रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Shlok Evam Arth (Acharya Samantabhadra)

रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ

आचार्य समन्तभद्र

आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार के संस्कृत मूल श्लोक 1 से 150, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ, ग्रंथ के अधिकारों के अनुसार इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। अर्थ संलग्न ग्रंथ (पं. सदासुखदास जी कासलीवाल कृत हिन्दी टीका) में हर श्लोक के बाद छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; भावार्थ और विस्तार नहीं लिया, वह नीचे की पीडीएफ में है। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक (छपाई की टिप्पणियों सहित): रत्नकरण्ड श्रावकाचार मूल श्लोक (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Mool Shlok (Acharya Samantabhadra)

संबंधित: रत्नकरण्ड श्रावकाचार - सम्यग्दर्शन अधिकार (दैनिक श्लोक) · रत्नकरण्ड श्रावकाचार - धर्म के दश लक्षण · श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार - पद्यानुवाद

स्रोत: ratnakarand_shravakachar.pdf

ratnakarand_shravakachar.pdf (6609 KB)


प्रथम - सम्यग्दर्शन अधिकार (श्लोक 1 से 41)

नमः श्रीवर्धमानाय निर्धूतकलिलात्मने ।
सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥1॥

श्लोकार्थ: श्री वर्द्धमान तीर्थंकर के लिये हमारा नमस्कार हो। श्री अर्थात् अंतरंग स्वाधीन जो अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य व अनंतसुख स्वरूप अविनाशी लक्ष्मी और बहिरंग इन्द्रादिक देवों द्वारा वंदनीय जो समोशरणादिक लक्ष्मी सहित वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं, वे श्री वर्द्धमान हैं। अथवा अव समंतात् अर्थात् समस्त प्रकार से, ऋद्ध अर्थात् परम अतिशय को प्राप्त हुआ है केवलज्ञानादि मान अर्थात् प्रमाण जिनका वे श्रीवर्धमान हैं।
यहाँ “अवाप्योरल्लोपः” इस व्याकरण शास्त्र के सूत्र द्वारा अकार (अ) का लोप (अभाव) हो गया है। कैसे हैं श्री वर्द्धमान? निर्धूत कलिल है आत्मा जिनका। निर्धूत अर्थात् नष्ट किया है आत्मा का, कलिल अर्थात् ज्ञानावरणादि कर्मरूप पापमल जिसने, ऐसे हैं; और जिनका केवलज्ञान अलोकाकाश सहित सम्पूर्ण तीनों लोकों को दर्पण के समान आचरण (प्रकाशित) कर रहा है।


देशयामि समीचीनं धर्मं कर्मनिवर्हणम् ।
संसारदुःखतः सत्वान् यो धरत्युत्तमे सुखे ॥2॥

श्लोकार्थ: मैं ग्रन्थकर्त्ता (आचार्य समन्तभद्र) इस ग्रन्थ में उस धर्म का उपदेश देने जा रहा हूँ - जो प्राणियों को पंचपरिवर्तनरूप संसार के दुखों से निकालकर स्वर्ग के और मोक्ष के बाधारहित उत्तम सुखों को प्राप्त करा देता हैं; और कैसे धर्म को कहूँगा ? जो समीचीन अर्थात् जिसमें वादी - प्रतिवादी द्वारा व प्रत्यक्ष - अनुमानादि द्वारा बाधा नहीं आती है तथा जो कर्म बंधन को नष्ट करने वाला है, ऐसे धर्म को कहूँगा।


सदृष्टिज्ञानवृतानि धर्मं धर्मेश्वराः विदुः ।
यदीयप्रत्यनीकानि भवन्ति भवपद्धतिः ॥3॥

श्लोकार्थ: धर्म के ईश्वर भगवान् तीर्थंकर परमदेव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र इन तीनों को धर्म कहते हैं; और इन तीनों से प्रतिकूल जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र हैं वे संसार परिभ्रमण की परिपाटी होते हैं।


श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥4॥

श्लोकार्थ: जो सत्यार्थ आप्त, आगम और तपोभृत् हैं उनके श्रद्धान से सम्यग्दर्शन होता है। आप्त तो समस्त पदार्थों को जानकर उनका सत्यार्थ स्वरूप प्रगट करनेवाले हैं; आगम - आप्त के द्वारा रचित रचनारूप शास्त्र हैं; आप्त द्वारा प्ररूपित शास्त्र के अनुसार आचरण को आचरने वाले तपोधन अर्थात् गुरु हैं।
यहां सच्चे आप्त, सच्चे शास्त्र और सच्चे गुरु का श्रद्धान वह सम्यग्दर्शन कहा है; किन्तु असत्य आप्त, आगम और गुरु का श्रद्धान वह सम्यग्दर्शन नहीं है। वह सम्यग्दर्शन तीन मूढ़ताओं से रहित, अपने अष्ट अंगों सहित और अष्टमद रहित होता है।


आप्तेनोच्छिन्नदोषेण सर्वज्ञेनागमेशिना ।
भवितव्यं नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ॥5॥

श्लोकार्थ: धर्म का मूल भगवान् आप्त हैं, उनके तीन गुण हैं - निर्दोषपना, सर्वज्ञपना, परम हितोपदेशकपना। जिसके क्षुधा, तृषादिक दोष नष्ट हो गये इसलिए निर्दोष; त्रिकालवर्ती समस्त गुण - पर्यायों सहित समस्त जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल की अनन्त पर्यायों को युगपत् प्रत्यक्ष जानते हैं इसलिए सर्वज्ञ; और परम हितोपदेशकपने द्वारा द्वादशांगरूप जो आगम उसके मूलकर्त्ता इसलिये आगम के हितोपदेशक स्वामी। इस प्रकार ये तीन गुण कहे हैं, उन सहित जो होता है वह निश्चय से आप्त ही होता है, उसी को देव कहते हैं।

इन तीन गुणों के बिना अन्य प्रकार से आप्तपना नहीं होता है।


क्षुत्पिपासाजरातंक जन्मान्तकभयस्मयाः ।
न रागद्वेषमोहाश्च यस्याप्तः स प्रकीर्त्यते ॥6॥

श्लोकार्थ: क्षुत् अर्थात् क्षुधा १, पिपासा अर्थात् तृषा २, जरा अर्थात् वृद्धपना ३, आतंक अर्थात् शरीर संबधी व्याधि ४, जन्म अर्थात् कर्म के वश से चतुर्गति में उत्पत्ति ५, अन्तक अर्थात् मृत्यु ६, भय अर्थात् इसलोक का भय, परलोक का भय, मरणभय, वेदनाभय, अनरक्षा भय, अगुप्ति भय, अकस्मात् भय - ऐसे सात प्रकार के भय ७, स्मय अर्थात् गर्व (मद) ८, राग ९, द्वेष १०, मोह ११, और च शब्द से चिन्ता १२, रति १३, निद्रा १४, विस्मय अर्थात् आश्चर्य १५, विषाद अर्थात् शोक १६, स्वेद अर्थात् पसीना १७, खेद अर्थात् व्याकुलता १८ जानना। ये १८ दोष जिसके नहीं होते हैं उसे आप्त कहते हैं।


परमेष्ठी परंज्योतिः विरागो विमलः कृती ।
सर्वज्ञोऽनादि मध्यान्तः सार्वः शास्तो पलाल्यते ॥7॥

श्लोकार्थ: जो अर्थ सहित इन आठ नामों को सार्थक करता है उसे शास्ता कहते हैं - परमेष्ठी, पंरज्योति, विराग, विमल, कृती, सर्वज्ञ, अनादिमध्यान्त और सार्व - ये आठ जिसके सार्थक नाम हैं वह शास्ता है, उसी को आप्त कहते हैं।


अनात्मार्थं विना रागैः शास्ता शास्ति सतो हितम् ।
ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शान्मुरजः किमपेक्षते ॥8॥

श्लोकार्थ: शास्ता जो धर्मोपदेशरूप शिक्षा देनेवाले अरहन्त आप्त हैं वे अनात्मार्थ अर्थात् अपनी ख्याति, लाभ, पूजादि प्रयोजन के बिना ही तथा शिष्यों मे रागभाव के बिना ही सत्पुरुष जो निकट भव्य हैं उन्हें हितरूप शिक्षा देते हैं; जैसे वाद्य बजानेवाले शिल्पि के हाथ का स्पर्श मात्र पाकर मृदंग अनेक प्रकार से ध्वनि करने लगता है, किन्तु बदले में वह मृदंग कुछ भी नहीं चाहता है।


आप्तोपज्ञमनुल्लंघ्यमदुष्टैष्टविरोधकम् ।
तत्त्वोपदेशकृतसार्वं शास्त्रं कापथघट्टनम् ॥9॥

श्लोकार्थ: शास्त्र उसे कहते हैं जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हुआ हो, किसी वादी - प्रतिवादी द्वारा उल्लंघन नहीं किया जा सके, दृष्ट अर्थात् प्रत्यक्ष और इष्ट अर्थात् अनुमान द्वारा जिसमें विरोध नहीं आवे, तत्त्व अर्थात् जैसा वस्तु का स्वरूप है वैसा कथन - उपदेश करनेवाला हो, सर्व जीवों को हितरूप हो, तथा कुमार्ग अर्थात् मिथ्यामार्ग का निषेध करनेवाला हो। इस प्रकार छह विशेषणों सहित शास्त्र का स्वरूप कहा।


विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रहः ।
ज्ञानध्यानतपोरक्तः तपस्वी स प्रशस्यते ॥10॥

श्लोकार्थ: जो पांच इंद्रियों के विषयों की आशा अर्थात् वांछा से रहित हो, छह काय के जीवों का जिसमें घात होता है ऐसे आरम्भ से रहित हो, अंतरंग - बहिरंग समस्त परिग्रहों से रहित हो, ज्ञान - ध्यान तप में आसक्त हो - जो इन चार विशेषणों सहित तपस्वी अर्थात् गुरु है, वही प्रशंसनीय है।


इदमेवेदृशं चैव तत्वं नान्यन्नचान्यथा ।
इत्यकम्पाऽऽयसाम्भोवत् सन्मार्गेऽसंशया रुचिः ॥11॥

श्लोकार्थ: यहां तत्त्वभूत आप्त, आगम और गुरु का जो लक्षण बताया है, वह ही सत्यार्थ स्वरूप है। ईदृशं चैव अर्थात् इसी प्रकार है, अन्य प्रकार नहीं है; ऐसा तलवार की धार के पानी की तरह सन्मार्ग में संशय रहित अकम्प रुचि अर्थात् श्रद्धान होना, वह निःशंकित अंग नाम का गुण है।


कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोदये ।
पापबीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकांक्षणा स्मृता ॥12॥

श्लोकार्थ: इन्द्रियजनित सुख में सुखपने की आस्था रहित जो श्रद्धान भाव वह अनाकांक्षा नाम का सम्यक्त्व का गुण भगवान् ने कहा है।


स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रते ।
निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिः मता निर्विचिकित्सिता ॥13॥

श्लोकार्थ: यह मनुष्य पर्याय का जो शरीर है वह स्वभाव से ही अपवित्र है। यहाँ किसी उत्तम मनुष्य के यदि रत्नत्रय प्रगट हो जाय तो उसकी अशुचि देह भी पवित्र है। इसलिये व्रतियों का शरीर रोगादि से मलिन देखकर भी उसमें ग्लानि का अभाव तथा रत्नत्रय में प्रीति होना उसका नाम निर्विचिकित्सा अंग है।


कापथे पथि दुःखांना कापथस्थेऽप्यसंमतिः ।
असंपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढ़ा दृष्टिरुच्यते ॥14॥

श्लोकार्थ: नरक - तिर्यंच - कुमनुष्यादि गतियों का घोर दुखों का मार्ग ऐसा जो मिथ्यामार्ग उसकी, तथा कुमार्गी अर्थात् मिथ्यामार्ग पर चलनेवाले पुरुषों की जो मन से प्रशंसा नहीं करता, वचनों से स्तवन नहीं करता तथा काय से हाथ की अंगुलियां नखादि मिलाकर सराहना नहीं करता वह अमूढ़दृष्टि है।


स्वयंशुद्धस्य मार्गस्य, बालाशक्तजनाश्रयाम् ।
वाच्यतां यत्प्रमार्जन्ति, तद्वदन्त्युपगूहनम् ॥15॥

श्लोकार्थ: यह जो जिनेन्द्र भगवान् का कहा हुआ रत्नत्रयरूप मार्ग है वह स्वयमेव शुद्ध है, निर्दोष है। इस रत्नत्रय मार्ग की किसी अज्ञानी तथा असक्त मनुष्य द्वारा आश्रय किये जाने से जो निंद्यता प्रकट हुई हो उसे दूर कर देना, शुद्ध निर्दोष कर देने को उपगूहन कहते हैं।


दर्शनाच्चरणाद्वापि चलितां धर्मवत्सलैः ।
प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञैः स्थितिकरणमुच्यते ॥16॥

श्लोकार्थ: कोई पुरुष पहले सम्यग्दर्शन सहित श्रद्धानी था तथा व्रत - संयम सहित चारित्र धारक था। पश्चात् किसी प्रबल कषाय के उदय से, खोटी संगति से, रोग की तीव्र वेदना से, दरिद्रता से, मिथ्या उपदेश से, तथा मिथ्यादृष्टियों के मंत्र - तंत्रादि चमत्कार देखकर सत्य श्रद्धान व आचारण से चलायमान होता हो तो उसे विचलित होता हो तो उसे विचलित जानकर जिनका धर्म में वात्सल्य है ऐसे धर्मात्मा प्रवीण पुरुष उसे उपदेशादि देकर पुन: सच्चे श्रद्धान व आचरण में स्थापित कर दें, उसे स्थितिकरण कहते हैं।


स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव - सनाथापेतकैतवा ।
प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥17॥

श्लोकार्थ: सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चारित्ररूप धर्म धारण करनेवालों का जो यूथ अर्थात् समूह वह धर्मात्मा का अपना समूह है। रत्नत्रय के धारकों के यूथ में रहनेवाले मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, तथा अव्रत - सम्यग्दृष्टियों के प्रति सच्चे भाव सहित, कपट रहित यथायोग्य प्रतिपत्ति अर्थात् उठकर खड़ा हो जाना, सामने आ जाना, वन्दना करना, गुणों का स्तवन करना, हाथ जोड़ना, आज्ञा मानना, पूजा - प्रशंसा करना, ऊंचे स्थान पर बैठाकर स्वयं नीचे बैठ जाना, उनके आने से इतना हर्ष मानना जितना किसी दरिद्री को महानिधान के प्राप्त हो जाने से होता है, महान् प्रीति का भाव आना, और अवसर अनुसार आहार - पानी, निवास, सामग्री आदि द्वारा वैयावृत्य करके आनंद मानना उसे वात्सल्य अंग कहते हैं।


अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् ।
जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः स्यात्प्रभावन ॥18॥

श्लोकार्थ: संसारी जीवों के हृदय में अज्ञानरूपी अंधेरा फैला हुआ है, उसे सच्चे स्वरूप के प्रकाश से दूर करके जिनेन्द्र के शासन का माहात्म्य बतलाना - प्रकाश करना वही प्रभावना नाम का सम्यक्त्व का आठवां अंग है।


तावदञ्जन चौराऽङ्गे ततोऽनन्तमती स्मृता ।
उद्दायनस्तृतीयेऽपि तुरीये रेवती मता ॥19॥

श्लोकार्थ: प्रथम अंग में राजपुत्र अंजनचोर, द्वितीय अंग में अनन्तमती नाम की सेठ की पुत्री, तृतीय अंग में उद्दायन राजा, चतुर्थ अंग में रेवती रानी, पंचम अंग में जिनेन्द्रभक्त सेठ, छठा अंग में राजपुत्र वारिषेण मुनि, सप्तम अंग में राजपुत्र विष्णुकुमार मुनि, और अष्टम अंग में राजपुत्र वज्रकुमार मुनि - ये आठ नाम आगम में सम्यक्त्व के अंगों में प्रसिद्ध होनेवालों के क्रम से दृष्टांतरूप में आये हैं। इनकी विस्तृत कथायें प्रथमानुयोग के शास्त्रों में प्रसिद्ध हैं, वहां से जान लेना।


ततो जिनेन्द्रभक्तोऽन्यो वारिषेणस्ततः परः ।
विष्णुश्च वज्रनामा च शेषयोर्लक्ष्यतां गतौ ॥20॥

श्लोकार्थ: प्रथम अंग में राजपुत्र अंजनचोर, द्वितीय अंग में अनन्तमती नाम की सेठ की पुत्री, तृतीय अंग में उद्दायन राजा, चतुर्थ अंग में रेवती रानी, पंचम अंग में जिनेन्द्रभक्त सेठ, छठा अंग में राजपुत्र वारिषेण मुनि, सप्तम अंग में राजपुत्र विष्णुकुमार मुनि, और अष्टम अंग में राजपुत्र वज्रकुमार मुनि - ये आठ नाम आगम में सम्यक्त्व के अंगों में प्रसिद्ध होनेवालों के क्रम से दृष्टांतरूप में आये हैं। इनकी विस्तृत कथायें प्रथमानुयोग के शास्त्रों में प्रसिद्ध हैं, वहां से जान लेना।


नाङ्गहीनं मलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसन्ततिम् ।
न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥21॥

श्लोकार्थ: अंगों से हीन सम्यग्दर्शन संसार की परिपाटी - जन्मपरम्परा छेदने में समर्थ नहीं होता है; जैसे हीनाक्षर - मन्त्र विष की वेदना को नष्ट नहीं कर सकता है। जिसके भावों में निःशंकितादि अंग प्रकट होते हैं वही सम्यग्दृष्टि संसार परिभ्रमण का नाश करता है। जिसका आठ अंगों में से यदि एक अंग भी कम हे - प्रकट नहीं हो पाया है, उसके संसार का अभाव उसी प्रकार नहीं होता है, जिस प्रकार अक्षरहीन - मंत्र सर्पादि का विष दूर नहीं कर सकता है।


आपगा सागरस्नानमुच्चयः सिकताश्मनाम् ।
गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥22॥

श्लोकार्थ: जो लौकिक - मिथ्याधर्मी लोग हैं उनका आचरण देखकर जो नदी में स्थान करने में धर्म मानते हैं, समुद्र में स्नान करने में धर्म मानते हैं, रेत का ढेर - पाषाण का ढेर करने में धर्म मानते हैं, पर्वत से गिर पड़ने में धर्म मानते हैं, अग्नि में गिर पड़ने धर्म मानते हैं उसे लोकमूढ़ता कहते हैं। सम्यग्दर्शन लोकमूढ़ता रहित ही होता है।


वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेषमलीमसाः ।
देवता यदुपासीत देवतामूढ़मुच्यते ॥23॥

श्लोकार्थ: जो अपने को अच्छा लगता है उसे वर कहते हैं। वर की इच्छा करके आशावान होकर के जो रागद्वेष से मलिन देवताओं का सेवन करता है - पूजन करता है उसे देवतामूढ़ कहते हैं और उसका कार्य देवमूढ़ता कहलाती है।


सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनाम् ।
पाखण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाखण्डिमोहनम् ॥24॥

श्लोकार्थ: परिग्रह, आरंभ और हिंसा सहित संसाररूप भंवरों में प्रवर्तन करनेवाले पाखण्डियों को प्रधान मानकर उनके वचनों में आदरपूर्वक प्रवर्तन करना पाखण्डमूढ़ता है।


ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः ।
अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः ॥25॥

श्लोकार्थ: जिनका मद नष्ट हो गया है ऐसे गणधर देव हैं उन्होने मद आठ प्रकार का कहा है। ज्ञान १, पूजा २, कुल ३, जाति ४, बल ५, ऋद्धि ६, तप ७, शरीर ८ - इन आठ का आश्रयकर के जो मानीपना होता है उसे स्मय ( मद ) कहते हैं।


स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थानगर्विताशयः ।
सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकै बिना ॥26॥

श्लोकार्थ: जो कोई पुरुष गर्व करके धर्म के धारक अन्य धर्मात्मा पुरुषों का तिरस्कार करता है वह अपने धर्म का ही तिरस्कार करता है, क्योंकि धर्मात्मा पुरुषों के बिना धर्म नहीं पाया जाता है। इसलिये जो ज्ञान, पूजा, धन, तप, ऐश्वर्य, रूप आदि का मद करके धर्मात्माओं का तिरस्कार करता है वह अपने ही धर्म का तिरस्कार करता है, क्योंकि धर्म तो किसी पुरुष के आधार से ही रहता है, बिना पुरुष के धर्म तो रहता नहीं है।


यदि पापनिरोधोऽन्यसंपदा किं प्रयोजनम् ।
अथ पापस्त्रवोऽस्त्यन्यसंपदा किं प्रयोजनम् ॥27॥

श्लोकार्थ: सम्यग्दृष्टि विचार करता है - यदि मेरे ज्ञानावरणादि अशुभ पाप प्रकृतियों का आस्त्रव होना रुक गया है तो अब मेरे पास जितनी संपत्ति है उससे अधिक संपत्ति प्राप्त हो जाने से मुझे क्या प्रयोजन है? यदि मेरे उन अशुभ पाप प्रकृतियों का आस्त्रव होना चालू ही है तथा संपत्ति भी आ रही है, तो इस नई आनेवाली संपत्ति से मुझे क्या प्रयोजन है, कितना लाभ है?


सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहजम् ।
देवादेवं विदुर्भस्मगूढाङ्गारान्तरौजसम् ॥28॥

श्लोकार्थ: सम्यग्दर्शन सहित, चांडाली के शरीर से उत्पन्न हुआ जो चांडाल है उसे भी गणधरदेव देव कहते हैं, जैसे भस्म से दबे हुए अंगार को अग्नि ही कहते हैं।


श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्विषात् ।
कापि नाम भवेदन्या संपद्धर्माच्छरीरिणाम् ॥29॥

श्लोकार्थ: धर्म ( पुण्य ) के प्रभाव से कुत्ता भी स्वर्ग में जाकर देवों में उत्पन्न हो जाता है, और पाप के प्रभाव से स्वर्गलोक का महान् ऋद्धिधारी देव भी यहाँ आकर कुत्ते के रूप में उत्पन्न हो जाता है। प्राणियों को, वचनों से जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता है ऐसी अहमिंद्रों की सम्पदा तथा अविनाशी मुक्ति संपदा धर्म के प्रभाव से प्राप्त हो जाती है।


भयाशास्नेहलोभाच्च कुदेवागलिङ्गनाम् ।
प्रमाणं विनयं चैव न कुर्युः शुद्धदृष्टयः ॥30॥

श्लोकार्थ: जो शुद्ध सम्यग्दृष्टि हैं वे भय से, आशा से, स्नेह से, लोभ से, कुदेव, कुआगम और कुलिंगधारी को प्रणाम नहीं करते हैं। विनय नहीं करते हैं। जो काम, क्रोध, भय, इच्छा, क्षुधा, तृषा, राग, द्वेष, मद, मोह, निद्रा, हर्ष, विषाद, जन्म, मरण आदि दोषों सहित हैं वे सब कुदेव हैं। उनका फैलाव इस जगत् में पंचमकाल के प्रभाव से बहुत है। अकेले एक सर्वज्ञ अन्तराग के सिवाय शेष सब कुदेव हैं।
हिंसा के पोषक, रागी - द्वेषी - मोही जीवों द्वारा प्रकाशित, पूर्वा - पर दोष सहित, विषय - कषाय - आरम्भ के पुष्ट करनेवाले, प्रत्यक्ष व अनुमान प्रमाण से दूषित ऐसे शास्त्र कुआगम हैं।
हिंसादि पांच पापों के त्यागी, आरंभ परिग्रह रहित, देह के संबंध में निर्मम, उत्तमक्षमादि दशधर्म के धारी, दोष टालकर अयाचक वृत्ति सहित दीनता रहित निर्जन स्थान में बसनेवाले, ध्यान - अध्ययन में निरंतर प्रवर्तनेवाले, पांच इंद्रियों के विषयों के त्यागी, छह काय के जीवों की विराधना के त्यागी; एक बार मौन से पर का दिया रस - नीरस आपके निमित्त नहीं बनाया गया भोजन, रत्नत्रय का सहायक, काय की रक्षा के निमित्त ग्रहण करनेवाले ऐसे नग्न मुनिराज का भेष, एक वस्त्र के धारक ऐलक व कौपीन के धारक क्षुल्लक का भेष, तथा एक वस्त्र की धारी अर्जिका का भेष इन तीन के सिवाय जो अन्य अनेक भेष धारण करते हैं वे सभी कुलिंगी हैं।
एक मुनि का भेष तथा लंगोटी धारी ऐलक - कौपीन धारी क्षुल्लक तथा एक वस्त्र की धारण करनेवाली अर्जिका - इन तीन भेषों के सिवाय समस्त भेषधारियों को सम्यग्दृष्टि विनय नमस्कार नहीं करता है। ऐसे कुदेव, कुशास्त्र और कुलिंगधारियों को भय, आशा, स्नेह, लोभ से सम्यग्दृष्टि नमस्कार नहीं करता, विनय नहीं करता है।


दर्शनं ज्ञानचारित्रात् साधिमानमुपाश्नुते ।
दर्शनं कर्णधारं तन्मोक्षमार्गे प्रचक्षते ॥31॥

श्लोकार्थ: ज्ञान और चारित्र से सम्यदर्शन अधिक उच्च अर्थात् साधिमान - सर्वोत्कृष्ट है, ऐसा जानकर उसे प्राप्त करने का पुरूषार्थ करना चाहिये। इसी कारण से मोक्ष के मार्ग में सम्यग्दर्शन को कर्णधार कहा है। जैसे समुद्र में जहाज को खेवटिया पार करता है उसी प्रकार अपार संसारसमुद्र में रत्नत्रयरूप जहाज को पार करने में सम्यग्दर्शन खेवटिया है।


विद्यावृत्तस्य संभूतिस्थितिवृद्धिफलोदयाः ।
न सन्त्यसति सम्यक्त्वे बीजाभावे तरोरिव ॥32॥

श्लोकार्थ: जैसे बीज के अभाव में वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलोदय नहीं होता है, उसी प्रकार ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलोदय सम्यक्त्व के अभाव में नहीं होता है।


गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान् ।
अनगारो गृही श्रेयान् निर्मोही मोहिनो मुनेः ॥33॥

श्लोकार्थ: जिसे दर्शनमोह नहीं ऐसा गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है; तथा मोही अनगार अर्थात् मोह सहित गृहरहित मुनि मोक्षमार्गी नहीं है। इसी कारण से मोहवान मुनि से निर्मोही - दर्शनमोह रहित गृहस्थ श्रेयान् अर्थात् उत्कृष्ट है।


न सम्यक्त्व समं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि ।
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥

श्लोकार्थ: जीवों का सम्यग्दर्शन के समान तीनों काल और तीनों लोकों में अन्य कोई कल्याण करनेवाला नहीं है; तथा मिथ्यात्व के समान तीनों कालों और तीनों लोकों में अन्य कोई अकल्याण करनेवाला नहीं है।


सम्यग्दर्शनशुद्धाः नारकतिर्यङ्नपुंसकस्त्रीत्वानि ।
दुष्कुलविकृताल्पायुः दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यव्रतिकाः ॥35॥

श्लोकार्थ: जो जीव सम्यग्दर्शन से शुद्ध हैं, वे व्रत रहित होने पर भी नारकी, तिर्यंच, नपुंसक व स्त्रीपने को प्राप्त नहीं होते हैं; नीचकुल में जन्म, विकृत अर्थात् अंधा, काना, बहरा, टूंटा, लूला, लंगड़ा, गूंगा, कुबड़ा, बौना - ठिगना, हीन अंग, अधिक अंग, मांजरा - कंजा, विड्रूप - अभद्र नहीं होते हैं, तथा अल्प ? आयु के धारक व दरिद्रपने को प्राप्त नहीं होते हैं।


ओजस्तेजो-विद्या-वीर्य-वृद्धि-विजय-सनाथाः ।
महाकुला महार्था मानवतिलका भवन्ति दर्शनपूताः ॥36॥

