रत्नकरण्ड श्रावकाचार: लौकिक मिथक और उनका खण्डन (आचार्य समन्तभद्र देव के आधार पर) | Ratnakarand Shravakachar: Laukik Mithak Aur Unka Khandan

लोक में धर्म के नाम पर कई बातें प्रचलित हैं, जिन्हें आचार्य समन्तभद्र ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में मूढ़ता और मिथ्या श्रद्धान कहा है। सम्यग्दर्शन तीन मूढ़ताओं से रहित, आठ अंगों सहित और आठ मदों से रहित होता है (श्लोक ४)। नीचे हर मिथक के साथ ग्रन्थ का कथन और श्लोक दिया है।

१. मिथक: नदी या समुद्र में स्नान करने से पाप धुलते हैं और धर्म होता है

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: लौकिक लोगों का आचरण देखकर नदी में स्नान करने में और समुद्र में स्नान करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। धर्म तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं, जो कर्म बन्धन को नष्ट करते हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३

२. मिथक: रेत या पत्थरों का ढेर लगाने से पुण्य मिलता है

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: रेत का ढेर और पाषाण का ढेर करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। सम्यग्दर्शन लोकमूढ़ता रहित ही होता है।
स्रोत: श्लोक २२

३. मिथक: पर्वत से कूदकर या अग्नि में गिरकर प्राण देने से स्वर्ग या मोक्ष मिलता है

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: पर्वत से गिर पड़ने में और अग्नि में गिर पड़ने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। संसार के दुःखों से निकालकर उत्तम सुख में धरने वाला धर्म रत्नत्रय है, और उससे उलटे मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र संसार भ्रमण की परिपाटी हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३

४. मिथक: मनचाहा वर पाने के लिए किसी भी देवता की पूजा कर लो

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: वर की इच्छा से आशावान् होकर राग और द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना देवमूढ़ता है।
स्रोत: श्लोक २३

५. मिथक: भगवान् प्रसन्न होकर भक्त को फल देते हैं और रुष्ट होकर दण्ड देते हैं

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सच्चे आप्त में राग, द्वेष, मोह आदि अठारह दोष नहीं होते। वे अपनी ख्याति, लाभ, पूजा के प्रयोजन बिना और शिष्यों में राग बिना ही हित का उपदेश देते हैं, जैसे शिल्पी के हाथ का स्पर्श पाकर मृदंग बजता है पर बदले में कुछ नहीं चाहता।
स्रोत: श्लोक ६, श्लोक ८

६. मिथक: भगवान् जन्म लेते हैं, बूढ़े होते हैं और मरते हैं (अवतार)

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जिसमें क्षुधा, तृषा, जरा, रोग, जन्म, मृत्यु, भय, मद आदि दोष नहीं होते, वही आप्त है। वह निर्दोष, सर्वज्ञ और हितोपदेशक होता है, इन तीन गुणों के बिना आप्तपना नहीं होता।
स्रोत: श्लोक ५ से ६

७. मिथक: परिग्रह और आरम्भ रखने वाला बाबा भी गुरु है, उसकी बात आदर से माननी चाहिए

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: परिग्रह, आरम्भ और हिंसा सहित संसार के भँवर में पड़े पाखण्डियों को प्रधान मानकर उनके वचनों में आदर से प्रवर्तन करना पाखण्डिमूढ़ता है। प्रशंसनीय तपस्वी वही है जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ रहित, परिग्रह रहित और ज्ञान, ध्यान, तप में लीन हो।
स्रोत: श्लोक २४, श्लोक १०

८. मिथक: डर या लालच से कुदेव को प्रणाम कर लेने में कोई दोष नहीं

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शुद्ध सम्यग्दृष्टि भय से, आशा से, स्नेह से या लोभ से भी कुदेव, कुआगम और कुलिंगी को प्रणाम और विनय नहीं करते।
स्रोत: श्लोक ३०

