तृतीय अध्याय (श्लोक 78 से 115)
प्रश्नः - व्यसनानि कति सन्ति तच्चिह्नं कीदृशं वद।
अथ व्यसनचिह्नं ते ब्रवीमि सुखतः शृणु
द्यूतं मांसं सुरा वेश्या स्तेयमाखेटकं तथा ।
परस्त्रीसङ्गमश्चैव सप्तैव व्यसनानि तु (क्षेपक)
द्यूतमेव जनानां स्याच्छत्रुः सर्वापहारकः ।
स्थानं दुष्कर्मणां नूनं मूढानां विपदां सखा ॥78॥
अर्थ: जुआ मनुष्यों का सर्वापहरण करनेवाला शत्रु है। शत्रु तो केवल बाह्य द्रव्य सुवर्ण-चांदी और गृह आदि का अपहरण कर सकता है, परन्तु द्यूत द्रव्य का अपहरण तो करता ही है, साथ ही कीर्ति का भी अपहरण करता है, स्वास्थ्य का भी नाशक है, आजीविका को भी नष्ट कर देता है और अविश्वास को उत्पन्न कर देता है। ऐसा जानकर छर्दि के समान द्यूत का त्याग कर शुद्ध चिद्रूप का स्वामी सज्जन पुरुष द्यूत व्यसन से दूर रहे।
ज्ञात्वेति च्छर्दिवद् द्यूतं त्यक्त्वा चात्यन्तदुःखदम् ।
सन्तो निर्व्यसनाः सन्तु शुद्धचिद्रूपनायकाः ॥79॥
अर्थ: जुआ मनुष्यों का सर्वापहरण करनेवाला शत्रु है। शत्रु तो केवल बाह्य द्रव्य सुवर्ण-चांदी और गृह आदि का अपहरण कर सकता है, परन्तु द्यूत द्रव्य का अपहरण तो करता ही है, साथ ही कीर्ति का भी अपहरण करता है, स्वास्थ्य का भी नाशक है, आजीविका को भी नष्ट कर देता है और अविश्वास को उत्पन्न कर देता है। ऐसा जानकर छर्दि के समान द्यूत का त्याग कर शुद्ध चिद्रूप का स्वामी सज्जन पुरुष द्यूत व्यसन से दूर रहे।
प्रश्नः - का मांसभक्षणे हानिस्तद्बोधाय गुरो वद।
न मांसभक्षिणां चित्ते दयाधर्मो भवेत्किल।
हेयोपादेयबोधोऽपि न स्यात्सद्विश्वशान्तिदः ॥80॥
अर्थ: हे गुरुदेव! मांस भक्षण करने में क्या हानि है। इस विषय को समझाइए - मांस भक्षण करना यह दूसरा व्यसन है जो प्राणी को धर्म मार्ग से भ्रष्टकर अधर्म के मार्ग में ले जाता है। जो लोग मांस भक्षण करते हैं वे दयावान नहीं होते। दया और हिंसा दोनों में परस्पर विरोध है। जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ एक स्थान पर नहीं रह सकते, इसी प्रकार एक प्राणी में दया और हिंसा दोनों एक साथ निवास नहीं कर सकते। मांस भक्षण निश्चित हिंसा महापाप का रूप है अथवा उसकी चरम सीमा है।
प्राणिवध के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। मांस वृक्षों में नहीं फलता, भूमि में उत्पन्न नहीं होता, आकाश से बरसता भी नहीं है, उसकी प्राप्ति प्राणी हिंसा से ही होती है। ऐसी स्थिति में दयावान् पुरुष भला किसी प्राणी की हिंसा मांसभक्षण के लिए कैसे करेगा? क्या कर्त्तव्य है। क्या नहीं । क्या कार्य हेय है, क्या उपादेय है, इस प्रकार विवेक जिसके हृदय में जागृत है वह दयावान् किसी भी प्राणी के एक रोम मात्र को भी दुःखी नहीं होने देता। पर शरीर का घात करना तो उसके लिए बहुत बड़ा पातक है।
मांस की उत्पत्ति में केवल उस प्राणी का ही वध नहीं है जिसका वह शरीर है बल्कि उसके मांस में उसी की जाति के अनन्त (निगोत) संख्यक प्राणियों की सतत उत्पत्ति होती है और मांस भक्षण में उनका विनाश सुनिश्चित है। इस तरह मौंस सेवी न केवल एक पंचेन्द्रिय का घातक है किन्तु उन असंख्य पंचेन्द्रियों का वह घातक हो जाता है जिन अनन्तानन्त निकोत जीवों के वहाँ अधिष्ठान हैं और जो उस मांस में सतत उत्पन्न होते रहते हैं 'इन जीवों की उत्पत्ति स्वयं मरे हुए प्राणी के मांस में भी होती है और मारे गए प्राणी के मांस में भी होती है तथा मांस की पकी हुई, पकती हुई, तथा कच्ची आदि सम्पूर्ण अवस्थाओं में भी होती है। अतएव मांसभक्षण में उनकी महान् हिंसा अवश्य होती है।
ज्ञात्वेति दुःखदं निन्द्यं त्यक्त्वा हि मांसभक्षणम् ।
कुर्वन्त्वात्महितं सन्तो धर्मज्ञा धर्मनायकाः ॥81॥
अर्थ: मांस भक्षण करना यह दूसरा व्यसन है जो प्राणी को धर्म मार्ग से भ्रष्टकर अधर्म के मार्ग में ले जाता है। जो लोग मांस भक्षण करते हैं वे दयावान नहीं होते। दया और हिंसा दोनों में परस्पर विरोध है। जैसे प्रकाश और अंधकार एक साथ एक स्थान पर नहीं रह सकते, इसी प्रकार एक प्राणी में दया और हिंसा दोनों एक साथ निवास नहीं कर सकते। मांस भक्षण निश्चित हिंसा महापाप का रूप है अथवा उसकी चरम सीमा है।
प्राणिवध के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। मांस वृक्षों में नहीं फलता, भूमि में उत्पन्न नहीं होता, आकाश से बरसता भी नहीं है, उसकी प्राप्ति प्राणी हिंसा से ही होती है। ऐसी स्थिति में दयावान् पुरुष भला किसी प्राणी की हिंसा मांसभक्षण के लिए कैसे करेगा? क्या कर्त्तव्य है। क्या नहीं । क्या कार्य हेय है, क्या उपादेय है, इस प्रकार विवेक जिसके हृदय में जागृत है वह दयावान् किसी भी प्राणी के एक रोम मात्र को भी दुःखी नहीं होने देता। पर शरीर का घात करना तो उसके लिए बहुत बड़ा पातक है।
मांस की उत्पत्ति में केवल उस प्राणी का ही वध नहीं है जिसका वह शरीर है बल्कि उसके मांस में उसी की जाति के अनन्त (निगोत) संख्यक प्राणियों की सतत उत्पत्ति होती है और मांस भक्षण में उनका विनाश सुनिश्चित है। इस तरह मौँस सेवी न केवल एक पंचेन्द्रिय का घातक है किन्तु उन असंख्य पंचेन्द्रियों का वह घातक हो जाता है जिन अनन्तानन्त निकोत जीवों के वहाँ अधिष्ठान हैं और जो उस मांस में सतत उत्पन्न होते रहते हैं 'इन जीवों की उत्पत्ति स्वयं मरे हुए प्राणी के मांस में भी होती है और मारे गए प्राणी के मांस में भी होती है तथा मांस की पकी हुई, पकती हुई, तथा कच्ची आदि सम्पूर्ण अवस्थाओं में भी होती है। अतएव मांसभक्षण में उनकी महान् हिंसा अवश्य होती है।
प्रश्नः - मद्यपानाद् भवेत् किं मे वदात्मशान्तये प्रभो।
चातुर्यं प्रवरा बुद्धिर्लज्जापि मद्यपायिनाम् ।
कुलजातिपवित्रत्वं नश्यति धर्मभावना ॥82॥
अर्थ: मद्यपान यह तीसरा व्यसन है। यह ऐसा कुव्यसन है जो आत्मा की बुद्धि पर सीधा कुठाराघात करता है। जैसे मस्तक विकृत हो जाने से बड़े बुद्धिमान् चतुर तत्त्वज्ञ पण्डित की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है इसी प्रकार मद्यपान से मनुष्य का चित्त विकृत हो जाता है और उसे कर्तव्याकर्तव्य का बोध शेष नहीं रहता। मद्यपायी लोग उत्तम मद्य उसे ही मानते हैं जो सुध-बुध भुला दे। जो मद्यप थोड़ा भी होश में रहता है मद्यप लोग उसके मद्य को हलके दर्जे का मानते हैं। जिस मद्य की उत्कृष्टता ही अज्ञान, विस्मरण या विवेकाभाव का प्रतीक है उसके सेवन करनेवाले मनुष्य में बुद्धि चातुर्य - विवेकशालिनी बुद्धि के सद्भाव की आशा करना स्वयं विकृत मस्तक का कार्य है। जैसे बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता वैसे ही मद्यपायी विवेकी नहीं हो सकता।
मद्यपायी को जब नशा उतरने पर होश आता है और उस समय उसे व्यावहारिक दृष्टि से कुछ बोध होने लगता है तब ही वह उस किञ्चिन्मात्र बुद्धि का नाश करने के लिए पुनः मद्यपान कर लेता है। होश में रहना उसे इष्ट ही नहीं, उसे तो अनिष्ट ही इष्ट है। जिसमें आत्मविस्मृति ही गुण है वहाँ चातुर्य और श्रेष्ठ बुद्धि की कल्पना या आशा करना मूर्खता है। सर्व साधारण पशु, पक्षी व कीट पतंगादि में भी खाने, पीने, सोने व विषय भोग करने का जो ज्ञान होता है उतना भी ज्ञान मद्यपायी को नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में मानवयोग्य बुद्धि की उसमें आशा कैसे की जा सकती है।
विवेक के अभाव में लज्जा चली जाती है। अविवेकी लज्जित क्यों होगा? कोई बुरा काम करनेवाले व्यक्ति को उसका विवेक जागृत होने पर ही लज्जा का अनुभव होता है, पर जिसे विवेक खोने के लिये ही मद्य पीना है उसे अपने दोष पर कभी लज्जा आयगी यह सोचा ही नहीं जा सकता। निर्लज्ज मनुष्य वेश्या सेवन, परधनापहरण, अभक्ष्य भक्षण, अपवित्र वस्तु सेवन, यहाँ तक कि स्वमाता से भी विषय सेवन जैसे निन्द्य कर्मों को करने में आगा पीछा नहीं देखता। व्यभिचारिणी स्त्रियों की संगति कर उनमें ही सन्तान उत्पन्न करता है और इस तरह अपनी जाति और कुल को कलंकित कर उसे अपवित्र बनाता है। आचार नामक वस्तु उसके लिए कुछ है ही नहीं। वह स्वैराचारी हो जाता है।
स्वैराचारी मनुष्य की धर्मभावना नष्ट हो जाती है। क्रूर और हिंसक भावनाएँ जागृत हो जाती हैं। उनकी मानसिक इच्छाएँ सदा दूषित रहती हैं। इच्छा न रहने पर भी वह अकृत्य को करता है, असेव्य को सेवन करता है। अगम्य में गमन करता है। वह अपनी सदिच्छाओं को पूरा करने के लिए स्वयं असमर्थ है। वह अपने आप में पराधीनता का अनुभव करता है। दुखी होता है और उस पराधीनता से छूटने की बार-बार इच्छा करता हुआ भी उससे अपने को छुड़ा नहीं पाता। जैसे पानी में बहनेवाले व्यक्ति को रीछ पकड़ ले तो उसे उससे पिण्ड छुड़ाना असम्भव सा जान पड़ता है। ऐसे ही नशे में बहनेवाले इस मद्यप को भी कहीं बचने का ठिकाना नहीं मालूम होता। वह दिन दिन घुलता है। परेशान होता है। इस दुःख से छूटना चाहता है पर अपनी असावधानी देख फिर आत्मविस्मृति के लिए मद्य ही पी लेता है और इस दुर्दशा से अन्त में मरण को प्राप्त हो दुर्गति का पात्र बनता है। ऐसा जानकर इस व्यसन का परिहार कर और स्वात्मानन्द रस का पान कर सुखी बनना चाहिए।८२ ।
