पञ्चाध्यायी श्लोक एवं अर्थ (पं. राजमल्ल) | Panchadhyayi Shlok Evam Arth (Pt. Rajmall)

उत्तरार्द्ध 901 से 1000 (श्लोक 901 से 1000)

आत्मनोऽन्यत्र कुत्रापि स्थिते ज्ञाने परात्मसु ।
ज्ञानसञ्चेतनायाः स्यात् क्षतिः साधीयसी तदा ॥901॥

अर्थ: शंकाकारका कहना है कि वही अर्थ निकला जो पहले प्रकरणमें आया हुआ था, अर्थात् किसी वीतराग सम्यग्दृष्टिके ही ज्ञानचेतना होती है, क्योंकि ज्ञानोपयोग जब आत्माको छोड़कर अन्य बाह्य पदार्थोंमें चला जायगा तो उस समय ज्ञानचेतनाकी क्षति अवश्य ही होगी ।


सत्यं चापि क्षतेरस्याः क्षतिः साध्यस्य न क्वचित् ।
इयानात्मोपयोगस्य तस्यास्तत्राप्यहेतुता ॥902॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ठीक है, उपयोगात्मक ज्ञानचेतनाकी क्षति होनेपर भी सम्यक्त्व हेतुका साध्यभूत अष्ट कर्मोंकी निर्जराकी क्षति नहीं होती है। क्योंकि ज्ञानचेतनाका कर्म निर्जरामें कारण न होना ही उपयोग ’ शुद्धोपयोग ’ का स्वरूप है। यहां पर साध्य-अष्ट कर्मोंकी निर्जरा है, और उसका कारणरूप हेतु सम्यग्दर्शन है, वह साध्य आत्मामें शक्ति होनेसे स्वतः भी होता है और ध्यानादि प्रयत्नसे भी होता है, किन्तु उसमें ज्ञानचेतना कारण नहीं है।


साध्यं यद्दर्शनाद्धेतोर्निर्जरा चाष्टकर्मणाम् ।
स्वतो हेतुवशाच्छक्तेर्न तद्धेतुः स्वचेतना ॥903॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ठीक है, उपयोगात्मक ज्ञानचेतनाकी क्षति होनेपर भी सम्यक्त्व हेतुका साध्यभूत अष्ट कर्मोंकी निर्जराकी क्षति नहीं होती है। क्योंकि ज्ञानचेतनाका कर्म निर्जरामें कारण न होना ही उपयोग ’ शुद्धोपयोग ’ का स्वरूप है। यहां पर साध्य - अष्ट कर्मोंकी निर्जरा है, और उसका कारणरूप हेतु सम्यग्दर्शन है, वह साध्य आत्मामें शक्ति होनेसे स्वतः भी होता है और ध्यानादि प्रयत्नसे भी होता है, किन्तु उसमें ज्ञानचेतना कारण नहीं है।


ननुचेदाश्रयासिद्धो विकल्पो व्योमपुष्पवत् ।
तत्किं हेतुः प्रसिद्धोस्ति सिद्धः सर्वविदागमात् ॥904॥

अर्थ: यहांपर स्वतन्त्र शंका यह है कि आपने (आचार्यने) जो मत्यादिक ज्ञानोंको संक्रमणात्मक व विकल्पात्मक बतलाया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि विकल्प कोई पदार्थ ही नहीं है जिस प्रकार कि आकाशके पुष्प कोई पदार्थ नहीं है। इसलिये विकल्प शब्दका कोई वाच्य न होनेसे उसे आश्रयासिद्ध ही कहना चाहिये, और जब विकल्प कोई पदार्थ नहीं है तब ज्ञानको सविकल्प कहनेमें सर्वज्ञागम प्रसिद्ध क्या हेतु हो सकता है, अर्थात् कुछ हेतु नहीं होसकता।


सत्यं विकल्पसर्वस्वसारं ज्ञानं स्वलक्षणात् ।
सम्यक्त्वे यद्विकल्पत्वं न तत्सिद्धं परीक्षणात् ॥905॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि ज्ञान अपने लक्षणसे विकल्पात्मक कहा जाता है, तथा सम्यक्त्वमें जो विकल्पका व्यवहार होता है वह परीक्षासे सिद्ध नहीं होता।


यत्पुनः कैश्चिदुक्तं स्यात् स्थूललक्ष्योन्मुखैरिह ।
अत्रोपचारहेतुर्यस्तं ब्रुवे किल साम्प्रतम् ॥906॥

अर्थ: जिन लोगोंने स्थूल दृष्टि रख कर सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शनको सविकल्प बतलाया है उन्होंने उपचारसे ही बतलाया है। वास्तवमें सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान सविकल्प नहीं हैं। उपचारका भी क्या कारण है ? उसे ही अब बतलाते हैं। -


क्षायोपशमिकं ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत् ।
तत्स्वरूपं न ज्ञानस्य किन्तु रागक्रियास्ति वै ॥907॥

अर्थ: क्षायोपशमिक ज्ञान जो हर एक पदार्थको क्रम क्रमसे जानता है वह ज्ञानका स्वरूप नहीं है किंतु राग क्रिया है, और यही राग उपचारका हेतु है।


प्रत्यर्थं परिणामित्वमर्थानामेतदस्ति यत् ।
अर्थमर्थं परिज्ञानं मुह्यद्रज्यद्द्विषद्यथा ॥908॥

अर्थ: पदार्थोंमें प्रत्येक पदार्थका परिणमन होता है, उस परिणमनमें ज्ञान हरएक पदार्थके प्रति मोह करता है, राग करता है, द्वेष करता है।


स्वसंवेदनप्रत्यक्षादस्ति सिद्धमिदं यतः ।
रागाक्तं ज्ञानमक्षान्तं रागिणो न तथा मुनेः ॥909॥

अर्थ: यह वात स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे सिद्ध है कि राग सहित ज्ञान शान्त नहीं है । ऐसा शान्ति रहित ज्ञान जैसा रागी पुरुषके होता है वैसा मुनिके नहीं होता ।


अस्तिज्ञानाविनाभूतो रागो बुद्धिपुरस्सरः ।
अज्ञातेर्थे यतो न स्याद् रागभावः खपुष्पवत् ॥910॥

अर्थ: बुद्धिपूर्वक राग ज्ञानका अविनाभावी है ! क्योंकि अज्ञात (नहीं जाने हुए) पदार्थमें राग भाव उत्पन्न हीं नहीं होता है । जिस प्रकार आकाशका पुष्प कोई पदार्थ नहीं है तो उसमें बुद्धिपूर्वक राग भी नहीं हो सक्ता है ।


अस्त्युक्तलक्षणो रागश्चारित्रावरणोदयात् ।
अप्रमत्तगुणस्थानादर्वाक् स्यान्नोर्ध्वमस्त्यसौ ॥911॥

अर्थ: ऊपर कहा हुआ बुद्धिपूर्वक राग चारित्रमोहनीयके उदयसे होता है यह रग अप्रमत्त गुण स्थानसे पहले २ होता है। छठे गुणस्थानसे ऊपर सर्वथा नहीं होता है।


अस्ति चोर्ध्वमसौ सूक्ष्मो रागश्चाबुद्धिपूर्वजः ।
अर्वाक् क्षीणकषायेभ्यः स्याद्विवक्षावशान्नवा ॥912॥

अर्थ: प्रमत्त गुणस्थानसे ऊपर सूक्ष्म-अबुद्धि पूर्वक राग है। यह राग क्षीणकषायसे पहले २ होता है। सो भी विवक्षाधीन है। यदि विवक्षा की जाय तो अबुद्धिपूर्वक-सूक्ष्म राग है अन्यथा नहीं है।


विमृश्यैतत्परं कैश्चिदसद्भूतोपचारतः ।
रागवज्ज्ञानमत्रास्ति सम्यक्त्वं तद्वदीरितम् ॥913॥

अर्थ: इसी बातको विचार कर किन्हीं पुरुषोंने असद्भूत उपचार नयसे राग सहित ज्ञानको देखकर सम्यक्त्वको भी वैसा कहा है ।


हेतोः परं प्रसिद्धैर्यैः स्थूललक्ष्यैरितिस्मृतम् ।
आप्रमत्तं च सम्यक्त्वं ज्ञानं वा सविकल्पकम् ॥914॥

अर्थ: स्थूल पदार्थको लक्ष्य रखनेवाले जिन प्रसिद्ध पुरुषोंने केवल रागरूप हेतुसे ऐसा कहा है। उनका कहना है कि प्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त सम्यक्त्व और ज्ञान दोनों ही सविकल्पक हैं।


ततस्तूर्ध्वं तु सम्यक्त्वं ज्ञानं वा निर्विकल्पकम् ।
शुक्लध्यानं तदेवास्ति तत्रास्ति ज्ञानचेतना ॥915॥

अर्थ: प्रमत्तगुणस्थानसे ऊर सम्यक्त्व और ज्ञान दोनों ही निर्विकल्पक होते हैं। वही शुक्लध्यान कहलाता है, और उसी अवस्थामें ज्ञानचेतना होती है।


प्रमत्तानां विकल्पत्वान्न स्यात्सा शुद्धचेतना ।
अस्तीति वासनोन्मेष केषाञ्चित्स न सन्निह ॥916॥

अर्थ: “प्रमत्त जीवोंको विकल्पात्मक होनेसे उनके शुद्ध चेतना नहीं हो सक्ती है ।” किन्हीं किन्हीं पुरुषोंके इस प्रकारकी वासना लगी हुई है, वह ठीक नहीं है।


यतः पराश्रितो दोषो गुणो वा नाश्रयेत्परम् ।
परो वा नाश्रयेद्दोषं गुणाश्चापि पराश्रितम् ॥917॥

अर्थ: क्योंकि दूसरेके आश्रयसे होनेवाला गुण दोष दूसरेके आश्रय नहीं हो सक्ता है। इसी प्रकार दूसरा भी दूसरेके आश्रयसे होनेवाले गुण दोषोंको अपने आश्रित नहीं बना सक्ता है।


पाकाच्चारित्रमोहस्य रागोस्त्यौदयिकः स्फुटम् ।
सम्यक्त्वे स कुतोन्यायाज्ज्ञाने वाऽनुदयात्मके ॥918॥

अर्थ: चारित्रमोहनीय कर्मका पाक होनेसे राग होता है, राग आत्माका औदयिक भाव है, अर्थात् कर्मके उदयसे होनेवाला है। वह औदयिक भाव अनुदय स्वरूप सम्यक्त्व और ज्ञानमें किस प्रकार हो सक्ता है ? अर्थात् नहीं हो सक्ता।


अनिघ्नन्निह सम्यक्त्वं रागोऽयं बुद्धिपूर्वकः ।
नूनं हन्तुं क्षमो न स्याज्ज्ञानसंचेतनामिमाम् ॥919॥

अर्थ: बुद्धिपूर्वक राग सम्यक्त्वका घात नहीं कर सक्ता है । इसलिये वह सम्यक्त्वके साथ अविनाभावी ज्ञानचेतना (लब्धिरूप)का भी घात नियमसे नहीं कर सक्ता है ।


नाप्यूहमिति शक्तिः स्याद्रागस्यैतावतोपि या ।
बन्धोत्कर्षोदयांशानां हेतुर्दृग्मोहकर्मणः ॥920॥

अर्थ: रागकी ऐसी भी शक्ति है जो दर्शन मोहनीय कर्मके बन्ध, उत्कर्ष और उदयमें कारण है ऐसी भी तर्कणा न करो ।


एवं चेत् सम्यगुत्पत्तिर्न स्यात्स्यात् दृगसंभवः ।
सत्यां प्रध्वंससामग्र्यां कार्यध्वंसस्य सम्भवात् ॥921॥

अर्थ: यदि राग भाव ही दर्शन मोहनीयके बन्ध उत्कर्ष और उदयमें कारण हों तो सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति ही नहीं होसकती है । फिर तो सम्यग्दर्शनका होना ही असंभव हो जायगा । क्योंकि नाशकी सामग्री रहने पर कार्यका नाश होना अवश्यंभावी है ।


न स्यात्सम्क्त्वप्रध्वंसश्चारित्रावरणोदयात् ।
रागेणैतावता तत्र दृङ्मोहेऽनधिकारिणा ॥922॥

अर्थ: चारित्रावरण कर्मके उदयसे (रागभावसे) सम्यक्त्वका विघात नहीं हो सकता है । क्योंकि रागभावका दर्शनमोहनीय कर्मके विषयमें कोई अधिकार नहीं है ।


यतश्चास्त्यागमात् सिद्धमेतद्दृङ्मोहकर्मणः ।
नियतं स्वोदयाद्बन्धप्रभृति न परोदयात् ॥923॥

अर्थ: क्योंकि यह बात आगमसे सिद्ध है कि दर्शन मोहनीय कर्मका बन्ध उत्कर्ष आदि दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे ही नियमसे होता है । किसी अन्य (चारित्र मोहनीय)के उदयसे दर्शनमोहनीयका बन्ध, उत्कर्ष, उदय कुछ नहीं होता ।


ननु चैवमनित्यत्वं सम्यक्त्वाद्यद्वयस्य यत् ।
स्वतः स्वस्योदयाभावे तत्कथं स्यादहेतुतः ॥924॥

अर्थ: शंकाकारका कहना है कि यदि अपने उदयमें ही अपना बन्ध उत्कर्ष हो अथवा परोदयमें परका उदय न हो तो आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता कैसे आ सक्ती है? क्योंकि विना कारण अपना उदय अपने आप तो हो नहीं सकेगा, और विना दर्शनमोहनीयके उदय हुए आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता आ नहीं सक्ती है तथा हम (शंकाकार) यह भी विश्वास नहीं कर सक्ते हैं कि स्वयं दर्शन मोहनीयका उपशम ही दर्शनमोहनीयके उदय अथवा उत्कर्षका कारण हो जाता हो ।


न प्रतीमो वयं चैतद्दृङ्मोहोपशमः स्वयम् ।
हेतुः स्यात् स्वोदयस्योच्चैरुत्कर्षस्याऽथवा मनाक् ॥925॥

अर्थ: शंकाकारका कहना है कि यदि अपने उदयमें ही अपना बन्ध उत्कर्ष हो अथवा परोदयमें परका उदय न हो तो आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता कैसे आ सक्ती है? क्योंकि विना कारण अपना उदय अपने आप तो हो नहीं सकेगा, और विना दर्शनमोहनीयके उदय हुए आदिके दो सम्यक्त्वोंमें अनित्यता आ नहीं सक्ती है तथा हम (शंकाकार) यह भी विश्वास नहीं कर सक्ते हैं कि स्वयं दर्शन मोहनीयका उपशम ही दर्शनमोहनीयके उदय अथवा उत्कर्षका कारण हो जाता हो।


नैवं यतोऽनभिज्ञोसि पुद्गलाचिन्त्यशक्तिषु ।
प्रतिकर्म प्रकृत्याद्यैर्नानारूपासु वस्तुतः ॥926॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि शंकाकारने जो ऊपर शंका उठाई है वह सर्वथा निर्मूल है। आचार्य शंकाकारसे सम्बोधन करते हुए कहते हैं कि अभी तुम पुद्गलकी अचिन्त्य शक्तियोंके विषयमें बिलकुल अजान हो, तुम नहीं समझते हो कि हर एक कर्ममें प्रकृति, प्रदेश, स्थिति, अनुभाग आदि अनेक रूपसे फलदान शक्ति भरी हुई है।


अस्त्युदयो यथानादेः स्वतश्चोपशमस्तथा ।
उदयः प्रशमो भूयः स्यादर्वागपुनर्भवात् ॥927॥

अर्थ: जिस प्रकार अनादि कालसे कर्मोंका उदय होरहा है उसी प्रकार कर्मोंका उपशम भी स्वयं होता है । इसी प्रकार उपशमके पीछे उदय और उदयके पीछे उपशम बार २ होते रहते हैं । यह उदय और उपशमकी शृङ्खला जब तक मोक्ष नहीं होती है बराबर होती रहती है ।


अथ गत्यन्तराद्दोषः स्यादसिद्धत्वसंज्ञकः ।
दोषः स्यादनवस्थात्मा दुर्वारोन्योन्यसंश्रयः ॥928॥

अर्थ: यदि ऊपर कही हुई व्यवस्था न मानी जाय और दूसरी ही रीति स्वीकार


दृङ्मोहस्योदयो नाम रागायत्तोस्ति चेन्मतम् ।
सोऽपि रागोस्ति स्वायत्तः किं स्यादपररागसात् ॥929॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


स्वायत्तश्चेच्च चारित्रस्य मोहस्योदयात्स्वतः ।
यथा रागस्तथा चायं स्वायत्तः स्वोदयात्स्वतः ॥930॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


