तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) का आठवाँ अध्याय बन्ध तत्त्व का वर्णन करता है: बन्ध के पाँच कारण, बन्ध का स्वरूप, प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश, ये चार प्रकार का बन्ध, आठ मूल कर्म और उनकी 148 उत्तर प्रकृतियाँ, हर कर्म की उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति, फल देना (अनुभाग) और झड़ना, प्रदेश बन्ध, और पुण्य पाप प्रकृतियाँ। छठे सातवें अध्याय में आस्रव बताया, यहाँ आए हुए कर्म आत्मा से कैसे बँधते हैं। इसमें कुल 26 सूत्र हैं। हर सूत्र नीचे मूल पाठ में ज्यों का त्यों दिया है, साथ में आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर सरल हिन्दी अर्थ। क्रम है: बन्ध के कारण और स्वरूप, चार बन्ध, आठ कर्म और उत्तर प्रकृतियाँ, स्थिति बन्ध, अनुभाग बन्ध, प्रदेश बन्ध, पुण्य पाप, फिर प्रश्नोत्तर और शब्दकोश।
मूल सूत्र: फोरम पर तत्त्वार्थसूत्र मूल पाठ से। पिछले अध्याय: अध्याय 1, अध्याय 2, अध्याय 3, अध्याय 4, अध्याय 5, अध्याय 6, अध्याय 7।
१. बन्ध के कारण और स्वरूप (सूत्र 1 से 3)
सूत्र 1:
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥ 1 ॥
अर्थ: मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग, ये पाँच बन्ध के हेतु (कारण) हैं।
सूत्र 2:
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बंधः ॥ 2 ॥
अर्थ: कषाय सहित होने से जीव कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है, वह बन्ध है। जैसे तेल लगे शरीर पर धूल चिपकती है, वैसे कषाय से गीले आत्मा पर कर्म।
सूत्र 3:
प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विधयः ॥ 3 ॥
अर्थ: उस बन्ध के चार प्रकार हैं: प्रकृति (स्वभाव), स्थिति (कितने समय टिकेगा), अनुभाग (फल देने की शक्ति) और प्रदेश (कितने परमाणु)। प्रकृति और प्रदेश बन्ध योग से, स्थिति और अनुभाग बन्ध कषाय से होते हैं।
सार: योग से कर्म आते हैं, कषाय उन्हें चिपकाती है। कषाय घटे तो बन्ध की पकड़ भी ढीली।
२. आठ मूल कर्म (सूत्र 4, 5)
सूत्र 4:
आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥ 4 ॥
अर्थ: पहला, प्रकृति बन्ध, आठ प्रकार का है: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय।
सूत्र 5:
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदायथाक्रमम् ॥ 5 ॥
अर्थ: इनके क्रम से पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, बयालीस, दो और पाँच उत्तर भेद हैं। (नाम कर्म के बयालीस पिण्ड भेद विस्तार से तिरानवे होते हैं, इस तरह कुल 148 उत्तर प्रकृतियाँ।)
३. उत्तर प्रकृतियाँ (सूत्र 6 से 13)
सूत्र 6:
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥ 6 ॥
अर्थ: ज्ञानावरण के पाँच भेद: मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधिज्ञानावरण, मनःपर्ययज्ञानावरण और केवलज्ञानावरण।
सूत्र 7:
चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च ॥ 7 ॥
अर्थ: दर्शनावरण के नौ भेद: चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवलदर्शनावरण, और निद्रा, निद्रा निद्रा, प्रचला, प्रचला प्रचला, स्त्यानगृद्धि, ये पाँच निद्राएँ।
सूत्र 8:
सदसद्वेद्ये ॥ 8 ॥
अर्थ: वेदनीय के दो भेद: सद्वेद्य (साता) और असद्वेद्य (असाता)।
सूत्र 9:
दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबंध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥ 9 ॥
अर्थ: मोहनीय के दो मुख्य भेद, दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय। दर्शन मोहनीय के तीन: सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व। चारित्र मोहनीय के दो, अकषाय वेदनीय और कषाय वेदनीय: अकषाय (नोकषाय) के नौ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद; और कषाय के सोलह, अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन, इन चारों के क्रोध, मान, माया, लोभ। कुल 3 + 9 + 16 = 28।
