सर्ग 4: ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 62)
यच्चतुर्धा मतं तज्ज्ञैः क्षीणमोहैर्मुनीश्वरैः ।
पूर्वप्रकीर्णकाङ्गेषु ध्यानलक्ष्म सविस्तरम् ॥1॥
अर्थ: ध्यानके जाननेवाले क्षीणमोह मुनीश्वरोंने सविस्तर ध्यानका लक्षण पूर्वप्रकीर्णकसहित द्वादश अंगोंमें चार प्रकारका माना है ।
शतांशमपि तस्याद्य न कश्चिद्वक्तुमीश्वरः ।
तदेतत्सुप्रसिद्ध्यर्थं दिङ्मात्रमिह वर्ण्यते ॥2॥
अर्थ: द्वादशांगसूत्रमें जो ध्यानका लक्षण विस्तारसहित कहा गया है, उसका शतांश (सौवाँ भाग) भी आज कोई कहनेको समर्थ नहीं है, तथापि उसकी प्रसिद्धिके लिये इस ग्रन्थमें दिग्दर्शन मात्र वर्णन किया जाता है ।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां गुणदोषैः प्रपञ्चितम् ।
हेयोपादेयभावेन सविकल्पं निगद्यते ॥3॥
अर्थ: यह ध्यानका लक्षण गुण-दोष और अन्वय-व्यतिरेकसे जिस प्रकार विस्ताररूप है, उसी प्रकार हेयोपादेय भावोंसे भेदों सहित कहा जाता है । अन्वयगुणोंसे अर्थात् जहाँ ऐसे गुण हो तो वहाँ ध्यान होता है और व्यतिरेक दोषोंसे अर्थात् जहाँ ये दोष हो वहाँ ध्यान नहीं होता । तथा अप्रशस्तध्यान तो हेय है और प्रशस्त ध्यान उपादेय है । आर्त्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ऐसे चार भेद कहे गये हैं, सो इनके विशेष वर्णनसे विस्ताररूप ध्यानका स्वरूप कहा जावेगा ।
ध्याता ध्यानमितस्तदङ्गमखिलं दृग्बोधवृत्तान्वितं
ध्येयं तद्गुणदोषलक्षणयुतं नामानि कालः फलम् ।
एतत्सूत्रमहार्णवात्समुदितं यत्प्राक्प्रणीतं बुधैः
तत्सम्यक्परिभावयन्तु निपुणा अत्रोच्यमानं क्रमात् ॥4॥
अर्थ: पूर्व कालके ज्ञानीपुरुषोंने (पूर्वाचार्योंने) ध्यान करनेवाला ध्याता, ध्यान, ध्यानके दर्शनज्ञानचारित्रसहित समस्त अंग, ध्येय तथा ध्येयके गुणदोष लक्षणसहित ध्यानके नाम, ध्यानका समय, और ध्यानका फल ये सब ही जो सूत्ररूप महासमुद्रसे प्रगट होकर बुद्धिमानोंके द्वारा पूर्वमें प्रणीत किये गये हैं, वे ही सब इस ग्रन्थमें क्रमसे कहे जाते हैं । निपुण पुरुषोंको भले प्रकार इनका परिशीलन करना चाहिए ।
ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं फलं चेति चतुष्टयम् ।
इति सूत्रसमासेन सविकल्पं निगद्यते ॥5॥
अर्थ: ध्याता, ध्यान, ध्येय और फल यह चतुष्टय सूत्ररूप संक्षेपसे भेदसहित कहा जाता है ।
मुमुक्षुर्जन्मनिर्विण्णः शान्तचित्तो वशी स्थिरः ।
जिताक्षः संवृतो धीरो ध्याता शास्त्रे प्रशस्यते ॥6॥
अर्थ: शास्त्रमें ऐसे ध्याताकी प्रशंसा की गई है कि जो मुमुक्षु हो अर्थात् मोक्षकी इच्छा रखनेवाला हो। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हो, तो मोक्षके कारणरूप ध्यानको क्यों करे ? दूसरे, संसारसे विरक्त हो । क्योंकि संसारसे विरक्त हुए बिना ध्यानमें चित्त किसलिये लगावें ? तीसरे, क्षोभरहित शान्तचित्त हो । क्योंकि व्याकुलचित्तके ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती । चौथे, वशी कहिये जिसका मन अपने वशमें हो ।