अथ चेत्तद्द्वयोरेव सिद्धिश्चान्योन्यहेतुतः ।
न्यायादसिद्धदोषः स्याद्दोषादन्योन्यसंश्रयात् ॥931॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


नागमः कश्चिदस्तीदृग्घेतुर्दृङ्मोहकर्मणः ।
रागस्तस्याथ रागस्य तस्य हेतुर्दृगावृतिः ॥932॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


तस्मात्सिद्धोस्ति सिद्धान्तो दृङ्मोहस्येतरस्य वा ।
उदयोनुदयो वाऽथ स्यादनन्यगतिःस्वतः ॥933॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


तस्मात्सम्यक्त्वमेकं स्यादर्थाचल्लक्षणादपि ।
तद्यथाऽवश्यकी तत्र विद्यते ज्ञानचेतना ॥934॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


मिश्रौपशमिकं नाम क्षायिकं चेति तत्त्रिधा ।
स्थितिबन्धकृतो भेदो न भेदो रसबन्धसात् ॥935॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


तद्यथाऽथ चतुर्भेदो बन्धोऽनादिप्रभेदतः ।
प्रकृतिश्च प्रदेशाख्यो बन्धौ स्थित्यनुभागकौ ॥936॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


प्रकृतिस्तत्स्वभावात्मा प्रदेशो देशसंश्रयः ।
अनुभागो रसो ज्ञेयो स्थितिः कालावधारणम् ॥937॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


स्वार्थक्रिया समर्थोत्र वन्धः स्याद्रससञ्ज्ञिकः ।
शेषवन्धत्रिकोप्येष न कार्यकरणक्षमः ॥938॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


ततः स्थितिवशादेव सन्मात्रेप्यत्र संस्थिते ।
ज्ञानसञ्चेतनायास्तु क्षतिर्न स्यान्मनागपि ॥939॥

अर्थ: (संलग्न उत्तरार्द्ध पीडीएफ में यह पन्ना नहीं है, इसलिए इस श्लोक का अर्थ यहाँ नहीं लिया जा सका)


एवमित्यादयश्चान्ये सन्ति ये सद्गुणोत्तमाः ।
सम्यक्त्वमात्रमारभ्य ततोप्यूर्ध्वं च तद्वतः ॥940॥

अर्थ: इसी प्रकार सम्यग्दर्शनके साथ तथा उसके आगे और भी सद्गुण प्रकट होते हैं । वे सब सम्यग्दर्शन सहित हैं इसीलिये सद्गुण हैं । उनमेंसे कुछ ये हैं-स्वसंवेदन प्रत्यक्ष स्वानुभव ज्ञान, वैराग्य, और भेद विज्ञान । इत्यादि सभी गुण सम्यग्दर्शनके होनेपर ही होते हैं इससे अधिक क्या कहा जाय ।


स्वसंवेदनप्रत्यक्षं ज्ञानं स्वानुभवाह्वयम् ।
वैराग्यं भेदविज्ञानमित्याद्यस्तीह किं बहु ॥941॥

अर्थ: इसी प्रकार सम्यग्दर्शनके साथ तथा उसके आगे और भी सद्गुण प्रकट होते हैं । वे सब सम्यग्दर्शन सहित हैं इसीलिये सद्गुण हैं । उनमेंसे कुछ ये हैं-स्वसंवेदन प्रत्यक्ष स्वानुभव ज्ञान, वैराग्य, और भेद विज्ञान । इत्यादि सभी गुण सम्यग्दर्शनके होनेपर ही होते हैं इससे अधिक क्या कहा जाय ।


अद्वैतेपि त्रिधा प्रोक्ता चेतना चैवमागमात् ।
ययोपलक्षितो जीवः सार्थनामास्ति नान्यथा ॥942॥

अर्थ: यद्यपि चेतना एक है तथापि आगमके अनुसार उस चेतनाके तीन भेद हैं उस चेतनासे विशिष्ट जीव ही यथार्थ नाम धारी कहलाता है। अन्यथा नहीं।


ननु चिन्मात्र एवास्ति जीवः सर्वोपि सर्वथा ।
किं तदाद्या गुणाश्चान्ये सन्ति तत्रापि केचन ॥943॥

अर्थ: क्या सम्पूर्ण जीव सर्वथा चैतन्यमात्र ही है अथवा चैतन्यके साथ उसके और भी गुण होते हैं ? उत्तर - हां होते हैं उनमेंसे कुछ गुण नीचे बतलाये जाते हैं।


उच्यतेनन्तधर्माधिरूढोप्येकः सचेतनः ।
अर्थजातं यतो यावत्स्यादनन्तगुणात्मकम् ॥944॥

अर्थ: यह जीव यद्यपि अनन्तगुणोंका धारी है तथापि एक कहा जाता है । जितना भी पदार्थ समूह है सभी अनन्तगुणात्मक है ।


अभिज्ञानं च तत्रापि ज्ञातव्यं तत्परीक्षकैः ।
वक्ष्यमाणमपि साध्यं युक्तिस्वानुभवागमात् ॥945॥

अर्थ: जीव अनन्तगुणात्मक है इस विषयका विशेष परिज्ञान परीक्षकोंको करना चाहिये, यद्यपि जो हम सिद्ध करना चाहते हैं उसे आगे युक्ति, स्वानुभव और आगम प्रमाणसे कहेंगे तथापि परीक्षकोंको निर्णय कर लेना ही उचित है ।


तद्यथायथं जीवस्य चारित्रं दर्शनं सुखम् ।
ज्ञानं सम्यक्त्वमित्येते स्युर्विशेषगुणाः स्फुटम् ॥946॥

अर्थ: चारित्र, दर्शन, सुख, ज्ञान, और सम्यक्त्व ये जीवके विशेष गुण हैं ।


वीर्यं सूक्ष्मोवगाहः स्यादव्याबाधश्चिदात्मकः ।
स्यादगुरुलघुसंज्ञं च स्युः सामान्यगुणा इमे ॥947॥

अर्थ: वीर्य, सूक्ष्म, अवगाह, अव्याबाध और अगुरुलघु ये जीवके सामान्य गुण हैं।


सामान्या वा विशेषा वा गुणाः सिद्धाः निसर्गतः ।
टंकोत्कीर्णा इवाजस्रं तिष्ठन्तः प्राकृताःस्वतः ॥948॥

अर्थ: जीवके सामान्यगुण अथवा विशेषगुण स्वभाव सिद्ध हैं। सभी गुण टांकीसे उकेरे हुए पत्थरके समान निरन्तर रहते हैं और स्वयं सिद्ध अनादिनिधन हैं।


तथापि प्रोच्यते किञ्चिच्छ्रूयतामवधानतः ।
न्यायवलात्समायातः प्रवाहः केन वार्यते ॥949॥

अर्थ: तथापि उन गुणोंके विषयमें थोड़ासा विवेचन किया जाता है उसे सावधानीसे सुनना चाहिये । गुणोंका प्रवाह न्याय (युक्ति)के बलसे चला आरहा है उसे कौन रोक सकता है ?


अस्ति वैभाविकी शक्तिः स्वतस्तेषु गुणेषु च ।
जन्तोः संसृत्यवस्थायां वैकृतास्ति स्वहेतुतः ॥950॥

अर्थ: उन्हीं जीवके अनन्त गुणोंमें एक स्वतः सिद्ध वैभाविक नामा शक्ति है। वह शक्ति संसार अवस्थामें अपने कारणसे विकृत ( विकारी ) हो रही है।


यथा वा स्वच्छताऽऽदर्शे प्राकृतास्ति निसर्गतः ।
तथाप्यस्यास्यसंयोगाद्वैकृतास्त्यर्थतोपि सा ॥951॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें स्वभावसे ही स्वच्छता ( निर्मलता ) सिद्ध है। तथापि सम्बन्ध होनेसे उसकी विकार अवस्था होजाती है। और वह विकार वास्तविक है।


वैकृतत्वेपि भावस्य न स्यादर्थान्तरं क्वचित् ।
प्रकृतौ यद्विकारित्वं वैकृतं हि तदुच्यते ॥952॥

अर्थ: विकृत अवस्था होनेपर भी पदार्थ कहीं बदल नहीं जाता है । प्रकृतिमें जो विकृति होती है उसे ही उसका विकार कहते हैं ।


तथापि वारुणीपानाद् बुद्धिर्नाऽबुद्धिरेव नुः ।
तत्प्रकारान्तरं बुद्धौ वैकृतत्वं तदर्थसात् ॥953॥

अर्थ: जिस प्रकार मदिरा पीनेसे मनुष्यकी बुद्धि बुद्धि ही रहती है वह अबुद्धि ( पदार्थान्तर ) नहीं होजाती है किन्तु बुद्धिमें ही कुछ दूसरी अवस्था हो जाती है। जो बुद्धिकी दूसरी अवस्था है वही उसकी वास्तविक विकृति है।


प्राकृतं वैकृतं वापि ज्ञानमात्रं तदेव यत् ।
यावदत्रेन्द्रियायत्तं तत्सर्वं वैकृतं विदुः ॥954॥

अर्थ: स्वाभाविक ज्ञान हो, अथवा वैभाविक ज्ञान हो सभी ज्ञान ही कहा जायगा। क्योंकि ज्ञानपना दोनों ही अवस्थाओंमें है। परन्तु इतना विशेष है कि जितना भी इन्द्रियोंसे ज्ञान होता है वह सब वैभाविक है।


अस्ति तत्र क्षतिर्नूनं नाक्षतिर्वास्तवादपि ।
जीवस्यातीवदुःखित्वात् सुखस्योन्मूलनादपि ॥955॥

अर्थ: जीवकी विकृत अवस्थामें वास्तवमें हानि है । विकृत अवस्थासे जीवकी वास्तवमें कुछ हानि न हो ऐसा नहीं है । क्योंकि विकृतावस्थामें जीवको अत्यन्त दुःख होता है और इसका स्वाभाविक सुख गुण नष्ट हो जाता है ।


अपि द्रव्यनयादेशाट्टंकोत्कीर्णोस्ति प्राणभृत् ।
नात्मसुखे स्थितः कश्चित् प्रत्युतातीव दुःखवान् ॥956॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्यार्थिक नयसे यह जीव टांकीसे उकेरे हुए पत्थरके समान सदा शुद्ध है तथापि पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे कोई संसारी जीव अपने सुखमें स्थित नहीं है किन्तु उल्टा अत्यन्त दुःखी है ।


नाङ्गीकर्तव्यमेवैतत् स्वस्वरूपे स्थितोस्ति ना ।
बद्धो वा स्यादबद्धो वा निर्विशेषाद्यथा मणिः ॥957॥

अर्थ: जिस प्रकार मणि मिली हुई ( कीचड़ आदिमें ) अवस्थामें भी शुद्ध है और भिन्न अवस्थामें भी शुद्ध है । उसी प्रकार यह मनुष्य भी चाहे कर्मोंसे बँधा हुआ हो चाहे मुक्त हो सदा अपने स्वरूपमें स्थित है ऐसा भी नहीं मानना चाहिये ।


यतश्चैवं स्थिते जन्तोः पक्षः स्याद् बाधितो बलात् ।
संसृतिर्वा विमुक्तिर्वा न स्याद्वा स्यादभेदसात् ॥958॥

अर्थ: क्योंकि जीवको यदि सदा शुद्ध माना जाय तो वह मानना न्यायबलसे बाधित है। जीवको सदा शुद्ध माननेसे न तो संसार ही सिद्ध हो सक्ता है, और न मोक्ष ही सिद्ध हो सक्ती है । अथवा दोनोंमें अभेद ही सिद्ध होगा ।


स्वस्वरूपे स्थितो ना चेत् संसारः स्यात्कुतो नयात् ।
हटाद्वा मन्यमानेस्मिन्ननिष्टत्वमहेतुकम् ॥959॥

अर्थ: यदि मनुष्य सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहे अर्थात् सदा शुद्ध ही बना रहे तो संसार किस नयसे हो सक्ता है ? यदि जीवको हट पूर्वक ही विना किसी हेतुके शुद्ध माना जाय तो अनिष्टताका प्रसंग आता है । उसे ही दिखाते हैं -


जीवश्चेत्सर्वतः शुद्धो मोक्षादेशो निरर्थकः ।
नेष्टमिष्टत्वमत्रापि तदर्थं वा वृथा श्रमः ॥960॥

अर्थ: यदि जीव सदा शुद्ध है तो फिर मोक्षका आदेश ( निरूपण ) व्यर्थ है । और यह बात इष्ट नहीं है । क्यों इष्ट नहीं है इसका उत्तर यही है कि मोक्षके लिये जो श्रम किया जाता है वह सब व्यर्थ होगा ।


सर्वं विप्लवतेप्येवं न प्रमाणं न तत्फलम् ।
साधनं साध्यभावश्च न स्याद्वा कारकक्रिया ॥961॥

अर्थ: जब मोक्ष व्यवस्था और उसका उपाय ही निरर्थक है, तब न प्रमाण बनता है, न उपका फल बनता है, न साधन बनता है न साध्य बनता है, न कारण बनता है और न क्रिया ही बनती है, सभीका विप्लव ( लोप ) हो जाता है ।


सिद्धमेतावताप्येवं वैकृता भावसन्ततिः ।
अस्ति संसारिजीवानां दुःखमूर्तिर्दुरुत्तरी ॥962॥

अर्थ: उपर्युक्त कथनसे यह बात भलीभांति सिद्ध हो चुकी कि संसारी जीवोंके भावोंकी सन्तति विकृत है, दुःखकी मूर्ति है, और खोटे फलवाली है ।


ननु वैभाविका भावाः कियन्तः सन्ति कीदृशाः ।
किं नामानः कथं ज्ञेया ब्रूहि मे वदतां वर ॥963॥

अर्थ: वैभाविक भाव कितने हैं, वे कैसे हैं, किस नामसे पुकारे जाते हैं, और कैसे जाने जाते हैं ? हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ ! मुझे सब समझाओ ।


श्रृणु साधो महाप्राज्ञ ! वच्म्यहं यत्तवेप्सितं ।
प्रायो जैनागमाभ्यासात् किञ्चित्स्वानुभवादपि ॥964॥

अर्थ: शङ्काकारको सम्बोधन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं-हे साधो ! हे महा विद्वान्! जो तुम्हें अभीष्ट है उसे मैं कहता हूँ, प्रायः सब कथन मैं जैन शास्त्रोंके अभ्याससे ही करूंगा, कुछ २ स्वानुभवसे भी कहूंगा । तुम सुनो ।


लोकासंख्यातमात्राः स्युर्भावाः सूत्रार्थविस्तरात् ।
तेषां जातिविवक्षायां भावाः पञ्च यथोदिताः ॥965॥

अर्थ: सूत्रोंके अर्थके विस्तारसे जीवके भाव असंख्यातलोक प्रमाण हैं। तथा उन भावोंकी जातियोंकी अपेक्षासे पांच भाव कहे गये हैं।


तत्रौपशमिको नाम भावः स्यात्क्षायिकोपि च ।
क्षायोपशमिकश्चेति भावोप्यौदयिकोस्ति नुः ॥966॥

अर्थ: औपशमिकभाव, क्षायिकभाव, क्षायोपशमिकभाव, औदयिकभाव और पारिणामिकभाव ये मनुष्य ( जीव ) के पांच भाव क्रमसे कहे गये हैं। इनके त्रेपन उत्तरभेद भी कहे गये हैं।


पारिणामिकभावः स्यात् पञ्चेत्युद्देशिताः क्रमात् ।
तेषामुत्तरभेदाश्च त्रिपञ्चाशादितीरिताः ॥967॥

अर्थ: औपशमिकभाव, क्षायिकभाव, क्षायोपशमिकभाव, औदयिकभाव और पारिणामिकभाव ये मनुष्य ( जीव ) के पांच भाव क्रमसे कहे गये हैं। इनके त्रेपन उत्तरभेद भी कहे गये हैं।


कर्मणां प्रत्यनीकानां पाकस्योपशमात् स्वतः ।
यो भावः प्राणिनां स स्यादौपशमिकसंज्ञकः ॥968॥

अर्थ: विपक्षी कर्मोंके पाकका स्वयं उपशम होनेसे जो प्राणियोंका भाव होता है उसीका नाम औपशमिक भाव है ।


यथास्वं प्रत्यनीकानां कर्मणां सर्वतः क्षयात् ।
जातो यः क्षायिको भावः शुद्धः स्वाभाविकोऽस्य सः ॥969॥

अर्थ: विपक्षी कर्मोंका सर्वथा क्षय होनेसे जो आत्माका भाव होता है उसे क्षायिक भाव कहते हैं । यह क्षायिक भाव आत्माका शुद्ध भाव है, और उमका स्वाभाविक भाव है ।