स्वैराचाराः स्पृहा दुष्टा वर्धन्ते भवदुःखदाः ।
त्यक्त्वेति मद्यपानादि पिबन्तु स्वात्मनो रसम् ॥83॥
अर्थ: मद्यपान यह तीसरा व्यसन है। यह ऐसा कुव्यसन है जो आत्मा की बुद्धि पर सीधा कुठाराघात करता है। जैसे मस्तक विकृत हो जाने से बड़े बुद्धिमान् चतुर तत्त्वज्ञ पण्डित की बुद्धि कुण्ठित हो जाती है इसी प्रकार मद्यपान से मनुष्य का चित्त विकृत हो जाता है और उसे कर्तव्याकर्तव्य का बोध शेष नहीं रहता। मद्यपायी लोग उत्तम मद्य उसे ही मानते हैं जो सुध-बुध भुला दे। जो मद्यप थोड़ा भी होश में रहता है मद्यप लोग उसके मद्य को हलके दर्जे का मानते हैं। जिस मद्य की उत्कृष्टता ही अज्ञान, विस्मरण या विवेकाभाव का प्रतीक है उसके सेवन करनेवाले मनुष्य में बुद्धि चातुर्य - विवेकशालिनी बुद्धि के सद्भाव की आशा करना स्वयं विकृत मस्तक का कार्य है। जैसे बालू से तेल नहीं निकाला जा सकता वैसे ही मद्यपायी विवेकी नहीं हो सकता।
मद्यपायी को जब नशा उतरने पर होश आता है और उस समय उसे व्यावहारिक दृष्टि से कुछ बोध होने लगता है तब ही वह उस किञ्चिन्मात्र बुद्धि का नाश करने के लिए पुनः मद्यपान कर लेता है। होश में रहना उसे इष्ट ही नहीं, उसे तो अनिष्ट ही इष्ट है। जिसमें आत्मविस्मृति ही गुण है वहाँ चातुर्य और श्रेष्ठ बुद्धि की कल्पना या आशा करना मूर्खता है। सर्व साधारण पशु, पक्षी व कीट पतंगादि में भी खाने, पीने, सोने व विषय भोग करने का जो ज्ञान होता है उतना भी ज्ञान मद्यपायी को नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में मानवयोग्य बुद्धि की उसमें आशा कैसे की जा सकती है।
विवेक के अभाव में लज्जा चली जाती है। अविवेकी लज्जित क्यों होगा? कोई बुरा काम करनेवाले व्यक्ति को उसका विवेक जागृत होने पर ही लज्जा का अनुभव होता है, पर जिसे विवेक खोने के लिये ही मद्य पीना है उसे अपने दोष पर कभी लज्जा आयगी यह सोचा ही नहीं जा सकता। निर्लज्ज मनुष्य वेश्या सेवन, परधनापहरण, अभक्ष्य भक्षण, अपवित्र वस्तु सेवन, यहाँ तक कि स्वमाता से भी विषय सेवन जैसे निन्द्य कर्मों को करने में आगा पीछा नहीं देखता। व्यभिचारिणी स्त्रियों की संगति कर उनमें ही सन्तान उत्पन्न करता है और इस तरह अपनी जाति और कुल को कलंकित कर उसे अपवित्र बनाता है। आचार नामक वस्तु उसके लिए कुछ है ही नहीं। वह स्वैराचारी हो जाता है।
स्वैराचारी मनुष्य की धर्मभावना नष्ट हो जाती है। क्रूर और हिंसक भावनाएँ जागृत हो जाती हैं। उनकी मानसिक इच्छाएँ सदा दूषित रहती हैं। इच्छा न रहने पर भी वह अकृत्य को करता है, असेव्य को सेवन करता है। अगम्य में गमन करता है। वह अपनी सदिच्छाओं को पूरा करने के लिए स्वयं असमर्थ है। वह अपने आप में पराधीनता का अनुभव करता है। दुखी होता है और उस पराधीनता से छूटने की बार-बार इच्छा करता हुआ भी उससे अपने को छुड़ा नहीं पाता। जैसे पानी में बहनेवाले व्यक्ति को रीछ पकड़ ले तो उसे उससे पिण्ड छुड़ाना असम्भव सा जान पड़ता है। ऐसे ही नशे में बहनेवाले इस मद्यप को भी कहीं बचने का ठिकाना नहीं मालूम होता। वह दिन दिन घुलता है। परेशान होता है। इस दुःख से छूटना चाहता है पर अपनी असावधानी देख फिर आत्मविस्मृति के लिए मद्य ही पी लेता है और इस दुर्दशा से अन्त में मरण को प्राप्त हो दुर्गति का पात्र बनता है। ऐसा जानकर इस व्यसन का परिहार कर और स्वात्मानन्द रस का पान कर सुखी बनना चाहिए।८२ ।
युग्मम्
प्रश्नः - खेटक्रीडाफलं लोके किमस्तीति गुरो वद।
खेटक्रीडादिलुब्धानां क्रूरता मूढताऽगतिः ।
वर्द्धते पशुता दुष्टा सन्मार्गनाशिनी स्पृहा ॥84॥
अर्थ: मांसादि सेवन करने का व्यसन जिन्हें पड़ गया है वे शिकार खेलने की आदत बना लेते हैं। कोई अपने शौर्य प्रकाशन की इच्छा से, कोई अपनी हिंसक समाज में कीर्ति सम्पादन की इच्छा से और कोई केवल अपना शौक पूरा करने के इरादे से अपनी कुत्सित इच्छाओं को पूरा करने के इरादे से दूसरे प्राणियों का वध करते हैं। इस कुकृत्य को करते हुए उनमें दया के स्थान में कौतूहल जागृत होता है। क्रूरता जागती है। एक तड़पते हुए प्राणी को देखकर सज्जन को जहाँ करुणा उत्पन्न होती है वहाँ व्यसनी को आनन्द आता है। यह आसुरी आनन्द ही क्रूरता है। यही सन्मार्ग से भ्रष्ट करानेवाली महा मूढ़ता है। हिंसक जन्तुओं की तरह यह पशुता उसकी दिन-दिन बढ़ती जाती है। प्रकारान्तर से वह कुछ समय में नरतनधारी होने पर भी अपने परिणामों की जाति द्वारा पशु से भी भयंकर हिंसक और अविवेकी बन जाता है। इस कुकृत्य का फल परलोक में नरकादि गति की प्राप्ति है। ऐसे कुमानुष का मरण इस लोक में भी बहुधा वन जन्तुओं द्वारा ही होता है। यदि वह तिर्यग्गति में भी उत्पन्न हुआ तो स्वयं निर्बल होता है और दूसरे सबल प्राणियों का भोग्य बनता है जिनको उसने पूर्वजन्म में सताया था। द्वीन्द्रियादि जन्म में कीटादि होकर भी वह पक्षियों का आहार बनता है। इस प्रकार महान् भय और दुःख को देनेवाले इस कुव्यसन का त्यागकर आत्मशोधकों को स्वात्मा में ही रमण करना चाहिए।८४ ।
खेटक्रीडां भयाक्रान्तां ज्ञात्वेतिदुःखदां सदा ।
त्यक्त्वा स्वात्मपदे नित्यं रमन्तां स्वात्मशोधकाः ॥85॥
अर्थ: मांसादि सेवन करने का व्यसन जिन्हें पड़ गया है वे शिकार खेलने की आदत बना लेते हैं। कोई अपने शौर्य प्रकाशन की इच्छा से, कोई अपनी हिंसक समाज में कीर्ति सम्पादन की इच्छा से और कोई केवल अपना शौक पूरा करने के इरादे से अपनी कुत्सित इच्छाओं को पूरा करने के इरादे से दूसरे प्राणियों का वध करते हैं। इस कुकृत्य को करते हुए उनमें दया के स्थान में कौतूहल जागृत होता है। क्रूरता जागती है। एक तड़पते हुए प्राणी को देखकर सज्जन को जहाँ करुणा उत्पन्न होती है वहाँ व्यसनी को आनन्द आता है। यह आसुरी आनन्द ही क्रूरता है। यही सन्मार्ग से भ्रष्ट करानेवाली महा मूढ़ता है। हिंसक जन्तुओं की तरह यह पशुता उसकी दिन-दिन बढ़ती जाती है। प्रकारान्तर से वह कुछ समय में नरतनधारी होने पर भी अपने परिणामों की जाति द्वारा पशु से भी भयंकर हिंसक और अविवेकी बन जाता है। इस कुकृत्य का फल परलोक में नरकादि गति की प्राप्ति है। ऐसे कुमानुष का मरण इस लोक में भी बहुधा वन जन्तुओं द्वारा ही होता है। यदि वह तिर्यग्गति में भी उत्पन्न हुआ तो स्वयं निर्बल होता है और दूसरे सबल प्राणियों का भोग्य बनता है जिनको उसने पूर्वजन्म में सताया था। द्वीन्द्रियादि जन्म में कीटादि होकर भी वह पक्षियों का आहार बनता है। इस प्रकार महान् भय और दुःख को देनेवाले इस कुव्यसन का त्यागकर आत्मशोधकों को स्वात्मा में ही रमण करना चाहिए।८४ ।
युग्मम्
प्रश्नः - वेश्यासङ्गफलं किं मे वदास्ति सिद्धये गुरो।
वेश्यारतस्य शुचिता सुखदा न शान्तिः
बुद्धेर्बलं सुजनता नरताऽपि नश्येत्
ज्ञात्वेति धर्मरसिकैर्न हि तत्प्रसङ्गः
कार्यो यतः खलु भवेत् विमलः किलात्मा ॥86॥
अर्थ: हे गुरुदेव! वेश्यासङ्ग का क्या फल है वह मेरे आत्महित की दृष्टि से कहिए - व्यभिचारिणी स्त्रियाँ जो व्यभिचार द्वारा ही अपना उदर निर्वाह करती हैं, जो बिना पति की होते हुए नगर के अनेक विटपुरुषों द्वारा नगरपालिका के पुरीषालयों की भाँति सेवित होती हैं वे वेश्या शब्द के द्वारा व्यवहृत होती हैं। वेश्याव्यसनी मनुष्य बहुत दुःखी होता है। सबसे प्रथम तो वेश्या अपने ग्राहक से किञ्चिन्मात्र स्नेह न होते हुए भी अत्यन्त स्नेह का प्रदर्शन करती है जिससे वह व्यसनी जाल में मछली की तरह उसके जाल में फँस जाता है। वह उस जाल से अपने को फिर मुक्त नहीं कर पाता। वह अपना सर्वस्व धन, धर्म, वैभव, ज्ञान, विवेक, कीर्ति, दया, सद्व्यवहार और नागरिकता उस कुटिला के चरणों में चढ़ा देता है।
चारुदत्त की कथा तो शास्त्रों में प्रसिद्ध है, परन्तु वेश्याव्यसनी की बरबादी के अनेक लौकिक उदाहरण प्रत्यक्ष भी देखे जाते हैं। वेश्या अपने ग्राहक को मद्यपान के व्यसन में फँसाए बिना नहीं रहती। मद्यपान से उसे यह लाभ होता है कि मद्यप उसके नशे में अपना होशहवाश खो बैठता है। चित्तभ्रम होने से कभी अपने भले की बात सोच ही नहीं पाता। यदि वह मद्यपान न करे तो अधिक सम्भव है कि वह कभी अपनी बरबादी, अपकीर्ति और धन की लूट आदि हानियों को देखकर सतर्क हो जाय और वेश्या की संगति छोड़ दे। इस भय से वेश्या उसे शराब पीने की बुरी आदत जरूर डाल देती है। जब वह मनुष्य शराब की बेहोशी में अनवरत व्यभिचार करते-करते शरीर से भी बेकाम हो जाता है, निर्धन हो जाता है तथा समाज, सज्जन गोष्ठी, परिवार और मित्र आदि सबसे वञ्चित हो दर-दर की भीख माँगने योग्य हो जाता है तब वह वेश्या उसे घर से इस प्रकार निकाल देती है जैसे किल्ली मृत पशु को रक्त विहीन देखकर छोड़ देती है।