क्योंकि मनके वश हुए विना वह ध्यानमें कैसे लगे ? पाँचवें, स्थिर हो अर्थात् शरीरके सांगोपांग आसनमें दृढ हो। क्योंकि काय चलायमान रहनेसे ध्यानकी सिद्धि नहीं होती । छट्ठे, जिताक्ष (जितेन्द्रिय) हो । क्योंकि इन्द्रियोंके जीते विना वे विषयोंमें प्रवृत्ति करती हैं और ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती । सातवें, संवृत कहिये संवरयुक्त हो । क्योंकि खानपानादिमें विकल हो जावें तो, ध्यानमें चित्त कैसे स्थिर हो ? आठवें, धीर हो । उपसर्ग आने पर ध्यानसे च्युत न होवे तब ध्यानकी सिद्धि होती है । ऐसे आठ गुणसहित ध्याताके ध्यानकी सिद्धि हो सकती है, अन्यके नहीं होती ।
उदीर्णकर्मेन्धनसंभवेन दुःखानलेनातिकदर्थ्यमानम् ।
दन्दह्यते विश्वमिदं समन्तात्प्रमादमूढं च्युतसिद्धिमार्गम् ॥7॥
अर्थ: छोड दिया है मोक्षमार्ग जिसने ऐसा प्रमादसे मूढ होकर यह जगत् उदयमें आये हुए कर्मरूपी ईंधनसे उत्पन्न दुःखरूपी अग्निसे पीडित होता हुआ चारों ओरसे जलता है ।
दह्यमाने जगत्यस्मिन्महता मोहवह्निना ।
प्रमादमदमुत्सृज्य निःक्रान्ता योगिनः परम् ॥8॥
अर्थ: महामोहरूपी अग्निसे जलते हुए इस जगत्मेंसे केवल मुनिगण ही प्रमादको छोडकर निकलते हैं, अन्य कोई नहीं ।
न प्रमादजयः कर्तुं धीधनैरपि पार्यते ।
महाव्यसनसंकीर्णे गृहवासेऽतिनिन्दिते ॥9॥
अर्थ: अनेक कष्टोंसे भरे हुए अति निंदित गृहवासमें बडे-बडे बुद्धिमान् भी प्रमादको पराजित करनेमें समर्थ नहीं है । इस कारण गृहस्थावस्थामें ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती ।
शक्यते न वशीकर्तुं गृहिभिश्चपलं मनः ।
अतश्चित्तप्रशान्त्यर्थं सद्भिस्त्यक्ता गृहे स्थितिः ॥10॥
अर्थ: गृहस्थगण घरमें रहते हुए अपने चपल मनको वश करनेमें असमर्थ होते हैं, अतएव चित्तकी शान्तिके अर्थ सत्पुरुषोंने घरमें रहना छोड दिया है और वे एकान्त स्थानमें रहकर ध्यानस्थ होनेको उद्यमी हुए हैं ।
प्रतिक्षणं द्वन्द्वशतार्त्तचेतसां नृणां दुराशाग्रहपीडितात्मनाम् ।
नितम्बिनीलोचनचौरसङ्कटे गृहाश्रमे स्वात्महितं न सिद्ध्यति ॥11॥
अर्थ: सैकडों प्रकारके कलहोंसे दुःखित चित्त, और धनादिककी दुराशारूपी पिशाचीसे पीडित मनुष्योंके प्रतिक्षण स्त्रियोंके नेत्ररूपी चौरोंका है उपद्रव जिसमें, ऐसे इस गृहस्थाश्रममें अपने आत्महितकी सिद्धि नहीं होती है ।
निरन्तरार्त्तानलदाहदुर्गमे कुवासनाध्वान्तविलुप्तलोचने ।
अनेकचिन्ताज्वरजिह्मितात्मनां नृणां गृहे नात्महितं प्रसिद्ध्यति ॥12॥
अर्थ: निरन्तर पीडारूप आर्त्तध्यानकी अग्निके दाहसे दुर्गम, बसनेके अयोग्य, तथा कामक्रोधादिकी कुवासनारूपी अंधकारसे विलुप्त हो गई है नेत्रोंकी दृष्टि जिसमें, ऐसे घरोंमें अनेक चिन्तारूपी ज्वरसे विकाररूप मनुष्योंके अपने आत्माका हित कदापि सिद्ध नहीं होता । ऐसे गृहस्थावासमें उत्तम ध्यान कैसे हो?
