तत्त्वार्थ सूत्र अध्याय 2 | Tattvarth Sutra Adhyay 2

तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 2: जीव के पाँच भाव, उपयोग, इन्द्रियाँ, विग्रह गति, जन्म, शरीर

तत्त्वार्थसूत्र (मोक्षशास्त्र) का दूसरा अध्याय जीव तत्त्व का वर्णन करता है: जीव के पाँच भाव, उसका लक्षण उपयोग, संसारी जीवों के भेद, इन्द्रियाँ, एक भव से दूसरे भव में जाने की विग्रह गति, जन्म और योनि, पाँच शरीर, वेद और आयु। पहले अध्याय में मोक्षमार्ग और ज्ञान बताया, यहाँ बताया है कि वह जीव कौन है जिसे मोक्ष पाना है। इसमें कुल 53 सूत्र हैं। हर सूत्र नीचे मूल पाठ में ज्यों का त्यों दिया है, साथ में आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर सरल हिन्दी अर्थ। क्रम है: पाँच भाव, उपयोग, संसारी जीव, इन्द्रियाँ, विग्रह गति, जन्म और योनि, पाँच शरीर, वेद, आयु, फिर प्रश्नोत्तर और शब्दकोश।

मूल सूत्र: फोरम पर तत्त्वार्थसूत्र मूल पाठ से। पिछला: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1, अगला: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 3।


१. जीव के पाँच भाव (सूत्र 1 से 7)

सूत्र 1:

औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥ 1 ॥

अर्थ: औपशमिक, क्षायिक, मिश्र (क्षायोपशमिक), औदयिक और पारिणामिक, ये पाँच भाव जीव के स्वतत्त्व हैं, यानी जीव के अपने भाव, जो किसी दूसरे द्रव्य में नहीं होते। कर्म के उपशम से औपशमिक, क्षय से क्षायिक, क्षयोपशम से मिश्र, उदय से औदयिक, और कर्म की अपेक्षा बिना स्वभाव से पारिणामिक भाव होता है। जैसे मैले पानी में निर्मली डालने से मैल नीचे बैठ जाता है, वैसे कर्म का दब जाना उपशम है।

सूत्र 2:

द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् ॥ 2 ॥

अर्थ: इन पाँच भावों के क्रम से दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद हैं। कुल 53 भेद।

सूत्र 3:

सम्यक्त्वचारित्रे ॥ 3 ॥

अर्थ: औपशमिक भाव के दो भेद: औपशमिक सम्यक्त्व और औपशमिक चारित्र।

सूत्र 4:

ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥ 4 ॥

अर्थ: क्षायिक भाव के नौ भेद: केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिक दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य, और “च” शब्द से क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र।

सूत्र 5:

ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥ 5 ॥

अर्थ: क्षायोपशमिक (मिश्र) भाव के अठारह भेद: चार ज्ञान (मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय), तीन अज्ञान (कुमति, कुश्रुत, कुअवधि), तीन दर्शन (चक्षु, अचक्षु, अवधि), पाँच लब्धि (दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य), और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र और संयमासंयम।

सूत्र 6:

गतिकषायलिंगमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्धलेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकैकषड्भेदाः ॥ 6 ॥

अर्थ: औदयिक भाव के इक्कीस भेद: चार गति, चार कषाय, तीन लिंग (वेद), एक मिथ्यादर्शन, एक अज्ञान, एक असंयम, एक असिद्धत्व और छह लेश्या।

सूत्र 7:

जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥ 7 ॥

अर्थ: पारिणामिक भाव के तीन भेद: जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व। ये कर्म के उदय आदि की अपेक्षा नहीं रखते, स्वभाव से हैं।

सार: जीव में जो भी भाव होता है वह इन पाँच में से किसी एक में आता है। मोक्षमार्ग औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक भावों से चलता है, और औदयिक भाव बन्ध का कारण है।


२. जीव का लक्षण: उपयोग (सूत्र 8, 9)

सूत्र 8:

उपयोगो लक्षणम् ॥ 8 ॥

अर्थ: जीव का लक्षण उपयोग है। चेतना के अनुसार होने वाले जानने देखने के परिणाम को उपयोग कहते हैं। यह सब जीवों में होता है और जीव के सिवा किसी द्रव्य में नहीं होता।

सूत्र 9:

स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥ 9 ॥

अर्थ: वह उपयोग दो प्रकार का है: ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग। ज्ञानोपयोग के आठ भेद हैं (पाँच ज्ञान और तीन अज्ञान) और दर्शनोपयोग के चार भेद हैं (चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवल दर्शन)।

