उत्तरार्द्ध 901 से 1000 (श्लोक 901 से 1000)
आत्मनोऽन्यत्र कुत्रापि स्थिते ज्ञाने परात्मसु ।
ज्ञानसञ्चेतनायाः स्यात् क्षतिः साधीयसी तदा ॥901॥
अर्थ: शंकाकारका कहना है कि वही अर्थ निकला जो पहले प्रकरणमें आया हुआ था, अर्थात् किसी वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है, क्योंकि ज्ञानोपयोग जब आत्माको छोड़कर अन्य बाह्य पदार्थोंमें चला जायगा तो उस समय ज्ञानचेतनाकी क्षति अवश्य ही होगी ।
सत्यं चापि क्षतेरस्याः क्षतिः साध्यस्य न क्वचित् ।
इयानात्मोपयोगस्य तस्यास्तत्राप्यहेतुता ॥902॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ठीक है, उपयोगात्मक ज्ञानचेतनाकी क्षति होनेपर भी सम्यक्त्व हेतुका साध्यभूत अष्ट कर्मोंकी निर्जराकी क्षति नहीं होती है। क्योंकि ज्ञानचेतनाका कर्म निर्जरामें कारण न होना ही उपयोग ’ शुद्धोपयोग ’ का स्वरूप है। यहां पर साध्य-अष्ट कर्मोंकी निर्जरा है, और उसका कारणरूप हेतु सम्यग्दर्शन है, वह साध्य आत्मामें शक्ति होनेसे स्वतः भी होता है और ध्यानादि प्रयत्नसे भी होता है, किन्तु उसमें ज्ञानचेतना कारण नहीं है।
साध्यं यद्दर्शनाद्धेतोर्निर्जरा चाष्टकर्मणाम् ।
स्वतो हेतुवशाच्छक्तेर्न तद्धेतुः स्वचेतना ॥903॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ठीक है, उपयोगात्मक ज्ञानचेतनाकी क्षति होनेपर भी सम्यक्त्व हेतुका साध्यभूत अष्ट कर्मोंकी निर्जराकी क्षति नहीं होती है। क्योंकि ज्ञानचेतनाका कर्म निर्जरामें कारण न होना ही उपयोग ’ शुद्धोपयोग ’ का स्वरूप है। यहां पर साध्य - अष्ट कर्मोंकी निर्जरा है, और उसका कारणरूप हेतु सम्यग्दर्शन है, वह साध्य आत्मामें शक्ति होनेसे स्वतः भी होता है और ध्यानादि प्रयत्नसे भी होता है, किन्तु उसमें ज्ञानचेतना कारण नहीं है।
ननुचेदाश्रयासिद्धो विकल्पो व्योमपुष्पवत् ।
तत्किं हेतुः प्रसिद्धोस्ति सिद्धः सर्वविदागमात् ॥904॥
अर्थ: यहांपर स्वतन्त्र शंका यह है कि आपने (आचार्यने) जो मत्यादिक ज्ञानोंको संक्रमणात्मक व विकल्पात्मक बतलाया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि विकल्प कोई पदार्थ ही नहीं है जिस प्रकार कि आकाशके पुष्प कोई पदार्थ नहीं है। इसलिये विकल्प शब्दका कोई वाच्य न होनेसे उसे आश्रयासिद्ध ही कहना चाहिये, और जब विकल्प कोई पदार्थ नहीं है तब ज्ञानको सविकल्प कहनेमें सर्वज्ञागम प्रसिद्ध क्या हेतु हो सकता है, अर्थात् कुछ हेतु नहीं होसकता।
सत्यं विकल्पसर्वस्वसारं ज्ञानं स्वलक्षणात् ।
सम्यक्त्वे यद्विकल्पत्वं न तत्सिद्धं परीक्षणात् ॥905॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ज्ञान अपने लक्षणसे विकल्पात्मक कहा जाता है, तथा सम्यक्त्वमें जो विकल्पका व्यवहार होता है वह परीक्षासे सिद्ध नहीं होता।
यत्पुनः कैश्चिदुक्तं स्यात् स्थूललक्ष्योन्मुखैरिह ।
अत्रोपचारहेतुर्यस्तं ब्रुवे किल साम्प्रतम् ॥906॥
अर्थ: जिन लोगोंने स्थूल दृष्टि रख कर सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शनको सविकल्प बतलाया है उन्होंने उपचारसे ही बतलाया है। वास्तवमें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सविकल्प नहीं हैं। उपचारका भी क्या कारण है ? उसे ही अब बतलाते हैं। -
क्षायोपशमिकं ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत् ।
तत्स्वरूपं न ज्ञानस्य किन्तु रागक्रियास्ति वै ॥907॥
अर्थ: क्षायोपशमिक ज्ञान जो हर एक पदार्थको क्रम क्रमसे जानता है वह ज्ञानका स्वरूप नहीं है किंतु राग क्रिया है, और यही राग उपचारका हेतु है।
प्रत्यर्थं परिणामित्वमर्थानामेतदस्ति यत् ।
अर्थमर्थं परिज्ञानं मुह्यद्रज्यद्द्विषद्यथा ॥908॥
अर्थ: पदार्थोंमें प्रत्येक पदार्थका परिणमन होता है, उस परिणमनमें ज्ञान हरएक पदार्थके प्रति मोह करता है, राग करता है, द्वेष करता है।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षादस्ति सिद्धमिदं यतः ।
रागाक्तं ज्ञानमक्षान्तं रागिणो न तथा मुनेः ॥909॥