विपन्महापङ्कनिमग्नबुद्धयः प्ररूढरागज्वरयन्त्रपीडिताः ।
परिग्रहव्यालविषाग्निमूर्च्छिता विवेकवीथ्यां गृहिणः स्खलन्त्यमी ॥13॥
अर्थ: गृहस्थावस्थाकी आपदारूपी महान् कीचडमें जिनकी बुद्धि फँसी हुई है, तथा जो प्रचुरतासे बढे हुए रागरूपी ज्वरके यन्त्रसे पीडित हैं, और जो परिग्रहरूपी सर्पके विषकी ज्वालासे मूर्च्छित हुए हैं, वे गृहस्थगण विवेकरूपी वीथीमें (गलीमें) चलते हुए स्खलित हो जाते हैं अर्थात् च्युत हो जाते हैं । अथवा समीचीन मार्गसे (मोक्षमार्गसे) भ्रष्ट हो जाते हैं ।
हिताहितविमूढात्मा स्वं शश्वद्वेष्टयेद् गृही ।
अनेकारम्भजैः पापैः कोशकारः कृमिर्यथा ॥14॥
अर्थ: जैसे रेशमका कीडा अपने ही मुखसे तारोंको निकाल कर अपनेको ही उसमें आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार हिताहितमें विचारशून्य होकर यह गृहस्थजन भी अनेक प्रकारके आरम्भोंसे पापोपार्जन करके अपनेको शीघ्र ही पापजालमें फँसा लेते हैं ।
जेतुं जन्मशतेनापि रागाद्यरिपताकिनी ।
विना संयमशस्त्रेण न सद्भिरपि शक्यते ॥15॥
अर्थ: रागादि शत्रुओंकी सेना संयमरूपी शस्त्रके विना बडे-बडे सत्पुरुषोंसे (राजाओंसे) सैकडों जन्म लेकर भी जब जीती नहीं जा सकती है, तो अन्यकी कथा ही क्या है ? ।
प्रचण्डपवनैः प्रायश्चाल्यन्ते यत्र भूभृतः ।
तत्राङ्गनादिभिः स्वान्तं निसर्गतरलं न किम् ॥16॥
अर्थ: स्त्रियाँ प्रचंड पवनके समान है । प्रचंड पवन बडे-बडे भूभृतों (पर्वतों) को उडा देता है और स्त्रियाँ बडे-बडे भूभृतों (राजाओंको) चला देती हैं । ऐसी स्त्रियोंसे, जो स्वभावसे ही चंचल है ऐसा मन, क्या चलायमान नहीं होगा ?
खपुष्पमथवा शृङ्गं खरस्यापि प्रतीयते ।
न पुनर्देशकालेऽपि ध्यानसिद्धिर्गृहाश्रमे ॥17॥
अर्थ: आकाशके पुष्प और गधेके सींग नहीं होते हैं । कदाचित् किसी देश वा कालमें इनके होनेकी प्रतीति हो सकती है, परन्तु गृहस्थाश्रममें ध्यानकी सिद्धि होनी तो किसी देश वा कालमें संभव नहीं है ।
दुर्दृशामपि न ध्यानसिद्धिः स्वप्नेऽपि जायते ।
गृह्णतां दृष्टिवैकल्याद्वस्तुजातं यदृच्छया ॥18॥
अर्थ: दृष्टिकी विकलतासे वस्तुसमूहको अपनी इच्छानुसार ग्रहण करनेवाले मिथ्यादृष्टियोंके ध्यानकी सिद्धि स्वप्नमें भी नहीं होती है ।
ध्यानसिद्धिर्यतित्वेऽपि न स्यात्पाषण्डिनां क्वचित् ।
पूर्वापरविरुद्धार्थमतसत्तावलम्बिनाम् ॥19॥
अर्थ: मिथ्यादृष्टिको (अन्यथा श्रद्धान करनेवाले अन्यमतीको) गृहस्थावस्था छोडकर मुनि होने पर भी ध्यानकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि वे पूर्वापरविरुद्ध पदार्थोंके स्वरूपमें समीचीनता (सत्यता) माननेवाले हैं, अर्थात् अन्यमतमें सत्ता-यथार्थता नहीं है ।
किं च पाषण्डिनः सर्वे सर्वथैकान्तदूषिताः ।
अनेकान्तात्मकं वस्तु प्रभवन्ति न वेदितुम् ॥20॥
अर्थ: सब ही अन्यमती पाखंडी सर्वथा एकान्ततासे दूषित हैं, और वस्तुका स्वरूप अनेकान्तात्मक है अतः वे उनके यथार्थ स्वरूपको जाननेमें असमर्थ हैं । स्याद्वादके जाने विना विरोध आदि दूषणोंका परिहार उनसे नहीं किया जा सकता है ।
