ज्ञानार्णव श्लोक एवं अर्थ (आचार्य शुभचन्द्र) | Gyanarnav Shlok Evam Arth (Acharya Shubhchandra)

सर्ग 28: आसनजय का वर्णन (श्लोक 1 से 40)

सिद्धक्षेत्रे महातीर्थे पुराणपुरुषाश्रिते ।
कल्याणकलिते पुण्ये ध्यानसिद्धिः प्रजायते ॥1॥

अर्थ: सिद्धक्षेत्र, जहाँ कि बडे-बडे प्रसिद्ध पुरुष ध्यान कर सिद्ध हुए हों तथा पुराणपुरुष अर्थात् तीर्थंकरादिकोंने जिसका आश्रय किया हो, ऐसे महातीर्थ, जो तीर्थंकरोंके कल्याणक स्थान हों, ऐसे स्थानोंमें ध्यानकी सिद्धि होती है ।


सागरान्ते वनान्ते वा शैलशृङ्गान्तरेऽथवा ।
पुलिने पद्मखण्डान्ते प्राकारे शालसङ्कटे ॥2॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


सरितां सङ्गमे द्वीपे प्रशस्ते तरुकोटरे ।
जीर्णोद्याने स्मशाने वा गुहागर्भे विजन्तुके ॥3॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


सिद्धकूटे जिनागारे कृत्रिमेऽकृत्रिमेऽपि वा ।
महर्द्धिकमहाधीरयोगिसंसिद्धवाञ्छिते ॥4॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


मनः प्रीतिप्रदे शस्ते शङ्काकोलाहलच्युते ।
सर्वर्त्तुसुखदे रम्ये सर्वोपद्रववर्जिते ॥5॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


शून्यवेश्मन्यथ ग्रामे भूगर्भे कदलीगृहे ।
पुरोपवनवेद्यन्ते मण्डपे चैत्यपादपे ॥6॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


वर्षातपतुषारादिपवनासारवर्जिते ।
स्थाने जागर्त्यविश्रान्तं यमी जन्मार्त्तिशान्तये ॥7॥

अर्थ: संयमी मुनि संसारकी पीडाको शांत करनेके लिये आगे लिखे स्थानोंमें निरंतर सावधान होकर रहें - समुद्रके किनारे पर, वनमें, पर्वतके शिखर पर, नदीके किनारे, कमलवनमें, प्राकार(कोट)में, शालवृक्षोंके समूहमें, नदियोंका जहाँ संगम हुआ हो, जलके मध्य जो द्वीप हो उसमें, प्रशस्त (निर्दोष-उज्ज्वल) वृक्षके कोटरमें, पुराने वनमें, स्मशानमें, पर्वतकी जीवरहित गुफामें, सिद्धकूट तथा कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जहाँ कि महाऋद्धिके धारक महाधीर वीर योगीश्वर सिद्धिकी वांछा करते हैं, मनको प्रीति देनेवाले, प्रशंसनीय, तथा जहाँ पर शंका कोलाहल शब्द न हो ऐसे स्थानमें, तथा समस्त ऋतुओंमें सुखके देनेवाले रमणीक सर्व उपद्रवरहित स्थानमें तथा शून्य घर तथा सूने ग्राममें, पृथ्वीके नीचे ऊँचे प्रदेशमें, तथा कदलीगृह(केलोंके कुंजों)में तथा नगरके उपवन(बाग)की वेदीके अंतमें, तथा वेदी परके मंडपमें वा चैत्यवृक्षके समीप, तथा वर्षा आतप हिम शीतादि तथा प्रचंड पवनादिसे वर्जित स्थानमें निरंतर तिष्ठें ॥२-७॥


यत्र रागादयो दोषा अजस्रं यान्ति लाघवम् ।
तत्रैव वसतिः साध्वी ध्यानकाले विशेषतः ॥8॥

अर्थ: जिस स्थानमें रागादि दोष निरंतर लघुताको प्राप्त हों उसी स्थानमें मुनिको बसना चाहिये, तथा ध्यानके कालमें तो अवश्य ही योग्य स्थानको ग्रहण करना चाहिये ।


दारुपट्टे शिलापट्टे भूमौ वा सिकतास्थले ।
समाधिसिद्धये धीरो विदध्यात्सुस्थिरासनम् ॥9॥

अर्थ: धीर वीर पुरुष समाधिकी सिद्धिके लिये काष्ठके तख्ते पर तथा शिला पर अथवा भूमि पर वा बालूरेतके स्थानमें भले प्रकार स्थिर आसन करें ।


पर्यङ्कमर्द्धपर्यङ्क वज्रं वीरासनं तथा ।
सुखारविन्दपूर्वे च कायोत्सर्गश्च सम्मतः ॥10॥

अर्थ: पर्यंक आसन, अर्द्धपर्यंक आसन, वज्रासन, वीरासन, सुखासन, कमलासन और कायोत्सर्ग ये ध्यानके योग्य आसन माने गये हैं ।


येन येन सुखासीना विदध्युर्निश्चलं मनः ।
तत्तदेव विधेयं स्यान्मुनिभिर्बन्धुरासनम् ॥11॥

अर्थ: जिस जिस आसनसे सुखरूप उपविष्ट मुनि अपने मनको निश्चल कर सके वही सुंदर आसन मुनियोंको स्वीकार करना चाहिये ।


कायोत्सर्गश्च पर्यङ्कः प्रशस्तं कैश्चिदीरितं ।
देहिनां वीर्यवैकल्यात्कालदोषेण संप्रति ॥12॥

अर्थ: तथा इस समय कालदोषसे जीवोंके वीर्यकी विकलता है अर्थात् सामर्थ्यकी हीनता है इस कारण कई आचार्योंने पर्यंकासन (पद्मासन) और कायोत्सर्ग ये दो आसन ही प्रशस्त कहे हैं ।


वज्रकाया महासत्त्वा निष्कम्पाः सुस्थिरासनाः ।
सर्वावस्थास्वलं ध्यात्वा गताः प्राग्योगिनः शिवम् ॥13॥

अर्थ: तथा जो वज्रकाय कहिये वज्रवृषभ संहननवाले बडे पराक्रमी निःकम्प (धीर) स्थिर आसन थे, वे ही योगी सर्वावस्थाओंमें ध्यान करके पूर्वकालमें मोक्षको प्राप्त हुए हैं ।


उपसर्गैरपि स्फीतैर्देवदैत्यारिकल्पितैः ।
स्वरूपालम्बितं येषां न चेतश्चाल्यते क्वचित् ॥14॥

अर्थ: जो पूर्वकालमें महापराक्रमी थे उनका स्वरूपमें अवलम्बित चित्त, देव दैत्य वैरी द्वारा किये गये घोर उपसर्गोंसे कदापि चलायमान नहीं होता था ।


श्रूयन्ते संवृतस्वान्ताः स्वतत्त्वकृतनिश्चयाः ।
विसह्योग्रोपसर्गाग्निं ध्यानसिद्धिं समाश्रिताः ॥15॥

अर्थ: जिन्होंने अपने मनको संवररूप किया है तथा जिन्होंने स्वतत्त्वमें निश्चय किया है वे ही पूर्वपुरुष तीव्र उपसर्गरूप अग्निको सहकर ध्यानकी सिद्धिको आश्रित हुए सुने जाते हैं ।


केचिज्ज्वालावलीढा हरिशरभगजव्यालविध्वस्तदेहाः
केचित्क्रूरादिदैत्यैरदयमतिहताश्चक्रशूलासिदण्डैः ।
भूकम्पोत्पातवातप्रबलपविघनव्रातरुद्धास्तथान्ये
कृत्वा स्थैर्यं समाधौ सपदि शिवपदं निष्प्रपञ्चं प्रपन्नाः ॥16॥

अर्थ: फिर भी सुना जाता है कि पूर्वकालमें अनेक महामुनि तो अग्निकी ज्वालाकी पंक्तिसे जल कर समाधिमें दृढ रहनेसे तत्काल मोक्षको प्राप्त हुए, कितनेक मुनि सिंह अष्टापद हस्ती सर्पादिक द्वारा देहसे विध्वस्त हो समाधिमें स्थिरता धारण कर तत्काल मोक्षको गये, तथा कितनेक मुनि क्रूर वैरी दैत्यादिके द्वारा चक्र शूल तलवार दंडादिकसे निर्दयताके साथ हते हुए समाधिमें लीन रहनेसे तत्काल मोक्षको गये; तथा कितने ही मुनि भूमिकंपनके उत्पात, प्रचंड पवन, प्रबल वज्रपात वा प्रबल मेघादिकके उपसर्गको जीतकर मोक्षको गये तथा अन्य भी अनेक मुनि नाना प्रकारके उपसर्गोंको सहकर समाधि(ध्यान)में दृढ होकर प्रपंच रहित शिवपदको प्राप्त हुए। सो ऐसे उत्तम संहननवालोंके आसनका नियम नहीं है ।


तद्धैर्यं यमिनां मन्ये न संप्रति पुरातनम् ।
अथ स्वप्नेऽपि नामास्थां प्राचीनां कर्तुमक्षमाः ॥17॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि पूर्वकालके मुनियोंका पुरातन धैर्य वा बलवीर्य इस वर्तमान कालमें नहीं है, इसी कारण पहले जैसी आस्था (स्थिरता) वर्त्तमानकालके मुनि स्वप्नमें भी करनेमें असमर्थ हैं; और जो इस समय करते हैं वे धन्य हैं ।


निःशेषविषयोत्तीर्णो निर्विण्णो जन्मसंक्रमात् ।
आत्माधीनमनाः शश्वत्सर्वदा ध्यातुमर्हति ॥18॥

अर्थ: जो पुरुष इन्द्रियोंके समस्त विषयोंसे रहित हैं, संसारके परिभ्रमणसे विरक्त हो गया हैं तथा अपने आधीन हैं मन जिसका, ऐसा निरन्तर हो वह पुरुष ही ध्यानके योग्य होता है ।


अविक्षिप्तं यदा चेतः स्वतत्त्वाभिमुखं भवेत् ।
मुनेस्तदैव निर्विघ्ना ध्यानसिद्धिरुदाहृता ॥19॥

अर्थ: जिस समय मुनिका चित्त क्षोभरहित होकर आत्मस्वरूपके सन्मुख होता है उस काल ही ध्यानकी सिद्धि निर्विघ्न होती है ।


स्थानासनविधानानि ध्यानसिद्धेर्निबन्धनम् ।
नैकं मुक्त्वा मुनेः साक्षाद्विक्षेपरहितं मनः ॥20॥

अर्थ: ध्यानकी सिद्धिका कारण स्थान और आसनका विधान है सो इनमेंसे एक भी न हो तो मुनि (ध्यानी) का चित्त विक्षेपरहित नहीं होता ।


संविग्नः संवृतो धीरः स्थिरात्मा निर्मलाशयः ।
सर्वावस्थासु सर्वत्र सर्वदा ध्यातुमर्हति ॥21॥

अर्थ: तथा जो मुनि संवेगवैराग्ययुक्त हो, संवररूप हो, धीर हो, जिसका आत्मा स्थिर हो, चित्त निर्मल हो, वह मुनि सर्व अवस्था, सर्व क्षेत्र और सर्व कालमें ध्यान करने योग्य है ।


विजने जनसंकीर्णे सुस्थिते दुःस्थितेऽपि वा ।
यदि धत्ते स्थिरं चित्तं न तदास्ति निषेधनम् ॥22॥

अर्थ: जनरहित क्षेत्र हो अथवा जनसहित प्रदेश हो, तथा सुस्थित हो अथवा दुःस्थित हो, जिस काल मुनिका चित्त स्थिर स्वरूपको धारण करे तब ही ध्यानकी योग्यता है, निषेध नहीं है । पहिले स्थान और आसनका विधान कहा, उसके सिवाय जिस समय मुनिका चित्त स्थिरता धारण करे उस समय सर्व अवस्था सर्व क्षेत्रमें ध्यानकी योग्यता है, निषेध नहीं है ।


पूर्वाशाभिमुखः साक्षादुत्तराभिमुखोऽपि वा ।
प्रसन्नवदनो ध्याता ध्यानकाले प्रशस्यते ॥23॥

अर्थ: ध्यानी मुनि जो ध्यानके समय प्रसन्नमुख होकर साक्षात् पूर्व दिशामें मुख करके अथवा उत्तर दिशामें भी मुख करके ध्यान करे, सो प्रशंसनीय कहा है ।


चरणज्ञानसम्पन्ना जिताक्षा वीतमत्सराः ।
प्रागनेकास्ववस्थासु संप्राप्ता यमिनः शिवम् ॥24॥

अर्थ: तथा ऐसा भी है कि चारित्र और ज्ञानसे संयुक्त, जितेन्द्रिय, मत्सररहित जो मुनिगण पूर्वकालमें अनेक अवस्थाओंसे मोक्षको प्राप्त हो गये हैं उनके दिशाकी सम्मुखताका कुछ नियम नहीं था ।


मुख्योपचारभेदेन द्वौ मुनी स्वामिनौ मतौ ।
अप्रमत्तप्रमत्ताख्यौ धर्मस्यैतौ यथायथम् ॥25॥

अर्थ: इस धर्मध्यानके यथायोग्य अधिकारी मुख्य और उपचारके भेदसे प्रमत्तगुणस्थानी और अप्रमत्तगुणस्थानी ये दो मुनि ही होते हैं ।


अप्रमत्तः सुसंस्थानो वज्रकायो वशी स्थिरः ।
पूर्ववित्संवृतो धीरो ध्याता संपूर्णलक्षणः ॥26॥

अर्थ: उक्त दोनों गुणस्थानियोंमें जो अप्रमत्तगुणस्थानी मुनि समचतुरस्रसंस्थान और वज्रवृषभनाराचसंहननवाला तथा जितेन्द्रिय हो, स्थिर हो, पूर्वका ज्ञानी हो, संवरवान् और धीर हो अर्थात् परीषह और उपसर्गादिकसे चलित न हो, वही संपूर्ण लक्षणका धारक धर्मध्यानके ध्यावने वाला होता है क्योंकि ऐसा मुनि ही किसी समय सातिशय अप्रमत्त होकर श्रेणीका आरंभ करता है ।


श्रुतेन विकलेनापि स्वामी सूत्रे प्रकीर्त्तितः ।
अधःश्रेण्यां प्रवृत्तात्मा धर्मध्यानस्य सुश्रुतः ॥27॥

अर्थ: सिद्धांतमें नीचेकी श्रेणीमें प्रवृत्त हुआ है आत्मा जिसका ऐसा विकलश्रुत अर्थात् पूर्वज्ञानरहित भावश्रुतवान् भी धर्मध्यानका स्वामी कहा है ।


किं च कैश्चिच्च धर्मस्य चत्वारः स्वामिनः स्मृताः ।
सद्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्ता यथायोग्येन हेतुना ॥28॥

अर्थ: तथा यह विशेष है कि कितने ही आचार्योंने धर्मध्यानके स्वामी (अधिकारी) चार भी कहे हैं वे अविरत सम्यग्दृष्टिसे लेकर देशविरत, प्रमत्त, अप्रमत्त पर्यन्त यथायोग्य हेतुसे कहे हैं ।


ध्यातारस्त्रिविधा ज्ञेयास्तेषां ध्यानान्यपि त्रिधा ।
लेश्याविशुद्धियोगेन फलसिद्धिरुदाहृता ॥29॥

अर्थ: इस धर्मध्यानके ध्याता तीन प्रकारके भी कहे हैं और उनके ध्यान भी तीन प्रकारके कहे हैं, क्योंकि लेश्याकी विशुद्धतासे फलसिद्धि कही है ।


अथासनजयं योगी करोतु विजितेन्द्रियः ।
मनागपि न खिद्यन्ते समाधौ सुस्थिरासनाः ॥30॥

अर्थ: अब यह कहते हैं कि जो योगी मुनि विशेष करके जितेन्द्रिय हैं वे आसनका जय करो क्योंकि जिनका आसन भले प्रकार स्थिर है वे समाधिमें किंचिन्मात्र भी खेदको प्राप्त नहीं होते ।


आसनाभ्यासवैकल्याद्वपुःस्थैर्यं न विद्यते ।
खिद्यते त्वङ्गवैकल्यात्समाधिसमये ध्रुवम् ॥31॥

अर्थ: आसनके अभ्यासकी विकलतासे शरीरकी स्थिरता नहीं रहती और समाधिके समय शरीरकी विकलतासे भी निश्चय करके खेदरूप हो जाता है ।


वातातपतुषाराद्यैर्जन्तुजातैरनेकशः ।
कृतासनजयो योगी खेदितोऽपि न खिद्यते ॥32॥

अर्थ: जो योगी आसनको जीत लेता है वह पवन आतप तुषार शीतादिकसे तथा अनेक जीवोंसे अनेक प्रकारसे पीडित हुआ भी खेदको प्राप्त नहीं होता। आसन जीतनेका फल यही है ।


आसाद्याभिमतं रम्यं स्थानं चित्तप्रसत्तिदम् ।
उद्भिन्नपुलकः श्रीमान्पर्यङ्कमधितिष्ठति ॥33॥

अर्थ: योगी मुनि आसन करते समय चित्तको प्रसन्न करनेवाले रमणीक स्थानको प्राप्त होकर उत्पन्न हुआ है हर्ष-आनन्दका रोमांच जिसके ऐसा श्रीमान्-उत्तम मुनि पर्यङ्कासन(पद्मासन) करके ध्यान करें ।


पर्यङ्कदेशमध्यस्थे प्रोत्ताने करकुड्मले ।
करोत्युत्फुल्लराजीवसन्निभे च्युतचापले ॥34॥

अर्थ: पर्यंक देशके मध्यभागमें स्थित उन्नत दोनों हस्तके मुकुल (करकमल) विकसित कमलके सदृश चपलतारहित करे ।


नासाग्रदेशविन्यस्ते धत्ते नेत्रेऽतिनिश्चले ।
प्रसन्ने सौम्यतापन्ने निष्पन्दे मन्दतारके ॥35॥

अर्थ: अति निश्चल, सौम्यताको लिये स्पन्दरहित हैं मन्द तारे जिनमें ऐसे दोनों नेत्रोंको नासिकाके अग्रभागमें धारण करे अर्थात् ठहरावे ।


भ्रूवल्लीविक्रियाहीनं सुश्लिष्टाधरपल्लवम् ।
सुप्तमत्स्यह्रदप्रायं विदध्यान्मुखपङ्कजम् ॥36॥

अर्थ: तथा मुखको इस प्रकार करे कि भौंहें तो विकाररहित हों, अधरपल्लव अर्थात् दोनों होठ न तो बहुत खुले और न अति मिले हों, ऐसे सोते हुए मत्स्यके ह्रदकी समान मुखकमलको करें ।


अगाधकरुणाम्भोधौ मग्नः संविग्नमानसः ।
ऋज्वायतं वपुर्धत्ते प्रशस्तं पुस्तमूर्तिवत् ॥37॥

अर्थ: योगी मुनिको चाहिये कि अपने शरीरको अगाध करुणासमुद्रमें, मग्न हो गया है संवेगसहित मन जिसका ऐसा सीधा और लम्बा रक्खें, जैसे कि दीवार पर चित्रामकी मूर्ति हो उस प्रकार बनावें ।


विवेकवार्द्धिकल्लोलैर्निर्मलीकृतमानसः ।
ज्ञानमन्त्रोद्धृताशेषरागादिविषमग्रहः ॥38॥

अर्थ: मुनि जब ध्यानका आसन जमाकर बैठे तब ऐसा होना चाहिये कि प्रथम तो विवेक भेदज्ञानरूप समुद्रकी कल्लोलोंसे निर्मल किया हुआ है मन जिसका ऐसा हो, तथा ज्ञानरूप मंत्रसे निकाल दिये हैं समस्त रागादिक विषम ग्रह अर्थात् पिशाच जिसने ऐसा हो, तथा समुद्रके समान अगाध हो, मेरुपर्वतके समान निश्चल हो अर्थात् जिसका अंग वा मन किसी प्रकार भी चलायमान न हो तथा जिसके वेगोंका संकल्प शान्त हो गया हो, समस्त भ्रम जिसके नष्ट हो गये हों, तथा ऐसा निश्चल हो कि समीपस्थ प्राज्ञ पुरुष भी ऐसा भ्रम करने लग जाय कि यह क्या पाषाणकी मूर्ति है वा चित्रामकी मूर्ति है ? इस प्रकार आसन जीतनेका विधान कहा ॥३८-४०॥


रत्नाकर इवागाधः सुराद्रिरिव निश्चलः ।
प्रशान्तविश्वविस्पन्दप्रणष्टसकलभ्रमः ॥39॥

अर्थ: मुनि जब ध्यानका आसन जमाकर बैठे तब ऐसा होना चाहिये कि प्रथम तो विवेक भेदज्ञानरूप समुद्रकी कल्लोलोंसे निर्मल किया हुआ है मन जिसका ऐसा हो, तथा ज्ञानरूप मंत्रसे निकाल दिये हैं समस्त रागादिक विषम ग्रह अर्थात् पिशाच जिसने ऐसा हो, तथा समुद्रके समान अगाध हो, मेरुपर्वतके समान निश्चल हो अर्थात् जिसका अंग वा मन किसी प्रकार भी चलायमान न हो तथा जिसके वेगोंका संकल्प शान्त हो गया हो, समस्त भ्रम जिसके नष्ट हो गये हों, तथा ऐसा निश्चल हो कि समीपस्थ प्राज्ञ पुरुष भी ऐसा भ्रम करने लग जाय कि यह क्या पाषाणकी मूर्ति है वा चित्रामकी मूर्ति है ? इस प्रकार आसन जीतनेका विधान कहा ॥३८-४०॥


किमयं लोष्टनिष्पन्नः किं वा पुस्तप्रकल्पितः ।
समीपस्थैरपि प्रायः प्राज्ञैर्ध्यानीति लक्ष्यते ॥40॥

अर्थ: मुनि जब ध्यानका आसन जमाकर बैठे तब ऐसा होना चाहिये कि प्रथम तो विवेक भेदज्ञानरूप समुद्रकी कल्लोलोंसे निर्मल किया हुआ है मन जिसका ऐसा हो, तथा ज्ञानरूप मंत्रसे निकाल दिये हैं समस्त रागादिक विषम ग्रह अर्थात् पिशाच जिसने ऐसा हो, तथा समुद्रके समान अगाध हो, मेरुपर्वतके समान निश्चल हो अर्थात् जिसका अंग वा मन किसी प्रकार भी चलायमान न हो तथा जिसके वेगोंका संकल्प शान्त हो गया हो, समस्त भ्रम जिसके नष्ट हो गये हों, तथा ऐसा निश्चल हो कि समीपस्थ प्राज्ञ पुरुष भी ऐसा भ्रम करने लग जाय कि यह क्या पाषाणकी मूर्ति है वा चित्रामकी मूर्ति है ? इस प्रकार आसन जीतनेका विधान कहा ॥३८-४०॥

सर्ग 29: प्राणायाम वर्णन (श्लोक 1 से 100)

सुनिर्णीतसुसिद्धान्तैः प्राणायामः प्रशस्यते ।
मुनिभिर्ध्यानसिद्ध्यर्थं स्थैर्यार्थं चान्तरात्मनः ॥1॥

अर्थ: भले प्रकार निर्णयरूप किया है सत्यार्थसिद्धांत जिन्होंने ऐसे मुनियोंने ध्यानकी सिद्धिके लिये तथा मनकी एकाग्रताके लिये प्राणायाम प्रशंसनीय कहा है ।


अतः साक्षात्स विज्ञेयः पूर्वमेव मनीषिभिः ।
मनागप्यन्यथा शक्यो न कर्त्तुं चित्तनिर्जयः ॥2॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि ध्यानकी सिद्धिके लिये मनको एकाग्र करनेके लिये पूर्वाचार्योंने प्राणायामकी प्रशंसा की है, इस कारण ध्यान करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंको प्रथमसे ही प्राणायामको विशेष प्रकारसे जानना चाहिये क्योंकि इसके जाने बिना अन्य प्रकार किंचिन्मात्र भी मनके जीतनेको समर्थ नहीं हो सकते ।


त्रिधा लक्षणभेदेन संस्मृतः पूर्वसूरिभिः ।
पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकस्तदनन्तरम् ॥3॥

अर्थ: पूर्वाचार्योंने इस पवनके स्तंभनस्वरूप प्राणायामको लक्षणभेदसे तीन प्रकारका कहा है, एकका नाम पूरक है, दूसरेका कुम्भक और तीसरेका रेचक है ।


द्वादशान्तात्समाकृष्य यः समीरः प्रपूर्यते ।
स पूरक इति ज्ञेयो वायुविज्ञानकोविदैः ॥4॥

अर्थ: द्वादशान्त कहिये तालुवेके छिद्रसे अथवा द्वादश अंगुलपर्यंतसे खेंचकर पवनको अपनी इच्छानुसार अपने शरीरमें पूरण करे उनको वायुविज्ञानी पंडितोंने पूरक पवन कहा हैं ।


निरुणद्धि स्थिरीकृत्य श्वसनं नाभिपङ्कजे ।
कुम्भवन्निर्भरः सोऽयं कुम्भकः परिकीर्त्तितः ॥5॥

अर्थ: तथा उस पूरक पवनको स्थिर करके नाभिकमलमें जैसे घडेको भरें तैसे रोके (थांमे) नाभिसे अन्य जगह चलने न दे सो कुंभक कहा है ।


निःसार्यतेऽतियत्नेन यत्कोष्टाच्छ्वसनं शनैः ।
स रेचक इति प्राज्ञैः प्रणीतः पवनागमे ॥6॥

अर्थ: जो अपने कोष्ठसे पवनको अतियत्नसे मंद-मंद बाहर निकालें उसको पवनाभ्यासके शास्त्रोंमें विद्वानोंने रेचक ऐसा नाम कहा है ।


नाभिस्कन्धाद्विनिष्क्रान्तं हृत्पद्मोदरमध्यगम् ।
द्वादशान्ते सुविश्रान्तं तज्ज्ञेयं परमेश्वरम् ॥7॥

अर्थ: जो नाभिस्कन्धसे निकला हुआ तथा हृदयकमलमेंसे होकर द्वादशान्त (तालुरंध्र) में विश्रान्त (ठहरा) हुआ पवन है उसे परमेश्वर जानो क्योंकि यह पवनका स्वामी है ।


तस्य चारं गतिं बुद्ध्वा संस्थां चैवात्मनः सदा ।
चिन्तयेत्कालमायुश्च शुभाशुभफलोदयम् ॥8॥

अर्थ: पवन ईश्वर जो तालुरन्ध्रमें विश्रान्त हुआ उसका चार कहिये चलना अर्थात् भ्रमण और गति कहिये गमन तथा आत्मा (जीव) की संस्था अर्थात् देहमें सदा रहना इनको जानकर और कालका प्रमाण आयुर्बल शुभ तथा अशुभ फलके उदयका विचार करे ।


अत्राभ्यासं प्रयत्नेन प्रास्ततन्द्रः प्रतिक्षणम् ।
कुर्वन् योगी विजानाति यन्त्रनाथस्य चेष्टितम् ॥9॥

अर्थ: इस पवनका अभ्यास बडे यत्नसे निष्प्रमादी होकर निरंतर करता हुआ योगी जीवकी समस्त चेष्टाओंको जानता है ।


शनैः शनैः मनोऽजस्रं वितन्द्रः सह वायुना ।
प्रवेश्य हृदयाम्भोजकर्णिकायां नियन्त्रयेत् ॥10॥

अर्थ: इस पवनका अभ्यास करनेवाला योगी निष्प्रमादी होकर बडे यत्नसे अपने मनको वायुके साथ मंद-मंद निरन्तर हृदयकमलकी कर्णिकामें प्रवेश कराकर वहाँ ही नियन्त्रण करे (थांमे), उस जगहसे चलने न दे ।


विकल्पा न प्रसूयन्ते विषयाशा निवर्त्तते ।
अन्तः स्फुरति विज्ञानं तत्र चित्ते स्थिरीकृते ॥11॥

अर्थ: उस हृदयकमलकी कर्णिकामें पवनके साथ चित्तको स्थिर करने पर मनमें विकल्प नहीं उठते और विषयोंकी आशा भी नष्ट हो जाती है तथा अन्तरंगमें विशेष ज्ञानका प्रकाश होता है । इस पवनके साधनसे मनको वश करना ही फल है ।


एवं भावयतः स्वान्ते यात्यविद्या क्षयं क्षणात् ।
विमदीस्युस्तथाक्षाणि कषायरिपुभिः समम् ॥12॥

अर्थ: इस प्रकार मनको वश करके भावना करते हुए पुरुषके अविद्या तो क्षणमात्रमें क्षय हो जाती है, और इन्द्रियाँ मदरहित हो जाती हैं, उनके साथ-ही-साथ कषाय भी क्षीण हो जाते हैं । यही इस पवनको साधन करके मनको वश करनेका प्रयोजन है ।


कुत्र श्वसनविश्रामः का नाड्यः संक्रमः कथम् ।
का मण्डलगतिः केयं प्रवृत्तिरिति बुद्ध्यते ॥13॥

अर्थ: तथा इस पवनके साधनसे ऐसा जाना जाता है कि इस श्वासरूप पवनका कहाँ तो विश्राम है, और नाडियाँ कितनी और कौन-कौन हैं, उन नाडियोंका पलटना किस प्रकार होता है तथा इसकी मंडलगति कौनसी है, इसकी प्रवृत्ति कहाँ है ।


स्थिरी भवन्ति चेतांसि प्राणायामावलम्बिनाम् ।
जगद्वृत्तं च निःशेषं प्रत्यक्षमिव जायते ॥14॥

अर्थ: जो प्राणायामके अवलंबन करनेवाले पुरुष हैं उनके चित्त स्थिर हो जाते हैं, चित्तके स्थिर होनेसे ज्ञान विशेष होता है, उसके द्वारा जगतके समस्त वृत्तांत (प्रवर्त्तन) प्रत्यक्षके समान जाने जाते हैं ।


यः प्राणायाममध्यास्ते स मंडलचतुष्टयम् ।
निश्चिनोतु यतः साध्वी ध्यानसिद्धिः प्रजायते ॥15॥

अर्थ: जो योगी प्राणायामको स्वाधीनतामें करके रहता है अर्थात् इसका साधन करता है सो मुनि पवनमंडलके चतुष्टयको निश्चय करो, जिससे समीचीन ध्यानकी सिद्धि होती है ।


घोणाविवरमध्यास्य स्थितं पुरचतुष्टयम् ।
पृथक् पवनसंवीतं लक्ष्यलक्षणभेदतः ॥16॥

अर्थ: नासिकाके छिद्रको आश्रित होकर चतुष्टय जो पृथ्वीमंडल, अप्मंडल, तेजोमंडल और वायुमंडल यह चतुष्टय है सो लक्ष्यलक्षणके भेदसे पवन भिन्न-भिन्न वेष्टित है, इन मंडलोंके पवनकी रीति लक्षणभेदसे भिन्न-भिन्न है ।


अचिन्त्यमतिदुर्लक्ष्यं तन्मण्डलचतुष्टयम् ।
स्वसंवेद्यं प्रजायेत महाभ्यासात्कथंचन ॥17॥

अर्थ: यह मंडलका चतुष्टय है सो अचिंत्य है अर्थात् चिंतवनमें नहीं आता तथा दुर्लक्ष्य है अर्थात् देखनेमें नहीं आता सो इस प्राणायामके बडे महान् अभ्याससे बडे कष्टसे कोई प्रकार स्वसंवेद्य (अपने अनुभवगोचर) होता है ।


तत्रादौ पार्थिवं ज्ञेयं वारुणं तदनन्तरम् ।
मरुत्पुरं ततः स्फीतं पर्यन्ते वह्निमण्डलम् ॥18॥

अर्थ: उन चारोंमेंसे प्रथम तो पार्थिव (पृथ्वीमंडल) को जानना, तत्पश्चात् वरुणमंडल (अप्मंडल) जानना, तत्पश्चात् पवनमंडल जानना और अन्तमें बढे हुए वह्निमंडलको जानना; इस प्रकार चारोंके नाम और अनुक्रम हैं ।


क्षितिबीजसमाक्रान्तं द्रुतहेमसमप्रभम् ।
स्याद्वज्रलाञ्छनोपेतं चतुरस्रं धरापुरम् ॥19॥

अर्थ: क्षितिबीज जो पृथ्वीका बीजाक्षर उस सहित गाले हुए सुवर्णकी समान पीतरक्तप्रभा जिसकी है और जो वज्रके चिह्नसंयुक्त चौकोर है वह धरापुर अर्थात् पृथ्वीमंडल है ।


अर्द्धचन्द्रसमाकारं वारुणाक्षरलक्षितम् ।
स्फुरत्सुधाम्बुसंसिक्तं चन्द्राभं वारुणं पुरम् ॥20॥

अर्थ: आकार तो आधे चन्द्रमाके समान, वारुण बीजाक्षरसे चिह्नित और स्फुरायमान अमृतस्वरूप जलसे सींचा हुआ ऐसा चन्द्रमा सरीखा शुक्लवर्ण वरुणपुर है । यह अप्मंडलका स्वरूप कहा ।


सुवृत्तं बिंदुसंकीर्णं नीलाञ्जनघनप्रभम् ।
चञ्चलं पवनोपेतं दुर्लक्ष्यं वायुमण्डलम् ॥21॥

अर्थ: सुवृत्त कहिये गोलाकार तथा बिंदुओं सहित नीलाञ्जन घनके समान है वर्ण जिसका, तथा चंचल (बहता हुआ) पवन बीजाक्षर सहित दुर्लक्ष्य (देखनेमें न आवे) ऐसा वायुमंडल है । यह पवनमंडलका स्वरूप कहा ।


स्फुलिङ्गपिङ्गलं भीममूर्ध्वज्वालाशतार्चितम् ।
त्रिकोणं स्वस्तिकोपेतं तद्बीजं वह्निमण्डलम् ॥22॥

अर्थ: अग्निके फुलिंगा समान पिंगलवर्ण, भीम रौद्ररूप ऊर्ध्वगमनस्वरूप सैकडों ज्वालाओं सहित, त्रिकोणाकार स्वस्तिक (साथिये) सहित, वह्निबीजसे मंडित ऐसा वह्निमंडल है । यह अग्निमंडलका स्वरूप कहा गया ।


ततस्तेषु क्रमाद्वायुः संचरत्यविलम्बितम् ।
स विज्ञेयो यथाकालं प्रणिधानपरैर्नरैः ॥23॥

अर्थ: उपर्युक्त चार मंडलोंका स्वरूप निश्चय किया उसके अनन्तर लगता ही यह जानो कि उन मंडलोंमें अनुक्रमसे निरन्तर पवन संचरे है उसे यथाकाल अर्थात् जैसा काल है उस ही कालमें प्रणिधान कहिये चिंतवनमें तत्पर ऐसे पुरुषोंको जानना चाहिये ।


घोणाविवरमापूर्य किञ्चिदुष्णं पुरन्दरः ।
वहत्यष्टाङ्गुलः स्वस्थः पीतवर्णः शनैः शनैः ॥24॥

अर्थ: नासिकाके छिद्रको भले प्रकार भरके कुछ उष्णता लिये आठ अंगुल बाहर निकलता, स्वस्थ, चपलता रहित, मंदमंद बहता, ऐसा पुरंदर कहिये इन्द्र जिसका स्वामी है ऐसे पृथ्वीमंडलके पवनको (इन चिह्नोंसे) जानना ।


त्वरितः शीतलोऽधस्तात्सितरुक् द्वादशाङ्गुलः ।
वरुणः पवनस्तज्ज्ञैर्वहनेनावसीयते ॥25॥

अर्थ: जो त्वरित कहिये शीघ्र बहनेवाला हो, कुछ नीचाई लिये बहता हो, शीतल हो, उज्ज्वल (शुक्ल) दीप्तिरूप हो, तथा बारह अंगुल बाहर आवे ऐसे पवनको, पवनके जाननेवालोंने वरुण पवन निश्चय किया है ।


तिर्यग्वहत्यविश्रान्तः पवनाख्यः षडङ्गुलः ।
पवनः कृष्णवर्णोऽसौ उष्णः शीतश्च लक्ष्यते ॥26॥

अर्थ: जो पवन सब तरफ तिर्यक् बहता हो, विश्राम न लेकर निरन्तर बहता ही रहे तथा छः अंगुल बाहर आवे, कृष्णवर्ण हो, उष्ण हो तथा शीत भी हो ऐसा पवनमंडल संबंधी पवन पहचाना जाता है ।


बालार्कसन्निभश्चोर्ध्वं सावर्त्तश्चतुरङ्गुलः ।
अत्युष्णो ज्वलनाभिख्यः पवनः कीर्त्तितो बुधैः ॥27॥

अर्थ: जो ऊगते हुए सूर्यके समान रक्तवर्ण हो तथा ऊँचा चलता हो, आवर्तों (चक्रों) सहित फिरता हुआ चले, चार अंगुल बाहर आवे और अति उष्ण हो ऐसा अग्निमंडलका पवन पंडितोंने कहा है ।


स्तम्भादिके महेन्द्रो वरुणः शस्तेषु सर्वकार्येषु ।
चलमलिनेषु च वायुर्वश्यादौ वह्निरुद्देश्यः ॥28॥

अर्थ: पुरुषको स्तंभनादि कार्य करने हो तो महेन्द्र कहिये पृथ्वीमंडलका पवन शुभ है, और वरुण कहिये अप् मंडलका पवन समस्त प्रकारके उत्तम कार्योंमें शुभ है, और पवनमंडलका पवन चलकार्य तथा मलिन कार्योंमें श्रेष्ठ है, तथा वश्य आदि कार्योंमें वह्निमंडलका पवन उत्तम कहा है ।


छत्रगजतुरगचामररामाराज्यादिसकलकल्याणम् ।
माहेन्द्रो वदति फलं मनोगतं सर्वकार्येषु ॥29॥

अर्थ: माहेन्द्रपवन छत्र गज तुरंग चामर स्त्री राज्यादिक समस्त कल्याणोंको कहता है और समस्त कार्योंमें मनोगत भावको प्रकट कहता है ।


अभिमतफलनिकुरम्बं विद्यावीर्यादिभूतिसंकीर्णम् ।
सुतयुवतिवस्तुसारं वरुणो योजयति जन्तूनाम् ॥30॥

अर्थ: वरुण पवन जीवोंके विद्यावीर्यादि विभूति सहित तथा पुत्रस्त्री आदिमें जो सारवस्तु मनोवांछित हो उन सबको जोडता है अर्थात् प्राप्त कराता है ।


भयशोकदुःखपीडा-विघ्नौघपरम्परां विनाशं च ।
व्याचष्टे देहभृतां दहनो दाहस्वभावोऽयम् ॥31॥

अर्थ: यह अग्निमंडलका पवन दाहस्वभावरूप है । यह पवन जीवोंके भय शोक दुःख पीडा तथा विघ्नसमूहकी परंपरा तथा विनाशादिक कार्योंको प्रगट कहता है ।


सिद्धमपि याति विलयं सेवाकृष्यादिकं समस्तमपि चैव ।
मृत्युभयकलहवैरं पवने त्रासादिकं च स्यात् ॥32॥

अर्थ: तथा पवनमंडलके पवन बहने पर सेवा कृषि आदिक समस्त कार्य सिद्ध हुये हो वे भी विलय हो जाते हैं (नष्ट हो जाते हैं ) तथा मृत्यु भय कलह वैर तथा त्रासादिक होते हैं ।


सर्वे प्रवेशकाले कथयन्ति मनोगतं फलं पुंसाम् ।
अहितमतिदुःखनिचितं त एव निःसरणवेलायाम् ॥33॥

अर्थ: ये चारों ही पवन प्रवेशकालमें अर्थात् नासिकाके बाहरसे आकर उल्टा प्रवेश करते हैं तो पुरुषोंके मनोगत फलको कहते है अर्थात् मनमें विचारे सो सिद्ध होता है । परन्तु ये ही चारों पवन निकलनेके समय अतिशय दुःखसे भरे अहितको प्रकाश करते हैं ।


सर्वेऽपि प्रविशन्तो रविशशिमार्गेण वायवः सततम् ।
विदधति परां सुखास्थां निर्गच्छन्तो विपर्यस्ताम् ॥34॥

अर्थ: ये चारों ही पवन सूर्य चंद्रमाके मार्गसे अर्थात् दाहिने बायें निरंतर प्रवेश करते हुए उत्कृष्ट सुखकी आस्थाको करते हैं और निकलते समय दुःखावस्थाको प्रगट करते हैं ।


वामेन प्रविशन्तौ वरुणमहेन्द्रो समस्तसिद्धिकरौ ।
इतरेण निःसरन्तौ हुतभुक्पवनौ विनाशाय ॥35॥

अर्थ: तथा वरुण और माहेन्द्र पवन (पृथ्वीपवन) बायीं तरफ प्रवेश करते हैं तो समस्त कार्योंके सिद्ध करनेवाले है तथा वह्निमण्डल और पवनमंडलके पवन दाहिनी तरफ निकलते हुए विनाशके अर्थ हैं ।


अथ मण्डलेषु वायोः प्रवेशनिःसरणकालमवगम्य ।
उपदिशति भुवनवस्तुषु विचेष्टितं सर्वथा सर्वम् ॥36॥

अर्थ: अथवा चारों मंडलोंमें पवनके प्रवेश और निःसरणकालको निश्चय करके ध्यानी पुरुष जगत् भरमें जो पदार्थ हैं उन सबकी सर्व प्रकारकी चेष्टाओंका उपदेश करता है ।


वामायां विचरन्तौ दहनसमीरौ तु मध्यमौ कथितौ ।
वरुणेन्द्रावितरस्यां तथाविधावेव निर्दिष्टौ ॥37॥

अर्थ: अग्निमंडलका पवन और वायुमंडलका पवन बायीं तरफसे बहता हुआ मध्यमफल कहता है और वरुण तथा माहेन्द्र ये दोनों पवन दाहिनी तरफसे बहे तो मध्यमफल कहते हैं ।


उदये वामा शस्ता सितपक्षे दक्षिणा पुनः कृष्णे ।
त्रीणि त्रीणि दिनानि तु शशिसूर्यस्योदयः श्लाघ्यः ॥38॥

अर्थ: शुक्लपक्षमें सूर्योदयके समय नाडी बायीं तरफ बहती हुई प्रशस्त है, उत्तम है । कृष्णपक्षमें उदयकालमें दाहिनी तरफ बहती हुई नाडी श्रेष्ठ है । इस प्रकार तीन-तीन दिन चन्द्रमा और सूर्यका उदय सराहा है ।


उदयश्चन्द्रेण हितः सूर्येणास्तं प्रशस्यते वायोः ।
रविणोदये तु शशिना शिवमस्तमनं सदा नृणाम् ॥39॥

अर्थ: तथा पवनका उदय चन्द्रमाके स्वरसे (बायें स्वरसे) शुभ है और अस्त सूर्यस्वर अर्थात् दाहिने स्वरसे प्रशस्त कहा है और सूर्य (दाहिने) उदय हो तो शशि कहिये बायें स्वरसे अस्त होना जीवोंको सदा कल्याणकारी (शुभ) है ।


सितपक्षे रव्युदये प्रतिपद्दिवसे समीक्ष्यते सम्यक् ।
शस्तेतरप्रचारौ वायोर्यत्नेन विज्ञानी ॥40॥

अर्थ: पवनका प्रचार (चलना) शुक्लपक्षमें सूर्यके उदयमें प्रतिपदाके दिन विज्ञानी सम्यक् प्रकार यत्नसे शुभ-अशुभ दोनोंको विचारे-देखे ।


व्यस्तः प्रथमे दिवसे चित्तोद्वेगाय जायते पवनः ।
धनहानिकृद्द्वितीये प्रवासदः स्यात्तृतीयेऽह्नि ॥41॥

अर्थ: पवन प्रथम दिवसमें व्यस्त कहिये विपरीत बहे तो चित्तको उद्वेग होता है और दूसरे दिन विपरीत बहे तो धनकी हानिका सूचन करता है, तीसरे दिन विपरीत चले तो परदेश गमन कराता है ।


इष्टार्थनाशविभ्रमस्वपदभ्रंशास्तथा महायुद्धम् ।
दुःखं च पञ्च दिवसैः क्रमशः संजायते त्वपरैः ॥42॥

अर्थ: और पाँच दिन तक विपरीत चले तो क्रमसे इष्ट प्रयोजनका नाश, विभ्रम, अपने पदसे भ्रष्ट होना, महायुद्ध और दुःख ये पाँच फल होते हैं । तथा इसी प्रकार अगले अगले पाँच-पाँच दिनका फल विपरीत अर्थात् अशुभ जानना ।


वामा सुधामयी ज्ञेया हिता शश्वच्छरीरिणाम् ।
संहर्त्री दक्षिणा नाडी समस्तानिष्टसूचिका ॥43॥

अर्थ: जीवोंके बायीं नाडी (चन्द्रस्वर या बाया स्वर) अमृतमयी सदा हितकारी जाननी और दाहिनी नाडी (सूर्यनाडी) समस्त अहितकी कहनेवाली संहारस्वरूप जाननी ।


अमृतमिव सर्वगात्रं प्रीणयति शरीरिणां ध्रुवं वामा ।
क्षपयति तदेव शश्वद्वहमाना दक्षिणा नाडी ॥44॥

अर्थ: बायीं नाडी निरन्तर बहती हुई जीवोंके समस्त शरीरको अमृतके समान तृप्त करती है । और दाहिनी नाडी निरन्तर बहती हुई शरीरको क्षीण करती है ।


संग्रामसुरतभोजनविरुद्धकार्येषु दक्षिणेष्टा स्यात् ।
अभ्युदयहृदयवाञ्छितसमस्तशस्तेषु वामैव ॥45॥

अर्थ: संग्राम, कामक्रीडा, भोजन आदि विरुद्ध कार्योंमें तो दाहिनी नाडी इष्ट (शुभ) है और अभ्युदय और मनोवांछित समस्त शुभकार्योंमें बायीं नाडी शुभ है ।


नेष्टघटनेऽसमर्था राहुग्रहकालचन्द्रसूर्याद्याः ।
क्षितिवरुणौ त्वमृतगतौ समस्तकल्याणदौ ज्ञेयौ ॥46॥

अर्थ: पृथ्वीमंडल और वरुणमंडल ये दोनों पवन अमृतगति कहिये चन्द्रस्वर (बायीं नाडी) में बहें तो ग्रहकाल चन्द्रमासूर्य आदिक अनिष्ट करनेमें समर्थ नहीं होते । समस्त कल्याणकी देनेवाली ये दोनों नाडी होती हैं ।


पूर्णे पूर्वस्य जयो रिक्ते त्वितरस्य कथ्यते तज्ज्ञैः ।
उभयोर्युद्धनिमित्ते दूतेनाशंसिते प्रश्ने ॥47॥

अर्थ: कोई दूत आकर युद्धके निमित्त भरे सुरमें प्रश्न करे तो पहिले पूछनेवालेकी जीत हो, और रिक्तस्वर (खाली स्वर) में पूछे तो दूसरेकी जय हो और दोनों चले तो दोनोंकी जय हो ।


ज्ञातुर्नाम प्रथमं पश्चाद्यद्यातुरस्य गृह्णाति ।
दूतस्तदेष्टसिद्धिस्तद्व्यस्ते स्याद्विपर्यस्ता ॥48॥

अर्थ: कोई प्रश्न करता दूत यदि प्रथम ही ज्ञाताका नाम लेकर तत्पश्चात् आतुरका नाम ले तो इष्टकी सिद्धि होती है और इससे विपरीत रोगीका नाम पहिले और ज्ञाताका नाम पीछे ले तो इष्टकी सिद्धि नहीं हैं ।


जयति समाक्षरनामा वामावाहस्थितेन दूतेन ।
विषमाक्षरस्तु दक्षिणदिक्संस्थेनास्त्रसंपाते ॥49॥

अर्थ: दूत आकर जिसके लिये पूछे उसके नामके अक्षर सम (दो चार छह इत्यादि) हों और बायीं नाडी बहती हुई की तरफ खडा होकर पूछे तो वह शस्त्रपातके होते हुए भी जीते और जिसके नामके विषमाक्षर हों अर्थात् एक तीन पाँच इत्यादि हों और दाहिनी नाडी बहती हुईमें खडा रह कर पूछे तो उसकी भी जीत हो, इस प्रकार जय पराजयके प्रश्नका उत्तर कहें ।


भूतादिगृहीतानां रोगार्त्तानां च सर्पदष्टानां ।
पूर्वोक्त एव च विधिर्बोद्धव्यो मान्त्रिकावश्यम् ॥50॥

अर्थ: जो कोई मंत्रवादीको दूत आकर पूछे कि अमुक भूतादिकसे गृहीत है तथा अमुक रोगसे पीडित है अथवा सर्पने काटा है तो पूर्वोक्त विधि ही जाननी। यह अवश्य है कि समअक्षरवालेका बायीं नाडीके चलते हुए पूछना शुभ है और विषमाक्षरवालेका दाहिनी बहती हुई नाडीमें पूछना शुभ है ।


पूर्णे वरुणे प्रविशति यदि वामा जायते क्वचित्पुण्यैः ।
सिद्ध्यन्त्यचिन्तितान्यपि कार्याण्यारभ्यमाणानि ॥51॥

अर्थ: वरुणमंडलका पवन पूर्ण होकर प्रवेश होते हुए यदि किसी पुण्योदयसे बायीं नाडी चले तो अनचिन्ते कार्यके प्रारंभ करनेमें भी सिद्धि होती है अर्थात् शुभ है ।


जयजीवितलाभाद्या येऽर्थाः पूर्वं तु सूचिताः शास्त्रे ।
स्युस्ते सर्वेऽप्यफला मृत्युस्थे मरुति लोकानाम् ॥52॥

अर्थ: जो पदार्थ पहिले जय जीवित लाभादिक शास्त्रमें सूचित किये अर्थात् कहे हैं वे यदि मृत्युके समय (श्वास नष्ट हुआ तथा टूटता हुआ) हों तो सब ही निष्फल हैं, अर्थात् इससे मरण ही निश्चय करना ऐसा तात्पर्य है ।


अनिलमवबुध्य सम्यक्पुष्पं हस्तात्प्रपातयेज्ज्ञानी ।
मृतजीवितविज्ञाने ततः स्वयं निश्चयं कुरुते ॥53॥

अर्थ: पवनको सम्यक्प्रकारसे निश्चय करके ज्ञानीपुरुष अपने हाथसे पुष्प डाले उससे मृत जीवितका विज्ञान स्वयं निश्चय करता है ।


वरुणे त्वरितो लाभश्चिरेण भौमे तदर्थिने वाच्यम् ।
तुच्छतरः पवनाख्ये सिद्धोऽपि विनश्यते वह्नौ ॥54॥

अर्थ: वरुण पवनके होनेपर त्वरित (शीघ्र) ही लाभ कहें, और पृथ्वी पवन हो तो बहुत कालसे लाभ कहे और पवन मंडलका पवन हो तो थोडा लाभ कहे और अग्निका पवन हो तो सिद्ध हुआ लाभ भी नाशको प्राप्त होता है, ऐसे कहना ।


आयाति गतो वरुणे भौमे तत्रैव तिष्टति सुखेन ।
यात्यन्यत्र श्वसने मृत इति वह्नौ समादेश्यम् ॥55॥

अर्थ: कोई परदेश गये हुएका प्रश्न करे तो उसको इस प्रकार कहना - प्रश्न करनेवाला यदि वरुणपवनमें प्रश्न करे तो गया हुआ मनुष्य आता है ऐसा कहना और पृथ्वीतत्त्वमें प्रश्न करे तो वहाँ ही रहता है और पवनतत्त्वमें पूछे तो जहाँ रहता था वहाँसे कहीं अन्यत्र गया है और वह्नितत्त्वमें पूछे तो मरणको प्राप्त हुआ ऐसा कहना चाहिये ।


घोरतरः संग्रामो हुताशने मरुति भङ्ग एव स्यात् ।
गगने सैन्यविनाशं मृत्युर्वा युद्धपृच्छायाम् ॥56॥

अर्थ: युद्धके प्रश्नमें अग्नितत्त्वमें तो तीव्रसंग्राम तथा वायुतत्त्वमें भंग होना कहे और आकाशतत्त्वमें सेनाका विनाश अथवा मृत्यु कहे ।


ऐन्द्रे विजयः समरे ततोऽधिको वाञ्छितश्च वरुणे स्यात् ।
सन्धिर्वा रिपुभङ्गात्स्वसिद्धिसंसूचनोपेतः ॥57॥

अर्थ: तथा पृथ्वीतत्त्वमें संग्राममें विजय कहे और वरुण पवनमें वांछितसे भी अधिक जय कहे अथवा सन्धि होना कहे तथा शत्रुके भंग होनेसे अपनी सिद्धिकी सूचना सहित कहे ।


वर्षति भौमे मघवान्वरुणेऽभिमतो मतस्तथाजस्रम् ।
दुर्दिनघनाश्च पवने वह्नौ वृष्टिः कियन्मात्रा ॥58॥

अर्थ: पृथ्वीतत्त्वमें तो मेघ वर्षना कहे, अप्तत्वमें मनोवांछित मेह निरन्तर बरसेगा ऐसा कहे; पवनतत्त्वमें दुर्दिन होगा, बादल होगा ऐसा कहे और वह्नितत्त्वमें किंचिन्मात्र वृष्टि होना कहे ।


सस्यानां निष्पत्तिः स्याद्वरुणे पार्थिवि च सुश्लाघ्या ।
स्वल्पापि न चाग्नेये वाय्वाकाशे तु मध्यस्था ॥59॥

अर्थ: कोई मनुष्य धान्य निष्पत्ति (उत्पन्न होने, न होने) का प्रश्न करे तो वरुण पवनमें और पृथ्वी पवनमें तो धान्यकी उत्पत्ति अच्छी होगी ऐसा कहे और अग्निपवनमें स्वल्प भी न होगी ऐसा कहे और वायुतत्त्वमें व शून्य (आकाशतत्त्व)में मध्यस्थ होगी ऐसा कहे ।


नृपतिगुरुबन्धुवृद्धा अपरेऽप्यभिलषितसिद्धयेः लोकाः ।
पूर्णाङ्गे कर्त्तव्या विदुषा वीतप्रपञ्चेन ॥60॥

अर्थ: यहाँ वशीकरण प्रयोग है-सो राजा गुरु बन्धु वृद्धपुरुष तथा अन्य लोग भी अपने वांछितके लिये वश करने हो तो पूर्णाङ्ग कहिये भरे स्वरमें प्रपंचरहित पंडित पुरुषोंको चाहिये कि वशीकरणप्रयोग करे।


शयनासनेषु दक्षैः पूर्णाङ्गनिवेशितासु योषासु ।
ह्रियते चेतस्त्वरितं नातोऽन्यद्वश्यविज्ञानम् ॥61॥

अर्थ: प्रवीण पुरुषोंके द्वारा भरे स्वरमें निवेशित की हुई स्त्रियोंके चित्त त्वरित ही हरे जाते हैं। इससे अन्य वश करनेका कोई भी विज्ञान उत्तम नहीं है ।


अरिऋणिकचौरदुष्टा अपरेऽप्युपसर्गविग्रहाद्याश्च ।
रिक्ताङ्गे कर्त्तव्या जयलाभसुखार्थिभिः पुरुषैः ॥62॥

अर्थ: तथा शत्रु, ऋणवाला, चौर, दुष्ट पुरुष तथा अन्य भी ऐसे लोक वश करने तथा उपसर्ग युद्ध इत्यादि कार्य जीतलाभसुखके अर्थियोंको रीते स्वरमें करने चाहिये ।


रिपुशस्त्रसंप्रहारे रक्षति यः पूर्णगात्रभूभागम् ।
बलिभिरपि वैरिवर्गैर्न भेद्यते तस्य सामर्थ्यम् ॥63॥

अर्थ: शत्रुके शस्त्रप्रहार होते समय अपना जो स्वर भरा हो उस स्वरकी तरफ वैरी रहे तो उस पुरुषकी सामर्थ्य बलवान् शत्रुसे भी भेदी नहीं जा सकती।


वरुणमहेन्द्रौ शस्तौ प्रश्ने गर्भस्य पुत्रदौ ज्ञेयौ ।
इतरौ स्त्रीजन्मकरौ शून्यं गर्भस्य नाशाय ॥64॥

अर्थ: वरुण और महेन्द्र इन दोनों पवनोंमें प्रश्न हों तो पुत्र जन्मेगा और अग्नि तथा वायुतत्त्वमें प्रश्न हो तो कन्या होगी और रीते स्वरमें प्रश्न हो तो गर्भ नष्ट हो जायगा ऐसा कहे ।


नासाप्रवाहदिग्भागे गर्भार्थं यस्तु पृच्छति ।
पुरुषः पुरुषादेशं शून्यभागे तथाङ्गना ॥65॥

अर्थ: जिस तरफका स्वर चलता हो उसी तरफ होंकर प्रश्न करे और वह प्रश्न करनेवाला पुरुष हो तो पुत्र होना कहें और शून्य भाग अर्थात् रीते स्वरकी तरफ होकर प्रश्न करे तो पुत्री होना कहे ६५॥


विज्ञेयः सम्मुखे षण्ढः सुषुम्नायामुभौ शिशू ।
गर्भहानिस्तु संक्रान्तौ समे क्षेमं विनिर्दिशेत् ॥66॥

अर्थ: यदि सन्मुख होकर प्रश्न करे तो नपुंसक सन्तान होगी ऐसा कहे तथा दोनों नासिका पूर्ण भरी हुईमें पूछें तो दो बालक होना कहे। पवनके संक्रम (पलटने) के समय पूछे तो गर्भकी हानि कहे और दोनों तरफ पवन सम बहती हुईमें पूछे तो क्षेम कुशल कहे ।


ज्ञायेत यदि न सम्यग्मरुत्तदा बिन्दुभिः स निश्चेयः ।
सितपीतारुणकृष्णैर्वरुणावनिपवनदहनोत्थैः ॥67॥

अर्थ: जो कदाचित् पवन भले प्रकार जाननेमें नहीं आवे तो फिर श्वेत पीत रक्त कृष्ण बिंदुओंसे निश्चय करना। वे बिन्दु वरुणसे उत्पन्न हुए तो सफेद होते हैं, पृथ्वीसे उत्पन्न हुए पीत(पीले) तथा पवनसे रक्त और अग्निसे काले उत्पन्न होते हैं ।


कर्णाक्षिनासिकापुटमङ्गुष्ठप्रथममध्यमाङ्गुलिभिः ।
द्वाभ्यां च पिधाय मुखं करणेन हि दृश्यते बिन्दुः ॥68॥

अर्थ: कान नेत्र नासिका इनको क्रमसे दोनों अंगूठे दोनों प्रथम अंगुली तथा दोनों मध्यमा अंगुलियोंसे बंद करके ढक करके मुखको भी शेष दोनों अंगुलियोंसे बंद कर ले। तत्पश्चात् मनसे देखने पर चारों प्रकारकी पवनोंके बिंदुओंमेंसे जिस प्रकारका बिंदु दीखे वही पवन ज़ानना ।


दक्षिणामथवा वामां यो निषेद्धुं समीप्सति ।
तदङ्गं पीडयेदन्यां नासानाडीं समाश्रयेत् ॥69॥

अर्थ: दाहिनी अथवा बायीं नाडीका निषेध करना (बदलना) चाहे, तो उस नाडीके अंगको पीडे तथा दाबे तो दूसरी नाडीका आश्रय करे अर्थात् दाहिनी से बायीं हो जाय और बायीं से दाहिनी हो जाय ।


अग्रे वामविभागे चन्द्रक्षेत्रं वदन्ति तत्त्वविदः ।
पृष्टे च दक्षिणाङ्गे रवेस्तदेवाहुराचार्याः ॥70॥

अर्थ: अग्र कहिये सन्मुख और बायीं तरफका भाग तो चन्द्रमाका क्षेत्र है और पिछला और दाहिना भाग सूर्यका क्षेत्र है इस प्रकार तत्त्वके जाननेवाले आचार्यगण कहते हैं ।


अवनिवनदहनमंडलविचलनशीलस्य तावदनिलस्य ।
गति ऋजुरेव मरुत्पुरविहारिणः सा तिरश्चीना ॥71॥

अर्थ: पृथ्वी जल अग्नि मंडलमें विहार करनेवाली पवनकी गति तो सरल है और पवन मंडलमें विहार करनेवाली गति तिरछी (वक्र) है ।


पवनप्रवेशकाले जीव इति प्रोच्यते महामतिभिः ।
निष्क्रमणे निर्जीवः फलमपि च तयोस्तथा ज्ञेयम् ॥72॥

अर्थ: किसी छिपी वस्तुके विषयमें प्रश्न करें तो पवनके प्रवेशकालमें तो जीव है ऐसा कहना चाहिये और पवनके निकलते हुए कालमें प्रश्न करे तो निर्जीव है ऐसा बडे बुद्धिमान् पुरुषोंने कहा है तथा इनका फल भी वैसा ही कहा जाता है ।


जीवे जीवति विश्वं मृते मृतं सूरिभिः समुद्दिष्टम् ।
सुखदुःखजयपराजयलाभालाभादिमार्गोऽयम् ॥73॥

अर्थ: जो पवनके प्रवेशकालमें जीव कहा सो जीते हुए समस्त वस्तु भी जीवित कहना और पवनके निकलते हुए मृतक कहा हो तो समस्त वस्तु निर्जीव ही कहना चाहिये । तथा सुख दुःख जय पराजय लाभ अलाभ आदिका भी यही मार्ग है ।


संचरति यदा वायुस्तत्त्वात्तत्त्वान्तरं तदा ज्ञेयम् ।
यत्त्यजति तद्धि रिक्तं तत्पूर्णं यत्र संक्रमति ॥74॥

अर्थ: जिस समय पवन है सो एक तत्त्वसे अन्य तत्त्वमें संचरता हो उस समय जिसको छोडे सो तो रिक्तपवन कहा जाता है और जिसमें संचरें उसको पूर्ण कहा जाता है ।


ग्रामपुरयुद्धजनपदगृहराजकुलप्रवेशनिःकाशे ।
पूर्णाङ्गपादमग्रे कृत्वा व्रजतोऽस्य सिद्धिः स्यात् ॥75॥

अर्थ: ग्राम पुर युद्ध देश घर राजमंदिरमें प्रवेश करना अथवा वहाँसे निकलना हो तो उस समय जिस तरफका स्वर भरा हुआ हो उस तरफका पाँव पहिले रखकर चले तो उसके कार्यकी सिद्धि होती है।


कुर्वीत पूरके सत्याकृष्टिं कुम्भके तथा स्तम्भम् ।
उच्चाटनं च योगी रेचकविज्ञानसामर्थ्यात् ॥76॥

अर्थ: पवनको साधनेवाला योगी है सो पूरकके होते तो आकर्षण करता है और कुम्भकके होते स्तंभन करता है और रेचकके विज्ञानकी सामर्थ्यसे उच्चाटन करता है ।


इदमखिलं श्वसनभवं सामर्थ्यं स्यान्मुनेर्ध्रुवं तस्य ।
यो नाडिकाविशुद्धिं सम्यक् कर्त्तुं विजानाति ॥77॥

अर्थ: यह सब पवनसे उत्पन्न हुआ सामर्थ्य है सो उस मुनिके ही होता है कि जो नाडिका कहिये पवनकी विशुद्धताके प्रचारका चलना नासिकाके द्वारसे निकलने प्रवेश करने आदिको भले प्रकार विशुद्ध करनेके लिये विशेषकर जानता है ।


यद्यपि समीरचारश्चपलतरो योगिभिः सुदुर्लक्ष्यः ।
जानाति विगततन्द्रस्तथाऽपि नाड्यां कृताभ्यासः ॥78॥

अर्थ: यद्यपि पवनका प्रचार है सो अतिशय चपल है, योगीश्वरोंको भी दुर्लक्ष्य है अर्थात् लखनेमें नहीं आता, तथापि योगी निष्प्रमाद होकर अति यत्नसे नाडीमें अभ्यास करनेसे इसके प्रचार (संचार) को जान सकता है ।


सकलं बिन्दुसनाथं रेफाक्रान्तं हवर्णमनवद्यम् ।
चिन्तयति नाभिकमले सुबन्धुरं कर्णिकारूढम् ॥79॥

अर्थ: चंद्रकला सहित बिंदुसंयुक्त रेफसे व्याप्त ऐसा हकार अर्थात् र्हँ ऐसा अक्षर निष्पाप मनोज्ञ नाभिकमलकी कर्णिकामें आरूढ है ऐसा चिंतवन करे ।


रेचयति ततः शीघ्रं पतङ्गमार्गेण भासुराकारम् ।
ज्वालाकलापकलितं स्फुलिङ्गमालाकराक्रान्तम् ॥80॥

अर्थ: भासुराकार देदीप्यमान ज्वालासमूहसे संयुक्त स्फुलिंगोंकी पंक्तिके किरणोंसे व्याप्त ऐसे सूर्यके मार्गसे अर्थात् दाहिनी नाडीसे रेचन करे अर्थात् बाहर निकाले - तत्पश्चात् वह वर्ण चंचल बिजलीके वेगकी समान वेगवाला और धूमकी शिखाके आवर्त्तसे जिसने दिशाओंको रोका है, देव दैत्योंके द्वारा भी थांमनेमें नहीं आवे ऐसे वेगसे आकाशमें गमन करता हुआ चिंतवन करे ॥८०-८१॥


तरलतडिदुग्रवेगं धूमशिखावर्त्तरुद्धदिक्चक्रम् ।
गच्छन्तं गगनतले दुर्द्धर्षं देवदैत्यानाम् ॥81॥

अर्थ: भासुराकार देदीप्यमान ज्वालासमूहसे संयुक्त स्फुलिंगोंकी पंक्तिके किरणोंसे व्याप्त ऐसे सूर्यके मार्गसे अर्थात् दाहिनी नाडीसे रेचन करे अर्थात् बाहर निकाले - तत्पश्चात् वह वर्ण चंचल बिजलीके वेगकी समान वेगवाला और धूमकी शिखाके आवर्त्तसे जिसने दिशाओंको रोका है, देव दैत्योंके द्वारा भी थांमनेमें नहीं आवे ऐसे वेगसे आकाशमें गमन करता हुआ चिंतवन करे ॥८०-८१॥


शरदिन्दुधामधवलं गगनतलान्मन्दमन्दमवतीर्णम् ।
क्षरदमृतमिव सुधांशोः पूरयति यथा पुनः पुरतः ॥82॥

अर्थ: तत्पश्चात् वही वर्ण शरदके चन्द्रमाकी कान्तिके समान धवल आकाशतलसे मंद-मंद उतरता हुआ चन्द्रमाके मार्गसे अर्थात् वामस्वरसे जैसे अमृत झरे वैसे फिर भी नाभिकमलमें पूरण करे अर्थात् आकाशसे उतार कर नाभिकमलमें धारण करे ।


आनीय नाभिकमलं निवेश्य तस्मिन्पुनः पुनश्चैव ।
अनलसमनसा कार्यं प्रवेशनिःसरणमनवरतम् ॥83॥

अर्थ: नाभिकमलमें लानेके पश्चात् उस नाभिकमलमें ही स्थापन करके उसमें ही आलस्यरहित मनसे प्रवेश निःसरण निरंतर वारंवार करना, इस कार्यके करनेमें मनमें प्रमाद न लाना, सावधानी रखना ।


अथ नाभिपुण्डरीकाच्छनैः शनैर्हृदयकमलनालेन ।
निःसारयति समीरं पुनः प्रवेशयति सोद्योगम् ॥84॥

अर्थ: तत्पश्चात् नाभिकमलसे हृदयरूप कमलकी नालसे धीरे-धीरे पवनको उद्यमसहित निकाले और प्रवेश करावे ।


नाडीशुद्धिं कुरुते दहनपुरं दिनकरस्य मार्गेण ।
निष्क्रामद्विशदिंदोः पुरमितरेणेति केऽप्याहुः ॥85॥

अर्थ: कोई-कोई आचार्य इस प्रकार कहते हैं कि अग्निमंडलका पवन है सो सूर्यके मार्ग (दाहिने स्वर) से निकलता और वरुणमंडलसंबंधी पवन चन्द्रमाके मार्ग (बाये स्वर) से प्रवेश करता नाडीकी शुद्धताको करता है ।


इति नाडिकाविशुद्धिपरिकलिताभ्यासकौशलो योगी ।
आत्मेच्छयैव घटयति पुटयोः पवनं क्षणार्द्धेन ॥86॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकारसे नाडीकी विशुद्धतामें भले प्रकार अभ्यास करनेमें प्रवीण योगी पवनको नासिकाके छिद्रोंमें अपनी इच्छासे ही आधे क्षण मात्रमें बना सकते हैं । नाडीमें अभ्यास करनेसे पवनके प्रवेश निःसरण करनेमें योगी स्वाधीन हो जाता है अर्थात् सिद्ध हो जाता है ।


एकस्यामयमास्ते कालं नालीयुगद्वयं सार्द्धम् ।
तामुत्सृज्य ततोऽन्यामधितिष्ठति नालिकामनिलः ॥87॥

अर्थ: यह पवन है सो एक नाडीमें नालीद्वयसार्द्धं कहिये अढाई घडी तक रहता है, तत्पश्चात् उसे छोड अन्य नाडीमें रहता है, यह पवनके ठहरनेके कालका परिमाण है ।


षोडशप्रमितः कैश्चिन्निर्णीतो वायुसंक्रमः ।
अहोरात्रमिते काले द्वयोर्नाड्योर्यथा क्रमम् ॥88॥

अर्थ: किन्हीं-किन्हीं आचार्योंने दोनों नाडियोंमें एक अहोरात्र परिमाण कालमें पवनका संक्रम (पलटना) क्रमसे १६ बार होना निर्णय किया है ।


षट्शतान्यधिकान्याहुः सहस्राण्येकविंशतिम् ।
अहोरात्रे नरि स्वस्थे प्राणवायोर्गमागमौ ॥89॥

अर्थ: स्वस्थ मनुष्यके शरीरमें प्राणवायु श्वासोच्छ्वासका गमनागमन एक दिन और रात्रिमें इक्कीस हजार छः सौ बार होता है ।


संक्रान्तिमपि नो वेत्ति यः समीरस्य मुग्धधीः ।
स तत्त्वनिर्णयं कर्त्तुं प्रवृत्तः किं न लज्जते ॥90॥

अर्थ: जो मूर्खबुद्धि पुरुष इस पवनकी पलटनको नहीं जानता है और पवनका तत्त्व यथार्थरूप निर्णय करनेके लिये प्रवर्तता है सो लज्जित क्यों नहीं होता ?