अर्थ: यह वात स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे सिद्ध है कि राग सहित ज्ञान शान्त नहीं है । ऐसा शान्ति रहित ज्ञान जैसा रागी पुरुषके होता है वैसा मुनिके नहीं होता ।
अस्तिज्ञानाविनाभूतो रागो बुद्धिपुरस्सरः ।
अज्ञातेर्थे यतो न स्याद् रागभावः खपुष्पवत् ॥910॥
अर्थ: बुद्धिपूर्वक राग ज्ञानका अविनाभावी है ! क्योंकि अज्ञात (नहीं जाने हुए) पदार्थमें राग भाव उत्पन्न हीं नहीं होता है । जिस प्रकार आकाशका पुष्प कोई पदार्थ नहीं है तो उसमें बुद्धिपूर्वक राग भी नहीं हो सक्ता है ।
अस्त्युक्तलक्षणो रागश्चारित्रावरणोदयात् ।
अप्रमत्तगुणस्थानादर्वाक् स्यान्नोर्ध्वमस्त्यसौ ॥911॥
अर्थ: ऊपर कहा हुआ बुद्धिपूर्वक राग चारित्रमोहनीयके उदयसे होता है यह रग अप्रमत्त गुण स्थानसे पहले २ होता है। छठे गुणस्थानसे ऊपर सर्वथा नहीं होता है।
अस्ति चोर्ध्वमसौ सूक्ष्मो रागश्चाबुद्धिपूर्वजः ।
अर्वाक् क्षीणकषायेभ्यः स्याद्विवक्षावशान्नवा ॥912॥
अर्थ: प्रमत्त गुणस्थानसे ऊपर सूक्ष्म-अबुद्धि पूर्वक राग है। यह राग क्षीणकषायसे पहले २ होता है। सो भी विवक्षाधीन है। यदि विवक्षा की जाय तो अबुद्धिपूर्वक-सूक्ष्म राग है अन्यथा नहीं है।
विमृश्यैतत्परं कैश्चिदसद्भूतोपचारतः ।
रागवज्ज्ञानमत्रास्ति सम्यक्त्वं तद्वदीरितम् ॥913॥
अर्थ: इसी बातको विचार कर किन्हीं पुरुषोंने असद्भूत उपचार नयसे राग सहित ज्ञानको देखकर सम्यक्त्वको भी वैसा कहा है ।
हेतोः परं प्रसिद्धैर्यैः स्थूललक्ष्यैरितिस्मृतम् ।
आप्रमत्तं च सम्यक्त्वं ज्ञानं वा सविकल्पकम् ॥914॥
अर्थ: स्थूल पदार्थको लक्ष्य रखनेवाले जिन प्रसिद्ध पुरुषोंने केवल रागरूप हेतुसे ऐसा कहा है। उनका कहना है कि प्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त सम्यक्त्व और ज्ञान दोनों ही सविकल्पक हैं।
ततस्तूर्ध्वं तु सम्यक्त्वं ज्ञानं वा निर्विकल्पकम् ।
शुक्लध्यानं तदेवास्ति तत्रास्ति ज्ञानचेतना ॥915॥
अर्थ: प्रमत्तगुणस्थानसे ऊर सम्यक्त्व और ज्ञान दोनों ही निर्विकल्पक होते हैं। वही शुक्लध्यान कहलाता है, और उसी अवस्थामें ज्ञानचेतना होती है।
प्रमत्तानां विकल्पत्वान्न स्यात्सा शुद्धचेतना ।
अस्तीति वासनोन्मेष केषाञ्चित्स न सन्निह ॥916॥
अर्थ: “प्रमत्त जीवोंको विकल्पात्मक होनेसे उनके शुद्ध चेतना नहीं हो सक्ती है ।” किन्हीं किन्हीं पुरुषोंके इस प्रकारकी वासना लगी हुई है, वह ठीक नहीं है।
यतः पराश्रितो दोषो गुणो वा नाश्रयेत्परम् ।
परो वा नाश्रयेद्दोषं गुणाश्चापि पराश्रितम् ॥917॥
अर्थ: क्योंकि दूसरेके आश्रयसे होनेवाला गुण दोष दूसरेके आश्रय नहीं हो सक्ता है। इसी प्रकार दूसरा भी दूसरेके आश्रयसे होनेवाले गुण दोषोंको अपने आश्रित नहीं बना सक्ता है।
पाकाच्चारित्रमोहस्य रागोस्त्यौदयिकः स्फुटम् ।
सम्यक्त्वे स कुतोन्यायाज्ज्ञाने वाऽनुदयात्मके ॥918॥
अर्थ: चारित्रमोहनीय कर्मका पाक होनेसे राग होता है, राग आत्माका औदयिक भाव है, अर्थात् कर्मके उदयसे होनेवाला है। वह औदयिक भाव अनुदय स्वरूप सम्यक्त्व और ज्ञानमें किस प्रकार हो सक्ता है ? अर्थात् नहीं हो सक्ता।
अनिघ्नन्निह सम्यक्त्वं रागोऽयं बुद्धिपूर्वकः ।
नूनं हन्तुं क्षमो न स्याज्ज्ञानसंचेतनामिमाम् ॥919॥
अर्थ: बुद्धिपूर्वक राग सम्यक्त्वका घात नहीं कर सक्ता है । इसलिये वह सम्यक्त्वके साथ अविनाभावी ज्ञानचेतना (लब्धिरूप)का भी घात नियमसे नहीं कर सक्ता है ।
नाप्यूहमिति शक्तिः स्याद्रागस्यैतावतोपि या ।
बन्धोत्कर्षोदयांशानां हेतुर्दृग्मोहकर्मणः ॥920॥
अर्थ: रागकी ऐसी भी शक्ति है जो दर्शन मोहनीय कर्मके बन्ध, उत्कर्ष और उदयमें कारण है ऐसी भी तर्कणा न करो ।
एवं चेत् सम्यगुत्पत्तिर्न स्यात्स्यात् दृगसंभवः ।
सत्यां प्रध्वंससामग्र्यां कार्यध्वंसस्य सम्भवात् ॥921॥
अर्थ: यदि राग भाव ही दर्शन मोहनीयके बन्ध उत्कर्ष और उदयमें कारण हों तो सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति ही नहीं होसकती है । फिर तो सम्यग्दर्शनका होना ही असंभव हो जायगा । क्योंकि नाशकी सामग्री रहने पर कार्यका नाश होना अवश्यंभावी है ।
