ज्ञानार्णव श्लोक एवं अर्थ (आचार्य शुभचन्द्र) | Gyanarnav Shlok Evam Arth (Acharya Shubhchandra)

ज्ञानार्णव श्लोक एवं अर्थ

आचार्य शुभचन्द्र

ज्ञानार्णव के 42 सर्गों के मूल श्लोक, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ, सर्ग नीचे अलग उत्तरों में। अर्थ श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम संस्करण (पं. पन्नालाल बाकलीवाल की हिन्दी) में हर श्लोक के बाद छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; भावार्थ नहीं लिए, वे पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक (छपाई की टिप्पणियों सहित): ज्ञानार्णव मूल श्लोक (आचार्य शुभचन्द्र) | Gyanarnav Mool Shlok (Acharya Shubhchandra)

अनुक्रमणिका

क्र. भाग श्लोक
1 सर्ग 1: सत्श्रुतप्रशंसा 1 से 49
2 सर्ग 2: द्वादश भावना - पीठिका एवं अनित्य भावना 1 से 47
3 सर्ग 2: द्वादश भावना - अशरण भावना 1 से 19
4 सर्ग 2: द्वादश भावना - संसार भावना 1 से 17
5 सर्ग 2: द्वादश भावना - एकत्व भावना 1 से 11
6 सर्ग 2: द्वादश भावना - अन्यत्व भावना 1 से 12
7 सर्ग 2: द्वादश भावना - अशुचि भावना 1 से 13
8 सर्ग 2: द्वादश भावना - आस्रव भावना 1 से 9
9 सर्ग 2: द्वादश भावना - संवर भावना 1 से 12
10 सर्ग 2: द्वादश भावना - निर्जरा भावना 1 से 9
11 सर्ग 2: द्वादश भावना - धर्म भावना 1 से 23
12 सर्ग 2: द्वादश भावना - लोक भावना 1 से 7
13 सर्ग 2: द्वादश भावना - बोधिदुर्लभ भावना 1 से 13
14 सर्ग 2: द्वादश भावना - उपसंहार 1 से 3
15 सर्ग 3: संक्षेप से ध्यान का स्वरूप 1 से 36
16 सर्ग 4: ध्यान का वर्णन 1 से 62
17 सर्ग 5: ध्याता की प्रशंसा 1 से 29
18 सर्ग 6: सम्यग्दर्शन 1 से 59
19 सर्ग 7: सम्यग्ज्ञान 1 से 23
20 सर्ग 8: अहिंसा महाव्रत 1 से 59
21 सर्ग 9: सत्य महाव्रत 1 से 42
22 सर्ग 10: अस्तेय महाव्रत 1 से 20
23 सर्ग 11: ब्रह्मचर्य महाव्रत 1 से 48
24 सर्ग 12: स्त्रीस्वरूप वर्णन 1 से 59
25 सर्ग 13: मैथुनत्यागोपदेश 1 से 25
26 सर्ग 14: स्त्रीसंसर्गनिषेध 1 से 45
27 सर्ग 15: वृद्धसेवा की प्रशंसा 1 से 47
28 सर्ग 16: परिग्रहत्याग महाव्रत 1 से 42
29 सर्ग 17: आशा की निंदा 1 से 21
30 सर्ग 18: पंचसमिति आदि का वर्णन 1 से 39
31 सर्ग 19: कषाय की निंदा 1 से 77
32 सर्ग 20: इन्द्रियजय का उपदेश 1 से 38
33 सर्ग 21: त्रितत्त्व वर्णन 1 से 27
34 सर्ग 22: मन वश करने का उपदेश 1 से 35
35 सर्ग 23: रागद्वेष रोकने का वर्णन 1 से 38
36 सर्ग 24: साम्यभाव का वर्णन 1 से 33
37 सर्ग 25: आर्त्तध्यान का वर्णन 1 से 43
38 सर्ग 26: रौद्रध्यान का वर्णन 1 से 44
39 सर्ग 27: ध्यानविरुद्ध स्थानों का वर्णन 1 से 34
40 सर्ग 28: आसनजय का वर्णन 1 से 40
41 सर्ग 29: प्राणायाम वर्णन 1 से 100
42 सर्ग 30: प्रत्याहार धारणा वर्णन 1 से 14
43 सर्ग 31: सवीर्यध्यान का वर्णन 1 से 42
44 सर्ग 32: शुद्धोपयोग का वर्णन 1 से 104
45 सर्ग 33: आज्ञाविचय धर्मध्यान 1 से 22
46 सर्ग 34: अपायविचय धर्मध्यान 1 से 17
47 सर्ग 35: विपाकविचय धर्मध्यान 1 से 31
48 सर्ग 36: संस्थानविचय धर्मध्यान 1 से 186
49 सर्ग 37: पिण्डस्थ ध्यान का वर्णन 1 से 33
50 सर्ग 38: पदस्थ ध्यान का वर्णन 1 से 116
51 सर्ग 39: रूपस्थ ध्यान का वर्णन 1 से 46
52 सर्ग 40: रूपातीत ध्यान का वर्णन 1 से 31
53 सर्ग 41: धर्मध्यान के फल का वर्णन 1 से 27
54 सर्ग 42: शुक्लध्यान का वर्णन 1 से 88

स्रोत: gyanarnav.pdf

gyanarnav.pdf (36911 KB)

सर्ग 1: सत्श्रुतप्रशंसा (श्लोक 1 से 49)

ज्ञानलक्ष्मीघनाश्लेषप्रभवानन्दनन्दितम् ।
निष्ठितार्थमजं नौमि परमात्मानमव्ययम् ॥1॥

अर्थ: आचार्यवर्य कहते हैं कि - मैं परमात्माको नमस्कार करता हूँ, परा= उत्कृष्ट, मा= लक्ष्मी- जिस आत्माको होय सो परमात्मा है, इस विशिष्ट गुणके धारक अरहन्त तथा सिद्ध भगवान् ही हैं । सो परमात्मा कैसा है ? ज्ञानकी जो लक्ष्मी अर्थात् समस्त पदार्थोका जानना तथा वीतरागतारूप लक्ष्मीके दृढ आलिंगनसे (एकरूपतासे) उत्पन्न हुए आनन्दसे (परम अतीन्द्रिय अनन्त सुखसे ) आनन्द स्वरूप है । इस विशेषणसे अन्यमती परमात्माके स्वरूपका भिन्न प्रकारसे वर्णन करते हैं, अतः उनसे विभिन्नता दिखाई है । अर्थात् कई वैष्णव तो “परमात्मा परब्रह्म है और सर्वव्यापक है । अतएव जितने स्त्रीके स्वरूप हैं, वे तो परमात्माकी शक्तिके रूप हैं और जितने पुरुषके स्वरूप हैं, वे सब परमात्माके रूप हैं । इस प्रकार लक्ष्मी और परमात्माके संयोगरूप दृढ आलिंगनसे परमात्माको सुख होता है ।” ऐसी कपोलकल्पना करके उसका व्यवहार करते हैं । और कोई कोई तो श्रीराम ऐसी संज्ञा रखकर स्त्री पुरुषका आकार (मूर्ति) स्थापन कर पूजते तथा ध्यान करते हैं । कोई-कोई लक्ष्मीनारायण कहते हैं, कोई राधाकृष्ण कहते हैं, और कोई गोपीनाथ कहते हैं । तथा कई एक शिवमती पार्वती का स्थापन करते हैं । कोई-कोई केवल शिवजी के लिंग तथा पार्वतीकी जननेन्द्रियको ही स्थापन कर पूजते हैं । सो इनके माने हुए स्वरूपको तो ज्ञानलक्ष्मी शब्दसे निराकरण किया । नैयायिक कहते हैं कि - “ज्ञान और आत्मा भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं और उनकी एकता जो समवायनामक एक भिन्न पदार्थ है, सो करता है ।” परन्तु भिन्न पदार्थकी की हुई एकता कदापि नहीं हो सकती, क्योंकि एकता तो तादात्म्यरूप होती है, सो ही होती हैं । इस कारण घनाश्लेषके कहनेसे उन नैयायिकोंकी कल्पनासे भी भिन्नता दिखाई है । सांख्यमती प्रकृति और पुरुषका संयोग होनेसे आत्माको ज्ञानसुख होना कहते हैं, सो इनसे भी ज्ञानलक्ष्मीके दृढ आलिंगन अर्थात् तादात्म्यभावसे ही सुख होता है, इस प्रकार भिन्नता दिखाई है । एवम् अन्यान्य मतवाले जो परमात्माको अन्य प्रकार कहते हैं, उन सबका भी निराकरण इसी विशेषणसे जानना चाहिए, क्योंकि परमात्माके ज्ञानानन्दरूपतासे परमानन्द है, अन्य प्रकारसे नहीं है । फिर कैसा है परमात्मा ? निष्ठित परिपूर्ण हो गये हैं अर्थ प्रयोजन जिसके, ऐसा कृतकृत्य है । इस विशेषणसे जो नैयायिक कहते हैं कि, परमात्मा वा ईश्वर समस्त कार्यका कर्ता है अर्थात् सृष्टिको बनाता व बिगाडता रहता है, सो इस मान्यताका खंडन किया है । क्योंकि जो कुछ भी कार्य करता रहता है, वह कृतकृत्य कदापि नहीं हो सकता । फिर कैसा है वह परमात्मा ? कि - अज है, अजन्मा है, अर्थात् उसका कभी जन्म नहीं होता । इस विशेषणसे जो राम कृष्ण आदि परमात्माके अवतारोंको मानते है, उनकी कल्पनाका निषेध किया है; क्योंकि परमात्माका फिर कभी संसारमें जन्म नहीं होता । फिर कैसा है परमात्मा ? अव्यय कहिये नाश रहित अर्थात् अविनाशी है । इस विशेषणसे जो कोई परमात्माका नाश मानते हैं, तथा सर्वथा अभाव ही मानते हैं, उनकी कल्पनाको मिथ्या टहराया है । इस प्रकार इन चार विशेषणोंसे सहित समस्त मतोंसे भिन्न जैसा यथार्थ स्वरूप परमात्माका है, उसे प्रकट करके आचार्य महाराजने नमस्काररूप मंगलाचरण किया है । अन्यमती जो कल्पना करके कहते हैं, सो यथार्थ नहीं है । और जो अयथार्थ है सो वस्तु नहीं है, तथा अवस्तुको नमस्कार करना योग्य नहीं है ।


भुवनाम्भोजमार्त्तंडं धर्मामृतपयोधरम् ।
योगिकल्पतरुं नौमि देवदेवं वृषध्वजम् ॥2॥

अर्थ: मैं (शुभचन्द्राचार्य) वृषध्वज कहिये वृषका है ध्वज अर्थात् चिह्न जिसका, अथवा वृषध्वज कहिये धर्मकी ध्वजास्वरूप श्री ऋषभदेव आदि तीर्थंकरको नमस्कार करता हूँ । कैसा है ऋषभदेव ? देवदेव कहिये चार प्रकारके देवोंका देव है । इस विशेषणसे समस्त देवोंके द्वारा पूज्यता दिखाई । फिर कैसा है ? भुवन कहिये लोकरूपी कमलको प्रफुल्लित करनेके लिये सूर्य समान है । इस विशेषणसे, भगवान्के गर्भजन्मकल्याणकमें अनेक अतिशय चमत्कार हुए, उनसे लोकमें प्रचुर आनन्द प्रवर्ता ऐसा जनाया है । फिर कैसा है प्रभु ? धर्मरूपी अमृत वर्षानेको मेघके समान है । इस विशेषणसे केवलज्ञानप्राप्तिके पश्चात् दिव्यध्वनिसे अभ्युदय निःश्रेयसका मार्ग धर्म प्रवर्त्तना प्रकट किया है । फिर कैसा है प्रभु ? योगीश्वरोंको मनोवांछित फल देनेके लिये कल्पवृक्षके समान है । इस विशेषणसे योगीश्वरोंको मोक्षमार्गके साधनेवाले ध्यानकी वांछा होती है, सो उनको यथार्थ ध्यानका मार्ग बतानेवाला है, अर्थात् जो ध्यान हम करते हैं, वही ध्यान तुम करो, इस प्रकार परंपरासे ध्यानका मार्ग जानकर योगीश्वरगण अपनी वांछाको पूर्ण करते हैं, ऐसा आशय जनाया है ।


भवज्वलनसंभ्रान्तसत्त्वशांतिसुधार्णवः ।
देवश्चन्द्रप्रभः पुष्यात् ज्ञानरत्नाकरश्रियम् ॥3॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि, चन्द्रप्रभदेव हैं सो ज्ञानरूप समुद्रकी लक्ष्मीको पुष्ट करो । कैसे हैं चन्द्रप्रभदेव ? संसाररूप अग्निमें भ्रमते हुए जीवोंको अमृतके समुद्रके समान हैं ।


सत्संयमपयःपूरपवित्रितजगत्त्रयम् ।
शांतिनाथं नमस्यामि विश्वविघ्नौघशान्तये ॥4॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि, मैं समस्त विघ्नोंके समूहकी शान्तिके लिये श्री शान्तिनाथ तीर्थंकर भगवान्को नमस्कार करता हूँ। कैसे हैं प्रभु ? सम्यक्चारित्ररूप जलके प्रवाहसे पवित्र किया है जगतका त्रय जिनने- ऐसे हैं।


श्रियं सकलकल्याणकुमुदाकरचन्द्रमाः ।
देवः श्रीवर्द्धमानाख्यः क्रियाद्भव्याभिनन्दिताम् ॥5॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि, श्री वर्द्धमान नामा अन्तिम तीर्थंकर देव हैं, सो भव्य पुरुषोंकर प्रशंसित और इच्छित लक्ष्मीको करो । कैसे है प्रभु ? समस्त प्रकारके कल्याणरूपी चंद्रवंशी कमलोंके समूहको प्रफुल्लित करनेके लिये चंद्रमाके समान है ।


श्रुतस्कन्धनभश्चन्द्रं संयमश्रीविशेषकम् ।
इन्द्रभूतिं नमस्यामि योगीन्द्रं ध्यानसिद्धये ॥6॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि, योगियोंमें इन्द्रके समान इन्द्रभूति कहिये श्री गौतम नामक गणधर भगवान्को ध्यानकी सिद्धिके अर्थ नमस्कार करता हूँ । कैसे हैं इन्द्रभूति ? श्रुतस्कन्ध कहिये द्वादशांगरूप शास्त्र, सो ही हुआ आकाश, उसमें प्रकाश करनेके अर्थ चन्द्रमाके समान है । फिर कैसे है ? संयमरूपी लक्ष्मीको विशेष करनेवाले हैं ।


प्रशान्तमतिगम्भीरं विश्वविद्याकुलगृहम् ।
भव्यैकशरणं जीयाच्छ्रीमत्सर्वज्ञशासनम् ॥7॥

अर्थ: श्रीमत् कहिये निर्बाध लक्ष्मीसहित जो सर्वज्ञका शासन (आज्ञामत) है, सो जयवन्त प्रवर्त्तो । कैसा है सर्वज्ञका शासन ? व्याकरण, न्याय, छन्द, अलंकार, साहित्य, यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, निमित्त और मोक्षमार्गकी प्रवृत्ति आदि विद्याओंके वसनेका कुलगृह है; तथा भव्य जीवोंको एकमात्र अद्वितीय शरण है । प्रशान्त है, तथा समस्त आकुलता और क्षोभका मिटानेवाला है, अतएव अति गम्भीर है, मन्दबुद्धि प्राणी इसका थाह नहीं पा सकते ।


प्रबोधाय विवेकाय हिताय प्रशमाय च ।
सम्यक्तत्त्वोपदेशाय सतां सूक्तिः प्रवर्त्तते ॥8॥

अर्थ: सत्पुरुषोंकी उत्तम वाणी जो है, सो जीवोंके प्रकृष्टज्ञान, विवेक, हित, प्रशमता और सम्यक् प्रकारसे तत्त्वके उपदेश देनेके अर्थ प्रवर्त्तती है ।


तच्छ्रुतं तच्च विज्ञानं तद्ध्यानं तत्परं तपः ।
अयमात्मा यदासाद्य स्वस्वरूपे लयं व्रजेत् ॥9॥

अर्थ: वही शास्त्रका सुनना है, वही चतुराईरूप भेद विज्ञान है, वही ध्यान वा तप है, जिसको प्राप्त होकर यह आत्मा अपने स्वरूपमें लवलीन होता है ।


दुरन्तदुरिताक्रान्तं निःसारमतिवञ्चकम् ।
जन्म विज्ञाय कः स्वार्थे मुह्यत्यङ्गी सचेतनः ॥10॥

अर्थ: जन्म अर्थात् संसारके स्वरूपको जानकर ज्ञानसहित प्राणी ऐसा कौन है, जो अपने हितरूप प्रयोजनमें मोहको प्राप्त हो ? अर्थात् कोई नहीं । कैसा है जन्म ? दुःखकर है अंत जिसका ऐसा, तथा दुरितसे (पापसे) व्याप्त है, ठग है, क्योंकि ठगके समान किंचित्सुखका लालच बताकर सर्वस्व हर लेता है, और निगोदका वास कराता है । इस प्रकार संसारका स्वरूप जान ज्ञानी पुरुषको अपना हित भूलना उचित नहीं है, ऐसी उपदेशकी सूचना दी गई है ।


अविद्याप्रसरोद्भूतग्रहनिग्रहकोविदम् ।
ज्ञानार्णवमिमं वक्ष्ये सतामानन्दमन्दिरम् ॥11॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं, कि मैं इस ज्ञानार्णव नामके ग्रंथको कहूँगा । कैसा होगा यह ग्रंथ ? अविद्याके प्रसारसे (फैलावसे) उत्पन्न हुए आग्रह (हठ) तथा पिशाचको निग्रह करनेमें प्रवीण, तथा सत्पुरुषोंके लिये आनंदका मंदिर ।


अपि तीर्येत बाहुभ्यामपारो मकरालयः ।
न पुनः शक्यते वक्तुं मद्विधैर्योगिरञ्जकम् ॥12॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, मकरालय कहिये समुद्र अपार है, तो भी अनेक समर्थ पुरुष उसे भुजाओंसे तैर सकते हैं, परंतु यह ज्ञानार्णव योगियोंको रंजायमान करनेवाला अथाह है, सो हम जैसोंसे नहीं तैरा जा सकता ।


महामतिभिर्निःशेषसिद्धान्तपथपारगैः ।
क्रियते यत्र दिग्मोहस्तत्र कोऽन्यः प्रसर्पति ॥13॥

अर्थ: जहाँ बडी बुद्धिवाले समस्त सिद्धान्त मार्गके पार करनेवाले भी दिशा भूल जाते हैं, वहाँ अन्य जन किस प्रकार पार पा सकते है ?


समन्तभद्रादिकवीन्द्रभास्वतां स्फुरन्ति यत्रामलसूक्तिरश्मयः ।
व्रजन्ति खद्योतवदेव हास्यतां न तत्र किं ज्ञानलवोद्धता जनाः ॥14॥

अर्थ: जहाँ समन्तभद्रादिक कवीन्द्ररूपी सूर्योंकी निर्मल उत्तम वचनरूप किरणें फैलती हैं, वहाँ ज्ञानलवसे उद्धत पटबीजके (जुगनूके) समान मनुष्य क्या हास्यताको प्राप्त नहीं होंगे ? अवश्य ही होंगे ।


अपाकुर्वन्ति यद्वाचः कायवाक्चित्तसम्भवम् ।
कलङ्कमङ्गिनां सोऽयं देवनन्दी नमस्यते ॥15॥

अर्थ: जिनके वचन जीवोंके काय वचन मनसे उत्पन्न होनेवाले मलोंको नष्ट करते हैं, ऐसे देवनन्दीनामक मुनीश्वरको (पूज्यपादस्वामीको) हम नमस्कार करते हैं ।


जयन्ति जिनसेनस्य वाचस्त्रैविद्यवन्दिताः ।
योगिभिर्यत्समासाद्य स्खलितं नात्मनिश्चये ॥16॥

अर्थ: जिनसेन आचार्यमहाराजके वचन है, सो जयवन्त है । क्योंकि योगीश्वर उनके वचनोंको प्राप्त होकर आत्माके निश्चयमें स्खलित नहीं होते, अर्थात् यथार्थ निश्चय कर लेते हैं । तथा उनके वचन न्याय, व्याकरण और सिद्धान्त इन तीन विद्याओंके ज्ञातापुरुषोंके द्वारा वन्दनीय हैं ।


श्रीमद्भट्टाकलङ्कस्य पातु पुण्या सरस्वती ।
अनेकान्तमरुन्मार्गे चन्द्रलेखायितं यया ॥17॥

अर्थ: श्रीमत् कहिये शोभायमान निर्दोष भट्टाकलंक नामा आचार्यकी पवित्र वाणी है, सो हमको पवित्र करो और हमारी रक्षा करो । कैसी है वाणी ? अनेकान्त स्याद्वादरूपी आकाशमें चन्द्रमाकी रेखासमान आचरण करती है ।


भवप्रभवदुर्वारक्लेशसन्तापपीडितम् ।
योजयाम्यहमात्मानं पथि योगीन्द्रसेविते ॥18॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, इस ग्रंथके रचनेसे संसारमें जन्म ग्रहण करनेसे उत्पन्न हुए दुर्निवार क्लेशोंके संतापसे पीडित मैं अपने आत्माको योगीश्वरोंसे सेवित ज्ञानध्यानरूपी मार्गमें जोडता हूँ।


न कवित्वाभिमानेन न कीर्तिप्रसरेच्छया ।
कृतिः किन्तु मदीयेयं स्वबोधायैव केवलम् ॥19॥

अर्थ: यहाँ ग्रंथरूपी मेरी कृति (कार्य) है, सो केवल मात्र अपने ज्ञानकी वृद्धिके लिये है । कविताके अभिमानसे तथा जगतमें कीर्ति होनेके अभिप्रायसे नहीं की जाती है ।


अयं जागर्ति मोक्षाय वेत्ति विद्यां भ्रमं त्यजेत् ।
आदत्ते शमसाम्राज्यं स्वतत्त्वाभिमुखीकृतः ॥20॥

अर्थ: सत्पुरुष ऐसा विचारते हैं कि, यह प्राणी अपना निजस्वरूप तत्त्वके सन्मुख करनेसे मोक्षके अर्थ जागता है । मोहनिद्राको छोडकर सम्यग्ज्ञानको जानता है । तथा भ्रम कहिये अनादि अविद्याको छोडकर उपशमभावरूपी (मन्दकषायरूपी) साम्राज्यको ग्रहण करता है ।


न हि केनाप्युपायेन जन्मजातङ्कसंभबा ।
विषयेषु महातृष्णा पश्य पुंसां प्रशाम्यति ॥21॥

अर्थ: और देखो कि, पुरुषोंकी विषयोंमें महातृष्णा है । वह तृष्णा कैसी है ? जन्मसे (संसारसे) उत्पन्न हुए आतंक (दाहरोग) से वह उपजी है, सो किसी भी उपायसे नष्ट नहीं होती ।


तस्याः प्रशान्तये पूज्यैः प्रतीकारः प्रदर्शितैः ।
जगज्जन्तूपकाराय तस्मिन्नस्यावधीरणा ॥22॥

अर्थ: उस तृष्णाकी प्रशान्तिके अर्थ पूज्य पुरुषोंने प्रतीकार (उपाय) दिखाया है, और वह जगतके जीवोंके उपकारार्थ ही दिखाया है । किन्तु यह जीव उस प्रतीकारकी अवज्ञा (अनादर) करता है ।


अनुद्विग्नैस्तथाप्यस्य स्वरूपं बन्धमोक्षयोः ।
कीर्त्यते येन निर्वेदपदवीमधिरोहति ॥23॥

अर्थ: तथापि उद्वेगरहित पूज्य पुरुषोंके द्वारा इस प्राणीके हितार्थ बन्धमोक्षका स्वरूप वर्णन किया जाता है, जिससे यह प्राणी वैराग्य पदवीको प्राप्त हो ।


निरूप्य सच्च कोऽप्युच्चैरुपदेशोऽस्य दीयते ।
येनादत्ते परां शुद्धिं तथा त्यजति दुर्मतिम् ॥24॥

अर्थ: इस कारण कोई अतिशय समीचीन उपदेश विचार करके इस प्राणीको देना चाहिये, जिससे यह प्राणी उत्कृष्ट शुद्धताको ग्रहण करे और दुर्बुद्धिको छोड दे ।


अहो सति जगत्पूज्ये लोकद्वयविशुद्धिदे ।
ज्ञानशास्त्रे सुधीः कः स्वमसच्छास्त्रैर्विडम्बयेत् ॥25॥

अर्थ: अहो ! जगत्पूज्य और लोकपरलोकमें विशुद्धिके देनेवाले समीचीन ज्ञानशास्त्रोंके होते हुए भी ऐसा कौन सुबुद्धि है, जो मिथ्याशास्त्रोंके द्वारा अपने आत्माको विडंबना रूप करे ।


असच्छास्त्रप्रणेतारः प्रज्ञालवमदोद्धताः ।
सन्ति केचिच्च भूपृष्ठे कवयः स्वान्यवञ्चकाः ॥26॥

अर्थ: इस पृथ्वीतलमें बुद्धिके अंशमात्रसे मदोन्मत्त होकर असत् शास्त्रोंके रचनेवाले अनेक कवि हैं । वे केवल अपने आत्मा तथा अन्य भोले जीवोंको ठगनेवाले ही हैं ।


स्वतत्त्वविमुखैर्मूढैः कीर्तिमात्रानुरञ्जितैः ।
कुशास्त्रच्छद्मना लोको वराको व्याकुलीकृतः ॥27॥

अर्थ: तथा आत्मतत्त्वसे विमुख, अपनी कीर्तिसे प्रसन्न होनेवाले मूढ हैं । और उन्हीं मूढोंने इस अज्ञानी जगत्को अपने बनाये हुए मिथ्याशास्त्रोंके बहानेसे व्याकुलित कर दिया है ।


अधीतैर्वा श्रुतैर्ज्ञातैः कुशास्त्रैः किं प्रयोजनम् ।
यैर्मनः क्षिप्यते क्षिप्रं दुरन्ते मोहसागरे ॥28॥

अर्थ: उन शास्त्रोंके पढने, सुनने व जाननेसे क्या प्रयोजन (लाभ) है, जिनसे जीवोंका चित्त (मन) दुरन्त तथा दुर्निवार मोह समुद्रमें पड जाता है ? ।


क्षणं कर्णामृतं सूते कार्यशून्यं सतामपि ।
कुशास्त्रं तनुते पश्चादविद्यागरविक्रियाम् ॥29॥

अर्थ: कुशास्त्र यद्यपि सुननेमें क्षणभरके लिये अमृतकी-सी वर्षा करता है, परन्तु कालान्तरमें वह सत्पुरुषोंके कार्यसे रहित अविद्यारूपी विषके विकारको बढाता है, अर्थात् विषयतृष्णाको बढाता है ।


अज्ञानजनितश्चित्रं न विद्मः कोऽप्ययं ग्रहः ।
उपदेशशतेनापि यः पुंसामपसर्प्पति ॥30॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, यह बडा आश्चर्य हैं, जो जीवोंका अज्ञानसे उत्पन्न हुआ यह आग्रह (हठ) सैकडों उपदेश देने पर भी दूर नहीं होता । हम नहीं जानते कि, इसमें क्या भेद है ?