श्लोकार्थ: जो पुरुष सम्यग्दर्शन से पवित्र हैं, वे मनुष्यों के तिलक अर्थात् समस्त मनुष्यों को शोभित करनेवाले, समस्त मनुष्यों के मस्तक के ऊपर धारण किये जाने योग्य, ऐसे मनुष्यों के तिलक होते हैं। और कैसे होते हैं? ओज अर्थात् पराक्रम, तेज अर्थात् प्रताप, विद्या अर्थात् समस्त लोक में अतिशय रूप ज्ञान,वीर्य अर्थात् अतिशयरूप शक्ति, उज्ज्वल यश, वृद्धि अर्थात् दिन प्रतिदिन गुणों की और सुख की वृद्धि, विजय अर्थात् सब प्रकार से जीत, अतिशयरूप वैभव - इस प्रकार ओज, तेज, विद्या, वीर्य, यश, वृद्धि, विजय, वैभव इन सभी गुणों के स्वामी होते हैं। महान् कुल के स्वामी होते हैं, महान् धर्म, महान् अर्थ, महाकाम, महामोक्षरूप चार पुरुषार्थों के स्वामी होते हैं। सम्यग्दर्शन को ग्रहण करने से ऐसे असीम अप्रमाण प्रभाव के धारी मनुष्य होते हैं।


अष्टगुणपुष्टितुष्टाः दृष्टिविशिष्टाः प्रकृष्टशोभाजुष्टाः ।
अमराप्सरसां परिषदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ताः स्वर्गे ॥37॥

श्लोकार्थ: जिनेन्द्र के भक्त सम्यग्दृष्टि देवों में जन्म लेकर अप्सराओं के समूह के बीच में चिरकाल तक रमते हैं - सुख भोगते हैं। कैसे होकर रमते हैं? अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व - जो ये आठ गुण है, उनकी पुष्टता अर्थात् जो अन्य असंख्यात देवों में नहीं पाई जावे ऐसी अधिकता से संतुष्ट होकर रमते हैं; तथा सब देवों से उत्कृष्ट ऐसी कांति, तेज, यश से शोभायमान होकर स्वर्गलोक में आनंदपूर्वक निवास करते हैं।


नवनिधिसप्तद्वयरत्नाधीशाः सर्वभूमिपतयश्चक्रम् ।
वर्तयितुं प्रभवन्ति स्पष्टदृशाः क्षत्रमौलिशेखरचरणाः ॥38॥

श्लोकार्थ: जिनके उज्ज्वल सम्यग्दर्शन है वे जीव स्वर्गलोक में आयु पूर्व व्यतीत करके, यहाँ मनुष्यलोक में आकर, नवनिधि चौदह रत्नों के स्वामी, समस्त भरतक्षेत्र के बत्तीस हजार देशों के मालिक, बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं के मस्तक के ऊपर मुकुटरूप हैं चरण जिनके, ऐसे चक्र को प्रवर्तन करने की सामर्थ्य वाले चक्रवर्ती होते हैं।


अमरासुरनरपतिभिर्यमधरपतिभिश्च नूत पादाम्भोजाः ।
दृष्ट्या सुनिश्चितार्थाः वृषचक्रधराः भवन्ति लोकशरण्याः ॥39॥

श्लोकार्थ: जिन पुरुषों ने सम्यग्दर्शन पूर्वक पदार्थों का सच्चा निर्णय किया है, वे अमरपति, असुरपति, नरपति, संयमियों के पति गणधरादि के द्वारा वन्दनीक हैं चरणकमल जिनके तथा लोगों को उत्कृष्ट शरणभूत हैं, ऐसे धर्मचक्र के धारक तीर्थंकररूप से उत्पन्न होते हैं।


शिवमजरमरूजमक्षयमव्याबाधं विशोकभयशंकम् ।
काष्ठागतसुखविद्याविभवं विमलं भजन्ति दर्शनशरणाः ॥40॥

श्लोकार्थ: जिनको सम्यग्दर्शन ही शरण है, वे पुरुष शिव अर्थात् निराकुलता लक्षण रूप जो मोक्ष है उसका अनुभव करते हैं। कैसा है शिव ? जिसमें जरा अर्थात् बुढ़ापा नहीं है, अनंतकाल में भी जहाँ पर आत्मा पुराना - कमजोर नहीं होता है, जीर्ण नहीं होता है; अरुज अर्थात् जहाँ पर कोई रोग, पीड़ा, व्याधि नहीं है; अक्षय अर्थात् जहाँ पर अनन्त चतुष्टयरूप स्वरूप का अभाव - नाश नहीं होता है; जहाँ पर किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं है; जहाँ पर शंका, भय, शोक आदि दूर हो गये हैं अर्थात् शोक - भय - शंका रहित है; सुख और ज्ञान के वैभव की पराकाष्ठा परमहद्द को जहाँ पर प्राप्त कर लिया है; द्रव्यकर्म - भावकर्म - नोकर्म ऐसे ज्ञानावरणादि - रागद्वेषादि - शरीरादि कर्ममल के अभाव से विमल हैं, ऐसे अद्वितीयस्वरूप मोक्ष को सम्यग्दृष्टि ही अनुभव करता है - भोगता है प्राप्त करता है। इस प्रकार सम्यक्त्व के प्रभाव का वर्णन किया।


देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानं राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोर्चनीयम् ।
धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकं लब्ध्वा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्याः ॥41॥

श्लोकार्थ: जिनेन्द्र परमात्मा के स्वरूप में भक्तिरूप अनुराग जिसे होता है, वह भव्य सम्यग्दृष्टि है। वह सम्यग्दृष्टि इस मनुष्यभव से जाकर स्वर्गलोक में अप्रमाण - अमाप ऋद्धि सुख वैभव के प्रभाव वाले देवेन्द्रों के समूह की महिमा प्राप्त करके, पश्चात् इसी पृथ्वी पर आकर बत्तीस हजार राजाओं के मस्तक द्वारा पूज्य राजेन्द्र चक्रवर्ती के चक्र को प्राप्त करके, फिर अहमिन्द्रलोक की महिमा को भी पाकर समस्त लोक को अपने आधीन किया जिसने, ऐसे भगवान् तीर्थंकर का धर्मचक्र प्राप्त करके निर्वाण को प्राप्त होता है। सम्यग्दर्शन का धारी जीव इसी क्रम से निर्वाण प्राप्त करता है।

द्वितीय - सम्यग्ज्ञान अधिकार (श्लोक 42 से 46)

अन्यूनमनतिरिक्तं याथातथ्यं बिना च विपरीतात् ।
निस्सन्देहं वेद यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिनाः ॥42॥

श्लोकार्थ: आगम के जाननेवाले जो श्री गणधरदेव तथा श्रुतकेवली हैं,वे उस ज्ञान को ज्ञान कहते हैं जो वस्तुस्वरुप को परिपूर्ण जानता है, कम नहीं जानता है, अधिक नहीं जानता है, जैसा वस्तु का यथार्थ सत्य स्वरुप है वैसा ही जानता है, विपरीतता रहित जानता है, संशय रहित जानता है।


प्रथमानुयोगमर्थाख्यानं चरितं पुराणमपि पुण्यम् ।
बोधिसमाधिनिधानं बोधति बोधः समीचीनः ॥43॥

श्लोकार्थ: सम्यग्ज्ञान प्रथमानुयोग को जानता है। कैसा है प्रथमानुयोग ? जिसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्षरुप चारों पुरुषार्थ का कथन है। एक पुरुष की मुख्यता से जो वर्णन होता है वह चरित्र कहलाता है, वह तथा जिसमें त्रेसठ शलाका पुरुषों के सम्बन्ध में वर्णन होता है उसे पुराण कहते हैं, वह भी प्रथमानुयोग कहा जाता है। सम्यग्दर्शन आदि जिन्हें नहीं था, उन्हें सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र की प्राप्ति होना बोधि कहलाता है; जिन्हें सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र था उसकी परिपूर्णता समाधि कहलाती है। प्रथमानुयोग रत्नत्रय की प्राप्ति और परिपूर्णता का निधान है, उत्पत्ति का स्थान है, पुण्य होने का कारण है अतः पुण्य है। ऐसे प्रथमानुयोग को सम्यग्ज्ञान ही जानता है।


लोकालोकविभक्तेर्युगपरिवृत्तेश्चतुर्गतीनां च ।
आदर्शमिव तथामतिरवैति करणानुयोगं च ॥44॥

श्लोकार्थ: सम्यग्ज्ञान करणानुयोग को जानता है। करणानुयोग कैसा है? लोक और अलोक के विभाग को, उत्सर्पिणी के छह काल व अवसर्पिणी के छह काल के परिवर्तन को, तथा चार गतियों के परिभ्रमण को दर्पण के समान दिखाने वाला है।


गृहमेध्यनगाराणां चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षाङ्गम् ।
चरणानुयोगसमयं सम्यग्ज्ञानं विजानाति ॥45॥

श्लोकार्थ: गृह में आसक्त है बुद्धि जिनकी ऐसे गृहस्थ,गृह से विरक्त होकर गृह के त्यागी ऐसे अनगार अर्थात् यति, उनका चारित्ररुप जो सम्यक् आचरण उसकी उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षा का अंग अर्थात् कारण ऐसे चरणानुयोग सिद्धान्त को सम्यग्ज्ञान ही जानता है।


जीवाजीवसुतत्वे पुण्यापुण्ये च बन्धमोक्षौ च ।
द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्या लोकमातनुते ॥46॥

श्लोकार्थ: जो द्रव्यानुयोगरुप दीपक है, वह जीव और अजीव इन दोनों निर्बाध तत्त्वो को, पुण्य - पाप को ,तथा बन्ध - मोक्ष को भावश्रुतज्ञान रुप सम्यग्ज्ञान प्रकाश के द्वारा " जैसा इनका स्वरुप है वैसा " प्रकाशित करता है।

तृतीय - अणुव्रत अधिकार (श्लोक 47 से 66)

मोहतिमिरापहरणे दर्शनलाभादवाप्तसंज्ञानः ।
रागद्वेषनिवृत्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥47॥

श्लोकार्थ: दर्शनमोहरुप अंधकार के दूर होने पर, सम्यग्दर्शन के प्रगट होने पर,जिसे सम्यग्ज्ञान की भी प्राप्ति हो गई है, ऐसा साधु ( सत्पुरुष ) जो निकटभव्य है, वह रागद्वेष के पूर्ण अभाव के लिये चारित्र अंगीकार करता है।


रागद्वेषनिवृत्तेः हिंसादिनिवर्तना कृता भवति ।
अनपेक्षितार्थवृत्तिः कः पुरुषः सेवते नृपतीन् ॥48॥

श्लोकार्थ: रागद्वेष का अभाव होने पर हिंसादि पाँचो पापों की पूर्ण निवृत्ति अर्थात् अभाव हो जाता है। पाँच पापों का अभाव होना ही चारित्र है। जिसे अपने किसी प्रयोजन के लिये कोई भी पदार्थ की अभिलाषा नहीं रह गई है, ऐसा पुरुष क्यों किसी राजा आदि की सेवा करेगा? नहीं करेगा। राजादि की महाकष्टरुप सेवा तो जिसे भोगों की चाह हो,धन तथा अभिमान आदि की अभिलाषा होती है,वही करता है। जिसे कुछ अपेक्षा( चाहना ) नहीं है, वह राजा की सेवा नहीं करता है। उसी प्रकार जिसके रागद्वेष का अभाव हो गया, वह पुरुष हिंसादि पाँच पापों में प्रवृत्ति नहीं करता है।


हिंसानृतचौर्येभ्यो मैथनुसेवा परिग्रहाभ्यां च ।
पापप्रणालिकाभ्यो विरतिः संज्ञस्य चारित्रम् ॥49॥

श्लोकार्थ: हिंसा,झूठ,चोरी,मैथुनसेवन,परिग्रह - ये पाप आने के बड़े रास्ते (परनाला) है, इनसे विरक्त हो जाना ही सम्यग्ज्ञानी का चारित्र है।


सकलं विकलं चरणं तत्सकलं सर्वसङ्गविरतानाम् ।
अनगाराणां विकलं सागाराणां ससङ्गानाम् ॥50॥

श्लोकार्थ: समस्त अंतर - बाह्य परिग्रह से विरक्त जो अनगार अर्थात् गृह मठादि नियत स्थान रहित वनखण्डादि में परम् दयालु होकर निरालम्बी विचरण करते है ऐसे ज्ञानी मुनीश्वरों के जो चारित्र होता है वह सकल चारित्र है। जो स्त्री - पुत्र - धन - धान्यादि परिग्रह सहित घर में ही निवास करते हैं,जिनवचनों के श्रद्धानी हैं,न्यायमार्ग का उलंघन नहीं करते है,पापों से भयभीत हैं ऐसे ज्ञानी गृहस्थों के विकल चारित्र है।


गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्यणु-गुण-शिक्षाव्रतात्मकं चरणम् ।
पञ्च-त्रि-चतुर्भेदं त्रयं यथासङ्ख्यमाख्यातम् ॥51॥

श्लोकार्थ: गृहस्थों के अणुव्रत, गुणव्रत, शिक्षाव्रतरुप तीन प्रकार का चारित्र होता है। उस तीन प्रकार के चारित्र के क्रमशः पाँच, तीन और चार भेद परमागम में कहे हैं।


प्राणातिपातवितथव्याहारस्तेयकाममूर्छाभ्यः ।
स्थूलेभ्यः पापेभ्यो व्युपरमणमणुव्रतं भवति ॥52॥

श्लोकार्थ: प्राणों का अतिपात अर्थात् वियोग करना उसे प्राणातिपात अर्थात् हिंसा कहते हैं; वितथ अर्थात् असत्य, व्याहार अर्थात् वचन बोलना उसे वितथ व्याहार अर्थात् असत्य वचन कहते हैं; स्तेय अर्थात् चोरी, काम अर्थात् मैथुन, मूर्च्छा अर्थात् परिग्रह, ये पाँच स्थूल पाप है। इन स्थूल पापों से विरक्त होना अणुव्रत है।


सङ्कल्पात्कृतकारितमननाद्योगत्रयस्य चरसत्वान् ।
न हिनस्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः ॥53॥

श्लोकार्थ: जो गृहस्थ मन - वचन - काय पूर्वक कृत - कारित - अनुमोदनारुप संकल्प से चर प्राणी दो इंद्रियादि त्रस जीवों का घात नहीं करता है, उसे निपुण पुरुष अर्थात् गणधर देव स्थूल हिंसा से विरक्त कहते है।


छेदनबंधनपीडनमतिभारारोपणं व्यतीचाराः ।
आहारवारणापि च स्थूलबधाद्व्युपरतेः पञ्च ॥54॥

श्लोकार्थ: ये स्थूल हिंसा का त्याग नामक अहिंसाणुव्रत के पांच अतिचार हैं,जो गृहस्थ को त्यागने योग्य हैं।


