थकान उतर जाती है, सारा तनाव दूर हो जाता है और उसकी स्मरण-शक्ति भी आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है, चौथा प्रयोग बताता है कि संगीत से जटिल रोगों की भी चिकित्सा करना आसान हो जाता है|
फ्रेंकफुर्त विश्वविद्यालय जर्मनी की एक शोध (research) कहती है कि संगीत से मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढती है, रोगी का सिरदर्द, माइग्रेन, स्लीप डिस-ऑर्डर आदि सब ठीक हो जाता है, नींद की गोलियां खाने वाले भी उन्हें छोडकर अच्छी नींद का मजा लेने लगते हैं| इसी प्रकार एक अन्य अध्ययन बताता है कि संगीत के द्वारा क्रोध, भय जैसे बड़े मनोविकार भी आसानी से दूर किये जा सकते हैं| भारतवर्ष के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, जो कि स्वयं एक वैज्ञानिक थे, ने तो एक बार यहाँ तक कहा था कि आतंकवाद जैसी विकराल समस्या को हल करने के लिए हमें संगीत-जैसी दैवी कला का उपयोग करना चाहिए (नवभारत टाइम्स, दिल्ली, 2 मार्च 2004)|
वैज्ञानिकों की उक्त सब बातें एकदम सत्य प्रतीत होती हैं, क्योंकि उन्हें हम सब अपने दैनिक जीवन में भी खूब देखते हैं| जैसे कि संगीत से रोता हुआ बच्चा तुरंत चुप हो जाता है| यदि हमें स्नानादि के समय बहुत सर्दी लग रही हो तो हम कुछ गाने-गुनगुनाने लगते हैं और हमारी सर्दी दूर हो जाती है| बैलों के गले में घंटी का संगीत बजता रहता है तो उससे वह थकता नहीं है, दिन भर काम करता रहता है, इत्यादि|
संगीत के माध्यम से आधुनिक युग में महामारी की तरह तेजी से बढ़ रहे तनाव (tension) और अवसाद (depression) को भी सहजतापूर्वक संभाला जा सकता है, जिसके कि बड़े ही भयंकर दुष्परिणाम हम सब प्रतिदिन समाचार-पत्रों में पढ़ते रहते हैं|
कहने का कुल तात्पर्य यही है कि संगीत एक अद्भुत कला है और इसका आश्रय लेकर हम जीवन के सभी क्षेत्रों में विशेष उन्नति कर सकते हैं, अत: हमें इसे हल्के से नहीं लेना चाहिए| हमें संगीत आये या न आये, प्रतिदिन थोड़ी देर अवश्य ही संगीत का अभ्यास करना चाहिए, उसे केवल सुनना ही नहीं, स्वयं से गाना भी अवश्य चाहिए - ‘गाना आये या ना आये गाना चाहिए’|
संगीत के महत्त्व को जानकर ही हमारे पूर्वजों ने हमारा अधिकांश साहित्य, न केवल साहित्य अपितु आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष आदि शास्त्रों को भी काव्यात्मक शैली में लिखा तथा हमें प्रतिदिन भजन, पूजन, आरती आदि कुछ-न-कुछ गाने की एक समृद्ध परम्परा भी प्रदान की| आज इस परम्परा के कारण हमारा बहुत कुछ सुरक्षित है, हम हजारों समस्याओं से बचे हुए हैं|
शास्त्रों में मित्र रखने की प्रेरणा देते हुए ( ‘अमित्रस्य कुतो सुखम्’ ) मित्र दो प्रकार के बताए गए हैं – स्वमित्र और परमित्र| इनमें से संगीत को स्वमित्र कहा गया है, क्योंकि हम उससे कभी भी, आधी रात को भी, कहीं भी, निर्जन अटवी में भी अपने मन की सारी बातें कर सकते हैं और एकदम निर्भार, स्वस्थ एवं प्रसन्न हो सकते हैं | संगीत की अद्भुत महिमा है, वचनों से कही नहीं जा सकती है| जिसका कोई नहीं उसका संगीत है यारो| संगीत निश्चय ही बहुत महान है|
इस पर भी यदि यह संगीत आध्यात्मिक हो, आत्मा-परमात्मा में मग्न करने वाला हो तो फिर कहना ही क्या ? ऐसे संगीत की तो गणधरादि महामुनि भी प्रशंसा करते हैं| भारतवर्ष मूलतः एक आध्यात्मिक देश है, यहाँ वही संगीत प्रशंसनीय माना गया है जो आध्यात्मिक हो| जो संगीत अश्लील हो, काम आदि विकारी भावों को उद्दीप्त करने वाला हो, उसे यहाँ कथमपि उपादेय नहीं माना गया है, क्योंकि उससे स्वस्थ मनोरंजन भी नहीं हो सकता, अपितु मानसिक रुग्णता ही पैदा होती है| अत: हमें सदैव श्रेष्ठ संगीत का आलम्बन लेना चाहिए| श्रेष्ठ संगीत ही हमें सच्ची सुख-शांति प्रदान करता है|
ऐसे श्रेष्ठ संगीत का वर्णन जैन आचार्य पार्श्वदेव स्वामी ने अपने महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ ‘संगीत-समयसार’ में भी बहुत अच्छा किया है जो पढ़ने और सीखने लायक है| वहाँ कहा गया है कि आध्यात्मिक संगीत से अत्यधिक विकारी, अशान्त एवं चंचल मन भी शीघ्र ही सहजतापूर्वक शान्त हो जाता है और शनै:-शनै: अपने आत्मस्वरूप में ही लीन हो जाता है| इस प्रकार संगीत आत्मलीनता या आत्मानुभूति का श्रेष्ठ साधन भी है| कविवर पण्डित दौलतरामजी आदि अनेक विद्वान् कवि इस आध्यात्मिक संगीत के द्वारा ही आत्मानुभूति का अमृतपान किया करते थे| निश्चय ही संगीत ब्रह्मसाक्षात्कार की अद्भुत कला है|
यद्यपि यह सत्य है कि संगीत रागात्मक होता है, परन्तु उसे वीतरागता का विशेष माध्यम भी बनाया जा सकता है| संगीत का आविष्कार रागी जीवों को वीतरागता के मार्ग पर लगाने की उत्तम कला के रूप में ही ऋषभदेवादि ने किया है| रागादि में आसक्त जीव बिना इसके, सीधे ही वीतरागता के मार्ग में नहीं लग सकते हैं और इसके माध्यम से सहज ही लग जाते हैं| यह बहुत बड़ा विज्ञान है|

संगीत का महत्त्व : दृष्टान्त-1

एक बार की बात है | श्रीकृष्ण वन में बांसुरी बजा रहे थे | इतना प्रभावी संगीत निकल रहा था कि सूखे पेड़-पौधों में भी जान आ गई | उनमें कोंपलें फूट आईं | सब लोग वाह-वाह करने लगे | किन्तु एक कुतर्की बोला – “मैं इसे बांसुरी के संगीत का प्रभाव नहीं मानता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो खुद बांसुरी में भी तो एक-दो पत्ते फूटने चाहिए थे |”
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- “अवश्य, यदि बांसुरी संगीत को ग्रहण करती तो उसमें भी कुछ पत्ते अवश्य फूटते, किन्तु बांसुरी में सात छिद्र हैं और उसने उनमें से सारा संगीत बाहर फेंक दिया, उसे ग्रहण नहीं किया | संगीत का प्रभाव उस पर पड़ता है जो उसे ग्रहण करता है |”

संगीत का महत्त्व : दृष्टान्त-2

पुराने ज़माने की बात है | एक आदमी धन कमाने के लिए बारह वर्ष के लिए विदेश जा रहा था | उसकी पत्नी बहुत दुखी होकर बोली- “मैं कैसे करूंगी, मेरा समय कैसे कटेगा?”
पति ने उसे संगीत सिखा दिया | पति विदेश चला गया | पत्नी संगीत में मग्न रहने लगी | वह जब संगीत-साधना करती तो अनेक पशु-पक्षी भी उसे घेरकर शांति से उसके पास आकर बैठ जाते- तोता, हिरण, सर्प आदि भी | एक हंस तो रोज ही उसकी गोद में एक मोती डालकर जाने लगा | खैर, साधना चलती गई और एक दिन उसका पति लौटकर उसके पास ही आकर खड़ा हो गया | पत्नी आश्चर्यचकित होकर बोली- “अरे तुम आ गये ! बारह वर्ष पूरे हो गये ! मुझे तो पता ही नहीं चला |”

संगीत का महत्त्व : दृष्टान्त-3

एक बार अकबर ने तानसेन से कहा – “वाह तानसेन वाह, क्या कमाल का गाते हो तुम, कैसे होंगे तुम्हारे गुरु ? अरे कभी एक बार अपने गुरुजी से भी तो मिलवाओ | बड़ी इच्छा है उनसे मिलने की |”
तानसेन – “किन्तु जहाँपनाह, वे यहाँ नहीं आते |”
अकबर – “हम उन्हें बड़े ही सम्मान से पालकी भेजकर बुलाएँगे |”
“नहीं, यदि उनके दर्शन करना है आपको स्वयं ही उनके पास चलना होगा |”
“ठीक है, चलो |”
अकबर और तानसेन जंगल में एक पेड़ के नीचे संगीत में डूबे हुए गुरु हरिदासजी के समक्ष जा खड़े हुए, किन्तु गुरुजी का ध्यान भंग न हुआ | किन्तु आखिरकार उनका ध्यान भंग हुआ, मुलाकात भी हुई और वे लौटकर वापिस आ गये | लौटकर अकबर ने तानसेन से कहा – “तानसेन, तुम बहुत अच्छा गाते हो, पर तुम्हारे गुरु के सामने तो तुच्छ-से ही हो |”
तानसेन – “जहाँपनाह, उनमें और मुझमें बड़ा अंतर है | मैं आपको खुश करने के लिए गाता हूँ और वे परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए गाते हैं | श्रेष्ठ संगीत दूसरों के लिए नहीं, केवल अपने लिए ही होता है |”
सुभाषितेन गीतेन बालानां च लीलया | यस्य न द्रवते चित्तं स मुक्तोsथवा पशु:||
अर्थ – जिस व्यक्ति का चित्त सुभाषित गीत – संगीत सुनकर और बच्चों की लीला देखकर द्रवित नहीं होता, वह या तो मुक्त होगा या पशु |
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5. न्यायशास्त्र के अध्ययन की जीवन में उपयोगिता :arrow_up:

अनेक लोग पूछते हैं कि न्यायशास्त्र को पढ़ने से जीवन में क्या लाभ है, इसकी हमारे दैनिक जीवन में क्या उपयोगिता है; अत: इस विषय को यहाँ संक्षेप में लिखने का प्रयास करता हूँ |
यह प्रश्न स्वाभाविक है, बहुतों को उत्पन्न होता है, क्योंकि न्यायशास्त्र एक बड़ा ही कठिन एवं नीरस-सा विषय है, प्रथम दृष्टि में उसकी जीवन में कोई उपयोगिता भासित नहीं होती | गणित, विज्ञान, कंप्यूटर आदि अन्य सब विषयों की तो जीवन में उपयोगिता समझ में आती है, पर न्यायशास्त्र की नहीं आती | लगता है कि यह सब प्रमाण, नय, अनुमान, हेतु, व्याप्ति, लक्षण, लक्षणाभास आदि आखिर हम क्यों पढ़ रहे हैं; इनसे क्या मिलने वाला है ?
यही कारण है कि न्यायशास्त्र को पढने वाले विद्यार्थी बहुत कम होते हैं | उन्हें इसकी जीवन में कोई उपयोगिता ही नहीं समझ में आती | जबकि इसकी हमारे दैनिक व्यावहारिक जीवन में भी बड़ी भारी उपयोगिता है | न्यायशास्त्र से तत्त्वाधिगम तो होता ही है, किन्तु उससे हमारी बुद्धि और वाणी भी अत्यंत निर्मल और निर्दोष बनती है तथा उससे हमारे सर्व कार्य भलीभांति सम्पन्न होते हैं |
न्यायशास्त्र हमारी बुद्धि को नाना प्रकार से एकदम निर्मल, निर्दोष बनाता है, ताकि हम सत्य-असत्य या सही-गलत का एकदम सही निर्णय कर सकें | यही उसकी मूल अवधारणा है, जिसे वह बार-बार अच्छी तरह कूट-कूट कर हमें गहराई से समझाता है | उसे किंचित् भी स्वार्थ, पक्षपात, अन्धविश्वास, पूर्वाग्रह, संकीर्णता आदि कोई भी बुद्धि-दोष स्वीकार नहीं है, क्योंकि इनसे सत्य का सही निर्णय नहीं होता, विपरीत हो जाता है | इसी प्रकार वह हमें निष्पक्षता, उदारता, शांति, धैर्य, युक्तिप्रमाणावलंबन आदि सद्गुणों से युक्त बनाता है, क्योंकि इन्हीं से सत्य का सही निर्णय होता है |
अत: इस आलोक में हम भलीभांति समझ सकते हैं कि न्यायशास्त्र व्यक्ति को एक ऐसा वैज्ञानिक चेतना-सम्पन्न, शान्त एवं तार्किक बुद्धिमान मनुष्य बनाता है जो अन्धविश्वास, पक्षपात, दुराग्रह, स्वार्थ, संकीर्णता आदि दुर्गुणों से कोसों दूर रहता है |
वह अपने विरोधी व्यक्ति से भी नफरत या क्रोध नहीं करता, अपितु उसकी बात शांतिपूर्वक सुनता है और फिर उसकी तर्क-युक्ति से समीचीन परीक्षा करता है और जैसी वह है वैसी ही मानता-मनवाता है | वह विरोधी व्यक्ति से मतभेद होते हुए भी मनभेद नहीं रखने की महान कला सीख जाता है | उसे अहंकार,उत्तेजना, आवेग आदि भी कभी परेशान नहीं करते | वह सहजतापूर्वक सत्य को सत्य और असत्य को असत्य जान लेता है, स्वीकार कर लेता है |
न्यायशास्त्र के ज्ञाता पुरुष को कभी कोई ठग भी नहीं सकता, खरीद नहीं सकता, मूर्ख नहीं बना सकता, क्योंकि वह भावुकता, भय, शर्म जैसी अनेक दुर्बलताओं से ऊपर उठ जाता है | भावुक व्यक्ति सत्य को नहीं समझ पाते, वे शीघ्र दूसरों के प्रभाव में आ जाते हैं, वे जीवन में बहुत जल्दी ठगाए जाते हैं |
न्यायशास्त्र का अध्येता कहीं पक्षपात भी नहीं करता | निष्पक्षता, वैज्ञानिकता, धैर्य आदि ही उसके जीवन-मूल्य होते हैं | वह केवल सत्य का आग्रह रखता है, अन्य कोई व्यक्ति, देश, काल, जाति, लिंग, भाषा आदि का भी आग्रह नहीं रखता | लोग अनेक प्रकार की संकीर्णताओं में रुके रहते हैं, पर वह आकाश के समान उदार बन जाता है | लोक में व्यक्तिवाद भी बहुत छाया हुआ है, लोग उसी में बुरी तरह उलझे हुए हैं, किन्तु न्यायशास्त्र का ज्ञाता पुरुष व्यक्तिवाद आदि से बहुत ऊपर उठ जाता है, वस्तुवादी बन जाता है, सत्यवादी बन जाता है |
कहने का तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार अन्य विद्याएँ जीवन में उपयोगी होती हैं, उसीप्रकार न्यायविद्या भी जीवन में अत्यंत उपयोगी है | बल्कि एक दृष्टि से तो यह उन अन्य विद्याओं से भी अधिक उपयोगी है | जिसप्रकार कंप्यूटरविद्या सीखने से कंप्यूटर को उसके दोषों से बचाकर ठीक से काम करनेवाला बनाए रखना आता है, आयुर्वेदविद्या सीखने से शरीर को उसके दोषों से बचाकर ठीक से काम करनेवाला बनाए रखना आता है, उसीप्रकार न्यायविद्या सीखने से बुद्धि को उसके दोषों से बचाकर ठीक से काम करनेवाला बनाए रखना आता है | न्यायशास्त्र पढ़ने वाले की बुद्धि में कभी कोई दोष उत्पन्न नहीं होते और कदाचित् कोई दोष उत्पन्न हो जाए तो वह उसे ठीक करना भी जान जाता है, अत: शीघ्र ठीक कर लेता है |
इस प्रकार न्यायशास्त्र हमें अपनी बुद्धि को सदैव निर्मल निर्दोष बनाए रखने की कला सिखाता है, जो जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है | जीवन का मूलाधार बुद्धि ही तो है | यदि हमारी बुद्धि ही मलिन, दूषित या रुग्ण है तो अन्य तन, धन, घर आदि ठीक भी रहें तो हमारे किस काम के ? अत: बुद्धि को निर्मल, निर्दोष, स्वस्थ रखने के लिए न्यायशास्त्र अवश्य पढना चाहिए |
न्यायशास्त्र सत्य को जानने के साथ सत्य को ठीक से ( निर्दोष रीति से ) कहने-सुनने या समझाने की कला भी सिखाता है, अत: न्यायशास्त्र के अध्ययन से बुद्धि के साथ-साथ वाणी भी निर्दोष निर्मल होती है | न्यायशास्त्र के ज्ञाता के मुख से दूषित वचन नहीं निकलते | स्वरूप, कारण, फल आदि सभी के विषय में वह युक्तियुक्त कथन करता है, युक्तिविरुद्ध कदापि नहीं | निराधार एवं अप्रामाणिक वचन वह कभी नहीं बोलता | वह समीचीन वक्ता बन जाता है |
इसप्रकार हम देखते हैं कि न्यायशास्त्र हमारी बुद्धि और वाणी – दोनों के सर्व दोषों को दूर करता है, हमें निर्दोष बुद्धि और वाणी का धनी बनाता है, जो कि हमारे जीवन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष होता है |
न्यायशास्त्र के अध्ययन से हम किसी भी वस्तु के स्वरूप का निर्भ्रान्त ज्ञान करने में समर्थ हो जाते हैं, कारण-कार्य-सम्बन्धों को समझने में भी हमसे कहीं कोई गलती नहीं होती | तथा इससे हमारे चित्त की सम्पूर्ण आकुलता दूर होकर सहज निराकुलता – शांति प्रकट होती है | न्यायशास्त्र के अध्ययन से सत्य का निर्णय करना भी सरल होता है, जिसप्रकार कि तराजू आदि पैमाने हों तो वस्तुओं का मान जानना सरल हो जाता है |
इसी प्रकार अन्य भी अनेक लाभ न्यायशास्त्र के अध्ययन से होते हैं, अत: हम सबको मन लगाकर न्यायशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए |
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6. समयसार में न्यायशास्त्र के प्रयोग :arrow_up:

न्यायशास्त्र अध्यात्मविद्या के लिए विशेष उपयोगी माना गया है, जैसा कि आचार्य सोमदेवसूरि ने ‘नीतिवाक्यामृत’ ( 5/63 ) में कहा है- “आन्वीक्षिक्यध्यात्मविषये|”
अर्थ- आन्वीक्षिकी विद्या अर्थात् न्यायविद्या आध्यात्मिक विषय में उपयोगी है |

‘समयसार’ अध्यात्मविद्या का शिरोमणि ग्रंथ है | उसमें न्यायशास्त्र के प्रचुर प्रयोग हुए हैं | यहाँ उनमें से कतिपय प्रयोग ध्यानपूर्वक द्रष्टव्य हैं | यथा-
  1. एकत्वविभक्त = एक वस्तु कभी दो नहीं हो सकती, दो वस्तु कभी एक नहीं हो सकती |
  2. यदि जीव के वर्णादि हों तो जीव रूपी सिद्ध होगा | (गाथा ६३)
  3. यदि संसारी जीव के भी वर्णादि माने जाएँ तो वह पुद्गल सिद्ध होगा और फिर पुद्गल को ही मोक्ष हुआ कहा जाएगा |(गाथा ६४)
  4. यदि जीव के वर्णादि माने जाएँ तो जीव और अजीव में कोई अंतर सिद्ध नहीं होगा |(गाथा६२)
  5. वर्णादि से गुणस्थान तक सभी भाव जीव से भिन्न हैं, परभाव हैं, क्योंकि जीव की अनुभूति करने पर वे कोई भी दिखाई नहीं देते |
  6. सभी जीवस्थान (14 जीवसमास ) पुद्गल हैं, क्योंकि वे नामकर्म की प्रकृति से बने हैं, जो कि पुद्गल है, क्योंकि जो जिससे बनता है, वह वही होता है | सोने से बने तो सोना और लोहे से बने तो लोहा | सीधा न्याय है |
  7. यदि जीव पुद्गल का कर्ता हो स्वयं भी पुद्गल हो जाए, यदि पुद्गल जीव का कर्ता हो स्वयं भी जीव हो जाए; किन्तु ऐसा नहीं होता है | इससे सिद्ध होता है जीव पुद्गल का और पुद्गल जीव का कर्ता नहीं है |
  8. यदि जीव अपना स्वयं का भी और पुद्गल का भी, दोनों का कर्ता माना जाए तो द्विक्रियावाद का दोष उपस्थित होता है | (गाथा ८६ )
  9. तुम किसी जीव को मार नहीं सकते, क्योंकि जीवों का मरण तो केवलियों ने आयुक्षय से कहा है और तुम आयुक्षय कर नहीं सकते | तुम किसी जीव को जिला भी नहीं सकते, क्योंकि जीवों का जीवन तो केवलियों ने आयु-उदय से कहा है और तुम आयु दे नहीं सकते | (गाथा 248)
  10. शास्त्र में ज्ञान नहीं है, क्योंकि शास्त्र कुछ जानता नहीं है | (गाथा 390)
  11. शब्द में ज्ञान नहीं है, क्योंकि शब्द कुछ जानता नहीं है | (गाथा 391)
इन प्रयोगों से यह भी सिद्ध होता है कि जैन अध्यात्म यूं ही निराधार या भावुकता मात्र नहीं है, अपितु तर्क, युक्ति या न्याय के ठोस धरातल पर स्थित है | तथा न्यायशास्त्र के अध्ययन से अध्यात्म में प्रवेश करना सुगम हो जाता है |
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7. आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान की उपयोगिता :arrow_up:

“एक घड़ी आधी घड़ी, आधी से भी आध |
जो आतम अनुभव करो, कटे कोटि अपराध ||”

आत्मानुभूति सम्पूर्ण द्वादशांग का सार है, सर्व आचार्यों के सर्व शास्त्रों के सर्व कथनों का एक मात्र मूल प्रतिपाद्य है | जैन दर्शन के अनुसार सच्चे धर्म का प्रारम्भ भी आत्मानुभूति से ही होता है, धर्म की वृद्धि भी आत्मानुभूति से ही होती है और धर्म की पूर्णता भी आत्मानुभूति से ही होती है | अतः वास्तव में देखा जाए तो आत्मानुभूति ही हम सबका एक मात्र मुख्य कर्तव्य है | जिनवाणी का सच्चा उपासक वास्तव में वही है जो निरंतर एक आत्मानुभूति का ही प्रयत्न करता रहता है, उसके अतिरिक्त एक क्षण भी कहीं व्यर्थ नहीं करता | अतः यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान की क्या उपयोगिता है, क्योंकि हमें तो एक आत्मानुभूति ही चाहिए | यही सर्व शास्त्रों का उपदेश है - आत्मानुभूति जरूरी है, बाकी सब मजबूरी (साधन) है | आचार्य अमृतचंद्र ने तो अपनी समयसार-टीका आत्मख्याति में यहाँ तक कह दिया है कि तुम कैसे भी करके, मरके भी आत्मानुभूति करो | यथा-

“अयि कथमपि मृत्वा तत्त्वकौतूहली सन्
अनुभव भव मूर्ते: पार्श्ववर्ती मुहूर्तम् |”
-समयसारकलश, 23

इसीप्रकार महाकवि भूधरदासजी ने एक सवैये में आत्मानुभूति के विषय में बहुत अच्छा कहा है, जो बहुत ही गम्भीरता से समझने योग्य है | यथा –
जीवन अलप आयु बुधि बल हीन तामें,
आगम अगाध सिन्धु कैसे ताहि डाकहै |

द्वादशांग मूल एक अनुभव अपूर्व कला,
भव दाघ हारी घनसार की सलाक है ||

यही एक सीख लीजे याही को अभ्यास कीजे,
याको रस पीजे ऐसो वीर जिन वाक् है |

इतनो ही सार ये ही आतम को हितकार,
याही लौं मदार और आगे ढूक ढाक है ||

भावार्थ- सम्पूर्ण द्वादशांग का मूल एक आत्मानुभव है | हमें एक मात्र उसी को सीखना चाहिए, उसी का अभ्यास करना चाहिए और सदा उसी का रस पान करना चाहिए | यही एक सार है और आत्म हितकार है, शेष सब व्यर्थ है |
इसीप्रकार के और भी अनेक उद्धरण आत्मानुभूति के महत्त्व को बताने वाले यहाँ प्रस्तुत किये जा सकते हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि जीवन में करने लायक कार्य वस्तुतः एक ही है और वह है आत्मानुभूति, किन्तु प्रश्न यह है कि यह आत्मानुभूति हो कैसे ? हम सब चाहते तो बहुत है, परन्तु होती क्यों नहीं ?

उत्तर- यही तो विशेष बात है | मात्र चाहने से क्या होता है ? कार्य तो अपनी विधि से ही होगा | अन्य लोगों के अध्यात्म में और जैन अध्यात्म में भी यही तो मूल अंतर है कि अन्यत्र तो यूँ ही निराधार अध्यात्म की बातें की जाती हैं, किन्तु जैन अध्यात्म भावुकता मात्र नहीं है, अपितु उसके पीछे आगम का ठोस धरातल है | उसके अनुसार आत्मानुभूति से पूर्व सम्यक् आत्मज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है | आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है | उसके बिना आत्मानुभूति कथमपि सम्भव नहीं है | आचार्य माइल्ल धवल ने अपने नयचक्र में स्पष्ट लिखा है-

“तच्चाणेसणकाले समयं बुज्झेहि जुत्तिमग्गेण |
णो आराहणसमये पच्चक्खो अणुहवो जम्हा ||”
-द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र 268
अर्थ– तत्त्वान्वेषण के काल में समय (आत्मा) को युक्तिमार्ग (न्यायशास्त्र) से भलीभांति समझना चाहिए और जब तत्त्व की आराधना (अनुभव) का काल आए तो उस युक्तिमार्ग (प्रमाण-नय-निक्षेप) को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि आत्मा का अनुभव तो प्रत्यक्ष है |

इससे सिद्ध होता है कि आत्मतत्त्व की अनुभूति से पूर्व आत्मतत्त्व का अन्वेषण अनिवार्य है | अन्वेषण अर्थात् अनुसंधान, स्पष्ट, निष्पक्ष एवं दृढ़ निर्णय |

तथा ऐसा यह अन्वेषण, अनुसंधान या निर्णय न्यायशास्त्र से ही सम्भव है, उसके बिना नहीं | अतः हमें थोड़ा-बहुत न्यायशास्त्र का ज्ञान अवश्य करना चाहिए | न्यायशास्त्र के द्वारा हम आत्मा के सम्बन्ध में उसके विविध पक्षों का निष्पक्ष, स्पष्ट एवं दृढ़ निर्णय कर सकेंगे और फिर उससे सहज ही आत्मानुभूति का महान कार्य सम्पन्न होगा | यही राजमार्ग है | उदाहरणार्थ न्यायशास्त्र के द्वारा हमें आत्मा के सम्बन्ध में निम्नलिखित बिन्दुओं को भलीभांति समझना होगा; सम्यक् लक्षण, हेतु, तर्क, अनुमान आदि के द्वारा एकदम पक्का निर्णय करना होगा| इसके बाद सहज ही ध्यानाभ्यास से आत्मानुभूति की प्राप्ति होगी और न केवल होगी, अपितु बारम्बार होती रहेगी | यथा–
  1. आत्मा की सत्ता अवश्य है, क्योंकि वह मैं स्वयं ही तो हूँ|
  2. आत्मा जड़ या अचेतन नहीं है, चेतन ही है, क्योंकि प्रत्यक्ष जानता-देखता अनुभव में आ रहा है|
  3. आत्मा शरीर नहीं है अपितु उससे भिन्न ही है, जैसे कि गृहस्वामी गृह से भिन्न होता है अथवा तलवार म्यान से भिन्न होती है | आज तो चिकित्सा विज्ञान ने भी दिखा दिया है कि सारा शरीर बदल देने पर भी ज्ञान वही रहता है –इससे भी सिद्ध होता है कि आत्मा शरीर से भिन्न है|
  4. आत्मा में स्पर्श, रस, गंध आदि पुद्गल-गुण नहीं पाए जाते; क्योंकि उनमें चेतना नहीं है या चेतना उनके बिना भी रहती है|
  5. चेतना आत्मा का स्वभाव है, अत: उसका भी कभी नाश नहीं हो सकता |
  6. चेतना [ज्ञान-दर्शन] दुःख का कारण नहीं है, क्योंकि वह आत्मा का स्वभाव है|
  7. दुःख का कारण राग-द्वेष है, ज्ञान नहीं | दुःख की व्याप्ति राग के साथ है, ज्ञान के साथ नहीं|
  8. आत्मा को चेतना के अवलंबन से जाना जा सकता है अर्थात् विशेष ज्ञान का तिरोभाव करके मात्र सामान्य ज्ञान के आविर्भाव से आत्मा को जाना जा सकता है|
  9. आत्मा किसी का अंश या अपूर्ण वस्तु नहीं है, पूर्ण और अखंड वस्तु ही है, क्योंकि एक वस्तु की दो और दो वस्तुओं की एक हो ही नहीं सकती|
  10. आत्मा का कभी नाश नहीं हो सकता, क्योंकि सत् का कभी नाश नहीं होता|
  11. आत्मा का कभी जन्म भी नहीं हुआ, हो भी नहीर सकता, क्योंकि सत् की कभी उत्पत्ति नहीं होती|
  12. आत्मा एक ही नहीं है, अपितु अनंत हैं | सब स्वतंत्र व पूर्ण हैं|
  13. वह मात्र स्व या पर को नहीं जानता, अपितु एक साथ स्व-पर-प्रकाशक है|
  14. वह वटकणिका मात्र या सर्वव्यापी नहीं है, स्वदेहप्रमाण ही है, संकोच-विस्तार उसका स्वभाव है|
  15. वह सर्वथा शुद्ध या सर्वथा अशुद्ध नहीं है|
  16. वह सर्वथा नित्य [कूटस्थ] या सर्वथा अनित्य [क्षणिक/क्षणभंगुर] भी नहीं है|
  17. वह अपने परिणामों का कर्ता-भोक्ता स्वयं है|
  18. राग-द्वेष आत्मा के स्वभाव नहीं हैं, विभाव हैं; उनका अभाव किया जा सकता है|
  19. आत्मा शुद्ध होने के बाद कभी पुनः अशुद्ध नहीं हो सकता|
  20. आत्मा का स्वभाव ऊर्ध्वगमन है, संसारावस्था में कर्म-प्रेरित होकर ही वह तिर्यक्-गमन करता है|
इन बिन्दुओं का समीचीन निर्णय हुए बिना अथवा इनके सम्बन्ध में मिथ्या मान्यता रहते हुए कदापि आत्मानुभूति सम्भव नहीं है और इनका समीचीन निर्णय न्यायशास्त्र के द्वारा ही सम्भव है, अन्यथा नहीं, किसी के कहने मात्र से भी नहीं | अत: हमें न्यायशास्त्र का अवश्य ही अभ्यास करना चाहिए |
प्रश्न- आत्मानुभूति तो सम्यग्दृष्टि तिर्यंच और नारकी जीवों को भी हो जाती है, उन्हें तो न्यायशास्त्र का ज्ञान होता ही नहीं, फिर उन्हें कैसे आत्मानुभूति हो जाती है ?

उत्तर- उन्हें भी न्यायशास्त्र का यथोचित ज्ञान अवश्य ही होता है, तभी उन्हें आत्मानुभूति होती है | भले ही वे उसे बहुत व्यवस्थित रूप से नहीं जान और कह सकते हैं, परन्तु प्रमाण-नयात्मक न्याय के द्वारा ही उन्हें भी आत्मतत्त्व का निर्णय और अनुभव होता है, उसके बिना नहीं | जिसप्रकार वे जीवादि सात तत्त्वों का भी सम्यक् स्वरूप पहचान जाते हैं, भले ही कह नहीं पाते, उसीप्रकार प्रमाण-नयात्मक न्याय को भी वे अनिवार्य रूप से पहचान जाते हैं |

तथा जिसप्रकार जीवादि सप्त तत्त्वों का स्पष्ट ज्ञान करने से हमें सुगमतापूर्वक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है, उसीप्रकार न्यायशास्त्र के ज्ञान से हमें सुगमतापूर्वक आत्मानुभूति की प्राप्ति होती है | तिर्यंचादि को तो यह दुर्लभ ही होती है, क्वचित् कदाचित् ही होती है |

आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान की क्या उपयोगिता है– इस सम्बन्ध में कतिपय निम्नलिखित शास्त्र-वचन/उद्धरण भी गम्भीरतापूर्वक विचारणीय हैं –
  1. प्रमाणनयैरधिगम: | -तत्त्वार्थसूत्र 1/6
  2. जैन न्याय का प्रयोजन तत्त्वाधिगम है, वाद-विवाद नहीं | -न्यायविनिश्चय
  3. आन्वीक्षिक्यध्यात्मविषये | -नीतिवाक्यामृत, 5/63
  4. न्यायशास्त्र तुला के समान है |प्रमाणमीमांसा
  5. जो ण पमाण-णएहिं णिक्खेवेण णिरक्खदे अट्ठं | तस्स अजुत्तं जुत्तं जुत्तमजुत्तं च पडिहादि || (जो प्रमाण-नय-निक्षेप से अर्थ को नहीं देखता है, उसे अयुक्त युक्त और युक्त अयुक्त प्रतिभासित होता है|) -तिलोयपण्णत्ति 1/82
  6. जदि इच्छह उत्तरिदुं अणाणमहोदहिं सुलीलाए | ता णादुं कुणह मइं णयचक्के दुणयतिमिरमत्तंडे ||(यदि अज्ञान-समुद्र को लीला मात्र में पार करना चाहते हो तो नयचक्र में बुद्धि लगाओ|) - नयचक्र 419
  7. जे णयदिट्ठीविहीणा ताण ण वत्थु-सहाव-उवलद्धि | (जो नयदृष्टि से रहित हैं, उन्हें वस्तुस्वभाव की उपलब्धि नहीं होती |)- नयचक्र 181
  8. जो आत्मा का समीचीन लक्षण नहीं जानता, वह मूढ़ है, नपुंसक है | - समयसार,39
  9. आत्मानमेवमधिगम्य नयप्रमाणनिक्षेपकादिभिरभिश्रयतैकचित्ता: |(जो आत्मा को प्रमाण-नय-निक्षेप से जानता है वही उसमें एकाग्र हो पाता है | ) – पद्मनंदी पंचविंशतिका, 139
इस प्रकार उक्त उद्धरणों को समझने से भी यह भलीभांति सिद्ध होता है कि आत्मानुभूति में न्यायशास्त्र के ज्ञान का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है, अतः हम सबको न्यायशास्त्र का यथासम्भव ज्ञान अवश्य करना चाहिए |

