सर्ग 36: संस्थानविचय धर्मध्यान (श्लोक 1 से 186)
अनन्तानन्तमाकाशं सर्वतः स्वप्रतिष्ठितम् ।
तन्मध्येऽयं स्थितो लोकः श्रीमत्सर्वज्ञवर्णितः ॥1॥
अर्थ: प्रथम तो सर्व तरफ (चारों ओर) अनन्तानन्त प्रदेशरूप आकाश है सो वह स्वप्रतिष्ठित है अर्थात् आप ही अपने आधार पर है; क्योंकि उससे बडा अन्य कोई पदार्थ नहीं है जो उसका आधार हो । उस आकाशके मध्य (बीच) में यह लोक स्थित है, सो श्रीमत्सर्वज्ञदेवने वर्णन किया है इस कारण प्रमाणभूत हैं, क्योंकि असत्य कल्पना करके अन्य किसीने नहीं कहा । सर्वज्ञ भगवानने प्रत्यक्ष देखकर, जैसा है वैसा ही, वर्णन किया है ।
स्थित्युत्पत्तिव्ययोपेतैः पदार्थैश्चेतनेतरैः ।
सम्पूर्णोऽनादिसंसिद्धः कर्तृव्यापारवर्जितः ॥2॥
अर्थ: यह लोक ध्राव्य, उत्पाद और व्यय (क्षय) करके संयुक्त चेतन अचेतन पदार्थसे सम्पूर्णतया भरा हुआ है और अनादिसंसिद्ध है। कत्तकि व्यापारसे वर्जित है, अर्थात् कोई अन्यमती इस लोकका कर्ता हर्त्ता ईश्वर आदिको कहते है; तथा कच्छप वा शेषनागके ऊपर स्थित है इत्यादि बुद्धिकल्पित असत्यार्थ कल्पना करके कहते हैं, सो वैसा नहीं है। सर्वज्ञने जैसा कहा है वैसा ही सत्य है ।
ऊर्ध्वाधोमध्यभागैर्यो बिभर्ति भुवनत्रयम् ।
अतः स एव सूत्रज्ञैस्त्रैलोक्याधार इष्यते ॥3॥
अर्थ: तथा यह लोक ऊर्ध्व, मध्य, अधोभागसे तीन भुवनोंको धारण करता है इस कारण सूत्रके जाननेवाले तीन लोक (तीन जगत्) का आधार इस लोकको कहते हैं ।
उपर्युपरि संक्रान्तैः सर्वतोऽपि निरन्तरैः ।
त्रिभिर्वायुभिराकीर्णो महावेगैर्महाबलैः ॥4॥
अर्थ: तथा यह लोक उपरि उपरि (एकके उपरि एक) सर्व तरफसे अन्तररहित महावेगवान महाबलवाले तीन पवनोंसे बेढा हुआ है ।
घनाब्धिः प्रथमस्तेषां ततोऽन्यो घनमारुतः ।
तनुवातस्तृतीयोऽन्ते विज्ञेया वायवः क्रमात् ॥5॥
अर्थ: उन तीन पवनोंमेंसे प्रथम तो यह लोक घनोदधि नाम पवनसे बेढा हुआ है, उसके ऊपर घनवात नामका पवन बेढा हुआ है, उसके ऊपर अन्तमें तनुवात नामका पवन है । इस प्रकार तीन पवनोंसे लोक बेढा हुआ है, इसी कारण इधर-उधर हट नहीं सकता, किंतु आकाशके मध्य भागमें स्थित है ।
उद्धृत्य सकलं लोकं स्वशक्त्यैव व्यवस्थिताः ।
पर्यन्तरहिते व्योम्नि मरुतः प्रांशुविग्रहाः ॥6॥
अर्थ: और ये तीनों पवन तीन लोकांको धारण करके अपनी शक्तिसे ही इस अन्तररहित आकाशमें अपने शरीरको विस्तृत किये हुए स्थित हैं ।
घनाब्धिवलये लोकः स च नान्ते व्यवस्थितः ।
तनुवातान्तरे सोऽपि स चाकाशे स्थितः स्वयम् ॥7॥
अर्थ: यह लोक तो घनोदधि नामके वातवलयमें स्थित है और घनोदधि वातवलय घनवातवलयके मध्यमें है, अर्थात् घनोदधि वातवलयके चारों ओर घनवातवलय घिरा हुआ है और घनवातवलयके चारों तरफ तनुवातवलय घिरा हुआ है और तनुवातवलय आकाशमें स्वयमेव स्थित है, इसमें किसीका कोई कर्तव्य नहीं है । अनादि कालसे इसी प्रकारकी व्यवस्था है ।
अधो वेत्रासनाकारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभः ।
मृदङ्गाभस्ततोऽप्यूर्ध्वं स त्रिधेति व्यवस्थितः ॥8॥
अर्थ: यह लोक नीचेसे तो वेत्रासन कहिये मोढेके आकारका है, अर्थात् नीचेसे चौडा है फिर घटता-घटता मध्यलोक पर्यंत सँकडा हैं । फिर मध्यलोक झालरके आकारका है, और उसके ऊपर ऊर्ध्वलोक मृदंगके आकारका है अर्थात् बीचमें कुछ चौडा और दोनों तरफ सँकडा है । ऐसे तीन प्रकारके लोककी व्यवस्था है ।
अस्य प्रमाणमुन्नत्या सप्त सप्त च रज्जवः ।
सप्तैका पञ्च चैका च मूलमध्यान्तविस्तरे ॥9॥
अर्थ: इस लोककी ऊँचाई तो सात सात राजू है, अर्थात् नीचेसे लगाकर मध्यलोक पर्यन्त सात राजू है और उसके ऊपर सात राजू है इस प्रकार चौदह राजू ऊँचा है, और मूलमें चौडा सात राजू है, सो घटता घटता मध्यलोकमें एक राजू चौडा है और उसके ऊपर बीचमें पाँच राजू चौडा है, और अन्तमें और आदिमें मध्यलोकके निकट एक एक राजू चौडा है ।
तत्राधोभागमासाद्य संस्थिताः सप्तभूमयः ।
यासु नारकषण्ढानां निवासाः सन्ति भीषणाः ॥10॥
अर्थ: इस लोकके अधोभागमें सात पृथ्वियाँ है, जिनमें नारकी नपुंसक जीवोंके बडे भयकारी निवासस्थान है ।
काश्चिद्वज्रानलप्रख्याः काश्चिच्छीतोष्णसंकुलाः ।
तुषारबहुलाः काश्चिद् भूमयोऽत्यन्तभीतिदाः ॥11॥
अर्थ: उन सप्त नरककी पृथ्वियोंमें कई तो वज्राग्निके समान उष्ण हैं, कई शीत उष्णतासे व्याप्त है और कई अत्यन्त हिमवाली हैं इस प्रकार अतिशय भयकारक है ।
उदीर्णानलदीप्तासु निसर्गोष्णासु भूमिषु ।
मेरुमात्रोऽप्ययःपिण्डः क्षिप्तः सद्यो विलीयते ॥12॥
अर्थ: उदयरूप है अग्नि जिनमें ऐसी स्वाभाविक उष्णारूप भूमियोंमें यदि मेरुपर्वतके समान लोहेका पिंड डाला जाय तो तत्काल गलकर भस्म हो जायेगा, ऐसी उन भूमियोंमें उष्णता है ।
शीतभूमिष्वपि प्राप्तो मेरुमात्रोऽपि शीर्यते ।
शतधासावयःपिण्डः प्राप्य भूमिं क्षणान्तरे ॥13॥
अर्थ: जिस प्रकार उष्णभूमियोंमें भी मेरु समान लोहेका पिंड गल जाता है, उसी प्रकार शीतप्रधान भूमियोंमें भी मेरुके समान लोहेका पिंड डाला जाय तो शीतके कारण क्षणमात्रमें खंड-खंड होकर बिखर जायेगा ।
हिंसास्तेयानृताब्रह्मबह्वारम्भादिपातकैः ।
विशन्ति नरकं घोरं प्राणिनोऽत्यन्तनिर्दयाः ॥14॥
अर्थ: उन घोर नरकोंमें हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (अब्रह्मचर्य) और बहुत आरंभ परिग्रहादि पापोंके करनेसे ही अत्यन्त निर्दयी जीव प्रवेश करते हैं ।
मिथ्यात्वाविरतिक्रोधरौद्रध्यानपरायणाः ।
पतन्ति जन्तवः श्वभ्रे कृष्णलेश्यावशं गताः ॥15॥
अर्थ: तथा मिथ्यात्व, अविरति, क्रोध, रौद्रध्यानमें तत्पर तथा कृष्ण लेश्याके वश हुए प्राणी नरकमें पडते हैं ।
असिपत्रवनाकीर्णे शस्त्रशूलासिसंकुले ।
नरकेऽत्यन्तदुर्गन्धे वसासृक्कृमिकर्दमे ॥16॥
अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥
शिवाश्वव्याघ्रकङ्काढ्ये मांसाशिविहगान्विते ।
वज्रकण्टकसंकीर्णे शूलशाल्मलिदुर्गमे ॥17॥
अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥
संभूय कोष्टिकामध्ये ऊर्ध्वपादा अधोमुखाः ।
ततः पतन्ति साक्रन्दं वज्रज्वलनभूतले ॥18॥
अर्थ: नरक कैसे हैं कि असिपत्र (तलवार) सरीखे हैं पत्र जिनके ऐसे वृक्षोंसे तथा शूल तलवार आदि शस्त्रोंसे व्याप्त है, अत्यन्त दुर्गन्धियुक्त है, वसा (अपक्वमांस), रुधिर और कीटोंसे भरा हुआ कर्दम है जिनमें ऐसे है, तथा सियाल, श्वान, व्याघ्रादिकसे तथा मांसभक्षी पक्षियोंसे भरे हुए हैं तथा वज्रमय कांटोंसे भरे हुए शूल और शाल्मलि वृक्षोंसे दुर्गम हैं अर्थात् जिनमें गमन करना दुःखदायक है, ऐसे नरकोंमें बिलोंके संपुटमें उत्पन्न होकर नारकी जीव ऊँचे पाँव और नीचे मुख चिल्लाते हुए उन संपुटों (उत्पत्तिस्थानों) से वज्राग्निमय पृथ्वीमें गिरते हैं ॥१६-१७-१८॥
अयःकण्टककीर्णासु द्रुतलोहाग्निवीथिषु ।
छिन्नभिन्नविशीर्णाङ्गा उत्पतन्ति पतन्ति च ॥19॥
अर्थ: उस नरकभूमिमें वे नारकी जीव छिन्न-भिन्न खंड-खंड होकर बिखरे हुए अंगसे पड कर वारंवार उछल उछलकर गिरते हैं, सो कैसी भूमिमें गिरते हैं कि जहाँ पर लोहेके काँटे बिखरे हुए हैं और जिनमें गलाया हुआ लोहा और अग्नि है ।
दुःसहा निष्प्रतीकारा ये रोगाः सन्ति केचन ।
साकल्येनैव गात्रेषु नारकाणां भवन्ति ते ॥20॥
अर्थ: जो रोग असह्य है और जिनका कोई उपाय (चिकित्सा) नहीं है ऐसे समस्त प्रकारके रोग नरकोमें रहनेवाले नारकी जीवोंके शरीरमें रोमरोम प्रति होते हैं ।
अदृष्टपूर्वमालोक्य तस्य रौद्रं भयास्पदम् ।
दिशः सर्वाः समीक्षन्ते वराकाः शरणार्थिनः ॥21॥
अर्थ: फिर वे नारकी जीव उस नरकभूमिको अपूर्व और रौद्र (भयानक) देखकर किसीकी शरण लेनेकी इच्छासे चारों तरफ देखते हैं; परन्तु कहीं कोई सुखका कारण नहीं दीखता और न कोई शरण ही प्रतीत होता है ।
न तत्र सुजनः कोऽपि न मित्रं न च बान्धवाः ।
सर्वे ते निर्दयाः पापाः क्रूरा भीमोग्रविग्रहाः ॥22॥
अर्थ: उस नरकभूमिमें कोई सुजन वा मित्र वा बांधव नहीं हैं; सभी निर्दय, पापी, क्रूर और भयानक प्रचण्ड शरीरवाले हैं ।
सर्वे च हुण्डसंस्थानाः स्फुलिङ्गसदृशेक्षणाः ।
विवर्द्धिताशुभध्यानाः प्रचण्डाश्चण्डशासनाः ॥23॥
अर्थ: वे सभी नारकी जीव हुंडक संस्थानवाले हैं अर्थात् जिनके शरीरका प्रत्येक अंग अति भयानक बेडोल है, और अग्निके स्फुलिंगके समान जिनके नेत्र हैं, तथा प्रचण्ड, आर्त्त रौद्रध्यानको बढाये हुए हैं, तथा क्रोधी हैं, और जिनका शासन भी प्रचण्ड है ।
तत्राक्रन्दरवैः सार्द्धं श्रूयन्ते कर्कशाः स्वनाः ।
दृश्यन्ते गृध्रगोमायुसर्पशार्दूलमण्डलाः ॥24॥
अर्थ: उस नरकभूमिमें चारों ओरसे पुकारनेके शब्द बडे कर्कश सुने जाते हैं; तथा गृध्रपक्षी, सियाल, सर्प, सिंह, कुत्ते ये सब जीव बडे भयानक दीखते हैं ।
घ्रायन्ते पूतयो गन्धाः स्पृश्यन्ते वज्रकण्टकाः ।
जलानि पूतिगन्धीनि नद्योऽसृग्मांसकर्दमाः ॥25॥
अर्थ: जिस नरकभूमिमें दुर्गन्ध सूँघनी पडती है और वज्रमय काँटोंसे छिदना पडता है और जल जहाँ दुर्गन्धमय है और रुधिरमांसका है कीचड जिनमें ऐसी नदियाँ हैं ।
चिन्तयन्ति तदालोक्य रौद्रमत्यन्तशङ्किताः ।
केयं भूमिः क्व चानीताः के वयं केन कर्मणा ॥26॥
अर्थ: उस स्थानको रौद्र (भयानक) देखकर वे नारकी (जो नवीन उत्पन्न हुए हैं) अत्यन्त शंकित होकर विचारते हैं कि यह भूमि कौनसी है और हम कौन है, कौनसे भयानक कर्मोंने हमें यहाँ लाकर पटका है?