स्थूलमलीकं न वदति न परान् वादयति सत्यमपि विपदे ।
यत्तद्वदन्ति सन्तः स्थूलमृषावादवैरमणम् ॥55॥

श्लोकार्थ: जो स्थूल असत्य स्वयं नहीं बोलता, न दुसरे से कहलाता है, तथा जिस वचन से अपने पर या दूसरे पर आपत्ति आ जावे ऐसा सत्य भी नहीं बोलता हैं; उसे संत पुरुष स्थूल झूठ का त्याग कहते हैं।


परिवादरहोभ्याख्या पैशून्यं कूटलेखकरणं च ।
न्यासापहारितापि च व्यतिक्रमाः पञ्व सत्यस्य ॥56॥

श्लोकार्थ: यहाँ परिवाद का अर्थ मिथ्या उपदेश देना है। जो चारित्र स्वर्ग व मोक्ष का कारण है, उस चारित्र के संबंध में अन्यथा उपदेश देना वह परिवाद नाम का अतिचार है । १ ।
किसी ने अपनी कोई गुप्त बात बताई हो, वह बात किसी तीसरे से कह देना - विख्यात कर देना, तथा किसी स्त्री या पुरुष की एकांत की गुप्त चेष्टा देखकर या गुप्त वचन सुनकर किसी अन्य से कह देना - प्रकट कर देना वह रहोभ्याख्यान नाम का अतिचार है । २ ।
किसी की कोई कमजोरी जानकर उसका बिगाड़ कराने के अभिप्राय से किसी को छिपकर कह देना, चुगली करदेना, वह पैशून्य नाम का अतिचार है । ३ ।
किसी को बिना स्पष्ट कहे तथा बिना आचरण किये, बिना समझाये ही झूठा लिख देना कि इसने ऐसा कहा है, ऐसा आचरण किया है - वह कूटलेखकरण नाम का अतिचार है ।४।
कोई आपको धन सौप गया हो, वस्त्र - आभरण रख गया हो, जब वह वापिस लेने आया तो सही संख्या भूलकर कुछ काम मांगने लगा; उससे ऐसा कहना कि - तुम्हारा जितना है उतना ही ले जाओ, वह न्यासापहारिता नाम का अतिचार है। ५ ।
इस प्रकार कहे गये स्थूल असत्य का त्याग नामक अणुव्रत के पाँच अतिचार त्यागने योग्य ही हैं।


निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टम् ।
न हरति यन्न च दत्ते तदकृशचौर्यादुपारमणम् ॥57॥

श्लोकार्थ: किसी पुरुष का जमीन में गड़ा हुआ धन हो; किसी भी स्थान में, महल में, मंदिर में, गृह आदि में, छिपाया हुआ धन हो आपको अमानत सौंप गया हो; अपने मकान में या दूसरे के मकान में आप को बिना बताये - जताये ही रख गया हो, गांव में नगर में रास्ते में वन में बाग में पटक गया हो, आप को सौंप कर भूल गया हो; हिसाब में, लेखे में चूक गया हो; आप के स्थान में भूल से रख गया हो, पटक गया हो; अथवा लेन - देन में, गिनती में, भूला हुआ पैसा, रुपया, मुहर, आभरण, वस्तु आदि मंहगी या थोड़े मोल की हो बिना दी हुई ग्रहण नहीं करना चाहिये। दूसरे की वस्तु उठाकर किसी अन्य को देना भी नहीं चाहिये, यह स्थूल चोरी का त्यागरुप अणुव्रत है।


चौरप्रयोग-चौरार्थादान-विलोप-सदृशसन्मिश्राः ।
हीनाधिकविनिमानं पञ्चास्तेये व्यतीपाताः ॥58॥

श्लोकार्थ: अचौर्य नाम के अणुव्रत के पांच अतिचार हैं।
आप स्वयं तो चोरी नहीं करता है किन्तु दूसरों को चौरी करने की प्रेरणा देता है तथा चोरी करने के उपाय बतलाता है। वह चोरप्रयोग नाम का अतिचार है।१।
चोर से चोरी करके लाये धन को लेना वह चोरार्थादान नाम का अतिचार है।२।
उचित न्याय की रीति छोड़कर अन्य रीति से धनग्रहण करना, तथा राजा की आज्ञा से जिस कार्य को करने का निषेध हो उस कार्य को करके धन ग्रहण करना वह विलोप नाम का अतिचार है। ३ ।
बहुत मूल्य की वस्तु में अल्प मूल्य की वस्तु मिला कर चला देना वह सदृशसन्मिश्र नाम का अतिचार है। जैसे घी में तेल मिला देना, शुद्ध सोने में कृत्रिम सोना मिला देना वह सदृशसन्मिश्र है । ४।
देने का बांट, तराजू आदि कम परिणाम के रखना, तथा लेने के अधिक परिमाण के रखना वह हीनाधिक मानोन्मान नाम का अतिचार है । ५।
इस प्रकार स्थूल चोरी का त्याग नाम के अणुव्रत के ये पांच अतिचार त्यागने योग्य हैं।


न च परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्यत् ।
सा परदारनिवृत्तिः स्वदारसन्तोषनामापि ॥59॥

श्लोकार्थ: जो पाप के भय से पर - स्त्री के यहां स्वयं नही जाता है; तथा न पर - स्त्री के यहां अन्य को गमन कराता है, वह स्वदार - संतोष नाम का या पर - स्त्री का त्याग नाम का अणुव्रत है।


अन्यविवाहाकरणानङ्गक्रीडा विटत्वविपुलतृषः ।
इत्वरिकागमनं चास्मरस्य पञ्च व्यतीचाराः ॥60॥

श्लोकार्थ: अस्मर अर्थात् स्थूल ब्रह्मचर्यव्रत के पाँच अतिचार हैं, वे त्यागने योग्य हैं।


धनधान्यादिग्रन्थं परिमाय ततोऽधिकेषु निः स्पृहता ।
परिमितपरिग्रहः स्यादिच्छा परिमाणनामापि ॥61॥

श्लोकार्थ: अपने परिणामों में परिग्रह से संतोष आ जाय उतना धन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, क्षेत्र, वास्तु, आभरण ( यान, आसन, वस्त्र, पात्र ) आदि परिग्रह का परिमाण करके अधिक परिग्रह में निर्वांछकपने का भाव रखना वह परिमित परिग्रह नाम का अणुव्रत है। इसी को इच्छा परिमाण नाम से भी कहते हैं।


अतिवाहनातिसंग्रहविस्मयलोभातिभारवहनानि ।
परिमितपरिग्रहस्य च विक्षेपाः पञ्च लक्ष्यन्ते ॥62॥

श्लोकार्थ: परिमित परिग्रह नाम के व्रत के ये पांच अतिचार जानना। घोड़ा, ऊंट, बैल इत्यादि तिर्यंचों को तथा दासी, दास, सेवक आदि को अतिलोभ के वश से मर्यादारहित अतिदूर की मंजिल तक ले जाना, बहुत चलाना वह अतिवाहन नाम का अतिचार है।१।
अपने घर में बिना प्रयोजन ही बहुत पदार्थों का संग्रह करना; भोजन, पात्र, वस्त्र इत्यादि थोड़े की आवश्यकता हो, किन्तु संग्रह बहुत का करना; धान्य, वस्त्र, औषधि, काष्ठ, पाषाण, धातु इत्यादि का बहुत संग्रह करने में ही परिणामों का रहना वह अतिसंग्रह नाम का अतिचार है ।२।
दूसरों के यहां बहुत संपत्ति, बहुत परिग्रह, अनेक देशों की वस्तुएँ तथा जो कभी नहीं देखी ऐसी वस्तुओं को देखकर - सुनकर आश्चर्य करना वह विस्मय नाम का अतिचार है।३।
किसी व्यापार में, सेवा में, कला से, हुनर से आप को अंतराय कर्म के क्षयोपशम के अनुसार बहुत लाभ हो गया तो भी तृप्त नहीं होना, संतोष नहीं आना वह अतिलोभ नाम का अतिचार है।४।
लोभ के वश से तिर्यंचों के ऊपर सीमा से अधिक भार लादकर चलाना वह अतिभारवहन नाम का अतिचार है ।


पंचाणुव्रतनिधयो निरतिक्रमणाः फलन्ति सुरलोकम् ।
यत्रावधिरष्टगुणा दिव्यशरीरं च लभ्यन्ते ॥63॥

श्लोकार्थ: अतिचार रहित ये ऊपर कहे पाँच अणुव्रत निधिरूप वृक्ष में देवलोकरूप फल लगते हैं। जिस देवलोक में अवधिज्ञान तथा अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व - ये आठ महागुण व धातु - उपधातु रहित दिव्यशरीर प्राप्त होता है।


मातङ्गो धनदेवश्च वारिषेणस्ततः परः ।
नीली जयश्च संप्राप्ताः पूजातिशयमुत्तमम् ॥64॥

श्लोकार्थ: अहिंसा अणुव्रत में मातंग चांडाल, सत्य अणुव्रत में धनदेव, अचौर्य अणुव्रत में वारिषेण, ब्रह्मचर्यव्रत में नीली तथा परिग्रह परिमाणव्रत में जयकुमार व्रतों के माहात्म्य से उत्तम कीर्तिरूप अतिशय को प्राप्त होकर उसी भव में देवों द्वारा पूज्य हुए हैं। यद्यपि इन व्रतों के प्रभाव से अनेक भव्यजीव इसलोक में महिमा पाकर देवलोक को गये हैं तथापि आगम में इनकी ही कथा प्रसिद्ध है।


धनश्रीसत्यघोषौ च तापसी रक्षकावपि ।
उपाख्येयास्तथाश्मश्रुनवनीतो यथाक्रमम् ॥65॥

श्लोकार्थ: हिंसा से धनश्री, असत्य से सत्यघोष, चोरी से तापसी, कुशील से कोतवाल, परिग्रह से श्मश्रुनवनीत - ये इसलोक में राजा द्वारा तीव्र दण्ड पाकर दुर्गति को प्राप्त हुये हैं। श्लोक में ये नाम क्रम से जानकर समझ लेना।


मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपञ्चकम् ।
अष्टौ मूलगुणानाहुर्गृहिणां श्रमणोत्तमाः ॥66॥

श्लोकार्थ: श्रमणोत्तम अर्थात् जो गणधरदेव तथा श्रुतकेवली हैं वे गृहस्थ के मद्य, मांस, मधु के त्याग सहित पाँच अणुव्रतों को अष्ट मूलगुण कहते हैं।

चतुर्थ - गुणव्रत अधिकार (श्लोक 67 से 90)

दिग्व्रतमनर्थदण्डव्रतं च भोगोपभोगपरिमाणम् ।
अनुवृंहणाद् गुणानामाख्यान्ति गुणव्रतान्यार्याः ॥67॥

श्लोकार्थ: आर्य अर्थात् जो भगवान् गणधरदेव हैं वे दिग्व्रत, अनर्थदण्डव्रत, भोगोपभोग परिमाणव्रत - ये तीन व्रत हैं, उन्हे अणुव्रतों को गुणाकाररूप बढ़ानेवाले होने से गुणव्रत कहते हैं।


दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं बहिर्न यास्यामि ।
इति संकल्पो दिग्व्रतमामृत्यणुपापविनिवृत्यै ॥68॥

श्लोकार्थ: दश दिशाओं के समूह में परिमाण करके, परिमाण की हुई सीमा से बाहर गमन नहीं करुँगा, अणुमात्र पाप की निवृत्ति के लिये भी मरण पर्यन्त संकल्प करना, वह दिग्व्रत नाम का गुणव्रत है।


मकराकरसरिदटवीगिरिजनपदयोजनानि मर्यादाः ।
प्राहुर्दिशां दशानां प्रतिसंहारे प्रसिद्धानि ॥69॥

श्लोकार्थ: आगम में दश दिशाओं की मर्यादारूप सीमा बांधने के लिये प्रसिद्ध तथा विख्यात समुद्र, नदी, पर्वत, वन, देश, योजन कहे हैं। समुद्र आदि लोक में विख्यात चिह्न से दिशा की मर्यादा की जाती है। मर्यादा लेनेवाला मरण पर्यन्त ली हुई मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में गमनागमन नहीं करता है।


अवधेर्बहिरणुपापप्रतिविरतेर्दिग्व्रतानि धारयताम् ।
पंच महाव्रत परिणतिमणुव्रतानि प्रपद्यन्ते ॥70॥

श्लोकार्थ: दिग्व्रतों को धारण करनेवाले गृहस्थों के मर्यादा के बाहर अणुमात्र भी पापप्रवृति से विरक्तता होने से वे अणुव्रत ही महाव्रतों की अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं।


प्रत्याख्तानतनुत्वान् मंदतराश्चरणमोहपरिणामाः ।
सत्वेन दुरवधारा महाव्रताय प्रकल्प्यन्ते ॥71॥

श्लोकार्थ: अणुव्रती गृहस्थ के सकल संयम की विरोधी प्रत्याख्यानावरण कषाय के मंद उदय के कारण, चारित्रमोह के मंदतर (संज्वलन कषाय के) उदय में होने वाला महाव्रत का परिणाम जीवों के द्वारा महाकष्ट करके भी धारण नहीं किया जा सकता है, इसलिये महाव्रतों की कल्पना करते हैं।


पंचानां पापानां हिंसादीनां मनोवचःकायैः ।
कृतकारितानुमोदैः त्यागस्तु महाव्रतं महताम् ॥72॥

श्लोकार्थ: जो हिंसादि पांच पापों का मन - वचन - काय पूर्वक कृत - कारित - अनुमोदना द्वारा त्याग करते हैं, उन महापुरुषों के महाव्रत होते हैं।


ऊर्ध्वाधस्तात्तिर्यग्व्यतिपाताः क्षेत्रवृद्धिरवधीनाम् ।
विस्मरणं दिग्विरतेरत्याशाः पञ्च मन्यन्ते ॥73॥

श्लोकार्थ: दिशाओं की मर्यादा की थी, उसका अज्ञान से या प्रमाद से उल्लंघन कर देना वह अतिचार है। जैसे ऊँचाई की मर्यादा का पर्वत पर चढ़कर भंग कर देना वह ऊर्ध्वातिपात अतिचार है। कुआ - बावड़ी, तालाब आदि में नीचे उतरने की ली हुई मर्यादा भंग कर देना वह अधःस्तातिक्रम अतिचार है। देशों, गुफाओं आदि में प्रवेश कर मर्यादा को भंग कर देना वह तिर्यग्व्यतिक्रम नाम का अतिचार है। मर्यादा का क्षेत्र किसी विशेष प्रयोजन हेतु बढ़ा लेना वह क्षेत्रवृद्धि अतिचार है। जो मर्यादा ली थी उसका विस्मरण हो जाना वह विस्मरण नाम का अतिचार है। ये दिग्व्रत के पांच अतिचार हैं।


अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः ।
विरमणमनर्थदण्डव्रतं विदुर्व्रतधराग्रण्यः ॥74॥

श्लोकार्थ: जो दिशाओं की मर्यादा ली है उसमें मन - वचन - काय के योगों की व्यर्थ की प्रवृत्ति से विरक्त होना उसे व्रतधारियों में अग्रणी जो भगवान् हैं, वे अनर्थदण्ड व्रत कहते हैं।


पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च ।
प्राहुः प्रमादचर्यामनर्थदण्डानदण्डधराः ॥75॥

श्लोकार्थ: पाप का उपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति, प्रमादचर्या - ये पांच अनर्थदण्ड हैं, उन्हें जो अदण्डधर गणधर देव हैं उन्होने कहा है।


तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
प्रसवः कथाप्रसंगः स्मर्तव्यः पाप उपदेशः ॥76॥

श्लोकार्थ: तिर्यंचों को क्लेश उत्पन्न कराने का, उन्हें खरीदने - बेचने का, उनकी हिंसा का, आरम्भ का, ठगने का इत्यादि पाप उत्पन्न करानेवाली प्रवृत्तिरूप कथा का बारम्बार कहना - उपदेश देना वह पापोपदेश नाम का अनर्थदण्ड है।


परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधश्रृंगिश्रृखलादीनाम् ।
वधहेतूनां दानं हिंसादानं ब्रुवन्ति बुधाः ॥77॥

श्लोकार्थ: हिंसा के कारण जो फरसा, तलवार, कुदाली, गेंती, अग्नि, आयुध, आग्नेयास्त्र, विष, बेड़ी, साकंल इत्यादि के दान को सभी ज्ञानी हिंसादान अनर्थदण्ड कहते हैं। जिनसे हिंसा ही उत्पन्न होती है ऐसी वस्तु अन्य को देना, फावड़ा, कुदाल, खुरपा, कुशि, हथौड़ा, तलवार, छुरी, कटारी, तमंचा, भाला, बाण, धनुष, बन्दूक, तोप, बारूद गोला, गोली, चाबुक, दांतला, दंतीला, बेड़ी, सांकल, जहर, अग्नि इत्यादि वस्तुओं का दान करना, मांगने पर उधार देना, बेचना, किराये से देना वह सब हिंसादान नाम का अनर्थदण्ड है।


वधबन्धच्छेदादेर्द्वेषाद्रागाच्च परकलत्रादेः ।
आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥78॥

श्लोकार्थ: जो द्वेष से, बैर से, अपना स्वार्थ सिद्ध करने के रागरूप अभिप्राय से दूसरे की स्त्री - पुरुष आदि के वध, बंधन, मारण, छेदन, आदि का चिंतवन करता है उसे जो जिनशासन में प्रवीण हैं वे अपध्यान नाम का अनर्थदण्ड कहते हैं।


आरम्भसंगसाहसमिथ्यात्वद्वेषरागमदमदनैः ।
चेतः कलुषयतां श्रुतिरवधीनां दुःश्रुतिर्भवति ॥79॥

श्लोकार्थ: आरम्भ अर्थात् असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य, शिल्प; संग अर्थात् धन, धान्यादि परिग्रह; साहस अर्थात् आश्चर्यकारी बहादुरी आदि; मिथ्यात्व अर्थात् ब्रह्म अद्वैत, ज्ञान अद्वैत, क्षणिक याज्ञकादि विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक शास्त्र; राग अर्थात् आसक्ति; द्वेष अर्थात् वैर; मद अर्थात् अभिमान रूप आठ मद; मदन अर्थात् कामवेदना कृत विकार इनसे चित्त को कलुषित करनेवाले अवधि अर्थात् शास्त्र, उनका श्रवण करना वह दुःश्रुति नाम का अनर्थदण्ड है।


क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदम् ।
सरणं सारणमपि च प्रमादचर्यां प्रभाषन्ते ॥80॥

श्लोकार्थ: बिना प्रयोजन पृथ्वी खोदने का, पत्थर फोड़ने का आरम्भ; जल पटकने का, सींचने का, छिड़कने का, अवगाहन करने का आरम्भ; बिना प्रयोजन अग्नि भड़काने का, जलाने का, बुझाने का, दाबने का आरम्भ; पवन चलाने का, फूंकने का, पवन के यन्त्र रोकने का, अग्नि में धमने का वृथा आरम्भ; प्रयोजन बिना वनस्पति का छेदना, बिना प्रयोजन गमन करना, गमन कराना - ये समस्त कार्य करने को प्रमादचर्या नाम का अनर्थदण्ड कहते हैं।


कन्दर्पं कौत्कुच्यं मौखर्यमतिप्रसाधनं पञ्च ।
असमीक्ष्य चाधिकरणं व्यतीतयोऽनर्थदण्डकृद्विरतेः ॥81॥

श्लोकार्थ: चारित्रमोहनीय कर्म के उदय से रागभाव की अधिकता के कारण हास्य से मिश्रित भण्डवचन बोलना वह कंदर्प नाम का अतिचार है।१। तीव्रराग के उदय से हास्यरूप भण्डवचनों सहित काया की खोटी चेष्टा निंद्य क्रिया करना वह कौत्कुच्य नाम का अतिचार है।२। बिना प्रयोजन साररहित बहुत बकवाद करना वह मौखर्य नाम का अतिचार है। ३।
प्रयोजन रहित बहुत अधिक मन - वचन - काय की प्रवृत्ति करना वह असमीक्ष्याधिकरण कहलाता है। रागद्वेष बढ़ाने वाले काव्य, श्लोक, कवित्त छंद गीतों का स्मरण करना वह मन असमीक्ष्याधिकरण कहलाता है। पाप कथा द्वारा दूसरे के मन - वचन - काय को बिगाड़ने वाली खोटी कथा कहना वह वचन असमीक्ष्याधिकरण है। बिना प्रयोजन गमन करना, उठना, बैठना, दौड़ना, पटकना, फेंकना, पत्र, फल, पुष्प आदि का छेदन - भेदन - विदारण आदि करना, तथा अग्नि, विष, क्षार आदि देना वह काय असमीक्ष्याधिकरण नाम का अतिचार है।४।
जितने भोग - उपभोग से प्रयोजन सधे उससे अधिक बिना प्रयोजन का अति संग्रह करना वह अतिप्रसाधन नाम का अतिचार है ।


अक्षार्थानां परिसंख्यानं भोगोपभोगपरिमाणम् ।
अर्थवतामप्यवधो रागरतीनां तनूकृतये ॥82॥

श्लोकार्थ: पांच इंद्रियों के प्रयोजनवान विषयों में जो रागरूप आसक्ति भाव है उसे घटाने के लिये सीमा बांधाना, सीमित करना वह भोगोपभोग परिमाण नाम का व्रत है।


भुक्त्वा परिहातव्यो भोगो भुवत्वा पुनश्च भोक्तव्यः ।
उपभोगोऽशनवसनप्रभृतिः पञ्चेन्द्रियो विषयः ॥83॥

श्लोकार्थ: जो एक बार भोग करने के बाद फिर त्यागने योग्य हो जाता है वह भोग है। जो भोगने के बाद फिर भोगने योग्य रहता है वह उपभोग है। भोजन आदि पांच इन्द्रियों के विषय भोग हैं तथा वस्त्र आदि पाँच इन्द्रियों के विषय उपभोग हैं।


त्रसहतिपरिहरणार्थ क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहृयते ।
मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणों शरणमुपयातैः ॥84॥

श्लोकार्थ: जिनेन्द्र भगवान् के चरणों की शरण जिन्हें प्राप्त हो गई हैं ऐसे जो सम्यग्दृष्टि लोग हैं उन्हें त्रस जीवों की हिंसा के परित्याग के लिये क्षौद्र अर्थात्, मधु तथा पिशित अर्थात् मांस त्यागने योग्य ही हैं। प्रमाद अर्थात् जो हित अहित में असावधानी है उसे छोड़ने के लिये मद्य का त्याग अवश्य करना चाहिये।


अल्पफलबहुविघातान्मूलकमार्द्राणि श्रृङ्गवेराणि ।
नवनीत निम्बकुसुमं कैतकमित्येवमवहेयत् ॥85॥

श्लोकार्थ: जिनके सेवन से अपना प्रयोजनरूप फल तो अल्पसिद्ध होता है किन्तु खाने से अनन्त जीवों का घात होता है ऐसे कन्द, मूल, अदरक, कांटेदार छोटी झाड़ियों के बेर - श्रृंगवेर, कंदमूल, मक्खन, नीम के फूल, केतकी - केवड़ा के फूल जिनमें अनन्त जीवों का घात होता हैं वे अनंतकाय त्यागने योग्य ही हैं। जिनके एक शरीर में अनन्त जीव हैं वे अनंतकाय हैं। जो अपने लिये अनिष्ट है उसका त्याग कर देना, जो सेवन योग्य नहीं ऐसे अनुपसेव्यों का त्याग करना ही उचित है। यद्यपि अनिष्ट अनुपसेव्य के सेवन का कोई प्रयोजन ही नहीं है, तो भी अपने अभिप्राय से योग्य विषय का त्याग करना भी व्रत कहलाता है।


यदनिष्टं तद्व्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् ।
अभिसन्धिकृता विरतिः विषयाद् योग्याद् व्रतं भवति ॥86॥

श्लोकार्थ: जिनके सेवन से अपना प्रयोजनरूप फल तो अल्पसिद्ध होता है किन्तु खाने से अनन्त जीवों का घात होता है ऐसे कन्द, मूल, अदरक, कांटेदार छोटी झाड़ियों के बेर - श्रृंगवेर, कंदमूल, मक्खन, नीम के फूल, केतकी - केवड़ा के फूल जिनमें अनन्त जीवों का घात होता हैं वे अनंतकाय त्यागने योग्य ही हैं। जिनके एक शरीर में अनन्त जीव हैं वे अनंतकाय हैं। जो अपने लिये अनिष्ट है उसका त्याग कर देना, जो सेवन योग्य नहीं ऐसे अनुपसेव्यों का त्याग करना ही उचित है। यद्यपि अनिष्ट अनुपसेव्य के सेवन का कोई प्रयोजन ही नहीं है, तो भी अपने अभिप्राय से योग्य विषय का त्याग करना भी व्रत कहलाता है।


नियमो यमश्च विहितौं द्वेधा भोगोपभोगसंहारे ।
नियमः परिमितकालो यावज्जीवं यमो ध्रियते ॥87॥

श्लोकार्थ: भगवान् भोगोपभोग घटाने से नियम और यम ऐसा दो प्रकार का भोगोपभोग परिमाणव्रत कहा है। काल की मर्यादा लेकर त्याग करने को नियम कहा है, तथा जब तक इस देह में जीवन है तब तक (जीवन पर्यंत के लिये) त्याग करने को यम कहा जाता है।


भोजनवाहनशयनस्नानपवित्राङ्गरागकुसुमेषु ।
ताम्बूलवसनभूषण मन्मथसङ्गीतगीतेषु ॥88॥

श्लोकार्थ: भोगोपभोग परिमाणव्रत में नित्य ही इस प्रकार नियम करना चाहिये - आज के दिन में एक बार ही भोजन करूँगा या दो बार भोजन करूँगा या तीन बार इत्यादि भोजन करने का परिमाण करना; अथवा मैं आज के दिन इतनी जाति का अन्न तथा इतने रस, इतने प्रकार व्यंजन खाऊंगा, अधिक प्रकार के नहीं खाऊंगा - ऐसा भोजन का नियम करना चाहिये।
वाहन, हाथी, घोड़ा, रथ, ऊंट, बैल, पालकी, वहली (मोटर, रेल) नाव, जहाज (हवाईजहाज) इत्यादि वाहन के ऊपर बैठने - चढ़ने का नियम करना चाहिये। पलंग, खाट, बिस्तर इत्यादि में शयन करने का नियम करना चाहिये - मैं आज पलंग आदि पर ही शयन करूंगा या भूमि पर ही शयन करूंगा।
आज एक बार स्नान करूँगा, या दो बार स्नान करूँगा या स्नान ही नहीं करूँगा इत्यादि नियम करना चाहिये। पवित्र अंगराग अर्थात् चन्दन, केशर, कपूर आदि का विलेपन करना या नहीं करना इसका भी नियम करना चाहिये। फूल तथा फूलों की माला, आभरण आदि धारण करने का भी नियम करना चाहिये। ताम्बूल, इलायची, सुपारी, लौंग आदि खाऊंगा इसका भी नियम करना चाहिये।
वस्त्रों का भी नियम करना चाहिये कि आज इतने वस्त्र पहिनूंगा, अधिक नहीं पहिनूंगा। आज इतने ही आभरण पहिनूंगा, अधिक नहीं पहिनूंगा - ऐसा आभरण पहिनने का भी नियम करना चाहिये।
कामसेवन का भी नियम करना चाहिये; नृत्य देखने का भी नियम करना चाहिये; गीत गाने का तथा कलाकारों से गीत सुनने का भी नियम करना चाहिये।
हरितकाय के भी खाने का नियम करना, षट् रस के खाने - पीने का नियम करना, पानी पीने का भी नियम करना, सिंहासन, कुर्सी, चौकी इत्यादि आसन पर बैठने का भी नियम करना चाहिये। इस प्रकार अपने योग्य भोग - उपभोग का भी नित्य नियम करनेवाले के भोजन - पानी करते हुए भी निरन्तर संवर होता है।


अद्य दिवा रजनी वा पक्षो मासस्तथर्तुरयनं वा ।
इति कालपरिच्छित्या प्रत्याख्यानं भवेन्नियमः ॥89॥

श्लोकार्थ: अद्य अर्थात् एक घड़ी, मुहूर्त, प्रहर, दिन, रात्रि, पक्ष, एक माह, ऋतु अर्थात् दो माह, अयन अर्थात् छह माह इत्यादि काल का परिमाण करके त्याग करना वह नियम कहलाता है। इस प्रकार भोगोपभोग परिमाण व्रत का वर्णन किया।


