श्रावकधर्मप्रदीप श्लोक एवं अर्थ (आचार्य कुन्थुसागर) | Shravakdharmpradip Shlok Evam Arth (Acharya Kunthusagar)

श्रावकधर्मप्रदीप श्लोक एवं अर्थ

आचार्य कुन्थुसागर

श्रावकधर्मप्रदीप के संस्कृत मूल श्लोक 1 से 212, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ, पाँच अध्याय नीचे अलग उत्तरों में। अर्थ संलग्न ग्रंथ में हर श्लोक की संस्कृत टीका के बाद छपे हिन्दी अर्थ से ज्यों का त्यों लिया है; संस्कृत टीका और ग्रन्थकार प्रशस्ति नीचे की पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक (छपाई की टिप्पणियों सहित): श्रावकधर्मप्रदीप मूल श्लोक (आचार्य कुन्थुसागर) | Shravakdharm Pradip Mool Shlok (Acharya Kunthusagar)

अनुक्रमणिका

स्रोत: Shravak_Dharm_Pradip.pdf

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प्रथम अध्याय (श्लोक 1 से 15)

श्रीदं नत्वा जिनं भक्त्या कुन्दकुन्दमुनीश्वरम् ।
सदा शान्तिसुधर्मौ च श्राद्धसद्बोधहेतवे ॥1॥

अर्थ: केवलज्ञानादि अनन्त गुणस्वरूप अन्तरङ्ग लक्ष्मी तथा समवशरणादि स्वरूप या चक्रवर्ती आदि की विशेष विभूतिरूप बाह्य लक्ष्मी ऐसी दोनों प्रकार की लक्ष्मी को प्रदान करने वाले तथा कर्मशत्रु पर विजय प्राप्त करने वाले श्री जिनेन्द्रदेव को विनय व हर्ष सहित नमस्कार करके तत्पश्चात् उनके मार्गानुसारी श्रीकुन्दकुन्दादि आचार्यों को मुख्य लेकर भगवान् महावीर स्वामी की परम्परा में चले आए हुए आचार्य वर्ग को भी प्रणाम करके तथा इसके बाद दक्षिणप्रान्त में विहार करने वाले अपने दीक्षागुरु श्री आचार्य शान्तिसागर स्वामी तथा उत्तरप्रान्त विहारी स्वर्गीय विद्यागुरु श्री सुधर्मसागर आचार्य को भी सदाकाल प्रणाम करके श्रद्धागुणसम्पन्न होने से जिन्हें ‘श्राद्ध’ संज्ञा प्राप्त है ऐसे श्रावकों की उनके कर्त्तव्य अर्थात् करने योग्य तथा अकर्त्तव्य अर्थात् न करने योग्य कार्यों के विवेक की प्राप्ति के लिए श्रावकों के धर्म को प्रकाशित करने वाला दीपक की तरह यह ‘श्रावकधर्म प्रदीप’ नामक ग्रन्थ विषयवाञ्छा से दूर परम वीतरागी निस्पृह अतएव स्वात्मसंतोषी श्री कुन्थुसागर आचार्य महाराज के द्वारा लिखा जा रहा है।।१-२।।


श्रावकधर्मप्रदीपो ग्रन्थोऽयं सौख्यदो भुवि ।
लिख्यते स्वात्मतुष्टेन कुन्थुसागरसूरिणा ॥2॥

अर्थ: केवलज्ञानादि अनन्त गुणस्वरूप अन्तरङ्ग लक्ष्मी तथा समवशरणादि स्वरूप या चक्रवर्ती आदि की विशेष विभूतिरूप बाह्य लक्ष्मी ऐसी दोनों प्रकार की लक्ष्मी को प्रदान करने वाले तथा कर्मशत्रु पर विजय प्राप्त करने वाले श्री जिनेन्द्रदेव को विनय व हर्ष सहित नमस्कार करके तत्पश्चात् उनके मार्गानुसारी श्रीकुन्दकुन्दादि आचार्यों को मुख्य लेकर भगवान् महावीर स्वामी की परम्परा में चले आए हुए आचार्य वर्ग को भी प्रणाम करके तथा इसके बाद दक्षिणप्रान्त में विहार करने वाले अपने दीक्षागुरु श्री आचार्य शान्तिसागर स्वामी तथा उत्तरप्रान्त विहारी स्वर्गीय विद्यागुरु श्री सुधर्मसागर आचार्य को भी सदाकाल प्रणाम करके श्रद्धागुणसम्पन्न होने से जिन्हें ‘श्राद्ध’ संज्ञा प्राप्त है ऐसे श्रावकों की उनके कर्त्तव्य अर्थात् करने योग्य तथा अकर्त्तव्य अर्थात् न करने योग्य कार्यों के विवेक की प्राप्ति के लिए श्रावकों के धर्म को प्रकाशित करने वाला दीपक की तरह यह ‘श्रावकधर्म प्रदीप’ नामक ग्रन्थ विषयवाञ्छा से दूर परम वीतरागी निस्पृह अतएव स्वात्मसंतोषी श्री कुन्थुसागर आचार्य महाराज के द्वारा लिखा जा रहा है।।१-२।।


युग्मम्

प्रश्न - पाक्षिकश्रावाकाणां किं चिह्नमस्ति गुरो वद?

अहिंसैव परो धर्मः स एको विश्वरक्षकः ।
आचन्द्रं प्राणिनां चित्तेऽतस्तिष्ठतु सदा मुदा ॥3॥

अर्थ: प्राणिमात्र की हिंसा से दूर रहना ही अहिंसा धर्म है, वही सर्वोत्तम धर्म है। तथा उस अहिंसा धर्म में ही लोककल्याण करने की परिपूर्ण शक्ति निहित है। इसमें किसी भी प्राणी को पीड़ा पहुँचाना आदि जो-जो भी कार्य धर्म के नाम पर व्याख्यात किए जाते हैं। वे केवल पक्ष मात्र हैं उनसे परस्पर में बैर ही बढ़ता है। इसलिए अहिंसा परमधर्म जीवधारियों के हृदय में सदा काल निवास करे इस प्रकार का पक्ष जिसका हो वही विवेकी पुरुष पाक्षिक श्रावक कहलाता है।


तदन्यः केवलं पक्षो मिथः स्याद्वैरवर्धकः ।
इत्येव निश्चयो यस्य विवेकी स च पाक्षिकः ॥4॥

अर्थ: प्राणिमात्र की हिंसा से दूर रहना ही अहिंसा धर्म है, वही सर्वोत्तम धर्म है। तथा उस अहिंसा धर्म में ही लोककल्याण करने की परिपूर्ण शक्ति निहित है। इसमें किसी भी प्राणी को पीड़ा पहुँचाना आदि जो-जो भी कार्य धर्म के नाम पर व्याख्यात किए जाते हैं। वे केवल पक्ष मात्र हैं उनसे परस्पर में बैर ही बढ़ता है। इसलिए अहिंसा परमधर्म जीवधारियों के हृदय में सदा काल निवास करे इस प्रकार का पक्ष जिसका हो वही विवेकी पुरुष पाक्षिक श्रावक कहलाता है।


प्रश्न - सद्गुरोर्विषये कीदृग्भावोऽस्ति पाक्षिकस्य वा?

निर्ग्रन्थसाधुः सुखदः सदैव मान्योऽपि बन्द्योऽखिलविश्वशान्त्यै।
त्याज्यस्तदन्योऽखिलविश्ववैरी स्यान्निश्चयो यस्य स पाक्षिकोऽस्ति ॥5॥

अर्थ: संसार में शान्ति-स्थापन करनेवाला परिग्रह और विषयाभिलाषा से रहित स्व-परोकार-साधक साधु ही सदा माननीय व वन्दनीय सुखदाता होता है। इससे भिन्न संसार के दुःखों से उद्विग्न पुरुषों को कुमार्ग में ले जानेवाला कुगुरु विश्व का वैरी है। अतएव वह त्याग देने योग्य है, ऐसा जिसके हृदय में निश्चय है वह विचारवान् पाक्षिक श्रावक है।


प्रश्न - देवस्य विषये कीदृग्भावोऽस्ति पाक्षिकस्य मे?

श्रीवीतराग्येव हितोपदेशी सर्वज्ञदेवोऽपि स एव योग्यः।
निर्दोषयोगादिति सर्ववन्द्यः स्यान्निश्चयो यस्य स पाक्षिकोऽस्ति ॥6॥

अर्थ: राग-द्वेषादि १८ दोषरहित वीतरागी तथा परिपूर्ण केवलज्ञान को प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही हित का उपदेश देने के योग्य है। इस तरह वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी इन गुणों सहित होना ही देव का सच्चा लक्षण है। जिसमें ये गुण नहीं वह देव कहलाने योग्य नहीं। सच्चा देव निर्दोष होने के कारण ही जगत्पूज्य होता है, ऐसा जिस गृहस्थ को निश्चय है वह पाक्षिक है।


प्रश्न - शास्त्रस्य विषये कीदृग्भावोऽस्ति पाक्षिकस्य मे?

बोधप्रदं वैरहरं मिथः कौ श्रीदं जिनोक्तं हि सदेति शास्त्रम्।
आचन्द्रसूर्यं पठितुं प्रमाणं स्यान्निश्चयो यस्य स पाक्षिकोऽस्ति ॥7॥

अर्थ: धर्मोपदेश के कार्य में शास्त्रों का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है इसलिए शास्त्र के सच्चेपन की क्या पहिचान है इस सम्बन्ध में मुझे क्या विचार रखना चाहिए, ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर देते हैं - सच्चे देव का उपदेश ही सच्चा शास्त्र है। उसकी पहिचान यह है कि वह अज्ञान निवृत्ति कर जीवों को वास्तविक बोध देता है। लोक व परलोक में लक्ष्मी को देनेवाला अर्थात् बाह्यसंपत्ति व ज्ञानसंपत्ति को बढ़ानेवाला होता है। साथ ही वह ऐसा होता है कि जिसे सुनकर पृथिवी के प्राणी अपना पारस्परिक वैर छोड़कर प्रेम व सहानुभूति के मार्ग पर उतर आवें। ऐसे शास्त्र सदाकाल जबतक दुनियाँ में सूर्य और चन्द्रमा हैं पठन-पाठन के योग्य प्रमाणीभूत हैं।


प्रश्न - स्वाचारवृत्तिविषये खलु पाक्षिकस्य कीदृग्गुरो भवति मे वद तस्य भावः।

भोगोपभोगाद्विषमात् प्रमोहात्तथा त्रसस्थावरजीवघातात्।
न स्याद्विरक्तिस्तदपि प्रवीरो धर्मादिकार्येऽस्ति सदैव दक्षः ॥8॥

अर्थ: गुरुवर! अपने आचरण के बारे में पाक्षिक श्रावक के कैसे विचार होते हैं?

पाक्षिक श्रावक की प्रवृत्ति चारित्रमोहनीय कर्म के उदय की विशेषता के कारण यद्यपि भोग योग्य और उपभोग योग्य पदार्थों के त्यागरूप नहीं होती। त्रसस्थावर जीवों का जिनमें विशेष घात होता है ऐसे व्यापार वाणिज्यादि कार्यों से भी लोभ की विशेषता वश वह विरत नहीं होता, तो भी धर्म के प्रत्येक कार्य के करने में उसका उत्साह सदा बढ़ता रहता है।


प्रश्न-पाक्षिकस्य प्रवृत्तिस्तु धार्मिका कीदृशी वद?

सद्धर्मसंस्कारवशाद्धि येन यज्ञोपवीतोऽपि धृतस्त्रिरत्नः।
दानार्चनादौ च कृता प्रवृत्तिः स पाक्षिकस्स्यात्सुखशान्तिमूर्तिः ॥9॥

अर्थ: पाक्षिक श्रावक की धार्मिक प्रवृत्ति कैसी होती है?

पाक्षिक श्रावक सर्वोत्कृष्ट धर्म की भावना के निमित्तवश सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वरूप धर्म को आत्मकल्याणकारी समझकर उसे धारण करने की इच्छा से रत्नत्रयस्वरूप धर्म के चिह्न रूप तीन सूतवाले यज्ञोपवीत (जनेऊ) को धारण करता है। उसकी प्रवृत्ति सदा देव की उपासना में, शास्त्रों के संग्रह विनय स्वाध्याय और संरक्षण करने मे तथा सद्गुरुओं की सब प्रकार की सेवा करने में ही रहती है। वह सदा शान्तस्वभावी होता है और इसीलिए सुखी रहता है।


प्रश्न-लोकोपकारविषये वद मेऽस्ति भावः कीदृग्गुरो गुणनिधे खलु पाक्षिकस्य।

विघ्नं करोति यदि मे शिवदेऽपि कार्ये
प्राणांस्त्यजामि खलु तत्प्रतिरोधनार्थम् ।
स्वान्योपकारकरणं हि ममेति धर्मो
भावोऽस्ति यस्य विशदः स च पाक्षिकोऽस्ति ॥10॥

अर्थ: पाक्षिक श्रावक की प्रवृति लोकोपकार के कार्य में कैसे रहती है इस प्रश्न का उत्तर आचार्य महाराज आगे लिखते हैं - पाक्षिक श्रावक स्वोपकार और परोपकार दोनों का परस्पर अविरुद्ध रीति से पालन करना ही अपना धर्म समझता है और उसके पालन करने में सदा कटिबद्ध रहता है। ऐसा करने में ही वह अपनी व दूसरों की भलाई सोचता है। उसके इस कल्याणकारक कार्य में यदि कोई विघ्न करे तो उसे वह हर एक उपाय से रोकता है। साधारण उपायों द्वारा यदि वह उपसर्ग निवारण में समर्थ नहीं होता तो अपने प्राणों की भी बाजी लगा देता है अर्थात् प्राण देकर भी विघ्नों को दूर कर देता है। इस तरह वात्सल्यपूर्ण पवित्र भाव जिसके हृदय में होता है वही पाक्षिक श्रावक होता है।


प्रश्न - दुष्टादिशिष्टविषये वद मेऽस्ति भावः कीदृग्गुरो सुखनिधे खलु पाक्षिकस्य?

दुष्टस्य रोधकरणं सुजनस्य रक्षा
सम्पूर्णविश्वनिलये सुखशान्तिहेतोः ।
कार्या मया सुजनताऽपि मिथः प्रमोदो
भावोऽस्ति यस्य विशदः स च पाक्षिकोऽस्ति ॥11॥

अर्थ: पाक्षिक श्रावक सम्पूर्ण विश्वरूपी अपने गृह में सुख और शान्ति को कायम रखने के लिए दुर्जन पुरुष के दुष्ट कार्यों का रोकना तथा सज्जन पुरुषों की रक्षा करना अपना कर्त्तव्य समझता है। वह स्वयं सबसे सज्जनता का व्यवहार करता है और परस्पर के सम्मिलन से हर्षित होता है। ऐसा निर्मल भाव पाक्षिक श्रावक का होता है।


प्रश्न - पाक्षिकस्य विशेषा तु प्रवृत्तिः कीदृशी वद।

कार्या स्वबुद्ध्या भुवि मित्रताऽपि
प्रमुच्य मायां सकलैः समं हि ।
यतो भवेत्ते विमलैव कीर्त्तिः
स्वराज्यलक्ष्मीश्च सदा स्वदासी ॥12॥

अर्थ: इस लोक और परलोक में सुख के अभिलाषी श्रावक को उचित है कि वह प्राणिमात्र के साथ सुख-दुःख में समभागी बने। धर्मज्ञ सज्जन की यही पहिचान है कि उसे किसी प्राणी को दुःखी देखकर करुणापूर्ण खेद उत्पन्न होता है और शक्त्यनुसार उसके कष्ट को दूर कर देने की भावना व प्रवृत्ति पाई जाती है तथा दूसरे प्राणियों को सुखी देखकर उसे प्रमोद होता है। इस भाव का नाम ही मैत्रीभाव या बन्धुत्वभाव है। श्रावक निष्कपट भाव से प्राणिमात्र में ऐसा भाव रखे तो संसार में उसकी निर्मलकीर्ति फैले और सर्वतन्त्र स्वतन्त्र शासनरूपी संपत्ति सदा उसकी दासी के समान सेवा करे।


सुखी ह्यधर्मेण भवामि नित्यं
ह्येवञ्च भावो न कदापि कार्यः ।
भवामि धर्मेण सुखी सदेति
कार्यात्मशान्तेर्वरभावनैव ॥13॥

अर्थ: हिंसादिरूप पापों के द्वारा परधनहरण कूटकपट द्वारा स्वार्थ साधन परस्त्रीभोग अपने भोगोपभोग के निमित्त पर प्राणियों को पीड़ा देना आदि दुष्कर्मों के द्वारा अधिकांश मानवों को दरिद्र-क्षुधापीडित और नग्न बना देनेवाले धन-धान्य, वस्त्रादि परिग्रह को अतिसंग्रह करने रूप महापाप रूप व्यापार के द्वारा मैं सुखी हो जाऊँगा - ऐसा भाव कभी नहीं करना चाहिए। पाक्षिक गृहस्थ को सदा यह भावना सर्वोत्तम प्रकार से करनी चाहिए कि उत्तमक्षमा, दुखियों की सेवा, परोपकार, सम्यग्ज्ञान का लाभ करना व कराना, देववन्दना, तीर्थवन्दना और सम्यग् गुरु की सेवा व दुखित दानादि सत्कर्म स्वरूप धर्म के द्वारा ही मैं सदा सुखी हो सकूँगा ऐसी उत्कृष्ट भावना संतोष सुख और शान्ति प्राप्त करने के लिए सदा हृदय में रखनी चाहिये।


भार्या न बोध्या कटुभाषणेन
स्वसद्मवार्तापि बहिर्न भाष्या ।
निजात्मनिन्दैव सदेति कार्या
परप्रशंसाखिलसौख्यदात्री ॥14॥

अर्थ: पाक्षिक श्रावक का यह भी कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को भी उत्तम शिक्षा देवे और उससे सदा प्रिय वचनों से वार्तालाप करे। यदि कोई त्रुटि हो तो मधुर शब्दों में ही उसे समझावे, कठोर शब्दों का उपयोग न करे। अपने गृह सम्बन्धी सुख-दुःख आदि की चर्चा दूसरों से न करे, सदा अपने अवगुणों की निन्दा और दूसरों के गुणों की प्रशंसा करे, ऐसा व्यवहार उसे सुखदाई होगा।


वादो विवादोऽपि मिथो विधेयः
कदापि न प्राणहरः कुबुद्ध्या ।
ज्ञात्वेति पूर्वोक्तविधिर्विधेयो
यतो भवेच्छान्तिकरी प्रवृत्तिः ॥15॥

अर्थ: किसी भी पुरुष के पराजय की इच्छा से परस्पर कलह और वैर को उत्पादन करनेवाला वाद और विवाद नहीं करना चाहिए। अनेक प्राणी जो अपने घमंड में ही चूर रहते है, अतत्त्व को ही तत्त्व समझ कर अपने को धर्मज्ञ या धर्मतत्त्व- वेत्ता मान लेते है, वे मानधनी वाद में अपनी पराजय देखकर जीवित ही प्राण देने को तैयार हो जाते हैं-स्वपराजय से होनेवाली तीव्र कषाय के कारण आत्मघात कर लेते हैं। उनकी इस कुबुद्धि को धिक्कार है जो उन्हें तत्त्वज्ञान नहीं उत्पन्न करने देती। आचार्य उपदेश देते हैं कि ऐसे पुरुषों से वादविवाद नहीं करना चाहिए, जिन्हें वाद-विवाद तत्त्वदर्शक न हो सके बल्कि उनके लिए जीवितावस्था में भी प्राणघातक जैसा हो जावे। सज्जन सद्गुणग्राही पुरुष को अतत्त्व खण्डन पूर्वक तत्त्वज्ञान की कथनी करनी हानिप्रद नहीं है। उपर्युक्त विधि को यथार्थ समझकर ही इसका प्रयोग करना शान्ति को उत्पन्न करता है, अन्यथा तत्त्वोपदेश के हृदय में भी अशान्ति उत्पन्न होकर हानिकर हो सकती है।

द्वितीय अध्याय (श्लोक 16 से 60)

प्रश्नः - जघन्यनैष्ठिकस्यैव किं चिह्नं विद्यते वद?

पूर्वोक्तपाक्षिकजनान् प्रविहाय शेषाः
सर्वेऽपि नैष्ठिकजनाः कथिताः क्रमेण ।
तेषां हि वच्मि सकलं सुखदं स्वरूपं
तद्बोधशून्यजनतादिहिताय भक्त्या ॥16॥

अर्थ: सदाचार का आराधन करनेवाले श्रावकों के पाक्षिक नैष्ठिक और साधक ये तीन भेद किए गए हैं। उनमें पाक्षिकों का स्वरूप प्रथमाध्याय में कहा है। तद्रूप आचारण करनेवाले पाक्षिकों के सिवाय तथा जिन्होंने अभी साधक अवस्था प्राप्त नहीं की ऐसे सम्पूर्ण श्रावक नैष्ठिक हैं। उनका सरल, सुबोध और सम्पूर्ण स्वरूप श्रीआचार्य उन मनुष्यों के हित के लिए, जो इस विषय से अपरिचित हैं, क्रमशः वर्णन करेंगे।


मन्दोदयात्सुमन्दाद्वा योऽप्रत्याख्यानकर्मणः ।
पञ्चविंशतिदोषान् हि सम्यक्त्वमूलनाशकान् ॥17॥

अर्थ: मोहनीयकर्म दर्शनमोह और चारित्रमोह के भेद से दो प्रकार का है। दर्शनमोह की तीन प्रकृतियाँ और चारित्रमोह की २५ कुल २८ प्रकृतियाँ हैं। इनमें से दर्शनमोहनीय की ३ तथा अनन्तानुबन्धी की ४ कुल सात प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन का घात करती हैं। जब इनका उपशम, क्षय या क्षयोपशम होता है तभी जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। यहाँ अनन्तानुबन्धी चार के उपशम और क्षयोपशम से उनका अनुदय लेना चाहिये, क्योंकि उपशम सम्यग्दृष्टि और क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्धी चार का यदि सत्त्व होता है तो वहाँ उनका उदय नहीं होता ऐसा नियम है। फिर भी ऐसे जीव के सम्यक्त्व के दोष अप्रत्याख्यानावरण चार के अत्यंत मंद होने से दूर होते हैं। वह सम्यक्त्व के घातक - शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मूढ़दृष्टि अनुपगूहन, अस्थितीकरण, अवात्सल्य और अप्रभावना - ये आठ दोष तथा ज्ञान, प्रतिष्ठा (यज्ञ) कुल, जाति, शक्ति, सम्पत्ति, तपस्या और शरीरसौन्दर्य इन आठके आश्रय से उत्पन्न आठ प्रकार का मद और कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु तथा कुदेव के आराधक, कुशास्त्र के स्वाध्याय करनेवाले और कुगुरुसेवी ऐसे ६ प्रकार के अनायतन तथा लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता एवं गुरुमूढ़ता ऐसी ३ मूढ़ता सब मिलाकर २५ प्रकार के दोषों को दूर करके सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाता है। यही प्राणी इसी अप्रत्याख्यानकषाय के अनुदय में द्यूत, मद्य, मांस, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, चोरी और शिकार इस संग्रह रूप पांचों पापों से यथाशक्ति दूर रहता है।

यह बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर, मद्य, मांस, मधु रूप आठ अति हिंसाकारक पदार्थों के खाने का त्यागकर आठ मूलगुणों का पालन करता है। वह ऐसा भाव रखता है कि संयमरूपी महल की मूलभित्तिस्वरूप ये आठ मूलगुण मेरे लिए यथार्थ में कल्याणकारक हैं। संयम के बिना इस दुःखमय संसार से छुटकारा मिलना असम्भव है। परिपूर्ण संयम का पालन प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय में उसे अपने लिए संभावनीय नहीं प्रतीत होता, फिर भी उसकी भावना उसे प्राप्त करने के लिए सदा रहती है। वह प्रथम प्रतिमा का आराधक होने पर भी दूसरी, तीसरी आदि प्रतिमाओं के पालन करने के प्रति सदा उत्सुक रहता है। उसकी आकांक्षा सदैव आत्मपद प्राप्ति तथा आत्मानुभव के आनंद से प्राप्त अमृत को आस्वादन करने की रहती है। वह बुद्धिमान् निःसंशय आत्मोत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है। ऐसा गुणवान् पुरुष लोक व शास्त्र में ‘दार्शनिक’ अर्थात् प्रथम दर्शन प्रतिमा का धारी माना जाता है।१७/१८/१९।


त्यक्त्वा कुव्यसनं निन्द्यं यथाशक्ति च पातकम् ।
अष्टमूलगुणान् भक्त्या गृहीत्वा सौख्यदान् सदा ॥18॥

अर्थ: मोहनीयकर्म दर्शनमोह और चारित्रमोह के भेद से दो प्रकार का है। दर्शनमोह की तीन प्रकृतियाँ और चारित्रमोह की २५ कुल २८ प्रकृतियाँ हैं। इनमें से दर्शनमोहनीय की ३ तथा अनन्तानुबन्धी की ४ कुल सात प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन का घात करती हैं। जब इनका उपशम, क्षय या क्षयोपशम होता है तभी जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। यहाँ अनन्तानुबन्धी चार के उपशम और क्षयोपशम से उनका अनुदय लेना चाहिये, क्योंकि उपशम सम्यग्दृष्टि और क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्धी चार का यदि सत्त्व होता है तो वहाँ उनका उदय नहीं होता ऐसा नियम है। फिर भी ऐसे जीव के सम्यक्त्व के दोष अप्रत्याख्यानावरण चार के अत्यंत मंद होने से दूर होते हैं। वह सम्यक्त्व के घातक - शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मूढ़दृष्टि अनुपगूहन, अस्थितीकरण, अवात्सल्य और अप्रभावना - ये आठ दोष तथा ज्ञान, प्रतिष्ठा (यज्ञ) कुल, जाति, शक्ति, सम्पत्ति, तपस्या और शरीरसौन्दर्य इन आठके आश्रय से उत्पन्न आठ प्रकार का मद और कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु तथा कुदेव के आराधक, कुशास्त्र के स्वाध्याय करनेवाले और कुगुरुसेवी ऐसे ६ प्रकार के अनायतन तथा लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता एवं गुरुमूढ़ता ऐसी ३ मूढ़ता सब मिलाकर २५ प्रकार के दोषों को दूर करके सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाता है। यही प्राणी इसी अप्रत्याख्यानकषाय के अनुदय में द्यूत, मद्य, मांस, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, चोरी और शिकार इस संग्रह रूप पांचों पापों से यथाशक्ति दूर रहता है।

यह बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर, मद्य, मांस, मधु रूप आठ अति हिंसाकारक पदार्थों के खाने का त्यागकर आठ मूलगुणों का पालन करता है। वह ऐसा भाव रखता है कि संयमरूपी महल की मूलभित्तिस्वरूप ये आठ मूलगुण मेरे लिए यथार्थ में कल्याणकारक हैं। संयम के बिना इस दुःखमय संसार से छुटकारा मिलना असम्भव है। परिपूर्ण संयम का पालन प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय में उसे अपने लिए संभावनीय नहीं प्रतीत होता, फिर भी उसकी भावना उसे प्राप्त करने के लिए सदा रहती है। वह प्रथम प्रतिमा का आराधक होने पर भी दूसरी, तीसरी आदि प्रतिमाओं के पालन करने के प्रति सदा उत्सुक रहता है। उसकी आकांक्षा सदैव आत्मपद प्राप्ति तथा आत्मानुभव के आनंद से प्राप्त अमृत को आस्वादन करने की रहती है। वह बुद्धिमान् निःसंशय आत्मोत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है। ऐसा गुणवान् पुरुष लोक व शास्त्र में ‘दार्शनिक’ अर्थात् प्रथम दर्शन प्रतिमा का धारी माना जाता है।१७/१८/१९।


द्वित्रयादिप्रतिमां युक्त्या गृहीतुं स्वपदं मुदा ।
यतते स्वरसं पातुं स कौ दार्शनिकः सुधीः ॥19॥

अर्थ: मोहनीयकर्म दर्शनमोह और चारित्रमोह के भेद से दो प्रकार का है। दर्शनमोह की तीन प्रकृतियाँ और चारित्रमोह की २५ कुल २८ प्रकृतियाँ हैं। इनमें से दर्शनमोहनीय की ३ तथा अनन्तानुबन्धी की ४ कुल सात प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन का घात करती हैं। जब इनका उपशम, क्षय या क्षयोपशम होता है तभी जीव को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। यहाँ अनन्तानुबन्धी चार के उपशम और क्षयोपशम से उनका अनुदय लेना चाहिये, क्योंकि उपशम सम्यग्दृष्टि और क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि के अनन्तानुबन्धी चार का यदि सत्त्व होता है तो वहाँ उनका उदय नहीं होता ऐसा नियम है। फिर भी ऐसे जीव के सम्यक्त्व के दोष अप्रत्याख्यानावरण चार के अत्यंत मंद होने से दूर होते हैं। वह सम्यक्त्व के घातक - शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मूढ़दृष्टि अनुपगूहन, अस्थितीकरण, अवात्सल्य और अप्रभावना - ये आठ दोष तथा ज्ञान, प्रतिष्ठा (यज्ञ) कुल, जाति, शक्ति, सम्पत्ति, तपस्या और शरीरसौन्दर्य इन आठ के आश्रय से उत्पन्न आठ प्रकार का मद और कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु तथा कुदेव के आराधक, कुशास्त्र के स्वाध्याय करनेवाले और कुगुरुसेवी ऐसे ६ प्रकार के अनायतन तथा लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता एवं गुरुमूढ़ता ऐसी ३ मूढ़ता सब मिलाकर २५ प्रकार के दोषों को दूर करके सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाता है। यही प्राणी इसी अप्रत्याख्यानकषाय के अनुदय में द्यूत, मद्य, मांस, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, चोरी और शिकार इस संग्रह रूप पांचों पापों से यथाशक्ति दूर रहता है।
यह बड़, पीपल, ऊमर, कठूमर, पाकर, मद्य, मांस, मधु रूप आठ अति हिंसाकारक पदार्थों के खाने का त्यागकर आठ मूलगुणों का पालन करता है। वह ऐसा भाव रखता है कि संयमरूपी महल की मूलभित्तिस्वरूप ये आठ मूलगुण मेरे लिए यथार्थ में कल्याणकारक हैं। संयम के बिना इस दुःखमय संसार से छुटकारा मिलना असम्भव है। परिपूर्ण संयम का पालन प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय में उसे अपने लिए संभावनीय नहीं प्रतीत होता, फिर भी उसकी भावना उसे प्राप्त करने के लिए सदा रहती है। वह प्रथम प्रतिमा का आराधक होने पर भी दूसरी, तीसरी आदि प्रतिमाओं के पालन करने के प्रति सदा उत्सुक रहता है। उसकी आकांक्षा सदैव आत्मपद प्राप्ति तथा आत्मानुभव के आनंद से प्राप्त अमृत को आस्वादन करने की रहती है। वह बुद्धिमान् निःसंशय आत्मोत्कर्ष के लिए प्रयत्नशील रहता है। ऐसा गुणवान् पुरुष लोक व शास्त्र में ‘दार्शनिक’ अर्थात् प्रथम दर्शन प्रतिमा का धारी माना जाता है।१७/१८/१९।


प्रश्नः - किं सम्यक्त्वस्य चिह्नं स्यात् कदा वा वद मे गुरो?

मोहस्य सप्तप्रकृतेः क्षयादुपशमान्नृणाम् ।
शुद्धचिद्रूपमूर्तेर्वा यथावत्स्वपरात्मनाम् ॥20॥

अर्थ: इस संसार समुद्र की उत्तुङ्ग तरङ्गों में यहाँ वहाँ भटकनेवाले प्राणी को भ्रमण कराने में निमित्त अष्ट कर्मों में से मोहनीय कर्म ही प्रबलतम कारण है। इसके दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ऐसी तीन प्रकृतियाँ तथा चारित्रमोह के २५ भेदों में से अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ ऐसी ४ प्रकृतियाँ इस प्रकार मिलकर ये ७ प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन का घात करती हैं यह बात पहले बता चुके हैं। इनके उपशम, क्षयोपशम व क्षय से ही शुद्ध चैतन्यमय आत्मा का बोध उत्पन्न होता है, अथवा यथावत् स्वरूप का या स्वात्मा से भिन्न पर पुद्गलादि पदार्थों का भान होता है। यह स्वपरावबोध ही प्राणियों के लिए आनन्ददाता और प्रिय होता है, इससे ही पर पदार्थों में स्वात्मबुद्धि रूप जो भ्रम था उसका उन्मूलन हो जाता है। इस परिणाम का नाम ही शुद्ध सम्यग्दर्शन है जो जन्म, जरा और मृत्यु से मयावह संसार-परिभ्रमण को रोकने में समर्थ है।

वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी सत्यार्थ आप्त; वीतराग परम गुरु और प्राणिमात्र के हित को प्रतिपादक जिन धर्म में तथा आत्मा के शुद्ध चैतन्य चमत्कार स्वरूप में दृढ़ श्रद्धा इसी सम्यक्त्व गुण से ही प्राप्त होती है। संसार चक्र से परीत सद्देव और सद्गुरु ही संसार के दुःखों से बचाने में समर्थ हैं। शुद्ध सम्यग्दर्शन के संसारोत्तरण का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। अतः उसकी प्राप्ति के लिए सदा प्रयत्न करना ही चाहिए।


सुसत्यार्थस्वरूपस्य दर्शकं बोधकं प्रियम् ।
सम्यक्त्वं जायते शुद्धं जन्ममृत्युजराहरम् ॥21॥

अर्थ: इस संसार समुद्र की उत्तुङ्ग तरङ्गों में यहाँ वहाँ भटकनेवाले प्राणी को भ्रमण कराने में निमित्त अष्ट कर्मों में से मोहनीय कर्म ही प्रबलतम कारण है। इसके दर्शन मोहनीय की मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ऐसी तीन प्रकृतियाँ तथा चारित्रमोह के २५ भेदों में से अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ ऐसी ४ प्रकृतियाँ इस प्रकार मिलकर ये ७ प्रकृतियाँ सम्यग्दर्शन का घात करती हैं यह बात पहले बता चुके हैं। इनके उपशम, क्षयोपशम व क्षय से ही शुद्ध चैतन्यमय आत्मा का बोध उत्पन्न होता है, अथवा यथावत् स्वरूप का या स्वात्मा से भिन्न पर पुद्गलादि पदार्थों का भान होता है। यह स्वपरावबोध ही प्राणियों के लिए आनन्ददाता और प्रिय होता है, इससे ही पर पदार्थों में स्वात्मबुद्धि रूप जो भ्रम था उसका उन्मूलन हो जाता है। इस परिणाम का नाम ही शुद्ध सम्यग्दर्शन है जो जन्म, जरा और मृत्यु से मयावह संसार-परिभ्रमण को रोकने में समर्थ है।
वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी सत्यार्थ आप्त; वीतराग परम गुरु और प्राणिमात्र के हित को प्रतिपादक जिन धर्म में तथा आत्मा के शुद्ध चैतन्य चमत्कार स्वरूप में दृढ़ श्रद्धा इसी सम्यक्त्व गुण से ही प्राप्त होती है। संसार चक्र से परीत सद्देव और सद्गुरु ही संसार के दुःखों से बचाने में समर्थ हैं। शुद्ध सम्यग्दर्शन के संसारोत्तरण का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। अतः उसकी प्राप्ति के लिए सदा प्रयत्न करना ही चाहिए।


सद्देवगुरुधर्मादौ संसारक्लेशनाशके ।
तत्पश्चात्स्वात्मनि श्रद्धा जायते विमलेऽचले ॥22॥

अर्थ: वीतराग, सर्वज्ञ व हितोपदेशी सत्यार्थ आप्त; वीतराग परम गुरु और प्राणिमात्र के हित को प्रतिपादक जिन धर्म में तथा आत्मा के शुद्ध चैतन्य चमत्कार स्वरूप में दृढ़ श्रद्धा इसी सम्यक्त्व गुण से ही प्राप्त होती है। संसार चक्र से परीत सद्देव और सद्गुरु ही संसार के दुःखों से बचाने में समर्थ हैं। शुद्ध सम्यग्दर्शन के संसारोत्तरण का कोई दूसरा उपाय है ही नहीं। अतः उसकी प्राप्ति के लिए सदा प्रयत्न करना ही चाहिए।


(क्षेपक)

प्रश्नः - निःशंकिताङ्गचिह्नं किं पृष्टे सत्युत्तरं मुदा।

वीतरागोक्तधर्मे हि श्रीदे देवे निरञ्जने ।
स्वान्यप्रबोधके शास्त्रे सद्गुरौ शान्तिदे सदा ॥23॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन के आठ गुणों में से प्रथम निशंकित नामा गुण का क्या स्वरूप है, शिष्य के ऐसा प्रश्न करने पर आचार्य हर्षोत्फुल्ल हो उत्तर देते हैं।

रागद्वेष अज्ञानादि सम्पूर्ण भावसंबंधी दोषों से जो रहित हैं तथा जिनके ज्ञानावरण-दर्शनावरण-वेदनीय- मोहनीय-आयु-नाम-गोत्र और अन्तराय ये आठ भवभीतिदायक दोषाधायक कर्म दूर हो गए हैं अतएव जो द्रव्य भाव मल से रहित होकर निरञ्जन हो गए हैं ऐसे सिद्ध परमात्मा में, तथा जो कल्याण कारक मोक्षमार्ग का उपदेश करने के कारण ‘श्रीद’ हैं ऐसे श्रीजिनेन्द्र तीर्थंकरदेव में,तथा उनके द्वारा प्ररूपित स्वपर को उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करनेवाले शास्त्र में और संसार भ्रमण की ज्वाला से जले हुए दूसरे प्राणियों को शान्ति के मार्गप्रदायक सच्चे गुरु में जिस भाग्यवान् को ऐसी दृढ़ श्रद्धा है, अर्थात् जो कितनी घोर विपत्ति पड़ने पर भी उसे अपने मार्ग से विचलित न कर सके तथा जो अन्तरङ्ग से पैदा हुई हो, ‘‘मैं जैन कुल का हूँ’’ ऐसे कुलाभिमान की नींव पर जो न खड़ी हो, ऐसी परम दृढ़ निश्चल संसार भ्रमण को छेद देनेवाली जिसे श्रद्धा है उसी के मुक्तिफल देनेवाला प्रथम ‘‘निःशंकित’’ नामा सम्यक्त्व का गुण होता है।२ ३ ।


अकम्पा निर्मदा श्रद्धा यस्यास्ति भवभेदिनी ।
तस्य निःशंकिताङ्गं स्याच्छुद्धं मोक्षफलप्रदम् ॥24॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन के आठ गुणों में से प्रथम निशंकित नामा गुण का क्या स्वरूप है, शिष्य के ऐसा प्रश्न करने पर आचार्य हर्षोत्फुल्ल हो उत्तर देते हैं।
रागद्वेष अज्ञानादि सम्पूर्ण भावसंबंधी दोषों से जो रहित हैं तथा जिनके ज्ञानावरण-दर्शनावरण-वेदनीय- मोहनीय-आयु-नाम-गोत्र और अन्तराय ये आठ भवभीतिदायक दोषाधायक कर्म दूर हो गए हैं अतएव जो द्रव्य भाव मल से रहित होकर निरञ्जन हो गए हैं ऐसे सिद्ध परमात्मा में, तथा जो कल्याण कारक मोक्षमार्ग का उपदेश करने के कारण ‘श्रीद’ हैं ऐसे श्रीजिनेन्द्र तीर्थकरदेव में,तथा उनके द्वारा प्ररूपित स्वपर को उत्कृष्ट ज्ञान प्रदान करनेवाले शास्त्र में और संसार भ्रमण की ज्वाला से जले हुए दूसरे प्राणियों को शान्ति के मार्गप्रदायक सच्चे गुरु में जिस भाग्यवान् को ऐसी दृढ़ श्रद्धा है, अर्थात् जो कितनी घोर विपत्ति पड़ने पर भी उसे अपने मार्ग से विचलित न कर सके तथा जो अन्तरङ्ग से पैदा हुई हो, ‘‘मैं जैन कुल का हूँ’’ ऐसे कुलाभिमान की नींव पर जो न खड़ी हो, ऐसी परम दृढ़ निश्चल संसार भ्रमण को छेद देनेवाली जिसे श्रद्धा है उसी के मुक्तिफल देनेवाला प्रथम ‘‘निःशंकित’’ नामा सम्यक्त्व का गुण होता है।२३ ।


प्रश्नः - निष्कांक्षितस्य चिह्नं किम् ? सिद्ध्यै स्याद् वद मे गुरो।

आदौ मध्येऽप्रिये चान्ते दुःखदे कटुके हृदि ।
क्षणिके स्वात्मबाह्ये हि निन्द्येऽग्राह्ये परोद्भवे ॥25॥

अर्थ: हे गुरुदेव! सम्यक्त्व के दूसरे निष्कांक्षित नामा गुण का क्या स्वरूप है वह मेरी आत्मा के बोध की सिद्धि के लिए कृपाकर कहिए–

संसारी प्राणी अनादि काल से ही इन्द्रिय सुखों को ही सुख समझकर उनके प्राप्त करने का ही प्रयत्न करते आये हैं। आत्मिक सत्यार्थ सुख का उन्हें कभी अनुभव नहीं हुआ। जब तक मिथ्यात्वकर्म के उदय से भ्रमबुद्धि है-तब तक आत्मिक सुख का अनुभव प्राप्त हो भी नहीं सकता है। जब मिथ्यात्व भाव स्वयं मिट जाता है और ज्ञानरूपी चक्षु मोहरूपी निद्रा से रहित हो जाते हैं तब उस प्राणी की दृष्टि निर्मल हो जाती है और उस सम्यग्दृष्टि को संसार के सुख को उत्पन्न करनेवाले इन्द्रियों के विषयभूत पदार्थों के संग्रह करने में और उनका भोग करने में रुचि उत्पन्न नहीं होती। इन्द्रिय जन्य सुख आत्मा से उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि इन्द्रियों को पुद्गल पदार्थों के निमित्त से हुआ है। वह परसे उत्पन्न पर पदार्थ के संयोग काल तक ही रह सकनेवाला सुख निन्दनीय है। सज्जनों के लिए ग्रहण करने योग्य नहीं है इसलिए सम्यग्दृष्टि को उसकी इच्छा ही नहीं होती। यह विषयभोग की अनिच्छा ही सम्यग्दर्शन का दूसरा निष्कांक्षित नामा अंग है।


परित्याज्येऽक्षसौख्येनास्था कांक्षा यस्य दुःखदा ।
निष्कांक्षिताङ्गमेवापि तस्य स्यान्निर्मलं प्रियं ॥26॥

अर्थ: संसारी प्राणी अनादि काल से ही इन्द्रिय सुखों को ही सुख समझकर उनके प्राप्त करने का ही प्रयत्न करते आये हैं। आत्मिक सत्यार्थ सुख का उन्हें कभी अनुभव नहीं हुआ। जब तक मिथ्यात्वकर्म के उदय से भ्रमबुद्धि है-तब तक आत्मिक सुख का अनुभव प्राप्त हो भी नहीं सकता है। जब मिथ्यात्व भाव स्वयं मिट जाता है और ज्ञानरूपी चक्षु मोहरूपी निद्रा से रहित हो जाते हैं तब उस प्राणी की दृष्टि निर्मल हो जाती है और उस सम्यग्दृष्टि को संसार के सुख को उत्पन्न करनेवाले इन्द्रियों के विषयभूत पदार्थों के संग्रह करने में और उनका भोग करने में रुचि उत्पन्न नहीं होती। इन्द्रिय जन्य सुख आत्मा से उत्पन्न नहीं हुआ बल्कि इन्द्रियों को पुद्गल पदार्थो के निमित्त से हुआ है। वह परसे उत्पन्न पर पदार्थ के संयोग काल तक ही रह सकनेवाला सुख निन्दनीय है। सज्जनों के लिए ग्रहण करने योग्य नहीं है इसलिए सम्यग्दृष्टि को उसकी इच्छा ही नहीं होती। यह विषयभोग की अनिच्छा ही सम्यग्दर्शन का दूसरा निष्कांक्षित नामा अंग है।


प्रश्नः - निर्विचिकित्सिताङ्गस्य किं चिह्नमस्ति मे वद।

तुच्छे निसर्गमलिने सुगुरोश्च देहे
रत्नत्रयेण सुखदेन पवित्रभूते
ग्लानिं करोति न च यो भुवि तस्य शुद्धं
सौख्यप्रदं भवति निर्विचिकित्सिताङ्गम् ॥27॥

अर्थ: संसारी प्राणी अनादि काल से ही शरीरबद्ध है। जैसे कोई राजा अपराधी प्राणी को मलिन स्थान दुर्गन्धितस्थान रूप जेलखाने में बाँधकर डाल देता है वैसे ही मोहराजा ने रसरुधिरादि अशुद्ध और दुर्गन्धित मलमूत्रोत्पादक, मलमूत्र से उत्पन्न निरंतर भोज्यपदार्थों को भी अभोज्य बनाने वाले इस देहरूपी महादुर्गन्धित जेलखाने में जीव को कैद कर रखा है। शरीर का यह स्वरूप ही है, फिर भी मनुष्य अपने शरीर से प्रीति करता है उसकी यथायोग्य सेवा करता है। उसकी सेवा में न प्रमाद करता और न उससे घृणा करता है।

कामी पुरुष काम के वशीभूत हो कामिनी के मल-मूत्रमय अंगों का प्रीतिपूर्वक सेवन करता है और उससे ही अपने जीवन को सफल मानता है। यदि वह अपने जीवन में पत्नीपरिग्रह न कर सके तो अपने जीवन को निरर्थक मानता है। मांसभक्षी पुरुष प्राणी के मलमूत्र स्थानभूत अंगों को भक्षण करने में ग्लानि नहीं करता। जो संसारी प्राणी इतने स्थलों में शरीर के मलिन स्वभाव को भुला सकता है वह सम्यक्त्वादिरूप रत्नत्रयों से विभूषित अनन्त गुणों के भंण्डार और अनेक प्रकार के तप संयम के द्वारा पवित्र साधुओं की देह से कैसे ग्लानि करता है यह आश्चर्य की बात है। सम्यग्दृष्टि पुरुष धर्मात्मा पुरुषों से कभी ग्लानि नहीं करता किन्तु उनकी सेवा और परिचर्या में सदा सावधान रहता है। जिसने इस प्रकार ग्लानि को जीत लिया है उसे सम्यक्त्व का तृतीय निर्विचिकित्सित अंग होता है ।


प्रश्नः - वदास्ति सिद्धये किं मेऽमूढदृष्ट्यङ्गलक्षणम्।

दुःखादिक्लेशकलिते कुटिले कुमार्गे
भ्रान्तिप्रदे सुखहरे विषमे विधर्मे।
श्रद्धा स्थितिर्ह्यनुमतिः क्रियते न येन
याऽमूढताङ्गमपि तस्य परं पवित्रम् ॥28॥

अर्थ: हे गुरो! मेरी इष्टसिद्धि के लिए चौथे अमूढ़दृष्टि अंग का लक्षण कहिए - सम्यग्दृष्टि पुरुष की पवित्र जिनमार्ग में सुमेरु की तरह अचल श्रद्धा होती है। वह यह निश्चित जानता है कि जिनोक्त धर्म संसार के महान् दुखों से बचाने वाला है, वह आत्मा के लिए हितकारक है, वह राजमार्ग की तरह प्राणिमात्र के लिए निर्भ्रान्त है। उससे विरुद्ध कोई भी धर्म विधर्म है, वह कभी भी हमारे संसार परिभ्रमणजन्य महान् दुःखों को दूर करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह सुख मार्ग का कण्टक होगा, भ्रम में फँसानेवाला होगा, आत्महित के प्रतिकूल होगा! सम्यक्त्वी न उस पर श्रद्धा लाता है, न वैसा विचार रखता है और न तदनुकूल आचरण करता है।

लौकिक चमत्कार के वश होकर, शाप आदि का भयंकर अथवा संतानादि की अभिलाषा वश अथवा धन की आशा से अथवा ये हमारे कुटुम्बी जन हैं या सगे सम्बन्धी हैं इसलिए मिथ्यादृष्टि होने पर भी इनकी सेवा करनी चाहिए, इन पर श्रद्धा करनी चाहिए, यह बात सम्यग्दृष्टि कभी नहीं स्वीकार करता। उसके इस निर्मल अचल परिणाम को अमूढ़दृष्टि नामक चौथा अंग कहा है ।


प्रश्नः - वदोपगूहनाङ्गस्य किं चिह्नं विद्यते गुरो।

विज्ञानशून्यमनुजैर्विमुखैः स्वधर्माज्
जाता जिनेन्द्रसुमतस्य यदि प्रणिन्दा।
ज्ञानैर्धनैर्भवहरैरपनीयते यैः
तेषां हि सर्वसुखदं ह्युपगूहनाङ्गम् ॥29॥

अर्थ: हे गुरो! पाँचवें उपगूहन अंग का क्या स्वरूप है इस प्रश्न पर आचार्य कहते हैं - अनादि कालीन परम्परा के प्रवाह में चले आए हुए इस विशाल जैन संघ में यदि कभी किसी श्रावक या श्राविका, मुनि या आर्यिका के द्वारा अपने अज्ञान या प्रमाद से अथवा शारीरिक वाचनिक या मानसिक कमजोरी के द्वारा चरित्र से विचलित हो जाने के अथवा पापोदय से मिथ्या अपवाद के कारण या दुष्ट जनों के द्वारा द्वेषवश लगाए गए दोषों के कारण जिनोक्त पवित्र धर्म की निन्दा उत्पन्न हो जाय तो सम्यग्ज्ञानी, सुचरित पुरुषों को जिस प्रकार बने उस अपवाद को दूर करना चाहिए इस कार्य को सम्यग्दर्शन का उपगूहन अंग कहा है।

उपशब्द का अर्थ है समीप से और गूहन शब्द का अर्थ है रक्षण करना। इसका यह तात्पर्य हुआ कि जैनमार्ग की जो स्वयं शुद्ध है निन्दा योग्य नहीं है, फिर भी यदि उसकी किसी प्रकार निन्दा हो तो सम्यग्दृष्टि को अपनी सामर्थ्य से उसे दूर करना चाहिए और इस प्रकार जैनमार्ग का रक्षण करना चाहिए। यदि धर्मात्मा पुरुष ऐसा न करेंगे तो लोकजन निन्दा के भय से इस सद्धर्म से विमुख हो जायँगे। ऐसी स्थिति में धर्म का द्वार अपनेआप बन्द हो जायगा और लोक जन-कल्याण के प्रदान करनेवाले इस मार्ग से वञ्चित रह जाँयगे और उनका कल्याण न हो सकेगा, अतः उपगूहन अंग का पालन करना अत्यावश्यक है।


प्रश्नः - किं स्थितीकरणस्य च चिह्नं वदास्ति मे गुरो।

स्वर्मोक्षशान्तिसुखतश्चलते जनाय
दत्त्वान्नवस्त्रनिलयानि हितोपदेशम् ।
तत्रैव तं प्रणयतोऽतिदृढीकरोति
श्रेष्ठं स्थितीकरणमस्य पवित्रमङ्गम् ॥30॥

अर्थ: स्वर्ग और मोक्ष के कारणभूत सुख और शान्ति के मार्ग चारित्र से किसी कारण से विचलित होने वाले गृहस्थ को उसकी आवश्यकतानुसार अन्न, वस्त्र और घर आदि तथा हितरूप उपदेश देकर संयम मार्ग में स्थिर कर देना, विचलित न होने देना सम्यक्त्व का स्थितीकरणनामा अंग है।


प्रश्नः - वात्सल्याङ्गस्वरूपं किं वदास्ति मे गुरो मुदा।

त्यक्तो मिथः कलिकरो भुवि येन भावः
स्वर्मोक्षमार्गनिरतस्य गुणानुरागात् ।
निःस्वार्थतो हि शिवदा क्रियते सुसेवा
वात्सल्यभाव इति तस्य भवेत् पवित्रः ॥31॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन के सातवें वात्सल्य अंग का स्वरूप हे गुरु! कृपा कर कहिए।

संसार में प्रत्येक प्राणी एक दूसरे से प्रीति करते हैं। उन सबमें माता और पुत्र की प्रीति पवित्र,निश्छल और निःस्वार्थ मानी गई है। माता का कोई स्वार्थ वत्स की रक्षा में नहीं होता। वह कपटरहित परम स्नेह भाव से उसका पालन-पोषण करती है। इसलिए पवित्र स्नेह ने ‘वात्सल्य’ नाम ही प्राप्त कर लिया है। सम्यग्दृष्टि जीव का यह भी एक महान् गुण है। स्वर्ग और मोक्ष के लिए कारणभूत सम्यग्दर्शनादि गुणों के पालनेवाले अपने समान धर्मी प्राणियों में उसे वात्सल्य भाव उत्पन्न होता है, वह उनकी निःस्वार्थ निष्कपट सेवा के लिए सदा प्रस्तुत रहता है। सम्यक्त्वी का यह भाव ही ‘वात्सल्य’ नामा सातवाँ अंग माना गया है।


प्रश्नः - प्रभावनाङ्गचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

मिथ्यात्वजां कुमतिदां भवदां कुविद्यां
बोधामृतैर्भवहरैरपहृत्य शीघ्रम् ।
सर्वोपरित्वमिति यैर्जिनशासनस्य
तोषां प्रभावनकृतिर्भुवि दृश्यते हि ॥32॥

अर्थ: हे गुरुदेव! कृपाकर सम्यक्त्व के आठवें प्रभावना अङ्ग का स्वरूप क्या है, कहिए।

अनादि काल से संसारी जीव मिथ्यात्व कर्म के वशीभूत हैं और इसी से उनका ज्ञान मिथ्याज्ञान हो रहा है, बुद्धि हित में नहीं जाती। वीतराग सर्वज्ञ भगवान् प्रतिपादित भी हित का उपदेश उन्हें अहित कर मालूम होता है। जैनधर्म के सम्बन्ध में वे सर्वथा विपरीत धारणाएँ कर बैठे हैं अथवा अज्ञानता के कारण जिन शासन का उन्हें बोध ही नहीं है। सम्यग्दृष्टि व्यक्ति जिस किसी भी उत्तम उपाय से कल्याणकरक धर्मोपदेश देकर उनका अज्ञान दूर करता है और उनमें जिनशासन की प्रतिष्ठा करता है। इसे ही सम्यक्त्व का आठवाँ प्रभावनाङ्ग कहते हैं।


अष्टाङ्गलक्षणं प्रोक्तमेवं सम्यक्त्वशुद्धिदम् ।
श्रीमता स्वात्मतुष्टेन कुन्थुसागरसूरिणा ॥33॥

अर्थ: ऊपर लिखे प्रकार से सम्यक्त्व के अष्टांगों का सम्यक् वर्णन श्री परम पूज्य आचार्य श्री कुन्थुसागरजी महाराज ने किया है। यहाँ आचार्य महाराज ने अपने लिए “स्वात्मतुष्ट” विशेषण लगाया है। स्वात्मतुष्ट व्यक्ति वह होता है जो केवल अपने आप में अर्थात् अपने आत्मगुणों की प्राप्ति में ही संतुष्ट हो चुका हो, जिसे न तो लौकिक संपत्ति की लालसा है और न अपने कामों से अपनी कीर्ति की, सम्मान की, प्रतिष्ठा की और पूज्यता की इच्छा है।

जो कार्य धन प्राप्ति के लिए किए जाते हैं या कीर्ति या सम्मान के लिए या किसी पद के लिए या अन्य किसी लौकिक लाभ के लिए किए जाते हैं उनके भीतर कोई दूसरी ही भावना काम करती है। वे मनुष्य सद्धर्म के सच्चे प्रचारक किसी भी हालत में नहीं हो सकते। सद्धर्मपालक और प्रचारक या प्रभावक को निःस्वार्थी-सेवाभावी औार प्रत्येक संभव उपाय के द्वारा स्व-परकल्याण करनेवाला होना चाहिए।

आचार्य महाराज ने “स्वात्मतुष्ट” एक ही विशेषण द्वारा अपने हृदय की निःस्वार्थता व कर्त्तव्यपरायणता तथा हितैषिता का परिचय दिया है। सम्यक्त्व के ये आठों अंग सम्यक्त्व को परिपूर्ण व पवित्र बनाते हैं। बिना इन अंगों को पूर्ण किए सम्यग्दृष्टि अपने गुण में अपूर्ण है, और अपूर्णशक्तिवाला अपने उद्देश्य की प्राप्ति में असफल रहता है। अतः संसारोच्छेद के लिए पूर्णांग सम्यक्त्व पालन करना चाहिए ।


प्रश्नः - लोकमूढत्वचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

मोहादिमुक्तमनुजो लभते स्वधर्मं
मूर्खो न सत्यपि सुवस्तुनि सौख्यदे हि।
गङ्गावगाहनवशाद्वदतीति धर्मो
लोकस्य तस्य भवदा भुवि मूढता स्यात् ॥34॥

अर्थ: अनादिकालीन मिथ्यात्व के उदय से जीवों को ऐसे संस्कार पड़े हुए हैं जिनके कारण पंचेन्द्रिय विषयों में विमूढ़ हो रहा है और इनके त्याग में असमर्थ होता हुआ सुखदायक सुमार्ग में नहीं चलता और न आत्महित को जानता है। सम्यग्दृष्टि सन्मार्ग का अवलम्बन करता है, क्योंकि वह विषयमूढ़ता से दूर है। जो विमूढ़ हैं वे धर्म की अभिलाषा से गंगादि तीर्थों में, प्रयाग के संगम में, गोदावरी, यमुना, नर्मदा या कहीं भी अन्यत्र स्नान करने मात्र से अपने को पापमुक्त मान लेते हैं। वे यह विचार नहीं करते कि स्नान से शारीरिक मल दूर होगा, आत्मा के रागद्वेषादि दोष दूर नहीं हो सकते। लौकिक मान्यता के आधार से चली हुई उक्त लोकमूढ़ता के कारण मोही पुरुष इस सम्यक् तत्त्व को नहीं जानता है।

पवित्रता धर्म का अङ्ग है यह निःसन्देह है। शारीरिक पवित्रता स्नानादि से प्राप्त होती है, पर आत्मा की पवित्रता स्नान से नहीं होती। आत्मा अमूर्त्त द्रव्य है और जल मूर्त्तिमान् पदार्थ है। मूर्तिमान पदार्थ से अमूर्त्त द्रव्य पवित्र या अपवित्र नहीं होता। गङ्गादि स्नान में धर्म माननेवाले सज्जनों को आत्मा की पवित्रता के लिए श्रीकृष्णजी का उपदेश ग्रहण करना चाहिए। अर्जुन को सम्बोधित करते हुए श्रीकृष्णजी ने कहा है - आत्मा नदी संयमतोयपूर्णा सत्यावहा शीलतटा दयोर्मिः ।
तत्रावगाहं कुरु पाण्डुपुत्र! न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा ।।

अर्थात् हे पाण्डु के पुत्र धीरवीर अर्जुन! अपनी आत्मा ही नदी है, उसमें ‘संयम रूप’ पवित्र जल भरा है, जिसमें सदा ‘सत्य’ ही बहता रहता है। ‘शील’ उसका तट है, उसमें दया की ऊर्मियाँ अर्थात् लहरें सदा लहराया करती हैं। ऐसी पवित्र आत्मा रूपी नदी में तू प्रवेशकर, अर्थात् आत्मा के अपने उक्त पवित्र रूप में रमण कर। इससे तेरी अन्तरात्मा पवित्र बनेगी। पानी के द्वारा चाहे वह गङ्गा का हो या अन्यत्र किसी भी महातीर्थ से लाया गया हो उससे अन्तरात्मा पवित्र नहीं हो सकती।

श्रीकृष्ण जी ने लोकमूढ़ता का कितना स्पष्ट निषेध करके आत्मा की पवित्रता का सुन्दरतम श्रेष्ठ मार्ग प्रकट किया है। यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए विचारणीय है। जो मनुष्य मोह या अज्ञान जन्य स्थिति से अपने को दूर रख सकता है वही स्वधर्म (आत्मधर्म) को प्राप्त कर सकता है, अन्य नहीं ।


प्रश्नः - किं देवमूढताचिह्नं वद मे सिद्धये गुरो।

सत्यार्थधर्मरहितो धनपुत्रहेतो-
र्मूर्खः कुदेवकुगुरोः शरणं प्रयाति।
स्यान्मूढता भुवि यतो भ्रमणस्य हेतु-
र्दुःखप्रदा सपदि तस्य कुदेवतायाः ॥35॥

अर्थ: जिसने धर्म का सच्चा स्वरूप नहीं समझा वह मनुष्य संसार परिभ्रमण के लिए कारणभूत दुःखप्रदायिनी देवमूढ़ता का त्याग नहीं कर सकता। वह लौकिक लाभ के लिए अर्थात् धन की प्राप्ति अथवा पुत्र के लाभ आदि को इष्ट जानकर उनके निमित्त कुदेव और कुगुरु की शरण पकड़ता है।


प्रश्नः - किं गुरुमूढ़ताचिह्नं वर्तते मे गुरो वद?