सार: शरीर, वाणी, धन जीव का लक्षण नहीं हैं। जो जानता देखता है वही जीव है, यही भेदविज्ञान की नींव है।


३. संसारी और मुक्त, त्रस और स्थावर (सूत्र 10 से 14)

सूत्र 10:

संसारिणो मुक्ताश्च ॥ 10 ॥

अर्थ: जीव दो प्रकार के हैं: संसारी और मुक्त।

सूत्र 11:

समनस्काऽमनस्काः ॥ 11 ॥

अर्थ: संसारी जीव मन सहित (समनस्क, संज्ञी) और मन रहित (अमनस्क, असंज्ञी) होते हैं। मन सहित जीव शिक्षा, उपदेश और संकेत समझ सकते हैं।

सूत्र 12:

संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥ 12 ॥

अर्थ: संसारी जीव त्रस और स्थावर भी हैं। त्रस नामकर्म के उदय से त्रस और स्थावर नामकर्म के उदय से स्थावर।

सूत्र 13:

पृथिव्यप्तेजो वायुवनस्पतयः स्थावराः ॥ 13 ॥

अर्थ: पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक, ये पाँच स्थावर हैं। इनके चार प्राण होते हैं: स्पर्शन इन्द्रिय, कायबल, आयु और श्वासोच्छ्वास।

सूत्र 14:

द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥ 14 ॥

अर्थ: दो इन्द्रिय से लेकर पाँच इन्द्रिय तक के जीव त्रस हैं।


४. इन्द्रियाँ (सूत्र 15 से 24)

सूत्र 15:

पंचेन्द्रियाणि ॥ 15 ॥

अर्थ: इन्द्रियाँ पाँच हैं।

सूत्र 16:

द्विविधानि ॥ 16 ॥

अर्थ: हर इन्द्रिय दो प्रकार की है: द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय।

सूत्र 17:

निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ 17 ॥

अर्थ: निर्वृत्ति और उपकरण को द्रव्येन्द्रिय कहते हैं। इन्द्रिय के आकार की रचना निर्वृत्ति है, और उसकी रक्षा करने वाला भाग उपकरण, जैसे आँख की पलकें।

सूत्र 18: *

लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥ 18 ॥

अर्थ: लब्धि और उपयोग को भावेन्द्रिय कहते हैं। ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से मिली जानने की शक्ति लब्धि है, और उस शक्ति से विषय की ओर आत्मा का लगना उपयोग।

सूत्र 19:

स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥ 19 ॥

अर्थ: स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र, ये पाँच इन्द्रियाँ हैं।

सूत्र 20:

स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥ 20 ॥

अर्थ: स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द, ये क्रम से उन पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। हर इन्द्रिय केवल अपना विषय जानती है।

सूत्र 21:

श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥ 21 ॥

अर्थ: श्रुतज्ञान का विषय मन (अनिन्द्रिय) का विषय है। मन की सहायता से ही आत्मा श्रुतज्ञान से पदार्थ को जानता है।

सूत्र 22:

वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥ 22 ॥

अर्थ: पृथ्वी से वनस्पति तक, पाँचों स्थावर जीवों के एक ही इन्द्रिय होती है: स्पर्शन।

सूत्र 23:

कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥ 23 ॥

अर्थ: कृमि, चींटी, भौंरा और मनुष्य आदि के क्रम से एक एक इन्द्रिय बढ़ती जाती है। लट, शंख के दो (स्पर्शन, रसना), चींटी, खटमल के तीन (और घ्राण), भौंरा, मक्खी, मच्छर के चार (और चक्षु), और मनुष्य, पशु, देव, नारकी के पाँच (और श्रोत्र)।

सूत्र 24:

संज्ञिनः समनस्काः ॥ 24 ॥

अर्थ: मन सहित जीव संज्ञी कहलाते हैं। एक से चार इन्द्रिय तक सब असंज्ञी हैं। पंचेन्द्रियों में देव, नारकी और मनुष्य संज्ञी हैं, तिर्यंच संज्ञी भी होते हैं और असंज्ञी भी।

सार: इन्द्रियाँ ज्ञान का साधन हैं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो आत्मा का है, इन्द्रियाँ केवल खिड़कियाँ हैं।


५. विग्रह गति: एक भव से दूसरे भव तक (सूत्र 25 से 30)

सूत्र 25:

विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥ 25 ॥

अर्थ: विग्रह गति में (मरण के बाद नया शरीर पाने के लिए जाते समय) केवल कार्मण काययोग होता है।

सूत्र 26:

अनुश्रेणी गतिः ॥ 26 ॥

अर्थ: जीव और पुद्गल की गति आकाश के प्रदेशों की सीधी पंक्ति (श्रेणी) के अनुसार होती है, पंक्ति लांघकर तिरछी नहीं।

सूत्र 27:

अविग्रहा जीवस्य ॥ 27 ॥

अर्थ: मुक्त जीव की गति मोड़ रहित (अविग्रहा) होती है। वह सीधा ऊपर जाकर एक समय में सिद्ध क्षेत्र में ठहर जाता है।

सूत्र 28:

विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्भ्यः ॥ 28 ॥

अर्थ: संसारी जीव की गति मोड़ सहित भी होती है, पर चार समय से पहले, यानी अधिक से अधिक तीन मोड़।

सूत्र 29:

एकसमयाऽविग्रहा ॥ 29 ॥

अर्थ: बिना मोड़ की गति (ऋजुगति) एक समय की होती है।

सूत्र 30:

एकं द्वौ त्रीन्वानाहारकः ॥ 30 ॥

अर्थ: विग्रह गति में जीव एक, दो या तीन समय तक अनाहारक रहता है, यानी शरीर के योग्य पुद्गल ग्रहण नहीं करता।

सार: मरण के बाद जीव अधिक से अधिक चार समय में नए स्थान पर पहुँच जाता है, और साथ में कार्मण शरीर (अपने कर्म) ही ले जाता है।


६. जन्म और योनि (सूत्र 31 से 35)

सूत्र 31:

सम्मूर्च्छनगर्भोपपादा जन्म ॥ 31 ॥

अर्थ: जन्म तीन प्रकार का है: सम्मूर्च्छन (बिना माता पिता के, चारों ओर से पुद्गल लेकर शरीर बनना), गर्भ और उपपाद।

सूत्र 32:

सचित्तशीतसंवृताः सेतरामिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥ 32 ॥

अर्थ: सचित्त, शीत और संवृत (ढकी), इनके उलटे अचित्त, उष्ण और विवृत (खुली), और इनके मिश्र, ये नौ योनियाँ हैं। जीव के उत्पन्न होने के स्थान को योनि कहते हैं।

सूत्र 33:

जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥ 33 ॥

अर्थ: जरायुज (जेर में लिपटे पैदा होने वाले, जैसे मनुष्य, गाय), अण्डज (अंडे से, जैसे पक्षी) और पोत (बिना जेर के पूरे अंगों के साथ, जैसे हिरण, शेर) जीवों का गर्भ जन्म होता है।

सूत्र 34:

देवनारकाणामुपपादः ॥ 34 ॥

अर्थ: देव और नारकियों का उपपाद जन्म होता है।

सूत्र 35:

शेषाणां सम्मूर्च्छनं ॥ 35 ॥

अर्थ: बाकी सब जीवों (एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय और कुछ पंचेन्द्रिय तिर्यंच) का सम्मूर्च्छन जन्म होता है।


७. पाँच शरीर (सूत्र 36 से 49)

सूत्र 36:

औदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि ॥ 36 ॥

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण, ये पाँच शरीर हैं। स्थूल शरीर औदारिक; छोटा बड़ा, एक अनेक हो सकने वाला वैक्रियिक; छठे गुणस्थान वाले मुनि का शंका समाधान हेतु निकला पुतला आहारक; शरीर में तेज देने वाला तैजस; और कर्मों का समूह कार्मण।

सूत्र 37:

परं परं सूक्ष्मम् ॥ 37 ॥

अर्थ: आगे आगे के शरीर सूक्ष्म हैं: औदारिक से वैक्रियिक, उससे आहारक, उससे तैजस और उससे कार्मण।

सूत्र 38:

प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात् ॥ 38 ॥

अर्थ: पर प्रदेशों (परमाणुओं) की गिनती में तैजस से पहले के शरीर असंख्यात गुने असंख्यात गुने हैं: औदारिक से वैक्रियिक में और उससे आहारक में असंख्यात गुने परमाणु।

सूत्र 39:

अनन्तगुणे परे ॥ 39 ॥

अर्थ: अंत के दो (तैजस और कार्मण) अनन्त गुने हैं: आहारक से तैजस में और तैजस से कार्मण में अनन्त गुने परमाणु। सूक्ष्म होते हुए भी वे घने हैं।