सम्यग्निरूप्य सद्वृत्तैर्विद्वद्भिर्वीतमत्सरैः ।
अत्र मृग्या गुणा दोषाः समाधाय मनः क्षणम् ॥31॥

अर्थ: ऐसे सदाचारी पुरुष जिन्हें मत्सर कहिये द्वेष नहीं है, उन्हें उचित है कि इस शास्त्र तथा प्रवृत्तिमें मनको समाधान करके गुणदोषको भले प्रकार विचारें ।


स्वसिद्ध्यर्थं प्रवृत्तानां सतामपि च दुर्धियः ।
द्वेषबुद्ध्या प्रवर्त्तन्ते केचिज्जगति जन्तवः ॥32॥

अर्थ: इस जगतमें अनेक दुर्बुद्धि ऐसे हैं, जो अपनी सिद्धिके अर्थ प्रवृत्त हुए सत्पुरुषों पर द्वेषबुद्धिका व्यवहार करते हैं ।


साक्षाद्वस्तुविचारेषु निकषग्रावसन्निभाः ।
विभजन्ति गुणान्दोषान्धन्याः स्वच्छेन चेतसा ॥33॥

अर्थ: वे धन्य पुरुष हैं जो अपने निष्पक्ष चित्तसे वस्तुके विचारमें कसौटीके समान है और गुणदोषोंको भिन्न भिन्न जान लेते हैं ।


प्रसादयति शीतांशुः पीडयत्यंशुमाञ्जगत् ।
निसर्गजनिता मन्ये गुणदोषाः शरीरिणाम् ॥34॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि, देखो चन्द्रमा जगतको प्रसन्न करता है और तापको नष्ट करता है ! एवं सूर्य पीडित करता है, अर्थात् तापको उत्पन्न करता है । इसी प्रकार जीवोंके गुणदोष स्वभावसे ही हुआ करते हैं । ऐसा मैं मानता हूँ ।


दूषयन्ति दुराचारा निर्दोषामपि भारतीम् ।
विधुबिम्बश्रियं कोकाः सुधारसमयीमिव ॥35॥

अर्थ: जो दुष्ट पुरुष हैं वे निर्दोष वाणीको भी दूषण लगाते हैं। जैसे सुधारसमयी चन्द्रमाके बिम्बकी शोभाको चक्रवाक दूषण देते हैं कि, चन्द्रमा ही चकवीसे हमारा विछोह (वियोग) करा देता है ।


अयमात्मा महामोहकलङ्की येन शुद्ध्यति ।
तदेव स्वहितं धाम तच्च ज्योतिः परं मतम् ॥36॥

अर्थ: यह आत्मा महामोहसे (मिथ्यात्व कषायसे) कलंकी और मलिन है, अतः जिससे यह शुद्ध हो, वही अपना हित है, वही अपना घर है और वही परम ज्योति वा प्रकाश है ।


विलोक्य भुवनं भीमयमभोगीन्द्रशङ्कितम् ।
अविद्याव्रजमुत्सृज्य धन्या ध्याने लयं गताः ॥37॥

अर्थ: इस जगतको भयानक कालरूपी सर्पसे शङ्कित देखकर अविद्याव्रज अर्थात् मिथ्याज्ञान और मिथ्या आचरणके समूहको छोड निजस्वरूपके ध्यानमें लवलीन हो जाते हैं, वे धन्य कहिये महाभाग्यवान् पुरुष हैं ।


हृषीकराक्षसाक्रान्तं स्मरशार्दूलचर्वितम् ।
दुःखार्णवगतं विश्वं विवेच्य विरतं बुधैः ॥38॥

अर्थ: जो बुद्धिमान् हैं, उन्होंने इस जगतको इन्द्रियरूपी राक्षसोंसे व्याप्त तथा कामरूपी सिंहसे चर्वित और दुःखरूपी समुद्रमें डूबा हुआ समझ कर छोड दिया ।


जन्मजातङ्कदुर्वारमहाव्यसनपीडितम् ।
जन्तुजातमिदं वीक्ष्य योगिनः प्रशमं गताः ॥39॥

अर्थ: संसारसे उत्पन्न दुर्निवार आतंक (दाहरोग) रूपी महाकष्टसे पीडित इस जीवसमूहको देखकर ही योगीजन शान्तभावको प्राप्त हो गये ।


भवभ्रमणविभ्रान्ते मोहनिद्रास्तचेतने ।
एक एव जगत्यस्मिन् योगी जागर्त्यहर्निशम् ॥40॥

अर्थ: संसार-भ्रमणसे विभ्रान्त और मोहरूपी निद्रासे जिसकी चेतना नष्ट हो गई है, ऐसे इस जगतमें मुनिगण ही निरंतर जागते हैं ।


रजस्तमोभिरुद्भूतं कषायविषमूर्च्छितम् ।
विलोक्य सत्त्वसंतानं सन्तः शान्तिमुपाश्रिताः ॥41॥

अर्थ: जो सत्पुरुष हैं, वे रज कहिये ज्ञानावरण, दर्शनावरण कर्म और तम कहिये मिथ्याज्ञानसे अथवा रजोगुण तमोगुणसे कम्पायमान तथा कषायरूपी विषसे मूर्छित इस सत्वसंतान कहिये जगतको देखकर शान्तभावको ग्रहण करते हैं ।


मुक्तिस्त्रीवक्त्रशीतांशुं द्रष्टुमुत्कण्ठिताशयैः ।
मुनिभिर्मथ्यते साक्षाद्विज्ञानमकरालयः ॥42॥

अर्थ: मुक्तिरूपी स्त्रीके मुखरूपी चन्द्रमाको देखनेको उत्सुक हुए मुनिजन साक्षात् विज्ञानरूपी समुद्रका मथन करते हैं ।


उपर्युपरिसंभूतदुःखवह्निक्षतं जगत् ।
वीक्ष्य सन्तः परिप्राप्ताः ज्ञानवारिनिधेस्तटम् ॥43॥

अर्थ: वारंवार उत्पन्न हुई दुःखाग्निसे क्षय होते जगतको देखकर सन्तपुरुष ज्ञानरूपी समुद्रके तटपर प्राप्त हुए हैं ।


अनादिकालसंलग्ना दुस्त्यजा कर्मकालिका ।
सद्यः प्रक्षीयते येन विधेयं तद्धि धीमताम् ॥44॥

अर्थ: अनादि कालसे लगी हुई कर्मरूपी कालिमा बडे कष्टसे तजने योग्य है । इस कारण यह कालिमा जिससे शीघ्र ही नष्ट हो जाये, वही उपाय बुद्धिमानोंको करना चाहिए । अन्य उपाय करना व्यर्थ है ।


निष्कलङ्कं निराबाधं सानन्दं स्वस्वभावजम् ।
वदन्ति योगिनो मोक्षं विपक्षं जन्मसन्ततेः ॥45॥

अर्थ: प्राणीका हित मोक्ष (कर्मोंसे छूटना) है । सो कैसा है ? समस्त प्रकारकी कालिमासे रहित निःकलंक है, बाधा (पीडा) रहित है, आनंद सहित है, जिसमें किसी भी प्रकारका दुःख नहीं है । तथा अपने स्वभावसे उत्पन्न है, क्योंकि जो परका उपजाया हो, उसको वह नष्ट भी कर सकता है, परन्तु जो स्वभावसे उत्पन्न हो, उसका कभी नाश नहीं होता । और संसारका विपक्षी कहिये शत्रु है । योगीगण मोक्षका स्वरूप इस प्रकार कहते हैं ।


जीवितव्ये सुनिःसारे नृजन्मन्यतिदुर्लभे ।
प्रमादपरिहारेण विज्ञेयं स्वहितं नृणाम् ॥46॥

अर्थ: मनुष्य जन्म अति दुर्लभ है । जीवितव्य है सो निःसार है । ऐसी अवस्थामें मनुष्यको आलस्य त्यागकर अपने हितको जानना चाहिए । वह हित मोक्ष ही है ।


विचारचतुरैर्धीरैरत्यक्षसुखलालसैः ।
अत्र प्रमादमुत्सृज्य विधेयः परमादरः ॥47॥

अर्थ: जो धीर और विचारशील पुरुष हैं, तथा अतीन्द्रिय सुख (मोक्षसुख) की लालसा रखते हैं, उनको प्रमाद छोडकर इस मोक्षमें ही परम आदर करना चाहिए ।


न हि कालकलैकापि विवेकविकलाशयैः ।
अहो प्रज्ञाधनैर्नेया नृजन्मन्यतिदुर्लभे ॥48॥

अर्थ: अहो भव्य जीवों ! यह मनुष्य जन्म बडा दुर्लभ है और इसका बारबार मिलना कठिन है, इस कारण बुद्धिमानोंको चाहिए कि, विचारशून्य हृदय होकर कालकी एक कलाको भी व्यर्थ नहीं जाने दें ।


भृशं दुःखज्वालानिचयनिचितं जन्मगहनम्
यदक्षाधीनं स्यात्सुखमिह तदन्तेऽतिविरसम् ।
अनित्याः कामार्थाः क्षणरुचिचलं जीवितमिदं
विमृश्योच्चैः स्वार्थे क इह सुकृती मुह्यति जनः ॥49॥

अर्थ: यह संसार बडा गहन वन ही है, क्योंकि दुःखरूपी अग्निकी ज्वालासे व्याप्त है । इस संसारमें इन्द्रियाधीन सुख है सो अन्तमें विरस है, दुःखका कारण है, तथा दुःखसे मिला हुआ है । और जो काम और अर्थ है सो अनित्य हैं, सदैव नहीं रहते । तथा जीवित है, सो बिजुलीके समान चंचल है । इस प्रकार समीचीनतासे विचार करनेवाले जो अपने स्वार्थमें सुकृती-पुण्यवान्-सत्पुरुष हैं, वे कैसे मोहको प्राप्त होवें? कदापि नहीं ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - पीठिका एवं अनित्य भावना (श्लोक 1 से 47)

सङ्गैः किं न विषाद्यते वपुरिदं किं छिद्यते नामयैः
मृत्युः किं न विजृम्भते प्रतिदिनं द्रुह्यन्ति किं नापदः ।
श्वभ्राः किं न भयानकाः स्वपनवद्भोगा न किं वञ्चकाः
येन स्वार्थमपास्य किन्नरपुरप्रख्ये भवे ते स्पृहा ॥1॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस संसारमें संग कहिये धन-धान्य स्त्री-कुटुंबादिकके मिलापरूप जो परिग्रह हैं, वे क्या तुझे विषादरूप नहीं करते ? तथा यह शरीर है, सो रोगोंके द्वारा छिन्न रूप वा पीडित नहीं किया जाता ? तथा मृत्यु क्या तुझे प्रतिदिन ग्रसनेके लिए मुख नहीं फाडती ? और आपदायें क्या तुझसे द्रोह नहीं करती ? क्या तुझे नरक भयानक नहीं दीखते ? और ये भोग हैं सो क्या स्वप्नके समान तुझे ठगनेवाले (धोखा देनेवाले) नहीं हैं ? जिससे कि तेरे इन्द्रजालसे रचे हुए किन्नरपुरके समान इस असार संसारमें इच्छा बनी हुई है ?


नासादयसि कल्याणं न त्वं तत्त्वं समीक्षसे ।
न वेत्सि जन्मवैचित्र्यं भ्रातर्भूतैर्विडम्बितः ॥2॥

अर्थ: हे भाई ! तू भूत अर्थात् इन्द्रियोंके विषयोंसे विडम्बनारूप होकर अपने कल्याणमें नहीं लगता है और तत्त्वोंका (वस्तुस्वरूपका) विचार नहीं करता है, तथा संसारकी विचित्रताको नहीं जानता है; सो यह तेरी बडी भूल है ।


असद्विद्याविनोदेन मात्मानं मूढ वञ्चय ।
कुरु कृत्यं न किं वेत्सि विश्ववृत्तं विनश्वरम् ॥3॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! अनेक असत् कला चतुराई शृंगार शास्त्रादि असद्विद्याओंके कौतूहलोंसे अपने आत्माको मत ठग और तेरे करने योग्य जो कुछ हितकार्य हो उसे कर । क्योंकि जगतके ये समस्त प्रवर्तन विनाशीक हैं । क्या तू ये बातें नहीं जानता है ? ।


समत्वं भज भूतेषु निर्ममत्वं विचिन्तय ।
अपाकृत्य मनःशल्यं भावशुद्धिं समाश्रय ॥4॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू समस्त जीवोंको एकसा जान । ममत्वको छोड कर निर्ममत्वका चिंतवन कर । मनके शल्यको दूर कर अर्थात् किसी प्रकारका शल्य (क्लेश) अपने चित्तमें न रखकर अपने भावोंकी शुद्धताको अंगीकार कर ।


चिनु चित्ते भृशं भव्य भावना भावशुद्धये ।
याः सिद्धान्तमहातन्त्रे देवदेवैः प्रतिष्ठिताः ॥5॥

अर्थ: हे भव्य ! तू अपने भावोंकी शुद्धिके अर्थ अपने चित्तमें बारह भावनाओंका चिंतवन कर, जिन्हें देवाधिदेव श्रीतीर्थंकर भगवान्ने सिद्धांतके प्रबंधमें प्रतिष्ठित की हैं ।


ताश्च संवेगवैराग्य - यमप्रशमसिद्धये ।
आलानिता मनःस्तम्भे मुनिभिर्मोक्तुमिच्छुभिः ॥6॥

अर्थ: उन भावनाओंको मोक्षाभिलाषी मुनियोने अपनेमें संवेग (धर्मानुराग), वैराग्य (संसारसे उदासीनता), यम (महाव्रतादि चारित्र) और प्रशमकी (कषायोंके अभावरूप शान्त भावोंकी) सिद्धिके लिये अपने चित्तरूपी स्तंभमें आलानित कहिये ठहराई वा बाँधी है ।


अनित्याद्याः प्रशस्यन्ते द्वादशैता मुमुक्षुभिः ।
या मुक्तिसौधसोपानराजयोऽत्यन्तबन्धुराः ॥7॥

अर्थ: वे भावना अनित्य आदि द्वादश हैं । इनको मोक्षाभिलाषी मुनिगणोंने प्रशंसारूप कही हैं । क्योंकि ये सब भावनायें, मोक्षरूपी महलके चढनेकी अति उत्तम पैडियोंकी (सीढियोंकी) पंक्ति समान हैं ।


हृषीकार्थसमुत्पन्ने प्रतिक्षणविनश्वरे ।
सुखे कृत्वा रतिं मूढ विनष्टं भुवनत्रयं ॥8॥

अर्थ: हे मूढ ! क्षणमें नाश होनेवाले इन्द्रियजनित सुखमें प्रीति करके ये तीनों भुवन नाशको प्राप्त हो रहे हैं, सो तू क्यों नहीं देखता ? ।


भवाब्धिप्रभवाः सर्वे सम्बन्धा विपदास्पदम् ।
सम्भवन्ति मनुष्याणां तथान्ते सुष्ठु नीरसाः ॥9॥

अर्थ: इस संसाररूपी समुद्रमें भ्रमण करनेसे मनुष्योंके जितने संबन्ध होते हैं, वे सब ही आपदाओं के घर हैं । क्योंकि अन्तमें प्रायः सब ही संबन्ध नीरस (दुःखदायक) हो जाते हैं । यह प्राणी उनसे सुख मानता है, सो भ्रम मात्र है ।


वपुर्विद्धि रुजाक्रान्तं जराक्रान्तं च यौवनम् ।
ऐश्वर्यं च विनाशान्तं मरणान्तं च जीवितम् ॥10॥

अर्थ: हे आत्मन् ! शरीरको तू रोगोंसे घिरा हुआ समझ और यौवनको बुढापेसे घिरा हुआ जान तथा ऐश्वर्य संपदाओंको विनाशीक और जीवनको मरणान्त जान ।


ये दृष्टिपथमायाताः पदार्थाः पुण्यमूर्त्तयः ।
पूर्वाह्णे न च मध्याह्ने ते प्रयान्तीह देहिनाम् ॥11॥

अर्थ: इस संसारमें जिनके यहाँ पुण्यके मूर्त्ति स्वरूप उत्तमोत्तम पदार्थ प्रभातके समय दृष्टिगोचर होते थे, वे मध्याह्नकालमें देखनेमें नहीं आते, अर्थात् नष्ट हो जाते हैं । आत्मन् ! तू विचारपूर्वक देख ।


यज्जन्मनि सुखं मूढ ! यच्च दुःखं पुरःस्थितम् ।
तयोर्दुःखमनन्तं स्यात्तुलायां कल्प्यमानयोः ॥12॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! इस संसारमें तेरे सन्मुख जो कुछ सुख वा दुःख है, उन दोनोंको ज्ञानरूपी तुलामें (तराजूमें) चढा कर तोलेगा, तो सुखसे दुःख ही अनन्तगुणा दीख पडेगा । क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुभवगोचर है ।


भोगा भुजङ्गभोगाभाः सद्यः प्राणापहारिणः ।
सेव्यमानाः प्रजायन्ते संसारे त्रिदशैरपि ॥13॥

अर्थ: इस संसारमें भोग सर्पके फण समान हैं, क्योंकि इनको सेवन करते हुए देव भी शीघ्र प्राणान्त हो जाते हैं ।


वस्तुजातमिदं मूढ प्रतिक्षणविनश्वरम् ।
जानन्नपि न जानासि ग्रहः कोऽयमनौषधः ॥14॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! यह प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि इस संसारमें जो वस्तुओंका समूह है सो पर्यायोंसे क्षण क्षणमें नाश होनेवाला है । इस बातको तू जान कर भी अजान हो रहा है, यह तेरा क्या आग्रह (हठ) है ? क्या तुझ पर कोई पिशाच चढ गया है, जिसकी औषधि ही नहीं है ? ।


क्षणिकत्वं वदन्त्यार्या घटीघातेन भूभृताम् ।
क्रियतामात्मनः श्रेयो गतेयं नागमिष्यति ॥15॥

अर्थ: इस लोकमें राजाओंके यहाँ जो घडीका घंटा बजता है और शब्द करता है, सो सबके क्षणिकपनको प्रकट करता है; अर्थात् जगत्को मानो पुकार पुकार कर कहता है कि, हे जगत्के जीवो ! जो कुछ अपना कल्याण करना चाहते हो, सो शीघ्र ही कर डालो, नहीं तो पछताओगे । क्योंकि यह जो घडी बीत गई, वह किसी प्रकार भी पुनर्वार लौट कर नहीं आयेगी । इसी प्रकार अगली घडी भी यदि व्यर्थ ही खो दोगे तो वह भी गई हुई नहीं लौटेगी ।


यद्यपूर्वं शरीरं स्याद्यदि वात्यन्तशाश्वतम् ।
युज्यते हि तदा कर्तुमस्यार्थे कर्म निन्दितम् ॥16॥

अर्थ: हे प्राणी ! यदि यह शरीर अपूर्व हो, अर्थात् पूर्वमें कभी तूने नहीं पाया हो, अथवा अत्यन्त अविनश्वर हो, तब तो इसके अर्थ निंद्यकार्य करना योग्य भी है, परन्तु ऐसा नहीं है । क्योंकि यह शरीर तूने अनन्तवार धारण किया है और छोडा भी है, तो फिर ऐसे शरीरके अर्थ निन्द्य कार्य करना कदापि उचित नहीं है । इस कारण ऐसे कार्य कर जिससे कि, तेरा वास्तवमें कल्याण हो ।


अवश्यं यान्ति यास्यन्ति पुत्रस्त्रीधनबान्धवाः ।
शरीराणि तदेतेषां कृते किं खिद्यते वृथा ॥17॥

अर्थ: पुत्र स्त्री बांधव धन शरीरादि चले जाते हैं और जो हैं, वह भी अवश्य चले जायेंगे। फिर इनके कार्यसाधनके लिये यह जीव वृथा ही क्यों खेद करता है ? ।


नायाता नैव यास्यन्ति केनापि सह योषितः ।
तथाप्यज्ञाः कृते तासां प्रविशन्ति रसातलम् ॥18॥

अर्थ: इस संसारमें स्त्रियाँ न तो किसीके साथ आई हैं और न ही किसीके साथ जायेंगी, तथापि मूढजन इनके लिये निन्द्य कार्य करके नरकादिमें प्रवेश करते हैं । यह बडा अज्ञान है ।


ये जाता रिपवः पूर्वं जन्मन्यस्मिन्विधेर्वशात् ।
त एव तव वर्त्तन्ते बान्धवा बद्धसौहृदः ॥19॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जो पूर्वजन्ममें तेरे शत्रु थे, वे ही इस जन्ममें तेरे अति स्नेही होकर बंधु हो गये हैं, अर्थात् तू इनको हितू वा मित्र समझता है, परन्तु ये तेरे हितू मित्र नहीं है, किन्तु पूर्वजन्मके शत्रु हैं ।


रिपुत्वेन समापन्नाः प्राक्तनास्तेऽत्र जन्मनि ।
बान्धवाः क्रोधरुद्धाक्षा दृश्यन्ते हन्तुमुद्यताः ॥20॥

अर्थ: और जो पूर्वजन्ममें तेरे बांधव थे, वे ही इस जन्ममें शत्रुताको प्राप्त होकर तथा क्रोधयुक्त लाल नेत्र करके तुझे मारनेके लिये उद्यत हुए हैं । यह प्रत्यक्षमें देखा जाता है ।


अङ्गनादिमहापाशैरतिगाढं नियन्त्रिताः ।
पतंत्यन्धमहाकूपे भवाख्ये भविनोऽध्वगाः ॥21॥

अर्थ: इस संसारमें निरन्तर फिरनेवाले प्राणीरूपी पथिक स्त्री आदिके बडे बडे रस्सोंसे अतिशय कसे हुए संसार नामक महान्धकूपमें गिरते हैं ।


पातयन्ति भवावर्त्ते ये त्वां ते नैव बान्धवाः ।
बन्धुतां ते करिष्यन्ति हितमुद्दिश्य योगिनः ॥22॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जो तुझे संसारके चक्रमें डालते हैं, वे तेरे बांधव (हितैषी) नहीं है, किन्तु जो मुनिगण (गुरुमहाराज) तेरे हितकी वांछा करके बंधुता करते हैं, अर्थात् हितका उपदेश करते हैं, स्वर्ग तथा मोक्षका मार्ग बताते हैं, वे ही वास्तवमें तेरे सच्चे और परम मित्र हैं ।


शरीरं शीर्यते नाशा गलत्यायुर्न पापधीः ।
मोहः स्फुरति नात्मार्थः पश्य वृत्तं शरीरिणाम् ॥23॥

अर्थ: देखो ! इन जीवोंका प्रवर्त्तन कैसा आश्चर्यकारक है कि, शरीर तो प्रतिदिन छीजता जाता है और आशा नहीं छीजती है; किन्तु बढती जाती है । तथा आयुर्बल तो घटता जाता है और पापकार्योंमें बुद्धि बढती जाती है । मोह तो नित्य स्फुरायमान होता है और यह प्राणी अपने हित वा कल्याण मार्गमें नहीं लगता है । सो यह कैसा अज्ञानका माहात्म्य है ! ।


यास्यन्ति निर्दया नूनं यद्दत्वा दाहमूर्जितम् ।
हृदि पुंसां कथं ते स्युस्तव प्रीत्यै परिग्रहाः ॥24॥

अर्थ: हे आत्मन् ! ये परिग्रह पुरुषोंके हृदयमें अतिशय दाह अर्थात् सन्ताप देकर अवश्य ही चले जाते हैं । ऐसे ये परिग्रह तेरी प्रीति करने योग्य कैसे हो सकते हैं ?