अथ कौतूहलहेतोः करोति वेधं समाधिसामर्थ्यात् ।
सम्यग्विनीतपवनः शनैः शनैरर्कतूलेषु ॥91॥

अर्थ: इसके पश्चात् यदि कोई पवनाभ्यासी कौतूहलके लिये समाधि जो पवनके अभ्यासकी लय उसकी सामर्थ्यसे भले प्रकार जाना है पवन जिसने ऐसा पुरुष आकके तूल (रूई) में मंदमंदतासे वेध करे।


तत्र कृतनिश्चयोऽसौ जातीबकुलादिगन्धद्रव्येषु ।
स्थिरलक्ष्यतया शश्वत्करोति वेधं वितन्द्रात्मा ॥92॥

अर्थ: फिर उस आककी रूईमें किया है वेध जिसने ऐसा योगी है सो निष्प्रमादी होकर जातीपुष्प बकुल मौलश्रीके पुष्प आदि सुगंध द्रव्योंमें वेध करता है ।


कर्पूरकुंकुमागुरुमलयजकुष्टादिगन्धद्रव्येषु ।
वरुणपवनेन वेधं करोति लक्ष्ये स्थिराभ्यासः ॥93॥

अर्थ: फिर जिसने लक्ष्यमें अभ्यास किया है ऐसा योगी कपूर केशर अगर चंदन कूठ (कूड) आदि सुगन्धित द्रव्योंमें वरुण पवनसे वेध करता है ।


एतेषु लब्धलक्ष्यस्ततोऽपि सूक्ष्मेषु पत्रिकायेषु ।
वेधं करोति वायुप्रपञ्चसंयोजने चतुरः ॥94॥

अर्थ: इन पूर्वोक्त वस्तुओंमें वेधका लक्ष प्राप्त होनेपर योगी पवनके प्रपंचके संयोजनमें चतुर होता हुआ सूक्ष्म पक्षिकायिक जीवोंमें वेध करता है ।


मधुकरपतङ्गपत्रिषु तथाणुज्येष्ठेषु मृगशरीरेषु ।
संचरति जातलक्ष्यस्त्वनन्यचेता वशी धीरः ॥95॥

अर्थ: उत्पन्न हुआ है लक्ष्य जिसके ऐसा योगी अनन्यचित्त और जितेन्द्रिय धीरवीर एकाग्रचित्त होकर भ्रमर पतंगादि पक्षियोंमें तथा अंडज पक्षियोंमें और मृगपशुके शरीरमें संचार करता है ।


नरतुरगकरिशरीरे क्रमेण संचरति निःसरत्येव ।
पुस्तोपलरूपेषु च यदृच्छया संक्रमं कुर्यात् ॥96॥

अर्थ: तथा इस पवनाभ्यासका करनेवाला योगी क्रमसे मनुष्य, घोडे, हस्तीके शरीरमें अपनी इच्छानुसार संचार (प्रवेश) करता व निकलता रहता है, उसी प्रकार लेप और पाषाणमें भी प्रवेश और निःसरण करता है । इस प्रकार नियमसे इच्छानुसार संक्रमण करे ।


इति परपुरप्रवेशाभ्यासोत्थसमाधिपरमसामर्थ्यात् ।
विचरति यदृच्छयासौ मुक्त इवात्यन्तनिर्लेपः ॥97॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे परपुरके प्रवेश करनेके अभ्याससे उत्पन्न हुई समाधिके परम उत्कृष्ट सामर्थ्यसे योगी अपनी इच्छानुसार मुक्त आत्माके समान निर्लेप होकर विचरता है ।


कौतुकमात्रफलोऽयं परपुरप्रवेशो महाप्रयासेन ।
सिद्ध्यति न वा कथञ्चिन्महतामपि कालयोगेन ॥98॥

अर्थ: अथवा यह परपुरप्रवेश है सो कौतुक मात्र है फल जिसका ऐसा है, इसका पारमार्थिक फल कुछ भी नहीं है । और यह जो है सो महापुरुष बडे-बडे तपस्वियोंके भी बहुत कालमें प्रयास करनेसे भी सिद्ध नहीं होता, व्यर्थ ही प्रयास होता है । अर्थात् फल तो इसमें थोडा है और प्रयास बहुत है ।


स्मरगरलमनोविजयं समस्तरोगक्षयं वपुःस्थैर्यम् ।
पवनप्रचारचतुरः करोति योगी न सन्देहः ॥99॥

अर्थ: तथा पवनके प्रचार करनेमें चतुर योगी कामरूपी विषयुक्त मनको जीतता (वश करता) है अर्थात् उसकी कामवासना नष्ट हो जाती है, समस्त रोगोंका क्षय करके शरीरमें स्थिरता (दृढता) करता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।


जन्मशतजनितमुग्रं प्राणायामाद्विलीयते पापम् ।
नाडीयुगलस्यान्ते यतेर्जिताक्षरस्य वीरस्य ॥100॥

अर्थ: इस पवनके साधनरूप प्राणायामसे जीती हैं इन्द्रियाँ जिसने ऐसे धीर वीर यतिके सैकडो जन्मोंके संचित किये तीव्र पाप दो घडीके भीतर-भीतर लय हो जाते हैं ॥

सर्ग 30: प्रत्याहार धारणा वर्णन (श्लोक 1 से 14)

समाकृष्येन्द्रियार्थेभ्यः साक्षं चेतः प्रशान्तधीः ।
यत्र यत्रेच्छया धत्ते स प्रत्याहार उच्यते ॥1॥

अर्थ: जो प्रशान्तबुद्धि विशुद्धतायुक्त मुनि अपनी इन्द्रियाँ और मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे खींचकर जहाँ-जहाँ अपनी इच्छा हो, तहाँ-तहाँ धारण करे सो प्रत्याहार कहा जाता है ।


निःसंगः संवृतस्वान्तः कूर्मवत्संवृतेन्द्रियः ।
यमी समत्वमापन्नो ध्यानतन्त्रे स्थिरी भवेत् ॥2॥

अर्थ: निःसंग (परिग्रहरहित) और संवररूप हुआ है मन जिसका और कछुएके समान संकोचरूप है इन्द्रियाँ जिसकी ऐसा मुनि ही रागद्वेषरहित समभावको प्राप्त होकर ध्यानरूपी तंत्र (प्रवृत्ति) में स्थिरस्वरूप होता है ।


गोचरेभ्यो हृषीकाणि तेभ्यश्चित्तमनाकुलम् ।
पृथक्कृत्य वशी धत्ते ललाटेऽत्यन्तनिश्चलम् ॥3॥

अर्थ: वशी मुनि विषयोंसे तो इन्द्रियोंको पृथक् करे, और इन्द्रियोंसे मनको पृथक् करे तथा अपने मनको निराकुल करके अपने ललाट पर निश्चलतापूर्वक धारण करे । यह विधि प्रत्याहारमें कही गई है ।


सम्यक्समाधिसिद्ध्यर्थं प्रत्याहारः प्रशस्यते ।
प्राणायामेन विक्षिप्तं मनः स्वास्थ्यं न विन्दति ॥4॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्राणायाममें पवनके साधनसे विक्षिप्त (क्षोभरूप) हुआ मन स्वास्थ्यको नहीं प्राप्त होता; इस कारण भले प्रकार समाधिकी सिद्धिके लिये प्रत्याहार करना प्रशस्त है अर्थात् प्रशंसा किया जाता है ।


प्रत्याहृतं पुनः स्वस्थं सर्वोपाधिविवर्जितम् ।
चेतः समत्वमापन्नं स्वस्मिन्नेव लयं व्रजेत् ॥5॥

अर्थ: प्रत्याहारसे ठहरा हुआ मन समस्त उपाधि अर्थात् रागादिकरूप विकल्पोंसे रहित समभावको प्राप्त होकर आत्मामें ही लयको प्राप्त होता है ।


वायोः संचारचातुर्यमणिमाद्यङ्गसाधनम् ।
प्रायः प्रत्यूहबीजं स्यान्मुनेर्मुक्तिमभीप्सतः ॥6॥

अर्थ: पवनसंचारका चातुर्य शरीरको सूक्ष्म स्थूलादि करनेरूप अंगका साधन है इस कारण मुक्तिकी वांछा करनेवाले मुनिके प्रायः विघ्नका कारण है ।


किमनेन प्रपञ्चेन स्वसन्देहार्त्तहेतुना ।
सुविचार्यैव तज्ज्ञेयं यन्मुक्तेर्बीजमग्रिमम् ॥7॥

अर्थ: इस पवनसंचारकी चतुराईके प्रपंचसे क्या लाभ ? क्योंकि यह आत्मामें सन्देह और पीडा (आर्त्तध्यान) का कारण है । ऐसे भले प्रकार विचार करके मुक्तिका प्रधान कारण हो सो जानना चाहिये ।


संविग्नस्य प्रशान्तस्य वीतरागस्य योगिनः ।
वशीकृताक्षवर्गस्य प्राणायामो न शस्यते ॥8॥

अर्थ: जो मुनि संसारदेहभोगोंसे विरक्त है, कषाय जिसके मंद है, विशुद्ध भावयुक्त है; वीतराग है और जितेन्द्रिय है ऐसे योगीको प्राणायाम प्रशंसा करने योग्य नहीं है ।


प्राणस्यायमने पीडा तस्यां स्यादार्त्तसम्भवः ।
तेन प्रच्याव्यते नूनं ज्ञाततत्त्वोऽपि लक्ष्यतः ॥9॥

अर्थ: प्राणायाममें प्राणों (श्वासोच्छ्वासरूप पवन ) का आयमन कहिये रोकनेसे (संकोचनेसे) पीडा होती है और उस पीडाके होते हुए आर्त्तध्यान उत्पन्न होता है और उस आर्त्तध्यानसे तत्त्वज्ञानी मुनि भी अपने लक्ष्य (अपने समाधिस्वरूप शुद्धभावों) से छुडाया जाता है ।


पूरणे कुम्भके चैव तथा श्वसननिर्गमे ।
व्यग्री भवन्ति चेतांसि क्लिश्यमानानि वायुभिः ॥10॥

अर्थ: पवन (श्वासोच्छ्वास) के पूरक करने तथा कुंभक करने तथा पवनके रेचक होनेमें चित्त व्यग्ररूप (खेदखिन्न) होता है, क्योंकि पवनसे क्लेशित होनेसे खेद पाता है । इस कारण प्राणायामका यत्न गौण किया है ।


नातिरिक्तं फलं सूत्रे प्राणायामात्प्रकीर्त्तितम् ।
अतस्तदर्थमस्माभिर्नातिरिक्तः कृतः श्रमः ॥11॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस प्राणायामसे सिद्धांतमें कुछ भी अधिक फल नहीं कहा है इस कारण प्राणायामके लिये हमने अधिक खेद नहीं किया है ।


निरुद्ध्य करणग्रामं समत्वमवलम्ब्य च ।
ललाटदेशसंलीनं विदध्यान्निश्चलं मनः ॥12॥

अर्थ: इन्द्रियोंके विषयोंको रोक कर और रागद्वेषको दूर कर समता अवलंबन करके अपने मनको ललाटदेशमें संलीन करना चाहिये । इस प्रकार करनेसे समाधिकी सिद्धि होती है ।


नेत्रद्वन्द्वे श्रवणयुगले नासिकाग्रे ललाटे ।
वक्त्रे नाभौ शिरसि हृदये तालुनि भ्रूयुगान्ते
ध्यानस्थानान्यमलमतिभिः कीर्तितान्यत्र देहे ।
तेष्वेकस्मिन्विगतविषयं चित्तमालम्बनीयम् ॥13॥

अर्थ: निर्मलबुद्धि आचार्योंने ध्यान करनेके लिये नेत्रयुगल, दोनों कान, नासिकाका अग्रभाग, ललाट, मुख, नाभि, मस्तक, हृदय, तालु, दोनों भौहोंका मध्य भाग इन दश स्थानोंमेंसे किसी एक स्थानमें अपने मनको विषयोंसे रहित करके आलंबित करना अर्थात् इन स्थानोंमेंसे किसी एक स्थान पर ठहराकर ध्यानमें लीन करना कहा है ।


स्थानेष्वेतेषु विश्रान्तं मुनेर्लक्ष्यं वितन्वतः ।
उत्पद्यन्ते स्वसंवित्तेर्बहवो ध्यानप्रत्ययाः ॥14॥

अर्थ: इन पूर्वोक्त स्थानोंमें विश्रामरूप ठहराये हुए लक्ष्य (चिंतवने योग्य ध्येय वस्तु) को विस्तारते हुए मुनिके स्वसंवेदनरूपसे ध्यानके कारण बहुत ही उत्पन्न होते हैं ।

सर्ग 31: सवीर्यध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 42)

अनन्तगुणराजीवबन्धुरप्यत्र वञ्चितः ।
अहो भवमहाकक्षे प्रागहं कर्मवैरिभिः ॥1॥

अर्थ: ध्यान करनेका उद्यमी प्रथम ही ऐसा विचारे कि अहो देखो ! यह बडा खेद है, जो मैं अनन्तगुण रूप कमलोंका बन्धु अर्थात् विकास करनेवाले सूर्य समान हूँ, तथापि इस संसाररूप वनमें कर्मरूप शत्रुओंके द्वारा पूर्वकालमें ठगा गया हूँ ।


स्वविभ्रमसमुद्भूतै रागाद्यतुलबन्धनैः ।
बद्धो विडम्बितः कालमनन्तं जन्मदुर्गमे ॥2॥

अर्थ: तत्पश्चात् फिर विचारे कि मैंने अपने ही विभ्रमसे उत्पन्न हुए रागादिक अतुल बंधनोंसे बंधे हुए अनन्तकाल पर्यन्त संसाररूप दुर्गम मार्गमें विडंबनारूप होकर विपरीताचरण किया ।


अद्य रागज्वरो जीर्णो मोहनिद्राद्य निर्गता ।
ततः कर्मरिपुं हन्मि ध्याननिस्त्रिंशधारया ॥3॥

अर्थ: फिर ऐसे विचारे कि इस समय मेरे रागरूपी ज्वर तो जीर्ण हो गया है । और मोहरूपी निद्रा निकल गई है, इस कारण ध्यानरूपी खड्गकी धारासे कर्मरूपी वैरीको मारता हूँ ।


आत्मानमेव पश्यामि निर्द्धूयाज्ञानजं तमः ।
प्लोषयामि तथाऽत्युग्रं कर्मेन्धनसमुत्करम् ॥4॥

अर्थ: तथा अज्ञानसे उत्पन्न हुए अन्धकारको दूर करके आत्माको हीं अवलोकन करता हूँ, तथा अति तीव्र कर्मरूपी ईंधनके समूहको दग्ध करता हूँ ।


प्रबलध्यानवज्रेण दुरितद्रुमसंक्षयम् ।
तथा कुर्मो यथा दत्ते न पुनर्भवसंभवम् ॥5॥

अर्थ: तथा प्रबलध्यानरूपी वज्रसे पापरूप वृक्षोंका क्षय (नाश) ऐसा करूँ कि जिससे फिर संसारमें उत्पन्न होनेरूप फल न दे ।


जन्मज्वरसमुद्भूतमहामूर्च्छान्धचक्षुषा ।
स्वविज्ञानोद्भवः साक्षान्मोक्षमार्गो न वीक्षितः ॥6॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि संसाररूपी ज्वरसे उत्पन्न हुई मूर्च्छासे अन्ध हो गये हैं नेत्र जिसके ऐसा जो मैं उसने अपने भेदविज्ञानसे उत्पन्न हुए साक्षात् मोक्षमार्गको नहीं देखा ।


मयात्मापि न विज्ञातो विश्वलोकैकलोचनः ।
अविद्याविषमग्राहदन्तचर्वितचेतसा ॥7॥

अर्थ: अहो ! मेरा आत्मा समस्त लोकको देखनेके लिये एक अद्वितीय नेत्र है सो ऐसेको भी अविद्या (मिथ्याज्ञान) रूपी ग्राहके दाँतोंसे चर्वित किया गया है चित्त जिसका ऐसा होकर मैंने नहीं जाना ।


परमात्मा परंज्योतिर्जगज्ज्येष्ठोऽपि वञ्चितः ।
आपातमात्ररम्यैस्तैर्विषयैरन्तनीरसैः ॥8॥

अर्थ: मेरा आत्मा परमात्मा है, परमज्योतिप्रकाशस्वरूप है, जगतमें ज्येष्ठ है, महान् है तो भी मैं वर्त्तमान देखनेमात्र रमणीक और अन्तमें नीरस ऐसे इंद्रियोंके विषयोंसे ठगाया गया हूँ ।


अहं च परमात्मा च द्वावेतौ ज्ञानलोचनौ ।
अतस्तं ज्ञातुमिच्छामि तत्स्वरूपोपलब्धये ॥9॥

अर्थ: मैं और परमात्मा दोनों ही ज्ञाननेत्रवाले हैं; इस कारण अपने आत्माको उस परमात्माके स्वरूपकी प्राप्तिके लिये जाननेकी इच्छा करता हूँ, इस प्रकार विचारे ।


मम शक्त्या गुणग्रामो व्यक्त्या च परमेष्ठिनः ।
एतावानावयोर्भेदः शक्तिव्यक्तिस्वभावतः ॥10॥

अर्थ: अनन्तचतुष्टयादि गुणोंका समूह मेरे तो शक्तिकी अपेक्षा विद्यमान है और परमेष्ठी अरहन्त सिद्धोंके व्यक्तिसे प्रगट है । हम दोनोंमें यह शक्ति और व्यक्तिके स्वभावसे ही भेद है । वास्तवमें शक्तिकी अपेक्षा अभेद है ।


तावन्मां पीडयत्येव महादाहो भवोद्भवः ।
यावज्ज्ञानसुधाम्भोधौ नावगाहः प्रवर्तते ॥11॥

अर्थ: तत्पश्चात् ऐसा विचार करे कि जबतक ज्ञानरूपी समुद्रमें मेरा अवगाह (स्नान करना) नहीं होता तब तक ही मुझे संसारसे उत्पन्न हुआ दाह पीडित करता है ।


अहं न नारको नाम न तिर्यग्नापि मानुषः ।
न देवः किन्तु सिद्धात्मा सर्वोऽयं कर्मविक्रमः ॥12॥

अर्थ: यदि शुद्ध निश्चयनयकी दृष्टिसे देखता हूँ तब न तो मैं नारकी हूँ, न तिर्यंच हूँ, न मनुष्य वा देव ही हूँ, किन्तु सिद्धस्वरूप हूँ । ये नारकादिक अवस्थाएँ हैं सो सब कर्मका विक्रम (पराक्रम) हैं । इस प्रकार भावना करें ।


अनन्तवीर्यविज्ञानदृगानन्दात्मकोऽप्यहम् ।
किं न प्रोन्मूलयाम्यद्य प्रतिपक्षविषद्रुमम् ॥13॥

अर्थ: तत्पश्चात् इस प्रकार भावना करे कि मैं अनन्त वीर्य, अनंत विज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनन्दस्वरूप भी हूँ। इस कारण इन अनन्त वीर्यादिकके प्रतिपक्षी शत्रु कर्म हैं वे ही विषके वृक्षके समान हैं, सो उन्हें क्या अभी जडमूलसे न उखाडूँ ? अवश्य ही उखाडूँगा ।


अद्यासाद्य स्वसामर्थ्यं प्रविश्यानन्दमन्दिरम् ।
न स्वरूपाच्यविष्येऽहं बाह्यार्थेषु गतस्पृहः ॥14॥

अर्थ: फिर इस प्रकार भावना करे कि मैं अपने सामर्थ्यको इसी वक्त प्राप्त होकर आनन्दमंदिरमें प्रवेश करके अपने स्वरूपसे कदापि च्युत न होऊँ, क्योंकि बाह्य पदार्थोमेंसे नष्ट हो गई है वांछा जिसके ऐसा होकर जब मैं स्वरूपमें स्थिर होता हूँ तब आनन्दरूप होनेसे अन्यकी वांछा नहीं रहती, फिर उस स्वरूपसे क्यों डिगूँ ? ।


मयाद्यैव विनिश्चेयं स्वस्वरूपं हि वस्तुतः ।
छित्त्वाप्यनादिसंभूतामविद्यावैरिवागुराम् ॥15॥

अर्थ: तथा अनादिसे उत्पन्न हुई अज्ञानतारूपी (कर्मरूपी) वैरीकी फाँसीको छिन्न करके इसी समय ही वास्तविक अपने स्वरूपका निश्चय करना चाहिये ।


इति प्रतिज्ञां प्रतिपद्य धीरः समस्तरागादिकलङ्कमुक्तः ।
आलम्बते धर्म्यमचञ्चलात्मा शुक्लं च यद्यस्ति बलं विशालं ॥16॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वोक्त रीतिसे प्रतिज्ञाको अङ्गीकार करके धीर वीर चंचलतारहित पुरुष समस्त रागादिक रूप कलंकसे रहित होकर धर्मध्यानका आलम्बन करता है और यदि उसकी सामर्थ्य उत्तम हो अर्थात् शुक्लध्यानके योग्य हो तो शुक्लध्यानका अवलम्बन करता है ।


ध्येयं वस्तु वदन्ति निर्मलधियस्तच्चेतनाचेतनम्
स्थित्युत्पत्तिविनाशलाञ्छनयुतं मूर्त्तेतरं च क्रमात् ।
शुद्धध्यानविशीर्णकर्मकवचो देवश्च मुक्तेर्वरः
सर्वज्ञः सकलः शिवः स भगवान्सिद्धः परो निष्कलः ॥17॥

अर्थ: निर्मलबुद्धि पुरुष ध्यान करने योग्य वस्तुको ध्येय कहते हैं। अवस्तु ध्यान करने योग्य नहीं है। वह ध्येय वस्तु चेतन अचेतन दो प्रकारकी है। चेतन तो जीव है और अचेतन धर्मादिक पाँच द्रव्य हैं। ये सब द्रव्य (वस्तु) स्थिति, उत्पत्ति और विनाश लक्षणसे युक्त हैं। सर्वथा नित्य वा सर्वथा अनित्य नहीं है, अर्थात् उत्पादव्ययध्रौव्य सहित हैं। तथा मूर्तिक अमूर्तिक भी हैं। पुद्गल मूर्तिक हैं, जीवादिक अमूर्तिक हैं, चैतन्य ध्येय, एक तो शुद्ध ध्यानसे नष्ट हुआ है कर्मरूप आवरण जिसका ऐसा मुक्तिका वर सर्वज्ञदेव सकल अर्थात् देहसहित समस्त कल्याणके पूरक अरहंत भगवान् हैं, और पर कहिये दूसरे निष्कल अर्थात् शरीररहित सिद्ध भगवान् हैं ।


अमी जीवादयो भावाश्चिदचिल्लक्षलाञ्छिताः ।
तत्स्वरूपाविरोधेन ध्येया धर्मे मनीषिभिः ॥18॥

अर्थ: ये जीवादिक षट् द्रव्य चेतन अचेतन लक्षणसे लक्षित हैं सो धर्मध्यानमें बुद्धिमान् पुरुषोंको इनके स्वरूपका अविरोध करके यथार्थ स्वरूपका ध्यान करना चाहिये ।


ध्याने ह्युपरते धीमान् मनः कुर्यात्समाहितम् ।
निर्वेदपदमापन्नं मग्नं वा करुणाम्बुधौ ॥19॥

अर्थ: ध्यानके पूर्ण होने पर धीमान् पुरुष मनको सावधानरूप वैराग्यपदको प्राप्त करे अथवा करुणारूपी समुद्रमें मग्न करे ।


अथ लोकत्रयीनाथममूर्त्तं परमेश्वरम् ।
ध्यातुं प्रक्रमते साक्षात्परमात्मानमव्ययम् ॥20॥

अर्थ: अथवा तीन लोकके नाथ अमूर्तिक परमेश्वर परमात्मा अविनाशीका ही साक्षात् ध्यान करनेका प्रारंभ करे ।


त्रिकालविषयं साक्षाच्छक्तिव्यक्तिविवक्षया ।
सामान्येन नयेनैकं परमात्मानमामनेत् ॥21॥

अर्थ: शक्ति और व्यक्तिकी विवक्षासे तीनकालके गोचर साक्षात् सामान्य नय (द्रव्यार्थिक नय)से एक परमात्माका ही ध्यान करे, अभ्यास करे ।


साकारं निर्गताकारम् निष्क्रियं परमाक्षरम् ।
निर्विकल्पं च निष्कम्पं नित्यमानन्दमन्दिरम् ॥22॥

अर्थ: परमात्मा कैसा है, उसका स्वरूप कहते हैं। प्रथम तो साकार (आकारसहित) है अर्थात् शरीराकार मूर्त्तिक है तथा निर्गताकार कहिए निराकार भी है। पुद्गलके आकारके समान उसका आकार नहीं है। निष्क्रिय (क्रियासे रहित) है, परमाक्षरस्वरूप है, विकल्परहित है, निष्कम्प है, नित्य है, आनन्दका घर है ।


विश्वरूपमविज्ञातस्वरूपं सर्वदोदितम् ।
कृतकृत्यं शिवं शान्तं निष्कलं करुणच्युतम् ॥23॥

अर्थ: तथा विश्वरूप है अर्थात् समस्त ज्ञेयों (पदार्थों) के आकार जिसमें प्रतिबिंबित हैं, तथा अविज्ञातस्वरूप हैं, अर्थात् जिसका स्वरूप मिथ्यादृष्टियोंने नहीं जाना ऐसा है, तथा सदाकाल उदयरूप है, कृतकृत्य है अर्थात् जिसको कुछ भी करना नहीं रहा है, तथा शिव है, कल्याणरूप है, शान्त (क्षोभरहित) है, निष्कल कहिये शरीररहित है, तथा करुणच्युत कहिये शोकरहित हैं अथवा करणच्युत कहिये इन्द्रियरहित है ।


निःशेषभवसम्भूतक्लेशद्रुमहुताशनम् ।
शुद्धमत्यन्तनिर्लेपं ज्ञानराज्यप्रतिष्ठितम् ॥24॥

अर्थ: तथा समस्त भवों (जन्ममरणों) से उत्पन्न हुए क्लेशरूप वृक्षोंको दग्ध करनेके लिये अग्निके समान है; तथा शुद्ध है, कर्मरहित है, और अत्यन्त निर्लेप है अर्थात् जिसके कोई कर्मरूपी लेप नहीं लगता, तथा ज्ञानरूपी राज्यमें अर्थात् सर्वज्ञतामें स्थित है ।


विशुद्धादर्शसंक्रान्तप्रतिबिम्बसमप्रभम् ।
ज्योतिर्मयं महावीर्यं परिपूर्णं पुरातनम् ॥25॥

अर्थ: तथा निर्मल दर्पणमें प्राप्त हुए प्रतिबिम्बकी समान प्रभावाला है तथा ज्योतिर्मय है अर्थात् जिसका ज्ञान प्रकाशरूप है, तथा अनन्त वीर्ययुक्त है, तथा परिपूर्ण है, जिसके कुछ भी अवयव (अंश) घटते नहीं, तथा पुरातन है, अर्थात् किसीने नया नहीं बनाया ऐसा है ।


विशुद्धाष्टगुणोपेतं निर्द्वन्द्वं निर्गतामयम् ।
अप्रमेयं परिच्छिन्नं विश्वतत्त्वव्यवस्थितम् ॥26॥

अर्थ: तथा निर्मल सम्यक्त्वादि अष्ट गुणसहित हैं, निर्द्वंद्व हैं, रागादिकसे रहित हैं, रोगरहित है, अप्रमेय है, अर्थात् जिसका प्रमाण नहीं किया जा सकता, तथा परिज्ञात है अर्थात् भेदज्ञानी पुरुषोंके द्वारा जाना हुआ है तथा समस्त तत्त्वोंसे व्यवस्थित है अर्थात् निश्चयरूप है ।


यदग्राह्यं बहिर्भावैर्ग्राह्यं चान्तर्मुखैः क्षणात् ।
तत्स्वभावात्मकं साक्षात्स्वरूपं परमात्मनः ॥27॥

अर्थ: परमात्मा कैसा है, उसका स्वरूप कहते हैं। प्रथम तो साकार (आकारसहित) है अर्थात् शरीराकार मूर्त्तिक है तथा निर्गताकार कहिए निराकार भी है। पुद्गलके आकारके समान उसका आकार नहीं है। निष्क्रिय (क्रियासे रहित) है, परमाक्षरस्वरूप है, विकल्परहित है, निष्कम्प है, नित्य है, आनन्दका घर है ॥२२॥ तथा विश्वरूप है अर्थात् समस्त ज्ञेयों (पदार्थों) के आकार जिसमें प्रतिबिंबित हैं, तथा अविज्ञातस्वरूप हैं, अर्थात् जिसका स्वरूप मिथ्यादृष्टियोंने नहीं जाना ऐसा है, तथा सदाकाल उदयरूप है, कृतकृत्य है अर्थात् जिसको कुछ भी करना नहीं रहा है, तथा शिव है, कल्याणरूप है, शान्त (क्षोभरहित) है, निष्कल कहिये शरीररहित है, तथा करुणच्युत कहिये शोकरहित हैं अथवा करणच्युत कहिये इन्द्रियरहित है ॥२३॥ तथा समस्त भवों (जन्ममरणों) से उत्पन्न हुए क्लेशरूप वृक्षोंको दग्ध करनेके लिये अग्निके समान है; तथा शुद्ध है, कर्मरहित है, और अत्यन्त निर्लेप है अर्थात् जिसके कोई कर्मरूपी लेप नहीं लगता, तथा ज्ञानरूपी राज्यमें अर्थात् सर्वज्ञतामें स्थित है ॥२४॥ तथा निर्मल दर्पणमें प्राप्त हुए प्रतिबिम्बकी समान प्रभावाला है तथा ज्योतिर्मय है अर्थात् जिसका ज्ञान प्रकाशरूप है, तथा अनन्त वीर्ययुक्त है, तथा परिपूर्ण है, जिसके कुछ भी अवयव (अंश) घटते नहीं, तथा पुरातन है, अर्थात् किसीने नया नहीं बनाया ऐसा है ॥२५॥ तथा निर्मल सम्यक्त्वादि अष्ट गुणसहित हैं, निर्द्वंद्व हैं, रागादिकसे रहित हैं, रोगरहित है, अप्रमेय है, अर्थात् जिसका प्रमाण नहीं किया जा सकता, तथा परिज्ञात है अर्थात् भेदज्ञानी पुरुषोंके द्वारा जाना हुआ है तथा समस्त तत्त्वोंसे व्यवस्थित है अर्थात् निश्चयरूप है ॥२६॥ तथा बाह्यभावोंसे तो ग्रहण करने योग्य नहीं है, और अन्तरंगभावोंसे क्षणमात्रमें ग्रहण करने योग्य है। इस प्रकार परमात्माका स्वरूप है। सो यह स्वरूप संसार अवस्थामें तो शक्तिरूप है, और मुक्त अवस्थामें व्यक्तिरूप हैं, ऐसा जानकर ध्यानगोचर करना चाहिये ।


अणोरपि च यः सूक्ष्मो महानाकाशतोऽपि च ।
जगद्वन्द्यः स सिद्धात्मा निष्पन्नोऽत्यन्तनिर्वृतः ॥28॥

अर्थ: जो सिद्धस्वरूप परमाणुसे तो सूक्ष्मस्वरूप है, और आकाशसे भी महान् है, वह सिद्धात्मा जगतसे वंदने योग्य है, निष्पन्न है, अत्यन्त सुखमय है ।


यस्याणुध्यानमात्रेण शीर्यन्ते जन्मजा रुजः ।
नान्यथा जन्मिनां सोऽयं जगतां प्रभुरच्युतः ॥29॥

अर्थ: जिसके ध्यानमात्रसे जीवोंके संसारमें उत्पन्न हुए रोग नष्ट हो जाते हैं, अन्य प्रकार नष्ट नहीं होते, वही यह त्रिभुवनका अविनाशी परमात्मा है ।


विज्ञातमपि निःशेषं यदज्ञानादपार्थकम् ।
यस्मिंश्च विदिते विश्वं ज्ञातमेव न संशयः ॥30॥

अर्थ: जिस परमात्माके जाने विना अन्य समस्त जाने हुए पदार्थ भी निरर्थक है, और इसमें कोई संदेह नहीं कि जिसका स्वरूप जाननेसे समस्त विश्व जाना जाता है ।


यत्स्वरूपापरिज्ञानान्नात्मतत्त्वे स्थितिर्भवेत् ।
यज्ज्ञात्वा मुनिभिः साक्षात्प्राप्तं तस्यैव वैभवम् ॥31॥

अर्थ: जिस परमात्माके स्वरूपको जाने विना आत्मतत्त्वमें स्थिति नहीं होती है, और जिसको जान करके मुनिगणोंने उसके ही वैभव (परमात्माके स्वरूप) को साक्षात् प्राप्त किया है ।


स एव नियतं ध्येयः स विज्ञेयो मुमुक्षुभिः ।
अनन्यशरणीभूय तद्गतेनान्तरात्मना ॥32॥

अर्थ: मुक्तिकी इच्छा करनेवाले मुनिजनोंकी वह परमात्मा ही नियमसे ध्यान करने योग्य है । अतएव अन्य समस्त शरण छोडकर उसमें ही अपने अन्तरात्माको प्राप्त करके जानना चाहिये ।


अवाग्गोचरमव्यक्तमनन्तं शब्दवर्जितम् ।
अजं जन्मभ्रमातीतं निर्विकल्पं विचिन्तयेत् ॥33॥

अर्थ: जो वचनके गोचर नहीं, पुद्गलके समान इन्द्रियगोचर नहीं ऐसा अव्यक्त है; जिसका अन्त नहीं है, जो शब्दसे वर्जित है अर्थात् जिसके शब्द नहीं, जिसके जन्म नहीं ऐसा अज है, तथा भवभ्रमण रहित है, ऐसे परमात्माको जिस प्रकार निर्विकल्प हो उस प्रकार ही चिंतवन करें ।


यद्बोधानन्तभागेऽपि द्रव्यपर्यायसंभृतम् ।
लोकालोकं स्थितिं धत्ते स स्याल्लोकत्रयीगुरुः ॥34॥

अर्थ: जिस परमात्माके ज्ञानके अनन्तवें भागमें द्रव्यपर्यायोंसे भरा हुआ यह अलोकसहित लोक स्थित हैं, वही परमात्मा तीन लोकका गुरु है ।


तत्स्वरूपाहितस्वान्तस्तद्गुणग्रामरञ्जितः ।
यो जयत्यात्मनात्मानं तस्मिंस्तद्रूपसिद्धये ॥35॥

अर्थ: ध्यानी मुनि उस परमात्माके स्वरूपमें मन लगाकर उसके ही गुणग्रामोंसे रंजायमान हो उसमें ही अपने आत्माको आपसे ही उस स्वरूपकी सिद्धिके लिये जोडता है अर्थात् तल्लीन होता है ।


इत्यजस्रं स्मरन्योगी तत्स्वरूपावलम्बितः ।
तन्मयत्वमवाप्नोति ग्राह्यग्राहकवर्जितम् ॥36॥

अर्थ: इस प्रकार निरन्तर स्मरण करता हुआ योगी (मुनि) उस परमात्माके स्वरूपके अवलंबनसे युक्त होकर उसके तन्मयत्वको प्राप्त होता है। कैसा होता है कि- यह परमात्माका रूप है, सो तो मेरे ग्रहण करने योग्य है, और मैं इसका ग्रहण करनेवाला हूँ, ऐसे ग्राह्यग्राहक-भावसे वर्जित (रहित) होता है, अर्थात् द्वैतभाव नहीं रहता ।


अनन्यशरणीभूय स तस्मिंल्लीयते तथा ।
ध्यातृध्यानोभयाभावे ध्येयेनैक्यं यथा व्रजेत् ॥37॥

अर्थ: वह ध्यान करनेवाला मुनि अन्य सबका शरण छोडकर उस परमात्मस्वरूपमें ऐसा लीन होता है कि ध्याता और ध्यान इन दोनोंके भेदका अभाव होकर ध्येय स्वरूपसे एकताको प्राप्त हो जाता है ।


सोऽयं समरसीभावस्तदेकीकरणं स्मृतम् ।
अपृथक्त्वेन यत्रात्मा लीयते परमात्मनि ॥38॥

अर्थ: जिस भावमें आत्मा अभिन्नतासे परमात्मामें लीन होता है वह समरसी भाव आत्मा और परमात्माका समानतास्वरूप भाव है सो उस परमात्मा और आत्माको एक करने स्वरूप कहा गया है ।


अनन्यशरणस्तद्धि तत्संलीनैकमानसः ।
तद्गुणस्तत्स्वभावात्मा स तादात्म्याच्च संवसन् ॥39॥

अर्थ: जब आत्मा परमात्माके ध्यानमें लीन होता है तब एकीकरण कहा है । सो यह एकीकरण अनन्यशरण है अर्थात् परमात्माके सिवाय अन्य आश्रय नहीं है उसमें ही जिसका मन लीन है ऐसा तथा तद्गुण कहिये उस परमात्माके ही अनन्त ज्ञानादि गुण जिसमें है ऐसा है तथा उसका शुद्ध स्वरूप आत्मा ही है और तत्स्वरूपतामें वह परमात्मा ही है । इस प्रकार परमात्माके ध्यानसे आत्मा परमात्मा होता है ।


कटस्य कर्ताहमिति सम्बन्धः स्याद्द्वयोर्द्वयोः ।
ध्यानं ध्येयं यदात्मैव सम्बन्धः कीदृशस्तदा ॥40॥

अर्थ: यदि कोई ऐसा कहे कि मैं कट कहिये चटाई अथवा कडे आदिका कर्ता हूँ तो उस पुरुष और कटका कर्ता कर्म संबंध कहा जाता है । और ध्यान तथा ध्येय जब एक आत्मा ही हो तब दोनों भावोंमें क्या संबंध कहा जाय अर्थात् कुछ भी संबंध नहीं हैं क्योंकि संबंध तो दो वस्तुओंमें होता है, एक ही पदार्थमें संबंध संबंधीभाव नहीं होता ।


यदज्ञानाज्जन्मी भ्रमति नियतं जन्मगहने
विदित्वा यं सद्यस्त्रिदशगुरुतो याति गुरुताम् ।
स विज्ञेयः साक्षात्सकलभुवनानन्दनिलयः
परं ज्योतिस्त्राता परमपुरुषोऽचिन्त्यचरितः ॥41॥

अर्थ: जिस परमात्माके ज्ञान बिना यह प्राणी संसाररूप गहन वनमें नियमसे भ्रमण करता है तथा जिस परमात्माको जाननेसे जीव तत्काल इन्द्रसे भी अधिक महत्ताको प्राप्त होता है, उसे ही साक्षात् परमात्मा जानना । वही समस्त लोकको आनन्द देनेवाला निवासस्थान है, वही परम ज्योति (उत्कृष्ट ज्ञानरूप प्रकाश सहित) है और वही त्राता (रक्षक) है, परम पुरुष है, अचिन्त्यचरित है अर्थात् जिसका चरित किसीके चिन्तवनमें नहीं आता ऐसा है ।


इत्थं यत्रानवच्छिन्नभावनाभिर्भवच्युतम् ।
भावयत्यनिशं ध्यानी तत्सवीर्यं प्रकीर्तितम् ॥42॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारसे जो ध्यानी (मुनि) संसाररहित परमात्माका भावनासहित निरंतर ध्यान करता है वही सवीर्यध्यान कहा गया है ।

सर्ग 32: शुद्धोपयोग का वर्णन (श्लोक 1 से 104)

अज्ञातस्वस्वरूपेण परमात्मा न बुध्यते ।
आत्मैव प्राग्विनिश्चेयो विज्ञातुं पुरुषं परम् ॥1॥

अर्थ: जिसने अपने आत्माका स्वरूप नहीं जाना वह पुरुष परमात्माको नहीं जान सकता, इस कारण परमपुरुष-परमात्माको जाननेकी इच्छा रखनेवाला पहिले अपने आत्माका ही निश्चय करें ।


आत्मतत्त्वानभिज्ञस्य न स्यादात्मन्यवस्थितिः ।
मुह्यत्यन्तः पृथक् कर्त्तुं स्वरूपं देहदेहिनोः ॥2॥

अर्थ: यहाँ यह विशेष है कि आत्मतत्त्वके यथार्थ स्वरूपको नहीं जाननेवाले पुरुषके आत्मामें निश्चय ठहरना नहीं होता । और अन्तरङ्गमें शरीर आत्माको भिन्न-भिन्न करने व समझनेमें मोहको प्राप्त होकर भूल जाता है कि इस देहमें, द्रव्यइंद्रिय, भाव-इंद्रिय, द्रव्यमन, भावमन, दर्शन, ज्ञान, सुख, दुःख, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, अज्ञान आदि जो अनेक भाव दीखते हैं; इनमेंसे आत्मा कौनसा ? इस प्रकार भ्रम उत्पन्न होता है, इस कारण पहिले आत्माका निश्चय करना चाहिये ।


तयोर्भेदापरिज्ञानान्नात्मलाभः प्रजायते ।
तदभावात्स्वविज्ञानसूतिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥3॥

अर्थ: उस देह और आत्माके भेदविज्ञान विना आत्माका लाभ (प्राप्ति) नहीं होता और आत्माके लाभ विना भेदविज्ञानकी उत्पत्ति स्वप्नमें भी दुर्घट है, अर्थात् दुर्लभ है ।


अतः प्रागेव निश्चेयः सम्यगात्मा मुमुक्षुभिः ।
अशेषपरपर्यायकल्पनाजालवर्जितः ॥4॥

अर्थ: इस कारण ही मोक्षाभिलाषियोंको समस्त परद्रव्योंकी पर्यायकल्पनाओंसे रहित आत्माका ही निश्चय करना चाहिये ।


त्रिप्रकारं स भूतेषु सर्वेष्वात्मा व्यवस्थितः ।
बहिरन्तः परश्चेति विकल्पैर्वक्ष्यमाणकैः ॥5॥

अर्थ: वह आत्मा समस्त देहधारियोंमें बहिरात्मा, अन्तरात्मा व परमात्माके भेदसे तीन प्रकारसे व्यवस्थित (अवस्थारूप) है, सो आगे कहे भेदोंसे जानना ।


आत्मबुद्धिः शरीरादौ यस्य स्यादात्मविभ्रमात् ।
बहिरात्मा स विज्ञेयो मोहनिद्रास्तचेतनः ॥6॥

अर्थ: जिस जीवके शरीरादि पदार्थोंमें आत्माके भ्रमसे आत्मबुद्धि हो कि यह मैं ही हूँ, अन्य अर्थात् पर नहीं है सो मोहरूपी निद्रासे अस्त हो गई हैं चेतना जिसकी ऐसा बहिरात्मा है ।


बहिर्भावानतिक्रम्य यस्यात्मन्यात्मनिश्चयः ।
सोऽन्तरात्मा मतस्तज्ज्ञैर्विभ्रमध्वान्तभास्करैः ॥7॥

अर्थ: तथा जिस पुरुषके बाह्य भावोंको उलंघन करके आत्मामें ही आत्माका निश्चय हो सो विभ्रमरूप अन्धकारको दूर करनेमें सूर्यके समान उस आत्माके जाननेवाले पुरुषोंने अन्तरात्मा कहा है ।


निर्लेपो निष्कलः शुद्धो निष्पन्नोऽत्यन्तनिर्वृतः ।
निर्विकल्पश्च शुद्धात्मा परमात्मेति वर्णितः ॥8॥

अर्थ: और जो निर्लेप है अर्थात् जिसके कर्मोका लेप नहीं, निष्कल कहिये शरीररहित है, शुद्ध है, जिसके रागादिक विकार नहीं है, तथा जो निष्पन्न हैं अर्थात् सिद्धरूप हैं (जिसको कुछ करना नहीं), और अत्यन्त निर्वृत हैं अर्थात् अविनाशी सुखरूप है, तथा निर्विकल्प हैं अर्थात् जिसमें भेद नहीं है ऐसे शुद्धात्माको परमात्मा कहा गया है ।


कथं तर्हि पृथक् कृत्वा देहाद्यर्थकदम्बकात् ।
आत्मानमभ्यसेद्योगी निर्विकल्पमतीन्द्रियम् ॥9॥

अर्थ: यहाँ प्रश्न है कि यदि आत्मा ऐसा है तो आत्माको देहादिक पदार्थोंके समूहसे पृथक् करके निर्विकल्प अतीन्द्रिय ऐसा किस प्रकार ध्यान करे ? ।


अपास्य बहिरात्मानं सुस्थिरेणान्तरात्मना ।
ध्यायेद्विशुद्धमत्यन्तं परमात्मानमव्ययम् ॥10॥

अर्थ: योगी मुनि बहिरात्माको छोडकर भले प्रकार स्थिर अन्तरात्मा होकर अत्यन्त विशुद्ध अविनाशी परमात्माका ध्यान करे ।


संयोजयति देहेन चिदात्मानं विमूढधीः ।
बहिरात्मा ततो ज्ञानी पृथक् पश्यति देहिनम् ॥11॥

अर्थ: जो बहिरात्मा है सो चैतन्यस्वरूप आत्माका देहके साथ संयोजन करता (जोडता) है अर्थात् एक समझता है; और जो ज्ञानी (अन्तरात्मा) है सो देहसे देही (चैतन्यस्वरूप आत्मा) को पृथक् ही देखता है । यही बहिरात्मा और अन्तरात्माके ज्ञानमें भेद है ।


अक्षद्वारैरविश्रान्तं स्वतत्त्वविमुखैर्भृशम् ।
व्यापृतो बहिरात्मायं वपुरात्मेति मन्यते ॥12॥

अर्थ: यह बहिरात्मा आत्मस्वरूपसे अतिशय करके निरन्तर विमुख इन्द्रियोके द्वारा व्यापाररूप हुआ शरीरको ही आत्मा मानता है ।


सुरं त्रिदशपर्यायैर्नृपर्यायैस्तथा नरम् ।
तिर्यञ्चं च तदङ्गे स्वं नारकाङ्गे च नारकम् ॥13॥

अर्थ: अविद्या(मिथ्याज्ञान)से परिश्रान्त (खेदखिन्न) मूढ बहिरात्मा देवके पर्यायों सहित आत्माको तो देव मानता है और मनुष्यपर्यायों सहित अपनेको मनुष्य मानता है, तथा तिर्यंचके अङ्गमें रहते हुएको तिर्यंच और नारकीके शरीरमें रहते हुएको नारकी मानता है सो भ्रम है; क्योंकि पर्यायका रूप आत्माका रूप नहीं है । आत्माका रूप तो अमूर्त्तिक हैं, स्वसंवेद्य है अर्थात् अपने द्वारा ही अपनेको जानने योग्य है ॥१३-१४॥


वेत्त्यविद्यापरिश्रान्तो मूढस्तन्न पुनस्तथा ।
किन्त्वमूर्तं स्वसंवेद्यं तद्रूपं परिकीर्तितम् ॥14॥

अर्थ: अविद्या(मिथ्याज्ञान)से परिश्रान्त (खेदखिन्न) मूढ बहिरात्मा देवके पर्यायों सहित आत्माको तो देव मानता है और मनुष्यपर्यायों सहित अपनेको मनुष्य मानता है, तथा तिर्यंचके अङ्गमें रहते हुएको तिर्यंच और नारकीके शरीरमें रहते हुएको नारकी मानता है सो भ्रम है; क्योंकि पर्यायका रूप आत्माका रूप नहीं है । आत्माका रूप तो अमूर्त्तिक हैं, स्वसंवेद्य है अर्थात् अपने द्वारा ही अपनेको जानने योग्य है ॥१३-१४॥


स्वशरीरमिवान्विष्य पराङ्गं च्युतचेतनम् ।
परमात्मानमज्ञानी परबुद्ध्याऽध्यवस्यति ॥15॥

अर्थ: तथा वही बहिरात्मा अज्ञानी जिस प्रकार अपने शरीरको आत्मा जानता है उसी प्रकार परके अचेतन देहको देखकर परका आत्मा मानता है अर्थात् उसको परकी बुद्धिसे निश्चय करता है ।


स्वात्मेतरविकल्पैस्तैः शरीरेष्ववलम्बितम् ।
प्रवृत्तैर्वञ्चितं विश्वमनात्मन्यात्मदर्शिभिः ॥16॥

अर्थ: अपने शरीरमें तो अपना आत्मा जाने और परके शरीरमें परका आत्मा जाने इस प्रकार शरीरमें अवलंबनस्वरूप प्रवर्त्ते हुए विकल्पोंसे अनात्मामें आत्माको देखनेवाले अज्ञानी जनोंने इस लोकको ठग लिया ।


ततः सोऽत्यन्तभिन्नेषु पशुपुत्राङ्गनादिषु ।
आत्मत्वं मनुते शश्वदविद्याज्वरजिह्मितः ॥17॥

अर्थ: इस कारणसे मिथ्याज्ञानरूपी ज्वरसे निरंतर पीडित होकर बहिरात्मा अज्ञानी अपनेसे अत्यन्त भिन्न पशु पुत्र स्त्री आदिकमें भी आत्मपना मानता है ।


साक्षात्स्वानेव निश्चित्य पदार्थांश्चेतनेतरान् ।
स्वस्यैव मन्यते मूढस्तन्नाशोपचयादिकम् ॥18॥

अर्थ: यह मूढ बहिरात्मा अपनेसे भिन्न चेतन अचेतन पदार्थोको साक्षात् अपने ही निश्चय करके उनके नाश होने और संचय होनेमें अपना ही नाश और संचय होना मानता है ।


अनादिप्रभवः सोऽयमविद्याविषमग्रहः ।
शरीरादीनि पश्यन्ति येन स्वमिति देहिनः ॥19॥

अर्थ: यह पूर्वोक्त अनादिसे उत्पन्न हुआ अविद्यारूपी विषम आग्रह है जिसके द्वारा यह मूढ प्राणी शरीरादिकको अपना मानता है, अर्थात् यह शरीर है सो मैं ही हूँ इस प्रकार देखता है ।


वपुष्यात्मेति विज्ञानं वपुषा घटयत्यमून् ।
स्वस्मिन्नात्मेति बोधस्तु भिनत्त्यङ्गं शरीरिणाम् ॥20॥

अर्थ: शरीरमें यह आत्मा है ऐसा ज्ञान तो जीवोंको शरीरसहित करता है, और आपमें ही आप है अर्थात् आत्मामें ही आत्मा है, इस प्रकारका विज्ञान जीवोंको शरीरसे भिन्न करता है ।


वपुष्यात्ममतिः सूते बन्धुवित्तादिकल्पनम् ।
स्वस्य संपदमेतेन मन्वानं मुषितं जगत् ॥21॥

अर्थ: शरीरमें जो आत्मबुद्धि है सो बन्धु धन इत्यादिककी कल्पना उत्पन्न कराती है, तथा इस कल्पनासे ही जगत् अपनी सम्पदा मानता हुआ ठगा गया है ।


तनावात्मेति यो भावः स स्याद्बीजं भवस्थितेः ।
बहिर्वीताक्षविक्षेपस्तत्त्यक्त्वान्तर्विशेत्ततः ॥22॥

अर्थ: शरीरमें ऐसा जो भाव है कि “यह मैं आत्मा ही हूँ” ऐसा भाव संसारकी स्थितिका बीज है । इस कारण, बाह्यमें नष्ट हो गया है इन्द्रियोंका विक्षेप जिसके ऐसा पुरुष उस भावरूप संसारके बीजको छोडकर अन्तरंगमें प्रवेश करो, ऐसा उपदेश है ।


अक्षद्वारैस्ततश्च्युत्वा निमग्नो गोचरेष्वहम् ।
तानासाद्याहमित्येतन्न हि सम्यगवेदिषम् ॥23॥

अर्थ: ज्ञानी ऐसे विचारता है कि इन्द्रियोंके द्वारोंसे मैं आत्मस्वरूपसे छूटकर विषयोंमें मग्न हो गया तथा उन विषयोंको प्राप्त होकर यह अहंपदसे जाना जाय ऐसे आत्मस्वरूपको भले प्रकार नहीं जाना ।


बाह्यात्मानमपास्यैवमन्तरात्मा ततस्त्यजेत् ।
प्रकाशयत्ययं योगः स्वरूपं परमेष्ठिनः ॥24॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारसे बाह्य शरीरादिकमें आत्मबुद्धिको छोडकर अन्तरात्मा होता हुआ इन्द्रियोंके विषयादिकमें भी आत्मबुद्धिको छोडें । इस प्रकार यह योग परमेष्ठीके स्वरूपको प्रकाश करता है ।


यद्यद्दृश्यमिदं रूपं तत्तदन्यन्न चान्यथा ।
ज्ञानवच्च व्यतीताक्षमतः केनाऽत्र वच्म्यहम् ॥25॥

अर्थ: जो-जो देखने योग्य यह रूप है सो-सो अन्य है, और ज्ञानवान् जो मेरा रूप है सो अन्य प्रकार (अन्यरूप सदृश) नहीं है यह व्यतीताक्ष (इन्द्रियज्ञानसे अतीत) है; इस कारण मैं किसके साथ वचनालाप करूँ ?