घर के लोग हिस्सा बाँट कर पहिले से ही उसे अलग कर देते हैं ताकि वह अपने हिस्से का ही धन बरबाद करे सब घर का धन व आजीविका नष्ट न कर सके। वेश्या द्वारा परित्यक्त निर्धन व्यक्ति को कोई कुटुंबी आश्रय देने को तैयार नहीं होता। इतना ही नहीं, उस व्यभिचारी हीनाचारी मद्यपायी को समाज का भी कोई व्यक्ति पास बैठाने को तैयार नहीं होता। उससे लोग ऐसे बचते हैं जैसे छूत की बीमारी से बचा जाता है। कोई धनी उससे लेने-देन व्यापार का व्यवहार नहीं करना चाहता, क्योंकि वह जानता है कि इसके पास पैसा तो है ही नहीं साथ ही दुर्गुणी होने से यह विश्वास का पात्र भी नहीं रहा। व्यसनी होने से यह अधिक संभव है जो यह हमारे द्वारा प्रदत्त धन का उपयोग अपनी आजीविकार्थ न करके मद्यपान में ही करे या फिर किसी वेश्या को दे दे।
आजीविका के अभाव में या तो वह लज्जाविहीन हो दर-दर भिक्षाटन करता है या फिर चोरी या द्यूत द्वारा अपना कष्ट दूर करने का प्रयत्न करता है। वेश्या व्यसनी यदि चोरी या द्यूत क्रीड़ा द्वारा धनोपार्जन कर भी ले तो वह उसे वेश्या को ही देगा या मद्यपान करेगा। वेश्याओं के पास ऐसे ही अनेक चोर, उचक्के, डाकू, शराबी और मांसभक्षी पुरुष आते जाते रहते हैं जो उसकी दुःसंगति को छोड़ने में अपने को असमर्थ पाते हैं।
वेश्या, कंचन और मद्य ये तीन यदि एक एक भी हो तो मनुष्य को सर्वथा अविवेकी, निर्दय, निर्लज्ज और पराधीन बना देते हैं। कदाचित् तीनों का योग हो जाय तब तो विनाश के लिए परम औषधि, जिसे महाविष भी कहा जा सकता है, तैयार हो गई ऐसा मान लेना चाहिए। जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, सुख और शान्ति का अभिलाषी है उसे परिवार चाहिए, समाज चाहिए और सत्संगति चाहिए। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रहना चाहता। वह साधु भी हो जाय तो भी उसे वही साधु समाज अपने सुख शान्ति के लिए चाहिए। फिर संसारी गृहस्थ की तो
प्रश्नः - स्तेयफलं गुरो किं स्यात् वदास्ति शान्तये मुदा।
स्ववित्तमपि मे नास्ति पुण्यलब्धं कथं परम् ।
ज्ञात्वेति तत्त्वतः स्तेयं न कुर्वन्त्यात्मवेदिनः ॥87॥
अर्थ: हे गुरुदेव! चोरी करने का क्या फल है कृपाकर शान्ति प्राप्ति के लिए मुझसे कहें - लोक में जो धन माना जाता है वह भी पुण्य कर्मोदय से प्राप्त होता है। बिना पुण्य के सातोत्पादक सामग्री का संयोग प्राप्त नहीं होता। धन यदि लौकिक सुख को उत्पन्न करता है तो पुण्य का फल है। यदि वह धन असाता और आकुलता प्राप्त कराता है तो पाप का फल है। एकान्त नहीं है जो यह धन-संपत्ति राज्य, परिवार, पुत्र, कलत्र सब पुण्य के फल हैं। यदि इनसे संसारी प्राणी साता का अनुभव करे तो ही ये पुण्य सामग्री हैं, अन्यथा असाता की उत्पादक हों तो ये सब पापोदय की सामग्री हैं। और इनसे विलग होना ही पुण्य का उदय है। सर्व साधारण मनुष्य धनादि से अपने को सुखी अनुभव करता है। इस दृष्टि को लक्ष्य में रखकर ही श्री आचार्य महाराज ने इसे पुण्य से प्राप्त होने वाली सामग्री लिखा है। जंगल में जब डाकू शस्त्र लेकर धन लूटने आते हैं उस समय यदि कोई धनी सामने आ जाता है तो वह शस्त्राघात से पीड़ित किया जाता है पर साथ में जो निर्धन है वह छोड़ दिया जाता है। ऐसे अवसर पर धन विपत्ति लानेवाला होने से पापोदय की निशानी हुई और निर्धनता पुण्य की सामग्री हुई। नगर में आग लग जाय तो धनी का धन महान् दुःखोत्पादक होने से पाप की सामग्री है और निर्धनता सुखोत्पादक होने से पुण्य की सामग्री है। मोक्षमार्ग साधन के लिए बाधक अनेक विकल्प जालों में फँसाने वाली अनिष्ट कारक विभव सामग्री पापरूप है और शीघ्र ही गार्हस्थिक जाल से विमुक्त करा देनेवाली इष्ट कारक निर्धनता पुण्य है।
सारांश यह है कि कोई भी सामग्री एकान्त रूप से पुण्य या पाप रूप नहीं है। जो संसारी प्राणी को इष्टकारक सुखसाधन हो जाय वह सब पुण्य का फल है और जो भी सामग्री अनिष्टकारक दुःख साधन रूप हो वह पाप का फल है। पुण्य से प्राप्त सामग्री को भी सम्यग्दृष्टि अपनी वस्तु नहीं मानता। वह जानता है कि यह सब स्वात्म स्वरूप व्यतिरिक्त पर पदार्थ हैं। मेरा तो केवल आत्मा है। दर्शन, ज्ञान, और चारित्रात्मक रत्नत्रयस्वरूप धर्म ही मेरा वैभव है। ऐसे विवेकी मनुष्य के द्वारा परधनापहरण रूप निन्द्य स्तेयकर्म कैसे हो सकता है।
स्वपरज्ञानशून्या हि स्तेयं कुर्वन्ति पापिनः ।
ततः स्वानन्दतृप्तः सन् वसतु स्वात्ममन्दिरे ॥88॥
अर्थ: जिन मिथ्यामतियों को स्वपर का विवेक नहीं जागृत हुआ और जिन्होंने अभी तक आत्मतत्त्व को ही नहीं जाना वे अपने मनुष्य के जन्म को ही अपना जन्म मानते हैं, शरीर को ही अपना स्वरूप समझते हैं और कुटुम्ब परिजन को अपना स्नेहभाजन जानते हैं। उन्हें हितैषी समझकर उनसे मोह करते हैं। उनके संयोग में सुखी और वियोग में दुःखी होते हैं। धन, सम्पत्ति, मकान और राजविभव आदि जो जो सामग्री उन्हें उनके कर्मोदय से प्राप्त है उस सब में राग द्वेषमय प्रवृत्ति करते हैं। यह अज्ञान भाव जिसके हृदय में जमा है वे अविवेकी ही धनादि को सम्पूर्ण सुख का साधन मान उसमें मूर्च्छित होते हैं। वे उन पर पदार्थों में ऐसे तन्मय हैं जो उनके लाभ में अपना परम लाभ और उनकी हानि में अपनी परम हानि समझकर महान् दुःखी होते हैं। ऐसे ही मोही जीव उसकी प्राप्ति के लिए परधनापहरणरूप स्तेय पाप को अंगीकार कर लेते हैं। एक बार इस पाप को करनेवाला उसे बार-बार करता है। चोरी उसकी आदत में आ जाती है।
प्रश्नः - परस्त्रीसेवनस्यास्ति किं फलं मे गुरो वद।
रक्तोऽस्ति यः कोऽपि किलान्यनार्यां तस्यापमानोऽपि पदे-पदे स्यात्।
दुःखप्रदा वैरविरोधवृद्धिः ज्ञात्वेति कार्यो न च तत्प्रसङ्गः ॥89॥
अर्थ: हे गुरुदेव! परस्त्री सेवन का क्या फल है कृपाकर मुझसे कहें - जो मनुष्य परस्त्री में रमण करता है या जो स्त्री पर पुरुष की इच्छा करती है उनका पतन अवश्यंभावी है। लोक में ये अपकीर्ति के भाजन बनते हैं। पद-पद पर उनका अपमान होता है। अनाचार की वृद्धि होती है। कुल और आचार की पवित्रता नष्ट होती है। यह पापी स्वयं तो गिरता ही है साथ ही परस्त्रियों को तथा अपनी संतान परम्परा को भी पापपंक में गिरा जाता है। व्यभिचारी माता-पिता की सन्तान हजारों वर्ष तक उनके नाम का स्मरण कर रोती है तथा उनके उस दुष्कृतपर थूकती है। वह इस जन्म में सर्वथा निरपराध और सदाचारिणी होते हुए भी पूर्व जन्म के पापोदय से ऐसे हीन पुरुषों की सन्तान हो कर पद-पद पर दुःखी और अपमानित होती है। उस अनर्थपरम्परा के उत्पादक होने से वह व्यक्ति अवश्य नरक का पात्र होता है।
जैसे हिंसा आदि अन्य पापों का सम्बन्ध उस व्यक्ति को ही हानि पहुँचानेवाला होता है वैसे व्यभिचार केवल उस व्यक्ति को ही हानि पहुँचाने वाला नहीं है, बल्कि उसकी सन्तान परम्परा को भी उससे हानि उठानी पड़ती है। कुल का पावित्र्य संतान की पवित्रता से है और संतान की पवित्रता माता-पिता के सदाचार पर है। असदाचारी माता-पिता अपने भावी कुल की अवनति और अपवित्रता के हेतु होते हैं।
व्यभिचार से परस्पर वैर भी बढ़ता है और विरोध भी होता है। सामाजिक पवित्रता और आत्मशान्ति नष्ट होती है। वेश्याव्यसनी की अपेक्षा यह परस्त्रीव्यसनी घोर पापी है। इसका कारण है कि यद्यपि वेश्याव्यसनी का पतन परस्त्री- व्यसनी की अपेक्षा अत्यधिक होता है तथापि उसका पतन उसके आत्मा तक ही सीमित है। वह समाज को गंदा नहीं करता। व्यक्तिगत हानि कर स्वयं को जरूर मिटा लेता है, किन्तु परस्त्री गमन करनेवाला समाज का कोढ़ है, जो उसे भी मिटा करके रहता है।
सारांश यह है कि वेश्याव्यसनी अपना व्यक्तिगत पूर्ण विनाश करता है और परस्त्री व्यसन वाला अपना विनाश तो करता ही है साथ ही अपने कुल पर कलंक लगाता है। अपनी संतान को व्यभिचार जात संतान बनाता है। समाज में अनाचार फैलाने का हेतु बनता है। अतः वह अत्यधिक पातक का भाजन होता है। उक्त व्यसन का परिपूर्ण स्वरूप विचार कर विवेकी पुरुषों को इससे सदा ही दूर रहना चाहिए ।
प्रोक्तं व्यथादं भवदं सदैवाविश्वासपात्रं व्यसनस्वरूपम् ।
त्याज्यानि बुद्ध्वा व्यसनानि सप्त यतो भवेत्ते हृदये प्रशान्तिः ॥90॥
अर्थ: उक्त प्रकार से सप्त व्यसनों के स्वरूप का संक्षेप में कथन किया। व्यसन कोई भी हो मनुष्य को कल्याणमार्ग से दूर फेंक देता है। लौकिक व्यवहार की दृष्टि से भी व्यसनी मनुष्य समाज का सदस्य बनने योग्य नहीं होता। वह स्वयं पतनशील होता है और उसकी दुःसंगति भी दूसरों को पतनशील बनाती है। ऐसा विचार करके ही समाज व्यसनी मनुष्यों को जाति से बहिर्मुख कर उसके साथ अपना खान-पान व लौकिक-धार्मिक व्यवहार आदि छोड़ देती है। यह परम्परा आज भी चालू है।
आजकल सुधार की दृष्टि से जाति बहिष्कार तथा धार्मिक स्थानों का बहिष्कार अनुचित माना जाता है। कहा जाता है कि इससे व्यक्ति की बहुत बड़ी हानि होती है। वह उठ नहीं सकता, उसका उत्थान नहीं हो सकता। यद्यपि उक्त तर्क संगत है, तदनुसार व्यक्ति के उत्थान के लिये नियमों में परिवर्तन करना आवश्यक है। तथापि यह ध्यान सदा रखना चाहिए कि व्यक्ति को ध्यान में रखकर समाज के चरित्र की चिन्ता न करना भी बहुत बड़ी हानि है। समाज व बहुमत व्यक्ति को अपनाने के लिए प्रस्तुत है पर व्यक्ति के लाभ के लिए, वह भी केवल समाज में समान हक प्राप्त हो जाय इतने मात्र के लिए, समाज की पवित्रता का बलिदान करना लाभप्रद नहीं है। इस प्रकार स्वयं के लिये व समाज के लिए, अनेक व्यथाओं के पैदा करनेवाले व्यसनों का सब प्रकार से त्याग करना ही श्रेष्ठतम कल्याण का मार्ग है ।
