सम्यग्दर्शन (सम्यक्त्व, सम्यक् दृष्टि): परिभाषा, स्वरूप, लक्षण, भेद, अंग, दोष, फल | Samyagdarshan: Sampurn Vivechan

सम्यग्दर्शन को आगम में धर्म का मूल और मोक्ष महल की पहली सीढ़ी कहा है। यह पोस्ट मिथ्यात्व: सम्पूर्ण विवेचन की जोड़ी है: वहाँ बताया कि संसार का मूल क्या है, यहाँ बताया है कि उससे छूटने की शुरुआत कहाँ से होती है। क्रम है: परिभाषा, स्वरूप, लक्षण, भेद, उत्पत्ति, आठ अंग, पच्चीस दोष, महिमा और फल, सम्यग्दृष्टि का जीवन, कथाएँ, प्रश्नोत्तर और शब्दकोश। हर भाग में ग्रंथों के मूल सूत्र, गाथा और श्लोक ज्यों के त्यों दिए हैं, साथ में सरल हिन्दी अर्थ।

सम्यक्त्व, सम्यग्दर्शन, सम्यक् दृष्टि: तीनों एक ही गुण के नाम हैं। जिस जीव में यह गुण प्रकट है, उसे सम्यग्दृष्टि कहते हैं।


१. परिभाषा

तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 1, सूत्र 2:

तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥

अर्थ: जीव आदि तत्त्व जैसे हैं, वैसा ही उनका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार (आचार्य समन्तभद्र), श्लोक 4:

श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥4॥

अर्थ: सच्चे देव (आप्त), सच्चे शास्त्र (आगम) और सच्चे गुरु (तपस्वी) का श्रद्धान, जो तीन मूढ़ताओं से रहित, आठ अंगों से सहित और आठ मद से रहित हो, वह सम्यग्दर्शन है।

बृहद् द्रव्यसंग्रह (आचार्य नेमिचन्द्र), गाथा 41:

जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं रूवमप्पणो तं तु ।
दुरभिणिवेसविमुक्कं णाणं सम्मं खु होदि सदि जह्मि ॥41॥

अर्थ: जीव आदि तत्त्वों का श्रद्धान सम्यक्त्व है, और वह आत्मा का ही अपना रूप है। उसके होने पर ज्ञान खोटे आग्रह से छूटकर सम्यक् (सच्चा) हो जाता है।

सार: तीनों परिभाषाएँ एक ही बात कहती हैं। तत्त्व का श्रद्धान, देव शास्त्र गुरु का श्रद्धान और अपने आत्मा की रुचि, ये एक ही सम्यक्त्व को तीन ओर से देखना है।


२. स्वरूप: निश्चय और व्यवहार

छहढाला (पं. दौलतराम जी), तीसरी ढाल, छन्द 2 (निश्चय):

पर-द्रव्यनतैं भिन्न आप में, रुचि सम्यक्त्व भला है।

अर्थ: पर द्रव्यों से भिन्न अपने आत्मा में रुचि होना ही सच्चा (निश्चय) सम्यक्त्व है।

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 3 (व्यवहार):

जीव-अजीव तत्त्व अरु आस्रव, बन्धरु संवर जानो।
निर्जर मोक्ष कहे जिन तिनको, ज्यौं का त्यौं सरधानो॥
है सोई समकित व्यवहारी, अब इन रूप बखानो।

अर्थ: जिनेन्द्र देव के कहे सात तत्त्वों का जैसा का तैसा श्रद्धान करना व्यवहार सम्यक्त्व है।

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 10:

देव जिनेन्द्र गुरु परिग्रह बिन, धर्म दयाजुत सारो।
येहू मान समकित को कारन, अष्ट अंग-जुत धारो॥(10)

अर्थ: जिनेन्द्र देव, परिग्रह रहित गुरु और दया से युक्त धर्म को मानना भी सम्यक्त्व का कारण है, इसे आठ अंगों सहित धारण करो।

समयसार (आचार्य कुन्दकुन्द), गाथा 13:

भूदत्थेणाभिगदा जीवाजीवा य पुण्णपावं च ।
आसवसंवरणिज्जरबंधो मोक्खो य सम्मत्तं ॥13॥

अर्थ: भूतार्थ (सच्ची दृष्टि) से जाने हुए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष, ये नौ तत्त्व ही सम्यग्दर्शन हैं।

समयसार, गाथा 11:

भूदत्थमस्सिदो खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो ॥11॥

अर्थ: जो जीव भूतार्थ (शुद्धनय) का आश्रय लेता है, वह निश्चय से सम्यग्दृष्टि होता है।

समझें: व्यवहार सम्यक्त्व साधन है, निश्चय सम्यक्त्व साध्य। सात तत्त्व, देव शास्त्र गुरु का सच्चा श्रद्धान करते करते जीव अपने शुद्ध आत्मा की रुचि तक पहुँचता है। छहढाला इसी को कहती है: “हेतु नियत को होई”, यानी व्यवहार निश्चय का कारण है।


३. लक्षण: सम्यग्दृष्टि को कैसे पहचानें

सर्वार्थसिद्धि (आचार्य पूज्यपाद), अध्याय 1, सूत्र 2 की टीका:

तद् द्विविधं, सरागवीतरागविषयभेदात् प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं प्रथमम्। आत्मविशुद्धिमात्रमितरत्।