यज्जनैरपि बोध्योऽहं यज्जनान्बोधयाम्यहम् ।
तद्विभ्रमपदं यस्मादहं विधुतकल्मषः ॥26॥

अर्थ: जो “लोगोंद्वारा मैं सम्बोधनेयोग्य हूँ तथा जो मैं लोगोंको सम्बोधता हूँ” ऐसा भाव है वह भी विभ्रमका स्थान है । क्योंकि मैं तो पापसे रहित हूँ अर्थात् आत्मा तो निष्कलंक है, इसे कौन सम्बोधे ? और यह किसको सम्बोधे ? ।


यः स्वमेव समादत्ते नादत्ते यः स्वतोऽपरम् ।
निर्विकल्पः स विज्ञानी स्वसंवेद्योऽस्मि केवलम् ॥27॥

अर्थ: जो आत्मा आपको ही ग्रहण करता है तथा आपसे पर है उसको नहीं ग्रहण करता सो यह विज्ञानी (भेदज्ञानी) विकल्परहित होकर, इस प्रकार भावना करता है कि मैं एक अपने ही जाननेयोग्य हूँ; इस प्रकार विचार कर परसे परस्पर देने लेनेका व्यवहार छोड देता है ।


जातसर्पमतेर्यद्वच्छृङ्खलायां क्रियाभ्रमः ।
तथैव मे क्रियाः पूर्वास्तन्वादौ स्वमिति भ्रमात् ॥28॥

अर्थ: जिसकी साँकलमें सर्पकी बुद्धि है ऐसे पुरुषके जैसे क्रियाका भ्रम होता है, उसी प्रकार मेरे भी शरीरादिकमें आत्मबुद्धिरूप भ्रमसे, भेदज्ञान होनेसे पहिले, भ्रमरूप क्रिया अनेक हुई ।


शृङ्खलायां यथा वृत्तिर्विनष्टे भुजगभ्रमे ।
तन्वादौ मे तथा वृत्तिर्नष्टात्मविभ्रमस्य वै ॥29॥

अर्थ: तथा जब साँकलमें सर्पका भ्रम था सो नष्ट हो जाने पर साँकलमें जिस प्रकार यथावत् प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार मेरे शरीरादिकमें आत्माका भ्रम नष्ट हो जाने पर मैं भ्रमसे रहित हो गया, तब मेरे शरीरादिकमें यथावत् प्रवृत्ति हो गई; उनको परद्रव्य माने, तब ऐसी भावनासे परद्रव्यका ममत्त्व छोडे ।


एतदेवैष एकं द्वे बहूनीति धियः पदम् ।
नाहं यच्चात्मनात्मानं वेत्त्यात्मनि तदस्म्यहम् ॥30॥

अर्थ: तथा इस प्रकार विचार करे कि यह तो नपुंसक है, यह स्त्री है, और यह पुरुष है, तथा यह एक है, दो हैं, बहुत हैं, ऐसे लिंग और संख्याकी बुद्धिका स्थान मैं नहीं हूँ, क्योंकि मैं तो अपने द्वारा अपनेको आपमें ही जाननेवाला हूँ; इस प्रकार लिंगसंख्याका विकल्प भी छोडे ।


यदबोधे मया सुप्तं यद्बोधे पुनरुत्थितम् ।
तद्रूपं मम प्रत्यक्षं स्वसंवेद्यमहं किल ॥31॥

अर्थ: जिसका ज्ञान नहीं होते तो मैं सोया और जिसका ज्ञान होते हुए मैं उठा (जगा) वह रूप भी मेरे जाननेयोग्य प्रत्यक्ष है, वह ही मैं हूँ; इस प्रकार विचार करें ।


ज्योतिर्मयं ममात्मानं पश्यतोऽत्रैव यान्त्यमी ।
क्षयं रागादयस्तेन नारिः कोऽपि प्रियो न मे ॥32॥

अर्थ: फिर यह विचारे कि मैं अपनेको ज्योतिर्मय ज्ञानप्रकाशरूप देखता हूँ, मेरे रागादिक यहाँ ही क्षयको प्राप्त होते हैं; इस कारण मेरे न तो कोई शत्रु है और न कोई मित्र है ।


अदृष्टमत्स्वरूपोऽयं जनो नारिर्न मे प्रियः ।
साक्षात्सुदृष्टरूपोऽपि जनो नारिः सुहृन्न मे ॥33॥

अर्थ: नहीं देखा है मेरा स्वरूप जिसने ऐसा लोक न तो मेरा शत्रु है और न मित्र है, और जिसने साक्षात् मेरा स्वरूप देखा वह लोक भी मेरा न शत्रु है और न मित्र ही है; इस प्रकार विचार करे ।


अतः प्रभृति निःशेषं पूर्वं पूर्वं विचेष्टितम् ।
ममाद्य ज्ञाततत्त्वस्य भाति स्वप्नेन्द्रजालवत् ॥34॥

अर्थ: यहाँसे लगाकर, तत्त्वस्वरूपके जाननेसे पहिले पहिले जो मैंने सर्व प्रकारकी चेष्टायें की, अब स्वरूप जाननेसे मुझे वे सब स्वप्नसदृश अथवा इन्द्रजालवत् प्रतिभासती हैं ।


यो विशुद्धः प्रसिद्धात्मा परं ज्योतिः सनातनः ।
सोऽहं तस्मात्प्रपश्यामि स्वस्मिन्नात्मानमच्युतम् ॥35॥

अर्थ: विशुद्ध (निर्मल) है और प्रसिद्ध है आत्मस्वरूप जिसका ऐसा परमज्योति सनातन जो सुननेमें आता है सो मैं ही हूँ, इस कारण अपनेमें ही अविनाशी परमात्माको मैं प्रकटतया देखता हूँ; इस प्रकार अपनेको ही परमात्मस्वरूप देखे ।


बाह्यात्मानमपि त्यक्त्वा प्रसन्नेनान्तरात्मना ।
विधूतकल्पनाजालं परमात्मानमामनेत् ॥36॥

अर्थ: फिर बाह्य आत्माको भी छोडकर प्रसन्नरूप अन्तरात्माके द्वारा मिटे हैं कल्पनाके जाल (समूह) जिसके ऐसे परमात्माको अभ्यासगोचर करे ।


बन्धमोक्षावुभावेतौ भ्रमेतरनिबन्धनौ ।
बन्धश्च परसम्बन्धाद्भेदाभ्यासात्ततः शिवम् ॥37॥

अर्थ: बन्ध और मोक्ष ये दोनों भ्रम और निर्भ्रम है कारण जिनका ऐसे हैं। उनमेंसे परके संबंधसे तो बंध है और परद्रव्यके भेदके अभ्याससे मोक्ष है ।


अलौकिकमहो वृत्तं ज्ञानिनः केन वर्ण्यते ।
अज्ञानी बध्यते यत्र ज्ञानी तत्रैव मुच्यते ॥38॥

अर्थ: अहो ! देखो, ज्ञानीपुरुषका यह बडा अलौकिक चरित्र किससे वर्णन किया जाय ? क्योंकि जिस आचरणमें अज्ञानी कर्मसे बंध जाता है उसी आचरणमें ज्ञानी बंधसे छूट जाता है यह आश्चर्यकी बात है।


यज्जन्मगहने खिन्नं प्राङ्मया दुःखसंकुले ।
तदात्मेतरयोर्नूनमभेदेनावधारणात् ॥39॥

अर्थ: फिर ऐसा विचार करे कि मैं दुःखसे भरे हुए इस संसाररूप गहन वनमें जो खेदखिन्न हुआ सो आत्मा और अनात्माके अभेदके द्वारा, अवधारणासे हुए भेदविज्ञानके बिना ही संसारमें दुःखी हुआ हूँ; ऐसा निश्चय करे ।


मयि सत्यपि विज्ञानप्रदीपे विश्वदर्शिनि ।
किं निमज्जत्ययं लोको वराको जन्मकर्दमे ॥40॥

अर्थ: मुझ समस्तको दिखानेवाले ज्ञानस्वरूप दीपकके होते हुए भी यह वराक लोक संसाररूपी कर्दममें क्यों डूबता है, अर्थात् आत्माकी ओर क्यों नहीं देखता कि जिससे संसाररूपी कर्दममें न डूबे ? इस प्रकार देखे ।


आत्मन्येवात्मनात्मायं स्वयमेवानुभूयते ।
अतोऽन्यत्रैव मां ज्ञातुं प्रयासः कार्यनिष्फलः ॥41॥

अर्थ: यह आत्मा आत्मामें ही आत्माके द्वारा स्वयमेव अनुभवन किया जाता है, इससे अन्यत्र आत्माके जाननेका जो खेद है सो कार्य निष्फल है, अर्थात् उस कार्यका फल नहीं है, इस प्रकार जाने ।


स एवाहं स एवाहमित्यभ्यस्यन्ननारतम् ।
वासनां दृढयन्नेव प्राप्नोत्यात्मन्यवस्थितिम् ॥42॥

अर्थ: ‘वही मैं हूँ, वही मैं हूँ’ इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करता हुआ पुरुष इस वासनाको दृढ करता हुआ आत्मामें अवस्थितिको प्राप्त होता है, अर्थात् ठहर जाता है ।


स्याद्यद्यत्प्रीतयेऽज्ञस्य तत्तदेवापदास्पदम् ।
बिभेत्ययं पुनर्यस्मिंस्तदेवानन्दमन्दिरम् ॥43॥

अर्थ: अज्ञानी पुरुषके जो जो विषयादिक वस्तु प्रीतिके अर्थ हैं वह वह ज्ञानीके आपदाका स्थान है तथा अज्ञानी जिस तपश्चरणादिमें भय करता है वही ज्ञानीके आनन्दका निवास है, क्योंकि अज्ञानीको अज्ञानके कारण विपर्यय भासता है ।


सुसंवृतेन्द्रियग्रामे प्रसन्ने चान्तरात्मनि ।
क्षणं स्फुरति यत्तत्त्वं तद्रूपं परमेष्ठिनः ॥44॥

अर्थ: भले प्रकार संवररूप किये हैं इन्द्रियोंके समूह जिसने और अन्तरंगमें प्रसन्न (विशुद्धपरिणामस्वरूप) अन्तरात्माके होनेपर जो उस समय तत्त्वका स्फुरण होता है वही परमेष्ठीका रूप है।


यः सिद्धात्मा परः सोऽहं योऽहं स परमेश्वरः ।
मदन्यो न मयोपास्यो मदन्येन न चाप्यहम् ॥45॥

अर्थ: जो सिद्धका आत्मस्वरूप है वही परमात्मा परमेश्वरस्वरूप मैं हूँ, मेरे मुझसे अन्य कोई उपासना करने योग्य नहीं है तथा मुझसे अन्यकरके मैं उपासना करने योग्य नहीं हूँ इस प्रकार अद्वैतभावना करें ।


आकृष्य गोचरव्याघ्रमुखादात्मानमात्मना ।
स्वस्मिन्नेव स्थिरीभूतश्चिदानन्दमये स्वयम् ॥46॥

अर्थ: फिर इस प्रकार भावना करे कि मैं अपने आत्माको इन्द्रियोंके विषयरूपी व्याघ्रके मुखसे खींच (काढ) कर, आत्माके द्वारा ही मैं चिदानन्दमय अपने आत्मामें स्थिररूप हुआ हूँ, इस प्रकार चैतन्य और आनन्दरूप विषें लीन हों ।


पृथगित्थं न मां वेत्ति यस्तनोर्वीतविभ्रमः ।
कुर्वन्नपि तपस्तीव्रं न स मुच्येत बन्धनैः ॥47॥

अर्थ: विभ्रमरहित जो मुनि पूर्वोक्तप्रकार आत्माको देहसे भिन्न नहीं जानता है वह तीव्र तप करता हुआ भी कर्मबंधनसे नहीं छूटता ।


स्वपरान्तरविज्ञानसुधास्पन्दाभिनन्दितः ।
खिद्यते न तपः कुर्वन्नपि क्लेशैः शरीरजैः ॥48॥

अर्थ: भेदविज्ञानी मुनि आत्मा और परके अन्तर्भेदी विज्ञानरूप अमृतके वेगसे आनन्दरूप होता हुआ व तप करता हुआ भी शरीरसे उत्पन्न हुए खेद क्लेशादिसे खिन्न नहीं होता है ।


रागादिमलविश्लेषाद्यस्य चित्तं सुनिर्मलम् ।
सम्यक् स्वं स हि जानाति नान्यः केनापि हेतुना ॥49॥

अर्थ: जिस मुनिका चित्त रागादिक मलके भिन्न होनेसे भले प्रकार निर्मल हो गया हो वही मुनि सम्यक्प्रकार आत्मा (अपने) को जानता है, अन्य किसी हेतुसे नहीं जान सकता ।


निर्विकल्पं मनस्तत्त्वं न विकल्पैरभिद्रुतम् ।
निर्विकल्पमतः कार्यं सम्यक्तत्त्वस्य सिद्धये ॥50॥

अर्थ: निर्विकल्प मन तो तत्त्वस्वरूप है; और जो मन विकल्पोंसे पीडित है वह तत्त्वस्वरूप नहीं है, इस कारण सम्यक्प्रकार तत्त्वकी सिद्धिके लिये मनको विकल्परहित करना, यह उपदेश है ।


अज्ञानविप्लुतं चेतः स्वतत्त्वादपवर्त्तते ।
विज्ञानवासितं तद्धि पश्यत्यन्तःपुरः प्रभुम् ॥51॥

अर्थ: जो मन अज्ञानसे बिगडा हुआ (पीडित) है वह तो निजस्वरूपसे छूट जाता है, और जो मन विज्ञान कहिये सम्यग्ज्ञानसे वासित है वह अपने अन्तरंगमें प्रभु भगवान् परमात्माको देखता है, यह विधि है। इस कारण अज्ञानको दूर करना चाहिये ।


मुनेर्यदि मनो मोहाद्रागाद्यैरभिभूयते ।
तन्नियोज्यात्मनस्तत्त्वे तान्येव क्षिप्यते क्षणात् ॥52॥

अर्थ: मुनिका मन यदि मोहके उदयसे रागादिकसे पीडित हो तो मुनि उस मनको आत्मस्वरूपमें लगाकर, उन रागादिकको क्षणमात्रमें क्षेपण करता है अर्थात् दूर करता है ।


यत्राज्ञात्मा रतः काये तस्माद्व्यावर्त्तितो धिया ।
चिदानन्दमये रूपे योजितः प्रीतिमुत्सृजेत् ॥53॥

अर्थ: जिस कायामें अज्ञानी आत्मा रत (रागी) हुआ है, उस कायासे बुद्धिपूर्वक भिन्न किये हुए चिदानन्द स्वरूपमें लगाया हुआ मन कायामें प्रीति छोड देता है ।


स्वविभ्रमोद्भवं दुःखं स्वज्ञानेनैव हीयते ।
तपसाऽपि न तच्छेद्यमात्मविज्ञानवर्जितैः ॥54॥

अर्थ: अपने विभ्रमसे उत्पन्न हुआ दुख अपने ही ज्ञानसे दूर होता है और जो आत्माके विज्ञानसे रहित पुरुष हैं वे तपके द्वारा भी उस दुःखको दूर नहीं कर सकते ।


रूपायुर्बलवित्तादि-सम्पत्तिं स्वस्य वाञ्छति ।
बहिरात्माथ विज्ञानी साक्षात्तेभ्योऽपि विच्युतिम् ॥55॥

अर्थ: जो बहिरात्मा है वह तो अपने लिये सुंदर रूप, आयु, बल, धन इत्यादिक चाहता है, और जो भेदविज्ञानी पुरुष है वह अपनेमें रूपादिक विद्यमान हों उनसे भी विच्युति कहिये छूटना चाहता है ।


कृत्वाहंमतिमन्यत्र बध्नाति स्वं स्वतश्च्युतः ।
आत्मन्यात्ममतिं कृत्वा तस्माद् ज्ञानी विमुच्यते ॥56॥

अर्थ: अपने आत्मस्वभावसे च्युत हुआ बहिरात्मा अन्य पदार्थोंमें अहंबुद्धि करके अपने आपको बाँधता है अर्थात् कर्मबन्ध करता है, और ज्ञानीपुरुष आत्मामें ही आत्मबुद्धि करके उस परपदार्थसे छूट जाता है ।


आत्मानं वेत्त्यविज्ञानी त्रिलिङ्गी संगतं वपुः ।
सम्यग्वेदी पुनस्तत्त्वं लिङ्गसंगतिवर्जितम् ॥57॥

अर्थ: भेदविज्ञान रहित बहिरात्मा तीन लिंगोंसे चिह्नित शरीरको आत्मा जानता है और सम्यग्ज्ञानी पुरुष आत्मतत्त्वको इन लिंगोंकी संगतिसे रहित जानता है ।


समभ्यस्तं सुविज्ञातं निर्णीतमपि तत्त्वतः ।
अनादिविभ्रमात्तत्त्वं प्रस्खलत्येव योगिनः ॥58॥

अर्थ: फिर ऐसी भावना करता है कि योगी मुनिका तत्त्व कहिये आत्माका यथार्थ स्वरूप भले प्रकार अभ्यासरूप (परमार्थनिर्णय) किया हुआ भी अनादि विभ्रमके कारण डिग जाता है।


अचिद्दृश्यमिदं रूपं न चिद्दृश्यं ततो वृथा ।
मम रागादयोऽर्थेषु स्वरूपं संश्रयाम्यहम् ॥59॥

अर्थ: यह रूप (मूर्ति) अचेतन हैं और दृश्य अर्थात् इन्द्रियग्राह्य हैं और यह चेतन दृश्य (इन्द्रियग्राह्य) नहीं हैं, इस कारण मेरे रूपादिक परपदार्थोंमें जो रागादिक हैं वे सब वृथा (निष्फल) हैं, मैं अपने स्वरूपका आश्रय करता हूँ; इस प्रकार विचारे ।


करोत्यज्ञो ग्रहत्यागौ बहिरन्तस्तु तत्त्ववित् ।
शुद्धात्मा न बहिर्वान्तस्तौ विदध्यात्कथंचन ॥60॥

अर्थ: अज्ञानी बाह्य त्याग ग्रहण करता है और तत्त्वज्ञानी अन्तरंग त्याग ग्रहण करता है, और जो शुद्धात्मा है सो बाह्य और अन्तरंगके दोनों ही त्याग ग्रहण नहीं करता है ।


वाक्कायाभ्यां पृथक् कृत्वा मनसात्मानमभ्यसेत् ।
वाक्तनुभ्यां प्रकुर्वीत कार्यमन्यन्न चेतसा ॥61॥

अर्थ: मुनि आत्माको वचन और कायसे भिन्न करके मनसे अभ्यास करे तथा अन्य कार्योंको वचन और कायसे करे, चित्तसे नहीं करे, चित्तसे तो आत्माका ही अभ्यास करे ।


विश्वासानन्दयोः स्थानं स्याज्जगदज्ञचेतसाम् ।
क्वानन्दः क्व च विश्वासः स्वस्मिन्नेवात्मवेदिनाम् ॥62॥

अर्थ: अज्ञानचित्तवालोंके तो यह जगत् विश्वास और आनन्दका स्थान है और अपने आत्मामें ही आनन्दके जाननेवालोंके कहाँ तो आनन्द और कहाँ विश्वास ? अर्थात् कहीं भी नहीं, अपनेमें ही आनन्दरूप है ।


स्वबोधादपरं किञ्चिन्न स्वान्ते विभूयात्क्षणम् ।
कुर्यात्कार्यवशात्किञ्चिद्वाक्कायाभ्यामनादृतः ॥63॥

अर्थ: आत्मज्ञानी मुनि ज्ञानके सिवाय किसी कार्यको मनमें क्षणमात्र भी नहीं धारण करता। यदि अन्य कार्योंको किसी कारणवशतः करता भी है तो वचन और कायसे बिना आदरके करता है, मनमें तो ज्ञानकी ही वासना निरन्तर रहती है ।


यदक्षविषयं रूपं मुद्रूपात्तद्विलक्षणम् ।
आनन्दनिर्भरं रूपमन्तर्ज्योतिर्मयं मम ॥64॥

अर्थ: आत्मज्ञानी मुनि यह विचारता है कि जो इन्द्रियोंके विषयरूप मूर्ति है सो तो मेरे आत्मस्वरूपसे विलक्षण है, मेरा रूप तो आनन्दसे भरा अन्तरंग ज्योतिर्मयी (ज्ञानप्रकाशमय) है ।


अन्तर्दुःखं बहिः सौख्यं योगाभ्यासोद्यतात्मनाम् ।
सुप्रतिष्ठितयोगानां विपर्यस्तमिदं पुनः ॥65॥

अर्थ: योगके अभ्यासमें उद्यमरूप है आत्मा जिनका ऐसे साधक मुनियोंके अन्तरंगमें दुःख और बाह्यमें सुख है, और जिनका योग सुप्रतिष्ठित है उनके इससे विपर्यस्त है अर्थात् अन्तरंगमें तो सुख है और बाह्यमें दुख है ।


तद्विज्ञेयं तदाख्येयं तच्छ्रव्यं चिन्त्यमेव वा ।
येन भ्रान्तिमपास्योच्चैः स्यादात्मन्यात्मनः स्थितिः ॥66॥

अर्थ: मुनिजनोंको यह करना योग्य है कि जिससे भ्रांतिको छोडकर आत्माकी स्थिति आत्मामें ही हो और यही विषय जानना चाहिये तथा इसको ही वचनसे कहना व सुनना तथा इसको ही विचारना चाहिये ।


विषयेषु न तत्किञ्चित्स्याद्धितं यच्छरीरिणाम् ।
तथाऽप्येष्वेव कुर्वन्ति प्रीतिमज्ञा न योगिनः ॥67॥

अर्थ: यद्यपि इन इन्द्रियोंके विषयोंमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो जीवोंको हितकर हो, तथापि ये अज्ञानको जोडनेवाले मूर्ख प्राणी उन विषयोंमें ही प्रीति करते हैं, सो यह अज्ञानकी चेष्टा है ।


अनाख्यातमिवाख्यातमपि न प्रतिपद्यते ।
आत्मानं जडधीस्तेन वन्ध्यस्तत्र ममोद्यमः ॥68॥

अर्थ: जडधी (मूर्ख) कहते हुए भी बिना कहेके समान आत्माको प्राप्त नहीं होता सो यहाँ मेरे कहनेका उद्यम वृथा (निष्फल) है, इस प्रकार विचार करे ।


तन्नाहं यन्मया किञ्चित्प्रज्ञापयितुमिष्यते ।
योऽहं न स परग्राह्यस्तन्मुधा बोधनोद्यमः ॥69॥

अर्थ: जो कुछ मैं परको जानना चाहता हूँ सो मैं वह आत्मा नहीं हूँ और जो मैं आत्मा हूँ वह आत्मा परके ग्रहण करने योग्य नहीं है; इस कारण मेरे परके संबोधनका जो उद्यम है, सो वृथा है, क्योंकि, आत्मा आपसे ही जाना जाता है, परका कहना सुनना निमित्तमात्र है, इसलिये इसमें आग्रह करना वृथा है ।


निरुद्धज्योतिरज्ञोऽन्तः स्वतोऽन्यत्रैव तुष्यति ।
तुष्यत्यात्मनि विज्ञानी बहिर्विगतविभ्रमः ॥70॥

अर्थ: अज्ञानी तो अपनेसे भिन्न परवस्तुमें ही सन्तुष्ट होता है, क्योंकि उसकी अन्तर्ज्योति रुद्ध हो गई है, और ज्ञानीपुरुष आत्मामें ही सन्तुष्ट होता है, क्योंकि उसके बाह्य विभ्रम नष्ट हो गया है ।


यावदात्मेच्छयाऽऽदत्ते वाक्चित्तवपुषां व्रजम् ।
जन्म तावदमीषां तु भेदज्ञानाद्भवच्युतिः ॥71॥

अर्थ: यह प्राणी जब तक वचन मन कायके समूहको आत्माकी इच्छासे ग्रहण करता है तब तक इसके संसार है, तथा इनका जब भेदज्ञान होता है तब उससे संसारका अभाव होता है ।


जीर्णे रक्ते घने ध्वस्ते नात्मा जीर्णादिकः पटे ।
एवं वपुषि जीर्णादौ नात्मा जीर्णादिकस्तथा ॥72॥

अर्थ: जिस प्रकार वस्त्रके जीर्ण होते, रक्त होते, दृढ होते वा नष्ट होते आत्मा वा शरीर जीर्ण रक्तादिक स्वरूप नहीं होता, उसी प्रकार शरीरके जीर्ण वा ध्वस्त होते हुए आत्मा जीर्णादिकरूप नहीं होता। यह दृष्टान्त दार्ष्टान्त जानना ।


चलमप्यचलप्रख्यं जगद्यस्यावभासते ।
ज्ञानयोगक्रियाहीनं स एवास्कन्दति ध्रुवम् ॥73॥

अर्थ: जिस योगी मुनिको चलस्वरूप भी यह जगत् अचलके समान दीखता है, वही मुनि इन्द्रियज्ञानकी और योगकी क्रियासे हीन ऐसे शिव(निर्वाण)को प्राप्त होता है।


तनुत्रयावृतो देही ज्योतिर्मयवपुः स्वयम् ।
न वेत्ति यावदात्मानं क्व तावद्बन्धविच्युतिः ॥74॥

अर्थ: यह आत्मा स्वयं तो ज्ञानज्योति-प्रकाशमय है, और देहसहित देही औदारिक तैजस और कार्माण इन तीन शरीरोंसे ढका हुआ है, सो यह आत्मा जब तक अपने ज्ञानमय आत्माको नहीं जानता तब तक बंधका अभाव कहाँसे होगा ? अर्थात् नहीं होगा ।


गलन्मिलदणुव्रातसंनिवेशात्मकं वपुः ।
वेत्ति मूढस्तदात्मानमनाद्युत्पन्नविभ्रमात् ॥75॥

अर्थ: क्षरते मिलते पुद्गल परमाणुओंके स्कन्धोंके निवेशसे रचा हुआ जो यह शरीर है, उसको यह मूढ बहिरात्मा अनादिसे उत्पन्न हुए विभ्रमसे आत्मा जानता है। यही संसारका बीज है ।


मुक्तिरेव मुनेस्तस्य यस्यात्मन्यचला स्थितिः ।
न तस्यास्ति ध्रुवं मुक्तिर्न यस्यात्मन्यवस्थितिः ॥76॥

अर्थ: जिस मुनिकी आत्मामें अचलस्थिति है उसीकी मुक्ति होती है, और जिसकी आत्मामें अवस्थिति नहीं है उसकी नियमसे मुक्ति नहीं होती; क्योंकि आत्मामें जो अवस्थिति है वही सम्यग्दर्शनज्ञानपूर्वक चारित्र है और उसीसे मुक्ति है। सांख्य नैयायिकादि मतावलंबी ज्ञानमात्रसे मुक्ति मानते हैं, सो नहीं है ।


दृढः स्थूलः स्थिरो दीर्घो जीर्णः शीर्णो लघुर्गुरुः ।
वपुषैवमसंबध्नन्स्वं विन्द्याद्वेदनात्मकम् ॥77॥

अर्थ: शरीरसहित मैं दृढ हूँ, स्थूल (मोटा) हूँ, स्थिर हूँ, लंबा हूँ, जीर्ण हूँ, शीर्ण (अतिकृश) हूँ, हलका हूँ और भारी हूँ इस प्रकार आत्माको शरीरसहित संबंध रूप नहीं करता हुआ पुरुष ही आत्माको ज्ञानस्वरूप जानता है अर्थात् अनुभव करता है ।


जनसंसर्गे वाक्चित्तपरिस्पन्दमनोभ्रमाः ।
उत्तरोत्तरबीजानि ज्ञानी जनस्ततस्त्यजेत् ॥78॥

अर्थ: लोकका संसर्ग होनेसे वचन और चित्तका चलना होता हैं और मनको भ्रम होता है, ये उत्तरोत्तर बीजस्वरूप हैं, अर्थात् लोकके संसर्गसे तो परस्पर वचनालाप होता है और उस वचनालापसे चित्त चलायमान होता है और चित्त चलनेसे मनमें भ्रम होता है; इस कारण, ज्ञानी मुनि लोकके संसर्गको छोडें ।


नगग्रामादिषु स्वस्य निवासं वेत्त्यनात्मवित् ।
सर्वावस्थासु विज्ञानी स्वस्मिन्नेवास्तविभ्रमः ॥79॥

अर्थ: जो अनात्मवित् हैं अर्थात् आत्माको नहीं जानते, वे पर्वत ग्राम आदिमें अपना निवास जानते हैं; और जो अस्तविभ्रम (ज्ञानी) हैं, वे समस्त अवस्थाओंमें अपने आत्मामें ही अपना निवासस्थान समझते हैं ।


आत्मेति वपुषि ज्ञानं कारणं कायसन्ततेः ।
स्वस्मिन्स्वमिति विज्ञानं स्याच्छरीरान्तरच्युतेः ॥80॥

अर्थ: शरीरमें यह शरीर ही आत्मा है इस प्रकार जानना कायकी सन्तान अर्थात् आगामी परिपाटीका कारण है, और अपने आत्मामें ही आत्मा है ऐसा ज्ञान इस शरीरसे अन्य शरीर होनेके अभावका कारण है ।


आत्माऽऽत्मनां भवं मोक्षमात्मनः कुरुते यतः ।
अतो रिपुर्गुरुश्चायमात्मैव स्फुटमात्मनः ॥81॥

अर्थ: यह आत्मा अपने ही द्वारा अपने संसारको करता है और अपने द्वारा आप ही अपने लिये मोक्ष करता है; इस कारण आप ही अपना शत्रु है और आप ही अपना गुरु है, यह प्रकटतया जानो। पर तो बाह्य निमित्तमात्र है ।


पृथग् दृष्ट्वात्मनः कायं कायादात्मानमात्मवित् ।
तथा त्यजत्यशङ्कोऽङ्गं यथा वस्त्रं घृणास्पदम् ॥82॥

अर्थ: आत्माका जाननेवाला ज्ञानी देहको आत्मासे भिन्न तथा आत्माको देहसे भिन्न देखकर ही निःशंक हो (देहको) त्यागता है। जैसे प्राकृत पुरुष जब वस्त्र मलिन होकर ग्लानिका स्थान होता है, तब उस वस्त्रको निःशंक हो, छोड देता है, उसी प्रकार यह देह भी ग्लानिका स्थान है, इस कारण ज्ञानीको इसके त्यागनेमें कुछ भी शंका नहीं होती है ।


अन्तर्दृष्ट्वाऽऽत्मनस्तत्त्वं बहिर्दृष्ट्वा ततस्तनुम् ।
उभयोर्भेदनिष्णातो न स्खलत्यात्मनिश्चये ॥83॥

अर्थ: ज्ञानी आत्माको स्वरूपके अन्तरंगमें देखकर और देहको बाह्यमें देखकर दोनोंके भेदमें निष्णात कहिये निःसंदेह ज्ञाता होकर आत्माके निश्चयमें नहीं डिगता अर्थात् निश्चल अन्तरात्मा होकर रहता है ।


तर्कयेज्ञगदुन्मत्तं प्रागुत्पन्नात्मनिश्चयः ।
पश्चाल्लोष्टमिवाचष्टे तद्दृढाभ्यासवासितः ॥84॥

अर्थ: जिसको आत्माका निश्चय हो गया है ऐसा ज्ञानी प्रथम तो इस जगतको उन्मत्तवत् विचारता है, तत्पश्चात् आत्माका दृढ अभ्यास करके पाषाणके समान देखता है।


शरीराद्भिन्नमात्मानं शृण्वन्नपि वदन्नपि ।
तावन्न मुच्यते यावन्न भेदाभ्यासनिष्ठितः ॥85॥

अर्थ: यह पुरुष आत्माको शरीरसे भिन्न सुनता हुआ भी तथा कहता हुआ भी जब तक इसके भेदाभ्यासमें निष्ठित (परिपक्व) नहीं होता, तब तक इससे छूटता नहीं, क्योंकि निरन्तर भेदज्ञानके अभ्याससे ही इसका ममत्व छूटता है ।


व्यतिरिक्तं तनोस्तद्वद्भाव्य आत्माऽऽत्मनाऽऽत्मनि ।
स्वप्नेऽप्ययं यथाऽभ्येति पुनर्नाङ्गेन संगतिम् ॥86॥

अर्थ: आत्माको आत्माके ही द्वारा आत्मामें शरीरसे भिन्न ऐसा विचारना कि जिससे फिर यह आत्मा स्वप्नमें भी शरीरकी संगतिको प्राप्त न हो, अर्थात् मैं शरीर हूँ ऐसी बुद्धि स्वप्नमें भी न हो ऐसा निश्चय करना चाहिये ।


यतो व्रताव्रते पुंसां शुभाशुभनिबन्धने ।
तदभावात्पुनर्मोक्षो मुमुक्षुस्ते ततस्त्यजेत् ॥87॥

अर्थ: तथा व्रत और अव्रत शुभ और अशुभ दो प्रकारके बंधोंके कारण हैं, और शुभाशुभ कर्मके अभावसे मोक्ष होता है, इस कारण मुक्तिका इच्छुक मुनि व्रत और अव्रत दोनोंको ही त्यागता है, अर्थात् इनमें करने न करनेका अभिमान नहीं करता ।


प्रागसंयममुत्सृज्य संयमैकरतो भवेत् ।
ततोऽपि विरमेत्प्राप्य सम्यगात्मन्यवस्थितिम् ॥88॥

अर्थ: व्रत अव्रतका त्यागना कहा है सो इस प्रकार त्यागे कि प्रथम तो असंयमको छोड संयममें रक्त हो । तत्पश्चात् सम्यक्प्रकारसे आत्मामें अवस्थितिको प्राप्त होकर उस संयममें भी विरक्त हो जावे, अर्थात् संयमका ममत्व वा अभिमान न रक्खे ।


जातिलिङ्गमिति द्वन्द्वमङ्गमाश्रित्य वर्त्तते ।
अङ्गात्मकश्च संसारस्तस्मात्तद्द्वितयं त्यजेत् ॥89॥

अर्थ: जाति (क्षत्रियादिक) और लिंग (मुनि श्रावकादिकका वेष) ये दोनों ही देहके आश्रित हैं तथा इस देहस्वरूप ही संसार है, इसलिये मुनि इन जाति लिंग दोनोंको ही त्यागता है, अर्थात् इनका अभिमान नहीं रखता ।


अभेदविद्यथा पङ्गोर्वेत्ति चक्षुरचक्षुपि ।
अङ्गेऽपि च तथा वेत्ति संयोगाद्दृश्यमात्मनः ॥90॥

अर्थ: जिस प्रकार अन्धेके कन्धेपर पांगुला चढकर चलता है, उनका भेद न जाननेवाला कोई पुरुष पंगुके नेत्रोंको अन्धेके नेत्र जानता है, उसी प्रकार आत्मा और देहका संयोग है, सो इनका भेद नहीं जाननेवाला अज्ञानी आत्माके दृश्यको अंग (देह) का ही दृश्य (देखने योग्य) जानता है ।


भेदविन्न यथा वेत्ति पङ्गोश्चक्षुरचक्षुषि ।
विज्ञातात्मा तथा वेत्ति न काये दृश्यमात्मनः ॥91॥

अर्थ: जिस प्रकार पंगु और अंधेके भेदको जाननेवाला पुरुष पंगुके नेत्रोंको अंधेके नेत्र नहीं जानता, उसी प्रकार आत्मा और देहके भेदको जाननेवाला पुरुष आत्माके दृश्यको देहका दृश्य नहीं जानता, क्योंकि आत्मा चैतन्य ज्ञानवान है, परन्तु देहके बिना चल नहीं सकता, इस कारण वह पंगुके समान है; और देह अचेतन है, इस कारण वह अंधेके समान है इस भेदको जो जानता है, वह देहमें आत्मा न जानकर, आत्मामें ही आत्माको जानता है ।


मत्तोन्मत्तादिचेष्टासु यथाज्ञस्य स्वविभ्रमः ।
तथा सर्वास्ववस्थासु न क्वचित्तत्त्वदर्शिनः ॥92॥

अर्थ: जिस प्रकार अज्ञानीके मत्त उन्मत्त आदि चेष्टाओंमें आत्माका विभ्रम होता है अर्थात् अज्ञानी अपनेको भूल जाता है और जब चेत करता है तब अपनेको जानता है; उसी प्रकार तत्त्वदर्शिके सब ही अवस्थाओंमें विभ्रम नहीं है अर्थात् सदा ही समस्त अवस्थाओंमें आत्मा जानता है, भूलता कभी नहीं है ।


देहात्मदृग्न मुच्येत चेज्जागर्ति पठत्यपि ।
सुप्तोन्मत्तोऽपि मुच्येत स्वस्मिन्नुत्पन्ननिश्चयः ॥93॥

अर्थ: जिसकी देहमें ही आत्मदृष्टि है ऐसा मिथ्यादृष्टि बहिरात्मा यदि जागता है तथा पढता (वचन उच्चार करता) है तो भी वह कर्मोंसे नहीं छूटता और जिसका आत्मामें निश्चय हो गया है ऐसा भेदज्ञानी सोता या उन्मत्त रहता हुआ भी कर्मोंसे मुक्त हो जाता है ।


आत्मानं सिद्धमाराध्य प्राप्नोत्यात्मापि सिद्धताम् ।
वर्तिः प्रदीपमासाद्य यथाभ्येति प्रदीपताम् ॥94॥

अर्थ: जैसे वर्तिका (बत्ती) दीपको प्राप्त होकर दीपक हो जाती है, उसी प्रकार यह आत्मा सिद्ध परमात्माका आराधन करके सिद्धपनेको प्राप्त होता है ।


आराध्यात्मानमेवात्मा परमात्मत्वमश्नुते ।
यथा भवति वृक्षः स्वं स्वेनोद्धृष्य हुताशनः ॥95॥

अर्थ: आत्मा आत्माको ही आराधकर परमात्मपनको प्राप्त होता है, जैसे वृक्ष अपनेको आपसे ही घिसकर अग्नि हो जाता है ।


इत्थं वाग्गोचरातीतं भावयन्परमेष्ठिनम् ।
आसादयति तद्यस्मान्न भूयो विनिवर्तते ॥96॥

अर्थ: यह आत्मा पूर्वोक्त प्रकार वचनके अगोचर परमेष्ठीको भावता हुआ उस पदको पाता है कि जिस पदसे फिर निवृत्ति (लौटना) न हो, अर्थात् जो छूटे नहीं ऐसे सिद्धपदको प्राप्त होता है ।


अयत्नजनितं मन्ये ज्ञानिनां परमं पदम् ।
यदात्मन्यात्मविज्ञानमात्रमेव समीहते ॥97॥

अर्थ: यदि यह आत्मा आत्मामें ही विज्ञान मात्रको सम्यक्प्रकार चाहता है, तो जानना चाहिये कि ज्ञानियोंके परमपद बिना यत्नके ही हो गया। ‘मैं ऐसा मानता हूँ’ इस प्रकार आचार्य महाराजने संभावना की है ।


स्वप्ने दृष्टविनाशोऽपि यथाऽऽत्मा न विनश्यति ।
जागरेऽपि तथा भ्रान्तेरुभयत्राविशेषतः ॥98॥

अर्थ: जैसे स्वप्नमें अपनेको नष्ट हुआ देख लेनेसे आत्मा नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार जागते हुए भी विनाश नहीं है किन्तु दोनों जगह विनाशके भ्रमका अविशेष है ।


अतीन्द्रियमनिर्देश्यममूर्तं कल्पनाच्युतम् ।
चिदानन्दमयं विद्धि स्वस्मिन्नात्मानमात्मना ॥99॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू आत्माको आत्मामें ही आपसे ही ऐसा जान कि, मैं अतीन्द्रिय हूँ अर्थात् मेरे इन्द्रिय नहीं अथवा मैं इन्द्रियोंके गोचर नहीं हूँ, अथवा इन्द्रियोंके स्पर्श रस गन्ध वर्ण और शब्द विषय मुझ (आत्मा) में नहीं हैं इस कारण अतीन्द्रिय हूँ, तथा अनिर्देश्य हूँ - वचनोंके द्वारा कहनेमें नहीं आता ऐसा हूँ, तथा अमूर्तिक हूँ अर्थात् स्पर्शादिकसे रहित हूँ, तथा कल्पनातीत हूँ, और चैतन्य तथा आनंदमय हूँ ।


मुच्येताधीतशास्त्रोऽपि नात्मेति कल्पयन्वपुः ।
आत्मन्यात्मानमन्विष्यन् श्रुतशून्योऽपि मुच्यते ॥100॥

अर्थ: शरीरमें यह शरीर ही आत्मा है इस प्रकार अभ्यास करता हुआ वा जानता हुआ पुरुष यदि अधीतशास्त्र (पढे हैं शास्त्र जिसने ऐसा) है तथापि कर्मसे नहीं छूटता है अर्थात् मुक्त नहीं हो सकता है तथा यदि शास्त्रसे शून्य है और आत्मामें ही आत्माको जानता वा मानता है तो कर्मसे छूटकर मुक्त हो जाता है ।


पराधीनसुखास्वादनिर्वेदविशदस्य ते ।
आत्मैवामृततां गच्छन्नविच्छिन्नं स्वमीक्षते ॥101॥

अर्थ: हे आत्मन् ! पराधीन इन्द्रियजनित सुखके स्वादमें वैराग्य है स्पष्ट जिसके ऐसा जो तू उसका आत्मा ही अमृतपनको प्राप्त होता हुआ अविच्छेदरूप अपनेको देखता है ।


यदभ्यस्तं सुखाद् ज्ञानं तद्दुःखेनापसर्पति ।
दुःखैकशरणस्तस्माद्योगी तत्त्वं निरूपयेत् ॥102॥

अर्थ: जो ज्ञान सुखसे अभ्यास किया है, वह ज्ञान प्रायः दुःख आने पर चला जाता है, इस कारण योगी दुःखको ही अंगीकार करके तत्त्वका अनुभव करता है।


निखिलभुवनतत्त्वोद्भासनैकप्रदीपं निरुपधिमधिरूढं निर्भरानन्दकाष्ठाम् ।
परममुनिमनीषोद्भेदपर्यन्तभूतं परिकलय विशुद्धं स्वात्मनात्मानमेव ॥103॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू अपने आत्माको अपने आत्मासे ही इस प्रकार विशुद्ध (निर्मल) अनुभव कर कि यह आत्मा समस्त लोकके यथार्थ स्वरूपको प्रकट करनेवाला अद्वितीय प्रदीप है, तथा अतिशय आनन्दकी सीमाको उपाधिरहित प्राप्त हुआ है, तथा परम मुनिकी बुद्धिसे प्रकट उत्कृष्टता पर्यन्त है स्वरूप जिसका ऐसा है, इस प्रकार आत्माका अनुभव कर; ऐसा उपदेश है ।


इति साधारणं ध्येयं ध्यानयोर्धर्मशुक्लयोः ।
विशुद्धिस्वामिभेदेन भेदः सूत्रे निरूपितः ॥104॥

अर्थ: इस (उक्त) प्रकार धर्मध्यान व शुक्लध्यानका ध्येय (ध्यान करने योग्य) पदार्थ साधारणतया कहा गया। इन दोनोंकी विशुद्धता और ध्यान करनेवाले (ध्याता आदि) का भेद सूत्रमें निरूपण किया है ।

सर्ग 33: आज्ञाविचय धर्मध्यान (श्लोक 1 से 22)

अनादिविभ्रमान्मोहादनभ्यासादसंग्रहात् ।
ज्ञातमप्यात्मनस्तत्त्वं प्रस्खलत्येव योगिनः ॥1॥

अर्थ: योगी (मुनि) आत्माके स्वरूपको यथार्थ जानता हुआ भी अनादि विभ्रमकी वासनासे तथा मोहके उदयसे, तथा विना अभ्याससे और उस तत्त्वके संग्रहके अभावसे मार्गसे च्युत हो जाता है अर्थात् मुनि भी तत्त्वस्वरूपसे चलायमान हो जाता है ।


अविद्यावासनावेशविशेषविवशात्मनाम् ।
योज्यमानमपि स्वस्मिन् न चेतः कुरुते स्थितिम् ॥2॥

अर्थ: तथा आत्माके स्वरूपको यथार्थ जानकर अपनेमें जोडता हुआ भी अर्थात् ध्यानसे एकाग्र लगता हुआ भी अविद्याकी वासनासे - वेगसे विशेषतया विवश है आत्मा जिनका उनका चित्त स्थिरताको नहीं धारण करता ।


साक्षात्कर्तुमतः क्षिप्रं विश्वतत्त्वं यथास्थितम् ।
विशुद्धिं चात्मनः शश्वद्वस्तुधर्मे स्थिरीभवेत् ॥3॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वोक्त ध्यानके विघ्नके कारण दूर करनेके लिये तथा समस्त वस्तुओंके स्वरूपका यथास्थित तत्काल साक्षात् करनेके लिये तथा आत्माकी विशुद्धता करनेके लिये निरन्तर वस्तुओंके धर्ममें स्थिरीभूत होवे ।


अलक्ष्यं लक्ष्यसम्बन्धात् स्थूलात्सूक्ष्मं विचिन्तयेत् ।
सालम्बाच्च निरालम्बं तत्त्ववित्तत्त्वमञ्जसा ॥4॥

अर्थ: तत्त्वज्ञानी इस प्रकार तत्त्वको प्रकटतया चिंतवन करे कि लक्ष्यके (जो अपने लखनेमें आवे उसके) सम्बन्धसे तो अलक्ष्यको (जो अनुभवगोचर नहीं उसको) चिंतवन करे, और स्थूल इन्द्रियगोचर पदार्थसे सूक्ष्म इन्द्रियोंके अगोचर पदार्थोंको चिंतवन करें; इसी प्रकार सालम्ब कहिये किसी ध्येयका आलंबन लेकर, उससे निरालम्ब वस्तु स्वरूपसे तन्मय होना चाहिये।


आज्ञापायविपाकानां क्रमशः संस्थितेस्तथा ।
विचयो यः पृथक् तद्धि धर्मध्यानं चतुर्विधम् ॥5॥

अर्थ: आज्ञा, अपाय, विपाक तथा संस्थान इनका भिन्न-भिन्न विचय (विचार) अनुक्रमसे करना ही धर्मध्यानके चार प्रकार हैं। यहाँ विचय नाम विचार करने अर्थात् चिंतवन करनेका है, तथा इन चारों प्रकारोंके नाम इस प्रकार कहने चाहिये-१ आज्ञाविचय, २ अपायविचय, ३ विपाकविचय और ४ संस्थानविचय ।


वस्तुतत्त्वं स्वसिद्धान्तं प्रसिद्धं यत्र चिन्तयेत् ।
सर्वज्ञाज्ञाभियोगेन तदाज्ञाविचयो मतः ॥6॥

अर्थ: जिस धर्मध्यानमें अपने जैन सिद्धान्तमें प्रसिद्ध वस्तुस्वरूपको सर्वज्ञ भगवानकी आज्ञाकी प्रधानतासे चिंतवन करे सो आज्ञाविचयनामा धर्मध्यानका प्रथम भेद है ।


अनन्तगुणपर्यायसंयुतं तत् त्रयात्मकम् ।
त्रिकालविषयं साक्षाज्जिनाज्ञासिद्धमामनेत् ॥7॥

अर्थ: आज्ञाविचय धर्मध्यानमें तत्त्व अनन्त गुण पर्यायोंसहित त्रयात्मक त्रिकालगोचर साक्षात् जिनेन्द्र भगवानकी आज्ञासे सिद्ध हुआ चिंतवन करे (माने) ।


प्रमाणनयनिक्षेपैर्निर्णीतं तत्त्वमञ्जसा ।
स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतं चिदचिल्लक्षणं स्मरेत् ॥8॥

अर्थ: आज्ञाविचयध्यानमें प्रमाण नय निक्षेपोंसे निर्णय किये हुए, स्थिति उत्पत्ति और व्ययसंयुत अर्थात् उपजें विनशें स्थिर रहे ऐसा, और चेतन अचेतनरूप है लक्षण जिसका ऐसे तत्त्वसमूहका चिन्तवन करे ।


श्रीमत्सर्वज्ञदेवोक्तं श्रुतज्ञानं च निर्मलम् ।
शब्दार्थनिचितं चित्रमत्र चिन्त्यमविप्लुतम् ॥9॥

अर्थ: तथा इस आज्ञाविचय ध्यानमें श्रीमत्सर्वज्ञदेवके कहे हुए निर्मल और शब्द तथा अर्थसे परिपूर्ण नाना प्रकारके निर्बाध श्रुतज्ञानका चिन्तवन करना चाहिये ।


परिस्फुरति यत्रैतद्विश्वविद्याकदम्बकम् ।
द्रव्यभावभिदा तद्धि शब्दार्थज्योतिरग्रिमम् ॥10॥

अर्थ: शब्द और अर्थका प्रकाश है मुख्य जिसमें ऐसा, तथा जो समस्त प्रकारकी विद्याओंका समूह है अर्थात् आचार आदि अंग, पूर्व अंग, बाह्य प्रकीर्णकरूप विद्याका समूह है तथा द्रव्यश्रुत (शब्दरूप) और भावश्रुत (ज्ञानरूप) ये दो हैं भेद जिसके ऐसा सर्वज्ञ भगवानका कहा हुआ श्रुतज्ञान है ।


अपारमतिगम्भीरं पुण्यतीर्थं पुरातनम् ।
पूर्वापरविरोधादिकलङ्कपरिवर्जितम् ॥11॥

अर्थ: फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? अपार है; क्योंकि जिसके शब्दोंका पार कोई अल्पज्ञानी नहीं पा सकता; तथा गंभीर है क्योंकि जिसके अर्थकी थाह हर कोई नहीं पा सकता; तथा पुण्यतीर्थ है, क्योंकि जिसमें पापका लेश भी नहीं है, अर्थात् निर्दोष है, इसी कारण जीवोंको तारनेवाला है; तथा पुरातन है, अर्थात् अनादिकालसे चला आया है; और पूर्वापरविरोध आदि कलंकोंसे रहित है ।


नयोपनयसंपातगहनं गणिभिः स्तुतम् ।
विचित्रमपि चित्रार्थसंकीर्णं विश्वलोचनम् ॥12॥

अर्थ: फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नय और सद्भूत, असद्भूत व्यवहारादिक उपनयोंके संपातसे तो गहन है, तथा गणधरादिकों करके स्तुति करने योग्य है; तथा विचित्र कहिए अपूर्व है तथापि चित्र कहिए अनेक प्रकारके अर्थोंसे भरा है; तथा समस्त लोकको दिखानेके लिए नेत्रके समान है ।


अनेकपदविन्यासैरङ्गपूर्वैः प्रकीर्णकैः ।
प्रसृतं यद्विभात्युच्चै रत्नाकर इवापरः ॥13॥

अर्थ: फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? अनेक पदोंका विन्यास (स्थान) है जिनमें ऐसे आचारादि अङ्ग तथा अग्रायणी आदि पूर्व और सामायिकादि प्रकीर्णकोंसे विस्ताररूप है; सो यह श्रुतज्ञान जिस प्रकार रत्नाकर (समुद्र) शोभता है उसी प्रकार शोभता है ।


मदमत्तोद्धतक्षुद्रशासनाशीविषान्तकम् ।
दुरन्तघनमिथ्यात्वध्वान्तघर्मांशुमण्डलम् ॥14॥

अर्थ: फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? मदसे माते, उद्धत, क्षुद्र (नीच) सर्वथा एकान्तवादियोंका शासन (मत) रूपी आशीविष कहिए सर्पका अन्तक है अर्थात् नष्ट करनेवाला है; तथा दुरन्त कहिये जिसका अन्त बहुत दूर है ऐसे दृढ मिथ्यात्वरूपी अन्धकारके दूर करनेको सूर्यमंडलके समान है ।


यत्पवित्रं जगत्यस्मिन्विशुद्ध्यति जगत्त्रयी ।
येन तद्धि सतां सेव्यं श्रुतज्ञानं चतुर्विधम् ॥15॥

अर्थ: फिर कैसा है यह श्रुतज्ञान ? इस जगतमें पवित्र है, क्योंकि जिसके द्वारा ये तीनों जगत् पवित्र होते हैं; इसी कारण यह श्रुतज्ञान सत्पुरुषोंके सेवने योग्य है । यह श्रुतज्ञान प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोगके भेदसे चार प्रकारका है ।


स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतं तृतीयं योगिलोचनम् ।
नयद्वयसमावेशात्साद्यनादि व्यवस्थितम् ॥16॥

अर्थ: फिर कैसा है श्रुतज्ञान ? उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य करके संयुक्त है; तथा योगीश्वरोंका तीसरा नेत्र है; तथा द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक इन दो नयोके कारण सादि अनादि व्यवस्था रूप है । द्रव्यनयसे संतानकी अपेक्षा अनादि है और पर्यायनयकी अपेक्षा तीर्थंकरोंकी दिव्यध्वनिसे प्रगट होता है इस कारण सादि है ।


निःशेषनयनिक्षेपनिकषग्रावसन्निभम् ।
स्याद्वादपविनिर्घातभग्नान्यमतभूधरम् ॥17॥

अर्थ: फिर यह श्रुतज्ञान समस्त नय निक्षेपोंसे वस्तुके स्वरूपकी परीक्षा करनेके लिये कसौटीके समान है; तथा स्याद्वाद कहिये कथंचित् वचनरूपी वज्रके निर्घातसे भग्न किये हैं अन्यमतरूपी पर्वत जिसने ऐसा है ।


इत्यादिगुणसंदर्भनिर्भरं भव्यशुद्धिदम् ।
ध्यायन्तु धीमतां श्रेष्ठाः श्रुतज्ञानमहार्णवम् ॥18॥

अर्थ: इत्यादि पूर्वोक्त गुणोंकी रचनासे भरा हुआ, भव्य जीवोंको शुद्धिका देनेवाला श्रुतज्ञानरूप महासमुद्र है सो इसको बुद्धिमानोंमें जो श्रेष्ठ हैं वे ध्यावो (चिंतवन करो)। यह प्रेरणारूप उपदेश है ।


यज्जन्मज्वरघातकं त्रिभुवनाधीशैर्यदभ्यर्चितं
यत्स्याद्वादमहाध्वजं नयशताकीर्णं च यत्पठ्यते ।
उत्पादस्थितिभङ्गलाञ्छनयुता यस्मिन्पदार्थाः स्थिता -
स्तच्छ्रीवीरमुखारविन्दगदितं दद्याच्छ्रुतं वः शिवम् ॥19॥

अर्थ: जो श्रुतज्ञान संसाररूपी ज्वरका तो घातक है और तीन भुवनके ईश इन्द्रोंसे पूजित हैं, तथा जो स्याद्वादरूपी बडी ध्वजावाला है, और सैकडों नयोंसे पूर्ण है, ऐसा कहा जाता है; तथा जिसमें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य लांछन युक्त पदार्थ रहते हैं ऐसे श्रीवर्द्धमान स्वामीके मुखकमलसे कहा हुआ श्रुतज्ञान तुम श्रोताजनोंको कल्याणरूप हो, ऐसा आशीर्वचन है ।


वाग्देव्याः कुलमन्दिरं बुधजनानन्दैकचन्द्रोदयं
मुक्तेर्मङ्गलमग्रिमं शिवपथप्रस्थानदिव्यानकम् ।
तत्त्वाभासकुरङ्गपञ्चवदनं भव्यान्विनेतुं क्षमं
तच्छ्रोत्राञ्जलिभिः पिबन्तु गुणिनः सिद्धान्तवार्द्धेः पयः ॥20॥

अर्थ: जो वाग्देवी (सरस्वती) के रहनेको कुलगृह है तथा विद्वानोंके आनन्द उपजानेके लिये अद्वितीय चन्द्रमाका उदय है, मुक्तिका मुख्य मंगल व मोक्षमार्गमें गमन करनेके लिये दिव्य आनक कहिये पटह नामका बाजा है, तत्त्वाभास (मिथ्यात्व) रूपी हिरणके नाश करनेको सिंहके समान है, तथा भव्य जीवोंको मोक्षमार्गमें चलानेके लिये समर्थ है ऐसे इस सिद्धान्तरूपी समुद्रके जलको हे गुणीजनों ! कर्णरूपी अञ्जलियोंसे पान करो ।


येनैते निपतन्ति वादिगिरयस्तुष्यन्ति योगीश्वराः
भव्या येन विदन्ति निर्वृतिपदं मुञ्चन्ति मोहं बुधाः ।
यद्बन्धुर्यमिनां यदक्षयसुखस्याधारभूतं नृणां
तल्लोकद्वयशुद्धिदं जिनवचः पुष्याद्विवेकश्रियम् ॥21॥

अर्थ: जिसके द्वारा प्रसिद्ध वादीरूप पर्वत गिरते हैं अर्थात् खंडखंड हो जाते हैं तथा जिसके द्वारा योगीश्वर प्रसन्न होते हैं, जिसके द्वारा भव्य जीव मोक्षपदको जानते हैं अर्थात् प्राप्त होते हैं, तथा जिसको पढ कर पण्डितजन संसारके मोहको छोड देते हैं, तथा जो वचन संयमी मुनियोंका बंधु (हित करनेवाला) है, तथा जो पुरुषोंके अविनाशी सुखका आधारभूत है । इस प्रकार दोनों लोकोंकी शुद्धताका देनेवाला जिनेन्द्र भगवानका वचन भव्य जीवोंकी विवेकरूपी श्रीको पुष्ट करें । इस प्रकार यह आशीर्वाद है ।


सर्वज्ञाज्ञां पुरस्कृत्य सम्यगर्थान् विचिन्तयेत् ।
यत्र तद्ध्यानमाम्नातमाज्ञाख्यं योगिपुङ्गवैः ॥22॥

अर्थ: जिस ध्यानमें सर्वज्ञकी आज्ञाको अग्रेसर (प्रधान) करके पदार्थोंको सम्यक्प्रकार चिंतवन करें (विचारें) सो मुनीश्वरोंने आज्ञाविचयनामा धर्मध्यान कहा है ।

सर्ग 34: अपायविचय धर्मध्यान (श्लोक 1 से 17)

अपायविचयं ध्यानं तद्वदन्ति मनीषिणः ।
अपायः कर्मणां यत्र सोपायः स्मर्यते बुधैः ॥1॥

अर्थ: जिस ध्यानमें कर्मोंका अपाय (नाश) हो, तथा सोपाय कहिये पंडितजनों करके इस प्रकार जिसमें चिन्तवन किया जाय कि इन कर्मोंका नाश किस उपायसे होगा ? उस ध्यानको बुद्धिमान् पुरुषोंने अपायविचय कहा है ।


श्रीमत्सर्वज्ञनिर्दिष्टं मार्गं रत्नत्रयात्मकम् ।
अनासाद्य भवारण्ये चिरं नष्टाः शरीरिणः ॥2॥

अर्थ: इस ध्यानमें ऐसा चिंतवन होता है कि ये प्राणी श्रीमत्सर्वज्ञजिनेन्द्रके उपदेश किये हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप मार्गको न पाकर संसाररूप वनमें बहुतकाल पर्यन्त नष्ट होते हुए, जन्ममरण और उपार्जन किये कर्मोंके नाश करनेका उपाय जो रत्नत्रय सो उन्होंने नहीं पाया ।


मज्जनोन्मज्जनं शश्वद्भजन्ति भवसागरे ।
वराकाः प्राणिनोऽप्राप्य यानपात्रं जिनेश्वरम् ॥3॥

अर्थ: तथा ये रंक प्राणी जिनेश्वर देवरूपी जहाजको न पाकर, संसाररूप समुद्रमें निरंतर मज्जन उन्मज्जन करते हैं अर्थात् निरंतर जन्ममरण पाते रहते हैं और दुःख भोगते हैं, इस प्रकार चिन्तवन करें ।


महाव्यसनसप्तार्चिःप्रदीप्ते जन्मकानने ।
भ्रमताऽद्य मया प्राप्तं सम्यग्ज्ञानाम्बुधेस्तटम् ॥4॥

अर्थ: फिर ऐसा चिंतन करे कि महान् कष्टरूपी अग्निसे प्रज्ज्वलित इस संसाररूपी वनमें भ्रमण करता हुआ मैं इस समय सम्यग्ज्ञानरूपी समुद्रका तट (किनारा) पा गया ।


अद्यापि यदि निर्वेदविवेकागेन्द्रमस्तकात् ।
स्खलेत्तदैव जन्मान्ध-कूपपातोऽनिवारितः ॥5॥

अर्थ: फिर इस प्रकार चिन्तन करे कि मैंने इस समय सम्यग्ज्ञान पाया है; सो यदि अब भी वैराग्य और भेदज्ञानरूप पर्वतके शिखरसे पड़ूँ तो संसाररूप अंधकूपमें अवश्य पडना होगा ।


अनादिभ्रमसंभूतं कथं निर्वार्यते मया ।
मिथ्यात्वाविरतिप्रायं कर्मबन्धनिबन्धनम् ॥6॥

अर्थ: तत्पश्चात् इस प्रकार चिन्तन करे कि अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुए तथा जिसमें मिथ्यात्व व अविरतिकी बहुलता है ऐसे कर्मबंध होनेके कारण मुझसे किस प्रकार निवारण किये जायेंगे ? ।


सोऽहं सिद्धः प्रसिद्धात्मा दृग्बोधविमलेक्षणः ।
जन्मपङ्के चिरं खिन्नः खण्ड्यमानः स्वकर्मणा ॥7॥

अर्थ: फिर ऐसा चिन्तन करे कि प्रसिद्ध है स्वरूप जिसका ऐसा मैं सिद्ध हूँ, दर्शन ज्ञान ही निर्मल नेत्र है जिसके ऐसा हूँ, तथापि संसाररूपी कीचडमें अपने उपार्जन किये हुए कर्मोंसे खंड-खंड किया चिरकालसे खेदखिन्न हुआ हूँ ।


एकतः कर्मणां सैन्यमहमेकस्ततोऽन्यतः ।
स्थातव्यमप्रमत्तेन मयास्मिन्नरिसंकटे ॥8॥

अर्थ: इस संसारमें एक ओर तो कर्मोंकी सेना है और एक तरफ मैं अकेला हूँ; इस कारण इस शत्रुसमूहमें मुझको अप्रमत्त (सावधान) होकर रहना चाहिये । असावधान रहूँगा तो कर्मरूप वैरी बहुत हैं, इससे वे मुझे बिगाड देंगे ।


निर्द्धूय कर्मसंघातं प्रबलध्यानवह्निना ।
कदा स्वं शोधयिष्यामि धातुस्थमिव काञ्चनम् ॥9॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि जिस प्रकार अन्य धातु (पाषाण) में मिला हुआ कंचन अग्निसे शोधकर शुद्ध किया जाता है उसी प्रकार मैं प्रबल ध्यानरूप अग्निके द्वारा कर्मोंके समूहको नष्ट करके आत्माको कब शुद्ध करूँगा ? इस प्रकार विचार करे ।


किमुपेयो ममात्मायं किंवा विज्ञानदर्शने ।
चरणं वापवर्गाय त्रिभिः सार्द्धं स एव वा ॥10॥

अर्थ: फिर ऐसा विचार करे कि मोक्षके लिये क्या मेरे यह आत्मा उपादेय हैं; अथवा ज्ञानदर्शन उपादेय है, अथवा चारित्र उपादेय है, अथवा ज्ञान दर्शन चारित्र इन तीनों सहित आत्मा ही उपादेय है ? ।


कोऽहं ममास्रवः कस्मात्कथं बन्धः क्व निर्जरा ।
का मुक्तिः किं विमुक्तस्य स्वरूपं च निगद्यते ॥11॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि मैं कौन हूँ और मेरे कर्मोंका आस्रव क्यों होता है तथा कर्मोंका बंध क्यों होता है ? और किस कारणसे निर्जरा होती है ? और मुक्ति क्या वस्तु है ? एवं मुक्त होने पर आत्माका क्या स्वरूप कहा जाता है ? ।