विषय विषतोऽनुपेक्षानुस्मृतिरतिलौल्यमतितृषानुभवौ ।
भोगोपभोगपरिमाव्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥90॥

श्लोकार्थ: ये भोगोपभोग परिमाणव्रत के पांच अतिचार त्यागने योग्य हैं।

पंचम - शिक्षाव्रत अधिकार (श्लोक 91 से 121)

देशावकाशिकं वा सामयिकं प्रोषधोपवासो वा ।
वैय्यावृत्यं शिक्षाव्रतानि चत्वारि शिष्टानि ॥91॥

श्लोकार्थ: देशावकाशिक १, सामायिक २, प्रोषधोपवास ३, वैयावृत्य ४ - ऐसे ये चार शिक्षाव्रत कहे हैं।


देशावकाशिकं स्यात्कालपरिच्छेदनेन देशस्य ।
प्रत्यहमणुव्रतानां प्रतिसंहारो विशालस्य ॥92॥

श्लोकार्थ: अणुव्रतों के धारी पुरुषों द्वारा दिन - प्रीतिदिन काल की मर्यादा करके विशाल सीमा को थोड़ा - थोड़ा घटाते जाना उसका नाम देशावकाशिक शिक्षाव्रत है।


गृहहारि - ग्रामाणां-क्षेत्र-नदी-दाव-योजनानां च ।
देशावकाशिकस्य स्मरन्ति सीम्नां तपोवृद्धाः ॥93॥

श्लोकार्थ: तपोवृद्ध जो गणधरदेव हैं वे देशावकाशिक व्रत करने की सीमा - मर्यादा बतलाते हैं - गृह, मोहल्ला, ग्राम, क्षेत्र, नदी, वन, योजन को देशावकाशिक व्रत में सीमा कहते हैं। इनके बाहर मैं इतने समय तक नहीं जाऊंगा, ऐसा नियम लेना।


संवत्सरमृतुरयनंमासचतुर्मासपक्षमृक्षं च ।
देशावकाशिकस्य प्राहुः कालावधिं प्राज्ञाः ॥94॥

श्लोकार्थ: जो प्रवीण पुरुष हैं वे एक वर्ष, छह माह, चार माह, दो माह, एक पक्ष, एक नक्षत्र इस प्रकार देशावकाशिक व्रत में काल की मर्यादा कहते हैं।


सीमान्तानां परतः स्थूलेतरपञ्चपापसंत्यागात् ।
देशावकाशिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥95॥

श्लोकार्थ: प्रतिदिन जितने क्षेत्र का परिमाण किया हो उसके बाहर स्थूल तथा सूक्ष्म जो पाँच पाप हैं, उनका त्याग करने से देशावकाशिक व्रत करने से ही महाव्रतों की सिद्धि प्राप्त हो जाती है।


प्रेषणशब्दानयनं रूपाभिव्यक्तिः पुद्गलक्षेपो ।
देशावकाशिकस्य व्यपदिश्यन्तेऽत्ययाः पञ्च ॥96॥

श्लोकार्थ: जितने क्षेत्र की मर्यादा की थी उसके बाहर किसी प्रयोजन के लिये अपने नौकर को, मित्र को, पुत्र को या किसी अन्य को कहना कि तुम वहाँ जाकर वह काम कर दो - ऐसा कहना वह प्रेषण नाम का अतिचार है ।१।
मर्यादा के बाहर क्षेत्र में रहनेवाले से बातें करना, तथा शब्दों द्वारा इशारे से समझा देना कि अमुक काम कर दो - वह शब्द नाम का अतिचार है ।२।
मर्यादा के बाहर के क्षेत्र से किसी को बुलाना या वस्त्र आदि आवश्यक इच्छित पदार्थ को शब्दों से कहकर मंगवा लेना, वह आनयन नाम का अतिचार है ।३।
मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में रहनेवालों को इशारे से समझाने के लिये अपना रूप दिखाना, वह रूपाभिव्यक्ति नाम का अतिचार है ।४।
मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में वस्त्रादि द्वारा, कंकरी, पत्थर, लकड़ी आदि फेंककर अपनी उपस्थिति जताना, वह पुद्गलक्षेप नाम का अतिचार है ।५।
इस प्रकार देशावकाशिक व्रत के ये पाँच अतिचार त्यागने योग्य हैं।


आसमयमुक्तिमुक्तं पञ्चाघानामशेषभावेन ।
सर्वत्र च सामयिकाः सामयिकं नाम शंसन्ति ॥97॥

श्लोकार्थ: परम साम्यभाव को प्राप्त जो गणधर देव हैं वे सामायिक की प्रगट प्रशंसा करते हैं। मर्यादा के बाहर के क्षेत्र में तथा मर्यादा के भीतर के क्षेत्र में सर्वत्र ही समस्त मन, वचन, काय तथा कृत कारित, अनुमोदना द्वारा कार्य की मर्यादा करके सभी पाँच पापों का पूर्ण त्याग करना सामायिक कहलाता है।


मूर्धरुहमुष्टिवासो बन्धं पर्यंकबन्धनं चापि ।
स्थानमुपवेशनं वा समयं जानन्ति समयज्ञाः ॥98॥

श्लोकार्थ: समयज्ञ अर्थात् जो परमागम के जानने वाले हैं वे कहते हैं कि शिर के केशों को अच्छी तरह बांध कर, मुष्टिबंधन, वस्त्रबंधन, आसनबंधन करके किसी एकांत स्थान में खड़े रहकर या बैठकर, राग - द्वेष रहित शुद्ध आत्मा को काल की मर्यादा लेकर केवल जानता ही रहे।


एकान्ते सामयिकं निर्व्याक्षेपे वनेषु वास्तुषु च ।
चैत्यालयेषु वापि च परिचेतव्यं प्रसन्नधियाः ॥99॥

श्लोकार्थ: ऐसा विक्षेप रहित एकान्त स्थान हो, वन हो, बाग हो, मकान हो, चैत्यालय हो वहाँ पर प्रसन्न चित्त से शुद्धात्मा से परिचय करना चाहिये।


व्यापारवैमनस्याद्विनिवृत्त्यामन्तरात्मविनिवृत्त्या ।
सामयिकं बध्नीयादुपवासे चैक भुक्ते वा ॥100॥

श्लोकार्थ: काय की चेष्टारूप कार्यों से विरक्त बाह्य आरंभ से छूटकर तथा अन्तरात्मा रूप मन को भी विकल्प रहित करके, उपवास के दिन या एकासन के दिन सामायिक में बैठना चाहिये। आलस्य रहित पुरुष प्रतिदिन नियम से एकाग्रचित्त होकर सामायिक करता हुआ अपनी आत्मा से परिचय बढ़ाता जाता है। कैसी है सामायिक? अहिंसा आदि पाँच व्रतों की परिपूर्णता का कारण है।


सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यम् ।
व्रतपञ्चक परिपूरण कारणमवधान युक्तेन ॥101॥

श्लोकार्थ: काय की चेष्टारूप कार्यों से विरक्त बाह्य आरंभ से छूटकर तथा अन्तरात्मा रूप मन को भी विकल्प रहित करके, उपवास के दिन या एकासन के दिन सामायिक में बैठना चाहिये। आलस्य रहित पुरुष प्रतिदिन नियम से एकाग्रचित्त होकर सामायिक करता हुआ अपनी आत्मा से परिचय बढ़ाता जाता है। कैसी है सामायिक ? अहिंसा आदि पाँच व्रतों की परिपूर्णता का कारण है।


सामयिके सारम्भाः परिग्रहा नैव सन्ति सर्वेऽपि ।
चेलोपसृष्टमुनिरिव गृही तदा याति यतिभावम् ॥102॥

श्लोकार्थ: सामायिक के काल में गृहस्थ समस्त आरम्भ और परिग्रह से रहित हैं, इसलिये सामायिक करता हुआ गृहस्थ वस्त्र के उपसर्ग सहित मुनि के समान यतिपने के भाव को प्राप्त हो जाता है।


शीतोष्णदंशमशकपरीषहमुपसर्गमपि च मौनधराः ।
सामयिकं प्रतिपन्ना अधिकुर्वीरन्नचलयोगाः ॥103॥

श्लोकार्थ: सामायिक में स्थित गृहस्थ मौन धारण करता है, मन - वचन - काय को चलायमान नहीं करता हैं। शीत, उष्ण, दंशमशक आदि परीषह तथा चेतन - अचेतन कृत उपसर्ग को सहता है।


अशरणमशुभमनित्यं दुःखमनात्मानमावसामि भवम् ।
मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायन्तु सामयिके ॥104॥

श्लोकार्थ: सामायिक करने वाला गृहस्थ संसार का स्वरूप इस प्रकार विचारता है : -


वाक्कायमानसानां दुःप्रणिधानान्यनादरास्मरणे ।
सामयिकस्यातिगमा व्यज्यन्ते पञ्च भावेन ॥105॥

श्लोकार्थ: ये पाँच सामाजिक के अतिचार हैं - सामायिक करते समय वचनों के द्वारा संसार सम्बन्धी प्रवृत्ति करना वह वचन दु:प्रणिधान नाम का अतिचार है १; शरीर की संयम रहित चलायमानपने की चेष्टा करना वह काय दु:प्रणिधान नाम का अतिचार है २; मन में आर्त - रौद्र आदि चिंतवन करना वह मनो दु:प्रणिधान नाम का अतिचार हैं ३; सामायिक को उत्साह रहित निरादर से करना वह अनादर नाम का अतिचार है ४; सामायिक करते समय देव वंदन आदि के पाठ भूल जाना व कायोत्सर्ग आदि को भूल जाना वह अस्मरण नाम का अतिचार है ५। इस प्रकार अतिचार सहित सामायिक का वर्णन किया।


पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोषधोपवासस्तु ।
चतुरभ्यवहार्य्याणां प्रत्याख्यानं सदेच्छाभिः ॥106॥

श्लोकार्थ: पर्व जो अष्टमी और चतुर्दशी को दिन तथा रात्रि में चार प्रकार के भोजन का सम्यक् इच्छापूर्वक त्याग करना उसे प्रोषधोपवास जानना चाहिये। एक माह में दो अष्टमी और दो चतुर्दशी - ये चार अनादि से ही पर्व कहलाते हैं। इन पर्वों में गृहस्थ व्रत - संयम सहित ही रहता है। जो धर्मात्मा संयमी हैं वे तो सदाकाल सभी दिनों में व्रतों सहित ही रहते हैं। धर्म में अनुराग रखने वाला गृहस्थ एक माह में चार दिन तो सभी पाप के आरंभ और इंद्रियों के विषयों को त्याग करके, कषाय को नष्ट करके, व्रत शील, संयम सहित उपवास धारण करके, चार प्रकार के आहार का त्याग करके, संयम सहित रहता हैं, उसके प्रोषधोपवास व्रत जानना।


पञ्चानां पापनामलंक्रियारम्भगन्धपुष्पाणाम् ।
स्नानाञ्जननस्यानामुपवासे परिहृतिं कुर्य्यात् ॥107॥

श्लोकार्थ: उपवास के दिन हिंसादि पाँचों पापों का त्याग करना चाहिये, अलंक्रिया अर्थात् आभरण आदि से सजने का त्याग करना, तथा गृहकार्य का आरम्भ, जीविका का आरंभ छोड़ देना चाहिये। सुगंध, केशर, कपूर आदि, इत्र, फुलेल आदि के ग्रहण करने का त्याग करना चाहिये। स्नान करने, आंख में अंजन लगाने का, नास सूंघने का त्याग करना चाहिये। नृत्य, गीत, वादित्र आदि देखना, सुनना, बजाना का त्याग करना चाहिये। पाँच इंद्रियों के भोगों का त्याग करना चाहिये।


धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिबतु पाययेद्वान्यान् ।
ज्ञानध्यानपरो वा भवतूपवसन्नतन्द्रालुः ॥108॥

श्लोकार्थ: उपवास करने वाला गृहस्थ निरालसी होता हुआ ज्ञान के अभ्यास में तथा धर्मध्यान में तत्पर रहता है। अतितृष्णावान होकर कर्ण इंद्रिय द्वारा धर्मरूप अमृत का स्वयं पान करता है व अन्य भव्य जीवों को धर्मरूप अमृत का पान कराता है।


चतुराहारविसर्जनमुपवासः प्रोषधः सकृद्भुक्तिः ।
स प्रोषधोपवासो यदुपोष्यारम्भमाचरति ॥109॥

श्लोकार्थ: अशन, पान, खाद्य, स्वाद्य - यह चार प्रकार का आहार (कवलाहार) है। इनका त्याग वह उपवास है। धारणा के दिन (उपवास के पूर्व) में व पारणा के दिन (उपवास के बाद) में एक बाद भोजन करना उसे प्रोषध कहते हैं। इस प्रकार सोलह प्रहर तक भोजन आदि आरंभ छोड़कर पश्चात् भोजन आदि आरंभ के कार्य करने को प्रोषधोपवास कहते हैं।


ग्रहणविसर्गास्तरणान्यदृष्टमृष्टान्यनादरास्मणे ।
यत्प्रोषधोपवासव्यतिलङ्घनपञ्चकं तदिदम् ॥110॥

श्लोकार्थ: प्रोषधोपवास के ये पाँच अतिचार हैं। नेत्रों से देखे बिना तथा कोमल वस्त्र आदि उपकरण से शुद्ध किये बिना पूजा व स्वाध्याय के उपकरण ग्रहण करना १, देखे सोधे बिना ही पूजा तथा स्वाध्याय के उपकरण रख देना व शरीर के अंग हाथ पैरों को पसारना २, देखे सोधे बिना ही सोने के बिस्तर आदि बिछा देना ३, उपवास में अनादर करना, उत्साह रहित होना ४, उपवास के दिन क्रिया, पाठ आदि करना भूल जाना ५। इस प्रकार ये उपवास के पाँच अतिचार टालने योग्य हैं।


दानं वैयावृत्यं धर्माय तपोधनाय गुणनिधये ।
अनपेक्षितोपचारोपक्रियमगृहाय विभवेन ॥111॥

