पञ्चाध्यायी श्लोक एवं अर्थ (पं. राजमल्ल) | Panchadhyayi Shlok Evam Arth (Pt. Rajmall)

पञ्चाध्यायी श्लोक एवं अर्थ

पं. राजमल्ल

पञ्चाध्यायी (पूर्वार्द्ध 1 से 768, उत्तरार्द्ध 1 से 1145) के मूल श्लोक, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ, भाग नीचे अलग उत्तरों में। अर्थ संलग्न ग्रंथ में हर श्लोक के बाद छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; भावार्थ नहीं लिए, वे पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक (छपाई की टिप्पणियों सहित): पञ्चाध्यायी मूल श्लोक (पं. राजमल्ल) | Panchadhyayi Mool Shlok (Pt. Rajmall)

अनुक्रमणिका

क्र. भाग श्लोक
1 पूर्वार्द्ध 1 से 100 1 से 100
2 पूर्वार्द्ध 101 से 200 101 से 200
3 पूर्वार्द्ध 201 से 300 201 से 300
4 पूर्वार्द्ध 301 से 400 (श्लोक 301 से 384) 301 से 384
5 पूर्वार्द्ध 301 से 400 (श्लोक 385 से 400) 385 से 400
6 पूर्वार्द्ध 401 से 500 401 से 500
7 पूर्वार्द्ध 501 से 600 501 से 600
8 पूर्वार्द्ध 601 से 700 601 से 700
9 पूर्वार्द्ध 701 से 768 701 से 768
10 उत्तरार्द्ध 1 से 100 1 से 100
11 उत्तरार्द्ध 101 से 200 101 से 200
12 उत्तरार्द्ध 201 से 300 201 से 300
13 उत्तरार्द्ध 301 से 400 301 से 400
14 उत्तरार्द्ध 401 से 500 401 से 500
15 उत्तरार्द्ध 501 से 600 501 से 600
16 उत्तरार्द्ध 601 से 700 (श्लोक 601 से 687) 601 से 687
17 उत्तरार्द्ध 601 से 700 (श्लोक 688 से 700) 688 से 700
18 उत्तरार्द्ध 701 से 800 701 से 800
19 उत्तरार्द्ध 801 से 900 801 से 900
20 उत्तरार्द्ध 901 से 1000 901 से 1000
21 उत्तरार्द्ध 1001 से 1100 1001 से 1100
22 उत्तरार्द्ध 1101 से 1145 1101 से 1145

स्रोत: Panchadhyayi_Purvardh_001681_HR.pdf, panchadhyayi_uttararddh_022393_hr6.pdf

Panchadhyayi_Purvardh_001681_HR.pdf (18009 KB)
panchadhyayi_uttararddh_022393_hr6.pdf (28013 KB)

पूर्वार्द्ध 1 से 100 (श्लोक 1 से 100)

पञ्चाध्यायावयवं मम कर्तुर्ग्रन्थराजमात्मवशात् ।
अर्थालोकनिदानं यस्य वचस्तं स्तुवे महावीरम् ॥1॥

अर्थ: पाँच अध्यायोंमें बँटे हुए जिस ग्रन्थराजको मैं स्वयं बनानेवाला हूँ, उस ग्रन्थराजके बनानेमें जिन महावीर स्वामीके वचन मेरे लिये पदार्थोंके प्रकाश करनेमें मूल कारण हैं, उन महावीर स्वामी ( वर्तमान-अन्तिम तीर्थंकर) का मैं स्तवन करता हूँ ।


शेषानपि तीर्थकराननन्तसिद्धानहं नमामि समम्
धर्माचार्याध्यापकसाधुविशिष्टान् मुनीश्वरान् वन्दे ॥2॥

अर्थ: महावीर स्वामीके सिवाय और भी जितने ( वृषभादिक २३ ) तीर्थंकर हैं। तथा अनादि कालसे होनेवाले अनन्त सिद्ध हैं। उन सबको एक साथ मैं नमस्कार करता हूं। धर्माचार्य, उपाध्याय, और साधु, इन तीन श्रेणियोंमें विभक्त मुनीश्वरोंको भी मैं वन्दना करता हूं।


जीयाज्जैनं शासनमनादिनिधनं सुवन्द्यमनवद्यम् ।
यदपि च कुमतारातीनदयं धूमध्वजोपमं दहति ॥3॥

अर्थ: जो जैन शासन (जैनमत) अनादि - अनन्त है । अतएव अच्छी तरह वन्दने योग्य है । दोषोंसे सर्वथा मुक्त है । साथमें खोटे मत रूपी शत्रुओंको अग्निकी तरह जलानेवाला है, वह सदा जयशील बना रहे ।


इति वन्दितपञ्चगुरुः कृतमङ्गलसत्क्रियः स एष पुनः ।
नाम्ना पञ्चाध्यायीं प्रतिजानीते चिकीर्षितं शास्त्रम् ॥4॥

अर्थ: इस प्रकार पञ्च परमेष्ठियोंकी बन्दना करनेवाला और मङ्गलरूप श्रेष्ठ क्रियाको करनेवाला यह ग्रन्थकार पञ्चाध्यायी नामक ग्रन्थको बनानेकी प्रतिज्ञा करता है ।


अत्रान्तरंगहेतुर्यद्यपि भावः कवेर्विशुद्धतरः ।
हेतोस्तथापि हेतुः साध्वी सर्वोपकारिणी बुद्धिः ॥5॥

अर्थ: ग्रन्थ बनानेमें यद्यपि अन्तरंग कारण कविका अति विशुद्ध भाव है, तथापि उस कारणका भी कारण सब जीवोंका उपकार करनेवाली श्रेष्ठ बुद्धि है ।


सर्वोपि जीवलोकः श्रोतुं कामो वृषं हि सुगमोक्त्या ।
विज्ञप्तौ तस्य कृते तत्रायमुपक्रमः श्रेयान् ॥6॥

अर्थ: सम्पूर्ण जनसमूह धर्मको सुनना चाहता है, परन्तु सरल रीतिसे सुनना चाहता है । यह बात सर्व विदित है। इसके लिये हमारी यह (नीचे लिखी हुई) कथन शैली अच्छी होगी-


सति धर्मिणि धर्माणां मीमांसा स्यादनन्यथा न्यायात् ।
साध्यं वस्त्वविशिष्टं धर्मविशिष्टं ततः परं चापि ॥7॥

अर्थ: धर्मीका निरूपण होनेपर ही धर्मोंका विशेष विचार किया जा सक्ता है। इसके सिवाय और कोई नीति नहीं हो सक्ती। इसलिये पहले सामान्य रूपसे ही वस्तुको सिद्ध करना चाहिये। उसके पीछे धर्मोंकी विशेषताके साथ सिद्ध करना चाहिये।


तत्त्वं सल्लाक्षणिकं सन्मात्रं वा यतः स्वतः सिद्धम् ।
तस्मादनादिनिधनं स्वसहायं निर्विकल्पञ्च ॥8॥

अर्थ: तत्त्व (वस्तु) सत् लक्षणवाली है। अथवा सत स्वरूप ही है। और वह स्वतः सिद्ध है इसीलिये अनादि निधन है। अपनी सहायतासे ही बनता और बिगड़ता है। और वह निर्विकल्प (वचनातीत) भी है।


इत्थं नोचेदसतः प्रादुर्भूति निरङ्कुशा भवति ।
परतः प्रादुर्भावो युतसिद्धत्वं सतो विनाशो वा ॥9॥

अर्थ: यदि ऊपर कही हुई रीतिसे वस्तुका स्वरूप न माना जावे तो अनेक दोष आते हैं । असत् पदार्थ भी होने लगेगा । जब वस्तुको सत् स्वरूप और स्वतःसिद्ध माना जाता है तब तो असत्की उत्पत्ति बन नहीं सकती है । परन्तु ऐसा न मानने पर यह दोष विना किसी अंकुशके प्रबलतासे उपस्थित हो जायगा । इसी प्रकार वस्तुकी परसे उत्पत्ति होने लगेगी । वस्तुमें युतसिद्धता (अखण्डताका अभाव) भी होगी । और सत् पदार्थका विनाश भी होने लगेगा । इस तरह ऊपरकी चारों बातोंके न माननेसे ये चार दोष आते हैं ।


असतः प्रादुर्भावे द्रव्याणामिह भवेदनन्तत्वम् ।
को वारयितुं शक्तः कुम्भोत्पत्तिं मृदाद्यभावेपि ॥10॥

अर्थ: यदि उन दोषोंको स्वीकार किया जाय तो और कौन २ दोष आते हैं, वही बतलाया जाता है। यदि असत्की उत्पत्ति मान ली जाय, अर्थात् जो वस्तु पहले किसी रूपमें भी नहीं है, और न उसके परमाणुओंकी सत्ता ही है, ऐसी वस्तुकी उत्पत्ति माननेसे वस्तुओंकी कोई इयत्ता ( मर्यादा ) नहीं रह सक्ती है। जब विना अपनी सत्ताके ही नवीन रूपसे उत्पत्ति होने लगेगी तो संसारमें अनन्तों द्रव्य होते चले जांयगे। ऐसी अवस्थामें विना मिट्टीके ही घड़ा बनने लगेगा, इसको कौन रोक सकेगा।


परतः सिद्धत्वे स्यादनवस्थालक्षणो महान् दोषः ।
सोपि परः परतः स्यादन्यस्मादिति यतश्च सोपि परः ॥11॥

अर्थ: वस्तुको परसे सिद्ध मानने पर अनवस्था नामक दोष आता है। यह दोष बड़ा दोष है। वह इस प्रकार आता है कि-वस्तु जब परसे सिद्ध होगी तो वह पर भी किसी दूसरे पर पदार्थसे सिद्ध होगा। क्योंकि पर-सिद्ध माननेवालोंका यह सिद्धान्त है कि हर एक पदार्थ परसे ही उत्पन्न होता है।


युतसिद्धत्वेप्येवं गुणगुणिनोः स्यात्पृथक् प्रदेशत्वम् ।
उभयोरात्मसमत्वाल्लक्षणभेदःकथं तयो र्भवति ॥12॥

अर्थ: युतसिद्ध माननेसे गुण और गुणी ( जिसमें गुण पाया जाय ) दोनों ही के भिन्न २ प्रदेश ठहरेंगे । उस अवस्थामें दोनों ही समान होंगें । फिर अमुक गुण है और अमुक गुणी है ऐसा गुण, गुणीका भिन्न २ लक्षण नहीं बन सकेगा ।


अथवा सतो विनाशः स्यादिति पक्षोपि वाधितो भवति ।
नित्यं यतः कथञ्चिद्द्रव्यं सुज्ञैः प्रतीयतेऽध्यक्षात् ॥13॥

अर्थ: अथवा सत्का नाश हो जायगा यह पक्ष भी सर्वथा वाधित है। क्योंकि द्रव्य कथञ्चित् नित्य है यह बात विशेष जानकारोंको प्रत्यक्ष रूपसे प्रतीत है।


तस्मादनेकदूषणदूषितपक्षाननिच्छता पुंसा ।
अनवद्यमुक्तलक्षणमिह तत्त्वं चानुमन्तव्यम् ॥14॥

अर्थ: इसलिये अनेक दूषणोंसे दूषित पक्षोंको जो पुरुष नहीं चाहता है उसे योग्य है कि वह ऊपर कहे हुए लक्षणवाली निर्दोष वस्तुको स्वीकार करै । अर्थात् सत् स्वरूप, स्वतः सिद्ध, अनादि निधन, स्वसहाय और निर्विकल्प स्वरूप ही वस्तुको समझे ।


किञ्चैवंभूतापि च सत्ता न स्यान्निरङ्कुशा किन्तु ।
सप्रतिपक्षा भवति हि स्वप्रतिपक्षेण नेतरेणेह ॥15॥

अर्थ: जिस सत्ताको वस्तुका लक्षण बतलाया है वह सत्ता भी स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है। किन्तु अपने प्रतिपक्ष ( विरोधी ) के कारण प्रतिपक्षी भावको लिये हुए है। सत्ताका जो प्रतिपक्ष है उसीके साथ सत्ताकी प्रतिपक्षता है दूसरे किसीके साथ नहीं।


अत्राहैवं कश्चित् सत्ता या सा निरङ्कुशा भवतु ।
परपक्षे निरपेक्षा स्वात्मनि पक्षेऽवलम्बिनी यस्मात् ॥16॥

अर्थ: यहां पर कोई कहता है कि जो सत्ता है वह स्वतन्त्र ही है । क्योंकि वह अपने स्वरूपमें ही स्थित है । परपक्षसे सर्वथा निरपेक्ष है । अर्थात् सत्ताका कोई प्रतिपक्ष नहीं है ।


तन्न यतो हि विपक्षः कश्चित्सत्त्वस्य वा सपक्षोपि ।
द्वावपि नयपक्षौ तौ मिथो विपक्षौ विवक्षितापेक्षात् ॥17॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है । क्योंकि सत्ताका कोई सपक्ष और कोई विपक्ष अवश्य है । दोनों ही नय पक्ष हैं, और वे दोनों ही नय पक्ष विवक्षा वश परस्परमें विपक्षपनेको लिये हुए हैं ।


अत्राप्याह कुदृष्टि र्यदि नय पक्षौ विवक्षितौ भवतः ।
का नः क्षति र्भवेतामन्यतरेणेह सत्त्वसंसिद्धिः ॥18॥

अर्थ: यहां पर फिर मिथ्या दृष्टि कहता है कि यदि नय पक्ष विवक्षित होते हैं, तो होओ, हमारी कोई हानि नहीं है । सत्ताकी स्वतन्त्र सिद्धि एक नयसे ही हो जायगी ।


तन्न यतो द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनयात्मकं वस्तु ।
अन्यतरस्य विलोपे शेषस्यापीह लोप इति दोषः ॥19॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं हैं। क्योंकि वस्तु द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नय स्वरूप है। इन दोनों नयोंमेंसे किसी एक नयका लोप करने पर बाकीकी दूसरी नयका भी लोप हो जायगा। यह दोष उपस्थित होता है।


प्रतिपक्षमसत्ता स्यात्सत्तायास्तद्यथा तथा चान्यत् ।
नाना रूपत्वं किल प्रतिपक्षं चैकरूपतायास्तु ॥20॥

अर्थ: जिस प्रकार सत्ताका प्रतिपक्ष असत्ता है उसी प्रकार और भी है। नाना रूपता एक रूपताका प्रतिपक्ष है।


एक पदार्थस्थितिरिह सर्वपदार्थस्थितेर्विपक्षत्वम् ।
ध्रौव्योत्पादविनाशैस्त्रिलक्षणायास्त्रिलक्षणाभावः ॥21॥

अर्थ: एक पदार्थकी सत्ता, समस्त पदार्थोंकी सत्ताका विपक्ष है। उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य स्वरूप त्रिलक्षणात्मक सत्ताका प्रतिपक्ष त्रिलक्षणाभाव (अत्रिलक्षणा) है।


एकस्यास्तु विपक्षः सत्तायाः स्याददो ह्यनेकत्वम् ।
स्यादप्यनन्तपर्ययप्रतिपक्षस्त्वेकपर्ययत्वं स्यात् ॥22॥

अर्थ: एक सत्ताका प्रतिपक्ष अनेक है । और अनन्त पर्यायका प्रतिपक्ष एक पर्याय है।


एकस्मिन्निह वस्तुन्यनादिनिधने च निर्विकल्पे च ।
भेदनिदानं किं तद्येनैतज्जृम्भते वचस्त्विति चेत् ॥23॥

अर्थ: वस्तु एक अखण्ड द्रव्य है। वह अनादि है, अनन्त है, और निर्विकल्प भी है। ऐसी वस्तुमें भेदका क्या कारण है ? जिससे कि तुम्हारा उपर्युक्त कथन सुसङ्गत हो।


अंशविभागः स्यादित्यखण्डदेशे महत्यपि द्रव्ये ।
विष्कम्भस्य क्रमतो व्योम्नीवाङ्गुलिवितस्तिहस्तादिः ॥24॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्य अखण्ड प्रदेश ( देशांश ) वाला है और बड़ा भी है। तथापि उसमें विस्तार क्रमसे अंशोंका विभाग कलित किया जाता है। जिस प्रकार आकाशमें विस्तार क्रमसे एक अंगुल, दो अंगुल, एक बिलस्त, एक हाथ आदि अंश-विभाग किया जाता है। जिसमें फिर दुबारा अंश न किया जासके उसे ही निरंश अंश कहते हैं। ऐसे निरंशरूप अंश एक द्रव्यमें-पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवां, संख्यात, अविभागी-असंख्यात, अनन्त, तथा च, शब्दसे अनन्तानन्त तक होसक्ते हैं। जितने एक द्रव्यमें अंश हैं, उतनी ही उस द्रव्यकी पर्यायें समझनी चाहिये। प्रत्येक अंशको ही द्रव्यपर्याय कहते हैं। क्योंकि द्रव्यमें जो अंशोंकी कल्पना की जाती है, वही पर्यायोंका स्वरूप है। द्रव्यकी एक समयकी पर्याय उस द्रव्यका एक अंश है। इस लिये उन सम्पूर्ण अंशोंका समूह ही द्रव्य है। दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिये कि द्रव्यकी जितनी भी अनादि-अनन्त पर्यायें हैं, उन्हीं पर्यायोंका समूह द्रव्य है। अर्थात् प्रत्येक द्रव्यकी एक समयमें एक पर्याय होती है, और कुल समय अनादि अनन्त है, इस लिये वस्तु भी अनादि अनन्त है। अत: उपर्युक्त कहा हुआ वस्तु-स्वरूप सर्वथा निर्दोष है, और सभी सुव्यवस्थित है। यही वस्तुका स्वरूप प्रमाणसे भली भांति सिद्ध है।


प्रथमो द्वितीय इत्याद्यसंख्यदेशास्ततोप्यनन्ताश्च ।
अंशा निरंशरूपास्तावन्तो द्रव्यपर्ययाख्यास्ते ॥25॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्य अखण्ड प्रदेश ( देशांश ) वाला है और बड़ा भी है । तयापि उसमें विस्तार क्रमसे अंशोंका विभाग कलित किया जाता है । जिस प्रकार आकाशमें विस्तार क्रमसे एक अंगुल, दो अंगुल, एक बिलस्त, एक हाथ आदि अंश-विभाग किया जाता है । जिसमें फिर दुबारा अंश न किया जासके उसे ही निरंश अंश कहते हैं । ऐसे निरंशरूप अंश एक द्रव्यमें-पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवां, संख्यात, अविभागी-असंख्यात, अनन्त, तथा च, शब्दसे अनन्तानन्त तक होसक्ते हैं । जितने एक द्रव्यमें अंश हैं, उतनी ही उस द्रव्यकी पर्यायें समझनी चाहिये । प्रत्येक अंशको ही द्रव्यपर्याय कहते हैं । क्योंकि द्रव्यमें जो अंशोंकी कल्पना की जाती है, वही पर्यायोंका स्वरूप है । द्रव्यकी एक समयकी पर्याय उस द्रव्यका एक अंश है । इस लिये उन सम्पूर्ण अंशोंका समूह ही द्रव्य है । दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिये कि द्रव्यकी जितनी भी अनादि-अनन्त पर्यायें हैं, उन्हीं पर्यायोंका समूह द्रव्य है । अर्थात् प्रत्येक द्रव्यकी एक समयमें एक पर्याय होती है, और कुल समय अनादि अनन्त है, इस लिये वस्तु भी अनादि अनन्त है । अतः उपर्युक्त कहा हुआ वस्तु-स्वरूप सर्वथा निर्दोष है, और सभी सुव्यवस्थित है । यही वस्तुका स्वरूप प्रमाणसे भली भांति सिद्ध है ।


पर्यायाणामेतद्धर्मं यत्त्वंशकल्पनं द्रव्ये ।
तस्मादिदमनवद्यं सर्वं सुस्थं प्रमाणतश्चापि ॥26॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्य अखण्ड प्रदेश ( देशांश ) वाला है और बड़ा भी है। तयापि उसमें विस्तार क्रमसे अंशोंका विभाग कलित किया जाता है। जिस प्रकार आकाशमें विस्तार क्रमसे एक अंगुल, दो अंगुल, एक बिलस्त, एक हाथ आदि अंश - विभाग किया जाता है। जिसमें फिर दुबारा अंश न किया जासके उसे ही निरंश अंश कहते हैं। ऐसे निरंशरूप अंश एक द्रव्यमें - पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवां, संख्यात, अविभागी - असंख्यात, अनन्त, तथा च, शब्दसे अनन्तानन्त तक होसक्ते हैं। जितने एक द्रव्यमें अंश हैं, उतनी ही उस द्रव्यकी पर्यायें समझनी चाहिये। प्रत्येक अंशको ही द्रव्यपर्याय कहते हैं। क्योंकि द्रव्यमें जो अंशोंकी कल्पना की जाती है, वही पर्यायोंका स्वरूप है। द्रव्यकी एक समयकी पर्याय उस द्रव्यका एक अंश है। इस लिये उन सम्पूर्ण अंशोंका समूह ही द्रव्यहै। दूसरे शब्दोंमें कहना चाहिये कि द्रव्यकी जितनी भी अनादि - अनन्त पर्यायें हैं, उन्हीं पर्यायोंका समूह द्रव्य है। अर्थात् प्रत्येक द्रव्यकी एक समयमें एक पर्याय होती है, और कुल समय अनादि अनन्त है, इस लिये वस्तु भी अनादि अनन्त है। अतः उपर्युक्त कहा हुआ वस्तु - स्वरूप सर्वथा निर्दोष है, और सभी सुव्यवस्थित है। यही वस्तुका स्वरूप प्रमाणसे भली भांति सिद्ध है।


एतेन विना चैकं द्रव्यं सम्यक् प्रपश्यतश्चापि ।
को दोषो यद्भीतेरियं व्यवस्थैव साधुरस्त्विति चेत् ॥27॥

अर्थ: ऊपर कही हुई व्यवस्थाका तो प्रत्यक्ष नहीं है; केवल एक द्रव्य ही भली भांति दीख रहा है, इस अवस्थामें कौनसा दोष आता है कि जिसके डरसे उपर्युक्त व्यवस्था ही ठीक मानी जावे।


देशाभावे नियमात्सत्त्वं द्रव्यस्य न प्रतीयेत ।
देशांशाभावेपि च सर्वं स्यादेकदेशमात्रं वा ॥28॥

अर्थ: यदि देशहीन माना जावे तो द्रव्यकी सत्ताका ही निश्चय नहीं हो सकेगा । और देशांशोंके न माननेपर सर्व द्रव्य एक देशमात्र हो जायगा ।


तत्रासत्त्वे वस्तुनि न श्रेयस्तस्य साधकाभावात् ।
एवं चैकांशत्वे महतो व्योम्नोऽप्रतीयमानत्वात् ॥29॥

अर्थ: वस्तुको असत् ( अभाव ) रूप स्वीकार करना ठीक नहीं है। क्योंकि वस्तु असत् स्वरूप सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है। दूसरा यह भी अर्थ हो सकता है कि वस्तुको अभाव रूप माननेसे वह किसी कार्यको सिद्ध न कर सकेगी। इस प्रकार वस्तुमें अंश भेद न माननेसे आकाशकी महानताका ज्ञान नहीं हो सकेगा।


किञ्चैतदंशकल्पनमपि फलवत्स्याद्यतोनुमीयेत ।
कायत्वमकायत्वं द्रव्याणामिह महत्त्वममहत्त्वम् ॥30॥

अर्थ: अंश कल्पनासे एक तो छोटे बड़ेका भेद ज्ञान ऊपर बतलाया गया है। दूसरा अंश कल्पनासे यह भी फल होता है कि उससे द्रव्योंमें कायत्व और अकायत्वका अनुमान कर लिया जाता है इसी प्रकार छोटे और बड़ेका भी अनुमान कर लिया जाता है ।


भवतु विवक्षितमेतन्ननु यावन्तो निरंशदेशांशाः
तल्लक्षणयोगादप्यणुवद्द्रव्याणि सन्तु तावन्ति ॥31॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि यह तुम्हारी विवक्षा रहो, अर्थात् तुम जो द्रव्यमें निरंश (फिर जिसका खण्ड न हो सके) अंशोंकी कल्पना करते हो, वह करो। परन्तु जितने भी निरंश-देशांश हैं उन्हींको एक एक द्रव्य समझो। जिस प्रकार परमाणु एक द्रव्य है उसी प्रकार एक द्रव्यमें जितने निरंश-देशांशोंकी कल्पना की जाती है, उनको उतने ही द्रव्य समझना चाहिये न कि एक द्रव्य मानकर उसके अंश समझो। द्रव्यका लक्षण उन प्रत्येक अंशोंमें जाता ही है।


नैवं यतो विशेषः परमः स्यात्पारिणामिकोऽध्यक्षः ।
खण्डैकदेशवस्तुन्यखण्डितानेकदेशे च ॥32॥

अर्थ: उक्त शंका ठीक नहीं है, क्योंकि खण्डस्वरूप एकदेश वस्तु माननेसे और अखंड स्वरूप अनेक देश वस्तु माननेसे परिणमनमें बड़ा भारी भेद पड़ता है यह वात प्रत्यक्ष है।


प्रथमोद्देशितपक्षे यः परिणामो गुणात्मकस्तस्य ।
एकत्र तत्र देशे भवितुं शीलो न सर्वदेशेषु ॥33॥

अर्थ: पहला पक्ष स्वीकार करनेसे अर्थात् खण्डरूप एक प्रदेशी द्रव्य माननेसे जो गुणोंका परिणमन होगा वह सम्पूर्ण वस्तुमें न होकर उसके एक ही देशांशमें होगा। क्योंकि शंकाकार एक देशांशरूप ही वस्तुको समझता है इसलिये उसके कथनानुसार गुणोंका परिणमन एक देशमें ही होगा।


तदसत्प्रमाणबाधितपक्षत्वादक्षसंविदुपलब्धेः ।
देहैकदेशविषयस्पर्शादिह सर्वदेशेषु ॥34॥

अर्थ: गुणोंका परिणमन एक देशमें होता है, यह बात प्रत्यक्ष बाधित है। जिसमें प्रमाण-बाधा आवे वह पक्ष किसी प्रकार ठीक नहीं हो सक्ता। इन्द्रियजन्य ज्ञानसे यह बात सिद्ध है कि शरीरके एक देशमें स्पर्श होनेसे सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो जाते हैं।


प्रथमेतर पक्षे खलु यः परिणामः स सर्वदेशेषु ।
एको हि सर्वपर्वसु प्रकम्पते ताडितो वेणुः ॥35॥

अर्थ: दूसरा पक्ष स्वीकार करने पर अर्थात् अनेक प्रदेशी-अखण्ड रूप द्रव्य मानने पर जो परिणमन होगा वह सर्व देशमें (सम्पूर्ण वस्तुमें) होगा। जिस प्रकार एक वेंतको एक तरफसे हिलानेसे सारा वेंत हिल जाता है।


एक प्रदेशवदपि द्रव्यं स्यात्खण्डवर्जितः स यथा ।
परमाणुरेव शुद्धः कालाणुर्वा यथा स्वतः सिद्धः ॥36॥

अर्थ: कोई द्रव्य एक प्रदेशवाला भी है और वह खण्ड रहित है अर्थात् अखण्ड एक प्रदेशी भी कोई द्रव्य है, जैसे पुद्गलका शुद्ध परमाणु और कालाणु। ये भी स्वतः सिद्ध द्रव्य हैं।


न स्याद्द्रव्यं क्वचिदपि बहु प्रदेशेषु खण्डितो देशः ।
तदपि द्रव्यमिति स्यादखण्डितानेकदेशमदः ॥37॥

अर्थ: परन्तु ऐसा द्रव्य कोई नहीं है कि बहु प्रदेशी होकर खण्ड - एक देश रूप हो इसलिये बहु प्रदेशवाला द्रव्य अखण्डरूप है।


अथ चैव ते प्रदेशाः सविशेषा द्रव्यसंज्ञया भणिताः ।
अपि च विशेषाः सर्वे गुणसंज्ञास्ते भवन्ति यावन्तः ॥38॥

अर्थ: ऊपर जिन देशांशों ( प्रदेशों ) का वर्णन किया गया है । वे देशांश गुण सहित हैं । गुण सहित उन्हीं देशांशोंकी द्रव्य संज्ञा है । उन देशांशोंमें रहनेवाले जो विशेष हैं उन्हींकी गुण संज्ञा है ।


तेषामात्मा देशो नहि ते देशात्पृथक्त्वसत्ताकाः ।
नहि देशे हि विशेषाः किन्तु विशेषैश्च तादृशो देशः ॥39॥

अर्थ: उन गुणोंका समूह ही देश ( अखण्ड-द्रव्य ) है । वे गुण देशसे भिन्न अपनी सत्ता नहीं रखते हैं और ऐसा भी नहीं कह सकते कि देशमें गुण ( विशेष ) रहते हैं किन्तु उन विशेषों ( गुणों ) के मेलसे ही वह देश कहलाता है ।


अत्रापि च संदृष्टिः शुक्लादीनामियं तनुस्तन्तुः ।
नहि तन्तौ शुक्लाद्याः किन्तु सिताद्यैश्च तादृशस्तन्तुः ॥40॥

अर्थ: गुण और गुणीमें अभेद है, इसी विषय में तन्तु ( डोरे ) का दृष्टान्त है । शुक्ल गुण आदिका शरीर ही तन्तु है । शुक्लादि गुणोंको छोड़कर और कोई वस्तु तंतु नहीं है और न ऐसा ही कहा जा सक्ता है कि तन्तुमें शुक्लादिक गुण रहते हैं, किन्तु शुक्लादि गुणोंके एकत्रित होनेसे ही तन्तु बना है ।


अथ चेद्भिन्नो देशो भिन्ना देशाश्रिता विशेषाश्च ।
तेषामिह संयोगाद्द्रव्यं दण्डीव दण्डयोगाद्वा ॥41॥

अर्थ: यदि देशको भिन्न समझा जाय और देशके आश्रित रहनेवाले विशेषोंको भिन्न समझा जाय, तथा उन सबके संयोगसे द्रव्य कहलाने लगे। जिस प्रकार पुरुष भिन्न है, दण्ड ( डंडा ) भिन्न है, दोनोंके संयोगसे दण्डी कहलाने लगता है तो


नैवं हि सर्वसङ्कर दोषत्वाद्वा सुसिद्धदृष्टान्तात् ।
तत्किं चेतनयोगादचेतनं चेतनं न स्यात् ॥42॥

अर्थ: उपर्युक्त आशंका ठीक नहीं है । देशको भिन्न और गुणोंको देशाश्रित भिन्न स्वीकार करनेसे सर्व संकर दोष आवेगा । यह बात सुघटित दृष्टान्त द्वारा प्रसिद्ध है । गुणोंको भिन्न माननेसे क्या चेतना गुणके सम्बन्धसे अचेतन पदार्थ चेतन ( जीव ) नहीं हो जायगा ?


अथवा विना विशेषैः प्रदेशसत्त्वं कथं प्रमीयेत ।
अपि चान्तरेण देशैर्विशेषलक्ष्मावलक्ष्यते च कथम् ॥43॥

अर्थ: दूसरी बात यह भी है कि विना गुणोंके द्रव्यके प्रदेशोंकी सत्ता ही नहीं जानी जा सक्ती अथवा विना प्रदेशोंके गुण भी नहीं जाने जा सक्ते ।


अथ चैतयोः पृथक्त्वे हठादहेतोश्च मन्यमानेपि ।
कथमिवगुणगुणिभावः प्रमीयते सत्समानत्वात् ॥44॥

अर्थ: यदि हठ पूर्वक विना किसी हेतुके गुण और गुणी भिन्न भिन्न सत्तावाले ही माने जावें, तो ऐसी अवस्थामें दोनोंकी सत्ता समान होगी । सत्ताकी समानतामें ’ यह गुण है और यह गुणी है,’ यह कैसे जाना जा सक्ता है ?


तस्मादिदमनवद्यं देशविशेषास्तु निर्विशेषास्ते ।
गुणसंज्ञकाः कथञ्चित्परणतिरूपाः पुनः क्षणं यावत् ॥45॥

अर्थ: इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि देश-विशेष ही गुण कहलाते हैं। गुणोंमें गुण नहीं रहते हैं। वे गुण प्रतिक्षण परिणमनशील हैं परन्तु सर्वथा विनाशी नहीं हैं।


एकत्वं गुणगुणिनोः साध्यं हेतोस्तयोरनन्यत्वात् ।
तदपि द्वैतमिव स्यात् किं तत्र निवन्धनं त्वितिचेत् ॥46॥

अर्थ: गुण, गुणी दोनों ही एक हैं क्योंकि वे दोनों ही भिन्न सत्तावाले नहीं हैं । यहांपर अभिन्न सत्ता रूप हेतुसे गुण, गुणीमें एकपना सिद्ध किया जाता है, फिर भी क्या कारण कि अखण्ड पिण्ड होनेपर भी द्रव्यमें द्वैतभावसा प्रतीत होता है ?


यत्किञ्चिदस्ति वस्तु स्वतः स्वभावे स्थितं स्वभावश्च ।
अविनाभावी नियमाद्विवक्षितो भेदकर्ता स्यात् ॥47॥

अर्थ: जो कोई भी वस्तु है वह अपने स्वभाव ( गुण-स्वरूप ) में स्थित है और वह स्वभाव भी निश्चयसे उस स्वभावी ( वस्तु ) से अविनाभावी-अभिन्न है परन्तु विवक्षा वश भिन्न समझा जाता है।


शक्तिर्लक्ष्मविशेषो धर्मो रूपं गुणः स्वभावश्च ।
प्रकृतिः शीलं चाकृतिरेकार्थवाचका अमी शब्दाः ॥48॥

अर्थ: शक्ति, लक्ष्म, विशेष, धर्म, रूप, गुण, स्वभाव, प्रकृति, शील, आकृति ये सभी शब्द एक अर्थके कहनेवाले हैं। सभी नाम गुणके हैं।


देशस्यैका शक्तिर्या काचित् सा न शक्तिरन्या स्यात् ।
क्रमतो वितर्क्यमाणा भवन्त्यनन्ताश्च शक्तयो व्यक्ताः ॥49॥

अर्थ: देशकी कोई भी एक शक्ति, दूसरी शक्तिरूप नहीं होती, इसी प्रकार क्रमसे प्रत्येक शक्तिके विषयमें विचार करनेपर भिन्न २ अनन्त शक्तियां स्पष्ट प्रतीत होती हैं ।


स्पर्शो रसश्च गन्धो वर्णो युगपद्यथा रसालफले ।
प्रतिनियतेन्द्रियगोचरचारित्वात्ते भवन्त्यनेकेपि ॥50॥

अर्थ: जिस प्रकार आमके फलमें स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, चारों ही एक साथ पाये जाते हैं, वे चारों ही गुण भिन्न २ नियत इन्द्रियों द्वारा जाने जाते हैं इसलिये वे भिन्न हैं ।


तदुदाहरणं चैतज्जीवे यद्दर्शनं गुणश्चैकः ।
तन्न ज्ञानं न सुखं चारित्रं वा न कश्चिदितरश्च ॥51॥

अर्थ: सभी गुण पृथक् २ हैं, इस विषयमें यह उदाहरण है - जैसे जीव द्रव्यमें जो एक दर्शन नामा गुण है, वह ज्ञान नहीं होसक्ता, न सुख होसक्ता, न चारित्र होसक्ता अथवा और भी किसी गुण स्वरूप नहीं हो सक्ता, दर्शनगुण सदा दर्शनरूप ही रहेगा ।


एवं यः कोपि गुणः सोपि च न स्यात्तदन्यरूपो वा ।
स्वयमुच्छलन्ति तदिमा मिथो विभिन्नाश्च शक्तयोऽनन्ताः ॥52॥

अर्थ: इसी प्रकार जो कोई भी गुण है वह दूसरे गुण रूप नहीं हो सक्ता इसलिये द्रव्यकी अनन्त शक्तियां परस्पर भिन्नताको लिये हुए भिन्न २ कार्यों द्वारा स्वयं उदित होती रहती हैं ।


तासामन्यतरस्या भवन्त्यनन्ता निरंशका अंशाः ।
तरतमभागविशेषैरंशच्छेदैः प्रतीयमानत्वात् ॥53॥

अर्थ: उन शक्तियोंमेंसे प्रत्येक शक्तिके अनन्त अनन्त निरंश ( जिसका फिर अंश न हो सके ) अंश होते हैं। हीनाधिक विशेष भेदसे उन अंशोंका परिज्ञान होता है।


दृष्टान्तः सुगमोऽयं शुक्लं वासस्ततोपि शुक्लतरम् ।
शुक्लतमं च ततः स्यादंशाश्चैते गुणस्य शुक्लस्य ॥54॥

अर्थ: एक सफेद कपड़ेका सुगम दृष्टान्त है । कोई कपड़ा कम सफेद होता है, कोई उससे अधिक सफेद होता है और कोई उससे भी अधिक सफेद होता है । ये सब सफेदी के ही भेद हैं । इस प्रकारकी तरतमता ( हीनाधिकता) अनेक प्रकार हो सक्ती है, इसलिये शुक्र गुणके अनेक ( अनन्त ) अंश कल्पित किये जाते हैं ।


अथवा ज्ञानं यावज्जीवस्यैको गुणोप्यखण्डोपि ।
सर्वजघन्यनिरंशच्छेदैरिव खण्डितोप्यनेकः स्यात् ॥55॥

अर्थ: दूसरा दृष्टान्त जीवके ज्ञान गुणका स्पष्ट है। जीवका ज्ञान गुण यद्यपि एक है और वह अखण्ड भी है तथापि सबसे जघन्य अंशोंके भेदसे खण्डित सरीखा अनेक रूप प्रतीत होता है।


देशच्छेदो हि यथा न तथा छेदो भवेद्गुणांशस्य ।
विष्कंभस्य विभागात्स्थूलो देशस्तथा न गुणभागः ॥56॥

अर्थ: जिस प्रकार देशके छेद ( देशांश ) होते हैं, उस प्रकार गुणोंके छेद नहीं होते। देशके छेद विष्कंभ ( विस्तार - चौड़ाई ) क्रमसे होते हैं और देश एक मोटा पदार्थ है। गुण इस प्रकारका नहीं है और न उसके छेद ही ऐसे होते हैं किन्तु तरतम रूपसे होते हैं।


क्रमोपदेशश्चायं प्रवाहरूपो गुणः स्वभावेन ।
अर्धच्छेदेन पुनश्छेत्तव्योपि च तदर्धछेदेन ॥57॥

अर्थ: गुणोंके अंशोंके छेद करनेमें क्रम कथनका उपदेश बतलाते हैं कि गुण स्वभावसे ही प्रवाह रूप है अर्थात् द्रव्य अनन्तगुणात्मक पिण्डके साथ बराबर चला जाता है । द्रव्य अनादि - अनंत है, गुण भी अनादि - अनन्त हैं । द्रव्यके साथ गुणका प्रवाह बराबर चला जाता है । वह गुण उसके अर्धच्छेदोंसे छिन्न भिन्न करने योग्य है अर्थात् उस गुणके आधे आधे छेद करना चाहिये, इसी प्रकार वार वारउसके अर्धच्छेद करना चाहिये, तथा वहांतक करना चाहिये जहांतककि कोई भी गुणका अंश फिर न छेदा जा सके, और वह निरंश समझा जाय । उन छेदरूप किये हुए गुणोंके अंशोंका जोड़ अनन्त होता है । उन्हीं अंशोंका समूह गुण कहलाता है । गुणोंके अंश, गुणसे भिन्न सत्ता नहीं रखते हैं किन्तु उन अंशोंका समूह ही एक सत्तात्मक गुण कहलाता है ।


एवं भूयो भूयस्तदर्धछेदैस्तदर्धछेदैश्च ।
यावच्छेतुमशक्यो यः कोपि निरंशको गुणांशः स्यात् ॥58॥

अर्थ: गुणोंके अंशोंके छेद करनेमें क्रम कथनका उपदेश बतलाते हैं कि गुण स्वभावसे ही प्रवाह रूप है अर्थात् द्रव्य अनन्तगुणात्मक पिण्डके साथ बराबर चला जाता है। द्रव्य अनादि - अनंत है, गुण भी अनादि - अनन्त हैं। द्रव्यके साथ गुणका प्रवाह बराबर चला जाता है। वह गुण उसके अर्धच्छेदोंसे छिन्न भिन्न करने योग्य है अर्थात् उस गुणके आधे आधे छेद करना चाहिये, इसी प्रकार वार वारउसके अर्धच्छेद करना चाहिये, तथा वहांतक करना चाहिये जहांतककि कोई भी गुणका अंश फिर न छेदा जा सके, और वह निरंश समझा जाय। उन छेदरूप किये हुए गुणोंके अंशोंका जोड़ अनन्त होता है। उन्हीं अंशोंका समूह गुण कहलाता है। गुणोंके अंश, गुणसे भिन्न सत्ता नहीं रखते हैं किन्तु उन अंशोंका समूह ही एक सत्तात्मक गुण कहलाता है।


तेन गुणांशेन पुनर्गणिताः सर्वे भवन्त्यनन्तास्ते ।
तेषामात्मा गुण इति नहि ते गुणतः पृथक्त्वसत्ताकाः ॥59॥

अर्थ: गुणोंके अंशोंके छेद करनेमें क्रम कथनका उपदेश बतलाते हैं कि गुण स्वभावसे ही प्रवाह रूप है अर्थात् द्रव्य अनन्तगुणात्मक पिण्डके साथ बराबर चला जाता है । द्रव्य अनादि - अनंत है, गुण भी अनादि - अनन्त हैं । द्रव्यके साथ गुणका प्रवाह बराबर चला जाता है । वह गुण उसके अर्धच्छेदोंसे छिन्न भिन्न करने योग्य है अर्थात् उस गुणके आधे आधे छेद करना चाहिये, इसी प्रकार वार वारउसके अर्धच्छेद करना चाहिये, तथा वहांतक करना चाहिये जहांतककि कोई भी गुणका अंश फिर न छेदा जा सके, और वह निरंश समझा जाय । उन छेदरूप किये हुए गुणोंके अंशोंका जोड़ अनन्त होता है । उन्हीं अंशोंका समूह गुण कहलाता है । गुणोंके अंश, गुणसे भिन्न सत्ता नहीं रखते हैं किन्तु उन अंशोंका समूह ही एक सत्तात्मक गुण कहलाता है ।


अपि चांशः पर्यायो भागो हारो विधा प्रकारश्च ।
भेदश्छेदो भंगः शब्दाश्चैकार्थवाचका एते ॥60॥

अर्थ: अंश, पर्याय, भाग, हार, विध, प्रकार, भेद, छेद, भंग, ये सब शब्द एक अर्थ के वाचक हैं। सबोंका अर्थ पर्याय है।


सन्ति गुणांशा इति ये गुणपर्यायास्त एव नाम्नापि ।
अविरुद्धमेतदेव हि पर्यायाणामिहांशधर्मत्वात् ॥61॥

अर्थ: जितने भी गुणांश हैं वे ही गुणपर्याय कहलाते हैं। यह बात अविरुद्ध सिद्ध है कि अंश स्वरूप ही पर्यायें होती हैं।


गुणपर्यायाणामिह केचिन्नामान्तरं वदन्ति बुधाः ।
अर्थो गुण इति वा स्यादेकार्थादर्थपर्यया इति च ॥62॥

अर्थ: कितने ही बुद्धिधारी गुणपर्यायोंका दूसरा नाम भी कहते हैं । गुण और अर्थ, ये दोनों ही एक अर्थवाले हैं इसलिये गुण पर्यायको अर्थपर्याय भी कह देते हैं ।


अपि चोद्दिष्टानामिह देशांशैर्द्रव्यपर्ययाणां हि ।
व्यञ्जनपर्याया इति केचिन्नामान्तरं वदन्ति बुधाः ॥63॥

अर्थ: देशांशोंके द्वारा जिन द्रव्यपर्यायोंका ऊपर निरूपण किया जा चुका है, उन द्रव्यपर्यायोंको कितने ही बुद्धिशाली व्यञ्जनपर्याय, इस नामसे पुकारते हैं ।


ननु मोघमेतदुक्तं सर्वं पिष्टस्य पेषणन्यायात् ।
एकेनैव कृतं यत् स इति यथा वा तदंश इति वा चेत् ॥64॥

अर्थ: ऊपर जितना भी कहा गया है, सभी पिष्ट पेषण है अर्थात् पीसे हुएको पीसा गया है। एकके कहनेसे ही काम चल जाता है, यातो द्रव्य ही कहना चाहिये अथवा पर्याय ही कहना चाहिये। द्रव्य और पर्यायको जुदा २ कहना निष्फल है ?


तन्नैवं फलवत्त्वाद् द्रव्यादेशादवस्थितं वस्तु ।
पर्यायादेशादिदमनवस्थितमिति प्रतीतत्वात् ॥65॥

अर्थ: ऊपर जो शङ्का की गई है वह ठीक नहीं है । द्रव्य और पर्याय दोनोंका ही निरूपण आवश्यक है । द्रव्यकी अपेक्षासे वस्तु नित्य है । पर्यायकी अपेक्षासे वस्तु अनित्य है । इस बातकी प्रतीति दोनोंके कथनसे ही होती है ।


स यथा परिणामात्मा शुक्लादित्वादवस्थितश्च पटः ।
अनवस्थितस्तदंशैस्तरतमरूपैर्गुणस्य शुक्लस्य ॥66॥

अर्थ: जिस प्रकार शुक्लादि अनन्त गुणोंका समूह वस्त्र अपनी अवस्थाओंको प्रतिक्षण बदलता रहता है । अवस्थाओंके बदलने पर भी शुक्लादिगुणोंका नाश कभी नहीं होता है इसलिये तो वह वस्त्र नित्य है । साथ ही शुक्लादिगुणोंके तरतम रूप अंशोंकी अपेक्षासे अनित्य भी है । क्योंकि एक अंश ( पर्याय ) दूसरे अंशसे भिन्न है ।


अपि चात्मा परिणामी ज्ञानगुणत्वादवस्थितोपि यथा ।
अनवस्थितस्तदंशैस्तरतमरूपैर्गुणस्य बोधस्य ॥67॥

अर्थ: आत्मामें ज्ञान गुण सदा रहता है । यदि ज्ञान गुणका आत्मामें अभाव हो जाय तो उस समय आत्मत्व ही नष्ट हो जाय । इसलिये उस गुणकी अपेक्षासे तो आत्मा नित्य है, परन्तु उस गुणके निमित्तसे आत्माका परिणमन प्रतिक्षण होता रहता है, कभी ज्ञानगुणके अधिक अंश व्यक्त हो जाते हैं और कभी कम अंश प्रकट हो जाते हैं, उस ज्ञानमें सदा हीनाधिकता ( संसारावस्थामें ) होती रहती है, इस हीनाधिकताके कारण आत्मा कथंचित् अनित्य भी हैं ।


यदि पुनरेवं न भवति भवति निरंशं गुणांशवद्द्रव्यम् ।
यदि वा कीलकवदिदं भवति न परिणामि वा भवेत्क्षणिकम् ॥68॥

अर्थ: यदि ऊपर कही हुई द्रव्य, गुण, पर्यायकी व्यवस्था न मानी जाय, और गुणांशकी तरह निरंश द्रव्य माना जाय, अथवा उस निरंश द्रव्यको परिणामी न मानकर कूटस्थ ( लोहेका पीटनेका एक मोटा कीला होता है जो कि लुहारोंके यहां गढ़ा रहता है ) की तरह नित्य माना जाय, अथवा उस द्रव्यको सर्वथा क्षणिक ही माना जाय, अथवा उस द्रव्यके अनन्त निरंश अंश मानकर उन अंशोंका समान रूपसे परिणमन माना जाय, तरतम रूपसे न माना जाय तब क्या दोष होगा ?


अथचेदिदमाकूतं भवन्त्वनन्ता निरंशका अंशाः ।
तेषामपि परिणामो भवतु समांशो न तरतमांशः स्यात् ॥69॥

अर्थ: यदि ऊपर कही हुई द्रव्य, गुण, पर्यायकी व्यवस्था न मानी जाय, और गुणांशकी तरह निरंश द्रव्य माना जाय, अथवा उस निरंश द्रव्यको परिणामी न मानकर कूटस्थ ( लोहेका पीटनेका एक मोटा कीला होता है जो कि लुहारोंके यहां गड़ा रहता है ) की तरह नित्य माना जाय, अथवा उस द्रव्यको सर्वथा क्षणिक ही माना जाय, अथवा उस द्रव्यके अनन्त निरंश अंश मानकर उन अंशोंका समान रूपसे परिणमन माना जाय, तरतम रूपसे न माना जाय तब क्या दोष होगा ?


एतत्पक्षचतुष्टयमपि दुष्टं दृष्टबाधितत्वाच्च ।
तत्साधकप्रमाणाभावादिह सोप्यदृष्टान्तात् ॥70॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए चारों ही विकल्प दोष सहित हैं, चारों ही विकल्पोंमें प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा बाधा आती है। तथा न उनका साधक कोई प्रमाण ही है और न उनकी सिद्धिमें कोई दृष्टान्त ही है।


द्रव्यत्वं किन्नाम पृष्टश्चेतीह केनचित् सूरिः ।
प्राह प्रमाणसुनयैरधिगतमिव लक्षणं तस्य ॥71॥

अर्थ: किसीने आचार्यसे पूछा कि महाराज ! द्रव्य क्या पदार्थ है ? ऐसा प्रश्न होने पर आचार्य उस द्रव्यका प्रमाण और सुनयोंद्वारा अच्छी तरह मनन किया हुआ लक्षण कहने लगे।


गुणपर्ययवद्द्रव्यं लक्षणमेतत्सुसिद्धमविरुद्धम् ।
गुणपर्ययसमुदायो द्रव्यं पुनरस्य भवति वाक्यार्थः ॥72॥

अर्थ: जिसमें गुण पर्याय पाये जांय, वह द्रव्य है । यह द्रव्यका लक्षण अच्छी तरह सिद्ध है । इस लक्षणमें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है । “गुण पर्याय जिसमें पाये जायं वह द्रव्य है” इस वाक्यका स्पष्ट अर्थ यह है कि गुण और पर्यायोंका समुदाय ही द्रव्य है।


गुण समुदायो द्रव्यं लक्षणमेतावताप्युशन्ति बुधाः ।
समगुणपर्यायो वा द्रव्यं कैश्चिन्निरूप्यते वृद्धैः ॥73॥

अर्थ: कोई २ बुद्धिधारी " गुण समुदाय ही द्रव्य है " ऐसा भी द्रव्यका लक्षण कहते हैं । कोई विशेष अनुभवी वृद्ध पुरुष समान रीति ( साथ २ ) से होनेवाली गुणोंकी पर्यायोंको ही द्रव्यका लक्षण बतलाते हैं ।


अयमत्राभिप्रायो ये देशास्तद्गुणास्तदंशाश्च ।
एकालापेन समं द्रव्यं नाम्ना त एव निश्शेषम् ॥74॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका यह अभिप्राय है कि जो देश हैं, उन देशोंमें रहनेवाले जो गुण हैं तथा उन गुणोंके जो अंश हैं उन तीनोंकी ही एक आलाप ( एक शब्द द्वारा ) से द्रव्य संज्ञा है ।


नहि किञ्चित्सद्द्रव्यं केचित्सन्तो गुणाः प्रदेशाश्च ।
केचित्सन्ति तदंशा द्रव्यं तत्सन्निपाताद्वा ॥75॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि द्रव्य कोई जुदा पदार्थ हो, गुण कोई जुदा पदार्थ हो, प्रदेश जुदा पदार्थ हो, उनके अंश कोई जुदा पदार्थ हो, और उन सबके मिलापसे द्रव्य कहलाता हो।


अथवापि यथा भित्तौ चित्रं द्रव्ये तथा प्रदेशाश्च ।
सन्ति गुणाश्च तदंशाः समवायित्वात्तदाश्रयाद्द्रव्यम् ॥76॥

अर्थ: अथवा ऐसा भी नहीं है कि जिस प्रकार भित्तिमें चित्र खिचा रहता है अर्थात् जैसे भीतिमें चित्र होता है वह भित्तिमें रहता है परन्तु भित्तिसे जुदा पदार्थ है उसी प्रकार द्रव्यमें प्रदेश, गुण, अंश रहते हैं और समवाय सम्बन्धसे उनका आश्रय द्रव्य है।


इदमस्ति यथा मूलं स्कन्धः शाखा दलानि पुष्पाणि ।
गुच्छाः फलानि सर्वाण्येकालापात्तदात्मको वृक्षः ॥77॥

अर्थ: जिस प्रकार जड़, स्कन्ध ( पीड़ ) शाखा, पत्ते, पुष्प, गुच्छा, फल, सभीको मिलाकर एक आलाप ( एक शब्द ) से वृक्ष कहते हैं। वृक्ष जड़, स्कन्ध, शाखा आदिसे भिन्न कोई पदार्थ नहीं है किन्तु इनका समुदाय ही वृक्ष कहलाता है, अथवा वृक्षको छोड़कर शाखादिक भिन्न कोई पदार्थ नहीं है। इसी प्रकार देश, देशांश, गुण, गुणांशका समूह ही द्रव्य है। द्रव्यसे भिन्न न तो देशादिक ही हैं, और देशादिसे भिन्न न द्रव्य ही है।


यद्यपि भिन्नोऽभिन्नो दृष्टान्तः कारकश्च भवतीह ।
ग्राह्यस्तथाप्यभिन्नो साध्ये चास्मिन् गुणात्मके द्रव्ये ॥78॥

अर्थ: यद्यपि दृष्टान्त और कारक भिन्न भी होते हैं और अभिन्न भी होते हैं। यहां गुण समुदायरूप द्रव्यकी सिद्धिमें अभिन्न दृष्टान्त और अभिन्न ही कारक ग्रहण करना चाहिये। खुलासा आगे किया जाता है।


भिन्नोप्यथ दृष्टान्तो भित्तौ चित्रं यथा दधीह घटे ।
भिन्नः कारक इति वा कश्चिद्घनवान् धनस्य योगेन ॥79॥

अर्थ: आधाराधेयकी भिन्नताका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे भित्तिमें चित्र होता है अथवा घडेमें दही रक्खा है । भित्ति भिन्न पदार्थ है और उसपर खिचा हुआ चित्र दूसरा पदार्थ है । इसी प्रकार घट दूसरा पदार्थ है और उसमें रक्खा हुआ दही दूसरा पदार्थ है, इसलिये ये दोनों ही दृष्टान्त आधाराधेयकी भिन्नतामें है । भिन्न कारकका दृष्टान्त इस प्रकार है - जैसे कोई आदमी धनके निमित्तसे धनवाला कहलाता है । यहांपर धन दूसरा पदार्थ है और पुरुष दूसरा पदार्थ है । धन और पुरुषका स्व-स्वामि सम्बन्ध कहलाता है । यह स्व-स्वामि सम्बन्ध भिन्नताका है ।


दृष्टान्तश्चाभिन्नो वृक्षे शाखा यथा गृहे स्तम्भः ।
अपि चाभिन्नः कारक इति वृक्षोऽयं यथा हि शाखावान् ॥80॥

अर्थ: आधार-आधेयकी अभिन्नतामें दृष्टान्त इस प्रकार है, जैसे वृक्षमें शाखा अथवा घरमें खम्भा। कारककी अभिन्नतामें दृष्टान्त इस प्रकार है जैसे-यह वृक्ष शाखावाला है


समवायः समवायी यदि वा स्यात्सर्वथा तदेकार्थः ।
समुदायो वक्तव्यो न चापि समवायवानिति चेत् ॥81॥

अर्थ: समवाय और समवायी अर्थात् गुण और द्रव्य दोनों ही सर्वथा एकार्थक हैं, ऐसी अवस्थामें गुण समुदाय ही कहना चाहिये। द्रव्यके कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ?


तन्न यतः समुदायो नियतं समुदायिनः प्रतीतत्वात् ।
व्यक्तप्रमाणसाधितसिद्धत्वाद्वा सुसिद्धदृष्टान्तात् ॥82॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है, क्योंकि समुदाय नियमसे समुदायीका होता है। यह बात प्रसिद्ध प्रमाणसे सिद्ध की हुई है और प्रसिद्धदृष्टान्तसे भी यह बात सिद्ध होती है।


स्पर्शरसगन्धवर्णा लक्षणभिन्ना यथा रसालफले ।
कथमपि हि पृथक्कर्तुं न तथा शक्यास्त्वखण्डदेशत्वात् ॥83॥

अर्थ: यद्यपि आमके फलमें स्पर्श, रस, गंध और रूप भिन्न २ हैं क्योंकि इनके लक्षण भिन्न २ हैं तथापि सभी अखण्डरूपसे एकरूप हैं किसी प्रकार जुदे २ नहीं किये जा सकते ।


अत एव यथा वाच्या देशगुणांशा विशेषरूपत्वात् ।
वक्तव्यं च तथा स्यादेकं द्रव्यं त एव सामान्यात् ॥84॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो चुकी कि विशेष कथनकी अपेक्षासे देश, गुण, पर्याय सभी जुदे २ हैं । और सामान्य कथनकी अपेक्षासे वे ही सब द्रव्य कहलाते हैं ।


अथ चैतदेव लक्षणमेकं वाक्यान्तरप्रवेशेन ।
निष्प्रतिघप्रतिपत्त्यै विशेषतो लक्षयन्ति बुधाः ॥85॥

अर्थ: “ गुण पर्ययवद्द्रव्यम् ” इसी एक लक्षणको निर्वाध प्रतीतिके लिये वाक्यान्तर ( दूसरी रीतिसे ) द्वारा विशेष रीतिसे भी बुद्धिमान् कहते हैं ।


उत्पादस्थितिभंगैर्युक्तं सद्द्रव्यलक्षणं हि यथा ।
एतैरेव समस्तैः पृक्तं सिद्धेत्समं न तु व्यस्तैः ॥86॥

अर्थ: पहले जो द्रव्यका लक्षण ‘सत्’ कहा गया है वह सत् उत्पाद, स्थिति, भंग, इन तीनोंसे सहित ही द्रव्यका लक्षण हैं । इतना विशेष है कि इन तीनोंका साहित्य भिन्न २ कालमें नहीं होता है, किन्तु एक ही कालमें होता है ।


अयमर्थः प्रकृतार्थो ध्रौव्योत्पादव्ययास्त्रयश्चांशाः ।
नाम्ना सदिति गुणः स्यादेकोऽनेके त एकशः प्रोक्ताः ॥87॥

अर्थ: इस प्रकरणका यह अर्थ है कि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य, ये तीनों ही अंश, एक सत् गुणके हैं इसलिये इन तीनोंको ही समुदाय रूपसे सन्मात्र कह देते हैं और क्रमसे वे तीनों ही जुदे २ अनेक हैं ।


लक्ष्यस्य लक्षणस्य च भेदविवक्षाश्रयात्सदेव गुणः ।
द्रव्यार्थादेशादिह तदेव सदिति स्वयं द्रव्यम् ॥88॥

अर्थ: लक्ष्य और लक्षणकी भेद विवक्षासे तो सत् गुण ही है परन्तु द्रव्यार्थिक दृष्टिसे वही सत् स्वयं द्रव्य स्वरूप है।


वस्त्वस्ति स्वतःसिद्धं यथा तथा तत्स्वतश्च परिणामि ।
तस्मादुत्पादस्थितिभंगमयं तत् सदेतदिह नियमात् ॥89॥

अर्थ: जिस प्रकार वस्तु अनादिनिधन स्वतः सिद्ध अविनाशी है उसी प्रकार परिणामी भी है इसलिये उत्पाद, स्थिति, भंग स्वरूप नियमसे सत् (द्रव्य) है ।


नहि पुनरुत्पादस्थितिभंगमयं तद्विनापि परिणामात् ।
असतो जन्मत्त्वादिह सतो विनाशस्य दुर्निवारत्वात् ॥90॥

अर्थ: यदि विना परिणामके ही वस्तुको उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य स्वरूप माना जाय तो असत्की उत्पत्ति और सत्का विनाश अवश्यंभावी होगा ।


द्रव्यं ततः कथञ्चित्केनचिदुत्पद्यते हि भावेन ।
व्येति तदन्येन पुनर्नैतद्द्वितयं हि वस्तुतया ॥91॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे द्रव्य परिणामी सिद्ध हो चुका इस लिये वह किसी अवस्थासे कथंचित् उत्पन्न भी होता है, किसी दूसरी अवस्थासे कथंचित् नष्ट भी होता है । वस्तु स्थितिसे उत्पत्ति और नाश, दोनों ही वस्तुमें नहीं होते ।


इह घटरूपेण यथा प्रादुर्भवतीति पिण्डरूपेण ।
व्येति तथा युगपत्स्यादेतद्द्वितयं न मृत्तिकात्वेन ॥92॥

अर्थ: वस्तु घटरूपसे उत्पन्न होती है, पिण्ड रूपसे नष्ट होती है, मृत्तिका रूपसे स्थिर है। ये तीनों ही अवस्थायें एक ही कालमें होती हैं परन्तु एक रूप नहीं है।


ननु ते विकल्पमात्रमिह यदकिञ्चित्करं तदेवेति ।
एतावतापि न गुणो हानिर्वा तद्विना यतस्त्विति चेत् ॥93॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यह सव तुम्हारी कल्पना मात्र है और वह व्यर्थ है। उत्पादादि त्रयके माननेसे न तो कोई गुण ही है और इसके न माननेसे कोई हानि भी नहीं दीखती ?


तन्न यतो हि गुणः स्यादुत्पादादित्रयात्मके द्रव्ये ।
तन्निन्हवे च न गुणः सर्वद्रव्यादिशून्यदोषत्वात् ॥94॥

अर्थ: शङ्काकारकी उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि उत्पादादि त्रय स्वरूप वस्तुको माननेसे ही लाभ है उसके न माननेमें कोई लाभ नहीं है, प्रत्युत द्रव्य, परलोक कार्य कारण आदि पदार्थोंकी शून्यताका प्रसंग आनेसे हानि है।


परिणामाभावादपि द्रव्यस्य स्यादनन्यथावृत्तिः ।
तस्यामिह परलोको न स्यात्कारणमथापि कार्यं वा ॥95॥

अर्थ: परिणामके न माननेसे द्रव्य सदा एकसा ही रहेगा । उस अवस्थामें परलोक कार्य, कारण आदि कोई भी नहीं ठहर सक्ता ।


परिणामिनोप्यभावत् क्षणिकं परिणाममात्रमिति वस्तु ।
तन्न यतोऽभिज्ञानान्नित्यस्याप्यात्मनः प्रतीतित्वात् ॥96॥

अर्थ: यदि परिणामीको न माना जाय तो वस्तु क्षणिक - केवल परिणाम मात्र ठहर जायगी और यह बात बनती नहीं, क्योंकि प्रत्यभिज्ञान द्वारा आत्माकी कथञ्चित् नित्य रूपसे भी प्रतीति होती है ।


गुणपर्ययवद्द्रव्यं लक्षणमेकं यदुक्तमिह पूर्वम् ।
वाक्यान्तरोपदेशादधुना तद्बाध्यते त्विति चेत् ॥97॥

अर्थ: पहले द्रव्यका लक्षण “ गुणपर्ययवद्द्रव्यं ” यह कहा गया है और अब वाक्यान्तरके द्वारा “ सद्द्रव्य लक्षणं ” यह कहा जाता है । तथा सत्को उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य युक्त बतलाया जाता है । इसलिये उस लक्षणमें इस लक्षणसे बाधा आती है ?


तन्न यतः सुविचारादेकोर्थो वाक्ययोर्द्वयोरेव ।
अन्यतरं स्यादितिचेन्न मिथोभिव्यञ्जकत्वाद्वा ॥98॥

अर्थ: दोनों लक्षणोंमें विरोध बतलाना ठीक नहीं है क्योंकि अच्छी तरह बिचार करनेसे दोनों वाक्योंका एक ही अर्थ प्रतीत होता है । फिर भी शंकाकार कहता है कि जब दोनों लक्षणोंका एक ही अर्थ है तो फिर दोनोंके कहनेकी क्या आवश्यकता है, दोनोंमेंसे कोई सा एक कह दिया जाय ? आचार्य उत्तर देते हैं कि ऐसा भी नहीं हैं कि दोनोंमेंसे एक ही कहा जाय, किन्तु दोनोंही मिलकर अभिव्यञ्जक (वस्तुप्रदर्शक) हैं ।


तद्दर्शनं यथा किल नित्यत्त्वस्य च गुणस्य व्याप्तिः स्यात् ।
गुणवद्द्रव्यं च स्यादित्युक्ते ध्रौव्यवत्पुनः सिद्धम् ॥99॥

अर्थ: दोनों लक्षणोंके विषयमें खुलासा इस प्रकार है कि नित्यता और गुणकी व्याप्ति है अर्थात् गुण कहनेसे नित्यपनेका बोध होता है इसलिये “ गुणवान् द्रव्य है ” ऐसा कहनेसे ध्रौव्यवान् द्रव्य सिद्ध होता है ।


अपि च गुणाः सँलक्ष्यास्तेषामिह लक्षणं भवेत् ध्रौव्यम् ।
तस्माल्लक्ष्यं साध्यं लक्षणमिह साधनं प्रिसद्धत्वात् ॥100॥

अर्थ: दूसरे शब्दोंमें यह कहा जाता है कि गुण लक्ष्य हैं, ध्रौव्य उनका लक्षण है इसलिये यहां पर लक्ष्यको साध्य बनाया जाता है और लक्षणको साधन बनाया जाता है।

पूर्वार्द्ध 101 से 200 (श्लोक 101 से 200)

पर्यायाणामिह किल भङ्गोत्पादद्वयस्य वा व्याप्तिः ।
इत्युक्ते पर्ययवद्द्रव्यं सृष्टिव्ययात्मकं वा स्यात् ॥101॥

अर्थ: पर्यायोंकी नियमसे उत्पाद और व्ययके साथ व्याप्ति है अर्थात् पर्यायके कहनेसे उत्पत्ति और विनाशका बोध होता है । इस लिये “पर्यायवाला द्रव्य है” ऐसा कहनेसे उत्पाद व्ययवाला द्रव्य सिद्ध होता है ।


द्रव्यस्थानीया इति पर्यायाः स्युः स्वभाववन्तश्च ।
तेषां लक्षणमिव वा स्वभाव इव वा पुनर्व्ययोत्पादम् ॥102॥

अर्थ: उक्त कथनसे पर्यायोंमें दो बातें सिद्ध होती हैं । एक तो यह कि वे द्रव्यस्थानीय हैं - द्रव्यमें ही उत्पन्न होती हैं या रहती हैं - पर्यायें द्रव्यसे भिन्न नहीं हैं । दूसरी बात यह कि वे स्वभाववान् हैं । जब पर्यायें द्रव्यस्थानीय तथा स्वभाववान् हैं तो उनका लक्षण और स्वभाव बताना भी आवश्यक है । अतएव यदि कोई यह जानना चाहे कि उनका लक्षण और स्वभाव क्या है ? तो उसको यही समझना चाहिये कि व्यय और उत्पाद ये दोनों ही ऐसे हैं कि जिनको पर्यायोंके लक्षणकी तरहसे भी कह सकते हैं या स्वभावकी तरहसे भी कह सकते हैं । तात्पर्य यह कि उत्पादव्यय और पर्यायमें लक्ष्यलक्षण सम्बन्ध अथवा स्वभावस्वभाववत्सम्बन्ध है । तथा पर्यायें द्रव्यस्थानीय हैं । अतएव पर्ययवद्द्रव्यं यह द्रव्यका लक्षण 'उत्पादव्ययवद्द्रव्यं इस द्रव्यके लक्षणका अभिव्यंजक होता है क्योंकि द्रव्यके दोनों लक्षणोंमें अभिव्यज्याभिव्यंजक भाव तथा साध्यसाधन भाव है । जैसा कि पहले गुणकी अपेक्षासे कहा जा चुका है ।


अथ च गुणत्वं किमहो सूक्तः केनापि जन्मिना सूरिः ।
प्रोचे सोदाहरणं लक्षितमिव लक्षणं गुणानां हि ॥103॥

अर्थ: गुण क्या पदार्थ है ? यह प्रश्न किसी पुरुषने आचार्यसे पूंछा, तब आचार्य उदाहरण सहित गुणोंका सुलक्षित लक्षण कहने लगे ।


द्रव्याश्रया गुणाःस्युर्विशेषमात्रास्तु निर्विशेषाश्च ।
करतलगतं यदेतैर्व्यक्तमिवालक्ष्यते वस्तु ॥104॥

अर्थ: द्रव्यके आश्रय रहनेवाले, विशेष रहित जो विशेष हैं वे ही गुण कहलाते हैं। उन्हीं गुणोंके द्वारा हाथमें रक्खे हुए पदार्थकी तरह वस्तु स्पष्ट प्रतीत होती है।


अयमर्थो विदितार्थः समप्रदेशाः समं विशेषा ये ।
ते ज्ञानेन विभक्ताः क्रमतः श्रेणीकृता गुणा ज्ञेयाः ॥105॥

अर्थ: गुण, द्रव्यके आश्रय रहते हैं, इसका खुलासा यह है कि एक गुणका जो प्रदेश है वही प्रदेश सभी गुणोंका है इसलिये सभी गुणोंके समान प्रदेश हैं उन प्रदेशोंमें रहनेवाले गुणोंका जब बुद्धिपूर्वक विभाग किया जाता है तब श्रेणीवार क्रमसे अनन्त गुण प्रतीत होते हैं अर्थात् बुद्धिसे विभाग करनेपर द्रव्यके सभी प्रदेश गुणरूप ही दीखते हैं। गुणोंके अतिरिक्त स्वतन्त्र आधाररूप प्रदेश कोई भिन्न पदार्थ नहीं प्रतीत होता है।


दृष्टान्तः शुक्लाद्या यथा हि समतन्तवः समं सन्ति ।
बुध्या विभज्यमानाः क्रमतः श्रेणीकृता गुणा ज्ञेयाः ॥106॥

अर्थ: समान तन्तुवाले सभी शुक्लादिक गुण समान है उन शुक्लादिक गुणोंका बुद्धिसे विभाग किया जाय तो क्रमसे श्रेणीवार अनन्त गुण ही प्रतीत होंगे ।


नित्यानित्यविचारस्तेषामिह विद्यते ततः प्रायः ।
विप्रतिपत्तौ सत्यां विवदन्ते वादिनो यतो बहवः ॥107॥

अर्थ: गुणोंके विषयमें बहुतसे वादियोंका विवाद होता है - कोई गुणोंको सर्वथा नित्य बतलाते हैं, और कोई सर्वथा अनित्य बतलाते हैं। इसलिये आवश्यक प्रतीत होता है कि गुणोंके विषयमें नित्यता और अनित्यताका विचार किया जाय।


जैनानामतमेतन्नित्यानित्यात्मकं यथा द्रव्यम् ।
ज्ञेयास्तथा गुणा अपि नित्यानित्यात्मकास्तदेकत्वात् ॥108॥

अर्थ: जैनियोंका तो ऐसा सिद्धान्त है कि जिस प्रकार द्रव्य कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य है, उसी प्रकार गुण भी कथंचित् नित्य और कथंचित् अनित्य हैं क्योंकि द्रव्यसे सर्वथा भिन्न गुण नहीं हैं ।


तत्रोदाहरणमिदं तद्भावाऽव्ययाद्गुणा नित्याः ।
तदभिज्ञानात्सिद्धं तल्लक्षणमिह यथा तदेवेदम् ॥109॥

अर्थ: नित्यका यह लक्षण है कि जिसके स्व-भावका नाश न हो। यह लक्षण गुणोंमें पाया जाता है इसलिये गुण नित्य हैं, गुणोंके स्व-भावका नाश नहीं होता है। यह गुणोंका लक्षण “यह वही है” ऐसे एकत्व प्रत्यभिज्ञान द्वारा सिद्ध होता है अर्थात् गुणोंमें यह वही गुण है, ऐसी प्रतीति होती है और यही प्रतीति उनमें नित्यताको सिद्ध करती है।


ज्ञानं परणामि यथा घटस्य चाकारतः पटाकृत्या ।
किं ज्ञानत्वं नष्टं न नष्टमथ चेत्कथं न नित्यं स्यात् ॥110॥

अर्थ: आत्माका ज्ञान गुण परिणमनशील है । कभी वह घटके आकार होता है तो कभी पटके आकार हो जाता है । घटाकारसे पटाकार होते समय उसमें क्या ज्ञान गुण नष्ट हो जाता है ? नहीं, ज्ञान नष्ट नहीं होता, केवल अवस्थाभेद हो जाता है, वह पहले घटको जानता था अब पटको जानने लगा है इतना ही भेद हुआ है । जानना दोनों अवस्थाओंमें बराबर है इस लिये ज्ञानका कभी नाश नहीं होता है । जब ज्ञानका कभी नाश नहीं होत, यह बात सुप्रतीत है, तो वह नित्य क्यों नहीं है ? अवश्य है ।


दृष्टान्तः किल वर्णो गुणो यथा परिणमन् रसालफले ।
हरितात्पीतस्तत्किं वर्णत्त्वं नष्टमिति नित्यम् ॥111॥

अर्थ: जिस प्रकार आमके फलमें रूप गुण बदलता रहता है, आमकी कच्ची अवस्थामें हरा रंग रहता है, पकनेपर उसमें पीला रंग हो जाता है, हरेसे पीला होनेपर क्या उसका रूप (रंग) नष्ट हो जाता है ? यदि नहीं नष्ट होता है तो क्यों नहीं रूप गुणको नित्य माना जावे ? अवश्य मानना चाहिये ।


वस्तु यथा परिणामि तथैव परिणामिनो गुणाश्चापि ।
तस्मादुत्पादव्ययद्वयमपि भवति हि गुणानां तु ॥112॥

अर्थ: जिस प्रकार वस्तु प्रतिक्षण परिणमनशील है, उसी प्रकार गुण भी प्रतिक्षण परिणमनशील हैं इसलिये जसे वस्तुका उत्पाद और व्यय होता है उसी प्रकार गुणोंका उत्पाद और व्यय होता है।


ज्ञानं गुणो यथा स्यान्नित्यं सामान्यवत्तयाऽपि यतः ।
नष्टोत्पन्नं च तथा घटं विहायाऽथ पटं परिच्छन्दत् ॥113॥

अर्थ: यद्यपि सामान्य दृष्टिसे ज्ञान गुण नित्य है तथापि वह कभी घटको और कभी पटको जानता है इसलिये अनित्य भी है ।


सन्दृष्टी रूपगुणो नित्यश्चाम्रेपि वर्णमात्रतया ।
नष्टोत्पन्नो हरितात्परिणममानश्च पीतवत्त्वेन ॥114॥

अर्थ: आममें रूप सदा रहता है इसकी अपेक्षासे यद्यपि रूप गुण नित्य है तो भी हरितसे पीत अवस्थामें बदलनेसे वह नष्ट और उत्पन्न भी होता है ।


ननु नित्या हि गुणा अपि भवन्त्वनित्यास्तु पर्ययाः सर्वे ।
तत्किं द्रव्यवदिह किल नित्यात्मका गुणाः प्रोक्ताः ॥115॥

अर्थ: यह बात निश्चित है कि गुण नित्य होते हैं और पर्यायें सभी अनित्य होती हैं । फिर क्या कारण है कि द्रव्यके समान गुणोंको भी नित्याऽनित्यात्मक बतलाया है ?


सत्यं तत्र यतः स्यादिदमेव विवक्षितं यथा द्रव्ये
न गुणेभ्यः पृथगिह तत्सदिति द्रव्यं च पर्ययाश्चेति ॥116॥

अर्थ: उपर्युक्त शङ्का यद्यपि ठीक है, तथापि उसका उत्तर इस प्रकार है कि गुणोंसे भिन्न सत् पदार्थ कोई वस्तु नहीं है। द्रव्य, पर्याय और गुण ये तीनों ही सत्स्वरूप हैं इसलिये जिस प्रकार द्रव्यमें विवक्षावश कथंचित् नित्यता और कथंचित् अनित्यता आती है, उसी प्रकार गुणोंमें भी नित्यता और अनित्यता विवक्षाधीन है।


अपि नित्याः प्रतिसमयं विनापि यत्नं हि परिणमन्ति गुणाः ।
स च परिणामोऽवस्था तेषामेव न पृथक्त्वसत्ताकः ॥117॥

अर्थ: यद्यपि गुण नित्य हैं तथापि विना किसी प्रयत्नके प्रति समय परिणमन करते हैं। वह परिणाम भी उन्हीं गुणोंकी अवस्था विशेष है, भिन्न सत्तावाला नहीं है।


ननु तद्वस्थो हि गुणः किल तदवस्थान्तरं हि परिणामः ।
उभयोरन्तर्वर्तित्वादिह पृथगेतदेवमिदमिति चेत् ॥118॥

अर्थ: शङ्काकारका कहना है कि गुण तो सदा एकसा रहता है और परिणाम एक समयसे दूसरे समयमें सर्वथा जुदा है । तथा परिणाम और गुण इन दोनोंके वीचमें रहनेवाला द्रव्य भिन्न ही पदार्थ है ?


तन्न यतः सदवस्थाः सर्वा आम्रेडितं यथा वस्तु ।
न तथा ताभ्यः पृथगिति किमपि हि सत्ताकमन्तरं वस्तु ॥119॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है । क्योंकि परिणाम गुणोंकी ही अवस्था विशेष है । द्रव्य, गुण, पर्याय ये तीनों ही मिलकर वस्तु कहलाते हैं । इन तीनोंका नाम लेनेसे वस्तुका ही बोध होता है इसलिये ये सब वस्तुके ही द्विरुक्त (पुनः पुनः कथन) हैं । उन अवस्थाओंसे जुदा भिन्न सत्तावाला गुण अथवा द्रव्य कोई पदार्थ नहीं है ।


नियतं परिणामित्वादुत्पादव्ययमया य एव गुणाः ।
टङ्कोत्कीर्णन्यायात्त एव नित्या यथा स्वरूपत्वात् ॥120॥

अर्थ: जिस प्रकार परिणमन शील होनेसे गुण उत्पाद, व्यय स्वरूप हैं उसी प्रकार टंकोत्कीर्ण न्यायसे अपने स्वरूपमें सदा स्थिर रहते हैं इसलिये वे नित्य भी हैं।


न हि पुनरेकेषामिह भवति गुणानां निरन्वयो नाशः ।
अपरेषामुत्पादो द्रव्यं यत्तद्द्वयाधारम् ॥121॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि किन्हीं गुणोंका तो सर्वथा नाश होता जाता है और दूसरे नवीन गुणोंकी उत्पत्ति होती जाती है तथा उन उत्पन्न और नष्ट होनेवाले गुणोंका आधार द्रव्य है।


दृष्टान्ताभासोऽयं स्याद्धि विपक्षस्य मृत्तिकायां हि ।
एके नश्यन्ति गुणा जायन्ते पाकजा गुणास्त्वन्ये ॥122॥

अर्थ: विपक्षका यह दृष्टान्त भी ठीक नहीं है कि मिट्टीमें पहले गुण तो नष्ट होजाते हैं और पाकसे होनेवाले दूसरे गुण पैदा होजाते हैं । यह केवल दृष्टान्ताभास है ।


तत्रोत्तरमिति सम्यक् सत्यां तत्र च तथाविधायां हि
किं पृथिवीत्वं नष्टं न नष्टमथ चेत्तथा कथं न स्यात् ॥123॥

अर्थ: नैयायिक सिद्धान्तका यह उत्तर स्पष्ट रीतिसे होजाता है कि अग्निमें घड़ेको रखनेसे क्या घड़ेकी मिट्टीका नाश हो जाता है ? यदि मिट्टीका नाश नहीं होता है तो घड़ेके गुणोंमें नित्यता क्यों नहीं है ? अवश्य है ।


ननु केवलं प्रदेशाद्रव्यं देशाश्रया विशेषास्तु ।
गुणसंज्ञका हि तस्माद्भवति गुणेभ्यश्च द्रव्यमन्यत्र ॥124॥

अर्थ: जो प्रदेश हैं वे ही द्रव्य कहलाते हैं । देशके आश्रयसे रहनेवाले जो विशेष हैं वे ही गुण कहलाते हैं इसलिये गुणोंसे द्रव्य भिन्न हैं, जब गुणोंसे द्रव्य भिन्न है तब उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, ये तीनों द्रव्यमें जिस प्रकार सुघटित होते हैं, उस प्रकार गुणोंमें नहीं होते न तो किसी २ गुणमें होते हैं और न गुण समुदायमें ही होते हैं ?


तत एव यथा सुघटं भङ्गोत्पादध्रुवत्रयं द्रव्ये ।
न तथा गुणेषु तत्स्यादपि च व्यस्तेषु वा समस्तेषु ॥125॥

अर्थ: जो प्रदेश हैं वे ही द्रव्य कहलाते हैं । देशके आश्रयसे रहनेवाले जो विशेष हैं वे ही गुण कहलाते हैं इसलिये गुणोंसे द्रव्य भिन्न हैं, जब गुणोंसे द्रव्य भिन्न है तब उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, ये तीनों द्रव्यमें जिस प्रकार सुघटित होते हैं, उस प्रकार गुणोंमें नहीं होते न तो किसी २ गुणमें होते हैं और न गुण समुदायमें ही होते हैं ?


यतः क्षणिकत्वापत्तेरिह लक्षणाद्गुणानां हि
तदभिज्ञानविरोधात्क्षणिकत्वं बाध्यतेऽध्यक्षात् ॥126॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है । क्योंकि इस लक्षणसे गुणोंमें क्षणिकता आती है गुणोंमें क्षणिकता यह वही है, इस प्रत्यभिज्ञानसे प्रत्यक्ष बाधित है ।


अपि चैवमेकसमये स्यादेकः कश्चिदेव तत्र गुणः ।
तन्नाशादन्यतरः स्यादिति युगपन्न सन्त्यनेकगुणाः ॥127॥

अर्थ: गुणोंको उत्पाद, व्यय रूप विशेष माननेसे द्रव्यमें एक समयमें कोई एक गुण ठहरेगा । उस गुणके नाश होनेसे दूसरा गुण उसमें आवेगा । एक साथ द्रव्यमें अनेक गुण नहीं रह सकेंगे ।


तदसद्यतः प्रमाणदृष्टान्तादपि च बाधितः पक्षः ।
स यथा सहकारफले युगपद्वर्णादिविद्यमानत्वात् ॥128॥

अर्थ: द्रव्यमें एक समयमें एक ही गुणकी सत्ता मानना ठीक नहीं है । क्योंकि यह वात प्रमाण और दृष्टान्त दोनोंसे बाधित है । आमके फलमें एक साथ ही रूप रस, गन्ध, स्पर्श आदिक अनेक गुणोंकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रतीत होती है ।


अथ चेदिति दोषभयान्नित्याः परिणामिनस्त इति पक्षः ।
तत्किं स्यान्न गुणानामुत्पादादित्रयं समं न्यायात् ॥129॥

अर्थ: यदि उपर्युक्त दोषोंके भयसे गुणोंको नित्य और परिणामी माना जाय तो फिर गुणोंमें एक साथ उत्पादादि त्रय क्यों नहीं होंगे ? अवश्य होंगे ।


अपि पूर्वं च यदुक्तं द्रव्यं किल केवलं प्रदेशाः स्युः ।
तत्र प्रदेशवत्त्वं शक्तिविशेषश्च कोपि सोपि गुणः ॥130॥

अर्थ: पहले यह भी शंका की गई थी कि केवल प्रदेश ही द्रव्य कहलाते हैं सो प्रदेश भी, प्रदेशत्व नामक शक्ति विशेष है। वह भी एक गुण है।


तस्माद्गुणसमुदायो द्रव्यं स्यात्पूर्वसूरिभिः प्रोक्तम् ।
अयमर्थः खलु देशो विभज्यमाना गुणा एव ॥131॥

अर्थ: इस लिये जो पूर्वाचार्यों ( अथवा पहले इसी ग्रन्थमें ) ने गुणोंके समुदायको द्रव्य कहा है वह ठीक है । इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि यदि देश ( द्रव्य ) को भिन्न २ विभाजित किया जाय तो गुण ही प्रतीत होंगे ।


ननु चैवं सति नियमादिह पर्याया भवन्ति यावन्तः ।
सर्वे गुणपर्याया वाच्या न द्रव्यपर्ययाः केचित् ॥132॥

अर्थ: यदि गुण समुदाय ही द्रव्य है तो जितनी भी द्रव्यमें पर्यायें होंगी उन सबोंको नियमसे गुणोंकी पर्याय ही कहना चाहिये, किसीको भी द्रव्य पर्याय नहीं कहना चाहिये ?


तन्न यतोऽस्ति विशेषः सति च गुणानां गुणत्ववत्त्वेपि ।
चिदचिद्यथा तथा स्यात् क्रियावती शक्तिरथ च भाववती ॥133॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है । क्योंकि गुणोंमें भी विशेषता है। यद्यपि गुणत्व धर्मकी अपेक्षासे सभी गुण, गुण कहलाते हैं तथापि उनमें कोई चेतन गुण है। कोई अचेतन गुण है । जिस प्रकार गुणोंमें यह विभागता है । उसी प्रकार उनमें कोई क्रियावती शक्ति ( गुण ) है और कोई भाववती शक्ति है ।


तत्र क्रिया प्रदेशो देशपरिस्पन्दलक्षणो वा स्यात् ।
भावः शक्तिविशेषस्तत्परिणामोऽथ वा निरंशांशैः ॥134॥

अर्थ: उन दोनों शक्तियोंमें प्रदेश अथवा देशका परिस्पंद ( हलन चलन ) क्रिया कहलाती है और शक्ति विशेष भाव कहलाता है उसका परिणमन निरंश-अंशों द्वारा होता है


यतरे प्रदेशभागास्ततरे द्रव्यस्य पर्याय नाम्ना ।
यतरे च विशेषांशास्ततरे गुणपर्यया भवन्त्येव ॥135॥

अर्थ: जितने भी प्रदेशांश हैं वे द्रव्य पर्याय कहे जाते हैं और जितने गुणांश हैं वे गुणपर्याय कहे जाते हैं ।


तत एव यदुक्तचरं व्युच्छेदादित्रयं गुणानां हि ।
अनवद्यमिदं सर्वं प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धत्वात् ॥136॥

अर्थ: इस लिये पहले जो गुणोंमें उत्पाद, व्यय, ध्रोव्य बतलाया गया है, वह सब प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे सिद्ध होनेसे निर्दोष है ।


अथ चैतल्लक्षणमिह वाच्यं वाक्यान्तरप्रवेशेन ।
आत्मा यथा चिदात्मा ज्ञानात्मा वा स एव चैकार्थः ॥137॥

अर्थ: अब गुणोंका लक्षण वाक्यान्तर (दूसरी रीतिसे) द्वारा कहते हैं । जिस प्रकार आत्मा, चिदात्मा, अथवा ज्ञानात्मा, ये सब एक अर्थको प्रगट करते हैं उसी प्रकार वह वाक्यान्तर कथन भी एकार्थक है ।


तद्वाक्यान्तरमेतद्यथा गुणाः सहभुवोपि चान्वयिनः ।
अर्थाश्चैकार्थत्वादर्थादेकार्थवाचकाः सर्वे ॥138॥

अर्थ: वह वाक्यान्तर इस प्रकार है - गुण, सहभावी, अन्वयी इन सबका एक ही अर्थ है । अर्थात् उपर्युक्त तीनों ही शब्द गुण रूप अर्थके वाचक हैं ।


सह सार्धं च समं वा तत्र भवन्तीति सहभुवः प्रोक्ताः ।
अयमर्थो युगपत्ते सन्ति न पर्यायवत्क्रमात्मानः ॥139॥

अर्थ: सह, सार्ध और सम इन तीनोंका एक ही साथ रूप अर्थ है । गुण सभी साथ २ रहते हैं इस लिये वे सहभावी कहे गये हैं । इसका यह अर्थ है कि सभी गुण एक साथ रहते हैं, पर्यायके समान क्रम क्रमसे नहीं होते हैं ।


ननु सह समं मिलित्वा द्रव्येण च सहभुवो भवन्त्विति चेत् ।
तन्न यतो हि गुणेभ्यो द्रव्यं पृथगिति यथा निषिद्धत्वात् ॥140॥

अर्थ: शंकाकार सहभावी शब्दका अर्थ करता है कि गुण द्रव्यके साथ मिलकर रहते हैं इसी लिये वे सहभावी कहलाते हैं । परन्तु शंकाकार की यह शंका निर्मूल है क्योंकि गुणोंसे भिन्न द्रव्य कोई पदार्थ है इस बातका पहले ही निषेध किया जाचुका है ।


ननुचैवमतिव्याप्तिः पर्यायेष्वपि गुणानुषंगत्वात् ।
पर्यायः पृथगिति चेत्सर्वं सर्वस्य दुर्निवारत्वात् ॥141॥

अर्थ: यदि गुणोंको साथ रहनेसे सहभावी कहा गया है तो यह लक्षण पर्यायोंमें भी जाता है वे भी तो साथ ही साथ रहती हैं। इस लिये वे भी गुण कहलावेंगी। यह अति व्याप्ति दोष है, इस अतिव्याप्ति दोषको दूर करनेके लिये आचार्य कहते हैं कि पर्यायोंमें गुणोंका लक्षण नहीं आता है, क्योंकि पर्यायें साथ २ नहीं रहती हैं किन्तु भिन्न २ रहती हैं। फिर भी यदि लक्षणको दूषित ठहराया जायगा तो हरएक दूषण हरएकमें दुर्निवार हो जायगा अथवा पर्यायोंको भी अभिन्न माननेसे अवस्थाओंमें भेद न रहनेसे सभी सब रूप हो जायंगे अर्थात् फिर अवस्थाभेद न हो सकेगा।


अनुरित्यव्युच्छिन्नप्रवाहरूपेण वर्तते यद्वा ।
अयतीत्ययगत्यर्थाद्धातोरन्वर्थतोन्वयं द्रव्यम् ॥142॥

अर्थ: अन्वय शब्दमें दो पद पड़े हुए हैं। एक अनु, दूसरा अय, अनु पदका यह अर्थ है कि विना किसी रुकावट ( अनर्गल ) के प्रवाहरूप और अय पद गत्यर्थक अय धातुसे बना है, इसका अर्थ होता है कि गमन करे, चला जाय। अनु और अय-अन्वयका मिलकर अर्थ होता है कि जो अनर्गल रीतिसे बराबर प्रवाह रूपसे चला जाय ऐसा अनुगत अर्थ घटनेसे द्रव्य अन्वय कहलाता है।


सत्ता सत्त्वं सद्वा सामान्यं द्रव्यमन्वयो वस्तु ।
अर्थो विधिरविशेषादेकार्थवाचका अमी शब्दाः ॥143॥

अर्थ: सत्ता, सत्त्व, सत्, सामान्य, द्रव्य, अन्वय, वस्तु, अर्थ विधि ये सभी शब्द सामान्य रीतिसे एक द्रव्य रूप अर्थके वाचक हैं ।


अयमन्वयोस्ति येषामन्वयिनस्ते भवन्ति गुणवाच्याः ।
अयमर्थो वस्तुत्वात् स्वतः सपक्षा न पर्ययापेक्षाः ॥144॥

अर्थ: यह अन्वय जिनके है वे अन्वयी कहलाते हैं ऐसे अन्वयी गुण कहलाते हैं। इसका अर्थ यह है कि वास्तवमें गुण अपने ही पक्ष ( अन्वयपूर्वक ) में रहते हैं, पर्यायोंकी अपेक्षा नहीं रखते हैं।


ननु च व्यतिरेकित्वं भवतु गुणानां सदन्वयत्वेपि ।
तदनेकत्वप्रसिद्धौ भावव्यतिरेकतः सतामिति चेत् ॥145॥

अर्थ: गुणोंका सत्के साथ अन्वय होनेपर भी उनमें व्यतिरेकीपना भी होना चाहिये क्योंकि वे अनेक हैं । भाव व्यतिरेक भी पदार्थोंमें होता है ।


तन्न यतोस्ति विशेषो व्यतिरेकस्यान्वयस्य चापि यथा ।
व्यतिरेकिणो ह्यनेकेप्येकः स्यादन्वयी गुणो नियमात् ॥146॥

अर्थ: शंकाकारकी उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है। क्योंकि अन्वय और व्यतिरेकमें विशेषता है व्यतिरेकी अनेक होते हैं। और एक गुण नियमसे अन्वयी होता है।


स यथा चैको देशः स भवति नान्यो भवति स चाप्यन्यः ।
सोपि न भवति स देशो भवति स देशश्च देशव्यतिरेकः ॥147॥

अर्थ: अनन्त गुणोंके एक समयवर्ती अभिन्न पिण्डको देश कहते हैं। जो एक देश है वह दूसरा नहीं है। तथा जो दूसरा है, वह दूसरा ही है। वह पहला नहीं है। इसको देश व्यतिरेक कहते हैं।


अपि यश्चैको देशो यावदभिव्याप्य वर्तते क्षेत्रम् ।
तत्तत्क्षेत्रं नान्यद्भवति तदन्यश्च क्षेत्रव्यतिरेकः ॥148॥

अर्थ: जितने क्षेत्रको व्यापकर ( घेरकर ) एक देश रहता है । वह क्षेत्र वही है, दूसरा नहीं है । और जो दूसरा क्षेत्र है, वह दूसरा ही है, पहला नहीं है । इसको क्षेत्र व्यतिरेक कहते हैं ।


अपि चैकस्मिन् समये यकाप्यवस्था भवेन्न साप्यन्या ।
भवति च सापि तदन्या द्वितीयसमयेपि कालव्यतिरेकः ॥149॥

अर्थ: एक समयमें जो अवस्था होती है, वह वही है। दूसरी नहीं हो जाती। और जो दूसरे समयमें अवस्था है वह दूसरी ही है, पहली नहीं हो जाती, इसको काल-व्यतिरेक कहते हैं।


भवति गुणांशः कश्चित् स भवति नान्यो भवति स चाप्यन्यः ।
सोपि न भवति तदन्यो भवति तदन्योपि भावव्यतिरेकः ॥150॥

अर्थ: जो एक गुणांश है वह वही है, दूसरा नहीं है। और जो दूसरा गुणांश है, वह दूसराही है, पहला नहीं है। इसको भाव व्यतिरेक कहते हैं।


यदि पुनरेवं न स्यात्स्यादपि चैवं पुनः पुनः सैषः ।
एकांशदेशमात्रं सर्वं स्यात्तन्न वाधितत्वाच्च ॥151॥

अर्थ: यदि ऊपर कही हुई व्यतिरेककी व्यवस्था न मानी जावे और जो पहले समयमें देशादिक हैं वे ही दूसरे समयमें माने जावें, भिन्न २ न माने जावें तो सम्पूर्ण वस्तु एक अंश मात्र देशवाली ठहरेगी । और ऐसा मानना ठीक नहीं है एक अंश मात्र देशकी स्वीकारतामें पहले ही बाधा दी जा चुकी है ।


अयमर्थः पर्यायाः प्रत्येकं किल यथैकशः प्रोक्ताः ।
व्यतिरेकिणो ह्यनेके न तथाऽनेकत्वतोपि सन्ति गुणाः ॥152॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए कथनका खुलासा अर्थ इस प्रकार है कि एक २ समयमें क्रमसे भिन्न २ होनेवाली जो पर्यायें हैं वे ही व्यतिरेकी हैं, परन्तु गुण अनेक होनेपर भी उस प्रकार व्यतिरेकी नहीं हैं।


किन्त्वेकशः स्वबुद्धौ ज्ञानं जीवः स्वसर्वसारेण ।
अथ चैकशः स्वबुद्धौ दृग्वा जीवः स्वसर्वसारेण ॥153॥

अर्थ: किसीने अपनी बुद्धिमें सर्वस्वतासे ज्ञानको ही जीव समझा, और दूसरेने अपनी बुद्धिमें सर्वस्वतासे दर्शनको ही जीव समझा ।


तत एव यथाऽनेके पर्यायाः सैष नेति लक्षणतः ।
व्यतिरेकिणश्च न गुणास्तथेति सोऽयं न लक्षणाभावात् ॥154॥

अर्थ: इस लिये जिस प्रकार अनेक पर्यायें " यह वह नहीं है " इस लक्षणसे व्यतिरेकी हैं, उस प्रकार अनेक भी गुण " यह वह नहीं है " इस लक्षणके न घटनेसे व्यतिरेकी नहीं हैं ।


तल्लक्षणं यथा स्याज्ज्ञानं जीवो य एव तावांश्च ।
जीवो दर्शनमिति वा तदभिज्ञानात् स एव तावांश्च ॥155॥

अर्थ: गुणोंमें अन्वय लक्षण ही घटता है। जिस समय जीवको ज्ञान स्वरूप कहा जाता है, उस समय वह उतना ही है और जिस समय जीवको दर्शन स्वरूप कहा जाता है उस समय वह उतना ही है। ज्ञान अथवा दर्शन रूप जीवको कहनेसे उसमें ’ यह वही है ’ ऐसा ही प्रत्यभिज्ञान होता है।


एष क्रमः सुखादिषु गुणेषु वाच्यो गुरूपदेशाद्वा ।
यो जानाति स पश्यति सुखमनुभवतीति स एव हेतोश्च ॥156॥

अर्थ: पूर्वाचार्योंके कथनानुसार यही क्रम सुखादिक गुणोंमें भी लगा लेना चाहिये। जो जीव जानता है, वही देखता है और वही सुखका अनुभवन करता है। इन सब कार्योंमें " यह वही है " ऐसी ही प्रतीति होती है।


अथ चोद्दिष्टं प्रागप्यर्था इति संज्ञया गुणा वाच्याः ।
तदपि न रूढिवशादिह किन्त्वर्थाद्यौगिकं तदेवेति ॥157॥

अर्थ: यह पहले कहा जा चुका है कि अर्थ नाम गुणका है, वह भी केवल रूढ़िवशसे नहीं है किन्तु वह यौगिक रीतिसे है ।


स्यादृगिताविति धातुस्तद्रूपोयं निरुच्यते तज्ज्ञैः ।
अर्त्यर्थानुगतार्थादनादिसन्तानरूपतोपि गुणः ॥158॥

अर्थ: ‘ऋ’ एक धातु है, गमन करना उसका अर्थ है। उसी धातुका यह ‘अर्थ’ शब्द बना है ऐसा व्याकरणके जानकार कहते हैं। जो गमन करें उसे अर्थ कहते हैं। गुण अनादि सन्तति रूपसे साथ २ चले जाते हैं। इसलिये गुणका अर्थ नाम अन्वर्थक (यथार्थ) ही है।


अयमर्थः सन्ति गुणा अपि किल परिणामिनः स्वतः सिद्धाः ।
नित्यानित्यत्वादप्युत्पादादित्रयात्मकाः सम्यक् ॥159॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका सारांश यह है कि गुण भी नियमसे स्वतः सिद्ध परिणामी हैं इसलिये ते कथंचित् नित्य भी हैं और कथंचित् अनित्य भी हैं, और इसीसे उनमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य अच्छी तरह घटते हैं ।


अस्ति विशेषस्तेषां सति च समाने यथा गुणत्वेपि ।
साधारणास्त एके केचिदसाधारणा गुणाः सन्ति ॥160॥

अर्थ: यद्यपि गुणत्व सामान्यकी अपेक्षासे सभी गुणोंमें समानता है, तथापि उनमें विशेषता भी है। कितने ही उनमें साधारण गुण हैं, और कितने ही असाधारण गुण हैं।


साधारणास्तु यतरे ततरे नाम्ना गुणा हि सामान्याः ।
ते चाऽसाधारणका यतरे ततरे गुणा विशेषाख्याः ॥161॥

अर्थ: जितने साधारण गुण हैं वे सामान्य गुण कहलाते हैं, और जितने असाधारण गुण हैं वे विशेष गुण कहलाते हैं ।


तेषामिह वक्तव्ये हेतुः साधारणैर्गुणैर्यस्मात् ।
द्रव्यत्वमस्ति साध्यं द्रव्यविशेषस्तु साध्यते त्वितरैः ॥162॥

अर्थ: ऐसा क्यों कहाजाता है ? इसका कारण यह है कि साधारण गुणोंसे तो द्रव्य सामान्य सिद्ध किया जाता है, और विशेष गुणोंसे द्रव्य विशेष सिद्ध किया जाता है।


संदृष्टिः सदिति गुणः स यथा द्रव्यत्वसाधको भवति ।
अथ च ज्ञानं गुण इति द्रव्यविशेषस्य साधको भवति ॥163॥

अर्थ: उदाहरण इस प्रकार है कि सत् ( अस्तित्व ) यह गुण सामान्य द्रव्यका साधक है, और ज्ञान गुण द्रव्य विशेष ( जीव ) का साधक है ।


उक्तं हि गुणानामिह लक्ष्यं तल्लक्षणं यथाऽऽगमतः ।
सम्प्रति पर्यायाणां लक्ष्यं तल्लक्षणं च वक्ष्यामः ॥164॥

अर्थ: इस ग्रन्थमें आगमके अनुसार गुणोंका लक्ष्य और लक्षण तो कहा गया, अब पर्यायोंका लक्ष्य और लक्षण कहते हैं।


क्रमवर्तिनो ह्यनित्या अथ च व्यतिरेकिणश्च पर्यायाः ।
उत्पादव्ययरूपा अपि च ध्रौव्यात्मकाः कथञ्चिच्च ॥165॥

अर्थ: पर्यायें क्रमवर्ती, अनित्य, व्यतिरेकी, उत्पादव्ययस्वरूप और कथंचित् ध्रौव्य स्वरूप होती हैं ।


तत्र व्यतिरेकित्वं प्रायः प्रागेव लक्षितं सम्यक् ।
अवशिष्टविशेषमितः क्रमतः सँल्लक्ष्यते यथाशक्ति ॥166॥

अर्थ: पर्यायोंका व्यतिरेकीपना तो गुणोंके कथनमें सिद्ध किया जा चुका है। अब बाकीके लक्षण क्रमसे यथाशक्ति यहांपर कहे जाते हैं।


अस्त्यत्र य प्रसिद्धः क्रम इति धातुश्च पादविक्षेपे ।
क्रमति क्रम इति रूपस्तस्य स्वार्थानतिक्रमादेषः ॥167॥

अर्थ: पादविक्षेपका अर्थ होता है क्रमसे गमन करना अथवा क्रमसे होना, इसी अर्थमें क्रम धातु प्रसिद्ध है । उसीका क्रम शब्द बना है । यह शब्द अपने अर्थका उल्लंघन नहीं करता है । क्रमसे जो वर्तन करे अर्थात् क्रमसे जो होवे उन्हें क्रमवर्ती कहते हैं अथवा क्रमस्वरूपसे होनेका जिनका स्वभाव है उन्हें क्रमवर्ती कहते हैं । अथवा क्रम ही जिनमें होता रहे उन्हें ही अनुगत-अर्थ होनेसे क्रमवर्ती कहते हैं ऐसी क्रमवर्ती पर्यायें होती हैं ।


वर्तन्ते ते नयतो भवितुं शीलास्तथा स्वरूपेण ।
यदि वा स एव वर्ती येषां क्रमवर्तिनस्त एवार्थात् ॥168॥

अर्थ: पादविक्षेपका अर्थ होता है क्रमसे गमन करना अथवा क्रमसे होना, इसी अर्थमें क्रम धातु प्रसिद्ध है। उसीका क्रम शब्द बना है। यह शब्द अपने अर्थका उल्लंघन नहीं करता है। क्रमसे जो वर्तन करे अर्थात् क्रमसे जो होवे उन्हें क्रमवर्ती कहते हैं अथवा क्रमस्वरूपसे होनेका जिनका स्वभाव है उन्हें क्रमवर्ती कहते हैं। अथवा क्रम ही जिनमें होता रहे उन्हें ही अनुगत-अर्थ होनेसे क्रमवर्ती कहते हैं ऐसी क्रमवर्ती पर्यायें होती हैं।


अयमर्थः प्रागेकं जातं समुच्छिद्य जायते चैकः ।
अथ नष्टे सति तस्मिन्नन्योप्युत्पद्यते यथा देशः ॥169॥

अर्थ: पर्यायें क्रमवर्ती हैं, इसका यह अर्थ है कि जिस प्रकार पहले एक पर्याय हुई, फिर उसका नाश होनेपर दूसरी हुई, उस दूसरीका भी नाश होनेपर तीसरी हुई इसी प्रकार पूर्व पूर्व पर्यायोंके नाश होनेपर जो उत्तरोत्तर पर्यायें क्रमसे होती जाती हैं इसीका नाम क्रमवर्ती है। अनन्त गुणोंके एक समयवर्ती अभिन्न पिण्डको देश कहते हैं। एक समयका देश दूसरे समयसे भिन्न है । यहां पर देशसे पर्यायका ग्रहण होता है ।


ननु यद्यस्ति स भेदः शब्दकृतो भवतु वा तदेकार्थात् ।
व्यतिरेकक्रमयोरिह को भेदः पारमार्थिकस्त्विति चेत् ॥170॥

अर्थ: यदि व्यतिरेकीपन और क्रमवर्तीपनमें शब्द भेद ही माना जाय तब तो ठीक है । क्योंकि दोनोंका एक ही अर्थ है । यदि इन दोनोंमें अर्थ भेद भी माना जाता है तब बतलाना चाहिये कि वास्तवमें इन दोनोंमें क्या भेद है ?


तन्न यतोस्ति विशेषः सदंशधर्मे द्वयोः समानेपि ।
स्थूलेष्विव पर्यायेष्वन्तर्लीनाश्च पर्ययाः सूक्ष्माः ॥171॥

अर्थ: शंकाकारका यह कहना " कि व्यतिरेकी और क्रमवर्ती दोनोंका एक ही अर्थ है " ठीक नहीं है । क्योंकि द्रव्यके पूर्व समय वर्ती और उत्तर समय वर्ती अंशोंमें समानता होने पर भी विशेषता है । जिस प्रकार स्थूल पर्यायोंमें सूक्ष्म पर्यायें अन्तर्लीन ( गर्भित ) हो जाती हैं परन्तु लक्षण भेदसे भिन्न हैं, उसी प्रकार व्यतिरेकी और क्रमवर्ती भी भिन्न हैं ।


तत्र व्यतिरेकः स्यात् परस्पराभावलक्षणेन यथा ।
अंशविभागः पृथगिति सदृशांशानां सतामेव ॥172॥

अर्थ: समान अंशोंमें परिणमन होनेवाले पदार्थोंका जो परस्परमें अभावको लिये हुए भिन्न २ अंशोंका विभाग किया जाता है, उसीका नाम व्यतिरेक है। जो एक समयवर्ती पर्याय है वह दूसरे समयवर्ती नहीं है। बस इसीसे व्यतिरेककी भले प्रकार सिद्धि हो जाती है।


तस्माद्व्यतिरेकित्वं तस्य स्यात् स्थूलपर्ययः स्थूलः ।
सोऽयं भवति न सोयं यस्मादेतावतैव संसिद्धिः ॥173॥

अर्थ: समान अंशोंमें परिणमन होनेवाले पदार्थोंका जो परस्परमें अभावको लिये हुए भिन्न २ अंशोंका विभाग किया जाता है, उसीका नाम व्यतिरेक है । जो एक समयवर्ती पर्याय है वह दूसरे समयवर्ती नहीं है । बस इसीसे व्यतिरेककी भले प्रकार सिद्धि हो जाती है ।


विष्कंभःक्रम इति वा क्रमः प्रवाहस्य कारणं तस्य ।
न विवक्षितमिह किञ्चित्तत्र तथात्वं किमन्यथात्वं वा ॥174॥

अर्थ: जो विस्तार युक्त हो वह क्रम कहलाता है, क्रम प्रवाहका कारण है, क्रममें यह नहीं विवक्षित है कि यह वह है अथवा अन्य है । क्रमवर्तीपना व्यतिरेकके पहले होता है और नियमसे व्यतिरेक सहित होता है । एक पर्यायके पीछे दूसरी, दूसरीके पीछे तीसरी, तीसरीके पीछे चौथी, इस प्रकार बराबरके प्रवाहको क्रम कहते हैं और ‘ यह वह नहीं है ’ इस प्रकार परस्परमें आनेवाले अभावको व्यतिरेक कहते हैं ।


क्रमवर्तित्वं नाम व्यतिरेकपुरस्सरं विशिष्टं च ।
स भवति भवति न सोऽयं भवति तथाथ च तथा न भवतीति ॥175॥

अर्थ: जो विस्तार युक्त हो वह क्रम कहलाता है, क्रम प्रवाहका कारण है, क्रममें यह नहीं विवक्षित है कि यह वह है अथवा अन्य है। क्रमवर्तीपना व्यतिरेकके पहले होता है और नियमसे व्यतिरेक सहित होता है। एक पर्यायके पीछे दूसरी, दूसरीके पीछे तीसरी, तीसरीके पीछे चौथी, इस प्रकार बराबरके प्रवाहको क्रम कहते हैं और ‘ यह वह नहीं है ’ इस प्रकार परस्परमें आनेवाले अभावको व्यतिरेक कहते हैं।


ननु तत्र किं प्रमाणं क्रमस्य साध्ये तदन्यथात्वे हि ।
सोऽयं यः प्राक् स तथा यथेति यः प्राक्तु निश्चयादिति चेत् ॥176॥

अर्थ: क्रम और व्यतिरेकके सिद्ध करनेमें क्या प्रमाण है, क्योंकि पहले कहा जा चुका है कि जो पहले था सो ही यह है अथवा जैसा पहले था वैसा ही है ?


तन्न यतः प्रत्यक्षादनुभवविषयात्तथानुमानाद्वा ।
स तथेति च नित्यस्य न तथेत्यनित्यस्य प्रतीतत्वात् ॥177॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है, क्योंकि, प्रत्यक्ष प्रमाणसे, अपने अनुभवसे अथवा अनुमान प्रमाणसे वह उसी प्रकार है, इस प्रकार नित्यकी और " वह उस प्रकार नहीं है" इस प्रकार अनित्यकी भी प्रतीति होती है।


अयमर्थः परिणामि द्रव्यं नियमाद्यथा स्वतः सिद्धम् ।
प्रतिसमयं परिणमते पुनः पुनर्वा यथा प्रदीपशिखा ॥178॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका यह अर्थ है कि द्रव्य जिस प्रकार स्वतः सिद्ध है, उसी प्रकार नियमसे परिणामी भी है। जिस प्रकार दीपककी शिखा (लौ) बार २ परिणमन करती है, उसी प्रकार प्रतिसमय द्रव्य भी परिणमन करता है।


इदमस्ति पूर्वपूर्वभावविनाशेन नश्यतोंशस्य ।
यदि वा तदुत्तरोत्तरभावोत्पादेन जायमानस्य ॥179॥

अर्थ: पहले पहले भावका विनाश होनेसे किसी अंशका (पर्यायका) नाश होनेसे और नवीन २ भावके उत्पन्न होनेसे किसी अंश (पर्याय) के पैदा होनेसे यह परिणमन होता है।


तदिदं यथा स जीवो देवो मनुजाद्भवन्नथाप्यन्यः ।
कथमन्यथात्वभावं न लभेत स गोरसोपि नयात् ॥180॥

अर्थ: वह पूर्व २ भावका विनाश और उत्तरोत्तर भावका उत्पाद इस प्रकार होता है - जैसे जो जीव पहले मनुष्य पर्यायमें था, वही जीव मरकर देव पर्यायमें चला गया । मनुष्य-जीवसे देव-जीव कथंचित् भिन्न है । जिस प्रकार दूधसे दही कथंचित् अन्यथाभावको प्राप्त होता है उसी प्रकार यह भी कथंचित् अन्यथा भावको क्यों नहीं प्राप्त होगा ? अवश्य ही होगा ।


ननु चैवं सत्यसदपि किञ्चिद्वा जायते सदेव यथा ।
सदपि विनश्यत्यसदिव सदृशासदृशत्वदर्शनादितिचेत् ॥181॥

अर्थ: इस प्रकारकी भिन्नता स्वीकार करनेसे मालूम होता है कि सत्की तरह कुछ असत् भी पैदा हो जाता है और असत्की तरह सत् पदार्थ भी विनष्ट हो जाता है, समानता और असमानताके देखनेसे ऐसा प्रतीत भी होता है । किसी किसीका समान उत्पाद होता है और किसी किसीका असमान उत्पाद होता है । अग्निका जो उष्ण रूप परिणमन होता है, वह उसका समान उत्पाद है और जो कच्चा आम पकनेपर हरेसे पीला हो जाता है वह असमान (विजातीय) उत्पाद है ?


सदृशोत्पादो हि यथा स्यादुष्णः परिणमन् यथा वन्हिः ।
स्यादित्यसदृशजन्मा हरितात्पीतं यथा रसालफलम् ॥182॥

अर्थ: इस प्रकारकी भिन्नता स्वीकार करनेसे मालूम होता है कि सत्की तरह कुछ असत् भी पैदा हो जाता है और असत्की तरह सत् पदार्थ भी विनष्ट हो जाता है, समानता और असमानताके देखनेसे ऐसा प्रतीत भी होता है । किसी किसीका समान उत्पाद होता है और किसी किसीका असमान उत्पाद होता है । अग्निका जो उष्ण रूप परिणमन होता है, वह उसका समान उत्पाद है और जो कच्चा आम पकनेपर हरेसे पीला हो जाता है वह असमान (विजातीय) उत्पाद है ?


नैवं यतः स्वभावादसतो जन्म न सतो विनाशो वा ।
उत्पादादित्रयमपि भवति च भावेन भावतया ॥183॥

अर्थ: उपर्युक्त जो शङ्का की गई है, वह ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक स्वाभाविक वात है कि न तो असत् पदार्थका जन्म होता है और न सत् पदार्थका विनाश ही होता है। जो उत्पाद, व्यय ध्रौव्य होते हैं वे भी वस्तुके एक भावसे भावान्तर रूप हैं।


अयमर्थः पूर्वं यो भावः सोप्युत्तरत्र भावश्च ।
भूत्वा भवनं भावो नष्टोत्पन्नो न भाव इह कश्चित् ॥184॥

अर्थ: इसका यह अर्थ है कि पहले जो भाव था वही उत्तर भाव रूप हो जाता है। होकर होनेका नाम ही भाव है। नष्ट और उत्पन्न कोई भाव नहीं होता है।


दृष्टान्तः परिणामी जलप्रवाहो य एव पूर्वस्मिन् ।
उत्तरकालेपि तथा जलप्रवाह स एव परिणामी ॥185॥

अर्थ: दृष्टान्तके लिये जलका प्रवाह है। जो जलका प्रवाह पहले समयमें परिणमन करता है वही जलका प्रवाह दूसरे समयमें परिणमन करता है।


यत्तत्र विसदृशत्वं जातेरनतिक्रमात् क्रमादेव ।
अवगाहनगुणयोगाद्देशांशानां सतामेव ॥186॥

अर्थ: यह जो द्रव्यकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें भिन्नता ( असमानता ) दीखती है वह अपने स्वरूपको नहीं छोड़कर क्रमसे होनेवाले देशांशोंके अवगाहन गुणके निमित्तसे ही दीखती है ।


दृष्टान्तो जीवस्य लोकासंख्यातमात्रदेशाः स्युः ।
हानिर्वृद्धिस्तेषामवगाहनविशेषतो न तु द्रव्यात् ॥187॥

अर्थ: दृष्टान्त इस प्रकार है। एक जीवके असंख्यात लोक प्रमाण प्रदेश होते हैं। उनकी हानि अथवा वृद्धि केवल अवगाहनकी विशेषतासे होती है द्रव्यकी अपेक्षासे नहीं होती।


यदि वा प्रदीपरोचिर्यथा प्रमाणादवस्थितं चापि ।
अतिरिक्तं न्यूनं वा गृहभाजनविशेषतोऽवगाहाच्च ॥188॥

अर्थ: अथवा दूसरा दृष्टान्त दीपकका है। दीपककी किरणें उतनी ही हैं जितनी कि वे हैं, परन्तु उनमें अधिकता और न्यूनता जो आती है, वह केवल घर आदि आवरककी विशेषतासे आती है और अवगाहनकी विशेषतासे भी आती है।


अंशानामवगाहे दृष्टान्तः स्वांशसंस्थितं ज्ञानम् ।
अतिरिक्तं न्यूनं वा ज्ञेयाकृति तन्मयान्न तु स्वांशैः ॥189॥

अर्थ: अंशोंके अवगाहनमें यह दृष्टान्त है कि ज्ञान - गुण जितना भी है वह अपने अंशों (अविभाग प्रतिच्छेदों) में स्थित है। वह जो कभी कमती कभी बढ़ती होता है, वह केवल ज्ञेय पदार्थका आकार धारण करनेसे होता है। जितना बड़ा ज्ञेय है, उतना ही बड़ा ज्ञानका आकार हो जाता है। वास्तवमें ज्ञान गुणके अंशोंमें न्यूनाधिकता नहीं होती।


तदिदं यथा हि संविद्घटं परिच्छिन्ददिहैव घटमात्रम् ।
यदि वा सर्वं लोकं स्वयमवगच्छच्च लोकमात्रं स्यात् ॥190॥

अर्थ: दृष्टान्त इस प्रकार है कि जिस समय ज्ञान घटको जान रहा है, उस समय वह घट मात्र है, अथवा जिस समय वह सम्पूर्ण लोकको स्वयं जान रहा है, उस समय वह लोक मात्र है।


न घटाकारेपि चितः शेषांशानां निरन्वयो नाशः ।
लोकाकारेपि चितः नियतांशानां न चाऽसदुत्पत्तिः ॥191॥

अर्थ: घटाकार होने पर ज्ञानके शेष अंशोंका सर्वथा नाश नहीं होता है और लोकाकार होनेपर नियमित अंशोंके अतिरिक्त उसके नवीन अंशोंकी उत्पत्ति भी नहीं होती है।


किन्त्वस्ति च कोपि गुणोऽनिर्वचनीयः स्वतः सिद्धः ।
नाम्ना चाऽगुरुलघुरिति गुरुलक्ष्यः स्वानुभूतिलक्ष्यो वा ॥192॥

अर्थ: किन्तु उन गुणोंमें एक अगुरुलघु नामक गुण है, वह वचनोंके अगम्य है, स्वतः सिद्ध है, उसका ज्ञान गुरु ( सर्वज्ञ अथवा आचार्य )के उपदेशसे होता है अथवा स्वानुभूति-प्रत्यक्षसे होता है ।


ननु चैवं सत्यर्थादुत्पादादित्रयं न संभवति ।
अपि नोपादानं किल करणं न फलं तदनन्यात् ॥193॥

अर्थ: " किसी शक्तिका कभी नाश भी नहीं होता है और न नवीन कुछ उत्पत्ति ही होती है। यदि ऐसा माना जावे तो गुणोंमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य नहीं घट सकते हैं , और न कोई किसीका कारण ही बन सक्ता है, न फल ही कुछ हो सक्ता है, क्योंकि उपर्युक्त कथनसे तुम गुणोंको सदा नित्य ही मान चुके हो।

दूसरी बात यह है कि हरएक गुणके अंशोंकी कभी न्यूनता भी प्रतीत होती है ऐसी अवस्थामें गुण दुर्बल ( सूक्ष्म-पतला ) क्यों नहीं हो जाता ? और कभी गुणमें अधिकता भी प्रतीत होती है, ऐसी अवस्थामें वह बलवान ( सशक्त-मोटा ) क्यों नहीं हो जाता ? यह एक महान् दोष है। इसका निराकरण कुछ कठिन है ?


अपिच गुणः स्वांशानामपकर्षे दुर्बलः कथं न स्यात् ।
उत्कर्षे बलवानिति दोषोऽयं दुर्जयो महानिति चेत् ॥194॥

अर्थ: “ किसी शक्तिका कभी नाश भी नहीं होता है और न नवीन कुछ उत्पत्ति ही होती है। यदि ऐसा माना जावे तो गुणोंमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य नहीं बन सकते हैं , और न कोई किसीका कारण ही बन सक्ता है, न फल ही कुछ हो सक्ता है, क्योंकि उपर्युक्त कथनसे तुम गुणोंको सदा नित्य ही मान चुके हो ।

दूसरी बात यह है कि हरएक गुणके अंशोंकी कभी न्यूनता भी प्रतीत होती है ऐसी अवस्थामें गुण दुर्बल ( सूक्ष्म - पतला ) क्यों नहीं हो जाता ? और कभी गुणमें अधिकता भी प्रतीत होती है, ऐसी अवस्थामें वह बलवान ( सशक्त - मोटा ) क्यों नहीं हो जाता ? यह एक महान् दोष है । इसका निराकरण कुछ कठिन है ?


तन्न यतः परिणामि द्रव्यं पूर्वं निरूपितं सम्यक् ।
उत्पादादित्रयमपि सुघटं नित्येऽथ नाप्यनित्येर्थे ॥195॥

अर्थ: उपर्युक्त जो शंका की गई है वह निर्मूल (ठीक नहीं) है क्योंकि यह पहले अच्छी तरह कहा जा चुका है कि द्रव्य परिणमन शील है, इसलिये नित्य पदार्थमें ही उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य अच्छी तरह घटते हैं, अनित्य पदार्थमें नहीं घटते ।


जाम्बूनदे यथा सति जायन्ते कुण्डलादयो भावाः ।
अथ सत्सु तेषु नियमादुत्पादादित्रयं भवत्येव ॥196॥

अर्थ: सोनेकी सत्ता माननेपर ही उसमें कुण्डलादिक भाव होते हैं और उन कुण्डलादिक भावोंके होनेपर उसमें उत्पादादिक घटते ही हैं ।


अनया प्रक्रियया किल बोद्धव्यं कारणं फलं चैव ।
यस्मादेवास्य सतस्तद्द्वयमपि भवत्येतत् ॥197॥

अर्थ: इसी ऊपर कही हुई प्रक्रिया ( रीति ) के अनुसार कारण और फल भी उसी कथंचित् नित्य पदार्थके घटते हैं। क्योंकि ये दोनों ही सत् पदार्थके ही हो सकते हैं।


आस्तामसदुत्पादः सतो विनाशस्तदन्वयादेशात् ।
स्थूलत्वं च कृशत्वं न गुणस्य च निजप्रमाणत्वात् ॥198॥

अर्थ: अविच्छिन्न सन्तति देखनेसे गुणोंमें असत्की उत्पत्ति और सत्का विनाश तो दूर रहो। परन्तु उनमें अपने प्रमाणसे स्थूलता और कृशता ( दुर्बलता ) भी नहीं होती।


इति पर्यायाणामिह लक्षणमुक्तं यथास्थितं चाथ ।
उत्पादादित्रयमपि प्रत्येकं लक्ष्यते यथाशक्ति ॥199॥

अर्थ: इस प्रकार पर्यायोंका लक्षण, जैसा कुछ था कहा गया । अब उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यका भिन्न २ स्वरूप यथाशक्ति कहा जाता है ।


उत्पादस्थितिभङ्गाः पर्यायाणां भवन्ति किल न सतः ।
ते पर्याया द्रव्यं तस्माद्द्रव्यं हि तत्त्रितयम् ॥200॥

अर्थ: उत्पाद, स्थिति, भङ्ग, ये तीनों ही पर्यायोंके होते हैं, पदार्थके नहीं होते, और उन पर्यायोंका समूह ही द्रव्य कहलाता है । इस लिये वे तीनों मिल कर द्रव्य कहलाते हैं ।

पूर्वार्द्ध 201 से 300 (श्लोक 201 से 300)

तत्रोत्पादोऽवस्था प्रत्यग्रं परिणतस्य तस्य सतः ।
सदसद्भावनिबद्धं तदतद्भावत्ववन्नयादेशात् ॥201॥

अर्थ: उन तीनोंमें परिणमन शील द्रव्यकी नवीन अवस्थाको उत्पाद कहते हैं। यह उत्पाद भी द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे सत् और असत् भावसे विशिष्ट है।


अपि च व्ययोपि न सतो व्ययोप्यवस्थाव्ययः सतस्तस्य ।
प्रध्वंसाभावः स च परिणामित्वात्सतोप्यवश्यं स्यात् ॥202॥

अर्थ: तथा व्यय भी पदार्थका नहीं होता है, किन्तु उसी परिणमन शील द्रव्यकी अवस्थाका व्यय होता है। इसीको प्रध्वंसाभाव कहते हैं। यह प्रध्वंसाभाव परिणमनशील द्रव्यके अवश्य होता है।


ध्रौव्यं सतः कथंचित् पर्यायार्थाच्च केवलं न सतः ।
उत्पादव्ययवदिदं तच्चैकांशं न सर्वदेशं स्यात् ॥203॥

अर्थ: ध्रौव्य भी कथंचित् पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे पदार्थके होता है । पर्यायदृष्टिको छोड़कर केवल पदार्थका ध्रौव्य नहीं होता है, किन्तु उत्पाद और व्ययकी तरह वह भी एक अंश स्वरूप है । सर्वांश रूप नहीं है ।


तद्भावाव्ययमिति वा ध्रौव्यं तत्रापि सम्यगयमर्थः ।
यः पूर्वं परिणामो भवति स पश्चात् स एव परिणामः ॥204॥

अर्थ: ध्रौव्यका लक्षण " तद्भावाव्ययम् " यह भी कहा गया है, उसका भी यही उत्तम अर्थ है कि वस्तुके भावका नाश नहीं होता, अर्थात् जो वस्तुका पहले परिणाम है, वही परिणाम पीछे भी होता है ।


पुष्पस्य यथा गन्धः परिणामः परिणमँश्च गन्धगुणः ।
नापरिणामी गन्धो न च निर्गन्धाद्धि गन्धवत्पुष्पम् ॥205॥

अर्थ: जिस प्रकार पुष्पका गन्ध परिणाम है, और गन्ध गुण भी परिणामी है, वह भी प्रतिक्षण परिणमन करता है, वह अपरिणामी नहीं है, परन्तु ऐसा नहीं है कि पहले पुष्प गन्ध रहित हो और पीछे गन्ध सहित हुआ हो ।


तत्रानित्यनिदानं ध्वंसोत्पादद्वयं सतस्तस्य ।
नित्यनिदानं ध्रुवमिति तत्त्रयमप्यंशभेदः स्यात् ॥206॥

अर्थ: उन तीनोंमें उत्पाद और व्यय ये दो तो उस परिणामी द्रव्यमें अनित्यताके कारण हैं और ध्रुव ( ध्रौव्य ) नित्यताका कारण है, ये तीनों ही एक २ अंशरूपसे भिन्न हैं ।


न च सर्वथा हि नित्यं किञ्चित्सत्त्वं गुणो न कश्चिदिति ।
तस्मादतिरिक्तौ द्वौ परिणतिमात्रौ व्ययोत्पादौ ॥207॥

अर्थ: कोई ऐसी आशंका न करे कि द्रव्यमें सत्त्व तो सर्वथा नित्य है बाकी का कोई गुण नित्य नहीं है, और उससे सर्वथा भिन्न परिणतिमात्र उत्पाद, व्यय दोनों हैं । क्योंकि -


सर्वं विप्रतिपन्नं भवति तथा सति गुणो न परिणामः ।
नापि द्रव्यं न सदिति पृथक्त्वदेशानुषङ्गत्वात् ॥208॥

अर्थ: ऊपर कही हुई आशंकाके अनुसार माननेपर सभी विवादकोटिमें आजायगा । प्रदेश भेद माननेसे न गुणकी सिद्धि होगी न पर्यायकी सिद्धि होगी । न द्रव्यकी, और न सत् की ही सिद्धि होगी । क्योंकि भिन्न २ स्वीकार करनेसे एक भी (कुछ भी) सिद्ध नहीं होता ।


अपि चैतद्दूषणमिह यन्नित्यं तद्धि नित्यमेव तथा ।
यदनित्यं तदनित्यं नैकस्यानेकधर्मत्वम् ॥209॥

अर्थ: उत्पाद, व्ययको सर्वथा भिन्न पर्यायमात्र माननेसे और द्रव्यको उससे भिन्न सर्वथा नित्य माननेसे यह भी दूषण आता है कि जो नित्य है वह सदा नित्य ही रहेगा, और जो अनित्य है वह सदा अनित्य ही रहेगा क्योंकि एकके अनेक धर्म नहीं हो सक्ते ।


अपि चैकमिदं द्रव्यं गुणोयमेवेति पर्ययोऽयं स्यात् ।
इति काल्पनिको भेदो न स्याद्द्रव्यान्तरत्ववन्नियमात् ॥210॥

अर्थ: भिन्नतामें यह द्रव्य है, यह गुण है यह पर्याय है, ऐसा काल्पनिक भेद जो होता है वह भी उठ जायगा, क्योंकि भिन्नतामें द्रव्यान्तरकी तरह सभी भिन्न २ द्रव्य कहलावेंगे ।


ननु भवतु वस्तु नित्यं गुणाश्च नित्या भवन्तु वार्धिरिव ।
भावाः कल्लोलादिवदुत्पन्नध्वंसिनो भवन्त्विति चेत् ॥211॥

अर्थ: द्रव्य और गुण समुद्रकी तरह नित्य हैं और पर्यायें तरंगोंकी तरह उत्पन्न होती हैं और नष्ट होती हैं ऐसा माननेमें क्या दोष है ?


तन्न यतो दृष्टान्तः प्रकृतार्थस्यैव बाधको भवति ।
अपि तदनुक्तस्यास्य प्रकृतविपक्षस्य साधकत्वाच्च ॥212॥

अर्थ: शङ्काकारकी यह शंका ठीक नहीं है क्योंकि जो दृष्टान्त समुद्र और तरंगोंका उसने दिया है वह उसके प्रकृत अर्थका बाधक हो जाता है और उसके अभिप्रायसे विरुद्ध - (विपक्ष) अर्थका साधक हो जाता है । किस प्रकार ? सो नीचे कहा जाता है -


अर्थान्तरं हि न सतः परिणामेभ्यो गुणस्य कस्यापि ।
एकत्वाज्जलधेरिव कलितस्य तरङ्गमालाभ्यः ॥213॥

अर्थ: जिस प्रकार तरंग मालाओंसे खचित समुद्र एक ही है ऐसा ही नहीं है कि तरंगें समुद्रसे भिन्न हों और समुद्र उनसे भिन्न हो, किन्तु तरंगोंसे डोलायमान होनेवाला समुद्र अभिन्न है, उसी प्रकार सत् ( द्रव्य ) से भिन्न गुण और पर्यायें पदार्थान्तर नहीं हैं ।


किन्तु य एव समुद्रस्तरङ्गमाला भवन्ति ता एव ।
यस्मात्स्वयं स जलधिस्तरङ्गरूपेण परिणमति ॥214॥

अर्थ: किन्तु ऐसा है कि जो समुद्र है वे ही तरङ्गमालायें हैं क्योंकि स्वयं वह समुद्र ही तरंगरूप परिणाम धारण करता है ।


तस्मात्स्वयमुत्पादः सदिति ध्रौव्यं व्ययोपि वा सदिति ।
न सतोऽतिरिक्त एव हि व्युत्पादो वा व्ययोपि वा ध्रौव्यम् ॥215॥

अर्थ: इसलिये ( अथवा इसी प्रकार ) स्वयं सत् ही उत्पाद है, स्वयं सत् ही व्यय है, और वही स्वयं ध्रौव्य है । सत्से भिन्न न कोई उत्पाद है, न व्यय है, और न ध्रौव्य है ।


यदि वा शुद्धत्वनयान्नाप्युत्पादो व्ययोपि न ध्रौव्यम् ।
गुणश्च पर्यय इति वा न स्याच्च केवलं सदिति ॥216॥

अर्थ: अथवा भेद विकल्प निरपेक्ष-शुद्धद्रव्यार्थिक नयसे न कोई उत्पाद है, न व्यय है, न ध्रौव्य है, न गुण है और न पर्याय है । केवल सन्मात्र ही वस्तु है ।


अयमर्थो यदि भेदः स्यादुन्मज्जति तदा हि तत्त्रितयम् ।
अपि तत्त्रितयं निमज्जति यदा निमज्जति स मूलतो भेदः ॥217॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका यही सारांश है कि यदि भेदबुद्धि रक्खी जाती है तब तो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तीनों ही सत् के अंशरूपसे प्रगट हो जाते हैं, और यदि मूलसे भेद बुद्धिको ही दूर कर दिया जाय, तब तीनोंही सन्मात्र वस्तुमें लीन हो जाते हैं ।


ननु चोत्पादध्वंसौ द्वावप्यंशात्मकौ भवेतां हि ।
ध्रौव्यं त्रिकालविषयं तत्कथमंशात्मकं भवेदिति चेत् ॥218॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि उत्पाद और ध्वंस (व्यय) ये दोनों ही अंशात्मक - अंश स्वरूप रहो, परन्तु ध्रौव्य तो सदा रहता है वह किस प्रकार अंश रूप हो सक्ता है ?


नैवं यतस्त्रयोंशाः स्वयं सदेवेति वस्तुतो न सतः ।
नैवार्थान्तरवदिदं प्रत्येकमनेकमिह सदिति ॥219॥

अर्थ: ऊपर की हुई शंका ठीक नहीं है, क्योंकि ये तीनों ही अंश स्वयं सत् स्वरूप हैं। वास्तवमें सत् के नहीं हैं और न पदार्थान्तरकी तरह ही अंश रूप हैं। किन्तु स्वयं सत् ही प्रत्येक अंश रूप है।


तत्रैतदुदाहरणं यद्युत्पादेन लक्ष्यमाणं सत् ।
उत्पादेन परिणतं केवलमुत्पादमात्रमिह वस्तु ॥220॥

अर्थ: इस विषयमें यह उदाहरण है कि यदि सत् उत्पादका लक्ष्य बनाया जाता है अर्थात् वह उत्पाद रूप परिणाम धारण करता है तो वह केवल उत्पाद मात्र है।


यदि वा व्ययेन नियतं केवलमिह सदिति लक्ष्यमाणं स्यात् ।
व्ययपरिणतं च सदिति व्ययमात्रं किल कथं हि तन्न स्यात् ॥221॥

अर्थ: अथवा यदि वह सत् केवल व्ययका लक्ष्य बनाया जाता है, अर्थात् वह व्यय परिणामको धारण करता है तो वह सत् केवल व्यय मात्र ही है ।


ध्रौव्येण परिणतं सद्यदि वा ध्रौव्येण लक्ष्यमाणं स्यात् ।
उत्पादव्ययवदिदं स्यादिति तद् ध्रौव्यमात्रं सत् ॥222॥

अर्थ: यदि सत् ध्रौव्य परिणामको धारण करता है अथवा वह ध्रौव्यका लक्ष्य बनाया जाता है, तब उत्पाद व्यय के समान वह सत् ध्रौव्य मात्र है ।


संदृष्टिर्मृद्द्रव्यं सता घटेनेह लक्ष्यमाणं सन् ।
केवलमिह घटमात्रमसता पिण्डेन पिण्डमात्रं स्यात् ॥223॥

अर्थ: दृष्टान्त के लिये मिट्टी द्रव्य है । जिस समय वह मिट्टी सत् स्वरूप घटका लक्ष्य होती है । उस समय वह केवल घट मात्र है और जिस समय वह असत् स्वरूप पिण्ड का लक्ष्य होती है, तब पिण्ड मात्र है ।


यदि वा तु लक्ष्यमाणं केवलमिह मृच्च मृत्तिकात्वेन ।
एवं चैकस्य सतो व्युत्पादादित्रयश्च तत्रांशाः ॥224॥

अर्थ: यदि वह मिट्टी मिट्टीपनेका ही केवल लक्ष्य बनाई जाती है तब वह केवल मिट्टी मात्र है। इस प्रकार एक ही सत् (द्रव्य) के उत्पाद व्यय ध्रौव्य, ऐसे तीन अंश होते हैं।


न पुनः सतो हि सर्गः केनचिदंशैकभागमात्रेण ।
संहारो वा ध्रौव्यं वृक्षे फलपुष्पपत्रवन्न स्यात् ॥225॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि सत् ( द्रव्य ) का ही किसी एक भागसे उत्पाद हो, और उसीका किसीएक भागसे व्यय हो, और उसीका एक भागसे ध्रौव्य रहता हो। जिस प्रकार कि वृक्षके एक भागमें फल हैं तथा एक भागमें पुष्प हैं और उसके एक भागमें पत्ते हैं । किन्तु ऐसा है कि सत् ही उत्पाद रूप है, सत् ही व्यय रूप है, और सत् ही ध्रौव्य स्वरूप है ।


ननु चोत्पादादित्रयमंशानामथ किमंशिनो वा स्यात् ।
अपि किं सदंशमात्रं किमथांशमसदस्ति पृथगिति चेत् ॥226॥

अर्थ: क्या उत्पादादिक तीनों ही अंशोंके होते हैं ? अथवा अंशीके होते हैं ? अथवा सत्के अंश मात्र हैं ? अथवा असत् - अंश रूप भिन्न २ हैं ?