सूत्र 40:

अप्रतीघाते ॥ 40 ॥

अर्थ: तैजस और कार्मण शरीर अप्रतिघाती हैं, किसी से रुकते नहीं, जैसे अग्नि लोहे के गोले में प्रवेश कर जाती है।

सूत्र 41:

अनादिसंबन्धे च ॥ 41 ॥

अर्थ: और इन दोनों का आत्मा से सम्बन्ध अनादि से है (परम्परा से), हालाँकि हर नया कर्मबन्ध सादि है।

सूत्र 42:

सर्वस्य ॥ 42 ॥

अर्थ: ये दोनों शरीर सब संसारी जीवों के होते हैं।

सूत्र 43:

तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥ 43 ॥

अर्थ: तैजस और कार्मण से शुरू करके एक जीव के एक साथ चार शरीर तक हो सकते हैं। विग्रह गति में दो, मनुष्य तिर्यंच के तीन (औदारिक, तैजस, कार्मण), देव नारकी के तीन (वैक्रियिक, तैजस, कार्मण), और आहारक ऋद्धि वाले मुनि के चार।

सूत्र 44:

निरुपभोगमन्त्यम् ॥ 44 ॥

अर्थ: अंतिम कार्मण शरीर निरुपभोग है। उससे इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग नहीं होता।

सूत्र 45:

गर्भसम्मूर्च्छनजमाद्यम् ॥ 45 ॥

अर्थ: गर्भ और सम्मूर्च्छन जन्म से पहला, यानी औदारिक शरीर होता है।

सूत्र 46:

औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥ 46 ॥

अर्थ: उपपाद जन्म से होने वाला शरीर वैक्रियिक है।

सूत्र 47:

लब्धिप्रत्ययं च ॥ 47 ॥

अर्थ: लब्धि (तप से मिली ऋद्धि) के कारण भी वैक्रियिक शरीर होता है।

सूत्र 48:

तैजसमपि ॥ 48 ॥

अर्थ: तैजस शरीर भी लब्धि के कारण होता है।

सूत्र 49:

शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥ 49 ॥

अर्थ: आहारक शरीर शुभ है, विशुद्ध है, किसी को बाधा नहीं देता और न किसी से बाधित होता है, और प्रमत्तसंयत (छठे गुणस्थान वाले) मुनि के ही होता है।

* सूत्र 18 में फोरम की मूल प्रति में “लब्ध्युपयोगो” छपा है। मुद्रित मोक्षशास्त्र में शब्द “लब्ध्युपयोगौ” (लब्धि और उपयोग, दोनों) है, इसलिए यहाँ वही शुद्ध पाठ दिया है। बाकी सब सूत्र मूल प्रति से अक्षरशः हैं।


८. वेद (सूत्र 50 से 52)

सूत्र 50:

नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि ॥ 50 ॥

अर्थ: नारकी और सम्मूर्च्छन जीव नपुंसक ही होते हैं।

सूत्र 51:

न देवाः ॥ 51 ॥

अर्थ: देव नपुंसक नहीं होते। देवगति में पुरुष वेद और स्त्री वेद ही हैं।

सूत्र 52:

शेषास्त्रिवेदाः ॥ 52 ॥

अर्थ: बाकी (गर्भज मनुष्य और तिर्यंच) तीनों वेद वाले होते हैं।


९. पूरी आयु भोगने वाले जीव (सूत्र 53)

सूत्र 53:

औपपादिकचरमोत्तमदेहाऽसंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥ 53 ॥

अर्थ: उपपाद जन्म वाले (देव, नारकी), चरम उत्तम देह वाले (उसी भव से मोक्ष जाने वाले) और असंख्यात वर्ष की आयु वाले (भोगभूमि के) जीवों की आयु बीच में नहीं घटती (अनपवर्त्य)। विष, शस्त्र आदि से इनका अकाल मरण नहीं होता। बाकी जीवों की आयु बीच में घट सकती है।


प्रश्नोत्तर

प्रश्न: जीव का लक्षण क्या है?
उत्तर: उपयोग, यानी जानना और देखना (सूत्र 8)।

प्रश्न: जीव के कितने भाव हैं और उनके कुल कितने भेद?
उत्तर: पाँच भाव, कुल 53 भेद: 2, 9, 18, 21 और 3 (सूत्र 1, 2)।

प्रश्न: कौन से भाव जीव में स्वभाव से हैं?
उत्तर: पारिणामिक: जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व (सूत्र 7)।