यो भावः सर्वतो घातिस्पर्धकानुदयोद्भवः ।
क्षायोपशमिकः स स्यादुदयादेशघातिनाम् ॥970॥

अर्थ: सर्वघाति स्पर्धकोंका अनुदय होने पर और देशघातिस्पर्धकोंका उदय होने पर जो आत्माका भाव होता है उसे ही क्षायोपशमिक भाव कहते हैं।


कर्मणामुदयाद्यः स्याद्भावो जीवस्य संसृतौ ।
नाम्नाप्यौदयिकाऽन्वर्थात्परं वन्धाधिकारवान् ॥971॥

अर्थ: संसारी जीवके कर्मोंके उदयसे जो भांव होता है वही औदयिक नामसे कहा जाता है और वही यथार्थ नामधारी है, तथा कर्मबन्ध करनेका वही अधिकारी है ।


कृत्स्नकर्मनिरपेक्षः प्रोक्तावस्थाचतुष्टयात् ।
आत्मद्रव्यत्वमात्रात्मा भावः स्यात्पारिणामिकः ॥972॥

अर्थ: कर्मोंके उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशमसे सर्वथा निरपेक्ष जो आत्माका स्वाभाविक भाव है उसे ही पारिणामिक भाव कहते हैं ।


इत्युक्तं लेशतस्तेषां भावानां लक्षणं पृथक् ।
इतः प्रत्येकमेतेषां व्यासात्तद्रूपमुच्यते ॥973॥

अर्थ: इस प्रकार उन भावोंका लेशमात्र लक्षण भिन्न २ कहा गया। अब उनमेंसे प्रत्येक भावका स्वरूप विस्तार पूर्वक कहा जाता है।


भेदाश्चौदयिकस्यास्य सूत्रार्थादेकविंशति ।
चतस्रो गतयो नाम चत्वारश्च कषायकाः ॥974॥

अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं । वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अब कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा ।


त्रीणि लिङ्गानि मिथ्यात्वमेकं चाज्ञानमात्रकम् ।
एकम्वाऽसंयतत्वं स्यादेकमेकास्त्यसिद्धता ॥975॥

अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं। वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अव कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा।


लेश्याः षडेव कृष्णाद्या क्रमादुद्देशिता इति ।
तत्स्वरूपं प्रवक्ष्यामि नाल्पं नातीव विस्तरम् ॥976॥

अर्थ: सूत्रोंके आशयसे औदयिक भावके इक्कीस भेद हैं । वे इस प्रकार हैं - गति ४, कषाय ४, लिङ्ग ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयतत्व १, असिद्ध १, कृष्णादिलेश्या ६ ये क्रमसे इक्कीस भाव हैं, इनका स्वरूप अव कहते हैं, वह नतो अधिक संक्षिप्त ही होगा और न अधिक विस्तृत ही होगा ।


गतिनामास्ति कर्मैकं विख्यातं नामकर्मणि ।
चतस्रो गतयो यस्मात्तच्चतुर्धाधिगीयते ॥977॥

अर्थ: नाम कर्मके भेदोंमें प्रसिद्ध एक गति नामा कर्म भी है। गतियां चार हैं इस लिये वह गति कर्म भी चार प्रकारका कहा जाता है।


कर्मणोस्य विपाकाद्वा दैवादन्यतमं वपुः ।
प्राप्य तत्रोचितान्भावान् करोत्यात्मोदयात्मनः ॥978॥

अर्थ: इस गतिकर्मके विपाक होनेसे यह आत्मा अपने ही उदयवश देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक इन चार गतियोंमेंसे किसी एकको प्राप्त होकर उसके उचित भावोंको करता है। अर्थात् जिस गतिमें पहुंचता है वहांकी द्रव्य क्षेत्र काल भाव सामग्रीके अनुसार ही अपने भावोंको बनाता है।


यथा तिर्यगवस्थायां तद्वया भावसन्ततिः ।
तत्रावश्यं च नान्यत्र तत्पर्यायानुसारिणी ॥979॥

अर्थ: जिस प्रकार तिर्यञ्च अवस्थामें जो उसके योग्य भावसन्तति है बह उस पर्यायके अनुसार वहां अवश्य होती है, तिर्यञ्च अवस्थाके योग्य जो भाव सन्तति है बह वहीं पर होती है अन्यत्र नहीं होती ।


एवं दैवेऽथ मानुष्ये नारके वपुषि स्फुटम् ।
आत्मीयात्मीयभावाश्च सन्त्यसाधारणा इव ॥980॥

अर्थ: इसी प्रकार देवगति, मनुष्यगति, नरकगतिमें भी अपनी २ गतिके योग्य भाव होते हैं । वे ऐसे ही होते हैं जैसे असाधारण हों ।


ननु देवादिपर्यायो नामकर्मोदयात्परम् ।
तत्कथं जीवभावस्य हेतुः स्याद्घातिकर्मवत् ॥981॥

अर्थ: देवादिक गतियां केवल नामकर्मके उदयसे होती हैं। जब ऐसा सिद्धान्त है तब क्या कारण है कि नाम ( देवादिगतियां ) कर्म घातिया कर्मोंके समान जीवके भावोंका हेतु समझा जाय ?


सत्यं तन्नामकर्मापि लक्षणाच्चित्रकारवत् ।
नूनं तद्देहमात्रादि निर्मापयति चित्रवत् ॥982॥

अर्थ: जिस प्रकार चित्रकार अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार नाम कर्म भी नियमसे शरीरादिकी रचना करता है, साथ ही वहां पर मोहनीय कर्मका निरन्तर उदय रहता है, इसी लिये उस देह क्रियाके आकार औदयिक भाव होता है ।


अस्ति तत्रापि मोहस्य नैरन्तर्योदयोञ्जसा ।
तस्मादौदयिको भावः स्यात्तद्देहक्रियाकृतिः ॥983॥

अर्थ: जिस प्रकार चित्रकार अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार नाम कर्म भी नियमसे शरीरादिकी रचना करता है, साथ ही वहां पर मोहनीय कर्मका निरन्तर उदय रहता है, इसी लिये उस देह क्रियाके आकार औदयिक भाव होता है ।


ननु मोहोदयो नूनं स्वायत्तोस्त्येकधारया ।
तत्तद्वपुः क्रियाकारो नियतोऽयं कुतो नयात् ॥984॥

अर्थ: मोहनीय कर्मका उदय अनर्गल रीतिसे अपने ही अधीन है। वह फिर भिन्न भिन्न शरीरोंकी क्रियाओंके आकार किस नयसे नियत है ? अर्थात् भिन्न २ शरीरानुसार मोहनीय कर्म क्यों फल देता है ?


नैवं यतोनभिज्ञोसि मोहस्योदयवैभवे ।
तत्रापि बुद्धिपूर्वं चाऽबुद्धिपूर्वं स्वलक्षणात् ॥985॥

अर्थ: शंकाकारका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है । शङ्काकारसे आचार्य कहते हैं कि मोहनीय कर्मका उदय वैभव कितना बढ़ा हुआ है, और वह अपने लक्षणके अनुसार बुद्धिपूर्वक अबुद्धिपूर्वक आदि भेदोंमें बँटा हुआ है इस विषयमें तुम सर्वथा अजान हो ।


मोहनान्मोहकर्मैकं तद्द्विधा वस्तुतः पृथक् ।
दृङ्मोहश्चात्र चारित्रमोहश्चेति द्विधा स्मृतः ॥986॥

अर्थ: मूर्छित करनेसे सामान्य रीतिसे मोहकर्म एक प्रकार है । और वही दर्शनमोह और चारित्रमोहकी अपेक्षासे वास्तवमें दो प्रकार भी है ।


एकधा त्रिविधा वा स्यात् कर्ममिथ्यात्वसञ्ज्ञकम् ।
क्रोधाद्याद्यचतुष्कञ्च, सप्तैते दृष्टिमोहनम् ॥987॥

अर्थ: दर्शन मोहनीय कर्म भी सामान्य रीतिसे मिथ्यात्वरूप एक प्रकार है, विशेष रीतिसे मिथ्यात्व, सम्यङ्मिथ्यात्व, सम्यक्प्रकृतिमिथ्यात्व, भेदोंसे तीन प्रकार है, और अनन्तानुबन्धि क्रोध, मान, माया, लोभ चार भेद प्रथम कषायके हैं । इस प्रकार ये सात भेद दर्शनमोहनीयके हैं ।


दृङ्मोहस्योदयादस्य मिथ्याभावोस्ति जन्मिनः ।
स स्यादौदयिको नूनं दुर्वारो दृष्टिघातकः ॥988॥

अर्थ: इस जीवके दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यारूप परिणाम होता है । वह मिथ्याभाव ही औदयिक भाव है और वही सम्यग्दर्शनका घात करनेवाला है । यह भाव आत्मासे कठिनतासे दूर होता है । जीवके शुद्ध सम्यग्दर्शन गुणको विपरीत स्वादु कर देना इस दर्शन मोहनीय कर्मका स्वभाव है । अर्थात् सम्यग्दर्शन गुणको मिथ्यादर्शन रूप करदेना दर्शन मोहनीय कर्मका कार्य है ।


अस्ति प्रकृतिरस्यापि दृष्टिमोहस्य कर्मणः ।
शुद्धं जीवस्य सम्यक्त्वं गुणं नयति विक्रियाम् ॥989॥

अर्थ: इस जीवके दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यारूप परिणाम होता है । वह मिथ्याभाव ही औदयिक भाव है और वही सम्यग्दर्शनका घात करनेवाला है । यह भाव आत्मासे कठिनतासे दूर होता है । जीवके शुद्ध सम्यग्दर्शन गुणको विपरीत स्वादु कर देना इस दर्शन मोहनीय कर्मका स्वभाव है । अर्थात् सम्यग्दर्शन गुणको मिथ्यादर्शन रूप करदेना दर्शन मोहनीय कर्मका कार्य है ।


यथा मद्यादिपानस्य पाकाद् बुद्धिर्विमुह्यति ।
श्वेतं शंखादि यद्वस्तु पीतं पश्यति विभ्रमात् ॥990॥

अर्थ: जिस प्रकार मदिरा पीनेवाले पुरुषकी बुद्धि मादिराका नशा चढ़नेपर भ्रष्ट होजाती है। वह पुरुष शंखादि सफेद पदार्थोंको भी विभ्रमसे पीलेही देखता है - समझता है।


तथा दर्शनमोहस्य कर्मणोस्तूदयादिह ।
अपि यावदनात्मीयमात्मीयमनुते कुदृक् ॥991॥

अर्थ: उसी प्रकार दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि पुरुष इस संसारमें जो आत्मासे भिन्न पदार्थ हैं उन्हें भी अपने ( आत्माके ) मानता है, अर्थात् मिथ्यादृष्टि भिन्न पदार्थोंमें आत्मीयत्व बुद्धि करता है ।


चापि लुम्पति सम्यक्त्वं दृङ्मोहस्योदयो यथा ।
निरुणद्ध्यात्मनो ज्ञानं ज्ञानस्यावरणोदयः ॥992॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्शन मोहनीय कर्मका उदय सम्यग्दर्शन गुणका लोप कर देता है, उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्मका उदय भी आत्माके ज्ञान गुणको ढक देता है।


यथा ज्ञानस्य निर्णाशो ज्ञानस्यावरणोदयात् ।
तथा दर्शननिर्णाशो दर्शनावरणोदयात् ॥993॥

अर्थ: जिस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके उदयसे ज्ञानका नाश होजाता है उसी प्रकार दर्शनावरण कर्मके उदयसे दर्शनका नाश होजाता है ।


यथा धाराधराकारैः गुण्ठितस्यांशुमालिनः ।
नाविर्भावः प्रकाशस्य द्रव्यादेशात् स्वतोपि वा ॥994॥

अर्थ: यद्यपि द्रव्यदृष्टिसे सूर्यका प्रकाश दा सूर्यके साथ है उसका कभी अभाव नहीं हो सक्ता है तथापि मेघोंसे आच्छादित होनेपर सूर्यका प्रकाश छिप अवश्य जाता है।


यत्पुनर्ज्ञानमज्ञानमस्ति रूढिवशादिह ।
तन्नौदयिकमस्त्यस्ति क्षायोपशमिकं किल ॥995॥

अर्थ: जो ज्ञान ही रूढिवश अज्ञान कहा जाता है वह औदयिक नहीं है किन्तु निश्चयसे क्षायोपशमिक है ।


अथास्ति केवलज्ञानं यत्तदावरणावृतम् ।
स्वापूर्वार्थान् परिच्छेतुं नालं मूर्छितजन्तुवत् ॥996॥

अर्थ: ज्ञानावरण कर्मोंमें एक केवल ज्ञानावरण कर्म भी है, वह केवलज्ञानावरण कर्म आत्माके स्वाभाविक केवलज्ञान गुणको ढक लेता है। आवरणसे ढक जानेपर वह ज्ञान मूर्छित पुरुषकी तरह अपने स्वरूप और अनिश्चित पदार्थोंको जाननेके लिये समर्थ नहीं रहता है।


यद्वा स्यादवधिज्ञानं ज्ञानं वा स्वान्तपर्ययम् ।
नार्थक्रियासमर्थं स्यात्तत्तदावरणावृतम् ॥997॥

अर्थ: अथवा अवधिज्ञान वा मनःपर्ययज्ञान ये भी अपने २ आवरकसे जब आवृत होते हैं अर्थात् ढके जाते हैं तब अर्थक्रिया करनेमें अर्थात् पदार्थोंके जाननेमें समर्थ नहीं रहते हैं।


मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं तत्तदावरणावृतम् ।
यद्यावतोदयांशेन स्थितं तावदपन्हुतम् ॥998॥

अर्थ: इसी प्रकार मतिज्ञान और श्रुतज्ञान भी अपने २ आवरणसे आच्छादित होते हैं, और उनके आवरक कर्मका जितने अंशोंमें उदय रहता है उतने ही अंशोंमें ज्ञान भी तिरोभूत ( ढका हुआ ) रहता है ।


यत्पुनः केवलज्ञानं व्यक्तं सर्वार्थभासकम् ।
स एव क्षायिको भावः कृत्स्नस्वावरणक्षयात् ॥999॥

अर्थ: जो केवलज्ञान है वह प्रकटरीतिसे सम्पूर्ण पदार्थोंका मकाशक है वह अपने सम्पूर्ण आवरणोंके क्षय होनेसे होता है इसलिये वही क्षायिक भाव है ।


कर्माण्यष्टौ प्रसिद्धानि मूलमात्रतया पृथक्
अष्टचत्वारिंशच्छतं कर्माण्युत्तरसंज्ञया ॥1000॥

अर्थ: कर्मोंके मूल भेद आठ प्रसिद्ध हैं और उनके उत्तर भेद एकसौ अड़तालीस हैं।

उत्तरार्द्ध 1001 से 1100 (श्लोक 1001 से 1100)

उत्तरोत्तरभेदैश्च लोकासंख्यातमात्रकम् ॥
शक्तितोऽनन्तसंज्ञं च सर्वकर्मकदम्बकम् ॥1001॥

अर्थ: ये ही कर्म उत्तरोत्तर भेदोंसे असंख्यात लोक प्रमाण हैं, और सर्व कर्म समूह शक्तिकी अपेक्षासे अनन्त भी हैं।


तत्र घातीनि चत्वारि कर्माण्यन्वर्थसंज्ञया ।
घातकत्वाद्गुणानां हि जीवस्यैवेति वाक्स्मृतिः ॥1002॥

अर्थ: उन मूल कर्मोंमें चार घातिया कर्म हैं, और घातिया संज्ञा उनके लिये अर्थानुकूल ही है, क्योंकि जीवके गुणोंका वे कर्म घात करनेवाले हैं ऐसा सिद्धान्त है।


ततः शेषचतुष्कं स्यात् कर्माघाति विवक्षया ।
गुणानां घातका भावशक्तेरप्यात्मशक्तिमत् ॥1003॥

अर्थ: घातिया कर्मोंसे बचे हुए बाकीके चार कर्म अघातिया कहलाते हैं। ये कर्म गुणोंके घात करनेकी शक्ति नहीं रखते हैं तौ भी विवक्षावश अपनी कर्मत्व, शक्ति रखते ही हैं।


एवमर्थवशान्नूनं सन्त्यनेके गुणाश्रितः ।
गत्यन्तरात्स्यात्कर्मत्वं चेतनावरणं किल ॥1004॥