तन्न यतोऽनेकान्तो बलवानिह खलु न सर्वथैकान्तः ।
सर्वं स्यादविरुद्धं तत्पूर्वं तद्विना विरुद्धं स्यात् ॥227॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है। क्योंकि यहां पर ( जैन दर्शनमें ) नियमसे अनेकान्त ही बलवान् है। सर्वथा एकान्त नहीं। यदि ऊपर किये हुए प्रश्न अनेकान्त दृष्टिसे किये गये हैं तो सभी कथन अविरुद्ध है। किसी दृष्टिसे कुछभी कहा जाय, उसमें विरोध नहीं आसक्ता। और अनेकान्तको छोड़कर केवल एकान्त रूपसे ही उपर्युक्त प्रश्न किये गये हैं तो अवश्य ही एक दूसरेके विरोधी हैं। इसलिये अनेकान्त पूर्वक सभी कथन अविरुद्ध है। और वही कथन उसके विना विरुद्ध है।


केवलमंशानामिह नाप्युत्पादो व्ययोपि न ध्रौव्यम् ।
नाप्यंशिनस्त्रयं स्यात् किमुतांशेनांऽशिनो हि तत्त्रितयम् ॥228॥

अर्थ: केवल अंशोंके ही उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य नहीं होते हैं और न केवल अंशीके ही तीनों होते हैं। किन्तु अंशी के अंश रूपसे उत्पादादिक तीनों होते हैं।


ननु चोत्पादध्वंसौ स्यातामन्वर्थतोऽथ वाङ्मात्रात ।
दृष्टविरुद्धत्वादिह ध्रुवत्वमपि चैकस्य कथमिति चेत् ॥229॥

अर्थ: एक पदार्थ के उत्पाद और ध्वंस भले ही हों; परन्तु उसी पदार्थ के ध्रौव्य भी होता है, यह बात वचन मात्र है, और प्रत्यक्ष बाधित है । एक ही पदार्थ के उत्पाद व्यय और ध्रौव्य ये तीनों किस प्रकार हो सक्ते हैं ?


सत्यं भवति विरुद्धं क्षणभेदो यदि भवेत्त्रयाणां हि ।
अथवा स्वयं सदेव हि नश्यत्युत्पद्यते स्वयं सदिति ॥230॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना तभी ठीक हो सक्ता है अथवा उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, इन तीनोंका एक पदार्थमें तभी विरोध आसक्ता है जब कि इन तीनोंका क्षण भेद हो । अथवा यदि स्वयं सत् ही नष्ट होता हो, और सत् ही उत्पन्न होता हो तब भी इन तीनोंमें विरोध आ सक्ता है ।


कापि कुतश्चित् किञ्चित् कस्यापि कथञ्चनापि तन्न स्यात् ।
तत्साधकप्रमाणाभावादिह सोप्यदृष्टान्तात् ॥231॥

अर्थ: परन्तु ऐसा कहीं किसी कारणसे किसीके किसी प्रकार किञ्चिन्मात्र भी नहीं होता है । उत्पाद भिन्न समयमें होता हो, व्यय भिन्न समयमें होता हो, और ध्रौव्य भिन्न समयमें होता हो इस प्रकार तीनोंके क्षण भेदको सिद्ध करनेवाला न तो कोई प्रमाण ही है, और न कोई उसका साधक दृष्टान्त ही है ।


ननु च स्वावसरे किल सर्गः सर्गैकलक्षणत्वात् स्यात् ।
संहारः स्वावसरे स्यादिति संहारलक्षणत्वाद्वा ॥232॥

अर्थ: उत्पाद अपने समयमें होता है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति होना ही एक लक्षण है । व्यय अपने समयमें होता है, क्योंकि संहार होना ही उसका लक्षण है । इसी प्रकार ध्रौव्य भी अपने समयमें होता है, क्योंकि उसका ध्रुव रहना ही स्वरूप है । जिस प्रकार बीज अङ्कुर और वृक्ष, इनका भिन्न २ क्षण है उसी प्रकार उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यका भी भिन्न २ क्षण है।


ध्रौव्यं चात्मावसरे भवति ध्रौव्यैकलक्षणात्तस्य ।
एवं क्षणभेदः स्याद्बीजाङ्कुरपादपत्ववत्त्वितिचेत् ॥233॥

अर्थ: उत्पाद अपने समयमें होता है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति होना ही एक लक्षण है । व्यय अपने समयमें होता है, क्योंकि संहार होना ही उसका लक्षण है । इसी प्रकार ध्रौव्य भी अपने समयमें होता है, क्योंकि उसका ध्रुव रहना ही स्वरूप है । जिस प्रकार बीज अङ्कुर और वृक्ष, इनका भिन्न २ क्षण है उसी प्रकार उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यका भी भिन्न २ क्षण है।


तन्न यतः क्षणभेदो न स्यादेकसमयमात्रं तत् ।
उत्पादादित्रयमपि हेतोः संदृष्टितोपि सिद्धत्वात् ॥234॥

अर्थ: लक्षणभेद होनेसे तीनोंको भिन्न २ समयमें मानना ठीक नहीं है क्योंकि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य तीनोंका समयभेद नहीं है । तीनों एक ही समयमें होते हैं । यह बात हेतु और दृष्टान्तसे भली भाँति सिद्ध है । इसीका खुलासा नीचे किया जाता है -


अथ तद्यथा हि बीजं बीजावसरे सदेव नासदिति ।
तत्र व्ययो न सत्वाद्व्ययश्च तस्मात्सदङ्कुरावसरे ॥235॥

अर्थ: वीज अपनी पर्यायके समयमें है । वीज पर्यायके समय वीजका अभाव नहीं कहा जा सक्ता । वीज पर्यायके समय वीज पर्यायका व्यय भी नहीं कहा जा सक्ता किन्तु अङ्कुरपर्यायके उत्पाद - समयमें वीज पर्यायका व्यय कहा जा सक्ता है ।


बीजावस्थायामपि न स्यादङ्कुरभवोस्ति वाऽसदिति ।
तस्मादुत्पादः स्यात्स्वावसरे चाङ्कुरस्य नाऽन्यत्र ॥236॥

अर्थ: जो समय वीज पर्यायका है, वह अङ्कुरकी उत्पत्तिका नहीं कहा जासक्ता। वीज पर्यायके समय अङ्कुरके उत्पादका अभाव ही हैं। इस लिये अङ्कुरका उत्पाद भी अपने ही समयमें होगा, अन्य समयमें नहीं।


यदि वाबीजाङ्कुरयोरविशेषात् पादपत्वमिति वाच्यम् ।
नष्टोत्पन्नं न तदिति नष्टोत्पन्नं च पर्ययाभ्यां हि ॥237॥

अर्थ: अथवा बीज और अङ्कुर इन दोनों को सामान्य रीतिसे यदि वृक्ष कहा जाय तो वृक्ष न तो उत्पन्न हुआ, और न वह नष्ट हुआ, किन्तु बीजपर्यायसे नष्ट हुआ है, और अङ्कुर पर्यायसे उत्पन्न हुआ है।


आयातं न्यायबलादेतद्यत्त्रितयमेककालं स्यात् ।
उत्पन्नमङ्कुरेण च नष्टं बीजेन पादपत्वं तत् ॥238॥

अर्थ: यह बात न्यायबलसे सिद्ध हो चुकी कि उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तीनोंका एक ही काल है। वृक्षका अङ्कुर रूपसे जिस समय उत्पाद हुआ है, उसी समय उसका बीज रूपसे व्यय हुआ है, और वृक्षपना दोनों अवस्थाओंमें मौजूद है।


अपि चाङ्कुरसृष्टेरिह य एव समयः स वीजनाशस्य ।
उभयोरप्यात्मत्वात् स एव कालश्च पादपत्वस्य ॥239॥

अर्थ: जो अंकुरकी उत्पत्तिका समय है। वही समय बीजके नाशका है, और अंकुरका उत्पाद तथा बीजका नाश दोनों ही वृक्ष स्वरूप हैं। इस लिये जो समय बीजके नाश और अंकुरके उत्पादका है वही समय वृक्षके ध्रौव्यका है।


तस्मादनवद्यमिदं प्रकृतं तत्त्वस्य चैकसमये स्यात् ।
उत्पादादित्रयमपि पर्यायार्थान्न सर्वथापि सतः ॥240॥

अर्थ: इसलिये यह बात सर्वथा निर्दोष सिद्ध हो गई कि सत् (पदार्थ)के एक समयमें ही उत्पादादिक तीनों होते हैं वे भी पदार्थके पर्यायदृष्टिसे होते हैं, पर्यायनिरपेक्ष पदार्थके नहीं होते।


भवति विरुद्धं हि तदा यदा सतः केवलस्य तत्त्रितयम् ।
पर्ययनिरपेक्षत्वात् क्षणभेदोपि च तदैव सम्भवति ॥241॥

अर्थ: जिस सम उत्पाद आदि तीनों, पर्यायनिरपेक्ष केवल पदार्थके ही माने जांयगे उस समय अवश्य ही तीनोंका एक साथ विरोध होगा, और उसी समय उनके समय भेदकी संभावना भी है ।


यदि वा भवति विरुद्धं तदा यदाप्येकपर्ययस्य पुनः ।
अस्त्युत्पादो यस्य व्ययोपि तस्यैव तस्य वै ध्रौव्यम् ॥242॥

अर्थ: अथवा तब भी विरोध होगा जब कि जिस एक पर्यायका उत्पाद है, उसीका व्यय भी माना जाय, और उसी एक पर्यायका ध्रौव्य भी माना जाय ।


प्रकृतं सतो विनाशः केनचिदन्येन पर्ययेण पुनः ।
केनचिदन्येन पुनः स्यादुत्पादो ध्रुवं तदन्येन ॥243॥

अर्थ: प्रकृतमें ऐसा है कि किसी अन्य पर्यायसे सत्का विनाश होता है, तथा किसी अन्य पर्यायसे उसका उत्पाद होता है, और किसी अन्य पर्यायसे ही उसका ध्रौव्य होता है।


संदृष्टिः पादपवत् स्वयमुत्पन्नः सदङ्कुरेण यथा ।
नष्टो बीजेन पुनर्ध्रुवमित्युभयत्र पादपत्वेन ॥244॥

अर्थ: वृक्षका दृष्टान्त स्पष्ट है। जिस प्रकार वृक्ष सत् रूप अंकुर से स्वयं उत्पन्न होता है, बीज रूपसे नष्ट होता है और वह वृक्षपनेसे दोनों जगह ध्रुव है।


न हि बीजेन विनष्टः स्यादुत्पन्नश्च तेन बीजेन ।
ध्रौव्यं बीजेन पुनः स्यादित्यध्यक्षपक्षबाध्यत्वात् ॥245॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि वृक्ष बीजरूपसे ही तो नष्ट होता हो, उसी बीज रूपसे वह उत्पन्न होता हो और उसी बीज रूपमें वह ध्रुवभी रहता हो क्योंकि यह बात प्रत्यक्ष वाधित है ।


उत्पादव्यययोरपि भवति यदात्मा स्वयं सदेवेति ।
तस्मादेतद्द्वयमपि वस्तु सदेवेति नान्यदस्ति सतः ॥246॥

अर्थ: उत्पाद और व्यय दोनोंका आत्मा ( जीव भूत ) स्वयं सत् ही है - इसलिये ये दोनों ही सद्वस्तुस्वरूप हैं । सत्से भिन्न ये दोनों कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है ।


पर्यायादेशत्वादस्त्युत्पादो व्ययोस्ति च ध्रौव्यम् ।
द्रव्यार्थादेशत्वान्नाप्युत्पादो व्ययोपि न ध्रौव्यम् ॥247॥

अर्थ: पर्यायार्थिक नयसे उत्पाद भी है, व्यय भी है, और ध्रौव्य भी है। द्रव्यार्थिक नय से न उत्पाद है, न व्यय है, और न ध्रौव्य है।


ननु चोत्पादेन सता कृतमसतैकेन वा व्ययेनाऽथ ।
यदि व ध्रौव्येण पुनर्यदवश्यं तत्त्रयेण कथमिति चेत् ॥248॥

अर्थ: यातो सद्रूप उत्पाद स्वरूप ही वस्तु मानो, या असद्रूप व्यय स्वरूप ही वस्तु मानो, अथवा ध्रौव्य स्वरूप ही वस्तु मानो, तीनों स्वरूप उसे कैसे मानते हो ?


तन्न यदविनाभावः प्रादुर्भावध्रुवव्ययानां हि ।
यस्मादेकेन विना न स्यादितरद्द्वयं तु तन्नियमात् ॥249॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि उत्पाद व्यय और ध्रौव्य, इन तीनोंका नियमसे अविनाभाव है क्योंकि एकको छोड़कर दूसरे दोनों भी नहीं रह सक्ते ।


अपि च द्वाभ्यां ताभ्यामन्यतमाभ्यां विना न चान्यतरत् ।
एकं वा तदवश्यं तत्त्रयमिह वस्तु संसिध्यै ॥250॥

अर्थ: अथवा विना किन्हीं भी दोके कोई एक भी नहीं रह सकता है इसलिये यह आवश्यक है कि वस्तुकी भले प्रकार सिद्धिके लिये उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तीनों एक साथ हों।


अथ तद्यथा विनाशः प्रादुर्भावं विना न भावीति ।
नियतमभावस्य पुनर्भावेन पुरस्सरत्वाच्च ॥251॥

अर्थ: तीनोंका परस्पर अविनाभाव है, इसी बातको स्पष्ट किया जाता है कि विनाश (व्यय) विना उत्पादके नहीं हो सक्ता । क्योंकि किसी पर्यायका अभाव नियमसे भाव पूर्वक ही होता है ।


उत्पादोपि न भावी व्ययं विना वा तथा प्रतीतत्वात् ।
प्रत्यग्रजन्मनः किल भावस्याभावतः कृतार्थत्वात् ॥252॥

अर्थ: उत्पाद भी विना व्ययके नहीं हो सक्ता, क्योंकि ऐसी प्रतीति हैं कि नवीन जन्म लेनेवाला भाव अभावसे ही कृतार्थ होता है ।


उत्पादध्वंसौ वा द्वावपि न स्तो विनापि तद्ध्रौव्यम् ।
भावस्याऽभावस्य च वस्तुत्वे सति तदाश्रयत्वाद्वा ॥253॥

अर्थ: अथवा विना ध्रौव्यके उत्पाद, व्यय भी नहीं होसक्ते, क्योंकि वस्तुकी सत्ता होने पर ही उसके आश्रयसे भाव और अभाव (उत्पाद और व्यय) रह सक्ते है ।


अपि च ध्रौव्यं न स्यादुत्पादव्ययद्वयं विना नियमात् ।
यदिह विशेषाभावे सामान्यस्य च सतोप्यभावत्वात् ॥254॥

अर्थ: अथवा विना उत्पाद और व्यय दोनोंके ध्रौव्य भी नियमसे नहीं रह सकता है, क्योंकि विशेषके अभावमें सामान्य सत्का भी अभाव ही है ।


एवं चोत्पादादित्रयस्य साधीयसी व्यवस्थेह ।
नैवान्यथाऽन्यनिन्हववदतः स्वस्यापि घातकत्वाच्च ॥255॥

अर्थ: इस प्रकार वस्तुमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यकी व्यवस्था घटित करना चाहिये । अन्य किसी प्रकार उनकी व्यवस्था नहीं घटित की जा सक्ती है । क्योंकि दूसरेका विघात करनेसे अपना ही विघात हो जाता है ।


अथ तद्यथा हि सर्गं केवलमेकं हि मृगयमाणस्य ।
असदुत्पादो वा स्यादुत्पादो वा न कारणाभावात् ॥256॥

अर्थ: जो केवल एक उत्पादको ही मानता है उसके मतमें असत्का उत्पाद होने लगेगा, अथवा कारणका अभाव होनेसे उत्पाद ही न होगा ।


अप्यथ लोकयतः किल संहारं सर्गपक्षनिरपेक्षम् ।
भवति निरन्वयनाशः सतो न नाशोऽथवाप्यहेतुत्वात् ॥257॥

अर्थ: उत्पादपक्षनिरपेक्ष केवल व्ययको ही जो मानता है, उसके यहां सत्का निरन्वय सर्वथा नाश हो जायगा । अथवा विना कारण उसका नाश भी नहीं हो सक्ता ।


अथ च ध्रौव्यं केवलमेकं किल पक्षमध्यवसतश्च ।
द्रव्यमपरिणामि स्यात्तदपरिणामाच्च नापि तद्ध्रौव्यम् ॥258॥

अर्थ: इसी प्रकार जो उत्पादव्ययनिरपेक्ष केवल ध्रौव्य पक्षको ही स्वीकार करते हैं, उनके मतमें द्रव्य अपरिणामी ठहरेगा और द्रव्यके अपरिणामी होनेसे उसके ध्रौव्य भी नहीं वन सक्ता है ।


अथ च ध्रौव्योपेक्षितमुत्पादादिद्वयं प्रमाणयतः ।
सर्वं क्षणिकमिवैतत् सद्भावे वा व्ययो न सर्गश्च ॥259॥

अर्थ: ध्रौव्य निरपेक्ष केवल उत्पाद और व्यय इन दोको ही जो प्रमाणभूत मानता है, उसके यहां सभी क्षणिककी तरह हो जायगा । अथवा सत् पदार्थके अभावमें न तो व्यय ही बन सक्ता है और न उत्पाद ही बन सक्ता है ।


एतद्दोषभयादिह प्रकृतं चास्तिक्यमिच्छता पुंसा ।
उत्पादादीनामयमविनाभावोऽवगन्तव्यः ॥260॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए दोषोंके भयसे आस्तिक्यके चाहनेवाले पुरुषको प्रकृतमें उत्पाद आदिक तीनोंका ही अविनाभाव मानना चाहिये ।


उक्तं गुणपर्ययवद्द्रव्यं यत्तद्व्ययादियुक्तं सत् ।
अथ वस्तुस्थितिरिह किल वाच्याऽनेकान्तबोधशुद्ध्यर्थम् ॥261॥

अर्थ: द्रव्य गुणपर्यायका समूह है और वह उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यवाला है, यह बात तो कही जा चुकी । अब अनेकान्त (स्याद्वाद)का बोध होनेके लिये वस्तुका विचार करते हैं -


स्यादस्ति च नास्तीति च नित्यमनित्यं त्वनेकमेकं च ।
तदतच्चेति चतुष्टययुग्मैरिव गुम्फितं वस्तु ॥262॥

अर्थ: स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् नित्य, स्यात् अनित्य, स्यात् एक, स्यात् अनेक, स्यात् तत्, स्यात् अतत्, इस प्रकार इन चार युगलोंकी तरह वस्तु अनेक धर्मोंसे गुंथी हुई है ।


अथ तद्यथा यदस्ति हि तदेव नास्तीति तच्चतुष्कं च ।
द्रव्येण क्षेत्रेण च कालेन तथाथ वाऽपि भावेन ॥263॥

अर्थ: उसीका खुलासा करते हैं कि जो कथंचित् (किसी स्वरूपसे) है वही कथंचित नहीं भी है। इसी प्रकार जो कथंचित् नित्य है वही कथंचित् अनित्य भी है। जो कथंचित् एक है वही कथंचित् अनेक भी है। जो कथंचित् वही है, वह कथंचित् वह नहीं भी है। इस प्रकार ये चारों ही कथंचित् वाद (स्याद्वाद) द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षासे होते हैं।


एका हि महासत्ता सत्ता वा स्यादवान्तराख्या च ।
न पृथक्प्रदेशवत्त्वं स्वरूपभेदोपि नानयोरेव ॥264॥

अर्थ: एक तो महासत्ता है। दूसरी अवान्तर सत्ता है। इन दोनों सत्ताओंके वस्तुसे भिन्न प्रदेश नहीं हैं अर्थात् सत्ता स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है तथा दोनोंमें स्वरूप भेद भी नहीं है। दोनोंका एक ही स्वरूप है केवल अपेक्षा-कथन भेद है।


किन्तु सदित्यभिधानं यत्स्यात्सर्वार्थसार्थसंस्पर्शि ।
सामान्यग्राहकत्वात् प्रोक्ता सन्मात्रतो महासत्ता ॥265॥

अर्थ: किन्तु जो सत् सम्पूर्ण पदार्थोंके समूहको स्पर्श करनेवाला है उसे ही महासत्ताके नामसे कहते हैं । वह सामान्यका ग्रहण करनेवाला है और उसहीकी अपेक्षासे वस्तु सन्मात्र है ।


अपिऽचावान्तरसत्ता सद्द्रव्यं सन्गुणश्च पर्यायः ।
सचोत्पादध्वंसः सदिति ध्रौव्यं किलेति विस्तारः ॥266॥

अर्थ: अवान्तर सत्ता हरएककी जुदी जुदी है। वह भिन्न २ रीतिसे ही कही जाती है। जैसे-सत्द्रव्य, सत्गुण, सत्पर्याय, सत्उत्पाद, सत्ध्वंस, सत्ध्रौव्य इस प्रकार और भी लगा लेना चाहिये।


अयमर्थो वस्तु यदा सदिति महासत्तयावधार्येत ।
स्यात्तदवान्तरसत्तारूपेणाभाव एव नतु मूलात् ॥267॥

अर्थ: द्रव्यकी अपेक्षा स्यात् अस्ति और स्यात् नास्तिका अर्थ यह है कि वस्तु जिस समय महासत्ताकी अपेक्षासे कथंचित् है, उस समय अवान्तर सत्ताकी अपेक्षासे वह कथंचित् नहीं भी है। वस्तुमें अवान्तर सत्ताकी अपेक्षासे ही अभाव आता है। वास्तवमें वह अभावात्मक नहीं है।


अपि चाऽवान्तरसत्तारूपेण यदावधार्यते वस्तु ।
अपरेण महासत्तारूपेणाभाव एव भवति तदा ॥268॥

अर्थ: इसी प्रकार जिस समय अवान्तर सत्ताकी अपेक्षासे वस्तु कही जाती है, उस समय उसकी अपेक्षासे तो वह कथंचित् है । परन्तु प्रतिपक्षी महासत्ता की अपेक्षासे कथंचित नहीं भी है ।


दृष्टान्तः स्पष्टोऽयं यथा पटो द्रव्यमस्ति नास्तीति ।
पटशुक्लत्वादीनामन्यतमस्याविवक्षितत्वाच्च ॥269॥

अर्थ: कथंचित् अस्तित्व और कथंचित् नास्तित्वका दृष्टान्त भी स्पष्ट ही है कि जिस प्रकार पट (वस्त्र) द्रव्य पटकी अपेक्षासे तो है परन्तु वही पट द्रव्य पटके शुक्लादि गुणोंकी अविवाक्षाकी अपेक्षासे नहीं है ।


क्षेत्रं द्विधावधानात् सामान्यमथ च विशेषमात्रं स्यात् ।
तत्र प्रदेशमात्रं प्रथमं प्रथमेतरं तदंशमयम् ॥270॥

अर्थ: वस्तुका क्षेत्र भी दो प्रकारसे कहा जाता है। एक सामान्य, दूसरा विशेष। वस्तुके जितने प्रदेश हैं उन प्रदेशोंके समुदायात्मक देशको तो सामान्य क्षेत्र कहते हैं और उसके अंशोंको विशेष क्षेत्र कहते हैं।


अथ केवलं प्रदेशात् प्रदेशमात्रं यदेष्यते वस्तु ।
अस्ति स्वक्षेत्रतया तदंशमात्राऽविवक्षितत्वान्न ॥271॥

अर्थ: जिस समय केवल प्रदेशोंके समुदायकी अपेक्षासे देश रूप वस्तु कही जाती है उस समय वह देश रूप स्वक्षेत्रकी अपेक्षासे तो है परन्तु उस देशके अंशोंकी अविवक्षा होनेसे अंशोंकी अपेक्षासे नहीं है।


अथ केवलं तदंशात्तावन्मात्राद्यदेष्यते वस्तु ।
अस्त्यंशविवक्षितया नास्ति च देशाविवक्षितत्वाच्च ॥272॥

अर्थ: अथवा जिस समय केवल देशके अंशोंकी अपेक्षासे वस्तु कही जाती है उस समय वह अंशोंकी अपेक्षासे तो है, परन्तु देशकी विवक्षा न होनेसे देशकी अपेक्षासे नहीं है।


संदृष्टिःपटदेशः क्षेत्रस्थानीय एव नास्त्यस्ति ।
शुक्लादितन्तुमात्रादन्यतरस्याविवक्षितत्वाद्वा ॥273॥

अर्थ: क्षेत्रके लिये दृष्टान्त पट रूप देश है। वह शुक्लादिस्वभाव-तन्तु समुदायकी अपेक्षासे तथा भिन्न भिन्न अंशोंकी अपेक्षासे कथंचित् अस्ति नास्ति रूप है। जिस समय जिसकी विवक्षा ( कहनेकी इच्छा ) की जाती है वह तो उस समय मुख्य होनेसे अस्ति रूप है और इतर अविवक्षित होनेसे उस समय गौण है इसलिये वह नास्ति रूप है। इस प्रकार क्षेत्रकी अपेक्षासे कथंचित् अस्तित्व और नास्तित्व समझना चाहिये।


कालो वर्तनमिति वा परिणमनं वस्तुनः स्वभावेन ।
सोपि पूर्ववद्द्वयमिह सामान्यविशेषरूपत्वात् ॥274॥

अर्थ: काल नाम वर्तनका है। अथवा वस्तुका स्वभावसे परिणमन होनेका है। वह काल भी पहलेकी तरह सामान्य और विशेष रूपसे दो प्रकार है।


सामान्यं विधिरूपं प्रतिषेधात्मा भवति विशेषश्च ।
उभयोरन्यतरस्यावमग्नोन्मग्नत्वादस्ति नास्तीति ॥275॥

अर्थ: सामान्य विधिरूप है, विशेष प्रतिषेधरूप है। उन दोनोंमेंसे किसी एकके विवक्षित और अविवक्षित होनेसे अस्तित्व और नास्तित्व आता है।


तत्र निरंशो विधिरिति स यथा स्वयं सदेवेति ।
तदिह विभज्य विभागैः प्रतिषेधश्चांशकल्पनं तस्य ॥276॥

अर्थ: अंश कल्पना रहित-निरंश परिणमनको विधि कहते हैं। जैसे-स्वयं सत्का-परिणमन। सत् सामान्यमें अंश कल्पना नहीं है किन्तु उसका सामान्य परिणमन है। और उसी सत्की भिन्न २ विभाजित-अंश-कल्पनाको प्रतिषेध कहते हैं।


तदुदाहरणं सम्प्रति परिणमनं सत्तयावधार्येत ।
अस्ति विवक्षितत्वादिह नास्त्यंशस्याऽविवक्षया तदिह ॥277॥

अर्थ: प्रकृतमें उदाहरण इस प्रकार है कि जिस समय वस्तुमें भेद विवक्षा रहित सत्ता सामान्यके परिणमनकी विवक्षा की जाती है, उस समय वह सामान्य रूप-स्व-कालकी अपेक्षासे तो है, परन्तु अंशोंकी विवक्षा न होनेसे विशेषरूप-परकालकी अपेक्षासे वह नहीं है।


संदृष्टिः पटपरिणतिमात्रं कालायतस्वकालतया ।
अस्ति च तावन्मात्रान्नास्ति पटस्तन्तुशुक्लरूपतया ॥278॥

अर्थ: दृष्टान्तके लिये पट है । सामान्य परिणमनको धारण करनेवाला पट, सामान्य-स्वकालकी अपेक्षासे तो है, परन्तु वही पट तन्तु और शुक्लरूप विशेष परिणमन ( परकाल ) की अपेक्षासे नहीं है ।


भावः परिणामः किल स चैव तत्त्वस्वरूपनिष्पत्तिः ।
अथवा शक्तिसमूहो यदि वा सर्वस्वसारः स्यात् ॥279॥

अर्थ: भाव नाम परिणामका है और वही तत्त्वके स्वरूपकी प्राप्ति है, अथवा शक्तियोंके समूहका नाम भी भाव है, अथवा वस्तुके सारका नाम ही भाव है ।


स विभक्तो द्विविधः स्यात्सामान्यात्मा विशेषरूपश्च ।
तत्र विवक्ष्यो मुख्यः स्यात्स्वभावोऽथ गुणोहि परभावः ॥280॥

अर्थ: वह भाव भी सामान्यात्मक और विशेषात्मक ऐसे दो भेदवाला है । उन दोनोंमें जो भाव विवक्षित होता है वह मुख्य होजाता है और जो अविवक्षित भाव है वह गौण होजाता है


सामान्यं विधिरेव हि शुद्धः प्रतिषेधकश्च निरपेक्षः ।
प्रतिषेधो हि विशेषः प्रतिषेध्यः सांशकश्च सापेक्षः ॥281॥

अर्थ: सामान्य विधिरूप ही है। वह शुद्ध है, प्रतिषेधक है और निरपेक्ष है। विशेष प्रतिषेध रूप है, प्रतिषेध्य है अंश सहित है और सापेक्ष है।


अयमर्थो वस्तुतया सत्सामान्यं निरंशकं यावत् ।
भक्तं तदिह विकल्पैर्द्रव्याद्यैरुच्यते विशेषश्च ॥282॥

अर्थ: ऊपरके श्लोकका खुलासा अर्थ यह है कि सत् ( पदार्थ ) जब तक अपनी वस्तुतामें सामान्यरीतिसे स्थिर है, और जब तक उसमें भेद कल्पना नहीं की जाती है तब तक तो वह सत् शुद्ध अखण्ड है, और जब वह द्रव्य, गुण, पर्याय आदि भेदोंसे विभाजित किया जाता है, तब वही सत् विशेष-खण्डरूप कहलाता है ।


तस्मादिदमनवद्यं सर्वं सामान्यतो यदाप्यस्ति ।
शेषविशेषविवक्षाभावादिह तदैव तन्नास्ति ॥283॥

अर्थ: इसलिये यह बात निर्दोष रीतिसे सिद्ध हो चुकी कि सम्पूर्ण पदार्थ जिस समय सामान्यतासे विवक्षित किये जाते हैं उस समय वे सामान्यतासे तो हैं, परन्तु शेष-विशेष विवक्षाका अभाव होनेसे वे नहीं भी हैं ।


यदि वा सर्वमिदं यद्विवक्षितत्वाद्विशेषतोऽस्ति यदा ।
अविवक्षितसामान्यात्तदैव तन्नास्ति नययोगात् ॥284॥

अर्थ: अथवा सम्पूर्ण पदार्थ जिस समय विशेषतासे विवक्षित किये जाते हैं, उस समय वे उसकी अपेक्षासे तो हैं, परन्तु उस समय सामान्य विवक्षाका उनमें अभाव होनेसे सामान्य दृष्टिसे वे नहीं भी हैं ।


तत्र विवक्ष्यो भावः केवलमस्ति स्वभावमात्रतया ।
अविवक्षितपरभावाभावतया नास्ति सममेव ॥285॥

अर्थ: वस्तुके सामान्य और विशेष भावोंमें जो भाव विवक्षित होता है, वही केवल वस्तुका स्व-भाव समझा जाता है, और उसी स्वभावकी अपेक्षासे वस्तुमें अस्तित्व आता है। परन्तु जो भाव अविवक्षित होता है, वही पर-भाव कहलाता है। जिस समय स्वभावकी विवक्षा की जाती है, उस समय परभावकी विवक्षा न होनेसे उसका वस्तुमें अभाव समझा जाता है। इसलिये परभाव की अपेक्षासे वस्तुमें नास्तित्व आता है। अस्तित्व और नास्तित्व दोनों एक कालमें ही वस्तुमें घटित होते हैं।


सर्वत्र क्रम एष द्रव्ये क्षेत्रे तथाऽथ काले च ।
अनुलोमप्रतिलोमैरस्तीति विवक्षितो मुख्यः ॥286॥

अर्थ: सर्वत्र यही ( ऊपर कहा हुआ ) क्रम लगा लेना चाहिये अर्थात् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव, चारों ही जगह अनुकूलता और प्रतिकूलताके अनुसार विवक्षित भाव है वही मुख्य समझा जाता है । यहां पर “च” से भावका ग्रहण किया गया है ।


संदृष्टिः पटभावः पटसारो वा पटस्य निष्पत्तिः ।
अस्त्यात्मना च तदितरघटादिभावाऽविवक्षया नास्ति ॥287॥

अर्थ: पटका भाव, पटका सार, पटके स्वरूपकी प्राप्ति, ये तीनों ही बातें एक अर्थवाली हैं। पटका भाव अपने स्वरूपकी अपेक्षासे है परन्तु उसके इतर घट आदि भावोंकी अविवक्षा होनेसे वह नहीं है। क्योंकि विवक्षित भावको छोड़कर बाकी सभी भाव अविवक्षित हैं।


अपि चैवं प्रक्रियया नेतव्याः पञ्चशेषभङ्गाश्च ।
वर्णवदुक्तद्वयमिह पटवच्छेषास्तु तद्योगात् ॥288॥

अर्थ: इसी प्रक्रियाके अनुसार बाकीके पांच भङ्ग भी वस्तुमें घटित कर लेना चाहिये । ‘स्यात् अस्ति’ और ‘स्यात् नास्ति’ ये दो भंग वर्णकी तरह कह दिये गये हैं । बाकीके भंग पटकी तरह उन्हीं दो भंगोंके योगसे घटित करना चाहिये ।


ननु चान्यतरेण कृतं किमथ प्रायः प्रयासभारेण ।
अपि गौरवप्रसंगादनुपादेयाच्च वाग्विलसितत्वात् ॥289॥

अर्थ: अस्ति नास्ति दोनोंमेंसे एक ही कहना चाहिये उसीसे काम चल जायगा, व्यर्थके प्रयास ( कष्ट ) से क्या प्रयोजन है.। इसके सिवाय दोनों कहनेसे उल्टा गौरव होता है, तथा वचनोंका आधिक्य होनेसे उसमें ग्राह्यता भी नहीं रहती है। इसलिये तत्त्वकी भले प्रकार सिद्धिके लिये या तो केवल ‘अस्ति’ ही कहना ठीक है, अथवा केवल ‘नास्ति’ कहना ही ठीक है। दोनोंका अलग २ ग्रहण करना युक्ति संगत नहीं है, दोनोंका ग्रहण व्यर्थ ही पड़ता है ?


अस्तीति च वक्तव्यं यदि वा नास्तीति तत्त्वसंसिध्यै ।
नोपादानं पृथगिह युक्तं तदनर्थकादिति चेत् ॥290॥

अर्थ: अस्ति नास्ति दोनोंमेंसे एक ही कहना चाहिये उसीसे काम चल जायगा, व्यर्थके प्रयास ( कष्ट ) से क्या प्रयोजन है.। इसके सिवाय दोनों कहनेसे उल्टा गौरव होता है, तथा वचनोंका आधिक्य होनेसे उसमें ग्राह्यता भी नहीं रहती है। इसलिये तत्त्वकी भले प्रकार सिद्धिके लिये या तो केवल ‘अस्ति’ ही कहना ठीक है, अथवा केवल ‘नास्ति’ कहना ही ठीक है। दोनोंका अलग २ ग्रहण करना युक्ति संगत नहीं है, दोनोंका ग्रहण व्यर्थ ही पड़ता है ?


तन्न यतः सर्वं स्वं तदुभयभावाध्यवसितमेवेति ।
अन्यतरस्य विलोपे तदितरभावस्य निह्नवापत्तेः ॥291॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ ’ अस्ति नास्ति ’ स्वरूप उभय ( दोनों ) भावोंको लिये हुए हैं। यदि इन दोनों भावोंमेंसे किसी एकका भी लोप कर दिया जाय, तो बाकीका दूसरा भाव भी लुप्त हो जायगा ।


स यथा केवलमन्वयमात्रं वस्तु प्रतीयमानोपि ।
व्यतिरेकाभावे किल कथमन्वयसाधकश्च स्यात् ॥292॥

अर्थ: यदि केवल ’ अस्ति ’ रूप वस्तुको माना जावे तो वह सदा अन्वयमात्र ही प्रतीत होगी, व्यतिरेक रूप नहीं होगी और विना व्यतिरेकभावके स्वीकार किये वह अन्वयकी साधक भी नहीं रहेगी ।


ननु का नो हानिः स्यादस्तु व्यतिरेक एव तद्वदपि ।
किन्त्वन्वयो यथाऽस्ति व्यतिरेकोप्यस्ति चिदचिदिव ॥293॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है । वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव । यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है । इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं । जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है । दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये । जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है । पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं। जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है । उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है । ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


यदि वा स्यान्मतं ते व्यतिरेके नान्वयः कदाप्यस्ति ।
न तथा पक्षच्युतिरिह व्यतिरेकोप्यन्वये यतो न स्यात् ॥294॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है । वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव । यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है । इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं । जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है । दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये । जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है । पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं । जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है । उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है । ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


तस्मादिदमनवद्यं केवलमयमन्वयो यथास्ति तथा ।
व्यतिरेकोस्त्यविशेषादेकोक्तया चैकशः समानतया ॥295॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है । वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव । यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है । इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं । जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है । दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये । जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है । पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं । जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है । उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है । ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


दृष्टान्तोप्यस्ति घटो यथा तथा स्वस्वरूपतोस्ति पटः ।
न घटः पटेऽथ न पटो घटेपि भवतोऽथ घटपटाविह हि ॥296॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है । वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव । यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है । इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं । जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है । दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये । जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है । पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं । जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है । उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है । ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


न पटाभावो हि घटो न पटाभावे घटस्य निष्पत्तिः ।
न घटाभावो हि पटः पटसर्गो वा घटव्ययादिति चेत् ॥297॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है। वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव। यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है। इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं। जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है। दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये। जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है। पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं। जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है। उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है। ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


तत्किं व्यतिरेकस्याभावेन विनाऽन्वयोपि नास्तीति ।
अस्त्यन्वयः स्वरूपादिति वक्तुं शक्यते यतस्त्विति चेत् ॥298॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि यदि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं बनता, तो व्यतिरेक भी उसी तरह मानो, इसमें हमारी कौनसी हानि है ? किन्तु इतना अवश्य मानना चाहिये कि अन्वय स्वतन्त्र है, और व्यतिरेक स्वतंत्र है । वे दोनों ऐसे ही स्वतन्त्र हैं जैसे कि जीव और अजीव । यदि कदाचित् तुम्हारा ऐसा सिद्धान्त हो कि व्यतिरेकमें अन्वय कभी नहीं रहता है तो भी हमारे पक्षका खण्डन नहीं होता है, क्योंकि जिस प्रकार व्यतिरेकमें अन्वय नहीं रहता है, उसी प्रकार अन्वयमें व्यतिरेक भी नहीं रहता है । इसलिये यह बात निर्दोष सिद्ध है कि जिस प्रकार केवल अन्वय है, उसी प्रकार व्यतिरेक भी है सामान्य दृष्टिसे दोनों ही समान हैं । जैसे अन्वय कहा जाता है, वैसे ही व्यतिरेक भी कहा जाता है । दृष्टान्त भी इस विषयमें घट पटका ले लीजिये । जिस प्रकार घट अपने स्वरूपको लिये हुए जुदा है, उसी प्रकार अपने स्वरूपको लिये हुए पट भी जुदा है । पटमें घट नहीं रहता है, और न घटमें पट ही रहता है, किन्तु घट और पट दोनों जुदे२ हैं । जिसप्रकार पटका अभाव घट नहीं है, और न पटके अभावमें घटकी उत्पत्ति ही होती है । उसी प्रकार पटभी घटका अभाव नहीं है, और न घटके अभावसे पटकी उत्पत्ति ही होती है । ऐसी अवस्थामें आपका (ग्रन्थकारका) यह कहना कि व्यतिरेकके अभावमें अन्वय भी नहीं होता है, ठीक नहीं है, क्योंकि घट पटकी तरह हम यह कह सकते हैं कि अन्वय अपने स्वरूपसे जुदा है और व्यतिरेक अपने स्वरूपसे जुदा है, ऐसी अवस्थामें विना व्यतिरेकके भी अन्वय हो सकता है ?


तन्न यतः सदिति स्यादद्वैतं द्वैतभावभागपि च ।
तत्र विधौ विधिमात्रं तदिह निषेधे निषेधमात्रं स्यात् ॥299॥

अर्थ: शङ्काकारकी उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है । क्योंकि सत् (द्रव्य) कथंचित् अद्वैत भी है, और कथंचित् द्वैत भी है । उन दोनोंमें विधिके विवक्षित होनेपर वह सत् विधि मात्र है, और वही सत् निषेधके विवक्षित होनेपर निषेध मात्र है ।


नहिं किंचिद्विधिरूपं किञ्चित्तच्छेषतो निषेधांशम् ।
आस्तां साधनमस्मिन्नाम द्वैतं न निर्विशेषत्वात् ॥300॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि द्रव्यका कुछ भाग तो विधिरूप है, और कुछ भाग निषेधरूप है। इसमें द्वैत-हेतु भी नहीं हो सकता है, क्योंकि द्रव्य केवल विशेषात्मक ही नहीं है।

पूर्वार्द्ध 301 से 400 (श्लोक 301 से 384)

न पुनर्द्रव्यान्तरवत्संज्ञा भेदोप्यबाधितो भवति ।
तत्र विधौ विधिमात्राच्छेषविशेषादिलक्षणाभावात् ॥301॥

अर्थ: ऐसा भी नहीं है कि द्रव्यान्तर ( घट, पट ) की तरह विधि, निषेध, दोनों ही सर्वथा भिन्न हों, सर्वथा नाम भेद भी इनमें बाधित ही है, क्योंकि सर्वथा विधिको कहनेसे वस्तु सर्वथा विधिमात्र ही हो जाती है, बाकीके विशेष लक्षणोंका उसमें अभाव ही हो जाता है। उसी प्रकार सर्वथा निषेधको कहनेसे उसमें विधिका अभाव होजाता है। इन दोनोंके सर्वथा भेदमें वस्तुकी वस्तुता ही चली जाती है। यदि वस्तुको उभयात्मक माना जाय तो प्रकृतकी सिद्धि होजाती है।


अपि च निषिद्धत्वे सति नहि वस्तुत्वं विधेरभावत्वात् ।
उभयात्मकं यदि खलु प्रकृतं न कथं प्रमीयेत ॥302॥

अर्थ: ऐसा भी नहीं है कि द्रव्यान्तर ( घट, पट ) की तरह विधि, निषेध, दोनों ही सर्वथा भिन्न हों, सर्वथा नाम भेद भी इनमें बाधित ही है, क्योंकि सर्वथा विधिको कहनेसे वस्तु सर्वथा विधिमात्र ही हो जाती है, बाकीके विशेष लक्षणोंका उसमें अभाव ही हो जाता है। उसी प्रकार सर्बथा निषेधको कहनेसे उसमें विधिका अभाव होजाता है । इन दोनोंके सर्वथा भेदमें वस्तुकी वस्तुता ही चली जाती है । यदि वस्तुको उभयात्मक माना जाय तो प्रकृतकी सिद्धि होजाती है ।


तस्मद्विधिरूपं वा निर्दिष्टं सन्निषेधरूपं वा ।
संहृत्यान्यतरत्वादन्यतरे सन्निरूप्यते तदिह ॥303॥

अर्थ: जब यह बात सिद्ध होचुकी कि पदार्थ विधि निषेधात्मक है, तब वह कभी विधिरूप कहा जाता है, और कभी निषेधरूप कहा जाता है ।


दृष्टान्तोऽत्र पटत्वं यावन्निर्दिष्टमेव तन्तुतया ।
तावन्न पटो नियमाद् दृश्यन्ते तन्तवस्तथाऽध्यक्षात् ॥304॥

अर्थ: दृष्टान्तके लिये पट है। जिस समय पट तन्तुकी दृष्टिसे देखा जाता है, उस समय वह पट प्रतीत नहीं होता, किन्तु तन्तु ही दृष्टिगत होते हैं। यदि वही पट पटबुद्धिसे देखा जाता है, तो वह पट ही प्रतीत होता है, उस समय वह तन्तुरूप नहीं दीखता।


यदि पुनरेव पटत्वं तदिह तथा दृश्यते न तन्तुतया ।
अपि संगृह्य समन्तात् पटोयमिति दृश्यते सद्भिः ॥305॥

अर्थ: दृष्टान्तके लिये पट है। जिस समय पट तन्तुकी दृष्टिसे देखा जाता है, उस समय वह पट प्रतीत नहीं होता, किन्तु तन्तु ही दृष्टिगत होते हैं। यदि वही पट पटबुद्धिसे देखा जाता है, तो वह पट ही प्रतीत होता है, उस समय वह तन्तुरूप नहीं दीखता।


इत्यादिकाश्च बहवो विद्यन्ते पाक्षिका हि दृष्टान्ताः ।
तेषामुभयाङ्गत्वान्नहि कोपि कदा विपक्षः स्यात् ॥306॥

अर्थ: पटकी तरह और भी अनेक ऐसे दृष्टान्त हैं, जो कि हमारे पक्षको पुष्ट करते हैं, वे सभी दृष्टान्त उभयपनेको सिद्ध करते हैं, इसलिये उनमेंसे कोई भी दृष्टान्त कमी हमारा ( जैन दर्शनका ) विपक्ष नहीं होने पाता है ।


अयमर्थो विधिरेव हि युक्तिवशात्स्यात्स्वयं निषेधात्मा ।
अपि च निषेधस्तद्वद्विधिरूपः स्यात्स्वयं हि युक्तिवशात् ॥307॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए कथनका खुलासा अर्थ यह है कि विधि ही युक्तिके वशसे स्वयं निषेधरूप होजाती है। और जो निषेध है, वह भी युक्तिके वशसे स्वयं विधिरूप होजाता है।


इति विन्दन्निह तत्त्वं जैनः स्यात्कोऽपि तत्त्ववेदीति ।
अर्थात्स्यात्स्याद्वादी तदपरथा नाम सिंहमाणवकः ॥308॥

अर्थ: ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार जो कोई तत्त्वका ज्ञाता तत्त्वको जानता है, वही जैन है, और वही वास्तविक स्याद्वादी है। यदि ऊपर कही हुई रीतिसे तत्त्वका स्वरूप नहीं जानता है, तो वह स्याद्वादी नहीं है किन्तु उसका नाम सिंहमाणवक है। किसी बालकको यदि सिंह कह दिया जाय तो उसे सिंह माणवक कहते हैं। बालक वास्तवमें सिंह नहीं है।


ननु सदिति स्थायि यथा सदिति तथा सर्वकालसमयेषु ।
तत्र विवक्षितसमये तत्स्यादथवा न तदिदमिति चेत् ॥309॥

अर्थ: सत् ध्रुवरूपसे रहता हैं, इसलिये वह सम्पूर्ण कालके सभी समयोमें रहता है, फिर आप (जैन) यह क्यों कहते है कि वह सत् विवक्षित समयमें ही है, अविवक्षित समयमें वह नहीं है ?


सत्यं तत्रोत्तरमिति सन्मात्रापेक्षया तदेवेदम् ।
न तदेवेदं नियमात् सदवस्थापेक्षया पुनः सदिति ॥310॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ठीक है, तुम्हारी शंकाका उत्तर यह है कि सत्ता मात्रकी अपेक्षासे तो सत् वही है, और सत्की अवस्थाओंकी अपेक्षासे सत् वह नहीं है ।


ननु तदतदोर्द्वयोरिह नित्यानित्यत्वयोर्द्वयोरेव ।
को भेदो भवति मिथो लक्षणलक्ष्यैकभेदभिन्नत्वात् ॥311॥

अर्थ: तत् और अतत् इन दोनोंमें तथा नित्य और अनित्य इन दोनोंमें परस्पर क्या भेद है, क्योंकि दोनोंका एक ही लक्षण है, और एक ही लक्ष्य है ?


नैवं यतो विशेषः समयात्परिणमति वा न नित्यादौ ।
तदतद्भावविचारे परिणामो विसदृशोऽथ सदृशो वा ॥312॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि नित्य अनित्यमें और तद्भाव अतद्भावमें अवश्य भेद है। भेद भी यह है कि नित्य, अनित्य पक्षमें तो वस्तुके समय समयमें होनेवाले परिणमनका ही विचार होता है, वहां पर 'समान परिणाम हैं या असमान हैं, इसका विचार नहीं होता है, परन्तु तद्भाव, अतद्भाव पक्षमें यह विचार होता है कि जो वस्तुमें परिणमन हो रहा है, वह सदृश है अथवा विसदृश है।


ननु सन्नित्यमनित्यं कथञ्चिदेतावतैव तत्सिद्धिः ।
तत्किं तदतद्भावाभावविचारेण गौरवादिति चेत् ॥313॥

अर्थ: सत् कथंचित नित्य है, कथंचित् अनित्य है, इतना ही कहनेसे वस्तुकी सिद्धि हो जाती है, फिर तत्, अतत्के भाव और अभावके बिचारसे क्या प्रयोजन ? इससे उल्टा गौरव ही होता है ?


नैवं तदतद्भावाभावविचारस्य निन्हवे दोषात् ।
नित्यानित्यात्मनि सति सत्यपि न स्यात् क्रियाफलं तत्त्वम् ॥314॥

अर्थ: ऊपर की हुई शंका ठीक नहीं है, क्योंकि तत्, अतत्के भाव और अभावका विचार यदि न किया जाय तो वस्तु सदोष ठहरती है । तत् अतत्के बिना वस्तुको नित्य और अनित्य स्वरूप मानने पर भी उसमें क्रिया और फल नहीं बन सकते ।


अयमर्थो यदि नित्यं सर्वं सत् सर्वथेति किल पक्षः ।
न तथा कारणकार्ये, कारकासिद्धिस्तु विक्रियाभावात् । ॥315॥

अर्थ: स्पष्ट अर्थ यह है कि " सर्व सत् नित्य ही है " यदि सर्वथा ऐसा ही पक्ष मान लिया जाय, तो कारण और कार्य, दोनों ही नहीं बनते। विक्रियाका अभाव होनेसे कार्य-सिद्धि ही नहीं होती।


यदि वा सदनित्यं स्यात्सर्वस्वं सर्वथेति किल पक्षः ।
न तथा क्षणिकत्वादिह क्रियाफलं कारकाणि तत्त्वं च ॥316॥

अर्थ: अथवा सतको यदि सर्वथा अनित्य ही स्वीकार किया जाय तो वह क्षणिक ठहरेगा। और क्षणिक होनेसे उसमें न तो क्रियाका फल ही हो सकता है, और न कारणता ही आ सकती है।


अपि नित्यानित्यात्मनि सत्यपि सति वा न साध्यसंसिद्धिः ।
तदतद्भावाभावैर्विना न यस्माद्विशेषनिष्पत्तिः ॥317॥

अर्थ: यदि तत् अतत्के भाव, अभावका विचार न करके केवल नित्यानित्यात्मक ही पदार्थ माना जाय, तो भी साध्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है, क्योंकि विना तत् अतत्का विचार किये पदार्थमें विशेष बुद्धि ही नहीं हो सकती है ।


अथ तद्यथा यथा सत्परिणममानं यदुक्तमस्तु तथा ।
भवति समीहितसिद्धिर्विना न तदतद्विवक्षया हि यथा ॥318॥

अर्थ: यदि सत् (पदार्थ) परिणमन करता हुआ भी नित्य अनित्य स्वरूप ही माना जाय, और उसमें तत् अतत्की विवक्षा न की जाय तो इच्छित अर्थकी सिद्धि नहीं होसक्ती है । उसे ही नीचे दिखलाते हैं -


अपि परिणमनमानं सन्नतदेतत् सर्वथाऽन्यदेवेति ।
इति पूर्वपक्षः किल विना तदेवेति दुर्निवारः स्यात् ॥319॥

अर्थ: " परिणमन करता हुआ सत् वही नहीं है जो पहले था किन्तु उससे सर्वथा भिन्न ही है " इस प्रकारका किया हुआ पूर्व पक्ष ( आशंका ) विना तत्पक्षके स्वीकार किये दूर नहीं किया जा सक्ता है ।


अपि परिणतं यथा सद्दीपशिखा सर्वथा तदेव यथा ।
इति पूर्वपक्षः किल दुर्वारः स्याद्विना न तदिति नयात् ॥320॥

अर्थ: " परिणमन करता हुआ सत् वही नहीं है जो पहले था किन्तु उससे सर्वथा भिन्न ही है " इस प्रकारका किया हुआ पूर्व पक्ष ( आशंका ) विना तत्पक्षके स्वीकार किये दूर नहीं किया जा सक्ता है । इसी प्रकार उस परिणमनशील सत्में दूसरा पूर्वपक्ष ऐसा भी होसक्ता है कि " यह दीप-शिखा सर्वथा वही है जो पहले थी " इसका समाधान भी विना अतत् पक्षके स्वीकार किये नहीं होसक्ता है ।


तस्मादवसेयं सन्नित्यानित्यत्ववत्तदतद्वत् ।
यस्मादेकेन विना न समीहितसिद्धिरध्यक्षात् ॥321॥

अर्थ: इसलिये यह बात निश्चित समझना चाहिये कि नित्य अनित्य पक्षकी तरह तत् अतत् पक्ष भी वस्तुमें मानना योग्य है । क्योंकि जिस प्रकार नित्य अनित्य पक्षके विना स्वीकार किये इच्छित अर्थकी सिद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार विना तत् अतत् पक्षके स्वीकार किये भी इच्छित अर्थकी सिद्धि नहीं हो सक्ती है । इसलिये दोनोंका मानना ही परम आवश्यक है ।


ननु भवति सर्वथैव हि परिणामो विसदृशोऽथ सदृशो वा ।
ईहितसिद्धिस्तु सतः परिणामित्वाद्यथाकथञ्चिद्वै ॥322॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि परिणाम चाहे सर्वथा समान हो अथवा चाहे सर्वथा असमान हो, तुम्हारे इच्छित अर्थकी सिद्धि तो पदार्थको परिणामी माननेसे ही यथा कथञ्चित् बन ही जायगी ?


तन्न यतः परिणामः सन्नपि सदृशैकपक्षतो न तथा ।
न समर्थश्चार्थकृते नित्यैकान्तादिपक्षवत् सदृशात् ॥323॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि सत्में दो प्रकारका ही परिणमन होगा, सदृशरूप अथवा विसदृशरूप। यदि सदृश रूप ही सत्में परिणमन माना जाय तो भी इष्ट अर्थकी सिद्धि नहीं होती है। जिस प्रकार नित्यैकान्त पक्षमें दोष आते हैं उसी प्रकार सदृश परिणाममें भी दोष आते हैं उससे भी अभीष्टकी सिद्धि नहीं होती है।


नापीष्टः संसिध्यै परिणामो विसदृशैकपक्षात्मो ।
क्षणिकैकान्तवदसतः प्रादुर्भावात् सतो विनाशाद्वा ॥324॥

अर्थ: यदि विसदृश रूप एक पक्षात्मक ही परिणमन माना जाय तो भी अभीष्टकी सिद्धि नहीं होती हैं। केवल विसदृश पक्ष माननेमें क्षणिकैकान्तकी तरह असत्की उत्पत्ति और सत्का विनाश होने लगेगा ।


एतेन निरस्तोऽभूत् क्लीवत्वादात्मनोऽपराद्धतया ।
तदतद्भावाभावापन्हववादी विबोध्यते त्वधुना ॥325॥

अर्थ: सदृश, असदृश पक्षमें नित्यैकान्त और अनित्यैकान्तके समान दोष आनेसे तत् अतत् पक्षका लोप करनेवाला शंकाकार खण्डित हो चुका । क्योंकि वह आत्मापराधी होनेसे स्वयं शक्ति हीन होचुका । अस्तु, अब हम (आचार्य) उसे समझाते हैं ।


तदतद्भावनिबद्धो यः परिणामः सतः स्वभावतया ।
तद्दर्शनमधुना किल दृष्टान्तपुरस्सरं वक्ष्ये ॥326॥

अर्थ: तद्भाव और अतद्भावके निमित्तसे जो वस्तुका स्वभावसे परिणमन होता है, उसका स्वरूप अब दृष्टान्त पूर्वक कहा जाता है ।


जीवस्य यथा ज्ञानं परिणामः परिणमँस्तदेवेति ।
सदृशस्योदाहृतिरिति जातेरनतिक्रमत्वतो वाच्या ॥327॥

अर्थ: जैसे जीवका ज्ञान परिणाम, परिणमन करता हुआ सदा वही (ज्ञान रूप ही) रहता है । ज्ञानके परिणमनमें ज्ञानत्व जाति (ज्ञानगुण) का कभी उल्लंघन नहीं होता है । यही सदृश परिणमनका उदाहरण है ।


यदि वा तदिह ज्ञानं परिणामः परिणमन्न तदिति यतः ।
स्वावसरे यत्सत्त्वं तदसत्त्वं परत्र नययोगात् ॥328॥

अर्थ: अथवा वही जीवका ज्ञान परिणाम परिणमन करता हुआ वह नहीं भी रहता है, क्योंकि उसका एक समयमें जो सत्त्व है, वह नय दृष्टिसे दूसरे समयमें नहीं है।


अत्रापि च संदृष्टिः सन्ति च परिणामतोपि कालांशाः ।
जातेरनतिक्रमतः सदृशत्वनिबन्धना एव ॥329॥

अर्थ: यहां पर दूसरा यह भी दृष्टान्त है कि यद्यपि कालके अंश परिणमनशील हैं तथापि स्वजातिका उछंघन नहीं होनेसे वे पदार्थोंमें सदृशबुद्धिके ही उत्पादक हैं ।


अपि नययोगाद्विसदृशसाधनसिध्यै त एव कालांशाः ।
समयः समयः समयः सोपीति बहुप्रतीतित्वात् ॥330॥

अर्थ: अथवा नयदृष्टिसे वे ही कालके अंश विसदृश बुद्धिके उत्पादक हो जाते हैं । क्योंकि उनमें एक समय, दो समय, तीन समय, चार समय आदि अनेक रूपसे भिन्न २ प्रतीति होती है, वही क्षणभेद - प्रतीति पदार्थ भेदका कारण है ।


अतदिदमिहप्रतीतौ क्रियाफलं कारकाणि हेतुरिति ।
तदिदं स्यादिह संविदि हि हेतुस्तत्त्वं हि चेन्मिथः प्रेम ॥331॥

अर्थ: ’ अतत् ’ अर्थात् यह वह नहीं है इस प्रतीतिमें क्रिया, फल, कारण ये सब हेतु हैं । ‘तत्’ अर्थात् यह वही है इस प्रतीतिमें परस्पर प्रेमभाव ( ऐक्यभाव ) को लिये हुए तत्त्व ही नियमसे हेतु है ।


अयमर्थः सदसद्वत्तदतदपि च विधिनिषेधरूपं स्यात् ।
न पुनर्निरपेक्षतया तद्द्वयमपि तत्त्वमुभयतया ॥332॥

अर्थ: तात्पर्य यह है कि सत् और असतके समान तत् और अतत् भी विधि, निषेधरूप है, परन्तु निरपेक्ष दृष्टिसे वे ऐसे नहीं है, क्योंकि एक दूसरेकी सापेक्षतामें दोनों रूप ही वस्तु है ।


रूपनिदर्शनमेतत्तदिति यदा केवलं विधिर्मुख्यः ।
अतदिति गुणो पृथक्त्वात्तन्मात्रं निरवशेषतया ॥333॥

अर्थ: विधि निषेधकी परस्पर सापेक्षतामें इतना विशेष है कि जिस समय केवल विधिको मुख्यतासे कहा जाता है उस समय अतत् अर्थात् निषेध कथन गौण हो जाता है, क्योंकि वह विधिसे जुदा है। विधिकी विवक्षामें वस्तु केवल विधि रूप ही प्रतीत होती है। उसी प्रकार जब ‘अतत्’ यह विधि कथन विवक्षित होता है, तब आदेशानुसार केवल वही मुख्य होजाता है, उस समय तत् कथन अविवक्षित होनेसे गौण होजाता है, अतत् विवक्षामें वस्तु तन्मात्र नहीं समझी जाती किन्तु अतन्मात्र ही समझी जाती है। यही विधिनिषेधका स्वरूप निदर्शन है।


अतदिति विधिर्विवक्ष्यो मुख्यःस्यात् केवलं यदादेशात् ।
तदिति स्वतो गुणत्वादविवक्षितमित्यतन्मात्रम् ॥334॥

अर्थ: विधि निषेधकी परस्पर सापेक्षतामें इतना विशेष है कि जिस समय केवल विधिको मुख्यतासे कहा जाता है उस समय अतत् अर्थात् निषेध कथन गौण हो जाता है, क्योंकि वह विधिसे जुदा है। विधिकी विवक्षामें वस्तु केवल विधि रूप ही प्रतीत होती है। उसी प्रकार जब ‘अतत्’ यह विधि कथन विवक्षित होता है, तब आदेशानुसार केवल वही मुख्य होजाता है, उस समय तत् कथन अविवक्षित होनेसे गौण होजाता है, अतत् विवक्षामें वस्तु तन्मात्र नहीं समझी जाती किन्तु अतन्मात्र ही समझी जाती है। यही विधिनिषेधका स्वरूप निदर्शन है।


शेषविशेषाख्यानं ज्ञातव्यं चोक्तवक्ष्यमाणतया ।
सूत्रे पदानुवृत्तिर्ग्राह्या सूत्रान्तरादिति न्यायात् ॥335॥

अर्थ: इस विषयमें विशेष व्याख्यान पहले कहा जा चुका है तथा आगे भी कहा गया है, वहांसे जान लेना चाहिये। ऐसा न्याय भी प्रसिद्ध है कि कोई बात किसी सूत्रमें यदि न हो तो वह दूसरे सूत्रसे लेली जाती है। जैसे कि व्याकरणादिमें पूर्व सूत्रसे पदोंकी अनुवृत्ति करली जाती है।


ननु किं नित्यमनित्यं किमथोभयमनुभयञ्च तत्त्वं स्यात् ।
व्यस्तं किमथ समस्तं क्रमतः किमथाक्रमादेतत् ॥336॥

अर्थ: क्या वस्तु नित्य है, अथवा अनित्य है ? क्या उभयरूप है, अथवा अनुभय (दोनोंरूप नहीं) रूप है ? क्या जुदी २ है, अथवा एकरूप है? क्या क्रम पूर्वक है, अथवा अक्रम पूर्वक है ?


सत्त्वं स्वपरनिहत्यै सर्वं किल सर्वथेति पदपूर्वं ।
स्वपरोपकृतिनिमित्तं सर्वं स्यात्स्यात्पदाङ्कितं तु पदम् ॥337॥

अर्थ: यदि वस्तुके पहले सर्वथा पद जोड़ दिया जाय तब तो वह स्वपर दोनोंकी विघातक हैं । यदि उसके पहले स्यात् पद जोड़ दिया जाय तब वही स्वपर दोनोंकी उपकारक है ।


अथ तद्यथा यथा सत्स्वतोस्ति सिद्धं तथा च परिणामि ।
इति नित्यमथानित्यं सच्चैकं द्विस्वभावतया ॥338॥

अर्थ: जिस प्रकार पदार्थ स्वयं सिद्ध है, उसी प्रकार उसका परिणमन भी स्वतः सिद्ध है। अर्थात् परिणमनशील ही पदार्थ अनादि निधन है। वह सदा रहता है अर्थात् वह अपने स्वरूपको कभी नहीं छोड़ता है इस दृष्टिसे वह नित्य भी है, और प्रतिक्षण वह बदलता भी रहता है अर्थात् एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें आया करता है इस दृष्टिसे अनित्य भी है। इस प्रकार एक ही पदार्थ दो स्वभाव वाला है।


अयमर्थो वस्तु यदा केवलमिह दृश्यते न परिणामः ।
नित्यं तदव्ययादिह सर्वं स्यादन्वयार्थनययोगात् ॥339॥

अर्थ: जिस समय निरन्तर एक रूपसे चले आये हुए पदार्थ पर दृष्टि रक्खी जाती है और उसके परिणामपर दृष्टि नहीं रक्खी जाती उस समय पदार्थ नित्य रूप प्रतीत होता है। क्योंकि उसका कभी नाश नहीं होता।


अपि च यदा परिणामः केवलमिह दृश्यते न किल वस्तु ।
अभिनवभावानभिनवभावाभावादनित्यमंशनयात् ॥340॥

अर्थ: तथा जिस समय पदार्थपर दृष्टि नहीं रक्खी जाती केवल उसके परिणामपर ही दृष्टि रक्खी जाती है उस समय वस्तुमें नवीन भाव और पुराने भावकी प्राप्ति अप्राप्ति होनेसे वस्तु अनित्यरूप प्रतीत होती है । यहांपर केवल वस्तुके परिणाम अंशको ग्रहण किया गया है, ऊपर उसके द्रव्य अंशको ग्रहण किया गया है । वस्तुके एक देशको ग्रहण करने वाला ही नय है । यहां पर शङ्काकार १८ श्लोकों द्वारा सत् और परिणामके विषयमें अपनी नाना कल्पनाओं द्वारा शङ्का करता है ।


ननु चैकं सदिति यथा तथा च परिणाम एव तद् द्वैतम् ।
वक्तुं क्षममन्यतरं क्रमतो हि समं न तदिति कुतः ॥341॥

अर्थ: जिस प्रकार एक सत् है उसी प्रकार एक परिणाम भी है, इन दोनोंमें स्वतन्त्र रीतिसे द्वैत भाव है। फिर क्या कारण है कि उन दोनोंमेंसे एकका क्रमसे ही कथन किया जाय, दोनोंका कथन समानतासे एक साथ क्यों नहीं किया जाता।


अथ किं कखादिवर्णाः सन्ति यथा युगपदेव तुल्यतया ।
वक्ष्यन्ते क्रमतस्ते क्रमवर्तित्वाद्ध्वनेरिति न्यायात् ॥342॥

अर्थ: सत् और परिणाम क्या क, ख आदि वर्णोंके समान दोनों बराबर हैं। जिस प्रकार क, ख आदि सभी वर्ण एक समान हैं परन्तु वे क्रमसे बोले जाते हैं, क्योंकि ध्वनि-उच्चारण क्रमसे ही होता है अर्थात् एक साथ दो वर्णोंका उच्चारण हो नहीं सक्ता। क्या इस न्यायसे सत् और परिणाम भी समानता रखते हैं और वे क्रमसे बोले जाते हैं?


अथ किं खरतरदृष्ट्या विन्ध्यहिमाचलयुगं यथास्ति तथा
भवतु विवक्ष्यो मुख्यो विवक्तुरिच्छावशाद्गुणोऽन्यतरः ॥343॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार विन्ध्य पर्वत और हिमालय पर्वत दोनों ही स्वतन्त्र हैं परन्तु दोनोंमें वक्ता की इच्छासे जो तीक्ष्णदृष्टिसे विवक्षित होता है वह मुख्य समझा जाता है और दूसरा अविवक्षित गौण समझा जाता है। क्या सत् और परिणाम भी इसी प्रकार स्वतन्त्र हैं, और उन दोनोंमें जो विवक्षित होता है वह मुख्य समझा जाता है तथा दूसरा गौण समझा जाता है ?


अथ चैकः कोपि यथा सिंहः साधुर्विवक्षितो द्वेधा ।
सत्परिणामोपि तथा भवति विशेषणविशेष्यवत् किमिति ॥344॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार कोई पुरुष शूरता, पराक्रम आदि गुणोंके धारण करनेसे कभी सिंह कहलाता है और सज्जनता, नम्रता आदि गुणोंके धारण करनेसे कभी साधु कहलाता है। एक ही पुरुष विवक्षाके अनुसार दो विशेषणोंवाला हो जाता है, अथवा उन दोनोंमें विवक्षित विशेषण कोटिमें आजाता है और अविवक्षित विशेष्य कोटिमें चला जाता है। क्या उसी प्रकार सत् और परिणाम भी विवक्षाके अनुसार कहे हुए किसी पदार्थके विशेषण हैं? अर्थात् क्या इनका भी कोई विशेष्य और है?


अथ किमनेकार्थत्वादेकं नामद्वयाङ्कितं किञ्चित् ।
अग्निर्वैश्वानर इव सव्येतरगोविषाणवत् किमथ ॥345॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार एक ही पदार्थ अनेक नामोंकी अपेक्षा रखनेसे अग्निवैश्वानरके समान दो नामोंसे कहा जाता है अर्थात् अग्निवैश्वानर आदि भेदोंसे एक ही अग्निके दो नाम (अनेक) हो जाते हैं उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम एक ही पदार्थके दो नाम हैं ? अथवा जिस प्रकार गौके दाँये वाँये (एक साथ) दो सींग होते हैं, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी किसी वस्तुके समान कालमें होनेवाले दो धर्म हैं ?


अथ किं काल विशेषादेकः पूर्वं ततोऽपरः पश्चात् ।
आमानामविशिष्टं पृथिवीत्वं तद्यथा तथा किमिति ॥346॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार कच्ची पृथ्वी ( कच्चा घड़ा ) पहले होती है, पीछे अग्निमें देनेसे वह पकी हुई हो जाती है। उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी काल विशेषसे आगे पीछे होनेवाले हैं ? अर्थात् क्या इन दोनोंमेंसे कोई एक पहले होता है और दूसरा पीछे ?


अथ किं कालक्रमतोऽप्युत्पन्नं वर्त्तमानमिव चास्ति ।
भवति सपत्नीद्वयमिह यथा मिथः प्रत्यनीकतया ॥347॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार किसी पुरुषकी आगे पीछे परणी हुई दो स्त्रियां (सौतें) एक कालमें परस्पर विरुद्धरूपसे रहती हैं। उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम काल क्रमसे आगे पीछे उत्पन्न होते हुए भी एक कालमें - वर्तमानकालमें परस्पर विरुद्धरूपसे रहते हैं ? अर्थात् भिन्न कालमें उत्पन्न होकर भी दोनों एक कालमें समान अधिकारी बनकर परस्पर विरुद्धता धारण करते हैं ?


अथ किं ज्येष्ठकनिष्ठभ्रातृद्वयमिव मिथः सपक्षतया ।
किमथोपसुन्दसुन्दमल्लन्यायात्किलेतरेतरस्मात् ॥348॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार बड़े छोटे दो भाई परस्पर प्रेमसे रहते हैं, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम आगे पीछे उत्पन्न होकर वर्त्तमानकालमें परस्पर अविरुद्ध रीतिसे रहते हैं ? अथवा जिस प्रकार उपसन्द और सुन्द नामके दो मल्ल परस्पर एक दूसरेसे जय अपजय प्राप्त करते हुए अन्तमें मर गये उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी परस्पर प्रतिद्वन्द्विता रखते हुए अन्तमें नष्ट हो जाते हैं ?


केवल मुपचारादिह भवति परत्वापरत्ववत्किमथ ।
पूर्वापरदिग्द्वैतं यथा तथा द्वैतमिदमपेक्षतया ॥349॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार दो छोटे बड़े पुरुषोंमें परापर व्यवहार केवल उपचारसे होता है, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी उपचारसे कहे जाते हैं । अथवा जिस प्रकार पूर्व दिशा, पश्चिम दिशा आदि व्यवहार होता है, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी केवल अपेक्षा मात्रसे कहे जाते हैं ।


किमथाधाराधेयन्यायादिह कारकादि द्वैतमिव ।
स यथा घटे जलं स्यान्न स्यादिह जले घटः कश्चित् ॥350॥

अर्थ: अथवा यह कहा जाय कि घड़ेमें जल है, तो यह कथन दो कारकोंको प्रकट करता है। घड़ेमें, यह वाक्य अधिकरण कारक रूप है, और जल है, यह वाक्य कर्ता कारक-रूप है। क्योंकि घड़ा जलका आधार है, और जल स्वतन्त्र है इसलिये कर्ता कारक है। दूसरे वाक्योंमें ऐसा भी कहा जा सकता है कि सप्तमी विभक्त्यन्त पद अधिकरण कारक होता है, और प्रथमा विभक्त्यन्त पद कर्ता कारक होता है। अधिकरण आधाररूप होता है और उसमें रहनेवाला आधेय होता है ऐसा विपरीत नहीं होता है कि आधेय तो आधार होजाय और आधार आधेय होजाय, क्योंकि घटमें जल रहता है परन्तु जलमें घट नहीं रहता जिस प्रकार घट और जलमें आधार आधेय भावरूप दो कारक हैं, क्या उसी प्रकार सत् और परिणाम भी हैं? अर्थात् उनमें भी जलके समान एक आधेय रूप और दूसरा घड़ेके समान आधार रूप है?


अथ किं बीजाङ्कुरवत्कारणकार्यद्वयं यथास्ति तथा ।
स यथा योनीभूतं तत्रैकं योनिजं तदन्यतरम् ॥351॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार बीज और अङ्कुरमें कार्यकारण भाव है। बीज अङ्कुरकी उत्पत्तिका स्थान - योनि है, और अङ्कुर उससे उत्पन्न - योनिज है। उसी प्रकार सत् और परिणाममें भी क्या कार्य कारण भाव है ?


अथ किं कनकोपलवत् किञ्चित्स्वं किञ्चिदस्वमेव यतः ।
ग्राह्यं स्वं सारतया तदितरमस्वं तु हेयमसारतया ॥352॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार एक कनक पाषाण नामका पत्थर होता है उसमें कुछ तो सोनेका अंश रहता है, और कुछ पाषाणका अंश रहता है । उन दोनोंमें स्वर्णांश सारभूत होनेसे ग्रहण करने योग्य होता है ? और दूसरा पाषाणांश असारभूत होनेसे छोड़ने योग्य होता है । उसी प्रकार क्या सत् और परिणाममें भी एक ग्रहण करने योग्य है और दूसरा छोड़ने योग्य है ?


अथ किं वागर्थद्वयमिव सम्पृक्तं सदर्थसंसिद्ध्यै ।
पानकवत्तन्नियमादर्थाभि व्यञ्जकं द्वैतात् ॥353॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार वचन और अर्थ दोनों मिले हुए ही पानकके समान पदार्थके साधक हैं उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी मिले हुए पदार्थके सूचक हैं ?


अथ किमवश्यतया तद्वक्तव्यं स्यादनन्यथासिद्धेः ।
भेरी दण्डवदुभयोः संयोगादिव विवक्षितः सिद्ध्येत् ॥354॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार भेरी और दण्डके संयोगसे ही शब्द होता है। केवल भेरी (नगाड़ा) से भी शब्द नहीं हो सक्ता और न केवल दण्डसे ही हो सकता है किंतु दोनोंके संयोगसे ही होता है इसलिये दोनोंका होना ही आवश्यक है। उसी प्रकार क्या सत् और परिणामके संयोगसे पदार्थकीसिद्धि होती है ? क्या दोनोंका कहना इसीलिये आवश्यक है ? अर्थात् जिस प्रकार भेरी और दण्ड दोनों ही भिन्न २ पदार्थ हैं परन्तु दोनोंके मेलसे वाद्य होता है, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी भिन्न२ हैं, तथा उनके मेलसे पदार्थकी सिद्धि होती है ?


अथ किमुदासीनतया वक्तव्यं वा यथारुचित्वान्न ।
यदपूर्णन्यायादप्यन्यतरेणेह साध्यसंसिद्धेः । ॥355॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार अपूर्ण न्यायसे एकका मुख्यतासे ग्रहण होता है और दूसरेका गौणरीतिसे ग्रहण होता है। गौणरीतिसे ग्रहण होनेवालेका विवेचन रुचिपूर्वक नहीं होता है किन्तु उदासीनतासे होता है। उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम हैं ? अथवा जिस प्रकार अपूर्ण न्यायसे पुकारे हुए दो नामोंमेंसे किसी एकसे ही साध्यकी सिद्धि हो जाती है, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाममेंसे किसी एकसे ही साध्यकी (पदार्थकी) सिद्धि होती है ?


अथ किमुपादानतया स्वार्थं सृजति कश्चिदन्यतमः ।
अपरः सहकारितया प्रकृतं पुष्णाति मित्रवत्तदिति ॥356॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार एक पुरुष किसी कार्यको स्वयं करता है, उसका मित्र उसे उसके कार्यमें सहायता पहुंचाता है, मित्रकी सहायतासे वह पुरुष अपने कार्यमें सफलता कर लेता है उसी प्रकार क्या सत् और परिणाममें एक उपादान होकर कार्य करता है, दूसरा उसका सहायक बनकर पदार्थ सिद्धि कराता है ?


शत्रु वदादेशः स्यात्तद्वत्तद्द्वैतमेव किमिति यथा ।
एकं विनाश्य मूलादन्यतमः स्वयमुदेति निरपेक्षः ॥357॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार शत्रुके समान आदेश होता है जो कि पहलेको सर्वथा हटाकर उसके स्थानमें स्वयं ठहरता है उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी हैं ? सत्को सर्वथा नष्ट कर कभी स्वयं परिणाम होता है और परिणामको सर्वथा नष्ट कर कभी स्वयं सत् उदित होता है ?


अथ किं वैमुख्यतया विसन्धिरूपं द्वयं तदर्थकृते ।
वामेतरकरवर्त्तितरज्जूयुग्मं यथास्वमिदमिति चेत् ॥358॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार छाछ विलोते समय दाँये बाँये हाथमें रहनेवालीं दो रस्सियां परस्पर विमुखतासे अनमिल रहती हुई कार्यको करती हैं उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी परस्पर विमुख रहकर ही पदार्थकी सिद्धि कराते हैं ?


नैवमदृष्टान्तत्वात् स्वेतरपक्षोभयस्य घातित्वात् ।
नाचरते मन्दोपि च स्वस्य विनाशाय कश्चिदेव यतः ॥359॥

अर्थ: शंकाकारने ऊपरके श्लोकों द्वारा जो जो शंकाएँ की हैं, तथा जो जो दृष्टान्त दिये हैं वे ठीक नहीं हैं। जो दृष्टान्त दिये हैं वे दृष्टान्त नहीं किन्तु दृष्टान्ताभास हैं। क्योंकि उन दृष्टान्तोंसे एक पक्षकी भी सिद्धि नहीं होती है। न तो उन दृष्टान्तोंसे शंकाकारका ही अभिप्राय सिद्ध होता है। और न जैन सिद्धान्त ही सिद्ध होता है। इसलिये दोनों पक्षोंके घातक होनेसे वे दृष्टान्त, दृष्टान्त कोटिमें ही नहीं आ सक्ते हैं। कोई मन्दबुद्धिवाला पुरुष भी तो ऐसा प्रयोग नहीं करता है जिससे कि स्वयं उसका ही विघात होता हो।


तत्र मिथस्सापेक्षधर्मद्वयदेशितृप्रमाणस्य ।
माभूदभाव इति नहि दृष्टान्तो वर्णपंक्तिरित्यत्र ॥360॥

अर्थ: सत् और परिणाम इन परस्पर सापेक्ष दोनों धर्मोंको विषय करनेवाला प्रमाण होता है। उस प्रमाणका अभाव न हो इसलिये इस विषयमें वर्णपंक्तिका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


अपि च प्रमाणाभावे नहि नयपक्षः क्षमः स्वरक्षायै ।
वाक्यविवक्षाभावे पदपक्षः कारकोपि नार्थकृते ॥361॥

अर्थ: पहले तो प्रमाणका अभाव किसी दृष्टांतसे सिद्ध ही नहीं होता, दूसरे प्रमाणके अभावमें नय पक्ष भी अपनी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं रह सकता है तथा वाक्य विवक्षाके विना पदपक्ष और कारकसे भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है।


संस्कारस्य वशादिह पदेषु वाक्यप्रतीतिरिति चेद्वै ।
वाच्यं प्रमाणमात्रं न नया ह्युक्तस्य दुर्निवारत्वात् ॥362॥

अर्थ: ऊपर यह कहा गया है कि विना प्रमाणके स्वीकार किये नय पक्ष भी नहीं ठहर सक्ता है जैसे - विना वाक्य विवक्षाके पदपक्ष अर्थकारी नहीं ठहरता है। इसके उत्तरमें यदि यह आशंका उठाई जाय कि संस्कारके वशसे पदोंमें ही वाक्यकी प्रतीति मानली जाय तो अर्थात् नयोंमें ही प्रमाणकी कल्पना करली जाय तो ? उत्तरमें कहा जाता है कि यदि नयोंमें ही वाक्य प्रतीति स्वीकार की जायगी तो प्रमाण मात्र ही कहना चाहिये फिर नय सिद्ध नहीं होते हैं। वही दूषण - नय पक्षका अभाव होना बना रहता है। अथवा पदोंमें वाक्य विवक्षाके समान नयोंमें ही प्रमाण पक्ष स्वीकार करनेसे दो दूषण आते हैं। (१) नयपक्षका अभाव होजायगा। क्योंकि नयोंके स्थानमें तो उन्हें प्रमाणरूप माना गया है। क्रमसे होने वाली जो ध्वनि है उसे शाब्दबोधमें कारणता नहीं रहेगी। (२) क्योंकि जब पदोंमें ही वाक्यकी प्रतीति हो जायगी तो एक पदसे ही अथवा एक अक्षरसे ही समस्त वाक्योंका बोध होजायगा, ऐसी अवस्थामें ध्वनिको अर्थ प्रतीतिमें हेतुता नहीं आसकेगी।


अथ चैवं सति नियमाद् दुर्वारं दूषणद्वयं भवति ।
नयपक्षच्युतिरिति वा क्रमवर्तित्वाद्ध्वनेरहेतुत्वम् ॥363॥

अर्थ: ऊपर यह कहा गया है कि विना प्रमाणके स्वीकार किये नय पक्ष भी नहीं ठहर सक्ता है जैसे - विना वाक्य विवक्षाके पदपक्ष अर्थकारी नहीं ठहरता है। इसके उत्तरमें यदि यह आशंका उठाई जाय कि संस्कारके वशसे पदोंमें ही वाक्यकी प्रतीति मानली जाय तो अर्थात् नयोंमें ही प्रमाणकी कल्पना करली जाय तो ? उत्तरमें कहा जाता है कि यदि नयोंमें ही वाक्य प्रतीति स्वीकार की जायगी तो प्रमाण मात्र ही कहना चाहिये फिर नय सिद्ध नहीं होते हैं। वही दूषण - नय पक्षका अभाव होना बना रहता है। अथवा पदोंमें वाक्य विवक्षाके समान नयोंमें ही प्रमाण पक्ष स्वीकार करनेसे दो दूषण आते हैं। (१) नयपक्षका अभाव होजायगा। क्योंकि नयोंके स्थानमें तो उन्हें प्रमाणरूप माना गया है। क्रमसे होने वाली जो ध्वनि है उसे शाब्दबोधमें कारणता नहीं रहेगी। (२) क्योंकि जब पदोंमें ही वाक्यकी प्रतीति हो जायगी तो एक पदसे ही अथवा एक अक्षरसे ही समस्त वाक्योंका बोध होजायगा, ऐसी अवस्थामें ध्वनिको अर्थ प्रतीतिमें हेतुता नहीं आसकेगी।


विन्ध्यहिमाचलयुग्मं दृष्टान्तो नेष्टसाधनायालम् ।
तदनेकत्वे नियमादिच्छानर्थक्यताऽविवक्षश्च ॥364॥

अर्थ: विन्ध्याचल और हिमाचल दोनों ही स्वतन्त्र सिद्ध हैं इसलिये एकमें मुख्य विवक्षा दूसरेमें गौण - अविवक्षा हो नहीं सक्ती है। दूसरी बात यह है कि जब दोनों ही स्वतन्त्र सिद्ध हैं तो एकमें मुख्य और दूसरेमें गौण विवक्षाकी इच्छाका होना ही निरर्थक है, इसलिये विन्ध्याचल और हिमाचल पर्वतोंका दृष्टान्त भी इष्ट पदार्थको सिद्ध करनेके लिये समर्थ नहीं है।


नालमसौ दृष्टान्तः सिंहः साधुर्यथेह कोऽपि नरः ।
दोषादपि स्वरूपासिद्धत्वात्किल यथा जलं सुरभि ॥365॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी पुरुषके सिंह, साधु विशेषण बना दिये जाते हैं, उसी प्रकार सत् और परिणाम भी पदार्थके विशेषण हैं ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहांपर सत् परिणामात्मक पदार्थ साध्य है, उस साध्यकी सिद्धि इस दृष्टान्तसे नहीं होती है, इसलिये सिंह साधुका दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। इस दृष्टान में स्वरूपासिद्ध दोष आता है यहांपर स्वरुपासिद्ध दोष असिद्ध नहीं है किन्तु साध्यशून्य होनेसे सुघटित ही है। जैसे - किसी पुरुषके रूढिमात्रसे इच्छानुसार सिंह और साधु ऐसे दो नाम रख दिये जाते हैं, उनमें सिंहत्व साधुत्व धर्मोंकी कुछ भी अपेक्षा नहीं की जाती है। केवल दो नामोंकी कल्पना कर दी जाती है, परन्तु सत्परिणाम काल्पनिक नहीं है किन्तु वास्तविक है, इसलिये यह दृष्टान्त उभयधर्मात्मक साध्यसे शून्य है। जिस प्रकार नैयायिकोंके यहां जलमें सुगन्धि सिद्ध करना असिद्ध है क्योंकि जलमें सुगन्धि स्वरूपसे ही असिद्ध है इसी प्रकार इस दृष्टान्तमें साध्य स्वरूपसे ही असिद्ध है।


नासिद्धं हि स्वरूपासिद्धत्वं तस्य साध्यशून्यत्वात् ।
केवलमिहरूढिवशादुपेक्ष्य धर्मद्वयं यथेच्छत्वात् ॥366॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी पुरुषके सिंह, साधु विशेषण बना दिये जाते हैं, उसी प्रकार सत् और परिणाम भी पदार्थके विशेषण हैं ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि यहांपर सत् परिणामात्मक पदार्थ साध्य है, उस साध्यकी सिद्धि इस दृष्टान्तसे नहीं होती है, इसलिये सिंह साधुका दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। इस दृष्टान में स्वरूपासिद्ध दोष आता है यहांपर स्वरूपासिद्ध दोष असिद्ध नहीं है किन्तु साध्यशून्य होनेसे सुघटित ही है। जैसे - किसी पुरुषके रूढिमात्रसे इच्छानुसार सिंह और साधु ऐसे दो नाम रख दिये जाते हैं, उनमें सिंहत्व साधुत्व धर्मोंकी कुछ भी अपेक्षा नहीं की जाती है। केवल दो नामोंकी कल्पना कर दी जाती है, परन्तु सत्परिणाम काल्पनिक नहीं है किन्तु वास्तविक है, इसलिये यह दृष्टान्त उभयधर्मात्मक साध्यसे शून्य है। जिस प्रकार नैयायिकोंके यहां जलमें सुगन्धि सिद्ध करना असिद्ध है क्योंकि जलमें सुगन्धि स्वरूपसे ही असिद्ध है इसी प्रकार इस दृष्टान्तमें साध्य स्वरूपसे ही असिद्ध है।


अग्निर्वैश्वानर इव नामद्वैतं च नेष्टसिद्धयर्थम् ।
साध्यविरुद्धत्वादिह संदृष्टेरथ च साध्यशून्यत्वात् ॥367॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है। क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं। दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है। तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है। यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोंका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींकि समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है। यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं। तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकरहो जायंगे अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जांयगे। द्रव्योंमें परस्पर भेद ही


नामद्वयं किमर्थादुपेक्ष्य धर्मद्वयं च किमपेक्ष्य ।
प्रथमे धर्माभावेप्यलं विचारेण धर्मिणोऽभावात् ॥368॥

अर्थ: यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोंका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है ।


प्रथमेतरपक्षेऽपि च भिन्नमभिन्नं किमन्वयात्तदिति ।
भिन्नं चेदविशेषादुक्तवदसतो हि किं विचारतया ॥369॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है। क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं। दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है। तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है। यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींके समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है। यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं। तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकर हो जायगें अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जायंगे। द्रव्योंमें परस्पर भेद ही


अथ चेद्युतसिद्धत्वात्तन्निष्पत्तिर्द्वयोः पृथक्त्वेपि ।
सर्वस्य सर्वयोगात् सर्वः सर्वोपि दुर्निवारः स्यात् ॥370॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है । क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं । दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है । तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है । यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोंका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है । यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींके समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं । तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकरहो जायगें अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जांयगे । द्रव्योंमें परस्पर भेद ही न हो सकेगा । इसलिये द्रव्यसे धर्मोंको जुदा मानना ठीक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो प्रश्न होता है कि वे वस्त्र और वस्त्रमें रहनेवाले रूप (रंग) की तरह अभिन्न हैं अथवा आटेमें मिले हुए खारेपनकी तरह अभिन्न हैं ? यदि कहा जाय कि खारे द्रव्यके समान वे धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि लवणकी रोटीमें जो खारापन है वह लवणका है, रोटीका नहीं है । रोटीसे खारापन जुदा ही है । इसीके समान धर्म द्वय भी द्रव्यसे जुदे पड़ेगे । जुदे होनेसे उनमें परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षा भी नहीं रहेगी । परंतु सत् और परिणाम परस्पर सापेक्ष हैं इसलिये क्षार द्रव्यके समान उनकी अभिन्नता उपादेय ( ग्राह्य ) नहीं है । क्षार द्रव्यके समान जो अभिन्नता है वह वैसी ही है जैसी कि क, ख, ग, घ आदि वर्णोंकी पंक्ति सर्वथा स्वतन्त्र होती है । इस प्रकारकी स्वतन्त्रता माननेसे न तो नय ही सिद्ध होते हैं और न प्रमाण ही सिद्ध होता है । विना परस्परकी अपेक्षाके एक भी सिद्ध नहीं हो सक्ता है । इसलिये क्षार द्रव्यके समान न मानकर रूप और पटके समान उन धर्मोंकी अभिन्नता यदि मानी जाय तो यह प्रकृतके अनुकूल ही है । अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र और उसका रंग अभिन्न है, विना वस्त्रकी अपेक्षा लिये उसके रंगकी सिद्धि नहीं, और विना उसके रंगकी अपेक्षा लिये वस्त्रकी सिद्धि नहीं, उसी प्रकार यदि परस्पर सापेक्ष सत् और परिणामकी अभिन्नता भी मानी जाय तब तो हमारा कथन ही (जैन सिद्धान्त) सिद्ध होता है, फिर शङ्काकारका एक पदार्थके ही सत् और परिणाम, दो नाम कहना तथा अग्नि और वैश्वानरका दृष्टान्त देना निरर्थक ही नहीं किन्तु उसके पक्षका स्वयं विघातक है ।


चेदन्वयादभिन्नं धर्मद्वैतं किलेति नयपक्षः ।
रूपपटादिवदिति किं किमथ क्षारद्रव्यवद्वेति ॥371॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है । क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं । दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है । तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है । यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोंका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है । यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींके समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं । तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकर हो जायगें अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जांयगे । द्रव्योंमें परस्पर भेद ही न हो सकेगा । इसलिये द्रव्यसे धर्मोंको जुदा मानना ठीक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो प्रश्न होता है कि वे वस्त्र और वस्त्रमें रहनेवाले रूप (रंग) की तरह अभिन्न हैं अथवा आटेमें मिले हुए खारेपनकी तरह अभिन्न हैं ? यदि कहा जाय कि खारे द्रव्यके समान वे धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि लवणकी रोटीमें जो खारापन है वह लवणका है, रोटीका नहीं है । रोटीसे खारापन जुदा ही है । इसीके समान धर्म द्वय भी द्रव्यसे जुदे पड़ेगे । जुदे होनेसे उनमें परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षा भी नहीं रहेगी । परंतु सत् और परिणाम परस्पर सापेक्ष हैं इसलिये क्षार द्रव्यके समान उनकी अभिन्नता उपादेय ( ग्राह्य ) नहीं है । क्षार द्रव्यके समान जो अभिन्नता है वह वैसी ही है जैसी कि क, ख, ग, घ आदि वर्णोंकी पंक्ति सर्वथा स्वतन्त्र होती है । इस प्रकारकी स्वतन्त्रता माननेसे न तो नय ही सिद्ध होते हैं और न प्रमाण ही सिद्ध होता है । विना परस्परकी अपेक्षाके एक भी सिद्ध नहीं हो सक्ता है । इसलिये क्षार द्रव्यके समान न मानकर रूप और पटके समान उन धर्मोंकी अभिन्नता यदि मानी जाय तो यह प्रकृतके अनुकूल ही है । अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र और उसका रंग अभिन्न है, विना वस्त्रकी अपेक्षा लिये उसके रंगकी सिद्धि नहीं, और विना उसके रंगकी अपेक्षा लिये वस्त्रकी सिद्धि नहीं, उसी प्रकार यदि परस्पर सापेक्ष सत् और परिणामकी अभिन्नता भी मानी जाय तब तो हमारा कथन ही (जैन सिद्धान्त) सिद्ध होता है, फिर शङ्काकारका एक पदार्थके ही सत् और परिणाम, दो नाम कहना तथा अग्नि और वैश्वानरका दृष्टान्त देना निरर्थक ही नहीं किन्तु उसके पक्षका स्वयं विघातक है ।


क्षारद्रव्यवदिदं चेदनुपादेयं मिथोनपेक्षत्वात् ।
वर्णततेरविशेषन्यायान्न नयाः प्रमाणं वा ॥372॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है । क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं । दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है । तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है । यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोंका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है । यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींके समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं । तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकर हो जायगें अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जांयगे । द्रव्योंमें परस्पर भेद ही न हो सकेगा । इसलिये द्रव्यसे धर्मोंको जुदा मानना ठीक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो प्रश्न होता है कि वे वस्त्र और वस्त्रमें रहनेवाले रूप (रंग) की तरह अभिन्न हैं अथवा आटेमें मिले हुए खारेपनकी तरह अभिन्न हैं ? यदि कहा जाय कि खारे द्रव्यके समान वे धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि लवणकी रोटीमें जो खारापन है वह लवणका है, रोटीका नहीं है । रोटीसे खारापन जुदा ही है । इसीके समान धर्म द्वय भी द्रव्यसे जुदे पड़ेगे । जुदे होनेसे उनमें परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षा भी नहीं रहेगी । परंतु सत् और परिणाम परस्पर सापेक्ष हैं इसलिये क्षार द्रव्यके समान उनकी अभिन्नता उपादेय ( ग्राह्य ) नहीं है । क्षार द्रव्यके समान जो अभिन्नता है वह वैसी ही है जैसी कि क, ख, ग, घ आदि वर्णोंकी पंक्ति सर्वथा स्वतन्त्र होती है । इस प्रकारकी स्वतन्त्रता माननेसे न तो नय ही सिद्ध होते हैं और न प्रमाण ही सिद्ध होता है । विना परस्परकी अपेक्षाके एक भी सिद्ध नहीं हो सक्ता है । इसलिये क्षार द्रव्यके समान न मानकर रूप और पटके समान उन धर्मोंकी अभिन्नता यदि मानी जाय तो यह प्रकृतके अनुकूल ही है । अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र और उसका रंग अभिन्न है, विना वस्त्रकी अपेक्षा लिये उसके रंगकी सिद्धि नहीं, और विना उसके रंगकी अपेक्षा लिये वस्त्रकी सिद्धि नहीं, उसी प्रकार यदि परस्पर सापेक्ष सत् और परिणामकी अभिन्नता भी मानी जाय तब तो हमारा कथन ही (जैन सिद्धान्त) सिद्ध होता है, फिर शङ्काकारका एक पदार्थके ही सत् और परिणाम, दो नाम कहना तथा अग्नि और वैश्वानरका दृष्टान्त देना निरर्थक ही नहीं किन्तु उसके पक्षका स्वयं विघातक है ।


रूपपटादिवदिति चेत्सत्यं प्रकृतस्य सानुकूलत्वात् ।
एकं नामद्वयाङ्कमिति पक्षस्य स्वयं विपक्षत्वात् ॥373॥

अर्थ: अग्नि और वैश्वानरके समान सत् और परिणाम ये दो नाम ही माने जाय तो भी इष्ट सिद्धि नहीं होती है । क्योंकि वे साध्यसे विरुद्ध पड़ते हैं । दृष्टान्त भी साध्य शून्य है, अर्थात् हमारा साध्य - परस्पर सापेक्ष उभय धर्मात्मक पदार्थरूप है उस उभय धर्मात्मक पदार्थरूप साध्यकी सिद्धि दो नामोंसे नहीं होती है । तथा अग्नि और वैश्वानर ये दो नाम भिन्न रहकर एक अग्निके वाचक हैं, इसलिये यह दृष्टांत भी साध्य रहित है । यदि नाम द्वयका दृष्टान्त साध्य विरुद्ध नहीं है तो हम पूंछते हैं कि नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा रखते हैं अथवा अपेक्षा रखते हैं ? यदि पहला पक्ष स्वीकार किया जाय, अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी अपेक्षा नहीं रखते केवल एक पदार्थके दो नाम हैं तो धर्मोका अभाव ही हुआ जाता है, धर्मोंके अभावमें धर्मी भी नहीं ठहर सक्ता है, फिर तो विचार करना ही व्यर्थ है । यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय अर्थात् दो नाम दो धर्मोंकी उपेक्षा नहीं करते किन्तु अपेक्षा रखते हैं तो वे दोनों धर्म द्रव्यसे भिन्न हैं अथवा अभिन्न हैं ? यदि द्रव्यसे भिन्न हैं तो भी वे नहींके समान हैं, फिर भी कुछ विशेषता नहीं हुई, जो धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे हैं तो वे उसके नहीं कहे जा सकते हैं, इसलिये उनका विचार करना ही निरर्थक है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे यद्यपि जुदे हैं क्योंकि वे युतसिद्ध हैं । तथापि उन धर्मोंका द्रव्यके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता है ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, यदि भिन्न पदार्थोंका इस प्रकार सम्बन्ध मानलिया जाय तो सब पदार्थोंका सब पदार्थोंके साथ सम्बन्ध हो जायगा ऐसी अवस्थामें सभी पदार्थ संकरहो जायगें अर्थात् जैसे सर्वथा भिन्न धर्मोंका एक द्रव्यके साथ सम्बन्ध माना जाता है वैसे उनका हरएक द्रव्यके साथ सम्बन्ध होसक्ता है, क्योंकि जब वे धर्म द्रव्यसे सर्वथा जुदे ही हैं तो जैसे उनका एक द्रव्यसे सम्बन्ध होसक्ता है वैसे सब द्रव्योंसे होसक्ता है फिर सभी द्रव्य परस्पर मिल जांयगे । द्रव्योंमें परस्पर भेद ही न हो सकेगा । इसलिये द्रव्यसे धर्मोंको जुदा मानना ठीक नहीं है । यदि यह कहा जाय कि दोनों धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो प्रश्न होता है कि वे वस्त्र और वस्त्रमें रहनेवाले रूप (रंग) की तरह अभिन्न हैं अथवा आटेमें मिले हुए खारेपनकी तरह अभिन्न हैं ? यदि कहा जाय कि खारे द्रव्यके समान वे धर्म द्रव्यसे अभिन्न हैं तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि लवणकी रोटीमें जो खारापन है वह लवणका है, रोटीका नहीं है । रोटीसे खारापन जुदा ही है । इसीके समान धर्म द्वय भी द्रव्यसे जुदे पड़ेगे । जुदे होनेसे उनमें परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षा भी नहीं रहेगी । परंतु सत् और परिणाम परस्पर सापेक्ष हैं इसलिये क्षार द्रव्यके समान उनकी अभिन्नता उपादेय ( ग्राह्य ) नहीं है। क्षार द्रव्यके समान जो अभिन्नता है वह वैसी ही है जैसी कि क, ख, ग, घ आदि वर्णोंकी पंक्ति सर्वथा स्वतन्त्र होती है । इस प्रकारकी स्वतन्त्रता माननेसे न तो नय ही सिद्ध होते हैं और न प्रमाण ही सिद्ध होता है । विना परस्परकी अपेक्षाके एक भी सिद्ध नहीं हो सक्ता है । इसलिये क्षार द्रव्यके समान न मानकर रूप और पटके समान उन धर्मोंकी अभिन्नता यदि मानी जाय तो यह प्रकृतके अनुकूल ही है । अर्थात् जिस प्रकार वस्त्र और उसका रंग अभिन्न है, विना वस्त्रकी अपेक्षा लिये उसके रंगकी सिद्धि नहीं, और विना उसके रंगकी अपेक्षा लिये वस्त्रकी सिद्धि नहीं, उसी प्रकार यदि परस्पर सापेक्ष सत् और परिणामकी अभिन्नता भी मानी जाय तब तो हमारा कथन ही (जैन सिद्धान्त) सिद्ध होता है, फिर शङ्काकारका एक पदार्थके ही सत् और परिणाम, दो नाम कहना तथा अग्नि और वैश्वानरका दृष्टान्त देना निरर्थक ही नहीं किन्तु उसके पक्षका स्वयं विघातक है ।


अपि चाकिञ्चित्कर इव सव्येतरगोविषाणदृष्टान्तः ।
सुरभि गगनारविन्दमिवाश्रयासिद्धदृष्टान्तात् ॥374॥

अर्थ: जिस प्रकार गौके दाँये बाँये दो सींग एक साथ उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार सत् और परिणाम भी एक साथ होनेवाले वस्तुके धर्म हैं, ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, सत् और परिणामके विषयमें गौके सींगोंका दृष्टान्त अकिञ्चित्कर है अर्थात् इस दृष्टान्तसे कुछ भी सिद्धि नहीं होती है। क्योंकि इस दृष्टान्तमें आश्रयासिद्ध दोष आता है। जहां पर हेतुका आश्रय ही असिद्ध होता है वहां आश्रयासिद्ध दोष आता है। जैसे - “गगनारविन्दं सुरभि अरविन्दत्वात् सरोजारविन्दवत्” अर्थात् यदि कोई पुरुष ऐसा अनुमान बनावे कि आकाशका कमल सुगंधित है, क्योंकि वह कमल है, जो जो कमल होता है वह वह सुगंधित होता है जैसे तालावका कमल, तालावमें कमल होता है वह सुगंधित ही होता है। इसी प्रकार जो आकाशमें कमल है वह भी कमल है इसलिये वह भी सुगंधित है। यहां पर आकाशका कमल यह पक्ष है, सुगंधिवाला है, यह साध्य है क्योंकि वह कमल है यह हेतु है। यह अनुमान नहीं है किन्तु अनुमानाभास है। क्योंकि हेतुका आश्रय ही असिद्ध है। आकाशमें कमलकी यदि संभावना हो तब तो वहां सुगंधि भी रह सक्ती है। परन्तु आकाशमें तो कमलका होना ही असंभव है फिर उसकी सुगन्धिका होना तो नितान्त ही असंभव है। जब कमलरूप हेतु ही आकाशमें नहीं रहता है तब सुगन्धिरूप साध्य भी वहां कैसे रह सक्ता है? इसलिये जिस प्रकार यहांपर आश्रय न होनेसे आश्रयासिद्ध दोष आता है उसी प्रकार गौके दँये बाँये सीगोंके दृष्टान्तमें भी आश्रयासिद्ध दोष आता है। क्योंकि सींगोंका दृष्टान्त दियागया है, सींग विना आश्रयके रह नहीं सक्ते हैं अथवा जिस प्रकार दोनों सीगोंका आश्रय गौ है उसी प्रकार यदि सत् और परिणामका आश्रयभूत कोई पदार्थ हो, तब तो दोनोंकी एक कालमें सत्ता मानी जा सक्ती है, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त उनका आश्रय ही असिद्ध है, क्योंकि सत् परिणामके सिवाय पदार्थका स्वरूप ही कुछ नहीं है। सत् परिणाम उभय धर्मात्मक ही तो पदार्थ है। इसलिये गौके सीगोंका दृष्टांत ठीक नहीं है।


न यतः पृथगिति किञ्चित् सत्परिणामातिरिक्तमिह वस्तु ।
दीपप्रकाशयोरिह गुम्फितमिव तद्द्वयोरैक्यात् ॥375॥

अर्थ: गौके सीगोंका दृष्टान्त इसलिये ठीक नहीं है कि उसमें सीगोंका आश्रय गौ पदार्थ जुदा पड़ता है, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त वस्तु पड़ती ही नहीं है । क्योंकि सत परिणाम स्वरूप ही पदार्थ है, उस उभयात्मक भावसे अतिरिक्त वस्तु कोई जुदा पदार्थ नहीं है । उन दोनोंका ऐक्यभाव ही वस्तु है, वह दीप और प्रकाशके समान है । दीपसे प्रकाश भिन्न नहीं है और प्रकाशसे दीप भिन्न नहीं है ।


आमानामविशिष्टं पृथिवीत्वं नेह भवति दृष्टान्तः ।
क्रमवर्त्तित्वादुभयोः स्वेतरपक्षद्वयस्य घातित्वात् ॥376॥

अर्थ: कच्ची पक्की पृथ्वी भी सत् परिणामके विषयमें दृष्टान्त नहीं हो सक्ती है, क्योंकि कच्ची पृथ्वी (कचा घड़ा) पहले होती है पक्की पृथ्वी (पक्का घड़ा) पीछे होती है, दोनों क्रमसे होते हैं, इसलिये यह दृष्टान्त उभयपक्ष (जैन सिद्धान्त और शंकाकार)का घातक है। अर्थात् इस दृष्टान्तसे दोनों ओरकी सिद्धि नहीं होती। जैन सिद्धान्तकी तो यों नहीं होती कि वह कच्चे पके घड़ेके समान सत् परिणामको आगे पीछे नहीं मानता है और इस दृष्टान्तसे तुम क्रमवर्त्तित्व, सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा ही कर चुके हो। परन्तु तुम्हारा यह हेतु कि क्रमसे सत् परिणाम होते हैं, असमर्थ है, क्योंकि सत् परिणामको छोड़कर नहीं रह सक्ता है और परिणाम सत्को छोड़कर नहीं रह सक्ता है। तथा इस दृष्टान्तसे शंकाकारका पक्षभी सिद्ध नहीं होता। शंकाकार एक समयमें वस्तुको स्वभावसे नित्य ही सिद्ध करता है अथवा अनित्य ही सिद्ध करता है, परन्तु एक समयमें एक सिद्ध करना बाधित है, क्योंकि दोनों धर्म एक समयमें वस्तुमें सिद्ध होते हैं, जिस समय पृथिवीत्व धर्मकी अपेक्षासे पृथिवीमें नित्यता सिद्ध है उसी समय पक्व अपक्वरूपकी अपेक्षासे उसमें अनित्यता भी सिद्ध हैं। दोनों ही धर्म परस्पर सापेक्ष हैं, इसलिये दोनों एक साथ ही रह सक्ते हैं अन्यथा एककी भी सिद्धि नहीं हो सक्ती।


परपक्षवधस्तावत् क्रमवर्तित्वाच्च स्वतः प्रतिज्ञायाः ।
असमर्थसाधनत्वात् स्वयमपि वा बाधकः स्वपक्षस्य ॥377॥

अर्थ: कच्ची पक्की पृथ्वी भी सत् परिणामके विषयमें दृष्टान्त नहीं हो सक्ती है, क्योंकि कच्ची पृथ्वी (कचा घड़ा) पहले होती है पक्की पृथ्वी (पक्का घड़ा) पीछे होती है, दोनों क्रमसे होते हैं, इसलिये यह दृष्टान्त उभयपक्ष (जैन सिद्धान्त और शंङ्काकार)का घातक है । अर्थात् इस दृष्टान्तसे दोनों ओरकी सिद्धि नहीं होती । जैन सिद्धान्तकी तो यों नहीं होती कि वह कच्चे पक्के घड़ेके समान सत् परिणामको आगे पीछे नहीं मानता है और इस दृष्टान्तसे तुम क्रमवर्त्तित्व, सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा ही कर चुके हो । परन्तु तुम्हारा यह हेतु कि क्रमसे सत् परिणाम होते हैं, असमर्थ है, क्योंकि सत् परिणामको छोड़कर नहीं रह सक्ता है और परिणाम सत्को छोड़कर नहीं रह सक्ता है । तथा इस दृष्टान्तसे शंकाकारका पक्षभी सिद्ध नहीं होता । शंकाकार एक समयमें वस्तुको स्वभावसे नित्य ही सिद्ध करता है अथवा अनित्य ही सिद्ध करता है, परन्तु एक समयमें एक सिद्ध करना बाधित है, क्योंकि दोनों धर्म एक समयमें वस्तुमें सिद्ध होते हैं, जिस समय पृथिवीत्व धर्मकी अपेक्षासे पृथिवीमें नित्यता सिद्ध है उसी समय पक्व अपक्वरूपकी अपेक्षासे उसमें अनित्यता भी सिद्ध हैं । दोनों ही धर्म परस्पर सापेक्ष हैं, इसलिये दोनों एक साथ ही रह सक्ते हैं अन्यथा एककी भी सिद्धि नहीं हो सक्ती ।


तत्साध्यमनित्यं वा यदि वा नित्यं निसर्गतो वस्तु ।
स्यादिह पृथिवीत्वतया नित्यमनित्यं ह्यपक्वपक्वतया ॥378॥

अर्थ: कच्ची पक्की पृथ्वी भी सत् परिणामके विषयमें दृष्टान्त नहीं हो सक्ती है, क्योंकि कच्ची पृथ्वी (कचा घड़ा) पहले होती है पक्की पृथ्वी (पक्का घड़ा) पीछे होती है, दोनों क्रमसे होते हैं, इसलिये यह दृष्टान्त उभयपक्ष (जैन सिद्धान्त और शंङ्काकार)का घातक है । अर्थात् इस दृष्टान्तसे दोनों ओरकी सिद्धि नहीं होती । जैन सिद्धान्तकी तो यों नहीं होती कि वह कच्चे पक्के घड़ेके समान सत् परिणामको आगे पीछे नहीं मानता है और इस दृष्टान्तसे तुम क्रमवर्त्तित्व, सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा ही कर चुके हो । परन्तु तुम्हारा यह हेतु कि क्रमसे सत् परिणाम होते हैं, असमर्थ है, क्योंकि सत् परिणामको छोड़कर नहीं रह सक्ता है और परिणाम सत्को छोड़कर नहीं रह सक्ता है । तथा इस दृष्टान्तसे शंकाकारका पक्षभी सिद्ध नहीं होवा । शंकाकार एक समयमें वस्तुको स्वभावसे नित्य ही सिद्ध करता है अथवा अनित्य ही सिद्ध करता है, परन्तु एक समयमें एक सिद्ध करना बाधित है, क्योंकि दोनों धर्म एक समयमें वस्तुमें सिद्ध होते हैं, जिस समय पृथिवीत्व धर्मकी अपेक्षासे पृथिवीमें नित्यता सिद्ध है उसी समय पक्व अपक्वरूपकी अपेक्षासे उसमें अनित्यता भी सिद्ध हैं । दोनों ही धर्म परस्पर सापेक्ष हैं, इसलिये दोनों एक साथ ही रह सक्ते हैं अन्यथा एककी भी सिद्धि नहीं हो सक्ती ।


अपि च सपत्नीयुग्मं स्यादिति हास्यास्पदोपमा दृष्टिः ।
इह पदसिद्धविरुद्धानैकान्तिकदोषदुष्टत्वात् ॥379॥

अर्थ: दो सपत्नियों ( सौतों ) का दृष्टान्त तो हास्य पैदा करता है, यह दृष्टान्त तो सभी दोषोंसे दूषित है, इस दृष्टान्तसे असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक आदि सभी दोष आते हैं । जिस प्रकार किसीका यह कहना कि मेरी माता बाँझ है, सर्वथा विरुद्ध है, उसी प्रकार सत् परिणामको दो सपत्नियोंके समान क्रमसे उत्पन्न मानकर एक कालमें परस्पर विरुद्ध रीतिसे उनकी सत्ताका कथन करना भी विरुद्ध है । क्योंकि सत् परिणाम न तो किसी काल विशेषमें क्रमसे उत्पन्न ही होते हैं, और न वे एक स्थानमें विरुद्ध रीतिसे ही रहते हैं, किन्तु अनादि अनन्त उनका परस्पर सापेक्ष प्रवाह युगपत चला जाता है । इसलिये सपत्नीयुग्मका दृष्टान्त विरुद्ध ही है । तथा जिस प्रकार कृतकत्वहेतुसे घट शरावेके समान पदार्थोंमें भिन्नता सिद्ध करना अनैकांतिक है क्योंकि पट और तन्तुओंमें कृतक होनेपर भी अभिन्नता पाई जाती है । इसलिये कृतकत्व हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास दोषसे दूषित है । इसी प्रकार सत् परिणामके विषयमें दो सपत्नियोंका दृष्टान्त भी अनैकान्तिक दोषसे दूषित है । क्योंकि दो सपत्नियां कहीं पर परस्पर विरुद्धहोकर रहती हैं और कहीं पर परस्पर एकदूसरेकी सहायता चाहती हुईप्रेमपूर्वक अविरुद्ध भी रहती हैं यह नियम नहीं है कि दो सौतें परस्पर विरुद्ध रीतिसे ही रहें । इसलिये यह दृष्टान्त अनैकान्तिक दोषसे दूषित है । अथवा सपत्नी युग्ममें विरोधिता पाई जाती है कहींनहीं भी पाई जाती है इसलिये अनैकान्तिक है तथा जिस प्रकार बौद्धका यह सिद्धान्त कि सब पदार्थ अनित्य हैं क्योंकि वे सर्वथा क्षणिक हैं, सर्वथा असिद्ध हैं असिद्धताका हेतु भी यही है कि जो क्षणिकैकान्त हेतु दिया जाता है वह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि पदार्थोंमें नित्यता भी प्रतीत होती है, यदि नित्यता पदार्थोंमें न हो तो यह वही पुरुष है जिसे दो वर्ष पहले देखा था, ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं होना चाहिये परन्तु ऐसा यथार्थ प्रत्यभिज्ञान होता है, तथा यदि नित्यता पदार्थोंमें न मानी जाय तो स्मरण पूर्वक जो लोकमें लैन दैनका व्यवहार होता है वह भी न हो सकै, परन्तु वह भी यथार्थ होता है इत्यादि अनेक हेतुओंसे सर्वथा क्षणिकता पदार्थोंमें सिद्ध नहीं होती उसी प्रकार दो सपत्नियोंका दृष्टांत भी सर्वथा असिद्ध है क्योंकि दो सपत्नियां दो पदार्थ हैं । यहां पर सत् परिणाम उभयात्मक एक ही पदार्थ है । दूसरे सपत्नीयुग्म विरोधी बनकर आगे पीछे क्रमसे होता है । सत् परिणाम एककालमें अविरुद्ध रहते हैं । इसलिये यह दृष्टांत हास्यकारक है, इस पर अधिक विचार करना ही व्यर्थ है ।


माता मे वन्ध्या स्यादित्यादिवदपि विरुद्धवाक्यत्वात् ।
कृतकत्वादिति हेतोः क्षणिकैकान्तात्कृतं कृतं विचारतया । ॥380॥

अर्थ: दो सपत्नियों ( सौतों ) का दृष्टान्त तो हास्य पैदा करता है, यह दृष्टान्त तो सभी दोषोंसे दूषित है, इस दृष्टान्तसे असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक आदि सभी दोष आते हैं । जिस प्रकार किसीका यह कहना कि मेरी माता बाँझ है, सर्वथा विरुद्ध है, उसी प्रकार सत् परिणामको दो सपत्नियोंके समान क्रमसे उत्पन्न मानकर एक कालमें परस्पर विरुद्ध रीतिसे उनकी सत्ताका कथन करना भी विरुद्ध है । क्योंकि सत् परिणाम न तो किसी काल विशेषमें क्रमसे उत्पन्न ही होते हैं, और न वे एक स्थानमें विरुद्ध रीतिसे ही रहते हैं, किन्तु अनादि अनन्त उनका परस्पर सापेक्ष प्रवाह युगपत चला जाता है । इसलिये सपत्नीयुग्मका दृष्टान्त विरुद्ध ही है । तथा जिस प्रकार कृतकत्वहेतुसे घट शरावेके समान पदार्थोंमें भिन्नता सिद्ध करना अनैकांतिक है क्योंकि पट और तन्तुओंमें कृतक होनेपर भी अभिन्नता पाई जाती है । इसलिये कृतकत्व हेतु अनैकान्तिक हेत्वाभास दोषसे दूषित है । इसी प्रकार सत् परिणामके विषयमें दो सपत्नियोंका दृष्टान्त भी अनैकान्तिक दोषसे दूषित है । क्योंकि दो सपत्नियां कहीं पर परस्पर विरुद्धहोकर रहती हैं और कहींपर परस्पर एकदूसरेकी सहायता चाहती हुईप्रेमपूर्वक अविरुद्ध भी रहती हैं यह नियम नहीं है कि दो सौतें परस्पर विरुद्ध रीतिसे ही रहें । इसलिये यह दृष्टान्त अनैकान्तिक दोषसेदूषित है । अथवा सपत्नी युग्ममें विरोधिता पाई जाती है कहींनहीं भी पाई जाती है इसलिये अनैकान्तिक है तथा जिस प्रकारबौद्धका यह सिद्धान्त कि सब पदार्थ अनित्य हैं क्योंकि वे सर्वथा क्षणिक हैं, सर्वथा असिद्ध हैं असिद्धताका हेतु भी यही है कि जो क्षणिकैकान्त हेतु दिया जाता है वह सिद्ध नहीं होता, क्योंकि पदार्थोंमें नित्यता भी प्रतीत होती है, यदि नित्यता पदार्थोंमें न हो तो यह वही पुरुष है जिसे दो वर्ष पहले देखा था, ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं होना चाहिये परन्तु ऐसा यथार्थ प्रत्यभिज्ञान होता है, तथा यदि नित्यता पदार्थोंमें न मानी जाय तो स्मरण पूर्वक जो लोकमें लैन दैनका व्यवहार होता है वह भी न हो सके, परन्तु वह भी यथार्थ होता है इत्यादि अनेक हेतुओंसे सर्वथा क्षणिकता पदार्थोंमें सिद्ध नहीं होती उसी प्रकार दो सपत्नियोंका दृष्टांत भी सर्वथा असिद्ध है क्योंकि दो सपत्नियां दो पदार्थ हैं । यहां पर सत् परिणाम उभयात्मक एक ही पदार्थ है । दूसरे सपत्नीयुग्म विरोधी बनकर आगे पीछे क्रमसे होता है । सत् परिणाम एककालमें अविरुद्ध रहते हैं । इसलिये यह दृष्टांत हास्यकारक है, इस पर अधिक विचार करना ही व्यर्थ है ।


तद्वज्ज्येष्ठकनिष्ठभ्रातृद्वैतं विरुद्धदृष्टान्तः ।
सति चाऽधर्मिणि तत्त्वे तथाऽऽश्रयासिद्धदोषत्वात् ॥381॥

अर्थ: छोटे बड़े भाईका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है, क्योंकि वह साध्यसे विरुद्ध पड़ता है । हमारा साध्य उभय धर्मात्मक पदार्थ है, परन्तु दृष्टान्त तृतीय पदार्थकी सत्ता सिद्ध करता है । छोटे बड़े भाई विना मातापिताके नहीं हो सक्ते हैं, मातापिताके होते हुए ही वे किसीकाल विशेषसे क्रमसे उत्पन्न हुए हैं । परन्तु यह बात सत् परिणाममें नहीं है, न तो सत् परिणामका उन दोनोंसे अतिरिक्त कोई आश्रय ही है और न उनकी काल विशेषसे क्रमसे उत्पत्ति ही है, इसलिये धर्मीका अभाव होनेसे आश्रयःसिद्ध दोष आता है दूसरी बात यह भी है कि इस दृष्टान्तसे अनवस्था दोष भी आता है क्योंकि भाई उनके माता पिताके पराधीन होते हैं । ऐसा पराधीनताका सिद्धान्त माननेमें जो कोई भी पर होगा उसे पराधीन ही मानना पड़ेगा, जिस प्रकार पुत्र पिताके आधीन है, पिता अपने पिताके अधीन है, वह अपने पिताके अधीन है, इसी प्रकार सत् और परिणामको पराधीन माननेपर अनवस्था दोष आता है क्योंकि पराधीनतारूपी श्रृंखलाका कहीं अन्त नहीं आवेगा ।


अपि कोपि परायत्तः सोपि परः सर्वथा परायत्तात् ।
सोपि परायत्तः स्यादित्यनवस्था प्रसङ्गदोषश्च ॥382॥

अर्थ: छोटे बड़े भाईका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है, क्योंकि वह साध्यसे विरुद्ध पड़ता है । हमारा साध्य उभय धर्मात्मक पदार्थ है, परन्तु दृष्टान्त तृतीय पदार्थकी सत्ता सिद्ध करता है । छोटे बड़े भाई विना मातापिताके नहीं हो सक्ते हैं, मातापिताके होते हुए ही वे किसीकाल विशेषसे क्रमसे उत्पन्न हुए हैं । परन्तु यह बात सत् परिणाममें नहीं है, न तो सत् परिणामका उन दोनोंसे अतिरिक्त कोई आश्रय ही है और न उनकी काल विशेषसे क्रमसे उत्पत्ति ही है, इसलिये धर्मीका अभाव होनेसे आश्रयःसिद्ध दोष आता है दूसरी बात यह भी है कि इस दृष्टान्तसे अनवस्था दोष भी आता है क्योंकि भाई उनके माता पिताके पराधीन होते हैं । ऐसा पराधीनताका सिद्धान्त माननेमें जो कोई भी पर होगा उसे पराधीन ही मानना पड़ेगा, जिस प्रकार पुत्र पिताके आधीन है, पिता अपने पिताके अधीन है, वह अपने पिताके अधीन है, इसी प्रकार सत् और परिणामको पराधीन माननेपर अनवस्था दोष आता है क्योंकि पराधीनतारूपी श्रृंखलाका कहीं अन्त नहीं आवेगा ।


नार्थक्रियासमर्थो दृष्टान्तः कारकादिवद्धि यतः ।
सव्यभिचारित्वादिह सपक्षवृत्तिर्विपक्षवृत्तिश्च ॥383॥

अर्थ: आधार आधेय न्यायसे जो दो कारकोंका दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, वह व्यभिचारी है क्योंकि वह सपक्ष विपक्ष दोनोंमें ही रहता है। साध्यके अनुकूल दृष्टान्तको सपक्ष कहते हैं और उसके प्रतिकूल दृष्टान्तको विपक्ष कहते हैं। जो दृष्टान्त साध्यका सपक्ष भी हो तथा विपक्ष भी हो वह व्यभिचार दोष विशिष्ट दृष्टान्त कहलाता है। सत् परिणुमके विषयमें दो कारकोंका दृष्टान्त भी ऐसा ही है। क्योंकि जैसे आधार आधेय दो कारक ‘वृक्षे शाखा’ (वृक्षमें शाखा) यहां पर अभिन्न - एकात्मक पदार्थमें होते हैं, वैसे ‘स्थाल्यां दधि’ (वटलोईमें दही) यहां पर भिन्न - अनेक पदार्थोंमें भी होते हैं। अर्थात् ‘वृक्षे शाखा’ यहां पर जो आधार आधेय है वह अभिन्न पदार्थमें हैं इसलिये सपक्ष है। परन्तु ‘स्थाल्यां दधि’ यहां पर जो आधार आधेय है वह भिन्न दो पदार्थोंमें है इस लिये वह विपक्ष है। इसलिये दो कारकोंका दृष्टान्त व्यभिचारी है। यदि कोई यह कहै कि यह दृष्टान्त व्यभिचारी भले ही हो, परन्तु इससे अपने पक्षकी सिद्धि भी किसी तो प्रकार हो ही जाती है। यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे दूसरे पक्षका शत्रु है वैसे अपने अपने पक्षका भी तो स्वयं शत्रु है अर्थात् व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे सपक्षमें रह कर साध्यकी सिद्धि कराता है वैसे विपक्षमें रहकर वह साध्य विरुद्ध भी तो हो जाता है। इसलिये यह दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। यहांपर सत् और परिणाममें देशके अंश होनेसे अंशपना सिद्ध किया जाता है और उनका आधार उनमें भिन्न पदार्थ सिद्ध किया जाता है (यह शंकाकारका मत है यदि उन दोनोंका कोई स्वामी - आधारभूत पदार्थ हो तब तो आधार आधेयभाव उनमें बन जाय, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त उनका कोई स्वामी ही नहीं है तो फिर ये दोनों किसके अंश कहलावेंगे, वे दोनों तो अंश स्वरूप ही माने जा चुके हैं ? इसलिये कारकद्वयका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


वृक्षे शाखा हि यथा स्यादेकात्मनि तथैव नानात्वे
स्थाल्यां दधीतिहेतोर्व्यभिचारी कारकः कथं न स्यात् ॥384॥

अर्थ: आधार आधेय न्यायसे जो दो कारकोंका दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, वह व्यभिचारी है क्योंकि वह सपक्ष विपक्ष दोनोंमें ही रहता है। साध्यके अनुकूल दृष्टान्तको सपक्ष कहते हैं और उसके प्रतिकूल दृष्टान्तको विपक्ष कहते हैं। जो दृष्टान्त साध्यका सपक्ष भी हो तथा विपक्ष भी हो वह व्यभिचार दोष विशिष्ट दृष्टान्त कहलाता है। सत् परिणुमके विषयमें दो कारकोंका दृष्टान्त भी ऐसा ही है। क्योंकि जैसे आधार आधेय दो कारक ‘वृक्षे शाखा’ (वृक्षमें शाखा) यहां पर अभिन्न - एकात्मक पदार्थमें होते हैं, वैसे ‘स्थाल्यां दधि’ (वटलोईमें दही) यहां पर भिन्न - अनेक पदार्थोंमें भी होते हैं। अर्थात् ‘वृक्षे शाखा’ यहां पर जो आधार आधेय है वह अभिन्न पदार्थमें हैं इसलिये सपक्ष है। परन्तु ‘स्थाल्यां दधि’ यहां पर जो आधार आधेय है वह भिन्न दो पदार्थोंमें है इस लिये वह विपक्ष है। इसलिये दो कारकोंका दृष्टान्त व्यभिचारी है। यदि कोई यह कहै कि यह दृष्टान्त व्यभिचारी भले ही हो, परन्तु इससे अपने पक्षकी सिद्धि भी किसी तो प्रकार हो ही जाती है। यह कहना भीठीक नहीं है, क्योंकि व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे दूसरे पक्षका शत्रु है वैसे अपने अपने पक्षका भी तो स्वयं शत्रु है अर्थात् व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे सपक्षमें रह कर साध्यकी सिद्धि कराता है वैसे विपक्षमें रहकर वह साध्य विरुद्ध भी तो हो जाता है। इसलिये यह दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। यहांपर सत् और परिणाममें देशके अंश होनेसे अंशपना सिद्ध किया जाता है और उनका आधार उनमें भिन्न पदार्थ सिद्ध किया जाता है (यह शंकाकारका मत है यदि उन दोनोंका कोई स्वामी - आधारभूत पदार्थ हो तब तो आधार आधेयभाव उनमें बन जाय, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त उनका कोई स्वामी ही नहीं है तो फिर ये दोनों किसके अंश कहलावेंगे, वे दोनों तो अंश स्वरूप ही माने जा चुके हैं ? इसलिये कारकद्वयका दृष्टान्त ठीक नहीं है।

पूर्वार्द्ध 301 से 400 (श्लोक 385 से 400)

अपि सव्यभिचारित्वे यथाकथञ्चित्सपक्षदक्षश्चेत् ।
न यतः परपक्षरिपुर्यथा तथारिः स्वयं स्वपक्षस्य ॥385॥

अर्थ: आधार आधेय न्यायसे जो दो कारकोंका दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, वह व्यभिचारी है क्योंकि वह सपक्ष विपक्ष दोनोंमें ही रहता है। साध्यके अनुकूल दृष्टान्तको सपक्ष कहते हैं और उसके प्रतिकूल दृष्टान्तको विपक्ष कहते हैं। जो दृष्टान्त साध्यका सपक्ष भी हो तथा विपक्ष भी हो वह व्यभिचार दोष विशिष्ट दृष्टान्त कहलाता है। सत् परिणुमके विषयमें दो कारकोंका दृष्टान्त भी ऐसा ही है। क्योंकि जैसे आधार आधेय दो कारक ‘वृक्षे शाखा’ (वृक्षमें शाखा) यहां पर अभिन्न-एकात्मक पदार्थमें होते हैं, वैसे ‘स्थाल्यां दधि’ (वटलोईमें दही यहां पर भिन्न-अनेक पदार्थोंमें भी होते हैं। अर्थात् ‘वृक्षे शाखा’ यहां पर जो आधार आधेय है वह अभिन्न पदार्थमें हैं इसलिये सपक्ष है। परन्तु ‘स्थाल्यां दधि’ यहां पर जो आधार आधेय है वह भिन्न दो पदार्थोंमें है इस लिये वह विपक्ष है। इसलिये दो कारकोंका दृष्टान्त व्यभिचारी है। यदि कोई यह कहे कि यह दृष्टान्त व्यभिचारी भले ही हो, परन्तु इससे अपने पक्षकी सिद्धि भी किसी तो प्रकार हो ही जाती है। यह कहना भीठीक नहीं है, क्योंकि व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे दूसरे पक्षका शत्रु है वैसे अपने अपने पक्षका भी तो स्वयं शत्रु है अर्थात् व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे सपक्षमें रह कर साध्यकी सिद्धि कराता है वैसे विपक्षमें रहकर वह साध्य विरुद्ध भी तो हो जाता है। इसलिये यह दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। यहांपर सत् और परिणाममें देशके अंश होनेसे अंशपना सिद्ध किया जाता है और उनका आधार उनमें भिन्न पदार्थ सिद्ध किया जाता है (यह शंकाकारका मत है यदि उन दोनोंका कोई स्वामी-आधारभूत पदार्थ हो तब तो आधार आधेयभाव उनमें बन जाय, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त उनका कोई स्वामी ही नहीं है तो फिर ये दोनों किसके अंश कहलावेंगे, वे दोनों तो अंश स्वरूप ही माने जा चुके हैं ? इसलिये कारकद्वयका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


साध्यं देशांशाद्वा सत्परिणामद्वयस्य सांशत्वम् ।
तत्स्यादंशिविलोपे कस्यांशा अंशमात्रएवांशः ॥386॥

अर्थ: आधार आधेय न्यायसे जो दो कारकोंका दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, वह व्यभिचारी है क्योंकि वह सपक्ष विपक्ष दोनोंमें ही रहता है। साध्यके अनुकूल दृष्टान्तको सपक्ष कहते हैं और उसके प्रतिकूल दृष्टान्तको विपक्ष कहते हैं। जो दृष्टान्त साध्यका सपक्ष भी हो तथा विपक्ष भी हो वह व्यभिचार दोष विशिष्ट दृष्टान्त कहलाता है। सत् परिणामके विषयमें दो कारकोंका दृष्टान्त भी ऐसा ही है। क्योंकि जैसे आधार आधेय दो कारक ‘वृक्षे शाखा’ (वृक्षमें शाखा) यहां पर अभिन्न - एकात्मक पदार्थमें होते हैं, वैसे ‘स्थाल्यां दधि’ (वटलोईमें दही यहां पर भिन्न - अनेक पदार्थोंमें भी होते हैं। अर्थात् ‘वृक्षे शाखा’ यहां पर जो आधार आधेय है वह अभिन्न पदार्थमें हैं इसलिये सपक्ष है। परन्तु ‘स्थाल्यां दधि’ यहां पर जो आधार आधेय है वह भिन्न दो पदार्थोंमें है इस लिये वह विपक्ष है। इसलिये दो कारकोंका दृष्टान्त व्यभिचारी है। यदि कोई यह कहै कि यह दृष्टान्त व्यभिचारी भले ही हो, परन्तु इससे अपने पक्षकी सिद्धि भी किसी तो प्रकार हो ही जाती है। यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे दूसरे पक्षका शत्रु है वैसे अपने अपने पक्षका भी तो स्वयं शत्रु है अर्थात् व्यभिचारी दृष्टान्त जैसे सपक्षमें रह कर साध्यकी सिद्धि कराता है वैसे विपक्षमें रहकर वह साध्य विरुद्ध भी तो हो जाता है। इसलिये यह दृष्टान्त दृष्टान्ताभास है। यहांपर सत् और परिणाममें देशके अंश होनेसे अंशपना सिद्ध किया जाता है और उनका आधार उनमें भिन्न पदार्थ सिद्ध किया जाता है (यह शंकाकारका मत है यदि उन दोनोंका कोई स्वामी - आधारभूत पदार्थ हो तब तो आधार आधेयभाव उनमें बन जाय, परन्तु सत् परिणामसे अतिरिक्त उनका कोई स्वामी ही नहीं है तो फिर ये दोनों किसके अंश कहलावेंगे, वे दोनों तो अंश स्वरूप ही माने जा चुके हैं ? इसलिये कारकद्वयका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


नाप्युपयोगी क्वचिदपि बीजाङ्कुरवदिहेति दृष्टान्तः ।
स्वावसरे स्वावसरे पूर्वापरभावभावित्वात् ॥387॥

अर्थ: बीज और अङ्कुरका दृष्टान्त भी सत् परिणामके विषयमें उपयोगी नहीं पड़ता है, क्योंकि बीज अपने समयमें होता है, अङ्कुर अपने समयमें होता है । दोनों ही पूर्वापरभाव वाले हैं अर्थात् आगे पीछे होने वाले हैं जिस प्रकार बीजके समय में अङ्कुर नहीं होता है और अङ्कुरके समयमें बीज नहीं होता है, उस प्रकार सत् और परिणाममें पूर्वापरभाव नहीं होता है, उन दोनोंका एक ही काल है । उसीको स्पष्ट करते हैं -


बीजावसरे नाङ्कुर इव बीजं नाङ्कुरक्षणे हि यथा ।
न तथा सत्परिणामद्वैतस्य तदेककालत्वात् ॥388॥

अर्थ: बीज और अङ्कुरका दृष्टान्त भी सत् परिणामके विषयमें उपयोगी नहीं पड़ता है, क्योंकि बीज अपने समयमें होता है, अङ्कुर अपने समयमें होता है। दोनों ही पूर्वापरभाव वाले हैं अर्थात् आगे पीछे होने वाले हैं जिस प्रकार बीजके समय में अङ्कुर नहीं होता है और अङ्कुरके समयमें बीज नहीं होता है, उस प्रकार सत् और परिणाममें पूर्वापरभाव नहीं होता है, उन दोनोंका एक ही काल है। उसीको स्पष्ट करते हैं -


सदभावे परिणामो भवति न सत्ताक आश्रयाभावात् ।
दीपाभावे हि यथा तत्क्षणमिव दृश्यते प्रकाशो न ॥389॥

अर्थ: जिस प्रकार दीपकका अभाव होनेपर उसी समय प्रकाशका भी अभाव हो जाता है, कारण - दीपक प्रकाशका आश्रय है, विना दीपकके प्रकाश किसके आश्रय ठहरे ? उसी प्रकार सत्के अभावमें परिणाम भी अपनी सत्ता नहीं रख सक्ता है, कारण - परिणामका सत् आश्रय है, विना आश्रयके आश्रयी कैसे रह सक्ता है ? अर्थात् नहीं रह सक्ता ।


परिणामाभावेपि च सदिति च नालम्बते हि सत्तान्ताम् ।
स यथा प्रकाशनाशे प्रदीपनाशोप्यवश्यमध्यक्षात् ॥390॥

अर्थ: जिसप्रकार प्रकाशका नाश होनेपर दीपकका नाश भी प्रत्यक्ष दीखता है, अर्थात् जहां प्रकाश नहीं रहता, वहां दीपक भी नहीं रहता है। उसी प्रकार परिणामके अभावमें सत् भी अपनी सत्ताको नहीं अवलम्बन कर सक्ता है।


अपि च क्षणभेदः किल भवतु यदीहेष्टसिद्धिरनायासात् ।
सापि न यतस्तथा सति सतो विनाशोऽसतश्च सर्गः स्यात् ॥391॥

अर्थ: यदि अनायास इष्ट पदार्थकी सिद्धि होजाय तो सत् और परिणाम दोनोंका क्षणभेद - कालभेद भी मान लिया जाय, परन्तु कालभेद माननेसे इष्ट सिद्धि तो दूर रहो उल्टी हानि हीती है। दोनोंका कालभेद माननेपर सत्का विनाश और असत्की उत्पत्ति होने लगेगी। क्योंकि जब दोनोंका काल भेद माना जायगा तो जो है वह सर्वथा नष्ट होगा और जो उत्पन्न होगा वह सर्वथा नवीन ही होगा। परन्तु ऐसा नहीं होता, सत्का विनाश और असत्की उत्पत्ति माननेसे जो दोष आते हैं उनका पहले ( १० वें श्लोकमें ) विवेचन किया जा चुका है।


कनकोपलवदिहैषः क्षमते न परीक्षितः क्षणं स्थातुम् ।
गुणगुणिभावाभावाद्यतः स्वयमसिद्धदोषात्मा ॥392॥

अर्थ: सत् परिणामके विषयमें कनकोपलका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है। यह दृष्टान्त परीक्षा करनेपर क्षण मात्र भी नहीं ठहर सक्ता है । सोना और पत्थर इन मिली हुई दो द्रव्योंका नाम ही कनकोपल है । इसलिये कनकोपल दो द्रव्योंके समुदायका नाम है । कनकोपलमें गुणगुणीभाव नहीं है अतः यह दृष्टान्त असिद्ध है । क्योंकि जिस प्रकार सत् परिणाममें कथञ्चित् गुणगुणीभाव है इस प्रकार इस दृष्टान्तमें नहीं है । दो द्रव्योंका समुदाय होनेसे ही कनकोपलमें कुछ अंशके ग्रहण करनेका और कुछ अंशके छोडनेका विचार हो सक्ता है । परन्तु सत् परिणाममें इस प्रकार हेय उपादेय विचार नहीं हो सक्ता है, क्योंकि वे दोनों एक द्रव्यरूप हैं । जहांपर दो अथवा अनेक द्रव्य होते हैं वहीं पर एक द्रव्यका ग्रहण और एकका त्याग हो सक्ता है परन्तु जहां पर केवल एक ही द्रव्य है वहां पर ऐसा होना असंभव ही है । इसलिये कनकोपलका दृष्टान्त सर्वथा विषम है ।


हेयादेयविचारो भवति हि कनकोपलद्वयोरेव ।
तदनेकद्रव्यत्वान्न स्यात्साध्ये तदेकद्रव्यत्वात् ॥393॥

अर्थ: सत् परिणामके विषयमें कनकोपलका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है। यह दृष्टान्त परीक्षा करनेपर क्षण मात्र भी नहीं ठहर सक्ता है। सोना और पत्थर इन मिली हुई दो द्रव्योंका नाम ही कनकोपल है। इसलिये कनकोपल दो द्रव्योंके समुदायका नाम है। कनकोपलमें गुणगुणीभाव नहीं है अतः यह दृष्टान्त असिद्ध है। क्योंकि जिस प्रकार सत् परिणाममें कथञ्चित् गुणगुणीभाव है इस प्रकार इस दृष्टान्तमें नहीं है। दो द्रव्योंका समुदाय होनेसे ही कनकोपलमें कुछ अंशके ग्रहण करनेका और कुछ अंशके छोडनेका विचार हो सक्ता है। परन्तु सत् परिणाममें इस प्रकार हेय उपादेय विचार नहीं हो सक्ता है, क्योंकि वे दोनों एक द्रव्यरूप हैं। जहांपर दो अथवा अनेक द्रव्य होते हैं वहीं पर एक द्रव्यका ग्रहण और एकका त्याग हो सक्ता है परन्तु जहां पर केवल एक ही द्रव्य है वहां पर ऐसा होना असंभव ही है। इसलिये कनकोपलका दृष्टान्त सर्वथा विषम है।


वागर्थद्वयमिति वा दृष्टान्तो न स्वसाधनायालम् ।
घट इति वर्णद्वैतात् कम्बुग्रीवादिमानिहास्त्यपरः ॥394॥

अर्थ: वचन और पदार्थ अर्थात् वाच्य वाचक द्वैतका दृष्टान्त भी अपनी सिद्धि करानेमें समर्थ नहीं है। क्योंकि घट - घकार और टकार इन दो वर्णोंसे कम्बुग्रीवादि वाला घट पदार्थ दूसरा ही है। जिस कम्बु (शंख) ग्रीवावाले घटमें जल रक्खा जाता है वह घट पदार्थ उन घ - ट वर्णोंसे सर्वथा जुदा ही है। केवल घट शब्दके उच्चारण करनेसे उस घट पदार्थका बोध हो जाता है इतना ही मात्र घट शब्दका घट पदार्थके साथ वाच्य वाचक सम्बन्ध है। परन्तु सत् परिणाम इस प्रकार भिन्न नहीं है। यदि वागर्थ, शब्दका वचन और पदार्थ, यह अर्थ न किया जाय और दूसरा कि वचन रूप ही अर्थ किया जाय तो ऐसा अर्थ करना पहले तो निस्सार ही है परन्तु सिद्धिके लिये यदि वह माना भी जाय तो भी उससे अभीष्ट सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि दूसरे अर्थका यही आशय निकला कि शब्दके समान सत् परिणाम हैं, परन्तु ऐसा माननेसे शब्दके समान सत् परिणामात्मक पदार्थ भी अनित्य सिद्ध होगा, और ऐसी अनित्यता पदार्थमें अभीष्ट नहीं है इसलिये उक्त दृष्टान्त भी ठीक नहीं है।


यदि वा निस्सारतया वागेवार्थः समस्यते सिद्ध्यै ।
न तथापीष्टसिद्धिः शब्दवदर्थस्याप्यनित्यत्वात् ॥395॥

अर्थ: वचन और पदार्थ अर्थात् वाच्य वाचक द्वैतका दृष्टान्त भी अपनी सिद्धि करानेमें समर्थ नहीं है। क्योंकि घट - घकार और टकार इन दो वर्णोंसे कम्बुग्रीवादि वाला घट पदार्थ दूसरा ही है। जिस कम्बु (शंख) ग्रीवावाले घटमें जल रक्खा जाता है वह घट पदार्थ उन घ - ट वर्णोंसे सर्वथा जुदा ही है। केवल घट शब्दके उच्चारण करनेसे उस घट पदार्थका बोध हो जाता है इतना ही मात्र घट शब्दका घट पदार्थके साथ वाच्य वाचक सम्बन्ध है। परन्तु सत् परिणाम इस प्रकार भिन्न नहीं है। यदि वागर्थ, शब्दका वचन और पदार्थ, यह अर्थ न किया जाय और दूसरा कि वचन रूप ही अर्थ किया जाय तो ऐसा अर्थ करना पहले तो निस्सार ही है परन्तु सिद्धिके लिये यदि वह माना भी जाय तो भी उससे अभीष्ट सिद्धि नहीं होती है, क्योंकि दूसरे अर्थका यही आशय निकला कि शब्दके समान सत् परिणाम हैं, परन्तु ऐसा माननेसे शब्दके समान सत् परिणामात्मक पदार्थ भी अनित्य सिद्ध होगा, और ऐसी अनित्यता पदार्थमें अभीष्ट नहीं है इसलिये उक्त दृष्टान्त भी ठीक नहीं है।


स्यादविचारितरम्या भेरीदण्डवदिहेति संदृष्टिः ।
पक्षाधर्मत्वेपि च व्याप्यासिद्धत्वदोषदुष्टत्वात् ॥396॥

अर्थ: भेरी दण्डका जो दृष्टान्त दिया गया है वह भी सत् परिणामके विषयमें अविचारित रम्य है अर्थात् जबतक उसके विषयमें विचार नहीं किया जाता है तभी तक वह अच्छा प्रतीत होता है । विचारनेपर निःसार प्रतीत होता है । उसीका अनुमान इस प्रकार है - ’ सत्परिणामौ कार्यकारिणौ संयुक्तत्वात् भेरीदण्डवत्, अर्थात् शंकाकारका पक्ष है कि सत् परिणाम मिलकर कार्य करते हैं क्योंकि वे संयुक्त हैं । जिस प्रकार भेरी दण्ड संयुक्त होकर कार्यकारी होते हैं । यह शङ्काकारका अनुमान ठीक नहीं है । क्योंकि यहांपर जो ’ संयुक्तत्व ’ हेतु दिया गया है वह सत् परिणामरूप पक्षमें नहीं रहता है । इसलिये हेतु व्याप्यासिद्ध दोषसे दूषित है । अर्थात् सत् परिणाम भेरीदण्डके समान मिलकर कार्यकारी नहीं है, किन्तु कथंचित् भिन्नता अथवा तादात्म्यरूपमें कार्यकारी है । यदि सत् परिणामको युतसिद्ध - भिन्न २ स्वतन्त्र माना जाय तो दोनोंमेंसे एक भी सिद्ध न हो सकेगा । क्योंकि दोनों ही परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षामें आत्मलाभ - स्वरूप सम्पादन करते हैं । यदि इन्हें स्वतन्त्र २ मानकर एकका दूसरा धर्म माना जाय तो ऐसी अवस्थामें सभी सबके धर्म हो जायँगे । कारण जब स्वतन्त्र रहनेपर भी एक दूसरेका धर्म माना जायगा तो धर्म धर्मीका कुछ नियम नहीं रहेगा । हरकोई हरएकका धर्म बन जाय इसमें कौन बाधक होगा?