प्रश्न: द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय में क्या अंतर है?
उत्तर: द्रव्येन्द्रिय पुद्गल की रचना है (निर्वृत्ति, उपकरण), भावेन्द्रिय आत्मा की जानने की शक्ति और उसका उपयोग है (सूत्र 17, 18)।

प्रश्न: मन का विषय क्या है?
उत्तर: श्रुतज्ञान का विषय (सूत्र 21)।

प्रश्न: मरण के बाद नया जन्म होने में कितना समय लगता है?
उत्तर: अधिक से अधिक चार समय। बिना मोड़ एक समय, तीन मोड़ हों तो चार समय (सूत्र 28, 29)।

प्रश्न: मुक्त जीव सिद्धलोक कैसे जाता है?
उत्तर: सीधी श्रेणी में, बिना मोड़, एक समय में (सूत्र 26, 27)।

प्रश्न: कौन सा शरीर सबसे सूक्ष्म है पर सबसे अधिक परमाणु वाला?
उत्तर: कार्मण शरीर (सूत्र 37, 39)।

प्रश्न: कौन से शरीर हर संसारी जीव के साथ सदा रहते हैं?
उत्तर: तैजस और कार्मण (सूत्र 41, 42)।

प्रश्न: किसका अकाल मरण नहीं होता?
उत्तर: देव, नारकी, चरमशरीरी और भोगभूमि के जीवों का (सूत्र 53)।


शब्दकोश

स्वतत्त्व: जीव का अपना भाव, जो अन्य द्रव्य में नहीं
उपशम: कर्म का कुछ समय के लिए दब जाना
क्षय: कर्म का पूरा नाश
क्षयोपशम: कुछ कर्म का क्षय, कुछ का उपशम, कुछ का मन्द उदय
पारिणामिक: कर्म की अपेक्षा बिना, स्वभाव से होने वाला भाव
उपयोग: चेतना का जानने देखने रूप परिणाम
समनस्क, संज्ञी: मन सहित जीव
त्रस, स्थावर: दो से पाँच इन्द्रिय वाले त्रस, एक इन्द्रिय वाले स्थावर
निर्वृत्ति, उपकरण: इन्द्रिय की रचना और उसकी रक्षा करने वाला भाग
लब्धि: क्षयोपशम से मिली शक्ति; तप से मिली ऋद्धि भी
अनिन्द्रिय: मन
विग्रह गति: मरण के बाद नए शरीर के लिए गमन
श्रेणी: आकाश प्रदेशों की सीधी पंक्ति
समय: काल का सबसे छोटा अंश
अनाहारक: शरीर योग्य पुद्गल ग्रहण न करने वाला
योनि: जीव के उत्पन्न होने का स्थान
उपपाद: देव नारकियों का जन्म, उपपाद शय्या या बिल में
अप्रतिघात: किसी से न रुकना
अनपवर्त्य आयु: जो बीच में न घटे


एक नज़र में

विषय मुख्य बात सूत्र
पाँच भाव औपशमिक, क्षायिक, मिश्र, औदयिक, पारिणामिक 1
भावों के भेद 2, 9, 18, 21, 3 = 53 2 से 7
जीव का लक्षण उपयोग: ज्ञान 8, दर्शन 4 8, 9
जीव के भेद संसारी, मुक्त; संज्ञी, असंज्ञी; त्रस, स्थावर 10 से 14
इन्द्रियाँ पाँच, द्रव्य और भाव 15 से 20
मन श्रुत का विषय 21, 24
कितनी इन्द्रियाँ किसके स्थावर 1, फिर एक एक बढ़ती 22, 23
विग्रह गति कार्मण योग, श्रेणी में, अधिकतम 3 मोड़ 25 से 30
जन्म सम्मूर्च्छन, गर्भ, उपपाद; नौ योनियाँ 31 से 35
शरीर औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस, कार्मण 36 से 49
वेद नारकी, सम्मूर्च्छन नपुंसक; देव दो; बाकी तीन 50 से 52
अनपवर्त्य आयु देव, नारकी, चरमशरीरी, भोगभूमि 53

फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · सर्वार्थसिद्धि · तत्त्वार्थसूत्र प्रदीपिका

सम्बन्धित चर्चा: तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1 · तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 3 · सम्यग्दर्शन · सम्यग्ज्ञान · सम्यक्चारित्र

स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 2, सूत्र 1 से 53; अर्थ आचार्य पूज्यपाद की सर्वार्थसिद्धि के आधार पर।

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