अर्थ: इस प्रकार प्रयोजनवश आत्माके अनेक गुण कल्पना किये जा सकते हैं अर्थात् यदि कर्मोंके मूल भेद आठ ही रक्खे जायें तो आत्मामें आठ कर्मोंसे आच्छादित सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन वीर्य सूक्ष्म अवगाहन अगुरुलघु अव्याबाध ये आठ गुण कल्पना किये जाते हैं। यदि कर्मोंके एकसौ अड़तालीस या उससे भी अधिक भेदोंकी अपेक्षा की जाय तो कर्मोंके भेदानुसार आत्माके अधिक गुण कल्पना किये जाते हैं जैसे कि ज्ञानावरणके पांच भेद होनेसे ज्ञानके भी मतिज्ञान श्रुतज्ञान आदि पांच भेद मान लिये जाते हैं इसी प्रकार आत्मगुणोंकी हीनाधिक कल्पनासे कर्मोंमें भी हीनाधिकता मानी जाती है। जैसे यदि चेतना गुणके ज्ञान दर्शन इन दो भेदोंकी पृथक् पृथक् कल्पना न करके केवल चेतना गुणकी ही अपेक्षा की जाय तो उस गुणका प्रतिपक्षी कर्म भी चेतनावरण एक ही माना जायगा और फिर ज्ञानावरण दर्शनावरणको अलग अलग माननेकी आवश्यकता न होगी।


दर्शनावरणेप्येष क्रमो ज्ञेयोस्ति कर्मणि ।
आवृतेरविशेषाद्वा चिद्गुणस्यानतिक्रमात् ॥1005॥

अर्थ: यही क्रम दर्शनावरण कर्ममें भी जानना चाहिये जिस प्रकार चेतना आत्माका गुण है और उसको आवरण करनेवाला कर्म चेतनावरण कहलाता है उसी प्रकार दर्शन भी आत्माका गुण है और उसको आवरण करनेवाला कर्म भी दर्शनावरण कहलाता है ।


एवं च सति सम्यक्त्वे गुणे जीवस्य सर्वतः
तं मोहयति यत्कर्म दृङ्मोहाख्यं तदुच्यते ॥1006॥

अर्थ: ज्ञान, दर्शनके समान आत्माका सम्यग्दर्शन गुण भी है, और उस सम्यग्दर्शन गुणको मूर्छित करनेवाला कर्म भी दर्शनमोहनीय कहलाता है।


नैतत्कर्मापि तत्तुल्यमन्तर्भावीति न क्वचित् ।
तद्द्वयावरणादेतदस्ति जात्यन्तरं यतः ॥1007॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरणके समान यह कर्म भी कहींपर अन्तर्भूत नहीं हो सक्ता है क्योंकि ज्ञानावरण, दर्शनावरणसे यह सर्वथा जुदा है इसलिये तीसरा ही कर्म इसे मानना चाहिये ।


ततः सिद्धं यथा ज्ञानं जीवस्यैको गुणः स्वतः ।
सम्यक्त्वं च तथा नाम जीवस्यैको गुणः स्वतः ॥1008॥

अर्थ: इसलिये यह बात सिद्ध हो चुकी कि जिस प्रकार जीवका एक स्वतःसिद्ध ज्ञान गुण है उसी प्रकार जीवका स्वतःसिद्ध एक सम्यग्दर्शन भी गुण है ।


पृथगुद्देश एवास्य पृथक् लक्ष्यं च लक्षणम् ।
पृथग्दृङ्मोहकर्म स्यादन्तर्भावः कुतो नयात् ॥1009॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनका भिन्न स्वरूप है, भिन्न ही लक्ष्य है, भिन्न ही लक्षण है, और भिन्न ही दर्शनमोहनीय कर्म है फिर किस नयसे इस कर्मका कहीं पर अन्तर्भाव ( गर्भितपना ) हो सक्ता है ? अर्थात् कहीं पर नहीं हो सक्ता ।


एवं जीवस्य चारित्रं गुणोस्त्येकः प्रमाणसात् ।
तन्मोहयति यत्कर्म तत्स्याचारित्रमोहनम् ॥1010॥

अर्थ: इसी प्रकार जीवका एक प्रमाणसिद्ध गुण चारित्र भी है, उस चारित्र गुणको जो कर्म मूर्छित करता है उसीको चारित्रमोहनीय कहते हैं।


अस्ति जीवस्य वीर्याख्यो गुणोस्त्येकस्तदादिवत्
तदन्तरयतीहेदमन्तरायं हि कर्म तत् ॥1011॥

अर्थ: पहले गुणोंके समान जीवका एक वीर्य नामक भी गुण है, उस वीर्य गुणमें जो अन्तर डालता है उसे ही अन्तराय कर्म कहते हैं ।


एतावदत्र तात्पर्यं यथा ज्ञानं गुणश्चितः ।
तथाऽनन्ता गुणा ज्ञेया युक्तिस्वानुभवागमात् ॥1012॥

अर्थ: यहांपर इतना ही तात्पर्य है कि जिस प्रकार आत्माका ज्ञान गुण है उसी प्रकार अनन्त गुण हैं। ये सभी गुण युक्ति, स्वानुभव और आगमसे सिद्ध हैं।


न गुणः कोपि कस्यापि गुणस्यान्तर्भवः क्वचित् ।
नाधारोपि च नाधेयो हेतुर्नापीह हेतुमान् ॥1013॥

अर्थ: कोई भी गुण कभी किसी दूसरे गुणमें अन्तर्भूत नहीं हो सक्ता है अर्थात् दूसरे गुणमें मिल नहीं जाता है, और न एक गुण दूसरे गुणका आधार ही है और न आधेय ही है, न हेतु ही है और न हेतुमान् (साध्य) ही है ।


किन्तु सर्वोपि स्वात्मीयः स्वात्मीयः शक्तियोगतः ।
नानारूपा ह्यनेकेपि सता सम्मिलिता मिथः ॥1014॥

अर्थ: किन्तु सभी गुण अपनी अपनी भिन्न २ शक्तिके धारण करनेसे भिन्न भिन्न अनेक हैं, और वे सब परस्पर पदार्थके साथ तादात्म्य रूपसे मिले हुए हैं।


गुणानां चाप्यनन्तत्वे वाग्व्यवहारगौरवात् ।
गुणाः केचित् समुद्दिष्टाः प्रसिद्धाः पूर्वसूरिभिः ॥1015॥

अर्थ: गुण अनन्त हैं, सब कहे नहीं जा सक्ते हैं । उनमेंसे कुछ अधिक भी यदि कहे जायं तो भी वचन गौरव होता है इसलिये पूर्वाचार्योंने उनमेंसे प्रसिद्ध कुछ गुणोंका निरूपण किया है ।


यत्पुनः क्वचित् कस्यापि सीमाज्ञानमनेकधा ।
मनःपर्ययज्ञानं वा तद्द्वयं भावयेत् समम् ॥1016॥

अर्थ: जो कहीं किसीके अवधिज्ञान होता है वह भी अनेक प्रकार है, इसी प्रकार मनःपर्यय ज्ञान भी अनेक प्रकार है, इन दोनोंको समान ही समझना चाहिये। दोनोंही अपने २ आवरण कर्मका क्षयोपशम होनेसे होते हैं और कभी २ यथायोग्य भावोंके अनुसार उनकी दूसरी भी गति होती है।


तत्तदावरणस्योच्चैः क्षायोपशमिकत्वतः ॥
स्याद्यथालक्षिताद्भावात्स्यादत्राप्यपरा गतिः ॥1017॥

अर्थ: जो कहीं किसीके अवधिज्ञान होता है वह भी अनेक प्रकार है, इसी प्रकार मनःपर्यय ज्ञान भी अनेक प्रकार है, इन दोनोंको समान ही समझना चाहिये । दोनोंही अपने २ आवरण कर्मका क्षयोपशम होनेसे होते हैं और कभी २ यथायोग्य भावोंके अनुसार उनकी दूसरी भी गति होती है ।


मतिज्ञानं श्रुतज्ञानमेतन्मात्रं सदातनम् ।
स्याद्वा तरतमैर्भावैर्यथा हेतूपलब्धिसात् ॥1018॥

अर्थ: मतिज्ञान और श्रुनज्ञान ये दोनों तो इस जीवके संसारावस्थामें सदा ही रहते हैं, इतना विशेष है कि जैसा निमित्त कारण मिल जाता है वैसे ही इन ज्ञानोंमें भी तरतम भाव होता रहता है ।


ज्ञानं यद्यावदर्थानामस्ति ग्राहकशक्तिमत् ।
क्षायोपशमिकं तावदस्ति नौदयिकं भवेत् ॥1019॥

अर्थ: पदार्थोंके ग्रहण करनेकी शक्ति रखनेवाला जितना भी ज्ञान है वह सब क्षायोपशमिक ज्ञान है, औदयिक नहीं है ।


अस्ति द्वेधावधिज्ञानं हेतोः कुतश्चिदन्तरात् ।
ज्ञानं स्यात्सम्यगवधिरज्ञानं कुत्सितोऽवधिः ॥1020॥

अर्थ: किसी कारणवश अवधिज्ञानके दो भेद हो जाते हैं । सम्यक् अवधिको ज्ञान कहते हैं तथा मिथ्या-अवधिको अंज्ञान कहते हैं ।


अस्ति द्वेधा मतिज्ञानं श्रुतज्ञानं च स्याद्द्विधा ।
सम्यङ् मिथ्याविशेषाभ्यां ज्ञानमज्ञानमित्यपि ॥1021॥

अर्थ: मतिज्ञान भी दो प्रकार है और श्रुतज्ञान भी दो प्रकार है, एक ज्ञान एक अज्ञान । सम्यग्ज्ञानको ज्ञान कहते हैं, और मिथ्याज्ञानको अज्ञान कहते हैं ।


त्रिषु ज्ञानेषु चैतेषु यत्स्यादज्ञानमर्थतः ।
क्षायोपशमिकं तत्स्यान्नस्यादौदयिकं क्वचित् ॥1022॥

अर्थ: इन तीनों ज्ञानोंमें अर्थात् कुमति, कुश्रुत, कुअवधिमें जो अज्ञान है वह वास्तवमें क्षायोपशमिक ज्ञान है वह अज्ञान कहीं औदयिक नहीं है ।


अस्ति यत्पुनरज्ञानमर्थादौदयिकं स्मृतम् ।
तदस्ति शून्यतारूपं यथा निश्चेतनं वपुः ॥1023॥

अर्थ: जो अज्ञानभाव औदयिक भावोंमें कहा गया है वह शून्यतारूप है, जैसे कि चेतनके निकल जानेपर शरीर रह जाता है ।


एतावतास्ति यो भावो दृङ्मोहस्योदयादपि ।
पाकाचारित्रमोहस्य सर्वोप्यौदयिकः स हि ॥1024॥

अर्थ: इस कथनसे यह बात भी सिद्ध हुई कि जो भाव दर्शन मोहनीयके उदयसे होता है और जो भाव चारित्र मोहनीयके उदयसे होता है वह सभी औदयिक है।


न्यायादप्येवमन्येषां मोहादिघातिकर्मणाम् ।
यावाँस्तत्रोदयाज्जातो भावोस्त्यौदयिकोऽखिलः ॥1025॥

अर्थ: इसी प्रकार और भी मोहको आदि लेकर जितने घातिया कर्म हैं उन सबके उदयसे जो आत्माका भाव होता है वह सब भी न्यायानुसार औदयिक भाव है ।


तत्राप्यस्ति विवेकोऽयं श्रेयानत्रोदितो यथा ।
वैकृतो मोहजो भावः शेषः सर्वोपि लौकिकः ॥1026॥

अर्थ: ऊपर कहे हुए कथनमें इतना समझ लेना और अच्छा है कि घातिया कर्मोंमें मोहनीय कर्मके उदयसे जो भाव होता है वही वैकृत (वैभाविक) भाव है। बाकीके सभी कर्मोंके उदयसे जो भाव होता है वह लौकिक है।


स यथाऽनादिसन्तानात् कर्मणोऽच्छिन्नधारया ।
चारित्रस्य दृशश्च स्यान्मोहस्यास्त्युदयाचितः ॥1027॥

अर्थ: वह विकृत-मोहरूप भाव दर्शनमोहनीय तथा चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे होता है । इन दोनों कर्मोंका उदय बराबर अनादि सन्तति रूपसे संसारी जीवोंके हो रहा है । इन्ही दोनों कर्मोंके उदयसे आत्माकी जो विकारावस्था हो रही है उसे ही मोहरूप औदयिक भाव कहते हैं ।


तत्रोल्लेखो यथासूत्रं दृङ्मोहस्योदये सति ।
तत्त्वस्याऽप्रतिपत्तिर्वा मिथ्यापत्तिः शरीरिणाम् ॥1028॥

अर्थ: सूत्रानुसार उस दर्शनमोहनीयके विषयमें ऐसा उल्लेख (कथन) है कि दर्शनमोहनीय कर्मके उदय होनेपर जीवोंको तत्त्वकी प्रतीति (श्रद्धान) नहीं होती है अथवा मिथ्या प्रतीति होती है।


अर्थादात्मप्रदेशेषु कालुष्यं दृग्विपर्ययात् ।
तत्स्यात्परिणतिमात्रं मिथ्याजात्यनतिक्रमात् ॥1029॥

अर्थ: अर्थात् सम्यग्दर्शनकी विपरीत अवस्था हो जानेसे आत्माके प्रदेशोंमें कलुषता आ जाती है और वह कलुषता आत्माका मिथ्यात्वरूप परिणाम विशेष है ।


तत्र सामान्यमात्रत्वादस्ति वक्तुमशक्यता ।
ततस्तल्लक्षणं वच्मि संक्षेपाद्बुद्धिपूर्वकम् ॥1030॥

अर्थ: वह मिथ्यात्वरूप परिणाम सामान्य स्वरूपवाला है इसलिये उसके विषयमें कहा नहीं जासकता। अतएव बुद्धिपूर्वक उसका लक्षण संक्षेपसे कहते हैं।


निर्विशेषात्मके तत्र न स्याद्धेतोरसिद्धता ।
स्वसंवेदनसिद्धत्वाद्युक्तिस्वानुभवागमैः ॥1031॥

अर्थ: सामान्य अर्थात् अबुद्धिपूर्वक मिथ्यात्वकी किसी हेतुसे असिद्धि नहीं हो सकती है। क्योंकि अबुद्धिपूर्वक मिथ्यात्व स्वसंवेदन ज्ञानसे भलीभांति सिद्ध है। तथा युक्ति, अपने अनुभव और आगमसे भी सिद्ध है।


सर्वसंसारिजीवानां मिथ्याभावो निरन्तरम् ।
स्याद्विशेषोपयोगीह केषाञ्चित् संज्ञिनां मनः ॥1032॥

अर्थ: सम्पूर्ण संसारी जीवोंके निरन्तर मिथ्याभाव होरहा है, परन्तु किन्हीं संज्ञी जीवोंका मन उस मिथ्याभावकी ओर विशेष उपयोगवाला हो रहा है।


तेषां वा संज्ञिनां नूनमस्त्यनवस्थितं मनः ।
कदाचित् सोपयोगि स्यान्मिथ्याभावार्थभूमिषु ॥1033॥

अर्थ: अथवा उन संज्ञी जीवोंका मन चञ्चल रहता है इसलिये मिथ्याभाव पूर्वक पदार्थोंमें कमी २ उपयुक्त होता है।


ततो न्यायागतो जन्तोर्मिथ्याभावो निसर्गतः ।
दृङ्मोहस्योदयादेव वर्त्तते वा प्रवाहवत् ॥1034॥

अर्थ: इसलिये यह बात न्यायसंगत है कि इस जीवके दर्शनमोहनीय कर्मके उदयसे ही स्वयं मिथ्याभाव हो रहा है, और उसका प्रवाह अनादिकालसे अनन्तकाल तक चला जाता है।


कार्यं तदुदयस्योच्चैः प्रत्यक्षात्सिद्धमेव यत् ॥
स्वरूपानुपलब्धिः स्यादन्यथा कथमात्मनः ॥1035॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्मके उदयका कार्य प्रत्यक्षसे ही सिद्ध है कि आत्माके स्वरूप-की प्राप्ति नहीं होने पाती। यदि दर्शनमोहनीय कर्मका उदय न होता तो अवश्य ही आत्माके निज स्वरूपकी उपलब्धि हो जाती। इसलिये आत्माके स्वरूपको नष्ट करना ही दर्शनमोहनीय कर्मका कार्य है।


स्वरूपानुपलब्धौ तु बन्धः स्यात्कर्मणो महान् ।
अत्रैवं शक्तिमात्रं तु वेदितव्यं सुदृष्टिभिः ॥1036॥

अर्थ: आत्माके स्वरूपकी अनुपलब्धि होनेसे कर्मोंका तीव्र बन्ध होता है। इस प्रकार सम्यग्दृष्टियोंको जान लेना चाहिये कि दर्शनमोहनीय वर्ममें ऐसी शक्ति है।


प्रसिद्धैरपि भास्वद्भिरलं दृष्टान्तकोटिभिः
अत्रेत्थमेवमेवं स्यादलङ्घ्या वस्तुशक्तयः ॥1037॥

अर्थ: प्रसिद्ध तथा ज्वलन्त (पुष्ट)ऐसे करोड़ो दृष्टान्त भी यदि दिये जांय तो भी यही बात सिद्ध होगी कि मोहनीय कर्ममें इसी प्रकारकी शक्ति है, जिस वस्तुमें जो शक्ति है वह अनिवार्य है। मोहनीय कर्ममें आत्माके स्वरूपको नष्ट करनेकी शक्ति है, इस शक्तिको उस कर्मसे कोई दूर नहीं कर सक्ता है। क्यों कि भिन्न २ पदार्थोंकी भिन्न २ ही शक्तियां होती हैं और जो जिसका स्वभाव है वह अमिट है।


सर्वे जीवमया भावा दृष्टान्तो बन्धसाधकः ।
एकत्र व्यापकः कस्मादन्यत्राऽव्यापकः कथम् ॥1038॥

अर्थ: जब कि जीवोंके सभी भाव बंधके साधक हैं और इसमें दृष्टांत भी मिलता है, जैसे क्रोध मान मतिज्ञान आदि। फिर यह नियम जिसप्रकार अन्यभावोंमें व्याप्त होकर रहता है उसी प्रकार स्वरूपोपलब्धिमें क्यों नहीं व्याप्त होकर रहता ?