ततो विदुर्विभङ्गात्स्वं पतितं श्वभ्रसागरे ।
कर्मणाऽत्यन्तरौद्रेण हिंसाद्यारम्भजन्मना ॥27॥
अर्थ: तत्पश्चात् वे विभङ्गावधि (कुअवधिज्ञान) से जानते हैं कि हिंसादिक आरंभोंसे उत्पन्न हुए अत्यन्त रौद्र (खोटे) कर्मसे हम नरकरूप समुद्रमें पडे हैं ।
ततः प्रादुर्भवत्युच्चैः पश्चात्तापोऽति दुःसहः ।
दहन्नविरतं चेतो वज्राग्निरिव निर्दयः ॥28॥
अर्थ: तत्पश्चात् नारकी जीवोंके दुःसह पश्चात्ताप अतिशय करके प्रगट होता है; वह दुःसह पश्चात्ताप वज्राग्निके समान निर्दय हो चित्तको दहन करता हुआ प्रकट होता है ।
मनुष्यत्वं समासाद्य तदा कैश्चिन्महात्मभिः ।
अपवर्गाय संविग्नैः कर्म पूज्यमनुष्ठितम् ॥29॥
अर्थ: कितनेक बडे पुरुषोंने मनुष्यत्व पाकर वैराग्य सहित हो मोक्षके लिये पूजनीय पवित्राचरण किया ।
विषयाशामपाकृत्य विध्याप्य मदनानलम् ।
अप्रमत्तैस्तपश्चीर्णं धन्यैर्जन्मार्त्तिशान्तये ॥30॥
अर्थ: और उन महाभाग्य मुनियोंने विषयोंकी आशाको दूर करके कामरूप अग्निको बुझाकर निष्प्रमादी हो संसार पीडाकी शान्तिके लिये तपका संचय किया ।
उपसर्गाग्निपातेऽपि धैर्यमालम्ब्य चोन्नतम् ।
तैः कृतं तदनुष्ठानं येन सिद्धं समीहितम् ॥31॥
अर्थ: तत्पश्चात् उन उत्तम पुरुषोंने उपसर्गरूपी अग्निके आने पर बडे धैर्यका आलंबन कर वह आचरण किया कि जिससे वांछित कार्य सिद्ध हुआ ।
प्रमादमदमुत्सृज्य भावशुद्ध्या मनीषिभिः ।
केनाप्यचिन्त्यवृत्तेन स्वर्गो मोक्षश्च साधितः ॥32॥
अर्थ: तथा उन बुद्धिमान् पुरुषोंने प्रमाद और मदको छोडकर भावकी शुद्धतासे किसी अचिन्त्य आचरणसे स्वर्ग तथा मोक्ष साधा ।
शिवाभ्युदयदं मार्गं दिशन्तोऽप्यतिवत्सलाः ।
मयावधीरिताः सन्तो निर्भर्त्स्य कटुकाक्षरैः ॥33॥
अर्थ: उन सत्पुरुषोंने वात्सल्यभावसे युक्त हो मुझे मोक्ष और स्वर्ग आदिके मार्गका उपदेश किया, परन्तु मैंने बडे कटु अक्षरोंसे उनका तिरस्कार करके निंदा की, उनका उपदेश अंगीकार नहीं किया, इत्यादि पश्चात्ताप करते हैं ।
तस्मिन्नपि मनुष्यत्वे परलोकैकशुद्धिदे ।
मया तत्संचितं कर्म यज्जातं श्वभ्रशंबलम् ॥34॥
अर्थ: फिर भी नारकी पश्चात्ताप करता है कि परलोककी अद्वितीय शुद्धता देनेवाले उस मनुष्यभवमें भी मैंने यह कर्म संचय किया कि जिसने नरकका शंबल (पाथेय-राहखर्च) हुआ अर्थात् उस कर्मने सहजमें ही नरकमें ला पटका ।
अविद्याक्रान्तचित्तेन विषयान्धीकृतात्मना ।
चरस्थिराङ्गिसंघातो निर्दोषोऽपि हतो मया ॥35॥
अर्थ: फिर नारकी विचारता है कि अविद्यासे आक्रान्त चित्तसे अर्थात् अज्ञानके वश होकर तथा विषयोंसे अन्ध होकर मैंने निर्दोष भी त्रस स्थावर प्राणियोंके समूहको मारा ।
परवित्तामिषासक्तः परस्त्रीसंगलालसः ।
बहुव्यसनविध्वस्तो रौद्रध्यानपरायणः ॥36॥
अर्थ: नारकी फिर पश्चात्ताप करता है कि मैं परके धनमें और मांसमें अथवा परके धनरूपी मांसमें आसक्त होकर परस्त्रीसंग करनेमें लुब्ध हुआ तथा बहुत प्रकारके व्यसनोंसे पीडित होकर रौद्रध्यानी हुआ ।
यत्स्थितः प्राक् चिरं कालं तस्यैतत्फलमागतम् ।
अनन्तयातनासारे दुरन्ते नरकार्णवे ॥37॥
अर्थ: पूर्वजन्ममें मैं इस प्रकार बहुत काल तक रहा, इस कारण उसका यह अनन्त पीडासे असार अपार नरकरूपी समुद्रकी प्राप्तिरूप फल आया है ।
यन्मया वञ्चितो लोको वराको मूढमानसः ।
उपायैर्बहुभिः पापैः स्वाक्षसन्तर्पणार्थिना ॥38॥
अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने भोले रंकजनोंको अति अन्यायरूप उपायोंसे इन्द्रियोंको पोषनेके लिये ठगा ।
कृतः पराभवो येषां धनभूस्त्रीकृते मया ।
घातश्च तेऽत्र संप्राप्ताः कर्त्तुं तस्याद्य निष्क्रियाम् ॥39॥
अर्थ: तथा परका धन, परकी भूमि वा स्त्री लेनेके लिये जिनका अपमान किया था तथा घात किया था वे लोग यहाँ नरकभूमिमें उसका दंड देनेके लिये आकर प्राप्त हुए हैं ।
ये तदा शशकप्राया मया बलवता हताः ।
तेऽद्य जाता मृगेन्द्राभा मां हन्तुं विविधैर्वधैः ॥40॥
अर्थ: मनुष्यभवमें जब मैं था तब तो वे शशक (खरगोश) के समान थे और मैं बलवान् था सो मैंने उन्हें मारा, किन्तु वे आज यहाँ पर सिंहके समान होकर अनेक प्रकारके घातोंसे मुझे मारनेके लिये उद्यत हैं ।
मानुष्येऽपि स्वतन्त्रेण यत्कृतं नात्मनो हितम् ।
तदद्य किं करिष्यामि दैवपौरुषवर्जितः ॥41॥
अर्थ: फिर विचारता है कि जब मनुष्यभवमें में स्वाधीन थां, तब भी मैने अपना हित साधन नहीं किया तो अब यहाँ दैव और पौरुष दोनोंसे रहित होकर क्या कर सकता हूँ ? यहाँ कुछ भी हितसाधन नहीं हो सकता ।
मदान्धेनापि पापेन निस्त्रिंशेनास्तबुद्धिना ।
विराध्याराध्यसन्तानं कृतं कर्मातिनिन्दितम् ॥42॥
अर्थ: फिर विचारता है कि मदसे अंधे, पापी, निर्दय, नष्टबुद्धि मैंने आराधने योग्य जो भले मार्गमें प्रवर्त्तनेवाले उन पूज्य पुरुषोंके सन्तानको विराध कर निंदनीय कर्म किया ।
यत्पुरग्रामविन्ध्येषु मया क्षिप्तो हुताशनः ।
जलस्थलबिलाकाशचारिणो जन्तवो हताः ॥43॥
अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने पूर्वभवमें पुर, ग्राम, वनमें अग्नि डालकर दव लगाई; और जलचर, थलचर, आकाशचर तथा बिलोंमें रहनेवाले असंख्य जीवोंको मारा, वे पूर्वके पाप-कर्म इस समय स्मरण आनेसे निरन्तर मेरे मर्मस्थानोंको दयारहित करोंतके समान भेदते हैं ॥४३-४४॥
कृन्तन्ति मम मर्माणि स्मर्यमाणान्यनारतम् ।
प्राचीनान्यद्य कर्माणि क्रकचानीव निर्दयम् ॥44॥
अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने पूर्वभवमें पुर, ग्राम, वनमें अग्नि डालकर दव लगाई; और जलचर, थलचर, आकाशचर तथा बिलोंमें रहनेवाले असंख्य जीवोंको मारा, वे पूर्वके पाप-कर्म इस समय स्मरण आनेसे निरन्तर मेरे मर्मस्थानोंको दयारहित करोंतके समान भेदते हैं ॥४३-४४॥
किं करोमि क्व गच्छामि कर्मजाते पुरःस्थिते ।
शरणं कं प्रपश्यामि वराको दैववञ्चितः ॥45॥
अर्थ: फिर विचारता है कि ऐसे नरकोंके दुःखमें भी कर्मोंका समूह मेरे सामने हैं, उसके होते हुए मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किसकी शरण देखूँ ? मैं रंक दैवसे ठगा हुआ हूँ; मुझे कुछ भी सुखका उपाय नहीं दीखता ।
यन्निमेषमपि स्मर्तुं द्रष्टुं श्रोतुं न शक्यते ।
तद्दुःखमत्र सोढव्यं वर्द्धमानं कथं मया ॥46॥
अर्थ: फिर विचारता है कि नेत्रके टिमकार मात्र भी जिसके स्मरण करने वा सुननेकी समर्थता नहीं ऐसा प्रतिक्षण बढता हुआ वह दुःख मैं कैसे सहूँगा ? ।
एतान्यदृष्टपूर्वाणि बिलानि च कुलानि च ।
यातनाश्च महाघोरा नारकाणां मयेक्षिताः ॥47॥
अर्थ: फिर विचारता है कि नरकोंके बिल तथा नारकियोंके कुल (समूह) तथा नारकियोंकी महातीव्र वेदनाका सहना आदि सब मैंने अदृष्टपूर्व देखा अर्थात् अन्यत्र नहीं देखा ऐसा यहीं पर देखा ।
विषज्वलनसंकीर्णं वर्द्धमानं प्रतिक्षणम् ।
मम मूर्ध्नि विनिक्षिप्तं दुःखं दैवेन निर्दयम् ॥48॥
अर्थ: फिर विचारता है कि विष तथा अग्निसे व्याप्त क्षण-क्षणमें बढनेवाले ये सब दुःख दैव (कर्म) ने दयारहित होकर मेरे ही माथे पर डाले हैं ।
न दृश्यन्तेऽत्र ते भृत्या न पुत्रा न च बान्धवाः ।
येषां कृते मया कर्म कृतं स्वस्यैव घातकम् ॥49॥
अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिये मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्वजन्ममें किये, इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, न कलत्र, न मित्र, और न ही पापमें प्रेरणा करनेवाले बांधव कोई देखनेमें आते हैं । वे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे साथ नहीं आये ॥४९-५०॥
न कलत्राणि मित्राणि न पापप्रेरको जनः ।
पदमप्येकमायातो मया सार्द्धं गतत्रपः ॥50॥
अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिनके लिये मैंने अपने घातक पापकर्म पूर्वजन्ममें किये, इस समय न तो वे चाकर, न पुत्र, न कलत्र, न मित्र, और न ही पापमें प्रेरणा करनेवाले बांधव कोई देखनेमें आते हैं । वे ऐसे निर्लज्ज हो गये कि एक कदम भी मेरे साथ नहीं आये ॥४९-५०॥