न्यायशास्त्र के प्रारम्भिक अभ्यास हेतु निम्नलिखित तीन ग्रंथ विशेष उपयोगी हैं-

  1. परीक्षामुखसूत्र (आचार्य माणिक्यनंदी )
  2. न्यायदीपिका (अभिनव धर्मभूषण यति )
  3. न्यायमंदिर (प्रो. वीरसागर जैन )
अंत में, सभी लोग न्यायशास्त्र का ज्ञान करके उसके द्वारा आत्मतत्त्व का अन्वेषण करके आत्मतत्त्व की अनुभूति करें – इसी मंगल भावना से मैं अपनी वाणी को विराम देता हूँ |
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8. जैनाचार्यों की राष्ट्रिय भावना :arrow_up:

जैन आचार्य पूर्णत: वीतरागता के उपासक होते हैं | वे कभी भी, किसी से भी, किंचित् भी रागादि भाव करना उचित नहीं मानते | तथापि उन्होंने स्थान-स्थान पर राष्ट्र के प्रति ऐसे विचार व्यक्त किये हैं कि उनसे उनका बहुत ही गहरा राष्ट्रानुराग व्यक्त होता है | आजकल कुछ लोग थोड़ा-सा धर्मध्यान करते ही धर्मात्मा होने का दम्भ भरते हुए राष्ट्रप्रेम से दूर रहते हैं, उन्हें जैनाचार्यों के इन उद्गारों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए |

  • आचार्य पूज्यपाद स्वामी के राष्ट्रिय भावना से भरपूर इस श्लोक से तो हम सब सुपरिचित हैं ही, जिसे प्रतिदिन पूजा के पश्चात् सभी जैन श्रावक-श्राविका नियम से बोलते हैं -
    “सम्पूजकानां प्रतिपालकानां, यतीन्द्रसामान्यतपोधनानाम् | देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञ:, करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्र ||”
    इस श्लोक में आचार्यदेव ने सम्पूर्ण राष्ट्र और उसके सभी अंगों की कुशलता की कामना जिनेन्द्रदेव से की है | यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण श्लोक है | ‘शांतिपाठ’ के नाम से प्रसिद्ध इस श्लोक के अलावा शांतिधारा में भी राष्ट्र और उसके विविध अंगों की शांति की मंगल कामना की गई है, जो वास्तव में मूलतः ही पूरा पठनीय है | उसमें प्रकृति के सभी उपादान यहाँ तक कि पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि की भी कल्याण-कामना की गई है | यह भी प्रत्येक जैन मन्दिर में प्रतिदिन अनिवार्य रूप से पढ़ा जाता है |
  • इसके अतिरिक्त आचार्य धरसेन कृत ‘विश्वलोचनकोश’ में एक महत्त्वपूर्ण श्लोक उपलब्ध होता है-
    “भारतं मे प्रियं राष्ट्रं, भारतं हितकारकम् |
    भारताय नमस्तुभ्यं, यत्र मे पूर्वजा: स्थिता: ||”

    अर्थ-भारत मेरा प्रिय राष्ट्र है | भारत हितकारक है | अहो, मैं इस भारतवर्ष को नमस्कार करता हूँ, जहाँ कि मेरे महान पूर्वज रहे हैं |
    भाव यह है कि भारतवर्ष हमारे तीर्थंकर आदि महान पुरुषों की अति पवित्र भूमि है | यहाँ उन्होंने जन्म लिया है, राज्य करके प्रजा का कल्याण किया है, फिर महान तप किया है और अंत में मोक्ष को भी प्राप्त किया है, अतः यह भूमि तीर्थ के समान पूजनीय-वन्दनीय है | यहाँ आज भी लोग उनके बताए मार्ग पर चलकर सतत स्व-पर-कल्याण में लगे रहते हैं | धर्मध्यान के लिए यहाँ अनुकूल वातावरण रहता है, जो कि सदैव बना ही रहना चाहिए, उसमें कभी भी कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए |
  • चामुंडराय कृत ‘चारित्रसार’ (पृष्ठ 42 )में तो यहाँ तक लिखा है कि हे मुनि ! यदि राष्ट्र पर कोई आपत्ति आई हो और वह तुमसे ही दूर हो सकती हो तो तुम अपनी मुनिदीक्षा का छेद करके भी राष्ट्र की आपत्ति को दूर करो, बाद में पुन: दीक्षा ले लेना | इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जैन आचार्यों की राष्ट्रिय भावना कितनी गहरी होती है |
  • जैन आचार्यों ने राष्ट्रविरुद्ध आचरण करने का भी कठोरतापूर्वक निषेध किया है, जैसा कि तत्त्वार्थसूत्र में भी कहा है- “विरुद्धराज्यातिक्रम…”
    आचरण ही क्या, राष्ट्रविरुद्ध कथन करने का भी कठोरतापूर्वक निषेध किया है | यदि कदाचित् कोई मुनि राष्ट्रविरुद्ध कथन कर दे तो संघ के आचार्य उसे राज्य की सीमा से पार चले जाने का दंड देते हैं, जिसे शास्त्रों में ‘पारंचिक प्रायश्चित्त’ कहा गया है | इसीप्रकार पं. टेकचंदजी भी ‘सुदृष्टितरंगिणी’ में लिखते हैं-
    "“धम्मसभा णिव पंच य जादी लोगा य बंधुवग्गाणी |
    इणविरुद्ध वच करदि स च सठ लोगणिंद दुखलहो ||100 ||”
    *
    भावार्थ- जो व्यक्ति राज्य के विरुद्ध बोलता है वह शठ है, लोकनिंद्य है, दुःखभागी है |
  • देश को स्वतंत्र कराने में भी जैनों की बड़ी भारी भूमिका रही है | इस विषय की विशेष जिज्ञासा हेतु देखें डॉ. कपूरचंद जैन की कृति ‘स्वतन्त्रता संग्राम में जैन’ |
  • भारतीय संविधान की पुस्तक में भी तीर्थंकर भगवान महावीर का चित्र प्रकाशित किया गया है और कहा गया है कि इन्हीं के अहिंसादि आदर्शों पर चलकर हमारा देश स्वतंत्र हुआ है | इस बात को राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने भी एक कविता में कहा है – “वैशाली जन का प्रतिपालक…प्रजातंत्र की माता” |
  • भारतीय संविधान में प्रयुक्त ‘संसद’ और ‘सर्वोदय’ शब्द भी जैन शास्त्रों से गृहीत हैं |
  • अमरचंद दीवान/ भामाशाह/ महात्मा गाँधी आदि की राष्ट्रभक्ति से तो हम सब परिचित हैं ही |
  • “यदि सब जैन होते तो एक पुलिस चौकी की भी जरूरत नहीं पडती” – ज्ञानी जैलसिंह
  • जैनों की राष्ट्र सेवा आज भी विशेष उल्लेखनीय है (हजारों विद्यालय, चिकित्सालय आदि )
  • जैन सदा ही राष्ट्र की सेवा में अग्रणी रहे हैं और रहना भी चाहिए |

इस प्रकार हम देखते हैं कि वीतरागी जैन सन्तों में भी बहुत गहरा राष्ट्रानुराग भरा रहता है और जब उन सन्तों में ही इतना राष्ट्रानुराग है तो गृहस्थ श्रावकों में तो कितना अधिक राष्ट्रानुराग होता होगा | सभी जैन श्रावक पूर्णतया राष्ट्रभक्त होते हैं | राष्ट्रिय संविधान और राष्ट्रिय प्रतीकों में उनकी हार्दिक आस्था होती है, वे कभी स्वप्न में भी इनके विरुद्ध चिन्तन नहीं करते, इनके विरुद्ध आचरण करने की तो बात ही बहुत दूर है |
जैन धर्म एक राष्ट्रवादी धर्म-दर्शन है | दुनिया के अनेक धर्म-दर्शन जहाँ राष्ट्र को कोई महत्त्व नहीं देते, वहीं जैन धर्म राष्ट्र को अत्यधिक महत्त्व देता है | जैनाचार्यों ने अपने ग्रन्थों में यत्र-तत्र राष्ट्र के सर्वविध कल्याण की कामना की है | जैन धर्म अपने अनुयायियों को भी राष्ट्र की हरसम्भव सेवा की प्रेरणा देता है |

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9. जैन अर्थशास्त्र (Jain Economics) :arrow_up:

हम सब रात-दिन धन-दौलत में मग्न हैं | हमें सदा सर्वत्र वही वही दिखाई देता है | जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दीखता है, वैसे ही हमें भी सदा सर्वत्र धन ही धन दिखाई देता है, उसके अलावा कहीं कुछ नहीं दीखता | हमारा सारा धर्म कर्म भी धनमूलक ही बना हुआ है | हम ‘ध्यान तेरस’ को भी ‘धन तेरस’ सुनते हैं | जाति से भी बनिया हैं | इसीलिए जैन आचार्यों ने हमें इसकी भाषा में तत्त्वज्ञान प्रदान किया है | जैन अर्थशास्त्र को समझने से सभी जैन सिद्धांत समझ में आ जाते हैं |
अकेले धर्म की बात करो तो लोग हमें एकांगी कहते हैं, क्योंकि उनके अनुसार चारों पुरुषार्थों की बात होनी चाहिए |
धन किसे कहते हैं / धन का लक्षण/ परिभाषा - सुख/उन्नति के साधन को धन कहते हैं |
धन के पर्यायवाची – धन, अर्थ, वित्त, द्रव्य, दौलत, वैभव, लक्ष्मी, सम्पत्ति |
धन के प्रकार/स्तर – अन्न-जल/समय /स्वास्थ्य(रसोई समाप्त हो रही है, ३०० वर्ष चलता है, आधा धर्मात्मा बन जाए )/परिवार/ज्ञान/केवलज्ञान/यश/धर्म
धन प्राप्ति का सच्चा उपाय –
लक्ष्मी यदा आगच्छति नारिकेलफलाम्बुवत् | लक्ष्मी यदा निर्गच्छति गजभुक्तकपित्थवत् |
शरीर भी धन है –आँख कीमती या कोहिनूर, पैर कीमती या जूते |
दरिद्रता की निंदा- क्षत्रचूड़ामणि 3/6-9,
नीतिवाक्यामृत 6 – 11 (तादात्विक, मूलहर और कदर्य के पास धन नहीं रहता )
दरिद्रता का महत्त्व –

  1. दारिद्दय तुज्झ णमो जस्स पसाएण एरिसी रिद्धी |
    पेच्छामि सयल लोए ते मह लोया ण पेच्छंति || -वज्जालग्ग
  2. मैं गुणी, मानी, ज्ञानी, विचक्षणों के पास रहती हूँ |
  3. आपने योगसिद्ध, अंजनसिद्ध आदि बहुत देखे होंगे, मैं दरिद्रयोगसिद्ध हूँ |
    एक महत्त्वपूर्ण बात- अन्यत्र तो जो जितना जोड़ता है उसकी उतनी अधिक पूजा-प्रतिष्ठा होती है, किन्तु भारत निराला है, यहाँ जो जितना छोड़ता है उसकी उतनी अधिक पूजा-प्रतिष्ठा होती है | इस बुनियादी बात को हम सबको, देश के कर्णधारों को गहराई से समझना चाहिए | हमें औरों का अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए | आज हम अपनी इस मूल विशेषता को भूल गये हैं | संयम तप त्याग शिक्षा के मुख्य उद्देश्य रहे हैं, पर आज हमारा ध्यान बिलकुल नहीं है | कोई भी अपनी सन्तान को संयम, तप, त्याग के मार्ग पर नहीं लगा रहा है | सब जोड़ने में लग गये हैं, छोड़ने से बड़ा बनते हैं- यह तो कहीं समझ ही नहीं रहे हैं | संयम-रत्न, तपोधन, त्याग-सम्पत्ति |
    इसी मूल में भूल के कारण आज असंख्य समस्याएँ पैदा हो गईं हैं |
    लोग गाय तक को कत्लखाने में भेजने लग गये हैं, जैसा कि असंख्य वर्षों के इतिहास में कभी नहीं हुआ | आगे चलकर हो सकता है कि लोग इंसानों को भी कत्लखाने में भेजने लग जाएँ | धन की तृष्णा कभी पूरी नहीं होगी - ‘अत्थं अणत्थमूलं’ –भगवती आराधना, 1808

कृपण = जो कृपा का पात्र है/ जो अपने ही ऊपर कृपाण चलाता है |

लक्ष्मी का स्वरूप
( कार्तिकेयानुप्रेक्षा, गाथा 10 से 20 )

जा सासया ण लच्छी चक्कहराणं पि पुण्णवंताणं।
सा किं बंधेइ रईं इयर-जणाणं अपुण्णवंताणं ।।
अर्थ- जो लक्ष्मी पुण्यवान चक्रवर्तियों के पास भी शाश्वत नहीं रहती, वह अन्य अपुण्यवानों से क्या प्रेम निभाएगी?
कत्थ वि ण रमइ लच्छी कुलीण-धीरे वि पंडिए सूरे।
पुज्जे धम्मिट्ठे वि य सुवत्त-सुयणे महासत्ते।।
अर्थ- यह लक्ष्मी कहीं भी नहीं रमती, चाहे वह व्यक्ति कुलीन, धीर, पंडित, शूरवीर, पूज्य, धार्मिक, सदाचारी, सज्जन, महासत्त्व हो।
ता भुंजिज्जउ लाच्छी दिज्जउ दाणे दया-पहाणेण।
जा जल-तरंग-चवला दो तिण्णि दिणाइ चिट्ठेइ।।
अर्थ- अत:लक्ष्मी को भोगों और दयायुक्त होकर दान में दो।यह लक्ष्मी जलतरंग के समान चंचल है,दो-तीन दिन ही टिकती है।
जो पुण लच्छी संचदि ण य भुंजदि णेय देदि पत्तेसु।
सो अप्पाणं वंचदि मणुयत्तं णिप्फलं तस्स।।
अर्थ- जो व्यक्ति लक्ष्मी का संचय करता है,उसे न तो भोगता है न ही पात्रों को देता है, वह स्वयं को धोखा देता है, उसका मनुष्यपना निष्फल है।
जो संचिऊण लच्छी धरणियले संठवेदि अइदूरे।
सो पुरिसो तं लच्छी पाहाण-समाणियं कुणदि।।
अर्थ- जो व्यक्ति लक्ष्मी को संचित करके पृथ्वी में कहीं दूर गाड़ देता है, वह उस लक्ष्मी को पत्थर के समान बना देता है।
अणवरयं जो संचदि लच्छिं ण य देदि णेय भुंजेदि।
अप्पणिया वि य लच्छी पर-लच्छी-समाणिया तस्स।।
अर्थ- जो व्यक्ति निरंतर लक्ष्मी का संचय करता है, उसे न तो किसी को देता है, न भोगता है, उसकी वह लक्ष्मी अपनी होते हुए भी पराई के समान ही है।
लच्छी-संसत्तमणो जो अप्पाणं धरेदि कट्ठेण।
सो राइ-दाइयाणं कज्जं साहेदि मूढप्पा।।
अर्थ- जो व्यक्ति लक्ष्मी में आसक्त होकर स्वयं को कष्टों में रखता है, वह राजा आदि के ही कार्य सिद्ध करता है।
जो वड़्ढारदि लच्छिं बहुविह-बुद्धीहिं णेय तिप्पेदि।
सव्वारंभं कुव्वदि रत्ति-दिणं तं पि चिंतेइ।।
ण य भुंजदि वेलाए चिंतावत्थो ण सुवदि रयणीए।
सो दासत्तं कुव्वदि विमोहिदो लच्छी-तरुणीए ।।
अर्थ- जो व्यक्ति बहुत प्रकार से बुद्धि लगाकर लक्ष्मी को बढ़ाता है,कभी तृप्त नहीं होता, रात दिन उसी के बारे में सोचता है, सर्व प्रकार से आरंभ करता है, न समय पर खाता है, न चिंतायुक्त होकर रात में सोता है, वह व्यक्ति लक्ष्मीरूपी तरुणी में मोहित होकर उसका दासत्व करता है।
जो वड्ढमाण-लच्छी अणवरयं देदि धम्म-कज्जेसु।
सो पंडिएहिं थुव्वदि तस्स वि सहला हवे लच्छी।।
अर्थ- जो व्यक्ति अपनी वर्द्धमान लक्ष्मी को निरंतर धर्म कार्य में देता है वही पंडितों के द्वारा स्तुत्य है और उसी की लक्ष्मी सफल है।
एवं जो जाणित्ता विहलिय-लोयाण धम्म-जुत्ताणं।
णिरवेक्खो तं देदि हु तस्स हवे जीवयं सहलं।।
अर्थ- इसप्रकार जानकर जो व्यक्ति धर्मयुक्त लोगों को निरपेक्ष भाव से लक्ष्मी देता है उसी का जीवन सफल है।

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10. वित्तरागी से वीतरागी बनने की अद्भुत कला सिखाने वाला शास्त्र (जैन अर्थशास्त्र - Jain Economics) :arrow_up:

जैन आचार्यों की यह बड़ी विशेषता है कि उन्होंने केवल धर्म, दर्शन या अध्यात्म के विषय में ही अपने विचार व्यक्त नहीं किये हैं, अपितु जीवन के हर पक्ष पर ही अपने महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किये हैं | यहाँ उनके अर्थशास्त्रीय विचारों को समझने के लिए जैन शास्त्रों से कतिपय प्रमुख उद्धरण संकलित करते हैं | आशा है कोई सुधी विद्वान् इनको विस्तृत एवं व्यवस्थित करेगा | इन उद्धरणों को ध्यान से पढ़कर कोई भी व्यक्ति आसानी से यह जान सकता है कि जैन आचार्यों ने, धन किसे कहते हैं, धन के पर्यायवाची शब्द क्या हैं, धन के कितने प्रकार हैं, धन का जीवन में कितना महत्त्व है, धन कितना असार है, धन की प्राप्ति कैसे होती है, धन की रक्षा कैसे होती है, धन का दुरुपयोग क्या है, धन का सदुपयोग क्या है, इत्यादि सभी पक्षों पर अपने अद्भुत विचार प्रकट किये हैं | इनको समझकर व्यक्ति अपना लौकिक एवं पारमार्थिक दोनों ही प्रकार का जीवन सुखद बना सकता है |