स्वात्मच्युतस्य भुवि कुर्वत एव पापम्
सेवाऽसतः क्रियत एव धनादिहेतोः।
स्यात्तस्य दुःखजनिका गुरुमूढताऽपि
ज्ञात्वेति सत्यरसिकैः परिवर्जनीया ॥36॥

अर्थ: हे गुरुदेव! गुरुमूढ़ता क्या है उसका क्या लक्षण है कृपाकर मुझे बतावें। ऐसा प्रश्न होने पर गुरुदेव गुरुमूढ़ता का स्वरूप बताते हैं - इस अनादिनिधन संसार में आत्मज्ञान रहित और इन्द्रियविषय लम्पट अनेक पापात्मा ‘गुरु’ नाम रखाकर लोगों को ठगते हैं। उनमें गुरुपना तो नाम निशान को भी नहीं है। जो व्यक्ति इन्द्रिय विषयों के दास नहीं है, हिंसादि पञ्च महापापों से दूर रहते हैं, निरभिमानी सरल प्रकृति व क्षमाशील हैं वे ही ‘सद्गुरु’ हैं, ऐसा स्वामी समन्तभद्राचार्य ने श्रावकाचार में वर्णित किया है। कुगुरु जन इष्ट वियोग और अनिष्ट संयोगादि तथा पीड़ा और रोगादि से व्याकुल प्राणियों को देखकर कहा करते हैं कि हम तुम्हारा दुःख दूर कर देंगे, हमें अनेक प्रकार की सिद्धि है। इत्यादि मिथ्याप्रलाप से जगत् के भोले प्राणियों को ठगते हैं। वे सरल संसारी जन संसार के दुःख से आतुर हो अपने दुख को दूर करने के लिए उन मूढ़ों की सेवा करते हैं। उनकी यह क्रिया गुरुसेवा नहीं ‘गुरुमूढ़ता’ है। इस प्रकार गुरुमूढ़ता के स्वरूप को जानकर तत्त्वरसिक जीवों को उसका त्याग करना चाहिए।


इत्यात्मदुःखदं निन्द्यं स्वाज्ञानदर्शकं मया।
त्रिमूढतास्वरूपं कौ प्रोक्तं तद्बोधहेतवे ॥37॥

अर्थ: उक्त प्रकार से तीन मूढ़ता का स्वरूप प्रतिपादन किया। ये तीनों मूढ़ताएँ यथार्थ में आत्महित के विरुद्ध होने के कारण दुःखदायक हैं, अतएव निन्दनीय तथा मूढ़ताभाव की प्रदर्शक हैं, सज्जनों के प्रतिबोध के लिए इन तीन मूढ़ताओं का स्वरूप श्री कुन्थुसागर स्वामी ने प्रतिपादित किया है ।


प्रश्नः - षडनायतनचिह्नं किं विद्यते मे गुरो! वद।

कुदेवस्य तथा तस्य भक्तस्य वन्दनादिकम् ।
न कार्यं तत्त्वतो भक्तिः सेवा वा शुश्रूषादिकम् ॥38॥

अर्थ: जो तत्त्वार्थ का परिपूर्ण ज्ञाता न होवे, अज्ञानादि दोषों से मुक्त न हो और परहित कामना से रहित हो, वही कुदेव नाम से प्रख्यात है। उसकी तथा उसके सेवकादिक की पूजा भक्ति वन्दनादि कभी न करनी चाहिए। ‘देव, ईश्वर, आप्त और परमात्मा’ आदि अनेक नामों द्वारा लोग किसी एक ऐसे आदर्श को मानते हैं जिसे वे संसार में सर्वोत्कृष्ट समझते हों। विचार यह करना चाहिए कि हम उसे सर्वोत्कृष्ट क्यों मानें? इसका उत्तर सीधा है कि वह हम सबसे अधिक गुणवान्, निर्दोष, ज्ञानवान् व समर्थ है और हमारा उससे हित होगा, इसीलिए हम उसे मानते हैं - पूजते हैं और स्तुति आदि करते हैं। यदि उस व्यक्ति में ये आदर्श गुण न हों तो वह किसलिए वन्दनीय माना जाय? इसी बात को दूसरे शब्दों में ग्रंथकार आचार्य लिखते हैं कि उक्त प्रकार के गुणों से रहित यदि कोई देवस्थानीय है तो वह कुदेव है और उसकी या उसके मानने वालों की सेवा शुश्रूषा आदि दोषकारक है।

यद्यपि जैनधर्म प्राणिमात्र में प्रेम का उपदेश देता है तथापि पदवीरूढ़ व्यक्ति यदि उस पद के योग्य न हो और उसे उस पद पर प्रतिष्ठित किया जाय तो यह बुद्धि में भ्रमोत्पादक होने से मिथ्यात्व कहा गया है। जिस सत्यार्थ वस्तु का स्वरूप परिज्ञान सुदेव के द्वारा हो सकता है वह कुदेवादि से नहीं, इसलिए कुदेव को छोड़ सुदेव का तथा उसकी मान्यता करनेवाले भक्तजनों का आदर करना समुचित है, कुदेव का नहीं। इसतरह कुदेव और कुदेव पूजक इन दोनों का आदरादि करना अनायतन सेवा है, इस प्रकार इन दोनों अनायतनों का स्वरूप कहा ।३८ ।


सत्यार्थवस्तुनो लाभो यतः स्यात् स्वैररोधनम् ।
सुदेवस्य सदा तस्य भक्तस्य वन्दनादिकम् ॥39॥

अर्थ: जो तत्त्वार्थ का परिपूर्ण ज्ञाता न होवे, अज्ञानादि दोषों से मुक्त न हो और परहित कामना से रहित हो, वही कुदेव नाम से प्रख्यात है। उसकी तथा उसके सेवकादिक की पूजा भक्ति वन्दनादि कभी न करनी चाहिए। ‘देव, ईश्वर, आप्त और परमात्मा’ आदि अनेक नामों द्वारा लोग किसी एक ऐसे आदर्श को मानते हैं जिसे वे संसार में सर्वोत्कृष्ट समझते हों। विचार यह करना चाहिए कि हम उसे सर्वोत्कृष्ट क्यों मानें? इसका उत्तर सीधा है कि वह हम सबसे अधिक गुणवान्, निर्दोष, ज्ञानवान् व समर्थ है और हमारा उससे हित होगा इसीलिए हम उसे मानते हैं - पूजते हैं और स्तुति आदि करते हैं। यदि उस व्यक्ति में ये आदर्श गुण न हों तो वह किसलिए वन्दनीय माना जाय? इसी बात को दूसरे शब्दों में ग्रथंकार आचार्य लिखते हैं कि उक्त प्रकार के गुणों से रहित यदि कोई देवस्थानीय है तो वह कुदेव है और उसकी या उसके मानने वालों की सेवा शुश्रूषा आदि दोषकारक है।

यद्यपि जैनधर्म प्राणिमात्र में प्रेम का उपदेश देता है तथापि पदवीरूढ़ व्यक्ति यदि उस पद के योग्य न हो और उसे उस पद पर प्रतिष्ठित किया जाय तो यह बुद्धि में भ्रमोत्पादक होने से मिथ्यात्व कहा गया है। जिस सत्यार्थ वस्तु का स्वरूप परिज्ञान सुदेव के द्वारा हो सकता है वह कुदेवादि से नहीं, इसलिए कुदेव को छोड़ सुदेव का तथा उसकी मान्यता करनेवाले भक्तजनों का आदर करना समुचित है, कुदेव का नहीं। इसतरह कुदेव और कुदेव पूजक इन दोनों का आदरादि करना अनायतन सेवा है, इस प्रकार इन दोनों अनायतनों का स्वरूप कहा ।३८ ।


अन्यागमस्य खलु तस्य कुपाठकस्य
ह्येकान्तपक्षकलितस्य भवप्रदस्य ।
सङ्गं विहाय जिनशास्त्रसुपाठकस्य
कार्यो निजात्मसुखदस्य सदैव सङ्गः ॥40॥

अर्थ: इस संसारिक जीवन में सदुपदेश ही आधारभूत या शरणभूत है। जीवन के सुधार के लिए या उसे समुन्नत बनाने के लिए उपदेश प्रभावपूर्ण कार्य करते हैं, यदि वे उपदेश यथार्थ हों। उपदेश की यथार्थता वक्ता की प्रामाणिकता से सम्बन्धित है। यदि वक्ता श्रेष्ठ गुणवान् है तो उसका उपदेश भी उपयोगी होगा और यदि वक्ता श्रेष्ठ गुणवान् नहीं है, स्वयं दोषी है, आत्मबल हीन है, तो उसका उपदेश जीवन को समुन्नत न बना सकेगा। ऐसे उपदेश को ही ‘कुशास्त्र’ या “कुआगम” कहा है। इन कुशास्त्रों में जो वस्तुतत्त्व वर्णित है वह एकान्तपक्ष से दूषित है। अतः वे अतत्त्वप्ररूपक हैं। वस्तु का स्वरूप अनेकान्त है और जैसा वस्तु का स्वरूप है वेसा ही प्रतिपादन करनेवाला आगम समीचीन शास्त्र है। सत्शास्त्र का उपदेश कल्याणकारक है। असत् तत्त्व के प्ररूपक ग्रंथ असत् शास्त्र हैं। वस्तु का यथार्थ ज्ञान होने से सुख या सुख के मार्ग की प्राप्ति होती है और मिथ्या या विपरीत ज्ञान से जीव मार्ग भ्रष्ट होकर दुःख या दुःख के मार्ग को प्राप्त हो जाता है। अतएव एकान्तपक्ष ग्रसित मिथ्याशास्त्र और उसके पाठकों से दूर रहकर आत्मा के शाश्वतिक सुख की प्राप्ति के लिए अनेकान्त प्रतिपादक जैन शास्त्रों का पठन तथा उसके सुपाठकों की संगति वन्दनादिक ही करनी चाहिए ।


शिष्यस्य तस्य कुगुरोश्च कुमार्गनेतुः
सेवा स्तुतिश्च सुजनैर्न कदापि कार्या ।
स्वानन्दसौख्यजनकस्य सदा सुसेवा
शिष्यस्य चास्य सुगुरोः सुखदा हि कार्या ॥41॥

अर्थ: पांचों इन्द्रियों की अभिलाषाओं के दास, आत्मबलहीन, लोभादिकषाय के वशीभूत अनेक आरम्भ और परिग्रह के भार से दबे हुए, काम-क्रोधादि दुर्गुणों के द्वारा पराजित अपने को गुरु माननेवाले अनेक पापी स्वयं संसार के दुःखों को भोगते हैं और अपने अनुयायी शिष्यों को भी संसार चक्र में परिभ्रमण कराते हैं। अतएव ऐसे कुगुरुओं की और उनके भक्तजनों की सेवा स्तुति प्रशंसा या वन्दनादिक कदापि नहीं करनी चाहिए। किन्तु स्वात्मसुख के अभिलाषी संसार के दुःखमय मार्ग से विमुख जो सुगुरु हैं जिनकी विषयाभिलाषा नष्ट हो चुकी है, जो गृहत्यागकर स्वात्मचिन्तन मात्र के लिए भयंकर वनों में निवास करते है, जो स्वयं ही परिग्रह से दूर, नग्नशरीरमात्र से भी मोह न रखनेवाले, मान से रहित, कामक्रोधादि दुर्गुणों से परित्यक्त, शील के भण्डार, गृहस्थ के द्वारा भक्तिपूर्वक दिए हुए रूखे-सूखे अन्न को अपने हस्तपुट में रखकर ही खड़े-खड़े एकबार निर्दोष आहार ग्रहण करनेवाले, परमदयालु, परोपकार करना ही जिनके जीवन का एकमात्र व्यापार है ऐसे परम वीतरागी महापुरुष ‘सुगुरु’ हैं। जो व्यक्ति संसार के दुःखों से भयभीत हैं, अनादिकाल की परम्परा द्वारा प्राप्त जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि अनिवार्य तथा विषयाभिलाषा, ईर्षा, द्वेष, दम्भ, कलह और वैर आदि स्वकृत महान् दुःखों से त्रस्त हैं और इनको दूर करना चाहते हैं उनका कर्त्तव्य है कि कुगुरु और उसके भक्तों का जो कि इन दुःखों में पगे हैं और इन दुःखों के मार्ग में ही चल रहे हैं संग त्यागकर सुगुरु और उनके भक्त शिष्यादिकों की संगति करें। “सुगुरु” परमदयालु हैं, प्राणिमात्र पर उनकी अनुपम दया है, वे अपनी सहजवृत्ति से प्राणियों के कल्याण की कामना करते हैं, वे उस कामना के बदले में तुमसे या किसी से कुछ भी नहीं चाहते। न वे धन चाहते हैं, न सेवा; न मान, न कीर्ति और न प्रशंसा। इस परोपकारवृत्ति पर कोई कृतघ्न यदि उन्हें गाली दे, मारे या बध-बन्धनादि उपसर्ग भी करे तो भी वे अपने चित्त में उद्विग्न नहीं होते, उस कृतघ्न पर क्रोधित नहीं होते, उसे शाप नहीं देते, उसे सद्बुद्धि आये ऐसी ही अभिलाषा रखते हैं। ऐसे परम सुगुरु की तथा उन जैसे ही उनके भक्तों की सेवा-स्तुति प्रशंसादि तथा अनुकरण सदा करनी चाहिए, जिससे स्वात्मकल्याण हो ।


प्रश्नः - भो! ज्ञानं प्राप्य किं कार्यं वद मे सिद्धये गुरो।

विज्ञानदानत इतीह भवेद्विवेक-
स्तद्बोधतो निजपदे स्थितिरेव ते स्यात् ।
ज्ञानादिदानमपि तत्र सदैव कार्यं
कार्यो मदो भयकरो भवदो न बद्ध्वा ॥42॥

अर्थ: हे गुरु! ज्ञान प्राप्त करके स्वात्मसिद्धि के लिए और क्या कर्त्तव्य है ? कहिए - ज्ञान आत्मा का लक्षण है। प्रत्येक जीव में केवल ज्ञान शक्ति है। संसार दशा में वह ज्ञान ज्ञानावरणादि कर्म द्वारा लुप्त सा हो रहा है, अतः जिन जीवों को कर्म का जितना क्षयोपशम प्राप्त है उतना ही ज्ञान खुला हुआ है। कर्म का नाश करने पर पूर्ण ज्ञान प्रकाशमान हो जाता है। जिनागम के श्रद्धानवाले सम्यग्दृष्टि जीवों को उक्त प्रकार का पूर्ण निश्चय रहता है, इसलिए स्वात्मबोध प्राप्त उन विवेकी पुरुषों को ज्ञानादि जन्य अहंकार नहीं उत्पन्न होता। उनकी बुद्धि दूसरों को ज्ञान दान देने की ओर ही प्रेरणा करती है। ज्ञान दान से विवेक उत्पन्न होता है और विवेक से वे स्वात्मपद में ही रमण करते हैं। मदादि या मात्सर्यादि दुर्गुणों में उनकी प्रवृत्ति नहीं जाती है।

यदि ज्ञानादि में हीनाधिकता हो तो मदादि उत्पन्न हों। जब सम्यग्दृष्टि जीवमात्र के परिपूर्ण ज्ञानरूपी धन है, ज्ञान जीव की सम्पत्ति है ऐसा दृढ़ निश्चय रखता है तो ईर्ष्या मात्सर्य और मद उत्पन्न होने का अवसर ही कहाँ है? यदि इतने पर भी जिनको मद उत्पन्न होता है तो समझना चाहिए कि उनको सम्यग्दर्शन नहीं है, जिनोदित तत्त्व पर श्रद्धा नहीं है। सभी जीव अपने को ज्ञानी और अन्य को अज्ञानी मानकर ज्ञान का गर्व करते हैं, क्योंकि कर्म के क्षयोपशम के अनुसार सांसारिक अवस्था में ज्ञान गुण की व्यक्ति में हीनाधिकता पाई जाती है। अतः अविवेकी मिथ्यादृष्टि मद करता है, विवेकी सम्यग्दृष्टि नहीं करता।

विवेकी सोचता है कि ज्ञानदान से ज्ञान की वृद्धि होती है। कदापि हानि नहीं होती। दान के अभाव में विद्या लुप्त हो जाती है, इसलिए विद्या देना परोपकार नहीं, स्वोपकार है। स्वोपकार करते हुए यदि परोपकार हो जाय तो इसमें अहंकार के लिए स्थान ही कहाँ है। फिर भी मिथ्यादृष्टि व्यर्थ ही अहंकार करते हैं। अहंकार ज्ञानादि गुणों का दूषण है। दूषण संसार परिभ्रमण का कारण है। संसार परिभ्रमण जन्य जरा रोगाक्रान्त होने से दुःखरूप है। इसलिए भयंकर संसार दुःखवर्द्धक ज्ञान का मद कदापि नहीं करना चाहिए ।


प्रश्नः - किं पूजामदचिह्नं मे वदास्ति शान्तये गुरो!

पूजादिदानकरणात् सुगुरोः प्रभोः स्यात्
पूजा सदा निजमतिर्विमलाऽपि कीर्त्तिः।
स्वानन्दशुद्धहृदयश्च कृतीति बुद्ध्वा
पूजामदं कुभवदं न करोति विज्ञः ॥43॥

अर्थ: हे गुरु! आठ मदों में पूजा का मद क्या वस्तु है? कृपया मेरे प्रश्न का समाधान कीजिए - सम्यक् वीतरागी, निर्मोही, विषयसंगविरक्त, सच्चे साधु की सेवा-विनय-पूजा तथा उनकी आहारादि दान से शुश्रुषा आदि से लोक में दाता की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। उसकी लोक में कीर्ति होती है तथा पवित्र भावनावाले साधुओं की सेवा से उसकी भावना भी पवित्र होती है। वह विचार करता है कि यदि संसार में मेरी कीर्ति हैं, प्रतिष्ठा है तो यह कोई अभिमान करने की बात नहीं है। सुगुरु सेवा करनेवाले दाता धर्माताओं की प्रशंसा सर्वत्र होती है। यह तो सुगुरु का मुझ पर महान् उपकार है जो मुझ जैसे अनादिकाल से भूले हुए पाथिक को दुख के गर्त से निकालकर कल्याण के सिंहासन पर बैठाया है। यदि मैं सुमार्ग पर चलने लगा तो इसमें घमंड करने योग्य क्या बात है। मैं कुमार्गगामी था अतः निन्दा का पात्र था, अब सुगुरु कृपा से निन्दा का पात्र नहीं रहा सो यह तो मेरा महान् उपकार हुआ। अब मैं व्यर्थ का घमण्ड कर क्यों नरकादि कुगति का पात्र बनूँ। इस तरह के विचारों से वह बुद्धिमान् अपनी प्रतिष्ठा का मद नहीं करता और समभाव रहकर अपना कल्याण करता है।४ ३।


प्रश्नः - उच्चकुलमदस्यास्ति किं चिह्नं? मे गुरो वद।

भवेदुच्चकुले जन्म दानपूजादिपुण्यतः।
ज्ञात्वेति दानपूजादि कार्यमुच्चकुले यतः ॥44॥

अर्थ: हे पूज्य गुरुदेव! “कुलमद” क्या वस्तु है, उसके क्या चिह्न हैं? यह मुझे स्पष्ट बताइए - उत्तम पात्र मुनि आदि को चतुर्विध दान देना तथा उनकी योग्यरीति से पूजा, विनय, सेवा और शुश्रूषा आदि करने से पुण्य का उत्पादन होता है और इस पुण्योदय से जीव का उच्चलोक प्रतिष्ठित सदाचारी माननीय कुल में जन्म होता है। यह कुलीनता पूर्व पुण्य का ही फल है। इस जन्म का कोई प्रयत्न नहीं है। तब उच्च कुल में जन्म पाने का अभिमान कैसा। तो भी यदि कोई मूढ़ कुल का अभिमान करे तो यह उसकी उन्मत जैसी चेष्टा है। पागलों का प्रलाप है। इससे उसकी प्रतिष्ठा घटती ही है। अतः इस चेष्टा को परित्याग कर परम पूज्य वन्दनीय सर्वज्ञ परमात्मा अर्हन्त देव का हितकर सन्देश अपने अपने हृदयों में स्थापित करना चाहिए, क्योंकि जिनोपदेश ही हमें दुःख के मार्ग से विमुख कर सुख के स्थान में पहुँचाएगा।४४ ।


उच्चकुलमदः त्याज्यः कार्यं नोन्मत्तचेष्टितम् ।
वन्द्यः सर्वज्ञसन्देशस्तथा स्थाप्यो जनैर्हृदि ॥45॥

अर्थ: उत्तम पात्र मुनि आदि को चतुर्विध दान देना तथा उनकी योग्यरीति से पूजा, विनय, सेवा और शुश्रूषा आदि करने से पुण्य का उत्पादन होता है और इस पुण्योदय से जीव का उच्चलोक प्रतिष्ठित सदाचारी माननीय कुल में जन्म होता है। यह कुलीनता पूर्व पुण्य का ही फल है। इस जन्म का कोई प्रयत्न नहीं है। तब उच्च कुल में जन्म पाने का अभिमान कैसा। तो भी यदि कोई मूढ़ कुल का अभिमान करे तो यह उसकी उन्मत जैसी चेष्टा है। पागलों का प्रलाप है। इससे उसकी प्रतिष्ठा घटती ही है। अतः इस चेष्टा को परित्याग कर परम पूज्य वन्दनीय सर्वज्ञ परमात्मा अर्हन्त देव का हितकर सन्देश अपने अपने हृदयों में स्थापित करना चाहिए, क्योंकि जिनोपदेश ही हमें दुःख के मार्ग से विमुख कर सुख के स्थान में पहुँचाएगा।४४ ।


प्रश्नः - चिह्नं जातिमदस्यास्ति ब्रूहि मे सिद्धये गुरो!

देवशास्त्रगुरूणां ये सेवां कुर्वन्ति भक्तितः ।
लभन्ते श्रेष्ठजातिं ते सखं कौ मान्यतामपि ॥46॥

अर्थ: हे दयालो! जातिमद के निराकरण की सिद्धि के लिए कृपाकर जातिमद के स्वरूप का प्रतिपादन कीजिए - मातृपक्ष यदि विशुद्ध हो तो वह विशुद्ध जातिवाला मनुष्य है और यदि मातृपक्ष अविशुद्ध है तो वह जातिहीन है। मातृपक्ष की उच्चता का, उसकी धनवत्ता, बलवत्ता, प्रतिष्ठा आदि का अभिमान करना ही जाति सम्बन्धी मद है। उच्च जातिवाला होने पर भी मनुष्य को उस उच्चता का अहंकार न करना चाहिए। उच्च कुल या उच्च जाति में जन्म उन महापुरुषों को स्वतः प्राप्त होता है जो सदेव, सद्धर्म तथा सद्गुरु की भक्ति और विनयपूर्वक यथोचित सेवा करते हैं। ऐसे सदाचारी जातिविशुद्ध पुरुष का कर्त्तव्य है कि वह ऐसे मर्मघातक वचन किसी से न कहे जिन वचनों से उसका जात्यभिमान प्रकट हो। अभिमानी पुरुष सदा पर का पराभव करता है और उससे ही दूसरे पुरुषों को मानसिक भयंकर दुःख होता है। इसलिए अभिमानी पुरुष हिंसक हो जाता है।

अभिमानी पुरुष को संसार के दूसरे मनुष्य उच्च न मानकर नीचा ही मानते हैं भले ही वह उच्च कुल या जाति का हो। अतः उच्चजाति का होकर भी वह लोक व्यवहार में जनता की निगाह में नीचा माना जाता है। इससे संक्लेश परिणामों में वृद्धि होती है और संक्लेश परिणाम पापबंधन का हेतु है तथा पाप से कुगति परिभ्रमण, करना होता है। अतः जो भव्य पुरुष स्वर्ग और परम्परा से मोक्ष को भी प्रदान करनेवाली धर्मबुद्धि को उत्पन्न करना चाहता है उसे चाहिए कि भूल कर भी जातिसम्बन्धी अहंकार न करे और न दूसरों को पराभूत करने का प्रयत्न करे। हीनजाति के मनुष्यों के साथ भी सद्व्यवहार रखे। उन्हें हीन समझकर उनका अनादर न करे। उनके सुधार के लिए केवल सदाचार का उपदेश करे। ऐसा करने वाले व्यक्तियों का ही श्रेष्ठ जाति में जन्म होता है। मद करनेवाले का जन्म तो नीच जाति में ही होता है।४६ ।


ज्ञात्वा जातिमदो नेति कार्यो मर्मविदारकः ।
श्रेष्ठजात्यां यतो जन्म स्यात्ते स्वर्मोक्षदा मतिः ॥47॥

अर्थ: मातृपक्ष यदि विशुद्ध हो तो वह विशुद्ध जातिवाला मनुष्य है और यदि मातृपक्ष अविशुद्ध है तो वह जातिहीन है। मातृपक्ष की उच्चता का, उसकी धनवत्ता, बलवत्ता, प्रतिष्ठा आदि का अभिमान करना ही जाति सम्बन्धी मद है। उच्च जातिवाला होने पर भी मनुष्य को उस उच्चता का अहंकार न करना चाहिए। उच्च कुल या उच्च जाति में जन्म उन महापुरुषों को स्वतः प्राप्त होता है जो सद्देव, सद्धर्म तथा सद्गुरु की भक्ति और विनयपूर्वक यथोचित सेवा करते हैं। ऐसे सदाचारी जातिविशुद्ध पुरुष का कर्त्तव्य है कि वह ऐसे मर्मघातक वचन किसी से न कहे जिन वचनों से उसका जात्यभिमान प्रकट हो। अभिमानी पुरुष सदा पर का पराभव करता है और उससे ही दूसरे पुरुषों को मानसिक भयंकर दुःख होता है। इसलिए अभिमानी पुरुष हिंसक हो जाता है।
अभिमानी पुरुष को संसार के दूसरे मनुष्य उच्च न मानकर नीचा ही मानते हैं भले ही वह उच्च कुल या जाति का हो। अतः उच्चजाति का होकर भी वह लोक व्यवहार में जनता की निगाह में नीचा माना जाता है। इससे संक्लेश परिणामों में वृद्धि होती है और संक्लेश परिणाम पापबंधन का हेतु है तथा पाप से कुगति परिभ्रमण, करना होता है। अतः जो भव्य पुरुष स्वर्ग और परम्परा से मोक्ष को भी प्रदान करनेवाली धर्मबुद्धि को उत्पन्न करना चाहता है उसे चाहिए कि भूल कर भी जातिसम्बन्धी अहंकार न करे और न दूसरों को पराभूत करने का प्रयत्न करे। हीनजाति के मनुष्यों के साथ भी सद्व्यवहार रखे। उन्हें हीन समझकर उनका अनादर न करे। उनके सुधार के लिए केवल सदाचार का उपदेश करे। ऐसा करने वाले व्यक्तियों का ही श्रेष्ठ जाति में जन्म होता है। मद करनेवाले का जन्म तो नीच जाति में ही होता है।४६ ।


युग्मम्

प्रश्नः - चिह्नं बलमदस्यास्ति ब्रूहि मे शान्तये गुरो।

दीनात्मरक्षणत एव सुपुण्यतोऽपि,
स्वर्मोक्षसाधकतमं लभते बलं ना।
ज्ञात्वेति दीनजनरक्षणमेव कार्यं
दुःखप्रदो बलमदो न कदापि कार्यः ॥48॥

अर्थ: हे श्रेष्ठ! बल का मद कैसा होता है उसका क्या फल है, मुझे शान्तिलाभार्थ उसका स्वरूप प्रतिपादन कीजिए - बलवान् पुरुषों के बल की उपयोगिता दीन, निर्बल और त्रस्त लोगों के रक्षण में ही संसार में मानी जाती है। इस परमोत्तम कार्य के द्वारा उत्पन्न श्रेष्ठ पुण्य के द्वारा ही उत्तम गति के साधन प्राप्त होते हैं और परम्परा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह सामान्य कर्त्तव्य है कि अपनी शक्ति का उपयोग सदा उन प्राणियों के रक्षण में करे जिनका जीवन ही एक मात्र धन है। उनकी विपत्तियों का दूर करना, रूग्णावस्था में उनकी शारीरिक सेवा करना, दूसरे बलवानों के द्वारा सताए जानेवाले निर्बलों की सहायता करना इत्यादि अनेक सदुपायों से उनकी रक्षा करनी चाहिए।

मैं बलवान् हूँ, मेरे सामने कौन ठहर सकता है, निर्बलों को मेरी सेवा करनी होगी, नहीं तो वे तकलीफ में डाल दिए जाँयगे! उनका विनाश कर दूँगा। इत्यादि कुभावों के द्वारा अपनी शक्ति का अनुचित अहंकार कर दूसरों का तिरस्कार करना, न्याय मार्ग का उल्लंघन कर उनके अधिकार छीनना, उनपर अपनी सत्ता जमाना, अपना प्रभुत्व स्थापन करना, यह सब “बलमद” है। बलमदवाला पुरुष अन्याय के मार्ग पर जाता है, हिंसा करता है, पराया धन हड़प जाता है, मिथ्या भाषण द्वारा स्वार्थसिद्धि के लिए दूसरों पर झूठा दोषारोपण करता है, पराई बहू-बेटियों पर खोटी निगाह करता है और अपने घमण्ड में चूर होकर तरह-तरह के अन्याय करते हुए भी नहीं डरता!

उसकी ये सब बातें उसे पारमार्थिक हानि तो पहुँचाती ही हैं पर लौकिक हानि भी पहुँचाती हैं। वह लोक में निंद्य होता है, पापी गिना जाता है, आततायी और अत्याचारी माना जाता है, सभी लोग उसके पराभव की कांक्षा करते हैं और उसके पराभूत होने पर आनंद मानते हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि अनिष्टकारक महान् दुःखदायी इस “शक्तिमद” को कभी पास न आने दे। ‘शक्ति’ की प्राप्ति को दीनों के उद्धार में व व्रत संयम के पालन में लगावे, जिससे कि उसका इस लोक और परलोक में कल्याण हो ।


प्रश्नः - चिह्नमृद्धिमदस्यास्ति ब्रूहि मे सिद्धये गुरो।

ऋद्धिः सुविस्मयकरी व्रतदानधर्माज्
ज्ञात्वेति शान्तिसुखदा भवतीह भव्य।
ऋद्धेर्विहाय कुमदं व्रतदानधर्मं
भक्त्या सदा कुरु यतश्च तवेष्टसिद्धिः ॥49॥

अर्थ: धन का मद क्या है, यह हे गुरो! मेरे कार्य की सिद्धि के लिए कृपया कहें - हे भव्य पुरुषों! व्रत पालन, सुपात्रदान, दया और उदारता आदि गुणों के द्वारा ही जीवन में शान्ति और सुख की दाता सामग्री प्राप्त होती है। केवल व्यापारादि के उद्योग या पुरुषार्थ से धनादि की प्राप्ति नहीं होती। इस निश्चित सत्य को जो लोग नहीं जानते ऐसे मूर्ख ही अपने वैभव का अभिमान करते हैं।

ऐश्वर्य से उन्मत्त पुरुषों की स्थिति बहुत विचित्र होती है। वे देव, शास्त्र और गुरु जैसे परम उद्धारकों की भी अवहेलना करते हैं। जब वे परम हितकारक देव, शास्त्र और गुरु की भी अवहेलना करते है तब अन्य पुरुषों की क्या कथा कहनी है। धनोन्मत्त पुरुष ऐसा मानता है कि मैं मन्दिरों का निर्माता हूँ, मैं देव स्थानों का व तीर्थस्थानों का रक्षक हूँ। यदि मेरे पास धन है तो बहुत से मन्दिर और बहुत-सी मूर्तियाँ बन सकती हैं। मन्दिरों की पूजा-प्रतिष्ठा, रथयात्रा महाभिषेक आदि सम्पूर्ण सत्कार्य करना मेरे बाएँ हाथ का खेल है।

शास्त्र भण्डारों में यदि चूहे घुसते हैं, यदि कृमि-कीट आदि शास्त्रों को नष्ट करते हैं तो हानि क्या है? और लिखा लिये जायँगे। धन पाने पर बहुत से पंडित और लेखक अनेक शास्त्र रचकर तैयार कर रख देंगे। मैं मुनिसंघों का संचालक हूँ। यदि मैं धन न खर्च करूँ तो मुनियों की क्या दशा होगी? मेरे धन से ही बड़े-बड़े विद्यालय विश्वविद्यालय चल रहे हैं। पैसे के लिए ही तो बड़े-बड़े विद्वान् पठन-पाठन करते हैं।

इस प्रकार धन या वैभव तथा अधिकार का अभिमान मनुष्य को धरती पर पैर नहीं रखने देता। वह चाहता है कि मैं सबके ऊपर चलूँ। वह समझता है कि सारा संसार मेरा मुँह देखता है। सबकी दृष्टि चाहे वह गृहस्थ हो व साधु, दीन हो या श्रीमान्, बलवान् हो या निर्बल, पंडित हो या मूर्ख, उद्योगी हो या निरुद्योगी, राजा हो या रंक, पापी हो या धर्मात्मा, मेरे धन की ओर है। मैं इन सबसे बड़ा हूँ। सब मेरा मान करते हैं। मेरा निरादर कोई नहीं कर सकता! मेरा निरादर करनेवालों की खैरियत नहीं है। उसका जीवन दुष्कर हो जायगा।


प्रश्नः - शरीरमदचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

अन्नौषधादिसुखहेतुविशेषदानाद्
देहं व्रतादिकरणे लभते समर्थम् ।
ज्ञात्वेति कायकुमदो भवदो न कार्यः
स्वात्मान्यशुद्धिकरणे सततं स योज्यः ॥50॥

अर्थ: हे गुरो! शरीरमद का क्या स्वरूप है? कृपया कहिए - यद्यपि संसार परिभ्रमणरूप चारों ही गतियों में मनुष्य देह श्रेष्ठ मानी गई है, पर वह जिस कारण से श्रेष्ठ है वह कारण है श्रेष्ठसंयम। इसकी प्राप्ति अन्य किसी भी गति में नहीं होती। तिर्यञ्चों में क्वचित् कदाचित् कथञ्चित् किसी को देशसंयम होने की सम्भावना रहती है तथापि परिपूर्ण संयम कभी नहीं होता। उसे प्राप्त करने की एकमात्र सामर्थ्य मानव देह में है और वह भी उच्चकुलीन पुरुष पर्यायाश्रित देह में।

यदि मानव देह की उत्कृष्टता के उक्त कारण को छोड़कर शरीर के स्वरूपपर विचार किया जाय तो यह देह महान् अपवित्र है। जिस देह का बीज मल है अर्थात् जो पुरुष के और स्त्रियों के रजवीर्य रूपी मल से ही बनता है तथा मल को उत्पादन करना ही जिसका एकमात्र कार्य है। नवद्वार जिसके सदा मलप्रवाही हैं। उस शरीर को सुन्दर मानना ही मूर्खता है; फिर सुन्दर मानकर उसका घमण्ड करना तो महान् मूढ़ता है।

मोही जन ही ऐसे घृणित शरीर को सुन्दर मानते तथा उसमें रमण करते हैं। विवेकी पुरुष उसमें कभी रमण नहीं करते। मिथ्यात्व के उदय से ही जीव हाड़ मांस चर्बी रक्त पीप आदि महान् दुर्गन्धित और अस्पृश्य पदार्थों के योग से बने इस शरीर को सजाते हैं और उसे सुन्दर मानते हैं। उसके लिए अच्छे-अच्छे पदार्थों की उपमा देकर अपने ज्ञाता हृदय को भी धोखा देकर अपना अकल्याण करते हैं।

सम्यग्दृष्टि पुरुष जिनके हृदय से भ्रम दूर हो गया है वे वस्तु के ठीक-ठीक स्वरूप को जानते हैं। वे कभी भ्रम में नहीं पड़ते, वे झूठी उपमाओं और उत्प्रेक्षाओं के जाल में पड़कर अपना वस्तुतत्त्व का ज्ञान गंदला नहीं करते। जब कि वे शरीर के वास्तविक रूप का ज्ञान रखते हैं तब ऐसी स्थिति में वे शरीर का मद भी कभी नहीं करते। वे जानते हैं कि यह मद संसार परिभ्रमण का मूल है। वे शरीर की उपयोगिता संयम के परिपालन में मानकर संयमधारण करते हैं। तपस्या के द्वारा इन्द्रिय विषय और कषायों का निग्रह कर वे आत्मशुद्धि के मार्ग में बढ़ते हैं तथा इस प्रकार स्वपरोपकार करते हुए अपना कालयापन करते हैं। यह कर्त्तव्य प्रत्येक मानव के लिए अनुकरणीय है ।


प्रश्नः - किं लक्षणं वद गुरो च तपोमदस्य।

इच्छानिरोधस्तपसः सुचिह्नं
ज्ञात्वेति चोक्तं सुखदं सुशान्त्यै।
मोक्षस्य चेच्छापि भवस्य बन्धो
वद प्रभो! चान्यकथास्ति का कौ ॥51॥

अर्थ: पाँचों इन्द्रियों के विषयों की अभिलाषा को स्वेच्छा से रोकना यह तप का सामान्य लक्षण है। संसार परिभ्रमण के गहन दुःखों से छूटने की अभिलाषा से तपस्वी पुरुष तप की आराधना करते हैं। उक्त अभिप्राय की पूर्ति के लिए तप करना श्रेयस्कर है। ऐसे तपस्वियों में अनेक ऐसे भी पुरुष हैं जिन्हें अपने द्वारा की जानेवाली उग्र तपस्या का गर्व उत्पन्न हो जाता है। वे यह कहने लगते हैं कि-हम तपस्वी हैं मेरे जैसा दुष्कर तप करने में मेरे सिवाय और कौन समर्थ है। किन्तु इस प्रकार का तपस्या का मद कभी नहीं करना चाहिए।

इच्छामात्र ही दुःख है। जो इच्छा रहित हैं उनके दुःख का लेश भी नहीं है। यह बात संसार प्रसिद्ध है कि अल्प इच्छावाला पुरुष स्वल्प प्रयत्न से अपनी इच्छा की पूर्ति करके सुखी हो जाता है और अनेक इच्छाओं वाला व्यक्ति अनेक प्रयत्नों से भी अपनी इच्छा पूर्ति नहीं कर पाता और दुःखी होता है। वह अपना शान्तिमय जीवन नहीं व्यतीत कर सकता। इससे यह सिद्ध है कि इच्छा का उत्पन्न होना दुःख का ही उत्पन्न होना है।

मोक्षप्राप्ति की अभिलाषा यद्यपि प्रशस्त इच्छा है। उसका अर्थ संसार के विषय भोगों की इच्छा से विमुक्त होना ही है, तथापि जब तक अन्य इच्छाओं के निरोध की तरह मोक्ष की भी अभिलाषा का निरोधकर एकमात्र दृष्टि आत्मविशुद्धि की ओर नहीं जाती तब तक मोक्ष भी दूर है। मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो वह मुझे कब मिले ऐसी चिन्ता करने वाला अपना समय व्यर्थ ही चिन्ता में खोता है। चिन्ता करने से कोई वस्तु नहीं मिलती, उसके लिए किए जानेवाले प्रयत्न में संलग्न होने से ही उक्त उद्देश्य की पूर्ति होती है। कर्तव्यविमूढ़ केवल चिन्ता में संलग्न तपस्वी अनेक वर्षों की तपस्या करने पर भी मुक्ति को प्राप्त नहीं होता है। जब मोक्षाभिलाषा ही मोक्ष प्राप्ति में बाधक है तब अन्य पदार्थों की अभिलाषाएँ कितनी अधिक बाधक होंगी यह सहज ही समझ में आ जाता है।

सारांश यह कि मोक्षाभिलाषी को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए बनाए गए प्रयत्नों में ही संलग्न रहना चाहिए। कर्त्तव्यशील व्यक्ति ही स्वोद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। कर्त्तव्य रहित चिन्तामात्र करनेवाला चिन्ताशील व्यक्ति केवल चिन्ता का पात्र होता है और अल्प प्रयत्नों को बड़ा प्रयत्न माननेवाला अथवा महान् प्रयत्न को भी अपने गर्व की वस्तु माननेवाला व्यक्ति पथ से च्युत हो जाता है और वह कभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं होता। अतः तपस्या का भी मद करना हेय है ।


मिथः क्लेशकरं प्रोक्तं हीत्यष्टमदलक्षणम् ।
ज्ञात्वेति तान् मदांस्त्यक्त्वा भवेयुर्निर्मदाः सदा ॥52॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए परस्पर क्लेशकर आठों मदों का स्वरूप भली भाँति समझ कर धर्मात्मा पुरुषों का कर्त्तव्य है कि वे इनसे अपने को सदा दूर रखें और किसी भी प्रकार का मद न करें। अभिमानी स्वल्पोन्नति में संतोषी हो जाता और अपने अल्प गुणों को भी महान् गुण मान बैठता है। उसके इस भ्रम से उसकी उन्नति रुक जाती है। वह अपनी उन्नति का स्वयं बाधक बन जाता है। सम्यग्दर्शन मोक्ष का मूल है। किन्तु इन मदों से उसकी जड़ पर ही कुठाराघात होता है और सम्यक्त्व सदोष हो जाता है। धर्मात्मा पुरुषों को इन मदों से दूर रहकर अपना सम्यक्त्व निर्मल बनाना चाहिए ।


प्रश्नः - इहलोकभयस्यास्ति किं चिह्नं मे गुरो वद।

स्वीयाज्ञानाद्यवस्थायां यत्किञ्चिद्धि कृतं मया ।
तदेव भुज्यते काले भावो यस्येति जायते ॥53॥

अर्थ: भय सात प्रकार के होते हैं। उनका वर्णन इस प्रकरण में क्रम से किया है। इनमें से सर्वप्रथम इस लोक संबंधी भय है। इसका क्या स्वरूप है ऐसा शिष्य श्रीगुरु से प्रश्न करता है - लोक में अपने-अपने जीवन की रक्षा के लिए अनेक पदार्थों का अर्जन और सञ्चय तथा उनका रक्षण लोग करते हैं। उनके प्रयत्न करने में कदाचित् पौरुष विफल हो जाय तो अनेक चिन्ताएँ उन्हें आ घेरती हैं और वे जीवन रक्षा के अभाव से भयभीत हो उत्साह रहित होकर म्लानचित्त हो जाते हैं। सम्यग्दृष्टि पुरुष तत्त्ववेदी है। वस्तु के स्वरूप का उसे परिज्ञान है। संपत्ति और विपत्ति दोनों अवस्थाओं में वह समभावी रहता है। न संपत्ति से फूल उठता है और न विपत्ति में चिन्तातुर होता है। वह जानता है कि मैने पूर्व में अच्छे या बुरे जो भी कर्म किए हैं उसके फलस्वरूप ही यह सम्पत्ति या विपत्ति है। अपने कर्मोदय के सिवाय अन्य कोई मेरी हानि या वृद्धि करने में समर्थ नहीं है। मैंने अपनी अज्ञानावस्था में जो अपराध किए हैं उनका ही कटुक फल मैं इस समय भोग रहा हूँ। इस प्रकार के तात्त्विक विचार से उसका चित्त सदा निर्भय रहता है। उसके चित्त में भय की रेखा का कभी उदय नहीं होता। यह सब उस महान् तत्त्वबोध की ही अचिन्त्य महिमा है कि जिससे वह सम्यग्दृष्टि विपत्ति में भी सुखी और निर्भय तथा साहसी बना रहता है।५३ ।


तस्येहलोकभीतिर्न जायते तत्त्ववेदिनः ।
सम्यग्दृष्टेस्तु जीवस्याऽचिन्त्योऽस्ति महिमा सदा ॥54॥

अर्थ: लोक में अपने-अपने जीवन की रक्षा के लिए अनेक पदार्थों का अर्जन और सञ्चय तथा उनका रक्षण लोग करते हैं। उनके प्रयत्न करने में कदाचित् पौरुष विफल हो जाय तो अनेक चिन्ताएँ उन्हें आ घेरती हैं और वे जीवन रक्षा के अभाव से भयभीत हो उत्साह रहित होकर म्लानचित्त हो जाते हैं। सम्यग्दृष्टि पुरुष तत्त्ववेदी है। वस्तु के स्वरूप का उसे परिज्ञान है। संपत्ति और विपत्ति दोनों अवस्थाओं में वह समभावी रहता है। न संपत्ति से फूल उठता है और न विपत्ति में चिन्तातुर होता है। वह जानता है कि मैने पूर्व में अच्छे या बुरे जो भी कर्म किए हैं उसके फलस्वरूप ही यह सम्पत्ति या विपत्ति है। अपने कर्मोदय के सिवाय अन्य कोई मेरी हानि या वृद्धि करने में समर्थ नहीं है। मैंने अपनी अज्ञानावस्था में जो अपराध किए हैं उनका ही कटुक फल मैं इस समय भोग रहा हूँ। इस प्रकार के तात्त्विक विचार से उसका चित्त सदा निर्भय रहता है। उसके चित्त में भय की रेखा का कभी उदय नहीं होता। यह सब उस महान् तत्त्वबोध की ही अचिन्त्य महिमा है कि जिससे वह सम्यग्दृष्टि विपत्ति में भी सुखी और निर्भय तथा साहसी बना रहता है।५३ ।


युग्मम्

प्रश्नः - परलोकभयस्यास्ति किं चिह्नं मे गुरो वद।

भवेऽस्मिन् यत् कृतं किञ्चित् परस्मिन् भोक्ष्यते मया ।
स एव तत्त्वतः श्रीदो भावो यस्येति वर्तते ॥55॥

अर्थ: हे गुरुदेव ! सात भयों में दूसरा परलोक सम्बंधी भय है उसका क्या स्वरूप है और उसका त्याग सम्यदृष्टि किस प्रकार करता है कृपया कहें। श्रीगुरु उत्तर देते हैं - मिथ्यादृष्टि लोग ऐसा विचार करते हैं कि यथार्थ में परलोक है भी या नहीं। यदि नहीं हो तो मेरा नाश ही हो जायगा। यदि परलोक है तो मेरा परलोक में क्या होगा। किसी योनि में जाऊँगा, मेरी वहाँ कैसी दशा होगी? इस प्रकार की विषम चिन्ताओं से यह दुःखी तथा भयभीत होता है। सम्यग्दृष्टि पुरुष ठीक इसके विपरीत यह निश्चय करता है कि परलोक में वह होगा जैसा हम इस लोक में करेंगे। यदि हम परलोक में सुख चाहते हैं तो हमें इस लोक में सदाचार से रहना चाहिए। परलोक में भय का कोई भी कारण नहीं है। परलोक का निर्माण हमारे ही अधीन है, पराधीन नहीं है। तब मैं क्यों व्यर्थ चिन्ता करूँ। मैं अपने भाग्य का निर्माता हूँ। फिर भय किस बात का? शुद्ध चैतन्य तत्त्व का अवलोकन करनेवाले उस ज्ञाननेत्र पुरुष की बहुत बड़ी महिमा है। वह कभी परलोक सम्बन्धी भीति को पास नहीं आने देता है।५५ ।


परलोकभयं तस्य न स्याद्विज्ञानचक्षुषः ।
शुद्धचिद्रूपमूर्त्तेः कौ ह्यगाधा महिमा मतः ॥56॥

अर्थ: हे गुरुदेव ! सात भयों में दूसरा परलोक सम्बंधी भय है उसका क्या स्वरूप है और उसका त्याग सम्यदृष्टि किस प्रकार करता है कृपया कहें। श्रीगुरु उत्तर देते हैं - मिथ्यादृष्टि लोग ऐसा विचार करते हैं कि यथार्थ में परलोक है भी या नहीं। यदि नहीं हो तो मेरा नाश ही हो जायगा। यदि परलोक है तो मेरा परलोक में क्या होगा। किसी योनि में जाऊँगा, मेरी वहाँ कैसी दशा होगी? इस प्रकार की विषम चिन्ताओं से यह दुःखी तथा भयभीत होता है। सम्यग्दृष्टि पुरुष ठीक इसके विपरीत यह निश्चय करता है कि परलोक में वह होगा जैसा हम इस लोक में करेंगे। यदि हम परलोक में सुख चाहते हैं तो हमें इस लोक में सदाचार से रहना चाहिए। परलोक में भय का कोई भी कारण नहीं है। परलोक का निर्माण हमारे ही अधीन है, पराधीन नहीं है। तब मैं क्यों व्यर्थ चिन्ता करूँ। मैं अपने भाग्य का निर्माता हूँ। फिर भय किस बात का? शुद्ध चैतन्य तत्त्व का अवलोकन करनेवाले उस ज्ञाननेत्र पुरुष की बहुंत बड़ी महिमा है। वह कभी परलोक सम्बन्धी भीति को पास नहीं आने देता है।५५ ।


प्रश्नः - वेदनाभयचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

यदि पुण्यं कृतं तर्हि कथं रोगी वाम्यहम् ।
भवत्येव सदा पापी रोगी दीनोऽतिचञ्चलः ॥57॥

अर्थ: संसार में प्रायः सभी साधारण प्राणियों के मन में इस प्रकार का अनागत भय बना रहता है कि मुझे कोई रोग न हो जाय। यदि मुझे जलोदर, क्षय और संग्रहणी आदि कोई भयंकर रोग हो गया तो मैं क्या करूँगा, कैसे अपने जीवन की रक्षा करूँगा? रोग अवस्था की उस महती वेदना को कैसे सहूँगा। देखो, बिचारे इन रोगों के रोगी कितने दुःखी हैं, उनका यौवन और जीवन दोनों व्यर्थ हैं। वे जीवन से निराश पाले (हिमपात) से मारे हुए वृक्षों जैसा नीरस निष्फल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी प्रकार जीवन मुझे भी भोगना पड़ेगा। इससे तो मरण अच्छा। ऐसे विचारों के द्वारा मिथ्यादृष्टि जनों के चित्त सदा क्लेशित, मोहित और भयभीत रहते हैं।

किन्तु सम्यग्दृष्टि पुरुष सदा निर्भय रहता है। वह देह में ममत्व तथा अहंकार नहीं करता। वह जानता है कि यदि पूर्व जन्म में मैंने पुण्यकार्य किए हैं, रोगी, दीन, दरिद्र, अङ्गहीन और असहायों की सेवा और उनके लिए उपयुक्त उचित सहायता की है तो मैंने अवश्य अनेक पुण्यों का सञ्चय किया है। ऐसी स्थिति में मैं कभी भी रोगी, दीन और दरिद्र नहीं हो सकता और न कभी असहाय रहूँगा। पाप सञ्चय करनेवाले पुरुष ही अपने दुष्कर्म के विपाकवश रोगी, दीन और चञ्चलचित्त होते हैं, ऐसा श्रीजिनेन्द्र का वचन है। यदि मैंने भी पूर्वजन्म में ऐसे पाप किए हैं तो मैं भी अवश्य ही रोगी और दुखी होऊँगा, फिर भी भय कैसा? पूर्वोपार्जित कर्म के फल भोगने में दीनता कैसी? ऐसा भय कायर पुरुष करते हैं। मुझ जैसा साहसी जिन वचन के दृढ़निश्चयी पुरुष को कायर बनना शोभास्पद नहीं है। ऐसा विचार करनेवाले सम्यग्दृष्टि पुरुष के कभी भी वेदना सम्बन्धी भय नहीं होता। सम्यक्त्व की ऐसी ही महिमा है।५७ ।


यस्येति तत्त्वतो भावस्तस्य तत्त्वार्थवेदिनः।
न वेदनाभयं स्यात् कौ सद्दृष्टेर्महिमाऽचलः ॥58॥

अर्थ: संसार में प्रायः सभी साधारण प्राणियों के मन में इस प्रकार का अनागत भय बना रहता है कि मुझे कोई रोग न हो जाय। यदि मुझे जलोदर, क्षय और संग्रहणी आदि कोई भयंकर रोग हो गया तो मैं क्या करूँगा, कैसे अपने जीवन की रक्षा करूँगा? रोग अवस्था की उस महती वेदना को कैसे सहूँगा। देखो, विचारे इन रोगों के रोगी कितने दुःखी हैं, उनका यौवन और जीवन दोनों व्यर्थ हैं। वे जीवन से निराश पाले (हिमपात) से मारे हुए वृक्षों जैसा नीरस निष्फल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी प्रकार जीवन मुझे भी भोगना पड़ेगा। इससे तो मरण अच्छा। ऐसे विचारों के द्वारा मिथ्यादृष्टि जनों के चित्त सदा क्लेशित, मोहित और भयभीत रहते हैं।
किन्तु सम्यग्दृष्टि पुरुष सदा निर्भय रहता है। वह देह में ममत्व तथा अहंकार नहीं करता। वह जानता है कि यदि पूर्व जन्म में मैंने पुण्यकार्य किए हैं, रोगी, दीन, दरिद्र, अङ्गहीन और असहायों की सेवा और उनके लिए उपयुक्त उचित सहायता की है तो मैंने अवश्य अनेक पुण्यो का सञ्चय किया है। ऐसी स्थिति में मैं कभी भी रोगी, दीन और दरिद्र नहीं हो सकता और न कभी असहाय रहूँगा। पाप सञ्चय करनेवाले पुरुष ही अपने दुष्कर्म के विपाकवश रोगी, दीन और चञ्चलचित्त होते हैं, ऐसा श्रीजिनेन्द्र का वचन है। यदि मैंने भी पूर्वजन्म में ऐसे पाप किए हैं तो मैं भी अवश्य ही रोगी और दुखी होऊँगा, फिर भी भय कैसा? पूर्वोपार्जित कर्म के फल भोगने में दीनता कैसी? ऐसा भय कायर पुरुष करते हैं। मुझ जैसा साहसी जिन वचन के दृढ़निश्चयी पुरुष को कायर बनना शोभास्पद नहीं है। ऐसा विचार करनेवाले सम्यग्दृष्टि पुरुष के कभी भी वेदना सम्बन्धी भय नहीं होता। सम्यक्त्व की ऐसी ही महिमा है।५७ ।


प्रश्नः - मरणभयचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

यावत्प्रमोहो भुवि तावदेव जन्मापि मृत्युश्च भवेन्नरस्य ।
वा यस्य जन्मास्ति च तस्य मृत्युः प्रियः सखा मे नववस्तुदाता ॥59॥

अर्थ: हे गुरुदेव! मरण भय क्या है और मिथ्यादृष्टि के उस मरणभय के कारण क्या परिणाम होते हैं। सम्यग्दृष्टि उस भय से कैसे विमुक्त रहता है, कृपाकर समझाइए। शिष्य के ऐसा प्रश्न करने पर सद्गुरु उत्तर देते हैं: - शरीर का प्राप्त होना ही जन्म है और उसका विनाश ही मरण है। जीवात्मा शरीर से बिल्कुल पृथक् लक्षणवाली वस्तु है। न तो जीव का कभी जन्म होता है और न मृत्यु ही। ऐसा तत्त्व निश्चित होनेपर भी मिथ्यात्व के उदय के वश संसारी प्राणी शरीर जन्म में स्वजन्म और शरीर के विनाश में अपना विनाश मान लेते हैं। उनकी ऐसी मिथ्या मान्यता ही उनके दुःख का मूल है। इस मिथ्याभावभासना से उन्हें मृत्यु का महान् भय उपस्थित होता है।

भेदविज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष को शरीर में ऐसा कोई मोह नहीं होता। उसे यह निश्चय है कि इस जन्म में इस शरीर का नाश हो जाने पर भी इस अमर आत्मा को जन्मान्तर लेना पड़ेगा और वहाँ नवीन शरीर अवश्य प्राप्त होगा। जब तक मेरा जीव कर्म से पराधीन है तब तक ऐसी अनेक योनियों में जन्म मरण करने होंगे।

मेरा यह जरा से जीर्ण शरीर छूटता है तो छूटने दो अब तो यह महारोगों का घर दुःख का निदान है, इससे छुड़ानेवाली और नवीन शरीर प्रदान करनेवाली मृत्यु मेरे साथ मित्रता का ही कार्य कर रही है। तब मृत्युसखा से भय कैसा? ऐसा विवेकपूर्ण भाव जिस शान्तिमूर्ति विवेकी पुरुष के हो उस चैतन्य तत्त्व के दर्शी महापुरुष को मृत्यु का भय अपने सन्मार्ग से कभी विचलित नहीं कर सकता। वह तीनों लोकों में निर्भय होकर विचरता है। सम्यक्त्व की यह अचिन्त्य महिमा है ।


यस्येति भावोऽस्ति विवेकपूर्णो मृत्योर्भयं तस्य भवेन्न दुष्टम् ।
चिद्रूपमूर्तेस्सुखशान्तिभोक्तुरहो ह्यचिन्त्यो महिमा त्रिलोके ॥60॥

अर्थ: शरीर का प्राप्त होना ही जन्म है और उसका विनाश ही मरण है। जीवात्मा शरीर से बिल्कुल पृथक् लक्षणवाली वस्तु है। न तो जीव का कभी जन्म होता है और न मृत्यु ही। ऐसा तत्त्व निश्चित होनेपर भी मिथ्यात्व के उदय के वश संसारी प्राणी शरीर जन्म में स्वजन्म और शरीर के विनाश में अपना विनाश मान लेते हैं। उनकी ऐसी मिथ्या मान्यता ही उनके दुःख का मूल है। इस मिथ्याभावभासना से उन्हें मृत्यु का महान् भय उपस्थित होता है।

भेदविज्ञानी सम्यग्दृष्टि पुरुष को शरीर में ऐसा कोई मोह नहीं होता। उसे यह निश्चय है कि इस जन्म में इस शरीर का नाश हो जाने पर भी इस अमर आत्मा को जन्मान्तर लेना पड़ेगा और वहाँ नवीन शरीर अवश्य प्राप्त होगा। जब तक मेरा जीव कर्म से पराधीन है तब तक ऐसी अनेक योनियों में जन्म मरण करने होंगे।

मेरा यह जरा से जीर्ण शरीर छूटता है तो छूटने दो अब तो यह महारोगों का घर दुःख का निदान है, इससे छुड़ानेवाली और नवीन शरीर प्रदान करनेवाली मृत्यु मेरे साथ मित्रता का ही कार्य कर रही है। तब मृत्युसखा से भय कैसा? ऐसा विवेकपूर्ण भाव जिस शान्तिमूर्ति विवेकी पुरुष के हो उस चैतन्य तत्त्व के दर्शी महापुरुष को मृत्यु का भय अपने सन्मार्ग से कभी विचलित नहीं कर सकता। वह तीनों लोकों में निर्भय होकर विचरता है। सम्यक्त्व की यह अचिन्त्य महिमा है ।

द्वितीय अध्याय (श्लोक 61 से 77)

युग्मम्

प्रश्नः - अरक्षाभयचिह्नं मे किमस्ति वद सिद्धये।

स्वात्मात्मना स्वात्मनि स्वात्मनो वा यथार्थतः कौ क्रियते स्वरक्षा ।
पुण्येन रक्षा व्यवहारदृष्ट्या पापेन कस्यापि विलोकिता न ॥61॥

अर्थ: हे गुरो! अरक्षाभय का स्वरूप कृपाकर बताइए जिसके परित्याग से मैं आत्मसिद्धि को प्राप्त कर सकूँ। आचार्य उत्तर देते हैं–

सात प्रकार के भयों में ‘अरक्षा भय’ भी एक है। मिथ्यात्व के द्वारा जिनकी बुद्धि मोहित है वे सदा ऐसी चिन्ताओं में निमग्न रहते हैं कि संसार में कोई मेरा रक्षक नहीं है। मेरी रक्षा कैसे हो? इस अरक्षा की चिन्ता को दूर करने के लिए वे अनेक पाप करते हैं। शरीर रक्षा के लिए शस्त्र रखते हैं। चोर आदि से रक्षा करने के लिए अपना धनादिक द्रव्य जमीन के भीतर गर्भगृह आदि बनाकर वहाँ छिपाते हैं। अनेक अपराधों को करते हुए भी अपराधों के दुष्फलों से बचने के लिए लोक के सामने मिथ्यावाद करते हैं। उचितानुचित प्रकार से अनेक प्रकार के परिग्रहण का सञ्चय करते हैं। इस प्रकार आत्मरक्षार्थ मिथ्यामार्ग का अवलम्बन करते हैं।

निश्चयनय से विचार कीजिए तो धनादिक परद्रव्य हैं - पुद्गल द्रव्य हैं। जीवद्रव्य की रक्षा से उनका बिलकुल सम्बन्ध नहीं है। केवल मोहजन्य बुद्धि के भ्रमवश धनादि से लोक स्वात्मरक्षा मानता है। आत्मा का सच्चा धन ज्ञानादि गुण हैं। उनमें ही जीव का स्वाधिकार है। विज्ञान का धनी आत्मा आत्मतत्त्व के बाधक क्रोध व कामादि विकारों से स्वात्मा की रक्षा करता है। वह अपनी आत्मा की यथार्थ रक्षा अपने ही सत्प्रयत्न से अपने ही भीतर करता है। वह जानता है कि मेरे सिवाय अन्य कोई जीव या अन्य कोई पुद्गलादि द्रव्य मेरी रक्षा करने में सर्वथा असमर्थ है।

व्यवहारनय से भी विचार किया जाय तो जीव के सत्प्रयत्नों द्वारा अर्जित पुण्यकर्म ही विपत्ति से रक्षा कर सकता है। पाप से तो केवल हानि ही है। पापी पुरुष तत्काल प्रसन्न भले ही हों पर अन्त में वे अपने को महान् दुःखों में फँसा हुआ पाते हैं।

उक्त प्रकार से ज्ञानरूपी सूर्य के द्वारा जिनका विवेक पूर्णरीत्या जागृत हो गया है; वे सम्यग्दृष्टि ही स्वात्मरक्षा करने में समर्थ हैं। ऐसे महापुरुषों के कदाचित् और


यस्येति भावोऽस्ति विवेकपूर्णोऽरक्षाभयं तस्य भवेन्न चित्ते ।
निजात्मरक्षां हि निजात्मनैव प्रकुर्वतो ज्ञानदिवाकरस्य ॥62॥

अर्थ: सात प्रकार के भयों में ‘अरक्षा भय’ भी एक है। मिथ्यात्व के द्वारा जिनकी बुद्धि मोहित है वे सदा ऐसी चिन्ताओं में निमग्न रहते हैं कि संसार में कोई मेरा रक्षक नहीं है। मेरी रक्षा कैसे हो? इस अरक्षा की चिन्ता को दूर करने के लिए वे अनेक पाप करते हैं। शरीर रक्षा के लिए शस्त्र रखते हैं। चोर आदि से रक्षा करने के लिए अपना धनादिक द्रव्य जमीन के भीतर गर्भगृह आदि बनाकर वहाँ छिपाते हैं। अनेक अपराधों को करते हुए भी अपराधों के दुष्फलों से बचने के लिए लोक के सामने मिथ्यावाद करते हैं। उचितानुचित प्रकार से अनेक प्रकार के परिग्रहण का सञ्चय करते हैं। इस प्रकार आत्मरक्षार्थ मिथ्यामार्ग का अवलम्बन करते हैं।

निश्चयनय से विचार कीजिए तो धनादिक परद्रव्य हैं - पुद्गल द्रव्य हैं। जीवद्रव्य की रक्षा से उनका बिलकुल सम्बन्ध नहीं है। केवल मोहजन्य बुद्धि के भ्रमवश धनादि से लोक स्वात्मरक्षा मानता है। आत्मा का सच्चा धन ज्ञानादि गुण हैं। उनमें ही जीव का स्वाधिकार है। विज्ञान का धनी आत्मा आत्मतत्त्व के बाधक क्रोध व कामादि विकारों से स्वात्मा की रक्षा करता है। वह अपनी आत्मा की यथार्थ रक्षा अपने ही सत्प्रयत्न से अपने ही भीतर करता है। वह जानता है कि मेरे सिवाय अन्य कोई जीव या अन्य कोई पुद्गलादि द्रव्य मेरी रक्षा करने में सर्वथा असमर्थ है।

व्यवहारनय से भी विचार किया जाय तो जीव के सत्प्रयत्नों द्वारा अर्जित पुण्यकर्म ही विपत्ति से रक्षा कर सकता है। पाप से तो केवल हानि ही है। पापी पुरुष तत्काल प्रसन्न भले ही हों पर अन्त में वे अपने को महान् दुःखों में फँसा हुआ पाते हैं।

उक्त प्रकार से ज्ञानरूपी सूर्य के द्वारा जिनका विवेक पूर्णरीत्या जागृत हो गया है; वे सम्यग्दृष्टि ही स्वात्मरक्षा करने में समर्थ हैं। ऐसे महापुरुषों के कदाचित् और


युग्मम्

प्रश्नः - अगुप्तिभयचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

यावन्मे वर्तते पुण्यं चौराद्याः केऽपि मद्धनम् ।
न हरन्ति गजाश्वादि पतितं यत्र कुत्रचित् ॥63॥

अर्थ: हे गुरुदेव! अगुप्ति भय के स्वरूप का भी प्रतिपादन कीजिए जिसे त्यागकर सम्यग्दृष्टि मुक्ति के पात्र होते हैं: - व्यवहार नय से यह विचार करना चाहिए कि जब किसी भी जीव को पुण्यकर्म का तीव्रोदय है तब तक उसकी हानि करने में कोई समर्थ नहीं हो सकता। मेरा धनादिक हाथी, घोड़ा आदि द्रव्य या अन्य व्यवहारोपयोगी भोगोपभोग की सामग्री चाहे वह कहीं भी रखी हो, भूली हुई हो, पराधीन हो पर उसे न चोर ले जा सकते हैं न राजादिक ही छीन सकते हैं। प्रत्युत वे सब मेरे सहायक ही होंगे, विरोधक नहीं। हाँ, पुण्यक्षीण होने पर कितना भी उपाय करूँ, कितना भी अधिक भोगोपभोग को गुप्त रखूँ किन्तु मैं उन्हें बचाने में असफल रहूँगा। निश्चयनय की दृष्टि से विचारिए तो आत्मा शुद्धज्ञान धनवाला है, अनन्तगुणों का भण्डार है। वे गुण आत्मद्रव्य से कभी पृथक् नहीं हो सकते। कर्म का आवरण भले ही हो, पर वे कर्म मेरे आत्मगुणों का नाश करने में समर्थ नहीं हैं। जैसे मदिरा पुरुष को मोहित कर उसे अपने गृह धनादि से दूर कर सकती है, पर उन्हें नष्ट नहीं कर सकती वैसे ही मोह मदिरा जीव को भ्रम में डाले है जिससे जीव आत्मधन को भूलकर परद्रव्य पुद्गलादिक में ही स्वस्वरूप देखता है, पर वह आत्मा के परमधन गुणों का विनाश नहीं कर सकता। आत्मा स्वयं रक्षित है उसे रक्षक की आवश्यकता नहीं है, ऐसी बोधदायिनी जिसकी बुद्धि है उस सम्यक्त्वी के कभी भी अगुप्ति भय नहीं हो सकता।६३ ।


स्वात्मास्ति तत्त्वतो गुप्तः शुद्धचिद्रूपनायकः।
यस्येति बोधदा बुद्धिस्तस्यागुप्तिभयं कुतः ॥64॥

अर्थ: व्यवहार नय से यह विचार करना चाहिए कि जब किसी भी जीव को पुण्यकर्म का तीव्रोदय है तब तक उसकी हानि करने में कोई समर्थ नहीं हो सकता। मेरा धनादिक हाथी, घोड़ा आदि द्रव्य या अन्य व्यवहारोपयोगी भोगोपभोग की सामग्री चाहे वह कहीं भी रखी हो, भूली हुई हो, पराधीन हो पर उसे न चोर ले जा सकते हैं न राजादिक ही छीन सकते हैं। प्रत्युत वे सब मेरे सहायक ही होंगे, विरोधक नहीं। हाँ, पुण्यक्षीण होने पर कितना भी उपाय करूँ, कितना भी अधिक भोगोपभोग को गुप्त रखूँ किन्तु मैं उन्हें बचाने में असफल रहूँगा। निश्चयनय की दृष्टि से विचारिए तो आत्मा शुद्धज्ञान धनवाला है, अनन्तगुणों का भण्डार है। वे गुण आत्मद्रव्य से कभी पृथक् नहीं हो सकते। कर्म का आवरण भले ही हो, पर वे कर्म मेरे आत्मगुणों का नाश करने में समर्थ नहीं हैं। जैसे मदिरा पुरुष को मोहित कर उसे अपने गृह धनादि से दूर कर सकती है, पर उन्हें नष्ट नहीं कर सकती वैसे ही मोह मदिरा जीव को भ्रम में डाले है जिससे जीव आत्मधन को भूलकर परद्रव्य पुद्गलादिक में ही स्वस्वरूप देखता है, पर वह आत्मा के परमधन गुणों का विनाश नहीं कर सकता। आत्मा स्वयं रक्षित है उसे रक्षक की आवश्यकता नहीं है, ऐसी बोधदायिनी जिसकी बुद्धि है उस सम्यक्त्वी के कभी भी अगुप्ति भय नहीं हो सकता।६३ ।


युग्मम्

प्रश्नः - अकस्माद् भयचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

मत्पुण्यविशेषश्चेन्न पतेत्किञ्चिन्ममोपरि ।
वा स्वचतुष्टये केऽपि न प्रविशन्ति वस्तुतः ॥65॥

अर्थ: हे गुरुदेव! अकस्माद् भय का स्वरूप क्या है? वह भी कृपाकर बताइए - यदि मेरे पुण्य का प्रबल उदय है तो कोई विपदा मेरे ऊपर नहीं आ सकती। न तो अन्य मेरे द्रव्यादि चतुष्टय में प्रवेश कर सकते हैं और न मैं अन्य किसी के द्रव्यादि चतुष्टय में प्रवेश कर सकता हूँ। ऐसे विचारपूर्ण जिसके परिणाम होते हैं, उसे अकस्माद् भय कैसे हो सकता है?