९. मिथक: धर्म ऊँची जाति या ऊँचे कुल वालों का ही है

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सम्यग्दर्शन सहित चाण्डाल को भी गणधर देव “देव” कहते हैं, जैसे राख में दबे अंगार को अग्नि ही कहते हैं। कुल और जाति का मद करना सम्यग्दर्शन का दोष है।
स्रोत: श्लोक २८, श्लोक २५

१०. मिथक: जो जिस योनि में जन्मा, वह सदा वैसा ही रहेगा

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: धर्म के प्रभाव से कुत्ता भी देव हो जाता है, और पाप के प्रभाव से देव भी कुत्ता हो जाता है।
स्रोत: श्लोक २९

११. मिथक: केवल बाहरी वेष और क्रिया से ही मोक्षमार्ग मिल जाता है

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जैसे बीज के बिना वृक्ष नहीं उगता, वैसे सम्यक्त्व के बिना ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल नहीं होते। दर्शनमोह रहित गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है, और मोह सहित अनगार मोक्षमार्गी नहीं।
स्रोत: श्लोक ३२ से ३३

१२. मिथक: पुराना लिखा है तो हर ग्रन्थ शास्त्र है, मान लेना चाहिए

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शास्त्र वही है जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसका उल्लंघन न हो सके, प्रत्यक्ष और अनुमान से जिसमें विरोध न आए, जो वस्तु का यथार्थ स्वरूप कहे, सबका हित करे और कुमार्ग का निषेध करे।
स्रोत: श्लोक ९

यह तुलना किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सामने रखने के लिए है।


स्रोत ग्रन्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र, हिन्दी टीका पं. सदासुखदास जी कासलीवाल।
पूरे श्लोक एवं अर्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Shlok Evam Arth (Acharya Samantabhadra)
मूल श्लोक: रत्नकरण्ड श्रावकाचार मूल श्लोक (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Mool Shlok (Acharya Samantabhadra)

१. कथा: स्नान से धुला मैल, पाप नहीं

एक नगर में धनदत्त नाम का सेठ रहता था। पर्व का दिन आया तो नगर के बहुत से लोग नदी स्नान को चल पड़े। सब कहते थे कि आज नदी में डुबकी लगाओ तो सारे पाप धुल जाते हैं। धनदत्त भी भीड़ के साथ चल पड़ा।

रास्ते में उसका पुराना मित्र जिनदत्त मिला, जो प्रतिदिन जिनवाणी का स्वाध्याय करता था। धनदत्त ने कहा, “चलो मित्र, आज स्नान करके पाप धो आएँ।”

जिनदत्त मुस्कुराया और बोला, “मित्र, पानी शरीर का मैल धोता है। जो कर्म आत्मा से बँधे हैं, वे पानी से कैसे धुलेंगे? यदि नदी में उतरने से पाप धुलते, तो नदी की मछलियाँ तो सबसे पहले मोक्ष पा लेतीं।”

धनदत्त सोच में पड़ गया। उसने पूछा, “तो फिर धर्म क्या है?”

जिनदत्त ने कहा, “आचार्य समन्तभद्र ने यही समझाया है। धर्म वह है जो कर्म बन्धन को नष्ट करे, और वह है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र। केवल लोगों को देखकर किसी काम में धर्म मान लेना मूढ़ता है।”

उस दिन धनदत्त नदी से लौट आया और जिनदत्त के साथ स्वाध्याय में बैठ गया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: लौकिक लोगों का आचरण देखकर नदी में स्नान करने में और समुद्र में स्नान करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। धर्म तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र हैं, जो कर्म बन्धन को नष्ट करते हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३

सीख: शरीर की शुद्धि जल से होती है, आत्मा की शुद्धि रत्नत्रय से।

२. कथा: पत्थरों का ढेर और पुण्य

सुमति अपनी दादी के साथ पहाड़ी रास्ते से तीर्थ वन्दना को जा रही थी। रास्ते के किनारे जगह जगह छोटे छोटे पत्थरों के ढेर लगे थे। कुछ यात्री रुककर उन पर और पत्थर रख रहे थे।

सुमति ने पूछा, “दादी, ये लोग पत्थर क्यों रख रहे हैं?”

