१२. कथा: अटारी में मिली पोथी
पुराने घर की सफाई में नीरज को अटारी में एक हाथ से लिखी पोथी मिली। पन्ने पीले पड़ चुके थे। उसमें लिखा था कि अमुक दिन अमुक वस्तु दान करो तो धन दुगना होगा, और अमुक जीव को मारने से संकट टलता है।
नीरज उत्साह से दादाजी के पास पहुँचा, “दादाजी, इतना पुराना शास्त्र है, इसमें जो लिखा है वही करेंगे।”
दादाजी ने पोथी पढ़ी और गम्भीर हो गए। “बेटा, पुराना होना शास्त्र होने का प्रमाण नहीं। आचार्य समन्तभद्र ने शास्त्र की कसौटी दी है। जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसे काटा न जा सके, जो प्रत्यक्ष और अनुमान से न टकराए, जो वस्तु का सच्चा स्वरूप बताए, सबका हित करे और कुमार्ग से रोके, वही शास्त्र है।”
“तो इसमें तो जीव मारने की बात है,” नीरज बोला।
“बस, यहीं कसौटी पर खोटा निकल गया। जो किसी जीव का अहित सिखाए, वह शास्त्र कैसे हुआ?”
नीरज ने पोथी को एक ओर रख दिया और दादाजी के साथ जिनवाणी पढ़ने बैठ गया।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार: शास्त्र वही है जो सर्वज्ञ वीतराग का कहा हो, जिसका उल्लंघन न हो सके, प्रत्यक्ष और अनुमान से जिसमें विरोध न आए, जो वस्तु का यथार्थ स्वरूप कहे, सबका हित करे और कुमार्ग का निषेध करे।
स्रोत: श्लोक ९
सीख: उम्र नहीं, कसौटी तय करती है कि ग्रन्थ शास्त्र है या नहीं।
यह कथाएँ किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सरल रूप में सामने रखने के लिए हैं।
स्रोत ग्रन्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र, हिन्दी टीका पं. सदासुखदास जी कासलीवाल।
पूरे श्लोक एवं अर्थ: रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Ratnakarand Shravakachar Shlok Evam Arth (Acharya Samantabhadra)