नित्यतां केचिदाचक्षुः केचिच्चानित्यतां खलाः ।
मिथ्यात्वान्नैव पश्यन्ति नित्यानित्यात्मकं जगत् ॥21॥
अर्थ: कोई-कोई तो वस्तुके नित्यता ही कहते हैं और कोई-कोई अनित्यता ही सिद्ध करते है । परन्तु यह जगत् नित्य-अनित्य दोनों स्वरूप हैं ऐसा मिथ्यात्वके उदयसे नहीं देखते ।
वस्तुतत्त्वापरिज्ञानात्किं ध्येयं क्व च भावना ।
ध्यानाभ्यासस्ततस्तेषां प्रयासायैव केवलम् ॥22॥
अर्थ: उक्त मिथ्यादृष्टि अन्य मतावलम्बियोंके यथार्थ स्वरूपके ज्ञानके अभावसे ध्येय कहाँ और भावना कहाँ ? इस कारण उनका ध्यानका करना केवल प्रयास मात्र ही है अर्थात् निष्फल खेद करना है।
ज्ञानादेवेष्टसिद्धिः स्यात्ततोऽन्यः शास्त्रविस्तरः ।
मुक्तेरुक्तमतो बीजं विज्ञानं ज्ञानवादिभिः ॥23॥
अर्थ: ज्ञानवादियोंका मत तो ऐसा है कि एक मात्र ज्ञानसे ही इष्टसिद्धि होती है। इससे अन्य जो कुछ है सो सब शास्त्रका विस्तार मात्र है। इस कारण विज्ञान ही मुक्तिका बीजभूत है ।
कैश्चिच्च कीर्त्तिता मुक्तिर्दर्शनादेव केवलम् ।
वादिनां खलु सर्वेषामपाकृत्य नयान्तरम् ॥24॥
अर्थ: और कई वादियोंने अन्य समस्त वादियोंके अन्य नयपक्षोंका निराकरण करके केवल दर्शन (श्रद्धा) से ही मुक्ति होनी कही है ।
अथान्यैर्वृत्तमेवैकं मुक्त्यङ्गं परिकीर्तितम् ।
अपास्य दर्शनज्ञाने तत्कार्यविफलश्रमे ॥25॥
अर्थ: अथवा अन्य कई वादियोंने चारित्रको (क्रियाको) मुक्तिका अंग माना है और ज्ञानदर्शनको मुक्तिमार्गकि कार्यमें व्यर्थ मानकर उसका खंडन किया है ।
विज्ञानादित्रिवर्गेऽस्मिन्द्वे द्वे इष्टे तथा परैः ।
स्वसिद्धान्तावलेपेन जन्मसन्ततिशातने ॥26॥
अर्थ: और कितने ही वादी अपने सिद्धान्तके गर्वसे संसारकी सन्ततिके नाशकी परिपाटीमें विज्ञान, दर्शन (श्रद्धान) और चारित्र इन तीनोंमेंसे दो-दो को इष्ट कहते हैं, अर्थात् कोई तो दर्शन और ज्ञानको ही मानते हैं, किसीने दर्शन और चारित्र ही माना है और कोई-कोई ज्ञान और चारित्रको ही मानते हैं। इस प्रकारसे तीन प्रकारके वादी हैं ।
एकैकं च त्रिभिर्नष्टं द्वे द्वे नष्टे तथाऽपरैः ।
त्रयं न रुच्यतेऽन्यस्य सप्तैते दुर्दृशः स्मृताः ॥27॥
अर्थ: इन वादियोंमें तीन वादियोंने तो एक-एकको नष्ट किया और तीन वादियोंने दो-दो को नष्ट किया । इनके अतिरिक्त एकको ये तीनों ही नहीं रुचते, इस प्रकार मिथ्यामतियोंके सात भेद हुए ।
कारकादिक्रमो लोके व्यवहारश्च जायते ।
न पक्षेऽन्विष्यमाणोऽपि सर्वथैकान्तवादिनाम् ॥28॥
अर्थ: सर्वथा एकान्तवादियोंके पक्षका विचार करनेसे उनके यहाँ कर्ता कर्म करण आदि कारकोंका क्रम (परिपाटी और व्यवहार) दृष्टिगोचर नहीं होता है ।
यस्य प्रज्ञा स्फुरत्युच्चैरनेकान्ते च्युतभ्रमा ।
ध्यानसिद्धिर्विनिश्चेया तस्य साध्वी महात्मनः ॥29॥
अर्थ: जिस पुरुषकी बुद्धि अनेकान्तमें भ्रमरहित अतिशय स्फुरायमान है, उसी महात्माको उत्तम ध्यानकी सिद्धि निश्चयसे हो सकती है । सर्वथा एकान्तस्वरूप वस्तु ही सिद्ध न हो, तब ध्यानकी सिद्धि कैसे हो ? ।
ध्यानतन्त्रे निषिध्यन्ते नैते मिथ्यादृशः परं ।