अथ तत्रापि केषाञ्चित् संज्ञिनां बुद्धिपूर्वकः ।
मिथ्याभावो गृहीताख्यो मिथ्यार्थाकृतिसंस्थितः ॥1039॥

अर्थ: किन्हीं २ संज्ञी जीवोंके बुद्धिपूर्वक-गृहीत मिथ्यात्व होता है, वह पदार्थोंमें मिथ्या भावको लिये हुए होता है ।


अर्थादेकविधः स स्याज्जातेरनतिक्रमादिह ।
लोकासंख्यातमात्रः स्यादालापापेक्षयापि च ॥1040॥

अर्थ: अर्थात् वह मिथ्याभाव जातिकी अपेक्षासे एक प्रकार है, अर्थात् मिथ्याभावोंके जितने भी भेद हैं उन सबोंमें मिथ्यात्व है इसलिये मिथ्यात्वकी अपेक्षासे तो कौनसा ही मिथ्या भाव क्यों न हो सब एक ही है, और आलाप (भेदों) की अपेक्षासे वह असंख्यात लोक प्रमाण है।


आलापोप्येकजातिर्यो नानारूपोप्यनेकधा ।
एकान्तो विपरीतश्च यथेत्यादिक्रमादिह ॥1041॥

अर्थ: जो एक जातिका आलाप (भेद) है वह भी अनेक रूपोंमें विभक्त होनेसे अनेक प्रकार है। जैसे - एकान्त मिथ्यात्व, विपरीत मिथ्यात्व इत्यादि।


अथवा शक्तितोऽनन्तो मिथ्याभावो निसर्गतः ।
यस्मादेकैकमालापं प्रत्यनन्ताश्च शक्तयः ॥1042॥

अर्थ: अथवा शक्तिकी अपेक्षासे वह मिथ्यात्व परिणाम स्वभावसे अनन्त प्रकार है क्योंकि एक एक आलापके प्रति अनन्त २ शक्तियां होती हैं ।


जघन्यमध्यमोत्कृष्टभावैर्वा परिणामिनः ।
शक्तिभेदात्क्षणं यावदुन्मज्जन्ति पुनः पृथक् ॥1043॥

अर्थ: उन कर्मोंकी जितनी भी शक्तियां हैं वे सब प्रतिक्षण परिणमनशील हैं, इसलिये वे यथायोग्य जघन्य, मध्यम तथा उत्कृष्ट भावों द्वारा परिणमन करती हुई भिन्न रूपसे प्रगट होती हैं । और बन्धरूप कार्य कर करके शीघ्र ही शान्त हो जाती हैं । उनके शान्त होते ही दूसरी शक्तियां अपने उदयानुसार प्रगट होजाती हैं । उन शक्तियोंका बन्ध करना ही एक कार्य है ।


कारुं कारुं स्वकार्यत्वाद्बन्धकार्यं पुनः क्षणात् ।
निमज्जन्ति पुनश्चान्ये प्रोन्मज्जन्ति यथोदयात् ॥1044॥

अर्थ: उन कर्मोंकी जितनी भी शक्तियां हैं वे सब प्रतिक्षण परिणमनशील हैं, इसलिये वे यथायोग्य जघन्य, मध्यम तथा उत्कृष्ट भावों द्वारा परिणमन करती हुई भिन्न रूपसे प्रगट होती हैं । और बन्धरूप कार्य कर करके शीघ्र ही शान्त हो जाती हैं । उनके शान्त होते ही दूसरी शक्तियां अपने उदयानुसार प्रगट होजाती हैं । उन शक्तियोंका बन्ध करना ही एक कार्य है ।


बुद्धिपूर्वकमिथ्यात्वं लक्षणाल्लक्षितं यथा ।
जीवादीनामश्रद्धानं श्रद्धानं वा विपर्ययात् ॥1045॥

अर्थ: बुद्धिपूर्वक मिथ्यात्वका जो लक्षण किया गया है वह इस प्रकार है - जीवादिक पदार्थोंका श्रद्धान नहीं करना, अथवा उनका उल्टा श्रद्धान करना।


सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः प्रागेवात्रापि दर्शिताः ।
नित्यं जिनोदितैर्वाक्यैर्ज्ञातुं शक्या न चान्यथा ॥1046॥

अर्थ: सूक्ष्म पदार्थ - परमाणु धर्मादि द्रव्य, अन्तरित पदार्थ - राम रावणादि, दूरवर्ती पदार्थ - सुमेरु अकृत्रिम चैत्यालय आदि। इसका वर्णन पहले भी आचुका है। ये पदार्थ जिनेन्द्र कथित - आगमसे ही जाने जा सक्ते हैं अन्यथा नहीं। इन पदार्थोंका स्याद्वाद पारंगत आचार्योंने अच्छी तरह शास्त्रोंमें विवेचन किया है परन्तु मिथ्यात्व कर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि पुरुष उनको नहीं स्वीकार करता है।


दर्शितेष्वेपि तेषूच्चैर्जैनैः स्याद्वादिभिः स्फुटम् ॥
न स्वीकरोति तानेव मिथ्याकर्मोदयादपि ॥1047॥

अर्थ: सूक्ष्म पदार्थ - परमाणु धर्मादि द्रव्य, अन्तरित पदार्थ - राम रावणादि, दूरवर्ती पदार्थ - सुमेरु अकृत्रिम चैत्यालय आदि। इसका वर्णन पहले भी आचुका है। ये पदार्थ जिनेन्द्र कथित - आगमसे ही जाने जा सक्ते हैं अन्यथा नहीं। इन पदार्थोंका स्याद्वाद पारंगत आचार्योंने अच्छी तरह शास्त्रोंमें विवेचन किया है परन्तु मिथ्यात्व कर्मके उदयसे मिथ्यादृष्टि पुरुष उनको नहीं स्वीकार करता है।


ज्ञानानन्दौ यथा स्यातां मुक्तात्मनो यदन्वयात् ।
विनाप्यक्षशरीरेभ्यः प्रोक्तमस्त्यस्ति वा न वा ॥1048॥

अर्थ: ज्ञान और सुख आत्माके गुण हैं इसलिये वे इन्द्रिय और शरीरके विना भी मुक्त जीवके निरन्तर रहते हैं, इसी विषयमें मिथ्यादृष्टि विचार करता है कि यह कहना ठीक है अथवा ठीक नहीं है ।


स्वतः सिद्धानि द्रव्याणि जीवादीनि किलेति षट् ।
प्रोक्तं जैनागमे यत्तत्स्याद्वा नेच्छेदनात्मवित् ॥1049॥

अर्थ: जैन शास्त्रोंमें स्वतः सिद्ध जीवादिक छह द्रव्य कहे गये हैं वे हो सक्ते हैं वा नहीं ! ऐसी भी आशंका वह आत्मस्वरूपको नहीं जाननेवाला-मिथ्यादृष्टि करता है ।


नित्यानित्यात्मकं तत्त्वमेकं चैकपदे च यत् ।
स्याद्वा नेति विरुद्धत्वात् संशयं कुरुते कुदृक् ॥1050॥

अर्थ: पदार्थ नित्यानित्यात्मक है, एक ही पदार्थमें नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म रहते हैं । इस विषयमें भी मिथ्या दृष्टि संशय करता है कि एक पदार्थमें नित्यत्व और अनित्यत्व दो धर्म रह सक्ते हैं या नहीं ! वह समझता है कि नित्यत्व और अनित्यत्व धर्म परस्पर विरोधी हैं इस लिये उनका एक पदार्थमें रहना अशक्य है ।


अप्यनात्मीयभावेषु यावन्नोकर्मकर्मसु ।
अहमात्मेति बुद्धिर्या दृङ्मोहस्य विजृम्भितम् ॥1051॥

अर्थ: कर्म-ज्ञानावरणादि, नो कर्म-शरीरादि जो आत्मासे भिन्न पदार्थ हैं उन पदार्थों में ९ मैं आत्मा हूँ, इस प्रकार जो बुद्धि होती है वह दर्शनमोहकी चेष्टा है।


अदेवे देवबुद्धिः स्यादगुरौ गुरुधीरिह ।
अधर्मे धर्मवज्ज्ञानं दृङ्मोहस्यानुशासनात् ॥1052॥

अर्थ: दर्शन मोहनीय कर्मके उदयसे यह जीव अदेवमें देवबुद्धि, अगुरुमें गुरुबुद्धि और अधर्ममें धर्मबुद्धि करता है।


धनधान्यसुताद्यर्थं मिथ्यादेवं दुराशयः ।
सेवते कुत्सितं कर्म कुर्याद्वा मोहशासनात् ॥1053॥

अर्थ: मोहनीय कर्मके वशीभूत होकर यह जीव अनेक खोटे २ आशयोंको हृदयमें रखकर धन धान्य पुत्र आदिकी प्राप्तिके लिये मिथ्या देवोंकी सेवा करता है । तथा नीच कर्म भी करता है ।


सिद्धमेतन्नु ते भावाः प्रोक्ता येऽपि गतिच्छलात् ।
अर्थादौदयिकास्तेपि मोहद्वैनोदयात्परम् ॥1054॥

अर्थ: यह बात सिद्ध हो गई कि गतिके बहानेसे जो भाव कहे गये हैं वे भी गति कर्मके साथ उदयमें आनेवाले मोहनीय कर्मके उदयसे औदयिक हैं।


यत्र कुत्रापि वान्यत्र रागांशो बुद्धिपूर्वकः ।
स स्याद्द्वैविध्यमोहस्य पाकाद्वान्यतमोदयात् ॥1055॥

अर्थ: जहां कहीं भी बुद्धिपूर्वक राग होता है वह दर्शनमोह और चारित्रमोहके पाकसे ही होता है अथवा दोनोंमेंसे किसी एकके पाकसे होता है।


एवमौदयिका भावाश्चत्वारो गतिसंश्रिताः ।
केवलं बन्धकर्तारो मोहकर्मोदयात्मकाः ॥1056॥

अर्थ: इस प्रकार गतिकर्मके आश्रयसे चार औदयिक भाव होते हैं। परन्तु बन्धके करनेवाले केवल मोहकर्मके उदयसे होनेवाले ही भाव हैं।


कषायाश्चापि चत्वारो जीवस्यौदयिकाः स्मृताः ।
क्रोधो मानोऽथ माया च लोभश्चेति चतुष्टयात् ॥1057॥

अर्थ: क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषायें भी जीवके औदयिक भाव हैं। और उन कषायोंके जितने उत्तर भेद हैं वे सब भी औदयिक भाव हैं। कषायोंके उत्तर भेद नामकी अपेक्षासे सोलह भी हैं तथा पचीस भी हैं। परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे उनके असंख्यात लोक प्रमाण भी भेद हैं। अथवा शक्तिकी अपेक्षासे उन कषायोंके अनन्त भी भेद है। क्योंकि एक २ भेदके प्रति अनन्त अनन्त शक्तियाँ हैं। ये सब कषायें पाप रूप हैं। अर्थात् सभी कषायें आत्माके गुणोंका घात करनेवाली हैं।


ते चाऽऽत्मोत्तरभेदैश्च नामतोप्यत्र षोडश ।
पञ्चविंशतिकाश्चापि लोकासंख्यातमात्रकाः ॥1058॥

अर्थ: क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषायें भी जीवके औदयिक भाव हैं । और उन कषायोंके जितने उत्तर भेद हैं वे सब भी औदयिक भाव हैं । कषायोंके उत्तर भेद नामकी अपेक्षासे सोलह भी हैं तथा पचीस भी हैं । परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे उनके असंख्यात लोक प्रमाण भी भेद हैं । अथवा शक्तिकी अपेक्षासे उन कषायोंके अनन्त भी भेद है । क्योंकि एक २ भेदके प्रति अनन्त अनन्त शक्तियाँ हैं । ये सब कषायें पाप रूप हैं । अर्थात् सभी कषायें आत्माके गुणोंका घात करनेवाली हैं ।


अथवा शक्तितोऽनन्ताः कषायाः कल्मषात्मकाः ।
यस्मादेकैकमालापं प्रत्यन्ताश्च शक्तयः ॥1059॥

अर्थ: क्रोध, मान, माया, लोभ ये चार कषायें भी जीवके औदयिक भाव हैं। और उन कषायोंके जितने उत्तर भेद हैं वे सब भी औदयिक भाव हैं। कषायोंके उत्तर भेद नामकी अपेक्षासे सोलह भी हैं तथा पच्चीस भी हैं। परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे उनके असंख्यात लोक प्रमाण भी भेद हैं। अथवा शक्तिकी अपेक्षासे उन कषायोंके अनन्त भी भेद हैं। क्योंकि एक २ भेदके प्रति अनन्त अनन्त शक्तियाँ हैं। ये सब कषायें पाप रूप हैं। अर्थात् सभी कषायें आत्माके गुणोंका घात करनेवाली हैं।


अस्ति जीवस्य चारित्रं गुणः शुद्धत्वशक्तिमान् ।
वैकृतोस्ति स चारित्रमोहकर्मोदयादिह ॥1060॥

अर्थ: जीवका एक चारित्र गुण है, वह शुद्ध स्वरूप है परन्तु इस संसारमें चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे वह विकृत हो रहा है अर्थात् अनादि कालसे चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे वह अशुद्ध हो रहा है।


तस्माचारित्रमोहश्च तद्भेदाद्द्विविधो भवेत् ।
पुद्गलो द्रव्यरूपोस्ति भावरूपोस्ति चिन्मयः ॥1061॥

अर्थ: इस लिये उसके भेदसे चारित्र मोह दो प्रकार है एक द्रव्य रूप, दूसरा भावरूप द्रव्यरूप चारित्र मोह पुद्गल स्वरूप है और भावरूप चारित्र मोह चैतन्य स्वरूप है ।


अस्त्येकं मूर्तिमद्द्रव्यं नाम्ना ख्यातः स पुद्गलः ।
वैकृतः सोस्ति चारित्रमोहरूपेण संस्थितः ॥1062॥

अर्थ: रूप रस गन्ध स्पर्शका नाम मूर्ति है। जिस द्रव्यमें ये चारों गुण पाये जावें उसे मूर्तिमान द्रव्य कहते हैं, ऐसा मूर्तिमान द्रव्य छहों द्रव्योंमेंसे एक है और वह पुद्गलके नामसे प्रसिद्ध है। उसी पुद्गलकी एक वैभाविक पर्याय चारित्र मोहरूप है।


पृथ्वीपिण्डसमानः स्यान्मोहः पौद्गलिकोऽखिलः ।
पुद्गलः स स्वयं नात्मा मिथो बन्धो द्वयोरपि ॥1063॥

अर्थ: पौद्गलिक जितना भी मोह है सभी पृथ्वी पिण्डके समान है, वह स्वयं पुद्गल है आत्मा नहीं है पौद्गलिक द्रव्यमोह और आत्मा इन दोनोंका परस्पर बन्ध होता है ।


द्विविधस्यापि मोहस्य पौद्गलिकस्य कर्मणः ।
उदयादात्मनो भावो भाव मोहः स उच्यते ॥1064॥

अर्थ: दोनों प्रकारके पौद्गलिक मोहनीय कर्मोंके उदयसे आत्माका जो भाव होता है उसे ही भाव मोह कहते हैं ।


जले जम्बालवन्नूनं स भावो मलिनो भवेत् ।
बन्धहेतुः स एव स्याद्द्वैतश्चाष्टकर्मणाम् ॥1065॥