प्रश्नः - पञ्चपापस्वरूपं मे विद्यते कीदृशं वद।
लोभाभिमानात्परपीडनं स्याद्धिंसैव दुष्टाऽखिलविश्वहन्त्री ।
दुःखस्य मूलं किल सर्वजन्तोर्हिंसा न कस्यापि कदापि कार्या ॥91॥
अर्थ: पाँच पाप कौन हैं और उनका स्वरूप क्या है, कृपया कहिए - राग और द्वेष दोनों हिंसा के पर्यायवाची नाम हैं। लोभ के कारण सांसारिक स्वार्थ के लिए अर्थात् पंचेन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले किसी व्यक्ति के मार्ग में यदि कोई बाधक सिद्ध होता हो तो वह उसे विषय लोभ के कारण मार देता है; पीड़ित करता है या अनेक प्रकार से त्रास देता है। तथा अनेक मानी पुरुष अपने अहंकार के वश होकर हिंसा करते हुए देखे जाते हैं और क्रोधादि कषायों के कारण तो पद-पद में हिंसा होती है यह स्पष्ट ही है।
हिंसा दुःख का मूल है। यदि हिंसा उचित मान ली जाय तो वन में लगी हुई अग्नि की कणिका की तरह वह सम्पूर्ण जगत् का विनाश करने में समर्थ है। वह सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रलयकाल का दृश्य दिखा सकती है अतः उसका औचित्य बिलकुल नहीं किया जा सकता।
अहिंसा का पालन दो प्रकार से होता है - सम्पूर्ण हिंसा का त्याग और अल्प हिंसा का त्याग। हिंसा का जो सम्पूर्ण त्याग कर सकते हैं वे साधु या मुनि हैं और जो केवल त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकते हैं वे गृहस्थ हैं। अपनी अपनी शक्ति के अनुसार और पद के अनुसार प्रत्येक आत्महितैषी को अहिंसा का पालन करना चाहिए जिससे संसार में सुख और शान्ति की वृद्धि हो।९१ ।
पूर्वोक्तहिंसा किल सर्वतः स्यात् त्याज्या मुनीनां गृहिणां च देशात्।
भव्यैरहिंसा हि यथोक्तरीत्या निजात्मशान्त्यै सुखदा सुपाल्या ॥92॥
अर्थ: राग और द्वेष दोनों हिंसा के पर्यायवाची नाम हैं। लोभ के कारण सांसारिक स्वार्थ के लिए अर्थात् पंचेन्द्रियों के विषयों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने वाले किसी व्यक्ति के मार्ग में यदि कोई बाधक सिद्ध होता हो तो वह उसे विषय लोभ के कारण मार देता है; पीड़ित करता है या अनेक प्रकार से त्रास देता है। तथा अनेक मानी पुरुष अपने अहंकार के वश होकर हिंसा करते हुए देखे जाते हैं और क्रोधादि कषायों के कारण तो पद-पद में हिंसा होती है यह स्पष्ट ही है।
हिंसा दुःख का मूल है। यदि हिंसा उचित मान ली जाय तो वन में लगी हुई अग्नि की कणिका की तरह वह सम्पूर्ण जगत् का विनाश करने में समर्थ है। वह सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रलयकाल का दृश्य दिखा सकती है अतः उसका औचित्य बिलकुल नहीं किया जा सकता।
अहिंसा का पालन दो प्रकार से होता है - सम्पूर्ण हिंसा का त्याग और अल्प हिंसा का त्याग। हिंसा का जो सम्पूर्ण त्याग कर सकते हैं वे साधु या मुनि हैं और जो केवल त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का त्याग कर सकते हैं वे गृहस्थ हैं। अपनी अपनी शक्ति के अनुसार और पद के अनुसार प्रत्येक आत्महितैषी को अहिंसा का पालन करना चाहिए जिससे संसार में सुख और शान्ति की वृद्धि हो।९१ ।
प्रश्नः - हिंसायाः कति भेदाः कौ सन्ति मे भो गुरो! वद।
सर्वेषां सुखसिद्ध्यर्थं कथ्यन्ते क्रमतोऽद्य भोः।
कृष्यादिवृत्तौ विहिता प्रवृत्तिरुद्योगिहिंसा कथितात्महन्त्री ।
आरम्भिहिंसाऽखिलपञ्चसूनकार्ये प्रवृत्तिर्गृहिणां व्यथादा ॥93॥
अर्थ: हिंसा के कितने भेद हैं? हे गुरो! कृपा कर कहें। इस प्रश्न के उत्तर में श्री गुरु कहते हैं - हे भव्य! सबके सुख पूर्वक ज्ञान के लिए मैं क्रमशः कहता हूँ सुनो - हिंसा चार प्रकार से विभाजित की गई है-उद्योगी, आरम्भी, विरोधी और सङ्कल्पी। इन चारों का क्रमशः स्वरूप कहते हैं-१ उद्योगीहिंसा-खेती, सेवा, शिल्प कार्य, व्यापार और लेखनादि कला के करने में तथा धर्म, देश व प्रजा के संरक्षणार्थ शस्त्र ग्रहण आदि के द्वारा अपनी आजीविका करने में जो हिंसा होती है वह सब उद्योगी हिंसा है। गृहस्थ इसे त्यागने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि गृहस्थों के लिए आजीविका मुख्य प्रश्न है। गृहस्थ का धर्म सृष्टि का पालन, संरक्षण और धर्मात्माओं की सेवा करना है। यदि गृहस्थ निरुद्योगी हो जाय तो उक्त सभी कार्य नहीं हो सकते। गृहसम्बन्धी उद्यम न करनेवाला व्यक्ति या तो साधु हो सकता है, या दर-दर का भिखारी। सारांश यह है कि इस हिंसा का त्याग गृहस्थ नहीं कर सकता। २-आरम्भी हिंसा-गृहस्थी के कार्यों में जैसे रसोई बनाना, पानी भरना, घर बनाना, घर की स्वच्छता, वस्त्रों की स्वच्छता, शरीर की स्वच्छता, साग सब्जी बनाना, जमीन खोदना, रोगी की परिचर्या करना, देवपूजा, गुरु का सम्मान, आहारादि दान, पशुपालन, गरीबों की रक्षा और बच्चों का परिपालन इत्यादि कार्यों में भी हिंसा होती है, किन्तु यह हिंसा गृहस्थ के लिए अपरिहार्य है। वह उसका परित्याग करने में असमर्थ है। यद्यपि व्यापार और आरंभ के कार्य गृहस्थ दयावान् होकर जीवों की हिंसा का बचाव करते हुए देख भाल कर ही करेगा, क्योंकि ऐसा करना उसका कर्त्तव्य है तो भी कुछ ऐसे जीव हैं जिनकी हिंसा बचाते-बचाते भी हो जाती है।
गृहस्थ का यह साधारण कर्त्तव्य है कि प्रत्येक कार्य करते समय जीवदया का ध्यान रखे। मार्ग में चले तो मार्ग को देखता हुआ चले और यह ध्यान रखे कि किसी जीवधारी पर मेरा पैर न पड़ जाय। किसी वस्तु को उठावे या रखे तब भी यह ध्यान रखे कि इनके नीचे कोई जन्तु न आ जाय। सोना बैठना, मल-मूत्र का त्याग करना, थूकना, वस्त्र प्रक्षालन और शरीर प्रक्षालन आदि जितने गार्हस्थिक आरंभ के कार्य बताए हैं उन सबमें वह जीव रक्षा का सतत ध्यान रखता है।
आजीविका के साधनभूत उद्योग-धंधों में भी वह यह ध्यान रखता है तथा ऐसे धंधों को छोड़कर वह अल्प सावद्य वाले धंधों को तलाश कर उन्हें स्वीकार करता है। भले ही उनमें आर्थिक लाभ न्यून हो पर वह अपनी लोभ वृत्ति को कमकर सन्तोषवृत्ति को स्वीकार करके अपना कर्त्तव्य परम धर्म ‘जीवदया’ का पालन करता है।
असि, मसि, कृषि, सेवा, शिल्प और वाणिज्य इन षट् कर्मों द्वारा आजीविका करने का उपदेश भगवान् श्री ऋषभ देव ने युग के प्रारंभ में दिया था और जिन-जिन लोगों की जैसे कर्मों के करने में प्रवृत्ति थी उनका वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों में विभाग किया था। जिन लोगों ने इन षट् कर्मों को छोड़कर पापोपहत वृत्तियाँ स्वीकार कर लीं। जैसे मछली मारना, पशु-पक्षियों का घात कर मांस बेचना, मांस खाना, मद्य बनाना, मद्य बेचना और उसका पान करना आदि के विषय में भगवान् मौन रहे और उनको शूद्रों की सबसे निम्न श्रेणी में सम्मिलित किया और इनका ‘अकारु’ नाम रखा। इनको किसी भी धार्मिक या सामाजिक व्यवहार के योग्य उन्होंने नहीं माना। इन सबका उल्लेख श्री आदिपुराण में हैं। सारांश यह निकला कि प्रत्यक्ष हिंसा स्वरूप कार्यों से या असदाचार के कार्यों से आजीविका करना अत्यन्त निन्द्य है। वह ऐसे उद्योग में या आरम्भ में सम्मिलित नहीं है जिसे श्रावक स्वीकार कर सके। जिन कार्यों में वह अपने प्रिय धर्म ‘जीवदया’ का पालन कर सकता है, उन कार्यों को ही आजीविका के लिए स्वीकार करता है और उनमें जो हिंसा बचाव करते हुए भी हो जाती है उसे वह त्याग नहीं सकता किन्तु इसके लिए वह दुःखी होता है और उसका प्रतिक्रमण द्वारा पाप विशोधन करता है।
स्वर्मोक्षमार्गादिकरक्षणार्थं नरत्वधर्मादिकशिक्षणार्थं ।
जगद्धितार्थं क्रियते गृहस्थैर्विरोधिहिंसा कथिता मुनीन्द्रैः ॥94॥
अर्थ: ३- तीसरी हिंसा- विरोधी हिंसा है। यह हिंसा भी गृहस्थ द्वारा अपरिहार्य है। पूर्वोक्त दोनों हिंसाओं की तरह इसे भी गृहस्थ त्यागने में असमर्थ है। जिस तरह उद्योग और आरम्भ में जीवदया का ध्यान रखते हुए भी हिंसा हो जाती है, ऐसे ही धर्म पालन के कार्य में, गृहस्थी के परिपालन में, बाल बच्चों के संरक्षण में और गार्हस्थिक कार्यों के लिए सञ्चित द्रव्यों के रक्षण में हिसा हो जाती है, क्योंकि किसी को भी सताने या कष्ट देने की इच्छा न रखते हुए भी क्वचित् कोई दुष्ट विघ्न उपस्थित कर देवे तो उससे बचना और विघ्न को दूर करना उसका कर्त्तव्य है। ऐसा करते हुए सम्भव है विरोधी को पीड़ा हो जाय, उसका अंगभंग हो जाय या बाधा उपस्थित हो जाय तो गृहस्थ इसके लिए भी लाचार है। ऐसी हिंसा विरोधी हिंसा है।