परचतुष्टये नापि प्रविशामि परात्मके ।
यस्येति बोधको भावस्तस्याकस्माद्भयं कुतः ॥66॥

अर्थ: यदि मेरे पुण्य का प्रबल उदय है तो कोई विपदा मेरे ऊपर नहीं आ सकती। न तो अन्य मेरे द्रव्यादि चतुष्टय में प्रवेश कर सकते हैं और न मैं अन्य किसी के द्रव्यादि चतुष्टय में प्रवेश कर सकता हूँ। ऐसे विचारपूर्ण जिसके परिणाम होते हैं, उसे अकस्माद् भय कैसे हो सकता है?


युग्मम्

इति सप्तभयादीनां स्वरूपं कथितं मया।
सर्वेषां धीमता शान्त्यै कुन्थुसागरसूरिणा ॥67॥

अर्थ: ऊपर लिखे प्रकार से बुद्धि वैभवशाली श्री १०८ आचार्यवर्य कुन्थुसागर महाराज ने जीवों के शान्ति लाभ के लिए तथा सम्यक्त्व की प्राप्ति के लिए अथवा सम्यक्त्व के निर्मल बनाने के लिए सप्त भय आदि का स्वरूप तथा उनसे दूर रहने के सदुपायों का वर्णन किया ।


संवेगाद्यष्टधर्माश्च श्राद्धानां सन्ति कीदृशाः।
वद तेषां स्वरूपं मे तेषु वृत्तिर्भवेद्यथा

स्वधर्मे सुखदे प्रीतिरधर्मे दुःखदेऽरुचिः।
भावो यस्येति स्यात्तस्य संवेगः सुखदो गुणः ॥68॥

अर्थ: हे गुरुदेव! सम्यक्त्वी के संवेग और निर्वेद आदिक अष्ट गुण होते हैं उनका क्या स्वरूप है कृपाकर कहिए ताकि उनके पालने में मेरी प्रवृत्ति हो - चतुर्गति परिभ्रमण ही संसार है। संसार रूप इस परिभ्रमण में यह जीव अनेक भाँति के दुःख उठाता है। यह संसार वृक्ष कर्ममूलक है। कर्मोदय से ही जीव चतुर्गति में परिभ्रमण करता है। इस दुःख मूलक संसार से उद्वेग उत्पन्न होना अर्थात् अरुचि उत्पन्न होना यही संवेगनामा गुण है। जिस बुद्धिमान् को संसारोत्पादक अधर्म में अरुचि होती है उसके दया, क्षमा, निरहंकार, सरलता, अपरिग्रहत्व और ब्रह्मचर्य आदि पवित्र गुणों में स्वयं प्रीति उत्पन्न होती है। ये दोनों ही प्रकार संवेग गुण के रूपान्तर हैं। यद्यपि सम्यग्दृष्टि सप्तभय रहित होता है तथापि वह संसार के दुःखों से भयभीत होता है। इन दोनों भयों में महान् अन्तर है। सप्त भय पर पदार्थ के निमित्त जन्य भ्रमवश मोहोदय से होते हैं, पर यह संवेग जनित भय स्वपदार्थ के यथार्थ बोध होने से तथा परपरणतिस्वरूप अपनी अज्ञानता पर खेद होने से पर के मोह के अभाव में होता है। इस प्रकार दोनों में महान् अन्तर है। सप्त भय त्याज्य हैं। उनका अस्तित्व मिथ्यात्व के अस्तित्त्व का सूचक है, किन्तु संसारपरिभ्रमण से भीरुता मोक्षसुख प्राप्ति के प्रति उत्साह और साहस प्रदान करता है। अतः वह भीरुता भी वीरता है। यही संवेग नामा प्रथम गुण है ।


संसारदेहे विषये विरक्तो यः शुद्धचिद्रूपसुखेऽनुरक्तः।
स्वानन्दमूर्त्तेः सुमतेः कृपाब्धेः स्यात्तस्य निर्वेगगुणः पवित्रः ॥69॥

अर्थ: प्रथम संवेग का स्वरूप बताया था कि संसार से भीरुता का नाम संवेग है। इस भीरुता का फल जीव की संसार, देह और विषयभोगों से विरक्ति है। जो पुरुष संसार की असारता, अनित्यता, और अशरणता को देखकर उससे विरक्त होता है, घृणास्पद देह के यथार्थ स्वरूप का चिन्तवन कर और कामिनियों की सुन्दरता को मल से भरे हुए सुवर्ण के घड़े की तरह समझकर काम भोगादिकों से अरुचि करने लगता है तथा पाँचों ही इन्द्रियों के विषयों के सुखों को अन्त में नीरस देखकर उनकी अभिलाषा से चित्तवृत्ति को हटाता है वही सम्यक् विचारवान् अपने परमानन्दस्वरूप, निरंजन, निर्विकार, कर्म कालिमारहित और चैतन्यस्वरूप आत्मा के प्रति अनुरागी हो जाता है। उस दयासागर आनन्दमूर्ति बुद्धिमान् की यह प्रवृत्ति ही निर्वेग नामा गुण है जो सम्यक्त्व का साधक है ।


क्रोधादेर्दुःखदस्यास्ति मन्दता यस्य सौम्यता।
स्यादुपशमगुणस्तस्य मिथः श्रीदः सुखप्रदः ॥70॥

अर्थ: क्रोधादि परिणाम आत्मा को सदा दुःखदाता है। क्रोधी स्वहिंसक है और परहिंसक है। क्रोध से हिंसा तो होती ही है पर अन्य भी लोभ, भीरुत्व और अहंकार आदि दुर्गुण उत्पन्न होते हैं। ये सब दुर्गुण अनात्म स्वरूप होने से अनन्त दुःख के प्रदाता हैं। जब जीव अपने सत्यप्रयत्नों द्वारा इन क्रोधादि परिणामों की मन्दता करता है तब उसके आत्मा में जो सन्तोष व शान्ति होती हैं उसे ही उपशम गुण कहते हैं। इस गुण से मनुष्य की प्रकृति में सौम्यता आ जाती है। दृष्टि बदल जाती है। यह उपशम गुण आत्मा को अनेक दुःखों से बचाता है और कल्याण के मार्ग को प्रकट करता है। इस गुण की प्राप्ति के बिना जीव को सम्यग्दर्शन का लाभ नहीं हो सकता। मिथ्यात्व का उपशम हो जानेपर भी यदि अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया या लोभ इनमें से किसी का उदय हो तो सम्यक्त्व का नाश हो जाता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि ‘उपशम’ सम्यक्त्वी का प्रधान गुण है ।


विद्यमाने गुणे श्रेष्ठे स्वात्मनि सुखदे सदा।
स्वनिन्दां कुरुते तस्य स्यात् स्वनिन्दागुणः प्रियः ॥71॥

अर्थ: संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जिसमें गुण या दोष न हों। किसी में गुण अधिक हैं तो दोष भी कोई न कोई पाया जाता है और किसी में यदि दोष बाहुल्य है तो एक-दो गुण भी उसमें पाए जाते हैं। सम्यग्दृष्टि आत्मा में उक्त नियमानुसार दोष भी हैं तथा सम्यक्त्वादि अनेक गुण भी हैं। ऐसा होने पर भी सम्यग्दृष्टि अपने में विद्यमान अनेक श्रेष्ठ गुणों की ओर लक्ष्य नहीं करता, किन्तु यदि उसमें स्वल्प भी दोष है तो उसे दूर करने के लिए स्वनिन्दा करता हुआ उस दोष को दूर करने का प्रयत्न करता है। सम्यग्दृष्टि का यह स्वनिन्दाकरण भी एक गुण है जो सम्यक्त्व में उज्ज्वलता लाता है।


धनादिकारणाद् गर्वः स्याच्चित्ते यदि दुःखदः।
तन्निन्दाकरणं नूनं श्रीदो गर्हागुणः प्रियः ॥72॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि पुरुष को भी कदाचित् कर्मोदयवशात् धन की प्राप्ति होने से, अनेक गुणों की प्राप्ति हो जाने से, कीर्ति फैल जाने से, राज्य सम्बन्धी अधिकार बल से और अनेक विद्याओं में अपने को पारङ्गत देख करके गर्व आ सकता है। सुन्दरशरीर, यौवनावस्था, अनेक प्रकार की भोगोपभोग सामग्री की प्राप्ति, सुपुत्र का होना, आज्ञाकारी पुत्र का होना, रूपवती सुलक्षण पतिव्रता भार्या का पाना और अनेक प्रकार से सामाजिक या राजकीय सम्मान की प्राप्ति का होना इत्यादि अनेक कारण हैं जिनका गर्व मनुष्य को उत्पन्न होता है। उक्त प्रकार से गर्वोन्नत मनुष्यों के मध्य में रहनेवाले सम्यग्दृष्टि को भी कदाचिद् ये सब दुर्गुण उत्पन्न हो सकते हैं तथपि वह सदा आत्महित में सतर्क रहता है। अतः कभी गर्व उत्पन्न भी हो जाय तो तत्काल अपने गर्व की निन्दा करता है। यह परनिमित्तजन्य हो जानेवाले गर्व को दूर करने की प्रक्रिया ही सम्यग्दृष्टि का ‘गर्हा’ नामक विशिष्ट गुण है।


स्वान्योपरिदयादृष्टिकरणमेव तत्त्वतः।
ह्यनुकम्पागुणो ज्ञेयः सर्वसौख्यप्रदर्शकः ॥73॥

अर्थ: दुःखित प्राणी को देखकर उसके दुःख को दूर करने की इच्छा या चिन्ता को अथवा प्रयत्न को अनुकम्पा या दया कहते हैं। सद्दृष्टि पुरुष सतत दयालु होता है। केवल व्यावहारिक दुःखों से परिपीड़ित पुरुषों पर ही वह दया नहीं करता बल्कि व्यवहारदृष्ट्या जो विषयान्ध पुरुष अपने को सुखी मानते हैं उनकी उस अनर्थ परम्परा को उत्पन्न करनेवाली विषयान्धता को भी दूर कर उन्हें आत्मिक सच्चे सुख की प्राप्ति होवे ऐसा प्रयत्न करता है। स्वयं अपने को भी दुःख का मूल राग, द्वेष, काम और क्रोधादि विकृत परिणामों से बचाता है। उसका यह सत्प्रयत्न ही अपने व अन्य पर की गई दया दृष्टि है जो सर्वप्रकार सुख प्रदायिनी है। इसे ही अनुकम्पानामा सम्यक्त्व का गुण कहते हैं ।


देवे शास्त्रे गुरौ यस्य बन्धे मोक्षे शुभेऽशुभे।
श्रद्धास्ति शर्मदा तस्याऽस्तिक्यनामा भवेद् गुणः ॥74॥

अर्थ: आस्तिकपने के भाव को आस्तिक्य गुण कहते हैं। प्राणिमात्र के हितकारक, राग द्वेष काम क्रोधादि विकारों से रहित व ज्ञानधनस्वरूप अर्हन्तपरमेष्ठी में, उनके द्वारा उपदिष्ट पारस्परिक विरोधभाव रहित दयामय सद्धर्म प्रकाशक शास्त्र में, शास्त्र प्रतिपादित सन्मार्ग का अवलम्बन करनेवाले तथा सुख-दुःख में मित्र-शत्रु में, संयोग और वियोग में और भवन-श्मशान में, हर्ष-विषाद से रहित समताभाव के समुपासक गुरु में और सर्वज्ञ प्रतिपादित सद्धर्म में तथा शुभाशुभरूप बन्ध-मोक्ष में जिसकी सुखदायिनी परम श्रद्धा है वही आस्तिक है। उसका यह सर्वोत्कृष्ट गुण ही ‘आस्तिक्य’ नामा गुण है।
“आस्तिक नियम से मोक्ष का तथा नास्तिक नरक का अधिकारी है” ऐसी लोकोक्ति को सुनकर अनेक धर्मात्माओं का यह विश्वास है कि आस्तिकों का कल्याण होगा, नास्तिकों का नहीं। पर कौन आस्तिक है और कौन नास्तिक है, यह तो सबसे बड़ा विवादास्पद प्रश्न है। वेदानुयायी लोग “वेदनिन्दक नास्तिक है” ऐसा कहते हैं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि जिस व्यक्ति की श्रद्धा में वेदों की प्रामाणिकता है वही आस्तिक है और अन्य सब नास्तिक हैं।


यः स्वात्मवत् सदा प्रीतिं करोति धार्मिकैः समम् ।
तस्य वात्सल्यधर्मः स्यात्सर्वप्राणिहितङ्करः ॥75॥

अर्थ: प्रीति का प्रकर्ष इस जगत् में माता का पुत्र में होता है। यद्यपि पिता-पुत्र का, भाई-भाई का और पति-पत्नी का भी स्नेह सम्बन्ध होता है, किन्तु इन सब में प्रीति का भाव कुछ न कुछ स्वार्थमूलक है। पिता पुत्र के प्रति प्रेम करता है क्योंकि उसे यह भरोसा है कि यह हमारे कुल का नाम जागृत करेगा तथा वृद्धावस्था में मेरा सहायक होगा। यदि उसे पुत्र से इन दोनों बातों की कोई आशा न रह जाय तो वह उसे अपने घर से पृथक् कर देता है। भाई-भाई अर्थ के लिए लड़ते हैं। अर्थ के निमित्त से भाई-बहिन में भी खटपट हो जाती है। पति-पत्नी का स्नेह तो केवल पारस्परिक विषय पूर्ति के साधन होने से ही प्रारम्भ होता है। मध्यकाल में वह जीवन निर्वाह के लिए परस्पर साधन भूत होने से टिकता है और अन्त में सन्तान मोह ही उस स्नेह को टिकाता है। उक्त स्वार्थों के अभाव में वह कच्ची लकड़ी की तरह पद-पद पर चटकता है। यदि लोकलज्जा के भय की चिन्ता न हो तो वह बिलकुल ही टूट सकता है। पुत्र भी माता को तब तक अधिक स्नेह करता है जब तक माता दुग्धपान कराती है। भोजन का साधन अन्नादि हो जाने पर स्नेह की मात्रा घटने लगती है। अवस्था बड़ी होने पर वह अपने स्वार्थ के लिए माता का अनादर भी करता है तथा आज्ञा के बहिर्मुख हो जाता है। विवाहित हो जाने पर वह विषयान्ध पत्नी का दास हो माता को बिल्कुल भूल जाता है और माता के भोजन का खर्च भी उसे भार रूप मालूम होने लगता है। वह स्वयं माता का अनादर करने लगता है। इतना ही नहीं, बल्कि पत्नी द्वारा भी माता का निरादर होने पर उसकी उपेक्षा करता है तथा माता को ही दोष देने को प्रस्तुत रहता है। इन सब बातों के विचार से यह ध्रुव सत्य है कि सांसारिक स्नेह बन्धन केवल स्वार्थजन्य बन्धन है। पारस्परिक स्वार्थ के लिए शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। अपरिचितों में भी घनिष्ट परिचय हो जाता है। इतना होते हुए भी माता का अपने वत्स पर स्नेह का बन्धन निःस्वार्थ होता है।

मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी प्राणियों में यह नियम देखा जाता है। ‘पुत्र कुपुत्र हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती’ ऐसी लोकोक्ति प्रसिद्ध है। माता गर्भ समय से ही बालक की सुविधा का ध्यान रखती है। गर्भभार को वहन करते हुए भी प्रसन्नमुख रहती है। गरम, तीखा, चटपटा और अनिष्टकारक भोजन केवल इस लिए नहीं खाती कि वह गर्भस्थ बालक को हानिकारक होगा। पुत्रोत्पत्ति के बाद जब तक वह दुग्धपान करता है तब तक शीतकारक, उष्णकारक और गरिष्ठ भोजन केवल इस विचार से नहीं करती कि बालक को शीत या उष्णता का विकार हो जायगा। दुग्धपान छूट जाने पर भी उसकी सदा परिचर्या करती रहती है, उसके सुख-दुःख का ध्यान रखती है। यदि घर में धन भी न हो, दरिद्रता हो तो भी स्वयं मज़दूरी करके धनोपार्जन करती है और स्वयं एक बार रूखा सूखा वासी अन्न खाकर भी बालक को उत्तम भोजन कराती है। बालक दुष्ट प्रकृति का भी हो जाय, अनादर भी करे, आज्ञा भी न माने तथा गाँव भर का उपद्रव कर उलाहना लावे तो भी माता उसे स्नेह करती है। विवाहित होने पर यदि पुत्र और पुत्रवधू दोनों निरादर करें, भोजन को भी तंग करें तो भी माता नित्य प्रातः सायं अपने पुत्र की, पुत्र के सुख के लिए पुत्रवधू की तथा उसके पुत्र-पुत्रियों की कुशलता और कल्याण की भावना पूर्वक परिचर्या करती रहती है।

वत्स के प्रति माता की इस निःस्वार्थ प्रीति ने इसीलिए अपना ‘वात्सल्य’ नाम पाया है। वात्सल्य शब्द के अर्थ में वे सब गुण छिपे हैं जो वत्स के प्रति माता की प्रीति में होते हैं या हो सकते हैं। कोई भी धर्मात्मा दूसरे धर्मात्मा के प्रति क्या व्यवहार रखे, कैसा बर्ताव करे इसके लिए आचार्यों ने सर्वत्र ‘वात्सल्य’ शब्द का ही उपयोग किया है। प्रीति के वाचक सैकड़ों शब्दों के रहते हुए उनमें से एक का भी प्रयोग नहीं किया है।

इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी धर्मज्ञ सम्यग्दृष्टि दूसरे साधर्मी को देखकर इतना प्रसन्न हो जितना माता वत्स को देखकर होती है। उसके हित का और सुख-दुःख का उतना ही ख्याल रखे। उससे गलती भी हो जाय तो वह उसकी निन्दा नहीं करे और न दूसरों से की गई उसकी निन्दा को सहे। वह सदा उसके दोषों को दूर करने की सतत


श्रावकाणां प्रबोधार्थं विशेषाष्टगुणा मया ।
प्रोक्तास्ते व्यवहारेऽपि मिथस्सत्प्रीतिकारकाः ॥76॥

अर्थ: श्रावकों के प्रबोध के लिए संवेगादि अष्ट गुणों का वर्णन जो पहले किया गया है वे गुण सम्यग्दृष्टि जीव के अवश्य होते हैं, क्योंकि सम्यक्त्व के उत्पन्न होने पर वे अवश्य पाये जाते हैं। यदि वे न हों तो सम्यक्त्व की भी हीनता हो जाय। ये गुण सम्यक्त्वरूपी वृक्ष के फल हैं, ऐसा भी कहा जाय तो उचित ही है। अतएव व्यवहार से संसार के साधारण मनुष्यों द्वारा भी यदि ये गुण अपना लिए जाँय तो परस्पर एक दूसरे के लिए अत्यन्त प्रीतिकारक सिद्ध होंगे।


प्रश्नः - सम्यक्त्वस्यातिचाराः के वद मे सिद्धये प्रभो।

शङ्का कांक्षा विचिकित्सा प्रशंसा संस्तवस्तथा।
सद्दृष्टेरतिचारास्ते सम्यक्त्वं दूषयन्ति नु ॥77॥

अर्थ: हे भगवान् ! सम्यक्त्व के भूषणों का वर्णन तो हो चुका अब उसके दूषणों का भी वर्णन कीजिए ताकि उनको दूरकर हम सम्यक्त्व निर्मल बना सकें - आस्तिक्य गुण के विरुद्ध आत्मा के अस्तित्व पर तथा परम वीतराग अर्हत्परमात्मा के वचनों पर सन्देह करना शंकातिचार है। इन्द्रियों के विषयों की अभिलाषा को ही जीवन में प्रमुख स्थान देना कांक्षा नाम दूसरा अतिचार है। धर्मात्मा श्रावक व साधु व्रती पुरुषों की तथा सर्व साधारण रोगी ग्लान पुरुषों की सेवा करने में घृणा करना विचिकित्सा नामा तृतीय अतिचार है। जो मिथ्यादृष्टि हैं, सद्धर्म से द्वेष रखते हैं, पाप से प्रीति रखते हैं, विषयान्ध हैं और कपटभेषी हैं अर्थात् धर्मात्मा का भेष रखकर दूसरों को ठगते हैं। इन सब कुलिंगियों और कुभेषियों की प्रशंसा करना यह प्रशंसा नामक चौथा अतिचार है तथा इन्हीं की स्तुति वन्दना करना संस्तत्व नाम का पांचवाँ अतिचार है।

तृतीय अध्याय (श्लोक 78 से 115)

प्रश्नः - व्यसनानि कति सन्ति तच्चिह्नं कीदृशं वद।
अथ व्यसनचिह्नं ते ब्रवीमि सुखतः शृणु

द्यूतं मांसं सुरा वेश्या स्तेयमाखेटकं तथा ।
परस्त्रीसङ्गमश्चैव सप्तैव व्यसनानि तु (क्षेपक)

द्यूतमेव जनानां स्याच्छत्रुः सर्वापहारकः ।
स्थानं दुष्कर्मणां नूनं मूढानां विपदां सखा ॥78॥

अर्थ: जुआ मनुष्यों का सर्वापहरण करनेवाला शत्रु है। शत्रु तो केवल बाह्य द्रव्य सुवर्ण-चांदी और गृह आदि का अपहरण कर सकता है, परन्तु द्यूत द्रव्य का अपहरण तो करता ही है, साथ ही कीर्ति का भी अपहरण करता है, स्वास्थ्य का भी नाशक है, आजीविका को भी नष्ट कर देता है और अविश्वास को उत्पन्न कर देता है। ऐसा जानकर छर्दि के समान द्यूत का त्याग कर शुद्ध चिद्रूप का स्वामी सज्जन पुरुष द्यूत व्यसन से दूर रहे।


ज्ञात्वेति च्छर्दिवद् द्यूतं त्यक्त्वा चात्यन्तदुःखदम् ।
सन्तो निर्व्यसनाः सन्तु शुद्धचिद्रूपनायकाः ॥79॥

अर्थ: जुआ मनुष्यों का सर्वापहरण करनेवाला शत्रु है। शत्रु तो केवल बाह्य द्रव्य सुवर्ण-चांदी और गृह आदि का अपहरण कर सकता है, परन्तु द्यूत द्रव्य का अपहरण तो करता ही है, साथ ही कीर्ति का भी अपहरण करता है, स्वास्थ्य का भी नाशक है, आजीविका को भी नष्ट कर देता है और अविश्वास को उत्पन्न कर देता है। ऐसा जानकर छर्दि के समान द्यूत का त्याग कर शुद्ध चिद्रूप का स्वामी सज्जन पुरुष द्यूत व्यसन से दूर रहे।


प्रश्नः - का मांसभक्षणे हानिस्तद्बोधाय गुरो वद।

न मांसभक्षिणां चित्ते दयाधर्मो भवेत्किल।
हेयोपादेयबोधोऽपि न स्यात्सद्विश्वशान्तिदः ॥80॥

अर्थ: हे गुरुदेव! मांस भक्षण करने में क्या हानि है। इस विषय को समझाइए - मांस भक्षण करना यह दूसरा व्यसन है जो प्राणी को धर्म मार्ग से भ्रष्टकर अधर्म के मार्ग में ले जाता है। जो लोग मांस भक्षण करते हैं वे दयावान नहीं होते। दया और हिंसा दोनों में परस्पर विरोध है। जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ एक स्थान पर नहीं रह सकते, इसी प्रकार एक प्राणी में दया और हिंसा दोनों एक साथ निवास नहीं कर सकते। मांस भक्षण निश्चित हिंसा महापाप का रूप है अथवा उसकी चरम सीमा है।

प्राणिवध के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। मांस वृक्षों में नहीं फलता, भूमि में उत्पन्न नहीं होता, आकाश से बरसता भी नहीं है, उसकी प्राप्ति प्राणी हिंसा से ही होती है। ऐसी स्थिति में दयावान् पुरुष भला किसी प्राणी की हिंसा मांसभक्षण के लिए कैसे करेगा? क्या कर्त्तव्य है। क्या नहीं । क्या कार्य हेय है, क्या उपादेय है, इस प्रकार विवेक जिसके हृदय में जागृत है वह दयावान् किसी भी प्राणी के एक रोम मात्र को भी दुःखी नहीं होने देता। पर शरीर का घात करना तो उसके लिए बहुत बड़ा पातक है।

मांस की उत्पत्ति में केवल उस प्राणी का ही वध नहीं है जिसका वह शरीर है बल्कि उसके मांस में उसी की जाति के अनन्त (निगोत) संख्यक प्राणियों की सतत उत्पत्ति होती है और मांस भक्षण में उनका विनाश सुनिश्चित है। इस तरह मौंस सेवी न केवल एक पंचेन्द्रिय का घातक है किन्तु उन असंख्य पंचेन्द्रियों का वह घातक हो जाता है जिन अनन्तानन्त निकोत जीवों के वहाँ अधिष्ठान हैं और जो उस मांस में सतत उत्पन्न होते रहते हैं 'इन जीवों की उत्पत्ति स्वयं मरे हुए प्राणी के मांस में भी होती है और मारे गए प्राणी के मांस में भी होती है तथा मांस की पकी हुई, पकती हुई, तथा कच्ची आदि सम्पूर्ण अवस्थाओं में भी होती है। अतएव मांसभक्षण में उनकी महान् हिंसा अवश्य होती है।


ज्ञात्वेति दुःखदं निन्द्यं त्यक्त्वा हि मांसभक्षणम् ।
कुर्वन्त्वात्महितं सन्तो धर्मज्ञा धर्मनायकाः ॥81॥

अर्थ: मांस भक्षण करना यह दूसरा व्यसन है जो प्राणी को धर्म मार्ग से भ्रष्टकर अधर्म के मार्ग में ले जाता है। जो लोग मांस भक्षण करते हैं वे दयावान नहीं होते। दया और हिंसा दोनों में परस्पर विरोध है। जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ एक स्थान पर नहीं रह सकते, इसी प्रकार एक प्राणी में दया और हिंसा दोनों एक साथ निवास नहीं कर सकते। मांस भक्षण निश्चित हिंसा महापाप का रूप है अथवा उसकी चरम सीमा है।

प्राणिवध के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। मांस वृक्षों में नहीं फलता, भूमि में उत्पन्न नहीं होता, आकाश से बरसता भी नहीं है, उसकी प्राप्ति प्राणी हिंसा से ही होती है। ऐसी स्थिति में दयावान् पुरुष भला किसी प्राणी की हिंसा मांसभक्षण के लिए कैसे करेगा? क्या कर्त्तव्य है। क्या नहीं । क्या कार्य हेय है, क्या उपादेय है, इस प्रकार विवेक जिसके हृदय में जागृत है वह दयावान् किसी भी प्राणी के एक रोम मात्र को भी दुःखी नहीं होने देता। पर शरीर का घात करना तो उसके लिए बहुत बड़ा पातक है।

मांस की उत्पत्ति में केवल उस प्राणी का ही वध नहीं है जिसका वह शरीर है बल्कि उसके मांस में उसी की जाति के अनन्त (निगोत) संख्यक प्राणियों की सतत उत्पत्ति होती है और मांस भक्षण में उनका विनाश सुनिश्चित है। इस तरह मौँस सेवी न केवल एक पंचेन्द्रिय का घातक है किन्तु उन असंख्य पंचेन्द्रियों का वह घातक हो जाता है जिन अनन्तानन्त निकोत जीवों के वहाँ अधिष्ठान हैं और जो उस मांस में सतत उत्पन्न होते रहते हैं 'इन जीवों की उत्पत्ति स्वयं मरे हुए प्राणी के मांस में भी होती है और मारे गए प्राणी के मांस में भी होती है तथा मांस की पकी हुई, पकती हुई, तथा कच्ची आदि सम्पूर्ण अवस्थाओं में भी होती है। अतएव मांसभक्षण में उनकी महान् हिंसा अवश्य होती है।


प्रश्नः - मद्यपानाद् भवेत् किं मे वदात्मशान्तये प्रभो।

चातुर्यं प्रवरा बुद्धिर्लज्जापि मद्यपायिनाम् ।
कुलजातिपवित्रत्वं नश्यति धर्मभावना ॥82॥

अर्थ: मद्यपान यह तीसरा व्यसन है। यह ऐसा कुव्यसन है जो आत्मा की बुद्धि पर सीधा कुठाराघात करता है। जैसे मस्तक विकृत हो जाने से बड़े बुद्धिमान् चतुर तत्त्वज्ञ पण्डित की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है इसी प्रकार मद्यपान से मनुष्य का चित्त विकृत हो जाता है और उसे कर्तव्याकर्तव्य का बोध शेष नहीं रहता। मद्यपायी लोग उत्तम मद्य उसे ही मानते हैं जो सुध-बुध भुला दे। जो मद्यप थोड़ा भी होश में रहता है मद्यप लोग उसके मद्य को हलके दर्जे का मानते हैं। जिस मद्य की उत्कृष्टता ही अज्ञान, विस्मरण या विवेकाभाव का प्रतीक है उसके सेवन करनेवाले मनुष्य में बुद्धि चातुर्य - विवेकशालिनी बुद्धि के सद्भाव की आशा करना स्वयं विकृत मस्तक का कार्य है। जैसे बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता वैसे ही मद्यपायी विवेकी नहीं हो सकता।

मद्यपायी को जब नशा उतरने पर होश आता है और उस समय उसे व्यावहारिक दृष्टि से कुछ बोध होने लगता है तब ही वह उस किञ्चिन्मात्र बुद्धि का नाश करने के लिए पुनः मद्यपान कर लेता है। होश में रहना उसे इष्ट ही नहीं, उसे तो अनिष्ट ही इष्ट है। जिसमें आत्मविस्मृति ही गुण है वहाँ चातुर्य और श्रेष्ठ बुद्धि की कल्पना या आशा करना मूर्खता है। सर्व साधारण पशु, पक्षी व कीट पतंगादि में भी खाने, पीने, सोने व विषय भोग करने का जो ज्ञान होता है उतना भी ज्ञान मद्यपायी को नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में मानवयोग्य बुद्धि की उसमें आशा कैसे की जा सकती है।

विवेक के अभाव में लज्जा चली जाती है। अविवेकी लज्जित क्यों होगा? कोई बुरा काम करनेवाले व्यक्ति को उसका विवेक जागृत होने पर ही लज्जा का अनुभव होता है, पर जिसे विवेक खोने के लिये ही मद्य पीना है उसे अपने दोष पर कभी लज्जा आयगी यह सोचा ही नहीं जा सकता। निर्लज्ज मनुष्य वेश्या सेवन, परधनापहरण, अभक्ष्य भक्षण, अपवित्र वस्तु सेवन, यहाँ तक कि स्वमाता से भी विषय सेवन जैसे निन्द्य कर्मों को करने में आगा पीछा नहीं देखता। व्यभिचारिणी स्त्रियों की संगति कर उनमें ही सन्तान उत्पन्न करता है और इस तरह अपनी जाति और कुल को कलंकित कर उसे अपवित्र बनाता है। आचार नामक वस्तु उसके लिए कुछ है ही नहीं। वह स्वैराचारी हो जाता है।

स्वैराचारी मनुष्य की धर्मभावना नष्ट हो जाती है। क्रूर और हिंसक भावनाएँ जागृत हो जाती हैं। उनकी मानसिक इच्छाएँ सदा दूषित रहती हैं। इच्छा न रहने पर भी वह अकृत्य को करता है, असेव्य को सेवन करता है। अगम्य में गमन करता है। वह अपनी सदिच्छाओं को पूरा करने के लिए स्वयं असमर्थ है। वह अपने आप में पराधीनता का अनुभव करता है। दुखी होता है और उस पराधीनता से छूटने की बार-बार इच्छा करता हुआ भी उससे अपने को छुड़ा नहीं पाता। जैसे पानी में बहनेवाले व्यक्ति को रीछ पकड़ ले तो उसे उससे पिण्ड छुड़ाना असम्भव सा जान पड़ता है। ऐसे ही नशे में बहनेवाले इस मद्यप को भी कहीं बचने का ठिकाना नहीं मालूम होता। वह दिन दिन घुलता है। परेशान होता है। इस दुःख से छूटना चाहता है पर अपनी असावधानी देख फिर आत्मविस्मृति के लिए मद्य ही पी लेता है और इस दुर्दशा से अन्त में मरण को प्राप्त हो दुर्गति का पात्र बनता है। ऐसा जानकर इस व्यसन का परिहार कर और स्वात्मानन्द रस का पान कर सुखी बनना चाहिए।८२ ।


स्वैराचाराः स्पृहा दुष्टा वर्धन्ते भवदुःखदाः ।
त्यक्त्वेति मद्यपानादि पिबन्तु स्वात्मनो रसम् ॥83॥

अर्थ: मद्यपान यह तीसरा व्यसन है। यह ऐसा कुव्यसन है जो आत्मा की बुद्धि पर सीधा कुठाराघात करता है। जैसे मस्तक विकृत हो जाने से बड़े बुद्धिमान् चतुर तत्त्वज्ञ पण्डित की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है इसी प्रकार मद्यपान से मनुष्य का चित्त विकृत हो जाता है और उसे कर्तव्याकर्तव्य का बोध शेष नहीं रहता। मद्यपायी लोग उत्तम मद्य उसे ही मानते हैं जो सुध-बुध भुला दे। जो मद्यप थोड़ा भी होश में रहता है मद्यप लोग उसके मद्य को हलके दर्जे का मानते हैं। जिस मद्य की उत्कृष्टता ही अज्ञान, विस्मरण या विवेकाभाव का प्रतीक है उसके सेवन करनेवाले मनुष्य में बुद्धि चातुर्य - विवेकशालिनी बुद्धि के सद्भाव की आशा करना स्वयं विकृत मस्तक का कार्य है। जैसे बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता वैसे ही मद्यपायी विवेकी नहीं हो सकता।

मद्यपायी को जब नशा उतरने पर होश आता है और उस समय उसे व्यावहारिक दृष्टि से कुछ बोध होने लगता है तब ही वह उस किञ्चिन्मात्र बुद्धि का नाश करने के लिए पुनः मद्यपान कर लेता है। होश में रहना उसे इष्ट ही नहीं, उसे तो अनिष्ट ही इष्ट है। जिसमें आत्मविस्मृति ही गुण है वहाँ चातुर्य और श्रेष्ठ बुद्धि की कल्पना या आशा करना मूर्खता है। सर्व साधारण पशु, पक्षी व कीट पतंगादि में भी खाने, पीने, सोने व विषय भोग करने का जो ज्ञान होता है उतना भी ज्ञान मद्यपायी को नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में मानवयोग्य बुद्धि की उसमें आशा कैसे की जा सकती है।

विवेक के अभाव में लज्जा चली जाती है। अविवेकी लज्जित क्यों होगा? कोई बुरा काम करनेवाले व्यक्ति को उसका विवेक जागृत होने पर ही लज्जा का अनुभव होता है, पर जिसे विवेक खोने के लिये ही मद्य पीना है उसे अपने दोष पर कभी लज्जा आयगी यह सोचा ही नहीं जा सकता। निर्लज्ज मनुष्य वेश्या सेवन, परधनापहरण, अभक्ष्य भक्षण, अपवित्र वस्तु सेवन, यहाँ तक कि स्वमाता से भी विषय सेवन जैसे निन्द्य कर्मों को करने में आगा पीछा नहीं देखता। व्यभिचारिणी स्त्रियों की संगति कर उनमें ही सन्तान उत्पन्न करता है और इस तरह अपनी जाति और कुल को कलंकित कर उसे अपवित्र बनाता है। आचार नामक वस्तु उसके लिए कुछ है ही नहीं। वह स्वैराचारी हो जाता है।

स्वैराचारी मनुष्य की धर्मभावना नष्ट हो जाती है। क्रूर और हिंसक भावनाएँ जागृत हो जाती हैं। उनकी मानसिक इच्छाएँ सदा दूषित रहती हैं। इच्छा न रहने पर भी वह अकृत्य को करता है, असेव्य को सेवन करता है। अगम्य में गमन करता है। वह अपनी सदिच्छाओं को पूरा करने के लिए स्वयं असमर्थ है। वह अपने आप में पराधीनता का अनुभव करता है। दुखी होता है और उस पराधीनता से छूटने की बार-बार इच्छा करता हुआ भी उससे अपने को छुड़ा नहीं पाता। जैसे पानी में बहनेवाले व्यक्ति को रीछ पकड़ ले तो उसे उससे पिण्ड छुड़ाना असम्भव सा जान पड़ता है। ऐसे ही नशे में बहनेवाले इस मद्यप को भी कहीं बचने का ठिकाना नहीं मालूम होता। वह दिन दिन घुलता है। परेशान होता है। इस दुःख से छूटना चाहता है पर अपनी असावधानी देख फिर आत्मविस्मृति के लिए मद्य ही पी लेता है और इस दुर्दशा से अन्त में मरण को प्राप्त हो दुर्गति का पात्र बनता है। ऐसा जानकर इस व्यसन का परिहार कर और स्वात्मानन्द रस का पान कर सुखी बनना चाहिए।८२ ।


युग्मम्

प्रश्नः - खेटक्रीडाफलं लोके किमस्तीति गुरो वद।

खेटक्रीडादिलुब्धानां क्रूरता मूढताऽगतिः ।
वर्द्धते पशुता दुष्टा सन्मार्गनाशिनी स्पृहा ॥84॥

अर्थ: मांसादि सेवन करने का व्यसन जिन्हें पड़ गया है वे शिकार खेलने की आदत बना लेते हैं। कोई अपने शौर्य प्रकाशन की इच्छा से, कोई अपनी हिंसक समाज में कीर्ति सम्पादन की इच्छा से और कोई केवल अपना शौक पूरा करने के इरादे से अपनी कुत्सित इच्छाओं को पूरा करने के इरादे से दूसरे प्राणियों का वध करते हैं। इस कुकृत्य को करते हुए उनमें दया के स्थान में कौतूहल जागृत होता है। क्रूरता जागती है। एक तड़पते हुए प्राणी को देखकर सज्जन को जहाँ करुणा उत्पन्न होती है वहाँ व्यसनी को आनन्द आता है। यह आसुरी आनन्द ही क्रूरता है। यही सन्मार्ग से भ्रष्ट करानेवाली महा मूढ़ता है। हिंसक जन्तुओं की तरह यह पशुता उसकी दिन-दिन बढ़ती जाती है। प्रकारान्तर से वह कुछ समय में नरतनधारी होने पर भी अपने परिणामों की जाति द्वारा पशु से भी भयंकर हिंसक और अविवेकी बन जाता है। इस कुकृत्य का फल परलोक में नरकादि गति की प्राप्ति है। ऐसे कुमानुष का मरण इस लोक में भी बहुधा वन जन्तुओं द्वारा ही होता है। यदि वह तिर्यग्गति में भी उत्पन्न हुआ तो स्वयं निर्बल होता है और दूसरे सबल प्राणियों का भोग्य बनता है जिनको उसने पूर्वजन्म में सताया था। द्वीन्द्रियादि जन्म में कीटादि होकर भी वह पक्षियों का आहार बनता है। इस प्रकार महान् भय और दुःख को देनेवाले इस कुव्यसन का त्यागकर आत्मशोधकों को स्वात्मा में ही रमण करना चाहिए।८४ ।


खेटक्रीडां भयाक्रान्तां ज्ञात्वेतिदुःखदां सदा ।
त्यक्त्वा स्वात्मपदे नित्यं रमन्तां स्वात्मशोधकाः ॥85॥

अर्थ: मांसादि सेवन करने का व्यसन जिन्हें पड़ गया है वे शिकार खेलने की आदत बना लेते हैं। कोई अपने शौर्य प्रकाशन की इच्छा से, कोई अपनी हिंसक समाज में कीर्ति सम्पादन की इच्छा से और कोई केवल अपना शौक पूरा करने के इरादे से अपनी कुत्सित इच्छाओं को पूरा करने के इरादे से दूसरे प्राणियों का वध करते हैं। इस कुकृत्य को करते हुए उनमें दया के स्थान में कौतूहल जागृत होता है। क्रूरता जागती है। एक तड़पते हुए प्राणी को देखकर सज्जन को जहाँ करुणा उत्पन्न होती है वहाँ व्यसनी को आनन्द आता है। यह आसुरी आनन्द ही क्रूरता है। यही सन्मार्ग से भ्रष्ट करानेवाली महा मूढ़ता है। हिंसक जन्तुओं की तरह यह पशुता उसकी दिन-दिन बढ़ती जाती है। प्रकारान्तर से वह कुछ समय में नरतनधारी होने पर भी अपने परिणामों की जाति द्वारा पशु से भी भयंकर हिंसक और अविवेकी बन जाता है। इस कुकृत्य का फल परलोक में नरकादि गति की प्राप्ति है। ऐसे कुमानुष का मरण इस लोक में भी बहुधा वन जन्तुओं द्वारा ही होता है। यदि वह तिर्यग्गति में भी उत्पन्न हुआ तो स्वयं निर्बल होता है और दूसरे सबल प्राणियों का भोग्य बनता है जिनको उसने पूर्वजन्म में सताया था। द्वीन्द्रियादि जन्म में कीटादि होकर भी वह पक्षियों का आहार बनता है। इस प्रकार महान् भय और दुःख को देनेवाले इस कुव्यसन का त्यागकर आत्मशोधकों को स्वात्मा में ही रमण करना चाहिए।८४ ।


युग्मम्

प्रश्नः - वेश्यासङ्गफलं किं मे वदास्ति सिद्धये गुरो।

वेश्यारतस्य शुचिता सुखदा न शान्तिः
बुद्धेर्बलं सुजनता नरताऽपि नश्येत्
ज्ञात्वेति धर्मरसिकैर्न हि तत्प्रसङ्गः
कार्यो यतः खलु भवेत् विमलः किलात्मा ॥86॥

अर्थ: हे गुरुदेव! वेश्यासङ्ग का क्या फल है वह मेरे आत्महित की दृष्टि से कहिए - व्यभिचारिणी स्त्रियाँ जो व्यभिचार द्वारा ही अपना उदर निर्वाह करती हैं, जो बिना पति की होते हुए नगर के अनेक विटपुरुषों द्वारा नगरपालिका के पुरीषालयों की भाँति सेवित होती हैं वे वेश्या शब्द के द्वारा व्यवहृत होती हैं। वेश्याव्यसनी मनुष्य बहुत दुःखी होता है। सबसे प्रथम तो वेश्या अपने ग्राहक से किञ्चिन्मात्र स्नेह न होते हुए भी अत्यन्त स्नेह का प्रदर्शन करती है जिससे वह व्यसनी जाल में मछली की तरह उसके जाल में फँस जाता है। वह उस जाल से अपने को फिर मुक्त नहीं कर पाता। वह अपना सर्वस्व धन, धर्म, वैभव, ज्ञान, विवेक, कीर्ति, दया, सद्व्यवहार और नागरिकता उस कुटिला के चरणों में चढ़ा देता है।

चारुदत्त की कथा तो शास्त्रों में प्रसिद्ध है, परन्तु वेश्याव्यसनी की बरबादी के अनेक लौकिक उदाहरण प्रत्यक्ष भी देखे जाते हैं। वेश्या अपने ग्राहक को मद्यपान के व्यसन में फँसाए बिना नहीं रहती। मद्यपान से उसे यह लाभ होता है कि मद्यप उसके नशे में अपना होशहवाश खो बैठता है। चित्तभ्रम होने से कभी अपने भले की बात सोच ही नहीं पाता। यदि वह मद्यपान न करे तो अधिक सम्भव है कि वह कभी अपनी बरबादी, अपकीर्ति और धन की लूट आदि हानियों को देखकर सतर्क हो जाय और वेश्या की संगति छोड़ दे। इस भय से वेश्या उसे शराब पीने की बुरी आदत जरूर डाल देती है। जब वह मनुष्य शराब की बेहोशी में अनवरत व्यभिचार करते-करते शरीर से भी बेकाम हो जाता है, निर्धन हो जाता है तथा समाज, सज्जन गोष्ठी, परिवार और मित्र आदि सबसे वञ्चित हो दर-दर की भीख माँगने योग्य हो जाता है तब वह वेश्या उसे घर से इस प्रकार निकाल देती है जैसे किल्ली मृत पशु को रक्त विहीन देखकर छोड़ देती है।

घर के लोग हिस्सा बाँट कर पहिले से ही उसे अलग कर देते हैं ताकि वह अपने हिस्से का ही धन बरबाद करे सब घर का धन व आजीविका नष्ट न कर सके। वेश्या द्वारा परित्यक्त निर्धन व्यक्ति को कोई कुटुंबी आश्रय देने को तैयार नहीं होता। इतना ही नहीं, उस व्यभिचारी हीनाचारी मद्यपायी को समाज का भी कोई व्यक्ति पास बैठाने को तैयार नहीं होता। उससे लोग ऐसे बचते हैं जैसे छूत की बीमारी से बचा जाता है। कोई धनी उससे लेने-देन व्यापार का व्यवहार नहीं करना चाहता, क्योंकि वह जानता है कि इसके पास पैसा तो है ही नहीं साथ ही दुर्गुणी होने से यह विश्वास का पात्र भी नहीं रहा। व्यसनी होने से यह अधिक संभव है जो यह हमारे द्वारा प्रदत्त धन का उपयोग अपनी आजीविकार्थ न करके मद्यपान में ही करे या फिर किसी वेश्या को दे दे।

आजीविका के अभाव में या तो वह लज्जाविहीन हो दर-दर भिक्षाटन करता है या फिर चोरी या द्यूत द्वारा अपना कष्ट दूर करने का प्रयत्न करता है। वेश्या व्यसनी यदि चोरी या द्यूत क्रीड़ा द्वारा धनोपार्जन कर भी ले तो वह उसे वेश्या को ही देगा या मद्यपान करेगा। वेश्याओं के पास ऐसे ही अनेक चोर, उचक्के, डाकू, शराबी और मांसभक्षी पुरुष आते जाते रहते हैं जो उसकी दुःसंगति को छोड़ने में अपने को असमर्थ पाते हैं।

वेश्या, कंचन और मद्य ये तीन यदि एक एक भी हो तो मनुष्य को सर्वथा अविवेकी, निर्दय, निर्लज्ज और पराधीन बना देते हैं। कदाचित् तीनों का योग हो जाय तब तो विनाश के लिए परम औषधि, जिसे महाविष भी कहा जा सकता है, तैयार हो गई ऐसा मान लेना चाहिए। जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, सुख और शान्ति का अभिलाषी है उसे परिवार चाहिए, समाज चाहिए और सत्संगति चाहिए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रहना चाहता। वह साधु भी हो जाय तो भी उसे वही साधु समाज अपने सुख शान्ति के लिए चाहिए। फिर संसारी गृहस्थ की तो


प्रश्नः - स्तेयफलं गुरो किं स्यात् वदास्ति शान्तये मुदा।

स्ववित्तमपि मे नास्ति पुण्यलब्धं कथं परम् ।
ज्ञात्वेति तत्त्वतः स्तेयं न कुर्वन्त्यात्मवेदिनः ॥87॥

अर्थ: हे गुरुदेव! चोरी करने का क्या फल है कृपाकर शान्ति प्राप्ति के लिए मुझसे कहें - लोक में जो धन माना जाता है वह भी पुण्य कर्मोदय से प्राप्त होता है। बिना पुण्य के सातोत्पादक सामग्री का संयोग प्राप्त नहीं होता। धन यदि लौकिक सुख को उत्पन्न करता है तो पुण्य का फल है। यदि वह धन असाता और आकुलता प्राप्त कराता है तो पाप का फल है। एकान्त नहीं है जो यह धन-संपत्ति राज्य, परिवार, पुत्र, कलत्र सब पुण्य के फल हैं। यदि इनसे संसारी प्राणी साता का अनुभव करे तो ही ये पुण्य सामग्री हैं, अन्यथा असाता की उत्पादक हों तो ये सब पापोदय की सामग्री हैं। और इनसे विलग होना ही पुण्य का उदय है। सर्व साधारण मनुष्य धनादि से अपने को सुखी अनुभव करता है। इस दृष्टि को लक्ष्य में रखकर ही श्री आचार्य महाराज ने इसे पुण्य से प्राप्त होने वाली सामग्री लिखा है। जंगल में जब डाकू शस्त्र लेकर धन लूटने आते हैं उस समय यदि कोई धनी सामने आ जाता है तो वह शस्त्राघात से पीड़ित किया जाता है पर साथ में जो निर्धन है वह छोड़ दिया जाता है। ऐसे अवसर पर धन विपत्ति लानेवाला होने से पापोदय की निशानी हुई और निर्धनता पुण्य की सामग्री हुई। नगर में आग लग जाय तो धनी का धन महान् दुःखोत्पादक होने से पाप की सामग्री है और निर्धनता सुखोत्पादक होने से पुण्य की सामग्री है। मोक्षमार्ग साधन के लिए बाधक अनेक विकल्प जालों में फँसाने वाली अनिष्ट कारक विभव सामग्री पापरूप है और शीघ्र ही गार्हस्थिक जाल से विमुक्त करा देनेवाली इष्ट कारक निर्धनता पुण्य है।

सारांश यह है कि कोई भी सामग्री एकान्त रूप से पुण्य या पाप रूप नहीं है। जो संसारी प्राणी को इष्टकारक सुखसाधन हो जाय वह सब पुण्य का फल है और जो भी सामग्री अनिष्टकारक दुःख साधन रूप हो वह पाप का फल है। पुण्य से प्राप्त सामग्री को भी सम्यग्दृष्टि अपनी वस्तु नहीं मानता। वह जानता है कि यह सब स्वात्म स्वरूप व्यतिरिक्त पर पदार्थ हैं। मेरा तो केवल आत्मा है। दर्शन, ज्ञान, और चारित्रात्मक रत्नत्रयस्वरूप धर्म ही मेरा वैभव है। ऐसे विवेकी मनुष्य के द्वारा परधनापहरण रूप निन्द्य स्तेयकर्म कैसे हो सकता है।


स्वपरज्ञानशून्या हि स्तेयं कुर्वन्ति पापिनः ।
ततः स्वानन्दतृप्तः सन् वसतु स्वात्ममन्दिरे ॥88॥

अर्थ: जिन मिथ्यामतियों को स्वपर का विवेक नहीं जागृत हुआ और जिन्होंने अभी तक आत्मतत्त्व को ही नहीं जाना वे अपने मनुष्य के जन्म को ही अपना जन्म मानते हैं, शरीर को ही अपना स्वरूप समझते हैं और कुटुम्ब परिजन को अपना स्नेहभाजन जानते हैं। उन्हें हितैषी समझकर उनसे मोह करते हैं। उनके संयोग में सुखी और वियोग में दुःखी होते हैं। धन, सम्पत्ति, मकान और राजविभव आदि जो जो सामग्री उन्हें उनके कर्मोदय से प्राप्त है उस सब में राग द्वेषमय प्रवृत्ति करते हैं। यह अज्ञान भाव जिसके हृदय में जमा है वे अविवेकी ही धनादि को सम्पूर्ण सुख का साधन मान उसमें मूर्च्छित होते हैं। वे उन पर पदार्थों में ऐसे तन्मय हैं जो उनके लाभ में अपना परम लाभ और उनकी हानि में अपनी परम हानि समझकर महान् दुःखी होते हैं। ऐसे ही मोही जीव उसकी प्राप्ति के लिए परधनापहरणरूप स्तेय पाप को अंगीकार कर लेते हैं। एक बार इस पाप को करनेवाला उसे बार-बार करता है। चोरी उसकी आदत में आ जाती है।


प्रश्नः - परस्त्रीसेवनस्यास्ति किं फलं मे गुरो वद।

रक्तोऽस्ति यः कोऽपि किलान्यनार्यां तस्यापमानोऽपि पदे-पदे स्यात्।
दुःखप्रदा वैरविरोधवृद्धिः ज्ञात्वेति कार्यो न च तत्प्रसङ्गः ॥89॥

अर्थ: हे गुरुदेव! परस्त्री सेवन का क्या फल है कृपाकर मुझसे कहें - जो मनुष्य परस्त्री में रमण करता है या जो स्त्री पर पुरुष की इच्छा करती है उनका पतन अवश्यंभावी है। लोक में ये अपकीर्ति के भाजन बनते हैं। पद-पद पर उनका अपमान होता है। अनाचार की वृद्धि होती है। कुल और आचार की पवित्रता नष्ट होती है। यह पापी स्वयं तो गिरता ही है साथ ही परस्त्रियों को तथा अपनी संतान परम्परा को भी पापपंक में गिरा जाता है। व्यभिचारी माता-पिता की सन्तान हजारों वर्ष तक उनके नाम का स्मरण कर रोती है तथा उनके उस दुष्कृतपर थूकती है। वह इस जन्म में सर्वथा निरपराध और सदाचारिणी होते हुए भी पूर्व जन्म के पापोदय से ऐसे हीन पुरुषों की सन्तान हो कर पद-पद पर दुःखी और अपमानित होती है। उस अनर्थपरम्परा के उत्पादक होने से वह व्यक्ति अवश्य नरक का पात्र होता है।

जैसे हिंसा आदि अन्य पापों का सम्बन्ध उस व्यक्ति को ही हानि पहुँचानेवाला होता है वैसे व्यभिचार केवल उस व्यक्ति को ही हानि पहुँचाने वाला नहीं है, बल्कि उसकी सन्तान परम्परा को भी उससे हानि उठानी पड़ती है। कुल का पावित्र्य संतान की पवित्रता से है और संतान की पवित्रता माता-पिता के सदाचार पर है। असदाचारी माता-पिता अपने भावी कुल की अवनति और अपवित्रता के हेतु होते हैं।

व्यभिचार से परस्पर वैर भी बढ़ता है और विरोध भी होता है। सामाजिक पवित्रता और आत्मशान्ति नष्ट होती है। वेश्याव्यसनी की अपेक्षा यह परस्त्रीव्यसनी घोर पापी है। इसका कारण है कि यद्यपि वेश्याव्यसनी का पतन परस्त्री- व्यसनी की अपेक्षा अत्यधिक होता है तथापि उसका पतन उसके आत्मा तक ही सीमित है। वह समाज को गंदा नहीं करता। व्यक्तिगत हानि कर स्वयं को जरूर मिटा लेता है, किन्तु परस्त्री गमन करनेवाला समाज का कोढ़ है, जो उसे भी मिटा करके रहता है।

सारांश यह है कि वेश्याव्यसनी अपना व्यक्तिगत पूर्ण विनाश करता है और परस्त्री व्यसन वाला अपना विनाश तो करता ही है साथ ही अपने कुल पर कलंक लगाता है। अपनी संतान को व्यभिचार जात संतान बनाता है। समाज में अनाचार फैलाने का हेतु बनता है। अतः वह अत्यधिक पातक का भाजन होता है। उक्त व्यसन का परिपूर्ण स्वरूप विचार कर विवेकी पुरुषों को इससे सदा ही दूर रहना चाहिए ।


प्रोक्तं व्यथादं भवदं सदैवाविश्वासपात्रं व्यसनस्वरूपम् ।
त्याज्यानि बुद्ध्वा व्यसनानि सप्त यतो भवेत्ते हृदये प्रशान्तिः ॥90॥

अर्थ: उक्त प्रकार से सप्त व्यसनों के स्वरूप का संक्षेप में कथन किया। व्यसन कोई भी हो मनुष्य को कल्याणमार्ग से दूर फेंक देता है। लौकिक व्यवहार की दृष्टि से भी व्यसनी मनुष्य समाज का सदस्य बनने योग्य नहीं होता। वह स्वयं पतनशील होता है और उसकी दुःसंगति भी दूसरों को पतनशील बनाती है। ऐसा विचार करके ही समाज व्यसनी मनुष्यों को जाति से बहिर्मुख कर उसके साथ अपना खान-पान व लौकिक-धार्मिक व्यवहार आदि छोड़ देती है। यह परम्परा आज भी चालू है।

आजकल सुधार की दृष्टि से जाति बहिष्कार तथा धार्मिक स्थानों का बहिष्कार अनुचित माना जाता है। कहा जाता है कि इससे व्यक्ति की बहुत बड़ी हानि होती है। वह उठ नहीं सकता, उसका उत्थान नहीं हो सकता। यद्यपि उक्त तर्क संगत है, तदनुसार व्यक्ति के उत्थान के लिये नियमों में परिवर्तन करना आवश्यक है। तथापि यह ध्यान सदा रखना चाहिए कि व्यक्ति को ध्यान में रखकर समाज के चरित्र की चिन्ता न करना भी बहुत बड़ी हानि है। समाज व बहुमत व्यक्ति को अपनाने के लिए प्रस्तुत है पर व्यक्ति के लाभ के लिए, वह भी केवल समाज में समान हक प्राप्त हो जाय इतने मात्र के लिए, समाज की पवित्रता का बलिदान करना लाभप्रद नहीं है। इस प्रकार स्वयं के लिये व समाज के लिए, अनेक व्यथाओं के पैदा करनेवाले व्यसनों का सब प्रकार से त्याग करना ही श्रेष्ठतम कल्याण का मार्ग है ।


प्रश्नः - पञ्चपापस्वरूपं मे विद्यते कीदृशं वद।

लोभाभिमानात्परपीडनं स्याद्धिंसैव दुष्टाऽखिलविश्वहन्त्री ।
दुःखस्य मूलं किल सर्वजन्तोर्हिंसा न कस्यापि कदापि कार्या ॥91॥