अर्थ: जलमें जिसप्रकार काई (हरा मल) के जमजानेसे जल मलिन हो जाता है उसी प्रकार वह भाव भी ( रागद्वेषरूप ) मलिन होता है, तथा वही अकेला आठों कर्मोंके बन्धका कारण है ।


अपि यावदनर्थानां मूलमेकः स एव च ।
यस्मादनर्थमूलानां कर्मणामादिकारणम् ॥1066॥

अर्थ: संसारमें जितने भी अनर्थ हैं उन सबका मूल-कारण वही भाव मोह है क्योंकि अनर्थके मूल कारण कर्म हैं और उन कर्मोंका भी आदि कारण वह भाव मोह है।


अशुचिर्घातको रौद्रो दुःखं दुःखफलं च सः ।
किमत्र बहुनोक्तेन सर्वासां विपदां पदम् ॥1067॥

अर्थ: यह भाव मोह अपवित्र है, आत्माके गुणोंका घातक है, रौद्रस्वरूप है, दुःखरूप है, और दुःखका फल स्वरूप है, अथवा दुःख ही उसका फल है। उस भाव मोहके विषयमें अधिक क्या कहा जाय, सम्पूर्ण आपत्तियोंका वह स्थान है।


कार्यकारणमप्येष मोहो भावसमाह्वयः ।
सर्वबद्धानुवादेन प्रत्यग्रास्रवसंचयात् ॥1068॥

अर्थ: यह भाव मोह कार्य भी है और कारण भी है । पूर्वमें बँधे हुए कर्मोंके उदयसे होता है इसलिये तो कार्य रूप है, तथा नवीन कर्मोंके आस्रवका सञ्चय करता है इसलिये कारण रूप है । नीचेके श्लोकोंमें भाव मोहका परस्पर कार्य कारण भाव ग्रन्थकार स्वयं कहते हैं -


यदोच्चैः पूर्ववद्धस्य द्रव्यमोहस्य कर्मणः ।
पाकाल्लब्धात्मसर्वस्वः कार्यरूपस्ततो नयात् ॥1069॥

अर्थ: [प्रारम्भिक अंश अपठनीय] कर्मके उदयसे भाव मोह आत्मलाभ करता है उस समय वह कार्यरूप है ।


निमित्तमात्रीकृत्योच्चैस्तमागच्छन्ति पुद्गलाः ।
ज्ञानावृत्यादिरूपस्य तस्माद्भावोस्ति कारणम् ॥1070॥

अर्थ: उस भाव कर्मके निमित्तसे ज्ञानावरणादि रूप पुद्गल कर्म आते हैं ( आत्माके साथ बँधते हैं ) इसलिये वह कारणरूप है ।


विशेषः कोप्ययं कार्यं केवलं मोहकर्मणः ।
मोहस्यास्यापि बन्धस्य कारणं सर्वकर्मणाम् ॥1071॥

अर्थ: इस भावमोहमें इतनी कोई विशेषता है कि यह कार्य तो केवल मोहनीय कर्मका है, परन्तु कारण उस मोहनीय कर्म तथा सम्पूर्ण कर्मोंके बंधका है ।


अस्ति सिद्धं ततोऽन्योन्यं जीवपुद्गलकर्मणोः ।
निमित्तनैमित्तिकोभावो यथा कुम्भकुलालयोः ॥1072॥

अर्थ: इस लिये यह बात सिद्ध हो चुकी कि जिस प्रकार कुम्हार और घटका निमित्तनैमित्तिक भाव है उसी प्रकार जीव और पुद्गल कर्मोंका परस्पर निमित्त नैमित्तिक भाव है। यहां पर दृष्टान्तका उद्दिष्ट अंश ही लेना चाहिये, दृष्टान्त स्थूल है।


अन्तर्दृष्ट्या कषायाणां कर्मणां च परस्परम् ।
निमित्तनैमित्तिकोभावः स्यान्नस्याज्जीवकर्मणोः ॥1073॥

अर्थ: बाह्य दृष्टिसे तो जीव और कर्मोंका परस्पर निमित्तनैमित्तिक भाव है परन्तु अन्तरंग दृष्टिसे कषायोंका निमित्तनैमित्तिक भाव है । अन्तर्दृष्टिसे जीव कर्मका नहीं है ।


यतस्तत्र स्वयं जीवे निमित्ते सति कर्मणाम् ।
नित्या स्यात्कर्तृता चेति न्यायान्मोक्षो न कस्यचित् ॥1074॥

अर्थ: यदि कर्म बन्धका निमित्त कारण स्वयं जीव ही माना जाय तो जीव सदा कर्म बन्धका कर्ता ही बना रहेगा । फिर किसी जीवकी कभी भी मोक्ष नहीं हो सकेगी । इसलिये कर्म बन्धके करनेवाले आत्माके वैभाविक भाव कषाय भाव ही हैं । जब तक उन भावोंकी सत्ता है, तभी तक आत्मा कर्म बन्ध करता है, उनके अभावमें कर्म बन्ध नहीं करता है । जीव स्वयं कर्मबन्धका कारण नहीं है । किन्तु अशुद्ध जीव है ।


इत्येवं ते कषायाख्याश्चत्वारोप्यौदयिकाः स्मृताः ।
चारित्रस्य गुणस्यास्य पर्याया वैकृतात्मनः ॥1075॥

अर्थ: इस प्रकार वे चारों ही कषायें औदयिक कही गई हैं । वे कषायें आत्माके चारित्र गुणकी वैभाविक पर्यायें हैं ।


लिङ्गान्यौदयिकान्येव त्रीणि स्त्रीपुन्नपुंसकात् ।
भेदाद्वा नोकषायाणां कर्मणामुदयात् किल ॥1076॥

अर्थ: स्त्रीवेद, पुंवेद, नपुंसक वेदके भेदसे तीन प्रकारके लिङ्ग भी औदयिक भाव हैं । ये भाव नो कषाय कर्मोंके उदयसे होते हैं


चारित्रमोहकर्मैतद्द्विविधं परमागमात् ।
आद्यं कषायमित्युक्तं नोकषायं द्वितीयकम् ॥1077॥

अर्थ: जैनागममें चारित्र मोह कर्मके दो भेद किये हैं। पहला - कषाय, दूसरा नोकषाय।


तत्रापि नोकषायाख्यं नवधा स्वविधानतः ।
हास्यो रत्यरती शोको भीर्जुगुप्सेति त्रिलिङ्गकम् ॥1078॥

अर्थ: नो कषायके नौ भेद हैं - हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद, नपुंसकवेद ।


ततश्चारित्रमोहस्य कर्मणो ह्युदयाद्ध्रुवम् ।
चारित्रस्य गुणस्यापि भावा वैभाविका अमी ॥1079॥

अर्थ: इसलिये चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे होनेवाले ये नोकषाय भी चारित्र गुणके वैभाविक भाव हैं।


प्रत्येकं द्विविधान्येव लिङ्गानीह निसर्गतः ।
द्रव्यभावविभेदाभ्यां सर्वज्ञाज्ञानतिक्रमात् ॥1080॥

अर्थ: सर्वज्ञकी आज्ञा - आगमके अनुसार प्रत्येक लिङ्ग स्वभावसे ही द्रव्य वेद, भाव वेद इन भेदोंसे दो दो प्रकार हैं। इन दोनोंका वर्णन पहले श्लोकमें सविस्तर किया गया है।


अस्ति यन्नामकर्मैकं नानारूपं च चित्रवत् ।
पौद्गलिकमचिद्रूपं स्यात्पुद्गलविपाकि यत् ॥1081॥

अर्थ: आठ कर्मोंमें एक नाम कर्म है वह चित्रोंके समान अनेक रूपवाला है, अर्थात् जिस प्रकार चित्रकार अपने हस्त कौशलसे अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार यह नाम कर्म भी अपने अनेक भेदोंसे अनेक आकार बनाता है। शरीर, संहनन, गति, जाति, आङ्गोपाङ्ग आदि सभी रचना इस नामकर्मके उदयसे ही होती है। इसका बहुत बड़ा विस्तार है। नाम कर्म पौद्गलिक है, पुद्गलकी वैभाविक व्यञ्जन पर्याय है। इसीलिये वह जड़ है, और पुद्गल विपाकी है


अङ्गोपाङ्गं शरीरं च तद्भेदौस्तोऽप्यभेदवत् ।
तद्द्वयात्त्रिलिङ्गानामाकाराः सम्भवन्ति च ॥1082॥

अर्थ: उसी नाम कर्मके भेदोंमें एक अंगोपांग और एक शरीर नाम कर्म भी है । ये दोनों ही भेद नाम कर्मसे अभिन्न हैं । इन्हीं दोनोंके उदयसे स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेदके आकार होते हैं ।


त्रिलिङ्गाकारसम्पत्तिः कार्यं तन्नामकर्मणः ।
नास्ति तद्भावलिङ्गेषु मनागपि करिष्णुता ॥1083॥

अर्थ: स्त्रीवेद अथवा पुरुषवेद अथवा नपुंसकवेदके आकारका पाना नाम कर्मका कार्य है। इस आकारकी भावलिङ्गोंमें कुछ भी कार्यकारिता नहीं है।


भाववेदेषु चारित्रमोहकर्मांशकोदयः ।
कारणं नूनमेकं स्यान्नेतरस्योदयः क्वचित् ॥1084॥

अर्थ: भाववेदोंके होनेमें केवल एक चारित्र मोहकर्मका उदय ही निश्चयसे कारण है, किसी दूसरे कर्मका उदय उनके होनेमें कारण नहीं है।


रिरंसा द्रव्यनारीणां पुंवेदस्योदयात्किल ।
नारी वेदोदयाद्वेदः पुसां भोगाभिलाषिता ॥1085॥

अर्थ: पुंवेदके उदयसे द्रव्य स्त्रियोंके साथ रमण करनेकी वाञ्छा होती है । स्त्री वेदके उदयसे पुरुषोंके साथ भोग करनेकी अभिलाषा होती है । और जो अशक्त सामर्थ्य हीन होनेसे न तो स्त्रियोंके साथ ही भोग कर सक्ता है, और न पुरुषोंके साथ ही कर सक्ता है किन्तु दोनोंकी वाञ्छा रखता हुआ हृदयमें ही जला करता है ऐसा भाव नपुंसक वेदके उदयसे होता है।


नालं भोगाय नारीणां नापि पुंसामशक्तितः ।
अन्तर्दग्धोस्ति यो भावः क्लीबवेदोदयादिव ॥1086॥

अर्थ: पुंवेदके उदयसे द्रव्य स्त्रियोंके साथ रमण करनेकी वाञ्छा होती है । स्त्री वेदके उदयसे पुरुषोंके साथ भोग करनेकी अभिलाषा होती है । और जो अशक्त सामर्थ्य हीन होनेसे न तो स्त्रियोंके साथ ही भोग कर सक्ता है, और न पुरुषोंके साथ ही कर सक्ता है किन्तु दोनोंकी वाञ्छा रखता हुआ हृदयमें ही जला करता है ऐसा भाव नपुंसक वेदके उदयसे होता है।


द्रव्यलिंगं यथा नाम भावलिंगं तथा क्वचित् ।
क्वचिदन्यतमं द्रव्यं भावश्चान्यतमो भवेत् ॥1087॥

अर्थ: कहीं पर जैसा द्रव्यलिंग होता है वैसा ही भावलिंग भी होता है । कहीं पर द्रव्यलिंग दूसरा होता है और भावलिंग दूसरा होता है ।


यथा दिविजनारीणां नारीवेदोस्ति नेतर ।
देवानां चापि सर्वेषां पाकः पुंवेद एव हि ॥1088॥

अर्थ: जितनी भी चारों निकायोंके देवोंकी देवियां हैं उन सबके स्त्रीवेद ही भाववेद होता हैं, दूसरा नहीं होता । और जितने भी देव हैं उन सबके पुंवेद ही भाववेद होता है दूसरा नहीं होता ।


भोग भूमौ च नारीणां नारीवेदो नचेतरः ।
पुंवेदः केवलः पुंसां नान्यो वाऽन्योन्यसंभवः ॥1089॥

अर्थ: भोगभूमिमें स्त्रियोंके स्त्रीवेद ही भाववेद होता है दूसरा नहीं होता ? और वहांके पुरुषोंके केवल पुंवेद ही भाववेद होता है, दूसरा नहीं होता अथवा इन दोनोंमें भी परस्पर विषमता नहीं होती ।


नारकाणां च सर्वेषां वेदश्चैको नपुंसकः ।
द्रव्यतो भावतश्चापि न स्त्रीवेदो न वा पुमान् ॥1090॥

अर्थ: सम्पूर्ण नारकियोंके एक नपुंसक वेद ही होता है। वही तो द्रव्यवेद होता है और वही भाववेद होता है। नारकियोंके द्रव्यसे अथवा भावसे स्त्रीवेद, पुरुषवेद सर्वथा नहीं होते।


तिर्यग्जातौ च सर्वेषां एकाक्षाणां नपुंसकः ।
वेदो विकलत्रयाणां क्लीवः स्यात् केवलः किल ॥1091॥

अर्थ: तिर्यञ्च जातिमें सभी एकेन्द्रिय जीवोंके नपुंसकवेद ही होता है, जितने भी विकलत्रय ( द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ) हैं उन सबके केवल नपुंसक वेद ही होता है । और जितने भी असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय हैं उन सबके भी केवल नपुंसक वेद ही होता है । वही द्रव्य वेद होता है और वही भाव वेद होता है । दूसरा वेद कभी नहीं होता ।


पञ्चाक्षासंज्ञिनां चापि तिरश्चां स्यान्नपुंसकः ।
द्रव्यतो भावतश्चापि वेदो नान्यः कदाचन ॥1092॥

अर्थ: तिर्यञ्च जातिमें सभी एकेन्द्रिय जीवोंके नपुंसकवेद ही होता है, जितने भी विकलत्रय ( द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय ) हैं उन सबके केवल नपुंसक वेद ही होता है । और जितने भी असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय हैं उन सबके भी केवल नपुंसक वेद ही होता है । वही द्रव्य वेद होता है और वही भाव वेद होता है । दूसरा वेद कभी नहीं होता ।


कर्मभूमौ मनुष्याणां मानुषीणां तथैव च ।
तिरश्चां वा तिरश्चीनां त्रयो वेदास्तथोदयात् ॥1093॥

अर्थ: कर्मभूमिमें होनेवाले मनुष्योंके, मानुषियोंके, तिर्यञ्चोंके और तिर्यञ्चिनियोंके कर्मोदयके अनुसार तीनों ही वेद होते हैं। किन्हींके द्रव्य वेद तो पुंवेद वेद होता है अर्थात् उनके शरीरमें पुरुषवेदका चिह्न होता है, परन्तु भाव वेद उनके स्त्रीवेद, अथवा नपुंसक वेद होता है। अथवा द्रव्यवेदके अनुसार भाववेद भी पुरुषवेद ही होता है। इस प्रकार एक द्रव्यके होते हुए भाववेद कर्मोदयके अनुसार तीनों ही हो सक्ते हैं। ऐसे ही किन्हींके द्रव्य वेद तो नपुंसक वेद होता है परन्तु भाववेद पुंवेद, अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं। इसी प्रकार यह भी समझ लेना चाहिये कि किन्हींके द्रव्य वेद तो स्त्री वेद होता है परन्तु भाव वेद पुंवेद अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं। कोई आपर्यय न्यायसे अर्थात् क्रमसे परिवर्त्तन करता हुआ तीनों वेदवाला भी हो जाता है, कभी भावसे नपुंसक वेदवाला, कभी स्त्रीवेदवाला और कभी पुरुष वेदवाला। इसका आशय यह है कि कोई तो ऐसे होते हैं जिनके द्रव्य वेदके समान ही भाव वेद होता है, कोई ऐसे हैं जिनके द्रव्य वेद दूसरा और भाव वेद दूसरा ही सदा रहता है जैसे कि जनखा हिजड़ा आदि। परन्तु कोई ऐसे होते हैं जिनके कर्मोदयके अनुसार भाव वेद बदलता भी रहता है। किन्तु द्रव्य वेद सदा सभीके एक ही होता है और वह आजन्म नहीं बदल सक्ता।


केषाञ्चिद्द्रव्यतः साङ्गः पुंवेदो भावतः पुनः ।
स्त्रीवेदः क्लीबवेदो वा पुंवेदो वा त्रिधापि च ॥1094॥