विरोधीहिंसा यद्यपि बहुत बड़ी हिंसा है तथापि वह गृहस्थ के लिए अपरिहार्य है। सर्व साधारण प्रजाजन यद्यपि अपने ऊपर आनेवाली विपत्ति को दूर करने के लिए राज्याश्रय ग्रहण करता है और न्यायालय में उस अपराधी के लिए कारागृह में बन्द कराने या अन्य प्रकार का दण्ड दिलाने का प्रयत्न करता है तभी उक्त प्रकार से वह निर्विघ्न होकर अपना धर्म पालन कर सकता है। ऐसा होने पर भी जो सर्व साधारण प्रजाजनों के संरक्षक हैं, राजा हैं, या राज्याधिकारी हैं और सैनिक हैं, उनका कर्त्तव्य है कि वे प्रजा का संरक्षण करें। शिष्ट अर्थात् सज्जन की सहायता और दुष्ट अर्थात् दुर्जन को दण्ड इन दोनों कार्यों के बिना कभी राज्य सञ्चालन नहीं हो सकता। राजा का यही एक प्रधान कर्त्तव्य है। दुष्ट लोग प्रजा में अशान्ति उत्पन्न करें, उनकी खेती नष्ट करें, उनके पशु चुरा लें, उनका द्रव्य (धन) चुरा लें, उनकी स्त्री बच्चों का अपहरण करें, उनके धर्मस्थान ध्वंस करें, धर्मात्मा को सतावें, अहिंसकों पर अत्याचार करें, सदाचारी शान्त प्रजा को उद्विग्न करें तो राजा का और राज्याधिकारियों का कर्त्तव्य हो जाता है कि वे उन दुष्ट आततायी लुटेरों का तथा ऐसा अन्याय करनेवाले दूसरे राष्ट्रों का सामना करें और उन्हें हर प्रकार से रोकें ताकि वे उक्त उपद्रव कर अशान्ति न पैदा कर सकें। इस रोक-थाम में अनेक उपाय काम में लाए जाते हैं पर उनमें जब सफलता नहीं मिलती और दुष्ट अपने मार्ग पर बढ़ते जाते हैं तब उनके रोध करने में उनकी हिंसा भी हो जाती है। यह हिंसा विरोधी हिंसा है। इसका परित्याग भी गृहस्थ कभी नहीं कर सकता। यह हिंसा सङ्कल्पी हिंसा कदापि नहीं है। सङ्कल्पी हिंसा में निरपराध जीवों का घात होता है जब कि विरोधी हिंसावाला एक चींटी को भी संकल्प पूर्वक नहीं मारता। जो निरपराध एक चींटी को भी नहीं मारता वह निरपराध अन्य प्राणियों को क्यों सतायगा? पर सापराधको वह दण्ड देता है और शान्त धर्मात्माओं की रक्षा करता है। ऐसा करने में यदि सापराध की मृत्यु भी हो जाय तो वह उसके लिए लाचार है।
विरोधी हिंसावाले जीव का लक्ष्य हिंसा नहीं है। बल्कि अन्य आतताइयों द्वारा फैलाई जानेवाली महान् हिंसा का प्रतिरोध उसका लक्ष्य है। यदि गृहस्थ विरोधी हिंसा से परहेज करे तो वह शान्ति से धर्म का परिपालन नहीं कर सकता। जिन दुष्टों को धर्म-कर्म का, न्यायान्याय का और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का कुछ भी विचार नहीं है, दूसरों को सताकर उनका स्वत्वापहरण ही जिनका एकमात्र उद्देश्य है और जो दूसरों का घात करके भी अपनी विषयवासनाओं और जघन्य स्वार्थों को सिद्ध करना चाहते हैं वे न्यायवान् शान्त और धार्मिक प्रजा को पनपने नहीं दे सकते। उनकी प्रमुखता में सर्वत्र अशान्ति, कलह, लूट,फूट, मारपीट, अन्याय, असदाचार तथा हिंसा का ही प्रसार होगा और सर्वप्रजाजन दुःखी होंगे। इस महान् उपसर्ग को दूर करने के लिए, सुखशान्ति की वृद्धि के लिए, धर्ममार्ग को अक्षुण्ण रखने के लिए, अहिंसकों को प्रोत्साहित करने के लिए और सदाचारी की वृद्धि के लिए दुष्टों का निग्रह करना गृहस्थ का धर्म हो जाता है। उत्तम उद्देश्य की पूर्ति का साधन होने से विरोधी-हिंसा गृहस्थ के लिये कर्त्तव्य हो जाती है।
यदि गृहस्थ अपने पदानुकूल उक्त कर्त्तव्य को पूरा न कर सके तो उसे समस्त विषय वासनाओं का परित्याग कर देना चाहिए। उसे न स्त्रीपरिग्रह का अधिकार है और न संतानोत्पत्ति का अधिकार है। उसे समस्त आरंभ उद्योग छोड़कर वीतराग हो साधुपना स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि वह अपनी वासनाओं का त्याग नहीं कर सकता और दुष्ट के निग्रह में भी हाथ नहीं बटाता तो वह स्वयं अशान्ति का मूल है। उसे कोई भी लौकिक या पारलौकिक सिद्धि नहीं हो सकती। वह राष्ट्र के लिए भार है। प्रजा की अशान्ति का कारण है। देश की पराधीनता और भ्रष्टता का बीज है। वह स्वयं भ्रष्टाचारी है और भ्रष्टाचार का पोषक है। ऐसे लोग समय पड़ने पर शिष्ट का साथ न देकर दुष्ट के ही साथी बन जाते हैं, अतः ऐसे लोगों को भी सन्मार्ग पर लगाने का प्रयत्न करना राज्य का व राज्याधिकारी का कर्त्तव्य हो जाता है। उक्त कार्यों में हिंसा होना अनिवार्य है और वह ही विरोधी हिंसा है जिसका त्यागी गृहस्थ नहीं हो सकता।
रागादिभावादथवा प्रमादाच्चित्ताक्षतृप्त्यै क्रियते जनैर्या ।
त्रासादिर्हिंसाखिलदुःखदात्री संकल्पिहिंसा भवबन्धिनी सा ॥95॥
अर्थ: गृहस्थ चौथी सङ्कल्पी हिंसा का अवश्य त्यागी होता है। मारने की इच्छा से ही किसी भी प्राणी को मारना सङ्कल्पी हिंसा है। इस सङ्कल्पी हिंसा की सीमा बहुत बड़ी है। सङ्कल्पी हिंसा से जीविका करना उद्योग या आरम्भ नहीं है। पूर्वोक्त सभी कार्यों में हिंसा हो जाना एक बात है जो गृहस्थ के लिए क्षम्य है, हिंसा के द्वारा उक्त कार्यों को साधना बिलकुल दूसरी बात है जो गृहस्थधर्म में अक्षम्य है। इसका खुलासा यह है कि मछली मारने का व्यवसाय, मद्य बनाने व बेचने का व्यवसाय, मांस बेचना, हड्डी व चमड़े का व्यवसाय, अंडे बेचना, मेढक और केचुओं का अचार बनाकर बेचना, वेश्यावृत्ति द्वारा धन पैदा करना, या अन्य प्रकार की व्यभिचार प्रवृत्ति द्वारा धन पैदा करना, डाका डालने का व्यवसाय, धोखा, विश्वासघात दूसरों को जाल में फँसाकर धनोपार्जन करना ये सब पापोपहत वृत्तियाँ हैं जो त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा हैं, या उनके कारण हैं, अथवा उसके अर्थ हैं। अतः सर्वथा परित्याज्य हैं।
अपनी विषयवासनाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को सताना, न्यायमार्ग का उल्लंघन कर द्रव्य कमाना, ये सब संकल्पी हिंसा के रूपान्तर हैं। जब कि दूसरों की रक्षा के लिए, शान्ति के बढ़ाने के लिए, धर्मात्माओं की रक्षा के लिए और अहिंसा और सत्य को जीवित रखने के लिए हिंसा का हो जाना अपरित्याज्य है, कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की पूर्ति में जो हिंसा हो जाती है वह गृहस्थ धर्म के प्रतिकूल नहीं है, किन्तु त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा गृहस्थधर्म के लिए सर्वथा प्रतिकूल है।
संकल्पी हिंसा वह है जो हिंसा की जाती है, तथा विरोधी, उद्योगी और आरम्भी हिंसा वह है जो हिंसा उक्त कार्यों में गृहस्थ से हो जाती है, की नहीं जाती। जो की
आदौ प्रगीता त्रिविधाऽपि हिंसाऽत्याज्याभवेन्मध्यमश्रावकैर्हि ।
रोगादिशान्त्यै कटुकौषधीव संकल्पिहिंसा न कदापि कार्या ॥96॥
अर्थ: गृहस्थ चौथी सङ्कल्पी हिंसा का अवश्य त्यागी होता है। मारने की इच्छा से ही किसी भी प्राणी को मारना सङ्कल्पी हिंसा है। इस सङ्कल्पी हिंसा की सीमा बहुत बड़ी है। सङ्कल्पी हिंसा से जीविका करना उद्योग या आरम्भ नहीं है। पूर्वोक्त सभी कार्यों में हिंसा हो जाना एक बात है जो गृहस्थ के लिए क्षम्य है, हिंसा के द्वारा उक्त कार्यों को साधना बिलकुल दूसरी बात है जो गृहस्थधर्म में अक्षम्य है। इसका खुलासा यह है कि मछली मारने का व्यवसाय, मद्य बनाने व बेचने का व्यवसाय, मांस बेचना, हड्डी व चमड़े का व्यवसाय, अंडे बेचना, मेढक और केचुओं का अचार बनाकर बेचना, वेश्यावृत्ति द्वारा धन पैदा करना, या अन्य प्रकार की व्यभिचार प्रवृत्ति द्वारा धन पैदा करना, डाका डालने का व्यवसाय, धोखा, विश्वासघात दूसरों को जाल में फँसाकर धनोपार्जन करना ये सब पापोपहत वृत्तियाँ हैं जो त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा हैं, या उनके कारण हैं, अथवा उसके अर्थ हैं। अतः सर्वथा परित्याज्य हैं।
अपनी विषयवासनाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को सताना, न्यायमार्ग का उल्लंघन कर द्रव्य कमाना, ये सब संकल्पी हिंसा के रूपान्तर हैं। जब कि दूसरों की रक्षा के लिए, शान्ति के बढ़ाने के लिए, धर्मात्माओं की रक्षा के लिए और अहिंसा और सत्य को जीवित रखने के लिए हिंसा का हो जाना अपरित्याज्य है, कर्त्तव्य है। इस कर्त्तव्य की पूर्ति में जो हिंसा हो जाती है वह गृहस्थ धर्म के प्रतिकूल नहीं है, किन्तु त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा गृहस्थधर्म के लिए सर्वथा प्रतिकूल है।
संकल्पी हिंसा वह है जो हिंसा की जाती है, तथा विरोधी, उद्योगी और आरम्भी हिंसा वह है जो हिंसा उक्त कार्यों में गृहस्थ से हो जाती है, की नहीं जाती। जो की
समस्तविश्वस्य विबोधनार्थं हिंसाप्रभेदाः कथिताः क्रमेण ।
पूर्वोक्तभोदान् स्वपदानुसारं ज्ञात्वेति भक्त्या परिपालयन्तु ॥97॥
अर्थ: पूर्वोक्त श्लोकों द्वारा हिंसा का विस्तृत स्वरूप तथा उसके भेद प्रभेदो का प्रतिपादन श्रीमदाचार्य कुन्थुसागर महाराज ने श्रीभगवान् महावीर स्वामी द्वारा सदुपदिष्ट और आगम परम्परा द्वारा प्राप्त संक्षेप में किया है। इन हिंसा भेदों का स्वरूप समझ करके अहिंसा व्रत का परिपालन अपने-अपने पदानुसार साधु, ऐलक, क्षुल्लक, प्रतिमाधारी व साधारण गृहस्थ श्रावकों को करना चाहिए। निरतिचार, निर्दोष व्रत का परिपालन स्वपर कल्याणकारक है ।
प्रश्नः - सत्यव्रतस्वरूपं मे विद्यते किं गुरो वद।
सत्यं मितं हितकरं सुखदं सुवाच्यं
श्रीदं वचः प्रियकरं मयमानमुक्तम् ।
वाच्यं न वैरजनकं हि मिथो व्यथादं
भ्रान्तिप्रदं विपदि वाऽपि तदेव सत्यम् ॥98॥
