तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) का दसवाँ और अन्तिम अध्याय मोक्ष तत्त्व का वर्णन करता है: केवलज्ञान कैसे प्रकट होता है, मोक्ष का स्वरूप, मुक्त जीव में कौन से भाव नष्ट होते हैं और कौन से रहते हैं, सिद्ध जीव का लोक के अन्त तक ऊर्ध्वगमन, उसके कारण और दृष्टान्त, आगे क्यों नहीं जाता, और सिद्धों का बारह अनुयोगों से विचार। पहले सूत्र “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” से जो यात्रा शुरू हुई, वह यहाँ पूरी होती है। इसमें कुल 9 सूत्र हैं। हर सूत्र नीचे मूल पाठ में ज्यों का त्यों दिया है, साथ में आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर सरल हिन्दी अर्थ। क्रम है: केवलज्ञान, मोक्ष का स्वरूप, मुक्त जीव के भाव, ऊर्ध्वगमन, सिद्धों का विचार, फिर पूरे ग्रंथ का सार, प्रश्नोत्तर और शब्दकोश।
मूल सूत्र: फोरम पर तत्त्वार्थसूत्र मूल पाठ से। पिछले अध्याय: अध्याय 1, अध्याय 2, अध्याय 3, अध्याय 4, अध्याय 5, अध्याय 6, अध्याय 7, अध्याय 8, अध्याय 9।
१. केवलज्ञान की उत्पत्ति (सूत्र 1)
सूत्र 1:
मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥ 1 ॥
अर्थ: मोहनीय कर्म के क्षय से, और फिर ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय के क्षय से केवलज्ञान (और केवलदर्शन) प्रकट होता है। पहले मोह जाता है (दसवें गुणस्थान के अन्त में), फिर बारहवें गुणस्थान के अन्त में बाकी तीन घातिया एक साथ।
सार: ज्ञान को ढकने वाला सबसे बड़ा कारण मोह है। मोह गया तो केवलज्ञान दूर नहीं।
२. मोक्ष का स्वरूप (सूत्र 2)
सूत्र 2:
बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥ 2 ॥
अर्थ: बन्ध के हेतुओं के अभाव (संवर) से और निर्जरा से समस्त कर्मों का पूरी तरह छूट जाना मोक्ष है। नए कर्म आना बन्द, पुराने सब झड़ गए, तो आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में।
३. मुक्त जीव में कौन से भाव नहीं, कौन से रहते हैं (सूत्र 3, 4)
सूत्र 3:
औपशमिकादिभव्यत्वानां च ॥ 3 ॥
अर्थ: मोक्ष होने पर औपशमिक आदि भावों का (क्षायोपशमिक, औदयिक, और पारिणामिक में भव्यत्व का) भी अभाव हो जाता है।
सूत्र 4:
अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥ 4 ॥
अर्थ: केवल सम्यक्त्व (क्षायिक सम्यक्त्व), केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व को छोड़कर। ये भाव सिद्धों में सदा रहते हैं (इनके साथ अनन्त वीर्य आदि भी)।
४. सिद्ध का ऊर्ध्वगमन (सूत्र 5 से 8)
सूत्र 5:
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्यालोकान्तात् ॥ 5 ॥
अर्थ: कर्मों से छूटते ही उसी समय जीव ऊपर लोक के अन्त तक जाता है, और सिद्ध शिला के ऊपर लोकाग्र में विराजमान होता है।
सूत्र 6:
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद्बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च ॥ 6 ॥
अर्थ: ऊर्ध्वगमन के चार कारण: पूर्व प्रयोग (पहले के अभ्यास का वेग), असंगत्व (कर्म का भार न रहना), बन्ध छेद (बन्धन टूटना), और तथा गति परिणाम (ऊपर जाना जीव का स्वभाव)।
सूत्र 7:
आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च ॥ 7 ॥
अर्थ: चारों के दृष्टान्त क्रम से: घुमाया हुआ कुम्हार का चाक (डंडा हटाने पर भी घूमता रहता है), लेप हटी तूम्बी (मिट्टी का लेप धुलते ही पानी के ऊपर आ जाती है), एरण्ड का बीज (फली फटते ही ऊपर उछलता है), और अग्नि की शिखा (स्वभाव से ऊपर जाती है)।
सूत्र 8:
धर्मास्तिकायाभावात् ॥ 8 ॥
अर्थ: लोक के आगे धर्मास्तिकाय का अभाव होने से सिद्ध जीव अलोक में नहीं जाते। गति में सहायक धर्म द्रव्य लोक तक ही है, यह अध्याय 5 में बताया।
सार: आत्मा का स्वभाव ऊपर उठना है। कर्म का भार ही उसे नीचे रोके है।
५. सिद्धों का विचार (सूत्र 9)
सूत्र 9:
क्षेत्रकालगतिलिङ्गतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितज्ञानावगाहनान्तरसंख्याल्पबहुत्वतः साध्याः ॥ 9 ॥
अर्थ: क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येकबुद्ध और बोधितबुद्ध, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व, इन बारह अनुयोगों से सिद्धों का विचार (भेद) किया जाता है, भूतपूर्व (पिछली अवस्था) की अपेक्षा से। वर्तमान में तो सब सिद्ध समान हैं: अनन्त ज्ञान, अनन्त सुख वाले।
पूरे ग्रंथ का सार
दस अध्यायों में सात तत्त्व इस तरह आए: जीव (अध्याय 1 से 4: मोक्ष मार्ग, प्रमाण नय, जीव के भाव, नरक, मनुष्य लोक, देव), अजीव (अध्याय 5), आस्रव (अध्याय 6, 7), बन्ध (अध्याय 8), संवर और निर्जरा (अध्याय 9) और मोक्ष (अध्याय 10)। पहला सूत्र मार्ग बताता है, अन्तिम सूत्र मंज़िल। बीच का सब उसी मार्ग का नक्शा है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न: केवलज्ञान किन कर्मों के क्षय से होता है?