जन्मनः प्रतिपक्षस्य मोक्षस्यात्यन्तिकं सुखम् ।
अव्याबाधं स्वभावोत्थं केनोपायेन लभ्यते ॥12॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि संसारका प्रतिपक्षी जो मोक्ष है उसका अविनाशी, अनन्त अव्याबाध (बाधारहित), स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ (स्वाधीन) सुख किस उपायसे प्राप्त हो ? ।


मय्येव विदिते साक्षाद्विज्ञातं भुवनत्रयम् ।
यतोऽहमेव सर्वज्ञः सर्वदर्शी निरञ्जनः ॥13॥

अर्थ: फिर ऐसा ध्यान करे कि मेरे स्वरूपको जाननेसे मैंने तीनों भुवन जान लिये; क्योंकि मैं ही सर्वज्ञ, सबका देखनेवाला, निरंजन और समस्त कर्मकालिमासे रहित हूँ ।


यावद्यावच्च सम्बन्धो मम स्याद्बाह्यवस्तुभिः ।
तावत्तावत्स्वयं स्वस्मिन्स्थितिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥14॥

अर्थ: फिर ऐसा ध्यान करे कि जब-जब मेरे बाह्य वस्तुओंसे सम्बन्ध होते हैं तब-तब मेरी आपसे ही अपनेमें स्थिति होना स्वप्नमें भी दुर्घट है ।


तथैवैतेऽनुभूयन्ते पदार्थाः सूत्रसूचिताः ।
अतो मार्गेऽत्र लग्नोऽहं प्राप्त एव शिवास्पदम् ॥15॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि जिनसूत्रमें जो पदार्थ कहे हैं वे वैसे ही अनुभव किये जाते हैं, और जैसे कहे हैं वैसे ही दीखते हैं, इस कारण मैं इस सूत्रके मार्गमें लगा हूँ और इसी कारण मोक्षस्थान भी मैं पाया हुआ ही मानता हूँ, क्योंकि जब मार्ग पाया और उस मार्गमें चला तो असली ठिकाना प्राप्त हुआ ही कहा जाता है ।


इत्युपायो विनिश्चेयो मार्गाच्च्यवनलक्षणः ।
कर्मणां च तथापाय उपायश्चात्मसिद्धये ॥16॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वोक्त मोक्षमार्गसे नहीं छूटना है लक्षण जिसका ऐसा तो उपाय निश्चय करना तथा वैसे ही कर्मोंका अपाय (नाश) निश्चय करना, इस प्रकार अपाय और उपाय दोनोंका आत्माकी सिद्धिके लिये निश्चय करना चाहिये ।


इति नयशतसीमालम्बि निर्द्धूतदोषं
च्युतसकलकलङ्कैः कीर्त्तितं ध्यानमेतत् ।
अविरतमनुपूर्वं ध्यायतोऽस्तप्रमादं
स्फुरति हृदि विशुद्धे ज्ञानभास्वत्प्रकाशः ॥17॥

अर्थ: यह पूर्वोक्त प्रकारका अपायविचयनामा ध्यान सैकडों नयोंको अवलम्बन करनेवाला है, तथा दूर किये हैं समस्त दोष जिसने ऐसे समस्त कलंकरहित सर्वज्ञदेवने कहा है; सो जो कोई पुरुष इसको अनुक्रमसे निरन्तर प्रमादरहित होकर ध्याता है उसके हृदयमें निर्मल ज्ञानरूप सूर्यका प्रकाश स्फुरायमान होता है ।

सर्ग 35: विपाकविचय धर्मध्यान (श्लोक 1 से 31)

स विपाक इति ज्ञेयो यः स्वकर्मफलोदयः ।
प्रतिक्षणसमुद्भूतश्चित्ररूपः शरीरिणाम् ॥1॥

अर्थ: प्राणियोंके अपने उपार्जन किये हुए कर्मके फलका जो उदय होता है वह विपाक नामसे कहा है; सो वह कर्मोदय क्षण क्षणप्रति उदय होता है और ज्ञानावरणादि अनेकरूप है ।


कर्मजातं फलं दत्ते विचित्रमिह देहिनाम् ।
आसाद्य नियतं नाम द्रव्यादिकचतुष्टयम् ॥2॥

अर्थ: जीवोंके कर्मोंका समूह निश्चित द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप चतुष्टयको पाकर इस लोकमें अनेक प्रकारसे अपने नामानुसार फल ( आगे कहते हैं उस प्रकार) को देता है ।


स्रक्शय्यासनयानवस्त्रवनितावादित्रमित्राङ्गजान् ।
कर्पूरागुरुचन्द्रचन्दनवनक्रीडाद्रिसौधध्वजान्
मातङ्गांश्च विहङ्गचामरपुरीभक्षान्नपानानि वा ।
छत्रादीनुपलभ्य वस्तुनिचयान्सौख्यं श्रयन्तेऽङ्गिनः ॥3॥

अर्थ: ये प्राणी पुष्पमाला, सुंदर शय्या, आसन, यान, वस्त्र, स्त्री, बाजे, मित्र, पुत्रादिको तथा कर्पूर, अगुरु, चन्द्रमा, चंदन, वनक्रीडा, पर्वत, महल ध्वजादिकको तथा हस्ती, घोडे, पक्षी, चामर, नगरी और खाने योग्य अन्नपानादिकको तथा छत्रादिक वस्तुसमूहको पाकर सुखका आश्रय करते हैं अर्थात् भोगते हैं ।


क्षेत्राणि रमणीयानि सर्वर्तुसुखदानि च ।
कामभोगास्पदान्युच्चैः प्राप्य सौख्यं निषेव्यते ॥4॥

अर्थ: सर्व ऋतुओंमें सुख देनेवाले रमणीय और काम भोगके स्थान ऐसे क्षेत्रोंको प्राप्त होकर अतिशय सुखका अनुभव करते हैं ।


प्रासासिक्षुरयन्त्रपन्नगगरव्यालानलोग्रग्रहान्
शीर्णाङ्गान्कृमिकीटकण्टकरजःक्षारास्थिपङ्कोपलान् ।
काराशृङ्खलशङ्कुकाण्डनिगडक्रूरारिवैरांस्तथा
द्रव्याण्याप्य भजन्ति दुःखमखिलं जीवा भवाध्वस्थिताः ॥5॥

अर्थ: संसाररूप मार्गमें रहते हुए जीव भाला, तलवार, छुरा, यंत्र बंदूक आदि शस्त्र और सर्प, विष, दुष्ट हस्ती, अग्नि, तीव्र खोटे ग्रहादिकको तथा दुर्गन्धित सडे हुए अंग, लट, कीडे, काँटे, रज, क्षार, अस्थि, कीच, पाषाणादिकको तथा बंदीखाना (जेलखाना), सांकल, कीला, कांड, बेडी, क्रूर (दुष्ट), वैरी, वैर, इत्यादि द्रव्योंको प्राप्त होकर समस्त दुःखोंको भोगते हैं ।


निसर्गेणातिरौद्राणि भयक्लेशास्पदानि च ।
दुःखमेवाप्नुवन्त्युच्चैः क्षेत्राण्यासाद्य जन्तवः ॥6॥

अर्थ: ये प्राणी स्वभावसे ही रौद्र, भय और क्लेशके ठिकाने ऐसे क्षेत्रोंको प्राप्त होकर अतिशय दुःखोंको ही पाते हैं ।


अरिष्टोत्पातनिर्मुक्तो वातवर्षादिवर्जितः ।
शीतोष्णरहितः कालः स्यात्सुखाय शरीरिणाम् ॥7॥

अर्थ: अरिष्ट (दुःख देनेवाले) उत्पातसे रहित तथा पवन वर्षा आदिसे वर्जित और शीत उष्णता रहित काल जीवोंके सुखके लिये हैं ।


वर्षातपतुषाराढ्य ईत्युत्पातादिसंकुलः ।
कालः सदैव सत्त्वानां दुःखानलनिबन्धनम् ॥8॥

अर्थ: वर्षा, आतप, हिम (बर्फ) सहित तथा ईति कहिये स्वचक्र परचक्रादिकोंके उत्पात आदि सहित काल जीवोंको निरन्तर दुःखरूप अग्निका कारण है ।


प्रशमादिसमुद्भूतो भावः सौख्याय देहिनाम् ।
कर्मगौरवजः सोऽयं महाव्यसनमन्दिरम् ॥9॥

अर्थ: जो कर्मके उपशमादिकसे उत्पन्न हुआ भाव है, वह तो जीवोंको सुखके अर्थ हैं; और जो कर्मके तीव्र गुरुपनसे उत्पन्न हुआ भाव हैं, सो महान् कष्टका घर है ।


मूलप्रकृतयस्तत्र कर्मणामष्ट कीर्तिताः ।
ज्ञानावरणपूर्वास्ता जन्मिनां बन्धहेतवः ॥10॥

अर्थ: कर्मकी मूल प्रकृति (भेद) ज्ञानावरणादिक आठ कही हैं; वे जीवोंके बंधनकी कारण हैं उन्हें परतन्त्र रखनेवाली है ।


ज्ञानावृतिकरं कर्म पञ्चभेदं प्रपञ्चितम् ।
निरुद्धं येन जीवानां मतिज्ञानादिपञ्चकम् ॥11॥

अर्थ: उन आठ कर्म प्रकृतियोंमेंसे प्रथम ज्ञानको आवरण करनेवाला ज्ञानावरणीय कर्म पाँच भेदरूप कहा गया है; इन पाँचों ज्ञानावरण कर्मोंने जीवोंके मतिज्ञानादिक (मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल) पाँचों ज्ञानोंको रोक रक्खा है अर्थात् ढँक रक्खा है ।


नवभेदं मतं कर्म दृगावरणसंज्ञकम् ।
रुद्ध्यते येन जन्तूनां शश्वदिष्टार्थदर्शनम् ॥12॥

अर्थ: दूसरा दर्शनावरण नामक कर्म वह नव प्रकारका है; जिसने जीवोंके निरन्तर इष्ट वस्तुके दर्शनको रोक रक्खा है अर्थात् ढक रक्खा है ।


वेदनीयं विदुः प्राज्ञा द्विधा कर्म शरीरिणाम् ।
यन्मधूच्छिष्टतद्व्यक्त - शस्त्रधारासमप्रभम् ॥13॥

अर्थ: इसके पश्चात् तीसरा वेदनीयकर्म दो प्रकारका है, एक साता वेदनीय और दूसरा असातावेदनीय; सो यह कर्म जीवोंको शहद-लिपटी तरवारकी धारके समान किंचित् सुखदायक है ।


सुरोरगनराधीशसेवितं श्रयते सुखम् ।
सातोदयवशात्प्राणी संकल्पानन्तरोद्भवम् ॥14॥

अर्थ: यह प्राणी सातावेदनीयके उदयके वशसे तो देवेन्द्र, नागेन्द्र, धरणीन्द्र व चक्रवर्तियोंसे सेवित तथा मनके संकल्प करते ही प्राप्त होनेवाले सुखको प्राप्त होता है, और असातावेदनीयके उदयसे शरीरसम्बन्धी और मनसम्बन्धी दोनों प्रकारके तीव्र दुःख नरकादिक पृथ्वियोंमें भोगता है ॥१४-१५॥


असद्वेद्योदयात्तीव्रं शारीरं मानसं द्विधा ।
जीवो विसह्यते दुःखं शश्वच्छ्वभ्रादिभूमिषु ॥15॥

अर्थ: यह प्राणी सातावेदनीयके उदयके वशसे तो देवेन्द्र, नागेन्द्र, धरणीन्द्र व चक्रवर्तियोंसे सेवित तथा मनके संकल्प करते ही प्राप्त होनेवाले सुखको प्राप्त होता है, और असातावेदनीयके उदयसे शरीरसम्बन्धी और मनसम्बन्धी दोनों प्रकारके तीव्र दुःख नरकादिक पृथ्वियोंमें भोगता है ॥१४-१५॥


दृष्टिमोहप्रकोपेन दृष्टिः साध्वी विलुप्यते ।
तद्विलोपान्निमज्जन्ति प्राणिनः श्वभ्रसागरे ॥16॥

अर्थ: तत्पश्चात् चौथा मोहनीय कर्म है, उसके दो भेद हैं - एक दर्शनमोहनीय और दूसरा चारित्रमोहनीय। इनमेंसे दर्शनमोहनीय नामक कर्मके प्रकोप (उदय) से जीवोंका सम्यग्दर्शन लोपा जाता है, सम्यग्दर्शनके लोपसे जीव नरकरूपी समुद्रमें डूबता है। इस दर्शनमोहनीयकी मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व ऐसी तीन प्रकृतियाँ है ।


चारित्रमोहपाकेन नाङ्गिभिर्लभ्यते क्षणम् ।
भावशुद्ध्या स्वसात्कर्तुं चरणं स्वान्तशुद्धिदम् ॥17॥

अर्थ: दूसरा चारित्रमोह कर्म है, उसके उदयसे यह प्राणी मनकी शुद्धि देनेवाले चारित्रको भावकी शुद्धतासे अंगीकार करनेके लिये क्षणमात्र भी समर्थ नहीं होता ।


लब्ध्वाऽपि यत्प्रमाद्यन्ति यत्स्खलन्त्यथ संयमात् ।
सोऽपि चारित्रमोहस्य विपाकः परिकीर्त्तितः ॥18॥

अर्थ: जो संयम (चारित्र) को ग्रहण करके भी जीव प्रमादरूप होता है और संयमसे भ्रष्ट हो जाता है उसका कारण भी चारित्रमोहका उदय कहा है ।


सुरायुरारम्भककर्मपाकात्संभूय नाके प्रथितप्रभावैः ।
समर्थ्यते देहिभिरायुरग्र्यं सुखामृतस्वादनलोलचित्तैः ॥19॥

अर्थ: पाँचवाँ आयुकर्म है उसके चार भेद है - देवायु, मनुष्यायु, तिर्यगायु और नरकायु । सो इनमेंसे देवायु उत्पन्न करनेवाले कर्मके उदयसे प्राणी स्वर्गमें उत्पन्न होकर, विख्यात हैं प्रभाव जिसका और सुखामृतके आस्वादनमें आसक्त हैं चित्त जिसका ऐसा देव होकर, स्वर्गकि सुख भोगता है ।


नरायुषः कर्मविपाकयोगान्नरत्वमासाद्य शरीरभाजः ।
सुखासुखाक्रान्तधियो नितान्तं नयन्ति कालं बहुभिः प्रपञ्चैः ॥20॥

अर्थ: तथा प्राणी मनुष्यायु नामा कर्मके उदययोगसे मनुष्यत्वको पाकर, कुछ सुख-दुःखसे व्याप्त है बुद्धि जिनकी ऐसे होकर, नानाप्रकारके प्रपञ्चों (कार्यो) से काल यापन करते हैं ।


चरस्थिरविकल्पासु तिर्यग्गतिषु जन्तुभिः ।
तिर्यगायुःप्रकोपेन दुःखमेवानुभूयते ॥21॥

अर्थ: तथा प्राणी तिर्यंच आयुके उदयसे त्रस स्थावर दो भेदरूप तिर्यंच गतियोंमें उत्पन्न होकर केवल दुःख ही दुःख भोगते हैं ।


नारकायुःप्रकोपेन नरकेऽचिन्त्यवेदने ।
निपतन्त्यङ्गिनस्तूर्णं कृतार्त्तिकरुणस्वनाः ॥22॥

अर्थ: तथा नारकायुःकर्मके उदयसे प्राणी अचिन्त्य वेदनावाले नरकोंके बिलोंमें जिसके सुननेसे करुंणा हो आवें ऐसे शब्द करते हुए उत्पन्न होते हैं और पाँच प्रकारके दुःख भोगते हैं ।


नामकर्मोदयः साक्षाद्धत्ते चित्राण्यनेकधा ।
नामानि गतिजात्यादिविकल्पानीह देहिनाम् ॥23॥

अर्थ: तथा जीवोंको नामकर्मका उदय अनेक प्रकारके गति, जाति आदि ९३ भेदवाले नामोंको साक्षात् धारण करता है; नामकर्मकी ९३ प्रकृतियोंका नाम लक्षणादि विशेष भेद गोमट्टसार ग्रन्थसे जानना ।


गोत्राख्यं जन्तुजातस्य कर्म दत्ते स्वकं फलम् ।
शस्ताशस्तेषु गोत्रेषु जन्म निष्पाद्य सर्वथा ॥24॥

अर्थ: तथा गोत्रनामकर्म जीवोंके समूहको ऊँच-नीच गोत्रमें उत्पन्न कराकर सर्व प्रकारसे अपना फल देता है ।


निरुणद्धिः स्वसामर्थ्याद्दानलाभादिपञ्चकम् ।
विघ्नसन्ततिविन्यासैर्विघ्नकृत्कर्म देहिनाम् ॥25॥

अर्थ: आठवाँ कर्म अन्तराय है सो विघ्न करनेवाला है । यह अपनी सामर्थ्य (उदय) से जीवोंके प्राप्त होनेवाले शक्ति, दान, लाभ, भोग, उपभोगोंमें विघ्नसन्ततिकी रचना करता है अर्थात् दानभोगादिमें अन्तराय डालकर उनको रोकता है ।


मन्दवीर्याणि जायन्ते कर्माण्यतिबलान्यपि ।
अपक्वपाचनायोगात्फलानीव वनस्पतेः ॥26॥

अर्थ: पूर्वोक्त अष्ट कर्म अतिशय बलिष्ठ हैं तथापि जिस प्रकार वनस्पतिके फल बिना पके भी पवनके निमित्त (पाल आदि) से पक जाते हैं, उसी प्रकार इन कर्मोंकी स्थिति पूरी होनेसे पहिले भी तपश्चरणादिकसे मन्दवीर्य (अल्प फल देनेवाले) हो जाते है ।


अपक्वपाकः क्रियतेऽस्ततन्द्रैस्तपोभिरुग्रैर्वरशुद्धियुक्तैः ।
क्रमाद्गुणश्रेणिसमाश्रयेण सुसंवृतान्तःकरणैर्मुनीन्द्रैः ॥27॥

अर्थ: नष्ट हुआ है प्रमाद जिनका और सम्यक्प्रकारसे संवररूप हुआ है चित्त जिनका ऐसे मुनीन्द्र उत्कृष्ट विशुद्धता सहित तपोंसे अनुक्रमसे गुणश्रेणी निर्जराका आश्रय करके बिना पके कर्मोंकी भी पका कर स्थिति पूर्ण हुए बिना ही निर्जरा करते हैं ।


द्रव्याद्युत्कृष्टसामग्रीमासाद्योग्रतपोबलात् ।
कर्माणि घातयन्त्युच्चैस्तुर्यध्यानेन योगिनः ॥28॥

अर्थ: योगीश्वर द्रव्यक्षेत्रकालभावकी उत्कृष्ट सामग्रीको प्राप्त होकर तीव्र तपके बलसे इस विपाकविचय नामा ध्यानके पश्चात् चौथे संस्थानविचय नामा ध्यानसे कर्मोको अतिशयताके साथ नष्ट करते हैं ।


विलीनाशेषकर्माणि स्फुरन्तमतिनिर्मलम् ।
स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ॥29॥

अर्थ: उक्त विधानसे कर्मोंकी निर्जरासे विलय हुए हैं समस्त कर्म जिसके ऐसा स्फुरायमान निर्मल पुरुषाकारस्वरूप अपने अंगमें ही प्राप्त हुए आत्माको स्मरण करता है अर्थात् चिन्तवन (ध्यान) करता है ।


इति विविधविकल्पं कर्म चित्रस्वरूपं
प्रतिसमयमुदीर्णं जन्मवर्त्त्यङ्गभाजाम् ।
स्थिरचरविषयाणां भावयन्नस्ततन्द्रो
दहति दुरितकक्षं संयमी शान्तमोहः ॥30॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकार अनेक है भेद (विकल्प) जिसमें ऐसे कर्मका स्वरूप संसारमें वर्तनेवाले प्राणी स्थावर त्रसोंके समय समयप्रति उदयरूप है; उसको शान्तमोह संयमी मुनि प्रमादरहित होकर विचारता हुआ पापरूपी वनको दग्ध करता है ।


इत्थं कर्मकटुप्रपाककलिताः संसारघोरार्णवे
जीवा दुर्गतिदुःखवाडवशिखासन्तानसंतापिताः ।
मृत्यूत्पत्तिमहोर्मिजालनिचिता मिथ्यात्ववातेरिताः
क्लिश्यन्ते तदिदं स्मरन्तु नियतं धन्याः स्वसिद्ध्यर्थिनः ॥31॥

अर्थ: इस प्रकार भयानक संसाररूप समुद्रमें जो जीव हैं वे ज्ञानावरणादिक कर्मोंके कटु पाक (तीव्रोदय) से संयुक्त है; वे दुर्गतिके दुःखरूपी वडवानलकी ज्वालाके संतानसे संतापित है, तथा मरण जन्मरूपी बडी लहरके समूहसे परिपूर्ण भरे हैं, तथा मिथ्यात्वरूप पवनके प्रेरे हुए क्लेश भोगते हैं, सो जो धन्यपुरुष हैं वे अपनी मुक्तिकी सिद्धिके लिये इस विपाकविचय ध्यानको स्मरण करे (ध्यावे) ।

सर्ग 36: संस्थानविचय धर्मध्यान (श्लोक 1 से 186)

अनन्तानन्तमाकाशं सर्वतः स्वप्रतिष्ठितम् ।
तन्मध्येऽयं स्थितो लोकः श्रीमत्सर्वज्ञवर्णितः ॥1॥

अर्थ: प्रथम तो सर्व तरफ (चारों ओर) अनन्तानन्त प्रदेशरूप आकाश है सो वह स्वप्रतिष्ठित है अर्थात् आप ही अपने आधार पर है; क्योंकि उससे बडा अन्य कोई पदार्थ नहीं है जो उसका आधार हो । उस आकाशके मध्य (बीच) में यह लोक स्थित है, सो श्रीमत्सर्वज्ञदेवने वर्णन किया है इस कारण प्रमाणभूत हैं, क्योंकि असत्य कल्पना करके अन्य किसीने नहीं कहा । सर्वज्ञ भगवानने प्रत्यक्ष देखकर, जैसा है वैसा ही, वर्णन किया है ।


स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतैः पदार्थैश्चेतनेतरैः ।
सम्पूर्णोऽनादिसंसिद्धः कर्तृव्यापारवर्जितः ॥2॥

अर्थ: यह लोक ध्राव्य, उत्पाद और व्यय (क्षय) करके संयुक्त चेतन अचेतन पदार्थसे सम्पूर्णतया भरा हुआ है और अनादिसंसिद्ध है। कत्तकि व्यापारसे वर्जित है, अर्थात् कोई अन्यमती इस लोकका कर्ता हर्त्ता ईश्वर आदिको कहते है; तथा कच्छप वा शेषनागके ऊपर स्थित है इत्यादि बुद्धिकल्पित असत्यार्थ कल्पना करके कहते हैं, सो वैसा नहीं है। सर्वज्ञने जैसा कहा है वैसा ही सत्य है ।


ऊर्ध्वाधोमध्यभागैर्यो बिभर्ति भुवनत्रयम् ।
अतः स एव सूत्रज्ञैस्त्रैलोक्याधार इष्यते ॥3॥

अर्थ: तथा यह लोक ऊर्ध्व, मध्य, अधोभागसे तीन भुवनोंको धारण करता है इस कारण सूत्रके जाननेवाले तीन लोक (तीन जगत्) का आधार इस लोकको कहते हैं ।


उपर्युपरि संक्रान्तैः सर्वतोऽपि निरन्तरैः ।
त्रिभिर्वायुभिराकीर्णो महावेगैर्महाबलैः ॥4॥

अर्थ: तथा यह लोक उपरि उपरि (एकके उपरि एक) सर्व तरफसे अन्तररहित महावेगवान महाबलवाले तीन पवनोंसे बेढा हुआ है ।


घनाब्धिः प्रथमस्तेषां ततोऽन्यो घनमारुतः ।
तनुवातस्तृतीयोऽन्ते विज्ञेया वायवः क्रमात् ॥5॥

अर्थ: उन तीन पवनोंमेंसे प्रथम तो यह लोक घनोदधि नाम पवनसे बेढा हुआ है, उसके ऊपर घनवात नामका पवन बेढा हुआ है, उसके ऊपर अन्तमें तनुवात नामका पवन है । इस प्रकार तीन पवनोंसे लोक बेढा हुआ है, इसी कारण इधर-उधर हट नहीं सकता, किंतु आकाशके मध्य भागमें स्थित है ।


उद्धृत्य सकलं लोकं स्वशक्त्यैव व्यवस्थिताः ।
पर्यन्तरहिते व्योम्नि मरुतः प्रांशुविग्रहाः ॥6॥

अर्थ: और ये तीनों पवन तीन लोकांको धारण करके अपनी शक्तिसे ही इस अन्तररहित आकाशमें अपने शरीरको विस्तृत किये हुए स्थित हैं ।


घनाब्धिवलये लोकः स च नान्ते व्यवस्थितः ।
तनुवातान्तरे सोऽपि स चाकाशे स्थितः स्वयम् ॥7॥

अर्थ: यह लोक तो घनोदधि नामके वातवलयमें स्थित है और घनोदधि वातवलय घनवातवलयके मध्यमें है, अर्थात् घनोदधि वातवलयके चारों ओर घनवातवलय घिरा हुआ है और घनवातवलयके चारों तरफ तनुवातवलय घिरा हुआ है और तनुवातवलय आकाशमें स्वयमेव स्थित है, इसमें किसीका कोई कर्तव्य नहीं है । अनादि कालसे इसी प्रकारकी व्यवस्था है ।


अधो वेत्रासनाकारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभः ।
मृदङ्गाभस्ततोऽप्यूर्ध्वं स त्रिधेति व्यवस्थितः ॥8॥

अर्थ: यह लोक नीचेसे तो वेत्रासन कहिये मोढेके आकारका है, अर्थात् नीचेसे चौडा है फिर घटता-घटता मध्यलोक पर्यंत सँकडा हैं । फिर मध्यलोक झालरके आकारका है, और उसके ऊपर ऊर्ध्वलोक मृदंगके आकारका है अर्थात् बीचमें कुछ चौडा और दोनों तरफ सँकडा है । ऐसे तीन प्रकारके लोककी व्यवस्था है ।


अस्य प्रमाणमुन्नत्या सप्त सप्त च रज्जवः ।
सप्तैका पञ्च चैका च मूलमध्यान्तविस्तरे ॥9॥

अर्थ: इस लोककी ऊँचाई तो सात सात राजू है, अर्थात् नीचेसे लगाकर मध्यलोक पर्यन्त सात राजू है और उसके ऊपर सात राजू है इस प्रकार चौदह राजू ऊँचा है, और मूलमें चौडा सात राजू है, सो घटता घटता मध्यलोकमें एक राजू चौडा है और उसके ऊपर बीचमें पाँच राजू चौडा है, और अन्तमें और आदिमें मध्यलोकके निकट एक एक राजू चौडा है ।


तत्राधोभागमासाद्य संस्थिताः सप्तभूमयः ।
यासु नारकषण्ढानां निवासाः सन्ति भीषणाः ॥10॥

अर्थ: इस लोकके अधोभागमें सात पृथ्वियाँ है, जिनमें नारकी नपुंसक जीवोंके बडे भयकारी निवासस्थान है ।


काश्चिद्वज्रानलप्रख्याः काश्चिच्छीतोष्णसंकुलाः ।
तुषारबहुलाः काश्चिद् भूमयोऽत्यन्तभीतिदाः ॥11॥

अर्थ: उन सप्त नरककी पृथ्वियोंमें कई तो वज्राग्निके समान उष्ण हैं, कई शीत उष्णतासे व्याप्त है और कई अत्यन्त हिमवाली हैं इस प्रकार अतिशय भयकारक है ।


उदीर्णानलदीप्तासु निसर्गोष्णासु भूमिषु ।
मेरुमात्रोऽप्ययःपिण्डः क्षिप्तः सद्यो विलीयते ॥12॥

अर्थ: उदयरूप है अग्नि जिनमें ऐसी स्वाभाविक उष्णारूप भूमियोंमें यदि मेरुपर्वतके समान लोहेका पिंड डाला जाय तो तत्काल गलकर भस्म हो जायेगा, ऐसी उन भूमियोंमें उष्णता है ।


शीतभूमिष्वपि प्राप्तो मेरुमात्रोऽपि शीर्यते ।
शतधासावयःपिण्डः प्राप्य भूमिं क्षणान्तरे ॥13॥

अर्थ: जिस प्रकार उष्णभूमियोंमें भी मेरु समान लोहेका पिंड गल जाता है, उसी प्रकार शीतप्रधान भूमियोंमें भी मेरुके समान लोहेका पिंड डाला जाय तो शीतके कारण क्षणमात्रमें खंड-खंड होकर बिखर जायेगा ।


हिंसास्तेयानृताब्रह्मबह्वारम्भादिपातकैः ।
विशन्ति नरकं घोरं प्राणिनोऽत्यन्तनिर्दयाः ॥14॥

अर्थ: उन घोर नरकोंमें हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (अब्रह्मचर्य) और बहुत आरंभ परिग्रहादि पापोंके करनेसे ही अत्यन्त निर्दयी जीव प्रवेश करते हैं ।


मिथ्यात्वाविरतिक्रोधरौद्रध्यानपरायणाः ।
पतन्ति जन्तवः श्वभ्रे कृष्णलेश्यावशं गताः ॥15॥

अर्थ: तथा मिथ्यात्व, अविरति, क्रोध, रौद्रध्यानमें तत्पर तथा कृष्ण लेश्याके वश हुए प्राणी नरकमें पडते हैं ।


असिपत्रवनाकीर्णे शस्त्रशूलासिसंकुले ।
नरकेऽत्यन्तदुर्गन्धे वसासृक्कृमिकर्दमे ॥16॥

अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥


शिवाश्वव्याघ्रकङ्काढ्ये मांसाशिविहगान्विते ।
वज्रकण्टकसंकीर्णे शूलशाल्मलिदुर्गमे ॥17॥

अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥


संभूय कोष्टिकामध्ये ऊर्ध्वपादा अधोमुखाः ।
ततः पतन्ति साक्रन्दं वज्रज्वलनभूतले ॥18॥

अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥


अयःकण्टककीर्णासु द्रुतलोहाग्निवीथिषु ।
छिन्नभिन्नविशीर्णाङ्गा उत्पतन्ति पतन्ति च ॥19॥

अर्थ: उस नरकभूमिमें वे नारकी जीव छिन्न-भिन्न खंड-खंड होकर बिखरे हुए अंगसे पड कर वारंवार उछल उछलकर गिरते हैं, सो कैसी भूमिमें गिरते हैं कि जहाँ पर लोहेके काँटे बिखरे हुए हैं और जिनमें गलाया हुआ लोहा और अग्नि है ।


दुःसहा निष्प्रतीकारा ये रोगाः सन्ति केचन ।
साकल्येनैव गात्रेषु नारकाणां भवन्ति ते ॥20॥

अर्थ: जो रोग असह्य है और जिनका कोई उपाय (चिकित्सा) नहीं है ऐसे समस्त प्रकारके रोग नरकोमें रहनेवाले नारकी जीवोंके शरीरमें रोमरोम प्रति होते हैं ।


अदृष्टपूर्वमालोक्य तस्य रौद्रं भयास्पदम् ।
दिशः सर्वाः समीक्षन्ते वराकाः शरणार्थिनः ॥21॥

अर्थ: फिर वे नारकी जीव उस नरकभूमिको अपूर्व और रौद्र (भयानक) देखकर किसीकी शरण लेनेकी इच्छासे चारों तरफ देखते हैं; परन्तु कहीं कोई सुखका कारण नहीं दीखता और न कोई शरण ही प्रतीत होता है ।


न तत्र सुजनः कोऽपि न मित्रं न च बान्धवाः ।
सर्वे ते निर्दयाः पापाः क्रूरा भीमोग्रविग्रहाः ॥22॥

अर्थ: उस नरकभूमिमें कोई सुजन वा मित्र वा बांधव नहीं हैं; सभी निर्दय, पापी, क्रूर और भयानक प्रचण्ड शरीरवाले हैं ।


सर्वे च हुण्डसंस्थानाः स्फुलिङ्गसदृशेक्षणाः ।
विवर्द्धिताशुभध्यानाः प्रचण्डाश्चण्डशासनाः ॥23॥

अर्थ: वे सभी नारकी जीव हुंडक संस्थानवाले हैं अर्थात् जिनके शरीरका प्रत्येक अंग अति भयानक बेडोल है, और अग्निके स्फुलिंगके समान जिनके नेत्र हैं, तथा प्रचण्ड, आर्त्त रौद्रध्यानको बढाये हुए हैं, तथा क्रोधी हैं, और जिनका शासन भी प्रचण्ड है ।


तत्राक्रन्दरवैः सार्द्धं श्रूयन्ते कर्कशाः स्वनाः ।
दृश्यन्ते गृध्रगोमायुसर्पशार्दूलमण्डलाः ॥24॥

अर्थ: उस नरकभूमिमें चारों ओरसे पुकारनेके शब्द बडे कर्कश सुने जाते हैं; तथा गृध्रपक्षी, सियाल, सर्प, सिंह, कुत्ते ये सब जीव बडे भयानक दीखते हैं ।


घ्रायन्ते पूतयो गन्धाः स्पृश्यन्ते वज्रकण्टकाः ।
जलानि पूतिगन्धीनि नद्योऽसृग्मांसकर्दमाः ॥25॥

अर्थ: जिस नरकभूमिमें दुर्गन्ध सूँघनी पडती है और वज्रमय काँटोंसे छिदना पडता है और जल जहाँ दुर्गन्धमय है और रुधिरमांसका है कीचड जिनमें ऐसी नदियाँ हैं ।


चिन्तयन्ति तदालोक्य रौद्रमत्यन्तशङ्किताः ।
केयं भूमिः क्व चानीताः के वयं केन कर्मणा ॥26॥

अर्थ: उस स्थानको रौद्र (भयानक) देखकर वे नारकी (जो नवीन उत्पन्न हुए हैं) अत्यन्त शंकित होकर विचारते हैं कि यह भूमि कौनसी है और हम कौन है, कौनसे भयानक कर्मोंने हमें यहाँ लाकर पटका है?


ततो विदुर्विभङ्गात्स्वं पतितं श्वभ्रसागरे ।
कर्मणाऽत्यन्तरौद्रेण हिंसाद्यारम्भजन्मना ॥27॥

अर्थ: तत्पश्चात् वे विभङ्गावधि (कुअवधिज्ञान) से जानते हैं कि हिंसादिक आरंभोंसे उत्पन्न हुए अत्यन्त रौद्र (खोटे) कर्मसे हम नरकरूप समुद्रमें पडे हैं ।


ततः प्रादुर्भवत्युच्चैः पश्चात्तापोऽति दुःसहः ।
दहन्नविरतं चेतो वज्राग्निरिव निर्दयः ॥28॥

अर्थ: तत्पश्चात् नारकी जीवोंके दुःसह पश्चात्ताप अतिशय करके प्रगट होता है; वह दुःसह पश्चात्ताप वज्राग्निके समान निर्दय हो चित्तको दहन करता हुआ प्रकट होता है ।


मनुष्यत्वं समासाद्य तदा कैश्चिन्महात्मभिः ।
अपवर्गाय संविग्नैः कर्म पूज्यमनुष्ठितम् ॥29॥

अर्थ: कितनेक बडे पुरुषोंने मनुष्यत्व पाकर वैराग्य सहित हो मोक्षके लिये पूजनीय पवित्राचरण किया ।


विषयाशामपाकृत्य विध्याप्य मदनानलम् ।
अप्रमत्तैस्तपश्चीर्णं धन्यैर्जन्मार्त्तिशान्तये ॥30॥

अर्थ: और उन महाभाग्य मुनियोंने विषयोंकी आशाको दूर करके कामरूप अग्निको बुझाकर निष्प्रमादी हो संसार पीडाकी शान्तिके लिये तपका संचय किया ।


उपसर्गाग्निपातेऽपि धैर्यमालम्ब्य चोन्नतम् ।
तैः कृतं तदनुष्ठानं येन सिद्धं समीहितम् ॥31॥

अर्थ: तत्पश्चात् उन उत्तम पुरुषोंने उपसर्गरूपी अग्निके आने पर बडे धैर्यका आलंबन कर वह आचरण किया कि जिससे वांछित कार्य सिद्ध हुआ ।


प्रमादमदमुत्सृज्य भावशुद्ध्या मनीषिभिः ।
केनाप्यचिन्त्यवृत्तेन स्वर्गो मोक्षश्च साधितः ॥32॥

अर्थ: तथा उन बुद्धिमान् पुरुषोंने प्रमाद और मदको छोडकर भावकी शुद्धतासे किसी अचिन्त्य आचरणसे स्वर्ग तथा मोक्ष साधा ।


शिवाभ्युदयदं मार्गं दिशन्तोऽप्यतिवत्सलाः ।
मयावधीरिताः सन्तो निर्भर्त्स्य कटुकाक्षरैः ॥33॥

अर्थ: उन सत्पुरुषोंने वात्सल्यभावसे युक्त हो मुझे मोक्ष और स्वर्ग आदिके मार्गका उपदेश किया, परन्तु मैंने बडे कटु अक्षरोंसे उनका तिरस्कार करके निंदा की, उनका उपदेश अंगीकार नहीं किया, इत्यादि पश्चात्ताप करते हैं ।


तस्मिन्नपि मनुष्यत्वे परलोकैकशुद्धिदे ।
मया तत्संचितं कर्म यज्जातं श्वभ्रशंबलम् ॥34॥

अर्थ: फिर भी नारकी पश्चात्ताप करता है कि परलोककी अद्वितीय शुद्धता देनेवाले उस मनुष्यभवमें भी मैंने यह कर्म संचय किया कि जिसने नरकका शंबल (पाथेय-राहखर्च) हुआ अर्थात् उस कर्मने सहजमें ही नरकमें ला पटका ।


अविद्याक्रान्तचित्तेन विषयान्धीकृतात्मना ।
चरस्थिराङ्गिसंघातो निर्दोषोऽपि हतो मया ॥35॥

अर्थ: फिर नारकी विचारता है कि अविद्यासे आक्रान्त चित्तसे अर्थात् अज्ञानके वश होकर तथा विषयोंसे अन्ध होकर मैंने निर्दोष भी त्रस स्थावर प्राणियोंके समूहको मारा ।


परवित्तामिषासक्तः परस्त्रीसंगलालसः ।
बहुव्यसनविध्वस्तो रौद्रध्यानपरायणः ॥36॥

अर्थ: नारकी फिर पश्चात्ताप करता है कि मैं परके धनमें और मांसमें अथवा परके धनरूपी मांसमें आसक्त होकर परस्त्रीसंग करनेमें लुब्ध हुआ तथा बहुत प्रकारके व्यसनोंसे पीडित होकर रौद्रध्यानी हुआ ।


यत्स्थितः प्राक् चिरं कालं तस्यैतत्फलमागतम् ।
अनन्तयातनासारे दुरन्ते नरकार्णवे ॥37॥

अर्थ: पूर्वजन्ममें मैं इस प्रकार बहुत काल तक रहा, इस कारण उसका यह अनन्त पीडासे असार अपार नरकरूपी समुद्रकी प्राप्तिरूप फल आया है ।


यन्मया वञ्चितो लोको वराको मूढमानसः ।
उपायैर्बहुभिः पापैः स्वाक्षसन्तर्पणार्थिना ॥38॥

अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने भोले रंकजनोंको अति अन्यायरूप उपायोंसे इन्द्रियोंको पोषनेके लिये ठगा ।


कृतः पराभवो येषां धनभूस्त्रीकृते मया ।
घातश्च तेऽत्र संप्राप्ताः कर्त्तुं तस्याद्य निष्क्रियाम् ॥39॥

अर्थ: तथा परका धन, परकी भूमि वा स्त्री लेनेके लिये जिनका अपमान किया था तथा घात किया था वे लोग यहाँ नरकभूमिमें उसका दंड देनेके लिये आकर प्राप्त हुए हैं ।


ये तदा शशकप्राया मया बलवता हताः ।
तेऽद्य जाता मृगेन्द्राभा मां हन्तुं विविधैर्वधैः ॥40॥

अर्थ: मनुष्यभवमें जब मैं था तब तो वे शशक (खरगोश) के समान थे और मैं बलवान् था सो मैंने उन्हें मारा, किन्तु वे आज यहाँ पर सिंहके समान होकर अनेक प्रकारके घातोंसे मुझे मारनेके लिये उद्यत हैं ।


मानुष्येऽपि स्वतन्त्रेण यत्कृतं नात्मनो हितम् ।
तदद्य किं करिष्यामि दैवपौरुषवर्जितः ॥41॥

अर्थ: फिर विचारता है कि जब मनुष्यभवमें में स्वाधीन थां, तब भी मैने अपना हित साधन नहीं किया तो अब यहाँ दैव और पौरुष दोनोंसे रहित होकर क्या कर सकता हूँ ? यहाँ कुछ भी हितसाधन नहीं हो सकता ।


मदान्धेनापि पापेन निस्त्रिंशेनास्तबुद्धिना ।
विराध्याराध्यसन्तानं कृतं कर्मातिनिन्दितम् ॥42॥

अर्थ: फिर विचारता है कि मदसे अंधे, पापी, निर्दय, नष्टबुद्धि मैंने आराधने योग्य जो भले मार्गमें प्रवर्त्तनेवाले उन पूज्य पुरुषोंके सन्तानको विराध कर निंदनीय कर्म किया ।


यत्पुरग्रामविन्ध्येषु मया क्षिप्तो हुताशनः ।
जलस्थलबिलाकाशचारिणो जन्तवो हताः ॥43॥

अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने पूर्वभवमें पुर, ग्राम, वनमें अग्नि डालकर दव लगाई; और जलचर, थलचर, आकाशचर तथा बिलोंमें रहनेवाले असंख्य जीवोंको मारा, वे पूर्वके पाप-कर्म इस समय स्मरण आनेसे निरन्तर मेरे मर्मस्थानोंको दयारहित करोंतके समान भेदते हैं ॥४३-४४॥


कृन्तन्ति मम मर्माणि स्मर्यमाणान्यनारतम् ।
प्राचीनान्यद्य कर्माणि क्रकचानीव निर्दयम् ॥44॥

अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने पूर्वभवमें पुर, ग्राम, वनमें अग्नि डालकर दव लगाई; और जलचर, थलचर, आकाशचर तथा बिलोंमें रहनेवाले असंख्य जीवोंको मारा, वे पूर्वके पाप-कर्म इस समय स्मरण आनेसे निरन्तर मेरे मर्मस्थानोंको दयारहित करोंतके समान भेदते हैं ॥४३-४४॥


किं करोमि क्व गच्छामि कर्मजाते पुरःस्थिते ।
शरणं कं प्रपश्यामि वराको दैववञ्चितः ॥45॥

अर्थ: फिर विचारता है कि ऐसे नरकोंके दुःखमें भी कर्मोंका समूह मेरे सामने हैं, उसके होते हुए मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किसकी शरण देखूँ ? मैं रंक दैवसे ठगा हुआ हूँ; मुझे कुछ भी सुखका उपाय नहीं दीखता ।


यन्निमेषमपि स्मर्तुं द्रष्टुं श्रोतुं न शक्यते ।
तद्दुःखमत्र सोढव्यं वर्द्धमानं कथं मया ॥46॥

अर्थ: फिर विचारता है कि नेत्रके टिमकार मात्र भी जिसके स्मरण करने वा सुननेकी समर्थता नहीं ऐसा प्रतिक्षण बढता हुआ वह दुःख मैं कैसे सहूँगा ? ।


एतान्यदृष्टपूर्वाणि बिलानि च कुलानि च ।
यातनाश्च महाघोरा नारकाणां मयेक्षिताः ॥47॥

अर्थ: फिर विचारता है कि नरकोंके बिल तथा नारकियोंके कुल (समूह) तथा नारकियोंकी महातीव्र वेदनाका सहना आदि सब मैंने अदृष्टपूर्व देखा अर्थात् अन्यत्र नहीं देखा ऐसा यहीं पर देखा ।


विषज्वलनसंकीर्णं वर्द्धमानं प्रतिक्षणम् ।
मम मूर्ध्नि विनिक्षिप्तं दुःखं दैवेन निर्दयम् ॥48॥

अर्थ: फिर विचारता है कि विष तथा अग्निसे व्याप्त क्षण-क्षणमें बढनेवाले ये सब दुःख दैव (कर्म) ने दयारहित होकर मेरे ही माथे पर डाले हैं ।


न दृश्यन्तेऽत्र ते भृत्या न पुत्रा न च बान्धवाः ।
येषां कृते मया कर्म कृतं स्वस्यैव घातकम् ॥49॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिये मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्वजन्ममें किये, इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, न कलत्र, न मित्र, और न ही पापमें प्रेरणा करनेवाले बांधव कोई देखनेमें आते हैं । वे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे साथ नहीं आये ॥४९-५०॥


न कलत्राणि मित्राणि न पापप्रेरको जनः ।
पदमप्येकमायातो मया सार्द्धं गतत्रपः ॥50॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिये मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्वजन्ममें किये, इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, न कलत्र, न मित्र, और न ही पापमें प्रेरणा करनेवाले बांधव कोई देखनेमें आते हैं । वे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे साथ नहीं आये ॥४९-५०॥


आश्रयन्ति यथा वृक्षं फलितं पत्रिणः पुरा ।
फलापाये पुनर्यान्ति तथा ते स्वजना गताः ॥51॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिस प्रकार पक्षी पहिले तो फले हुए वृक्षका आश्रय करते हैं, परन्तु जब फलोंका अभाव हो जाता है तब सब पक्षी उड जाते हैं, उसी प्रकार मेरे स्वजनगण जाते रहे । ये दुःख भोगनेको कोई साथ नहीं आया ।


शुभाशुभानि कर्माणि यान्त्येव सह देहिभिः ।
स्वार्जितानीति यत्प्रोचुः सन्तस्तत्सत्यतां गतम् ॥52॥

अर्थ: फिर क्या विचारता है कि जो सत्पुरुष कहते थे कि अपने उपार्जन किए हुए शुभ अशुभ कर्म हैं; वे ही जीवके साथ जाते हैं अन्य कोई साथ नहीं जाता सो वह आज सत्य प्रतीत हुआ ।


धर्म एव समुद्धर्त्तुं शक्तोऽस्माच्छ्वभ्रसागरात् ।
न स स्वप्नेऽपि पापेन मया सम्यक्पुरार्जितः ॥53॥

अर्थ: फिर विचारता है कि इस नरकरूपी समुद्रसे उद्धार करनेके लिये एक धर्म ही समर्थ है, परन्तु मुझ पापिष्ठने पहिले स्वप्नमें भी उसका योग्य रीतिसे उपार्जन नहीं किया ।


सहायः कोऽपि कस्यापि नाभून्न च भविष्यति ।
मुक्त्वैकं प्राक्कृतं कर्म सर्वसत्त्वाभिनन्दकम् ॥54॥

अर्थ: फिर विचारता है कि इस संसारमें कोई किसीका सहायक न है, न हुआ और न होगा, किन्तु समस्त जीवोंको आनंद करनेवाला अर्थात् जिसमें सबकी दया हो ऐसा शुभ कर्म ही सहायक होता है ।


तत्कुर्वन्त्यधमाः कर्म जिह्वोपस्थादिदण्डिताः ।
येन श्वभ्रेषु पच्यन्ते कृतार्त्तकरुणस्वनाः ॥55॥

अर्थ: फिर यह विचारता है कि जो अधम (पापी) पुरुष जिह्वा उपस्थेन्द्रियसे दण्डित होते हैं, वे ऐसा कर्म करते हैं कि जिस कर्मसे वे पापी पीडित होकर नरकोंमें पचाये जाते हैं, रोते हैं वा शब्द करते हैं; जिसको सुननेसे अन्यको दया उपज आवें ।


चक्षुरुन्मेषमात्रस्य सुखस्यार्थे कृतं मया ।
तत्पापं येन सम्पन्ना अनन्ता दुःखराशयः ॥56॥

अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने नेत्रोंके टिमकारमात्र सुखके लिये ऐसा पाप किया कि जिससे अनन्त दुःखोंकी राशि प्राप्त हुई ।


याति सार्द्धं ततः पाति करोति नियतं हितम् ।
हन्ति दुःखं सुखं दत्ते यः स बन्धुर्न पोषितः ॥57॥

अर्थ: फिर विचारता है कि यह धर्मरूप बन्धु ऐसा है कि साथ जाता है, और जहाँ जाता है, वहीं रक्षा करता है, और यह मित्र नियमसे हित ही करता है; दुःखका नाश करके सुख देता है; ऐसे इस धर्मरूपी मित्रको मैंने पोषा ही नहीं और जिनको मित्र समझकर पोषा उनमेंसे कोई एक भी साथ नहीं आया ।


परिग्रहमहाग्राहसंग्रस्तेनार्तचेतसा ।
न दृष्टा यमशार्दूलचपेटा जीवनाशिनी ॥58॥

अर्थ: फिर विचारता है कि परिग्रहरूपी महाग्राहसे पकडे हुए पीडितचित्त होकर मैंने जीवको नाश करनेवाली यमरूपी शार्दूलकी चपेट नहीं देखी, अर्थात् परिग्रहमें आसक्त होकर निरन्तर पाप ही करता रहा ।


पातयित्वा महाघोरे मां श्वभ्रेऽचिन्त्यवेदने ।
क्व गतास्तेऽधुना पापा मद्वित्तफलभोगिनः ॥59॥

अर्थ: फिर विचारता है कि जो कुटुम्बादिक मेरे उपार्जन किए हुए धनके फल भोगनेवाले थे वे पापी मुझे अचिन्त्य वेदनामय इस घोर नरकमें डालकर अब कहाँ चले गये ? यहाँ दुःखमें कोई साथी न हुआ ।


इत्यजस्रं सुदुःखार्त्ता विलापमुखराननाः ।
शोचन्ते पापकर्माणि वसन्ति नरकालये ॥60॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारसे नारकी जीव निरन्तर महादुःखसे पीडित हुए, मुखसे पुकारते हुए, विलाप करते हुए अपने पापकार्योंको स्मरण कर करके शोच करते हैं और नरकमन्दिरमें बसते हैं ।


इति चिन्तानलेनोच्चैर्दह्यमानस्य ते तदा ।
धावन्ति शरशूलासिकराः क्रोधाग्निदीपिताः ॥61॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारकी चिंतारूप अग्निसे अतिशय जलते हुए नारकीके ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बाण, शूल, तलवार लिये हुए क्रोधरूपी अग्निसे जलते हुए दौडते हैं और पूर्वके पाप तथा वैरको याद कराते हुए कटु वचनोंसे तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयतासे दुःख देते हैं ॥६१-६२॥


वैरं पराभवं पापं स्मारयित्वा पुरातनम् ।
निर्भर्त्स्य कटुकालापैः पीडयन्त्यतिनिर्दयम् ॥62॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारकी चिंतारूप अग्निसे अतिशय जलते हुए नारकीके ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बाण, शूल, तलवार लिये हुए क्रोधरूपी अग्निसे जलते हुए दौडते हैं और पूर्वके पाप तथा वैरको याद कराते हुए कटु वचनोंसे तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयतासे दुःख देते हैं ॥६१-६२॥


उत्पाटयन्ति नेत्राणि चूर्णयन्त्यस्थिसंचयम् ।
दारयन्त्युदरं क्रुद्धास्त्रोटयन्त्यन्त्रमालिकाम् ॥63॥

अर्थ: वे पुराने नारकी उस विलाप करते हुए नये नारकीके नेत्रोंको उखाडते हैं, हड्डियोंको चूर्ण कर डालते हैं, उदरको फाडते हैं, और क्रोधी होकर उसकी आँतोंको तोड डालते हैं ।


निष्पीडयन्ति यन्त्रेषु दलन्ति विषमोपलैः ।
शाल्मलीषु निघर्षन्ति कुम्भीषु क्वाथयन्ति च ॥64॥

अर्थ: तथा वे नारकी उसे घानीमें डालकर पीलते हैं और कठिन पाषाणोंसे दलते हैं, लोहेके कांटेवाले वृक्षोंसे घिसते (रगडते) हैं तथा कुंभियोंमें (कलशियोंमें) डालकर काढा करते (उबालते) हैं ।


असह्यदुःखसन्तानदानदक्षाः कलिप्रियाः ।
तीक्ष्णदंष्ट्रा करालास्या भिन्नाञ्जनसमप्रभाः ॥65॥

अर्थ: तथा वे नारकी कैसे हैं कि - असह्य दुःखोंकी निरन्तरता देनेमें चतुर हैं, कलह करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढोंसे भयानक मुखवाले हैं, बिखरे हुए काजलके समान जिनके शरीरकी काली प्रभा है; तथा कृष्णलेश्याके कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और एक रौद्रध्यानके भावनेवाले हैं, एवं क्षेत्रके दोषसे वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं ॥६५-६६॥


कृष्णलेश्योद्धताः पापा रौद्रध्यानैकभाविताः ।
भवन्ति क्षेत्रदोषेण सर्वे ते नारकाः खलाः ॥66॥

अर्थ: तथा वे नारकी कैसे हैं कि-असह्य दुःखोंकी निरन्तरता देनेमें चतुर हैं, कलह करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढोंसे भयानक मुखवाले हैं, बिखरे हुए काजलके समान जिनके शरीरकी काली प्रभा है; तथा कृष्णलेश्याके कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और एक रौद्रध्यानके भावनेवाले हैं, एवं क्षेत्रके दोषसे वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं ॥६५-६६॥


वैक्रियिकशरीरत्वाद्विक्रियन्ते यदृच्छया ।
यन्त्राग्निश्वापदाङ्गैस्ते हन्तुं चित्रैर्वधैः परान् ॥67॥

अर्थ: उन नारकियोंका वैक्रियिक शरीर होनेके कारण अपनी इच्छानुसार घाणी, अग्नि, हिंस्र जन्तु सिंहादिकका रूप बनाकर अनेक प्रकारसे परस्पर मारनेके लिये विक्रिया करते हैं ।


न तत्र बान्धवः स्वामी मित्रभृत्याङ्गनाङ्गजाः ।
अनन्तयातनासारे नरकेऽत्यन्तभीषणे ॥68॥

अर्थ: उस अत्यन्त भयानक नरकमें न तो कोई बांधव है, न कोई स्वामी है, न कोई मित्र है, न कोई भृत्य है, न स्त्री है, न पुत्र है; केवल अनन्त यातनाका भयानक वृष्टिपात ही है ।


तत्र ताम्रमुखा गृध्रा लोहतुण्डाश्च वायसाः ।
दारयन्त्येव मर्माणि चञ्चुभिर्नखरैः खरैः ॥69॥

अर्थ: उस नरकमें ताँबे-से हैं मुख-चोंच जिनके ऐसे तो गृध्रपक्षी हैं और लोहेकी चोंचवाले काक हैं; सो चोंचोंसे तथा तीक्ष्ण नखोंसे नारकी जीवोंके मर्मोंको विदारते हैं ।


कृमयः पूतिकुण्डेषु वज्रसूचीसमाननाः ।
भित्वा चर्मास्थिमांसानि पिबन्त्याकृष्य लोहितम् ॥70॥

अर्थ: तथा उस नरकमें पीबके कुंडोंमें वज्रकी सूई समान है मुख जिनके ऐसे कीडे वा जोके नारकी जीवोंके चमडे और हाडमांसको विदार कर रक्त (खून) को पीते हैं ।


बलाद्विदार्य संदंशैर्वदनं क्षिप्यते क्षणात् ।
विलीनं प्रज्वलत्ताम्रं यैः पीतं मद्यमुद्धतैः ॥71॥

अर्थ: तथा जिन पापियोंने मनुष्यजन्ममें उद्धत होकर मद्यपान किया है, उनके मुखको संडासीसे फाड-फाड कर तुरंतके पिघलाये हुए ताँबेको बलपूर्वक पिलाते हैं ।


परमांसानि यैः पापैर्भक्षितान्यतिनिर्दयैः ।
शूलपक्वानि मांसानि तेषां खादन्ति नारकाः ॥72॥

अर्थ: और जिन पापियोंने मनुष्यभवमें निर्दय होकर अन्य जीवोंका मांस भक्षण किया है, उनके मांसके शूले पका-पका कर नारकी जीव खाते हैं ।


यैः प्राक्परकलत्राणि सेवितान्यात्मवञ्चकैः ।
योज्यन्ते प्रज्वलन्तीभिः स्त्रीभिस्ते ताम्रजन्मभिः ॥73॥

अर्थ: तथा जिन आत्मवञ्चक पापीजनोंने पूर्वभवमें परस्त्री सेवन की है, उनको ताँबेकी अग्निसे लाल की हुई स्त्रियोंसे संगम कराया जाता है ।


न सौख्यं चक्षुरुन्मेषमात्रमप्युपलभ्यते ।
नरके नारकैर्दीनैर्हन्यमानैः परस्परम् ॥74॥

अर्थ: नरकमें नारकीजीव परस्पर एक दूसरेको मारते हैं, सो वे दीन एक पलकमात्र भी सुखको नहीं पाते ।


किमत्र बहुनोक्तेन जन्मकोटिशतैरपि ।
केनापि शक्यते वक्तुं न दुःखं नरकोद्भवम् ॥75॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि बहुत कहाँ तक कहें ? क्योंकि उस नरकमें उत्पन्न हुए दुःखको कोटि जन्म लेकर भी कोई कहनेको समर्थ नहीं है; तो हम क्या कह सकते हैं ? ।


विस्मृतं यदि केनापि कारणेन क्षणान्तरे ।
स्मारयन्ति तदाभ्येत्य पूर्ववैरं सुराधमाः ॥76॥

अर्थ: यदि वे नारकी किसी कारणसे क्षणमात्रके लिये भूल जाते हैं तो उसी समय नीच असुर देव आकर उन्हें पूर्ववैर याद करा देते हैं जिससे फिर वे परस्पर मारपीट करके अपनेको महादुःखी कर लेते हैं।


बुभुक्षा जायतेऽत्यर्थं नरके तत्र देहिनाम् ।
यां न शामयितुं शक्तः पुद्गलप्रचयोऽखिलः ॥77॥

अर्थ: तथा उस नरकमें नारकी जीवोंको भूख ऐसी लगती है कि समस्त पुद्गलोंका समूह भी उसको शमन करनेमें असमर्थ है ।


तृष्णा भवति या तेषु वाडवाग्निरिवोल्बणा ।
न सा शाम्यति निःशेषपीतैरप्यम्बुराशिभिः ॥78॥

अर्थ: तथा नरकमें नारकी जीवोंकी तृषा वडवाग्निकी समान अति उत्कृष्ट (तीव्र) होती है सो समस्त समुद्रोंका जल पी लें तो भी नहीं मिटती ।


बिन्दुमात्रं न तैर्वारि प्राप्यते पातुमातुरैः ।
तिलमात्रोऽपि नाहारो ग्रसितुं लभ्यते हि तैः ॥79॥

अर्थ: यद्यपि नरकोंमें उपर्युक्त भूख-प्यासकी तीव्रता है, परन्तु न तो किसी कालमें तिलमात्र किसीको भोजन मिलता है और न एक बिंदु पानी ही मिलता है। इस प्रकार आतुर होकर निरंतर भूखप्यास सहते हैं।


तिलादप्यतिसूक्ष्माणि कृतखण्डानि निर्दयैः ।
वपुर्मिलति वेगेन पुनस्तेषां विधेर्वशात् ॥80॥

अर्थ: तथा उन नारकियोंके शरीर निर्दय नारकियोंके द्वारा तिलतिलमात्र खण्ड किये जाते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं आती, तत्काल मिल कर शरीर बन जाता है। इनके ऐसा ही कर्मोदय है, जो मरण नहीं होता। सागरोंकी आयु पूर्ण होने पर ही मरण होता है; अकाल मृत्यु कभी नहीं होती ।


यातनारुक्शरीरायुर्लेश्यादुःखभयादिकम् ।
वर्द्धमानं विनिश्चेयमधोऽधः श्वभ्रभूमिषु ॥81॥

अर्थ: उन नरककी भूमियोंमें पीडा, रोग, शरीर, आयु, लेश्या, दुःख, भय इत्यादि नीचे-नीचे बढता हुआ है; अर्थात् पहिले नरक (पृथ्वी) से दूसरे नरकमें अधिक हैं, दूसरेसे तीसरेमें और तीसरेसे चौथेमें और चौथेसे पाँचवेंमें और पाँचवेंसे छठेमें और छठेसे सातवेंमें इस क्रमसे अधिक-अधिक हैं; यह अधोलोकका वर्णन हुआ ।


मध्यभागस्ततो मध्ये तत्रास्ते झल्लरीनिभः ।
यत्र द्वीपसमुद्राणां व्यवस्था वलयाकृतिः ॥82॥

अर्थ: उस अधोलोकके ऊपर झालर (घंटा बजानेकी घडावली) के समान गोलाकार मध्यलोकका मध्य भाग है, उसमें गोल-गोल वलयों (कडों) के समान असंख्यात द्वीप समुद्र हैं ।


जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणोदादयोऽर्णवाः ।
स्वयम्भूरमणान्तास्ते प्रत्येकं द्वीपसागराः ॥83॥

अर्थ: उस मध्यलोकमें जम्बूद्वीपादिक तो द्वीप हैं और लवणसमुद्रादिक समुद्र हैं सो अन्तके स्वयंभूरमणपर्यन्त भिन्न-भिन्न हैं ।


द्विगुणा द्विगुणा भोगाः प्रावर्त्यान्योन्यमास्थिताः ।
सर्वे ते शुभनामानो वलयाकारधारिणः ॥84॥

अर्थ: तथा वे द्वीप और समुद्र दूने दूने विस्तारवाले हैं तथा परस्पर एक दूसरेको लपेटे हुए हैं। वे गोलाकार कडेके आकारसे स्थित हैं और उनके नाम भी जम्बूद्वीप, धातकीद्वीप, पुष्करद्वीप, लवणसमुद्र, कालोदधि समुद्र आदि उत्तमोत्तम हैं ।


मानुषोत्तरशैलेन्द्रमध्यस्थमतिसुन्दरम् ।
नरक्षेत्रं सरिच्छैलसुराचलविराजितम् ॥85॥

अर्थ: तथा मानुषोत्तर पर्वतके मध्यस्थ नदी पर्वत मेरुपर्वतसे अतिसुन्दर मनुष्यक्षेत्र है।


तत्रार्यम्लेच्छखण्डानि भूरिभेदानि तेष्वमी ।
आर्या म्लेच्छा नराः सन्ति तत्क्षेत्रजनितैर्गुणैः ॥86॥

