तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 5: छह द्रव्य, अजीवकाय, प्रदेश, उपकार, पुद्गल, सत्, बन्ध, गुण पर्याय | Tattvarthsutra Adhyay 5: Sampurn Vivechan

तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) का पाँचवाँ अध्याय अजीव तत्त्व का वर्णन करता है: छह द्रव्य (जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल), उनके प्रदेश, लोक में उनका अवगाह, एक दूसरे पर उपकार, पुद्गल के गुण और भेद, द्रव्य का लक्षण “सत्”, उत्पाद व्यय ध्रौव्य, परमाणुओं का बन्ध, और गुण पर्याय। पहले चार अध्यायों में जीव तत्त्व बताया, यहाँ अजीव। इसमें कुल 42 सूत्र हैं। हर सूत्र नीचे मूल पाठ में ज्यों का त्यों दिया है, साथ में आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर सरल हिन्दी अर्थ। क्रम है: अजीवकाय और द्रव्य, द्रव्यों का स्वभाव, प्रदेश, अवगाह, उपकार, पुद्गल, सत् का लक्षण, बन्ध, गुण पर्याय और काल, फिर प्रश्नोत्तर और शब्दकोश।

मूल सूत्र: फोरम पर तत्त्वार्थसूत्र मूल पाठ से। पिछले अध्याय: अध्याय 1, अध्याय 2, अध्याय 3, अध्याय 4।


१. अजीवकाय और द्रव्य (सूत्र 1 से 3)

सूत्र 1:

अजीवकायाधर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥ 1 ॥

अर्थ: धर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल, ये चार अजीवकाय हैं। “अजीव” इसलिए कि इनमें चेतना नहीं; “काय” इसलिए कि शरीर की तरह इनके बहुत प्रदेश हैं। काल का नाम यहाँ नहीं लिया, क्योंकि वह एक प्रदेशी है, कायवान नहीं।

सूत्र 2:

द्रव्याणि ॥ 2 ॥

अर्थ: ये चारों द्रव्य हैं। जो अपनी पर्यायों को प्राप्त होते रहते हैं, बहते रहते हैं, वे द्रव्य हैं।

सूत्र 3:

जीवाश्च ॥ 3 ॥

अर्थ: और जीव भी द्रव्य हैं। इस तरह जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश पाँच हुए; काल को सूत्र 39 में जोड़ा है। कुल छह द्रव्य।


२. द्रव्यों का स्वभाव (सूत्र 4 से 7)

सूत्र 4:

नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥ 4 ॥

अर्थ: ये द्रव्य नित्य हैं (अपने स्वभाव से कभी नष्ट नहीं होते), अवस्थित हैं (संख्या में छह ही रहते हैं, घटते बढ़ते नहीं), और अरूपी हैं (पुद्गल को छोड़कर)।

सूत्र 5:

रूपिणः पुद्गलाः ॥ 5 ॥

अर्थ: पुद्गल रूपी हैं। रूप यानी स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण वाली मूर्ति। इसी से पुद्गल इन्द्रियों से जाने जाते हैं।

सूत्र 6:

आ आकाशादेकद्रव्याणि ॥ 6 ॥

अर्थ: आकाश तक के द्रव्य, यानी धर्म, अधर्म और आकाश, एक एक द्रव्य हैं। जीव और पुद्गल अनन्त हैं।

सूत्र 7:

निष्क्रियाणि च ॥ 7 ॥

अर्थ: और ये धर्म, अधर्म, आकाश निष्क्रिय हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन नहीं करते। गमन रूप क्रिया जीव और पुद्गल में ही है।


३. द्रव्यों के प्रदेश (सूत्र 8 से 11)

सूत्र 8:

असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम् ॥ 8 ॥

अर्थ: धर्म, अधर्म और एक जीव, इनके असंख्यात प्रदेश हैं, और तीनों के प्रदेश बराबर, लोकाकाश जितने।

सूत्र 9:

आकाशस्यानन्ताः ॥ 9 ॥

अर्थ: आकाश के अनन्त प्रदेश हैं (लोक और अलोक मिलाकर)।

सूत्र 10:

संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥ 10 ॥

अर्थ: पुद्गलों के, यानी स्कन्धों के, संख्यात, असंख्यात और (“च” से) अनन्त प्रदेश होते हैं।

सूत्र 11:

नाणोः ॥ 11 ॥

अर्थ: अणु (परमाणु) के प्रदेश नहीं होते। वह स्वयं एक प्रदेश मात्र है, उसका और भाग नहीं होता।

सार: एक जीव के प्रदेश पूरे लोक जितने हैं, फिर भी वह छोटे बड़े शरीर में समा जाता है। यह सूत्र 16 में बताया है।