अर्थ: पाँच पाप कौन हैं और उनका स्वरूप क्या है, कृपया कहिए - राग और द्वेष दोनों हिंसा के पर्यायवाची नाम हैं। लोभ के कारण सांसारिक स्वार्थ के लिए अर्थात् पंचेन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले किसी व्यक्ति के मार्ग में यदि कोई बाधक सिद्ध होता हो तो वह उसे विषय लोभ के कारण मार देता है; पीड़ित करता है या अनेक प्रकार से त्रास देता है। तथा अनेक मानी पुरुष अपने अहंकार के वश होकर हिंसा करते हुए देखे जाते हैं और क्रोधादि कषायों के कारण तो पद-पद में हिंसा होती है यह स्पष्ट ही है।

हिंसा दुःख का मूल है। यदि हिंसा उचित मान ली जाय तो वन में लगी हुई अग्नि की कणिका की तरह वह सम्पूर्ण जगत् का विनाश करने में समर्थ है। वह सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रलयकाल का दृश्य दिखा सकती है अतः उसका औचित्य बिलकुल नहीं किया जा सकता।

अहिंसा का पालन दो प्रकार से होता है - सम्पूर्ण हिंसा का त्याग और अल्प हिंसा का त्याग। हिंसा का जो सम्पूर्ण त्याग कर सकते हैं वे साधु या मुनि हैं और जो केवल त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकते हैं वे गृहस्थ हैं। अपनी अपनी शक्ति के अनुसार और पद के अनुसार प्रत्येक आत्महितैषी को अहिंसा का पालन करना चाहिए जिससे संसार में सुख और शान्ति की वृद्धि हो।९१ ।


पूर्वोक्तहिंसा किल सर्वतः स्यात् त्याज्या मुनीनां गृहिणां च देशात्।
भव्यैरहिंसा हि यथोक्तरीत्या निजात्मशान्त्यै सुखदा सुपाल्या ॥92॥

अर्थ: राग और द्वेष दोनों हिंसा के पर्यायवाची नाम हैं। लोभ के कारण सांसारिक स्वार्थ के लिए अर्थात् पंचेन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले किसी व्यक्ति के मार्ग में यदि कोई बाधक सिद्ध होता हो तो वह उसे विषय लोभ के कारण मार देता है; पीड़ित करता है या अनेक प्रकार से त्रास देता है। तथा अनेक मानी पुरुष अपने अहंकार के वश होकर हिंसा करते हुए देखे जाते हैं और क्रोधादि कषायों के कारण तो पद-पद में हिंसा होती है यह स्पष्ट ही है।
हिंसा दुःख का मूल है। यदि हिंसा उचित मान ली जाय तो वन में लगी हुई अग्नि की कणिका की तरह वह सम्पूर्ण जगत् का विनाश करने में समर्थ है। वह सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रलयकाल का दृश्य दिखा सकती है अतः उसका औचित्य बिलकुल नहीं किया जा सकता।
अहिंसा का पालन दो प्रकार से होता है - सम्पूर्ण हिंसा का त्याग और अल्प हिंसा का त्याग। हिंसा का जो सम्पूर्ण त्याग कर सकते हैं वे साधु या मुनि हैं और जो केवल त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकते हैं वे गृहस्थ हैं। अपनी अपनी शक्ति के अनुसार और पद के अनुसार प्रत्येक आत्महितैषी को अहिंसा का पालन करना चाहिए जिससे संसार में सुख और शान्ति की वृद्धि हो।९१ ।


प्रश्नः - हिंसायाः कति भेदाः कौ सन्ति मे भो गुरो! वद।
सर्वेषां सुखसिद्ध्यर्थं कथ्यन्ते क्रमतोऽद्य भोः।

कृष्यादिवृत्तौ विहिता प्रवृत्तिरुद्योगिहिंसा कथितात्महन्त्री ।
आरम्भिहिंसाऽखिलपञ्चसूनकार्ये प्रवृत्तिर्गृहिणां व्यथादा ॥93॥

अर्थ: हिंसा के कितने भेद हैं? हे गुरो! कृपा कर कहें। इस प्रश्न के उत्तर में श्री गुरु कहते हैं - हे भव्य! सबके सुख पूर्वक ज्ञान के लिए मैं क्रमशः कहता हूँ सुनो - हिंसा चार प्रकार से विभाजित की गई है-उद्योगी, आरम्भी, विरोधी और सङ्कल्पी। इन चारों का क्रमशः स्वरूप कहते हैं-१ उद्योगीहिंसा-खेती, सेवा, शिल्प कार्य, व्यापार और लेखनादि कला के करने में तथा धर्म, देश व प्रजा के संरक्षणार्थ शस्त्र ग्रहण आदि के द्वारा अपनी आजीविका करने में जो हिंसा होती है वह सब उद्योगी हिंसा है। गृहस्थ इसे त्यागने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि गृहस्थों के लिए आजीविका मुख्य प्रश्न है। गृहस्थ का धर्म सृष्टि का पालन, संरक्षण और धर्मात्माओं की सेवा करना है। यदि गृहस्थ निरुद्योगी हो जाय तो उक्त सभी कार्य नहीं हो सकते। गृहसम्बन्धी उद्यम न करनेवाला व्यक्ति या तो साधु हो सकता है, या दर-दर का भिखारी। सारांश यह है कि इस हिंसा का त्याग गृहस्थ नहीं कर सकता। २-आरम्भी हिंसा-गृहस्थी के कार्यों में जैसे रसोई बनाना, पानी भरना, घर बनाना, घर की स्वच्छता, वस्त्रों की स्वच्छता, शरीर की स्वच्छता, साग सब्जी बनाना, जमीन खोदना, रोगी की परिचर्या करना, देवपूजा, गुरु का सम्मान, आहारादि दान, पशुपालन, गरीबों की रक्षा और बच्चों का परिपालन इत्यादि कार्यों में भी हिंसा होती है, किन्तु यह हिंसा गृहस्थ के लिए अपरिहार्य है। वह उसका परित्याग करने में असमर्थ है। यद्यपि व्यापार और आरंभ के कार्य गृहस्थ दयावान् होकर जीवों की हिंसा का बचाव करते हुए देख भाल कर ही करेगा, क्योंकि ऐसा करना उसका कर्त्तव्य है तो भी कुछ ऐसे जीव हैं जिनकी हिंसा बचाते-बचाते भी हो जाती है।

गृहस्थ का यह साधारण कर्त्तव्य है कि प्रत्येक कार्य करते समय जीवदया का ध्यान रखे। मार्ग में चले तो मार्ग को देखता हुआ चले और यह ध्यान रखे कि किसी जीवधारी पर मेरा पैर न पड़ जाय। किसी वस्तु को उठावे या रखे तब भी यह ध्यान रखे कि इनके नीचे कोई जन्तु न आ जाय। सोना बैठना, मल-मूत्र का त्याग करना, थूकना, वस्त्र प्रक्षालन और शरीर प्रक्षालन आदि जितने गार्हस्थिक आरंभ के कार्य बताए हैं उन सबमें वह जीव रक्षा का सतत ध्यान रखता है।

आजीविका के साधनभूत उद्योग-धंधों में भी वह यह ध्यान रखता है तथा ऐसे धंधों को छोड़कर वह अल्प सावद्य वाले धंधों को तलाश कर उन्हें स्वीकार करता है। भले ही उनमें आर्थिक लाभ न्यून हो पर वह अपनी लोभ वृत्ति को कमकर सन्तोषवृत्ति को स्वीकार करके अपना कर्त्तव्य परम धर्म ‘जीवदया’ का पालन करता है।

असि, मसि, कृषि, सेवा, शिल्प और वाणिज्य इन षट् कर्मों द्वारा आजीविका करने का उपदेश भगवान् श्री ऋषभ देव ने युग के प्रारंभ में दिया था और जिन-जिन लोगों की जैसे कर्मों के करने में प्रवृत्ति थी उनका वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों में विभाग किया था। जिन लोगों ने इन षट् कर्मों को छोड़कर पापोपहत वृत्तियाँ स्वीकार कर लीं। जैसे मछली मारना, पशु-पक्षियों का घात कर मांस बेचना, मांस खाना, मद्य बनाना, मद्य बेचना और उसका पान करना आदि के विषय में भगवान् मौन रहे और उनको शूद्रों की सबसे निम्न श्रेणी में सम्मिलित किया और इनका ‘अकारु’ नाम रखा। इनको किसी भी धार्मिक या सामाजिक व्यवहार के योग्य उन्होंने नहीं माना। इन सबका उल्लेख श्री आदिपुराण में हैं। सारांश यह निकला कि प्रत्यक्ष हिंसा स्वरूप कार्यों से या असदाचार के कार्यों से आजीविका करना अत्यन्त निन्द्य है। वह ऐसे उद्योग में या आरम्भ में सम्मिलित नहीं है जिसे श्रावक स्वीकार कर सके। जिन कार्यों में वह अपने प्रिय धर्म ‘जीवदया’ का पालन कर सकता है, उन कार्यों को ही आजीविका के लिए स्वीकार करता है और उनमें जो हिंसा बचाव करते हुए भी हो जाती है उसे वह त्याग नहीं सकता किन्तु इसके लिए वह दुःखी होता है और उसका प्रतिक्रमण द्वारा पाप विशोधन करता है।


स्वर्मोक्षमार्गादिकरक्षणार्थं नरत्वधर्मादिकशिक्षणार्थं ।
जगद्धितार्थं क्रियते गृहस्थैर्विरोधिहिंसा कथिता मुनीन्द्रैः ॥94॥

अर्थ: ३- तीसरी हिंसा- विरोधी हिंसा है। यह हिंसा भी गृहस्थ द्वारा अपरिहार्य है। पूर्वोक्त दोनों हिंसाओं की तरह इसे भी गृहस्थ त्यागने में असमर्थ है। जिस तरह उद्योग और आरम्भ में जीवदया का ध्यान रखते हुए भी हिंसा हो जाती है, ऐसे ही धर्म पालन के कार्य में, गृहस्थी के परिपालन में, बाल बच्चों के संरक्षण में और गार्हस्थिक कार्यों के लिए सञ्चित द्रव्यों के रक्षण में हिसा हो जाती है, क्योंकि किसी को भी सताने या कष्ट देने की इच्छा न रखते हुए भी क्वचित् कोई दुष्ट विघ्न उपस्थित कर देवे तो उससे बचना और विघ्न को दूर करना उसका कर्त्तव्य है। ऐसा करते हुए सम्भव है विरोधी को पीड़ा हो जाय, उसका अंगभंग हो जाय या बाधा उपस्थित हो जाय तो गृहस्थ इसके लिए भी लाचार है। ऐसी हिंसा विरोधी हिंसा है।

विरोधीहिंसा यद्यपि बहुत बड़ी हिंसा है तथापि वह गृहस्थ के लिए अपरिहार्य है। सर्व साधारण प्रजाजन यद्यपि अपने ऊपर आनेवाली विपत्ति को दूर करने के लिए राज्याश्रय ग्रहण करता है और न्यायालय में उस अपराधी के लिए कारागृह में बन्द कराने या अन्य प्रकार का दण्ड दिलाने का प्रयत्न करता है तभी उक्त प्रकार से वह निर्विघ्न होकर अपना धर्म पालन कर सकता है। ऐसा होने पर भी जो सर्व साधारण प्रजाजनों के संरक्षक हैं, राजा हैं, या राज्याधिकारी हैं और सैनिक हैं, उनका कर्त्तव्य है कि वे प्रजा का संरक्षण करें। शिष्ट अर्थात् सज्जन की सहायता और दुष्ट अर्थात् दुर्जन को दण्ड इन दोनों कार्यों के बिना कभी राज्य सञ्चालन नहीं हो सकता। राजा का यही एक प्रधान कर्त्तव्य है। दुष्ट लोग प्रजा में अशान्ति उत्पन्न करें, उनकी खेती नष्ट करें, उनके पशु चुरा लें, उनका द्रव्य (धन) चुरा लें, उनकी स्त्री बच्चों का अपहरण करें, उनके धर्मस्थान ध्वंस करें, धर्मात्मा को सतावें, अहिंसकों पर अत्याचार करें, सदाचारी शान्त प्रजा को उद्विग्न करें तो राजा का और राज्याधिकारियों का कर्त्तव्य हो जाता है कि वे उन दुष्ट आततायी लुटेरों का तथा ऐसा अन्याय करनेवाले दूसरे राष्ट्रों का सामना करें और उन्हें हर प्रकार से रोकें ताकि वे उक्त उपद्रव कर अशान्ति न पैदा कर सकें। इस रोक-थाम में अनेक उपाय काम में लाए जाते हैं पर उनमें जब सफलता नहीं मिलती और दुष्ट अपने मार्ग पर बढ़ते जाते हैं तब उनके रोध करने में उनकी हिंसा भी हो जाती है। यह हिंसा विरोधी हिंसा है। इसका परित्याग भी गृहस्थ कभी नहीं कर सकता। यह हिंसा सङ्कल्पी हिंसा कदापि नहीं है। सङ्कल्पी हिंसा में निरपराध जीवों का घात होता है जब कि विरोधी हिंसावाला एक चींटी को भी संकल्प पूर्वक नहीं मारता। जो निरपराध एक चींटी को भी नहीं मारता वह निरपराध अन्य प्राणियों को क्यों सतायगा? पर सापराधको वह दण्ड देता है और शान्त धर्मात्माओं की रक्षा करता है। ऐसा करने में यदि सापराध की मृत्यु भी हो जाय तो वह उसके लिए लाचार है।

विरोधी हिंसावाले जीव का लक्ष्य हिंसा नहीं है। बल्कि अन्य आतताइयों द्वारा फैलाई जानेवाली महान् हिंसा का प्रतिरोध उसका लक्ष्य है। यदि गृहस्थ विरोधी हिंसा से परहेज करे तो वह शान्ति से धर्म का परिपालन नहीं कर सकता। जिन दुष्टों को धर्म-कर्म का, न्यायान्याय का और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का कुछ भी विचार नहीं है, दूसरों को सताकर उनका स्वत्वापहरण ही जिनका एकमात्र उद्देश्य है और जो दूसरों का घात करके भी अपनी विषयवासनाओं और जघन्य स्वार्थों को सिद्ध करना चाहते हैं वे न्यायवान् शान्त और धार्मिक प्रजा को पनपने नहीं दे सकते। उनकी प्रमुखता में सर्वत्र अशान्ति, कलह, लूट,फूट, मारपीट, अन्याय, असदाचार तथा हिंसा का ही प्रसार होगा और सर्वप्रजाजन दुःखी होंगे। इस महान् उपसर्ग को दूर करने के लिए, सुखशान्ति की वृद्धि के लिए, धर्ममार्ग को अक्षुण्ण रखने के लिए, अहिंसकों को प्रोत्साहित करने के लिए और सदाचारी की वृद्धि के लिए दुष्टों का निग्रह करना गृहस्थ का धर्म हो जाता है। उत्तम उद्देश्य की पूर्ति का साधन होने से विरोधी-हिंसा गृहस्थ के लिये कर्त्तव्य हो जाती है।

यदि गृहस्थ अपने पदानुकूल उक्त कर्त्तव्य को पूरा न कर सके तो उसे समस्त विषय वासनाओं का परित्याग कर देना चाहिए। उसे न स्त्रीपरिग्रह का अधिकार है और न संतानोत्पत्ति का अधिकार है। उसे समस्त आरंभ उद्योग छोड़कर वीतराग हो साधुपना स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि वह अपनी वासनाओं का त्याग नहीं कर सकता और दुष्ट के निग्रह में भी हाथ नहीं बटाता तो वह स्वयं अशान्ति का मूल है। उसे कोई भी लौकिक या पारलौकिक सिद्धि नहीं हो सकती। वह राष्ट्र के लिए भार है। प्रजा की अशान्ति का कारण है। देश की पराधीनता और भ्रष्टता का बीज है। वह स्वयं भ्रष्टाचारी है और भ्रष्टाचार का पोषक है। ऐसे लोग समय पड़ने पर शिष्ट का साथ न देकर दुष्ट के ही साथी बन जाते हैं, अतः ऐसे लोगों को भी सन्मार्ग पर लगाने का प्रयत्न करना राज्य का व राज्याधिकारी का कर्त्तव्य हो जाता है। उक्त कार्यों में हिंसा होना अनिवार्य है और वह ही विरोधी हिंसा है जिसका त्यागी गृहस्थ नहीं हो सकता।


रागादिभावादथवा प्रमादाच्चित्ताक्षतृप्त्यै क्रियते जनैर्या ।
त्रासादिर्हिंसाखिलदुःखदात्री संकल्पिहिंसा भवबन्धिनी सा ॥95॥

अर्थ: गृहस्थ चौथी सङ्कल्पी हिंसा का अवश्य त्यागी होता है। मारने की इच्छा से ही किसी भी प्राणी को मारना सङ्कल्पी हिंसा है। इस सङ्कल्पी हिंसा की सीमा बहुत बड़ी है। सङ्कल्पी हिंसा से जीविका करना उद्योग या आरम्भ नहीं है। पूर्वोक्त सभी कार्यों में हिंसा हो जाना एक बात है जो गृहस्थ के लिए क्षम्य है, हिंसा के द्वारा उक्त कार्यों को साधना बिलकुल दूसरी बात है जो गृहस्थधर्म में अक्षम्य है। इसका खुलासा यह है कि मछली मारने का व्यवसाय, मद्य बनाने व बेचने का व्यवसाय, मांस बेचना, हड्डी व चमड़े का व्यवसाय, अंडे बेचना, मेढक और केचुओं का अचार बनाकर बेचना, वेश्यावृत्ति द्वारा धन पैदा करना, या अन्य प्रकार की व्यभिचार प्रवृत्ति द्वारा धन पैदा करना, डाका डालने का व्यवसाय, धोखा, विश्वासघात दूसरों को जाल में फँसाकर धनोपार्जन करना ये सब पापोपहत वृत्तियाँ हैं जो त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा हैं, या उनके कारण हैं, अथवा उसके अर्थ हैं। अतः सर्वथा परित्याज्य हैं।

अपनी विषयवासनाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को सताना, न्यायमार्ग का उल्लंघन कर द्रव्य कमाना, ये सब संकल्पी हिंसा के रूपान्तर हैं। जब कि दूसरों की रक्षा के लिए, शान्ति के बढ़ाने के लिए, धर्मात्माओं की रक्षा के लिए और अहिंसा और सत्य को जीवित रखने के लिए हिंसा का हो जाना अपरित्याज्य है, कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की पूर्ति में जो हिंसा हो जाती है वह गृहस्थ धर्म के प्रतिकूल नहीं है, किन्तु त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा गृहस्थधर्म के लिए सर्वथा प्रतिकूल है।

संकल्पी हिंसा वह है जो हिंसा की जाती है, तथा विरोधी, उद्योगी और आरम्भी हिंसा वह है जो हिंसा उक्त कार्यों में गृहस्थ से हो जाती है, की नहीं जाती। जो की


आदौ प्रगीता त्रिविधाऽपि हिंसाऽत्याज्याभवेन्मध्यमश्रावकैर्हि ।
रोगादिशान्त्यै कटुकौषधीव संकल्पिहिंसा न कदापि कार्या ॥96॥

अर्थ: गृहस्थ चौथी सङ्कल्पी हिंसा का अवश्य त्यागी होता है। मारने की इच्छा से ही किसी भी प्राणी को मारना सङ्कल्पी हिंसा है। इस सङ्कल्पी हिंसा की सीमा बहुत बड़ी है। सङ्कल्पी हिंसा से जीविका करना उद्योग या आरम्भ नहीं है। पूर्वोक्त सभी कार्यों में हिंसा हो जाना एक बात है जो गृहस्थ के लिए क्षम्य है, हिंसा के द्वारा उक्त कार्यों को साधना बिलकुल दूसरी बात है जो गृहस्थधर्म में अक्षम्य है। इसका खुलासा यह है कि मछली मारने का व्यवसाय, मद्य बनाने व बेचने का व्यवसाय, मांस बेचना, हड्डी व चमड़े का व्यवसाय, अंडे बेचना, मेढक और केचुओं का अचार बनाकर बेचना, वेश्यावृत्ति द्वारा धन पैदा करना, या अन्य प्रकार की व्यभिचार प्रवृत्ति द्वारा धन पैदा करना, डाका डालने का व्यवसाय, धोखा, विश्वासघात दूसरों को जाल में फँसाकर धनोपार्जन करना ये सब पापोपहत वृत्तियाँ हैं जो त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा हैं, या उनके कारण हैं, अथवा उसके अर्थ हैं। अतः सर्वथा परित्याज्य हैं।

अपनी विषयवासनाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को सताना, न्यायमार्ग का उल्लंघन कर द्रव्य कमाना, ये सब संकल्पी हिंसा के रूपान्तर हैं। जब कि दूसरों की रक्षा के लिए, शान्ति के बढ़ाने के लिए, धर्मात्माओं की रक्षा के लिए और अहिंसा और सत्य को जीवित रखने के लिए हिंसा का हो जाना अपरित्याज्य है, कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की पूर्ति में जो हिंसा हो जाती है वह गृहस्थ धर्म के प्रतिकूल नहीं है, किन्तु त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा गृहस्थधर्म के लिए सर्वथा प्रतिकूल है।

संकल्पी हिंसा वह है जो हिंसा की जाती है, तथा विरोधी, उद्योगी और आरम्भी हिंसा वह है जो हिंसा उक्त कार्यों में गृहस्थ से हो जाती है, की नहीं जाती। जो की


समस्तविश्वस्य विबोधनार्थं हिंसाप्रभेदाः कथिताः क्रमेण ।
पूर्वोक्तभोदान् स्वपदानुसारं ज्ञात्वेति भक्त्या परिपालयन्तु ॥97॥

अर्थ: पूर्वोक्त श्लोकों द्वारा हिंसा का विस्तृत स्वरूप तथा उसके भेद प्रभेदो का प्रतिपादन श्रीमदाचार्य कुन्थुसागर महाराज ने श्रीभगवान् महावीर स्वामी द्वारा सदुपदिष्ट और आगम परम्परा द्वारा प्राप्त संक्षेप में किया है। इन हिंसा भेदों का स्वरूप समझ करके अहिंसा व्रत का परिपालन अपने-अपने पदानुसार साधु, ऐलक, क्षुल्लक, प्रतिमाधारी व साधारण गृहस्थ श्रावकों को करना चाहिए। निरतिचार, निर्दोष व्रत का परिपालन स्वपर कल्याणकारक है ।


प्रश्नः - सत्यव्रतस्वरूपं मे विद्यते किं गुरो वद।

सत्यं मितं हितकरं सुखदं सुवाच्यं
श्रीदं वचः प्रियकरं मयमानमुक्तम् ।
वाच्यं न वैरजनकं हि मिथो व्यथादं
भ्रान्तिप्रदं विपदि वाऽपि तदेव सत्यम् ॥98॥

अर्थ: अहिंसा व्रत को परिपालन करनेवाला जिस प्रकार अपने मन को पवित्र रखकर अपने कर्त्तव्य को पालन करने के लिए निर्दोष कार्यों को ही करता है वैसे ही उसे सत्यभाषी भी होना चाहिए। सत्य क्या है? यह एक बड़ा प्रश्न है। इसकी अनेक व्याख्याएँ की जाती हैं। दर्शनशास्त्र की दृष्टि से तो जैसा का तैसा कहना सत्य है। पर यह सत्य व्यवहार के लिए सर्वथा अनुकूल नहीं पड़ता। क्वचित् कदाचित् वह निन्द्य और कलह कारक हो जाता है। जैसे, किसी एक आँख वाले मनुष्य को काना, एक खराब पैरवाले को लंगड़ा, झगड़ा करने वाले को झगड़ालु, और असद् व्यवहार करनेवाले को बदमाश इत्यादि शब्दों का प्रयोग दार्शनिक दृष्टि से ज्यों का त्यों वर्णन है अतः सत्य है, तथापि श्रोता को दुःखदायक व्यथा उत्पन्न करनेवाला होने से वह कथन कलह या वैर करा देता है। लोक में भी ऐसा माना जाता है कि यह व्यक्ति जो ऐसा बोलता है बड़ा मूर्ख और उद्धत है। उसे बोलने की भी सभ्यता नहीं है।

धार्मिक दृष्टि से ज्यों का त्यों बोलना भी सत्य है और कहीं पर वह सत्य नहीं भी है। सत्य की व्याख्या धर्मशास्त्र में इस प्रकार की है। जो वचन जीवों को सुनने पर सुखदायक हो वह सत्य है। जो परिणाम में कल्याण कारक अर्थात् हितकर हो वह सत्य है। जो श्रोता को श्रवण करने पर प्रिय हो अप्रिय न हो वह सत्य है। जो वचन विनयपूर्वक दूसरे के सम्मान की रक्षा करनेवाला हो वह सत्य है। जो वचन अपने अहंकार का पूरक न हो वह सत्य है। जो वचन सुननेवालों में वैर या कलह को पैदा न करे वह सत्य है। जिस वचन से श्रोताओं के हृदय को खेद न हो वह सत्य है। जिस वचन से श्रोता भ्रम में न पड़ जाय वह सत्य है। जो वचन निरर्थक अति प्रलाप से रहित परिमित शब्दों में हो वह सत्य है। जो वचन किसी को पाप में प्रवृत्त न कराकर धर्म मार्ग में लगावे वह सत्य है। जो वचन आगम परम्परा के अनुकूल हो वह सत्य है। जो वचन हिंसाकारक या हिंसोत्पादक न हो वह सत्य है। जो वचन किसी को मिथ्यामार्ग या कुमार्ग में न ले जाय वह सत्य है। जो वचन श्रोता को सद्धर्म में स्थापित करे वह सत्य है। उक्त प्रकार से सत्य के अनेक रूप बताए गए हैं। इतना होने पर भी जिस वचन से किसी को विपत्ति आ जाय, अकल्याणकारक हो, भ्रांतिदायक हो और कलह उत्पन्न करा दे तो वह ज्यों का त्यों होकर भी सत्यवचन न होकर अप्रशस्त और निन्द्यवचन है ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है। अतः सत्यासत्य का स्वरूप जानकर असत् वचन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।


प्रश्नः - अचौर्यव्रतचिह्नं किं वर्त्तते मे गुरो वद।

त्यक्तं वने वा पतितं श्मशाने कौ स्थापितं स्वात्मन एव बाह्यम् ।
ग्राह्यं ह्यदत्तं भवदं न वस्त्वचौर्यव्रतं तत्सुखदं सदा स्यात् ॥99॥

अर्थ: हे गुरो! अचौर्य व्रत क्या है? कृपया उसका स्वरूप कहिए - जैन सिद्धान्त में पर द्रव्य का ग्रहण ही चौर्य है ऐसा चोरी का बहुव्यापक लक्षण है। इस लक्षण के अनुसार अचौर्यव्रत का परिपूर्ण पालन करनेवाले साधुजन घर, कुटुम्ब व धनादि द्रव्य इन सबका परित्याग कर नग्न देह ही वन में देह के स्नेह से रहित होकर विचरते हैं। वे सब पर द्रव्यों से अपने को पृथक् अनुभव करते हुए एकान्त वन में केवल आत्मनिधि को, जिसे उनकी आत्मा अनादि से भूली हुई थी, खोजने का प्रयत्न करते हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि मेरा आत्मा ही मेरा द्रव्य है, मेरे आत्मा के असंख्यप्रदेश ही मेरा निवास स्थल है। आत्मा से विभिन्न कोई दूसरा आत्मा या दूसरे निर्जीव पदार्थ मेरे नहीं हैं। मेरा मैं ही हूँ, दूसरा पदार्थ दूसरा है, वह मेरा कदापि नहीं हो सकता। यह पृथिवी या आसमान मेरा निवास स्थल है यह उपचार है, क्योंकि मेरे साथ न पृथिवी जाती है और न आसमान मेरे साथ चलता है। मेरे आत्मा के असंख्य प्रदेश ही सदा मेरे पास हैं, और उनमें ही रहता हूँ, वे ही मेरे निवासस्थान हैं। मेरे ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, शक्ति, आनन्द, क्षमा, सरलता, विनयशीलता, सत्यता, पवित्रता और अकिञ्चनता ये मेरे गुण हैं, वे ही मेरी निधियाँ हैं। इनमें ही मेरे सब सुखों का भण्डार भरा है। ये सब मेरे भाव हैं। इनपर किसी का स्वत्व नहीं है। गृहादिक, सुवर्णादिक, भूमि आदिक व अन्न, वस्त्र, सोना, चाँदी, मणि, माणिक्य, दासी और दास आदि सर्व पर हैं, मेरे नहीं। ये सब मेरे स्वरूप से और मेरी सत्ता से सर्वथा भिन्न हैं। अतएव इनका किञ्चिन् मात्र भी ग्रहण चोरी है, महान् पाप है। मेरी आत्मपरणतियों का सुन्दर परिवर्तन ही मेरी उन्नति है और उनका पर पदार्थोन्मुखी परिवर्तन ही मेरी अवनति है। परपदार्थ अर्थात् धनादिक या गृहादिक या कुटुम्बादिक की दृष्टि से उनकी न्यूनता मेरी अवनति नहीं है, क्योंकि वे पदार्थ पर हैं, मेरे नहीं हैं। मेरी सत्ता से विभिन्न पदार्थों की उन्नति ही मेरी उन्नति है, ऐसा मानना मिथ्यात्व है तथा चोरी है। इस प्रकार से आत्मनिधि की खोज करनेवाले और उसमें ही तल्लीन रहनेवाले देह के स्नेह से रहित निःसंग साधु परम अचौर्य व्रत के परिपालक हैं।

जो गृहस्थ हैं, ऊपर लिखे सत्यार्थ विचारों और तन्निहित सत्य तत्त्वों पर जिनकी परिपूर्ण श्रद्धा है, किन्तु अपनी कमजोरी के कारण जो परिगृहीत परपदार्थों को अपना पदार्थ न मानते हुए भी परित्याग करने में अशक्त हैं, परमुखापेक्षी हैं, वे इस महान् अचौर्य


प्रश्नः - ब्रह्मचर्यव्रतचिह्नं किं मे वदास्ति भो गुरो।

त्याज्या स्वकीया ललना यदि स्यात् कथापरासां वद काऽस्ति लोके।
पूर्वोक्तरीतिर्यदि वास्त्यसाध्या त्याज्या परस्त्री स्वपरात्मशान्त्यै ॥100॥

अर्थ: हे गुरुदेव! ब्रह्मचर्य व्रत का क्या स्वरूप है, कृपाकर कहें ।

स्त्री का ग्रहण रागपरिणामों से होता है। रागादि परिणाम आत्मा के विकार भाव हैं। आत्मस्वभाव की प्राप्ति में ये विघ्नकारक हैं। इनसे संसार की और दुःख की परम्परा बढ़ती है। काम-भोग के द्वारा सुखानुभव करनेवाले मोही स्त्री-पुरुष कुत्ते के द्वारा किए गए हड्डी के चर्वण के तुल्य अपने ही रजवीर्य के प्रस्रवण से, जो उनके शारीरिक बल का नाशक है और आत्मपावित्र्यका घातक है, अपने को सुखी मानते हैं। जैसे कुत्ते को यह ज्ञात नहीं है जो सूखे हाड़ों से यह रक्त नहीं आता जिसे चाटकर मैं प्रसन्न हो रहा हूँ, अपि तु यह मेरे ही मुख से निकलनेवाले रक्त का स्वाद है जो हड्डी के संघर्ष से क्षत-विक्षत हो निकलने लगा है, उसी प्रकार कामवेदना से पीड़ित स्त्री-पुरुष परस्पर


प्रश्नः - सङ्गत्यागस्वरूपस्य किं चिह्नं मे गुरो बद।

बाह्योऽन्तरङ्गो भवदोऽस्ति संगो ज्ञात्वेति मुक्त्वा द्विविधं ततस्तम्।
तिष्ठेत्स्वभावे यदि स्वात्मनो वाऽसङ्गव्रतं तस्य भवेत्पवित्रम् ॥101॥

अर्थ: हे गुरुदेव! परिग्रह त्याग व्रत का क्या स्वरूप है, कृपाकर मुझसे कहें - अपनी आत्मा से भिन्न पदार्थों का ग्रहण है, वह परिग्रह है। वह परिग्रह दो प्रकार है-अन्तरङ्ग और बाह्य। आत्मा के विकारस्वरूप भाव जैसे-मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया और लोभ तथा हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद, और नपुंसकवेद ये ४ अन्तरङ्ग परिग्रह हैं और खेत, मकान, सोना, चांदी, रुपया, अन्न, नौकर, नौकरानी, वस्त्र, कपड़े ये दश बाह्य परिग्रह हैं। इन दोनों प्रकार के परिग्रहों को पापदायक कुसङ्ग समझकर जो छोड़ देते हैं वे परिग्रह त्याग महाव्रती हैं और जो सम्पूर्ण रीति से उभय परिग्रहों को छोड़ने में असमर्थ हैं वे यथायोग्य अपनी आवश्यकताओं को कम करते हुए परिग्रह का प्रमाण करते हैं और परिमित में अपना जीवन निर्वाह करते हुए शेष सब परिग्रह का त्याग करते हैं वे परिग्रह परिमाणाणुव्रती माने गये हैं ।


पञ्चाणुव्रतचिह्नं हि प्रोक्तमेवं शिवप्रदम् ।
पालयन्तु सदा भव्याः स्वान्यात्मशान्तये मुदा ॥102॥

अर्थ: ऊपर वर्णित प्रकार से परम्परा से मोक्षसुख प्रदान करनेवाले पञ्च महापापों के एकदेश परित्यागरूप पञ्चाणुव्रत जो गृहस्थ श्रावकों के योग्य हैं वर्णन किए गए हैं। जो जीव अपना कल्याण चाहते हैं तथा परोपकार की इच्छा रखते हैं उन्हें इनका बड़े प्रेम से परिपालन करना चाहिए।
पाप करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति न केवल अपने लिए दुःखोत्पादक है बल्कि वह परिवार, कुटुम्ब, जाति, समाज, प्रान्त व देश यहाँ तक कि संसार का शत्रु है। अशान्ति उत्पन्न करने वाला है, अतएव स्वपर हानिकारक महान् अशान्ति के हेतु इन पांचों पापों का त्यागकर अणुव्रतों का पालन करना चाहिए ।


प्रश्नः - श्राद्धमूलगुणानां तु किं चिह्नं मे गुरो वद।

मद्यमांसमधूनां हि सेवनं स्पर्शनं तथा ।
न कार्यं दुःखदं निन्द्यं श्रावकैर्धर्मवत्सलैः ॥103॥

अर्थ: श्रद्धावान् श्रावक का कल्याण केवल श्रद्धामात्र से न होगा, अपने कल्याण के लिए उसे जिनोक्त उस सन्मार्ग पर जिसकी उसने श्रद्धा की है चलना भी होगा, उसे ही चारित्र कहते हैं।

यह चारित्र पञ्चपाप परित्याग रूप है। सम्पूर्णतया पञ्चपाप परित्याग रूप व्रत महाव्रत है। यह दिगम्बरत्व को स्वीकार करनेवाले परम निस्पृही वीतराग निःसङ्ग साधु पुरुषों द्वारा ही साध्य है। यह विधेय मार्ग है जिसे राजमार्ग भी कहते हैं। जो हीन पुरुषार्थी पुरुष इस परम कल्याणकारक मार्ग को पालन करने में असमर्थ हैं उनके लिए एकदेश पाप परित्याग रूप यह श्रावकों का अणुव्रत है। यह अपवाद मार्ग है। मुनिमार्ग का निरूपण मुनिमार्गप्रदीप नामक ग्रंथ में आचार्य श्री कुन्थुसागर महाराज ने किया है। श्रावकधर्म का वर्णन इस ग्रन्थ में किया जा रहा है।

श्रावक के चारित्र में मूलव्रत ८ हैं।-मद्यत्याग, मांसत्याग,मधुत्याग तथा बड़, पीपर, पाकर, ऊमर और कठूमर इन पाँच क्षीर फलों का त्याग ये आठ मूलव्रत हैं। इन आठ मूलगुणों को धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टि को श्रावक संज्ञा प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। मूल के अभाव में जैसे वृक्ष में शाखाएँ, फल-पत्र-निरर्थक हैं, ऐसे ही मूलव्रत के अभाव में उत्तरव्रतों की कल्पना भी निरर्थक है। चारित्ररूपी मन्दिर की यह पहली सीढ़ी है। इस पर चढ़े बिना कोई चारित्रमन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता।

दया धर्म के आराधक श्रावक इन मद्यादि पदार्थों का सेवन तो बहुत दूर की बात है स्पर्शन करना भी पाप समझते हैं। मांस का भक्षण महान् क्रूर कर्म है। मद्य चित्तभ्रम को उत्पन्न कर अनेक पापों को प्रोत्साहित करता है। मधु मधुमक्खियों का सञ्जित खाद्य है, जिसके खाने में उन मधुमक्खियों के साथ ही उस खाद्य रूप मधु में उत्पन्न होनेवाले मक्षिका जातीय असंख्य निकोत जीवों की हिंसा अनिवार्य है। इस प्रकार महान् हिंसा पाप के उत्पादक इन मकारत्रय का स्पर्शन भी दयाधर्माराधक श्रावक के लिए निन्द्य है। इसके सेवन का फल उत्तर काल में अत्यन्त दुःखप्रद है।

बड़ आदि फल भी बहुत से जीवित जीवों के स्थान हैं। वे प्रत्यक्ष भी दीखने में आते हैं और असंख्य जीव ऐसे हैं जो दीखने में नहीं आते। इनको खाने में इनकी हिंसा सुनिश्चित है। यह भी अत्यन्त क्रूर कर्म है। ऐसा विचार कर धर्म के इच्छुक इनका कदापि सेवन नहीं करते। इन आठों का त्याग ही आठ मूल गुण या आठ मूल व्रत कहलाता है। ये आठों सर्वथा अभक्ष्य हैं।१०३ ।


सदा प्राणिसमाकीर्णं वटादिफलपञ्चकम् ।
न भक्ष्यमिष्टसिद्ध्यै च तन्मूलव्रतमिष्यते ॥104॥

अर्थ: श्रद्धावान् श्रावक का कल्याण केवल श्रद्धामात्र से न होगा, अपने कल्याण के लिए उसे जिनोक्त उस सन्मार्ग पर जिसकी उसने श्रद्धा की है चलना भी होगा, उसे ही चारित्र कहते हैं।

यह चारित्र पञ्चपाप परित्याग रूप है। सम्पूर्णतया पञ्चपाप परित्याग रूप व्रत महाव्रत है। यह दिगम्बरत्व को स्वीकार करनेवाले परम निस्पृही वीतराग निःसङ्ग साधु पुरुषों द्वारा ही साध्य है। यह विधेय मार्ग है जिसे राजमार्ग भी कहते हैं। जो हीन पुरुषार्थी पुरुष इस परम कल्याणकारक मार्ग को पालन करने में असमर्थ हैं उनके लिए एकदेश पाप परित्याग रूप यह श्रावकों का अणुव्रत है। यह अपवाद मार्ग है। मुनिमार्ग का निरूपण मुनिमार्गप्रदीप नामक ग्रंथ में आचार्य श्री कुन्थुसागर महाराज ने किया है। श्रावकधर्म का वर्णन इस ग्रन्थ में किया जा रहा है।

श्रावक के चारित्र में मूलव्रत ८ हैं।-मद्यत्याग, मांसत्याग,मधुत्याग तथा बड़, पीपर, पाकर, ऊमर और कठूमर इन पाँच क्षीर फलों का त्याग ये आठ मूलव्रत हैं। इन आठ मूलगुणों को धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टि को श्रावक संज्ञा प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। मूल के अभाव में जैसे वृक्ष में शाखाएँ, फल-पत्र-निरर्थक हैं, ऐसे ही मूलव्रत के अभाव में उत्तरव्रतों की कल्पना भी निरर्थक है। चारित्ररूपी मन्दिर की यह पहली सीढ़ी है। इस पर चढ़े बिना कोई चारित्रमन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता।

दया धर्म के आराधक श्रावक इन मद्यादि पदार्थों का सेवन तो बहुत दूर की बात है स्पर्शन करना भी पाप समझते हैं। मांस का भक्षण महान् क्रूर कर्म है। मद्य चित्तभ्रम को उत्पन्न कर अनेक पापों को प्रोत्साहित करता है। मधु मधुमक्खियों का सञ्जित खाद्य है, जिसके खाने में उन मधुमक्खियों के साथ ही उस खाद्य रूप मधु में उत्पन्न होनेवाले मक्षिका जातीय असंख्य निकोत जीवों की हिंसा अनिवार्य है। इस प्रकार महान् हिंसा पाप के उत्पादक इन मकारत्रय का स्पर्शन भी दयाधर्माराधक श्रावक के लिए निन्द्य है। इसके सेवन का फल उत्तर काल में अत्यन्त दुःखप्रद है।

बड़ आदि फल भी बहुत से जीवित जीवों के स्थान हैं। वे प्रत्यक्ष भी दीखने में आते हैं और असंख्य जीव ऐसे हैं जो दीखने में नहीं आते। इनको खाने में इनकी हिंसा सुनिश्चित है। यह भी अत्यन्त क्रूर कर्म है। ऐसा विचार कर धर्म के इच्छुक इनका कदापि सेवन नहीं करते। इन आठों का त्याग ही आठ मूल गुण या आठ मूल व्रत कहलाता है। ये आठों सर्वथा अभक्ष्य हैं।१०३ ।


युग्मम्

प्रश्नः - अभक्ष्यवस्तुत्यागस्य हेतुः को विद्यते वद।

तुच्छफलाद्यभक्ष्याणां दयाधर्मप्रणाशिनाम् ।
भक्षणं स्पर्शनञ्चापि न कार्यं भवभीरुभिः ॥105॥

अर्थ: आठ पदार्थों को ऊपर अभक्ष्य कहा गया है। सो हे गुरुदेव! अभक्ष्य क्या है? उनके त्याग का क्या हेतु है? उनका त्याग क्यों करना चाहिए। इनके सिवाय भी अभक्ष्य और होते हैं क्या? हैं तो कौन-कौन हैं? कृपाकर कहें - जो पदार्थ खाने के अयोग्य है वह अभक्ष्य है। खाने के अयोग्य पदार्थ पाँच कारणों से होते हैं - (१) जिनके खाने में त्रस जीवों का घात हो। जैसे-पञ्चोदुम्बरफल, रात्रि में निष्पन्न भोजन, मक्खन, (मर्यादा बाहिर) मधु, बरफ, द्विदल, बैगन, अचार इत्यादि।

(२) जिनके खाने में बहुत से स्थावर जीवों का घात होता हो। जैसे-कन्दमूल, बहुबीजा, कोंपल, बालअवस्था वाले फल इत्यादि सप्रतिष्ठित वनस्पतियाँ।

(३) जिनके खाने से चित्त में भ्रम पैदा हो, नशा चढ़े, उन्मत्तता बढ़ जाय, पागलपन आ जाय। जैसे-मदिरा, गांजा, भांग, तम्बाखू, अफीम आदि।

(४) जो उच्च कुलीन धर्मात्मा व्रती पुरुषों द्वारा सेवन नहीं किए जाते हैं वे पदार्थ चौथे प्रकार के अभक्ष्य हैं। लोकविरुद्ध पदार्थ का भक्षण लोकनिन्द्य होता है। जैसे-लहसुन, प्याज आदि। यद्यपि ये जमीकन्द होने के कारण भी अभक्ष्य हैं तथापि लोकविरुद्ध भी है। जो जमीकन्द का त्याग नहीं किए वे भी उनका भक्षण कुलीन होने के नाते नहीं करते हैं। देश भेद से इसमें भेद पड़ जाता है। जिस प्रान्त में जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी लोकनिन्द्य हो वह व्रती को सेवन नहीं करना चाहिए। अजानफल भी इसी श्रेणी में है।

(५) जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी रोगोत्पादक हो या रोगावस्था में अपथ्यकारी हो या सहज ही प्रकृति के विरुद्ध पड़ता हो वह पदार्थ भी अभक्ष्य है। इसके भक्षण करने से मनुष्य रोगी होने पर धर्म कर्म से विहीन हो जाता है। संक्लेश परिणाम होते हैं, अतः हेय है। दूसरी बात यह है कि शरीर में रोग होने पर अनेक रोगों के कीटाणु उत्पन्न हो जाते


तच्चलितरसं वस्तु न भक्ष्यं व्याधिवर्धकम् ।
पूर्वोक्तविधिसाध्यात्स्याद्धि लोके शान्तिदा मतिः ॥106॥

अर्थ: जो पदार्थ खाने के अयोग्य है वह अभक्ष्य है। खाने के अयोग्य पदार्थ पाँच कारणों से होते हैं - (१) जिनके खाने में त्रस जीवों का घात हो। जैसे-पञ्चोदुम्बरफल, रात्रि में निष्पन्न भोजन, मक्खन, (मर्यादा बाहिर) मधु, बरफ, द्विदल, बैगन, अचार इत्यादि।
(२) जिनके खाने में बहुत से स्थावर जीवों का घात होता हो। जैसे-कन्दमूल, बहुबीजा, कोंपल, बालअवस्था वाले फल इत्यादि सप्रतिष्ठित वनस्पतियाँ।
(३) जिनके खाने से चित्त में भ्रम पैदा हो, नशा चढ़े, उन्मत्तता बढ़ जाय, पागलपन आ जाय। जैसे-मदिरा, गांजा, भांग, तम्बाखू, अफीम आदि।
(४) जो उच्च कुलीन धर्मात्मा व्रती पुरुषों द्वारा सेवन नहीं किए जाते हैं वे पदार्थ चौथे प्रकार के अभक्ष्य हैं। लोकविरुद्ध पदार्थ का भक्षण लोकनिन्द्य होता है। जैसे-लहसुन, प्याज आदि। यद्यपि ये जमीकन्द होने के कारण भी अभक्ष्य हैं तथापि लोकविरुद्ध भी है। जो जमीकन्द का त्याग नहीं किए वे भी उनका भक्षण कुलीन होने के नाते नहीं करते हैं। देश भेद से इसमें भेद पड़ जाता है। जिस प्रान्त में जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी लोकनिन्द्य हो वह व्रती को सेवन नहीं करना चाहिए। अजानफल भी इसी श्रेणी में है।
(५) जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी रोगोत्पादक हो या रोगावस्था में अपथ्यकारी हो या सहज ही प्रकृति के विरुद्ध पड़ता हो वह पदार्थ भी अभक्ष्य है। इसके भक्षण करने से मनुष्य रोगी होने पर धर्म कर्म से विहीन हो जाता है। संक्लेश परिणाम होते हैं, अतः हेय है। दूसरी बात यह है कि शरीर में रोग होने पर अनेक रोगों के कीटाणु उत्पन्न हो जाते


युग्मम्

प्रश्नः - वदातिचारकाः पञ्चौदुम्बरस्य कति प्रभो।

यावद्येषां फलानां तु गुणधर्मो न ज्ञायते ।।
न तावद् भक्षणं तेषां कार्यं तत्त्वार्थवेदिभिः ॥107॥

अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।

एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।


फलानामपि चान्येषां कृत्वा चूर्णञ्च छेदनम् ।।
ज्ञात्वा जीवांस्ततस्त्यक्त्वा कार्यं पश्चाद्धि भक्षणम् ॥108॥

अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।

एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।


त्रसजीवसमाकीर्णं फलं सेव्यं न तत्त्वतः ।
अतीचारविमुक्तं हि श्लाघ्यं तस्य व्रतं भवेत् ॥109॥

अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।
एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।


विशेषकम्

प्रश्नः - मांसातिचारचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

चर्मपात्रे धृतं तैलं हिंगु नीरं तथा घृतम् ।
त्यक्तमांसाशनैस्त्याज्यमेवमन्यद्यथागमम् ॥110॥

अर्थ: चमड़े के बर्तन में रखी हुई वस्तु का भक्षण मांसातिचारोत्पादक है। जैसे घी, तेल, हींग और जल आदि पदार्थ अनेक प्रान्तों में चमड़े की मशक में रखे जाते हैं। चमड़े की चालनी में चाला हुआ, चमड़े की तराजू में तौला हुआ तथा चमड़े के सूपे में रखा हुआ आटा आदि अभक्ष्य हैं। और जो अनाज धोकर शुद्ध किया जा सकता है उसे धोकर शुद्ध कर ही काम में लाना चाहिए। भोजन में यदि नख रोमादि का संपर्क आ जाय तो वह नहीं खाना चाहिए। रोम शरीरांश है अतः रोम, नख आदि सहित (स्पृष्ट) पदार्थ न खाना चाहिए। इसी प्रकार जिस पदार्थ में यह मांस है ऐसा संकल्प हो जाय उसे खा लेना भी मांसातिचार है। इनका वर्जन व्रती को अवश्य करना चाहिए। मांसभक्षी के हाथ का तथा उसके वर्तनों में बना आहार भी सर्वथा त्याज्य है ।


प्रश्नः - मद्यातिचारचिह्नं किं वर्त्तते मे गुरो वद।

मद्यपायिकरस्पृष्टं भोजनमपि दोषकृत् ।
न सेव्यं निन्दितं वस्तु स्वादतश्चलितं तथा ॥111॥

अर्थ: हे गुरुदेव! मद्यत्याग व्रत के दोष कौन-कौन हैं, कृपाकर बताइए - गुड़ आदि में मदोत्पादक अन्य पदार्थों को गलाकर मद्य बनाया जाता है। उसे पीनेवाले मद्यप कहलाते हैं। मद्य में अनेक त्रस जीव उत्पन्न होते हैं, जो मद्यपान से नष्ट हो जाते हैं। उन्माद को उत्पन्न करने के लिये ही लोग मद्य का सेवन करते हैं। इसीप्रकार जो पदार्थ मदोत्पादक हों और जो पदार्थ सड़ जाने से अपने स्वाद से विचलित हो गये हैं उनका सेवन मद्य के दोष को ही उत्पन्न करता है। मद्य पीनेवालों की संगति करना, उनसे सम्बन्ध बढ़ाना, उनके साथ बैठकर भोजन करना, उनके द्वारा बनाया अन्न व जल ग्रहण करना, उनके द्वारा उपयुक्त बर्तनों में भोजन आदि करना और उनके बाल-बच्चों से अपने बालबच्चों की शादी आदि करना ये सब मद्य के अतिचार हैं। इन कार्यों से मद्य के प्रति होनेवाली विरक्तता मिट जाती है और मद्य के प्रति अनुराग क्रमशः बढ़ता जाता है। कुछ ही समय बाद ऐसे लोग स्वयं मद्यपायी हो जाते हैं। उनका भक्ष्याभक्ष्य का विवेक उन अविवेकियों की संगति में नष्ट हो जाता है। अभ्यक्ष्य के प्रति घृणा का भाव उठ जाता है। यह विचार कर मद्य के उक्त अतिचारों से दूर रहकर अपने व्रत की रक्षा करनी चाहिए ।


प्रश्नः - मध्वतिचारचिह्नं किं वर्तते मे गुरो वद।

त्रसजीवसमाकीर्णं कुसुमं चान्यद्वस्तुकम् ।
मधुस्पृष्टं सदाऽहृद्यं त्याज्यं तत्त्वार्थवेदिभिः ॥112॥

अर्थ: हे गुरुदेव! मधुत्यागव्रत में भी कोई अतिचार होते हैं? यदि होते हैं तो कृपाकर समझाइए - मधु त्रस जीवों का कलेवर है और त्रसोत्पादक है अतएव अग्राह्य है। इसी प्रकार उक्त दोषों से पूर्ण जो भी पदार्थ हैं उनका सेवन करना मधुव्रत के लिए ही दोषाधायक है। फूलों में उसकी गंध और रस के लोभी छोटे-छोटे जन्तु सदा बसते हैं और प्राणान्त हो जाने पर भी उनको नहीं छोड़ना चाहते। कमल में गंध के लोभ में भ्रमर के मरण को प्राप्त हो जाने की कथा जगत् में प्रसिद्ध है। इसी प्रकार भ्रमर की ही जाति के अन्य क्षुद्र कीटाणुओं की भी यही स्थिति है। उक्त कारणों से प्रायः फूलों का सेवन नहीं करना चाहिए। जो पुष्प शोधे जा सकते हैं-स्पष्टतया त्रस रहित किए जा सकते हैं, आवश्यकता होने पर उनका उपयोग कर भी सकते हैं, तो भी ऐसी पुष्प जो शोधे नहीं जा सकते, या शोधे जाने पर भी जिनपर क्षुद्र जन्तु उड़कर बैठ जाते हैं, या जो सदा जीवसमाकीर्ण ही रहते हैं ऐसे नीम के फूल केतकी पुष्प आदि सर्वथा परिहार के योग्य हैं।

मधुस्पृष्ट भोज्य को ग्रहण करना, मधुस्पृष्ट भाजन में भोजन करना भी अतिचार है। नेत्र में, दांतों में और गुदा में उत्पन्न हुए अनेक रोगों में जो मधु का प्रयोग किया जाता है वह भी दोषाधायक है। अर्थात् औषधि के रूप में लेपादि के लिए भी मधु का प्रयोग मधुव्रतवाले के लिए अतिचार ही है। अतः अतिचारों का परहेज कर व्रत को निर्मल बनाना ही श्रेयस्कर है ।


प्रश्नः - द्यूतातिचारचिह्नं किं वर्तते मे गुरो वद।

क्रीडतश्च मिथो द्यूतं दृष्ट्वा जीवान् कदापि न।
तुष्येत् पलायनं लोभात् कारयित्वा पशोस्तथा ॥113॥

अर्थ: हे गुरो! द्यूत व्रत के दोषाधायक अतिचारों का वर्णन कीजिए - जुआ खेलना जैसे विशिष्ट राग-द्वेष, लोभ और मोह का उत्पादक होने से श्रेयोमार्ग का विघातक है उसी उसी प्रकार वे सब कार्य जो द्यूत क्रीड़ा के समय ही विशिष्ट राग-द्वेष को उत्पन्न करते हों वे सब द्यूतक्रीड़ा जैसे ही हैं और उनका सेवन व्रती पुरुष के लिए अतिचार है।

पशुओं का लड़ाना, दौड़ाना व परस्पर संघर्ष करा देना ये सब राक्षसी प्रकृति के आनन्ददायक कार्य दोषोत्पादक हैं। ये लोग पशुओं की पराजय से अपनी पराजय और उनकी विजय में अपनी विजय मानकर उनमें मारणान्तिक संघर्ष उत्पन्न करा देते हैं। यह सब महान् दोषाधायक है।

होड़ लगाकर जीत हार की शर्त रखकर जो भी खेल खेले जाते हैं, जिनका अभिप्राय अर्थात् उद्देश्य केवल अपने दुरभिप्राय और दुरिच्छाओं की पूर्ति है, परपराजय, परनिन्दा, परावनति तथा स्वविजय, स्वप्रशंसा और स्वाहंकार ही जिनका प्रतिफल है वे सब कार्य जैसे ताश खेलना, चौपर, संतरंज, घुड़दौड़ आदि द्यूत के समान ही दोषाधायक होने से अतिचार हैं।

पर स्वास्थ्य रक्षा, ज्ञानवृद्धि और सदाचार की उन्नति के उद्देश्य से किए जानेवाले और उक्त उद्देश्य की पूर्ति करनेवाले होड़ के कार्य दोषाधायक नहीं हैं। उससे मनुष्य की उन्नति होती है विद्या बढ़ती है, स्वास्थ्य अनुकूल होता है। सदाचार की वृद्धि होती है। जैसे-सदाचारी छात्र को पारितोषिक देने की शर्त लगाकर घोषणा करना, अमुक ग्रंथ में अच्छे नम्बरों में पास होने पर अमुक पारितोषिक प्राप्त होगा आदि की घोषणा करना तथा अनुत्तीर्ण होने पर शारीरिक व आर्थिक दण्ड की घोषणा करना इत्यादि ये सब कार्य ग्राह्य हैं; क्योंकि ये बालकों को द्यूतादि से दूर कर ज्ञानार्जन और स्वास्थ्य तथा सदाचार वर्द्धन की प्रेरणा करते हैं।

किसी भी कार्य का गुणदोष उसके उद्देश्यपूर्ति के ऊपर ही लिया जाता है। एक ही कार्य दोषोत्पादक होने से हेय और गुणोंत्पादक होने से उपादेय हो जाता है। मुनिपर उपसर्ग करनेवाले सिंह और सिंह से मुनि की रक्षा करने की इच्छा रखनेवाले शूकर में जब संघर्ष हुआ तब दोनों एक दूसरे पर प्रहार करते थे, मारते काटते थे, यहाँ तक कि अन्त में दोनों मृत्यु को प्राप्त हो गए। एक दूसरे को मारने के दोनों दोषी हुए फिर भी शूकर स्वर्ग गया और सिंह नरक गया। दोनों के कषायें थीं पर दोनों के उद्देश्य भिन्न थे, इसलिए एक ही कार्य करने पर दोनों के परिणामों में महान् भेद था, अतएव उनके फल


प्रश्नः - वेश्यात्यागातिचारस्य किं चिह्नं विद्यते वद

वार्तालापः तया सार्धं न कार्यो धार्मिकैर्जनैः।
न वेश्यागीतनृत्यादि पश्येद् गच्छेन्न तद्गृहम् ॥114॥

अर्थ: वेश्याव्यसन त्याग व्रत के अतिचार कौन हैं, कृपाकर हे गुरो! कहिए - वेश्याव्यसन त्याग व्रत की रक्षा करनेवाले को चाहिए कि वह उसके प्रति प्रेरणादायक प्रत्येक कार्य से बचे। वे सब उस व्रत के अतिचार हैं। जैसे वेश्या का नृत्य देखना, उसका गाना सुनना, उसके घर जाना, उससे वार्तालाप करना, उसके साथ लेनदेन व्यापार आदि करना, उसे अपने गृह में रहने को स्थान देना, वेश्याव्यसनियों की संगति करना, उन्हें वेश्या के प्रति अनुरागी बनाना, उन्हें आर्थिक सहायता देना ये सब उस व्रत को नाश करने के हेतु हैं। चित्र के द्वारा या सिनेमा आदि के द्वारा भी वेश्यानृत्यदर्शन या वेश्यागीतश्रवण इस व्रत के लिए दोषास्पद है ।


प्रश्नः - स्तेयातिचारचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।

धनधान्यादिकमग्राह्यं परस्यान्यायतश्छलात् ।
यतो व्रतं भवेत् पूर्णं लोकद्वयसुखावहम् ॥115॥

अर्थ: हे गुरुदेव! चोरी व्यसन त्यागव्रत के अतिचारों का प्रतिपादन कीजिए - चोरी का त्याग करनेवाला व्यक्ति कदाचित् चोरी न करते हुए भी परके धन, धान्य, पशु आदि के पदार्थों को अथवा राजकीय, व्यापारिक, सामाजिक, धार्मिक तथा कौटुम्बिक अधिकारों को अन्य मार्ग से, विश्वासघात करके और कपट करके छीन लेवे तो यह सब चौर्यत्यागव्रत के ही दोष हैं ।

तृतीय अध्याय (श्लोक 116 से 117)

प्रश्नः - आखेटकातिचाराणां किं चिह्नं विद्यते गुरो।

मह्यां लिखितचित्राणां भित्तिकाष्ठपटादिषु।
छेदनं भेदनञ्चूर्णं न कार्यं धर्मवेदिभिः ॥116॥

अर्थ: हे गुरुदेव! आखेटक व्यसन के कौन से अतिचार हैं, कहिए - पृथिवी पर, भित्ति पर, काष्ठपट पर, कागज या वस्त्रादिक पर उल्लिखित चित्र अथवा मिट्टी, काठ, धातु व काच आदि के बने हुए मनुष्य, हाथी, घोड़ा, आदि प्राणियों की मूर्तियों में जीव का संकल्प करके उनको मारना, मस्तक छेदना, अंग-भंग करना आदि दुष्कर्म आखेटत्यागव्रत के अतिचार हैं। जैसे लोक में रामलीला आदि के अवसर पर रावणादि की मूर्तियाँ बनाकर उनका मस्तक छेदते हैं और जो भी विद्वेष पूर्ण भाव होते हैं वह सब इस व्रत के लिए दोषाधायक हैं। यद्यपि रावण का दुष्कृत्य निन्द्य है तथापि किसी आश्रय से अपने परिणामों में क्रूरता लाना भी बंध का ही हेतु है।

मन के द्वारा मारण, छेदन, अंग भंग का विचार जैसे दोषास्पद है; क्योंकि ऐसा संकल्प परिणामों में निर्दयपना उत्पन्न करता है। इसी प्रकार वचन के द्वारा दुष्ट बातों का कहना तेरा मस्तक छेदूँगा इत्यादि हिंसा पूरक निर्दयता के वचन और काय के द्वारा हिंसा का अभिनय जैसे किसी के मस्तक के छेदन का अभिनय, शिकारी का वेश रखना तथा शिकार का स्वांग करना, इत्यादि काय से क्रूरकर्म करना सब आखेटत्यागव्रत के लिए अतिचार हैं। इन सबसे परिणाम मलिन होते हैं तथा इस व्यसन के लिए प्रोत्साहन मिलता है ।


प्रश्नः - परस्त्रीसेवनस्यास्ति किं चिह्नं मे गुरो वद।

कन्यकादूषणं वापि कन्यकाहरणं हठात् ।
नान्यस्त्रीचिन्तनं कार्यं कदापि भवभीरुभिः ॥117॥

अर्थ: हे गुरुदेव! परस्त्रीव्यसनत्यागव्रत के अतिचार कौन-कौन हैं, कृपया कहिए - जिस कन्या का किसी दूसरे पुरुष के साथ सम्बन्ध निश्चित हो चुका है उसे अपने विवाह के लिए समझाना, उस पुरुष को उससे विरक्त करने के लिये कन्या को मिथ्या दूषण लगाना, कन्या को अपने साथ विवाहित करने के लिए हठात् हरण कर ले जाना, परस्त्रियों के नख-शिख शृंगार आदि का विचार करना, उनकी सुन्दरता का विचार करना ये सब परस्त्रीव्यसनत्यागी के लिए अतिचार हैं। व्रत को ये दूषित करनेवाले हैं।

परस्त्री का त्याग होने पर भी जो परस्त्रियों की चर्चा करते हैं; उनके हावभाव, विलास, क्रीड़ा, गमन, हास्य और वेश-भूषा आदि विषयों पर वार्तालाप करते हैं, व्यभिचारिणी स्त्रियों से हँसते बोलते हैं, व्यङ्ग्य वचन कहते हैं, गाली आदि भण्डवचन बोलते हैं, स्त्रियों के चित्रों का संग्रह करते हैं, नग्न चित्रों का दुर्भावना से अवलोकन करते हैं वे अपने पवित्र व्रत को मलिन करते हैं, अतः उक्त सभी ही दोष त्याज्य हैं।

स्वस्त्री में भी अति आसक्तता, काम से अतिआतुर होना, विभिन्न अङ्गों से क्रीड़ा करना आदि सम्पूर्ण कुचेष्टाएँ रागभाववर्द्धक होने से स्वदारसन्तोषी व्यक्ति के भी असन्तोष को उत्पन्न कर उसके व्रत को मलिन कर देती हैं, अतः इन कुचेष्टाओं को व्रत का अतिचार मानकर दूर से ही त्याग देना चाहिए ।