आश्रयन्ति यथा वृक्षं फलितं पत्रिणः पुरा ।
फलापाये पुनर्यान्ति तथा ते स्वजना गताः ॥51॥
अर्थ: फिर ऐसा विचारता है कि जिस प्रकार पक्षी पहिले तो फले हुए वृक्षका आश्रय करते हैं, परन्तु जब फलोंका अभाव हो जाता है तब सब पक्षी उड जाते हैं, उसी प्रकार मेरे स्वजनगण जाते रहे । ये दुःख भोगनेको कोई साथ नहीं आया ।
शुभाशुभानि कर्माणि यान्त्येव सह देहिभिः ।
स्वार्जितानीति यत्प्रोचुः सन्तस्तत्सत्यतां गतम् ॥52॥
अर्थ: फिर क्या विचारता है कि जो सत्पुरुष कहते थे कि अपने उपार्जन किए हुए शुभ अशुभ कर्म हैं; वे ही जीवके साथ जाते हैं अन्य कोई साथ नहीं जाता सो वह आज सत्य प्रतीत हुआ ।
धर्म एव समुद्धर्त्तुं शक्तोऽस्माच्छ्वभ्रसागरात् ।
न स स्वप्नेऽपि पापेन मया सम्यक्पुरार्जितः ॥53॥
अर्थ: फिर विचारता है कि इस नरकरूपी समुद्रसे उद्धार करनेके लिये एक धर्म ही समर्थ है, परन्तु मुझ पापिष्ठने पहिले स्वप्नमें भी उसका योग्य रीतिसे उपार्जन नहीं किया ।
सहायः कोऽपि कस्यापि नाभून्न च भविष्यति ।
मुक्त्वैकं प्राक्कृतं कर्म सर्वसत्त्वाभिनन्दकम् ॥54॥
अर्थ: फिर विचारता है कि इस संसारमें कोई किसीका सहायक न है, न हुआ और न होगा, किन्तु समस्त जीवोंको आनंद करनेवाला अर्थात् जिसमें सबकी दया हो ऐसा शुभ कर्म ही सहायक होता है ।
तत्कुर्वन्त्यधमाः कर्म जिह्वोपस्थादिदण्डिताः ।
येन श्वभ्रेषु पच्यन्ते कृतार्त्तकरुणस्वनाः ॥55॥
अर्थ: फिर यह विचारता है कि जो अधम (पापी) पुरुष जिह्वा उपस्थेन्द्रियसे दण्डित होते हैं, वे ऐसा कर्म करते हैं कि जिस कर्मसे वे पापी पीडित होकर नरकोंमें पचाये जाते हैं, रोते हैं वा शब्द करते हैं; जिसको सुननेसे अन्यको दया उपज आवें ।
चक्षुरुन्मेषमात्रस्य सुखस्यार्थे कृतं मया ।
तत्पापं येन सम्पन्ना अनन्ता दुःखराशयः ॥56॥
अर्थ: फिर विचारता है कि मैंने नेत्रोंके टिमकारमात्र सुखके लिये ऐसा पाप किया कि जिससे अनन्त दुःखोंकी राशि प्राप्त हुई ।
याति सार्द्धं ततः पाति करोति नियतं हितम् ।
हन्ति दुःखं सुखं दत्ते यः स बन्धुर्न पोषितः ॥57॥
अर्थ: फिर विचारता है कि यह धर्मरूप बन्धु ऐसा है कि साथ जाता है, और जहाँ जाता है, वहीं रक्षा करता है, और यह मित्र नियमसे हित ही करता है; दुःखका नाश करके सुख देता है; ऐसे इस धर्मरूपी मित्रको मैंने पोषा ही नहीं और जिनको मित्र समझकर पोषा उनमेंसे कोई एक भी साथ नहीं आया ।
परिग्रहमहाग्राहसंग्रस्तेनार्तचेतसा ।
न दृष्टा यमशार्दूलचपेटा जीवनाशिनी ॥58॥
अर्थ: फिर विचारता है कि परिग्रहरूपी महाग्राहसे पकडे हुए पीडितचित्त होकर मैंने जीवको नाश करनेवाली यमरूपी शार्दूलकी चपेट नहीं देखी, अर्थात् परिग्रहमें आसक्त होकर निरन्तर पाप ही करता रहा ।
पातयित्वा महाघोरे मां श्वभ्रेऽचिन्त्यवेदने ।
क्व गतास्तेऽधुना पापा मद्वित्तफलभोगिनः ॥59॥
अर्थ: फिर विचारता है कि जो कुटुम्बादिक मेरे उपार्जन किए हुए धनके फल भोगनेवाले थे वे पापी मुझे अचिन्त्य वेदनामय इस घोर नरकमें डालकर अब कहाँ चले गये ? यहाँ दुःखमें कोई साथी न हुआ ।
इत्यजस्रं सुदुःखार्त्ता विलापमुखराननाः ।
शोचन्ते पापकर्माणि वसन्ति नरकालये ॥60॥
अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारसे नारकी जीव निरन्तर महादुःखसे पीडित हुए, मुखसे पुकारते हुए, विलाप करते हुए अपने पापकार्योंको स्मरण कर करके शोच करते हैं और नरकमन्दिरमें बसते हैं ।
इति चिन्तानलेनोच्चैर्दह्यमानस्य ते तदा ।
धावन्ति शरशूलासिकराः क्रोधाग्निदीपिताः ॥61॥
अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारकी चिंतारूप अग्निसे अतिशय जलते हुए नारकीके ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बाण, शूल, तलवार लिये हुए क्रोधरूपी अग्निसे जलते हुए दौडते हैं और पूर्वके पाप तथा वैरको याद कराते हुए कटु वचनोंसे तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयतासे दुःख देते हैं ॥६१-६२॥
वैरं पराभवं पापं स्मारयित्वा पुरातनम् ।
निर्भर्त्स्य कटुकालापैः पीडयन्त्यतिनिर्दयम् ॥62॥
अर्थ: इस पूर्वोक्त प्रकारकी चिंतारूप अग्निसे अतिशय जलते हुए नारकीके ऊपर उसी समय अन्य पुराने नारकी बाण, शूल, तलवार लिये हुए क्रोधरूपी अग्निसे जलते हुए दौडते हैं और पूर्वके पाप तथा वैरको याद कराते हुए कटु वचनोंसे तिरस्कार करके उसे अतिनिर्दयतासे दुःख देते हैं ॥६१-६२॥
उत्पाटयन्ति नेत्राणि चूर्णयन्त्यस्थिसंचयम् ।
दारयन्त्युदरं क्रुद्धास्त्रोटयन्त्यन्त्रमालिकाम् ॥63॥
अर्थ: वे पुराने नारकी उस विलाप करते हुए नये नारकीके नेत्रोंको उखाडते हैं, हड्डियोंको चूर्ण कर डालते हैं, उदरको फाडते हैं, और क्रोधी होकर उसकी आँतोंको तोड डालते हैं ।
निष्पीडयन्ति यन्त्रेषु दलन्ति विषमोपलैः ।
शाल्मलीषु निघर्षन्ति कुम्भीषु क्वाथयन्ति च ॥64॥
अर्थ: तथा वे नारकी उसे घानीमें डालकर पीलते हैं और कठिन पाषाणोंसे दलते हैं, लोहेके कांटेवाले वृक्षोंसे घिसते (रगडते) हैं तथा कुंभियोंमें (कलशियोंमें) डालकर काढा करते (उबालते) हैं ।
असह्यदुःखसन्तानदानदक्षाः कलिप्रियाः ।
तीक्ष्णदंष्ट्रा करालास्या भिन्नाञ्जनसमप्रभाः ॥65॥
अर्थ: तथा वे नारकी कैसे हैं कि - असह्य दुःखोंकी निरन्तरता देनेमें चतुर हैं, कलह करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढोंसे भयानक मुखवाले हैं, बिखरे हुए काजलके समान जिनके शरीरकी काली प्रभा है; तथा कृष्णलेश्याके कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और एक रौद्रध्यानके भावनेवाले हैं, एवं क्षेत्रके दोषसे वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं ॥६५-६६॥
कृष्णलेश्योद्धताः पापा रौद्रध्यानैकभाविताः ।
भवन्ति क्षेत्रदोषेण सर्वे ते नारकाः खलाः ॥66॥
अर्थ: तथा वे नारकी कैसे हैं कि-असह्य दुःखोंकी निरन्तरता देनेमें चतुर हैं, कलह करना ही जिनको प्रिय है, तीक्ष्ण दाढोंसे भयानक मुखवाले हैं, बिखरे हुए काजलके समान जिनके शरीरकी काली प्रभा है; तथा कृष्णलेश्याके कारण उद्धत हैं, पापरूप हैं और एक रौद्रध्यानके भावनेवाले हैं, एवं क्षेत्रके दोषसे वे सब ही नारकी दुष्ट होते हैं ॥६५-६६॥
वैक्रियिकशरीरत्वाद्विक्रियन्ते यदृच्छया ।
यन्त्राग्निश्वापदाङ्गैस्ते हन्तुं चित्रैर्वधैः परान् ॥67॥
अर्थ: उन नारकियोंका वैक्रियिक शरीर होनेके कारण अपनी इच्छानुसार घाणी, अग्नि, हिंस्र जन्तु सिंहादिकका रूप बनाकर अनेक प्रकारसे परस्पर मारनेके लिये विक्रिया करते हैं ।
न तत्र बान्धवः स्वामी मित्रभृत्याङ्गनाङ्गजाः ।
अनन्तयातनासारे नरकेऽत्यन्तभीषणे ॥68॥
अर्थ: उस अत्यन्त भयानक नरकमें न तो कोई बांधव है, न कोई स्वामी है, न कोई मित्र है, न कोई भृत्य है, न स्त्री है, न पुत्र है; केवल अनन्त यातनाका भयानक वृष्टिपात ही है ।
तत्र ताम्रमुखा गृध्रा लोहतुण्डाश्च वायसाः ।
दारयन्त्येव मर्माणि चञ्चुभिर्नखरैः खरैः ॥69॥
अर्थ: उस नरकमें ताँबे-से हैं मुख-चोंच जिनके ऐसे तो गृध्रपक्षी हैं और लोहेकी चोंचवाले काक हैं; सो चोंचोंसे तथा तीक्ष्ण नखोंसे नारकी जीवोंके मर्मोंको विदारते हैं ।
कृमयः पूतिकुण्डेषु वज्रसूचीसमाननाः ।
भित्वा चर्मास्थिमांसानि पिबन्त्याकृष्य लोहितम् ॥70॥
अर्थ: तथा उस नरकमें पीबके कुंडोंमें वज्रकी सूई समान है मुख जिनके ऐसे कीडे वा जोके नारकी जीवोंके चमडे और हाडमांसको विदार कर रक्त (खून) को पीते हैं ।
बलाद्विदार्य संदंशैर्वदनं क्षिप्यते क्षणात् ।
विलीनं प्रज्वलत्ताम्रं यैः पीतं मद्यमुद्धतैः ॥71॥
अर्थ: तथा जिन पापियोंने मनुष्यजन्ममें उद्धत होकर मद्यपान किया है, उनके मुखको संडासीसे फाड-फाड कर तुरंतके पिघलाये हुए ताँबेको बलपूर्वक पिलाते हैं ।
परमांसानि यैः पापैर्भक्षितान्यतिनिर्दयैः ।
शूलपक्वानि मांसानि तेषां खादन्ति नारकाः ॥72॥
अर्थ: और जिन पापियोंने मनुष्यभवमें निर्दय होकर अन्य जीवोंका मांस भक्षण किया है, उनके मांसके शूले पका-पका कर नारकी जीव खाते हैं ।