सूत्र 10:
नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि ॥ 10 ॥
अर्थ: आयु के चार भेद: नरक आयु, तिर्यंच आयु, मनुष्य आयु और देव आयु।
सूत्र 11:
गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबंधनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगंधवर्णानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययशः कीर्तिसेतराणि तीर्थकरत्वं च ॥ 11 ॥
अर्थ: नाम कर्म के भेद: गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, आनुपूर्व्य, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास और विहायोगति, ये इक्कीस; और प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय, यशःकीर्ति, ये दस अपने विरोधी (साधारण, स्थावर, दुर्भग आदि) के साथ बीस; और तीर्थंकरत्व। कुल बयालीस।
सूत्र 12:
उच्चैर्नीचैश्च ॥ 12 ॥
अर्थ: गोत्र के दो भेद: उच्च गोत्र और नीच गोत्र।
सूत्र 13:
दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् ॥ 13 ॥
अर्थ: अन्तराय के पाँच भेद: दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य अन्तराय।
४. स्थिति बन्ध (सूत्र 14 से 20)
सूत्र 14:
आदितस्तिसृणामंतरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ॥ 14 ॥
अर्थ: आदि के तीन, ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, और अन्तराय की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागर है।
सूत्र 15:
सप्ततिर्मोहनीयस्य ॥ 15 ॥
अर्थ: मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर है। सबसे लम्बी, इसलिए मोह को कर्मों का राजा कहा है।
सूत्र 16:
विंशतिर्नामगोत्रयोः ॥ 16 ॥
अर्थ: नाम और गोत्र की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोड़ाकोड़ी सागर है।
सूत्र 17:
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः ॥ 17 ॥
अर्थ: आयु की उत्कृष्ट स्थिति तैंतीस सागर है।
सूत्र 18:
अपरा द्वादश मुहूर्ता वेदनीयस्य ॥ 18 ॥
अर्थ: जघन्य स्थिति: वेदनीय की बारह मुहूर्त।
सूत्र 19:
नामगोत्रयोरष्टौ ॥ 19 ॥
अर्थ: नाम और गोत्र की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त।
सूत्र 20:
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता ॥ 20 ॥
अर्थ: शेष (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयु, अन्तराय) की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त।
५. अनुभाग बन्ध और निर्जरा (सूत्र 21 से 23)
सूत्र 21:
विपाकोऽनुभवः ॥ 21 ॥
अर्थ: विपाक (कर्म का पककर फल देना) अनुभव, यानी अनुभाग है।
सूत्र 22:
स यथानाम ॥ 22 ॥
अर्थ: वह अनुभाग कर्म के नाम के अनुसार होता है: ज्ञानावरण ज्ञान को ढकता है, वेदनीय सुख दुःख वेदन कराता है, इसी तरह सब।
सूत्र 23:
ततश्च निर्जरा ॥ 23 ॥
अर्थ: और फल देने के बाद कर्म की निर्जरा होती है, वह आत्मा से झड़ जाता है।
सार: हर उदय एक अवसर है: फल समता से भोगा तो कर्म झड़ गया और नया नहीं बँधा; राग द्वेष से भोगा तो फिर बँध गया।
६. प्रदेश बन्ध (सूत्र 24)
सूत्र 24:
नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥ 24 ॥
अर्थ: कर्म प्रकृतियों के कारण रूप, सब भवों में, योग की विशेषता से, सूक्ष्म, एक क्षेत्र में अवगाह करके स्थित, आत्मा के सब प्रदेशों में अनन्तानन्त प्रदेश वाले पुद्गल स्कन्ध प्रति समय बँधते हैं। यही प्रदेश बन्ध है।
७. पुण्य और पाप प्रकृतियाँ (सूत्र 25, 26)
सूत्र 25:
सद्वेद्यशुभायुर्नामगोत्राणि पुण्यम् ॥ 25 ॥
अर्थ: साता वेदनीय, शुभ आयु (तिर्यंच, मनुष्य, देव आयु), शुभ नाम और उच्च गोत्र, ये पुण्य प्रकृतियाँ हैं।
सूत्र 26:
अतोऽन्यत्पापम् ॥ 26 ॥
अर्थ: इनसे अन्य सब पाप प्रकृतियाँ हैं। घातिया कर्म (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय) सब पाप रूप ही हैं।
सार: पुण्य भी बन्ध है, सोने की बेड़ी। मोक्ष के लिए दोनों से छूटना है।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न: बन्ध के पाँच कारण?