चतुर्थ अध्याय (श्लोक 118 से 154)

प्रश्नः - प्रातरुत्थाय किं कार्यं वद मे शान्तये गुरो।

नमोऽस्तु वीतरागाय भक्त्यैवमुच्चरन् वचः।
उत्तिष्ठतु सदा प्रातर्देहः स्यादशुचिर्यदि ॥118॥

अर्थ: हे गुरुदेव! दार्शनिक श्रावक के आचार का वर्णन किया किन्तु उसके योग्य दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, कृपाकर शान्ति की प्राप्ति के लिए कहिए - सर्वप्रथम जब प्रातःकाल निद्रा पूर्ण हो जाय तब “श्रीवीतरागाय नमः या श्रीजिनाय नमः” अथवा 'णमो अरिहन्ताणं" इत्यादि नमस्कारात्मक वाक्य जो कि परम आराध्य मंगलदायक और सर्वअनिष्ट निवारक परमात्मा के मंगलमयस्मरण स्वरूप हैं उनका उच्चारण करते हुए ही शय्या का परित्याग करे।

यदि कभी ऐसा प्रसंग आवे जो उठते ही यह अनुभव में आवे कि मेरी देह तो अशुद्ध है। रोगादि के कारण मैं पवित्रता से नहीं रह पाता हूँ या स्त्रीससंभोगादि गार्हस्थिक कार्यों के कारण वह अशुद्ध है अथवा छोटे-छोटे बाल बच्चों के मलमूत्रादि के संपर्क से देह वस्त्रादि अशुद्ध हैं तो शब्दों द्वारा मंत्रपाठ का उच्चारण न करे, क्योंकि अशुद्धावस्था में मंत्रपाठ करना, स्वाध्याय करना, सामायिक करना, देव वन्दना करना और दान देना आदि पुण्य कार्य करना निषिद्ध है। पवित्रता के साथ ही उक्त कार्यों को निष्पन्न करना चाहिए। अतएव ऐसी स्थिति में मौनपूर्वक ही पञ्चनमस्कार मंत्र का स्मरण करे। स्मरण करने का त्रिकाल में भी निषेध नहीं है। अशुद्ध मनुष्य भी परमात्मा के स्मरण से पवित्र हृदय बन जाता है। इसलिए परमपूज्य पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करके शरीरादि की अपवित्रता और उस निमित्त से अपनी आत्मा की पराधीनता को विचार कर अन्यत्वभावना द्वारा आत्मा को शरीरादि से पृथक् चिन्तवन कर शुद्धस्वरूप का ध्यान करे। ऐसा करनेवाले महापुरुष की आधि, व्याधि, विघ्न, अनिष्ट और भय सब जड़ सहित नाश को प्राप्त हो जाते हैं।११८ ।


मौनेनैवोच्चरन्मन्त्रं ध्यायतु स्वात्मनः पदम्।
आधिर्व्याधिर्यतो भीतिः स्वयं नश्येत् समूलतः ॥119॥

अर्थ: सर्वप्रथम जब प्रातःकाल निद्रा पूर्ण हो जाय तब “श्रीवीतरागाय नमः या श्रीजिनाय नमः” अथवा ‘णमो अरिहन्ताणं” इत्यादि नमस्कारात्मक वाक्य जो कि परम आराध्य मंगलदायक और सर्वअनिष्ट निवारक परमात्मा के मंगलमयस्मरण स्वरूप हैं उनका उच्चारण करते हुए ही शय्या का परित्याग करे।

यदि कभी ऐसा प्रसंग आवे जो उठते ही यह अनुभव में आवे कि मेरी देह तो अशुद्ध है। रोगादि के कारण मैं पवित्रता से नहीं रह पाता हूँ या स्त्रीससंभोगादि गार्हस्थिक कार्यों के कारण वह अशुद्ध है अथवा छोटे-छोटे बाल बच्चों के मलमूत्रादि के संपर्क से देह वस्त्रादि अशुद्ध हैं तो शब्दों द्वारा मंत्रपाठ का उच्चारण न करे, क्योंकि अशुद्धावस्था में मंत्रपाठ करना, स्वाध्याय करना, सामायिक करना, देव वन्दना करना और दान देना आदि पुण्य कार्य करना निषिद्ध है। पवित्रता के साथ ही उक्त कार्यों को निष्पन्न करना चाहिए। अतएव ऐसी स्थिति में मौनपूर्वक ही पञ्चनमस्कार मंत्र का स्मरण करे। स्मरण करने का त्रिकाल में भी निषेध नहीं है। अशुद्ध मनुष्य भी परमात्मा के स्मरण से पवित्र हृदय बन जाता है। इसलिए परमपूज्य पञ्चपरमेष्ठी का स्मरण करके शरीरादि की अपवित्रता और उस निमित्त से अपनी आत्मा की पराधीनता को विचार कर अन्यत्वभावना द्वारा आत्मा को शरीरादि से पृथक् चिन्तवन कर शुद्धस्वरूप का ध्यान करे। ऐसा करनेवाले महापुरुष की आधि, व्याधि, विघ्न, अनिष्ट और भय सब जड़ सहित नाश को प्राप्त हो जाते हैं।११८ ।


युग्मम्

ततः प्रातर्विधिं कृत्वा पूजां दानं तथैव च ।
स्वर्मोक्षदं मुदा स्तोत्रं स्वाध्यायं स्वात्मदर्शकम् ॥120॥

अर्थ: तदन्तर शौच क्रिया के पश्चात् दन्तधावन, तैलमर्दन तथा स्नान आदि नित्यक्रिया करके पवित्र वस्त्रों को धारण कर अपने गृह से जल, अक्षत आदि अष्ट द्रव्य लेकर ईर्यापथशुद्धि से गमन कर जिनालय जावे। दूर से ही जिनालय की शिखर तथा कलश और ध्वज को देखकर विचार करे कि मेरा जीवन सफल है, जो मैं परम वीतराग परमात्मा के पवित्र मन्दिर का दर्शन कर रहा हूँ। जिनालय जाते समय मार्ग में कोई दूसरा कार्य नहीं करने लगना चाहिए। निःसही शब्द को उच्चारण करते हुए श्री जिनालय में प्रवेश करे।

मार्ग में चलने से मलीनता को प्राप्त अपने पैरे आदि को पवित्र कर परमपुरुष का दिव्य दर्शन करे। श्री भगवान् का यह दर्शन नाना योनियों में परिभ्रमण करते-करते बड़े कष्ट से प्राप्त हुए इस मानव जन्म में बहुत ही सुयोग से प्राप्त हुआ है। ऐसा विचार करते हुए भक्तिभावपूर्वक अष्ट द्रव्य से श्रीजिन का अभिषेक पूर्वक पूजन करे। पूजन के अनन्तर शान्ति की अभिलाषा से शान्तिपाठ पढ़े, इष्ट प्रार्थना करे, विश्व की शान्ति के लिए तथा देश, राष्ट्र और समाज की शान्ति के लिए प्रार्थना करे। तदनन्तर जिन-वाणी का स्वाध्याय करे। यदि भाग्योदय से परम दिगम्बर गुरु का संयोग मिल जाय तो उन्हें भक्ति पूर्वक प्रणामकर उनके श्रीमुख से अपना कल्याणकारक उपदेश श्रवण करे। अपने प्रमाद से या कषाय से या इन्द्रिय परवशता से कोई अपराध बन गया हो तो श्री गुरु के समीप आलोचना करे तथा उनकी आज्ञानुसार प्रायश्चित्त स्वरूप दण्ड को अङ्गीकार करके अपने जीवन को पवित्र बनावे।

जिन मन्दिर में अपने अनेक साधर्मी भाई आते हैं, उनको देखकर प्रसन्न वदन होकर उनके साथ धर्म कुशल पूछते हुए अपना कुछ समय धर्मालाप में व्यतीत करे और यह देखे कि इनमें कौन भाई ऐसा है जो किसी प्रकार के कष्ट में है। उनकी यथायोग्य सहायता कर अपने गृह लौटे। गृह में नाना प्रकार के सदुपायों से अपनी आजीविका सम्पादन करे। उसके बाद यथासमय द्वारप्रेक्षण करे। सौभाग्य से यदि कोई उत्तम सत्पात्र का लाभ मिल जाय तो श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उन्हें विधिपूर्वक आहार आदि दान देवे। यदि उत्तम पात्र का लाभ न हो तो मध्यम पात्र श्रावकों को या जघन्य पात्र जैनमात्र को दान देवे। उनका भी लाभ न हो तो दयाबुद्धि से दयापात्र जो त्रस्त है उनका आवश्यकतानुकूल आहारिक दान देवे। तदनन्तर अपने घर में अपने आश्रित जनों को तथा पशुओं को आहारादि की व्यवस्था कर मौनपूर्वक भोजन करे।


पश्चाद्धि भोजनं कुर्यात् तथान्यां शान्तिदां कृतिम् ।
यतः स्यात्सफलं जन्म भवबन्धनभेदनम् ॥121॥

अर्थ: तदन्तर शौच क्रिया के पश्चात् दन्तधावन, तैलमर्दन तथा स्नान आदि नित्यक्रिया करके पवित्र वस्त्रों को धारण कर अपने गृह से जल, अक्षत आदि अष्ट द्रव्य लेकर ईर्यापथशुद्धि से गमन कर जिनालय जावे। दूर से ही जिनालय की शिखर तथा कलश और ध्वज को देखकर विचार करे कि मेरा जीवन सफल है, जो मैं परम वीतराग परमात्मा के पवित्र मन्दिर का दर्शन कर रहा हूँ। जिनालय जाते समय मार्ग में कोई दूसरा कार्य नहीं करने लगना चाहिए। निःसही शब्द को उच्चारण करते हुए श्री जिनालय में प्रवेश करे।

मार्ग में चलने से मलीनता को प्राप्त अपने पैरे आदि को पवित्र कर परमपुरुष का दिव्य दर्शन करे। श्री भगवान् का यह दर्शन नाना योनियों में परिभ्रमण करते-करते बड़े कष्ट से प्राप्त हुए इस मानव जन्म में बहुत ही सुयोग से प्राप्त हुआ है। ऐसा विचार करते हुए भक्तिभावपूर्वक अष्ट द्रव्य से श्रीजिन का अभिषेक पूर्वक पूजन करे। पूजन के अनन्तर शान्ति की अभिलाषा से शान्तिपाठ पढ़े, इष्ट प्रार्थना करे, विश्व की शान्ति के लिए तथा देश, राष्ट्र और समाज की शान्ति के लिए प्रार्थना करे। तदनन्तर जिन-वाणी का स्वाध्याय करे। यदि भाग्योदय से परम दिगम्बर गुरु का संयोग मिल जाय तो उन्हें भक्ति पूर्वक प्रणामकर उनके श्रीमुख से अपना कल्याणकारक उपदेश श्रवण करे। अपने प्रमाद से या कषाय से या इन्द्रिय परवशता से कोई अपराध बन गया हो तो श्री गुरु के समीप आलोचना करे तथा उनकी आज्ञानुसार प्रायश्चित्त स्वरूप दण्ड को अङ्गीकार करके अपने जीवन को पवित्र बनावे।

जिन मन्दिर में अपने अनेक साधर्मी भाई आते हैं, उनको देखकर प्रसन्न वदन होकर उनके साथ धर्म कुशल पूछते हुए अपना कुछ समय धर्मालाप में व्यतीत करे और यह देखे कि इनमें कौन भाई ऐसा है जो किसी प्रकार के कष्ट में है। उनकी यथायोग्य सहायता कर अपने गृह लौटे। गृह में नाना प्रकार के सदुपायों से अपनी आजीविका सम्पादन करे। उसके बाद यथासमय द्वारप्रेक्षण करे। सौभाग्य से यदि कोई उत्तम सत्पात्र का लाभ मिल जाय तो श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उन्हें विधिपूर्वक आहार आदि दान देवे। यदि उत्तम पात्र का लाभ न हो तो मध्यम पात्र श्रावकों को या जघन्य पात्र जैनमात्र को दान देवे। उनका भी लाभ न हो तो दयाबुद्धि से दयापात्र जो त्रस्त है उनका आवश्यकतानुकूल आहारिक दान देवे। तदनन्तर अपने घर में अपने आश्रित जनों को तथा पशुओं को आहारादि की व्यवस्था कर मौनपूर्वक भोजन करे।


युग्मम्

प्रश्नः - गर्भाधानक्रियादीनां किं रूपं कति ताः वद।

गर्भाधानक्रियादीनां संस्काराणां यथायथम् ।
काले काले विधिः कार्यः श्रावकैर्धार्मिकैर्मुदा ॥122॥

अर्थ: हे गुरु ! गर्भाधानादि क्रियाएँ कितनी हैं और उनका क्या स्वरूप है, कृपाकर कहें - गर्भाधान आदि सोलह संस्कार हैं जो श्रावकों को अवश्य करने चाहिए। जैसे घी के संस्कार से मिट्टी का घड़ा भी सचिक्कण हो जाता है ऐसे ही उत्तम संस्कारों से बालक भी धर्मात्मा और साहसी बन जाते हैं। यदि बालकों को उत्तम संस्कार न हो, तो बुरे संस्कारों के प्रभाव से वे ही बालक पापी और कायर बनते हैं। कुसंस्कारों के दुष्प्रभाव के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष में देखे जाते हैं। सुसंस्कृत व्यक्ति यदि गुणी न भी हो तो वह दुर्गुण नहीं बन सकता, इतना लाभ भी थोड़ा नहीं है।

जब बालक गर्भ में आता है उसी समय से माता के विचारों का प्रभाव उसपर पड़ता है, ऐसा प्रत्यक्ष देखा जाता है कि अभिमन्यु जब माता के गर्भ में था तब चक्रव्यूह में प्रवेश करने की तथा उसे तोड़ने की कथा अर्जुन द्रौपदी से कह रहे थे। वह कथा द्रौपदी के श्रवण के साथ साथ बालक पर भी असर कर रही थी। जब बालक जन्मा और १६ साल का हुआ तो कौरव-पाण्डवों के युद्ध में अर्जुन की अनुपस्थिति में अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया। जब कि उसने इस विषय की शिक्षा कहीं पाई नहीं थी; केवल गर्भस्थ अवस्था में ही माता ने सुनी थी, उतने से ही इसे ज्ञात था। यह कथा पुराणों में है। माता के गरम शीत आहार का बालक के शरीर पर असर पड़ता है यह सब लोग जानते हैं। इसी से गर्भवती स्त्री को बालक की रक्षा के अभिप्राय से बहुत सम्हाल कर रखते हैं। इससे यह सहज सिद्ध है कि गर्भ से लेकर ही यदि बालक को सुसंस्कृत किया जाय तो उसकी प्रवृत्ति धार्मिक होगी और वह पाप क्रियाओं से निवृत्त होगा। शुभप्रवृत्ति मोक्ष का भी परम्परा कारण बन जाती है। यह बात जगत् में प्रसिद्ध है। इसलिए प्रयत्न पूर्वक बालकों के संस्कार अवश्य करने चाहिए।१२२/१२३।


येनाशुभक्रियायाः स्यान्निवृत्ति : सुखदे शुभे ।
प्रवृत्तिः प्राणिनां श्रीदा सदा भूमण्डलेऽखिले ॥123॥

अर्थ: गर्भाधान आदि सोलह संस्कार हैं जो श्रावकों को अवश्य करने चाहिए। जैसे घी के संस्कार से मिट्टी का घड़ा भी सचिक्कण हो जाता है ऐसे ही उत्तम संस्कारों से बालक भी धर्मात्मा और साहसी बन जाते हैं। यदि बालकों को उत्तम संस्कार न हो, तो बुरे संस्कारों के प्रभाव से वे ही बालक पापी और कायर बनते हैं। कुसंस्कारों के दुष्प्रभाव के अनेक उदाहरण प्रत्यक्ष में देखे जाते हैं। सुसंस्कृत व्यक्ति यदि गुणी न भी हो तो वह दुर्गुण नहीं बन सकता, इतना लाभ भी थोड़ा नहीं है।

जब बालक गर्भ में आता है उसी समय से माता के विचारों का प्रभाव उसपर पड़ता है, ऐसा प्रत्यक्ष देखा जाता है कि अभिमन्यु जब माता के गर्भ में था तब चक्रव्यूह में प्रवेश करने की तथा उसे तोड़ने की कथा अर्जुन द्रौपदी से कह रहे थे। वह कथा द्रौपदी के श्रवण के साथ साथ बालक पर भी असर कर रही थी। जब बालक जन्मा और १६ साल का हुआ तो कौरव-पाण्डवों के युद्ध में अर्जुन की अनुपस्थिति में अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया। जब कि उसने इस विषय की शिक्षा कहीं पाई नहीं थी; केवल गर्भस्थ अवस्था में ही माता ने सुनी थी, उतने से ही इसे ज्ञात था। यह कथा पुराणों में है। माता के गरम शीत आहार का बालक के शरीर पर असर पड़ता है यह सब लोग जानते हैं। इसी से गर्भवती स्त्री को बालक की रक्षा के अभिप्राय से बहुत सम्हाल कर रखते हैं। इससे यह सहज सिद्ध है कि गर्भ से लेकर ही यदि बालक को सुसंस्कृत किया जाय तो उसकी प्रवृत्ति धार्मिक होगी और वह पाप क्रियाओं से निवृत्त होगा। शुभप्रवृत्ति मोक्ष का भी परम्परा कारण बन जाती है। यह बात जगत् में प्रसिद्ध है। इसलिए प्रयत्न पूर्वक बालकों के संस्कार अवश्य करने चाहिए।१२२/१२३।


प्रश्नः - कस्मै देयं गुरो दानं तत्फलं वा मुदा वद।

यथायोग्यं क्षमाकर्त्रे नवधाभक्तिपूर्वकम् ।
अन्येभ्यश्च सुपात्रेभ्यो दानं देयं चतुर्विधम् ॥124॥

अर्थ: हे गुरुदेव गृहस्थ का धर्म - दान, पूजा, शील और तप के भेद से सामान्यतः चार प्रकार का बताया गया है। उसमें यह जानना है कि दान किसे देना चाहिए और उसका क्या फल है। कृपाकर कहें - क्षमा की मूर्ति - परमदिगम्बर, इच्छारहित, समभावी, अपने हाथ में ही आहार करनेवाले, परिग्रह रहित, लोभरहित, इन्द्रियविजयी, किसी से याचना न करनेवाले, वन के एकान्त प्रदेश में निवास करनेवाले, परम ब्रह्मचारी, सर्व जीवों के हितवाञ्छक, सम्यग्दृष्टि महापुरुष कहे जाते हैं। सच्चे साधुओं के ये ही लक्षण हैं। इनको दान देना परम पुण्यदायक है। ये सुपात्रों में उत्तम सुपात्र हैं। इनको अत्यन्त श्रद्धा भक्ति और विनय के साथ शास्त्रोक्त नवधा भक्तिपूर्वक विधिवत् शुद्ध आहारादि देना उचित है। इनके लाभ न होने पर व्रती श्रावक मध्यमपात्र को और उसका भी लाभ न मिले तो धर्मात्मा सम्यग्दृष्टि जघन्य सुपात्र को दान देना चाहिए।

उत्तमपात्र में दान का फल उत्तम भोगभूमि में उत्पन्न होना है, मध्यमपात्र के दान का मध्यमभोग भूमि और जघन्य पात्र में दान का फल जघन्य भोगभूमि है। वहाँ के सुख भोगकर भोगभूमि में जीव निश्चित स्वर्गगति पाते हैं। स्वर्ग-सुखों को अपनी आयुप्रमाण भोगकर उत्तम मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। चक्रवर्ती की भी विभूति को प्राप्त करते हैं और अन्त में सर्व कर्मों का नाश कर परम शान्ति और सुख का स्थान जो मोक्षरूपी नगर है उसे सदा के लिए प्राप्त करते हैं, यह दान का फल है। ऐसा जानकर गृहस्थों को प्रयत्न पूर्वक सत्पात्रों में प्रतिदिन दान देना चाहिए।१२४ ।


तद्दानाच्चक्रवर्त्यादेः सुखं लब्ध्वा यथाक्रमम् ।
दातारः शान्तिदं नित्यं प्रयान्ति मोक्षपत्तनम् ॥125॥

अर्थ: क्षमा की मूर्ति - परमदिगम्बर, इच्छारहित, समभावी, अपने हाथ में ही आहार करनेवाले, परिग्रह रहित, लोभरहित, इन्द्रियविजयी, किसी से याचना न करनेवाले, वन के एकान्त प्रदेश में निवास करनेवाले, परम ब्रह्मचारी, सर्व जीवों के हितवाञ्छक, सम्यग्दृष्टि महापुरुष कहे जाते हैं। सच्चे साधुओं के ये ही लक्षण हैं। इनको दान देना परम पुण्यदायक है। ये सुपात्रों में उत्तम सुपात्र हैं। इनको अत्यन्त श्रद्धा भक्ति और विनय के साथ शास्त्रोक्त नवधा भक्तिपूर्वक विधिवत् शुद्ध आहारादि देना उचित है। इनके लाभ न होने पर व्रती श्रावक मध्यमपात्र को और उसका भी लाभ न मिले तो धर्मात्मा सम्यग्दृष्टि जघन्य सुपात्र को दान देना चाहिए।

उत्तमपात्र में दान का फल उत्तम भोगभूमि में उत्पन्न होना है, मध्यमपात्र के दान का मध्यमभोग भूमि और जघन्य पात्र में दान का फल जघन्य भोगभूमि है। वहाँ के सुख भोगकर भोगभूमि में जीव निश्चित स्वर्गगति पाते हैं। स्वर्ग-सुखों को अपनी आयुप्रमाण भोगकर उत्तम मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। चक्रवर्ती की भी विभूति को प्राप्त करते हैं और अन्त में सर्व कर्मों का नाश कर परम शान्ति और सुख का स्थान जो मोक्षरूपी नगर है उसे सदा के लिए प्राप्त करते हैं, यह दान का फल है। ऐसा जानकर गृहस्थों को प्रयत्न पूर्वक सत्पात्रों में प्रतिदिन दान देना चाहिए।१२४ ।


युग्मम्

प्रश्नः - न ददाति धनाढ्योऽपि दानं स कीदृशो वद।

दानं धनाढ्योऽपि ददाति यो न
गृही स मूर्खः सुखशान्तिबीजम् ।
आगामिकालस्य भिनत्त्यवश्यं
नास्त्यत्र शङ्का तिलमात्रतोऽपि ॥126॥

अर्थ: जो धनी होकर भी लोभादि के कारण दान नहीं करता वह कैसा है, कहिए–

सांसारिक सुख और शान्तिदायक सामग्री का संयोग इस जीव को अपने पूर्वकृत पुण्योदय से प्राप्त होता है। यह जीव संसार में सुख, दुःख, सम्पत्ति, दारिद्र और ऐश्वर्य, शिष्ट या दुष्ट समागम, कीर्ति-अपकीर्ति, मित्र-शत्रु, इष्ट संयोग-वियोग, भवन-वन आदि साता या असातादायक सामग्री का प्राप्ति अपने पुण्य और पाप कर्म के उदय से ही प्राप्त करता है। पुण्योदय के अभाव में प्राप्त सुख सामग्री भी क्षणकाल में विलीन हो जाती है।

इस सत्य का ज्ञान जिनको नहीं और जो अहंकार वश सातासामग्री की प्राप्ति का कर्ता स्वयं को मानता है वह अविवेकी गृहस्थ मोहान्ध है। उसे वस्तुतत्त्व का किञ्चित् भी बोध नहीं है। वह भाग्यहीन अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी पटकता है। उसे यह ज्ञान नहीं है कि उत्तम सत्पात्रों के दान के फल से ही उस सातिशय पुण्य का बन्ध होता है जिससे यह साधारण विभव की क्या गणना इन्द्र और चक्रवर्ती की विभूति भी चरणों में लोटती है। वह उस मूर्ख की तरह है जो मूल की पूँजी खा ले और भविष्य के लिये कोई उद्योग न करे। अथवा उस मूर्ख किसान की तरह है जो बीज के योग्य धान्य को योग्य समय पर योग्य भूमि में वपन नहीं करता और उसे खाकर ही अपने को धन्य मानता है, ऐसा किसान कुछ समय बाद अपनी करनी पर स्वयं पछतायगा।

उत्तम पात्र में दिया हुआ दान उत्तम भूमि में यथासमय प्राप्त बीज की तरह महान् शान्तिदायक फलवान वृक्ष को प्रदान करता है। जो इस सत्यभूत रहस्य को नहीं जानता अथवा मोह या लोभवश जान कर भी भुला देता है और अहंकार के वश हो उत्तम पात्रों का सम्मान नहीं करता। वह आगामी जन्म में भाग्यहीन दरिद्र दुखी होता है इसमें तिलतुष मात्र भी शंका नहीं करनी चाहिए ।


प्रश्नः - किं पुरुषार्थचिह्नं मे तत्फलं भो गुरो वद।

अस्ति कार्योत्तमो लोके पुरुषार्थश्चतुर्विधः ।
इन्द्रियातीन्द्रियादीनां सत्सुखानां प्रदायकः ॥127॥

अर्थ: हे गुरुवर धनादि की प्राप्ति यदि पुराकृत पुण्य से होती है, स्वयं के पुरुषार्थ से नहीं होती, तो पुरुषार्थ फिर क्या है और उसका क्या फल है? कृपया कहिए - धर्म का पालन, अर्थ का उपार्जन करना, प्राप्त भोगोपभोगों का सेवन और मोक्षप्राप्ति का प्रयत्न ये पुरुषार्थ हैं। इसका दूसरा नाम है उद्यम, उद्योग और उन्नति। जो इसे साधते हैं वे वीर और साहसी होते हैं तथा लौकिक और पारलौकिक सुख को भोगते हैं। और जो लोग पुरुषार्थ को अङ्गीकार नहीं करते वे प्रमादी होकर पारलौकिक सुख की बात तो दूर रही इस लोक में भी दुखी रहते हैं और पशुतुल्य जीवन व्यतीत करते हैं। उक्त चारों पुरुषार्थों में से आदि के तीन पुरुषार्थों को साधनेवाले श्रावक या गृहस्थ होते है और आत्मीय मोक्ष पुरुषार्थ को साधने वाले साधु कहलाते हैं।


कार्यो ज्ञात्वेत्यतो भव्यैर्धर्मार्थादिचतुर्विधः ।।
पुरुषार्थो यतः श्रीदोऽभीष्टसिद्धिर्भवेत्तव ॥128॥

अर्थ: धर्म का पालन, अर्थ का उपार्जन करना, प्राप्त भोगोपभोगों का सेवन और मोक्षप्राप्ति का प्रयत्न ये पुरुषार्थ हैं। इसका दूसरा नाम है उद्यम, उद्योग और उन्नति। जो इसे साधते हैं वे वीर और साहसी होते हैं तथा लौकिक और पारलौकिक सुख को भोगते हैं। और जो लोग पुरुषार्थ को अङ्गीकार नहीं करते वे प्रमादी होकर पारलौकिक सुख की बात तो दूर रही इस लोक में भी दुखी रहते हैं और पशुतुल्य जीवन व्यतीत करते हैं। उक्त चारों पुरुषार्थों में से आदि के तीन पुरुषार्थों को साधनेवाले श्रावक या गृहस्थ होते है और आत्मीय मोक्ष पुरुषार्थ को साधने वाले साधु कहलाते हैं।


युग्मम्

प्रश्नः - चातुर्मासेऽन्यकाले वा कथं कार्यं धनार्जनम् ।

मुख्यरीत्याष्टमासे हि कार्यं नीत्या धनार्जनम् ।।
वर्षाऋतौ चतुर्मासे मुख्यतो धर्मसाधनम् ॥129॥

अर्थ: वर्ष में १२ मास होते हैं। इनमें से आषाढ़ी अष्टाह्निका से कार्तिकी अष्टाह्निका तक के ४ मास वर्षा ऋतु कहलाती है। जलवृष्टि के कारण इस काल में सम्पूर्ण भूमि असंख्य त्रस और स्थावर जीवों से संकुल हो जाती है और गमनागमन आदि में मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इसी कारण से यति भी जिनका आठ मास पर्यन्त नियमित बिहार होता है इन दिनों में एक ही क्षेत्र में निवास करते हैं। इस समय वर्षा के कारण व्यापारियों का भी आवागमन बन्द हो जाने से व्यापार भी मन्थर गति से चलता है। अतएव ऐसा सुन्दर सुयोग श्रावकों को व्यर्थ न खोना चाहिये। इन दिनों में मुख्यता से धर्मसाधन करना चाहिए।

जैसे बाकी के आठ मास व्यापार आदि कार्यों के साधक हैं। ऐसे ही ४ मास धमोपार्जन के मुख्य साधक हैं। परम वीतराग गुरुओं का सङ्गम इस समय सोने में सुगंध की कहावत को चरितार्थ करता है। इन आठ महीनों में भी नीति से धनार्जन करना व्यापार का मूल उद्देश्य जिस किसी प्रकार से धनसंग्रह नहीं है। उसका उद्देश्य अपने परिश्रम के अनुकूल दूसरों के लाभ के अधिकार को न बिगाड़ते हुए न्याय प्राप्त अपने अधिकार प्रमाण राज्य के नियमानुकूल तथा महाजनों द्वारा नियमित विधिसम्मत उपयुक्त द्रव्य का प्राप्त करना तथा उतने में ही संतोषपूर्वक आजीविका निर्वाह करना ही है। ऐसा करनेवालों को ही शान्ति की प्राप्ति और इष्ट प्राप्ति होती है।१२९/१३०।


पूर्वोक्तविधिरेवं हि विधेयः शान्तिदः सदा ।।
यतः स्यादुभये लोके सततं स्वेष्टसङ्गमः ॥130॥

अर्थ: वर्ष में १२ मास होते हैं। इनमें से आषाढ़ी अष्टाह्निका से कार्तिकी अष्टाह्निका तक के ४ मास वर्षा ऋतु कहलाती है। जलवृष्टि के कारण इस काल में सम्पूर्ण भूमि असंख्य त्रस और स्थावर जीवों से संकुल हो जाती है और गमनागमन आदि में मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इसी कारण से यति भी जिनका आठ मास पर्यन्त नियमित बिहार होता है इन दिनों में एक ही क्षेत्र में निवास करते हैं। इस समय वर्षा के कारण व्यापारियों का भी आवागमन बन्द हो जाने से व्यापार भी मन्थर गति से चलता है। अतएव ऐसा सुन्दर सुयोग श्रावकों को व्यर्थ न खोना चाहिये। इन दिनों में मुख्यता से धर्मसाधन करना चाहिए।
जैसे बाकी के आठ मास व्यापार आदि कार्यों के साधक हैं। ऐसे ही ४ मास धमोपार्जन के मुख्य साधक हैं। परम वीतराग गुरुओं का सङ्गम इस समय सोने में सुगंध की कहावत को चरितार्थ करता है। इन आठ महीनों में भी नीति से धनार्जन करना व्यापार का मूल उद्देश्य जिस किसी प्रकार से धनसंग्रह नहीं है। उसका उद्देश्य अपने परिश्रम के अनुकूल दूसरों के लाभ के अधिकार को न बिगाड़ते हुए न्याय प्राप्त अपने अधिकार प्रमाण राज्य के नियमानुकूल तथा महाजनों द्वारा नियमित विधिसम्मत उपयुक्त द्रव्य का प्राप्त करना तथा उतने में ही संतोषपूर्वक आजीविका निर्वाह करना ही है। ऐसा करनेवालों को ही शान्ति की प्राप्ति और इष्ट प्राप्ति होती है।१२९/१३०।


प्रश्नः - अहिंसाधर्मवृद्ध्यर्थं किं किं कार्यं जनैः सदा।

स्वदेशोद्धारकार्येऽपि यतन्तां श्रावकाः मुदा ।।
धर्मार्थमपि सर्वत्र गच्छन्तु स्वात्मसिद्धये ॥131॥

अर्थ: श्रावक को क्या क्या करना उचित है जिससे अहिंसा परमधर्म की वृद्धि हो। कृपया बताइए - श्रावकों को अपने देश के उद्धार के लिए भी सदा प्रयत्न करना चाहिए तथा अहिंसा धर्म के प्रचार के लिए उन्हें सभी जगह जाना चाहिए। इससे विश्व के कोने-कोने में जैन धर्म की प्रसिद्धि, प्रभावना और प्रचार होगा और श्रावकों का उत्कृष्ट मानव जन्म भी सफल होगा ।


यतः स्याज्जैनधर्मस्य प्रसिद्धिः सर्वभूतले ।।
श्रावकाणां परं जन्म सफलं स्याद्विशेषतः ॥132॥

अर्थ: श्रावकों को अपने देश के उद्धार के लिए भी सदा प्रयत्न करना चाहिए तथा अहिंसा धर्म के प्रचार के लिए उन्हें सभी जगह जाना चाहिए। इससे विश्व के कोने-कोने में जैन धर्म की प्रसिद्धि, प्रभावना और प्रचार होगा और श्रावकों का उत्कृष्ट मानव जन्म भी सफल होगा ।


युग्मम्

प्रश्नः - वात्सल्यभावो ध्रियते किमर्थं गुरो कृपाब्धे वद मे हितार्थम् ।

मिथ्याप्रपञ्चं प्रविहाय मोहं श्राद्धैश्चिदानन्दपदाश्रितैर्वा ।।
वात्सल्यभावोऽपि मिथः प्रशान्त्यै सर्वैश्च सार्धं सततं विधेयः ॥133॥

अर्थ: हे कृपासिन्धु गुरुदेव! वात्सल्य भाव किसलिए धारण किया जाता है? कृपाकर मेरे हित के लिए निरूपण कीजिए - परस्पर के व्यवहार में जो शिष्टाचार प्रदर्शन किया जाता है वह शिष्ट पुरुषों के योग्य ही है, अनुचित नहीं है; किन्तु वह सरलचित्त से करना चाहिए। केवल मायाचार से मिथ्या प्रपञ्च करना और झूठे ही सद्व्यवहार का प्रदर्शन करना हानि के लिए ही है, लाभ के लिए नहीं। जो अपने इन्द्रिय भोगों में तथा इन्द्रिय भोगों के लिए उपयोगी धन स्त्री आदि पदार्थों में मोहित बुद्धिवाले हैं वे केवल अपने स्वार्थ साधन के लिए ही सभ्यता का ढोंग करते हैं, ऐसे मायाचारी पुरुष लोक में अपकीर्ति के ही भागी होते हैं। लोग उनका कभी विश्वास नहीं करते।

मायावी का नम्र व्यवहार चूहे पकड़ने के लिए शान्त और नम्रता से बैठी हुई बिल्ली के व्यवहार के समान झूठ स्वार्थों से परिपूर्ण होता है। लोक में उसे बिलैया दण्डवत कहते हैं। ऐसा असद्व्यवहार या कपटविशिष्ट शिष्ट व्यवहार सम्यग्दृष्टि श्रावक कभी नहीं करता। जिन इन्द्रिय भोगों के साधने के लिए यह कपट का वेष रखा जाता है सम्यग्दृष्टि उन इन्द्रिय भोगों को हेय और क्षणस्थायी मानता है। वह उन्हें आत्महित के प्रतिकूल समझता है तब वह उसे कैसे स्वीकार कर सकता है अपने परम शुद्धि चैतन्य स्वरूप में रमण करने वाला और उस आत्मसुख के स्वाद का अनुभवन करनेवाला वह सम्यग्दृष्टि श्रावक सदा ऐसे मिथ्याप्रपञ्च से दूर रह कर सभी साधर्मी बन्धुओं के साथ उनकी सब प्रकार की उन्नति की कामना रखते हुए प्रेमभाव रखता है, सहानुभूति रखता है। विपत्ति में उनका साथ देता है, उनकी सब प्रकार से सहायता करता है। इस प्रकार के पारस्परिक सद्व्यवहार से वह अपनी पूरी समाज में शान्ति का स्रोत बहा देता है जो फैलने पर एक साथ संसार भर की अशान्ति को हर लेने में समर्थ है।१ ३ ३।


प्रश्नः - कथं क्षमादयो धर्माः पाल्याः प्रसिद्ध्यै गुरो वद।

यथाशक्ति क्षमादीनां धर्माणां पालनं मुदा ।
स्वात्मसिद्ध्यै सदा कार्यं चानुप्रेक्षादिचिन्तनम् ॥134॥

अर्थ: हे गुरुदेव! क्षमादि धर्मों का पालन कैसे करना चाहिए, कृपाकर मेरी इष्ट सिद्धि के लिए कहिए - यद्यपि उत्तम क्षमादि धर्मों का पालन तथा बारह अनुप्रेक्षाओं का चिन्तवन साधुजन करते हैं तथापि उसका एकदेश श्रावकों को भी पालन करना चाहिए। क्रोध के कारणों की उपस्थिति में भी मन पर संयमन करना, उसे विकृत न होने देना उत्तमक्षमा है। ऐसी उत्तम क्षमा कायरों की क्षमा नहीं है। मन पर विजय पाना बहुत बड़े साहसी और वीर पुरुष का कार्य है। बदला न लेना या न ले सकना क्षमा नहीं है, वह तो शक्ति के अभाव की पराधीनता है। वहाँ मन तो विकारी है। जहाँ मन विकारी न होकर सामर्थ्यवान् है तथा बदला न लेने की भावना है वह क्षमावान है। इस क्षमा गुण से गृहस्थ भी पारस्परिक वैर को खोकर सहानुभूति का पात्र बनकर लोकपूज्य हो जाता है। जबकि क्रोध से और बदला लेने से वैर और अशान्ति ही बढ़ती है। ऐसा होने पर भी गृहस्थ एकान्त क्षमा पालने के योग्य पात्र नहीं है। गृहस्थ होने के नाते उसपर स्त्री, बालबच्चों के परिपालन का भार है। देश, धर्म व समाज का भार है, अतः जब कोई दुष्ट अनेक प्रकार से समझाने पर भी बिना कारण दुष्टता करता है, सताता है, धर्म नष्ट करता है, धर्मात्माओं के धर्मपालन करने में विघ्न करता है, शान्ति को स्थिर नहीं रहने देना चाहता, तब वह सम्यग्दृष्टि गृहस्थ उसके अशान्तिपूर्ण कार्यों को सभी सम्भव उपायों से रोकता है। धर्मात्माओं की रक्षा करता है। उसके इस प्रयत्न में दुष्ट के ऊपर से क्षमा का भाव दूर हो जाता है, उसे दण्ड देना पड़ता है, उसकी मृत्यु भी हो जाती है। इतना बड़ा अनर्थ भी उस क्षमाशील गृहस्थ को अंगीकार कर लेना पड़ता है उससे भी बड़े अनर्थ से बचने के लिए ।

यदि गृहस्थ ऐसा न करे तो संसार में शान्ति के इच्छुक क्षमाशील करोड़ों भी सज्जन हों तो एक ही अशान्त दुष्ट अपने असत् कृत्यों से उनकी शान्ति में बाधा उपस्थित कर वन में सुलगनेवाली अग्नि की एक चिनगारी के समान समस्त सज्जन वन को अपनी ज्वाला से अशान्त बना सकता है। अतः उनके प्रति द्वेष से नहीं किन्तु सज्जनों की रक्षा के लिए उनका रोध आवश्यक समझ कर वह अपनी शान्ति को तब तक के लिए तिलाञ्जलि दे देता है जब तक कि वह उसके असत् प्रयत्नों को विफल न कर दे। उसकी यह अशान्त क्रिया शान्ति रक्षा के लिए है, शान्ति भंग के लिए नहीं। गृहस्थ के लिए जितनी आवश्यकता क्षमा की है उतनी ही आवश्यकता क्षमाशीलों के संरक्षण की भी है। उसके बिना सारा विश्व अशान्त हो सकता है अतः क्षमाशीलों के संरक्षण करते हुए ही गृहस्थ को क्षमाशील होना चाहिए।

क्षमा के साथ ही सद्गृहस्थ को उत्तम विनय गुण का भी पालन करना आवश्यक है। इसे उत्तममार्दव नाम का दूसरा धर्म कहा है। अहंकार अनेक गुणों को भी दूषित


प्रश्नः - कार्यं किमर्थं शास्त्राणां पठनं कठिनं विभो।

श्राद्धानां पतनं न स्यात् तदर्थं दृश्यते मया।
सुस्वाध्यायक्रमस्तेभ्यः संसारेऽपि सुखप्रदः ॥135॥

अर्थ: हे विभो! शास्त्रों का पठन जो कि अत्यन्त कठिन है किसलिए किया जाता है, उससे क्या लाभ है; कृपा कर कहें - शास्त्र पठन से सत्शिक्षा प्राप्त होती है। विद्या का सुसंस्कार ही मानव जीवन को उच्च बनाने का एकमात्र उपाय है। जिन्होंने भी उन्नति की है सम्यग्ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त की है। ज्ञान की बहुत महिमा है। बिना परिपूर्ण ज्ञान हुए मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती ज्ञान से उत्तम विचार बनते हैं, उज्ज्वल हृदय बनता है, वाणी में मिठास आती है और कर्त्तव्य ऊँचे होते हैं। अतः श्राद्धों का अर्थात् सम्यग्दृष्टि श्रद्धावान् गृहस्थों का सन्मार्ग से कदाचित् पतन न हो जाय इसके लिए सच्चे शास्त्रों का पठन-पाठन आवश्यक है। स्वाध्याय करनेवाला ज्ञानी इस लोक में भी परम सुखी और सन्तोषी होता है और परलोक की उज्ज्वलता तो वह साधता ही है। स्वाध्याय सदा उत्तम जिन-प्रतिपादित शास्त्रों का हो। राग-द्वेष वर्द्धक विकथाकथक ग्रन्थों का पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। वह तो कुशिक्षादायक दुःश्रुतिनामा महान् पापदायक अनर्थदण्ड है, अतः उसे त्यागकर सच्चे शास्त्रों का विधिपूर्वक स्वाध्याय करना चाहिए ।


कौ त्रिषष्टिशलाकादिपुरुषाणां सुधर्मिणाम् ।
चरित्रं प्रथमं पाठ्यं शान्तिदं बोधदं सदा ॥136॥

अर्थ: जैनागम चार अनुयोगों में विभाजित किया गया है-(१) प्रथमानुयोग, (२) करणानुयोग, (३) चरणानुयोग और (४) द्रव्यानुयोग। जैनाचारके प्रतिपालक श्री चौबीसों तीर्थङ्कर भगवान् तथा बारह चक्रवर्ती, नव नारायण, नव प्रतिनारायण तथा नव बलभद्र इस प्रकार ६३ शलाका पुरुषों के पुण्य चरित्र का जिनमें वर्णन है वे शास्त्र प्रथमानुयोग हैं।

इनका पठन-पाठन सर्वप्रथम करना चाहिये। जिनागम को गहराई से न जानने और न समझनेवाले लोग भी उक्त पुण्य पुरुषों के सदाचारपूर्ण चरित्र से प्रभावित होकर सदाचारी बन जाते हैं, उनसे शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं।

प्रथमानुयोग में पुण्यात्माओं का पुण्य चरित्र तथा उसका उत्तम फल बताया गया है। इतना ही नहीं, बल्कि जो पापात्मा हैं उन्होंने कैसे-कैसे कटुक फल भोगे हैं, उनका भी चरित्र उनमें अङ्कित है। अतः दोनों चरित्रों के उदाहरणों को देखकर लोग पाप से भयभीत होते हैं तथा धर्म के मार्ग में लगते हैं। अतएव शान्ति का प्रदान करनेवाला, बोधदायक और उत्तम पुरुषों के चरित्र का प्रतिपादक प्रथमानुयोग अवश्य पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की प्रवृत्ति अशुभ अर्थात् पाप के कार्यों से विरक्त होकर पुण्य अर्थात् धार्मिक शुभ कर्मों में स्वयमेव संलग्न होती है, अतः सर्वप्रथम प्रथमानुयोग का ही स्वाध्याय कल्याणप्रद है।१३६ ।


तच्चरित्रप्रपाठेन यद्यदाचरितं हितैः ।
तत्तज्ज्ञानं भवेत् तस्य तथा स्यादशुभेऽरतिः ॥137॥

अर्थ: जैनागम चार अनुयोगों में विभाजित किया गया है-(१) प्रथमानुयोग, (२) करणानुयोग, (३) चरणानुयोग और (४) द्रव्यानुयोग। जैनाचारके प्रतिपालक श्री चौबीसों तीर्थङ्कर भगवान् तथा बारह चक्रवर्ती, नव नारायण, नव प्रतिनारायण तथा नव बलभद्र इस प्रकार ६ ३ शलाका पुरुषों के पुण्य चरित्र का जिनमें वर्णन है वे शास्त्र प्रथमानुयोग हैं।

इनका पठन-पाठन सर्वप्रथम करना चाहिये। जिनागम को गहराई से न जानने और न समझनेवाले लोग भी उक्त पुण्य पुरुषों के सदाचारपूर्ण चरित्र से प्रभावित होकर सदाचारी बन जाते हैं, उनसे शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं।

प्रथमानुयोग में पुण्यात्माओं का पुण्य चरित्र तथा उसका उत्तम फल बताया गया है। इतना ही नहीं, बल्कि जो पापात्मा हैं उन्होंने कैसे-कैसे कटुक फल भोगे हैं, उनका भी चरित्र उनमें अङ्कित है। अतः दोनों चरित्रों के उदाहरणों को देखकर लोग पाप से भयभीत होते हैं तथा धर्म के मार्ग में लगते हैं। अतएव शान्ति का प्रदान करनेवाला, बोधदायक और उत्तम पुरुषों के चरित्र का प्रतिपादक प्रथमानुयोग अवश्य पढ़ना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की प्रवृत्ति अशुभ अर्थात् पाप के कार्यों से विरक्त होकर पुण्य अर्थात् धार्मिक शुभ कर्मों में स्वयमेव संलग्न होती है, अतः सर्वप्रथम प्रथमानुयोग का ही स्वाध्याय कल्याणप्रद है।१ ३ ६।१ ३ ७।


प्रश्नः - प्रथमानुयोगपठनानन्तरं किं पाठ्यम् ।

सत्करणानुयोगादि शास्त्रं पाठ्यं शिवप्रदम् ।
पश्चाद्योग्यं भवेज्ज्ञानं सर्वसत्त्वहितङ्करम् ॥138॥

अर्थ: प्रथमानुयोग शास्त्र के स्वाध्याय के बाद किस अनुयोग का स्वाध्याय करना चाहिये? आगे उसका स्पष्टीकरण करते हैं - प्रथमानुयोग के अन्तर करणानुयोग शास्त्रों का पठन-पाठन करना श्रेयस्कर है। इस अनुयोग के स्वाध्याय से हमें लोक और अलोक के स्वरूप का, युगों के परिवर्तन का, जीव के परिणामों का, कर्म के प्रभाव का, जीवों की उत्पत्तिस्थान का, चतुर्गति का, गुणस्थानों, मार्गणास्थानों, जीवसमासों तथा बीस प्ररूपणाओं का स्वरूप भलीभाँति ज्ञात हो जाता है।

साधारणतया करण शब्द का अर्थ जीव के परिणाम भी है। हमें जीव के परिणामों के भेदों का स्वरूप आत्मस्वरूप के परिणाम के लिए जानना अत्यावश्यक है। उनकी यथोचित सम्हाल के बिना धारण किया हुआ चारित्र प्रायः द्रव्यचारित्र ही नाम पाता है। अतः सदाचार पालने से स्वात्महित वांछक पुरुषों का कर्तव्य है कि सदाचार के नियमों के साथ ही या उसके पूर्व ही करणानुयोग शास्त्रों का मनन करें। इसके स्वाध्याय से सर्व प्राणियों के लिए हितकर्ता योग्य ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान सम्पादन से ही मनुष्य जन्म की सफलता है। १३८ ।


लोकालोकस्वरूपस्य बोधकं तत्त्वतो नृणाम् ।
ज्ञात्वेति क्रमतः पाठ्यं जन्म स्यात् सफलं यतः ॥139॥

अर्थ: प्रथमानुयोग के अन्तर करणानुयोग शास्त्रों का पठन-पाठन करना श्रेयस्कर है। इस अनुयोग के स्वाध्याय से हमें लोक और अलोक के स्वरूप का, युगों के परिवर्तन का, जीव के परिणामों का, कर्म के प्रभाव का, जीवों की उत्पत्तिस्थान का, चतुर्गति का, गुणस्थानों, मार्गणास्थानों, जीवसमासों तथा बीस प्ररूपणाओं का स्वरूप भलीभाँति ज्ञात हो जाता है।

साधारणतया करण शब्द का अर्थ जीव के परिणाम भी है। हमें जीव के परिणामों के भेदों का स्वरूप आत्मस्वरूप के परिणाम के लिए जानना अत्यावश्यक है। उनकी यथोचित सम्हाल के बिना धारण किया हुआ चारित्र प्रायः द्रव्यचारित्र ही नाम पाता है। अतः सदाचार पालने से स्वात्महित वांछक पुरुषों का कर्तव्य है कि सदाचार के नियमों के साथ ही या उसके पूर्व ही करणानुयोग शास्त्रों का मनन करें। इसके स्वाध्याय से सर्व प्राणियों के लिए हितकर्ता योग्य ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञान सम्पादन से ही मनुष्य जन्म की सफलता है। १३८ ।


युग्मम्

पाठ्यं सदैव सुखदं चरणानुयोग-
शास्त्रं सुसाधुगृहिणां व्रतमण्डितानाम् ।
शीलव्रताचरणबोधकमेव भक्त्या
स्वात्मा भवेद् भुवि यतो व्रतशीलधारी ॥140॥

अर्थ: प्रथमानुयोग और करणानुयोग शास्त्रों के स्वाध्याय करने के बाद देशव्रतधारी गृहस्थ और महाव्रती साधुओं के आचार क्रम का प्रतिपादक चरणानुयोग शास्त्र पढ़ना चाहिए। इस शास्त्र का अध्ययन करनेवाला आत्मा शील-व्रत का धारी हो जाता है, कारण इस अनुयोग के शास्त्रों में यह विषय बहुत स्पष्टता के साथ बताया गया है कि श्रावक के कितने भेद हैं, कितनी प्रतिमाएँ व्रताचरण की वृद्धि के लिए हैं, क्या उनका स्वरूप है, साधु के व्रत कौन-कौन से हैं, शील क्या है, उनके भेद कौन-कौन हैं, व्रतों के रक्षार्थ क्या करना चाहिए, कौन-कौन सी भावनाएँ व्रत में गुणवृद्धि कर सकती हैं और किस जिस व्रत के कौन-कौन अतीचार हैं जो व्रत को मलिन करते हैं।

मानसिक अपवित्रता यदि एक बार हो जाय तो वह अतिक्रम दोष है। यदि बार बार मानसिक अपवित्रता हो जाय तो वह दुःशील होने से व्यतिक्रम है। यदि व्रत एकदेश या एक बार प्रमाद से भंग हो जाय तो अतीचार है और यदि सर्वदेश या अनेकबार जानबूझ कर व्रत भंग किया जाय तो अनाचार है। इस प्रकार अतिक्रमादि का स्वरूप तथा दोषमुक्त होने के लिए दश दोषरहित प्रायश्चित्त का विधान प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, समता, वन्दना, स्तुति, कायोत्सर्ग आदि सम्पूर्ण विधि विधान जहाँ वर्णित है वह सुखदायक चरणानुयोग शास्त्र है जिसका स्वाध्याय आत्महित के लिए सदैव करना चाहिए ।


द्रव्यानुयोगशास्त्रस्य स्वपरबोधकस्य च ।
पठनं पाठनं कार्यमन्ते सर्वसुखप्रदम् ॥141॥

अर्थ: द्रव्यानुयोग शास्त्रोंमें जीवाजीवादि छह द्रव्य, नव पदार्थ, अस्तिकाय, और सात तत्त्वादिका उत्तम स्वरूप युक्ति और आगमके आधारसे विविध गहन नय स्वरूप अनेकान्तवादके आश्रयसे वर्णित किया है। साथ ही उन द्रव्यों के अपरिमित गुणों और पर्यायोंका भी विशद विस्तृत वर्णन वहाँ किया गया है।

पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष, और जीव-कर्म, आदि की सम्यक् व्यवस्था, प्रमाण, नय और निक्षेप का विशद विवेचन, अनेकान्तवाद द्वारा सर्वथैकान्तवादोंका युक्ति और आगमादि प्रमाणोंके आधार पर खण्डन आदि इस अनुयोगमें वर्णित है। स्वतन्त्र सत्तावाला आत्मा परभावोंसे भिन्न अनंत गुणोंका पिंड स्वरूप अपने स्वरूपों में ही रमण करनेवाला है। वह चैतन्य स्वरूप विमुक्त पुद्गलादि जड़ पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न है। इस तरह स्वपरविवेक स्वरूप अध्यात्मविद्याके प्रतिपादक द्रव्यानुयोग शास्त्रका अन्तमें अन्तिम अनुपम सुख प्राप्तिके लिए अवश्य पठन-पाठन करना चाहिये। इस क्रमसे चारों अनुयोगोंका सम्यक् स्वाध्याय स्वच्छंद प्रवृत्तिको दूर कर व्रताचरणकी वृद्धि करता है जिससे शान्तिप्रदायिनी मुक्तिरूपी सखी का समागम प्राप्त होता है।१४१ ।


पूर्वोक्तक्रमतः पाठ्यास्तेऽनुयोगा जिनोदिताः ।
स्वैरवृत्तिर्यतो न स्यात् मोक्षश्रीः शान्तिदा सखी ॥142॥

अर्थ: द्रव्यानुयोग शास्त्रोंमें जीवाजीवादि छह द्रव्य, नव पदार्थ, अस्तिकाय, और सात तत्त्वादिका उत्तम स्वरूप युक्ति और आगमके आधारसे विविध गहन नय स्वरूप अनेकान्तवादके आश्रयसे वर्णित किया है। साथ ही उन द्रव्यों के अपरिमित गुणों और पर्यायोंका भी विशद विस्तृत वर्णन वहाँ किया गया है।
पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष, और जीव-कर्म, आदि की सम्यक् व्यवस्था, प्रमाण, नय और निक्षेप का विशद विवेचन, अनेकान्तवाद द्वारा सर्वथैकान्तवादोंका युक्ति और आगमादि प्रमाणोंके आधार पर खण्डन आदि इस अनुयोगमें वर्णित है। स्वतन्त्र सत्तावाला आत्मा परभावोंसे भिन्न अनंत गुणोंका पिंड स्वरूप अपने स्वरूपों में ही रमण करनेवाला है। वह चैतन्य स्वरूप विमुक्त पुद्गलादि जड़ पदार्थोंसे सर्वथा भिन्न है। इस तरह स्वपरविवेक स्वरूप अध्यात्मविद्याके प्रतिपादक द्रव्यानुयोग शास्त्रका अन्तमें अन्तिम अनुपम सुख प्राप्तिके लिए अवश्य पठन-पाठन करना चाहिये। इस क्रमसे चारों अनुयोगोंका सम्यक् स्वाध्याय स्वच्छंद प्रवृत्तिको दूर कर व्रताचरणकी वृद्धि करता है जिससे शान्तिप्रदायिनी मुक्तिरूपी सखी का समागम प्राप्त होता है।१४१ ।


युग्मम्

प्रश्नः - न्यायव्याकरणादीनां स्वाध्यायः स्यात्कदा गुरो?