युतसिद्धत्वं स्यादिति सत्परिणामद्वयस्य यदि पक्षः ।
एकस्यापि न सिद्धिर्यदि वा सर्वोपि सर्वधर्मः स्यात् ॥397॥

अर्थ: भेरी दण्डका जो दृष्टान्त दिया गया है वह भी सत् परिणामके विषयमें अविचारित रम्य है अर्थात् जबतक उसके विषयमें विचार नहीं किया जाता है तभी तक वह अच्छा प्रतीत होता है । विचारनेपर निःसार प्रतीत होता है । उसीका अनुमान इस प्रकार है - ‘ सत्परिणामौ कार्यकारिणौ संयुक्तत्वात् भेरीदण्डवत्, अर्थात् शंकाकारका पक्ष है कि सत् परिणाम मिलकर कार्य करते हैं क्योंकि वे संयुक्त हैं । जिस प्रकार भेरी दण्ड संयुक्त होकर कार्यकारी होते हैं । यह शङ्काकारका अनुमान ठीक नहीं है । क्योंकि यहांपर जो ‘ संयुक्तत्व ’ हेतु दिया गया है वह सत् परिणामरूप पक्षमें नहीं रहता है । इसलिये हेतु व्याप्यासिद्ध दोषसे दूषित है । अर्थात् सत् परिणाम भेरीदण्डके समान मिलकर कार्यकारी नहीं है, किन्तु कथंचित् भिन्नता अथवा तादात्म्यरूपमें कार्यकारी है । यदि सत् परिणामको युतसिद्ध - भिन्न २ स्वतन्त्र माना जाय तो दोनोंमेंसे एक भी सिद्ध न हो सकेगा । क्योंकि दोनों ही परस्पर एक दूसरेकी अपेक्षामें आत्मलाभ - स्वरूप सम्पादन करते हैं । यदि इन्हें स्वतन्त्र २ मानकर एकका दूसरा धर्म माना जाय तो ऐसी अवस्थामें सभी सबके धर्म हो जायँगे । कारण जब स्वतन्त्र रहनेपर भी एक दूसरेका धर्म माना जायगा तो धर्म धर्मीका कुछ नियम नहीं रहेगा । हरकोई हरएकका धर्म बन जाय इसमें कौन बाधक होगा?


इह यदपूर्णन्यायादस्ति परीक्षाक्षमो न दृष्टान्तः ।
अविशेषत्वापत्तौ द्वैताभावस्य दुर्निवारत्वात् ॥398॥

अर्थ: यहांपर अपूर्ण न्यायसे एकका मुख्यतासे दूसरेका उदासीनतासे ग्रहण करने रूप दृष्टान्त भी परीक्षा करने योग्य नहीं है । क्योंकि अपूर्ण न्यायसे जिसका मुख्यतासे ग्रहण किया जायगा वही प्रधान ठहरेगा, दूसरा जो उदासीनतासे कहा जायगा वह नहीं के बराबर सामान्य ठहरेगा, ऐसी अवस्थामें द्वैतका अभाव दुर्निवार ही होगा, अर्थात् जब दूसरा उदासीन नहीं के तुल्य है तो एक ही समझना चाहिये, इसलिये एककी ही सिद्धि होगी, परन्तु सत् परिणाम दो हैं । अतः अपूर्ण न्यायका दृष्टान्त उनके विषयमें ठीक नहीं है यदि यह कहा जाय कि दोनों ही यद्यपि समान हैं तथापि एकको मुख्यतासे कह दिया जाता है तो यह कहना भी विरुद्ध ही पड़ता है, जब दोनोंकी समानतामें भी एकके विना दूसरेकी सिद्धि हो जाती है तो दूसरेकी भी सिद्धि पहलेके विना हो जायगी, अर्थात् दोनों ही निरपेक्ष अथवा एक व्यर्थ सिद्ध होगा, ऐसी अवस्थामें कार्यकारण भाव भी नहीं वन सकेगा । क्योंकि कार्यकारण भाव तो एक दूसरेकी आधीनतामें ही बनता है । इसलिये अपूर्ण न्यायका दृष्टान्त सब तरह विरुद्ध ही पड़ता है ।


अपि चान्यतरेण विना यथेष्टसिद्धिस्तथा तदितरेण ।
भवतु विनापि च सिद्धिः स्यादेवं कारणाद्यभावश्च ॥399॥

अर्थ: यहांपर अपूर्ण न्यायसे एकका मुख्यतासे दूसरेका उदासीनतासे ग्रहण करने रूप दृष्टान्त भी परीक्षा करने योग्य नहीं है । क्योंकि अपूर्ण न्यायसे जिसका मुख्यतासे ग्रहण किया जायगा वही प्रधान ठहरेगा, दूसरा जो उदासीनतासे कहा जायगा वह नहीं के बराबर सामान्य ठहरेगा, ऐसी अवस्थामें द्वैतका अभाव दुर्निवार ही होगा, अर्थात् जब दूसरा उदासीन नहीं के तुल्य है तो एक ही समझना चाहिये, इसलिये एककी ही सिद्धि होगी, परन्तु सत् परिणाम दो हैं । अतः अपूर्ण न्यायका दृष्टान्त उनके विषयमें ठीक नहीं है यदि यह कहा जाय कि दोनों ही यद्यपि समान हैं तथापि एकको मुख्यतासे कह दिया जाता है तो यह कहना भी विरुद्ध ही पड़ता है, जब दोनोंकी समानतामें भी एकके विना दूसरेकी सिद्धि हो जाती है तो दूसरेकी भी सिद्धि पहलेके विना हो जायगी, अर्थात् दोनों ही निरपेक्ष अथवा एक व्यर्थ सिद्ध होगा, ऐसी अवस्थामें कार्यकारण भाव भी नहीं वन सकेगा । क्योंकि कार्यकारण भाव तो एक दूसरेकी आधीनतामें ही बनता है । इसलिये अपूर्ण न्यायका दृष्टान्त सब तरह विरुद्ध ही पड़ता है ।


मित्रद्वैतवदित्यपि दृष्टान्तः स्वप्नसन्निभो हि यतः ।
स्याद्गौरवप्रसंगाद्धेतोरपि हेतु हेतुरनवस्था ॥400॥

अर्थ: एक अपने कार्यको सिद्ध करता है, दूसरा उसका उसके कार्यमें सहायक होता है, यह मित्रद्वयका दृष्टान्त भी स्वप्नके समान ही है। जिस प्रकार स्वप्नमें पाये हुए पदार्थसे कार्यसिद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार इस दृष्टान्तसे भी कुछ कार्यसिद्धि नहीं होती है, क्योंकि इस दृष्टान्तसे हेतुका हेतु उसका भी फिर हेतु, उस हेतुका भी हेतु मानना पड़ेगा। ऐसा माननेसे अनवस्था दोष आवेगा और गौरवका प्रसंग भी आवेगा। उसका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे कोई पुरुष मुख्यतासे अपने कार्यको सिद्ध करताहै और दूसरा उसका मित्र उसके उस कार्यमें सहायक होजाता है। जिस प्रकार दूसरा पहलेकी सहायता करता है उसी प्रकार दूसरेकी सहायताके लिये तीसरे सहायककी आवश्यकता है, उसके लिये चौथेकी, उसके लिये पांचवेकी, इस प्रकार उत्तरोत्तर सहायकोंकी योजना अवश्य ही अनिवार्य (प्राप्त) होगी यदि यह कहा जाय कि एक कार्यके लिये दो कारणोंकी ही आवश्यकता होती है (१) उपादान कारण (२) निमित्त कारण अथवा एक कार्यमें दो ही सहायकमित्र आवश्यक होते हैं। उनसे अतिरिक्त कारणोंकी आवश्यकता ही नहीं होती तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्यमें दो ही कारण होते हैं उनसे अधिक होते ही नहीं, इस नियमका विधायक कोई प्रमाण नहीं है इसलिये सत् परिणामके विषयमें मित्रद्वयका दृष्टान्त भी कुछ कार्यकारी नहीं है।

पूर्वार्द्ध 401 से 500 (श्लोक 401 से 500)

तदुदाहरणं कश्चित्स्वार्थं सृजतीति मूलहेतुतया ।
अपरः सहकारितया तमनु तदन्योपि दुर्निवारः स्यात् ॥401॥

अर्थ: एक अपने कार्यको सिद्ध करता है, दूसरा उसका उसके कार्यमें सहायक होता है, यह मित्रद्वयका दृष्टान्त भी स्वप्नके समान ही है। जिस प्रकार स्वप्नमें पाये हुए पदार्थसे कार्यसिद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार इस दृष्टान्तसे भी कुछ कार्यसिद्धि नहीं होती है, क्योंकि इस दृष्टान्तसे हेतुका हेतु उसका भी फिर हेतु, उस हेतुका भी हेतु मानना पड़ेगा। ऐसा माननेसे अनवस्था दोष आवेगा और गौरवका प्रसंग भी आवेगा। उसका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे कोई पुरुष मुख्यतासे अपने कार्यको सिद्ध करताहै और दूसरा उसका मित्र उसके उस कार्यमें सहायक होजाता है। जिस प्रकार दूसरा पहलेकी सहायता करता है उसी प्रकार दूसरेकी सहायताके लिये तीसरे सहायककी आवश्यकता है, उसके लिये चौथेकी, उसके लिये पांचवेकी, इस प्रकार उत्तरोत्तर सहायकोंकी योजना अवश्य ही अनिवार्य (प्राप्त) होगी यदि यह कहा जाय कि एक कार्यके लिये दो कारणोंकी ही आवश्यकता होती है (१) उपादान कारण (२) निमित्त कारण अथवा एक कार्यमें दो ही सहायकमित्र आवश्यक होते हैं। उनसे अतिरिक्त कारणोंकी आवश्यकता ही नहीं होती तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्यमें दो ही कारण होते हैं उनसे अधिक होते ही नहीं, इस नियमका विधायक कोई प्रमाण नहीं है इसलिये सत् परिणामके विषयमें मित्रद्वयका दृष्टान्त भी कुछ कार्यकारी नहीं है।


कार्यम्प्रति नियतत्वाद्धेतुद्वैतं न ततोऽतिरिक्तंचेत् ।
तन्न यतस्तन्नियमग्राहकमिव न प्रमाणमिह ॥402॥

अर्थ: एक अपने कार्यको सिद्ध करता है, दूसरा उसका उसके कार्यमें सहायक होता है, यह मित्रद्वयका दृष्टान्त भी स्वप्नके समान ही है। जिस प्रकार स्वप्नमें पाये हुए पदार्थसे कार्यसिद्धि नहीं होती है, उसी प्रकार इस दृष्टान्तसे भी कुछ कार्यसिद्धि नहीं होती है, क्योंकि इस दृष्टान्तसे हेतुका हेतु उसका भी फिर हेतु, उस हेतुका भी हेतु मानना पड़ेगा। ऐसा माननेसे अनवस्था दोष आवेगा और गौरवका प्रसंग भी आवेगा। उसका दृष्टान्त इस प्रकार है कि जैसे कोई पुरुष मुख्यतासे अपने कार्यको सिद्ध करता है और दूसरा उसका मित्र उसके उस कार्यमें सहायक होजाता है। जिस प्रकार दूसरा पहलेकी सहायता करता है उसी प्रकार दूसरेकी सहायताके लिये तीसरे सहायककी आवश्यकता है, उसके लिये चौथेकी, उसके लिये पांचवेकी, इस प्रकार उत्तरोत्तर सहायकोंकी योजना अवश्य ही अनिवार्य (प्राप्त) होगी यदि यह कहा जाय कि एक कार्यके लिये दो कारणोंकी ही आवश्यकता होती है (१) उपादान कारण (२) निमित्त कारण अथवा एक कार्यमें दो ही सहायकमित्र आवश्यक होते हैं। उनसे अतिरिक्त कारणोंकी आवश्यकता ही नहीं होती तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्यमें दो ही कारण होते हैं उनसे अधिक होते ही नहीं, इस नियमका विधायक कोई प्रमाण नहीं है इसलिये सत् परिणामके विषयमें मित्रद्वयका दृष्टान्त भी कुछ कार्यकारी नहीं है।


एवं मिथो विपक्षद्वैतवदित्यपि न साधुदृष्टान्तः ।
अनवस्थादोषत्वाद्यथाऽरिरस्यापरारिरपि यस्मात् ॥403॥

अर्थ: जिस प्रकार मित्र द्वैतका दृष्टान्त ठीक नहीं है, उसी प्रकार शत्रु द्वैतका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार मित्र द्वैतके दृष्टान्तमें अनवस्था दोष आता है, उसी प्रकार शत्रुद्वैतके दृष्टान्तमें भी अनवस्था दोष आता है। जैसे एक पुरुषका दूसरा शत्रु है, वैसे दूसरेका तीसरा और तीसरेका चौथा शत्रु भी होगा। इस शत्रुमालाका भी कहीं अन्त नहीं दीखता है। यदि कहा जाय कि एक कार्यके प्रति दो शत्रु ही नियत हैं, दोसे अधिक नहीं होते हैं तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्यमें दो ही शत्रु होते हैं, उन शत्रुओंके शत्रु नहीं होते ऐसा नियम करनेमें कोई प्रमाण नहीं है। इसलिये दो शत्रुओंका दृष्टान्त भी सत् परिणामके विषयमें विरुद्ध ही है।


कार्यम्प्रति नियतत्वाच्छत्रुद्वैते न ततोऽतिरिक्तं चेत् ।
तन्न यतस्तन्नियमग्राहकमिव न प्रमाणमिह ॥404॥

अर्थ: जिस प्रकार मित्र द्वैतका दृष्टान्त ठीक नहीं है, उसी प्रकार शत्रु द्वैतका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है । क्योंकि जिस प्रकार मित्र द्वैतके दृष्टान्तमें अनवस्था दोष आता है, उसी प्रकार शत्रुद्वैतके दृष्टान्तमें भी अनवस्था दोष आता है । जैसे एक पुरुषका दूसरा शत्रु है, वैसे दूसरेका तीसरा और तीसरेका चौथा शत्रु भी होगा । इस शत्रुमालाका भी कहीं अन्त नहीं दीखता है । यदि कहा जाय कि एक कार्यके प्रति दो शत्रु ही नियत हैं, दोसे अधिक नहीं होते हैं तो यह कहना भी अयुक्त है, क्योंकि एक कार्यमें दो ही शत्रु होते हैं, उन शत्रुओंके शत्रु नहीं होते ऐसा नियम करनेमें कोई प्रमाण नहीं है । इसलिये दो शत्रुओंका दृष्टान्त भी सत् परिणामके विषयमें विरुद्ध ही है ।


वामेतरकरवर्त्तिरज्जूयुग्मं न चेह दृष्टान्तः ।
बाधितविषयत्वाद्वा दोषात्कालात्ययापदिष्टत्वात् ॥405॥

अर्थ: छाछको विलोते समय दाँये बाँये हाथमें रहनेवाली रस्सियोंका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है । क्योंकि इस दृष्टान्त द्वारा दोनोंको विमुख रहकर कार्यकारी बतलाया गया है । परन्तु परस्परकी विमुखतामें कार्यकी सिद्धि नहीं होती, उलटी हानि होती है, इसलिये इस दृष्टान्तमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधा आती है। अतः यह दृष्टान्त कालात्ययापदिष्ट दोष विशिष्ट है अर्थात् बाधित है । क्यों बाधित है ? इसका विवेचन इस प्रकार है - जहांपर एक कार्य होता है वहांपर उपादान कारणके समान ही कार्य होता है । ऐसा प्रत्यक्षसे भी देखा जाता है जैसे कि गौके दूधमें गोरसपना है वैसे उसके दहीमें भी गोरसपना अवश्य है ।


तद्वाक्यमुपादानकारणसदृशं हि कार्यमेकत्वात् ।
अस्त्यनतिगोरसत्वं दधिदुग्धावस्थयोर्यथाध्यक्षात् ॥406॥

अर्थ: छाछको विलोते समय दाँये बाँये हाथमें रहनेवाली रस्सियोंका दृष्टान्त भी ठीक नहीं है। क्योंकि इस दृष्टान्त द्वारा दोनोंको विमुख रहकर कार्यकारी बतलाया गया है। परन्तु परस्परकी विमुखतामें कार्यकी सिद्धि नहीं होती, उलटी हानि होती है, इसलिये इस दृष्टान्तमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधा आती है। अतः यह दृष्टान्त कालात्ययापदिष्ट दोष विशिष्ट है अर्थात् बाधित है। क्यों बाधित है ? इसका विवेचन इस प्रकार है - जहांपर एक कार्य होता है वहांपर उपादान कारणके समान ही कार्य होता है। ऐसा प्रत्यक्षसे भी देखा जाता है जैसे कि गौके दूधमें गोरसपना है वैसे उसके दहीमें भी गोरसपना अवश्य है।


सुन्दोपसुन्दमल्लद्वैतं दृष्टान्ततः प्रतिज्ञातम् ।
तदसदसत्वापत्तेरितरेतरनियतदोषत्वात् ॥407॥

अर्थ: सुन्द और उपसुन्द इन दो मल्लोंका जो दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस दृष्टान्तसे अन्योन्याश्रय दोषके साथ ही पदार्थके अभावका प्रसंग आता है। जैसे - जब उपसुन्द है तब उसका प्रतिपक्षी सुन्द सिद्ध होता है, और जब सुन्द है तब उसका प्रतिपक्षी उपसुन्द सिद्ध होता है। ये दोनों ही एक दूसरेके आश्रित सिद्ध होते हैं इसीका नाम अन्योन्याश्रय दोष है। अन्तमें दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहींहो पाती अर्थात् दोनों ही मरजाते हैं। इसलिये उनसे कुछ भी कार्य सिद्ध नहीं हो पाता। यह दोष शङ्काकारने अपने मुखसे ही कह डाला है।


सत्युपसुन्दे सुन्दो भवति च सुन्दे किलोपसुन्दोपि ।
एकस्यापि न सिद्धिः क्रियाफलं वा तदात्ममुखदोषात् ॥408॥

अर्थ: सुन्द और उपसुन्द इन दो मल्लोंका जो दृष्टान्त दिया गया है वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस दृष्टान्तसे अन्योन्याश्रय दोषके साथ ही पदार्थके अभावका प्रसंग आता है। जैसे - जब उपसुन्द है तब उसका प्रतिपक्षी सुन्द सिद्ध होता है, और जब सुन्द है तब उसका प्रतिपक्षी उपसुन्द सिद्ध होता है। ये दोनों ही एक दूसरेके आश्रित सिद्ध होते हैं इसीका नाम अन्योन्याश्रय दोष है। अन्तमें दोनोंमेंसे एककी भी सिद्धि नहींहो पाती अर्थात् दोनों ही मरजाते हैं। इसलिये उनसे कुछ भी कार्य सिद्ध नहीं हो पाता। यह दोष शङ्काकारने अपने मुखसे ही कह डाला है।


अथ चेदनादिसिद्धं कृतकत्वापन्हवात्तदेवेह ।
तदपि न तद्द्वैतं किल त्यक्तदोषास्पदं यदत्रैतत् ॥409॥

अर्थ: यदि यह कहा जाय कि सत् परिणाम दोनों अनादि सिद्ध हैं। वे किसीके किये हुए नहीं है। उनमें सदा ये वे ही हैं ऐसी नित्यताकी प्रतीति भी होती रहती है तो ऐसा कहना भी निर्दोष सिद्ध नहीं होता है कारण कि इस प्रकारकी नित्यतामें परिणाम नहीं बन सक्ता है। परिणामकी सिद्धि वहीं पर होसक्ती है जहां पर कि कथञ्चित् अनित्यता है। सर्वथा नित्यमें परिणाम नहीं बन सक्ता है। इसलिये उपर्युक्त रीतिके अनुसार मानने पर भी सत् परिणामके द्वैतमें निर्दोषता नहीं सिद्ध होती है।


दृष्टान्ताभासा इति निक्षिप्ताः स्वेष्टसाध्यशून्यत्वात् ।
लक्ष्योन्मुखेषव इव दृष्टान्तास्त्वथ यथा प्रशस्यन्ते ॥410॥

अर्थ: ऊपर जो दृष्टान्त दिये गये हैं वे सब दृष्टान्ताभास हैं उनसे उनके साध्यकी सिद्धि नहीं होती है । जो दृष्टान्त लक्ष्यके सन्मुखवाणोंके समान स्व साध्यकी सिद्धि कराते हैं वे ही दृष्टान्त प्रशंसनीय कहे जाते हैं ।


सत्परिणामाद्वैतं स्यादविभिन्नप्रदेशवत्वाद्वै ।
सत्परिणामद्वैतं स्यादपि दीपप्रकाशयोरेव ॥411॥

अर्थ: सत् परिणामके भिन्न प्रदेश नहीं हैं किन्तु अभिन्न हैं, इसलिये उन दोनोंमें द्वैत भाव नहीं है, अर्थात् दोनों एक ही अद्वैत हैं। तथा कथंचित् सत् और परिणाममें द्वैत भी है, अर्थात् कथंचित् सत् भिन्न है और परिणाम भिन्न है। सत् परिणाममें कथंचित् भिन्नता और कथंचित् अभिन्नता ऐसी ही है जैसी कि दीप और प्रकाशमें होती है। दीपसे प्रकाश कथंचित् भिन्न भी है और कथंचित् अभिन्न भी है।


अथवा जलकल्लोलवदद्वैतं द्वैतमपि च तद्द्वैतम् ।
उन्मज्जच्च निमज्जन्नाप्युन्मज्जन्निमज्जदेवेति ॥412॥

अर्थ: अथवा सत् परिणाममें जल और उसकी तरंगोंके समान कथंचित् भिन्नता और अभिन्नता है। जलमें एक तरंग उछलती है दूसरी शान्त होती है, फिर तीसरी उछलती है चौथी शान्त होती है। इन तरंगोंके प्रवाहसे तो प्रतीत होता है कि जलसे तरंगें भिन्न हैं। परन्तु वास्तव दृष्टिसे विचार किया जाय तो न कोई तरंग उछलती है और न कोई शान्त होती है, केवल जल ही जल प्रतीत होता है। विचार करने पर तरंगें भी जलमय ही प्रतीत होने लगती हैं, इसी प्रकार सत्से परिणाम कथंचित् भिन्न भी प्रतीत होता है, क्योंकि जो एक समयमें परिणाम है, वह दूसरे समयमें नहीं है। जो दूसरे समयमें है वह तीसरेमें नहीं है। यदि द्रव्य दृष्टिसे विचार किया जाय तो उन प्रतिक्षणमें होनेवाले परिणामों-अवस्थाओंका समूह ही द्रव्य है। अनादि-अनन्तकालके परिणामसमूहको छोड़कर सत् और कोई पदार्थ नहीं है, इसलिये सत्से परिणाम भिन्न भी नहीं है।


घटमृत्तिकयोरिव वा द्वैतं तद्द्वैतवदद्वैतम् ।
नित्यं मृण्मात्रतया यदनित्यं घटत्वमात्रतया ॥413॥

अर्थ: अथवा सत् परिणाममें घट और मिट्टीके समान द्वैतभाव और अद्वैतभाव है मृत्तिका रूपसे तो उस पदार्थमें नित्यता आती है और घटरूप पर्यायकी अपेक्षासे उसमें अनित्यता आती है। उसी प्रकार द्रव्य दृष्टिसे सत् कहा जाता है और पर्याय दृष्टिसे परिणाम कहा जाता है।


अयमर्थः सन्नित्यं तदभिज्ञप्तेर्यथा तदेवेदम् ।
न तदेवेदं नियमादिति प्रतीतेश्च सन्न नित्यं स्यात् ॥414॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका तात्पर्य यह है कि सत् कथंचित् नित्य भी है और कथंचित् अनित्य भी है । किसी पुरुषको १० वर्ष पहले देखनेके पीछे दुबारा जब देखते हैं तब उसका वही स्वरूप पाते हैं जो कि १० वर्ष पहले हमने देखा था, इसलिये हम झट कह देते हैं कि यह वही पुरुष है जिसे हमने पहले देखा है, इस प्रत्यभिज्ञानरूप प्रतीतिसे तो सत् नित्य सिद्ध होता है, और उस पुरुषकी १० वर्ष पहले जो अवस्था थी वह १० वर्ष पीछे नहीं रहती । १० वर्ष पीछे एक प्रकारसे वह पुरुष ही बदल जाता है । फिर उसमें यह प्रतीति होने लगती है कि यह वैसा नहीं है, इस प्रतीतिसे सत् अनित्य सिद्ध होता हैं ।


अप्युभयं युक्तिवशादेकं सच्चैककालमेकोक्तेः ।
अप्यनुभयं सदेतन्नयप्रमाणादिवादशून्यत्वात् ॥415॥

अर्थ: युक्तिवश - विवक्षावश सत् उभय दो रूप भी है, और एककी विवक्षा करनेसे एक कालमें एक ही कहा जाता है, इसलिये वह एक है, अर्थात् विवक्षावश सत कथंचित् एक रूप है और कथंचित् उभयरूप है तथा वही सत् अनुभयरूप भी प्रतीत होने लगता है जबकि नय प्रमाणादि वादसे वह रहित होता है, अर्थात् विकल्पातीत अवस्थामें वह सत् न एक है न दो है, किन्तु अनुभयरूप प्रतीत होता है ।


व्यस्तं सन्नपयोगान्नित्यं नित्यत्वमात्रतस्तस्य ।
अपि च समस्तं सदिति प्रमाणसापेक्षतो विवक्षायाः ॥416॥

अर्थ: नयकी विवक्षा करनेसे सत् पृथक् २ (जुदा) है। नित्यत्वकी विवक्षा करने पर वह नित्य मात्र ही है, और प्रमाणकी विवक्षा करनेसे वही सत् समस्त ( अभिन्न - नित्यानित्य ) है।


न विरुद्धं क्रमवर्ति च सदिति तथाऽनादितोपि परिणामि ।
अक्रमवर्ति सदित्यपि न विरुद्धं सदैकरूपत्वात् ॥417॥

अर्थ: सत् क्रमवर्ती - क्रमसे परिवर्त्तनशील है, यह वात भी विरुद्ध नहीं है। क्योंकि वह अनादिकालसे परिणमन करता आया है तथा वह सत् अक्रमवर्ती है, यह बात भी विरुद्ध नहीं है क्योंकि परिवर्त्तनशील होने पर भी वह सदा एकरूप ही रहता है।


ननु किमिह जगदशरणं विरुद्धधर्मद्वयाधिरोपत्वात् ।
स्वयमपि संशयदोलान्दोलित इव चलितप्रतीतिः स्यात् ॥418॥

अर्थ: क्या एक द्रव्यमें दो विरोधी धर्म रह सक्ते हैं ? यदि ऊपरके कथनानुसार रह सक्ते हैं तब तो इस जगत्में कोई भी शरण नहीं रहेगा। सर्वत्र ही विरुद्ध धर्म उपस्थित रहेंगे। ऐसी विरुद्धतामें कोई भी पदार्थोंके समझनेकी इच्छा रखनेवाला - जिज्ञासु कुछ निश्चय नहीं कर सकेगा किन्तु वह स्वयं संशयरूपी झूलेमें झूलने लगेगा, क्योंकि वह जिस समय सत् - वस्तुको नित्य समझेगा उसी समय उसको नित्यताकी विरोधिनी अनित्यता भी उसमें प्रतीत होगी, ऐसी अवस्थामें वह न तो वस्तुमें नित्यता ही स्थिर कर सकेगा और न अनित्यता ही स्थिर कर सकेगा किन्तु सदा सशल्य - संशयालु बना रहेगा। उसी प्रकार यदि वह यह समझने लगे कि वस्तु अनित्य ही होती है, तो भी वह निश्चित विचारवाला निःसंशयी नहीं बन सकेगा, क्योंकि उसी समय अनित्यका विरोधी नित्यरूप - सदा वस्तुको निजरूप भी वस्तुमें उसे प्रत्यक्ष दीखने लगेगा। इन बातोंसे जाना जाता है कि अनेकान्त - स्याद्वाद बहुत ही कठिन है, अर्थात् सब कोई इसका पार नहीं पासक्तेहैं, इसीलिये यह अच्छा नहीं है, क्योंकि सहसा इससे कल्याण नहीं होता है, दूसरी बात यह भी है कि यह अनेकान्त स्वयं ही दोषी बन जाता है, क्योंकि जो कुछ भी यह कहता है उसी समय उसका व्यभिचार - निरोध खड़ा हो जाता है, इसलिये यह अनेकान्त ठीक नहीं है ?


इह कश्चिज्जिज्ञासुर्नित्यं सदिति प्रतीयमानोपि ।
सदनित्यमिति विपक्षे सति शल्ये स्यात्कथं हि निःशल्यः ॥419॥

अर्थ: क्या एक द्रव्यमें दो विरोधी धर्म रह सक्ते हैं ? यदि ऊपरके कथनानुसार रह सक्ते हैं तब तो इस जगत्में कोई भी शरण नहीं रहेगा। सर्वत्र ही विरुद्ध धर्म उपस्थित रहेंगे। ऐसी विरुद्धतामें कोई भी पदार्थोंके समझनेकी इच्छा रखनेवाला - जिज्ञासु कुछनिश्चय नहीं कर सकेगा किन्तु वह स्वयं संशयरूपी झूलेमें झूलने लगेगा, क्योंकि वह जिस समय सत् - वस्तुको नित्य समझेगा उसी समय उसको नित्यताकी विरोधिनी अनित्यता भी उसमें प्रतीत होगी, ऐसी अवस्थामें वह न तो वस्तुमें नित्यता ही स्थिर कर सकेगा और न अनित्यता ही स्थिर कर सकेगा किन्तु सदा सशल्य - संशयालु बना रहेगा। उसी प्रकार यदि वह यह समझने लगे कि वस्तु अनित्य ही होती है, तो भी वह निश्चित विचारवाला निःसंशयी नहीं बन सकेगा, क्योंकि उसी समय अनित्यका विरोधी नित्यरूप - सदा वस्तुको निजरूप भी वस्तुमें उसे प्रत्यक्ष दीखने लगेगा। इन बातोंसे जाना जाता है कि अनेकान्त - स्याद्वाद बहुत ही कठिन है, अर्थात् सब कोई इसका पार नहीं पासक्तेहैं, इसीलिये यह अच्छा नहीं है, क्योंकि सहसा इससे कल्याण नहीं होता है, दूसरी बात यह भी है कि यह अनेकान्त स्वयं ही दोषी बन जाता है, क्योंकि जो कुछ भी यह कहता है उसी समय उसका व्यभिचार - निरोध खड़ा हो जाता है, इसलिये यह अनेकान्त ठीक नहीं है ?


इच्छन्नपि सदनित्यं भवति न निश्चितमना जनः कश्चित् ।
जीवदवस्थत्वादिह सन्नित्यं तद्विरोधिनोऽध्यक्षात् ॥420॥

अर्थ: क्या एक द्रव्यमें दो विरोधी धर्म रह सक्ते हैं ? यदि ऊपरके कथनानुसार रह सक्ते हैं तब तो इस जगत्में कोई भी शरण नहीं रहेगा। सर्वत्र ही विरुद्ध धर्म उपस्थित रहेंगे। ऐसी विरुद्धतामें कोई भी पदार्थोंके समझनेकी इच्छा रखनेवाला - जिज्ञासु कुछ निश्चय नहीं कर सकेगा किन्तु वह स्वयं संशयरूपी झूलेमें झूलने लगेगा, क्योंकि वह जिस समय सत् - वस्तुको नित्य समझेगा उसी समय उसको नित्यताकी विरोधिनी अनित्यता भी उसमें प्रतीत होगी, ऐसी अवस्थामें वह न तो वस्तुमें नित्यता ही स्थिर कर सकेगा और न अनित्यता ही स्थिर कर सकेगा किन्तु सदा सशल्य - संशयालु बना रहेगा। उसी प्रकार यदि वह यह समझने लगे कि वस्तु अनित्य ही होती है, तो भी वह निश्चित विचारवाला निःसंशयी नहीं बन सकेगा, क्योंकि उसी समय अनित्यका विरोधी नित्यरूप - सदा वस्तुको निजरूप भी वस्तुमें उसे प्रत्यक्ष दीखने लगेगा। इन बातोंसे जाना जाता है कि अनेकान्त - स्याद्वाद बहुत ही कठिन है, अर्थात् सब कोई इसका पार नहीं पासक्ते हैं, इसीलिये यह अच्छा नहीं है, क्योंकि सहसा इससे कल्याण नहीं होता है, दूसरी बात यह भी है कि यह अनेकान्त स्वयं ही दोषी बन जाता है, क्योंकि जो कुछ भी यह कहता है उसी समय उसका व्यभिचार - निरोध खड़ा हो जाता है, इसलिये यह अनेकान्त ठीक नहीं है ?


तत एव दुरधिगम्यो न श्रेयान् श्रेयसे ह्यनेकान्तः ।
अप्यात्मसुखदोषात् सव्यभिचारो यतो चिरादिति चेत् ॥421॥

अर्थ: क्या एक द्रव्यमें दो विरोधी धर्म रह सक्ते हैं ? यदि ऊपरके कथनानुसार रह सक्ते हैं तब तो इस जगत्में कोई भी शरण नहीं रहेगा। सर्वत्र ही विरुद्ध धर्म उपस्थित रहेंगे। ऐसी विरुद्धतामें कोई भी पदार्थोंके समझनेकी इच्छा रखनेवाला - जिज्ञासु कुछ निश्चय नहीं कर सकेगा किन्तु वह स्वयं संशयरूपी झूलेमें झूलने लगेगा, क्योंकि वह जिस समय सत् - वस्तुको नित्य समझेगा उसी समय उसको नित्यताकी विरोधिनी अनित्यता भी उसमें प्रतीत होगी, ऐसी अवस्थामें वह न तो वस्तुमें नित्यता ही स्थिर कर सकेगा और न अनित्यता ही स्थिर कर सकेगा किन्तु सदा सशल्य - संशयालु बना रहेगा। उसी प्रकार यदि वह यह समझने लगे कि वस्तु अनित्य ही होती है, तो भी वह निश्चित विचारवाला निःसंशयी नहीं बन सकेगा, क्योंकि उसी समय अनित्यका विरोधी नित्यरूप - सदा वस्तुको निजरूप भी वस्तुमें उसे प्रत्यक्ष दीखने लगेगा। इन बातोंसे जाना जाता है कि अनेकान्त - स्याद्वाद बहुत ही कठिन है, अर्थात् सब कोई इसका पार नहीं पासक्तेहैं, इसीलिये यह अच्छा नहीं है, क्योंकि सहसा इससे कल्याण नहीं होता है, दूसरी बात यह भी है कि यह अनेकान्त स्वयं ही दोषी बन जाता है, क्योंकि जो कुछ भी यह कहता है उसी समय उसका व्यभिचार - निरोध खड़ा हो जाता है, इसलिये यह अनेकान्त ठीक नहीं है ?


तन्न यतस्तदभावे बलवानस्तीह सर्वथैकान्तः ।
सोपि च सदनित्यं वा सन्नित्यं वा न साधनायालम् ॥422॥

अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है क्योंकि यदि अनेकान्तका अभाव मान लिया जाय तो उस समय एकान्त ही सर्वथा बलवान सिद्ध होगा, वह या तो सत्को सर्वथा नित्य ही कहेगा अथवा सर्वथा उसे अनित्य ही कहेगा, परन्तु सर्वथा एकान्तरूपसे पदार्थमें न तो नित्यता ही सिद्ध होती है और न अनित्यता ही सिद्ध होती है । इसलिये एकान्त पक्षसे कुछ भी सिद्धि नहीं होती है । इसी बातको नित्य अनित्य पक्षों द्वारा नीचे दिखाते हैं -


सन्नित्यं सर्वस्मादिति पक्षे विक्रिया कुतो न्यायात् ।
तदभावेपि न तत्त्वं क्रियाफलं कारकाणि यावदिति ॥423॥

अर्थ: सर्वथा सत् नित्य ही है, ऐसा पक्ष स्वीकार करनेपर पदार्थमें विक्रिया किस न्यायसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो सक्ती, यदि पदार्थमें विक्रिया ही न मानी जाय तो उसके अभावमें पदार्थ ही सिद्ध नहीं होता है, न क्रिया ही सिद्ध होती है, न उसका फल सिद्ध होता है और न उसके कारण ही सिद्ध होते हैं। क्योंकि सत् पदार्थकी अवस्थाओंका नाम ही परिणाम है, और उसीको विक्रियाके नामसे कहते हैं। उस परिणामका प्रतिक्षण होनेवाली अवस्थाओंका अभाव मानने पर सत्का ही अभाव हो जाता है यह बात असिद्ध नहीं है, किन्तु सुप्रसिद्ध दृष्टान्तसे सिद्ध है।


परिणामः सदवस्थाकर्मत्वाद्विक्रियेति निर्देशः ।
तदभावे सदभावो नासिद्धः सुप्रसिद्धदृष्टान्तात् ॥424॥

अर्थ: सर्वथा सत् नित्य ही है, ऐसा पक्ष स्वीकार करनेपर पदार्थमें विक्रिया किस न्यायसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो सक्ती, यदि पदार्थमें विक्रिया ही न मानी जाय तो उसके अभावमें पदार्थ ही सिद्ध नहीं होता है, न क्रिया ही सिद्ध होती है, न उसका फल सिद्ध होता है और न उसके कारण ही सिद्ध होते हैं । क्योंकि सत् पदार्थकी अवस्थाओंका नाम ही परिणाम है, और उसीको विक्रियाके नामसे कहते हैं । उस परिणामका प्रतिक्षण होनेवाली अवस्थाओंका अभाव मानने पर सत्का ही अभाव हो जाता है यह बात असिद्ध नहीं है, किन्तु सुप्रसिद्ध दृष्टान्तसे सिद्ध है ।


अथ तद्यथा पटस्य क्रिया प्रसिद्धेति तन्तुसंयोगः ।
भवति पटाभावः किल तदभावे यथा तदनन्यात् ॥425॥

अर्थ: यह जगत् प्रसिद्ध है कि अनेक तन्तुओंका संयोग ही पटकी क्रिया है। यदि वह तन्तु संयोगरूप पटक्रिया न मानी जाय तो पट ही कुछ नहीं ठहरता है। क्योंकि तन्तु संयोगसे अतिरिक्त पट कोई पदार्थ नहीं है।


अपि साधनं क्रिया स्यादपवर्गस्तत्फलं प्रमाणत्वात् ।
तत्कर्ता ना कारकमेतत् सर्वं न विक्रियाभावात् ॥426॥

अर्थ: यदि विक्रिया मानी जाती है तब तो मोक्ष प्राप्तिका जो साधन - उपाय किया जाता है वह तो क्रिया पड़ती है, और उसका फल मोक्ष भी प्रमाण सिद्ध है तथा उसका करनेवाला - कर्ता पुरुषार्थी पुरुष होता है । यदि पदार्थमें विक्रिया ही न मानी जाय तो इनमेंसे एक मी कारक सिद्ध नहीं होता है ।


ननु का नो हानिः स्याद्भवतु तथा कारकाद्यभावश्च ।
अर्थात् सन्नित्यं किल नह्यौषधमातुरे तमनुवर्त्ति ॥427॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ग्रन्थकारने विक्रियाके अभावमें जो कारकादिका न बनना आदि दोष बतलाये हैं वे हों, अर्थात् कारकादि भले ही सिद्ध न हों, ऐसा माननेसे भी हमारी कोई हानि नहीं है। हम तो पदार्थको सर्वथा नित्य ही मानेंगे। नित्य मानने पर उसमें मोक्ष प्राप्ति आदि कुछ भी न सिद्ध हो, इसकी हमें परवाह नहीं है, क्योंकि औषधि रोगीका रोग दूर करनेके लिये दी जाती है। यह आवश्यक नहीं है कि वह रोगीको अच्छी लगे या बुरी लगे ?


सत्यं सर्वमनीषितमेतत्तद्भाववादिना तावत् ।
यत्सत्तत्क्षणिकादिति यावन्नोदेति जलददृष्टान्तः ॥428॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि शंकाकारके पदार्थको सर्वथा नित्य मानना आदि विचार तभी तक ठहर सक्ते हैं जब तक कि उसके सामने मेघका दृष्टान्त नहीं आया है। जिस समय उसके सामने यह अनुमान रक्खा जाता है कि जो सत् है वह क्षणिक भी है जैसे जलके देनेवाले मेघ। उसी समय उसके नित्यताके विचार भाग जाते हैं, अर्थात् जो मेघ अभी आते हुए दीखते हैं वे ही मेघ तुरन्त ही नष्ट-विलीन होते हुए भी दीखते हैं, ऐसी अवस्थामें कौन साहस कर सक्ता है कि वह पदार्थको सर्वथा नित्य कहे ?


अयमप्यात्मरिपुः स्यात्सदनित्यं सर्वथेति किल पक्षः ।
प्रागेव सतो नाशादपि प्रमाणं क्व तत्फलं यस्मात् ॥429॥

अर्थ: सत् - पदार्थ सर्वथा अनित्य है ऐसा पक्ष भी उनका (सत्को अनित्य माननेवालोंका) स्वयं शत्रु है। क्योंकि जब सत् अनित्य है तो पहले ही उसका नाश हो जायगा, फिर प्रमाण और उसका फल किस प्रकार बन सक्ता है ? अर्थात् नहीं बन सक्ता।


अपि यत्सत्तदिति वचो भवति च निग्रहकृते स्वतस्तस्य ।
यस्मात्सदिति कुतः स्यात्सिद्धं तच्छून्यवादिनामिह हि ॥430॥

अर्थ: जो दार्शनिक ( बौद्धादि ) पदार्थको सर्वथा अनित्य मानते हैं उनके यहां उनका वचन ही स्वयं उनका खण्डन करता है, क्योंकि जो पदार्थको सर्वथा विनाशीक माननेवाले - शून्यवादी हैं ‘वे जो सत् है सो अनित्य है’ ऐसा वाक्य ही नहीं कह सक्ते हैं। उसके न कहनेका कारण भी यही है, कि, जब वे वाक्य बोलते हैं उस समय सत् तो नष्ट ही हो जाता है अथवा सर्वथा अनित्य पक्षवालोंके यहां पूरा वाक्य ही नहीं बोला जासक्ता, क्योंकि जब तक वे ‘जो सत् है’ इस वाक्यका ‘सत्’ पद बोलेंगे तब तक ‘जो’ नष्ट हो जायगा। जब ‘है’ पद बोलेंगे तबतक ‘सत्’ पद भी नष्ट हो जायगा। जब उत्तरार्ध ‘सो अनित्य है’ बोलेंगे तबतक पूर्वार्ध और उत्तरार्धके पहलेके वर्ण भी नष्ट हो जायँगे। इसलिये शून्य वादियोंके यहां पदार्थकी सिद्धि तो दूर रहो, उसका प्रतिवादक वाक्य भी नहीं बनता है।


अपि च सदमन्यमानः कथमिव तदभावसाधनायालम् ।
वन्ध्यासुतं हिनस्मीत्यध्यवसायादिवद्व्यलीकत्वात् ॥431॥

अर्थ: यदि सत्का अभाव स्वीकार करते हुए ही किसी प्रकार पदार्थमें नित्यपनेका अभाव सिद्ध किया जाता है तो यह सिद्ध करना उसी प्रकार मिथ्या ( झूंठा ) है जिस प्रकर किसीका यह कहना कि मैं बाँझ स्त्रीके पुत्रको मारता हूँ, मिथ्या है ।


अपि यत्सत्तन्नित्यं तत्साधनमिह यथा तदेवेदम् ।
तदभिज्ञानसमक्षात् क्षणिकैकान्तस्य बाधकं च स्यात् ॥432॥

अर्थ: दूसरी बात यह भी है कि लोकमें ऐसी प्रतीति भी होती है जो कि क्षणिक एकान्तकी सर्वथा बाधक है । वह प्रतीति इस प्रकार है - जो सत् है वह नित्य है, जैसे - यह वही वस्तु है जिसे पहले हमने देखा था ऐसा प्रत्यभिज्ञान । प्रत्यभिज्ञान प्रतीति यथार्थ है क्योंकि उससे लोक यथार्थ बोध और इष्ट वस्तुकी प्राप्ति करता है, प्रत्यभिज्ञानकी यथार्थतासे पदार्थ भी नित्य सिद्ध हो जाता है । विना कथंचित् नित्यताके पदार्थमें प्रत्यभिज्ञान प्रतीति होती ही नहीं । इसलिये यह प्रतीति ही क्षणिकैकान्तकी बाधक है ।


क्षणिकैकान्तवदित्यपि नित्यैकान्ते न तत्त्वसिद्धिः स्यात् ।
तस्मान्न्यायागतमिति नित्यानित्यात्मकं स्वतस्तत्त्वम् ॥433॥

अर्थ: जिस प्रकार क्षणिकैकान्तसे पदार्थकी सिद्धि नहीं होती है उसी प्रकार नित्य एकान्तसे भी पदार्थकी सिद्धि नहीं होती है। इसलिये यह बात न्यायसे सिद्ध है कि पदार्थ कथंचित् नित्य है और कथंचित् अनित्य भी है, उभयात्मक है।


ननु चैकं सदिति स्यात्किमनेकं स्यादथोभयं चैतत् ।
अनुभयमिति किं तत्त्वं शेषं पूर्ववदथान्यथा किमिति ॥434॥

अर्थ: क्या सत् एक है, अथवा अनेक है अथवा उभय है वा अनुभय है अथवा बाकीके एक एक भंगरूप है। अथवा और ही प्रकार है ?


सत्यं सदेकमिति वा सदनेकं चोभयं च नययोगात् ।
न च सर्वथा सदेकं सदनेकं वा सदप्रमाणत्वात् ॥435॥

अर्थ: ठीक है, सत् नय दृष्टिसे एक भी है अनेक भी है उभय भी है और अनुभय भी है परन्तु यह बात नयविवक्षासे ही बनती है, नय विवक्षाकी अपेक्षाको छोड़कर सर्वथा सत्को एक कहना भी ठीक नहीं है, अनेक कहना भी ठीक नहीं है और उभय कहना भी ठीक नहीं, अनुभय कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सर्वथा एकान्तरूपसे एक अनेक सत् अप्रमाण ही हैं ।


अथ तद्यथा सदेकं स्यादविभिन्नप्रदेशवत्त्वाद्वा ।
गुणपर्यायांशैरपि निरंशदेशादखण्डसामान्यात् ॥436॥

अर्थ: गुण पर्याय रूप अंशोंको अभिन्न प्रदेशी होनेमे सत् एक है अथवा अखण्ड सामान्यकी अपेक्षासे निरंश-अंश रहित देश होनेसे सत् एक है ।


द्रव्येण क्षेत्रेण च कालेनापीह चाथ भावेन ।
सदखण्डं नियमादिति यथाधुना वक्ष्यते हि तल्लक्ष्म ॥437॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षासे नियमसे सत् अखण्ड है, अब इन चारोंकी अपेक्षासे ही सत्में अखण्डता क्रमसे सिद्ध की जाती है।


गुणपर्ययवद्द्रव्यं तद्गुणपर्ययवपुः सदेकं स्यात् ।
नहि किञ्चिद्गुणरूपं पर्ययरूपं च किञ्चिदंशांशैः ॥438॥

अर्थ: गुण पर्यायवाला द्रव्य है, अर्थात् गुणपर्याय ही द्रव्यका शरीर है, गुण पर्याय स्वरूप ही द्रव्य है, इसलिये सत् एक है। ऐसा नहीं है कि उसके कुछ अंश तो गुणरूप हों, कुछ पर्यायरूप हों।


रूपादितन्तुमानिह यथा पटः स्यात्स्वयं हि तद्द्वैतम् ।
नहि किञ्चिद्रूपमयं तन्तुमयं स्यात्तदंशगर्भांशैः ॥439॥

अर्थ: रूपादि विशिष्ट तन्तुवाला पट कहलाता है, इस कथनकी अपेक्षासे वह स्वयं द्वैतभाव धारण करता है, परन्तु ऐसा नहीं है कि पटमें कुछ अंश तो रूपमय हों, और कुछ तन्तुमय हों । किन्तु रूप तन्तु पट तीनों एक ही पदार्थ हैं । केवल विवक्षासे उसमें द्वैतभाव है ।


न पुनर्गोरसवदिदं नानासत्त्वैकसत्त्वसामान्यम् ।
सम्मिलितावस्थायामपि घृतरूपं च जलमयं किञ्चित् ॥440॥

अर्थ: सत्में जो एकत्व है, वह गोरसके समान अनेक सत्ताओंके सम्मेलनसे एक सामान्य सत्त्वरूप नहीं है । जैसे - गोरस (दुग्धादि) की मिली हुई अवस्थामें कुछ घृतभाग है, और कुछ जलभाग है, परन्तु सम्मेलन होनेके कारण उन्हें एक ही गोरससे पुकारते हैं, वैसे सत्में एकत्व नहीं है ।


अपि यदशक्यविवेचनमिह न स्याद्वा प्रयोजकं यस्मात् ।
क्वचिदश्मनि तद्भावान्माभूत्कनकोपलद्वयाद्वैतम् ॥441॥

अर्थ: अथवा ऐसा भी नहीं कहा जासक्ता कि यद्यपि सत्में भिन्न २ सत्तायें हैं परन्तु उनका भिन्न २ विवेचन नहीं किया जासक्ता है इसलिये सतको एक अथवा एक सत्तावाला कह दिया जाता है । जैसे कि स्वर्ण पाषाणमें स्वर्ण और पाषाण दो पदार्थ हैं परन्तु उनका भिन्न २ विवेचन अशक्य है इसलिये उसे एक ही पत्थरके नामसे पुकारा जाता है । ऐसा कहनेसे जिस प्रकार कनकोपल-स्वर्ण पाषाणमें द्वैतभाव है उसी प्रकार सत्में भी द्वैतभाव सिद्ध होगा, परन्तु स्वर्णपाषाणमें जिस प्रकार भिन्न २ दो पदार्थ हैं उस प्रकार सत्में नहीं है । सत् वास्तवमें एक सत्तावाला एक ही है ।


सत्त्वादेकं यदपि प्रधानकं स्यादखण्डवस्तुत्वम् ।
प्रकृतं यथा सदेकं द्रव्येणाखण्डितं मतं तावत् ॥442॥

अर्थ: इसलिये एकत्व सिद्ध करनेके लिये न तो भिन्न २ अनेक सत्ताओंका सम्मेलन ही प्रयोजक है और न अशक्य विवेचन ही एकत्वका प्रयोजक है किन्तु अखण्ड वस्तुत्व ही उसका प्रयोजक है। अर्थात् जो अखण्ड प्रदेशी-एक सत्तात्मक पदार्थ है वही एक है। प्रकृतमें द्रव्यकी अपेक्षासे भी ऐसा ही अखण्ड प्रदेशी एकत्व सत्में माना गया है।


ननु यदि सदेव तत्त्वं स्वयं गुणः पर्ययः स्वयं सदिति ।
शेषः स्यादन्यतरस्तदितरलोपस्य दुर्निवारत्वात् ॥443॥

अर्थ: यदि स्वयं सत् ही द्रव्य है, स्वयं ही गुण है, स्वयं ही पर्याय है तो एक शेष रहना चाहिये । अर्थात् जब द्रव्य गुण पर्याय तीनों एक ही हैं तो तीनोंमेंसे कोई एक कहा जा सक्ता है बाकीके दोनोंका लोप होना अवश्यम्भावी है, परन्तु वैसा होता नहीं है, द्रव्य गुण पर्याय, तीनोंका कहना ही आवश्यक प्रतीत होता है, इसलिये यह बात ही निर्दोष सिद्ध होती है कि सत् छाया और दर्पणके समान अनेक कारणजन्य है ?


न च भवति तथावश्यम्भावात्तत्समुदयस्य निर्देशात् ।
तस्मादनवद्यमिदं छायादर्शवदनेकहेतुः स्यात् ॥444॥

अर्थ: यदि स्वयं सत् ही द्रव्य है, स्वयं ही गुण है, स्वयं ही पर्याय है तो एक शेष रहना चाहिये । अर्थात् जब द्रव्य गुण पर्याय तीनों एक ही हैं तो तीनोंमेंसे कोई एक कहा जा सक्ता है बाकीके दोनोंका लोप होना अवश्यम्भावी है, परन्तु वैसा होता नहीं है, द्रव्य गुण पर्याय, तीनोंका कहना ही आवश्यक प्रतीत होता है, इसलिये यह बात ही निर्दोष सिद्ध होती है कि सत् छाया और दर्पणके समान अनेक कारणजन्य है ?


सत्यं सदनेकं स्यादपि तद्धेतुश्च यथा प्रतीतत्वात् ।
न च भवति यथेच्छं तच्छायादर्शवदसिद्धदृष्टान्तात् ॥445॥

अर्थ: ठीक है, कथंचित् सत् अनेक भी है तथा यथायोग्य अनेक हेतुक भी है। परन्तु उसमें अनेक हेतुता छाया और दर्पणके समान इच्छानुसार नहीं है किन्तु प्रतीतिके अनुसार है। सत्के विषयमें छायादर्शका दृष्टान्त असिद्ध है। क्यों असिद्ध है ? उसीका उत्तर नीचे दिया जाता है।


प्रतिबिम्बः किल छाया वदनादर्शादिसन्निकर्षाद्वै ।
आदर्शस्य सा स्यादिति पक्षे सदसदिव वाऽन्वयाभावः ॥446॥

अर्थ: नियमसे प्रतिबिम्बका नाम ही छाया है। वह वदन (मुख) और आदर्श (दर्पण)के सम्बन्धसे होती है। यदि उस छायाको केवल दर्पणकी ही कहा जाय तो ऐसा पक्ष माननेसे सत् असत्के समान ठहरेगा। अथवा अन्वय नहीं बनेगा। अर्थात् यदि छायाको दर्पणकी ही कहा जाय तो जहां २ दर्पण है वहां २ छाया होनी चाहिये परन्तु ऐसा देखनेमें नहीं आता है, विना छायाके भी दर्पण देखा जाता है। परन्तु द्रव्य गुण पर्यायमें वैसा अन्वयाभाव नहीं है। कथंचित् तीनों ही सहभावी हैं और कथंचित् एक हैं। यदि वह छाया मुखकी कही जाय तो यह पक्ष भी विना विचारे कहा हुआ ही प्रतीत होता है, क्योंकि मुखकी छाया माननेसे व्यतिरेक नहीं बनता है। यदि मुखकी ही छाया मानी जाती है तो जहां २ छाया नहीं है वहां २ मुख भी नहीं होना चाहिये, परन्तु यह बात असिद्ध है, जहां मुख देखनेमें आता है वहां छाया नहीं भी देखनेमें आती है। परन्तु द्रव्य गुण पर्यायमें ऐसा व्यतिरेक व्यभिचार नहीं है। जहां द्रव्य नहीं है वहां गुण पर्याय भी नहीं है और जहां गुण पर्याय नहीं है वहां द्रव्य भी नहीं है। तीनोंमें रूप रस गन्ध स्पर्शके समान अभिन्नता है। इसलिये सत्के विषयमें छाया आदर्शका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


यदि वा सा वदनस्य स्यादिति पक्षोऽसमीक्ष्यकारित्वात् ।
व्यतिरेकाभावः किल भवति तदास्यस्य सतोऽप्यच्छायत्वात् ॥447॥

अर्थ: नियमसे प्रतिबिम्बका नाम ही छाया है। वह वदन (मुख) और आदर्श (दर्पण)के सम्बन्धसे होती है। यदि उस छायाको केवल दर्पणकी ही कहा जाय तो ऐसा पक्ष माननेसे सत् असत्के समान ठहरेगा। अथवा अन्वय नहीं बनेगा। अर्थात् यदि छायाको दर्पणकी ही कहा जाय तो जहां २ दर्पण है वहां २ छाया होनी चाहिये परन्तु ऐसा देखनेमें नहीं आता है, विना छायाके भी दर्पण देखा जाता है। परन्तु द्रव्य गुण पर्यायमें वैसा अन्वयाभाव नहीं है। कथंचित् तीनों ही सहभावी हैं और कथंचित् एक हैं। यदि वह छाया मुखकी कही जाय तो यह पक्ष भी विना विचारे कहा हुआ ही प्रतीत होता है, क्योंकि मुखकी छाया माननेसे व्यतिरेक नहीं बनता है। यदि मुखकी ही छाया मानी जाती है तो जहां २ छाया नहीं है वहां २ मुख भी नहीं होना चाहिये, परन्तु यह बात असिद्ध है, जहां मुख देखनेमें आता है वहां छाया नहीं भी देखनेमें आती है। परन्तु द्रव्य गुण पर्यायमें ऐसा व्यतिरेक व्यभिचार नहीं है। जहां द्रव्य नहीं है वहां गुण पर्याय भी नहीं है और जहां गुण पर्याय नहीं है वहां द्रव्य भी नहीं है। तीनोंमें रूप रस गन्ध स्पर्शके समान अभिन्नता है। इसलिये सत्के विषयमें छाया आदर्शका दृष्टान्त ठीक नहीं है।


एतेन निरस्तोभून्नानासत्वैकसत्त्ववादीति ।
प्रत्येकमनेकम्प्रति सद्द्रव्यं सन्गुणो यथेत्यादि ॥448॥

अर्थ: कोई दर्शनकार ( नैयायिकादि ) ऐसा मानता है कि द्रव्यकी सत्ता भिन्न है गुणकी भिन्न है, कर्मकी भिन्न है, और उन सब भिन्न २ सत्तावाले पदार्थोंमें एक महा सत्ता रहती है । इस प्रकार नाना सत्त्वोंके ऊपर एक सत्त्व माननेवाला उपर्युक्त कथनसे खण्डित किया गया है ।


क्षेत्रं प्रदेश इति वा सदधिष्ठानं च भूर्निवासश्च ।
तदपि स्वयं सदेव स्यादपि यावन्न सत्प्रदेशस्थम् ॥449॥

अर्थ: क्षेत्र कहो, प्रदेश कहो, सत्का आधार कहो, सत्की पृथ्वी कहो, सत्का निवास कहो, ये सब पर्यायवाची है। परन्तु ये सब स्वयं सत् स्वरूप ही हैं। ऐसा नहीं है कि सत् कोई दूसरा पदार्थ हो और क्षेत्र दूसरा हो, उस क्षेत्रमें सत् रहता हो। किन्तु सत् और उसके प्रदेश दोनों एक ही बात है। सत्का क्षेत्र स्वयं सत्का स्वरूप ही है।


अथ ते त्रिधा प्रदेशाः क्वचिन्निरंशैकदेशमात्रं सत् ।
क्वचिदपि च पुनरसंख्यदेशमयं पुनरनन्तदेशवपुः ॥450॥

अर्थ: वे प्रदेश तीन प्रकार हैं-कोई सत् तो निरंश फिर जिसका खण्ड न हो सके ऐसा एक देश मात्र है, कोई (कहीं पर) सत् असंख्यात प्रदेशवाला है, और कोई अनन्त प्रदेशी भी है ।


ननु च द्व्यणुकादि यथा स्यादपि संख्यातदेशि सत्त्विति चेत् ।
न यतः शुद्धादेशैरुपचारस्याविवक्षितत्वाद्वा ॥451॥

अर्थ: जिस प्रकार एक प्रदेश, असंख्यात प्रदेश और अनन्त प्रदेशवाले द्रव्य बतलाये गये हैं, उस प्रकार संख्यात प्रदेशी द्रव्य भी बतलानां चाहिये। और ऐसे द्रव्य द्वयणुक त्र्यणुक चतुरणुक शताणुक लक्षाणुक आदि पुद्गल स्कन्ध हो सकते हैं। उन्हे क्यों छोड़ दिया गया ? परंतु उपर्युक्त आशङ्का ठीक नहीं है, क्योंकि यहां शुद्ध नयकी अपेक्षासे शुद्ध द्रव्योंका कथन है, उपचरित द्रव्योंका कथन नहीं है।


अयमर्थः सद्वेधा यथैकदेशीत्यनेकदेशीति ।
एकमनेकं च स्यात्प्रत्येकं तन्नयद्वयान्न्यायात् ॥452॥

अर्थ: तात्पर्य यह है कि सत्के दो भेद हैं (१) एक देशी (२) अनेक देशी। इन दोनोंमें प्रत्येक ही दो नयोंकी विवक्षासे एक और अनेक रूप है।


अथ यस्य यदा यावद्यदेकदेशे यथा स्थितं सदिति ।
तत्तावत्तस्य तदा तथा समुदितं च सर्वदेशेषु ॥453॥

अर्थ: जिस समय जिस द्रव्यके एक देशमें जैसे सत् रहता है वैसे उस द्रव्यके उस समय सर्व देशोंमें सत् समुदित रहता है ।


इत्यनवद्यमिदं स्याल्लक्षणमुद्देशि तस्य तत्र यथा ।
क्षेत्रेणाखण्डित्वात् सदेकमित्यत्र नयविभागोऽयम् ॥454॥

अर्थ: इस प्रकार उस सत्का यह निर्दोष लक्षण क्षेत्रकी अपेक्षासे कहा गया । एक सत्के सर्व ही प्रदेश अखण्ड हैं इस लिये वे सब एक ही सत् कहे जाते हैं यही एकत्व विषक्षामें नय विभाग है ।


न पुनश्चैकापवरकमश्चरितानेकदीपवत्सदिति ।
हि यथा दीपसमृद्धौ प्रकाशवृद्धिस्तथा न सद्वृद्धिः ॥455॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी मकानके भीतर एक दीप फिर दूसरा दीप फिर तीसरा फिर चौथा इसी क्रमसे अनेक दीप लाये जाँय तो जितनी२ दीपोंकी संख्या बढ़ती जायगी उतनी२ ही प्रकाशकी वृद्धि भी होती जायगी । उस प्रकार सत् नहीं है । सत्की वृद्धि अनेक दीपोंके प्रकाशके समान नहीं होती है ।


अपि तत्र दीपशमनेकस्मिंश्चित्तत्प्रकाशहानिः स्यात् ।
न तथा स्यादविवक्षितदेशे तद्धानिरेकरूपत्वात् ॥456॥

अर्थ: ऐसा भी नहीं है कि जिस प्रकार मकानमें रक्खे हुए अनेक दीपोंमेंसे किसी दीपके बुझा देनेपर उस मकानमें कुछ प्रकाशकी कमी हो जाती है, उस प्रकार सत्की भी कमी हो जाती है, किन्तु अविवक्षित देशमें सत्की हानि नहीं होती है, वह सदा एकरूप ही रहता है।


नात्र प्रयोजकं स्यादिति तन्निजाभोगदेशमात्रत्वम् ।
तदनन्यथात्वसिद्धौ सदनेकं क्षेत्रतः कथं स्याद्वा ॥457॥

अर्थ: यहां पर यह भी प्रयोजन नहीं है कि सत् जितने देश (यहां पर देशसे तात्पर्य आकाशकी अपेक्षासे है।) में रहता है उसका नियमित उतना ही देश कहा जाय, यदि ऐसा ही कहा जाय और सत्में अन्यथापना न माना जाय तो क्षेत्रकी अपेक्षासे सत अनेक किसप्रकार सिद्ध होगा ?


सदनेकं देशानामुपसंहारात्प्रसर्पणादिति चेत् ।
न यतो नित्यविभूनां व्योमादीनां न तद्धि तदयोगात् ॥458॥

अर्थ: सत्के प्रदेशोंका संकोच विस्तार होता है। इसलिये सत् अनेक है, ऐसी आशंका ठीक नहीं है, यदि सत्के प्रदेशोंका संकोच और विस्तार होनेसे ही उसे अनेक कहा जाय तो आकाश आदि नित्य-विभु सर्व व्यापक पदार्थोंमें अनेकत्व नहीं घट सकेगा, क्योंकि आकाश, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्यके प्रदेशोंका संकोच विस्तार ही नहीं होता है तथा परमाणु और कालाणु ये दो द्रव्य एक २ प्रदेश मात्र हैं। इनमें संकोच बिस्तार हो ही नहीं सक्ता है, फिर इनमें अनेकत्व किस प्रकार सिद्ध होगा ?


अपि परमाणोरिह वा कालाणोरेकदेशमात्रत्वात् ।
कथमिव सदनेकं स्यादुपसंहारप्रसर्पणाभावात् ॥459॥

अर्थ: सत्के प्रदेशोंका संकोच विस्तार होता है। इसलिये सत् अनेक है, ऐसी आशंका ठीक नहीं है, यदि सत्के प्रदेशोंका संकोच और विस्तार होनेसे ही उसे अनेक कहा जाय तो आकाश आदि नित्य-विभु सर्व व्यापक पदार्थोंमें अनेकत्व नहीं घट सकेगा, क्योंकि आकाश, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्यके प्रदेशोंका संकोच विस्तार ही नहीं होता है तथा परमाणु और कालाणु ये दो द्रव्य एक २ प्रदेश मात्र हैं। इनमें संकोच विस्तार हो ही नहीं सक्ता है, फिर इनमें अनेकत्व किस प्रकार सिद्ध होगा ?


ननु च सदेकं देशैरिव संख्या खण्डयितुमशक्यत्वात् ।
अपि सदनेकं देशैरिव संख्यानेकतो नयादिति चेत् ॥460॥

अर्थ: प्रदेशोंके समान सत्की संख्याका खण्ड नहीं किया जा सक्ता है, इसलिये तो सत् एक है और प्रदेशोंके समान सत् अनेक संख्यावाला है इस नयसे वह अनेक है ?


न यतोऽशक्यविवेचनमेकक्षेत्रावगाहिनां चास्ति ।
एकत्वमनेकत्वं नहि तेषां तथापि तदयोगात् ॥461॥

अर्थ: सत्में उपर्युक्त रीतिसे एकत्व अनेकत्व लाना ठीक नहीं है । क्योंकि खण्ड तो एक क्षेत्रावगाही अनेक पदार्थोंका भी नहीं होता है, अर्थात् आकाश, धर्म, अधर्म, काल, इन द्रव्योंमें भी क्षेत्र भेद नहीं है । इनके क्षेत्रका भेद करना भी अशक्य ही है, यद्यपि इन पदार्थोंमें क्षेत्र भेदकी अपेक्षासे अनेकत्व नहीं है, तथापि इसप्रकार उनमें एकत्व अथवा अनेकत्व नहीं घटता है ।


ननु ते यथा प्रदेशाः सन्ति मिथो गुम्फितैकसूत्रत्वात् ।
न तथा सदनेकत्वादेकक्षेत्रावगाहिनः सन्ति ॥462॥

अर्थ: जिसप्रकार एक द्रव्यके प्रदेश एक सूत्रमें गुम्फित ( गूँथे हुए ) होते हैं । उस प्रकार एक क्षेत्रावगाही अनेक द्रव्योंके नहीं होते हैं ?


सत्यं तत्र निदानं किमिति तदन्वेषणीयमेव स्यात् ।
तेनाखण्डितमिव सत् स्यादेकमनेकदेशवत्त्वेपि ॥463॥

अर्थ: ठीक है, एक पदार्थके प्रदेश जैसे अखण्ड होते हैं वैसे एक क्षेत्रवगाही - अनेक पदार्थोंके नहीं होते, इसका ही कारण ढूंढना चाहिये जिससे कि अनेक प्रदेशवाला होने पर भी सत् एक - अखण्ड प्रतीत हो ।


ननु तत्र निदानमिदं परिणममाने यदेकदेशेस्य ।
वेणोरिव पर्वसु किल परिणमनं सर्वदेशेषु ॥464॥

अर्थ: एक पदार्थमें अखण्डताका यह निदान-सूचक है कि उसके एक देशमें परिणमन होने पर सर्व देशमें परिणमन होता है । जिस प्रकार किसी वाँसको एक भागसे फिराने पर उसके सभी पर्वों ( गाँठों ) में अर्थात् समस्त वाँसमें परिणमन ( हिलता ) होता है ?


तन्न यतस्तद्ग्राहकमिव प्रमाणं च नास्त्यदृष्टान्तात् ।
केवलमन्वयमात्रादपि वा व्यतिरेकिणश्च तदसिद्धेः ॥465॥

अर्थ: एक देशमें परिणमन होनेसे सर्व देशोंमें परिणमन होना एक वस्तुकी अखण्डतामें निदान नहीं होसक्ता है। क्योंकि इस बातको सिद्ध करनेवाला न तो कोई प्रमाण ही है और न कोई उसका साधक दृष्टान्त ही है। यदि उपर्युक्त कथन (एक देशमें परिणमन होनेसें सर्व देशोंमें परिणमन होता है) में अन्वय व्यतिरेक दोनों घटित होते हों तब तो उसकी सिद्धि हो सक्ती है, अन्यथा केवल अन्वयमात्रसे अथवा केवल व्यतिरेक मात्रसे उक्त कथनकी सिद्धि नहीं हो सक्तो है। यहां पर सदृश परिणमनकी अपेक्षासे अन्वय यथा कथंचित् बन भी जाता है परन्तु व्यतिरेक सर्वथा ही नहीं बनता।


ननु चैकस्मिन् देशे कस्मिंश्चित्त्वन्यतरेपि हेतुवशात् ।
परिणमति परिणमन्ति हि देशाः सर्वे सदेकतस्त्विति चेत् ॥466॥

अर्थ: कारणवश किसी अन्यतर एक देशमें परिणमन होने पर सर्व देशोंमें परिणमन होता ही है, क्योंकि उन सब प्रदेशोंकी एक ही सत्ता है।


न यतः सव्यभिचारः पक्षोनैकान्तिकत्वदोषत्वात् ।
परिणमति समयदेशे तद्देशाः परिणमन्ति चेति यथा ॥467॥

अर्थ: ऊपर जो अन्वय बतलाया गया है वह ठीक नहीं है क्योंकि वैसा अन्वय पक्ष अनैकान्तिक दोष आनेसे व्यभिचारी ( दोषी ) है । वह दोष इसप्रकार आता है कि अनेक सत्तावाले-मिले हुए पदार्थोंमें किसी सांकेतिक देशमें परिणमन होनेपर सभी देशोंमें सभी पदार्थोंमें परिणमन होता हैं ।


व्यतिरेके वाक्यमिदं यदपरिणमति सदेकदेशे हि ।
क्वचिदपि न परिणमन्ति हि देशाः सर्वतः सदेकत्वात् ॥468॥

अर्थ: व्यतिरेक पक्षमें यह वाक्य है - किसी वस्तुके एक देशका परिणमन न होनेपर उसके सर्व देशोंमें भी परिणमन नहीं होता है। क्योंकि उन सब देशोंकी एक ही सत्ता है।


तन्न यतः सति सति वै व्यतिरेकाभाव एव भवति यथा ।
तद्देशसमयभावैरखण्डितत्वात्सतः स्वतः सिद्धात् ॥469॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि शंकाकारने जो व्यतिरेक वाक्य कहा है वह बनता ही नहीं है, क्योंकि पदार्थ सदात्मक है अर्थात् उसका सत् लक्षण है और जिसमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य होता रहे उसे सत् कहते हैं । जब पदार्थ उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यात्मक - सत्रूप है तब उसमें व्यतिरेक सर्वथा ही नहीं बनता । क्योंकि उस देशमें प्रतिक्षण अखण्ड रीतिसे परिणमन होता रहता है, 'और वह पदार्थका स्वतः सिद्ध परिणमन है ।


एवं यकेपि दूरादपनेतव्या हि लक्षणाभासाः ।
यदकिञ्चित्कारित्वादत्रानधिकारिणोऽनुक्ताः ॥470॥

अर्थ: इसीप्रकार और भी जो लक्षणाभास हैं उन्हें भी दूरसे ही छोड़ देना चाहिये । क्योंकि उनसे किसी कार्यकी सिद्धि नहीं हो पाती, ऐसे अकिञ्चित्कर लक्षणभासोंका यहांपर हम उल्लेख भी नहीं करते हैं । उनका प्रयोग करना अधिकारसे बाहर है ।


कालः समयो यदि वा तद्देशे वर्त्तनाकृतिश्चार्थात् ।
तेनाप्यखण्डितत्वाद्भवति सदेकं तदेकनययोगात् ॥471॥

अर्थ: काल, समय अथवा उस देश (वस्तु) में वर्त्तनारूप आकारका होना ये तीनों ही बातें एक हैं । उस कालसे भी वस्तु अखण्डित है। वस्तुमें यह अखण्डता द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे लाई जाती है ।


अयमर्थः सन्मालामिह संस्थाप्य प्रवाहरूपेण ।
क्रमतो व्यस्तसमस्तैरितस्ततो वा विचारयन्तु बुधाः ॥472॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक पदार्थ अनादिकालसे अनन्तकाल तक ( सदा ) नवीन २ पर्यायोंको धारण करता रहता है । इसलिये पदार्थ उन समस्त अवस्थाओंका समूह ही है । उस पर्याय समूहरूप पदार्थमाला पर बुद्धिमान् पुरुष विचार करें तो वे यह बात समझ लेंगे कि प्रवाहरूपसे होनेवालीं क्रमसे भिन्न भिन्न अथवा समस्त पर्यायें पदार्थरूप ही हैं अथवा पदार्थ ही प्रवाहसे होनेवालीं उन पर्यायोंस्वरूप है किसी रूपसे भी पदार्थके ऊपर विचार किया जाय तो यही बात सिद्ध होती है कि पदार्थ जैसा एक समयमें होनेवाली अवस्थारूप है वैसा सम्पूर्ण समयोंमें होनेवालीं अवस्थाओंस्वरूप भी वही है, अथवा वह जितना एक समयमें होनेवाली अवस्थारूप है, उतना ही वह सम्पूर्ण समयोंमें होनेवाली अवस्थाओंरूप है।


तत्रैकावसरस्थं यावद्यादृगस्ति सत्सर्वम् ।
सर्वावसरसमुदितं तत्तावत्तादृगस्ति सत्सर्वम् ॥473॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका स्पष्ट अर्थ यह है कि एक पदार्थ अनादिकालसे अनन्तकाल तक ( सदा ) नवीन २ पर्यायोंको धारण करता रहता है । इसलिये पदार्थ उन समस्त अवस्थाओंका समूह ही है । उस पर्याय समूहरूप पदार्थमाला पर बुद्धिमान् पुरुष विचार करें तो वे यह बात समझ लेंगे कि प्रवाहरूपसे होनेवालीं क्रमसे भिन्न भिन्न अथवा समस्त पर्यायें पदार्थरूप ही हैं अथवा पदार्थ ही प्रवाहसे होनेवालीं उन पर्यायोंस्वरूप है किसी रूपसे भी पदार्थके ऊपर विचार किया जाय तो यही बात सिद्ध होती है कि पदार्थ जैसा एक समयमें होनेवाली अवस्थारूप है वैसा सम्पूर्ण समयोंमें होनेवालीं अवस्थाओंस्वरूप भी वही है, अथवा वह जितना एक समयमें होनेवाली अवस्थारूप है, उतना ही वह सम्पूर्ण समयोंमें होंनेवाली अवस्थाओंरूप है।


न पुनः कालसमृद्धौ यथा शरीरादिवृद्धिरिति वृद्धौ ।
अपि तद्धानौ हानिर्न तथा वृद्धिर्न हानिरेव सतः ॥474॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि जिसप्रकार कालकी वृद्धि होनेपर शरीरादिकी वृद्धि होती है और कालकी हानि होनेपर शरीरादिकी हानि होती है, उस प्रकार सत्की भी हानि वृद्धि होती हो। शरीरादिकी हानि वृद्धिके समान न तो पदार्थकी वृद्धि ही होती है और न हानि ही होती है ।


ननु भवति पूर्वपूर्वभावध्वंसान्नु हानिरेव सतः ।
स्यादपि तदुत्तरोत्तरभावोत्पादेन वृद्धिरेव सतः ॥475॥

अर्थ: जब पदार्थमें पहले २ भावोंका नाश होता जाता है तो अवश्य ही पदार्थकी हानि (न्यूनता) होती है, और जब उत्तरोत्तर - नवीन भावोंका उसमें उत्पाद होता रहता है तो अवश्य ही उसकी वृद्धि होती है ?


नैवं सतो विनाशादसतः सर्गादसिद्धसिद्धान्तात् ।
सदनन्यथाथ वा चेत्सदनित्यं कालतः कथं तस्य ॥476॥

अर्थ: उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है, यदि पदार्थकी हानि और वृद्धि होने लगे तो सत्पदार्थका विनाश और असत्का उत्पाद भी स्वयं सिद्ध होगा और ऐसा सिद्धान्त सर्वथा असिद्ध है अथवा यदि पदार्थको सर्वथा एकरूपमें ही मान लिया जाय, उसमें उत्पाद व्यय ध्रौव्य न माना जाय तो ऐसा माननेवालेके यहां कालकी अपेक्षासे सत् अनित्य किस प्रकार सिद्ध होगा ? अर्थात् विना परिणमन स्वीकार किये पदार्थमें अनित्यता भी कालकी अपेक्षासे नहीं आसक्ती है ।


नासिद्धमनित्यत्वं सतस्ततः कालतोप्यनित्यस्य ।
परिणामित्वान्नियतं सिद्धं तज्जलधरादिदृष्टान्तात् ॥477॥

अर्थ: पदार्थ कथञ्चित् अनित्य है यह बात असिद्ध भी नहीं है। कालकी अपेक्षासे वह सदा परिणमन करता ही रहता है, इसलिये उसमें कथंचित् अनित्यता स्वयं सिद्ध है। इस विषयमें मेघ-विजली आदि अनेक दृष्टान्त प्रत्यक्ष सिद्ध हैं।


तस्मादनवद्यमिदं परिणममानं पुनः पुनः सदपि ।
स्यादेकं कालादपि निजप्रमाणादखण्डितत्वाद्वा ॥478॥

अर्थ: ऊपरके कथनसे यह बात निर्दोष रीतिसे सिद्ध होती है कि सत् बार बार परिणमन करता हुआ भी कालकी अपेक्षासे वह एक है, क्योंकि उसका जितना प्रमाण ( परिमाण ) है, उससे वह सदा अखण्ड रहता है ।


भावः परिणाममयः शक्तिविशेषोऽथवा स्वभावः स्यात् ।
प्रकृतिः स्वरूपमात्रं लक्षणमिह गुणश्च धर्मश्च ॥479॥

अर्थ: भाव, परिणाम, शक्ति, विशेष, स्वभाव, प्रकृति, स्वरूप, लक्षण, गुण, धर्म ये सब भावके ही पर्यायवाचक हैं ।


तेनाखण्डतया स्यादेकं सच्चैकदेशनययोगात् ।
तल्लक्षणमिदमधुना विधीयते सावधानतया ॥480॥

अर्थ: उस भावसे सत् अखण्ड है । इसलिये एक देश नयसे (गुणोंकी अखण्डताके कारण) वह कथंचित् एक है । भावकी अपेक्षासे सत् एक है । इस विषयका लक्षण (स्वरूप) सावधानीसे इस समय कहा जाता है -


सर्वं सदिति यथा स्यादिह संस्थाप्य गुणपंक्तिरूपेण ।
पश्यन्तु भावसादिह निःशेषं सन्नशेषमिह किञ्चित् ॥481॥

अर्थ: सम्पूर्ण सत्को गुणोंकी पंक्तिरूपसे यदि स्थापित किया जाय तो उस सम्पूर्ण सत्को आप भावरूप ही देखेंगे, भावों ( गुणों ) को छोड़कर सत्में और कुछ भी आपकी दृष्टिमें न आवेगा ।


एकं तत्रान्यतरं भावं समपेक्ष्य यावदिह सदिति ।
सर्वानपि भावानिह व्यस्तसमस्तानपेक्ष्य सत्तावत् ॥482॥

अर्थ: उन सम्पूर्ण भावों (गुणों) में से जब किसी एक भावकी विवक्षा की जाती है तो संपूर्ण सत् उसीरूप (तन्मय) प्रतीत होता है । इसी प्रकार भिन्न २ भावोंकी अथवा समस्त भावोंकी बिवक्षा करनेसे सत् भी उतना ही प्रतीत होता है ।


न पुनर्द्व्यणुकादिरिति स्कन्धः पुद्गलमयोऽस्त्यणूनां हि ।
लघुरपि भवति लघुत्वे सति च महत्त्वे महानिहास्ति यथा ॥483॥

अर्थ: जिस प्रकार पुद्गलमय द्व्यणुकादि स्कन्ध परमाणुओंके कम होनेसे छोटा और उनके अधिक होनेपर बड़ा हो जाता है, उस प्रकार सत्में छोटापन और बड़ापन नहीं होता है । अर्थात् उसमें न तो कोई गुण कहीं चला जाता है और न कोई कहींसे आजाता है । वह जितना है सदा उतना ही रहता है ।


अयमर्थो वस्तु यदा सदिति विवक्षितैकभावेन ।
तन्मात्रं सदिति स्यात्सन्मात्रः स च विवक्षितो भावः ॥484॥

अर्थ: जिस समय जिस विवक्षित भावसे वस्तु कही जाती है, उस समय वह उसी भावमय प्रतीत होती है, और वह विवक्षित भाव भी सत्स्वरूप प्रतीत होता है, यदि किसी दूसरे भावसे वस्तु विवक्षित की जाती है तो वह उसी भावमय प्रतीत होती है और वह विवक्षित भाव भी उसी रूप ( सत्स्वरूप ) प्रतीत होता है।


यदि पुनरन्यतरेण हि भावेन विवक्षितं सदेव स्यात् ।
तन्मात्रं सदिति स्यात्तन्मात्रः स च विवक्षितो भावः ॥485॥

अर्थ: जिस समय जिस विवक्षित भावसे वस्तु कही जाती है, उस समय वह उसी भावमय प्रतीत होती है, और वह विवक्षित भाव भी सत्स्वरूप प्रतीत होता है, यदि किसी दूसरे भावसे वस्तु विवक्षित की जाती है तो वह उसी भावमय प्रतीत होती है और वह विवक्षित भाव भी उसी रूप ( सत्स्वरूप ) प्रतीत होता है।


अत्रापि च संदृष्टिः कनकः पीतादिमानिहास्ति यथा ।
पीतेन पीतमात्रो भवति गुरुत्वादिना च तन्मात्रः ॥486॥

अर्थ: वस्तु जिस भावसे विवक्षित की जाती है उसी भावमय प्रतीत होती है, इस विषयमें सुवर्ण (सोना)का दृष्टान्त भी है । सुवर्णमें पीलापन भारीपन, चमकीलापन आदि अनेक गुण हैं । जिस समय वह पीत गुणसे विवक्षित किया जाता है उत समय वह पीत मात्र ही प्रतीत होता है । तथा जिस समय वह सुवर्ण गुरुत्व गुणसे विवक्षित किया जाता है उस समय वह गुरु रूप ही प्रतीत होता है । ऐसा नहीं है कि उस सोनेमें कुछ तो पीतिमा हो, कुछ स्निग्धता हो, और कुछ गुरुता हो, और उन सबके समवायसे तीन सत्ताओंवाला एक सोना कहलाता हो । यहां पर इतना ही तात्पर्य है कि जो सोनेका पीत गुण है उसके गुरुत्व आदिक गुण अन्तर्भूत हैं इसलिये सोना केवल गुरुत्वगुणके द्वारा भी कहा जाता है ।


न च किञ्चित्पीतत्वं किञ्चित्स्निग्धत्वमस्ति गुरुता च ।
तेषामिह समवायादिति सुवर्णस्त्रित्वसत्ताकः ॥487॥

अर्थ: वस्तु जिस भावसे विवक्षित की जाती है उसी भावमय प्रतीत होती है, इस विषयमें सुवर्ण (सोना)का दृष्टान्त भी है । सुवर्णमें पीलापन भारीपन, चमकीलापन आदि अनेक गुण हैं । जिस समय वह पीत गुणसे विवक्षित किया जाता है उस समय वह पीत मात्र ही प्रतीत होता है । तथा जिस समय वह सुवर्ण गुरुत्व गुणसे विवक्षित किया जाता है उस समय वह गुरु रूप ही प्रतीत होता है । ऐसा नहीं है कि उस सोनेमें कुछ तो पीतिमा हो, कुछ स्निग्धता हो, और कुछ गुरुता हो, और उन सबके समवायसे तीन सत्ताओंवाला एक सोना कहलाता हो । यहां पर इतना ही तात्पर्य है कि जो सोनेका पीत गुण है उसके गुरुत्व आदिक गुण अन्तर्भूत हैं इसलिये सोना केवल गुरुत्वगुणके द्वारा भी कहा जाता है ।


इदमत्र तु तात्पर्यं यत्पीतत्वं गुणः सुवर्णस्य ।
अन्तर्लीनगुरुत्वादि लक्ष्यते तद्गुरुत्वेन ॥488॥

अर्थ: वस्तु जिस भावसे विवक्षित की जाती है उसी भावमय प्रतीत होती है, इस विषयमें सुवर्ण (सोना)का दृष्टान्त भी है । सुवर्णमें पीलापन भारीपन, चमकीलापन आदि अनेक गुण हैं । जिस समय वह पीत गुणसे विवक्षित किया जाता है उस समय वह पीत मात्र ही प्रतीत होता है । तथा जिस समय वह सुवर्ण गुरुत्व गुणसे विवक्षित किया जाता है उस समय वह गुरु रूप ही प्रतीत होता है । ऐसा नहीं है कि उस सोनेमें कुछ तो पीतिमा हो, कुछ स्निग्धता हो, और कुछ गुरुता हो, और उन सबके समवायसे तीन सत्ताओंवाला एक सोना कहलाता हो । यहां पर इतना ही तात्पर्य है कि जो सोनेका पीत गुण है उसके गुरुत्व आदिक गुण अन्तर्भूत हैं इसलिये सोना केवल गुरुत्वगुणके द्वारा भी कहा जाता है ।


ज्ञानत्वं जीवगुणस्तदिह विवक्षावशात्सुखत्वं स्यात् ।
अन्तर्लीनत्वादिह तदेकसत्त्वं तदात्मकत्वाच्च ॥489॥

अर्थ: जीवका जो ज्ञान गुण है, वही विवक्षावश सुखरूप हो जाता है, क्योंकि सुख गुण ज्ञान गुणके अन्तर्लीन ( भीतर छिपा हुआ ) रहता है। इसलिये विवक्षा करने पर ज्ञान सुखरूप ही प्रतीत होने लगता है। जिस समय जीवको सुख गुणसे विवक्षित किया जाता है, उस समय वह सुखस्वरूप ही प्रतीत होता है। उस समय जीवके ज्ञान, दर्शन, चारित्र, वीर्य आदि सभी गुणोंकी सुख स्वरूप ही एक सत्ता प्रतीत होती है।


ननु निर्गुणा गुणा इति सूत्रे सूक्तं प्रमाणतो वृद्धैः ।
तत्किं ज्ञानं गुण इति विवक्षितं स्यात्सुखत्वेन ॥490॥

अर्थ: सूत्रकार-पूर्वमहर्षियोंने गुणोंका लक्षण बतलाते हुए उन्हें निर्गुण बतलाया है, ऐसा सूत्रभी है-’ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ’ और यह बात सप्रमाण सिद्ध की गई है, फिर किस प्रकार जीवका ज्ञान गुण सुख रूपसे विवक्षित किया जा सक्ता है ?


सत्यं लक्षणभेदाद्गुणभेदो निर्विलक्षणः स स्यात् ।
तेषां तदेकसत्त्वादखण्डितत्वं प्रमाणतोऽध्यक्षात् ॥491॥

अर्थ: ठीक है, परन्तु बात यह है कि गुणोंमें जो भेद है वह उनके लक्षणोंके भेदसे है । वह ऐसा भेद नहीं है कि गुणोंको सर्वथा जुदा २ सिद्ध करनेवाला हो । उन सम्पूर्ण गुणोंकी एक ही सत्ता है इसलिये प्रत्यक्ष प्रमाणसे उनमें अखण्डता - अभेद सिद्ध है ।


तस्मादनवद्यमिदं भावेनाखण्डितं सदेकं स्यात् ।
तदपि विवक्षावशतः स्यादिति सर्वं न सर्वथेति नयात् ॥492॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात निर्दोष रीतिसे सिद्ध हो चुकी कि भावकी अपेक्षासे सत् अखण्डित एक है। इतना विशेष समझना चाहिये कि वह सत्की एकता विवक्षाके आधीन है। सर्वथा एकता उसमें असिद्ध ही है, क्योंकि वस्तुमें एकता और अनेकता किसी नय विशेषसे सिद्ध होती है।


एवं भवति सदेकं भवति न तदपि च निरंकुशं किन्तु ।
सदनेकं स्यादिति किल सप्रतिपक्षं यथा प्रमाणाद्वा ॥493॥

अर्थ: सत् एक है परन्तु वह सर्वथा एक नहीं है। उसका प्रतिपक्ष भी प्रमाण सिद्ध है इसलिये वह निश्चयसे अनेक भी है।


अपि च स्यात्सदनेकं तद्द्रव्याद्यैरखण्डितत्वेपि ।
व्यतिरेकेण विना यन्नान्वयपक्षः स्वपक्षरक्षार्थम् ॥494॥

अर्थ: यद्यपि सत् द्रव्य गुण, पर्यायोंसे अखण्ड है तथापि वह अनेक है क्योंकि बिना व्यतिरेकपक्ष स्वीकार किये अन्वयपक्ष भी अपनी रक्षा नहीं कर सक्ता है।


अस्ति गुणस्तल्लक्षणयोगादिह पर्ययस्तथा च स्यात् ।
तदनेकत्वे नियमात्सदनेकं द्रव्यतः कथं न स्यात् ॥495॥

अर्थ: गुणोंका लक्षण भिन्न है, पर्यायका लक्षण भिन्न है । गुण पर्यायोंकी अनेकतामें द्रव्यकी अपेक्षासे सत् अनेक क्यों नहीं है ? अर्थात् भेद विवक्षासे सत् कथंचित् अनेक भी है ।


यत्सत्तदेकदेशे तद्देशे न तद्द्वितीयेषु ।
अपि तद्द्वितीयदेशे सदनेकं क्षेत्रतश्च को नेच्छेत् ॥496॥

अर्थ: जो सत् एक देशमें है वह उसी देशमें है। वह दूसरे देशोंमें नहीं है। और जो दूसरे देशमें है वह उसीमें है, वह अन्यमें नहीं है। इसलिये क्षेत्रकी अपेक्षासे सत् अनेक है, इस बातको कौन नहीं चाहेगा ?


यत्सत्तदेककाले तत्तत्काले न तदितरत्र पुनः ।
अपि सत्तदितरकाले सदनेकं कालतोपि तदवश्यम् ॥497॥

अर्थ: जो सत् एक कालमें है, वह उसी कालमें है, वह दूसरे कालमें नही है, और जो सत् दूसरे कालमें है वह पहलेमें अथवा तीसरे आदि कालोंमें नहीं है इसलिये कालकी अपेक्षासेभी सत् अनेक अवश्य है ।


तन्मात्रत्वादेको भावो यः स न तदन्यभावः स्यात् ।
भवति च तदन्यभावः सदनेकं भावतो भवेन्नियतम् ॥498॥

अर्थ: जो एक भाव है वह अपने स्वरूपसे उसी प्रकार है, वह अन्यभावरूप नहीं हो सक्ता है, और जो अन्यभाव है वह अन्यरूप ही है वह दूसरे भाव रूप नहीं हो सक्ता है, इसलिये भावकी अपेक्षासे भी नियमसे सत् अनेक है।


शेषो विधिरुक्तत्वादत्र न निर्दिष्ट एव दृष्टान्तः ।
अपि गौरवप्रसङ्गाद्यदि वा पुनरुक्तदोषभयात् ॥499॥

अर्थ: बाकीकी विधि (सत् नित्य अनित्य भिन्न आदिरूप) पहले ही कही जाचुकी है, इसलिये वह नहीं कही जाती है। गौरवके प्रसंगसे अथवा पुनरुक्त दोषके भयसे उस विषयमें दृष्टान्त भी नहीं कहा जाता है


तस्माद्यदिह सदेकं सदनेकं स्यात्तदेव युक्तिवशात् ।
अन्यतरस्य विलोपे शेषविलोपस्य दुर्निवारत्वात् ॥500॥

अर्थ: इसलिये जो सत् एक है वही युक्तिवशसे अनेक भी सिद्ध होता है । यदि एक और अनेक इन दोनोंमेंसे किसी एकका लोप कर दिया जाय तो दूसरेका लोप भी दुर्निवार - अवश्यम्भावी है, अर्थात् एक दूसरेकी अपेक्षा रखता है । दोनोंकी सिद्धिमें दोनोंकी सापेक्षता ही कारण है । एक की असिद्धिमें दूसरेकी असिद्धि स्वयं सिद्ध है ।

पूर्वार्द्ध 501 से 600 (श्लोक 501 से 600)

अपि सर्वथा सदेकं स्यादिति पक्षो न साधनायालम् ।
इह तदवयवाभावे नियमात्सदवयविनोऽप्यभावत्वात् ॥501॥

अर्थ: सत् सर्वथा एक है, यह पक्ष भी वस्तुकी सिद्धि करानेमें समर्थ नहीं है। वस्तुके अवयवोंके अभावमें वस्तुरूप अवयवी भी नियमसे सिद्ध नहीं होता है।


अपि सदनेकं स्यादिति पक्षः कुशलो न सर्वथेति यतः ।
एकमनेकं स्यादिति नानेकं स्यादनेकमेकैकात् ॥502॥

अर्थ: सत् सर्वथा अनेक है यह पक्ष भी सर्वथा ठीक नहीं है । क्योंकि एक एक मिलकर ही अनेक कहलाता है । अनेक ही अनेक नहीं कहलाता। किन्तु एक एक संख्याके जोड़से ही अनेक सिद्ध होता है।


उक्तं सदिति यथा स्यादेकमनेकं सुसिद्धदृष्टान्तात् ।
अधुना तद्वाङ्मात्रं प्रमाणनयलक्षणं वक्ष्ये ॥503॥

अर्थ: सत् - पदार्थ कथंचित् एक है, कथंचित् वह अनेक है, यह बात सुप्रसिद्ध दृष्टान्तों द्वारा सिद्ध की जा चुकी है। अब वचनमात्र प्रमाण नयका लक्षण कहा जाता है।


इत्युक्तलक्षणेऽस्मिन् विरुद्धधर्मद्वयात्मके तत्त्वे ।
तत्राप्यन्यतरस्य स्यादिह धर्मस्य वाचकश्च नयः ॥504॥

अर्थ: पदार्थ विरुद्ध दो धर्म स्वरूप है, ऐसा उसका लक्षण ऊपर कहा जा चुका है। उन दोनों विरोधी धर्मोंमेंसे किसी एक धर्मका कहनेवाला नय कहलाता है।


द्रव्यनयो भावनयः स्यादिति भेदाद्द्विधा च सोपि यथा ।
पौद्गलिकः किल शब्दो द्रव्यं भावश्च चिदिति जीवगुणः ॥505॥

अर्थ: वह नय भी द्रव्यनय और भावनयके भेदसे दो प्रकार है । पौद्गलिक शब्द द्रव्यनय कहलाता है तथा जीवका चेतना गुण भावनय कहलाता है ।


यदि वा ज्ञानविकल्पो नयो विकल्पोस्ति सोप्यपरमार्थः ।
नयतो ज्ञानं गुण इति शुद्धं ज्ञेयं च किन्तु तद्योगात् ॥506॥

अर्थ: अथवा ज्ञान विकल्पका नाम ही नय है। अर्थात् विकल्पात्मक ज्ञानको नय कहते हैं-और जितना विकल्प है वह सब अपरमार्थ-अयथार्थ है क्योंकि शुद्ध ज्ञान गुण नय नहीं कहा जाता है, और न शुद्ध ज्ञेय ही नय कहा जता है। किंतु ज्ञान और ज्ञेय, इन दोनोंके योग-सम्बन्धसे ही नय कहा जाता है। इसीलिये वह अयथार्थ है।


ज्ञानविकल्पो नय इति तत्रेयं प्रक्रियापि संयोज्या ।
ज्ञानं ज्ञानं न नयो नयोपि न ज्ञानमिह विकल्पत्वात् ॥507॥

अर्थ: ज्ञान विकल्प नय है इस विषयमें यह प्रक्रिया (शैली) लगानी चाहिये कि ज्ञान तो ज्ञानरूप ही है, ज्ञान नयरूप नहीं है । जो नय है वह ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि नय विकल्प स्वरूप है ।


उन्मज्जति नयपक्षो भवति विकल्पो विवक्षितो हि यदा ।
न विवक्षितो विकल्पः स्वयं निमज्जति तदा हि नयपक्षः ॥508॥

अर्थ: जिस समय विकल्प विवक्षित होता है उस समय नय पक्ष भी प्रकट होता है। जिस समय विकल्प विवक्षित नहीं होता है, उस समय नय पक्ष भी स्वयं छिप जाता है। अर्थात् जहां पदार्थ किसी अपेक्षा विशेषसे विवक्षित होता है वहींपर नय पक्ष स्वकार्यदक्ष होता है।


संदृष्टिः स्पष्टेयं स्यादुपचाराद्यथा घटज्ञानम् ।
ज्ञानं ज्ञानं न घटो घटोपि न ज्ञानमस्ति स इति घटः ॥509॥

अर्थ: यह दृष्टान्त स्पष्ट ही है कि जैसे उपचारसे घटको विषय करनेवाले ज्ञानको घटज्ञान कहा जाता है । वास्तवमें ज्ञान घट रूप नहीं होजाता, और न घट ही ज्ञान रूप होजाता है । ज्ञान ज्ञान ही रहता है तथा घट घट ही रहता है ।


इदमत्र तु तात्पर्यं हेयः सर्वो नयो विकल्पात्मा ।
बलवानिव दुर्वारः प्रवर्त्तते किल तथापि बलात् ॥510॥

अर्थ: नयके विषयमें यही तात्पर्य है कि जितना भी विकल्पात्मक नय है सभी त्याज्य (छोडने योग्य) है । यहांपर शंका होसक्ती है कि जब विकल्पात्मक नय सभी छोड़ने योग्य है फिर क्यों कहा जाता है ? उत्तर - यद्यपि यह बात ठीक है तथापि उसका कहना आवश्यक प्रतीत होता है । इसलिये वह बलवान्के समान बलपूर्वक प्रवर्तित होता ही है अर्थात् उसका प्रयोग करना ही पड़ता है । वह यद्यपि त्याज्य है तथापि वह दुर्वार है ।


अथ तद्यथा यथा सत्सन्मात्रं मन्यमान इह कश्चित् ।
न विकल्पमतिक्रामति सदिति विकल्पस्य दुर्निवारत्वात् ॥511॥

अर्थ: जितना भी नय है सब विकल्पात्मक है इसी बातको यहां पर स्पष्ट करते हैं । जैसे किसी पुरुषने सत्में कोई विकल्प नहीं समझा हो केवल उसे उसने सन्मात्र सत्स्वरूप ही समझा हो तो यहां पर भी विकल्पातीत उसका ज्ञान नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ‘सत’ यह विकल्प उसके ज्ञानमें आचुका ही है, वह दुर्निवार है, अर्थात् सत् इस विकल्पको तो कोई उसके ज्ञानसे दूर नहीं कर सकता ।


स्थूलं वा सूक्ष्मं वा बाह्यान्तर्जल्पमात्रवर्णमयम् ।
ज्ञानं तन्मयमिति वा नयकल्पो वाग्विलासत्वात् ॥512॥

अर्थ: स्थूल अथवा सूक्ष्म जो वाह्यजल्प (स्पष्टबोलना) और अन्तर्जल्प (मन ही मनमें बोलना) है वह सब वर्णमय है और वह नयरूप है, क्योंकि वह वचन विन्यासरूप है। जितना भी वचनात्मक कथन है सब नयात्मक है तथा उन वचनोंका जो बोध है ज्ञान है वह भी नयरूप ही है। क्योंकि वचनोंके समान उसने भी वस्तुके विवक्षित अंशको ही विषय किया है।


अवलोक्य वस्तुधर्मं प्रतिनियतं प्रतिविशिष्टमेकैकम् ।
संज्ञाकरणं यदि वा तद्वागुपचर्यते च नयः ॥513॥

अर्थ: एक एक प्रतिनियित वस्तु धर्मको वस्तुसे विशिष्ट देखकर उस धर्म विशिष्ट वस्तुकी उसी नामसे संज्ञा-नामकरण करना भी नय है । ऐसा ज्ञान भी नयात्मक है और वचन भी नयात्मक हीं उपचार है ।


अथ तद्यथा यथाग्नेरौष्ण्यं धर्मं समक्षतोऽपेक्ष्य ।
उष्णोऽग्निरिति वागिह तज्ज्ञानं वा नयोपचारः स्यात् ॥514॥

अर्थ: जैसे अग्निका उष्णधर्म सामने देखकर किसीने कहा कि 'अग्नि उष्ण है, यह वचन नयरूप है और उस वचनका वाच्यरूप बोध भी नयात्मक है ।


इह किल छिदाक्रियायां स्यादिव परशुः स्वतन्त्र एव यथा ।
न तथा नयः स्वलक्ष्यं धर्मविशिष्टं करोति वस्तुबलात् ॥515॥

अर्थ: जिस प्रकार छेदनक्रियाका कारण फरसा छेदनक्रियाके करनेमें स्वतंत्र रीतिसे चलाया जाता है । उस प्रकार नय स्वतन्त्र रीतिसे वस्तुको किसी धर्मसे विशिष्ट नहीं समझता है और न कहता ही है ।


एकः सर्वोपि नयो भवति विकल्पाविशेषतोपि नयात् ।
अपि च द्विविधः स यथा स्वविषयभेदे विकल्पद्वैविध्यात् ॥516॥

अर्थ: विकल्पात्मक ज्ञानको ही नय कहते हैं कोई नय क्यों न हो, विकल्पात्मक ही होगा इसलिये विकल्पकी अविशेषता होनेसे सभी नय एक हैं । सभी नयोंकी एकताका विकल्पसामान्य ही हेतु है । विषयभेदकी अपेक्षा होनेपर वह नय दो प्रकार भी है । विषयभेदसे विकल्पभेद - विकल्पद्वैविध्यका होना भी आवश्यकहै और विकल्पद्वैविध्यमें नयद्वैविध्यका होना भी आवश्यक है ।


एकोद्रव्यार्थिक इति पर्यायार्थिक इति द्वितीयः स्यात् ।
सर्वेषां च नयानां मूलमिदं नयद्वयं यावत् ॥517॥

अर्थ: एक द्रव्यार्थिक नय है, दूसरा पर्यायार्थिक नय है। सम्पूर्ण नयोंके मूलभूत ये दो ही नय हैं।


द्रव्यं सन्मुख्यतया केवलमर्थः प्रयोजनं यस्य ।
भवति द्रव्यार्थिक इति नयः स्वधात्वर्थसंज्ञकश्चैकः ॥518॥

अर्थ: केवल द्रव्य ही मुख्यतासे जिस नयका प्रयोजन विषय है वह नय द्रव्यार्थिक नय कहा जाता है और वही अपनी धातुके अर्थके अनुसार यथार्थ नाम धारक है तथा वह एक है ।


अंशाः पर्याया इति तन्मध्ये यो विवक्षितोऽशः सः
अर्थो यस्येति मतः पर्यायार्थिकनयस्त्वनेकश्च ॥519॥

अर्थ: अंशोंका नाम ही पर्याय है उन अंशोंमेंसे जो विवक्षित अंश है वह अंश जिस नयका विषय है, वही पर्यायार्थिक नय कहलाता है। ऐसे पर्यायार्थिक नय अनेक हैं।


अधुना रूपदर्शनं संदृष्टिपुरस्सरं द्वयोर्वक्ष्ये ।
श्रुतपूर्वमिव सर्वं भवति च यद्वाऽनुभूतपूर्वं तत् ॥520॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि वे अब उन दोनों नयोंका स्वरूप दृष्टान्तपूर्वक कहेंगे। दृष्टान्त पूर्वक कहनेसे सुननेवालोंको वह विषय पहले सुने हुएके समान हो जाता है अथवा पहले अनुभव किये हुएके समान होजाता है।


पर्यायार्थिक नय इति यदि वा व्यवहार एव नामेति ।
एकार्थो यस्मादिह सर्वोप्युचारमात्रः स्यात् ॥521॥

अर्थ: पर्यायार्थिक नय कहो अथवा व्यवहार नय कहो दोनोंका एक ही अर्थ है, सभी उपचारमात्र है।


व्यवहरणं व्यवहारः स्यादिति शब्दार्थतो न परमार्थः ।
स यथा गुणगुणिनोरिह सदभेदे भेदकरणं स्यात् ॥522॥

अर्थ: किसी वस्तुमें भेद करनेका नाम ही व्यवहार है, व्यवहारनय शब्दार्थ - वाक्य विवक्षाके आधार पर है अथवा शब्द और अर्थ दोनोंहीसे अपरमार्थ है । वास्तवमें यह नय वस्तुके यथार्थ रूपको नहीं कहता है इसलिये यह परमार्थभूत नहीं है । जैसे - यद्यपि सत् अभिन्न - अखण्ड है तथापि उसमें ’ यह गुण है ’ यह गुणी है, इसप्रकार गुण गुणीका भेद करना ही इस नयका विषय है ।


साधारणगुण इति वा यदि वाऽसाधारणः सतस्तस्य ।
भवति विवक्ष्यो हि यदा व्यवहारनयस्तदा श्रेयान् ॥523॥

अर्थ: पदार्थका सामान्य गुण हो अथवा विशेष गुण हो, जो जिस समय विवक्षित होता है उसी समय उसे व्यवहारनयका यथार्थ विषय समझना चाहिये । अर्थात् विवक्षित गुण ही गुण गुणीमें भेद सिद्ध करता है, वह व्यवहारनयका विषय है ।


फलमास्तिक्यमतिः स्यादनन्तधर्मैकधर्मिणस्तस्य ।
गुणसद्भावे नियमाद्द्रव्यास्तित्वस्य सुप्रतीतत्वात् ॥524॥

अर्थ: व्यवहारनयका फल पदार्थोंमें आस्तिक्यबुद्धिका होना है, व्यवहारनयसे वस्तु अनन्त गुणोंका पुञ्ज है, यह बात जानी जाती है । क्योंकि गुणोंकी विवक्षामें गुणोंका सद्भाव सिद्ध होता है और गुणोंके सद्भावमें गुणी - द्रव्यका सद्भाव स्वयं सिद्ध अनुभवमें आता है ।


व्यवहारनयो द्वेधा सद्भूतस्त्वथ भवेदसद्भूतः ।
सद्भूतस्तद्गुण इति व्यवहारस्तत्प्रवृत्तिमात्रत्वात् ॥525॥

अर्थ: व्यवहार नयके दो भेद हैं। (१) सद्भूतव्यवहार नय (२) असद्भूत व्यवहार नय। सद्भूत उस वस्तुके गुणोंका नाम है, और व्यवहार उनकी प्रवृत्तिका नाम है।


अत्र निदानं च यथा सदसाधारणगुणो विवक्ष्यः स्यात् ।
अविवक्षितोऽथवापि च सत्साधारणगुणो न चान्यतरात् ॥526॥

अर्थ: सद्भूत व्यवहार नयकी प्रवृत्तिका हेतु यह है कि पदार्थके असाधारण गुण ही इस नय द्वारा विवक्षित किये जाते हैं अथवा पदार्थके साधारण गुण इस नय द्वारा विवक्षित नहीं किये जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इस नय द्वारा कभी कोई और कभी कोई गुण विवक्षित और अविवक्षित किया जाय।


अस्यावगमे फलमिति तदितरवस्तुनि निषेधबुद्धिः स्यात् ।
इतरविभिन्नो नय इति भेदाभिव्यञ्जको न नयः ॥527॥

अर्थ: सद्भूत व्यवहार नयके समझने पर एक पदार्थसे दूसरे पदार्थमें निषेध बुद्धि हो जाती है अर्थात् एक पदार्थसे दूसरा पदार्थ जुदा ही प्रतीत होने लगता है यह सद्भूत व्यवहार नय एक पदार्थकी दूसरे पदार्थसे भिन्न प्रतीति करानेवाला है । एक ही पदार्थमें भिन्नताका सूचक नहीं हैं ।


अस्तमितसर्वसङ्करदोषं क्षतसर्वशून्यदोषं वा ।
अणुरिव वस्तुसमस्तं ज्ञानं भवतीत्यनन्यशरणमिदम् ॥528॥

अर्थ: सद्भूत व्यवहार नयसे वस्तुका यथार्थ परिज्ञान होनेपर वह सब प्रकारके संकर दोषोंसे रहित - सबसे जुदी, सब प्रकारके शून्यता - अभाव आदि दोषोंसे रहित, समस्त ही वस्तु परमाणुके समान (अखण्ड) प्रतीत होती है । ऐसी अवस्थामें वह उसका शरण वही दीखती है ।


अपि चाऽसद्भूतादिर्व्यवहारान्तो नयश्च भवति यथा ।
अन्यद्रव्यस्य गुणाः सञ्जायन्ते बलात्तदन्यत्र ॥529॥

अर्थ: दूसरे द्रव्यके गुणोंका बल पूर्वक दूसरे द्रव्यमें आरोपण किया जाय, इसीको असद्भूत व्यवहार नय कहते हैं ।


स यथा वर्णादिमतो मूर्तद्रव्यस्य कर्म किल मूर्तम् ।
तत्संयोगत्वादिह मूर्ताः क्रोधादयोपि जीवभवाः ॥530॥

अर्थ: वर्णादिवाले मूर्त द्रव्यसे कर्म बनते हैं इससिये वे भी मूर्त ही हैं। उन कर्मोंके सम्बन्धसे क्रोधादिक भाव बनते हैं इसलिये वेभी मूर्त हैं, उन्हें जीवके कहना यही असद्भूत व्यवहार नयका विषय है।


कारणमन्तर्लीना द्रव्यस्य विभावभावशक्तिः स्यात् ।
सा भवति सहजसिद्धा केवलमिह जीवपुद्गलयोः ॥531॥

अर्थ: असद्भूत व्यवहारनयकी प्रवृत्ति क्यों होती है ? इसका कारण द्रव्यमें रहनेवाली वैभाविक शक्ति है । वह स्वाभाविकी शक्ति है तथा केवल जीव और पुद्गलमें ही वह पाई जाती है ।


फलमागन्तुकभावादुपाधिमात्रं विहाय यावदिह ।
शेषस्तच्छुद्धगुणः स्यादिति मत्त्वा सुदृष्टिरिह कश्चित् ॥532॥

अर्थ: जीवमें क्रोधादिक उपाधि है। वह आगन्तुक भावों-कर्मोंसे हुई है। उपाधिको दूर करदेनेसे जीव शुद्ध गुणोंवाला प्रतीत होता है, अर्थात् जीवके गुणोंमेंसे परनिमित्तसे होनेवाली उपाधिको हटा देनेसे बाकी उसके चारित्र आदि शुद्ध गुण प्रतीत होने लगते हैं। ऐसा समझ कर जीवके स्वरूपको पहचान कर कोई (मिथ्यादृष्टि अथवा विचलितवृत्ति जीव भी) सम्यग्दृष्टि हो सकता है। बस यही इस नयका फल है।


अत्रापि च संदृष्टिः परगुणयोगाच्च पाण्डुरः कनकः ।
हित्वा परगुणयोगं स एव शुद्धोऽनुभूयते कैश्चित् ॥533॥

अर्थ: इस विषयमें दृष्टान्त भी स्पष्ट ही है कि सोना दूसरे पदार्थके गुणके सम्बन्धसे कुछ सफेदीको लिये हुए पीला हो जाता है, परगुणके विना वही सोना किन्हींको शुद्ध (तेजोमय पीला) अनुभवमें आता है ।


सद्भूतव्यवहारोऽनुपचरितोस्ति च तथोपचरितश्च ।
अपि चाऽसद्भूतः सोनुपचरितोस्ति च तथोपचरितश्च ॥534॥

अर्थ: सद्भूत व्यवहार नय अनुपचरित भी होता है और उपचरित होता है । तथा असद्भूत व्यवहार नय भी अनुपचरित और उपचरित होता है ।


स्यादादिमो यथान्तर्लीना या शक्तिरस्ति यस्य सतः ।
तत्तत्सामान्यतया निरूप्यते चेद्विशेषनिरपेक्षम् ॥535॥

अर्थ: जिस पदार्थके भीतर जो शक्ति है, वह विशेषकी अपेक्षासे रहित सामान्य रीतिसे उसीकी निरूपण की जाती है । यही अनुपचरित सद्भूतव्यवहार नयका स्वरूप है ।


इदमत्रोदाहरणं ज्ञानं जीवोपजीवि जीवगुणः ।
ज्ञेयालम्बनकाले न तथा ज्ञेयोपजीवी स्यात् ॥536॥

अर्थ: अनुपचरित-सद्भूतव्यवहारनयके विषयमें यह उदाहरण है कि ज्ञान जीवका अनुजीवी गुण है। वह ज्ञेयके अवलम्बन कालमें ज्ञेयका उपजीवी गुण नहीं होता है।


घटसद्भावे हि यथा घटनिरपेक्षं चिदेव जीवगुणः ।
अस्ति घटाभावेपि च घटनिरपेक्षं चिदेव जीवगुणः ॥537॥

अर्थ: जैसे ज्ञान घटके सद्भाव ( घटको विषय करते समय ) में घटनिरपेक्ष जीवका गुण है। वैसे घटाभावमें भी वह घट निरपेक्ष जीवका ही गुण है।


एतेन निरस्तं यन्मतमेतत्सति घटे घटज्ञानम् ।
असति घटे च ज्ञानं न घटज्ञानं प्रमाणशून्यत्वात् ॥538॥

अर्थ: जो सिद्धान्त ऐसा मानता है कि घटके होनेपर ही घटज्ञान हो सकता है, घटके न होने पर घटज्ञान भी नहीं हो सकता और ज्ञान भी नहीं हो सकता है। वह सिद्धान्त उपर्युक्त कथनसे खण्डित हो चुका, क्योंकि ऐसा सिद्धान्त माननेमें कोई प्रमाण नहीं है।


फलमास्तिक्यनिदानं सद्द्रव्ये वास्तवप्रतीतिः स्यात् ।
भवति क्षणिकादिमते परमोपेक्षा यतो विनायासात् ॥539॥

अर्थ: पदार्थमें यथार्थ प्रतीतिका होना ही आस्तिक्यबुद्धिका कारण है। ऐसी यथार्थ प्रतीति अनुपचरित - सद्भूत व्यवहार नयसे होती है। साथ ही क्षणिकादि सिद्धान्तके माननेवालों (बौद्धादि)में विना किसी प्रयासके ही परम उपेक्षा (उदासीनता हो जाती है, यही इस नयका फल है।


उपचरितः सद्भूतो व्यवहारः स्यान्नयो यथा नाम ।
अविरुद्धं हेतुवशात्परतोप्युपचर्यते यथा स्वगुणः ॥540॥

अर्थ: अविरुद्धता पूर्वक किसी हेतुसे उस वस्तुका उसीमें परकी अपेक्षासे भी जहां पर उपचरित किया जाता है वहां पर उपचरित सद्भूत व्यवहार नय प्रवर्त्तित होता है ।


अर्थविकल्पो ज्ञानं प्रमाणमिति लक्ष्यतेधुनापि यथा ।
अर्थः स्वपरनिकायो भवति विकल्पस्तु चित्तदाकारम् ॥541॥

अर्थ: जैसे प्रमाणका लक्षण कहा जाता है कि अर्थ विकल्प ज्ञानरूप प्रमाण होता है, यहां पर अर्थ नाम ज्ञान और पर पदार्थोंका है । विकल्प नाम ज्ञानका उस आकाररूप होना है । अर्थात् स्व पर ज्ञान होना ही प्रमाण है ।


असदपि लक्षणमेतत्सन्मात्रत्वे सुनिर्विकल्पत्वात् ।
तदपि न विनावलम्बान्निर्विषयं शक्यते वक्तुम् ॥542॥

अर्थ: ज्ञान यद्यपि निर्विकल्पक होनेसे सन्मात्र है इसलिये उपर्युक्त विकल्प स्वरूप लक्षण उसमें नहीं जाता है, तथापि वह विना अवलम्बनके निर्विषय नहीं कहा जासक्ता है।


तस्मादनन्यशरणं सदपि ज्ञानं स्वरूपसिद्धत्वात् ।
उपचरितं हेतुवशात् तदिह ज्ञानं तदन्यशरणमिव ॥543॥

अर्थ: इसलिये ज्ञान अपने स्वरूपसे स्वयं सिद्ध है अतएव वह अनन्य शरण (उसका वही अवलम्बन) है तो भी हेतु वश वह ज्ञान अन्य शरणके समान उपचरित होता है।


हेतुः स्वरूपसिद्धिं विना न परसिद्धिरप्रमाणत्वात् ।
तदपि च शक्तिविशेषाद्द्रव्यविशेषे यथा प्रमाणं स्यात् ॥544॥

अर्थ: ऐसा होनेमें कारण भी यह है कि स्वरूप सिद्धिके बिना परसे सिद्धि अप्रमाण ही है, अर्थात् ज्ञान स्वरूपसे सिद्ध है तभी वह परसे भी सिद्ध माना जाता है। ज्ञान स्वरूपसे सिद्ध है इस विषयमें भी यही कहा जा सकता है कि वह द्रव्य विशेष (जीव द्रव्य)का गुण विशेष है। यह बात प्रमाण पूर्वक सिद्ध है।


अर्थो ज्ञेयज्ञायकसङ्करदोषभ्रमक्षयो यदि वा ।
अविनाभावात् साध्यं सामान्यं साधको विशेषः स्यात् ॥545॥

अर्थ: उपचरित - सद्भूत व्यवहार नयका यह फल है कि ज्ञेय और ज्ञायकमें अर्थात् ज्ञान और पदार्थमें संकर दोष न उत्पन्न हो, तथा किसी प्रकारका भ्रम भी इनमें न उत्पन्न हो। यदि पहले ज्ञेय और ज्ञायकमें संकर दोष अथवा दोनोंमें भ्रम हुआ हो तो इस नयके जानने पर वह दोष तथा वह भ्रम दूर हो जाता है। यहां पर अविनाभाव होनेसे सामान्य साध्य है तथा विशेष उसका साधक है अर्थात् ज्ञान साध्य है और घटज्ञान पटज्ञानादि उसके साधक हैं। दोनोंका ही अविनाभाव है। कारण कि पदार्थ प्रमेय है इसलिये वह किसी न किसीके ज्ञानका विषय होता ही है और ज्ञान भी ज्ञेयका अवलम्बन करता ही है निर्विषय वह भी नहीं होता।


अपि वाऽसद्भूतो योऽनुपचरिताख्यो नयः स भवति यथा ।
क्रोधाद्या जीवस्य हि विवक्षिताश्चेदबुद्धिभवाः ॥546॥

अर्थ: अबुद्धि पूर्वक होनेवाले क्रोधादिक भावोंमें जीवके भावोंकी विवक्षा करना, यह अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय कहलाता है।


कारणमिह यस्य सतो या शक्तिः स्याद्विभावभावमयी ।
उपयोगदशाविष्टा सा शक्तिः स्यात्तदाप्यनन्यमयी ॥547॥

अर्थ: जिस पदार्थकी जो शक्ति वैभाविक मावमय हो रही है और उपयोगदशा ( कार्यकारिणी ) विशिष्ट है । तो भी वह शक्ति अन्यकी नहीं कही जा सक्ती । यही अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयकी प्रवृत्तिमें कारण है ।


फलमागन्तुकभावाः स्वपरनिमित्ता भवन्तियावन्तः ।
क्षणिकत्वान्नादेया इति बुद्धिः स्यादनात्मधर्मत्वात् । ॥548॥

अर्थ: अपने और परके निमित्तसे होनेवाले जितने भी आगन्तुक भाव–वैभाविकभाव हैं । वे सब आत्माके धर्म नहीं हैं । इसलिये वे क्षणिक हैं । क्षणिक होनेसे अथवा आत्मिक धर्म न होनेसे वे ग्राह्य–ग्रहण करने योग्य नहीं हैं ऐसी बुद्धिका होना ही इस नयका फल है ।


उपचरितोऽसद्भूतो व्यवहाराख्यो नयः स भवति यथा ।
क्रोधाद्याः औदयिकाश्चितश्चेद्बुद्धिजा विवक्ष्याः स्युः ॥549॥

अर्थ: औदयिक क्रोधादिक भाव यदि बुद्धिपूर्वक हों, फिर उन्हें जीवके समझना या कहना उपचरित - असद्भूत व्यवहार नय है ।


बीजं विभावभावाः स्वपरोभयहेतवस्तथा नियमात् ।
सत्यपि शक्तिविशेषे न परनिमित्ताद्विना भवन्ति यतः ॥550॥

अर्थ: जितने भी वैभाविक भाव हैं वे नियमसे अपने और परके निमित्तसे होते हैं। यद्यपि वे शक्ति विशेष हैं अर्थात् किसी द्रव्यके निज गुण हैं तथापि वे परके निमित्त विना नहीं होते हैं।


तत्फलमविनाभावात्साध्यं तदबुद्धिपूर्वका भावाः ।
तत्सत्तामात्रं प्रति साधनमिह बुद्धिपूर्वका भावाः ॥551॥

अर्थ: विना अबुद्धिपूर्वक भावोंके बुद्धिपूर्वक भाव हो ही नहीं सक्ते हैं । इसलिये बुद्धिपूर्बक भावोंका अबुद्धिपूर्वक भावोंके साथ अविनाभाव है । अविनाभाव होनेसे अबुद्धिपूर्बक भाव साध्य हैं और उनकी सत्ता सिद्ध करनेके लिये साधन बुद्धिपूर्वक भाव हैं । यही इसका फल है ।


ननु चासद्भूतादिर्भवति स यत्रेत्यतद्गुणारोपः ।
दृष्टान्तादपि च यथा जीवो वर्णादिमानिहास्त्विति चेत् ॥552॥

अर्थ: असद्भूत व्यवहार नय वहांपर प्रवृत्त होता है जहां कि एक वस्तुके गुण दूसरी वस्तुमें आरोपित किये जाते हैं। दृष्टान्त–जैसे जीवको वर्णादिवाला कहना। ऐसा माननेमें क्या हानि है ?


तन्न यतो न नयास्ते किन्तु नयाभाससंज्ञकाः सन्ति ।
स्वयमप्यतद्गुणत्वादव्यवहाराऽविशेषतो न्यायात् ॥553॥

अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है। कारण जो तद्गुणारोपी नहीं हैं किन्तु एक वस्तुके गुण दूसरी वस्तुमें आरोपित करते हैं वे नय नहीं है किन्तु नयाभास हैं। वे व्यवहारके योग्य नहीं हैं।


तदभिज्ञानं चैतद्येऽतद्गुणलक्षणा नयाः प्रोक्ताः ।
तन्मिथ्यावादत्वाद्ध्वस्तास्तद्वादिनोपि मिथ्याख्याः ॥554॥

अर्थ: जो ऊपर कहा गया है उसका खुलासा इस प्रकार है कि जितने अतद्गुणलक्षण नय कहे गये हैं वे सब मिथ्यावादरूप हैं। अतएव वे खण्डित किये गये हैं। उन नयोंके माननेवाले भी मिथ्यावादी हैं।


तद्वादोऽथ यथा स्याज्जीवो वर्णादिमानिहास्तीति ।
इत्युक्ते न गुणः स्यात्प्रत्युत दोषस्तदेकबुद्धित्वात् ॥555॥

अर्थ: वह मिथ्यावाद यों है कि यदि कोई यह कहे कि जीव रूप, रस, गन्ध स्पर्शवाला है। तो ऐसा कहने पर कोई गुण - लाभ नहीं होता है किन्तु उल्टा दोष होता है। दोष यह होता है कि जीव और रूप रसादिमें एकत्व बुद्धि होने लगती है और ऐसी बुद्धिका होना ही मिथ्या है।


ननु किल वस्तु विचारे भवतु गुणो वाथ दोष एव यतः ।
न्यायबलादायातो दुर्वारः स्यान्नयप्रवाहश्च ॥556॥

अर्थ: वस्तुके विचार समयमें गुण हो अथवा दोष हो, अर्थात् जो वस्तु जिस रूपमें है उसी रूपमें वह सिद्ध होगी, चाहे उसकी यथार्थसिद्धिमें दोष आवे या गुण । नयोंका प्रवाह न्याय बलसे प्राप्त हुआ है इसलिये बह दूर नहीं किया जा सक्ता ?