अर्थ: सम्यग्दर्शन दो प्रकार का है, सराग और वीतराग। प्रशम, संवेग, अनुकम्पा और आस्तिक्य आदि का प्रकट होना जिसका लक्षण है, वह सराग सम्यग्दर्शन है। आत्मा की विशुद्धि मात्र वीतराग सम्यग्दर्शन है।

सराग सम्यक्त्व के ये चार बाहरी चिह्न हैं:

लक्षण अर्थ रोज़ के जीवन में कैसा दिखता है
प्रशम कषायों का मन्द होना क्रोध आए तो टिके नहीं, बदले की भावना न रहे
संवेग संसार से डर, धर्म में उत्साह भोगों में डूबकर भी भीतर से “यह मेरा नहीं” का भाव
अनुकम्पा सब जीवों पर दया किसी को दुःखी देखकर मन पिघलना, यथाशक्ति सहायता
आस्तिक्य जिनवचन, आत्मा, परलोक, कर्मफल में दृढ़ विश्वास “भगवान ने कहा है तो ऐसा ही है” यह अडिग भाव

छहढाला (तीसरी ढाल, छन्द 11) भी कहती है: “संवेगादिक चित पागो”, यानी संवेग आदि गुणों में चित्त को रंग लो।

ध्यान रहे: ये चिह्न बाहर से अनुमान कराते हैं। असली सम्यक्त्व भीतर का गुण है, जिसे पूरी तरह केवली ही जानते हैं।


४. भेद

(क) उत्पत्ति की अपेक्षा: निसर्गज और अधिगमज

तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 1, सूत्र 3:

तन्निसर्गादधिगमाद्वा ॥३॥

सर्वार्थसिद्धि टीका:

निसर्गः स्वभाव इत्यर्थः। अधिगमोऽर्थावबोधः।

अर्थ: वह सम्यग्दर्शन निसर्ग से या अधिगम से उत्पन्न होता है। निसर्ग यानी स्वभाव से (बिना उपदेश के), अधिगम यानी पदार्थों के ज्ञान से (उपदेश सुनकर)।

मूलाचार प्रदीप, पञ्चम अधिकार, श्लोक 1382 से 1383 (अर्थ):

जो भव्य जीव है, पंचेन्द्रिय है, संज्ञी है और संसाररूपी समुद्र के किनारे आ लगा है उसके काल प्राप्त कर पर जो देव-शास्त्र-गुरु में, तत्त्वों में और मोक्षमार्ग में, बिना गुरु के उपदेश के बहुत शीघ्र स्वयं महा निश्चय हो जाता है उसको निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं।

समझें: निसर्गज में भी पिछले जन्मों का सुना हुआ उपदेश काम करता है, बस इस जन्म में तत्काल उपदेश की ज़रूरत नहीं पड़ी। भीतर का कारण दोनों में एक ही है: दर्शनमोह का उपशम, क्षय या क्षयोपशम।

(ख) कर्म की अपेक्षा: औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक

ज्ञानार्णव (आचार्य शुभचन्द्र), सर्ग 6, श्लोक 7:

क्षीणप्रशान्तमिश्रासु मोहप्रकृतिषु क्रमात् । तत् स्याद्द्रव्यादिसामग्र्या पुंसां सद्दर्शनं त्रिधा ॥7॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की सामग्री मिलने पर दर्शनमोह की प्रकृतियों के क्षय, उपशम और क्षयोपशम से सम्यग्दर्शन क्रम से तीन प्रकार का होता है।

भेद क्या होता है विशेषता
औपशमिक सात प्रकृतियाँ (मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति और अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ) दबी हुई, जैसे गंदे पानी में मैल नीचे बैठ जाए सबसे पहले यही होता है, अन्तर्मुहूर्त ही टिकता है
क्षायोपशमिक छह दबी या क्षीण, सम्यक्त्व प्रकृति का उदय निर्मल नहीं: चल, मलिन, अगाढ़ दोष रहते हैं; सबसे अधिक पाया जाने वाला
क्षायिक सातों प्रकृतियों का पूर्ण क्षय कभी नहीं छूटता, पूर्ण निर्मल

तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 2, सूत्र 3 में औपशमिक भाव के दो भेद गिनाए हैं:

सम्यक्त्वचारित्रे ॥

मूलाचार प्रदीप, पञ्चम अधिकार, श्लोक 1388 (अर्थ):

तथा इन्हीं सातों प्रकृतियों का जब पूर्णरूप से क्षय हो जाता है तब आसन्न भव्यजीवों को क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है। यह क्षायिक सम्यग्दर्शन साक्षात् मोक्ष देने वाला है और प्रकट होने के बाद सदा बना रहता है।

कर्मप्रकृति, गाथा 158 (अर्थ):

क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव उत्कृष्टतः चौथे भव में सिद्धि को प्राप्त करता है।

(ग) अनुभव की अपेक्षा: सराग और वीतराग

ऊपर लक्षण में सर्वार्थसिद्धि का वचन दिया है। चौथे गुणस्थान से छठे तक प्रायः सराग सम्यक्त्व की चर्चा होती है, जहाँ प्रशम आदि चिह्न दिखते हैं। वीतराग सम्यक्त्व आत्मा की विशुद्धि मात्र है।

(घ) नय की अपेक्षा: निश्चय और व्यवहार

ऊपर स्वरूप में छहढाला और समयसार के वचन दिए हैं। व्यवहार सम्यक्त्व: सात तत्त्व और देव शास्त्र गुरु का सच्चा श्रद्धान। निश्चय सम्यक्त्व: पर से भिन्न अपने शुद्ध आत्मा की रुचि।