न स्यात्सम्क्त्वप्रध्वंसश्चारित्रावरणोदयात् ।
रागेणैतावता तत्र दृङ्मोहेऽनधिकारिणा ॥922॥
अर्थ: चारित्रावरण कर्मके उदयसे (रागभावसे) सम्यक्त्वका विघात नहीं हो सकता है । क्योंकि रागभावका दर्शनमोहनीय कर्मके विषयमें कोई अधिकार नहीं है ।
यतश्चास्त्यागमात् सिद्धमेतद्दृङ्मोहकर्मणः ।
नियतं स्वोदयाद्बन्धप्रभृति न परोदयात् ॥923॥
अर्थ: क्योंकि यह बात आगमसे सिद्ध है कि दर्शन मोहनीय कर्मका बन्ध उत्कर्ष आदि दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे ही नियमसे होता है । किसी अन्य (चारित्र मोहनीय)के उदयसे दर्शनमोहनीयका बन्ध, उत्कर्ष, उदय कुछ नहीं होता ।
ननु चैवमनित्यत्वं सम्यक्त्वाद्यद्वयस्य यत् ।
स्वतः स्वस्योदयाभावे तत्कथं स्यादहेतुतः ॥924॥
अर्थ: शंकाकारका कहना है कि यदि अपने उदयमें ही अपना बन्ध उत्कर्ष हो अथवा परोदयमें परका उदय न हो तो आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता कैसे आ सक्ती है? क्योंकि विना कारण अपना उदय अपने आप तो हो नहीं सकेगा, और विना दर्शनमोहनीयके उदय हुए आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता आ नहीं सक्ती है तथा हम (शंकाकार) यह भी विश्वास नहीं कर सक्ते हैं कि स्वयं दर्शन मोहनीयका उपशम ही दर्शनमोहनीयके उदय अथवा उत्कर्षका कारण हो जाता हो ।
न प्रतीमो वयं चैतद्दृङ्मोहोपशमः स्वयम् ।
हेतुः स्यात् स्वोदयस्योच्चैरुत्कर्षस्याऽथवा मनाक् ॥925॥
अर्थ: शंकाकारका कहना है कि यदि अपने उदयमें ही अपना बन्ध उत्कर्ष हो अथवा परोदयमें परका उदय न हो तो आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता कैसे आ सक्ती है? क्योंकि विना कारण अपना उदय अपने आप तो हो नहीं सकेगा, और विना दर्शनमोहनीयके उदय हुए आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता आ नहीं सक्ती है तथा हम (शंकाकार) यह भी विश्वास नहीं कर सक्ते हैं कि स्वयं दर्शन मोहनीयका उपशम ही दर्शनमोहनीयके उदय अथवा उत्कर्षका कारण हो जाता हो।
नैवं यतोऽनभिज्ञोसि पुद्गलाचिन्त्यशक्तिषु ।
प्रतिकर्म प्रकृत्याद्यैर्नानारूपासु वस्तुतः ॥926॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि शंकाकारने जो ऊपर शंका उठाई है वह सर्वथा निर्मूल है। आचार्य शंकाकारसे सम्बोधन करते हुए कहते हैं कि अभी तुम पुद्गलकी अचिन्त्य शक्तियोंके विषयमें बिलकुल अजान हो, तुम नहीं समझते हो कि हर एक कर्ममें प्रकृति, प्रदेश, स्थिति, अनुभाग आदि अनेक रूपसे फलदान शक्ति भरी हुई है।
अस्त्युदयो यथानादेः स्वतश्चोपशमस्तथा ।
उदयः प्रशमो भूयः स्यादर्वागपुनर्भवात् ॥927॥
अर्थ: जिस प्रकार अनादि कालसे कर्मोंका उदय होरहा है उसी प्रकार कर्मोंका उपशम भी स्वयं होता है । इसी प्रकार उपशमके पीछे उदय और उदयके पीछे उपशम बार २ होते रहते हैं । यह उदय और उपशमकी शृङ्खला जब तक मोक्ष नहीं होती है बराबर होती रहती है ।
अथ गत्यन्तराद्दोषः स्यादसिद्धत्वसंज्ञकः ।
दोषः स्यादनवस्थात्मा दुर्वारोन्योन्यसंश्रयः ॥928॥
अर्थ: यदि ऊपर कही हुई व्यवस्था न मानी जाय और दूसरी ही रीति स्वीकार
दृङ्मोहस्योदयो नाम रागायत्तोस्ति चेन्मतम् ।
सोऽपि रागोस्ति स्वायत्तः किं स्यादपररागसात् ॥929॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
स्वायत्तश्चेच्च चारित्रस्य मोहस्योदयात्स्वतः ।
यथा रागस्तथा चायं स्वायत्तः स्वोदयात्स्वतः ॥930॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
अथ चेत्तद्द्वयोरेव सिद्धिश्चान्योन्यहेतुतः ।
न्यायादसिद्धदोषः स्याद्दोषादन्योन्यसंश्रयात् ॥931॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
नागमः कश्चिदस्तीदृग्घेतुर्दृङ्मोहकर्मणः ।
रागस्तस्याथ रागस्य तस्य हेतुर्दृगावृतिः ॥932॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
तस्मात्सिद्धोस्ति सिद्धान्तो दृङ्मोहस्येतरस्य वा ।
उदयोनुदयो वाऽथ स्यादनन्यगतिःस्वतः ॥933॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
तस्मात्सम्यक्त्वमेकं स्यादर्थाचल्लक्षणादपि ।