मुनयोऽपि जिनेशाज्ञाप्रत्यनीकाश्चलाशयाः ॥30॥
अर्थ: सिद्धान्तमें ध्यान केवल मात्र मिथ्यादृष्टियोंके ही नहीं निषेधते हैं, किन्तु जो जिनेन्द्र भगवान्की आज्ञासे प्रतिकूल हैं तथा जिनका चित्त चलित है और जैन साधु कहाते हैं, उनके भी ध्यानका निषेध किया जाता है । क्योंकि उनके ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।
योग्यता न यतित्वेऽपि येषां ध्यातुमिह क्षणम् ।
अन्विष्य लिङ्गमेतेषां सूत्रसिद्धं निगद्यते ॥31॥
अर्थ: इस लोकमें जिनके मुनि-अवस्थामें भी ध्यान करनेकी एक क्षणमात्रकी योग्यता नहीं है, उनकी पहिचान सूत्रसिद्ध (शास्त्रोक्त) कही जाती है ।
यत्कर्मणि न तद्वाचि वाचि यत्तन्न चेतसि ।
यतेर्यस्य स किं ध्यानपदवीमधिरोहति ॥32॥
अर्थ: जिस यतिके जो कर्म (क्रिया) में है, सो वचनमें नहीं है, वचनमें कुछ और ही है । तथा जो कुछ वचनमें है सो चित्तमें नहीं है । ऐसे मायाचारी यति क्या ध्यान पदवीको पा सकते है ? ।
सङ्गेनापि महत्त्वं ये मन्यन्ते स्वस्य लाघवम् ।
परेषां सङ्गवैकल्यात्ते स्वबुद्ध्यैव वञ्चिताः ॥33॥
अर्थ: जो मुनि होकर भी परिग्रह रखते हैं और उस परिग्रहसे अपना महत्त्व मानते हैं तथा अन्य कि जिनके परिग्रह नहीं है उनकी लघुता समझते हैं, वे अपनी ही बुद्धिसे ठगे गये हैं; क्योंकि मुनिका महत्त्व तो निर्ग्रन्थतासे ही है ।
सत्संयमधुरां धृत्वा तुच्छशीलैर्मदोद्धतैः ।
त्यक्ता यैः सा च्युतस्थैर्यैर्ध्यातुमीशं क्व तन्मनः ॥34॥
अर्थ: जिन निःसारस्वभावी मदोद्धत मुनियोंने समीचीन संयमकी धुरा धारण करके छोड दी और जिनका धैर्य छूट गया, उनका मन क्या ध्यान करनेमें समर्थ हो सकता है ? कदापि नहीं । क्योंकि हीन प्रकृति मदोद्धत धैर्य रहितके ध्यानकी योग्यता नहीं है ।
कीर्त्तिपूजाभिमानार्त्तैर्लोकयात्रानुरञ्जितैः ।
बोधचक्षुर्विलुप्तं यैस्तेषां ध्याने न योग्यता ॥35॥
अर्थ: जो मुनि कीर्ति प्रतिष्ठा और अभिमानके अर्थमें आसक्त हैं, दुःखित हैं तथा लोकयात्रासे प्रसन्न होते हैं अर्थात् हमारे पास बहुतसे लोग आवें जावें और हमको माने ऐसी जो वांछा रखते हैं, उन्होंने अपने ज्ञानरूपी नेत्रको नष्ट किया है, ऐसे मुनियोंके ध्यानकी योग्यता नहीं हो सकती है ।
अन्तःकरणशुद्ध्यर्थं मिथ्यात्वविषमुद्धतम् ।
निष्ठ्यूतं यैर्न निःशेषं न तैस्तत्त्वं प्रमीयते ॥36॥
अर्थ: जिन मुनियोंने अपने अंतःकरणकी शुद्धताके लिये उत्कट मिथ्यात्वरूपी समस्त विष नहीं वमन किया (नहीं उगला) वे तत्त्वोंको प्रमाणरूप नहीं जान सकते हैं । क्योंकि मिथ्यात्वरूपी विष ऐसा प्रबल है कि इसका लेशमात्र भी हृदयमें रहे, तो तत्त्वार्थका ज्ञान श्रद्धान प्रमाणरूप नहीं होता, तब ऐसी अवस्थामें ध्यानकी योग्यता कहाँ ? ।
दुःषमत्वादयं कालः कार्यसिद्धेर्न साधकम् ।
इत्युक्त्वा स्वस्य चान्येषां कैश्चिद्ध्यानं निषिध्यते ॥37॥
अर्थ: कोई कोई साधु ऐसा कहकर अपने तथा परके ध्यानका निषेध करते हैं कि ‘‘यह काल दुःषमा (पंचम) है । इस कालमें ध्यानकी योग्यता किसीके भी नहीं है ।’’ इस प्रकार कहनेवालोंके ध्यान कैसे हो?