अर्थ: उस मनुष्यक्षेत्रमें अर्थात् अढाई द्वीपोंमें अनेक आर्यखंड और म्लेच्छखंड है, और आर्यक्षेत्रोंमें आर्य पुरुष और म्लेच्छक्षेत्रोंमें म्लेच्छ रहते हैं, उन क्षेत्रोंके अनुसार ही उनके गुण आचारादिक हैं, अर्थात् आर्योंके उत्तम आचार, उत्तम गुण हैं, और म्लेच्छोंके निकृष्ट आचार और धर्मशून्यतादि निकृष्ट गुण है।


क्वचित्कुमानुषोपेतं क्वचिद्व्यन्तरसंभृतम् ।
क्वचिद्भोगधराकीर्णं नरक्षेत्रं निरन्तरम् ॥87॥

अर्थ: यह मनुष्यक्षेत्र निरंतर कहीं तो कुमानुष कुभोगभूमि सहित है, कहीं व्यन्तरदेवोंसे भरा है, कहीं उत्तम भोगभूमि सहित है। इस प्रकार संक्षेपसे मध्यलोकका वर्णन किया ।


ततो नभसि तिष्टन्ति विमानानि दिवौकसाम् ।
चरस्थिरविकल्पानि ज्योतिष्काणां यथाक्रमम् ॥88॥

अर्थ: उस मध्यलोकके ऊपर आकाशमें ज्योतिषी देवोंके विमान रहते हैं; वे चर स्थिर भेदसे दो प्रकारके हैं अर्थात् कई विमान तो निरन्तर गमन करते रहते हैं और कई विमान स्थिर रहते हैं ।


तदूर्ध्वे सन्ति देवेशकल्पाः सौधर्मपूर्वकाः ।
ते षोडशाच्युतस्वर्गपर्यन्ता नभसि स्थिताः ॥89॥

अर्थ: ज्योतिषी देवोंके विमानों के ऊपर कल्पवासी देवोंके कल्प (विमान) है; जिनके सौधर्म स्वर्ग, ईशानस्वर्ग आदि नाम हैं वे अच्युतस्वर्ग पर्यन्त सोलह हैं और आकाशमें स्थित हैं ।


उपर्युपरि देवेशनिवासयुगलं क्रमात् ।
अच्युतान्तं ततोऽप्यूर्ध्वमेकैकत्रिदशास्पदम् ॥90॥

अर्थ: वे देवोंके निवास (स्वर्ग) आकाशमें दो स्वर्गके ऊपर दो स्वर्ग, फिर उन दोके ऊपर फिर दो स्वर्ग, इस प्रकार अच्युतस्वर्गपर्यंत दो-दोके आठ युगल हैं और उनके ऊपर एक-एक विमान करके नव ग्रैवेयक विमान हैं, तथा एक अनुदिश और एक अनुत्तर विमान भी है ।


निशादिनविभागोऽयं न तत्र त्रिदशास्पदे ।
रत्नालोकः स्फुरत्युच्चैः सततं नेत्रसौख्यदः ॥91॥

अर्थ: उन देवोंके निवासोंमें रात्रिदिनका विभाग नहीं है; क्योंकि वहाँ पर सूर्यचन्द्रमा नहीं हैं, किन्तु नेत्रोंको सुख देनेवाला रत्नोंका उत्तम प्रकाश निरन्तर स्फुरायमान रहता है ।


वर्षातपतुषारादिसमयैः परिवर्जितः ।
सुखदाः सर्वदा सौम्यस्तत्र कालः प्रवर्त्तते ॥92॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें वर्षा, शीत, आतप आदिक समय व ऋतुओंसे रहित सदाकाल सुख देनेवाला सौम्य मध्यस्थ काल (वसंतऋतु) रहता है ।


उत्पातभयसन्तापभङ्गचौरारिविड्वराः ।
न हि स्वप्नेऽपि दृश्यन्ते क्षुद्रसत्त्वाश्च दुर्जनाः ॥93॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें उत्पात, भय, संताप, भंग, चौर, शत्रु, वञ्चक तथा क्षुद्र जीव, दुर्जन ये स्वप्नमें भी नहीं दीखते ।


चन्द्रकान्तशिलानद्धाः प्रवालदलदन्तुराः ।
वज्रेन्द्रनीलनिर्माणा विचित्रास्तत्र भूमयः ॥94॥

अर्थ: उन देवोंके निवासोंमें पृथ्वी चन्द्रकान्त मणियोंसे बँधी हुई है तथा मूंगेके पत्रकी समान रची हुई है; तथा कहीं कहीं हीरा इन्द्रनीलमणि आदि नाना प्रकारके रत्नोंसे बनी हुई है ।


माणिक्यरोचिषां चक्रैः कर्बुरीकृतदिङ्मुखाः ।
वाप्यः स्वर्णाम्बुजच्छन्ना रत्नसोपानराजिताः ॥95॥

अर्थ: तथा स्वर्गोमें वापिकायें माणिककी किरणोंके समूहोंसे दिशाओंको अनेक वर्णमय कर रही हैं तथा सुवर्णमय कमलोंसे आच्छादित और रत्नमय सीढियोंसे सुशोभित हैं ।


सरांस्यमलवारीणि हंसकारण्डमण्डलैः ।
वाचालै रुद्धतीर्थानि दिव्यनारीजनेन च ॥96॥

अर्थ: स्वर्गमें सरोवर भी अतिस्वच्छ निर्मल जलवाले हैं, हंस व कारंड जातिके पक्षियोंके समूहसे तथा देवांगना वा अप्सराओंसे रुके हुए हैं तट जिनके ऐसे हैं ।


गावः कामदुघाः सर्वाः कल्पवृक्षाश्च पादपाः ।
चिन्तारत्नानि रत्नानि स्वर्गलोके स्वभावतः ॥97॥

अर्थ: तथा उस स्वर्गमें गौ हैं वे तो कामधेनु हैं, वृक्ष हैं सो कल्पवृक्ष हैं और रत्न हैं सो चिन्तामणि रत्न हैं; ये सब क्षेत्रके स्वभावसे निरन्तर रहते हैं ।


ध्वजचामरछत्राङ्कैर्विमानैर्वनितासखाः ।
संचरन्ति सुरासारैः सेव्यमानाः सुरेश्वराः ॥98॥

अर्थ: उन स्वर्गोंके अधिपति इन्द्र ध्वजा, चमर, छत्रोंसे चिह्नित हुए विमानोंके द्वारा अनेक देवांगनाओं सहित यत्र तत्र विचरते हैं; उनकी अनेक देव सेवा करते हैं ।


यक्षकिन्नरनारीभिर्मन्दारवनवीथिषु ।
कान्ताश्लिष्टाभिरानन्दं गीयन्ते त्रिदशेश्वराः ॥99॥

अर्थ: तथा वहाँके इन्द्र, मंदार वृक्षोंकी गलियोंमें यक्ष और किन्नर जातीय देवोंकी देवांगना अपने पति सहित आलिंगित आनंदसे भरी गाती हैं, उनके गीत सुनते हैं ।


क्रीडागिरिनिकुञ्जेषु पुष्पशय्यागृहेषु वा ।
रमन्ते त्रिदशा यत्र वरस्त्रीवृन्दवेष्टिताः ॥100॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोके देव क्रीडापर्वतोंकी कुंजोमें, पुष्पलतादिकृत कंदराओंमें, पुष्पोंकी शय्यामें सुन्दर देवांगनाओके समूहके साथ वेष्टित होकर नाना प्रकारकी आनन्द क्रीडा करते हैं ।


मन्दारचम्पकाशोकमालतीरेणुरञ्जिताः ।
भ्रमन्ति यत्र गन्धाढ्या गन्धवाहाः शनैः शनैः ॥101॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें मंदार, चम्पक, अशोक, मालतीके पुष्पोंकी रजसे रंजित भ्रमरों सहित मन्दमन्द सुगन्धी पवन बहता है ।


लीलावनविहारैश्च पुष्पावचयकौतुकैः ।
जलक्रीडादिविज्ञानैर्विलासास्तत्र योषिताम् ॥102॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें देवांगनाओके विलास, क्रीडावनके विहारोंसे तथा पुष्पोंके चुननेके कौतुकसे तथा जलक्रीडाके विज्ञानों (चतुराइयों) से बडी शोभा है ।


वीणामादाय रत्यन्ते कलं गायन्ति योषितः ।
ध्वनन्ति मुरजा धीरं दिवि देवाङ्गनाहताः ॥103॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें देवांगनायें संभोगके अन्तमें वीणा लेकर सुन्दर गान करती हैं तथा उनके बजाये हुए मृदंग धीरे धीरे बजते हैं ।


कोकिलाः कल्पवृक्षेषु चैत्यागारेषु योषितः ।
विबोधयन्ति देवेशांल्ललितैर्गीतनिःस्वनैः ॥104॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें कल्पवृक्षों पर तो कोकिलायें और चैत्य मन्दिरोंमें देवांगनायें सुन्दर गीत और शब्दोंसे इन्द्रोंको जागृत करती हैं ।


नित्योत्सवयुतं रम्यं सर्वाभ्युदयमन्दिरम् ।
सुखसंपद्गुणाधारं कैः स्वर्गमुपमीयते ॥105॥

अर्थ: प्रत्येक स्वर्ग नित्य ही उत्सवों सहित है, रमणीक है, समस्त अभ्युदयोंके भोगोंका निवास है तथा सुख, संपद् और गुणोंका आधार है सो उसको किसकीं उपमा दी जाय ? ।


पञ्चवर्णमहारत्ननिर्माणाः सप्तभूमिकाः ।
प्रासादाः पुष्करिण्यश्च चन्द्रशाला वनान्तरे ॥106॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंकि बागोंमें पाँच वर्णोंकि रत्नोंसे बने हुए सात-सात खण्डके महल हैं और वापिका तथा चन्द्रशाला (शिरोगृह-अंटे) हैं ।


प्राकारपरिखावप्रगोपुरोत्तुङ्गतोरणैः ।
चैत्यद्रुमसुरागारैर्नगर्यो रत्नराजिताः ॥107॥

अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें जो नगरी है वे कोट, खाई, बडे दरवाजों और ऊँचे तोरणोंसे तथा चैत्य, वृक्ष, और देवोंके मंदिर आदिकसे रत्नमयी शोभती है ।


इन्द्रायुधश्रियं धत्ते यत्र नित्यं नभस्तलम् ।
हर्म्याग्रलग्नमाणिक्यमयूखैः कर्बुरीकृतम् ॥108॥

अर्थ: तथा स्वर्गोंमें आकाश महलोंके अग्रभागमें लगे हुए रत्नोंकी किरणोंसे विचित्र वर्णका होकर इन्द्रधनुषकीसी शोभाको नित्य धारण किये हुए रहता है ।


सप्तभिस्त्रिदशानीकैर्विमानैरङ्गनान्वितैः ।
कल्पद्रुमगिरीन्द्रेषु रमन्ते विबुधेश्वराः ॥109॥

अर्थ: स्वर्गोंके इन्द्र सात प्रकारकी देवसेनाओंसे तथा देवांगना सहित विमानोंके द्वारा कल्पवृक्षों तथा क्रीडावनोंमें रमते (आनन्द करते) हैं ।


हस्त्यश्वरथपादातवृषगन्धर्वनर्त्तकि ।
सप्तानीकानि सन्त्यस्य प्रत्येकं च महत्तरम् ॥110॥

अर्थ: हस्ती, घोडे, रथ, पयादे, बैल, गन्धर्व, नर्त्तकी इस प्रकार सात प्रकारकी सेना इन्द्रकी होती है सो प्रत्येक एकसे एक बढकर हैं ।


शृङ्गारसारसंपूर्णा लावण्यवनदीर्घिकाः ।
पीनस्तनभराक्रान्ताः पूर्णचन्द्रनिभाननाः ॥111॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ॥१११-११२-११३ ॥


विनीताः कामरूपिण्यो महर्द्धिमहिमान्विताः ।
हावभावविलासाढ्या नितम्बभरमन्थराः ॥112॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ।।१११-११२-११३ ।।


मन्ये शृङ्गारसर्वस्वमेकीकृत्य विनिर्मिताः ।
स्वर्गवासविलासिन्यः सन्ति मूर्त्ता इव श्रियः ॥113॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ॥१११-११२-११३ ॥


गीतवादित्रविद्यासु शृङ्गाररसभूमिषु ।
परिरम्भादि सर्वेषु स्त्रीणां दाक्ष्यं स्वभावतः ॥114॥

अर्थ: स्वर्गोंमें शृंगाररसकी भूमि ऐसी गीत व बाजेकी विद्याओंमें तथा आलिंगनादि समस्त क्रियाओंमें स्त्रियोंकी स्वभावसे ही प्रवीणता होती है ।


सर्वावयवसम्पूर्णा दिव्यलक्षणलक्षिताः ।
अनङ्गप्रतिमा धीराः प्रसन्नाः प्रांशुविग्रहाः ॥115॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि-शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ।


हारकुण्डलकेयूरकिरीटाङ्गदभूषिताः ।
मन्दारमालतीगन्धा अणिमादिगुणान्विताः ॥116॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।


प्रसन्नामलपूर्णेन्दुकान्ताः कान्ताजनप्रियाः ।
शक्तित्रयगुणोपेताः सत्त्वशीलावलम्बिनः ॥117॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।


विज्ञानविनयोद्दामप्रीतिप्रसरसंभृताः ।
निसर्गसुभगाः सर्वे भवन्ति त्रिदिवौकसः ॥118॥

अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।


न तत्र दुःखितो दीनो वृद्धो रोगी गुणच्युतः ।
विकलाङ्गो गतश्रीकः स्वर्गलोके विलोक्यते ॥119॥

अर्थ: तथा उस स्वर्गमें कोई ऐसा नहीं देखा जाता जो दुःखी, दीन, वृद्ध, वा गुणरहित, विकल-अंग अथवा कान्तिहीन हो ।


सभ्यसामानिकामात्यलोकपालप्रकीर्णकाः ।
मित्राद्यभिमतस्तेषां पार्श्ववर्ती परिग्रहः ॥120॥

अर्थ: स्वर्गोंमें सभाके देव, सामानिक देव, अमात्यादिक देव, लोकपाल देव, प्रकीर्णक देव ये भेद है; तथा मित्र आदिक सब ही उन इन्द्रोंके पार्श्ववर्ती परिवार उनके अभिमत (इष्ट प्रीति करनेवाले) हैं ।


बन्दिगायनसैरन्ध्रीस्वाङ्गरक्षाः पदातयः ।
नटवेत्रिविलासिन्यः सुराणां सेवको जनः ॥121॥

अर्थ: तथा स्वर्गोंमें उन देवोंकी सेवा करनेवाले देव हैं, बंदीजन हैं, गानेवाले हैं, अङ्गरक्षक हैं, दंड धरनेवाले हैं तथा नाचनेवाली विलासिनी अप्सरायें हैं ।


तत्रातिभव्यताधारे विमाने कुन्दकोमले ।
उपपादिशिलागर्भे संभवन्ति स्वयं सुराः ॥122॥

अर्थ: स्वर्गोंमें अति मनोज्ञताका आधार ऐसे विमानमें कुन्दके पुष्प समान कोमल ऐसी उपपादि शिलाके मध्यसे देव स्वयमेव उत्पन्न होते हैं ।


सर्वाक्षसुखदे रम्ये नित्योत्सवविराजिते ।
गीतवादित्रलीलाढ्ये जयजीवस्वनाकुले ॥123॥

अर्थ: उस उपपाद शय्याका स्थान कैसा है कि-समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सवसहित विराजता है, गीत वादित्रादि लीलाओं सहित है, तथा “जयवन्त होओ” “चिरंजीवी होओ” ऐसे शब्दोंसे व्याप्त है ।


दिव्याकृतिसुसंस्थानाः सप्तधातुविवर्जिताः ।
कायकान्तिपयःपूरैः प्रसादितदिगन्तराः ॥124॥

अर्थ: ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते हैं, वे कैसे हैं ? दिव्य सुन्दराकार है संस्थान जिनका और जिनका सप्तधातु रहित शरीर है, जो शरीरकी प्रभारूपी जलके प्रभावसे समस्त दिशाओंको प्रसन्न करनेवाले हैं ।


शिरीषसुकुमाराङ्गाः पुण्यलक्षणलक्षिताः ।
अणिमादिगुणोपेता ज्ञानविज्ञानपारगाः ॥125॥

अर्थ: उस उपपाद शय्याका स्थान कैसा है कि-समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सवसहित विराजता है, गीत वादित्रादि लीलाओं सहित है, तथा ‘‘जयवन्त होओ’’ ‘‘चिरंजीवी होओ’’ ऐसे शब्दोंसे व्याप्त है ॥१२३॥ ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते हैं, वे कैसे हैं ? दिव्य सुन्दराकार है संस्थान जिनका और जिनका सप्तधातु रहित शरीर है, जो शरीरकी प्रभारूपी जलके प्रभावसे समस्त दिशाओंको प्रसन्न करनेवाले हैं ॥१२४॥ जिनका शरीर शिरीषपुष्पके समान कोमल है, पवित्र लक्षणों सहित है, अणिमा महिमादि गुणोंसे युक्त है, अवधिज्ञानादि विज्ञान चतुरताओंके पारगामी है ॥१२५॥ तथा चन्द्रमाकी मूर्ति समान है; जिनके सब दोष शान्त हो गये हैं; जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित है, भय क्लेश पीडासे रहित है ॥१२६॥ जिनका उत्साह बढता ही रहता है, वज्रके समान दृढशरीर हैं, बडे पराक्रमी हैं, इस प्रकारके देव अचिन्त्य पुण्यके योगसे उस उपपादस्थानमें शरीरको धारण करते हैं ।


मृगाङ्कमूर्त्तिसंकाशाः शान्तदोषाः शुभाशयाः ।
अचिन्त्यमहिमोपेता भयक्लेशार्त्तिवर्जिताः ॥126॥

अर्थ: तथा चन्द्रमाकी मूर्ति समान है; जिनके सब दोष शान्त हो गये हैं; जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित है, भय क्लेश पीडासे रहित है ।


वर्द्धमानमहोत्साहा वज्रकाया महाबलाः ।
अचिन्त्यपुण्ययोगेन गृह्णन्ति वपुरूर्जितम् ॥127॥

अर्थ: जिनका उत्साह बढता ही रहता है, वज्रके समान दृढशरीर हैं, बडे पराक्रमी हैं, इस प्रकारके देव अचिन्त्य पुण्यके योगसे उस उपपादस्थानमें शरीरको धारण करते हैं ।


सुखामृतमहाम्भोधेर्मध्यादिव विनिर्गताः ।
भवन्ति त्रिदशाः सद्यः क्षणेन नवयौवनाः ॥128॥

अर्थ: उस उपपाद शय्यामें वे देव उत्पन्न होते हैं सो जिस प्रकार समुद्रमेंसे कोई मनुष्य निकलें, उसी प्रकारं वे देव सुखरूपी महासमुद्रमेंसे तत्काल नवयौवनरूप होकर उत्पन्न होते हैं ।


किं च पुष्पफलाक्रान्तैः प्रवालदलदन्तुरैः ।
तेषां कोकिलवाचालैर्द्रुमैर्जन्म निगद्यते ॥129॥

अर्थ: फूल-फलोंसे भरपूर, कोमल पत्तोंसे अंकुरित और कोकिलाओंसे शब्दायमान वृक्षों करके उनके जन्मकी सूचना की जाती है ।


गीतवादित्रनिर्घोषैर्जयमङ्गलपाठकैः ।
विबोध्यन्ते शुभैः शब्दैः सुखनिद्रात्यये यथा ॥130॥

अर्थ: तथा वे देव उस उपपादशय्यामें ऐसे उत्पन्न होते हैं कि जैसे कोई राजकुमार सोता हो और वह गीत वादित्रोंके शब्दोंसे, ‘जय-जय’ इत्यादि मंगलके पाठोंसे तथा उत्तमोत्तम शब्दोंसे सुखनिद्राका अभाव होने पर जगाया जाता है; उसी प्रकार देव भी उस उपपादशिला (शय्या) में उठ कर सावधान होते हैं ।


किञ्चिद्भ्रममपाकृत्य वीक्षते स शनैः शनैः ।
यावदाशा मुहुः स्निग्धैस्तदा कर्णान्तलोचनैः ॥131॥

अर्थ: तथा उस उपपादशय्यामें सावधान होकर कुछ भ्रमको दूर करके उस समय कर्णान्त पर्यन्त नेत्रोंको उघाड कर दृष्टि फेर फेरकर चारों ओर देखता है ।


इन्द्रजालमथ स्वप्नः किं नु माया भ्रमो नु किम् ।
दृश्यमानमिदं चित्रं मम नायाति निश्चयम् ॥132॥

अर्थ: फिर सावधान होकर वह देव ऐसा विचारता है कि अहो ! यह क्या इन्द्रजाल है ? अथवा मुझे क्या स्वप्न आ रहा है ? अथवा यह मायामय कोई भ्रम है ? यह तो बडा आश्चर्य देखनेमें आता है; निश्चय नहीं कि यह क्या है ? इस प्रकार सन्देहरूप होता है ।


इदं रम्यमिदं सेव्यमिदं श्लाघ्यमिदं हितम् ।
इदं प्रियमिदं भव्यमिदं चित्तप्रसत्तिदम् ॥133॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥


एतत्कन्दलितानन्दमेतत्कल्याणमन्दिरम् ।
एतन्नित्योत्सवाकीर्णमेतदत्यन्तसुन्दरम् ॥134॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥


सर्वर्द्धिमहिमोपेतं महर्द्धिकसुरार्चितम् ।
सप्तानीकान्वितं भाति त्रिदशेन्द्रसभाजिरम् ॥135॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥


मामेवोद्दिश्य सानन्दः प्रवृत्तः किमयं जनः ।
पुण्यमूर्त्तिः प्रियः श्लाघ्यो विनीतोऽत्यन्तवत्सलः ॥136॥

अर्थ: फिर वह देव विचारता है कि ये सामने जो लोग खडे हैं वे क्या मुझे ही देख कर आनंद सहित प्रवृत्त हैं ? ये पवित्र हैं, उज्वल हैं मूर्ति जिनकी ऐसे हैं तथा ये सब बहुत प्रिय हैं, प्रशंसनीय हैं, विनीत हैं, चतुर हैं, अत्यन्त प्रीतियुक्त हैं ।


त्रैलोक्यनाथसंसेव्यः कोऽयं देशः सुखाकरः ।
अनन्तमहिमाधारो विश्वलोकाभिनन्दितः ॥137॥

अर्थ: तथा फिर विचारता है कि यह सुखकी खानि तीन लोकके स्वामी द्वारा सेवने योग्य कौनसा देश है ? यह देश अनन्त महिमाका आधार है, सबको वांछनीय है ।


इदं पुरमतिस्फीतं वनोपवनराजितम् ।
अभिभूय जगद्भूत्या वल्गतीव ध्वजांशुकैः ॥138॥

अर्थ: तथा यह नगर भी अति विस्तीर्ण है, वन उपवनोंसे शोभित है, संपदाके द्वारा समस्त जगत्को जीतकर ध्वजाओंके वस्त्रोंके हिलनेसे मानो दौडता है, नृत्य ही करता है, इत्यादि विचारता है ।


आकलय्य तदाकूतं सचिवा दिव्यचक्षुषः ।
नतिपूर्वं प्रवर्त्तन्ते वक्तुं कालोचितं तदा ॥139॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसी समय वहाँके मंत्री देव दिव्यनेत्रोंसे उस उत्पन्न हुए देवेन्द्रके अभिप्रायको समझ कर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव ! हम सेवकों पर प्रसन्न हूजिये, निर्मल दृष्टिसे देखिये और हमारे पूर्वापर परिपाटीके प्रकाश करनेवाले वचनोंको सुनिये ।।१३९-१४०।।


प्रसादः क्रियतां देव नतानां स्वेच्छया दृशा ।
श्रूयतां च वचोऽस्माकं पौर्वापर्यप्रकाशकम् ॥140॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसी समय वहाँके मंत्री देव दिव्यनेत्रोंसे उस उत्पन्न हुए देवेन्द्रके अभिप्रायको समझ कर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव ! हम सेवकों पर प्रसन्न हूजिये, निर्मल दृष्टिसे देखिये और हमारे पूर्वापर परिपाटीके प्रकाश करनेवाले वचनोंको सुनिये ।।१३९-१४०।।


अद्य नाथ वयं धन्याः सफलं चाद्य जीवितम् ।
अस्माकं यत्त्वया स्वर्गः संभवेन पवित्रितः ॥141॥

अर्थ: यदि कोई मनुष्य सौधर्मस्वर्गमें इन्द्र उत्पन्न होता है तो उसका मंत्री सबकी तरफसे इस प्रकार कहता है कि हे नाथ ! आपने यहाँ उत्पन्न होकर इस स्वर्गको पवित्र किया सो आज हम धन्य हुए, हमारा जीवन भी आज सफल हुआ ।


प्रसीद जय जीव त्वं देव पुण्यस्तवोद्भवः ।
भव प्रभुः समग्रस्य स्वर्गलोकस्य सम्प्रति ॥142॥

अर्थ: हे नाथ ! आप प्रसन्न हूजिये, आपकी जय हो, आप चिरंजीव रहिये । हे देव ! आपका उत्पन्न होना पुण्यरूप है, पवित्र है । आप इस स्वर्गलोकके स्वामी हूजिये ।


सौधर्मोऽयं महाकल्पः सर्वामरशतार्चितः ।
नित्याभिनवकल्याणवार्द्धिवर्द्धनचन्द्रमाः ॥143॥

अर्थ: यदि कोई मनुष्य सौधर्मस्वर्गमें इन्द्र उत्पन्न होता है तो उसका मंत्री सबकी तरफसे इस प्रकार कहता है कि हे नाथ ! आपने यहाँ उत्पन्न होकर इस स्वर्गको पवित्र किया सो आज हम धन्य हुए, हमारा जीवन भी आज सफल हुआ ॥१४१॥ हे नाथ ! आप प्रसन्न हूजिये, आपकी जय हो, आप चिरंजीव रहिये । हे देव ! आपका उत्पन्न होना पुण्यरूप है, पवित्र है । आप इस स्वर्गलोकके स्वामी हूजिये ॥१४२॥ यह सौधर्म नामा महास्वर्ग है, सैकडों देवोंसे पूजित हैं; यह स्वर्ग सर्वदेवोंके कल्याणरूप समुद्रको बढानेके लिये चन्द्रमाके समान है ॥१४३॥ यह सौधर्म नामा स्वर्ग ऐसा है कि इसमें जो इन्द्र उत्पन्न होता है, उसका इशान इन्द्र आदि समस्त देव परमोत्सव करते हैं ॥१४४॥ इस स्वर्गमें वांछित पदार्थ भोगने योग्य है; यहाँ नित्य नया यौवन है, अविनश्वर लक्ष्मी है, और निरन्तर सुख ही सुख है ॥१४५॥ तथा यह स्वर्गीय विमान जहाँ जाना चाहें वहीं जा सकता है । इसका दर्शन अति मनोहर है, यह देवोंकी मंडली (सभा) आपके चरणकमलोंमें नम्रीभूत है ॥१४६॥ ये मनोहर अप्सराओंसे भरे हुए चन्द्रकान्तके समान मनोहर आपके महल हैं, ये रत्नमयी वापिकायें हैं, ये क्रीडानदियाँ तथा पर्वत हैं ॥१४७॥ यह सभाभवन है सो नम्रीभूत सैकडों देवोंके द्वारा सेवा करने योग्य है, पूजित है, तथा रत्नमयी दीपकोंसे प्रकाशमान एवं पुष्पसमूहोंसे शोभित है ॥१४८॥ और विनीत चतुर वेशकी धरनेवाली कामरूपिणी सुन्दर स्त्रियाँ नृत्य संगीतादि रसमें उत्सुक होकर आपके सामने नृत्य करनेके लिये आपकी आज्ञाकी प्रतीक्षा कर रही हैं ॥१४९॥ तथा यह आपका छत्र है, यह आपका पूजनीय सिंहासन है, यह चमरोंका समूह है, ये विजयकी ध्वजायें हैं ॥१५०॥ और ये


कल्पः सौधर्मनामायमीशानप्रमुखाः सुराः ।
इहोत्पन्नस्य शक्रस्य कुर्वन्ति परमोत्सवम् ॥144॥

अर्थ: यह सौधर्म नामा स्वर्ग ऐसा है कि इसमें जो इन्द्र उत्पन्न होता है, उसका इशान इन्द्र आदि समस्त देव परमोत्सव करते हैं ।


अत्र संकल्पिताः कामा नवं नित्यं च यौवनम् ।
अत्राविनश्वरा लक्ष्मीः सुखं चात्र निरन्तरम् ॥145॥

अर्थ: इस स्वर्गमें वांछित पदार्थ भोगने योग्य है; यहाँ नित्य नया यौवन है, अविनश्वर लक्ष्मी है, और निरन्तर सुख ही सुख है ।


स्वर्विमानमिदं रम्यं कामगं कान्तदर्शनम् ।
पादाम्बुजनता चेयं तव त्रिदशमण्डली ॥146॥

अर्थ: तथा यह स्वर्गीय विमान जहाँ जाना चाहें वहीं जा सकता है । इसका दर्शन अति मनोहर है, यह देवोंकी मंडली (सभा) आपके चरणकमलोंमें नम्रीभूत है ।


एते दिव्याङ्गनाकीर्णाश्चन्द्रकान्ता मनोहराः ।
प्रासादा रत्नवाप्यश्च क्रीडानद्यश्च भूधराः ॥147॥

अर्थ: ये मनोहर अप्सराओंसे भरे हुए चन्द्रकान्तके समान मनोहर आपके महल हैं, ये रत्नमयी वापिकायें है, ये क्रीडानदियाँ तथा पर्वत हैं ।


सभाभवनमेतत्ते नतामरशतार्चितम् ।
रत्नदीपकृतालोकं पुष्पप्रकरशोभितम् ॥148॥

अर्थ: यह सभाभवन है सो नम्रीभूत सैकडों देवोंके द्वारा सेवा करने योग्य है, पूजित है, तथा रत्नमयी दीपकोंसे प्रकाशमान एवं पुष्पसमूहोंसे शोभित है ।


विनीतवेषधारिण्यः कामरूपा वरस्त्रियः ।
तवादेशं प्रतीक्षन्ते लास्यलीलारसोत्सुकाः ॥149॥

अर्थ: और विनीत चतुर वेशकी धरनेवाली कामरूपिणी सुन्दर स्त्रियाँ नृत्य संगीतादि रसमें उत्सुक होकर आपके सामने नृत्य करनेके लिये आपकी आज्ञाकी प्रतीक्षा कर रही हैं ।


आतपत्रमिदं पूज्यमिदं च हरिविष्टरम् ।
एतच्च चामरव्रातमेते विजयकेतवः ॥150॥

अर्थ: तथा यह आपका छत्र है, यह आपका पूजनीय सिंहासन है, यह चमरोंका समूह है, ये विजयकी ध्वजायें हैं ।


एता अग्रे महादेव्यो वरस्त्रीवृन्दवन्दिताः ।
तृणीकृतसुराधीशलावण्यैश्वर्यसम्पदः ॥151॥

अर्थ: और ये सब आपकी अग्रमहिषी अर्थात् पट्टदेवियाँ हैं, ये श्रेष्ठ देवांगनाओं द्वारा वंदने योग्य है तथा इन्द्रके ऐश्वर्यको तृणकी समान समझनेवाली हैं तथा शृंगाररूपी समुद्रकी लहरोंके समान चंचल है; विलासके कारण जिनकी भौहें प्रफुल्लित है और लीलारूपी अलंकारसे पूरित है; सो हे नाथ ! ये आपके चरणोंमें समर्पित हैं ॥१५१-१५२॥


शृङ्गारजलधेर्वेला-विलासोल्लासितभ्रुवः ।
लीलालङ्कारसम्पूर्णास्तव नाथ समर्पिताः ॥152॥

अर्थ: और ये सब आपकी अग्रमहिषी अर्थात् पट्टदेवियाँ हैं, ये श्रेष्ठ देवांगनाओं द्वारा वंदने योग्य है तथा इन्द्रके ऐश्वर्यको तृणकी समान समझनेवाली हैं तथा शृंगाररूपी समुद्रकी लहरोंके समान चंचल है; विलासके कारण जिनकी भौहें प्रफुल्लित है और लीलारूपी अलंकारसे पूरित है; सो हे नाथ ! ये आपके चरणोंमें समर्पित हैं ॥१५१-१५२॥


सर्वावयवनिर्माणश्रीरासां नोपमास्पदम् ।
यासां श्लाघ्यामलस्निग्धपुण्याणुप्रभवं वपुः ॥153॥

अर्थ: इन पट्टदेवियोंके शरीरकी शोभा अनुपम है; क्योंकि इनका शरीर योग्य निर्मल स्निग्ध पवित्र परमाणुओंके द्वारा बना हुआ है ।


अयमैरावणो नाम देवदन्ती महामनाः ।
धत्ते गुणाष्टकैश्वर्याच्छ्रियं विश्वातिशायिनीम् ॥154॥

अर्थ: हे नाथ ! वह आपका महामनवाला ऐरावत नामा देव हस्ती है जो अणिमामहिमादि आठ गुणोके ऐश्वर्यसे समस्त प्रकारकी विक्रियारूप लक्ष्मीको धरनेवाला है ।


इदं मत्तगजानीकमितोऽश्वीयं मनोजवम् ।
एते स्वर्णरथास्तुङ्गा वल्गन्त्येते पदातयः ॥155॥

अर्थ: और यह आपकी मदोन्मत्त हस्तियोंकी सेना है, यह घोडोंकी सेना हैं, इसका वेग मनके समान है; यह सुवर्णमयी ऊँचे-ऊँचे रथोंकी सेना है और ये पयादे हैं ।


एतानि सप्त सैन्यानि पालितान्यमरेश्वरैः ।
नमन्ति ते पदद्वन्द्वं नतिविज्ञप्तिपूर्वकम् ॥156॥

अर्थ: तथा यह आपकी सात प्रकारकी सेना है, पूर्वके इन्द्रों द्वारा पालित है; यह आपके चरणकमलोंको प्रार्थना पूर्वक नमस्कार करतीं है ।


समग्रं स्वर्गसाम्राज्यं दिव्यभूत्योपलक्षितम् ।
पुण्यैस्ते सम्मुखीभूतं गृहाण प्रणतामरम् ॥157॥

अर्थ: यह समस्त स्वर्गीय राज्य दिव्य सम्पदाओंसे शोभित है, सो आपके पुण्यके प्रतापसे आपके सन्मुख हुआ है । नम्रीभूत है देव जिसमें ऐसा है, सो आप ग्रहण कीजिये ।


इति वादिनी सुस्निग्धे सचिवेऽत्यन्तवत्सले ।
अवधिज्ञानमासाद्य पौर्वापर्यं स बुद्ध्यति ॥158॥

अर्थ: इस प्रकार अति स्नेहयुक्त अत्यन्त प्रीतिपूर्वक मंत्री कहता है, उसी समय इन्द्र अवधिज्ञानको प्राप्त होकर पूर्वजन्मसंबंधी समस्त वृतान्त जान जाता है ।


अहो तपः पुरा चीर्णं मयान्यजनदुश्चरम् ।
वितीर्णं चाभयं दानं प्राणिनां जीवितार्थिनाम् ॥159॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह इन्द्र अवधिज्ञानसे सब जानकर मन ही मनमें कहता है कि अहो ! देखो, मैंने पूर्वभवमें अन्यसे आचरण करनेमें नहीं आवे ऐसे तपको धारण किया था तथा अनेक जीवोंको मैंने अभयदान दिया था ।


आराधितं मनःशुद्ध्या दृग्बोधादिचतुष्टयम् ।
देवश्च जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥160॥

अर्थ: तथा मनकी विशुद्धिपूर्वक दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप इन चारों आराधनाओंसे त्रैलोक्यके नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर देवाधिदेवका आराधन किया था ।


निर्दग्धं विषयारण्यं स्मरवैरी निपातितः ।
कषायतरवश्छिन्ना रागशत्रुर्नियन्त्रितः ॥161॥

अर्थ: तथा मैंने पूर्वभवमें इन्द्रियोंके विषयरूप वनको दग्ध किया था, कामरूप शत्रुका नाश किया था, कषायरूप वृक्षोंको काट दिया था और रागरूपी शत्रुको पीडित किया था ।


सर्वस्तस्य प्रभावोऽयमहं येनाद्य दुर्गतेः ।
उद्धृत्य स्थापितं स्वर्गराज्ये त्रिदशवन्दिते ॥162॥

अर्थ: उसीका यह प्रभाव है; उक्त आचरणोंने ही इस समय मुझे दुर्गतिसे बचाकर इस देवोंके वंदनीय स्वर्गके राज्यमें स्थापित किया है ।


रागादिदहनज्वाला न प्रशाम्यन्ति देहिनाम् ।
सद्वृत्तवार्यसंसिक्ताः क्वचिज्जन्मशतैरपि ॥163॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह इन्द्र विचारता है कि जीवोंके रागादिकरूप अग्निकी ज्वाला सम्यक् चारित्ररूपी जलको सींचे बिना सैकडों जन्म लेने पर भी नहीं बुझती ।


तन्नात्र सुलभं मन्ये तत्किं कुर्मोऽधुना वयम् ।
सुराणां स्वर्गलोकेऽस्मिन्दर्शनस्यैव योग्यता ॥164॥

अर्थ: ऐसा सम्यक् चारित्र इस स्वर्गमें सुलभ नहीं है, इसलिये क्या करूँ ? इस स्वर्गलोकमें तो सम्यग्दर्शनकी ही योग्यता है, चारित्रकी योग्यता नहीं है ।


अतस्तत्त्वार्थश्रद्धा मे श्रेयसी स्वार्थसिद्धये ।
अर्हद्देवपदद्वन्द्वे भक्तिश्चात्यन्तनिश्चला ॥165॥

अर्थ: इस कारण मेरे स्वार्थके लिये तत्त्वार्थश्रद्धान ही कल्याणकारी व श्रेष्ठ है, तथा अर्हन्त भगवानके चरणयुगलमें अत्यन्त निश्चल भक्ति करना ही कल्याणकारी है ।


यान्यत्र प्रतिबिम्बानि स्वर्गलोके जिनेशिनाम् ।
विमानचैत्यवृक्षेषु मेर्वाद्युपवनेषु च ॥166॥

अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥


तेषां पूर्वमहं कृत्वा स्वद्रव्यैः स्वर्गसंभवैः ।
पुष्पचन्दननैवेद्यैर्गन्धदीपाक्षतोत्करैः ॥167॥

अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥


गीतवादित्रनिर्घोषैः स्तुतिस्तोमैर्मनोहरैः ।
स्वर्गैश्वर्यं ग्रहीष्यामि ततस्त्रिदशवन्दितः ॥168॥

अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥


इति सर्वज्ञदेवस्य कृत्वा पूजामहोत्सवम् ।
स्वीकरोति ततो राज्यं पट्टबन्धादिलक्षणम् ॥169॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर वह इन्द्र सर्वज्ञदेवकी पूजा करके महान् उत्सवपूर्वक पट्टबंधादिक है लक्षण जिसका ऐसे स्वर्गके राज्यको ग्रहण करता है ।


तस्मिन्मनोजवैर्यानैर्विचरन्तो यदृच्छया ।
वनाद्रिसागरान्तेषु दीव्यन्ते ते दिवौकसः ॥170॥

अर्थ: तत्पश्चात् वे स्वर्गके देव मनके समान वेगवाले विमानोंके द्वारा स्वच्छन्द विचरते हुए वन, पर्वत, वा समुद्रोंके तीर पर क्रीडा करते रहते हैं ।


संकल्पानन्तरोत्पन्नैर्दिव्यभोगैः समन्वितम् ।
सेवमानाः सुरानीकैः श्रयन्ति स्वर्गिणः सुखम् ॥171॥

अर्थ: तथा संकल्प करते ही उत्पन्न होनेवाले नानाप्रकारके दिव्य मनोहर भोगोंको भोगते हुए देवोंकी सेना सहित वे स्वर्गके सुख भोगते रहते हैं ।


महाप्रभावसम्पन्ने महाभूत्योपलक्षिते ।
कालं गतं न जानन्ति निमग्नाः सौख्यसागरे ॥172॥

अर्थ: इस प्रकार महाप्रभाव सहित महाविभूतियुक्त स्वर्गोंके सुखरूपी समुद्रमें निमग्न रहते हुए समयको नहीं जानते कि कितना बीत गया ।


क्वचिद्गीतैः क्वचिन्नृत्यैः क्वचिद्वाद्यैर्मनोरमैः ।
क्वचिद्विलासिनीव्रातक्रीडाशृङ्गारदर्शनैः ॥173॥

अर्थ: इस प्रकार कहीं तो मनके लुभानेवाले गीत तथा नृत्य वादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओंके समूहसे किये हुए क्रीडा शृंगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकारके भोगों (कल्पवृक्षों) से उत्पन्न हुए सुखों सहित कल्पनातीत विभववाले स्वर्गोंमें देव रहते हैं ॥१७३-१७४॥


दशाङ्गभोगजैः सौख्यैर्लभ्यमानाः क्वचित् क्वचित् ।
वसन्ति स्वर्गिणः स्वर्गे कल्पनातीतवैभवे ॥174॥

अर्थ: इस प्रकार कहीं तो मनके लुभानेवाले गीत तथा नृत्य वादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओंके समूहसे किये हुए क्रीडा शृंगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकारके भोगों (कल्पवृक्षों) से उत्पन्न हुए सुखों सहित कल्पनातीत विभववाले स्वर्गोंमें देव रहते हैं ॥१७३-१७४॥


मद्यतूर्यगृहज्योतिर्भूषाभोजनविग्रहाः ।
स्रग्दीपवस्त्रपात्राङ्गा दशधा कल्पपादपाः ॥175॥

अर्थ: मद्य, वादित्र, गृह, ज्योति, भूषण, भोजन, माला, दीपक, वस्त्र, पात्र, इन दश प्रकारके भोगोंके देनेवाले दश प्रकारके कल्पवृक्ष स्वर्गोंमें होते हैं; इस कारण स्वर्गके देव दशांग भोग भोगते हैं ।


यत्सुखं नाकिनां स्वर्गे तद्वक्तुं केन पार्यते ।
स्वभावजमनातङ्कं सर्वाक्षप्रीणनक्षमम् ॥176॥

अर्थ: स्वर्गोंमें स्वर्गवासियोंको जो सुख है, उसका वर्णन करनेमें कोई समर्थ नहीं है; क्योंकि वह सुख बिना प्रयासके स्वयमेव उत्पन्न होता है, उस सुखमें आतंक (रोगादिक) नहीं है और समस्त इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें समर्थ है ।


अशेषविषयोद्भूतं दिव्यस्त्रीसंगसंभवम् ।
विनीतजनविज्ञानज्ञानाद्यैश्वर्यलाञ्छितम् ॥177॥

अर्थ: स्वर्गोंका सुख समस्त प्रकारके विषयोंसे उत्पन्न हुआ है तथा दिव्य स्त्रियोंके संगमसे उत्पन्न हुआ है तथा विनीत जनके विज्ञान चतुराई ज्ञानादिक ऐश्वर्यसहित उत्पन्न हुआ है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ?


सौधर्माद्यच्युतान्ता ये कल्पाः षोडश वर्णिताः ।
कल्पातीतास्ततो ज्ञेया देवा वैमानिकाः परे ॥178॥

अर्थ: सौधर्म स्वर्गसे लगाकर अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह स्वर्ग कल्प कहे जाते हैं; उनके ऊपर जो नव ग्रैवेयकोंमें वैमानिक देव हैं, वे कल्पातीत कहाते हैं ।


अहमिन्द्राभिधानास्ते प्रवीचारविवर्जिताः ।
विवर्द्धितशुभध्यानाः शुक्ललेश्यावलम्बिनः ॥179॥

अर्थ: वे देव अहमिन्द्र नामसे वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका आचार्योंने अहमिन्द्र नाम कहा है । वे अहमिन्द्र कामरहित हैं, उनके स्त्रीका मैथुन वर्जित है, इसी कारण वहाँ देवांगनायें नहीं होती । उन देवोंका शुभध्यान उत्तरोत्तर बढता हुआ है और वे शुक्ल लेश्याके धरनेवाले हैं ।


अनुत्तरविमानेषु श्रीजयन्तादिपञ्चसु ।
संभूय स्वर्गिणश्च्युत्वा व्रजन्ति पदमव्ययम् ॥180॥

अर्थ: तत्पश्चात् उन नव ग्रैवेयक विमानोंसे ऊपर श्रीजयंतादिक पाँच अनुत्तर विमान हैं। उनमें जो देव उत्पन्न होते हैं, वे वहाँसे च्यव कर मनुष्य हो अवश्य ही मोक्षको पाते हैं ।


कल्पेषु च विमानेषु परतः परतोऽधिकाः ।
शुभलेश्यायुर्विज्ञानप्रभावैः स्वर्गिणः स्वयम् ॥181॥

अर्थ: तथा कल्पोंमें और कल्पातीत विमानोंमें शुभ लेश्या, आयु, विज्ञान, प्रभावादिक करके देव स्वयं ही अगले-अगले विमानोंमें अधिक-अधिक बढते हुए हैं ।


ततोऽग्रे शाश्वतं धाम जन्मजातङ्कविच्युतम् ।
ज्ञानिनां यदधिष्टानं क्षीणनिःशेषकर्मणाम् ॥182॥

अर्थ: उन अनुत्तर विमानोंसे आगे अर्थात् ऊपर शाश्वत धाम (मोक्षस्थान वा सिद्धशिला) है सो संसारसे उत्पन्न हुए क्लेश दुःखादिसे रहित है और समस्त कर्मोंके नाश करनेवाले सिद्ध भगवानोंका आश्रयस्थान है ।


चिदानन्दगुणोपेता निष्ठितार्था विबन्धनाः ।
यत्र सन्ति स्वयंबुद्धाः सिद्धाः सिद्धेः स्वयंवराः ॥183॥

अर्थ: उस मोक्षस्थानमें सिद्ध भगवान् विद्यमान है। वे चैतन्य और आनन्दरूप गुणोंसे संयुक्त है, कृतकृत्य है, कर्मबन्धसे रहित है, स्वयंबुद्ध है, अर्थात् जिनके स्वाधीन अतीन्द्रिय ज्ञान है तथा सिद्धि (मुक्ति) को स्वयं वरनेवाले हैं ।


समस्तोऽयमहो लोकः केवलज्ञानगोचरः ।
तं व्यस्तं वा समस्तं वा स्वशक्त्या चिन्तयेद्यतिः ॥184॥

अर्थ: अहो भव्य जीवों ! यह समस्त लोक केवलज्ञानगोचर है तथापि इस संस्थानविचय नामा धर्मध्यानमें मुनि सामान्यतासे सबको ही तथा व्यस्त कहिये कुछ भिन्न भिन्नको अपनी शक्तिके अनुसार चिन्तवन करे ।


विलीनाशेषकर्माणं स्फुरन्तमतिनिर्मलम् ।
स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ॥185॥

अर्थ: तथा इस लोकके संस्थानके चिन्तवनके पश्चात् शरीरमें प्राप्त पुरुषाकार अपने आत्माको कर्मरहित स्फुरायमान अति निर्मल चिन्तवन (स्मरण) करे ।


इति निगदितमुच्चैर्लोकसंस्थानमित्थं
नियतमनियतं वा ध्यायतः शुद्धबुद्धेः ।
भवति सततयोगाद्योगिनो निष्प्रमादं
नियतमनतिदूरं केवलज्ञानराज्यम् ॥186॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस पूर्वोक्त प्रकारसे कहे हुए लोकके स्वरूप (संस्थान) को इस प्रकार नियत मर्यादा सहित वा अनियत मर्यादा सहित चिन्तवन करता हुआ जो निर्मलबुद्धि मुनि है उसको प्रमादरहित ध्यान करनेसे नियमसे शीघ्र ही केवलज्ञान राज्यकी प्राप्ति होती है ।

सर्ग 37: पिण्डस्थ ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 33)

पिण्डस्थं च पदस्थं च रूपस्थं रूपवर्जितम् ।
चतुर्धा ध्यानमाम्नातं भव्यराजीवभास्करैः ॥1॥

अर्थ: जो भव्यरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्यके समान योगीश्वर है, उन्होंने ध्यानको पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ऐसे चार प्रकारका कहा है ।


पिण्डस्थे पञ्च विज्ञेया धारणा वीरवर्णिताः ।
संयमी यास्वसंमूढो जन्मपाशान्निकृन्तति ॥2॥

अर्थ: पिण्डस्थ ध्यानमें श्रीवर्धमानस्वामीसे कही हुई जो पाँच धारणायें हैं, उनमें संयमी मुनि ज्ञानी होकर संसाररूपी पाशको काटता है ।


पार्थिवी स्यात्तथाग्नेयी श्वसना वाथ वारुणी ।
तत्त्वरूपवती चेति विज्ञेयास्ता यथाक्रमम् ॥3॥

अर्थ: वे धारणायें पार्थिवी, आग्नेयी तथा श्वसना, वारुणी और तत्त्वरूपवती ऐसे यथाक्रमसे होती है ।


तिर्यग्लोकसमं योगी स्मरति क्षीरसागरम् ।
निःशब्दं शान्तकल्लोलं हारनीहारसंनिभम् ॥4॥

अर्थ: प्रथम ही योगी मध्यलोकमें स्वयंभूरमण नामा समुद्रपर्यन्त जो तिर्यक् लोक है, उसके समान निःशब्द, कल्लोल रहित तथा हार और बरफके सदृश सफेद क्षीरसमुद्रका ध्यान (चिन्तवन) करे ।


तस्य मध्ये सुनिर्माणं सहस्रदलमम्बुजम् ।
स्मरत्यमितभादीप्तं द्रुतहेमसमप्रभम् ॥5॥

अर्थ: उस क्षीरसमुद्रके मध्यमार्गमें सुन्दर है निर्माण (रचना) जिसका और अमित फैलती हुई दीप्तिसे शोभायमान, पिघलाये हुए सुवर्णकी-सी प्रभावाले एक सहस्रदलके कमलका चिन्तवन (ध्यान) करे ।


अब्जरागसमुद्भूतकेसरालिविराजितम् ।
जम्बूद्वीपप्रमाणं च चित्तभ्रमररञ्जकम् ॥6॥

अर्थ: फिर इस कमलको कैसा ध्यावे कि कमलके रागसे उत्पन्न हुई केसरोंकी पंक्तिसे विराजमान (शोभायमान) तथा चित्तरूपी भ्रमरको रंजायमान करनेवाले जम्बूद्वीपके बराबर लाख योजनका चिन्तवन करे ।


स्वर्णाचलमयीं दिव्यां तत्र स्मरति कर्णिकाम् ।
स्फुरत्पिङ्गप्रभाजालपिशङ्गितदिगन्तराम् ॥7॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस कमलके मध्य सुवर्णाचल(मेरु)के समान, स्फुरायमान है पीतरंगकी प्रभाका समूह जिसमें तथा उसके द्वारा पीतरंगकी कर दी हैं दशों दिशायें जिसने ऐसी एक कर्णिकाका ध्यान करे ।


शरच्चन्द्रनिभं तस्यामुन्नतं हरिविष्टरम् ।
तत्रात्मानं सुखासीनं प्रशान्तमिति चिन्तयेत् ॥8॥

अर्थ: उस कमलकी कर्णिकामें शरद ऋतुके चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णका एक ऊँचा सिंहासन चिंतवन करे; उस सिंहासनमें अपने आत्माको सुखरूप, शान्तस्वरूप, क्षोभरहित चिंतवन करे ।


रागद्वेषादिनिःशेषकलङ्कक्षपणक्षमम् ।
उद्युक्तं च भवोद्भूतकर्मसन्तानशातने ॥9॥

अर्थ: उस सिंहासन पर बैठे हुए अपने आत्माको ऐसा विचारे कि यह रागद्वेषादिक समस्त कलंकोंको क्षय करनेमें समर्थ है और संसारमें उत्पन्न हुए जो जो कर्म हैं, उनके सन्तानको नाश करनेमें उद्यमी है ।


ततोऽसौ निश्चलाभ्यासात्कमलं नाभिमण्डले ।
स्मरत्यतिमनोहारि षोडशोन्नतपत्रकम् ॥10॥

अर्थ: तत्पश्चात् योगी (ध्यानी) निश्चल अभ्याससे अपने नाभिमंडलमें सोलह ऊँचे-ऊँचे पत्रोंके एक मनोहर कमलका ध्यान (चिंतवन) करे ।


प्रतिपत्रसमासीनस्वरमालाविराजितम् ।
कर्णिकायां महामन्त्रं विस्फुरन्तं विचिन्तयेत् ॥11॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस कमलकी कर्णिकामें महामन्त्रका (जो आगे कहा जाता है उसका) चिंतवन करे और उस कमलके सोलह पत्रों पर ‘अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः’ इन सोलह अक्षरोंका ध्यान करे ।


रेफरुद्धं कलाबिन्दुलाञ्छितं शून्यमक्षरम् ।
लसदिन्दुच्छटाकोटिकान्तिव्याप्तहरिन्मुखम् ॥12॥

अर्थ: रेफसे रुद्ध कहिये आवृत और कला तथा बिन्दुसे चिह्नित और शून्य कहिये हकार ऐसा अक्षर लसत् कहिये देदीप्यमान होते हुए इंदुकी छटाकोटिकी कान्तिसे व्याप्त किया है दिशाका मुख जिसने ऐसा महामंत्र ‘‘र्हँ’’ उस कमलकी कर्णिकामें स्थापन कर, चिन्तवन करे ।


तस्य रेफाद्विनिर्यान्तीं शनैर्धूमशिखां स्मरेत् ।
स्फुलिङ्गसंततिं पश्चाज्ज्वालालीं तदनन्तरम् ॥13॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस महामन्त्रके रेफसे मंद मंद निकलती हुई धूम (धूआं) की शिखाका चिन्तवन करे । तत्पश्चात् उसमेंसे अनुक्रमसे प्रवाहरूप निकलते हुए स्फुलिंगोंकी पंक्तिका चिन्तवन करे और तत्पश्चात् उसमेंसे निकलती हुई ज्वालाकी लपटोंको विचारे ।


तेन ज्वालाकलापेन वर्द्धमानेन सन्ततम् ।
दहत्यविरतं धीरः पुण्डरीकं हृदि स्थितम् ॥14॥

अर्थ: तत्पश्चात् योगी मुनि क्रमसे बढते हुए उस ज्वालाके समूहसे अपने हृदयस्थ कमलको निरन्तर जलाता हुआ चिन्तवन करे ।


तदष्टकर्मनिर्माणमष्टपत्रमधोमुखम् ।
दहत्येव महामन्त्रध्यानोत्थप्रबलोऽनलः ॥15॥

अर्थ: वह हृदयस्थ कमल अधोमुख आठ पत्रका (पांखुडीवाला) है; उन आठ पत्रों(दलों)पर आठ कर्म स्थित हों ऐसे कमलको नाभिस्थ कमलकी कर्णिकामें स्थित “र्हँ” महामन्त्रके ध्यानसे उठी हुई प्रबल अग्नि निरन्तर दहती है इस प्रकार चिन्तवन करे, तब अष्टकर्म जल जाते हैं, यह चैतन्य परिणामोंकी सामर्थ्य है ।


ततो बहिः शरीरस्य त्रिकोणं वह्निमण्डलम् ।
स्मरेज्ज्वालाकलापेन ज्वलन्तमिव वाडवम् ॥16॥

अर्थ: उस कमलके दग्ध हुए पश्चात् शरीरके बाह्य त्रिकोण वह्नि (अग्नि) का चिन्तवन करे, सो ज्वालाके समूहोंसे जलते हुए वडवानलके समान ध्यान करे ।


वह्निबीजसमाक्रान्तं पर्यन्ते स्वस्तिकाङ्कितम् ।
ऊर्ध्ववायुपुरोद्भूतं निर्धूमं काञ्चनप्रभम् ॥17॥

अर्थ: तथा अग्नि बीजाक्षर ‘र’ से व्याप्त और अन्तमें साथियाके चिह्नसे चिह्नित हो, ऊर्ध्व वायुमंडलसे उत्पन्न धूमरहित कांचनकी-सी प्रभावाला चिंतवन करे ।


अन्तर्दहति मन्त्रार्चिर्बहिर्वह्निपुरं पुरम् ।
धगद्धगितिविस्फूर्जज्ज्वालाप्रचयभासुरम् ॥18॥

अर्थ: इस प्रकार यह धगधगायमान फैलती हुई लपटोंके समूहसे देदीप्यमान बाहरका अग्निपुर (अग्निमण्डल) अन्तरंगकी मन्त्राग्निको दग्ध करता है ।


भस्मभावमसौ नीत्वा शरीरं तच्च पङ्कजम् ।
दाह्याभावात्स्वयं शान्तिं याति वह्निः शनैः शनैः ॥19॥

अर्थ: तत्पश्चात् यह अग्निमण्डल उस नाभिस्थ कमल और शरीरको भस्मीभूत करके दाह्य (जलाने योग्य पदार्थ) का अभाव होनेसे धीरे-धीरे अपने आप यह अग्नि शान्त हो जाती है ।


विमानपथमापूर्य संचरन्तं समीरणम् ।
स्मरत्यविरतं योगी महावेगं महाबलम् ॥20॥

अर्थ: योगी (ध्यान करनेवाला मुनि) आकाशमें पूर्ण होकर विचरते हुए महावेगवाले और महाबलवान ऐसे वायुमण्डलका चिन्तवन करे ।


चालयन्तं सुरानीकं ध्वनन्तं त्रिदशाचलम् ।
दारयन्तं घनव्रातं क्षोभयन्तं महार्णवम् ॥21॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस पवनको ऐसा चिन्तवन करे कि देवोंकी सेनाको चलायमान करता है, मेरु पर्वतको कँपाता है, मेघोंके समूहको बिखेरता हुआ, समुद्रको क्षोभरूप करता हुआ तथा लोकके मध्य गमन करता हुआ, दशों दिशाओंमें संचरता हुआ, जगतरूप घरमें फैला हुआ, पृथ्वीतलमें प्रवेश करता हुआ चिंतवन करे । तत्पश्चात् ध्यानी (मुनि) ऐसा चिंतवन करे कि वह जो शरीरादिककी भस्म है, उसको इस प्रबल वायुमण्डलने तत्काल उडा दिया, तत्पश्चात् इस वायुको स्थिररूप चिन्तवन करके शान्तरूप करे ॥२१-२३॥


व्रजन्तं भुवनाभोगे संचरन्तं हरिन्मुखे ।
विसर्पन्तं जगन्नीडे निविशन्तं धरातले ॥22॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस पवनको ऐसा चिन्तवन करे कि देवोंकी सेनाको चलायमान करता है, मेरु पर्वतको कँपाता है, मेघोंके समूहको बिखेरता हुआ, समुद्रको क्षोभरूप करता हुआ तथा लोकके मध्य गमन करता हुआ, दशों दिशाओंमें संचरता हुआ, जगतरूप घरमें फैला हुआ, पृथ्वीतलमें प्रवेश करता हुआ चिंतवन करे । तत्पश्चात् ध्यानी (मुनि) ऐसा चिंतवन करे कि वह जो शरीरादिककी भस्म है, उसको इस प्रबल वायुमण्डलने तत्काल उडा दिया, तत्पश्चात् इस वायुको स्थिररूप चिन्तवन करके शान्तरूप करे ॥२१-२३॥


उद्धूय तद्रजः शीघ्रं तेन प्रबलवायुना ।
ततः स्थिरीकृताभ्यासः समीरं शांतिमानयेत् ॥23॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस पवनको ऐसा चिन्तवन करे कि देवोंकी सेनाको चलायमान करता है, मेरु पर्वतको कँपाता है, मेघोंके समूहको बिखेरता हुआ, समुद्रको क्षोभरूप करता हुआ तथा लोकके मध्य गमन करता हुआ, दशों दिशाओंमें संचरता हुआ, जगतरूप घरमें फैला हुआ, पृथ्वीतलमें प्रवेश करता हुआ चिंतवन करे । तत्पश्चात् ध्यानी (मुनि) ऐसा चिंतवन करे कि वह जो शरीरादिककी भस्म है, उसको इस प्रबल वायुमण्डलने तत्काल उडा दिया, तत्पश्चात् इस वायुको स्थिररूप चिन्तवन करके शान्तरूप करे ॥२१-२३॥


वारुण्यां स हि पुण्यात्मा घनजालचितं नभः ।
इन्द्रायुधतडिद्गर्जच्चमत्काराकुलं स्मरेत् ॥24॥

अर्थ: वही पुण्यात्मा (ध्यानी मुनि) इन्द्रधनुष, बिजुली, गर्जनादि चमत्कार सहित मेघोंके समूहसे भरे हुए आकाशका ध्यान (चिन्तवन) करे ।


सुधाम्बुप्रभवैः सान्द्रैर्बिन्दुभिर्मौक्तिकोज्ज्वलैः ।
वर्षन्तं ते स्मरेद्धीरः स्थूलस्थूलैर्निरन्तरम् ॥25॥

अर्थ: तथा उन मेघोंको अमृतसे उत्पन्न हुए मोती समान उज्ज्वल बडे-बडे बिंदुओंसे निरन्तर धारारूप वर्षते हुए आकाशको धीर, वीर मुनि स्मरण करे अर्थात् ध्यान करे ।


ततोऽर्द्धेन्दुसमं कान्तं पुरं वरुणलाञ्छितम् ।
ध्यायेत्सुधापयः पूरैः प्लावयन्तं नभस्तलम् ॥26॥

अर्थ: तत्पश्चात् अर्द्धचन्द्राकार, मनोहर, अमृतमय जलके प्रवाहसे आकाशको बहाते हुए वरुणपुर (वरुणमंडल)का चिन्तवन करे ।


तेनाचिन्त्यप्रभावेण दिव्यध्यानोत्थिताम्बुना ।
प्रक्षालयति निःशेषं तद्रजः कायसंभवम् ॥27॥

अर्थ: अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे दिव्य ध्यानसे उत्पन्न हुए जलसे शरीरके जलनेसे उत्पन्न हुए समस्त भस्मको प्रक्षालन करता है अर्थात् धोता है, ऐसा चिन्तवन करे ।


सप्तधातुविनिर्मुक्तं पूर्णचन्द्रामलत्विषम् ।
सर्वज्ञकल्पमात्मानं ततः स्मरति संयमी ॥28॥