यैः प्राक्परकलत्राणि सेवितान्यात्मवञ्चकैः ।
योज्यन्ते प्रज्वलन्तीभिः स्त्रीभिस्ते ताम्रजन्मभिः ॥73॥
अर्थ: तथा जिन आत्मवञ्चक पापीजनोंने पूर्वभवमें परस्त्री सेवन की है, उनको ताँबेकी अग्निसे लाल की हुई स्त्रियोंसे संगम कराया जाता है ।
न सौख्यं चक्षुरुन्मेषमात्रमप्युपलभ्यते ।
नरके नारकैर्दीनैर्हन्यमानैः परस्परम् ॥74॥
अर्थ: नरकमें नारकीजीव परस्पर एक दूसरेको मारते हैं, सो वे दीन एक पलकमात्र भी सुखको नहीं पाते ।
किमत्र बहुनोक्तेन जन्मकोटिशतैरपि ।
केनापि शक्यते वक्तुं न दुःखं नरकोद्भवम् ॥75॥
अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि बहुत कहाँ तक कहें ? क्योंकि उस नरकमें उत्पन्न हुए दुःखको कोटि जन्म लेकर भी कोई कहनेको समर्थ नहीं है; तो हम क्या कह सकते हैं ? ।
विस्मृतं यदि केनापि कारणेन क्षणान्तरे ।
स्मारयन्ति तदाभ्येत्य पूर्ववैरं सुराधमाः ॥76॥
अर्थ: यदि वे नारकी किसी कारणसे क्षणमात्रके लिये भूल जाते हैं तो उसी समय नीच असुर देव आकर उन्हें पूर्ववैर याद करा देते हैं जिससे फिर वे परस्पर मारपीट करके अपनेको महादुःखी कर लेते हैं।
बुभुक्षा जायतेऽत्यर्थं नरके तत्र देहिनाम् ।
यां न शामयितुं शक्तः पुद्गलप्रचयोऽखिलः ॥77॥
अर्थ: तथा उस नरकमें नारकी जीवोंको भूख ऐसी लगती है कि समस्त पुद्गलोंका समूह भी उसको शमन करनेमें असमर्थ है ।
तृष्णा भवति या तेषु वाडवाग्निरिवोल्बणा ।
न सा शाम्यति निःशेषपीतैरप्यम्बुराशिभिः ॥78॥
अर्थ: तथा नरकमें नारकी जीवोंकी तृषा वडवाग्निकी समान अति उत्कृष्ट (तीव्र) होती है सो समस्त समुद्रोंका जल पी लें तो भी नहीं मिटती ।
बिन्दुमात्रं न तैर्वारि प्राप्यते पातुमातुरैः ।
तिलमात्रोऽपि नाहारो ग्रसितुं लभ्यते हि तैः ॥79॥
अर्थ: यद्यपि नरकोंमें उपर्युक्त भूख-प्यासकी तीव्रता है, परन्तु न तो किसी कालमें तिलमात्र किसीको भोजन मिलता है और न एक बिंदु पानी ही मिलता है। इस प्रकार आतुर होकर निरंतर भूखप्यास सहते हैं।
तिलादप्यतिसूक्ष्माणि कृतखण्डानि निर्दयैः ।
वपुर्मिलति वेगेन पुनस्तेषां विधेर्वशात् ॥80॥
अर्थ: तथा उन नारकियोंके शरीर निर्दय नारकियोंके द्वारा तिलतिलमात्र खण्ड किये जाते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं आती, तत्काल मिल कर शरीर बन जाता है। इनके ऐसा ही कर्मोदय है, जो मरण नहीं होता। सागरोंकी आयु पूर्ण होने पर ही मरण होता है; अकाल मृत्यु कभी नहीं होती ।
यातनारुक्शरीरायुर्लेश्यादुःखभयादिकम् ।
वर्द्धमानं विनिश्चेयमधोऽधः श्वभ्रभूमिषु ॥81॥
अर्थ: उन नरककी भूमियोंमें पीडा, रोग, शरीर, आयु, लेश्या, दुःख, भय इत्यादि नीचे-नीचे बढता हुआ है; अर्थात् पहिले नरक (पृथ्वी) से दूसरे नरकमें अधिक हैं, दूसरेसे तीसरेमें और तीसरेसे चौथेमें और चौथेसे पाँचवेंमें और पाँचवेंसे छठेमें और छठेसे सातवेंमें इस क्रमसे अधिक-अधिक हैं; यह अधोलोकका वर्णन हुआ ।
मध्यभागस्ततो मध्ये तत्रास्ते झल्लरीनिभः ।
यत्र द्वीपसमुद्राणां व्यवस्था वलयाकृतिः ॥82॥
अर्थ: उस अधोलोकके ऊपर झालर (घंटा बजानेकी घडावली) के समान गोलाकार मध्यलोकका मध्य भाग है, उसमें गोल-गोल वलयों (कडों) के समान असंख्यात द्वीप समुद्र हैं ।
जम्बूद्वीपादयो द्वीपा लवणोदादयोऽर्णवाः ।
स्वयम्भूरमणान्तास्ते प्रत्येकं द्वीपसागराः ॥83॥
अर्थ: उस मध्यलोकमें जम्बूद्वीपादिक तो द्वीप हैं और लवणसमुद्रादिक समुद्र हैं सो अन्तके स्वयंभूरमणपर्यन्त भिन्न-भिन्न हैं ।
द्विगुणा द्विगुणा भोगाः प्रावर्त्यान्योन्यमास्थिताः ।
सर्वे ते शुभनामानो वलयाकारधारिणः ॥84॥
अर्थ: तथा वे द्वीप और समुद्र दूने दूने विस्तारवाले हैं तथा परस्पर एक दूसरेको लपेटे हुए हैं। वे गोलाकार कडेके आकारसे स्थित हैं और उनके नाम भी जम्बूद्वीप, धातकीद्वीप, पुष्करद्वीप, लवणसमुद्र, कालोदधि समुद्र आदि उत्तमोत्तम हैं ।
मानुषोत्तरशैलेन्द्रमध्यस्थमतिसुन्दरम् ।
नरक्षेत्रं सरिच्छैलसुराचलविराजितम् ॥85॥
अर्थ: तथा मानुषोत्तर पर्वतके मध्यस्थ नदी पर्वत मेरुपर्वतसे अतिसुन्दर मनुष्यक्षेत्र है।
तत्रार्यम्लेच्छखण्डानि भूरिभेदानि तेष्वमी ।
आर्या म्लेच्छा नराः सन्ति तत्क्षेत्रजनितैर्गुणैः ॥86॥
अर्थ: उस मनुष्यक्षेत्रमें अर्थात् अढाई द्वीपोंमें अनेक आर्यखंड और म्लेच्छखंड है, और आर्यक्षेत्रोंमें आर्य पुरुष और म्लेच्छक्षेत्रोंमें म्लेच्छ रहते हैं, उन क्षेत्रोंके अनुसार ही उनके गुण आचारादिक हैं, अर्थात् आर्योंके उत्तम आचार, उत्तम गुण हैं, और म्लेच्छोंके निकृष्ट आचार और धर्मशून्यतादि निकृष्ट गुण है।
क्वचित्कुमानुषोपेतं क्वचिद्व्यन्तरसंभृतम् ।
क्वचिद्भोगधराकीर्णं नरक्षेत्रं निरन्तरम् ॥87॥
अर्थ: यह मनुष्यक्षेत्र निरंतर कहीं तो कुमानुष कुभोगभूमि सहित है, कहीं व्यन्तरदेवोंसे भरा है, कहीं उत्तम भोगभूमि सहित है। इस प्रकार संक्षेपसे मध्यलोकका वर्णन किया ।
ततो नभसि तिष्टन्ति विमानानि दिवौकसाम् ।
चरस्थिरविकल्पानि ज्योतिष्काणां यथाक्रमम् ॥88॥
अर्थ: उस मध्यलोकके ऊपर आकाशमें ज्योतिषी देवोंके विमान रहते हैं; वे चर स्थिर भेदसे दो प्रकारके हैं अर्थात् कई विमान तो निरन्तर गमन करते रहते हैं और कई विमान स्थिर रहते हैं ।
तदूर्ध्वे सन्ति देवेशकल्पाः सौधर्मपूर्वकाः ।
ते षोडशाच्युतस्वर्गपर्यन्ता नभसि स्थिताः ॥89॥
अर्थ: ज्योतिषी देवोंके विमानों के ऊपर कल्पवासी देवोंके कल्प (विमान) है; जिनके सौधर्म स्वर्ग, ईशानस्वर्ग आदि नाम हैं वे अच्युतस्वर्ग पर्यन्त सोलह हैं और आकाशमें स्थित हैं ।
उपर्युपरि देवेशनिवासयुगलं क्रमात् ।
अच्युतान्तं ततोऽप्यूर्ध्वमेकैकत्रिदशास्पदम् ॥90॥
अर्थ: वे देवोंके निवास (स्वर्ग) आकाशमें दो स्वर्गके ऊपर दो स्वर्ग, फिर उन दोके ऊपर फिर दो स्वर्ग, इस प्रकार अच्युतस्वर्गपर्यंत दो-दोके आठ युगल हैं और उनके ऊपर एक-एक विमान करके नव ग्रैवेयक विमान हैं, तथा एक अनुदिश और एक अनुत्तर विमान भी है ।
निशादिनविभागोऽयं न तत्र त्रिदशास्पदे ।
रत्नालोकः स्फुरत्युच्चैः सततं नेत्रसौख्यदः ॥91॥
अर्थ: उन देवोंके निवासोंमें रात्रिदिनका विभाग नहीं है; क्योंकि वहाँ पर सूर्यचन्द्रमा नहीं हैं, किन्तु नेत्रोंको सुख देनेवाला रत्नोंका उत्तम प्रकाश निरन्तर स्फुरायमान रहता है ।
वर्षातपतुषारादिसमयैः परिवर्जितः ।
सुखदाः सर्वदा सौम्यस्तत्र कालः प्रवर्त्तते ॥92॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें वर्षा, शीत, आतप आदिक समय व ऋतुओंसे रहित सदाकाल सुख देनेवाला सौम्य मध्यस्थ काल (वसंतऋतु) रहता है ।
उत्पातभयसन्तापभङ्गचौरारिविड्वराः ।
न हि स्वप्नेऽपि दृश्यन्ते क्षुद्रसत्त्वाश्च दुर्जनाः ॥93॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें उत्पात, भय, संताप, भंग, चौर, शत्रु, वञ्चक तथा क्षुद्र जीव, दुर्जन ये स्वप्नमें भी नहीं दीखते ।
चन्द्रकान्तशिलानद्धाः प्रवालदलदन्तुराः ।
वज्रेन्द्रनीलनिर्माणा विचित्रास्तत्र भूमयः ॥94॥
अर्थ: उन देवोंके निवासोंमें पृथ्वी चन्द्रकान्त मणियोंसे बँधी हुई है तथा मूंगेके पत्रकी समान रची हुई है; तथा कहीं कहीं हीरा इन्द्रनीलमणि आदि नाना प्रकारके रत्नोंसे बनी हुई है ।
माणिक्यरोचिषां चक्रैः कर्बुरीकृतदिङ्मुखाः ।
वाप्यः स्वर्णाम्बुजच्छन्ना रत्नसोपानराजिताः ॥95॥
अर्थ: तथा स्वर्गोमें वापिकायें माणिककी किरणोंके समूहोंसे दिशाओंको अनेक वर्णमय कर रही हैं तथा सुवर्णमय कमलोंसे आच्छादित और रत्नमय सीढियोंसे सुशोभित हैं ।
सरांस्यमलवारीणि हंसकारण्डमण्डलैः ।
वाचालै रुद्धतीर्थानि दिव्यनारीजनेन च ॥96॥
अर्थ: स्वर्गमें सरोवर भी अतिस्वच्छ निर्मल जलवाले हैं, हंस व कारंड जातिके पक्षियोंके समूहसे तथा देवांगना वा अप्सराओंसे रुके हुए हैं तट जिनके ऐसे हैं ।
गावः कामदुघाः सर्वाः कल्पवृक्षाश्च पादपाः ।
चिन्तारत्नानि रत्नानि स्वर्गलोके स्वभावतः ॥97॥