उत्तर: पहले मोहनीय, फिर ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय (सूत्र 1)।
प्रश्न: मोक्ष की परिभाषा?
उत्तर: बन्ध हेतुओं के अभाव और निर्जरा से समस्त कर्मों का छूटना (सूत्र 2)।
प्रश्न: सिद्धों में कौन से भाव रहते हैं?
उत्तर: क्षायिक सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन, सिद्धत्व (सूत्र 4)।
प्रश्न: मुक्त जीव कहाँ जाता है?
उत्तर: उसी समय ऊपर लोक के अन्त तक (सूत्र 5)।
प्रश्न: ऊर्ध्वगमन के चार कारण?
उत्तर: पूर्व प्रयोग, असंगत्व, बन्ध छेद, तथा गति परिणाम (सूत्र 6)।
प्रश्न: इनके चार दृष्टान्त?
उत्तर: कुम्हार का चाक, लेप रहित तूम्बी, एरण्ड बीज, अग्नि शिखा (सूत्र 7)।
प्रश्न: सिद्ध अलोक में क्यों नहीं जाते?
उत्तर: आगे धर्मास्तिकाय नहीं है (सूत्र 8)।
प्रश्न: सिद्धों का विचार कितने अनुयोगों से?
उत्तर: बारह: क्षेत्र, काल, गति, लिंग आदि (सूत्र 9)।
शब्दकोश
केवलज्ञान: सब द्रव्यों और पर्यायों को एक साथ जानने वाला पूर्ण ज्ञान
मोक्ष: समस्त कर्मों से पूर्ण मुक्ति
विप्रमोक्ष: विशेष रूप से, सदा के लिए छूटना
सिद्धत्व: कृतकृत्य होने का भाव
लोकाग्र: लोक का सबसे ऊपरी भाग, सिद्धों का स्थान
असंगत्व: कर्म का संग, भार न रहना
अलाबु: तूम्बी
प्रत्येकबुद्ध, बोधितबुद्ध: स्वयं बोध पाने वाले; उपदेश से बोध पाने वाले
अवगाहना: शरीर की ऊँचाई, आकार
अल्पबहुत्व: कम अधिक की तुलना
एक नज़र में
| विषय | मुख्य बात | सूत्र |
|---|---|---|
| केवलज्ञान | मोह क्षय, फिर तीन घातिया क्षय | 1 |
| मोक्ष | बन्ध हेतु अभाव और निर्जरा से सब कर्म छूटना | 2 |
| भावों का अभाव | औपशमिक आदि और भव्यत्व | 3 |
| शेष भाव | क्षायिक सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन, सिद्धत्व | 4 |
| ऊर्ध्वगमन | लोकान्त तक; चार कारण, चार दृष्टान्त | 5 से 7 |
| अलोक में नहीं | धर्मास्तिकाय का अभाव | 8 |
| सिद्धों का विचार | बारह अनुयोग | 9 |
फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · सर्वार्थसिद्धि · तत्त्वार्थसूत्र प्रदीपिका
सम्बन्धित चर्चा: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1 · अध्याय 2 · अध्याय 3 · अध्याय 4 · अध्याय 5 · अध्याय 6 · अध्याय 7 · अध्याय 8 · अध्याय 9 · केवलज्ञान
स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 10, सूत्र 1 से 9; अर्थ आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर।
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इति तत्त्वार्थसूत्रापरनाम मोक्षशास्त्रं समाप्तम्। ![]()