लोक में धर्म के नाम पर कई बातें प्रचलित हैं, जिन्हें आचार्य समन्तभद्र ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में मूढ़ता और मिथ्या श्रद्धान कहा है। सम्यग्दर्शन तीन मूढ़ताओं से रहित, आठ अंगों सहित और आठ मदों से रहित होता है (श्लोक ४)। नीचे हर मिथक के साथ ग्रन्थ का कथन और श्लोक दिया है।
१. मिथक: नदी या समुद्र में स्नान करने से पाप धुलते हैं और धर्म होता है
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: लौकिक लोगों का आचरण देखकर नदी में स्नान करने में और समुद्र में स्नान करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। धर्म तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं, जो कर्म बन्धन को नष्ट करते हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३
२. मिथक: रेत या पत्थरों का ढेर लगाने से पुण्य मिलता है
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: रेत का ढेर और पाषाण का ढेर करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। सम्यग्दर्शन लोकमूढ़ता रहित ही होता है।
स्रोत: श्लोक २२
३. मिथक: पर्वत से कूदकर या अग्नि में गिरकर प्राण देने से स्वर्ग या मोक्ष मिलता है
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: पर्वत से गिर पड़ने में और अग्नि में गिर पड़ने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। संसार के दुःखों से निकालकर उत्तम सुख में धरने वाला धर्म रत्नत्रय है, और उससे उलटे मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र संसार भ्रमण की परिपाटी हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३
४. मिथक: मनचाहा वर पाने के लिए किसी भी देवता की पूजा कर लो
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: वर की इच्छा से आशावान् होकर राग और द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना देवमूढ़ता है।
स्रोत: श्लोक २३
५. मिथक: भगवान् प्रसन्न होकर भक्त को फल देते हैं और रुष्ट होकर दण्ड देते हैं
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सच्चे आप्त में राग, द्वेष, मोह आदि अठारह दोष नहीं होते। वे अपनी ख्याति, लाभ, पूजा के प्रयोजन बिना और शिष्यों में राग बिना ही हित का उपदेश देते हैं, जैसे शिल्पी के हाथ का स्पर्श पाकर मृदंग बजता है पर बदले में कुछ नहीं चाहता।
स्रोत: श्लोक ६, श्लोक ८
६. मिथक: भगवान् जन्म लेते हैं, बूढ़े होते हैं और मरते हैं (अवतार)
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जिसमें क्षुधा, तृषा, जरा, रोग, जन्म, मृत्यु, भय, मद आदि दोष नहीं होते, वही आप्त है। वह निर्दोष, सर्वज्ञ और हितोपदेशक होता है, इन तीन गुणों के बिना आप्तपना नहीं होता।
स्रोत: श्लोक ५ से ६
७. मिथक: परिग्रह और आरम्भ रखने वाला बाबा भी गुरु है, उसकी बात आदर से माननी चाहिए
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: परिग्रह, आरम्भ और हिंसा सहित संसार के भँवर में पड़े पाखण्डियों को प्रधान मानकर उनके वचनों में आदर से प्रवर्तन करना पाखण्डिमूढ़ता है। प्रशंसनीय तपस्वी वही है जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ रहित, परिग्रह रहित और ज्ञान, ध्यान, तप में लीन हो।
स्रोत: श्लोक २४, श्लोक १०
८. मिथक: डर या लालच से कुदेव को प्रणाम कर लेने में कोई दोष नहीं
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शुद्ध सम्यग्दृष्टि भय से, आशा से, स्नेह से या लोभ से भी कुदेव, कुआगम और कुलिंगी को प्रणाम और विनय नहीं करते।
स्रोत: श्लोक ३०
९. मिथक: धर्म ऊँची जाति या ऊँचे कुल वालों का ही है
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सम्यग्दर्शन सहित चाण्डाल को भी गणधर देव “देव” कहते हैं, जैसे राख में दबे अंगार को अग्नि ही कहते हैं। कुल और जाति का मद करना सम्यग्दर्शन का दोष है।
स्रोत: श्लोक २८, श्लोक २५
१०. मिथक: जो जिस योनि में जन्मा, वह सदा वैसा ही रहेगा
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: धर्म के प्रभाव से कुत्ता भी देव हो जाता है, और पाप के प्रभाव से देव भी कुत्ता हो जाता है।
स्रोत: श्लोक २९
११. मिथक: केवल बाहरी वेष और क्रिया से ही मोक्षमार्ग मिल जाता है
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जैसे बीज के बिना वृक्ष नहीं उगता, वैसे सम्यक्त्व के बिना ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल नहीं होते। दर्शनमोह रहित गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है, और मोह सहित अनगार मोक्षमार्गी नहीं।
स्रोत: श्लोक ३२ से ३३
१२. मिथक: पुराना लिखा है तो हर ग्रन्थ शास्त्र है, मान लेना चाहिए
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शास्त्र वही है जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसका उल्लंघन न हो सके, प्रत्यक्ष और अनुमान से जिसमें विरोध न आए, जो वस्तु का यथार्थ स्वरूप कहे, सबका हित करे और कुमार्ग का निषेध करे।
स्रोत: श्लोक ९
यह तुलना किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सामने रखने के लिए है।
स्रोत ग्रन्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र, हिन्दी टीका पं. सदासुखदास जी कासलीवाल।
पूरे श्लोक एवं अर्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Shlok Evam Arth (Acharya Samantabhadra)
मूल श्लोक: रत्नकरण्ड श्रावकाचार मूल श्लोक (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Mool Shlok (Acharya Samantabhadra)