श्लोकार्थ: यहाँ परमागम में आहार दान ही को वैयावृत्य कहते हैं। जिनके तप ही धन है अर्थात् जो इच्छा निरोध आदि तपों को अपना अविनाशी धन जानते हैं वे तपोधन हैं। तप के बिना समस्त कलंक मल रहित आत्मा का शुद्ध स्वभावरूप अविनाशी धन नहीं प्राप्त होता है। जिन्होंने रागादि कषायमल को जला देने वाला तपरूपी धन प्राप्त कर लिया है, तथा संसार में नष्ट करने वाला जड़, अचेतन, बिनाशीक स्वर्ण आदि धन का त्याग कर दिया है, ऐसे तप की निधि, रत्नत्रय रूपी गुणों के निधान, परम वीतरागी दिगम्बर यतियों को दातार व पात्र की धर्मप्रवृत्ति चलाने के लिये आहारदान देना वह वीतरागी मुनियों की वैयावृत्य है।


व्यापत्तिव्यपनोदः पदयोः संवाहनं च गुणरागात् ।
वैयावृत्यं यावानुपग्रहोऽन्योऽपि संयमिनाम् ॥112॥

श्लोकार्थ: संयमीजनों पर आई हुई अनेक प्रकार की आपत्तियों को दूर कर देना, उनके चरण मर्दन करना तथा उनके गुणों में अनुराग करके आवश्यकतानुसार कार्य कर देना वैयावृत्य है।


नवपुण्यैः प्रतिपत्ति सप्तगुणसमाहितेन शुद्धेन ।
अपसूनारम्भाणामार्याणामिष्यते दानम् ॥113॥

श्लोकार्थ: जो दातार सप्तगुण सहित, नवधा भक्ति सहित होकर सूना रहित, आरम्भ रहित, सम्यग्दर्शन के धारी मुनियों को नव पुण्य परिणामों सहित अर्थात् आदरपूर्वक गौरव सहित अंगीकार करता है उसे दान कहते हें।


गृहकर्मणापि निचितं कर्मविमार्ष्टि खलु गृहविमुक्तानाम् ।
अतिथिनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि ॥114॥

श्लोकार्थ: गृह रहित अतिथि जो मुनि हैं उनकी प्रतिपूजा अर्थात् दानसम्मान आदि रूप जो उपासना है, वह गृहस्थ के षट्कर्मों द्वारा उपार्जित जो पाप कर्मरूप मल है, उसे दूर करके उसी प्रकार शुद्ध कर देती है, जैसे शरीर पर लगे हुए रुधिर रूप मल को जल धो देता है।


उच्चैर्गोत्रं प्रणतेभोगी दानादुपासनात्पूजा
भक्तेः सुन्दररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनिधिषु ॥115॥

श्लोकार्थ: तप के निधान, साम्यभाव के धारक, बाईस परिषहों को सहने वाले, अपनी देह से निर्ममत्व, पाँच इंद्रियों के विषयों से अत्यन्त विरक्त, अभिमान कषाय आदि रहित, आत्म विशुद्धता के इच्छुक ऐसे उत्तमपात्र जो मुनिराज हैं उन्हें प्रणति अर्थात् नमस्कार करने से स्वर्गलोक में जन्म, स्वर्ग से आकर तीर्थंकर रूप में जन्म, चक्रीरूप में जन्म रूप उच्चगोत्र को तथा सिद्धों की सर्वोच्कृष्ट उच्चता को प्राप्त होते हैं।
उत्तमपात्र को दान देने से भोगभूमि के भोग, देवलोक के भोग, फिर राजा आदि के भोग, फिर अहमिंद्र लोक के भोग पाकर, तीर्थंकर चक्रीपना पाकर, निर्वाण के अनन्त सुख के भोग को प्राप्त करते हैं। उत्तम पात्र जो साधु हैं उनकी उपासना करने से तीन लोक में पूज्य केवली हो जाते हैं। उत्तमपात्र जो साधु हैं उनकी भक्ति करने से सुन्दररूप जो केवलज्ञान का रूप वह प्राप्त हो जाता है।
उत्तमपात्र जो साधु हैं उनका स्तवन करने से तीन लोक में फैंल जानेवाली कीर्ति, इंद्र आदि द्वारा स्तवन कीर्तन को प्राप्त हो जाते हैं।


क्षितिगतमिववटबीजं पात्रगतं दानमल्पमपि काले ।
फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृताम ॥116॥

श्लोकार्थ: समय पर सत्पात्र को दिया गया दान थोड़ा भी हो तो सुन्दर पृथ्वी में बोये गये वट के बीज के समान प्राणियों को छाया अर्थात् महात्म्य, ऐश्वर्य तथा विभव अर्थात् भोगोपभोग की सम्पदारूप वांछित बहुत फल देता है। अत: पात्रदान का अचिन्त्य फल है। पात्रदान के प्रभाव से सम्यक्त्व ग्रहण हो जाता है सम्यक्त्व रहित मिथ्यादृष्टि भी पात्रदान के प्रभाव से उत्तम भोगभूमि में जाकर उत्पन्न हो जाता है।


आहारौषधयोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन ।
वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन चतुरस्त्राः ॥117॥

श्लोकार्थ: चतुरस्त्र अर्थात् जो प्रवीण ज्ञानी हैं वे आहारदान, औषधिदान, उपकरणदान व आवासदान ये चार प्रकार के दान करके वैयावृत्य को चार प्रकार का कहते हैं।


श्रीषेण वृषभसेने कौण्डेशः शूकरश्च दृष्टांताः ।
वैयावृत्यस्यैते चतुर्विकल्पस्य मन्तव्याः ॥118॥

श्लोकार्थ: चार प्रकार की वैयावृत्य के चार उदाहरण जानने योग्य हैं। आहारदान के फल में श्रीषेण राजा प्रसिद्ध हुए हैं। औषधिदान के फल में सेठ की पुत्री वृषभसेना प्रसिद्ध हुई है। शास्त्रदान के फल में कौण्डेश नाम का ग्वाला, जो आगे चलकर केवली बन गया, प्रसिद्ध हुआ है। वस्तिका दान (अभयदान) के फल में शूकर मरकर स्वर्ग लोक में महर्द्धिक देव होकर प्रसिद्ध हुआ है।


देवाधिदेवचरणे परिचरणं सर्वदुखनिर्हरणम् ।
कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादादृतो नित्यम् ॥119॥

श्लोकार्थ: देव जो इंद्रादि उनके अधिदेव अर्थात् स्वामी जो अरहन्तदेव, उनके चरणों के समीप जो परिचरण अर्थात् पूजन वह नित्य ही करना चाहिये। कैसी है पूजन? समस्त दुःखों का नाश करनेवाली, मनोवांछित को पूर्ण करनेवाली और कामभाव का नाश करनेवाली हैं।


अर्हच्चरणसपर्या महानुभावं महात्मनामवत् ।
भेकः प्रमोदमत्तः कुसुमेनैकेन राजगृहे ॥120॥

श्लोकार्थ: राजगृह नाम के नगर में जिनेन्द्र को पूजने के हर्ष में मस्त अपनी सामर्थ्य को नहीं जाननेवाला एक मेंढ़क हुआ है, जिसने अरहन्त के चरणों की पूजा करने का महान् प्रभाव जो भव्यजीव महापुरुष हैं उन्हें प्रगट करके दिखलाया हैं।


हरितपिधान निधाने ह्यनादरास्मरणमत्सरत्वानि ।
वैयावृत्यस्यैते व्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥121॥

श्लोकार्थ: वैयावृत्य अर्थात् दान के पाँच अतिचार त्यागने योग्य हैं - हरितपिधान, हरितनिधान, अनादर, अस्मरण, मत्सरत्व।

सप्तम - सल्लेखना अधिकार (श्लोक 122 से 135)

उपसर्गे दुभिक्षे जरसि रुजायां च निःप्रतिकारे ।
धर्माय तनुविमोचनमाहुः सल्लेखनामार्याः ॥122॥

श्लोकार्थ: जिसका इलाज नहीं दिखता हो, मिटने का उपाय नहीं दिखता हो, ऐसा उपसर्ग होने पर, दुर्भिक्ष आ जाने पर, वृद्ध अवस्था आ जाने पर, रोग हो जाने पर, धर्म की रक्षा के लिये जो शरीर का त्याग किया जाता है, उसे गणधरदेव सल्लेखना कहते हैं ।


अंतः क्रियाधिकरणं तपः फलं सकलदर्शिनः स्तुवते ।
तस्माद्यावद्विभवं समाधिमरणे प्रयतितव्यम् ॥123॥

श्लोकार्थ: अंत क्रिया अर्थात् सन्यासमरण, वही जिस तप का आधार हो, उस तप के फल की सकलदर्शी सर्वज्ञदेव भगवान् स्तुवते अर्थात् प्रशंसा करते हैं। जिस तप के करनेवाले को तप के फल से अन्त में सन्यास मरण नहीं हुआ वह तप निष्फल है। इसलिये जितनी अपनी सामर्थ्य हो उतना समाधिमरण करने में प्रकृष्ट यत्न करना योग्य है ।


स्नेहं वैरं सङ्गं परिग्रहं चापहाय शुद्धमनाः ।
स्वजनं परिजनमपि च क्षान्त्वा क्षमयेत् प्रियैर्वचनैः ॥124॥

श्लोकार्थ: स्नेह, बैर, संग, परिग्रह इनका त्याग करके शुद्ध मनवाला होकर, स्वजन तथा परिजन के जनों के प्रति क्षमा ग्रहण करके, तथा आप भी समस्त परिजनों से प्रिय हितरुप वचनों द्वारा क्षमा मांगकर क्षमा ग्रहण करावे।


आलोच्यसर्वमेनः कृतकारितमनुमतं च निर्व्याजम् ।
आरोपयेन्महाव्रतमामरणस्थायि निःशेषम् ॥125॥

श्लोकार्थ: यदि आपने कोई पाप अपराध किया हो, अन्य से कराया हो, करनेवालों को अच्छा जाना हो, तो उस अपराध को एकान्त में कपट रहित होकर निर्दोष वीतरागी ज्ञानी गुरु से आलोचना करे, तथा मरणपर्यन्त पूर्ण महाव्रतों का आरोपण करे, ग्रहण करे।


शोकं भयमवसादं क्लेदं कालुष्यमरतिमपि हित्वा ।
सत्वोत्साहमुर्दीय च मनः प्रसाद्यं श्रुतैरमृतैः ॥126॥

श्लोकार्थ: सन्यास के समय में शोक, भय, विषाद, क्लेष, कलुषता, अरति आदि भावों को छोड़कर कायरपना का अभाव करना चाहिये; अपने आत्म सत्व का प्रकाश (अनुभव, ज्ञान) करके शास्त्रज्ञानरुप अमृत के द्वारा मन को प्रसन्न रखना चाहिये ।


आहारंपरिहाय क्रमशः स्निग्धं विवर्द्धयेत्पानम् ।
स्निग्धं च हापयित्वा खरपानं पूरयेत्क्रमशः ॥127॥

श्लोकार्थ: काय सल्लेखना अनुक्रम से करना चाहिये। क्रमशः आहार को छोड़कर स्निग्ध दूध आदि को बढ़ाकर ग्रहण करे, फिर दूध आदि छोड़कर छाछ को बढ़ावे, फिर छाछ को छोड़कर गर्मजल बढ़ावे, फिर गर्म जल को भी छोड़कर शक्ति अनुसार एक दो उपवास करते हुए सर्व प्रयत्न से मन में पंच नमस्कार मंत्र का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करे।


खरपानहापनामपि कृत्वा कृत्वोपवासमपि शक्त्या ।
पञ्चनमस्कारमनास्तनुं त्यजेत् सर्वयत्नेन ॥128॥

श्लोकार्थ: काय सल्लेखना अनुक्रम से करना चाहिये। क्रमशः आहार को छोड़कर स्निग्ध दूध आदि को बढ़ाकर ग्रहण करे, फिर दूध आदि छोड़कर छाछ को बढ़ावे, फिर छाछ को छोड़कर गर्मजल बढ़ावे, फिर गर्म जल को भी छोड़कर शक्ति अनुसार एक दो उपवास करते हुए सर्व प्रयत्न से मन में पंच नमस्कार मंत्र का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करे।


जीवितमरणाशंसे भयमित्रस्मृतिनिदाननामामः ।
सल्लेखनातिचाराः पञ्च जिनेन्द्रैः समादिष्टः ॥129॥

श्लोकार्थ: सल्लेखना धारण करके जो जीने की इच्छा करता है कि - दो दिन और जी जाऊँ तो ठीक है, वह जीविताशंसा नाम का अतिचार है १; मरण की इच्च्छा करना कि - अब मरण हो जाय तो ठीक है, वह मरणाशंसा नाम का अतिचार है २; भय करना कि - देखो मरण में कैसा दुःख होगा, कैसे सहूँगा, वह भय नाम का अतिचार है ३; अपने स्वजन पुत्र - पुत्री - मित्र आदि की याद करना, वह मित्रस्मृति नाम का अतिचार है ४; आगामी पर्याय में विषय - भोग - स्वर्गादिकी चाह करना, वह निदान नाम का अतिचार है ५। इस प्रकार जिनेन्द्रदेव ने सल्लेखना के पँाच अतिचार कहे हैं।


निःश्रेयसमभ्युदयं निस्तीरं दुस्तरं सुखाम्बुनिधिम् ।
निःपिबति पीतधर्मा सर्वै र्दुःखैरनालीढः ॥130॥

श्लोकार्थ: इस प्रकार समाधिमरण धारण करनेवाला सम्यग्दृष्टि अंत समय में सल्लेखना सहित बारह व्रतों को धारण कर लेता है; वह जिनेन्द्र के धर्मरुप अमृत का पानकर तृप्त हो जाता है। पीतधर्मा अर्थात् जिसने धर्म का आचरण पिया है ऐसा धर्मात्मा श्रावक अभ्युदय अर्थात् स्वर्ग का महद्धिक देवपना असंख्यात काल तक भोगकर, फिर मनुष्यों में उत्तम राज्यादि वैभव पाकर, फिर संसार - शरीर - भोगों से विरक्तहोकर, शुद्ध संयम अंगीकार करके निःश्रेयस जो निर्वाण है, उसे निःपिबति अर्थात् आस्वादन करता है, अनुभव करता है। कैसा है निःश्रेयस ? निस्तीर अर्थात् जिसके किनारे का कोई अंत नही है तथा दुस्तर है अर्थात् जिसका पार नहीं है, तथा सुख जल का समुद्र है ऐसे निर्वाण को समस्त दुःखों से अस्पृष्ट रहता हुआ भोगता है।


जन्मजरामयमरणैः शोकैः दुखैः भयैश्च परिमुक्तम् ।
निर्वाणं शुद्ध सुखं निःश्रेयसमिष्यते नित्यम् ॥131॥