अर्थ: तथा उस स्वर्गमें गौ हैं वे तो कामधेनु हैं, वृक्ष हैं सो कल्पवृक्ष हैं और रत्न हैं सो चिन्तामणि रत्न हैं; ये सब क्षेत्रके स्वभावसे निरन्तर रहते हैं ।
ध्वजचामरछत्राङ्कैर्विमानैर्वनितासखाः ।
संचरन्ति सुरासारैः सेव्यमानाः सुरेश्वराः ॥98॥
अर्थ: उन स्वर्गोंके अधिपति इन्द्र ध्वजा, चमर, छत्रोंसे चिह्नित हुए विमानोंके द्वारा अनेक देवांगनाओं सहित यत्र तत्र विचरते हैं; उनकी अनेक देव सेवा करते हैं ।
यक्षकिन्नरनारीभिर्मन्दारवनवीथिषु ।
कान्ताश्लिष्टाभिरानन्दं गीयन्ते त्रिदशेश्वराः ॥99॥
अर्थ: तथा वहाँके इन्द्र, मंदार वृक्षोंकी गलियोंमें यक्ष और किन्नर जातीय देवोंकी देवांगना अपने पति सहित आलिंगित आनंदसे भरी गाती हैं, उनके गीत सुनते हैं ।
क्रीडागिरिनिकुञ्जेषु पुष्पशय्यागृहेषु वा ।
रमन्ते त्रिदशा यत्र वरस्त्रीवृन्दवेष्टिताः ॥100॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोके देव क्रीडापर्वतोंकी कुंजोमें, पुष्पलतादिकृत कंदराओंमें, पुष्पोंकी शय्यामें सुन्दर देवांगनाओके समूहके साथ वेष्टित होकर नाना प्रकारकी आनन्द क्रीडा करते हैं ।
मन्दारचम्पकाशोकमालतीरेणुरञ्जिताः ।
भ्रमन्ति यत्र गन्धाढ्या गन्धवाहाः शनैः शनैः ॥101॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें मंदार, चम्पक, अशोक, मालतीके पुष्पोंकी रजसे रंजित भ्रमरों सहित मन्दमन्द सुगन्धी पवन बहता है ।
लीलावनविहारैश्च पुष्पावचयकौतुकैः ।
जलक्रीडादिविज्ञानैर्विलासास्तत्र योषिताम् ॥102॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें देवांगनाओके विलास, क्रीडावनके विहारोंसे तथा पुष्पोंके चुननेके कौतुकसे तथा जलक्रीडाके विज्ञानों (चतुराइयों) से बडी शोभा है ।
वीणामादाय रत्यन्ते कलं गायन्ति योषितः ।
ध्वनन्ति मुरजा धीरं दिवि देवाङ्गनाहताः ॥103॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें देवांगनायें संभोगके अन्तमें वीणा लेकर सुन्दर गान करती हैं तथा उनके बजाये हुए मृदंग धीरे धीरे बजते हैं ।
कोकिलाः कल्पवृक्षेषु चैत्यागारेषु योषितः ।
विबोधयन्ति देवेशांल्ललितैर्गीतनिःस्वनैः ॥104॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें कल्पवृक्षों पर तो कोकिलायें और चैत्य मन्दिरोंमें देवांगनायें सुन्दर गीत और शब्दोंसे इन्द्रोंको जागृत करती हैं ।
नित्योत्सवयुतं रम्यं सर्वाभ्युदयमन्दिरम् ।
सुखसंपद्गुणाधारं कैः स्वर्गमुपमीयते ॥105॥
अर्थ: प्रत्येक स्वर्ग नित्य ही उत्सवों सहित है, रमणीक है, समस्त अभ्युदयोंके भोगोंका निवास है तथा सुख, संपद् और गुणोंका आधार है सो उसको किसकीं उपमा दी जाय ? ।
पञ्चवर्णमहारत्ननिर्माणाः सप्तभूमिकाः ।
प्रासादाः पुष्करिण्यश्च चन्द्रशाला वनान्तरे ॥106॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंकि बागोंमें पाँच वर्णोंकि रत्नोंसे बने हुए सात-सात खण्डके महल हैं और वापिका तथा चन्द्रशाला (शिरोगृह-अंटे) हैं ।
प्राकारपरिखावप्रगोपुरोत्तुङ्गतोरणैः ।
चैत्यद्रुमसुरागारैर्नगर्यो रत्नराजिताः ॥107॥
अर्थ: तथा उन स्वर्गोंमें जो नगरी है वे कोट, खाई, बडे दरवाजों और ऊँचे तोरणोंसे तथा चैत्य, वृक्ष, और देवोंके मंदिर आदिकसे रत्नमयी शोभती है ।
इन्द्रायुधश्रियं धत्ते यत्र नित्यं नभस्तलम् ।
हर्म्याग्रलग्नमाणिक्यमयूखैः कर्बुरीकृतम् ॥108॥
अर्थ: तथा स्वर्गोंमें आकाश महलोंके अग्रभागमें लगे हुए रत्नोंकी किरणोंसे विचित्र वर्णका होकर इन्द्रधनुषकीसी शोभाको नित्य धारण किये हुए रहता है ।
सप्तभिस्त्रिदशानीकैर्विमानैरङ्गनान्वितैः ।
कल्पद्रुमगिरीन्द्रेषु रमन्ते विबुधेश्वराः ॥109॥
अर्थ: स्वर्गोंके इन्द्र सात प्रकारकी देवसेनाओंसे तथा देवांगना सहित विमानोंके द्वारा कल्पवृक्षों तथा क्रीडावनोंमें रमते (आनन्द करते) हैं ।
हस्त्यश्वरथपादातवृषगन्धर्वनर्त्तकि ।
सप्तानीकानि सन्त्यस्य प्रत्येकं च महत्तरम् ॥110॥
अर्थ: हस्ती, घोडे, रथ, पयादे, बैल, गन्धर्व, नर्त्तकी इस प्रकार सात प्रकारकी सेना इन्द्रकी होती है सो प्रत्येक एकसे एक बढकर हैं ।
शृङ्गारसारसंपूर्णा लावण्यवनदीर्घिकाः ।
पीनस्तनभराक्रान्ताः पूर्णचन्द्रनिभाननाः ॥111॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ॥१११-११२-११३ ॥
विनीताः कामरूपिण्यो महर्द्धिमहिमान्विताः ।
हावभावविलासाढ्या नितम्बभरमन्थराः ॥112॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ।।१११-११२-११३ ।।
मन्ये शृङ्गारसर्वस्वमेकीकृत्य विनिर्मिताः ।
स्वर्गवासविलासिन्यः सन्ति मूर्त्ता इव श्रियः ॥113॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें विलासिनी देवांगनायें शृंगारका सार है जिनके ऐसी लावण्यरूपी जलकी वापिका ही है तथा पीन (पुष्ट) कुचोंके भार सहित हैं, जिनके मुख पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान हैं, जो विनीत हैं, चतुर हैं, महाऋद्धिकी शोभा सहित हैं, मुखके हाव-भाव, चित्तविकार, विलास, भ्रूविकार आदिसे भरी हुई हैं; नितम्बोंके भारसे धीरगतिवाली हैं । आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि वे देवांगनायें मानों शृंगारका सर्वस्व एकत्र करके ही बनायी गयी हैं, जिससे मूर्तिमान् लक्ष्मी समान ही शोभती है ॥१११-११२-११३ ॥
गीतवादित्रविद्यासु शृङ्गाररसभूमिषु ।
परिरम्भादि सर्वेषु स्त्रीणां दाक्ष्यं स्वभावतः ॥114॥
अर्थ: स्वर्गोंमें शृंगाररसकी भूमि ऐसी गीत व बाजेकी विद्याओंमें तथा आलिंगनादि समस्त क्रियाओंमें स्त्रियोंकी स्वभावसे ही प्रवीणता होती है ।
सर्वावयवसम्पूर्णा दिव्यलक्षणलक्षिताः ।
अनङ्गप्रतिमा धीराः प्रसन्नाः प्रांशुविग्रहाः ॥115॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि-शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ।
हारकुण्डलकेयूरकिरीटाङ्गदभूषिताः ।
मन्दारमालतीगन्धा अणिमादिगुणान्विताः ॥116॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।
प्रसन्नामलपूर्णेन्दुकान्ताः कान्ताजनप्रियाः ।
शक्तित्रयगुणोपेताः सत्त्वशीलावलम्बिनः ॥117॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।
विज्ञानविनयोद्दामप्रीतिप्रसरसंभृताः ।
निसर्गसुभगाः सर्वे भवन्ति त्रिदिवौकसः ॥118॥
अर्थ: उन स्वर्गोंमें देव कैसे हैं कि - शरीरके समस्त अवयव जिनके सम्पूर्ण सुडौल हैं, दिव्यमनोहर लक्षणों सहित हैं, कामदेवके समान सुंदर है, धीर (क्षोभरहित) हैं, प्रसन्न वा विस्तीर्ण है शरीर जिनका ऐसे हैं ॥११५॥ तथा हार, कुंडल, केयूर (भुजबन्ध), किरीट (मुकुट), अंगद (कटक आदि) इन आभूषणोंसे भूषित हैं, मन्दार मालतीके पुष्पोंके समान जिनके अंगमें सुगन्धी है, अणिमा महिमादि अष्टऋद्धि सहित हैं ॥११६॥ तथा निर्मल पूर्ण चन्द्रमा समान मनोहर हैं, और कान्ताजन कहिये स्त्रियोंको अतिशय प्रिय लगनेवाले हैं, तीन शक्ति कहिये प्रभुत्व, मन्त्र, उत्साह इन गुणों सहित है, तथा सत्त्व पराक्रम और शील कहिये सुस्वभावके अवलम्बन करनेवाले हैं ॥११७॥ तथा विज्ञान, प्रवीणता और विनय वा उत्तम प्रीतिके प्रसर कहिये वेगसे भरे हैं । स्वर्गमें समस्त देव इसी प्रकार स्वभावसे सुन्दर होते हैं ।
न तत्र दुःखितो दीनो वृद्धो रोगी गुणच्युतः ।
विकलाङ्गो गतश्रीकः स्वर्गलोके विलोक्यते ॥119॥
अर्थ: तथा उस स्वर्गमें कोई ऐसा नहीं देखा जाता जो दुःखी, दीन, वृद्ध, वा गुणरहित, विकल-अंग अथवा कान्तिहीन हो ।
सभ्यसामानिकामात्यलोकपालप्रकीर्णकाः ।
मित्राद्यभिमतस्तेषां पार्श्ववर्ती परिग्रहः ॥120॥
अर्थ: स्वर्गोंमें सभाके देव, सामानिक देव, अमात्यादिक देव, लोकपाल देव, प्रकीर्णक देव ये भेद है; तथा मित्र आदिक सब ही उन इन्द्रोंके पार्श्ववर्ती परिवार उनके अभिमत (इष्ट प्रीति करनेवाले) हैं ।
बन्दिगायनसैरन्ध्रीस्वाङ्गरक्षाः पदातयः ।
नटवेत्रिविलासिन्यः सुराणां सेवको जनः ॥121॥
अर्थ: तथा स्वर्गोंमें उन देवोंकी सेवा करनेवाले देव हैं, बंदीजन हैं, गानेवाले हैं, अङ्गरक्षक हैं, दंड धरनेवाले हैं तथा नाचनेवाली विलासिनी अप्सरायें हैं ।