अर्थ: कर्मभूमिमें होनेवाले मनुष्योंके, मानुषियोंके, तिर्यञ्चोंके और तिर्यञ्चिनियोंके कर्मोदयके अनुसार तीनों ही वेद होते हैं । किन्हींके द्रव्य वेद तो पुंवेद वेद होता है अर्थात् उनके शरीरमें पुरुषवेदका चिह्न होता है, परन्तु भाव वेद उनके स्त्रीवेद, अथवा नपुंसक वेद होता है । अथवा द्रव्यवेदके अनुसार भाववेद भी पुरुषवेद ही होता है । इस प्रकार एक द्रव्यके होते हुए भाववेद कर्मोदयके अनुसार तीनों ही हो सक्ते हैं । ऐसे ही किन्हींके द्रव्य वेद तो नपुंसक वेद होता है परन्तु भाववेद पुंवेद, अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । इसी प्रकार यह भी समझ लेना चाहिये कि किन्हींके द्रव्य वेद तो स्त्री वेद होता है परन्तु भाव वेद पुंवेद अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । कोई आपर्यय न्यायसे अर्थात् क्रमसे परिवर्त्तन करता हुआ तीनों वेदवाला भी हो जाता है, कभी भावसे नपुंसक वेदवाला, कभी स्त्रीवेदवाला और कभी पुरुष वेदवाला। इसका आशय यह है कि कोई तो ऐसे होते हैं जिनके द्रव्य वेदके समान ही भाव वेद होता है, कोई ऐसे हैं जिनके द्रव्य वेद दूसरा और भाव वेद दूसरा ही सदा रहता है जैसे कि जनखा हिजड़ा आदि। परन्तु कोई ऐसे होते हैं जिनके कर्मोदयके अनुसार भाव वेद वदलता भी रहता है । किन्तु द्रव्य वेद सदा सभीके एक ही होता है और वह आ जन्म नहीं बदल सक्ता ।


केषाञ्चित्क्लीबवेदो वा द्रव्यतो भावतः पुनः ।
पुंवेदो क्लीबवेदो वा स्त्रीवेदो वा त्रिधोचितः ॥1095॥

अर्थ: कर्मभूमिमें होनेवाले मनुष्योंके, मानुषियोंके, तिर्यञ्चोंके और तिर्यञ्चिनियोंके कर्मोदयके अनुसार तीनों ही वेद होते हैं । किन्हींके द्रव्य वेद तो पुंवेद वेद होता है अर्थात् उनके शरीरमें पुरुषवेदका चिह्न होता है, परन्तु भाव वेद उनके स्त्रीवेद, अथवा नपुंसक वेद होता है । अथवा द्रव्यवेदके अनुसार भाववेद भी पुरुषवेद ही होता है । इस प्रकार एक द्रव्यके होते हुए भाववेद कर्मोदयके अनुसार तीनों ही हो सक्ते हैं । ऐसे ही किन्हींके द्रव्य वेद तो नपुंसक वेद होता है परन्तु भाववेद पुंवेद, अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । इसी प्रकार यह भी समझ लेना चाहिये कि किन्हींके द्रव्य वेद तो स्त्री वेद होता है परन्तु भाव वेद पुंवेद अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । कोई आपर्यय न्यायसे अर्थात् क्रमसे परिवर्त्तन करता हुआ तीनों वेदवाला भी हो जाता है, कभी भावसे नपुंसक वेदवाला, कभी स्त्रीवेदवाला और कभी पुरुष वेदवाला। इसका आशय यह है कि कोई तो ऐसे होते हैं जिनके द्रव्य वेदके समान ही भाव वेद होता है, कोई ऐसे हैं जिनके द्रव्य वेद दूसरा और भाव वेद दूसरा ही सदा रहता है जैसे कि जनला हिजड़ा आदि। परन्तु कोई ऐसे होते हैं जिनके कर्मोदयके अनुसार भाव वेद बदलता भी रहता है। किन्तु द्रव्य वेद सदा सभीके एक ही होता है और वह आ जन्म नहीं बदल सक्ता ।


कश्चिदापर्ययन्यायात्क्रमादस्ति त्रिवेदवान् ।
कदाचित्क्लीबवेदो वा स्त्री वा भावात् क्वचित् पुमान् ॥1096॥

अर्थ: कर्मभूमिमें होनेवाले मनुष्योंके, मानुषियोंके, तिर्यञ्चोंके और तिर्यञ्चिनियोंके कर्मोदयके अनुसार तीनों ही वेद होते हैं । किन्हींके द्रव्य वेद तो पुंवेद वेद होता है अर्थात् उनके शरीरमें पुरुषवेदका चिह्न होता है, परन्तु भाव वेद उनके स्त्रीवेद, अथवा नपुंसक वेद होता है । अथवा द्रव्यवेदके अनुसार भाववेद भी पुरुषवेद ही होता है । इस प्रकार एक द्रव्यके होते हुए भाववेद कर्मोदयके अनुसार तीनों ही हो सक्ते हैं । ऐसे ही किन्हींके द्रव्य वेद तो नपुंसक वेद होता है परन्तु भाववेद पुंवेद, अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । इसी प्रकार यह भी समझ लेना चाहिये कि किन्हींके द्रव्य वेद तो स्त्री वेद होता है परन्तु भाव वेद पुंवेद अथवा नपुंसक वेद अथवा स्त्री वेद तीनों ही हो सक्ते हैं । कोई आपर्यय न्यायसे अर्थात् क्रमसे परिवर्त्तन करता हुआ तीनों वेदवाला भी हो जाता है, कभी भावसे नपुंसक वेदवाला, कभी स्त्रीवेदवाला और कभी पुरुष वेदवाला। इसका आशय यह है कि कोई तो ऐसे होते हैं जिनके द्रव्य वेदके समान ही भाव वेद होता है, कोई ऐसे हैं जिनके द्रव्य वेद दूसरा और भाव वेद दूसरा ही सदा रहता है जैसे कि जनखा हिजड़ा आदि। परन्तु कोई ऐसे होते हैं जिनके कर्मोदयके अनुसार भाव वेद बदलता भी रहता है । किन्तु द्रव्य वेद सदा सभीके एक ही होता है और वह आ जन्म नहीं बदल सक्ता ।


त्रयोपि भाववेदास्ते नैरन्तर्योदयात्किल ।
नित्यंचाबुद्धि पूर्वाःस्युः क्वचिद्वै बुद्धिपूर्वकाः ॥1097॥

अर्थ: ये तीनों ही भाव वेद निरन्तर कर्मोंके उदयसे होते हैं। किन्हींके अबुद्धि पूर्वक होते हैं और किन्हींके बुद्धिपूर्वक होते हैं।


तेपि चारित्रमोहान्तर्भाविनो बन्धहेतवः ।
संक्लेशाङ्कैकरूपत्वात् केवलं पापकर्मणाम् ॥1098॥

अर्थ: दोनों प्रकारके भी भाववेद चारित्रमोहके उदयसे होते हैं इसलिये उसीमें उनका अन्तर्भाव हो जाता है। तथा संक्लेश स्वरूप होनेसे वे केवल पाप कर्मोंके ही बन्धके कारण हैं।


द्रव्यलिङ्गानि सर्वाणि नात्रबन्धस्य हेतवः ।
देहमात्रैकवृत्तत्वे बन्धस्याऽकारणात्स्वतः ॥1099॥

अर्थ: जितने भी द्रव्य लिंग हैं वे सभी बन्धके कारण नहीं हैं । क्योंकि शरीरमें उनका चिह्न मात्र है और चिह्न मात्र बन्धका स्वयं कारण नहीं हो सक्ता । शरीराकृति बन्धका कारण नहीं हो सक्ती है ।


मिथ्यादर्शनमाख्यातं पाकान्मिथ्यात्वकर्मणः ।
भावो जीवस्य मिथ्यात्वं स स्यादौदयिकः किलः ॥1100॥

अर्थ: मिथ्यात्व कर्मके उदयसे जीवका जो मिथ्या भाव होता है वही मिथ्यादर्शन कहलाता है । वह जीवका औदयिक भाव है ।

उत्तरार्द्ध 1101 से 1145 (श्लोक 1101 से 1145)

अस्ति जीवस्य सम्यक्त्वं गुणश्चैको निसर्गजः ।
मिथ्याकर्मोदयात्सोपि वैकृतो विकृताकृतिः ॥1101॥

अर्थ: जीवका एक स्वाभाविक सम्यक्त्व गुण भी है, वह भी मिथ्यादर्शनके उदयसे विकारी-वैभाविक हो जाता है ।


उक्तमस्ति स्वरूपं प्राङ् मिथ्याभावस्य जन्मिनाम् ।
तस्मान्नोक्तं मनागत्र पुनरुक्तभयात्किल ॥1102॥

अर्थ: जीवोंको मिथ्या भाव कितना दुःख दे रहा है उससे जीवोंकी कैसी अवस्था हो जाती है इत्यादि कथन पहले विस्तार पूर्वक किया जा चुका है इसलिये पुनरुक्तिके भयसे यहां उसका थोड़ा भी स्वरूप नहीं कहा है ।


अज्ञानं जीवभावो यः स स्यादौदयिकः स्फुटम् ।
लब्धजन्मोदयाद्यस्माज्ज्ञानावरणकर्मणः ॥1103॥

अर्थ: ज्ञानावरण कर्मके उदयसे होनेवाला अज्ञान भाव भी जीवका औदयिक भाव है।


अस्त्यात्मनो गुणो ज्ञानं स्वापूर्वार्थावभासकम् ।
मूर्छितं मृतकं वा स्याद्वपुः स्वावरणोदयात् ॥1104॥

अर्थ: आत्माका एक ज्ञान गुण है वह अपने स्वरूपका और दूसरे अनिश्चित पदार्थोंका प्रकाशक है, परन्तु ज्ञानावरण कर्मके उदयसे वह ज्ञान गुण मूर्छित हो जाता है अथवा मृतकके समान हो जाता है।


अर्थादौदयिकत्वेपि भावस्यास्याऽप्यवश्यतः ।
ज्ञानावृत्त्यादिबन्धेस्मिन् कार्ये वै स्यादहेतुता ॥1105॥

अर्थ: यद्यपि अज्ञानभाव औदयिक भाव अवश्य है तथापि वह नियमसे ज्ञानावरणादि कर्मोंके बन्धका कारण नहीं है।


नापि संक्लेशरूपोऽयं यः स्याद् बन्धस्य कारणम् ।
यः क्लेशो दुःखमूर्तिः स्यात्तद्योगादस्ति क्लेशवान् ॥1106॥

अर्थ: अज्ञान भाव संक्लेश रूप भी नहीं है जो कि बन्धका कारण हो, परंतु जो क्लेश दुःखकी मूर्ति समझा जाता है, उसके सम्बन्धसे अवश्य क्लेशवान् है ।


दुःखमूर्तिश्च भावोऽयमज्ञानात्मा निसर्गतः ।
वज्राघात इव ख्यातः कर्मणामुदयो यतः ॥1107॥

अर्थ: यह अज्ञान रूप भाव स्वभावसे ही दुःखकी मूर्ति है। क्योंकि कर्मोंका उदय मात्र ही वज्रके आघात ( चोट ) के समान दुःखदाई है।


ननु कश्चिद्गुणोप्यस्ति सुखं ज्ञानगुणादिवत् ।
दुःखं तद्वैकृतं पाकात्तद्विपक्षस्य कर्मणः ॥1108॥

अर्थ: क्या ज्ञानादि गुणोंके समान कोई सुख गुण भी है ? उस सुख गुणका ही वैभाविक भाव - दुःख है ? और वह दुःख सुखके विपक्षी कर्मके उदयसे होता है । फिर यहां पर मूर्छित ज्ञानको सर्वथा दुःख कैसे कहा गया है ? क्योंकि ’ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ’ ऐसा सूत्र है, उसका यही आशय है कि जो द्रव्यके आश्रय रहै और जो निर्गुण हो उन्हें ही गुण कहते हैं । यदि ज्ञानादि गुणोंमें कोई सुख गुण नहीं है तो मिथ्या भाव, और कषाय इत्यादि दुःख क्यों कहे जाते हैं ?


तत्कथं मूर्छितं ज्ञानं दुःखमेकान्ततो मतम् ।
सूत्रं द्रव्याश्रयाः प्रोक्ता यस्माद्वै निर्गुणा गुणाः ॥1109॥

अर्थ: क्या ज्ञानादि गुणोंके समान कोई सुख गुण भी है ? उस सुख गुणका ही वैभाविक भाव-दुःख है ? और वह दुःख सुखके विपक्षी कर्मके उदयसे होता है । फिर यहां पर मूर्छित ज्ञानको सर्वथा दुःख कैसे कहा गया है ? क्योंकि ’ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ’ ऐसा सूत्र है, उसका यही आशय है कि जो द्रव्यके आश्रय रहै और जो निर्गुण हो उन्हें ही गुण कहते हैं । यदि ज्ञानादि गुणोंमें कोई सुख गुण नहीं है तो मिथ्या भाव, और कषाय इत्यादि दुःख क्यों कहे जाते हैं ?


न ज्ञानादिगुणेषूच्चैरस्ति कश्चिद्गुणः सुखम् ।
मिथ्याभावाः कषायाश्च दुःखमित्यादयः कथम् ॥1110॥

अर्थ: क्या ज्ञानादि गुणोंके समान कोई सुख गुण भी है ? उस सुख गुणका ही वैभाविक भाव - दुःख है ? और वह दुःख सुखके विपक्षी कर्मके उदयसे होता है । फिर यहां पर मूर्छित ज्ञानको सर्वथा दुःख कैसे कहा गया है ? क्योंकि ’ द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ’ ऐसा सूत्र है, उसका यही आशय है कि जो द्रव्यके आश्रय रहै और जो निर्गुण हो उन्हें ही गुण कहते हैं । यदि ज्ञानादि गुणोंमें कोई सुख गुण नहीं है तो मिथ्या भाव, और कषाय इत्यादि दुःख क्यों कहे जाते हैं ?


सत्यं चास्ति सुखं जन्तोर्गुणो ज्ञानगुणादिवत् ।
भवेत्तद्वैकृतं दुःखं हेतोः कर्माष्टकोदयात् ॥1111॥

अर्थ: ठीक है, ज्ञानादि गुणोंके समान इस जीवका एक सुख गुण भी है, उसीका वैभाविक भाव दुःख है, और वह आठों कर्मोंके उदयसे होता है।


अस्ति शक्तिश्च सर्वेषां कर्मणामुदयात्मिका ।
सामान्याख्या विशेषाख्या द्वैविध्यात्तद्रसस्य च ॥1112॥

अर्थ: सम्पूर्ण कर्मोंके उदयमें दो प्रकारकी शक्तियां हैं । एक सामान्य शक्ति, एक विशेषशक्ति । इस लिये उनका रस भी दो प्रकार ही होता है ।


सामान्याख्या यथा कृत्स्नकर्मणामेकलक्षणात् ।
जीवस्याकुलतायाः स्याद्धेतु पाकागतो रसः ॥1113॥

अर्थ: समान्य शक्ति सभी कर्मोंकी एक ही है, और वह यही है कि-सम्पूर्ण कर्मोंका उदय रस जीवकी आकुलताका कारण है ।


न चैतदप्रसिद्धं स्याद दृष्टान्ताद्विषभक्षणात् ।
दुःखस्य प्राणघातस्य कार्यद्वैतस्य दर्शनात् ॥1114॥

अर्थ: कर्मोंमें सामान्य और विशेष ऐसी दो शक्तियां हैं यह बात अप्रसिद्ध-असिद्ध भी नहीं है। दृष्टान्त भी है-विष खानेसे दुःख भी होता है और प्राणोंका नाश भी होता है। इसी प्रकार ज्ञानावरण कर्म ज्ञानका घात भी करता है और दुःख भी देता है। अन्यान्य कर्मोंमें भी यही बात है। एक ही विषमें दो कार्य देखनेसे कर्मोंमें भी दो कार्य भलीभांति सिद्ध हैं।


कर्माष्टकं विपक्षि स्यात् सुखस्यैकगुणस्य च ।
अस्ति किञ्चिन्न कर्मैकं तद्विपक्षं ततः पृथक् ॥1115॥

अर्थ: इसलिये आठों ही कर्म सुख गुणके विपक्षी हैं, कोई जुदा खास कर्म सुख गुणका विपक्षी नहीं है ।


वेदनीयं हि कर्मैकमस्ति चेत्तद्विपक्षि च ।
न यतोस्यास्त्यघातित्वं प्रसिद्धं परमागमात् ॥1116॥

अर्थ: यदि वेदनीय कर्मको सुख गुणका विपक्षी कर्म माना जाय तो भी ठीक नहीं है, क्योंकि जैन सिद्धान्तसे यह कर्म अघातिया प्रसिद्ध है।


असंयतत्वमस्यास्ति भावोप्यौदयिको यतः ।
पाकाच्चारित्रमोहस्य कर्मणो लब्धजन्मवान् ॥1117॥

अर्थ: चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे होनेवाला असंयतत्व भाव भी आत्माका औदयिक भाव है ।


संयमः क्रियया द्वेधा व्यासाद्द्वादशधाऽथवा ।
शुद्धस्वात्मोपलब्धिः स्यात् संयमो निष्क्रियस्य च ॥1118॥

अर्थ: क्रियाकी अपेक्षासे संयमके दो भेद हैं । अथवा विस्तारकी अपेक्षासे उसके बारह भेद हैं । तथा अपने आत्माकी शुद्धोपलब्धि - शुद्धताका होना ही निष्क्रिय - क्रिया रहित संयमका स्वरूप है ।


पञ्चानामिन्द्रियाणाञ्च मनसश्च निरोधनात् ।
स्यादिन्द्रियनिरोधाख्यः संयमः प्रथमो मतः ॥1119॥

अर्थ: सक्रिय संयमके पहले भेदका नाम इन्द्रिय निरोध संयम है । वह पांचो इन्द्रियां और मनके रोकनेसे होता है ।


स्थावराणां च पञ्चानां त्रसस्यापि च रक्षणात् ।
असुसंरक्षणाख्यः स्याद्द्वितीयः प्राणसंयमः ॥1120॥

अर्थ: सक्रिय संयमके दूसरे भेदका नाम असुसंरक्षण है उसीको प्राण संयम भी कहते हैं। वह पांच स्थावर और त्रस जीवोंकी रक्षा करनेसे होता है।


ननु किं नु निरोधित्वमक्षाणां मनसस्तथा ।
संरक्षणं च किन्नाम स्थावराणां त्रसस्य च ॥1121॥

अर्थ: मन और इन्द्रियोंको रोकना तो क्या है और स्थावर तथा त्रस जीवोंकी रक्षा करना क्या है ? अर्थात् इन दोनोंका स्वरूप क्या है ?