अर्थ: तत्पश्चात् संयमी मुनि सप्त धातु रहित, पूर्णचन्द्रमाके समान है निर्मल प्रभा जिसकी ऐसे सर्वज्ञसमान अपने आत्माका ध्यान करे ।


मृगेन्द्रविष्टरारूढं दिव्यातिशयसंयुतम् ।
कल्याणमहिमोपेतं देवदैत्योरगार्चितम् ॥29॥

अर्थ: तत्पश्चात् अपने आत्माको अतिशय युक्त, सिंहासन पर आरूढ, कल्याणकी महिमा सहित देव दानव धरणेन्द्रादिसे पूजित हैं, ऐसा चिन्तवन करे ।


विलीनाशेषकर्माणं स्फुरन्तमतिनिर्मलम् ।
स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ॥30॥

अर्थ: तत्पश्चात् विलय हो गये हैं आठ कर्म जिसके ऐसा स्फुरायमान (प्रगट) अति निर्मल पुरुषाकार अपने शरीरमें प्राप्त हुए अपने आत्माका चिन्तवन करे । इस प्रकार तत्त्वरूपवती धारणा कही गई ।


इत्यविरतं स योगी पिण्डस्थे जातनिश्चलाभ्यासः ।
शिवसुखमनन्यसाध्यं प्राप्नोत्यचिरेण कालेन ॥31॥

अर्थ: इस प्रकार पिंडस्थ ध्यानमें जिसका निश्चल अभ्यास हो गया है वह ध्यानी मुनि अन्य प्रकारसे साधनेमें न आवे ऐसे मोक्षके सुखको शीघ्र (अल्प समयमें) ही प्राप्त होता है ।


इत्थं यत्रानवद्यं स्मरति नवसुधासान्द्रचन्द्रांशुगौरं
श्रीमत्सर्वज्ञकल्पं कनकगिरितटे वीतविश्वप्रपञ्चम् ।
आत्मानं विश्वरूपं त्रिदशगुरुगणैरप्यचिन्त्यप्रभावं
तत्पिण्डस्थं प्रणीतं जिनसमयमहाम्भोधिपारं प्रयातैः ॥32॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे जिस पिंडस्थ ध्यानमें निर्दोष, नये अमृतसे भीगी हुई चन्द्रमाकी किरण सदृश गोरा वर्ण, श्रीमत्सर्वज्ञ भगवान् समान तथा मेरु गिरिके तट वा शिखर पर बैठा, बीते हैं समस्त प्रपंच जिसके ऐसे तथा विश्वरूप समस्त ज्ञेय पदार्थोंके आकार जिसमें प्रतिबिम्बित हो रहे हैं ऐसे देवेन्द्रोंके समूहसे भी जिसका अधिक प्रभाव हो ऐसे आत्माका जो चिन्तवन किया जाय, उसको जिनसिद्धान्तरूपी महासमुद्रके पार पहुँचनेवाले मुनीश्वरोंने पिंडस्थ ध्यान कहा है ।


विद्यामण्डलमन्त्रयन्त्रकुहकक्रूराभिचाराः क्रियाः
सिंहाशीविषदैत्यदन्तिशरभा यान्त्येव निःसारताम् ।
शाकिन्यो ग्रहराक्षसप्रभृतयो मुञ्चन्त्यसद्वासनां
एतद्ध्यानधनस्य सन्निधिवशाद्भानोर्यथा कौशिकाः ॥33॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्यके उदय होने पर उलूक (घूघू) भाग जाते हैं उसी प्रकार इस पिंडस्थ ध्यानरूपी धनके समीप होनेसे विद्या, मंडल, मंत्र, यन्त्र, इन्द्रजालके आश्चर्य (प्रसिद्धकपट) क्रूर अभिचार (मरणादि) स्वरूप क्रिया तथा सिंह आशीविष (सर्प) दैत्य हस्ती अष्टापद ये सब ही निःसारताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् किसी प्रकारका भी उपद्रव नहीं करते तथा शाकिनी ग्रह राक्षस वगैरह भी खोटी वासनाको छोड देते हैं ।

सर्ग 38: पदस्थ ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 116)

पदान्यालम्ब्य पुण्यानि योगिभिर्यद्विधीयते ।
तत्पदस्थं मतं ध्यानं विचित्रनयपारगैः ॥1॥

अर्थ: जिसको योगीश्वर पवित्र मन्त्रोंके अक्षर स्वरूप पदोंका अवलम्बन करके चिंतवन करते हैं, उसको अनेक नयोंके पार पहुँचनेवाले योगीश्वरोंने पदस्थ ध्यान कहा है ।


ध्यायेदनादिसिद्धान्तप्रसिद्धां वर्णमातृकाम् ।
निःशेषशब्दविन्यासजन्मभूमिं जगन्नुताम् ॥2॥

अर्थ: अनादि सिद्धान्तमें प्रसिद्ध जो वर्णमातृका अर्थात् अकारादि स्वर और ककारादि व्यञ्जनोंका समूह है, उसका चिन्तवन करे, क्योंकि यह वर्णमातृका सम्पूर्ण शब्दोंकी रचनाकी जन्मभूमि है और जगतसे वंदनीय है ।


द्विगुणाष्टदलाम्भोजे नाभिमण्डलवर्तिनि ।
भ्रमन्तीं चिन्तयेद्ध्यानी प्रतिपत्रं स्वरावलीम् ॥3॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला पुरुष नाभिमंडल पर स्थित सोलह दल (पँखडी) के कमलमें प्रत्येक दल पर क्रमसे फिरती हुई स्वरावलीका अर्थात् अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः इन अक्षरोंका चिन्तवन करे ।


चतुर्विंशतिपत्राढ्यं हृदि कञ्जं सकर्णिकम् ।
तत्र वर्णानिमान्ध्यायेत्संयमी पञ्चविंशतिम् ॥4॥

अर्थ: तत्पश्चात् संयमी मुनि अपने हृदयस्थान पर कर्णिका सहित चौबीस पत्रोंके कमलका चिन्तवन करके उसकी कर्णिका तथा पत्रोंमें क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म इन पच्चीस अक्षरोंका ध्यान करे ।


ततो वदनराजीवे पत्राष्टकविभूषिते ।
परं वर्णाष्टकं ध्यायेत्सञ्चरन्तं प्रदक्षिणम् ॥5॥

अर्थ: तत्पश्चात् आठ पत्रोंसे विभूषित मुखकमलके प्रत्येक पत्र पर भ्रमण करते हुए य र ल व श ष स ह इन आठ वर्णोंका ध्यान करें ।


इत्यजस्रं स्मरन् योगी प्रसिद्धां वर्णमातृकाम् ।
श्रुतज्ञानाम्बुधेः पारं प्रयाति विगतभ्रमः ॥6॥

अर्थ: इस प्रकार प्रसिद्ध वर्णमातृकाका निरन्तर ध्यान करता हुआ योगी भ्रमरहित होकर श्रुतज्ञानरूपी समुद्रके पार (उत्तरतट) को प्राप्त हो जाता है।


अथ मन्त्रपदाधीशं सर्वतत्त्वैकनायकम् ।
आदिमध्यान्तभेदेन स्वरव्यञ्जनसम्भवम् ॥7॥

अर्थ: अब समस्त मन्त्रपदोंका स्वामी, सब तत्त्वोंका नायक, आदि मध्य और अन्तके भेदसे स्वर तथा व्यंजनोंसे उत्पन्न, ऊपर और नीचे रेफ (र्) से रुका हुआ तथा बिन्दु (ँ) से चिह्नित, सपर कहिये हकार अर्थात् ( ँर्ह्) ऐसा बीजाक्षर तत्त्व है; अनाहत सहित इसको योगीजन मन्त्रराज कहते हैं ॥७-८॥


ऊर्ध्वाधोरेफसंरुद्धं सपरं बिन्दुलाञ्छितम् ।
अनाहतयुतं तत्त्वं मन्त्रराजं प्रचक्षते ॥8॥

अर्थ: अब समस्त मन्त्रपदोंका स्वामी, सब तत्त्वोंका नायक, आदि मध्य और अन्तके भेदसे स्वर तथा व्यंजनोंसे उत्पन्न, ऊपर और नीचे रेफ (र्) से रुका हुआ तथा बिन्दु (ँ) से चिह्नित, सपर कहिये हकार अर्थात् (ँर्ह) ऐसा बीजाक्षर तत्त्व है; अनाहत सहित इसको योगीजन मन्त्रराज कहते हैं ॥७-८॥


देवासुरनतं भीमदुर्बोधध्वान्तभास्करम् ।
ध्यायेन्मूर्द्धस्थचन्द्रांशुकलापाक्रान्तदिङ्मुखम् ॥9॥

अर्थ: देव और असुर कर रहे हैं नमस्कार जिसको ऐसा, अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके लिये सूर्यके समान तथा मस्तक पर स्थित जो चन्द्रमा उसकी किरणोंके समूहसे व्याप्त किया है दिशाओंका मुख (आदि) भाग जिसने ऐसे इस मन्त्रराजका ध्यान करे ।


कनककमलगर्भे कर्णिकायां निषण्णं
विगतमलकलङ्कं सान्द्रचन्द्रांशुगौरम् ।
गगनमनुसरन्तं सञ्चरन्तं हरित्सु
स्मर जिनवरकल्पं मन्त्रराजं यतीन्द्र ॥10॥

अर्थ: हे मुनीन्द्र ! सुवर्णमय कमलके मध्यमें कर्णिका पर विराजमान, मल तथा कलंकसे रहित शरदऋतुके पूर्ण चन्द्रमाकी किरणोंके समान गौरवर्णकि धारक, आकाशमें गमन करते हुए तथा दिशाओंमें व्याप्त होते हुए ऐसे श्रीजिनेन्द्रके सदृश इस मन्त्रराजका स्मरण अर्थात् ध्यान करो ।


बुद्धः कैश्चिद्धरिः कैश्चिदजः कैश्चिन्महेश्वरः ।
शिवः सार्वस्तथैशानः सोऽयं वर्णः प्रकीर्तितः ॥11॥

अर्थ: कितने ही इस (र्हँ) अक्षरको बुद्ध, कितने ही हरि, कितने ही ब्रह्मा, कितने ही महेश्वर, कितने ही शिव, कितने ही सार्व और कितने ही ईशानस्वरूप कहते हैं ।


मन्त्रमूर्तिं समादाय देवदेवः स्वयं जिनः ।
सर्वज्ञः सर्वगः शान्तः सोऽयं साक्षाद्व्यवस्थितः ॥12॥

अर्थ: यह मन्त्रराज (र्हँ) अक्षर ऐसा है कि मानो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, शान्तमूर्तिकि धारक देवाधिदेव स्वयं श्रीजिनेन्द्र भगवान् ही मन्त्रमूर्तिको धारण करके साक्षात् विराजमान हैं ।


ज्ञानबीजं जगद्वन्द्यं जन्मज्वलनवार्मुचम् ।
पवित्रं मतिमान्ध्यायेदिमं मन्त्रमहेश्वरम् ॥13॥

अर्थ: बुद्धिमान् पुरुष इस मन्त्रराजको ज्ञानका बीज, जगतसे वंदनीय तथा संसाररूपी अग्निके लिये अर्थात् जन्मसंतापको दूर करनेके लिये मेघके समान ध्यावे ।


सकृदुच्चारितं येन हृदि येन स्थिरीकृतम् ।
तत्त्वं तेनापवर्गाय पाथेयं प्रगुणीकृतम् ॥14॥

अर्थ: इस मन्त्रराज महातत्त्वका जिस पुरुषने एक बार भी उच्चारण किया तथा जिसने हृदयमें स्थित किया उसने मोक्षके लिये पाथेय (संबल) संग्रह किया ।


यदैवेदं महातत्त्वं मुनेर्धत्ते हृदि स्थितिम् ।
तदैव जन्मसन्तानप्ररोहः प्रविशीर्यते ॥15॥

अर्थ: जिस समय यह महातत्त्व मुनिके हृदयमें स्थिति करता है, उस ही काल संसारके संतानका अंकुर गल जाता है अर्थात् टूट जाता है ।


स्फुरन्त भ्रूलतामध्ये विशन्तं वदनाम्बुजे ।
तालुरन्ध्रेण गच्छन्तं स्रवन्तममृताम्बुभिः ॥16॥

अर्थ: धैर्यका धारक योगी कुंभक प्राणायामसे इस मन्त्रराजकी भौंहकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, मुखकमलमें प्रवेश करता हुआ, तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ, तथा अमृतमय जलसे झरता हुआ, नेत्रकी पलकों पर स्फुरायमान होता हुआ, केशोंमें स्थिति करता तथा ज्योतिषियोंके समूहमें भ्रमता हुआ, चन्द्रमाके साथ स्पर्द्धा करता हुआ, दिशाओंमें संचरता हुआ, आकाशमें उछलता हुआ, कलंकके समूहको छेदता हुआ, संसारके भ्रमको दूर करता हुआ, तथा परम स्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्षलक्ष्मीसे मिलाप करता हुआ ध्यावे ॥१६-१९॥


स्फुरन्तं नेत्रपत्रेषु कुर्वन्तमलके स्थितिम् ।
भ्रमन्तं ज्योतिषां चक्रे स्पर्द्धमानं सितांशुना ॥17॥

अर्थ: धैर्यका धारक योगी कुंभक प्राणायामसे इस मन्त्रराजकी भौंहकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, मुखकमलमें प्रवेश करता हुआ, तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ, तथा अमृतमय जलसे झरता हुआ, नेत्रकी पलकों पर स्फुरायमान होता हुआ, केशोंमें स्थिति करता तथा ज्योतिषियोंके समूहमें भ्रमता हुआ, चन्द्रमाके साथ स्पर्द्धा करता हुआ, दिशाओंमें संचरता हुआ, आकाशमें उछलता हुआ, कलंकके समूहको छेदता हुआ, संसारके भ्रमको दूर करता हुआ, तथा परम स्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्षलक्ष्मीसे मिलाप करता हुआ ध्यावे ॥१६-१९॥


संचरन्तं दिशामास्ये प्रोच्छलन्तं नभस्तले ।
छेदयन्तं कलङ्कौघं स्फोटयन्तं भवभ्रमम् ॥18॥

अर्थ: धैर्यका धारक योगी कुंभक प्राणायामसे इस मन्त्रराजकी भौंहकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, मुखकमलमें प्रवेश करता हुआ, तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ, तथा अमृतमय जलसे झरता हुआ, नेत्रकी पलकों पर स्फुरायमान होता हुआ, केशोंमें स्थिति करता तथा ज्योतिषियोंके समूहमें भ्रमता हुआ, चन्द्रमाके साथ स्पर्द्धा करता हुआ, दिशाओंमें संचरता हुआ, आकाशमें उछलता हुआ, कलंकके समूहको छेदता हुआ, संसारके भ्रमको दूर करता हुआ, तथा परम स्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्षलक्ष्मीसे मिलाप करता हुआ ध्यावे ॥१६-१९॥


नयन्तं परमस्थानं योजयन्तं शिवश्रियम् ।
इति मन्त्राधिपं धीर कुम्भकेन विचिन्तयेत् ॥19॥

अर्थ: धैर्यका धारक योगी कुंभक प्राणायामसे इस मन्त्रराजकी भौंहकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, मुखकमलमें प्रवेश करता हुआ, तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ, तथा अमृतमय जलसे झरता हुआ, नेत्रकी पलकों पर स्फुरायमान होता हुआ, केशोंमें स्थिति करता तथा ज्योतिषियोंके समूहमें भ्रमता हुआ, चन्द्रमाके साथ स्पर्द्धा करता हुआ, दिशाओंमें संचरता हुआ, आकाशमें उछलता हुआ, कलंकके समूहको छेदता हुआ, संसारके भ्रमको दूर करता हुआ, तथा परम स्थान (मोक्षस्थान) को प्राप्त करता हुआ, मोक्षलक्ष्मीसे मिलाप करता हुआ ध्यावे ॥१६-१९॥


अनन्यशरणः साक्षात्तत्संलीनैकमानसः ।
तथा स्मरत्यसौ ध्यानी यथा स्वप्नेऽपि न स्खलेत् ॥20॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला इस मन्त्राधिपको अन्य किसीकी शरण न लेकर, इसमें ही साक्षात् तल्लीन मन करके स्वप्नमें भी इस मंत्रसे च्युत न हो ऐसा दृढ होकर ध्यावें ।


इति मत्वा स्थिरीभूतं सर्वावस्थासु सर्वथा ।
नासाग्रे निश्चलं धत्ते यदि वा भ्रूलतान्तरे ॥21॥

अर्थ: ऐसे पूर्वोक्त प्रकार महामंत्रके ध्यानके विधानको जानकर मुनि समस्त अवस्थाओंमें स्थिरस्वरूप सर्वथा नासिकाके अग्रभागमें अथवा भौंहलताके मध्यमें इसको निश्चल धारण करें ।


तत्र कैश्चिच्च वर्णादिभेदैस्तत्कल्पितं पुनः ।
मन्त्रमण्डलमुद्रादिसाधनैरिष्टसिद्धिदम् ॥22॥

अर्थ: इस नासिकाके अग्रभाग अथवा भौंहलताके मध्यमें निश्चल धारण करनेके अवसरमें कई आचार्योंने उस मन्त्राधिपको ध्यान करनेमें अक्षरादिकके भेद करके कल्पना की है और मंत्र मंडल मुद्रा इत्यादिक साधनोंसे इष्टकी सिद्धिका देनेवाला कहा है ।


चन्द्रलेखासमं सूक्ष्मं स्फुरन्तं भानुभास्वरम् ।
अनाहताभिधं देवं दिव्यरूपं विचिन्तयेत् ॥23॥

अर्थ: चन्द्रमाकी रेखा समान सूक्ष्म और सूर्य सरीखा देदीप्यमान, स्फुरायमान होता हुआ तथा दिव्य रूपका धारक ऐसा जो अनाहत नामका देव है, उसका चिन्तवन करे ।


अस्मिन्स्थिरीकृताभ्यासाः सन्तः शान्तिं समाश्रिताः ।
अनेन दिव्यपोतेन तीर्त्वा जन्मोग्रसागरम् ॥24॥

अर्थ: इस अनाहत नामा देवमें किया है स्थिर अभ्यास जिन्होंने ऐसे सत्पुरुष इस दिव्य जहाजके द्वारा संसाररूप घोर समुद्रको तिर कर, शान्तिको प्राप्त हो गये हैं ।


तदेव च पुनः सूक्ष्मं क्रमाद्वालाग्रसन्निभम् ।
ध्यायेदेकाग्रतां प्राप्य कर्त्तुं चेतः सुनिश्चलम् ॥25॥

अर्थ: और फिर एकाग्रताको प्राप्त होकर, चित्तको स्थिर (निश्चल) करनेके लिये उस ही अनाहतको अनुक्रमसे सूक्ष्म ध्याता हुआ बालके अग्रभाग समान ध्यावें ।


ततोऽपि गलिताशेषविषयीकृतमानसः ।
अध्यक्षमीक्षते साक्षाज्जगज्ज्योतिर्मयं क्षणे ॥26॥

अर्थ: उसके पश्चात् गलित हो गये हैं समस्त विषय जिसमें ऐसे अपने मनको स्थिर करनेवाला योगी उसी क्षणमें ज्योतिर्मय साक्षात् जगतको प्रत्यक्ष अवलोकन करता है ।


सिद्ध्यन्ति सिद्धयः सर्वा अणिमाद्या न संशयः ।
सेवां कुर्वन्ति दैत्याद्या आज्ञैश्वर्यं च जायते ॥27॥

अर्थ: इस अनाहत मंत्रके ध्यानसे ध्यानीके अणिमा आदि सर्व सिद्धियाँ होती हैं और दैत्यादिक सेवा करते हैं तथा आज्ञा और ऐश्वर्य होता है इसमें संदेह नहीं हैं ।


क्रमात्प्रच्याव्य लक्ष्येभ्यस्ततोऽलक्ष्ये स्थिरं मनः ।
दधतोऽस्य स्फुरत्यन्तर्ज्योतिरत्यक्षमक्षयम् ॥28॥

अर्थ: तत्पश्चात् क्रमसे लक्ष्यों (लखने योग्य वस्तुओं) से छुडाकर अलक्ष्यमें अपने मनको धारण करते हुए ध्यानीके अन्तरंगमें अक्षय तथा इन्द्रियोंके अगोचर ज्योति अर्थात् ज्ञान प्रकट होता है ।


इति लक्ष्यानुसारेण लक्ष्याभावः प्रकीर्तितः ।
तस्मिन्स्थितस्य मन्येऽहं मुनेः सिद्धं समीहितम् ॥29॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्यके अनुसार लक्ष्यका अभाव कहा गया; सो आचार्य महाराज उत्प्रेक्षासे कहते हैं कि उस अलक्ष्यमें स्थिर रहनेवाले मुनिके वांछित कार्यको मैं सिद्ध हुआ मानता हूँ ।


एतत्तत्त्वं शिवाख्यं वा समालम्ब्य मनीषिणः ।
उत्तीर्णा जन्मकान्तारमनन्तं क्लेशसंकुलम् ॥30॥

अर्थ: इस अनाहत तत्त्व अथवा शिवनामा तत्त्वका अवलंबन करके मनीषिण अनन्तक्लेश सहित संसाररूपी वनसे पार हो गये; इस प्रकार मंत्रराज और अनाहत दोनों मंत्रोंके ध्यानका विधान कहा ।


स्मर दुःखानलज्वाला - प्रशान्तेर्नवनीरदम् ।
प्रणवं वाङ्मयज्ञानप्रदीपं पुण्यशासनम् ॥31॥

अर्थ: हे मुने ! तू प्रणव नामा अक्षरका स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर, क्योंकि यह प्रणव नामा अक्षर दुःखरूपी अग्निकी ज्वालाको शान्त करनेके लिये मेघके समान है तथा वाङ्मय (समस्त श्रुत) के प्रकाश करनेके लिये दीपक है और पुण्यका शासन है ।


यस्माच्छब्दात्मकं ज्योतिः प्रसूतमतिनिर्मलम् ।
वाच्यवाचकसम्बन्धस्तेनैव परमेष्ठिनः ॥32॥

अर्थ: इस प्रणवसे अतिनिर्मल शब्दरूप ज्योति अर्थात् ज्ञान उत्पन्न हुआ है और परमेष्ठीका वाच्य वाचक संबंध भी इसी प्रणवसे होता है अर्थात् परमेष्ठी तो इस प्रणवका बाच्य और यह परमेष्ठीका वाचक है ।


हृत्कञ्जकर्णिकासीनं स्वरव्यञ्जनवेष्टितम् ।
स्फीतमत्यन्तदुर्द्धर्षं देवदैत्येन्द्रपूजितम् ॥33॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला संयमी हृदयकमलकी कर्णिकामें स्थित और स्वर व्यञ्जन अक्षरोंसे बेढा हुआ, उज्ज्वल, अत्यन्त दुर्धर्ष, देव और दैत्योंके इन्द्रोंसे पूजित तथा झरते हुए मस्तकमें स्थित चन्द्रमाकी (लेखा) रेखाके अमृतसे आर्द्रित, महाप्रभावसम्पन्न, कर्मरूपी वनको दग्ध करनेके लिये अग्नि समान ऐसे इस महातत्त्व, महाबीज, महामंत्र, महापदस्वरूप तथा शरद्के चन्द्रमाके समान गौर वर्णके धारक ‘ओं’ को कुम्भक प्राणायामसे चिन्तवन करे ॥३३-३५॥


प्रक्षरन्मूर्ध्निसंक्रान्तचन्द्रलेखामृतप्लुतम् ।
महाप्रभावसम्पन्नं कर्मकक्षहुताशनम् ॥34॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला संयमी हृदयकमलकी कर्णिकामें स्थित और स्वर व्यञ्जन अक्षरोंसे बेढा हुआ, उज्ज्वल, अत्यन्त दुर्धर्ष, देव और दैत्योंके इन्द्रोंसे पूजित तथा झरते हुए मस्तकमें स्थित चन्द्रमाकी (लेखा) रेखाके अमृतसे आर्द्रित, महाप्रभावसम्पन्न, कर्मरूपी वनको दग्ध करनेके लिये अग्नि समान ऐसे इस महातत्त्व, महाबीज, महामंत्र, महापदस्वरूप तथा शरद्के चन्द्रमाके समान गौर वर्णके धारक ‘ओं’ को कुम्भक प्राणायामसे चिन्तवन करे ॥३३-३५॥


महातत्त्वं महाबीजं महामन्त्रं महत्पदम् ।
शरच्चन्द्रनिभं ध्यानी कुंभकेन विचिन्तयेत् ॥35॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला संयमी हृदयकमलकी कर्णिकामें स्थित और स्वर व्यञ्जन अक्षरोंसे बेढा हुआ, उज्ज्वल, अत्यन्त दुर्धर्ष, देव और दैत्योंके इन्द्रोंसे पूजित तथा झरते हुए मस्तकमें स्थित चन्द्रमाकी (लेखा) रेखाके अमृतसे आर्द्रित, महाप्रभावसम्पन्न, कर्मरूपी वनको दग्ध करनेके लिये अग्नि समान ऐसे इस महातत्त्व, महाबीज, महामंत्र, महापदस्वरूप तथा शरद्के चन्द्रमाके समान गौर वर्णके धारक ‘ओं’ को कुम्भक प्राणायामसे चिन्तवन करे ॥३३-३५॥


सान्द्रसिंदूरवर्णाभं यदि वा विद्रुमप्रभम् ।
चिन्त्यमानं जगत्सर्वं क्षोभयत्यभिसंगतम् ॥36॥

अर्थ: यह प्रणव अक्षर गहरे सिंदूरके वर्णके समान अथवा मूंगेके समान चिन्तवन किया हुआ मिले हुए जगतको क्षोभित करता है ।


जाम्बूनदनिभं स्तम्भे विद्वेषे कज्जलत्विषम् ।
ध्येयं वश्यादिके रक्तं चन्द्राभं कर्मशातने ॥37॥

अर्थ: तथा इस प्रणवको स्तंभनके प्रयोगमें सुवर्णके समान पीला चिंतवन करें और द्वेषके प्रयोगमें कज्जलके समान काला तथा वश्यादि प्रयोगमें रक्त (लाल) वर्ण और कर्मोंके नाश करनेमें चन्द्रमाके समान श्वेतवर्ण ध्यान करें ।


गुरुपञ्चनमस्कारलक्षणं मन्त्रमूर्जितम् ।
विचिन्तयेज्जगज्जन्तुपवित्रीकरणक्षमम् ॥38॥

अर्थ: पंचपरमेष्ठियोंको नमस्कार करनेरूप है लक्षण जिसका ऐसे महामन्त्रका चिंतवन करें, क्योंकि यह नमस्कारात्मक मन्त्र जगतके जीवोंको पवित्र करनेमें समर्थ है ।


स्फुरद्विमलचन्द्राभे दलाष्टकविभूषिते ।
कञ्जे तत्कर्णिकासीनं मन्त्रं सप्ताक्षरं स्मरेत् ॥39॥

अर्थ: स्फुरायमान निर्मल चन्द्रमाकी कान्ति समान आठ पत्रसे शोभित जो कमल है उसकी कर्णिका पर स्थित सात अक्षरके “णमो अरहंताणं” मन्त्रका चिन्तवन करें ।


दिग्दलेषु ततोऽन्येषु विदिक्पत्रेष्वनुक्रमात् ।
सिद्धादिकं चतुष्कं च दृष्टिबोधादिकं तथा ॥40॥

अर्थ: स्फुरायमान निर्मल चन्द्रमाकी कान्ति समान आठ पत्रसे शोभित जो कमल है उसकी कर्णिका पर स्थित सात अक्षरके “णमो अरहंताणं” मन्त्रका चिन्तवन करें ॥३९॥ और उस कर्णिकासे बाहरके आठ पत्रोंमेंसे चार दिशाओंके चार दलों पर “णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं,” ये चार मन्त्रपद और विदिशाओंके चार पत्रों पर “सम्यग्दर्शनाय नमः, सम्यग्ज्ञानाय नमः, सम्यक्चारित्राय नमः, सम्यक्तपसे नमः,” इन चार नमस्कार मन्त्रोंका चिन्तवन करें । इस प्रकार अष्टदलका कमल और एक कर्णिकामें नव मन्त्रोंको स्थापन कर चिन्तवन करें ।


श्रियमात्यन्तिकीं प्राप्ता योगिनो येऽत्र केचन ।
अमुमेव महामन्त्रं ते समाराध्य केवलम् ॥41॥

अर्थ: इस लोकमें जिन कितने ही योगियोंने आत्यन्तिकी लक्ष्मी (मोक्षलक्ष्मी) प्राप्त की है उन सबोंने एकमात्र इस महामंत्रकी आराधना करके ही प्राप्त की है ।


प्रभावमस्य निःशेषं योगिनामप्यगोचरम् ।
अनभिज्ञो जनो ब्रूते यः स मन्येऽनिलार्दितः ॥42॥

अर्थ: इस महामन्त्रका पूर्ण प्रभाव योगी मुनीश्वरोंके भी अगोचर हैं, उनके द्वारा भी कहनेमें नहीं आता और जो इसको नहीं जाननेवाला पुरुष इसके प्रभावको कहता है उसको मैं वायु रोगसे प्रलाप करनेवाला मानता हूँ ।


अनेनैव विशुद्ध्यन्ति जन्तवः पापपङ्किताः ।
अनेनैव विमुच्यन्ते भवक्लेशान्मनीषिणः ॥43॥

अर्थ: जो जीव पापसे मलिन हैं वे इसी मन्त्रसे विशुद्ध होते हैं और इसी मन्त्रके प्रभावसे मनीषिगण (बुद्धिमान्) संसारके क्लेशोंसे छूटते हैं ।


असावेव जगत्यस्मिन्भव्यव्यसनबान्धवः ।
अमुं विहाय सत्त्वानां नान्यः कश्चित्कृपापरः ॥44॥

अर्थ: भव्य जीवोंको आपदाके समय यही मन्त्र इस जगतमें बांधव (मित्र) है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी जीवों पर कृपा करनेमें तत्पर नहीं है।


एतद्व्यसनपाताले भ्रमत्संसारसागरे ।
अनेनैव जगत्सर्वमुद्धृत्य विधृतं शिवे ॥45॥

अर्थ: आपदा अर्थात् कष्ट ही है पातालगर्त्त जिसमें ऐसे संसाररूपी समुद्रमें भ्रमते हुए इस जगतको इस मन्त्रने ही उद्धार करके मोक्षमें धारण किया है ।


कृत्वा पापसहस्राणि हत्वा जन्तुशतानि च ।
अमुं मन्त्रं समाराध्य तिर्यञ्चोऽपि दिवं गताः ॥46॥

अर्थ: पूर्व कालमें हजारों पाप करके तथा सैकडों जीवोंको मारकर तिर्यंच भी इस महामन्त्रका शुद्ध भावसे आराधन करके स्वर्गको प्राप्त हुए हैं, उनकी कथा पुराणोंमें प्रसिद्ध है ।


शतमष्टोत्तरं चास्य त्रिशुद्ध्या चिन्तयन्मुनिः ।
भुञ्जानोऽपि चतुर्थस्य प्राप्नोत्यविकलं फलम् ॥47॥

अर्थ: मन वचन कायको शुद्ध करके इस मन्त्रका एक सौ आठ बार चिंतवन करें तो वह मुनि आहार करता हुआ भी चतुर्थ कहिये एक उपवासके पूर्ण फलको प्राप्त होता है ।


स्मर पञ्चपदोद्भूतां महाविद्यां जगन्नुताम् ।
गुरुपञ्चकनामोत्थां षोडशाक्षरराजिताम् ॥48॥

अर्थ: हे मुने, तू सोलह अक्षरोंसे विराजमान जो महा विद्या है उसका स्मरण कर अर्थात् ध्यान कर, क्योंकि षोडशाक्षरी विद्या पञ्च पदों और पंच परमगुरुके नामोंसे उत्पन्न हुई है और जगतमात्रसे नमस्कार करने योग्य है। वह सोलह अक्षरी विद्या यह है - “अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो: नमः” ।


अस्याः शतद्वयं ध्यानी जपन्नेकाग्रमानसः ।
अनिच्छन्नप्यवाप्नोति चतुर्थतपसः फलम् ॥49॥

अर्थ: जो जीव इस षोडशाक्षरी विद्याका एकाग्र मन होकर, दो सौ बार जप करता है वह नहीं चाहता हुआ भी चतुर्थ तप अर्थात् एक उपवासके फलको प्राप्त होता है ।


विद्यां षड्वर्णसम्भूतामजय्यां पुण्यशालिनीम् ।
जपन्प्रागुक्तमभ्येति फलं ध्यानी शतत्रयम् ॥50॥

अर्थ: तथा “अरहन्त सिद्ध” इस प्रकार छह अक्षरोंसे उत्पन्न हुई विद्याका तीन सौ बार जप करनेवाला मनुष्य एक उपवासके फलको प्राप्त होता है, क्योंकि यह षडक्षरी विद्या अजप्य है और पुण्यको उत्पन्न करनेवाली तथा पुण्यसे शोभित है ।


चतुर्वर्णमयं मन्त्रं चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
चतुःशतं जपन्योगी चतुर्थस्य फलं लभेत् ॥51॥

अर्थ: “अरहंत” इन चार अक्षरोंका मन्त्र है सो धर्म अर्थ काम मोक्षरूप फलको देनेवाला है; इसको जो चारसौ बार जप करता है वह एक उपवासका फल पाता है ।


वर्णयुग्मं श्रुतस्कन्धसारभूतं शिवप्रदम् ।
ध्यायेज्जन्मोद्भवाशेषक्लेशविध्वंसनक्षमम् ॥52॥

अर्थ: ‘सिद्ध’ इन दो अक्षरोंका युग्म है सो श्रुतस्कन्ध (द्वादशांग शास्त्र) का सारभूत है, मोक्षको देनेवाला है, संसारसे उत्पन्न हुए समस्त क्लेशोंको नाश करनेमें समर्थ हैं, इसलिये योगी इसका ध्यान करें ।


अवर्णस्य सहस्रार्द्धं जपन्नानन्दसंभृतः ।
प्राप्नोत्येकोपवासस्य निर्जरां निर्जिताशयः ॥53॥

अर्थ: जो मुनि अपने चित्तको वश करके आनन्दसे ‘अ’ इस वर्णमात्रका पाँच सौ बार जप करता है, वह एक उपवासके निर्जरारूप फलको प्राप्त होता है ।


एतद्धि कथितं शास्त्रे रुचिमात्रप्रसाधकम् ।
किन्त्वमीषां फलं सम्यक्स्वर्गमोक्षैकलक्षणम् ॥54॥

अर्थ: यह जो शास्त्रमें इन मंत्रोंके जपका एक उपवासरूप फल कहा है सो केवल मंत्र जपनेकी रुचि करानेके लिये हैं, किन्तु वास्तवमें उक्त मंत्रोंका उत्तम फल स्वर्ग और मोक्ष ही है ।


पञ्चवर्णमयीं विद्यां पञ्चतत्त्वोपलक्षिताम् ।
मुनिवीरैः श्रुतस्कन्धाद्बीजबुद्ध्या समुद्धृताम् ॥55॥

अर्थ: पाँच तत्त्वोंसे युक्त, पाँच अक्षरमयी विद्याको मुनीश्वरोंने द्वादशांग शास्त्रमेंसे सारभूत समझ कर निकाली है; वह पंचाक्षरमयी विद्या ‘ॐ हाँ हीँ हूँ हौँ हः अ सि आ उ सा नमः’’ इस प्रकार है ।


अस्यां निरन्तराभ्यासाद्वशीकृतनिजाशयः ।
प्रोच्छिनत्त्याशु निःशङ्को निर्गूढं जन्मबन्धनम् ॥56॥

अर्थ: इस पूर्वोक्त पंचाक्षरमयी विद्यामें निरन्तर अभ्यास करनेसे वशीभूत कर लिया है मन जिसने ऐसा मुनि निःशंक होकर अति कठिन संसाररूपी बन्धनको शीघ्र ही काट देता है ।


मङ्गलशरणोत्तमपदनिकुरम्बं यस्तु संयमी स्मरति ।
अविकलमेकाग्रधिया स चापवर्गश्रियं श्रयति ॥57॥

अर्थ: जो संयमी मुनि एकाग्र बुद्धिसे मंगल, शरण, उत्तम इन पदोंके समूहका स्मरण करता है वह मोक्षलक्ष्मीका आश्रय करता है । वह मंगलकारक उत्तम पदोंका समूह यह है - चत्तारि मंगलं । अरहंत मंगलं । सिद्ध मंगलं । साहु मंगलं । केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं । चत्तारि लोगुत्तमा । अरहंत लोगुत्तमा । सिद्ध लोगुत्तमा । साहु लोगुत्तमा । केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरणं पव्वज्जामि । अरहंतसरणं पव्वज्जामि । सिद्धसरणं पव्वज्जामि । साहुसरणं पव्वज्जामि । केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि ।


सिद्धेः सौधं समारोढुमियं सोपानमालिका ।
त्रयोदशाक्षरोत्पन्ना विद्या विश्वातिशायिनी ॥58॥

अर्थ: और जगतमें अतिशयरूप तेरह अक्षरोंसे उत्पन्न हुई यह विद्या मोक्षके महलपर चढनेके लिये सीढियोंकी पंक्ति है। वह तेरह अक्षरका मन्त्र इस प्रकार है ‘ॐ अर्हत् सिद्ध सयोगकेवली स्वाहा’ ।


प्रसादयितुमुद्युक्तैर्मुक्तिकान्तां यशस्विनीम् ।
दूतिकेयं मता मन्ये जगद्वन्द्यैर्मुनीश्वरैः ॥59॥

अर्थ: यशकी धारक मुक्तिरूपी स्त्रीको प्रसन्न करनेके लिये उद्यमी हुए ऐसे तथा जगतसे पूज्य मुनीश्वरोंने इस तेरह अक्षरी विद्याको मुक्तिको प्रसन्न करनेके अर्थ दूती माना है, ऐसा मैं मानता हूँ ।


सकलज्ञानसाम्राज्यदानदक्षं विचिन्तय ।
मन्त्रं जगत्त्रयी-नाथ-चूडारत्नं कृपास्पदम् ॥60॥

अर्थ: यह मन्त्र सकल ज्ञानके साम्राज्य (केवलज्ञान) के देनेमें प्रवीण है और जगत्त्रयके नाथोंके चूडारत्न समान है तथा कृपाका स्थान है, सो हे मुने, तू चिन्तवन कर। वह मन्त्र ‘ॐ ह्रीँ श्रीँ अर्हं नमः’ है ।


न चास्य भुवने कश्चित्प्रभावं गदितुं क्षमः ।
श्रीमत्सर्वज्ञदेवेन यः साम्यमवलम्बते ॥61॥

अर्थ: इस मन्त्रका प्रभाव लोकमें कोई भी कहनेको समर्थ नहीं है, क्योंकि यह मन्त्र श्रीमत्सर्वज्ञ देवकी समानताको धारण करनेवाला है ।


स्मर कर्मकलङ्कौघध्वान्तविध्वंसभास्करम् ।
पञ्चवर्णमयं मन्त्रं पवित्रं पुण्यशासनम् ॥62॥

अर्थ: हे मुने, तू पंच अक्षरमयी जो मन्त्र है, उसे चिन्तवन कर; क्योंकि यह मन्त्र कर्मकलंकोंके समूहरूप अंधकारका विध्वंसन करनेको सूर्यके समान है, पवित्र है और पुण्यशासन है। वह मन्त्र ‘णमो सिद्धाणं’ यह है ।


सर्वसत्त्वाभयस्थानं वर्णमालाविराजितम् ।
स्मर मन्त्रं जगज्जन्तुक्लेशसंततिघातकम् ॥63॥

अर्थ: हे मुने, तू समस्त जीवोंका अभयस्थान तथा जगतके जीवोंके क्लेशकी सन्ततिको काटने वाला और अक्षरोंकी पंक्तिसे विराजमान ऐसे मन्त्रका चिन्तवन कर। वह मन्त्र यह है ‘ॐ नमोऽर्हते केवलिने परमयोगिनेऽनन्तशुद्धिपरिणामविस्फुरदुरुशुक्लध्यानाग्निर्दग्धकर्मबीजाय प्राप्तानन्तचतुष्टयाय सौम्याय शान्ताय मङ्गलाय वरदाय अष्टादशदोषरहिताय स्वाहा’ ।


स्मरेन्दुमण्डलाकारं पुण्डरीकं मुखोदरे ।
दलाष्टकसमासीनं वर्णाष्टकविराजितम् ॥64॥

अर्थ: हे मुने ! तू मुखमें चन्द्रमंडलके आकारका, आठ अक्षरोंसे शोभायमान, आठ पत्रोंका एक कमल चिन्तवन कर ।


ॐ णमो अरहंताणमिति वर्णानपि क्रमात् ।
एकशः प्रतिपत्रं तु तस्मिन्नेव निवेशयेत् ॥65॥

अर्थ: ‘ॐ णमो अरहंताणं’ ये आठ अक्षर मुखमें स्मरण किये हुए उस कमलके आठों पत्रों पर क्रमसे एक एक अक्षरका स्थापन कर ध्यान करना चाहिये ।


स्वर्णगौरीं स्वरोद्भूतां केशरालीं ततः स्मरेत् ।
कर्णिकां च सुधास्यन्दबिन्दुव्रजविभूषिताम् ॥66॥

अर्थ: तत्पश्चात् अमृतके झरनोंके बिन्दुओंसे सुशोभित कर्णिकाका चिन्तवन करे और उसमें स्वरोंसे उत्पन्न हुई तथा सुवर्णके समान गौरवर्णवाली केशरोंकी पंक्तिका ध्यान करे ।


प्रोद्यत्संपूर्णचन्द्राभं चन्द्रबिम्बाच्छनैः शनैः ।
समागच्छत्सुधाबीजं मायावर्णं तु चिन्तयेत् ॥67॥

अर्थ: पश्चात् उदयको प्राप्त होते हुए, पूर्णचन्द्रमाकी कान्ति समान, चन्द्रबिंबसे मन्द-मन्द अमृतबीजको प्राप्त होते हुए मायावर्ण ह्रीं का चिंतवन करे ।


विस्फुरन्तमतिस्फीतं प्रभामण्डलमध्यगम् ।
संचरन्तं मुखाम्भोजे तिष्ठन्तं कर्णिकोपरि ॥68॥

अर्थ: उपर्युक्त मायाबीज ह्रीं अक्षरको स्फुरायमान होता हुआ, अत्यन्त उज्ज्वल प्रभामंडलके मध्य प्राप्त हुआ, कभी पूर्वोक्त मुखस्थ कमलमें संचरता हुआ, कभी कभी उसकी कर्णिकाके उपरि तिष्ठता हुआ, तथा कभी कभी उस कमलके आठों दलों पर फिरता हुआ तथा कभी कभी क्षणभरमें आकाशमें चलता हुआ, मनके अज्ञान अन्धकारको दूर करता हुआ, अमृतमयी जलसे चूता हुआ तथा तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ भौंहोंकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, ज्योतिर्मयके समान अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे मायावर्णका चिन्तवन करे ॥६८-७०॥


भ्रमन्तं प्रतिपत्रेषु चरन्तं वियति क्षणे ।
छेदयन्तं मनोध्वान्तं स्रवन्तममृताम्बुभिः ॥69॥

अर्थ: उपर्युक्त मायाबीज ह्रीं अक्षरको स्फुरायमान होता हुआ, अत्यन्त उज्ज्वल प्रभामंडलके मध्य प्राप्त हुआ, कभी पूर्वोक्त मुखस्थ कमलमें संचरता हुआ, कभी कभी उसकी कर्णिकाके उपरि तिष्ठता हुआ, तथा कभी कभी उस कमलके आठों दलों पर फिरता हुआ तथा कभी कभी क्षणभरमें आकाशमें चलता हुआ, मनके अज्ञान अन्धकारको दूर करता हुआ, अमृतमयी जलसे चूता हुआ तथा तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ भौंहोंकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, ज्योतिर्मयके समान अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे मायावर्णका चिन्तवन करे ।।६८-७०।।


व्रजन्तं तालुरन्ध्रेण स्फुरन्तं भ्रूलतान्तरे ।
ज्योतिर्मयमिवाचिन्त्यप्रभावं भावयेन्मुनिः ॥70॥

अर्थ: उपर्युक्त मायाबीज ह्रीं अक्षरको स्फुरायमान होता हुआ, अत्यन्त उज्ज्वल प्रभामंडलके मध्य प्राप्त हुआ, कभी पूर्वोक्त मुखस्थ कमलमें संचरता हुआ, कभी कभी उसकी कर्णिकाके उपरि तिष्ठता हुआ, तथा कभी कभी उस कमलके आठों दलों पर फिरता हुआ तथा कभी कभी क्षणभरमें आकाशमें चलता हुआ, मनके अज्ञान अन्धकारको दूर करता हुआ, अमृतमयी जलसे चूता हुआ तथा तालुआके छिद्रसे गमन करता हुआ भौंहोंकी लताओंमें स्फुरायमान होता हुआ, ज्योतिर्मयके समान अचिन्त्य है प्रभाव जिसका ऐसे मायावर्णका चिन्तवन करे ॥६८-७०॥


वाक्पथातीतमाहात्म्यं देवदैत्योरगार्चितम् ।
विद्यार्णवमहापोतं विश्वतत्त्वप्रदीपकम् ॥71॥

अर्थ: इस मन्त्रका माहात्म्य वचनातीत है, इसको देव दैत्य नागेन्द्र पूजते हैं तथा यह मन्त्र विद्यारूपी समुद्रके तिरनेको महान् जहाज है और जगतके पदार्थोंको दिखानेके लिये दीपक ही है ।


अमुमेव महामन्त्रं भावयन्नस्तसंशयः ।
अविद्याव्यालसंभूतं विषवेगं निरस्यति ॥72॥

अर्थ: इसी महामन्त्रका संशय रहित होकर ध्यान करनेवाला मुनि अविद्यारूपी सर्पसे उत्पन्न हुए विषके वेगको दूर करता है ।


इति ध्यायन्नसौ ध्यानी तत्संलीनैकमानसः ।
वाङ्मनोमलमुत्सृज्य श्रुताम्भोधिं विगाहते ॥73॥

अर्थ: ऐसे पूर्वोक्त प्रकार इस मन्त्रका ध्यान करता हुआ और उस ध्यानमें ही लीन है मन जिसका ऐसा जो ध्यानी है, वह अपने मन तथा वचनके मलको नष्ट करके श्रुतसमुद्रमें अवगाहन करता है अर्थात् शास्त्ररूपी समुद्रमें तैरता है ।


ततो निरन्तराभ्यासान्मासैः षड्भिः स्थिराशयः ।
मुखरन्ध्राद्विनिर्यान्तीं धूमवर्तिं प्रपश्यति ॥74॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह ध्यानी स्थिरचित्त होकर निरन्तर अभ्यास करने पर छह महीनेमें अपने मुखसे निकलती हुई (धूप) धूएँकी वर्त्तिका देखता है ।


ततः संवत्सरं यावत्तथैवाभ्यस्यते यदि ।
प्रपश्यति महाज्वालां निःसरन्तीं मुखोदरात् ॥75॥

अर्थ: तत्पश्चात् यदि एक वर्ष पर्यन्त उसी प्रकार अभ्यास करे तो मुखमेंसे निकलती हुई महा अग्निकी ज्वालाको देखता है ।


ततोऽतिजातसंवेगो निर्वेदालम्बितो वशी ।
ध्यायन्पश्यत्यविश्रान्तं सर्वज्ञमुखपङ्कजम् ॥76॥

अर्थ: तत्पश्चात् अतिशय उत्पन्न हुआ है धर्मानुराग जिसके ऐसा वैराग्यावलंबित जितेन्द्रिय मुनि निरन्तर ध्यान करता करता सर्वज्ञके मुखकमलको देखता है ।


अथाप्रतिहतानन्दप्रीणितात्मा जितश्रमः ।
श्रीमत्सर्वज्ञदेवेशं प्रत्यक्षमिव वीक्षते ॥77॥

अर्थ: यहाँसे आगे वही ध्यानी अनिवारित आनन्दसे तृप्त है आत्मा जिसका और जीता है दुख जिसने ऐसा होकर श्रीमत्सर्वज्ञदेवका प्रत्यक्ष अवलोकन करता है ।


सर्वातिशयसंपूर्णं दिव्यरूपोपलक्षितम् ।
कल्याणमहिमोपेतं सर्वसत्त्वाभयप्रदम् ॥78॥

अर्थ: सर्वज्ञको ध्यानी कैसे प्रत्यक्ष देखता है कि - सर्व अतिशयोंसे परिपूर्ण, दिव्य रूपसे उपलक्षित, पंचकल्याणककी महिमासहित, समस्त जीवोंको अभयदान देनेवाले तथा प्रभावलयके बीचमें स्थित हुए भव्यरूप कमलोंको रंजायमान करनेवाले, ज्ञानकी लीलाके धरनेवाले, विशिष्ट लक्ष्मीवाले, देवोंके देव स्वयंभू ऐसे सर्वज्ञको साक्षात् देखता है ॥७८-७९॥


प्रभावलयमध्यस्थं भव्यराजीवरञ्जकम् ।
ज्ञानलीलाधरं वीरं देवदेवं स्वयंभुवम् ॥79॥

अर्थ: सर्वज्ञको ध्यानी कैसे प्रत्यक्ष देखता है कि - सर्व अतिशयोंसे परिपूर्ण, दिव्य रूपसे उपलक्षित, पंचकल्याणककी महिमासहित, समस्त जीवोंको अभयदान देनेवाले तथा प्रभावलयके बीचमें स्थित हुए भव्यरूप कमलोंको रंजायमान करनेवाले, ज्ञानकी लीलाके धरनेवाले, विशिष्ट लक्ष्मीवाले, देवोंके देव स्वयंभू ऐसे सर्वज्ञको साक्षात् देखता है ॥७८-७९॥


ततो विधूततन्द्रोऽसौ तस्मिन्संजातनिश्चयः ।
भवभ्रममपाकृत्य लोकाग्रमधिरोहति ॥80॥

अर्थ: तत्पश्चात् इस मन्त्रका ध्यान करनेवाला मुनि प्रमादको नष्ट करके तथा इस मंत्रमें सर्वज्ञके स्वरूपका निश्चय हो जानेपर संसारभ्रमणको दूर करके लोकके अग्रभाग मोक्षस्थानका आश्रय करता है ।


स्मर सकलसिद्धविद्यां प्रधानभूतां प्रसन्नगम्भीराम् ।
विधुबिम्बनिर्गतामिव क्षरत्सुधार्द्रां महाविद्याम् ॥81॥

अर्थ: हे मुने, तू सकल सिद्धविद्याका भी चिंतवन कर, क्योंकि वह विद्या प्रधानस्वरूप है, प्रसन्न है, गम्भीर है तथा चन्द्रमाके बिंबसे निकली हुई के समान जो झरती हुई सुधा है जिससे आद्रित है, ऐसी वह महाविद्या ‘क्ष्वीं’ ऐसा अक्षर है ।


अविचलमनसा ध्यायंल्ललाटदेशे स्थितामिमां देवीम् ।
प्राप्नोति मुनिरजस्रं समस्तकल्याणनिकुरम्बम् ॥82॥

अर्थ: इस विद्या देवीको ललाट देश पर स्थित करके, निश्चल मनसे निरन्तर ध्यान करता हुआ मुनि समस्त कल्याणके समूहको प्राप्त होता है ।


अमृतजलधिगर्भान्निःसरन्तीं सुदीप्ता -
मलकतलनिषण्णां चन्द्रलेखां स्मर त्वम् ।
अमृतकणविकीर्णां प्लावयन्तीं सुधाभिः
परमपदधरित्र्यां धारयन्तीं प्रभावम् ॥83॥

अर्थ: हे मुने, तू इस अमृतके समुद्रसे निकलती हुई, भले प्रकार देदीप्यमान, ललाटदेशमें स्थित, अमृतके कणोंसे बिखरी हुई और अमृतसे आद्रित करती हुई चन्द्रलेखाका स्मरण कर; क्योंकि यह विद्या मोक्षरूपी पृथ्वीमें अपने प्रभावको धारण करनेवाली है ।


एतां विचिन्तयन्नेव स्तिमितेनान्तरात्मना ।
जन्मज्वरक्षयं कृत्वा याति योगी शिवास्पदम् ॥84॥

अर्थ: इस विद्याको पूर्वोक्त प्रकारसे अपने निश्चल मनसे ध्यान करता हुआ ध्यानी योगी संसाररूप ज्वरका क्षय करके मोक्षस्थानको प्राप्त होता है ।


यदि साक्षात्समुद्विग्नो जन्मदावोग्रसंक्रमात् ।
तदा स्मरादिमन्त्रस्य प्राचीनं वर्णसप्तकम् ॥85॥

अर्थ: हे मुने, यदि तू संसाररूप अग्निके तीव्र संक्रम (संयोग) से उद्वेगरूप हुआ है अर्थात् दुःखी हुआ है तो आदिमन्त्र जो पंच नमस्कार मन्त्र है, उसके पहिले सात अक्षरोंका ध्यान कर । वे सात अक्षर ‘णमो अरहंताणं’ ये हैं ।


यदत्र प्रणवं शून्यमनाहतमिति त्रयम् ।
एतदेव विदुः प्राज्ञास्त्रैलोक्यतिलकोत्तमम् ॥86॥

अर्थ: जो इस प्रकरणमें प्रणव और शून्य तथा अनाहत ये तीन अक्षर हैं, इन तीनों (ॐ ह अ) अक्षरोंको ही बुद्धिमानोंने तीनलोकके तिलक समान कहा है ।


नासाग्रदेशसंलीनं कुर्वन्नत्यन्तनिर्मलम् ।
ध्याता ज्ञानमवाप्नोति प्राप्य पूर्वं गुणाष्टकम् ॥87॥

अर्थ: इन तीन अक्षरोंको नासिकाके अग्रभागमें अत्यन्त लीन करता हुआ ध्यानी अणिमा महिमादिक आठ ऋद्धियोंको प्राप्त होकर, तत्पश्चात् अति निर्मल ज्ञान (केवलज्ञान) को प्राप्त होता है ।


शङ्खेन्दुकुन्दधवला ध्याता देवास्त्रयो विधानेन ।
जनयन्ति सर्वविषयं बोधं कालेन तद्ध्यानात् ॥88॥

अर्थ: पूर्वोक्त ये तीन देव (अक्षर) शंखके समान, कुन्दके पुष्प समान तथा चन्द्रमासमान विधान पूर्वक ध्याये जावें तो इनके ध्यानसे कितने ही कालमें समस्त विषयोंका ज्ञान करानेवाला केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।


प्रणवयुगलस्य युग्मं पार्श्वे मायायुगं विचिन्तयति ।
मूर्द्धस्थं हंसपदं कृत्वा व्यस्तं वितन्द्रात्मा ॥89॥

अर्थ: प्रणवयुगल कहिये दो ओंकारका युग्म और दोनों तरफ दो मायायुगल हीं हीं ऐसे और इनके ऊपरी हंसपद रखकर, प्रमादरहित होकर, ध्यानी भिन्न भिन्न चिंतवन करे । वह मंत्र ‘ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं हंसः’ ऐसा है ।


ततो ध्यायेन्महाबीजं स्त्रींकारं छिन्नमस्तकम् ।
अनाहतयुतं दिव्यं विस्फुरन्तं मुखोदरे ॥90॥

अर्थ: तत्पश्चात् महाबीज जो ‘स्त्रीं’ ऐसा अक्षर और छिन्नमस्तक अर्थात् जिस पर बिंदु, अनुस्वार नहीं है, उसको अनीहत सहित दिव्य मुख पर स्फुरायमान होता हुआ चिंतवन करे ।


श्रीवीरवदनोद्गीर्णां विद्यां चाचिन्त्यविक्रमाम् ।
कल्पवल्लीमिवाचिन्त्यफलसंपादनक्षमाम् ॥91॥

अर्थ: और श्रीवीरवर्द्धमान भगवानके मुखसे निकली हुई विद्याका चिंतवन करे । कैसी है वह विद्या ? अचिन्त्य पराक्रमवाली और कल्पवेलके समान अचिन्त्य फल देनेमें समर्थ है । ऐसी विद्या ‘ॐ जोग्गे मग्गे त्तच्चे भूदे भव्वे भविस्से अक्खे पक्खे जिणपारिस्से स्वाहा’ तत्पश्चात् ऐसा मंत्र है ‘ॐ ह्रीं स्वर्हं नमो नमोऽर्हंताणं ह्रीं नमः” ऐसे अक्षर हैं ।


विद्यां जयति य इमां निरन्तरं शान्तविश्वविस्पन्दः ।
अणिमादिगुणाँल्लब्ध्वा ध्यानी शास्त्रार्णवं तरति ॥92॥

अर्थ: जो ध्यानी शान्तवेग निश्चल होकर इस विद्याको निरन्तर जपता है, वह अणिमादिक गुणोंको प्राप्त होकर, शास्त्रसमुद्रके पार हो जाता है अर्थात् श्रुतकेवली होता है ।


त्रिकालविषयं साक्षाज्ज्ञानमस्योपजायते ।
विश्वतत्त्वप्रबोधश्च सतताभ्यासयोगतः ॥93॥

अर्थ: इस विद्याका ध्यान करनेवालेके निरंतर अभ्यास करनेसे समस्त तत्त्वोंका ज्ञान और त्रिकाल विषय साक्षात्ज्ञान कहिये केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।


शाम्यन्ति जन्तवः क्रूरास्तथान्ये व्यन्तरादयः ।
ध्यानविध्वंसकर्तारो येन तद्धि प्रपञ्च्यते ॥94॥

अर्थ: अब ध्यानीके उपसर्ग करनेवाले क्रूर जन्तु तथा ध्यानको नाश करनेवाले व्यन्तरादिक जिस ध्यानसे उपशमताको प्राप्त होते हैं, उस ध्यानका विस्तारसे वर्णन करते हैं ।


दिग्दलाष्टकसम्पूर्णे राजीवे सुप्रतिष्ठितम् ।
स्मरत्वात्मानमत्यन्तस्फुरद्ग्रीष्मार्कभास्करम् ॥95॥

अर्थ: आठ दिशा संबंधी आठ पत्रोंसे पूर्ण कमलमें भले प्रकार स्थापित और अत्यन्त स्फुरायमान ग्रीष्मऋतुके सूर्यके समान देदीप्यमान आत्माका स्मरण करे ।


प्रणवाद्यस्य मन्त्रस्य पूर्वादिषु प्रदक्षिणम् ।
विचिन्तयति पत्रेषु वर्णैकैकमनुक्रमात् ॥96॥

अर्थ: प्रणव है आदिमें जिसके ऐसे मंत्रको पूर्वादिक दिशाओंमें प्रदक्षिणारूप एक एक पत्र पर अनुक्रमसे एक एक अक्षरका चिन्तवन करे । वे अक्षर “ॐ णमो अरहंताणं” ये हैं ।


अधिकृत्य छदं पूर्वं सर्वाशासम्मुखः परम् ।
स्मरत्यष्टाक्षरं मन्त्रं सहस्रैकं शताधिकम् ॥97॥

अर्थ: इनमेंसे प्रथम पत्रको मुख्य करके सर्व दिशाओंके सन्मुख होकर इस अष्टाक्षर मंत्रको ग्यारहसै बार चिन्तवन (ध्यान) करे ।


प्रत्यहं प्रतिपत्रेषु महेन्द्राशाद्यनुक्रमात् ।
अष्टरात्रं जपेद्योगी प्रसन्नामलमानसः ॥98॥

अर्थ: इस प्रकार प्रतिदिन प्रत्येक पत्रमें पूर्व दिशादिकके अनुक्रमसे आठ रात्रिपर्यन्त प्रसन्न होकर जपे ।


तस्याचिन्त्यप्रभावेण क्रूराशयकलङ्किताः ।
त्यजन्ति जन्तवो दर्पं सिंहत्रस्ता इव द्विपाः ॥99॥

अर्थ: उसके अचिन्त्य प्रभावसे क्रूरचित्त जीव, सिंहसे भयभीत होकर जिस प्रकार हाथी गर्व छोड देते हैं, उसी प्रकार अपना गर्व छोड देते हैं ।


अष्टरात्रे व्यतिक्रान्ते कमलस्यास्यवर्त्तिनः ।
निरूपयति पत्रेषु वर्णानेताननुक्रमात् ॥100॥

अर्थ: तत्पश्चात् पूर्वोक्त आठ रात्रियोंके व्यतीत होनेके पश्चात् इस कमलके पत्रों पर वर्तनेवाले अक्षरोंको अनुक्रमसे निरूपण करके देखें ।


आलम्ब्य प्रक्रियामेनां पूर्वं विघ्नौघशान्तये ।
पश्चात्सप्ताक्षरं मन्त्रं ध्यायेत्प्रणववर्जितम् ॥101॥

अर्थ: इस प्रकार इस प्रक्रियाको प्रथम विघ्नके समूहकी शान्तिके लिये आलंबन करके तत्पश्चात् प्रणववर्जित सात अक्षर स्वरूप “णमो अरहंताणं” इस मन्त्रका ध्यान करे ।


मन्त्रः प्रणवपूर्वोऽयं निश्शेषाभीष्टसिद्धिदः ।
ऐहिकानेककामार्थं मुक्त्यर्थं प्रणवच्युतः ॥102॥

अर्थ: जब इस मन्त्रको प्रणवपूर्वक ध्यावे, तब यह समस्त मनोवांछित सिद्धिका देनेवाला है तथा इस लोकसंबंधी अनेक कार्योंके लिये हैं और प्रणववर्जित ध्यान करनेसे यह मन्त्र मुक्तिका कारण है ।


स्मर मन्त्रपदं वान्यज्जन्मसंघातघातकम् ।
रागाद्युग्रतमस्तोमप्रध्वंसरविमण्डलम् ॥103॥

अर्थ: अब कहते हैं कि हे मुने, तू अन्य एक मन्त्रपदका स्मरण कर, क्योंकि वह मन्त्र जन्मसमूहको घात करनेवाला है और रागादिकरूप तीव्र अंधकारको नष्ट करनेके लिये सूर्यमंडल समान है। वह मन्त्र “श्रीमद्वृषभादिवर्द्धमानान्तेभ्यो नमः” ऐसा है ।


मनः कृत्वा सुनिष्कम्पं तां विद्यां पापभक्षिणीम् ।
स्मर सत्त्वोपकाराय या जिनेन्द्रैः प्रकीर्तिता ॥104॥