अविद्यारागदुर्वारप्रसरान्धीकृतात्मनाम् ।
श्वभ्रादौ देहिनां नूनं सोढव्या सुचिरं व्यथा ॥25॥

अर्थ: मिथ्याज्ञानजनित रागोंके दुर्निवार विस्तारसे अन्धे किये हुए जीवोंको अवश्य ही नरकादिमें बहुत काल पर्यंत दुःख सहने पडेंगे, जिसका जीवोंको चेत ही नहीं है ।


वह्निं विशति शीतार्थं जीवितार्थं पिबेद्विषम् ।
विषयेष्वपि यः सौख्यमन्वेषयति मुग्धधीः ॥26॥

अर्थ: जो मूढधी पञ्चेन्द्रियोंके विषय सेवनमें सुख ढूँढते हैं, वे मानो शीतलताके लिए अग्निमें प्रवेश करते हैं और दीर्घ जीवनके लिए विषपान करते हैं । उन्हें इस विपरीत बुद्धिसे सुखके स्थानमें दुःख ही होगा।


कृते येषां त्वया कर्म कृतं श्वभ्रादिसाधकम् ।
त्वामेव यान्ति ते पापा वञ्चयित्वा यथायथम् ॥27॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जिन कुटुंबादिकके लिये तूने नरकादिकके दुःख देनेवाले पापकर्म किये, वे पापी तुझे अवश्य ही धोखा देकर अपनी-अपनी गतिको चले जाते हैं । उनके लिए तूने जो पापकर्म किये थे, उनके फल तुझे अकेले ही भोगने पडते हैं, वा भोगने पडेंगे ।


अनेन नृशरीरेण यल्लोकद्वयशुद्धिदम् ।
विवेच्य तदनुष्ठेयं हेयं कर्म ततोऽन्यथा ॥28॥

अर्थ: इस प्राणीको चाहिये कि, इस मनुष्य देहसे उभय लोकमें शुद्धताको देनेवाले कार्यका विचार करके अनुष्ठान करे और उससे भिन्न अन्य सब कार्य छोड दे । यह सामान्यतया उपदेश है ।


वर्द्धयन्ति स्वघाताय ते नूनं विषपादपम् ।
नरत्वेऽपि न कुर्वन्ति ये विवेच्यात्मनो हितम् ॥29॥

अर्थ: जिसमें समस्त प्रकारके विचार करनेकी सामर्थ्य है, तथा जिसका पाना दुर्लभ है ऐसे मनुष्य जन्मको पाकर भी जो अपना हित नहीं करते, वे अपना घात करनेके लिये विषवृक्षको बढाते हैं ।


यद्वद्देशान्तरादेत्य वसन्ति विहगा नगे ।
तथा जन्मान्तरान्मूढ प्राणिनः कुलपादपे ॥30॥

अर्थ: जैसे पक्षी नानादेशोंसे आ आकर सन्ध्याके समय वृक्षों पर बसते हैं, वैसे ही ये प्राणीजन अन्यान्य जन्मोंसे आ आकर कुलरूपी वृक्षों पर बसते हैं, अर्थात् जन्म लेते हैं ।


प्रातस्तरुं परित्यज्य यथैते यान्ति पत्रिणः ।
स्वकर्मवशगाः शश्वत्तथैते क्वापि देहिनः ॥31॥

अर्थ: जिस प्रकार वे पक्षी प्रभातके समय उस वृक्षको छोडकर अपना अपना रास्ता लेते हैं, उस ही प्रकार ये प्राणी भी आयु पूर्ण होनेपर अपने-अपने कर्मानुसार अपनी-अपनी गतिमें चले जाते हैं ।


गीयते यत्र सानन्दं पूर्वाह्णे ललितं गृहे ।
तस्मिन्नेव हि मध्याह्ने सदुःखमिह रुद्यते ॥32॥

अर्थ: जिस घरमें प्रभातके समय आनन्दोत्साहके साथ सुन्दर-सुन्दर मांगलिक गीत गाये जाते हैं, मध्याह्नके समय उसी घरमें दुःखके साथ रोना सुना जाता है ।


यस्य राज्याभिषेकश्रीः प्रत्यूषेऽत्र विलोक्यते ।
तस्मिन्नहनि तस्यैव चिताधूमश्च दृश्यते ॥33॥

अर्थ: प्रभातके समय जिसके राज्याभिषेककी शोभा देखी जाती है, उसी दिन उस राजाकी चिताका धुआँ देखनेमें आता है । यह संसारकी विचित्रता है ।


अत्र जन्मनि निर्वृत्तं यैः शरीरं तवाणुभिः ।
प्राक्तनान्यत्र तैरेव खण्डितानि सहस्रशः ॥34॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस संसारमें जिन परमाणुओंसे तेरा यह शरीर रचा गया है, उन्हीं परमाणुओंने इस शरीरसे पहले तेरे हजारों शरीर खंड खंड किये हैं ।


शरीरत्वं न ये प्राप्ता आहारत्वं न येऽणवः ।
भ्रमतस्ते चिरं भ्रातर्यन्न ते सन्ति तद्गृहे ॥35॥

अर्थ: हे भाई ! तेरे इस संसारमें बहुत कालसे भ्रमण करते हुए जो परमाणु शरीरताको तथा आहारताको प्राप्त नहीं हुए, ऐसे बचे हुए परमाणु कोई भी नहीं है ।


सुरोरगनरैश्वर्यं शक्रकार्मुकसन्निभम् ।
सद्यः प्रध्वंसमायाति दृश्यमानमपि स्वयम् ॥36॥

अर्थ: इस जगतमें जो सुर (कल्पवासी देव), उरग (भवनवासी देव), और मनुष्योंके इन्द्र अर्थात् चक्रवर्त्तीपनेके ऐश्वर्य (विभव) हैं, वे सब इन्द्रधनुषके समान हैं, अर्थात् देखनेमें अति सुन्दर दीख पडते हैं, परन्तु देखते-देखते विलय जाते हैं ।


यान्त्येव न निवर्त्तन्ते सरितां यद्वदूर्मयः ।
तथा शरीरिणां पूर्वा गता नायान्ति भूतयः ॥37॥

अर्थ: जिस प्रकार नदीकी जो लहरें जाती हैं, वे फिर लौटकर कभी नहीं आती हैं, इसी प्रकार जीवोंकी जो विभूति पहिले होती है, वह नष्ट होनेके पश्चात् फिर लौटकर नहीं आती । यह प्राणी वृथा ही हर्षविषाद करता है ।


क्वचित्सरित्तरङ्गाली गतापि विनिवर्त्तते ।
न रूपबललावण्यं सौन्दर्यं तु गतं नृणाम् ॥38॥

अर्थ: नदीकी लहरें कदाचित् कहीं लौट भी आती हैं, परन्तु मनुष्योंका गया हुआ रूप, बल, लावण्य और सौन्दर्य फिर नहीं आता । यह प्राणी वृथा ही उनकी आशा लगाये रहता है ।


गलत्येवायुरव्यग्रं हस्तन्यस्ताम्बुवत्क्षणे ।
नलिनीदलसंक्रान्तं प्रालेयमिव यौवनम् ॥39॥

अर्थ: जीवोंका आयुर्बल तो अञ्जलिके जल समान क्षण-क्षणमें निरन्तर झरता है और यौवन कमलिनीके पत्र पर पडे हुए जलबिंदुके समान तत्काल ढलक जाता है । यह प्राणी वृथा ही स्थिरताकी इच्छा रखता है ।


मनोज्ञविषयैः सार्द्धं संयोगाः स्वप्नसन्निभाः ।
क्षणादेव क्षयं यान्ति वञ्चनोद्धतबुद्धयः ॥40॥

अर्थ: जीवोंके मनोज्ञ विषयोंके साथ संयोग स्वप्नके समान है, क्षणमात्रमें नष्ट हो जाते हैं । जिनकी बुद्धि ठगनेमें उद्धत है, ऐसे ठगोंकी भाँति ये किंचित्काल चमत्कार दिखाकर फिर सर्वस्व हरनेवाले हैं ।


घनमालानुकारीणि कुलानि च बलानि च ।
राज्यालङ्कारवित्तानि कीर्त्तितानि महर्षिभिः ॥41॥

अर्थ: महर्षियोंने जीवोंके कुल-कुटुंब, बल, राज्य, अलंकार, धनादिकोंको मेघपटलोंके समूह समान देखते-देखते विलुप्त होनेवाले कहे हैं । यह मूढ प्राणी वृथा ही उनमें नित्यकी बुद्धि करता है ।


फेनपुञ्जेऽथवा रम्भास्तम्भे सारः प्रतीयते ।
शरीरे न मनुष्याणां दुर्बुद्धे विद्धि वस्तुतः ॥42॥

अर्थ: हे दुर्बुद्धि मूर्ख प्राणी ! वास्तवमें देखा जाये, तो झागोंके समूहमें तथा केलेके थंभमें तो कुछ सार प्रतीत होता भी है, परन्तु मनुष्योंके शरीरमें तो कुछ सार नहीं है ।


यातायातानि कुर्वन्ति ग्रहचन्द्रार्कतारकाः ।
ऋतवश्च शरीराणि न हि स्वप्नेऽपि देहिनाम् ॥43॥

अर्थ: इस लोकमें ग्रह, चन्द्र, सूर्य, तारे तथा छह ऋतु आदि सब ही जाते और आते हैं, अर्थात् निरन्तर गमनागमन करते रहते हैं । परन्तु जीवोंके गये हुए शरीर स्वप्नमें भी कभी लौटकर नहीं आते । यह प्राणी वृथा ही इनसे प्रीति करता है ।


ये जाताः सातरूपेण पुद्गलाः प्राङ्मनःप्रियाः ।
पश्य पुंसां समापन्ना दुःखरूपेण तेऽधुना ॥44॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस जगतमें जो पुद्गलस्कन्ध पहिले जिन पुरुषोंके मनको प्रिय और सुखके देनेवाले उपजे थे, वे ही अब दुःखके देनेवाले हो गये हैं, उन्हें देख अर्थात् जगत्में ऐसा कोई भी नहीं है जो शाश्वत सुखरूप ही रहता हो ।


मोहाञ्जनमिवाक्षाणामिन्द्रजालोपमं जगत् ।
मुह्यत्यस्मिन्नयं लोको न विद्मः केन हेतुना ॥45॥

अर्थ: यह जगत् इन्द्रजालवत् है । प्राणियोंके नेत्रोंको मोहनी अञ्जनके समान भुलाता है, और लोग इसमें मोहको प्राप्त होकर अपनेको भूल जाते हैं, अर्थात् लोग धोखा खाते हैं, अतः आचार्य महाराज कहते हैं कि, हम नहीं जानते ये लोग किस कारणसे भूलते हैं । यह प्रबल मोहका माहात्म्य ही है ।


ये चात्र जगतीमध्ये पदार्थाश्चेतनेतराः ।
ते ते मुनिभिरुद्दिष्टाः प्रतिक्षणविनश्वराः ॥46॥

अर्थ: इस जगतमें जो जो चेतन और अचेतन पदार्थ हैं, उन्हें सब महर्षियोंने क्षणक्षणमें नष्ट होनेवाले और विनाशीक कहे हैं । यह प्राणी इन्हें नित्यरूप मानता है, यह भ्रम मात्र है ।


गगननगरकल्पं सङ्गमं वल्लभानाम्
जलदपटलतुल्यं यौवनं वा धनं वा ।
सुजनसुतशरीरादीनि विद्युच्चलानि
क्षणिकमिति समस्तं विद्धि संसारवृत्तम् ॥47॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हे प्राणी ! वल्लभा अर्थात् प्यारी स्त्रियोंका संगम आकाशमें देवोंसे रचे हुए नगरके समान है; अतः तुरन्त विलुप्त हो जाता है । और तेरा यौवन वा धन जलद पटलके समान है, सो भी क्षणमें नष्ट हो जानेवाला है । तथा स्वजन परिवारके लोग पुत्र शरीरादिक बिजुलीके समान चंचल हैं । इस प्रकार इस जगतकी अवस्था अनित्य जानकर नित्यताकी बुद्धि मत रख ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - अशरण भावना (श्लोक 1 से 19)

न स कोऽप्यस्ति दुर्बुद्धे शरीरी भुवनत्रये ।
यस्य कण्ठे कृतान्तस्य न पाशः प्रसरिष्यति ॥1॥

अर्थ: हे मूढ दुर्बुद्धि प्राणी ! तू जो किसीकी शरण चाहता है, सो इस त्रिभुवनमें ऐसा कोई भी शरीरी (जीव) नहीं है कि, जिसके गलेमें कालकी फाँसी नहीं पडती हो ।


समापतति दुर्वारे यमकण्ठीरवक्रमे ।
त्रायते तु न हिं प्राणी सोद्योगैस्त्रिदशैरपि ॥2॥

अर्थ: जब यह प्राणी दुर्निवार कालरूपी सिंहके पाँवतले आ जाता है, तब उद्यमशील देवगण भी इसकी रक्षा नहीं कर सकते हैं; अन्य मनुष्यादिकोंकी तो क्या सामर्थ्य है कि, रक्षा कर सकें ।


सुरासुरनराहीन्द्रनायकैरपि दुर्द्धरा ।
जीवलोकं क्षणार्धेन बध्नाति यमवागुरा ॥3॥

अर्थ: यह कालका जाल अथवा फंदा ऐसा है कि क्षण मात्रमें जीवोंको फाँस लेता है और सुरेन्द्र असुरेन्द्र नरेन्द्र तथा नागेन्द्र भी इसका निवारण नहीं कर सकते हैं ।


जगत्त्रयजयी वीर एक एवान्तकः क्षणे ।
इच्छामात्रेण यस्यैते पतन्ति त्रिदशेश्वराः ॥4॥

अर्थ: यह काल तीन जगतको जीतनेवाला अद्वितीय सुभट है, क्योंकि इसकी इच्छा मात्रसे देवोंके इन्द्र भी क्षणमात्रमें गिर पडते हैं, अर्थात् स्वर्गसे च्युत हो जाते हैं । फिर अन्यकी कथा ही क्या है ? ।


शोच्यन्ते स्वजनं मूर्खाः स्वकर्मफलभोगिनम् ।
नात्मानं बुद्धिविध्वंसा यमदंष्ट्रान्तरस्थितम् ॥5॥

अर्थ: यदि अपना कोई कुटुंबीजन अपने कर्मवशात् मरणको प्राप्त हो जाता है, तो नष्टबुद्धि मूर्खजन उसका शोच करते हैं, परन्तु आप स्वयं यमराजकी दाढोंमें आया हुआ है, इसकी चिन्ता कुछ भी नहीं करता है ! यह बडी मूर्खता है ।


यस्मिन्संसारकान्तारे यमभोगीन्द्रसेविते ।
पुराणपुरुषाः पूर्वमनन्ताः प्रलयं गताः ॥6॥

अर्थ: कालरूप सर्पसे सेवित संसाररूपी वनमें पूर्व कालमें अनेक पुराणपुरुष (शलाकापुरुष) प्रलयको प्राप्त हो गये, उनका विचार कर शोक करना वृथा है ।


प्रतीकारशतेनापि त्रिदशैर्न निवार्यते ।
यत्रायमन्तकः पापी नृकीटैस्तत्र का कथा ॥7॥

अर्थ: जब यह पापस्वरूप यम देवताओंके सैंकडों उपायोंसे भी नहीं निवारण किया जाता है, तब मनुष्यरूपी कीडेकी तो बात ही क्या ?


गर्भादारभ्य नीयन्ते प्रतिक्षणमखण्डितैः ।
प्रयाणैः प्राणिनो मूढ कर्मणा यममन्दिरम् ॥8॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! आयुनामा कर्म जीवोंको गर्भावस्थासे ही निरंतर प्रतिक्षण अपने प्रयाणोंसे (मंजिलोंसे) यममंदिरकी तरफ ले जाता है, सो उसे देख ! ।


यदि दृष्टः श्रुतो वास्ति यमाज्ञावञ्चको बली ।
तमाराध्य भज स्वास्थ्यं नैव चेत्किं वृथा श्रमः ॥9॥

अर्थ: हे प्राणी ! यदि तूने किसीको यमराजकी आज्ञाका लोप करनेवाला बलवान पुरुष देखा वा सुना हो, तो तू उसीकी सेवा कर, अर्थात् उसकी शरण लेकर निश्चिन्त हो रह, और यदि ऐसा कोई बलवान् देखा वा सुना नहीं है, तो तेरा खेद करना व्यर्थ है ।


परस्येव न जानाति विपत्तिं स्वस्य मूढधीः ।
वने सत्त्वसमाकीर्णे दह्यमाने तरुस्थवत् ॥10॥

अर्थ: ये मूढजन दूसरोंकी आई हुई आपदाओंके समान अपनी आपदाओंको इस प्रकार नहीं जानते, जैसे असंख्य जीवोंसे भरा हुआ वन जलता हो और वृक्ष पर बैठा हुआ मनुष्य कहे कि, देखो ये सब जीव जल रहे हैं, परन्तु यह नहीं जाने कि, जब यह वृक्ष जलेगा, तब मैं भी इनके समान ही जल जाऊँगा । यह बडी मूर्खता है ।


यथा बालं तथा वृद्धं यथाढ्यं दुर्विधं तथा ।
यथा शूरं तथा भीरुं साम्येन ग्रसतेऽन्तकः ॥11॥

अर्थ: यह काल जैसे बालकको ग्रसता है, तैसे ही वृद्धको भी ग्रसता है । और जैसे धनाढ्य पुरुषको ग्रसता है, उसी प्रकार दरिद्रको भी ग्रसता है । तथा जैसे शूरवीरको ग्रसता है, उसी प्रकार कायरको भी ग्रसता है । एवं प्रकार जगतके सब ही जीवोंको समान भावसे ग्रसता है किसीमें भी इसका हीनाधिक विचार नहीं है, इसी कारणसे इसका एक नाम समवर्त्ती भी है ।


गजाश्वरथसैन्यानि मन्त्रौषधबलानि च ।
व्यर्थीभवन्ति सर्वाणि विपक्षे देहिनां यमे ॥12॥

अर्थ: जब यह काल जीवोंके विरुद्ध होता है अर्थात् जगत्के जीवोंको ग्रसता है तथा नष्ट करता है, तब हाथी घोडा रथ सेना मंत्र तंत्र औषध पराक्रमादि सब ही व्यर्थ हो जाते हैं ।


विक्रमैकरसस्तावज्जनः सर्वोऽपि वल्गति ।
न शृणोत्यदयं यावत्कृतान्तहरिगर्जितम् ॥13॥

अर्थ: पराक्रम ही है अद्वितीय रस जिसके, ऐसा यह मनुष्य तब तक ही उद्धत होकर दौडता कूदता है, जब तक कि कालरूपी सिंहकी गर्जनाका शब्द नहीं सुनता अर्थात् ‘तेरी मौत आ गई’ ऐसा शब्द सुनते ही सब खेल कूद भूल जाता है ।


अकृताभीष्टकल्याणमसिद्धारब्धवाञ्छितम् ।
प्रागेवागत्य निस्त्रिंशो हन्ति लोकं यमः क्षणे ॥14॥

अर्थ: यह काल ऐसा निर्दयी है कि, जिन्होंने अपना मनोवांछित कल्याणरूप कार्य नहीं किया और न अपने प्रारंभ किये हुए कार्योंको पूर्ण कर पाये, ऐसे लोगोंको यह सबसे पहिले आ कर तत्काल मार डालता है । लोगोंके कार्य जैसेके तैसे अधूरे ही धरे रह जाते हैं ।


भ्रूभङ्गारम्भभीतं स्खलति जगदिदं ब्रह्मलोकावसानम्
सद्यस्त्रुट्यन्ति शैलाश्चरणगुरुभराक्रान्तधात्रीवशेन ।
येषां तेऽपि प्रवीराः कतिपयदिवसैः कालराजेन सर्वे
नीता वार्त्तावशेषं तदपि हतधियां जीवितेऽप्युद्धताशा ॥15॥

अर्थ: जिनकी भौंहके कटाक्षोंके प्रारंभ मात्रसे ब्रह्मलोक पर्यन्तका यह जगत् भयभीत हो जाता है, तथा जिनके चरणोंके गुरुभारके कारण पृथ्वीके दबने मात्रसे पर्वत तत्काल खंड-खंड हो जाते हैं, ऐसे-ऐसे सुभटोंको भी, जिनकी कि अब कहानी मात्र ही सुननेमें आती है, इस कालने खा लिया है; फिर यह हीनबुद्धि जीव अपने जीनेकी बडी भारी आशा रखता है, यह कैसी बडी भूल है ! ।


रुद्राशागजदेवदैत्यखचरग्राहग्रहव्यन्तरा-
दिक्पालाः प्रतिशत्रवो हरिबला व्यालेन्द्रचक्रेश्वराः ।
ये चान्ये मरुदर्यमादिबलिनः संभूय सर्वे स्वयम्
नारब्धं यमकिङ्करैः क्षणमपि त्रातुं क्षमा देहिनम् ॥16॥

अर्थ: रुद्र, दिग्गज देव, दैत्य, विद्याधर, जलदेवता, ग्रह, व्यन्तर, दिक्पाल, नारायण, प्रतिनारायण, बलभद्र, धरणीन्द्र, चक्रवर्ती तथा पवन देव सूर्यादि बलिष्ठ देहधारी सब एकत्र हो कर भी कालके किंकर स्वरूप कालकी कलासे आरंभ किये अर्थात् पकडे हुए प्राणीको क्षणमात्र भी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं ।


आरब्धा मृगबालिकेव विपिने संहारदन्तिद्विषा
पुंसां जीवकला निरेति पवनव्याजेन भीता सती ।
त्रातुं न क्षमसे यदि क्रमपदप्राप्तां वराकीमिमां
न त्वं निर्घृण लज्जसेऽत्र जनने भोगेषु रन्तुं सदा ॥17॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! जिस प्रकार वनमें मृगकी बालिकाको सिंह पकडनेका आरंभ करता है और वह भयभीत होकर भागती है, उसी प्रकार जीवोंके जीवनकी कला कालरूपी सिंहसे भयभीत होकर उच्छ्वासके बहानेसे बाहर निकलती है, अर्थात् भागती है । और जिस प्रकार वह मृगकी बालिका सिंहके पाँवों तले आ जाती है, उसी प्रकार जीवोंके जीवनकी कला कालके अनुक्रमसे अन्तको प्राप्त हो जाती है । अतएव तू इस निर्बलकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं है, और हे निर्दयी ! तू इस जगत्में भोगोंमें रमनेको उद्यमी होकर प्रवृत्ति करता है और लज्जित नहीं होता, यह तेरा निर्दयपन है क्योंकि सत्पुरुषोंकी ऐसी प्रवृत्ति होती है कि, यदि कोई किसी असमर्थ प्राणीको समर्थ दबावें, तो अपने समस्त कार्य छोडकर उसकी रक्षा करनेका विचार करते हैं; और तू कालसे हनते हुए प्राणियोंको देखकर भी भोगोंमें रमता है और सुकृत करके अपनेको नहीं बचाता है, यह तेरी बडी निर्दयता है ।


पाताले ब्रह्मलोके सुरपतिभवने सागरान्ते वनान्ते
दिक्चक्रे शैलशृंगे दहनवनहिमध्वान्तवज्रासिदुर्गे ।
भूगर्भे सन्निविष्टं समदकरिघटासंकटे वा बलीयान्
कालोऽयं क्रूरकर्मा कवलयति बलाज्जीवितं देहभाजां ॥18॥

अर्थ: यह काल बडा बलवान् और क्रूरकर्मा अर्थात् दुष्ट है । जीवोंको पातालमें, ब्रह्मलोकमें, इन्द्रके भवनमें, समुद्रके तट, वनके पार, दिशाओंके अन्तमें, पर्वतके शिखर पर, अग्निमें, जलमें, हिमालयमें, अंधकारमें, वज्रमयी स्थानमें, तलवारोंके पहरेमें, गढ कोट भूमि घरमें, तथा मदोन्मत्त हस्तियोंके समूह इत्यादि किसी भी विकट स्थानमें, यत्नपूर्वक बिठाओ, तो भी यह काल बलात्कारपूर्वक जीवोंके जीवनको ग्रसीभूत कर लेता है । इस कालके आगे किसीका भी वश नहीं चलता ।


अस्मिन्नन्तकभोगिवक्त्रविवरे संहारदंष्ट्राङ्किते
संसुप्तं भुवनत्रयं स्मरगरव्यापारमुग्धीकृतम् ।
प्रत्येकं गिलितोऽस्य निर्दयधियः केनाप्युपायेन वै
नास्मान्निःसरणं तवार्य कथमप्यत्यक्षबोधं विना ॥19॥

अर्थ: हे आर्य सत्पुरुष ! अन्तसमयरूपी दाढसे चिह्नित कालरूप सर्पके मुखरूपी विवरमें कामरूपी विषकी गहलतासे मूर्छित भुवनत्रयके प्राणी गाढ निद्रामें सो रहे हैं, उनमें प्रत्येकको यह निर्दयबुद्धि काल निगलता जाता है । परन्तु प्रत्यक्षज्ञानकी प्राप्तिके बिना इस कालके पंजेसे निकलनेका और कोई भी उपाय नहीं है अर्थात् अपने ज्ञान व स्वरूपका शरण लेनेसे ही इस कालसे रक्षा हो सकती है । इस प्रकार अशरण भावनाका वर्णन किया है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - संसार भावना (श्लोक 1 से 17)

चतुर्गतिमहावर्त्ते दुःखवाडवदीपिते ।
भ्रमन्ति भविनोऽजस्रं वराका जन्मसागरे ॥1॥

अर्थ: चार गतिरूप महा आवर्त्त (भौंरें) वाले तथा दुःखरूप वडवानलसे प्रज्ज्वलित इस संसाररूपी समुद्रमें जगत्के दीन अनाथ प्राणी निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं ।


उत्पद्यन्ते विपद्यन्ते स्वकर्मनिगडैर्वृताः ।
स्थिरेतरशरीरेषु सञ्चरन्तः शरीरिणः ॥2॥

अर्थ: ये जीव अपने-अपने कर्मरूपी बेडियोंसे बंधे स्थावर और त्रस शरीरोंमें संचार करते हुए मरते और उपजते हैं ।