  1. ‘अत्थं अणत्थमूलं’ –भगवती आराधना, 1808
  2. लोभे कए वि अत्थो ण होइ पुरिसस्स अपडिभोगस्स |अकए वि हवदि लोभे अत्थो पडिभोगवंतस्स| –भगवती आराधना, 1436
  3. यदि पापनिरोधोsन्यसम्पदा किं प्रयोजनम् | अथ पापास्रवोsस्त्यन्यसम्पदा किं प्रयोजनम् || -रत्नकरंड
  4. कापि नाम भवेदन्या सम्पद्धर्माच्छरीरिणाम् |- रत्नकरंड, 29
  5. धर्मादयो हि हितहेतुतया प्रसिद्धा … –अमृताशीति,3
  6. भ्रात प्रभात समये त्वरित किमर्थमर्थाय चेत… –-अमृताशीति,4
  7. ‘आयव्ययमुखयोर्मुनिकमंडलुरेव निदर्शनम् |’ -नीतिवाक्यामृत,18/6
  8. अलियं कमले कमला कयकमले तुह जिणिंद सा वसदि |…- आचार्य पद्मनंदी, ऋषभस्तोत्र 46
  9. कौआ भी बाँट कर खाता है …- आचार्य पद्मनंदी, दानोपदेशन,46
  10. जदि चित्तं ण हि वित्तं, जदि वित्तं ण हि चित्तं, चित्तं वित्तं च ण हि सुपत्तं |
  11. पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् | मूढै: पाषाणखंडेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ||
  12. मन वचन काय सम्पत्ति
  13. रत्नत्रय से बड़ा कोई धन नहीं -नियमसार
  14. जिनधर्म से बड़ा धन नहीं (स्याच्चेटोsपि दरिद्रोsपि … )
  15. मुमुक्षु को लक्ष्मीवन्तों से सम्पर्क नहीं रखना चाहिए - आचार्य पद्मनंदी, परमार्थविंशति 8
  16. दुरर्ज्येनासुरक्षेण नश्वरेण धनादिना | स्वस्थंमन्य: जन: कोsपि ज्वरवानिव सर्पिषा || - इष्टोपदेश,13
  17. त्यागाय श्रेयसे वित्तमवित्त: संचिनोति य: | स्वशरीरं स पंकेन स्नास्यामीति विलंपति || - इष्टोपदेश,16
  18. आयुर्वृद्धिधनोत्कर्षहेतुं कालस्य निर्गमम् | वांछतां धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनम् || - इष्टोपदेश,15
  19. ‘दारिद्र्यादपरं नास्ति जन्तुनामप्यरुन्तुदम्|अत्यन्तं मरणं प्राणै: प्राणिनां हि दरिद्रता|– क्षत्रचूड़ामणि,3/6
  20. रिक्तस्य हि न जागर्ति कीर्तनीयोsखिलो गुण: |… – क्षत्रचूड़ामणि,3/7
  21. लोभ-निंदा -ज्ञानार्णव, 70-71
  22. धन की अनित्यता, असारता – कार्तिकेयानुप्रेक्षा
  23. न चैतद्विद्यते किंचिद्यदर्थेन न सिद्ध्यति |यत्नेन मतिमांस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत ||-मदनपराजय, 2/13
  24. यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः | यस्यार्था: स: पुमान् लोके यस्यार्था: स च जीवति ||-मदनपराजय, 2/14
  25. इह लोकेपि धनिनां परोपि स्वजनायते|स्वजनोपि दरिद्राणां तत्क्षणाद् दुर्जनायते ||-मदनपराजय,2/15
  26. धन पाकर धर्म को नहीं भूलना चाहिए -यशस्तिलकचम्पू 3/220-280
  27. कृपण कृपाण के समान है - यशस्तिलकचम्पू, भाग 1, पृष्ठ 256
  28. वृक्षों में भी परिग्रह संज्ञा है - धवला 5/5/24
  29. पुण्णेण होइ विहवो, विहवेण मओ मएण मइमोहो | मइमोहेण य पावं तम्हा पुण्णं अम्ह मा होऊ || - परमात्मप्रकाश 2/60
  30. लोभ तनाव का प्रमुख कारण है | -चरकसंहिता
  31. जो धन लाभ लिलार लिख्यो …जैन शतक,75
  32. बुधजन सतसई 166 - 172

अर्थशास्त्रीय सूक्तियां
• अर्थातुराणां भयं न लज्जा |
• अर्थातुराणां गुरुर्न बन्धु: |
• न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य: |
• लक्ष्मीवन्तो न जानन्ति प्रायेण परवेदनाम् |
• विद्या विवादाय धनं मदाय शक्ति: परेषां परिपीडनाय | ,… ||
• क्षणै: कणैश्च लभ्यन्ते विद्यामर्थञ्च मानवा: | क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम् ||
• Wealth is lost nothing is lost, health is lost something is lost, character is lost everything is lost.
• Health is wealth.
अर्थशास्त्रीय दोहे-
• दाम बिना निर्धन दुखी,तृष्णावश धनवान |कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान |
• पानी बाढ़ा नाव में,घर में बाढ़ा दाम |दोनों हाथ उलीचिए, यही सयाना काम ||
• धन की गतियाँ तीन हैं, दान भोग और नाश |दान भोग यदि ना किया, निश्चय होय विनाश ||
• बीज राखि फल भोगवै, ज्यों किसान जग मांहि| त्यों चक्री नृप सुख करे, धर्म विसारे नांहि ||
• भोंदू धन हित अघ करे,अघतें धन नहीं होय | धर्म करत धन पाइए, मन माने कर सोय | -द्यानतविलास, सुबोध-पंचाशिका, 41
• धन देकर तन राखिए,तन दे रखिए लाज |धन दे तन दे लाज दे, एक धर्म के काज ||
• आमद थोड़ी खर्च घनेरा,यह लक्षण मिट जाने का|हिम्मत थोड़ी रोष घनेरा,यह लक्षण पिट जाने का||
• मीत न नीत गलीत है, जो चाहो धन जोरि |खाये खरचे जो जुरे, तो जोरिये करोर ||
• सरस्वति के भंडार की,बड़ी अपूरब बात |ज्यों खर्चे त्यों त्यों बढ़े, बिन खरचे घट जात ||
• धन कन कंचन राजसुख, सबहि सुलभ कर जान | दुर्लभ है संसार में, एक यथारथ ज्ञान ||
• धर्म बढे तो धन बढे, धन बढ़ मन बढ़ जाय | मन बढ़ते सब बढ़त है, बढ़त बढ़त बढ़ जाय ||
• धर्म घटे तो धन घटे, धन घट मन घट जाय| मन घटते सब घटत है,घटत घटत घट जाय ||
• धन समाज गज बाज राज तो काज न आवे | ज्ञान आपको रूप भये फिर अचल रहावे ||

अर्थशास्त्रीय कहानियाँ-
• सुकुमाल सेठ (काबुल का कम्बल)/ पांच दाने की कथा(क्षणश: कणशश्चैव… )
• सुनार की सलाह / सेठ छदामीलाल /मेरे स्पर्श से सब सोना हो जाए /छाया में आना छाया में जाना
• हीरे-मोती का बैल /भाई-पुत्रों को मारने का विचार आया (अहिदेव, महिदेव)
• लोभी पति एक लाल कमाकर लाया, वीणावादिनी पत्नी को मृग ने ढेरों लाल दिए |
जैन अर्थशास्त्र के मुख्य संदेश-
• रुपये-पैसे को ही धन न समझें, उससे बड़े भी अनेक धन हैं | यह धन तो अनर्थों का मूल है |
• धन की प्राप्ति माया, लोभ से नहीं होती | कोई देवी-देवता भी धन नहीं दे सकते |
• धन की प्राप्ति वस्तुतः पुरुषार्थ से भी नहीं होती | धन का कारण धर्म/पुण्य है |
• धन का दानादि में सदुपयोग करना चाहिए |

सहायक ग्रंथ
• कार्तिकेयानुप्रेक्षा
• आत्मानुशासन
• महावीर का अर्थशास्त्र
• अहिंसक अर्थशास्त्र

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11. अध्यात्मप्रधान भारतवर्ष :arrow_up:

भारत मूलतः एक आध्यात्मिक देश है, क्योंकि यहाँ जीवन के हर क्षेत्र में अध्यात्मविद्या को सर्वोपरि स्थान दिया गया है | यथा-

  1. यहाँ अध्यात्मविद्या अर्थात् आत्मविद्या को ही विद्या कहा गया है | यथा- विद्या वही है जो मुक्ति प्रदान करे – ‘सा विद्या या विमुक्तये’ | अथवा – ‘आत्मज्ञान ही ज्ञान है, शेष सभी अज्ञान’ |
  2. ज्ञानी भी उसे ही माना गया है जो आत्मा को जानता है, भले ही और कुछ नहीं जानता हो |
  3. अज्ञानी भी उसे ही माना गया है जो आत्मा को नहीं जानता है, भले ही और सब कुछ जानता हो | जो आत्मा को नहीं जानता,वह सकल शास्त्रों का ज्ञाता होते हुए भी अज्ञानी है |
  4. गुरु भी उसे ही माना गया है जो आत्मज्ञान कराए |
  5. शिष्य भी उसे ही माना गया है जिसे आत्मा की जिज्ञासा हो |
  6. कवि भी उसे ही माना गया है जो अध्यात्मवेत्ता हो- ‘अनन्तमव्ययं कविम्’अथवा ‘कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यातोsर्थान्…’ ईशावास्योपनिषद् 8 |
  7. लेखक भी उसे ही माना गया है जो आत्मज्ञान का वर्णन करे |
  8. होली, दिवाली आदि सभी पर्वों की व्याख्या आध्यात्मिक की गई है |
  9. लेखन,उपदेश आदि कार्य भी अपने ही लिए किये जाते हैं , दूसरे के लिए नहीं |स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथ गाथा |
  10. सर्वत्र बहिरंग क्रिया की बजाय अन्तरंग भावों को महत्त्व दिया गया है |
  11. धर्म मस्जिद मन्दिर में नहीं, अपने अंदर में है –ऐसा सभी ने बार-बार कहा है |
  12. आत्मा ही उत्तम तीर्थ है |(रयणत्तयसंजुत्तो जीवो वि हवदि उत्तमं तित्थं – कर्तिकेयानुप्रेक्षा )
  13. आत्मज्ञान ही लक्ष्य है, बाकी सब उपलक्ष्य है |
  14. वीर/पुरुष– इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  15. दुर्बल/नपुंसक- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  16. अंधा वही है, जिसके पास ज्ञान चक्षु नहीं है |(उरलोचन जिनके मुंदे ते आंधे निर्मूल )
  17. इसी प्रकार गूंगा, बहरा आदि भी समझ लेना चाहिए |
  18. बालक/वृद्ध- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  19. दुर्लभ/ सुलभ- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  20. अंधकार प्रकाश- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  21. उन्नति अवनति- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  22. सोना/जगना- इनका अर्थ भी यहाँ आध्यात्मिक किया गया है |
  23. ज्योतिष गणित आदि सभी विद्याओं का पर्यवसान यहाँ अध्यात्म में ही होता है |
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12. क्यों कहते हैं क्षमावाणी को महापर्व ? :arrow_up:

भारत एक उत्सवप्रधान देश है | मन, तन, घर, समाज,राष्ट्र – सभी की समृद्धि के लिए यहाँ अनेकानेक उत्सवों, त्योहारों या पर्वों की स्थापना की गई है | (उत्सवा: समाजाश्च वर्धन्ते राष्ट्रवर्धना: - वाल्मीकि रामायण) वैसे तो सभी पर्व महत्त्वपूर्ण होते हैं, बशर्ते कोई उनका दुरुपयोग न करे; किन्तु क्षमावाणी को ‘महापर्व’ या ‘पर्वराज’ कहा जाता है, क्योंकि उसके अनेक कारण हैं | यथा –

  1. अन्य पर्वों पर हम अपने मित्रों को याद करते हैं, उनके घर जाते हैं, उनसे गले मिलते हैं; किन्तु आज क्षमावाणी के दिन हमें अपने शत्रुओं को याद करना होता है, उनके घर जाना होता है, उनसे गले मिलना होता है |
  2. अन्य पर्व किसी न किसी व्यक्ति विशेष या घटना विशेष से जुड़े हुए होते हैं, किन्तु क्षमावाणी पर्व का सम्बन्ध न किसी व्यक्ति विशेष है न किसी घटना विशेष से |
  3. अन्य पर्व किसी धर्मविशेष, जातिविशेष, लिंग-विशेष या देश-प्रदेशविशेष के होते हैं, किन्तु क्षमावाणी पर्व किसी भी धर्मविशेष, जातिविशेष लिंगविशेष या देश-प्रदेशविशेष का नहीं है, भले ही इसे एक धर्म विशेष (जैन) लोग ही अधिकतर मनाते हों, पर यह सभी का है, सभी के लिए है | इसमें धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र आदि का कोई बंधन नहीं है |
  4. क्षमावाणी पर्व का सम्बन्ध मनुष्य मात्र तक भी सीमित नहीं है, अपितु सभी जीवों से है, प्राणिमात्र है | क्षमावाणी के अवसर पर विश्व के सभी सूक्ष्मतम जीवों के प्रति क्षमाभाव धारण करते हुए उन सबसे क्षमायाचना की जाती है |
  5. क्षमावाणी पर्व सभी धर्म-सम्प्रदायों के भी अनुकूल है, निर्विवाद है, इसमें किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है | सभी के धर्म-ग्रन्थ सिद्धांत रूप से क्षमा को मान्य करते है |
  6. क्षमावाणी विशुद्ध आत्मकल्याण का पर्व है | इसका सीधा-सच्चा संदेश है कि क्रोधादि विकारों का त्याग करो और क्षमादि शुद्ध भावों को धारण करो |
  7. अन्य अनेक पर्वों पर लोग प्रदूषण फैलाते हैं, पर क्षमावाणी के अवसर पर ऐसा नहीं होता | क्षमावाणी तो बल्कि बाह्य प्रदूषण के मूल कारण मानसिक प्रदूषण को भी दूर करता है |
  8. अन्य पर्वों का सम्बन्ध अच्छा-अच्छा खाने-खेलने आदि से है, पर यह तो संयम और अध्यात्म का पर्व है |
  9. अन्य पर्व अस्थाई हैं, पर क्षमावाणी एक शाश्वत पर्व है | जैन पुराणों के अनुसार यह अनादि काल से मनाया जाता रहा है और अनंत काल तक मनाया जाता रहेगा |
  10. अन्य पर्व पराधीन हैं, उन्हें मनाने के लिए दूसरे की आवश्यकता होती है, पर क्षमावाणी एक स्वाधीन पर्व है, उसे मनाने के लिए दूसरे की अनिवार्यता नहीं होती | कोई भी प्राणी एकांत में बैठकर इसे अच्छी तरह मना सकता है |
    इस प्रकार हम देखते हैं कि क्षमावाणी एक सार्वभौमिक, सार्वकालिक और सार्वजनिक पर्व है | सार्वजनिक ही नहीं, सार्वजैविक पर्व है| वह समस्त विरोधी जीवों से भी प्रेम करने की कला सिखाकर विश्वमैत्री की भावना पैदा करने वाला अनुपम पर्व है,महापर्व है |
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13. जैन दर्शन की विशेषता :arrow_up:

विश्व के सभी धर्म-दर्शनों में जैन दर्शन का विशेष स्थान है | जैन दर्शन की प्रकृति को समझने-समझाने के लिए यहाँ हम उसकी कतिपय प्रमुख विशेषताओं को अति संक्षेप में लिखने का प्रयास करते हैं, ताकि उन्हें एक दृष्टि में आसानी से समझा जा सके | यद्यपि एक-एक विशेषता को स्पष्ट करने के लिए एक-एक विस्तृत निबन्ध की आवश्यकता है, किन्तु अभी संक्षेप में ही कुछ कहने का उद्यम करते हैं | यथा –