तत्रातिभव्यताधारे विमाने कुन्दकोमले ।
उपपादिशिलागर्भे संभवन्ति स्वयं सुराः ॥122॥
अर्थ: स्वर्गोंमें अति मनोज्ञताका आधार ऐसे विमानमें कुन्दके पुष्प समान कोमल ऐसी उपपादि शिलाके मध्यसे देव स्वयमेव उत्पन्न होते हैं ।
सर्वाक्षसुखदे रम्ये नित्योत्सवविराजिते ।
गीतवादित्रलीलाढ्ये जयजीवस्वनाकुले ॥123॥
अर्थ: उस उपपाद शय्याका स्थान कैसा है कि-समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सवसहित विराजता है, गीत वादित्रादि लीलाओं सहित है, तथा “जयवन्त होओ” “चिरंजीवी होओ” ऐसे शब्दोंसे व्याप्त है ।
दिव्याकृतिसुसंस्थानाः सप्तधातुविवर्जिताः ।
कायकान्तिपयःपूरैः प्रसादितदिगन्तराः ॥124॥
अर्थ: ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते हैं, वे कैसे हैं ? दिव्य सुन्दराकार है संस्थान जिनका और जिनका सप्तधातु रहित शरीर है, जो शरीरकी प्रभारूपी जलके प्रभावसे समस्त दिशाओंको प्रसन्न करनेवाले हैं ।
शिरीषसुकुमाराङ्गाः पुण्यलक्षणलक्षिताः ।
अणिमादिगुणोपेता ज्ञानविज्ञानपारगाः ॥125॥
अर्थ: उस उपपाद शय्याका स्थान कैसा है कि-समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला है, रमणीक है, नित्य ही उत्सवसहित विराजता है, गीत वादित्रादि लीलाओं सहित है, तथा ‘‘जयवन्त होओ’’ ‘‘चिरंजीवी होओ’’ ऐसे शब्दोंसे व्याप्त है ॥१२३॥ ऐसे स्थान पर जो देव उत्पन्न होते हैं, वे कैसे हैं ? दिव्य सुन्दराकार है संस्थान जिनका और जिनका सप्तधातु रहित शरीर है, जो शरीरकी प्रभारूपी जलके प्रभावसे समस्त दिशाओंको प्रसन्न करनेवाले हैं ॥१२४॥ जिनका शरीर शिरीषपुष्पके समान कोमल है, पवित्र लक्षणों सहित है, अणिमा महिमादि गुणोंसे युक्त है, अवधिज्ञानादि विज्ञान चतुरताओंके पारगामी है ॥१२५॥ तथा चन्द्रमाकी मूर्ति समान है; जिनके सब दोष शान्त हो गये हैं; जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित है, भय क्लेश पीडासे रहित है ॥१२६॥ जिनका उत्साह बढता ही रहता है, वज्रके समान दृढशरीर हैं, बडे पराक्रमी हैं, इस प्रकारके देव अचिन्त्य पुण्यके योगसे उस उपपादस्थानमें शरीरको धारण करते हैं ।
मृगाङ्कमूर्त्तिसंकाशाः शान्तदोषाः शुभाशयाः ।
अचिन्त्यमहिमोपेता भयक्लेशार्त्तिवर्जिताः ॥126॥
अर्थ: तथा चन्द्रमाकी मूर्ति समान है; जिनके सब दोष शान्त हो गये हैं; जिनका चित्त शुभ है, अचिन्त्य महिमा सहित है, भय क्लेश पीडासे रहित है ।
वर्द्धमानमहोत्साहा वज्रकाया महाबलाः ।
अचिन्त्यपुण्ययोगेन गृह्णन्ति वपुरूर्जितम् ॥127॥
अर्थ: जिनका उत्साह बढता ही रहता है, वज्रके समान दृढशरीर हैं, बडे पराक्रमी हैं, इस प्रकारके देव अचिन्त्य पुण्यके योगसे उस उपपादस्थानमें शरीरको धारण करते हैं ।
सुखामृतमहाम्भोधेर्मध्यादिव विनिर्गताः ।
भवन्ति त्रिदशाः सद्यः क्षणेन नवयौवनाः ॥128॥
अर्थ: उस उपपाद शय्यामें वे देव उत्पन्न होते हैं सो जिस प्रकार समुद्रमेंसे कोई मनुष्य निकलें, उसी प्रकारं वे देव सुखरूपी महासमुद्रमेंसे तत्काल नवयौवनरूप होकर उत्पन्न होते हैं ।
किं च पुष्पफलाक्रान्तैः प्रवालदलदन्तुरैः ।
तेषां कोकिलवाचालैर्द्रुमैर्जन्म निगद्यते ॥129॥
अर्थ: फूल-फलोंसे भरपूर, कोमल पत्तोंसे अंकुरित और कोकिलाओंसे शब्दायमान वृक्षों करके उनके जन्मकी सूचना की जाती है ।
गीतवादित्रनिर्घोषैर्जयमङ्गलपाठकैः ।
विबोध्यन्ते शुभैः शब्दैः सुखनिद्रात्यये यथा ॥130॥
अर्थ: तथा वे देव उस उपपादशय्यामें ऐसे उत्पन्न होते हैं कि जैसे कोई राजकुमार सोता हो और वह गीत वादित्रोंके शब्दोंसे, ‘जय-जय’ इत्यादि मंगलके पाठोंसे तथा उत्तमोत्तम शब्दोंसे सुखनिद्राका अभाव होने पर जगाया जाता है; उसी प्रकार देव भी उस उपपादशिला (शय्या) में उठ कर सावधान होते हैं ।
किञ्चिद्भ्रममपाकृत्य वीक्षते स शनैः शनैः ।
यावदाशा मुहुः स्निग्धैस्तदा कर्णान्तलोचनैः ॥131॥
अर्थ: तथा उस उपपादशय्यामें सावधान होकर कुछ भ्रमको दूर करके उस समय कर्णान्त पर्यन्त नेत्रोंको उघाड कर दृष्टि फेर फेरकर चारों ओर देखता है ।
इन्द्रजालमथ स्वप्नः किं नु माया भ्रमो नु किम् ।
दृश्यमानमिदं चित्रं मम नायाति निश्चयम् ॥132॥
अर्थ: फिर सावधान होकर वह देव ऐसा विचारता है कि अहो ! यह क्या इन्द्रजाल है ? अथवा मुझे क्या स्वप्न आ रहा है ? अथवा यह मायामय कोई भ्रम है ? यह तो बडा आश्चर्य देखनेमें आता है; निश्चय नहीं कि यह क्या है ? इस प्रकार सन्देहरूप होता है ।
इदं रम्यमिदं सेव्यमिदं श्लाघ्यमिदं हितम् ।
इदं प्रियमिदं भव्यमिदं चित्तप्रसत्तिदम् ॥133॥
अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥
एतत्कन्दलितानन्दमेतत्कल्याणमन्दिरम् ।
एतन्नित्योत्सवाकीर्णमेतदत्यन्तसुन्दरम् ॥134॥
अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥
सर्वर्द्धिमहिमोपेतं महर्द्धिकसुरार्चितम् ।
सप्तानीकान्वितं भाति त्रिदशेन्द्रसभाजिरम् ॥135॥
अर्थ: तत्पश्चात् वह देव विचार करता है कि यह वस्तु रमणीय है, यह सेवनीय है, यह सराहने योग्य है, यह हितरूप है, यह प्रिय है, यह सुन्दर है, यह चित्तको प्रसन्नता देनेवाली है तथा यह आनन्दको उत्पन्न करनेवाला कल्याणका मंदिर निरन्तर उत्सवरूप तथा अत्यन्त सुन्दर है, तथा यह स्थान समस्त ऋद्धि और महिमासहित महाऋद्धिके धारक देवोंसे पूजनीय सात प्रकारकी सेना सहित देवेन्द्रके स्थानके समान दीखता है ॥१३३-१३५॥
मामेवोद्दिश्य सानन्दः प्रवृत्तः किमयं जनः ।
पुण्यमूर्त्तिः प्रियः श्लाघ्यो विनीतोऽत्यन्तवत्सलः ॥136॥
अर्थ: फिर वह देव विचारता है कि ये सामने जो लोग खडे हैं वे क्या मुझे ही देख कर आनंद सहित प्रवृत्त हैं ? ये पवित्र हैं, उज्वल हैं मूर्ति जिनकी ऐसे हैं तथा ये सब बहुत प्रिय हैं, प्रशंसनीय हैं, विनीत हैं, चतुर हैं, अत्यन्त प्रीतियुक्त हैं ।
त्रैलोक्यनाथसंसेव्यः कोऽयं देशः सुखाकरः ।
अनन्तमहिमाधारो विश्वलोकाभिनन्दितः ॥137॥
अर्थ: तथा फिर विचारता है कि यह सुखकी खानि तीन लोकके स्वामी द्वारा सेवने योग्य कौनसा देश है ? यह देश अनन्त महिमाका आधार है, सबको वांछनीय है ।
इदं पुरमतिस्फीतं वनोपवनराजितम् ।
अभिभूय जगद्भूत्या वल्गतीव ध्वजांशुकैः ॥138॥
अर्थ: तथा यह नगर भी अति विस्तीर्ण है, वन उपवनोंसे शोभित है, संपदाके द्वारा समस्त जगत्को जीतकर ध्वजाओंके वस्त्रोंके हिलनेसे मानो दौडता है, नृत्य ही करता है, इत्यादि विचारता है ।
आकलय्य तदाकूतं सचिवा दिव्यचक्षुषः ।
नतिपूर्वं प्रवर्त्तन्ते वक्तुं कालोचितं तदा ॥139॥
अर्थ: तत्पश्चात् उसी समय वहाँके मंत्री देव दिव्यनेत्रोंसे उस उत्पन्न हुए देवेन्द्रके अभिप्रायको समझ कर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव ! हम सेवकों पर प्रसन्न हूजिये, निर्मल दृष्टिसे देखिये और हमारे पूर्वापर परिपाटीके प्रकाश करनेवाले वचनोंको सुनिये ।।१३९-१४०।।
प्रसादः क्रियतां देव नतानां स्वेच्छया दृशा ।
श्रूयतां च वचोऽस्माकं पौर्वापर्यप्रकाशकम् ॥140॥
अर्थ: तत्पश्चात् उसी समय वहाँके मंत्री देव दिव्यनेत्रोंसे उस उत्पन्न हुए देवेन्द्रके अभिप्रायको समझ कर नमस्कार करके कहते हैं कि हे देव ! हम सेवकों पर प्रसन्न हूजिये, निर्मल दृष्टिसे देखिये और हमारे पूर्वापर परिपाटीके प्रकाश करनेवाले वचनोंको सुनिये ।।१३९-१४०।।
अद्य नाथ वयं धन्याः सफलं चाद्य जीवितम् ।
अस्माकं यत्त्वया स्वर्गः संभवेन पवित्रितः ॥141॥
अर्थ: यदि कोई मनुष्य सौधर्मस्वर्गमें इन्द्र उत्पन्न होता है तो उसका मंत्री सबकी तरफसे इस प्रकार कहता है कि हे नाथ ! आपने यहाँ उत्पन्न होकर इस स्वर्गको पवित्र किया सो आज हम धन्य हुए, हमारा जीवन भी आज सफल हुआ ।
प्रसीद जय जीव त्वं देव पुण्यस्तवोद्भवः ।
भव प्रभुः समग्रस्य स्वर्गलोकस्य सम्प्रति ॥142॥
अर्थ: हे नाथ ! आप प्रसन्न हूजिये, आपकी जय हो, आप चिरंजीव रहिये । हे देव ! आपका उत्पन्न होना पुण्यरूप है, पवित्र है । आप इस स्वर्गलोकके स्वामी हूजिये ।