सत्यं दुर्वारः स्यान्नयप्रवाहो यथाप्रमाणाद्वा ।
दुर्वारश्च तथा स्यात्सम्यङ्मिथ्येति नयविशेषोपि ॥557॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि नयप्रवाह अनिवार्य है, परन्तु साथ ही यह भी अनिवार्य है कि वह प्रमाणाधीन हो। तथा कोई नय समीचीन (यथार्थ) होता है कोई मिथ्या होता है यह नयोंकी विशेषता भी अनिवार्य है।


अर्थ विकल्पो ज्ञानं भवति तदेकं विकल्पमात्रत्वात् ।
अस्ति च सम्यग्ज्ञानं मिथ्याज्ञानं विशेषविषयत्वात् ॥558॥

अर्थ: ज्ञान अर्थविकल्पात्मक होता है अर्थात् ज्ञान स्व - पर पदार्थको विषय करता है इसलिये ज्ञान सामान्यकी अपेक्षासे ज्ञान एक ही है, क्योंकि अर्थ विकल्पता सभी ज्ञानोंमें है, परन्तु विशेष २ विषयोंकी अपेक्षासे उसी ज्ञानके दो भेद हो जाते हैं ( १ ) सम्यग्ज्ञान ( २ ) मिथ्याज्ञान।


तत्रापि यथावस्तु ज्ञानं सम्यग्विशेषहेतुः स्यात् ।
अथ चेदयथावस्तु ज्ञानं मिथ्याविशेषहेतुः स्यात् ॥559॥

अर्थ: उन दोनों ज्ञानोंमें सम्यग्ज्ञानका कारण वस्तुका यथार्थ ज्ञान है तथा मिथ्याज्ञानका कारण वस्तुका अयथार्थ ज्ञान है।


ज्ञानं यथा तथासौ नयोस्ति सर्वो विकल्पमात्रत्वात् ।
तत्रापि नयः सम्यक् तदितरथा स्यान्नयाभासः ॥560॥

अर्थ: जिस प्रकार ज्ञान है उसी प्रकार नय भी है, अर्थात् जैसे सामान्य ज्ञान एक है वैसे सम्पूर्ण नय भी विकल्पमात्र होनेसे (विकल्पात्मक ज्ञानको ही नय कहते हैं) सामान्यरूपसे एक है और विशेषकी अपेक्षासे ज्ञानके समान नय भी सम्यक् नय, मिथ्या नय ऐसे दो भेद वाले हैं। जो सम्यक् नय हैं उन्हें नय कहते हैं जो मिथ्या नय हैं उन्हें नयाभास कहते हैं।


तद्गुणसंविज्ञानः सोदाहरणः सहेतुरथ फलवान्
यो हि नयः स नयः स्याद्विपरीतो नयो नयाभासः ॥561॥

अर्थ: जो तद्गुणसंविज्ञान हो अर्थात् गुण गुणीके भेद पूर्वक किसी वस्तुके विशेष गुणोंको उसीमें बतलानेवाला हो, उदाहरण सहित हो, हेतु पूर्वक हो, फल सहित हो, वही नय, नय कहलाता है। उपर्युक्त बातोंसे जो विपरीत हो, वह नय नयाभास कहलाता है।


फलवत्त्वेन नयानां भाव्यमवश्यं प्रमाणवद्धि यतः ।
स्यादवयविप्रमाणं स्युस्तदवयवा नयास्तदंशत्वात् ॥562॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रमाण फल सहित होता है उस प्रकार नयोंका भी फल सहित होना परम आवश्यक है कारण आवयवी प्रमाण कहलाता है, उसीके अवयव नय कहलाते हैं। नय प्रमाणके ही अंश रूप हैं।


तस्मादनुपादेयो व्यवहारोऽतद्गुणे तदारोपः ।
इष्टफलाभावादिह न नयो वर्णादिमान् यथा जीवः ॥563॥

अर्थ: जिस वस्तुमें जो गुण नहीं हैं, दूसरी वस्तुके गुण उसमें आरोपित-विवक्षित किये जाते हैं; जहांपर ऐसा व्यवहार किया जाता है वह व्यवहार ग्राह्य नहीं है। क्योंकि ऐसे व्यवहारसे इष्ट फलकी प्राप्ति नहीं होती है। इसलिये जीवको वर्णादिवाला कहना, यह नय नहीं है किन्तु नयाभास है।


ननु चैवं सति नियमादुक्तासद्भूतलक्षणो न नयः ।
भवति नयाभासः किल क्रोधादीनामतद्गुणारोपात् ॥564॥

अर्थ: यदि एक वस्तुके गुण दूसरी वस्तुमें आरोपित करनेका नाम नयाभास है तो ऐसा माननेसे जो ऊपर असद्भूत व्यवहार नय कहा गया है उसे भी नय नहीं कहना चाहिये किन्तु नयाभास कहना चाहिये। कारण क्रोधादिक जीवके गुण नहीं हैं फिर भी उन्हें जीवके कहा गया है। यह भी तो अतद्गुणारोप ही है, इसलिये ग्रन्थकारका कहा हुआ भी असद्भूत व्यवहार नय नयाभास ही है ?


नैवं यतो यथा ते क्रोधाद्या जीवसंभवा भावाः ।
न तथा पुद्गलवपुषः सन्ति च वर्णादयो हि जीवस्य ॥565॥

अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार क्रोधादिक भाव जीवसे उत्पन्न हैं अथवा जीवके हैं। उस प्रकार पुद्गलमय वर्णादिक जीवके भाव नहीं हैं।


अथ सन्ति नयाभासा यथोपचाराख्यहेतुदृष्टान्ताः ।
अत्रोच्यन्ते केचिद्धेयतया वा नयादिशुद्ध्यर्थम् ॥566॥

अर्थ: उपचार नामवाले (उपचार पूर्वक) हेतु दृष्टान्तोंको ही नयाभास कहते हैं। यहांपर कुछ नयाभासोंका उल्लेख किया जाता है। वह इसलिये कि उन नयाभासोंको समझकर उन्हें छोड़ दिया जाय अथवा उन नयाभासोंके देखनेसे शुद्ध नयोंका परिज्ञान होजाय।


अस्ति व्यवहारः किल लोकानामयमलब्धबुद्धित्वात् ।
योऽयं मनुजादिवपुर्भवति सजीवस्ततोप्यनन्यत्वात् ॥567॥

अर्थ: बुद्धिका अभाव होनेसे लोकोंका यह व्यवहार होता है कि जोयह मनुष्यादिका शरीर है वह जीव है क्योंकि वह जीवसे अभिन्न है।


सोऽयं व्यवहारः स्यादव्यवहारो यथापसिद्धान्तात् ।
अप्यपसिद्धान्तत्वं नासिद्धं स्यादनेकधर्मित्वात् ॥568॥

अर्थ: शरीरमें जीवका व्यवहार जो लोकमें होता है वह व्यवहार अयोग्य व्यवहार है, अथवा व्यवहारके अयोग्य व्यवहार है। कारण वह सिद्धान्त विरुद्ध है। सिद्धान्त विरुद्धता इस व्यवहारमें असिद्ध नहीं है, किन्तु शरीर और जीवको भिन्न २ धर्मी होनेसे प्रसिद्ध ही है।


नाशङ्क्यं कारणमिदमेकक्षेत्रावगाहिमात्रं यत् ।
सर्वद्रव्येषु यतस्तथावगाहाद्भवेदतिव्याप्तिः ॥569॥

अर्थ: शरीर और जीव दोनोंका एक क्षेत्रमें अवगाहन (स्थिति) है इसी कारण लोकमें वैसा व्यवहार होता है ऐसी आशंका भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि एक क्षेत्रमें तो सम्पूर्ण द्रव्योंका अवगाहन होरहा है, यदि एक क्षेत्रमें अवगाहन होना ही एकताका कारण हो तो सभी पदार्थोंमें अतिव्याप्ति दोष उत्पन्न होगा।


अपि भवति बन्ध्यबन्धकभावो यदिवानयोर्न शङ्क्यमिति ।
तदनेकत्वे नियमात्तद्बन्धस्य स्वतोप्यसिद्धत्वात् ॥570॥

अर्थ: कदाचित् यह कहा जाय कि जीव और शरीरमें परस्पर वन्ध्य बन्धक भाव है इसलिये वैसा व्यवहार होता है, ऐसी आशंका भी नहीं करना चाहिये क्योंकि बन्ध नियमसे अनेक पदार्थोंमें होता है। एक पदार्थमें अपने आप ही बन्धका होना असिद्ध ही है।


अथ चेदवश्यमेतन्निमित्तनैमित्तिकत्वमस्ति मिथः ।
न यतः स्वयं स्वतो वा परिणममानस्य किं निमित्ततया ॥571॥

अर्थ: कदाचित् मनुष्यादि शरीरमें जीवत्व बुद्धिका कारण शरीर और जीवका निमित्त नैमित्तक सम्बन्ध हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सक्ता, कारण जो अपने आप परिणमनशील है उसके लिये निमित्तपनेसे क्या प्रयोजन ? अर्थात् जीवस्वरूपमें निमित्त कारण कुछ नहीं कर सक्ता।


अपरोपि नयाभासो भवति यथा मूर्तस्य तस्य सतः ।
कर्ता भोक्ता जीवः स्यादपि नोकर्मकर्मकृतेः ॥572॥

अर्थ: आहारवर्गणा, भाषावर्गणा, तैजसवर्गणा, मनोवर्गणा ये चार वर्गणायें जब आत्मासे सम्बन्धित होती हैं, तब वे नोकर्मके नामसे कहीं जातीं हैं, और कार्माणवर्गणा जब आत्मासे सम्बन्धित होकर कर्मरूप - ज्ञानावरणादिरूप परिणत होती है तब वह कर्मके नामसे कही जाती है । ये कर्म और नोकर्म पुद्गलकी पर्यायें हैं, अतएव वे मूर्त हैं । उन मूर्त कर्म नोकर्मका जीव कर्ता तथा भोक्ता है ऐसा कहना दूसरा नयाभास है।


नाभासत्त्वमसिद्धं स्यादपसिद्धान्ततो नयस्यास्य ।
सदनेकत्वे सति किल गुणसंक्रातिः कुतः प्रमाणाद्वा ॥573॥

अर्थ: मूर्तकर्मोंका जीवको कर्ता भोक्ता बतलानेवाला व्यवहार नय नयाभास है यह बात असिद्ध नहीं है कारण ऐसा व्यवहार नय सिद्धान्तविरुद्ध है । सिद्धान्तविरुद्धताका भी कारण यह है कि जब कर्म और जीव दोनों भिन्न २ पदार्थ हैं तब उनमें गुणसंक्रमण किस प्रमाणसे होगा ? अर्थात् नहीं होगा तथा विना गुणोंके परिवर्त्तन हुए जीव, कर्मका कर्ता भोक्ता नहीं होसक्ता, यदि विना गुणोंकी संक्रातिके ही जीव कर्मका कर्ता भोक्ता होजाय तो सब पदार्थोंमें सर्वसंकर दोष उत्पन्न होगा । तथा सर्वशून्य दोष भी उत्पन्न होगा ।


गुणसंक्रातिमृते यदि कर्ता स्यात्कर्मणश्च भोक्तात्मा ।
सर्वस्य सर्वसंकरदोषः स्यात् सर्वशून्यदोषश्च ॥574॥

अर्थ: मूर्तकर्मोंका जीवको कर्ता भोक्ता बतलानेवाला व्यवहार नय नयाभास है यह बात असिद्ध नहीं है कारण ऐसा व्यवहार नय सिद्धान्तविरुद्ध है । सिद्धान्तविरुद्धताका भी कारण यह है कि जब कर्म और जीव दोनों भिन्न २ पदार्थ हैं तब उनमें गुणसंक्रमण किस प्रमाणसे होगा ? अर्थात् नहीं होगा तथा विना गुणोंके परिवर्त्तन हुए जीव, कर्मका कर्ता भोक्ता नहीं होसक्ता, यदि विना गुणोंकी संक्रातिके ही जीव कर्मका कर्ता भोक्ता होजाय तो सब पदार्थोंमें सर्वसंकर दोष उत्पन्न होगा । तथा सर्वशून्य दोष भी उत्पन्न होगा ।


अस्त्यत्र भ्रमहेतुर्जीवस्याशुद्धपरणतिं प्राप्य ।
कर्मत्वं परिणमते स्वयमपि मूर्तिमद्यतो द्रव्यम् ॥575॥

अर्थ: जीव कर्मोंका कर्ता है, इस भ्रमका कारण भी यह है कि जीवकी अशुद्ध परिणतिके निमित्तसे पुद्गलद्रव्य - कार्माण वर्गणा स्वयं (उपादान) कर्मरूप परिणत होजाती है।


इदमत्र समाधानं कर्ता यः कोपि सः स्वभावस्य ।
परभावस्य न कर्ता भोक्ता वा तन्निमित्तमात्रेपि ॥576॥

अर्थ: उस भ्रमका समाधान यह है कि जो कोई भी कर्ता होगा वह अपने स्वभावका ही कर्ता होगा। उसका निमित्त कारण मात्र होनेपर भी कोई परभावका कर्ता अथवा भोक्ता नहीं होसक्ता है।


भवति स यथा कुलालः कर्ता भोक्ता यथात्मभावस्य ।
न तथा परभावस्य च कर्ता भोक्ता कदापि कलशस्य ॥577॥

अर्थ: कुम्हार सदा अपने स्वभावका ही कर्ता भोक्ता होता है वह परभाव-कलशका कर्ता भोक्ता कभी नहीं होता, अर्थात् कलशके बनानेमें वह केवल निमित्त कारण है। निमित्त मात्र होनेसे वह उसका कर्ता भोक्ता नहीं कहा जासक्ता।


तदभिज्ञानं च यथा भवति घटो मृत्तिकास्वभावेन ।
अपि मृण्मयो घटः स्यान्न स्यादिह घटः कुलालमयः ॥578॥

अर्थ: कुम्हार कलशका कर्ता क्यों नहीं है इस विषयमें यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष है कि घट मिट्टीके स्वभाववाला होता है, अथवा मिट्टी स्वरूप ही वह होता है, परन्तु घट कभी कुम्हारके स्वभाववाला अथवा कुम्हारस्वरूप नहीं होता है ।


अथ चेद्घटकर्तासौ घटकारो जनपदोक्तिलेशोयम् ।
दुर्वारो भवतु तदा कानो हानिर्यदा नयाभासः ॥579॥

अर्थ: यदि यह कहाजाय कि लोकमें यह व्यवहार होता है कि घटकार - कुम्हार घटका बनानेवाला है; सो क्यों ? आचार्य कहते हैं कि उस व्यवहारको होने दो, उससे हमारी कोई हानि नहीं है परन्तु उसे नयाभास समझो, अर्थात् उसे नयाभास समझते हुए वरावर व्यवहार करो इससे हमारे कथनमें कोई बाधा नहीं आती है। परन्तु यदि उसे नय समझने वाला लोकव्यवहार है तो वह मिथ्या है।


अपरे वहिरात्मानो मिथ्यावादं वदन्ति दुर्मतयः ।
यदवद्धेपि परस्मिन् कर्ता भोक्ता परोपि भवति यथा ॥580॥

अर्थ: और भी खोटी बुद्धिके धारण करनेवाले मिथ्यादृष्टी पुरुष मिथ्या बातें कहते हैं। जैसे-जो पर पदार्थ सर्वथा दूर है, जीवके साथ जो बँधा हुआ भी नहीं है उसका भी जीव कर्ता भोक्ता होता है। ऐसा वे कहते हैं।


सद्वेद्योदयभावान् गृहधनधान्यं कलत्रपुत्राँश्च ।
स्वयमिह करोति जीवो भुनक्ति वा स एव जीवश्च ॥581॥

अर्थ: सातावेदनीय कर्मके उदयसे होनेवाले जो घर धन, धान्य, स्त्री, पुत्र आदि सजीव निर्जीव पदार्थ ( स्थावर जंगम सम्पत्ति ) हैं उनका जीव ही स्वयं कर्ता है और वही जीव उनका भोक्ता है।


ननु सति गृहवनितादौ भवति सुखं प्राणिनामिहाध्यक्षात् ।
असति च तत्र न तदिदं तत्तत्कर्ता स एव तद्भोक्ता ॥582॥

अर्थ: यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है कि घर, स्त्री आदिके होने पर ही जीवोंको सुख होता है उनके अभावमें उन्हें सुख भी नहीं होता। इसलिये जीव ही उनका कर्ता है और वही उनका भोक्ता है? अर्थात् अपनी सुख सामग्रीको यह जीव स्वयं संग्रह करता है और स्वयं उसको भोगता है।


सत्यं वैषयिकमिदं परमिह तदपि न परत्र सापेक्षम् ।
सति बहिरर्थेपि यतः किल केषाञ्चिदसुखादिहेतुत्वात् ॥583॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि घर वनितादिके संयोगसे यह संसारी जीव सुख समझने लगता है परन्तु उसका यह सुख केवल वैषयिक - विषयजन्य है। वास्तविक नहीं है। सो भी घर, स्त्री आदि पदार्थोंकी अपेक्षा नहीं रखता है। कारण घर स्त्री आदि बाह्य पदार्थोंके होने पर भी किन्हीं पुरुषोंको सुखके बदले दुःख होता है, उनके लिये वही सामग्री दुःखका कारण होती है।


इदमत्र तात्पर्यं भवतु स कर्ताथ वा च मा भवतु ।
भोक्ता स्वस्य परस्य च यथाकथञ्चिच्चिदात्मको जीवः ॥584॥

अर्थ: यहां पर सारांश इतना ही है कि जीव अपना और परका यथा कथंचित् कर्ता हो अथवा भोक्ता हो अथवा मत हो परन्तु वह चिदात्मक - चैतन्य स्वरूप है।


अयमपि च नयाभासो भवति मिथो बोध्यबोधसम्बन्धः ।
ज्ञानं ज्ञेयगतं वा ज्ञानगतं ज्ञेयमेतदेव यथा ॥585॥

अर्थ: परस्पर ज्ञान और ज्ञेयका जो बोध्यबोधरूप सम्बन्ध है, उसके कारण ज्ञानको ज्ञेयगत - ज्ञेयका धर्म मानना अथवा ज्ञेयको ज्ञानगत मानना यह भी नयाभास है।


चक्षू रूपं पश्यति रूपगतं तन्न चक्षुरेव यथा ।
ज्ञानं ज्ञेयमवैति च ज्ञेयगतं वा न भवति तज्ज्ञानम् ॥586॥

अर्थ: जिस प्रकार चक्षु रूपको देखता है, परन्तु वह रूपमें चला नहीं जाता है। अथवा रूपका वह धर्म नहीं हो जाता है उसी प्रकार ज्ञान ज्ञेयपदार्थको जानता है परन्तु वह ज्ञान ज्ञेयमें नहीं जाता है अथवा उसका धर्म नहीं हो जाता है।


इत्यादिकाश्च वहवः सन्ति यथालक्षणा नयाभासाः ।
तेषामयमुद्देशो भवति विलक्ष्यो नयान्नयाभासः ॥587॥

अर्थ: कुछ नयाभासोंका ऊपर उल्लेख किया गया है, उनके सिवा और भी बहुतसे नयाभास हैं जो कि वैसे ही लक्षणोंवाले हैं। उन सब नयाभासोंका यह उद्देश्य - आशय नयसे विरुद्ध है। इसीलिये वे नयाभास कहे जाते हैं।


ननु सर्वतो नयास्ते किं नामानोथ वा कियन्तश्च ।
कथमिव मिथ्यार्थास्ते कथमिव ते सन्ति सम्यगुपदेश्याः ॥588॥

अर्थ: सम्पूर्ण नयोंके क्या २ नाम हैं और वे समस्त नय कितने हैं, तथा कैसे वे मिथ्या अर्थको विषय करनेवाले होजाते हैं और कैसे यथार्थ पदार्थको विषय करनेवाले होते हैं ? अर्थात् कैसे वे ठीक २ कहे जाते हैं और कैसे विरुद्ध कहे जाते हैं?


सत्यं यावदनन्ताः सन्ति गुणा वस्तुतो विशेषाख्याः ।
तावन्तो नयवादा वचोविलासा विकल्पाख्याः ॥589॥

अर्थ: वास्तवमें जितने भी वस्तुके अनन्त विशेष गुण हैं उतने ही नयवाद हैं, तथा जितनी भी वचनविवक्षा है वह सब नयवाद है । कारण विशेष गुणोंका परिज्ञान और वचनविकल्प दोनों ही विकल्पात्मक हैं । विकल्पज्ञानको ही नय कहते हैं, तथा जो निरपेक्ष नय हैं वे ही मिथ्या नय हैं । जो दूसरे नयकी अपेक्षा रखते हैं वे नय यथार्थ नय हैं, क्योंकि सामान्य विशेषात्मक ही पदार्थ है । इसलिये सामान्य विशेष दोनोंमें परस्पर अविनाभाव होनेसे सापेक्षता है ।


अपि निरपेक्षा मिथ्यास्त एव सापेक्षका नयाः सम्यक् ।
अविनाभावत्वे सति सामान्यविशेषयोश्च सापेक्षात् ॥590॥

अर्थ: वास्तवमें जितने भी वस्तुके अनन्त विशेष गुण हैं उतने ही नयवाद हैं, तथा जितनी भी वचनविवक्षा है वह सब नयवाद है । कारण विशेष गुणोंका परिज्ञान और वचनविकल्प दोनों ही विकल्पात्मक हैं । विकल्पज्ञानको ही नय कहते हैं, तथा जो निरपेक्ष नय हैं वे ही मिथ्या नय हैं । जो दूसरे नयकी अपेक्षा रखते हैं वे नय यथार्थ नय हैं, क्योंकि सामान्य विशेषात्मक ही पदार्थ है । इसलिये सामान्य विशेष दोनोंमें परस्पर अविनाभाव होनेसे सापेक्षता है ।


सापेक्षत्वं नियमादविनाभावस्त्वनन्यथासिद्धः ।
अविनाभावोपि यथा येन विना जायते न तत्सिद्धिः ॥591॥

अर्थ: सामान्य विशेषमें परस्पर सापेक्षता इसलिये है कि उनमें नियमसे अविनाभाव है । उनका अविनाभाव अन्यथा सिद्ध नहीं है अर्थात् और प्रकार नहीं बन सक्ता है । अविनाभाव उसे कहते हैं कि जिसके विना जिसकी सिद्धि न हो ।


अस्त्युक्तो यस्य सतो यन्नामा यो गुणो विशेषात्मा ।
तत्पर्यायविशिष्टास्तन्नामानो नया यथाम्नायात् ॥592॥

अर्थ: जिस द्रव्यका जिस नामवाला विशेष गुण कहा जाता है, उस गुणकी पर्यायोंको विषय करनेवाला अथवा उस गुणको विषय करनेवाला नय भी आगमके अनुसार उसी नामसे कहा जाता है। इसी प्रकार जितने भी गुण विवक्षित किये जाते हैं वे जिस२ नामवाले हैं उनको प्रतिपादन करनेवाले या जाननेवाले नय भी उन्हीं नामोंसेकहे जाते हैं।


अस्तित्वं नाम गुणः स्यादिति साधारणः सतस्तस्य ।
तत्पर्यायश्च नयः समासतोस्तित्वनय इति वा ॥593॥

अर्थ: द्रव्यका एक सामान्य गुण अस्तित्व नामवाला है, उस अस्तित्वको विषय करनेवाला नय भी संक्षेपसे अस्तित्व नय कहलाता है।


कर्तृत्वं जीवगुणोस्त्वथ वैभाविकोऽथवा भावः ।
तत्पर्यायविशिष्टः कर्तृत्वनयो यथा नाम ॥594॥

अर्थ: जीवका कर्तृत्व गुण है, अथवा उसका वह वैभाविक भाव है, उस कर्तृत्व पर्यायको विषय करनेवाला नय भी कर्तृत्व नय कहलाता है।


अनया परिपाट्या किल नयचक्रं यावदस्ति बोद्धव्यम् ।
एकैकं धर्मं प्रति नयोपि चैकैक एव भवति यतः ॥595॥

अर्थ: जितना भी नयचक्र है वह सब इसी परिपाटी (शैली)से जान लेना चाहिये, क्योंकि एक २ धर्मके प्रति नय भी एक २ है। इसलिये वस्तुमें जितने धर्म हैं नय भी उतने और उन्हीं नामोंवाले हैं।


सोदाहरणो यावान्नयो विशेषणविशेष्यरूपः स्यात् ।
व्यवहारापरनामा पर्यायार्थो नयो न द्रव्यार्थः ॥596॥

अर्थ: जितना भी उदाहरण सहित नय है और विशेषण विशेष्यरूप नय है वह सब पर्यायार्थिक नय है, उसीका दूसरा नाम व्यवहार नय है। उदाहरण पूर्वक विशेषण विशेष्यको विषय करनेवाला नय द्रव्यार्थिक नय नहीं है।


ननु चोक्तलक्षण इति यदि न द्रव्यार्थिको नयो नियमात् ।
कोऽसौ द्रव्यार्थिक इति पृष्टास्तच्चिह्नमाहुराचार्याः ॥597॥

अर्थ: यदि उपर्युक्त लक्षणवाला द्रव्यार्थिक नय नहीं है तो फिर द्रव्यार्थिक नय कौन है ? इसप्रकार किसीने आचार्यसे प्रश्न किया, प्रश्नानुसार अब आचार्य द्रव्यार्थिक नयका लक्षण कहते हैं।


व्यवहारः प्रतिषेध्यस्तस्य प्रतिषेधकश्च परमार्थः ।
व्यवहारप्रतिषेधः स एव निश्चयनयस्य वाच्यः स्यात् ॥598॥

अर्थ: व्यवहार प्रतिषेध्य है अर्थात् निषेध करने योग्य है, उसका निषेध करनेवाला निश्चय है। इसलिये व्यवहारका निषेध ही निश्चय नयका वाच्य - अर्थ है।


व्यवहारः स यथा स्यात्सद्द्रव्यं ज्ञानवांश्च जीवो वा ।
नेत्येतावन्मात्रो भवति स निश्चयनयो नयाधिपतिः ॥599॥

अर्थ: व्यवहार नय विवेचन करता है अथवा जानता है कि द्रव्य सत्रूप है, निश्चय नय वतलाता है कि नहीं। व्यवहार नय बतलाता है कि जीव ज्ञानवान् है, निश्चय नय बतलाता है कि नहीं। इस प्रकार न - निषेधको विषय करनेवाला ही निश्चय नय है, और वही सब नयोंका शिरोमणि है।


ननु चोक्तं लक्षणमिह नयोस्ति सर्वोपि किल विकल्पात्मा ।
तदिह विकल्पाभावात् कथमस्य नयत्वमिदमिति चेत् ॥600॥

अर्थ: यह बात पहले कही जा चुकी है कि सभी नय विकल्पात्मक ही होते हैं। नयका लक्षण ही विकल्प है। फिर इस द्रव्यार्थिक नय - निश्चय नयमें विकल्प तो कुछ पड़ता ही नहीं है। क्योंकि उक्त नय केवल निषेधात्मक है। इसलिये विकल्पका अभाव होनेसे इस नयको नयपना ही कैसे आवेगा? अर्थात् इस नयमें नयका लक्षण ही नहीं जाता है।

पूर्वार्द्ध 601 से 700 (श्लोक 601 से 700)

तन्न यतोस्ति नयत्वं नेति यथा लक्षितस्य पक्षत्वात् ।
पक्षग्राही च नयः पक्षस्य विकल्पमात्रत्वात् ॥601॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है। क्योंकि द्रव्यार्थिक नयमें भी न ( निषेधात्मक ) यह पक्ष आता ही है। यह बात पहले ही कही जा चुकी है कि द्रव्यार्थिक नयका वाच्य ‘न’ है अर्थात् निषेध है। यह निषेध ही उसका एक पक्ष है और पक्षका ग्राहक ही नय होता है, तथा पक्ष ही विकल्पात्मक होता है।


प्रतिषेध्यो विधिरूपो भवति विकल्पः स्वयं विकल्पत्वात् ।
प्रतिषेधको विकल्पो भवति तथा सः स्वयं निषेधात्मा ॥602॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रतिषेध्य विधिरूप है और स्वयं विकल्परूप होनेसे विकल्पात्मक है। उसी प्रकार प्रतिषेधक भी निषेधात्मक विकल्परूप है।


तल्लक्षणमपि च यथा स्यादुपयोगो विकल्प एवेति ।
अर्थानुपयोगः किल वाचक इह निर्विकल्पस्य ॥603॥

अर्थ: प्रतिषेधक भी विकल्पात्मक है इस बातको ही इन श्लोकों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। पदार्थका उपयोग ही तो विकल्प कहा जाता है, तथा पदार्थका अनुपयोग निर्विकल्प कहा जाता है, तथा ज्ञानका पदार्थाकार परिणमन होना ही उपयोग कहलाता है, उसका अर्थाकार परिणमन न होना अनुपयोग कहलाता है। जब उपयोग अनुपयोगकी ऐसी व्यवस्था है तब द्रव्यार्थिक नयमें ‘न’ इत्याकारक जो निषेधात्मक बोध है वह भी निषेध ज्ञानरूप पक्षसे विशिष्ट होनेसे अनुपयोग नहीं कहा जा सक्ता है। किन्तु उपयोग ही है, क्योंकि उपयोग उसीको कहते हैं कि जिस ज्ञानमें पदार्थाकार परिणमन हो। यहां पर भी अर्थाकार परिणमनके बिना ‘न’ इत्याकारक निषेधात्मक ज्ञान नहीं हो सक्ता है। परन्तु द्रव्यार्थिक नयमें निषेधरूप बोध होता है। इसलिये निषेधाकार परिणमन होनेसे द्रव्यार्थिक नय भी उपयोगात्मक है और उपयोगको ही विकल्प कहते हैं।


अर्थाकृतिपरिणमनं ज्ञानस्य स्यात् किलोपयोग इति ।
नार्थाकृतिपरिणमनं तस्य स्यादनुपयोग एव यथा ॥604॥

अर्थ: प्रतिषेधक भी विकल्पात्मक है इस बातको ही इन श्लोकों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। पदार्थका उपयोग ही तो विकल्प कहा जाता है, तथा पदार्थका अनुपयोग निर्विकल्प कहा जाता है, तथा ज्ञानका पदार्थाकार परिणमन होना ही उपयोग कहलाता है, उसका अर्थाकार परिणमन न होना अनुपयोग कहलाता है। जब उपयोग अनुपयोगकी ऐसी व्यवस्था है तब द्रव्यार्थिक नयमें ‘न’ इत्याकारक जो निषेधात्मक बोध है वह भी निषेध ज्ञानरूप पक्षसे विशिष्ट होनेसे अनुपयोग नहीं कहा जा सक्ता है। किन्तु उपयोग ही है, क्योंकि उपयोग उसीको कहते हैं कि जिस ज्ञानमें पदार्थाकार परिणमन हो। यहां पर भी अर्थाकार परिणमनके बिना ‘न’ इत्याकारक निषेधात्मक ज्ञान नहीं हो सक्ता है। परन्तु द्रव्यार्थिक नयमें निषेधरूप बोध होता है। इसलिये निषेधाकार परिणमन होनेसे द्रव्यार्थिक नय भी उपयोगात्मक है और उपयोगको ही विकल्प कहते हैं।


नेति निषेधात्मा यो नानुपयोगः सबोधपक्षत्वात् ।
अर्थाकारेण विना नेतिनिषेधावबोधशून्यत्वात् ॥605॥

अर्थ: प्रतिषेधक भी विकल्पात्मक है इस बातको ही इन श्लोकों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। पदार्थका उपयोग ही तो विकल्प कहा जाता है, तथा पदार्थका अनुपयोग निर्विकल्प कहा जाता है, तथा ज्ञानका पदार्थाकार परिणमन होना ही उपयोग कहलाता है, उसका अर्थाकार परिणमन न होना अनुपयोग कहलाता है। जब उपयोग अनुपयोगकी ऐसी व्यवस्था है तब द्रव्यार्थिक नयमें ‘न’ इत्याकारक जो निषेधात्मक बोध है वह भी निषेध ज्ञानरूप पक्षसे विशिष्ट होनेसे अनुपयोग नहीं कहा जा सक्ता है। किन्तु उपयोग ही है, क्योंकि उपयोग उसीको कहते हैं कि जिस ज्ञानमें पदार्थाकार परिणमन हो। यहां पर भी अर्थाकार परिणमनके बिना ‘न’ इत्याकारक निषेधात्मक ज्ञान नहीं हो सक्ता है। परन्तु द्रव्यार्थिक नयमें निषेधरूप बोध होता है। इसलिये निषेधाकार परिणमन होनेसे द्रव्यार्थिक नय भी उपयोगात्मक है और उपयोगको ही विकल्प कहते हैं।


जीवो ज्ञानगुणः स्यादर्थालोकं विना नयो नासौ ।
नेति निषेधात्मत्वादर्थालोकं विना नयो नासौ ॥606॥

अर्थ: जिस ‘प्रकार जीव ज्ञान गुणवाला है, यह नय (व्यवहार) अर्थालोकके विना अर्थात् पदार्थको विषय करनेके विना नहीं होता है, उसी प्रकार’ ऐसा नहीं है, यह नय (निश्चय) भी निषेधको विषय करनेसे अर्थालोकके विना नहीं होता है। विषय बोधसे दोनों ही सहित हैं।


स यथा शक्तिविशेषं समीक्ष्य पक्षश्चिदात्मको जीवः ।
न तथेत्यपि पक्षः स्यादभिन्नदेशादिकं समीक्ष्य पुनः ॥607॥

अर्थ: जीवकी विशेष शक्तिको देख कर (विचार कर) यह कहना या समझना कि जीव चिदात्मक है जिस प्रकार यह पक्ष है, उसी प्रकार जीवको अभिन्न प्रदेशी समझ कर यह कहना या समझना कि वैसा नहीं है, यह भी तो पक्ष है। पक्षग्राहिता उभयत्र समान है, क्योंकि -


अर्थालोकविकल्पः स्यादुभयत्राविशेषतोपि यतः ।
न तथेत्यस्य नयत्वं स्यादिह पक्षस्य लक्षकत्वाच्च ॥608॥

अर्थ: अर्थका प्रकाश - पदार्थ विषयितारूप विकल्प दोनों ही जगह समान हैं। इसलिये वैसा नहीं है, इत्याकारक निषेधको विषय करनेसे द्रव्यार्थिक नयमें नयपना है ही। कारण उसने एक निषेध पक्षका अवलम्बन किया है।


एकाङ्गग्रहणादिति पक्षस्य स्यादिहांशधर्मत्वम् ।
न तथेति द्रव्यार्थिकनयोस्ति मूलं यथा नयत्वस्य ॥609॥

अर्थ: पक्ष उसीको कहते हैं जो एक अंगको ग्रहण करता है। इसलिये ‘न तथा’ इस पक्षमें भी अंश धर्मता है ही। अतएव ‘न तथा’ को विषय करनेवाला द्रव्यार्थिक नय एक अंशको विषय करनेसे पक्षात्मक है।


एकाङ्गत्वमसिद्धं न नेति निश्चयनयस्य तस्य पुनः ।
वस्तुनि शक्तिविशेषो यथा तथा तदविशेषशक्तित्वात् ॥610॥

अर्थ: न, इस निषेधको विषय करनेवाले निश्चयनयमें एकाङ्गता असिद्ध नहीं है, किन्तु सिद्ध ही है। जिस प्रकार वस्तुमें विशेष शक्ति होती है, उसी प्रकार उसमें सामान्य शक्ति भी होती है।


ननु च व्यवहारनयः सोदाहरणो यथा तथायमपि ।
भवतु तदा को दोषो ज्ञानविकल्पाविशेषतो न्यायात् ॥611॥

अर्थ: जिस प्रकार व्यवहारनय उदाहरण सहित होता है, उस प्रकार निश्चयनय भी उदाहरण सहित माना जाय तो क्या दोष आता है ? क्योंकि जैसा ज्ञान विकल्प उदाहरण रहित ज्ञानमें है, वैसा ही ज्ञान विकल्प उदाहरण सहित ज्ञान विकल्पमें है । इस न्यायसे निश्चय नयको सोदाहरण ही मानना ठीक है । उदाहरण सहित निश्चय नयको कहनेसे व्यवहार नयसे कैसे भेद होगा, ? वह इस प्रकार होगा - जैसे व्यवहार नय सत्को अनेक बतलाता है, जीवको चिदात्मक बतलाता है । निश्चय नय केवल अपने पक्षका ही विवेचन करे, जैसे सत् एक है, जीव चित् ही है । ऐसा कहनेसे निश्चय नय उदाहरण सहित भी होजाता है, तथा व्यवहार नयसे भिन्न भी होजाता है ?


स यथा व्यवहारनयः सदनेकं स्याच्चिदात्मको जीवः ।
तदितरनयः स्वपक्षं वदतु सदेकं चिदात्मवस्त्विति चेत् ॥612॥

अर्थ: जिस प्रकार व्यवहारनय उदाहरण सहित होता है, उस प्रकार निश्चयनय भी उदाहरण सहित माना जाय तो क्या दोष आता है ? क्योंकि जैसा ज्ञान विकल्प उदाहरण रहित ज्ञानमें है, वैसा ही ज्ञान विकल्प उदाहरण सहित ज्ञान विकल्पमें है । इस न्यायसे निश्चय नयको सोदाहरण ही मानना ठीक है । उदाहरण सहित निश्चय नयको कहनेसे व्यवहार नयसे कैसे भेद होगा, ? वह इस प्रकार होगा - जैसे व्यवहार नय सत्को अनेक बतलाता है, जीवको चिदात्मक बतलाता है । निश्चय नय केवल अपने पक्षका ही विवेचन करै, जैसे सत् एक है, जीव चित् ही है । ऐसा कहनेसे निश्चय नय उदाहरण सहित भी होजाता है, तथा व्यवहार नयसे भिन्न भी होजाता है ?


न यतः सङ्करदोषो भवति तथा सर्वशून्यदोषश्च ।
स यथा लक्षणभेदाल्लक्ष्यविभागोस्त्यनन्यथासिद्धः ॥613॥

अर्थ: शंकाकारकी उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है । ऐसी शंकामें संकर दोष और सर्वशून्य दोष आता है । क्योंकि लक्षणके भेदसे लक्ष्यका भेद अवश्यंभावी है ।


लक्षणमेकस्य सतो यथाकथञ्चिद्यथा द्विधाकरणम् ।
व्यवहारस्य तथा स्यात्तदितरथा निश्चयस्य पुनः ॥614॥

अर्थ: व्यवहार नयका लक्षण यह है कि एक ही सत्का जिस किसी प्रकार द्वैधीभाव करना, अर्थात् सत्में भेद बतलाना व्यवहार नयका लक्षण है, ठीक इससे उल्टा निश्चय नयका लक्षण है, अर्थात् सत्में अभेद बतलाना निश्चय नयका लक्षण है।


अथ चेत्सदेकमिति वा चिदेव जीवोथ निश्चयो वदति ।
व्यवहारान्तर्भावो भवति सदेकस्य तद्द्विधापत्तेः ॥615॥

अर्थ: यदि शंकाकारके कथनानुसार सत्को एक माना जाय अथवा चित् ही जीव माना जाय और इनको निश्चय नयका उदाहरण कहा जाय तो व्यवहार नयसे निश्चय नयमें कुछ भी भेद नहीं रहेगा, क्योंकि ये दोनों ही उदाहरण व्यवहार नयके ही अन्तर्गत-(गर्भित) हो जाते हैं। सत्को एक कहनेसे भी सत्में भेद ही सिद्ध होता है, अथवा जीवको चित्स्वरूप कहनेसे भी जीवमें भेद ही सिद्ध होता है। किस प्रकार ? सो नीचे कहते हैं-


एवं सदुदाहरणे सल्लक्ष्यं लक्षणं तदेकमिति ।
लक्षणलक्ष्यविभागो भवति व्यवहारतः स नान्यत्र ॥616॥

अर्थ: शंकाकारने निश्चय नयका उदाहरण यह बतलाया है कि सत् एक है, इसमें आचार्य दोष दिखलाते हैं - सत् एक है, यहां पर सत् तो लक्ष्य ठहरता है और उसका एक यह लक्षण ठहरता है। इस प्रकारका लक्षण लक्ष्यका भेद व्यवहार नयमें ही होता है निश्चय नयमें नहीं होता। जिस प्रकार सत् और एकमें लक्षण लक्ष्यका भेद होता है, उसी प्रकार जीव और चित्में भी होता है। जीव लक्ष्य और चित् उसका लक्षण सिद्ध होता है। शंकाकारने यद्यपि इन उदाहरणोंको अभेद बुद्धिसे बतलाया है, परन्तु विचार करने पर उदाहरण मात्र ही भेदजनक पड़ता है। इसलिये यह व्यवहार नयका ही विषय है, निश्चयका नहीं। क्योंकि जितना भी भेद व्यवहार है, सब व्यवहार ही है।


अथवा चिदेव जीवो यदुदाह्रियतेप्यभेदबुद्धिमता ।
उक्तवदत्रापि तथा व्यवहारनयो न परमार्थः ॥617॥

अर्थ: शंकाकारने निश्चय नयका उदाहरण यह बतलाया है कि सत् एक है, इसमें आचार्य दोष दिखलाते हैं- सत् एक है, यहां पर सत् तो लक्ष्य ठहरता है और उसका एक यह लक्षण ठहरता है । इस प्रकारका लक्षण लक्ष्यका भेद व्यवहार नयमें ही होता है निश्चय नयमें नहीं होता । जिस प्रकार सत् और एकमें लक्षण लक्ष्यका भेद होता है, उसी प्रकार जीव और चित्में भी होता है । जीव लक्ष्य और चित् उसका लक्षण सिद्ध होता है । शंकाकारने यद्यपि इन उदाहरणोंको अभेद बुद्धिसे बतलाया है, परन्तु विचार करने पर उदाहरण मात्र ही भेदजनक पड़ता है । इसलिये यह व्यवहार नयका ही विषय है, निश्चयका नहीं । क्योंकि जितना भी भेद व्यवहार है, सब व्यवहार ही है ।


एवं सुसिद्धसंकरदोषे सति सर्वशून्यदोषः स्यात् ।
निरपेक्षस्य नयत्वाभावात्तल्लक्षणाद्यभावत्वात् ॥618॥

अर्थ: इस प्रकार दोनों ही नयोंमें संकरता आती है। संकरता आनेसे सर्वशून्य दोष आता है, जो निरपेक्ष है उसमें नयपना ही नहीं आता, क्योंकि निरपेक्षता नयका लक्षण ही नहीं है।


ननु केवलं सदेव हि यदि वा जीवो विशेषनिरपेक्षः ।
भवति च तदुदाहरणं भेदाभावात्तदा हि को दोषः ॥619॥

अर्थ: यदि सत्को एक कहनेसे और जीवको चित् रूप कहनेसे भी व्यवहार नयका ही विषय आजाता है तो निश्चय नयका उदाहरण केवल सत् ही कहना चाहिये, अथवा जीव ही कहना चाहिये। सत्का एकत्व विशेष और जीवका चित् विशेष नहीं कहना चाहिये। सन्मात्र कहनेसे अथवा जीव मात्र कहनेसे फिर कोई दोष नहीं रहता है। सन्मात्र और जीव मात्र कहनेसे भेद बुद्धि भी नहीं रहती है। व्यवहार नयका अवकाश तो भेदमें ही प्रति नियत है जैसे यह कहना कि सत् एक है, सत् अनेक है, जीव चिद्द्रव्य है, जीव आत्मवान् है, यह भेदज्ञान ही व्यवहार नयका लक्षण है। निश्चय नयमें केवल सत् अथवा जीव ही उदाहरण मान लेने चाहिये ?


अपि चैवं प्रतिनियतं व्यवहारस्यावकाश एव यथा ।
सदनेकं च सदेकं जीवश्चिद्द्रव्यमात्मवानिति चेत् ॥620॥

अर्थ: यदि सतको एक कहनेसे और जीवको चित् रूप कहनेसे भी व्यवहार नयका ही विषय आजाता है तो निश्चय नयका उदाहरण केवल सत् ही कहना चाहिये, अथवा जीव ही कहना चाहिये। सत्का एकत्व विशेष और जीवका चित् विशेष नहीं कहना चाहिये। सन्मात्र कहनेसे अथवा जीव मात्र कहनेसे फिर कोई दोष नहीं रहता है। सन्मात्र और जीव मात्र कहनेसे भेद बुद्धि भी नहीं रहती है। व्यवहार नयका अवकाश तो भेदमें ही प्रति नियत है जैसे यह कहना कि सत् एक है, सत् अनेक है, जीव चिद्द्रव्य है, जीव आत्मवान है, यह भेदज्ञान ही व्यवहार नयका लक्षण है। निश्चय नयमें केवल सत् अथवा जीव ही उदाहरण मान लेने चाहिये ?


न यतः सदिति विकल्पो जीवः काल्पनिक इति विकल्पश्च ।
तत्तद्धर्मविशिष्टस्तद्वानुपचर्यते स यथा ॥621॥

अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि सत् यह विकल्प और जीव यह विकल्प दोनों ही काल्पनिक हैं। भिन्न २ धर्मोंसे विशिष्ट होनेसे उन धर्म वाले उपचारसे कहे जाते हैं, अर्थात् जिस धर्मकी विवक्षा रक्खी जाती है उसी धर्मसे विशिष्ट वस्तु कही जाती है। वह धर्मका उपचार इस प्रकार होता है -


जीवः प्राणादिमतः संज्ञा करणं यदेतदेवेति ।
जीवनगुणसापेक्षो जीवः प्राणादिमानिहास्त्यर्थात् ॥622॥

अर्थ: जो प्राणोंको धारण करनेवाला है उसीको जीव इस नामसे कहा जाता है, अथवा जो जीवन गुणकी अपेक्षा रखनेवाला है उसे ही जीव कहते हैं। इसलिये जीव मात्र कहनेसे भी प्राण विशिष्ट और जीवत्वगुण विशिष्टका ही बोध होता है। इसी प्रकार -


यदि वा सदिति सत्सतः स्यात्संज्ञा सत्तागुणस्य सापेक्षात् ।
लब्धं तदनुक्तमपि सद्भावात् सदिति वा गुणो द्रव्यम् ॥623॥

अर्थ: अथवा सत् यह नाम सत्तागुणकी अपेक्षा रखमेवाले (अस्तित्व गुण विशिष्ट) सत् पदार्थका है । इसलिये सत् इतना कहनेसे ही विना कहे हुए भी अस्तित्व गुण अथवा अस्तित्व गुण विशिष्ट द्रव्यका बोध होता है ।


यदि च विशेषणशून्यं विशेष्यमात्रं सुनिश्चयस्यार्थः ।
द्रव्यं गुणो न य इति वा व्यवहारलोपदोषः स्यात ॥624॥

अर्थ: यदि विशेषण रहित बिशेष्य ही केवल निश्चय नयका विषय माना जाय तो द्रव्य और गुणकी ही सिद्धि होगी, पर्यायकी सिद्धि नहीं होगी, अथवा व्यवहारका ही लौप हो जायगा। यह एक बड़ा दोष है।


तस्मादवसेयमिदं यावदुदाहरणपूर्वको रूपः ।
तावान् व्यवहारनयस्तस्य निषेधात्मकस्तु परमार्थः ॥625॥

अर्थ: इसलिये यह निश्चय करना चाहिये कि जितना भी उदाहरण पूर्वक कथन है उतना सब व्यवहार नय है। उस व्यवहारका निषेधक ही निश्चय नय है।


ननु च व्यवहारनयो भवति च निश्चयनयो विकल्पात्मा ।
कथमाद्यः प्रतिषेध्योऽस्त्यन्यः प्रतिषेधकश्च कथमिति चेत् ॥626॥

अर्थ: व्यवहार नय भी विकल्पात्मक है और निश्चय नय भी विकल्पात्मक है फिर व्यवहार नय क्यों निषेध करने योग्य है, तथा निश्चय नय क्यों उसका निषेध करनेवाला है ?


न यतो विकल्पमात्रमर्थाकृतिपरिणतं यथा वस्तु ।
प्रतिषेध्यस्य न हेतुश्चेदयथार्थस्तु हेतुरिह तस्य ॥627॥

अर्थ: उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है, क्योंकि हरएक वस्तुमें उस वस्तुके अनुरूप अर्थाकार परिणमन करनेवाले ज्ञानको ही विकल्प कहते हैं। वह विकल्प प्रतिषेध्यका हेतु नहीं है, किन्तु उसका कारण अयथार्थता है।


व्यवहारः किल मिथ्या स्वयमपि मिथ्योपदेशकश्च यतः ।
प्रतिषेध्यस्तस्मादिह मिथ्यादृष्टिस्तदर्थदृष्टिश्च ॥628॥

अर्थ: व्यवहार नय मिथ्या है क्योंकि वह स्वयं ही मिथ्या उपदेश देता है। इसलिये वह प्रतिषेध्य निषेध करने योग्य है और उस व्यवहार नयके विषय पर दृष्टि देनेवाला - श्रद्धान करनेवाला भी मिथ्यादृष्टि है।


स्वयमपि भूतार्थत्वाद्भवति स निश्चयनयो हि सम्यक्त्वम् ।
अविकल्पवदतिवागिव स्यादनुभवैकगम्यवाच्यार्थः ॥629॥

अर्थ: निश्चय नय यथार्थ विषयका प्रतिपादन करनेवाला है, इसलिये वह सम्यक्रूप है । यद्यपि निश्चयनय भी विकल्पात्मक है, तो भी वह विकल्प रहितसा प्रतीत होता है । यद्यपि वह ‘न’ इत्याकारक वचनसे कहा जाता है तो भी वह वचनागोचर ही जैसा प्रतीत होता है । निश्चय नयका क्या वाच्य है यह बात अनुभवगम्य ही है अर्थात् निश्चय नयके विषयका बोध अनुभवसे ही जाना जाता है । वचनसे वह नहीं कहा जाता, क्योंकि जो कुछ वचनसे विवेचन किया जायगा वह सब भेदरूप होनेसे व्यवहार नयका ही विषय हो जाता है । इसलिये वचनसे तो वह ‘न’ निषेधरूप ही वक्तव्य है । अथवा उस निश्चय नयके विषयपर श्रद्धान करनेवाला सम्यग्दृष्टि है और वही कार्यकारी है । इसलिये निश्चयनय ही उपादेय - ग्राह्य है । अन्य जितना भी नयवाद है सभी अग्राह्य - त्याज्य है ।


यदि वा सम्यग्दृष्टिस्तद्दृष्टिः कार्यकारी स्यात् ।
तस्मात् स उपादेयोनोपादेय स्तदन्यनयवादः ॥630॥

अर्थ: निश्चय नय यथार्थ विषयका प्रतिपादन करनेवाला है, इसलिये वह सम्यक्रूप है । यद्यपि निश्चयनय भी विकल्पात्मक है, तो भी वह विकल्प रहितसा प्रतीत होता है । यद्यपि वह ‘न’ इत्याकारक वचनसे कहा जाता है तो भी वह वचनागोचर ही जैसा प्रतीत होता है । निश्चय नयका क्या वाच्य है यह बात अनुभवगम्य ही है अर्थात् निश्चय नयके विषयका बोध अनुभवसे ही जाना जाता है । वचनसे वह नहीं कहा जाता, क्योंकि जो कुछ वचनसे विवेचन किया जायगा वह सब भेदरूप होनेसे व्यवहार नयका ही विषय हो जाता है । इसलिये वचनसे तो वह ‘न’ निषेधरूप ही वक्तव्य है । अथवा उस निश्चय नयके विषयपर श्रद्धान करनेवाला सम्यग्दृष्टि है और वही कार्यकारी है । इसलिये निश्चयनय ही उपादेय - ग्राह्य है । अन्य जितना भी नयवाद है सभी अग्राह्य - त्याज्य है ।


ननु च व्यवहारनयो भवति स सर्वोपि कथमभूतार्थः ।
गुणपर्ययवद्द्रव्यं यथोपदेशात्तथानुभूतेश्च ॥631॥

अर्थ: सम्पूर्ण ही व्यवहार नय किसप्रकार मिथ्या हो सक्ता है ? क्योंकि ‘गुणपर्ययवद्द्रव्यम्, गुण पर्यायवाला द्रव्य होता है, ऐसा उपदेश (सर्वज्ञ व महर्षियोंका) भी है तथा अनुभवसे भी यही बात सिद्ध होती है। हम पूछते हैं (शंकाकार) कि यहां पर क्या अभूतार्थपना है, द्रव्याभाव है अथवा गुणाभाव है। अथवा दोनोंका अभाव है, अथवा उन दोनोंके योग (मेल)का अभाव है। किसका अभाव है जिससे कि ’ गुणपर्ययवद्द्रव्यम्’ यह कथन अभूतार्थ समझा जाय, यदि किसीका अभाव नहीं है तो फिर व्यवहार नय मिथ्या क्यों ?


अथ किमभूतार्थत्वं द्रव्याभावोऽथ वा गुणाभावः ।
उभयाभावो वा किल तद्योगस्याप्यभावसादिति चेत् ॥632॥

अर्थ: सम्पूर्ण ही व्यवहार नय किसप्रकार मिथ्या हो सक्ता है ? क्योंकि ‘गुणपर्ययवद्द्रव्यम्, गुण पर्यायवाला द्रव्य होता है, ऐसा उपदेश (सर्वज्ञ व महर्षियोंका) भी है तथा अनुभवसे भी यही बात सिद्ध होती है। हम पूछते हैं (शंकाकार) कि यहां पर क्या अभूतार्थपना है, द्रव्याभाव है अथवा गुणाभाव है। अथवा दोनोंका अभाव है, अथवा उन दोनोंके योग (मेल)का अभाव है। किसका अभाव है जिससे कि ’ गुणपर्ययवद्द्रव्यम्’ यह कथन अभूतार्थ समझा जाय, यदि किसीका अभाव नहीं है तो फिर व्यवहार नय मिथ्या क्यों ?


सत्यं न गुणाभावो द्रव्याभावो न नोभयाभावः ।
न हि तद्योगाभावो व्यवहारः स्यात्तथाप्यभूतार्थः ॥633॥

अर्थ: ठीक है, न गुणका अभाव है, न द्रव्यका अभाव है, न दोनोंका अभाव है, और न उन दोनोंके योगका अभाव है, तो भी व्यवहार नय मिथ्या ही है। क्यों मिथ्या है ? उसीको स्पष्ट करते हैं -


इदमत्र निदानं किल गुणवद्द्रव्यं यदुक्तमिह सूत्रे ।
अस्ति गुणोस्ति द्रव्यं तद्योगात्तदिह लब्धमित्यर्थात् ॥634॥

अर्थ: व्यवहारनय मिथ्या है, इसमें यह कारण है कि जो सूत्रमें ‘गुणवद्द्रव्यम्’ कहा गया है, उसका यह अर्थ निकलता है कि एक कोई गुण पदार्थ है एक द्रव्य पदार्थ है, उन दोनोंके योगसे द्रव्य सिद्ध होता है। परन्तु ऐसा कथन ही मिथ्या है। क्योंकि न कोई गुण है, न द्रव्य है, न दोनों हैं, और न उनका योग ही है, किन्तु केवल अद्वैत सत् है, वही सत् गुण कहलाओ अथवा वही सत् द्रव्य कहलाओ। कुछ कहलाओ।


तदसन्न गुणोस्ति यतो न द्रव्यं नोभयं न तद्योगः ।
केवलमद्वैतं सद्भवतु गुणो वा तदेव सद्द्रव्यम् ॥635॥

अर्थ: व्यवहारनय मिथ्या है, इसमें यह कारण है कि जो सूत्रमें ‘गुणवद्द्रव्यम्’ कहा गया है, उसका यह अर्थ निकलता है कि एक कोई गुण पदार्थ है एक द्रव्य पदार्थ है, उन दोनोंके योगसे द्रव्य सिद्ध होता है। परन्तु ऐसा कथन ही मिथ्या है। क्योंकि न कोई गुण है, न द्रव्य है, न दोनों हैं, और न उनका योग ही है, किन्तु केवल अद्वैत सत् है, वही सत् गुण कहलाओ अथवा वही सत् द्रव्य कहलाओ। कुछ कहलाओ।


तस्मान्यायागत इति व्यवहारः स्यान्नयोप्यभूतार्थः ।
केवलमनुभवितारस्तस्य च मिथ्यादृशो हतास्तेपि ॥636॥

अर्थ: इसलिये यह बात न्यायसे प्राप्त हो चुकी कि व्यवहारनय अभूतार्थ है। जो लोग केवल उसी व्यवहारनयका अनुभव करते रहते हैं वे नष्ट हो चुके हैं, तथा वे मिथ्यादृष्टि हैं।


ननु चैवं चेन्नियमादादरणीयो नयो हि परमार्थः ।
किमकिञ्चित्कारित्वाद्व्यवहारेण तथाविधेन यतः ॥637॥

अर्थ: यदि व्यवहारनय मिथ्या ही है तो केवल निश्चयनय ही आदरणीय होना चाहिये। व्यवहारनय मिथ्या है इसलिये कुछ भी करनेमें असमर्थ है, फिर उसे सर्वथा कहना ही नहीं चाहिये ?


नैवं यतो बलादिह विप्रतिपत्तौ च संशयापत्तौ ।
वस्तुविचारे यदि वा प्रमाणमुभयावलम्बि तज्ज्ञानम् ॥638॥

अर्थ: ऊपरकी शंका ठीक नहीं है, कारण किसी विषयमें विवाद होने पर अथवा किसी विषयमें संदेह होनेपर अथवा वस्तुके विचार करनेमें व्यवहारनयका अवलम्बन बलपूर्वक ( अवश्य ही ) लेना पड़ता है। जो ज्ञान निश्चयनय और व्यवहारनय दोनोंका अवलम्बन करता है वही ज्ञान प्रमाणज्ञान समझा जाता है।


तस्मादाश्रयणीयः केषाञ्चित् स नयः प्रसङ्गत्वात् ।
अपि सविकल्पानामिव न श्रेयो निर्विकल्पबोधवताम् ॥639॥

अर्थ: इसलिये प्रसंगवश किन्हीं २ को व्यवहार नय भी आश्रयणीय ( आश्रय करने योग्य ) है। वह सविकल्पक बोधवालोंके लिये ही आश्रय करने योग्य है। सविकल्पक बोधवालोंके समान निर्विकल्पक बोधवालोंके लिये वह नय हितकारी नहीं है।


ननु च समीहितसिद्धिः किल चैकस्मान्नयात्कथं न स्यात् ।
विप्रतिपत्तिनिरासो वस्तुविचारश्च निश्चयादिति चेत् ॥640॥

अर्थ: अपने अभीष्टकी सिद्धि एक ही नय ( निश्चय ) से क्यों नहीं हो जाती है, विवादका परिहार और वस्तुका विचार भी निश्चयसे ही हो जायगा इसलिये केवल निश्चयनय ही मान लो ?


नैवं यतोस्ति भेदोऽनिर्वचनीयो नयः स परमार्थः ।
तस्मात्तीर्थस्थितये श्रेयान् कश्चित् स वावदूकोपि ॥641॥

अर्थ: ऊपर जो शंका की गई है वह ठीक नहीं है क्योंकि दोनों नयोंमें भेद है । निश्चय नय अनिर्बचनीय है, उसके द्वारा पदार्थका विवेचन नहीं किया जा सक्ता, इसलिये धर्म अथवा दर्शनकी स्थितिके लिये अर्थात् वस्तु स्वभावको जाननेके लिये कोई बोलनेवाला भी नय - व्यवहार नय हितकारी है ।


ननु निश्चयस्य वाच्यं किमिति यदालम्ब्य वर्त्तते ज्ञानम् ।
सर्वविशेषाभावेऽत्यन्ताभावस्य वै प्रतीतत्वात् ॥642॥

अर्थ: निश्चय नयका क्या वाच्य (विषय) है कि जिसको अवलम्बन करके ज्ञान रहता है ? सम्पूर्ण विशेषके अभावमें निश्चयनयसे अत्यन्ताभाव ही प्रतीत होता है ।


इदमत्र समाधानं व्यवहारस्य च नयस्य यद्वाच्यम् ।
सर्वविकल्पाभावे तदेव निश्चयनयस्य यद्वाच्यम् ॥643॥

अर्थ: ऊपरकी शंकाका यहांपर यह समाधान किया जाता है कि जो कुछ व्यवहार नयका वाच्य है उसमेंसे सम्पूर्ण विकल्पोंको दूर करनेपर जो वाच्य रहता है वही निश्चय नयका वाच्य है।


अस्त्यत्र च संदृष्टिस्तृणाग्निरिति वा यदोष्ण एवाग्निः ।
सर्वविकल्पाभावे तत्संस्पर्शादिनाप्यशीतत्वम् ॥644॥

अर्थ: निश्चय नयके वाच्यके विषयमें यहांपर अग्निका दृष्टान्त दिया जाता है - अग्नि यदि तृणकी अग्नि है तब भी अग्नि ही है, यदि वह कण्डेकी अग्नि है तो भी वह उष्ण अग्नि ही है, यदि वह कोयलेकी अग्नि है तो भी वह उष्ण अग्नि ही है। इसलिये उस अग्निमेंसे तृण, कण्डा (उपला) कोयला आदि विकल्प दूर कर दिये जायँ तो भी वह स्पर्शादिसे उष्ण ही प्रतीत होगी।


ननु चैवं परसमयः कथं स निश्चयनयावलंबी स्यात् ।
अविशेषादपि स यथा व्यवहारनयावलंबी यः ॥645॥

अर्थ: जो व्यवहारनयका अवलम्बन करनेवाला है, वह जिस प्रकार सामान्यरीतिसे मिथ्यादृष्टि है उसी प्रकार जो निश्चयनयका अवलम्बन करनेवाला है वह मिथ्यादृष्टि क्यों है ? अर्थात् व्यवहारनयके अवलम्बन करनेवालेको मिथ्यादृष्टि कहा गया है, सो ठीक परंतु निश्चयनयावलंबीको भी मिथ्यादृष्टि ही कहा गया है सो क्यों ?


सत्यं किन्तु विशेषो भवति स सूक्ष्मो गुरूपदेश्यत्वात् ।
अपि निश्चयनयपक्षादपरः स्वात्मानुभूतिमहिमा स्यात् ॥646॥

अर्थ: ठीक है, परन्तु निश्चयनयसे भी विशेष कोई है, वह सूक्ष्म है, इसलिये वह मुरुके ही उपदेश योग्य है । सिवा महनीय गुरुके उसका स्वरूप कोई नहीं बतला सक्ता । वह विशेष स्वात्मानुभूतिकी महिमा है जोकि निश्चयनयसे भी बहुत सूक्ष्म और भिन्न है ।


इत्युक्तसूत्रादपि सविकल्पत्वात्तथानुभूतेश्च ।
सर्वोपि नयो यावान् परसमयः सच नयावलंबी ॥647॥

अर्थ: निश्चय नयावलम्बीको भी मिथ्यादृष्टि कहा गया है इस विषयमें उक्त गाथा भी प्रमाण है। उसका अर्थ यह है कि जो दो प्रकारके नय कहे गये हैं उन्हें सम्यग्दृष्टि जानता तो है परन्तु किसी भी नयके पक्षको ग्रहण नहीं करता है, वह नय पक्षसे रहित है। है। इस गाथारूप सूत्रसे यह बात सिद्ध हो चुकी कि सम्यग्दृष्टि निश्चय नयका भी अवलम्बन नहीं करता है। दूसरी बात यह है कि निश्चय नयको भी आचार्यने सविकल्पक बतलाया है और जितना सविकल्प ज्ञान है उसे अभूतार्थ बतलाया है जैसा कि पहले कहा गया है यथा - “यदि वा ज्ञानविकल्पो नयो विकल्पोस्ति सोप्यपरमार्थः” इसलिये सविकल्पज्ञानात्मक होनेसे भी निश्चय नय मिथ्या सिद्ध होता है, तथा अनुभवमें भी यही बात आती है कि जितने भी नय हैं सभी पर समय - मिथ्या हैं, तथा उन नयोंका अवलम्बन करनेवाला भी मिथ्यादृष्टि है?


स यथा सति सविकल्पे भवति स निश्चयनयो निषेधात्मा ।
न विकल्पो न निषेधो भवति चिदात्मानुभूतिमात्रं च ॥648॥

अर्थ: वह स्वात्मानुभूतिकी महिमा इसप्रकार है कि सविकल्पज्ञान होनेपर निश्चय नय उस विकल्पका निषेध करता है। परन्तु जहां पर न तो विकल्प ही है और न निषेध ही है वहां पर चिदात्मानुभूति मात्र है।


दृष्टान्तोपि च महिषध्यानाविष्टो यथा हि कोपि नरः ।
महिषोयमहं तस्योपासक इति नयावलम्बी स्यात् ॥649॥

अर्थ: स्वात्मानुभूतिके विषयमें दृष्टान्त भी है, जैसे-कोई पुरुष महिषके ध्यानमें आरूढ़ है। ध्यान करते हुए वह यह समझता है कि यह महिष (मैंसा) है और मैं उसकी उपासना (सेवा-ध्यान) करनेवाला हूं। इसप्रकारके विकल्पको लिये हुए जब तक उसका ज्ञान है। तब तक वह नयका अवलम्बन करनेवाला है। बहुत काल तक अथवा जल्दी ही ध्यान करते २ जिस समय वह दैव वश स्वयं महिषरूप वन जाता है तो उस समय वह केवल एक महिषका ही अनुभव करता है, वही महिषानुभूति है।


चिरमचिरं वा यावत् स एव दैवात् स्वयं हि महिषात्मा ।
महिषस्यैकस्य यथा भवनात् महिषानुभूतिमात्रं स्यात् ॥650॥

अर्थ: स्वात्मानुभूतिके विषयमें दृष्टान्त भी है, जैसे-कोई पुरुष महिषके ध्यानमें आरूढ़ है। ध्यान करते हुए वह यह समझता है कि यह महिष (मैंसा) है और मैं उसकी उपासना (सेवा-ध्यान) करनेवाला हूं। इसप्रकारके विकल्पको लिये हुए जब तक उसका ज्ञान है। तब तक वह नयका अवलम्बन करनेवाला है। बहुत काल तक अथवा जल्दी ही ध्यान करते २ जिस समय वह दैव वश स्वयं महिषरूप बन जाता है तो उस समय वह केवल एक महिषका ही अनुभव करता है, वही महिषानुभूति है।


स्वात्मध्यानाविष्टस्तथेह कश्चिन्नरोपि किल यावत् ।
अयमहमात्मा स्वयमिति स्यामनुभविताहमस्यनयपक्षः ॥651॥

अर्थ: उसी प्रकार यदि कोई पुरुष अपने आत्माके ध्यान करनेमें आरूढ़ है, ध्यान करते हुए वह विकल्प उठाता है कि मैं यह आत्मा हूँ और मैं ही स्वयं उसका अनुभवन करनेवाला हूँ, जवतक उसके ऐसा विकल्पात्मक बोध है तव तक उसके नय पक्ष है । बहुत काल तक अथवा जल्दी ही दैववश वही आत्मा यदि निर्विकल्प होजाय, अर्थात् 'मैं उपासक हूँ और मैं ही स्वयं उपास्य हूँ, इस उपास्य उपासक विकल्पको दूर कर स्वयं आत्मा निज आत्मामें तन्मय होजाय तो उस समय वह आत्मा स्वात्मानुभवन करने लग जाता है । जो स्वात्मानुभवन है वही स्वात्मानुभूति कहलाती है ।


चिरमाचिरं वा दैवात् स एव यदि निर्विकल्पश्च स्यात् ।
स्वयमात्मेत्यनुभवनात् स्यादियमात्मानुभूतिरिह तावत् ॥652॥

अर्थ: उसी प्रकार यदि कोई पुरुष अपने आत्माके ध्यान करनेमें आरूढ़ है, ध्यान करते हुए वह विकल्प उठाता है कि मैं यह आत्मा हूँ और मैं ही स्वयं उसका अनुभवन करनेवाला हूँ, जवतक उसके ऐसा विकल्पात्मक बोध है तव तक उसके नय पक्ष है । बहुत काल तक अथवा जल्दी ही दैववश वही आत्मा यदि निर्विकल्प होजाय, अर्थात् 'मैं उपासक हूँ और मैं ही स्वयं उपास्य हूँ, इस उपास्य उपासक विकल्पको दूर कर स्वयं आत्मा निज आत्मामें तन्मय होजाय तो उस समय वह आत्मा स्वात्मानुभवन करने लग जाता है। जो स्वात्मानुभवन है वही स्वात्मानुभूति कहलाती है ।


तस्माद्व्यवहार इव प्रकृतो नात्मानुभूतिहेतुः स्यात् ।
अयमहमस्य स्वामी सदवश्यम्भाविनो विकल्पत्वात् ॥653॥

अर्थ: इसलिये व्यवहारनयके समान निश्चयनय भी आत्मानुभूतिका कारण नहीं है। क्योंकि उसमें भी यह आत्मा है, मैं इसका स्वामी हूँ, ऐसा सत् पदार्थमें अवश्यंभावी विकल्प उठता ही है।


ननु केवलमिह निश्चयनयपक्षो यदि विवक्षितो भवति ।
व्यवहारान्निरपेक्षो भवति तदात्मानुभूतिहेतुः सः ॥654॥

अर्थ: यदि यहांपर व्यवहार नयसे निरपेक्ष केवल निश्चयनयका पक्ष ही विवक्षित किया जाय तो वह आत्मानुभूतिका कारण होगा ?


नैवमसंभवदोषाद्यतो न कश्चिन्नयो हि निरपेक्षः ।
सति च विधौ प्रतिषेधः प्रतिषेधे सति विधेः प्रसिद्धत्वात् ॥655॥

अर्थ: ऊपर जो शंका की गई है वह ठीक नहीं है कारण वैसा माननेमें असंभव दोष आता है। कोई भी नय निरपेक्ष नहीं हुआ करता है, न हो सक्ता है। क्योंकि विधिके होनेपर प्रतिषेधका होना भी अवश्यंभावी है, और प्रतिषेधके होनेपर विधिका होना भी प्रसिद्ध है।


ननु च व्यवहारनयो भवति यथाऽनेक एव सांशत्वात् ।
अपि निश्चयो नयः किल तद्वदनेकोऽथ चैककस्त्विति चेत् ॥656॥

अर्थ: जिस प्रकार अनेक अंश सहित होनेसे व्यवहारनय अनेक ही है, उसी प्रकार व्यवहारनयके समान निश्चयनय भी एक एक मिलाकर नियमसे अनेक है ऐसा माना जाय तो ?


नैवं यतोस्त्यनेको नैकः प्रथमोप्यनन्तधर्मत्वात् ।
न तथेति लक्षणत्वादस्त्येको निश्चयो हि नानेकः ॥657॥

अर्थ: उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है, कारण व्यवहारनय तो अनन्तधर्मात्मक होनेसे अनेक है, वह एक नहीं है। परन्तु निश्चनय अनेक नहीं है, क्योंकि उसका लक्षण ‘न तथा’ है अर्थात् जो कुछ व्यवहारनय कहता है उसका निषेध करना, कि (पदार्थ) वैसा नहीं है। यही निश्चयनयका लक्षण है, इसलिये कितने ही धर्मोंके विवेचन क्यों न किये जायँ, सबोंका निषेध करना मात्र ही निश्चयनयका एक कार्य है अतएव वह एक ही है।


संदृष्टिः कनकत्वं ताम्रोपाधेर्निवृत्तितो यादृक् ।
अपरं तदपरमिह वा रुक्मोपाधेर्निवृत्तितस्तादृक् ॥658॥

अर्थ: निश्चयनय क्यों एक है इस विषयमें सोनेका दृष्टान्त भी है। सोना तावेंकी उपाधिकी निवृत्तिसे जैसा है, वैसा ही चांदीकी उपाधिकी निवृत्तिसे भी है, अथवा और और अनेक उपाधियोंकी निवृत्तिसे भी वैसा ही सोना है, अर्थात् सोनेमें जो तावाँ, पीतल, चाँदी, कालिमा आदि उपाधियाँ हैं वे अनेक हैं परन्तु उनका अभाव होना अनेक नहींहै , किसी उधाधिका अभाव क्यों न हो वह एक अभाव ही रहेगा। हरएक उपाधिकी निवृत्तिमें सोना सदा सोना ही रहेगा।


एतेन हतास्ते ये स्वात्मप्रज्ञापराधतः केचित् ।
अप्येकनिश्चयनयमनेकमिति सेवयन्ति यथा ॥659॥

अर्थ: इस कथनसे वे पुरुष खण्डित किये गये जो कि अपने ज्ञानके दोषसे एक निश्चय नयको अनेक समझते हैं । कोई कोई अज्ञानी निश्चय नयके इसप्रकार भेद कहते हैं


शुद्धद्रव्यार्थिक इति स्यादेकः शुद्धनिश्चयो नाम ।
अपरोऽशुद्धद्रव्यार्थिक इति तदशुद्धनिश्चयो नाम ॥660॥

अर्थ: एक शुद्ध द्रव्यार्थिक नय है, उसीका नाम शुद्ध निश्चय नय है। दूसरा अशुद्धद्रव्यार्थिक नय है उसका नाम अशुद्ध निश्चय नय है। ऐसे निश्चय नयके दो भेद हैं।


इत्यादिकाश्च वहवो भेदा निश्चयनयस्य यस्य मते ।
सहि मिथ्यादृष्टित्वात् सर्वज्ञाज्ञानमानितो नियमात् ॥661॥

अर्थ: और भी बहुतसे भेद निश्चय नयके जिसके मतमें हैं वह मिथ्यादृष्टि है। इसीलिये वह नियमसे सर्वज्ञकी आज्ञाका उलङ्घन करता है, अर्थात् निश्चय नयके शुद्ध अशुद्ध आदि भेद कुछ भी नहीं हैं ऐसा जैन सिद्धान्त है, वह केवल निषेधात्मक एक है। जो उसके भेद करता है वह सर्वज्ञकी आज्ञाका उलङ्घन करता है। अतएव वह मिथ्यादृष्टि है।


इदमत्र तु तात्पर्यमधिगन्तव्यं चिदादि यद्वस्तु ।
व्यवहारनिश्चयाभ्यामविरुद्धं यथात्मशुध्यर्थम् ॥662॥

अर्थ: यहां पर इतना ही तात्पर्य है कि जीवादिक जो पदार्थ हैं वे आत्मशुद्धिके लिये तभी उपयुक्त होसक्ते हैं जब कि वे व्यवहार और निश्चय नयके द्वारा अविरुद्ध रीतिसे जाने जाते हैं।


अपि निश्चयस्य नियतं हेतुः सामान्यमात्रमिह वस्तु ।
फलमात्मसिद्धिः स्यात् कर्मकलंकावमुक्तबोधात्मा ॥663॥

अर्थ: निश्चय नयका कारण नियमसे सामान्य मात्र वस्तु है। फल आत्माकी सिद्धि है। निश्चय नयसे वस्तु बोध करने पर कर्म कलंकसे रहित ज्ञानवाला आत्मा हो जाता है।


उक्तो व्यवहारनयस्तदनु नयो निश्चयः पृथक् पृथक् ।
युगपद्द्वयं च मिलितं प्रमाणमिति लक्षणं वक्ष्ये ॥664॥

अर्थ: व्यवहार नयका स्वरूप कहा गया, उसके पीछे निश्चय नयका भी स्वरूप कहा गया। दोनों ही नय भिन्न २ स्वरूपवाले हैं। जब एक साथ दोनों नय मिल जाते हैं तभी वह प्रमाणका स्वरूप कहलाता है। उसी प्रमाणका लक्षण कहा जाता है।


विधिपूर्वः प्रतिषेधः प्रतिषेधपुरस्सरो विधिस्त्वनयोः ।
मैत्री प्रमाणमिति वा स्वपराकारावगाहि यज्ज्ञानम् ॥665॥

अर्थ: विधिपूर्वक प्रतिषेध होता है। प्रतिषेध पूर्वक विधि होती है। विधि और प्रतिषेध इन दोनोंकी जो मैत्री है वही प्रमाण कहलाता है अथवा स्व परको जाननेवाला जो ज्ञान है वही प्रमाण कहलाता है।


अयमर्थोर्थविकल्पो ज्ञानं किल लक्षणं स्वतस्तस्य ।
एकविकल्पो नयसादुभयविकल्पः प्रमाणमिति बोधः ॥666॥

अर्थ: ऊपर जो कहा गया है उसका खुलासा इस प्रकार है। अर्थाकार - पदार्थाकार परिणमन करनेका नाम ही अर्थ विकल्प है, यही ज्ञानका लक्षण है। वह ज्ञान जब एक विकल्प होता है अर्थात् एक अंशको विषय करता है तब वह नयाधीन - नयात्मक ज्ञान कहलाता है, और वही ज्ञान जब उभय विकल्प होता है अर्थात् पदार्थके दोनों अंशोंको विषय करता है तब वह प्रमाणरूप ज्ञान कहलाता है।


ननु चास्त्येकविकल्पोप्यविरुद्धोभयविकल्प एवास्ति ।
कथमिव तदेकसमये विरुद्धभावद्वयोर्विकल्पः स्यात् ॥667॥

अर्थ: एक विकल्प भी अविरुद्ध उभय (दो) विकल्पवाला हो सक्ता है । अर्थात् अविरोधी कई धर्म एक साथ रह सक्ते हैं । परन्तु एक समयमें विरुद्ध दो भावोंका विकल्प किस प्रकार होसक्ता है ? यदि एक साथ विरुद्ध दो विकल्प होसक्ते हैं तो क्रमसे हो सक्ते हैं या एक साथ उन दोनोंका हट पूर्वक प्रयोग किया जासक्ता है ? यदि कहा जाय कि विरोधी दो धर्म क्रमसे होसक्ते हैं तो वे क्रमसे होनेवाले धर्म नय ही कहे जायँगे, प्रमाण वे नियमसे नहीं कहे जासक्ते, यह एक बड़ा दोष उपस्थित होगा । यदि कहा जाय कि वे दोनों धर्म एक साथ होसक्ते हैं तो यह बात बनती नहीं, कारण विरोधी धर्म एक साथ दो रह नहीं सक्ते । दो विरोधी धर्म एक साथ रहें इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध आता है । जैसे प्रकाश और अन्धकार दोनों ही विरोधी हैं । वे क्या एक साथ रहते हुए कभी किसीने देखें हैं ?


अथ चेदस्ति विकल्पो क्रमेण युगपद्वा वलाद्वाच्यः ।
अथ चेत् क्रमेण नय इति भवति न नियमात्प्रमाणमितिदोषः ॥668॥

अर्थ: एक विकल्प भी अविरुद्ध उभय (दो) विकल्पवाला हो सक्ता है । अर्थात् अविरोधी कई धर्म एक साथ रह सक्ते हैं । परन्तु एक समयमें विरुद्ध दो भावोंका विकल्प किस प्रकार होसक्ता है ? यदि एक साथ विरुद्ध दो विकल्प होसक्ते हैं तो क्रमसे हो सक्ते हैं या एक साथ उन दोनोंका हट पूर्वक प्रयोग किया जासक्ता है ? यदि कहा जाय कि विरोधी दो धर्म क्रमसे होसक्ते हैं तो वे क्रमसे होनेवाले धर्म नय ही कहे जायँगे, प्रमाण वे नियमसे नहीं कहे जासक्ते, यह एक बड़ा दोष उपस्थित होगा । यदि कहा जाय कि वे दोनों धर्म एक साथ होसक्ते हैं तो यह बात बनती नहीं, कारण विरोधी धर्म एक साथ दो रह नहीं सक्ते । दो विरोधी धर्म एक साथ रहें इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध आता है । जैसे प्रकाश और अन्धकार दोनों ही विरोधी हैं । वे क्या एक साथ रहते हुए कभी किसीने देखें हैं ?


युगपच्चेदथ न मिथो विरोधिनोर्यौगपद्यं स्यात् ।
दृष्टिविरुद्धत्वादपि प्रकाशतमसोर्द्वयोरिति चेत् ॥669॥

अर्थ: एक विकल्प भी अविरुद्ध उभय (दो) विकल्पवाला हो सक्ता है । अर्थात् अविरोधी कई धर्म एक साथ रह सक्ते हैं । परन्तु एक समयमें विरुद्ध दो भावोंका विकल्प किस प्रकार होसक्ता है ? यदि एक साथ विरुद्ध दो विकल्प होसक्ते हैं तो क्रमसे हो सक्ते हैं या एक साथ उन दोनोंका हट पूर्वक प्रयोग किया जासक्ता है ? यदि कहा जाय कि विरोधी दो धर्म क्रमसे होसक्ते हैं तो वे क्रमसे होनेवाले धर्म नय ही कहे जायँगे, प्रमाण वे नियमसे नहीं कहे जासक्ते, यह एक बड़ा दोष उपस्थित होगा । यदि कहा जाय कि वे दोनों धर्म एक साथ होसक्ते हैं तो यह बात बनती नहीं, कारण विरोधी धर्म एक साथ दो रह नहीं सक्ते । दो विरोधी धर्म एक साथ रहें इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध आता है । जैसे प्रकाश और अन्धकार दोनों ही विरोधी हैं । वे क्या एक साथ रहते हुए कभी किसीने देखें हैं ?


न यतो युक्तिविशेषाद्युगपद्वृत्तिर्विरोधिनामस्ति ।
सदसदनेकेषामिह भावाभावध्रुवाध्रुवाणाञ्च ॥670॥

अर्थ: ऊपर की हुई शङ्का ठीक नहीं है, कारण युक्ति विशेषसे विरोधी धर्मोंकी भी एक साथ वृत्ति रह सक्ती है । सत् असत्, भाव अभाव, नित्य अनित्य, भेद अभेद, एक अनेक आदि अनेक धर्मोंकी एक पदार्थमें एक साथ वृत्ति रहती है।


अयमर्थो जीवादौ प्रकृतपरामर्शपूर्वकं ज्ञानम् ।
यदि वा सदभिज्ञानं यथा हि सोयं बलाद्वयामर्शि ॥671॥

अर्थ: ऊपर जो कुछ कहा गया है उसका यह अर्थ है कि जीवादि पदार्थोंमें व्यवहार और निश्चयके विचारपूर्वक जो ज्ञान है वही प्रमाण ज्ञान है । अथवा पदार्थमें जो प्रत्यभिज्ञान है वह प्रमाण ज्ञान है जैसे - यह वही है, इसप्रकारका ज्ञान एक वस्तुकी सायान्य विशेष दोनों अवस्थाओंको एक समयमें ग्रहण करता है ।


सोयं जीवविशेषो यः सामान्येन सदिति वस्तुमयः ।
संस्कारस्य वशादिह सामान्यविशेषजं भवेज्ज्ञानम् ॥672॥

अर्थ: वही यह जीव विशेष है जो सामान्यतासे सन्मात्र - वस्तुरूप था। उस सत्पदार्थमें संस्कारके वशसे सामान्यविशेषात्मक ज्ञान हो जाता है।


अस्त्युपयोगि ज्ञानं सामान्यविशेषयोः समं सम्यक् ।
आदर्शस्थानीयात् तस्य प्रतिबिम्बमात्रतोऽन्यस्य ॥673॥

अर्थ: एक साथ सामान्यविशेषका उपयोगात्मक ज्ञान भले प्रकार हो सक्ता है। जैसे-दर्पणसे उसमें पड़नेवाला प्रतिबिम्ब यद्यपि (कथंचित्) भिन्न है। तथापि उस प्रतिबिम्बका और दर्पणका एक साथ बोध होता है।


ननु चैवं नययुग्मं व्यस्तं नय एव न प्रमाणं स्यात् ।
तदिह समस्तं योगात् प्रमाणमिति केवलं न नयः ॥674॥

अर्थ: दोनों ही नय जब भिन्न २ प्रयुक्त किये जाते हैं तब तो वे नय ही हैं, प्रमाण नहीं हैं और वे ही दोनों नय जब मिलाकर एक साथ प्रयोगमें लाये जाते हैं तब वह केवल प्रमाण कहलाता है, नय नहीं कहलाता है ?


तन्न यतो नययोगादतिरिक्तरसान्तरं प्रमाणमिदम् ।
लक्षणविषयोदाहृतिहेतुफलाख्यादिभेदभिन्नत्वात् ॥675॥

अर्थ: ऊपर जो शंका की गई है वह ठीक नहीं है, क्योंकि नयोंके योगसे प्रमाण भिन्न ही वस्तु है, प्रमाणका लक्षण, विषय, उदाहरण हेतु, फल, नाम, भेद, आदि स्वरूप नयोंसे जुदा ही है। उसीको नीचे स्पष्ट करते हैं।


तत्रोक्तं लक्षणमिह सर्वस्वग्राहकं प्रमाणमिति ।
विषयो वस्तुसमस्तं निरंशदेशादिभूरुदाहरणम् ॥676॥

अर्थ: प्रमाणका लक्षण सम्पूर्णपदार्थको ग्रहण करना। प्रमाणका विषय - समस्त वस्तु निरंशदेशादिक पृथ्वी उसका उदाहरण है।


हेतुस्तत्त्वबुभुत्सोः संदिग्धस्याथवा च बालस्य ।
सार्थमनेकं द्रव्यं हस्तामलकवद्वेतुकामस्य ॥677॥

अर्थ: तत्त्वके जाननेकी इच्छा रखनेवाला जो कोई संदिग्ध पुरुष अथवा मूर्ख पुरुष है उसकी एक साथ अनेक द्रव्यको हाथमें रक्खे हुए आमलेके समान जाननेकी इच्छाका होना ही प्रमाणका कारण है।


फलमस्यानुभवः स्यात्समक्षमिव सर्ववस्तुजातस्य ।
आख्या प्रमाणमिति किल भेदः प्रत्यक्षमथ परोक्षं च ॥678॥

अर्थ: सम्पूर्ण वस्तुमात्रका प्रत्यक्षके समान अनुभव होना ही प्रमाणका फल है। प्रमाणका नाम प्रमाण है। प्रत्यक्ष और परोक्ष उसके दो भेद हैं।


ज्ञानविशेषो नय इति ज्ञानविशेषः प्रमाणमिति नियमात् ।
उभयोरन्तर्भेदो विषयविशेषान्न वस्तुतो भेदः ॥679॥

अर्थ: नय भी ज्ञानविशेष है, और प्रमाण भी ज्ञानविशेष है। दोनोंमें विषय विशेषकी अपेक्षासे ही भेद है, वास्तवमें ज्ञानकी अपेक्षासे दोनोंमें कुछ भी भेद नहीं है।


स यथा विषयविशेषो द्रव्यैकांशो नयस्य योन्यतमः ।
सोप्यपरस्तदपर इह निखिलं विषयः प्रमाणजातस्य ॥680॥

अर्थ: प्रमाण और नयमें विषयभेद इस प्रकार है - द्रव्यके अनन्त गुणोंमेंसे कोई सा विवक्षित अंश नयका विषय है। वह अंश तथा और भी सब अंश अर्थात् अनन्त गुणात्मक समस्त ही वस्तु प्रमाणका विषय है।


यदनेकनयसमूहे संग्रहकरणादनेकधर्मत्वम् ।
तत्सदपि न सदिव यतस्तदनेकत्वं विरुद्धधर्ममयम् ॥681॥

अर्थ: कोई ऐसी आशंका करते हैं कि जब वस्तुके एक अंशको विषय करनेवाला नय है तो अनेक नयोंका समूह होनेपर उससे ही अनेक धर्मता प्रमाणमें आजायगी, अर्थात् प्रमाण स्वतन्त्र कोई ज्ञान विशेष न माना जाय, अनेक नयोंके समूहको ही प्रमाण कहा जाय तो क्या हानि है ? आचार्य उत्तर देते हैं कि यह आशंका किसी प्रकार ठीक सी मालूम पड़ती है तो भी ठीक नहीं है । क्योंकि अनेक नयोंके संग्रहसे जो अनेक धर्मोंका संग्रह होगा वह विरुद्ध होगा । कारण नय सभी एक दूसरेसे प्रतिपक्ष धर्मोंका विवेचन करते हैं । प्रमाण जो अनेक अंशोंका ग्रहण करता है सो वह विरुद्ध रीतिसे नहीं करता है । किन्तु परस्पर मैत्रीभाव पूर्वक ही उन धर्मोंको ग्रहण करता है । इसलिये नयभेदसे प्रमाण भिन्न ही है ।


यदनेकांशग्राहकमिह प्रमाणं न प्रत्यनीकतया ।
प्रत्युत मैत्रीभावादिति नयभेदाददः प्रभिन्नं स्यात् ॥682॥

अर्थ: कोई ऐसी आशंका करते हैं कि जब वस्तुके एक अंशको विषय करनेवाला नय है तो अनेक नयोंका समूह होनेपर उससे ही अनेक धर्मता प्रमाणमें आजायगी, अर्थात् प्रमाण स्वतन्त्र कोई ज्ञान विशेष न माना जाय, अनेक नयोंके समूहको ही प्रमाण कहा जाय तो क्या हानि है ? आचार्य उत्तर देते हैं कि यह आशंका किसी प्रकार ठीक सी मालूम पड़ती है तो भी ठीक नहीं है। क्योंकि अनेक नयोंके संग्रहसे जो अनेक धर्मोंका संग्रह होगा वह विरुद्ध होगा। कारण नय सभी एक दूसरेसे प्रतिपक्ष धर्मोंका विवेचन करते हैं। प्रमाण जो अनेक अंशोंका ग्रहण करता है सो वह विरुद्ध रीतिसे नहीं करता है। किन्तु परस्पर मैत्रीभाव पूर्वक ही उन धर्मोंको ग्रहण करता है। इसलिये नयभेदसे प्रमाण भिन्न ही है।


ननु युगपदुच्यमानं नययुग्मं तद्यथास्ति नास्तीति ।
एको भङ्गः कथमयमेकांशग्राहको नयो नान्यत् ॥683॥

अर्थ: ‘स्यात् अस्ति नास्ति’ यह एक साथ कहा हुआ नययुग्म एक भङ्ग कहलाता है। यह भंग एक अंशका ग्रहण करनेवाला नय कैसे कहा जा सक्ता है, इसमें ‘अस्ति नास्ति’ ऐसे दो अंश आचुके हैं इसलिये यह प्रमाण क्यों नहीं कहा जाता है? दूसरी बात यह भी है कि ‘अस्ति नास्ति’ ये एक साथ कहे जाते हैं तो फिर प्रमाणका नाश ही हो जायगा। कारण अस्ति नास्तिको एक साथ कहनेवाला एक भंग ही है उसीसे कार्य चल जाता है फिर प्रमाणका लोप ही समझना चाहिये, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति क्रमसे होते हैं तो यह कहना अपने नाशके लिये स्वयं अपना शत्रु है। कारण क्रमसे होनेवाला भंग दूसरा ही है, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति एक साथ कहा नहीं जा सक्ता इसलिये वह अवक्तव्यमय भंग है तो ऐसा माननेमें पूर्वापर बाधा आती है। किस प्रमाणसे किस प्रमाणकी सिद्धि हो सक्ती है? अर्थात् यदि एक साथ कथन अवक्तव्य है तो प्रमाणकी सिद्धि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहेगा क्योंकि प्रमाण तो अवक्तव्य हो जायगा। यदि यह कहा जाय कि बोलनेवाला नय ही होता है, प्रमाण नहीं, तो ऐसा कथन भी मूलका विघात करनेवाला है क्योंकि प्रमाणको अवक्ता ( नहीं बोलनेवाला ) मान लेने पर अवाच्यताका दोष आता है ?


अपि चास्ति न चास्तीति सममेकोक्त्या प्रमाणनाशः स्यात्
अथ च क्रमेण यदि वा स्वस्य रिपुः स्वयमहो स्वनाशाय ॥684॥

अर्थ: ‘स्यात् अस्ति नास्ति’ यह एक साथ कहा हुआ नययुग्म एक भङ्ग कहलाता है। यह भंग एक अंशका ग्रहण करनेवाला नय कैसे कहा जा सक्ता है, इसमें ‘अस्ति नास्ति’ ऐसे दो अंश आचुके हैं इसलिये यह प्रमाण क्यों नहीं कहा जाता है? दूसरी बात यह भी है कि ‘अस्ति नास्ति’ ये एक साथ कहे जाते हैं तो फिर प्रमाणका नाश ही हो जायगा । कारण अस्ति नास्तिको एक साथ कहनेवाला एक भंग ही है उसीसे कार्य चल जाता है फिर प्रमाणका लोप ही समझना चाहिये, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति क्रमसे होते हैं तो यह कहना अपने नाशके लिये स्वयं अपना शत्रु है । कारण क्रमसे होनेवाला भंग दूसरा ही है, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति एक साथ कहा नहीं जा सक्ता इसलिये वह अवक्तव्यमय भंग है तो ऐसा माननेमें पूर्वापर वाधा आती है । किस प्रमाणसे किस प्रमाणकी सिद्धि हो सक्ती है? अर्थात् यदि एक साथ कथन अवक्तव्य है तो प्रमाणकी सिद्धि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहेगा क्योंकि प्रमाण तो अवक्तव्य हो जायगा। यदि यह कहा जाय कि बोलनेवाला नय ही होता है, प्रमाण नहीं, तो ऐसा कथन भी मूलका विघात करनेवाला है क्योंकि प्रमाणको अवक्ता ( नहीं बोलनेवाला ) मान लेने पर अवाच्यताका दोष आता है ?


अथवाऽवक्तव्यमयो वक्तुमशक्यात्समं स चेद्भङ्गः ।
पूर्वापरवाधायाः कुतः प्रमाणात्प्रमाणमिह सिद्ध्येत् ॥685॥

अर्थ: ‘स्यात् अस्ति नास्ति’ यह एक साथ कहा हुआ नययुग्म एक भङ्ग कहलाता है। यह भंग एक अंशका ग्रहण करनेवाला नय कैसे कहा जा सक्ता है, इसमें ‘अस्ति नास्ति’ ऐसे दो अंश आचुके हैं इसलिये यह प्रमाण क्यों नहीं कहा जाता है? दूसरी बात यह भी है कि ‘अस्ति नास्ति’ ये एक साथ कहे जाते हैं तो फिर प्रमाणका नाश ही हो जायगा । कारण अस्ति नास्तिको एक साथ कहनेवाला एक भंग ही है उसीसे कार्य चल जाता है फिर प्रमाणका लोप ही समझना चाहिये, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति क्रमसे होते हैं तो यह कहना अपने नाशके लिये स्वयं अपना शत्रु है । कारण क्रमसे होनेवाला भंग दूसरा ही है, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति एक साथ कहा नहीं जा सक्ता इसलिये वह अवक्तव्यमय भंग है तो ऐसा माननेमें पूर्वापर वाधा आती है । किस प्रमाणसे किस प्रमाणकी सिद्धि हो सक्ती है? अर्थात् यदि एक साथ कथन अवक्तव्य है तो प्रमाणकी सिद्धि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहेगा क्योंकि प्रमाण तो अवक्तव्य हो जायगा। यदि यह कहा जाय कि बोलनेवाला नय ही होता है, प्रमाण नहीं, तो ऐसा कथन भी मूलका विघात करनेवाला है क्योंकि प्रमाणको अवक्ता ( नहीं बोलनेवाला ) मान लेने पर अवाच्यताका दोष आता है ?


इदमपि वक्तुमयुक्तं वक्ता नय एव न प्रमाणमिह ।
मूलविनाशाय यतोऽवक्तरि किल चेदवाच्यतादोषः ॥686॥

अर्थ: ‘स्यात् अस्ति नास्ति’ यह एक साथ कहा हुआ नययुग्म एक भङ्ग कहलाता है। यह भंग एक अंशका ग्रहण करनेवाला नय कैसे कहा जा सक्ता है, इसमें ‘अस्ति नास्ति’ ऐसे दो अंश आचुके हैं इसलिये यह प्रमाण क्यों नहीं कहा जाता है? दूसरी बात यह भी है कि ‘अस्ति नास्ति’ ये एक साथ कहे जाते हैं तो फिर प्रमाणका नाश ही हो जायगा। कारण अस्ति नास्तिको एक साथ कहनेवाला एक भंग ही है उसीसे कार्य चल जाता है फिर प्रमाणका लोप ही समझना चाहिये, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति क्रमसे होते हैं तो यह कहना अपने नाशके लिये स्वयं अपना शत्रु है। कारण क्रमसे होनेवाला भंग दूसरा ही है, अथवा यदि यह कहा जाय कि अस्ति नास्ति एक साथ कहा नहीं जा सक्ता इसलिये वह अवक्तव्यमय भंग है तो ऐसा माननेमें पूर्वापर बाधा आती है। किस प्रमाणसे किस प्रमाणकी सिद्धि हो सक्ती है? अर्थात् यदि एक साथ कथन अवक्तव्य है तो प्रमाणकी सिद्धि करनेवाला कोई प्रमाण नहीं रहेगा क्योंकि प्रमाण तो अवक्तव्य हो जायगा। यदि यह कहा जाय कि बोलनेवाला नय ही होता है, प्रमाण नहीं, तो ऐसा कथन भी मूलका विघात करनेवाला है क्योंकि प्रमाणको अवक्ता ( नहीं बोलनेवाला ) मान लेने पर अवाच्यताका दोष आता है ?


नैवं यतः प्रमाणं भंगध्वंसाद्भंगबोधवपुः ।
भङ्गात्मको नय इति यावानिह तदंशधर्मत्वात् ॥687॥

अर्थ: ऊपर की हुई शंका ठीक नहीं है। क्योंकि प्रमाण भंगज्ञानमय नहीं है किन्तु अभंगज्ञानमय है, भंगज्ञानमय नय होता है, कारण जितना भी नय विभाग है सभी वस्तुके अंशधर्मको विषय करता है। इसलिये -


स यथास्ति च नास्तीति च क्रमेण युगपच्च वानयोर्भङ्गः ।
अपि वाऽवक्तव्यमिदं नयो विकल्पानतिक्रमादेव ॥688॥

अर्थ: ‘स्यात् अस्ति स्यात् नास्ति’ इनका क्रमसे होनेवाला अथवा युगपत् होनेवाला भंग, भंग ही है, अथवा अवक्तव्यरूप भी भंग ही है। इन सब भंगोंमें विकल्पका उल्लंघन नहीं है इसलिये ये सभी भंग नय रूप हैं।


तत्रास्ति च नास्ति समं भंगस्यास्यैकधर्मता नियमात् ।
न पुनः प्रमाणमिव किल विरुद्धधर्मद्वयाधिरूढत्वम् ॥689॥

अर्थ: उन भंगोंमें 'स्यादस्ति नास्ति यह एक साथ बोला हुआ भंग नियमसे एक धर्मवाला है। वह प्रमाणके समान नहीं कहा जा सक्ता क्योंकि प्रमाण एक ही समयमें दो विरुद्ध धर्मोंका मैत्रीभावसे प्रतिपादन करता है। उस प्रकार यह भंग विरुद्ध दो धर्मोंका प्रतिपादन नहीं करता है किन्तु पहले दूसरे भंगकी मिली हुई तीसरी ही अवस्थाका प्रतिपादन करता है इसलिये वह ज्ञान भी अंशरूप ही है।


अयमर्थश्चार्थवशादथ च विवक्षावशात्तदंशत्वम् ।
युगपदिदं कथ्यमानं क्रमाज्ज्ञेयं तथापि तत्स यथा ॥690॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए कथनका यह आशय है कि प्रयोजनवश अथवा विवक्षावश युगपत् क्रमसे कहा हुआ जो भंग है वह अंशरूप है इसलिये वह नय ही है ।


अस्ति स्वरूपसिद्धेर्नास्ति च पररूपसिद्ध्यभावाच्च ।
अपरस्योभयरूपादितस्ततः कथितमस्ति नास्तीति ॥691॥

अर्थ: वस्तुमें निजरूपकी अपेक्षासे अस्तित्व है, यह प्रथम भंग है। उसमें पर रूपकी अपेक्षासे नास्तित्व है, यह द्वितीय भंग है। तथा स्वरूपकी अपेक्षासे अस्तित्व पररूपकी अपेक्षासे नास्तित्व ऐसा तृतीय भंग उभयरूपकी अपेक्षासे अस्ति नास्ति रूप कहा गया है। अर्थात् (१) स्यादस्ति (२) स्यान्नास्ति (३) स्यादस्तिनास्ति। ये तीन भंग स्वरूप, पररूप, स्वरूप पररूपकी, अपेक्षासे क्रमसे जान लेने चाहिये। प्रमाणका स्वरूप इन भंगोंसे जुदा ही है -


उक्तं प्रमाणदर्शनमस्ति स योयं हि नास्तिमानर्थः ।
भवतीदमुदाहरणं न कथञ्चिद्वै प्रमाणतोऽन्यत्र ॥692॥

अर्थ: प्रमाणका जो स्वरूप कहा गया है वह नयोंसे जुदा ही है वह इस प्रकार है - जो पदार्थ अस्तिरूप है वही पदार्थ नास्तिरूप है । तृतीयभंगमें स्वरूपसे अस्तित्व और पररूपसे नास्तित्व क्रमसे कहा जाता है प्रमाणमें दोनों धर्मोंका प्रतिपादन समकालमें प्रत्यभिज्ञानरूपसे कहा जाता है । जो अस्ति रूप है वही नास्ति रूप है, यह उदाहरण प्रमाणको छोड़कर अन्यत्र किसी प्रकार भी नहीं मिल सक्ता है, अर्थात् नयों द्वारा ऐसा विवेचन नहीं किया जा सक्ता । नयोंसे युगपत् ऐसा विवेचन क्यों नहीं हो सक्ता ? उसे ही स्पष्ट करते हैं -


तदभिज्ञानं हि यथा वक्तुमशक्यात् समं नयस्य यतः ।
अपि तुर्यो नयभंगस्तत्त्वावक्तव्यतां श्रितस्तस्मात् ॥693॥

अर्थ: उसका कारण यह है कि नय एक साथ दो धर्मोंका प्रतिपादन करनेमें असमर्थ है। इसलिये एक साथ दो धर्मोंके कहनेकी विवक्षामें ‘अवक्तव्य’ नामक चौथा भंग होता है। यह भंग भी एक अंशात्मक है। जो नहीं बोला जा सके उसे अवक्तव्य कहते हैं एक समयमें एक ही धर्मका विवेचन हो सक्ता है, दो का नहीं।


न पुनर्वक्तुमशक्यं युगपद्धर्मद्वयं प्रमाणस्य ।
क्रमवर्त्ती केवलमिह नयः प्रमाणं न तद्वदिह यस्मात् ॥694॥

अर्थ: परन्तु प्रमाणके विषयभूत दो धर्म एक साथ कहे नहीं जा सके ऐसा नहीं है, किन्तु एक साथ दोनों धर्म कहे जाते हैं। क्रमवर्त्ती केवल नय है, नयके समान प्रमाण क्रमवर्त्ती नहीं है, अर्थात् प्रमाण चतुर्थ नयके समान अवक्तव्य भी नहीं है और तृतीय नयके समान वह क्रमसे भी दो धर्मोंका प्रतिपादन नहीं करता है, किन्तु दोनों धर्मोंका समकाल ही प्रतिपादन करता है। इसलिये नय युग्मसे प्रमाण भिन्न ही है।


यत्किल पुनः प्रमाणं वक्तुमलं वस्तुजातमिह यावत् ।
सदसदनेकैकमथो नित्यानित्यादिकं च युगपदिति ॥695॥

अर्थ: वह प्रमाण निश्चयसे वस्तु मात्रका प्रतिपादन करनेमें समर्थ है, अथवा सत् असत् एक अनेक, नित्य अनित्य, इत्यादि अनेक धर्मोंका युगपत् प्रतिपादन करनेमें प्रमाण ही समर्थ है ।


अथ तद्द्विधा प्रमाणं ज्ञानं प्रत्यक्षमथ परोक्षञ्च ।
असहायं प्रत्यक्षं भवति परोक्षं सहायसापेक्षम् ॥696॥

अर्थ: प्रमाणरूप ज्ञानके दो भेद हैं, (१) प्रत्यक्ष (२) परोक्ष । जो ज्ञान किसीकी सहायताकी अपेक्षा नहीं रखता वह प्रत्यक्ष है, और जो ज्ञान दूसरोंकी सहायताकी अपेक्षा रखता है वह परोक्ष है ।


प्रत्यक्षं द्विविधं तत्सकलप्रत्यक्षमक्षयं ज्ञानम् ।
क्षायोपशमिकमपरं देशप्रत्यक्षमक्षयं क्षयि च ॥697॥

अर्थ: प्रत्यक्ष दो प्रकारका है (१) सकल प्रत्यक्ष (२) विकल प्रत्यक्ष। जो अक्षय - अविनाशी ज्ञान है वह सकल प्रत्यक्ष है। दूसरा विकल प्रत्यक्ष अर्थात् देश प्रत्यक्ष कर्मोंके क्षयोपशमसे होता है। देश प्रत्यक्ष कर्मोंके क्षयसे नहीं होता है, तथा यह विनाशी भी है।


अयमर्थो यज्ज्ञानं समस्तकर्मक्षयोद्भवं साक्षात् ।
प्रत्यक्षं क्षायिकमिदमक्षातीतं सुखं तदक्षयिकम् ॥698॥

अर्थ: स्पष्ट अर्थ यह है कि जो ज्ञान समस्त कर्मोंके क्षयसे प्रकट होता है तथा जो साक्षात्-आत्म मात्र सापेक्ष होता है वह सकल प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है। वह प्रत्यक्ष ज्ञान क्षायिक है, इन्द्रियोंसे रहित है, आत्मीक सुख स्वरूप है, तथा अविनश्वर है।


देशप्रत्यक्षमिहाप्यवधिमनःपर्ययं च यज्ज्ञानम् ।
देशं नोइन्द्रियमन उत्थात् प्रत्यक्षमितरनिरपेक्षात् ॥699॥

अर्थ: अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान ये दो ज्ञान देश प्रत्यक्ष कहलाते हैं। देश प्रत्यक्ष इन्हें क्यों कहते हैं। देश तो इसलिये कहते हैं कि ये मनसे उत्पन्न होते हैं। प्रत्यक्ष इसलिये कहलाते हैं कि ये इतर इन्द्रियोंकी सहायतासे निरपेक्ष हैं।


आभिनिवोधिकबोधो विषयविषयिसन्निकर्षजस्तस्मात् ।
भवति परोक्षं नियमादपि च मतिपुरस्सरं श्रुतं ज्ञानम् ॥700॥

अर्थ: आभिनिबोधिक बोध अर्थात् मतिज्ञान पदार्थ और इन्द्रियोंके सन्निकर्षसे होता है इसलिये वह नियमसे परोक्ष है, और मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है, वह भी परोक्ष है ।

पूर्वार्द्ध 701 से 768 (श्लोक 701 से 768)

छद्मस्थावस्थायामावरणेन्द्रियसहायसापेक्षम् ।
यावज्ज्ञानचतुष्टयमर्थात् सर्वं परोक्षमिववाच्यम् ॥701॥

अर्थ: छद्मस्थ-अल्पज्ञ अवस्थामें जितने भी ज्ञान हैं-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय चारों ही आवरण और इन्द्रियोंकी सहायताकी अपेक्षा रखते हैं। इसलिये इन चारों ही ज्ञानोंको परोक्षके समान ही कहना चाहिये। अर्थात् मतिश्रुत तो परोक्ष कहे ही गये हैं परन्तु अवधि मनःपर्यय भी इन्द्रिय आवरणकी अपेक्षा रखते हैं इसलिये वे भी परोक्ष तुल्य ही हैं।


अवधिमनःपर्ययविद्द्वैतं प्रत्यक्षमेकदेशत्वात् ।
केवलमिदमुपचारादथ च विवक्षावशान्न चान्वर्थात् ॥702॥

अर्थ: अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान ये दो ज्ञान एक देश प्रत्यक्ष कहे गये हैं, परन्तु इनमें यह प्रत्यक्षता विवक्षावश केवल उपचारसे ही घटती है। वास्तवमें ये प्रत्यक्ष नहीं हैं।


तत्रोपचारहेतुर्यथा मतिज्ञानमक्षजं नियमात् ।
अथ तत्पूर्वं श्रुतमपि न तथावधिचित्तपर्ययं ज्ञानम् ॥703॥

अर्थ: उपचारका कारण भी यह है कि जिस प्रकार मतिज्ञान नियमसे इन्द्रियजन्य ज्ञान है, और उस मतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान भी इन्द्रियजन्य है । उस प्रकार अवधि और मनः पर्यय ज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं है इसीलिये अवधि और मनःपर्यय उपचारसे प्रत्यक्ष कहे जाते हैं ।


यत्स्यादवग्रहेहावायानतिधारणापरायत्तम् ।
आद्यं ज्ञानं द्वयमिह यथा तथा नैव चान्तिमं द्वैतम् ॥704॥

अर्थ: अवग्रह, ईहा, अवाय धारणाके पराधीन जिस प्रकार आदिके दो ज्ञान होते हैं उस प्रकार अन्तके दो नहीं होते ।


दूरस्थानर्थानिह समक्षमिव वेत्ति हेलया यस्मात् ।
केवलमेव मनःसादवधिमनः पर्ययद्वयं ज्ञानम् ॥705॥

अर्थ: अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान केवल मनकी सहायतासे दूरवर्त्ती पदार्थोंको कौतुकके समान प्रत्यक्ष जान लेते हैं ।


अपि किंवाभिनिबोधिकबोधद्वैतं तदादिमं यावत् ।
स्वात्मानुभूतिसमये प्रत्यक्षं तत्समक्षमिव नान्यत् ॥706॥

अर्थ: विशेष बात यह है कि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये आदिके दो ज्ञान भी स्वात्मानुभूतिके समय प्रत्यक्ष ज्ञानके समान प्रत्यक्ष हो जाते हैं, और समयमें नहीं।


तदिह द्वैतमिदं चित्स्पर्शादीन्द्रियविषयपरिग्रहणे ।
व्योमाद्यवगमकाले भवति परोक्षं न समक्षमिह नियमात् ॥707॥

अर्थ: वे ही मतिज्ञान श्रुतज्ञान जब स्पर्शादि इन्द्रियोंके विषयोंका (मानसिक) बोध करने लगते हैं तब वे नियमसे परोक्ष हैं, प्रत्यक्ष नहीं ।


ननु चाद्ये हि परोक्षे कथमिव सूत्रे कृतः समुद्देशः ।
अपि तल्लक्षणयोगात् परोक्षमिव सम्भवत्येतत् ॥708॥

अर्थ: ‘आद्ये परोक्षम्’ इस सूत्रमें मतिज्ञान श्रुतज्ञानको परोक्ष बतलाया गया है, तथा परोक्षका लक्षण भी इन दोनोंमें सुघटित होता है इसलिये ये दोनों ज्ञान परोक्ष हैं। फिर उन्हें स्वानुभूतिके समय प्रत्यक्ष क्यों बतलाया जाता है ?


सत्यं वस्तुविचारः स्यादतिशयवर्जितोऽविसंवादात् ।
साधारणरूपतया भवति परोक्षं तथा प्रतिज्ञायाः ॥709॥

अर्थ: ठीक है, परन्तु वस्तुका विचार अतिशय रहित होता है, उसमें कोई विवाद नहीं रहता। यद्यपि यह बात ठीक है और ऐसी ही सूत्रकारकी प्रतिज्ञा है कि साधारणरूपसे मतिज्ञान, श्रुतज्ञान परोक्ष हैं, परन्तु सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्व कर्मोदयके नाश होनेसे कोई ऐसी अनिर्वचनीय शक्ति प्रकट होजाती है कि जिसके द्वारा नियमसे स्वात्म प्रत्यक्ष होने लगता है।


इह सम्यग्दृष्टेः किल मिथ्यात्वोदयविनाशजा शक्तिः ।
काचिदनिर्वचनीया स्वात्मप्रत्यक्षमेतदस्ति यया ॥710॥

अर्थ: ठीक है, परन्तु वस्तुका विचार अतिशय रहित होता है, उसमें कोई विवाद नहीं रहता। यद्यपि यह बात ठीक है और ऐसी ही सूत्रकारकी प्रतिज्ञा है कि साधारणरूपसे मतिज्ञान, श्रुतज्ञान परोक्ष हैं, परन्तु सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्व कर्मोदयके नाश होनेसे कोई ऐसी अनिर्वचनीय शक्ति प्रकट होजाती है कि जिसके द्वारा नियमसे स्वात्म प्रत्यक्ष होने लगता है।


तदभिज्ञानं हि यथा शुद्धस्वात्मानुभूतिसमयेस्मिन् ।
स्पर्शनरसनघ्राणं चक्षुः श्रोत्रं च नोपयोगि मतम् ॥711॥

अर्थ: इसका कारण यह है कि इस शुद्ध स्वात्मानुभवके समयमें स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये पाचों इन्द्रियाँ उपयोगात्मक नहीं मानी गई हैं। अर्थात् शुद्ध-आत्मानुभवके समय इन्द्रियजन्य ज्ञान नहीं होता है, किन्तु -


केवलमुपयोगि मनस्तत्र च भवतीह तन्मनो द्वेधा ।
द्रव्यमनो भावमनो नोइन्द्रियनाम किल स्वार्थात् ॥712॥

अर्थ: केवल मन ही उस समय उपयुक्त होता है। वह मन दो प्रकार है। ( १ ) द्रव्यमन ( २ ) भावमन। मनका ही उसके अर्थानुसार दूसरा नाम नो इन्द्रिय है।


द्रव्यमनो हृत्कमले घनाङ्गुलासंख्यभागमात्रं यत् ।
अचिदपि च भावमनसः स्वार्थग्रहणे सहायतामेति ॥713॥

अर्थ: द्रव्यमन हृदय कमलमें होता है, वह घनाङ्गुलके असंख्यात मात्र भाग प्रमाण होता है। यद्यपि वह अचेतन - जड़ है तथापि भाव मन जिस समय पदार्थोंको विषय करता है उस समय द्रव्यमन उसकी सहायता करता है।


भावमनः परिणामो भवति तदात्मोपयोगमात्रं वा ।
लब्ध्युपयोगविशिष्टं स्वावरणस्य क्षयात्क्रमाच्च स्यात् ॥714॥

अर्थ: भावमन आत्माका ज्ञानात्मक परिणाम विशेष है। वह अपने प्रतिपक्षी-आवरण कर्मके क्षय होनेसे लब्धि और उपयोग सहित क्रमसे होता है।


स्पर्शनरसनघ्राणं चक्षुः श्रोत्रं च पञ्चकं यावत् ।
मूर्तग्राहकमेकं मूर्त्तामूर्त्तस्य वेदकं च मनः ॥715॥

अर्थ: स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये जितनी भी पाचों इन्द्रियां हैं सभी एक मूर्त्त पदार्थको ग्रहणकरनेवाली हैं। परन्तु मन मूर्त और अमूर्त दोनोंको जाननेवाला है।


तस्मादिदमनवद्यं स्वात्मग्रहणे किलोपयोगि मनः ।
किन्तु विशिष्टदशायां भवतीह मनः स्वयं ज्ञानम् ॥716॥

अर्थ: इसलिये वह बात निर्दोष रीतिसे सिद्ध होचुकी कि स्वात्माके ग्रहण करनेमें नियमसे मन ही उपयोगी है। किन्तु इतना विशेष है कि वह मन विशेष अवस्थामें अर्थात् अमूर्त पदार्थके ग्रहण करते समय स्वयं भी अमूर्त ज्ञानरूप हो जाता है।


नासिद्धमेतदुक्तं तदिन्द्रियानिन्द्रियोद्भवं सूत्रात् ।
स्यान्मतिज्ञाने यत्तत्पूर्वं किल भवेच्छ्रुतज्ञानम् ॥717॥

अर्थ: यह बात असिद्ध भी नहीं है, सूत्रद्वारा यह बतलाया जा चुका है कि मतिज्ञान तथा उस मतिज्ञान पूर्वक श्रुतज्ञान दोनों ही इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न होते हैं । इतना विशेष है कि भावमन विशेष (अमूर्त) ज्ञान विशिष्ट जब होता है तब वह स्वयं अमूर्त स्वरूप होजाता है । उस अमूर्त - मनरूप ज्ञानद्वारा आत्माका प्रत्यक्ष होता है इसलिये वह प्रत्यक्ष अतीन्द्रिय क्यों न हो ? अर्थात् केवल स्वात्माको जाननेवाला जो मानसिक ज्ञान है वह अवश्य अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष है ।


अयमर्थो भावमनो ज्ञानविशिष्टं स्वयं हि सदमूर्तम् ।
तेनात्मदर्शनमिह प्रत्यक्षमतीन्द्रियं कथं न स्यात् ॥718॥

अर्थ: यह बात असिद्ध भी नहीं है, सूत्रद्वारा यह वतलाया जा चुका है कि मतिज्ञान तथा उस मतिज्ञान पूर्वक श्रुतज्ञान दोनोंही इन्द्रिय और मनसे उत्पन्न होते हैं । इतना विशेष है कि भावमन विशेष (अमूर्त) ज्ञान विशिष्ट जब होता है तब वह स्वयं अमूर्त स्वरूप होजाता है । उस अमूर्त - मनरूप ज्ञानद्वारा आत्माका प्रत्यक्ष होता है इसलिये वह प्रत्यक्ष अतीन्द्रिय क्यों न हो ? अर्थात् केवल स्वात्माको जाननेवाला जो मानसिक ज्ञान है वह अवश्य अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष है ।


अपि चात्मसंसिद्ध्यै नियतं हेतू मतिश्रुती ज्ञाने ।
प्रान्त्यद्वयं विना स्यान्मोक्षो न स्यादृते मतिद्वैतम् ॥719॥

अर्थ: तथा आत्माकी भले प्रकार सिद्धिके लिये मतिश्रुत ये दो ही ज्ञान नियत कारण हैं । कारण इसका यह है कि अवधि और मनःपर्यय ज्ञानोंके विना तो मोक्ष होजाता हैं परन्तु मतिश्रुतके विना कदापि नहीं होता ।


ननु जैनानामेतन्मतं मतेष्वेव नापरेषां हि ।
विप्रतिपत्तौ बहवः प्रमाणमिदमन्यथा वदन्ति यतः ॥720॥

अर्थ: सम्पूर्ण मतोंमें जैनियोंके मतमें ही प्रमाणकी ऐसी व्यवस्था है, दूसरोंके यहां ऐसी नहीं है। यह विषय विवादग्रस्त है, क्योंकि बहुतसे मत प्रमाणका स्वरूप दूसरे ही प्रकार कहते हैं।


वेदाः प्रमाणमिति किल वदन्ति वेदान्तिनो विदाभासाः ।
यस्मादपौरुषेयाः सन्ति यथा व्योम ते स्वतः सिद्धाः ॥721॥

अर्थ: ज्ञानाभासी ( मिथ्याज्ञानी ) वेदान्त मतवाले कहते हैं कि वेद ही प्रमाण हैं। और वे पुरुषके बनाये हुए नहीं है, किन्तु आकाशके समान स्वतः सिद्ध हैं। अर्थात् जिसप्रकार आकाश अनादिनिधन स्वयं सिद्ध है किसीने उसे नहीं बनाया है उसी प्रकार वेद भी अनादिनिधन स्वयं सिद्ध हैं।


अपरे प्रमानिदानं प्रमाणमिच्छन्ति पण्डितम्मन्याः ।
समयन्तिसम्यगनुभवसाधनमिह यत्प्रमाणमिति केचित् ॥722॥

अर्थ: दूसरे मतवाले (नैयायिक) अपने आपको पण्डित मानते हुए प्रमाणका स्वरूप यह कहते हैं कि जो प्रमाका निदान हो वह प्रमाण है अर्थात् प्रमा नाम प्रमाणके फलका है। उस फलका जो साधकतम कारण है वही प्रमाण है ऐसा नैयायिक कहते हैं। दूसरे कोई ऐसा भी कहते हैं कि जो सम्यग्ज्ञानमें कारण पड़ता हो वही प्रमाण है। ऐसा प्रमाणका स्वरूप माननेवालोंमें वैशेषिक बौद्ध आदि कई मतवाले आजाते हैं जो कि आलोक, पदार्थ, सन्निकर्षादिको प्रमाण मानते हैं।


इत्यादि वादिवृन्दैः प्रमाणमालक्ष्यते यथारुचि तत् ।
आप्ताभिमानदग्धैरलब्धमानैरतीन्द्रियं वस्तु ॥723॥

अर्थ: जिन्होंने अतीन्द्रिय वस्तुके स्वरूपको नहीं पहचाना है, जो वृथा ही अपने आपको आप्तपनेके अभिमानसे जला रहे हैं ऐसे अनेक वादीगण प्रमाणका स्वरूप अपनी इच्छानुसार कहते हैं ।


प्रकृतमलक्षणमेतल्लक्षणदोषैरधिष्ठितं यस्मात् ।
स्यादविचारितरम्यं विचार्यमाणं खपुष्पवत्सर्वम् ॥724॥

अर्थ: जिन प्रमाणोंका ऊपर उल्लेख किया गया है वे सब दूषित हैं, कारण जो प्रमाणका लक्षण होना चाहिये वह लक्षण उनमें नाता ही नहीं है और जो कुछ उनका लक्षण किया गया है वह दोषोंसे विशिष्ट (सहित) है तथा अविचारित रम्य है । उन समस्त प्रमाणोंके लक्षणोंपर विचार किया जाय तो वे आकाशके पुष्पोंके समान मालूम होते हैं । अर्थात् असिद्ध ठहरते हैं । क्यों ? सो आगे कहा गया है । -


अर्थाद्यथा कथञ्चिज्ज्ञानादन्यत्र न प्रमाणत्वम् ।
करणादि विना ज्ञानादचेतनं कः प्रमाणयति ॥725॥

अर्थ: अर्थात् किसी भी प्रकार ज्ञानको छोड़कर अन्य किसी जड़ पदार्थमें प्रमाणता आ नहीं सकती है । विना ज्ञानके अचेतन करण, सन्निकर्ष इन्द्रिय आदिको कौन प्रमाण समझेगा ? अर्थात् प्रमाणका फल प्रमा - अज्ञान निवृत्तिरूप है, उसका कारण भी अज्ञान निवृत्तिरूप होना आवश्यक है इसलिये प्रमाण भी अज्ञान निवृत्ति ज्ञानस्वरूप होना चाहिये। जड़ पदार्थ प्रमेय हैं वे प्रमाण नहीं हो सकते हैं, अपने आपको जाननेवाला ही परका ज्ञाता हो सकता है जो स्वयं अज्ञानरूप है वह स्व - पर किसीको नहीं जना सकता है । इसलिये करण आदि जड़ हैं वे प्रमाण नहीं हो सकते, किन्तु ज्ञान ही प्रमाण है ।


तत्रान्तर्लीनत्वाज्ज्ञानसनाथं प्रमाणमिदमिति चेत् ।
ज्ञानं प्रमाणमिति यत्प्रकृतं न कथं प्रतीयेत ॥726॥

अर्थ: यदि यह कहा जाय कि करण आदि वाह्य कारण हैं उनमें भीतर जाननेवाला ज्ञान ही है इसलिये ज्ञान सहित करण आदि प्रमाण हैं, तो ऐसा कहनेसे वही बात सिद्ध हुई कि जो प्रकृतमें हम (जैन) कह रहे हैं अर्थात् ज्ञान ही प्रमाण है । यही बात सिद्ध होगई ।


ननु फलभूतं ज्ञानं तस्य तु करणं भवेत्प्रमाणमिति ।
ज्ञानस्य कृतार्थत्वात् फलवत्त्वमसिद्धमिदामिति चेत् ॥727॥

अर्थ: ज्ञानको प्रमाणका फल मानना चाहिये, उसके कारणको प्रमाण मानना चाहिये। यदि ज्ञानको ही प्रमाण मान लिया जाय तो ज्ञानका प्रयोजन तो हो चुका फिर फल क्या होगा? फिर फल असिद्ध ही होगा।


नैवं यतः प्रमाणं फलं च फलवच्च तत्स्वयं ज्ञानम् ।
दृष्टिर्यथा प्रदीपः स्वयं प्रकाश्यः प्रकाशकश्च स्यात् ॥728॥

अर्थ: ऊपर की हुई शंका ठीक नहीं है, क्योंकि प्रमाण, उसका फल, उसका कारण स्वयं ज्ञान ही है। जिस प्रकार दीपक स्वयं अपना भी प्रकाश करता है और दूसरोंका भी प्रकाश करता है, अथवा दीपक स्वयं प्रकाश्य (जिसका प्रकाश किया जाय) भी है और वही प्रकाशक है।


उक्तं कदाचिदिन्द्रियमथ च तदर्थेन सन्निकर्षयुतम् ।
भवति कदाचिज्ज्ञानं त्रिविधं करणं प्रमायाश्च ॥729॥

अर्थ: कभी इन्द्रियोंको प्रमाण कहा गया है, कभी इन्द्रिय और पदार्थके सन्निकर्षको प्रमाण कहा गया है, कभी ज्ञानको ही प्रमाण कहा गया है। इस प्रकार तीन प्रकार प्रमा (प्रमाणका फल)का करण अर्थात् प्रमाणका परम साधक कारण कहा गया है। ये तीनों ही आत्माकी अवस्थायें हैं। पहली इन्द्रियरूप अवस्था भी आत्मावस्था है, सन्निकर्ष विशिष्ट अवस्था भी आत्मावस्था है। तथा ज्ञानावस्था भी आत्मावस्था है, अर्थात् तीनों ही ज्ञान रूप हैं। इन तीनोंमें पहला पहला करण पड़ता है और आगे आगेका फल पड़ता है। इसलिये यह बात न्यायसे सिद्ध हो चुकी कि ज्ञान ही फल है और ज्ञान ही प्रमाण है।


पूर्वं पूर्वं करणं तत्र फलं चोत्तरोत्तरं ज्ञेयम् ।
न्यायात्सिद्धमिदं चित्फलं च फलवच्च तत्स्वयं ज्ञानम् ॥730॥

अर्थ: कभी इन्द्रियोंको प्रमाण कहा गया है, कभी इन्द्रिय और पदार्थके सन्निकर्षको प्रमाण कहा गया है, कभी ज्ञानको ही प्रमाण कहा गया है। इस प्रकार तीन प्रकार प्रमा (प्रमाणका फल)का करण अर्थात् प्रमाणका परम साधक कारण कहा गया है। ये तीनों ही आत्माकी अवस्थायें हैं। पहली इन्द्रियरूप अवस्था भी आत्मावस्था है, सन्निकर्ष विशिष्ट अवस्था भी आत्मावस्था है। तथा ज्ञानावस्था भी आत्मावस्था है, अर्थात् तीनों ही ज्ञान रूप हैं। इन तीनोंमें पहला पहला करण पड़ता है और आगे आगेका फल पड़ता है। इसलिये यह बात न्यायसे सिद्ध हो चुकी कि ज्ञान ही फल है और ज्ञान ही प्रमाण है।


तत्रापि यदा करणं ज्ञानं फलसिद्धिरस्ति नाम तदा ।
अविनाभावेन चितो हानोपादानबुद्धिसिद्धित्वात् ॥731॥

अर्थ: उनमें भी जिस समय ज्ञान करण पड़ता है, उस समय अविनाभावसे आत्माकी हान उपादान रूपा बुद्धि उसका फल पड़ता है अर्थात् पूर्व ज्ञान करण और उत्तर ज्ञान फल पड़ता है और यह बात असिद्ध भी नहीं है।


नाप्येतदप्रसिद्धं साधनसाध्यद्वयोः सदृष्टान्तात् ।
न विना ज्ञानात्त्यागो भुजगादेर्वा स्रगाद्युपादानम् ॥732॥

अर्थ: साधन भी ज्ञान पड़ता है और साध्य भी ज्ञान पड़ता है यह बात असिद्ध नहीं है किन्तु दृष्टान्तसे सुसिद्ध है। यह बात प्रसिद्ध है कि ज्ञानके विना सर्पादिका त्याग और माला आदि इष्ट पदार्थोंका ग्रहण नहीं होता है।


उक्तं प्रमाणलक्षणमिह यदनार्हतं कुवादिभिः स्वैरम् ।
तल्लक्षणदोषत्वात्तत्सर्वं लक्षणाभासम् ॥733॥

अर्थ: जो कुछ प्रमाणका लक्षण कुवादियोंने कहा है वह आर्हत ( जैन ) लक्षण नहीं है, किन्तु उन्होंने स्वेच्छा पूर्वक कहा है, उसमें लक्षणके दोष आते हैं इसलिये वह लक्षण नहीं किन्तु लक्षणाभास है ।


स यथा चेत्प्रमाणं लक्ष्यं तल्लक्षणं प्रमाकरणम् ।
अव्याप्तिको हि दोषः सदेश्वरे चापि तदयोगात् ॥734॥

अर्थ: यदि प्रमाण लक्ष्य है, उसका प्रमाकरण लक्षण है तो अव्याप्ति दोष आता है, क्योंकि ईश्वरमें उस लक्षणका सदा अभाव रहता है ।


योगिज्ञानेपि तथा न स्यात्तल्लक्षणं प्रमाकरणम् ।
परमाण्वादिषु नियमान्न स्यात्तत्सन्निकर्षश्च ॥735॥

अर्थ: इसी प्रकार जो लोग प्रमाकरण प्रमाणका लक्षण करते हैं उनके यहां योगियोंके ज्ञानमें भी उक्त लक्षण नहीं जाता है, क्योंकि उन्हीं लोगोंने योगियोंके ज्ञानको दिव्य ज्ञान माना है वह सूक्ष्म और अमूर्त पदार्थोंका भी प्रत्यक्ष करता है ऐसा वे स्वीकार करते हैं परन्तु परमाणु आदि पदार्थोंमें इन्द्रिय सन्निकर्ष नियमसे नहीं हो सक्ता है ।


वेदाः प्रमाणमत्र तु हेतुः केवलमपौरुषेयत्वम् ।
आगमगोचरताया हेतोरन्याश्रितादहेतुत्वम् ॥736॥

अर्थ: वेदको प्रमाण माननेवाले वेदान्ती तो केवल अपौरुषेय हेतु द्वारा उसमें प्रमाणता लाते हैं। दूसरा उनका हेतु आगम है, आगम प्रमाणरूप हेतु अन्योन्याश्रय दोष आनेसे अहेतु हो जाता है।


एवमनेकविधं स्यादिह मिथ्यामतकदम्बकं यावत् ।
अनुपादेयमसारं वृद्धैः स्याद्वादवेदिभिः समयात् ॥737॥

अर्थ: इसप्रकार जितना भी अनेक विध प्रचलित मिथ्या मतोंका समूह है वह सब असार है, इसलिये वह शास्त्रानुसार स्याद्वादवेदी - वृद्ध पुरुषों द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं है।


उक्तं प्रमाणलक्षणमनुभवगम्यं यथागमज्ञानात् ।
अधुना निक्षेपपदं संक्षेपाल्लक्ष्यते यथालक्ष्म ॥738॥

अर्थ: आगमज्ञानके अनुसार अनुभवमें आने योग्य प्रमाणका लक्षण कहा गया। अब संक्षेपसे निक्षेपोंका स्वरूप उनके लक्षणानुसार कहा जाता है।


ननु निक्षेपो न नयो नच प्रमाणं न चांशकं तस्य ।
पृथगुद्देश्यत्वादपि पृथगिव लक्ष्यं स्वलक्षणादितिचेत् ॥739॥

अर्थ: निक्षेप न नय है, और न प्रमाण है, न उसका अंश है, नय प्रमाणसे निक्षेपका उद्देश्य ही जुदा है। उद्देश्य जुदा होनेसे उसका लक्षण ही जुदा है, इसलिये लक्ष्य भी स्वतन्त्र होना चाहिये ? अर्थात् निक्षेप नय प्रमाणसे जब जुदा है तो उनके समान इसका भी स्वतन्त्र ही उल्लेख करना चाहिये ?