कदाचिद्देवगत्यायुर्नामकर्मोदयादिह ।
प्रभवन्त्यङ्गिनः स्वर्गे पुण्यप्राग्भारसंभृताः ॥3॥

अर्थ: कभी तो यह जीव देवगति-नामकर्म और देवायुकर्मके उदयसे पुण्यकर्मके समूहोंसे भरे स्वर्गोंमें देव उत्पन्न होता है ।


कल्पेषु च विमानेषु निकायेष्वितरेषु च ।
निर्विशन्ति सुखं दिव्यमासाद्य त्रिदिवश्रियम् ॥4॥

अर्थ: और वहाँ देवगतिमें कल्पवासियोंके विमानोंमें तथा भवनवासी ज्योतिषी तथा व्यन्तरदेवोंमें उनकी लक्ष्मी पाकर देवोपनीत सुखोंको भोगता है ।


प्रच्यवन्ते ततः सद्यः प्रविशन्ति रसातलम् ।
भ्रमन्त्यनिलवद्विश्वं पतन्ति नरकोदरे ॥5॥

अर्थ: फिर उस देवगतिसे च्युत होकर पृथ्वीतल पर आता है और वहाँ पवनके समान जगत्में भ्रमण करता है तथा नरकोंमें गिरता है ।


विडम्बयत्यसौ हन्त संसारः समयान्तरे ।
अधमोत्तमपर्यायैर्नियोज्य प्राणिनां गणम् ॥6॥

अर्थ: आचार्य महाराज आश्चर्य करते हैं कि, देखो यह संसार जीवोंके समूहको समयान्तरमें ऊँची नीची पर्यायोंसे जोडकर विडम्बनारूप करता है और जीवके स्वरूपको अनके प्रकारसे बिगाडता है ।


स्वर्गी पतति साक्रन्दं श्वा स्वर्गमधिरोहति ।
श्रोत्रियः सारमेयः स्यात् कृमिर्वा श्वपचोऽपि वा ॥7॥

अर्थ: अहो ! देखो ! स्वर्गका देव तो रोता पुकारता स्वर्गसे नीचे गिरता है और कुत्ता स्वर्गमें जाकर देव होता है ! एवं श्रोत्रिय अर्थात् क्रियाकांडका अधिकारी अस्पृष्ट रहनेवाला ब्राह्मण मर कर कुत्ता कृमि अथवा चंडालादि हो जाता है ! इस प्रकार इस संसारकी विडंबना है ।


रूपाण्येकानि गृह्णाति त्यजत्यन्यानि सन्ततम् ।
यथा रङ्गेऽत्र शैलूषस्तथायं यन्त्रवाहकः ॥8॥

अर्थ: यह यंत्रवाहक (प्राणी) संसारमें अनेक रूपोंको ग्रहण करता है और अनेक रूपोंको छोडता है। जिस प्रकार नृत्यके रंगमञ्च पर नृत्य करनेवाला भिन्न भिन्न स्वांगोंको धरता है, उसी प्रकार यह जीव निरन्तर भिन्न भिन्न स्वांग (शरीर) धारण करता रहता है ।


सुतीव्रासातसंतप्ताः मिथ्यात्वातङ्कतर्किताः ।
पञ्चधा परिवर्त्तन्ते प्राणिनो जन्मदुर्गमे ॥9॥

अर्थ: इस संसाररूपी दुर्गम वनमें संसारी जीव मिथ्यात्वरूपी रोगसे शंकित अतिशय तीव्र असातावेदनीसे दुःखित होते हुए पांच प्रकारके परिवर्त्तनोंमें भ्रमण करते रहते हैं ।


द्रव्यक्षेत्रे तथा कालभवभावविकल्पतः ।
संसारो दुःखसंकीर्णः पञ्चधेति प्रपञ्चितः ॥10॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भावके भेदसे संसार पांच प्रकारके विस्ताररूप दुःखोंसे व्याप्त कहा गया है । इन पांच प्रकारके परिवर्त्तनोंका स्वरूप विस्तारपूर्वक अन्य ग्रंथोंसे जानना ।


सर्वैः सर्वेऽपि सम्बन्धाः संप्राप्ता देहधारिभिः ।
अनादिकालसंभ्रान्तैस्त्रसस्थावरयोनिषु ॥11॥

अर्थ: इस संसारमें अनादिकालसे त्रसस्थावर योनियोंमें फिरते हुए जीवोंने समस्त जीवोंके साथ पिता पुत्र भ्राता माता पुत्री स्त्री आदिक संबंध अनेक बार पाये हैं। ऐसा कोई भी जीव या सम्बन्ध बाकी नहीं रहा, जो इस जीवने न पाया हो ।


देवलोके नृलोके च तिरश्चि नरकेऽपि च ।
न सा योनिर्न तद्रूपं न तद्देशो न तत्कुलम् ॥12॥

अर्थ: इस संसारमें चतुर्गतिमें फिरते हुए जीवके वह योनि वा रूप, देश, कुल तथा वह सुख, दुःख, वा पर्याय नहीं है, जो निरन्तर गमनागमन करनेसे प्राप्त न हुई हो ।


न तद्दुःखं सुखं किञ्चिन्न पर्यायः स विद्यते ।
यत्रैते प्राणिनः शश्वद्यातायातैर्न खण्डिताः ॥13॥

अर्थ: इस संसारमें चतुर्गतिमें फिरते हुए जीवके वह योनि वा रूप, देश, कुल तथा वह सुख, दुःख, वा पर्याय नहीं है, जो निरन्तर गमनागमन करनेसे प्राप्त न हुई हो ।


न के बन्धुत्वमायाताः न के जातास्तव द्विषः ।
दुरन्तागाधसंसारपङ्कमग्नस्य निर्दयम् ॥14॥

अर्थ: हे प्राणी ! इस दुरन्त अगाध संसाररूपी कर्दम (कीच) में फँसे हुए, तेरे ऐसे कौन से जीव हैं, जो मित्र वा निर्दयतासे शत्रु नहीं हुए ? अर्थात् सब जीव तेरे शत्रु वा बंधु हो गये हैं ।


भूपः कृमिर्भवत्यत्र कृमिश्चामरनायकः ।
शरीरी परिवर्त्तेत कर्मणा वञ्चितो बलात् ॥15॥

अर्थ: इस संसारमें यह प्राणी कर्मोंसे बलात् वञ्चित हो राजासे तो मर कर कृमि (लट) हो जाता है और कृमिसे मर कर क्रमसे देवोंका इन्द्र हो जाता है । इस प्रकार परस्पर ऊँची गतिसे नीची गति और नीचीसे ऊँची गति पलटती ही रहती है ।


माता पुत्री स्वसा भार्या सैव संपद्यतेऽङ्गजा ।
पिता पुत्रः पुनः सोऽपि लभते पौत्रिकं पदम् ॥16॥

अर्थ: इस संसारमें प्राणीकी माता तो मर कर पुत्री हो जाती है और बहन मर कर स्त्री हो जाती है, और फिर वही स्त्री मर कर आपकी पुत्री भी हो जाती है। इसी प्रकार पिता मर कर पुत्र हो जाता है तथा फिर वही मरकर पुत्रका पुत्र हो जाता है। इस प्रकार परिवर्त्तन होता ही रहता है ।


श्वभ्रे शूलंकुठारयन्त्रदहनक्षारक्षुरव्याहतै-
स्तिर्यक्षु श्रमदुःखपावकशिखासंभारभस्मीकृतैः ।
मानुष्येऽप्यतुलप्रयासवशगैर्देवेषु रागोद्धतैः
संसारेऽत्र दुरन्तदुर्गतिमये बम्भ्रम्यते प्राणिभिः ॥17॥

अर्थ: इस दुर्निवार दुर्गतिमय संसारमें जीव निरन्तर भ्रमण करते हैं । नरकोंमें तो ये शूली, कुल्हाडी, घाणी, अग्नि, क्षार, जल, छुरा, कटारी आदिसे पीडाको प्राप्त हुए नाना प्रकारके दुःखोंको भोगते हैं और तिर्यंचगतिमें अग्निकी शिखाके भारसे भस्मरूप खेद और दुःख पाते हैं । तथा मनुष्यगतिमें भी अतुल्य खेदके वशीभूत होकर नाना प्रकारके दुःख भोगते हैं । इसी प्रकार देवगतिमें रागभावसे उद्धत होकर दुःख सहते हैं । अर्थात् चारों ही गतिमें दुःख ही पाते हैं, इन्हें सुख कहीं भी नहीं है । इस प्रकार संसार भावनाका वर्णन किया ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - एकत्व भावना (श्लोक 1 से 11)

महाव्यसनसंकीर्णे दुःखज्वलनदीपिते ।
एकाक्येव भ्रमत्यात्मा दुर्गे भवमरुस्थले ॥1॥

अर्थ: महा आपदाओंसे भरे हुए दुःखरूपी-अग्निसे प्रज्वलित और गहन ऐसे संसाररूपी मरुस्थलमें (जल-वृक्षादि-हीन रेतीली भूमिमें) यह जीव अकेला ही भ्रमण करता है । कोई भी इसका साथी नहीं है ।


स्वयं स्वकर्मनिर्वृत्तं फलं भोक्तुं शुभाशुभम् ।
शरीरान्तरमादत्ते एकः सर्वत्र सर्वथा ॥2॥

अर्थ: इस संसारमें यह आत्मा अकेला ही तो अपने पूर्वकर्मोंके सुखदुःखरूप फलको भोगता है और सर्व प्रकारसे अकेला ही समस्त गतियोंमें एक शरीरसे दूसरे शरीरको धारण करता है ।


सङ्कल्पानन्तरोत्पन्नं दिव्यं स्वर्गसुखामृतम् ।
निर्विशत्ययमेकाकी स्वर्गश्रीरञ्जिताशयः ॥3॥

अर्थ: तथा यह आत्मा अकेला ही स्वर्गकी शोभासे रंजायमान होकर देवोपनीत संकल्प मात्र करते ही उत्पन्न होनेवाले स्वर्गसुखरूपी अमृतका पान करता है अर्थात् स्वर्गके सुख भी अकेला ही भोगता है । कोई भी इसका साथी नहीं होता ।


संयोगे विप्रयोगे च संभवे मरणेऽथवा ।
सुखदुःखविधौ वास्य न सखान्योऽस्ति देहिनः ॥4॥

अर्थ: इस प्राणीके संयोग वियोगमें अथवा जन्म मरणमें तथा दुःखसुख भोगनेमें कोई भी मित्र साथी नहीं है । अकेला ही भोगता है ।


मित्रपुत्रकलत्रादिकृते कर्म करोत्ययम् ।
यत्तस्य फलमेकाकी भुङ्क्ते श्वभ्रादिषु स्वयम् ॥5॥

अर्थ: तथा यह जीव पुत्र, मित्र, स्त्री आदिके निमित्त जो कुछ बुरे-भले कार्य करता है, उनका फल भी नरकादिक गतियोंमें स्वयं अकेला ही भोगता है । वहाँ भी कोई पुत्र-मित्रादि कर्मफल भोगनेको साथी नहीं होते ।


सहाया अस्य जायन्ते भोक्तुं वित्तानि केवलम् ।
न तु सोढुं स्वकर्मोत्थं निर्दयां व्यसनावलीम् ॥6॥

अर्थ: यह प्राणी बुरे-भले कार्य करके जो धनोपार्जन करता है, उस धनके भोगने को तो पुत्रमित्रादि अनेक साथी हो जाते हैं, परन्तु अपने कर्मोंसे उपार्जन किये हुए निर्दयरूप दुःखोंके समूहको सहनेके अर्थ कोई भी साथी नहीं होता है ! यह जीव अकेला ही सब दुःखोंको भोगता है ।


एकत्वं किं न पश्यन्ति जडा जन्मग्रहार्दिताः ।
यज्जन्ममृत्युसम्पाते प्रत्यक्षमनुभूयते ॥7॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, ये मूर्ख प्राणी संसाररूपी पिशाचसे पीडित हुए भी अपनी एकताको क्यों नहीं देखते, जिसे जन्ममरणके प्राप्त होने पर सब ही जीव प्रत्यक्षमें अनुभवन करते हैं ।


अज्ञातस्वस्वरूपोऽयं लुप्तबोधादिलोचनः ।
भ्रमत्यविरतं जीव एकाकी विधिवञ्चितः ॥8॥

अर्थ: यह जीव अपने अकेलेपनको नहीं देखता है इसका कारण यह है कि, ज्ञानादि नेत्रोंके लुप्त होनेसे यह अपने स्वरूपको भले प्रकार नहीं जानता है और इसी कारणसे कर्मोंसे ठगाया हुआ यह जीव एकाकी ही इस संसारमें भ्रमण करता है ।


यदैक्यं मनुते मोहादयमर्थैः स्थिरेतरैः ।
तदा स्वं स्वेन बध्नाति तद्विपक्षैः शिवीभवेत् ॥9॥

अर्थ: यह मूढ प्राणी जिस समय मोहके उदयसे चेतन तथा अचेतन पदार्थोंसे अपनी एकता मानता है तब यह जीव आपको अपने ही भावोंसे बाँधता है अर्थात् कर्मबन्ध करता है । और जब यह अन्य पदार्थोंसे अपनी एकता नहीं मानता है तब कर्मबन्ध नहीं करता है । और कर्मोंकी निर्जरापूर्वक परंपरा मोक्षगामी होता है । एकत्वभावनाका यही फल है ।


एकाकित्वं प्रपन्नोऽस्मि यदाहं वीतविभ्रमः ।
तदैव जन्मसम्बन्धः स्वयमेव विशीर्यते ॥10॥

अर्थ: जिस समय यह जीव भ्रमरहित हो ऐसा चिंतवन करे कि, मैं एकता को प्राप्त हो गया हूँ, उसी समय इस जीवका संसारका सम्बन्ध स्वयं ही नष्ट हो जाता है । क्योंकि संसारका संबंध तो मोहसे है और यदि मोह जाता रहे, तो आप एक हैं फिर मोक्ष क्यों न पावें ?


एकः स्वर्गी भवति विबुधः स्त्रीमुखाम्भोजभृङ्गः
एकः श्वाभ्रं पिबति कलिलं छिद्यमानः कृपाणैः ।
एकः क्रोधाद्यनलकलितः कर्म बध्नाति विद्वान्
एकः सर्वावरणविगमे ज्ञानराज्यं भुनक्ति ॥11॥

अर्थ: यह आत्मा आप एक ही देवांगनाके मुखरूपी कमलकी सुगन्धी लेनेवाले भ्रमरके समान स्वर्गका देव होता है और अकेला आप ही कृपाण छुरी तलवारोंसे छिन्न-भिन्न किया हुआ नरक संबन्धी रुधिरको पीता है तथा अकेला आप क्रोधादि कषायरूपी अग्निसहित होकर कर्मोंको बाँधता है और अकेला ही आप विद्वान् ज्ञानी पण्डित होकर समस्त कर्मरूप आवरणके अभाव होने पर ज्ञानरूप राज्यको भोगता है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - अन्यत्व भावना (श्लोक 1 से 12)

अयमात्मा स्वभावेन शरीरादेर्विलक्षणः ।
चिदानन्दमयः शुद्धो बन्धं प्रत्येकवानपि ॥1॥

अर्थ: यह आत्मा यदि कर्मबन्धकी दृष्टिसे देखा जाय तो बंधरूप वा एकरूप है, और स्वभावकी दृष्टिसे देखा जाय तो शरीरादिकसे विलक्षण चिदानंदमय परद्रव्यसे भिन्न है, शुद्ध है ।


अचिच्चिद्रूपयोरैक्यं बन्धं प्रति न वस्तुतः ।
अनादिश्चानयोः श्लेषः स्वर्णकालिकयोरिव ॥2॥

अर्थ: चेतन और अचेतनके बन्धदृष्टिकी अपेक्षा एकपना है और वस्तुतः देखनेसे दोनों भिन्न-भिन्न वस्तु हैं, एकपना नहीं है। इन दोनोंका अनादिकालसे एकक्षेत्रावगाहरूप संश्लेष है-मिलाप है। जैसे सुवर्ण और कालिमाके खानिमें एकपना है, उसी प्रकार जीव-पुद्गलोंके एकता है, परन्तु वास्तवमें भिन्न-भिन्न वस्तु हैं ।


इह मूर्त्तममूर्त्तेन चलेनात्यन्तनिश्चलम् ।
शरीरमुह्यते मोहाच्चेतनेनास्तचेतनम् ॥3॥

अर्थ: इस जगत्में मोहके कारण अमूर्तिक और चलनेवाले जीवको यह मूर्तिक अति निश्चल चेतनारहित जड शरीर अपने साथ साथ लगाये रहना पडता है ।


अणुप्रचयनिष्पन्नं शरीरमिदमङ्गिनाम् ।
उपयोगात्मकोऽत्यक्षः शरीरी ज्ञानविग्रहः ॥4॥

अर्थ: जीवोंका यह शरीर पुद्गल-परमाणुओंके समूहसे बना है । और शरीरी अर्थात् आत्मा उपयोगमयी है और अतीन्द्रिय है । यह इन्द्रियगोचर नहीं है, तथा इसका ज्ञान ही शरीर है । शरीर और आत्मामें इस प्रकार अत्यन्त भेद है ।


अन्यत्वं किं न पश्यन्ति जडा जन्मग्रहार्दिताः ।
यज्जन्ममृत्युसंपाते सर्वेणापि प्रतीयते ॥5॥

अर्थ: यद्यपि उक्त प्रकारसे शरीर और आत्माके अन्यपना है, तथापि संसाररूपी पिशाचसे पीडित मूढ प्राणी क्यों नहीं देखते कि, यह अन्यपना जन्म तथा मरणके सम्पातमें सर्वलोककी प्रतीतिमें आता है ? अर्थात् जन्मा तब शरीरको साथ लाया नहीं, और मरता है तब यह शरीर साथ जाता नहीं है । इस प्रकार शरीरसे जीवकी पृथक्ता प्रतीत होती है ।


मूर्तैर्विचेतनैश्चित्रैः स्वतन्त्रैः परमाणुभिः ।
यद्वपुर्विहितं तेन कः सम्बन्धस्तदात्मनः ॥6॥

अर्थ: मूर्तिक चेतनारहित नाना प्रकारके स्वतन्त्र पुद्गल परमाणुओंसे जो शरीर रचा गया है उससे और आत्मासे क्या संबंध है ? विचारो ! इसका विचार करनेसे कुछ भी संबंध नहीं है, ऐसा प्रतिभास होगा।


अन्यत्वमेव देहेन स्याद्भृशं यत्र देहिनः ।
तत्रैक्यं बन्धुभिः सार्धं बहिरङ्गैः कुतो भवेत् ॥7॥

अर्थ: जब उपर्युक्त प्रकारसे देहसे ही प्राणीके अत्यन्त भिन्नता है, तब बहिरंग जो कुटुंबादिक हैं उनसे एकता कैसे हो सकती है ? क्योंकि ये तो प्रत्यक्षमें भिन्न दीख पडते हैं ।


ये ये सम्बन्धमायाताः पदार्थाश्चेतनेतराः ।
ते ते सर्वेऽपि सर्वत्र स्वस्वरूपाद्विलक्षणाः ॥8॥

अर्थ: इस जगत्में जो जो जड और चेतन पदार्थ इस प्राणीके सम्बन्धरूप हुए हैं, वे सब ही सर्वत्र अपने-अपने स्वरूपसे विलक्षण (भिन्न-भिन्न) हैं, आत्मा सबसे अन्य है ।


पुत्रमित्रकलत्राणि वस्तूनि च धनानि च ।
सर्वथाऽन्यस्वभावानि भावय त्वं प्रतिक्षणम् ॥9॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस जगत्में पुत्र मित्र स्त्री आदि अन्य वस्तुओंकी तू निरन्तर सर्व प्रकारसे अन्यस्वभाव भावना कर, इनमें एकपनेकी भावना कदापि न कर, ऐसा उपदेश है ।


अन्यः कश्चिद्भवेत्पुत्रः पितान्यः कोऽपि जायते ।
अन्येन केनचित्सार्द्धं कलत्रेणानुयुज्यते ॥10॥

अर्थ: इस जगत्में कोई अन्य जीव ही तो पुत्र होता है और अन्य ही पिता होता है और किसी अन्य जीवके ही साथ स्त्री सम्बन्ध होता है । इस प्रकार सब ही संबंध भिन्न-भिन्न जीवोंसे होते हैं ।


त्वत्स्वरूपमतिक्रम्य पृथक्पृथग्व्यवस्थिताः ।
सर्वेऽपि सर्वथा मूढ भावास्त्रैलोक्यवर्त्तिनः ॥11॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! तीनलोकवर्ती समस्त ही पदार्थ तेरे स्वरूपसे भिन्न सर्वथा पृथक्-पृथक् तिष्ठते हैं, तू उनसे अपना एकत्व न मान ।


मिथ्यात्वप्रतिबद्धदुर्नयपथभ्रान्तेन बाह्यानलं
भावान् स्वान् प्रतिपद्य जन्मगहने खिन्नं त्वया प्राक् चिरं ।
संप्रत्यस्तसमस्तविभ्रमभवश्चिद्रूपमेकं परम्
स्वस्थं स्वं प्रविगाह्य सिद्धिवनितावक्त्रं समालोकय ॥12॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू इस संसाररूपी गहन वनमें मिथ्यात्वके संबंधसे उत्पन्न हुए सर्वथा एकान्तरूप दुर्नयके मार्गमें भ्रमरूप होता हुआ, बाह्य पदार्थोंको अतिशय करके अपने मान करके तथा अंगीकार करके, चिरकालसे सदैव खेद खिन्न हुआ और अब अस्त हुआ है समस्त विभ्रमोंका भार जिसका ऐसा होकर, तू अपने आप ही में रहने वाले उत्कृष्ट चैतन्यस्वरूपको अवगाहन करके उसमें मुक्तिरूपी स्त्रीके मुखको अवलोकन कर (देख) ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - अशुचि भावना (श्लोक 1 से 13)

निसर्गमलिनं निन्द्यमनेकाशुचिसम्भृतम् ।
शुक्रादिबीजसम्भूतं घृणास्पदमिदं वपुः ॥1॥

अर्थ: इस संसारमें जीवोंका जो शरीर है, वह प्रथम तो स्वभावसे ही मलिनरूप (मैला झरनेवाला) है, निंद्य है, तथा अनेक धातु उपधातुओंसे भरा हुआ है । एवं शुक्र रुधिरके बीजसे उत्पन्न हुआ है, इस कारण ग्लानिका स्थान है ।


असृग्मांसवसाकीर्णं शीर्णं कीकसपञ्जरम् ।
शिरानद्धं च दुर्गन्धं क्व शरीरं प्रशस्यते ॥2॥

अर्थ: यह शरीर रुधिर मांस चर्बीसे घिरा हुआ सड रहा है, हाडोंका पंजर है और शिराओंसे (नसोंसे) बंधा हुआ दुर्गन्धमय है । आचार्य महाराज कहते हैं, कि इस शरीरके कौनसे स्थानकी प्रशंसा करें ? सर्वत्र निंद्य ही दीख पडता है ।


प्रस्रवन्नवभिर्द्वारैः पूतिगन्धान्निरन्तरम् ।
क्षणक्षयं पराधीनं शश्वन्नरकलेवरम् ॥3॥

अर्थ: यह मनुष्यका शरीर नव द्वारोंसे निरन्तर दुर्गन्धरूप पदार्थोंसे झरता रहता है, तथा क्षणध्वंसी पराधीन है और नित्य अन्नपानीकी सहायता चाहता है ।


कृमिजालशताकीर्णे रोगप्रचयपीडिते ।
जराजर्जरिते काये कीदृशी महतां रतिः ॥4॥

अर्थ: यह शरीर लट कीडोंके सैंकडों समूहोंसे भरा हुआ रोगोंके समूहसे पीडित तथा वृद्धावस्थासे जर्जरित है । ऐसे शरीरमें महन्त पुरुषोंकी रति (प्रीति) कैसे हो ? कदापि नहीं हो ।


यद्यद्वस्तु शरीरेऽत्र साधुबुद्ध्या विचार्यते ।
तत्तत्सर्वं घृणां दत्ते दुर्गन्धामेध्यमंदिरे ॥5॥

अर्थ: इस शरीरमें जो जो पदार्थ हैं, सुबुद्धिसे विचार करने पर वे सब घृणाके स्थान तथा दुर्गन्धमय विष्टाके घर ही प्रतीत होते हैं । इस शरीरमें कोई भी पदार्थ पवित्र नहीं है ।


यदीदं शोध्यते दैवाच्छरीरं सागराम्बुभिः ।
दूषयत्यपि तान्येवं शोध्यमानमपि क्षणे ॥6॥

अर्थ: यदि इस शरीरको दैवात् समुद्रके जलसे भी शुद्ध किया जाय, तो उसी क्षण समुद्रके जलको भी यह अशुद्ध (मैला) कर देता है । अन्य वस्तुको अपवित्र कर दे, तो आश्चर्य ही क्या ? ।


कलेवरमिदं न स्याद्यदि चर्मावगुण्ठितम् ।
मक्षिकाकृमिकाकेभ्यः स्यात्त्रातुं कस्तदा प्रभुः ॥7॥

अर्थ: यदि यह शरीर बाहिरके चमडेसे ढका हुआ नहीं होता, तो मक्खी, कृमि तथा कौओंसे इसकी रक्षा करनेमें कोई भी समर्थ नहीं होता । ऐसे घृणास्पद शरीरको देखकर सत्पुरुष जब दूरसे छोड देते हैं, तब इसकी रक्षा कौन करे ? ।


सर्वदैव रुजाक्रान्तं सर्वदैवाशुचेर्गृहम् ।
सर्वदा पतनप्रायं देहिनां देहपञ्जरम् ॥8॥