पास खड़े एक यात्री ने कहा, “बिटिया, यहाँ ढेर लगाओ तो पुण्य मिलता है, मन की मुराद पूरी होती है।”

सुमति भी पत्थर उठाने लगी तो दादी ने प्यार से उसका हाथ थाम लिया। “बेटा, पत्थर पर पत्थर रखने से आत्मा में क्या बदला? न क्रोध घटा, न मोह घटा, न किसी जीव का भला हुआ। केवल दूसरों को करते देखकर उसमें धर्म मान लेना, इसी को आचार्य ने लोकमूढ़ता कहा है।”

सुमति ने पत्थर वहीं रख दिया। “तो दादी, पुण्य कैसे होता है?”

दादी बोलीं, “भावों के सुधरने से। चलो, ऊपर चलकर भगवान् के दर्शन करें और उनके गुणों को याद करें।”

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: रेत का ढेर और पाषाण का ढेर करने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। सम्यग्दर्शन लोकमूढ़ता रहित ही होता है।
स्रोत: श्लोक २२

सीख: जो काम भावों को नहीं सुधारता, उसे धर्म मान लेना भीड़ के पीछे चलना है।

३. कथा: पर्वत की चोटी पर खड़ा सोमदत्त

सोमदत्त के व्यापार में बड़ा घाटा हुआ। घर में कलह, सिर पर कर्ज। किसी ने उससे कह दिया कि अमुक पर्वत से कूदकर प्राण दे दो तो सीधे स्वर्ग मिलता है और सारे दुःख छूट जाते हैं।

दुःखी सोमदत्त पर्वत की चोटी पर पहुँच गया। वहाँ एक वृद्ध श्रावक बैठे सामायिक कर रहे थे। उन्होंने उसका मुरझाया चेहरा देखा और पास बुला लिया।

सोमदत्त ने अपनी बात कह दी। वृद्ध बोले, “बेटा, शरीर छोड़ने से कर्म नहीं छूटते। जो कषाय और दुःख के भाव लेकर प्राण त्यागता है, वह उन्हीं भावों का बोझ लेकर आगे जाता है। पर्वत से गिरने में या अग्नि में गिरने में धर्म मानना आचार्य समन्तभद्र ने लोकमूढ़ता कहा है।”

“तो मेरे दुःख कैसे छूटेंगे?” सोमदत्त की आँखें भर आईं।

“संसार के दुःख से जो निकालता है, वह धर्म है, और वह है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र। घाटा फिर भर जाएगा, पर यह मनुष्य जन्म बहुत कठिनाई से मिलता है।”

सोमदत्त उनके साथ नीचे उतर आया और नए सिरे से जीवन शुरू किया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: पर्वत से गिर पड़ने में और अग्नि में गिर पड़ने में धर्म मानना लोकमूढ़ता है। संसार के दुःखों से निकालकर उत्तम सुख में धरने वाला धर्म रत्नत्रय है, और उससे उलटे मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, मिथ्याचारित्र संसार भ्रमण की परिपाटी हैं।
स्रोत: श्लोक २२, श्लोक २ से ३

सीख: दुःख से छूटने का मार्ग शरीर छोड़ना नहीं, रत्नत्रय को पकड़ना है।

४. कथा: कमला की मनौतियाँ

कमला की बेटी के विवाह की बात कहीं बन नहीं रही थी। जो जहाँ बता देता, कमला वहीं चली जाती। किसी ने कहा इस देवी को चुनरी चढ़ाओ, किसी ने कहा उस देवता के नाम धागा बाँधो, किसी ने कहा अमुक स्थान पर मन्नत माँगो। कमला ने सब कर डाला।

एक दिन उसकी सहेली विमला ने पूछा, “कमला, जिनके आगे तुम माँगने जाती हो, उनका स्वरूप कभी देखा है? कोई क्रोध में हथियार लिए है, कोई प्रसन्न हो तो देता है, रूठे तो छीन लेता है। जो स्वयं राग और द्वेष में बँधा है, वह तुम्हें क्या दे सकेगा?”