५. उत्पत्ति: सम्यक्त्व कैसे प्रकट होता है

सर्वार्थसिद्धि, अध्याय 1, सूत्र 7 की टीका:

साधनं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च। अभ्यन्तरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो वा।

अर्थ: सम्यग्दर्शन का साधन दो प्रकार का है, भीतरी और बाहरी। भीतरी साधन दर्शनमोह का उपशम, क्षय या क्षयोपशम है।

उसी टीका में बाहरी साधन गिनाए हैं:

तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनबिम्बदर्शनम्। मनुष्याणामपि तथैव।

अर्थ: तिर्यंचों में किसी को जातिस्मरण (पिछले जन्म की याद), किसी को धर्मश्रवण, किसी को जिनबिम्ब दर्शन से सम्यक्त्व होता है। मनुष्यों में भी ऐसा ही। (नारकियों में वेदना का अनुभव भी कारण बनता है।)

पाँच लब्धियाँ: पहला (प्रथमोपशम) सम्यक्त्व पाने से पहले जीव को पाँच लब्धियाँ मिलती हैं। पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, एकत्वसप्तति श्लोक 12 (अर्थ) में इनके नाम हैं:

१. देशना, २. प्रायोग्य, ३. विशुद्धि, ४. क्षयोपशम तथा ५. करणलब्धि

पहली चार भव्य और अभव्य दोनों को मिल सकती हैं, पर करणलब्धि (अधःकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण रूप परिणाम) मिलने पर ही सम्यक्त्व निश्चित प्रकट होता है।

कर्मप्रकृति (अर्थ):

दर्शनमोह के तीन भेद होने का दृष्टान्तपूर्वक वर्णन-यन्त्र (जाँता या चक्की) से दले हुए कोदों के समान प्रथमोपशम सम्यक्त्व परिणामरूप यन्त्र से मिथ्यात्व रूप कर्म द्रव्य तीन प्रकार का हो जाता है

समझें: बन्ध के समय दर्शनमोह एक ही (मिथ्यात्व) होता है। पहली बार सम्यक्त्व होते ही वह चक्की में दले कोदों की तरह तीन हिस्सों में बँट जाता है: मिथ्यात्व, मिश्र और सम्यक्त्व प्रकृति। यही कारण है कि मिथ्यात्व के प्रभेदों में तीन दर्शनमोह प्रकृतियाँ आती हैं।


६. आठ अंग

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 12 से 13 (आठों अंग एक साथ):

जिन-वच में शंका न, धारि वृष, भव-सुख-वांछा भानै।
मुनि-तन मलिन न देख घिनावै, तत्त्व कुतत्त्व पिछानै॥
निज-गुन अरु पर औगुन ढाकै, वा निज-धर्म-बढ़ावै।
कामादिक कर वृषतैं चिगते, निज-पर को सु दृढ़ावै॥(12)

धर्मीसों गउ-वच्छ-प्रीति-सम, कर जिन-धर्म दिपावै।

अब रत्नकरण्ड श्रावकाचार से एक एक अंग:

(१) निःशंकित

इदमेवेदृशं चैव तत्वं नान्यन्नचान्यथा ।
इत्यकम्पाऽऽयसाम्भोवत् सन्मार्गेऽसंशया रुचिः ॥11॥

अर्थ: तत्त्व यही है, ऐसा ही है, दूसरा नहीं और दूसरी तरह नहीं, इस प्रकार तलवार के पानी (धार) की तरह अडिग, सन्मार्ग में शंका रहित रुचि निःशंकित अंग है।

(२) निःकांक्षित

कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोदये ।
पापबीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकांक्षणा स्मृता ॥12॥

अर्थ: संसार का सुख कर्म के अधीन है, नाशवान है, बीच बीच में दुःखों से घिरा है और पाप का बीज है; ऐसे सुख में आस्था न रखना निःकांक्षित अंग है।

(३) निर्विचिकित्सा

स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रते ।
निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिः मता निर्विचिकित्सिता ॥13॥

अर्थ: शरीर स्वभाव से अपवित्र है, पर रत्नत्रय से पवित्र हुए (मुनि के) शरीर से घृणा न करके उनके गुणों में प्रीति रखना निर्विचिकित्सा अंग है।

(४) अमूढदृष्टि

कापथे पथि दुःखांना कापथस्थेऽप्यसंमतिः ।
असंपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढ़ा दृष्टिरुच्यते ॥14॥

अर्थ: दुःखों के मार्ग रूप कुमार्ग में और कुमार्ग पर चलने वालों में मन से सहमति न देना, शरीर से सम्पर्क न रखना और वचन से प्रशंसा न करना अमूढदृष्टि अंग है।

(५) उपगूहन

स्वयंशुद्धस्य मार्गस्य, बालाशक्तजनाश्रयाम् ।
वाच्यतां यत्प्रमार्जन्ति, तद्वदन्त्युपगूहनम् ॥15॥

अर्थ: मोक्षमार्ग तो स्वयं शुद्ध है; अज्ञानी या असमर्थ लोगों के कारण उस पर जो निन्दा आती है, उसे दूर करना उपगूहन अंग है।

(६) स्थितिकरण

दर्शनाच्चरणाद्वापि चलितां धर्मवत्सलैः ।
प्रत्यवस्थापनं प्राज्ञैः स्थितिकरणमुच्यते ॥16॥

