तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) का छठा अध्याय आस्रव तत्त्व का वर्णन करता है: योग क्या है, आस्रव कैसे होता है, पुण्य और पाप आस्रव, साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव, आस्रव में हीनाधिकता के कारण, अधिकरण, और फिर आठों कर्मों में से हर एक के आस्रव के अलग अलग कारण, तीर्थंकर प्रकृति की सोलह कारण भावना सहित। पाँचवें अध्याय में अजीव बताया, अब जीव और अजीव के मेल का पहला कदम, आस्रव। इसमें कुल 27 सूत्र हैं। हर सूत्र नीचे मूल पाठ में ज्यों का त्यों दिया है, साथ में आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर सरल हिन्दी अर्थ। क्रम है: योग और आस्रव, पुण्य पाप, साम्परायिक और ईर्यापथ, विशेषता के कारण, अधिकरण, आठ कर्मों के आस्रव, फिर प्रश्नोत्तर और शब्दकोश।
मूल सूत्र: फोरम पर तत्त्वार्थसूत्र मूल पाठ से। पिछले अध्याय: अध्याय 1, अध्याय 2, अध्याय 3, अध्याय 4, अध्याय 5।
१. योग और आस्रव (सूत्र 1 से 3)
सूत्र 1:
कायवाङ्मनः कर्मयोगः ॥ 1 ॥
अर्थ: काय, वचन और मन की क्रिया योग है। इनके निमित्त से आत्मा के प्रदेशों में जो हलन चलन होता है, वही योग।
सूत्र 2:
स आस्रवः ॥ 2 ॥
अर्थ: वही योग आस्रव है। जैसे नाली से तालाब में पानी आता है, वैसे योग से आत्मा में कर्म आते हैं।
सूत्र 3:
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥ 3 ॥
अर्थ: शुभ योग पुण्य का आस्रव है और अशुभ योग पाप का। जैसे जीवों की रक्षा, सत्य वचन, अर्हन्त भक्ति शुभ; हिंसा, झूठ, ईर्ष्या अशुभ।
सार: पुण्य भी आस्रव है, बन्ध का कारण है। मोक्ष का कारण तो आस्रव का रुकना है, जो अध्याय 9 में आएगा।
२. साम्परायिक और ईर्यापथ आस्रव (सूत्र 4, 5)
सूत्र 4:
सकषायाकषाययोः साम्परायिकेर्यापथयोः ॥ 4 ॥
अर्थ: कषाय सहित जीव का आस्रव साम्परायिक है, जो संसार बढ़ाता है और स्थिति अनुभाग सहित बँधता है। कषाय रहित जीव (ग्यारहवें से तेरहवें गुणस्थान) का आस्रव ईर्यापथ है, जो आते ही झड़ जाता है, जैसे सूखी दीवार पर फेंकी धूल।
सूत्र 5:
इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पंचचतुःपंचपंचविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः ॥ 5 ॥
अर्थ: पहले यानी साम्परायिक आस्रव के भेद: पाँच इन्द्रिय, चार कषाय, पाँच अव्रत (हिंसा आदि) और पच्चीस क्रियाएँ, कुल उनतालीस।
३. आस्रव में विशेषता के कारण और अधिकरण (सूत्र 6 से 9)
सूत्र 6:
तीव्रमंदज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेषः ॥ 6 ॥
अर्थ: तीव्र भाव, मन्द भाव, ज्ञात भाव (जानबूझकर), अज्ञात भाव (बिना जाने), अधिकरण (आधार) और वीर्य (शक्ति) की विशेषता से आस्रव में विशेषता होती है। एक ही काम भी भाव के भेद से अलग फल देता है।
सूत्र 7:
अधिकरणं जीवाजीवाः ॥ 7 ॥
अर्थ: अधिकरण दो प्रकार का है: जीव अधिकरण और अजीव अधिकरण।
सूत्र 8:
आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषायविशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥ 8 ॥
अर्थ: पहला, जीव अधिकरण, एक सौ आठ प्रकार का है: संरम्भ (विचार करना), समारम्भ (साधन जुटाना), आरम्भ (काम शुरू करना) ये तीन; मन, वचन, काय योग ये तीन; कृत, कारित, अनुमोदित ये तीन; और क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार। 3 × 3 × 3 × 4 = 108। इसी से माला में 108 मनके होते हैं।
सूत्र 9:
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥ 9 ॥
अर्थ: दूसरा, अजीव अधिकरण: निर्वर्तना (रचना) दो प्रकार, निक्षेप (रखना) चार प्रकार, संयोग (मिलाना) दो प्रकार और निसर्ग (प्रवृत्ति) तीन प्रकार।
सार: 108 बार णमोकार जपने का अर्थ है इन 108 द्वारों से आने वाले पाप को रोकने का संकल्प।
४. ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वेदनीय के आस्रव (सूत्र 10 से 12)
सूत्र 10:
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ 10 ॥
अर्थ: ज्ञान और ज्ञानी के प्रति प्रदोष (ईर्ष्या, द्वेष), निह्नव (जानते हुए भी छिपाना), मात्सर्य (दूसरा न सीख ले, ऐसी जलन), अन्तराय (पढ़ने में बाधा), आसादन (ज्ञान का अनादर) और उपघात (सच्चे ज्ञान को झूठा कहना), ये ज्ञानावरण और दर्शनावरण के आस्रव हैं (दर्शन के प्रति करने से दर्शनावरण)।
सूत्र 11:
दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थानान्यसद्वेद्यस्य ॥ 11 ॥
अर्थ: अपने में, दूसरे में या दोनों में दुःख, शोक, ताप (पश्चात्ताप), आक्रन्दन (रोना चिल्लाना), वध और परिदेवन (करुण विलाप) करना असाता वेदनीय के आस्रव हैं।