सत्यमक्षार्थसम्बन्धाज्ज्ञानं नासंयमाय यत् ।
तत्र रागादिबुद्धिर्या संयमस्तन्निरोधनम् ॥1122॥

अर्थ: इन्द्रिय और पदार्थके सम्बन्धसे जो ज्ञान होता है वह असंयम नहीं करता है किन्तु इन्द्रिय पदार्थके सम्बन्ध होने पर उस पदार्थमें जो रागद्वेष परिणाम होते हैं वे ही असंमयको करनेवाले हैं । उन रागद्वेषरूप परिणामोंको रोकना ही इन्द्रिय निरोध संयम है । तथा त्रस स्थावर जीवोंका मारनेके लिये मन वचन कायकी कभी प्रवृत्ति नहीं करना ही प्राण संयम है


त्रसस्थावरजीवानां न वधायोद्यतं मनः ।
न वचो न वपुः क्वापि प्राणिसंरक्षणं स्मृतम् ॥1123॥

अर्थ: इन्द्रिय और पदार्थके सम्बन्धसे जो ज्ञान होता है वह असंयम नहीं करता है किन्तु इन्द्रिय पदार्थके सम्बन्ध होने पर उस पदार्थमें जो रागद्वेष परिणाम होते हैं वे ही असंमयको करनेवाले हैं । उन रागद्वेषरूप परिणामोंको रोकना ही इन्द्रिय निरोध संयम है । तथा त्रस स्थावर जीवोंका मारनेके लिये मन वचन कायकी कभी प्रवृत्ति नहीं करना ही प्राण संयम है


इत्युक्तलक्षणो यत्र संयमो नापि लेशतः
असंयतत्वं तन्नाम भावोस्त्यौदयिकः स च ॥1124॥

अर्थ: ऊपर कहा हुआ दोनों प्रकारका संयम जहांपर लेश मात्र भी नहीं पाला जाता है वहीं पर असंयत भाव होता है, वह आत्माका औदयिक भाव है।


ननु वाऽसंयतत्वस्य कषायाणां परस्परम् ।
को भेदः स्याच्च चारित्रमोहस्यैकस्य पर्ययात् ॥1125॥

अर्थ: असंयत भाव और कषायोंमें परस्पर क्या अन्तर है क्योंकि दोनों ही एक चारित्र मोहनीयकी पर्याय हैं । अर्थात् दोनों ही चारित्र मोहके उदयसे होते हैं ?


सत्यंचारित्रमोहस्य कार्यं स्यादुभयात्मकम् ।
असंयमः कषायाश्च पाकादेकस्य कर्मणः ॥1126॥

अर्थ: ठीक है चारित्र मोहनीयके ही दो कार्य हैं। उसी एक कर्मके उदयसे असंयम भाव और कषाय भाव होते हैं।


पाकाच्चारित्रमोहस्य क्रोधाद्याः सन्ति षोडश ।
नव नोकषायनामानो न न्यूना नाधिकास्ततः ॥1127॥

अर्थ: चारित्र मोहनीय कर्मके पाकसे क्रोधादिक सोलह कषायें और नव नो कषायें होती हैं । इन पचीससे न कम होती हैं और न अधिक ही होती हैं ।


पाकात्सम्यक्त्वहानिः स्यात् तत्रानन्तानुबन्धिनाम् ।
पाकाच्चाप्रत्याख्यानस्य संयतासंयतक्षतिः ॥1128॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धि कषायके उदयसे सम्यग्दर्शनका घात होता है। अ प्रत्याख्यान कषायके उदयसे संयमासंयमका घात होता है। प्रत्याख्यान कषायके उदयसे सकल संयमका घात होता है और संज्वलन और नो कषायोंके उदयसे यथाख्यात संयमका घात होता है।


प्रत्याख्यानकषायाणामुदयात् संयमक्षतिः ।
संज्वलननोकषायैर्न यथाख्यातसंयमः ॥1129॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धि कषायके उदयसे सम्यग्दर्शनका घात होता है। अ प्रत्याख्यान कषायके उदयसे संयमासंयमका घात होता है। प्रत्याख्यान कषायके उदयसे सकल संयमका घात होता है और संज्वलन और नो कषायोंके उदयसे यथाख्यात संयमका घात होता है।


इत्येवं सर्ववृत्तान्तः कारणकार्ययोर्द्वयोः ।
कषायनोकषायाणां संयतस्येतरस्य च ॥1130॥

अर्थ: यह सम्पूर्ण कथन कषाय नोकषाय संयम और असंयमके कार्य कारणको प्रकट करता है ।


किन्तु तच्छक्तिभेदाद्वा नासिद्धं भेदसाधनम् ।
एकं स्याद्वाप्यनेकं च विषं हालाहलं यथा ॥1131॥

अर्थ: किन्तु चारित्र मोहनीयमें शक्ति भेदसे भेद साधन असिद्ध नहीं है । जिस प्रकार विषके विष, हालाहल इत्यादि अनेक भेद हो जाते हैं, उसी प्रकार उक्त कर्म भी एक तथा अनेक रूप हो जाता है ।


अस्ति चारित्रमोहे पि शक्तिद्वैतं निसर्गतः
एकश्चाऽसंयतत्वं स्यात् कषायत्वमथापरम् ॥1132॥

अर्थ: चारित्र मोह कर्ममें भी स्वभावसे दो शक्तियां हैं - (१) असंयत (२) कषाय ।


ननु चैवं सति न्यायात्तत्संख्या चाभिवर्धताम् ।
यथा चारित्रमोहस्य भेदाः षड्विशतिः स्फुटम् ॥1133॥

अर्थ: यदि कषाय और असंयतभाव दोनों चारित्र मोहके ही भेद हैं तो चारित्रमोहनीयकी संख्याका बढ़ना भी न्याय संगत है । पचीसके स्थानमें असंयत भावको मिलाकर छब्बीस भेद उसके होने चाहिये ?


सत्यं यज्जातिभिन्नास्ता यत्र कार्माणवर्गणाः ।
आलापापेक्षयाऽसंख्यास्तत्रैवान्यत्र न क्वचित् ॥1134॥

अर्थ: ठीक है, जहांपर भिन्न भिन्न जातियोंमें बँटी हुई कार्माण वर्गणायें होती हैं, वहीं पर आलाप ( भेद ) की अपेक्षासे असंख्यात वर्गणायें भिन्न २ होती हैं । अथवा जहां भिन्न जातिवाली वर्गणायें होती हैं वहीं पर आलापकी अपेक्षासे संख्या भेद होता है, जहां ऐसा नहीं होता वहां कर्मोंकी संख्या भी भिन्न नहीं समझी जाती है । यहां पर भिन्न जातिवाली वर्गणायें नहीं हैं किन्तु एक चारित्र मोहनीयकी ही हैं इसलिये चारित्र मोहकी छब्बीसवीं संख्या नहीं हो सक्ती है परन्तु शक्ति भेद अवश्य है, वह भी भिन्न स्वभाव वाला है ।


नात्र तज्जातिभिन्नास्ता यत्र कार्माणवर्गणाः ।
किन्तु शक्तिविशेषोस्ति सोपि जात्यन्तरात्मकः ॥1135॥

अर्थ: ठीक है, जहांपर भिन्न भिन्न जातियोंमें बँटी हुई कार्माण वर्गणायें होती हैं, वहीं पर आलाप ( भेद ) की अपेक्षासे असंख्यात वर्गणायें भिन्न २ होती हैं । अथवा जहां भिन्न जातिवालीं वर्गणायें होती हैं वहीं पर आलापकी अपेक्षासे संख्या भेद होता है, जहां ऐसा नहीं होता वहां कर्मोकी संख्या भी भिन्न नहीं समझी जाती है । यहां पर भिन्न जातिवालीं वर्गणायें नहीं हैं किन्तु एक चारित्र मोहनीयकी ही हैं इसलिये चारित्र मोहकी छब्वीसवीं संख्या नहीं हो सक्ती है परन्तु शक्ति भेद अवश्य है, वह भी भिन्न स्वभाव वाला है ।


तत्र यन्नाम कालुष्यं कषायाः स्युः स्वलक्षणम् ।
व्रताभावात्मको भावो जीवस्यासंयमो मतः ॥1136॥

अर्थ: जीवके कलुषित भावोंका नाम ही कषाय है यही कषायका लक्षण है। तथा जीवके व्रत रहित भावोंका नाम ही असंयम है।


एतद्द्वैतस्य हेतुः स्याच्छक्तिद्वैतैककर्मणः ।
चारित्रमोहनीयस्य नेतरस्य मनागपि ॥1137॥

अर्थ: कषाय भाव और असंयम भावका कारण - दो शक्तियोंको धारण करनेवाला केवल चारित्र मोहनीय कर्मका उदय है। किसी दूसरे कर्मका उदय इन दोनोंमें सर्वथा कारण नहीं है।


यौगपद्यं द्वयोरेव कषायासंयतत्वयोः ।
समं शक्तिद्वयस्योच्चैः कर्मणोस्य तथोदयात् ॥1138॥

अर्थ: कषायभाव और असंयतभाव ये दोनों साथ साथ होते हैं, क्योंकि समान दो शक्तियोंको धारण करनेवाले चारित्र मोहनीय कर्मका उदय ही वैसा होता है।


अस्ति तत्रापि दृष्टान्तः कर्मानन्तानुबन्धि यत् ।
घातिशक्तिद्वयोपेतं मोहनं दृक्चरित्रयोः ॥1139॥

अर्थ: दो शक्तियोंको धारण करनेवाले कर्मके उदयसे एक साथ दो भाव उत्पन्न होते हैं इस विषयमें अनन्तानुवन्धी कषायका दृष्टान्त भी है - सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रको घात करने रूप दो शक्तियोंको धारण करनेवाली अनन्तानुवन्धि कषाय जिस समय उदयमें आती है उस समय सम्यग्दर्शन और चारित्र दोनों ही गुण नष्ट हो जाते हैं ।


ननु चाप्रत्याख्यानादिकर्मणामुदयात् क्रमात् ।
देशकृत्स्नव्रतादीनां क्षतिः स्यात्तत्कथं स्मृतौ ॥1140॥

अर्थ: जब कि अप्रत्याख्यानके उदयसे देशव्रतकी और प्रत्याख्यानके उदयसे महाव्रतकी क्रम क्रमसे क्षति होती है तब अप्रत्याख्यानके उदय समयमें महाव्रत क्यों नहीं हो जाता क्योंकि उस समय महाव्रतको रोकनेवाला प्रत्याख्यानका तो उदय रहता ही नहीं और यदि अप्रत्याख्यानके उदयकालमें प्रत्याख्यानका भी उदय माना जाय तो दोनोंका क्रमक्रमसे उदय क्यों कहा है ?


सत्यं तत्राविनाभावो बन्धसत्वोदयं प्रति ।
द्वयोरन्यतरस्यातो विवक्षायां न दूषणम् ॥1141॥

अर्थ: अप्रत्याख्यानके उदयकालमें प्रत्याख्यानका भी उदय रहता है इसलिये तो अप्रत्याख्यानके उदयकालमें महाव्रत नहीं होता और पांचवें गुणस्थानमें अप्रत्याख्यानके उदयका अभाव होनेपर भी प्रत्याख्यानका उदय रहता है इसलिये कथंचित् क्रमसे उदय कहा जाता है तथा अप्रत्याख्यानका उदय कहनेसे प्रत्याख्यानका भी उदय आजाता है क्योंकि अप्रत्याख्यानके बंध उदय और सत्त्व प्रत्याख्यानके बंध उदय और सत्त्वके साथ अविनाभावी हैं, अर्थात् प्रत्याख्यानके बंधोदय सत्त्वके बिना अप्रत्याख्यानके बंध उदय सत्त्व नहीं होसकते। इसलिये चौथे गुणस्थान तक दोनोंका उदय रहते हुए भी अप्रत्याख्यानका उदय कहनेमें कोई दोष नहीं आता । अविनाभावी पदार्थोंमें एकका कथन करनेसे दूसरेका कथन स्वयं होजाया करता है । यहां यह शंका होसकती है कि जब अन्यतरका ही (किसी एकका) प्रयोग करना इष्ट है तब अप्रत्याख्यानके स्थानमें प्रत्याख्यानका ही प्रयोग क्यों नहीं किया जाता अर्थात् जैसे अप्रत्याख्यानके उदयसे प्रत्याख्यानके उदयका बोध होता है उसी प्रकार प्रत्याख्यानका उदय कहनेसे अप्रत्याख्यानके उदयका भी बोध हो जाना चाहिये परंतु इसका उत्तर यह है कि अप्रत्याख्यान व प्रत्याख्यानके उदयकी परस्पर विषम व्याप्ति है क्योंकि चौथे गुणस्थान तक अप्रत्याख्यानका उदय तो विना प्रत्याख्यानके उदयके नहीं रहता किंतु पांचवें गुणस्थानमें प्रत्याख्यानका उदय अप्रत्याख्यानके उदयके विना भी रह जाता है। इसलिये अप्रत्याख्यानकी जगह प्रत्याख्यानका प्रयोग नहीं होसकता ।


असिद्धत्वं भवेद्भावो नूनमौदयिको यतः ।
व्यस्ताद्वा स्यात्समस्ताद्वा जातेः कर्माष्टकोदयात् ॥1142॥

अर्थ: असिद्धत्वभाव भी औदयिक भाव है। यह भाव आठों कर्मोंके उदयसे होता है। भिन्न २ कर्मोंके उदयसे भी होता है और आठों कर्मोंके सम्मिलित उदयसे भी होता है।


सिद्धत्वं कृत्स्नकर्मभ्यः पुंसोवस्थान्तरं पृथक् ।
ज्ञानदर्शनसम्यक्त्ववीर्याद्यष्टगुणात्मकम् ॥1143॥

अर्थ: सम्पूर्ण कर्मोंसे रहित पुरुषकी शुद्ध अवस्थाका नाम ही सिद्धत्वगुण अथवा सिद्धावस्था है। वह अवस्था ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व, वीर्यादि आठ गुण स्वरूप है।


नेदं सिद्धत्वमेति स्यादसिद्धत्वमर्थतः ।
यावत्संसारसर्वस्वं महानर्थास्पदं परम् ॥1144॥

अर्थ: जब तक महा अनर्थोंका घर संसार ही इस जीवका सब कुछ है। तब तक इसके सिद्धत्वभाव नहीं होता है किन्तु असिद्धत्व रहता है


लेश्या षडेव विख्याता भावा औदयिकाः स्मृताः ।
यस्माद्योगकषायाभ्यां द्वाभ्यामेवोदयोद्भवाः ॥1145॥

अर्थ: लेश्याओंके छह भेद हैं - १ कृष्ण २ नील ३ कापोत ४ पीत ५ पद्म ६ शुक्ल । इन्हीं छह भेदोंसे लेश्यायें प्रसिद्ध हैं । लेश्यायें भी जीवके औदयिक भाव हैं । क्योंकि लेश्यायें योग और कषायोंके उदयसे होती हैं । कर्मोंके उदयसे होनेवाले आत्माके भावोंका नाम ही औदयिक भाव है ।