अर्थ: इन जीवोंका देहरूपी पिंजरा सदा ही रोगोंसे व्याप्त, सर्वदा अशुद्धताओंका घर और सदा ही पतन होनेके स्वभाववाला है। ऐसा कभी मत समझो कि, किसी कालमें यह उत्तम और पवित्र होता होगा।


तैरेव फलमेतस्य गृहीतं पुण्यकर्मभिः ।
विरज्य जन्मनः स्वार्थे यैः शरीरं कदर्थितम् ॥9॥

अर्थ: इस शरीरके प्राप्त होने का फल उन्हींने लिया, जिन्होंने संसारसे विरक्त होकर इसे अपने आत्मकल्याणके मार्गमें लगाकर पुण्यकर्मोंसे क्षीण किया ।


शरीरमेतदादाय त्वया दुःखं विसह्यते ।
जन्मन्यस्मिंस्ततस्तद्धि निःशेषानर्थमन्दिरम् ॥10॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस संसारमें तूने इस शरीरको ग्रहण करके दुःख पाये वा सहें हैं इसीसे तू निश्चय कर जान कि, यह शरीर ही समस्त अनर्थोंका घर है, इसके संसर्गसे सुखका लेश भी न मान ।


भवोद्भवानि दुःखानि यानि यानीह देहिभिः ।
सह्यन्ते तानि तान्युच्चैर्वपुरादाय केवलम् ॥11॥

अर्थ: इस जग्रतमें संसारसे (जन्ममरणसे) उत्पन्न जो जो दुःख जीवोंको सहने पडते हैं, वे सब केवल इस शरीरके ग्रहणसे ही सहने पडते हैं । इस शरीरसे निवृत्त (मुक्त) होनेपर फिर कोई भी दुःख नहीं है ।


कर्पूरकुङ्कुमागुरुमृगमदहरिचन्दनादिवस्तूनि ।
भव्यान्यपि संसर्गान्मलिनयति कलेवरं नृणाम् ॥12॥

अर्थ: कर्पूर, केशर, अगर, कस्तूरी, हरिचंदनादि सुन्दर-सुन्दर पदार्थोंको भी यह मनुष्योंका शरीर संसर्ग मात्रसे अर्थात् लगाते ही अशुद्ध (मैले) कर देता है ।


अजिनपटलगूढं पञ्जरं कीकसानां
कुथितकुणपगन्धैः पूरितं मूढ गाढम् ।
यमवदननिषण्णं रोगभोगीन्द्रगेहं
कथमिह मनुजानां प्रीतये स्याच्छरीरम् ॥13॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! इस संसारमें मनुष्योंका यह शरीर चर्मके पटलोंसे (परदोंसे) ढँका हुआ हाडोंका पिंजरा है, तथा बिगडी हुई राधकी (पीबकी) दुर्गन्धसे परिपूर्ण है, एवं कालके मुखमें बैठे हुए रोगरूपी सर्पोंका घर है । ऐसा शरीर प्रीति करनेके योग्य कैसे हो ? यह बडा आश्चर्य है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - आस्रव भावना (श्लोक 1 से 9)

मनस्तनुवचःकर्म योग इत्यभिधीयते ।
स एवास्रव इत्युक्तस्तत्त्वज्ञानविशारदैः ॥1॥

अर्थ: मन-वचन-कायकी क्रियाको योग कहते हैं और इस योगको ही तत्त्वविशारदोंने (ऋषियोंने) आस्रव कहा है । यह स्वरूप तत्त्वार्थसूत्रमें कहा है । यथा-“कायवाङ्मनः कर्म योगः स आस्रवः” ।


वार्द्धेरन्तः समादत्ते यानपात्रं यथा जलम् ।
छिद्रैर्जीवस्तथा कर्म योगरन्ध्रैः शुभाशुभैः ॥2॥

अर्थ: जैसे समुद्रमें प्राप्त हुआ जहाज छिद्रोंसे जलको ग्रहण करता है, उस ही प्रकार जीव शुभाशुभ योगरूप छिद्रोंसे (मनवचनकायसे) शुभाशुभ कर्मोंको ग्रहण करता है ।


यमप्रशमनिर्वेदतत्त्वचिन्तावलम्बितम् ।
मैत्र्यादिभावनारूढं मनः सूते शुभास्रवम् ॥3॥

अर्थ: यम (अणुव्रत महाव्रत), प्रशम (कषायोंकी मंदता), निर्वेद (संसारसे विरागता अथवा धर्मानुराग), तथा तत्त्वोंका चिन्तवन इत्यादिका अवलंबन हो, एवं मैत्री, प्रमोद, कारुण्य और माध्यस्थ इन चार भावोंकी जिस मनमें भावना हो, वही मन शुभास्रवको उत्पन्न करता है ।


कषायदहनोद्दीप्तं विषयैर्व्याकुलीकृतम् ।
सञ्चिनोति मनः कर्म जन्मसम्बन्धसूचकम् ॥4॥

अर्थ: कषायरूप अग्निसे प्रज्वलित और इन्द्रियोंके विषयोंसे व्याकुल मन संसारके संबंधके सूचक अशुभ कर्मोंका संचय करता है ।


विश्वव्यापारनिर्मुक्तं श्रुतज्ञानावलम्बितम् ।
शुभास्रवाय विज्ञेयं वचः सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥5॥

अर्थ: समस्त विश्वके व्यापारोंसे रहित तथा श्रुतज्ञानके अवलम्बनयुक्त और सत्यरूप प्रामाणिक वचन शुभास्रवके लिये होते हैं ।


अपवादास्पदीभूतमसन्मार्गोपदेशकम् ।
पापास्रवाय विज्ञेयमसत्यं परुषं वचः ॥6॥

अर्थ: अपवाद(निन्दा)का स्थान, असन्मार्गका उपदेशक, असत्य, कठोर, कानोंसे सुनते ही जो दूसरेके कषाय उत्पन्न कर दे, और जिससे परका बुरा हो जाये, ऐसे वचन अशुभास्रवके कारण होते हैं ।


सुगुप्तेन सुकायेन कायोत्सर्गेण वाऽनिशम् ।
सञ्चिनोति शुभं कर्म काययोगेन संयमी ॥7॥

अर्थ: भले प्रकार गुप्त रूप किये हुए, अर्थात् अपने वशीभूत किये हुए कायसे तथा निरन्तर कायोत्सर्गसे संयमी मुनि शुभ कर्मको संचय (आस्रवरूप) करते हैं ।


सततारम्भयोगैश्च व्यापारैर्जन्तुघातकैः ।
शरीरं पापकर्माणि संयोजयति देहिनाम् ॥8॥

अर्थ: निरन्तर आरंभ करनेवाले और जीवघातके कार्योंसे तथा व्यापारोंसे जीवोंका शरीर (काययोग) पापकर्मोंको संग्रह करता हे अर्थात् काययोगसे अशुभास्रव करता है ।


कषायाः क्रोधाद्याः स्मरसहचराः पञ्चविषयाः
प्रमादा मिथ्यात्वं वचनमनसी काय इति च ।
दुरन्ते दुर्ध्याने विरतिविरहश्चेति नियतं
स्रवन्त्येते पुंसां दुरितपटलं जन्मभयदम् ॥9॥

अर्थ: प्रथम तो मिथ्यात्वरूप परिणाम, दूसरे क्रोधादि कषाय, तीसरे कामके सहचारी (मित्र) पंचेन्द्रियोंके विषय, चौथे प्रमाद विकथा, पाँचवे मनवचनकायके योग, छट्ठे व्रतरहित अविरतिरूप परिणाम और सातवे आर्त्त-रौद्र दोनों अशुभ ध्यान ये सब परिणाम नियमसे पापरूप आस्रवोंको करते हैं । इन परिणामोंका विशेष कथन तत्त्वार्थसूत्रकी टीकाओंसे जानना चाहिए । इस प्रकार आस्रवभावनाका व्याख्यान पूर्ण किया ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - संवर भावना (श्लोक 1 से 12)

सर्वास्रवनिरोधो यः संवरः स प्रकीर्तितः ।
द्रव्यभावविभेदेन स द्विधा भिद्यते पुनः ॥1॥

अर्थ: समस्त आस्रवोंके निरोधको संवर कहा है । वह द्रव्यसंवर तथा भावसंवरके भेदसे दो प्रकार का है ।


यः कर्मपुद्गलादानविच्छेदः स्यात्तपस्विनः ।
स द्रव्यसंवरः प्रोक्तो ध्याननिर्धूतकल्मषैः ॥2॥

अर्थ: ध्यानसे पापोंको उडानेवाले ऋषियोंने कहा है कि जो तपस्वी मुनियोंके कर्मरूप पुद्गलोंके ग्रहण करनेका विच्छेद (निरोध) हो, वह द्रव्यसंवर है ।


या संसारनिमित्तस्य क्रियाया विरतिः स्फुटम् ।
स भावसंवरस्तज्ज्ञैर्विज्ञेयः परमागमात् ॥3॥

अर्थ: संसारके कारणस्वरूप कर्मग्रहणकी क्रियाकी विरति अर्थात् अभावको भावसंवर कहते हैं, यह निश्चित है ऐसा उक्त भावसंवरके ज्ञाताओंको परमागमसे जानना चाहिए ।


असंयममयैर्बाणैः संवृतात्मा न भिद्यते ।
यमी यथा सुसन्नद्धो वीरः समरसंकटे ॥4॥

अर्थ: जिस प्रकार युद्धके संकटमें भले प्रकारसे सजा हुआ वीरपुरुष बाणोंसे नहीं भिदता है, उसी प्रकार संसारकी कारणरूप क्रियाओंसे विरतिरूप संवरवाला संयमी मुनि भी असंयमरूप बाणोंसे नहीं भिदता है ।


जायते यस्य यः साध्यः स तेनैव निरुध्यते ।
अप्रमत्तैः समुद्युक्तैः संवरार्थं महर्षिभिः ॥5॥

अर्थ: प्रमादरहित संवरके लिए उद्यमी महर्षियों द्वारा जो जिसको साध्य हो, वह उसीसे रोकना चाहिये ।


क्षमा क्रोधस्य मानस्य मार्दवं त्वार्जवं पुनः ।
मायायाः सङ्गसंन्यासो लोभस्यैते द्विषः क्रमात् ॥6॥

अर्थ: क्रोधकषायका तो क्षमा शत्रु है; तथा मानकषायका मृदुभाव (कोमलभाव), मायाकषायका ऋजुभाव (सरलभाव) और लोभकषायका परिग्रहत्यागभाव; इस प्रकार अनुक्रमसे शत्रु जानने चाहिए ।


रागद्वेषौ समत्वेन निर्ममत्वेन वाऽनिशम् ।
मिथ्यात्वं दृष्टियोगेन निराकुर्वन्ति योगिनः ॥7॥

अर्थ: जो योगी ध्यानी मुनि हैं, वे निरंतर समभावोंसे अथवा निर्ममत्वसे रागद्वेषका निराकरण (परास्त) करते रहते हैं, तथा सम्यग्दर्शनके योगसे मिथ्यात्वरूप भावोंको नष्ट कर देते हैं ।


अविद्याप्रसरोद्भूतं तमस्तत्त्वावरोधकम् ।
ज्ञानसूर्यांशुभिर्बाढं स्फेटयन्त्यात्मदर्शिनः ॥8॥

अर्थ: आत्माको अवलोकन करनेवाले मुनिगण अविद्याके विस्तारसे उत्पन्न और तत्त्वज्ञानको रोकनेवाले अज्ञानरूपी अंधकारको ज्ञानरूपी सूर्यकी किरणोंसे अतिशय दूर कर देते हैं ।


असंयमगरोद्गारं सत्संयमसुधाम्बुभिः ।
निराकरोति निःशङ्कं संयमी संवरोद्यतः ॥9॥

अर्थ: संवर करनेमें तत्पर संयमी और निःशंक मुनि असंयमरूपी विषके (जहरके) उद्गारको संयमरूपी अमृतमयी जलोंसे दूर कर देते हैं ।


द्वारपालीव यस्योच्चैर्विचारचतुरा मतिः ।
हृदि स्फुरति तस्याघसूतिः स्वप्नेऽपि दुर्घटा ॥10॥

अर्थ: जिस पुरुषके हृदयमें द्वारपालके समान अतिशय विचार करनेवाली चतुर मति कलोलें करती है, उसके हृदयमें स्वप्नमें भी पापकी उत्पत्ति होनी कठिन है ।


विहाय कल्पनाजालं स्वरूपे निश्चलं मनः ।
यदाधत्ते तदैव स्यान्मुनेः परमसंवरः ॥11॥

अर्थ: जिस समय समस्त कल्पनाओंके जालको छोडकर अपने स्वरूपमें मनको निश्चलतासे थामते हैं, उस ही काल मुनिको परमसंवर होता है ।


सकलसमितिमूलः संयमोद्दामकाण्डः
प्रशमविपुलशाखो धर्मपुष्पावकीर्णः ।
अविकलफलबन्धैर्बन्धुरो भावनाभि-
र्जयति जितविपक्षः संवरोद्दामवृक्षः ॥12॥

अर्थ: ईर्यासमिति आदि पाँच समितियाँ ही हैं मूल अर्थात् जड जिसकी, सामायिक आदि संयम ही हैं स्कन्ध जिसके, और प्रशमरूप (विशुद्धभावरूप) बडी-बडी शाखावाला, उत्तमक्षमादि दश धर्म हैं पुष्प जिसके, तथा मजबूत अविकल हैं फल जिसमें, ऐसा बारह भावनाओंसे सुन्दर यह संवररूपी महावृक्ष सर्वोपरि है । इस प्रकार संवरभावनाका व्याख्यान किया है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - निर्जरा भावना (श्लोक 1 से 9)

यया कर्माणि शीर्यन्ते बीजभूतानि जन्मनः ।
प्रणीता यमिभिः सेयं निर्जरा जीर्णबन्धनैः ॥1॥

अर्थ: निर्जरासे जीर्ण हो गये हैं कर्मबन्ध जिनके ऐसे मुनिजन, जिससे संसारके बीजरूप कर्म गल जाते हैं वा झड जाते हैं, उसे मुनिजन निर्जरा कहते हैं ।


सकामाकामभेदेन द्विधा सा स्याच्छरीरिणाम् ।
निर्जरा यमिनां पूर्वा ततोऽन्या सर्वदेहिनाम् ॥2॥

अर्थ: यह निर्जरा जीवोंको सकाम और अकाम दो प्रकारकी होती है। इनमेंसे पहिली सकामनिर्जरा तो मुनियोंको होती है और दूसरी अकामनिर्जरा समस्त जीवोंको होती है। इससे अर्थात् अकामनिर्जरासे विना तपश्चरणादिके स्वयमेव निरन्तर ही कर्म उदयरस देकर क्षरते रहते हैं ।


पाकः स्वयमुपायाच्च स्यात्फलानां तरोर्यथा ।
तथात्र कर्मणां ज्ञेयः स्वयं सोपायलक्षणः ॥3॥

अर्थ: जिस प्रकार वृक्षोंके फलोंका पकना एक तो स्वयं ही होता है, दूसरे पाल देनेसे भी होता है; इसी प्रकार कर्मोंका पकना भी है अर्थात् एक तो कर्मोंकी स्थिति पूरी होने पर फल देकर क्षिर जाती है, दूसरे सम्यग्दर्शनादि सहित तपश्चरण करनेसे कर्म नष्ट हो जाते हैं अर्थात् क्षर जाते हैं ।


विशुद्ध्यति हुताशेन सदोषमपि काञ्चनम् ।
यद्वत्तथैव जीवोऽयं तप्यमानस्तपोऽग्निना ॥4॥

अर्थ: जैसे सदोष भी सुवर्ण (सोना) अग्निमें तपानेसे विशुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार यह कर्मरूपी दोषों सहित जीव तपरूपी अग्निमें तपनेसे विशुद्ध और निर्दोष (कर्मरहित) हो जाता है ।


चमत्कारकरं धीरैर्बाह्यमाध्यात्मिकं तपः ।
तप्यते जन्मसन्तानशङ्कितैरार्यसूरिभिः ॥5॥

अर्थ: संसारकी परिपाटीसे भयभीत धीर और श्रेष्ठ मुनीश्वरगण, उक्त निर्जराका एक मात्र कारण तप ही है ऐसा जानकर, बाह्य और अभ्यन्तर दोनों प्रकारका तप करते हैं ।


तत्र बाह्यं तपः प्रोक्तमुपवासादिषड्विधम् ।
प्रायश्चित्तादिभिर्भेदैरन्तरङ्गं च षड्विधम् ॥6॥

अर्थ: उनमेंसे अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह तो बाह्य (बहिरंग) तप हैं और प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग, और ध्यान ये छह अभ्यन्तर तप हैं । इनका विशेषरूप जानना हो तो तत्त्वार्थसूत्रकी टीकाओंको देखना चाहिए ।


निर्वेदपदवीं प्राप्य तपस्यति यथा यथा ।
यमी क्षपति कर्माणि दुर्जयानि तथा तथा ॥7॥

अर्थ: संयमी मुनि वैराग्य पदवीको प्राप्त होकर जैसे जैसे (ज्यों ज्यों) तप करते हैं, तैसे तैसे (त्यों त्यों) दुर्जय कर्मोंको क्षय करते हैं ।


ध्यानानलसमालीढमप्यनादिसमुद्भवम् ।
सद्यः प्रक्षीयते कर्म शुद्ध्यत्यङ्गी सुवर्णवत् ॥8॥

अर्थ: यद्यपि कर्म अनादि कालसे जीवके साथ लगे हुए हैं, तथापि वे ध्यानरूपी अग्निसे स्पर्श होने पर तत्काल ही क्षय हो जाते हैं । उनके क्षय हो जानेसे जैसे अग्निके तापसे सुवर्ण शुद्ध होता है, उसी प्रकार यह प्राणी भी तपसे कर्म नष्ट होकर शुद्ध (मुक्त) हो जाता है ।


तपस्तावद्बाह्यं चरति सुकृती पुण्यचरित-
स्ततश्चात्माधीनं नियतविषयं ध्यानपरमम् ।
क्षपत्यन्तर्लीनं चिरतरचितं कर्मपटलं
ततो ज्ञानाम्भोधिं विशति परमानन्दनिलयम् ॥9॥

अर्थ: पवित्र आचरणवाला सुकृती पुरुष प्रथम अनशनादि बाह्यतपोंका आचरण करता है, तत्पश्चात् आत्माधीन आभ्यन्तर तपोंको आचरता है । और उनमें नियत विषयवाले ध्याननामक उत्कृष्ट तपको आचरता है । इस तपसे चिरकालसे संचित किये हुए कर्मरूपी पटलको (घातिया कर्मोको) क्षय करता है, और पश्चात् परमानंदके (अतीन्द्रिय सुखके) घर ज्ञानरूपी समुद्रमें प्रवेश करता है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - धर्म भावना (श्लोक 1 से 23)

पवित्रीक्रियते येन येनैवोद्ध्रियते जगत् ।
नमस्तस्मै दयार्द्राय धर्मकल्पाङ्घ्रिपाय वै ॥1॥

अर्थ: जिस धर्मसे जगत् पवित्र किया जाता है, तथा उद्धार किया जाता है, और जो दयारूपी रससे आर्द्रित (गीला) और हरा है, उस धर्मरूपी कल्पवृक्षके लिये मेरा नमस्कार है । इस प्रकार आचार्य महाराजने धर्मको (माहात्म्य कथनपूर्वक) नमस्कार किया है ।


दशलक्ष्मयुतः सोऽयं जिनैर्धर्मः प्रकीर्तितः ।
यस्यांशमपि संसेव्य विन्दन्ति यमिनः शिवम् ॥2॥

अर्थ: वह धर्म जिसके अंशमात्रको भी सेवन करके संयमी मुनि मुक्तिको प्राप्त होते हैं, उसे जिनेन्द्र भगवान्ने दश लक्षणयुक्त कहा है ।


न सम्यग्गदितुं शक्यं यत्स्वरूपं कुदृष्टिभिः ।
हिंसाक्षपोषकैः शास्त्रैरतस्तैस्तन्निगद्यते ॥3॥

अर्थ: धर्मका स्वरूप मिथ्यादृष्टियों तथा हिंसा और इन्द्रियविषयपोषण करनेवाले शास्त्रोंके द्वारा भले प्रकार नहीं कहा जा सकता । इस कारण इस धर्मका वास्तविक स्वरूप हम कहते हैं ।


चिन्तामणिर्निधिर्दिव्यः स्वर्धेनुः कल्पपादपाः ।
धर्मस्यैते श्रिया सार्द्धं मन्ये भृत्याश्चिरन्तनाः ॥4॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि लक्ष्मीसहित चिन्तामणि, दिव्यनवनिधि, कामधेनु और कल्पवृक्ष, ये सब धर्मके चिरकालसे किंकर (सेवक) हैं, ऐसा मैं मानता हूँ ।


धर्मो नरोरगाधीशनाकनायकवाञ्छिताम् ।
अपि लोकत्रयीपूज्यां श्रियं दत्ते शरीरिणाम् ॥5॥

अर्थ: धर्म, जीवोंको चक्रवर्ती धरणीन्द्र तथा देवेन्द्रों द्वारा वांछित और त्रैलोक्यपूज्य तीर्थंकरकी लक्ष्मीको देता है ।


धर्मो व्यसनसंपाते पाति विश्वं चराचरम् ।
सुखामृतपयः पूरैः प्रीणयत्यखिलं जगत् ॥6॥

अर्थ: धर्म, कष्टके आने पर समस्त जगत्के त्रस स्थावर जीवोंकी रक्षा करता है और सुखरूपी अमृतके प्रवाहोंसे समस्त जगत्को तृप्त करता है ।


पर्जन्यपवनार्केन्दुधराम्बुधिपुरन्दराः ।
अमी विश्वोपकारेषु वर्त्तन्ते धर्मरक्षिताः ॥7॥

अर्थ: मेघ, पवन, सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, समुद्र और इन्द्र ये सम्पूर्ण पदार्थ जगत्के उपकाररूप प्रवर्त्तते हैं और वे सब ही धर्म द्वारा रक्षा किये हुए प्रवर्त्तते हैं । धर्मके बिना ये कोई भी उपकारी नहीं होते हैं ।


मन्येऽसौ लोकपालानां व्याजेनाव्याहतक्रमः ।
जीवलोकोपकारार्थं धर्म एव विजृम्भितः ॥8॥

अर्थ: आचार्य महाराज ऐसा मानते हैं कि, इन्द्रादिक लोकपाल अथवा राजादिकोंके व्याजसे (बहानेसे) लोकोंके उपकारार्थ यह धर्म ही अव्याहत फैल रहा है ।


न तत्त्रिजगतीमध्ये भुक्तिमुक्त्योर्निबन्धनम् ।
प्राप्यते धर्मसामर्थ्यान्न यद्यमितमानसैः ॥9॥

अर्थ: इस तीन जगत्में भोग और मोक्षका ऐसा कोई भी कारण नहीं है, जिसको धर्मात्मा पुरुष धर्मकी सामर्थ्यसे न पाते हों अर्थात् धर्मसामर्थ्यसे समस्त मनोवांछित पदको प्राप्त होते हैं ।


नमन्ति पादराजीवराजिकां नतमौलयः ।
धर्मैकशरणीभूतचेतसां त्रिदशेश्वराः ॥10॥

अर्थ: जिनके चित्तमें धर्म ही एक शरणभूत है, उनके चरणकमलोंकी पंक्तिको इन्द्रगण भी नम्रीभूत मस्तकसे नमस्कार करते हैं ।


धर्मो गुरुश्च मित्रं च धर्मः स्वामी च बान्धवः ।
अनाथवत्सलः सोऽयं संत्राता कारणं विना ॥11॥

अर्थ: धर्म गुरु है, मित्र है, स्वामी है, बांधव है, हितू है, और धर्म ही बिना कारण अनाथोंकी प्रीतिपूर्वक रक्षा करनेवाला है । इस प्राणीको धर्मके अतिरिक्त और कोई शरण नहीं है ।


धत्ते नरकपाताले निमज्जज्जगतां त्रयम् ।
योजयत्यपि धर्मोऽयं सौख्यमत्यक्षमङ्गिनां ॥12॥

अर्थ: यह धर्म, नरकोंके नीचे जो निगोदस्थान है उसमें पडते हुए जगत्त्रयको धारण करता है- अवलम्बन देकर बचाता है तथा जीवोंको अतीन्द्रिय सुख भी प्रदान करता है ।


नरकान्धमहाकूपे पततां प्राणिनां स्वयम् ।
धर्म एव स्वसामर्थ्याद्दत्ते हस्तावलम्बनम् ॥13॥

अर्थ: नरकरूपी महा अंधकूपमें स्वयं गिरते हुए जीवोंको धर्म ही अपने सामर्थ्यसे हस्तावलम्बन (हाथका सहारा) देकर बचाता है ।


महातिशयसम्पूर्णम् कल्याणोद्दाममन्दिरम् ।
धर्मो ददाति निर्विघ्नं श्रीमत् सर्वज्ञवैभवम् ॥14॥

अर्थ: धर्म, महा अतिशयसे पूर्ण, कल्याणोंके उत्कट निवासस्थन और निर्विघ्न ऐसे लक्ष्मीसहित सर्वज्ञ भगवान्के वैभवको देता है अर्थात् तीर्थंकर-पदवीको प्राप्त कराता है ।


याति सार्द्धं तथा पाति करोति नियतं हितम् ।
जन्मपङ्कात्समुद्धृत्य स्थापयत्यमले पथि ॥15॥

अर्थ: धर्म, परलोकमें प्राणीके साथ जाता है, उसकी रक्षा करता है, नियमसे उसका हित करता है तथा संसाररूपी कर्दमसे उसे निकालकर निर्मल मोक्षमार्गमें स्थापन करता है ।