षड्द्रव्यसप्ततत्त्वानां न्यायव्याकरणस्य च ।
पठनं पाठनं भक्त्या यतः स्यात् स्वात्मदर्शनम् ॥143॥

अर्थ: हे गुरुदेव! यदि चारों अनुयोगों का पठन-पाठन ही श्रेष्ठ है तो न्याय व्याकरण तथा साहित्यादि शास्त्रोंको कब पढ़ना चाहिये, कहिए - इन चारों अनुयोगोंमें प्रतिपादित छह द्रव्य व सप्त तत्त्व आदिके ज्ञानकी उत्पन्न करानेमें हेतुभूत न्याय, व्याकरण, साहिन्य, कोष, अलंकार व छन्द आदि विद्याओंका पाठन-पाठन निषिद्ध नहीं है, भक्तिपूर्वक उनका भी यथायोग्य पठन-पाठन करना चाहिए। उपयोगी विद्याओंकी सहायतासे तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति की जा सकती है। केवल अपना पाण्डित्य प्रदर्शनके लिए शास्त्रोंका पठन-पाठन अनुचित है। अनेक विद्वान् दूसरे विद्वानोंके ज्ञानोत्कर्ष को मात्सर्य या ईर्षा के कारण सहन नहीं कर सकते, अतः वे कपट व वाद-विवाद से अपना पाण्डित्य प्रदर्शनमात्र कर अपनी कषायों का पोषण करते हैं। उनका वह शास्त्रपठन स्वाध्याय के नामको प्राप्त नहीं कर सकता। वह शास्त्रग्रहण शस्त्रग्रहण ही है जो केवल परको नीचा दिखाने मात्र को है।

उपर्युक्त कथन से यह अच्छी तरह स्पष्ट हो गया कि जो मिथ्यात्ववर्द्धक न हों, असदाचार के पोषक न हों, हिंसादि महापापों के उपदेशक न हों, कलह वितण्डावाद को उत्पन्न करनेवाले न हों तथा कामादि विकारों के वर्द्धक न हों उन लौकिक शास्त्रों का पठन-पाठन निषिद्ध नहीं है। तत्त्वज्ञान की प्राप्ति में सहायक ग्रन्थान्तरों का इसके बाद भक्तिपूर्वक पढ़ना भी स्वात्मदर्शन के लिए ही होता है ।


प्रश्नः - श्राद्धानामन्तरायाः मे कति सन्ति गुरो वद।

दर्शनस्य भवन्त्यष्टावन्तराया जिनागमे ।
स्पर्शस्य विंशतिः प्रोक्ताः श्रोत्रस्य भयदा दश ॥144॥

अर्थ: श्रद्धावान् व्रती श्रावकों के भोजन सम्बन्धी अन्तरायों का विवेचन कृपाकर गुरुवर्य मुझे बतावें - दयावान् श्रद्धावान् सदाचारी व्रती श्रावक शुद्ध आहार के द्वारा ही अपनी क्षुधा मेंटता है। यद्वा तद्वा शुद्धाशुद्ध आहार के द्वारा वह अपनी इन्द्रियलिप्सा को पूरी नहीं करता। उसका अपनी विषय वासनाओं पर इतना नियंत्रण है कि वह बुभुक्षित होने पर भी कभी अमर्यादित पदार्थों का, परित्यक्त पदार्थों का, अनीति से प्राप्त पदार्थों का तथा हिंसा-चौर्य आदि पापों से कमाए हुए पदार्थों का भक्षण नहीं करता। शुद्ध, शास्त्रानुमोदित, हिंसादि पापों से दूर व न्यायोपार्जित पदार्थों का ही सेवन करता है। इस प्रकार के शुद्धाहार के समय यदि उसे हृदयद्रावक मांसादि पदार्थों का दर्शन हो जाय तो उनके दर्शन मात्र से वह अपने शुद्धाहार का भी तत्काल के लिए त्याग कर देता है। वह दयापरिणामी उस हिंसा तथा निर्दयक्रिया द्वारा कृत पदार्थ को देखने मात्र से दुःखी होता है। पर-दुःख-कातरता उसका गुण है। इसी प्रकार मृत पुरुष, स्त्री या पशु आदि के शरीर का अथवा मृत शरीर के अंशभूत चर्म, नखादि का स्पर्श होने पर प्राप्त अपवित्र दशा में भी वह भोजन का परित्याग करता है।

श्रवण सम्बन्धी भी अन्तराय होता है। जब भोजन करने वाला व्रती भोजन के समय किसी का करुणापूर्ण रुदन सुनता है या मरण सुनता है, अग्निदाह या शस्त्रघात आदि के शब्द सुनता है तब वह भोजन त्याग कर तत्काल अग्नि बुझाने का, शस्त्राघात दूर करने का व दुःखी को सान्त्वना देने का सत्प्रयत्न करता है। दूसरों को दुःखी अवस्था में छोड़कर वह चैन से भोजन करते नहीं बैठता, यह उसका अहिंसा गुण है। अपनी अन्तरङ्ग मानसिक शुद्धि के लिए तथा बाह्य में शारीरिक शुद्धि के लिए, लोक कल्याण के लिए और दयाधर्म के प्रतिपालन के लिए धर्मात्मा श्रावकों को प्रेमपूर्वक भोजन के अन्तरायों का पालन करना चाहिए।१४४ ।


बाह्यान्तरङ्गशुद्ध्यर्थं धर्मज्ञैः श्रावकैः सदा।
पूर्वोक्ताः त्रिविधाः पाल्या अन्तरायाः प्रयत्नतः ॥145॥

अर्थ: दयावान् श्रद्धावान् सदाचारी व्रती श्रावक शुद्ध आहार के द्वारा ही अपनी क्षुधा मेंटता है। यद्वा तद्वा शुद्धाशुद्ध आहार के द्वारा वह अपनी इन्द्रियलिप्सा को पूरी नहीं करता। उसका अपनी विषय वासनाओं पर इतना नियंत्रण है कि वह बुभुक्षित होने पर भी कभी अमर्यादित पदार्थों का, परित्यक्त पदार्थों का, अनीति से प्राप्त पदार्थों का तथा हिंसा-चौर्य आदि पापों से कमाए हुए पदार्थों का भक्षण नहीं करता। शुद्ध, शास्त्रानुमोदित, हिंसादि पापों से दूर व न्यायोपार्जित पदार्थों का ही सेवन करता है। इस प्रकार के शुद्धाहार के समय यदि उसे हृदयद्रावक मांसादि पदार्थों का दर्शन हो जाय तो उनके दर्शन मात्र से वह अपने शुद्धाहार का भी तत्काल के लिए त्याग कर देता है। वह दयापरिणामी उस हिंसा तथा निर्दयक्रिया द्वारा कृत पदार्थ को देखने मात्र से दुःखी होता है। पर-दुःख-कातरता उसका गुण है। इसी प्रकार मृत पुरुष, स्त्री या पशु आदि के शरीर का अथवा मृत शरीर के अंशभूत चर्म, नखादि का स्पर्श होने पर प्राप्त अपवित्र दशा में भी वह भोजन का परित्याग करता है।

श्रवण सम्बन्धी भी अन्तराय होता है। जब भोजन करने वाला व्रती भोजन के समय किसी का करुणापूर्ण रुदन सुनता है या मरण सुनता है, अग्निदाह या शस्त्रघात आदि के शब्द सुनता है तब वह भोजन त्याग कर तत्काल अग्नि बुझाने का, शस्त्राघात दूर करने का व दुःखी को सान्त्वना देने का सत्प्रयत्न करता है। दूसरों को दुःखी अवस्था में छोड़कर वह चैन से भोजन करते नहीं बैठता, यह उसका अहिंसा गुण है। अपनी अन्तरङ्ग मानसिक शुद्धि के लिए तथा बाह्य में शारीरिक शुद्धि के लिए, लोक कल्याण के लिए और दयाधर्म के प्रतिपालन के लिए धर्मात्मा श्रावकों को प्रेमपूर्वक भोजन के अन्तरायों का पालन करना चाहिए।१४४ ।


प्रश्नः - कार्यो वितानबन्धेऽपि कुत्र कुत्र गुरो वद

पेषणप्रभृतिस्थाने श्रावकैर्धार्मिकैः सदा ।
वितानस्य प्रबन्धोऽपि कर्त्तव्यो जीवरक्षकः ॥146॥

अर्थ: हे गुरुवर्य! श्रावक अपने घर में चँदोवा कहाँ कहाँ बाँधे, कृपया कहिये - दयावान् श्रावकों का कर्त्तव्य है कि अपने गृह में चक्की आदि ग्यारह स्थानों के ऊपर चँदोवा जो कि अच्छे वस्त्र आदि का बनाया गया हो तथा छिद्ररहित हो बाँधे। अर्थात् चक्की के ऊपर, अन्न के कूटने के स्थान पर, रसोई करने के स्थान पर, पानी रखने के स्थान पर, भोजन करने के स्थान, पर, दुकान के स्थान पर, शयन के स्थान पर, स्वाध्यायशाला में, सामायिक व उपवास करने के स्थान में, पूजा और यज्ञ के स्थान में तथा अन्यत्र जहाँ कहीं भी अग्नि जलाने या रखने का काम पड़े उन सब स्थानों पर चँदोवा बाँधना चाहिये। मण्डप बन्धन से गृह के ऊपर भाग के छप्पर से व बांसों के सड़ने आदि से जीव जन्तु गिरने लगते हैं वे भूमि में, अन्नादि वस्तु में, पूजनादि सामग्री में, जल में, तथा आग में इत्यादि स्थानों में न गिर कर मण्डप में ही रह जांयगे और तात्कालिक अवश्यंभावी विनाश से बच जांयगे। अन्नादि की शुद्धि भी रहेगी।

जिन स्थानों में ऊपर छप्पर नहीं है वहाँ भी मकरी के जाल आदि के निमित्त से जीव बाधा सम्भव हैं, अतः मण्डप बन्धन करना चाहिये। पक्की छतों के या अन्य प्रकार के सिमेंट आदि से बने हुए स्थानों में मण्डप की क्या अवश्यकता है ऐसा प्रश्न हो सकता है? उत्तर यह है कि विवेकी मनुष्य तो ऐसे स्थानों की स्वच्छता रखकर जीवरक्षा कर सकता है। मण्डप बन्धन के उद्देश्य की पूर्ति तो इससे हो सकती है, पर नियम का पालन नहीं हो सकने से परम्परा व मण्डप बन्धन की पद्धति रुक जा सकती है। सर्वसाधारण को यह बोध होगा जो अमुक व्रती पुरुष मण्डप बन्धन नहीं करता तो मालूम होता है जो यह कोई आवश्यक परम्परा या पद्धति नहीं है। अतः परम्परा में नियम का घात न हो ऐसा विचार कर श्रावक को इन स्थानों पर मण्डप बन्धन करना ही चाहिए ।


प्रश्नः - कौ मौनधारणं क्व क्व कार्यं मे सिद्धये वद।

भोजने मैथुने स्नाने मल-मूत्रविमोचने ।
सामायिकेऽर्चने दाने वमने च पलायने ॥147॥

अर्थ: श्रावक को मौन धारण करना भी आवश्यक सुना गया उसे किस किस अवसर पर मौन धारण करना चाहिए, कृपा कर कहें - भोजन, मैथुन, स्नान, मलत्याग और वमन आदि शारीरिक कार्यों में तथा पूजन, यज्ञ, हवन, सामायिक और दान आदि पारमार्थिक कार्यों में और कार्यवशात् यदि पलायन याने वेग से गमन करना पड़े दौड़ना पड़े भागना पड़े तो उस अवसर में ऐसे दस मौकों पर धर्मात्मा श्रावकों को सदा मौन धारण करना चाहिए। ये कार्य जीवरक्षा के ध्यान से तथा शान्तिपूर्वक उक्त कार्यों को पूरा करने के अभिप्राय से तथा धार्मिक कार्यों में शुभ परिणामों की सिद्धि के लिए मौन पूर्वक ही किए जाने चाहिए।

यहाँ पर मौन से तात्पर्य इस बात का है कि जो काम स्वयं अकेले के करने के है वहाँ तो सर्वथा मौन रखे। जहाँ पर अपने सिवाय दूसरे व्यक्तियों का भी सहयोग आवश्यक है वहाँ उस व्यक्ति के सिवाय अन्य किसी से बातचीत न करे। संबंधित व्यक्ति से भी संबंधित कार्य के लिए आवश्यक बात ही करनी चाहिए, चाहे जिस विषय पर पद-पद पर मनमानी चर्चा न करनी चाहिए।

उदाहरणार्थ पूजा करने वाला पूजा करते समय पूजा पढ़ेगा तथा यदि कोई साथ पूजन करने वाला है तो उससे पूजा के लिए आवश्यक वस्तु के सम्बन्ध में या पाठ की शुद्धि या अर्थ के सम्बन्ध में जरूरत के स्थान पर अल्पमात्रा में बोलेगा। अन्य व्यक्तियों से बात न करेगा। मौन के बिना की जाने वाली क्रियाओं में चित्त की एकाग्रता नहीं रहती और बिना एकाग्रता के अन्यमनस्क पुरुष के द्वारा किए गए भोजन, मैथुन, मल-मूत्रत्याग, स्नान, वमन, पलायनादि कार्य अत्यन्त शारीरिक हानि को पहुँचाते हैं तथा ऐसे ही अन्यमनस्क के सामायिक व पूजादिक कार्य उद्देश्य को पूरा नहीं करते। इस तरह लौकिक और पारलौकिक हानि को रोकनेवाले होने से मौन को उक्त कार्यों में अवश्य धारण करना चाहिए।१४७ ।


सन्मौनधारणं कार्यं धर्मज्ञैः श्रावकैः सदा ।
यतः स्यात् सर्वकार्येषु शान्तिः सिद्धिर्निजाश्रिता ॥148॥

अर्थ: भोजन, मैथुन, स्नान, मलत्याग और वमन आदि शारीरिक कार्यों में तथा पूजन, यज्ञ, हवन, सामायिक और दान आदि पारमार्थिक कार्यों में और कार्यवशात् यदि पलायन याने वेग से गमन करना पड़े दौड़ना पड़े भागना पड़े तो उस अवसर में ऐसे दस मौकों पर धर्मात्मा श्रावकों को सदा मौन धारण करना चाहिए। ये कार्य जीवरक्षा के ध्यान से तथा शान्तिपूर्वक उक्त कार्यों को पूरा करने के अभिप्राय से तथा धार्मिक कार्यों में शुभ परिणामों की सिद्धि के लिए मौन पूर्वक ही किए जाने चाहिए।

यहाँ पर मौन से तात्पर्य इस बात का है कि जो काम स्वयं अकेले के करने के है वहाँ तो सर्वथा मौन रखे। जहाँ पर अपने सिवाय दूसरे व्यक्तियों का भी सहयोग आवश्यक है वहाँ उस व्यक्ति के सिवाय अन्य किसी से बातचीत न करे। संबंधित व्यक्ति से भी संबंधित कार्य के लिए आवश्यक बात ही करनी चाहिए, चाहे जिस विषय पर पद-पद पर मनमानी चर्चा न करनी चाहिए।

उदाहरणार्थ पूजा करने वाला पूजा करते समय पूजा पढ़ेगा तथा यदि कोई साथ पूजन करने वाला है तो उससे पूजा के लिए आवश्यक वस्तु के सम्बन्ध में या पाठ की शुद्धि या अर्थ के सम्बन्ध में जरूरत के स्थान पर अल्पमात्रा में बोलेगा। अन्य व्यक्तियों से बात न करेगा। मौन के बिना की जाने वाली क्रियाओं में चित्त की एकाग्रता नहीं रहती और बिना एकाग्रता के अन्यमनस्क पुरुष के द्वारा किए गए भोजन, मैथुन, मल-मूत्रत्याग, स्नान, वमन, पलायनादि कार्य अत्यन्त शारीरिक हानि को पहुँचाते हैं तथा ऐसे ही अन्यमनस्क के सामायिक व पूजादिक कार्य उद्देश्य को पूरा नहीं करते। इस तरह लौकिक और पारलौकिक हानि को रोकनेवाले होने से मौन को उक्त कार्यों में अवश्य धारण करना चाहिए।१४७ ।


युग्मम्

प्रश्नः - किमर्थं जप्यते माला तद्रहस्यं गुरो वद।

संरम्भसमारम्भारम्भादिभेदाद्धि सर्वदा ।
वाक्कायचित्तचाञ्चल्यात् क्रोधादीनां वशङ्गताः ॥149॥

अर्थ: किसी भी कार्य के करने का इरादा (विचार) करना संरंभ है। उस कार्य के योग्य साधन सामग्री का संग्रह करना समारंभ है। साधनों की सहायता से विचारित कार्य को प्रारंभ करना आरंभ है। ये संरंभादि तीनों कार्य मनमात्र से भी होते हैं, वचनमात्र से भी होते हैं और काय से भी होते हैं अतः तीनों भंगों के साथ संरंभादि का संयोग होने से नव भंग बनते हैं।

ये नव भंगवाले कार्य क्रोध के वश से हों तो क्रोध के नव भंग हुए और ये ही नव भंग वाले कार्य मान कषाय के वश होकर किए जायँ तो वैसे ही नव भंग मानकषाय के हुए। माया और लोभ कषाय के आवेश में भी ये नव हो सकते हैं, अतः माया के भी नव और लोभ के भी नव भंग हुए। सब मिलकर ९×४=३६ भंग पाप कार्य के हुए।

किसी भी कार्य को स्वयं करना कृत कहलाता है। दूसरो से कराना कारित कहलाता है और प्रेरणा के बिना भी यदि कोई स्वेच्छा से उक्त कार्य करे और दूसरा केवल उसका समर्थन करे तो वह अनुमोदना कहलाती है। वे ३६ भंगवाले पाप कृत से भी होते हैं, कारित से भी होते हैं और अनुमोदना से भी होते हैं अतएव उनको एकत्रित करने पर ३६+३६+३६=१०८ एक सौ आठ भंग कार्य के हुए। इन एकसौ आठ भंगों के द्वारा पंचेन्द्रियों के विषय पोषणार्थ हिंसादि पाँच पाप गृहस्थ द्वारा हो जाते हैं। कुछ ज्ञातभाव से होते हैं और कुछ अज्ञात आदि भाव से होते हैं। उन सब पापों से बचने के लिए अथवा उनका नाश करने के लिए ही १०८ बार पञ्चपरमेष्ठी भगवान् का नामस्मरण उतनी मणिवाली माला से किया जाता है। जप माला में १०८ मणियाँ इसीलिए रखी जाती हैं। माला के प्रारम्भ में या अन्त में दोनों ओर के धागों में पिरोये गए तीन दाने, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय के स्मरणार्थ हैं। इनसे कम मणिवाली माला जप के योग्य नहीं मानी गई है। यदि माला में पूर्ण १०८ मणियाँ न हों तो सुमेरु के ३ दानों के सिवाय १०८ के आधे ५४ या चतुर्थांश २७ मणि की भी माला उपयोग में लाई जा सकती है, पर उसे दो बार या चार बार फेरकर १०८ की संख्या पूरी कर दी जानी चाहिए। स्वात्मबोध को प्राप्त करने के लिए स्वात्मबोध प्राप्त करने वाले भगवान् का नामस्मरण ही एकमात्र हेतु है, अतः माला जपने का प्रयोजन अपने पापों का नाश करना है।

माला जपते समय श्रावक को विचार करना चाहिए कि मैंने क्या-क्या पाप आज किए हैं। उनकी आलोचना करे। अपने पापों पर पश्चात्ताप करे। अपनी कमजोरी पर दुखी हो। पापों से छूटने के लिए निष्पाप रूप भगवान् का नामस्मरण कर विचार करे जो मैं


अष्टोत्तरशतं पापं कुर्वन्ति प्रत्यहं जनाः ।
तन्नाशाय जपं भक्त्या कुर्वन्तु स्वात्मचिन्तनम् ॥150॥

अर्थ: किसी भी कार्य के करने का इरादा (विचार) करना संरंभ है। उस कार्य के योग्य साधन सामग्री का संग्रह करना समारंभ है। साधनों की सहायता से विचारित कार्य को प्रारंभ करना आरंभ है। ये संरंभादि तीनों कार्य मनमात्र से भी होते हैं, वचनमात्र से भी होते हैं और काय से भी होते हैं अतः तीनों भंगों के साथ संरंभादि का संयोग होने से नव भंग बनते हैं।

ये नव भंगवाले कार्य क्रोध के वश से हों तो क्रोध के नव भंग हुए और ये ही नव भंग वाले कार्य मान कषाय के वश होकर किए जायँ तो वैसे ही नव भंग मानकषाय के हुए। माया और लोभ कषाय के आवेश में भी ये नव हो सकते हैं, अतः माया के भी नव और लोभ के भी नव भंग हुए। सब मिलकर ९×४=३६ भंग पाप कार्य के हुए।

किसी भी कार्य को स्वयं करना कृत कहलाता है। दूसरो से कराना कारित कहलाता है और प्रेरणा के बिना भी यदि कोई स्वेच्छा से उक्त कार्य करे और दूसरा केवल उसका समर्थन करे तो वह अनुमोदना कहलाती है। वे ३६ भंगवाले पाप कृत से भी होते हैं, कारित से भी होते हैं और अनुमोदना से भी होते हैं अतएव उनको एकत्रित करने पर ३६+३६+३६=१०८ एक सौ आठ भंग कार्य के हुए। इन एकसौ आठ भंगों के द्वारा पंचेन्द्रियों के विषय पोषणार्थ हिंसादि पाँच पाप गृहस्थ द्वारा हो जाते हैं। कुछ ज्ञातभाव से होते हैं और कुछ अज्ञात आदि भाव से होते हैं। उन सब पापों से बचने के लिए अथवा उनका नाश करने के लिए ही १०८ बार पञ्चपरमेष्ठी भगवान् का नामस्मरण उतनी मणिवाली माला से किया जाता है। जप माला में १०८ मणियाँ इसीलिए रखी जाती हैं। माला के प्रारम्भ में या अन्त में दोनों ओर के धागों में पिरोये गए तीन दाने, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र स्वरूप रत्नत्रय के स्मरणार्थ हैं। इनसे कम मणिवाली माला जप के योग्य नहीं मानी गई है। यदि माला में पूर्ण १०८ मणियाँ न हों तो सुमेरु के ३ दानों के सिवाय १०८ के आधे ५४ या चतुर्थांश २७ मणि की भी माला उपयोग में लाई जा सकती है, पर उसे दो बार या चार बार फेरकर १०८ की संख्या पूरी कर दी जानी चाहिए। स्वात्मबोध को प्राप्त करने के लिए स्वात्मबोध प्राप्त करने वाले भगवान् का नामस्मरण ही एकमात्र हेतु है, अतः माला जपने का प्रयोजन अपने पापों का नाश करना है।


युग्मम्

प्रश्नः - श्राद्धेभ्यो ध्यानभेदानामुपदेशो विधीयते।

रौद्रार्त्ते दुःखदे ध्याने त्यक्त्वा कुर्वन्तु शक्तितः ।
धर्मध्यानं सदा श्रीदं शुक्लध्यानस्य भावनाम् ॥151॥

अर्थ: यहाँ पर श्रावकों को ध्यानसंबंधी उपदेश भी आर्य आचार्य देते हैं - किसी इष्ट पदार्थ या व्यक्ति के वियोग में शोकरूप चिन्तवन करना इष्ट वियोगज आर्त्तध्यान है। इसी प्रकार किसी अनिष्ट कारक पदार्थ या व्यक्ति के संयोग होने पर उसके वियोग के लिए दुःखी होना बार-बार चिन्तवन करना अनिष्टसंयोगज नाम का दूसरा आर्त्तध्यान है। बीमारी आदि शारीरिक बाधा या मानसिक बाधा आने पर उसके दूर करने के लिए जो एकाग्रचिन्ता रहती है वह पीड़ाचिन्तन नामक तीसरा आर्त्तध्यान है। भविष्यकाल के लिए नाना प्रकार के भोगों की इच्छा करना निदान नाम का चौथा आर्त्तध्यान है। ये चार प्रकार के आर्त्तध्यान दुर्ध्यान हैं, अतः त्याज्य हैं।

इसी प्रकार चार प्रकर का रौद्रध्यान भी त्याज्य है। हिंसा में, हिंसा के कार्यों में और उसके कारणों में प्रसन्नता होना और उसी की एकाग्र चिन्ता करना हिंसानन्द नामक रौद्रध्यान है। इसी प्रकार मिथ्या भाषण में, कपट करने में, दूसरों के ठगने में, धोखा देने और विश्वासघात करने में आनंद मानना उसमें एकाग्र होना मृषानन्द नाम का दूसरा रौद्रध्यान है। चोरी करने में, चोरी के उपाय बताने में, चोरी के उपाय ढूँढ़ने में और उनकी चर्चाओं के सुनने में आनन्द मानने संबंधी चित्त की एकाग्रता को स्तेयानंदी नामक तीसरा रौद्रध्यान कहते हैं। इसी प्रकार धनधान्यादि परिग्रह या स्त्रीपरिग्रह की चिन्ता में एकाग्र होना परिग्रहानन्द नाम का चौथा रौद्रध्यान है।

ये चारों प्रकार के आर्त्तध्यान और रौद्रध्यान संसारी प्राणियों के सदा बने रहते हैं। उनका मन सदा पापों में, पापों के स्मरण में और भविष्य काल में भी नाना प्रकार के पापोपायों के संग्रह में तल्लीन रहता है। वे उनमें ही आनन्द ढूँढ़ते हैं अतः इन दुर्ध्यानों के कारण ये चतुर्गति के दुखों के पात्र होते हैं अतः आत्महित वांछक धर्मज्ञ श्रावकों का कर्त्तव्य है कि इनका दूर से ही परिहार करें तथा इनसे बचने का सतत प्रयत्न करें और धर्मध्यान का आराधन करें।

धर्मध्यान भी चार प्रकार का शास्त्रकारों ने बताया है। उनका स्वरूप निम्न प्रकार है। सर्वप्रथम, आज्ञाविचयधर्मध्यान है। जिनेन्द्र भगवान् के उपदेश और उनकी आज्ञाओं के सम्बन्ध में अपने ध्यान को एकाग्र करना, उनका विचार करना और उनके प्रतिपालन की चिन्ता करना यह सब आज्ञाविचय है। संसार के स्वरूप का चिन्तवन कर उसके दुःखों से स्वयं भयभीत हो अपने को व संसार के अन्य दुखी प्राणियों को संसार परिभ्रमण के घोर दुखों से बचाने के उपायों का चिन्तवन करना उपायविचय या अपायविचय नाम का दूसरा धर्मध्यान है। संसार में प्राणी कर्मोदय जनित दुखों से पीड़ित है अतः शारीरिक या मानसिक पीड़ा आने पर उद्विग्न हो उठता है, घबड़ाने लगता है तथा संक्लिष्ट परिणामी भी हो जाता है। ऐसे समय कर्म के उदय उदीरणा आदि के कार्यों का विचार


प्रश्नः - निर्जीवदेहदहनादिविधिः कथं मे कार्यो कृपाश्रय! गुरो! गृहिभिः स्वशान्त्यै

श्राद्धैश्च शास्त्रविधिना विमले वनादौ
निर्जीवदेहदहनादिविधिर्विधेयः।
हाहादिरोदनकृतिर्न मनाग्विधेया
पश्चाद्यतो न हि भवेत् किल कर्मबन्धः ॥152॥

अर्थ: शास्त्रोक्त विधि के अनुसार परीक्षित मृत देह को नेत्र की स्थिरता, नाड़ी का न चलना व हृदयस्पंदन न होना आदि चैतन्याभाव सूचक लक्षणों से निर्जीव पहिचान कर एकान्त जीव-जन्तु बाधारहित निर्मल वन आदि प्रदेश में अग्नि द्वारा संस्कारित करना चाहिए। साधर्मी भाइयों का कर्त्तव्य है कि लौकिक सम्मान की व व्यवस्था की दृष्टि से मृत को सामूहिक रूप से स्मशान में ले जाँय। वहाँ वायु के सञ्चार तथा जलस्नानादि द्वारा उसकी बार-बार परीक्षा हो जाने पर ही उसका निर्जन्तु काष्ठादि की अग्नि से संस्कार करें। मृत मनुष्य के नजदीकी और स्नेही बन्धु ही प्रथम अग्नि संस्कार करें। इस नियम का पालन करने से कभी रुग्णावस्था व दुर्बलावस्था से मूर्च्छित व्यक्ति का किसी शत्रु भाववाले व्यक्ति द्वारा जीवितावस्था में ही अग्निदाह हो गया ऐसी शंका को स्थान नहीं रहता। अग्निदाह समाप्त होने पर तृतीय दिवस या पञ्चम दिवस भस्म तथा अस्थियों को भूमि में गड्ढा कर उसमें गाड़ देना चाहिए। नदी आदि जलाशय में उस क्षार पदार्थ को नहीं डालना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से नदी के असंख्य प्राणियों का जल जन्तुओं का घात होता है। अनेक लोग गङ्गादि नदी में अस्थि विसर्जन को पुण्य मानते हैं। वे समझते हैं कि गंगादि स्नान से आत्मा पवित्र होती है अतः मृत देह को भी गंगा स्नान कराना पवित्रता का हेतु होगा और मृतात्मा का उद्धार होगा। यह बात नितान्त असत्य है। कारण गंगादि नदी का जल शारीरिक मैल को धो सकता है। आत्मा की मलीनता तो पापों के गलने से ही जा सकती है। जैसे कुरते में लगा हुआ मैल धोती के धोने से नहीं छूट सकता, वैसे ही शरीर का मैल धोने से आत्मा का मैल पाप नहीं धुल सकता, अतः गंगादि में अस्थिविसर्जन करना व्यर्थ है। यह असत्कल्पना उन ठगों द्वारा बना दी गई जो उन तीर्थों पर इन कार्यों से ही रुपया पैदा करते हैं। मरण के बाद जीव अपने कर्मानुसार ३ समय के भीतर जन्म ले लेता है उसका क्या उद्धार होगा ?

इष्टवियोगजन्य दुःख अवश्य मोही जीवों को होता है। उस दुःख में अनेक जन अपने व संसार के स्वरूप को भूलकर अत्यन्त उद्विग्न हो उठते हैं और हाहाकार मचाते हैं। वे यह नहीं सोचते कि जीवन के साथ मरण का अविनाभावी सम्बन्ध है। जो जन्म लेता है उसका मरण अवश्यंभावी है और जो अवश्यंभावी है वह हमारे हाहाकार से नहीं मिट सकता। अतः संसार की विनाशशीलता का विचार कर शोक को दूर करना चाहिए। यह विचार करना चाहिए कि यह जीव अनादि काल से कर्मबद्ध हो नाना जन्मों में भ्रमण करता फिरता है। यह मनुष्ययोनि भी उन अनन्त जीवों में से एक है। विना मरण के पुनर्जन्म कैसे संभव है? और संसार तो जन्म मरणों के समूह का ही नाम है। स्वोपार्जित कर्म को यह जीव अकेला ही भोगता है, कोई दूसरा इसका साथी नहीं है। जब यह उत्पन्न होने के समय अकेला ही आया है तब अकेला ही तो जायगा। जिस देह के साथ यह उत्पन्न हुआ था वह देह भी तो साथ नहीं जाती। तब अन्य भाई-बन्धु आदि कहाँ तक उसका साथ दे सकते हैं।

यथार्थ दृष्टि से विचार किया जाय तो भाई, बहिन, माता-पिता, पुत्र, मित्र, स्त्री और पति आदि लौकिक सगे सम्बन्धी हैं वे सब कल्पित हैं। यहाँ अकेला उत्पन्न होने पर भी प्राणी दूसरे प्राणियों से केवल जन्म निमित्त से सम्बन्ध जोड़ लेता है। जब जन्म ही मरणावस्था को प्राप्त हो गया तब जन्मसम्बन्धी कल्पित सम्बन्ध भी तो स्वयं समाप्त हो गए अतः शोक कैसा? ये कल्पित सम्बन्ध भी तो कुछ न कुछ स्वार्थ को लेकर होते हैं। जिन-जिन का स्वार्थ एक साथ बँधा है वे परस्पर सम्बन्धी कहलाते हैं। माता-पिता का स्नेह कब तक हृदय में बसता है जब तक उनसे अपना प्रतिपालन होता है। जब पुत्र समर्थ हो जाता है तब पत्नी का दास हो जाता है और माता-पिता का धन ले लेता है। उन्हें केवल दो रोटी का मुहताज बना देता है। पत्नी का स्नेह कबतक रहता है जब तक विषयवासना सधती है। यदि वह न सधे तो परस्पर कलह होने लगती है। भाई-भाई का प्रेम कबतक है जब तक धन का बाँट नहीं है, उसके बाद पड़ोसी जैसा व्यवहार रह जाता है। इत्यादि संसार और सगे सम्बन्धियों का यथार्थ रूप देखकर और विचार कर मोह का त्याग करे। हाहाकार न करे। किन्तु अपने कर्त्तव्य का पालन करे। अपने मृत सम्बन्धी के पुत्र, पुत्री, अबोध हों तो उनका पालन करे। उसकी सम्पत्ति की निःस्वार्थ


प्रश्नः - किं सूतकविधेश्चिह्नं वर्तते मे गुरो वद।

मरणे सूतकं प्रोक्तं बन्धोर्मातुः पितुः कृते ।
द्वादशाहप्रमाणमन्येषां हीनं यथाक्रमम् ॥153॥

अर्थ: हे गुरुदेव! सूतक क्या है, उसका स्वरूप क्या है, उसका पालन करने का क्या श्रम है, कृपा कर कहें - अशुद्धि का नाम अशौच है। जिससे यहाँ किसी का मरण हो तो उस मृत शरीर के निमित्त से उसके गृह में अपवित्रता का वास हो जाता है और वह अपवित्रता केवल स्नान तथा वस्त्र धोने से नहीं मिटती, बल्कि यथाकाल दूर होती है। आठ प्रकार की लौकिक शुद्धियों में कालशुद्धि को भी श्री अकलंक देव ने स्थान दिया है। इस अशौच की शुद्धि काल से ही होती है। यह अशौच बालक के जन्म निमित्त से भी होता है।

मृतक के अग्निदाह में असंख्य प्राणियों की हिंसा होती है। मृतशरीर अन्तर्मुहूर्त के बाद ही अनन्त जीवों की उत्पत्ति का स्थान हो जाता है। उन जीवों की हिंसा श्रावक के लिए अग्नि संस्कार में अनिवार्य होती है इसलिए भी उसे इस निमित्त से अशौच प्राप्त होता है। इसी प्रकार जन्म के समय बालक के साथ जो माता के उदर से जर आदि निकलती है वह भी अनन्त जीवों की उत्पत्ति का स्थान है उसे भी भूमि आदि में गड़वाकर नष्ट करना पड़ता है जिसमें उन प्राणियों की हिंसा बच नहीं सकती। इस पाप के कारण उस समय भी अशौच प्राप्त होता है।

मृतक के वस्त्रादि के सम्बन्ध का तथा परम्परा सम्बन्ध का विछिन्न होना तत्काल सम्भव नहीं है। इसी प्रकार प्रसूता के अपवित्र वस्त्रों का सम्बन्ध तथा जन्मे हुए बालक का संबंध से छूटना शक्य नहीं है। वहीं कहीं किसी-किसी देश में इनका बहुत सावधानी से परहेज रखा जाता है पर यह सर्वत्र नहीं होता और न संभव ही है। मरण समय शोकातुरता के कारण और पुत्रोत्पत्ति के समय हर्षातिरेक के कारण परहेज कम होता है अतः यह अपवित्रता भी बिना काल शुद्धि के दूर नहीं होती भले ही उसके पूर्व घर की स्वच्छता तथा वस्त्रों की स्वच्छता कर ली गई हो।

शोकातिरेक और हर्षातिरेक दोनों में रागद्वेष की प्रबलता मन में उत्पन्न हो जाती है। रागद्वेष का अतिरेक भी एक महान् अशौच है। तात्कालिक मरण और जन्म की घटनाओं से वह अशौच शीघ्र नष्ट नहीं होता। उसे शान्त होने में कुछ काल लगता है उसे ही कालशुद्धि या सूतक शुद्धि कहते हैं। जिनके यह रागद्वेष का अतिरेक हो उनको मन्दिर आदि पवित्र स्थानों में जाना तथा पूजनादि धार्मिक क्रियाएँ करना वर्जित है। यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि ऐसे समय धार्मिक कार्यों को वर्जन कर और भी अनर्थ किया जाता है। धर्मकार्य के लिए यह रुकावट कैसी? धर्म से तो अशुद्ध व्यक्ति भी शुद्ध बन जाता है। इस प्रश्न का समाधान यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जो धर्मस्थानों में धर्मलाभार्थ जाता है उसका सम्बन्ध उस तक ही सीमित नहीं है, किन्तु उसके निमित्त से अनेक दर्शनार्थी, पूजार्थी, स्वाध्यायार्थी भाइयों से भी उसका सम्बन्ध है जो कि उक्त लाभ के लिए जिन मन्दिरों में जाते हैं। उक्त अशौच के समय सम्बन्धित व्यक्ति मन्दिर में जाकर भी अपने को नहीं सम्हाल पाता बल्कि अपने शोक के कारण अन्य उपस्थित व्यक्तियों को भी शोकाविष्ट बना देता है। तद्वत् हर्षातिरेक वाला मन्दिर में स्थित प्रत्येक साधर्मी के सामने अपने हर्ष की चर्चा कर बैठता है। इन दोनों कार्यों से दर्शनार्थी और पूजनार्थी भाइयों का समय भी व्यर्थ जाता है, वे भी उसके शोक या हर्ष के प्रवाह में बह जाते हैं। अतः सूतक के दिनों में अशौच मान कर समष्टिगत धार्मिक कार्यों से दूर रहकर व्यक्तिगत सामायिकादि स्तुति व पाठादि धार्मिक कार्यों के द्वारा धर्म का साधन करना चाहिए।

मृत रोगी की बीमारी भी यदि कोई छुआछूत की हो या राजरोग हो तो उसके सम्पर्क में रहनेवाले वस्त्रादि की तथा सम्बन्धित व्यक्तियों की शुद्धि जब तक न हो जाय तब तक सम्पर्क रखने से बीमारी के फैलने या बढ़ने का शक बना रहता है, अतः लौकिक लाभ की दृष्टि से भी सूतक विधि को मानना लाभदायक है। मरण का सूतक वंश की तीन पीढ़ी तक अथवा खुद की पीढ़ी जोड़कर चार पीढ़ी तक के लोगों को १२ दिन का


जन्मन्यपि तथा प्राहुर्दशदिनप्रमाणकम् ।
स्ववंशिनां तथान्येषां हीनं ज्ञेयं यथाक्रमम् ॥154॥

अर्थ: अशुद्धि का नाम अशौच है। जिससे यहाँ किसी का मरण हो तो उस मृत शरीर के निमित्त से उसके गृह में अपवित्रता का वास हो जाता है और वह अपवित्रता केवल स्नान तथा वस्त्र धोने से नहीं मिटती, बल्कि यथाकाल दूर होती है। आठ प्रकार की लौकिक शुद्धियों में कालशुद्धि को भी श्री अकलंक देव ने स्थान दिया है। इस अशौच की शुद्धि काल से ही होती है। यह अशौच बालक के जन्म निमित्त से भी होता है।

मृतक के अग्निदाह में असंख्य प्राणियों की हिंसा होती है। मृतशरीर अन्तर्मुहूर्त के बाद ही अनन्त जीवों की उत्पत्ति का स्थान हो जाता है। उन जीवों की हिंसा श्रावक के लिए अग्नि संस्कार में अनिवार्य होती है इसलिए भी उसे इस निमित्त से अशौच प्राप्त होता है। इसी प्रकार जन्म के समय बालक के साथ जो माता के उदर से जर आदि निकलती है वह भी अनन्त जीवों की उत्पत्ति का स्थान है उसे भी भूमि आदि में गड़वाकर नष्ट करना पड़ता है जिसमें उन प्राणियों की हिंसा बच नहीं सकती। इस पाप के कारण उस समय भी अशौच प्राप्त होता है।

मृतक के वस्त्रादि के सम्बन्ध का तथा परम्परा सम्बन्ध का विछिन्न होना तत्काल सम्भव नहीं है। इसी प्रकार प्रसूता के अपवित्र वस्त्रों का सम्बन्ध तथा जन्मे हुए बालक का संबंध से छूटना शक्य नहीं है। वहीं कहीं किसी-किसी देश में इनका बहुत सावधानी से परहेज रखा जाता है पर यह सर्वत्र नहीं होता और न संभव ही है। मरण समय शोकातुरता के कारण और पुत्रोत्पत्ति के समय हर्षातिरेक के कारण परहेज कम होता है अतः यह अपवित्रता भी बिना काल शुद्धि के दूर नहीं होती भले ही उसके पूर्व घर की स्वच्छता तथा वस्त्रों की स्वच्छता कर ली गई हो।

शोकातिरेक और हर्षातिरेक दोनों में रागद्वेष की प्रबलता मन में उत्पन्न हो जाती है। रागद्वेष का अतिरेक भी एक महान् अशौच है। तात्कालिक मरण और जन्म की घटनाओं से वह अशौच शीघ्र नष्ट नहीं होता। उसे शान्त होने में कुछ काल लगता है उसे ही कालशुद्धि या सूतक शुद्धि कहते हैं। जिनके यह रागद्वेष का अतिरेक हो उनको मन्दिर आदि पवित्र स्थानों में जाना तथा पूजनादि धार्मिक क्रियाएँ करना वर्जित है। यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि ऐसे समय धार्मिक कार्यों को वर्जन कर और भी अनर्थ किया जाता है। धर्मकार्य के लिए यह रुकावट कैसी? धर्म से तो अशुद्ध व्यक्ति भी शुद्ध बन जाता है। इस प्रश्न का समाधान यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जो धर्मस्थानों में धर्मलाभार्थ जाता है उसका सम्बन्ध उस तक ही सीमित नहीं है, किन्तु उसके निमित्त से अनेक दर्शनार्थी, पूजार्थी, स्वाध्यायार्थी भाइयों से भी उसका सम्बन्ध है जो कि उक्त लाभ के लिए जिन मन्दिरों में जाते हैं। उक्त अशौच के समय सम्बन्धित व्यक्ति मन्दिर में जाकर भी अपने को नहीं सम्हाल पाता बल्कि अपने शोक के कारण अन्य उपस्थित व्यक्तियों को भी शोकाविष्ट बना देता है। तद्वत् हर्षातिरेक वाला मन्दिर में स्थित प्रत्येक साधर्मी के सामने अपने हर्ष की चर्चा कर बैठता है। इन दोनों कार्यों से दर्शनार्थी और पूजनार्थी भाइयों का समय भी व्यर्थ जाता है, वे भी उसके शोक या हर्ष के प्रवाह में बह जाते हैं। अतः सूतक के दिनों में अशौच मान कर समष्टिगत धार्मिक कार्यों से दूर रहकर व्यक्तिगत सामायिकादि स्तुति व पाठादि धार्मिक कार्यों के द्वारा धर्म का साधन करना चाहिए।

मृत रोगी की बीमारी भी यदि कोई छुआछूत की हो या राजरोग हो तो उसके सम्पर्क में रहनेवाले वस्त्रादि की तथा सम्बन्धित व्यक्तियों की शुद्धि जब तक न हो जाय तब तक सम्पर्क रखने से बीमारी के फैलने या बढ़ने का शक बना रहता है, अतः लौकिक लाभ की दृष्टि से भी सूतक विधि को मानना लाभदायक है। मरण का सूतक वंश की तीन पीढ़ी तक अथवा खुद की पीढ़ी जोड़कर चार पीढ़ी तक के लोगों को १२ दिन का

चतुर्थ अध्याय (श्लोक 155 से 162)

प्रश्नः - वद सूतकचिह्नं किं वा तत्प्रयोजनं गुरो।

मृतस्य देहसंसर्गात् वस्त्रपात्रगृहादिकम् ।
स्याद् दुर्गन्धमयं हेयं तच्छुद्ध्यै सूतकस्य वा ॥155॥

अर्थ: हे गुरुदेव! सूतक का चिह्न क्या है तथा सूतक मानने का प्रयोजन क्या है, कृपाकर कहें - मृत मनुष्यों का शरीर एक तो स्वयं रोगों का मन्दिर है अतः वैसे ही अपवित्र रहता है। उससे सम्बन्धित वस्त्र, पात्र और गृहादिक भी गलित शरीर की दुर्गंधि के समान दुर्गन्धमय रोगकारक बन जाते है, अतः उस अशौच से बचने के लिए सूतक विधि के नियमों का पालन आवश्यक है। गलित शरीर में असंख्य जीवराशि उत्पन्न होती है, उनका विनाश भी रुक नहीं सकता। इसलिए तथा परस्पर में जो मोह का अतिरेक है उसे दूर करने के लिए भी काल अपेक्षित है। अतः जन्म-मरण का अशौच उक्त काल की मर्यादा के भीतर बताया गया है।

मनुष्य की प्रत्येक वृत्ति विवेकपूर्ण है पशुओं की तरह अविवेक पूर्ण नहीं है इस बात का बोध भी इन आवश्यक नियमों से ही मालूम पड़ता है, अतः इनका पालना आवश्यक कर्त्तव्य है। जो लोग इन शास्त्रोक्त लाभदायक नियमों का पालन नहीं करते वे शारीरिक और धार्मिक हानि को उठाते हैं अतः पूर्वज आचार्यों द्वारा प्रतिपादित सूतक पातक की विधिका यथायोग्य पालन करना ही श्रेयस्कर है। जन्म सम्बन्धी अशौच को सूतक तथा मरण सम्बन्धी अशौच को पातक कहते हैं। लोक में दोनों को सूतक शब्द से व्यवहार करते हैं अतः यहाँ दोनों को सूतक शब्द लिखा गया है। १५५ ।


कौ मिथो मोहनाशाय तदेव क्रियते विधिः ।
नृणां वृत्तिः पशोर्भिन्ना बोधार्थमिति धार्मिकैः ॥156॥

अर्थ: मृत मनुष्यों का शरीर एक तो स्वयं रोगों का मन्दिर है अतः वैसे ही अपवित्र रहता है। उससे सम्बन्धित वस्त्र, पात्र और गृहादिक भी गलित शरीर की दुर्गंधि के समान दुर्गन्धिमय रोगकारक बन जाते है, अतः उस अशौच से बचने के लिए सूतक विधि के नियमों का पालन आवश्यक है। गलित शरीर में असंख्य जीवराशि उत्पन्न होती है, उनका विनाश भी रुक नहीं सकता। इसलिए तथा परस्पर में जो मोह का अतिरेक है उसे दूर करने के लिए भी काल अपेक्षित है। अतः जन्म-मरण का अशौच उक्त काल की मर्यादा के भीतर बताया गया है।

मनुष्य की प्रत्येक वृत्ति विवेकपूर्ण है पशुओं की तरह अविवेक पूर्ण नहीं है इस बात का बोध भी इन आवश्यक नियमों से ही मालूम पड़ता है, अतः इनका पालना आवश्यक कर्त्तव्य है। जो लोग इन शास्त्रोक्त लाभदायक नियमों का पालन नहीं करते वे शारीरिक और धार्मिक हानि को उठाते हैं अतः पूर्वज आचार्यों द्वारा प्रतिपादित सूतक पातक की विधिका यथायोग्य पालन करना ही श्रेयस्कर है। जन्म सम्बन्धी अशौच को सूतक तथा मरण सम्बन्धी अशौच को पातक कहते हैं। लोक में दोनों को सूतक शब्द से व्यवहार करते हैं अतः यहाँ दोनों को सूतक शब्द लिखा गया है। १५५ ।


युग्मम्

प्रश्नः - श्रीदं न गृह्णाति यथार्थधर्मं स कीदृशो मे वद विश्वशान्त्यै।

करोति केवलं कौ यो धर्मं रूढ़िवशात्सदा ।
न जानाति गुणान् दोषान् धर्मस्यापि स्वबुद्धितः ॥157॥

अर्थ: हे गुरो! कल्याणकारक धर्म को जो नहीं धारण करता वह मनुष्य कैसा है? विश्वशान्ति के लिए उसका स्वरूप बताइये - धर्म और अधर्म के स्वरूप को और उसके गुण दोषों को विचार कर जो अधर्म का त्याग कर धर्म का पालन करता है वह मनुष्य बुद्धिमान् है। किन्तु जो धर्माधर्म के स्वरूप को नहीं जानता अथवा जानकर भी स्वयं की बुद्धि से विवेक को प्राप्त न होकर केवल रूढ़ि के वश यह समझकर धर्म का पालन करता है कि यह तो मेरा वंश परम्परागत धर्म है अतः पालना चाहिए, वह मनुष्य धर्मात्मा नहीं है। वह केवल पर्यायबुद्धिवाला है। जैसे वह जैन कुल में उत्पन्न होने से जैन धर्म को कुलधर्म मानता है इसी प्रकार विधर्मियों के कुल में उत्पन्न होने पर वह उसे भी कुलधर्म मानकर पालन करता है। जिस पर्याय में जीव जाता है उसे ही अपनी करके मान लेता है, इसमें विवेक का कार्य कहाँ है। जो विवेक से जैनधर्म को आत्मधर्म मानकर पालन करेगा उसका ही कल्याण होगा।

जो धर्म के स्वरूप को जानकर भी उसे लौकिक रूढ़ि मात्र से पालता है, आचार्य कहते हैं वह नेत्रवान् होते हुए भी अंधे के ही समान है। वह केवल कलहप्रिय है, धर्मप्रिय नहीं। वह धर्म के सुन्दर फल स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग से बहुत दूर है ऐसा हम मानते हैं। अतः विवेकी मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह जो कुछ भी कार्य करे उसे विवेक की कसौटी पर कस लेवे और हितकर सिद्ध होने पर उसे आचरण में लावे। अविवेकी मनुष्य ठगाया जाता है वह हित मार्ग के स्थान में रूढ़ि या परम्परा को ही धर्म मानकर कभी-कभी अधर्म या अहित के मार्ग को ही हितकर मान बैठता है। अतः विवेकपूर्ण क्रिया ही श्रेयस्कर है।१५७ ।


नेत्रवानपि चान्धः स बुधोऽपि मूर्ख एव सः ।
स कलहप्रियो मन्ये स्वर्मोक्षसौख्यदूरगः ॥158॥

अर्थ: धर्म और अधर्म के स्वरूप को और उसके गुण दोषों को विचार कर जो अधर्म का त्याग कर धर्म का पालन करता है वह मनुष्य बुद्धिमान् है। किन्तु जो धर्माधर्म के स्वरूप को नहीं जानता अथवा जानकर भी स्वयं की बुद्धि से विवेक को प्राप्त न होकर केवल रूढ़ि के वश यह समझकर धर्म का पालन करता है कि यह तो मेरा वंश परम्परागत धर्म है अतः पालना चाहिए, वह मनुष्य धर्मात्मा नहीं है। वह केवल पर्यायबुद्धिवाला है। जैसे वह जैन कुल में उत्पन्न होने से जैन धर्म को कुलधर्म मानता है इसी प्रकार विधर्मियों के कुल में उत्पन्न होने पर वह उसे भी कुलधर्म मानकर पालन करता है। जिस पर्याय में जीव जाता है उसे ही अपनी करके मान लेता है, इसमें विवेक का कार्य कहाँ है। जो विवेक से जैनधर्म को आत्मधर्म मानकर पालन करेगा उसका ही कल्याण होगा।
जो धर्म के स्वरूप को जानकर भी उसे लौकिक रूढ़ि मात्र से पालता है, आचार्य कहते हैं वह नेत्रवान् होते हुए भी अंधे के ही समान है। वह केवल कलहप्रिय है, धर्मप्रिय नहीं। वह धर्म के सुन्दर फल स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग से बहुत दूर है ऐसा हम मानते हैं। अतः विवेकी मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह जो कुछ भी कार्य करे उसे विवेक की कसौटी पर कस लेवे और हितकर सिद्ध होने पर उसे आचरण में लावे। अविवेकी मनुष्य ठगाया जाता है वह हित मार्ग के स्थान में रूढ़ि या परम्परा को ही धर्म मानकर कभी-कभी अधर्म या अहित के मार्ग को ही हितकर मान बैठता है। अतः विवेकपूर्ण क्रिया ही श्रेयस्कर है।१५७ ।


युग्मम्

प्रश्नः - कीदृक् तर्हि गुरो ग्राह्यो धर्मो मे सिद्धये वद।

कौ वीतराग एवास्ति सद्धर्मो विश्वरक्षकः ।
सोऽपि तत्रैव विज्ञेयो यत्रेर्ष्याद्या न दुःखदाः ॥159॥

अर्थ: हे गुरुदेव! मुझे अपने कल्याण की सिद्धि के लिए कैसा धर्म ग्रहण करना चाहिए, कृपाकर बताइए - धर्म शब्द का अर्थ अपना कर्त्तव्य है। जब कि यह परीक्षित, स्वानुभूत तथा सुनिश्चित है। संसार का प्रत्येक प्राणी सुख और शान्ति को पसन्द करता है, वह दुःखमय तथा अशान्तिमय जीवन नहीं चाहता, तब यह भी सुनिश्चित है कि जिस मार्ग से उसे सुख और शान्ति प्राप्त हो वही उसका कर्तव्य है और वही कर्तव्य उसका धर्म है।

संसारी प्रत्येक आत्मा में कुछ गुण भी हैं और कुछ दोष भी। गुण आत्मा का स्वभाव है, और दोष आत्मा के गुणों का विकार है। आत्मा जितना अपने स्वभाव रूप को प्राप्त करेगा उतना ही अपने धर्म के निकट आयगा और जितना विभाव रूप परिणत होगा उतना ही आत्मधर्म से दूर होगा। ईर्ष्या, क्रोध, मोह, लोभ, मद, मत्सर, आदि आत्मा के विकारी भाव हैं। इनके होनेपर आत्मा अपनी स्वतंत्र सत्ता की पर से भिन्नता का भान नहीं करता। उसकी दृष्टि परपदार्थ पर रहती है। उसकी प्राप्ति में लाभ और अप्राप्ति में अलाभ मानता है। ये परपदार्थ संघर्ष के कारण हो जाते हैं। इनकी प्राप्ति के लिए अनेक मिथ्यात्वी मोही प्राणी सदा लालायित रहते हैं और उसके लिए लड़ाई झगड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, मोह, मत्सर आदि किन्हीं भी दुर्गुणों से नहीं डरते।

सम्यग्दृष्टि पुरुष निर्मल दृष्टि होने से सदा आत्मगुणों की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्नशील होते हैं। वे अपने विकृत भावों का विश्लेषण करते हैं और उनसे दूर रहने का प्रयत्न करते हैं। पर पदार्थों को वे ‘‘पर’’ मानकर उनके लिए कभी किसी से संघर्ष नहीं करते। उन्हें आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता में - उसकी अमरता पर विश्वास है, अतः आत्मा के मिथ्या तोष के लिए पर पदार्थ को प्राप्त करने का प्रयत्न बिल्कुल नहीं होता। वे पर से राग द्वेष मुक्त होकर वीतराग स्वरूप परम धर्म को ही पालन करते हैं। विश्वशान्ति का यही सर्वोत्कृष्ट मार्ग है अन्य नहीं, अतः धर्म का स्वरूप जानकर उसे ग्रहण करना चाहिए ।


प्रश्नः - के वीतरागधर्मस्य रक्षकाः स्युर्गुरो वद।

श्रीवीतरागधर्मस्य स्वर्मोक्षसुखदायिनः ।
कौ त्रिषष्टिशलाकादिपुरुषाः सन्ति रक्षकाः ॥160॥

अर्थ: भगवान् वीतराग सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित रागादि दोषरहित स्वात्मधर्म स्वरूप सद्धर्म ही आत्मा को संसार के बंधन से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। वही सद्धर्म यदि पूर्णमात्रा में न हो सका और मुक्ति प्राप्त न हुई तो संसार अवस्था में भी उसके प्रसाद से नरकादि दुखों का विनाश होकर स्वर्गादि में सुखों की प्राप्ति होती है। इस सद्धर्म के प्रमुख उपासक और निर्देशक तो भगवान् तीर्थंकर देव हैं जो प्रत्येक उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी काल में २४ होते हैं। वे अपने तपोबल से घातिया कर्म ज्ञानावरणादि को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त कर, जगतके हित के लिए ही तत्त्वोपदेश करते हैं। उन तीर्थकरों के काल में मध्यमध्य में (१२) चक्रवर्ती होते हैं, जो षट्खण्ड भूमि के साधक होते हैं। समस्त भरत क्षेत्र के ३२ हजार मुकुटबद्ध राजा जिनके चरणों में नमस्कार करते हैं उन चक्रवर्तियों द्वारा धर्म का पालन होता है। वे धर्मानुकूल विश्वशान्ति के लिए ही जगत् का शासन करते हैं तथा तीर्थकरों की तरह ही प्रायः तप करके मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

अपने-अपने समय में चक्रवर्ती की तरह तीन खण्ड भूमि के अधिपति ९ प्रतिनारायण होते हैं, ये भी यथायोग्य धर्म का पालन करते हैं तथा प्रजाजनों में धर्म की वृद्धि करते हैं। राज्य कारणों से इनका विनाश करनेवाले नारायण भी इनके ही समय में होते हैं। उनकी भी संख्या ९ है। इनके बड़े भाई बलभद्र कहलाते हैं। नारायण और बलभद्र में अत्यन्त गाढ़ स्नेह होता है। ये सब २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ प्रतिनारायण, ९ नारायण और ९ बलभद्र कुल ३६ नररत्न प्रमुख शलाका पुरुष हैं जिनके द्वारा धर्म की सदा रक्षा और वृद्धि होती आई है। जिसतरह उन्होंने सद्धर्म का अनुपालन, प्रवृत्ति, प्रचार और वृद्धि की है, ऐसी ही सबको करनी चाहिए। ऐसा होने पर ही जगत् में संघर्ष का अभाव होकर सुख और शान्ति की वृद्धि हो सकेगी।


नीतिज्ञा निर्मदाः स्वस्था वाभवन्विश्वनायकाः ।
तदुनुकरणं कार्यं ज्ञात्वा शान्त्यै विचक्षणैः ॥161॥

अर्थ: भगवान् वीतराग सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित रागादि दोषरहित स्वात्मधर्म स्वरूप सद्धर्म ही आत्मा को संसार के बंधन से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। वही सद्धर्म यदि पूर्णमात्रा में न हो सका और मुक्ति प्राप्त न हुई तो संसार अवस्था में भी उसके प्रसाद से नरकादि दुखों का विनाश होकर स्वर्गादि में सुखों की प्राप्ति होती है। इस सद्धर्म के प्रमुख उपासक और निर्देशक तो भगवान् तीर्थंकर देव हैं जो प्रत्येक उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी काल में २४ होते हैं। वे अपने तपोबल से घातिया कर्म ज्ञानावरणादि को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त कर, जगतके हित के लिए ही तत्त्वोपदेश करते हैं। उन तीर्थकरों के काल में मध्यमध्य में (१२) चक्रवर्ती होते हैं, जो षट्खण्ड भूमि के साधक होते हैं। समस्त भरत क्षेत्र के ३२ हजार मुकुटबद्ध राजा जिनके चरणों में नमस्कार करते हैं उन चक्रवर्तियों द्वारा धर्म का पालन होता है। वे धर्मानुकूल विश्वशान्ति के लिए ही जगत् का शासन करते हैं तथा तीर्थकरों की तरह ही प्रायः तप करके मुक्ति को प्राप्त करते हैं।

अपने-अपने समय में चक्रवर्ती की तरह तीन खण्ड भूमि के अधिपति ९ प्रतिनारायण होते हैं, ये भी यथायोग्य धर्म का पालन करते हैं तथा प्रजाजनों में धर्म की वृद्धि करते हैं। राज्य कारणों से इनका विनाश करनेवाले नारायण भी इनके ही समय में होते हैं। उनकी भी संख्या ९ है। इनके बड़े भाई बलभद्र कहलाते हैं। नारायण और बलभद्र में अत्यन्त गाढ़ स्नेह होता है। ये सब २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ प्रतिनारायण, ९ नारायण और ९ बलभद्र कुल ३६ नररत्न प्रमुख शलाका पुरुष हैं जिनके द्वारा धर्म की सदा रक्षा और वृद्धि होती आई है। जिसतरह उन्होंने सद्धर्म का अनुपालन, प्रवृत्ति, प्रचार और वृद्धि की है, ऐसी ही सबको करनी चाहिए। ऐसा होने पर ही जगत् में संघर्ष का अभाव होकर सुख और शान्ति की वृद्धि हो सकेगी।


श्रीवीतरागधर्मस्य यतः स्यात्सर्वभूतले ।
प्रचारः कार्यरूपेण स्वात्मचर्या गृहे-गृहे ॥162॥

अर्थ: भगवान् वीतराग सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित रागादि दोषरहित स्वात्मधर्म स्वरूप सद्धर्म ही आत्मा को संसार के बंधन से मुक्ति प्रदान करने में समर्थ है। वही सद्धर्म यदि पूर्णमात्रा में न हो सका और मुक्ति प्राप्त न हुई तो संसार अवस्था में भी उसके प्रसाद से नरकादि दुखों का विनाश होकर स्वर्गादि में सुखों की प्राप्ति होती है। इस सद्धर्म के प्रमुख उपासक और निर्देशक तो भगवान् तीर्थंकर देव हैं जो प्रत्येक उत्सर्पिणी या अवसर्पिणी काल में २४ होते हैं। वे अपने तपोबल से घातिया कर्म ज्ञानावरणादि को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त कर, जगतके हित के लिए ही तत्त्वोपदेश करते हैं। उन तीर्थकरों के काल में मध्यमध्य में (१२) चक्रवर्ती होते हैं, जो षट्खण्ड भूमि के साधक होते हैं। समस्त भरत क्षेत्र के ३२ हजार मुकुटबद्ध राजा जिनके चरणों में नमस्कार करते हैं उन चक्रवर्तियों द्वारा धर्म का पालन होता है। वे धर्मानुकूल विश्वशान्ति के लिए ही जगत् का शासन करते हैं तथा तीर्थकरों की तरह ही प्रायः तप करके मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
अपने-अपने समय में चक्रवर्ती की तरह तीन खण्ड भूमि के अधिपति ९ प्रतिनारायण होते हैं, ये भी यथायोग्य धर्म का पालन करते हैं तथा प्रजाजनों में धर्म की वृद्धि करते हैं। राज्य कारणों से इनका विनाश करनेवाले नारायण भी इनके ही समय में होते हैं। उनकी भी संख्या ९ है। इनके बड़े भाई बलभद्र कहलाते हैं। नारायण और बलभद्र में अत्यन्त गाढ़ स्नेह होता है। ये सब २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ प्रतिनारायण, ९ नारायण और ९ बलभद्र कुल ३६ नररत्न प्रमुख शलाका पुरुष हैं जिनके द्वारा धर्म की सदा रक्षा और वृद्धि होती आई है। जिसतरह उन्होंने सद्धर्म का अनुपालन, प्रवृत्ति, प्रचार और वृद्धि की है, ऐसी ही सबको करनी चाहिए। ऐसा होने पर ही जगत् में संघर्ष का अभाव होकर सुख और शान्ति की वृद्धि हो सकेगी।

पञ्चम अध्याय (श्लोक 163 से 201)

प्रश्नः - द्वितीयप्रतिमाचिह्नं किमस्ति मे गुरो वद।

पञ्चाणुव्रतपूर्त्यर्थं त्रीणि गुणव्रतानि वा ।
चतुःशिक्षाव्रतान्येवं गृहीत्वा स्वात्मचिन्तनम् ॥163॥

अर्थ: हे गुरुदेव! दार्शनिक श्रावक का स्वरूप ज्ञात किया। अब दूसरी प्रतिमा का स्वरूप कृपाकर कहिए - तीसरे अध्याय में पाँच पापों का स्वरूप निरूपण किया है। उन पापों का त्याग ही यथार्थ में व्रत है। यद्यपि पाँचों पापों का सम्पूर्ण त्याग गृहस्थ के नहीं होता, तथापि एकदेश रूप त्याग गृहस्थ अवश्य कर सकता है। श्रावक के इस एकदेश पाप परित्याग रूप व्रतों को ही अणुव्रत कहते हैं। इन अणुव्रतों से दोष न लगें और गुणों की वृद्धि हो इसके लिए तीन गुणव्रत अर्थात् दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदण्डत्याग इनका पालन किया जाता है। इसी प्रकार से अणुव्रतों को महाव्रत बनाने के लिए उसके अभ्यासस्वरूप ही सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग परिमाण और अतिथिसंविभाग ऐसे ४ व्रत शिक्षाव्रत के नाम से गृहस्थ के लिए बताए गए हैं। जो इन सम्पूर्ण व्रतों का निर्दोष निरतिचार पालन करते हैं तथा जो इस प्रकार पर पदार्थों के सम्पर्क से दूर रहकर स्वात्मचिंतवन की ओर सम्मुख होते हैं वे ही द्वितीय प्रतिमा के धारक हैं।

सभी व्रत का पालन एकमात्र महान् परमधर्म अहिंसा व्रत के पालन के लिए ही किया जाता है। असत्य, चौर्य, कुशील और परिग्रह ये चारों हिंसामूलक कार्य हैं। हिंसामूलक होने से ही इनकी पाप संज्ञा पड़ी है। रागादिपरिणामों के द्वारा आत्मस्वभाव का हनन ही हिंसा है। इस निमित्त से राग, द्वेष, क्रोध और लोभ इनको हिंसा का पर्यायवाची कहते हैं। इन दुर्गुणों के कारण ही असत्य भाषण चौर्य और कुशील आदि पाप होते हैं, अतः इनके त्यागरूप व्रतों से एक अहिंसा परमधर्म की ही प्रभावना होती है। ऐसा करनेवाले महानुभाव गृही ही द्वितीय प्रतिमा के आराधक हैं ऐसा जानना चाहिये।१६३ ।


कुर्वन्ति ये यथाशक्ति दयाधर्मप्रभावनाम् ।
द्वितीयप्रतिमायास्ते भवन्ति स्वामिनः सदा ॥164॥

अर्थ: तीसरे अध्याय में पाँच पापों का स्वरूप निरूपण किया है। उन पापों का त्याग ही यथार्थ में व्रत है। यद्यपि पाँचों पापों का सम्पूर्ण त्याग गृहस्थ के नहीं होता, तथापि एकदेश रूप त्याग गृहस्थ अवश्य कर सकता है। श्रावक के इस एकदेश पाप परित्याग रूप व्रतों को ही अणुव्रत कहते हैं। इन अणुव्रतों से दोष न लगें और गुणों की वृद्धि हो इसके लिए तीन गुणव्रत अर्थात् दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदण्डत्याग इनका पालन किया जाता है। इसी प्रकार से अणुव्रतों को महाव्रत बनाने के लिए उसके अभ्यासस्वरूप ही सामायिक, प्रोषधोपवास, भोगोपभोग परिमाण और अतिथिसंविभाग ऐसे ४ व्रत शिक्षाव्रत के नाम से गृहस्थ के लिए बताए गए हैं। जो इन सम्पूर्ण व्रतों का निर्दोष निरतिचार पालन करते हैं तथा जो इस प्रकार पर पदार्थों के सम्पर्क से दूर रहकर स्वात्मचिंतवन की ओर सम्मुख होते हैं वे ही द्वितीय प्रतिमा के धारक हैं।
सभी व्रत का पालन एकमात्र महान् परमधर्म अहिंसा व्रत के पालन के लिए ही किया जाता है। असत्य, चौर्य, कुशील और परिग्रह ये चारों हिंसामूलक कार्य हैं। हिंसामूलक होने से ही इनकी पाप संज्ञा पड़ी है। रागादिपरिणामों के द्वारा आत्मस्वभाव का हनन ही हिंसा है। इस निमित्त से राग, द्वेष, क्रोध और लोभ इनको हिंसा का पर्यायवाची कहते हैं। इन दुर्गुणों के कारण ही असत्य भाषण चौर्य और कुशील आदि पाप होते हैं, अतः इनके त्यागरूप व्रतों से एक अहिंसा परमधर्म की ही प्रभावना होती है। ऐसा करनेवाले महानुभाव गृही ही द्वितीय प्रतिमा के आराधक हैं ऐसा जानना चाहिये।१६३ ।


(क्षेपक)

प्रश्नः - अहिंसाव्रतचिह्नं किं केऽतिचारा गुरो वद।

जीवस्थानं गुणस्थानं मार्गणास्थानकं तथा ।
योन्यादि निश्चयाद् बुद्ध्वा त्रसजीवादिरक्षणम् ॥165॥

अर्थ: हे गुरो! अहिंसा व्रत का क्या स्वरूप है और उसके दोष कौन हैं? कहिए - मिथ्यादर्शन, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यक्त्व, देशविरति, प्रमत्तविरति, अप्रमत्तविरति, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय, उपशांतकषाय, क्षीणमोह, सयोगी और अयोगी ये चौदह गुणस्थान हैं। मोह और योग के तथा उसके क्रमशः क्षीण होने से ये गुणस्थान बनते हैं। इन विभिन्न परिणाम वाले जीव गुणस्थानों में पाए जानेवाले जीव हैं।

बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संज्ञी व असंज्ञी पंचेन्द्रिय, इन सात के पर्याप्त और इनके ही अपर्याप्त के भेद से चौदह प्रकार के जीवसमासों में भी जीव व्यवस्थित हैं। चारों गति, पाँचों इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञा, आहारक ये १४ मार्गणा हैं। इनके भेद प्रभेदों में भी जीवों की स्थिति है।

उक्त प्रकार जीवों की व्यवस्था जानकर तथा कहाँ-कहाँ किन जीवों की उत्पत्ति होती है इसे भी आगम से ज्ञात कर जो जीव यथाशक्ति स्थावरों की प्रतिसमय रक्षा करते हुए त्रसहिंसा को संकल्प से नहीं करता वह जीवन में शान्ति और सुख प्रदान करनेवाले पवित्र अहिंसाव्रत का पालन करनेवाला है। १६५ ।


कार्यं नित्यं यथाशक्ति स्थावराणामपि तथा ।
अहिंसाणुव्रतं पूतं यतः स्याच्छांतिसौख्यदम् ॥166॥