सौधर्मोऽयं महाकल्पः सर्वामरशतार्चितः ।
नित्याभिनवकल्याणवार्द्धिवर्द्धनचन्द्रमाः ॥143॥
अर्थ: यदि कोई मनुष्य सौधर्मस्वर्गमें इन्द्र उत्पन्न होता है तो उसका मंत्री सबकी तरफसे इस प्रकार कहता है कि हे नाथ ! आपने यहाँ उत्पन्न होकर इस स्वर्गको पवित्र किया सो आज हम धन्य हुए, हमारा जीवन भी आज सफल हुआ ॥१४१॥ हे नाथ ! आप प्रसन्न हूजिये, आपकी जय हो, आप चिरंजीव रहिये । हे देव ! आपका उत्पन्न होना पुण्यरूप है, पवित्र है । आप इस स्वर्गलोकके स्वामी हूजिये ॥१४२॥ यह सौधर्म नामा महास्वर्ग है, सैकडों देवोंसे पूजित हैं; यह स्वर्ग सर्वदेवोंके कल्याणरूप समुद्रको बढानेके लिये चन्द्रमाके समान है ॥१४३॥ यह सौधर्म नामा स्वर्ग ऐसा है कि इसमें जो इन्द्र उत्पन्न होता है, उसका इशान इन्द्र आदि समस्त देव परमोत्सव करते हैं ॥१४४॥ इस स्वर्गमें वांछित पदार्थ भोगने योग्य है; यहाँ नित्य नया यौवन है, अविनश्वर लक्ष्मी है, और निरन्तर सुख ही सुख है ॥१४५॥ तथा यह स्वर्गीय विमान जहाँ जाना चाहें वहीं जा सकता है । इसका दर्शन अति मनोहर है, यह देवोंकी मंडली (सभा) आपके चरणकमलोंमें नम्रीभूत है ॥१४६॥ ये मनोहर अप्सराओंसे भरे हुए चन्द्रकान्तके समान मनोहर आपके महल हैं, ये रत्नमयी वापिकायें हैं, ये क्रीडानदियाँ तथा पर्वत हैं ॥१४७॥ यह सभाभवन है सो नम्रीभूत सैकडों देवोंके द्वारा सेवा करने योग्य है, पूजित है, तथा रत्नमयी दीपकोंसे प्रकाशमान एवं पुष्पसमूहोंसे शोभित है ॥१४८॥ और विनीत चतुर वेशकी धरनेवाली कामरूपिणी सुन्दर स्त्रियाँ नृत्य संगीतादि रसमें उत्सुक होकर आपके सामने नृत्य करनेके लिये आपकी आज्ञाकी प्रतीक्षा कर रही हैं ॥१४९॥ तथा यह आपका छत्र है, यह आपका पूजनीय सिंहासन है, यह चमरोंका समूह है, ये विजयकी ध्वजायें हैं ॥१५०॥ और ये
कल्पः सौधर्मनामायमीशानप्रमुखाः सुराः ।
इहोत्पन्नस्य शक्रस्य कुर्वन्ति परमोत्सवम् ॥144॥
अर्थ: यह सौधर्म नामा स्वर्ग ऐसा है कि इसमें जो इन्द्र उत्पन्न होता है, उसका इशान इन्द्र आदि समस्त देव परमोत्सव करते हैं ।
अत्र संकल्पिताः कामा नवं नित्यं च यौवनम् ।
अत्राविनश्वरा लक्ष्मीः सुखं चात्र निरन्तरम् ॥145॥
अर्थ: इस स्वर्गमें वांछित पदार्थ भोगने योग्य है; यहाँ नित्य नया यौवन है, अविनश्वर लक्ष्मी है, और निरन्तर सुख ही सुख है ।
स्वर्विमानमिदं रम्यं कामगं कान्तदर्शनम् ।
पादाम्बुजनता चेयं तव त्रिदशमण्डली ॥146॥
अर्थ: तथा यह स्वर्गीय विमान जहाँ जाना चाहें वहीं जा सकता है । इसका दर्शन अति मनोहर है, यह देवोंकी मंडली (सभा) आपके चरणकमलोंमें नम्रीभूत है ।
एते दिव्याङ्गनाकीर्णाश्चन्द्रकान्ता मनोहराः ।
प्रासादा रत्नवाप्यश्च क्रीडानद्यश्च भूधराः ॥147॥
अर्थ: ये मनोहर अप्सराओंसे भरे हुए चन्द्रकान्तके समान मनोहर आपके महल हैं, ये रत्नमयी वापिकायें है, ये क्रीडानदियाँ तथा पर्वत हैं ।
सभाभवनमेतत्ते नतामरशतार्चितम् ।
रत्नदीपकृतालोकं पुष्पप्रकरशोभितम् ॥148॥
अर्थ: यह सभाभवन है सो नम्रीभूत सैकडों देवोंके द्वारा सेवा करने योग्य है, पूजित है, तथा रत्नमयी दीपकोंसे प्रकाशमान एवं पुष्पसमूहोंसे शोभित है ।
विनीतवेषधारिण्यः कामरूपा वरस्त्रियः ।
तवादेशं प्रतीक्षन्ते लास्यलीलारसोत्सुकाः ॥149॥
अर्थ: और विनीत चतुर वेशकी धरनेवाली कामरूपिणी सुन्दर स्त्रियाँ नृत्य संगीतादि रसमें उत्सुक होकर आपके सामने नृत्य करनेके लिये आपकी आज्ञाकी प्रतीक्षा कर रही हैं ।
आतपत्रमिदं पूज्यमिदं च हरिविष्टरम् ।
एतच्च चामरव्रातमेते विजयकेतवः ॥150॥
अर्थ: तथा यह आपका छत्र है, यह आपका पूजनीय सिंहासन है, यह चमरोंका समूह है, ये विजयकी ध्वजायें हैं ।
एता अग्रे महादेव्यो वरस्त्रीवृन्दवन्दिताः ।
तृणीकृतसुराधीशलावण्यैश्वर्यसम्पदः ॥151॥
अर्थ: और ये सब आपकी अग्रमहिषी अर्थात् पट्टदेवियाँ हैं, ये श्रेष्ठ देवांगनाओं द्वारा वंदने योग्य है तथा इन्द्रके ऐश्वर्यको तृणकी समान समझनेवाली हैं तथा शृंगाररूपी समुद्रकी लहरोंके समान चंचल है; विलासके कारण जिनकी भौहें प्रफुल्लित है और लीलारूपी अलंकारसे पूरित है; सो हे नाथ ! ये आपके चरणोंमें समर्पित हैं ॥१५१-१५२॥
शृङ्गारजलधेर्वेला-विलासोल्लासितभ्रुवः ।
लीलालङ्कारसम्पूर्णास्तव नाथ समर्पिताः ॥152॥
अर्थ: और ये सब आपकी अग्रमहिषी अर्थात् पट्टदेवियाँ हैं, ये श्रेष्ठ देवांगनाओं द्वारा वंदने योग्य है तथा इन्द्रके ऐश्वर्यको तृणकी समान समझनेवाली हैं तथा शृंगाररूपी समुद्रकी लहरोंके समान चंचल है; विलासके कारण जिनकी भौहें प्रफुल्लित है और लीलारूपी अलंकारसे पूरित है; सो हे नाथ ! ये आपके चरणोंमें समर्पित हैं ॥१५१-१५२॥
सर्वावयवनिर्माणश्रीरासां नोपमास्पदम् ।
यासां श्लाघ्यामलस्निग्धपुण्याणुप्रभवं वपुः ॥153॥
अर्थ: इन पट्टदेवियोंके शरीरकी शोभा अनुपम है; क्योंकि इनका शरीर योग्य निर्मल स्निग्ध पवित्र परमाणुओंके द्वारा बना हुआ है ।
अयमैरावणो नाम देवदन्ती महामनाः ।
धत्ते गुणाष्टकैश्वर्याच्छ्रियं विश्वातिशायिनीम् ॥154॥
अर्थ: हे नाथ ! वह आपका महामनवाला ऐरावत नामा देव हस्ती है जो अणिमामहिमादि आठ गुणोके ऐश्वर्यसे समस्त प्रकारकी विक्रियारूप लक्ष्मीको धरनेवाला है ।
इदं मत्तगजानीकमितोऽश्वीयं मनोजवम् ।
एते स्वर्णरथास्तुङ्गा वल्गन्त्येते पदातयः ॥155॥
अर्थ: और यह आपकी मदोन्मत्त हस्तियोंकी सेना है, यह घोडोंकी सेना हैं, इसका वेग मनके समान है; यह सुवर्णमयी ऊँचे-ऊँचे रथोंकी सेना है और ये पयादे हैं ।
एतानि सप्त सैन्यानि पालितान्यमरेश्वरैः ।
नमन्ति ते पदद्वन्द्वं नतिविज्ञप्तिपूर्वकम् ॥156॥
अर्थ: तथा यह आपकी सात प्रकारकी सेना है, पूर्वके इन्द्रों द्वारा पालित है; यह आपके चरणकमलोंको प्रार्थना पूर्वक नमस्कार करतीं है ।
समग्रं स्वर्गसाम्राज्यं दिव्यभूत्योपलक्षितम् ।
पुण्यैस्ते सम्मुखीभूतं गृहाण प्रणतामरम् ॥157॥
अर्थ: यह समस्त स्वर्गीय राज्य दिव्य सम्पदाओंसे शोभित है, सो आपके पुण्यके प्रतापसे आपके सन्मुख हुआ है । नम्रीभूत है देव जिसमें ऐसा है, सो आप ग्रहण कीजिये ।
इति वादिनी सुस्निग्धे सचिवेऽत्यन्तवत्सले ।
अवधिज्ञानमासाद्य पौर्वापर्यं स बुद्ध्यति ॥158॥
अर्थ: इस प्रकार अति स्नेहयुक्त अत्यन्त प्रीतिपूर्वक मंत्री कहता है, उसी समय इन्द्र अवधिज्ञानको प्राप्त होकर पूर्वजन्मसंबंधी समस्त वृतान्त जान जाता है ।
अहो तपः पुरा चीर्णं मयान्यजनदुश्चरम् ।
वितीर्णं चाभयं दानं प्राणिनां जीवितार्थिनाम् ॥159॥
अर्थ: तत्पश्चात् वह इन्द्र अवधिज्ञानसे सब जानकर मन ही मनमें कहता है कि अहो ! देखो, मैंने पूर्वभवमें अन्यसे आचरण करनेमें नहीं आवे ऐसे तपको धारण किया था तथा अनेक जीवोंको मैंने अभयदान दिया था ।
आराधितं मनःशुद्ध्या दृग्बोधादिचतुष्टयम् ।
देवश्च जगतां नाथः सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥160॥
अर्थ: तथा मनकी विशुद्धिपूर्वक दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप इन चारों आराधनाओंसे त्रैलोक्यके नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर देवाधिदेवका आराधन किया था ।
निर्दग्धं विषयारण्यं स्मरवैरी निपातितः ।
कषायतरवश्छिन्ना रागशत्रुर्नियन्त्रितः ॥161॥
अर्थ: तथा मैंने पूर्वभवमें इन्द्रियोंके विषयरूप वनको दग्ध किया था, कामरूप शत्रुका नाश किया था, कषायरूप वृक्षोंको काट दिया था और रागरूपी शत्रुको पीडित किया था ।
सर्वस्तस्य प्रभावोऽयमहं येनाद्य दुर्गतेः ।
उद्धृत्य स्थापितं स्वर्गराज्ये त्रिदशवन्दिते ॥162॥
अर्थ: उसीका यह प्रभाव है; उक्त आचरणोंने ही इस समय मुझे दुर्गतिसे बचाकर इस देवोंके वंदनीय स्वर्गके राज्यमें स्थापित किया है ।
रागादिदहनज्वाला न प्रशाम्यन्ति देहिनाम् ।
सद्वृत्तवार्यसंसिक्ताः क्वचिज्जन्मशतैरपि ॥163॥
अर्थ: तत्पश्चात् वह इन्द्र विचारता है कि जीवोंके रागादिकरूप अग्निकी ज्वाला सम्यक् चारित्ररूपी जलको सींचे बिना सैकडों जन्म लेने पर भी नहीं बुझती ।