सूत्र 12:
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षांतिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥ 12 ॥
अर्थ: प्राणी मात्र पर और व्रतियों पर अनुकम्पा, दान, सराग संयम आदि (संयमासंयम, अकाम निर्जरा, बाल तप) का योग, क्षमा और शौच (लोभ का त्याग), ये साता वेदनीय के आस्रव हैं।
५. मोहनीय के आस्रव (सूत्र 13, 14)
सूत्र 13:
केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ 13 ॥
अर्थ: केवली, श्रुत (शास्त्र), संघ, धर्म और देव का अवर्णवाद (झूठा दोष लगाना) दर्शन मोहनीय का आस्रव है।
सूत्र 14:
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥ 14 ॥
अर्थ: कषाय के उदय से होने वाले तीव्र परिणाम चारित्र मोहनीय के आस्रव हैं।
६. चार आयु के आस्रव (सूत्र 15 से 21)
सूत्र 15:
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥ 15 ॥
अर्थ: बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह रखना नरक आयु का आस्रव है।
सूत्र 16:
माया तैर्यग्योनस्य ॥ 16 ॥
अर्थ: माया (छल कपट) तिर्यंच आयु का आस्रव है।
सूत्र 17:
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥ 17 ॥
अर्थ: अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रह मनुष्य आयु का आस्रव है।
सूत्र 18:
स्वभावमार्दवं च ॥ 18 ॥
अर्थ: और स्वभाव की मृदुता (सहज कोमलता) भी मनुष्य आयु का आस्रव है।
सूत्र 19:
निःशीलव्रतत्त्वं च सर्वेषाम् ॥ 19 ॥
अर्थ: और शील और व्रत का न होना सभी आयुओं का आस्रव है (देव आयु में भोगभूमिज जीवों की अपेक्षा)।
सूत्र 20:
सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ॥ 20 ॥
अर्थ: सराग संयम (मुनि का), संयमासंयम (श्रावक का), अकाम निर्जरा (बिना इच्छा के कष्ट सहना) और बाल तप (अज्ञानपूर्वक तप), ये देव आयु के आस्रव हैं।
सूत्र 21:
सम्यक्त्वं च ॥ 21 ॥
अर्थ: और सम्यक्त्व भी देव आयु का आस्रव है, सर्वार्थसिद्धि के अनुसार वैमानिक देवों की आयु का।
सार: आज के छोटे छोटे स्वभाव ही अगले भव की गति चुनते हैं: छल से तिर्यंच, कोमलता से मनुष्य, संयम से देव।
७. नाम कर्म के आस्रव और सोलह कारण भावना (सूत्र 22 से 24)
सूत्र 22:
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥ 22 ॥
अर्थ: योगों की वक्रता (मन, वचन, काय की कुटिलता) और विसंवाद (झगड़ा कराना, उलटा बोलना) अशुभ नाम कर्म के आस्रव हैं।
सूत्र 23:
तद्विपरीतं शुभस्य ॥ 23 ॥
अर्थ: उससे उलटा, यानी योगों की सरलता और विसंवाद न करना, शुभ नाम कर्म का आस्रव है।
सूत्र 24:
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नताशीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावनाप्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ 24 ॥
अर्थ: ये सोलह भावनाएँ तीर्थंकर प्रकृति के आस्रव हैं: (1) दर्शनविशुद्धि, (2) विनयसम्पन्नता, (3) शील और व्रतों में अतिचार न लगाना, (4) अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग, (5) संवेग, (6) शक्ति अनुसार त्याग, (7) शक्ति अनुसार तप, (8) साधु समाधि, (9) वैयावृत्य करना, (10) अर्हन्त भक्ति, (11) आचार्य भक्ति, (12) बहुश्रुत भक्ति, (13) प्रवचन भक्ति, (14) आवश्यकों में कमी न करना, (15) मार्ग प्रभावना, (16) प्रवचन वात्सल्य। इनमें दर्शनविशुद्धि मुख्य है।
सार: यही सोलह कारण भावना है, जिसका पर्व भाद्रपद में मनाया जाता है।
८. गोत्र और अन्तराय के आस्रव (सूत्र 25 से 27)
सूत्र 25:
परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद् गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥ 25 ॥
अर्थ: पर की निन्दा और अपनी प्रशंसा करना, दूसरों के सद्गुण ढकना और अपने असद्गुण (जो नहीं हैं) प्रकट करना, ये नीच गोत्र के आस्रव हैं।
सूत्र 26:
तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥ 26 ॥
अर्थ: उससे उलटा (अपनी निन्दा, पर की प्रशंसा आदि), नम्र वृत्ति और अनुत्सेक (गर्व न करना), ये उच्च गोत्र के आस्रव हैं।
सूत्र 27:
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥ 27 ॥
अर्थ: दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य में विघ्न करना अन्तराय कर्म का आस्रव है।
सार: हर कर्म का आस्रव अपने भाव से जुड़ा है। जो भाव छोड़ना है, उसकी पहचान यहीं से होती है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न: योग किसे कहते हैं?