अर्थ: हे गुरो! अहिंसा व्रत का क्या स्वरूप है और उसके दोष कौन हैं? कहिए - मिथ्यादर्शन, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यक्त्व, देशविरति, प्रमत्तविरति, अप्रमत्तविरति, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय, उपशांतकषाय, क्षीणमोह, सयोगी और अयोगी ये चौदह गुणस्थान हैं। मोह और योग के तथा उसके क्रमशः क्षीण होने से ये गुणस्थान बनते हैं। इन विभिन्न परिणाम वाले जीव गुणस्थानों में पाए जानेवाले जीव हैं।

बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, संज्ञी व असंज्ञी पंचेन्द्रिय, इन सात के पर्याप्त और इनके ही अपर्याप्त के भेद से चौदह प्रकार के जीवसमासों में भी जीव व्यवस्थित हैं। चारों गति, पाँचों इन्द्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञा, आहारक ये १४ मार्गणा हैं। इनके भेद प्रभेदों में भी जीवों की स्थिति है।

उक्त प्रकार जीवों की व्यवस्था जानकर तथा कहाँ-कहाँ किन जीवों की उत्पत्ति होती है इसे भी आगम से ज्ञात कर जो जीव यथाशक्ति स्थावरों की प्रतिसमय रक्षा करते हुए त्रसहिंसा को संकल्प से नहीं करता वह जीवन में शान्ति और सुख प्रदान करनेवाले पवित्र अहिंसाव्रत का पालन करनेवाला है। १६५ ।


युग्मम्

आहारपानपरिरोधननिन्द्यकृत्यं
बन्धो वधश्च गुरुभारकरोपणादि ।
छेदो न धर्मरसिकैर्विषयादिवृद्ध्यै
कार्यः सदा भुवि यतः स्वपदे निवासः ॥167॥

अर्थ: अपने अधीन रहनेवाले पशु, पक्षी व मनुष्यादिकों को यथासमय भोजन व पान प्रदान करना अहिंसाव्रती के लिए आवश्यक कर्त्तव्य है। समय टाल करके उनको भोजन-पान देना उन्हें कष्ट पहुंचाना है जो कि उसके व्रत के लिए अनुचित है। तथापि यदि कोई व्रती इसका ध्यान न रखे प्रमाद से अथवा अपने कार्य की अधिकता से भूल जाय और समय का उल्लंघन कर उन्हें भोजन-पान दे तो वह अहिंसाव्रती के लिये अतिचार है।

अपने आर्थिक वैषयिक प्रयोजन के कारण मनुष्यों या पशुओं को अथवा मनोरंजन के लिए शुक, सारिका आदि को पिंजड़े आदि में अथवा रस्सी, सांकल, यंत्र, मंत्र द्वारा या केवल वचनों के द्वारा किसी नियत स्थान में रोककर रखना व यथेच्छ गमनागमन न करने देना यह परिरोधन नामक द्वितीय अतिचार है।

अपने वश में रखने के लिए यदि पशु पक्षी के लिए बाँधने की आवश्यकता अनुभव में आवे और वे सहज में बंधनादि तोड़कर भाग जा सकते हैं ऐसी आशंका हो तो लोग उनके नाक-कान छेद देते हैं और उनमें रस्सी डाल कर बांध देते हैं ताकि भागने की चेष्टा करने पर उनके उन मुलायम अंगों को पीड़ा हो और उस पीड़ा को न सह सकने के कारण वे बंधन तुड़ा कर न भाग सकें। यह छेदन नाम का तृतीय अतिचार है।

अपने उक्त प्रयोजनों की सिद्धि के लिए मनुष्यों, पशुओं अथवा पक्षियों को वेत-दण्ड आदि के द्वारा मारना या ताड़ना देना वध नामक चतुर्थ अतिचार है।

अतिभारारोपण यह अहिंसा व्रत का पांचवाँ अतिचार है। भारवाही लोग बैलों पर, गाड़ियों में, घोड़ों पर, तांगा, टमटम आदि में, गृधों पर तथा ऊँटों पर उनकी सामर्थ्य से अधिक बोझ लाद कर उन्हें कष्ट देकर अपना अल्प प्रयोजन साधते हैं। यह अन्याय कार्य इस व्रत का पांचवाँ अतिचार है।

नगर में या ग्राम में समर्थ लोग अपने कार्यों को सम्पन्न करने के लिए नौकर रखते हैं, मुनीम रखते हैं अथवा क्लर्क रखते हैं। इन कार्यों की सेवा का भार उनपर इतना अधिक रख देते हैं कि जिसे वे वहन नहीं कर पाते या बड़े कष्ट से वहन कर पाते हैं। दिन में रात्रि में १० घण्टे, १२ घण्टे, १४ और १६ घण्टे भी काम लिया जाता है। दो आदमी के करने योग्य कार्य का भार एक ही आदमी से लिया जाता है। यह सब अतिभारारोपण अतिचार ही है।

इन सम्पूर्ण कामों को लोग अपने वैषयिक साधन के लिए अथवा आर्थिक प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर लोभ के आवेश में करते हैं कार्यों की साधना के लिए क्रोधादि कषायों का भी अवलंबन करते हैं। किन्तु ये सब हिंसा आपादक कार्य हैं। जब तक अहिंसाव्रती इन कार्यों को एक हद तक करता है और अपना व्रत भंग न हो जाय इसका ध्यान रखता है तबतक उक्त कार्य अतिचार है। किन्तु व्रतरक्षा की हार्दिक चिन्ता के अभाव में दुष्टता या तीव्र लोभवश किए गये ये कार्य अनाचार संज्ञा को भी प्राप्त हो जाते हैं, अतः इनसे बचना ही श्रेयस्कर है ।


प्रश्नः - सत्याणुव्रतचिह्नं किं तदतिचारकाश्च के।

न रागादिवशं गत्वाऽसत्यवाक्यं कदापि कौ ।
स्वान्यतापकरं सत्यमपि प्राणहरं मिथः ॥168॥

अर्थ: हे गुरु! सत्याणुव्रत का क्या लक्षण है और उसके अतिचार कौन-कौन हैं? कहिए - श्रावक का दूसरा अणुव्रत सत्य है। जैनाचार्यों ने सत्य शब्द का अर्थ ‘प्रशस्त वचन’ किया है। जैसे का तैसा कहना सत्य है। मात्र इस व्याख्या को उन्होंने सत्य की सही व्याख्या नहीं माना। काणे मनुष्य को ‘काणा’ कहकर बुलाना या पुकारना यद्यपि जैसे को तैसा कहने से ‘सत्य वचन’ होना चाहिए पर जैनाचार्य उसे ‘असत्य’ वचन मानते हैं। कारण यह कि यह वचन पर को पीड़ाकारक है। वचन का प्रयोग कर्ता उसके अनादर भाव से तथा परिणाम दुःखी करने या चिढ़ाने के अभिप्राय से वैसा बोलता है अतः ऐसा वचन दुर्वचन होने से अप्रशस्त है - निंद्य है और इसी कारण से वह असत्य है। सत्यव्रती ऐसा वचन नहीं बोलता। यह बात पहिले भी कही गई है।

जो वचन स्वपर हितकारक हों, सुनने में प्रिय मालूम हों, थोड़े शब्दों में कहे गए हों इस प्रकार इन तीन विशेषणों से सहित होते हुए जो यथार्थ वस्तु के परिचायक हों वे सत्य या प्रशस्त वचन हैं ऐसा जैनाचार्यों का अभिमत है। जो वचन मिथ्या हों, स्वपरहितकारक न होकर हानिकारक हों, भ्रमोत्पादक हों, संशय उत्पन्न करनेवाले हों, कषायोत्पादक हों, मिथ्यामार्ग के पोषक और प्रेरक हों, सदाचार के विरोधक हों, धर्म मार्ग के विपरीत हों, किसी के प्राणहर्त्ता हों, समाज में संक्लेश और क्षोभ को उत्पन्न करनेवाले हों, लोक, समजा व देश के हितनाशक हों वे सब वचन तथा वचन प्रतिपादक चेष्टाएँ “असत्य” हैं। सत्याणुव्रती ऐसे वचनों को राग, द्वेष, ईर्षा, लोभ, क्रोध व अभिमान आदि के वशीभूत होकर कभी नहीं बोलता। वह ऐसे वचनों को ही सत्य मानकर उनका प्रयोग करता है जो सुननेवाले के तथा बोलनेवाले के प्राणहर्त्ता न हों, अकल्याण कर्ता न हों, अधर्म व असदाचार में लेजानेवाले न हों, सुनने में कर्ण को प्रिय लगें, हृदय को प्रिय लगें, जगत् में किसी के लिए भी अशान्तिदायक न हों और सम्यग्ज्ञान के उत्पादक हों।

उक्त गुणों से रहित किन्तु ऊपर कहे हुए असत्य के दोषों से सहित वचन यदि स्थिति को स्पष्ट करनेवाले भी हों तो भी वे संक्लेश, सन्ताप, हिंसा तथा पाप के उत्पादक होने के कारण ‘असत्य वचन’ हैं। उनका प्रयोग सत्याणुव्रती के लिए वर्जित हैं।१६८ ।


बोधदं सुप्रियं वाक्यं सत्यं वाच्यं हितं मितम् ।
स्यात्सत्याणुव्रतं शुद्धं शान्तिदं सर्वभूतले ॥169॥

अर्थ: श्रावक का दूसरा अणुव्रत सत्य है। जैनाचार्यों ने सत्य शब्द का अर्थ ‘प्रशस्त वचन’ किया है। जैसे का तैसा कहना सत्य है। मात्र इस व्याख्या को उन्होंने सत्य की सही व्याख्या नहीं माना। काणे मनुष्य को ‘काणा’ कहकर बुलाना या पुकारना यद्यपि जैसे को तैसा कहने से ‘सत्य वचन’ होना चाहिए पर जैनाचार्य उसे ‘असत्य’ वचन मानते हैं। कारण यह कि यह वचन पर को पीड़ाकारक है। वचन का प्रयोग कर्ता उसके अनादर भाव से तथा परिणाम दुःखी करने या चिढ़ाने के अभिप्राय से वैसा बोलता है अतः ऐसा वचन दुर्वचन होने से अप्रशस्त है - निंद्य है और इसी कारण से वह असत्य है। सत्यव्रती ऐसा वचन नहीं बोलता। यह बात पहिले भी कही गई है।

जो वचन स्वपर हितकारक हों, सुनने में प्रिय मालूम हों, थोड़े शब्दों में कहे गए हों इस प्रकार इन तीन विशेषणों से सहित होते हुए जो यथार्थ वस्तु के परिचायक हों वे सत्य या प्रशस्त वचन हैं ऐसा जैनाचार्यों का अभिमत है। जो वचन मिथ्या हों, स्वपरहितकारक न होकर हानिकारक हों, भ्रमोत्पादक हों, संशय उत्पन्न करनेवाले हों, कषायोत्पादक हों, मिथ्यामार्ग के पोषक और प्रेरक हों, सदाचार के विरोधक हों, धर्म मार्ग के विपरीत हों, किसी के प्राणहर्त्ता हों, समाज में संक्लेश और क्षोभ को उत्पन्न करनेवाले हों, लोक, समजा व देश के हितनाशक हों वे सब वचन तथा वचन प्रतिपादक चेष्टाएँ “असत्य” हैं। सत्याणुव्रती ऐसे वचनों को राग, द्वेष, ईर्षा, लोभ, क्रोध व अभिमान आदि के वशीभूत होकर कभी नहीं बोलता। वह ऐसे वचनों को ही सत्य मानकर उनका प्रयोग करता है जो सुननेवाले के तथा बोलनेवाले के प्राणहर्त्ता न हों, अकल्याण कर्ता न हों, अधर्म व असदाचार में लेजानेवाले न हों, सुनने में कर्ण को प्रिय लगें, हृदय को प्रिय लगें, जगत् में किसी के लिए भी अशान्तिदायक न हों और सम्यग्ज्ञान के उत्पादक हों।

उक्त गुणों से रहित किन्तु ऊपर कहे हुए असत्य के दोषों से सहित वचन यदि स्थिति को स्पष्ट करनेवाले भी हों तो भी वे संक्लेश, सन्ताप, हिंसा तथा पाप के उत्पादक होने के कारण ‘असत्य वचन’ हैं। उनका प्रयोग सत्याणुव्रती के लिए वर्जित हैं।१६८ ।


युग्मम्

मिथ्योपदेशो न रहस्यभेदो न कूटलेखो न च मन्त्रभेदः ।
न्यासापहारश्च तथा न कार्यो व्रतस्य शुद्धिर्यदि वाञ्छनीया ॥170॥

अर्थ: मिथ्याशास्त्रों का पठन-पाठन तथा उपदेश करना मिथ्योपदेश नामक प्रथम अतिचार है। प्रमाद के कारण यह सम्भव है। आर्थिक लाभ और आजीविका के निर्वाह के लिए जिन प्रतिपादित मार्ग के विरोधक असन्मार्ग के प्रतिपादक मिथ्यात्वपोषक ग्रन्थों का पढ़ना, पढ़ाना या समाज में उनका प्रचार करना तथा यह समझना कि मैं केवल अपनी आजीविका के लिए इस मार्ग का अवलम्बन कर रहा हूँ, मेरी श्रद्धा तो जिन मार्ग पर ही है, सत्यव्रती के लिए व्रतभङ्ग कारक है।

यही कार्य यदि जिनमार्ग में अश्रद्धा तथा मिथ्यामार्ग में श्रद्धा होने के कारण किया जाय तो वह सम्यक्त्व का विघातक होने से अनन्त निगोद का कारक महान् असत्य है। उसके होने पर वह व्यक्ति महान् अव्रती तथा मिथ्यादृष्टि होगा। केवल मिथ्या को मिथ्या मानकर भी वह उसे सच्चा माननेवाले तत्संप्रदायके व्यक्तियों के लिए केवल स्वजीविका के लिए उपदेश करता है अथवा लिखता है, मिथ्यात्वपोषक ग्रन्थों की टीकादि लिखकर आजीविका करता है तो ऐसा करनेवाला वह सदोषी व्रती है। व्रती को ऐसी आजीविका न करनी चाहिए। यह पहला अतिचार है।

दूसरा अतिचार है रहस्यभेद। अर्थात् कोई व्यक्ति अपना कार्य साधना चाहते हैं जो आप पर या अन्य किसी पर प्रकट नहीं किया जा सकता। तथापि उनकी चेष्टा से उनके अभिप्राय को समझ कर उसे जनता में प्रकट कर उन्हें नीचा दिखाना व उनको हानि पहुँचाना रहस्यभेद है। यह उसी दशा में अतिचार है जब कि हम उस अभिप्राय का भेदन केवल उनकी हानि के लिए करते या कौतुकवश करते हैं।

कूटलेख-किसी विषय को प्रतिपादन करने के लिए ऐसी शब्दावली या वाक्यावली का प्रयोग करना जिससे पढ़ने वाला सहसा उसके इस अभिप्राय को जो वह निज स्वार्थ वश निकालना चाहता है न समझ सके किन्तु दूसरा ही अर्थ समझे। रुपया पैसा आदि के व सुवर्ण भूमि आदि के सम्बन्ध में ऐसे स्टांप या अन्य प्रकार के कपटपूर्ण लेख लिखाना जिससे दूसरे प्रकार के निजस्वार्थसाधक भी अर्थ निकाले जा सकें ऐसे परवञ्चक शब्द पूर्ण लेख कूटलेख हैं। इन लेखों को लिखने या लिखाने वाला प्रतिवादी की सरलता का अनुचित लाभ उठाना चाहता है। वह अवसर पड़ने पर अपने लेख का भिन्नार्थ उसे समझा कर उसे अपने स्वार्थ साधन के लिए मजबूर कर देता है। एक उदाहरण द्वारा यह विषय स्पष्ट हो जायगा-मान लीजिए कि एक मनुष्य एक ज्योतिषी के पास गया और यह बोला कि मेरी पुत्रवधू गर्भिणी है। उसके पुत्र होगा या पुत्री? यदि हमारे प्रश्न का सही समाधन


प्रश्नः - अचौर्याणुव्रतं किं स्यादतिचाराश्च तस्य के?

ग्रामे पुरे वनपथे पतितं न दत्तम्
कौ स्थापितं परधनं यदि विस्मृतं वा।
तत्त्याग एव सुखदं व्रतमुत्तमं स्यात्
श्राद्धस्य धर्मरसिकस्य किलैकदेशम् ॥171॥

अर्थ: हे गुरो! अचौर्याणुव्रत तथा उसके अतिचार क्या हैं, कृपया कहें - किसी भी स्थान विशेष में चाहे गाँव में हो अथवा नगर में या वन में, मार्ग में, धर्मशाला में, रेल में, मोटर में, नदीतीर में या अन्यत्रापि कहीं पर दूसरे के द्वारा भूले हुए, रखे हुए, छोड़े हुए, स्थापित किए हुए या भूमि में गाड़े हुए उसके धन को ले लेना चौर्य पाप है। उसका त्याग ही उत्तम व्रत है। धर्मप्रेमी श्रावक को भी इस व्रत का एकदेश परिपालन करना चाहिए। उसे ही अचौर्याणुव्रत कहते हैं ।


चौरप्रयोगो लघु-दीर्घमाने चौरार्थवाञ्छा नृपनीतिभङ्गः ।
दुःखप्रदो न प्रतिरूपयोगः कार्यो यतः स्याद् भुवि सर्वशान्तिः ॥172॥

अर्थ: अचौर्य व्रतधारी स्वकृत चोरी के अभाव में भी यदि दूसरों के द्वारा चोरी कराता है। उन्हें चोरी के उपाय बताता है तो वह चौर प्रयोग नामक अतिचार है। दूसरा अतिचार है लघु-दीर्घमानः अर्थात् व्यापार कार्य में जिन मापने तौलने की निर्णायक वस्तुओं का प्रयोग होता है उन्हें देने के समय के लिए हीन प्रमाण का रखना और खरीदने के लिए अधिक प्रमाण का रखना और इस पद्धति से प्रकारान्तर से पर का धनापहरण करना दूसरा अतिचार है।
तीसरा दोष यह है कि यदि हमें यह ज्ञात हो जाय कि यह द्रव्य अमुक व्यक्ति चोरी से लाया है और हम उसकी कमजोरी को जानकर उसका अनुचित लाभ उठाना चाहें। उसे डराकर धमकी देकर उसी माल को कम मूल्यपर उससे ले लें तो यह चोरी के द्रव्य की वांछा नामक तीसरा अतिचार होगा।
राज्य द्वारा बनाए हुए व्यापारों के नियमों को भङ्ग करना, राजकीय कर का छिपा कर न देना तथा बिक्री कर, नगर निगम कर और आयकर से मुक्ति पाने के लिए हिसाब गलत बनाना, छल करना तथा राज्य के युद्धरत होने पर, पर चक्र के द्वारा आक्रमण होने पर अथवा परचक्र के आक्रमण की आशंका होने पर यदि शासक शासन के कार्य में आन्तरिक व्यवस्था में ढीले पड़ जायँ तो उस संधि का दुरुपयोग करना, मनमाने भाव से सौदा बेचना और सामग्री का अतिसंग्रह कर उसे रोककर रख लेना, यह सब अपराध नृपनीति भङ्ग नामक अचौर्य व्रत का चतुर्थ दोष है।
पाँचवें प्रकार का दोष यह है कि बहुमूल्य वस्तु में अल्प मूल्य की नकली चीजें मिलाकर बहुमूल्य के भाव में बेचना यह “प्रतिरूपक व्यवहार” नामक अतिचार है। इस प्रकार ये पाँचों अतिचार शान्ति के घातक हैं।


विहाय यश्चान्यकलत्रमात्रं सुपुत्रहेतोः स्वकलत्र एव ।
करोति रात्रौ समयेन सङ्गं ब्रह्मव्रतं तस्य किलैकदेशम् ॥173॥

अर्थ: स्त्री के लिए पुरुष समागम की इच्छा और पुरुष के लिए स्त्री समागम की इच्छा अथवा स्वात्मभिन्न किसी भी पर पदार्थ के ग्रहण करने की इच्छा मात्र मोहनीय कर्म के उदय का दुष्परिणाम है। जो पुरुष विवेकी हैं वे कर्माधीन उक्त वृत्ति को स्वीकार करके भी उसमें श्रेष्ठ मार्ग का अवलम्बन करते हैं। वे अपनी कुलपरम्परा को चलाने के हेतु सधर्मा योग्य कन्या का धर्मसाक्षी से पाणिग्रह करते हैं और पञ्च देव और अग्नि की साक्षी से प्रतिज्ञापूर्वक ग्रहीत स्वकलत्र में ही श्रेष्ठ सन्तान को जन्म देते हैं। स्वप्न में भी परस्त्रियों के प्रति गमन नहीं करते हैं। ऐसे सन्तोषी व्यक्ति ही स्वदारसन्तोषव्रती हैं। इसी प्रकार जो कन्याएँ अपने माता पिता आदि की अनुमति पूर्वक पञ्च देव तथा अग्नि की साक्षी से योग्य कुलीन वर का पाणिग्रहण कर उसे अपना पति स्वीकार करती हैं तथा अन्य पुरुषों की ओर स्वप्न में भी विकार भाव नहीं लाती वे शीलशिरोमणि उत्तम गृहिणी हैं।

जिनमें उक्त प्रकार से एकदेश ब्रह्मचर्यव्रत है वे शीलवान् स्त्री पुरुष ही उत्तम पात्र दिगम्बर जैन साधुओं के लिए दान देने के विशेष अधिकारी हैं जो दान कल्याण परम्परा का हेतु है।


तीव्रकामाभिलाषाद्यतिचारा दुःखदाः खलाः।
त्याज्याः स्वानन्दतुष्टेन दीपेनेव कुकज्जलम् ॥174॥

अर्थ: स्वदार सन्तोषव्रती यदि काम की तीव्र अभिलाषा रखे और सदा चित्त को मलीन रखे तो वह व्रती होकर भी दोषी है। उसका यह भी कर्त्तव्य है कि जिस प्रकार दीपक अपने सुन्दराकार प्रकाश के द्वारा सदा दैदीप्यमान रहता है और अपने अन्दर विद्यमान कृष्णवर्ण कज्जल को सदा वमन करता है, त्याग करता है, उसी तरह अपने आत्मानन्द स्वरूप से प्रकाशमान व्रती को भी अपने अन्तर्दोषों का सदा निरीक्षण करते हुए उनका वमन करना चाहिए तथा नवीन दोष उत्पन्न न हो इसका प्रयत्न करना चाहिए।

कामातुरता व्रतभङ्ग का प्रधान हेतु है। कामातुर अपना व्रत सदा सुरक्षित नहीं रख सकता। कामसन्ताप से संतप्त पुरुष को कर्त्तव्याकर्तव्य का बोध नहीं रहता। उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता। दृष्टि दूषित हो जाती है। मन सदा भटकता रहता है। अपने आपको वश में नहीं रख सकता। पागलों की तरह प्रलाप करता है। न कहने योग्य अयोग्य वचन बोलता है। कुचेष्टाएँ करता है। नीच संगति करता है। परस्त्रीसेवी में जितने दुर्गुण होते हैं वे सब कामातुर को प्राप्त होते हैं। कामातुरता से ही तो लोग परस्त्री गमन करते हैं। कामातुर के लिए स्त्रीमात्र में एक ही सम्बन्ध प्राप्त है और वह है भोगदृष्टि। माता, बहन, कन्या ये केवल कथन के लिए शब्दमात्र हैं। उन शब्दों में अन्तर्निहित पवित्र भावना का उसे दर्शन भी नहीं होता। कामातुरता सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ है, अतः स्वस्त्री सन्तोषव्रती को उक्त दोष को सर्प, विष, अग्नि, सिंह और शार्दूल आदि भयंकर जीवों से भी महान् भयंकर समझकर उससे सदा दूर रहना चाहिए।

परविवाहकरण, इत्वरिकागमन और अनङ्गक्रीड़ा आदि समस्त दोष काम की तीव्र अभिवांछा से ही उत्पन्न होते हैं। व्रत के अतिचार दुर्जन की भाँति सदा पीड़ा और धोखा देनेवाले हैं। वे व्रत का नाश करते हैं और स्वयं अनेकानेक पापों को उत्पन्न करानेवाले हैं। स्वस्त्री व्रती को उत्तम सन्तान की प्राप्ति के हेतु अथवा शरीर में होनेवाले मदावेश को मिटाने के हेतु ही स्वस्त्रीगमन स्वीकार करना चाहिए। योग्य सन्तान से कुलवृद्धि होती है। योग्य सन्तान धर्म परम्परा को चलाने के लिए समर्थ होती है। इसलिए अन्तर्वर्ती कज्जल को सतत वमन करनेवाले और सदा प्रकाशमान अपने निज स्वरूप में स्थित रहनेवाले दीपक के समान स्वानन्दतुष्ट आत्मरसभोगी स्वदारसंतोषी को अपने अन्तर्वर्ती अतिचारों का परिहार कर अपने स्वरूप में रहना उचित है। तब ही वह निर्दोष व्रती रह सकता है ।


प्रश्नः - परिग्रहपरिमाणव्रतचिह्नं गुरो वद।

धनादीनां यथाशक्ति प्रमाणं प्रविधाय यः ।
आशाग्निशमनार्थं तु करोति दानपूजनम् ॥175॥

अर्थ: हे गुरुदेव! परिग्रह परिमाण व्रत के क्या चिह्न हैं, कृपा कर कहें। ऐसा प्रश्न करने पर गुरु उपदेश करते हैं - जिन्हें हम लाकर संग्रह करें ग्रहण करें वह “परिग्रह” है। आत्मा में ज्ञान दर्शन आदि अनन्त गुण हैं। वही आत्मा का निज भण्डार है। उसे छोड़कर धनधान्यादि का जो यावन्मात्र संग्रह है वह सब पाप है। यह आत्मा अनादिकाल से इसी परद्रव्य ग्रहण के कारण पराधीन हो रहा है। जब तक यह परद्रव्यग्रहण को त्यागकर स्व-स्वरूप को प्राप्त नहीं करता तब तक सुखी नहीं हो सकता। अतः यह बात निश्चित हो जाती है कि जिस किसी प्रकार हो प्रत्येक जीव का कल्याण पर-पदार्थ ग्रहण में नहीं, उसके त्याग में है। यदि चारित्रमोहनीय के भेद प्रत्याख्यानावरण का तीव्रोदय हो और पर-पदार्थ से मोह न छूटे तो भी उसका एकदेश त्याग अर्थात् क्रमिक त्याग करना चाहिये। इस क्रमिक त्याग को ही देशव्रत या परिग्रह परिमाणाणुव्रत कहते हैं।

धन-धान्य, खेत, मकान, रुपया, सोना, चाँदी, धातु तथा वस्त्र आदि पदार्थों का अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रमाण करने शेष का त्याग करना यह त्याग की विधि है। इस त्याग से आत्मा में अनन्त आशाओं का अन्त हो जाता है और असन्तोष और तृष्णा सन्तोष सुख में परिणत हो जाती है। यह व्रत का अनुपम लाभ है। आशा अग्नि


परिग्रहपरिमाणव्रतं स्यात्तस्य सौख्यदम् ।
ध्यानस्वाध्यायलीनस्य सारासारविचारिणः ॥176॥

अर्थ: जिन्हें हम लाकर संग्रह करें ग्रहण करें वह “परिग्रह” है। आत्मा में ज्ञान दर्शन आदि अनन्त गुण हैं। वही आत्मा का निज भण्डार है। उसे छोड़कर धनधान्यादि का जो यावन्मात्र संग्रह है वह सब पाप है। यह आत्मा अनादिकाल से इसी परद्रव्य ग्रहण के कारण पराधीन हो रहा है। जब तक यह परद्रव्यग्रहण को त्यागकर स्व-स्वरूप को प्राप्त नहीं करता तब तक सुखी नहीं हो सकता। अतः यह बात निश्चित हो जाती है कि जिस किसी प्रकार हो प्रत्येक जीव का कल्याण पर-पदार्थ ग्रहण में नहीं, उसके त्याग में है। यदि चारित्रमोहनीय के भेद प्रत्याख्यानावरण का तीव्रोदय हो और पर-पदार्थ से मोह न छूटे तो भी उसका एकदेश त्याग अर्थात् क्रमिक त्याग करना चाहिये। इस क्रमिक त्याग को ही देशव्रत या परिग्रह परिमाणाणुव्रत कहते हैं।

धन-धान्य, खेत, मकान, रुपया, सोना, चाँदी, धातु तथा वस्त्र आदि पदार्थों का अपनी आवश्यकता के अनुसार प्रमाण करने शेष का त्याग करना यह त्याग की विधि है। इस त्याग से आत्मा में अनन्त आशाओं का अन्त हो जाता है और असन्तोष और तृष्णा सन्तोष सुख में परिणत हो जाती है। यह व्रत का अनुपम लाभ है। आशा अग्नि है। संसारज्वाला से दग्ध प्राणी आशा से जीवित है। निराशा से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। किन्तु मुक्ति मार्ग में निराशा से ही जीवित रहते हैं और आशा से मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

आशा रूपी गढ़ा प्रत्येक प्राणी के हृदय में अथाह है, उसका अन्त नहीं है। उसमें कितना भी डालो उसकी पूर्ति नहीं होती। सन्तोषरूपी अमृत की एक बूंद से ही वह पूर्ण भर जाता है और आत्मा में शीतल जल, चन्द्रकिरण, चन्दनानुलेपन, हिमस्पर्श और शीतल छाया की प्राप्ति के सदृश शान्ति प्राप्त हो जाती है, अतः गृहीत परिग्रह में न्यूनता करना कल्याणकारी है।

अपनी परिमित तृष्णा पूर्त्यर्थ अथवा गृह की सामान्य आवश्यकता की पूर्ति के हेतु व्यापारादि से धनार्जन कर शेष समय का देवपूजन, स्वाध्याय तथा अध्यात्मचिन्ता आदि के द्वारा सदुपयोग करना चाहिए। साथ ही अपने अर्जित धन का उपयोग केवल स्वविषयोपभोग में नहीं करना चाहिए बल्कि जिनपूजन, मुनियों को आहारादिदान, स्वाध्यायशाला, पुस्तकदान, विद्यादान, शिक्षार्थियों आदि को आहार, औषधि, शिक्षासाधनों का प्रदान करना, निर्धन साधर्मी भाइयों को यथायोग्य सहायता देकर उन्हें धर्म में दृढ़ रखना तथा धर्मोत्साह बढ़ाना आदि उत्तमोत्तम कार्यों में करना लौकिक दृष्टि से भी सुखदायक है और पारलौकिक लाभ के लिए भी वह हेतुभूत है। इसलिए तृष्णा के दुःख को न्यून करने के लिए परिग्रहपरिमाणव्रत को स्वीकार करना श्रेष्ठतर कार्य है।१७५ ।


धनादीनां कृतस्यैव प्रमाणस्य बहि र्न च ।
गन्तव्यं तत्त्वतो भव्यैर्यतः स्यात् सौख्यदा गतिः ॥177॥

अर्थ: धन्य-धान्यादि दस प्रकार का परिग्रह है। परिग्रहपरिमाण व्रत में उनका प्रमाण इस प्रकार किया था कि मैं अपने जीवन में इतने मकान रखूँगा, इतना सोना रखूँगा इत्यादि प्रमाण द्वारा गृहीत सम्पत्ति में ही अपने जीवन का निर्वाह करता था। यदि कदाचित् लोभवश या परिस्थितिवश गृहस्थ को ऐसा प्रसंग आवे कि उसकी इच्छा अपने परिग्रह की मर्यादा के उल्लंघन करने की हो जाय तो उसे अपने पर नियन्त्रण करना चाहिए और कदाचित् भी अपनी मर्यादा का भंग प्राणान्त होने पर भी नहीं करना चाहिए। इस प्रकार दृढ़ता से व्रत पालन करनेवाला मनुष्य स्वर्ग गति में सुखपूर्वक जीवन यापन करता है। अन्यथा इस लोक में अपवादादि तथा परलोक में नरकादि गति का उसे पात्र बनना पड़ता है। अतः अतिचार पिशाचों से सदा व्रत का रक्षण करना चाहिए। कैसी भी अवस्था में अपने व्रत में अतिचार नहीं लगना चाहिए। अतिचार धीरे-धीरे व्रत को समाप्त कर देते हैं और तब व्रती अव्रत की भूमिका में आ जाता है। एक बार व्रत से छूटा प्राणी दुबारा व्रत की भूमिका में बड़ी कठिनता से आरोहण करता है और हतोत्साह हो जाता है। अतः व्रतों में सदा उत्साह रहे इसके लिए यह आवश्यक है कि अतिचारों से सर्वथा व्रतों को बचाये ।


प्रश्नः - दिग्व्रतलक्षणं किं स्यात्तदतिचाराश्च के वद।

पापस्य दुःखजनकस्य निरोधनार्थं
कृत्वा प्रसिद्धनगरादिदिशः प्रमाणम् ।
द्रव्यार्जनाय न हि गच्छति तद्बहिर्यः
स्याद्दिग्व्रतं ह्यनुपमं सुखदञ्च तस्य ॥178॥

अर्थ: दिग्व्रत का क्या लक्षण है और उसके अतिचार कौन हैं? कृपाकर कहें - पञ्चाणुव्रतों के स्वरूप निर्देश करने के बाद आचार्य दिग्व्रतादि तीन गुणव्रतों का स्वरूप लिखते हैं। इन गुणव्रतों से पञ्चाणुव्रतों की रक्षा होती है और उनमें गुणवृद्धि होती है।

दशों दिशाओं में प्रसिद्ध-प्रसिद्ध स्थानों को निश्चित करके उन स्थानों के आश्रय से कि मैं इस दिशा में इस पर्वत पर्यन्त ही अपने व्यापारादि गार्हस्थिक प्रयोजनों से आना-जाना, कार्य करना-कराना, अन्य किसी को प्रेरणा करना आदि करूँगा, इस क्षेत्र के बाहर मैं न जाऊँगा।

इस व्रत का तात्पर्य स्पष्ट है। व्रती का ध्येय यह है कि यद्यपि मेरे अणुव्रत है। अर्थात् एकदेश पाप मेरे जीवन में विद्यमान है उसका त्याग मेरे संभव नहीं है तथापि यदि कुछ निश्चित क्षेत्र में ही मैं अपना निर्वाह कर सकता हूँ तो अपनी आजीविका आदि के लिए सारे संसार में क्यों दौड़ा-दौड़ा फिरूँ। सर्व क्षेत्र को पापमय क्यों बनाऊँ। यदि मैं अपने कार्यक्षेत्र की सीमा बांध लेता हूँ तो उस क्षेत्र के बाहर मेरे सब पापों का पूर्ण त्याग बन जाता है। इस ध्येय को सामने रखकर व्रती दिग्व्रत को ग्रहण करता है।

वह अपने जीवन भर उन-उन सीमाओं का उल्लंघन व्यापार, लोभ, सुरक्षा और भोगोपभोग आदि किन्हीं कारणों के उपस्थित होने पर भी नहीं करता। अपनी सीमा के भीतर ही भीतर व्यापार करता है। यदि विपत्ति आ जाय तो उसके भीतर ही अपनी रक्षा का उपाय करता है और यदि संभव न हो तो समाधिमरण स्वीकार कर लेता है, मर्यादा को लांघता नहीं। मर्यादा के बाहर यदि कोई लाभ का सौदा मिलता है तो न लायगा, न मँगायगा। यदि कोई अपना यहाँ शत्रु हो या मित्र हो तो बैर या स्नेह के वश भी वहाँ न जायगा। यदि कर्जदार कर्ज लेकर भाग जाय तो वह सन्तोष रखेगा पर सीमा का उल्लंघन न करेगा। यदि सीमा बाहर उत्तमोत्तम भोगोपभोग की प्रचुर सामग्री सहज ही उपलब्ध होती हो तो वह इच्छा निरोध करेगा, सीमा बाहर न जायगा।

इस तरह इस व्रत के पालन से गृहस्थ को निर्लोभ वृत्ति आती है। रागद्वेष हीन होता है। धन की स्पृहा कम होकर व्रत के प्रति श्रद्धा बढ़ती है। भोगोपभोग में तृष्णा घटती है। संकल्प विकल्प घटते हैं। अतः दुःखों से बचने के लिए अपने शारीरिक पाप कार्यों की क्षेत्र मर्यादा हो जाने से वह पाप और उसके फल से कुछ अंशों में बच जाता है। इस व्रत का परिपालन सुखदायी है, अहिंसादि व्रतों का पोषक है, अतः अणुव्रती को यह व्रत पालना गुणकर है ।


ऊर्ध्वाद्यतिक्रमा निन्द्या न कार्या दुःखदाः सदा ।
यतः स्वस्थो भवेत्स्वात्मा संसारार्णवपारगः ॥179॥

अर्थ: दिग्व्रत के ग्रन्थान्तरों में पाँच अतिचार बताए हैं। ये अतिचार व्रत का एकदेश भंग कर देते हैं। व्रतभ्रष्ट मनुष्य संसार से पार नहीं हो सकता। आत्मा स्वात्मरूप से विचलित हो जाता है, इसलिए ऐसे निन्दनीय अतिचारों से सदा दूर रहना चाहिए। वे अतिचार ये हैं-प्रमाद या विस्मरण से ऊर्ध्वदेशका, उल्लंघन कर देना। अर्थात् जितनी मर्यादा पहिले की थी कि मैं ऊर्ध्व दिशा में ४० या ५० या ६० या १०० फुट ऊपर चढ़ूँगा उस मर्यादा को लांघ जाना यथा - वायुयान से भ्रमण करते समय पर्वत के ऊपर, मीनार या कीर्तिस्तम्भादिकों के ऊपर चढ़ते समय यह मर्यादा टूट सकती है। इसी प्रकार उक्त कारणों से ही अधोदिशा का उल्लंघन करना दूसरा अतिचार है। पूर्वादि आठ तिर्यग्दिशाओं का उल्लंघन करना तिर्यग्दिशाव्यतिक्रम नामक तृतीयातिचार है। चौथा अतिचार है क्षेत्रवृद्धि। यह इस प्रकार कि पूर्वादि दिशाओं में किसी ने १००-१०० योजन की मर्यादा ले रखी है। कुछ समय बाद पूर्व में तो १० योजन का ही काम पड़ा पर उत्तर में १५० योजन जाना आवश्यक ज्ञात हुआ। तब पूर्व में ५० घटाकर उत्तर में ५० योजन जोड़कर यह समझना कि हमने व्रत भंग नहीं किया यह चतुर्थ क्षेत्रवृद्धि नामा अतिचार है। व्रत की मर्यादा का स्मरण न रखना लापरवाही करना यह विस्मरण नाम का पाँचवाँ अतिचार है। इस प्रकार ये पाँच अतिचार त्याज्य हैं। तब ही व्रत निर्दोष रह सकता है ।


दिग्व्रतनियते देशे परमितकालं पुनश्च सङ्कोचः ।
देशावकाशिकाख्यं तद्व्रतमुदितं विशेषज्ञैः ॥180॥

अर्थ: दिग्व्रत में आजन्म के लिए दशों दिशाओं में आवागमन के क्षेत्र की मर्यादा ली थी। देशव्रती यह सोचता है कि पूर्व दिशा में १०० योजन की मर्यादा है तथापि आज या दो चार दिन तक पूर्व दिशा में १०० योजन जाना नहीं है, अतः यदि मर्यादा का संकोच कर लिया जाय तो कोई हानि नहीं है ऐसा विचार कर दिग्व्रत की मर्यादा के भीतर ही भीतर अपनी आवश्यकता को देखकर तदनुसार आने जाने के लिए क्षेत्र की मर्यादा का १ दिन २ दिन, अथवा १० दिन के लिए प्रमाण कर लेता है वह देशावकाशिकव्रत कहलाता है।

देशव्रती देशव्रत की मर्यादा का कभी उल्लंघन नहीं करता। भोगोपभोग के साधनों की प्राप्ति के लिए अथवा व्यापारादि कार्य करने के लिए अपनी मर्यादा के भीतर ही प्रयत्न करता है, उसके बाहर नहीं।

इस कार्य के करने से उसके कषायों में और भी क्षीणता आती है, लोभवृत्ति घट जाती है, उदारता आ जाती है, त्याग और संयम की भावना जागृत हो उठती है। अतः पंचाणुव्रतों की स्थिति को पुष्ट करके उनमें गुणवृद्धि करनेवाले ये व्रत हैं, अतः ग्राह्य हैं ।


आनयनाद्यतिचारास्त्याज्याः सन्तापकारकाः ।
यतः स्यात्स्वात्मशुद्धिस्ते निवासोऽपि निजात्मनि ॥181॥

अर्थ: आनयन, प्रेष्यप्रयोग, शब्दानुपात, रूपानुपात और पुद्गलक्षेपण ये पाँच अतिचार ग्रंथान्तरों में लिखे गए हैं। उन सबको आदिपद से स्वीकार करते हुए, आचार्य प्रतिपादन करते हैं कि देशव्रत में जो क्षेत्र मर्यादा दिग्व्रत की विशाल मर्यादा में और भी संकोच कर बाँधी गई है, वह जितने समय के लिए है उतने समय तक अपने क्षेत्र के बाहर के प्रदेश में न तो किसी व्यक्ति को भेजकर कार्य कराना चाहिए और न किसी वस्तु को मर्यादा के बाहर क्षेत्र में भेजना चाहिए। यदि ऐसा करे तो क्षेत्रमर्यादा करने का वास्तविक प्रयोजन नष्ट हो जाता है। अतः व्रत लेने की जो मूल भावना है उसकी रक्षा करने के लिए इन दोषों का त्याग करे। क्षेत्र की मर्यादा के भीतर ही भीतर लेना, देना, व्यापार व्यवहार आदि करना चाहिए। भले ही उसमें कष्ट हो, पर उसको सहन कर शान्त रहना चाहिए, यही तो व्रत है।

इसी प्रकार अमर्यादित क्षेत्र से कोई वस्तु या व्यक्ति को बुलाना अथवा आदेश देकर उस क्षेत्र में स्थित पुरुष से ही उस क्षेत्र के व्यापारादि कार्य को कराना यह भी दोषकारक है। यदि किसी को न भेजे, न बुलावे, न शब्दोच्चारण पूर्वक आदेश दे, पर केवल अपने संकेत द्वारा बहिःक्षेत्र में स्थित अपने कार्यकारी व्यक्ति को स्वाभिप्राय समझा दे तो भी रूपानुपात नाम अतिचार है। मर्यादा बाहर कोई वस्तु फेंकना, पत्र भेजना इत्यादि पुद्गल द्रव्य का भेजना और उससे कार्य करना यह भी अतिचार है।

ये सब अतिचारों के उदाहरण मात्र हैं। शास्त्रकारों ने प्रत्येक व्रत के जो ५-५ अतिचार बताए हैं वे उदाहरण मात्र हैं ऐसा समझना चाहिए। उन जैसे अन्य कार्य भी उसी कोटि में गिने जाँयगे। जैसे तार व टेलीफोन द्वारा समाचार भेजना शब्दानुपात है। चिट्ठी भेजना, पार्सल भेजना, मनीआर्डर भेजना आदि पुद्गलक्षेप है। इत्यादि अनेकानेक कार्य हैं जिनका नाम भले ही स्पष्ट न आया हो पर वे सब इन अतिचारों में अन्तर्गर्भित


स्वान्यात्मदुःखजनिका न च पापशिक्षा
देया कदापि न च हिंसकवस्तुदानम् ।
त्याज्यं तथा स्वहितशून्यधनं ह्यनर्थं-
त्यागव्रतं स्वसुखदञ्च भवेद्यतस्ते ॥182॥

अर्थ: गृहस्थ एकदेशव्रत का धारी है, अतः गार्हस्थिक प्रयोजन से जो आरम्भ, उद्योग और व्यापार आदि के कार्य हैं उनका त्याग उसने नहीं किया है। तथापि उसके व्रत में इस अनर्थ दण्ड व्रत से विशेषता आ जाती है। जिन कार्यों के बिना किए भी उसका निर्वाह हो जाता है उन कार्यों के आरम्भ से बचना यह अनर्थ-दण्डव्रत है। जिन गृहस्थारम्भों का उसके त्याग नहीं है उनके करने में व्रतभंग भले ही न हो पर पाप तो होता ही है। उतना त्याग और हो जाय तो अणुव्रत महाव्रत जैसे बन जाते हैं। अतः जब तक उसके महाव्रत धारण करने की सामर्थ्य भीतर से नहीं उत्पन्न हुई तब तक अणुव्रतधारी यह विचार रखता है कि मैं अत्यावश्यक होने पर ही आरम्भ कार्य करूँ। यदि बिना आरम्भ के भी मेरा निर्वाह हो सकता हो तो मैं उन आरम्भों को जो व्यर्थ ही पापबंध के हेतु हैं न करूँ। ऐसा करना भी व्रत संज्ञा को प्राप्त कर लेता है और उसे ही अनर्थदण्डव्रत कहते हैं।

बिना प्रयोजन भूमि खोदना, पानी सींचना, हवा करना, अग्नि जलाना या बुझाना, वृक्ष काटना, उसके पत्र व फल फूलों का तोड़ना, तथा किसी को अनेकानेक आरंभों को करने का उपदेश देना, पापारम्भ की क्रिया सिखाना, हिंसा के साधनों का प्रदान करना, स्वयं हिंसा झूठ चोरी आदि का त्याग होते हुए भी अपने पुत्र मित्रादि को जिन्हें उक्त पापों का त्याग नहीं है उन्हें यह समझकर कि मैं स्वयं तो करता नहीं हूँ और इन्हें त्याग नहीं है अतः इनको लाभ मिल जाय इस अभिप्राय से पापारम्भ के उपायों का बताना, कामवर्द्धक, हिंसा पोषक, चोरी विश्वासघात छल ठगोरी के विविध उपाय बतानेवाली पुस्तकों का पठन-पाठन करना, अथवा ऐसे खेल- तमाशे सिनेमा नाटक आदि देखना, किसी का अहित हो जाने पर हर्ष मानना, चोरी हो जाने पर प्रसन्न होना अथवा किसी के दध-बन्धन हो जाने का विचार करना, चोर कथा आदि विकथा करना, बिना प्रयोजन बाजार में हाट में गली कूचों में वेश्या व्यभिचारिणी कुट्टनी आदि के निवास स्थानों की ओर व चोर व्यभिचारी जुआरी लोगों के अड्डों पर चक्कर लगाना अनर्थदण्ड हैं। इत्यादि कार्य अपने तथा दूसरों के हित के विरुद्ध होने से नहीं करने चाहिए। इनसे कर्ता का कोई लौकिक प्रयोजन भी नहीं सधता किन्तु पाप का वृथा बंध हो जाता है। अतः निष्प्रयोजन पाप से बचना चाहिए ।


कन्दर्पकौत्कुच्याद्यतिचारा भ्रान्तिकारकाः ।
त्याज्या ज्ञात्वेति भव्यैः स्यात् स्वस्थः स्वात्मा सदा सुखी ॥183॥

अर्थ: हँसी करना, रागोत्पादक व्यंग्य वचन बोलना, कामोत्पादक दुश्चेष्टाओं का वर्णन करना कन्दर्प है।उक्त अभिप्राय पूरक शारीरिक दुश्चेष्टाएँ कौत्कुच्य है। जिन वचनों या चेष्टाओं से दूसरे प्राणियों को क्रोध, अभिमान, माया, लोभ आदि कषायों की प्रबलता हो उठे, झगड़े हो जाँय, मार-पीट हो जाय, कलह विसंवाद हो जाय, बैर बढ़ जाय वे भी इन दोनों अतिचारों में सम्मिलित हैं। वाचालता करना बिना प्रयोजन किसी की भी बातचीत के मध्य में अधिकता से बोलना मौखर्य है। अपने भोगोपभोग के योग्य भी हों, ऐसे गृह, आभूषण, सोना, चाँदी, रुपया, वस्त्र अथवा अन्य अनेक प्रकार के साधनों का अपनी आवश्यकता की पूर्ति हो जाने के बाद भी लोभवृत्ति से तथा अनादिकालीन परिग्रह संज्ञा, मैथुन संज्ञा, आहार संज्ञा तथा भय संज्ञा इन चतुर्विध संज्ञाओं के संस्कार से अधिकाधिक संग्रह करना तथा यह वस्त्र अच्छा लगता है इस भाव से अनेक फैसनों के पदार्थों का, जिनसे आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती किन्तु केवल रागभाव प्रबल होता है, संग्रह करना अतिप्रसाधन नामक अतिचार है। पाँचवाँ है असमीक्ष्याधिकरण अर्थात् बिना विचारे, बिना देखे, शोधे अनावश्यक रूप से भी विविध प्रवृत्तियाँ करना। ये पाँच उदाहरण रूप से अनर्थदण्ड व्रत के अतिचार बताए गए हैं। वास्तव में असंख्यात लोक प्रमाण कषायें जीवों में हैं जिनकी पूर्ति न कभी हुई और न होगी। जीव अनादि से ही उन कषायों द्वारा अभिभूत है, अतः शारीरिक आवश्यकता न भी हो तो भी वह विविध प्रवृत्तियाँ, विविध चेष्टाएँ और विविध वाग्व्यापार करता है। इस भ्रांति को छोड़कर ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे आत्मा सदा सुखी और स्वाधीन रहे ।


वाक्कायचित्तचलनञ्च निरुद्ध्य साम्यं
धृत्वात्मबाह्यसकले भवदे पदार्थे।
लीनो भवेन्निजपदे हृदि यः स धीरः
सामायिकव्रतयुतो भवति प्रकामम् ॥184॥

अर्थ: मन-वचनव्यापार और काय के अवलंबन से आत्मप्रदेशों में हलचल होती है। यही हलचल आत्मा को कर्माधीन करने में हेतु है। जब संसार के पदार्थों की ओर आत्मा का उपयोग होता है तब उस अनात्मयोगी के उन पदार्थों में आत्मसुख प्राप्त करने की कल्पना उठती है। जो पदार्थ इन्द्रिय विषयों के लिए साधक पड़ने लगते हैं उन्हें इष्ट मानकर संग्रह करता है और जो असाधक हों उनसे दूर रहना चाहता है। प्रत्येक पदार्थ में उसे भेददृष्टि प्राप्त हो जाती है। यदि एक आम का फल हाथ आया तो उसमें रसभाग से प्रीति और छिलका आदि के प्रति अप्रीति पैदा हो जाती है। इसी प्रकार प्रीतिदायक व्यक्ति से प्रीति और अन्य से अप्रीति। कभी-कभी इष्ट पादर्थ के अनेक ग्राहक होने से भी पारस्परिक संघर्ष की स्थिति आ जाती है। संसार में यह प्रवृत्ति जीव की अनात्मबुद्धि होने के कारण अनादि से है।

सामायिक व्रत से यह रोग दूर हो जाता है। सामायिक व्रती आत्मभिन्न इन पदार्थों को ही आत्महित के बाधक मानकर उस ओर अपने मन, वचन और काय का व्यापार नहीं जाने देना चाहता। तीनों योगों की प्रवृत्ति आत्मतत्त्व या परमात्मतत्त्व के स्वरूपालिंगन में ही करता है। यदि वह इस प्रयोग में सफल होता है तो आत्मबाह्य पदार्थों में उसे कोई पदार्थ इष्ट या अनिष्ट कर प्रतीत नहीं होते। उनमें कोई भेद भाव नहीं होता। सब पदार्थों में साम्यभाव उत्पन्न हो जाता है। वह समझता है कि ये अनात्मपूत पदार्थ हैं इनमें राग और द्वेष क्यों? पर पदार्थ मानकर उनके प्रति उपेक्षा और आत्मतत्त्व को निजस्वरूप मानकर उसके प्रति उपादेयता का भाव जागृत होता है। इस साम्य परणति का नाम ही सामायिक है। यह व्रत जिसे हो वह समझदार पुरुष सामायिक व्रत का व्रती है। यह व्रती सदा अपनी दृष्टि में यह रखता है कि आत्मबाह्य पदार्थों में कदाचित् भी राग द्वेष न हो। सबको एक ही दृष्टि से देखता है कि ये पर हैं मेरे लिए अनुपादेय हैं। सबपर समान भाव का नाम ही साम्य है। उसी साम्य भाव की प्राप्ति का प्रयत्न सामायिक है ।


संरम्भादिकभेदाद्वा कायकृतादिभेदतः ।
क्रोधादिसंयुता जीवा पापञ्चाष्टोत्तरं शतम् ॥185॥

अर्थ: गृहाश्रम में प्रतिदिन जो पुण्य या पाप के कार्य होते हैं उनका विभाजन १०८ प्रकार का किया गया है। उन १०८ प्रकार के पापों केप्रक्षालन हेतु १०८ बार परमात्मा का नाम स्मरण करना आवश्यक है। १०८ पाप कौन से हैं उनका विवरण किस भाँति हैं, आगे यह बतलाते हैं - सर्वप्रथम मनुष्य उद्देश्य बाँधता है, कार्य करने का संकल्प करता है। इस उद्देश्य बंधन या संकल्प करण को संरम्भ कहते हैं। संकल्प के बाद उसे पूरा करने के लिए उस कार्य के पूर्ण करने योग्य साधनों को एकत्रित करने को सामारम्भ कहते हैं। साधनों के संगृहीत हो जाने पर उस कार्य का प्रारम्भ हो जाता है उसे शास्त्रकार आरम्भ कहते हैं। इस तरह इन तीनों को यह प्राणी मन, वचन व काय की सहायता से करता है, दूसरों से कराता है अथवा करनेवाले व्यक्ति के कार्य की अनुमोदना करता है। इस प्रकार ३ ३ ३ २७ प्रकार के इन पापों को क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायों के वश करता है। इस कारण पापों के भेद २७ ४ १०८ हो जाते हैं। जितनी संख्या में गृहाश्रम में ये पाप संभव हैं उतने दाने ही एक जपमाला में नियत किए गए हैं। यद्यपि जैनेतर बंधु भी १०८ दाने की माला जपते हैं, पर माला में १०८ दानों के रहने का क्या हेतु है यह उन्हें ज्ञात नहीं। जैनाचार्यों ने उसका उक्त प्रकार से स्पष्ट विवेचन किया है। इन १०८ विधि से होनेवाले दुःखदायी संसार परिभ्रमण के हेतुभूत पापों से बचने के लिए सामायिक व्रती सामायिक के समय जपमाला के आश्रय से अथवा अपनी कराङ्गुलियों की सहायता से १०८ बार परम पूज्य परमात्मा का नाम स्मरण करे तो उसके दैनिक पापों का दैनिक प्रक्षालन हो जाता है। पापों का पहाड़ एकत्रित नहीं होता, अतः सामायिकव्रती का प्राथमिक कर्त्तव्य जिनेन्द्र के नामों का संस्मरण है।१८५ ।


प्रतिदिनं प्रकुर्वन्ति दुःखदं तत्त्वतस्सदा ।
तन्नाशाय जपं कुर्याद् भक्त्या ह्यष्टोत्तरं शतम् ॥186॥

अर्थ: गृहाश्रम में प्रतिदिन जो पुण्य या पाप के कार्य होते हैं उनका विभाजन १०८ प्रकार का किया गया है। उन १०८ प्रकार के पापों केप्रक्षालन हेतु १०८ बार परमात्मा का नाम स्मरण करना आवश्यक है। १०८ पाप कौन से हैं उनका विवरण किस भाँति हैं, आगे यह बतलाते हैं - सर्वप्रथम मनुष्य उद्देश्य बाँधता है, कार्य करने का संकल्प करता है। इस उद्देश्य बंधन या संकल्प करण को संरम्भ कहते हैं। संकल्प के बाद उसे पूरा करने के लिए उस कार्य के पूर्ण करने योग्य साधनों को एकत्रित करने को सामारम्भ कहते हैं। साधनों के संगृहीत हो जाने पर उस कार्य का प्रारम्भ हो जाता है उसे शास्त्रकार आरम्भ कहते हैं। इस तरह इन तीनों को यह प्राणी मन, वचन व काय की सहायता से करता है, दूसरों से कराता है अथवा करनेवाले व्यक्ति के कार्य की अनुमोदना करता है। इस प्रकार ३ ३ ३ २७ प्रकार के इन पापों को क्रोध, मान, माया और लोभ इन चार कषायों के वश करता है। इस कारण पापों के भेद २७ ४ १०८ हो जाते हैं। जितनी संख्या में गृहाश्रम में ये पाप संभव हैं उतने दाने ही एक जपमाला में नियत किए गए हैं। यद्यपि जैनेतर बंधु भी १०८ दाने की माला जपते हैं, पर माला में १०८ दानों के रहने का क्या हेतु है यह उन्हें ज्ञात नहीं। जैनाचार्यों ने उसका उक्त प्रकार से स्पष्ट विवेचन किया है। इन १०८ विधि से होनेवाले दुःखदायी संसार परिभ्रमण के हेतुभूत पापों से बचने के लिए सामायिक व्रती सामायिक के समय जपमाला के आश्रय से अथवा अपनी कराङ्गुलियों की सहायता से १०८ बार परम पूज्य परमात्मा का नाम स्मरण करे तो उसके दैनिक पापों का दैनिक प्रक्षालन हो जाता है। पापों का पहाड़ एकत्रित नहीं होता, अतः सामायिकव्रती का प्राथमिक कर्त्तव्य जिनेन्द्र के नामों का संस्मरण है।१८५ ।


युग्मम्

सत्प्रतिक्रमणं पश्चात् कार्यं निष्कामतो जनैः ।
स्वात्मशुद्धिर्यतः स्यात् कौ प्रेमवृद्धिः परस्परम् ॥187॥

अर्थ: प्रत्येक व्रती के लिए प्रतिक्रमण एक आवश्यक कर्म है। बिना प्रतिक्रमण के मुनि या श्रावक अपने व्रतों में जीवित नहीं रह सकता। उसकी पदमृत्यु बहुत शीघ्र हो जायगी। प्रतिक्रमण व्रती के लिए रसायन है। दिव्यौषधि है। आत्मदोषों का स्मरण कर उसे दूर करने की भावना से व्रती जब अपने आप यह संकल्प करता है कि मैं इन पापों से मुक्त हो जाऊँ! मुझसे अब ऐसे पाप न बनें ऐसा प्रयत्न करूँगा तब वह प्रतिक्रमण का कर्ता माना जाता है। यदि हम अपने पापों पर स्वयं पश्चात्ताप करें तो हमारा वैरी भी शान्त हो जाता है। वह हमें क्षमा कर देता है। परस्पर प्रेम की वृद्धि होती है, अतः व्रती को प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए।
अपनी आत्मा से भिन्न मूर्तिक या अमूर्तिक पर पदार्थों का विचार कर व चिह्नों से उनकी परीक्षा कर उनमें न उलझना तथा उन्हें आत्महित का बाधक समझ उनकी उपेक्षा करना और स्वात्मचिंतन कर स्वात्मा में लीन होना उसमें ही निवास करना सामायिक व्रत है। इस सर्वोच्च्य अवस्था की प्राप्ति के लिए ही नाम स्मरण तथा प्रतिक्रमण का उपदेश दिया गया है।१८७ ।


वस्त्वन्यत्स्वात्मनो भिन्नं त्यक्त्वा ज्ञात्वेति चिद्गतः ।
स्वात्मन्येव निवासः स्यात् परं सामायिकं व्रतम् ॥188॥

अर्थ: प्रत्येक व्रती के लिए प्रतिक्रमण एक आवश्यक कर्म है। बिना प्रतिक्रमण के मुनि या श्रावक अपने व्रतों में जीवित नहीं रह सकता। उसकी पदमृत्यु बहुत शीघ्र हो जायगी। प्रतिक्रमण व्रती के लिए रसायन है। दिव्यौषधि है। आत्मदोषों का स्मरण कर उसे दूर करने की भावना से व्रती जब अपने आप यह संकल्प करता है कि मैं इन पापों से मुक्त हो जाऊँ। मुझसे अब ऐसे पाप न बनें ऐसा प्रयत्न करूँगा तब वह प्रतिक्रमण का कर्ता माना जाता है। यदि हम अपने पापों पर स्वयं पश्चात्ताप करें तो हमारा वैरी भी शान्त हो जाता है। वह हमें क्षमा कर देता है। परस्पर प्रेम की वृद्धि होती है, अतः व्रती को प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए।
अपनी आत्मा से भिन्न मूर्तिक या अमूर्तिक पर पदार्थों का विचार कर व चिह्नों से उनकी परीक्षा कर उनमें न उलझना तथा उन्हें आत्महित का बाधक समझ उनकी उपेक्षा करना और स्वात्मचिंतन कर स्वात्मा में लीन होना उसमें ही निवास करना सामायिक व्रत है। इस सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति के लिए ही नाम स्मरण तथा प्रतिक्रमण का उपदेश दिया गया है।१८७ ।


युग्मम्

सिद्धार्हद्वन्दनां कृत्वा भक्त्यात्मनः स्पृहोज्झनात् ।
स्वात्मोत्थरसपानं हि श्रीदं स्याद्वन्दनाव्रतम् ॥189॥

अर्थ: १ - लौकिक लाभ प्रतिष्ठा अथवा अन्य प्रयोजन की अपेक्षा न करके केवल श्रद्धावश उत्पन्न हुई जिनभक्ति के कारण अर्हन्त और सिद्ध परमात्मा की वन्दना करना चाहिए। ये दोनों परमेष्ठी क्रमशः बहुदेश या सर्वदेश रूप से द्रव्यकर्म और भावकर्म से रहित होकर शुद्ध स्वात्मस्वरूप को प्राप्त कर चुके हैं। इनके स्वरूप चिन्तन से भक्त पुरुषों को स्वात्मा के स्वरूप का दर्शन होता है। शुद्धान्तःस्स्वरूप परमात्मा हमारे आत्मा के प्रतिबिम्ब जैसे हैं। उन्हें देखकर हम आत्मस्वरूप की पहिचान करते हैं। आत्मोत्पन्न अमृतरस का स्वाद हमें उनके दर्शन से प्राप्त होता है, अतः जिन की वन्दना कल्याणप्रद है।


चतुर्विंशतिदेवानां गुणान् स्तुत्वाऽऽत्मनोऽर्थतः ।
स्तुतिव्रतं वरं स्याद्धि चिद्रूपोत्थान्नभक्षणम् ॥190॥

अर्थ: २ - ऋषभदेव से महावीर पर्यन्त वर्तमान चौबीस तीर्थंकर भगवान् अथवा भूतकाल या भाविकाल में होनेवाले चौबीसों तीर्थंकर अथवा विदेहक्षेत्रों में विद्यमान सीमंधरादि बीस तीर्थंकर हैं। इन सबके गुणों का बार-बार स्मरण कर यह विचार करना कि मेरे आत्मा में भी ये गुण विद्यमान हैं। मेरा शुद्ध स्वरूप तो इसी प्रकार है। इस तरह जिनेन्द्र की स्तुति के आधार से अपने स्वरूप का चिन्तवन करना आत्मा की बुभुक्षा को आत्मगुण रूपी अन्न भक्षण से शान्त करना ही जिनेन्द्र-स्तुति है।