अर्थ: जो सम्यग्दर्शन या चारित्र से डिग रहे हों, धर्म प्रेमी ज्ञानी जनों द्वारा उन्हें फिर से उसमें स्थिर करना स्थितिकरण अंग है।

(७) वात्सल्य

स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव - सनाथापेतकैतवा ।
प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते ॥17॥

अर्थ: अपने साधर्मी जनों के प्रति सच्चे भाव से, छल कपट रहित, यथायोग्य आदर सत्कार करना वात्सल्य अंग है। छहढाला कहती है: “धर्मीसों गउ-वच्छ-प्रीति-सम”, जैसे गाय बछड़े से प्रेम करती है।

(८) प्रभावना

अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् ।
जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः स्यात्प्रभावन ॥18॥

अर्थ: अज्ञान रूपी अन्धकार के फैलाव को यथायोग्य दूर करके जिनशासन की महिमा को प्रकाशित करना प्रभावना अंग है।

एक भी अंग कम हो तो?

नाङ्गहीनं मलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसन्ततिम् ।
न हि मन्त्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विषवेदनाम् ॥21॥

अर्थ: अंग से हीन सम्यग्दर्शन जन्म मरण की परम्परा को काटने में समर्थ नहीं, जैसे एक अक्षर कम मन्त्र विष की वेदना को दूर नहीं करता।


७. पच्चीस दोष

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 11:

वसु मद टारि निवारि त्रिशठता, षट् अनायतन त्यागो।
शंकादिक वसु दोष बिना संवेगादिक चित पागो॥
अष्ट अंग अरु दोष पचीसों, तिन संक्षेप हु कहिये।
विन जानेतैं दोष-गुनन को, कैसे तजिये गहिये॥(11)

8 मद + 3 मूढ़ता + 6 अनायतन + 8 शंका आदि दोष = 25 दोष।

(क) आठ मद

रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक 25:

ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः ।
अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः ॥25॥

अर्थ: ज्ञान, पूजा (प्रतिष्ठा), कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर (रूप), इन आठ के आश्रय से घमण्ड करना मद है, ऐसा मद रहित (गणधर आदि) कहते हैं।

आगे का श्लोक 26 बताता है क्यों:

स्मयेन योऽन्यानत्येति धर्मस्थानगर्विताशयः ।
सोऽत्येति धर्ममात्मीयं न धर्मो धार्मिकै बिना ॥26॥

अर्थ: जो घमण्ड से दूसरे धर्मात्माओं का तिरस्कार करता है, वह अपने ही धर्म का तिरस्कार करता है, क्योंकि धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं होता।

(ख) तीन मूढ़ता

लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता और पाखण्डिमूढ़ता (गुरुमूढ़ता)। रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक 22, 23, 24 के मूल पाठ सहित विवरण मिथ्यात्व पोस्ट के “तीन मूढ़ता” भाग में देखें। देवमूढ़ता का श्लोक:

वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेषमलीमसाः ।
देवता यदुपासीत देवतामूढ़मुच्यते ॥23॥

अर्थ: वरदान पाने की आशा से राग द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना देवमूढ़ता है।

(ग) छह अनायतन

अनायतन यानी धर्म का स्थान न होना: कुदेव, कुगुरु, कुधर्म और इन तीनों के सेवक, इन छह की प्रशंसा या संगति। छहढाला:

कुगुरु-कुदेव-कुवृष-सेवक की, नहिं प्रशंस उचरै है।
जिनमुनि जिनश्रुत बिन, कुगुरादिक तिन्हैं न नमन करै है॥(14)

(घ) शंका आदि आठ दोष

आठ अंगों के ठीक उल्टे: शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, मूढदृष्टि, अनुपगूहन, अस्थितिकरण, अवात्सल्य और अप्रभावना। छहढाला: “इन गुनतैं विपरीत दोष वसु, तिनकों सतत खिपावै”।

ज्ञानार्णव, सर्ग 6, श्लोक 8 (अर्थ): सम्यग्दर्शन की शक्ति का घात करने वाले पच्चीस दोषों को छोड़ने से ही यह कहीं प्राप्त होता है।


८. महिमा और फल

(क) धर्म का मूल

अष्टपाहुड, दर्शनपाहुड (आचार्य कुन्दकुन्द), गाथा 2:

दंसणमूलो धम्मो उवइट्ठो जिणवरेहिं सिस्साणं । तं सोऊण सकण्णे दंसणहीणो ण वंदिव्वो ॥2॥

अर्थ: जिनवर ने शिष्यों को ऐसा धर्म कहा है जिसका मूल दर्शन (सम्यग्दर्शन) है। हे सत्पुरुषो, इसे अपने कानों से सुनकर समझो: दर्शन से रहित वन्दना योग्य नहीं।

दर्शनपाहुड, गाथा 3:

दंसणभट्ठा भट्ठा दंसणभट्ठस्स णत्थि णिव्वाणं । सिज्झंति चरियभट्ठा दंसणभट्ठा ण सिज्झंति ॥3॥

अर्थ: जो दर्शन से भ्रष्ट हैं वही असली भ्रष्ट हैं, उन्हें निर्वाण नहीं। चारित्र से भ्रष्ट तो (फिर सम्हलकर) सिद्ध हो जाते हैं, दर्शन से भ्रष्ट सिद्ध नहीं होते।

(ख) मोक्षमार्ग का कर्णधार

रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक 31 और 32:

दर्शनं ज्ञानचारित्रात् साधिमानमुपाश्नुते ।
दर्शनं कर्णधारं तन्मोक्षमार्गे प्रचक्षते ॥31॥

विद्यावृत्तस्य संभूतिस्थितिवृद्धिफलोदयाः ।
न सन्त्यसति सम्यक्त्वे बीजाभावे तरोरिव ॥32॥

अर्थ: दर्शन ज्ञान और चारित्र से श्रेष्ठता पाता है, इसलिए मोक्षमार्ग में इसे कर्णधार (नाव का खेवनहार) कहा है। जैसे बीज के बिना वृक्ष नहीं, वैसे सम्यक्त्व के बिना ज्ञान और चारित्र की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फल नहीं।

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 17:

मोक्ष-महल की परथम सीढ़ी, या बिन ज्ञान चरित्रा।
सम्यकता न लहै सो दर्शन, धारो भव्य पवित्रा॥

(ग) तीनों लोक में इसके समान कुछ नहीं

रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक 34:

न सम्यक्त्व समं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि ।
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥

अर्थ: तीनों कालों और तीनों लोकों में जीवों का सम्यक्त्व के समान कोई कल्याण नहीं और मिथ्यात्व के समान कोई अकल्याण नहीं।

(घ) दुर्गति से रक्षा

रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक 35:

सम्यग्दर्शनशुद्धाः नारकतिर्यङ्नपुंसकस्त्रीत्वानि ।
दुष्कुलविकृताल्पायुः दरिद्रतां च व्रजन्ति नाप्यव्रतिकाः ॥35॥

अर्थ: शुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव, व्रत रहित होने पर भी, (सम्यक्त्व रहते हुए नई आयु बाँधे तो) नरक, तिर्यंच, नपुंसक और स्त्री पर्याय, नीच कुल, विकृत अंग, अल्प आयु और दरिद्रता को प्राप्त नहीं होते।

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 16:

प्रथम नरक बिन षट् भू ज्योतिष, वान भवन षंढ नारी।
थावर विकलत्रय पशु में नहिं, उपजत समकितधारी॥
तीन लोक तिहुँ काल माँहि नहिं, दर्शनसो सुखकारी।
सकल धरम को मूल यही इस, बिन करनी दुखकारी॥(16)

ध्यान दें: यह नियम उस जीव के लिए है जिसने सम्यक्त्व होने के बाद आयु बाँधी। जिसने पहले ही नरक आयु बाँध ली (जैसे राजा श्रेणिक), वह पहले नरक तक जाता है, उससे आगे नहीं।


९. सम्यग्दृष्टि का जीवन

छहढाला, तीसरी ढाल, छन्द 15:

दोषरहित गुनसहित सुधी जे, सम्यक्दर्श सजै हैं।
चरितमोहवश लेश न संजम, पै सुरनाथ जजै हैं॥
गेही पै गृह में न रचै ज्यों, जलतैं भिन्न कमल है।
नगरनारि को प्यार यथा, कादे में हेम अमल है॥(15)

अर्थ: दोष रहित, गुण सहित सम्यग्दृष्टि में चारित्रमोह के कारण भले ही लेश भी संयम न हो, फिर भी इन्द्र उसकी पूजा करते हैं। वह घर में रहकर भी घर में रचता नहीं, जैसे कमल जल में रहकर भी जल से अलग है, जैसे कीचड़ में पड़ा सोना भी निर्मल ही रहता है।

रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक 33:

गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान् ।
अनगारो गृही श्रेयान् निर्मोही मोहिनो मुनेः ॥33॥

अर्थ: मोह (मिथ्यात्व) रहित गृहस्थ मोक्षमार्ग में स्थित है, पर मोह सहित मुनि नहीं। मोह सहित मुनि से मोह रहित गृहस्थ श्रेष्ठ है।


आठ अंगों की कथाएँ

रत्नकरण्ड श्रावकाचार स्वयं आठ अंगों के आठ उदाहरण गिनाता है:

तावदञ्जन चौराऽङ्गे ततोऽनन्तमती स्मृता ।
उद्दायनस्तृतीयेऽपि तुरीये रेवती मता ॥19॥
ततो जिनेन्द्रभक्तोऽन्यो वारिषेणस्ततः परः ।
विष्णुश्च वज्रनामा च शेषयोर्लक्ष्यतां गतौ ॥20॥

इन आठों की पूरी कथा आराधना कथाकोश (ब्रह्म नेमिदत्त) में क्रम से कथा 6 से 13 तक है।

(१) अंजन चोर: निःशंकित

सेठ जिनदत्त ने सोमदत्त माली को आकाशगामिनी विद्या साधने की विधि बताई: पेड़ पर छींका बाँधो, नीचे नुकीले शस्त्र गाड़ो, मन्त्र जपते हुए छींके की एक एक रस्सी काटो। माली शंका में ऊपर नीचे होता रहा। अंजन चोर ने पूछा, जिनदत्त सेठ का वचन है यह जानकर बिना किसी शंका के सारी रस्सियाँ एक साथ काट दीं, और विद्या सिद्ध हो गई। आगे वह मुनि बनकर आत्मकल्याण के मार्ग पर चला।

सीख: जिनवचन पर अडिग विश्वास ही पहला अंग है।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 6 (पढ़ें)