तन्नात्र सुलभं मन्ये तत्किं कुर्मोऽधुना वयम् ।
सुराणां स्वर्गलोकेऽस्मिन्दर्शनस्यैव योग्यता ॥164॥
अर्थ: ऐसा सम्यक् चारित्र इस स्वर्गमें सुलभ नहीं है, इसलिये क्या करूँ ? इस स्वर्गलोकमें तो सम्यग्दर्शनकी ही योग्यता है, चारित्रकी योग्यता नहीं है ।
अतस्तत्त्वार्थश्रद्धा मे श्रेयसी स्वार्थसिद्धये ।
अर्हद्देवपदद्वन्द्वे भक्तिश्चात्यन्तनिश्चला ॥165॥
अर्थ: इस कारण मेरे स्वार्थके लिये तत्त्वार्थश्रद्धान ही कल्याणकारी व श्रेष्ठ है, तथा अर्हन्त भगवानके चरणयुगलमें अत्यन्त निश्चल भक्ति करना ही कल्याणकारी है ।
यान्यत्र प्रतिबिम्बानि स्वर्गलोके जिनेशिनाम् ।
विमानचैत्यवृक्षेषु मेर्वाद्युपवनेषु च ॥166॥
अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥
तेषां पूर्वमहं कृत्वा स्वद्रव्यैः स्वर्गसंभवैः ।
पुष्पचन्दननैवेद्यैर्गन्धदीपाक्षतोत्करैः ॥167॥
अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥
गीतवादित्रनिर्घोषैः स्तुतिस्तोमैर्मनोहरैः ।
स्वर्गैश्वर्यं ग्रहीष्यामि ततस्त्रिदशवन्दितः ॥168॥
अर्थ: इसलिये यहाँ स्वर्गमें विमानों, चैत्यवृक्षों तथा मेरु आदिके उपवनोंमें जो जिनेन्द्र भगवानके प्रतिबिम्ब है उनका प्रथम ही इस स्वर्गमें उत्पन्न हुए अपने द्रव्य पुष्प, चंदन, नैवेद्य, गन्ध, दीपक व अक्षतोंके समूहसे पूजन करके तथा गीत नृत्य वादित्रोंके शब्दों सहित मनोहर स्तुतियाँ करके तत्पश्चात् इस देवोंसे वंदनीय स्वर्गके ऐश्वर्यको ग्रहण करना चाहिये ॥१६६-१६८॥
इति सर्वज्ञदेवस्य कृत्वा पूजामहोत्सवम् ।
स्वीकरोति ततो राज्यं पट्टबन्धादिलक्षणम् ॥169॥
अर्थ: इस प्रकार विचारकर वह इन्द्र सर्वज्ञदेवकी पूजा करके महान् उत्सवपूर्वक पट्टबंधादिक है लक्षण जिसका ऐसे स्वर्गके राज्यको ग्रहण करता है ।
तस्मिन्मनोजवैर्यानैर्विचरन्तो यदृच्छया ।
वनाद्रिसागरान्तेषु दीव्यन्ते ते दिवौकसः ॥170॥
अर्थ: तत्पश्चात् वे स्वर्गके देव मनके समान वेगवाले विमानोंके द्वारा स्वच्छन्द विचरते हुए वन, पर्वत, वा समुद्रोंके तीर पर क्रीडा करते रहते हैं ।
संकल्पानन्तरोत्पन्नैर्दिव्यभोगैः समन्वितम् ।
सेवमानाः सुरानीकैः श्रयन्ति स्वर्गिणः सुखम् ॥171॥
अर्थ: तथा संकल्प करते ही उत्पन्न होनेवाले नानाप्रकारके दिव्य मनोहर भोगोंको भोगते हुए देवोंकी सेना सहित वे स्वर्गके सुख भोगते रहते हैं ।
महाप्रभावसम्पन्ने महाभूत्योपलक्षिते ।
कालं गतं न जानन्ति निमग्नाः सौख्यसागरे ॥172॥
अर्थ: इस प्रकार महाप्रभाव सहित महाविभूतियुक्त स्वर्गोंके सुखरूपी समुद्रमें निमग्न रहते हुए समयको नहीं जानते कि कितना बीत गया ।
क्वचिद्गीतैः क्वचिन्नृत्यैः क्वचिद्वाद्यैर्मनोरमैः ।
क्वचिद्विलासिनीव्रातक्रीडाशृङ्गारदर्शनैः ॥173॥
अर्थ: इस प्रकार कहीं तो मनके लुभानेवाले गीत तथा नृत्य वादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओंके समूहसे किये हुए क्रीडा शृंगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकारके भोगों (कल्पवृक्षों) से उत्पन्न हुए सुखों सहित कल्पनातीत विभववाले स्वर्गोंमें देव रहते हैं ॥१७३-१७४॥
दशाङ्गभोगजैः सौख्यैर्लभ्यमानाः क्वचित् क्वचित् ।
वसन्ति स्वर्गिणः स्वर्गे कल्पनातीतवैभवे ॥174॥
अर्थ: इस प्रकार कहीं तो मनके लुभानेवाले गीत तथा नृत्य वादित्रों सहित तथा कहीं विलासिनी अप्सराओंके समूहसे किये हुए क्रीडा शृंगार सहित तथा कहीं पर दश प्रकारके भोगों (कल्पवृक्षों) से उत्पन्न हुए सुखों सहित कल्पनातीत विभववाले स्वर्गोंमें देव रहते हैं ॥१७३-१७४॥
मद्यतूर्यगृहज्योतिर्भूषाभोजनविग्रहाः ।
स्रग्दीपवस्त्रपात्राङ्गा दशधा कल्पपादपाः ॥175॥
अर्थ: मद्य, वादित्र, गृह, ज्योति, भूषण, भोजन, माला, दीपक, वस्त्र, पात्र, इन दश प्रकारके भोगोंके देनेवाले दश प्रकारके कल्पवृक्ष स्वर्गोंमें होते हैं; इस कारण स्वर्गके देव दशांग भोग भोगते हैं ।
यत्सुखं नाकिनां स्वर्गे तद्वक्तुं केन पार्यते ।
स्वभावजमनातङ्कं सर्वाक्षप्रीणनक्षमम् ॥176॥
अर्थ: स्वर्गोंमें स्वर्गवासियोंको जो सुख है, उसका वर्णन करनेमें कोई समर्थ नहीं है; क्योंकि वह सुख बिना प्रयासके स्वयमेव उत्पन्न होता है, उस सुखमें आतंक (रोगादिक) नहीं है और समस्त इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें समर्थ है ।
अशेषविषयोद्भूतं दिव्यस्त्रीसंगसंभवम् ।
विनीतजनविज्ञानज्ञानाद्यैश्वर्यलाञ्छितम् ॥177॥
अर्थ: स्वर्गोंका सुख समस्त प्रकारके विषयोंसे उत्पन्न हुआ है तथा दिव्य स्त्रियोंके संगमसे उत्पन्न हुआ है तथा विनीत जनके विज्ञान चतुराई ज्ञानादिक ऐश्वर्यसहित उत्पन्न हुआ है, उसका वर्णन कौन कर सकता है ?
सौधर्माद्यच्युतान्ता ये कल्पाः षोडश वर्णिताः ।
कल्पातीतास्ततो ज्ञेया देवा वैमानिकाः परे ॥178॥
अर्थ: सौधर्म स्वर्गसे लगाकर अच्युत स्वर्ग पर्यन्त सोलह स्वर्ग कल्प कहे जाते हैं; उनके ऊपर जो नव ग्रैवेयकोंमें वैमानिक देव हैं, वे कल्पातीत कहाते हैं ।
अहमिन्द्राभिधानास्ते प्रवीचारविवर्जिताः ।
विवर्द्धितशुभध्यानाः शुक्ललेश्यावलम्बिनः ॥179॥
अर्थ: वे देव अहमिन्द्र नामसे वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका आचार्योंने अहमिन्द्र नाम कहा है । वे अहमिन्द्र कामरहित हैं, उनके स्त्रीका मैथुन वर्जित है, इसी कारण वहाँ देवांगनायें नहीं होती । उन देवोंका शुभध्यान उत्तरोत्तर बढता हुआ है और वे शुक्ल लेश्याके धरनेवाले हैं ।
अनुत्तरविमानेषु श्रीजयन्तादिपञ्चसु ।
संभूय स्वर्गिणश्च्युत्वा व्रजन्ति पदमव्ययम् ॥180॥
अर्थ: तत्पश्चात् उन नव ग्रैवेयक विमानोंसे ऊपर श्रीजयंतादिक पाँच अनुत्तर विमान हैं। उनमें जो देव उत्पन्न होते हैं, वे वहाँसे च्यव कर मनुष्य हो अवश्य ही मोक्षको पाते हैं ।
कल्पेषु च विमानेषु परतः परतोऽधिकाः ।
शुभलेश्यायुर्विज्ञानप्रभावैः स्वर्गिणः स्वयम् ॥181॥
अर्थ: तथा कल्पोंमें और कल्पातीत विमानोंमें शुभ लेश्या, आयु, विज्ञान, प्रभावादिक करके देव स्वयं ही अगले-अगले विमानोंमें अधिक-अधिक बढते हुए हैं ।
ततोऽग्रे शाश्वतं धाम जन्मजातङ्कविच्युतम् ।
ज्ञानिनां यदधिष्टानं क्षीणनिःशेषकर्मणाम् ॥182॥
अर्थ: उन अनुत्तर विमानोंसे आगे अर्थात् ऊपर शाश्वत धाम (मोक्षस्थान वा सिद्धशिला) है सो संसारसे उत्पन्न हुए क्लेश दुःखादिसे रहित है और समस्त कर्मोंके नाश करनेवाले सिद्ध भगवानोंका आश्रयस्थान है ।
चिदानन्दगुणोपेता निष्ठितार्था विबन्धनाः ।
यत्र सन्ति स्वयंबुद्धाः सिद्धाः सिद्धेः स्वयंवराः ॥183॥
अर्थ: उस मोक्षस्थानमें सिद्ध भगवान् विद्यमान है। वे चैतन्य और आनन्दरूप गुणोंसे संयुक्त है, कृतकृत्य है, कर्मबन्धसे रहित है, स्वयंबुद्ध है, अर्थात् जिनके स्वाधीन अतीन्द्रिय ज्ञान है तथा सिद्धि (मुक्ति) को स्वयं वरनेवाले हैं ।
समस्तोऽयमहो लोकः केवलज्ञानगोचरः ।
तं व्यस्तं वा समस्तं वा स्वशक्त्या चिन्तयेद्यतिः ॥184॥
अर्थ: अहो भव्य जीवों ! यह समस्त लोक केवलज्ञानगोचर है तथापि इस संस्थानविचय नामा धर्मध्यानमें मुनि सामान्यतासे सबको ही तथा व्यस्त कहिये कुछ भिन्न भिन्नको अपनी शक्तिके अनुसार चिन्तवन करे ।
विलीनाशेषकर्माणं स्फुरन्तमतिनिर्मलम् ।
स्वं ततः पुरुषाकारं स्वाङ्गगर्भगतं स्मरेत् ॥185॥
अर्थ: तथा इस लोकके संस्थानके चिन्तवनके पश्चात् शरीरमें प्राप्त पुरुषाकार अपने आत्माको कर्मरहित स्फुरायमान अति निर्मल चिन्तवन (स्मरण) करे ।
इति निगदितमुच्चैर्लोकसंस्थानमित्थं
नियतमनियतं वा ध्यायतः शुद्धबुद्धेः ।
भवति सततयोगाद्योगिनो निष्प्रमादं
नियतमनतिदूरं केवलज्ञानराज्यम् ॥186॥
अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस पूर्वोक्त प्रकारसे कहे हुए लोकके स्वरूप (संस्थान) को इस प्रकार नियत मर्यादा सहित वा अनियत मर्यादा सहित चिन्तवन करता हुआ जो निर्मलबुद्धि मुनि है उसको प्रमादरहित ध्यान करनेसे नियमसे शीघ्र ही केवलज्ञान राज्यकी प्राप्ति होती है ।