संदिह्यते मतिस्तत्त्वे यस्य कामार्थलालसा ।
विप्रलुब्धोऽन्यसिद्धान्तैः स कथं ध्यातुमर्हति ॥38॥
अर्थ: जिसकी बुद्धि अन्य मतके शास्त्रोंसे ठगी गई है तथा जो काम और अर्थमें लुब्ध होकर वस्तुके यथार्थ स्वरूपमें संदिग्धरूप (संदेहसहित) है वह ध्यान करनेका पात्र कैसे हो ? क्योंकि जब तक तत्त्वोंमें (वस्तुस्वरूपमें) संदेह होता है, तब तक मन निश्चल नहीं हो सकता और जब मन ही निश्चल नहीं, तब ध्यान कैसे हो ? ।
निसर्गचपलं चेतो नास्तिकैर्विप्रतारितम् ।
स्याद्यस्य स कथं ध्यानपरीक्षायां क्षमो भवेत् ॥39॥
अर्थ: एक तो मन स्वभावसे ही चंचल है, तिस पर भी जिसका मन नास्तिकवादियों द्वारा वंचित किया गया हो वह मुनि ध्यानकी परीक्षामें कैसे समर्थ हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता, क्योंकि नास्तिकमती खोटी-खोटी युक्तियोंसे आत्माका नाश ही सिद्ध करते हैं । उनकी कुयुक्तियोंमें जिसका मन फँस जाता है, उसके ध्यानकी योग्यता कहाँसे हो सकती है ? ।
कान्दर्पीप्रमुखाः पञ्च भावना रागरञ्जिताः ।
येषां हृदि पदं चक्रुः क्व तेषां वस्तुनिश्चयः ॥40॥
अर्थ: जिनके मनमें रागसे रंजित कांदर्पी आदि पांच भावनाओंने निवास किया है, उनके वस्तुनिश्चय (तत्त्वार्थज्ञान) कैसे हो ? ।
कान्दर्पी कैल्विषी चैव भावना चाभियोगिकी ।
दानवी चापि संमोही त्याज्या पञ्चतयी च सा ॥41॥
अर्थ: कान्दर्पी (कामचेष्टा), कैल्विषी (क्लेशकारिणी), आभियोगिकी (युद्धभावना), आसुरी (सर्वभक्षणी) और संमोहिनी (कुटुंबमोहनी), इस प्रकार ये पाँच भावनायें पापरूप हैं सो पाँचों ही त्यागने योग्य है ।
मार्जाररसितप्रायं येषां वृत्तं त्रपाकरम् ।
तेषां स्वप्नेऽपि सद्ध्यानसिद्धिर्नैवोपजायते ॥42॥
अर्थ: जिस मुनिका चारित्र बिलावके कहे हुए उपाख्यानके (कहानीके) समान लज्जाजनक है, उसके समीचीन ध्यानकी सिद्धि स्वप्नमें भी नहीं हो सकती । बिलावका उपाख्यान लोकप्रसिद्ध है कि एक बिलाव मूषकोंसे कहा करता था कि मैंने तीर्थमें जाकर मूषक मारने वा खानेका त्याग कर दिया है, तुम हमारे पास आते हुए कदापि शंका न करो । जब मूषक निःशंक होकर बिलावके पास आने लगे तब बिलावने क्रम क्रमसे सब मूषकोंको खा डाला । इसी प्रकार जो पुरुष पहिले तो मुनिदीक्षा ले कर प्रतिज्ञायें ग्रहण कर लें और फिर भ्रष्ट हो जावें उनके ध्यानकी सिद्धिका निषेध है ।
अनिरुद्धाक्षसन्ताना अजितोग्रपरीषहाः ।
अत्यक्तचित्तचापल्या प्रस्खलन्त्यात्मनिश्चये ॥43॥
अर्थ: जिन्होंने इन्द्रियोंके विषय भोगनेकी प्रवृत्तिको नहीं रोका, उग्र परीषह नहीं जीते, और मनकी चपलता नहीं छोडी वे मुनि आत्माके निश्चयसे च्युत हो जाते हैं ।
अनासादितनिर्वेदा अविद्याव्याधवञ्चिताः ।
असंवर्धितसंवेगा न विदन्ति परं पदम् ॥44॥
अर्थ: जो विरागताको प्राप्त नहीं हुए हैं तथा मिथ्यात्वरूपी व्याधसे (शिकारीसे) वंचित किये गये हैं और जिनका मोक्ष और मोक्षमार्गमें अनुराग नहीं है, वे परमपद अर्थात् आत्माके स्वरूपकी प्राप्तिरूप मोक्षको नहीं जानते ।
न चेतः करुणाक्रान्तं न च विज्ञानवासितम् ।
विरतं च न भोगेभ्यो यस्य ध्यातुं न स क्षमः ॥45॥
अर्थ: जिसका मन करुणासे व्याप्त नहीं हुआ, तथा भेदविज्ञानसे वासित नहीं हुआ, विषयभोगोंसे विरक्त नहीं हुआ, वह ध्यान करनेमें समर्थ नहीं है ।
लोकानुरञ्जकैः पापैः कर्मभिर्गौरवं श्रिताः ।
अरञ्जितनिजस्वान्ता अक्षार्थगहने रताः ॥46॥