कमला चुप रह गई।

विमला बोली, “आचार्य समन्तभद्र ने कहा है कि वर पाने की आशा में राग द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना देवमूढ़ता है। विवाह तो पुण्य और पुरुषार्थ से होगा। तुम शान्त मन से अच्छा घर खोजो और वीतराग भगवान् के गुणों का स्मरण करो, जिससे भाव निर्मल हों।”

कमला ने उस दिन से मनौतियाँ छोड़ दीं। कुछ ही महीनों में अच्छा रिश्ता अपने आप आ गया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: वर की इच्छा से आशावान् होकर राग और द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना देवमूढ़ता है।
स्रोत: श्लोक २३

सीख: जो स्वयं राग द्वेष से भरा है, उसके आगे माँगना अपनी श्रद्धा को मैला करना है।

५. कथा: मृदंग वाला

गाँव के रामू को डर था कि अगर वह किसी दिन मन्दिर न जा पाया तो भगवान् रूठ जाएँगे और उसका नुकसान कर देंगे। बीमार होने पर भी वह काँपता हुआ मन्दिर पहुँचता।

एक दिन मन्दिर में पण्डित जी स्वाध्याय करा रहे थे। रामू ने अपना डर बताया। पण्डित जी ने पास रखा मृदंग उठाया और उस पर थाप दी। मीठी ध्वनि गूँज उठी।

“रामू, बताओ, इस मृदंग ने बजने के बदले मुझसे कुछ माँगा?”

“नहीं पण्डित जी।”

“सच्चे भगवान् ऐसे ही हैं। उनमें राग नहीं, द्वेष नहीं, मोह नहीं। वे न प्रसन्न होकर इनाम देते हैं, न रूठकर दण्ड देते हैं। उन्होंने तो बिना किसी स्वार्थ के, बिना अपनी ख्याति या पूजा की चाह के, केवल जीवों के हित का उपदेश दिया। फल तो हमारे अपने कर्मों का मिलता है।”

रामू के मन का बोझ उतर गया। अब वह डर से नहीं, भक्ति और प्रेम से मन्दिर जाने लगा।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सच्चे आप्त में राग, द्वेष, मोह आदि अठारह दोष नहीं होते। वे अपनी ख्याति, लाभ, पूजा के प्रयोजन बिना और शिष्यों में राग बिना ही हित का उपदेश देते हैं, जैसे शिल्पी के हाथ का स्पर्श पाकर मृदंग बजता है पर बदले में कुछ नहीं चाहता।
स्रोत: श्लोक ६, श्लोक ८

सीख: वीतराग भगवान् से डरना नहीं, उनके गुणों को अपनाना है।

६. कथा: बार बार जन्म लेने वाला भगवान्?

पाठशाला में बच्चे बहस कर रहे थे। मोहित बोला, “मेरे दोस्त कहते हैं भगवान् बार बार जन्म लेकर आते हैं, फिर बूढ़े होते हैं और चले जाते हैं।”

अध्यापिका जी ने बच्चों से पूछा, “अच्छा बताओ, जिसे भूख लगती हो, प्यास लगती हो, जो बीमार पड़ता हो, बूढ़ा होता हो, जिसे मृत्यु का डर हो, वह कैसा है?”

बच्चे एक साथ बोले, “हमारे जैसा!”