तद्यथाऽवश्यकी तत्र विद्यते ज्ञानचेतना ॥934॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
मिश्रौपशमिकं नाम क्षायिकं चेति तत्त्रिधा ।
स्थितिबन्धकृतो भेदो न भेदो रसबन्धसात् ॥935॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
तद्यथाऽथ चतुर्भेदो बन्धोऽनादिप्रभेदतः ।
प्रकृतिश्च प्रदेशाख्यो बन्धौ स्थित्यनुभागकौ ॥936॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
प्रकृतिस्तत्स्वभावात्मा प्रदेशो देशसंश्रयः ।
अनुभागो रसो ज्ञेयो स्थितिः कालावधारणम् ॥937॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
स्वार्थक्रिया समर्थोत्र वन्धः स्याद्रससञ्ज्ञिकः ।
शेषवन्धत्रिकोप्येष न कार्यकरणक्षमः ॥938॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
ततः स्थितिवशादेव सन्मात्रेप्यत्र संस्थिते ।
ज्ञानसञ्चेतनायास्तु क्षतिर्न स्यान्मनागपि ॥939॥
अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)
एवमित्यादयश्चान्ये सन्ति ये सद्गुणोत्तमाः ।
सम्यक्त्वमात्रमारभ्य ततोप्यूर्ध्वं च तद्वतः ॥940॥
अर्थ: इसी प्रकार सम्यग्दर्शनके साथ तथा उसके आगे और भी सद्गुण प्रकट होते हैं । वे सब सम्यग्दर्शन सहित हैं इसीलिये सद्गुण हैं । उनमेंसे कुछ ये हैं-स्वसंवेदन प्रत्यक्ष स्वानुभव ज्ञान, वैराग्य, और भेद विज्ञान । इत्यादि सभी गुण सम्यग्दर्शनके होनेपर ही होते हैं इससे अधिक क्या कहा जाय ।
स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्ञानं स्वानुभवाह्वयम् ।
वैराग्यं भेदविज्ञानमित्याद्यस्तीह किं बहु ॥941॥
अर्थ: इसी प्रकार सम्यग्दर्शनके साथ तथा उसके आगे और भी सद्गुण प्रकट होते हैं । वे सब सम्यग्दर्शन सहित हैं इसीलिये सद्गुण हैं । उनमेंसे कुछ ये हैं-स्वसंवेदन प्रत्यक्ष स्वानुभव ज्ञान, वैराग्य, और भेद विज्ञान । इत्यादि सभी गुण सम्यग्दर्शनके होनेपर ही होते हैं इससे अधिक क्या कहा जाय ।
अद्वैतेपि त्रिधा प्रोक्ता चेतना चैवमागमात् ।
ययोपलक्षितो जीवः सार्थनामास्ति नान्यथा ॥942॥
अर्थ: यद्यपि चेतना एक है तथापि आगमके अनुसार उस चेतनाके तीन भेद हैं उस चेतनासे विशिष्ट जीव ही यथार्थ नाम धारी कहलाता है। अन्यथा नहीं।
ननु चिन्मात्र एवास्ति जीवः सर्वोपि सर्वथा ।
किं तदाद्या गुणाश्चान्ये सन्ति तत्रापि केचन ॥943॥
अर्थ: क्या सम्पूर्ण जीव सर्वथा चैतन्यमात्र ही है अथवा चैतन्यके साथ उसके और भी गुण होते हैं ? उत्तर - हां होते हैं उनमेंसे कुछ गुण नीचे बतलाये जाते हैं।
उच्यतेनन्तधर्माधिरूढोप्येकः सचेतनः ।
अर्थजातं यतो यावत्स्यादनन्तगुणात्मकम् ॥944॥
अर्थ: यह जीव यद्यपि अनन्तगुणोंका धारी है तथापि एक कहा जाता है । जितना भी पदार्थ समूह है सभी अनन्तगुणात्मक है ।
अभिज्ञानं च तत्रापि ज्ञातव्यं तत्परीक्षकैः ।
वक्ष्यमाणमपि साध्यं युक्तिस्वानुभवागमात् ॥945॥
अर्थ: जीव अनन्तगुणात्मक है इस विषयका विशेष परिज्ञान परीक्षकोंको करना चाहिये, यद्यपि जो हम सिद्ध करना चाहते हैं उसे आगे युक्ति, स्वानुभव और आगम प्रमाणसे कहेंगे तथापि परीक्षकोंको निर्णय कर लेना ही उचित है ।
तद्यथायथं जीवस्य चारित्रं दर्शनं सुखम् ।
ज्ञानं सम्यक्त्वमित्येते स्युर्विशेषगुणाः स्फुटम् ॥946॥
अर्थ: चारित्र, दर्शन, सुख, ज्ञान, और सम्यक्त्व ये जीवके विशेष गुण हैं ।
वीर्यं सूक्ष्मोवगाहः स्यादव्याबाधश्चिदात्मकः ।
स्यादगुरुलघुसंज्ञं च स्युः सामान्यगुणा इमे ॥947॥
अर्थ: वीर्य, सूक्ष्म, अवगाह, अव्याबाध और अगुरुलघु ये जीवके सामान्य गुण हैं।
सामान्या वा विशेषा वा गुणाः सिद्धाः निसर्गतः ।
टंकोत्कीर्णा इवाजस्रं तिष्ठन्तः प्राकृताःस्वतः ॥948॥
अर्थ: जीवके सामान्यगुण अथवा विशेषगुण स्वभाव सिद्ध हैं। सभी गुण टांकीसे उकेरे हुए पत्थरके समान निरन्तर रहते हैं और स्वयं सिद्ध अनादिनिधन हैं।
तथापि प्रोच्यते किञ्चिच्छ्रूयतामवधानतः ।
न्यायवलात्समायातः प्रवाहः केन वार्यते ॥949॥
अर्थ: तथापि उन गुणोंके विषयमें थोड़ासा विवेचन किया जाता है उसे सावधानीसे सुनना चाहिये । गुणोंका प्रवाह न्याय (युक्ति)के बलसे चला आरहा है उसे कौन रोक सकता है ?