उत्तर: काय, वचन, मन की क्रिया से आत्म प्रदेशों का हलन चलन (सूत्र 1)।
प्रश्न: पुण्य और पाप का आस्रव?
उत्तर: शुभ योग से पुण्य, अशुभ से पाप (सूत्र 3)।
प्रश्न: ईर्यापथ आस्रव किसके होता है?
उत्तर: कषाय रहित जीव के (सूत्र 4)।
प्रश्न: जीव अधिकरण के 108 भेद कैसे?
उत्तर: संरम्भ आदि 3 × योग 3 × कृत आदि 3 × कषाय 4 (सूत्र 8)।
प्रश्न: ज्ञानावरण का आस्रव कैसे होता है?
उत्तर: ज्ञान पर प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन, उपघात से (सूत्र 10)।
प्रश्न: दर्शन मोहनीय का आस्रव?
उत्तर: केवली, श्रुत, संघ, धर्म, देव का अवर्णवाद (सूत्र 13)।
प्रश्न: नरक और तिर्यंच आयु के कारण?
उत्तर: बहु आरम्भ परिग्रह; माया (सूत्र 15, 16)।
प्रश्न: मनुष्य आयु के कारण?
उत्तर: अल्प आरम्भ परिग्रह और स्वभाव की मृदुता (सूत्र 17, 18)।
प्रश्न: तीर्थंकर प्रकृति किससे बँधती है?
उत्तर: दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावना से (सूत्र 24)।
प्रश्न: नीच गोत्र का आस्रव?
उत्तर: पर निन्दा, आत्म प्रशंसा, गुण छिपाना, अवगुण दिखाना (सूत्र 25)।
शब्दकोश
योग: मन, वचन, काय से आत्म प्रदेशों का कम्पन
आस्रव: कर्मों का आत्मा की ओर आना
साम्परायिक: कषाय सहित, संसार बढ़ाने वाला आस्रव
ईर्यापथ: कषाय रहित, आते ही झड़ने वाला आस्रव
अधिकरण: आस्रव का आधार, जीव या अजीव
संरम्भ, समारम्भ, आरम्भ: विचार, साधन जुटाना, शुरू करना
कृत, कारित, अनुमोदित: स्वयं करना, कराना, अच्छा मानना
निह्नव: जानते हुए ज्ञान छिपाना
अवर्णवाद: गुणवान पर झूठा दोष लगाना
अकाम निर्जरा: बिना इच्छा के कष्ट सहने से कर्म झड़ना
बाल तप: सम्यग्ज्ञान बिना किया तप
दर्शनविशुद्धि: पच्चीस दोष रहित निर्मल सम्यग्दर्शन
अनुत्सेक: गर्व न करना
एक नज़र में
| विषय | मुख्य बात | सूत्र |
|---|---|---|
| योग और आस्रव | मन वचन काय की क्रिया ही आस्रव | 1, 2 |
| पुण्य पाप | शुभ योग पुण्य, अशुभ पाप | 3 |
| दो आस्रव | साम्परायिक (39 भेद), ईर्यापथ | 4, 5 |
| विशेषता | तीव्र, मन्द, ज्ञात, अज्ञात, अधिकरण, वीर्य | 6 |
| अधिकरण | जीव 108, अजीव 11 | 7 से 9 |
| ज्ञान दर्शनावरण | प्रदोष आदि छह | 10 |
| वेदनीय | दुःख आदि असाता; अनुकम्पा आदि साता | 11, 12 |
| मोहनीय | अवर्णवाद; तीव्र कषाय | 13, 14 |
| आयु | नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव के कारण | 15 से 21 |
| नाम | वक्रता अशुभ; सरलता शुभ; सोलह कारण | 22 से 24 |
| गोत्र | निन्दा प्रशंसा से नीच; उलटे से उच्च | 25, 26 |
| अन्तराय | दान आदि में विघ्न | 27 |
फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · सर्वार्थसिद्धि · तत्त्वार्थसूत्र प्रदीपिका
सम्बन्धित चर्चा: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1 · अध्याय 2 · अध्याय 3 · अध्याय 4 · अध्याय 5 · सम्यग्दर्शन · सम्यक्चारित्र
स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 6, सूत्र 1 से 27; अर्थ आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर।
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