न धर्मसदृशः कश्चित्सर्वाभ्युदयसाधकः ।
आनन्दकुञ्जकन्दश्च हितः पूज्यः शिवप्रदः ॥16॥

अर्थ: इस जगत्में धर्मके समान अन्य कोई समस्त प्रकारके अभ्युदयका साधक नहीं है । यह मनोवांछित सम्पदाका देनेवाला है । आनन्दरूपी वृक्षका कन्द है अर्थात् आनन्दके अंकुर इससे ही उत्पन्न होते हैं तथा हितरूप, पूजनीय और मोक्षका देनेवाला भी यही है ।


व्यालानलोरगव्याघ्रद्विपशार्दूलराक्षसाः ।
नृपादयोऽपि द्रुह्यन्ति न धर्माधिष्ठितात्मने ॥17॥

अर्थ: जो धर्मसे अधिष्ठित (सहित) आत्मा है, उसके साथ सर्प, अग्नि, विष, व्याघ्र, हस्ती, सिंह, राक्षस तथा राजादिक भी द्रोह नहीं करते हैं अर्थात् यह धर्म इन सबसे रक्षा करता है अथवा धर्मात्माओंके ये सब रक्षक होते हैं ।


निःशेषं धर्मसामर्थ्यं न सम्यग्वक्तुमीश्वरः ।
स्फुरद्वक्त्रसहस्रेण भुजङ्गेशोऽपि भूतले ॥18॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, धर्मका समस्त सामर्थ्य भले प्रकार कहनेको स्फुरायमान सहस्र मुखवाला नागेन्द्र भी इस भूतलमें समर्थ नहीं हैं । फिर हम कैसे समर्थ हो सकते हैं ? ।


धर्मधर्मेति जल्पन्ति तत्त्वशून्याः कुदृष्टयः ।
वस्तुतत्त्वं न बुध्यन्ते तत्परीक्षाऽक्षमा यतः ॥19॥

अर्थ: तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे शून्य मिथ्यादृष्टि ‘धर्म धर्म’ ऐसा तो कहते हैं, परन्तु वस्तुके यथार्थ स्वरूपको नहीं जानते । क्योंकि वे उसकी परीक्षा करनेमें असमर्थ हैं ।


तितिक्षा मार्दवं शौचमार्जवं सत्यसंयमौ ।
ब्रह्मचर्यं तपस्त्यागाकिञ्चन्यं धर्म उच्यते ॥20॥

अर्थ: १ क्षमा, २ मार्दव, ३ शौच, ४ आर्जव, ५ सत्य, ६ संयम, ७ ब्रह्मचर्य, ८ तप, ९ त्याग, और १० आकिंचन्य, ये दस प्रकारके धर्म हैं । इनका विशेष स्वरूप तत्त्वार्थसूत्रकी टीकाओंसे जानना चाहिए ।


यद्यत्स्वस्यानिष्टं तत्तद्वाक्चित्तकर्मभिः कार्यम् ।
स्वप्नेऽपि नो परेषामिति धर्मस्याग्रिमं लिङ्गम् ॥21॥

अर्थ: धर्मका मुख्य (प्रधान) चिह्न यह है कि, जो जो क्रियायें अपनेको अनिष्ट (बुरी) लगती हों, सो सो अन्यके लिये मनवचनकायसे स्वप्नमें भी नहीं करनी चाहिये ।


धर्मः शर्मः भुजङ्गपुङ्गवपुरीसारं विधातुं क्षमो
धर्मः प्रापितमर्त्यलोकविपुलप्रीतिस्तदाशंसिनां ।
धर्मः स्वर्नगरीनिरन्तरसुखास्वादोदयस्यास्पदम्
धर्मः किं न करोति मुक्तिललनासंभोगयोग्यं जनम् ॥22॥

अर्थ: यह धर्म धर्मात्मा पुरुषोंको धरणीन्द्रकी पुरीके सारसुखको करनेमें समर्थ है, तथा यह धर्म उस धर्मके वांछक और उसके पालनेवाले पुरुषोंको मनुष्यलोकमें विपुल प्रीति (सुख) प्राप्त कराता है, और यह धर्म स्वर्गपुरीके निरन्तर सुखास्वादके उदयका स्थान है, तथा यह धर्म ही मनुष्यको मुक्तिस्त्रीसे संभोग करनेके योग्य करता है। धर्म और क्या-क्या नहीं कर सकता ? ।


यदि नरकनिपातस्त्यक्तुमत्यन्तमिष्ट -
स्त्रिदशपतिमहर्द्धिं प्राप्तुमेकान्ततो वा ।
यदि चरमपुमर्थः प्रार्थनीयस्तदानीं
किमपरमभिधेयं नाम धर्मं विधत्त ॥23॥

अर्थ: हे आत्मन् ! यदि तुझे नरकनिपातका छोडना परम इष्ट है अथवा इन्द्रका महान् विभव पाना एकान्त ही इष्ट है, यदि चारों पुरुषार्थोंमेंसे अन्तका पुरुषार्थ (मोक्ष) प्रार्थनीय ही है, तो और विशेष क्या कहा जावे, तू एक मात्र धर्मका सेवन कर । क्योंकि धर्मसे ही समस्त प्रकारके अनिष्ट नष्ट होकर समस्त प्रकारके इष्टकी प्राप्ति होती है । इस प्रकार धर्मभावनाका व्याख्यान पूर्ण किया ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - लोक भावना (श्लोक 1 से 7)

यत्र भावा विलोक्यन्ते ज्ञानिभिश्चेतनेतराः ।
जीवादयः स लोकः स्यात्ततोऽलोको नभः स्मृतः ॥1॥

अर्थ: जितने आकाशमें जीवादिक चेतन-अचेतन पदार्थ ज्ञानीपुरुषोंने देखे हैं, सो तो लोक है । उसके बाह्य जो केवल मात्र आकाश है, उसे अलोक वा अलोकाकाश कहते हैं ।


वेष्टितः पवनैः प्रान्ते महावेगैर्महाबलैः ।
त्रिभिस्त्रिभुवनाकीर्णो लोकस्तालतरुस्थितिः ॥2॥

अर्थ: तीन भुवनसहित यह लोक अन्तमें सब तरफसे अतिशय वेगवाले और अतिशय बलिष्ठ तीन वातवलयोंसे वेष्टित है और ताड वृक्षके आकार सरीखा है अर्थात् नीचेसे चौडा, बीचमें सरल तथा अन्तमें विस्ताररूप है ।


निष्पादितः स केनापि नैव नैवोद्धृतस्तथा ।
न भग्नः किन्त्वनाधारो गगने स स्वयं स्थितः ॥3॥

अर्थ: यह लोक किसीके द्वारा बनाया नहीं गया है अर्थात् अनादि-निधन है। भिन्न धर्मीगण इसे ब्रह्मादिकका बनाया हुआ कहते हैं सो मिथ्या है। तथा किसीसे धारण किया हुआ वा थांमा हुआ हो, सो भी नहीं है। अन्यमती कच्छपकी पीठपर अथवा शेषनागके फन पर ठहरा हुआ कहते हैं, यह उनका भ्रम है। यदि कोई आशंका करे कि विना आधारके आकाशमें कैसे ठहरेगा, भग्न हो जायगा ? तो उत्तर देना चाहिए कि, निराधार होने पर भी भग्न नहीं होता अर्थात् आकाशमें वातवलयके आधारसे स्वयमेव स्थित है ।


अनादिनिधनः सोऽयं स्वयं सिद्धोऽप्यनश्वरः ।
अनीश्वरोऽपि जीवादिपदार्थैः संभृतो भृशम् ॥4॥

अर्थ: यद्यपि यह लोक अनादिनिधन है, स्वयंसिद्ध है, अविनाशी है और इसका कोई ईश्वर स्वामी वा कर्ता नहीं है; तथापि जीवादिक पदार्थोंसे भरा हुआ है । अन्यमती लोक-रचनाकी अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ करते हैं, वे सब ही सर्वथा मिथ्या हैं ।


अधो वेत्रासनाकारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभः ।
मृदङ्गसदृशश्चाग्रे स्यादित्थं स त्रयात्मकः ॥5॥

अर्थ: यह लोक नीचे तो वेत्रासन अर्थात् मोढेके आकारका है अर्थात् नीचेसे चौडा है, पीछे ऊपर ऊपर घटता आया है और बीचमें झालरके जैसा है तथा ऊपर मृदंगके समान अर्थात् दोनों तरफ सकरा और बीचमें चौडा है । इस प्रकार तीन स्वरूपात्मक यह लोक स्थित है ।


यत्रैते जन्तवः सर्वे नानागतिषु संस्थिताः ।
उत्पद्यन्ते विपद्यन्ते कर्मपाशवशंगताः ॥6॥

अर्थ: इस लोकमें ये सब प्राणी नाना गतियोंमें संस्थित अपने अपने कर्मरूप फाँसीके वशीभूत होकर मरते तथा उपजते रहते हैं ।


पवनवलयमध्ये संभृतोऽत्यन्तगाढं
स्थितिजननविनाशालिङ्गितैर्वस्तुजातैः ।
स्वयमिह परिपूर्णोऽनादिसिद्धः पुराणः
कृतिविलयविहीनः स्मर्यतामेष लोकः ॥7॥

अर्थ: इस लोकको ऐसा चिंतवन करना चाहिए कि, तीन वलयोंके मध्यमें स्थित है । पवनोंसे अतिशय गाढरूप घिरा हुआ है । इधर उधर चलायमान नहीं होता और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसहित वस्तुसमूहोंसे अनादि कालसे स्वयमेव भरा हुआ है अर्थात् अनादिसिद्ध है, किसीका रचा हुआ नहीं है, इसी कारण पुराण है तथा उत्पत्ति और प्रलयसे रहित है । इस प्रकार लोकको स्मरण करते रहो, यह लोकभावनाका उपदेश है । इसका विशेष स्वरूप त्रैलोकसारादि ग्रंथोंसे जानना चाहिये । किसीको लोकके अनादिनिधन होनेमें (अकर्तापनमें) संदेह हो, तो उसे परीक्षामुखकी प्रमेयरत्नमाला, प्रमेयकमलमार्त्तण्डटीका तथा अष्टसहस्री, श्लोकवार्तिकादि ग्रंथोंको देखना चाहिये । इनमें कर्तृवादका विद्वानोंके देखने-योग्य विशेष प्रकारसे (युक्तिप्रमाणोंसे) निराकरण किया गया है ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - बोधिदुर्लभ भावना (श्लोक 1 से 13)

दुरन्तदुरितारातिपीडितस्य प्रतिक्षणम् ।
कृच्छ्रान्नरकपातालतलाज्जीवस्य निर्गमः ॥1॥

अर्थ: बुरा है अन्त जिसका ऐसे पापरूपी वैरीसे निरन्तर पीडित इस जीवका प्रथम तो नरकोंके नीचे निगोदस्थान है, सो वहाँकी नित्यनिगोदसे निकलना अत्यंत कठिन है ।


तस्माद्यदि विनिष्क्रान्तः स्थावरेषु प्रजायते ।
त्रसत्वमथवाप्नोति प्राणी केनापि कर्मणा ॥2॥

अर्थ: उस नित्यनिगोदसे निकला तो फिर पृथ्वीकायादि स्थावर जीवोंमें उपजता है । और किसी पुण्यकर्मके उदयसे स्थावर कायसे त्रसगति पाता है ।


यत्पर्याप्तस्तथा संज्ञी पञ्चाक्षोऽवयवान्वितः ।
तिर्यक्ष्वपि भवत्यङ्गी तत्र स्वल्पाशुभक्षयात् ॥3॥

अर्थ: कदाचित् त्रसगति भी पावे, तो तिर्यञ्च योनिमें पर्याप्तता (पूर्णावयवसंयुक्तत्व) पाना कुछ न्यून पापके क्षयसे नहीं होता है अर्थात् बहुत पापके क्षय होने पर पाता है । उसमें भी मन सहित पञ्चेन्द्रिय पशुका शरीर पान्ना बहुत ही दुर्लभ है, तिस पर भी संपूर्ण अवयव पाना अतिशय दुर्लभ है ।


नरत्वं यद्गुणोपेतं देशजात्यादिलक्षितम् ।
प्राणिनः प्राप्नुवन्त्यत्र तन्मन्ये कर्मलाघवात् ॥4॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, ये प्राणीगण संसारमें मनुष्यपन और उसमें गुणसहितपना तथा उत्तम देश, जाति, कुल आदि साहित्य उत्तरोत्तर कर्मोंके क्षयसे पाते हैं । ये बहुत दुर्लभ हैं, ऐसा मैं मानता हूँ ।


आयुः सर्वाक्षसामग्री बुद्धिः साध्वी प्रशान्तता ।
यत्स्यात्तत्काकतालीयं मनुष्यत्वेऽपि देहिनाम् ॥5॥

अर्थ: जीवोंके देश, जाति, कुलादि सहित मनुष्यपन होते भी दीर्घायु, पाँचों इन्द्रियोंकी पूर्ण सामग्री, विशिष्ट तथा उत्तम बुद्धि, शीतल मंदकषायरूप परिणामोंका होना काकतालीयन्यायके समान दुर्लभ जानना चाहिये। जैसे किसी समय तालका फल पक कर गिरे और उस ही समय काकका आना हो एवं वह उस फलको आकाशमें ही पाकर खाने लगे। ऐसा योग मिलना अत्यन्त कठिन है ।


ततो निर्विषयं चेतो यमप्रशमवासितम् ।
यदि स्यात्पुण्ययोगेन न पुनस्तत्त्वनिश्चयः ॥6॥

अर्थ: कदाचित् पुण्यके योगसे उक्त सामग्री प्राप्त हो जावें तो विषयोंसे विरक्त वा व्रतरूप परिणाम तथा यम-प्रशमरूप शुद्ध भावोंसहित चित्तका होना बडा कठिन है । कदाचित् पुण्यके योगसे इनकी प्राप्ति हो जाये, तो तत्त्वनिर्णय होना अत्यंत दुर्लभ है ।


अत्यन्तदुर्लभेष्वेषु दैवाल्लब्धेष्वपि क्वचित् ।
प्रमादात्प्रच्यवन्तेऽत्र केचित्कामार्थलालसाः ॥7॥

अर्थ: यद्यपि पूर्वोक्त सामग्री अत्यंत दुर्लभ है तथापि यदि दैवयोगसे प्राप्त हो जाय, तो अनेक संसारी जीव प्रमादके वशीभूत होकर, काम और अर्थमें लुब्ध होकर सम्यग्मार्गसे च्युत हो जाते हैं और विषयकषायमें लग जाते हैं ।


मार्गमासाद्य केचिच्च सम्यग्रत्नत्रयात्मकम् ।
त्यजन्ति गुरुमिथ्यात्वविषव्यामूढचेतसः ॥8॥

अर्थ: कोई कोई सम्यक् रत्नत्रय मार्गको पाकर भी तीव्र-मिथ्यात्वरूप विषसे व्यामूढ चित्त होते हुए सम्यग्मार्गको छोड देते हैं । गृहीतमिथ्यात्व बडा बलवान् है, जो उत्तम मार्ग मिलें, तो उसको भी छुडा देता है ।


स्वयं नष्टो जनः कश्चित्कश्चिन्नष्टैश्च नाशितः ।
कश्चित्प्रच्यवते मार्गाच्चण्डपाषण्डशासनैः ॥9॥

अर्थ: कोई कोई तो सम्यग्मार्गसे आप ही नष्ट हो जाते हैं। कोई अन्यमार्गसे च्युत हुए मनुष्योंके द्वारा नष्ट किये जाते हैं और कोई कोई प्रचंड पाखंडियोंके उपदेशे हुए मतोंको देखकर मार्गसे च्युत हो जाते हैं।


त्यक्त्वा विवेकमाणिक्यं सर्वाभिमतसिद्धिदम् ।
अविचारितरम्येषु पक्षेष्वज्ञः प्रवर्त्तते ॥10॥

अर्थ: जो मार्गसे च्युत अज्ञानी है, वह समस्त मनोवांछित सिद्धिके देनेवाले विवेकरूपी चिन्तामणि रत्नको छोड कर विना विचारके रमणीक भासनेवाले पक्षोंमें (मतोंमें) प्रवृत्ति करने लग जाता है ।


अविचारितरम्याणि शासनान्यसतां जनैः ।
अधमान्यपि सेव्यन्ते जिह्वोपस्थादिदण्डितैः ॥11॥

अर्थ: जो पुरुष जिह्वा तथा उपस्थादि इन्द्रियोंसे दंडित हैं, वे अविचारसे रमणीक भासनेवाले दुष्टोंके चलाये हुए अधम मतोंको भी सेवन करते हैं । विषयकषाय क्या क्या अनर्थ नहीं कराते ? ।


सुप्रापं न पुनः पुंसां बोधिरत्नं भवार्णवे ।
हस्ताद्भ्रष्टं यथा रत्नं महामूल्यं महार्णवे ॥12॥

अर्थ: यह जो बोधि अर्थात् सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र-स्वरूप रत्नत्रय है, संसाररूपी समुद्रमें प्राप्त होना सुगम नहीं है, किन्तु अत्यंत दुर्लभ है । इसको पाकर भी जो खो बैठते हैं, उनको हाथमें रक्खे हुए रत्नको बडे समुद्रमें डाल देने पर जैसे फिर मिलना कठिन है, उसी प्रकार सम्यग्रत्नत्रयका पाना दुर्लभ है ।


सुलभमिह समस्तं वस्तुजातं जगत्या-
मुरगसुरनरेन्द्रैः प्रार्थितं चाधिपत्यम् ।
कुलबलसुभगत्वोद्दामरामादि चान्यत्
किमुत तदिदमेकं दुर्लभं बोधिरत्नम् ॥13॥

अर्थ: इस जगतमें (त्रैलोकमें) समस्त द्रव्योंका समूह सुलभ है तथा धरणीन्द्र नरेन्द्र सुरेन्द्रों द्वारा प्रार्थना करने योग्य अधिपतिपना भी सुलभ है, क्योंकि ये सब ही कर्मोंके उदयसे मिलते हैं । तथा उत्तम कुल, बल, सुभगता, सुन्दर स्त्री आदिक समस्त पदार्थ सुलभ हैं; किन्तु जगत्प्रसिद्ध सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप बोधिरत्न अत्यंत दुर्लभ है । इस प्रकार बोधिदुर्लभभावनाका व्याख्यान पूर्ण किया ।

सर्ग 2: द्वादश भावना - उपसंहार (श्लोक 1 से 3)

दीव्यन्नाभिरयं ज्ञानी भावनाभिर्निरन्तरम् ।
इहैवाप्नोत्यनातङ्कं सुखमत्यक्षमक्षयम् ॥1॥

अर्थ: इन बारह भावनाओंसे निरन्तर रमते हुए ज्ञानीजन इसी लोकमें रोगादिककी बाधारहित अतीन्द्रिय अविनाशी सुखको पाते हैं अर्थात् केवलज्ञानानन्दको पाते हैं ।


विध्याति कषायाग्निर्विगलति रागो विलीयते ध्वान्तम् ।
उन्मिषति बोधदीपो हृदि पुंसां भावनाभ्यासात् ॥2॥

अर्थ: इन द्वादश भावनाओंके निरन्तर अभ्यास करनेसे पुरुषोंके हृदयमें कषायरूप अग्नि बुझ जाती है तथा परद्रव्यों प्रति रागभाव गल जाता है और अज्ञानरूप अंधकारका विलय होकर ज्ञानरूप दीपकका प्रकाश होता है ।


एता द्वादशभावनाः खलु सखे सख्योऽपवर्गश्रिय-
स्तस्याः सङ्गमलालसैर्घटयितुं मैत्रीं प्रयुक्ता बुधैः ।
एतासु प्रगुणीकृतासु नियतं मुक्त्यङ्गना जायते
सानन्दा प्रणयप्रसन्नहृदया योगीश्वराणां मुदे ॥3॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि मित्र ! ये बारह भावनायें निश्चयसे मुक्तिरूपी लक्ष्मीकी सखी हैं। इन्हें मुक्तिरूपी लक्ष्मीके संगमकी लालसा करनेवाले पंडितगणोंने मित्रता करनेके अर्थ प्रयोगरूप कही हैं। इन भावनाओंके अभ्यास करनेसे मुक्तिरूपी स्त्री आनन्दसहित स्नेहरूप प्रसन्न हृदय होकर योगीश्वरोंको आनन्ददायिनी होती है।

सर्ग 3: संक्षेप से ध्यान का स्वरूप (श्लोक 1 से 36)

अस्मिन्ननादिसंसारे दुरन्ते सारवर्जिते ।
नरत्वमेव दुःप्राप्यं गुणोपेतं शरीरिभिः ॥1॥

अर्थ: दुरन्त तथा सारवर्जित इस अनादि संसारमें गुणसहित मनुष्यपन ही जीवोंको दुष्प्राप्य है अर्थात् दुर्लभ है ।


काकतालीयकन्यायेनोपलब्धं यदि त्वया ।
तत्तर्हि सफलं कार्यं कृत्वात्मन्यात्मनिश्चयम् ॥2॥

अर्थ: हे आत्मन् ! यदि तूने यह मनुष्यपना काकतालीय न्यायसे पाया है, तो तुझे अपनेमें ही अपनेको निश्चय करके अपना कर्त्तव्य सफल करना चाहिए । इस मनुष्य जन्मके सिवाय अन्य किसी जन्ममें अपने स्वरूपका निश्चय नहीं होता, इस कारण यह उपदेश है ।


नृजन्मनः फलं कैश्चित्पुरुषार्थः प्रकीर्त्तितः ।
धर्मादिकप्रभेदेन स पुनः स्याच्चतुर्विधः ॥3॥

अर्थ: अनेक विद्वानोंने इस मनुष्य जन्मका फल पुरुषार्थ करना ही कहा है । और वह पुरुषार्थ धर्मादिक भेदसे चार प्रकारका है ।


धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चेति महर्षिभिः ।
पुरुषार्थोऽयमुद्दिष्टश्चतुर्भेदः पुरातनैः ॥4॥

अर्थ: प्राचीन महर्षियोंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष यह चार प्रकारका पुरुषार्थ कहा है ।


त्रिवर्गं तत्र सापायं जन्मजातङ्कदूषितम् ।
ज्ञात्वा तत्त्वविदः साक्षाद्यतन्ते मोक्षसाधने ॥5॥

अर्थ: इन चारों पुरुषार्थोंमेंसे पहिलेके तीन पुरुषार्थ नाशसहित और संसारके रोगोंसे दूषित हैं, ऐसा जानकर तत्त्वोंके जाननेवाले ज्ञानीपुरुष अन्तके परम पुरुषार्थ अर्थात् मोक्षके साधन करनेमें ही यत्न करते हैं, क्योंकि मोक्ष नाशरहित अविनाशी है ।


निःशेषकर्मसम्बन्धपरिविध्वंसलक्षणः ।
जन्मनः प्रतिपक्षो यः स मोक्षः परिकीर्तितः ॥6॥

अर्थ: जो प्रकृति, प्रदेश, स्थिति तथा अनुभागरूप समस्त कर्मोंके संबंधके सर्वथा नाशरूप लक्षणवाला तथा संसारका प्रतिपक्षी है, वही मोक्ष है । यह व्यतिरेक प्रधानतासे मोक्षका स्वरूप है ।


दृग्वीर्यादिगुणोपेतं जन्मक्लेशैः परिच्युतम् ।
चिदानन्दमयं साक्षान्मोक्षमात्यन्तिकं विदुः ॥7॥

अर्थ: दर्शन और वीर्यादि गुणसहित और संसारके क्लेशोंसे रहित, चिदानन्दमयी आत्यन्तिक अवस्थाको साक्षात् मोक्ष कहते हैं । यह अन्वय प्रधानतासे मोक्षका स्वरूप कहा है ।


अत्यक्षं विषयातीतं निरौपम्यं स्वभावजम् ।
अविच्छिन्नं सुखं यत्र स मोक्षः परिपठ्यते ॥8॥

अर्थ: जिसमें अतीन्द्रिय (इन्द्रियोंसे अतिक्रान्त), विषयोंसे अतीत, उपमारहित, और स्वाभाविक (अपने स्वभावसे ही उत्पन्न हो ऐसा) विच्छेदरहित पारमार्थिक सुख हो, वही मोक्ष कहा जाता है ।


निर्मलो निष्कलः शान्तो निष्पन्नोऽत्यन्तनिर्वृतः ।
कृतार्थः साधुबोधात्मा यत्रात्मा तत्पदं शिवम् ॥9॥

अर्थ: जिसमें यह आत्मा निर्मल (द्रव्यकर्म-नोकर्मरहित), शरीररहित, क्षोभरहित, शान्तस्वरूप, निष्पन्न (सिद्धरूप), अत्यन्त अविनाशी, सुखरूप, कृतकृत्य (जिसको कुछ करना बाकी न हो ऐसा) तथा समीचीन सम्यग्ज्ञानस्वरूप हो जाता है, उस पदको (अवस्थाको) शिव अर्थात् मोक्ष कहते हैं ।


तस्यानन्तप्रभावस्य कृते त्यक्त्वाखिलभ्रमाः ।
तपश्चरन्त्यमी धीराः बन्धविध्वंसकारणम् ॥10॥

अर्थ: धीरवीर पुरुष इस अनन्त प्रभाववाले मोक्षरूपी कार्यके निमित्त समस्त प्रकारके भ्रमोंको छोडकर कर्मबंधके नष्ट करनेके कारणरूप तपको अंगीकार करते हैं ।


सम्यग्ज्ञानादिकं प्राहुर्जिना मुक्तेर्निबन्धनम् ।
तेनैव साध्यते सिद्धिर्यस्मात्तदर्थिभिः स्फुटम् ॥11॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् सर्वज्ञ हैं, वे सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रको मुक्तिका कारण कहते हैं, अतएव जो मुक्तिकी इच्छा करते हैं वे इन सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रसे ही मोक्षको प्रगटतया साधते हैं ।


भवक्लेशविनाशाय पिब ज्ञानसुधारसम् ।
कुरु जन्माब्धिमत्येतुं ध्यानपोतावलम्बनम् ॥12॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू संसारके दुःखविनाशार्थ ज्ञानरूपी सुधारसको पी और संसाररूप समुद्रके पार होनेके लिए ध्यानरूपी जहाजका अवलम्बन कर ।


मोक्षः कर्मक्षयादेव स सम्यग्ज्ञानतः स्मृतः ।
ध्यानसाध्यं मतं तद्धि तस्मात्तद्धितमात्मनः ॥13॥

अर्थ: मोक्ष कर्मोंके क्षयसे ही होता है । कर्मोंका क्षय सम्यग्ज्ञानसे होता है और वह सम्यग्ज्ञान ध्यानसे सिद्ध होता है अर्थात् ध्यानसे ज्ञानकी एकाग्रता होती है, इस कारण ध्यान ही आत्माका हित है ।


अपास्य कल्पनाजालं मुनिभिर्मोक्तुमिच्छुभिः ।
प्रशमैकपरैर्नित्यं ध्यानमेवावलम्बितम् ॥14॥

अर्थ: आत्माका हित ध्यान ही है । इस कारण जो कर्मोंसे मुक्त होनेके इच्छुक मुनि हैं, उन्होंने प्रथम कषायोंकी मंदताके लिये तत्पर होकर कल्पना-समूहोंका नाश करके नित्य ध्यानका ही अवलम्बन किया है ।


मोहं त्यज भज स्वास्थ्यं मुञ्च सङ्गान् स्थिरीभव ।
यतस्ते ध्यानसामग्री सविकल्पा निगद्यते ॥15॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, हे आत्मन् ! तू संसारके मोहको छोड, स्वास्थ्यको भज और परिग्रहोंको छोडकर स्थिरीभूत हो । जिससे कि हम तेरे लिए ध्यानकी सामग्री भेदों सहित कहें ।


उत्तितीर्षुर्महापङ्काज्जन्मसंज्ञाद्दुरुत्तरात् ।
यदि किं न तदा धत्से धैर्यं ध्याने निरन्तरम् ॥16॥

अर्थ: हे आत्मन् ! यदि तू कष्टसे पार पाने योग्य संसार नामक महा पंक (कीचड) से निकलनेकी इच्छा रखता है, तो ध्यानमें निरन्तर धैर्य क्यों नहीं धारण करता ?