  1. प्राचीनता– अनेकानेक प्रमाणों से यह भलीभांति सिद्ध होता है कि जैन दर्शन विश्व का सबसे प्राचीन दर्शन है | इसे प्राचीन काल में श्रमण, निगंठ, निर्ग्रन्थ, आर्हत, दिगम्बर आदि अनेक नामों से भी जाना जाता था | संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद माना जाता है, किन्तु उसमें भी ऋषभदेवादि जैन तीर्थंकरों का अनेक बार उल्लेख मिलता है – इससे सिद्ध होता है कि जैन दर्शन वेदों से भी पूर्व विद्यमान था | इसके अतिरिक्त इतिहास, पुरातत्त्व आदि के साक्ष्यों से भी जैन धर्म की अत्यधिक प्राचीनता सिद्ध होती है | रामधारीसिंह ‘दिनकर’ ने भी अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में पृष्ठ 147 पर स्पष्ट लिखा है कि ‘‘वेदोल्लिखित होने पर भी ऋषभदेव वेदपूर्व परम्परा के प्रतिनिधि हैं |’’
  2. व्यापकता– अनेक शोधार्थियों ने सिद्ध किया है कि जैन दर्शन केवल भारतवर्ष में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कोने-कोने में व्याप्त रहा है | यह बात अलग है कि आज वह किन्हीं प्राकृतिक/राजनीतिक/सामाजिक आदि अनेक कारणों से बहुत सीमित रह गया है; किन्तु आज भी हमें जर्मनी, जापान, यूनान, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, श्रीलंका, तिब्बत आदि सैंकड़ों देशों में जैन धर्म के अस्तित्व के प्रमाण उपलब्ध होते हैं | इस विषय में जिनेश्वर दास जैन की पुस्तक ‘भारत के बाहर जैन पुरातत्त्व’ (jainism abroad) पठनीय है |
  3. उदारता– जैन दर्शन भाषा, जाति, लिंग, क्षेत्र, वेश, पूजापद्धति आदि के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की कोई कट्टरता या संकीर्णता की बात नहीं करता | वह अत्यंत उदार है – ‘‘सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधि: |यत्र सम्यक्त्वहानिर्न न चापि व्रतदूषणम् ||’’ (यशस्तिलकचम्पू) यही कारण है कि जैन धर्म का पालन कोई भी मनुष्य कर सकता है, यहाँ तक कि कोई पशु-पक्षी भी | उदार होने के कारण जैन धर्म का पालन अत्यंत सरल भी है | इस विषय में मेरा एक अन्य लेख पठनीय है – ‘अत्यंत सरल है जैन धर्म’ | जैनाचार्यों की भाषिक उदारता को समझने के लिए भी मैंने एक स्वतंत्र निबन्ध लिखा है -‘जैनाचार्यों का भाषादर्शन’ |
  4. व्यावहारिकता – जैन दर्शन एक अत्यंत व्यावहारिक दर्शन है | वह केवल सिद्धांत मात्र नहीं है, उसे जीवन में सहजतापूर्वक उतारा भी जा सकता है | इसी प्रकार उससे केवल मोक्ष की ही प्राप्ति नहीं होती, अपितु व्यक्ति का लौकिक जीवन भी मंगलमय होता है | वह उभय लोक सुखकारी है | व्यक्ति का ही नहीं, समाज और राष्ट्र का भी परम हित होता है, उसकी हर समस्या का समाधान भी प्राप्त होता है | यही कारण है कि जैन दर्शन हर क्षेत्र और हर काल में प्रासंगिक सिद्ध होता है | इस विषय में मेरा एक स्वतंत्र निबन्ध पठनीय है – ‘जैन दर्शन की व्यावहारिकता’ |
  5. समृद्धता – साहित्य, कला आदि अनेक दृष्टियों से जैन संस्कृति जितनी समृद्ध है, उतनी शायद अन्य कोई नहीं है | जैन साहित्य के विषय में ही देखा जाए तो ज्ञात होता है कि ज्ञान-विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर जैन आचार्यों के ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं | इसी प्रकार साहित्य की लगभग हर विधा में ही अनगिनत जैन ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं | इस विषय पर भी मेरा एक स्वतंत्र निबन्ध पठनीय है– ‘जैन विद्या की व्यापकता’ | साहित्य की भांति कला की दृष्टि से भी जैन संस्कृति अत्यंत समृद्ध है | कला में भी विविधता और गुणवत्ता– दोनों ही दृष्टियों से जैन संस्कृति अद्भुत है, किन्तु यह विषय मूर्तिकला, चित्रकला, संगीतकला आदि सभी पर पृथक्-पृथक् विचार करने पर ही ठीक से समझ में आ सकता है |
  6. वैज्ञानिकता– जैन दर्शन कोई अन्ध श्रद्धा या प्राचीन अतार्किक आस्थाओं पर टिका हुआ नहीं है, अपितु आधुनिक विज्ञान से बहुत अधिक मेल खाता है | यद्यपि उसकी सभी बातें सर्वथा ही आधुनिक विज्ञान से मेल नहीं खाती हैं, परन्तु काफी हद तक उसके आचार एवं विचार – दोनों ही पक्ष आधुनिक विज्ञान द्वारा निरंतर पुष्ट या समर्थित किये जा रहे हैं | इस विषय पर आज अनेक विद्वानों के ग्रन्थ/शोधग्रन्थ भी उपलब्ध होते हैं, जिनमें से अग्रलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं – जैनदर्शन और आधुनिक विज्ञान (मुनि नगराज), कॉस्मोलोजी ओल्ड एंड न्यू (प्रो.जी.आर.जैन), विश्व-प्रहेलिका (मुनि महेंद्रकुमार), जैनधर्म में विज्ञान (नारायणलाल कछारा), इत्यादि |
  7. व्यक्तिवादी नहीं, वस्तुवादी – जैन दर्शन के वैज्ञानिक होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वह किसी व्यक्ति या ग्रन्थ विशेष पर आधारित नहीं है, अपितु नितांत वस्तुवादी है | उसकी स्पष्ट घोषणा है– “वत्थु सहावो धम्मो” | यही कारण है कि जैन धर्म के णमोकार आदि महामंत्रों में भी किसी व्यक्ति विशेष को नमस्कार नहीं किया गया है, अपितु गुणों को ही नमस्कार किया गया है | जैन दर्शन के अनुसार जो भी व्यक्ति राग-द्वेषादि विकारी भावों से रहित हो जाता है, वही प्रणम्य है |
  8. परीक्षाप्रधानी - जैन दर्शन के वैज्ञानिक होने का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि वह किसी अंधश्रद्धा पर आधारित नहीं है, अपितु बड़ा ही परीक्षाप्रधानी है | वह हर बात को स्वयं युक्ति से परीक्षा करके मानने की स्पष्ट सलाह देता है, चाहे वह कोई भी कहता हो | यहाँ तक कि भगवान को भी परीक्षा करके ही मानने की बात कहता है | इस विषय में आचार्य समन्तभद्र कृत ‘आप्तमीमांसा’, आचार्य विद्यानंद कृत ‘आप्तपरीक्षा’ आदि ग्रन्थ विशेष रूप से पठनीय हैं |
  9. अकर्तावादी – दुनिया के प्राय: सभी धर्म-दर्शन अपने भगवान या ईश्वर को सृष्टि का कर्ता-धर्ता-हर्ता मानते हैं, किन्तु जैन दर्शन बड़ा ही अकर्तावादी दर्शन है | वह भगवान को सृष्टि का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं मानता, अपितु मात्र ज्ञाता-द्रष्टा एवं पूर्ण वीतराग मानता है | जैन दर्शन के अनुसार यह सृष्टि अपने व्यवस्थित वैज्ञानिक नियमों से स्वतः संचालित है, इसका कोई भी ईश्वरादि कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं है | जैन दर्शन के अनुसार तो ईश्वर ही क्या, कोई भी एक पदार्थ किसी दूसरे पदार्थ का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं है | सभी पदार्थ स्वतंत्र सम्प्रभुतासम्पन्न हैं |
  10. स्वतन्त्रतावादी – कहा जा चुका है कि जैन दर्शन के अनुसार जगत के सभी पदार्थ स्वतंत्र सम्प्रभुतासम्पन्न हैं; कोई भी एक पदार्थ किसी भी दूसरे पदार्थ का कर्ता-धर्ता-हर्ता नहीं है | इससे ज्ञात होता है कि जैन दर्शन स्वतन्त्रता के सर्वोच्च प्रतिमानों पर स्थित है |लोग जनतंत्र या गणतन्त्र की बात करते हैं,पर जैन दर्शन कणतन्त्र की बात करता है, जगत के कण-कण को स्वतन्त्र या स्वाधीन मानता है | मानवाधिकार ही नहीं, उससे आगे बढ़कर जीवाधिकार की बात करता है | जीवाधिकार भी क्या, पदार्थाधिकार की बात करता है, प्रत्येक पदार्थ को स्वतंत्र/स्वाधीन बताकर उसमें दखलंदाजी को अनुचित मानता है |
  11. पूर्ण वीतरागतावादी - जैन दर्शन द्वेष भाव को तो त्याज्य मानता ही है, जोर देकर राग भाव को भी त्याज्य ही कहता है | वह किंचित् भी राग भाव को हितकर नहीं बताता, अपितु बारम्बार जोर देकर कहता है कि द्वेष की भांति राग भी दुःखरूप एवं हेय है |यहाँ तक कि राग ही द्वेष का मूल कारण बनता है, अत: सम्पूर्ण रागादि को छोडकर पूर्ण वीतराग बनना चाहिए | जो पूर्ण वीतराग है, वही शुद्धात्मा है, सिद्धात्मा है, परमात्मा है | जिसमें किंचित् भी राग-द्वेष है, वह शुद्धात्मा,परमात्मा या भगवान नहीं हो सकता |
  12. अहिंसावादी– अहिंसा यद्यपि सभी धर्म-दर्शनों में पाई जाती है, किन्तु एक तो अन्य धर्म येन केन प्रकारेण जाने-अनजाने में हिंसा का समर्थन कर बैठते हैं, जबकि जैन धर्म कथमपि हिंसा का समर्थन नहीं करता, दूसरे- जैन दर्शन अहिंसा की जैसी सूक्ष्म व्याख्या करता है, वैसी अन्य कोई नहीं करता | लोक में कोई मानता है कि जीवों को मारना-सताना हिंसा है, कोई उससे आगे बढ़कर कहता है कि जीवों को मारने-सताने का मन में भाव करना भी हिंसा है और कोई उससे आगे बढकर कहता है कि किसी से किंचित् भी घृणा, ईर्ष्या, वैर आदि का भाव रखना भी हिंसा है, किन्तु जैन दर्शन और भी आगे बढ़कर कहता है कि किसी से किंचित् राग भाव रखना भी हिंसा है | राग ही हिंसा का मूल है |
  13. अनेकांतवादी – अनेकान्तवाद या स्याद्वाद जैन दर्शन की सबसे बड़ी - प्राणभूत विशेषता है | इसके अनुसार प्रत्येक विषय/पदार्थ अनेक विरोधी धर्मों का समुदाय होता है | अत: यदि हमें उसका पूरा ज्ञान करना हो तो हमेशा बात के अपर पक्ष का भी ध्यान रखना चाहिए, अन्यथा पूर्ण ज्ञान नहीं होगा, अज्ञान रह जाएगा और वह कलह का कारण बनेगा | जैसे – एक बार एक ग्राम में पहली बार एक हाथी आया | सर्वत्र कौतुहल मच गया | सब लोग उसे देखने गये | छह जन्मान्ध मित्र भी गये | उन्होंने उसे अपने हाथों से छूकर देखा | किन्तु देखने के बाद वे झगड़ने लगे | एक बोला– हाथी खम्भे जैसा होता है, दूसरा बोला– हाथी दीवार जैसा होता है, तीसरा बोला– हाथी रस्सी जैसा होता है,चौथा बोला– हाथी सूप जैसा होता है,पांचवां बोला – हाथी भाले जैसा होता है, छठा बोला – हाथी कदलीस्तम्भ जैसा होता है | तब उन्हें किसी चक्षुष्मान व्यक्ति ने ठीक से पूरी बात समझाई और तब उनका विवाद समाप्त हुआ | जैन दर्शन का अनेकान्तवाद भी इसीप्रकार सर्व विवादों का समाधान करता है | यदि व्यक्ति अनेकान्तवादी न बने तो आतंकवादी बन जाएगा |
  14. अपरिग्रहवादी – जैन दर्शन पूर्ण सुखी एवं मुक्त होने के लिए जिसप्रकार समस्त रागात्मक भावों का भी त्याग आवश्यक मानता है, उसीप्रकार समस्त परिग्रह का भी त्याग आवश्यक मानता है | परिग्रह ही अशांति का मूल कारण है | यही कारण है कि जैन साधु पूर्णत: नग्न दिगम्बर रहते हैं | तथा जैन दर्शन का एक प्राचीन मूल नाम ‘दिगम्बर’ भी प्रचलित रहा है | यथा – ‘श्रमणा: दिगम्बरा:’ इत्यादि |
  15. पुरुषार्थवादी - जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का विकास और विनाश उसके स्वयं के ही हाथ में है, अत: वह सुखी होने के लिए किसी अन्य के या भाग्य आदि के भरोसे बैठने को मना करता है और स्वयं को ही पुरुषार्थ करने की विशेष प्रेरणा देता है |
  16. राष्ट्रवादी – जैन दर्शन एक राष्ट्रवादी दर्शन है | वह अपने राष्ट्र एवं उसके सभी नीति-नियमों, ध्वज, प्रतीकों आदि का पूर्ण सम्मान करता है | उनके विरुद्ध कभी कुछ नहीं करता-कहता | राष्ट्रिय संविधान के प्रति गहरी आस्था रखता है, राजकीय नियमों का पालन करता है और सदा ही, पूजा-पाठ आदि में भी पूरे राष्ट्र के सर्वविध हित की कामना करता है | कहता है – ‘‘सम्पूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसामान्यतपोधनानां, देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञ: करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्र ||’’ अथवा ‘‘अयं मे भारतं राष्ट्रं, यत्र” आदि |
  17. निवृत्तिप्रधान – विद्वानों ने भारतीय दर्शनों को प्रवृत्ति और निवृत्ति – इन दो धाराओं में विभक्त कर जैन दर्शन को एक निवृत्तिप्रधान दर्शन कहा है, क्योंकि उसका मुख्य लक्ष्य पूर्ण निवृत्ति ही है | यदि क्वचित् कदाचित् वह किसी प्रवृत्ति का उपदेश देता है तो वह भी वस्तुतः निवृत्ति के लिए ही होता है | जैन दर्शन को शुभ और अशुभ सभी प्रवृत्तियों से निवृत्त होना ही अभीष्ट है |
  18. आध्यात्मिकता - जैन दर्शन एक उच्च कोटि का आध्यात्मिक दर्शन है | विद्वानों का मानना है कि भारतवर्ष में जितना भी अध्यात्म है वह जैन आचार्यों की ही देन है, जैसा कि डॉ. मंगलदेव शास्त्री ने भी लिखा है | यथा - ‘‘हमारे देश के अध्यात्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र का मुख्य आधार ये ही द्वितीय पक्ष (निवृत्ति/मुनि पक्ष ) की धारणाएँ हैं | ये धारणाएँ अवैदिक हैं – यह सुनकर हमारे अनेक भाई चौंक उठेंगे, किन्तु हमारे मत में वस्तुस्थिति यही दीखती है|…भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता, त्याग और अपरिग्रह की भावना, पारलौकिक भावना, अहिंसावाद जैसी प्रवृत्तियों की जड़ जिनके वास्तविक और संयतरूप का हमें गर्व हो सकता है, हमको वैदिक संस्कृति की तह से नीचे तक जाती हुई मिलेगी |’’ –भारतीय संस्कृति का विकास,पृष्ठ 16-20
  19. आदेश नहीं, उपदेश– जैन दर्शन की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि वह कोई आदेश (फतवा) नहीं देता, अपितु मात्र उपदेश ही देता है | कोई मानो या न मानो, वह कोई जबरदस्ती नहीं करता | उपदेश भी क्या, वह तो निर्देश ही देना पसंद करता है | योग्य शिष्य को निर्देश ही पर्याप्त है | आदेशों से धर्म नहीं होता | आदेश से देनेवाले को भी अन्तराय आदि कर्मों का बंध होता है | निर्देश या उपदेश की शैली कुछ इस प्रकार की होती है – “बंधे विषय-कषाय से, छूटे ज्ञान-विराग | इनमें जो अच्छा लगे, ताहि मारग लाग ||”
  20. नयव्यवस्था – जैन दर्शन की एक महती विशेषता इसकी नयव्यवस्था है जो संसार के अन्य किसी धर्म-दर्शन में नहीं पाई जाती | अपनी इस नयव्यवस्था के द्वारा जैन दर्शन प्रत्येक विषय को और उसमें उपस्थित विवाद को बड़ी ही कुशलता से सुलझा देता है | यह विषय बड़ा ही गूढ़-गम्भीर है, जिसे स्पष्ट करने का यहाँ अवकाश नहीं है | नय के निश्चय-व्यवहार या द्रव्यार्थिक-पर्यायार्थिक आदि अनेक भेद हैं |
  21. पर्यावरणवादी (eco-friendly) – जैन दर्शन पर्यावरणवादी भी है | दुनिया के अनेक सम्प्रदायों में ऐसी-ऐसी अनेक क्रियाएँ की जाती हैं जिनसे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचता है, किन्तु जैन दर्शन ऐसी सर्व क्रियाओं से दूर रहता है | उसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति की भी किंचित् भी विराधना न करने का बारम्बार उपदेश दिया गया है |

सन्दर्भ–

  1. जैन धर्म की प्राचीनता – संजय जैन, विश्व जैन संगठन, श्रुत संवर्धन संस्थान, मेरठ
  2. जैन धर्म – पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री, श्रुत संवर्धन संस्थान, मेरठ
  3. प्रागैतिहासिक-प्राग्वैदिक जैन धर्म और उसके सिद्धांत – पं. नाथूलाल शास्त्री, जैन युवक संघ, इंदौर
  4. विश्व धर्म की रूपरेखा – आचार्य विद्यानंद, वीर निर्वाण ग्रन्थ प्रकाशन समिति, इंदौर
  5. सर्वोदयी जैनधर्म और उसकी मौलिकता पर लोकमत–ज्ञानचंद खिंदुका, दि.जैन महासमिति, जयपुर
  6. भारतीयसंस्कृति के विकासमें जैनों का योगदान–डॉ.प्रेमचन्द रांवका, राज. जैनसाहित्यपरिषद, जयपुर
  7. भारतीयसंस्कृति के विकासमें जैनधर्म का योगदान–डॉ.हीरालाल जैन, म.प्र.साहित्यपरिषद, भोपाल
  8. संस्कृतकाव्य के विकास में जैनकवियों का योगदान–डॉ. नेमिचंद्र शास्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ, नईदिल्ली
  9. श्रमण संस्कृति और वैदिक व्रात्य –प्रो. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  10. हिमालय में भारतीय संस्कृति –विश्वम्भरसहाय प्रेमी,मेरठ
  11. संस्कृति के चार अध्याय – रामधारीसिंह दिनकर, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद
  12. भारत और मानव संस्कृति –विश्वम्भरनाथ पांडे, प्रकाशन विभाग, सूचना प्रसारण मंत्रालय,भारत
  13. जैन धर्म में विज्ञान –नारायण लाल कछारा, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  14. जैनधर्म परिचय – वृषभप्रसाद जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  15. भारतीय दर्शन –वाचस्पति गैरोला,
  16. भारतीय संस्कृति का विकास – डॉ.मंगलदेव शास्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  17. ब्राह्मण तथा श्रमण संस्कृतियों का दार्शनिक विवेचन – डॉ. जगदीशदत्त दीक्षित
  18. जैन धर्म का इतिहास (तीन भाग) – कैलाशचन्द्र जैन जयपुर, डी के प्रिंटवर्ल्ड, बालीनगर, नईदिल्ली
  19. भारत के बाहर जैन पुरातत्त्व – डॉ.जिनेश्वर दास जैन, श्री भा. दि. जैन महासभा, नई दिल्ली
  20. जैन धर्म की विश्वव्यापकता – डॉ. एन. सुरेश कुमार, मैसूर विश्वविद्यालय (अनेकांत, सितम्बर 2016)
  21. जैन संस्कृति के विस्मृत केंद्र : अंडमान-निकोबार द्वीप –प्रो. राजाराम जैन (जैनबोधक,अक्टूबर 2016)
  22. जैनधर्म : प्राचीन स्वतंत्र धर्म–पं. महावीर प्रसाद शास्त्री (श्रीमहावीरजी सहस्राब्दी समारोह स्मारिका)
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14. जैन धर्म की प्राचीनता :arrow_up:

‘‘तापसा भुंजते चापि श्रमणाश्चैव भुंजते |’’ –वाल्मीकि रामायण,बालकाण्ड, सर्ग 14, श्लोक 22

‘‘नाहं रामो न मे वांछा भावेषु च न मे मन: | शान्तमास्थातुमिच्छामि स्वात्मन्येव जिनो यथा ||’’ - योगवाशिष्ठ,15

“सन्तुष्टा करुणा मैत्रा शान्ता दांतास्तितिक्षव: | आत्मारामा समदृश: प्रायश: श्रमणा जना: || -भागवत 12/3/19

‘‘भारतीय विचारधारा हमें अनादि काल से ही दो रूपों में विभक्त मिलती है | पहली विचारधारा परम्परामूलक ब्राह्मण या ब्रह्मवादी रही है जिसका विकास वैदिक साहित्य के बृहद रूप में प्रकट हुआ है | दूसरी विचारधारा पुरुषार्थमूलक प्रगतिशील, श्रामण्य या श्रमणप्रधान रही है | दोनों विचारधाराएं एक-दूसरे की प्रपूरक रही हैं और विरोधी भी | … श्रमण विचारधारा के जनक थे जैन |’’ –वाचस्पति गैरोला, भारतीय दर्शन, पृष्ठ 86

‘‘श्रमण संस्कृति का प्रवर्तक जैन धर्म प्रागैतिहासिक धर्म है |…मोहनजोदड़ो से उपलब्ध ध्यानस्थ योगियों की मूर्तियों की प्राप्ति से जैन धर्म की प्राचीनता निर्विवाद सिद्ध होती है |वैदिक युग में व्रात्यों और श्रमण ज्ञानियों की परम्परा का प्रतिनिधित्व भी जैन धर्म ने ही किया |धर्म, दर्शन, संस्कृति और कला की दृष्टि से भारतीय इतिहास में जैन धर्म का विशेष योग रहा है |’’ –वाचस्पति गैरोला, भारतीय दर्शन, पृष्ठ 93

यूनानी इतिहास से पता चलता है कि ईसा से कम से कम चार सौ वर्ष पूर्व ये दिगम्बर भारतीय तत्त्व वेत्ता पश्चिमी एशिया पहुँच चुके थे |…ईसा की जन्म की शताब्दी तक इन दिगम्बर भारतीय दार्शनिकों की एक बहुत बड़ी संख्या इथियोपिया (अफ्रीका)के वनों में रहती थी |’’ - विश्वम्भरनाथ पांडे, भारत और मानव संस्कृति, पृष्ठ 128

‘‘वस्तुतः जैन धर्म संसार का मूल अध्यात्म धर्म है |इस देश में वैदिक धर्म के आने से बहुत पहले से यही जैन धर्म प्रचलित था |’’ - नीलकंठ दास, ‘उड़ीसा में जैन धर्म’ की भूमिका

‘‘हमारे देश के अध्यात्मशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र का मुख्य आधार ये ही द्वितीय पक्ष (निवृत्ति/मुनि पक्ष ) की धारणाएँ हैं | ये धारणाएँ अवैदिक हैं – यह सुनकर हमारे अनेक भाई चौंक उठेंगे, हमारे मत में वस्तुस्थिति यही दीखती है |… भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता, त्याग और अपरिग्रह की भावना, पारलौकिक भावना, अहिंसावाद जैसी प्रवृत्तियों की जड़ जिनके वास्तविक और संयत रूप का हमें गर्व हो सकता है, हमको वैदिक संस्कृति की तह से नीचे तक जाती हुई मिलेगी |’’ –डॉ. मंगलदेव शास्त्री, भारतीय संस्कृति का विकास,पृष्ठ 16-20

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15. जैन विद्या की व्यापकता :arrow_up:

जैन लेखकों की कृतियाँ परिमाण, गुणवत्ता, विविधता आदि अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती हैं | यहाँ हम उन्हें विविधता की दृष्टि से देखने का लघु प्रयास करना चाहते हैं |
आश्चर्य होता है कि जैन लेखकों ने धर्म, दर्शन, अध्यात्म आदि कुछ गिने-चुने विषयों पर ही नहीं, अपितु भारतीय वाङ्गमय
के प्राय: प्रत्येक विषय पर अनेकानेक कृतियों की रचना की है |
इसी प्रकार साहित्य की लगभग हर विधा में ही उनकी कृतियाँ उपलब्ध होती हैं, चाहे वह गद्यात्मक हो या पद्यात्मक | इतना ही नहीं, जैन लेखकों ने अनेक नई विधाओं का उद्भव और विकास भी किया है |
यहाँ हम कतिपय महत्त्वपूर्ण विषयों एवं विधाओं पर जैन लेखकों की कृतियां नमूने के तौर पर संचित कर रहे हैं, ताकि जैन विद्या की व्यापकता का कुछ अनुमान हो सके |
[क] सर्वप्रथम विविध विषयों के अनुसार जैन कृतियां देखिये—

  1. अध्यात्म- समयसार, नियमसार, इष्टोपदेश, समाधितन्त्र, परमात्मप्रकाश,अध्यात्मतरंगिणी |
  2. धर्म- पद्मनंदी-पंचविशतिका, प्रतिष्ठा-प्रदीप, धर्मामृत, षट्कर्मोपदेश,ज्ञानपीठ-पूजांजलि |
  3. दर्शन- षट्खंडागम, तत्त्वार्थसूत्र, प्रवचनसार, पंचास्तिकाय, पंचाध्यायी, धवला |
  4. आचार- रत्नकरंडश्रावकाचार, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, मूलाचार, धर्मामृत |
  5. न्याय- परीक्षामुख, न्यायदीपिका, प्रमाणमीमांसा, प्रमेयकमलमार्तण्ड, प्रमेयरत्नमाला, अष्टसहस्री, न्यायविनिश्चय, स्याद्वादमंजरी, आप्तमीमांसा, आप्तपरीक्षा, तर्कभाषा, नयचक्र |
  6. साहित्य- गद्यचिंतामणि, गीतवीतराग, धर्मशर्माभ्युदय, जैनमेघदूत, भरतेश-वैभव, मदन-पराजय, अध्यात्मबारहखड़ी, दौलत-विलास |
  7. छन्द- स्वयम्भूच्छंद, छंदोनुशासन, प्राकृत-पैंगलं, छंदशतक, रत्नमंजूषा, वृत्तजातिसमुच्चय, छन्दःकोश, छन्दःकन्दली, कविदर्पण, छन्दःशास्त्र |
  8. अलंकार- वाग्भटालंकार, अलंकारदर्पण, काव्यानुशासन, शृंगारमंजरी, कल्पलता, कविशिक्षा, अलंकारप्रबोध,अलंकारमहोदधि,अलंकारमंडन, अलंकारचिंतामणि, शृंगारार्णवचन्द्रिका |
  9. व्याकरण- कातन्त्र, जैनेन्द्र, शब्दानुशासन, शब्दाम्भोजभास्कर, शाकटायनन्यास, शब्दार्णव,धातुमंजरी.धातुरत्नाकर,उपसर्गमंडन, |
  10. आयुर्वेद- कल्याणकारक, अष्टांगसंग्रह,सिद्धांतरसायनकल्प, पुष्पायुर्वेद, वैद्यवल्लभ, रसचिंतामणि, ज्वरपराजय, आयुर्वेदमहोदधि, निदानमुक्तावली, नाड़ीपरीक्षा,वैद्यामृत, बालगृहचिकित्सा |
  11. गणित- गणितसारसंग्रह, गोम्मट्टसार, लब्धिसार, क्षपणासार, बीजगणित, व्यवहारगणित, गणितसूत्र, गणितसंग्रह, सिद्ध-भू-पद्धति, षटत्रिंशिका, अर्थसंदृष्टि |
  12. ज्योतिष- भद्रबाहुसंहिता, भारतीय ज्योतिष, जातक-तिलक, विवाहपडल, कालसंहिता, प्रश्नपद्धति, प्रश्नशतक, ज्योतिष्प्रकाश, ज्योतिषरत्नाकर |
  13. वास्तु – वत्थुसारपगरण, लोयालोयविभाग, प्रतिष्ठासारोद्धार, वत्थुविज्जा |
  14. सामुद्रिक- सामुद्रिकशास्त्र, सामुद्रिकलक्षण, हस्तसंजीवन, करलक्खण, अंगविज्जा, अंगविद्याशास्त्र|
  15. रमल- रमलशास्त्र, रमलविद्या, पाशाकेवली,अर्हत्पाशाकेवली |
  16. भूगोल- त्रिलोकसार, तिलोयपणणत्ति |
  17. खगोल- सूर्यप्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति |
  18. पुराण- महापुराण, पद्मपुराण, हरिवंशपुराण,पांडवपुराण, पार्श्वपुराण |
  19. चरित- श्रीपालचरित, जीवन्धरस्वामिचरित,चन्द्रप्रभचरित, श्रेणिकचरित, यशोधरचरित |
  20. कथा- धर्मपरीक्षा, समराइच्चकहा, वसुदेवहिंडी, कुवलयमाला, पुण्यास्रव-कथाकोश, गद्यकथाकोश, व्रतकथाकोश, आराधना-कथाकोश, सम्यक्त्वकौमुदी |
  21. आत्मकथा- अर्धकथानक, मेरी जीवनगाथा |
  22. कला – चित्रवर्णसंग्रह, कलाकलाप, मषीचार|
  23. शिल्प- वास्तुसार, शिल्पशास्त्र |
  24. कोश- विश्वलोचनकोश, जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, अभिधान राजेन्द्र कोश, नाममाला, पाइयसद्दमहणणव, पाइलच्छीनाममाला, विश्वलोचनकोश, एकाक्षरकोश |
  25. भक्ति-स्तुति- स्तुतिविद्या, दशभक्ति, स्वयम्भूस्तोत्र, भक्तामरस्तोत्र, कल्याणमन्दिरस्तोत्र, महावीराष्टकस्तोत्र, सिद्धचक्रविधान, इंद्रध्वजविधान, उवसग्गहरंत्थोत्त |
  26. अर्थशास्त्र- कार्तिकेयानुप्रेक्षा, अहिंसक अर्थशास्त्र, महावीर का अर्थशास्त्र, तीर्थंकर महावीर की अर्थनीति [डॉ.निर्मल जैन,मेघ प्रकाशन, नई दिल्ली ] |
  27. समाजशास्त्र- यशस्तिलकचम्पू, पुरुदेवचम्पू, महापुराण |
  28. राजनीतिशास्त्र- क्षत्रचूड़ामणि, नीतिवाक्यामृत |
  29. निमित्तशास्त्र- जोणीपाहुड, रिट्ठसमुच्चय, निमित्तपाहुड, जयपाहुड, सिद्धादेश,पणहवागरण|
  30. विधिशास्त्र [law]- इंद्रनंदी-संहिता, अर्हन्नीति, the jain law,
  31. नीतिशास्त्र- सुभाषितरत्नसंदोह, नीतिवाक्यामृत, सूक्तिमुक्तावली, जिनसंहिता |
  32. योगशास्त्र- योगसार, ज्ञानार्णव, ध्यानशतक, तत्त्वानुशासन, योगसारसंग्रह |
  33. लक्षणशास्त्र- जैनलक्षणावली, लक्षणमाला, लक्षणसंग्रह, लक्ष्यलक्षणविचार, लक्षणपंक्तिकथा|
  34. संगीतशास्त्र- संगीत-समयसार, संगीतशती, संगीतरत्नावली, संगीतोपनिषद, संगीतदीपक, संगीतमंडन, संगीतसहपिंगल |
  35. स्वप्नशास्त्र- सामुद्रिकतिलक, अंगविज्जा, भद्रबाहुचरित, सुविणदार, स्वप्नशास्त्र, स्वप्नप्रदीप |
  36. शकुनशास्त्र- शकुनसारोद्धार, शकुनरहस्य, शकुनरत्नावली, शकुनावलि, शकुनविचार |
  37. नाट्यशास्त्र- नाट्यदर्पण, नाट्यदर्पणविवृत्ति, प्रबंधशत, |
  38. काव्यशास्त्र- नवरस पद्यावली,काव्यानुशासन काव्यालोचन, काव्यालंकार टीका |
  39. मंत्रविज्ञान- मन्त्रमहोदधि, मंत्रानुशासन, लघुविद्यानुवाद, मन्त्रव्याकरण, सरस्वतीकल्प |
  40. धातुविज्ञान- धातुवादप्रकरण, भूगर्भप्रकाश, धातूत्पत्ति |
  41. रत्नविज्ञान- रत्नपरीक्षा, हीरकपरीक्षा, मणिकल्प |
  42. भौतिकविज्ञान- द्रव्यसंग्रह, पंचास्तिकाय |
  43. मनोविज्ञान – कषायपाहुड, धवला, जयधवला, चित्त और मन |
  44. प्राणिविज्ञान- तुरंगप्रबंध, हस्तिपरीक्षा, मृगपक्षिशास्त्र |
  45. मृत्युविज्ञान- मरणकंडिका, भगवती-आराधना, मृत्युमहोत्सववचनिका |