श्लोकार्थ: जन्म, जरा, रोग, मरण से रहित; शोक, दुःख, भय से रहित; नित्य, अविनाशी, समस्त पर का संयोग रहित; केवल शुद्ध, सुख स्वरुप जो निर्वाण है, उसे निःश्रेयस कहते हैं।


विद्यादर्शनशक्तिस्वास्थ्यप्रह्लादतृप्तिशुद्धियुजः ।
निरतिशया निरवधयो निःश्रेयसमावसन्ति सुखम् ॥132॥

श्लोकार्थ: विद्या अर्थात् केवलज्ञान, अनन्तदर्शन तथा अनन्तवीर्य, स्वास्थ्य अर्थात् परमवीतरागता, प्रल्हाद अर्थात् अनन्त सुख, तृप्ति अर्थात् विषयों की निर्वाछकता, शुद्धि अर्थात् द्रव्यकर्म - भाव कर्म की रहितता से आत्म स्वरुप को प्राप्त हुए, निरतिशया अर्थात् पूर्वोक्त ज्ञानादिगुणों की हीनता - अधिकता से रहित, निरवधयः अर्थात् काल की मर्यादा रहित होते हुए ऐसा जो निर्वाण उसमें निश्रेयस अर्थात् सुखरुप जैसे होते हैं, वैसे रहते हैं।


काले कल्पशतेऽपि च गते शिवानां न विक्रिया लक्ष्या ।
उत्पातोऽपि यदि स्यात् त्रिलोकसम्भ्रान्तिकरणपटुः ॥133॥

श्लोकार्थ: अनन्तानन्त कल्पकाल व्यतीत हो जाने पर भी मुक्त जीवों को विकार अर्थात् स्वरुप के संबंध में अन्यथाभाव नहीं देखा जाता है, न ही प्रमाण से जानने में आता है। तीनों लोकों को संभ्रमन (उलट - पुलट) करने में समर्थ ऐसा कोई उत्पात हो जाने पर भी सिद्धों को विकार नही होता है।


निःश्रेयसमधिपन्नास्त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं दधते ।
निःकिट्टिकालिमाच्छविचामीकरभासुरात्मानः ॥134॥

श्लोकार्थ: जो निर्वाण को प्राप्त हुए मुक्त जीव हैं वे किट्ट कालिमा रहित, कांतिमान छवि को धारण करनेवाले स्वर्ण के समान, द्रव्यकर्म - भावकर्म - नोकर्म रुप मलरहित - दैदीप्यमान होते हुए तीन लोक की शिखामणिरुप लक्ष्मी (शोभा) को धारण करते हैं।


पूजार्थाज्ञैश्वर्यैर्बलपरिजनकामभोगभूयिष्ठैः ।
अतिशयितभुवनद्भुवनमद्भुतमभ्युदयं फलति सद्धर्मः ॥135॥

श्लोकार्थ: समाधि से उपार्जित सम्यग् धर्म अभ्युदय अर्थात् इन्द्रादि पदवी के रुप में फलता है। कैसा अभ्युदय फलता है ? पूजा (प्रतिष्ठा), धन, आज्ञा, ऐश्वर्य द्वारा तथा बल, परिकर के लोग, कामभोग की सामग्री की प्रचुरता तीनलोक में नहीं समाती है; तीनलोक में आश्चर्यरुप अभ्युदय इस सम्यक् धर्म का ही फल है।

अष्टम - प्रतिमा अधिकार (श्लोक 136 से 150)

श्रावकपदानि देवैरेकादश देशितानि येषु खलु ।
स्वगुणाः पूर्वगुणैः सह संतिष्ठन्ते क्रमविवृद्धाः ॥136॥

श्लोकार्थ: भगवान् सर्वज्ञदेव ने श्रावक धर्म के ग्यारह स्थान कहे हैं। वे स्थान पूर्व के स्थानों के गुणों सहित क्रम से बढ़ते हुए रहते हैं। श्रावक के ग्यारह पद ये हैं: दर्शन १, व्रत २, सामायिक ३, प्रोषधोपवास ४, सचित्त त्याग ५, रात्रिभोजन त्याग ६, ब्रह्मचर्य ७, आरम्भ त्याग ८, परिग्रह त्याग ९, अनुमति त्याग १०, उद्दिष्ट त्याग ११ - ऐसे ये ग्यारह पद हैं।


सम्यग्दर्शनशुद्धः संसारशरीरभोगनिर्विण्णः ।
पंचगुरुचरणशरणो दार्शनिकस्तत्त्वपथगृह्यः ॥137॥

श्लोकार्थ: जो सम्यग्दर्शन के पच्चीस मल दोषों से रहित हो; निरन्तर संसार - वास से, शरीर के साथ से, इन्द्रियों के भोगों से विरक्त हो; पंच परमेष्ठी ही जिसको शरणभूत हों; सर्वज्ञभाषित जीवादि तत्त्वों का श्रद्धान करनेवाला हो; वह सत्यार्थ मार्ग में ग्रहण करने योग्य दार्शनिक श्रावक प्रथम पद का धारक होता है।


निरतिक्रमणमणुव्रतपंचकमपि शीलसप्तकं चापि ।
धारयते निःशल्यो योऽसौ व्रतिनों मतो व्रतिकः ॥138॥

श्लोकार्थ: जो अतिचार रहित पाँच अणुव्रत और सात शील (तीन गुणव्रत,चार शिक्षाव्रत) इन बारह व्रतों को माया - मिथ्या - निदान शल्यों से रहित होकर धारण करता है, वह व्रतियों के बीच व्रती श्रावक माना जाता है ।


चतुरावर्तत्रितयश्चतुःप्रणामः स्थितो यथाजातः ।
सामयिको द्विनिषद्यस्त्रियोग शुद्धस्त्रिसन्ध्यमभिवन्दी ॥139॥

श्लोकार्थ: सामायिक में पंच नमस्कार के पहले व अन्त में तथा थोस्सामि के पहिले चारों दिशाओं में एक - एक प्रणाम, तीन - तीन आवर्त करता है; कायोत्सर्ग में स्थित, बाह्य आभ्यन्तर परिग्रह से रहित, दो आसन में से किसी एक आसन में, देववंदन के पहले व पश्चात् दो बार झुककर, दिन में तीन बार वन्दना सहित सामायिक करनेवाले को सामायिक नाम के तीसरे पद में जानना। इसकी विशेष विधि बहुज्ञानी गुरुओं की परिपाटी से कहे अनुसार प्रमाण है ।


पर्वदिनेषु चतुर्ष्वपि मासे-मासे स्वशक्तिमनिगुह्य ।
प्रोषधनियमविधायी प्रणधिपरः प्रोषधानशनः ॥140॥

श्लोकार्थ: एक - एक माह में दो अष्टमी, दो चतुर्दशी इस प्रकार चार पर्व के दिनों में अपनी शक्ति को नहीं छिपाकर, आहार - पानी आदि का त्यागकर या नीरस आहार या अल्प आहार या छाँछ आदि मात्र ही लेकर, शुभ ध्यान में लीन होकर प्रोषध पूर्वक नियम से उपवास करनेवाले को, जो चारों पर्वों में इसी प्रकार रहता है, उस प्रोषध नाम के चौथे पद में जानना ।


मूलफलशाकशाखाकरीरकन्दप्रसूनबीजानि ।
नामानि योऽत्ति सोऽयं सचित्तविरतो दयामूर्तिः ॥141॥

श्लोकार्थ: जो श्रावक मूल, फल, पत्र, डाली, करीर ( कोंपल, वंशकिरण ), कंद, फल और बीज बिना अग्नि से पकाये, कच्चे हो; उन्हें निरर्गल होकर भक्षण नहीं करता है, वह दया की मूर्ति ही सचित्तविरत नाम के पांचवें पद में स्थित जानना ।


अन्नं पानं खाद्यं लेह्यं नाश्नाति यो विभावर्याम् ।
स च रात्रिभुक्तिविरतः सत्वेष्वनुकम्पमानमनाः ॥142॥

श्लोकार्थ: जो प्राणियों पर अनुकम्पा ( दया ) रुप परिणामों को मन में धारण करनेवाला पुरुष रात्रि में अन्न से बना हुआ भोजन; पान अर्थात् जल, दूध, शरबत इत्यादि पीने योग्य; खाद्य अर्थात् पेड़ा, लड्डू, पाक आदि; लेह्य अर्थात् स्वाद लेने योग्य मात्र इलायची, सुपारी, लौग, औषधि आदि - इस प्रकार चार तरह से कहने से समस्त खाने योग्य - पीने योग्य सामग्री को रात्रि में नहीं खाता है, वह रात्रि भुक्तिविरत नामक छठे पद का धारी श्रावक है ।


मलबीजं मलयोनिं गलन्मलं पूतगन्धि बीभत्सं ।
पश्यन्नङ्गमनङ्गाद् विरमति यो ब्रह्मचारी सः ॥143॥

श्लोकार्थ: यह शरीर माता के रुधिर व पिता के वीर्यरुप मल से उत्पन्न हुआ है, इसलिये इसका बीज मल ही है। यह शरीर मल को ही उत्पन्न करता है, अतः यह मल की योनि है। यह सदा ही नव द्वारों से मल को ही बहाता रहता है, अतः गलन्मल है। महादुर्गन्धयुक्त तथा घृणा का स्थान है। ऐसे शरीर को देखते हुए जो कामभाव से विरक्त हो जाता है, वह ब्रह्मचारी सप्तम पद वाला है।


सेवाकृषिवाणिज्यप्रमुखादारम्भतो व्युपारमति ।
प्राणातिपातहेतोर्योऽसावारम्भविनिवृत्तः ॥144॥

श्लोकार्थ: जो जीव हिंसा के कारण हैं ऐसे नौकरी (सेवा), कृषि, व्यापार आदि से मुख्यता से, तथा असिकर्म, लेखनकर्म, शिल्पकर्म से भी जिनमें हिंसा होती है, ऐसे आरंभों से विरक्त होता है, वह आरंभनिवृत नामक आठवें पद का धारी श्रावक है।


बाह्येषु दशसु वस्तुषु ममत्वमुत्सृज्य निर्ममत्वरतः ।
स्वस्थः संतोषपरः परिचितपरिग्रहाद्विरतः ॥145॥

श्लोकार्थ: दश प्रकार के बाह्य परिग्रह में ममत्व छोड़कर के, हमारा किंचित् भी कुछ भी नहीं है ऐसा निर्ममत्वपनें में लीन रहना है; देहादि, रागादि, समस्त परद्रव्य - पर पर्यायो में आत्मबुद्धि रहित होकर, अपने अविनाशी ज्ञायक भाव में स्थिर रहता है; जो भोजन,स्थान, वस्त्रादि कर्मोदय से मिला है उससे अधिक नहीं चाहता हुआ, संतोषरुप होकर, समस्त वांछा - दीनता रहित हो जाता है; साथ में जो परिचित परिग्रह है उससे भी अत्यन्त विरक्त रहता है; वह परिग्रहत्यागी श्रावक नवमें पदवाला होता है।


अनुमतिरारम्भे वा परिग्रहे ऐहिकेषु कर्मसु वा ।
नास्ति खलु यस्य समधीरनुमतिविरतः स मन्तव्यः ॥146॥

श्लोकार्थ: जो आरंभ में, परिग्रह में, इसलोक संबंधी कार्य जो विवाह आदि, गृह बनवाना, वणिज, सेवा इत्यादि क्रिया में, कुटुम्ब के लोग पूछें तो भी अनुमति नहीं देता है; तुमने अच्छा किया - ऐसा मन - वचन - काय से नहीं प्रकट करता; रागादि रहित समबुद्धि वाला है, वह श्रावक अनुमतिविरत है।


गृहतो मुनिवनमित्वा गुरूपकण्ठे व्रतानि परिगृह्य ।
भैक्ष्याशनस्तपस्यन्नुत्कष्टश्चेलखण्डधरः ॥147॥

श्लोकार्थ: जो समस्त परिग्रह का त्याग करके, अपने घर से मुनियों के रहने के वन मे जाकर, गुरुओं के समीप व्रतों का ग्रहण करके, खण्ड - वस्त्र धारण करके भिक्षा द्वारा भोजन करता हुआ तपश्चरण करता है, वह उत्कृष्ट श्रावक है।


पापमरातिर्धर्मो बन्धुर्जीवस्य चेति निश्चिन्वन् ।
समयं यदि जानीते श्रेयो ज्ञाता ध्रुवं भवति ॥148॥

श्लोकार्थ: पाप इस जीव का वैरी है, धर्म वह बन्धु है - ऐसा दृढ़ निश्चय करता हुआ जो अपने को समय अर्थात् शुद्ध आत्म स्वरुप को जानता है, वही अपने कल्याण के जाननेवाला होता है।


येन स्वयं वीतकलंकविद्यादृष्टिक्रियारत्नकरण्डभावम् ।
नीतस्तमायाति पतीच्छयेव सर्वार्थसिद्धिस्त्रिषु विष्टपेषु ॥149॥

श्लोकार्थ: जो पुरुष अपने आत्मा को कलंक व अतिचारों से रहित निर्दोष ज्ञान - दर्शन - चारित्ररुप रत्नों का करण्ड अर्थात् पिटारा की पात्रता को प्राप्त कर लेता है, उस पुरुष को तीनलोक में सर्व वांछित अर्थ की सिद्धि उसी प्रकार हो जाती है जिस प्रकार अपने पति को प्राप्त स्त्री की सर्व - अर्थ सिद्धि हो जाती है।


सुखयतु सुखभूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिव जननी मां शुद्धशीला भुनक्तु ।
कुलमिव गुणभूषा कन्यका संपुनीताज्जिनपतिपद पद्मप्रेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मीः ॥150॥

श्लोकार्थ: जिनेन्द्र भगवान् के चरण कमलों का अवलोकन करनेवाली सम्यग्दर्शनरुप लक्ष्मी मुझे उसी प्रकार सुखी कर दे, जिस प्रकार कामिनी (स्त्री) कामी पुरुष को सुखी कर देती है; जैसे शुद्धशीला अर्थात् शुद्ध स्वभाव की धारक माता अपने पुत्र का पालन करती है, वैसा ही मेरा पालन करो; तथा जैसे शीलादि गुण ही हैं आभूषण जिसके ऐसी कन्या कुल को पवित्र करती है, उसी प्रकार हे सम्यग्दर्शन! मुझे भी पवित्र करो, उज्ज्वल करो।