चित्ते तव विवेकश्रीर्यद्यशङ्का स्थिरीभवेत् ।
कीर्त्यते ते तदा ध्यानलक्षणं स्वान्तशुद्धिदम् ॥17॥

अर्थ: हे भव्य ! यदि तेरे चित्तमें निःशङ्क विवेकरूप लक्ष्मी (सन्देहरहित) स्थिर होवे, तो तेरे मनको शुद्धता देनेवाले ध्यानका लक्षण हम कहते हैं ।


इयं मोहमहानिद्रा जगत्त्रयविसर्पिणी ।
यदि क्षीणा तदा क्षिप्रं पिब ध्यानसुधारसम् ॥18॥

अर्थ: हे भव्य ! तीन जगत्में फैलनेवाली यह अज्ञानरूपी महानिद्रा यदि तेरे क्षीण हो गई हो-नष्ट हो गई हो, तो तू ध्यानरूपी अमृतरसका तुरंत पान कर । क्योंकि सुषुप्त अवस्थामें पीना नहीं हो सकता ।


बाह्यान्तर्भूतनिःशेषसङ्गमूर्च्छा क्षयं गता ।
यदि तत्त्वोपदेशेन ध्याने चेतस्तदार्पय ॥19॥

अर्थ: हे भव्य ! यदि तेरे तत्त्वोंके उपदेशसे बाह्य और अभ्यंतरकी समस्त मूर्च्छा (ममत्व परिणाम) नष्ट हो गई हो, तो तू अपने चित्तको ध्यानमें ही लगा ।


प्रमादविषयग्राहदन्तयन्त्राद्यदि च्युतः ।
त्वं तदा क्लेशसङ्घातघातकं ध्यानमाश्रय ॥20॥

अर्थ: हे भव्य ! यदि तू प्रमाद और इन्द्रियोंके विषयरूपी पिशाच अथवा जलजन्तुओंके दांतरूपी यन्त्रसे छूट गया है, तो क्लेशोंके समूहको घात तथा नष्ट करनेवाले ध्यानका आश्रय कर ।


इमेऽनन्तभ्रमासारप्रसरैकपरायणाः ।
यदि रागादयः क्षीणस्तदा ध्यातुं विचेष्ट्यताम् ॥21॥

अर्थ: हे भव्य ! अनन्त भ्रमरूप निरन्तर वृष्टिके विस्तार करनेमें तत्पर ऐसे ये रागद्वेष मोहादिक भाव तेरे क्षीण हो गये हों, तो तुझे ध्यानकी चेष्टा करनी चाहिए, क्योंकि रागादिकका विस्तार रहते ध्यानमें प्रवर्त्तना नहीं हो सकती ।


यदि संवेगनिर्वेदविवेकैर्वासितं मनः ।
तदा धीर स्थिरीभूय स्वस्मिन् स्वान्तं निरूपय ॥22॥

अर्थ: हे धीर पुरुष ! यदि संवेग अर्थात् मोक्ष वा मोक्षमार्गसे अनुराग तथा निर्वेद अर्थात् संसारदेहभोगोंसे वैराग्य और विवेक अर्थात् स्वपरका भेदविज्ञान इससे तेरा मन वासित है, तो तू स्थिर होकर आपमें ही अपने मनको देख, कि कैसा है ?


विरज्य कामभोगेषु विमुच्य वपुषि स्पृहाम् ।
निर्ममत्वं यदि प्राप्तस्तदा ध्यातासि नान्यथा ॥23॥

अर्थ: हे भव्य ! यदि तू कामभोगोंमें विरक्त होकर तथा शरीरमें स्पृहाको छोडकर निर्ममताको प्राप्त हुआ है, तो ध्यान करनेवाला ध्याता हो सकता है, अन्यथा नहीं हो सकता; क्योंकि भोगोंकी इच्छा वा भोग-विलास करनेमें जब चित्त रहता है, तब ध्यानमें चित्त कैसे लगे ? तथा शरीरमें अनुराग होता है, तो उसको सँवारने तथा पुष्ट करनेमें ही मन लगा रहता है, अथवा रोगादिक होने वा नाश होनेका भय निरन्तर बना रहता है, तब ध्यान करनेमें चित्त कैसे लगे ? इस कारण ध्याताको ध्यान करनेका पात्र बनानेसे ध्यान हो सकता है ।


निर्विण्णोऽसि यदा भ्रातर्दुरन्ताज्जन्मसंक्रमात् ।
तदा धीर परां ध्यानधुरां धैर्येण धारय ॥24॥

अर्थ: हे धीर पुरुष ! यदि तू दुरन्त संसारके भ्रमणसे विरक्त है, तो उत्कृष्ट ध्यानकी धुराको धारण कर । क्योंकि संसारसे विरक्त हुए विना ध्यानमें चित्त नहीं ठहरता ।


पुनात्याकर्णितं चेतो दत्ते शिवमनुष्ठितम् ।
ध्यानतन्त्रमिदं धीर धन्ययोगीन्द्रगोचरम् ॥25॥

अर्थ: हे धीर पुरुष ! यह ध्यानका तंत्र (शास्त्र) सुननेसे चित्तको पवित्र करता है, तीव्र रागादिकका अभाव करके चित्तको विशुद्ध करता है तथा आचरण किया हुआ शिव अर्थात् मोक्षको देता है । योगीश्वरोंका जाना हुआ है, इस कारण इसको तू आस्वाद, धार वा सुन और ध्यानका आचरण कर ।


विस्तरेणैव तुष्यन्ति केऽप्यहो विस्तरप्रियाः ।
संक्षेपरुचयश्चान्ये विचित्राश्चित्तवृत्तयः ॥26॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि, अनेक पुरुष तो विस्तारसे ही प्रसन्न होते हैं और अनेक संक्षेपसे रुचि रखनेवाले होते हैं । आश्चर्य है कि, चित्तकी वृत्तियाँ भी विचित्र अर्थात् अनेक प्रकारकी होती हैं ।


संक्षेपरुचिभिः सूत्रात्तन्निरूप्यात्मनिश्चयात् ।
त्रिधैवाभिमतं कैश्चिद्यतो जीवाशयस्त्रिधा ॥27॥

अर्थ: आत्माका है निश्चय जिसमें ऐसे सूत्रसे निरूपण करके कितने ही संक्षेप रुचिवालोंने तीन प्रकारका ही ध्यान माना है । क्योंकि जीवका आशय तीन प्रकारका ही है अर्थात् अध्यात्मशास्त्रकी अपेक्षा आत्माके उपयोगकी प्रवृत्ति संक्षेपसे तीन प्रकारकी ही मानी गई है ।


तत्र पुण्याशयः पूर्वस्तद्विपक्षोऽशुभाशयः ।
शुद्धोपयोगसंज्ञो यः स तृतीयः प्रकीर्त्तितः ॥28॥

अर्थ: उन तीनोंमें प्रथम पुण्यरूप शुभ आशय है और उसका विपक्षी दूसरा पापरूप अशुभ आशय और तीसरा शुद्धोपयोगनामा आशय है ।


पुण्याशयवशाज्जातं शुद्धलेश्यावलम्बनात् ।
चिन्तनाद्वस्तुतत्त्वस्य प्रशस्तं ध्यानमुच्यते ॥29॥

अर्थ: पुण्यरूप आशयके वशसे तथा शुद्ध लेश्याके अवलंबनसे और वस्तुके यथार्थस्वरूपके चिंतवनसे उत्पन्न हुआ ध्यान प्रशस्त कहाता है ।


पापाशयवशान्मोहान्मिथ्यात्वाद्वस्तुविभ्रमात् ।
कषायाज्जायतेऽजस्रमसद्ध्यानं शरीरिणाम् ॥30॥

अर्थ: जीवोंके पापरूप आशयके वशसे तथा मोह-मिथ्यात्व-कषाय और तत्त्वोंके अयथार्थरूप विभ्रमसे अप्रशस्त अर्थात् असमीचीन ध्यान होता है ।


क्षीणे रागादिसन्ताने प्रसन्ने चान्तरात्मनि ।
यः स्वरूपोपलम्भः स्यात्स शुद्धाख्यः प्रकीर्तितः ॥31॥

अर्थ: रागादिककी सन्तानके क्षीण होने पर अन्तरंग आत्माके प्रसन्न होनेसे जो अपने स्वरूपका उपलंभन अर्थात् प्राप्ति होती है, वह शुद्ध ध्यान है ।


शुभध्यानफलोद्भूतां श्रियं त्रिदशसंभवाम् ।
निर्विशन्ति नरा नाके क्रमाद्यान्ति परं पदम् ॥32॥

अर्थ: मनुष्य शुभध्यानके फलसे उत्पन्न हुई स्वर्गकी लक्ष्मीको स्वर्गमें भोगते हैं और क्रमसे मोक्षको प्राप्त होते हैं ।


दुर्ध्यानाद्दुर्गतेर्बीजं जायते कर्म देहिनाम् ।
क्षीयते यन्न कष्टेन महतापि कथञ्चन ॥33॥

अर्थ: दुर्ध्यानसे जीवोंकी दुर्गतिका कारणभूत अशुभ कर्म होता है, जो कि बडे कष्टसे भी कभी क्षय नहीं होता ।


निःशेषक्लेशनिर्मुक्तं स्वभावजमनश्वरम् ।
फलं शुद्धोपयोगस्य ज्ञानराज्यं शरीरिणाम् ॥34॥

अर्थ: जीवोंके शुद्धोपयोगका फल समस्त दुःखोंसे रहित, स्वभावसे उत्पन्न, और अविनाशी ज्ञानरूपी राज्यका पाना है ।


इति संक्षेपतो ध्यानलक्षणं समुदाहृतम् ।
बन्धमोक्षफलोपेतं संक्षेपरुचिरञ्जकम् ॥35॥

अर्थ: इस प्रकार संक्षेपसे संक्षेपरुचि पुरुषोंको रंजन्न करनेवाला बन्धमोक्षके फलसहित ध्यानका लक्षण कहा गया ।


अविद्याविक्रान्तैश्चपलचरितैर्दुर्नयशतै-
र्जगल्लुप्तालोकं कृतमतिघनध्वान्तनिचितम् ।
त्वयोच्छेद्याशेषं परमततमोव्रातमतुलं
प्रणीतं भव्यानां शिवपदमयानन्दनिलयम् ॥36॥

अर्थ: अविद्या अर्थात् मिथ्याज्ञानसे विकाररूप होकर अनिश्चयरूप तथा भ्रमात्मक आचरणवाले मिथ्यादृष्टियोंने सर्वथा एकान्तरूप सैकडों दुर्नीतियोंसे जगत्को अति सघन अन्धकारके समूहमें लुप्तालोक (प्रकाशरहित) कर दिया है अर्थात् हिताहितके मार्गसे विभ्रमरूप कर दिया है । इस कारण आचार्य महाराज कहते हैं कि, हे ज्ञानी आत्मन् ! तू पर-मतरूप अतुल अंधकारके समस्त समूहोंको दूर करके भव्य जीवोंको आनंद देनेवाले मोक्षरूपी घरको प्राप्त कर ।

सर्ग 4: ध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 62)

यच्चतुर्धा मतं तज्ज्ञैः क्षीणमोहैर्मुनीश्वरैः ।
पूर्वप्रकीर्णकाङ्गेषु ध्यानलक्ष्म सविस्तरम् ॥1॥

अर्थ: ध्यानके जाननेवाले क्षीणमोह मुनीश्वरोंने सविस्तर ध्यानका लक्षण पूर्वप्रकीर्णकसहित द्वादश अंगोंमें चार प्रकारका माना है ।


शतांशमपि तस्याद्य न कश्चिद्वक्तुमीश्वरः ।
तदेतत्सुप्रसिद्ध्यर्थं दिङ्मात्रमिह वर्ण्यते ॥2॥

अर्थ: द्वादशांगसूत्रमें जो ध्यानका लक्षण विस्तारसहित कहा गया है, उसका शतांश (सौवाँ भाग) भी आज कोई कहनेको समर्थ नहीं है, तथापि उसकी प्रसिद्धिके लिये इस ग्रन्थमें दिग्दर्शन मात्र वर्णन किया जाता है ।


अन्वयव्यतिरेकाभ्यां गुणदोषैः प्रपञ्चितम् ।
हेयोपादेयभावेन सविकल्पं निगद्यते ॥3॥

अर्थ: यह ध्यानका लक्षण गुण-दोष और अन्वय-व्यतिरेकसे जिस प्रकार विस्ताररूप है, उसी प्रकार हेयोपादेय भावोंसे भेदों सहित कहा जाता है । अन्वयगुणोंसे अर्थात् जहाँ ऐसे गुण हो तो वहाँ ध्यान होता है और व्यतिरेक दोषोंसे अर्थात् जहाँ ये दोष हो वहाँ ध्यान नहीं होता । तथा अप्रशस्तध्यान तो हेय है और प्रशस्त ध्यान उपादेय है । आर्त्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल ऐसे चार भेद कहे गये हैं, सो इनके विशेष वर्णनसे विस्ताररूप ध्यानका स्वरूप कहा जावेगा ।


ध्याता ध्यानमितस्तदङ्गमखिलं दृग्बोधवृत्तान्वितं
ध्येयं तद्गुणदोषलक्षणयुतं नामानि कालः फलम् ।
एतत्सूत्रमहार्णवात्समुदितं यत्प्राक्प्रणीतं बुधैः
तत्सम्यक्परिभावयन्तु निपुणा अत्रोच्यमानं क्रमात् ॥4॥

अर्थ: पूर्व कालके ज्ञानीपुरुषोंने (पूर्वाचार्योंने) ध्यान करनेवाला ध्याता, ध्यान, ध्यानके दर्शनज्ञानचारित्रसहित समस्त अंग, ध्येय तथा ध्येयके गुणदोष लक्षणसहित ध्यानके नाम, ध्यानका समय, और ध्यानका फल ये सब ही जो सूत्ररूप महासमुद्रसे प्रगट होकर बुद्धिमानोंके द्वारा पूर्वमें प्रणीत किये गये हैं, वे ही सब इस ग्रन्थमें क्रमसे कहे जाते हैं । निपुण पुरुषोंको भले प्रकार इनका परिशीलन करना चाहिए ।


ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं फलं चेति चतुष्टयम् ।
इति सूत्रसमासेन सविकल्पं निगद्यते ॥5॥

अर्थ: ध्याता, ध्यान, ध्येय और फल यह चतुष्टय सूत्ररूप संक्षेपसे भेदसहित कहा जाता है ।


मुमुक्षुर्जन्मनिर्विण्णः शान्तचित्तो वशी स्थिरः ।
जिताक्षः संवृतो धीरो ध्याता शास्त्रे प्रशस्यते ॥6॥

अर्थ: शास्त्रमें ऐसे ध्याताकी प्रशंसा की गई है कि जो मुमुक्षु हो अर्थात् मोक्षकी इच्छा रखनेवाला हो। क्योंकि यदि ऐसा नहीं हो, तो मोक्षके कारणरूप ध्यानको क्यों करे ? दूसरे, संसारसे विरक्त हो । क्योंकि संसारसे विरक्त हुए बिना ध्यानमें चित्त किसलिये लगावें ? तीसरे, क्षोभरहित शान्तचित्त हो । क्योंकि व्याकुलचित्तके ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती । चौथे, वशी कहिये जिसका मन अपने वशमें हो ।क्योंकि मनके वश हुए विना वह ध्यानमें कैसे लगे ? पाँचवें, स्थिर हो अर्थात् शरीरके सांगोपांग आसनमें दृढ हो। क्योंकि काय चलायमान रहनेसे ध्यानकी सिद्धि नहीं होती । छट्ठे, जिताक्ष (जितेन्द्रिय) हो । क्योंकि इन्द्रियोंके जीते विना वे विषयोंमें प्रवृत्ति करती हैं और ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती । सातवें, संवृत कहिये संवरयुक्त हो । क्योंकि खानपानादिमें विकल हो जावें तो, ध्यानमें चित्त कैसे स्थिर हो ? आठवें, धीर हो । उपसर्ग आने पर ध्यानसे च्युत न होवे तब ध्यानकी सिद्धि होती है । ऐसे आठ गुणसहित ध्याताके ध्यानकी सिद्धि हो सकती है, अन्यके नहीं होती ।


उदीर्णकर्मेन्धनसंभवेन दुःखानलेनातिकदर्थ्यमानम् ।
दन्दह्यते विश्वमिदं समन्तात्प्रमादमूढं च्युतसिद्धिमार्गम् ॥7॥

अर्थ: छोड दिया है मोक्षमार्ग जिसने ऐसा प्रमादसे मूढ होकर यह जगत् उदयमें आये हुए कर्मरूपी ईंधनसे उत्पन्न दुःखरूपी अग्निसे पीडित होता हुआ चारों ओरसे जलता है ।


दह्यमाने जगत्यस्मिन्महता मोहवह्निना ।
प्रमादमदमुत्सृज्य निःक्रान्ता योगिनः परम् ॥8॥

अर्थ: महामोहरूपी अग्निसे जलते हुए इस जगत्मेंसे केवल मुनिगण ही प्रमादको छोडकर निकलते हैं, अन्य कोई नहीं ।


न प्रमादजयः कर्तुं धीधनैरपि पार्यते ।
महाव्यसनसंकीर्णे गृहवासेऽतिनिन्दिते ॥9॥

अर्थ: अनेक कष्टोंसे भरे हुए अति निंदित गृहवासमें बडे-बडे बुद्धिमान् भी प्रमादको पराजित करनेमें समर्थ नहीं है । इस कारण गृहस्थावस्थामें ध्यानकी सिद्धि नहीं हो सकती ।


शक्यते न वशीकर्तुं गृहिभिश्चपलं मनः ।
अतश्चित्तप्रशान्त्यर्थं सद्भिस्त्यक्ता गृहे स्थितिः ॥10॥

अर्थ: गृहस्थगण घरमें रहते हुए अपने चपल मनको वश करनेमें असमर्थ होते हैं, अतएव चित्तकी शान्तिके अर्थ सत्पुरुषोंने घरमें रहना छोड दिया है और वे एकान्त स्थानमें रहकर ध्यानस्थ होनेको उद्यमी हुए हैं ।


प्रतिक्षणं द्वन्द्वशतार्त्तचेतसां नृणां दुराशाग्रहपीडितात्मनाम् ।
नितम्बिनीलोचनचौरसङ्कटे गृहाश्रमे स्वात्महितं न सिद्ध्यति ॥11॥

अर्थ: सैकडों प्रकारके कलहोंसे दुःखित चित्त, और धनादिककी दुराशारूपी पिशाचीसे पीडित मनुष्योंके प्रतिक्षण स्त्रियोंके नेत्ररूपी चौरोंका है उपद्रव जिसमें, ऐसे इस गृहस्थाश्रममें अपने आत्महितकी सिद्धि नहीं होती है ।


निरन्तरार्त्तानलदाहदुर्गमे कुवासनाध्वान्तविलुप्तलोचने ।
अनेकचिन्ताज्वरजिह्मितात्मनां नृणां गृहे नात्महितं प्रसिद्ध्यति ॥12॥

अर्थ: निरन्तर पीडारूप आर्त्तध्यानकी अग्निके दाहसे दुर्गम, बसनेके अयोग्य, तथा कामक्रोधादिकी कुवासनारूपी अंधकारसे विलुप्त हो गई है नेत्रोंकी दृष्टि जिसमें, ऐसे घरोंमें अनेक चिन्तारूपी ज्वरसे विकाररूप मनुष्योंके अपने आत्माका हित कदापि सिद्ध नहीं होता । ऐसे गृहस्थावासमें उत्तम ध्यान कैसे हो?


विपन्महापङ्कनिमग्नबुद्धयः प्ररूढरागज्वरयन्त्रपीडिताः ।
परिग्रहव्यालविषाग्निमूर्च्छिता विवेकवीथ्यां गृहिणः स्खलन्त्यमी ॥13॥

अर्थ: गृहस्थावस्थाकी आपदारूपी महान् कीचडमें जिनकी बुद्धि फँसी हुई है, तथा जो प्रचुरतासे बढे हुए रागरूपी ज्वरके यन्त्रसे पीडित हैं, और जो परिग्रहरूपी सर्पके विषकी ज्वालासे मूर्च्छित हुए हैं, वे गृहस्थगण विवेकरूपी वीथीमें (गलीमें) चलते हुए स्खलित हो जाते हैं अर्थात् च्युत हो जाते हैं । अथवा समीचीन मार्गसे (मोक्षमार्गसे) भ्रष्ट हो जाते हैं ।


हिताहितविमूढात्मा स्वं शश्वद्वेष्टयेद् गृही ।
अनेकारम्भजैः पापैः कोशकारः कृमिर्यथा ॥14॥

अर्थ: जैसे रेशमका कीडा अपने ही मुखसे तारोंको निकाल कर अपनेको ही उसमें आच्छादित कर लेता है, उसी प्रकार हिताहितमें विचारशून्य होकर यह गृहस्थजन भी अनेक प्रकारके आरम्भोंसे पापोपार्जन करके अपनेको शीघ्र ही पापजालमें फँसा लेते हैं ।


जेतुं जन्मशतेनापि रागाद्यरिपताकिनी ।
विना संयमशस्त्रेण न सद्भिरपि शक्यते ॥15॥

अर्थ: रागादि शत्रुओंकी सेना संयमरूपी शस्त्रके विना बडे-बडे सत्पुरुषोंसे (राजाओंसे) सैकडों जन्म लेकर भी जब जीती नहीं जा सकती है, तो अन्यकी कथा ही क्या है ? ।


प्रचण्डपवनैः प्रायश्चाल्यन्ते यत्र भूभृतः ।
तत्राङ्गनादिभिः स्वान्तं निसर्गतरलं न किम् ॥16॥

अर्थ: स्त्रियाँ प्रचंड पवनके समान है । प्रचंड पवन बडे-बडे भूभृतों (पर्वतों) को उडा देता है और स्त्रियाँ बडे-बडे भूभृतों (राजाओंको) चला देती हैं । ऐसी स्त्रियोंसे, जो स्वभावसे ही चंचल है ऐसा मन, क्या चलायमान नहीं होगा ?