सत्यं गुणसाक्षेपो सविपक्षः स च नयः स्वपक्षपतिः ।
य इह गुणाक्षेपः स्यादुपचरितः केवलं स निक्षेपः ॥740॥

अर्थ: नय तो गौण और मुख्यकी अपेक्षा रखता है, इसीलिये वह विपक्ष सहित है। नय सदा अपने ( विवक्षित ) पक्षका स्वामी है अर्थात् वह विवक्षित पक्ष पर आरूढ़ रहता है और दूसरे प्रतिपक्ष नयकी अपेक्षा भी रखता है, निक्षेपमें यह बात नहीं है, यहां पर तो गौण पदार्थमें मुख्यका आक्षेप किया जाता है, इसलिये निक्षेप केवल उपचरित है।


निक्षेपः स चतुर्धा नाम ततः स्थापना ततो द्रव्यम् ।
भावस्तल्लक्षणमिह भवति यथा लक्ष्यतेऽधुना चार्थात् ॥741॥

अर्थ: निक्षेप चार प्रकार है - (१) नाम निक्षेप, (२) स्थापना निक्षेप (३) द्रव्य निक्षेप (४) भाव निक्षेप। अब इन चारोंका लक्षण कहा जाता है।


वस्तुन्यतद्गुणे खलु संज्ञाकरणं जिनो यथा नाम ।
सोऽयं तत्समरूपे तद्बुद्धिः स्थापना यथा प्रतिमा ॥742॥

अर्थ: किसी वस्तुमें उसके नामके अनुसार गुण तो न हों, केवल व्यवहार चलानेके लिये उसका नाम रख देना नाम निक्षेप हैं। जैसे किसी पुरुषमें कर्मोंके जीतनेका गुण सर्वथा नहीं है, वह मिथ्यादृष्टि है उसको बुलानेके लिये ‘जिन’ यह नाम रख दिया जाता है।
किसी समान आकारवाले अथवा असमान आकारवाले पदार्थमें गुण तो न हों, परन्तु उसमें गुणोंकी बुद्धि रखना और उसका ‘यह वही है’ ऐसा व्यवहार करना स्थापना निक्षेप है। जैसे - प्रतिमा, जैसे पार्श्वनाथकी प्रतिमाको मंदिरमें हम पूजते हैं, यद्यपि प्रतिमा पुरुषाकार है परन्तु है पाषाणकी। उस पाषाणकी प्रतिमामें उन पार्श्वनाथ भगवानके जीवकी जो कि अनन्तगुण धारी - अर्हन् हैं (थे) स्थापना करना और व्यवहार करना कि यह प्रतिमा ही पार्श्वनाथ है स्थापना निक्षेप है।


ऋजुनयनिरपेक्षतया, सापेक्षं भाविनैगमादिनयैः ।
छद्मस्थो जिनजीवो जिन इव मान्यो यथात्र तद्द्रव्यम् ॥743॥

अर्थ: ऋजुसूत्र नयकी अपेक्षा नहीं रखनेवाला किन्तु भाविनैगम आदि नयोंकी अपेक्षा रखनेवाला द्रव्य निक्षेप है। जैसे - छद्मस्थ जिनके जीवको साक्षात् जिनके समान समझना।


तत्पर्यायो भावो यथा जिनः समवशरणसंस्थितिकः ।
घातिचतुष्टयरहितो ज्ञानचतुष्टययुतो हि दिव्यवपुः ॥744॥

अर्थ: वर्त्तमानमें जो पदार्थ जिस पर्याय सहित हैं उसी पर्यायवाला उसे कहना भाव निक्षेप है। जैसे समवशरणमें विराजमान, चार घातियाकर्मोंसे रहित, अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्तसुख, अनन्तवीर्य, इस ज्ञानचतुष्टय (अनन्त चतुष्टय) से विशिष्ट, परम औदारिक शरीरवाले अरहन्त - जिनको जिन कहना।


दिङ्मात्रमत्र कथितं व्यासादपि तच्चतुष्टयं यावत् ।
प्रत्येकमुदाहरणं ज्ञेयं जीवादिकेषु चार्थेषु ॥745॥

अर्थ: यहांपर चारों निक्षेपोंका डिङ्मात्र (संक्षिप्त) स्वरूप कहा गया है । इनका विस्तारसे कथन और प्रत्येकका उदाहरण जीवादि पदार्थोंमें सुघटित जानना चाहिये । दूसरे ग्रन्थमें भी सोदाहरण चारों निक्षेपोंका उल्लेख इस प्रकार है -


उक्तं गुरूपदेशान्नयनिक्षेपप्रमाणमिति तावत् ।
द्रव्यगुणपर्ययाणामुपरि यथासंभवं दधाम्यधुना ॥746॥

अर्थ: गुरु (पूर्वाचार्य) के उपदेशसे नय, निक्षेप और प्रमाणका स्वरूप मैंने कहा । अब उनको द्रव्य गुण पर्यायोंके ऊपर यथायोग्य मैं ( ग्रन्थकार ) घटाता हूँ ।


तत्त्वमनिर्वचनीयं शुद्धद्रव्यार्थिकस्य भवति मतम् ।
गुणपर्ययवद्द्रव्यं पर्यायार्थिकनयस्य पक्षोऽयम् ॥747॥

अर्थ: तत्त्व अनिर्वचनीय है अर्थात् बचनके अगोचर है । यह शुद्ध द्रव्यार्थिक नय का पक्ष है । तथा तत्त्व (द्रव्य) गुण पर्यायवाला है यह पर्यायार्थिक नयका पक्ष है ।


यदिदमनिर्वचनीयं गुणपर्ययवत्तदेव नास्त्यन्यत् ।
गुणपर्ययवद्यदिदं तदेव तत्त्वं तथा प्रमाणमिति ॥748॥

अर्थ: जो तत्त्व अनिर्वचनीय है वही गुण पर्यायवाला है, अन्य नहीं है तथा जो तत्त्व गुण पर्यायवाला है, वही तत्त्व है, यही प्रमाणका विषय है।


यद्द्रव्यं तन्न गुणो योपि गुणस्तन्न द्रव्यमिति चार्थात् ।
पर्यायोपि यथा स्याद्ऋजुनयपक्षः स्वपक्षमात्रत्वात् ॥749॥

अर्थ: जो द्रव्य है, वह गुण नहीं है, जो गुण है वह द्रव्य नहीं है, तथा जो द्रव्य गुण है वह पर्याय नहीं है। यह ऋजुसूत्र नय ( पर्यायार्थिक ) का पक्ष है क्योंकि भेद पक्ष ही पर्यायार्थिक नयका पक्ष है। तथा जो द्रव्य है वही गुण है, जो गुण है वही द्रव्य है। गुण द्रव्य दोनोंका एक ही अर्थ है। यह अभेदपक्ष द्रव्यार्थिक नयका पक्ष है तथा भेद और अभेद इन दोनों पक्षोंमें समर्थ विवक्षित प्रमाण पक्ष है।


यदिदं द्रव्यं स गुणो योपि गुणो द्रव्यमेतदेकार्थात् ।
तदुभयपक्षे दक्षो विवक्षितः प्रमाणपक्षोऽयम् ॥750॥

अर्थ: जो द्रव्य है, वह गुण नहीं है, जो गुण है वह द्रव्य नहीं है, तथा जो द्रव्य गुण है वह पर्याय नहीं है। यह ऋजुसूत्र नय ( पर्यायार्थिक ) का पक्ष है क्योंकि भेद पक्ष ही पर्यायार्थिक नयका पक्ष है। तथा जो द्रव्य है वही गुण है, जो गुण है वही द्रव्य है। गुण द्रव्य दोनोंका एक ही अर्थ है। यह अभेदपक्ष द्रव्यार्थिक नयका पक्ष है तथा भेद और अभेद इन दोनों पक्षोंमें समर्थ विवक्षित प्रमाण पक्ष है।


पृथगादानमशिष्टं निक्षेपो नयविशेष इव यस्मात् ।
तदुद्दारणं नियमादस्ति नयानां निरूपणावसरे ॥751॥

अर्थ: नय और प्रमाणके समान निक्षेपोंका स्वतन्त्र निरूपण करना व्यर्थ है, क्योंकि निक्षेपोंका उदाहरण नयोंके विवेचनमें नियमसे किया गया है।


अस्ति द्रव्यं गुणोऽथवा पर्यायस्तत्त्रयं मिथोऽनेकम् ।
व्यवहारैकविशिष्टो नयः स वाऽनेकसंज्ञको न्यायात् ॥752॥

अर्थ: द्रव्य, अथवा गुण अथवा पर्याय, ये तीनों ही अनेक हैं । व्यवहार विशिष्ट यही नय अनेक संज्ञक कहलाता है, अर्थात् व्यवहार नाम पर्यायका है पर्याय विशिष्ट अनेक अनेक पर्यायार्थिक नय कहलाता है ।


एकं सदिति द्रव्यं गुणोऽथवा पर्ययोऽथवा नाम्ना ।
इतरद्वयमन्यतरं लब्धमनुक्तं स एकनयपक्षः ॥753॥

अर्थ: द्रव्य अथवा गुण अथवा पर्याय ये तीनों ही एक नामसे सत् कहे जाते हैं। अर्थात् तीनों ही अभिन्न एक सतरूप हैं। एकके कहनेसे बाकीके दो का विना कहे हुए ही ग्रहण हो जाता है। यही एक नयका पक्ष है अर्थात् एक पर्यायार्थिक नयका पक्ष है।


न द्रव्यं नापि गुणो नच पर्यायो निरंशदेशत्वात् ।
व्यक्तं न विकल्पादपि शुद्धद्रव्यार्थिकस्य मतमेतत् ॥754॥

अर्थ: न द्रव्य है, न गुण है, न पर्याय है और न विकल्पद्वारा ही प्रकट है किन्तु निरंश देशात्मक (तत्त्व) है । यह शुद्ध द्रव्यार्थिक नयका पक्ष है ।


द्रव्यगुणपर्ययाख्यैर्यदनेकं सद्विभिद्यते हेतोः ।
तदभेद्यमनंशत्वादेकं सदिति प्रमाणमतमेतत् ॥755॥

अर्थ: कारण वश जो सत् द्रव्यगुण पर्यायोंके द्वारा अनेक रूप भिन्न किया जाता है वही सत् अंश रहित होनेसे अभिन्न एक है। यह एक अनेकात्मक उभयरूप प्रमाणपक्ष है।


अपि चास्ति सामान्यमात्रादथवा विशेषमात्रत्वात् ।
अविवक्षितो विपक्षो यावदनन्यः स तावदस्ति नयः ॥756॥

अर्थ: वस्तु सामान्यमात्रसे है, अथवा विशेषमात्रसे है। जब तक विपक्षनय अविवक्षित (गौण) रहता है तबतक अनन्यरूपसे एक अस्ति नय ही प्रधान रहता है।


नास्ति च तदिह विशेषैः सामान्यस्याविवक्षितायां वा ।
सामान्यैरितरस्य च गौणत्वे सति भवति नास्ति नयः ॥757॥

अर्थ: वस्तु सामान्यकी अविवक्षामें विशेषरूपसे नहीं है, अथवा विशेषकी अविवक्षामें सामान्यरूपसे नहीं है यहां पर नास्ति नय ही प्रधान रहता है ।


द्रव्यार्थिकनयपक्षादस्ति न तत्त्वं स्वरूपतोपि ततः ।
नच नास्ति परस्वरूपात् सर्वविकल्पातिगं यतो वस्तु ॥758॥

अर्थ: द्रव्यार्थिकनयकी अपेक्षासे वस्तु स्वरूपसे भी अस्तिरूप नहीं है, क्योंकि सर्व विकल्पोंसे रहित ही वस्तुका स्वरूप है।


यदिदं नास्ति स्वरूपाभावादस्ति स्वरूपसद्भावात् ।
तद्वाच्यात्ययरचितं वाच्यं सर्वं प्रमाणपक्षस्य ॥759॥

अर्थ: जो वस्तु स्वरूपाभावसे नास्तिरूप है और जो स्वरूप सद्भावसे अस्तिरूप है वही वस्तु विकल्पातीत (अवक्तव्य) है। यह सव प्रमाण पक्ष है, अर्थात् पर्यायार्थिक नयसे अस्तिरूप और द्रव्यार्थिक नयसे विकल्पातीत तथा प्रमाणसे उभयात्मक वस्तु है।


उत्पद्यते विनश्यति सदिति यथास्वं प्रतिक्षणं यावत् ।
व्यवहार विशिष्टोऽयं नियतमनित्यो नयः प्रसिद्धः स्यात् ॥760॥

अर्थ: सत् - पदार्थ अपने आप प्रतिक्षण उत्पन्न होता है और विनष्ट होता है। यह प्रसिद्ध व्यवहार विशिष्ट अनित्य नय अर्थात् अनित्य व्यवहार (पर्यायार्थिक) नय है।


नोत्पद्यते न नश्यति ध्रुवमिति सत्स्यादनन्यथावृत्तेः ।
व्यवहारान्तर्भूतो नयः स नित्योऽप्यनन्यशरणः स्यात् ॥761॥

अर्थ: सत् न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है, किन्तु अन्यथा भाव न होनेसे वह नित्य है। यह अनय शरण (स्वपक्ष नियत) नित्य व्यवहार नय है।


न विनश्यति वस्तु यथा वस्तु तथा नैव जायते नियमात्
स्थितिमेति न केवलमिह भवति स निश्चयनयस्य पक्षश्च ॥762॥

अर्थ: जिसप्रकार वस्तु नष्ट नहीं होता है, उस प्रकार वह नियमसे उत्पन्न भी नहीं होता है, तथा ध्रुव भी नहीं है। यह केवल निश्चय नयका पक्ष है।


यदिदं नास्ति विशेषैः सामान्यस्याविवक्षया तदिदम्
उन्मज्जत्सामान्यैरस्ति तदेतत्प्रमाणमविशेषात् ॥763॥

अर्थ: जो वस्तु सामान्यकी अविवक्षामें विशेषोंसे नहीं है, वही वस्तु सामान्यकी विवक्षासे है, यही सामान्य रीतिसे प्रमाण पक्ष है ।


अभिनवभाव परिणतेर्योयं वस्तुन्यपूर्वसमयोयः ।
इति यो वदति स कश्चित् पर्यायार्थिकनयेष्वभावनयः ॥764॥

अर्थ: नवीन परिणाम धारण करनेसे वस्तुमें नवीन ही भाव होता है, ऐसा जो कोई कहता है वह पर्यायार्थिक नयोंमें अभाव नय है ।


परिणममानेपि तथा भूतैर्भावैर्विनश्यमानेपि ।
नायमपूर्वो भावः पर्यायार्थिकविशिष्टभावनयः ॥765॥

अर्थ: वस्तुके परिणमन करनेपर भी तथा उसके पूर्व भावोंकेविनष्ट होनेपर भी वस्तुमें नवीन भाव नहीं होता है किन्तु जैसेका तैसा ही रहता है, वह पर्यायार्थिक भाव नय है।


शुद्धद्रव्यादेशादभिनवभावो न सर्वतो वस्तुनि ।
नाप्यनभिनवश्च यतः स्यादभूतपूर्वो न भूतपूर्वो वा ॥766॥

अर्थ: शुद्ध द्रव्यार्थिक नयसे वस्तुमें सर्वथा नवीन भाव भी नहीं होता है, तथा प्राचीन भाव भी नहीं रहता है, क्योंकि वस्तु न तो अभूतपूर्व है और न भूतपूर्व है। अर्थात् शुद्ध द्रव्यार्थिक दृष्टिसे वस्तु न नवीन है और न पुरानी है किन्तु जैसी है वैसी ही है।


अभिनवभावैर्यदिदं परिणममानं प्रतिक्षणं यावत् ।
असदुत्पन्नं नहि तत्सन्नष्टं वा न प्रमाणमतमेतत् ॥767॥

अर्थ: जो सत् प्रतिक्षण नवीन २ भावोंसे परिणमन करता है वह न तो असत् उत्पन्न होता है और न सत् विनष्ट ही होता है यही प्रमाण पक्ष है ।


इत्यादि यथासम्भवमुक्तमिवानुक्तमपि च नयचक्रम् ।
भोज्यं यथागमादिह प्रत्येकमनेकभावयुतम् ॥768॥

अर्थ: इत्यादि अनेक धर्मोको धारण करनेवाला और भी नयसमूह जो यहां पर नहीं कहा गया है, उसे भी कहे हुए के तुल्य ही समझना चाहिये, तथा हर एक नयको आगमके अनुसार यथायोग्य (जहां जैसी अपेक्षा हो) घटाना चाहिये।

उत्तरार्द्ध 1 से 100 (श्लोक 1 से 100)

सिद्धं विशेषवद्वस्तु सत्सामान्यं स्वतो यथा ।
नासिद्धो धातुसंज्ञोपि कश्चित् पीतः सितोऽपरः ॥1॥

अर्थ: जिस प्रकार वस्तुका सामान्य धर्म स्वयं सिद्ध है उसी प्रकार वस्तुका विशेष धर्म भी स्वतः सिद्ध है । जिसमें सामान्य धर्म पाया जाता है उसीमें विशेष धर्म भी पाया जाता है यह बात असिद्ध नहीं हैं । जिस प्रकार किसी वस्तुकी ‘‘धातु’’ संज्ञा रखदी जाती है यह तो सामान्य है, चांदी भी धातु कहलाती है, सोना भी धातु कहलाता है इसलिये धातु शब्द तो सामान्य है परन्तु कोई धातु पीली है और कोई सफेद है । यह पीले और सफेदका जो कथन है वह विशेषकी अपेक्षासे है ।


बहुव्यापकमेवैतत् सामान्यं सदृशत्वतः
अस्त्यल्पव्यापको यस्तु विशेषः सदृशेतरः ॥2॥

अर्थ: सामान्य बहुत वस्तुओंमें रहता है । क्योंकि अनेक वस्तुओंमें रहनेवाले समान धर्मको ही सामान्य कहते हैं । विशेष बहुत वस्तुओंमें नहीं रहता, किंतु खास२ वस्तुओंमें जुदा जुदा रहता है । जो बहुत देशमें रहे उसे व्यापक कहते हैं और जो थोड़े देशमें रहे उसे व्याप्य कहते हैं । सामान्य व्यापक है और विशेष व्याप्य है ।


जीवाजीवविशेषोस्ति द्रव्याणां शब्दतोर्थतः ।
चेतनालक्षणो जीवः स्यादजीवोऽप्यचेतनः ॥3॥

अर्थ: द्रव्यके मूलमें दो भेद हैं जीव द्रव्य और अजीव द्रव्य । ये दोनों भेद शब्दकी अपेक्षासे भी हैं और अर्थकी अपेक्षासे भी हैं । जीव और अजीव ये दो बाचक रूप शब्द हैं । इनके वाच्य भी दो प्रकार हैं एक जीव और दूसरा अजीव । इस प्रकार शब्दकी अपेक्षासे दो भेद हैं । अर्थकी अपेक्षासे भी दो भेद हैं । जिसमें ज्ञान दर्शनादिक गुण पाये जांय, वह जीव द्रव्य है और जिसमें ज्ञान दर्शन आदिक गुण न पाये जांय वह अजीव द्रव्य है ।


नासिद्धं सिद्धदृष्टान्ताच्चेतनाऽचेतनद्वयम् ।
जीवद्वपुर्घटादिभ्यो विशिष्टं कथमन्यथा ॥4॥

अर्थ: जीव और अजीव अथवा चेतन और अचेतन ये दो पदार्थ हैं यह बात असिद्ध नहीं है प्रसिद्ध दृष्टान्तसे जीव और अजीव दोनोंकी सिद्धि हो जाती है । यदि जीव और अजीव दोनोंको जुदे जुदे न मानकर एक रूप ही मान लिया जाय तो जीते हुए शरीरमें और घट वस्त्र आदिक जड़ पदार्थोंमें प्रत्यक्ष अन्तर दीखता है वह नहीं दीखना चाहिये इस प्रत्यक्ष भेदसे ही जीव और अजीवकी भिन्न भिन्न सिद्धि हो जाती है ।


अस्ति जीवः सुखादीनां संवेदनसमक्षतः ।
यो नैवं स न जीवोस्ति सुप्रसिद्धो यथा घटः ॥5॥

अर्थ: जीव एक स्वतन्त्र पदार्थ है इस विषयमें सुखादिकोंका स्वसंवेदन ज्ञानही प्रमाण है जो सुखादिकका अनुभव नहीं करता है वह जीव भी नहीं है, जिस प्रकार कि एक घड़ा।


इति हेतुसनाथेन प्रत्यक्षेणावधारितः ।
साध्यो जीवस्स्वसिद्ध्यर्थमजीवश्च ततोऽन्यथा ॥6॥

अर्थ: जीवः अस्ति स्वसंवेदनप्रत्यक्षत्वात् ” पूर्वोक्त श्लोकके अनुसार इस अनुमानसे जीवकी सिद्धि होती है । ऊपरके अनुमान वाक्यमें स्वसंवेदन हेतु प्रत्यक्षरूप है । जीवका अस्तित्व (सत्ता) साध्य है । जिसमें पूर्वोक्त स्वसंवेदन प्रत्यक्ष रूप हेतु नहीं है वह जीवसे भिन्न अजीव पदार्थ ह ।


मूर्तामूर्तविशेषश्च द्रव्याणां स्यान्निसर्गतः ।
मूर्तं स्यादिन्द्रियग्राह्यं तदग्राह्यममूर्तिमत् ॥7॥

अर्थ: छहों द्रव्योंमें कुछ द्रव्य तो मूर्त हैं और कुछ अमूर्त हैं द्रव्योंमें यह मूर्त और अमूर्तका भेद स्वभावसे ही है किसी निमित्तसे किया हुआ नहीं है । जो इन्द्रियोंसे जाना जाय उसे मूर्त कहते हैं और जो इन्द्रियोंके गोचर न हो उसे अमूर्त कहते हैं।


न पुनर्वास्तवं मूर्तममूर्तं स्यादवास्तवम् ।
सर्वशून्यादिदोषाणां सन्निपातात्तथा सति ॥8॥

अर्थ: मूर्त पदार्थ ही वास्तविक है अमूर्त पदार्थ वास्तविक नहीं है यह बात भी नहीं है क्योंकि ऐसा माननेसे सब पदार्थोंकी शून्यताका प्रसंग आ जायगा ।


स्पर्शो रसश्च गन्धश्च वर्णोऽमी मूर्तिसंज्ञकाः ।
तद्योगान्मूर्तिमद्द्रव्यं तदयोगादमूर्तिमत् ॥9॥

अर्थ: रूप, रस, गन्ध, वर्णका नाम ही मूर्ति है। जिसमें मूर्ति पाई जाय वही मूर्त द्रव्य कहलाता है और जिसमें रूप, रस, गन्ध, वर्णरूप मूर्ति नहीं पाई जाय वही अमूर्त द्रव्य कहलाता है।


नासंभवं भवदेतत् प्रत्यक्षानुभवाद्यथा ।
सन्निकर्षोस्ति वर्णाद्यैरिन्द्रियाणां न चेतरैः ॥10॥

अर्थ: इन्द्रियोंका रूपादिकके साथ ही सम्बन्ध होता है और दूसरे पदार्थोंके साथ नहीं होता यह बात असंभव नहीं है किन्तु प्रत्यक्ष और अनुभवसे सिद्ध है।


नन्वमूर्तार्थसद्भावे किं प्रमाणं वदाद्य नः ।
यद्विनापीन्द्रियार्थानां सन्निकर्षात् खपुष्पवत् ॥11॥

अर्थ: यहां पर शङ्काकार कहता है कि अमूर्त पदार्थ भी हैं इसमें क्या प्रमाण है - क्योंकि जितने पदार्थ हैं उन सबका इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध होता है। अमूर्त पदार्थका इन्द्रियोंके साथ सम्बन्ध नहीं होता है इसलिये उसका मानना ऐसा ही है जिस प्रकार कि आकाशके फूलोंका मानना ।


नैवं यतः सुखादीनां संवेदनसमक्षतः ।
नासिद्धं वास्तवं तत्र किंत्वसिद्धं रसादिमत् ॥12॥

अर्थ: अमूर्त पदार्थकी सत्तामें कोई प्रमाण नहीं है ऐसा शङ्काकारका कहना ठीक नहीं है । क्योंकि सुख दुःखादिकका स्वसंवेदन होनेसे आत्मा भले प्रकार सिद्ध है सुख दुःखादिककाप्रत्यक्ष करनेवाला आत्मा असिद्ध नहीं है परन्तु उसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श मानना असिद्ध है ।
वास्तवमें इन्द्रियज्ञान मलिन ज्ञान है और इसीलिये यथार्थ दृष्टिसे वह परोक्ष है । उसक विषय भी बहुत थोड़ा और मोटा है । सूक्ष्म पदार्थोंका विशद बोध अतीन्द्रिय प्रत्यक्षसे ही होता है । इसलिये जिनका इन्द्रिय ज्ञान होता है वे ही पदार्थ ठीक हैं बाकी कुछ नहीं, ऐसा मानना किसी तरह युक्ति सङ्गत नहीं है ।


तद्यथा तद्रसज्ञानं स्वयं तन्न रसादिमत् ।
यस्माज्ज्ञानं सुखं दुःखं यथा स्यान्न तथा रसः ॥13॥

अर्थ: ऊपरके श्लोकमें रसादिक आत्मासे भिन्न ही बतलाये हैं । उसी बातको यहाँपर खुलासा करते हैं । आत्मामें जो रसका ज्ञान होता है वह ज्ञान ही है । रस ज्ञान होनेसे ज्ञान रसवाला नहीं हो जाता है क्योंकि रस पुद्गलका गुण है वह जीवमें किस तरह आसकता है । यदि रस भी आत्मामें पाया जाता तो जिस प्रकार ज्ञान, सुख, दुःखका अनुभव होनेसे ज्ञानी सुखी दुःखी आत्मा बन जाता है उसी प्रकार रसमयी भी होजाता परन्तु ऐसा नहीं है ।


नासिद्धं सुखदुःखादि ज्ञानानर्थान्तरं यतः ।
चेतनत्वात् सुखं दुःखं ज्ञानादन्यत्र न क्वचित् ॥14॥

अर्थ: सुख दुःख आदिक जो भाव हैं वे ज्ञानसे अभिन्न हैं अर्थात् ज्ञान स्वरूप ही हैं। क्योंकि चेतन भावों में ही सुख दुःखका अनुभव होता है ज्ञानको छोड़कर अन्यत्र कहीं सुख दुःखादिकका अनुभव नहीं हो सक्ता।


न पुनः स्वैरसञ्चारि सुखं दुःखं चिदात्मनि ।
अचिदात्मन्यपि व्याप्तं वर्णादौ तदसम्भवात् ॥15॥

अर्थ: ऐसा नहीं है कि सुख दुःख भाव जीव और अजीव दोनोंमें ही स्वतन्त्रतासे व्याप्त रहें । किन्तु ये भाव जीवके ही हैं । वर्णादिकमें इन भावोंका होना असंभव है ।


ततः सिद्धं चिदात्मादि स्यादमूर्तं तदर्थवत् ।
प्रसाधितसुखादीनामन्यथाऽनुपपत्तितः ॥16॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध हो चुकी कि आत्मा आदि अमूर्त पदार्थ भी वास्तविक हैं इनको न माननेसे स्वानुभव सिद्ध सुखदुःख आदिकी प्राप्ति नहीं हो सकती।


नन्वसिद्धं सुखादीनां मूर्तिमत्वादमूर्तिमत् ।
तद्यथा यद्रसज्ञानं तद्रसो रसवद्यतः ॥17॥

अर्थ: सुख दुःख आदि मूर्त हैं इसलिये उनको अमूर्त मानना असिद्ध है। जैसे रसका ज्ञान होता है वह रस स्वरूप ही है क्योंकि वह ज्ञान रसवाला है इसी तरह सुखादिकमें मूर्तता सिद्ध हो जाने पर विना कारण उनमें अमूर्तता किस तरह आ सकती है ? अविनाभावी साधनसे ही साध्यकी सिद्धि होती है ऐसा न्यायका सिद्धांत है ।


तन्मूर्तत्वे कुतस्त्यं स्यादमूर्तं कारणाद्विना
यत्साधनाविनाभूतं साध्यं न्यायानतिक्रमात् ॥18॥

अर्थ: सुख दुःख आदि मूर्त हैं इसलिये उनको अमूर्त मानना असिद्ध है। जैसे रसका ज्ञान होता है वह रस स्वरूप ही है क्योंकि वह ज्ञान रसवाला है इसी तरह सुखादिकमें मूर्तता सिद्ध हो जाने पर विना कारण उनमें अमूर्तता किस तरह आ सकती है ? अविनाभावी साधनसे ही साध्यकी सिद्धि होती है ऐसा न्यायका सिद्धांत है ।


नैवं यतो रसाद्यर्थं ज्ञानं तन्न रसः स्वयम् ।
अर्थाज्ज्ञानममूर्तं स्यान्मूर्तं मूर्तोपचारतः ॥19॥

अर्थ: ऊपर जो शङ्का उठाई गई है वह ठीक नहीं है। क्योंकि जो रसादि पदार्थोंका ज्ञान होता है वह स्वयं रस रूप नहीं हो जाता अर्थात् ज्ञान ज्ञान ही रहता है और वह अमूर्त ही है। यदि उस ज्ञानको मूर्त कहा जाता है तो उस समय केवल उपचारमात्र ही समझना चाहिये।


न पुनः सर्वथा मूर्तं ज्ञानं वर्णादिमद्यतः ।
स्वसंवेद्याद्य भावः स्यात्तज्जडत्वानुषङ्गतः ॥20॥

अर्थ: ज्ञान उपचार मात्रसे तो मूर्त है परन्तु वास्तवमें मूर्त नहीं है। वह वर्णादिकको विषय करनेवाला है इसीलिये उसमें उपचार है। यदि वास्तवमें ज्ञान मूर्त हो जाय तो पुद्गलकी तरह ज्ञानमें जड़पना भी आ जायगा, और ऐसी अवस्थामें स्वसंवेदन आदिकका अभाव ही हो जायगा।


तस्माद्वर्णादिशून्यात्मा जीवाद्यर्थोस्त्यमूर्तिमान् ।
स्वीकर्तव्यः प्रमाणाद्वा स्वानुभूतेर्यथागमात् ॥21॥

अर्थ: इसलिये वर्णादिकसे रहित जीवादिक पदार्थ अमूर्त हैं ऐसा उपर्युक्त प्रमाणसे स्वीकार करना चाहिये अथवा स्वानुभवसे स्वीकार करना चाहिये। आगम भी इसी बातको बतलाता है कि वर्णादिक पुद्गलके गुण हैं और बाकी जीवादिक पांच द्रव्य अमूर्त हैं।


लोकालोकविशेषोस्ति द्रव्याणां लक्षणाद्यथा ।
षड्द्रव्यात्मा स लोकोस्ति स्यादलोकस्ततोऽन्यथा ॥22॥

अर्थ: द्रव्योंके लक्षणकी अपेक्षासे ही लोक और अलोकका विभाग होता है। जहां पर छह द्रव्य पाये जाँय अथवा जो छह द्रव्य स्वरूप हो उसे लोक कहते हैं। और जहां छह द्रव्य नहीं पाये जाँय उसे अलोक कहते हैं।


सोप्यलोको न शून्योस्ति षड्भिर्द्रव्यैरशेषतः ।
व्योममात्रावशेषत्वाद्व्योमात्मा केवलं भवेत् ॥23॥

अर्थ: जो अलोक है वह भी छह द्रव्योंसे सर्वथा शून्य नहीं है। अलोकमें भी छह द्रव्योंमेंसे एक आकाश द्रव्य रहता है इसलिये अलोक केवल आकाशस्वरूप ही है।


क्रिया भावविशेषोस्ति तेषामन्वर्थतो यतः ।
भावक्रियाद्वयोपेताः केचिद्भावगताः परे ॥24॥

अर्थ: उन छहों द्रव्योंमें दो भेद हैं । कोई द्रव्य तो भावात्मक ही हैं और कोई भावात्मक भी हैं तथा क्रियात्मक भी हैं ।


भाववन्तौ क्रियावन्तौ द्वावेतौ जीवपुद्गलौ ।
तौ च शेषचतुष्कं च षडेते भावसंस्कृताः ॥25॥

अर्थ: जीव और पुद्गल ये दो द्रव्य भाववाले भी हैं और क्रियावाले भी हैं। तथा जीव, पुद्गल और शेष चारों द्रव्य भाव सहित हैं।


तत्र क्रिया प्रदेशानां परिस्पंदश्चलात्मकः ।
भावस्तत्परिणामोस्ति धारावाह्येकवस्तुनि ॥26॥

अर्थ: प्रदेशोंके हिलने चलनेको क्रिया कहते हैं और भाव परिणामको कहते हैं जो कि प्रत्येक वस्तु में धारावाही ( बराबर ) से होता रहता है ।


नासंभवमिदं यस्मादर्थाः परिणामिनोऽनिशं ।
तत्र केचित् कदाचिद्वा प्रदेशचलनात्मकाः ॥27॥

अर्थ: यह बात असिद्ध नहीं है कि पदार्थ प्रतिक्षण परिणमन करते रहते हैं । उसी परिणमनमें कभी २ किन्हीं किन्हीं पदार्थोंके प्रदेश भी हलन चलन करते हैं ।


तद्यथाद्याधिचिद्द्रव्यदेशना रभ्यते मया ।
युक्त्यागमानुभूतिभ्यः पूर्वाचार्यानतिक्रमात् ॥28॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि अब हम चेतन द्रव्यके विषयमें ही व्याख्यान करेंगे। जो कुछ हम कहेंगे वह हमारी निजकी कल्पना नहीं समझना चाहिये, किन्तु युक्ति, आगम, अनुभव और पूर्वाचार्योंके कथनके अनुकूल ही हम कहेंगे। इनसे विरुद्ध नहीं।


प्रागुद्देश्यः स जीवोस्ति ततोऽजीवस्ततः क्रमात् ।
आस्रवाद्या यतस्तेषां जीवोधिष्ठानमन्वयात् ॥29॥

अर्थ: पहले जीवतत्त्वका निरूपण किया जाता है फिर अजीव तत्त्वका किया जायगा। उसके बाद क्रमसे आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्षका कथन किया जायगा। जीवका निरूपण सबसे प्रथम रखनेका कारण भी यही है कि सम्पूर्ण तत्त्वोंका आधार मुख्य रीतिसे जीव ही पड़ता है सातों तत्त्वोंमें जीवका ही सम्बन्ध चला जाता है।


अस्ति जीवः स्वतस्सिद्धोऽनाद्यनन्तोप्यमूर्तिमान् ।
ज्ञानाद्यनन्तधर्मादि रूढत्वाद्द्रव्यमव्ययम् ॥30॥

अर्थ: जीव द्रव्य स्वतः सिद्ध है। इसकी आदि नहीं है इसी प्रकार अन्त भी नहीं है। यह जीव अमूर्त है, ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्यादिक अनन्त धर्मात्मक है इसी लिये यह नाशरहित द्रव्य है।


साधारणगुणोपेतोप्यसाधारणधर्मभाक् ।
विश्वरूपोप्यविश्वस्थः सर्वोपेक्षोपि सर्ववित् ॥31॥

अर्थ: यह जीव साधारण गुण सहित है और असाधारण गुण सहित भी है। विश्व ( जगत् ) रूप है परन्तु विश्वमें ठहरा नहीं है। सबसे उपेक्षा रखनेवाला है, तो भी सबका जाननेवाला है।


असंख्यातप्रदेशोपि स्यादखण्डप्रदेशवान् ।
सर्वद्रव्यातिरिक्तोऽपि तन्मध्ये संस्थितोपि च ॥32॥

अर्थ: यह जीव असंख्यात प्रदेशवाला है । तथापि अखण्ड द्रव्य है अर्थात् इसके प्रदेश सब अभिन्न हैं तथा सम्पूर्ण द्रव्योंसे यह भिन्न है तथापि उनके बीचमें स्थित है ।


अथ शुद्धनयादेशाच्छुद्धश्चैकविधोपि यः ।
स्याद्द्विधा सोपि पर्यायान्मुक्तामुक्तप्रभेदतः ॥33॥

अर्थ: शुद्ध नयकी अपेक्षासे यह जीव द्रव्य शुद्धस्वरूप है, एक रूप है, उसमें भेद कल्पना नहीं है, तथापि पर्याय दृष्टिसे यह जीव दो प्रकार है एक मुक्त जीव दूसरा अमुक्त जीव ।


बद्धो यथा स संसारी स्यादलब्धस्वरूपवान् ।
मूर्छितोनादितोष्टाभिर्ज्ञानाद्यावृतिकर्मभिः ॥34॥

अर्थ: जो आत्मा कर्मोंसे बंधा हुआ है वही संसारी है । संसारी आत्मा अपने यथार्थ स्वरूपसे रहित है और अनादिकालसे ज्ञानावरणीय आदिक आठ कर्मोंसे मूर्छित हो रहा है ।


यथानादिः स जीवात्मा यथानादिश्च पुद्गलः ।
द्वयोर्बन्धोप्यनादिः स्यात् सम्बन्धो जीवकर्मणोः ॥35॥

अर्थ: यह जीवात्मा भी अनादि है और पुद्गल भी अनादि है । इसलिये दोनोंका सम्बन्ध रूप बन्ध भी अनादि है ।


द्वयोरनादिसम्बन्धः कनकोपलसन्निभः ।
अन्यथा दोषएव स्यादितरेतरसंश्रयः ॥36॥

अर्थ: जीव और कर्म दोनोंका सम्बन्ध अनादि कालसे चला आरहा है। यह सम्बन्ध उसी प्रकार है जिस प्रकार कि कनकपाषाणका सम्बन्ध अनादिकालीन होता है। यदि जीव पुद्गलका सम्बन्ध अनादिसे न माना जाय तो अन्योन्याश्रय दोष आता है।


तद्यथा यदि निष्कर्मा जीवः प्रागेव तादृशः ।
बन्धाभावेथ शुद्धेपि बन्धश्चेन्निर्वृत्तिः कथम् ॥37॥

अर्थ: यदि जीव पहले कर्मरहित अर्थात् शुद्ध माना जाय तो बन्ध नहीं हो सकता, और यदि शुद्ध होनेपर भी उसके बन्ध मान लिया जाय तो फिर मोक्ष किस प्रकार हो सकती है ?


अथ चेत्पुद्गलः शुद्धः सर्वतः प्रागनादितः ।
हेतोर्विना यथा ज्ञानं तथा क्रोधादिरात्मनः ॥38॥

अर्थ: यदि कोई यह कहे कि पुद्गल अनादिसे सदा शुद्ध ही रहता है, ऐसा कहने वालेके मतमें आत्माके साथ कर्मोंका सम्बन्ध भी नहीं बनेगा । फिर तो विना कारण जिस प्रकार आत्माका ज्ञान स्वाभाविक गुण है उसी प्रकार क्रोधादिक भी आत्माके स्वाभाविक गुण ही ठहरेंगे ।


एवं बन्धस्य नित्यत्वं हेतोः सद्भावतोऽथवा ।
द्रव्याभावो गुणाभावे क्रोधादीनामदर्शनात् ॥39॥

अर्थ: यदि पुद्गलको अनादिसे शुद्ध माना जाय और शुद्ध अवस्थामें भी उसका आत्मासे बन्ध माना जाय तो वह बन्ध सदा रहेगा, क्योंकि शुद्ध पुद्गल रूप हेतुके सद्भावको कौन हटानेवाला है ? पुद्गलकी शुद्धता स्वाभाविक है वह सदा भी रह सक्ती है, और हेतुकी सत्तामें कार्य भी रहेगा ही ।
यदि बन्ध ही न माना जाय तो " ज्ञानकी तरह क्रोधादिक भी आत्माके ही गुण ठहरेंगे " वही दोष जो कि पहले श्लोकमें कह चुके हैं फिर भी आता है और क्रोधादिकको आत्माका गुण स्वीकार करनेमें दूसरा दोष यह आता है कि जिन २ आत्माओंमें क्रोधादिकका अभाव हो चुका हैं उन २ आत्माओंका भी अभाव हो जायगा । क्योंकि जब क्रोधादिकको गुण मान चुके हैं तो गुणके अभावमें गुणीका अभाव होना स्वतः सिद्ध है, और यह बात देखनेमें भी आती है कि किन्हीं २ शांत आत्माओंमें क्रोधादिक बहुत थोड़ा पाया जाता है । योगियोंमें अति मन्द पाया जाता है, और बारहवें गुणस्थानमें तो उसका सर्वथा अभाव है । इसलिये अशुद्ध पुद्गलका अशुद्ध आत्मासे बन्ध मानना ही न्याय संगत है ।


तत्सिद्धः सिद्धसम्बन्धो जीवकर्मोभयोर्मिथः ।
सादिसिद्धेरसिद्धत्वात् असत्संदृष्टितश्च तत् ॥40॥

अर्थ: इसलिये जीव और कर्मका सम्बन्ध प्रसिद्ध है और वह अनादिकालसे बन्ध रूप है यह बात सिद्ध हो चुकी। जो पहले शङ्काकारने जीव कर्मका सम्बन्ध सादि (किसी समय विशेषसे) सिद्ध किया था वह नहीं सिद्ध हो सका। सादि सम्बन्ध माननेसे इतरेतर (अन्योन्याश्रय) आदि अनेक दोष आते हैं तथा दृष्टान्त भी कोई ठीक नहीं मिलता।


जीवस्याशुद्धरागादिभावानां कर्म कारणम् ।
कर्मणस्तस्य रागादिभावाः प्रत्युपकारिवत् ॥41॥

अर्थ: जीवके अशुद्ध रागादिक भावोंका कारण कर्म है, उस कर्मके कारण जीवके रागादि भाव हैं। यह परस्परका कार्यकारणपन ऐसा ही है जैसे कि कोई पुरुष किसी पुरुषका उपकार कर दे तो वह उपकृत पुरुष भी उसका बदला चुकानेके लिये उपकार करनेवालेका प्रत्युपकार करता है।


पूर्वकर्मोदयाद्भावो भावात्प्रत्यग्रसंचयः ।
तस्य पाकात्पुनर्भावो भावाद्बन्धः पुनस्ततः ॥42॥

अर्थ: पहले कर्मके उदयसे रागद्वेष - भाव पैदा होते हैं, उन्हीं रागद्वेष भावोंसे नवीन कर्मोंका संचय होता है, उन आये हुए कर्मोंके पाक ( उदय ) से फिर रागद्वेष भाव बनते हैं, उन भावोंसे फिर नवीन कर्मोंका बन्ध होता है, इसी प्रकार प्रवाहकी अपेक्षासे जीव और कर्मका सम्बन्ध अनादिसे चला आया है । इसी सम्बन्धका नाम संसार है, अर्थात् जीवकी रागद्वेष रूप अशुद्ध अवस्थाका ही नाम संसार है । यह संसार विना सम्यग्दर्शन आदि भावोंके नहीं छूट सक्ता है ।


एवं सन्तानतोऽनादिः सम्बन्धो जीवकर्मणोः ।
संसारः स च दुर्मोच्यो विना सम्यग्दगादिना ॥43॥

अर्थ: पहले कर्मके उदयसे रागद्वेष - भाव पैदा होते हैं, उन्हीं रागद्वेष भावोंसे नवीन कर्मोंका संचय होता है, उन आये हुए कर्मोंके पाक ( उदय ) से फिर रागद्वेष भाव बनते हैं, उन भावोंसे फिर नवीन कर्मोंका बन्ध होता है, इसी प्रकार प्रवाहकी अपेक्षासे जीव और कर्मका सम्बन्ध अनादिसे चला आया है । इसी सम्बन्धका नाम संसार है, अर्थात् जीवकी रागद्वेष रूप अशुद्ध अवस्थाका ही नाम संसार है । यह संसार विना सम्यग्दर्शन आदि भावोंके नहीं छूट सक्ता है ।


न केवलं प्रदेशानां बन्धः सम्बन्धमात्रतः ।
सोपि भावैरशुद्धैः स्यात्सापेक्षस्तद्द्वयोरिति ॥44॥

अर्थ: आत्मा और कर्मका जो बन्ध होता है, वह केवल दोनोंके सम्बन्ध मात्रसे ही नहीं हो जाता है, किन्तु आत्माके अशुद्ध भावोंसे होता है और वह परस्पर दोनोंकी अपेक्षा भी रखता है ।


अयस्कान्तोपलाकृष्ट सूचीवत्तद्द्वयोः पृथक् ।
अस्ति शक्तिर्विभावाख्या मिथो बन्धाधिकारिणी ॥45॥

अर्थ: जिस प्रकार चुम्बक प्रत्थरमें सुईको खींचनेकी शक्ति है उसी प्रकार जीव और पुद्गल दोंनोंमें वैभाविकी नामा एक शक्ति है जो कि दोनोंमें परस्पर बन्धका कारण है ।


अर्थतास्त्रिविधो बन्धो भावद्रव्योभयात्मकः ॥
प्रत्येकं तद्द्वयं यावत्तृतीयो द्वन्द्वजः क्रमात् ॥46॥

अर्थ: वास्तवमें बन्ध तीन प्रकारका है । भावबंध द्रव्यबंध और उभयबंध । उनमें भाव बन्ध और द्रव्य बन्ध तो अलग अलग स्वतन्त्र हैं, परन्तु तीसरा जो उभयबन्ध है वह जीव आदि पुद्गल दोनोंके मेलसे होता है ।


रागात्मा भावबन्धः स जीवबन्ध इति स्मृतः ।
द्रव्यं पौद्गलिकः पिण्डो बन्धस्तच्छक्तिरेव वा ॥47॥

अर्थ: जो आत्माका रागद्वेष रूप परिणाम है वही भावबन्ध कहलाता है। उसीको जीवबन्ध भी कहते हैं। ’ द्रव्यबन्ध ’ इस पदमें पड़ा हुआ जो द्रव्य शब्द है उसका अर्थ तो पुद्गल पिण्ड है। उस पुद्गल पिण्डमें जो आत्माके साथ बन्ध होनेकी शक्ति है वही बन्ध शब्दका अर्थ है।


इतरेतरबन्धश्च देशानां तद्द्वयोर्मिथः ।
बन्ध्यबन्धकभावः स्याद्भावबन्धनिमित्ततः ॥48॥

अर्थ: भावबन्धके निमित्तसे पुद्गल-कर्म और जीवके प्रदेशोंका जो परस्पर बन्ध्य-बन्धक भाव अर्थात् एक रूपसे मिल जाना है वही उभय बन्ध कहलाता है ।


नाप्यसिद्धं स्वतस्सिद्धेरस्तित्वं जीवकर्मणोः ।
स्वानुभवगर्भयुक्तेर्वा समक्षोपलब्धितः ॥49॥

अर्थ: जीव और कर्मकी सत्ता भी असिद्ध नहीं है किन्तु स्वतः सिद्ध है। जीव भी स्वतः सिद्ध है और कर्म भी स्वतः सिद्ध है। अथवा जीव और कर्मकी सत्तामें अनेक युक्तियां हैं जो कि अपने अनुभवमें आती हैं, अथवा जीव और कर्मकी सत्तामें प्रत्यक्ष प्रमाण भी है।


अहम्प्रत्ययवेद्यत्त्वाजीवस्यास्तित्वमन्वयात् ।
एको दरिद्र एको हि श्रीमानिति च कर्मणः ॥50॥

अर्थ: इस शरीरके भीतर " मैं हूँ, मैं हूँ " ऐसा जो एक प्रकारका ज्ञान होता रहता है उस ज्ञानसे जाना जाता है कि इस शरीरके भीतर जीवरूप एक वस्तु स्वतन्त्र है । अथवा मैं-मैं इस बोधसे ही जीवात्माका मानसिक प्रत्यक्ष स्वयं होता है । इसी प्रकार कोई दरिद्र है, कोई धनाढ्य है कोई अन्धा है कोई गूंगा है आदि अनेक प्रकारके जीवोंके देखनेसे कर्मका बोध होता है ।


यथास्तित्वं स्वतः सिद्धं संयोगोपि तथानयोः ।
कर्तृभोक्त्रादिभावानामन्यथानुपपत्तितः ॥51॥

अर्थ: जिस प्रकार जीव और कर्मका अस्तित्व ( सत्ता ) स्वतः सिद्ध है उसी प्रकार इन दोनोंका संयोग भी स्वतः सिद्ध हैं । यदि जीव कर्मका सम्बन्ध नहीं माना जाय तो जीवमें कर्तापना तथा भोक्तापना नहीं आ सक्ता ।


ननु मूर्तिमता मूर्तो बध्यते द्व्यणुकादिवत्
मूर्तिमत्कर्मणा बन्धो नामूर्तस्य स्फुटं चितः ॥52॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि मूर्तिमान् पदार्थसे मूर्तिवाला पदार्थ ही बँध सक्ता हैं । जैसे कि द्व्यणुक, द्व्यणुक दो परमाणुओंके समूहको कहते हैं । दोंनों ही परमाणु मूर्त हैं इसी लिये उन दोनोंका मिलकर द्व्यणुक कहलाता है । परन्तु मूर्तिवाले कर्मसे अमूर्त-आत्माका बन्ध कभी नहीं हो सक्ता ?


नैवं यतः स्वतः सिद्धः स्वभावोतर्कगोचरः ।
तस्मादर्हति नाक्षेपं चेत्परीक्षां च सोर्हति ॥53॥

अर्थ: कर्मका जीवात्माके साथ बन्ध नहीं हो सक्ता है ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है । क्योंकि जीव - कर्मका बंध अनादिसे स्वयं सिद्ध है यह एक स्वाभाविक बात है, और स्वभाव किसीका कैसा ही क्यों न हो, उसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं हो सकती । जीव कर्मका बन्ध अनादिकालसे हो रहा है यह अशुद्ध जीवात्माका स्वभाव ही है और कर्मका भी यह स्वभाव है कि वह अशुद्ध जीवात्मासे संयुक्त हो जाता है तथा जीवकी अशुद्धता अनादि कालसे है, इसलिये इस स्वाभाविक विषयमें आक्षेप करना व्यर्थ है । यदि कोई इस बातकी ( जीव - कर्मका बंध कैसे हुआ ) परीक्षा ही करना चाहे तो उस अनादिकालीन बंधरूप स्वभावकी परीक्षा भी हो सकती है ।


अग्नेरौष्ण्यं यथा लक्ष्म न केनाप्यर्जितं हि तत् ।
एवं विधः स्वभावाद्वा न चेत्स्पर्शेन स्पृश्यताम् ॥54॥

अर्थ: जिस प्रकार अग्निका उष्ण लक्षण है । वह किसीने कहींसे लाकर नहीं रक्खा है। इस प्रकारका अग्निका स्वभाव ही है कि वह गर्म रहती है । यदि कोई यह शंका करे कि अग्नि क्यों गर्म है ? तो इसका उत्तर यही हो सकता है कि अग्निका स्वभाव ही ऐसा है । “ऐसा स्वभाव क्यों है” यदि ऐसी तर्कणा उठाई जाय तो यही कहना पडेगा कि नहीं मानते हो तो छूकर देखलो, स्पर्श करनेसे हाथ जलने लगता है इस लिये अग्नि गर्म है। यह निर्णीत अग्निका स्वभाव ही है ।


तथानादिः स्वतो बन्धो जीवपुद्गलकर्मणोः ।
कुतः केन कृतः कुत्र प्रश्नोयं व्योमपुष्पवत् ॥55॥

अर्थ: जिस प्रकार अग्निमें स्वयं सिद्ध उष्णता है, उसी प्रकार जीव और पुद्गल कर्मका भी अनादिसे स्वयं सिद्ध बन्ध हो रहा है । जिस प्रकार अग्निके उष्णपनेमें किसी प्रकारकी शंका नहीं हो सक्ती है उसी प्रकार जीव और कर्मके बन्धमें भी किसी प्रकारकी शंका नहीं हो सक्ती है । फिर यह बन्ध कहांसे हुआ ? किसने किया ? कहां किया ? आदि प्रश्न आकाशके पुष्पकी तरह सर्वथा निष्फल है । जिस प्रकार आकाशके पुष्प नहीं ठहरते उसी प्रकार यह प्रश्न भी नहीं ठहरता।


चेद् विभुत्सास्तिचित्ते ते स्यात्तथा वान्यथेति वा ।
स्वानुभूतिसनाथेन प्रत्यक्षेण विमृश्यताम् ॥56॥

अर्थ: कर्मोंका जीवके साथ बन्ध है अथवा नहीं है ? है तो किस प्रकार है ? इत्यादि जाननेकी यदि तुम्हारे हृदयमें आकांक्षा है तो स्वानुभूति प्रत्यक्षसे विचार ले ।


अस्त्यमूर्तं मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं च वस्तुतः ।
मद्यादिना समूर्तेन स्यात्तत्पाकानुसारि तत् ॥57॥

अर्थ: वास्तवमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञान-दोनों ही ज्ञान अमूर्त हैं, परन्तु मूर्त मद्य आदि पदार्थोंके योगसे उन ज्ञानोंका परिणमन बदल जाता है ।


नासिद्धं तत्तथायोगात् यथा दृष्टोपलब्धितः ।
विना मद्यादिना यस्मात् तद्विशिष्टं न तद्द्वयम् ॥58॥

अर्थ: मदिराके निमित्तसे ज्ञान मंद हो जाता है यह बात असिद्ध नहीं है किन्तु प्रत्यक्ष सिद्ध है । क्योंकि मदिरा आदिके विना मतिज्ञान, श्रुतज्ञान मूर्छित नहीं होते ।


अपि चोपचारतो मूर्तं तूक्तं ज्ञानद्वयं हि यत् ।
न तत्तत्त्वाद्यथा ज्ञानं वस्तुसीम्नोऽनतिक्रमात् ॥59॥

अर्थ: मतिज्ञान और श्रतज्ञान कथंचित् मूर्त भी हैं, परन्तु उक्त दोनों ज्ञानोंमें मूर्तपना उपचारसे है, वास्तवमें नहीं है । तत्त्वदृष्टिसे देखा जाय तो ज्ञान अमूर्त ही है और अमूर्त ज्ञान मूर्त कभी नहीं हो सक्ता है क्योंकि वस्तुकी सीमाका उल्लङ्घन कभी नहीं हो सक्ता है । जो मूर्त है वह सदा मूर्त ही रहता है और जो अमूर्त है वह सदा अमूर्त ही रहता है । इसलिये मतिज्ञान श्रुतज्ञान आत्माके गुण हैं वे वास्तवमें अमूर्त ही हैं केवल उपचारसे मूर्त कहलाते हैं ।


नासिद्धश्चोपचारोयं मूर्तं यत्तत्त्वतोपि च ।
वैचित्र्याद्वस्तुशक्तीनां स्वतः स्वस्यापराधतः ॥60॥

अर्थ: मतिज्ञान, श्रुतज्ञानको वास्तवमें अमूर्त कहा गया है और उपचारसे मूर्त कहा गया है, उस उपचारको कुछ न समझ कर या असिद्ध समझ कर जो कोई उक्त ज्ञानोंको सर्वथा अमूर्त ही समझते हों उनके लिये कहा जाता है कि जिस उपचारसे उक्त ज्ञानोंको मूर्त कहा गया है वह उपचार भी असिद्ध नहीं है किन्तु सिद्ध ही है। दूसरी तरहसे यह भी कहा जा सक्ता है कि वास्तवमें भी उक्त ज्ञान मूर्त हैं। यहां पर कोई शंका करै कि वास्तवमें अमूर्त पदार्थ मूर्त कैसे हो गया ? इसके लिये आचार्य उत्तर देते हैं कि वस्तुओंकी शक्तियां विचित्र हैं किसी शक्तिका कैसा ही परिणमन होता है और किसीका कैसा ही। आत्माका ज्ञान गुण अमूर्त है वह मूर्त कैसे हो गया और वस्तुशक्तिका ऐसा विपरिणमन क्यों हुआ ? इसमें किसीका दोष नहीं है, स्वयं आत्माने अपना अपराध किया है जिससे उसे मूर्त बनना पड़ा है।


अप्यस्त्यनादिसिद्धस्य सतः स्वाभाविकी क्रिया ।
वैभाविकी क्रिया चास्ति पारिणामिकशक्तितः ॥61॥

अर्थ: अनादि सिद्ध सत्ता रखनेवाले इस जीवात्माके दो प्रकारकी क्रिया होती है। एक स्वाभाविकी क्रिया और दूसरी वैभाविकी क्रिया। यह दोनों प्रकारकी क्रिया शक्तियोंके परिणमनशील होनेसे होती है।


न परं स्यात्परायत्ता सतो वैभाविकी क्रिया ।
यस्मात्सतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्यैर्न शक्यते ॥62॥

अर्थ: यदि कोई वैभाविक शक्तिको पराधीन ही समझे, तो उसके लिये आचार्य कहते हैं कि वैभाविक शक्ति आत्माका ही निज गुण है क्योंकि जिसमें जो गुण नहीं है वह दूसरोंसे नहीं आ सक्ता।


ननु वैभाविकभावाख्या क्रिया चेत्पारिणामिकी ।
स्वाभाविक्याः क्रियायाश्च कः शेषो हि विशेषभाक् ॥63॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि यदि वैभाविक नामकी शक्ति ही परिणमन शील है तो उसीका विभाव और स्वभाव परिणमन होगा। फिर स्वभावकी शक्तिमें क्या विशेषता बाकी रहेगी ?


अपि चार्थ परिच्छेदि ज्ञानं स्वं लक्षणं चितः ।
ज्ञेयाकारक्रिया चास्य कुतो वैभाविकी क्रिया ॥64॥

अर्थ: शंकाकारका कहना है कि पदार्थको जाननेवाला जो ज्ञान है वह इस जीवात्माका निज लक्षण है । उस ज्ञानमें जो ज्ञेयके आकार क्रिया होती है वह क्रिया वैभाविकी कैसे कही जा सक्ती है ?


नस्माद्यथा घटाकृत्या घटज्ञानं न तद्घटः ।
मद्याकृत्या तथाज्ञानं ज्ञानं ज्ञानं न तन्मयम् ॥65॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि जिस समय ज्ञेयके निमित्तसे ज्ञान ज्ञेयाकार हो जाता है, उस समय ज्ञान ज्ञान ही रहता है, वह ज्ञेय नहीं हो जाता । दृष्टान्तके लिये घटज्ञानको ले लीजिये । जिस समय ज्ञान घटाकार होता है उस समय घटज्ञान ज्ञान ही तो है, वह घट ज्ञाम घट नहीं बन जाता । इसी प्रकार मदिराके निमित्तसे जो ज्ञान मद्याकार अर्थात् मलिन तथा मूर्छित हो जाता है, वह भी ज्ञान ही है, ज्ञान मदिरामय (विकारी) कभी नहीं हो सकता है ।


नैवं यतो विशेषोस्ति वद्धावद्धावबोधयोः ।
मोहकर्मावृतो वद्धः स्यादवद्धस्तदत्ययात् ॥66॥

अर्थ: जो पहले शंकाकारकी तरफसे यह कहा गया था कि मदिराके निमित्तसे बदला हुआ ज्ञान भी ज्ञान ही है और ज्ञेयाकार होनेवाला भी ज्ञान ही है, ज्ञानपना दोनोंमें समान है । इसके उत्तरमें आचार्य कहते हैं कि यह बात नहीं है क्योंकि विना किसी अन्य निमित्तके (केवल ज्ञेयके निमित्तसे) ज्ञेयाकार होनेवाले ज्ञानमें और मदिराके निमित्तसे बदलने वाले ज्ञानमें बहुत अन्तर है । मदिराके निमित्तसे जो ज्ञान बदला है वह ज्ञान मलिन है, उस ज्ञानमें यथार्थता नहीं है । यथार्थता उसी ज्ञानमें है जो कि वस्तुको यथार्थ रीतिसे ग्रहण करता है । जो ज्ञान केवल ज्ञेयके निमित्तसे ज्ञेयाकार होता है वह वस्तुको यथार्थ ग्रहण करता है इसलिये दोनों ज्ञानोंमें बड़ा अन्तर है ।
इसी प्रकार जीवोंका ज्ञान दो प्रकारका है, एक बद्ध ज्ञान दूसरा अबद्ध ज्ञान । जो ज्ञान मोहनीय कर्मसे ढका हुआ है अर्थात् जिसके साथ मोहनीय कर्म लगा हुआ है उसे तो बद्ध अर्थात् बँधा हुआ ज्ञान कहते हैं और जो ज्ञान मोहनीय कर्मसे रहित हो चुका है वह ज्ञान अबद्ध कहलाता है । बद्ध और अबद्ध ज्ञानमें बड़ा अन्तर है ।


मोहकर्मावृतं ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत् ।
इष्टानिष्टार्थसंयोगात् स्वयं रज्यद्द्विषद्यथा ॥67॥

अर्थ: मोहनीय कर्मसे जो ज्ञान आवृत हो रहा है वह जिस २ पदार्थको जानता है उसी २ पदार्थमें इष्ट और अनिष्ट बुद्धि होनेसे स्वयं रागद्वेष करता है ।


तत्र ज्ञानमबद्धं स्यान्मोहकर्मातिगं यथा ।
क्षायिकं शुद्धमेवैतल्लोकालोकावभासकम् ॥68॥

अर्थ: जिस ज्ञानके साथ मोहनीय कर्मका सम्बन्ध नहीं रहा है वह अबद्ध ज्ञान कहलाता है। ऐसा ज्ञान परम शुद्ध क्षायिक ज्ञान है वही ज्ञान लोक अलोकका जाननेवाला है।


नासिद्धं सिद्धदृष्टान्तात् एतद्दृष्टोपलब्धितः ।
शीतोष्णानुभवः स्वस्मिन् न स्यात्तज्ज्ञे परात्मनि ॥69॥

अर्थ: क्षायिक ज्ञान अबद्ध है, उसमें इष्ट अनिष्ट रूप बुद्धि नहीं होती है यह बात असिद्ध नहीं हैं किन्तु प्रत्यक्ष सिद्ध है । हम शीत और गर्मीका अनुभव करते हैं, अर्थात् हमें ठण्ड भी लगती है और गरमी भी लगती है, परन्तु दूसरा मनुष्य जो कि हमारे शीत उष्णका परिज्ञान करता है वह शीत उष्णका अनुभव नहीं करता है ।


ततः सिद्धः सुदृष्टान्तो मूर्तं ज्ञानद्वयं यथा ।
अस्त्यमूर्तोपि जीवात्मा बद्धः स्यान्मूर्तकर्मभिः ॥70॥

अर्थ: इस लिये इतने कथनसे तथा मदिराके ज्वलन्त उदाहरणसे यह बात भले प्रकार सिद्ध हो गई कि जिस प्रकार मतिज्ञान और श्रुत ज्ञान अमूर्त होने पर भी मूर्त हो जाते हैं। उसी प्रकार अमूर्त भी जीवात्मा मूर्तिमान् कर्मोंसे बँध जाता है अर्थात् मूर्त कर्मोंके निमित्तसे अमूर्त आत्मा भी कथंचित् मूर्त हो जाता है।


ननु बद्धत्वं किं नाम किमशुद्धत्वमर्थतः ।
वावदूकोथ संदिग्धो बोध्यः कश्चिदिति क्रमात् ॥71॥

अर्थ: ऊपर कहा गया है कि जीव कर्मोंसे बँधा हुआ है। यहां पर यह बतलाइये कि वद्धता क्या वस्तु है ? तथा अशुद्धता भी वास्तवमें क्या वस्तु है ? जिस किसी अधिक बोलनेवालेको इस विषयमें संदेह है उसके संदेहको दूर कर उसे यथार्थ बोध करा दीजिये ?


अर्थाद्वैभाविकी शक्तिर्या सा चेदुपयोगिनी ।
तद्गुणाकारसंक्रान्तिर्बन्धः स्यादन्यहेतुकः ॥72॥

अर्थ: आत्मामें अन्य गुणोंकी तरह एक वैभाविक नामा शक्ति भी है । वह शक्ति जब उपयुक्त अवस्थामें आती है तब आत्माके गुणोंकी संक्रान्ति ( च्युत ) होती है । गुणोंका अपने स्वरूपसे च्युत होना ही बन्ध कहलाता है और वह बन्ध दूसरेके कारणसे होता है ।


तत्र बन्धे न हेतुः स्याच्छक्तिर्वैभाविकी परम् ।
नोपयोगोपि तत्किन्तु परायत्तं प्रयोजकम् ॥73॥

अर्थ: आत्माके गुणोंकी च्युति होने रूप बन्धमें केवल वैभाविकी शक्ति ही कारण नहीं है अथवा उसका केवल उपयोग भी कारण नहीं है किन्तु पराधीनता ही प्रयोजक है ।


अस्ति वैभाविकी शक्तिस्तत्तद्द्रव्योपजीविनी ।
सा चेद्बन्धस्य हेतुः स्यादर्थान्मुक्तेरसंभवः ॥74॥

अर्थ: जीव और पुद्गलका वैभाविक उपजीवी गुण है यदि वही बन्धका कारण हो तो जीवकी कभी मोक्ष ही नहीं हो सकती है ।


उपयोगः स्यादभिव्यक्तिः शक्तेः स्वार्थाधिकारिणी ।
सैव बन्धस्य हेतुश्चेत् सर्वो बन्धः समस्यताम् ॥75॥

अर्थ: शक्तिकी स्वरूपात्मक व्यक्तताका नाम भी उपयोग है। यदि वही उपयोग बन्धका हेतु हो तो सभी बंध विशिष्ट हो जांयगे।


तस्मात्तद्धेतुसामग्री सान्निध्ये तद्गुणाकृतिः ।
स्वाकारस्य परायत्ता तया बद्धोऽपराधवान् ॥76॥

अर्थ: इसलिये बन्धका कारण कलाप मिलनेपर यह स्वयं अपराधी आत्मा परतंत्र होता हुआ बँध जाता है उसी समय आत्माके निज गुणोंका स्वरूप अपनी अवस्थाको छोड़कर विभाव ( विकार ) अवस्थामें आ जाता है ।


नासिद्धं तत्परायत्तं सिद्धसंदृष्टितो यथा ।
शीतमुष्णमिवात्मानं कुर्वन्नात्माप्यनात्मवित् ॥77॥

अर्थ: संसारी आत्मा कर्मोंके परतन्त्र है यह बात भी असिद्ध नहीं है। प्रसिद्ध दृष्टान्तसे यह बात सिद्ध है। जिस समय यह आत्मा ठण्ड या गरमीका अनुभव करने लगता है उस समय यह मूर्ख आत्मा अपनी आत्माको ही ठण्ड या गरम समझने लगता है। यह मूर्खता इसकी कर्मोंकी परतन्त्रतासे ही होती है।


तद्यथा मूर्तद्रव्यस्य शीतश्चोष्णो गुणोखिलः ।
आत्मनश्चाप्यमूर्तस्य शीतोष्णानुभवः क्वचित् ॥78॥

अर्थ: शीत और उष्ण दोनों मूर्तद्रव्य ( पुद्गल )के गुण हैं । इन गुणोंका कहीं २ अमूर्त आत्मामें भी अनुभव होता है ।


ननु वैभाविकी शक्तिस्तथा स्यादन्ययोगतः ।
परयोगाद्विना किं न स्याद्वास्ति तथान्यथा ॥79॥

अर्थ: क्या वैभाविक शक्तिका विभाव रूप परिणमन दूसरेके निमित्तसे ही होता है ? दूसरेके विना निमित्तके नहीं ही होता ? अथवा वैभाविक शक्ति वास्तवमें है या नहीं है ?


सत्यं नित्या तथा शक्तिः शक्तित्वाच्छुद्धशक्तिवत् ।
अथान्यथा सतो नाशः शक्तीनां नाशतः क्रमात् ॥80॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि वैभाविक शक्ति वास्तवमें है और वह नित्य है क्योंकि जो २ शक्तियां होती हैं वे सब नित्य ही हुआ करती हैं जिस प्रकार आत्माकी शुद्ध शक्तियां ज्ञान दर्शनादिक नित्य हैं उसी प्रकार यह भी नित्य है । यदि इस वैभाविक शक्तिको नित्य नहीं माना जाय तो सत् पदार्थका ही नाश हो जायगा । क्योंकि शक्तियों ( गुणों )का समूह ही तो पदार्थ है । जब शक्तियोंका ही क्रम २ से नाश होने लगे तो पदार्थ भी अवश्य नष्ट हो जायगा । अंग नाशसे अंगीका नाश अवश्यंभावी है । इस लिये वैभाविक शक्ति आत्माका नित्य गुण है ।


किन्तु तस्यास्तथाभावः शुद्धादन्योन्यहेतुकः ।
तन्निमित्ताद्विना शुद्धो भावः स्यात्केवलं स्वतः ॥81॥

अर्थ: किन्तु उस वैभाविक शक्तिकी शुद्ध अवस्थासे जो अशुद्ध अवस्था होती है वह दूसरेके निमित्तसे होती है। वह निमित्त जब आत्मासे दूर हो जाता है तब उस शक्तिकी शुद्ध अवस्था हो जाती है।


नासिद्धोसौ हि सिद्धान्तः सिद्धः संदृष्टितो यथा ।
वन्हियोगाज्जलंचोष्णं शीतं तत्तद्योगतः ॥82॥

अर्थ: दूसरेके निमित्तसे वैभाविक शक्तिका विभाव परिणमन होता है विना निमित्तके उसी शक्तिका स्वभाव परिणमन हो जाता है यह सिद्धान्त असिद्ध नहीं है । यह बात तो दृष्टान्त द्वारा भले प्रकार सिद्ध होती है । यथा अग्निके निमित्तसे जल गरम हो जाता है, और अग्निके दूर होनेपर वही जल अपनी स्वाभाविक शीत अवस्थामें आ जाता है ।


ननु चैवं चैका शक्तिस्तद्भावो द्विविधो भवेत् ।
एकः स्वाभाविको भावो भावो वैभाविकोऽपरः ॥83॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ऊपरके कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि एक वैभाविकी नामा शक्ति है, उसी एक शक्तिकी दो प्रकारकी अवस्थायें होती हैं, एक स्वाभाविक अवस्था, दूसरी वैभाविक अवस्था । यदि ऐसा ही है अर्थात् पदार्थमें स्वभाव-विभाव दोनों प्रकारके परिणमन होते हैं तो फिर पदार्थमें दो शक्तियां ही क्यों न मान ली जावें, इसमें पदार्थोंकी क्या हानि होती है ? एक शक्ति मानकर उसकी दो अवस्थायें माननेकी अपेक्षा दो स्वतन्त्र शक्तियां मान लेना ही ठीक है । आत्माके स्वाभाविक भावोंसे होनेवाली स्वाभाविकी शक्ति और आत्माके वैभाविक भावोंसे होनेवाली वैभाविकी शक्ति । इस प्रकार दोनों सिद्ध होती हैं ।
चाहे आत्मामें कर्मोंका सम्बन्ध हो चाहे न हो आत्माके शुद्ध भावोंमें परिणमन करनेवाली स्वाभाविकी शक्ति सदा रहती है । वह शक्ति उन्हीं आत्माके अंशोंमें काम करती है जो शुद्ध हैं । तथा कर्मोंका जब तक आत्मासे सम्बन्ध रहेगा तबतक वैभाविक शक्तिका परिणमन होता रहेगा, जब कर्मोंका उदय न रहेगा अर्थात् जब कर्म शान्त हो जांयगे उस समय उस वैभाविक शक्तिका परिणमन भी नहीं होगा, उस समय वह बेकार ही पड़ी रहेगी । दृष्टान्त - कुम्हारके चाकको जब तक दण्डका निमित्त रहता है तब तक वह चाक अपने आप घूमता है, परन्तु जब दण्डका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह चाक भित्तिमें बनाये हुए चित्रकी तरह अपने स्थानमें ही ठहरा रहता है ।


चेदवश्यं हि द्वे शक्ती सतः स्तः का क्षतिः सताम् ।
स्वाभाविकी स्वभावैः स्वैः स्वैर्विभावैर्विभावजा ॥84॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ऊपरके कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि एक वैभाविकी नामा शक्ति है, उसी एक शक्तिकी दो प्रकारकी अवस्थायें होती हैं, एक स्वाभाविक अवस्था, दूसरी वैभार्विक अवस्था । यदि ऐसा ही है अर्थात् पदार्थमें स्वभाव-विभाव दोनों प्रकारके परिणमन होते हैं तो फिर पदार्थमें दो शक्तियां ही क्यों न मान ली जावें, इसमें पदार्थोंकी क्या हानि होती है ? एक शक्ति मानकर उसकी दो अवस्थायें माननेकी अपेक्षा दो स्वतन्त्र शक्तियां मान लेना ही ठीक है । आत्माके स्वाभाविक भावोंसे होनेवाली स्वाभाविकी शक्ति और आत्माके वैभाविक भावोंसे होनेवाली वैभाविकी शक्ति । इस प्रकार दोनों सिद्ध होती हैं ।
चाहे आत्मामें कर्मोंका सम्बन्ध हो चाहे न हो आत्माके शुद्ध भावोंमें परिणमन करनेवाली स्वाभाविकी शक्ति सदा रहती है । वह शक्ति उन्हीं आत्माके अंशोंमें काम करती है जो शुद्ध हैं । तथा कर्मोंका जब तक आत्मासे सम्बन्ध रहेगा तबतक वैभाविक शक्तिका परिणमन होता रहेगा, जब कर्मोंका उदय न रहेगा अर्थात् जब कर्म शान्त हो जांयगे उस समय उस वैभाविक शक्तिका परिणमन भी नहीं होगा, उस समय वह बेकार ही पड़ी रहेगी । दृष्टान्त - कुम्हारके चाकको जब तक दण्डका निमित्त रहता है तब तक वह चाक अपने आप घूमता है, परन्तु जब दण्डका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह चाक भित्तिमें बनाये हुए चित्रकी तरह अपने स्थानमें ही ठहरा रहता है ।


सद्भावेथाप्यसद्भावे कर्मणां पुद्गलात्मनाम् ।
अस्तु स्वाभावकी शक्तिः शुद्धैर्भावैर्विराजिता ॥85॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ऊपरके कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि एक वैभाविकी नामा शक्ति है, उसी एक शक्तिकी दो प्रकारकी अवस्थायें होती हैं, एक स्वाभाविक अवस्था, दूसरी वैभाविक अवस्था। यदि ऐसा ही है अर्थात् पदार्थमें स्वभाव-विभाव दोनों प्रकारके परिणमन होते हैं तो फिर पदार्थमें दो शक्तियां ही क्यों न मान ली जावें, इसमें पदार्थोंकी क्या हानि होती है ? एक शक्ति मानकर उसकी दो अवस्थायें माननेकी अपेक्षा दो स्वतन्त्र शक्तियां मान लेना ही ठीक है। आत्माके स्वाभाविक भावोंसे होनेवाली स्वाभाविकी शक्ति और आत्माके वैभाविक भावोंसे होनेवाली वैभाविकी शक्ति। इस प्रकार दोनों सिद्ध होती हैं।
चाहे आत्मामें कर्मोंका सम्बन्ध हो चाहे न हो आत्माके शुद्ध भावोंमें परिणमन करनेवाली स्वाभाविकी शक्ति सदा रहती है। वह शक्ति उन्हीं आत्माके अंशोंमें काम करती है जो शुद्ध हैं। तथा कर्मोंका जब तक आत्मासे सम्बन्ध रहेगा तबतक वैभाविक शक्तिका परिणमन होता रहेगा, जब कर्मोंका उदय न रहेगा अर्थात् जब कर्म शान्त हो जांयगे उस समय उस वैभाविक शक्तिका परिणमन भी नहीं होगा, उस समय वह बेकार ही पड़ी रहेगी। दृष्टान्त - कुम्हारके चाकको जब तक दण्डका निमित्त रहता है तब तक वह चाक अपने आप घूमता है, परन्तु जब दण्डका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह चाक भित्तिमें बनाये हुए चित्रकी तरह अपने स्थानमें ही ठहरा रहता है।


अस्तु वैभाविकी शक्तिः संयोगात्पारिणामिकी ।
कर्मणामुदयाभावे न स्यात्सा पारिणामिकी ॥86॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ऊपरके कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि एक वैभाविकी नामा शक्ति है, उसी एक शक्तिकी दो प्रकारकी अवस्थायें होती हैं, एक स्वाभाविक अवस्था, दूसरी वैभाविक अवस्था । यदि ऐसा ही है अर्थात् पदार्थमें स्वभाव-विभाव दोनों प्रकारके परिणमन होते हैं तो फिर पदार्थमें दो शक्तियां ही क्यों न मान ली जावें, इसमें पदार्थोंकी क्या हानि होती है ? एक शक्ति मानकर उसकी दो अवस्थायें माननेकी अपेक्षा दो स्वतन्त्र शक्तियां मान लेना ही ठीक है । आत्माके स्वाभाविक भावोंसे होनेवाली स्वाभाविकी शक्ति और आत्माके वैभाविक भावोंसे होनेवाली वैभाविकी शक्ति । इस प्रकार दोनों सिद्ध होती हैं।
चाहे आत्मामें कर्मोंका सम्बन्ध हो चाहे न हो आत्माके शुद्ध भावोंमें परिणमन करनेवाली स्वाभाविकी शक्ति सदा रहती है । वह शक्ति उन्हीं आत्माके अंशोंमें काम करती है जो शुद्ध हैं । तथा कर्मोंका जब तक आत्मासे सम्बन्ध रहेगा तबतक वैभाविक शक्तिका परिणमन होता रहेगा, जब कर्मोंका उदय न रहेगा अर्थात् जब कर्म शान्त हो जांयगे उस समय उस वैभाविक शक्तिका परिणमन भी नहीं होगा, उस समय वह बेकार ही पड़ी रहेगी। दृष्टान्त - कुम्हारके चाकको जब तक दण्डका निमित्त रहता है तब तक वह चाक अपने आप घूमता है, परन्तु जब दण्डका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह चाक भित्तिमें बनाये हुए चित्रकी तरह अपने स्थानमें ही ठहरा रहता है ।


दण्डयोगाद्यथा चक्रं बम्भ्रमत्यात्मनात्मनि ।
दण्डयोगाद्विना चक्रं चित्रं वा व्यवतिष्ठते ॥87॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ऊपरके कथनसे यह बात सिद्ध होती है कि एक वैभाविकी नामा शक्ति है, उसी एक शक्तिकी दो प्रकारकी अवस्थायें होती हैं, एक स्वाभाविक अवस्था, दूसरी वैभाविक अवस्था । यदि ऐसा ही है अर्थात् पदार्थमें स्वभाव-विभाव दोनों प्रकारके परिणमन होते हैं तो फिर पदार्थमें दो शक्तियां ही क्यों न मान ली जावें, इसमें पदार्थोंकी क्या हानि होती है ? एक शक्ति मानकर उसकी दो अवस्थायें माननेकी अपेक्षा दो स्वतन्त्र शक्तियां मान लेना ही ठीक है । आत्माके स्वाभाविक भावोंसे होनेवाली स्वाभाविकी शक्ति और आत्माके वैभाविक भावोंसे होनेवाली वैभाविकी शक्ति । इस प्रकार दोनों सिद्ध होती हैं।
चाहे आत्मामें कर्मोंका सम्बन्ध हो चाहे न हो आत्माके शुद्ध भावोंमें परिणमन करनेवाली स्वाभाविकी शक्ति सदा रहती है । वह शक्ति उन्हीं आत्माके अंशोंमें काम करती है जो शुद्ध हैं । तथा कर्मोंका जब तक आत्मासे सम्बन्ध रहेगा तबतक वैभाविक शक्तिका परिणमन होता रहेगा, जब कर्मोंका उदय न रहेगा अर्थात् जब कर्म शान्त हो जांयगे उस समय उस वैभाविक शक्तिका परिणमन भी नहीं होगा, उस समय वह बेकार ही पड़ी रहेगी। दृष्टान्त - कुम्हारके चाकको जब तक दण्डका निमित्त रहता है तब तक वह चाक अपने आप घूमता है, परन्तु जब दण्डका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह चाक भित्तिमें बनाये हुए चित्रकी तरह अपने स्थानमें ही ठहरा रहता है ।


नैवं यतोस्ति परिणामि शक्तिजातं सतोऽखिलम् ।
कथं वैभाविकी शक्तिर्न स्याद्वै पारिणामिकी ॥88॥

अर्थ: शङ्काकारका यह कहना कि वैभाविक शक्ति विना कर्मोदयके चित्रकी तरह कूटस्थ - परिणाम शून्य रह जाती है, सर्वथा युक्ति - आगम शून्य है । क्योंकि जितना भी शक्ति समूह है सब परिणमन शील है । पदार्थमें ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो प्रतिक्षण अपनी अवस्थाको न बदलती हो । फिर वैभाविकी शक्ति परिणमन शील क्यों न होगी । जब वह परिणमन शील है तो " कर्मोंके अनुदयमें चित्रकी तरह परिणाम रहित हो जाती है " यह शङ्काकारकी शङ्का नितान्त व्यर्थ है ।


परिणामात्मिका काचिच्छक्तिश्चाऽपारिणामिकी ।
तद्ग्राहकप्रमाणस्याऽभावात्संदृष्ट्यभावतः ॥89॥

अर्थ: द्रव्यमें जितनी शक्तियां हैं सभी प्रतिक्षण परिणमन करती रहती हैं। किसी शक्तिको परिणमन शील माना जाय और किसीको नहीं माना जाय या कुछ कालके लिये परिणमन शील माना जाय, इसमें कोई प्रमाण नहीं है और न कोई दृष्टान्त ही है।


तस्माद्वैभाविकी शक्तिः स्वयं स्वाभाविकी भवेत् ।
परिणामात्मिका भावैरभावे कृत्स्नकर्मणाम् ॥90॥

अर्थ: जब उपर्युक्त कथनानुसार सभी शक्तियोंका परिणमन होता है। तब वैभाविकी शक्तिका भी प्रतिक्षण परिणमन सिद्ध ही चुका। इसलिये फलितार्थ यह हुआ कि वैभाविकी शक्तिही अवस्थाभेदसे स्वभाव विभावमें आया करती है। जब कर्मोंका सम्बन्ध रहता है तब तो उस वैभाविकी शक्तिका विभावरूप परिणमन होता है और जब सम्पूर्ण कर्मोंका अभाव होता है तथा आत्मा अपने स्वाभाविक शुद्धभावोंका अधिकारी हो जाता है, उस समय उस वैभाविकी शक्तिका परिणमन स्वभावरूप होता है। इस प्रकार केवल एक वैभाविक शक्तिके ही स्वाभाविक और वैभाविक ऐसे दो अवस्था भेद हैं।


ततः सिद्धं सतोऽवश्यं न्यायाच्छक्तिद्वयं यतः ।
सदवस्थाभेदतो द्वैतं न द्वैतं युगपत्तयोः ॥91॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात भली भांति सिद्ध हो जाती है कि पदार्थमें अवस्थाके भेदसे दो शक्तियां हैं। यह द्वैत अवस्था भेदसे ही है, स्वाभाविक और वैभाविक इन दो शक्तियोंकी अपेक्षासे युगपत् द्वैत नहीं है।


यौगपद्ये महान् दोषस्तद्द्वैतस्य नयादपि ।
कार्यकारणयोर्नाशो नाशः स्याद्बन्धमोक्षयोः ॥92॥

अर्थ: यद्यपि वैभाविक शक्ति एक ही है और उसकी दो अवस्थायें क्रमसे होती हैं यह सिद्धान्त है । तथापि अवस्था भेदसे जो द्वैत है अर्थात् पर्यायकी अपेक्षासे जो स्वाभाविक और वैभाविक दो भेद हैं इन भेदोंको एक साथ ही कोई स्वीकार करे तो भी ठीक नहीं है । ऐसा माननेसे अनेक दोष आते हैं । एक तो कार्य कारण भाव इनमें नहीं रहेगा क्योंकि वैभाविक अवस्था पूर्वक ही स्वाभाविक अवस्था होती है । जिस प्रकार संसार पूर्वक ही मोक्ष होती है । इस लिये संसार मोक्ष प्राप्तिमें कारण है । इसी प्रकार वैभाविक अवस्थाके बिना स्वाभाविक अवस्था भी नहीं हो सक्ती है । एक साथ माननेमें यह कार्यकारणभाव नहीं बनेगा । दूसरे बन्ध और मोक्षकी भी व्यवस्था नहीं बनेगी, क्योंकि वैभाविक अवस्थाको पहले माननेसे तो बन्धपूर्वक मोक्षका होना सिद्ध होता है । परन्तु एक साथ दोनों अवस्थाओंकी सत्ता स्वीकार करनेसे बन्ध और मोक्ष एक साथ ही प्राप्त होंगी । अथवा बन्धकी सत्ता होते हुए मोक्ष कभी हो नहीं सक्ती, इसलिये इस आत्माकी कभी भी मोक्ष नहीं होगी । इसी बातको नीचे भी दिखाते हैं -


नैकशक्ते र्द्विधाभावो यौगपद्यानुषङ्गतः ।
सति तत्र विभावस्य नित्यत्वं स्यादवाधितम् ॥93॥

अर्थ: यद्यपि एक शक्ति ( वैभाविक ) के ही दो भेद होते हैं अर्थात् एक ही शक्ति दो रूप धारण करती है । परन्तु एक साथ ही एक शक्तिके दो भेद नहीं हो सक्ते । यदि दोनों भेद बराबर एक साथ ही होने लगें तो वैभाविक अवस्था भी नियमसे सदा बनी रहेगी और वैभाविक अवस्थाकी नित्यतामें आत्माका मोक्ष-प्रयास व्यर्थ हो जायगा । इसलिये एक गुणकी वैभाविक और स्वाभाविक अवस्थायें क्रमसे ही होती हैं । एक कालमें नहीं होती ।


ननु चानादितः सिद्धं वस्तुजातमहेतुकम् ।
तथाजातं परं नाम स्वतः सिद्धमहेतुकम् ॥94॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं। पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं। उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं। यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है। इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं। यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है। यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं। इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं। उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता। उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है। सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय। कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता। जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है। यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


तदवश्यमवश्यं स्यादन्यथा सर्वसङ्करः ।
सर्वशून्यादिदोषश्च दुर्वारो निग्रहास्पदम् ॥95॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं। पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं। उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं। यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है। इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं। यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है। यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं। इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं। उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता। उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है। सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय। कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता। जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है। यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


ततः सिद्धं यथा वस्तु यत्किञ्चिच्चिज्जड़ात्मकम् ।
तत्सर्वं स्वस्वरूपाद्यैः स्यादनन्यगतिः स्वतः ॥96॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं । पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं । उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं । यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है । इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं । यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है । यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं । इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं । उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता । उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है । सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय । कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता । जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है । यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


अयमर्थः कोपि कस्यापि देशमात्रं हि नाश्नुते ।
द्रव्यतः क्षेत्रतः कालाद्भावात् सीम्नोनतिक्रमात् ॥97॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं । पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं । उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं । यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है । इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं । यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है । यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं । इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं । उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता । उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है । सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय । कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता । जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है । यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


व्याप्यव्यापकभावस्य स्यादभावेपि मूर्तिमत् ।
द्रव्यं हेतुर्विभावस्य तत्किं तत्रापि नापरम् ॥98॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं। पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं। उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं। यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है। इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं। यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है। यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं। इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं। उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता। उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है। सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय। कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता। जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है। यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


वैभाविकस्य भावस्य हेतुः स्यात्सन्निकर्षतः ।
तत्रस्थोप्यपरो हेतु र्न स्यात्किंवा वतेति चेत् ॥99॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सभी पदार्थ अनादि सिद्ध हैं । पदार्थोंको पैदा करनेवाला कोई कारण नहीं है, वे सभी अपने आप ही अनादि सिद्ध हैं । उसी प्रकार उनके नाम भी अनादि सिद्ध हैं । यद्यपि एक वस्तुका पहले कुछ नाम और पीछे कुछ नाम भले ही हो जाय परन्तु वाच्यवाचक सम्बन्ध सदा ही रहता है । इसलिये जिस प्रकार पदार्थ अनादिसे हैं उसी प्रकार उनके वाचक नाम भी अनादिसे हैं । यह पदार्थों और उनके सङ्केतोंकी अनादिता अवश्य अवश्य स्वीकार करनी पड़ती है । यदि ऐसा न माना जाय तो " सर्व सङ्कर " और " शून्यता " आदिक अनेक दोष आते हैं जो कि पदार्थोंके नाशके कारण हैं । इसलिये यह बात भलीभाँति सिद्ध है कि जो कोई भी चैतन्य या जड़ वस्तु है सभी अपने अपने स्वरूपको लिये हुए हैं । उसके स्वरूपका परिवर्तन (फेरफार) कभी नहीं हो सकता । उपर्युक्त कथनका सारांश यह निकला कि कोई भी पदार्थ किसी दूसरे पदार्थके एक देशमात्रको भी नहीं बिगाड़ सकता है । सभी पदार्थ द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावसे अपने २ स्वरूपमें ही स्थित हैं, यदि इन चारोंमेंसे किसी एककी अपेक्षासे भी पदार्थ दूसरे रूपमें आजाँय तो वह अपनी सीमासे बाहर हो जाँय । कोई भी पदार्थ क्यों न हो अपनी सीमाका उल्लङ्घन कभी किसी अंशमें नहीं कर सकता । जब ऐसा नियम है तो क्या कारण है कि जीव और पुद्गलमें व्याप्य व्यापक भाव सम्बन्ध न होनेपर भी मूर्तिमान् पुद्गल द्रव्य जीवके वैभाविक भावोंमें कारण हो जाता है । यदि विना किसी प्रकारके सम्बन्धके भी पुद्गलकर्म जीवके वैभाविक भावमें कारण हो जाता है तो उसी स्थलपर रहनेवाला धर्मादिक अपर द्रव्यभी जीवके विकारका कारण क्यों न माना जाय ? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि सन्निकर्ष - सम्बन्ध विशेष होनेसे पुद्गलद्रव्य ही जीवके विभावका कारण होता है, धर्मादिक नहीं होते, तो भी यह दोष आता है कि उसी स्थानपर रहनेवाला सन्निकर्ष सम्बन्ध विशिष्ट विस्रसोपचयरूप पुद्गलपिण्ड जीवके विकारका कारण क्यों नहीं हो जाता है ?


सत्यं बद्धमबद्धं स्याच्चिद्द्रव्यं चाथ मूर्तिमत् ।
स्वीयसम्बन्धिभिर्बद्धमबद्धं परबन्धिभिः ॥100॥

अर्थ: आपने जो शंका उठाई है सो ठीक, परन्तु बात यह है कि सभी जीव पुद्गल बद्ध तथा अबद्ध नहीं होते किन्तु कोई बद्ध होते हैं और कोई अबद्ध होते हैं। संसारी जीव पुद्गल कर्मोंसे बँधे हुए हैं, मुक्त नहीं। इसी प्रकार पुद्गल द्रव्यमें भी ज्ञानावरणीय आदि कर्म परिणत पुद्गल द्रव्य ही जीवसे बँधे हुए हैं, अन्य ( पांच प्रकारकी वर्गणाओंको छोड़कर ) पुद्गल नहीं। और भी जो बन्ध योग्य जीव व पुद्गल द्रव्य हैं, उनमें भी सभी जीव संसारकी समस्त कर्मवर्गणाओंसे एक साथ नहीं बँध जाते, और न समस्त कर्मवर्गणायें ही प्रत्येक जीवके साथ प्रतिसमय बँध जाती हैं, किन्तु जिस समय जिस जीवके जैसी कषाय होती है उसीके योग्य कर्मोंसे जीव बँध जाता है अन्य प्रकारकी कषायसे बँधने योग्य कर्मोंके साथ नहीं बँधता। इसलिये कोई पुद्गलद्रव्य जीवमें विकार करता है कोई नहीं करता। ऐसा भी नहीं है कि सांख्यमतकी तरह पुरुष (जीवात्मा) को सर्वथा शुद्ध मान लिया जाय और बन्धको केवल प्रकृति (कर्म)का ही धर्म मान लिया जाय तथा बद्धजीव और मुक्तजीवमें वास्तवमें कुछ अन्तर ही न माना जाय। और ऐसा भी नहीं है कि किसी द्रव्यमें दूसरे द्रव्यके निमित्तसे विकार सर्वथा हो ही नहीं सकता। ऐसा माननेसे पदार्थोंका निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध ही उड़जाता है। और निमित्त नैमित्तिक संबंधके अभावमें किसी कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है। इस लिये बद्ध जीव और मुक्त जीवोंमें वास्तविक भेद हैं। तथा जीव और पुद्गलमें विजातीयपना होने पर भी परस्पर इस प्रकारका निमित्त नैमित्तिक भाव है जिससे कि संसारी जीवोंकी कषायका निमित्त पाकर पुद्गल कर्म जीवोंके साथ बन्धको प्राप्त हो जाता है, और उन बंधे हुए कर्मोंके परिपाक कालमें जीवोंमें कषायादि रूप विकार उत्पन्न हो जाते हैं।

उत्तरार्द्ध 101 से 200 (श्लोक 101 से 200)

बद्धाबद्धत्वयोरस्ति विशेषः पारमार्थिकः ।
तयोर्जात्यन्तरत्वेपि हेतुमद्धेतुशक्तितः ॥101॥

अर्थ: आपने जो शंका उठाई है सो ठीक, परन्तु बात यह है कि सभी जीव पुद्गल बद्ध तथा अबद्ध नहीं होते किन्तु कोई बद्ध होते हैं और कोई अबद्ध होते हैं। संसारी जीव पुद्गल कर्मोंसे बँधे हुए हैं, मुक्त नहीं। इसी प्रकार पुद्गल द्रव्यमें भी ज्ञानावरणीय आदि कर्म परिणत पुद्गल द्रव्य ही जीवसे बँधे हुए हैं, अन्य ( पांच प्रकारकी वर्गणाओंको छोड़कर ) पुद्गल नहीं। और भी जो बन्ध योग्य जीव व पुद्गल द्रव्य हैं, उनमें भी सभी जीव संसारकी समस्त कर्मवर्गणाओंसे एक साथ नहीं बँध जाते, और न समस्त कर्मवर्गणायें ही प्रत्येक जीवके साथ प्रतिसमय बँध जाती हैं, किन्तु जिस समय जिस जीवके जैसी कषाय होती है उसीके योग्य कर्मोंसे जीव बँध जाता है अन्य प्रकारकी कषायसे बँधने योग्य कर्मोंके साथ नहीं बँधता। इसलिये कोई पुद्गलद्रव्य जीवमें विकार करता है कोई नहीं करता। ऐसा भी नहीं है कि सांख्यमतकी तरह पुरुष (जीवात्मा) को सर्वथा शुद्ध मान लिया जाय और बन्धको केवल प्रकृति (कर्म)का ही धर्म मान लिया जाय तथा बद्धजीव और मुक्तजीवमें वास्तवमें कुछ अन्तर ही न माना जाय। और ऐसा भी नहीं है कि किसी द्रव्यमें दूसरे द्रव्यके निमित्तसे विकार सर्वथा हो ही नहीं सकता। ऐसा माननेसे पदार्थोंका निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध ही उड़जाता है। और निमित्त नैमित्तिक संबंधके अभावमें किसी कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है। इस लिये बद्ध जीव और मुक्त जीवमें वास्तविक भेद हैं। तथा जीव और पुद्गलमें विजातीयपना होने पर भी परस्पर इस प्रकारका निमित्त नैमित्तिक भाव है जिससे कि संसारी जीवोंकी कषायका निमित्त पाकर पुद्गल कर्म जीवोंके साथ बन्धको प्राप्त हो जाता है, और उन बंधे हुए कर्मोंके परिपाक कालमें जीवोंमें कषायादि रूप विकार उत्पन्न हो जाते हैं।


बद्धःस्याद्बद्धयोर्भावः स्यादबद्धोप्यबद्धयोः ।
सानुकूलतया बन्धो न बन्धः प्रतिकूलयोः ॥102॥

अर्थ: बँधे हुए दो पदार्थोंकी अवस्था विशेषको बद्ध कहते हैं । इसी प्रकार नहीं बँधे हुए दो पदार्थोंकी अवस्थाको अबद्ध कहते हैं । बन्ध वहीं होता है जहां पर कि अनुकूलता होती है । प्रतिकूल पदार्थोंका बन्ध नहीं होता है ।


अर्थतस्त्रिविधो बन्धो वाच्यं तल्लक्षणं त्रयम् ।
प्रत्येकं तद्द्वयं यावत्तृतीयस्तूच्यतेऽधुना ॥103॥

अर्थ: वास्तवमें बन्ध तीन प्रकारका होता है इसी लिये उन तीनोंके जुदे जुदे तीन लक्षण भी हैं । तीनों प्रकारोंके बन्धोंमें दो बंधोंका स्वरूप तो एक एक स्वतन्त्र है । परन्तु तीसरे बन्धका स्वरूप जो कि दो के मिलनेसे होता है कहा जाता है -


जीवकर्मोभयोर्बन्धः स्यान्मिथः साभिलाषुकः ।
जीवः कर्मनिबद्धो हि जीवबद्धं हि कर्म तत् ॥104॥

अर्थ: परस्परमें एक दूसरेकी अपेक्षाको लिये हुए जो जीव और कर्म दोनोंका सम्बन्ध है वही उभयबन्ध कहलाता है । जीव तो कर्मोंसे बँधा हुआ है और कर्म जीवसे बँधे हुए हैं ।


तद्गुणाकारसंक्रान्ति र्भावो वैभाविकश्चितः ।
तन्निमित्तं च तत्कर्म तथा सामर्थ्यकारणम् ॥105॥

अर्थ: जीवके गुणोंका अपने स्वरूपसे बदलकर दूसरे रूपमें आ जाना, इसीका नाम वैभाविक भाव है । यही जीवका भाव कर्मके बन्ध करनेमें कारण है, और वैभाविक भावके निमित्तसे होनेवाला वही कर्म उसी वैभाविक भावके पैदा करनेकी सामर्थ्यका कारण है ।


अर्थोयं यस्य कार्यं तत् कर्मणस्तस्य कारणम् ।
एको भावश्च कर्मैकं बन्धोयं द्वन्द्वजः स्मृतः ॥106॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका यही आशय है कि जिस कर्मका यह वैभाविक भाव कार्य है, उसी कर्मका कारण भी है । इसलिये एक तो भाव और एक कर्म इन दोनोंसे ही उभय बन्ध होता है ।


तथाऽऽदर्शो यथा चक्षुः स्वरूपं संदधत्पुनः ।
स्वाकाराकारसंक्रान्तं कार्यं हेतुः स्वयं च तत् ॥107॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें मुख देखनेसे चक्षुका प्रतिबिम्ब दर्पणमें पड़ता है । उस अपने प्रतिबिम्बमें कारण स्वयं चक्षु है, प्रतिबिम्ब कार्य है । परन्तु वही चक्षुके आकारको धारण करनेवाला चक्षुका प्रतिबिम्ब अपने दिखानेमें कारण भी है ।


अपि चाचेतनं मूर्तं पौद्गलं कर्म तद्यथा ।
…………………………… ॥108॥

अर्थ: अचेतन, पौद्गलिक, मूर्त द्रव्य कर्म तो जीवके भावोंके विकारका कारण है । और उस द्रव्य कर्मका कारण वह वैभाविक भाव है । यह परस्पर कारणपना इसी प्रकार है कि मानों एक दूसरेके उपकारका परस्पर बदला ही चुकाते हों ।


जीवभावविकारस्य हेतुः स्याद्द्रव्य कर्म तत् ।
तद्धेतुस्तद्विकारश्च यथा प्रत्युपकारकः ॥109॥

अर्थ: अचेतन, पौद्गलिक, मूर्त द्रव्य कर्म तो जीवके भावोंके विकारका कारण है। और उस द्रव्य कर्मका कारण वह वैभाविक भाव है। यह परस्पर कारणपना इसी प्रकार है कि मानों एक दूसरेके उपकारका परस्पर बदला ही चुकाते हों।


चिद्विकाराकृतिस्तस्य भावो वैभाविकः स्मृतः ।
तन्निमित्तात्पृथग्भूतोप्यर्थः स्यात्तन्निमित्तकः ॥110॥

अर्थ: जीवकी शुद्ध अवस्थासे बिगड़कर जो विकार अवस्था है वही जीवका वैभाविक भाव है उसी वैभाविक भावके निमित्तसे जीवसे सर्वथा भिन्न भी पुद्गल द्रव्य उस वैभाविक भावके लिये निमित्त कारण होता है ।


तद्धि नोभयबन्धाद्वै वहिर्बद्धाश्चिरादपि ।
न हेतवो भवन्त्येकक्षेत्रस्याप्यबद्धवत् ॥111॥

अर्थ: वह कर्म चेतन-भावोंके बिगाड़नेका कारण हो जाता है इसमें भी उभयबन्ध ही कारण है । क्योंकि जब तक वह पुद्गल द्रव्य कर्मरूप परिणत न होगा तब तक वह आत्माके भावोंको विकारी बनानेमें कारण नहीं हो सकता है । यदि विना कर्मरूप अवस्थाको धारण किये ही पुद्गल द्रव्य जीवके बिकार भावोंका कारण हो जाय तो जीवके साथ ही उसी क्षेत्रमें चिरकालसे लगे हुए विस्रसोपचय भी कारण हो जांयगे, परन्तु विस्रसोपचय विकारमें कारण होते नहीं, किन्तु कर्म ही कारण हैं और कर्म-अवस्था पुद्गलकी तभी होती है जब कि वह उभयबन्ध रूपमें परिणत हो जाता है ।


तद्बद्धत्वाविनाभूतं स्यादशुद्धत्वमक्रमात् ।
तल्लक्षणं यथा द्वैतं स्यादद्वैतात्स्वतोन्यतः ॥112॥

अर्थ: आत्माकी बद्धताकी अविनाभाविनी अशुद्धता भी उसी समय आ जाती है। उस अशुद्धताका यही लक्षण है कि स्वयं अद्वैत आत्मा अन्य पदार्थके निमित्तसे द्वैत हो जाता है।


तत्राऽद्वैतेपि यद्द्वैतं तद्द्विधाप्यौपचारिकम् ।
तत्राद्यं स्वांशसंकल्पश्चेत्सोपाधि द्वितीयकम् ॥113॥

अर्थ: आत्मा अशुद्ध अवस्थामें द्विरूपता धारण करता है अर्थात् उसमें दो प्रकारके अंशोंका मेल हो जाता है । यह दोनों ही प्रकारका मेल औपचारिक ( उपचारसे ) है । उन दोनों अशोंमें एक अंश तो स्वयं आत्माका ही है, और दूसरा उपाधिसे होनेवाला अर्थात् परषदार्थका है ।


ननु चैकं सत्सामान्यात् द्वैतं स्यात्सद्विशेषतः ।
तद्विशेषेपि सोपाधि निरुपाधि कुतोर्थतः ॥114॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि हर एक पदार्थकी दो अवस्थायें होती हैं । एक सामान्य अवस्था, दूसरी विशेष अवस्था । सामान्य रीतिसे पदार्थ एक ही है, और विशेष रीतिसे दो प्रकार है । ऐसा विशेष खुलासा होने पर भी सोपाधि और निरुपाधि भेद कैसा ? और ऐसा अनुभव भी होता है कि जो ज्ञान रस रूपको जानता है वह ज्ञान कहीं रूप, रस रूप स्वयं नहीं हो जाता है । वास्तवमें ज्ञान ज्ञान ही है और रूप, रस पुद्गल ही हैं ।


अपि चाभिज्ञानमत्रास्ति ज्ञानं यद्रसरूपयोः ।
न रूपं न रसो ज्ञानं ज्ञानमात्रमथार्थतः ॥115॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि हर एक पदार्थकी दो अवस्थायें होती हैं । एक सामान्य अवस्था, दूसरी विशेष अवस्था । सामान्य रीतिसे पदार्थ एक ही है, और विशेष रीतिसे दो प्रकार है । ऐसा विशेष खुलासा होने पर भी सोपाधि और निरुपाधि भेद कैसा ? और ऐसा अनुभव भी होता है कि जो ज्ञान रस रूपको जानता है वह ज्ञान कहीं रूप, रस रूप स्वयं नहीं हो जाता है । वास्तवमें ज्ञान ज्ञान ही है और रूप, रस पुद्गल ही हैं ।


नैवं यतो विशेषोस्ति सद्विशेषेपि वस्तुतः ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां द्वाभ्यां वै सिद्धसाधनात् ॥116॥

अर्थ: शङ्काकारका यह कहना कि ज्ञानमें अज्ञानता आती ही नहीं है । अथवा अशुद्धता कोई चीज ही नहीं है सर्वथा मिथ्या है । क्योंकि पदार्थके सामान्य और विशेष ये दो भेद होनेपर भी कुछ और भी विशेषता है । वह विशेषता अन्वय, व्यतिरेकके द्वारा सिद्ध होती है । किस प्रकार ? सो नीचे दिखाते हैं -


तत्रान्वयो यथा ज्ञानमज्ञानं परहेतुतः ।
अर्थाच्छीतमशीतं स्याद्वन्हियोगाद्धि वारिवत् ॥117॥

अर्थ: “ यत्सत्त्वे यत्सत्त्वमन्वयः ” जिसके होनेपर जो हो इसीका नाम अन्वय है । पर पदार्थकी निमित्ततासे ज्ञान अज्ञान हो जाता है यह अन्वय यहां पर ठीक घटता है । जिस प्रकार ठण्डा जल अग्निके सम्बन्धसे गरम हो जाता है ।


नासिद्धोसौ हि दृष्टान्तो ज्ञानस्याज्ञानतः सतः ।
अस्त्यवस्थान्तरं तस्य यथाजातप्रमात्त्वतः ॥118॥

अर्थ: यह दृष्टान्त असिद्ध भी नहीं है । जिस समय ज्ञान अज्ञानरूपमें आता है उस समय पदार्थकी यथार्थ प्रमिति नहीं हो पाती है किन्तु अवस्थान्तर ही हो जाता है ।


व्यतिरेकोस्त्यात्मविज्ञानं यथास्वं परहेतुतः ।
मिथ्यावस्थाविशिष्टं स्यात्तदभावे शुद्धमेव तत् ॥119॥

अर्थ: जिस प्रकार ज्ञानमें अन्वय घटता है उसी प्रकार व्यतिरेक भी घटता है । व्यतिरेक उसे कहते हैं कि जिसके न होने पर जो न हो । जिस प्रकार आत्माका ज्ञान दूसरेके निमित्तसे मिथ्या-अवस्था सहित हो जाता है उसी प्रकार उस परहेतुके विना शुद्ध ही है । अर्थात् कर्मके निमित्तसे ज्ञान अज्ञानरूप, और कर्मके अभावमें ज्ञान शुद्ध ज्ञानरूप रहता है । इसीका नाम अन्वय व्यतिरेक है ।


तद्यथा क्षायिकं ज्ञानं सार्थं सर्वार्थगोचरम् ।
शुद्धं स्वजातिमात्रत्वात् अबद्धं निरुपाधितः ॥120॥

अर्थ: सम्पूर्ण पदार्थोंका प्रत्यक्ष करनेवाला जो क्षायिक ज्ञान ( केवलज्ञान ) है वह शुद्धज्ञान है। क्योंकि उसमें परनिमित्तता नहीं है। वह केवल स्वस्वरूप मात्र ही है। वही ज्ञान अबद्ध भी है। क्योंकि उसमें किसी पर पदार्थरूप उपाधिका सम्बन्ध नहीं है।


क्षायोपशमिकं ज्ञानमक्षयात्कर्मणां सताम् ।
आत्मजातेश्च्युतेरेतद्बद्धं चाशुद्धमक्रमात् ॥121॥

अर्थ: सर्व घाति कर्मोंका उदयाभावी क्षय होनेसे और उन्हीं सर्व घाति कर्मोंके उदय होनेसे क्षायोपशमिक कहलाता है । यह क्षायोपशमिक ज्ञान कर्म सहित है, क्योंकि सत्कर्मोंका अभी क्षय नहीं हुआ है । इसलिये यह ज्ञान अपने स्वरूपसे च्युत है अतएव बद्ध कहलाता है तथा अशुद्ध भी है ।


नस्याच्छुद्धं तथाऽशुद्धं ज्ञानं चेदिति सर्वतः ।
न बन्धो न फलं तस्य बन्धहेतोरसंभवात् ॥122॥

अर्थ: यदि कोई यह कहे कि ज्ञान न तो शुद्ध ही है, और न अशुद्ध ही है, जैसा है वैसा ही है । तो उसके उत्तरमें यही कहा जा सक्ता है कि आत्मामें बन्ध भी नहीं है, औन न उसका फल ही है । क्योंकि बन्धका कारण ही कोई नहीं है ।


अथचेद्बन्धस्तदा बन्धो बन्धो नाऽबन्ध एव यः ।
न शेषश्चिद्विशेषाणां निर्विशेषादबन्धभाक् ॥123॥

अर्थ: यदि अशुद्धताके विना ही बन्ध हो जाय तो फिर बन्ध ही रहेगा। बन्ध-अबन्ध अवस्थामें कभी नहीं आ सक्ता। ऐसी अवस्थामें कोई भी जीव सम्पूर्ण रीतिसे मुक्त नहीं हो सक्ता।


माभूद्वा सर्वतो बन्धः स्यादबन्धप्रसिद्धितः ।
नाबन्धः सर्वतः श्रेयान् बन्धकार्योपलब्धितः ॥124॥

अर्थ: न तो सब आत्माओंके सदा बन्ध ही रहता है, क्योंकि अबन्धकी भी प्रसिद्धि है अर्थात् मुक्त जीव भी प्रसिद्ध है, तथा न सर्वथा सदा अबन्ध ही मानना ठीक है क्योंकि बन्ध रूप कार्य अथवा बन्धका कार्य भी पाया जाता है ।


अस्तिचित्सार्थसर्वार्थसाक्षात्कार्यविकारभुक् ।
अक्षयि क्षायिकं साक्षादबद्धं बन्धव्यत्ययात् ॥125॥

अर्थ: सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षात् ( प्रत्यक्ष ) करनेवाला, सदा अविनश्वर, ऐसा जो क्षायिक ज्ञान - केवल ज्ञान है वह निर्विकार है, शुद्ध है, तथा बन्धका नाश होनेसे अबद्ध अर्थात् मुक्त है ।


बद्धः सर्वोपि संसारकार्यत्वे वैपरीत्यतः ।
सिद्धं सोपाधि तद्धेतोरन्यथानुपपत्तितः ॥126॥

अर्थ: संसारी जीवोंका ज्ञान बद्ध है, क्योंकि उसके कार्यमें विपरीतता पाई जाती है, इसलिये ज्ञान उपाधि सहित भी होता है यह बात अच्छी तरह सिद्ध होती है। उपाधि पदसे यहां कर्मोपाधिका ग्रहण करना चाहिये। यदि संसारियोंके ज्ञानको सोपाधि न माना जावे तो उसमें विपरीतता रूप हेतु नहीं बन सकता।


सिद्धमेतावता ज्ञानं सोपाधि निरुपाधि च ।
तत्राशुद्धं हि सोपाधि शुद्धं तन्निरुपाधि यत् ॥127॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात अच्छी तरह सिद्ध होती है कि ज्ञान दो प्रकारका है एक तो उपाधि सहित है और दूसरा उपाधि रहित है। कर्मोपाधि सहित ज्ञान अशुद्ध है। कर्मोपाधिसे रहित शुद्ध है।


ननु कस्को विशेषोस्ति बद्धाबद्धत्वयोर्द्वयोः ।
अस्त्यनर्थान्तरं यस्मादर्थादैक्योपलब्धितः ॥128॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि बद्धता और अबद्धतामें क्या विशेषता है ? क्योंकि हम दोनों अवस्थाओंमें कोई भी भेद नहीं पाते हैं अर्थात् दोनों अवस्थायें एक ही हैं ?


नैवं यतो विशेषोस्ति हेतुमद्धेतुभावतः ।
कार्यकारणभेदाद्वा द्वयोस्तल्लक्षणं यथा ॥129॥

अर्थ: बद्धता और अबद्धताको एक ही मानना सर्वथा मिथ्या है। इन दोनोंमें हेतु और हेतुमान् अथवा कार्यकारणके भेदसे विशेषता है।


बन्धः परगुणाकारा क्रिया स्यात्पारिणामिकी ।
तस्यां सत्यामशुद्धत्वं तद्द्वयोः स्वगुणच्युतिः ॥130॥

अर्थ: जीव और पुद्गलके गुणोंका परगुणाकार परिणमन होनेका नाम ही बन्ध है। जिस समय जीव और पुद्गलमें पर गुणाकार परिणमन होता है उसी समय उनमें अशुद्धता आती है, अशुद्धतामें उन दोनोंके गुणोंकी च्युति हो जाती है अर्थात् दोनों ही अपने अपने स्वरूपको छोड़कर विकार अवस्थाको धारण कर लेते हैं।


बन्धहेतुरशुद्धत्वं हेतुमच्चेति निर्णयः ।
यस्माद्बन्धं विना न स्यादशुद्धत्वं कदाचन ॥131॥

अर्थ: बन्धका कारण अशुद्धता है, और बन्धका कार्य भी है, क्योंकि बन्धके बिना अशुद्धता कभी नहीं होती।


कार्यरूपः स बन्धोस्ति कर्मणां पाकसंभवात् ।
हेतुरूपमशुद्धत्वं तन्नवाकर्षणत्वतः ॥132॥

अर्थ: बन्ध कार्य रूप भी है। क्योंकि कर्मोंके विपाक होनेसे होता है। अशुद्धता उसका कारण है। अशुद्धताके द्वारा ही नवीन २ कर्म खिंचकर आता है और फिर बन्धको प्राप्त होता है।


जीवः शुद्धनयादेशादस्ति शुद्धोपि तत्त्वतः ।
नासिद्धश्चाप्यशुद्धोपि बद्धाबद्धनयादिह ॥133॥

अर्थ: शुद्धनय ( निश्चयनय ) से जीव वास्तवमें शुद्ध है परन्तु व्यवहार नयसे जीव अशुद्ध भी है। व्यवहारमें यह जीव कर्मोंसे बंधा हुआ भी है और मुक्त भी होता है इसलिये इसकी अशुद्धता भी अमिद्ध नहीं है।


एकः शुद्धनयः सर्वो निर्द्वन्द्वो निर्विकल्पकः ।
व्यवहारनयोऽनेकः सद्वन्द्वः सविकल्पकः ॥134॥

अर्थ: सम्पूर्ण शुद्धनय एक है वह निर्द्वन्द्व है, उसमें किसी प्रकारका भेद नहीं है, वह निर्विकल्प है अर्थात् यह शुद्धनय न तो किसी दूसरे पदार्थसे मिश्रित ही है और न इसमें किसी प्रकार भेदकल्पना है इसीलिये इसका स्वरूप वचनातीत है । क्योंकि वचनोंद्वारा जितना स्वरूप कहा जायगा वह सब खण्डशः होगा, इसलिये वह कथन शुद्ध नयसे गिर जाता है । परन्तु व्यवहार नय शुद्ध नयसे प्रतिकूल है । वह अनेक है, उसमें दूसरे पदार्थोंका मिश्रण है, उसके अनेक भेद हैं, वह सविकल्प है । इस नयके द्वारा वस्तुका असली रूप नहीं कहा जा सक्ता । यह नय वस्तुको खण्डशः प्रतिपादन करता है और इस नयसे वस्तुके शुद्धांशका कथन नहीं होता ।


वाच्यः शुद्धनयस्यास्य शुद्धो जीवश्चिदात्मकः ।
शुद्धादन्यत्र जीवाद्याः पदार्थास्ते नव स्मृताः ॥135॥

अर्थ: शुद्ध नयकी अपेक्षासे जीव सदा शुद्धचैतन्य स्वरूप है, इस नयसे जीव सदा एक और अखण्ड द्रव्य है, परन्तु व्यवहार नयसे जीव अनेक स्वरूप है। व्यवहार नयकी अपेक्षासे ही जीव, अजीव, आश्रव, बन्ध, सँवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पाप ये नौ पदार्थ कहलाते हैं।


ननु शुद्धनयः साक्षादस्तिसम्यक्त्वगोचरः ।
एको वाच्यः किमन्येन व्यवहारनयेन चेत् ॥136॥

अर्थ: सम्यक्त्वगोचर एक शुद्ध नय ही है । इस लिये उसीका कथन करना चाहिये, बाकी व्यवहार नयसे क्या लाभ है ?


सत्यं शुद्धनयः श्रेयान् न श्रेयानितरो नयः ।
अपि न्यायवलादस्ति नयः श्रेयानिवेतरः ॥137॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि शुद्ध नय उत्तम है, उसीसे वास्तविक वस्तुबोध होता है और यह भी ठीक है कि व्यवहार नय वास्तविक नहीं है । परन्तु शुद्ध नयके समान अशुद्ध नय भी न्यायके बलसे मानना ही पड़ता है ।


तद्यथानादिसन्तानबन्धपर्यायमात्रतः ।
एको विवक्षितो जीवः स्मृता नव पदा अमी ॥138॥

अर्थ: एक ही जीव अनादि सन्तान रूपसे प्राप्त बन्धपर्यायकी अपेक्षासे जब कहा जाता है तब वही जीव नव पदार्थ रूपसे स्मरण किया जाता है ।


किञ्च पर्यायधर्माणो नवामी पद संज्ञकाः ।
उपराक्तिरुपाधिः स्यान्नात्र पर्यायमात्रता ॥139॥

अर्थ: अथवा ये नौ पदार्थ जीवकी पर्यायें हैं । इतना विशेष है कि ये केवल जीवकी पर्यायें ही नहीं है किन्तु इन पर्यायोंमें उपराग (कर्ममल) रूप उपाधि लगी हुई है। उपरागोपाधि सहित पर्यायोंको ही नौ पदार्थ कहते हैं ।


नात्रासिद्धमुपाधित्वं सोपरक्तेस्तथा स्वतः ।
यतो नव पदव्याप्तमव्याप्तं पर्ययेषु तत् ॥140॥

अर्थ: संसारी जीवके उपराग रूप उपाधि असिद्ध नहीं है किन्तु स्वतः सिद्ध है । इस उपाधिका सम्बन्ध इन नौ पदार्थों ( अशुद्ध जीवकी पर्यायों ) में ही है । जीवकी सभी पर्यायोंमें नहीं है । क्योंकि जीवकी शुद्ध पर्यायमें इसका बिलकुल सम्बन्ध नहीं है ।


सोपरक्तेरुपाधित्वान्नादरश्चेद्विधीयते ।
क्व पदानि नवामूनि जीवः शुद्धोनुभूयते ॥141॥

अर्थ: व्यवहार दृष्टिसे जीव उपराग-उपाधिवाला है। यदि उपाधि होनेसे उसका अनादर किया जाय अर्थात् उसे न माना जाय, तो ये जीवकी नौ अवस्थायें भी नहीं हो सक्ती हैं। सदा शुद्ध जीवका ही अनुभव होना चाहिये। अथवा नौ पदार्थोंके असिद्ध होनेपर शुद्ध जीवका भी अनुभव नहीं हो सक्ता है।


ननूपरक्तिरस्तीति किंवा नास्तीति तत्त्वतः ।
उभयं नोभयं किंवा तत्क्रमेणाक्रमेण किम् ॥142॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्वामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।

यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?

यदि शुद्धता और उपराग जन्य अशुद्धता, इन दोनोंको एक साथ ही माना जावे तो भी दोनोंसे हमारा अभीष्ट सिद्ध न होगा, उस समय भी शुद्ध ही ग्राह्य होगा और अशुद्ध अग्राह्य होगा ?

एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सक्ते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर " दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा " इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है ।

इसलिये अनन्य गति न्यायसे अर्थात् अन्यत्र गति न होनेसे अथवा घूम फिरकर वहीं


अस्तीति चेत्तदा तस्यां सत्यां कथमनादरः ।
नास्तीति चेदसत्त्वेस्याः सिद्धो नानादरो नयात् ॥143॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्मामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।

यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?

यदि शुद्धता और उपराग जन्य अशुद्धता, इन दोनोंको एक साथ ही माना जावे तो भी दोनोंसे हमारा अभीष्ट सिद्ध न होगा, उस समय भी शुद्ध ही ग्राह्य होगा और अशुद्ध अग्राह्य होगा ?

एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सक्ते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर “ दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा ” इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है ।

इसलिये अनन्य गति न्यायसे अर्थात् अन्यत्र गति न होनेसे अथवा घूम फिरकर वहीं


सत्यामुपरक्तौ तस्यां नादेयानि पदानि वै ।
शुद्धादन्यत्र सर्वत्र नयस्यानधिकारतः ॥144॥

अर्थ: दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है )


असत्यामुपरक्तौ वा नैवामूनि पदानि च ।
हेतुशून्याविनाभूतकार्यशून्यस्य दर्शनात् ॥145॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्मामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।

यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?

यदि शुद्धता और उपराग जन्य अशुद्धता, इन दोनोंको एक साथ ही माना जावे तो भी दोनोंसे हमारा अभीष्ट सिद्ध न होगा, उस समय भी शुद्ध ही ग्राह्य होगा और अशुद्ध अग्राह्य होगा ?

एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सक्ते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर " दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा " इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है।

इसलिये अनन्य गति न्यायसे अर्थात् अन्यत्र गति न होनेसे अथवा घूम फिरकर वहीं


उभयं चेत्क्रमेणेह सिद्धं न्यायाद्विवक्षितम् ।
शुद्धमात्रमुपादेयं हेयं शुद्धेतरं तदा ॥146॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्वामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।

यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?


यौगपद्येपि तद्द्वैतं न समीहितसिद्धये ।
केवलं शुद्धमादेयं नादेयं तत्परं यतः ॥147॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्वामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।

यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?

यदि शुद्धता और उपराग जन्य अशुद्धता, इन दोनोंको एक साथ ही माना जावे तो भी दोनोंसे हमारा अभीष्ट सिद्ध न होगा, उस समय भी शुद्ध ही ग्राह्य होगा और अशुद्ध अग्राह्य होगा ?

एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सक्ते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर " दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा " इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है ।

इसलिये अनन्य गति न्यायसे अर्थात् अन्यत्र गति न होनेसे अथवा घूम फिरकर वहीं आजानेसे शुद्ध ही एक पदार्थ मानना चाहिये, वही सम्यग्दर्शनका विषय है । उसी पदार्थका कहनेवाला यदि कोई नय है तो केवल शुद्धनय ( निश्चयनय ) है ?


नैकस्यैकपदे स्तो द्वे क्रिये वा कर्मणी ततः ।
यौगपद्यमसिद्धं स्याद्द्वैताद्वैतस्य का कथा ॥148॥

अर्थ: एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सकते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर “ दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा ” इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है।


ततोऽनन्यगतेर्न्यायाच्छुद्धः सम्यक्त्वगोचरः ।
तद्वाचकश्च यः कोपि वाच्यः शुद्धनयोपि सः ॥149॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि निश्चयनयसे (वास्तवमें) उपराग इस जीवात्वामें है या नहीं है ? अथवा उपराग और अनुपराग (शुद्धता) दोनों है ? अथवा क्या दोनों ही नहीं है ? दोनों है तो क्रमसे हैं या एक साथ ? यदि वास्तवमें उपराग है तो फिर उसमें अनादर (अग्राह्यता) क्यों किया जाता है ? यदि वास्तवमें व्यवहारनयका विषय भूत उपराग कोई वस्तु नहीं है, तो उसमें अनादर भी सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अनादर उसीका किया जाता है जो कि कुछ चीज हो । जब निश्चय नयसे उपराग कोई चीज ही नहीं है तो अनादर किसका ? दूसरी बात यह है कि यदि उपराग माना भी जाय तो भी नौ पदार्थोंमें ग्राह्यता नहीं आती, क्योंकि शुद्ध पदार्थके सिवाय दूसरी जगह नयका अधिकार ही नहीं है ? ( शङ्काकारकी यह शङ्का केवल शुद्ध नयको ध्यानमें रखकर ही की गई है ) यदि उपराग नहीं माना जाय तब तो ये जीवके नौ स्थान किसी प्रकार भी नहीं बन सक्ते हैं क्योंकि जिसका कारण ही नहीं है उसका कार्य भी नहीं हो सक्ता है ।
यदि शुद्धता और अशुद्धता ( उपराग ) दोनोंहीको माना जावे, परन्तु क्रमसे माना जावे तो भी न्यायसे शुद्ध मात्र ही उपादेय (ग्राह्य) सिद्ध होगा, और शुद्धसे भिन्न अशुद्ध त्याज्य होगा ?
यदि शुद्धता और उपराग जन्य अशुद्धता, इन दोनोंको एक साथ ही माना जावे तो भी दोनोंसे हमारा अभीष्ट सिद्ध न होगा, उस समय भी शुद्ध ही ग्राह्य होगा और अशुद्ध अग्राह्य होगा ?
एक बात यह भी है कि एक पदार्थके एक स्थानमें दो क्रियायें अथवा दो कर्म रह भी नहीं सकते हैं इसलिये जीवमें एक साथ शुद्धता और अशुद्धता नहीं बन सक्ती, फिर " दोनोंमेंसे शुद्ध ही ग्राह्य होगा " इत्यादि द्वैताद्वैतकी कथा तो पीछे है ।
इसलिये अनन्य गति न्यायसे अर्थात् अन्यत्र गति न होनेसे अथवा घूम फिरकर वहीं आजानेसे शुद्ध ही एक पदार्थ मानना चाहिये, वही सम्यग्दर्शनका विषय है । उसी पदार्थका कहनेवाला यदि कोई नय है तो केवल शुद्धनय ( निश्चयनय ) है ?


नैवं त्वनन्यथासिद्धेः शुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयोः ।
विरोधेप्यविरोधः स्यान्मिथः सापेक्षतः सतः ॥150॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है क्योंकि शुद्धता और अशुद्धता इन दोनोंमेंसे किसी एकको न माना जाय अथवा इन दोनोंका कार्य कारण भाव न माना जाय तो काम नहीं चल सक्ता । ये दोनों ही अनन्यथा सिद्ध हैं अर्थात् दोनों ही आवश्यक हैं । दोनोंके माननेमें अशुद्धता पक्षमें जो शङ्काकारने विरोध बतलाया है सो भी अविरोध ही है पदार्थ परस्परकी अपेक्षाको लिये हुए हैं इसलिये विरोध नहीं रहता किन्तु अपेक्षाकृत भेदसे दोनों ही ठीक हैं ।


नासिद्धानन्यथासिद्धिस्तद्द्वयोरेकवस्तुतः ।
यद्विशेषेपि सामान्यमेकमात्रं प्रतीयते ॥151॥

अर्थ: शुद्धता और अशुद्धता ये दोनों ही आवश्यक हैं यह बात भी असिद्ध नहीं है क्योंकि दोनों एक ही वस्तु तो पड़ती हैं। उक्त दोनों ही भेद जीवकी अवस्था विशेष ही तो हैं। इन भेदोंकी अपेक्षासे जीव अनेक होनेपर भी सामान्य रीतिसे केवल एक ही प्रतीत होता है।


तद्यथा नव तत्त्वानि केवलं जीवपुद्गलौ ।
स्वद्रव्याद्यैरनन्यत्वाद्वस्तुतः कर्तृकर्मणोः ॥152॥

अर्थ: वास्तवमें विचार किया जाय तो ये नौ भी पदार्थ ( अशुद्ध-अवस्था ) केवल जीव और पुद्गल दो द्रव्य रूप ही पड़ते हैं, और कर्ता तथा कर्म ये वास्तवमें अपने द्रव्यादिकसे अभिन्न होते हैं ।


ताभ्यामन्यत्र नैतेषां किञ्चिद्द्रव्यान्तरं पृथक् ।
न प्रत्येकं विशुद्धस्य जीवस्य पुद्गलस्य च ॥153॥

अर्थ: जीव और पुद्गल, इन दो द्रव्योंको छोड़कर नव पदार्थ और कोई दूसरे द्रव्य नहीं है । अर्थात् नौ ही पदार्थ जीव, पुद्गलकी अवस्था विशेष हैं इनमें अन्य किसी द्रव्यका मेल नहीं है । और ऐसा भी नहीं है कि ये नौ ही पदार्थ केवल शुद्ध जीवके ही हों अथवा केवल पुद्गलके ही हों । किन्तु दोनों ही के योगसे हुए हैं । इसी बातको नीचे दिखाते हैं -


किन्तु सम्बद्धयोरेव तद्द्वयोरितरेतरम् ।
नैमित्तिकनिमित्ताभ्यां भावा नव पदा अमी ॥154॥

अर्थ: नैमित्तिक जीव और निमित्तकारण पुद्गल, इन दोनोंके ही परस्पर सम्बन्धसे ये नौ पदार्थ हो गये हैं ।


अर्थान्नवपदीभूय जीवश्चैको विराजते ।
तदात्वेपि परं शुद्धस्तद्विशिष्टदशामृते ॥155॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका सारांश यही निकलता है कि यह जीव ही नौ पदार्थ रूप होकर ठहरा हुआ है । यद्यपि पहले श्लोकों द्वारा जीव और पुद्गल दोनों ही की अवस्था नौ पदार्थ रूप बतलाई है । परन्तु यहां पर जीवके ही अवस्था भेद नौ पदार्थोंको बतलाया है । इसका अभिप्राय यह है कि यहां पर निमित्तकारणको विवक्षित नहीं रक्खा है । पुद्गलके निमित्तसे जीवके ये नौ भेद होते हैं । अर्थात् अवस्था तो ये जीवकी हैं परन्तु पुद्गल निमित्तकारण है इस लिये यहांपर निमित्त कारणको अविवक्षित रखकर “ जीव ही नौ पदार्थ रूप है ” ऐसा कहा है ।

यद्यपि इन अवस्थाओंसे यह जीव अशुद्ध है तथापि इन अवस्थाओंसे रहित विचारनेसे केवल शुद्ध जीवका ही प्रतिभास होता है ।


नासंभवं भवेदेतत् तद्विधेरुपलब्धितः ।
सोपरक्तेरभूतार्थात् सिद्धं न्यायाददर्शनम् ॥156॥

अर्थ: अशुद्धताके भीतर शुद्ध जीवका प्रतिभास होता है यह बात असिद्ध नहीं है। किन्तु अनेक प्रकारसे सिद्ध है। परन्तु अयथार्थ उपाधिका सम्बन्ध हो जानेके कारण उस शुद्धताका दर्शन नहीं होता है।


सन्त्यनेकेत्र दृष्टान्ता हेमपद्मजलाऽनलाः ।
आदर्शस्फटिकाश्मानौ बोधवारिधिसैन्धवाः ॥157॥

अर्थ: अशुद्धताके भीतर शुद्धताका ज्ञान होता है इस विषयमें अनेक उदाहरण हैं । उनमेंसे कितने ही दृष्टान्त तो ये हैं - सोना, कमल, जल, अग्नि, दर्पण, स्फटिक पत्थर, ज्ञान, समुद्र और नमक( लवण)।


एकं हेम यथानेकवर्णं स्यात्परयोगतः ।
तमसन्तमिवोपेक्ष्य पश्य तद्धेम केवलम् ॥158॥

अर्थ: यद्यपि सोना दूसरे पदार्थके निमित्तसे अनेक रूपोंको धारण करता है । जैसे कभी चांदीमें मिला दिया जाता है तो दूसरे ही रूपको धारण करता है, कभी पीतलमें मिला दिया जाय तो दूसरे ही रूपको धारण करता है इसी प्रकार तावाँ, लोहा, अलमोनियम, रेडियम आदि पदार्थोंके सम्बन्धसे अनेक प्रकार दीखता है, तथापि उन पदार्थोंको नहीं सा समझ कर उनकी उपेक्षा कर दें तो केवल सोनेका स्वरूप ही दृष्टिगत होगा ।


नचाशंक्यं सतस्तस्य स्यादुपेक्षा कथं जवात् ।
सिद्धं कुतः प्रमाणाद्वा तत्सत्त्वं न कुतोपिवा ॥159॥

अर्थ: केवल सोनेके ग्रहण करनेमें दूसरे मिले हुए पदार्थकी शीघ्र ही कैसे उपेक्षा की जा सकती है ? अथवा उस सोनेमें दूसरे पदार्थकी सत्ता है या नहीं है ? है तो किस प्रमाणसे है ? अथवा किसी भी प्रमाणसे नहीं है ? इस प्रकारकी शंका करना ठीक नहीं है । क्यों ठीक नहीं है ? सो नीचे बतलाते हैं -


नानादेयं हि तद्धेम सोपरक्तेरुपाधिवत् ।
तत्त्यागे सर्वशून्यादिदोषाणां सन्निपाततः ॥160॥

अर्थ: सोनेके साथ दूसरे पदार्थका मेल हो रहा है। मेल होनेसे सोना अग्राह्य नहीं है। यदि उपाधिविशिष्ट सोनेका ग्रहण न किया जाय तो सर्वशून्यता आदि अनेक दोषोंका समावेश होगा। क्योंकि विना अशुद्धताके स्वीकार किये शुद्धता भी नहीं ठहरती।


न परीक्षाक्षमं चैतच्छुद्धं शुद्धं यदा तदा ।
शुद्धस्यानुपलब्धौ स्याल्लब्धिहेतोरदर्शनम् ॥161॥

अर्थ: यह कहना भी परीक्षाके योग्य नहीं है कि जिस समय सोना शुद्ध है उस समय वह शुद्ध ही है। ऐसा माननेसे शुद्ध सोनेका प्रतिभास भी नहीं हो सकेगा। क्योंकि शुद्धतामें कारण अशुद्धता है। अशुद्धतामें ही शुद्धता का प्रतिभास होता है। अशुद्धताका अदर्शन (लोप) होनेसे शुद्धताका भी लोप हो जायगा।


यदा तद्वर्णमालायां दृश्यते हेम केवलम् ।
न दृश्यते परोपाधिः स्वेष्टं दृष्टेन हेम तत् ॥162॥

अर्थ: जिस समय अनेक रूपोंको लिये हुए उस मिले हुए सोनेमें केवल सोनेको हम देखते हैं तो उस समय दूसरे पदार्थोंकी उपाधिका प्रतिभास नहीं करते हैं। उस समय तो अपना इष्ट जो सोना है उसीका प्रत्यक्ष कर लेते हैं।


ततः सिद्धं यथा हेम परयोगाद्विना पृथक् ।
सिद्धं तद्वर्णमालायामन्ययोगेपि वस्तुतः ॥163॥

अर्थ: तावाँ, पीतल, चांदी आदिसे मिला हुआ भी सोना वास्तवदृष्टिसे विचार करनेपर दूसरे पदार्थोंके मेलसे रहित शुद्ध ही प्रतीत हो जाता है अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल होनेपर भी सोनेका स्वरूप भिन्न ही प्रतीत हो जाता है । उसी प्रकार पुद्गलके निमित्तसे नौ अवस्थाओंमें आया हुआ भी जीव, ( उसका स्वरूप विचारने पर ) शुद्ध ही प्रतीत हो जाता है ।
जिस प्रकार सोनेका दृष्टान्त घटित किया गया है उसी प्रकार सब दृष्टान्तोंको घटित करना चाहिये । वे दृष्टान्त ही साध्यार्थके साथ अविरोध रीतिसे साधनको बतलानेके लिये भूषण स्वरूप हैं अर्थात् साध्य साधनके ठीक ठीक परिज्ञानके लिये ये दृष्टान्त अत्युपयोगी हैं ।


प्रक्रियेयं हि संयोज्या सर्वदृष्टान्तभूमिषु ।
साध्यार्थस्याविरोधेन साधनालंकरिष्णुषु ॥164॥

अर्थ: तावाँ, पीतल, चांदी आदिसे मिला हुआ भी सोना वास्तवदृष्टिसे विचार करनेपर दूसरे पदार्थोंके मेलसे रहित शुद्ध ही प्रतीत हो जाता है अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल होनेपर भी सोनेका स्वरूप भिन्न ही प्रतीत हो जाता है । उसी प्रकार पुद्गलके निमित्तसे नौ अवस्थाओंमें आया हुआ भी जीव, ( उसका स्वरूप विचारने पर ) शुद्ध ही प्रतीत हो जाता है ।
जिस प्रकार सोनेका दृष्टान्त घटित किया गया है उसी प्रकार सब दृष्टान्तोंको घटित करना चाहिये । वे दृष्टान्त ही साध्यार्थके साथ अविरोध रीतिसे साधनको बतलानेके लिये भूषण स्वरूप हैं अर्थात् साध्य साधनके ठीक ठीक परिज्ञानके लिये ये दृष्टान्त अत्युपयोगी हैं ।


तोयमग्नं यथा पद्मपत्रमत्र तथा न तत् ।
तदस्पृश्यस्वभावत्वादर्थतो नास्ति पत्रतः ॥165॥

अर्थ: यद्यपि कमल जलमें मग्न है तथापि वह जलमें नहीं है वास्तव दृष्टिसे जलमें कमल नहीं है। क्योंकि उसका जलसे भिन्न रहनेका स्वभाव है।


सकर्दमं यथा वारि वारि पश्य न कर्दमम् ।
दृश्यते तदवस्थायां शुद्धं वारि विपङ्कवत् ॥166॥

अर्थ: जो जल कीचड़में मिला हुआ है, उस जलमें भी यदि तुम जलका स्वरूप देखो, कीचड़का न देखो तो तुम्हें मिली हुई अवस्थामें भी कीचड़से भिन्न शुद्ध जलकी ही प्रतीति होगी । इसी प्रकार जीवात्मा भी पुद्गलसे भिन्न प्रतीत होता है ।


अग्निर्यथा तृणाग्निः स्यादुपचारात्तृणं दहन् ।
नाग्निस्तृणं तृणं नाग्निरग्निरग्निस्तृणं तृणम् ॥167॥

अर्थ: जिस समय अग्नि तिनकेको जला रही है, उस समय उस अग्निको तिनकेके निमित्तसे - उपचारसे तिनकेकी अग्नि कह देते हैं । परन्तु वास्तवमें तिनकेकी अग्नि क्या है ? अग्नि ही अग्नि है । अग्नि तिनका नहीं है । और न तिनका अग्नि है । अग्नि, अग्नि ही है और तिनका, तिनका ही है ।


प्रतिबिम्बं यथादर्शे सन्निकर्षात्कलापिनः ।
तदात्वे तदवस्थायामपि तत्र कुतः शिखी ॥168॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें मयूरके सम्बन्धसे प्रतिबिम्ब (छाया) पड़ता है। परन्तु वास्तवमें छाया पड़ने पर भी वहां मयूर नहीं है। केवल दर्पण ही है। उसी प्रकार पुद्गलके निमित्तसे जीवात्मा अशुद्ध प्रतीत होता है वास्तवमें वह शुद्ध निराला ही है।


जपापुष्पोपयोगेन विकारः स्फटिकाश्मनि ।
अर्थात्सोपि विकारश्चाऽवास्तवस्तत्र वस्तुतः ॥169॥

अर्थ: जपापुष्प लाल फूल होता है, उस फूलको स्फटिक पत्थरके पीछे लगानेसे स्फटिक पत्थरमें विकार हो जाता है अर्थात् वह स्फटिक भी लाल मालूम होने लगता है। परन्तु यथार्थ रीतिसे देखा जाय तो स्फटिकमें कोई प्रकारका लाली आदि विकार नहीं है।


ज्ञानं स्वयं घटज्ञानं परिच्छिन्दद्यथा घटम् ।
नार्थाज्ज्ञानं घटोयं स्याज्ज्ञानं ज्ञानं घटो घटः ॥170॥

अर्थ: जिस समय ज्ञान घटको जानता है उस समय वह स्वयं घट ज्ञान कहलाता है। परन्तु वास्तवमें ज्ञान घट रूप नहीं हो जाता है। किन्तु ज्ञान, ज्ञान ही रहता है और घट, घट ही रहता है।


वारिधिः सोत्तरङ्गोऽपि वायुना प्रेरितो यथा ।
नार्थादैक्यं तदात्वेपि पारावारसमीरयोः ॥171॥

अर्थ: वायुके निमित्तसे प्रेरित होता हुआ समुद्र ऊँची ऊँची तरङ्गोंको धारण करता है। परन्तु ऐसा होने पर भी समुद्र और वायुमें अभिन्नता नहीं है।


सर्वतः सैन्धवं खिल्यमर्थादेकरसं स्वयम् ।
चित्रोपदंशकेषूच्चैर्यन्नानेकरसं यतः ॥172॥

अर्थ: वास्तवमें नमकका खण्ड एक रस स्वरूप है, उसका स्वाद तो नमक रूप ही होता है। परन्तु भिन्न भिन्न प्रकारके व्यंजनोंमें पहुंचनेसे भिन्न भिन्न रीतिसे स्वाद आता है। लेकिन नमक तो नमक ही रहता है। वह किसी भी वस्तुमें क्यों न मिला दिया जाय, नमकका दूसरा स्वाद नहीं बदलेगा।


इति दृष्टान्तसनाथेन स्वेष्टं दृष्टेन सिद्धिमत् ।
यत्पदानि नवामूनि वाच्यान्यर्थादवश्यतः ॥173॥

अर्थ: इस प्रकार अनेक दृष्टांतोंसे प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा हमारा अभीष्ट सिद्ध हो चुका। वह अभीष्ट यही है कि ये आत्माकी नौ अवस्थायें (नव पदार्थ) अवश्य कहनी चाहिये।


कैश्चित्तु कल्प्यते मोहाद्वक्तव्यानि पदानि न ।
हेयानीति यतस्तेभ्यः शुद्धमन्यत्र सर्वतः ॥174॥

अर्थ: मोहनीय कर्मकी तीव्रतासे भूले हुए कोई तो कहते हैं कि ये नव पदार्थ नहीं कहना चाहिये । क्योंकि ये सर्वथा त्याज्य हैं । इन नवों पदार्थोंसे आत्माका शुद्ध निजरूप सर्वथा भिन्न ही है ।

आचार्य कहते हैं कि ऐसा कहना सर्वथा अयुक्त है । इन नव पदार्थोंको सर्वथा ही न कहा जाय अथवा ये सर्वथा ही त्यागने योग्य हैं यह बात किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नहीं होती है । और उन नौ पदार्थोंके छोड़नेपर शुद्ध आत्माकी भी प्रतीति नहीं हो सकती है ।


तदसत्सर्वतस्त्यागः स्यादसिद्धः प्रमाणतः ।
नथा तेभ्योऽतिरिक्तस्य, शुद्धस्यानुपलब्धितः ॥175॥

अर्थ: मोहनीय कर्मकी तीव्रतासे भूले हुए कोई तो कहते हैं कि ये नव पदार्थ नहीं कहना चाहिये । क्योंकि ये सर्वथा त्याज्य हैं । इन नवों पदार्थोंसे आत्माका शुद्ध निजरूप सर्वथा भिन्न ही है ।
आचार्य कहते हैं कि ऐसा कहना सर्वथा अयुक्त है । इन नव पदार्थोंको सर्वथा ही न कहा जाय अथवा ये सर्वथा ही त्यागने योग्य हैं यह बात किसी भी प्रमाणसे सिद्ध नहीं होती है । और उन नौ पदार्थोंके छोड़नेपर शुद्ध आत्माकी भी प्रतीति नहीं हो सकती है ।


नावश्यं वाच्यता सिद्ध्येत्सर्वतो हेयवस्तुनि ।
नान्धकारेऽप्रविष्टस्य प्रकाशानुभवो मनाक् ॥176॥

अर्थ: इन नौ पदार्थोंको निन्द्य तथा त्यागने योग्य बतलाया है और शुद्धात्माको उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य बतलाया है । यदि इनको सर्वथा ही छोड़ दिया जाय तो इनमें त्याग करनेका उपदेश भी किस प्रकार सिद्ध हो सकता है ? और शुद्ध आत्मामें ग्राह्यताका उपदेश भी कैसे हो सकता है ? जो पुरुष अन्धकारको अच्छी तरह पहचानता है वही तो प्रकाशका अनुभव करता है । जिसने कभी अन्धकारमें प्रवेश ही नहीं किया है वह प्रकाशका अनुभव भी क्या करेगा ?