४. लोकाकाश में अवगाह (सूत्र 12 से 16)

सूत्र 12:

लोकाकाशेऽवगाहः ॥ 12 ॥

अर्थ: इन सब द्रव्यों का अवगाह (ठहरना) लोकाकाश में है। आकाश तो स्वयं अपने में ठहरा है; जहाँ तक बाकी द्रव्य हैं, वह लोकाकाश, उसके बाहर अलोकाकाश।

सूत्र 13:

धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥ 13 ॥

अर्थ: धर्म और अधर्म द्रव्य पूरे लोकाकाश में, तिल में तेल की तरह, व्याप्त हैं।

सूत्र 14:

एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥ 14 ॥

अर्थ: पुद्गलों का अवगाह एक प्रदेश आदि में विकल्प से है: एक परमाणु एक प्रदेश में, और स्कन्ध एक, दो, संख्यात, असंख्यात प्रदेशों में, जैसा उनका परिणमन हो।

सूत्र 15:

असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥ 15 ॥

अर्थ: जीवों का अवगाह लोक के असंख्यातवें भाग आदि में है। छोटे से छोटा शरीर भी लोक का असंख्यातवाँ भाग घेरता है, और केवली समुद्घात में जीव पूरे लोक में फैलता है।

सूत्र 16:

प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥ 16 ॥

अर्थ: जीव के प्रदेश दीपक की तरह संकोच और विस्तार वाले हैं। जैसे दीपक छोटे घड़े में रखो तो उतना प्रकाश, बड़े कमरे में रखो तो उतना, वैसे ही जीव कर्म से मिले छोटे या बड़े शरीर के बराबर हो जाता है।


५. द्रव्यों का उपकार (सूत्र 17 से 22)

सूत्र 17:

गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥ 17 ॥

अर्थ: गति में सहायक होना धर्म द्रव्य का, और स्थिति (ठहरने) में सहायक होना अधर्म द्रव्य का उपकार है। जैसे मछली के चलने में जल, और पथिक के ठहरने में छाया; प्रेरक नहीं, केवल उदासीन सहायक।

सूत्र 18:

आकाशस्यावगाहः ॥ 18 ॥

अर्थ: अवगाह (स्थान) देना आकाश का उपकार है।

सूत्र 19:

शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥ 19 ॥

अर्थ: शरीर, वचन, मन और प्राण अपान (श्वास उच्छ्वास), ये पुद्गलों के उपकार हैं। यानी ये सब पुद्गल से बने हैं।

सूत्र 20:

सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥ 20 ॥

अर्थ: सुख, दुःख, जीवन और मरण भी पुद्गल के उपकार हैं, क्योंकि इनमें कर्म रूपी पुद्गल निमित्त है।

सूत्र 21:

परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥ 21 ॥

अर्थ: जीवों का उपकार एक दूसरे पर उपग्रह करना है: स्वामी सेवक, गुरु शिष्य जैसे परस्पर सहायता।

सूत्र 22:

वर्तनापरिणामक्रियापरत्वापरत्वे च कालस्य ॥ 22 ॥

अर्थ: वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व, ये काल के उपकार हैं। वर्तना यानी हर द्रव्य का अपनी पर्याय में प्रति समय बदलना, उसमें निश्चय काल निमित्त है; परिणाम, क्रिया, छोटा बड़ा पन (परत्व अपरत्व) व्यवहार काल से जाने जाते हैं।

सार: कोई द्रव्य किसी को बलपूर्वक चलाता या रोकता नहीं। हर द्रव्य अपने उपादान से बदलता है, दूसरा केवल निमित्त होता है।


६. पुद्गल के गुण और भेद (सूत्र 23 से 28)

सूत्र 23:

स्पर्शरसगंधवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥ 23 ॥

अर्थ: पुद्गल स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण वाले हैं। स्पर्श आठ, रस पाँच, गन्ध दो, वर्ण पाँच।

सूत्र 24:

शब्दबंधसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च ॥ 24 ॥

अर्थ: और शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान (आकार), भेद (टुकड़े), अन्धकार, छाया, आतप (धूप) और उद्योत (चाँदनी जैसा शीतल प्रकाश) वाले भी पुद्गल हैं। ये सब पुद्गल की पर्यायें हैं।

सूत्र 25:

अणवः स्कन्धाश्च ॥ 25 ॥

अर्थ: पुद्गल दो प्रकार के हैं: अणु (परमाणु) और स्कन्ध (परमाणुओं का समूह)।

सूत्र 26:

भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥ 26 ॥

अर्थ: स्कन्ध भेद (टूटने) से, संघात (जुड़ने) से, और भेद संघात दोनों से उत्पन्न होते हैं।