“बिल्कुल। तो जो हमारे जैसे ही दोषों से भरा है, वह हमें इन दोषों से कैसे छुड़ाएगा? आचार्य समन्तभद्र कहते हैं कि सच्चा आप्त वही है जिसमें भूख, प्यास, बुढ़ापा, रोग, जन्म, मृत्यु, भय, मद जैसे दोष न रहें। वह निर्दोष हो, सर्वज्ञ हो और हित का उपदेश दे। ये तीन गुण न हों तो आप्तपना नहीं होता।”

मोहित ने सोचकर कहा, “तो जो इन सब से छूट गया, वह फिर लौटकर जन्म नहीं लेता।”

अध्यापिका जी मुस्कुराईं, “यही समझना था।”

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जिसमें क्षुधा, तृषा, जरा, रोग, जन्म, मृत्यु, भय, मद आदि दोष नहीं होते, वही आप्त है। वह निर्दोष, सर्वज्ञ और हितोपदेशक होता है, इन तीन गुणों के बिना आप्तपना नहीं होता।
स्रोत: श्लोक ५ से ६

सीख: जो स्वयं जन्म मरण में बँधा है, वह हमें उससे पार नहीं ले जा सकता।

७. कथा: बड़ा आश्रम, बड़े बाबा

शहर में एक बाबा का बड़ा नाम था। विशाल आश्रम, गाड़ियाँ, जमीनें, और हर सप्ताह भीड़। विनय के पिता भी हर बात में कहते, “बाबा ने कहा है, तो वही करेंगे।”

एक दिन विनय ने अपने पिता से पूछा, “पापा, गुरु तो वह होता है न जो सब छोड़ दे? ये बाबा तो रोज नई जमीन ले रहे हैं, नया निर्माण करा रहे हैं।”

पिता नाराज हो गए, पर विनय ने उन्हें घर में रखा रत्नकरण्ड श्रावकाचार खोलकर दिखाया।

“देखिए, आचार्य समन्तभद्र कहते हैं, जो परिग्रह, आरम्भ और हिंसा में डूबे हैं, उन्हें बड़ा मानकर उनकी बात आदर से मानना पाखण्डिमूढ़ता है। सच्चा तपस्वी वह है जिसमें विषयों की आशा न हो, जो आरम्भ और परिग्रह से रहित हो और ज्ञान, ध्यान, तप में लीन रहे।”

पिता देर तक पन्ना देखते रहे। फिर बोले, “बेटा, भीड़ देखकर गुरु मान लिया था, गुण देखकर नहीं।”

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: परिग्रह, आरम्भ और हिंसा सहित संसार के भँवर में पड़े पाखण्डियों को प्रधान मानकर उनके वचनों में आदर से प्रवर्तन करना पाखण्डिमूढ़ता है। प्रशंसनीय तपस्वी वही है जो विषयों की आशा से रहित, आरम्भ रहित, परिग्रह रहित और ज्ञान, ध्यान, तप में लीन हो।
स्रोत: श्लोक २४, श्लोक १०

सीख: गुरु की पहचान भीड़ से नहीं, त्याग और ज्ञान से होती है।

८. कथा: ठेके वाला प्रणाम

जिनेश को एक बड़ा ठेका चाहिए था। अधिकारी ने कहा, “हमारे यहाँ जो काम शुरू करता है, वह पहले अमुक स्थान पर माथा टेकता है। तुम भी चलो, नहीं तो काम मिलना कठिन है।”

जिनेश के मित्र ने समझाया, “बस एक प्रणाम ही तो है, कर लो। मन में थोड़े ही मानोगे।”

जिनेश रात भर सोचता रहा। सुबह उसने अपनी माँ से पूछा। माँ बोलीं, “बेटा, शुद्ध सम्यग्दृष्टि डर से, लालच से, किसी के मोह से या आशा से भी कुदेव, कुशास्त्र और कुगुरु को प्रणाम नहीं करते। आज ठेके के लिए सिर झुकाया, कल किसी और लोभ के लिए झुकाओगे। श्रद्धा का सौदा नहीं होता।”

जिनेश ने अधिकारी से विनम्रता से कहा, “मैं सबका आदर करता हूँ, पर प्रणाम केवल वीतराग को करता हूँ। काम मेरी योग्यता से दीजिए।”