अर्थ: अहिंसा व्रत को परिपालन करनेवाला जिस प्रकार अपने मन को पवित्र रखकर अपने कर्त्तव्य को पालन करने के लिए निर्दोष कार्यों को ही करता है वैसे ही उसे सत्यभाषी भी होना चाहिए। सत्य क्या है? यह एक बड़ा प्रश्न है। इसकी अनेक व्याख्याएँ की जाती हैं। दर्शनशास्त्र की दृष्टि से तो जैसा का तैसा कहना सत्य है। पर यह सत्य व्यवहार के लिए सर्वथा अनुकूल नहीं पड़ता। क्वचित् कदाचित् वह निन्द्य और कलह कारक हो जाता है। जैसे, किसी एक आँख वाले मनुष्य को काना, एक खराब पैरवाले को लंगड़ा, झगड़ा करने वाले को झगड़ालु, और असद् व्यवहार करनेवाले को बदमाश इत्यादि शब्दों का प्रयोग दार्शनिक दृष्टि से ज्यों का त्यों वर्णन है अतः सत्य है, तथापि श्रोता को दुःखदायक व्यथा उत्पन्न करनेवाला होने से वह कथन कलह या वैर करा देता है। लोक में भी ऐसा माना जाता है कि यह व्यक्ति जो ऐसा बोलता है बड़ा मूर्ख और उद्धत है। उसे बोलने की भी सभ्यता नहीं है।
धार्मिक दृष्टि से ज्यों का त्यों बोलना भी सत्य है और कहीं पर वह सत्य नहीं भी है। सत्य की व्याख्या धर्मशास्त्र में इस प्रकार की है। जो वचन जीवों को सुनने पर सुखदायक हो वह सत्य है। जो परिणाम में कल्याण कारक अर्थात् हितकर हो वह सत्य है। जो श्रोता को श्रवण करने पर प्रिय हो अप्रिय न हो वह सत्य है। जो वचन विनयपूर्वक दूसरे के सम्मान की रक्षा करनेवाला हो वह सत्य है। जो वचन अपने अहंकार का पूरक न हो वह सत्य है। जो वचन सुननेवालों में वैर या कलह को पैदा न करे वह सत्य है। जिस वचन से श्रोताओं के हृदय को खेद न हो वह सत्य है। जिस वचन से श्रोता भ्रम में न पड़ जाय वह सत्य है। जो वचन निरर्थक अति प्रलाप से रहित परिमित शब्दों में हो वह सत्य है। जो वचन किसी को पाप में प्रवृत्त न कराकर धर्म मार्ग में लगावे वह सत्य है। जो वचन आगम परम्परा के अनुकूल हो वह सत्य है। जो वचन हिंसाकारक या हिंसोत्पादक न हो वह सत्य है। जो वचन किसी को मिथ्यामार्ग या कुमार्ग में न ले जाय वह सत्य है। जो वचन श्रोता को सद्धर्म में स्थापित करे वह सत्य है। उक्त प्रकार से सत्य के अनेक रूप बताए गए हैं। इतना होने पर भी जिस वचन से किसी को विपत्ति आ जाय, अकल्याणकारक हो, भ्रांतिदायक हो और कलह उत्पन्न करा दे तो वह ज्यों का त्यों होकर भी सत्यवचन न होकर अप्रशस्त और निन्द्यवचन है ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है। अतः सत्यासत्य का स्वरूप जानकर असत् वचन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
प्रश्नः - अचौर्यव्रतचिह्नं किं वर्त्तते मे गुरो वद।
त्यक्तं वने वा पतितं श्मशाने कौ स्थापितं स्वात्मन एव बाह्यम् ।
ग्राह्यं ह्यदत्तं भवदं न वस्त्वचौर्यव्रतं तत्सुखदं सदा स्यात् ॥99॥
अर्थ: हे गुरो! अचौर्य व्रत क्या है? कृपया उसका स्वरूप कहिए - जैन सिद्धान्त में पर द्रव्य का ग्रहण ही चौर्य है ऐसा चोरी का बहुव्यापक लक्षण है। इस लक्षण के अनुसार अचौर्यव्रत का परिपूर्ण पालन करनेवाले साधुजन घर, कुटुम्ब व धनादि द्रव्य इन सबका परित्याग कर नग्न देह ही वन में देह के स्नेह से रहित होकर विचरते हैं। वे सब पर द्रव्यों से अपने को पृथक् अनुभव करते हुए एकान्त वन में केवल आत्मनिधि को, जिसे उनकी आत्मा अनादि से भूली हुई थी, खोजने का प्रयत्न करते हैं। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि मेरा आत्मा ही मेरा द्रव्य है, मेरे आत्मा के असंख्यप्रदेश ही मेरा निवास स्थल है। आत्मा से विभिन्न कोई दूसरा आत्मा या दूसरे निर्जीव पदार्थ मेरे नहीं हैं। मेरा मैं ही हूँ, दूसरा पदार्थ दूसरा है, वह मेरा कदापि नहीं हो सकता। यह पृथिवी या आसमान मेरा निवास स्थल है यह उपचार है, क्योंकि मेरे साथ न पृथिवी जाती है और न आसमान मेरे साथ चलता है। मेरे आत्मा के असंख्य प्रदेश ही सदा मेरे पास हैं, और उनमें ही रहता हूँ, वे ही मेरे निवासस्थान हैं। मेरे ज्ञान, दर्शन, श्रद्धा, चारित्र, शक्ति, आनन्द, क्षमा, सरलता, विनयशीलता, सत्यता, पवित्रता और अकिञ्चनता ये मेरे गुण हैं, वे ही मेरी निधियाँ हैं। इनमें ही मेरे सब सुखों का भण्डार भरा है। ये सब मेरे भाव हैं। इनपर किसी का स्वत्व नहीं है। गृहादिक, सुवर्णादिक, भूमि आदिक व अन्न, वस्त्र, सोना, चाँदी, मणि, माणिक्य, दासी और दास आदि सर्व पर हैं, मेरे नहीं। ये सब मेरे स्वरूप से और मेरी सत्ता से सर्वथा भिन्न हैं। अतएव इनका किञ्चिन् मात्र भी ग्रहण चोरी है, महान् पाप है। मेरी आत्मपरणतियों का सुन्दर परिवर्तन ही मेरी उन्नति है और उनका पर पदार्थोन्मुखी परिवर्तन ही मेरी अवनति है। परपदार्थ अर्थात् धनादिक या गृहादिक या कुटुम्बादिक की दृष्टि से उनकी न्यूनता मेरी अवनति नहीं है, क्योंकि वे पदार्थ पर हैं, मेरे नहीं हैं। मेरी सत्ता से विभिन्न पदार्थों की उन्नति ही मेरी उन्नति है, ऐसा मानना मिथ्यात्व है तथा चोरी है। इस प्रकार से आत्मनिधि की खोज करनेवाले और उसमें ही तल्लीन रहनेवाले देह के स्नेह से रहित निःसंग साधु परम अचौर्य व्रत के परिपालक हैं।
जो गृहस्थ हैं, ऊपर लिखे सत्यार्थ विचारों और तन्निहित सत्य तत्त्वों पर जिनकी परिपूर्ण श्रद्धा है, किन्तु अपनी कमजोरी के कारण जो परिगृहीत परपदार्थों को अपना पदार्थ न मानते हुए भी परित्याग करने में अशक्त हैं, परमुखापेक्षी हैं, वे इस महान् अचौर्य
प्रश्नः - ब्रह्मचर्यव्रतचिह्नं किं मे वदास्ति भो गुरो।
त्याज्या स्वकीया ललना यदि स्यात् कथापरासां वद काऽस्ति लोके।
पूर्वोक्तरीतिर्यदि वास्त्यसाध्या त्याज्या परस्त्री स्वपरात्मशान्त्यै ॥100॥
अर्थ: हे गुरुदेव! ब्रह्मचर्य व्रत का क्या स्वरूप है, कृपाकर कहें ।
स्त्री का ग्रहण रागपरिणामों से होता है। रागादि परिणाम आत्मा के विकार भाव हैं। आत्मस्वभाव की प्राप्ति में ये विघ्नकारक हैं। इनसे संसार की और दुःख की परम्परा बढ़ती है। काम-भोग के द्वारा सुखानुभव करनेवाले मोही स्त्री-पुरुष कुत्ते के द्वारा किए गए हड्डी के चर्वण के तुल्य अपने ही रजवीर्य के प्रस्रवण से, जो उनके शारीरिक बल का नाशक है और आत्मपावित्र्यका घातक है, अपने को सुखी मानते हैं। जैसे कुत्ते को यह ज्ञात नहीं है जो सूखे हाड़ों से यह रक्त नहीं आता जिसे चाटकर मैं प्रसन्न हो रहा हूँ, अपि तु यह मेरे ही मुख से निकलनेवाले रक्त का स्वाद है जो हड्डी के संघर्ष से क्षत-विक्षत हो निकलने लगा है, उसी प्रकार कामवेदना से पीड़ित स्त्री-पुरुष परस्पर
प्रश्नः - सङ्गत्यागस्वरूपस्य किं चिह्नं मे गुरो बद।
बाह्योऽन्तरङ्गो भवदोऽस्ति संगो ज्ञात्वेति मुक्त्वा द्विविधं ततस्तम्।
तिष्ठेत्स्वभावे यदि स्वात्मनो वाऽसङ्गव्रतं तस्य भवेत्पवित्रम् ॥101॥
अर्थ: हे गुरुदेव! परिग्रह त्याग व्रत का क्या स्वरूप है, कृपाकर मुझसे कहें - अपनी आत्मा से भिन्न पदार्थों का ग्रहण है, वह परिग्रह है। वह परिग्रह दो प्रकार है-अन्तरङ्ग और बाह्य। आत्मा के विकारस्वरूप भाव जैसे-मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया और लोभ तथा हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद, और नपुंसकवेद ये ४ अन्तरङ्ग परिग्रह हैं और खेत, मकान, सोना, चांदी, रुपया, अन्न, नौकर, नौकरानी, वस्त्र, कपड़े ये दश बाह्य परिग्रह हैं। इन दोनों प्रकार के परिग्रहों को पापदायक कुसङ्ग समझकर जो छोड़ देते हैं वे परिग्रह त्याग महाव्रती हैं और जो सम्पूर्ण रीति से उभय परिग्रहों को छोड़ने में असमर्थ हैं वे यथायोग्य अपनी आवश्यकताओं को कम करते हुए परिग्रह का प्रमाण करते हैं और परिमित में अपना जीवन निर्वाह करते हुए शेष सब परिग्रह का त्याग करते हैं वे परिग्रह परिमाणाणुव्रती माने गये हैं ।
पञ्चाणुव्रतचिह्नं हि प्रोक्तमेवं शिवप्रदम् ।
पालयन्तु सदा भव्याः स्वान्यात्मशान्तये मुदा ॥102॥
अर्थ: ऊपर वर्णित प्रकार से परम्परा से मोक्षसुख प्रदान करनेवाले पञ्च महापापों के एकदेश परित्यागरूप पञ्चाणुव्रत जो गृहस्थ श्रावकों के योग्य हैं वर्णन किए गए हैं। जो जीव अपना कल्याण चाहते हैं तथा परोपकार की इच्छा रखते हैं उन्हें इनका बड़े प्रेम से परिपालन करना चाहिए।
पाप करनेवाला प्रत्येक व्यक्ति न केवल अपने लिए दुःखोत्पादक है बल्कि वह परिवार, कुटुम्ब, जाति, समाज, प्रान्त व देश यहाँ तक कि संसार का शत्रु है। अशान्ति उत्पन्न करने वाला है, अतएव स्वपर हानिकारक महान् अशान्ति के हेतु इन पांचों पापों का त्यागकर अणुव्रतों का पालन करना चाहिए ।
प्रश्नः - श्राद्धमूलगुणानां तु किं चिह्नं मे गुरो वद।
मद्यमांसमधूनां हि सेवनं स्पर्शनं तथा ।
न कार्यं दुःखदं निन्द्यं श्रावकैर्धर्मवत्सलैः ॥103॥
अर्थ: श्रद्धावान् श्रावक का कल्याण केवल श्रद्धामात्र से न होगा, अपने कल्याण के लिए उसे जिनोक्त उस सन्मार्ग पर जिसकी उसने श्रद्धा की है चलना भी होगा, उसे ही चारित्र कहते हैं।
यह चारित्र पञ्चपाप परित्याग रूप है। सम्पूर्णतया पञ्चपाप परित्याग रूप व्रत महाव्रत है। यह दिगम्बरत्व को स्वीकार करनेवाले परम निस्पृही वीतराग निःसङ्ग साधु पुरुषों द्वारा ही साध्य है। यह विधेय मार्ग है जिसे राजमार्ग भी कहते हैं। जो हीन पुरुषार्थी पुरुष इस परम कल्याणकारक मार्ग को पालन करने में असमर्थ हैं उनके लिए एकदेश पाप परित्याग रूप यह श्रावकों का अणुव्रत है। यह अपवाद मार्ग है। मुनिमार्ग का निरूपण मुनिमार्गप्रदीप नामक ग्रंथ में आचार्य श्री कुन्थुसागर महाराज ने किया है। श्रावकधर्म का वर्णन इस ग्रन्थ में किया जा रहा है।