अर्थ: जो लोगोंको रंजित करनेवाले पापरूप कार्योंसे गुरुताको प्राप्त है, नहीं रंजित हुआ है आत्मामें चित्त जिनका ऐसे हैं, तथा इन्द्रियोंके विषयोंकी गहनतामें लीन हैं, जिन्होंने मनके शल्यको दूर नहीं किया है तथा अध्यात्मका निश्चय नहीं किया है और अपने भावोंसे दुर्लेश्याको दूर नहीं किया है, ऐसे पुरुष ध्यान साधनमें निषेधित हैं । क्योंकि इनमें ध्यानकी योग्यता नहीं है ॥४६-४७॥
अनुद्धृतमनःशल्या अकृताध्यात्मनिश्चयाः ।
अभिन्नभावदुर्लेश्या निषिद्धा ध्यानसाधने ॥47॥
अर्थ: जो लोगोंको रंजित करनेवाले पापरूप कार्योंसे गुरुताको प्राप्त है, नहीं रंजित हुआ है आत्मामें चित्त जिनका ऐसे हैं, तथा इन्द्रियोंके विषयोंकी गहनतामें लीन हैं, जिन्होंने मनके शल्यको दूर नहीं किया है तथा अध्यात्मका निश्चय नहीं किया है और अपने भावोंसे दुर्लेश्याको दूर नहीं किया है, ऐसे पुरुष ध्यान साधनमें निषेधित हैं । क्योंकि इनमें ध्यानकी योग्यता नहीं है ।।४६-४७।।
नर्मकौतुककौटिल्यपापसूत्रोपदेशकाः ।
अज्ञानज्वरशीर्णाङ्गा मोहनिद्रास्तचेतनाः ॥48॥
अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।
अनुद्युक्तास्तपः कर्तुं विषयग्रासलालसाः ।
ससङ्गाः शङ्किता भीता मन्येऽमी दैववञ्चिताः ॥49॥
अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।
एते तृणीकृतस्वार्था मुक्तिश्रीसङ्गनिःस्पृहाः ।
प्रभवन्ति न सद्ध्यानमन्वेषितुमपि क्षणम् ॥50॥
अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।
पापाभिचारकर्माणि सातर्द्धिरसलम्पटैः ।
यैः क्रियन्तेऽधमैर्मोहाद्धा हतं तैः स्वजीवितम् ॥51॥
अर्थ: जो अधम मनुष्य सातावेदनीयजनित सुख और अणिमा-महिमादि तथा धनादिक ऋद्धि तथा रसीले भोजनादिकमें लंपट हैं, मोहसे पापाभिचार कर्म करते हैं, उनके लिये आचार्य महाराज खेदसहित कहते हैं कि हाय ! हाय ! इन्होंने अपने जीवनका नाश किया और अपनेको संसारसमुद्रमें डूबा दिया ।
वश्याकर्षणविद्वेषं मारणोच्चाटनं तथा ।
जलानलविषस्तम्भो रसकर्म रसायनम् ॥52॥
अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ।
पुरक्षोभेन्द्रजालं च बलस्तम्भो जयाजयौ ।
विद्याच्छेदस्तथा वेधं ज्योतिर्ज्ञानं चिकित्सितम् ॥53॥
अर्थ: नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ।
यक्षिणीमन्त्रपातालसिद्धयः कालवञ्चना ।
पादुकाञ्जननिस्त्रिंशभूतभोगीन्द्रसाधनम् ॥54॥
अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ॥५२॥ नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ॥५३॥ यक्षिणी मंत्र, पातालसिद्धिके विधानका अभ्यास करना, कालवंचना (मृत्यु जीतनेका मंत्र साधना), पादुकासाधन (खडाऊँ पहनकर आकाश वा जलमें विहार करनेकी विद्याका साधन) करना, अदृश्य होने तथा गडे हुए धन देखनेके अञ्जनका साधना, शस्त्रादिकका साधना, भूतसाधन, सर्पसाधन ॥५४॥ इत्यादि विक्रियारूप कार्योंमें अनुरक्त होकर दुष्ट चेष्टा करनेवाले जो हैं, उन्होंने आत्मज्ञानसे भी हाथ धोया और अपने दोनों लोकका कार्य भी नष्ट किया । ऐसे पुरुषोके ध्यानकी सिद्धि होनी कठिन है ।
इत्यादिविक्रियाकर्मरञ्जितैर्दुष्टचेष्टितैः ।
आत्मानमपि न ज्ञातुं नष्टं लोकद्वयच्युतैः ॥55॥
अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ॥५२॥ नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ॥५३॥ यक्षिणी मंत्र, पातालसिद्धिके विधानका अभ्यास करना, कालवंचना (मृत्यु जीतनेका मंत्र साधना), पादुकासाधन (खडाऊँ पहनकर आकाश वा जलमें विहार करनेकी विद्याका साधन) करना, अदृश्य होने तथा गडे हुए धन देखनेके अञ्जनका साधना, शस्त्रादिकका साधना, भूतसाधन, सर्पसाधन ॥५४॥ इत्यादि विक्रियारूप कार्योंमें अनुरक्त होकर दुष्ट चेष्टा करनेवाले जो हैं, उन्होंने आत्मज्ञानसे भी हाथ धोया और अपने दोनों लोकका कार्य भी नष्ट किया । ऐसे पुरुषोंके ध्यानकी सिद्धि होनी कठिन है ।