नावाच्यता पदार्थानां स्यादकिञ्चित्करत्वतः ।
सार्थानीति यतोऽवश्यं वक्तव्यानि नवार्थतः ॥177॥

अर्थ: यदि कोई कहे कि ये नौ पदार्थ अकिञ्चित्कर ( कुछ प्रयोजनी भूत नहीं ) है इसलिये इनको कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ? ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि इन नौ पदार्थोंका कहना अवश्य सार्थक ( कुछ प्रयोजन रखता है ) है इसलिये नौ पदार्थ अवश्य ही कहने योग्य हैं ।


न स्यात्तेभ्योऽतिरिक्तस्य सिद्धिः शुद्धस्य सर्वतः ।
साधनाभावतस्तस्य तद्यथानुपलब्धितः ॥178॥

अर्थ: यदि नौ पदार्थोंको न माना जाय तो उनसे अतिरिक्त शुद्ध जीवका भी कभी अनुभव नहीं हो सकता अर्थात् शुद्ध जीव भी विना अशुद्धताके स्वीकार किये सिद्ध नहीं होता । क्योंकि कारणसामग्रीके अभावमें कार्यकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती है । अशुद्धता पूर्वक ही शुद्धताकी उपलब्धि होती है ।


ननु चार्थान्तरं तेभ्यः शुद्धं सम्यक्त्वगोचरम् ।
अस्ति जीवस्य स्वं रूपं नित्योद्योगं निरामयम् ॥179॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि उन नौ पदार्थोंसे जीवका निज रूप भिन्न ही है, वह शुद्ध है, नित्य उद्योगशील है, निरोग है, और वही शुद्ध रूप सम्यक्त्व गोचर है । परन्तु उस शुद्ध रूपको जगत् तब तक नहीं देख सकता है जब तक कि वह मिथ्यात्व रूपी अँधेरेसे व्याप्त ( अन्धा ) हो रहा है । जब इस जगत्का मिथ्यान्धकार नष्ट हो जाता है तभी यह जगत् बहुत ही शीघ्र उस शुद्ध जीवात्माको देखने लगता है ?


न पश्यति जगद्यावन्मिथ्यान्धतमसा ततम् ।
अस्तमिथ्यान्धकारं चेत् पश्यतीदं जगज्जवात् ॥180॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि उन नौ पदार्थोंसे जीवका निज रूप भिन्न ही है, वह शुद्ध है, नित्य उद्योगशील है, निरोग है, और वही शुद्ध रूप सम्यक्त्व गोचर है । परन्तु उस शुद्ध रूपको जगत् तब तक नहीं देख सकता है जब तक कि वह मिथ्यात्व रूपी अँधेरेसे व्याप्त ( अन्धा ) हो रहा है । जब इस जगत्का मिथ्यान्धकार नष्ट हो जाता है तभी यह जगत् बहुत ही शीघ्र उस शुद्ध जीवात्माको देखने लगता है ?


नैवं विरुद्धधर्मत्वाच्छुद्धाशुद्धत्वयोर्द्वयोः ।
नैकस्यैकपदे द्वेस्तः शुद्धाशुद्धे क्रियेर्थतः ॥181॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है क्योंकि शुद्धता और अशुद्धता ये दोनों ही विरोधी धर्म हैं । और विरोधी पदार्थ एक स्थानमें रह नहीं सकते। इसलिये शुद्धता और अशुद्धता ये दोनों एक स्थानमें कैसे रह सकती हैं ? क्यों नहीं रह सकतीं ? इसी बातको नीचे स्पष्ट करते हैं -


अथ सत्यां हि शुद्धायां क्रियायामर्थतश्चितः ।
स्यादशुद्धा कथं वा चेदस्ति नित्या कथं न सा ॥182॥

अर्थ: यदि वास्तवमें जीवमें शुद्धता ही मानी जाय तो अशुद्धता किस प्रकार हो सकती है ? यदि हो सकती है तो वह फिर नित्य क्यों नहीं ?


अथ सत्यामशुद्धायां बन्धाभावो विरुद्धभाक् ।
नित्यायामथ तस्यां हि सत्यां मुक्तेरसंभवः ॥183॥

अर्थ: यदि जीवमें अशुद्धता ही मानी जाय तो बन्धका अभाव कभी नहीं हो सकता, यदि वह अशुद्धता नित्य है तो इस जीवात्माकी मुक्ति ही असंभव हो जायगी ।


ततः सिद्धं यदा येन भावेनात्मा समन्वितः ।
तदाऽनन्यगतिस्तेन भावेनात्माऽस्ति तन्मयः ॥184॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए तीनों श्लोकोंसे यह परिणाम निकालना चाहिये कि जिस समय आत्मा जिस भावसे सहित है उस समय वह उसी भावमें तल्लीन हो रहा है । उस समय उसकी और कोई गति नहीं है ।


तस्माच्छुभः शुभेनैव स्यादशुभोऽशुभेन यः ।
शुद्धः शुद्धेन भावेन तदात्वे तन्मयत्वतः ॥185॥

अर्थ: जिस समय आत्मा शुभ भावोंको धारण करता है उस समय आत्मा शुभ है, जिस समय अशुभ भावोंको धारण करता है, उस समय आत्मा अशुभ है, जिस समय शुद्ध भावोंको धारण करता है, उस समय वही आत्मा शुद्ध है। ऐसा होनेका कारण भी यही है कि जिस समय यह आत्मा जैसे भावोंको धारण करता है उस समय उन्हीं भावोंमें तन्मय (तल्लीन) हो जाता है।


ततोऽनर्थान्तरं तेभ्यः किंचिच्छुद्धमनीदृशम् ।
शुद्धं नव पदान्येव तद्विकारादृते परम् ॥186॥

अर्थ: इसलिये अशुद्धतासे विलक्षण जो शुद्ध जीव है वह उन नौ पदार्थोंसे कथंचित् अभिन्न है । सर्वथा भिन्न कहना मिथ्या है । ऐसा भी कह सकते हैं कि विकारके दूर हो जानेपर वे नौ पदार्थ ही शुद्ध स्वरूप हैं ।


अतस्तत्त्वार्थश्रद्धानं सूत्रे सद्दर्शनं मतम ।
तत्तत्त्वं नव जीवाद्या यथोद्देश्याः क्रमादपि ॥187॥

अर्थ: श्रीमद्वान् उमास्वामीने " तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् " इस सूत्रद्वारा तत्त्वार्थश्रद्धानको सम्यग्दर्शन बतलाया है, वही सूत्रका आशय उपर्युक्त कथनसे सिद्ध होता है । अब उन्ही जीवादिक नव तत्त्वों (पदार्थों) को क्रमसे बतलाते हैं -


तदुद्देश्यो यथा जीवः स्यादजीवस्तथास्रवः ।
बन्धः स्यात्संवरश्चापि निर्जरा मोक्ष इत्यपि ॥188॥

अर्थ: वे नव पदार्थ इस प्रकार हैं-जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष ये सात तत्त्व और पुण्य तथा पाप । ये नौ पदार्थ सम्यग्दर्शनके विषयभूत हैं अर्थात् इन्हींका श्रद्धानी सम्यग्दृष्टी है और ये पदार्थ वास्तविक हैं ।


सप्तैते पुण्यपापाभ्यां पदार्थास्ते नव स्मृताः ।
सन्ति सद्दर्शनस्योच्चैर्विषया भूतार्थमाश्रिताः ॥189॥

अर्थ: वे नव पदार्थ इस प्रकार हैं-जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष ये सात तत्त्व और पुण्य तथा पाप । ये नौ पदार्थ सम्यग्दर्शनके विषयभूत हैं अर्थात् इन्हींका श्रद्धानी सम्यग्दृष्टी है और ये पदार्थ वास्तविक हैं ।


तत्राधिजीवमाख्यानं विदधाति यथाधुना ।
कविः पूर्वापरायत्तपर्यालोचविचक्षणः ॥190॥

अर्थ: पूर्वापर विचार करनेमें अति चतुर कविवर ( आचार्य ) अब जीवके विषयमें व्याख्यान करते हैं -


जीवसिद्धिः सती साध्या सिद्धा साधीयसी पुरा ।
तत्सिद्धलक्षणं वक्ष्ये साक्षात्तल्लब्धिसिद्धये ॥191॥

अर्थ: पहले जीवकी सिद्धि कह चुके हैं, इसलिये प्रसिद्ध है । उसीको पुनः साध्य बनाते हैं अर्थात् सिद्ध करते हैं । जीवके ठीक २ स्वरूपकी प्राप्ति हो जाय, इसलिये उसका सिद्ध ( प्रसिद्ध ) लक्षण कहते हैं ।


स्वरूपं चेतना जन्तोः सा सामान्यात्सदेकधा ।
सद्विशेषादपि द्वेधा क्रमात्सा नाऽक्रमादिह ॥192॥

अर्थ: जीवका स्वरूप चेतना है वह चेतना सामान्य रीतिसे एक प्रकार है क्योंकि सामान्य रीतिसे सत्ता एक ही प्रकार है । तथा सत् विशेषकी अपेक्षासे वह चेतना दो प्रकार है । परन्तु उसके दोनों भेद क्रमसे होते हैं एक साथ नहीं होते ।


एका स्याच्चेतना शुद्धा स्यादशुद्धा परा ततः ।
शुद्धा स्यादात्मनस्तत्त्वमस्त्यशुद्धाऽऽत्मकर्मजा ॥193॥

अर्थ: एक शुद्ध चेतना है दूसरी अशुद्ध चेतना है। शुद्ध चेतना आत्माका निजरूप है और अशुद्ध चेतना आत्मा और कर्मके निमित्तसे होती है।


एकधा चेतना शुद्धा शुद्धस्यैकविधत्त्वतः ।
शुद्धाशुद्धोपलब्धित्त्वाज्ज्ञानत्त्वाज्ज्ञानचेतना ॥194॥

अर्थ: शुद्ध चेतना एक प्रकार है क्योंकि शुद्ध एक प्रकार ही है। शुद्ध चेतनामें शुद्धताकी उपलब्धि होती है इसलिये वह शुद्ध है और वह शुद्धोपलब्धि ज्ञान रूप है इसलिये उसे ज्ञान चेतना कहते हैं।


अशुद्धा चेतना द्वेधा तद्यथा कर्मचेतना ।
चेतनत्वात्फलस्यास्य स्यात्कर्मफलचेतना ॥195॥

अर्थ: अशुद्ध चेतना दो प्रकार है। एक कर्म चेतना, दूसरी कर्मफल चेतना। कर्मफल चेतनामें फल भोगनेकी मुख्यता है।


अत्रात्मा ज्ञानशब्देन वाच्यस्तन्मात्रतः स्वयम् ।
स चेत्यतेऽनया शुद्धः शुद्धा सा ज्ञानचेतना ॥196॥

अर्थ: यहां पर ज्ञान शब्दसे आत्मा समझना चाहिये । क्योंकि आत्मा ज्ञान रूप ही स्वयं है । वह आत्मा जिसके द्वारा शुद्ध जानी जावे उसीका नाम ज्ञान चेतना है ।


अर्थाज्ज्ञाने गुणः सम्यक् प्राप्तावस्थान्तरं यदा
आत्मोपलब्धिरूपं स्यादुच्यते ज्ञानचेतना ॥197॥

अर्थ: अर्थात् जिस समय आत्माका ज्ञानगुण सम्यक् अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, केवल शुद्धात्माका अनुभवन करता है उसी समय उसे ज्ञान चेतना कहते हैं ।


सा ज्ञानचेतना नूनमस्ति सम्यग्दृगात्मनः ।
न स्यान्मिथ्यादृशः क्वापि तदात्वे तदसम्भवात्ः ॥198॥

अर्थ: वह ज्ञानचेतना निश्चयसे सम्यग्दृष्टिके ही होती है । मिथ्यादृष्टिके कहीं भी नहीं हो सक्ती, क्योंकि मिथ्यादर्शनके होनेपर उसका होना असंभव ही है ।


अस्ति चैकादशाङ्गानां ज्ञानं मिथ्यादृशोपि यत् ।
नात्मोपलब्धिरस्यास्ति मिथ्याकर्मोदयात्परम् ॥199॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिको ग्यारह अंग तकका ज्ञान हो जाता है, परन्तु आत्माका शुद्ध अनुभव उसको नहीं होता है यह केवल मिथ्यादर्शनके उदयका ही महात्म्य है ।


ननूपलब्धिशब्देन ज्ञानं प्रत्यक्षमर्थतः ।
तत् किं ज्ञानावृतेः स्वीयकर्मणोन्यत्र तत्क्षतिः ॥200॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि आत्माकी उपलब्धि सम्यग्दृष्टिको होती है, यहांपर ’ उपलब्धि ’ शब्दसे प्रत्यक्ष ज्ञान लेते हैं अर्थात् आत्माका प्रत्यक्ष होता है । यह अर्थ हुआ तो क्या आत्मीय ज्ञानावरण कर्मका वहां क्षय हो जाता है ?

उत्तरार्द्ध 201 से 300 (श्लोक 201 से 300)

सत्यं स्वावरणस्योच्चैर्मूलं हेतुर्यथोदयः ।
कर्मान्तरोदयापेक्षो नासिद्धः कार्यकृद्यथा ॥201॥

अर्थ: तुम्हारा कहना ठीक है। आत्माके प्रत्यक्ष न होनेमें मूल कारण आत्मीय ज्ञानावरण कर्मका उदय ही है । परन्तु साथ ही दूसरे कर्मका उदय भी उस प्रत्यक्षको रोक रहा है । एक गुणके प्राप्त करनेके लिये कर्मान्तर ( दूसरे कर्म ) के उदयकी अपेक्षा असिद्ध नहीं किन्तु कार्यकारी ही है ।


अस्ति मत्यादि यज्ज्ञानं ज्ञानावृत्त्युदयक्षतेः ।
तथा वीर्यान्तरायस्य कर्मणोऽनुदयादपि ॥202॥

अर्थ: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान आदि जितने भी ज्ञान हैं, वे सभी अपने २ ज्ञानावरणीय कर्मके उदयका क्षय होनेसे होते हैं । साथमें वीर्यान्तराय कर्मका अनुदय भी आवश्यक है ।


मत्याद्यावरणस्योच्चैः कर्मणोऽनुदयाद्यथा ।
दृङ्मोहस्योदयाभावादात्मशुद्धोपलब्धिः स्यात् ॥203॥

अर्थ: जिस प्रकार आत्मोपलब्धि (आत्म प्रत्यक्ष) मतिज्ञानावरणी और वीर्यान्तराय कर्मके अनुदयसे होती है, उसी प्रकार दर्शनमोहनीय कर्मके भी अनुदयसे होती है ।


किञ्चोपलब्धिशब्दोपि स्यादनेकार्थवाचकः ।
शुद्धोपलब्धिरित्युक्ता स्यादशुद्धत्वहानये ॥204॥

अर्थ: उपलब्धि शब्द भी अनेकार्थ वाचक है । यहां पर उपलब्धि शब्दका प्रयोजन शुद्धोपलब्धिसे है और कह अशुद्धताको दूर करनेके लिये है ।


अस्त्यशुद्धोपलब्धिश्च तथा मिथ्यादृशां परम् ।
सुदृशां गौणरूपेण स्यान्न स्याद्वा कदाचन ॥205॥

अर्थ: अशुद्धोपलब्धि केवल मिथ्यादृष्टियोंके ही होती है । सम्यग्दृष्टियोंके नहीं होती, यदि कदाचित हो भी तो गौण रूपसे होती है ।


तद्यथा सुखदुःखादिरूपेणात्माऽस्ति तन्मयः ।
तदात्वेऽहं सुखी दुःखी मन्यते सर्वतो जगत् ॥206॥

अर्थ: यह आत्मा सुख दुःख आदि विकारोंके होनेपर स्वयं तन्मय हो जाता है । सांसारिक सुख मिलनेपर समझता है कि मैं सुखी हूँ, दुःख होनेपर समझता है कि मैं दुःखी हूँ इस प्रकार सब वस्तुओंमें ऐसी ही बुद्धि इसकी हो रही है । कभी कभी ऐसे भाव भी करता है कि यह क्रोधी है मैं इस शत्रुको अवश्य ही मार डालूंगा तथा अपने मित्रको कभी नहीं मारूंगा । इन बातोंसे यह बात सिद्ध होती है कि यह जगत् सुख दुःखादिका वेदन करनेवाला है ।


यद्वा क्रुद्धोयमित्यादि हिनस्म्येनं हठाद्द्विषम् ।
न हिनस्मि वयस्यं स्वं सिद्धं चेत्तत् सुखादिवत् ॥207॥

अर्थ: यह आत्मा सुख दुःख आदि विकारोंके होनेपर स्वयं तन्मय हो जाता है। सांसारिक सुख मिलनेपर समझता है कि मैं सुखी हूँ, दुःख होनेपर समझता है कि मैं दुःखी हूँ इस प्रकार सब वस्तुओंमें ऐसी ही बुद्धि इसकी हो रही है। कभी कभी ऐसे भाव भी करता है कि यह क्रोधी है मैं इस शत्रुको अवश्य ही मार डालूंगा तथा अपने मित्रको कभी नहीं मारूंगा। इन बातोंसे यह बात सिद्ध होती है कि यह जगत् सुख दुःखादिका वेदन करनेवाला है।


बुद्धिमानत्र संवेद्यो यः स्वयं स्यात्सवेदकः ।
स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानमुपलब्धिरियं यतः ॥208॥

अर्थ: यहां पर स्वयं जाननेवाला बुद्धिमान् पुरुष ही समझना चाहिये वही समझ सकता है कि यह सुख दुःखकी जो आत्मामें उपलब्धि होती है वह स्मृतिज्ञान नहीं है, किन्तु उससे भिन्न ही है ।


नोपलब्धिरसिद्धास्य स्वादुसंवेदनात्स्वयम् ।
अन्यादेशस्य संस्कारमन्तरेण सुदर्शनात् ॥209॥

अर्थ: आत्मामें सुख दुःखका अनुभव होता है इसलिये इसकी उपलब्धि असिद्ध नहीं है किन्तु सिद्ध ही है । क्योंकि यह आत्मा विना किसीके कहे हुए संस्कारके स्वयं ही कभी सुखका और कभी दुःखका अनुभव करता है यह सुप्रतीत है ।


नातिव्याप्तिरभिज्ञाने ज्ञाने वा सर्ववेदिनः ।
तयोः संवेदनाभावात् केवलं ज्ञानमात्रतः ॥210॥

अर्थ: इस सुख दुःखके स्वादुसंवेदनकी तरह प्रत्यभिज्ञान अथवा केवलज्ञान भी हो ऐसा नहीं है। प्रत्यभिज्ञान और केवलज्ञान दोनों ही वस्तुका ज्ञान मात्र तो करते हैं, परन्तु वस्तुके स्वादका अनुभव नहीं करते। इसलिये यह उपलब्धि उक्त दोनों ज्ञानोंसे भिन्न प्रकारकी ही है।


व्याप्यव्यापकभावः स्यादात्मनि नातदात्मनि ।
व्याप्यव्यापकताभावः स्वतः सर्वत्र वस्तुषु ॥211॥

अर्थ: जिसका जिसके साथ व्याप्य व्यापक भाव ( सम्बन्धविशेष ) होता है उसीका उसके साथ अनुभव घटता है । व्याप्य व्यापक भाव अपने सुख दुःखका अपने साथ है। दूसरेके साथ नहीं । क्योंकि व्याप्य व्यापकपना सर्वत्र वस्तुओंमें भिन्न २ हुआ करता है ।


उपलब्धिरशुद्धासौ परिणामक्रियामयी ।
अर्थादौदयिकी नित्यं तस्माद्बन्धफला स्मृता ॥212॥

अर्थ: यह जो सुख दुःखादिककी उपलब्धि होती है वह अशुद्ध-उपलब्धि है तथा क्रियारूप परिणामको लिये हुए है अर्थात् वह उपलब्धि कर्मोंके उदयसे होनेवाली है । इसलिये उसका बन्ध होना ही फल बतलाया गया है ।


अस्त्यशुद्धोपलब्धिः सा ज्ञानाभासाचिदन्वयात् ।
न ज्ञानचेतना किन्तु कर्म तत्फलचेतना ॥213॥

अर्थ: वह उपलब्धि, अशुद्ध-उपलब्धि कहलाती है । उस उपलब्धिमें यथार्थ ज्ञान नहीं होता, किन्तु मिथ्या स्वादुसंवेदन रूप ज्ञानाभास होता है । इसलिये उसे ज्ञानचेतना नहीं कह सकते । किन्तु अशुद्ध ज्ञानका संस्कार लिये हुए ज्ञानपूर्वक कर्मबन्ध करनेकी और कर्मफलके भोगनेकी प्रधानता होनेसे उसे कर्मचेतना तथा कर्मफल चेतना कहते हैं ।


इयं संसारिजीवानां सर्वेषामविशेषतः ।
अस्ति साधारणीवृत्ति र्न स्यात् सम्यक्त्वकारणम् ॥214॥

अर्थ: यह कर्मचेतना अथवा कर्मफलचेतना सामान्यरीतिसे सभी संसारी जीवोंके होती है । यह सम्यकृत्व पूर्वक नहीं होती है, किन्तु साधारण रीतिसे हरएक संसारी जीवात्मामें पाई जाती है ।


न स्यादात्मोपलब्धिर्वा सम्यग्दर्शनलक्षणम् ।
शुद्धा चेदस्ति सम्यक्त्वं न चेच्छुद्धा न सा सुदृक् ॥215॥

अर्थ: यह भी नियम नहीं है कि आत्मोपलब्धि मात्र ही सम्यग्दर्शन सहित होती है, यदि वह उपलब्धि शुद्ध हो तबतो सम्यग्दर्शन समझना चाहिये। यदि वह उपलब्धि अशुद्ध हो तो सम्यग्दर्शन भी नहीं समझना चाहिये।


ननु चेयमशुद्धैव स्यादशुद्धा कथंचन ।
अथ बन्धफला नित्यं किमबन्धफला क्वचित् ॥216॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि पूर्वोक्त आत्मोपलब्धि अशुद्ध ही है ? अथवा किसी समय अशुद्ध है ? क्या सदा बन्ध करनेवाली है ? अथवा कभी बन्धका कारण नहीं भी है ?


सत्यं शुद्धास्ति सम्यक्त्वे सैवाशुद्धास्ति तद्विना ।
असत्यबन्धफला तत्र सैव बन्धफलाऽन्यथा ॥217॥

अर्थ: हां ठीक है, सुनो ! यदि वह उपलब्धि सम्यग्दर्शनके होनेपर हो, तब तो शुद्ध है और विना सम्यग्दर्शनके वही अशुद्ध है । सम्यग्दर्शनके होनेपर वह बन्धका कारण नहीं है और सम्यग्दर्शनके अभावमें बन्धका कारण है ।


ननु सद्दर्शनं शुद्धं स्यादशुद्धा मृषा रुचिः ।
तत्कथं विषयश्चैकः शुद्धाशुद्धविशेषभाक् ॥218॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सम्यग्दर्शन तो शुद्ध है और मिथ्यादर्शन अशुद्ध है और दोनोंका विषय एक ही है। ऐसी अवस्थामें एक शुद्ध और दूसरा अशुद्ध कैसे हो सकता है ?


यद्वा नवसु तत्त्वेषु चास्ति सम्यग्दृगात्मनः ।
आत्मोपलब्धिमात्रं वै साचेच्छुद्धा कुतो नव ॥219॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टीकी नव तत्त्वों ( नव पदार्थों ) के विषयमें आत्मोपलब्धि होती है। यदि वह आत्मोपलब्धि शुद्ध है, तब नौ पदार्थ कहांसे हो सकते हैं ।


नैवं यतः स्वतः शश्वत् स्वादुभेदोस्ति वस्तुनि ।
तत्राभिव्यञ्जकद्वैधाभावसद्भावतः पृथक् ॥220॥

अर्थ: शङ्काकारकी उपर्युक्त दोनों शङ्कायें ठीक नहीं हैं क्योंकि वस्तु एक होनेपर भी उसमें किसी जतानेवाले अभिव्यञ्जक (सूचक) के द्विधाभाव होनेसे भिन्न २ निरन्तर स्वाद भेद हो जाता है ।


शुद्धं सामान्यमात्रत्वादशुद्धं तद्विशेषतः ।
वस्तु सामान्यरूपेण स्वदते स्वादु सद्विदाम् ॥221॥

अर्थ: सामान्यमात्र विषय होनेसे शुद्धता समझी जाती हैं और वस्तुकी विशेषतामें अशुद्धता समझी जाती है । सद्वस्तुका बोध करनेवाले सम्यग्दृष्टियोंको वस्तुका सामान्यरूपसे स्वाद आता है ।


स्वदते न परेषां तद्यद्विशेषेप्यनीदृशम् ।
तेषामलब्धबुद्धित्वाद् दृष्टेर्दृङ्मोहदोषतः ॥222॥

अर्थ: वस्तुकी विशेषतामें भी जिस प्रकार सम्यग्दृष्टी स्वाद लेता है वैसा मिथ्यादृष्टियोंको कभी नहीं आता। वे दूसरी तरहका ही वस्तुका विशेष स्वाद लेते हैं और उसमें भी दर्शनमोहनीय कर्मके दोषसे होनेवाली उनकी अज्ञानता ही कारण है।


यद्वा विशेषरूपेण स्वदते तत्कुदृष्टिनाम् ।
अर्थात् सा चेतना नूनं कर्मकार्येऽथ कर्मणि ॥223॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टीयोंको वस्तुका विलक्षणरीतिसे ही स्वाद आता है अर्थात् उनकी चेतना (बोध) निश्चयसे कर्मफलमें अथवा कर्ममें ही लगी रहती है ।


दृष्टान्तः सैन्धवं खिल्यं व्यञ्जनेषु विमिश्रितम् ।
व्यञ्जनं क्षारमज्ञानां स्वदते तद्विमोहिनाम् ॥224॥

अर्थ: दृष्टान्त - नमकका टुकड़ा (डली) जिस भोजन सामग्रीमें मिला दिया जाता है उस भोजनको यदि अज्ञानी जीमता है, तो वह समझता है कि भोजन ही खारा है।


क्षारं खिल्यं तदेवैकं मिश्रितं व्यञ्जनेषु वा ।
न मिश्रितं तदेवैकं स्वदते ज्ञानवेदिनाम् ॥225॥

अर्थ: चाहे नमक भोजनमें मिला हो चाहे न मिला हो ज्ञानीपुरुष खारापन नमकका ही समझते हैं ।


इति सिद्धं कुदृष्टीनामेकैवाज्ञानचेतना ।
सर्वैर्भावैस्तदज्ञानजातैस्तैरनतिक्रमात् ॥226॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध हो चुकी कि मिथ्यादृष्टियोंके एक ही अज्ञान चेतना है क्योंकि अज्ञानसे होनेवाले सभी भावोंका उनमें समावेश (सत्ता) है ।


सिद्धमेतावता यावच्छुद्धोपलब्धिरात्मनः ।
सम्यक्त्वं तावदेवास्ति तावती ज्ञानचेतना ॥227॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात भी सिद्ध हो चुकी कि जब तक आत्माकी शुद्ध उपलब्धि है तभी तक सम्यक्त्व है और तभी तक ज्ञानचेतना भी है ।


एकः सम्यग्दृगात्माऽसौ केवलं ज्ञानवानिह ।
ततो मिथ्यादृशः सर्वे नित्यमज्ञानिनो मताः ॥228॥

अर्थ: इस संसारमें केवल एक ही सम्यग्दृष्टी ज्ञानवान् (सम्यग्ज्ञानी) है। बाकी सभी मिथ्यादृष्टी जीव सदा अज्ञानी (मिथ्याज्ञानी) कहे गये हैं।


क्रिया साधारणी वृत्ति र्ज्ञानिनोऽज्ञानिनस्तथा ।
अज्ञानिनः क्रिया, बन्धहेतुर्न ज्ञानिनः क्वचित् ॥229॥

अर्थ: ज्ञानी और अज्ञानी ( सम्यग्दृष्टी और मिथ्यादृष्टी ) दोनों ही की क्रिया यद्यपि समान है, तथापि अज्ञानीकी क्रिया बन्धका कारण है परन्तु ज्ञानीकी क्रिया कहीं भी बन्धका कारण नहीं है ।


आस्तां न बन्धहेतुः स्याज्ज्ञानिनां कर्मजा क्रिया ।
चित्रं यत्पूर्वबद्धानां निर्जरायै च कर्मणाम् ॥230॥

अर्थ: ज्ञानियोंके कर्मसे होनेवाली क्रिया बन्धका हेतु नहीं है, यह तो है ही परंतु आश्चर्य तो इस बातका है कि वह क्रिया केवल पूर्व बंधे हुए कर्मोंकी केवल निर्जराका कारण है।


यस्माज्ज्ञानमया भावा ज्ञानिनां ज्ञाननिर्वृताः ।
अज्ञानमयभावानां नावकाशः सुदृष्टिषु ॥231॥

अर्थ: सम्यक्ज्ञानियोंके ज्ञानसे होनेवाले ज्ञानस्वरूप भाव ही सदा होते हैं तथा सम्यग्दृष्टियोंमें अज्ञानसे होनेवाले अज्ञानमय भावोंका स्थान नहीं है ।


वैराग्यं परमोपेक्षाज्ञानं स्वानुभवः स्वयम् ।
तद्द्वयं ज्ञानिनो लक्ष्म जीवन्मुक्तः स एव च ॥232॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञानी, वैराग्य परम उदासीनतारूप ज्ञान तथा अपनी आत्माका अनुभव स्वयं करता रहता है। वैराग्य परम उदासीनता और स्वानुभव ये ही दो चिह्न सम्यग्ज्ञानीके हैं और वही ज्ञानी नियमसे जीवन्मुक्त है।


ज्ञानी ज्ञानैकपात्रत्वात् पश्यत्यात्मानमात्मवित् ।
बद्धस्पृष्टादिभावानामस्वरूपादनास्पदम् ॥233॥

अर्थ: ज्ञानी, ज्ञानका ही अद्वितीयपात्र है। वही आत्माको जाननेवाला है, इसलिये अपनी आत्माको देखता है। वही ज्ञानी, कर्मोंसे बँधनेका तथा अन्य पदार्थोंसे मिलनेका स्थान नहीं है। क्योंकि कर्मोंसे बँधना और मिलना आदि भाव उसके स्वरूप नहीं है।


ततः स्वादु यथाध्यक्षं स्वमासादयति स्फुटम् ।
अविशिष्टमसंयुक्तं नियतं स्वमनन्यकम् ॥234॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी पुरुष जैसा अपने आपको प्रत्यक्ष पाता है उसी प्रकारका स्वाद भी लेता है। अर्थात् वैसा ही अनुभव करता है। वह अपनेको सदा सबसे अमिल, असम्बन्धित और निश्चल जानता है।


अथाबद्धमथास्पृष्टं शुद्धं सिद्धपदोपमम् ।
शुद्धस्फटिकसंकाशं निःसङ्गं व्योमवत् सदा ॥235॥

अर्थ: ज्ञानी सदा अपनी आत्माको इस प्रकार देखता है कि आत्मा कर्मोंसे नहीं बँधा है, वह किसीसे नहीं मिला है, शुद्ध है सिद्धोंकी उपमा धारण करता है, शुद्ध - स्फटिकके समान है, सदा आकाशकी तरह परिग्रह रहित है, अतीन्द्रिय - अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्यकी मूर्ति है और अतीन्द्रिय सुख आदिक अनन्त स्वाभाविक गुणवाला है । इस प्रकार ज्ञानकी हो अद्वितीय मूर्ति - वह ज्ञानी अपने आपको देखता है । प्रसङ्गवश दूसरे पदार्थकी भले ही इच्छा करे, परन्तु वास्तवमें वह समस्त पदार्थोंसे कृतार्थसा हो चुका है । दूसरे सांसारिक पदार्थोंके विषयमें भी वह इस प्रकार चिन्तवन करता है -


इन्द्रियोपेक्षितानन्तज्ञानदृग्वीर्यमूर्तिकम् ।
अक्षातीतसुखानन्तस्वाभाविकगुणान्वितम् ॥236॥

अर्थ: ज्ञानी सदा अपनी आत्माको इस प्रकार देखता है कि आत्मा कर्मोंसे नहीं बँधा है, वह किसीसे नहीं मिला है, शुद्ध है सिद्धोंकी उपमा धारण करता है, शुद्ध-स्फटिकके समान है, सदा आकाशकी तरह परिग्रह रहित है, अतीन्द्रिय - अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्यकी मूर्ति है और अतीन्द्रिय सुख आदिक अनन्त स्वाभाविक गुणवाला है । इस प्रकार ज्ञानकी ही अद्वितीय मूर्ति - वह ज्ञानी अपने आपको देखता है । प्रसङ्गवश दूसरे पदार्थकी भले ही इच्छा करे, परन्तु वास्तवमें वह समस्त पदार्थोंसे कृतार्थसा हो चुका है । दूसरे सांसारिक पदार्थोंके विषयमें भी वह इस प्रकार चिन्तवन करता है -


पश्यन्निति निजात्मानं ज्ञानी ज्ञानैकमूर्तिमान् ।
प्रसङ्गादपरं चैच्छेदर्थात्सार्थं कृतार्थवत् ॥237॥

अर्थ: ज्ञानी सदा अपनी आत्माको इस प्रकार देखता है कि आत्मा कर्मोंसे नहीं बँधा है, वह किसीसे नहीं मिला है, शुद्ध है सिद्धोंकी उपमा धारण करता है, शुद्ध - स्फटिकके समान है, सदा आकाशकी तरह परिग्रह रहित है, अतीन्द्रिय - अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्यकी मूर्ति है और अतीन्द्रिय सुख आदिक अनन्त स्वाभाविक गुणवाला है । इस प्रकार ज्ञानकी हो अद्वितीय मूर्ति - वह ज्ञानी अपने आपको देखता है । प्रसङ्गवश दूसरे पदार्थकी भले ही इच्छा करै, परन्तु वास्तवमें वह समस्त पदार्थोंसे कृतार्थसा हो चुका है । दूसरे सांसारिक पदार्थोंके विषयमें भी वह इस प्रकार चिन्तवन करता है -


ऐहिकं यत्सुखं नाम सर्वं वैषयिकं स्मृतम् ।
न तत्सुखं सुखाभासं किन्तु दुःखमसंशयम् ॥238॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि विचार करता है कि जो सांसारिक ( इस लोक सम्बन्धी ) सुख है वह सब पञ्चेन्द्रिय सम्बंधी विषयोंसे होनेवाला है । वास्तवमें वह सुख नहीं है, किन्तु सुखका आभासमात्र है, निश्चयसे वह दुःख ही है ।


तस्माद्धेयं सुखाभासं दुःखं दुःखफलं यतः ।
हेयं तत्कर्म यद्धेतुस्तस्यानिष्टस्य सर्वतः ॥239॥

अर्थ: इसलिये वह सुखाभास छोड़ने योग्य है। वह स्वयं दुःख स्वरूप है। और दुःखरूप फलको देनेवाला है, उस सदा अनिष्ट करनेवाले वैषयिक सुखका कारण कर्म है, इसलिये उस कर्मका ही नाश करना चाहिये।


तत्सर्वं सर्वतः कर्म पौद्गलिकं तदष्टधा ।
वैपरीत्यात्फलं तस्य सर्वं दुःखं विपच्यतः ॥240॥

अर्थ: वह सम्पूर्ण पौद्गलिक कर्म सर्वदा आठ प्रकारका है, उसी कर्मका उलटा विपाक होनेसे सभी फल दुःखरूप ही होता है।


चतुर्गतिभवावर्ते नित्यं कर्मैकहेतुके ।
न पदस्थो जनः कश्चित् किन्तु कर्मपदस्थितः ॥241॥

अर्थ: सदा कर्मके ही निमित्तसे होनेवाले इस चतुर्गति संसाररूप चक्रमें घूमता हुआ कोई भी जीव स्वस्वरूपमें स्थित नहीं है, किन्तु कर्म स्वरूपमें स्थित है, अर्थात् कर्माधीन है।


स्वस्वरूपाच्च्युतो जीवः स्यादलब्धस्वरूपवान् ।
नानादुःखसमाकीर्णे संसारे पर्यटन्निति ॥242॥

अर्थ: यह जीव अनेक दुःखोंसे भरे हुए संसारमें घूमता हुआ अपने स्वरूपसे गिर गया है। इसने अपना स्वरूप नहीं पाया है।


ननु किञ्चिच्छुभं कर्म किंचित्कर्माशुभं ततः ।
क्वचित्सुखं क्वचिद्दुःखं तत्किं दुःखं परं नृणाम् ॥243॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि कोई कर्म शुभ होता है और कोई कर्म अशुभ होता है । इसलिये कहीं पर सुख और कहीं पर दुःख होना चाहिये, केवल मनुष्योंको दुःख ही क्यों बतलाते हो ?


नैवं यतः सुखं नैतत् तत्सुखं यत्र नाऽसुखम् ।
स धर्मो यत्र नाधर्मस्तच्छुभं यत्र नाऽशुभम् ॥244॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है। क्योंकि जिसको वह सुख समझता है वह सुख नहीं है। वास्तवमें सुख वही है जहां पर कभी थोड़ा भी दुःख नहीं है, वही धर्म है जहां पर अधर्मका लेश नहीं है और वही शुभ है जहां पर अशुभ नहीं है।


इदमस्ति पराधीनं सुखं वाधापुरस्सरम् ।
व्युच्छिन्नं बन्धहेतुश्च विषमं दुःखमर्थतः ॥245॥

अर्थ: यह इन्द्रियोंसे होनेवाला सुख पराधीन है, कर्मके परतन्त्र है, बाधापूर्वक है, इसमें अनेक विघ्न आते हैं, बीचबीचमें इसमें दुःख होता जाता है, यह सुख बन्धका कारण है, तथा विषम है । वास्तवमें इन्द्रियोंसे होनेवाला सुख दुःख रूप ही है इसी बातको दूसरे ग्रन्थकार भी कहते हैं -


भावार्थश्चात्र सर्वेषां कर्मणामुदयः क्षणात् ।
वज्राघात इवात्मानं दुर्वारो निष्पिनष्टि वै ॥246॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका सारांश यह है कि सम्पूर्ण कर्मोंका उदय एक क्षण मात्रमें वज्रसे होनेवाले आघात ( चोट ) की तरह आत्माको पीस डालता है । यह कर्म बड़ी कठिनतासे दूर किया जाता है ।


व्याकुलः सर्वदेशेषु जीवः कर्मोदयाद्ध्रुवम् ।
वन्हियोगाद्यथा वारि तप्तं स्पर्शोवलब्धितः ॥247॥

अर्थ: जिस प्रकार अग्निका स्पर्श होनेसे जल तपता है ( खलबल खलबल करता है ) उसी प्रकार यह जीव भी कर्मोंके उदयसे सम्पूर्ण प्रदेशोंमें नियमसे व्याकुल हो रहा है ।


साताऽसातोदयादुःखमास्तां स्थूलोपलक्षणात् ।
सर्वकर्मोदयाघात इवाघातश्चिदात्मनः ॥248॥

अर्थ: साता वेदनीय और असाता वेदनीयके उदयसे दुःख होता है यह कथन तो मोटी रीतिसे है । वास्तवमें सम्पूर्ण कर्मोंका ही उदय जीवात्माको उसी प्रकार आघात पहुंचा रहा है जिस प्रकार कि वज्रकी चोट होती है ।


आस्तां घातः प्रदेशेषु संदृष्टेरुपलब्धितः ।
वातव्याधेर्यथाध्यक्षं पीड्यन्ते ननु सन्धयः ॥249॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टीके प्रदेशोंमें भी उस कर्मका आघात हो रहा है । जिस प्रकार वात व्याधि (वायु रोग)से घुटनों, कमर आदिकी मिली हुई हड्डियां दुखती रहती हैं उसी प्रकार कर्मका आघात भी दुःख पहुंचा रहा है ।


नहि कर्मोदयः काश्चित् जन्तोर्यः स्यात्सुखावहः ।
सर्वस्य कर्मणस्तत्र वैलक्षण्यात् स्वरूपतः ॥250॥

अर्थ: कोई भी ऐसा कर्मोदय नहीं है जो इस जीवको सुख पहुंचानेवावाला हो, जीवके विषयमें तो सभी कर्मोंका स्वरूप विलक्षण ही है । अर्थात् वहां तो सभी कर्म जड़ता ही करते हैं । कैसा ही शुभ अथवा अशुभ कर्म क्यों न हो जीवके लिये तो सभी दुःखदाई है ।


तस्य मन्दोदयात् केचित् जीवाः समनस्काः क्वचित् ।
तद्वेगमसहमाना रमन्ते विषयेषु च ॥251॥

अर्थ: उस कर्मके मन्द उदय होनेसे कोई कहीं संज्ञी जीव उस कर्मके वेगको नहीं सहन कर सक्ते हैं और विषयोंमें रमने लग जाते हैं।


केचित्तीव्रोदयाः सन्तो मन्दाक्षाः खल्वसंज्ञिनः ।
केवलं दुःखवेगार्ता रन्तुं नार्थानपि क्षमाः ॥252॥

अर्थ: कोई कोई मन्द इन्द्रियोंको धारण करनेवाले असंज्ञी जीव उस कर्मके तीव्रोदयसे सताये हुए केवल दुःखके वेगसे पीडित होते रहते हैं । वे पदार्थोंमें रमण करनेके लिये भी समर्थ नहीं हैं ।


यद्दुःखं लौकिकी रूढिर्निर्णीतेस्तत्र का कथा ।
यत्सुखं लौकिकी रूढिस्तत्सुखं दुःखमर्थतः ॥253॥

अर्थ: लोकमें जिसकी दुःखके नामसे प्रसिद्धि है, वह तो दुःख है ही यह बात तो निर्णीत हो ही चुकी है। उस विषयमें तो कहा ही क्या जाय, परन्तु लोकमें जो सुखके नामसे प्रसिद्ध है, वह भी वास्तवमें दुःख ही है।


कादाचित्कं न तद्दुःखं प्रत्युताच्छिन्नधारया ।
सन्निकर्षेषु तेषूच्चैस्तृष्णातङ्कस्य दर्शनात् ॥254॥

अर्थ: वह दुःख भी कभी कभी नहीं होनेवाला है किन्तु निरन्तर रहता है। उन इन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंमें इस जीवका तीव्र लालसा रूपी रोग लगा हुआ है, इसीसे इसके वह दुःख सदा बना रहता है।


इन्द्रियार्थेषु लुब्धानामन्तर्दाहः सुदारुणः ।
तमन्तरा यतस्तेषां विषयेषु रतिः कुतः ॥255॥

अर्थ: इन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंमें जो लोलुपी हो रहे हैं, उन पुरुषोंके अन्तरंगमें सदा अत्यन्त कठिन दाह (अग्नि समान) होता रहता है। क्योंकि विना अन्तर दाहके हुए उनकी विषयोंमें लीनता ही कैसे हो सक्ती है।


दृश्यते रतिरेतेषां सुहितानामिवेक्षणात् ।
तृष्णावीजं जलौकानां दुष्टशोणितकर्षणात् ॥256॥

अर्थ: इन्द्रियार्थ सेवियोंकी विषय - रति देखनेमें भी आती है, वे लोग उन्ही पदार्थोंकी प्राप्तिसे सुहित सा मानने लगते हैं । जिस प्रकार खराब रक्त (लोहू) के पीनेमें ही जोंक (जलजन्तु) हित समझती है और उसीसे प्रेम करती है । उसी प्रकार इन्द्रियार्थ सेवियोंकी अवस्था समझनी चाहिये । यह उनका प्रेम तृष्णाका बीज है अर्थात् उस रीतिसे तृष्णाकी वृद्धि ही होती जाती है ।


शक्रचक्रधरादीनां केवलं पुण्यशालिनाम् ।
तृष्णावीजं रतिस्तेषां सुखावाप्तिः कुतस्तनी ॥257॥

अर्थ: केवल पुण्यको धारण करनेवाले जो इन्द्र और चक्रवर्ती आदिक बड़े पुरुष हैं उनके भी तृष्णाका बीजभूत विषय-लालसा है, इसलिये उनको भी सुखकी प्राप्ति कहां रक्खी है ।


सर्वं तात्पर्यमत्रैतद्दुःखं यत्सुखसंज्ञकम् ।
दुःखस्यानात्मधर्मत्वान्नाभिलाषः सुदृष्टिनाम् ॥258॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका समग्र सारांश यह निकला कि जिसकी संसारमें सुख संज्ञा है वह दुःख ही है और दुःख आत्माका धर्म नहीं है। इसी लिये सम्यग्दृष्टी पुरुषकी विषयोंमें अभिलाषा नहीं होती।


वैषयिकसुखे न स्याद्रागभावः सुदृष्टिनाम् ।
रागस्याज्ञानभावत्वात् अस्ति मिथ्यादृशः स्फुटम् ॥259॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टियोंका विषयजन्य सुखमें रागभाव नहीं है, क्योंकि राग अज्ञानभाव है, और अज्ञानमय भाव सम्यग्दृष्टिके होते नहीं, यह वात पहले ही कही जा चुकी है इस लिये वह रागभाव मिथ्यादृष्टिके ही नियमसे होता है ।


सम्यग्दृष्टेस्तु सम्यक्त्वं स्यादवस्थान्तरं चितः ।
सामान्यजनवत्तस्मान्नाभिलाषोऽस्य कर्मणि ॥260॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिकी आत्मामें सम्यग्दर्शन गुण प्रकट हो चुका है, इससे उसकी आत्मा अवस्थान्तर रूपमें आ चुकी है । इसीलिये सामान्य मनुष्योंकी तरह सम्यग्दृष्टिको क्रियाओंमें अभिलाषा नहीं होती है ।


उपेक्षा सर्वभोगेषु सद्दृष्टेर्दृष्टरोगवत् ।
अवश्यं तदवस्थायास्तथाभावो निसर्गजः ॥261॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिको प्रत्यक्षमें देखे हुए रोगकी तरह सम्पूर्ण भोगोंमें उपेक्षा (वैराग्य) हो चुकी है और उस अवस्थामें ऐसा होना अवश्यंभावी तथा स्वाभाविक है।


अस्तु रूढिर्यथा ज्ञानी हेयं ज्ञात्वाऽथ मुञ्चति ।
अत्रास्त्यावस्थिकः कश्चित् परिणामः सहेतुकः ॥262॥

अर्थ: ज्ञानी पुरुष सांसारिक पदार्थोंको हेय ( त्याज्य ) समझकर छोड़ देता है। यह बात प्रसिद्ध तो है ही परन्तु इस विषयमें अवस्थाजन्य कोई परिणाम हेतु भी है उसे ही बतलाते हैं -


सिद्धमस्ताभिलाषत्वं कस्यचित्सर्वतश्चितः ।
देशतोप्यस्मदादीनां रागभावस्य दर्शनात् ॥263॥

अर्थ: जब हम लोगोंके भी एक देश ( किन्हीं अंशोंमें ) राग भावका त्याग दिखता है तो किसी जीवात्माके सर्वथा त्याग भी सिद्ध होता है ।


तद्यथा न मदीयं स्यादन्यदीयमिदं ततः ।
परप्रकरणे कश्चित्तृप्यन्नपि न तृप्यति ॥264॥

अर्थ: हम लोगोंके भी एक देश रूपसे अभिलाषायें नहीं होती हैं, इसी बातको बतलाते हैं - हम लोग अपने सम्बन्धियोंसे प्रेम करते हैं दूसरोंसे नहीं करते । जब हम यह जान लेते हैं कि यह हमारी वस्तु नहीं है यह तो दूसरोंकी है तब झट दूसरोंकी वस्तुओंके विषयमें सन्तोष धारण कर लेते हैं । फिर वहां पर अभिलाषा नहीं होती परन्तु अपनी वस्तुओंमें सन्तोष नहीं होता वहां तो अभिलाषा लगी ही रहती है । इससे सिद्ध होता है कि दूसरे पदार्थोंके विषयमें हमारी भी अभिलाषायें शान्त हैं ।


यथा कश्चित्परायत्तः कुर्वाणोऽनुचितां क्रियाम् ।
कर्ता तस्याः क्रियायाश्च न स्यादस्ताभिलाषवान् ॥265॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई पराधीन पुरुष पराधीनता वश किसी अनुचित क्रिया (कार्य) को करता है तो भी उसका करनेवाला वह नहीं समझा जाता है। क्योंकि उसने अपनी अभिलाषासे उस कार्यको नहीं किया है किन्तु पर प्रेरणासे किया है।


स्वदते ननु सद्दृष्टिरिन्द्रियार्थकदम्बकम् ।
तत्रेष्टं रोचते तस्मै कथमस्ताभिलाषवान् ॥266॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सम्यग्दृष्टी भी इन्द्रिय जन्य विषयोंका सेवन करता है। वहां पर जो उसे इष्ट प्रतीत होता है उसीसे वह रुचि भी करता है। फिर उसकी अभिलाषायें शान्त हो चुकी हैं, ऐसा किस प्रकार कह सक्ते हैं ?


सत्यमेतादृशो यावज्जघन्यं पदमाश्रितः ।
चारित्रावरणं कर्म जघन्यपदकारणम् ॥267॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यह बात ठीक है कि जब तक सम्यग्दृष्टी जघन्य श्रेणी (नीचे दरजे) में है, तब तक वह पदार्थोंमें इष्टानिष्ट बुद्धि करता है तथा उनसे रुचि भी करता है। उस जघन्य श्रेणीका कारण भी चारित्र मोहनीय कर्म है।


तदर्थेषु रतो जीवश्चारित्रावरणोदयात् ।
तद्विना सर्वतः शुद्धो वीतरागोस्त्यतीन्द्रियः ॥268॥

अर्थ: इष्ट पदार्थोंमें यह जीव चारित्रमोहनीयके उदयसे ही रत होता है, उस चारित्रमोहनीयके विना सर्वदा शुद्ध है, वीतराग है और अतीन्द्रिय है ।


दृङ्मोहस्य क्षतेस्तस्य नूनं भोगाननिच्छितः ।
हेतुसद्भवतोऽवश्यमुपभोगक्रिया बलात् ॥269॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टीको दर्शनमोहनीय कर्मके नाश होनेसे भोगोंकी इच्छा नियमसे नहीं होती वह भोगोंको नहीं चाहता, परन्तु हेतुकी सत्तासे अवश्य ही प्रेरित होकर उसे उपभोग क्रिया करनी पड़ती है । हेतु, वही चारित्र मोहनीय है ।


नासिद्धं तद्विरागत्वं क्रियामात्रस्य दर्शनात् ।
जगतोनिच्छितोप्यास्ति दारिद्र्यं मरणादि च ॥270॥

अर्थ: यद्यपि सम्यग्दृष्टी उपभोग क्रिया करता है अर्थात् भोग, उपभोगका सेवन करता है, तथापि वह वीतराग है । क्योंकि उसके भोगोपभोगकी क्रिया मात्र देखी जाती है, चाहना नहीं है, और चाहना नहीं होनेपर भी उसे ऐसा करना पडता है । संसारमें कोई नहीं चाहता कि मेरे पास दरिद्रता आजाय, अथवा मेरी मृत्यु होजाय । ऐसा न चाहनेपर भी पापके उदयसे दारिद्य आता ही है और आयुकी क्षीणतासे मृत्यु होती ही है । उसी प्रकार चारित्रमोहनीयके उदयसे सम्यग्दृष्टिको सांसारिक वासनाओंकी इच्छा न होनेपर भी उन्हें राग बुद्धिके लिये बाध्य होना पडता है ।


व्यापीडितो जनः कश्चित्कुर्वाणो रुक्प्रतिक्रियाम् ।
तदात्वे रुक्पदं नेच्छेत् का कथा रुक्पुनर्भवे ॥271॥

अर्थ: कोई आदमी जिसको कि रोग सता रहा है रोगका प्रतीकार ( नाश ) करता है। रोगका प्रतीकार करने पर भी वह रोगी रहना नहीं चाहता, तो क्या वह कभी चाहेगा कि मेरे फिरसे रोग हो जाय।


कर्मणा पीडितो ज्ञानी कुर्वाणः कर्मजां क्रियाम् ।
नेच्छेत् कर्मपदं किञ्चित् साभिलाषः कुतो नयात् ॥272॥

अर्थ: इसी प्रकार सम्यग्ज्ञानी भी चारित्रमोहनीय कर्मसे पीडित होकर उस कर्मके उदयसे होनेवाली क्रियाको करता है। परन्तु उस क्रियाको करता हुआ भी वह उस स्थानको ( उसी क्रियाको ) पसन्द नहीं करता है। तो फिर उसके अभिलाषा ( चाहना ) है, ऐसा किस नयसे कहा जा सकता हैं ?


नासिद्धोऽनिच्छितस्तस्य कर्म तस्याऽऽमयात्मनः ।
वेदनायाः प्रतीकारो न स्याद्रोगादिहेतुकः ॥273॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टीके इच्छाके विना भी क्रिया होती है यह वात असिद्ध नहीं है। जो रोगी है वह वेदनाका प्रतीकार करता है, परन्तु वह उसका प्रतीकार करना रोगादिक होनेका कारण नहीं है।


सम्यग्दृष्टिरसौ भोगान् सेवमानोप्यसेवकः ।
नीरागस्य न रागाय कर्माऽकामकृतं यतः ॥274॥

अर्थ: यह सम्यग्दृष्टि भोगोंका सेवन भी करता है, तो भी उनका सेवक नहीं समझा जाता क्योंकि राग विहीन पुरुषका इच्छाके बिना किया हुआ कर्म उसके रागके लिये नहीं कहा जा सकता ।


अस्ति तस्यापि सद्दृष्टेः कस्यचित्कर्मचेतना ।
अपि कर्मफले सा स्यादर्थतो ज्ञानचेतना ॥275॥

अर्थ: किसी किसी सम्यग्दृष्टीके कर्मचेतना और कर्मफल चेतना भी होती है, परन्तु वास्तवमें वह ज्ञान चेतना ही है । (?)


चेतनायाः फलं बन्धस्तत्फले वाऽथ कर्मणि ।
रागाभावान्न वन्धोस्य तस्मात्सा ज्ञानचेतना ॥276॥

अर्थ: चाहे कर्मचेतना हो अथवा कर्मफलचेतना हो, दोनोंका ही फल वन्ध है अर्थात् दोनों ही चेतनायें बन्ध करनेवाली हैं । सम्यग्दृष्टीके रागका ( अज्ञानभावका ) अभाव होचुका है, इस लिये उसके बन्ध नहीं होता, इसी लिये वास्तवमें उसके ज्ञानचेतना ही है ।


अस्ति ज्ञानं यथा सौख्यमैन्द्रियं चाप्यतीन्द्रियम् ।
आद्यं द्वयमनादेयं समादेयं परं द्वयम् ॥277॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्रियजन्य सुख और अतीन्द्रिय सुख होता है, उसी प्रकार इन्द्रियजन्य ज्ञान और अतीन्द्रिय ज्ञान भी होता है । इन दोनों ही प्रकारोंमें आदिके दो अर्थात् इंद्रियजन्य सुख और ज्ञान ग्रहण करने योग्य नहीं हैं और पीछेके दो अर्थात् अतीन्द्रिय सुख और अतीन्द्रिय ज्ञान अच्छी तरह ग्रहण करने योग्य हैं ।


नूनं यत्परतो ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत् ।
व्याकुलं मोहसंपृक्तमर्थाद्दुःखमनर्थवत् ॥278॥

अर्थ: जो ज्ञान पर ( इन्द्रिय और मन ) की सहायतासे होता है वह एक एक पदार्थमें क्रमसे परिणमन करता है । इसी लिये वह निश्चयसे व्याकुल है, मोहसे मिला हुआ है, दुःख स्वरूप है और अनर्थ करनेवाला है ।


सिद्धं दुःखत्वमस्योच्चैर्व्याकुलत्वोपलब्धितः ।
ज्ञातशेषार्थसद्भावे तद्बुभुत्सादिदर्शनात् ॥279॥

अर्थ: जो पदार्थ ज्ञानका विषय नहीं होता है अथवा एक ही पदार्थका जो अंश नहीं जाना जाता है उसी सबके जाननेके लिये वह ज्ञान उत्कण्ठित, तथा अधीर रहता है, इसलिये वह व्याकुलता पूर्ण है । व्याकुलता होनेसे ही वह ज्ञान ( इन्द्रियज ) दुःखरूप हैं।


आस्तां शेषार्थजिज्ञासोरज्ञानाद् व्याकुलं मनः ।
उपयोगि सदर्थेषु ज्ञानं वाप्यसुखावहम् ॥280॥

अर्थ: शेष पदार्थोंके जाननेकी इच्छा रखनेवाला मन ( इन्द्रियां भी ) अज्ञानतासे व्याकुल है, यह तो है ही, परन्तु जिन यथार्थ पदार्थोंमें वह उपयुक्त ( लगा हुआ ) है । उनके विषयमें भी वह दुःखप्रद ही हैं । किस प्रकार ? सोई बतलाते हैं -


प्रमत्तं मोहयुक्तत्वान्निकृष्टं हेतुगौरवात् ।
व्युच्छिन्नं क्रमवर्तित्वात् कृच्छ्रं चेहाद्युपक्रमात् ॥281॥

अर्थ: इन्द्रिय और मनसे होनेवाला ज्ञान, मोह सहित है इसलिये प्रमादी है, विना हेतु वगैरह ( प्रत्यक्ष ) के होता नहीं इस लिये हेतु गौरव होनेसे निकृष्ट है, क्रम क्रमसे होता है इस लिये वीच वीचमें रुक जाता है, और पहले दर्शन होता है, फिर अवग्रह होता है, फिर ईहा फिर अवाय, फिर धारणा, इस तरह बहुतसे ज्ञान होने पर तब कहीं पूरा ज्ञान होपाता है इसलिये कठिन साध्य है ।


परोक्षं तत्परायत्तादाक्ष्यमक्षसमुद्भवात् ।
सदोषं संशयादीनां दोषाणां तत्र संभवात् ॥282॥

अर्थ: वह पराधीन होता है इसलिये परोक्ष है, इन्द्रियोंसे होता है इसलिये इन्द्रिय जन्य ( एक देश ) ज्ञान कहलाता है। फिर भी उसमें संशय विपर्ययादिक अनेक दोष आते हैं इसलिये वह ज्ञान सदोष है।


विरुद्धं बन्धहेतुत्वाद्बन्धकार्याच्च कर्मजम् ।
अश्रेयोऽनात्मधर्मत्वात् कालुष्यादशुचिः स्वतः ॥283॥

अर्थ: इन्द्रियज ज्ञान बन्धका कारण है इसलिये वह विरुद्ध है, वह बन्धका कार्य भी है इसलिये वह ज्ञान आत्मीय नहीं कहलाता, किन्तु कर्मसे होने वाला है, वह आत्माका धर्म नहीं है इसलिये आत्माको हानिकारक है और वह मलिन है इसलिये वह स्वयं अपवित्र है ।


मूर्छितं यदपस्मारवेगवद्वर्धमानतः ।
क्षणं वा हीयमानत्वात् क्षणं यावददर्शनात् ॥284॥

अर्थ: वह ज्ञान मृगीरोगकी तरह कभी बढ़ जाता है और कभी घट जाता है, कभी दीखता है कभी नहीं दीखता इसलिये वह मूर्छित है ।


अत्राणं प्रत्यनीकस्य क्षणं शान्तस्य कर्मणः ।
जीवदवस्थातोऽवश्यमेष्यतः स्वरसंस्थितेः ॥285॥

अर्थ: जो कर्म आत्माका शत्रु है, और जो क्षणमात्रके लिये शान्त भी हो जाता है, परन्तु अपनी सत्ता रखनेके कारण अवश्य ही अपने रसको देनेवाला है, ऐसे कर्मकी जीती हुई अवस्थासे वह ज्ञान रक्षा नहीं कर सक्ता।


दिङ्मात्रं षट्सु द्रव्येषु मूर्तस्यैवोपलम्भकात् ।
तत्र सूक्ष्मेषु नैव स्यादस्ति स्थूलेषु केषुचित् ॥286॥

अर्थ: यह इन्द्रियजन्य ज्ञान छह द्रव्योंमें केवल मूर्त (पुद्गल) द्रव्यको ही दिङ् मात्र ( थोड़ासा ) जानता है। उस पुद्गल द्रव्यमें भी सूक्ष्म पदार्थोंको तो जानता ही नहीं, किन्तु स्थूलोंको जानता है, सो भी सर्वोंको नहीं, किन्तु किन्हीं किन्हीं पदार्थोंको ही जानता है।


सत्सु ग्राह्येषु तत्रापि नाग्राह्येषु कदाचन ।
तत्रापि विद्यमानेषु नातीतानागतेषु च ॥287॥

अर्थ: उन किन्हीं किन्हीं स्थूल पदार्थोंमें भी जो ग्राह्य हैं अर्थात् इन्द्रियद्वारा ग्रहण करने योग्य हैं उन्हींको जानता है, जो अग्राह्य हैं उन्हें नहीं जानता। ग्राह्य पदार्थोंमें भी जो सामने मोजूद हैं उन्हींको जानता है, जो होचुके हैं अथवा जो होनेवाले हैं उन्हें वह नहीं जानता।


तत्रापि सन्निधानत्वे सन्निकर्षेषु सत्सु च ।
तत्राप्यवग्रहेहादौ ज्ञानस्यास्तिक्यदर्शनात् ॥288॥

अर्थ: जो सामने मौजूद पदार्थ हैं उनमें भी जिन पदार्थोंका इन्द्रियोंके साथ सन्निधान (अत्यन्त निकटता) और सन्निकर्ष (संयोग) है उन्हींका ज्ञान होता है, उनमें भी अवग्रह, ईहा आदिकके होने पर ही ज्ञान होता है अन्यथा नहीं ।


समस्तेषु न व्यस्तेषु हेतुभूतेषु सत्स्वपि ।
कदाचिज्जायते ज्ञानमुपर्युपरि शुद्धितः ॥289॥

अर्थ: उपर्युक्त कारणोंके मिलने पर भी समस्त पदार्थोंका ज्ञान नहीं होता, किन्तु भिन्न भिन्न पदार्थोंका होता है, वह भी तभी होता है जब कि ऊपर ऊपर कुछ शुद्धि बढ़ती जाती है, सो भी सदा नहीं होता किन्तु कभी कभी होता है ।


तद्यथा मतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानस्य वा सतः ।
आलापाः सन्त्यसंख्यातास्तत्रानन्ताश्च शक्तयः ॥290॥

अर्थ: ऊपर ऊपर ज्ञानमें शुद्धता किस प्रकार आती है ? इसी वातको बतलाते हैं । मतिज्ञान अथवा श्रुतज्ञानके असंख्यात भेद हैं और उन भेदोंमें भी अनन्त शक्तियां भरी हुई हैं ।


तेषामावरणान्युच्चैरालापाच्छक्तितोथवा ।
प्रत्येकं सन्ति तावन्ति सन्तानस्यानतिक्रमात् ॥291॥

अर्थ: जितने मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके भेद हैं उतने ही उनके आवरण करने वाले कर्मोंके भेद हैं उन आवरण करनेवाले कर्मोंकी भी सन्तान बराबर चलती रहती है।


तत्रालापस्य यस्योच्चैर्यावदंशस्य कर्मणः ।
क्षायोपशमिकं नाम स्यादवस्थान्तरं स्वतः ॥292॥

अर्थ: जिस आलाप ( भेद - पटल ) के जितने कर्मके अंशका क्षयोमशम होजाता है, उतनी ही ज्ञानकी अवस्था दूसरी होजाती है अर्थात् उतना ही ज्ञान प्रकट रूपमें आता है । जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होता है उसी प्रकार वीर्यान्तराय कर्मका भी क्षयोपशम होना आवश्यक है । उक्त दोनों कर्मोंके क्षयोपशम होनेसे जो ज्ञानमें विशुद्धि होती है वही एक आलाप ( ज्ञान - भेद ) कहलाता है और शक्तिकी अपेक्षा भी उतना ही अंश ( ज्ञान विशुद्धि ) कहलाता है ।


अपि वीर्यान्तरायस्य लब्धिरित्यभिधीयते ।
तदैवास्ति स आलापस्तावदंशश्च शक्तितः ॥293॥

अर्थ: जिस आलाप ( भेद - पटल ) के जितने कर्मके अंशका क्षयोमशम होजाता है, उतनी ही ज्ञानकी अवस्था दूसरी होजाती है अर्थात् उतना ही ज्ञान प्रकट रूपमें आता है । जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होता है उसी प्रकार वीर्यान्तराय कर्मका भी क्षयोपशम होना आवश्यक है । उक्त दोनों कर्मोंके क्षयोपशम होनेसे जो ज्ञानमें विशुद्धि होती है वही एक आलाप ( ज्ञान - भेद ) कहलाता है और शक्तिकी अपेक्षा भी उतना ही अंश ( ज्ञान विशुद्धि ) कहलाता है ।


उपयोगविवक्षायां हेतुरस्यास्ति तद्यथा ।
अस्ति पञ्चेन्द्रियं कर्म कर्मस्यान्मानसं तथा ॥294॥

अर्थ: जितना२ आवरण हटता है उतना२ ज्ञान प्रकट होता है यह ऊपर कह चुके हैं, परन्तु इतना होनेपर भी वस्तुका ज्ञान नहीं होता, आत्माके परिणाम जिस तरफ उन्मुख - रिजु होते हैं उसीकी ज्ञान होता है इसीका नाम उपयोग है। इसी उपयोगकी विवक्षामें पञ्चेन्द्रिय नाम कर्म और मानस कर्म, ये दोनों हेतु हैं।


दैवात्तद्बन्धमायाति कथञ्चित्कस्यचित्कचित् ।
अस्ति तस्योदयस्तावन्न स्यात्संक्रमणादि चेत् ॥295॥

अर्थ: उपर्युक्त दोनों प्रकारका कर्म (पञ्चेन्द्रिय, मानस) दैव योगसे कहीं किसीके किसी प्रकार बँधता है और बन्ध होनेपर भी उसका उदय तभी होता है जब कि संक्रमणादिक न हों।


अथ तस्योदये हेतुरस्ति हेत्वन्तरं यथा ।
पर्याप्तं कर्म नामेति स्यादवश्यं सहोदयात् ॥296॥

अर्थ: आगे उस पञ्चेन्द्रिय और मानस कर्मके उदयमें दूसरा कारण भी बतलाते हैं । उपर्युक्त दोनों कर्मोंके साथ पर्याप्त नाम कर्मका भी उदय होना अत्यावश्यक है । विना पर्याप्तियोंके हुए शरीरादिक पूरे भी नहीं होपाते, बीचमें ही मृत्यु होजाती है । इस लिये पर्याप्त कर्मका उदय भी अवश्य होना चाहिये ।


सति तत्रोदये सिद्धाः स्वतो नोकर्मवर्गणाः ।
मनो देहेन्द्रियाकारं जायते तन्निमित्ततः ॥297॥

अर्थ: पर्याप्त कर्मके उदय होने पर नो कर्म वर्गणायें भी आने लगती हैं यह वात स्वतःसिद्ध है उन नोकर्म वर्गणाओंके निमित्तसे मन और शरिरमें इन्द्रियोंका आकार बनता है ।


तेषां परिसमाप्तिश्चेज्जायते दैवयोगतः ।
लब्धेः स्वार्थोपयोगेषु बाह्यं हेतुर्जडेन्द्रियम् ॥298॥

अर्थ: उन इन्द्रियादिकोंकी रचनाकी भी दैवयोगसे समाप्ति हो जावे । फिर कहीं कर्मोंके क्षयोपशम होनेसे स्वपर पदार्थका उपयोग हो । उसमें भी बाह्य हेतु द्रव्येन्द्रियां हैं ।


अस्ति तत्रापि हेतुर्वा प्रकाशो रविदीपयोः ।
अन्यदेशस्थसंस्कारः पारं पर्यावलोकनम् ॥299॥

अर्थ: इतना सब कुछ होने पर भी यदि सूर्य और दीपकका प्रकाश न हो तो भी उपयोगात्मक ज्ञान नहीं हो सक्ता है । इसलिये प्रकाशका होना आवश्यक है । और भी - पहले किसी स्थानमें किये हुए ज्ञानके संस्कार भी कारण हैं । फिर भी परम्परासे अवलोकन (प्रत्यक्ष) होता है ।


एतेषु हेतुभूतेषु सत्सु सज्ज्ञानसंभवात् ।
रूपेणैकेन हीनेषु ज्ञानं नार्थोपयोगि तत् ॥300॥

अर्थ: इन ऊपर कहे हुए पञ्चेन्द्रियकर्म, मानस कर्म, पर्याप्तकर्म, इन्द्रियादिककी रचना, सूर्यादिकका प्रकाश, अन्य देशस्थ संस्कार आदि समग्र हेतुओंके होने पर ही वस्तुका ठीक २ भान ( ज्ञान–प्रत्यक्ष ) होना संभव है । यदि इन कारणोंमेंसे कोई भी कम हो तो पदार्थका ज्ञान नहीं हो सक्ता ।

उत्तरार्द्ध 301 से 400 (श्लोक 301 से 400)

अस्ति तत्र विशेषोयं विना बाह्येन हेतुना ।
ज्ञानं नार्थोपयोगीति लब्धिज्ञानस्य दर्शनात् ॥301॥

अर्थ: यहां पर इतना विशेष समझ लेना चाहिये कि क्षयोपशम ( लब्धि ) ज्ञानके होने पर भी विना बाह्य कारणके मिले पदार्थोंका ज्ञान ( उपयोग रूप ) नहीं हो सक्ता है।


देशतः सर्वतो घातिस्पर्धकानामिहोदयात् ।
क्षायोपशमिकावस्था न चेज्ज्ञानं न लब्धिमत् ॥302॥

अर्थ: देशघातिस्पर्धकोंका उदय होने पर सर्वघातिस्पर्धकोंका उदयक्षय ( उदयाभावी क्षय ) होने पर क्षयोपशम होता है। ऐसी क्षयोपशम - अवस्था यदि न हो तो वह लब्धिरूप ज्ञान भी नहीं हो सक्ता।


ततः प्रकृतार्थमेवैतद्दिङ्मात्रं ज्ञानमैन्द्रियम् ।
तदर्थार्थस्य सर्वस्य देशमात्रस्य दर्शनात् ॥303॥

अर्थ: ऊपर कही हुई समस्त वातोंका प्रकरणमें यही प्रयोजन है कि इन्द्रियजन्य ज्ञान दिङ्मात्र होता है। पूरे पदार्थके एक देश मात्रका इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होता है।


खण्डितं खण्डशस्तेषामेकैकार्थस्य कर्षणात् ।
प्रत्येकं नियतार्थस्य व्यस्तमात्रे सति क्रमात् ॥304॥

अर्थ: उन सम्पूर्ण पदार्थोंमेंसे एक एक पदार्थके खण्ड २ ( अंशमात्र ) को जानता है इस लिये वह इन्द्रियजन्य ज्ञान खण्डित-अधूरा भी है । तथा वह भिन्न २ होता है, किसी नियमित वस्तुको भिन्न २ अवस्थामें क्रमसे जानता है ।


आस्तामित्यादि दोषाणां सन्निपातास्पदं पदम् ।
ऐन्द्रियं ज्ञानमप्यस्ति प्रदेशचलनात्मकम् ॥305॥

अर्थ: इन्द्रियजन्य ज्ञान उपर्युक्त अनेक दोषोंके समावेशका स्थान तो है ही, साथमें वह आत्मप्रदेशोंकी कंपता ( चलपना ) को लिये हुए है । और इस क्रियाविहीन आत्माकी जब तक कोई औदयिकी ( कर्मोंके उदयसे होने वाली ) क्रिया रहती है तभी तक आत्मप्रदेशोंका हलन चलन होता है । कर्मोंके उदयके विना हलनचलन नहीं हो सक्ता ।


निष्क्रियस्यात्मनः काचिद्यावदौदयिकी क्रिया ।
अपि देशपरिस्पन्दो नोदयोपाधिना विना ॥306॥

अर्थ: इन्द्रियजन्य ज्ञान उपर्युक्त अनेक दोषोंके समावेशका स्थान तो है ही, साथमें वह आत्मप्रदेशोंकी कंपता ( चलपना ) को लिये हुए है । और इस क्रियाविहीन आत्माकी जब तक कोई औदयिकी ( कर्मोंके उदयसे होने वाली ) क्रिया रहती है तभी तक आत्मप्रदेशोंका हलन चलन होता है । कर्मोंके उदयके विना हलनचलन नहीं हो सक्ता ।


नासिद्धमुदयोपाधे र्दुःखत्वं कर्मणः फलात् ।
कर्मणो यत्फलं दुःखं प्रसिद्धं परमागमात् ॥307॥

अर्थ: उदयोपाधि दुःखरूप है, यह बात असिद्ध नहीं है । क्योंकि वह कर्मोंके ही फल स्वरूप है । जो कर्मोका फल होता है वह दुःख रूप होता ही है, यह बात परमागमसे प्रसिद्ध है ।


बुद्धिपूर्वकदुःखेषु दृष्टान्ताः सन्ति केचन ।
नाबुद्धिपूर्वके दुःखे ज्ञानमात्रैकगोचरे ॥308॥

अर्थ: दुःख दो प्रकारका होता है - एक बुद्धिपूर्वक, दूसरा अबुद्धिपूर्वक । जो दुःख प्रत्यक्षमें ही मालूम होता है वह दुःख बुद्धिपूर्वक कहलाता है । ऐसे दुःखके अनेक दृष्टान्त हैं । जैसे फोडेकी तकलीफ होना, किसीका किसीको मारना, बीमारी होना आदि, परन्तु अबुद्धिपूर्वक दुःख ज्ञान मात्रके ही गोचर है, उसके दृष्टान्त भी नहीं मिलते ।


अस्त्यात्मनो महादुःखं गाढं बद्धस्य कर्मभिः ।
मनःपूर्वं कदाचिद्वै शश्वत्सर्वप्रदेशजम् ॥309॥

अर्थ: कर्मोंसे गाढ़ रीतिसे बंधे हुए इस आत्माके सम्पूर्ण प्रदेशोंमें होने वाला मन पूर्वक दुःख कभी होता है । परंतु कर्मोंकी परतन्त्रतासे इस आत्माको महादुःख संसारी अवस्थामें सदा ही रहा करता है ।


अस्ति स्वस्यानुमेयत्वाद् बुद्धिजं दुःखमात्मनः ।
सिद्धत्वात्साधनेनालं वर्जनीयो वृथा श्रमः ॥310॥

अर्थ: आत्माका, जो दुःख बुद्धिपूर्वक होता है वह तो अपने आप ही अनुमान किया जासक्ता है। इसलिये वह सिद्ध ही है, उसके सिद्ध करनेके लिये हेतु देनेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो बात सुसिद्ध है उसमें परिश्रम करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है।


साध्यं तन्निहितं दुःखं नाम यावदबुद्धिजम् ।
कार्यानुमानतो हेतुर्वाच्यो वा परमागमात् ॥311॥

अर्थ: जो छिपा हुआ - अबुद्धिपूर्वक दुःख है वही सिद्ध करने योग्य है । उसकी सिद्धि दो ही प्रकारसे हो सक्ती है, यातो कार्यको देखकर हेतु कहना चाहिये, अथवा परमागमसे उसकी सिद्धि मान्नी चाहिये ।


अस्ति कार्यानुमानाद्वै कारणानुमितिः क्वचित् ।
दर्शनान्नदपूरस्य देवो वृष्टो यथोपरि ॥312॥

अर्थ: कहीं पर कार्यको देखकर कारणका अनुमान होजाता है । जिस प्रकार किसी नाले ( छोटी नदी ) के बढे हुए प्रवाहको देखकर यह अनुमान कर लिया जाता है कि ऊपरकी ओर मेघ बर्षा हैं । बिना मेघके बरसे नदका प्रवाह नहीं चल सक्ता । इसी प्रकार कार्यसे उसके कारणका अनुमान कर लिया जाता है ।


अस्त्यात्मनो गुणः सौख्यं स्वतःसिद्धमनश्वरम् ।
घातिकर्माभिघातत्वादसद्वाऽदृश्यतां गतम् ॥313॥

अर्थ: आत्माका सुख गुण स्वाभाविक है, वह स्वतः सिद्ध है और नित्य है, परन्तु घातिया कर्मोंके घातसे नष्टसा होगया है अर्थात् अदृश्य होगया है । वही सुखका अदर्शन (अभाव) कार्य रूप हेतु है । वह हेतु सुखके विपक्षी दुःखका ( जो कि आत्मामें मौजूद है ) अनुमान कराता है ।


सुखस्यादर्शनं कार्यलिङ्गं लिङ्गमिवात्र तत् ।
कारणं तद्विपक्षस्य दुःखस्यानुमितिः सतः ॥314॥

अर्थ: आत्माका सुख गुण स्वाभाविक है, वह स्वतः सिद्ध है और नित्य है, परन्तु घातिया कर्मोंके घातसे नष्टसा होगया है अर्थात् अदृश्य होगया है। वही सुखका अदर्शन (अभाव) कार्य रूप हेतु है। वह हेतु सुखके विपक्षी दुःखका ( जो कि आत्मामें मौजूद है ) अनुमान कराता है।


सर्वसंसारिजीवानामस्ति दुःखमबुद्धिजम् ।
हेतोर्नैसर्गिकस्यात्र सुखस्याभावदर्शनात् ॥315॥

अर्थ: सम्पूर्ण संसारी जीवोंके अबुद्धि पूर्वक दुःख है । क्योंकि सुखका अदर्शनरूप स्वाभाविक हेतु दीखता है ।


नासौ हेतुरसिद्धोस्ति सिद्धसंदृष्टिदर्शनात् ।
व्याप्तेः सद्भावतो नूनमन्यथानुपपत्तितः ॥316॥

अर्थ: यह उपर्युक्त हेतु असिद्ध नहीं है । इस विषयमें बहुतसे प्रसिद्ध दृष्टान्त मौजूद हैं । सुखका जहां अभाव है वहां दुःख अवश्य है ऐसा फलितार्थ निकालनेमें व्यतिरेक व्याप्तिका सद्भाव है । जहां पर दुःख नहीं है वहां सुखका भी अदर्शन नहीं है जैसे कि अनन्तचतुष्टय धारी अर्हन् सर्वज्ञ । अरहन्त देवके दुःख नहीं है इसलिये अनन्त सुखकी उनके उद्भूति होगई है । यदि ऐसा कार्य - कारण भाव न माना जावै तो व्याप्ति भी नहीं बन सक्ती ।


व्याप्तिर्यथा विचेष्टस्य मूर्छितस्येव कस्यचित् ।
अदृश्यमपि मद्यादिपानमस्त्यत्र कारणम् ॥317॥

अर्थ: व्याप्ति इस प्रकार है - जैसे किसी मूर्छितकी तरह चेष्टा विहीन पुरुषको देखकर यह अनुमान कर लिया जाता है कि इसने मदिरापान किया है। यद्यपि मदिरा - पान प्रत्यक्ष नहीं है तो भी उसका कार्य वेहोशी देखकर उस मदिरापान - कारणका अनुमान कर लिया जाता है। उसी प्रकार प्रकृतमें जानना।


अस्ति संसारिजीवस्य नूनं दुःखमबुद्धिजम् ।
सुखस्यादर्शनं स्वस्य सर्वतः कथमन्यथा ॥318॥

अर्थ: संसारी जीवके निश्चयसे अबुद्धि पूर्वक दुःख है । यदि दुःख नहीं होता तो उसके ( आत्मीक ) सुखका सर्वथा अदर्शन कैसे होजाता ।


ततोनुमीयते दुःखमस्ति नूनमबुद्धिजम् ।
अवश्यं कर्मबद्धस्य नैरन्तर्योदयादितः ॥319॥

अर्थ: इस कर्मसे बंधे हुए आत्माके निरन्तर कर्मोंका उदय, उदीरणा आदि होनेसे निश्चय पूर्वक अबुद्धि पूर्वक दुःख है ऐसा अनुमान होता है ।


नाऽवाच्यता यथोक्तस्य दुःखजातस्य साधनं ।
अर्थादबुद्धिमात्रस्य हेतोरौदयिकत्वतः ॥320॥

अर्थ: ऊपर जो अबुद्धिसे होने वाला दुःखसमूह बतलाया गया है, उसके सिद्ध करनेमें अवाच्यता नहीं है अर्थात् ऐसा नहीं है कि वह किसी प्रकार कहा ही न जासके । अबुद्धिपूर्वक दुःखका हेतु कर्मोका उदय होना ही है । कर्मोका उदय ही बतलाता है कि इस आत्मामें दुःख है ।


तद्यथा कश्चिदत्राह नास्ति बद्धस्य तत्सुखम् ।
यत्सुखं स्वात्मनस्तत्त्वं मूर्छितं कर्मभिर्बलात् ॥321॥

अर्थ: कोई शङ्काकार कहता है कि जो सुख आत्मीक तत्त्व है वह सुख कर्मसे बँधे हुए आत्मामें नहीं है। कर्मोंने बलपूर्वक उसे मूर्च्छित किया है और अनिष्ट पदार्थोंका संयोग होनेसे आत्माको शारीरिक दुःख होता है। तथा इन्द्रियजन्य भी दुःख होता है। बस शारीरिक और ऐन्द्रियिक ये ही बुद्धिपूर्वक दुःख जगतमें प्रसिद्ध हैं। मन, देह, इन्द्रिय इनसे भिन्न और कोई बुद्धिपूर्वक दुःख नहीं है। इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है कि और भी दुःख है। जैसे आकाशके पुष्प नहीं है वैसे ही अन्य दुःख नहीं हैं। आपने जो अबुद्धिपूर्वक दुःख सिद्ध करनेके लिये सुखाभाव हेतु दिया है, वह यथार्थ हेतु नहीं है किन्तु हेत्वाभास है। (हेत्वाभास झूंठे हेतुको कहते है जो साध्यको सिद्ध नहीं कर सकै) यहां पर व्याप्यत्वासिद्ध नामका हेत्वाभास है। क्योंकि सुखाभावकी अबुद्धिपूर्वक दुःखके साथ व्याप्ति नहीं है। साध्य साधनमें व्याप्य व्यापक हुआ करता है। जिस हेतुमें साध्यकी व्याप्यता न होवै उसीका नाम व्याप्यत्वासिद्ध है। ऐसा हेतु साध्यको सिद्ध नहीं कर सक्ता है ?


अस्त्यनिष्टार्थसंयोगाच्छारीरं दुःखमात्मनः ।
ऐन्द्रियं बुद्धिजं नाम प्रसिद्धं जगति स्फुटम् ॥322॥

अर्थ: कोई शङ्काकार कहता है कि जो सुख आत्मीक तत्त्व है वह सुख कर्मसे बँधे हुए आत्मामें नहीं है । कर्मोंने बलपूर्वक उसे मूर्च्छित किया है और अनिष्ट पदार्थोंका संयोग होनेसे आत्माको शारीरिक दुःख होता है । तथा इन्द्रियजन्य भी दुःख होता है । बस शारीरिक और ऐन्द्रियिक ये ही बुद्धिपूर्वक दुःख जगतमें प्रसिद्ध हैं । मन, देह, इन्द्रिय इनसे भिन्न और कोई बुद्धिपूर्वक दुःख नहीं है । इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है कि और भी दुःख है । जैसे आकाशके पुष्प नहीं है वैसे ही अन्य दुःख नहीं हैं । आपने जो अबुद्धिपूर्वक दुःख सिद्ध करनेके लिये सुखाभाव हेतु दिया है, वह यथार्थ हेतु नहीं है किन्तु हेत्वाभास है । (हेत्वाभास झूंठे हेतुको कहते है जो साध्यको सिद्ध नहीं कर सकै ) यहां पर व्याप्यत्वासिद्ध नामका हेत्वाभास है । क्योंकि सुखाभावकी अबुद्धिपूर्वक दुःखके साथ व्याप्ति नहीं है । साध्य साधनमें व्याप्य व्यापक हुआ करता है । जिस हेतुमें साध्यकी व्याप्यता न होवै उसीका नाम व्याप्यत्वासिद्ध है । ऐसा हेतु साध्यको सिद्ध नहीं कर सक्ता है ?


मनोदेहेन्द्रियादिभ्यः पृथग् दुःखं न बुद्धिजम् ।
यद्ग्राहकप्रमाणस्य शून्यत्वाद् व्योमपुष्पवत् ॥323॥

अर्थ: कोई शङ्काकार कहता है कि जो सुख आत्मीक तत्त्व है वह सुख कर्मसे बँधे हुए आत्मामें नहीं है । कर्मोंने बलपूर्वक उसे मूर्च्छित किया है और अनिष्ट पदार्थोंका संयोग होनेसे आत्माको शारीरिक दुःख होता है । तथा इन्द्रियजन्य भी दुःख होता है । बस शारीरिक और ऐन्द्रियिक ये ही बुद्धिपूर्वक दुःख जगतमें प्रसिद्ध हैं । मन, देह, इन्द्रिय इनसे भिन्न और कोई बुद्धिपूर्वक दुःख नहीं है । इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है कि और भी दुःख है । जैसे आकाशके पुष्प नहीं है वैसे ही अन्य दुःख नहीं हैं । आपने जो अबुद्धिपूर्वक दुःख सिद्ध करनेके लिये सुखाभाव हेतु दिया है, वह यथार्थ हेतु नहीं है किन्तु हेत्वाभास है । (हेत्वाभास झूंठे हेतुको कहते है जो साध्यको सिद्ध नहीं कर सकै ) यहां पर व्याप्यत्वासिद्ध नामका हेत्वाभास है । क्योंकि सुखाभावकी अबुद्धिपूर्वक दुःखके साथ व्याप्ति नहीं है । साध्य साधनमें व्याप्य व्यापक हुआ करता है । जिस हेतुमें साध्यकी व्याप्यता न होवै उसीका नाम व्याप्यत्वासिद्ध है । ऐसा हेतु साध्यको सिद्ध नहीं कर सक्ता है ?


साध्ये वाऽबुद्धिजे दुःखे साधनं तत्सुखक्षतिः ।
हेत्वाभासः स व्याप्यत्वासिद्धौ व्याप्तेरसंभवात् ॥324॥

अर्थ: कोई शङ्काकार कहता है कि जो सुख आत्मीक तत्त्व है वह सुख कर्मसे बँधे हुए आत्मामें नहीं है। कर्मोंने बलपूर्वक उसे मूर्च्छित किया है और अनिष्ट पदार्थोंका संयोग होनेसे आत्माको शारीरिक दुःख होता है। तथा इन्द्रियजन्य भी दुःख होता है। बस शारीरिक और ऐन्द्रियिक ये ही बुद्धिपूर्वक दुःख जगतमें प्रसिद्ध हैं। मन, देह, इन्द्रिय इनसे भिन्न और कोई बुद्धिपूर्वक दुःख नहीं है। इस विषयमें कोई प्रमाण नहीं है कि और भी दुःख है। जैसे आकाशके पुष्प नहीं है वैसे ही अन्य दुःख नहीं हैं। आपने जो अबुद्धिपूर्वक दुःख सिद्ध करनेके लिये सुखाभाव हेतु दिया है, वह यथार्थ हेतु नहीं है किन्तु हेत्वाभास है। (हेत्वाभास झूंठे हेतुको कहते है जो साध्यको सिद्ध नहीं कर सकै) यहां पर व्याप्यत्वासिद्ध नामका हेत्वाभास है। क्योंकि सुखाभावकी अबुद्धिपूर्वक दुःखके साथ व्याप्ति नहीं है। साध्य साधनमें व्याप्य व्यापक हुआ करता है। जिस हेतुमें साध्यकी व्याप्यता न होवै उसीका नाम व्याप्यत्वासिद्ध है। ऐसा हेतु साध्यको सिद्ध नहीं कर सक्ता है ?


नैवं यत्तद्विपक्षस्य व्याप्तिर्दुःखस्य साधने ।
कर्मणस्तद्विपक्षत्वं सिद्धं न्यायात्कुतोन्यथा ॥325॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है। क्योंकि दुःखके सिद्ध करनेमें सुखके विपक्षकी व्याप्ति है। जो सुखका विपक्षी है वही दुःखका साधक है और सुखका विपक्ष कर्म है। यह बात न्यायसे भली भांति सिद्ध है।


विरुद्धधर्मयोरेव वैपक्ष्यं नाऽविरुद्धयोः ।
शीतोष्णधर्मयोर्वैरं न तत्क्षारद्रवत्वयोः ॥326॥

अर्थ: जिनका विरोधी धर्म है उन्हींकी विपक्षता होती है, जो अविरोधी धर्म वाले हैं उनकी विपक्षता नहीं होती। शीत और उष्ण धर्मवालों ( जल और अग्नि ) का ही वैर है। खारापन और पतलापन, इनका परस्पर कोई वैर नहीं है। ( क्योंकि समुद्रमें दोनों चीजें मौजूद हैं। )


निराकुलं सुखं जीवशक्तिर्द्रव्योपजीविनी ।
तद्विरुद्धाकुलत्वं वै शक्तिस्तद्घातिकर्मणः ॥327॥

अर्थ: आकुलता रहित जीवकी एक शक्तिका नाम सुख है वह सुख नामकी शक्ति द्रव्योपजीवी है । उसीकी विरोधिनी आकुलता है, और वह आकुलता घातिया कर्मोंकी शक्ति हैं ।


असिद्धा न तथा शक्तिः कर्मणः फलदर्शनात् ।
अन्यथाऽऽत्मतया शक्ते र्बाधकं कर्म तत्कथम् ॥328॥

अर्थ: सुख गुणके अभावमें होनेवाली जो आकुलता है, वह घातिया कर्मोंकी शक्ति है, यह बात असिद्ध नहीं है, क्योंकि कर्मोंका फल दीखता है । यदि वह कर्म-शक्ति नहीं है तो आत्माकी शक्तिका बाधक कर्म कैसे होता है ?


नयात्सिद्धं ततो दुःखं सर्वदेशप्रकम्पवत् ।
आत्मनः कर्मबद्धस्य यावत्कर्मरसोदयात् ॥329॥

अर्थ: इसलिये यह बात न्यायसे सिद्ध होचुकी कि कर्मसे बँधे हुए आत्माके जब तक कर्मोंका उदय होरहा है तब तक उसके सम्पूर्ण प्रदेशोंमें कम्प (कँपानेवाला) करनेवाला दुःख है।


देशतोस्त्यत्र दृष्टान्तो वारिधिर्वायुना हतः ।
व्याकुलोऽव्याकुलः स्वस्थः स्वाधिकारप्रमत्तवान् ॥330॥

अर्थ: यहां पर एक देश दृष्टान्त भी है - वायुसे ताडित (प्रेरित) समुद्र व्याकुल होता है । जब वायुसे रहित स्वाधिकारी समुद्र है तब व्याकुलता रहित है, स्वस्थ है ।

यहां पर ’ स्वाधिकारप्रमत्तवान् ’ यह समुद्रका विशेषण तीन प्रकारसे लगाया जासक्ता है । जिस समय समुद्रस्वाधिकारमें प्रमादी है उस समय वह व्याकुल है । ऐसा भी अर्थ होसक्ता है । दूसरा ऐसा भी अर्थ होसक्ता है कि स्वाधिकार अवस्थामें वह अव्याकुल है और प्रमत्त अवस्थामें व्याकुल है । तीसरा-स्वाधिकारमें ही जिस समय लीन है तब वह अव्याकुल है । तात्पर्य सबतरह स्पष्ट है ।


न च वाच्यं सुखं शश्वद्विद्यमानमिवास्ति तत् ।
बद्धस्याथाप्यबद्धस्य हेतोस्तच्छक्तिमात्रतः ॥331॥

अर्थ: यदि कोई यह कहै कि सुख सदा विद्यमान ही रहता है । चाहे आत्मा कर्मोंसे बँधा हो, चाहे न बँधा हो । क्योंकि सुख आत्माकी शक्तिका नाम है । शक्ति नित्य रहने वाला पदार्थ है । इस लिये सुख मौजूदकी तरह ही समझना चाहिये ? शंकाकारका ऐसा कहना ठीक नहीं हैं इसमें अनेक दोष आते हैं, वे नीचे दिखाये जाते हैं-


अत्र दोषावतारस्य युक्तिः प्रागेव दर्शिता ।
यथा स्वस्थस्य जीवस्य व्याकुलत्वं कुतोर्थतः ॥332॥

अर्थ: यदि सुख गुण सदा विद्यमान ही माना जावे तो अवश्य दोष आते हैं । जो दोष आते हैं उनकी युक्ति पहले ही कही जाचुकी है । जो स्वस्थ जीव है उसके वास्तवमें व्याकुलता कहां हो सक्ती है ? और संसारी जीवके व्याकुलता है, इस लिये जाना जाता है कि सुखका अभाव है ।


नचैकतः सुखव्यक्तिरेकतो दुःखमस्ति तत् ।
एकस्यैकपदे सिद्धमित्यनेकान्तवादिनाम् ॥333॥

अर्थ: अनेकान्तवादी (जैन) एक पदार्थमें एक ही स्थानमें दो धर्म मान लेते है, इसलिये एक आत्मामें ही सुख व्यक्ति और उसीमें दुःख व्यक्ति मानलेना चाहिये अर्थात् एक ही आत्मामें एक समयमें सुख और दुःख दोनों मानना चाहिये । ऐसा माननेसे जैनियोंका अनेकान्तवाद भी घट जाता है ? सो यह कहना भी असमझका है ।


अनेकान्तः प्रमाणं स्यादर्थादेकत्र वस्तुनि ।
गुणपर्याययोर्द्वैताद् गुणमुख्यव्यवस्थया ॥334॥

अर्थ: एक वस्तुमें होनेवाला जो अनेकान्त है वह प्रमाण अवश्य है, परन्तु सब जगह नहीं। जहां पर गुण, पर्यायके कथनमें एकको मुख्य कर दिया जाता है और दूसरेको उस समय गौण कर दिया जाता है, वहीं पर अनेकान्त प्रमाण है और वहीं पर द्वैत घटता है।


अभिव्यक्तिस्तु पर्यायरूपा स्यात्सुखदुःखयोः ।
तदात्वे तन्न तद्द्वैतं द्वैतं चेद्द्रव्यतः क्वचित् ॥335॥

अर्थ: परन्तु सुख, दुःखकी व्यक्ति (प्रगटता) तो पर्याय स्वरूप है। ऐसी अवस्थामें द्वैत नहीं घट सक्ता। द्वैत यदि कहीं पर होगा तो द्रव्यकी उपेक्षासे ही होगा।


बहु प्रलपनेनालं साध्यं सिद्धं प्रमाणतः ।
सिद्धं जैनागमाच्चापि स्वतः सिद्धो यथागमः ॥336॥

अर्थ: अब अधिक कहनेसे क्या प्रयोजन ! हमारा साध्य " कर्मबद्ध आत्मा दुःखी है " अनुमान प्रमाणसे सिद्ध हो चुका, और जैनागमसे भी आत्मामें दुःखकी सत्ता सिद्ध हो चुकी । तथा आगममें अन्य प्रमाणोंकी आवश्यकता नहीं है, आगम स्वयं प्रमाणरूप है ।


एतत्सर्वज्ञवचनमाज्ञामात्रं तदागमः ।
यावत्कर्मफलं दुःखं पच्यमानं रसोन्मुखम् ॥337॥

अर्थ: सर्वज्ञदेवके बचनोंको आज्ञारूप समझना चाहिये, बस उसीका नाम आगम है। सर्वज्ञके ये बचन हैं कि पके हुए कर्मोंका उदयावस्थापन्न जो फल है वही दुःख है, अर्थात् जितना भी कर्मफल है वह सभी दुःख है ।


अभिज्ञानं यदत्रैतज्जीवाः कार्मणकायकाः ।
आ एकाक्षादापञ्चाक्षा अप्यन्ये दुःखिनोमताः ॥338॥

अर्थ: जितने भी एकेन्द्रियसे आदि लेकर पचेन्द्रिय तक जीव हैं वे सब कार्माण काय वाले हैं अर्थात् सभी कर्म वाले हैं। इस लिये सभी दुःखी माने गये हैं तथा और भी जो ( विग्रह गतिमें रहने वाले ) कर्म वद्ध हैं वे सब दुःखी माने गये हैं।


तत्राभिव्यञ्जको भावो वाच्यं दुःखमनीहितम् ।
घातिकर्मोदयाघाताज्जीवदेशवधात्मकम् ॥339॥

अर्थ: घातिया कर्मोंके उदयके आघातसे आत्माके प्रदेशोंका घात करनेवाला जो कर्म है वही दुःखका सूचक है, अर्थात् घाति कर्मका उदय ही दुःखावह है ।


अन्यथा न गतिः साध्वी दोषाणां सन्निपाततः ।
संज्ञिनां दुःखमेवैकं दुःखं नाऽसंज्ञिनामिति ॥340॥

अर्थ: यदि कर्मोंको दुःखका कारण न माना जाय तो दुःखोंके कारणोंका और कोई उपाय ही नहीं है क्योंकि कर्मोंको दुःखका कारण न माननेसे अनेक दोष आते हैं, यदि केवल संज्ञी जीवोंके ही दुःख होता है, असंज्ञी जीवोंके नहीं ऐसा कहाजाय ?


महच्चेत्संज्ञिनां दुःखं स्वल्पं चाऽसंज्ञिनां न वा ।
यतो नीचपदादुच्चैः पदं श्रेयस्तथामतम् ॥341॥

अर्थ: अथवा यह कहा जाय कि बहुत भारी दुःख संज्ञियोंके ही होता है और थोडा असंज्ञियोंके होता है ? तोभी यह सब कथन ठीक नहीं है । क्योंकि नीच स्थानसे उच्चस्थान सदा अच्छा माना गया है ।


न च वाच्यं शरीरं च स्पर्शनादीन्द्रियाणि च ।
सन्ति सूक्ष्मेषु जीवेषु तत्फलं दुःखमङ्गिनाम् ॥342॥

अर्थ: यदि यह कहा जाय कि एकेन्द्रियादिक सूक्ष्म जीवोंके भी शरीर और स्पर्शनादिक इन्द्रियां हैं। इसलिये उनको भी शारीरिक और ऐन्द्रियिक दुःख ही उठाना पड़ता है ? सो यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योंकि -


अव्याप्तिः कार्मणावस्थावस्थितेषु तथा सति ।
देहेन्द्रियादिनोकर्मशून्यस्य तस्य दर्शनात् ॥343॥

अर्थ: यदि शारिरिक और इन्द्रियजन्य ही दुःख माना जावे, और कोई दुःख ( कर्मजन्य ) न माना जावे तो जो जीव विग्रहगतिमें हैं, जहां केवल कार्माण अवस्था है; शरीर, इन्द्रियादि (के कारण)नोकर्म नहीं है, वहां दुःख है या नहीं ?


अस्ति चेत्कार्मणो देहस्तत्र कर्मकदम्बकः ।
दुःखं तद्धेतुरित्यस्तु सिद्धं दुःखमनीहितम् ॥344॥

अर्थ: यदि यह कहाजाय कि विग्रहगतिमें भी कर्मका समूह रूप कार्माण शरीर है। इसलिये शरीरजन्य दुःख वहां भी है ? तो इस कथनसे कर्मजन्य दुःख ही सिद्ध हुआ । इसलिये कर्म ही दुःख देनेवाला है यह बात भली भांति सिद्ध हो गई।


अपि सिद्धं सुखं नाम यदनाकुललक्षणम् ।
सिद्धत्वादपि नोकर्मविप्रमुक्तौ चिदात्मनः ॥345॥

अर्थ: तथा यह बात भी सिद्ध हो चुकी कि सुख वही है जो अनाकुल लक्षणवाला है, और वह निराकुल सुख इस जीवात्माके कर्म और नोकर्मके छूट जानेपर ( सिद्धावस्थामें ) होता है। (यहांपर नो-कर्म शब्दसे कर्म और नोकर्म दोनोंका ग्रहण है। )


ननु देहेन्द्रियाभावः प्रसिद्धः परमात्मनि ।
तदभावे सुखं ज्ञानं सिद्धिमुन्नीयत कथम् ॥346॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि परमात्मामें शरीर और इन्द्रियोंका अभाव है, यह बात प्रसिद्ध है। परन्तु बिना इन्द्रिय और शरीरके सुख और ज्ञान किस प्रकार भली भांति सिद्धिको प्राप्त होते हैं ?


न यद्यतः प्रमाणं स्यात् साधने ज्ञानसौख्ययोः ।
अत्यक्षस्याशरीरस्य हेतोः सिद्धस्य साधनम् ॥347॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है क्योंकि ज्ञान और सुखके सिद्ध करनेमें इन्द्रिय और शरीर प्रमाण नहीं है किन्तु प्रसिद्ध अतीन्द्रिय और अशरीर ही हेतु उनकी सिद्धिमें साधन है।


अस्ति शुद्धं सुखं ज्ञानं सर्वतः कस्यचिद्यथा ।
देशतोप्यस्मदादीनां स्वादुमात्रं वत द्वयोः ॥348॥

अर्थ: शुद्ध ज्ञान और शुद्ध सुख ( आत्मीक )का थोड़ासा स्वाद हमलोगोंमें भी किसी किसीके पाया जाता है, इससे जाना जाता है कि किसीके शुद्ध ज्ञान और सुख सम्पूर्णतासे भी है ।


ज्ञानानन्दौ चितो धर्मौ नित्यौ द्रव्योपजीविनौ ।
देहेन्द्रियाद्यभावेपि नाभावस्तद्द्वयोरिति ॥349॥

अर्थ: ज्ञान और आनन्द (सुख) ये दोनों ही आत्माके धर्म हैं, वे नित्य हैं और द्रव्योपजीवी (भावात्मक) गुण हैं। इसलिये शरीर और इन्द्रियोंके अभावमें भी उनका अभाव नहीं हो सक्ता ( प्रत्युत वृद्धि होती है )


सिद्धं धर्मत्वमानन्दज्ञानयोर्गुणलक्षणात् ।
यतस्तत्राप्यवस्थायां किञ्चिद्देहेन्द्रियं विना ॥350॥

अर्थ: ज्ञान और आनंद आत्माके धर्म हैं, यह वात सिद्ध है, क्योंकि गुणका लक्षण इनमें मौजूद है, तथा शरीर और इन्द्रियोंके बिना भी ये पाये जाते हैं ।


मतिज्ञानादिवेलायामात्मोपादानकारणम् ।
देहेन्द्रियास्तदर्थाश्च बाह्यं हेतुरहेतुवत् ॥351॥

अर्थ: मतिज्ञान आदिके समय जो शरीर, इन्द्रियां और उनके विषयभूत - पदार्थ कारण हैं वे केवल बाह्य हेतु हैं, इसलिये अहेतुके ही समान हैं। ज्ञानादिकमें अन्तरंग - उपादान हेतु तो आत्मा ही है, इसलिये आत्माके ही ज्ञान, सुख धर्म हैं।


संसारे वा विमुक्तौ वा जीवो ज्ञानादिलक्षणः ।
स्वयमात्मा भवत्येष ज्ञानं वा सौख्यमेव वा ॥352॥

अर्थ: आत्मा चाहे संसारमें हो, चाहे मुक्तिमें हो, कहीं भी क्यों न हो, सदा ज्ञान, सुख, दर्शन, वीर्य आदि लक्षणोंवाला है। स्वयं आत्मा ही ज्ञानरूप होजाता है और स्वयं ही सुखमय होजाता है।


स्पर्शादीन् प्राप्य जीवश्च स्वयं ज्ञानं सुखं च तत् ।
अर्थाः स्पर्शादयस्तत्र किं करिष्यन्ति ते जडाः ॥353॥

अर्थ: स्पर्शादि विषयोंको प्राप्त होकर यह जीव ही स्वयं ज्ञान और सुख मय होजाता है । उस ज्ञान और सुखके विषयमें ये स्पर्शादिक पदार्थ - जड़ विचारे क्या कर सक्ते हैं ।


अर्थाः स्पर्शादयः स्वैरं ज्ञानमुत्पादयन्ति चेत् ।
घटादौ ज्ञानशून्ये च तत्किं नोत्पादयन्ति ते ॥354॥

अर्थ: यदि स्पर्शादिक अचेतन पदार्थ ही स्वयं ज्ञानको पैदा करदेवें तो ज्ञानशून्य घटादिक पदार्थोंमें क्यों नहीं उत्पन्न करते ? अर्थात् आत्मामें ही ज्ञान क्यों होता है ?


अथ चेच्चेतने द्रव्ये ज्ञानस्योत्पादकाः क्वचित् ।
चेतनत्वात्स्वयं तस्य किं तत्रोत्पादयन्ति वा ॥355॥

अर्थ: यदि यह कहा जावै कि स्पर्शादिक ज्ञानको पैदा करते हैं, परन्तु चेतन द्रव्यमें ही पैदा करते हैं ? तो चेतन द्रव्य तो स्वयं ज्ञान रूप है, वहां उन्होंने पैदा क्या किया ?


ततः सिद्धं शरीरस्य पञ्चाक्षाणां तदर्थसात् ।
अस्त्यकिञ्चित्करत्वं तच्चितो ज्ञानं सुखम्प्रति ॥356॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध होगई कि शरीर और पांचों ही इन्द्रियां आत्माके ज्ञान और सुखके प्रति सर्वथा अकिञ्चित्कर हैं, अर्थात् कुछ नहीं कर सक्ते ।


ननु देहेन्द्रियार्थेषु सत्सु ज्ञानं सुखं नृणाम् ।
असत्सु न सुखं ज्ञानं तदकिञ्चित्करं कथम् ॥357॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि मनुष्योंके शरीर इन्द्रिय और पदार्थके रहते हुए ही ज्ञान और सुख होता है । विना शरीरादिकके ज्ञान और सुख नहीं होता । फिर शरीर, इन्द्रिय और पदार्थ, ज्ञान और सुखके प्रति अकिञ्चित्कर ( कुछ भी नहीं करने वाले ) क्यों हैं ?


नैवं यतोन्वयापेक्षे व्यञ्जके हेतुदर्शनात् ।
कार्याभिव्यञ्जकः कोपि साधनं न विनान्वयम् ॥358॥

अर्थ: शङ्काकारका उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है । क्योंकि शरीरादिकको जो ज्ञानादिकके प्रति हेतु बतलाया जाता है वह अन्वयकी अपेक्षा रखने वाले व्यञ्जककी अपेक्षासे हैं । कार्यका जतलाने वाला कोई भी साधन विना अन्वयके नहीं हो सक्ता ।


दृष्टान्तोऽगुरु गन्धस्य व्यञ्जकः पावको भवेत् ।
न स्याद्विनाऽगुरुद्रव्यं गन्धस्तत्पावकस्य सः ॥359॥

अर्थ: दृष्टान्तके लिये अग्नि है - अग्नि अगुरु आदि सुगन्धित पदार्थोंकी व्यञ्जक (विदित करानेवाली) है। परन्तु वह सुगन्धित गन्ध, विना अगुरु द्रव्यके अग्निकी नहीं हो सक्ती। अगुरु द्रव्यके रहते हुए ही अग्नि उसकी सुगन्धिको विदित करा देती है।


तथा देहेन्द्रियं चार्थाः सन्त्यभिव्यञ्जकाः क्वचित् ।
ज्ञानस्य तथा सौख्यस्य न स्वयं चित्सुखात्मकाः ॥360॥

अर्थ: इसी प्रकार (आत्माके रहते हुए ही) देह, इन्द्रिय और पदार्थ कहीं ज्ञान और सुखके व्यञ्जक (विदित करानेवाले) हैं। परन्तु देहादिक स्वयं ज्ञान, सुख स्वरूप नहीं हैं। ऐसा तो एक आत्मा ही है।


नाप्युपादानशून्येपि स्यादभिव्यञ्जकात्सुखम् ।
ज्ञानं वा तत्र सर्वत्र हेतुशून्यानुषङ्गतः ॥361॥

अर्थ: उपादान शून्यतामें व्यञ्जक मात्रसे सुख अथवा ज्ञान नहीं होसक्ते । यदि बिना उपादानके भी सुख अथवा ज्ञान हो जायं तो सर्वत्र हेतुशून्यताका प्रसङ्ग होगा अर्थात् फिर हेतुके बिना भी कार्य होने लगेगा । बिना पदार्थके रहते हुए भी दीपक पदार्थका प्रकाश कर देगा । इसलिये उपादान कारण - आत्माके रहते हुए ही ज्ञान, सुख हो सक्ते हैं ।


ततः सिद्धं गुणो ज्ञानं सौख्यं जीवस्य वा पुनः ।
संसारे वा प्रमुक्तौ वा गुणानामनतिक्रमात् ॥362॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि ज्ञान और सुख जीवके ही गुण हैं। चाहे वह जीव संसारमें हो, चाहे मुक्तिमें हो, गुणोंका उल्लंघन कहीं नहीं होता।


किञ्च साधारणं ज्ञानं सुखं संसारपर्यये ।
तन्निरावरणं मुक्तौ ज्ञानं वा सुखमात्मनः ॥363॥

अर्थ: संसार पर्यायमें आत्माके साधारण ज्ञान और सुख होते हैं और मुक्ति होने पर उसी आत्माके निरावरण सुख और ज्ञान होते हैं ।


कर्मणां विप्रमुक्तौ तु नूनं नात्मगुणक्षतिः ।
प्रत्युतातीव नैर्मल्यं पङ्कापाये जलादिवत् ॥364॥

अर्थ: कर्मोंके नाश होने पर निश्चयसे आत्माके गुणोंकी क्षति ( हानि ) नहीं है । उल्टी निर्मलता आती है । जिस प्रकार कीचड़के दूर होने पर जल आदिकमें निर्मलता आजाती है । ( कर्म आत्मामें कीचड़की तरह समझने चाहिये ) ।


अस्ति कर्ममलापाये विकारक्षतिरात्मनः ।
विकारः कर्मजो भावः कादाचित्कः सपर्ययः ॥365॥

अर्थ: कर्म रूपी मलके नाश होने पर आत्मामें होने वाले विकारका नाश हो जाता है। क्योंकि विकार कर्मसे होनेवाला परिणाम है। वह सदा नहीं रहता कदाचित होता है इसलिये वह गुण नहीं है पर्याय है।


नष्टे चाशुद्धपर्याये मा भूभ्रान्तिर्गुणव्यये ।
ज्ञानानन्दत्वमस्योच्चैर्नित्यत्वात्परमात्मनि ॥366॥

अर्थ: आत्माकी अशुद्ध पर्यायके नाश होने पर उसके नाशका भ्रम नहीं करना चाहिये क्योंकि ज्ञान और सुख इस आत्माके नित्य गुण हैं, वे परमात्मामें पूर्णतासे रहते हैं।


दृषदादिमलापाये यथा पावकयोगतः ।
पीतत्वादिगुणाभावो न स्यात्कार्तस्वरोस्ति चेत् ॥367॥

अर्थ: यदि वह वास्तवमें सोना है तो अग्निके निमित्तसे पाषाण ( किट्टिकालिमा ) आदि मलके दूर होने पर सोनेके पीतत्वादि गुणोंका नाश कभी नहीं होता ।


एकविंशतिदुःखानां मोक्षो निर्मोक्षलक्षणः ।
इत्येके तदसज्जीवगुणानां शून्यसाधनात् ॥368॥

अर्थ: “एकविंशतिदुःखध्वंसो मोक्षः” इस गौतमसूत्रके अनुसार नैयायिक लोग कहते हैं कि ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि इक्कीस दुःखोंका नाश होना ही मोक्ष है। यह उनका कहना ठीक नहीं है ऐसे कथनसे जीवके गुणोंकी शून्यता सिद्ध होती है।


न स्यान्निजगुणव्यक्तिरात्मनो दुःखसाधनम् ।
सुखस्य मूलतो नाशादतिदुःखानुषङ्गतः ॥369॥

अर्थ: आत्मामें निज गुणोंका प्रकट होना दुःखका साधन कभी नहीं हो सक्ता । जहां पर सुखका जड़ मूलसे नाश माना जाता है, वहां अति दुःखका प्रसंग अवश्य होगा ।


निश्चितं ज्ञानरूपस्य सुखरूपस्य वा पुनः ।
देहेन्द्रियैर्विनापि स्तो ज्ञानानन्दौ परात्मनः ॥370॥

अर्थ: ज्ञान स्वरूप और सुखस्वरूप परमात्मा है उसके शरीर और इन्द्रियोंके विना भी ज्ञान और सुख हैं यह बात निश्चित हो चुकी । अथवा निश्चयसे परमात्माके ज्ञान और सुख दोनों हैं ।


इत्येवं ज्ञाततत्त्वोसौ सम्यग्दृष्टिर्निजात्मदृक् ।
वैषयिके सुखे ज्ञाने रागद्वेषौ परित्यजेत् ॥371॥

अर्थ: इस प्रकार वस्तु स्वरूपको जाननेवाला यह सम्यग्दृष्टि अपनी आत्माका स्वरूप देखता हुआ विषयोंसे होने वाले सुख और ज्ञानमें राग द्वेष नहीं करता है।


ननूल्लेखः किमेतावान् अस्ति किंवा परोप्यतः ।
लक्ष्यते येन सद्दृष्टिर्लक्षणेनाञ्चितः पुमान् ॥372॥

अर्थ: क्या सम्यग्दृष्टिके विषयमें इतना ही कथन है, या और भी है ? ऐसा कोई लक्षण है जिससे कि सम्यग्दृष्टी जाना जासके ?


अपराण्यपि लक्ष्माणि सन्ति सम्यग्दृगात्मनः ।
सम्यक्त्वेनाविनाभूतैर्यै संलक्ष्यते सुदृक् ॥373॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिके और भी बहुतसे लक्षण हैं, जो कि सम्यग्दर्शनके अविनाभावी हैं। उन्हींसे सम्यग्दृष्टी जाना जाता है। ( जो लक्षण सम्यग्दर्शनके बिना हो नहीं सक्ते वे सम्यग्दर्शनके अविनाभावी हैं।


उक्तमाक्ष्यं सुखं ज्ञानमनादेयं दृगात्मनः ।
नादेयं कर्म सर्वं च तद्वद् दृष्टोपलब्धितः ॥374॥

अर्थ: ऊपर जितना भी इन्द्रियजन्य सुख और ज्ञान बतलाया गया है, सम्यग्दृष्टिके लिये वह सभी हेय (त्याज्य) है तथा उसी प्रकार सम्पूर्ण कर्म भी त्याज्य हैं यह बात प्रत्यक्ष है।


सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्मं केवलज्ञानगोचरम् ।
गोचरं स्वावधिस्वान्तपर्ययज्ञानयोर्द्वयोः ॥375॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन वास्तवमें आत्माका अति सूक्ष्म गुण है वह केवलज्ञानका विषय है। तथा परमावधि, सर्वावधि और मनःपर्यय ज्ञानका भी विषय है अर्थात् इन्हीं तीनों ज्ञानोंसे जाना जासक्ता है।


न गोचरं मतिज्ञानश्रुतज्ञानद्वयोर्मनाक् ।
नापि देशावधेस्तत्र विषयोऽनुपलब्धितः ॥376॥

अर्थ: मतिज्ञान और श्रुतज्ञानका किञ्चित् भी वह विषय नहीं है और न देशावधिका ही विषय है। इनके द्वारा उसका बोध नहीं होता है ।


अस्त्यात्मनो गुणः कश्चित् सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् ।
तद्दृङ्मोहोदयान्मिथ्यास्वादुरूपमनादितः ॥377॥

अर्थ: आत्माका एक विलक्षण निर्विकल्पक गुण सम्यक्त्व है। वह सम्यग्दर्शन दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे अनादिकालसे मिथ्या-स्वादुरूप हो रहा है।


दैवात्कालादिसंलब्धौ प्रत्यासन्ने भवार्णवे ।
भव्यभावविपाकाद्वा जीवः सम्यक्त्वमश्नुते ॥378॥

अर्थ: दैवयोगसे ( विशेष पुण्योदयसे ) कालादि लब्धियोंके प्राप्त होने पर तथा संसारसमुद्र निकट ( थोड़ा ) रह जाने पर और भव्य भावका विपाक होनेसे यह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त होता है ।


प्रयत्नमन्तरेणापि दृङ्मोहोपशमो भवेत् ।
अन्तर्मुहूर्तमात्रं च गुणश्रेण्यनतिक्रमात् ॥379॥

अर्थ: फिर अन्तर्मुहूर्तमें ही विना किसी प्रयत्नके दर्शनमोहनीयका उपशम हो जाता है । उस अवस्थामें भी गुणश्रेणीके क्रमका उलङ्घन नहीं होता ।


अस्त्युपशमसम्यक्त्वं दृङ्मोहोपशमाद्यथा ।
पुंसोवस्थान्तराकारं नाकारं चिद्विकल्पके ॥380॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम होनेसे उपशम सम्यक्त्व होता है। वह मिथ्यात्व अवस्थासे पुरुषकी दूसरी अवस्थाविशेष है । सम्यग्दर्शन आत्माका निर्विकल्पक-निराकार गुण है उसीका स्पष्ट कथन नीचे किया जाता है -


सामान्याद्वा विशेषाद्वा सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् ।
सत्तारूपं च परिणामि प्रदेशेषु परं चितः ॥381॥

अर्थ: सामान्य रीतिसे अथवा विशेष रीतिसे सम्यक्त्व निर्विकल्पक है, सत्वरूप है और आत्माके प्रदेशोंमें परिणमन करने वाला है।


तत्रोल्लेखस्तमोनाशे तमोऽरेरिव रश्मिभिः ।
दिशः प्रसत्तिमासेदुः सर्वतो विमलाशयाः ॥382॥

अर्थ: सम्यक्त्व आत्मामें किस प्रकार निर्मलता पैदा करता है, इस विषयमें सूर्यका उल्लेख है कि जिस प्रकार सूर्यकी किरणोंसे अन्धकारका नाश होने पर सब जगह दिशायें निर्मलता धारण करती हुई प्रसन्नताको प्राप्त होती हैं।


दृङ्मोहोपशमे सम्यग्दृष्टेरुल्लेख एव सः ।
शुद्धत्वं सर्वदेशेषु त्रिधा बन्धापहारि यत् ॥383॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम होने पर सम्यग्दृष्टिका भी वही उल्लेख है अर्थात् उसका आत्मा निर्मलता धारण करता हुआ प्रसन्नताको प्राप्त होजाता है । उस आत्माके सम्पूर्ण प्रदेशोंमें शुद्धता होजाती है, और वह सम्यक्त्व तीन प्रकार ( भावकर्म, द्रव्यकर्म, नोकर्म )से होनेवाले बन्धका नाश करनेवाला है ।


यथा वा मद्यधत्तूरपाकस्यास्तंगतस्य वै ।
उल्लेखो मूर्च्छितो जन्तुरुल्लाघः स्यादमूर्च्छितः ॥384॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई आदमी मदिरा या धतूरा पी लेता है तो उसे मूर्छा आजाती है, परन्तु कुछ काल बाद उसका नशा उतर जाता है तब वह मूर्छित आदमी मूर्छा रहित नीरोग होजाता है ।


दृङ्मोहस्योदयान्मूर्छा वैचित्यं वा तथा भ्रमः ।
प्रशान्ते त्वस्य मूर्छाया नाशाज्जीवो निरामयः ॥385॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे जीवको मूर्छा रहा करती है, तथा इसका चित्त ठिकाने नहीं रहता है और हरएक पदार्थमें भ्रम रहता है, परन्तु उप मोहनीयके शान्त (उपशमित) होनेपर मूर्छाका नाश होनेसे यह जीव नीरोग होजाता है ।


श्रद्धानादिगुणा बाह्यं लक्ष्म सम्यग्दृगात्मनः ।
न सम्यक्त्वं तदेवेति सन्ति ज्ञानस्य पर्ययाः ॥386॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिके जो श्रद्धान, आदि गुण बतलाये हैं वे सब बाह्य लक्षण हैं, क्योंकि श्रद्धानादिक सम्यक्त्वरूप नहीं हैं, किन्तु वे सब ज्ञानकी पर्याय हैं ।


अपि चित्सानुभूतिस्तु ज्ञानं ज्ञानस्य पर्ययात् ।
अर्थात् ज्ञानं न सम्यक्त्वमस्ति चेद्बाह्यलक्षणम् ॥387॥

अर्थ: और भी समयसारकारने सम्यक्त्वका लक्षण आत्मानुभूतिको बतलाया है। वह लक्षण ज्ञानरूप ही पड़ता है क्योंकि आत्माका अनुभव (प्रत्यक्ष) ज्ञानकी ही पर्याय विशेष है। इसलिये ज्ञानरूप होनेसे यह भी सम्यक्त्वका लक्षण नहीं होसक्ता, यदि माना जाय तो केवली इसे बाह्य लक्षण ही कह सक्ते हैं ।


यथोल्लाघो हि दुर्लक्ष्यो लक्ष्यते स्थूललक्षणैः ।
वा मनःकायचेष्टानामुत्साहादिगुणात्मकैः ॥388॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी रोगीकी नीरोगताका जानना बहुत कठिन है, परन्तु मन और शरीरकी चेष्टाओंके उत्साहादिक स्थूल लक्षणोंसे उसकी नीरोगताका ज्ञान कर लिया जाता है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शन एक निर्विकल्पक सूक्ष्म गुण है। तथापि उपर्युक्त बाह्य लक्षणोंसे उसका ज्ञान कर लिया जाता है।


नत्वात्मानुभवः साक्षात् सम्यक्त्वं वस्तुतः स्वयम् ।
सर्वतः सर्वकालेऽस्य मिथ्यादृष्टेरसंभवात् ॥389॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि वास्तवमें आत्मानुभव ही साक्षात् सम्यक्त्व है क्योंकि आत्मानुभव मिथ्यादृष्टिके कभी कहींभी नहीं हो सक्ता । मिथ्यादृष्टिके आत्मानुभवका होना असंभव है इसलिये आत्मानुभव ही स्वयं सम्यक्त्व है ?


नैवं यतोऽनभिज्ञोसि सत्सामान्यविशेषयोः ।
अप्यनाकारसाकारलिङ्गयोस्तद्यथोच्यते ॥390॥

अर्थ: शङ्काकारसे आचार्य कहते हैं कि तुम्हारा कहना ठीक नहीं है, तुम सामान्य और विशेषमें कुछ भेद ही नहीं समझते, और न अनाकार, साकारका ही तुम्हें ज्ञान है इस लिये तुम सुनो हम कहते हैं -


आकारोर्थविकल्पः स्यादर्थः स्वपरगोचरः ।
सोपयोगो विकल्पो वा ज्ञानस्यैतद्धि लक्षणम् ॥391॥

अर्थ: आकार कहते हैं अर्थ विकल्पको । अर्थ नाम है स्वपर पदार्थका । विकल्प नाम है उपयोगावस्थाका । यह ज्ञानका लक्षण है ।


नाकारः स्यादनाकारो वस्तुतो निर्विकल्पता ।
शेषानन्तगुणानां तल्लक्षणं ज्ञानमन्तरा ॥392॥

अर्थ: आकारका स्वरूप ऊपर कह चुके है । उस आकारका न होना ही अनाकार कहलाता है । उसीका नाम वास्तवमें निर्विकल्पता है । वह निर्विकल्पता अथवा अनाकारता ज्ञानको छोड़ कर बाकी सभी अनन्तगुणोंका लक्षण है ।


नन्वस्ति वास्तवं सर्वं सत्सामान्यं विशेषवत् ।
तत्किं किञ्चिदनाकारं किञ्चित्साकारमेव तत् ॥393॥

अर्थ: सत्सामान्य और सत् विशेष दोनों ही वास्तविक हैं तो फिर कोई अनाकार है और कोई साकार है ऐसा क्यों ?