सूत्र 27:

भेदादणुः ॥ 27 ॥

अर्थ: अणु भेद से ही उत्पन्न होता है, यानी स्कन्ध के टूटते टूटते अन्तिम अविभाज्य भाग।

सूत्र 28:

भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥ 28 ॥

अर्थ: चाक्षुष (आँख से दिखने वाला) स्कन्ध भेद और संघात दोनों से बनता है। सूक्ष्म स्कन्ध टूटकर और दूसरे से मिलकर ही आँख से दिखने योग्य होता है।


७. सत्, उत्पाद व्यय ध्रौव्य और नित्यता (सूत्र 29 से 32)

सूत्र 29:

सद् द्रव्यलक्षणम् ॥ 29 ॥

अर्थ: द्रव्य का लक्षण सत् है। जो है, वही द्रव्य है।

सूत्र 30:

उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥ 30 ॥

अर्थ: जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है, वह सत् है। जैसे सोने का कंगन तोड़कर हार बनाया: हार का उत्पाद, कंगन का व्यय, और सोना ध्रुव। तीनों एक ही समय में।

सूत्र 31:

तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥ 31 ॥

अर्थ: उसके भाव (स्वभाव) का नष्ट न होना नित्य है। द्रव्य पर्याय से बदलता है, पर अपने स्वभाव से कभी नहीं छूटता, इसलिए नित्य है।

सूत्र 32:

अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥ 32 ॥

अर्थ: अर्पित (मुख्य) और अनर्पित (गौण) की अपेक्षा से एक ही वस्तु में नित्यता और अनित्यता, दोनों सिद्ध होती हैं। द्रव्य दृष्टि मुख्य करो तो नित्य, पर्याय दृष्टि मुख्य करो तो अनित्य। यही अनेकान्त और स्याद्वाद का आधार है।

सार: वस्तु न केवल नित्य है, न केवल अनित्य। दोनों को अपेक्षा से देखना सम्यग्ज्ञान है।


८. परमाणुओं का बन्ध (सूत्र 33 से 37)

सूत्र 33:

स्निग्धरूक्षत्वाद् बन्धः ॥ 33 ॥

अर्थ: स्निग्धता (चिकनापन) और रूक्षता (रूखापन) से परमाणुओं का बन्ध होता है।

सूत्र 34:

न जघन्यगुणानाम् ॥ 34 ॥

अर्थ: जघन्य गुण (सबसे कम, एक अंश स्निग्धता या रूक्षता) वाले परमाणुओं का बन्ध नहीं होता।

सूत्र 35:

गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥ 35 ॥

अर्थ: गुण समान हों तो सदृश (स्निग्ध का स्निग्ध से, रूक्ष का रूक्ष से) परमाणुओं का बन्ध नहीं होता।

सूत्र 36:

द्व्यधिकादिगुणानां तु ॥ 36 ॥

अर्थ: परन्तु दो अधिक आदि गुण हों तो बन्ध होता है: जैसे दो अंश वाले का चार अंश वाले से, सदृश हो या विसदृश।

सूत्र 37:

बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च ॥ 37 ॥

अर्थ: बन्ध होने पर अधिक गुण वाला परमाणु कम गुण वाले को अपने रूप परिणमा लेता है, जैसे गीला गुड़ धूल को अपने जैसा मीठा बना लेता है।


९. गुण, पर्याय और काल (सूत्र 38 से 42)

सूत्र 38:

गुणपर्ययवद् द्रव्यम् ॥ 38 ॥

अर्थ: जो गुण और पर्याय वाला है, वह द्रव्य है। गुण द्रव्य के साथ सदा रहते हैं (सहभावी), पर्याय क्रम से बदलती हैं (क्रमभावी)।

सूत्र 39:

कालश्च ॥ 39 ॥

अर्थ: काल भी द्रव्य है। लोकाकाश के एक एक प्रदेश पर एक एक कालाणु रत्नों की राशि की तरह अलग अलग स्थित है।

सूत्र 40:

सोऽनन्तसमयः ॥ 40 ॥

अर्थ: वह (व्यवहार काल) अनन्त समय वाला है। समय काल का सबसे छोटा अंश है, उसी से आवली, घड़ी, दिन आदि बनते हैं।

सूत्र 41:

द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥ 41 ॥

अर्थ: जो द्रव्य के आश्रय रहते हैं और स्वयं निर्गुण हैं (गुण में और गुण नहीं होते), वे गुण हैं। जैसे जीव में ज्ञान, पुद्गल में रूप।

सूत्र 42:

तद्भावः परिणामः ॥ 42 ॥

अर्थ: उसका भाव, यानी द्रव्य का अपने स्वरूप में होते रहना, परिणाम है। धर्मादि में अनादि परिणाम, और जीव पुद्गल में आदिमान परिणाम भी।

सार: आत्मा भी एक द्रव्य है: अपने गुणों में नित्य, पर्यायों में बदलती। राग द्वेष पर्याय है, स्वभाव नहीं; इसलिए वह मिट सकता है।


प्रश्नोत्तर

प्रश्न: छह द्रव्य कौन हैं?
उत्तर: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल (सूत्र 1 से 3, 39)।

प्रश्न: अस्तिकाय कितने और काल अस्तिकाय क्यों नहीं?
उत्तर: पाँच: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश। काल का हर अणु एक प्रदेशी है, बहुप्रदेशी नहीं (सूत्र 1, 39)।

प्रश्न: रूपी द्रव्य कौन सा है?
उत्तर: केवल पुद्गल (सूत्र 5)।

प्रश्न: कौन से द्रव्य एक एक हैं और निष्क्रिय हैं?
उत्तर: धर्म, अधर्म, आकाश (सूत्र 6, 7)।

प्रश्न: जीव छोटे बड़े शरीर में कैसे समाता है?
उत्तर: दीपक के प्रकाश की तरह प्रदेशों के संकोच विस्तार से (सूत्र 16)।

प्रश्न: धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार?
उत्तर: गति में और स्थिति में उदासीन सहायता (सूत्र 17)।

प्रश्न: शरीर, वचन, मन किसके बने हैं?
उत्तर: पुद्गल के (सूत्र 19)।

प्रश्न: द्रव्य का लक्षण?
उत्तर: सत्; और सत् = उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य युक्त (सूत्र 29, 30)।

प्रश्न: परमाणुओं का बन्ध कब नहीं होता?
उत्तर: जघन्य गुण में, और समान गुण वाले सदृश में (सूत्र 34, 35)।

प्रश्न: गुण और पर्याय में अन्तर?
उत्तर: गुण द्रव्य के साथ सदा रहते हैं, पर्याय क्रम से बदलती है (सूत्र 38, 41)।


शब्दकोश

अजीव: जिसमें चेतना नहीं
अस्तिकाय: जो है और बहुप्रदेशी है
प्रदेश: एक परमाणु जितना आकाश का भाग
लोकाकाश, अलोकाकाश: जहाँ छहों द्रव्य हैं वह लोक, उसके बाहर केवल आकाश
अवगाह: स्थान पाना, ठहरना
उपग्रह, उपकार: सहायता, निमित्त होना
वर्तना: हर द्रव्य का प्रति समय अपनी पर्याय में बदलना
अणु, स्कन्ध: अविभाज्य परमाणु; परमाणुओं का समूह
चाक्षुष: आँख से दिखने योग्य
उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य: नई पर्याय का होना, पुरानी का जाना, द्रव्य का बना रहना
अर्पित, अनर्पित: मुख्य किया हुआ, गौण रखा हुआ
स्निग्ध, रूक्ष: चिकना, रूखा
गुण, पर्याय: सहभावी विशेषता; क्रमभावी अवस्था
समय: काल का सबसे छोटा अविभाज्य अंश


एक नज़र में

विषय मुख्य बात सूत्र
अजीवकाय धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल 1
द्रव्य ये चार और जीव, फिर काल 2, 3, 39
स्वभाव नित्य, अवस्थित, अरूपी; पुद्गल रूपी 4, 5
एक और निष्क्रिय धर्म, अधर्म, आकाश 6, 7
प्रदेश असंख्यात, अनन्त, संख्यात आदि; अणु अप्रदेशी 8 से 11
अवगाह लोकाकाश में; जीव दीपक की तरह 12 से 16
उपकार गति, स्थिति, अवगाह, शरीर आदि, परस्पर, वर्तना 17 से 22
पुद्गल स्पर्श आदि, शब्द आदि, अणु स्कन्ध 23 से 28
सत् उत्पाद व्यय ध्रौव्य; नित्य; अर्पित अनर्पित 29 से 32
बन्ध स्निग्ध रूक्ष से, दो अधिक गुण पर 33 से 37
द्रव्य, काल, गुण गुण पर्याय वाला द्रव्य; काल अनन्त समय 38 से 42

फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · सर्वार्थसिद्धि · तत्त्वार्थसूत्र प्रदीपिका

सम्बन्धित चर्चा: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1 · अध्याय 2 · अध्याय 3 · अध्याय 4 · सम्यग्दर्शन · सम्यग्ज्ञान · सम्यक्चारित्र

स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 5, सूत्र 1 से 42; अर्थ आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर।

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