यतित्वं जीवनोपायं कुर्वन्तः किं न लज्जिताः ।
मातुः पण्यमिवालम्ब्य यथा केचिद्गतघृणाः ॥56॥
अर्थ: कई निर्दय, निर्लज्ज साधुपनमें भी अतिशय निंदा करनेयोग्य कार्य करते हैं । वे समीचीन हितरूप मार्गका विरोध कर नरकमें प्रवेश करते हैं । जैसे कोई अपनी माताको वेश्या बनाकर उससे धनोपार्जन करते हैं, तैसे ही जो मुनि होकर उस मुनिदीक्षाको जीवनका उपाय बनाते हैं और उसके द्वारा धनोपार्जन करते हैं, वे अतिशय निर्दय तथा निर्लज्ज हैं ॥५६-५७॥
निस्त्रपाः कर्म कुर्वन्ति यतित्वेऽप्यतिनिन्दितम् ।
ततो विराध्य सन्मार्गं विशन्ति नरकोदरे ॥57॥
अर्थ: कई निर्दय, निर्लज्ज साधुपनमें भी अतिशय निंदा करनेयोग्य कार्य करते हैं । वे समीचीन हितरूप मार्गका विरोध कर नरकमें प्रवेश करते हैं । जैसे कोई अपनी माताको वेश्या बनाकर उससे धनोपार्जन करते हैं, तैसे ही जो मुनि होकर उस मुनिदीक्षाको जीवनका उपाय बनाते हैं और उसके द्वारा धनोपार्जन करते हैं, वे अतिशय निर्दय तथा निर्लज्ज हैं ।।५६-५७।।
अविद्याश्रयणं युक्तं प्राग्गृहावस्थितैर्वरम् ।
मुक्त्यङ्गं लिङ्गमादाय न श्लाघ्यं लोकदम्भनम् ॥58॥
अर्थ: जो गृहस्थावस्थामें हैं, उनको तो ऐसी अविद्याका आश्रय करना कदाचित् युक्त भी कहा जा सकता है, परन्तु मुक्तिके अंगस्वरूप मुनिके भेषको धारण करके लोकका ठगना कदापि प्रशंसनीय नहीं है।
मनुष्यत्वं समासाद्य यतित्वं च जगन्नुतम् ।
हेयमेवाशुभं कार्यं विवेच्य सुहितं बुधैः ॥59॥
अर्थ: मनुष्यपन पाकर उसमें फिर जगत्पूज्य मुनिदीक्षाको ग्रहण करके विद्वानोंको अपना हित विचार अशुभ कर्म अवश्य ही छोडना चाहिए ।
अहो विभ्रान्तचित्तानां पश्य पुंसां विचेष्टितम् ।
यत्प्रपञ्चैर्यतित्वेऽपि नीयते जन्म निष्फलम् ॥60॥
अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि देखो, भ्रमरूप चित्तवाले पुरुषोंकी चेष्टा साधुपनमें भी पाखंड प्रपंच करके जन्मको निष्फल कर देती है ।
किं ते सन्ति न कोटिशोऽपि सुधियः स्फारैर्वचोभिः परम्
ये वार्तां प्रथयन्त्यमेयमहसां राशेः परब्रह्मणः ।
तत्रानन्दसुधासरस्वति पुनर्निर्मज्य मुञ्चन्ति ये
सन्तापं भवसम्भवं त्रिचतुरास्ते सन्ति वा नात्र वा ॥61॥
अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस जगतमें प्रचुर वचनोंसे (व्याख्यानोंसे) अमर्याद प्रतापकी राशिरूप परमात्माकी वार्ताको विस्तार करनेवाले करोडों विद्वान् क्या नहीं होते ? अवश्य होते ही है । परन्तु इस परब्रह्मस्वरूप अमृतके समुद्रमें मग्न होकर संसारसे उत्पन्न हुए सन्तापको नष्ट करनेवाले जगतमें तीन वा चार ही होते हैं अथवा नहीं भी होते ।
एते पण्डितमानिनः शमदमस्वाध्यायचिन्ताच्युताः
रागादिग्रहवञ्चिता यतिगुणप्रध्वंसकृष्णाननाः ।
व्याकृष्टा विषयैर्मदैः प्रमुदिताः शङ्काभिरङ्गीकृताः
न ध्यानं न विवेचनं न च तपः कर्तुं वराकाः क्षमाः ॥62॥
अर्थ: जो पंडित तो नहीं है, किन्तु अपनेको पंडित मानते हैं, और शम, दम, स्वाध्यायकी चिन्तासे रहित तथा रागद्वेष मोहादि पिशाचोंसे वञ्चित हैं, एवं जो मुनिपनके गुण नष्ट करनेसे अपना मुँह काला करनेवाले, विषयोंसे आकर्षित, मदोंसे प्रसन्न, शंका संदेह शल्यभयादिकसे पकडे गये हैं, ऐसे रंक पुरुष न ध्यान करनेमें समर्थ हैं, न भेदज्ञान करनेमें समर्थ हैं और न तप ही कर सकते हैं ।