सत्यं सामान्यवज्ज्ञानमर्थाच्चास्ति विशेषवत् ।
यत्सामान्यमनाकारं साकारं यद्विशेषभाक् ॥394॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि ज्ञान दोनों ही प्रकारका होता है । सामान्य रीतिसे और विशेष रीतिसे । उन दोनोंमें जो सामान्य है वह अनाकार है और जो विशेष है वह साकार है ।


ज्ञानाद्विना गुणाः सर्वे प्रोक्ताः सल्लक्षणाङ्किताः ।
सामान्याद्वा विशेषाद्वा सत्यं नाकारमात्रकाः ॥395॥

अर्थ: ज्ञानको छोड़कर बाकीके सभी गुण सन्मात्र हैं । चाहें वे सामान्य गुण हो, चाहे विशेष गुण हों सभी आकार रहित हैं अर्थात् निर्विकल्पक हैं ।


ततो वस्तुमशक्यत्वात् निर्विकल्पस्य वस्तुनः ।
तदुल्लेखं समालेख्य ज्ञानद्वारा निरूप्यते ॥396॥

अर्थ: इस लिये जो निर्विकल्पक वस्तु है, उसका कथन ही नहीं हो सक्ता है वह वचनके अगोचर है । इस लिये उसका उल्लेख ज्ञानद्वारा किया जाता है ।


स्वापूर्वार्थद्वयोरेव ग्राहकं ज्ञानमेकशः ।
नात्र ज्ञानमपूर्वार्थो ज्ञानं ज्ञानं परः परः ॥397॥

अर्थ: निज और अनिश्चित पदार्थ, दोनोंके ही स्वरूपका ग्राहक ज्ञान है, वह दोनोंका ही एक समयमें निश्चय कराता है, परन्तु अनिश्चित पदार्थका निश्चय कराते समय ज्ञान स्वयं उस पदार्थरूप नहीं होजाता है। ज्ञान ज्ञान ही रहता है और पर पदार्थ पर ही रहता है।


स्वार्थो वै ज्ञानमात्रस्य ज्ञानमेकं गुणश्चितः ।
परार्थस्स्वार्थसम्बन्धी गुणाः शेषे सुखादयः ॥398॥

अर्थ: ज्ञान - स्वार्थ परार्थ दोनोंका निश्चय कराता है, यहां पर ज्ञानका स्वार्थ तो क्या है, और परार्थ क्या है ? इसे ही बतलाते हैं - अपने स्वरूप जो पदार्थ है वही स्वार्थ है । अपने स्वरूप पदार्थ ज्ञानका ज्ञान ही है । आत्माका ज्ञान रूप जो गुण है वही ज्ञान गुण, ज्ञानका स्वार्थ है । बाकी सब परार्थ हैं । पर स्वरूप जो पदार्थ है वह परार्थ है । पर स्वरूप पदार्थ ज्ञानसे पर ही होगा । परन्तु परार्थ भी स्वार्थ - ज्ञानसे सम्बन्ध रखने वाला है । इसलिये आत्मामें जितने भी सुखादिक अनन्त गुण हैं सभी ज्ञानके परार्थ हैं, परन्तु वे सब ज्ञानसे सम्बन्ध अवश्य रखते हैं ।


तद्यथा सुखदुःखादिभावो जीवगुणः स्वयम् ।
ज्ञानं तद्वेदकं नूनं नार्थाज्ज्ञानं सुखादिमत् ॥399॥

अर्थ: सुख दुःखादि भाव, जीवके ही गुण हैं, ज्ञान उन सबका जाननेवाला है। परन्तु वह सुखादि रूप स्वयं नहीं है।


सम्यक्त्वं वस्तुतः सूक्ष्ममस्ति वाचामगोचरम् ।
तस्माद्वक्तुं च श्रोतुं च नाधिकारी विधिक्रमात् ॥400॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन वास्तवमें आत्माका सूक्ष्म गुण है, वह वचनोंके गोचर नहीं है अर्थात् वचनों द्वारा हम उसे नहीं कह सक्ते । इसलिये उसके कहने सुननेके लिये विधिक्रमसे कोई अधिकारी नहीं होसक्ता ।

उत्तरार्द्ध 401 से 500 (श्लोक 401 से 500)

प्रसिद्धं ज्ञानमेवैकं साधनादिविधौ चितः ।
स्वानुभूत्येकहेतुश्च तस्मात्तत्परमं पदम् ॥401॥

अर्थ: वस आत्माका एक ज्ञान गुण ही प्रसिद्ध है जो कि हरएक पदार्थकी सिद्धि कराता है । सम्यग्दर्शनके जाननेके लिये स्वानुभूति ही एक हेतु है, इसलिये वही सर्वोत्कृष्ट वस्तु है ।


तत्राप्यात्मानुभूतिः सा विशिष्टं ज्ञानमात्मनः ।
सम्यक्त्वेनाविनाभूतमन्वयाद्व्यतिरेकतः ॥402॥

अर्थ: वह आत्मानुभूति आत्माका ज्ञानविशेष है, और वह ज्ञानविशेष, सम्यग्दर्शनके साथ अन्वय और व्यतिरेक दोनोंसे अविनाभाव रखता है ।


ततोऽस्ति योग्यता वक्तुं व्याप्तेः सद्भावतस्तयोः ।
सम्यक्त्वं स्वानुभूतिः स्यात्सा चेच्छुद्धनयात्मिका ॥403॥

अर्थ: सम्यक्त्व और स्वानुभूतिकी जब साथ २ व्याप्ति ( सहभावीपना ) है तो फिर सम्यग्दर्शन भी रूपान्तरसे कहने योग्य हो जाता है । यह कहा जा सक्ता है कि स्वानुभूति ही सम्यक्त्व है, परन्तु वह स्वानुभूति शुद्ध नय स्वरूप हो तो ।


किञ्चास्ति विषमव्याप्तिः सम्यक्त्वानुभवद्वयोः ।
नोपयोगे समव्याप्तिरस्ति लब्धिविधौ तु सा ॥404॥

अर्थ: विशेष इतना है कि सम्यग्दर्शन और स्वानुभव इन दोनोंमें विषम व्याप्ति है क्योंकि उपयोगावस्थामें समव्याप्ति नहीं हो सक्ती । परन्तु लब्धि रूप ज्ञानके साथ तो सम्यक्त्वकी समव्याप्ति है ।


तद्यथा स्वानुभूतौ वा तत्काले वा तदात्मनि ।
अस्त्यवश्यं हि सम्यक्त्वं यस्मात्सा न विनापि तत् ॥405॥

अर्थ: जिस आत्मामें जिस कालमें स्वानुभूति है, उस आत्मामें उस समय अवश्य ही सम्यक्त्व है क्योंकि बिना सम्यक्त्वके स्वानुभूति हो नहीं सक्ती।


यदि वा सति सम्यक्त्वे स स्याद्वा नोपयोगवान् ।
शुद्धस्यानुभवस्तत्र लब्धिरूपोस्ति वस्तुतः ॥406॥

अर्थ: अथवा सम्यग्दर्शनके होनेपर शुद्धात्माका उपयोगात्मक अनुभव हो भी, और नहीं भी हो। परन्तु सम्यक्त्वके होनेपर स्वानुभवाऽऽवरण कर्म ( मतिज्ञानावरण )का क्षयोपशम रूप ( लब्धि ) ज्ञान अवश्य है।


हेतुस्तत्रापि सम्यक्त्वोत्पत्तिकालेस्त्यवश्यतः ।
तज्ज्ञानावरणस्योच्चैरस्त्यवस्थान्तरं स्वतः ॥407॥

अर्थ: सम्यक्त्वके होनेपर लब्धि रूप स्वानुभूति अवश्य होजाती है ऐसा होनेमें कारण भी यही है कि जिस समय सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है, उसी समय स्वानुभूत्यावरण कर्म ( मतिज्ञानावरण विशेष )की अवस्था पलट जाती है अर्थात् क्षयोपशम होजाता है।


यस्माज्ज्ञानमनित्यं स्याच्छद्मस्थस्योपयोगवत् ।
नित्यं ज्ञानमछद्मस्थे छद्मस्थस्य च लब्धिमत् ॥408॥

अर्थ: छद्मस्थ ( अल्पज्ञ ) पुरुषका उपयोग एकसा नहीं रहता, कभी किसी पदार्थ विषयक होता है और कभी किसी पदार्थ विषयक होता है, तथा कभी कभी निद्रादि अवस्थाओंमें अनुपयोगी ज्ञान भी रहता है। इसलिये छद्मस्थोंका उपयोगात्मक ज्ञान अनित्य होता है। परन्तु सर्वज्ञका उपयोगात्मक ज्ञान सदा नित्य रहता है। छद्मस्थोंका क्षयोपशम ( लब्धि ) रूप ज्ञान नित्य रहता है।


नित्यं सामान्यमात्रत्वात् सम्यक्त्वं निर्विशेषतः ।
तत्सिद्धा विषमव्याप्तिः सम्यक्त्वानुभवद्वयोः ॥409॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन भी सामान्यरीतिसे नित्य ही है इसलिये सम्यक्त्व और अनुभव दोनोंमें विषम व्याप्ति है ।


अपि सन्ति गुणाः सम्यक् श्रद्धानादि विकल्पकाः ।
उद्देशो लक्षणं तेषां तत्परीक्षाधुनोच्यते ॥410॥

अर्थ: स्वानुभूतिके साथ२ होनेवाले सम्यक्श्रद्धान आदि और भी बहुतसे गुण हैं। ग्रन्थकार कहते हैं, कि अब उनका उद्देश्य, लक्षण, परीक्षा बतलाते हैं।


तत्रोद्देशो यथा नाम श्रद्धारुचिप्रतीतयः ।
चरणं च यथाम्नायमर्थात्तत्वार्थगोचरम् ॥411॥

अर्थ: आम्नाय ( शास्त्र - पद्धति )के अनुसार अर्थात् जीवादि तत्त्वोंके विषयमें श्रद्धा करना, रुचि करना, प्रतीति करना, आचरण करना, यह सब कथन उद्देश्य कहलाता है।


तत्त्वार्थाभिमुखी बुद्धिः श्रद्धा सात्म्यं रुचिस्तथा ।
प्रतीतिस्तु तथेति स्यात्स्वीकारश्चरणं क्रिया ॥412॥

अर्थ: तत्त्वार्थ ( जीवादि तत्त्व )के सन्मुख बुद्धिका होना अर्थात् तत्त्वार्थके जाननेके लिये उद्यत बुद्धिका होना श्रद्धा कहलाती है । और तत्त्वार्थमें आत्मीक भावका होना रुचि कहलाती है । “वह उसी प्रकार है” ऐसा स्वीकार करना प्रतीति कहलाती है और उसके अनुकूल क्रिया करना चरण - आचरण कहलाता है ।


अर्थादाद्यत्रिकं ज्ञानं ज्ञानस्यैवात्र पर्ययात् ।
चरणं वाक्कायचेतोभिर्व्यापारः शुभकर्मसु ॥413॥

अर्थ: श्रद्धा, रुचि, प्रतीति, ये तीनों ही ज्ञान स्वरूप हैं क्योंकि तीनों ही ज्ञानकी पर्याय हैं। तथा आचरण-चारित्र-मन, वचन, कायका शुभ कार्योंमें होनेवाला व्यापार है।


व्यस्ताश्चैते समस्ता वा सद्दृष्टेर्लक्षणं न वा ।
सपक्षे वा विपक्षे वा सन्ति यद्वा न सन्ति वा ॥414॥

अर्थ: श्रद्धा, रुचि आदि चारों ही सम्यग्दृष्टिके लक्षण हो भी सक्ते हैं और नहीं भी होसक्ते । यदि ये सम्यग्दृष्टिके लक्षण हों तो भिन्न भिन्न अवस्थामें भी होसक्ते हैं, और समुदाय अवस्थामें भी होसक्ते हैं । चाहे ये सम्यग्दृष्टिके सपक्षमें हों चाहे विपक्षमें हों, अर्थात् सम्यग्दर्शनके साथ२ हों अथवा मिथ्या दर्शनके साथ२ हों कुछ नियम नहीं है । अथवा श्रद्धादिक सम्यग्दृष्टिके हों या न भी हों, ऐसा भी कुछ नियम नहीं है ।


स्वानुभूतिंसनाथाश्चेत् सन्ति श्रद्धादयो गुणाः ।
स्वानुभूतिं विनाऽऽभासा नार्थाच्छ्रद्धादयो गुणाः ॥415॥

अर्थ: यदि श्रद्धादिक गुण स्वानुभूतिके साथ हों तो वे गुण ( सम्यग्दर्शनके लक्षण ) समझे जाते हैं और विना स्वानुभूतिके गुणाभास समझे जाते हैं । अर्थात् स्वानुभूतिके अभावमें श्रद्धाआदिक गुण नहीं समझे जाते ।


तत्स्याच्छ्रद्धादयः सर्वे सम्यक्त्वं स्वानुभूतिमत् ।
न सम्यक्त्वं तदाभासा मिथ्याश्रद्धादिवत् स्वतः ॥416॥

अर्थ: इसलिये ऊपर कहनेका यही सारांश है कि श्रद्धा आदिक चारों ही यदि स्वानुभूतिके साथ हों तो वे ही श्रद्धा आदिक सम्यग्दर्शन समझे जाते हैं और यदि श्रद्धा आदि मिथ्यारूप हों - मिथ्या श्रद्धा आदि हों तो सम्यक्त्व नहीं समझे जाते किन्तु श्रद्धाभास और रुच्याभास आदि समझे जाते हैं ।


सम्यङ्मिथ्याविशेषाभ्यां विना श्रद्धादिमात्रकाः ।
सपक्षवद्विपक्षेपि वृत्तित्वाद्व्यभिचारिणः ॥417॥

अर्थ: जो श्रद्धा आदि न तो सम्यक् विशेषण रखते हों, और न मिथ्या विशेषण ही रखते हों तो वे सपक्षकी तरह विपक्षमें भी रह सक्ते हैं, इसलिये व्यभिचारी हैं ।


अर्थाच्छ्रद्धादयः सम्यग्दृष्टिः श्रद्धादयो यतः ।
मिथ्या श्रद्धादयो मिथ्या नार्थाच्छ्रद्धादयो यतः ॥418॥

अर्थ: अर्थात् श्रद्धादिक यदि सम्यक् ( यथार्थ ) हों तब तो वे श्रद्धादिक कहलाते हैं परन्तु यदि श्रद्धादिक मिथ्या ( अयथार्थ ) हों तब वे श्रद्धादिक नहीं कहे जाते किन्तु मिथ्या समझे जाते हैं ।


ननु तत्त्वरुचिः श्रद्धा श्रद्धामात्रैकलक्षणात् ।
सम्यङ् मिथ्याविशेषाभ्यां सा द्विधा तत्कुतोर्थतः ॥419॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि तत्त्वरुचिका नाम ही श्रद्धा है क्योंकि श्रद्धाका लक्षण श्रद्धामात्र ही है । फिर वह श्रद्धा, सम्यक् श्रद्धा और मिथ्या श्रद्धा ऐसे दो भेद वाली वास्तवमें कैसे हो जाती है ?


नैवं यतः समव्याप्तिः श्रद्धा स्वानुभवद्वयोः ।
नूनं नानुपलब्धेर्थे श्रद्धा खरविषाणवत् ॥420॥

अर्थ: शङ्काकारका उक्त कथन ठीक नहीं है, क्योंकि श्रद्धा और स्वानुभूति, इन दोनोंमें समव्याप्ति है । अर्थात् दोनों ही साथ होनेवाली हैं इसलिये अनुपलब्ध पदार्थमें गधेके सींगकी तरह श्रद्धा निश्चयसे नहीं होसक्ती ।


विना स्वार्थानुभूतिं तु या श्रद्धा श्रुतमात्रतः ।
तत्त्वार्थानुगताप्यर्थाच्छ्रद्धा नानुपलब्धितः ॥421॥

अर्थ: बिना स्वार्थानुभवके जो श्रद्धा केवल सुननेसे अथवा शास्त्रज्ञानसे ही है वह तत्त्वार्थके अनुकूल होने पर भी पदार्थकी उपलब्धि न होनेसे श्रद्धा नहीं कहलाती ।


लब्धिः स्यादविशेषाद्वा सदसतोरुन्मत्तवत् ।
नोपलब्धिरिहार्थात्सा तच्छेषानुपलब्धिवत् ॥422॥

अर्थ: उन्मत्त पुरुषकी तरह सत् पदार्थ और असत् पदार्थ ( यथार्थ अयथार्थ )में सामान्य रीतिसे होनेवाली लब्धि वास्तवमें उपलब्धि ( प्राप्ति ) नहीं है । किन्तु अनुपलब्धिकी तरह ( ठीक पदार्थको विषय न करनेसे ) वह भी अनुपलब्धि ही है ।


ततोऽस्ति यौगिकी रूढिः श्रद्धा सम्यक्त्वलक्षणम् ।
अर्थादप्यविरुद्धं स्यात्सूक्तं स्वात्मानुभूतिवत् ॥423॥

अर्थ: इसलिये यौगिक रीतिसे भी श्रद्धा सम्यक्त्वका लक्षण है और रूढिसे भी सम्यक्त्वका लक्षण है। पहलेका यह कथन कि जो स्वानुभूति सहित है वही श्रद्धा कहलाती है, सर्वथा ठीक और अविरोधी है।


गुणाश्चान्ये प्रसिद्धा ये सद्दृष्टेः प्रशमादयः ।
बहिर्दृष्ट्या यथास्वं ते सन्ति सम्यक्त्वलक्षणाः ॥424॥

अर्थ: और भी प्रशमादिक जो सम्यग्दृष्टिके प्रसिद्ध गुण हैं, वे सब बाह्य दृष्टिसे ही सम्यक्त्वके लक्षण हैं। यदि वे सम्यग्दर्शनके अविनाभावी हैं तो लक्षण हैं, अन्यथा नहीं।


तत्राद्यः प्रशमो नाम संवेगश्च गुणक्रमात् ।
अनुकम्पा तथास्तिक्यं वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥425॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिका पहला गुण प्रशम है दूसरा संवेग है, तीसरा अनुकम्पा है और चौथा आस्तिक्य है । इन चारोंका क्रमसे लक्षण कहते हैं ।


प्रशमो विषयेषूच्चैर्भावक्रोधादिकेषु च ।
लोकासंख्यातमात्रेषु स्वरूपाच्छिथिलं मनः ॥426॥

अर्थ: पञ्चेन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंमें और असंख्यात लोक प्रमाण क्रोधादिक भावोंमें स्वभावसे ही मनकी शिथिलताका होना प्रशम ( शान्ति ) कहलाता है


सद्यः कृताऽपराधेषु यद्वा जीवेषु जातुचित् ।
तद्वाधादि विकाराय न बुद्धिः प्रशमो मतः ॥427॥

अर्थ: जिन जीवोंने अपने साथमें कोई नवीन अपराध किया हो उन जीवोंके विषयमें कभी भी मारने आदि विकारकी बुद्धिका न होना भी प्रशम है।


हेतुस्तत्रोदयाभावः स्यादनन्तानुबन्धिनाम् ।
अपि शेषकषायाणां नूनं मन्दोदयोंशतः ॥428॥

अर्थ: अपराधी जीवों पर भी क्षमाभाव करनेकी बुद्धि क्यों होती हैं ? इसका कारण अक्तानुबन्धि कषायका उदय न होना और अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण कषायोंका कुछ मन्दोदय होना ही है ।


आरम्भादि क्रिया तस्य दैवाद्वा स्यादकामतः ।
अन्तः शुद्धेः प्रसिद्धत्वान्न हेतुः प्रशमक्षतेः ॥429॥

अर्थ: दैवयोगसे (चारित्र मोहनीयके उदयसे) यद्वि सम्यग्दृष्टी विना इच्छाके आरम्भ आदि क्रिया भी करै तो भी अन्तरंगमें शुद्धता होनेसे वह क्रिया उसके प्रशम गुणके नाशका कारण नहीं हो सक्ती ।


सम्यक्त्वेनाविनाभूतः प्रशमः परमो गुणः ।
अन्यत्र प्रशमम्मन्योऽप्याभासः स्यात्तदत्ययात् ॥430॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनके साथ यदि प्रशम हो तब तो वह उत्कृष्ट गुण समझा जाता है और यदि सम्यग्दर्शनके विना ही प्रशम हो, तो वह प्रशम नहीं है, किन्तु प्रशामाऽऽभास और प्रशम मानना मात्र है । सम्यग्दर्शनके अभावमें प्रशम गुण कभी नहीं कहलाता ।


संवेगः परमोत्साहो धर्मे धर्मफले चितः ।
सधर्मेष्वनुरागो वा प्रीतिर्वा परमेष्ठिषु ॥431॥

अर्थ: आत्माके धर्म और धर्मके फलमें पूरा उत्साह होना संवेग कहलाता है। अथवा समान धर्मियोंमें अनुराग करना अथवा पांचों परमेष्ठियोंमें प्रेम करना भी संवेग कहलाता है।


धर्मः सम्यक्त्वमात्रात्मा शुद्धस्यानुभवोऽथवा ।
तत्फलं सुखमत्यक्षमक्षयं क्षायिकं च यत् ॥432॥

अर्थ: सम्यक्त्वस्वरूप - आत्मा ही धर्म कहलाता है अथवा शुद्धात्माका अनुभव होना ही धर्म है और अतीन्द्रिय, अविनाशी क्षायिक सुख ही धर्मका फल कहलाता है।


इतरत्र पुना रागस्तद्गुणेष्वनुरागतः ।
नातद्गुणेऽनुरागोपि तत्फलस्याप्यलिप्सया ॥433॥

अर्थ: समान धर्मियोंमें जो प्रेम बतलाया है वह केवल उनके गुणोंमें अनुरागबुद्धिसे होना चाहिये । जिनमें गुण नहीं है, उनमें फलकी इच्छा न रखते हुए भी अनुराग नहीं होना चाहिये ।


अत्रानुरागशब्देन नाभिलाषो निरुच्यते ।
किन्तु शेषमधर्माद्वा निवृत्तिस्तत्फलादपि ॥434॥

अर्थ: यहां पर अनुराग शब्दसे अभिलाषा अर्थ नहीं लेना चाहिये किन्तु दूसरा ही अर्थ लेना चाहिये अर्थात् गुणप्रेम अनुराग शब्दका अर्थ है अथवा अधर्म और अधर्मके फलसे निवृत्ति होना भी अनुराग शब्दका अर्थ है ।


अथानुरागशब्दस्य विधिर्वाच्यो यदार्थतः ।
प्राप्तिः स्यादुपलब्धिर्वा शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥435॥

अर्थ: जिस समय अनुराग शब्दका विधिरूप अर्थ करना हो, तब प्राप्ति, उपलब्धि ये सब शब्द एक ही अर्थके वाचक होते हैं ।


नचाऽऽशङ्क्यं निषिद्धः स्यादभिलाषो भोगेष्वलम् ।
शुद्धोपलब्धिमात्रेपि हि यो भोगाभिलाषवान् ॥436॥

अर्थ: ऐसी आशङ्का नहीं करना चाहिये कि अभिलाषाका निषेध केवल भोगोंके विषयमें ही कहागया है । शुद्धोपलब्धि होने पर भी जो भोगोंमें अभिलाषा रखता हो उसीकी अभिलाषाका निषेध किया गया है, ऐसा भी नहीं समझना चाहिये ।


अर्थात्सर्वोभिलाषः स्यादज्ञानं दृग्विपर्ययात् ।
न्यायादलब्धतत्त्वार्थो लब्धुं कामो न लब्धिमान् ॥437॥

अर्थ: सभी अभिलाषायें अज्ञानरूप (बुरी) हैं क्योंकि सभी मिथ्यात्वसे होती हैं। न्यायसे यह बात सिद्ध है कि जिसने तत्त्वार्थको नहीं जाना है उसे चाहनेकी इच्छा होने पर भी पदार्थ नहीं मिलता है।


मिथ्या सर्वोभिलाषः स्यान्मिथ्याकर्मोदयात्परम् ।
स्वार्थसार्थक्रियासिद्धौ नालं प्रत्यक्षतो यतः ॥438॥

अर्थ: सम्पूर्ण अभिलाषायें मिथ्या हैं। क्योंकि सभी मिथ्यात्वकर्मके उदयसे होनेवाली हैं। तथा कोई भी अभिलाषा अपने अभीष्ट क्रियाकी सिद्धि करानेमें समर्थ नहीं है क्योंकि यह बात प्रत्यक्ष है।


कचित्तस्यापि सद्भावे नेष्टसिद्धिरहेतुतः ।
अभिलाषस्याप्यसद्भावे स्वेष्टसिद्धिश्च हेतुतः ॥439॥

अर्थ: कहीं पर अभिलाषाके होने पर भी बिना कारण इष्ट सिद्धि नहीं होती है । और कहीं पर अभिलाषाके न होने पर भी, कारण मिलने पर अपने अभीष्टकी सिद्धि होजाती है ।


यशःश्रीसुतमित्रादि सर्वं कामयते जगत् ।
नास्य लाभोऽभिलाषेपि विना पुण्योदयात्सतः ॥440॥

अर्थ: यश, लक्ष्मी, पुत्र, मित्र आदिकको सभी जगत् चाहता है परन्तु उसकी अभिलाषा होमे पर भी बिना पुण्योदयके कोई वस्तु नहीं मिल सक्ती।


जरामृत्युदरिद्रादि नहि कामयते जगत् ।
तत्संयोगो वलादस्ति सतस्तत्राऽशुभोदयात् ॥441॥

अर्थ: बुढ़ापा, मृत्यु, दरिद्रता आदिको कोई भी आदमी नहीं चाहता है परन्तु बिना चाहने पर भी अशुभ कर्मके उदयसे बुढ़ापा आदिका संयोग अवश्य हो ही जाता है।


संवेगो विधिरूपः स्यान्निषेधश्च निषेधनात् ।
स्याद्विवक्षावशाद्द्वैतं नार्थादर्थान्तरं तयोः ॥442॥

अर्थ: संवेग कहीं विधिरूप भी होता है और निषेध करनेसे निषेधरूप भी होता है। जैसी विवक्षा ( वक्ताके कहनेकी इच्छा ) होती है, वैसा ही विधि या निषेधरूप अर्थ ले लिया जाता है। विधि और निषेध, दोनोंमें भेद नहीं है, दोनोंका प्रयोजन एक ही है।


त्यागः सर्वाभिलाषस्य निर्वेदो लक्षणात्तथा ।
स संवेगोथवा धर्मः साभिलाषो न धर्मवान् ॥443॥

अर्थ: सम्पूर्ण अभिलाषाओंका त्याग करना अथवा वैराग्य ( संसारसे ) धारण करना संवेग है और उसीका नाम धर्म है। क्योंकि जिसके अभिलाषा पाई जाती है वह धर्मधारी कभी नहीं होसक्ता।


नापि धर्मः क्रियामात्रं मिथ्यादृष्टेरिहार्थतः ।
नित्यं रागादिसद्भावात् प्रत्युताऽधर्म एव सः ॥444॥

अर्थ: क्रियामात्रको धर्म नहीं कहते हैं। मिथ्यादृष्टि पुरुषके सदा रागादिभावोंका सद्भाव होनेसे उसकी क्रियाको वास्तवमें अधर्म ही कहना चाहिये।


नित्यं रागी कुदृष्टिः स्यान्न स्यात्क्वचिदरागवान् ।
अस्तरागोऽस्ति सद्दृष्टिर्नित्यं वा स्यान्न रागवान् ॥445॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि पुरुष सदा रागी है, वह कहीं भी राग रहित नहीं होता परन्तु सम्यग्दृष्टिका राग नष्ट होजाता है। वह रागी नहीं है, किन्तु वैरागी है।


अनुकम्पा क्रिया ज्ञेया सर्वसत्त्वेष्वनुग्रहः ।
मैत्रीभावोऽथ माध्यस्थं नैःशल्यं वैरवर्जनात् ॥446॥

अर्थ: सम्पूर्ण प्राणियोंमें उपकार बुद्धि रखना अनुकम्पा ( दया ) कहलाती है अथवा सम्पूर्ण जीवोंमें मैत्री भाव रखना भी अनुकम्पा है । अथवा द्वेषबुद्धिको छोड़कर मध्यमवृत्ति धारण करना भी अनुकम्पा है । अथवा शत्रुता छोड देनेसे सम्पूर्ण जीवोंमें शल्य रहित (निष्कषाय) हो जाना भी अनुकम्पा है ।


दृङ्मोहानुदयस्तत्र हेतुर्वाच्योऽस्ति केवलम् ।
मिथ्याज्ञानं विना न स्याद्वैरभावः क्वचिद्यतः ॥447॥

अर्थ: सम्पूर्ण जीवोंमें दयारूप परिणाम होनेमें कारण केवल दर्शनमोहनीय कर्मके उदयका न होना ही है। क्योंकि मिथ्या ज्ञानको छोड़कर कहीं भी वैरभाव नहीं होसक्ता है।


मिथ्या यत्परतः स्वस्य स्वस्माद्वा परजन्मिनाम् ।
इच्छेत्तत्सुखदुःखादि मृत्युर्वा जीवितं मनाक् ॥448॥

अर्थ: दूसरे जीवोंमें सुखदुःखादिक अथवा जीना मरना देख कर, उनसे अपनेमें उन बातोंकी चाहना करना अथवा अपनेमें इन बातोंको होती हुई देख कर, अपनेसे पर पुरुषोंके लिये इच्छा करना, यह सब मिथ्या है ।


अस्ति यस्यैतदज्ञानं मिथ्यादृष्टिः स शल्यवान् ।
अज्ञानाद्धन्तुकामोपि क्षमो हन्तुं न चाऽपरम् ॥449॥

अर्थ: जिस पुरुषके ऊपर कहा हुआ अज्ञान है, वही मिथ्यादृष्टि है और वही शल्यवाला है । अज्ञानसे वह दूसरेको मारना चाहता है, परन्तु वह उसे मारनेमें समर्थ नहीं है ।


समता सर्वभूतेषु यानुकम्पा परत्र सा ।
अर्थतः स्वानुकम्पा स्याच्छल्यवच्छल्य वर्जनात् ॥450॥

अर्थ: अनुकम्पा दो प्रकारकी है । एक पराऽनुकम्पा, दूसरी स्वानुकम्पा । समग्र जीवोंमें समताभाव धारण करना परमें अनुकम्पा कहलाती है और काँटेकी तरह चुभनेवाली शल्यका त्याग करदेना स्वाऽनुकम्पा कहलाती है । वास्तवमें स्वानुकम्पा ही प्रधान है ।


रागाद्यशुद्धभावानां सद्भावे बन्ध एव हि ।
न बन्धस्तदसद्भावे तद्विधेया कृपाऽऽत्मनि ॥451॥

अर्थ: रागादिक अशुद्ध भावोंके रहते हुए बन्ध ही निश्चयसे होता है और उनके नहीं होने पर बन्ध नहीं होता । इसकिये ( जिससे वैर भावका कारण बन्ध ही न होवे ) ऐसी कृपा आत्मामें अवश्य करनी चाहिये ।


आस्तिक्यं तत्त्वसद्भावे स्वतः सिद्धे विनिश्चितिः ।
धर्मे हेतौ च धर्मस्य फले चाऽऽत्मादि धर्मवत् ॥452॥

अर्थ: स्वतःसिद्ध ( अपने आप सिद्ध ) तत्त्वोंके सद्भावमें, धर्ममें, धर्मके कारणमें, धर्मके फलमें, निश्चयबुद्धि विश्वासबुद्धि रखना, इसीका नाम आस्तिक्य है। जिस प्रकार आत्मा आदि पदार्थोंके धर्म हैं उसी प्रकार उनमें यथार्थ विश्वस्तबुद्धि रखना ही आस्तिक्य है।


अस्त्यात्मा जीवसंज्ञो यः स्वतः सिद्धोप्यमूर्तिमान् ।
चेतनः स्यादजीवस्तु यावानप्यस्त्यचेतनः ॥453॥

अर्थ: जिसकी जीव संज्ञा है वही आत्मा है, आत्मा स्वतःसिद्ध है अमूर्त है और चेतन है तथा जितना भी अजीव है वह सब अचेतन है।


अस्त्यात्माऽनादितो बद्धः कर्मभिः कार्मणात्मकैः ।
कर्ता भोक्ता च तेषां हि तत्क्षयान्मोक्षभाग्भवेत् ॥454॥

अर्थ: कार्माणवर्गणासे बने हुए कर्मोंसे यह आत्मा अनादिकालसे बँधा हुआ है और उन्हीं कर्मोंका कर्ता है तथा उन्हींका भोक्ता है और उन्हीं कर्मोंके क्षय होनेसे मोक्षका अधिकारी हो जाता है।


अस्ति पुण्यं च पापं च तद्धेतुस्तत्फलं च वै ।
आस्रवाद्यास्तथा सन्ति तस्य संसारिणोऽनिशम् ॥455॥

अर्थ: उस संसारी जीवके उन कर्मोंके निमित्तसे निरन्तर पुण्य और पाप तथा उनका फल होता रहता है । उसी प्रकार आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा भी होते हैं ।


अप्येवं पर्ययादेशाद्बन्धो मोक्षश्च तत्फलम् ।
अथ शुद्धनयादेशाच्छुद्धः सर्वोपि सर्वदा ॥456॥

अर्थ: यह आत्मा पर्यायदृष्टिसे बंधा हुआ है और उसी पर्यायदृष्टिसे मुक्त भी होता है, तथा उनके फलोंका भोक्ता भी है, परन्तु शुद्ध द्रव्यार्थिक दृष्टिसे सभी आत्माएं सदा शुद्ध हैं अर्थात् न बन्ध है और न मोक्ष है।


तत्रायं जीवसंज्ञो यः स्वसंवेद्यश्चिदात्मकः ।
सोहमन्ये तु रागाद्या हेयाः पौद्गलिका अमी ॥457॥

अर्थ: जो यह जीवसंज्ञाधारी आत्मा है वह स्वसंवेद्य ( अपने आपको आप ही जाननेवाला) है, ज्ञानवान् है और वही " सोहं " है अर्थात् उसी ज्ञानधारी जीवात्मामें “वह मैं हूँ” ऐसी बुद्धि होती है । बाकी जितने भी रागादिक पुद्गल हैं वे सभी त्यागने योग्य हैं ।


इत्याद्यनादिजीवादि वस्तुजातं यतोऽखिलम् ।
निश्चयव्यवहाराभ्यां आस्तिक्यं तत्तथामतिः ॥458॥

अर्थ: इस प्रकार अनादि कालसे चला आया जितना भी जीवादिक वस्तु समूह है, सभी निश्चय और व्यवहारसे भिन्न भिन्न स्वरूपको लिये हुए है। उसमें वैसी ही बुद्धि रखना जैसा कि वह है, इसीका नाम आस्तिक्य है।


सम्यक्त्वेनाविनाभूतस्वानुभूत्यैकलक्षणम् ।
आस्तिक्यं नाम सम्यक्त्वं मिथ्यास्तिक्यं ततोऽन्यथा ॥459॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनकी अविनाभाविनी स्वानुभूतिके साथ होनेवाला जो आस्तिक्य है वही सम्यक् आस्तिक्य है अथवा सम्यक्त्व है। उससे विपरीत ( स्वानुभूतिके अभावमें होनेवाला ) जो आस्तिक्य है वह मिथ्या - आस्तिक्य है अथवा मिथ्यात्त्व है।


ननु वै केवलज्ञानमेकं प्रत्यक्षमर्थतः ।
न प्रत्यक्षं कदाचित्तच्छेषज्ञानचतुष्टयम् ॥460॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि वास्तवमें एक केवलज्ञान ही प्रत्यक्ष है बाकीके चारों ही ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं हैं। वे सदा परोक्ष ही रहते है ? अथवा इन्द्रियजन्य ज्ञान भी यदि एक देश प्रत्यक्ष है, जिस प्रकार कि सुखका मानसिक प्रत्यक्ष होता है। तो वास्तवमें आस्तिक्य स्वसंवेदन प्रत्यक्ष कैसे हो सक्ता है ?


यदि वा देशतोऽध्यक्षमाक्ष्यं स्वात्मसुखादिवत् ।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षमास्तिक्यं तत्कुतोर्थतः ॥461॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि वास्तवमें एक केवलज्ञान ही प्रत्यक्ष है बाकीके चारों ही ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं हैं । वे सदा परोक्ष ही रहते है ? अथवा इन्द्रियजन्य ज्ञान भी यदि एक देश प्रत्यक्ष है, जिस प्रकार कि सुखका मानसिक प्रत्यक्ष होता है । तो वास्तवमें आस्तिक्य स्वसंवेदन प्रत्यक्ष कैसे हो सक्ता है ?


सत्यमाद्यद्वयं ज्ञानं परोक्षं परसंविदि ।
प्रत्यक्षं स्वानुभूतौ तु दृङ्मोहोपशमादितः ॥462॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि आदिके दोनों ज्ञान ( मति - श्रुत ) परोक्ष हैं परन्तु वे पर - पदार्थका ज्ञान करनेमें ही परोक्ष हैं, स्वात्मानुभव करनेमें वे भी प्रत्यक्ष हैं। क्योंकि स्वात्मानुभव दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम, क्षय, क्षयोपशमसे होता है। दर्शनमोहनीय कर्म ही स्वानुभूतिके प्रत्यक्ष होनेमें बाधक है और उसका अभाव ही साधक है।


स्वात्मानुभूतिमात्रं स्यादास्तिक्यं परमो गुणः ।
भवेन्मा वा परद्रव्ये ज्ञानमात्रं परत्वतः ॥463॥

अर्थ: स्वात्मानुभव स्वरूप जो आस्तिक्य है वही परम गुण है। वह आस्तिक्य पर द्रव्यमें हो, चाहे न हो। पर पदार्थ, पर है, इसलिये उसका प्रत्यक्ष न होकर केवल, ज्ञानमात्र ही होता है।


अपि तत्र परोक्षत्वे जीवादौ परवस्तुनि ।
गाढं प्रतीतिरस्याऽस्ति यथा सम्यग्दृगात्मनः ॥464॥

अर्थ: यद्यपि स्वानुभव - आस्तिक्यवाले पुरुषके जीवादिक पर पदार्थ परोक्ष हैं। तथापि उसके उन पदार्थोंमें गाढ़ प्रतीति है। जिस प्रकार - सम्यग्दृष्टिकी अपनी आत्मामें गाढ़ प्रतीति है, उसी प्रकार अन्य परोक्ष पदार्थोंमें भी गाढ़ प्रतीति है।


न तथास्ति प्रतीतिर्वा चास्ति मिथ्यादृशः स्फुटम् ।
दृङ्मोहस्योदयात्तत्र भ्रान्तेर्दृङ्मोहतोऽनिशम् ॥465॥

अर्थ: परन्तु वैसी प्रतीति मिथ्यादृष्टिके कभी नहीं होती। क्योंकि उसके दर्शनमोहनीयका उदय है। दर्शनमोहनीयके निमित्तसे निरन्तर मिथ्यादृष्टिको पदार्थोंमें भ्रम-बुद्धि रहा करती है।


ततः सिद्धमिदं सम्यक् युक्तिस्वानुभवागमात् ।
सम्यक्त्वेनाऽविनाभूतमस्त्यास्तिक्यं गुणो महान् ॥466॥

अर्थ: इसलिये यह वात - युक्ति, स्वानुभव और आगमसे भली भांति सिद्ध होचुकी कि सम्यग्दर्शनके साथ होनेवाला जो आस्तिक्य है वही महान् गुण है ।


उक्तगाथार्थसूत्रेपि प्रशमादिचतुष्टयम् ।
नातिरिक्तं यतोस्त्यत्र लक्षणस्योपलक्षणम् ॥467॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए गाथा-सूत्रमें भी प्रशम, संवेगादिक चारों ही आगये हैं। ये सभी पञ्चाध्यायीमें कहे हुए प्रशमादिक चारोंसे भिन्न नहीं हैं। किन्तु कोई लक्षण रूपसे कहे गये हैं, और कोई उपलक्षण ( लक्षणका लक्षण ) रूपसे कहे गये हैं अर्थात् ग्रन्थान्तरमें और इस कथनमें कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही वातको कहने वाले हैं।


अस्त्युपलक्षणं यत्तल्लक्षणस्यापि लक्षणम् ।
तत्तथाऽस्यादिलक्ष्यस्य लक्षणं चोत्तरस्य तत् ॥468॥

अर्थ: लक्षणके लक्षणको उपलक्षण कहते हैं अर्थात् किसी वस्तुका एक लक्षण कहाजाय, फिर उस लक्षणका लक्षण कहाजाय, इसीका नाम ( जो दुवारा कहा गया है ) उपलक्षण है । जो पहले लक्ष्य ( जिसका लक्षण कियाजाय उसे लक्ष्य कहते है ) का लक्षण है वही आगे वालेका उपलक्षण है ।


यथा सम्यक्त्वभावस्य संवेगो लक्षणं गुणः ।
सचोऽपलक्ष्यते भक्तिवात्सल्येनाऽथवार्हताम् ॥469॥

अर्थ: जिस प्रकार सम्यग्दर्शनका संवेग गुण लक्षण है, वही संवेगगुण अरहन्तोंकी भक्ति अथवा वात्सल्यका उपलक्षण हो जाता है ।


तत्र भक्तिरनौद्धत्यं वाग्वपुश्चेतसां शमात् ।
वात्सल्यं तद्गुणोत्कर्षहेतवे सोद्यतं मनः ॥470॥

अर्थ: मन, वचन, कायकी शान्तिसे उद्धत्ताका नहीं होना ही भक्ति है। अर्थात् किसीके प्रति मन, वचन, काय द्वारा किसी प्रकारकी उद्धत्ता प्रगट नहीं करना ही उसीकी भक्ति है और किसीके गुणोत्कर्षकी प्राप्तिके लिये मनमें उल्लास होना ही उसके प्रति वात्सल्य कहलाता है।


भक्तिर्वा नाम वात्सल्यं न स्यात्संवेगमन्तरा ।
स संवेगो दृशो लक्ष्म द्वावेतावुपलक्षणम् ॥471॥

अर्थ: भक्ति अथवा वात्सल्य संवेगके विना नहीं हो सक्ते, वह संवेग सम्यग्दर्शनका लक्षण है और ये दोनों ( भक्ति वात्सल्य ) उपलक्षण हैं ।


दृङ्मोहस्योदयाभावात् प्रसिद्धः प्रशमो गुणः ।
तत्राभिव्यञ्जकं बाह्यान्निन्दनं चापि गर्हणम् ॥472॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उदयका अभाव होनेसे प्रशम गुण होता है यह प्रसिद्ध है। उसी प्रशम गुणका बाह्य - व्यंजक (बतानेवाला) निंदन है, और उसीका गर्हण है अर्थात् निन्दन और गर्हणसे प्रशम गुण जाना जाता है।


निन्दनं तत्र दुर्वाररागादौ दुष्टकर्मणि ।
पश्चात्तापकरो बन्धो नाऽपेक्ष्यो नाप्युपेक्षितः ॥473॥

अर्थ: कठिनतासे दूर करने योग्य जो रागादि दुष्ट कर्म हैं उनके विषयमें ऐसा विचार करना कि इनके होनेपर पश्चात्तापकारी बन्ध होता है । वह न तो अपेक्षणीय है और न उपेक्षणीय है अर्थात् रागादिको बन्धका कारण समझकर उनके विषयमें रागबुद्धिको दूर कर उन्हें हटानेका प्रयत्न करना चाहिये इसीका नाम निंदन है ।


गर्हणं तत्परित्यागः पञ्चगुर्वात्मसाक्षिकः ।
निष्प्रमादतया नूनं शक्तितः कर्महानये ॥474॥

अर्थ: पञ्चगुरुओंकी साक्षीसे कर्मोंका नाश करनेके लिये शक्तिपूर्वक प्रमाद रहित होकर उस रागका त्याग करना - गर्हण कहलाता हैं ।


अर्थादेतद्द्वयं सूक्तं सम्यक्त्वस्योपलक्षणम ।
प्रशमस्य कषायाणामनुद्रेकाऽविशेषतः ॥475॥

अर्थ: कषायोंके अनुदयसे होनेवाले प्रशम गुण - लक्षणका धारी जो सम्यक्त्व है उसके ये दोनों उपलक्षण हैं। इन दोनों (निन्दन-गर्हण)का स्वरूप ऊपर अच्छी तरह कहा जाचुका है।


शेषमुक्तं यथाम्नायात् ज्ञातव्यं परमागमात् ।
आगमाब्धेः परं पारं मादृग्गन्तुं क्षमः कथम ॥476॥

अर्थ: बाकीका जो कथन है, वह निर्दिष्ट पद्धतिके अनुसार अर्थात् परम्परासे आये हुए परमागम (शास्त्र)से जानना चाहिये। आगम रूपी समुद्रका पार बहुत लम्बा है, इसलिये उसके पार जानेके लिये हम सरीखे कैसे तयार होसक्ते हैं ?


ननु तद्दर्शनस्यैतल्लक्ष्यस्यस्यादशेषतः ।
किमथास्त्यपरं किञ्चिल्लक्षणं तद्वदाद्यनः ॥477॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि सम्यग्दर्शनका सम्पूर्ण लक्षण इतना ही है कि और भी कोई लक्षण है ? यदि है तो आज हमसे कहिये ?


सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमस्ति सिद्धं जगत्त्रये ।
लक्षणं च गुणश्चाङ्गं शब्दाश्चैकार्थवाचकाः ॥478॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनके सब जगह आठ अंग प्रसिद्ध हैं। तथा लक्षण, गुण, अंग ये सभी शब्द एक अर्थके ही कहने वाले हैं।


निःशङ्कितं यथा नाम निष्कांक्षितमतः परम् ।
विचिकित्सावर्जं चापि तथा दृष्टेरमूढता ॥479॥

अर्थ: निःशङ्कित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपवृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना ये आठ अंग क्रमसे परम्परा - आगत हैं ।


उपवृंहणनामा च सुस्थितीकरणं तथा
वात्सल्यं च यथाम्नायाद् गुणोप्यस्ति प्रभावना ॥480॥

अर्थ: निःशङ्कित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा, अमूढदृष्टि, उपवृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना ये आठ अंग क्रमसे परम्परा - आगत हैं।


शङ्का भीः साध्वसं भीतिर्भयमेकाभिधा अमी ।
तस्य निष्क्रान्तितो जातो भावो निःशङ्कितोऽर्थतः ॥481॥

अर्थ: शंका, भी, साध्वस, भीति, भय ये सभी शब्द एक अर्थके वाचक हैं। उस शंका अथवा भयसे रहित जो आत्माका परिणाम है, वही वास्तवमें निःशंकित भाव कहलाता है।


अर्थवशादत्र सूत्रे शंका न स्यान्मनीषिणाम् ।
सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः स्युस्तदास्तिक्यगोचराः ॥482॥

अर्थ: जैन सिद्धान्तमें ( किसी सूत्रमें ) प्रयोजन वश बुद्धिमानोंको शंका नहीं करना चाहिये । जो पदार्थ सूक्ष्म हैं, जो अन्तरवाले हैं, अर्थात् जो बीचमें अनेक व्यवधान होनेसे दृष्टिगत नहीं है और जो कालकी अपेक्षा बहुत दूर हैं, वे सब निःशङ्करीतिसे आस्तिक्य गोचर ( दृढ-बुद्धिगत ) होने चाहिये ।


तत्र धर्मादयः सूक्ष्माः सूक्ष्माः कालाणवोऽणवः
अस्ति सूक्ष्मत्त्वमेतेषां लिङ्गस्याक्षैरदर्शनात् ॥483॥

अर्थ: धर्म द्रव्य, आदिक पदार्थ सूक्ष्म हैं, कालाणु भी सूक्ष्म हैं और पुद्गल-परमाणु भी सूक्ष्म हैं। इनका हेतु [ जतलानेवाला कोई चिह्न (हेतु) ] इन्द्रियोंसे नहीं दीखता इसलिये ये सूक्ष्म हैं।


अन्तरिता यथा द्वीपसरिन्नाथनगाधिपाः ।
दूरार्था भाविनोतीता रामरावणचक्रिणः ॥484॥

अर्थ: द्वीप, समुद्र, पर्वत आदि पदार्थ अंतरित हैं क्योंकि इनके बीचमें बहुतसी चीजें आगई हैं इसलिये ये दीख नहीं सकते। तथा राम, रावण, चक्रवर्ती ( बलभद्र अर्धचक्री चक्री ) जो हो गये हैं और जो होने वाले हैं वे दूरार्थ ( दूरवर्ती पदार्थ ) कहलाते हैं।


न स्यान्मिथ्यादृशो ज्ञानमेतेषां काप्यसंशयम् ।
संशयस्यादिहेतोर्वै दृङ्मोहस्योदयात्सतः ॥485॥

अर्थ: इन सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती पदार्थोंका संशय रहित ज्ञान मिथ्यादृष्टिको कभी नहीं होसक्ता क्योंकि संशयका मूल कारण दर्शनमोहनीयका उदय है और वह उसके मौजूद है।


नचाशङ्क्यं परोक्षास्ते सद्दृष्टेर्गोचराः कुतः ।
तैः सह सन्निकर्षस्य साक्षकस्याप्यसंभवात् ॥486॥

अर्थ: वे परोक्ष पदार्थ सम्यग्दृष्टिके विषय कैसे हो सकते हैं ? क्योंकि उनके साथ इन्द्रियोंका सम्बन्ध ही असंभव है ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये ।


अस्ति तत्रापि सम्यक्त्वमाहात्म्यं दृश्यते महत् ।
यदस्य जगतो ज्ञानमस्त्यास्तिक्यपुरस्सरम् ॥487॥

अर्थ: परोक्ष पदार्थोंके बोध करनेमें भी सम्यग्दर्शनका बड़ा भारी माहात्म्य है । सम्यग्दृष्टिको इस जगत्का ज्ञान आस्तिक्य - बुद्धि पूर्वक होजाता है ।


नासंभवमिदं यस्मात् स्वभावोऽतर्कगोचरः ।
अतिवागतिशयः सर्वो योगिनां योगशक्तिवत् ॥488॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी आस्तिक्य बुद्धिपूर्वक जगतभरका ज्ञान कर लेता है, यह बात असंभव नहीं है। क्योंकि सम्यग्दर्शनका स्वभाव ही ऐसा है। स्वभावमें तर्कणा हो नहीं सक्ती, योगियोंकी योगशक्तिकी तरह यह सब अतिशय बचनोंसे बाहर है।


अस्ति चात्मपरिच्छेदि ज्ञानं सम्यग्दृगात्मनः ।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं शुद्धं सिद्धास्पदोपमम् ॥489॥

अर्थ: आत्माका अनुभव करानेवाला ज्ञान सम्यग्दृष्टिको है। सम्यग्दृष्टिका स्वसंवेदन प्रत्यक्ष शुद्ध है और सिद्धोंकी उपमावाला है।


यत्रानुभूयमानेपि सर्वैराबालमात्मनि ।
मिथ्याकर्मविपाकाद्वै नानुभूतिः शरीरिणाम् ॥490॥

अर्थ: बालकसे लेकर सभीको उस शुद्धात्माका अनुभव होसक्ता है। परन्तु मिथ्या कर्मके उदयसे जीवोंको अनुभव नहीं होता है।


सम्यग्दृष्टेः कुदृष्टेश्च स्वादुभेदोस्ति वस्तुनि ।
न तत्र वास्तवो भेदो वस्तुसीम्नोऽनतिक्रमात् ॥491॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी और मिथ्यादृष्टीको वस्तुमें स्वादुभेद होता है परन्तु दोनोंमें वास्तविक भेद कुछ नहीं है । क्योंकि आत्मायें दोनोंकी समान हैं । वस्तु सीमाका उल्लंघन कभी नहीं होता ।


अत्र तात्पर्यमेवैतत्तत्त्वैकत्त्वेपि यो भ्रमः ।
शङ्कायाः सोऽपराधोऽस्ति सातु मिथ्योपजीविनी ॥492॥

अर्थ: यहां पर तात्पर्य इतना ही है कि तत्त्व (सम्यग्दृष्टी और मिथ्यादृष्टी) दोनोंकी आत्माओंके समान होने पर तथा विषयभूत पदार्थके भी एक होने पर जो मिथ्यादृष्टीको भ्रम होता है वह शंकाका अपराध है, और वह शंका मिथ्यात्वसे होनेवाली है ।


ननु शङ्काकृतो दोषो यो मिथ्यानुभवो नृणाम् ।
सा शङ्कापि कुतो न्यायादस्ति मिथ्योपजीविनी ॥493॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जो मनुष्योंको मिथ्या अनुभव होता है वह शंकासे होने वाला दोष है । वह शङ्का भी किस न्यायसे मिथ्यात्वसे होनेवाली है ?


अत्रोत्तरं कुदृष्टिर्यः स सप्तभिर्भयैर्युतः ।
नापि स्पृष्टः सुदृष्टिर्यः स सप्तभिर्भयैर्मनाक् ॥494॥

अर्थ: उपर्युक्त शंकाका उत्तर यह है कि जो मिथ्यादृष्टी है उसीको ही सात प्रकारके भय हुआ करते हैं। जो सम्यग्दृष्टी है उसे कोई भी भय थोड़ासा भी नहीं छूपाता।


परत्रात्मानुभूतेर्वै विना भीतिः कुतस्तनी ।
भीतिः पर्यायमूढानां नात्मतत्त्वैकचेतसाम् ॥495॥

अर्थ: पर पदार्थोंमें आत्माका अनुभव होनेसे भय होता है विना पर पदार्थमें आपा समझे भय किसी प्रकार नहीं हो सक्ता इसलिये जो वैभाविक पर्यायमें ही मूढ़ हो रहे हैं उन्हींको भय लगता है । जिन्होंने आत्मतत्त्वको अच्छी तरह समझ लिया है उन्हें कभी भय नहीं लगता ।


ततो भीत्यानुमेयोस्ति मिथ्याभावो जिनागमात् ।
सा च भीतिरवश्यं स्याद्धेतुः स्वानुभवक्षतेः ॥496॥

अर्थ: इसलिये भय होनेसे ही मिथ्या - भावका अनुमान किया जाता है। वह भय आत्मानुभवके क्षयका कारण है। यह बात जिनागमसे प्रसिद्ध है।


अस्ति सिद्धं परायत्तो भीतः स्वानुभवच्युतः ।
स्वस्थस्य स्वाधिकारित्वान्नूनं भीतेरसंभवात् ॥497॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि जो भय सहित है और पराधीन है, वह आत्मानुभवसे गिरा हुआ है। परन्तु जो स्वस्थ है वह आत्मानुभवशील है, उसको भीति (भय) का होना असंभव ही है।


ननु सन्ति चतस्रोपि संज्ञास्तस्यास्य कस्यचित् ।
अर्वाक् च तत्परिच्छेदस्थानादस्तित्वसंभवात् ॥498॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि किसी२ सम्यग्दृष्टीके भी चारों ( आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ) ही संज्ञायें होती हैं। जहां पर उन संज्ञाओंकी समाप्ति बतलाई गई है उससे पहले२ उनका अस्तित्व होना संभव ही है ?


तत्कथं नाम निर्भीकः सर्वतो दृष्टिवानपि ।
अप्यनिष्टार्थसंयोगादस्त्यध्यक्षं प्रयत्नवान् ॥499॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जब सम्यग्दृष्टीके चारों संज्ञायें पाई जाती हैं तो फिर वह सम्यग्दर्शनका धारी होने पर भी सर्वदा निर्भीक किस प्रकार कहा जा सक्ता है और अनिष्ट पदार्थोंका संयोग होने पर वह उनसे बचनेके लिये प्रयत्न भी करता है। वह बात प्रत्यक्ष देखते ही हैं ?


सत्यं भीकोपि निर्भीकस्तत्स्वामित्वाद्यभावतः ।
रूपि द्रव्यं यथा चक्षुः पश्यदपि न पश्यति ॥500॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि सम्यग्दृष्टीके चारों संज्ञायें हैं और वह भयभीत भी है। परन्तु वह उन संज्ञाओंका अपनेको स्वामी नहीं समझता है, किन्तु उन्हें कर्मजन्य उपाधि समझता है। जिस प्रकार द्रव्यचक्षु (द्रव्येन्द्रिय) रूपी द्रव्यको देखता हुआ भी वास्तवमें नहीं देखता है।

उत्तरार्द्ध 501 से 600 (श्लोक 501 से 600)

सन्ति संसारिजीवानां कर्मांशाश्चोदयागताः ।
मुह्यन् रज्यन् द्विषँस्तत्र तत्फलेनोयुज्यते ॥501॥

अर्थ: संसारि जीवोंके कर्म - परमाणु उदयमें आते रहते हैं। उनके फलमें यह जीव मोह करता है, राग करता है, द्वेष करता है और तल्लीन होजाता है।


एतेन हेतुना ज्ञानी निःशङ्को न्यायदर्शनात् ।
देशतोप्यत्र मूर्च्छायाः शङ्काहेतोरसंभवात् ॥502॥

अर्थ: इसी कारण सम्यग्ज्ञानी निःशंक है । यह बात न्यायसे सिद्ध है । सम्यग्ज्ञानीमें एक देश भी मूर्छा ( ममता - अपनापन ) नहीं है इसलिये शंकाका कारण ही वहां असंभव है।


स्वात्मसंचेतनं तस्य कीदृगस्तीति चिन्त्यते ।
येन कर्मापि कुर्वाणः कर्मणा नोपयुज्यते ॥503॥

अर्थ: उस सम्यग्ज्ञानीकी स्वात्मचेतना ( स्वात्मविचार - ज्ञानचेतना ) कैसी विचित्र है, अब उसीका विचार किया जाता है। उसी चेतनाके कारण वह कर्म (कार्य) करता भी है, तो भी उससे तल्लीन नहीं होता।


तत्र भीतिरिहामुत्र लोके वै वेदनाभयम् ।
चतुर्थी भीतिरत्राणं स्यादगुप्तिस्तु पञ्चमी ॥504॥

अर्थ: पहला - इस लोकका भय, दूसरा - परलोकका भय, तीसरा - वेदना भय, चौथा - अरक्षा भय, पांचवां - अगुप्ति भय, छठवां - मरण भय और सातवां - आकस्मिक भय । ये क्रमसे सात - भीति बतलाई हैं ।


भीतिः स्याद्वा तथा मृत्युर्भीतिराकस्मिकं ततः ।
क्रमादुद्देशिताश्चेति सप्तैताः भीतयः स्मृताः ॥505॥

अर्थ: पहला - इस लोकका भय, दूसरा - परलोकका भय, तीसरा - वेदना भय, चौथा - अरक्षा भय, पांचवां - अगुप्ति भय, छठवां - मरण भय और सातवां - आकस्मिक भय । ये क्रमसे सात - भीति बतलाई हैं ।


तत्रेह लोकतो भीतिः क्रन्दितं चात्र जन्मनि ।
इष्टार्थस्य व्ययो माभून्माभून्मेऽनिष्टसंगमः ॥506॥

अर्थ: उन सातों भीतियोंमें “मेरे इष्ट पदार्थका तो नाश न हो और मुझे 'अनिष्ट पदार्थका समागम भी न हो ऐसा इस जन्ममें विलाप करना” इस लोक संबंधी पहिली भीति है।


स्थास्यतीदं धनं नोवा दैवान्माभूद्दरिद्रता ।
इत्याद्याधिश्चिता दग्धुं ज्वलितेवाऽदृगात्मनः ॥507॥

अर्थ: यह धन ठहरेगा या नहीं, दैवयोगसे दरिद्रता कभी नहीं हो । इत्यादि व्याधि-चिता मिथ्यादृष्टीको जलानेके लिये जलती ही रहती है ।


अर्थादज्ञानिनो भीतिर्भीतिर्न ज्ञानिनः क्वचित् ।
यतोऽस्ति हेतुतः शेषाद्विशेषश्चानयोर्महान् ॥508॥

अर्थ: अर्थात् अज्ञानी पुरुषको ही भय लगता है । ज्ञानी पुरुषको थोड़ा भी भय नहीं लगता । पारिशेषानुमानसे ( फलवतात् ) यह बात सिद्ध होती है कि ज्ञानी और अज्ञानीमें बड़ा भारी अन्तर है । इसका कारण वही मोहनीय कर्म है ।


अज्ञानी कर्मनोकर्मभावकर्मात्मकं च यत् ।
मनुते सर्वमेवैतन्मोहादद्वैतवादवत् ॥509॥

अर्थ: अज्ञानी जीव, द्रव्यकर्म, नोकर्म और भावकर्म सभीको मोहसे अद्वैतवादकी तरह अर्थात् आत्मासे अभिन्न ही समझता है ।


विश्वाद्भिन्नोपि विश्वं स्वं कुर्वन्नात्मानमात्महा ।
भूत्वा विश्वमयो लोके भयं नोज्झति जातुचित् ॥510॥

अर्थ: आत्माका नाश करनेवाला–अज्ञानी जीव यद्यपि जगसे भिन्न है, तो भी जगत्को अपना ही बनाता है और विश्वमय बनकर लोकमें कभी भी भयको नहीं छोडता, वह सदा भयभीत ही बना रहता है ।


तात्पर्यं सर्वतोऽनित्ये कर्मणः पाकसंभवात् ।
नित्यबुद्ध्या शरीरादौ भ्रान्तो भीतिमुपैति सः ॥511॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका सारांश इतना ही है कि अज्ञानी पुरुष कर्मके उदय वश सर्वथा अनित्य शरीर–आदि पदार्थोंमें नित्यबुद्धि रखकर भ्रम करता हुआ भय करने लगता है।


सम्यग्दृष्टिः सदैकत्वं स्वं समासादयन्निव ।
यावत्कर्मातिरिक्तत्वाच्छुद्धमत्येति चिन्मयम् ॥512॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी पुरुष सदा अपनेको अकेला ही समझता है और जितना भी कर्मका विकार है, उसमें अपनी आत्माको भिन्न, शुद्ध और चैतन्यस्वरूप समझता है ।


शरीरं सुखदुःखादि पुत्रपौत्रादिकं तथा ।
अनित्यं कर्मकार्यत्वादस्वरूपमवैति यः ॥513॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी समझता है कि शरीर, सुख, दुःख आदिक पदार्थ और पुत्र, पौत्र आदिक पदार्थ अनित्य हैं, ये सब कर्मके निमित्तसे हुए हैं, और इसीलिये ये आत्म स्वरूप नहीं हैं।


लोकोऽयं मे हि चिल्लोको नूनं नित्योस्ति सोऽर्थतः ।
नाऽपरोऽलौकिको लोकस्ततो भीतिः कुतोऽस्ति मे ॥514॥

अर्थ: वह समझता है कि लोक यह है ? मेरा तो निश्चयसे आत्मा ही लोक है और वह मेरा आत्मा - लोक वास्तवमें नित्य है । तथा मेरा कोई और अलौकिक लोक नहीं है इसलिये मुझे किससे भय होसक्ता है ?


स्वात्मसंचेतनादेवं ज्ञानी ज्ञानैकतानतः
इह लोकभयान्मुक्तो मुक्तस्तत्कर्मबन्धनात् ॥515॥

अर्थ: ज्ञानमें ही तल्लीन होनेसे ज्ञान चेतना द्वारा ही सम्यग्ज्ञानी इसलोक सम्बन्धी भयसे रहित है और इसीलिये वह कर्म बन्धनसे भी रहित है ।


परलोकः परत्रात्मा भाविजन्मान्तरांशभाक् ।
ततः कम्प इव त्रासो भीतिः परलोकतोऽस्ति सा ॥516॥

अर्थ: आगामी जन्मान्तरको प्राप्त होनेवाले - परभव सम्बन्धी आत्माका नाम ही परलोक है। उस परलोकसे - कपाँने वाला दुःख होता है और वही परलोक - भीति कहलाती है।


भद्रं चेज्जन्म स्वर्लोके माभून्मे जन्म दुर्गतौ ।
इत्याद्याकुलितं चेतः साध्वसं पारलौकिकम् ॥517॥

अर्थ: यदि स्वर्ग-लोकमें जन्म हो तो अच्छा है, बुरी गतिमें मेरा जन्म न हो। इत्यादि रीतिसे जो चित्तकी व्याकुलता है उसीका नाम पारलौकिक भय है।


मिथ्यादृष्टेस्तदेवास्ति मिथ्याभावैककारणात् ।
तद्विपक्षस्य सद्दृष्टेर्नास्ति तत्तत्रव्यत्ययात् ॥518॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टीके मिथ्या भावोंसे परलोक सम्बन्धी भय होता रहता है, परन्तु सम्यग्दृष्टिके ऐसा भय नहीं होता क्योंकि उसके मिथ्यात्व कर्मका उदय नहीं है । कारणके अभावमें कार्य भी नहीं होसक्ता ।


बहिर्दृष्टिरनात्मज्ञो मिथ्यामात्रैकभूमिकः ।
स्वं समासादयत्यज्ञः कर्म कर्मफलात्मकम् ॥519॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टी अपने आत्माको नहीं पहचानता है क्योंकि मिथ्यात्व ही उसका एक क्षेत्र है। वह मूर्ख, कर्म और कर्मके फल स्वरूप ही अपनेको समझता है।


ततो नित्यं भयाक्रान्तो वर्तते भ्रान्तिमानिव ।
मनुते मृगतृष्णायामम्भोभारं जनः कुधीः ॥520॥

अर्थ: इसलिये वह सदा भयभीत रहता है सदा भ्रान्तसा रहता है और वह कुबुद्धि मिथ्यादृष्टी पुरुष मृगतृष्णामें ( सफेद रेतीली जमीनमें ) ही जल समझता है ।


अन्तरात्मा तु निर्भीकः पदं निर्भयमाश्रितः ।
भीतिहेतोरिहावश्यं भ्रान्तेरत्राप्यसंभवात् ॥521॥

अर्थ: अन्तरात्मा ( सम्यग्दृष्टी ) तो सदा निर्भय रहता है, क्योंकि वह निर्भय स्थान ( आत्मतत्त्व ) पर पहुंच चुका है । इसीलिये भयका कारण–भ्रान्ति भी उसके असंभव है अर्थात् सम्यग्दृष्टीको भ्रमबुद्धि भी नहीं होती ।


मिथ्याभ्रान्तिर्यदन्यत्र दर्शनं चान्यवस्तुनः ।
यथा रज्जौ तमोहेतोः सर्पाध्यासाद्द्रवत्यधीः ॥522॥

अर्थ: जो मिथ्या–भ्रम होता है और जो अयथार्थ (अन्य वस्तुका) श्रद्धान होता है वह मिथ्यादृष्टीके ही होता है । जिस प्रकार अन्धकारके कारण रस्सीमें सर्पका निश्चय होनेसे डर लग जाता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टी सदा मोहान्धकारके कारण डरता ही रहता है ।


स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्योतिर्यो वेत्त्यनन्यसात् ।
स बिभेति कुतो न्यायादन्यथाऽभवनादिह ॥523॥

अर्थ: जो स्वसंवेदन प्रत्यक्ष रूप ज्योतिको अपनेसे अभिन्न समझता है, वह (सम्यग्दृष्टी) किस न्यायसे डरेगा। उसे निश्चय है कि अन्यथा कुछ नहीं होसकता, अर्थात् वह आत्माको सदा अविनश्वर समझता है इसलिये किसीसे नहीं डरता।


वेदनाऽऽगन्तुका बाधा मलानां कोपतस्तनौ ।
भीतिः प्रागेव कम्पः स्यान्मोहाद्वा परिदेवनम् ॥524॥

अर्थ: शरिरमें वात, पित्त, कफ, इन तीन मलोंका कोप होनेसे आनेवाली जो बाधा है, उसीका नाम वेदना है । उस आनेवाली वेदनासे पहले ही कंप होने लगता है वही वेदना - भय है अथवा मोहबुद्धिसे विलापका होना भी वेदना भय है ।


उल्लाघोहं भविष्यामि माभून्मे वेदना क्वचित् ।
मूर्च्छैव वेदनाभीतिश्चिन्तनं वा मुहुर्मुहुः ॥525॥

अर्थ: मैं नीरोग होजाऊं, मुझे वेदना कभी भी नहीं हो इस प्रकार बार बार चिंतवन करना ही वेदना–भय है, अथवा मूर्छा ( मोह बुद्धि ) ही वेदना भय है ।


अस्ति नूनं कुदृष्टेः सा दृष्टिदोषैकहेतुतः ।
नीरोगस्यात्मनोऽज्ञानान्न स्यात्सा ज्ञानिनः क्वचित् ॥526॥

अर्थ: वह वेदना भय मिथ्यादर्शनके कारण नियमसे मिथ्यादृष्टीके ही होता है । अज्ञानसे होने वाला कह वेदना–भय सदा नीरोगी ज्ञानीके कभी नहीं होता ।


पुद्गलाद्भिन्नचिद्धाम्नो न मे व्याधिः कुतो भयम् ।
व्याधिः सर्वा शरीरस्य नाऽमूर्तस्येति चिन्तनम् ॥527॥

अर्थ: मेरा ज्ञानमय - आत्मा ही स्थान है और वह पुद्गलसे सर्वथा भिन्न है। इसलिये मुझे कोई व्याधि (रोग) नहीं होसकती। फिर मुझे भय किसका ? जितनी भी व्याधियां हैं सभी शरीरको ही होती हैं, अमूर्त - आत्माको एक भी व्याधि नहीं होसक्ती। इस प्रकार सम्यग्दृष्टि सदा चिन्तवन करता रहता है।


यथा प्रज्वलितो वन्हिः कुटीरं दहति स्फुटम् ।
न दहति तदाकारमाकाशमिति दर्शनात् ॥528॥

अर्थ: जैसे - बहुत जोरसे जलती हुई अग्नि मकानको जला देती है, परन्तु मकानके आकारमें आया हुआ जो आकाश है उसे नहीं जला सक्ती, यह बात प्रत्यक्ष - सिद्ध है ।


स्पर्शनादीन्द्रियार्थेषु प्रत्युत्पन्नेषु भाविषु ।
नादरो यस्य सोस्त्यर्थान्निर्भीको वेदनाभयात् ॥529॥

अर्थ: वर्तमानमें प्राप्त जो स्पर्शनादि इन्द्रियोंके विषय हैं अथवा जो आगामी मिलने वाले हैं, उनमें जिसका आदर नहीं है, वही (सम्यग्दृष्टी) वास्तवमें वेदना - भयसे निडर है ।


व्याधिस्थानेषु तेषूच्चैर्नाऽसिद्धोऽनादरो मनाक् ।
बाधाहेतोः स्वतस्तेषामामयस्याविशेषतः ॥530॥

अर्थ: इन्द्रियोंके विषय, व्याधियोंके मुख्य स्थान हैं क्योंकि वे बाधाके कारण हैं। इसलिये उनमें रोगसे कोई विशेषता नहीं है अर्थात् आत्माको दुःख देनेवाले रोग इन्द्रियोंके विषय हैं।


अत्राणं क्षणिकैकान्ते पक्षे चित्तक्षणादिवत् ।
नाशात्प्रागंशनाशस्य त्रातुमक्षमताऽऽत्मनः ॥531॥

अर्थ: सर्वथा क्षणिक मानने वाला बौद्ध दर्शन है वह चित्तका क्षणमात्रमें नाश मानता है । चित्त पदसे आत्मा समझना चाहिये । जिसप्रकार वह आत्माको क्षण नाशी मानता है उसी प्रकार अन्यान्य सभी पदार्थोंको भी क्षण–विनाशी मानता है । साथमें चित्तसन्तति मानता है । आत्मा नाशवाला है परन्तु उसकी सन्तान बराबर चलती रहती है । ऐसा बौद्ध सिद्धान्त है परन्तु जैन सिद्धान्त ऐसा सर्वथा नहीं मानता वह पर्यायकी अपेक्षा आत्मा तथा इतर पदार्थोंका नाश मानता है किंतु द्रव्यकी अपेक्षासे सभीको नित्य मानता है। परन्तु मिथ्यादृष्टी इससे उलटा ही समझता है । जिस समय मनुष्य पर्यायका नाश तो नहीं हुआ है, परन्तु धीरे २ आयु कम हो रही है ऐसी अवस्थामें वह ( मिथ्यादृष्टी ) उसकी रक्षा तो कर नहीं सक्ता, परन्तु नाशका भय उसे बराबर लगा रहता है । उसीका नाम अत्राण-भय ( अरक्षा-भय ) है ।


भीतिः प्रागंशनाशात्स्यादंशिनाशभ्रमोन्वयात् ।
मिथ्यामात्रैकहेतुत्वान्नूनं मिथ्यादृशोऽस्ति सा ॥532॥

अर्थ: मिथ्याग्दृष्टी समझता है कि धीरे २ आत्माकी पर्यायोंका नाश होनेसे संभव है कि कभी सम्पूर्ण आत्माका ही नाश हो जाय । क्योंकि सन्तानके नाशसे सन्तानीके नाशका भी डर है । इस प्रकारका भय मिथ्यादृष्टीको पहलेसे ही हुआ करता है । इसमें कारण केवल मिथ्यात्त्वकर्मका उदय ही है ऐसा भय नियमसे मिथ्यादृष्टीको ही हीता है सम्यग्दृष्टीको कभी नहीं होता।


शरणं पर्ययस्यास्तंगतस्यापि सदन्वयात् ।
तमनिच्छन्निवाज्ञः स त्रस्तोस्त्यत्राणसाध्वसात् ॥533॥

अर्थ: वास्तवमें पर्यायका नाश होनेपर भी आत्मसत्ताकी शृंखला सदा रहेगी और वह आत्मसत्ता ही शरण है परन्तु मूर्ख-मिथ्यादृष्टि इस बातको नहीं मानता हुआ अत्राण भय ( आत्माकी रक्षा कैसे हो इस भयसे ) सदा दुःखी रहता है ।


सद्दृष्टिस्तु चिदंशैः स्वैः क्षणं नष्टे चिदात्मनि ।
पश्यन्नष्टमिवात्मानं निर्भयोऽत्राणभीतितः ॥534॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टी तो आत्माको पर्यायकी अपेक्षासे नाश मानता हुआ भी अत्राण भयसे सदा निडर रहता है। वह आत्माको नाश होती हुई सी देखता है तथापि वह निडर है।


द्रव्यतः क्षेत्रतश्चापि कालादपि च भावतः ।
नाऽत्राणमंशतोप्यत्र कुतस्तद्धि महात्मनः ॥535॥

अर्थ: इस आत्माका अथवा इस संसारमें किसी भी पदार्थका द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावकी अपेक्षासे अंशमात्र भी अरक्षण ( नाश ) नहीं होता है तो फिर महान् पदार्थ आत्मा–महात्माका नाश कैसे हो सक्ता है ?


दृङ्मोहस्योदयाद्बुद्धिः यस्यैकान्तवादिनी ।
तस्यैवागुप्ति भीतिः स्यान्नूनं नान्यस्य जातुचित् ॥536॥

अर्थ: दर्शनमोहनीयके उदयसे जिसकी बुद्धि एकान्तकी तरफ झुक गई है उसीके अगुप्ति–भय होता है। जिसके दर्शनमोहनीयका उदय नहीं हैं उसके कभी भी ऐसी बुद्धि नहीं होती।


असज्जन्म सतोनाशं मन्यमानस्य देहिनः ।
कोवकाशस्ततो मुक्तिमिच्छतोऽगुप्तिसाध्वसात् ॥537॥

अर्थ: जो मनुष्य असत् पदार्थकी उत्पत्ति मानता है और सत् पदार्थका नाश मानता है तथा फिर अगुप्ति - भयसे छूटना चाहता है वह ऐसा मानने वाला अगुप्ति भयसे कहां छुटकारा पा सक्ता है ?


सम्यग्दृष्टिस्तु स्वरूपं गुप्तं वै वस्तुनो विदन् ।
निर्भयोऽगुप्तितो भीतेः भीतिहेतोरसंभवात् ॥538॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि तो वस्तुके स्वरूपको निश्चयरीतिसे रक्षित ही मानता है, वह भयके कारणको ही असंभव मानता है इसलिये वह अगुप्ति - भीतिसे निर्भय रहता है ।


मृत्युः प्राणात्ययः प्राणाः कायवागिन्द्रियं मनः ।
निःश्वासोच्छ्वासमायुश्च दशैते वाक्यविस्तरात् ॥539॥

अर्थ: प्राणोंका नाश होना ही मृत्यु है। काय, वचन, पांच इन्द्रिय, मन, निःश्वासोच्छ्वास और आयु ये दश प्राण हैं। ये दश प्राण विस्तार रूप हैं। यदि इन्हींको संक्षेपमें कहा जाय तो बल (काय, वचन, मन) इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास और आयु, ऐसे चार प्राण हैं।


तद्भीतिर्जीवितं भूयान्मा भून्मे मरणं क्वचित् ।
कदा लेभे न वा दैवात् इत्याधिः स्वे तनुव्यये ॥540॥

अर्थ: मृत्यु-भय इस प्रकार होता रहता है कि मैं जीता रहूं, मैं कभी नहीं मरूँ, अथवा दैवयोगसे कभी मर न जाऊँ, इत्यादि पीडा अपने शरीरके नष्ट होनेके भयसे होती रहती है।


नूनं तद्भीः कुदृष्टीनां नित्यं तत्त्वमनिच्छताम् ।
अन्तस्तत्त्वैकवृत्तीनां तद्भीतिर्ज्ञानिनां कुतः ॥541॥

अर्थ: निश्चयसे मृत्यु भय तत्त्वको नहीं पहचानने वाले मिथ्यादृष्टियोंको ही सदा बना रहता है। जिन्होंने आत्माके स्वरूपमें ही अपनी वृत्तियोंको लगा रक्खा है ऐसे सम्यग्ज्ञानियोंको मृत्यु भय कहांसे होसकता है ?


जीवस्य चेतना प्राणाः नूनं सात्मोपजीविनी ।
नार्थान्मृत्युरतस्तद्भीः कुतः स्यादिति पश्यतः ॥542॥

अर्थ: जीवके चेतना ही प्राण हैं। वह चेतना निश्चयसे आत्मोपजीविनी (आत्माका उपजीवी गुण) है। ऐसा देखनेवाला मृत्यु होना ही नहीं समझता, फिर मृत्यु-भय उसे कहांसे हो सकता है?


अकस्माज्जातमित्युच्चैराकस्मिकभयं स्मृतम् ।
तद्यथा विद्युदादीनां पातात्पातोऽसुधारिणाम् ॥543॥

अर्थ: जो भय अकस्मात् (अचानक) होजाता है उसे आकस्मिक भय कहते हैं। वह विजली आदिके गिरनेसे प्राणियोंका नाश होना आदि रूपसे होता है।


भीतिर्भूयाद्यथा सौस्थ्यं माभूद्दौस्थ्यं कदापि मे ।
इत्येवं मानसी चिन्ता पर्याकुलितचेतसा ॥544॥

अर्थ: आकस्मिक भय इस प्रकार होता है कि सदा मैं स्वस्थ बना रहूं, मुझे अस्वस्थता कभी न हो। इस प्रकार आकुल चित्तवाला मानसिक चिन्तासे पीडित रहता है।


अर्थादाकस्मिकभ्रान्तिरस्ति मिथ्यात्वशालिनः ।
कुतो मोक्षोऽस्य तद्भीतेर्निर्भीकैकपदच्युतेः ॥545॥

अर्थ: आकस्मिक भय मिथ्यादृष्टीको ही होता है क्योंकि वह निर्भीक स्थानसे गिरा हुआ है और सदा भयभीत रहता है। फिर भला उसे मोक्ष कहांसे होसक्ती है।


निर्भीकैकपदो जीवो स्यादनन्तोप्यनादिसात् ।
नास्ति चाकस्मिकं तत्र कुतस्तद्भीस्तमिच्छतः ॥546॥

अर्थ: जीव सदा निर्भीक स्थानवाला है, अनन्त है, और अनादि भी है। उस निर्भीकस्थानको चाहनेवाले जीवको आकस्मिक भय कभी नहीं होता ? क्योंकि अनादि अनन्त जीवमें आकस्मिक घटना हो ही क्या सकती है ?


कांक्षा भोगाभिलाषः स्यात्कृतेऽमुष्य क्रियासु वा ।
कर्मणि तत्फले सात्म्यमन्यदृष्टिप्रशंसनम् ॥547॥

अर्थ: जो काम किये जाते हैं उनसे पर लोकके लिये भोगोंकी चाहना करना इसीका नाम कांक्षा है । अथवा कर्म और कर्मके फलमें आत्मीय-भाव रखना अथवा मिथ्यादृष्टियोंकी प्रशंसा करना आदि सब कांक्षा कहलाती है ।


हृषीकारुचितेषूच्चैरुद्वेगो विषयेषु यः ।
स स्याद्भोगाभिलाषस्य लिंगं स्वेष्टार्थरञ्जनात् ॥548॥

अर्थ: जो इन्द्रियोंको रुचिकर विषय नहीं हैं, उनमें बहुत दुःख करना, बस यही भोगोंकी अभिलाषाका चिह्न है । क्योंकि इन्द्रियोंके अरुचिकर विषयोंमें दुःख प्रकट करनेसे अपने अभीष्ट पदार्थोंमें राग अवश्य होगा ।


तद्यथा न रतिः पक्षे विपक्षेप्यरतिं विना ।
नारतिर्वा स्वपक्षेपि तद्विपक्षे रतिं विना ॥549॥

अर्थ: विपक्षमें विना द्वेष हुए स्व-पक्षमें राग नहीं होता है और विपक्षमें विना राग हुए स्वपक्षमें द्वेष नहीं होता है ।


शीतद्वेषी यथा कश्चित् उष्णस्पर्शं समीहते ।
नेच्छेदनुष्णसंस्पर्शमुष्णस्पर्शाभिलाषुकः ॥550॥

अर्थ: जैसे कोई शीतसे द्वेष करनेवाला है तो वह उष्णस्पर्शको चाहता है। जो उष्णस्पर्शकी अभिलाषा रखता है वह शीतस्पर्शको नहीं चाहता !


यस्यास्ति कांक्षितो भावो नूनं मिथ्यादृगस्ति सः ।
यस्य नास्ति स सद्दृष्टिर्युक्तिस्वानुभवागमात् ॥551॥

अर्थ: जिसके कांक्षित ( भोगाभिलाषा ) भाव है वह नियमसे मिथ्यादृष्टी है । जिसके वह भाव नहीं है वह सम्यग्दृष्टी है । यह बात स्वानुभव, युक्ति और आगम तीनोंसे सिद्ध है ।


आस्तामिष्टार्थसंयोगोऽमुत्रभोगाभिलाषतः ।
स्वार्थसार्थैकसंसिद्धिर्न स्यान्नामैहिकात्परम् ॥552॥

अर्थ: परलोकमें भोगोंकी अभिलाषासे इष्ट पदार्थोंका संयोग मिले यह भावना तो मिथ्यादृष्टिके लगी ही रहती है परंतु वह यह भी समझता है कि अपने समग्र अभीष्टोंकी सिद्धि इसलोकके सिवा कहीं नहीं है अर्थात् जो कुछ सुख सामग्री है वह यही ( सांसारिक ) है, इससे बढ़कर और कहीं नहीं है ।


निःसारं प्रस्फुरत्येष मिथ्याकर्मैकपाकतः ।
जन्तोरुन्मत्तवच्चापि वार्धेर्वातोत्तरङ्गवत् ॥553॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टीको ऐसी ऐसी (जो कुछ है सो इसी संसारमें है) निस्सार भावनायें मिथ्या कर्मके उदयसे आया करती हैं । वे ऐसी ही हैं जैसे कि किसी उन्मत्त (पागल) आदमीको हुआ करती हैं । वायुसे हिलोरा हुआ समुद्र जिस प्रकार तरंगोंसे उछलने लगता है, उसी प्रकार मिथ्यात्त्वके उदयसे मिथ्यादृष्टी अज्ञानभावोंसे उछलने लगता है ।


ननु कार्यमनुद्दिश्य न मन्दोपि प्रवर्तते ।
भोगाकांक्षां विना ज्ञानी तत्कथं व्रतमाचरेत् ॥554॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि बिना किसी कार्यको लक्ष्य किये मन्द पुरुष भी किसी काममें नहीं लगता है तो फिर विशेष ज्ञानी - सम्यग्ज्ञानी बिना भोगोंकी चाहनाके कैसे व्रतोंको धारण करता है ?


नासिद्धं बन्धमात्रत्वं क्रियायाः फलमद्वयम् ।
शुभमात्रं शुभायाः स्यादशुभायाश्चाऽशुभावहम् ॥555॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सबोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह वात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह बात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( वारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।

चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध-जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता-उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


नचाऽऽशङ्क्यं क्रियाप्येषा स्यादबन्धफला क्वचित् ।
दर्शनातिशयाद्धेतोः सरागेपि विरागवत् ॥556॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सवोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह वात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह वात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( वारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।
चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध-जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता-उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


यतः सिद्धं प्रमाणाद्वै नूनं बन्धफला क्रिया ।
अर्वाक् क्षीणकषायेभ्योऽवश्यं तद्धेतुसंभवात् ॥557॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सबोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह वात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह वात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( वारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।

चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध-जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता-उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


सरागे वीतरागे वा नूनमौदयिकी क्रिया ।
अस्ति बन्धफलाऽवश्यं मोहस्यान्यतमोदयात् ॥558॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सबोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह बात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह वात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( बारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।
चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध - जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता - उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


न वाच्यं स्यादात्मदृष्टिः कश्चित् प्रज्ञापराधतः ।
अपि बन्धफलां कुर्यात्तामबन्धफलां विदन् ॥559॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सवोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह वात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह वात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( वारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।
चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध - जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता - उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


यतः प्रज्ञाविनाभूतमस्ति सम्यग्विशेषणम् ।
तस्याश्चाऽभावतो नूनं कुतस्त्या दिव्यता दृशः ॥560॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि जितनी भी क्रियायें की जाती हैं सबोंका एक बन्ध होना ही फल है । यह वात भली भांति सिद्ध है । यदि वह शुभ क्रिया है तो उसका फल शुभरूप होगा और यदि वह अशुभ है तो उसका फल भी अशुभ ही होगा । परन्तु कोई सी क्रिया क्यों न हो वह बन्ध अवश्य करेगी । ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये कि यह क्रिया कहीं पर बन्ध न करै । जिस प्रकार वीतरागी पुरुषमें क्रिया बन्धरूप फलको नहीं पैदा करती है, उसी प्रकार सम्यग्दर्शनके अतिशयके कारण सरागीमें भी बन्धफला क्रिया नहीं होगी ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये । क्योंकि यह बात प्रमाण सिद्ध है कि सभी क्रियायें बन्धरूप फलको पैदा करने वाली हैं । क्षीणकषाय ( वारहवां गुणस्थान ) से पहले२ अवश्य ही बन्धका कारण संभव है ।

चाहे सरागी हो चाहे वीतरागी ( क्षीणकषायसे पहले ) हो दोनोंमें ही औदयिकी (उदयसे होनेवाली) क्रिया होती है और वह क्रिया अवश्य ही बन्धरूप फलको पैदा करनेवाली हैं, क्योंकि मोहनीय प्रकृतियोंमेंसे किसी एकका उदय मौजूद है इसलिये बुद्धिके दोषसे किसीको स्वानुभूतिवाला मत कहो और मत बन्ध - जनक क्रिया करनेवालेकी क्रियाको अबन्ध फला क्रिया बतलाओ । क्योंकि बुद्धिका अविनाभावी सम्यक् विशेषण है । उस सम्यक् विशेषणवाली बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) का अभाव होनेसे दर्शनको दिव्यता - उत्कृष्टता (सम्यग्दर्शनता) कैसे आसक्ती है ?


नैवं यतः सुसिद्धं प्रागस्ति चानिच्छतः क्रिया ।
शुभायाश्चाऽशुभायाश्च कोऽवशेषो विशेषभाक् ॥561॥

अर्थ: शंकाकारकी उपर्युक्त शंका व्यर्थ है, क्योंकि पहले यह बात अच्छी तरह सिद्ध होचुकी है कि बिना इच्छाके भी क्रिया होती है। फिर शुभ क्रिया और अशुभ क्रियाकी क्या विशेषता बाकी रह गई ?


नन्वनिष्टार्थसंयोगरूपा साऽनिच्छतः क्रिया ।
विशिष्टेष्टार्थसंयोगरूपा साऽनिच्छतः कथम् ॥562॥

अर्थ: शंकाकार कहता है कि जो क्रिया अनिष्ट पदार्थोंकी संयोगरूपा है वह तो नहीं चाहनेवालेके ही होजाती है । परन्तु विशेष विशेष इष्ट पदार्थोंके संबोग करानेवाली जो क्रिया है वह नहीं चाहने वाले पुरुषके कैसे हो सक्ती है ?


सत्क्रिया व्रतरूपा स्यादर्थान्नानिच्छतः स्फुटम् ।
तस्याः स्वतन्त्रसिद्धत्वात् सिद्धं कर्तृत्वमर्थसात् ॥563॥

अर्थ: व्रत-स्वरूप जो अच्छी क्रिया है वह विना व्रत चाहने वालेके कैसे हो सक्ती है ? अर्थात् नहीं होसक्ती । व्रत रूपा क्रिया इच्छानुसार की जाती है इसलिये व्रत करनेवाला व्रत क्रियाका कर्ता है यह वात सिद्ध हुई ।


नैवं यतोस्त्यनिष्टार्थः सर्वः कर्मोदयात्मकः ।
तस्मान्नाकांक्षते ज्ञानी यावत् कर्म च तत्फलम ॥564॥

अर्थ: उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है। क्योंकि जितना भी कुछ कर्मके उदय-स्वरूप है सब अनिष्ट-अर्थ है। इसलिये जितना भी कर्म और उसका फल है उसे ज्ञानी पुरुष नहीं चाहता है।


यत्पुनः कश्चिदिष्टार्थोऽनिष्टार्थः कश्चिदर्थसात ।
तत्सर्वं दृष्टिदोषत्वात् पीतशंखावलोकवत ॥565॥

अर्थ: और जो प्रयोजन वश कोई पदार्थ इष्ट मान लिया जाता है अथवा कोई पदार्थ अनिष्ट मान लिया जाता है वह सब मानना दृष्टि ( दर्शन ) दोषसे है । जिसप्रकार दृष्टि ( नेत्र ) दोषसे सफेद शंख भी पीला ही दीखता है उसी प्रकार मोह बुद्धिसे कर्मोदय प्राप्त पदार्थोंमें यह मोही जीव इष्टानिष्ट बुद्धि करता है । वास्तवमें कर्मोदयसे होनेवाला सभी अनिष्ट ही है ।


दृङ्मोहस्यात्यये दृष्टिः साक्षात् सूक्ष्मार्थदर्शिनी ।
तस्याऽनिष्टेऽस्त्यनिष्टार्थबुद्धिः कर्मफलात्मके ॥566॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके नाश हो जाने पर साक्षात् सूक्ष्मपदार्थोंको देखनेवाली दृष्टि ( दर्शन ) होजाती है । फिर सम्यग्दृष्टिकी, कर्मके फल स्वरूप अनिष्ट पदार्थोंमें अनिष्ट पदार्थ रूपा ही बुद्धि होती है ।


नचाऽसिद्धमनिष्टत्वं कर्मणस्तत्फलस्य च ।
सर्वतो दुःखहेतुत्वाद्युक्तिस्वानुभवागमात् ॥567॥

अर्थ: कर्म और कर्मका फल अनिष्ट है, यह बात असिद्ध नहीं है क्योंकि जितना मी कर्म और कर्मका फल है सभी सर्वदा दुःखका ही कारण है । यह बात युक्ति, स्वानुभव और आगमसे प्रसिद्ध है ।


अनिष्टफलवत्त्वात् स्यादनिष्टार्था व्रतक्रिया ।
दुष्टकार्यानुरूपस्य हेतोर्दुष्टोपदेशवत् ॥568॥

अर्थ: जितनी भी व्रत–क्रिया हैं सब अनिष्टार्थ हैं क्योंकि अनिष्ट फल वाली हैं। जिस प्रकार दुष्ट पुरुषका उपदेश दुष्ट–कार्यको पैदा करता है, उसी प्रकार यह भी दुष्ट–कार्यको उत्पन्न करने वाली हैं।


अथाऽसिद्धं स्वतन्त्रत्वं क्रियायाः कर्मणः फलात् ।
कृते कर्मोदयाद्धेतोस्तस्याश्चाऽसंभवो यतः ॥569॥

अर्थ: पहले यह शंका की गई थी कि क्रिया स्वतन्त्र होती है, उसका कर्ता सम्यग्दृष्टि है ? सो वास्तवमें ठीक नहीं है। क्रिया कर्मके फलसे होती हैं अथवा कर्मका फल है। इसलिये क्रियाको स्वतन्त्र बतलाना असिद्ध है क्योंकि कर्मोदयरूप हेतुके विना क्रियाका होना ही असंभव है।


यावदक्षीणमोहस्य क्षीणमोहस्य चाऽऽत्मनः ।
यावत्यस्ति क्रिया नाम तावत्यौदयिकी स्मृता ॥570॥

अर्थ: जिस आत्माका मोह क्षीण होगया है अथवा जिसका क्षीण नहीं हुआ है, दोनों ही की जितनी भी क्रिया हैं सभी औदयिकी अर्थात् कर्मके उदयसे होनेवाली हैं।


पौरुषो न यथाकामं पुंसः कर्मोदितं प्रति ।
न परं पौरुषापेक्षो दैवापेक्षो हि पौरुषः ॥571॥

अर्थ: पुरुषका पुरुषार्थ कर्मोदयके प्रति भर सक उपयुक्त नहीं होता, और पुरुषार्थ केवल पुरुषार्थसे भी नहीं होता किन्तु दैव ( कर्म ) से होता है ।


सिद्धो निष्कांक्षितो ज्ञानी कुर्वाणोप्युदितां क्रियाम् ।
निष्कामतः कृतं कर्म न रागाय विरागिणाम् ॥572॥

अर्थ: यह वात सिद्ध हुई कि सम्यग्ज्ञानी उदयरूपा क्रियाको करता हुआ भी निःकांक्षित है अर्थात् आकांक्षा रहित है । विरागियोंका विना इच्छाके किया हुआ कर्म रागके लिये नहीं होता है ।


नाशंक्यं चास्ति निःकांक्षः सामान्योपि जनः कश्चित् ।
हेतोः कुतश्चिदन्यत्र दर्शनातिशयादपि ॥573॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनके अतिशय रूप हेतुको छोड़ कर कहीं दूसरी जगह सामान्य आदमी भी आकांक्षा रहित हो जाता है ? ऐसी आशंका नहीं करना चाहिये।


यतो निष्कांक्षता नास्ति न्यायात्सद्दर्शनं विना ।
नानिच्छास्त्यक्षजे सौख्ये तदत्यक्षमनिच्छतः ॥574॥

अर्थ: क्योंकि विना सम्यग्दर्शनके हुए निष्कांक्षता हो ही नहीं सकती है, यह न्याय सिद्ध है क्योंकि जो अतीन्द्रिय सुखको नहीं चाहता है उसकी इन्द्रियजन्य सुखमें अनिच्छा भी नहीं होती है ।


तदत्यक्षसुखं मोहान्मिथ्यादृष्टिः स नेच्छति ।
दृङ्मोहस्य तथा पाकः शक्तेः सद्भावतोऽनिशम् ॥575॥

अर्थ: उस अतीन्द्रिय सुखको मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि नहीं चाहता है क्योंकि शक्तिका सद्भाव होनेसे दर्शन मोहनीयका निरन्तर पाक ही वैसा होता रहता है।


उक्तो निष्कांक्षितो भावो गुणः सद्दर्शनस्य वै ।
सस्तु का नः क्षतिः प्राक्चेत्परीक्षा क्षमता मता ॥576॥

अर्थ: निष्कांक्षित भाव कहा जाचुका, यह सम्यग्दृष्टिका ही गुण है ऐसा क़हनेमें हमारी कोई हानि नहीं हैं यह परीक्षा सिद्ध वात है।


अथ निर्विकित्साख्यो गुणः संलक्ष्यते स यः ।
अद्दर्शनगुणस्योच्चैर्गुणो युक्तिवशादपि ॥577॥

अर्थ: अब निर्विकित्सा नामक गुण कहा जाता है । जो कि युक्ति द्वारा भी सम्यग्दृष्टिका ही एक उन्नत गुण समझा गया है ।


आत्मन्यात्मगुणोत्कर्षबुद्धयां स्वात्मप्रशंसनात् ।
परत्राप्यपकर्षेषु बुद्धिर्विचिकित्सा स्मृता ॥578॥

अर्थ: अपनेमें अधिक गुण समझकर अपनी प्रशंसा करना और दूसरोंको हीनता सिद्ध करनेकी बुद्धि रखना विचिकित्सा मानी गई है ।


निष्क्रान्तो विचिकित्सायाः प्रोक्तो निर्विचिकित्सकः ।
गुणः सद्दर्शनस्योच्चैर्वक्ष्ये तल्लक्षणं यथा ॥579॥

अर्थ: उपर्युक्त कही हुई विचिकित्सासे रहित जो भाव है वही निर्विचिकित्सा गुण कहा गया है । वह सम्यग्दृष्टिका उत्तम गुण है, उसका लक्षण कहा जाता है -


दुर्दैवाद्दुःखिते पुंसि तीव्राऽसाताघृणास्पदे ।
यन्नादयापरं चेतः स्मृतो निर्विचिकित्सकः ॥580॥

अर्थ: जो पुरुष खोटे कर्मके उदयसे दुखी हो रहा है, और तीव्र असातावेदनीयक जो निन्द्यस्थान बन रहा है ऐसे पुरुषके विषयमें चित्तमें अदयाबुद्धि नहीं होना वही निर्विचिकित्सा गुण कहा गया है ।


नैतत्तन्मनस्यज्ञानमस्म्यहं सम्पदां पदम् ।
नासावस्मत्समो दीनो वराको विपदां पदम् ॥581॥

अर्थ: इस प्रकारका मनमें अज्ञान नहीं होना चाहिये कि मैं सम्पत्तियोंका घर हूँ और यह विचारा दीन विपत्तियोंका घर है, यह मेरे समान नहीं हो सका ।


प्रत्युत ज्ञानमेवैतत्तत्र कर्मविपाकजाः ।
प्राणिनः सदृशाः सर्वे त्रसस्थावरयोनयः ॥582॥

अर्थ: उपर्युक्त अज्ञान न होकर ऐसा ज्ञान होना चाहिये कि कर्मके उदयसे सभी त्रस, स्थावर योनिवाले प्राणी समान हैं ।


यथा द्वावर्भकौ जातौ शूद्रिकायास्तथोदरात् ।
शूद्रावभ्रान्तितस्तौ द्वौ कृतो भेदो भ्रमात्मना ॥583॥

अर्थ: जिस प्रकार शूद्रीके गर्भसे दो बालक पैदा हुए। वास्तवमें वे दोनों ही निर्भ्रान्तरीतिसे शूद्र हैं, परन्तु भ्रमात्मा उनमें भेद समझने लगता है।


जले जम्वालवज्जीवे यावत्कर्माशुचि स्फुटम् ।
अहंता चाऽविशेषाद्वा नूनं कर्ममलीमसः ॥584॥

अर्थ: जलमें काईकी तरह इस जीवमें जब तक अपवित्र कर्मका सम्बन्ध है, तब तक इस कर्म-मलीन आत्माके सामान्य रीतिसे अहं बुद्धि लगी हुई है। अर्थात् इतर पदार्थोंमें इसने आपा मान रक्खा है।


अस्ति सद्दर्शनस्यासौ गुणो निर्विचिकित्सकः ।
यतोऽवश्यं स तत्रास्ति तस्मादन्यत्र न क्वचित् ॥585॥

अर्थ: यह निर्विचिकित्सा - गुण सम्यग्दृष्टिका ही गुण है। क्योंकि सम्यग्दृष्टिमें वह अवश्य है। सम्यग्दृष्टिसे अतिरिक्त कहीं नहीं पाया जाता है।


कर्मपर्यायमात्रेषु रागिणः स कुतो गुणः ।
सद्विशेषेऽपि सम्मोहाद्द्वयोरैक्योपलब्धितः ॥586॥

अर्थ: जड़ और चैतन्यमें परस्पर विशेषता होनेपर भी मोहसे दोनोंको एक समझने वाला-कर्मकी पर्यायमात्रमें जो रागी होरहा है, उसके वह निर्विचिकित्सा गुण कहांसे हो सक्ता है ?


इत्युक्तो युक्तिपूर्वोसौ गुणः सद्दर्शनस्य यः ।
नाविवक्षो हि दोषाय विवक्षो न गुणाप्तये ॥587॥

अर्थ: इस प्रकार युक्तिपूर्वक- निर्विचिकित्सा गुण सम्यग्दृष्टिका कहा गया है । यदि यह गुण न कहा जाय तो कोई दोष नहीं होसक्ता, और कहनेपर कोई विशेष लाभ नहीं है ।


अस्ति चामूढदृष्टिः सा सम्यग्दर्शनशालिनी ।
ययालंकृतवपुष्येतद्भाति सद्दर्शनं नरि ॥588॥

अर्थ: अमूढदृष्टि गुण भी सम्यग्दर्शन सहित ही होता है। अमूढदृष्टि गुणसे विभूषित आत्मामें यह सम्यग्दर्शन शोभायमान होता है।


अतत्त्वे तत्त्वश्रद्धानं मूढदृष्टिः स्वलक्षणात् ।
नास्ति सा यस्य जीवस्य विख्यातः सोस्त्यमूढदृक् ॥589॥

अर्थ: अतत्त्वमें तत्त्व - श्रद्धान करना, मूढ़दृष्टि कहलाती है। मूढ़ जो दृष्टि वह मूढ़दृष्टि, ऐना मूढ़दृष्टि शब्दसे ही स्पष्टार्थ है । जिस जीवके ऐसी मूढ़ - दृष्टि नहीं है वह अमूढ़दृष्टि प्रसिद्ध है ।


अस्त्यसद्धेतुदृष्टान्तैर्मिथ्याऽर्थः साधितोऽपरैः ।
नाप्यलं तत्र मोहाय दृङ्मोहस्योदयक्षतेः ॥590॥

अर्थ: दूसरे मतवालोंसे मिथ्या हेतु और दृष्टातों द्वारा मिथ्या ( विपरीत ) पदार्थ सिद्ध किया है । वह मिथ्यापदार्थ, मोहनीय कर्मके क्षय होनेसे सम्यग्दृष्टिमें मोह (विपरीतता) पैदा करनेके लिये समर्थ नहीं है ।


सूक्ष्मान्तरितदूरार्थे दर्शितेऽपि कुदृष्टिभिः ।
नाल्पश्रुतः स मुह्येत किं पुनश्चेद्बहुश्रुतः ॥591॥

अर्थ: सूक्ष्म, अन्तरित तथा दूरवर्ती पदार्थोंको मिथ्यादृष्टि पुरुष यदि विपरीत रीतिसे दिखाने लगें तो जो थोड़े शास्त्रका जाननेवाला है वह भी मोहित नहीं होता है । यदि बहुत शास्त्रोंका पाठी हो तो फिर क्या है ? अर्थात् बहुश्रुत किसी प्रकार धोखेमें नहीं आ सक्ता है ।


अर्थाभासेऽपि तत्रोच्चैः सम्यग्दृष्टेर्न मूढता ।
सूक्ष्मानन्तरितोपात्तमिथ्यार्थस्य कुतो भ्रमः ॥592॥

अर्थ: जहां कहीं अर्थ - आभास भी हो वहां भी सम्यग्दृष्टि मूढ़ नहीं होता है। तो फिर आगम प्रसिद्ध सूक्ष्म अन्तरित और दूरार्थ मिथ्या बतलाये हुए पदार्थोंमें सम्यग्दृष्टिको कैसे भ्रम हो सक्ता है ?


तद्यथा लौकिकी रूढिरस्ति नाना विकल्पसात् ।
निःसारैराश्रिता पुम्भिरथाऽनिष्टफलप्रदा ॥593॥

अर्थ: लौकिकी रूढ़ि नाना विकल्पोंसे होती है अर्थात् अनेक मिथ्या विचारोंसे की जाती है। निस्सार पुरुष उसे करते रहते हैं। लोकरूढ़ि सदा अनिष्ट फलको ही देती है।


अफलाऽनिष्टफला हेतुशून्या योगापहारिणी ।
दुस्त्याज्या लौकिकी रूढिः कैश्चिदुष्कर्मपाकतः ॥594॥

अर्थ: लोकमें प्रचलित रूढ़ि फल शून्य है, अथवा अनिष्ट फलवाली है, हेतु शून्य है और योगका नाश करनेवाली है । खोटे कर्मके उदयसे कोई २ पुरुष इस लोकरूढ़िको छोड़ भी नहीं सकते हैं ।


अदेवे देवबुद्धिः स्यादधर्मे धर्मधीरिह ।
अगुरौ गुरुबुद्धिर्या ख्याता देवादिमूढता ॥595॥

अर्थ: अदेवमें देवबुद्धिका होना, अधर्ममें धर्मबुद्धिका होना, अगुरुमें गुरुबुद्धिका होना ही देवमूढ़ता कही गई है ।


कुदेवाराधनं कुर्यादैहिकश्रेयसे कुधीः ।
मृषालोकोपचारत्वादश्रेया लोकमूढता ॥596॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि सांसारिक सुखके लिये कुदेवोंका आराधन-पूजन करता है। ऐसा करना मिथ्या लोकाचार है, इसीका नाम लोकमूढ़ता है, लोकमूढ़ता महा - अहितकर है।


अस्ति श्रद्धानमेकेषां लोकमूढवशादिह ।
धनधान्यप्रदा नूनं सम्यगाराधिताऽम्बिका ॥597॥

अर्थ: लोकमूढतावश किन्हीं २ पुरुषोंको ऐसा श्रद्धान हो रहा है कि भले प्रकार आराधना की हुई अम्बिका देवी ( चण्डी - मुण्डी आदि ) निश्चयसे धन धान्य - सम्पत्तियोंको देवेगी।


अपरेऽपि यथाकामं देवमिच्छन्ति दुर्धियः ।
सदोषानपि निर्दोषानिव प्रज्ञाऽपराधतः ॥598॥

अर्थ: और भी बहुतसे मिथ्या-बुद्धिवाले पुरुष इच्छानुसार देवोंको मानते हैं। वे बुद्धिके दोष ( अज्ञानता )से सदोषियोंको भी निर्दोषीकी तरह मान बैठते हैं।


नोक्तस्तेषां समुद्देशः प्रसङ्गादपि सङ्गतः ।
लब्धवर्णो न कुर्याद्वै निःसारं ग्रन्थविस्तरम् ॥599॥

अर्थ: उन मिथ्या - विचारवालोंका विशेष उद्देश्य ( अधिक वर्णन ) प्रसंगवश भी विस्तारभयसे नहीं कहा है क्योंकि जिसको बहुतसे शब्द मिल भी जावें वह भी व्यर्थ ग्रन्थविस्तारको नहीं करेगा, अर्थात् कुदेवके स्वरूपके कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ।


अधर्मस्तु कुदेवानां यावानाराधनोद्यमः ।
तैः प्रणीतेषु धर्मेषु चेष्टा वाक्कायचेतसाम् ॥600॥

अर्थ: कुदेवोंकी आराधना करनेका जितना भी उद्यम है, तथा उनके द्वारा कहे हुए धर्मोंमें मन, वचन, कायका जो व्यापार है वह सभी अधर्म कहलाता है ।

उत्तरार्द्ध 601 से 700 (श्लोक 601 से 687)

कुगुरुः कुत्सिताचारः सशल्यः सपरिग्रहः ।
सम्यक्त्वेन व्रतेनापि युक्तः स्यात्सद्गुरुर्यतः ॥601॥

अर्थ: जिसका निन्द्य ( मलीन ) आचरण है, जिसके माया, मिथ्या, निदान-शल्य लगी हुई हैं, और जो परिग्रह सहित है वह कुगुरु है, तथा जो सम्यग्दर्शन और व्रत सहित है वह सद्गुरु है ।


अत्रोद्देशोऽपि न श्रेयान् सर्वतोतीव विस्तरात् ।
आदेयो विधिरत्रोक्तो नादेयोनुक्त एव सः ॥602॥

अर्थ: कुधर्म और कुगुरुके विषयमें भी अधिक लिखना लाभकारी नहीं है । क्योंकि इनका पूरा स्वरूप लिखनेसे अत्यन्त ग्रन्थ-विस्तार होनेका डर है । इसलिये इस ग्रन्थमें जो विधि कही गई है, वही ग्रहण करने योग्य है, और जो यहां नहीं कही गई है वह त्यागने योग्य समझना चाहिये ।


दोषो रागादिसद्भावः स्यादावरणकर्म तत् ।
तयोरभावोऽस्ति निःशेषो यत्रासौ देव उच्यते ॥603॥

अर्थ: रागादिक वैकारिक भाव और ज्ञानावरणादिक कर्म, दोष कहलाते हैं। उनका जिस आत्मामें सम्पूर्णतासे अभाव हो चुका है, वही देव कहा जाता है।


अस्त्यत्र केवलं ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं सुखम् ।
वीर्यं चेति सुविख्यातं स्यादनन्तचतुष्टयम् ॥604॥

अर्थ: उस देवमें केवलज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक सुख और क्षायिकवीर्य यह प्रसिद्ध अनन्त चतुष्टय प्रकट हो जाता है ।


एको देवः स सामान्याद् द्विधावस्था विशेषतः ।
संख्येया नाम सन्दर्भाद् गुणेभ्यः स्यादनन्तधा ॥605॥

अर्थ: सामान्य रीतिसे देव एक प्रकार है, अवस्था विशेषसे दो प्रकार है, विशेष रचना ( कथन ) की अपेक्षासे संख्यात प्रकार है, और गुणोंकी अपेक्षासे अनन्त प्रकार है।


एको यथा सद्द्रव्यार्थात्सिद्धेः शुद्धात्मलब्धितः ।
अर्हन्निति च सिद्धश्च पर्यायार्थाद्द्विधा मतः ॥606॥

अर्थ: सत् द्रव्यार्थ नयकी अपेक्षासे एक प्रकार ही देव है क्योंकि शुद्धात्माकी उपलब्धि (प्राप्ति) एक ही प्रकार है। पर्यायार्थिकनयसे अरहन्त और सिद्ध, ऐसे देवके दो भेद हैं।


दिव्यौदारिकदेहस्थो धौतघातिचतुष्टयः ।
ज्ञानदृग्वीर्यसौख्याढ्यः सोऽर्हन् धर्मोपदेशकः ॥607॥

अर्थ: जो दिव्य-औदारिक शरीरमें स्थित है, घाति कर्म चतुष्टयको धो चुका है, ज्ञान, दर्शन, वीर्य और सुखसे परिपूर्ण है और धर्मका उपदेश देनेवाला है, वह अरहन्त देव है ।


मूर्त्तिमद्देहनिर्मुक्तो मुक्तो लोकाग्रसंस्थितः ।
ज्ञानाद्यष्टगुणोपेतो निष्कर्मा सिद्धसंज्ञकः ॥608॥

अर्थ: जो मूर्तिमान् शरीरसे मुक्त हो चुका है, सम्पूर्ण कर्मोंसे छूट चुका है, लोकके अग्रभाग ( सिद्धालय ) में स्थित है, ज्ञानादिक आठ गुण सहित है और कर्ममलकलंकसे रहित है वह सिद्ध देव है ।


अर्हन्निति जगत्पूज्यो जिनः कर्मारिशातनात् ।
महादेवोधिदेवत्वाच्छङ्करोपि सुखावहात् ॥609॥

अर्थ: जो दिव्य-औदारिक शरीरमें स्थित है, घाति कर्म चतुष्टयको धो चुका है, ज्ञान, दर्शन, वीर्य और सुखसे परिपूर्ण है और धर्मका उपदेश देनेवाला है, वह अरहन्त देव है ।
जो मूर्तिमान् शरीरसे मुक्त हो चुका है, सम्पूर्ण कर्मोंसे छूट चुका है, लोकके अग्रभाग ( सिद्धालय ) में स्थित है, ज्ञानादिक आठ गुण सहित है और कर्ममलकलंकसे रहित है वह सिद्ध देव है ।
वह देव जगत्पूज्य है इसलिये अरहन्त कहलाता है, कर्म रूपी शत्रुको जीतनेवाला है इसलिये जिन कहलाता है, सम्पूर्ण देवोंका स्वामी है इसलिये महादेव कहलाता है, सुख देनेवाला है, इसलिये शंकर कहलाता है, ज्ञानद्वारा सम्पूर्ण पदार्थोंमें फैला हुआ है इसलिये कथंचित् विष्णु ( व्यापक ) कहलाता है, आत्माको पहचाननेवाला है इसलिये ब्रह्मा कहलाता है, और दुःखको दूर करनेवाला है इसलिये हरि कहलाता है । इत्यादि रीतिसे वह देव अनेक नामोंवाला है । तथापि अपने देवत्व लक्षणकी अपेक्षासे वह एक ही है । अनेक नहीं है । क्योंकि अनन्तगुणात्मक एक ही ( समान ) आत्मद्रव्य प्रसिद्ध है ।
और भी चौबीस तीर्थंकर आदि अनेक भेद हैं तथा गुणोंकी अपेक्षा अनन्त भेद हैं । ये सब भेद ( बहुपना ) किसी प्रकार दोषोत्पादक नहीं हैं क्योंकि सभी देवभेदोंमें देवत्वगुण एक प्रकार ही है ।


विष्णुर्ज्ञानेन सर्वार्थविस्तृत्त्वात्कथञ्चन ।
ब्रह्म ब्रह्मज्ञरूपत्वाद्धरिर्दुःखापनोदनात् ॥610॥

अर्थ: जो दिव्य-औदारिक शरीरमें स्थित है, घाति कर्म चतुष्टयको धो चुका है, ज्ञान, दर्शन, वीर्य और सुखसे परिपूर्ण है और धर्मका उपदेश देनेवाला है, वह अरहन्त देव है ।
जो मूर्तिमान् शरीरसे मुक्त हो चुका है, सम्पूर्ण कर्मोंसे छूट चुका है, लोकके अग्रभाग ( सिद्धालय ) में स्थित है, ज्ञानादिक आठ गुण सहित है और कर्ममलकलंकसे रहित है वह सिद्ध देव है ।
वह देव जगत्पूज्य है इसलिये अरहन्त कहलाता है, कर्म रूपी शत्रुको जीतनेवाला है इसलिये जिन कहलाता है, सम्पूर्ण देवोंका स्वामी है इसलिये महादेव कहलाता है, सुख देने वाला है, इसलिये शंकर कहलाता है, ज्ञानद्वारा सम्पूर्ण पदार्थोंमें फैला हुआ है इसलिये कथंचित् विष्णु ( व्यापक ) कहलाता है, आत्माको पहचाननेवाला है इसलिये ब्रह्मा कहलाता है, और दुःखको दूर करनेवाला है इसलिये हरि कहलाता है । इत्यादि रीतिसे वह देव अनेक नामोंवाला है । तथापि अपने देवत्व लक्षणकी अपेक्षासे वह एक ही है । अनेक नहीं है । क्योंकि अनन्तगुणात्मक एक ही ( समान ) आत्मद्रव्य प्रसिद्ध है ।
और भी चौबीस तीर्थंकर आदि अनेक भेद हैं तथा गुणोंकी अपेक्षा अनन्त भेद हैं । ये सब भेद ( बहुपना ) किसी प्रकार दोषोत्पादक नहीं हैं क्योंकि सभी देवभेदोंमें देवत्वगुण एक प्रकार ही है ।


इत्याद्यनेकनामापि नानेकोऽस्ति स्वलक्षणात् ।
यतोऽनन्तगुणात्मैकद्रव्यं स्यात्सिद्धसाधनात् ॥611॥

अर्थ: इत्यादि रीतिसे वह देव अनेक नामोंवाला है । तथापि अपने देवत्व लक्षणकी अपेक्षासे वह एक ही है । अनेक नहीं है । क्योंकि अनन्तगुणात्मक एक ही ( समान ) आत्मद्रव्य प्रसिद्ध है ।


चतुर्विंशतिरित्यादि यावदन्तमनन्तता ।
तद्बहुत्वं न दोषाय देवत्वैकविधत्वतः ॥612॥

अर्थ: और भी चौवीस तीर्थंकर आदि अनेक भेद हैं तथा गुणोंकी अपेक्षा अनन्त भेद हैं । ये सब भेद ( बहुपना ) किसी प्रकार दोषोत्पादक नहीं हैं क्योंकि सभी देवभेदोंमें देवत्वगुण एक प्रकार ही है ।


प्रदीपानामनेकत्वं न प्रदीपत्वहानये ।
यतोऽत्रैकविधत्वं स्यान्न स्यान्नानाप्रकारता ॥613॥

अर्थ: जिस प्रकार दीपकोंकी अनेक संख्या भी दीपत्व बुद्धिको दूर नहीं करसकी है ? उसी प्रकार देवोंकी अनेक संख्या भी देवत्व बुद्धिको दूर नहीं कर सकी है । क्योंकि सभी दीपोंमें और सभी देवोंमें दीपत्व गुण और देवत्व गुण एकसा ही है । वास्तवमें अनेक प्रकारता नहीं है । अर्थात् वास्तवमें भेद नहीं है,


न चाशंक्यं यथासंख्यं नामतोऽस्यास्त्यनंतधा ।
न्यायादेकं गुणं चैकं प्रत्येकं नाम चैककम् ॥614॥

अर्थ: क्रमसे उसके अनन्त नाम हैं ऐसी भी आशंका नहीं करना चाहिये क्योंकि वास्तवमें एक गुणकी अपेक्षा एक नाम कहा जाता है ।


नयतः सर्वतो मुख्यसंख्या तस्यैव संभवात् ।
अधिकस्य ततो वाच्यं व्यवहारस्य दर्शनात् ॥615॥

अर्थ: सबसे अधिक संख्या गुणकी अपेक्षासे ही होसक्ती है । परन्तु यह सब कथन भयकी अपेक्षासे है । इसलिये जैसा जैसा अधिक व्यवहार दीखता जाय उसी २ तरहसे नाम लेना चाहिये ।


वृद्धैः प्रोक्तमतःसूत्रे तत्त्वं वागतिशायि यत् ।
द्वादशाङ्गाङ्गवाह्यं वा श्रुतं स्थूलार्थगोचरम् ॥616॥

अर्थ: इसीलिये वृद्ध ( ज्ञानवृद्ध - आचार्य ) पुरुषोंने सूत्रद्वारा तत्त्वको वचनके अगम्य बतलाया है । जो द्वादशाङ्ग अथवा अंगबाह्य श्रुतज्ञान है, वह केवल स्थूल - पदार्थको विषय करनेवाला है ।


कृत्स्नकर्मक्षयाज्ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं पुनः ।
अत्यक्षं सुखमात्मोत्थं वीर्यश्चेति चतुष्टयम् ॥617॥

अर्थ: सम्पूर्ण कर्मोंके क्षय होनेसे क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, अतीन्द्रिय सुख, आत्मासे उत्पन्न वीर्य, इस प्रकार चतुष्टय तो यह, और सम्यक्त्व, सूक्ष्मत्व, अव्यावाधगुण, तथा अगुरुलघुत्व, ये आठ स्वाभाविक गुण सिद्धदेवके हैं ।


सम्यक्त्वं चैव सूक्ष्मत्वमव्यावाधगुणः स्वतः ।
अस्त्यगुरुलघुत्वं च सिद्धेचाष्टगुणाः स्मृताः ॥618॥

अर्थ: सम्पूर्ण कर्मोंके क्षय होनेसे क्षायिक ज्ञान, क्षायिक दर्शन, अतीन्द्रिय सुख, आत्मासे उत्पन्न वीर्य, इस प्रकार चतुष्टय तो यह, और सम्यक्त्व, सूक्ष्मत्व, अव्यावाधगुण, तथा अगुरुलघुत्व, ये आठ स्वाभाविक गुण सिद्धदेवके हैं ।


इत्याद्यनन्तधर्माढ्यो कर्माष्टकविवर्जितः ।
मुक्तोऽष्टादशभिर्दोषैर्देवः सेव्यो न चेतरः ॥619॥

अर्थ: इत्यादि अनन्त धर्मोको धारण करनेवाला आठों कर्मोंसे रहित. अठारह दोषोंसे रहित, देव पूजने योग्य है । जिसमें उपर्युक्त गुण नहीं पाये जाते वह नहीं पूजने योग्य है ।


अर्थाद्गुरुः स एवास्ति श्रेयो मार्गोपदेशकः
आप्तश्चैव स्वतः साक्षान्नेता मोक्षस्य वर्त्मनः ॥620॥

अर्थ: अर्थात् वही देव सचा गुरु है, वही मोक्ष मार्गका उपदेश देनेवाला है वही आप्त है, और वही मोक्ष मार्गका साक्षात् नेता ( प्राप्त कराने वाला ) है ।


तेभ्योर्वागपि छद्मस्थरूपास्तद्रूपधारिणः ।
गुरवःस्युर्गुरोर्न्यायान्नान्योऽवस्था विशेषभाक् ॥621॥

अर्थ: उन गुरुओंसे नीचे भी जो अल्पज्ञ हैं, परन्तु उसी वेशको लिये हुए हैं; वे भी गुरु हैं। गुरुका लक्षण उनमें भी वैसा ही है, और कोई अवस्थाविशेषवाला नहीं है।


अस्त्यवस्थाविशेषोत्र युक्तिस्वानुभवागमात् ।
शेषः संसारिजीवेभ्यस्तेषामेवातिशायनात् ॥622॥

अर्थ: गुरुओंमें संसारीजीवोंसे कोई अवस्था-विशेष है यह बात युक्ति अनुभव और आगमसे प्रसिद्ध है । उनमें संसारियोंसे विशेष अतिशय है ।


भाविनैगमनयायत्तो भूष्णुस्तद्वानिवेष्यते ।
अवश्यं भावतो व्याप्तेः सद्भावात् सिद्धसाधनम् ॥623॥

अर्थ: भावि नैगम नयकी अपेक्षासे जो होनेवाला है, वह हुआ सा ही समझा जाता है। भाव ( गुण ) की व्याप्तिका सद्भाव होनेसे यह बात सिद्ध हो जाती है, अर्थात् जो गुण अरहन्तमें हैं वे ही गुण एक देशसे ( अंशरूपसे ) छद्मस्थ गुरुओंमें भी मौजूद हैं।


अस्ति सद्दर्शनं तेषु मिथ्याकर्मोपशान्तितः ।
चारित्रं देशतः सम्यक्चारित्रावरणक्षतेः ॥624॥

अर्थ: उन छद्मस्थ गुरुओंमें भो मिथ्यात्व कर्मके उपशम होनेसे सम्यग्दर्शन गुण प्रकट हो चुका है और चारित्र मोहनीय कर्मका ( अनन्तानुबंधि, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन कषायोंका ) क्षय होनेसे एकदेश सम्यक्चारित्र भी प्रकट हो चुका है।


ततः सिद्धं निसर्गाद्वै शुद्धत्वं हेतुदर्शनात् ।
मोहकर्मोदयाभावात्तत्कार्यस्याप्यसंभवात् ॥625॥

अर्थ: इसलिये स्वभावसे ही उन गुरुओंमें शुद्धता पाई जाती है यह वात हेतुद्वारा सिद्ध हो चुकी क्योंकि मोहनीय कर्मके उदयका अभाव होनेसे उसका कार्य भी असंभव है ।


तच्छुद्धत्वं सुविख्यातं निर्जराहेतुरञ्जसा ।
निदानं संवरस्यापि क्रमान्निर्वाणभागपि ॥626॥

अर्थ: वह शुद्धता निर्जराका समर्थ कारण है यह बात सुप्रसिद्ध है तथा संवरका भी कारण है और क्रमसे मोक्ष-प्राप्त करानेवाली भी है ।


यद्वा स्वयं तदेवार्थान्निर्जरादित्रयं यतः ।
शुद्धभावाविनाभावि द्रव्यनामापि तत्त्रयम् ॥627॥

अर्थ: अथवा वह शुद्धता ही स्वयं निर्जरा, संवर और मोक्ष है। क्योंकि शुद्ध भावोंका अविनाभावी जो आत्मद्रव्य है वही निर्जरा, संवर और मोक्ष है।


निर्जरादिनिदानं यः शुद्धो भावश्चिदात्मनः ।
परमार्हः स एवास्ति तद्वानात्मा परं गुरुः ॥628॥

अर्थ: जो निर्जरादिकका कारण आत्माका शुद्ध भाव है वही परम पूज्य है और उस शुद्ध भावको धारण करनेवाला आत्मा ही परम गुरु है ।


न्यायाद्गुरुत्वहेतुः स्यात् केवलं दोषसंक्षयः ।
निर्दोषो जगतः साक्षी नेता मार्गस्य नेतरः ॥629॥

अर्थ: न्याय रीतिसे गुरुत्व ( गुरुपने ) का कारण केवल दोषोंका भले प्रकार क्षय होना है, निर्दोष ही जगत्का जाननेवाला ( सर्वज्ञ ) है और वही मार्ग ( मोक्षमार्ग ) का नेता अर्थात् प्राप्त करानेवाला है। जो निर्दोष नहीं है वह न सर्वज्ञ हो सक्ता है, और न मोक्षको प्राप्त करनेवाला तथा करानेवाला ही हो सक्ता है।


नालं छद्मस्थताप्येषा गुरुत्वक्षतये मुनेः ।
रागाद्यशुद्धभावानां हेतुर्मोहैककर्म तत् ॥630॥

अर्थ: यह मुनि ( गुरु ) की अल्पज्ञता भी गुरुपनेको दूर करनेके लिये समर्थ नहीं है क्योंकि गुरुताको दूर करनेवाले रागादिक अशुद्ध भाव हैं, और उनका एक मात्र हेतु मोहनीय कर्म है ।


नन्वावृतिद्वयं कर्म वीर्यविध्वंसि कर्म च ।
अस्ति तत्राप्यवश्यं वै कुतः शुद्धत्वमत्र चेत् । ॥631॥

अर्थ: शङ्काकार कहता है कि ज्ञानावरण, दर्शनावरण और वीर्यको नाश करनेवाला अन्तराय कर्म, अभी छद्मस्थ गुरुओंमें मौजूद है, इसलिये उनमें शुद्धता कहांसे आई ?