उत्तर: मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग (सूत्र 1)।
प्रश्न: बन्ध किसे कहते हैं?
उत्तर: कषाय सहित जीव का कर्म योग्य पुद्गलों को ग्रहण करना (सूत्र 2)।
प्रश्न: बन्ध के चार प्रकार?
उत्तर: प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश (सूत्र 3)।
प्रश्न: आठ कर्मों के उत्तर भेद कितने?
उत्तर: 5, 9, 2, 28, 4, 42, 2, 5; विस्तार से 148 (सूत्र 5)।
प्रश्न: पाँच निद्राएँ कौन सी?
उत्तर: निद्रा, निद्रा निद्रा, प्रचला, प्रचला प्रचला, स्त्यानगृद्धि (सूत्र 7)।
प्रश्न: मोहनीय के 28 भेद कैसे?
उत्तर: दर्शन मोह 3, नोकषाय 9, कषाय 16 (सूत्र 9)।
प्रश्न: सबसे लम्बी स्थिति किस कर्म की?
उत्तर: मोहनीय, सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर (सूत्र 15)।
प्रश्न: आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति?
उत्तर: तैंतीस सागर (सूत्र 17)।
प्रश्न: वेदनीय की जघन्य स्थिति?
उत्तर: बारह मुहूर्त (सूत्र 18)।
प्रश्न: अनुभाग क्या है?
उत्तर: कर्म का विपाक, फल देने की शक्ति, नाम के अनुसार (सूत्र 21, 22)।
प्रश्न: पुण्य प्रकृतियाँ कौन सी?
उत्तर: साता वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम, उच्च गोत्र (सूत्र 25)।
शब्दकोश
बन्ध: आत्मा और कर्म पुद्गल का एक क्षेत्र में दूध पानी की तरह मिलना
प्रकृति: कर्म का स्वभाव
स्थिति: कर्म के आत्मा के साथ रहने का काल
अनुभाग: फल देने की तीव्रता मन्दता
प्रदेश: बँधने वाले कर्म परमाणुओं की संख्या
उत्तर प्रकृति: मूल कर्म के भेद
नोकषाय: ईषत् कषाय, हास्य आदि नौ
अनन्तानुबन्धी: सम्यक्त्व को घातने वाली कषाय
कोड़ाकोड़ी: करोड़ गुणा करोड़
मुहूर्त, अन्तर्मुहूर्त: 48 मिनट; उससे कम
विपाक: कर्म का पककर उदय में आना
घातिया: आत्मा के गुणों को घातने वाले चार कर्म
एक नज़र में
| विषय | मुख्य बात | सूत्र |
|---|---|---|
| बन्ध हेतु | मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग | 1 |
| बन्ध | कषाय से कर्म पुद्गल ग्रहण | 2 |
| चार बन्ध | प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश | 3 |
| आठ कर्म | ज्ञानावरण से अन्तराय | 4 |
| उत्तर भेद | 5, 9, 2, 28, 4, 42, 2, 5 | 5 से 13 |
| उत्कृष्ट स्थिति | 30, 70, 20 कोड़ाकोड़ी सागर; आयु 33 सागर | 14 से 17 |
| जघन्य स्थिति | वेदनीय 12, नाम गोत्र 8 मुहूर्त; शेष अन्तर्मुहूर्त | 18 से 20 |
| अनुभाग | विपाक, नाम अनुसार, फिर निर्जरा | 21 से 23 |
| प्रदेश बन्ध | योग से, सब प्रदेशों में अनन्तानन्त | 24 |
| पुण्य पाप | साता, शुभ आयु नाम गोत्र पुण्य; शेष पाप | 25, 26 |
फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · सर्वार्थसिद्धि · तत्त्वार्थसूत्र प्रदीपिका
सम्बन्धित चर्चा: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1 · अध्याय 2 · अध्याय 3 · अध्याय 4 · अध्याय 5 · अध्याय 6 · अध्याय 7
स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 8, सूत्र 1 से 26; अर्थ आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर।
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