ठेका उस बार किसी और को मिल गया। पर अगली बार उसी अधिकारी ने उसके काम की ईमानदारी देखकर उसे बुलाया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शुद्ध सम्यग्दृष्टि भय से, आशा से, स्नेह से या लोभ से भी कुदेव, कुआगम और कुलिंगी को प्रणाम और विनय नहीं करते।
स्रोत: श्लोक ३०

सीख: नुकसान सह लेना छोटी बात है, श्रद्धा बेच देना बड़ी हानि है।

९. कथा: राख में दबा अंगार

सर्दी की एक सुबह गाँव के चौपाल पर लोग आग ताप रहे थे। रात की आग बुझ चुकी थी, ऊपर केवल राख दिख रही थी। एक लड़के ने कहा, “आग तो खत्म हो गई।”

बूढ़े बाबा ने लकड़ी से राख हटाई। नीचे लाल अंगार चमक रहे थे।

उसी समय मन्दिर का सफाई कर्मी हरिया वहाँ से निकला। सब जानते थे कि वह रोज भगवान् के गुण गाता है, किसी का बुरा नहीं सोचता, और जिनवाणी की बातें बड़ी श्रद्धा से सुनता है। फिर भी कुछ लोग उसे नीची जाति का कहकर दूर रखते थे।

बाबा ने राख की ओर इशारा किया, “देखो, ऊपर राख है, पर भीतर अंगार है, तो इसे आग ही कहोगे न? आचार्य समन्तभद्र कहते हैं कि सम्यग्दर्शन सहित चाण्डाल को भी गणधर देव ‘देव’ कहते हैं। और कुल या जाति का घमण्ड करना तो सम्यग्दर्शन का दोष है।”

उस दिन से चौपाल पर हरिया के लिए भी जगह बनने लगी।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: सम्यग्दर्शन सहित चाण्डाल को भी गणधर देव “देव” कहते हैं, जैसे राख में दबे अंगार को अग्नि ही कहते हैं। कुल और जाति का मद करना सम्यग्दर्शन का दोष है।
स्रोत: श्लोक २८, श्लोक २५

सीख: धर्म जन्म से नहीं, श्रद्धा और गुणों से पहचाना जाता है।

१०. कथा: जो जैसा जन्मा, वैसा ही रहेगा?

नगर के सेठ का बेटा प्रमोद बड़ा घमण्डी था। वह नौकरों से कहता, “तुम लोग जैसे पैदा हुए, वैसे ही रहोगे, और हम जैसे पैदा हुए, वैसे ही रहेंगे।”

एक दिन उसकी माँ ने उसे पास बिठाया। “प्रमोद, तुम्हें पता है, आचार्य समन्तभद्र ने क्या लिखा है? धर्म के प्रभाव से कुत्ता भी देव बन जाता है, और पाप के प्रभाव से देव भी कुत्ता बन जाता है।”

प्रमोद हँसा, “माँ, कुत्ता देव कैसे बनेगा?”

“जीव तो सबमें एक जैसा है, बेटा। आज जो शरीर मिला है, वह पिछले कर्मों का फल है, स्थायी पहचान नहीं। जो जीव अच्छे भाव करता है, वह ऊँचा उठता है। जो ऊँचे स्थान पर बैठकर पाप करता है, वह गिर जाता है। तुम्हारा सेठ होना भी हमेशा का नहीं।”

प्रमोद उस रात सो न सका। अगले दिन से उसका सबसे बोलने का ढंग बदल गया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: धर्म के प्रभाव से कुत्ता भी देव हो जाता है, और पाप के प्रभाव से देव भी कुत्ता हो जाता है।
स्रोत: श्लोक २९