सत्यं किन्तु विशेषोऽस्ति प्रोक्तकर्मत्रयस्य च ।
मोहकर्माविनाभूतं बन्धसत्त्वोदयक्षयम् ॥632॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि अभी ज्ञानावरण आदि तीन घातिया कर्म छद्मस्थ गुरुओंमें मौजूद हैं । किन्तु इतनी विशेषता है कि ज्ञानावरण आदि कहे हुए तीनों कर्मोंका वन्ध, सत्त्व, उदय और क्षय, मोहनीय कर्मके साथ अविनाभावी है ।


तद्यथा वध्यमानेऽस्मिंस्तद्वन्धो मोहवन्धसात् ।
तत्सत्त्वे सत्त्वमेतस्य पाके पाकः क्षये क्षयः ॥633॥

अर्थ: मोहनीय कर्मके बन्ध होने पर ही उसीके आधीन ज्ञानावरणादि बन्धयोग्य प्रकृतियोंका बन्ध होता है, मोहनीय कर्मके सत्त्व रहने पर ही ज्ञानावणादि कर्मोंका सत्त्व रहता है, मोहनीय कर्मके पकने पर ही ज्ञानावरणादि पकते हैं और मोहनीय कर्मके क्षय होने पर ही ज्ञानावरणादि नष्ट हो जाते हैं।


नोह्यं छद्मस्थावस्थायामर्वागेवास्तु तत्क्षयः ।
अंशान्मोहक्षयस्यांशात्सर्वतः सर्वतः क्षयः ॥634॥

अर्थ: छद्मस्थ अवस्थामें, मोहनीय कर्मका ज्ञानावरणादिसे पहले ही क्षय होजाता है, ऐसी आशंका भी नहीं करना चाहिये क्योंकि अंशरूपसे मोहनीयका क्षय होनेसे ज्ञानावरणादिका अंश रूपसे क्षय हो जाता है, और मोहनीयका सर्वथा क्षय होनेसे ज्ञानावरणादिका भी सर्वथा क्षय होजाता है।


नासिद्धं निर्जरातत्त्वं सद्दृष्टेः कृत्स्नकर्मणाम् ।
आदृङ्मोहोदयाभावात्तच्चासंख्यगुणं क्रमात् ॥635॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिके सम्पूर्ण कर्मोंकी निर्जरा होना असिद्ध नहीं है किन्तु दर्शन मोहनीय कर्मका उदयाभाव होनेसे वह क्रमसे असंख्यात गुणी २ होती चली जाती है।


ततः कर्मत्रयं प्रोक्तमस्ति यद्यपि साम्प्रतम् ।
रागद्वेषविमोहानामभावाद्गुरुता मता ॥636॥

अर्थ: इसलिये छद्मस्थ गुरुओंमें यद्यपि अभी ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्म मौजूद हैं तथापि राग, द्वेष, मोहका अभाव होनेसे गुरूपना माना ही जाता है।


यथास्त्येकः स सामान्यात्तद्विशेषात्त्रिधा गुरुः ।
एकोप्यग्निर्यथा तार्णः पार्णो दार्व्यस्त्रिधोच्यते ॥637॥

अर्थ: सामान्य रीतिसे एक ही गुरु है और विशेष रीतिसे तीन प्रकार गुरु हैं। जैसे - अग्नि यद्यपि सामान्य रीतिसे एक ही है तथापि तिनकेकी अग्नि, पत्तेकी अग्नि और लकड़ीकी अग्नि, इस प्रकार एक ही अग्निके तीन भेद होजाते हैं।


आचार्यः स्यादुपाध्यायः साधुश्चेति त्रिधा मतः ।
स्युर्विशिष्टपदारूढास्त्रयोपि मुनिकुञ्जराः ॥638॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और साधु ( मुनि ) इस प्रकार तीन भेद हैं। ये तीनों ही मुनिवर विशेष विशेष पदों पर नियुक्त हैं अर्थात् विशेष २ पदोंके अनुसार ही आचार्य, उपाध्याय और साधु संज्ञा है ।


एको हेतुः क्रियाप्येका वेषश्चैको वहिः समः ।
तपो द्वादशधा चैकं व्रतं चैकं च पञ्चधा ॥639॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ - नग्न ) समान है, वारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न २ स्वरूप कहते हैं -


त्रयोदश विधं चापि चारित्रं समतैकधा ।
मूलोत्तरगुणाश्चैके संयमोप्येकधा मतः ॥640॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ-नग्न ) समान है, वारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न२ स्वरूप कहते हैं-


परीषहोपसर्गाणां सहनं च समं स्मृतम् ।
आहारादिविधिश्चैकश्चर्यास्थानासनादयः ॥641॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ - नग्न ) समान है, वारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न २ स्वरूप कहते हैं -


मार्गो मोक्षस्य सद्दृष्टिर्ज्ञानं चारित्रमात्मनः ।
रत्नत्रयं समं तेषामपि चान्तर्वहिस्स्थितम् ॥642॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ-नग्न ) समान है, वारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न २ स्वरूप कहते हैं -


ध्याता ध्यानं च ध्येयं च ज्ञाता ज्ञानं च ज्ञेयसात् ।
चतुर्धाऽऽराधना चापि तुल्या क्रोधादिजिष्णुता ॥643॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ-नग्न ) समान है, बारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न२ स्वरूप कहते हैं-


किंवात्र बहुनोक्तेन तद्विशेषोऽवशिष्यते ।
विशेषाच्छेदनिःशेषो न्यायादस्त्यविशेषभाक् ॥644॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु तीनोंका ही समान कारण है अर्थात् तीनों ही निष्परिग्रहता और कषायत्रयके जीतनेसे मुनि हुए हैं। क्रिया (आचरण) भी तीनोंकी समान है, वाह्य भेष भी ( निर्ग्रन्थ-नग्न ) समान है, वारह प्रकारका तप भी सबके समान है, पांच प्रकारका महाव्रत भी समान है, तेरह प्रकारका चारित्र भी समान है, समता भी समान है, अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तरगुण भी समान ही हैं, चारित्र भी समान है, परीषह और उपसर्गोंका सहन करना भी समान है, आहारादिक विधि भी सभीकी समान है। चर्या विधि भी समान है। स्थान आसन आदि भी समान हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र जो आत्मिक गुण तथा रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग है वह भी अन्तरंग और बाहरमें समान ही है, और भी ध्याता, ध्यान, ध्येय, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, चार आराधनायें (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप) क्रोधादि कषायोंका जीतना आदि सभी बातें एकसी हैं। इस विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इतना ही कहना बस होगा कि वही विशेष रह जाता है जोकि विशेषतासे दूर हो चुका है। अर्थात् न्यायानुसार तीनोंमें सर्वथा समानता है, कोई विशेषता नहीं है। अब तीनोंका भिन्न २ स्वरूप कहते हैं -


आचार्योऽनादितो रूढेर्योगादपि निरुच्यते ।
पञ्चाचारं परेभ्यः स आचरयति संयमी ॥645॥

अर्थ: आचार्य संज्ञा अनादिकालसे नियत है । पंच परमेष्ठियोंकी सत्ता अनादिकालीन है । यौगिक दृष्टिसे भी आचार्य उसे कहते हैं जो कि दूसरों ( मुनियों ) को पांच प्रकारका आचार ग्रहण करावे अर्थात् जो दीक्षा देवे वही आचार्य है।


अपि छिन्ने व्रते साधोः पुनः सन्धानमिच्छतः ।
तत्समावेशदानेन प्रायश्चित्तं प्रयच्छति ॥646॥

अर्थ: और जिन किसी साधुका व्रत भंग हो जाय, और व्रत भंग होने पर वह साधु फिरसे उसको प्राप्त करना चाहे तो आचार्य उस व्रतको फिरसे धारण कराते हुए उस साधुको प्रायश्चित देते हैं, अर्थात् दीक्षाके अतिरिक्त प्रायश्चित देना भी आचार्योंका कर्तव्य है।


आदेशस्योपदेशेभ्यः स्याद्विशेषः स भेदभाक् ।
आददे गुरुणा दत्तं नोपदेशेष्वयं विधिः ॥647॥

अर्थ: उपदेशोंसे आदेशमें यही विशेष भेद है कि उपदेशमें जो बात कही जाती है वह आज्ञारूप ग्राह्य नहीं होती। मानना न मानना शिष्यकी इच्छापर निर्भर है परन्तु आदेश में यह बात नहीं है, वहां तो जो बात गुरुने बताई वह आज्ञारूपसे ग्रहण ही करनी पड़ती है " गुरुके दिये हुए व्रतको मैं ग्रहण करता हूं " यह आदेश लेनेवालेकी प्रतिज्ञा है।


न निषिद्धस्तदादेशो गृहिणां व्रतधारिणाम् ।
दीक्षाचार्येण दीक्षेव दीयमानास्ति तत्क्रिया ॥648॥

अर्थ: व्रत धारण करनेवाले जो गृहस्थ हैं उनको भी आदेश निषिद्ध नहीं है। जिस प्रकार दीक्षाचार्य दीक्षा देता है उसी प्रकार गृहस्थ भी आदेश किया करता है।


स निषिद्धो यथाम्नायादव्रतिना मनागपि ।
हिंसकश्चोपदेशोपि नोपयुज्योत्र कारणात् ॥649॥

अर्थ: शास्त्रानुसार अव्रती पुरुष आदेश देनेका सर्वथा अधिकारी नहीं है, और किसी भी कारणसे वह हिंसक उपदेश भी नहीं दे सकता ।


मुनिव्रतधराणां हि गृहस्थव्रतधारिणाम् ।
आदेशश्चोपदेशो वा न कर्तव्यो बधाश्रितः ॥650॥

अर्थ: मुनिव्रत धारण करनेवाले आचार्योंको और गृहस्थव्रत धारण करनेवाले गृहस्थाचार्योंको वधाश्रित आदेश व उपदेश ( जिस आदेश तथा उपदेशसे जीवोंका वध होता हो ) नहीं करना चाहिये ।


नचाशङ्क्यं प्रसिद्धं यन्मुनिभिर्व्रतधारिभिः ।
मूर्तिमच्छक्तिसर्वस्वं हस्तरेखेव दर्शितम् ॥651॥

अर्थ: ऐसी भी आशंका नहीं करना चाहिये कि मुनिगण व्रतधारण करनेवाले हैं और उन्होंने मूर्तिमान् पदार्थोंकी सम्पूर्ण शक्तियोंको हस्तरेखाके समान जान लिया है।


नूनं प्रोक्तोपदेशोपि न रागाय विरागिणाम् ।
रागिणामेव रागाय ततोवश्यं निषेधितः ॥652॥

अर्थ: यह बात ठीक है कि जो वीतरागी हैं उनके प्रति बधकारी उपदेश भी रागका कारण नहीं होसक्ता है, वह रागियोंके लिये ही रागका कारण होसक्ता है। इसलिये अर्थात् रागियोंके लिये ही उसका निषेध किया गया है।


न निषिद्धः स आदेशो नोपदेशो निषेधितः ।
नूनं सत्पात्रदानेषु पूजायामर्हतामपि ॥653॥

अर्थ: सत्पात्रोंके लिये दान देनेके विषयमें और अरहन्तोंकी पूजाके विषयमें न तो आदेश ही निषिद्ध है और न उपदेश ही निषिद्ध है।


यद्वादेशोपदेशौ द्वौ स्तो निरवद्यकर्मणि ।
यत्र सावद्यलेशोस्ति तत्रादेशो न जातुचित् ॥654॥

अर्थ: अथवा मुनियोंके लिये, सर्वथा निर्दोष कार्यके विषयमें ही आदेश व उपदेश होसक्ता है । जहां पापका लेश भी हो वहां उनके लिये आदेश तो कभी हो ही नहीं सक्ता ।


सहासंयमिभिर्लोकैः संसर्ग भाषणं रतिम् ।
कुर्यादाचार्य इत्येके नासौ सूरिर्न चार्हतः ॥655॥

अर्थ: असंयमी पुरुषोंके साथ सम्बन्ध, भाषण और प्रेम भी आचार्य करै, ऐसा भी कोई कहते हैं। ग्रन्थकार कहते हैं कि जो असंयमी पुरुषोंके साथ सम्बन्धादिक रखता है वह आचार्य नहीं कहा जासकता, और न वह जिनमतका अनुयायी है।


संघसम्पोषकः सूरिः प्रोक्तः कैश्चिन्मतेरिह ।
धर्मादेशोपदेशाभ्यां नोपकारोऽपरोऽस्त्यतः ॥656॥

अर्थ: कोई दर्शनवाले आचार्यका स्वरूप ऐसा भी कहते हैं कि जो संघका पालन-पोषण करता है वह आचार्य है। ग्रन्थकार कहते हैं कि यह भी कहना अयुक्त है। धर्मका आदेश और धर्मका उपदेश देना ही आचार्यका उपकार है। इसको छोड़कर मुनियोंका पालन पोषण करना आदिक आचार्योंका उपकार नहीं है।


यद्वा मोहात्प्रमादाद्वा कुर्याद्यो लौकिकीं क्रियाम् ।
तावत्कालं स नाऽऽचार्योप्यस्ति चान्तर्व्रतच्युतः ॥657॥

अर्थ: अथवा मोहके वशीभूत होकर अथवा प्रमादसे जो लौकिक क्रियाको करता है उस कालमें वह आचार्य नहीं कहा जा सक्ता है, इतना ही नहीं किन्तु अन्तरंग व्रतसे च्युत ( पतित ) समझा जाता है ।


उक्तव्रततपः शीलसंयमादिधरो गणी ।
नमस्यः स गुरुः साक्षात्तदन्यो न गुरुर्गणी ॥658॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनके अनुसार जो व्रत, तप, शील, संयमादिकका धारण करनेवाला है वही गणका स्वामी आचार्य कहा जाता है, वही साक्षात् गुरु है, वही नमस्कार करने योग्य है। उससे भिन्न स्वरूपका धारण करनेवाला गणका स्वामी आचार्य नहीं कहा जा सकता।


उपाध्यायः समाधीयान् वादी स्याद्वादकोविदः ।
वाङ्मी वाग्ब्रह्मसर्वज्ञः सिद्धान्तागमपारगः ॥659॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


कविर्व्रत्यग्रसूत्राणां शब्दार्थैः सिद्धसाधनात् ।
गमकोऽर्थस्य माधुर्ये धुर्यो वक्तृत्ववर्त्मनाम् ॥660॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही गृहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


उपाध्यायत्वमित्यत्र श्रुताभ्यासो हि कारणम् ।
यदध्येति स्वयं चापि शिष्यानध्यापयेद्गुरुः ॥661॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


शेषस्तत्र व्रतादीनां सर्वसाधारणो विधिः ।
कुर्याद्धर्मोपदेशं स नाऽऽदेशं सूरिवत्क्वचित् ॥662॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


तेषामेवाश्रमं लिङ्गं सूरीणां संयमं तपः ।
आश्रयेच्छुद्धचारित्रं पञ्चाचारं स शुद्धधीः ॥663॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


मूलोत्तरगुणानेव यथोक्तानाचरेच्चिरम् ।
परीषहोपसर्गाणां विजयी स भवेद्वशी ॥664॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


अत्रातिविस्तरेणालं नूनमन्तर्बहिर्मुनेः ।
शुद्धवेषधरो धीमान् निर्ग्रन्थः स गुणाग्रणी ॥665॥

अर्थ: प्रत्येक प्रश्नका समाधान करनेवाला, वाद करनेवाला, स्याद्वादके रहस्यका जानकार, वचन बोलनेमें चतुर, वचन ब्रह्मका सर्वज्ञ, सिद्धान्त शास्त्रका पारगामी, वृत्ति और प्रधान सूत्रोंका विद्वान्, उन वृत्ति और सूत्रोंको शब्द तथा अर्थके द्वारा सिद्ध करनेवाला, अर्थमें मधुरता लानेवाला, बोलनेवाले व्याख्याताओंके मार्गमें अग्रगामी इत्यादि गुणोंका धारी उपाध्याय होता है। उपाध्याय होनेमें मुख्य कारण शास्त्रोंका अभ्यास है, जो गुरू स्वयं उन शास्त्रोंका अध्ययन करता है तथा जो शिष्योंको अध्ययन कराता (पढ़ाता) है वही उपाध्याय कहलाता है। उपाध्यायमें पढ़ने पढ़ानेके सिवा बाकी व्रतादिकोंका पालन आदि विधि मुनियोंके समान साधारण है। उपाध्याय धर्मका उपदेश कर सक्ता है, परन्तु आचार्यके समान धर्मका आदेश (आज्ञा) कभी नहीं कर सक्ता। बाकी आचार्योंके ही सहवासमें वह रहता है, उसी प्रकार निर्ग्रन्थ अवस्था रखता है, आचार्यके समान ही संयम, तप, शुद्ध चारित्र, और पांच आचारों (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र, तप, वीर्य)को वह शुद्धबुद्धि उपाध्याय पालता है। मुनियोंके जो अट्ठाईस मूलगुण और चौरासी लाख उत्तर गुण बतलाये गये हैं उन्हें भी वह पालता है, परीषह तथा उपसर्गोंको भी वह जितेन्द्रिय उपाध्याय जीतता है। यहां पर बहुत विस्तार न कर संक्षेपमें इतना ही कहना पर्याप्त है कि निश्चयसे उपाध्याय मुनिके समान ही अन्तरंग और बाह्यमें शुद्ध रूपका धारण करनेवाला है, बुद्धिमान् है, निष्परिग्रह नग्न दिगम्बर है, और गुणोंमें सर्व श्रेष्ठ है।


उपाध्यायः समाख्यातो विख्यातोऽस्ति स्वलक्षणैः ।
अधुना साध्यते साधोर्लक्षणं सिद्धमागमात् ॥666॥

अर्थ: उपाध्याय अपने लक्षणोंसे प्रसिद्ध है, उसका स्वरूप तो कहा जाचुका, अब साधुका लक्षण कहा जाता है जो कि आगमसे भलीभांति सिद्ध है।


मार्गो मोक्षस्य चारित्रं तत्सद्भक्तिपुरःसरम् ।
साधयत्यात्मसिद्ध्यर्थं साधुरन्वर्थसंज्ञकः ॥667॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


नोच्याचायं यमी किञ्चिद्धस्तपादादिसंज्ञया ।
न किञ्चिद्दर्शयेत्स्वस्थो मनसापि न चिन्तयेत् ॥668॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


आस्ते स शुद्धमात्मानमास्तिघ्नुवानश्च परम् ।
स्तिमिन्तान्तर्बहिस्तुल्यो निस्तरङ्गाब्धिवन्मुनिः ॥669॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिसकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


नादेशं नोपदेशं वा नादिशेत् स मनागपि ।
स्वर्गापवर्गमार्गस्य तद्विपक्षस्य किं पुनः ॥670॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उरदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विरक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


वैराग्यस्य परां काष्ठामधिरूढोधिकप्रभः ।
दिगम्बरो यथाजातरूपधारी दयापरः ॥671॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


निर्ग्रन्थोन्तर्बहिर्मोहग्रन्थेरुद्ग्रन्थको यमी ।
कर्मनिर्जरकः श्रेण्या तपस्वी स तपोंशुभिः ॥672॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


परीषहोपसर्गाद्यैरजय्यो जितमन्मथः ।
एषणाशुद्धिसंशुद्धः प्रत्याख्यानपरायणः ॥673॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विरक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


इत्याद्यनेकधाऽनेकैः साधुः साधुगुणैः श्रितः ।
नमस्यः श्रेयसेऽवश्यं नेतरो विदुषां महान् ॥674॥

अर्थ: मोक्षका मार्ग चारित्र है उस चारित्रको जो सद्भक्ति पूर्वक आत्मसिद्धिके लिये सिद्ध करता है उसे साधु कहते हैं । यह साधु न तो कुछ कहता ही है और न हाथ पैर आदिसे किसी प्रकारका इशारा ही करता है, तथा मनसे भी किसीका चिन्तवन नहीं करता, किन्तु एकाग्रचित्त होकर केवल अपने शुद्धात्माका ध्यान करता है जिनकी अन्तरंग और बाह्य वृत्तियां बिल्कुल शान्त हो चुकी हैं वह तरंगरहित समुद्रके समान मुनि कहलाता है । वह मुनि न तो सर्वथा आदेश ही करता है और न उपदेश ही करता है, आदेश और उपदेश वह स्वर्ग और मोक्षमार्गके विषयमें भी नहीं करता है विपक्षकी तो बात ही क्या है, अर्थात् विपक्ष संसारके विषयमें तो वह बिल्कुल ही नहीं बोलता है । ऐसा मुनि वैराग्यकी उत्कृष्ट कोटि तक पहुंच जाता है । अथवा मुनिका स्वरूप ही यह है कि वह वैराग्यकी चरमसीमा तक पहुंच जाता है । और वह मुनि अधिक प्रभावशाली, दिगम्बर दिशारूपी वस्त्रोंका धारण करनेवाला, बालकके समान निर्विकार रूपका धारी, दयामें सदा तत्पर, निष्परिग्रह नग्न, अंतरंग तथा वहिरंग मोहरूपी ग्रन्थियों (गाँठों)को खोलनेवाला, सदाकालीन नियमोंको पालनेवाला, तपकी किरणोंके द्वारा श्रेणीके क्रमसे कर्मोंकी निर्जरा करनेवाला, तपस्वी, परीषह तथा उपसर्गादिकोंसे अजेय, कामदेवका जीतनेवाला, एषणाशुद्धिसे परम शुद्ध, चारित्रमें सदा तत्पर इत्यादि अनेक प्रकारके अनेक उत्तम गुणोंको धारण करनेवाला होता है । ऐसा ही साधु कल्याणके लिये नमस्कार करने योग्य है । और कोई विद्वानोंमें श्रेष्ठ भी हो तो भी नमस्कार करने योग्य नहीं है ।


एवं मुनित्रयी ख्याता महती महतामपि ।
तथापि तद्विशेषोऽस्ति क्रमात्तरतमात्मकः ॥675॥

अर्थ: महान् पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ यह मुनित्रयी ( आचार्य, उपाध्याय, साधु )प्रसिद्ध है । तथापि उसमें क्रमसे तरतम रूपसे विशेषता भी है ।


तत्राचार्यः प्रसिद्धोऽस्ति दीक्षादेशाद्गणाग्रणीः ।
न्यायाद्वाऽऽदेशतोऽध्यक्षात्सिद्धः स्वात्मनि तत्परः ॥676॥

अर्थ: दीक्षा देनेसे, आदेश करनेसे गणका स्वामी आचार्य प्रसिद्ध है। तथा युक्ति आगम, अनुभवसे वह अपने आत्मामें तल्लीन है यह बात भी प्रसिद्ध है।


अर्थान्नातत्परोऽप्येष दृङ्मोहानुदयात्सतः ।
अस्ति तेनाविनाभूतः शुद्धात्मानुभवः स्फुटम् ॥677॥

अर्थ: अर्थात् वह आचार्य दर्शन मोहनीयका अनुदय होनेसे अपने आत्मामें तल्लीन ही है। उसे उस विषयमें तल्लीनता रहित नहीं कहा जा सक्ता है क्योंकि दर्शन मोहनीयके अनुदयका अविनाभावी निश्चयसे शुद्धात्माका अनुभव है। इसलिये दर्शन मोहनीयका अनुदय होनेसे आचार्य शुद्धात्माका अनुभव करता ही है।


अप्यस्ति देशतस्तत्र चारित्रावरणक्षतिः ।
बाह्यार्थात्केवलं न स्यात् क्षतिर्वा च तदक्षतिः ॥678॥

अर्थ: आचार्यके शुद्धात्माके अनुभवका अविनाभावी दर्शन मोहनीय कर्मका तो अनुदय है ही, साथमें एक देश चारित्रमोहनीय कर्मका भी उसके क्षय हो चुका है। चारित्रके क्षय अथवा अक्षयमें बाह्यपदार्थ केवल कारण नहीं हैं।


अस्त्युपादानहेतोश्च तत्क्षतिर्वा तदक्षतिः ।
तदापि न बहिर्वस्तु स्यात्तद्धेतुरहेतुतः ॥679॥

अर्थ: उपादान कारण मिलने पर चारित्रकी हानि अथवा उसका लाभ होसक्ता है। चारित्रकी क्षति अथवा अक्षतिमें बाह्य वस्तु हेतु नहीं है। क्योंकि बाह्य वस्तु उसमें कारण नहीं पड़ती है।


सति संज्वलने नोच्चैः स्पर्धका देशघातिनः ।
तद्विपाकोस्त्यमन्दो वा मन्दोहेतुः क्रमाद्द्वयोः ॥680॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, - और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्ते कषायके तीव्रोदयसे संक्लेशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराव (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


संक्लेशस्तत्क्षतिर्नूनं विशुद्धिस्तु तदक्षतिः ।
सोऽपि तरतमांशांशैः सोप्यनेकैरनेकधा ॥681॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है । उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं । उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है । इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है । संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है । और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है । यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है । यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है । यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, - और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं । किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं । संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्ते कषायके तीव्रोदयसे संक्लेशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है । संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये । यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराव (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है । इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती । क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है ।


अस्तु यद्वा न शैथिल्यं तत्र हेतुवशादिह ।
तथाप्येतावताचार्यः सिद्धो नात्मन्यतत्परः ॥682॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्त कषायके तीव्रोदयसे संक्लशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्धयंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराध (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


तत्रावश्यं विशुद्ध्यंशस्तेषां मन्दोदयादिति ।
संक्लेशांशोथवा तीव्रोदयान्नायं विधिः स्मृतः ॥683॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्त कषायके तीव्रोदयसे संक्लशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराध (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


किन्तु दैवाद्विशुद्ध्यंशः संक्लेशांशोथवा क्वचित् ।
तद्विशुद्धेर्विशुद्ध्यंशः संक्लेशांशोदयः पुनः ॥684॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्त कषायके तीव्रोदयसे संक्लेशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराध (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


तेषां तीव्रोदयात्तावदेतावानत्र बाधकः ।
सर्वतश्चेत्प्रकोपाय नापराधोपरोस्त्यतः ॥685॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्त कषायके तीव्रोदयसे संक्लेशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराध (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


तेनात्रैतावता नूनं शुद्धस्यानुभवच्युतिः ।
कर्त्तुं न शक्यते यस्मादत्रास्त्यन्यः प्रयोजकः ॥686॥

अर्थ: आचार्य परमेष्ठीके अनन्तानुबन्धि, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषायका तो अनुदय ही है, केवल संज्वलन कषायका उनके उदय है। संज्वलन कषाय देशघाती है। उसके स्पर्धक सर्वघाती नहीं हैं। उस एकदेश घात करनेवाली संज्वलन कषायका विपाक यदि तीव्र हो तो चारित्रकी क्षति है, यदि उसका विपाक मन्द हो तो चारित्रकी कोई क्षति नहीं है। संज्वलन कषायकी तीव्रता चारित्रकी क्षतिका कारण है और उसकी मंदता चारित्रकी क्षतिका कारण नहीं है। इसका कारण यह है कि संज्वलन कषायकी तीव्रतासे आत्मामें संक्लेश होता है और संक्लेश चारित्रके क्षयका कारण है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे आत्मा विशुद्ध होता है। और विशुद्धि चारित्रके क्षयका कारण नहीं है किन्तु उसकी वृद्धिका कारण है। यह संक्लेश और विशुद्धि उसी प्रकारसे कम बढ़ होती रहती है जिस प्रकारसे कि संज्वलन कषायके विपाकमें तीव्रता और मन्दताके अंशोंमें तरतमता होती रहती है। यह तरतमता अनेक भेदोंमें विभाजित की जाती है। यह चारित्रकी क्षति और अक्षतिका कारण कहा गया है परन्तु आचार्यके किसी कारणवश शिथिलता नहीं आती है, और यदि उनके संज्वलन कषायकी तीव्रतासे थोड़े अंशोंमें चारित्रकी क्षति भी हो जाय तो भी आचार्य स्वात्मामें अतत्पर (असावधान) नहीं सिद्ध हो सकते हैं। किन्तु अपने आत्मामें सदा तत्पर ही हैं। संज्वलन कषायके मन्द होनेसे आचार्यके विशुद्धिके अंश बढ़ जाते हैं अथवा उक्त कषायके तीव्रोदयसे संक्लेशके अंश बढ़ जाते हैं, यह समग्र विधान शुद्धात्माके अनुभवमें कुछ कार्यकारी नहीं है, चाहे दैववश उनके विशुद्धिके अंश बढ़ जांय चाहे संक्लेशके अंश बढ़ जांय परन्तु आचार्यके शुद्धात्मानुभवमें बाधा नहीं आती है। संज्वलन कषायकी मन्दतासे चारित्रमें विशुद्ध्यंश प्रकट हो जाता है और संज्वलन कषायकी तीव्रतासे चारित्रमें संक्लेशांश प्रकट हो जाता है बस इतनी ही बाधा समझनी चाहिये। यदि संज्वलन कषायकी आचार्यके तीव्रता हो तो वह तीव्रता कुछ प्रकोप (प्रमाद) लाती है बाकी और कोई अपराध (शुद्धात्माकी च्युतिका कारण) नहीं कर सकती है। इसलिये उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है कि संज्वलन कषायकी तीव्रता अथवा चारित्रकी कुछ अंशोंमें क्षति आचार्यके शुद्धात्मानुभवका नाश नहीं कर सकती। क्योंकि शुद्धात्मानुभवके नाशका कारण और ही है।


हेतुःशुद्धात्मनो ज्ञाने शमो मिथ्यात्वकर्मणः
प्रत्यनीकस्तु तत्रोच्चैरशमस्तत्र व्यत्ययात् ॥687॥

अर्थ: शुद्धात्माके ज्ञानमें कारण मिथ्यात्व कर्मका उपशम है। इसका उल्टा मिथ्यात्व कर्मका उदय है, मिथ्यात्व कर्मके उदय होनेसे शुद्धात्माका अनुभव नहीं हो सक्ता है।

उत्तरार्द्ध 601 से 700 (श्लोक 688 से 700)

दृङ्मोहेऽस्तंगते पुंसः शुद्धस्यानुभवो भवेत् ।
न भवेद्विघ्नकरः कश्चिचारित्रावरणोदयः ॥688॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मका अनुदय होनेपर आत्माके शुद्धानुभव होता है । उसमें चारित्रमोहनीयका उदय विघ्न नहीं कर सकता है ।


न चाकिञ्चित्करश्चैवं चारित्रावरणोदयः ।
दृङ्मोहस्य कृते नालं अलं स्वस्यकृते च तत् ॥689॥

अर्थ: चारित्रमोहनीयका उदय कुछ करता ही न हो ऐसा भी नहीं है। यद्यपि वह दर्शन मोहनीयके कार्यके लिये असमर्थ है तथापि अपने कार्यके लिये अवश्य समर्थ है।


कार्यं चारित्रमोहस्य चारित्राच्च्युतिरात्मनः ।
नात्मदृष्टेस्तु दृष्टित्वान्न्यायादितरदृष्टिवत् ॥690॥

अर्थ: आत्माके चारित्र गुणकी क्षति करना ही चारित्र मोहनीयका कार्य है। चारित्र मोहनीयका कार्य आत्माके दर्शन गुणकी क्षति करना नहीं हो सक्ता है। क्योंकि सम्यग्दर्शन गुण जुदा ही है इसलिये उसका घातक भी जुदा ही कर्म है। जिसप्रकार दूसरेके दर्शनमें दूसरा बाधा नहीं पहुंचा सक्ता है उसी प्रकार सम्यग्दर्शन गुणमें चारित्र मोहनीय बाधा नहीं पहुंचा सक्ता है। उसका काम केवल चारित्र गुणको घात करनेका है।


यथा चक्षुः प्रसन्नं वै कस्यचिद्दैवयोगतः ।
इतरत्राक्षतायेपि दृष्टाध्यक्षान्न तत्क्षतिः ॥691॥

अर्थ: जिस प्रकार किसीका चक्षु रोग रहित है और दैवयोगसे दूसरे किसीके चक्षुमें किसी प्रकारकी पीड़ा है तो उस पीड़ासे निर्मल चक्षुवालेकी कोई हानि नहीं हो सक्ती है यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है ।


कषायाणामनुद्रेकश्चारित्रं तावदेव हि ।
नानुद्रेकः कषायाणां चारित्राच्च्युतिरात्मनः ॥692॥

अर्थ: जबतक कषायोंका अनुदय रहता है तभी तक चारित्र है। जब कषायोंका उदय हो जाता है तभी आत्माके चारित्र गुणकी क्षति हो जाती है।


ततस्तेषामनुद्रेकः स्यादुद्रेकोऽथवा स्वतः ।
नात्मदृष्टेः क्षतिर्नूनं दृङ्मोहस्योदयादृते ॥693॥

अर्थ: इसलिये कषायोंका अनुदय हो अथवा उदय हो शुद्धात्मानुभवकी किसी प्रकार क्षति नहीं हो सक्ती है जबतक कि दर्शन मोहनीयका उदय न हो ।


अथ सूरिरुपाध्यायो द्वावेतौ हेतुतः समौ ।
साधू साधुरिवात्मज्ञौ शुद्धौ शुद्धोपयोगिनौ ॥694॥

अर्थ: आचार्य और उपाध्याय दोनों ही समान हैं । जो कारण आचार्यके हैं वे ही उपाध्यायके हैं । दोनों ही साधु हैं अर्थात् साधुकी सम्पूर्ण क्रियायें-अट्ठाईस मूल गुण और चौरासी लाख उत्तर गुण वे दोनों पालते हैं । साधुके समान ही आत्मानुभव करनेवाले हैं । दोनों ही शुद्ध हैं, शुद्ध-उपयोग सहित हैं । आचार्य और उपाध्यायमें परस्पर भी कोई तरतम रूपसे विशेषता नहीं पाई जाती है, और न इन दोनोंसे कोई विशेष अतिशय साधुमें ही पाया जाता है । ऐसा नहीं है कि साधुमें कोई अन्तरंग विशेष उत्कर्ष हो वह उत्कर्ष ( उन्नतता ) इनमें न हो, किन्तु तीनों ही समान हैं । यदि लेशमात्र विशेषता है तो उन तीनोंमें बाह्य क्रियाकी अपेक्षासे ही है अन्तरंग तीनोंका समान है, इसलिये बाह्य क्रियाओंमें भेद होनेपर भी अन्तःशुद्धि तीनोंमें समान होनेसे कोई हानि नहीं है, क्योंकि मूल कारण अन्तःशुद्धि है वह तीनोंमें समान है । आचार्य, उपाध्याय और साधु तीनोंमें ही संज्वलनका मन्द, मध्यम, तीव्र उदय कोई नियमित नहीं है, कैसे भी अंशोंका उदय हो यह बात युक्ति, स्वानुभव और आगमसे सिद्ध है ।


नापि कश्चिद्विशेषोस्ति तयोस्तरतमौ मिथः ।
नैताभ्यामन्तरुत्कर्षः साधोरप्यतिशायनात् ॥695॥

अर्थ: आचार्य और उपाध्याय दोनों ही समान हैं । जो कारण आचार्यके हैं वे ही उपाध्यायके हैं । दोनों ही साधु हैं अर्थात् साधुकी सम्पूर्ण क्रियायें - अट्ठाईस मूल गुण और चौरासी लाख उत्तर गुण वे दोनों पालते हैं । साधुके समान ही आत्मानुभव करनेवाले हैं । दोनों ही शुद्ध हैं, शुद्ध-उपयोग सहित हैं । आचार्य और उपाध्यायमें परस्पर भी कोई तरतम रूपसे विशेषता नहीं पाई जाती है, और न इन दोनोंसे कोई विशेष अतिशय साधुमें ही पाया जाता है । ऐसा नहीं है कि साधुमें कोई अन्तरंग विशेष उत्कर्ष हो वह उत्कर्ष ( उन्नतता ) इनमें न हो, किन्तु तीनों ही समान हैं । यदि लेशमात्र विशेषता है तो उन तीनोंमें बाह्य क्रियाकी अपेक्षासे ही है अन्तरंग तीनोंका समान है, इसलिये बाह्य क्रियाओंमें भेद होनेपर भी अन्तःशुद्धि तीनोंमें समान होनेसे कोई हानि नहीं है, क्योंकि मूल कारण अन्तःशुद्धि है वह तीनोंमें समान है । आचार्य, उपाध्याय और साधु तीनोंमें ही संज्वलनका मन्द, मध्यम, तीव्र उदय कोई नियमित नहीं है, कैसे भी अंशोंका उदय हो यह बात युक्ति, स्वानुभव और आगमसे सिद्ध है ।


लेशतोऽस्ति विशेषश्चेन्मिथस्तेषां बहिःकृतः ।
का क्षतिर्मूलहेतोः स्यादन्तःशुद्धेः समत्वतः ॥696॥

अर्थ: आचार्य और उपाध्याय दोनों ही समान हैं । जो कारण आचार्यके हैं वे ही उपाध्यायके हैं । दोनों ही साधु हैं अर्थात् साधुकी सम्पूर्ण क्रियायें - अट्ठाईस मूल गुण और चौरासी लाख उत्तर गुण वे दोनों पालते हैं । साधुके समान ही आत्मानुभव करनेवाले हैं । दोनों ही शुद्ध हैं, शुद्ध-उपयोग सहित हैं । आचार्य और उपाध्यायमें परस्पर भी कोई तरतम रूपसे विशेषता नहीं पाई जाती है, और न इन दोनोंसे कोई विशेष अतिशय साधुमें ही पाया जाता है । ऐसा नहीं है कि साधुमें कोई अन्तरंग विशेष उत्कर्ष हो वह उत्कर्ष ( उन्नतता ) इनमें न हो, किन्तु तीनों ही समान हैं । यदि लेशमात्र विशेषता है तो उन तीनोंमें बाह्य क्रियाकी अपेक्षासे ही है अन्तरंग तीनोंका समान है, इसलिये बाह्य क्रियाओंमें भेद होनेपर भी अन्तःशुद्धि तीनोंमें समान होनेसे कोई हानि नहीं है, क्योंकि मूल कारण अन्तःशुद्धि है वह तीनोंमें समान है । आचार्य, उपाध्याय और साधु तीनोंमें ही संज्वलनका मन्द, मध्यम, तीव्र उदय कोई नियमित नहीं है, कैसे भी अंशोंका उदय हो यह बात युक्ति, स्वानुभव और आगमसे सिद्ध है ।


नास्त्यत्र नियतः कश्चिद्युक्तिस्वानुभवागमात् ।
मन्दादिरुदयस्तेषां सूर्युपाध्यायसाधुषु ॥697॥

अर्थ: आचार्य और उपाध्याय दोनों ही समान हैं । जो कारण आचार्यके हैं वे ही उपाध्यायके हैं । दोनों ही साधु हैं अर्थात् साधुकी सम्पूर्ण क्रियायें - अट्ठाईस मूल गुण और चौरासी लाख उत्तर गुण वे दोनों पालते हैं । साधुके समान ही आत्मानुभव करनेवाले हैं । दोनों ही शुद्ध हैं, शुद्ध-उपयोग सहित हैं । आचार्य और उपाध्यायमें परस्पर भी कोई तरतम रूपसे विशेषता नहीं पाई जाती है, और न इन दोनोंसे कोई विशेष अतिशय साधुमें ही पाया जाता है । ऐसा नहीं है कि साधुमें कोई अन्तरंग विशेष उत्कर्ष हो वह उत्कर्ष ( उन्नतता ) इनमें न हो, किन्तु तीनों ही समान हैं । यदि लेशमात्र विशेषता है तो उन तीनोंमें बाह्य क्रियाकी अपेक्षासे ही है अन्तरंग तीनोंका समान है, इसलिये बाह्य क्रियाओंमें भेद होनेपर भी अन्तःशुद्धि तीनोंमें समान होनेसे कोई हानि नहीं है, क्योंकि मूल कारण अन्तःशुद्धि है वह तीनोंमें समान है । आचार्य, उपाध्याय और साधु तीनोंमें ही संज्वलनका मन्द, मध्यम, तीव्र उदय कोई नियमित नहीं है, कैसे भी अंशोंका उदय हो यह बात युक्ति, स्वानुभव और आगमसे सिद्ध है ।


प्रत्येकं बहवः सन्ति सूर्युपाध्यायसाधवः ।
जघन्यमध्यमोत्कृष्टभावैश्चैकैकशः पृथक् ॥698॥

अर्थ: आचार्य उपाध्याय और साधु तीनोंके ही अनेक भेद हैं, वे भेद जघन्य, मध्यम, उत्कृष्ट भावोंकी अपेक्षासे हो जाते हैं।


कश्चित्सूरिः कदाचिद्वै विशुद्धिं परमां गतः ।
मध्यमां वा जघन्यां वा विशुद्धिं पुनराश्रयेत् ॥699॥

अर्थ: कोई आचार्य कभी उत्कृष्ट विशुद्धिको प्राप्त हो जाता है, फिर वही कभी मध्यम अथवा जघन्य विशुद्धिको प्राप्त हो जाता है।


हेतुस्तत्रोदिता नाना भावांशैः स्पर्धकाः क्षणम् ।
धर्मादेशोपदेशादिहेतुर्नात्र वहिः क्वचित् ॥700॥

अर्थ: ऊपर कही हुई विशुद्धि कभी उत्कृष्टतासे मध्यम अथवा जघन्य क्यों हो जाती है ? इसका कारण यही है कि वहां पर अनेक प्रकार भावोंमें तरतमता करनेवाले कषायके स्पर्धक प्रतिक्षण उदित होते रहते हैं, विशुद्धिकी तरतमतामें धर्मका उपदेश तथा धर्मका आदेश - बाह्य कारण - हेतु नहीं कहा जा सक्ता है ।

उत्तरार्द्ध 701 से 800 (श्लोक 701 से 800)

परिपाट्यानया योज्याः पाठकाः साधवश्च ये ।
न विशेषो यतस्तेषां न्यायाच्छेषोऽविशेषभाक् ॥701॥

अर्थ: इसी ऊपर कही हुई परिपाटी ( पद्धति-क्रम ) से उपाध्याय और साधुओंकी व्यवस्थाका परिज्ञान करना चाहिये । क्योंकि उनमें भी आचार्यसे कोई विशेषता नहीं रह जाती है । तीनों ही समान हैं ।


नोह्यं धर्मोपदेशादि कर्म तत्कारणं वहिः ।
हेतोरभ्यन्तरस्यापि बाह्यं हेतुर्वहिः क्वचित् ॥702॥

अर्थ: यदि कोई यह कहै कि आचार्यकी विशेषतामें बाह्य क्रियायें - धर्मका उपदेश तथा आदेश भी कारण हैं, क्योंकि अभ्यन्तर हेतुका भी कहीं पर बाह्य कर्म बाह्य हेतु होता ही है ? अर्थात् कर्मोदयरूप अभ्यन्तर कारणमें धर्मोपदेशादि क्रियाको भी कारण मानना चाहिये। आचार्य कहते हैं कि ऐसी तर्कणा नहीं करना चाहिये ।


नैवमर्थाद्यतः सर्वं वस्त्वकिञ्चित्करं वहिः ।
तत्पदं फलवन्मोहादिच्छतोऽर्थान्तरं परम् ॥703॥

अर्थ: ऊपर जो तर्कणा की गई है वह ठीक नहीं है क्योंकि बाह्य जितनी भी वस्तु है सभी अकिंचित्कर ( कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं ) है, हां यदि कोई मोहके वशीभूत होकर बाह्य आचारादि पदको चाहे तो अवश्य उसके लिये वह बाह्य पद फल सहित है अर्थात् उसका फिर सांसारिक फल होगा ।


किं पुनर्गणिनस्तस्य सर्वतोनिच्छतो वहिः ।
धर्मादेशोपदेशादि स्वपदं तत्फलं च यत् ॥704॥

अर्थ: धर्मका उपदेश, धर्मका आदेश, अपना पदस्थ और उसका फल आदि सम्पूर्ण बाह्य बातोंको सर्वथा नहीं चाहनेवाले आचार्यकी तो बात ही निराली है ।


नास्यासिद्धं निरीहत्वं धर्मादेशादि कर्मणि ।
न्यायादक्षार्थकांक्षाया ईहा नान्यत्र जातुचित् ॥705॥

अर्थ: धर्मादेशादि कार्य करते हुए भी आचार्य इच्छाविहीन हैं यह बात असिद्ध नहीं है। जो इन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंमें इच्छा की जाती है वास्तवमें उसीका नाम इच्छा है, जहांपर धार्मिक कार्योंमें इच्छा की जाती है उसे इच्छा ही नहीं कहते हैं।


ननु नेहा विना कर्म कर्म नेहां विना क्वचित् ।
तस्मान्नानीहितं कर्म स्यादक्षार्थस्तु वा न वा ॥706॥

अर्थ: विना क्रियाके इच्छा नहीं हो सकती है और विना इच्छाके क्रिया नहीं हो सकती है यह सर्वत्र नियम है । इसलिये विना इच्छाके कोई क्रिया नहीं हो सकती है, चाहे वह इन्द्रिय सम्बन्धी विषय हो अथवा नहीं हो ।


नैवं हेतोरतिव्याप्तेरारादक्षीणमोहिषु
वन्धस्य नित्यतापत्तेर्भवेन्मुक्तेरसंभवः ॥707॥

अर्थ: शङ्काकारकी उपर्युक्त शंका ठीक नहीं है क्योंकि ‘इच्छाके विना क्रिया नहीं होती है’ इस लक्षगकी क्षीणकषाय वालोंमें अतिव्याप्ति है, बारहवें गुणस्थानमें क्रिया तो होती है परन्तु बहां इच्छा नहीं है यदि बारहवें गुणस्थानमें भी क्रियाके सद्भावसे इच्छा, मानी जाय तो वन्ध सदा ही होता रहेगा । और बन्धकी नित्यतामें मुक्ति ही असंभव हो जायगी ।


ततोस्त्यन्तः कृतो भेदः शुद्धेर्नानांशतस्त्रिषु ।
निर्विशेषात्समस्त्वेष पक्षो माभूद्वहिः कृतः ॥708॥

अर्थ: इसलिये आचार्य, उपाध्याय, साधु, इन तीनोंमें विशुद्धिके नाना अंशोंकी अपेक्षासे अन्तरंग कृत भेद है, सामान्य रीतिसे तीनोंमें ही समानता है। उन तीनोंमें बाह्य क्रियाओंकी अपेक्षासे भेद बतलाना यह पक्ष ठीक नहीं है।


किञ्चास्ति यौगिकीरूढिः प्रसिद्धा परमागमे ।
विना साधुपदं न स्यात्केवलोत्पत्तिरञ्जसा ॥709॥

अर्थ: यौगिकरीति और रुढिसे यह बात परमागममें प्रसिद्ध है कि विना साधु पद प्राप्त किये केवलज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । वहीं पर सर्वज्ञ देवने यह बात भी भले प्रकार प्रगट कर दी है कि श्रेणी चढ़नेवालेको क्षणमात्रमें साधुपद स्वयं प्राप्त हो जाता है ।


तत्र चोक्तमिदं सम्यक् साक्षात्सर्वार्थसाक्षिणा ।
क्षणमस्ति स्वतः श्रेण्यामधिरूढस्य तत्पदम् ॥710॥

अर्थ: यौगिकरीति और रुढ़िसे यह बात परमागममें प्रसिद्ध है कि विना साधु पद प्राप्त किये केवलज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है । वहीं पर सर्वज्ञ देवने यह बात भी भले प्रकार प्रगट कर दी है कि श्रेणी चढ़नेवालेको क्षणमात्रमें साधुपद स्वयं प्राप्त हो जाता है ।


यतोऽवश्यं स सूरिर्वा पाठकः श्रेण्यनेहसि ।
कृत्स्नचिन्तानिरोधात्मलक्षणं ध्यानमाश्रयेत् ॥711॥

अर्थ: क्योंकि श्रेणी चढ़नेके समयमें आचार्य अथवा उपाध्याय सम्पूर्ण चिन्ता निरोधात्मक लक्षणवाले ध्यानको करता है ।


ततः सिद्धमनायासात्तत्पदत्वं तयोरिह ।
नूनं बाह्योपयोगस्य नावकाशोऽस्ति यत्र तत् ॥712॥

अर्थ: इस लिये आचार्य और उपाध्यायको साधुपना अनायास (विना किसी विशेषताके) ही सिद्ध है । वहां पर बाह्य उपयोगका अवकाश नहीं है ।


नपुनश्चरणं तत्र छेदोपस्थापनादिवत् ।
प्रागादायक्षणं पश्चात् सूरिः साधुपदं श्रयेत् ॥713॥

अर्थ: ऐसा भी नहीं है कि आचार्य पहले छेदोपस्थापना चारित्रको धारण करके पीछे साधुपदको धारण करता है ।


उक्तं दिङ्मात्रमत्रापि प्रसङ्गाद्गुरुलक्षणम् ।
शेषं विशेषतो वक्ष्ये तत्स्वरूपं जिनागमात् ॥714॥

अर्थ: प्रपञ्च पाकर यहांपर गुरुका लक्षण दिङ्मात्र कहा गया है, बाकीका उनका विशेष स्वरूप जिनेन्द्रकथित आगमके अनुसार कहेंगे ।


धर्मो नीचैः पदादुच्चैः पदे धरति धार्मिकम् ।
तत्राजवञ्जवो नीचैः पदमुच्चैस्तदत्ययः ॥715॥

अर्थ: जो धर्मात्मा पुरुषको नीच स्थानसे उठाकर उच्चस्थानमें धारण करे उसे धर्म कहते हैं। संसार नीचस्थान है और उसका नाश होना ‘मोक्ष’ उच्चस्थान है।


सधर्मः सम्यग्दृग्ज्ञप्तिचारित्रत्रितयात्मकः ।
तत्र सद्दर्शनं मूलं हेतुरद्वैतमेतयोः ॥716॥

अर्थ: वह धर्म सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र स्वरूप है। उन तीनोंमें सम्यग्दर्शन ही सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका अद्वितीय मूल कारण है।


ततः सागाररूपो वा धर्मोऽनागार एव वा ।
सदृक् पुरस्सरो धर्मो न धर्मस्तद्विना क्वचित् ॥717॥

अर्थ: इसलिये चाहे गृहस्थ धर्म हो, चाहे मुनिधर्म हो सम्यग्दर्शनपूर्वक है तो वह धर्म है, यदि सम्यग्दर्शन पूर्वक नहीं है तो वह धर्म भी नहीं कहा जा सकता है।


रूढ़ितोधिवपुर्वाचां क्रिया धर्मः शुभावहा ।
तत्रानुकूलरूपा वा मनोवृत्तिः सहानया ॥718॥

अर्थ: शरीर और वचनोंकी शुभ क्रिया रूढ़िसे धर्म कहलाती है। उसी क्रियाके साथ मनोवृत्ति भी अनुकूल होनी चाहिये।


सा द्विधा सर्वसागारानगाराणां विशेषतः ।
यतः क्रिया विशेषत्वान्नूनं धर्मो विशेषितः ॥719॥

अर्थ: घर सहित - गृहस्थ और घर रहित - मुनियोंकी विशेषतासे वह क्रिया दो प्रकार है। क्योंकि क्रियाकी विशेषतासे ही निश्चयसे धर्म भी विशेष कहलाता है।


तत्र हिंसानृतस्तेयाब्रह्मकृत्स्नपरिग्रहात् ।
देशतो विरतिः प्रोक्तं गृहस्थानामणुव्रतम् ॥720॥

अर्थ: हिंसा, झूंठ, चोरी, कुशील और सम्पूर्ण परिग्रहका एकदेश त्याग करना गृहस्थोंका अणुव्रत कहा गया है ।


सर्वतो विरतिस्तेषां हिंसादीनां व्रतं महत् ।
नैतत्सागारिभिः कर्तुं शक्यते लिङ्गमर्हताम् ॥721॥

अर्थ: उन्ही हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और सम्पूर्ण परिग्रहका सर्वथा ( मन वचन काय कृत कारित अनुमोदनापूर्वक ) त्याग करना महाव्रत कहलाता है। यह महाव्रत गृहस्थोंसे नहीं किया जा सकता है, किन्तु पूज्य - मुनियोंका यह चिह्न ( स्वरूप ) है ।


मूलोत्तरगुणाः सन्ति देशतो वेश्मवर्त्तिनाम् ।
तथाऽनगारिणां न स्युः सर्वतः स्युः परेप्यतः ॥722॥

अर्थ: मूलगुण और उत्तरगुणोंको गृहस्थ एकदेशरूपसे पालन करते हैं, मुनि वैसा नहीं करते हैं किन्तु वे उनको सम्पूर्णतासे पालन करते हैं। मुनियोंके उत्तरगुणोंका पालन भी सम्पूर्णतासे होता है।


तत्र मूलगुणाश्चाष्टौ गृहिणां व्रतधारिणाम् ।
क्वचिद्व्रतिनां साक्षात् सर्वसाधारणा इमे ॥723॥

अर्थ: व्रत धारण करनेवाले गृहस्थियोंके आठ मूलगुण कहे गये हैं । ये आठ मूलगुण अव्रतियोंके भी पाये जाते हैं, ये मूलगुण सर्वोंके साधारण रीतिसे पाये जाते हैं ।


निसर्गाद्वा कुलाम्नायादायातास्ते गुणाः स्फुटम् ।
तद्विना न व्रतं यावत्सम्यक्त्वं च तथाङ्गिनाम् ॥724॥

अर्थ: ये अष्ट मूल या तो कुल परम्परासे ही पलते चले आते हैं, या स्वभावसे ही नियमसे पलते चले आते हैं। विना अष्टमूल गुणोंके पालन किये कोई व्रत नहीं हो सकता है और न जीवोंके सम्यग्दर्शन ही हो सकता है।


एतावता विनाप्येष श्रावको नास्ति नामतः ।
किं पुनः पाक्षिको गूढो नैष्ठिकः साधकोथवा ॥725॥

अर्थ: इतना किये विना अर्थात् अष्ट मूल गुण धारण किये विगा नाम मात्र भी श्रावक नहीं कहा जाता है, फिर पाक्षिक, गूढ, नैष्ठिक, अथवा साधककी तो बात ही क्या है ?


मद्यमांसमधुत्यागी त्यक्तोदुम्बरपञ्चकः ।
नामतः श्रावकः क्षान्तो नान्यथापि तथा गृही ॥726॥

अर्थ: मदिरा, मांस, मधु (शहत) का त्याग करनेवाला तथा पांच उदुम्बर फलोंका त्याग करनेवाला नाम मात्रका श्रावक कहा जाता है, वही क्षमा धर्मका पालक है अन्यथा वह श्रावक नहीं कहा जासकता है ।


यथाशक्ति विधातव्यं गृहस्थैर्व्यसनोज्झनम् ।
अवश्यं तद्व्रतस्थैस्तैरिच्छद्भिः श्रेयसीं क्रियाम् ॥727॥

अर्थ: गृहस्थों (अव्रती) को यथाशक्ति सप्तव्यसनका त्याग करना चाहिये और जो व्रतोंका पालन करते हैं तथा शुभ क्रियाओंको चाहते हैं उन गृहस्थोंको तो अवश्य ही सप्तव्यसनका त्याग करना चाहिये ।


त्यजेद्दोषाँस्तु तत्रोक्तान् सूत्रोतीचारसंज्ञकान् ।
अन्यथा मद्यमांसादीन् श्रावकः कः समाचरेत् ॥728॥

अर्थ: व्रतोंके पालनेमें जो अतीचार नामक दोष सूत्रोंमें कहे गये हैं उन्हें भी छोड़ना चाहिये । मद्य मांसादिकोंका तो कौन श्रावक सेवन करेगा ? अर्थात् मद्यादिक तो प्रथमसे ही सर्वथा त्याज्य हैं ।


दानं चतुर्विधं देयं पात्रबुद्ध्याऽथ श्रद्धया ।
जघन्यमध्यमोत्कृष्टपात्रेभ्यः श्रावकोत्तमैः ॥729॥

अर्थ: उत्तम श्रावकोंको जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट पात्रोंके लिये पात्रबुद्धि तथा श्रद्धापूर्वक चार प्रकारका दान देना चाहिये ।


कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम् ।
पात्रबुद्ध्या निषिद्धं स्यान्निषिद्धं न कृपाधिया ॥730॥

अर्थ: कुपात्र और अपात्रके लिये भी यथोचित दान देना चाहिये। इतना विशेष है कि कुपात्र और अपात्रके लिये पात्र बुद्धिसे दान देना निषिद्ध (वर्जित) कहा गया है, परंतु वह कृपाबुद्धिसे निषिद्ध नहीं है।


शेषेभ्यः क्षुत्पिपासादिपीडितेभ्योऽशुभोदयात् ।
दीनेभ्यो दयादानादि दातव्यं करुणार्णवैः ॥731॥

अर्थ: और भी जो अशुभकर्मोदयसे क्षुधा, प्यास आदि बाधाओंसे पीड़ित दीन पुरुष हैं उनके लिये भी करुणा सिन्धुओं (दयालुओं)को करुणादान आदि करना चाहिये ।


पूजामप्यर्हतां कुर्याद्यद्वा प्रतिमासु तद्धिया ।
स्वरव्यञ्जनानि संस्थाप्य सिद्धानप्यर्चयेत्सुधीः ॥732॥

अर्थ: सद्बुद्धि गृहस्थको तेरहवें गुणस्थानवर्त्ती, वीतराग, सर्वज्ञ अरहन्त भगवानकी पूजन करना चाहिये अथवा उन अरहन्तोंकी प्रतिमाओंमें अरहन्तकी बुद्धि रख कर स्वर व्यञ्जनोंकी स्थापना करके उनकी पूजा करना चाहिये अथवा स्वरव्यञ्जनोंकी स्थापना करके सिद्ध भगवानकी भी पूजन करना चाहिये ।


सूर्युपाध्यायसाधूनां पुरस्तत्पादयोःस्तुतिम् ।
प्राग्विधायाष्टधा पूजां विदध्यात् स त्रिशुद्धितः ॥733॥

अर्थ: आचार्य, उपाध्याय और साधुओंके चरणोंकी पहले स्तुति करके फिर मन, वचन, कायकी शुद्धतासे श्रावकको उन तीनों परमेष्ठियोंकी अष्ट द्रव्यसे पूजा करना चाहिये ।


सम्मानादि यथाशक्ति कर्तव्यं च सधर्मिणाम् ।
व्रतिनां चेतरेषाम्वा विशेषाद्ब्रह्मचारिणाम् ॥734॥

अर्थ: जो अपने समान धर्मसेवी ( अपने समान श्रावक ) हैं उनका यथाशक्ति आदर सत्कार करना चाहिये, तथा जो व्रती श्रावक हैं अथवा सम्यग्दृष्टि हैं उनका भी यथाशक्ति आदर सत्कार करना चाहिये, और विशेष रीतिसे ब्रह्मचारियोंका आदर सत्कार करना चाहिये।


नारीभ्योऽपि व्रताढ्याभ्यो न निषिद्धं जिनागमे ।
देयं सम्मानदानादि लोकानामविरुद्धतः ॥735॥

अर्थ: व्रतयुक्त जो स्त्रियां हैं, उनका भी लोकसे अविरुद्ध आदर सत्कार करना जैनागममें निषिद्ध नहीं है ।


जिनचैत्यगृहादीनां निर्माणे सावधानता ।
यथा सम्पद्विधेयास्ति दूष्या नाऽवद्यलेशतः ॥736॥

अर्थ: श्रावकोंको जिन मन्दिर बनवानेमें सदा सावधान रहना चाहिये, अपनी सम्पत्तिके परिमाणके अनुसार जिन मन्दिरोंकी रचना अवश्य कराना चाहिये । जिन चैत्य गृह (मन्दिर) बनवानेमें थोड़ासा आरम्भजनित पाप लगता है इस लिये मन्दिर बनवानेमें दोष हो ऐसा नहीं है ।


सिद्धानामर्हताञ्चापि यन्त्राणि प्रतिमाः शुभाः ।
चैत्यालयेषु संस्थाप्य प्राक्प्रतिष्ठापयेत् सुधीः ॥737॥

अर्थ: सिद्ध यंत्र और अर्हन्तोंकी शुभ प्रतिमाओंको चैत्यालयोंमें स्थापना करके पहले उनकी बुद्धिमान् पुरुषको प्रतिष्ठा करानी चाहिये।


अपि तीर्थादियात्रासु विदध्यात्सोद्यतं मनः ।
श्रावकः स च तत्रापि संयमं न विराधयेत् ॥738॥

अर्थ: तीर्थवन्दना, आदि यात्राओंके लिये सदा उत्साह सहित मनको रखना चाहिये। परन्तु तीर्थादिककी यात्राओंमें भी श्रावक संयमकी विराधना न करै, अर्थात् यात्राओंमें अनेक विघ्नके कारण मिलनेपर भी वह संयमको सुरक्षित ही रक्खे ।


नित्ये नैमित्तिके चैवं जिनबिम्बमहोत्सवे ।
शैथिल्यं नैव कर्तव्यं तत्त्वज्ञैस्तद्विशेषतः ॥739॥

अर्थ: जो नित्य नैमित्तिक जिन बिम्ब महोत्सव होते रहेते हैं उनमें भी श्रावकोंको शिथिलता नहीं करना चाहिये, तत्त्वके जानकारोंको तो विशेषतासे उनमें सम्मिलित होना चाहिये ।


संयमो द्विविधश्चैव विधेयो गृहमेधिभिः ।
बिनापि प्रतिमारूपं व्रतं यद्वा स्वशक्तितः ॥740॥

अर्थ: गृहस्थोंको दो प्रकारका संयम भी धारण करना चाहिये । या तो अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिमारूप व्रतको धारण करना चाहिये अथवा विना प्रतिमाके भी अभ्यस्तरूप व्रतोंको धारण करना चाहिये ।


तपो द्वादशधा द्वेधा बाह्याभ्यन्तरभेदतः ।
कृत्स्नमन्यतमं वा तत्कार्यंचानतिवीर्यसात् ॥741॥

अर्थ: बाह्य और अभ्यन्तरके भेदसे तप बारह प्रकार कहा गया है छह प्रकार बाह्य और छह प्रकार अभ्यन्तर। इन बारह प्रकारके तपोंको सम्पूर्णतासे अथवा इनमेंसे किसी एकको अपनी शक्तिके अनुसार करना चाहिये।


उक्तं दिङ्मात्रतोऽप्यत्र प्रसङ्गाद्वा गृहिव्रतम् ।
वक्ष्ये चोपासकाध्यायात्सावकाशात्सविस्तरम् ॥742॥

अर्थ: ग्रन्थकार कहते हैं कि यहांपर प्रसङ्गवश गृहस्थियोंके व्रत दिङ्मात्र हमने कह दिये हैं । आगे अवकाश पाकर उपासकाध्ययन ग्रंथोंके आधारसे उन्हें विस्तारपूर्वक हम कहेंगे ।


यतेर्मूलगुणाश्चाष्टाविंशतिर्मूलवत्तरोः ।
नात्राप्यन्यतमेनोना नातिरिक्ताः कदाचन ॥743॥

अर्थ: मुनियोंके मूलगुण भी अट्ठाईस हैं । वे ऐसे ही हैं जैसे कि वृक्षका मूल होता है । विना मूलके जिस प्रकार वृक्ष नहीं ठहर सकता उसी प्रकार विना अट्ठाईस मूलगुणोंके मुनिव्रत भी नहीं ठहर सकता । इन अट्ठाईस मूलगुणोंमेंसे मुनियोंके न तो एक भी कम होता है और न अधिक ही होता है ।


सर्वैरेभिः समस्तैश्च सिद्धं यावन्मुनिव्रतम् ।
न व्यस्तैर्व्यस्तमात्रं तु यावदंशनयादपि ॥744॥

अर्थ: अट्ठाईस मूलगुणोंको सम्पूर्ण रीतिसे पालनेसे ही मुनिव्रत सिद्ध होता है। इनमेंसे कुछ गुणोंको पालनेसे मुनिव्रत नहीं समझा जाता, किन्तु वह भी अपूर्ण ही रहता है। जितने अंशमें मूलगुणोंमें न्यूनता रहती है उतने ही अंशमें मुनिव्रतमें भी न्यूनता रह जाती है।


वदसमिदिंदियरोधो लोचो आवस्सयमचेलमन्हाणं ।
खिदिसयणमदंतमणं ठिदिभोयणमेयभत्तं च ॥745॥

अर्थ: पंच महाव्रत, पंच समिति, पाँचों इन्द्रियोंका निरोध, केशलोंच करना, छह आवश्यकों ( समता, वंदना, स्तुति, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, कायोत्सर्ग ) का पालना, वस्त्र धारण नहीं करना, स्नान नहीं करना, पृथ्वीपर सोना, दन्तधावन नहीं करना, खड़े होकर आहार लेना और एकवार भोजन करना ये मुनियोंके अट्ठाईस मूल गुण हैं ।


एते मूलगुणाः प्रोक्ताः यतीनां जैनशासने ।
लक्षाणां चतुरशीतिर्गुणाश्चोत्तरसंज्ञकाः ॥746॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए मुनियोंके मूल गुण जैन शासनमें कहे गये हैं उन्हीं मुनियोंके उत्तर गुण चौरासी लाख हैं ।


ततः सागारधर्मो वाऽनगारो वा यथोदितः ।
प्राणिसंरक्षणं मूलमुभयत्राऽविशेषतः ॥747॥

अर्थ: सारांश यही है कि जो गृहस्थोंका धर्म कहा गया है अथवा जो मुनियोंका धर्म कहा गया है उन दोनोंमें सामान्य रीतिसे प्राणियोंकी रक्षा मूल भूत है, अर्थात् दोनोंके व्रतोंका उद्देश्य प्राणियोंकी रक्षा करना है। गृहस्थ धर्ममें एक देश रक्षा की जाती है और मुनि धर्ममें सर्वथा की जाती है।


उक्तमस्ति क्रियारूपं व्यासाद्व्रतकदम्बकम् ।
सर्वसावद्ययोगस्य तदेकस्य निवृत्तये ॥748॥

अर्थ: और भी जो क्रियारूप व्रतोंका समूह विस्तारसे कहा गया है वह एक सर्व सावद्ययोग ( प्राणि हिंसापरिणाम ) की निवृत्तिके ही लिये है।


अर्थाज्जैनोपदेशोयमस्त्यादेशः स एव च ।
सर्वसावद्ययोगस्य निवृत्तिर्व्रतमुच्यते ॥749॥

अर्थ: अर्थात् यही तो जिनमतका उपदेश है और यही जिनमतका आदेश है कि सर्व सावद्ययोगकी निवृत्तिको व्रत कहते हैं ।


सर्वशब्देन तत्रान्तर्बहिर्वृत्तिर्यदर्थतः ।
प्राणच्छेदो हि सावद्यं सैव हिंसा प्रकीर्तिता ॥750॥

अर्थ: सर्व सावद्य योगका शब्दार्थ करते हुए प्रत्येक शब्दका अर्थ करते हैं -सर्व शब्दका अर्थ है अन्तरंग और वहिरंग व्यापार, सावद्य शब्दका अर्थ है प्राणोंका छेद करना, इसीका नाम हिंसा है। योग शब्दका अर्थ है उस सर्व सावद्य (हिंसा)के विषयमें उपयोग लगाना, उपयोग दो प्रकारका है, एक बुद्धि पूर्वक, दूसरा सूक्ष्म-अबुद्धि पूर्वक, इस प्रकार योगके दो भेद हो जाते हैं।


योगस्तत्रोपयोगो वा बुद्धिपूर्वः स उच्यते ।
सूक्ष्मश्चाबुद्धिपूर्वो यः स स्मृतो योग इत्यपि ॥751॥

अर्थ: सर्व सावद्य योगका शब्दार्थ करते हुए प्रत्येक शब्दका अर्थ करते हैं - सर्व शब्दका अर्थ है अन्तरंग और वहिरंग व्यापार, सावद्य शब्दका अर्थ है प्राणोंका छेद करना, इसीका नाम हिंसा है। योग शब्दका अर्थ है उस सर्व सावद्य (हिंसा)के विषयमें उपयोग लगाना, उपयोग दो प्रकारका है, एक बुद्धि पूर्वक, दूसरा सूक्ष्म-अबुद्धि पूर्वक, इस प्रकार योगके दो भेद हो जाते हैं।


तस्याभावन्निवृत्तिः स्याद् व्रतं वार्थादिति स्मृतिः ।
अंशात्साप्यंशतस्तत्सा सर्वतः सर्वतोपि तत् ॥752॥

अर्थ: उस सर्व सावद्ययोगका अभाव होनेका नाम ही सर्व सावद्ययोग निवृत्ति कहलाती है, उसीका नाम व्रत है। यदि सर्व सावद्य योगकी निवृत्ति अंश रूपसे है तो व्रत भी अंश रूपसे है, और यदि वह सर्वांश रूपसे (पूर्णतासे) है तो व्रत भी पूर्ण है।


सर्वतः सिद्धमेवैतद्व्रतं बाह्यं दयाङ्गिषु ।
व्रतमन्तः कषायाणां त्यागः सैवात्मनि कृपा ॥753॥

अर्थ: यह बात निर्णीत है कि प्राणियोंमें दया करना बाह्य व्रत कहलाता है और कषायोंका त्याग करना अन्तर्व्रत कहलाता है तथा यही अन्तर्व्रत निजात्मा पर दया-भाव कहलाता है।


लोकासंख्यातमात्रास्ते यावद्रागादयः स्फुटम् ।
हिंसा स्यात्संविदादीनां धर्माणां हिंसनाचितः ॥754॥

अर्थ: असंख्यात लोक प्रमाण रागादिक वैभाविक भाव जब तक रहते हैं तब तक आत्माके ज्ञानादिक गुणोंकी हिंसा होनेसे आत्माकी हिंसा होती रहती है। इसलिये ये भाव ही हिंसाके कारण तथा स्वयं हिंसारूप हैं।


अर्थाद्रागादयो हिंसा चास्त्यधर्मो व्रतच्युतिः ।
अहिंसा तत्परित्यागो व्रतं धर्मोऽथवा किल ॥755॥

अर्थ: अर्थात् रागादिक भाव ही हिंसा है, अधर्म है, व्रतच्युति है, और रागादिक्का त्याग ही अहिंसा है, धर्म है अथवा व्रत है ।


आत्मेतराङ्गिणामङ्गरक्षणं यन्मतं स्मृतम् ।
तत्परं स्वात्मरक्षायाः कृतं नातः परत्र यत् ॥756॥

अर्थ: आत्मासे भिन्न दूसरे प्राणियोंके शरीरकी रक्षा जो कही गई है वह भी केवल अपनी ही रक्षाके लिये है। इससे भिन्न नहीं है।


सत्सु रागादिभावेषु बन्धः स्यात्कर्मणां बलात् ।
तत्पाकादात्मनो दुःखं तत्सिद्धः स्वात्मनो वधः ॥757॥

अर्थ: रागादिक भावोंके होने पर अवश्य ही कर्म बन्ध होता है, और उस कर्म बन्धके पाकसे आत्माको दुःख होता है इसलिये रागादिक भावों ( परहिंसा परिणाम )से अपने आत्माका घात होता है यह बात सिद्ध हो चुकी ।


ततः शुद्धोपयोगो यो मोहकर्मोदयादृते ।
चारित्रापरनामैतद् व्रतं निश्चयतः परम् ॥758॥

अर्थ: इस लिये मोहनीय कर्मके उदयसे रहित जो आत्माका शुद्धोपयोग है उसीका दूसरा नाम चारित्र है और वही निश्चयसे उत्कृष्ट व्रत है ।


चारित्रं निर्जराहेतुर्न्यायादप्यस्त्यवाधितम् ।
सर्वस्वार्थक्रियामर्हन् सार्थनामास्ति दीपवत् ॥759॥

अर्थ: चारित्र निर्जराका कारण है यह बात न्यायसे अवाधित सिद्ध है। वह चारित्र ही स्वार्थ क्रिया करनेमें समर्थ है। जिस प्रकार दीपक प्रकाशन क्रियासे सार्थनामा ( यथार्थ नामवाला ) है उसी प्रकार चारित्र भी कर्म नाश क्रियासे सार्थनामा है।


रूढेः शुभोपयोगोपि ख्यातश्चारित्रसञ्ज्ञया ।
स्वार्थक्रियामकुर्वाणः सार्थनामा न निश्चयात् ॥760॥

अर्थ: रूढ़िसे शुभोपयोग भी चारित्र कहा जाता है परन्तु शुभोपयोग चारित्र स्वार्थ क्रिया (कर्मोंकी निर्जरा)के करनेमें समर्थ नहीं है इस लिये निश्चयसे वह यथार्थ चारित्र नहीं है । किन्तु कर्मबन्धका कारण है इस लिये शत्रुके समान है । यह चारित्र श्रेष्ठ नहीं कहा जा सक्ता किन्तु शुद्धोपयोगरूप चारित्र श्रेष्ठ है । यह न तो आत्माका उपकार ही करनेमें समर्थ है और न अपकार ही करनेमें समर्थ है ।


किन्तु बन्धस्य हेतुः स्यादर्थात्तत्प्रत्यनीकवत् ।
नासौ वरं वरं यः स नापकारोपकारकृत् ॥761॥

अर्थ: रूढ़िसे शुभोपयोग भी चारित्र कहा जाता है परन्तु शुभोपयोग चारित्र स्वार्थ क्रिया (कर्मोंकी निर्जरा)के करनेमें समर्थ नहीं है इस लिये निश्चयसे वह यथार्थ चारित्र नहीं है । किन्तु कर्मबन्धका कारण है इस लिये शत्रुके समान है। यह चारित्र श्रेष्ठ नहीं कहा जा सक्ता किन्तु शुद्धोपयोगरूप चारित्र श्रेष्ठ है। यह न तो आत्माका उपकारही करनेमें समर्थ है और न अपकार ही करनेमें समर्थ है।


विरुद्धकार्यकारित्वं नास्यासिद्धं विचारसात् ।
बन्धस्यैकान्ततो हेतोः शुद्धादन्यत्रसंभवात् ॥762॥

अर्थ: शुभोपयोग रूप चारित्र विरुद्ध कार्यकारी है यह बात असिद्ध नही है। क्योंकि शुद्धके सिवा सर्वत्र एकान्त रीतिसे बन्ध होना संभव ही है।


नोह्यं प्रज्ञापराधत्वान्निर्जरा हेतुरंशतः ।
अस्ति नाबंधहेतुर्वा शुभो नाप्यशुभावहः ॥763॥

अर्थ: बुद्धिके दोषसे ऐसी भी तर्कणा नहीं करना चाहिये कि शुभोपयोग-चारित्र अंश मात्र निर्जराका भी कारण है । शुभोपयोग और अशुभोपयोग दोनों निर्जराके कारण तो है ही नहीं, किन्तु संवरके भी नहीं हैं ।


कर्मादानक्रियारोधः स्वरूपाचरणं च यत् ।
धर्मः शुद्धोपयोगः स्यात् सैष चारित्रसंज्ञकः ॥764॥

अर्थ: कर्मके ग्रहण करनेकी क्रियाका रुक जाना ही स्वरूपाचरण चारित्र है। वही धर्म है, वही शुद्धोपयोग है, और वही यथार्थ चारित्र है।


चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समोति णिद्दिट्ठो ।
मोहक्कोहविहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो ॥765॥

अर्थ: निश्चयसे चारित्र ही धर्म है और धर्म वही है जो उपशमरूप है । तथा मोह क्रोधसे रहित आत्माका परिणाम ही धर्म है ।


ननु सद्दर्शनज्ञानचारित्रैर्मोक्षपद्धतिः ।
समस्तैरेव न व्यस्तैस्तत्किं चारित्रमात्रया ॥766॥

अर्थ: शङ्काकारका कहना है कि सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और चारित्र तीनोंको मिलकर ही मोक्षमार्ग कहलाता है। फिर केवल चारित्रके कहनेसे क्या प्रयोजन है ?


सत्यं सद्दर्शनं ज्ञानं चारित्रान्तर्गतं मिथः ।
त्रयाणामविनाभावादिदं त्रयमखण्डितम् ॥767॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि सामान्य दृष्टिसे शंका ठीक है कि सामान्य दृष्टिसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान दोनों ही चारित्रमें गर्भित हैं। परंतु तीनोंका अविनाभाव होनेसे तीनों ही अखण्डित हैं।


किञ्च सद्दर्शनं हेतुः सँविचारित्रयोर्द्वयोः
सम्यग्विशेषणस्योच्चैर्यद्वा प्रत्यग्रजन्मनः ॥768॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र, दोनोंमें सम्यग्दर्शन कारण है, और वह कारणता भी नवीन जन्म धारण वरनेवाले सम्यग् विशेषणकी अपेक्षासे है अर्थात् सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रको प्रकट करनेमें कारण नहीं है किन्तु ज्ञान और चारित्रमें सम्यक्पना लानेमें कारण है । इसी लिये वह तीनोंमें प्रधान है।


अर्थोयं सति सम्यक्त्वे ज्ञानं चारित्रमत्र यत् ।
भूतपूर्वं भवेत् सम्यक् सूते वाऽभूतपूर्वकम् ॥769॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका स्पष्ट अर्थ यह है कि सम्यग्दर्शनके होने पर ज्ञान और चारित्र सम्यक् विशेषणको धारण करते हैं। अथवा उनदोनोंमें नवीन सम्यक्पना आता है।


शुद्धोपलब्धिशक्तिर्या लब्धिर्ज्ञानातिशायिनी ।
सा भवेत्सति सम्यक्त्वे शुद्धो भावोऽथवापि च ॥770॥

अर्थ: आत्माकी शुद्धोपलब्धिमें कारणीभूत जो अतिशय ज्ञानात्मक लब्धि (मतिज्ञानावरणीय कर्मका विशेष क्षयोपशम) है वह सम्यग्दर्शनके होने पर ही होती है। अथवा आत्माका शुद्ध भाव - शुद्धात्मानुभूति सम्यग्दर्शन होने पर ही होती है।


यत्पुनर्द्रव्यचारित्रं श्रुतं ज्ञानं विनापि दृक् ।
न तज्ज्ञानं न चारित्रमस्ति चेत्कर्मबन्धकृत् ॥771॥

अर्थ: और भी जो द्रव्य चारित्र और श्रुतज्ञान है यदि वह सम्यग्दर्शन रहित है तो न तो वह ज्ञान है और न वह चारित्र है, यदि है तो केवल कर्मबन्ध करनेवाला ही है ।


तेषामन्यतमोद्देश्यो नास्ति दोषाय कुत्रचित् ।
मोक्षमार्गैकसाध्यस्य साधकानां स्मृतेरपि ॥772॥

अर्थ: इसलिये उन तीनोंमेंसे किसी एकका कथन भी कहीं दोषाधायक नहीं है । मोक्षमार्ग एक साध्य है और ये तीनों ही उसके साधक रूपसे कहे जाते हैं ।


बन्धो मोक्षश्च ज्ञातव्यः समासात्प्रश्नकोविदैः ।
रागांशैर्बन्ध एव स्यान्नोऽरागांशैः कदाचन ॥773॥

अर्थ: प्रश्न करनेमें जो अति चतुर हैं उन्हें बन्ध और मोक्षकी व्यवस्था भी संक्षेपसे जान लेना चाहिये। वह यह है कि रागांश - परिणामोंसे बन्ध होता है और विना रागांश - परिणामोंके बन्ध कभी नहीं हो सकता।


येनांशेन सुदृष्टिस्तेनांशेनास्य बन्धनं नास्ति ।
येनांशेन तु रागस्तेनांशेनास्य बन्धनं भवति ॥774॥

अर्थ: जिस अंशसे आत्मा सम्यग्दर्शन विशिष्ट है उस अंशसे उसके कर्मबन्ध नहीं होता और जिस अंशसे उसके राग है उस अंशसे उसके कर्मबन्ध होता है।


उक्तो धर्मस्वरूपोपि प्रसङ्गात्सङ्गतोंशतः ।
कविर्लब्धावकाशस्तं विस्तराद्वा करिष्यति ॥775॥

अर्थ: प्रसङ्गवश अंशरूपसे धर्मका स्वरूप भी कहा गया, अत्र आचार्य कहते हैं कि अवकाश पाकर उस धर्मका स्वरूप विस्तार पूर्वक भी कहेंगे ।


देवे गुरौ तथा धर्मे दृष्टिस्तत्त्वार्थदर्शिनी ।
ख्याताप्यमूढदृष्टिः स्यादन्यथा मूढदृष्टिता ॥776॥

अर्थ: देव गुरु और धर्ममें श्रद्धान करना अमूढ़दृष्टि अंग कहलाता है, अन्यथा (इसकी विपरीततामें) मूढ़दृष्टि दोष कहलाता है ।


सम्यक्त्वस्य गुणोप्येष नालं दोषाय लक्षितः ।
सम्यग्दृष्टिर्यतोवश्यं तथा स्यान्न तथेतरः ॥777॥

अर्थ: अमूढ़दृष्टि सम्यग्दर्शनका गुण है। यह गुण किसी प्रकार दोषोत्पादक नहीं है किन्तु गुणोत्पादक है। क्योंकि सम्यग्दृष्टि नियमसे अमूढ़दृष्टि अंगका पालन करता है। मिथ्यादृष्टि ऐसा नहीं करता वह उल्टा ही करता है।


उपब्रंहणनामास्ति गुणः सम्यग्दृगात्मनः ।
लक्षणादात्मशक्तीनामवश्यं ब्रंहणादिह ॥778॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिका उपब्रंहण ( उपगूहन ) नामक भी एक गुण है । उसका यह लक्षण है कि अपनी आत्मिक शक्तियोंको बढ़ाना अथवा उनका विकाश करना। इसीसे उसका अन्वर्थ नाम उपब्रंहण है ।


आत्मशुद्धेरदौर्बल्यकरणं चोपबृंहणम् ।
अर्थाद्दृग्ज्ञप्तिचारित्रभावात् संवलितं हि तत् ॥779॥

अर्थ: आत्माकी शुद्धिमें मन्दता नहीं आने देना किन्तु उसे बढ़ाना इसका नाम भी उपबृंहण है, अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र, इन भावोंसे विशिष्ट आत्माकी शुद्धिको बढ़ाते रहना उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता नहीं आने देना इसीका नाम उपबृंहण है।


जानन्नप्येष निःशेषात्पौरुषं प्रेरयन्निव ।
तथापि यत्नवान्नात्र पौरुषं प्रेरयन्निव ॥780॥

अर्थ: उपत्रंहण गुणका धारी पुरुष पुरुषार्थ पूर्वक सम्पूर्ण ऐहिक बातोंको जानता है परन्तु उन ऐहिक ( संसार सम्बन्धी ) बातोंके प्राप्त करनेके लिये वह पुरुषार्थ पूर्वक प्रयत्न नहीं करता है ।


नायं शुद्धोपलब्धौ स्याल्लेशतोपि प्रमादवान् ।
निष्प्रमादतयाऽऽत्मानमाददानः समादरात् ॥781॥

अर्थ: उपत्रहंण गुणका धारक आत्माकी शुद्ध-उपलब्धिमें लेश मात्र भी प्रमादी नहीं है किन्तु प्रमाद रहित आदर पूर्वक अपने आत्माका ग्रहण करता है ।


यद्वा शुद्धोपलब्ध्यर्थमभ्यस्येदपि तद्बहिः ।
सत्क्रियां काञ्चिदप्यर्थात्तत्तत्साध्योपयोगिनीम् ॥782॥

अर्थ: अथवा वह शुद्धोपलब्धिके लिये बाह्य किसी सत्क्रियाका भी अभ्यास करता है जो कि उसके साध्यमें उपयोगी पड़ती है।


रसेन्द्रं सेवमानोपि कोपि पथ्यं न वाऽऽचरेत् ।
आत्मनोऽनुल्लाघतामुज्झन्नुज्झन्नुल्लाघतामपि ॥783॥

अर्थ: कोई पुरुष रसायनका सेवन भी करै परन्तु पथ्य न करै तो रसायनसे जिस प्रकार वह अपने रोगका नाश करता है उसी प्रकार पथ्यके न करनेसे नीरोगताका भी नाश करता है।


यद्वा सिद्धं विनायासात्स्वतस्तत्रोपबृंहणम् ।
ऊर्ध्वमूर्ध्वगुणश्रेण्यां निर्जरायाः सुसंभवात् ॥784॥

अर्थ: अथवा सम्यग्दृष्टिके किसी खास यत्नके स्वतः ही उपबृंहण गुण सिद्ध है। क्योंकि ऊपर ऊपर गुणश्रेणी (परिणामोंकी उत्तरोत्तर विशुद्धतामें) रूपसे उसके निर्जराका होना अवश्यंभावी है।


अवश्यंभाविनी चात्र निर्जरा कृत्स्नकर्मणाम् ।
प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावदसंख्येयगुणक्रमात् ॥785॥

अर्थ: उपबृंहण गुणधारीके सम्पूर्ण कर्मोंकी निर्जरा अवश्य होगी, क्योंकि प्रतिक्षण उसके असंख्यात गुणी २ निर्जरा होती ही रहती है ।


न्यायादायातमेतद्वै यावतांशेन तत्क्षतिः ।
वृद्धिः शुद्धोपयोगस्य वृद्धेर्वृद्धिः पुनः पुनः ॥786॥

अर्थ: यह बात न्याय प्राप्त है कि जितने अंशमें कर्मोंका क्षय होजाता है उतने ही अंशमें शुद्धोपयोगकी वृद्धि होजाती है । उधर कर्मोंके क्षयकी वृद्धि होती जाती है इधर शुद्धोषयोगकी वृद्धि होती जाती है । यह वृद्धि बराबर बढ़ती चली जाती है ।


यथा यथा विशुद्धेः स्याद् वृद्धिरन्तः प्रकाशिनी ।
तथा तथा हृषीकाणामुपेक्षा विषयेष्वपि ॥787॥

अर्थ: जैसी जैसी विशुद्धिकी वृद्धि अन्तरंगमें प्रकाश डालती है, वैसी वैसी ही आत्माकी इन्द्रियोंके विषयोंमें उपेक्षा होती जाती है ।


ततो भूम्नि क्रियाकाण्डे नात्मशक्तिं स लोपयेत् ।
किन्तु संवर्धयेन्नूनं प्रयत्नादपि दृष्टिमान् ॥788॥

अर्थ: इसलिये बहुतसे क्रियाकाण्डमें अपनी शक्तिको नहीं छिपाना चाहिये। किन्तु यत्नपूर्वक उसे बढ़ाना चाहिये यह सम्यग्दृष्टिका कर्तव्य है।


उपबृंहणनामापि गुणः सद्दर्शनस्य यः ।
गणितो गणनामध्ये गुणानां नागुणाय च ॥789॥

अर्थ: जो उपब्रंहण (उपगूहन) गुण कहा गया है वह भी सम्यग्दृष्टिका गुण है। सम्यग्दृष्टिके गुणोंमें यह भी गुण गिना गया है, यह दोषाधायक नहीं है।


सुस्थितीकरणं नाम गुणः सम्यग्दृगात्मनः ।
धर्माच्च्युतस्य धर्मे तत् नाऽधर्मेऽधर्मणः क्षतेः ॥790॥

अर्थ: स्थितिकरण गुण भी सम्यग्दृष्टिका गुण है। धर्मसे जो पतित हो चुका है अथवा पतित होनेके सन्मुख है उसे फिर धर्ममें स्थित कर देना इसीका नाम स्थितिकरण है। किन्तु अधर्मकी क्षति होने पर अधर्ममें स्थित करनेको स्थितिकरण नहीं कहते हैं।


न प्रमाणीकृतं वृद्धैर्धर्मायाधर्मसेवनम् ।
भाविधर्माशया केचिन्मन्दाः सावद्यवादिनः ॥791॥

अर्थ: धर्मके लिये भी अधर्मका सेवन करना वृद्ध पुरुषोंने स्वीकार नहीं किया है। आगामी कालमें धर्मकी आशासे कोई मूर्ख - अधर्म सेवनका भी उपदेश देते हैं।


परस्परेति पक्षस्य नावकाशोत्र लेशतः ।
मूर्खादन्यत्र नो मोहाच्छीतार्थं वन्हिमाविशेत् ॥792॥

अर्थ: 'अधर्म सेवनसे परम्परा धर्म होता है, इस प्रकार परम्परा पक्षका लेशमात्र भी यहां अवकाश नहीं है। मूर्खको छोड़ कर ऐसा कौन पुरुष है जो मोहसे शीतके लिये वन्हिमें प्रवेश करै ।


नैतद्धर्मस्य प्राग्रूपं प्रागधर्मस्य सेवनम् ।
व्याप्तेरपक्षधर्मत्वाद्धेतोर्वा व्यभिचारतः ॥793॥

अर्थ: अधर्मका सेवन धर्मका प्राक्रूप भी नहीं है। क्योंकि अधर्मसेवनरूप हेतु विपक्षभूत-अधर्मप्राप्तिमें भी रह जाता है इसलिये व्यभिचारी है इसीसे अधर्मसेवन और धर्मप्राप्तिकी व्याप्ति भी व्यभिचरित है ।


प्रतिसूक्ष्मक्षणं यावद्धेतोः कर्मोदयात्स्वतः ।
धर्मो वा स्यादधर्मो वाप्येष सर्वत्र निश्चयः ॥794॥

अर्थ: प्रति समय जब तक कर्मका उदय है तब तक धर्म और अधर्म दोनों ही हो सकते हैं ऐसा सर्वत्र नियम है ।


तत्स्थितीकरणं द्वेधाऽध्यक्षात्स्वापरभेदतः ।
स्वात्मनः स्वात्मतत्त्वेऽर्थात्परत्वे तु परस्य तत् ॥795॥

अर्थ: वह स्थितिकरण अपने और परके भेदसे दो प्रकारका है। अर्थात् अपने आत्माके पतित होनेपर अथवा पतित होनेके सन्मुख होनेपर अपने आत्मामें ही पुनः अपने आपको लगा लैना इसे स्व-स्थितीकरण कहते हैं। और दूसरे आत्माके धर्मसे पतित होनेपर पुनः उसे उसी धर्ममें तदवस्थ कर देना इसे पर स्थितीकरण कहते हैं।


तत्र मोहोदयोद्रेकाच्च्युतस्यात्मस्थितेश्चितः ।
भूयः संस्थापनं स्वस्य स्थितीकरणमात्मनि ॥796॥

अर्थ: मोहोदयके उद्रेकवश अपनी आत्म परिस्थिति ( धर्मस्थिति ) से पतित अपने आत्माको पुनः आत्म परिस्थितिमें लगा देना इसीका नाम स्वस्थितीकरण है।


अयं भावः क्वचिद्दैवाद्दर्शनात्स पतत्यधः ।
व्रजत्यूर्ध्वं पुनर्दैवात्सम्यगारुह्य दर्शनम् ॥797॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए कथनका खुलासा इस प्रकार है - कभी कर्मोदयकी तीव्रतासे वह सम्यग्दृष्टि दर्शनसे नीचे गिरता है। फिर दैववश सम्यग्दर्शनको पाकर ऊपर चढ़ता है।


अथ क्वचिद्यथाहेतुदर्शनादपतन्नपि ।
भावशुद्धिमधोधोंशैरूर्ध्वमूर्ध्वं प्ररोहति ॥798॥

अर्थ: अथवा सामग्रीकी योग्यतामें कभी दर्शनसे नहीं भी गिरता है तो भावोंकी शुद्धिको नीचे नीचेके अंशोंसे ऊपर ऊपरको बढ़ाता है।


क्वचिद्वहिः शुभाचारं स्वीकृतं चापि मुञ्चति ।
न मुञ्चति कदाचिद्वै मुक्त्वा वा पुनराश्रयेत् ॥799॥

अर्थ: कभी स्वीकृत किये हुए भी बाह्य-शुभाचारको छोड़ देता है। कभी नहीं भी छोड़ता है। अथवा छोड़कर पुनः ग्रहण करने लगता है ।


यद्वा वहिः क्रियाचारे यथावस्थं स्थितेपि च ।
कदाचिद्दीप्यमानोन्तर्भावैर्भूत्वा च वर्त्तते ॥800॥

अर्थ: अथवा बाह्य क्रियाचारमें ठीक २ स्थित रहनेपर कभी २ अन्तरंग भावोंसे दैदीप्यमान होने लगता है ।

उत्तरार्द्ध 801 से 900 (श्लोक 801 से 900)

नासंभवमिदं यस्माच्चारित्रावरणोदयः ।
अस्ति तरतमस्वांशैर्गच्छन्निम्नोन्नतामिह ॥801॥

अर्थ: कभी अन्तरंगके भाव बढ़ने लगते हैं कभी घटने लगते हैं यह बात असंभव नहीं है। क्योंकि चारित्र मोहनीय कर्मका उदय अपने अंशोंसे कभी बढ़ने लगता है और कभी घटने लगता है।


अत्राभिप्रेतमेवैतत्स्वस्थितीकरणं स्वतः ।
न्यायात्कुतश्चिदत्रास्ति हेतुस्तत्रानवस्थितिः ॥802॥

अर्थ: यहां पर इतना ही अभिप्राय है कि स्वस्थितीकरण स्वयं होता है और उसमें आत्माकी स्थिरताका न होना ही कारण है ।


सुस्थितीकरणं नाम परेषां सदनुग्रहात् ।
भ्रष्टानां स्वपदात्तत्र स्थापनं तत्पदे पुनः ॥803॥

अर्थ: दूसरोंपर सत् अनुग्रह करना ही पर-स्थितीकरण है। वह अनुग्रह यही है कि जो अपने पदसे भ्रष्ट हो चुके हैं उन्हें उसी पदमें फिर स्थापन कर देना।


धर्मादेशोपदेशाभ्यां कर्तव्योऽनुग्रहःपरे ।
नात्मव्रतं विहायास्तु तत्परः पररक्षणे ॥804॥

अर्थ: धर्मका आदेश और धर्मका उपदेश देकर दूसरों पर अनुग्रह करना चाहिये। परन्तु आत्मीय व्रतमें किसी प्रकारकी बाधा न पहुंचा कर ही दूसरोंके रक्षणमें तत्पर रहना उचित है। अन्यथा नहीं।


आदहिदं कादव्वं जइ सक्कइ परहिदं च कादव्वं ।
आदहिदपरहिदादो आदहिदं सुट्ठु कादव्वं ॥805॥

अर्थ: सबसे प्रथम अपना हित करना चाहिये । यदि अपना हित करते हुए जो पर हित करनेमें समर्थ है उसे परहित भी करना चाहिये । आत्महित और परहित इन दोनोंमें आत्महित ही उत्तम है उसे ही प्रथम करना चाहिये ।


उक्तं दिङ्मात्रतोऽप्यत्र सुस्थितीकरणं गुणः ।
निर्जरायां गुणश्रेणौ प्रसिद्धः सुदृगात्मनः ॥806॥

अर्थ: सुस्थितिकरण गुणका स्वरूप थोड़ासा यहां पर कहा गया है। यह गुण सम्यग्दृष्टिके उत्तरोत्तर असंख्यात गुणी निर्जराके लिये प्रसिद्ध है।


वात्सल्यं नाम दासत्वं सिद्धार्हद्बिम्बवेश्मसु ।
संघे चतुर्विधे शास्त्रे स्वामिकार्ये सुभृत्यवत् ॥807॥

अर्थ: सिद्धपरमेष्ठी, अर्हद्बिम्ब, जिन मन्दिर, चतुर्विध संघ ( मुनि, आर्यिका, श्रावक; श्राविका ) और शास्त्रमें, स्वामिकार्यमें योग्य सेवककी तरह दासत्व भाव रखना ही वात्सल्य है।


अर्थादन्यतमस्योच्चैरुद्दिष्टेषु स दृष्टिमान् ।
सत्सु घोरोपसर्गेषु तत्परः स्यात्तदत्यये ॥808॥

अर्थ: अर्थात् ऊपर जो सिद्धपरमेष्ठी आदि पूज्य बतलाये हैं उनमेंसे किसी भी एक पर घोर उपसर्ग होने पर उसके दूर करनेके लिये सम्यग्दृष्टि पुरुषको सदा तत्पररहना चाहिये ।


यद्वा नह्यात्मसामर्थ्यं यावन्मन्त्रासिकोशकम् ।
तावद्द्रष्टुं च श्रोतुं च तद्बाधां सहते न सः ॥809॥

अर्थ: अथवा जब तक अपनी सामर्थ्य है और जब तक मन्त्र, असि (तलवारका जोर) और बहुतसा द्रव्य ( खज़ाना ) है तब तक वह सम्यग्दृष्टि पुरुष उन पर आई हुई किसी प्रकारकी बाधाको न तो देख ही सक्ता है और न सुन ही सकता है।


तद्द्विधाऽथ च वात्सल्यं भेदात्स्वपरगोचरात् ।
प्रधानं स्वात्मसम्बन्धि गुणो यावत्परात्मनि ॥810॥

अर्थ: अपने और परके भेदसे वात्सल्य अंग भी दो प्रकारका है। आत्म सम्बन्धी वात्सल्य प्रधान है परात्म सम्बन्धी गौण है।


परीषहोपसर्गाद्यैः पीडितस्यापि कुत्रचित् ।
न शैथिल्यं शुभाचारे ज्ञाने ध्याने तदादिमम् ॥811॥

अर्थ: परीषह और उपसर्गादिसे कभी पीड़ित होनेपर भी अपने श्रेष्ठ आचारमें, ज्ञानमें, ध्यानमें शिथिलता नहीं आने देना इसीका नाम स्वात्म वात्सल्य है।


इतरत्प्रागिह ख्यातं गुणो दृष्टिमतः स्फुटम् ।
शुद्धज्ञानबलादेव यतो बाधापकर्षणम् ॥812॥

अर्थ: दूसरा-परात्मसम्बन्धी वात्सल्य पहले इसी प्रकरणमें कहा जा चुका है। परात्म सम्बन्धी वात्सल्य सम्यग्दृष्टिका निश्चयसे गौण गुण है। क्योंकि शुद्ध ज्ञानके बलसे ही वाधा दूर की जा सकती है। इस लिये आत्मीय शुद्धिका प्राप्त करना ही प्रमुख है।


प्रभावनाङ्गसंज्ञोस्ति गुणः सद्दर्शनस्य वै ।
उत्कर्षकरणं नाम लक्षणादपि लक्षितम् ॥813॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टिका प्रभावना अंग भी प्रसिद्ध गुण है। उसका यही लक्षण है कि हर एक धार्मिक कार्यमें उत्कर्ष - उन्नति करना।


अथातद्धर्मणः पक्षे नावद्यस्य मनागपि ।
धर्मपक्षक्षतिर्यस्मादधर्मोत्कर्षपोषणात् ॥814॥

अर्थ: पापरूप अधर्मके पक्षमें किञ्चिन्मात्र भी उत्कर्ष नहीं बढ़ाना चाहिये। क्योंकि अधर्मका उत्कर्ष बढ़ानेसे धर्मके पक्षकी हानि होती है।


पूर्ववत्सोपि द्विविधः स्वान्यात्मभेदतः पुनः ।
तत्राद्यो वरमादेयः स्यादादेयः परोऽप्यतः ॥815॥

अर्थ: पहले अंगोंकी तरह प्रभावना अंग भी स्वात्मा और परात्माके भेदसे दो प्रकार है। उन दोनोंमें पहला सर्वोत्तम है और उपादेय है। इसके पीछे दूसरा भी ग्राह्य है।


उत्कर्षो यद्बलाधिक्यादधिकीकरणं वृषे ।
असत्सु प्रत्यनीकेषु नालं दोषाय तत्क्वचित् ॥816॥

अर्थ: विपक्षके न होने पर बल पूर्वक धर्ममें वृद्धि करना, इसीका नाम उत्कर्ष है। प्रभावना अंग दोषोत्पादक कभी नहीं होसकता है।


मोहारातिक्षतेः शुद्धः शुद्धाच्छुद्धतरस्ततः ।
जीवः शुद्धतमः कश्चिदस्तीत्यात्मप्रभावना ॥817॥

अर्थ: मोहरूपी शत्रुका नाश होजानेसे जीव शुद्ध होजाता है, कोई शुद्धसे भी अधिक शुद्ध होजाता है और कोई उससे भी अधिक शुद्ध होजाता है इस प्रकार अपने आत्माका उत्कर्ष बढ़ाना इसीका नाम स्वात्मप्रभाक्ना है ।


नेदं स्यात्पौरुषायत्तं किन्तु नूनं स्वभावतः ।
ऊर्ध्वमूर्ध्वगुणश्रेणौ यतः सिद्धिर्यथोत्तरम् ॥818॥

अर्थ: इस प्रकारका उत्कर्ष करना पौरुषके अधीन नहीं है किन्तु स्वभावसे ही होता है। और उत्तरोत्तर श्रेणीके क्रमसे असंख्यात गुणी निर्जरा होनेसे उसकी सिद्धि होती है।


बाह्यः प्रभावनाङ्गोस्ति विद्यामन्त्रादिभिर्बलैः ।
तपोदानादिभिर्जैनधर्मोत्कर्षो विधीयताम् ॥819॥

अर्थ: विद्याके बलसे, मन्त्रादिके बलसे, तपसे तथा दानादि उत्तम कार्योंसे जैनधर्मका उत्कर्ष (आधिक्य) बढ़ाना चाहिये इसीको बाह्य प्रभावना कहते हैं।


परेषामपकर्षाय मिथ्यात्वोत्कर्षशालिनाम् ।
चमत्कारकरं किञ्चित्तद्विधेयं महात्मभिः ॥820॥

अर्थ: जो लोग मिथ्या क्रियाओंके बढ़ानेमें लगे हुए हैं ऐसे पुरुषोंको नीचा दिखानेके लिये अथवा उनकी हीनता प्रकट करनेके लिये महात्माओंको कुछ चमत्कार करनेवाले प्रयोग भी करना चाहिये।


उक्तः प्रभावनाङ्गोपि गुणः सद्दर्शनान्वितः ।
येन सम्पूर्णतां याति दर्शनस्य गुणाष्टकम् ॥821॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनसे विशिष्ट प्रभावना अंग भी गुण है। उसका कथन हो चुका। इसी प्रभावना अंगके कारण सम्यग्दर्शनके आठ गुण संपूर्ण हो जाते हैं, अर्थात् आठवां गुण प्रभावना है।


इत्यादयो गुणाश्चान्ये विद्यन्ते सद्दृगात्मनः ।
अलं चिन्तनया तेषामुच्यते यद्विवक्षितम् ॥822॥

अर्थ: इन आठ गुणोंके सिवा और भी सम्यग्दृष्टीके गुण हैं उनका यहां पर विचार नहीं किया जाता है। किन्तु जो विवक्षित है वही कहा जाता है।


प्रकृतं तद्यथास्ति स्वं स्वरूपं चेतनात्मनः ।
सा त्रिधात्राप्युपादेया सद्दृष्टेर्ज्ञानचेतना ॥823॥

अर्थ: प्रकृत यही है कि आत्माका निजस्वरूप चेतना है। वह चेतना तीन प्रकार है - कर्म चेतना, कर्मफल चेतना और ज्ञान चेतना। इन तीनोंमें ज्ञान चेतना ही सम्यग्दृष्टिको उपादेय है, बाकी दोनों त्याज्य हैं।


श्रद्धानादि गुणाश्चैते बाह्योल्लेखच्छलादिह ।
अर्थात्सद्दर्शनस्यैकं लक्षणं ज्ञानचेतना ॥824॥

अर्थ: श्रद्धान आदिक जो सम्यग्दृष्टिके गुण हैं वे सब बाह्य कथनके छलसे हैं, अर्थात् सम्यग्दृष्टिका तो केवल एक ज्ञानचेतना ही लक्षण है ।


ननु रूढिरिहाप्यस्ति योगाद्वा लोकतोऽथवा ।
तत्सम्यक्त्वं द्विधाप्यर्थनिश्चयाद्व्यवहारतः ॥825॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व। व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है। उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं। उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है। उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग-सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


व्यावहारिकसम्यक्त्वं सरागं सविकल्पकम् ।
निश्चयं वीतरागं तु सम्यक्त्वं निर्विकल्पकम् ॥826॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व । व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है । उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं । उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है । उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग-सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


इत्यस्ति वासनोन्मेषः केषाञ्चिन्मोहशालिनाम् ।
तन्मते वीतरागस्य सद्दृष्टेर्ज्ञानचतना ॥827॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व । व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है । उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं । उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है । उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग-सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


तैः सम्यक्त्वं द्विधा कृत्वा स्वामिभेदो द्विधा कृतः ।
एकः कश्चित् सरागोस्ति वीतरागश्च कश्चन ॥828॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व । व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है । उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं । उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है । उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग-सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


तत्रास्ति वीतरागस्य कस्यचिज्ज्ञानचेतना ।
सद्दृष्टेर्निर्विकल्पस्य नेतरस्य कदाचन ॥829॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व। व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है। उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं। उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है। उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग - सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


व्यावहारिकसद्दृष्टेः सविकल्पस्य रागिणः ।
प्रतीतिमात्रमेवास्ति कुतः स्यात् ज्ञानचेतना ॥830॥

अर्थ: ऐसी योगरूढि अथवा लोकरूढि है कि वह सम्यग्दर्शन दो प्रकार है एक निश्चय सम्यक्त्व दूसरा व्यवहार सम्यक्त्व। व्यवहार सम्यक्त्व सराग और सविकल्प है, और निश्चय सम्यक्त्व वीतराग तथा निर्विकल्पक है। किन्हीं मोहशाली पुरुषोंकी ऐसी वासना है, उनके मतमें वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है। उन लोगोंने सम्यक्त्वके दो भेद करके उसके स्वामीके भी दो भेद किये हैं। उनका कहना है कि एक सराग सम्यक्त्व होता है और एक वीतराग सम्यक्त्व होता है। उन दोनोंमें जो वीतराग-निर्विकल्पक सम्यग्दृष्टि है उसीके ज्ञान चेतना होती है, जो सराग-सविकल्पक व्यावहारिक सम्यग्दृष्टि है उसके ज्ञानचेतना कभी नहीं होती क्योंकि उसके प्रतीतिमात्र है इस लिये ज्ञान चेतना उसके कहांसे हो सकती है।


इति प्रज्ञापराधेन ये वदन्ति दुराशयाः ।
तेषां यावच्छ्रुताभ्यासः कायक्लेशाय केवलम् ॥831॥

अर्थ: इस प्रकार बुद्धिके दोषसे जो दुष्ट आशयवाले ऐसा कहते हैं उनका जितना भी शास्त्राभ्यास है वह केवल शरीरको कष्ट पहुंचानेके लिये है।


अत्रोच्यते समाधानं सामवेदेन सूरिभिः ।
उच्चैरुत्फणिते दुग्धे योज्यं जलमनाविलम् ॥832॥

अर्थ: यहां पर आचार्य शान्ति पूर्वक समाधान करते हैं क्योंकि दूधका उफान आने पर स्वच्छ जल उसमें डालना ही ठीक है।


सतृणाभ्यवहारित्वं करीव कुरुते कुदृक् ।
तज्जहीहि जहीहि त्वं कुरु प्राज्ञ विवेकिताम् ॥833॥

अर्थ: जिस प्रकार हस्ती तृण सहित खाजाता है उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि अविवेकपूर्वक बोलता है । आचार्य कहते हैं कि हे प्राज्ञ ! उस अविवेकिताको छोड़ दो और विवेक से काम लो ।


वन्हेरौष्ण्यमिवात्मज्ञ पृथक्कर्त्तुं त्वमर्हसि ।
मा विभ्रमस्व दृष्ट्वापि चक्षुषाऽचाक्षुषाशया ॥834॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि हे आत्मज्ञ ! तुम वन्हिसे उष्णताकी तरह ‘सम्यग्दृष्टिसे ज्ञान चेतना’ को अलग करना चाहते हो। परंतु चक्षुसे किसी पदार्थको देखकर भी अचाक्षुष प्रत्यक्षकी आशासे उस पदार्थमें विभ्रम मत करो ।


विकल्पो योगसंक्रान्तिरर्थाऽज्ज्ञानस्य पर्ययः ।
ज्ञेयाकारः स ज्ञेयार्थात् ज्ञेयार्थान्तरसङ्गतः ॥835॥

अर्थ: उपयोगके बदलनेको विकल्प कहते हैं। वह विकल्प ज्ञानकी पर्याय है अर्थात् पदार्थाकार ज्ञान ही उस ज्ञेयरूप पदार्थसे हटकर दूसरे पदार्थके आकारको धारण करने लगता है।


क्षायोपशमिकं तत्स्यादर्थादक्षार्थसम्भवम् ।
क्षायिकात्यक्षज्ञानस्य संक्रान्तेरप्यसंभवात् ॥836॥

अर्थ: वह उपयोग संक्रान्ति स्वरूप विकल्प क्षयोपशमात्मक है । अर्थात् इन्द्रिय और पदार्थके सम्बन्धसे होनेवाला ज्ञान है । क्योंकि अतीन्द्रिय-क्षायिक ज्ञानमें संक्रान्तिका होना ही असंभव है ।


अस्ति क्षायिकज्ञानस्य विकल्पत्वं स्वलक्षणात् ।
नार्थादर्थान्तराकारयोगसंक्रान्तिलक्षणात् ॥837॥

अर्थ: क्षायिक ज्ञानमें विकल्पपना अपने लक्षणसे आता है न कि अर्थसे अर्थान्तराकारमें परिणत होनेवाले उपयोगके संक्रमण रूप लक्षणसे ।


तल्लक्षणं स्वापूर्वार्थविशेषग्रहणात्मकम् ।
एकोऽर्थो ग्रहणं तत्स्यादाकारः सविकल्पता ॥838॥

अर्थ: क्षायिकज्ञानका लक्षण इस प्रकार है - स्व - आत्मा और अपूर्व पदार्थको विशेष रीतिसे ग्रहण करना। यहां पर अर्थ नाम पदार्थका है और ग्रहण नाम आकारका है। स्व और पदार्थके ज्ञानका ज्ञेयाकार होना ही ज्ञानमें सविकल्पता है।


विकल्पः सोधिकारेस्मिन्नाधिकारी मनागपि ।
योगसंक्रान्तिरूपो यो विकल्पोधिकृताऽधुना ॥839॥

अर्थ: जो विकल्प क्षायिक ज्ञानमें घटित किया गया है वह विकल्प इस अधिकारमें कुछ भी अधिकारी नहीं है। यहां पर तो उपयोगके पलटने रूप विकल्पका ही अधिकार है।


ऐन्द्रियं तु पुनर्ज्ञानं न संक्रान्तिमृते क्वचित् ।
यतोप्यस्य क्षणं यावदर्थादर्थान्तरे गतिः ॥840॥

अर्थ: यहां पर इन्द्रियजन्य ज्ञानका अधिकार है और इन्द्रिजन्य ज्ञान विना संक्रान्तिके कभी होता ही नहीं है । क्योंकि उसकी प्रतिक्षण अर्थसे अर्थान्तरमें गति होती रहती है ।


इदं तु क्रमवर्त्यस्ति न स्यादक्रमवर्ति यत् ।
ऐकां व्यक्तिं परित्यज्य पुनर्व्यक्तिं समाश्रयेत् ॥841॥

अर्थ: इन्द्रियजन्य ज्ञान नियमसे क्रमवर्ती होता है वह अक्रमवर्ती - सभी पदार्थोंको एक साथ जाननेवाला कभी नहीं होता। इन्द्रियजन्य ज्ञान एक पदार्थको छोड़कर दूसरे पदार्थको जाननेकी चेष्टा करता ह ।


इदं त्वावश्यकी वृत्तिः समव्याप्तेरिवाह्वया ।
इयं तत्रैव नान्यत्र तत्रैवेयं नचेतरा ॥842॥

अर्थ: समव्याप्तिकी तरह इन्द्रियजन्यबोध और संक्रान्तिकी आवश्यक व्यवस्था है । अर्थात् इन्द्रियजन्य बोध और क्रमवर्तीपना दोनोंकी समव्याप्तिके समान ही व्यवस्था है । जहां इन्द्रियजन्य बोध है वहीं क्रमवर्तीपन है, अन्यत्र नहीं है । जहां इन्द्रियजन्य बोध है वहां क्रमवर्तीपन ही है, वहां और व्यवस्था नहीं है, अर्थात् क्षायिक ज्ञान और संक्रान्तिकी प्राप्ति नहीं है ।


यत्पुनर्ज्ञानमेकत्र नैरन्तर्येण कुत्रचित् ।
अस्ति तद्ध्यानमत्रापि क्रमो नाप्यक्रमोर्थतः ॥843॥

अर्थ: जो ज्ञान किसी एक पदार्थमें निरन्तर रहता है उसीको ध्यान कहते हैं। इस ध्यानरूप ज्ञानमें भी वास्तवमें न तो क्रम ही है और न अक्रम ही है। ध्यानमें एक वृत्ति होनेसे वह ज्ञान एक सरीखा ही विदित होता है। वह वार वार उसी ध्येयकी तरफ लगता है इस लिये वह क्रमवर्ती भी है।


एकरूपमिवाभाति ज्ञानं ध्यानैकतानतः ।
तत्स्यात्पुनः पुनर्वृत्तिरूपं स्यात् क्रमवर्त्ति च ॥844॥

अर्थ: जो ज्ञान किसी एक पदार्थमें निरन्तर रहता है उसीको ध्यान कहते हैं । इस ध्यानरूप ज्ञानमें भी वास्तवमें न तो क्रम ही है और न अक्रम ही है । ध्यानमें एक वृत्ति होनेसे वह ज्ञान एक सरीखा ही विदित होता है । वह वार वार उसी ध्येयकी तरफ लगता है इस लिये वह क्रमवर्ती भी है ।


नात्र हेतुः परं साध्ये क्रमत्वेऽर्थान्तराकृतिः ।
किन्तु तत्रैव चैकार्थे पुनर्वृत्तिरपि क्रमात् ॥845॥

अर्थ: इस ध्यानरूप ज्ञानमें जो क्रमवर्त्तीपना है उसमें अर्थसे अर्थान्तर होना हेतु नहीं है किन्तु एक पदार्थमें ही क्रमसे पुनः पुनर्वृत्ति होती रहती है ।


नोह्यं तत्राप्यति व्याप्तिः क्षायिकात्यक्षसंविदि ।
स्यात्परिणामवत्वेपि पुनर्वृत्तेरसंभवात् ॥846॥

अर्थ: कदाचित् यह कहा जाय कि इस ऊपर कहे हुए ध्यानरूप ज्ञानकी अतीन्द्रिय क्षायिक ज्ञानमें अतिव्याप्ति आती है क्योंकि क्षायिक ज्ञान भी अर्थसे अर्थान्तरका ग्रहण नहीं करता है और ध्यानरूप ज्ञान भी अर्थसे अर्थान्तरका ग्रहण नहीं करता है इस लिये ध्यान रूप ज्ञानका क्षायिक ज्ञानमें लक्षण चला जाता है ? ऐसी आशंका ठीक नहीं है, क्योंकि क्षायिक ज्ञान यद्यपि परिणमनशील है तथापि उसमें पुनर्वृत्ति (वार वार ध्येय पदार्थमें उपयोग करना)का होना असंभव है


यावच्छद्मस्थजीवानामस्ति ज्ञानचतुष्टयम् ।
नियतक्रमवर्त्तित्वात् सर्वं संक्रमणात्मकम् ॥847॥

अर्थ: छद्मस्थ जीवोंके चारों ही ज्ञान (मति, श्रुति, अवधि, मनःपर्ययः) नियमसे क्रमवर्त्ती हैं इसलिये चारों ही संक्रमण रूप हैं।


नालं दोषाय तच्छक्तिः सूक्तसंक्रान्तिलक्षणा ।
हेतोर्वैभाविकत्वेपि शक्तित्वाज्ज्ञानशक्तिवत् ॥848॥

अर्थ: संक्रमण होनेसे ज्ञान शक्तिमें कोई दोष नहीं समझना चाहिये। यद्यपि वैभाविक हेतुसे उसमें विकार हुआ है तथापि वह आत्मीक शक्ति है जिस प्रकार शुद्धज्ञान आत्माकी शक्ति है। इसीप्रकार संक्रमणात्मक ज्ञान भी आत्माकी शक्ति है।


ज्ञानसञ्चेतनायास्तु न स्यात्तद्विघ्नकारणम् ।
तत्पर्यायस्तदेवेति तद्विकल्पो न तद्रिपुः ॥849॥

अर्थ: वह संक्रान्ति ज्ञानचेतनामें विघ्न नहीं कर सकती है क्योंकि वह भी ज्ञानकी ही पर्याय है। ज्ञानकी पर्याय ज्ञानरूप ही है। इसलिये विकल्प (संक्रमण ज्ञान) ज्ञानचेतनाका शत्रु नहीं है।


ननु चेति प्रतिज्ञा स्यादर्थादर्थान्तरे गतिः ।
आत्मनोऽन्यत्र तत्रास्ति ज्ञानसञ्चेतनान्तरम् ॥850॥

अर्थ: आपकी यह प्रतिज्ञा है कि संक्रान्तिके रहते हुए अर्थसे अर्थान्तरका ज्ञान होता है, जब ऐसी प्रतिज्ञा है तो क्या आत्मासे भिन्न पदार्थोंमें भी ज्ञान संचेतनान्तर होता है ?


सत्यं हेतोर्विपक्षत्वे वृत्तित्वाद्व्यभिचारिता ।
यतोऽत्रान्यात्मनोऽन्यत्र स्वात्मनि ज्ञानचेतना ॥851॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि तुम्हारा कहना ठीक है विपक्षवृत्ति होनेसे हेतुको व्यभिचारीपना अवश्य आता है, किन्तु यहां पर हेतु विपक्ष वृत्ति नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थोंसे भिन्न जो शुद्ध निजात्मा है, उसमें ज्ञान चेतनाकी वृत्ति होनेसे संक्रमण भी बन जाता है और ज्ञान चेतनाको विपक्षवृत्तित्व भी नहीं आता है ।


किञ्च सर्वस्य सद्दृष्टेर्नित्यं स्याज्ज्ञानचेतना ।
अव्युच्छिन्नप्रवाहेण यद्वाऽखण्डैकधारया ॥852॥

अर्थ: सम्पूर्ण सम्यग्दृष्टियोंके सदा ज्ञानचेतना रहती है। वह निरन्तर प्रवाह रूपसे रहती है, अथवा अखण्ड एकधारा रूपसे सदा रहती है।


हेतुस्तत्रास्ति सध्रीची सम्यक्त्वेनान्वयादिह ।
ज्ञानसञ्चेतनालब्धिर्नित्या स्वावरणव्ययात् ॥853॥

अर्थ: निरन्तर ज्ञानचेतनाके रहनेमें भी सहकारी कारण सम्यग्दर्शनके साथ अन्वयरूपसे रहनेवाली ज्ञानचेतनालब्धि है वह अपने आवरणके क्षय होनेसे सम्यग्दर्शनके साथ सदा रहती है ।


कादाचित्कास्ति ज्ञानस्य चेतना स्वोपयोगिनी ।
नालं लब्धेर्विनाशाय समव्याप्तेरसंभवात् ॥854॥

अर्थ: ज्ञानकी निज उपयोगात्मक चेतना कभी २ होती है। वह लब्धिका विनाश करनेमें समर्थ नहीं है। इसका कारण भी यही है कि उपयोगरूप ज्ञानचेतनाकी सम व्याप्ति नहीं है।


अस्त्यत्र विषमव्याप्तिर्यावल्लब्ध्युपयोगयोः ।
लब्धिक्षतेरवश्यं स्यादुपयोगक्षतिर्यतः ॥855॥

अर्थ: लब्धि और उपयोगमें विषम व्याप्ति है । क्योंकि लब्धिका नाश होने पर उपयोगका नाश अवश्यंभावी है । परन्तु उपयोगका नाश होनेपर लब्धिका नाश अवश्यंभावी नहीं है । हो या न हो कुछ नियम नहीं है। सम्यग्दर्शनके साथ लब्ध्यावरणकर्मके क्षयोपशमकी व्याप्ति है, उसके साथ उपयोगात्मक ज्ञानकी व्याप्ति नहीं है । व्याप्तिसे तात्पर्य यहां समव्याप्तिका है सम्यग्दर्शनके होनेपर लब्ध्यावरण कर्म ( ज्ञानचेतनाको रोकनेवाला कर्म )का क्षयोपशम भी अवश्य होता है । सम्यग्दर्शनके अभावमें लब्ध्यावरण कर्मका क्षयोपशम भी नहीं होता है । यह वात जिनागमसे सिद्ध है ।


अभावात्तूपयोगस्य क्षतिर्लब्धेश्च वा न वा ।
यत्तदावरणस्यामा दृशा व्याप्तिर्नचामुना ॥856॥

अर्थ: लब्धि और उपयोगमें विषम व्याप्ति है। क्योंकि लब्धिका नाश होने पर उपयोगका नाश अवश्यंभावी है। परन्तु उपयोगका नाश होनेपर लब्धिका नाश अवश्यंभावी नहीं है। हो या न हो कुछ नियम नहीं है। सम्यग्दर्शनके साथ लब्ध्यावरणकर्मके क्षयोपशमकी व्याप्ति है, उसके साथ उपयोगात्मक ज्ञानकी व्याप्ति नहीं है। व्याप्तिसे तात्पर्य यहां समव्याप्तिका है सम्यग्दर्शनके होनेपर लब्ध्यावरण कर्म ( ज्ञानचेतनाको रोकनेवाला कर्म )का क्षयोपशम भी अवश्य होता है। सम्यग्दर्शनके अभावमें लब्ध्यावरण कर्मका क्षयोपशम भी नहीं होता है। यह वात जिनागमसे सिद्ध है।


अवश्यं सति सम्यक्त्वे तल्लब्ध्यावरणक्षतिः ।
न तत्क्षतिरसत्यत्र सिद्धमेतज्जिनागमात् ॥857॥

अर्थ: लब्धि और उपयोगमें विषम व्याप्ति है । क्योंकि लब्धिका नाश होने पर उपयोगका नाश अवश्यंभावी है । परन्तु उपयोगका नाश होनेपर लब्धिका नाश अवश्यंभावी नहीं है । हो या न हो कुछ नियम नहीं है। सम्यग्दर्शनके साथ लब्ध्यावरणकर्मके क्षयोपशमकी व्याप्ति है, उसके साथ उपयोगात्मक ज्ञानकी व्याप्ति नहीं है । व्याप्तिसे तात्पर्य यहां समव्याप्तिका है सम्यग्दर्शनके होनेपर लब्ध्यावरण कर्म ( ज्ञानचेतनाको रोकनेवाला कर्म )का क्षयोपशम भी अवश्य होता है । सम्यग्दर्शनके अभावमें लब्ध्यावरण कर्मका क्षयोपशम भी नहीं होता है । यह वात जिनागमसे सिद्ध है ।


नूनं कर्मफले सद्यश्चेतना वाऽथ कर्मणि ।
स्यात्सर्वतः प्रमाणाद्वै प्रत्यक्षं बलवद्यतः ॥858॥

अर्थ: सम्यक्त्वके अभावमें कर्म चेतना व कर्मफल चेतना होती है, और यह बात सर्व प्रमाण सिद्ध है । क्योंकि यह बात प्रत्यक्ष सिद्ध है कि मिथ्यादृष्टिके कर्मचेतना व कर्मफल चेतना होती है । जो बात प्रत्यक्ष सिद्ध होती है वह सर्व प्रमाण सिद्ध होती है, क्योंकि प्रत्यक्ष सबमें बलवान प्रमाण है ।


सिद्धमेतावतोक्तेन लब्धिर्या प्रोक्तलक्षणा ।
निरुपयोगरूपत्वान्निर्विकल्पा स्वतोस्ति सा ॥859॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका यही सारांश है कि जो ज्ञानचेतनावरणकी क्षयोपशमरूप लब्धि है वह शुद्धात्मानुभव रूप उपयोगके अभावमें निर्विकल्पक अवस्थामें रहती है ।


शुद्धस्यात्मोपयोगो यः स्वयं स्यात् ज्ञानचेतना ।
निर्विकल्पः स एवार्थादर्थासंक्रान्तसङ्क्तेः ॥860॥

अर्थ: शुद्धात्मानुभव रूप जो उपयोगात्मक ज्ञानचेतना है वह भी वास्तवमें निर्विकल्पक ही है, क्योंकि जितनेकाल तक शुद्धात्मानुभव होता रहता है उतने काल तक ही उपयोगात्मक ज्ञानचेतना कहलाती है, और उस कालमें शुद्धात्मासे हटकर दूसरे पदार्थोंकी ओर ज्ञान जाता नहीं है इसलिये उस समय संक्रान्तिके न होनेसे उपयोगात्मक ज्ञानको भी निर्विकल्पक कहा गया है।


अस्ति प्रश्नावकाशस्य लेशमात्रोत्र केवलम् ।
यत्कश्चिद्बहिरर्थे स्यादुपयोगोन्यत्रात्मनः ॥861॥

अर्थ: यहां पर इस प्रश्नके लिये फिर भी लेश मात्र अवकाश रह जाता है कि जब ज्ञान चेतनामें शुद्धात्माको छोड़कर अन्य पदार्थ विषय पड़ते ही नहीं, तब केवलज्ञानियोंके ज्ञान चेतना है या नहीं, यदि है तो उसमें अन्य पदार्थ क्यों विषय पड़ते हैं, यदि नहीं है तो केवलियोंके कर्मचेतना तथा कर्मफलचेतनाकी असंभावनामें कौनसी चेतना कहनी चाहिये ? इस प्रश्नके उत्तरमें यही समझना चाहिये कि केवलज्ञानियोंके ज्ञानचेतना ही होती है और उसमें शुद्धात्मा विषय रहते हुए ही अन्य सकल पदार्थ विषय पड़ते हैं । शुद्धात्माको छोड़ कर केवल अन्य पदार्थ विषय नहीं पड़ते हैं ।


अस्ति ज्ञानोपयोगस्य स्वभावमहिमोदयः ॥
आत्मपरोभयाकारभावकश्च प्रदीपवत् ॥862॥

अर्थ: ज्ञानोपयोगकी यह स्वाभाविक महिमा है कि वह अपना प्रकाशक है, परका प्रकाशक है और स्व - पर दोनोंका प्रकाशक है। जिस प्रकार दीपक अपना और दूसरे पदार्थोंका प्रकाशक है उसी प्रकार ज्ञान भी अपना और दूसरे पदार्थोंका प्रकाशक है यह ज्ञानोपयोगकी स्वाभाविक महिमा है।


निर्विशेषाद्यथात्मानमिव ज्ञेयमवैति च ।
तथा मूर्तानमूर्तांश्च धर्मादीनवगच्छति ॥863॥

अर्थ: ज्ञान साम्रान्य रीतिसे जिस प्रकार अपने स्वरूपको जानता है उसी प्रकार ज्ञेय पदार्थोंको भी वह जानता है तथा ज्ञेय पदार्थोंमें मूर्त पदार्थोंको और अमूर्त धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य आदि पदार्थोंको वह जानता है।


स्वस्मिन्नेवोपयुक्तो वा नोपयुक्तः स एव हि ।
परस्मिन्नुपयुक्तोवा नोपयुक्तः स एव हि ॥864॥

अर्थ: पहले यह बात कही जा चुकी थी कि क्षयोपशमात्मक ज्ञानकी दो अवस्थायें होती हैं - एक लब्धिरूप, दूसरी उपयोगरूप । ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे होनेवाली जो आत्मामें विशुद्धि है उसको लब्धि कहते हैं और पदार्थोंके जाननेकी चेष्टा करना उसे उपयोग कहते हैं, अब यहां पर उपयोगात्मक ज्ञानका ही विचार चल रहा है कि वह कभी आत्मामें ही उपयुक्त होता है अर्थात् निजात्माको ही जानता है, और कभी नहीं भी उपयुक्त होता है अर्थात् कभी आत्माको नहीं भी जानता है केवल, लब्धिरूप ही रहता है । अथवा कभी वह पर पदार्थमें भी उपयुक्त होता है और कभी वहां भी उपयुक्त नहीं होता है । जिस समय वह उपयोग निजात्माको जान रहा है उस समय वह कुछ उत्कर्ष पैदा नहीं करता है, और जिस समय वह पर पदार्थको भी जान रहा है उस समय वास्तवमें कुछ अपकर्ष पैदा नहीं करता है ।


स्वस्मिन्नेवोपयुक्तोऽपि नोत्कर्षाय स वस्तुतः ॥
उपयुक्तः परत्रापि नापकर्षाय तत्त्वतः ॥865॥

अर्थ: पहले यह बात कही जा चुकी थी कि क्षयोपशमात्मक ज्ञानकी दो अवस्थायें होती हैं - एक लब्धिरूप, दूसरी उपयोगरूप । ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे होनेवाली जो आत्मामें विशुद्धि है उसको लब्धि कहते हैं और पदार्थोंके जाननेकी चेष्टा करना उसे उपयोग कहते हैं, अब यहां पर उपयोगात्मक ज्ञानका ही विचार चल रहा है कि वह कभी आत्मामें ही उपयुक्त होता है अर्थात् निजात्माको ही जानता है, और कभी नहीं भी उपयुक्त होता है अर्थात् कभी आत्माको नहीं भी जानता है केवल, लब्धिरूप ही रहता है । अथवा कभी वह पर पदार्थमें भी उपयुक्त होता है और कभी वहां भी उपयुक्त नहीं होता है । जिस समय वह उपयोग निजात्माको जान रहा है उस समय वह कुछ उत्कर्ष पैदा नहीं करता है, और जिस समय वह पर पदार्थको भी जान रहा है उस समय वास्तवमें कुछ अपकर्ष पैदा नहीं करता है ।


तस्मात्स्वस्थितयेऽन्यस्मादेकाकारचिकीर्षया ।
मा सीदसि महाप्राज्ञ सार्थमर्थमवैहि भोः ॥866॥

अर्थ: इसलिये अपने स्वरूपमें स्थित रहनेके लिये दूसरे पदार्थसे हटकर एकाकार (आत्माकार) के करनेकी इच्छासे खेद मत कर ! हे महा प्राज्ञ ! सम्पूर्ण पदार्थको पहचान ।


चर्यया पर्यटन्नेव ज्ञानमर्थेषु लीलया ।
न दोषाय गुणायाऽथ नित्यं प्रत्यर्थमर्थसात् ॥867॥

अर्थ: ज्ञान सम्पूर्ण पदार्थोंमें लीलामात्रसे घूमता फिरता है, वह प्रत्येक पदार्थको जानता हुआ न तो कुछ दोष ही पैदा करता है और न कुछ गुण ही पैदा करता है। अर्थात् हरएक पदार्थको जानना यह ज्ञानका धर्म है। दोष गुणसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।


दोषः सम्यग्दृशो हानिः सर्वतोंशांशतोऽथवा ।
संवराग्रेसरायाश्च निर्जरायाः क्षतिर्मनाक् ॥868॥

अर्थ: सम्पूर्णतासे सम्यग्दर्शनकी हानिका होना, अथवा कुछ अंशोंमें उसकी हानिका होना, संवर और निर्जराकी कुछ हानिका होना, इन दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश होना, अथवा दोनोंका ही सर्व देश विनाश होना, अथवा उपादेय - पुण्यबन्धकी हानिका होना, अथवा उसका कम रह जाना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्तिका होना, अथवा पापबन्धका उत्कर्ष - बढ़वारी होना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष रूपमें कुछ उद्वेलन आदिका होना, ये सब दोष कहलाते हैं ।


व्यस्तेनाथ समस्तेन तद्द्वयस्योपमूलनम् ।
हानिर्वा पुण्यबन्धस्याहेयस्याप्यपकर्षणात् ॥869॥

अर्थ: सम्पूर्णतासे सम्यग्दर्शनकी हानिका होना, अथवा कुछ अंशोंमें उसकी हानिका होना, संवर और निर्जराकी कुछ हानिका होना, इन दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश होना, अथवा दोनोंका ही सर्व देश विनाश होना, अथवा उपादेय - पुण्यबन्धकी हानिका होना, अथवा उसका कम रह जाना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्तिका होना, अथवा पापबन्धका उत्कर्ष - बढवारी होना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष रूपमें कुछ उद्वेलन आदिका होना, ये सब दोष कहलाते हैं ।


उत्पत्तिः पापबन्धस्य स्यादुत्कर्षोऽथवास्य च ।
तद्द्वयस्याथवा किञ्चिद्यावदुद्वेलनादिकम् ॥870॥

अर्थ: सम्पूर्णतासे सम्यग्दर्शनकी हानिका होना, अथवा कुछ अंशोंमें उसकी हानिका होना, संवर और निर्जराकी कुछ हानिका होना, इन दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश होना, अथवा दोनोंका ही सर्व देश विनाश होना, अथवा उपादेय-पुण्यबन्धकी हानिका होना, अथवा उसका कम रह जाना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्तिका होना, अथवा पापबन्धका उत्कर्ष-बढवारी होना, अथवा पापबन्धकी उत्पत्ति और उसके उत्कर्ष रूपमें कुछ उद्वेलन आदिका होना, ये सब दोष कहलाते हैं।


गुणः सम्यक्त्वसंभूतिरुत्कर्षो वा सतोंऽशकैः ।
निर्जराऽभिनवा यद्वा संवरोऽभिनवो मनाक् ॥871॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिका होना, अथवा उसकी अंशरूपसे वृद्धिका होना, अथवा नवीन निर्जराका होना अथवा कुछ नवीन संवरका होना, अथवा संवर और निर्जरा दोनोंकी अंशरूपसे वृद्धिका होना, अथवा दोनोंमेंसे किसी एकका उत्कर्ष होना, पुण्य बन्धका होना, अथवा उसकी बढ़वारी होना अथवा पुण्य बन्धमें अपकर्ष ( हीनता ) का न होना ये सव गुण कहलाते हैं ।


उत्कर्षो वाऽनयोरंशैर्द्वयोरन्यतरस्य वा ।
श्रेयोबन्धोऽथवोत्कर्षो यद्वा नह्यपकर्षणम् ॥872॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनकी उत्पत्तिका होना, अथवा उसकी अंशरूपसे वृद्धिका होना, अथवा नवीन निर्जराका होना अथवा कुछ नवीन संवरका होना, अथवा संवर और निर्जरा दोनोंकी अंशरूपसे वृद्धिका होना, अथवा दोनोंमेंसे किसी एकका उत्कर्ष होना, पुण्य बन्धका होना, अथवा उसकी बढ़वारी होना अथवा पुण्य बन्धमें अपकर्ष ( हीनता ) का न होना ये सव गुण कहलाते हैं ।


गुणदोषद्वयोरेवं नोपयोगोस्ति कारणम् ।
हेतुर्नान्यतरस्यापि योगवाही च नाप्ययम् ॥873॥

अर्थ: इस प्रकार ऊपर कहे हुए गुण और दोषोंमें उपयोग ( ज्ञानोपयोग ) कारण नहीं है, और न वह उन दोनोंमेंसे किसी एकका हेतु ही है । तथा यह उपयोग दोनोंका सहकारी भी नहीं है ।


सम्यक्त्वं जीवभावः स्यादस्ताद्दृङ्मोहकर्मणः ।
अस्ति तेनाविनाभूतं व्याप्तेः सद्भावतस्तयोः ॥874॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम होनेसे सम्यक्त्व नामा जीवका गुण प्रकट होता है । दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशमके साथ ही सम्यक्त्वका अविनाभाव है । इन्हीं दोनोंमें व्याप्ति घटित होती है ।


दैवादस्तं गते तत्र सम्यक्त्वं स्यादनन्तरम् ।
दैवान्नास्तंगते तत्र न स्यात्सम्यक्त्वमञ्जसा ॥875॥

अर्थ: दैववश ( काल लब्धि आदिक निमित्त मिलने पर ) उस दर्शनमोहनीय कर्मके उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम होने पर आत्मामें सम्यक्त्व प्रकट हो जाता है, और दैववश (प्रतिकूलतामें) उस दर्शन मोहनीयके अस्त नहीं होने पर अर्थात् उदित रहने पर सम्यक्त्व नहीं होता है।


सार्धं तेनोपयोगेन न स्याद् व्याप्तिर्द्वयोरपि ।
विना तेनापि सम्यक्त्वं तदस्ते सति स्याद्यतः ॥876॥

अर्थ: उस ज्ञानोपयोगके साथ दर्शन मोहाभाव और सम्यक्त्वकी व्याप्ति नहीं है । क्योंकि विना उपयोग (शुद्धोपयोग)के भी दर्शन मोहनीय कर्मके अनुदय होने पर सम्यक्त्व होता ही है । इसलिये दर्शनमोहाभाव और सम्यक्त्वकी व्याप्ति है, उपयोगके साथ इनकी व्याप्ति नहीं है ।


सम्यक्त्वेनाविनाभूता येपि ते निर्जरादयः ।
समं तेनोपयोगेन न व्याप्तास्ते मनागपि ॥877॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनके साथ अविनाभावसे रहने वाले जो निर्जरा, संवर आदिक गुण हैं वे भी उस उपयोगके साथ व्याप्ति नहीं रखते हैं, अर्थात् निर्जरा आदिमें भी उपयोग कारण नहीं है।


सत्यत्र निर्जरादीनामवश्यम्भावलक्षणम् ।
सद्भावोस्ति नासद्भावो यत्स्याद्वा नोपयोगि तत् ॥878॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनके होने पर निर्जरा आदिक अवश्य ही होते हैं। सम्यग्दर्शनकी उपस्थितिमें निर्जरादिका अभाव नहीं हो सकता है। परन्तु उस समय ज्ञान उपयोगात्मक हो अथवा न हो कुछ नियम नहीं है। अर्थात् शुद्धोपयोग हो या न हो निर्जरादिक सम्यक्त्वके अविनाभावी हैं। उनमें उपयोग कारण नहीं है।


आत्मन्येवोपयोग्यस्तु ज्ञानं वा स्यात्परात्मनि ।
सत्सु सम्यक्त्वभावेषु सन्ति ते निर्जरादयः ॥879॥

अर्थ: ज्ञान चाहे स्वात्मामें ही उपयुक्त हो चाहे वह परात्मा (पर पदार्थ) में भी उपयुक्त हो, सम्यग्दर्शनरूप भावोंके होनेपर ही निर्जरादिक होते हैं।


यत्पुनः श्रेयसो बन्धो बन्धश्चाऽश्रेयसोपि वा ।
रागाद्वा द्वेषतो मोहात् स स्यात् स्यान्नोपयोगसात् ॥880॥

अर्थ: जिस प्रकार निर्जरादिक गुणोंमें उपयोग कारण नहीं है। उसी प्रकार पुण्यबन्ध और पापबन्धमें भी वह कारण नहीं है। पुण्यबन्ध और पापबन्ध रागद्वेष मोहसे होते हैं, वे उपयोगाधीन नहीं होते।


व्याप्तिर्बन्धस्य रागाद्यैर्नाऽव्याप्तिर्विकल्पैरिव ।
विकल्पैरस्य चाऽव्याप्तिर्न व्याप्तिः किल तैरिव ॥881॥

अर्थ: बन्धकी व्याप्ति (अविनाभाव) रागादिकोंके साथ है। रागादिकोंके साथ उपयोगकी तरह बन्धकी अव्याप्ति नहीं है। और उपयोगके साथ बन्धकी अव्याप्ति है। उपयोगके साथ रागादिककी तरह बन्धकी व्याप्ति नहीं है।


नानेकत्वमसिद्धं स्यान्नस्याद्व्याप्तिर्मिथोऽनयोः ।
रागादेश्चोपयोगस्य किन्तूपेक्षास्ति तद्द्वयोः ॥882॥

अर्थ: राग और उपयोग इनमें अनेकत्व असिद्ध नहीं है, अर्थात् राग भिन्न पदार्थ है और उपयोग भिन्न पदार्थ है। इन दोनोंमें परस्पर व्याप्ति भी नहीं है किन्तु राग और उपयोग दोनोंमें उपेक्षा भाव है, अर्थात् दोनोंमें कोई भी दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखता है। दोनोंमें कोई सम्बन्ध भी नहीं है। दोनों स्वतन्त्र हैं।


कालुष्यं तत्र रागादिर्भावश्चौदयिको यतः ।
पाकाच्चारित्रमोहस्य दृङ्मोहस्याथ नान्यथा ॥883॥

अर्थ: आत्माके कलुषित ( सकषाय ) परिणामोंका नाम ही रागादिक है। रागादिक आत्माका औदयिक भाव है। क्योंकि वह चारित्रमोहनीय और दर्शनमोहनीयके पाकसे होता है। अन्यथा नहीं होता।


क्षायोपशमिकं ज्ञानमुपयोगः स उच्यते ।
एतदावरणस्योच्चैः क्षयाद्वोपशमाद्यतः ॥884॥

अर्थ: क्षायोपशमिक ज्ञानको उपयोग कहते हैं। यह उपयोग ज्ञानावरण कर्मके क्षय और उपशमसे होता है।


अस्ति स्वहेतुको रागो ज्ञानं चास्ति स्वहेतुकम् ।
दूरे स्वरूपभेदत्वादेकार्थत्वं कुतोऽनयोः ॥885॥

अर्थ: राग अपने कारणसे होता है और ज्ञान अपने कारणसे होता है। राग और ज्ञान दोनोंका स्वरूप भिन्न भिन्न है इसलिये दोनोंका एक अर्थ कैसे होसक्ता है ?


किञ्च ज्ञानं भवदेव भवतीदं न चापरम् ।
रागादयो भवन्तश्च भवन्त्येते न चिद्यथा ॥886॥

अर्थ: जिस समय ज्ञान होता है उस समय ज्ञानही होता है उस समय रागद्वेष नहीं होते और जिस समय रागादिक होते हैं उस समय रागादिक ही होते हैं उस समय ज्ञान नहीं होता ।


अभिज्ञानं च तत्रास्ति वर्धमाने चितिस्फुटम् ।
रागादीनामभिवृद्धि र्नस्याद् व्याप्तेरसंभवात् ॥887॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनका खुलासा दृष्टान्त इस प्रकार है कि ज्ञानकी वृद्धि होनेपर रागादिककी वृद्धि नहीं होती है। क्योंकि इन दोनोंकी व्याप्ति नहीं है। अर्थात् ज्ञानकी वृद्धिसे रागादिकका कोई सम्बन्ध नहीं है।


वर्धमानेषु चैतेषु वृद्धिर्ज्ञानस्य न क्वचित् ।
अस्ति यद्वा स्वसामग्र्यां सत्यां वृद्धिः समा द्वयोः ॥888॥

अर्थ: रागादिकोंकी वृद्धि होनेपर ज्ञानकी वृद्धि कहीं नहीं भी होती है, अथवा अपनी २ सामिग्रीके मिलनेपर दोनोंकी एक साथ ही वृद्धि होजाती है ।


ज्ञानेऽथ वर्धमानेपि हेतोः प्रतिपक्षक्षयात् ।
रागादीनां न हानिः स्याद्धेतोर्मोहोदयात्सतः ॥889॥

अर्थ: अथवा प्रतिपक्ष कर्म (ज्ञानावरण) के क्षय होनेसे ज्ञानकी वृद्धि होनेपर मोहनीय कर्मके उदय रहनेसे रागादिकोंकी हानि भी नहीं होती है।


यद्वा दैवात्तत्सामग्र्यां सत्यां हानिः समं द्वयोः ।
आत्मीयाऽऽत्मीयहेतोर्या ज्ञेया नान्योन्यहेतुतः ॥890॥

अर्थ: अथवा दैववश अपनी २ सामग्रीके मिलनेपर दोनोंकी साथ ही हानि होती है । यह हानि वृद्धिका क्रम अपने २ कारणोंसे होता है । एकका कारण दूसरेकी हानि वृद्धिमें सहायक कभी नहीं हो सक्ता ।


व्याप्तिर्वा नोपयोगस्य द्रव्यमोहेन कर्मणा ।
रागादीनान्तु व्याप्तिः स्यात् संविदावरणैः सह ॥891॥

अर्थ: जिस प्रकार रागद्वेषादि भावमोहके साथ उपयोगकी व्याप्ति नहीं है उसी-प्रकार द्रव्यमोहके साथ भी उसकी व्याप्ति नहीं है। परन्तु रागादिकोंकी तो ज्ञानावरणके साथ व्याप्ति है।


अन्वयव्यतिरेकाभ्यामेषा स्याद्विषमैव तु ।
न स्यात् क्रमात्तथाव्याप्तिर्हेतोरन्यतरादपि ॥892॥

अर्थ: रागादिकोंकी ज्ञानावरणके साथ अन्वय व्यतिरेक दोनोंसे विषम ही व्याप्ति है। किसी अन्यत्तर हेतुसे भी इन दोनोंकी सम व्याप्ति नहीं है ।


व्याप्तेरसिद्धिः साध्यात्र साधनं व्यभिचारिता ।
सैकस्मिन्नपि सत्यन्यो न स्यात्स्याद्वा स्वहेतुतः ॥893॥

अर्थ: यहां पर समव्याप्तिकी असिद्धि साध्य है और व्यभिचारीपन हेतु है, अर्थात् यदि रागादिक और ज्ञानावरण कर्म इनकी समव्याप्ति मानी जाय तो व्यभिचाररूप दोष आता है वह इस प्रकार आता है - ज्ञानावरण कर्मके रहनेपर रागादिभाव नहीं भी होता है । यदि होता भी है तो अपने कारणोंसे होता है ।


व्याप्तित्वं साहचर्यस्य नियमः स यथा मिथः ।
सति यत्र यः स्यादेव न स्यादेवासतीह यः ॥894॥

अर्थ: साहचर्यके नियमको व्याप्ति कहते हैं, वह इस प्रकार है-जिसके होनेपर जो होता है और जिसके नहीं होनेपर जो नहीं होता है, यह व्याप्तिका नियम परस्परमें होता है।


मा समा रागसद्भावे नूनं बन्धस्य संभवात् ।
रागादीनामसद्भावे बन्धस्याऽसंभवादपि ॥895॥

अर्थ: यहांपर समव्याप्ति नहीं है, रागके सद्भावमें बन्ध नियमसे होता है और रागादिकोंके अभावमें बन्ध नहीं होता है ।


व्याप्तिः सा विषमा सत्सु संविदावरणादिषु ।
अभावाद्रागभावस्य भावाद्वाऽस्य स्वहेतुतः ॥896॥

अर्थ: विषम व्याप्ति इस प्रकार है - ज्ञानावरणादि कर्मोंके रहने पर रागभावका अभाव पाया जाता है, अथवा रागादिकका सद्भाव भी पाया जाय तो उसके कारणोंसे ही पाया जायगा, ज्ञानावरणादिके निमित्तसे नहीं ।


अव्याप्तिश्चोपयोगेपि विद्यमानेष्टकर्मणाम् ।
बन्धो नान्यतमस्यापि नाबन्धस्तत्राप्यसति ॥897॥

अर्थ: उपयोगके साथ द्रव्यकर्मोंकी व्याप्ति नहीं है । उपयोगके विद्यमान रहने पर भी अष्ट कर्मोंका बन्ध नहीं होता है, अष्ट कर्मोंमेंसे किसी एक कर्मका भी बन्ध नहीं होता है । और उपयोगके नहीं होने पर भी आठों कर्मोंका बन्ध होता है ।


यद्वा स्वात्मोपयोगीह कश्चिन्नानुपयोगवान् ।
व्यतिरेकावकाशोपि नार्थादत्रास्ति वस्तुतः ॥898॥

अर्थ: अथवा मिथ्यात्व अवस्थामें अष्टकर्मोंका बन्ध रहते हुए भी आत्मा निजात्माका अनुभव नहीं करता है, और कहीं पर ‘सिद्धावस्था’ में अष्टकर्मोंका अभाव होने पर भी निजात्माका अनुभव करता है। इसलिये यहांपर व्यतिरेकका अवकाश भी नहीं है।


सर्वतश्चोपसंहारः सिद्धश्चैतावतात्र वै ।
हेतुः स्यान्नोपयोगोयं दृशो वा बन्धमोक्षयोः ॥899॥

अर्थ: उपर्युक्त सम्पूर्ण कथनका उपसंहार-सारांश यही निकला कि उपयोग सम्यग्दर्शनका कारण नहीं है और न वह बन्ध तथा मोक्षका ही कारण है ।


ननु चैवं स एवार्थो यः पूर्वं प्रकृतो यथा ।
कस्यचिद्वीतरागस्य सद्दृष्टेर्ज्ञानचेतना ॥900॥

अर्थ: शंकाकारका कहना है कि वही अर्थ निकला जो पहले प्रकरणमें आया हुआ था, अर्थात् किसी वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है, क्योंकि ज्ञानोपयोग जब आत्माको छोड़कर अन्य बाह्य पदार्थोंमें चला जायगा तो उस समय ज्ञानचेतनाकी क्षति अवश्य ही होगी ।