द्रव्यादौ स्वकृतं त्यक्त्वा विभावमात्मनस्तमः ।
स्थितिरेवात्मसौख्ये हि स्यात्प्रतिक्रमणं व्रतम् ॥191॥

अर्थ: ३ - तीसरा अंग है प्रतिक्रमण। इसका स्वरूप इस प्रकार है यह विचार करना कि मुझसे जो प्रमादवश अपराध हुए हैं वे दूर हों। मेरे दोष मुझसे पृथक् हों। मैं निर्दोष बनूँ। इस प्रकार के विचारों से अपनी आत्मा के कृत अपराधों की आलोचना पूर्वक उनसे अपने को मुक्त करने की भावना करना प्रतिक्रमण है। व्रती पुरुष को दिन में जो दोष प्राप्त हुए हों उनको दूर करने का परिणाम दैवसिक प्रतिक्रमण है। रात्रि सम्बन्धी दोषों को दूर करना रात्रिकप्रतिक्रमण है। इसी तरह पाक्षिक, मासिक, चातुर्मासिक और वार्षिक दोषों को दूर करना उक्त नाम के प्रतिक्रमण हैं। जीवन के अन्त में जीवनभर के दोषों की विशुद्धि के लिए भी प्रतिक्रमण किया जाता है। उक्त सातों प्रसंगों पर अपने दोषों का स्मरण कर आत्मनिन्दा पूर्वक उनका विशोधन करना सात प्रकार का प्रतिक्रमण है।


सावद्यद्रव्यसंजातं दोषं मुक्त्वात्मनः स्पृहाम् ।
शुद्धद्रव्ये स्थितिं कुर्यात् प्रत्याख्यानव्रतं भवेत् ॥192॥

अर्थ: ४ - अतीत काल के दोषों को जैसे निन्दा गर्हापूर्वक तथा वर्तमान दोषों को आलोचनापूर्वक विशुद्ध करके फिर यह विचार करना कि भविष्यकाल में मैं इस प्रकार के दोषों को अपने में न लगने दूँगा। ऐसे प्रयत्न का नाम प्रत्याख्याननामा चतुर्थ अंग है।


स्वात्मास्ति शुद्धचिद्रूपो भिन्नो मे देहतः सदा ।
मत्वेत्यात्मनिवासः स्यात्कायोत्सर्गव्रतं वरम् ॥193॥

अर्थ: ५ - अपने शरीर से ममत्व परिणाम (यह मेरा है ऐसा परिणाम) त्यागकर निर्मोह भाव को प्राप्त कर स्थिर होकर पञ्चनमस्कार मंत्र का ध्यसान करना कायोत्सर्ग नामा पाँचवाँ अंग है। दोनों हाथ नीचे उन्मुक्त छोड़ना, दोनों पैरों के बीच ४ अंगुल मात्र अन्तर रखकर खड़े होना तथ काष्ठ या पाषाण की तरह स्थिर होकर जपना यह कायोत्सर्ग की मुद्रा है। मुख्य प्रयोजन कायोत्सर्ग का काय से भी निर्ममत्व होना है। इसमें नवबार, सत्ताईस बार, चौअन बार या एक सौ आठ बार भी जाप किया जाता है। सामायिक के इन पाँचों अंगों के करने में मुख्य हेतु क्या है इस प्रश्न का विचार करना आवश्यक है।


कुलकम्

मनोदुष्प्रणिधानाद्या अतिचारा भवप्रदाः ।
न कार्या भ्रान्तिदा भव्यैः स्वस्थः स्वात्मा भवेद्यतः ॥194॥

अर्थ: मन की चञ्चलता, वचनव्यापार और शारीरिक क्रिया इन तीनों योगों का सञ्चलन संसारी प्राणी के अपनी-अपनी योग्यतानुसार सदा होता रहता है। सामायिक व्रत में इन तीनों योगों को सांसारिक विषयों से और उनकी प्राप्ति या अप्राप्ति में होनेवाली कषायों से बचाकर साम्यभाव की प्राप्ति के लिए लगाने का प्रयत्न किया जाता है। यदि सामायिक व्रती अपने योगों को इस प्रयत्न से हटाकर विषय कषायों में प्रमादवश चलाता है तो उसके व्रत के लिए ये तीनों दोषरूप हैं।

तीनों ही योगों की चञ्चलता से यह जीव कर्मों के द्वारा बँधता है, क्योंकि जीव में कर्मों का प्रवेश इन्हीं के द्वारा होता है, कषायभाव इनका दृढ़ बंधन आत्मा के साथ कर देते हैं। यदि योगों की चञ्चलता मिट जाय तो कर्मों का प्रवेश ही आत्मा में नहीं हो सकता और आस्रव के अभाव में संसार-चक्र का परिभ्रमण भी मिट जाय।

यदि योग की प्रवृत्ति साम्यभाव से च्युत हो जाय तो भी उसे जिनगुण चिन्तवन में, जिनेन्द्र के नामोच्चारण में और जिनवन्दनादि कार्यों में ही लगाना चाहिए न कि विषयकषायादि के चिन्तवन आदि में। इन तीन अतिचारों के सिवाय सामायिक का चौथा अतिचार है सामायिक के कार्य में आदरभाव न होना। अनादर होने पर सामायिक की क्रियाओं का विस्मृत हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। अतः सामायिक की क्रियाओं का भूल जाना यह पाँचवाँ अतिचार है। इस प्रकार सामायिक व्रत के पाँच अतिचारों का निरूपण किया।

सदोष आचरण ही अतिचार है। जिस व्रत को स्वीकार किया यदि उसके पालन करने में व्यक्ति उद्देश्य को भूल जाता है तो वह व्रत सदोष बन जाता है। उसके पास व्रत की खोल रह जाती है और उसका सारभाग नष्ट हो जाता है। सामायिक व्रती भी सामायिक को इसलिए स्वीकार किए है कि इसके द्वारा मैं उस परम साम्यावस्था को प्राप्त हो जाऊँ जो कि अन्तिम ध्येय है। यदि वह सामायिक सम्बन्धी समस्त बाह्य क्रियाओं का आलंबन कर संतुष्ट हो जाय, अपने मूलोद्देश्य को भूल जाय तो मन, वचन, काय


प्रश्नः - प्रोषधोपवासस्यास्ति किं चिह्नं मे गुरो वद।

सर्वेन्द्रियाणां सुखदं हि धर्म्यध्यानं यथावद् गृहिणां च न स्यात् ।
तत्पर्ववारेषु चतुर्विधश्चाहारं कषायं विषयं विचार्य ॥195॥

अर्थ: हे गुरुदेव! प्रोषधोपवास व्रत का स्वरूप मुझे बताइए - गृही गृह की अनेक झंझटों के कारण सम्पूर्ण सुख का निधान जो आत्मध्यान या धर्म्यध्यान है उसे सदा नहीं कर सकता है, अतः जिस प्रकार प्रातः, सायं या मध्याह्न काल में कुछ नियमित समय के लिए वह सर्व पापारम्भ का त्याग कर अपनी साम्यावस्था को अपने समीपस्थ करने के प्रयत्न स्वरूप सामायिक को स्वीकार करता है। उसी प्रकार सप्ताह में एकबार अष्टमी और चतुर्दशी के पुण्य पर्व में भी वह उस साम्यावस्था को रात्रि-दिन समीपस्थ करने का प्रयत्न करता है। इसी क्रिया का नाम प्रोषधोपवास व्रत है।

इस व्रत के पालन करने के लिए उसे सर्वप्रथम यह विचार करना पड़ता है कि मुझे आज जबतक उक्त व्रत का समय है किसी भी प्रकार का कषाय भाव चाहे वह क्रोध हो, मान हो, मायाचारी हो, लोभ हो, अथवा हास्य, रति, अरति, शोक, भय, गुगुप्सा हो अथवा स्त्री-पुरुष या अनुभय रूप विकृत परिणाम हों उसने अपने को सर्वथा बचाना है। इनमें से कोई भी कषाय या नोकषाय मुझपर अपना प्रभाव न ला सके, इसके लिए वह अपने को संवृत रखता है।

कषायों पर विजय प्राप्त करने के लिए ही वह पञ्चेन्द्रिय के विषयों को उस दिन अङ्गीकार नहीं करता। ब्रह्मचर्यपूर्वक अपना समय व्यतीत करता है। नाना रसों के स्वादरूप रसनेन्द्रिय के विषयों से बचने के लिए या तो आहार मात्र का त्याग करता है अथवा नीरस आहार ग्रहण करता है। घ्राणेन्द्रिय के विषय त्याग के लिए सुगन्धित पुष्प, तेल, इतर अथवा चंदन, केशर आदि पदार्थों का उपयोग नहीं करता। चक्षुरिन्द्रिय के विषय को जीतने के लिए देशाटन करने, नाटक, सिनेमा या अन्य दृश्यों को देखने से अपने को दूर रखता है। मधुर संगीत, वाद्य आदि कर्णेन्द्रिय के विषयों से अपने को बचाता है। अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को इस प्रकार वश में रखता है जैसे कछुआ किसी भी विपत्ति की आशंका से अपने हाथ, पैर, मुख आदि सम्पूर्ण अवयवों को एकत्रित कर संकुचित कर छिपा लेता है और अपने पृष्ठ बलपर आनेवाले सम्पूर्ण आघातों को सह लेता है पर अपने अन्य किसी भी अंग पर चोट नहीं आने देता।

उक्त उद्देश्य को पूरा करने के लिए शारीरिक उन्मत्तता पर विजय प्राप्त करने के लिए, इन्द्रियों का मान मर्दन करने के लिए, विषयों को जीतने के लिए, मन को वश में रखने के लिए और पापारम्भ की सम्पूर्ण क्रियाओं से अपने को बचाने के लिए वह उसदिन जबतक व्रत का समय है आहार का भी त्याग करता है।

इस तरह कषाय, विषय और आहार का त्याग कर निद्रापर विजय प्राप्त कर अपने समय का धर्मध्यान द्वारा सदुपयोग करने वाला व्रती प्रोषधोपवासी कहलाता है। प्रोषधोपवास के उक्त चिह्न हैं या स्वरूप हैं। यह निःसंदेह सुगति का कारण है।


त्यक्त्वोपवासः क्रियते स्वधर्मे सदा स्थितैः यैस्सुगतिश्च तेषाम् ।
श्रेष्ठोपवासोभवतीह लोके पूर्वोक्तवाक्ये न च सङ्कनीयम् ॥196॥

अर्थ: गृही गृह की अनेक झंझटों के कारण सम्पूर्ण सुख का निधान जो आत्मध्यान या धर्म्यध्यान है उसे सदा नहीं कर सकता है, अतः जिस प्रकार प्रातः, सायं या मध्याह्न काल में कुछ नियमित समय के लिए वह सर्व पापारम्भ का त्याग कर अपनी साम्यावस्था को अपने समीपस्थ करने के प्रयत्न स्वरूप सामायिक को स्वीकार करता है। उसी प्रकार सप्ताह में एकबार अष्टमी और चतुर्दशी के पुण्य पर्व में भी वह उस साम्यावस्था को रात्रि-दिन समीपस्थ करने का प्रयत्न करता है। इसी क्रिया का नाम प्रोषधोपवास व्रत है।

इस व्रत के पालन करने के लिए उसे सर्वप्रथम यह विचार करना पड़ता है कि मुझे आज जबतक उक्त व्रत का समय है किसी भी प्रकार का कषाय भाव चाहे वह क्रोध हो, मान हो, मायाचारी हो, लोभ हो, अथवा हास्य, रति, अरति, शोक, भय, गुगुप्सा हो अथवा स्त्री-पुरुष या अनुभय रूप विकृत परिणाम हों उसने अपने को सर्वथा बचाना है। इनमें से कोई भी कषाय या नोकषाय मुझपर अपना प्रभाव न ला सके, इसके लिए वह अपने को संवृत रखता है।

कषायों पर विजय प्राप्त करने के लिए ही वह पञ्चेन्द्रिय के विषयों को उस दिन अङ्गीकार नहीं करता। ब्रह्मचर्यपूर्वक अपना समय व्यतीत करता है। नाना रसों के स्वादरूप रसनेन्द्रिय के विषयों से बचने के लिए या तो आहार मात्र का त्याग करता है अथवा नीरस आहार ग्रहण करता है। घ्राणेन्द्रिय के विषय त्याग के लिए सुगन्धित पुष्प, तेल, इतर अथवा चंदन, केशर आदि पदार्थों का उपयोग नहीं करता। चक्षुरिन्द्रिय के विषय को जीतने के लिए देशाटन करने, नाटक, सिनेमा या अन्य दृश्यों को देखने से अपने को दूर रखता है। मधुर संगीत, वाद्य आदि कर्णेन्द्रिय के विषयों से अपने को बचाता है। अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को इस प्रकार वश में रखता है जैसे कछुआ किसी भी विपत्ति की आशंका से अपने हाथ, पैर, मुख आदि सम्पूर्ण अवयवों को एकत्रित कर संकुचित कर छिपा लेता है और अपने पृष्ठ बलपर आनेवाले सम्पूर्ण आघातों को सह लेता है पर अपने अन्य किसी भी अंग पर चोट नहीं आने देता।

उक्त उद्देश्य को पूरा करने के लिए शारीरिक उन्मत्तता पर विजय प्राप्त करने के लिए, इन्द्रियों का मान मर्दन करने के लिए, विषयों को जीतने के लिए, मन को वश में रखने के लिए और पापारम्भ की सम्पूर्ण क्रियाओं से अपने को बचाने के लिए वह उसदिन जबतक व्रत का समय है आहार का भी त्याग करता है।

इस तरह कषाय, विषय और आहार का त्याग कर निद्रापर विजय प्राप्त कर अपने समय का धर्मध्यान द्वारा सदुपयोग करने वाला व्रती प्रोषधोपवासी कहलाता है। प्रोषधोपवास के उक्त चिह्न हैं या स्वरूप हैं। यह निःसंदेह सुगति का कारण है।


युग्मम्

सन्मार्जनेनैव विना पृथिव्यां विलोकनेनैव विना पदार्थाः ।
ग्राह्या न तेषां त्यजनं न कार्यं यतो भवेत्कौ स्वपरात्मरक्षा ॥197॥

अर्थ: प्रोषधोपवास व्रती विषयों की इच्छा और कषायभाव से रहित होने के कारण जो भी कार्य करता है उसमें यह विचार अवश्य रखता है कि मेरे किसी भी कार्य के द्वारा किसी भी जीव को बाधा उत्पन्न न हो।

यदि वह ऐसा विचार न रखे, और बिना देखे तथा बिना शोधे ही चले, जीव रक्षा का विचार किए बिना ही वस्तुओं को उठाये या रखे, अशोधित स्थान व आसन पर बैठे या शयन करे, शास्त्र स्वाध्याय सामायिक आदि तथा जिन पूजनादि कार्यों में भी यद्वा तद्वा प्रवृत्ति करे, जहाँ कहीं भी जिस किसी भी प्रकार मल-मूत्र आदि शारीरिक-मलों को त्याग करे, आदर व ग्राह्येच्छा रहित आलस्य पूर्वक लापरवाही से कर्त्तव्याकर्त्तव्य का बिना विचार किए यदि कार्य करे व्यवहार करे तो उस व्रती का व्रत सदोष अर्थात् सातिचार है।

स्व-पर रक्षा व्रत का लाभ है। सदोष व्रती उक्त लाभ से वंचित रहता है। परघात की अभिलाषा न रहते हुए भी, उनके प्रति क्रोधादि कषायों का भाव न रहते हुए भी अपने प्रमाद मात्र या असावधानी से परघात हो जाता है। इस असावधानी का कारण है चित्तवृत्ति की अनेकाग्रता। चित्त यदि अनेक विचारों में अनेक चिन्तनों में मग्न रहता है तब व्रत पालन में या तत्संबंधी कार्यों के करने में स्वयं ही गलती हो जाती है। अतः व्रती को व्रत के प्रति आदर भाव रखकर चित्त की सावधानी रखनी चाहिए। यदि सावधानी रहे तो उक्त दोष उत्पन्न नहीं हो सकते।

स्वपरिणामों की अस्थिरता ही बंध का कारण है। परिणामों की स्थिरता के हेतु ही व्रत उपवासादि हैं। तब ही वे संवर (कर्मों का न आ सकना) के लिए कारण होते हैं। संवर होने से स्वात्मरक्षा ही होती है। इस प्रकार से पररक्षा की सावधानी में हमारी वास्तविक रक्षा है। संसारी प्राणी सदा ही कर्म के आगमन, बंध, उदय और उदीरणा से त्रस्त है। इस सनातनी प्रक्रिया को जब तक बन्द न किया जाय तब तक यह प्राणी सुखी नहीं बन सकता। व्रत, समिति, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परीषहविजय और चारित्र ये संवर के हेतु आचार्यों ने बताए हैं। इससे यह प्रमाणित है कि निर्दोष व्रत का यदि पालन किया जाय तो यह आत्मा नवीन कर्म बंधनों से नहीं बंधता। इस विचार से भी उक्त सम्पूर्ण दोषों को टालकर व्रत के समय साम्यभाव पूर्वक रहकर उसका सुन्दरता से विधिवत् निर्वाह करे जिससे स्व-परकल्याण हो ।


प्रश्नः - भोगोपभोगव्रतस्य किं चिह्नमत्ययाश्च के?

मोहादिकर्मरिपुसंघविनाशनार्थं कृत्वा प्रमाणमिति वस्त्रधनादिकानाम् ।
यः प्रत्यहं निजपदे निवसेत्कृतार्थी भोगोपभोगविरतः स भवेद् व्रतेशः ॥198॥

अर्थ: हे गुरुदेव! भोगोपभोग व्रत का क्या स्वरूप है और उसके अतिचार कौन कौन हैं, कृपया मुझे बताइए - पञ्चाणुव्रतों में पाँचवाँ परिग्रह परिमाण व्रत है। इस व्रत में श्रावक ने गृहीत परिग्रहों को न्यून करने के लिए धन, धान्य, वस्तु, गृह, सुवर्ण, चाँदी आदि दसप्रकार के पदार्थों को जो दैनिक उपयोग के होने से परिगृहीत हैं घटाया था। अल्प परिग्रह से ही अपना व्यावहारिक कार्य चल सके ऐसा विचार कर प्रमाण नियत किया था। इस भोगोपभोग प्रमाण व्रत द्वारा उनमें भी क्षीणता लाने का प्रयत्न किया जा रहा है।

जो पदार्थ दैनिक उपयोग में आते हैं पर जो एक बार काम में आकर नष्ट हो जाते हैं उनका दूसरी बार उपयोग नहीं हो सकता ऐसे पदार्थ भोग संज्ञा को प्राप्त होते हैं। जैसे भोजन के सब पदार्थ, शरीर पर लगने के तेल, उपटन, सुगंधित अन्य पदार्थ, नस्य, अञ्जन, गीत, नृत्य आदि। जो भोजन उदरस्थ किया गया है वह लौटाकर पुनः नहीं किया जा सकता। जो तेल फुलेल शरीर पर लगा दिया गया है वह एक बार में ही समाप्त हो गया। दूसरी बार उपयोग की आवश्यकता होने पर दूसरा भोजन पदार्थ या दूसरा तेल उपयोग में लाना पड़ेगा। व्यक्तिगत रीति पर इन पदार्थों का उपयोग इसी प्रकार किया जा सकता है। यही बात नस्य और अञ्जन की है। संगीत के जो शब्द तथा नृत्य के जो हाव भाव एक बार सामने आए वे नष्ट हो गए, दूसरी बार दूसरे शब्दों का प्रयोग गायक करेगा तथा दूसरी बार पुनः उसी प्रकार की चेष्टा नर्त्तक करेगा। वे ही शब्द अथवा वहीं हाव भाव वापिस लौटाया नहीं जा सकता। केवल पुनरुक्ति हो सकती है।

जो पदार्थ एक बार काम में आने पर भी स्थिर रहते हैं तथ जिन्हें दूसरी बार भी काम में लाया जा सकता है उन्हें ‘उपभोग’ संज्ञा प्राप्त है। जैसे वस्त्र, शय्या, गृह, लाठी, बाग-बगीचे, टेबिल, कुर्सी, खेत, सड़क, बोतल, चित्र और दर्पण आदि। इन पदार्थों के कुछ काल तक स्थिर रहने से ये अनेक बार उपभोग में लाए जा सकते हैं, अतः उपभोग कहलाते हैं। यदि विषय ग्रहण करने वाली इन्द्रियों द्वारा विभाजन करें तो रसना और श्रोत्र द्वारा गृहीत विषय भोग की श्रेणी में आते हैं तथा स्पर्शन घ्राण और चक्षु द्वारा गृहीत पदार्थ दोनों प्रकार के पाए जाते हैं। उदाहरण इस प्रकार समझना चाहिए कि शरीर पर जो तेल भोजन और उपटन आदि पदार्थ उपयोग में आते हैं वे भोग हैं। शय्या और शीत वारणार्थ वस्त्र आदि पदार्थ स्पर्शन के विषय होते हुए भी अनेक बार उपयोग में आते हैं, अतः उपभोग हैं। नस्य या इतर आदि घ्राण के भोग हैं। एकबार काम में लेने के बाद वे नष्ट हो जाते हैं। पुष्प जो कई बार सूँघा जा सकता है वह उपभोग है। पुष्पमाला को कहीं कहीं भोग में परिगणित किया है वह इस व्यवहार की अपेक्षा किया है कि पुष्पमाला का उपयोग एकबार सूँघने या गले में डालने के बाद दूसरी बार या दूसरे व्यक्ति के लिए वह अयोग्य मानी गई है ऐसा लोक व्यवहार है। पर यदि व्यवहार के चलने के नियमों की ओर ध्यान न देकर एक ही पुष्पमाला का दिन में १० बार उपयोग करें या १० व्यक्ति उसका उपयोग करें तो कर सकते हैं। इस अपेक्षा उसकी उपभोग में भी गणना की जा सकती है। नेत्र के विषयभूत पदार्थ विभिन्न दृश्य स्थिर भी रहते है अतः उपभोग रूप भी हैं, और बिजली की चमक तथा सिनेमा के परिवर्तनशील चित्र आदि भोग रूप भी हैं। वे एक बार दिखाई देते ही छाया रूप होने से समय-समय में परिवर्तित होते जाते हैं। अन्य समय में अन्य चित्र की अथवा उसी चित्र की दूसरी छाया के दृश्य दिखाई देते हैं। इस प्रकार भोगोपभोग का स्वरूप आचार्यों ने बताया है।

इन पदार्थों के उपयोग से केवल विषय और कषाय ही परिपुष्ट होते हैं अथवा कषायोद्रेक से ही हम इन पदार्थों का उपयोग करते हैं, इनका संग्रह करते हैं और इनमें ममत्व भाव करते हैं। यदि हम अपनी विषयेच्छा को कम कर सकते हैं तो हमें इनका जितना कम से कम ग्रहण हो उतना इनका कम से कम उपयोग करना चाहिए।


सचित्ताद्यतिचाराश्च केवलं दुःखदायकाः ।
दोषा न धार्मिकैः सेव्याः स्वस्थः स्वात्मा भवेद्यतः ॥199॥

अर्थ: भोगोपभोग परिमाण व्रत के पाँच अतिचार बतलाए गए हैं (१) सचित्ताहार, (२) सचित्तसंबंधाहार (३) सचित्तसंमिश्राहार, (४) अभिषव और (५) दुष्पक्वाहार। इन पाँचों से उक्त व्रत दूषित होता है।
(१) सचित्ताहार–सचित्त का अर्थ है सजीव अर्थात् जीव सहित पदार्थ। जिन पदार्थों के सेवन करने में उस पदार्थ में स्थित जीव को बाधा उत्पन्न होती है उसका सेवन सचित्ताहार है। ऐसे पदार्थ भोजनादि भोगरूप और वस्त्रादि उपभोगरूप होते हैं। यद्यपि त्रस जीव सहित पदार्थों के आहार का त्याग तो व्रती के इसके पूर्व अष्टमूलगुणों में ही हो गया है अतः उसके ऐसे पदार्थों के ग्रहण की संभावना ही नहीं की जा सकती किन्तु वनस्पत्यादि एकेन्द्रिय सहित होने से जो सचित्त कहलाता है उसके ग्रहण की संभावना ही की जा सकती है। ऐसी स्थिति में सहज ही यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जब एकेन्द्रिय वनस्पत्यादि सचित्ताहार का त्याग पञ्चम प्रतिमा से होता है तब द्वितीय प्रतिमा के भोगोपभोग प्रमाणव्रत वाले के सचित्ताहार दोषाधायक क्यों है? यदि यहाँ ही दोषाधायक होने से उसका त्याग हो जाता है तब पाँचवीं प्रतिमा किसलिए है? वहाँ क्या त्याग करता है? यह एक प्रश्न है। इसका समाधान कोई इस प्रकार करते हैं कि यद्यपि यह व्रती त्रसहिंसा का त्यागी है और स्थूल तो क्या सूक्ष्म भी त्रसादि की संभावना जहाँ की जा सकती है उसका भी दूर से परिहार करता है। तथापि ऐसे पदार्थ जिनकी मर्यादा शास्त्रों में नियमित समयतक बताई है। जैसे छने जल की एक अन्तर्मुहूर्त की और आटा अथवा पिसे हुए दूसरे अन्नादि पदार्थों की ग्रीष्म, वर्षा ओर शीत ऋतु में क्रम से ५, ३ और ७ दिन की है। परन्तु इन पदार्थों की मर्यादा समाप्त होने पर प्रमाद या भूल से यदि वे सेवन में आ जायँ तो वह भी सचित्ताहार है।
इसी प्रकार सचित्तत्याग प्रतिमावाले को स्नानादि कार्यों में प्रमाद से कच्चे जल का, या वृक्षों की सचित्त छाल का उपयोग करने में आ जाय तो सचित्ताहार का दोष प्राप्त होगा। चूँकि भोगोपभोग परिणाम व्रत द्वितीय प्रतिमा से ही प्रारम्भ हो जाता है तथा एकादश प्रतिमा तक रहता है, जिसके मध्य में सचित्तत्याग नामक पाँचवी प्रतिमा है अतः प्रतिमा में ये अतिचार जिस प्रकार से संभावनीय हैं उसी प्रकार ग्रहण करना चाहिए।


प्रश्नः - अतिथिसंविभागस्य किं चिह्नं मे गुरो वद।

स्वानन्दसौख्यनिरताय चतुर्विधाय
संघाय धर्मरसिकाय निजान्यसिद्ध्यै।
दानं क्षमादिजनकं हि चतुर्विधं यो
भक्त्या ददाति स जनोऽतिथिसंविभागी ॥200॥

अर्थ: श्रावक के १२ व्रतों में अन्तिम व्रत अतिथिसंविभाग है। यह व्रत उसके सम्पूर्ण व्रतों का मुकुटमणि है। इस व्रत के द्वारा वह अपने भीतर उदार भावनाओं को प्रोत्साहित करता है और त्याग के मार्ग पर आनंद के साथ वृद्धि को प्राप्त होता जाता है।

अतिथि उन्हें कहते हैं जिनके आने व जाने की कोई निश्चित तिथि यानि दिन न हो। महाव्रती दिगम्बर साधु आत्मसाधना के हेतु वन में विचरण करते हैं। आत्मा और शरीर के भेद का विज्ञान प्राप्त हो जाने से वे शरीर के सम्पूर्ण साधनों का त्याग कर चुके हैं। केवल स्वात्मगुणों के प्रेमी,उनकी प्राप्ति के उद्देश्य से ही अनेकापदाओं का आश्रय करने वाले धनरहित व परिग्रहरहित वे तपोधन एकान्त प्रदेशों में आत्मध्यान करते हैं।

आत्मगुणों की सम्पत्ति के स्वामी आत्मानन्द रस के आस्वादी परम अचिन्त्य अतीन्द्रिय सुख के भोक्ता वे महामुनि कठिन से कठिन तपस्याओं का अवलंबन करने पर भी किंचिन्मात्र भी दुःख नहीं मानते। पाँचों इन्द्रियों के विषयों में तथा क्रोध, मान माया, लोभ आदि कषायों में सर्वथा निस्पृह होकर वे अपनी धर्म संपत्ति को सम्हालने में ही लगे रहते हैं। उनका यही एक मात्र व्यापार है।


ये सचित्तनिक्षेपाद्या अत्ययाः पञ्चसंख्यकाः ।
ते त्याज्या दुःखदा भव्यैः सुखी स्वात्मा भवेद्यतः ॥201॥

अर्थ: इस अतिथिसंविभाग व्रत में पाँच प्रकार के अतिचारों की संभावना ग्रंथों में बताई गई है। उनकी ओर ही यहाँ आचार्य का संकेत है कि वे अतिचार अविवेकपूर्ण होने से व्रत के दूषक हैं, अतः उनका फल दुःख ही है। यह समझकर उक्त अतिचार या उन जैसे अन्य भी अतिचार भव्य पुरुषों को नहीं लगाने चाहिए जिससे व्रत निर्मल हो और उसके परमोत्तम फल को प्राप्त कर वे सुखी बन सकें। अतिचारों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है - जिन कार्यों के करने से मूलतः व्रत नष्ट न होते हुए भी अंशतः खण्डित होते हों अथवा जिनसे व्रतों में दोषोत्पादन हो ऐसे कार्य प्रमाद से हो जायँ तो वे अतिचार नाम पाते है। यहाँ अतिथिसंविभागव्रत के अतिचार निम्न भाँति कहे गए हैं - (१) सचित्तनिक्षेप, (२) सचित्तपिधान। अर्थात् सचित्त द्रव्य कमलपत्र या कच्ची मिट्टी के वर्तन आदि में भोजन योग्य द्रव्य को रखकर दान देना अथवा उससे ढक कर रखे हुए आहारादि द्रव्य को दान में देना उक्त दोनों अतिचार हैं।

पञ्चम अध्याय (श्लोक 202 से 212)

द्वादशव्रतचिह्नानि तदतीचारकाश्च ये ।
ज्ञातास्ते वद मे शेषप्रतिमालक्षणं गुरो

त्यक्त्वा कषायनिचयं समतां विधाय
शुद्धात्मधर्मविषये सुखदे स्वभावे।
चिद्रूपचैत्यनिलये निवसेत्सदा यः
सामायिकप्रतिमया स विभूषितः स्यात् ॥202॥

अर्थ: श्रावक के १२ व्रतों में सामायिकशिक्षाव्रत है, यह व्रत द्वितीय प्रतिमा में श्रावक द्वारा धारण किया गया था तथापि वहाँ यह शीलरूप था। व्रतप्रतिमावाला सामायिक करने की आदत डालता है, अभ्यास करता है और उसके अतिचारों को भी बचाने का प्रयत्न करता है तथापि यह कठिन व्रत है अतः अतिचार लग ही जाते हैं। इस प्रतिमा में यह व्रत सातिचार ही हो सकता है निरतिचार नहीं।

सामायिक का समय प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल है। तीनों कालों में कम से कम २ घड़ी, मध्यम रीति में ४ घड़ी और उत्तम रूप में ६ घड़ी सामायिक करना चाहिए। कोई कोई ऐसा कहते हैं जो सामायिक का काल मात्र २ घड़ी ही है। जो व्रत प्रतिभाधारी केवल प्रातःकाल ही सामायिक करते हैं वे २ घड़ी काल मात्र करने के कारण जघन्य सामायिक करते हैं। जो प्रातः सायं दोनों कालों में करते हैं वे मध्यम ४ घड़ी सामायिकवाले हैं। इसी प्रकार तीनों संध्याओं में दो-दो घड़ी सामायिक करना ६ घड़ी समयवाली उत्तम सामायिक है। सामायिक प्रतिमावाला उत्तम सामायिक ही स्वीकार करता है, न कि मध्यम या जघन्य। व्रत प्रतिमावाला क्रमशः जघन्य मध्यम और उत्तम सामायिक का अभ्यास करता है। उभय व्याख्यानों का निष्कर्ष इतना है कि सामायिक प्रतिमा में सामायिक शिक्षा व्रत पूर्णता को प्राप्त होता है। द्वितीय प्रतिमा में यह केवल अभ्यासात्मक है अतः अतिचारादि दोष उसे प्राप्त हो जाते हैं।

सामायिक प्रतिमावान् जो एकान्त हो, जन संपर्क रहित हो, जीवजन्तु की बाधा रहित हो, अति शीत या अति उष्ण न हो ऐसे योग्य क्षेत्र में योग्य काल का विचार कर खड्गासन या पद्मासन से अथवा अर्धपद्मासन से अत्यन्त विनय भाव से पंचपरमेष्ठी की भक्ति को हृदय में धारण कर उनके आदर्श पर पहुँचने की भावना रखता हुआ मानसिक वाचनिक तथा कायिक प्रवृत्तियों की चंचलता को रोक कर उन्हें स्थिर कर स्वात्मध्यान करता है।

सुख में, दुःख में, धनिकता और दरिद्रता में, मृत्तिका और रत्न में, शत्रु और मित्र में, इष्ट के संयोग में और उसके वियोग में, महल में और श्मशान में, निन्दा करनेवाले में और अपनी प्रशंसा करने वाले में, अपने को मारने वाले में और अपने पर शस्त्र प्रहार करनेवाले में प्रत्येक विरुद्ध स्थिति के रहते हुए भी जो अपने को समान बुद्धिवाला बना सकता है वही सच्चा सामायिकी है। ऐसी समता बुद्धि का निवासी ही विषय कषायों से अपने को बचाकर शुद्ध चिन्मय स्वात्ममन्दिर का प्रतिष्ठित देवता है। वही संवर और निर्जरा को प्राप्त कर मोक्ष का अधिकारी है। निर्ग्रन्थ दिगम्बर साधु ही इस खड्गधारावत् कठोर व्रत के सच्चे स्वामी हैं। बिना सामायिक के मुक्ति प्राप्त नहीं होती। जितने भी व्रत हैं उन सबका एकमात्र उद्देश्य समता भाव की प्राप्ति ही है। यद्यपि साधु प्रतिसमय अपने परिणाम ऐसे ही समता रूप रखते हैं तथापि उस भावना को उन्नत बनाने के लिए संध्यात्रय में सामायिक करते हैं।


द्वात्रिंशद्दोषाः कथिताः सामायिकविनाशकाः ।
त्याज्याः स्वात्मा यतः स स्याच्छुद्धचिद्रूपनायकः ॥203॥

अर्थ: सामायिक में ३२ प्रकार के दोषों की संभावना शास्त्रों में बताई गई है। अनादर से, गर्वयुक्त, दूसरों से कीर्ति मिले इसलिए, दूसरों को पीड़ा उत्पन्न करते हुए, अपने शरीर को स्थिर न रखकर, अंग चलाचल करते हुए, तिरछे मुख से अथवा संकुचित शरीर से, ऊँचानीचा शरीर करते हुए, दुष्परिणामों से, आम्नायविरुद्ध, भयसहित, ग्लानिसहित, या अपने बड़प्पन का अनुभव करते हुए, अपनी उच्चजाति कुल का गौरव समझते हुए और चोर की तरह छिपते हुए, सामायिक के काल का उल्लंघन कर सामायिक करना उचित नहीं है। इसी तरह दुर्वचन, पापवचनोच्चारण पूर्वक, परनिन्दावचन उच्चारण पूर्वक, भौंह चढ़ाकर या संकुचितकर, स्थान की शुद्धि न करते हुए भी चारों दिशाओं में दृष्टि फेरता हुआ सामायिक न करे।

अव्यवस्थित चित्त से अथवा जो समय पर मन में आवे उसका विचार करता हुआ, चाहे जो कुछ बोलता हुआ, गूँगे की तरह गुनगुनाता हुआ, मेढक की तरह बीच में जोर जोर से चिल्लाता हुआ, विस्मृति के कारण अशुद्ध तथा खंडित पाठ पढ़ता हुआ लौकिक लाभ की इच्छा से जो सामायिक करता है उसकी सामायिक सदोष होती है। उक्त ३२ दोषों को तथा इसी प्रकार के अन्य दोषों को जैसे सामायिक में अँगड़ाई लेना, हाथ-पैर पसारना, अंगुली चटकाना, नख तोड़ना, ताली बजाना, चुटकी बजाना, लवंगादि चबाना, शारीरिक शृंगार व वस्त्रों की सम्हाल पर बार-बार ध्यान देना, असूया से किसी का बुरा चिन्तन करना, किसी को अनिष्ट कार्य करते देख चिन्तित होना, क्रोध करना और सामायिक के बाद अमुक कार्य करूँगा ऐसी चिन्ता करना इत्यादि अनेकानेक दोष सामायिक में प्राप्त होते हैं, उनसे बचना चाहिए।

सामायिक सब प्रकार से अपने को संकोचकर आत्मध्यान में अपने को लगाने का कठिनतर कार्य है। अनादि कालीन राग-द्वेष के संस्कार बिना कारण भी प्रति समय सामने आते रहते हैं। व्यवहार में यदि कोई यात्रा की तैयारी कर रहा है तब उसमें व्यस्त होने से अन्य इन्द्रियों के विषयों को उक्त समय भूल जाता है। इसी प्रकार जब नाटक देखता है तब कर्ण और नेत्र के विषयों के सिवाय स्पर्शन रसन और घ्राण के विषयों की ओर चित्तवृत्ति नहीं जाती। पर सामायिक के समय चित्त के घोड़े को दौड़ने के लिए खुला मैदान है अतः साधारण समय की अपेक्षा वह न जाने कहाँ-कहाँ की दौड़ लगाता है। इसलिए अत्यन्त सावधानी के साथ अपने मन, वचन और काय को स्थिर करके अपना उपयोग ध्यान में लगाना चाहिए। सामायिक संवर और निर्जरा का कारण है। निर्जरा और संवर ही मुक्ति प्राप्ति के हेतु हैं, अतः संसार के दुःख से जो भयभीत हैं उन्हें आदरसहित, निराकुलता से, विशुद्ध परिणाम बढ़ाते हुए प्रमाद रहित होकर तथा अत्यन्त सावधानी से सामायिक करना चाहिए।


त्यक्त्वा कषायविषयान् गृहकर्मसक्तिं
भुक्तिं प्रमादजननीञ्च चतुर्विधां यः।
कुर्वंश्च पर्वदिवसेषु सदोपवासं
नूनं चतुर्थप्रतिमाव्रतपालकः सः ॥204॥

अर्थ: पहिले व्रत प्रतिमा में सामायिक शील की तरह शिक्षाव्रतों में प्रोषधोपवास भी एक शील रूप से वर्णित किया है। उस व्रत का प्रारंभ यद्यपि व्रत प्रतिमा में ही हो गया है तथापि उस व्रत की परिपूर्णता अर्थात् निरतिचार आवश्यक परिपालन इस प्रतिमा में होता है। वहाँ यह व्रत अभ्यासरूप में था, अतः अतिचारों की संभावना थी, यहाँ चतुर्थ प्रतिमा में अब वह व्रतरूपता को प्राप्त हो जाता है, अतः उसका निरतिचार प्रतिपालन इस प्रतिमा में आवश्यक है।

यह बताया जा चुका है कि श्रावक के उत्तर व्रत कुल १२ हैं। जिनका प्रारम्भ द्वितीय प्रतिमा में हो जाता है। किन्तु उन व्रतों की पूर्णता वहाँ नहीं होती है। वहाँ केवल पञ्चाणुव्रत निरतिचार पालन होते हैं। शेष सात उत्तरगुण शीलव्रत हैं। अर्थात् व्रती उन्हें अपने अभ्यास में लेता है और तद्रूप अपने स्वभाव को बनाता है। इस प्रयत्न में अनभ्यास के कारण कभी अतिचारादि दोष लग जाते थे। अब उन सातों की पूर्णता के हेतु ही आगे की सम्पूर्ण प्रतिमाएँ हैं।

श्रावक के व्रत एकदेश हैं। एकदेश का अर्थ है असंपूर्ण। अपूर्णता में अनेक भेद होते हैं पूर्णता का कोई भेद नहीं होता। एक रुपया में एक आना रूपये का अपूर्णरूप है। और पन्द्रह आना भी अपूर्णरूप है। तथापि दोनों में कई गुना अन्तर है। इसी प्रकार देशव्रती होने पर भी द्वितीय प्रतिमा के और दशवीं ग्यारहवीं प्रतिमा के श्रावकों में बहुत बड़ा अन्तर है। श्रावक जितनी प्रतिमा बढ़ता जाता है उतना ही श्रावक व्रतों को पूर्णकर महाव्रतों की प्राप्ति की ओर जा रहा है।

सामायिक व्रत में जिस प्रकार सामायिक का काल उसी व्रत की तरह व्यतीत करने का उपदेश दिया था उसी प्रकार इस प्रतिमावाला श्रावक अपने पर्व के दिनों का अर्थात् प्रत्येक अष्टमी और प्रत्येक चतुर्दशी का सम्पूर्ण समय साम्य भाव से व्यतीत करता है।


प्रश्न : - पञ्चमप्रतिमाचिह्नं किमस्ति मे गुरो वद।

अग्न्यादिपाकरहितस्य फलादिकस्य
कार्यं न सेवनमितीह निजात्मविद्भिः।
आत्मा स्वयं ह्यनुपमो विमलो यतः स्यात्
स्वस्थो मनोक्षविजयी कृतकृत्यभाक् सः ॥205॥

अर्थ: हे गुरुदेव! पञ्चम प्रतिमा का क्या स्वरूप है, कृपाकर कहें - वक्ष से पृथक् होने पर भी पत्र, फल, पुष्प, कन्द और मूल आदि सचित्त (एकेन्द्रिय जीव सहित) होते हैं। इनमें कन्द, मूल और पुष्पों का त्याग पूर्व में अभक्ष्य त्याग में हो चुका है तथापि सचित्त के उदाहरण स्वरूप उनके नाम गिनाए हैं। चतुर्थ प्रतिमा तक प्रत्येक (जिस वनस्पति में एक शरीर का एक ही एकेन्द्रिय स्वामी है) वनस्पति रूप फलादि व पत्रादि का अथवा सचित्त (कच्चे) जलादि का ग्रहण चतुर्थ प्रतिमा तक यदा कदाचित् हो जाता था। यद्यपि पर्वादि दिनों में अथवा भोगोपभोगत्याग में सचित्त द्रव्य के भक्षण का त्याग चतुर्थ प्रतिमा तक भी था तथापि इस प्रतिमा में उस सचित्त द्रव्य का सर्वथा त्याग व्रती कर देता है। इसलिए इस प्रतिमा का नाम सचित्तत्यागप्रतिमा है।

ये सचित्तद्रव्य अग्नि से पकाने पर, नमक आदि क्षार द्रव्य से संयुक्त होने पर अथवा चाकू आदि के द्वारा छोटे-छोटे टुकड़े करने पर या सिल लोढ़ा आदि से कुचल जाने पर अचित्त हो जाते हैं। इस प्रतिमा वाला ऐसे अचित्त द्रव्यों का ही उपयोग करता है। सचित्तपदार्थों का प्राणान्त होने पर भी भक्षण नहीं करता। इस व्रत के परिपालन करने से भोगोपभोग परिणाम व्रत में अभिवृद्धि होती है, परिणामों में विशेष दया उत्पन्न होती है, मन और इन्द्रियों के विषयों पर विजय होती है, प्राणी स्वात्मा के समीप आता है, पर पदार्थों में विरक्ति बढ़ती है और परिणाम निर्मल होते हैं। स्वयं आराधना किए गए अपने व्रत रुपी सम्पत्ति में वृद्धि होने से वह अपने को कृतकृत्य मानता है। इसलिए इस प्रतिमा को स्वीकार करता है। ऐसा पंचम प्रतिमा का स्वरूप है।


वाक्कायिकस्वकृतकारितसम्मतैश्च
यो रात्रिभोजनमथो दिनमैथुनञ्च।
सम्यग्विहाय सुखदे स्वपदे च यः स्यात्
त्यागोऽस्ति तस्य सुखदो निशि भोजनादेः ॥206॥

अर्थ: इस प्रतिमा के नाम में द्वैविध्य है। इसके दो नाम हैं। १-दिवामैथुनत्याग और २-रात्रिभुक्तिव्रत। अर्थात् जो दिन में परिपूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है। मन वचन कायादि व्यापार से स्वयं मैथुन सेवन नहीं करता, दूसरों को ऐसा करने की प्रेरणा नहीं करता, करनेवाले की प्रशंसा नहीं करता, वही दिवामैथुनत्यागी है। वही रात्रिभुक्तिव्रती है। रात्रिभुक्तित्याग ऐसा इस प्रतिमा का नाम नहीं है। किन्तु रात्रिभुक्तिव्रत ऐसा नाम है। जिसका अर्थ है रात्रि में ही भोगग्रहण, प्रकारान्तर से दिन में भोग त्याग ही है। दूसरी व्याख्या ऐसी भी की जाती है कि यह प्रतिमा रात्रिभोजनत्याग के लिये है। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि क्या पंचम प्रतिमा तक रात्रि भोजन चालू था जो इस प्रतिमा में इसकी चर्चा आई। इसका उत्तर यह है कि अभी तक व्रती स्वयं चारों प्रकार का रात्रि भोजन नहीं करता था, पर गृहाश्रम में छोटे-छोटे बच्चे होते हैं उन्हें प्रसंगानुसार भोजन देना पड़ता था। जैनेतर अतिथियों को भी भोजन देना पड़ता था। अथवा ऐसा करनेवालों की प्रशंसा या अनुमोदना करनी पड़ती थी। इस प्रतिमा से इसका भी त्याग हो जाता है। दोनों व्याख्याएँ इष्टाधायक हैं। २२ अभक्ष्य के त्याग में रात्रि भोजन त्याग प्रथम प्रतिमा में ही हो गया तब छठी प्रतिमा में रात्रि भोजन त्याग की बात कहना यद्यपि संगत नहीं है ऐसा कहा जा सकता है तथापि कारित और अनुमोदना से रात्रि भोजन त्याग इसके पूर्व न था। अतः यहाँ उसका बुद्धिपूर्वक त्याग किया गया है।

जो श्रावकोत्तम उक्त प्रकार उभय व्याख्याओं को स्वीकार कर षष्ठ प्रतिमा को पालता है वह व्रतियों में प्रशंसा के योग्य माना जाता है। इन बंधनों से मुक्त होनेवाले का ही स्वानन्दस्वरूप मुक्ति सुख में निवास होता है ।


स्त्रीणां कथापि किल मानवमात्रकस्य
चेतोविकारजननीति विचार्य तास्तत् ।
त्यक्त्वात्मसौख्यनिलये निवसेत् सदा यो
ब्रह्मव्रती स निपुणो भुवि भाग्यशाली ॥207॥

अर्थ: सातवीं प्रतिमा ब्रह्मचर्य व्रत प्रतिमा है। छठी प्रतिमा में ही श्रावक ने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि स्त्री परिग्रह हेय है। तथापि सर्वथा त्याग में असमर्थ होने से क्रमशः त्याग का मार्ग अंगीकार किया था। जिस ब्रह्मचर्य का साङ्गोपांग पालन वह छठी प्रतिमा में मात्र दिन को करता था, उसी ब्रह्मचर्य को अब रात्रि दिन स्वीकार करता है।
विषय भोग भुजंग के समान हैं। जैसे भुजंग डस लेता है उसी तरह विषय भी प्राणी को डस लेते हैं और उसके धर्मरूप प्राण नष्ट हो जाते हैं। जैसे स्वर्ण के समान उज्ज्वल वर्ण अग्नि में आगत पतंग भस्म हो जाता है उसी तरह स्वर्णकाय स्त्री या पुरुष प्रतिमा को काम के वशीभूत होकर यह प्राणी अपना कर संसार के महान् ताप से संतप्त होता है। संयोग दुःख मूलक है। यद्यपि संयोग को लोग इष्ट मानते हैं, और वियोग को अनिष्ट, तथापि यह तो सुनिश्चित है कि संयोग पूर्वक ही वियोग होता है। पुत्र वियोग का दुःख उसे होगा जिसके पुत्र हो। धन चोरी चले जाने का दुःख उसे होगा जिसे धन का संयोग हुआ हो। स्त्री-पुरुष का संयोग ही सन्तान परम्परा का उत्पादक है जो द्रव्यरूप संसार है तथा उनके संयोग के मूलहेतुभूत रागादि परिणाम हैं जो भावसंसार के उत्पादक हैं। पुत्र पौत्रादि की अनुकूल प्रवृत्ति हो तो उनमें रागभाव बढ़ता है। यदि प्रतिकूल प्रवृत्ति हो तो द्वेष बढ़ता है। इस प्रकार इष्ट संयोग और अनिष्ट संयोग रागद्वेष के हेतु हैं और रागद्वेष ही हमें संसार परिभ्रमण के हेतुभूत हैं।


प्रश्न : - आरम्भत्यागचिह्नं मे विद्यते किं गुरो वद।

वाणिज्यसेवासिमषीकृषिष्वा -
रम्भं व्यथादं प्रविहाय सर्वम् ।
शुद्धस्वभावे रमते सदा य
आरम्भत्यागीति स एव शुद्धः ॥208॥

अर्थ: आठवीं आरम्भत्याग प्रतिमा है। इस प्रतिमा में उस उद्देश्य की पूर्ति की जाती है जिसे सामने रखकर दिग्व्रत और देशव्रत धारण किए गए थे। दशों दिशाओं में आवागमन की मर्यादा करने का प्रयोजन यही था कि हम अपने लोभादि कषायों का संवरण कर व्यापार और तज्जनित आरंभ को नियमित क्षेत्र में करके तद्बहिः क्षेत्र में आरंभादिक का त्याग करें।

आरंभ और परिग्रह में बहुत कुछ न्यूनता सप्तम ब्रह्मचर्य प्रतिमा में आ चुकी है; क्योंकि ब्रह्मचारी के लौकिक कुटुम्ब से भी मोह छूट जाता है, अतः उसके पास अब केवल स्वजीविका निर्वाहार्थ आरंभ व्यापारादि शेष रह गए थे। इस प्रतिमा में उस वीर ब्रह्मचारी ने बहुत बड़े साहस की बात विचारी है। इसलिए उसने सर्वथा व्यापार आदि आरम्भ कार्यों का यहाँ त्याग किया है और दिग्व्रत देशव्रती की पूर्णता की है। आरंभ त्याग आठवीं, नौवीं और दशमी इन तीन प्रतिमाओं में पूर्ण होता है। आठवीं में स्वयं आरंभ नहीं करता, तथापि अभी परिग्रह शेष है अतः कारित और अनुमोदन संबंधी दोष प्राप्त हो जाते हैं। यदि उसे आजीवन भूखा रहना पड़े, भोजन के न प्राप्त होने पर समाधि भी लेनी पड़े तो भी अष्टम प्रतिमावान् स्वयं आरम्भ के द्वारा भोजन का प्रयत्न नहीं करता। यदि उसे प्रासुक जलमात्र प्राप्त हो जाय तो केवल उसी से निर्वाह कर लेगा अथवा कच्ची दाल पानी में फुलाकर खायेगा या सूखे मेवादि मोल लेकर जल प्राप्ति की अवस्था में खाकर निर्वाह करेगा। ऐसा करना उसकी प्रतिमा में त्याज्य नहीं है। कदाचित् प्रासुक जल की प्राप्ति न हो सके तब वह उक्त प्रकार के भोजन पान से भी वञ्चित रहेगा


परिग्रहपरित्यागचिह्नं मे शान्तये वद।

अन्यत्र पात्रवसनादिकतः समस्तं
द्रव्यं विहाय भवदं विषमं व्यथादम् ।
शुद्धेऽचले निजपदे निवसेत् सदा यो
ज्ञेयः परिग्रहविवर्जितधीः कृती सः ॥209॥

अर्थ: गुरुदेव! परिग्रह त्याग नामक नवमी प्रतिमा का स्वरूप शान्ति प्राप्ति के हेतु मुझे बताइए - परिग्रह त्याग प्रतिमावान् अब अपने द्वारा परिग्रहीत परिग्रह को मुर्दे के शृंगार की तरह व्यर्थ समझता है अतः उसके त्याग की ओर प्रवृत्त होता है। उसे यह अनुभव होने लगता है कि मैं ब्रह्मचारी हूँ, स्त्री पुत्रादि कुटुम्बी अपने-अपने आत्मा के व अपने-अपने पुण्य पाप के स्वयं स्वामी हैं। मुझे पहिनने के दो चार वस्त्र और शौचादि निमित्त अथवा भोजनादि निमित्त १-२ वर्तनों के सिवाय अन्य परिग्रह का कोई उपयोग अपने लिये नहीं ज्ञात होता। तब इस भार को कब तक सिर पर रखे रहूँ। वह ऐसा विचार करता है। वह यह भी देखता है कि पुत्रादि जन उस परिग्रह के आकांक्षी हैं। उन्हें उसकी आवश्यकता है। मुझे वह भाररूप है। उपयोग में आता नहीं, रक्षा की चिन्ता और साथ में लगी है। तब वह अपने पुत्रादि को अन्य कुटुम्बवर्ग या अन्य साधर्मीजन पुरजन या परिजन के समक्ष बुलाकर विधिवत् उन्हें गृह भार सौंप देता है और स्वयं अपने को उस परिग्रह से मुक्त कर लेता है।

व्यापार के लेन देन में, गृह कार्यों में, पुत्रादि के विवाह आदि में, संबंधियों के व्यवहार आदि में, तथा अन्य सांसारिक कार्यों में, वह भाग नहीं लेता। न उनके अधिकारियों को उसके लिए कोई प्रेरणा करता है। यदि कोई उत्तराधिकारी इस प्रतिमाधारी से इन कार्यों में सम्मति माँगे और अपना अभिप्राय और उद्देश्य प्रकट करे तो उसकी उचितता और अनुचितता को प्रतिपादन करनेवाली अनुमति देता है। इतना मोह उसे शेष है। प्रेरणा फिर भी नहीं करता। अपनी सम्मत्यनुसार यदि पुत्रादि कार्य न करें तो अपने चित्त में दुखी नहीं होता। उन्हें आर्थिक हानि-लाभ होने पर शोक या हर्ष नहीं मानता।

मोह के परित्याग के लिये यह अत्यावश्यक है। बिना मोह त्याग के यदि कोई उक्त पद का अवलंबन करे या आगे की प्रतिमाओं पर अथवा मुनिपद पर आरोहण करे


वदानुमतित्यागस्य किं चिह्नं वर्तते गुरो।

संसारभोगविषये विषमे व्यथादे
लग्नादिकार्यकरणेऽनुमतिर्न यस्य।
वन्द्यः सतामनुमतेर्विरतः स धीरः
वासं तनोतु सततं निजमन्दिरे सः ॥210॥

अर्थ: गुरुदेव! अनुमतित्याग नामक दशमी प्रतिमा का क्या स्वरूप है, कहिए–

दशमी प्रतिमाधारी श्रावक परिग्रह के सञ्चयादि में, गृहारम्भ के कार्यों में व विवाहादि कार्यों में अपने कुटुम्बी जनों के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भी अपनी सम्मति नहीं देता। यही विशेष त्याग इस प्रतिमा में होता है। मन, वचन, काय और कृत कारित अनुमोदना से इसे आरम्भ परिग्रह का त्याग है। मात्र दो तीन वस्त्रों के व भोजन और शौच हेतु एक दो वर्तनों के तथा शयनासन के हेतु चटाई आदि के अतिरिक्त अन्य कोई परिग्रह इसके पास नहीं है। इस प्रतिमा में नवम प्रतिमा के परिग्रह की अपेक्षा और भी न्यूनता आ जाती है।

यह गृह कुटुम्ब तथा धनादि से विरक्त हो देव वन्दना, स्वाध्याय, सामायिक और जप आदि कार्यों में अपना समय लगाता है। किसी के द्वारा यदि भोजन के लिये आमंत्रण दिया जाय तो उसे अपने लिए भोजन सम्बन्धी आरम्भ की अनुमति का दोष मान कर स्वीकार नहीं करता। तथापि भोजन के समय यदि कोई सज्जन, चाहे वे उसके अपने पूर्व गृह के हों, या किसी अन्य घर के श्रावक हों, बुलाने के लिये आकर भोजन की प्रार्थना करें तो बिना किसी स्वपर भेद के समता बुद्धिपूर्वक भोजन के हेतु चला जाता है। स्वगृह का कोई पक्ष मोह उन्हें नहीं है। सब ही लोगों के साथ उसका समान व्यवहार है। न किसी से राग विशेष है और न किसी से बैर। शरीर से भी मोह नहीं है तब अन्य वस्तु से मोह होने की बात दूर ही है।

यह अपने पास नरम वस्त्र आदि की एक प्रतिलेखनी रखता है। मयूर पिच्छ तो ग्रहण करने की आज्ञा नहीं है तथापि कोई भी मृदु उपकरण से प्रतिलेखन करके ही स्थान, शयन, आसन अथवा किसी पदार्थ के उठाने रखने आदि का वह अभ्यास करता है। जीव दया की उठी हुई भावना उसे ऐसा करने को बाध्य करती है।

भिक्षु संज्ञा प्राप्त न होने पर भी इसकी रुचि भिक्षुवत् ही है। इससे आगे का पद भिक्षुक का है। प्रकारान्तर से यह पद भोजन प्राप्ति की अपेक्षा भिक्षु के पद से भी कठिन है। भिक्षु तो भिक्षार्थ श्रावक गृह तक स्वयं जाता है, पर यह धीर वीर स्वेच्छा से श्रावक घर नहीं जाता, बुलाने पर ही जाता है और यदि कोई उसे भोजन के समय न बुलावे तो संतोष रख कर उपवास ही करता है। इस प्रकार के कठोर व्रत का धारक अनुमतित्यागी दशम प्रतिमाधारी होता है ।


उद्दिष्टाहारत्यागस्य किं चिह्नं क्षुल्लकस्य हि।

स्वीयेषु मातृपितृबन्धुजनेषु मोह-
मन्येषु क्लेशमथवा मनसा विहाय।
कौपीनखण्डवसनो गुरुपार्श्ववर्ती
स्यात् क्षुल्लकः शुचिमनाः समताभिलाषी ॥211॥

अर्थ: ग्यारहवीं प्रतिमा का नाम है उद्दिष्टत्याग प्रतिमा। इसके दो भेद हैं - प्रथम का नाम क्षुल्लक और दूसरे भेद का नाम है ऐलक। क्षुल्लक का अर्थ है छोटा और ऐलक का अर्थ है बड़ा। इनमें से पहिले भेद क्षुल्लक के स्वरूप का वर्णन इस श्लोक में आचार्य ने किया है।

दशम प्रतिमा के बाद श्रावक इसे स्वीकार करता है तथा जो अन्य प्रतिमाधारी इस प्रतिमा को स्वीकार करना चाहता है वह अपने माता पिता भाई बहन स्त्री पुत्र आदि बंधु बांधवों से मोह ममता का त्याग करता है। अपने प्रतिकूल चलनेवाले, अपनी निन्दा करनेवाले, अकीर्ति मिथ्यापवाद करनेवाले, आलोचना करनेवाले अथवा बिना कारण ही अपनी दुष्टता से वैर करनेवाले शत्रुओं में द्वेष ईर्ष्या असूया आदि नहीं करता। सबको समान दृष्टि से देखता है। वह विचार करता है कि अपने शुभाशुभ कर्म का फल ही जीव इस संसार में भोगता है। यथार्थ में न कोई बंधु है न कोई शत्रु है। राग-द्वेष कषायों के वशीभूत होकर ही यह जीव स्वानुकूल वर्तन करने वालों पर राग और प्रतिकूल चलने वालों पर द्वेष करता हैं।

इस संसारिक व्यवहार में पंचेन्द्रियों के विषय में साधक या सहायक व्यक्ति या पदार्थ ही इष्ट मान लिए जाते हैं। जो भोगोपभोग में बाधक है ऐसे व्यक्ति या पदार्थ अनिष्ट माने जाते हैं। संसारिक स्वार्थ केवल पंचेन्द्रियों के विषय और क्रोधादि कषायें हैं। परमार्थ से विचार किया जाय तो आत्मा के हित के ये दोनों विरोधी हैं। श्री दौलतरामजी कवि ने अपनी भाषा स्तुति में बहुत सुन्दर शब्दों में लिखा है और भगवान् से प्रार्थना


किमैलकस्य चिह्नं मे वर्तते सिद्धये वद।

कौपीनमात्रवसनो करपात्रभोजी
स्थित्वासनेऽशनविधानपरः प्रकामम् ।
स्वर्मोक्षमार्गनिरतो विरतोऽन्यकार्यात्
स्यादैलको निजरतः प्रतिमाप्रयोगी ॥212॥

अर्थ: हे गुरुदेव! ऐलक का क्या लक्षण है, मेरी कल्याणसिद्धि के लिए कृपाकर कहे - क्षुल्लक व्रती वैराग्य परिणामों की वृद्धि के कारण साहसी होकर ऐलक वृत्ति को प्राप्त होता है। इनकी आर्यसंज्ञा है। ये अपने केशों का उत्पाटन दो, तीन, या चार मास में अपने हाथों से करते हैं। कैंची आदि का उपयोग न स्वयं करते हैं और न अन्य को करने देते हैं। खण्ड वस्त्र का भी त्याग कर मात्रकटिसूत्र और कौपीन (लंगोटी) धारण करते हैं। शीत डांस मच्छर वर्षा और ग्रीष्म की सम्पूर्ण बाधाएँ अपने खुले खरीर पर झेलते हैं। कोई भी परीषह और उपसर्ग आजाय तो उसके सहन करने में कायरता नहीं दिखाते, प्रीतिपूर्वक सहन करते हैं। तथापि परीषह उपसर्गों की प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करते। घोर तपश्चरण आदि को धारण करने की शक्ति को उत्पन्न कराने का प्रयत्न करते हैं, पर वर्तमान अवस्था में वैसी शक्ति के अभाव में घोर तपस्या नहीं करते। प्रतिग्रहादि नवधा भक्तिपूर्वक श्रावक आहार दे, तो बैठ्कर अपने करपात्र में ही लेते हैं। भोजन का पात्र ये अपने पास नहीं रखते, और न श्रावक के पात्रों में भोजन करते हैं। अपने हाथ पर जो आहार श्रावक दे दे मात्र उसे उदरस्थ करते हैं। आराम से स्वाद लेकर आहार ग्रहण नहीं करते। न अतिशीघ्र ही भोजन करते हैं। ये एषणा समितिपूर्वक देख शोधकर आहार को लेते हैं। आहार सरस है या नीरस है, स्वादिष्ट है या बेस्वाद इन बातों पर उनका ध्यान नहीं जाता। केवल इतना ध्यान रखते हैं कि आहार शुद्ध है, निर्जीव (प्रासुक) है, कोई अन्तराययोग्य वस्तु का उसमें समागम नहीं है।

स्वाध्याय, ध्यान, धर्मोपदेश और धर्मप्रभावना आदि कार्यों में अपने समय का सदुपयोग करनेवाले साधु संघ में ही रहते हैं, अकेले नहीं। रात्रि में मुनि की तरह नग्न