(२) अनन्तमती: निःकांक्षित

सेठ प्रियदत्त की पुत्री अनन्तमती ने बचपन में मुनिराज के सामने ब्रह्मचर्य व्रत लिया और बड़ी होकर उसे जीवन भर निभाया। विद्याधर द्वारा हरण, वन, भील राजा और अनेक संकट आए, बहुत से लोभ दिखाए गए, पर उसने किसी सांसारिक सुख की चाह नहीं की और शील नहीं छोड़ा। अन्त में आर्यिका दीक्षा लेकर समाधिमरण किया।

सीख: धर्म के बदले संसार का कोई सुख न चाहना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 7 (पढ़ें)

(३) राजा उद्दायन: निर्विचिकित्सा

इन्द्र ने सभा में राजा उद्दायन की निर्विचिकित्सा की प्रशंसा की। परीक्षा के लिए एक देव कोढ़ से गलते शरीर वाले मुनि का रूप लेकर आया और आहार के बाद वमन कर दिया। राजा और रानी ने बिना घृणा के अपने हाथों से उनकी सेवा की। देव ने प्रकट होकर उनकी स्तुति की।

सीख: रोगी, मलिन शरीर वाले साधर्मी की सेवा में घृणा नहीं।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 8 (पढ़ें)

(४) रेवती रानी: अमूढदृष्टि

एक विद्याधर क्षुल्लक ने परीक्षा के लिए नगर के बाहर ब्रह्मा, विष्णु, महेश और फिर नकली तीर्थंकर का रूप तक बनाया। सारा नगर देखने उमड़ पड़ा, पर रेवती रानी नहीं गई, क्योंकि आगम में चौबीस ही तीर्थंकर कहे हैं। अन्त में क्षुल्लक ने प्रकट होकर उनकी दृढ़ता की प्रशंसा की। (पूरी कथा मिथ्यात्व पोस्ट में भी है।)

सीख: चमत्कार और भीड़ देखकर मार्ग से न डिगना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 9 (पढ़ें)

(५) जिनेन्द्रभक्त सेठ: उपगूहन

सेठ जिनेन्द्रभक्त के चैत्यालय में रत्न जड़ा छत्र था। एक चोर क्षुल्लक का वेश बनाकर वहाँ रहा और रात को रत्न लेकर भागा। लोगों ने पकड़ लिया। सेठ ने सोचा, लोग कहेंगे जैन त्यागी चोर होते हैं, इससे धर्म की निन्दा होगी। उन्होंने कहा, “यह रत्न मैंने ही इन्हें लाने भेजा था”, और बाद में एकान्त में उस चोर को समझाया।

सीख: किसी एक व्यक्ति के दोष से धर्म की निन्दा न होने देना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 10 (पढ़ें)

(६) वारिषेण मुनि: स्थितिकरण

राजा श्रेणिक के पुत्र वारिषेण मुनि बने। उनके बचपन के मित्र पुष्पडाल भी मुनि बने, पर उनका मन वर्षों तक घर और पत्नी में अटका रहा। वारिषेण मुनि उन्हें अपने राजमहल ले गए और अपनी छोड़ी हुई सारी रानियाँ और वैभव दिखाया। यह देखकर पुष्पडाल को लज्जा और वैराग्य हुआ, और वे फिर से संयम में दृढ़ हो गए।

सीख: डिगते हुए साधर्मी को प्रेम से फिर स्थिर करना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 11 (पढ़ें)

(७) विष्णुकुमार मुनि: वात्सल्य

हस्तिनापुर में बलि आदि मन्त्रियों ने आचार्य अकम्पन सहित सात सौ मुनियों को घेरकर यज्ञ के बहाने भयानक उपसर्ग किया। विष्णुकुमार मुनि ने विक्रिया ऋद्धि से वामन रूप बनाकर बलि से तीन पग भूमि माँगी और उपसर्ग दूर किया। मुनियों की रक्षा के उसी दिन से रक्षाबन्धन पर्व मनाया जाता है।

सीख: साधर्मी पर संकट हो तो अपनी शक्ति लगाकर रक्षा करना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 12 (पढ़ें)

(८) वज्रकुमार मुनि: प्रभावना

मथुरा में रानी उर्विला हर वर्ष अष्टाह्निका में जिनेन्द्र रथयात्रा निकालती थीं। दूसरी रानी ने अपना रथ पहले निकालने का हठ किया और जिन रथ रुकवा दिया। वज्रकुमार मुनि की प्रेरणा से विद्याधरों ने आकर बड़ी धूमधाम से जिन रथयात्रा निकाली, जिससे जिनशासन की महिमा फैली।

सीख: जिनधर्म की महिमा सबके सामने प्रकट करना।

स्रोत: आराधना कथाकोश कथा 13 (पढ़ें)

(९) राजा श्रेणिक: क्षायिक सम्यक्त्व

राजा श्रेणिक पहले बौद्ध गुरुओं के अनुयायी थे और उन्होंने यशोधर मुनि पर उपसर्ग किया था (कथा मिथ्यात्व पोस्ट में)। रानी चेलना के प्रयत्न से सच्चा श्रद्धान हुआ, और आगे भगवान महावीर के समवशरण में उन्होंने क्षायिक सम्यक्त्व पाया। श्रेणिक चरित्र (प्रथम सर्ग, श्लोक 17 से 18, अर्थ):

अतिशय मनोहर निर्मल समस्त दोषों से रहित क्षायिक सम्यक्त्व को धारण किया और समस्त इन्द्रियों को संकोच कर शुद्ध सम्यग्दर्शन से विभूषित हुए। जिसने भगवान् महावीर स्वामी के सामने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया

सम्यक्त्व से पहले नरक आयु बँध चुकी थी, इसलिए वे पहले नरक गए; पर आगे आने वाली चौबीसी में पहले तीर्थंकर श्री पद्मनाभ होंगे।

सीख: पिछली भूल कितनी भी बड़ी हो, सच्चा श्रद्धान जीव को तीर्थंकर तक ले जाता है।

स्रोत: श्रेणिक चरित्र (आचार्य शुभचन्द्र) सर्ग 1 और 12 (पढ़ें); आराधना कथाकोश कथा 19 (पढ़ें)


नए पाठक के लिए प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1: सम्यग्दर्शन एक वाक्य में क्या है?
उत्तर: जीव आदि सात तत्त्वों का, और सच्चे देव शास्त्र गुरु का, जैसा है वैसा श्रद्धान; और भीतर से अपने आत्मा की रुचि।

प्रश्न 2: सम्यक्त्व, सम्यग्दर्शन और सम्यग्दृष्टि में क्या अन्तर है?
उत्तर: सम्यक्त्व और सम्यग्दर्शन एक ही गुण के नाम हैं। जिस जीव में यह गुण है, उसे सम्यग्दृष्टि कहते हैं।

प्रश्न 3: क्या केवल “मैं जैन हूँ” कहना सम्यक्त्व है?
उत्तर: नहीं। कुल से मिला धर्म सम्यक्त्व नहीं, तत्त्व को समझकर हुआ सच्चा श्रद्धान सम्यक्त्व है।

प्रश्न 4: सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से पहले सम्यग्दर्शन क्यों?
उत्तर: रत्नकरण्ड श्लोक 32: बीज के बिना वृक्ष नहीं। सम्यक्त्व के बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान और चारित्र मिथ्याचारित्र कहलाता है।

प्रश्न 5: निसर्गज और अधिगमज में क्या अन्तर है?
उत्तर: निसर्गज बिना उपदेश के स्वभाव से होता है, अधिगमज उपदेश या शास्त्र से समझकर। भीतरी कारण दोनों का एक ही है।

प्रश्न 6: औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक में सबसे श्रेष्ठ कौन?
उत्तर: क्षायिक, क्योंकि दर्शनमोह की सातों प्रकृतियाँ पूरी तरह नष्ट हो जाती हैं और यह कभी नहीं छूटता।

प्रश्न 7: क्या सम्यक्त्व होकर छूट सकता है?
उत्तर: औपशमिक और क्षायोपशमिक छूट सकते हैं, क्षायिक कभी नहीं।

प्रश्न 8: गृहस्थ को सम्यक्त्व हो सकता है?
उत्तर: हाँ। चौथा गुणस्थान (अविरत सम्यग्दृष्टि) गृहस्थ का भी होता है। रत्नकरण्ड श्लोक 33 कहता है, मोह रहित गृहस्थ मोह सहित मुनि से श्रेष्ठ है।

प्रश्न 9: पशु और नारकी को भी सम्यक्त्व होता है?
उत्तर: हाँ, संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव को। सर्वार्थसिद्धि के अनुसार तिर्यंचों को जातिस्मरण, धर्मश्रवण या जिनबिम्ब दर्शन से, और नारकियों को वेदना से भी सम्यक्त्व होता है।

प्रश्न 10: सम्यग्दृष्टि को बाहर से कैसे पहचानें?
उत्तर: प्रशम, संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य, इन चार चिह्नों से अनुमान होता है। पक्का निर्णय भीतर का विषय है।

प्रश्न 11: पच्चीस दोष कौन से हैं?
उत्तर: आठ मद, तीन मूढ़ता, छह अनायतन और शंका आदि आठ दोष।

प्रश्न 12: सम्यग्दृष्टि मरकर कहाँ नहीं जाता?
उत्तर: छहढाला छन्द 16: पहले नरक के नीचे की छह पृथ्वी, ज्योतिषी, व्यन्तर, भवनवासी, नपुंसक, स्त्री, स्थावर, विकलत्रय और पशु पर्याय में नहीं जाता (यदि सम्यक्त्व के बाद आयु बँधी हो)।

प्रश्न 13: सम्यक्त्व पाने के लिए आज क्या करूँ?
उत्तर: छहढाला कहती है: “तातैं जिनवर-कथित, तत्त्व अभ्यास करीजै”। रोज़ स्वाध्याय, देव दर्शन, साधर्मी संग, और सात तत्त्वों को अपने ऊपर घटाकर सोचना।

प्रश्न 14: एक अंग कम हो तो क्या फ़र्क पड़ता है?
उत्तर: रत्नकरण्ड श्लोक 21: एक अक्षर कम मन्त्र विष नहीं उतारता, वैसे ही अंग हीन सम्यक्त्व संसार नहीं काटता।