अस्ति वैभाविकी शक्तिः स्वतस्तेषु गुणेषु च ।
जन्तोः संसृत्यवस्थायां वैकृतास्ति स्वहेतुतः ॥950॥
अर्थ: उन्हीं जीवके अनन्त गुणोंमें एक स्वतः सिद्ध वैभाविक नामा शक्ति है। वह शक्ति संसार अवस्थामें अपने कारणसे विकृत ( विकारी ) हो रही है।
यथा वा स्वच्छताऽऽदर्शे प्राकृतास्ति निसर्गतः ।
तथाप्यस्यास्यसंयोगाद्वैकृतास्त्यर्थतोपि सा ॥951॥
अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें स्वभावसे ही स्वच्छता ( निर्मलता ) सिद्ध है। तथापि सम्बन्ध होनेसे उसकी विकार अवस्था होजाती है। और वह विकार वास्तविक है।
वैकृतत्वेपि भावस्य न स्यादर्थान्तरं क्वचित् ।
प्रकृतौ यद्विकारित्वं वैकृतं हि तदुच्यते ॥952॥
अर्थ: विकृत अवस्था होनेपर भी पदार्थ कहीं बदल नहीं जाता है । प्रकृतिमें जो विकृति होती है उसे ही उसका विकार कहते हैं ।
तथापि वारुणीपानाद् बुद्धिर्नाऽबुद्धिरेव नुः ।
तत्प्रकारान्तरं बुद्धौ वैकृतत्वं तदर्थसात् ॥953॥
अर्थ: जिस प्रकार मदिरा पीनेसे मनुष्यकी बुद्धि बुद्धि ही रहती है वह अबुद्धि ( पदार्थान्तर ) नहीं होजाती है किन्तु बुद्धिमें ही कुछ दूसरी अवस्था हो जाती है। जो बुद्धिकी दूसरी अवस्था है वही उसकी वास्तविक विकृति है।
प्राकृतं वैकृतं वापि ज्ञानमात्रं तदेव यत् ।
यावदत्रेन्द्रियायत्तं तत्सर्वं वैकृतं विदुः ॥954॥
अर्थ: स्वाभाविक ज्ञान हो, अथवा वैभाविक ज्ञान हो सभी ज्ञान ही कहा जायगा। क्योंकि ज्ञानपना दोनों ही अवस्थाओंमें है। परन्तु इतना विशेष है कि जितना भी इन्द्रियोंसे ज्ञान होता है वह सब वैभाविक है।
अस्ति तत्र क्षतिर्नूनं नाक्षतिर्वास्तवादपि ।
जीवस्यातीवदुःखित्वात् सुखस्योन्मूलनादपि ॥955॥
अर्थ: जीवकी विकृत अवस्थामें वास्तवमें हानि है । विकृत अवस्थासे जीवकी वास्तवमें कुछ हानि न हो ऐसा नहीं है । क्योंकि विकृतावस्थामें जीवको अत्यन्त दुःख होता है और इसका स्वाभाविक सुख गुण नष्ट हो जाता है ।
अपि द्रव्यनयादेशाट्टंकोत्कीर्णोस्ति प्राणभृत् ।
नात्मसुखे स्थितः कश्चित् प्रत्युतातीव दुःखवान् ॥956॥
अर्थ: यद्यपि द्रव्यार्थिक नयसे यह जीव टांकीसे उकेरे हुए पत्थरके समान सदा शुद्ध है तथापि पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे कोई संसारी जीव अपने सुखमें स्थित नहीं है किन्तु उल्टा अत्यन्त दुःखी है ।
नाङ्गीकर्तव्यमेवैतत् स्वस्वरूपे स्थितोस्ति ना ।
बद्धो वा स्यादबद्धो वा निर्विशेषाद्यथा मणिः ॥957॥
अर्थ: जिस प्रकार मणि मिली हुई ( कीचड़ आदिमें ) अवस्थामें भी शुद्ध है और भिन्न अवस्थामें भी शुद्ध है । उसी प्रकार यह मनुष्य भी चाहे कर्मोंसे बँधा हुआ हो चाहे मुक्त हो सदा अपने स्वरूपमें स्थित है ऐसा भी नहीं मानना चाहिये ।
यतश्चैवं स्थिते जन्तोः पक्षः स्याद् बाधितो बलात् ।
संसृतिर्वा विमुक्तिर्वा न स्याद्वा स्यादभेदसात् ॥958॥
अर्थ: क्योंकि जीवको यदि सदा शुद्ध माना जाय तो वह मानना न्यायबलसे बाधित है। जीवको सदा शुद्ध माननेसे न तो संसार ही सिद्ध हो सक्ता है, और न मोक्ष ही सिद्ध हो सक्ती है । अथवा दोनोंमें अभेद ही सिद्ध होगा ।
स्वस्वरूपे स्थितो ना चेत् संसारः स्यात्कुतो नयात् ।
हटाद्वा मन्यमानेस्मिन्ननिष्टत्वमहेतुकम् ॥959॥
अर्थ: यदि मनुष्य सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहे अर्थात् सदा शुद्ध ही बना रहे तो संसार किस नयसे हो सक्ता है ? यदि जीवको हट पूर्वक ही विना किसी हेतुके शुद्ध माना जाय तो अनिष्टताका प्रसंग आता है । उसे ही दिखाते हैं -
जीवश्चेत्सर्वतः शुद्धो मोक्षादेशो निरर्थकः ।
नेष्टमिष्टत्वमत्रापि तदर्थं वा वृथा श्रमः ॥960॥
अर्थ: यदि जीव सदा शुद्ध है तो फिर मोक्षका आदेश ( निरूपण ) व्यर्थ है । और यह बात इष्ट नहीं है । क्यों इष्ट नहीं है इसका उत्तर यही है कि मोक्षके लिये जो श्रम किया जाता है वह सब व्यर्थ होगा ।
सर्वं विप्लवतेप्येवं न प्रमाणं न तत्फलम् ।
साधनं साध्यभावश्च न स्याद्वा कारकक्रिया ॥961॥
अर्थ: जब मोक्ष व्यवस्था और उसका उपाय ही निरर्थक है, तब न प्रमाण बनता है, न उपका फल बनता है, न साधन बनता है न साध्य बनता है, न कारण बनता है और न क्रिया ही बनती है, सभीका विप्लव ( लोप ) हो जाता है ।
सिद्धमेतावताप्येवं वैकृता भावसन्ततिः ।