सीख: जन्म से मिली स्थिति स्थायी नहीं, भाव और आचरण ही आगे का रास्ता बनाते हैं।

११. कथा: बीज के बिना बगीचा

दो भाई थे, धर्मचन्द और सुखचन्द। धर्मचन्द ने घर छोड़कर साधु का वेष ले लिया, पर मन में अभिमान बना रहा कि अब मैं सबसे ऊँचा हूँ। लोगों की प्रशंसा न मिले तो उसे क्रोध आ जाता। सुखचन्द घर में ही रहा, व्यापार करता रहा, पर उसकी श्रद्धा पक्की थी, देव, शास्त्र, गुरु के स्वरूप को वह ठीक से समझता था और रोज आत्मचिन्तन करता था।

एक दिन दोनों एक माली के बगीचे में मिले। माली उदास था। उसने बहुत मेहनत से क्यारियाँ बनाईं, पानी दिया, खाद डाली, पर कुछ नहीं उगा।

सुखचन्द ने मिट्टी खोदकर देखी और बोला, “भाई, इसमें बीज ही नहीं डाला।”

धर्मचन्द ठिठक गया। उसे याद आया कि आचार्य समन्तभद्र ने यही कहा है: जैसे बीज के बिना पेड़ नहीं उगता, वैसे ही सम्यक्त्व के बिना ज्ञान और चारित्र न उत्पन्न होते, न टिकते, न बढ़ते, न फल देते। मोह रहित गृहस्थ मोक्षमार्ग में है, और मोह सहित मुनि वेषधारी मोक्षमार्ग में नहीं।

उसने भाई का हाथ पकड़ लिया, “वेष तो मैंने बदल लिया, बीज तो तुम्हारे पास है।”

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: जैसे बीज के बिना वृक्ष नहीं उगता, वैसे सम्यक्त्व के बिना ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल नहीं होते। दर्शनमोह रहित गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है, और मोह सहित अनगार मोक्षमार्गी नहीं।
स्रोत: श्लोक ३२ से ३३

सीख: बाहरी क्रिया क्यारी है, सम्यग्दर्शन बीज है। बीज के बिना मेहनत फल नहीं देती।

१२. कथा: अटारी में मिली पोथी

पुराने घर की सफाई में नीरज को अटारी में एक हाथ से लिखी पोथी मिली। पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसमें लिखा था कि अमुक दिन अमुक वस्तु दान करो तो धन दुगना होगा, और अमुक जीव को मारने से संकट टलता है।

नीरज उत्साह से दादाजी के पास पहुँचा, “दादाजी, इतना पुराना शास्त्र है, इसमें जो लिखा है वही करेंगे।”

दादाजी ने पोथी पढ़ी और गम्भीर हो गए। “बेटा, पुराना होना शास्त्र होने का प्रमाण नहीं। आचार्य समन्तभद्र ने शास्त्र की कसौटी दी है। जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसे काटा न जा सके, जो प्रत्यक्ष और अनुमान से न टकराए, जो वस्तु का सच्चा स्वरूप बताए, सबका हित करे और कुमार्ग से रोके, वही शास्त्र है।”

“तो इसमें तो जीव मारने की बात है,” नीरज बोला।

“बस, यहीं कसौटी पर खोटा निकल गया। जो किसी जीव का अहित सिखाए, वह शास्त्र कैसे हुआ?”

नीरज ने पोथी को एक ओर रख दिया और दादाजी के साथ जिनवाणी पढ़ने बैठ गया।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शास्त्र वही है जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसका उल्लंघन न हो सके, प्रत्यक्ष और अनुमान से जिसमें विरोध न आए, जो वस्तु का यथार्थ स्वरूप कहे, सबका हित करे और कुमार्ग का निषेध करे।
स्रोत: श्लोक ९

सीख: उम्र नहीं, कसौटी तय करती है कि ग्रन्थ शास्त्र है या नहीं।


यह कथाएँ किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सरल रूप में सामने रखने के लिए हैं।

स्रोत ग्रन्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र, हिन्दी टीका पं. सदासुखदास जी कासलीवाल।
पूरे श्लोक एवं अर्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Shlok Evam Arth (Acharya Samantabhadra)