अर्थ: तत्पश्चात् हे मुने, तू निश्चल मनसे उस पापभक्षिणी विद्याका स्मरण कर, जिसको कि समस्त जीवोंके उपकारार्थ श्रीजिनेन्द्र भगवानने कहा है। वह विद्या यह है “ॐ अर्हन्मुखकमलवासिनि पापात्मक्षयंकरि श्रुतज्ञानज्वालासहस्रप्रज्वलिते सरस्वति मत्पापं हन हन दह दह क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षौं क्षः क्षीरवरधवले अमृतसंभवे वं वं हूँ हूँ स्वाहा।” ये पापभक्षिणी विद्याके अक्षर हैं ।


चेतः प्रसत्तिमाधत्ते पापपङ्कः प्रलीयते ।
आविर्भवति विज्ञानं मुनेरस्याः प्रभावतः ॥105॥

अर्थ: इस पापभक्षिणी विद्याके प्रभावसे मुनिका चित्त प्रसन्नताको धारण करता है, पापरूपी पंकका प्रलय हो जाता है और विशिष्ट ज्ञान प्रगट होता है ।


मुनिभिः संजयन्ताद्यैर्विद्यावादात्समुद्‌धृतम् ।
भुक्तिमुक्तेः परं धाम सिद्धचक्राभिधं स्मरेत् ॥106॥

अर्थ: तत्पश्चात् सिद्धचक्र नामा मंत्रको संजयन्तादिक महामुनियोंने विद्यानुवाद नामा दशम पूर्वसे उद्धृत किया है सो यह मन्त्र भोग और मोक्षका उत्कृष्ट धाम है, इसका ध्यान करे ।


तस्य प्रयोजकं शास्त्रं तदाश्रित्योपदेशतः ।
ध्येयं मुनीश्वरैर्जन्ममहाव्यसनशान्तये ॥107॥

अर्थ: इस सिद्धचक्र मन्त्रके प्रयोजक शास्त्रका आश्रय लेकर, उसके उपदेशसे जन्मरूप महाकष्टकी शान्तिके लिए मुनीश्वरोंको ध्यान करना चाहिये, इसके अक्षरादिकका विधान उसके प्रयोजक शास्त्रसे जानना ।


स्मर मन्त्रपदाधीशं मुक्तिमार्गप्रदीपकम् ।
नाभिपङ्कजसंलीनमवर्णं विश्वतोमुखम् ॥108॥

अर्थ: हे मुने ! तू मन्त्रपदोंका स्वामी और मुक्तिके मार्गको प्रकाश करनेवाले अकार अक्षरको नाभिकमलमें चिन्तवन कर । यह अक्षर सर्वव्यापी है, और सि अक्षरको मस्तक कमल पर, आ अक्षरको कंठस्थ कमलमें, उ अक्षरको हृदयकमल पर और सा अक्षरको मुखस्थ कमल पर ऐसे ‘असिआउसा’ इन पाँच अक्षरोंको पाँच स्थानों पर चिन्तवन कर ।।१०८-१०९।।


सिवर्णं मस्तकाम्भोजे साकारं मुखपङ्कजे ।
आकारं कण्ठकञ्जस्थं स्मरोकारं हृदि स्थितम् ॥109॥

अर्थ: हे मुने ! तू मन्त्रपदोंका स्वामी और मुक्तिके मार्गको प्रकाश करनेवाले अकार अक्षरको नाभिकमलमें चिन्तवन कर । यह अक्षर सर्वव्यापी है, और सि अक्षरको मस्तक कमल पर, आ अक्षरको कंठस्थ कमलमें, उ अक्षरको हृदयकमल पर और सा अक्षरको मुखस्थ कमल पर ऐसे ‘असिआउसा’ इन पाँच अक्षरोंको पाँच स्थानों पर चिन्तवन कर ॥१०८-१०९॥


सर्वकल्याणबीजानि बीजान्यन्यान्यपि स्मरेत् ।
यान्याराध्य शिवं प्राप्ता योगिनः शीलसागराः ॥110॥

अर्थ: सर्व कल्याणके बीज अन्यान्य भी मन्त्र हैं, जिनका आराधन करके शीलके सागर योगीगंण मोक्षको प्राप्त हुए हैं, उन सब ही अक्षरोंको ध्यानी मुनि चिन्तवन करे। ‘नमः सर्वसिद्धेभ्यः’ यह भी एक मन्त्र पद है ।


श्रुतिसिन्धुसमुद्भूतमन्यद्वा पदमक्षरम् ।
तत्सर्वं मुनिभिर्ध्येयं स्यात्पदस्थप्रसिद्धये ॥111॥

अर्थ: अन्य भी पद तथा अक्षर जो श्रुतसमुद्र द्वादशांग शास्त्रसे उत्पन्न हुए हैं, वे सब ही पदस्थ ध्यानकी प्रसिद्धतार्थ होते हैं, उन्हें भी मुनिगणोंको ध्यानगोचर करना चाहिये ।


एवं समस्तवर्णेषु मन्त्रविद्यापदेषु च ।
कार्यक्रमेण विश्लेषो लक्ष्यभावप्रसिद्धये ॥112॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त अक्षरोंमें तथा मन्त्रपद और विद्यापदोंमें अनुक्रमसे लक्ष्य भावकी प्रसिद्धताके लिये भेद करना अर्थात् भिन्न भिन्न चिन्तवन करना चाहिये ।


अन्यद्यद्यच्छ्रुतस्कन्धबीजं निर्वेदकारणम् ।
तत्तद्ध्यायन्नसौ ध्यानी नापवर्गपथि स्खलेत् ॥113॥

अर्थ: अन्य जो जो द्वादशांग शास्त्रके बीजाक्षर है तथा वैराग्यके कारण हैं, उन उन मंत्रोंका ध्यान करता हुआ मुनि मोक्षमार्गमें गमन करता हुआ डिगता नहीं।


वीतरागस्य विज्ञेया ध्यानसिद्धिर्ध्रुवं मुनेः ।
क्लेश एव तदर्थं स्याद्रागार्त्तस्येह देहिनः ॥114॥

अर्थ: जो मुनि वीतराग है उसके ध्यानकी सिद्धि अवश्य होती है और जो रागसे पीडित है उसका ध्यान करना क्लेशके लिये ही है अर्थात् रागीके ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।


निर्मथ्य श्रुतसिन्धुमुन्नतधियः श्रीवीरचन्द्रोदये
तत्त्वान्येव समुद्धरन्ति मुनयो यत्नेन रत्नान्यतः ।
तान्येतानि हृदि स्फुरन्ति सुभगन्यासानि भव्यात्मनां
ये वाञ्छन्त्यनिशं विमुक्तिललनासम्भोगसंभावनाम् ॥115॥

अर्थ: श्रीवीर वर्द्धमानस्वामीरूप चन्द्रमाके उदय होते हुए जो उन्नतबुद्धि मुनि हैं, वे शास्त्ररूपी समुद्रको मथकर, सुन्दर है रचना जिनकी ऐसे मंत्ररूप तत्त्वों (रत्नों) को निकालते हैं और ये सब मंत्रपदरूप रत्न मुक्तिरूपी स्त्रीके संभोगकी निरन्तर वांछा करनेवाले भव्य पुरुषोंके ही हृदयमें स्फुरायमान होते हैं।


विलीनाशेषकर्माणं स्फुरन्तमतिनिर्मलम् ।
स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ॥116॥

अर्थ: इन मंत्रपदोंके अभ्यासके पश्चात् विलय हुए हैं समस्त कर्म जिसमें ऐसे अतिनिर्मल स्फुरायमान अपने आत्माको अपने शरीरमें चिंतवन (ध्यान) करें ।

सर्ग 39: रूपस्थ ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 46)

आर्हत्यमहिमोपेतं सर्वज्ञं परमेश्वरम् ।
ध्यायेद्देवेन्द्रचन्द्रार्कसभान्तस्थं स्वयम्भुवम् ॥1॥

अर्थ: इस रूपस्थ ध्यानमें अरहंत भगवानका ध्यान करना चाहिये; जिसमें अरहंतका किस प्रकारका स्वरूप चिन्तवन करना चाहिये सो कहते है - अरहन्तताकी महिमा जो समवसरणादिकी रचना है उस सहित, सर्वज्ञ, परमेश्वर, देवेन्द्र, चन्द्रमा, सूर्यादिकी सभाके मध्यमें स्थित, स्वयंभू ।


सर्वातिशयसंपूर्णं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
सर्वभूतहितं देवं शीलशैलेन्द्रशेखरम् ॥2॥

अर्थ: तथा समस्त अतिशयोंसे संपूर्ण, सब लक्षणोंसे लक्षित, तथा जिनसे समस्त जीवोंका हित होता है ऐसे, और शील कहिये उत्तर गुणरूपी पर्वतके शिखर ।


सप्तधातुविनिर्मुक्तं मोक्षलक्ष्मीकटाक्षितम् ।
अनन्तमहिमाधारं सयोगिपरमेश्वरम् ॥3॥

अर्थ: तथा सप्तधातुसे रहित और मोक्षलक्ष्मी जिनको कटाक्षपूर्वक देखती है ऐसे, अनन्त महिमाके आधार सयोगकेवली, परमेश्वर ।


अचिन्त्यचरितं चारुचारित्रैः समुपासितम् ।
विचित्रनयनिर्णीतं विश्वं विश्वैकबान्धवम् ॥4॥

अर्थ: तथा अचिन्त्य है चरित जिनका, और सुन्दर चरित्रवाले गणधरादिक मुनिगणोंसे सेवनीय तथा अनेक नयोंसे निर्णय किया है विश्व अर्थात् समस्त वस्तुओंका आकार स्वरूप जगत् जिन्होंने ऐसे और समस्त जगतके हितू अर्थात् बान्धव ।


निरुद्धकरणग्रामं निषिद्धविषयद्विषम् ।
ध्वस्तरागादिसन्तानं भवज्वलनवार्मुचम् ॥5॥

अर्थ: तथा इन्द्रियोंके ग्रामोंको रोकनेवाले, विषयरूप शत्रुओंको निषेध कर देनेवाले तथा रागादिक सन्तानका कर दिया है नाश जिन्होंने ऐसे, और संसाररूपी अग्निके बुझानेको मेघके समान ।


दिव्यरूपधरं धीरं विशुद्धज्ञानलोचनम् ।
अपि त्रिदशयोगीन्द्रैः कल्पनातीतवैभवम् ॥6॥

अर्थ: तथा दिव्यरूपके धारक, धीर अर्थात् क्षोभरहित, निर्मल ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं ऐसे, देव और योगीश्वरोंकी कल्पनासे अतीत है-विभव जिनका ऐसे ।


स्याद्वादपविनिर्घातभिन्नान्यमतभूधरम् ।
ज्ञानामृतपयःपूरैः पवित्रितजगत्त्रयम् ॥7॥

अर्थ: इस रूपस्थ ध्यानमें अरहंत भगवानका ध्यान करना चाहिये; जिसमें अरहंतका किस प्रकारका स्वरूप चिन्तवन करना चाहिये सो कहते है - अरहन्तताकी महिमा जो समवसरणादिकी रचना है उस सहित, सर्वज्ञ, परमेश्वर, देवेन्द्र, चन्द्रमा, सूर्यादिकी सभाके मध्यमें स्थित, स्वयंभू ॥१॥ तथा समस्त अतिशयोंसे संपूर्ण, सब लक्षणोंसे लक्षित, तथा जिनसे समस्त जीवोंका हित होता है ऐसे, और शील कहिये उत्तर गुणरूपी पर्वतके शिखर ॥२॥ तथा सप्तधातुसे रहित और मोक्षलक्ष्मी जिनको कटाक्षपूर्वक देखती है ऐसे, अनन्त महिमाके आधार सयोगकेवली, परमेश्वर॥३॥ तथा अचिन्त्य है चरित जिनका, और सुन्दर चरित्रवाले गणधरादिक मुनिगणोंसे सेवनीय तथा अनेक नयोंसे निर्णय किया है विश्व अर्थात् समस्त वस्तुओंका आकार स्वरूप जगत् जिन्होंने ऐसे और समस्त जगतके हितु अर्थात् बान्धव ॥४॥ तथा इन्द्रियोंके ग्रामोंको रोकनेवाले, विषयरूप शत्रुओंको निषेध कर देनेवाले तथा रागादिक सन्तानका कर दिया है नाश जिन्होंने ऐसे, और संसाररूपी अग्निके बुझानेको मेघके समान ॥५॥ तथा दिव्यरूपके धारक, धीर अर्थात् क्षोभरहित, निर्मल ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं ऐसे, देव और योगीश्वरोंकी कल्पनासे अतीत है-विभव जिनका ऐसे ॥६॥ तथा स्याद्वादरूप वज्रसे खंडित किये है अन्य मतरूपी पर्वत जिन्होंने ऐसे, तथा ज्ञानरूप अमृतमय जलके प्रवाहोंसे पवित्र स्वरूप किया है तीन जगत् जिन्होंने ऐसे ॥७॥ इनको आदि लेकर गणनासे अतीत गुणरूप रत्नोंके महासमुद्र, देवोंके देव, स्वयंबुद्ध, जिनोंके सूर्य, ऐसे श्रीऋषभदेव सर्वज्ञका हे मुने, तू चिन्तवन (ध्यान) कर ।


इत्यादिगणनातीतगुणरत्नमहार्णवम् ।
देवदेवं स्वयम्बुद्धं स्मराद्यं जिनभास्करम् ॥8॥

अर्थ: इनको आदि लेकर गणनासे अतीत गुणरूप रत्नोंके महासमुद्र, देवोंके देव, स्वयंबुद्ध, जिनोंके सूर्य, ऐसे श्रीऋषभदेव सर्वज्ञका हे मुने, तू चिन्तवन (ध्यान) कर ।


जन्ममृत्युजराक्रान्तं रागादिविषमूर्च्छितम् ।
सर्वसाधारणैर्दोषैरष्टादशभिरावृतम् ॥9॥

अर्थ: कई अन्यमती जन्म जरा मरणसे व्याप्त, रागद्वेषादि विषसे मूर्छित, सर्व साधारण मनुष्यके समान क्षुधा तृषा आदि १८ दोषोंसे आच्छादित ।


अनेकव्यसनोच्छिष्टं संयमज्ञानविच्युतम् ।
संज्ञामात्रेण केचिच्च सर्वज्ञं प्रतिपेदिरे ॥10॥

अर्थ: तथा अनेक व्यसनों (कष्ट आपदाओं) सहित, संयम और ज्ञानसे रहित, ऐसे आत्माको नाममात्रसे सर्वज्ञ मानते हैं ।


इतरोऽपि नरः षड्भिः प्रमाणैर्वस्तुसंचयम् ।
परिच्छिन्दन्मतः कैश्चित्सर्वज्ञः सोऽपि नेक्ष(ष्य)ते ॥11॥

अर्थ: कई अन्यमती जन्म जरा मरणसे व्याप्त, रागद्वेषादि विषसे मूर्छित, सर्व साधारण मनुष्यके समान क्षुधा तृषा आदि १८ दोषोंसे आच्छादित ॥९॥ तथा अनेक व्यसनों (कष्ट आपदाओं) सहित, संयम और ज्ञानसे रहित, ऐसे आत्माको नाममात्रसे सर्वज्ञ मानते हैं ॥१०॥ तथा कई लोगोंने १ प्रत्यक्ष, २ अनुमान, ३ उपमान, ४ आगम, ५ अर्थापत्ति, और ६ अभाव, इन छः प्रमाणोंसे वस्तुके समूहको जानते हुए अन्य पुरुषको भी सर्वज्ञ माना है सो वह भी सर्वज्ञ नहीं है ।


अतः सम्यक्स विज्ञेयः परित्यज्यान्यशासनम् ।
युक्त्यागमविभागेन ध्यातुकामैर्मनीषिभिः ॥12॥

अर्थ: इस कारण जो सर्वज्ञ भगवानका ध्यान करनेके इच्छुक बुद्धिमान् पुरुष हैं, उनको चाहिये कि अन्य मतोंको छोडकर, युक्ति और आगमसे निर्णय करके सर्वज्ञको सम्यक् प्रकारसे निश्चय करे कि जिस सर्वज्ञकी सिद्धि वृषभसेन आदि गणधर और आचार्योंने युक्तिसे असाधु दुर्जनोंके कथनका खण्डन करके, सत्पुरुषोंके बीचमें निर्मल चन्द्रमण्डलमें लिखी है ॥१२-१३॥


युक्त्या वृषभसेनाद्यैर्निर्धूयासाधुवल्गितम् ।
यस्य सिद्धिः सतां मध्ये लिखिता चन्द्रमण्डले ॥13॥

अर्थ: इस कारण जो सर्वज्ञ भगवानका ध्यान करनेके इच्छुक बुद्धिमान् पुरुष हैं, उनको चाहिये कि अन्य मतोंको छोडकर, युक्ति और आगमसे निर्णय करके सर्वज्ञको सम्यक् प्रकारसे निश्चय करे कि जिस सर्वज्ञकी सिद्धि वृषभसेन आदि गणधर और आचार्योंने युक्तिसे असाधु दुर्जनोंके कथनका खण्डन करके, सत्पुरुषोंके बीचमें निर्मल चन्द्रमण्डलमें लिखी है ॥१२-१३॥


अनेकवस्तुसंपूर्णं जगद्यस्य चराचरम् ।
स्फुरत्यविकलं बोधविशुद्धादर्शमण्डले ॥14॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हे मुने, तू आगे लिखे हुए प्रकारसे सर्वज्ञ देवका स्मरण कर कि जिस सर्वज्ञ देवके ज्ञानरूप निर्मल दर्पणके मंडलमें अनेक वस्तुओंसे भरा हुआ चराचर यह जगत् प्रकाशमान है ।


स्वभावजमसंदिग्धं निर्दोषं सर्वदोदितम् ।
यस्य विज्ञानमत्यक्षं लोकालोकं विसर्पति ॥15॥

अर्थ: तथा जिनका ज्ञान स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ है, संशयादिक रहित है, निर्दोष है, सदाकाल उदयरूप है, तथा इन्द्रियोंका उल्लंघन करके प्रवर्त्तनेवाला है और लोकालोकमें सर्वत्र विस्तरता है ।


यस्य विज्ञानघर्मांशु-प्रभाप्रसरपीडिताः ।
क्षणादेव क्षयं यान्ति खद्योता इव दुर्नयाः ॥16॥

अर्थ: तथा खद्योत (जुगनू) के समान जिसके विज्ञानरूप सूर्यकी प्रभासे पीडित हुए दुर्नय (एकान्त पक्ष) क्षणमात्रमें नष्ट हो जाते हैं ।


पादपीठीकृताशेषत्रिदशेन्द्रसभाजिरम् ।
योगिगम्यं जगन्नाथं गुणरत्नमहार्णवम् ॥17॥

अर्थ: तथा जिसने समस्त इंद्रोंकी सभाके स्थानको सिंहासनरूप किया है तथा जो योगीगणोंसे गम्य है, जगतका नाथ है, गुणरूपी रत्नोंका महान् समुद्र है ।


पवित्रितधरापृष्टं समुद्धृतजगत्त्रयम् ।
मोक्षमार्गप्रणेतारमनन्तं पुण्यशासनम् ॥18॥

अर्थ: तथा पवित्र किया है पृथ्वीतल जिसने, तथा उद्धार किया है तीन जगतका जिसने ऐसा और मोक्षमार्गका निरूपण करनेवाला है; अनन्त है और जिसका शासन पवित्र है ।


भामण्डलनिरुद्धार्कं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ।
शरण्यं सर्वगं शान्तं दिव्यवाणीविशारदम् ॥19॥

अर्थ: तथा जिसने भामंडलसे सूर्यको आच्छादित किया है, कोटि चन्द्रमाके समान प्रभाका धारक है, जो जीवोंको शरणभूत है, सर्वत्र जिसके ज्ञानकी गति है, शान्त है, दिव्य वाणीमें प्रवीण है ।


अक्षोरगशकुन्तेशं सर्वाभ्युदयमन्दिरम् ।
दुःखार्णवपतत्सत्त्वदत्तहस्तावलम्बनम् ॥20॥

अर्थ: तथा इन्द्रियरूपी सर्पोंको गरुड समान है, समस्त अभ्युदयका मंदिर है तथा दुःखरूप समुद्रमें पडते हुए जीवोंको हस्तावलंबन देनेवाला है ।


मृगेन्द्रविष्टरारूढं मारमातङ्गघातकम् ।
इन्दुत्रयसमोद्दामच्छत्रत्रयविराजितम् ॥21॥

अर्थ: तथा सिंहासन पर स्थित है, कामरूप हस्तीका घातक है, तथा तीन चन्द्रमाके समान मनोहर तीन छत्र सहित विराजमान है ।


हंसालीपातलीलाढ्यं चामरव्रजवीजितम् ।
वीततृष्णं जगन्नाथं वरदं विश्वरूपिणम् ॥22॥

अर्थ: तथा हंसपंक्तिके पडने की लीलापूर्ण चमरोंके समूहसे वीजित है, तृष्णारहित है, जगतका नाथ है, वरका देनेवाला और विश्वरूपी है; अर्थात् ज्ञानके द्वारा समस्त पदार्थोंके रूप देखनेवाला है ।


दिव्यपुष्पानकाशोकराजितं रागवर्जितम् ।
प्रातिहार्यमहालक्ष्मीलक्षितं परमेश्वरम् ॥23॥

अर्थ: तथा दिव्य पुष्पवृष्टि, आनक अर्थात् दुंदुभि बाजों तथा अशोक वृक्षों सहित विराजमान है, तथा रागरहित (वीतराग) है, प्रातिहार्य महालक्ष्मीसे चिह्नित है, परम ऐश्वर्य करके सहित (परमेश्वर) है ।


नवकेवललब्धिश्रीसंभवं स्वात्मसंभवम् ।
तुर्यध्यानमहावह्नौ हुतकर्मेन्धनोत्करम् ॥24॥

अर्थ: तथा अनंतज्ञान १, दर्शन २, दान ३, लाभ ४, भोग ५, उपभोग ६, वीर्य ७, क्षायिकसम्यक्त्व ८, और चारित्र ९, इन नवलब्धिरूपी लक्ष्मीकी जिससे उत्पत्ति है तथा अपने आत्मासे ही उत्पन्न है, और शुक्लध्यानरूपी महान् अग्निमें होम दिया है कर्मरूपी इन्धनका समूह जिसने ऐसा है ।


रत्नत्रयसुधास्यन्दमन्दीकृतभवश्रमम् ।
वीतसंगं जितद्वैतं शिवं शान्तं सनातनम् ॥25॥

अर्थ: तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप अमृतके झरनोंसे संसारके खेदको दूर करनेवाला है, परिग्रहरहित है, जीत लिया है द्वैतभाव जिसने ऐसा है, कल्याणस्वरूप, शान्तरूप तथा सनातन अर्थात् नित्यरूप है ।


अर्हन्तमजमव्यक्तं कामदं कामनाशकम् ।
पुराणपुरुषं देवं देवदेवं जिनेश्वरम् ॥26॥

अर्थ: तथा अरहन्त है, अजन्मा है, अव्यक्त है अर्थात् इन्द्रियगोचर नहीं है, तथा कामद (मनोवांछित दाता) है, कामका नाशक है, पुराण पुरुष है, देव है, देवोंका देव है, जिनेश्वर है ।


विश्वनेत्रं जगद्वन्द्यं योगिनाथं महेश्वरम् ।
ज्योतिर्मयमनाद्यन्तं त्रातारं भुवनेश्वरम् ॥27॥

अर्थ: तथा समस्त लोकको देखने वा दिखानेको नेत्र समान हैं, जगतके वंदने योग्य है, योगियोंका नाथ है, महेश्वर है, ज्योतिर्मय (ज्ञानप्रकाशमय) है, आदि अंत रहित है, सबका रक्षक है, तीन भुवनका ईश्वर है ।


योगीश्वरं तमीशानमादिदेवं जगद्गुरुम् ।
अनन्तमच्युतं शान्तं भास्वन्तं भूतनायकम् ॥28॥

अर्थ: योगीश्वर है, ईशान है, आदिदेव है, जगद्गुरु है, अनन्त है, अच्युत है, शान्त है, तेजस्वी है, भूतनायक है ।


सन्मतिं सुगतं सिद्धं जगज्ज्येष्ठं पितामहम् ।
महावीरं मुनिश्रेष्ठं पवित्रं परमाक्षरम् ॥29॥

अर्थ: सन्मति है, सुगत है, सिद्ध है, जगतमें ज्येष्ठ है, पितामह है, महावीर है, मुनिश्रेष्ठ है, पवित्र है, परमाक्षर है ।


सर्वज्ञं सर्वदं सार्वं वर्धमानं निरामयम् ।
नित्यमव्ययमव्यक्तं परिपूर्णं पुरातनम् ॥30॥

अर्थ: सर्वज्ञ है, सबका दाता है, सर्वहितैषी है, वर्द्धमान है, निरामय (रोगरहित) है, नित्य है, अव्यय (नाशरहित) है, अव्यक्त है, परिपूर्ण है, पुरातन है ।


इत्यादिसान्वयानेकपुण्यनामोपलक्षितम् ।
स्मर सर्वगतं देवं वीरममरनायकम् ॥31॥

अर्थ: इत्यादिक अनेक सार्थ पवित्र नाम सहित, सर्वगत, देवोंका नायक, सर्वज्ञ, जो श्रीवीरतीर्थंकर है उसका हे मुने, तू स्मरण कर ।


अनन्यशरणं साक्षात्तत्संलीनैकमानसः ।
तत्स्वरूपमवाप्नोति ध्यानी तन्मयतां गतः ॥32॥

अर्थ: उपर्युक्त सर्वज्ञ देवका ध्यान करनेवाला ध्यानी अन्य शरणसे रहित हो, साक्षात् उसमें ही संलीन है मन जिसका ऐसा हो, तन्मयताको पाकर उसी स्वरूपको प्राप्त होता है ।


यमाराध्य शिवं प्राप्ता योगिनो जन्मनिस्पृहाः ।
यं स्मरन्त्यनिशं भव्याः शिवश्रीसंगमोत्सुकाः ॥33॥

अर्थ: जिस सर्वज्ञ देवका आराधन करके संसारसे निःस्पृह मुनिगण मोक्षको प्राप्त हुए हैं तथा मोक्षलक्ष्मीके संगममें उत्सुक भव्यजीव जिसका निरन्तर ध्यान करते हैं ।


यस्य वागमृतस्यैकामासाद्य कणिकामपि ।
शाश्वते पथि तिष्टन्ति प्राणिनः प्रास्तकल्मषाः ॥34॥

अर्थ: तथा जिनके वचनरूपी अमृतकी एक कणिका मात्रको पाकर संसारी जीव कल्मष (मिथ्यात्व पापों) को नष्ट करके शाश्वत मोक्षमार्गमें तिष्ठते हैं ।


देवदेवः स ईशानो भव्याम्भोजैकभास्करः ।
ध्येयः सर्वात्मना वीरः निश्चलीकृत्य मानसम् ॥35॥

अर्थ: सो देवोंका देव, ईशान, भव्य जीवरूप कमलोंको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य समान ऐसा श्रीवीरजिनेन्द्र मनको निश्चल करके ध्यान करने योग्य (ध्येय) है; अन्य कल्पित ध्येय (ध्यान करने योग्य) नहीं है ।


तस्मिन्निरन्तराभ्यासवशात्संजातनिश्चलाः ।
सर्वावस्थासु पश्यन्ति तमेव परमेष्ठिनम् ॥36॥

अर्थ: उस सर्वज्ञ देवके ध्यानमें सदा अभ्यास करनेके प्रभावसे निश्चल हुए योगीगण सर्व अवस्थाओंमें उसी परमेष्ठीको देखते हैं ।


तदालम्ब्य परं ज्योतिस्तद्गुणग्रामरञ्जितः ।
अविक्षिप्तमना योगी तत्स्वरूपमुपाश्नुते ॥37॥

अर्थ: योगी (ध्यानी मुनि) उस सर्वज्ञ देव परम ज्योतिका आलंबन करके उसके गुणग्रामोंमें रंजायमान होता हुआ मनमें विक्षेप रहित होकर उसी स्वरूपको प्राप्त होता है ।


इत्थं तद्भावनानन्दसुधास्यन्दाभिनन्दितः ।
न हि स्वप्नाद्यवस्थासु ध्यायन्प्रच्यवते मुनिः ॥38॥

अर्थ: इस प्रकार उस सर्वज्ञदेवकी भावनासे उत्पन्न हुए आनन्दरूप अमृतके वेगसे आनंदरूप हुआ मुनि स्वप्नादिक अवस्थाओंमें भी ध्यानसे च्युत नहीं होता ।


तस्य लोकत्रयैश्वर्यं ज्ञानराज्यं स्वभावजम् ।
ज्ञानत्रयजुषां मन्ये योगिनामप्यगोचरम् ॥39॥

अर्थ: जो उस सर्वज्ञ देवके तीन लोकका ईश्वरत्व है, स्वभावसे उत्पन्न ज्ञानका राज्य है, वह मति-श्रुत-अवधि इन तीन ज्ञान सहित योगी मुनियोंको भी अगोचर है, ऐसा मैं मानता हूँ ।


साक्षान्निर्विषयं कृत्वा साक्षं चेतः सुसंयमी ।
नियोजयत्यविश्रान्तं तस्मिन्नेव जगद्गुरौ ॥40॥

अर्थ: यद्यपि सर्वज्ञ देवका रूप छद्मस्थ ज्ञानीके अगोचर है तथापि इन्द्रिय और मनको अन्य विषयोंसे हटा कर सुसंयमी मुनि निरन्तर साक्षात् उसी भगवानके स्वरूपमें अपने मनको लगाता है ।


तद्गुणग्रामसंलीनमानसस्तद्गताशयः ।
तद्भावभावितो योगी तन्मयत्वं प्रपद्यते ॥41॥

अर्थ: उस परमात्मामें मन लगावे तब उसके ही गुणोंमें लीनचित्त होकर उसमें ही चित्तको प्रवेश करके उसी भावसे भावित योगी मुनि उसीकी तन्मयताको प्राप्त होता है ।


यदाभ्यासवशात्तस्य तन्मयत्वं प्रजायते ।
तदात्मानमसौ ज्ञानी सर्वज्ञीभूतमीक्षते ॥42॥

अर्थ: जब अभ्यासके वशसे उस मुनिके उस सर्वज्ञके स्वरूपसे तन्मयता उत्पन्न होती है, उस समय वह मुनि अपने असर्वज्ञ आत्माको सर्वज्ञ स्वरूप देखता है ।


एष देवः स सर्वज्ञः सोऽहं तद्रूपतां गतः ।
तस्मात्स एव नान्योऽहं विश्वदर्शीति मन्यते ॥43॥

अर्थ: जिस समय सर्वज्ञ स्वरूप अपनेको देखता है, उस समय ऐसा मानता है कि यह वही सर्वज्ञ देव है, वही तत्स्वरूपताको प्राप्त हुआ मैं हूँ, इस कारण वही सर्वका देखनेवाला मैं हूँ, अन्य मैं नहीं हूँ ऐसा मानता है ।


भव्यतैव हि भूतानां साक्षान्मुक्तेर्निबन्धनम् ।
अतः सर्वज्ञता भव्ये भवन्ती नात्र शङ्क्यते ॥44॥

अर्थ: अथवा इस प्रकार है कि जीवोंके भव्यत्व भाव है सो साक्षात् मुक्तिका कारण है, इस कारण भव्य प्राणीमें सर्वज्ञता होनेमें संदेह नहीं करना अर्थात् भव्यके निःसंदेह सर्वज्ञता होती ही है ।


अयमात्मा स्वसामर्थ्याद्विशुद्ध्यति न केवलम् ।
चालयत्यपि संक्रुद्धो भुवनानि चतुर्दश ॥45॥

अर्थ: यह आत्मा अपने सामर्थ्यसे केवल विशुद्ध ही नहीं होता है, किन्तु यदि क्रोधरूप होता है तो चौदह भुवनोंको (लोकोंको) भी चला देता है।


त्रैलोक्यानन्दबीजं जननजलनिधेर्यानपात्रं पवित्रं
लोकालोकप्रदीपं स्फुरदमलशरच्चन्द्रकोटिप्रभाढ्यम् ।
कस्यामप्यग्रकोटौ जगदखिलमतिक्रम्य लब्धप्रतिष्ठं
देवं विश्वैकनाथं शिवमजमनघं वीतरागं भजस्व ॥46॥

अर्थ: हे मुने, तू वीतराग देवका ही ध्यान कर । कैसे हैं वीतराग भगवान् ? तीनों लोकोंके जीवोंको आनन्दके कारण हैं, संसाररूप समुद्रके पार होनेके लिये जहाज तुल्य हैं तथा पवित्र अर्थात् द्रव्यभाव मलसे रहित हैं तथा लोक अलोकके प्रकाश करनेके लिये दीपकके समान हैं और प्रकाशमान तथा निर्मल ऐसे जो करोड शरद्के चन्द्रमा उनकी प्रभासे भी अधिक प्रभाके धारक हैं तथा किसी मुख्य कोटिमें समस्त जगतका उल्लंघन कर पाई है प्रतिष्ठा जिन्होंने ऐसे हैं; जगतके अद्वितीय नाथ हैं, शिवस्वरूप हैं, अजन्मा है, पाप रहित है, ऐसे वीतराग भगवानका ध्यान करो ।

सर्ग 40: रूपातीत ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 31)

वीतरागं स्मरन्योगी वीतरागो विमुच्यते ।
रागी सरागमालम्ब्य क्रूरकर्माश्रितो भवेत् ॥1॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला योगी वीतरागका ध्यान करता हुआ वीतराग होकर, कर्मोंसे छूट जाता है और रागीका अवलंबन करके ध्यान करनेसे रागी होकर कर्मोंके आश्रित हो जाता है अर्थात् अशुभ कर्मोंसे बँध जाता है ।


मन्त्रमण्डलमुद्रादिप्रयोगैर्ध्यातुमुद्यतः ।
सुरासुरनरव्रातं क्षोभयत्यखिलं क्षणात् ॥2॥

अर्थ: यदि ध्यानी मुनि मन्त्र, मंडल, मुद्रादि प्रयोगोंसे ध्यान करनेमें उद्यत हो तो समस्त सुर, असुर और मनुष्योंके समूहको क्षणमात्रमें क्षोभित कर सकता है ।


क्रुद्धस्याप्यस्य सामर्थ्यमचिन्त्यं त्रिदशैरपि ।
अनेकविक्रियासारध्यानमार्गावलम्बिनः ॥3॥

अर्थ: अनेक प्रकारकी विक्रियारूप असार ध्यानमार्गका अवलंबन करनेवाले क्रोधीके भी ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जाती हैं कि जिसका देव भी चिन्तवन नहीं कर सकते ।


बहूनि कर्माणि मुनीप्रवीरैर्विद्यानुवादात्प्रकटीकृतानि ।
असंख्य भेदानि कुतूहलार्थं कुमार्गकुध्यानगतानि सन्ति ॥4॥

अर्थ: ज्ञानी मुनियोंने विद्यानुवादपूर्वसे असंख्य भेदवाले अनेक प्रकारके विद्वेषण उच्चाटन आदि कर्म कौतूहलके लिये प्रकट किये हैं परन्तु वे सब कुमार्ग और कुध्यानके अन्तर्गत हैं ।


असावनन्तप्रथितप्रभावः स्वभावतो यद्यपि यन्त्रनाथः ।
नियुज्यमानः स पुनः समाधौ करोति विश्वं चरणाग्रलीनम् ॥5॥

अर्थ: यद्यपि यह आत्मा स्वभावसे ही अनन्त और जगत्प्रसिद्ध प्रभावका धारक है, फिर समाधि (ध्यान) में जोडा हुआ हो तो यह समस्त जगतको अपने चरणोंमें लीन कर लेता है ।


स्वप्नेऽपि कौतुकेनापि नासद्ध्यानानि योगिभिः ।
सेव्यानि यान्ति बीजत्वं यतः सन्मार्गहानये ॥6॥

अर्थ: परन्तु योगी मुनियोंको चाहिये कि असमीचीन ध्यानोंको कौतुकसे स्वप्नमें भी न विचारें, क्योंकि असमीचीन ध्यान सन्मार्गकी हानिके लिये बीजस्वरूप (कारण) है ।


सन्मार्गात्प्रच्युतं चेतः पुनर्वर्षशतैरपि ।
शक्यते न हि केनापि व्यवस्थापयितुं पथि ॥7॥

अर्थ: खोटे ध्यानके कारण सन्मार्गसे विचलित हुए चित्तको फिर सैंकडों वर्षोंमें भी कोई सन्मार्गमें लानेको समर्थ नहीं हो सकता; इस कारण खोटा ध्यान कदापि नहीं करना चाहिये ।


असद्ध्यानानि जायन्ते स्वनाशायैव केवलम् ।
रागाद्यसद्ग्रहावेशात्कौतुकेन कृतान्यपि ॥8॥

अर्थ: असमीचीन (खोटे) ध्यान कौतुक मात्रसे किये हुए भी रागादिरूप खोटे ग्रहोंके आवेशसे केवल अपने नाशके लिये ही होते हैं ।


निर्भरानन्दसन्दोहपदसंपादनक्षमम् ।
मुक्तिमार्गमतिक्रम्य कः कुमार्गे प्रवर्त्तते ॥9॥

अर्थ: इस कारण अतिशयरूप आनन्दके समूहके स्थानको उत्पन्न करनेमें समर्थ ऐसे मोक्षमार्ग (समीचीन ध्यान) को छोडकर ऐसा कौन है जो कुमार्ग (खोटे ध्यान) में प्रवृत्ति करे ? अर्थात् ज्ञानवान तो कदापि नहीं करे ।


क्षुद्रध्यानपरप्रपञ्चचतुरा रागानलोद्दीपिताः
मुद्रामण्डलयन्त्रमन्त्रकरणैराराधयन्त्यादृताः ।
कामक्रोधवशीकृतानिह सुरान् संसारसौख्यार्थिनो
दुष्टाशाभिहताः पतन्ति नरके भोगार्तिभिर्वञ्चिताः ॥10॥

अर्थ: जो पुरुष खोटे ध्यानके उत्कृष्ट प्रपंचोंका विस्तार करनेमें चतुर हैं, वे इस लोकमें राग रूप अग्निसे प्रज्ज्वलित होकर मुद्रा, मंडल, यंत्र, मंत्र आदि साधनोंके द्वारा कामक्रोधसे वशीभूत कुदेवोंका आदरसे आराधन करते हैं, सो सांसारिक सुखके चाहनेवाले और दुष्ट आशासे पीडित तथा भोगोंकी पीडासे वंचित होकर वे नरकमें पडते हैं ।


तद्ध्येयं तदनुष्ठेयं तद्विचिन्त्यं मनीषिभिः ।
यज्जीवकर्मसम्बन्धविश्लेषायैव जायते ॥11॥

अर्थ: वही बुद्धिमानोंको ध्यान करने योग्य है और वही अनुष्ठान व चिन्तवन करने योग्य है, जो कि जीव और कर्मोंके सम्बन्धको दूर करनेवाला ही हो, अर्थात् जिस कार्यसे कर्मोंसे मोक्ष हो, वही कार्य करना योग्य है ।


स्वयमेव हि सिद्ध्यन्ति सिद्धयः शान्तचेतसाम् ।
अनेकफलसंपूर्णा मुक्तिमार्गावलम्बिनाम् ॥12॥

अर्थ: जो मुनि शान्तचित्त हैं और मुक्तिमार्गका अवलम्बन करनेवाले हैं, उनके अनेक प्रकारके फलोंसे भरी हुई सिद्धियाँ स्वयमेव सिद्ध हो जाती है।


संभवन्ति न चाभीष्टसिद्धयः क्षुद्रयोगिनाम् ।
भवत्येव पुनस्तेषां स्वार्थभ्रंशोऽनिवारितः ॥13॥

अर्थ: जो खोटे ध्यान करनेवाले क्षुद्र योगी है, उनको इष्ट सिद्धियाँ कदापि नहीं होती, किन्तु उनके उलटी स्वार्थकी अनिवार्य हानि ही होती है ।


भवप्रभवसम्बन्धनिरपेक्षा मुमुक्षवः ।
न हि स्वप्नेऽपि विक्षिप्तं मनः कुर्वन्ति योगिनः ॥14॥

अर्थ: जो मोक्षाभिलाषी योगीश्वर मुनि हैं, वे जिससे संसारकी उत्पत्ति हो ऐसे संबन्धोंसे निरपेक्ष रहते हैं; वे अपने मनको स्वप्नमें भी चलायमान नहीं करते हैं।


अथ रूपे स्थिरीभूतचित्तः प्रक्षीणविभ्रमः ।
अमूर्त्तमजमव्यक्तं ध्यातुं प्रक्रमते ततः ॥15॥

अर्थ: इसके पश्चात् रूपमें स्थिरीभूत है चित्त जिसका तथा नष्ट हो गये हैं विभ्रम जिसके ऐसा ध्यानी रूपातीत ध्यानमें अमूर्त, अजन्मा, इन्द्रियोंसे अगोचर, ऐसे परमात्माके ध्यानका प्रारम्भ करता है ।


चिदानन्दमयं शुद्धममूर्त्तं परमाक्षरम् ।
स्मरेद्यत्रात्मनात्मानं तद्रूपातीतमिष्यते ॥16॥

अर्थ: जिस ध्यानमें ध्यानी मुनि चिदानन्दमय, शुद्ध, अमूर्त्त, परमाक्षररूप आत्माको आत्मासे ही स्मरण करे अर्थात् ध्यावे सो रूपातीत ध्यान माना गया है ।


वदन्ति योगिनो ध्यानं चित्तमेवमनाकुलम् ।
कथं शिवत्वमापन्नमात्मानं संस्मरेन्मुनिः ॥17॥

अर्थ: योगीश्वर चित्तके आकुलतारहित होने अर्थात् क्षोभरहित होनेको ही ध्यान कहते हैं; तो कोई मुनि मोक्षप्राप्त आत्माका स्मरण कैसे करे ?


विवेच्य तद्गुणग्रामं तत्स्वरूपं निरूप्य च ।
अनन्यशरणो ज्ञानी तस्मिन्नेव लयं व्रजेत् ॥18॥

अर्थ: प्रथम तो उस परमात्माके गुणसमूहोंको पृथक् पृथक् विचारे और फिर उन गुणोंके समुदायरूप परमात्माको गुणगुणीके अभिन्न भावसे विचारे और फिर अन्यके शरणसे रहित होकर ज्ञानी पुरुष उसी परमात्मामें लीन हो जावें ।


तद्गुणग्रामसम्पूर्णं तत्स्वभावैकभावितः ।
कृत्वात्मानं ततो ध्यानी योजयेत्परमात्मनि ॥19॥

अर्थ: परमात्माके स्वभावसे एकरूप भावित अर्थात् मिला हुआ ध्यानी मुनि उस परमात्माके गुणसमूहोंसे पूर्णरूप अपने आत्माको करके फिर उसे परमात्मामें योजन करे, ऐसा विधान है ।


द्वयोर्गुणैर्मतं साम्यं व्यक्तिशक्तिव्यपेक्षया ।
विशुद्धेतरयोः स्वात्मतत्त्वयोः परमागमे ॥20॥

अर्थ: परमागममें विशुद्ध अर्थात् कर्मरहित और उससे इतर अर्थात् कर्मसहित इन दोनों स्वात्मतत्त्वोंमें शक्ति और व्यक्तिकी अपेक्षासे गुणोंसे समानता मानी है ।


यः प्रमाणनयैर्नूनं स्वतत्त्वमवबुद्ध्यते ।
बुद्ध्यते परमात्मानं स योगी वीतविभ्रमः ॥21॥

अर्थ: जो मुनि प्रमाण और नयोंके द्वारा अपने आत्मतत्त्वको जानता है, वही योगी विना किसी सन्देहके परमात्माको जानता है ।


व्योमाकारमनाकारं निष्पन्नं शान्तमच्युतम् ।
चरमाङ्गात्कियन्न्यूनं स्वप्रदेशैर्घनैः स्थितम् ॥22॥

अर्थ: आकाशके आकार अर्थात् अमूर्त, अनाकार अर्थात् पुद्गलके आकारसे रहित, निष्पन्न अर्थात् फिर जिसमें किसी प्रकारकी हीनाधिकता न हो , शान्त अर्थात् क्षोभ रहित, अच्युत अर्थात् जो अपने रूपसे कभी च्युत न हो, चरम शरीरसे किञ्चित् न्यून अर्थात् जिस शरीरसे मोक्ष हुआ है, उस शरीरसे नासिकादि रन्ध्र प्रदेशोंसे हीन, अपने घनीभूत प्रदेशोंसे स्थित तथा लोकाकाशके अग्रभागमें स्थित, शिवीभूत अर्थात् पहले अकल्याणरूप थे अब कल्याणरूप हुए ऐसे, अनामय अर्थात् रोगादिकसे सर्वथा रहित और पुरुषाकारको प्राप्त होकर भी अमूर्त अर्थात् आकार तो पुरुषका है परन्तु तो भी उसमें रूप रस गंध स्पर्शादिक नहीं है ऐसे परमात्माका ध्यान इस रूपातीत ध्यानमें करे ॥२२-२३॥


लोकाग्रशिखरासीनं शिवीभूतमनामयम् ।
पुरुषाकारमापन्नमप्यमूर्त्तं च चिन्तयेत् ॥23॥

अर्थ: आकाशके आकार अर्थात् अमूर्त, अनाकार अर्थात् पुद्गलके आकारसे रहित, निष्पन्न अर्थात् फिर जिसमें किसी प्रकारकी हीनाधिकता न हो , शान्त अर्थात् क्षोभ रहित, अच्युत अर्थात् जो अपने रूपसे कभी च्युत न हो, चरम शरीरसे किञ्चित् न्यून अर्थात् जिस शरीरसे मोक्ष हुआ है, उस शरीरसे नासिकादि रन्ध्र प्रदेशोंसे हीन, अपने घनीभूत प्रदेशोंसे स्थित तथा लोकाकाशके अग्रभागमें स्थित, शिवीभूत अर्थात् पहले अकल्याणरूप थे अब कल्याणरूप हुए ऐसे, अनामय अर्थात् रोगादिकसे सर्वथा रहित और पुरुषाकारको प्राप्त होकर भी अमूर्त अर्थात् आकार तो पुरुषका है परन्तु तो भी उसमें रूप रस गंध स्पर्शादिक नहीं है ऐसे परमात्माका ध्यान इस रूपातीत ध्यानमें करे ॥२२-२३॥


निष्कलस्य विशुद्धस्य निष्पन्नस्य जगद्गुरोः ।
चिदानन्दमयस्योच्चैः कथं स्यात्पुरुषाकृतिः ॥24॥

अर्थ: जो परमात्मा निष्कल अर्थात् देहरहित है, विशुद्ध अर्थात् द्रव्यभावरूप दोनों मलोंसे रहित है, निष्पन्न अर्थात् जिसमें कुछ हीनाधिकता होनेवाली नहीं है, जो जगतका गुरु है और जो चिदानन्द स्वरूप अर्थात् चैतन्य और आनन्द स्वरूप है, महान् है, ऐसे परमात्माके पुरुषाकृति अर्थात् पुरुषका आकार कैसे हो सकता है ? ।


विनिर्गतमधूच्छिष्टप्रतिमे मूषिकोदरे ।
यादृग्गगनसंस्थानं तदाकारं स्मरेद्विभुम् ॥25॥

अर्थ: जिससे मोम निकल गया है ऐसी मूषिकाके उदरमें जैसा आकाशका आकार है, तदाकार परमात्मा प्रभुका ध्यान करे ।


सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
विशुद्धादर्शसंक्रान्तप्रतिबिम्बसमप्रभम् ॥26॥

अर्थ: समस्त अवयवोंसे पूर्ण और समस्त लक्षणोंसे लक्षित ऐसे निर्मल दर्पणमें पडते हुए प्रतिबिम्बके समान प्रभावाले परमात्माका चिन्तवन करे।


इत्यसौ सन्तताभ्यासवशात्संजातनिश्चयः ।
अपि स्वप्नाद्यवस्थासु तमेवाध्यक्षमीक्षते ॥27॥

अर्थ: इस प्रकार जिसके निरन्तर अभ्यासके वशसे निश्चय हो गया है ऐसा ध्यानी स्वप्नादिक अवस्थामें भी उसी परमात्माको प्रत्यक्ष देखता है।


सोऽहं सकलवित्सार्वः सिद्धः साध्यो भवच्युतः ।
परमात्मा परंज्योतिर्विश्वदर्शी निरञ्जनः ॥28॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकारसे जब परमात्माका निश्चय हो जाता है और दृढ अभ्याससे उसका प्रत्यक्ष होने लगता है, उस समय परमात्माका चिन्तवन इस प्रकार करे कि ऐसा परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सर्वज्ञ हूँ, सर्वव्यापक हूँ, सिद्ध हूँ, तथा मैं ही साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य था; संसारसे रहित, परमात्मा, परमज्योतिस्वरूप, समस्त विश्वका देखनेवाला मैं ही हूँ, मैं ही निरंजन हूँ। ऐसा परमात्माका ध्यान करे; उस समय अपना स्वरूप निश्चल, अमूर्त्त अर्थात् शरीररहित, निष्कलङ्क, जगतका गुरु चैतन्यमात्र और ध्यान तथा ध्याताके भेदरहित ऐसा अतिशय स्फुरायमान होता है ॥२८-२९॥


तदासौ निश्चलोऽमूर्त्तो निष्कलङ्को जगद्गुरुः ।
चिन्मात्रो विस्फुरत्युच्चैर्ध्यानध्यातृविवर्जितः ॥29॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकारसे जब परमात्माका निश्चय हो जाता है और दृढ अभ्याससे उसका प्रत्यक्ष होने लगता है, उस समय परमात्माका चिन्तवन इस प्रकार करे कि ऐसा परमात्मा मैं ही हूँ, मैं ही सर्वज्ञ हूँ, सर्वव्यापक हूँ, सिद्ध हूँ, तथा मैं ही साध्य अर्थात् सिद्ध करने योग्य था; संसारसे रहित, परमात्मा, परमज्योतिस्वरूप, समस्त विश्वका देखनेवाला मैं ही हूँ, मैं ही निरंजन हूँ। ऐसा परमात्माका ध्यान करे; उस समय अपना स्वरूप निश्चल, अमूर्त्त अर्थात् शरीररहित, निष्कलङ्क, जगतका गुरु चैतन्यमात्र और ध्यान तथा ध्याताके भेदरहित ऐसा अतिशय स्फुरायमान होता है ॥२८-२९॥


पृथग्भावमतिक्रम्य तथैक्यं परमात्मनि ।
प्राप्नोति स मुनिः साक्षाद्यथान्यत्वं न बुध्यते ॥30॥

अर्थ: यह मुनि जिस समय पूर्वोक्त प्रकारसे परमात्माका ध्यान करता है उस समय परमात्मामें पृथक् भाव अर्थात् अलगपनेका उल्लंघन करके साक्षात् एकताको इस तरह प्राप्त हो जाता है कि जिससे पृथक्पनेका बिलकुल भान नहीं होता ।


इतिविगतविकल्पं क्षीणरागादिदोषं विदितसकलवेद्यं त्यक्तविश्वप्रपञ्चम् ।
शिवमजमनवद्यं विश्वलोकैकनाथं परमपुरुषमुच्चैर्भावशुद्ध्या भजस्व ॥31॥

अर्थ: यहाँ आचार्य विशेष उपदेशरूप प्रेरणा करते हैं कि हे मुने, इस प्रकार जिसके समस्त विकल्प दूर हो गये हैं, जिसके रागादिक सब दोष क्षीण हो चुके हैं, जो जानने योग्य समस्त पदार्थोंका जाननेवाला है, जिसने संसारके समस्त प्रपञ्च छोड दिये हैं, जो शिव अर्थात् कल्याण स्वरूप अथवा मोक्ष स्वरूप हैं, जो अज अर्थात् जिसको आगे जन्म मरण नहीं करना है, जो अनवद्य अर्थात् पापोंसे रहित है तथा जो समस्त लोकका एक अद्वितीय नाथ है ऐसे परम पुरुष परमात्माको भावोंकी शुद्धता पूर्वक अतिशय करके भज।

सर्ग 41: धर्मध्यान के फल का वर्णन (श्लोक 1 से 27)

प्रसीद शान्तिं व्रज सन्निरुद्ध्यतां दुरन्तजन्मज्वरजिह्मितं मनः ।
अगाधजन्मार्णवपारवर्तिनां यदि श्रियं वाञ्छसि विश्वदर्शिनाम् ॥1॥

अर्थ: हे आत्मन्, यदि तू अगाध संसाररूपी समुद्रके पारवर्त्ती और समस्त लोकालोकके देखनेवाले ऐसे अरहंत और सिद्ध भगवानकी लक्ष्मीकी इच्छा करता है तो प्रसन्न हो, शान्तता धारण कर और तुरन्त संसाररूप ज्वरसे मूर्छित मनको वश कर ।


यदि रोद्धुं न शक्नोति तुच्छवीर्यो मुनिर्मनः ।
तदा रागेतरध्वंसं कृत्वा कुर्यात्सुनिश्चलम् ॥2॥

अर्थ: और तुच्छवीर्य मुनि अर्थात् सामर्थ्यहीन मुनि यदि अपने मनको वश नहीं कर सके तो रागद्वेषका नाश करके मनको निश्चल करे ।


अनुप्रेक्षाश्च धर्मस्य स्युः सदैव निबन्धनम् ।
चित्तभूमौ स्थिरीकृत्य स्वस्वरूपं निरूपय ॥3॥

अर्थ: हे मुने ! अनित्य अशरणादिक बारह अनुप्रेक्षा अर्थात् अनित्यादिकका चिन्तवन करना सदा धर्मध्यानका कारण है, इसलिये अपनी चित्तरूपी भूमिमें उन अनुप्रेक्षाओंको स्थिर करके अपने स्वरूपका अवलोकन कर ।


स्फोटयत्याशु निष्कम्पो यथा दीपो घनं तमः ।
तथा कर्मकलङ्कौघं मुनेर्ध्यानं सुनिश्चलम् ॥4॥

अर्थ: जैसे निष्कम्प अर्थात् अचल दीपक सघन अन्धकारको शीघ्र ही दूर कर देता है, उसी तरह मुनिका सुनिश्चल ध्यान भी कर्मकलंकके समूहको शीघ्र ही नाश करता है ।


चलत्येवाल्पसत्त्वानां क्रियमाणमपि स्थिरम् ।
चेतः शरीरिणां शश्वद्विषयैर्व्याकुलीकृतम् ॥5॥

अर्थ: अल्पवीर्य अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियोंका मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयोंसे व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है, इसलिये अतिशय अल्पचित्तवालों का शुक्लध्यान करनेमें अधिकार नहीं है । प्राचीन मुनियोंने पहलेके (वज्रवृषभनाराच) संहननवालेके ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहननवालेका ही चित्त ऐसा है कि शरीरको छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने आत्माको उस शरीरसे अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकालके पवन आदिक दुःखोंसे चलायमान होता है, तथा उस ध्यानके समय लेपकी मूर्ति अर्थात् रंगसे निकली हुई चित्रामकी मूर्तिकी तरह हो जाता है । इस कारण यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूँघता है और न कुछ स्पर्श किये हुएको जानता है ।


न स्वामित्वमतः शुक्ले विद्यतेऽत्यल्पचेतसाम् ।
आद्यसंहननस्यैव तत्प्रणीतं पुरातनैः ॥6॥

अर्थ: अल्पवीर्य अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियोंका मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयोंसे व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है, इसलिये अतिशय अल्पचित्तवालों का शुक्लध्यान करनेमें अधिकार नहीं है । प्राचीन मुनियोंने पहलेके (वज्रवृषभनाराच) संहननवालेके ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहननवालेका ही चित्त ऐसा है कि शरीरको छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने आत्माको उस शरीरसे अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकालके पवन आदिक दुःखोंसे चलायमान होता है, तथा उस ध्यानके समय लेपकी मूर्ति अर्थात् रंगसे निकली हुई चित्रामकी मूर्तिकी तरह हो जाता है । इस कारण यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूँघता है और न कुछ स्पर्श किये हुएको जानता है ।


छिन्ने भिन्ने हते दग्धे देहे स्वमिव दूरगम् ।
प्रपश्यन् वर्षवातादिदुःखैरपि न कम्पते ॥7॥

अर्थ: अल्पवीर्य अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियोंका मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयोंसे व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है, इसलिये अतिशय अल्पचित्तवालों का शुक्लध्यान करनेमें अधिकार नहीं है । प्राचीन मुनियोंने पहलेके (वज्रवृषभनाराच) संहननवालेके ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहननवालेका ही चित्त ऐसा है कि शरीरको छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने आत्माको उस शरीरसे अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकालके पवन आदिक दुःखोंसे चलायमान होता है, तथा उस ध्यानके समय लेपकी मूर्ति अर्थात् रंगसे निकली हुई चित्रामकी मूर्तिकी तरह हो जाता है । इस कारण यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूँघता है और न कुछ स्पर्श किये हुएको जानता है ।


न पश्यति तदा किञ्चिन्न शृणोति न जिघ्रति ।
स्पृष्टं किञ्चिन्न जानाति साक्षान्निर्वृत्तलेपवत् ॥8॥

अर्थ: अल्पवीर्य अर्थात् सामर्थ्यहीन प्राणियोंका मन स्थिर करते हुए भी निरन्तर विषयोंसे व्याकुल होता हुआ चलायमान होता ही है, इसलिये अतिशय अल्पचित्तवालों का शुक्लध्यान करनेमें अधिकार नहीं है । प्राचीन मुनियोंने पहलेके (वज्रवृषभनाराच) संहननवालेके ही शुक्लध्यान कहा है । इसका कारण यह है कि इस संहननवालेका ही चित्त ऐसा है कि शरीरको छेदने, भेदने, मारने और जलाने पर भी अपने आत्माको उस शरीरसे अत्यन्त दूर अर्थात् भिन्न देखता हुआ चलायमान नहीं होता, और न वर्षाकालके पवन आदिक दुःखोंसे चलायमान होता है, तथा उस ध्यानके समय लेपकी मूर्ति अर्थात् रंगसे निकली हुई चित्रामकी मूर्तिकी तरह हो जाता है । इस कारण यह योगी न तो कुछ देखता है, न कुछ सुनता है, न कुछ सूँघता है और न कुछ स्पर्श किये हुएको जानता है ।


आद्यसंहननोपेता निर्वेदपदवीं श्रिताः ।
कुर्वन्ति निश्चलं चेतः शुक्लध्यानक्षमं नराः ॥9॥

अर्थ: जिनके आदिका संहनन है और जो वैराग्य पदवीको प्राप्त हुए हैं, ऐसे पुरुष ही अपने चित्तको शुक्लध्यान करनेमें समर्थ ऐसा निश्चल करते हैं ।


सामग्र्योरुभयोर्ध्यातुर्ध्यानं बाह्यान्तरङ्ग्योः ।
पूर्वयोरेव शुक्लं स्यान्नान्यथा जन्मकोटिषु ॥10॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्व कही हुई बाह्य और आभ्यन्तर अर्थात् आदिके संहनन और वैराग्यभाव इन दोनों सामग्रियोंसे ध्यान करनेवालेके शुक्लध्यान होता है; अन्यथा अर्थात् विना आदिके संहनन और वैराग्यभावके, करोडों जन्मोंमें भी नहीं हो सकता ।


अतिक्रम्य शरीरादिसङ्गा नात्मन्यवस्थितः ।
नैवाक्षमनसोर्योगं करोत्येकाग्रताश्रितः ॥11॥

अर्थ: धर्मध्यान करनेवाला शरीरादि परिग्रहोंको छोड, आत्मामें अवस्थित होता हुआ, एकाग्रताको धारण कर, इन्द्रिय व मनका संयोग नहीं करता अर्थात् इन्द्रियोंसे जो पदार्थोंका ग्रहण होता है, उनका मनसे संयोग नहीं करता; मनको केवल स्वरूपमें ही स्थिर रखता है ।


असंख्येयमसंख्येयं सद्दृष्ट्यादिगुणेऽपि च ।
क्षीयते क्षपकस्यैव कर्मजातमनुक्रमात् ॥12॥

अर्थ: इस धर्मध्यानमें कर्मोंका क्षय करनेवाले क्षपकके सद्दृष्टि अर्थात् सम्यग्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थानसे लेकर सातवें अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त अनुक्रमसे असंख्यातगुणा कर्मका समूह क्षय होता है, और जो कर्मोंका उपशम करनेवाला उपशमक है, उसके क्रमसे असंख्यात असंख्यातगुणा कर्मका समूह उपशम होता है, इसलिये ऐसा धर्मध्यानी आतंक दाहादि दुःखोंसे रहित होता हुआ उपशमभावरूप सुखको प्राप्त होता है ।


शमकस्य क्रमात् कर्म शान्तिमायाति पूर्ववत् ।
प्राप्नोति निर्गतातङ्कः स सौख्यं शमलक्षणम् ॥13॥

अर्थ: इस धर्मध्यानमें कर्मोंका क्षय करनेवाले क्षपकके सद्दृष्टि अर्थात् सम्यग्दृष्टि नामक चौथे गुणस्थानसे लेकर सातवें अप्रमत्त गुणस्थान पर्यन्त अनुक्रमसे असंख्यातगुणा कर्मका समूह क्षय होता है, और जो कर्मोंका उपशम करनेवाला उपशमक है, उसके क्रमसे असंख्यात असंख्यातगुणा कर्मका समूह उपशम होता है, इसलिये ऐसा धर्मध्यानी आतंक दाहादि दुःखोंसे रहित होता हुआ उपशमभावरूप सुखको प्राप्त होता है ।


धर्मध्यानस्य विज्ञेया स्थितिरान्तर्मुहूर्त्तिकी ।
क्षयोपशमिको भावो लेश्या शुक्लैव शाश्वती ॥14॥

अर्थ: इस धर्मध्यानकी स्थिति अन्तर्मुहूर्त्त हैं, इसका भाव क्षायोपशमिक है और लेश्या सदा शुक्ल ही रहती है ।


इदमत्यन्तनिर्वेदविवेकप्रशमोद्भवम् ।
स्वात्मानुभवमत्यक्षं योजयत्यङ्गिनां सुखम् ॥15॥

अर्थ: यह धर्मध्यान जीवोंको अत्यन्त निर्वेद अर्थात् संसार देह भोगादिकोंसे अत्यन्त वैराग्य तथा विवेक अर्थात् भेदज्ञान और प्रशम अर्थात् मंदकषाय इनसे उत्पन्न होनेवाले अपने आत्माके ही अनुभवमें आनेवाले और इन्द्रियोंसे अतीत अर्थात् अतीन्द्रिय ऐसे सुखको प्राप्त करता है ।