शब्दकोश

शब्द अर्थ
तत्त्वार्थ जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, ये सात तत्त्व और उनका सच्चा अर्थ
श्रद्धान पक्का भीतरी विश्वास, रुचि
आप्त सच्चे देव: वीतराग, सर्वज्ञ, हितोपदेशी
भूतार्थ सच्चा, वास्तविक (शुद्धनय का विषय)
निश्चय सम्यक्त्व पर से भिन्न अपने शुद्ध आत्मा की रुचि
व्यवहार सम्यक्त्व सात तत्त्व और देव शास्त्र गुरु का सच्चा श्रद्धान
निसर्गज स्वभाव से, बिना उपदेश के हुआ
अधिगमज उपदेश या शास्त्र से समझकर हुआ
दर्शनमोह सम्यक्त्व को ढकने वाला कर्म; तीन प्रकृतियाँ: मिथ्यात्व, मिश्र, सम्यक्त्व प्रकृति
अनन्तानुबन्धी अनन्त संसार से बाँधने वाली कषाय; सम्यक्त्व का घात करती है
उपशम कर्म का कुछ समय के लिए दब जाना
क्षयोपशम कुछ अंश नष्ट, कुछ दबे, कुछ उदय में
क्षय कर्म का पूरी तरह नष्ट होना
सराग सम्यक्त्व प्रशम आदि चिह्नों से पहचाना जाने वाला
वीतराग सम्यक्त्व आत्मा की विशुद्धि मात्र
प्रशम कषायों की मन्दता
संवेग संसार से भय, धर्म में उत्साह
अनुकम्पा सब जीवों पर दया
आस्तिक्य जिनवचन, आत्मा, कर्मफल में दृढ़ विश्वास
लब्धि सम्यक्त्व से पहले मिलने वाली योग्यता; पाँच: क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य, करण
करण अधःकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण रूप उत्तरोत्तर विशुद्ध परिणाम
अंग सम्यक्त्व के आठ अवयव
मद घमण्ड; आठ प्रकार
मूढ़ता बिना परखे मान लेना; तीन प्रकार
अनायतन धर्म के अस्थान: कुदेव, कुगुरु, कुधर्म और उनके सेवक
चल, मलिन, अगाढ़ क्षायोपशमिक सम्यक्त्व के सूक्ष्म दोष
अविरत सम्यग्दृष्टि चौथा गुणस्थान: सम्यक्त्व है, व्रत अभी नहीं
कर्णधार नाव का खेवनहार, दिशा देने वाला

एक नज़र में

भाग सार मुख्य आधार
परिभाषा तत्त्वार्थ श्रद्धान; देव शास्त्र गुरु का श्रद्धान; आत्मा का रूप तत्त्वार्थसूत्र 1.2, रत्नकरण्ड 4, द्रव्यसंग्रह 41
स्वरूप निश्चय: आत्म रुचि; व्यवहार: सात तत्त्व का श्रद्धान छहढाला 3.2, 3.3, 3.10, समयसार 11, 13
लक्षण प्रशम, संवेग, अनुकम्पा, आस्तिक्य सर्वार्थसिद्धि 1/2
भेद निसर्गज, अधिगमज; औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक; सराग, वीतराग; निश्चय, व्यवहार तत्त्वार्थसूत्र 1.3, 2.3, ज्ञानार्णव 6/7, मूलाचार प्रदीप 1385 से 1388
उत्पत्ति दर्शनमोह का उपशम आदि; जातिस्मरण, धर्मश्रवण, जिनबिम्ब दर्शन; पाँच लब्धि सर्वार्थसिद्धि 1/7, पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, कर्मप्रकृति
आठ अंग निःशंकित से प्रभावना तक रत्नकरण्ड 11 से 21, छहढाला 3.12, 3.13
पच्चीस दोष 8 मद, 3 मूढ़ता, 6 अनायतन, 8 शंकादि छहढाला 3.11, 3.14, रत्नकरण्ड 22 से 26
महिमा, फल धर्म का मूल, मोक्ष की पहली सीढ़ी, दुर्गति से रक्षा दर्शनपाहुड 2, 3, रत्नकरण्ड 31, 32, 34, 35, छहढाला 3.16, 3.17
जीवन घर में रहकर भी जल में कमल छहढाला 3.15, रत्नकरण्ड 33

फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · रत्नकरण्ड श्रावकाचार मूल श्लोक · छहढाला · समयसार गाथा एवं अर्थ · बृहद् द्रव्यसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ · आराधना कथाकोश · श्रेणिक चरित्र

सम्बन्धित चर्चा: मिथ्यात्व: सम्पूर्ण विवेचन · सम्यग्दर्शन: सभी ग्रंथों से संकलन · सम्यग्ज्ञान: सम्पूर्ण विवेचन · सम्यक्चारित्र: सम्पूर्ण विवेचन

स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी) अध्याय 1 सूत्र 2, 3, अध्याय 2 सूत्र 3; सर्वार्थसिद्धि 1/2, 1/3, 1/7 (आचार्य पूज्यपाद); रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक 4, 11 से 26, 31 से 35 (आचार्य समन्तभद्र); समयसार गाथा 11, 13 और दर्शनपाहुड गाथा 2, 3 (आचार्य कुन्दकुन्द); बृह���् द्रव्यसंग्रह गाथा 41 (आचार्य नेमिचन्द्र); ज्ञानार्णव सर्ग 6 श्लोक 7, 8 (आचार्य शुभचन्द्र); मूलाचार प्रदीप पञ्चम अधिकार; पद्मनन्दि पञ्चविंशतिका, एकत्वसप्तति 12; कर्मप्रकृति गाथा 158; छहढाला तीसरी ढाल (पं. दौलतराम जी)। कथाओं के लिए: आराधना कथाकोश कथा 6 से 13 और 19 (ब्रह्म नेमिदत्त); श्रेणिक चरित्र सर्ग 1 और 12 (आचार्य शुभचन्द्र)। मूल पाठ फोरम पर उपलब्ध इन्हीं ग्रंथों से लिए गए हैं।

कुछ जोड़ना हो या प्रश्न हो तो नीचे लिखें। :folded_hands:

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