श्रावक के चारित्र में मूलव्रत ८ हैं।-मद्यत्याग, मांसत्याग,मधुत्याग तथा बड़, पीपर, पाकर, ऊमर और कठूमर इन पाँच क्षीर फलों का त्याग ये आठ मूलव्रत हैं। इन आठ मूलगुणों को धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टि को श्रावक संज्ञा प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। मूल के अभाव में जैसे वृक्ष में शाखाएँ, फल-पत्र-निरर्थक हैं, ऐसे ही मूलव्रत के अभाव में उत्तरव्रतों की कल्पना भी निरर्थक है। चारित्ररूपी मन्दिर की यह पहली सीढ़ी है। इस पर चढ़े बिना कोई चारित्रमन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता।
दया धर्म के आराधक श्रावक इन मद्यादि पदार्थों का सेवन तो बहुत दूर की बात है स्पर्शन करना भी पाप समझते हैं। मांस का भक्षण महान् क्रूर कर्म है। मद्य चित्तभ्रम को उत्पन्न कर अनेक पापों को प्रोत्साहित करता है। मधु मधुमक्खियों का सञ्जित खाद्य है, जिसके खाने में उन मधुमक्खियों के साथ ही उस खाद्य रूप मधु में उत्पन्न होनेवाले मक्षिका जातीय असंख्य निकोत जीवों की हिंसा अनिवार्य है। इस प्रकार महान् हिंसा पाप के उत्पादक इन मकारत्रय का स्पर्शन भी दयाधर्माराधक श्रावक के लिए निन्द्य है। इसके सेवन का फल उत्तर काल में अत्यन्त दुःखप्रद है।
बड़ आदि फल भी बहुत से जीवित जीवों के स्थान हैं। वे प्रत्यक्ष भी दीखने में आते हैं और असंख्य जीव ऐसे हैं जो दीखने में नहीं आते। इनको खाने में इनकी हिंसा सुनिश्चित है। यह भी अत्यन्त क्रूर कर्म है। ऐसा विचार कर धर्म के इच्छुक इनका कदापि सेवन नहीं करते। इन आठों का त्याग ही आठ मूल गुण या आठ मूल व्रत कहलाता है। ये आठों सर्वथा अभक्ष्य हैं।१०३ ।
सदा प्राणिसमाकीर्णं वटादिफलपञ्चकम् ।
न भक्ष्यमिष्टसिद्ध्यै च तन्मूलव्रतमिष्यते ॥104॥
अर्थ: श्रद्धावान् श्रावक का कल्याण केवल श्रद्धामात्र से न होगा, अपने कल्याण के लिए उसे जिनोक्त उस सन्मार्ग पर जिसकी उसने श्रद्धा की है चलना भी होगा, उसे ही चारित्र कहते हैं।
यह चारित्र पञ्चपाप परित्याग रूप है। सम्पूर्णतया पञ्चपाप परित्याग रूप व्रत महाव्रत है। यह दिगम्बरत्व को स्वीकार करनेवाले परम निस्पृही वीतराग निःसङ्ग साधु पुरुषों द्वारा ही साध्य है। यह विधेय मार्ग है जिसे राजमार्ग भी कहते हैं। जो हीन पुरुषार्थी पुरुष इस परम कल्याणकारक मार्ग को पालन करने में असमर्थ हैं उनके लिए एकदेश पाप परित्याग रूप यह श्रावकों का अणुव्रत है। यह अपवाद मार्ग है। मुनिमार्ग का निरूपण मुनिमार्गप्रदीप नामक ग्रंथ में आचार्य श्री कुन्थुसागर महाराज ने किया है। श्रावकधर्म का वर्णन इस ग्रन्थ में किया जा रहा है।
श्रावक के चारित्र में मूलव्रत ८ हैं।-मद्यत्याग, मांसत्याग,मधुत्याग तथा बड़, पीपर, पाकर, ऊमर और कठूमर इन पाँच क्षीर फलों का त्याग ये आठ मूलव्रत हैं। इन आठ मूलगुणों को धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टि को श्रावक संज्ञा प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। मूल के अभाव में जैसे वृक्ष में शाखाएँ, फल-पत्र-निरर्थक हैं, ऐसे ही मूलव्रत के अभाव में उत्तरव्रतों की कल्पना भी निरर्थक है। चारित्ररूपी मन्दिर की यह पहली सीढ़ी है। इस पर चढ़े बिना कोई चारित्रमन्दिर में प्रवेश नहीं कर सकता।
दया धर्म के आराधक श्रावक इन मद्यादि पदार्थों का सेवन तो बहुत दूर की बात है स्पर्शन करना भी पाप समझते हैं। मांस का भक्षण महान् क्रूर कर्म है। मद्य चित्तभ्रम को उत्पन्न कर अनेक पापों को प्रोत्साहित करता है। मधु मधुमक्खियों का सञ्जित खाद्य है, जिसके खाने में उन मधुमक्खियों के साथ ही उस खाद्य रूप मधु में उत्पन्न होनेवाले मक्षिका जातीय असंख्य निकोत जीवों की हिंसा अनिवार्य है। इस प्रकार महान् हिंसा पाप के उत्पादक इन मकारत्रय का स्पर्शन भी दयाधर्माराधक श्रावक के लिए निन्द्य है। इसके सेवन का फल उत्तर काल में अत्यन्त दुःखप्रद है।
बड़ आदि फल भी बहुत से जीवित जीवों के स्थान हैं। वे प्रत्यक्ष भी दीखने में आते हैं और असंख्य जीव ऐसे हैं जो दीखने में नहीं आते। इनको खाने में इनकी हिंसा सुनिश्चित है। यह भी अत्यन्त क्रूर कर्म है। ऐसा विचार कर धर्म के इच्छुक इनका कदापि सेवन नहीं करते। इन आठों का त्याग ही आठ मूल गुण या आठ मूल व्रत कहलाता है। ये आठों सर्वथा अभक्ष्य हैं।१०३ ।
युग्मम्
प्रश्नः - अभक्ष्यवस्तुत्यागस्य हेतुः को विद्यते वद।
तुच्छफलाद्यभक्ष्याणां दयाधर्मप्रणाशिनाम् ।
भक्षणं स्पर्शनञ्चापि न कार्यं भवभीरुभिः ॥105॥
अर्थ: आठ पदार्थों को ऊपर अभक्ष्य कहा गया है। सो हे गुरुदेव! अभक्ष्य क्या है? उनके त्याग का क्या हेतु है? उनका त्याग क्यों करना चाहिए। इनके सिवाय भी अभक्ष्य और होते हैं क्या? हैं तो कौन-कौन हैं? कृपाकर कहें - जो पदार्थ खाने के अयोग्य है वह अभक्ष्य है। खाने के अयोग्य पदार्थ पाँच कारणों से होते हैं - (१) जिनके खाने में त्रस जीवों का घात हो। जैसे-पञ्चोदुम्बरफल, रात्रि में निष्पन्न भोजन, मक्खन, (मर्यादा बाहिर) मधु, बरफ, द्विदल, बैगन, अचार इत्यादि।
(२) जिनके खाने में बहुत से स्थावर जीवों का घात होता हो। जैसे-कन्दमूल, बहुबीजा, कोंपल, बालअवस्था वाले फल इत्यादि सप्रतिष्ठित वनस्पतियाँ।
(३) जिनके खाने से चित्त में भ्रम पैदा हो, नशा चढ़े, उन्मत्तता बढ़ जाय, पागलपन आ जाय। जैसे-मदिरा, गांजा, भांग, तम्बाखू, अफीम आदि।
(४) जो उच्च कुलीन धर्मात्मा व्रती पुरुषों द्वारा सेवन नहीं किए जाते हैं वे पदार्थ चौथे प्रकार के अभक्ष्य हैं। लोकविरुद्ध पदार्थ का भक्षण लोकनिन्द्य होता है। जैसे-लहसुन, प्याज आदि। यद्यपि ये जमीकन्द होने के कारण भी अभक्ष्य हैं तथापि लोकविरुद्ध भी है। जो जमीकन्द का त्याग नहीं किए वे भी उनका भक्षण कुलीन होने के नाते नहीं करते हैं। देश भेद से इसमें भेद पड़ जाता है। जिस प्रान्त में जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी लोकनिन्द्य हो वह व्रती को सेवन नहीं करना चाहिए। अजानफल भी इसी श्रेणी में है।
(५) जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी रोगोत्पादक हो या रोगावस्था में अपथ्यकारी हो या सहज ही प्रकृति के विरुद्ध पड़ता हो वह पदार्थ भी अभक्ष्य है। इसके भक्षण करने से मनुष्य रोगी होने पर धर्म कर्म से विहीन हो जाता है। संक्लेश परिणाम होते हैं, अतः हेय है। दूसरी बात यह है कि शरीर में रोग होने पर अनेक रोगों के कीटाणु उत्पन्न हो जाते
तच्चलितरसं वस्तु न भक्ष्यं व्याधिवर्धकम् ।
पूर्वोक्तविधिसाध्यात्स्याद्धि लोके शान्तिदा मतिः ॥106॥
अर्थ: जो पदार्थ खाने के अयोग्य है वह अभक्ष्य है। खाने के अयोग्य पदार्थ पाँच कारणों से होते हैं - (१) जिनके खाने में त्रस जीवों का घात हो। जैसे-पञ्चोदुम्बरफल, रात्रि में निष्पन्न भोजन, मक्खन, (मर्यादा बाहिर) मधु, बरफ, द्विदल, बैगन, अचार इत्यादि।
(२) जिनके खाने में बहुत से स्थावर जीवों का घात होता हो। जैसे-कन्दमूल, बहुबीजा, कोंपल, बालअवस्था वाले फल इत्यादि सप्रतिष्ठित वनस्पतियाँ।
(३) जिनके खाने से चित्त में भ्रम पैदा हो, नशा चढ़े, उन्मत्तता बढ़ जाय, पागलपन आ जाय। जैसे-मदिरा, गांजा, भांग, तम्बाखू, अफीम आदि।
(४) जो उच्च कुलीन धर्मात्मा व्रती पुरुषों द्वारा सेवन नहीं किए जाते हैं वे पदार्थ चौथे प्रकार के अभक्ष्य हैं। लोकविरुद्ध पदार्थ का भक्षण लोकनिन्द्य होता है। जैसे-लहसुन, प्याज आदि। यद्यपि ये जमीकन्द होने के कारण भी अभक्ष्य हैं तथापि लोकविरुद्ध भी है। जो जमीकन्द का त्याग नहीं किए वे भी उनका भक्षण कुलीन होने के नाते नहीं करते हैं। देश भेद से इसमें भेद पड़ जाता है। जिस प्रान्त में जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी लोकनिन्द्य हो वह व्रती को सेवन नहीं करना चाहिए। अजानफल भी इसी श्रेणी में है।
(५) जो पदार्थ शुद्ध होने पर भी रोगोत्पादक हो या रोगावस्था में अपथ्यकारी हो या सहज ही प्रकृति के विरुद्ध पड़ता हो वह पदार्थ भी अभक्ष्य है। इसके भक्षण करने से मनुष्य रोगी होने पर धर्म कर्म से विहीन हो जाता है। संक्लेश परिणाम होते हैं, अतः हेय है। दूसरी बात यह है कि शरीर में रोग होने पर अनेक रोगों के कीटाणु उत्पन्न हो जाते
युग्मम्
प्रश्नः - वदातिचारकाः पञ्चौदुम्बरस्य कति प्रभो।
यावद्येषां फलानां तु गुणधर्मो न ज्ञायते ।।
न तावद् भक्षणं तेषां कार्यं तत्त्वार्थवेदिभिः ॥107॥
अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।
एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।
फलानामपि चान्येषां कृत्वा चूर्णञ्च छेदनम् ।।
ज्ञात्वा जीवांस्ततस्त्यक्त्वा कार्यं पश्चाद्धि भक्षणम् ॥108॥
अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।
एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।
त्रसजीवसमाकीर्णं फलं सेव्यं न तत्त्वतः ।
अतीचारविमुक्तं हि श्लाघ्यं तस्य व्रतं भवेत् ॥109॥