[ख] अब साहित्य की विविध विधाओं की दृष्टि से जैन कृतियों का अवलोकन कीजिये-–

  • महाकाव्य - पद्मानंद, धर्मशर्माभ्युदय, ऋषभायण, शिलप्पदिकारम्, मणिमेखला, कुंडलकेशी, रायमल्लाभ्युदय |
  • खण्डकाव्य- पार्श्वाभ्युदय, पश्चात्ताप |
  • मुक्तककाव्य - वज्जालग्ग, बुधजन-सतसई, जैन शतक |
  • चरितकाव्य – वर्धमानचरित, प्रद्युम्नचरित, चन्द्रप्रभचरित, श्रेणिकचरित, सनत्कुमारचरित, कुमारपालचरित, वस्तुपालचरित |
  • पुराण - महापुराण, पद्मपुराण, हरिवंशपुराण, शांतिनाथपुराण, अजितनाथपुराण, पांडवपुराण |
  • रासोकाव्य - आदिनाथरास, भरतेश्वर-बाहुबली-रास, ब्रह्मगुलालरास, हनुमंत-रास, होली-रास|
  • फागकाव्य –आदीश्वर फाग, चैतन्य फाग, वीरविलास फाग |
  • धूलिकाव्य - ऋषभनाथ की धूलि |
  • सन्धानकाव्य - द्विसन्धानकाव्य, सप्तसन्धानकाव्य, चतुर्विंशतिसन्धानकाव्य |
  • दूतकाव्य - नेमिदूत, जैनमेघदूत, शीलदूत, पवनदूत |
  • सूक्तिकाव्य - सूक्तिमुक्तावली, सुभाषितरत्नसंदोह |
  • नीतिकाव्य - बुधजन सतसई, उपदेश शतक |
  • ललितकाव्य - नेमिनिर्वाण, जयंतविजय, नरनारायणानन्द,चतुर बनजारा |
  • गीतिकाव्य - चौरपंचाशिका, गीतवीतराग, क्षेत्रपाल-गीत, गीत-परमार्थी,जीवड़ा गीत,णमोकार गीत, अष्टाह्निका गीत |
  • गद्यकाव्य- तिलकमंजरी, गद्यचिंतामणि, कुवलयमाला |
  • चम्पूकाव्य - पुरुदेवचम्पू जीवन्धरचम्पू, चम्पूमण्डन |
  • रूपककाव्य - मोहराजपराजय, मदनपराजय, मोहविवेकयुद्ध, ज्ञानचन्द्रोदय, विवेक-विलास, परमहंस|
  • नाट्यकाव्य - ज्ञानसूर्योदय, समयसार नाटक |
  • संवादकाव्य- जिह्वा-दन्त-संवाद, चेतन-काया-संवाद, निमित्त-उपादान-संवाद, पंचेन्द्रिय-संवाद |
  • चौपाईकाव्य- मधुबिंदुक चौपाई, धर्मसार चौपाई |
  • अष्टककाव्य - अकलंकाष्टक, पार्श्वनाथाष्टक, महावीराष्टक, सांत्वनाष्टक, दृष्टाष्टक |
  • दशककाव्य – दर्शन-दशक,
  • चतुर्दशीकाव्य –आश्चर्य-चतुर्दशी |
  • पच्चीसीकाव्य - अध्यात्म-पच्चीसी, वैराग्य-पच्चीसी, व्यवहार-पच्चीसी, नवकार-पचीसी, पद्मनंदी पच्चीसी |
  • बत्तीसीकाव्य- कमल-बत्तीसी, अनादि-बत्तीसी, अक्षर-बत्तीसी, आत्म-बत्तीसी, भावना-बत्तीसी, स्वप्न-बत्तीसी |
  • पंचाशिकाकाव्य – संबोधन-पंचाशिका, पूर्ण-पंचाशिका |
  • बावनीकाव्य –अक्षरबावनी, दानबावनी |
  • शतककाव्य- जैनशतक, उपदेशशतक, भुजबलिशतक, अपराजितशतक, छंदशतक |
  • वेलि – जम्बूस्वामि-वेलि, बाहुबली-वेलि, गुणस्थान-वेलि |
  • चूनडी – चूनड़ी (भगवतीदास) |
  • सतसई – बुधजन सतसई
  • बारहखड़ी – बारहक्खर-कक्क, अध्यात्मबारहखड़ी |
  • बारहमासा – नेमिनाथ-बारहमासा, बारहमासा, बारहमासी-गीत |
  • विलासकाव्य - बनारसी-विलास, दौलत-विलास, द्यानत-विलास, वृन्दावन-विलास, भूधर-विलास, ब्रह्म-विलास, विवेक-विलास |
  • भक्तिकाव्य- दशभक्ति, चैत्यभक्ति, सिद्धभक्ति, आचार्यभक्ति, श्रुतभक्ति |
  • स्तुतिकाव्य- स्तुतिविद्या, देवस्तुति,आदिनाथ स्तुति |
  • स्तोत्रकाव्य – भक्तामरस्तोत्र, कल्याणमंदिरस्तोत्र, विषापहारस्तोत्र |
  • पूजाकाव्य – देवशास्त्रगुरु पूजा, आदिनाथ-पूजा, महावीर-पूजा |
  • विधानकाव्य - सिद्धचक्र-विधान, इंद्रध्वज-विधान, शांतिनाथ-विधान, पञ्चपरमेष्ठी-विधान |
  • आरतीकाव्य- पंचपरमेष्ठी आरती, पार्श्वनाथ-आरती, वर्धमान आरती, आरती संग्रह |
  • चालीसाकाव्य - चन्द्रप्रभ-चालीसा, पार्श्वनाथ-चालीसा, महावीर-चालीसा |
  • जयमालाकाव्य - श्रुत-जयमाला, गुरु-जयमाला, तीर्थ-जयमाला, दशलक्षण-जयमाला, षोडशकारण- जयमाला, बीस तीर्थंकर जयमाला, चौरासी जाति जयमाला |
  • प्रश्नोत्तरी – प्रश्नोत्तररत्नमालिका योगसार-प्रश्नोत्तरी, परमात्मप्रकाश-प्रश्नोत्तरी |
  • सूत्र - तत्त्वार्थसूत्र, परीक्षामुखसूत्र, ध्यानसूत्र, षटखंडागमसूत्र |
  • वृत्ति- सर्वार्थसिद्धि, देवागमवृत्ति, तत्त्वार्थवृत्ति, प्राकृतपञ्चसंग्रहवृत्ति, सिद्धिविनिश्चयवृत्ति, परमार्थप्रकाशवृत्ति, लघीयस्त्रय-वृत्ति |
  • वार्तिक - राजवार्तिक|
  • टीका – आत्मख्याति, तत्त्वप्रदीपिका, तात्पर्यवृत्ति |
  • टब्बाटीका - वसुनंदी-श्रावकाचार-टब्बाटीका, तत्त्वार्थसूत्र-टब्बाटीका, समयसारटब्बाटीका, कार्तिकेयानुप्रेक्षा-टब्बाटीका |
  • भाष्य - श्लोकवार्तिकभाष्य, प्रमाणसंग्रहभाष्य |
  • महाभाष्य- गंधहस्ति-महाभाष्य,
  • टिप्पण – महापुराण-टिप्पण, न्यायदीपिका-टिप्पण, धर्मचरित-टिप्पण |
  • चूर्णी – कषायपाहुडचूर्णी |
  • भाषावचनिका - रत्नकरंड-भाषावचनिका, समयसार-भाषावचनिका, परीक्षामुख-भाषावचनिका |
  • कथा- सुगंधदशमीकथा, भविष्यदत्तकथा, अनंतचतुर्दशीकथा |
  • कहानी –अहिंसा के पथ पर, आप कुछ भी कहो, जैनधर्म की कहानियाँ |
  • चित्रकथा- अनंगधरा, षटखंडागम, कहान कथा : महान कथा, ताली एक हाथ से बजती रही, आटे का मुर्गा |
  • आत्मकथा - अर्धकथानक, मेरी जीवनगाथा |
  • जीवनी - चारित्रचक्रवर्ती, ज्ञान का हिमालय, सुधा का सागर, विद्याधर से विद्यासागर |
  • उपन्यास - मुक्तिदूत, सत्य की खोज |
  • नाटक- सुभद्रा, विक्रांतगौरव, ज्योतिष्प्रभा, अंजनापवनंजय |
  • एकांकी - धर्माभ्युदय, शमामृत |
  • शोधप्रबंध - जैनदर्शने बंधमुक्तिविमर्श:, पंडित टोडरमल : व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व |
  • गुर्वावली - गुर्वावली, जैन-शिलालेख-संग्रह, प्रबंधावली, प्रबंध-चिंतामणी |
  • पट्टावली- पुरातन-प्रबंध-संग्रह, सेन पट्टावली, वृद्धाचार्य प्रबंधावली |
  • प्रशस्ति- वस्तुपाल-प्रशस्ति, मूलाचार-प्रशस्ति, सुकृतकीर्तिकल्लोलिनी |
  • पत्र – रहस्यपूर्ण चिट्ठी,उपादान-निमित्त की चिट्ठी, आध्यात्मिक पत्रावली, स्वानुभव-पत्रावली |
  • कोश – प्रबंधकोश, जैनेन्द्र-सिद्धांत-कोश, अभिधान-राजेन्द्र-कोश |

विचारणीयम्

• ‘‘यदि आपको भारतीय साहित्य व संस्कृति की सच्ची झलक देखनी है तो जलपान के लिए लोटा डोर और खाने के लिए सत्तू साथ में बांध लो और प्रत्येक जैन मंदिर और वहाँ के शास्त्र भंडारों को छान डालो |वहाँ आपको भारतीय संस्कृति के सच्चे रत्न मिलेंगे |’’ -महापंडित राहुल सांकृत्यायन

• ‘‘सृष्टि की रचना पता नहीं किसने की, पर साहित्य की सृष्टि तो जैन लेखकों ने ही की है |’’
-महापंडित राहुल सांकृत्यायन
• “ साहित्यसेवा के क्षेत्र में जैनाचार्यों की नीति निष्पक्ष तथा धार्मिक उदारता से प्रेरित थी | उन्होंने अनेक कृतियाँ इन भावनाओं से प्रेरित होकर भी लिखी पड़ीं और उनका संरक्षण किया है | ”
– डॉ. गुलाबचंद्र चौधरी
• ‘‘भारतीय भाषाओँ के इतिहास की दृष्टि से भी जैन साहित्य बहुत महत्त्वपूर्ण है |’’
-डा. विंटरनिटज, A HISTORY OF INDIAN LITERATURE
• ‘‘राजस्थान के जैन ग्रन्थागार सरस्वती के पीहर हैं |’’ -डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल

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16. जैन विद्या के छात्रों को निर्देश :arrow_up:

काल पका है कि आज जैन विद्या के अनेक विद्यालय, महाविद्यालय खुले हैं और उनमें से हजारों की संख्या में विद्वान् तैयार होकर निकल रहे हैं | लगभग सभी विद्वान् बहुत अच्छे हैं | उनमें जैन तत्त्वज्ञान की गहरी रुचि भी पाई जाती है और वे अच्छे वक्ता भी हैं | उनके निमित्त से जैन विद्या का बहुत प्रचार-प्रसार हो रहा है | यह सब बड़े ही हर्ष और संतोष का विषय है | किन्तु फिर भी उन विद्वानों को कुछ निर्देश देने का बहुत भाव आ रहा है, ताकि वे राष्ट्रिय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होकर इस क्षेत्र में और भी अच्छा, ठोस कार्य कर सकें |कुछ विद्वान् छात्र आजीविका की दृष्टि से भी बहुत चिंतित दिखाई देते हैं | मैं समझता हूँ कि यदि वे इन निर्देशों पर ध्यान देंगे तो इससे उनकी इस समस्या का भी समाधान हो जाएगा | जैन विद्या के क्षेत्र में आज भी बहुत काम है, बस ठीक से करनेवाला चाहिए |
बहरहाल, वे निर्देश कुछ इस प्रकार हैं –

  1. अपने ज्ञान को बहुत व्यापक बनाएं | जैन विद्या बहुत व्यापक है, आपका ज्ञान भी बहुत व्यापक होना चाहिए | भाषा, व्याकरण, कोश, जैनेतर दर्शन, पुरातत्त्व, इतिहास, काव्यशास्त्र, न्यायशास्त्र आदि का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है |
  2. अध्ययन प्रतिदिन अवश्य करें | न केवल अध्ययन करें, प्रतिदिन एक-दो श्लोक, गाथा, लक्षण, परिभाषा आदि कंठस्थ भी अवश्य करें | जिसे लक्षण, भेद-प्रभेद आदि कंठस्थ हों, वही किसी विषय का ठीक से प्रतिपादन कर सकता है |
  3. प्रतिदिन घंटे-आध घंटे कुछ लोगों को पढ़ाने का कार्य भी अवश्य करना चाहिए | इससे विषय का ज्ञान और उसके प्रतिपादन का तरीका – दोनों ही बहुत निर्मल और व्यवस्थित होते हैं |(Teaching is the best way of learning.)
  4. अध्ययन से भी अधिक अधीत विषय का चिन्तन-मनन करें, तभी वह आत्मसात् होता है | अन्न को खाना ही नहीं, पचाना भी जरूरी होता है |
  5. बहुत अच्छा लेखक बनने का अभ्यास भी अवश्य करना चाहिए | स्तरीय शोध-पत्रिकाओं में आपके शोध-पत्र प्रकाशित होने चाहिए |
  6. संगोष्ठी-सम्मेलनों में जाकर पत्रवाचन या परिचर्चा करके सक्रिय सहभागिता करनी चाहिए |
  7. राष्ट्रिय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सीमित समय में (संक्षेप में) अपनी बात कहने में कुशलता हासिल करनी चाहिए | वक्तृत्व-कला और सभाशास्त्र पर भी कुछ पुस्तकें अवश्य पढ़नी चाहिए |
  8. विविध पत्र-पत्रिकाओं का भी अवलोकन करना चाहिए | न केवल अवलोकन करना चाहिए, यदि उनमें कुछ बहुत अच्छा या बहुत गलत छपा हो तो थोड़ी प्रतिक्रिया भी अवश्य लिखनी चाहिए|
  9. अंग्रेजी भाषा और कंप्यूटर के प्रयोग में भी दक्षता प्राप्त करनी चाहिए | आधुनिक युग में कंप्यूटर की सहायता से अपने व्याख्यान को बहुत प्रभावशाली बनाया जा सकता है |
  10. हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत – कम से कम इन तीन भाषाओं में तो धाराप्रवाह रूप से लिखना-बोलना आना ही चाहिए | इसके अतिरिक्त एक प्राकृत भाषा भी बहुत अच्छी आनी चाहिए, क्योंकि वही तो जैन आगमों की मूल भाषा है | उसके बिना कैसी श्रुतभक्ति ?
  11. समकालीन वातावरण और समस्याओं के प्रति भी जागरूक होना चाहिए और उनके समाधान भी – जैनदर्शन के आलोक में - आपके पास अवश्य होने चाहिए | सभी पूर्वाचार्यों में ऐसी समकालीन युगचेतना पाई जाती थी | जैनदर्शन सदा ही समसामयिक एवं प्रासंगिक रहा है |
  12. अपना दृष्टिकोण अत्यंत उदार रखें, किसी की निंदा-आलोचना में बहुत न उलझें | परिष्कार करो, बहिष्कार नहीं – की नीति पर चलें | स्याद्वादरूप जिनवाणी में ‘सर्वथा’ कहीं नहीं है | सभी पूर्वाचार्यों ने भी किसी के खंडन पर नहीं, अपितु खंडन के खंडन पर ही अधिक ध्यान दिया है, कथन की विवक्षा समझाने पर ही अधिक ध्यान दिया है |
  13. अप्रयोजनभूत बातों में भी बहुत न उलझें | मूल तत्त्वज्ञान को ही ठीक से समझने-समझाने में ऊर्जा लगाएं | आज के वैज्ञानिक युग का लाभ उठाएं | सामाजिक मुद्दों को भी गौण ही रखें, मुख्यता तो दार्शनिक विषयों की ही रहनी चाहिए | यही जैन विद्वान् का असली कार्य है |
  14. अच्छे विद्वानों की खूब सेवा/संगति करें | उनके प्रति अत्यधिक विनय भाव रखें | उनसे चर्चा-परिचर्चा भी खूब करें | उन सबके गुण ग्रहण करके स्वयं को समृद्ध बनाएं |
  15. अपने स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखें | आहार-विहार उचित ही होना चाहिए | अनुचित आहार-विहार कथमपि न करें | (long seating, bad posture, study in dim light, fast food)
  16. अनुशासन या समय-पालन का बहुत अधिक ध्यान रखें | समय का उल्लंघन व्यक्ति को कभी सफल नहीं होने देता | समय से पूर्व पहुंचने वाला व्यक्ति आधा तो इसी से सफल हो जाता है |
  17. वस्त्र भी ठीक ही पहनने चाहिए | खासकर सभा में तो अच्छे ही वस्त्र पहनने चाहिए |
  18. ईर्ष्या, लालच, कपट, अहंकार, दैन्य, प्रमाद, विषाद आदि दुर्भावों से स्वयं को दूर रखें | करुणा, सेवा, वात्सल्य, परोपकार, प्रसाद एवं परिश्रम आदि उत्तम गुणों को बढाएं |
  19. व्यक्तिवाद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, पंथवाद आदि सर्व संकीर्णताओं से दूर रहें | किसी भी एक ग्रुप के बनकर न रहें |
  20. किसी की भी निंदा या प्रशंसा करना विद्वान् का कार्य नहीं है | उसे तो सर्वत्र ‘समीक्षा’ ही प्रस्तुत करनी चाहिए |
  21. आजीविका की बहुत अधिक चिंता न करें, स्वयं के कर्मोदय को शांति से सहन करें |बहुत चिंता करने से या जगह-जगह दीन होकर मांगते रहने से आजीविका नहीं मिलती | काल पकेगा तब सहज मिलेगी | आजीविका वास्तव में धन से नहीं, ज्ञान से चलती है – इस रहस्य को भी समझें| हमें जिनवाणी रूपी अद्भुत धन मिला, उससे अधिक और क्या चाहिए ? तथा कुछ पुरुषार्थी तो ऐसे होते हैं कि रोजगार मांगते नहीं, पैदा करते हैं – इस बात पर भी विचार करें | तथा अपनी योग्यता भी बढ़ावें, प्राय: योग्यता की कमी से ही रोजगार नहीं मिलता |
  22. औपचारिक शिक्षा जल्दी से न छोड़ दें, उसे निरंतर जारी रखें | शास्त्री क्या, आचार्य तक की शिक्षा भी पर्याप्त नहीं है |एम. फिल., पी-एच. डी. करना भी बहुत जरूरी है | आचार्य/एम.ए. भी यदि तीन-चार विषयों में हो जाए तो अच्छा है | बी.एड. करना भी उपयोगी है |
  23. आजीविका नहीं मिल रही – यह सोचकर जल्दी से किसी दुकान-व्यापारादि के कार्य में नहीं उलझ जाना चाहिए, क्योंकि बाद में उसमें से निकलकर शिक्षा के क्षेत्र में लगना बहुत कठिन हो जाता है |
  24. आपके पास अपना एक व्यवस्थित एवं प्रभावशाली बायोडाटा भी अवश्य होना चाहिए और आपको उसे उचित अवसरों पर प्रस्तुत भी अवश्य करना चाहिए |
  25. सदा प्रसन्न रहें, कभी दुखी न हों | चिंता चिता से भी बुरी होती है |( सजीवे दहति चिंता …)
  26. परिश्रम खूब करें, श्रमण संस्कृति के उपासक होकर श्रम से न घबराएं | प्रमाद से दूर रहें |
  27. ज्ञानाराधना से बहुत गहरा अनुराग रखें, उसी में सदा संतुष्ट और संतृप्त रहें |
  28. कभी भी किसी अन्य धर्म, जाति, समाज, देश आदि की निंदा न करें |
  29. जैनेतर साहित्य एवं संस्कृति का भी थोडा-बहुत परिचय अवश्य प्राप्त करें | जैनेतर विद्वानों से भी मधुर सम्बन्ध बनाकर रखें | उनसे विद्वेष भाव न रखें | उनसे भी ज्ञानचर्चा करके बहुत लाभ उठाया जा सकता है |
  30. भारतीय संविधान में आस्था रखें | शासन के विरुद्ध आचरण न करें | जैन दर्शन राष्ट्रवादी है | सभी आचार्यों ने राष्ट्रहित की हार्दिक कामना प्रकट की है और राष्ट्रविरुद्ध कुछ भी करने-कहने का निषेध किया है |
  31. विविध शास्त्रों का अभ्यास करते हुए या अन्य कोई आजीविकादि कार्य करते हुए भी अपने अन्तरंग में अध्यात्मविद्या को सर्वोपरि स्थान पर रखें, अन्यथा आत्महित के मुख्य लक्ष्य से भटक जाने की सम्भावना है | चतुर व्यक्ति सदैव ‘आदहिदं कादव्वं …’ का कुतुबनुमा अपने हाथ में रखते हैं |