अस्ति संसारिजीवानां दुःखमूर्तिर्दुरुत्तरी ॥962॥
अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो चुकी कि संसारी जीवोंके भावोंकी सन्तति विकृत है, दुःखकी मूर्ति है, और खोटे फलवाली है ।
ननु वैभाविका भावाः कियन्तः सन्ति कीदृशाः ।
किं नामानः कथं ज्ञेया ब्रूहि मे वदतां वर ॥963॥
अर्थ: वैभाविक भाव कितने हैं, वे कैसे हैं, किस नामसे पुकारे जाते हैं, और कैसे जाने जाते हैं ? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मुझे सब समझाओ ।
श्रृणु साधो महाप्राज्ञ ! वच्म्यहं यत्तवेप्सितं ।
प्रायो जैनागमाभ्यासात् किञ्चित्स्वानुभवादपि ॥964॥
अर्थ: शङ्काकारको सम्बोधन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-हे साधो ! हे महा विद्वान्! जो तुम्हें अभीष्ट है उसे मैं कहता हूँ, प्रायः सब कथन मैं जैन शास्त्रोंके अभ्याससे ही करूंगा, कुछ २ स्वानुभवसे भी कहूंगा । तुम सुनो ।
लोकासंख्यातमात्राः स्युर्भावाः सूत्रार्थविस्तरात् ।
तेषां जातिविवक्षायां भावाः पञ्च यथोदिताः ॥965॥
अर्थ: सूत्रोंके अर्थके विस्तारसे जीवके भाव असंख्यातलोक प्रमाण हैं। तथा उन भावोंकी जातियोंकी अपेक्षासे पांच भाव कहे गये हैं।
तत्रौपशमिको नाम भावः स्यात्क्षायिकोपि च ।
क्षायोपशमिकश्चेति भावोप्यौदयिकोस्ति नुः ॥966॥
अर्थ: औपशमिकभाव, क्षायिकभाव, क्षायोपशमिकभाव, औदयिकभाव और पारिणामिकभाव ये मनुष्य ( जीव ) के पांच भाव क्रमसे कहे गये हैं। इनके त्रेपन उत्तरभेद भी कहे गये हैं।
पारिणामिकभावः स्यात् पञ्चेत्युद्देशिताः क्रमात् ।
तेषामुत्तरभेदाश्च त्रिपञ्चाशादितीरिताः ॥967॥
अर्थ: औपशमिकभाव, क्षायिकभाव, क्षायोपशमिकभाव, औदयिकभाव और पारिणामिकभाव ये मनुष्य ( जीव ) के पांच भाव क्रमसे कहे गये हैं। इनके त्रेपन उत्तरभेद भी कहे गये हैं।
कर्मणां प्रत्यनीकानां पाकस्योपशमात् स्वतः ।
यो भावः प्राणिनां स स्यादौपशमिकसंज्ञकः ॥968॥
अर्थ: विपक्षी कर्मोंके पाकका स्वयं उपशम होनेसे जो प्राणियोंका भाव होता है उसीका नाम औपशमिक भाव है ।
यथास्वं प्रत्यनीकानां कर्मणां सर्वतः क्षयात् ।
जातो यः क्षायिको भावः शुद्धः स्वाभाविकोऽस्य सः ॥969॥
अर्थ: विपक्षी कर्मोंका सर्वथा क्षय होनेसे जो आत्माका भाव होता है उसे क्षायिक भाव कहते हैं । यह क्षायिक भाव आत्माका शुद्ध भाव है, और उमका स्वाभाविक भाव है ।
यो भावः सर्वतो घातिस्पर्धकानुदयोद्भवः ।
क्षायोपशमिकः स स्यादुदयादेशघातिनाम् ॥970॥
अर्थ: सर्वघाति स्पर्धकोंका अनुदय होने पर और देशघातिस्पर्धकोंका उदय होने पर जो आत्माका भाव होता है उसे ही क्षायोपशमिक भाव कहते हैं।
कर्मणामुदयाद्यः स्याद्भावो जीवस्य संसृतौ ।
नाम्नाप्यौदयिकाऽन्वर्थात्परं वन्धाधिकारवान् ॥971॥
अर्थ: संसारी जीवके कर्मोंके उदयसे जो भांव होता है वही औदयिक नामसे कहा जाता है और वही यथार्थ नामधारी है, तथा कर्मबन्ध करनेका वही अधिकारी है ।
कृत्स्नकर्मनिरपेक्षः प्रोक्तावस्थाचतुष्टयात् ।
आत्मद्रव्यत्वमात्रात्मा भावः स्यात्पारिणामिकः ॥972॥
अर्थ: कर्मोंके उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशमसे सर्वथा निरपेक्ष जो आत्माका स्वाभाविक भाव है उसे ही पारिणामिक भाव कहते हैं ।
इत्युक्तं लेशतस्तेषां भावानां लक्षणं पृथक् ।
इतः प्रत्येकमेतेषां व्यासात्तद्रूपमुच्यते ॥973॥
अर्थ: इस प्रकार उन भावोंका लेशमात्र लक्षण भिन्न २ कहा गया। अब उनमेंसे प्रत्येक भावका स्वरूप विस्तार पूर्वक कहा जाता है।
भेदाश्चौदयिकस्यास्य सूत्रार्थादेकविंशति ।
चतस्रो गतयो नाम चत्वारश्च कषायकाः ॥974॥
अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं । वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अब कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा ।
त्रीणि लिङ्गानि मिथ्यात्वमेकं चाज्ञानमात्रकम् ।
एकम्वाऽसंयतत्वं स्यादेकमेकास्त्यसिद्धता ॥975॥
अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं। वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अव कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा।
लेश्याः षडेव कृष्णाद्या क्रमादुद्देशिता इति ।
तत्स्वरूपं प्रवक्ष्यामि नाल्पं नातीव विस्तरम् ॥976॥
अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं । वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अव कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा ।
गतिनामास्ति कर्मैकं विख्यातं नामकर्मणि ।
चतस्रो गतयो यस्मात्तच्चतुर्धाधिगीयते ॥977॥
अर्थ: नाम कर्मके भेदोंमें प्रसिद्ध एक गति नामा कर्म भी है। गतियां चार हैं इस लिये वह गति कर्म भी चार प्रकारका कहा जाता है।
कर्मणोस्य विपाकाद्वा दैवादन्यतमं वपुः ।
प्राप्य तत्रोचितान्भावान् करोत्यात्मोदयात्मनः ॥978॥
अर्थ: इस गतिकर्मके विपाक होनेसे यह आत्मा अपने ही उदयवश देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक इन चार गतियोंमेंसे किसी एकको प्राप्त होकर उसके उचित भावोंको करता है। अर्थात् जिस गतिमें पहुंचता है वहांकी द्रव्य क्षेत्र काल भाव सामग्रीके अनुसार ही अपने भावोंको बनाता है।
यथा तिर्यगवस्थायां तद्वया भावसन्ततिः ।
तत्रावश्यं च नान्यत्र तत्पर्यायानुसारिणी ॥979॥
अर्थ: जिस प्रकार तिर्यञ्च अवस्थामें जो उसके योग्य भावसन्तति है बह उस पर्यायके अनुसार वहां अवश्य होती है, तिर्यञ्च अवस्थाके योग्य जो भाव सन्तति है बह वहीं पर होती है अन्यत्र नहीं होती ।
एवं दैवेऽथ मानुष्ये नारके वपुषि स्फुटम् ।
आत्मीयात्मीयभावाश्च सन्त्यसाधारणा इव ॥980॥
अर्थ: इसी प्रकार देवगति, मनुष्यगति, नरकगतिमें भी अपनी २ गतिके योग्य भाव होते हैं । वे ऐसे ही होते हैं जैसे असाधारण हों ।
ननु देवादिपर्यायो नामकर्मोदयात्परम् ।
तत्कथं जीवभावस्य हेतुः स्याद्घातिकर्मवत् ॥981॥
अर्थ: देवादिक गतियां केवल नामकर्मके उदयसे होती हैं। जब ऐसा सिद्धान्त है तब क्या कारण है कि नाम ( देवादिगतियां ) कर्म घातिया कर्मोंके समान जीवके भावोंका हेतु समझा जाय ?
सत्यं तन्नामकर्मापि लक्षणाच्चित्रकारवत् ।
नूनं तद्देहमात्रादि निर्मापयति चित्रवत् ॥982॥
अर्थ: जिस प्रकार चित्रकार अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार नाम कर्म भी नियमसे शरीरादिकी रचना करता है, साथ ही वहां पर मोहनीय कर्मका निरन्तर उदय रहता है, इसी लिये उस देह क्रियाके आकार औदयिक भाव होता है ।
अस्ति तत्रापि मोहस्य नैरन्तर्योदयोञ्जसा ।
तस्मादौदयिको भावः स्यात्तद्देहक्रियाकृतिः ॥983॥
अर्थ: जिस प्रकार चित्रकार अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार नाम कर्म भी नियमसे शरीरादिकी रचना करता है, साथ ही वहां पर मोहनीय कर्मका निरन्तर उदय रहता है, इसी लिये उस देह क्रियाके आकार औदयिक भाव होता है ।
ननु मोहोदयो नूनं स्वायत्तोस्त्येकधारया ।
तत्तद्वपुः क्रियाकारो नियतोऽयं कुतो नयात् ॥984॥
अर्थ: मोहनीय कर्मका उदय अनर्गल रीतिसे अपने ही अधीन है। वह फिर भिन्न भिन्न शरीरोंकी क्रियाओंके आकार किस नयसे नियत है ? अर्थात् भिन्न २ शरीरानुसार मोहनीय कर्म क्यों फल देता है ?
नैवं यतोनभिज्ञोसि मोहस्योदयवैभवे ।
तत्रापि बुद्धिपूर्वं चाऽबुद्धिपूर्वं स्वलक्षणात् ॥985॥
अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है । शङ्काकारसे आचार्य कहते हैं कि मोहनीय कर्मका उदय वैभव कितना बढ़ा हुआ है, और वह अपने लक्षणके अनुसार बुद्धिपूर्वक अबुद्धिपूर्वक आदि भेदोंमें बँटा हुआ है इस विषयमें तुम सर्वथा अजान हो ।
मोहनान्मोहकर्मैकं तद्द्विधा वस्तुतः पृथक् ।
दृङ्मोहश्चात्र चारित्रमोहश्चेति द्विधा स्मृतः ॥986॥
अर्थ: मूर्छित करनेसे सामान्य रीतिसे मोहकर्म एक प्रकार है । और वही दर्शनमोह और चारित्रमोहकी अपेक्षासे वास्तवमें दो प्रकार भी है ।
एकधा त्रिविधा वा स्यात् कर्ममिथ्यात्वसञ्ज्ञकम् ।
क्रोधाद्याद्यचतुष्कञ्च, सप्तैते दृष्टिमोहनम् ॥987॥
अर्थ: दर्शन मोहनीय कर्म भी सामान्य रीतिसे मिथ्यात्वरूप एक प्रकार है, विशेष रीतिसे मिथ्यात्व, सम्यङ्मिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृतिमिथ्यात्व, भेदोंसे तीन प्रकार है, और अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया, लोभ चार भेद प्रथम कषायके हैं । इस प्रकार ये सात भेद दर्शनमोहनीयके हैं ।
दृङ्मोहस्योदयादस्य मिथ्याभावोस्ति जन्मिनः ।
स स्यादौदयिको नूनं दुर्वारो दृष्टिघातकः ॥988॥