अर्थ: जिस फल को व्रती पुरुष भक्ष्य है या अभक्ष्य ऐसा निर्णीत नहीं कर सकते वह कभी भक्ष्य नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को वह कभी नहीं खाना चाहिए। उस प्रमाद से अभक्ष्य भक्षण में आ सकता है। बिना जाने हुए फल को खाने से खुद का भी मरण या रोगादिक का होना सम्भव है।
एवं और भी फल आदि वस्तुएँ जो सुखा ली जाती हैं और जिनके टुकड़े-टुकड़े करके रख लिए जाते हैं या चूर्ण या गोली बनाकर औषधि के काम में लाए जाते हैं उन सबको अशोधित खाना दोषास्पद है। शोध कर ही निर्जीवावस्था में उनका सेवन करना चाहिए। त्रसजीव संयुक्त बेर, मकुइया, जामुन और अचार आदि अभक्ष्य ही हैं। बेर आदि शोधनीय हो भी जाँय तो भी उनमें त्रस जीवों की संभावना है। अतः अभक्ष्य ही हैं। इस प्रकार विचारपूर्वक भोजन करनेवाले पुरुष का व्रत ही निरतिचार और प्रशंसा योग्य होता है। १०७।१०८ ।
विशेषकम्
प्रश्नः - मांसातिचारचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।
चर्मपात्रे धृतं तैलं हिंगु नीरं तथा घृतम् ।
त्यक्तमांसाशनैस्त्याज्यमेवमन्यद्यथागमम् ॥110॥
अर्थ: चमड़े के बर्तन में रखी हुई वस्तु का भक्षण मांसातिचारोत्पादक है। जैसे घी, तेल, हींग और जल आदि पदार्थ अनेक प्रान्तों में चमड़े की मशक में रखे जाते हैं। चमड़े की चालनी में चाला हुआ, चमड़े की तराजू में तौला हुआ तथा चमड़े के सूपे में रखा हुआ आटा आदि अभक्ष्य हैं। और जो अनाज धोकर शुद्ध किया जा सकता है उसे धोकर शुद्ध कर ही काम में लाना चाहिए। भोजन में यदि नख रोमादि का संपर्क आ जाय तो वह नहीं खाना चाहिए। रोम शरीरांश है अतः रोम, नख आदि सहित (स्पृष्ट) पदार्थ न खाना चाहिए। इसी प्रकार जिस पदार्थ में यह मांस है ऐसा संकल्प हो जाय उसे खा लेना भी मांसातिचार है। इनका वर्जन व्रती को अवश्य करना चाहिए। मांसभक्षी के हाथ का तथा उसके वर्तनों में बना आहार भी सर्वथा त्याज्य है ।
प्रश्नः - मद्यातिचारचिह्नं किं वर्त्तते मे गुरो वद।
मद्यपायिकरस्पृष्टं भोजनमपि दोषकृत् ।
न सेव्यं निन्दितं वस्तु स्वादतश्चलितं तथा ॥111॥
अर्थ: हे गुरुदेव! मद्यत्याग व्रत के दोष कौन-कौन हैं, कृपाकर बताइए - गुड़ आदि में मदोत्पादक अन्य पदार्थों को गलाकर मद्य बनाया जाता है। उसे पीनेवाले मद्यप कहलाते हैं। मद्य में अनेक त्रस जीव उत्पन्न होते हैं, जो मद्यपान से नष्ट हो जाते हैं। उन्माद को उत्पन्न करने के लिये ही लोग मद्य का सेवन करते हैं। इसीप्रकार जो पदार्थ मदोत्पादक हों और जो पदार्थ सड़ जाने से अपने स्वाद से विचलित हो गये हैं उनका सेवन मद्य के दोष को ही उत्पन्न करता है। मद्य पीनेवालों की संगति करना, उनसे सम्बन्ध बढ़ाना, उनके साथ बैठकर भोजन करना, उनके द्वारा बनाया अन्न व जल ग्रहण करना, उनके द्वारा उपयुक्त बर्तनों में भोजन आदि करना और उनके बाल-बच्चों से अपने बालबच्चों की शादी आदि करना ये सब मद्य के अतिचार हैं। इन कार्यों से मद्य के प्रति होनेवाली विरक्तता मिट जाती है और मद्य के प्रति अनुराग क्रमशः बढ़ता जाता है। कुछ ही समय बाद ऐसे लोग स्वयं मद्यपायी हो जाते हैं। उनका भक्ष्याभक्ष्य का विवेक उन अविवेकियों की संगति में नष्ट हो जाता है। अभ्यक्ष्य के प्रति घृणा का भाव उठ जाता है। यह विचार कर मद्य के उक्त अतिचारों से दूर रहकर अपने व्रत की रक्षा करनी चाहिए ।
प्रश्नः - मध्वतिचारचिह्नं किं वर्तते मे गुरो वद।
त्रसजीवसमाकीर्णं कुसुमं चान्यद्वस्तुकम् ।
मधुस्पृष्टं सदाऽहृद्यं त्याज्यं तत्त्वार्थवेदिभिः ॥112॥
अर्थ: हे गुरुदेव! मधुत्यागव्रत में भी कोई अतिचार होते हैं? यदि होते हैं तो कृपाकर समझाइए - मधु त्रस जीवों का कलेवर है और त्रसोत्पादक है अतएव अग्राह्य है। इसी प्रकार उक्त दोषों से पूर्ण जो भी पदार्थ हैं उनका सेवन करना मधुव्रत के लिए ही दोषाधायक है। फूलों में उसकी गंध और रस के लोभी छोटे-छोटे जन्तु सदा बसते हैं और प्राणान्त हो जाने पर भी उनको नहीं छोड़ना चाहते। कमल में गंध के लोभ में भ्रमर के मरण को प्राप्त हो जाने की कथा जगत् में प्रसिद्ध है। इसी प्रकार भ्रमर की ही जाति के अन्य क्षुद्र कीटाणुओं की भी यही स्थिति है। उक्त कारणों से प्रायः फूलों का सेवन नहीं करना चाहिए। जो पुष्प शोधे जा सकते हैं-स्पष्टतया त्रस रहित किए जा सकते हैं, आवश्यकता होने पर उनका उपयोग कर भी सकते हैं, तो भी ऐसी पुष्प जो शोधे नहीं जा सकते, या शोधे जाने पर भी जिनपर क्षुद्र जन्तु उड़कर बैठ जाते हैं, या जो सदा जीवसमाकीर्ण ही रहते हैं ऐसे नीम के फूल केतकी पुष्प आदि सर्वथा परिहार के योग्य हैं।
मधुस्पृष्ट भोज्य को ग्रहण करना, मधुस्पृष्ट भाजन में भोजन करना भी अतिचार है। नेत्र में, दांतों में और गुदा में उत्पन्न हुए अनेक रोगों में जो मधु का प्रयोग किया जाता है वह भी दोषाधायक है। अर्थात् औषधि के रूप में लेपादि के लिए भी मधु का प्रयोग मधुव्रतवाले के लिए अतिचार ही है। अतः अतिचारों का परहेज कर व्रत को निर्मल बनाना ही श्रेयस्कर है ।
प्रश्नः - द्यूतातिचारचिह्नं किं वर्तते मे गुरो वद।
क्रीडतश्च मिथो द्यूतं दृष्ट्वा जीवान् कदापि न।
तुष्येत् पलायनं लोभात् कारयित्वा पशोस्तथा ॥113॥
अर्थ: हे गुरो! द्यूत व्रत के दोषाधायक अतिचारों का वर्णन कीजिए - जुआ खेलना जैसे विशिष्ट राग-द्वेष, लोभ और मोह का उत्पादक होने से श्रेयोमार्ग का विघातक है उसी उसी प्रकार वे सब कार्य जो द्यूत क्रीड़ा के समय ही विशिष्ट राग-द्वेष को उत्पन्न करते हों वे सब द्यूतक्रीड़ा जैसे ही हैं और उनका सेवन व्रती पुरुष के लिए अतिचार है।
पशुओं का लड़ाना, दौड़ाना व परस्पर संघर्ष करा देना ये सब राक्षसी प्रकृति के आनन्ददायक कार्य दोषोत्पादक हैं। ये लोग पशुओं की पराजय से अपनी पराजय और उनकी विजय में अपनी विजय मानकर उनमें मारणान्तिक संघर्ष उत्पन्न करा देते हैं। यह सब महान् दोषाधायक है।
होड़ लगाकर जीत हार की शर्त रखकर जो भी खेल खेले जाते हैं, जिनका अभिप्राय अर्थात् उद्देश्य केवल अपने दुरभिप्राय और दुरिच्छाओं की पूर्ति है, परपराजय, परनिन्दा, परावनति तथा स्वविजय, स्वप्रशंसा और स्वाहंकार ही जिनका प्रतिफल है वे सब कार्य जैसे ताश खेलना, चौपर, संतरंज, घुड़दौड़ आदि द्यूत के समान ही दोषाधायक होने से अतिचार हैं।
पर स्वास्थ्य रक्षा, ज्ञानवृद्धि और सदाचार की उन्नति के उद्देश्य से किए जानेवाले और उक्त उद्देश्य की पूर्ति करनेवाले होड़ के कार्य दोषाधायक नहीं हैं। उससे मनुष्य की उन्नति होती है विद्या बढ़ती है, स्वास्थ्य अनुकूल होता है। सदाचार की वृद्धि होती है। जैसे-सदाचारी छात्र को पारितोषिक देने की शर्त लगाकर घोषणा करना, अमुक ग्रंथ में अच्छे नम्बरों में पास होने पर अमुक पारितोषिक प्राप्त होगा आदि की घोषणा करना तथा अनुत्तीर्ण होने पर शारीरिक व आर्थिक दण्ड की घोषणा करना इत्यादि ये सब कार्य ग्राह्य हैं; क्योंकि ये बालकों को द्यूतादि से दूर कर ज्ञानार्जन और स्वास्थ्य तथा सदाचार वर्द्धन की प्रेरणा करते हैं।
किसी भी कार्य का गुणदोष उसके उद्देश्यपूर्ति के ऊपर ही लिया जाता है। एक ही कार्य दोषोत्पादक होने से हेय और गुणोंत्पादक होने से उपादेय हो जाता है। मुनिपर उपसर्ग करनेवाले सिंह और सिंह से मुनि की रक्षा करने की इच्छा रखनेवाले शूकर में जब संघर्ष हुआ तब दोनों एक दूसरे पर प्रहार करते थे, मारते काटते थे, यहाँ तक कि अन्त में दोनों मृत्यु को प्राप्त हो गए। एक दूसरे को मारने के दोनों दोषी हुए फिर भी शूकर स्वर्ग गया और सिंह नरक गया। दोनों के कषायें थीं पर दोनों के उद्देश्य भिन्न थे, इसलिए एक ही कार्य करने पर दोनों के परिणामों में महान् भेद था, अतएव उनके फल
प्रश्नः - वेश्यात्यागातिचारस्य किं चिह्नं विद्यते वद
वार्तालापः तया सार्धं न कार्यो धार्मिकैर्जनैः।
न वेश्यागीतनृत्यादि पश्येद् गच्छेन्न तद्गृहम् ॥114॥
अर्थ: वेश्याव्यसन त्याग व्रत के अतिचार कौन हैं, कृपाकर हे गुरो! कहिए - वेश्याव्यसन त्याग व्रत की रक्षा करनेवाले को चाहिए कि वह उसके प्रति प्रेरणादायक प्रत्येक कार्य से बचे। वे सब उस व्रत के अतिचार हैं। जैसे वेश्या का नृत्य देखना, उसका गाना सुनना, उसके घर जाना, उससे वार्तालाप करना, उसके साथ लेनदेन व्यापार आदि करना, उसे अपने गृह में रहने को स्थान देना, वेश्याव्यसनियों की संगति करना, उन्हें वेश्या के प्रति अनुरागी बनाना, उन्हें आर्थिक सहायता देना ये सब उस व्रत को नाश करने के हेतु हैं। चित्र के द्वारा या सिनेमा आदि के द्वारा भी वेश्यानृत्यदर्शन या वेश्यागीतश्रवण इस व्रत के लिए दोषास्पद है ।
प्रश्नः - स्तेयातिचारचिह्नं किं विद्यते मे गुरो वद।
धनधान्यादिकमग्राह्यं परस्यान्यायतश्छलात् ।
यतो व्रतं भवेत् पूर्णं लोकद्वयसुखावहम् ॥115॥
अर्थ: हे गुरुदेव! चोरी व्यसन त्यागव्रत के अतिचारों का प्रतिपादन कीजिए - चोरी का त्याग करनेवाला व्यक्ति कदाचित् चोरी न करते हुए भी परके धन, धान्य, पशु आदि के पदार्थों को अथवा राजकीय, व्यापारिक, सामाजिक, धार्मिक तथा कौटुम्बिक अधिकारों को अन्य मार्ग से, विश्वासघात करके और कपट करके छीन लेवे तो यह सब चौर्यत्यागव्रत के ही दोष हैं ।