सोहेइ सुहावेइ अ उवभुज्जंतो लवो वि लच्छीए |
देवी सरस्सई उण असमग्गा किं पि विणडेइ || - गउडवहो
अर्थ- लक्ष्मी तो थोड़ी भी उपभोग करो तो वह सुहाती है, सुखी करती है; किन्तु अपूर्ण सरस्वती उपहास ही कराती है |

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17. जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान :arrow_up:

जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में जैन पत्र-पत्रिकाओं का बहुत बड़ा योगदान है | पहले भी बहुत रहा है, आज भी बहुत है और आगे भी बहुत रहेगा | आज आवश्यकता है कि इस तथ्य को हम सभी और हमारी समाज का हर सदस्य भलीभांति समझे, ताकि जैन संस्कृति का क्षरण रुके और संरक्षण-संवर्धन हो |
जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में पत्र-पत्रिकाओं के विशेष योगदान को भलीभांति समझकर प्रत्येक जैन बन्धु को जैन पत्र-पत्रिकाओं को बहुत अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए | उनके सदस्य स्वयं भी बनना चाहिए और दूसरों को भी बनाना चाहिए अथवा अन्य किसी उपलक्ष्य में भी उनको कुछ आर्थिक सहयोग अवश्य करना चाहिए | उनका यह सहयोग उनका अपना हित तो करेगा ही, इससे जैन संस्कृति की महती सेवा भी होगी | मैं समझता हूँ कि प्रत्येक जैन घर में चार-पांच पत्रिकाएँ अवश्य ही आनी चाहिए |
आजकल बहुत से लोग अनेक प्रकार के बहाने बनाकर पत्र-पत्रिकाओं से दूरियां बनाते देखे जा रहे हैं, उनकी सदस्यता छोड़ रहे हैं, आदि; परन्तु यह अच्छी स्थिति नहीं है | उन्हें बात को ठीक से समझना चाहिए | जैसे कोई कहता है कि उनकी अविनय होती है इसलिए नहीं मंगाते| यह बात ऊपर से देखने पर ठीक लगती है, परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है | ऐसे ही अविनय नहीं होती है | अविनय तो अविनय करने से होती है, व्यर्थ ही आतंकित होना उचित नहीं है | संसार में लाखों पत्रिकाएँ छपती हैं, सब में महापुरुषों के चित्र एवं विचार होते हैं, परन्तु इससे उनकी अविनय नहीं होती, अपितु उनका प्रचार-प्रसार होता है, उनका महत्त्व बढ़ता है |

बहरहाल, यहाँ हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में जैन पत्र-पत्रिकाओं का कैसे बहुत बड़ा योगदान होता है | बातें तो बहुत हैं, पर हम संक्षेप में लिख रहे हैं | आशा है, सब लोग इन बिन्दुओं को विस्तृत करके गम्भीरता से समझने-समझाने का प्रयास करेंगे | यथा-

  1. पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से समाज में नये-नये कवि, लेखक एवं साहित्यकार तैयार होते हैं | जरा सोचिए, पत्र-पत्रिकाएँ न हों तो नये साहित्यकार कैसे तैयार होंगे ?
  2. पत्र-पत्रिकाओं से तीर्थों का विकास होता है, उनकी अद्यतन जानकारी प्राप्त होती है, उन पर कोई संकट आया हो तो उसकी रक्षा होती है |
  3. पत्र-पत्रिकाओं से बच्चों में धार्मिक संस्कार डलते हैं | वे आधुनिक ढंग से आकर्षक रूप में छपती हैं, उनमें अनेक प्रेरक प्रसंग आदि छपते हैं | उनसे बच्चों में बहुत संस्कार डलते हैं | मेरा अपना अनुभव है कि मुझे स्वयं बचपन में सन्मति-संदेश, आत्मधर्म आदि घर आते थे, उनको पढकर ही धर्म की रुचि जागृत हुई |
  4. पत्र-पत्रिकाओं से समकालीन मिथ्या मान्यताओं का निराकरण होता है | यह कार्य केवल प्राचीन ग्रन्थों से सम्भव नहीं है | तथा यदि यह कार्य न किया जाए तो हमारे अनेक सामान्य लोग अपनी संस्कृति से भ्रष्ट हो सकते हैं |
  5. पुस्तक समीक्षा से नई पुस्तकों/कृतियों का परिष्कार होता है | आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इसी के द्वारा हिन्दी-साहित्य को अनेक श्रेष्ठ ग्रंथ और ग्रन्थकार दिए |
  6. पत्र-पत्रिकाओं से धर्मप्रभावना आदि के समाचार पढ़कर बहुत प्रभावना होती है | एक स्थान के उत्तम कार्यों को जानकर अन्य स्थान वाले भी वैसा ही श्रेष्ठ कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं |
  7. पत्र-पत्रिकाओं से संस्थाएं उन्नति करती हैं, क्योंकि वे प्राय: किसी-न-किसी संस्था का मुखपत्र होती हैं | उसमें उनकी गतिविधियाँ प्रकाशित होना आवश्यक होता है |
  8. पत्र-पत्रिकाओं से कोई भी अच्छा जन-जागरण-अभियान चलाने में सहायता प्राप्त होती है | भगवान महावीर का 2500वाँ निर्वाण महोत्सव, आचार्य कुन्दकुन्द द्विसहस्राब्दी आदि अनेक कार्यक्रम पत्र-पत्रिकाओं की वजह से ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए |
  9. जैन संस्कृति केवल धर्म-दर्शन-अध्यात्मरूप नहीं है, अपितु न्याय, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, वास्तु, कला, समाज, राजनीति आदि जीवन के सभी पक्षों से सम्बंधित है | पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से जैन संस्कृति की इस विविधता और व्यापकता पर अच्छा प्रकाश डाला जा सकता है |
  10. आजकल विश्वविद्यालयों में बहुत शोधकार्य हो रहे हैं | यह पत्र-पत्रिकाओं का ही योगदान है कि वे उन शोधकार्यों से हमें परिचित कराती हैं | शोधार्थियों के शोध पत्र प्रकाशित करती हैं और इससे शोधकार्यों को प्रोत्साहन प्राप्त होता है |
  11. पत्र-पत्रिकाओं से सामाजिक एकता का भी वातावरण बनता है | पत्रकार बिना किसी भेदभाव के सभी के प्रेरक समाचारों से पाठकों को अवगत कराते हैं | इससे समाज के सभी अंग एक-दूसरे के निकट आते हैं, उनमें स्नेहभाव बढ़ता है |

इस प्रकार हम देखते हैं कि जैन संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में जैन पत्र-पत्रिकाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है | प्रत्येक जैन बन्धु का यह पावन कर्तव्य बनता है कि वह इन्हें प्रोत्साहित करे |

पत्रकार बन्धुओं से भी निवेदन है कि यद्यपि वे बहुत कठोर परिश्रम करते हैं, तथापि निम्नलिखित बातों का और भी अधिक ध्यान रखें | यथा –

  1. सम्पादकीय अवश्य लिखा करें, बिना सम्पादकीय के अच्छा नहीं लगता, समसामयिक विषयों पर आपके अमूल्य विचार जनता के समक्ष अवश्य आने चाहिए | यदि किसी समसामयिक विषय पर न लिखें तो अन्य किसी सांस्कृतिक विषय पर ही सही, पर अवश्य लिखना चाहिए |
  2. पत्रिका में ‘पुस्तक-समीक्षा’ का स्तम्भ भी अवश्य होना चाहिए, इससे साहित्य समृद्ध होता है | तथा ‘पुस्तक-समीक्षा’ में वास्तव में ही कुछ समीक्षा (गुण-दोष-विवेचन) भी अवश्य करनी चाहिए, केवल पुस्तक का परिचय मात्र लिख देने से कोई लाभ नहीं होता |
  3. कहीं पर भी अभक्ष्य वस्तुओं के सेवन का कोई उपदेश या विज्ञापन भी नहीं देना चाहिए | कहीं-कहीं ‘स्वास्थ्य-रक्षा’ आदि स्तम्भों में गाजर, मूली, लहसुन, यहाँ तक कि शहद आदि के सेवन की सलाह दी जाती है | इससे बहुत दोष लगता है |
  4. अधिक से अधिक समाचार कवर करें, चाहे संक्षेप में ही सही | दिगम्बर-श्वेताम्बर दोनों के प्रेरक समाचारों से जनता को अवगत कराया जाए तो यह भी अच्छा ही है | इससे समाज में स्वस्थ स्पर्द्धा एवं स्नेह भाव विकसित होता है |
  5. वर्ष के अंत में समाज के विविध क्षेत्रों में कार्य करने वालों का सर्वेक्षण करके ‘टॉप टेन’ प्रकाशित करना चाहिए | जैसे - ‘इस वर्ष के टॉप टेन लेखक’ | यहाँ ‘लेखक’ के स्थान पर विद्वान्, कृतियाँ, दातार, संस्थान, समाजसेवक, पत्रिका, तीर्थ, तीर्थयात्री, इत्यादि | यह भी समाज की प्रगति का हेतु बनेगा |
  6. यदा-कदा प्राचीन जैन स्थलों ( मन्दिर, मूर्ति, तीर्थ, आदि ) से भी पाठकों को अवश्य परिचित करना चाहिए | ये हमारी अमूल्य धरोहर हैं | चर्चा करते रहने से लुप्त नहीं होंगी |
  7. कभी-कभी प्राकृत भाषा के उत्थान हेतु भी कुछ सामग्री प्रकाशित करना चाहिए, क्योंकि यह हमारे आगमों की मूल भाषा है | खासकर श्रुत पंचमी के अवसर पर तो अवश्य ही प्राकृत भाषा का महत्त्व समझाकर जनता को उसे सीखने की प्रेरणा देनी चाहिए | आपका यह कदम जैन संस्कृति की रक्षा में बहुत बड़ा योगदान करेगा |

अन्त में सभी जैन पत्र-पत्रिकाएँ उन्नति करें और उनके निमित्त से जैन संस्कृति का निरंतर संरक्षण-संवर्धन होता रहे- इसी मंगल कामना से मैं अपनी बात पूर्ण करता हूँ |

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18. व्यस्त रहो स्वस्थ रहो / जो व्यस्त है वह स्वस्थ है:arrow_up:

एक किसान था | बहुत ही कठोर परिश्रमी, दिन-रात काम में लगे रहने वाला | उसे कभी भी अपने कामों से थोड़ी-सी भी फुर्सत नहीं मिलती थी, बहुत ही व्यस्त रहता था; लेकिन उसकी एक विशेषता थी कि वह नित्य थोड़ी देर पूजा-पाठ अवश्य करता था | कितना भी व्यस्त हो, पर पूजा नहीं छोड़ता था | उसकी ऐसी धर्मनिष्ठा देखकर एक दिन एक देव प्रगट हुआ | बोला- “मैं तुम्हारी धर्मनिष्ठा से बहुत प्रभावित हूँ, कुछ वरदान मांगो |”
किसान बोला– “मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, मेरे पास कुछ भोगने का समय ही नहीं है |”
देव ने बहुत आग्रह किया- “कुछ-न-कुछ तो अवश्य ले लो, मुझे बहुत प्रसन्नता होगी |”
किसान- “ठीक है, यदि तुम कुछ देना ही चाहते हो तो तुम मुझे एक अच्छा-सा कार्यकर्ता दे दो, क्योंकि मेरे पास काम बहुत है |”
“तथास्तु” - कहकर देव ने किसान को एक बहुत ही अच्छा कार्यकर्ता दे दिया |
किसान ने अब अपने कार्यकर्ता को बहुत काम बताना शुरू किया – “जाओ जल्दी खेत के चारों ओर बाड़ लगाओ |”
कार्यकर्ता तो अलौकिक था, एकदम जादुई, पूरा राक्षस | अत: शीघ्र गया और कुछ ही क्षण में लौटकर आ गया – “आपका काम पूरा हो गया है मेरे आका, अब जल्दी और काम बताइए, अन्यथा मैं आपको खा जाऊंगा |”
किसान – “खेत के चारों कोनों पर चार कुँए खोदो सिंचाई के लिए |”
कार्यकर्ता राक्षस पुन: शीघ्र गया और कुछ ही क्षणों में लौटकर वापिस आ गया – “आपका काम पूरा हो गया है मेरे आका, अब जल्दी और काम बताइए, अन्यथा मैं आपको खा जाऊंगा |”
किसान जो भी काम बताता, उसे वह राक्षस इसीप्रकार शीघ्र भलीभांति सम्पन्न करके आ जाता था | किसान उसके कार्यों से तो प्रसन्न था, किन्तु वह जो ऐसा बोलता था कि मैं आपको खा जाऊंगा, उससे बहुत डरता था, अत: उसने एक दिन उस देव का आह्वान किया जिसने उसे वह राक्षस कार्यकर्ता वरदानस्वरूप प्रदान किया था |
देव प्रकट हुआ – “कैसे हो भक्तप्रवर ? कैसा है हमारा कार्यकर्ता ?कोई समस्या तो नहीं ?”
किसान – “कार्यकर्ता तो निश्चय ही बहुत अच्छा है, शीघ्र एवं भलीभांति सब कार्य सम्पन्न करता है, किन्तु …”
“किन्तु क्या ?”
“किन्तु हे देवराज, वह बारम्बार मुझे खा जाने की धमकी देता है |”
“देखो, यदि उसे खाली छोड़ोगे तो ऐसा ही होगा | तुमने कहा था कि तुम्हारे पास बहुत काम है, अत: मैंने तुम्हें बहुत काम करने वाला उत्कृष्ट कार्यकर्ता दिया | उसे हमेशा काम में लगाये रखा करो, फिर तुम्हें कभी कोई परेशानी नहीं होगी |”
“मगर इतना काम अब मैं उसके लिए कहाँ से लाऊं ?”
“देखो, पहले उससे कहना कि सौ फुट गहरा गड्डा खोदो, गड्डा खुदने के बाद कहना कि कहीं से एक हजार फुट लम्बा बांस ढूँढ़ कर लाओ और उसे इसमें गाड़ दो | अब, जब तुम्हें काम हो तब उससे काम करा लेना और जब कोई काम न हो तब उससे कहना कि इस बांस पर चढो और उतरो, जब तक मैं आवाज न दूँ तब तक न आना | अथवा एक हजार बार गिनकर चढो और उतरो, एक भी कम-ज्यादा नहीं होना चाहिए | इत्यादि-इत्यादि, परन्तु उसे कभी भी खाली मत छोड़ना, खाली छोड़ोगे तो वह तुम्हें खा जाएगा |”
किसान ने ऐसा ही किया और सुखी हो गया |
किन्तु अब हमारी बात है | हमारे पास भी एक उत्कृष्ट कार्यकर्ता है – हमारा मन | हम उससे बहुत काम ले सकते हैं, किन्तु लेना आना चाहिए | हमें उससे अच्छे काम कराने होंगे और येन-केन प्रकारेण उसे व्यस्त भी अवश्य रखना होगा, बिलकुल भी खाली नहीं छोड़ना होगा, अन्यथा वह हमें खा भी जाएगा – यह सच है | लोकोक्ति में भी जो ऐसा कहा जाता है कि खाली दिमाग शैतान का घर है, वह बहुत ही अनुभव की और अत्यंत सारगर्भित बात है, हमें इसे गम्भीरता से लेना चाहिए | यदि कदाचित् हमारे पास कोई बहुत अच्छे प्रयोजनभूत कार्य न हों तो भी हमें उसे किसी-न-किसी छोटे-मोटे कलात्मक कार्यों में ही उसको लगा देना चाहिए, पर इसे व्यस्त अवश्य ही रखना चाहिए | जो व्यस्त है वही स्वस्थ है | हमारे पूर्वजों ने मन को व्यस्त रखने के लिए ही नानाविध शास्त्रों एवं कलाओं का प्रणयन किया है, उन्हें अप्रयोजनभूत नहीं समझना चाहिए |

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19. लघु कथा - मनमानी या जिनवाणी :arrow_up:

प्राचीन काल की बात है | एक आदमी कहीं दूर जा रहा था | मार्ग में थकान दूर करने के लिए वह एक वृक्ष की छाया में रुका | संयोग से वह वृक्ष एक कल्पवृक्ष था | शीघ्र ही उसकी थकान उतर गई| वह बहुत प्रसन्न हो गया और सोचने लगा- काश, एक गिलास पानी भी मिल जाता | तत्काल पानी सामने हाजिर हो गया | पानी पीते हुए सोचने लगा- काश, खाने के लिए एक लड्डू भी साथ होता | अब लड्डू भी प्लेट में उपस्थित हो गया | उसने लड्डू खाकर पानी पी लिया, परन्तु सोचने लगा कि सुबह से भूखा हूँ, एक लड्डू से क्या होता है, पूरा भोजन ही मिलता तो तृप्ति होती | अब भोजन की थाली सजकर सामने आ गई | उसने पेट भरकर भोजन कर लिया | भोजन करके सोचा- काश, यहाँ एक बिस्तर भी लगा होता तो मैं जरा देर लेट भी जाता, भोजन के तुरंत बाद मुझसे चला कैसे जाएगा | अब बिस्तर लग गया और वह उस पर लेट गया | लेटकर वह सोचता है- अरे, यह क्या हो रहा है, मैंने सोचा- पानी तो पानी हाजिर हो गया, मैंने सोचा- लड्डू तो लड्डू हाजिर हो गया, मैंने सोचा- भोजन तो भोजन हाजिर हो गया, मैंने सोचा- बिस्तर तो बिस्तर हाजिर हो गया, यहाँ कहीं कोई भूत तो नहीं है ? इतने में ही एक भूत प्रकट हो गया | उसने सोचा- अरे, यह तो सचमुच भूत ही है, कहीं मुझे खा तो नहीं जाएगा | अब भूत उसे खा गया |
कहानी का तात्पर्य यही है कि जो मन के पीछे चलेगा, मनमानी करेगा, वह नष्ट हो जाएगा और जो जिनवाणी की सुनेगा वह तर जाएगा |

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