अर्थ: इस जीवके दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यारूप परिणाम होता है । वह मिथ्याभाव ही औदयिक भाव है और वही सम्यग्दर्शनका घात करनेवाला है । यह भाव आत्मासे कठिनतासे दूर होता है । जीवके शुद्ध सम्यग्दर्शन गुणको विपरीत स्वादु कर देना इस दर्शन मोहनीय कर्मका स्वभाव है । अर्थात् सम्यग्दर्शन गुणको मिथ्यादर्शन रूप करदेना दर्शन मोहनीय कर्मका कार्य है ।
अस्ति प्रकृतिरस्यापि दृष्टिमोहस्य कर्मणः ।
शुद्धं जीवस्य सम्यक्त्वं गुणं नयति विक्रियाम् ॥989॥
अर्थ: इस जीवके दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यारूप परिणाम होता है । वह मिथ्याभाव ही औदयिक भाव है और वही सम्यग्दर्शनका घात करनेवाला है । यह भाव आत्मासे कठिनतासे दूर होता है । जीवके शुद्ध सम्यग्दर्शन गुणको विपरीत स्वादु कर देना इस दर्शन मोहनीय कर्मका स्वभाव है । अर्थात् सम्यग्दर्शन गुणको मिथ्यादर्शन रूप करदेना दर्शन मोहनीय कर्मका कार्य है ।
यथा मद्यादिपानस्य पाकाद् बुद्धिर्विमुह्यति ।
श्वेतं शंखादि यद्वस्तु पीतं पश्यति विभ्रमात् ॥990॥
अर्थ: जिस प्रकार मदिरा पीनेवाले पुरुषकी बुद्धि मादिराका नशा चढ़नेपर भ्रष्ट होजाती है। वह पुरुष शंखादि सफेद पदार्थोंको भी विभ्रमसे पीलेही देखता है - समझता है।
तथा दर्शनमोहस्य कर्मणोस्तूदयादिह ।
अपि यावदनात्मीयमात्मीयमनुते कुदृक् ॥991॥
अर्थ: उसी प्रकार दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि पुरुष इस संसारमें जो आत्मासे भिन्न पदार्थ हैं उन्हें भी अपने ( आत्माके ) मानता है, अर्थात् मिथ्यादृष्टि भिन्न पदार्थोंमें आत्मीयत्व बुद्धि करता है ।
चापि लुम्पति सम्यक्त्वं दृङ्मोहस्योदयो यथा ।
निरुणद्ध्यात्मनो ज्ञानं ज्ञानस्यावरणोदयः ॥992॥
अर्थ: जिस प्रकार दर्शन मोहनीय कर्मका उदय सम्यग्दर्शन गुणका लोप कर देता है, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्मका उदय भी आत्माके ज्ञान गुणको ढक देता है।
यथा ज्ञानस्य निर्णाशो ज्ञानस्यावरणोदयात् ।
तथा दर्शननिर्णाशो दर्शनावरणोदयात् ॥993॥
अर्थ: जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके उदयसे ज्ञानका नाश होजाता है उसी प्रकार दर्शनावरण कर्मके उदयसे दर्शनका नाश होजाता है ।
यथा धाराधराकारैः गुण्ठितस्यांशुमालिनः ।
नाविर्भावः प्रकाशस्य द्रव्यादेशात् स्वतोपि वा ॥994॥
अर्थ: यद्यपि द्रव्यदृष्टिसे सूर्यका प्रकाश दा सूर्यके साथ है उसका कभी अभाव नहीं हो सक्ता है तथापि मेघोंसे आच्छादित होनेपर सूर्यका प्रकाश छिप अवश्य जाता है।
यत्पुनर्ज्ञानमज्ञानमस्ति रूढिवशादिह ।
तन्नौदयिकमस्त्यस्ति क्षायोपशमिकं किल ॥995॥
अर्थ: जो ज्ञान ही रूढिवश अज्ञान कहा जाता है वह औदयिक नहीं है किन्तु निश्चयसे क्षायोपशमिक है ।
अथास्ति केवलज्ञानं यत्तदावरणावृतम् ।
स्वापूर्वार्थान् परिच्छेतुं नालं मूर्छितजन्तुवत् ॥996॥
अर्थ: ज्ञानावरण कर्मोंमें एक केवल ज्ञानावरण कर्म भी है, वह केवलज्ञानावरण कर्म आत्माके स्वाभाविक केवलज्ञान गुणको ढक लेता है। आवरणसे ढक जानेपर वह ज्ञान मूर्छित पुरुषकी तरह अपने स्वरूप और अनिश्चित पदार्थोंको जाननेके लिये समर्थ नहीं रहता है।
यद्वा स्यादवधिज्ञानं ज्ञानं वा स्वान्तपर्ययम् ।
नार्थक्रियासमर्थं स्यात्तत्तदावरणावृतम् ॥997॥
अर्थ: अथवा अवधिज्ञान वा मनःपर्ययज्ञान ये भी अपने २ आवरकसे जब आवृत होते हैं अर्थात् ढके जाते हैं तब अर्थक्रिया करनेमें अर्थात् पदार्थोंके जाननेमें समर्थ नहीं रहते हैं।
मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं तत्तदावरणावृतम् ।
यद्यावतोदयांशेन स्थितं तावदपन्हुतम् ॥998॥
अर्थ: इसी प्रकार मतिज्ञान और श्रुतज्ञान भी अपने २ आवरणसे आच्छादित होते हैं, और उनके आवरक कर्मका जितने अंशोंमें उदय रहता है उतने ही अंशोंमें ज्ञान भी तिरोभूत ( ढका हुआ ) रहता है ।
यत्पुनः केवलज्ञानं व्यक्तं सर्वार्थभासकम् ।
स एव क्षायिको भावः कृत्स्नस्वावरणक्षयात् ॥999॥
अर्थ: जो केवलज्ञान है वह प्रकटरीतिसे सम्पूर्ण पदार्थोंका मकाशक है वह अपने सम्पूर्ण आवरणोंके क्षय होनेसे होता है इसलिये वही क्षायिक भाव है ।
कर्माण्यष्टौ प्रसिद्धानि मूलमात्रतया पृथक्
अष्टचत्वारिंशच्छतं कर्माण्युत्तरसंज्ञया ॥1000॥
अर्थ: कर्मोंके मूल भेद आठ प्रसिद्ध हैं और उनके उत्तर भेद एकसौ अड़तालीस हैं।