अथावसाने स्वतनुं विहाय ध्यानेन संन्यस्तसमस्तसङ्गाः ।
ग्रैवेयकानुत्तरपुण्यवासे सर्वार्थसिद्धौ च भवन्ति भव्याः ॥16॥

अर्थ: जो भव्य पुरुष इस पर्यायके अन्तसमयमें समस्त परिग्रहोंको छोडकर, धर्मध्यानसे अपना शरीर छोडते हैं, वे पुरुष पुण्यके स्थानरूप ऐसे ग्रैवेयक और अनुत्तर विमानोंमें तथा सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न होते है ।


तत्रात्यन्तमहाप्रभावकलितं लावण्यलीलान्वितं
स्रग्भूषाम्बरदिव्यलाञ्छनचितं चन्द्रावदातं वपुः ।
संप्राप्योन्नतवीर्यबोधसुभगं कामज्वरार्त्तिच्युतं
सेवन्ते विगतान्तरायमतुलं सौख्यं चिरं स्वर्गिणः ॥17॥

अर्थ: जो जीव धर्मध्यानके प्रभावसे स्वर्गमें उत्पन्न होते हैं, वे वहाँ अत्यन्त महाप्रभाव सहित, सुन्दरता और क्रीडायुक्त तथा माला, भूषण, वस्त्र और दिव्य लक्षणादि सहित, चन्द्रमासदृश शुक्लवर्ण शरीरको पा कर, उन्नत वीर्य और ज्ञानसे सुभग, कामज्वरकी वेदनासे रहित और अन्तराय रहित ऐसे अतुल सुखोंको चिरकाल पर्यन्त भोगते हैं ।


ग्रैवेयकानुत्तरवासभाजां विचारहीनं सुखमत्युदारम् ।
निरन्तरं पुण्यपरम्पराभिर्विवर्द्धते वार्द्धिरिवेन्दुपादैः ॥18॥

अर्थ: ग्रैवेयक व अनुत्तरादि विमानोंमें रहनेवाले देवोंका सुख कामसेवनसे रहित होता है अर्थात् उनके कामसेवन सर्वथा नहीं है तथापि उनका सुख अत्यन्त उदार है, और वह जैसे चन्द्रमाकी किरणोंसे समुद्र बढता है, वैसे ही निरन्तर पुण्यकी परम्परासे बढता ही रहता है ।


देवराज्यं समासाद्य यत्सुखं कल्पवासिनाम् ।
निर्विशन्ति ततोऽनन्तं सौख्यं कल्पातिवर्त्तिनः ॥19॥

अर्थ: इन्द्रपदको पाने पर कल्पवासियोंको जो सुख मिलता है, उससे अनन्त गुणा सुख कल्पातीतों (नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश और विजयादिक पाँच विमानोंमें रहनेवाले अहमिन्द्रों) को प्राप्त होता है ।


संभवन्त्यथ कल्पेषु तेष्वचिन्त्यविभूतिदम् ।
प्राप्नुवन्ति परं सौख्यं सुराः स्त्रीभोगलाञ्छितम् ॥20॥

अर्थ: अथवा धर्मध्यानसे पर्याय छोड कर, जो उन कल्पस्वर्गों (सोलह स्वर्गों) में उत्पन्न होते हैं वे देव भी अचिन्त्य विभूतिके देनेवाले और स्त्रियोंके भोगों सहित उत्कृष्ट सुखको प्राप्त होते हैं ।


दशाङ्गभोगसम्भूतं महाष्टगुणवर्द्धितम् ।
यत्कल्पवासिनां सौख्यं तद्वक्तुं केन पार्यते ॥21॥

अर्थ: कल्पवासी देवोंका सुख दशाङ्ग भोगोंसे उत्पन्न हुआ है और अणिमादिक आठ महागुणोंसे बढा हुआ है; इसलिये उस सुखका कौन वर्णन कर सकता है ? ।


सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तं सर्वाभ्युदयभूषितम् ।
नित्योत्सवयुतं दिव्यं दिवि सौख्यं दिवौकसाम् ॥22॥

अर्थ: स्वर्गमें देवोंका सुख सर्वद्वन्द्व अर्थात् क्षोभोंसे रहित है, समस्त अभ्युदयोंसे भूषित, नित्य उत्सवों सहित और दिव्य है ।


प्रतिसमयमुदीर्णं स्वर्गसाम्राज्यरूढं सकलविषयबीजं स्वान्तदत्ताभिनन्दम् ।
ललितयुवतिलीलालिङ्गनादिप्रसूतं सुखमतुलमुदारं स्वर्गिणो निर्विशन्ति ॥23॥

अर्थ: स्वर्गके देव प्रत्येक समयमें उदयरूप अर्थात् विच्छेद रहित, स्वर्गके साम्राज्यसे प्रसिद्ध, समस्त विषयोंका कारण, अन्तःकरणको आनन्द देनेवाले, सुन्दर देवाङ्गनाओंकी लीला और आलिंगनादिकसे उत्पन्न, अतुल और उदार सुखका अनुभव करते हैं ।


सर्वाभिमतभावोत्थं निर्विघ्नं स्वःसुखामृतम् ।
सेव्यमाना न बुद्ध्यन्ते गतं जन्म दिवौकसः ॥24॥

अर्थ: स्वर्गनिवासी देव अपने समस्त मनोवांछित पदार्थोंसे उत्पन्न और निर्विघ्न ऐसे स्वर्गके सुखरूप अमृतका सेवन करते हुए व्यतीत हुए जन्मको अर्थात् गये हुए देवपर्यायको नहीं जानते ।


तस्माच्च्युत्वा त्रिदिवपटलाद्दिव्यभोगावसाने
कुर्वन्त्यस्यां भुवि नरनुते पुण्यवंशेऽवतारम् ।
तत्रैश्वर्यं परमवपुषं प्राप्य देवोपनीतै -
र्भोगैर्नित्योत्सवपरिणतैर्लाल्यमाना वसन्ति ॥25॥

अर्थ: फिर वे स्वर्गके देव दिव्य भोगोंको भोग कर, उस स्वर्गपटलसे च्युत होते हैं और इस भूमंडलमें जिसको लोग नमस्कार करते हैं ऐसे उत्तम पुण्य वंशमें अवतार लेते हैं; और वहाँ भी परम (उत्कृष्ट) शरीर और ऐश्वर्यको पाकर, नित्य उत्सवरूप परिणत ऐसे देवोपनीत अनेक भोगोंसे लालित और पुष्ट हुए निवास करते हैं । यह सब धर्मध्यानका फल है ।


ततो विवेकमालम्ब्य विरज्य जननभ्रमात् ।
त्रिरत्नशुद्धिमासाद्य तपः कृत्वान्यदुष्करम् ॥26॥

अर्थ: उसके बाद अर्थात् उत्तम मनुष्य भवके सुख भोग कर, पुनः भेदज्ञान ( शरीरादिकसे आत्माकी भिन्नता) को अवलंबन कर, संसारके परिभ्रमणसे विरक्त हो, रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्रको प्राप्त कर, दुर्धर तप कर तथा अपनी शक्तिके अनुसार धर्मध्यान और शुक्लध्यानको धारण कर और समस्त कर्मोंका नाश कर, अविनाशी मोक्षपदको प्राप्त होते हैं । यह धर्मध्यानका परंपरारूप फल है । इस प्रकार धर्मध्यानका फल निरूपण किया ॥२६-२७॥


धर्मध्यानं च शुक्लं च स्वीकृत्य निजवीर्यतः ।
कृत्स्नकर्मक्षयं कृत्वा व्रजन्ति पदमव्ययम् ॥27॥

अर्थ: उसके बाद अर्थात् उत्तम मनुष्य भवके सुख भोग कर, पुनः भेदज्ञान ( शरीरादिकसे आत्माकी भिन्नता) को अवलंबन कर, संसारके परिभ्रमणसे विरक्त हो, रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्रको प्राप्त कर, दुर्धर तप कर तथा अपनी शक्तिके अनुसार धर्मध्यान और शुक्लध्यानको धारण कर और समस्त कर्मोंका नाश कर, अविनाशी मोक्षपदको प्राप्त होते हैं । यह धर्मध्यानका परंपरारूप फल है । इस प्रकार धर्मध्यानका फल निरूपण किया ॥२६-२७॥

सर्ग 42: शुक्लध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 88)

रागाद्युग्ररुजाकलापकलितं सन्देहलोलायितं
विक्षिप्तं सकलेन्द्रियार्थगहने कृत्वा मनो निश्चलम् ।
संसारव्यसनप्रबन्धविलयं मुक्तेर्विनोदास्पदं
धर्मध्यानमिदं विदन्तु निपुणां अत्यक्षसौख्यार्थिनः ॥1॥

अर्थ: अतीन्द्रिय सुखके चाहनेवाले निपुण मुनि प्रथम ही रागादिक तीव्र रोगोंके समूहोंसे व्याप्त, अनेक सन्देहोंसे चलायमान अर्थात् जब तक निर्णय न हो तब तक स्थिर न रहनेवाले और समस्त इन्द्रियोके विषयरूप गहन वनमें विक्षिप्त अर्थात् भूले हुए मनको निश्चल करते हैं; संसारके कष्ट आपत्ति आदि व्यसनोंके प्रबंधसे रहित और मुक्तिके क्रीडा करनेका स्थान ऐसे इस ध्यानको धर्मध्यान कहते हैं ।


आत्मार्थं श्रय मुञ्च मोहगहनं मित्रं विवेकं कुरु
वैराग्यं भज भावयस्व नियतं भेदं शरीरात्मनोः ।
धर्मध्यानसुधासमुद्रकुहरे कृत्वावगाहं परं
पश्यानन्तसुखस्वभावकलितं मुक्तेर्मुखाम्भोरुहम् ॥2॥

अर्थ: हे आत्मन्, तू आत्माके प्रयोजनका आश्रय कर अर्थात् और प्रयोजनोंको छोड कर केवल आत्माके प्रयोजनका ही आश्रय कर, तथा मोहरूपी वनको छोड, विवेक अर्थात् भेदज्ञानको मित्र बना, संसार देह भोगोंसे वैराग्यका सेवन कर, और परमार्थसे जो शरीर और आत्मामें भेद है उसका निश्चयसे चिन्तवन कर, और धर्मध्यानरूपी अमृतके समुद्रके कुहर (मध्य) में परम अवगाहन (स्नान) करके अनन्त सुख स्वभाव सहित मुक्तिके मुखकमलको देख ।


अथ धर्ममतिक्रान्तः शुद्धिं चात्यन्तिकीं श्रितः ।
ध्यातुमारभते वीरः शुक्लमत्यन्तनिर्मलम् ॥3॥

अर्थ: इस धर्मध्यानके अनन्तर धर्मध्यानसे अतिक्रान्त होकर अर्थात् निकलकर, अत्यन्त शुद्धताको प्राप्त हुआ धीर वीर मुनि अत्यन्त निर्मल शुक्लध्यानके ध्यावनेका प्रारम्भ करता है ।


निष्क्रियं करणातीतं ध्यानधारणवर्जितम् ।
अन्तर्मुखं च यच्चित्तं तच्छुक्लमिति पठ्यते ॥4॥

अर्थ: जो निष्क्रिय अर्थात् क्रिया रहित है, इन्द्रियातीत है और ध्यानकी धारणासे रहित है अर्थात् ‘‘मैं इसका ध्यान करूँ’’ ऐसी इच्छासे रहित है और जिसमें चित्त अन्तर्मुख अर्थात् अपने स्वरूपके ही सन्मुख है; उसको शुक्लध्यान कहते हैं ।


आदिसंहननोपेतः पूर्वज्ञः पुण्यचेष्टितः ।
चतुर्विधमपि ध्यानं स शुक्लं ध्यातुमर्हति ॥5॥

अर्थ: जिसके प्रथम वज्रवृषभनाराच संहनन है, जो पूर्व अर्थात् ग्यारह अंग व चौदह पूर्वका जाननेवाला है और जिसकी पुण्यरूप चेष्टा है अर्थात् शुद्धचारित्र है, वही मुनि चारों प्रकारके शुक्ल ध्यानोंको धारण करने योग्य होता है ।


कषायमलविश्लेषात्प्रशमाद्वा प्रसूयते ।
यतः पुंसामतस्तज्ज्ञैः शुक्लमुक्तं निरुक्तिकम् ॥6॥

अर्थ: पुरुषोंके कषायरूपी मलके क्षय होनेसे अथवा उपशम होनेसे यह शुक्लध्यान होता है; इसलिये उस ध्यानके जाननेवाले आचार्योंने इसका नाम शुक्ल ऐसा निरुक्तिपूर्वक अर्थात् सार्थक कहा है ।


छद्मस्थयोगिनामाद्ये द्वे तु शुक्ले प्रकीर्त्तिते ।
द्वे त्वन्त्ये क्षीणदोषाणां केवलज्ञानचक्षुषाम् ॥7॥

अर्थ: शुक्लध्यानके पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति, व्युपरतक्रियानिवृत्ति ऐसे चार भेद हैं । उनमेंसे पहिलेके दो अर्थात् पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क तो छद्मस्थ योगी अर्थात् बारहवें गुणस्थान पर्यन्त अल्पज्ञानियोंके होते हैं; और अन्तके दो शुक्लध्यान सर्वथा रागादि दोषोंसे रहित ऐसे केवलज्ञानियोंके होते हैं ।


श्रुतज्ञानार्थसम्बन्धाच्छ्रुतालम्बनपूर्वके ।
पूर्वे परे जिनेन्द्रस्य निःशेषालम्बनच्युते ॥8॥

अर्थ: प्रथमके दो शुक्लध्यान जो कि छद्मस्थोंके होते हैं, वे श्रुतज्ञानके अर्थके संबंधसे श्रुतज्ञानके आलंबनपूर्वक हैं अर्थात् उनमें श्रुतज्ञानपूर्वक पदार्थका आलंबन होता है; और अन्तके दो शुक्लध्यान जो कि जिनेन्द्रदेवके होते हैं वे समस्त आलंबन रहित होते हैं ।


सवितर्कं सवीचारं सपृथक्त्वं च कीर्त्तितम् ।
शुक्लमाद्यं द्वितीयं तु विपर्यस्तमतोऽपरम् ॥9॥

अर्थ: आदिके दो शुक्लध्यानोंमें पहला शुक्लध्यान वितर्क, वीचार और पृथक्त्व सहित हैं, इसलिये इसका नाम पृथक्त्ववितर्कवीचार है और दूसरा इससे विपर्यस्त है, सो ही कहते हैं ।


सवितर्कमवीचारमेकत्वपदलाञ्छितम् ।
कीर्तितं मुनिभिः शुक्लं द्वितीयमतिनिर्मलम् ॥10॥

अर्थ: दूसरा शुक्लध्यान वितर्कसहित है, परन्तु वीचाररहित है और एक पदसे लाञ्छित अर्थात् सहित है, इसलिये इसका नाम मुनियोंने एकत्ववितर्कावीचार कहा है; यह ध्यान अत्यन्त निर्मल है ।


सूक्ष्मक्रियाप्रतीपाति तृतीयं सार्थनामकम् ।
समुच्छिन्नक्रियं ध्यानं तुर्यमार्यैर्निवेदितम् ॥11॥

अर्थ: तीसरे शुक्लध्यानका सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति ऐसा सार्थक नाम है। इसमें उपयोगकी क्रिया नहीं है, परन्तु कायकी क्रिया विद्यमान है। यह कायकी क्रिया घटते-घटते जब सूक्ष्म रह जाती है तभी यह तीसरा शुक्लध्यान होता है और इससे इसका सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति ऐसा नाम है; और आर्य पुरुषोंने चौथे ध्यानका नाम समुच्छिन्नक्रिय अर्थात् व्युपरतक्रियानिवृत्ति ऐसा कहा है; इसमें कायकी क्रिया भी मिट जाती है ।


तत्र त्रियोगिनामाद्यं द्वितीयं त्वेकयोगिनाम् ।
तृतीयं तनुयोगानां स्यात्तुरीयमयोगिनाम् ॥12॥

अर्थ: शुक्लध्यानके चारों भेदोंमेंसे पहला जो पृथक्त्ववितर्कवीचार है सो मन, वचन, काय इन तीनों योगोंवाले मुनियोंके होता है, क्योंकि इसमें योग पलटते रहते हैं। दूसरा एकत्ववितर्कावीचार किसी एक योगसे ही होता है, क्योंकि इसमें योग पलटते नहीं; योगी जिस योगमें लीन है, वही योग रहता है। तीसरा सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति काययोगवालेके ही होता है, क्योंकि केवली भगवानके केवल काययोगकी सूक्ष्मक्रिया ही है, शेष दो योगोंकी क्रिया नहीं है और चौथा समुच्छिन्नक्रिय अयोगकेवलीके होता है, क्योंकि अयोगकेवलीके योगोंकी क्रियाका सर्वथा अभाव है ।


पृथक्त्वेन वितर्कस्य वीचारो यत्र विद्यते ।
सवितर्कं सवीचारं सपृथक्त्वं तदिष्यते ॥13॥

अर्थ: जिस ध्यानमें पृथक् पृथक् रूपसे वितर्क अर्थात् श्रुतका वीचार अर्थात् संक्रमण होता है अर्थात् जिसमें अलग-अलग श्रुतज्ञान बदलता रहता है, उसको सवितर्क सवीचार सपृथक्त्व ध्यान कहते हैं ।


अवीचारो वितर्कस्य यत्रैकत्वेन संस्थितः ।
सवितर्कमवीचारं तदेकत्वं विदुर्बुधाः ॥14॥

अर्थ: जिस ध्यानमें वितर्कका वीचार (संक्रमण) नहीं होता और जो एक रूपसे ही स्थित हो उसको पंडितजन सवितर्क अवीचार रूप एकत्व ध्यान कहते हैं ।


पृथक्त्वं तत्र नानात्वं वितर्कः श्रुतमुच्यते ।
अर्थव्यञ्जनयोगानां वीचारः संक्रमः स्मृतः ॥15॥

अर्थ: तहाँ नानात्व अर्थात् अनेकपनेको पृथक्त्व कहते हैं, श्रुतज्ञानको वितर्क कहते हैं और अर्थ, व्यञ्जन और योगोंके संक्रमणका नाम वीचार कहा गया है ।


अर्थादर्थान्तरापत्तिरर्थसंक्रान्तिरिष्यते ।
ज्ञेया व्यञ्जनसंक्रान्तिर्व्यञ्जनाद्व्यञ्जने स्थितिः ॥16॥

अर्थ: एक अर्थ (पदार्थ) से दूसरे अर्थकी प्राप्ति होना अर्थसंक्रान्ति है, एक व्यञ्जनसे दूसरे व्यञ्जनमें प्राप्त होकर स्थिर होना व्यञ्जनसंक्रान्ति है, और एक योगसे दूसरे योगमें गमन करना योगसंक्रान्ति है । इस प्रकार विशुद्ध ध्यानके सामर्थ्यसे जिसका मोहनीयकर्म नष्ट हो गया है ऐसे योगीके ये होते हैं ॥१६-१७।


स्यादियं योगसंक्रांतिर्योगाद्योगान्तरे गतिः ।
विशुद्धध्यानसामर्थ्यात्क्षीणमोहस्य योगिनः ॥17॥

अर्थ: एक अर्थ (पदार्थ) से दूसरे अर्थकी प्राप्ति होना अर्थसंक्रान्ति है, एक व्यञ्जनसे दूसरे व्यञ्जनमें प्राप्त होकर स्थिर होना व्यञ्जनसंक्रान्ति है, और एक योगसे दूसरे योगमें गमन करना योगसंक्रान्ति है । इस प्रकार विशुद्ध ध्यानके सामर्थ्यसे जिसका मोहनीयकर्म नष्ट हो गया है ऐसे योगीके ये होते हैं ॥१६-१७।


अर्थादिषु यथा ध्यानी संक्रामत्यविलम्बितम् ।
पुनर्व्यावर्त्तते तेन प्रकारेण स हि स्वयम् ॥18॥

अर्थ: जो ध्यानी अर्थ व्यञ्जन आदि योगोंमें जैसे शीघ्रतासे संक्रमण करता है वह ध्यानी अपने आप पुनः उसी प्रकार लौटता है ।


त्रियोगी पूर्वविद्यः स्यादिदं ध्यायत्यसौ मुनिः ।
सवितर्कं सवीचारं सपृथक्त्वमतो मतम् ॥19॥

अर्थ: जिसके तीनों योग होते हैं और जो पूर्वका जाननेवाला होता है, वह मुनि इस पहले ध्यानको धारण करता है, इसलिये इस ध्यानका नाम सवितर्कसवीचारसपृथक्त्व कहा है ।


अस्याचिन्त्यप्रभावस्य सामर्थ्यात्स प्रशान्तधीः ।
मोहमुन्मूलयत्येव शमयत्यथवा क्षणे ॥20॥

अर्थ: इस अचिन्त्य प्रभाववाले ध्यानके सामर्थ्यसे जिसका चित्त शान्त हो गया है ऐसा ध्यानी मुनि क्षणभरमें मोहनीय कर्मका मूलसे नाश करता है, अथवा उपशम करता है ।


शब्दाच्छब्दान्तरं यायाद्योगं योगान्तरादपि ।
सवीचारमिदं तस्मात्सवितर्कं च लक्ष्यते ॥21॥

अर्थ: यह ध्यान एक शब्दसे दूसरे शब्द पर जाता है और एक योगसे दूँसरे योग पर जाता है इसलिये इसका नाम सवीचारसवितर्क कहते हैं ।


श्रुतस्कन्धमहासिन्धुमवगाह्य महामुनिः ।
ध्यायेत्पृथक्त्ववितर्कवीचारं ध्यानमग्रिमम् ॥22॥

अर्थ: महामुनि द्वादशांग शास्त्ररूप महासमुद्रका अवगाहन करके, इस पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक पहले शुक्लध्यानको ध्यावे ।


एवं शान्तकषायात्मा कर्मकक्षाशुशुक्षणिः ।
एकत्वध्यानयोग्यः स्यात्पृथक्त्वेन जिताशयः ॥23॥

अर्थ: इस प्रकार पृथक्त्व ध्यानसे जिसने अपना चित्त जीत लिया है और जिसके कषाय शान्त हो गये हैं और जो कर्मरूप कक्ष अर्थात् तृणसमूह अथवा वनके दग्ध करनेको अग्निके समान है; ऐसा महामुनि एकत्व ध्यानके योग्य होता है ।


पृथक्त्वे तु यदा ध्यानी भवत्यमलमानसः ।
तदैकत्वस्य योग्यः स्यादाविर्भूतात्मविक्रमः ॥24॥

अर्थ: जिस समय इस ध्यानीका चित्त पृथक्त्व ध्यानके द्वारा कषायमलसे रहित होता है, तब इस ध्यानीका पराक्रम प्रगट होता है और तभी यह एकत्व ध्यानके योग्य होता है।


ज्ञेयं प्रक्षीणमोहस्य पूर्वज्ञस्यामितद्युतेः ।
सवितर्कमिदं ध्यानमेकत्वमतिनिश्चलम् ॥25॥

अर्थ: जिसका मोहनीयकर्म नष्ट हो गया है और जो पूर्वका जाननेवाला है और जिसकी दीप्ति अपरिमित है, उस मुनिके अत्यन्त निश्चल ऐसा यह सवितर्क एकत्व ध्यान होता है ।


अपृथक्त्वमवीचारं सवितर्कं च योगिनः ।
एकत्वमेकयोगस्य जायतेऽत्यन्तनिर्मलम् ॥26॥

अर्थ: किसी एक योगवाले मुनिके पृथक्त्व रहित, वीचार रहित और वितर्क सहित ऐसा यह एकत्व ध्यान अत्यन्त निर्मल होता है ।


द्रव्यं चैकमणुं चैकं पर्यायं चैकमश्रमः ।
चिन्तयत्येकयोगेन यत्रैकत्वं तदुच्यते ॥27॥

अर्थ: जिस ध्यानमें योगी खेद रहित होकर, एक द्रव्यको, एक अणुको अथवा एक पर्यायको एक योगसे चिन्तवन करता है, उसको एकत्व ध्यान कहते हैं ।


अस्मिन् सुनिर्मलध्यानहुताशे प्रविजृम्भिते ।
विलीयन्ते क्षणादेव घातिकर्माणि योगिनः ॥28॥

अर्थ: योगी पुरुषोंके अतिशय निर्मल एकत्ववितर्कअवीचार नामक द्वितीय ध्यानरूपी अग्निके प्रकट होते हुए घातिया कर्म क्षणमात्रमें नष्ट हो जाते हैं ।


दृग्बोधरोधकद्वन्द्वं मोहविघ्नस्य वा परम् ।
स क्षिणोति क्षणादेव शुक्लधूमध्वजार्चिषा ॥29॥

अर्थ: ध्यानी मुनि इस दूसरे शुक्लध्यानरूपी अग्निकी ज्वालासे दर्शन और ज्ञानके आवरण करनेवाले दर्शनावरण, ज्ञानावरण कर्मको और मोहनीय तथा अन्तराय कर्मको क्षणमात्रमें ही नष्ट कर देता है।


आत्मलाभमथासाद्य शुद्धिं चात्यन्तिकीं पराम् ।
प्राप्नोति केवलज्ञानं तथा केवलदर्शनम् ॥30॥

अर्थ: एकत्ववितर्कअवीचार ध्यानसे घातिकर्मका नाश करके, अपने आत्मलाभको प्राप्त होता है और अत्यन्त उत्कृष्ट शुद्धताको पाकर, केवलज्ञान और केवलदर्शनको प्राप्त करता है ।


अलब्धपूर्वमासाद्य तदासौ ज्ञानदर्शने ।
वेत्ति पश्यति निःशेषं लोकालोकं यथास्थितम् ॥31॥

अर्थ: वे ज्ञान और दर्शन दोनों अलब्धपूर्व हैं अर्थात् पहले कभी प्राप्त नहीं हुए थे सो उनको पाकर, उसी समय वे केवली भगवान् समस्त लोक और अलोकको यथावत् देखते और जानते हैं ।


तदा स भगवान् देवः सर्वज्ञः सर्वदोदितः ।
अनन्तसुखवीर्यादिभूतेः स्यादग्रिमं पदम् ॥32॥

अर्थ: जिस समय केवलज्ञानकी प्राप्ति होती है उस समय वे भगवान् सर्वकालमें उदयरूप सर्वज्ञदेव होते हैं, और अनन्त सुख अनन्त वीर्य आदि विभूतिके प्रथम स्थान होते हैं; यह भावमुक्तका स्वरूप है ।


इन्द्रचन्द्रार्कभोगीन्द्रनरामरनतक्रमः ।
विहरत्यवनीपृष्ठं स शीलैश्वर्यलाञ्छितः ॥33॥

अर्थ: इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, धरणेन्द्र, मनुष्य और देवोंसे नमस्कृत हुए हैं चरण जिनके, ऐसे केवली भगवान् शील अर्थात् चौरासी लाख उत्तरगुण और ऐश्वर्य सहित पृथ्वीतलमें विहार करते हैं ।


उन्मूलयति मिथ्यात्वं द्रव्यभावमलं विभुः ।
बोधयत्यपि निःशेषं भव्यराजीवमण्डलम् ॥34॥

अर्थ: वे विभु सर्वज्ञ भगवान् पृथ्वीतलमें विहार करके जीवोंके द्रव्यमल और भावमल रूप मिथ्यात्वका जडसे नाश करते हैं और समस्त भव्यजीवरूपी कमलोंकी मंडली (समूह) को प्रफुल्लित करते हैं ।


ज्ञानलक्ष्मीं तपोलक्ष्मीं लक्ष्मीं त्रिदशयोजिताम् ।
आत्यन्तिकीं च सम्प्राप्य धर्मचक्राधिपो भवेत् ॥35॥

अर्थ: इस शुक्लध्यानके प्रभावसे ज्ञानलक्ष्मी, तपोलक्ष्मी और देवोंकी की हुई समवसरण आदिक लक्ष्मी तथा मोक्षलक्ष्मीको पाकर, धर्मके चक्रवर्ती होते हैं ।


कल्याणविभवं श्रीमान् सर्वाभ्युदयसूचकम् ।
समासाद्य जगद्वन्द्यं त्रैलोक्याधिपतिर्भवेत् ॥36॥

अर्थ: अन्तरंग बहिरंग लक्ष्मी करके सहित केवली भगवान् जगतसे वंदनीय और सब अभ्युदयोंका सूचक ऐसे कल्याणरूप विभव (संपदा) को पाकर, तीनों लोकोंके अधिपति होते हैं ।


तन्नामग्रहणादेव निःशेषा जन्मजा रुजः ।
अप्यनादिसमुद्भूता भव्यानां यान्ति लाघवम् ॥37॥

अर्थ: जिन भगवानके नाम लेनेसे ही भव्य जीवोंके अनादि कालसे उत्पन्न हुए जन्ममरणजन्य समस्त रोग लघु (हलके) हो जाते हैं ।


तदार्हत्त्वं परिप्राप्य स देवः सर्वगः शिवः ।
जायतेऽखिलकर्मौघजरामरणवर्जितः ॥38॥

अर्थ: तब वे सर्वगत और शिव ऐसे भगवान् अरहंतपनेको पाकर, सम्पूर्ण कर्मोंके समूह और जरामरणसे रहित हो जाते हैं।


तस्यैव परमैश्वर्यं चरणज्ञानवैभवम् ।
ज्ञातुं वक्तुमहं मन्ये योगिनामप्यगोचरम् ॥39॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि मैं ऐसा मानता हूँ कि उन सर्वज्ञ भगवानका परम ऐश्वर्य, चारित्र और ज्ञानके विभवका जानना और कहना बडे बडे योगियोंके भी अगोचर है ।


मोहेन सह दुर्द्धर्षे हते घातिचतुष्टये ।
देवस्य व्यक्तिरूपेण शेषमास्ते चतुष्टयम् ॥40॥

अर्थ: केवलीभगवानके जब मोहनीय कर्मके साथ ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय इन चार दुर्द्धर्ष घातिया कर्मोंका नाश हो जाता है तब अवशेष चार अघातिकर्म व्यक्तिरूपसे रहते हैं ।


सर्वज्ञः क्षीणकर्मासौ केवलज्ञानभास्करः ।
अन्तर्मुहूर्त्तशेषायुस्तृतीयं ध्यानमर्हति ॥41॥

अर्थ: कर्मोंसे रहित और केवलज्ञानरूपी सूर्यसे पदार्थोंको प्रकाश करनेवाले ऐसे वे सर्वज्ञ जब अन्तर्मुहूर्त्तप्रमाण आयु बाकी रह जाती है तब तीसरे सूक्ष्मक्रिया-अप्रतिपाति शुक्लध्यानके योग्य होते हैं ।


षण्मासायुषि शेषे संवृत्ता ये जिनाः प्रकर्षेण ।
ते यान्ति समुद्घातं शेषा भाज्याः समुद्घाते ॥42॥

अर्थ: जो जिनदेव उत्कृष्ट छः महीनेकी आयु अवशेष रहते हुए केवली हुए हैं वे अवश्य ही समुद्घात करते हैं और शेष अर्थात् जो छः महीनेसे अधिक आयु रहते हुए केवली हुए हैं वे समुद्घातमें विकल्प रूप हैं ।


यदायुरधिकानि स्युः कर्माणि परमेष्ठिनः ।
समुद्घातविधिं साक्षात्प्रागेवारभते तदा ॥43॥

अर्थ: जब अरहंत परमेष्ठीके आयु कर्म अन्तर्मुहूर्त्तका अवशेष रह जाता है और अन्य तीनों कर्मोंकी स्थिति अधिक होती है तब समुद्घातकी विधि साक्षात् प्रथम ही आरम्भ करते हैं ।


अनन्तवीर्यप्रथितप्रभावो दण्डं कपाटं प्रतरं विधाय ।
स लोकमेनं समयैश्चतुर्भिर्निश्शेषमापूरयति क्रमेण ॥44॥

अर्थ: अनन्त वीर्यके द्वारा जिनका प्रभाव फैला हुआ है ऐसे वे केवली भगवान् क्रमसे दण्ड, कपाट, प्रतर, इन तीन क्रियाओंको तीन समयमें करके चौथे समयमें इस समस्त लोकको पूरण करते हैं ।


तदा स सर्वगः सार्वः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।
विश्वव्यापी विभुर्भर्त्ता विश्वमूर्त्तिर्महेश्वरः ॥45॥

अर्थ: केवली भगवान् जिस समय लोकपूर्ण होते हैं, उस समय उनके सर्वगत, सार्व, सर्वज्ञ, सर्वतोमुख, विश्वव्यापी, विभु, भर्त्ता, विश्वमूर्ति और महेश्वर ये नाम यथार्थ (सार्थक) होते हैं ।


लोकपूरणमासाद्य करोति ध्यानवीर्यतः ।
आयुःसमानि कर्माणि भुक्तिमानीय तत्क्षणे ॥46॥

अर्थ: केवली भगवान् लोकपूरण प्रदेशोंको पाकर, ध्यानके बलसे वेदनीय, नाम और गोत्र इन तीनों अघाति कर्मोंकी स्थिति घटाकर, अर्थात् भोगमें लाकर, आयुकर्मके समान स्थिति करते हैं ।


ततः क्रमेण तेनैव स पश्चाद्विनिवर्त्तते ।
लोकपूरणतः श्रीमान् चतुर्भिः समयैः पुनः ॥47॥

अर्थ: श्रीमान् केवलीभगवान् पुनः लोकपूरण प्रदेशोंसे उसी क्रमसे चार समयोंमें लौटकर स्वस्थ होते हैं।


काययोगे स्थितिं कृत्वा बादरेऽचिन्त्यचेष्टितः ।
सूक्ष्मीकरोति वाक्चित्तयोगयुग्मं स बादरम् ॥48॥

अर्थ: जिनकी चेष्टा अचिन्त्य है ऐसे केवली भगवान् उस समय बादर काययोगमें स्थिति करके, बादर वचनयोग और बादर मनोयोगको सूक्ष्म करते हैं ।


काययोगं ततस्त्यक्त्वा स्थितिमासाद्य तद्द्वये ।
स सूक्ष्मीकुरुते पश्चात् काययोगं च बादरम् ॥49॥

अर्थ: पुनः वे भगवान् कायको छोड कर, वचनयोग और मनोयोगमें स्थिति करके, बादर काययोगको सूक्ष्म करते हैं ।


काययोगे ततः सूक्ष्मे स्थितिं कृत्वा पुनः क्षणात् ।
योगद्वयं निगृह्णाति सद्यो वाक्चित्तसंज्ञकम् ॥50॥

अर्थ: तत्पश्चात् सूक्ष्म काययोगमें स्थिति करके, क्षणमात्रमें उसी समय वचनयोग और मनोयोग दोनोंका निग्रह करते हैं ।


सूक्ष्मक्रियं ततो ध्यानं स साक्षात् ध्यातुमर्हति ।
सूक्ष्मैककाययोगस्थस्तृतीयं यद्धि पठ्यते ॥51॥

अर्थ: तब यह सूक्ष्मक्रिय ध्यानको साक्षात् ध्यान करने योग्य होता है; और वह वहाँ पर सूक्ष्म एक काययोगमें स्थित हुआ उसका ध्यान करता है; यही तृतीय सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपाति ध्यान हैं ।


द्वासप्ततिर्विलीयन्ते कर्मप्रकृतयो द्रुतम् ।
उपान्त्ये देवदेवस्य मुक्तिश्रीप्रतिबन्धकाः ॥52॥

अर्थ: तदनन्तर अयोग गुणस्थानके उपान्त्य अर्थात् अन्त समयके पहले समयमें देवाधिदेवके मुक्तिरूपी लक्ष्मीकी प्रतिबन्धक कर्मोंकी बहत्तर प्रकृति शीघ्र ही नष्ट होती हैं ।


तस्मिन्नेव क्षणे साक्षादाविर्भवति निर्मलम् ।
समुच्छिन्नक्रियं ध्यानमयोगिपरमेष्ठिनः ॥53॥

अर्थ: भगवान् अयोगी परमेष्ठीके उसी अयोग गुणस्थानके उपान्त्य समयमें साक्षात् निर्मल ऐसा समुच्छिन्नक्रिय नामक चौथा शुक्लध्यान प्रगट होता है ।


विलयं वीतरागस्य पुनर्यान्ति त्रयोदश ।
चरमे समये सद्यः पर्यन्ते या व्यवस्थिताः ॥54॥

अर्थ: तत्पश्चात् वीतराग अयोगी केवलीके अयोग गुणस्थानके अन्त समयमें शेष रही हुई तेरह कर्मप्रकृति जो कि अब तक लगी हुई थीं, तत्काल ही विलय हो जाती हैं ।


तदासौ निर्मलः शान्तो निष्कलङ्को निरामयः ।
जन्मजानेकदुर्वारबन्धव्यसनविच्युतः ॥55॥

अर्थ: उस अयोग केवली चौदहवें गुणस्थानमें केवली भगवान् निर्मल, शांत, निष्कलङ्क, निरामय और जन्ममरणरूप संसारके अनेक दुर्निवार बन्धके कष्टोंसे रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न है, तथा ये कर्ममल रहित निरंजन हैं; क्रियारहित हैं, शरीररहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल हैं । इनके यथाख्यात चारित्र प्रगट हुआ है अर्थात् चारित्रकी पूर्णता हुई हैं; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अब अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते और आत्माके दर्शन ज्ञानकी उत्कृष्ट शुद्धताको प्राप्त हुए है; तथा ये मन, वचन, कायके योगोंसे रहित है इसलिये अयोगी है । अत्यंत निर्वृत हैं, इसलिये केवल हैं । इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया हैं इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव-स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं, और उत्कृष्ट प्रभु हैं । उस चौदहवें गुणस्थानमें इतने समय तक ठहरते हैं कि जितने समयमें लघु पाँच अक्षरका अ इ उ ऋ ल का उच्चारण हो और फिर कर्मबन्धसे रहित वे शुद्धात्मा स्वभावसे ही ऊर्ध्वगमन करते हैं ॥५५-५९॥


सिद्धात्मा सुप्रसिद्धात्मा निष्पन्नात्मा निरञ्जनः ।
निष्क्रियो निष्कलः शुद्धो निर्विकल्पोऽतिनिर्मलः ॥56॥

अर्थ: उस अयोग केवली चौदहवें गुणस्थानमें केवली भगवान् निर्मल, शांत, निष्कलङ्क, निरामय और जन्ममरणरूप संसारके अनेक दुर्निवार बन्धके कष्टोंसे रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न है, तथा ये कर्ममल रहित निरंजन हैं; क्रियारहित हैं, शरीररहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल हैं । इनके यथाख्यात चारित्र प्रगट हुआ है अर्थात् चारित्रकी पूर्णता हुई हैं; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अब अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते और आत्माके दर्शन ज्ञानकी उत्कृष्ट शुद्धताको प्राप्त हुए है; तथा ये मन, वचन, कायके योगोंसे रहित है इसलिये अयोगी है । अत्यंत निर्वृत हैं, इसलिये केवल हैं । इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया हैं इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव-स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं, और उत्कृष्ट प्रभु हैं । उस चौदहवें गुणस्थानमें इतने समय तक ठहरते हैं कि जितने समयमें लघु पाँच अक्षरका अ इ उ ऋ ल का उच्चारण हो और फिर कर्मबन्धसे रहित वे शुद्धात्मा स्वभावसे ही ऊर्ध्वगमन करते हैं ॥५५-५९॥


आविर्भूतयथाख्यातचरणोऽनन्तवीर्यवान् ।
परां शुद्धिं परिप्राप्तो दृष्टेर्बोधस्य चात्मनः ॥57॥

अर्थ: उस अयोग केवली चौदहवें गुणस्थानमें केवली भगवान् निर्मल, शांत, निष्कलङ्क, निरामय और जन्ममरणरूप संसारके अनेक दुर्निवार बन्धके कष्टोंसे रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न है, तथा ये कर्ममल रहित निरंजन हैं; क्रियारहित हैं, शरीररहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल हैं । इनके यथाख्यात चारित्र प्रगट हुआ है अर्थात् चारित्रकी पूर्णता हुई हैं; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अब अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते और आत्माके दर्शन ज्ञानकी उत्कृष्ट शुद्धताको प्राप्त हुए है; तथा ये मन, वचन, कायके योगोंसे रहित है इसलिये अयोगी है । अत्यंत निर्वृत हैं, इसलिये केवल हैं । इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया हैं इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव-स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं, और उत्कृष्ट प्रभु हैं । उस चौदहवें गुणस्थानमें इतने समय तक ठहरते हैं कि जितने समयमें लघु पाँच अक्षरका अ इ उ ऋ ल का उच्चारण हो और फिर कर्मबन्धसे रहित वे शुद्धात्मा स्वभावसे ही ऊर्ध्वगमन करते हैं ॥५५-५९॥


अयोगी त्यक्तयोगत्वात्केवलोत्पादनिर्वृतः ।
साधितात्मस्वभावश्च परमेष्ठी परं प्रभुः ॥58॥

अर्थ: उस अयोग केवली चौदहवें गुणस्थानमें केवली भगवान् निर्मल, शांत, निष्कलङ्क, निरामय और जन्ममरणरूप संसारके अनेक दुर्निवार बन्धके कष्टोंसे रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न है, तथा ये कर्ममल रहित निरंजन हैं; क्रियारहित हैं, शरीररहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल हैं । इनके यथाख्यात चारित्र प्रगट हुआ है अर्थात् चारित्रकी पूर्णता हुई हैं; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अब अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते और आत्माके दर्शन ज्ञानकी उत्कृष्ट शुद्धताको प्राप्त हुए है; तथा ये मन, वचन, कायके योगोंसे रहित है इसलिये अयोगी है । अत्यंत निर्वृत हैं, इसलिये केवल हैं । इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया हैं इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव-स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं, और उत्कृष्ट प्रभु हैं । उस चौदहवें गुणस्थानमें इतने समय तक ठहरते हैं कि जितने समयमें लघु पाँच अक्षरका अ इ उ ऋ ल का उच्चारण हो और फिर कर्मबन्धसे रहित वे शुद्धात्मा स्वभावसे ही ऊर्ध्वगमन करते हैं ॥५५-५९॥


लघुपञ्चाक्षरोच्चारकालं स्थित्वा ततः परम् ।
स स्वभावाद्व्रजत्यूर्ध्वं शुद्धात्मा वीतबन्धनः ॥59॥

अर्थ: उस अयोग केवली चौदहवें गुणस्थानमें केवली भगवान् निर्मल, शांत, निष्कलङ्क, निरामय और जन्ममरणरूप संसारके अनेक दुर्निवार बन्धके कष्टोंसे रहित हैं; इनका आत्मा सिद्ध, सुप्रसिद्ध और निष्पन्न है, तथा ये कर्ममल रहित निरंजन हैं; क्रियारहित हैं, शरीररहित हैं, शुद्ध हैं, निर्विकल्प हैं और अत्यन्त निर्मल हैं । इनके यथाख्यात चारित्र प्रगट हुआ है अर्थात् चारित्रकी पूर्णता हुई हैं; और अनन्त वीर्य सहित हैं अर्थात् अब अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते और आत्माके दर्शन ज्ञानकी उत्कृष्ट शुद्धताको प्राप्त हुए है; तथा ये मन, वचन, कायके योगोंसे रहित है इसलिये अयोगी है । अत्यंत निर्वृत हैं, इसलिये केवल हैं । इन्होंने अपना आत्मा सिद्ध कर लिया हैं इसलिए साधितात्मा हैं, तथा स्वभाव-स्वरूप हैं, परमेष्ठी हैं, और उत्कृष्ट प्रभु हैं । उस चौदहवें गुणस्थानमें इतने समय तक ठहरते हैं कि जितने समयमें लघु पाँच अक्षरका अ इ उ ऋ ल का उच्चारण हो और फिर कर्मबन्धसे रहित वे शुद्धात्मा स्वभावसे ही ऊर्ध्वगमन करते हैं ॥५५-५९॥


अवरोधविनिर्मुक्तं लोकाग्रं समये प्रभुः ।
धर्माभावे ततोऽप्यूर्ध्वगमनं नानुमीयते ॥60॥

अर्थ: पश्चात् वे भगवान् ऊर्ध्वगमन कर, एक समयमें ही कर्मकि अवरोध रहित लोकके अग्रभागमें विराजमान होते हैं, लोकाग्र भागसे आगे धर्मास्तिकायका अभाव है, इसलिये इनका आगे गमन नहीं होता, यही अनुमान द्वारा दिखलाते हैं ।


धर्मो गतिस्वभावोऽयमधर्मः स्थितिलक्षणः ।
तयोर्योगात्पदार्थानां गतिस्थिती उदाहृते ॥61॥

अर्थ: जो गतिस्वभाव है अर्थात् गमन करनेमें हेतु है सो धर्मास्तिकाय है और जो स्थिति लक्षणरूप है अर्थात् पदार्थोकी स्थितिमें कारण है सो अधर्मास्तिकाय है, इन दोनोंके निमित्तसे पदार्थोंकी गति और स्थिति कही गई है ।


तौ लोकगमनान्तस्थौ ततो लोके गतिस्थिती ।
अर्थानां न तु लोकान्तमतिक्रम्य प्रवर्त्तते ॥62॥

अर्थ: वे धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय लोकके गमन पर्यन्त स्थित है, इसलिये पदार्थोंकी गति और स्थिति लोकमें ही होती है, लोकका उल्लंघन करके नहीं होती, इसलिये भगवान् लोकाग्रभाग तक ही गमन करते हैं ।


स्थितिमासाद्य सिद्धात्मा तत्र लोकाग्रमन्दिरे ।
आस्ते स्वभावजानन्तगुणैश्वर्योपलक्षितः ॥63॥

अर्थ: सिद्धात्मा उस लोकाग्रमंदिरमें स्थिति पाकर, स्वभावसे उत्पन्न हुए अनन्त गुण और ऐश्वर्य सहित विराजमान रहते हैं ।


आत्यन्तिकं निराबाधमत्यक्षं स्वस्वभावजम् ।
यत्सुखं देवदेवस्य तद्वक्तुं केन पार्यते ॥64॥

अर्थ: सिद्धात्मा देवाधिदेवका जो अत्यन्त, बाधारहित, अतीन्द्रिय और अपने स्वभावसे ही उत्पन्न सुख है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ? ।


तथाप्युद्देशतः किञ्चिद् ब्रवीमि सुखलक्षणम् ।
निष्ठितार्थस्य सिद्धस्य सर्वद्वन्द्वातिवर्त्तिनः ॥65॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जिनके समस्त प्रयोजन सम्पन्न हो चुके हैं और सुखके घातक ऐसे समस्त द्वन्द्वोंसे जो रहित हैं ऐसे सिद्ध भगवानके सुखको यद्यपि कोई नहीं कह सकता; तथापि मैं नाममात्रसे किञ्चित् कहता हूँ ।


ये देवमनुजाः सर्वे सौख्यमक्षार्थसम्भवम् ।
निर्विशन्ति निराबाधं सर्वाक्षप्रीणनक्षमम् ॥66॥

अर्थ: जो समस्त देव और मनुष्य इन्द्रियोंके विषयोंसे उत्पन्न और इन्द्रियोंके तृप्त करनेमें समर्थ ऐसे निराबाध सुखको वर्तमान कालमें भोगते हैं तथा सबने अतीत कालमें जो सुख भोगे हैं और जो सुख महाऋद्धियोंसे उत्पन्न हुए हैं तथा स्वादिष्ट और मनको प्रसन्न करनेवाले जो सुख आगामी कालमें भोगे जायेंगे उन समस्त सुखोंसे अनन्त गुणे अतीन्द्रिय और अपने स्वभावसे उत्पन्न होनेवाले सुखको श्रीसिद्ध भगवान् परमेश्वर एक ही समयमें भोगते हैं ।।६६-६७-६८।।


सर्वेणातीतकालेन यच्च भुक्तं महर्द्धिकम् ।
भाविनो यच्च भोक्ष्यन्ति स्वादिष्टं स्वान्तरञ्जकम् ॥67॥

अर्थ: जो समस्त देव और मनुष्य इन्द्रियोंके विषयोंसे उत्पन्न और इन्द्रियोंके तृप्त करनेमें समर्थ ऐसे निराबाध सुखको वर्तमान कालमें भोगते हैं तथा सबने अतीत कालमें जो सुख भोगे हैं और जो सुख महाऋद्धियोंसे उत्पन्न हुए हैं तथा स्वादिष्ट और मनको प्रसन्न करनेवाले जो सुख आगामी कालमें भोगे जायेंगे उन समस्त सुखोंसे अनन्त गुणे अतीन्द्रिय और अपने स्वभावसे उत्पन्न होनेवाले सुखको श्रीसिद्ध भगवान् परमेश्वर एक ही समयमें भोगते हैं ॥६६-६७-६८॥


अनन्तगुणितं तस्मादत्यक्षं स्वस्वभावजम् ।
एकस्मिन् समये भुङ्क्ते तत्सुखं परमेश्वरः ॥68॥

अर्थ: जो समस्त देव और मनुष्य इन्द्रियोंके विषयोंसे उत्पन्न और इन्द्रियोंके तृप्त करनेमें समर्थ ऐसे निराबाध सुखको वर्तमान कालमें भोगते हैं तथा सबने अतीत कालमें जो सुख भोगे हैं और जो सुख महाऋद्धियोंसे उत्पन्न हुए हैं तथा स्वादिष्ट और मनको प्रसन्न करनेवाले जो सुख आगामी कालमें भोगे जायेंगे उन समस्त सुखोंसे अनन्त गुणे अतीन्द्रिय और अपने स्वभावसे उत्पन्न होनेवाले सुखको श्रीसिद्ध भगवान् परमेश्वर एक ही समयमें भोगते हैं ॥६६-६७-६८॥


त्रिकालविषयाशेषद्रव्यपर्यायसंकुलम् ।
जगत्स्फुरति बोधार्के युगपद्योगिनां पतेः ॥69॥

अर्थ: योगीश्वरोंके पति श्री सिद्ध भगवानके ज्ञानरूपी सूर्यमें भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों काल सम्बन्धी समस्त द्रव्य पर्यायोंसे व्याप्त जो यह जगत् है सो एक ही समयमें स्पष्ट प्रत्यक्ष प्रतिभासित होता है ।


सर्वतोऽनन्तमाकाशं लोकेतरविकल्पितम् ।
तस्मिन्नपि घनीभूय यस्य ज्ञानं व्यवस्थितम् ॥70॥

अर्थ: यह आकाश सर्वतः अनन्त हैं और उसके लोक और अलोक ऐसे दो भेद है, उस समस्त आकाशमें सिद्ध परमेष्ठीका ज्ञान घनीभूत होकर भरा हुआ है ।


निद्रातन्द्राभयभ्रान्तिरागद्वेषार्त्तिसंशयैः ।
शोकमोहजराजन्ममरणाद्यैश्च विच्युतः ॥71॥

अर्थ: श्री सिद्ध भगवान् निद्रा, तन्द्रा, भय, भ्रांति, राग, द्वेष, पीडा और संशयसे रहित हैं तथा शोक, मोह, जरा, जन्म और मरण इत्यादिकसे रहित है ।


क्षुत्तृट्श्रममदोन्मादमूर्च्छामात्सर्यवर्जितः ।
वृद्धिह्रासव्यतीतात्मा कल्पनातीतवैभवः ॥72॥

अर्थ: और क्षुधा, तृषा, खेद, मद, उन्माद, मूर्च्छा और मत्सर भावोंसे रहित हैं और न इनके आत्मामें वृद्धि ह्रास (घटना बढना) है और इनका विभव कल्पनातीत है ।


निष्कलः करणातीतो निर्विकल्पो निरञ्जनः ।
अनन्तवीर्यतापन्नो नित्यानन्दाभिनन्दितः ॥73॥

अर्थ: सिद्ध भगवान् शरीर रहित हैं, इन्द्रित रहित हैं, मनके विकल्पोंसे रहित हैं, निरंजन है अर्थात् उनके नये कर्मोंका बंध नहीं है, अनन्तवीर्यताको प्राप्त हुए हैं अर्थात् अपने स्वभावसे कभी च्युत नहीं होते और नित्य आनन्दसे आनन्दरूप हैं अर्थात् उनके सुखका कभी विच्छेद नहीं होता ।


परमेष्ठी परंज्योतिः परिपूर्णः सनातनः ।
संसारसागरोत्तीर्णः कृतकृत्योऽचलस्थितिः ॥74॥

अर्थ: तथा परमेष्ठी (परम पदमें विराजमान), परंज्योति (ज्ञानप्रकाशरूप), परिपूर्ण, सनातन (नित्य), संसाररूपी समुद्रसे उत्तीर्ण अर्थात् संसारसंबन्धी चेष्टाओंसे रहित, कृतकृत्य (जिनको करना कुछ शेष नहीं है), अचलस्थिति (प्रदेशोंकी क्रियाओंसे रहित) ऐसे सिद्ध भगवान् हैं ।


संतृप्तः सर्वदैवास्ते देवस्त्रैलोक्यमूर्द्धनि ।
नोपमेयं सुखादीनां विद्यते परमेष्ठिनः ॥75॥

अर्थ: पुनः सिद्ध भगवान् संतृप्त है, तृष्णा रहित हैं, तीन लोकके शिखर पर सदा विराजमान हैं अर्थात् गमन रहित हैं । इस संसारमें कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है, जिसकी उपमा परमेष्ठीके सुखको दी जाय अर्थात् उनका सुख निरुपमेय है ।


चरस्थिरार्थसम्पूर्णे मृग्यमाणं जगत्त्रये ।
उपमानोपमेयत्वं मन्ये स्वस्यैव स स्वयम् ॥76॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यदि चर और स्थिर पदार्थोंसे भरे हुए इन तीनों जगतोंमें उपमेय और उपमान ढूँढा जाय तो मैं ऐसा मानता हूँ कि वे स्वयं ही उपमान-उपमेयरूप है ।


यतोऽनन्तगुणानां स्यादनन्तांशोऽपि कस्यचित् ।
ततो न शक्यते कर्तुं तेन साम्यं जगत्त्रये ॥77॥

अर्थ: क्योंकि तीनों जगतमें उन सिद्ध परमेष्ठीके अनन्त गुणोंका अनन्तवाँ अंश भी किसी पदार्थमें नहीं हैं, इसलिये उनकी समानता किसीके साथ नहीं कर सकते ।


शक्यते न यथा ज्ञातुं पर्यन्तं व्योमकालयोः ।
तथा स्वभावजातानां गुणानां परमेष्ठिनः ॥78॥

अर्थ: जैसे कोई आकाश और कालका अंत नहीं जान सकता, उसी तरह स्वभावसे उत्पन्न हुए परमेष्ठीके गुणोंका अन्त भी कोई नहीं जान सकता ।


गगनघनपतङ्गाहीन्द्रचन्द्राचलेन्द्र - क्षितिदहनसमीराम्भोधिकल्पद्रुमाणाम् ।
निचयमपि समस्तं चिन्त्यमानं गुणानां परमगुरुगुणौघैर्नोपमानत्वमेति ॥79॥

अर्थ: आकाश, मेघ, सूर्य, सर्पोंका इन्द्र, चन्द्रमा, मेरु, पृथ्वी, अग्नि, वायु, समुद्र और कल्पवृक्षोंके गुणोंका समस्त समूह भी चिन्तवन किया जाय तो भी उनकी उपमा परम गुरु श्रीसिद्ध परमेष्ठीके गुणोंके साथ नहीं हो सकती ।


नासत्पूर्वाश्च पूर्वा नो निर्विशेषविकारजाः ।
स्वाभाविकविशेषा ह्यभूतपूर्वाश्च तद्गुणाः ॥80॥

अर्थ: सिद्ध परमेष्ठीके गुण पूर्वमें नहीं थे ऐसे नहीं है अर्थात् ‘‘पूर्वमें भी शक्तिरूपसे विद्यमान ही थे, क्योंकि असत्का प्रादुर्भाव नहीं होता यह नियम है । यदि असत्का भी प्रादुर्भाव माना जाय तो शशशृङ्गका भी प्रादुर्भाव होना चाहिये, किन्तु होता नहीं है यही इस नियममें प्रमाण है ।’’ और पूर्वमें व्यक्त नहीं थे तथा विशेष विकारसे उत्पन्न नहीं, किन्तु स्वाभाविक है । इस प्रकार पूर्वार्द्धद्वारा निषेधमुख कथन करके, इसी विषयको पुनः उत्तरार्द्धद्वारा विधिमुखवाक्यसे कहते हैं कि सिद्ध परमेष्ठीके गुण स्वाभाविकविशेष अर्थात् पूर्वमें भी शक्तिकी अपेक्षा स्वभावमें ही विद्यमान और अभूतपूर्व अर्थात् पूर्वमें व्यक्त नहीं हुए ऐसे हैं ।


वाक्पथातीतमाहात्म्यमनन्तज्ञानवैभवम् ।
सिद्धात्मनां गुणग्रामं सर्वज्ञज्ञानगोचरम् ॥81॥

अर्थ: जिसका माहात्म्य वचनोंसे कहने योग्य नहीं है और जिसके अनन्त ज्ञानका विभव है, ऐसे सिद्ध परमेष्ठीके गुणोंका समूह सर्वज्ञके ज्ञानके गोचर है ।


स स्वयं यदि सर्वज्ञः सम्यग्ब्रूते समाहितः ।
तथाप्येति न पर्यन्तं गुणानां परमेष्ठिनः ॥82॥

अर्थ: सर्वज्ञदेव परमेष्ठीके गुणोंको जानते हैं, परन्तु यदि वे उन गुणोंको समाधान सहित अच्छी तरह कहें तो वे भी उनका पार नहीं पा सकेंगे ।


त्रैलोक्यतिलकीभूतं निःशेषविषयच्युतम् ।
निर्द्वन्द्वं नित्यमत्यक्षं स्वादिष्टं स्वस्वभावजम् ॥83॥

अर्थ: श्रीसिद्ध परमेष्ठी परमेश्वर देव समस्त त्रैलोक्यका तिलकस्वरूप, समस्त विषयोंसे रहित, निर्द्वन्द अर्थात् प्रतिपक्षी रहित, अविनाशी, अतीन्द्रिय, स्वादस्वरूप, अपने स्वभावसे ही उत्पन्न, उपमा रहित और विच्छेदरहित ज्ञान और सुखरूपी अमृतको पीते हुए स्थिरीभूत तीनलोकके शिखरपर विराजमान रहते हैं ।


निरौपम्यमविच्छिन्नं स देवः परमेश्वरः ।
तत्रैवास्ते स्थिरीभूतः पिबन् ज्ञानसुखामृतम् ॥84॥

अर्थ: श्रीसिद्ध परमेष्ठी परमेश्वर देव समस्त त्रैलोक्यका तिलकस्वरूप, समस्त विषयोंसे रहित, निर्द्वन्द्व अर्थात् प्रतिपक्षी रहित, अविनाशी, अतीन्द्रिय, स्वादस्वरूप, अपने स्वभावसे ही उत्पन्न, उपमा रहित और विच्छेदरहित ज्ञान और सुखरूपी अमृतको पीते हुए स्थिरीभूत तीनलोकके शिखरपर विराजमान रहते हैं ।


देवः सोऽनन्तवीर्यो दृगवगमसुखानर्घ्यरत्नावकीर्णः ।
श्रीमाँस्त्रैलोक्यमूर्ध्नि प्रतिवसति भवध्वान्तविध्वंसभानुः
स्वात्मोत्थानन्तनित्यप्रवरशिवसुधाम्भोधिमग्नः स देवः ।
सिद्धात्मा निर्विकल्पोऽप्रतिहतमहिमा शश्वदानन्दधामा ॥85॥

अर्थ: जिनके अनन्त वीर्य है अर्थात् प्राप्त स्वभावसे कभी च्युत नहीं होते, जो दर्शन ज्ञान और सुखरूप अमूल्य रत्नों सहित है, जो संसाररूप अन्धकारको दूर कर सूर्यके समान विराजमान है, जो अपने आत्मासे ही उत्पन्न ऐसे अनन्त नित्य उत्कृष्ट शिवसुखरूपी अमृतके समुद्रमें सदा मग्न है, विकल्प रहित हैं, जिसकी महिमा अप्रतिहत (जो किसीसे आहत न होवे) है और जो निरन्तर आनन्दके निवासस्थान हैं ऐसे श्रीसिद्ध परमेष्ठी देव शोभायमान जो तीनों लोकोंका मस्तक (शिखर) हैं उसमें सदा निवास करते हैं ।


इति कतिपयवरवर्णैर्ध्यानफलं कीर्तितं समासेन ।
निःशेषं यदि वक्तुं प्रभवति देवः स्वयं वीरः ॥86॥

अर्थ: ऐसे पूर्वोक्त प्रकार कितने ही श्रेष्ठ अक्षरोंके द्वारा संक्षेपसे ध्यानका फल कहा है; इसका समस्त फल कहनेको स्वयं श्रीवर्द्धमानस्वामी ही समर्थ हो सकते हैं ।


इति जिनपतिसूत्रात्सारमुद्धृत्य किञ्चित्
स्वमतिविभवयोग्यं ध्यानशास्त्रं प्रणीतम् ।
विबुधमुनिमनीषाम्भोधिचन्द्रायमाणं
चरतु भुवि विभूत्यै यावदद्रीन्द्रचन्द्रौ ॥87॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि हमने इस प्रकार जिनेन्द्र देव सर्वज्ञके सूत्रसे थोडासा सार लेकर अपनी बुद्धिके विभवानुसार यह ध्यानका शास्त्र निर्माण किया है; सो यह शास्त्र विद्वान् मुनियोंकी बुद्धिरूप समुद्रको बढानेके लिये चन्द्रमाके समान होता हुआ, जब तक मेरु और चन्द्रमा रहें, तब तक इस पृथ्वीमें अपनी विभूतिके लिये सदा प्रवर्त्ते (यह आचार्यका आशीर्वाद है) ।


ज्ञानार्णवस्य माहात्म्यं चित्ते को वेत्ति तत्त्वतः ।
यज्ज्ञानात्तीर्यते भव्यैर्दुस्तरोऽपि भवार्णवः ॥88॥

अर्थ: भव्य जीव जिसके ज्ञानसे ही अत्यन्त कठिनतासे पार करने योग्य संसाररूप समुद्रके पार हो जाते हैं ऐसे इस ज्ञानार्णव ग्रन्थका माहात्म्य यथार्थ रीतिसे अपने चित्तमें कौन जानता है ? ।