खपुष्पमथवा शृङ्गं खरस्यापि प्रतीयते ।
न पुनर्देशकालेऽपि ध्यानसिद्धिर्गृहाश्रमे ॥17॥

अर्थ: आकाशके पुष्प और गधेके सींग नहीं होते हैं । कदाचित् किसी देश वा कालमें इनके होनेकी प्रतीति हो सकती है, परन्तु गृहस्थाश्रममें ध्यानकी सिद्धि होनी तो किसी देश वा कालमें संभव नहीं है ।


दुर्दृशामपि न ध्यानसिद्धिः स्वप्नेऽपि जायते ।
गृह्णतां दृष्टिवैकल्याद्वस्तुजातं यदृच्छया ॥18॥

अर्थ: दृष्टिकी विकलतासे वस्तुसमूहको अपनी इच्छानुसार ग्रहण करनेवाले मिथ्यादृष्टियोंके ध्यानकी सिद्धि स्वप्नमें भी नहीं होती है ।


ध्यानसिद्धिर्यतित्वेऽपि न स्यात्पाषण्डिनां क्वचित् ।
पूर्वापरविरुद्धार्थमतसत्तावलम्बिनाम् ॥19॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टिको (अन्यथा श्रद्धान करनेवाले अन्यमतीको) गृहस्थावस्था छोडकर मुनि होने पर भी ध्यानकी सिद्धि नहीं होती । क्योंकि वे पूर्वापरविरुद्ध पदार्थोंके स्वरूपमें समीचीनता (सत्यता) माननेवाले हैं, अर्थात् अन्यमतमें सत्ता-यथार्थता नहीं है ।


किं च पाषण्डिनः सर्वे सर्वथैकान्तदूषिताः ।
अनेकान्तात्मकं वस्तु प्रभवन्ति न वेदितुम् ॥20॥

अर्थ: सब ही अन्यमती पाखंडी सर्वथा एकान्ततासे दूषित हैं, और वस्तुका स्वरूप अनेकान्तात्मक है अतः वे उनके यथार्थ स्वरूपको जाननेमें असमर्थ हैं । स्याद्वादके जाने विना विरोध आदि दूषणोंका परिहार उनसे नहीं किया जा सकता है ।


नित्यतां केचिदाचक्षुः केचिच्चानित्यतां खलाः ।
मिथ्यात्वान्नैव पश्यन्ति नित्यानित्यात्मकं जगत् ॥21॥

अर्थ: कोई-कोई तो वस्तुके नित्यता ही कहते हैं और कोई-कोई अनित्यता ही सिद्ध करते है । परन्तु यह जगत् नित्य-अनित्य दोनों स्वरूप हैं ऐसा मिथ्यात्वके उदयसे नहीं देखते ।


वस्तुतत्त्वापरिज्ञानात्किं ध्येयं क्व च भावना ।
ध्यानाभ्यासस्ततस्तेषां प्रयासायैव केवलम् ॥22॥

अर्थ: उक्त मिथ्यादृष्टि अन्य मतावलम्बियोंके यथार्थ स्वरूपके ज्ञानके अभावसे ध्येय कहाँ और भावना कहाँ ? इस कारण उनका ध्यानका करना केवल प्रयास मात्र ही है अर्थात् निष्फल खेद करना है।


ज्ञानादेवेष्टसिद्धिः स्यात्ततोऽन्यः शास्त्रविस्तरः ।
मुक्तेरुक्तमतो बीजं विज्ञानं ज्ञानवादिभिः ॥23॥

अर्थ: ज्ञानवादियोंका मत तो ऐसा है कि एक मात्र ज्ञानसे ही इष्टसिद्धि होती है। इससे अन्य जो कुछ है सो सब शास्त्रका विस्तार मात्र है। इस कारण विज्ञान ही मुक्तिका बीजभूत है ।


कैश्चिच्च कीर्त्तिता मुक्तिर्दर्शनादेव केवलम् ।
वादिनां खलु सर्वेषामपाकृत्य नयान्तरम् ॥24॥

अर्थ: और कई वादियोंने अन्य समस्त वादियोंके अन्य नयपक्षोंका निराकरण करके केवल दर्शन (श्रद्धा) से ही मुक्ति होनी कही है ।


अथान्यैर्वृत्तमेवैकं मुक्त्यङ्गं परिकीर्तितम् ।
अपास्य दर्शनज्ञाने तत्कार्यविफलश्रमे ॥25॥

अर्थ: अथवा अन्य कई वादियोंने चारित्रको (क्रियाको) मुक्तिका अंग माना है और ज्ञानदर्शनको मुक्तिमार्गकि कार्यमें व्यर्थ मानकर उसका खंडन किया है ।


विज्ञानादित्रिवर्गेऽस्मिन्द्वे द्वे इष्टे तथा परैः ।
स्वसिद्धान्तावलेपेन जन्मसन्ततिशातने ॥26॥

अर्थ: और कितने ही वादी अपने सिद्धान्तके गर्वसे संसारकी सन्ततिके नाशकी परिपाटीमें विज्ञान, दर्शन (श्रद्धान) और चारित्र इन तीनोंमेंसे दो-दो को इष्ट कहते हैं, अर्थात् कोई तो दर्शन और ज्ञानको ही मानते हैं, किसीने दर्शन और चारित्र ही माना है और कोई-कोई ज्ञान और चारित्रको ही मानते हैं। इस प्रकारसे तीन प्रकारके वादी हैं ।


एकैकं च त्रिभिर्नष्टं द्वे द्वे नष्टे तथाऽपरैः ।
त्रयं न रुच्यतेऽन्यस्य सप्तैते दुर्दृशः स्मृताः ॥27॥

अर्थ: इन वादियोंमें तीन वादियोंने तो एक-एकको नष्ट किया और तीन वादियोंने दो-दो को नष्ट किया । इनके अतिरिक्त एकको ये तीनों ही नहीं रुचते, इस प्रकार मिथ्यामतियोंके सात भेद हुए ।


कारकादिक्रमो लोके व्यवहारश्च जायते ।
न पक्षेऽन्विष्यमाणोऽपि सर्वथैकान्तवादिनाम् ॥28॥

अर्थ: सर्वथा एकान्तवादियोंके पक्षका विचार करनेसे उनके यहाँ कर्ता कर्म करण आदि कारकोंका क्रम (परिपाटी और व्यवहार) दृष्टिगोचर नहीं होता है ।


यस्य प्रज्ञा स्फुरत्युच्चैरनेकान्ते च्युतभ्रमा ।
ध्यानसिद्धिर्विनिश्चेया तस्य साध्वी महात्मनः ॥29॥

अर्थ: जिस पुरुषकी बुद्धि अनेकान्तमें भ्रमरहित अतिशय स्फुरायमान है, उसी महात्माको उत्तम ध्यानकी सिद्धि निश्चयसे हो सकती है । सर्वथा एकान्तस्वरूप वस्तु ही सिद्ध न हो, तब ध्यानकी सिद्धि कैसे हो ? ।


ध्यानतन्त्रे निषिध्यन्ते नैते मिथ्यादृशः परं ।
मुनयोऽपि जिनेशाज्ञाप्रत्यनीकाश्चलाशयाः ॥30॥

अर्थ: सिद्धान्तमें ध्यान केवल मात्र मिथ्यादृष्टियोंके ही नहीं निषेधते हैं, किन्तु जो जिनेन्द्र भगवान्की आज्ञासे प्रतिकूल हैं तथा जिनका चित्त चलित है और जैन साधु कहाते हैं, उनके भी ध्यानका निषेध किया जाता है । क्योंकि उनके ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।


योग्यता न यतित्वेऽपि येषां ध्यातुमिह क्षणम् ।
अन्विष्य लिङ्गमेतेषां सूत्रसिद्धं निगद्यते ॥31॥

अर्थ: इस लोकमें जिनके मुनि-अवस्थामें भी ध्यान करनेकी एक क्षणमात्रकी योग्यता नहीं है, उनकी पहिचान सूत्रसिद्ध (शास्त्रोक्त) कही जाती है ।


यत्कर्मणि न तद्वाचि वाचि यत्तन्न चेतसि ।
यतेर्यस्य स किं ध्यानपदवीमधिरोहति ॥32॥

अर्थ: जिस यतिके जो कर्म (क्रिया) में है, सो वचनमें नहीं है, वचनमें कुछ और ही है । तथा जो कुछ वचनमें है सो चित्तमें नहीं है । ऐसे मायाचारी यति क्या ध्यान पदवीको पा सकते है ? ।


सङ्गेनापि महत्त्वं ये मन्यन्ते स्वस्य लाघवम् ।
परेषां सङ्गवैकल्यात्ते स्वबुद्ध्यैव वञ्चिताः ॥33॥

अर्थ: जो मुनि होकर भी परिग्रह रखते हैं और उस परिग्रहसे अपना महत्त्व मानते हैं तथा अन्य कि जिनके परिग्रह नहीं है उनकी लघुता समझते हैं, वे अपनी ही बुद्धिसे ठगे गये हैं; क्योंकि मुनिका महत्त्व तो निर्ग्रन्थतासे ही है ।


सत्संयमधुरां धृत्वा तुच्छशीलैर्मदोद्धतैः ।
त्यक्ता यैः सा च्युतस्थैर्यैर्ध्यातुमीशं क्व तन्मनः ॥34॥

अर्थ: जिन निःसारस्वभावी मदोद्धत मुनियोंने समीचीन संयमकी धुरा धारण करके छोड दी और जिनका धैर्य छूट गया, उनका मन क्या ध्यान करनेमें समर्थ हो सकता है ? कदापि नहीं । क्योंकि हीन प्रकृति मदोद्धत धैर्य रहितके ध्यानकी योग्यता नहीं है ।


कीर्त्तिपूजाभिमानार्त्तैर्लोकयात्रानुरञ्जितैः ।
बोधचक्षुर्विलुप्तं यैस्तेषां ध्याने न योग्यता ॥35॥

अर्थ: जो मुनि कीर्ति प्रतिष्ठा और अभिमानके अर्थमें आसक्त हैं, दुःखित हैं तथा लोकयात्रासे प्रसन्न होते हैं अर्थात् हमारे पास बहुतसे लोग आवें जावें और हमको माने ऐसी जो वांछा रखते हैं, उन्होंने अपने ज्ञानरूपी नेत्रको नष्ट किया है, ऐसे मुनियोंके ध्यानकी योग्यता नहीं हो सकती है ।


अन्तःकरणशुद्ध्यर्थं मिथ्यात्वविषमुद्धतम् ।
निष्ठ्यूतं यैर्न निःशेषं न तैस्तत्त्वं प्रमीयते ॥36॥

अर्थ: जिन मुनियोंने अपने अंतःकरणकी शुद्धताके लिये उत्कट मिथ्यात्वरूपी समस्त विष नहीं वमन किया (नहीं उगला) वे तत्त्वोंको प्रमाणरूप नहीं जान सकते हैं । क्योंकि मिथ्यात्वरूपी विष ऐसा प्रबल है कि इसका लेशमात्र भी हृदयमें रहे, तो तत्त्वार्थका ज्ञान श्रद्धान प्रमाणरूप नहीं होता, तब ऐसी अवस्थामें ध्यानकी योग्यता कहाँ ? ।


दुःषमत्वादयं कालः कार्यसिद्धेर्न साधकम् ।
इत्युक्त्वा स्वस्य चान्येषां कैश्चिद्ध्यानं निषिध्यते ॥37॥

अर्थ: कोई कोई साधु ऐसा कहकर अपने तथा परके ध्यानका निषेध करते हैं कि ‘‘यह काल दुःषमा (पंचम) है । इस कालमें ध्यानकी योग्यता किसीके भी नहीं है ।’’ इस प्रकार कहनेवालोंके ध्यान कैसे हो?


संदिह्यते मतिस्तत्त्वे यस्य कामार्थलालसा ।
विप्रलुब्धोऽन्यसिद्धान्तैः स कथं ध्यातुमर्हति ॥38॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि अन्य मतके शास्त्रोंसे ठगी गई है तथा जो काम और अर्थमें लुब्ध होकर वस्तुके यथार्थ स्वरूपमें संदिग्धरूप (संदेहसहित) है वह ध्यान करनेका पात्र कैसे हो ? क्योंकि जब तक तत्त्वोंमें (वस्तुस्वरूपमें) संदेह होता है, तब तक मन निश्चल नहीं हो सकता और जब मन ही निश्चल नहीं, तब ध्यान कैसे हो ? ।


निसर्गचपलं चेतो नास्तिकैर्विप्रतारितम् ।
स्याद्यस्य स कथं ध्यानपरीक्षायां क्षमो भवेत् ॥39॥

अर्थ: एक तो मन स्वभावसे ही चंचल है, तिस पर भी जिसका मन नास्तिकवादियों द्वारा वंचित किया गया हो वह मुनि ध्यानकी परीक्षामें कैसे समर्थ हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता, क्योंकि नास्तिकमती खोटी-खोटी युक्तियोंसे आत्माका नाश ही सिद्ध करते हैं । उनकी कुयुक्तियोंमें जिसका मन फँस जाता है, उसके ध्यानकी योग्यता कहाँसे हो सकती है ? ।


कान्दर्पीप्रमुखाः पञ्च भावना रागरञ्जिताः ।
येषां हृदि पदं चक्रुः क्व तेषां वस्तुनिश्चयः ॥40॥

अर्थ: जिनके मनमें रागसे रंजित कांदर्पी आदि पांच भावनाओंने निवास किया है, उनके वस्तुनिश्चय (तत्त्वार्थज्ञान) कैसे हो ? ।


कान्दर्पी कैल्विषी चैव भावना चाभियोगिकी ।
दानवी चापि संमोही त्याज्या पञ्चतयी च सा ॥41॥

अर्थ: कान्दर्पी (कामचेष्टा), कैल्विषी (क्लेशकारिणी), आभियोगिकी (युद्धभावना), आसुरी (सर्वभक्षणी) और संमोहिनी (कुटुंबमोहनी), इस प्रकार ये पाँच भावनायें पापरूप हैं सो पाँचों ही त्यागने योग्य है ।


मार्जाररसितप्रायं येषां वृत्तं त्रपाकरम् ।
तेषां स्वप्नेऽपि सद्ध्यानसिद्धिर्नैवोपजायते ॥42॥

अर्थ: जिस मुनिका चारित्र बिलावके कहे हुए उपाख्यानके (कहानीके) समान लज्जाजनक है, उसके समीचीन ध्यानकी सिद्धि स्वप्नमें भी नहीं हो सकती । बिलावका उपाख्यान लोकप्रसिद्ध है कि एक बिलाव मूषकोंसे कहा करता था कि मैंने तीर्थमें जाकर मूषक मारने वा खानेका त्याग कर दिया है, तुम हमारे पास आते हुए कदापि शंका न करो । जब मूषक निःशंक होकर बिलावके पास आने लगे तब बिलावने क्रम क्रमसे सब मूषकोंको खा डाला । इसी प्रकार जो पुरुष पहिले तो मुनिदीक्षा ले कर प्रतिज्ञायें ग्रहण कर लें और फिर भ्रष्ट हो जावें उनके ध्यानकी सिद्धिका निषेध है ।


अनिरुद्धाक्षसन्ताना अजितोग्रपरीषहाः ।
अत्यक्तचित्तचापल्या प्रस्खलन्त्यात्मनिश्चये ॥43॥

अर्थ: जिन्होंने इन्द्रियोंके विषय भोगनेकी प्रवृत्तिको नहीं रोका, उग्र परीषह नहीं जीते, और मनकी चपलता नहीं छोडी वे मुनि आत्माके निश्चयसे च्युत हो जाते हैं ।


अनासादितनिर्वेदा अविद्याव्याधवञ्चिताः ।
असंवर्धितसंवेगा न विदन्ति परं पदम् ॥44॥

अर्थ: जो विरागताको प्राप्त नहीं हुए हैं तथा मिथ्यात्वरूपी व्याधसे (शिकारीसे) वंचित किये गये हैं और जिनका मोक्ष और मोक्षमार्गमें अनुराग नहीं है, वे परमपद अर्थात् आत्माके स्वरूपकी प्राप्तिरूप मोक्षको नहीं जानते ।


न चेतः करुणाक्रान्तं न च विज्ञानवासितम् ।
विरतं च न भोगेभ्यो यस्य ध्यातुं न स क्षमः ॥45॥

अर्थ: जिसका मन करुणासे व्याप्त नहीं हुआ, तथा भेदविज्ञानसे वासित नहीं हुआ, विषयभोगोंसे विरक्त नहीं हुआ, वह ध्यान करनेमें समर्थ नहीं है ।


लोकानुरञ्जकैः पापैः कर्मभिर्गौरवं श्रिताः ।
अरञ्जितनिजस्वान्ता अक्षार्थगहने रताः ॥46॥

अर्थ: जो लोगोंको रंजित करनेवाले पापरूप कार्योंसे गुरुताको प्राप्त है, नहीं रंजित हुआ है आत्मामें चित्त जिनका ऐसे हैं, तथा इन्द्रियोंके विषयोंकी गहनतामें लीन हैं, जिन्होंने मनके शल्यको दूर नहीं किया है तथा अध्यात्मका निश्चय नहीं किया है और अपने भावोंसे दुर्लेश्याको दूर नहीं किया है, ऐसे पुरुष ध्यान साधनमें निषेधित हैं । क्योंकि इनमें ध्यानकी योग्यता नहीं है ॥४६-४७॥


अनुद्धृतमनःशल्या अकृताध्यात्मनिश्चयाः ।
अभिन्नभावदुर्लेश्या निषिद्धा ध्यानसाधने ॥47॥

अर्थ: जो लोगोंको रंजित करनेवाले पापरूप कार्योंसे गुरुताको प्राप्त है, नहीं रंजित हुआ है आत्मामें चित्त जिनका ऐसे हैं, तथा इन्द्रियोंके विषयोंकी गहनतामें लीन हैं, जिन्होंने मनके शल्यको दूर नहीं किया है तथा अध्यात्मका निश्चय नहीं किया है और अपने भावोंसे दुर्लेश्याको दूर नहीं किया है, ऐसे पुरुष ध्यान साधनमें निषेधित हैं । क्योंकि इनमें ध्यानकी योग्यता नहीं है ।।४६-४७।।


नर्मकौतुककौटिल्यपापसूत्रोपदेशकाः ।
अज्ञानज्वरशीर्णाङ्गा मोहनिद्रास्तचेतनाः ॥48॥

अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।


अनुद्युक्तास्तपः कर्तुं विषयग्रासलालसाः ।
ससङ्गाः शङ्किता भीता मन्येऽमी दैववञ्चिताः ॥49॥

अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।


एते तृणीकृतस्वार्था मुक्तिश्रीसङ्गनिःस्पृहाः ।
प्रभवन्ति न सद्ध्यानमन्वेषितुमपि क्षणम् ॥50॥

अर्थ: जो हास्य, कौतूहल, कुटिलता तथा हिंसादि पाप प्रवृत्तिके शास्त्रोंका उपदेश करनेवाले हैं तथा मिथ्यात्वरूपी ज्वर रोगसे जिनका आत्मा शीर्ण (रोगी) है, विकाररूप है, और मोहरूप निद्रासे जिनकी चेतना नष्ट हो गई है, जो तप करनेको उद्यमी नहीं है, विषयोंकी जिनके अतिशय लालसा है, जो परिग्रह और शंकासहित हैं, वस्तुका निर्णय जिनको नहीं है, तथा जो भयभीत हैं, मैं ऐसा मानता हूँ कि ऐसे पुरुष दैवके द्वारा ठगे गये हैं । फिर ऐसे पुरुषोंसे ध्यान कैसे हो सकता है ? इन पुरुषोंने अपने हितको तृणके समान समझ लिया है तथा मुक्तिरूपी स्त्रीका संगम करनेमें निःस्पृह हो गये हैं । इस कारण ये समीचीन ध्यानके अन्वेषण करनेको क्षणमात्र भी समर्थ नहीं हो सकते हैं ।


पापाभिचारकर्माणि सातर्द्धिरसलम्पटैः ।
यैः क्रियन्तेऽधमैर्मोहाद्धा हतं तैः स्वजीवितम् ॥51॥

अर्थ: जो अधम मनुष्य सातावेदनीयजनित सुख और अणिमा-महिमादि तथा धनादिक ऋद्धि तथा रसीले भोजनादिकमें लंपट हैं, मोहसे पापाभिचार कर्म करते हैं, उनके लिये आचार्य महाराज खेदसहित कहते हैं कि हाय ! हाय ! इन्होंने अपने जीवनका नाश किया और अपनेको संसारसमुद्रमें डूबा दिया ।


वश्याकर्षणविद्वेषं मारणोच्चाटनं तथा ।
जलानलविषस्तम्भो रसकर्म रसायनम् ॥52॥

अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ।


पुरक्षोभेन्द्रजालं च बलस्तम्भो जयाजयौ ।
विद्याच्छेदस्तथा वेधं ज्योतिर्ज्ञानं चिकित्सितम् ॥53॥

अर्थ: नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ।


यक्षिणीमन्त्रपातालसिद्धयः कालवञ्चना ।
पादुकाञ्जननिस्त्रिंशभूतभोगीन्द्रसाधनम् ॥54॥

अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ॥५२॥ नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ॥५३॥ यक्षिणी मंत्र, पातालसिद्धिके विधानका अभ्यास करना, कालवंचना (मृत्यु जीतनेका मंत्र साधना), पादुकासाधन (खडाऊँ पहनकर आकाश वा जलमें विहार करनेकी विद्याका साधन) करना, अदृश्य होने तथा गडे हुए धन देखनेके अञ्जनका साधना, शस्त्रादिकका साधना, भूतसाधन, सर्पसाधन ॥५४॥ इत्यादि विक्रियारूप कार्योंमें अनुरक्त होकर दुष्ट चेष्टा करनेवाले जो हैं, उन्होंने आत्मज्ञानसे भी हाथ धोया और अपने दोनों लोकका कार्य भी नष्ट किया । ऐसे पुरुषोके ध्यानकी सिद्धि होनी कठिन है ।


इत्यादिविक्रियाकर्मरञ्जितैर्दुष्टचेष्टितैः ।
आत्मानमपि न ज्ञातुं नष्टं लोकद्वयच्युतैः ॥55॥

अर्थ: वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, मारण, उच्चाटन तथा जल अग्नि विषका स्तंभन, रसकर्म रसायन ॥५२॥ नगरमें क्षोभ उत्पन्न करना, इन्द्रजाल साधना, सेनाका स्तंभन करना, जीतहारका विधान बताना, विद्याके छेदनेका विधान साधना, वेधना, ज्योतिषका ज्ञान, वैद्यकविद्यासाधन ॥५३॥ यक्षिणी मंत्र, पातालसिद्धिके विधानका अभ्यास करना, कालवंचना (मृत्यु जीतनेका मंत्र साधना), पादुकासाधन (खडाऊँ पहनकर आकाश वा जलमें विहार करनेकी विद्याका साधन) करना, अदृश्य होने तथा गडे हुए धन देखनेके अञ्जनका साधना, शस्त्रादिकका साधना, भूतसाधन, सर्पसाधन ॥५४॥ इत्यादि विक्रियारूप कार्योंमें अनुरक्त होकर दुष्ट चेष्टा करनेवाले जो हैं, उन्होंने आत्मज्ञानसे भी हाथ धोया और अपने दोनों लोकका कार्य भी नष्ट किया । ऐसे पुरुषोंके ध्यानकी सिद्धि होनी कठिन है ।


यतित्वं जीवनोपायं कुर्वन्तः किं न लज्जिताः ।
मातुः पण्यमिवालम्ब्य यथा केचिद्गतघृणाः ॥56॥

अर्थ: कई निर्दय, निर्लज्ज साधुपनमें भी अतिशय निंदा करनेयोग्य कार्य करते हैं । वे समीचीन हितरूप मार्गका विरोध कर नरकमें प्रवेश करते हैं । जैसे कोई अपनी माताको वेश्या बनाकर उससे धनोपार्जन करते हैं, तैसे ही जो मुनि होकर उस मुनिदीक्षाको जीवनका उपाय बनाते हैं और उसके द्वारा धनोपार्जन करते हैं, वे अतिशय निर्दय तथा निर्लज्ज हैं ॥५६-५७॥


निस्त्रपाः कर्म कुर्वन्ति यतित्वेऽप्यतिनिन्दितम् ।
ततो विराध्य सन्मार्गं विशन्ति नरकोदरे ॥57॥

अर्थ: कई निर्दय, निर्लज्ज साधुपनमें भी अतिशय निंदा करनेयोग्य कार्य करते हैं । वे समीचीन हितरूप मार्गका विरोध कर नरकमें प्रवेश करते हैं । जैसे कोई अपनी माताको वेश्या बनाकर उससे धनोपार्जन करते हैं, तैसे ही जो मुनि होकर उस मुनिदीक्षाको जीवनका उपाय बनाते हैं और उसके द्वारा धनोपार्जन करते हैं, वे अतिशय निर्दय तथा निर्लज्ज हैं ।।५६-५७।।


अविद्याश्रयणं युक्तं प्राग्गृहावस्थितैर्वरम् ।
मुक्त्यङ्गं लिङ्गमादाय न श्लाघ्यं लोकदम्भनम् ॥58॥

अर्थ: जो गृहस्थावस्थामें हैं, उनको तो ऐसी अविद्याका आश्रय करना कदाचित् युक्त भी कहा जा सकता है, परन्तु मुक्तिके अंगस्वरूप मुनिके भेषको धारण करके लोकका ठगना कदापि प्रशंसनीय नहीं है।


मनुष्यत्वं समासाद्य यतित्वं च जगन्नुतम् ।
हेयमेवाशुभं कार्यं विवेच्य सुहितं बुधैः ॥59॥

अर्थ: मनुष्यपन पाकर उसमें फिर जगत्पूज्य मुनिदीक्षाको ग्रहण करके विद्वानोंको अपना हित विचार अशुभ कर्म अवश्य ही छोडना चाहिए ।


अहो विभ्रान्तचित्तानां पश्य पुंसां विचेष्टितम् ।
यत्प्रपञ्चैर्यतित्वेऽपि नीयते जन्म निष्फलम् ॥60॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि देखो, भ्रमरूप चित्तवाले पुरुषोंकी चेष्टा साधुपनमें भी पाखंड प्रपंच करके जन्मको निष्फल कर देती है ।


किं ते सन्ति न कोटिशोऽपि सुधियः स्फारैर्वचोभिः परम्
ये वार्तां प्रथयन्त्यमेयमहसां राशेः परब्रह्मणः ।
तत्रानन्दसुधासरस्वति पुनर्निर्मज्य मुञ्चन्ति ये
सन्तापं भवसम्भवं त्रिचतुरास्ते सन्ति वा नात्र वा ॥61॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस जगतमें प्रचुर वचनोंसे (व्याख्यानोंसे) अमर्याद प्रतापकी राशिरूप परमात्माकी वार्ताको विस्तार करनेवाले करोडों विद्वान् क्या नहीं होते ? अवश्य होते ही है । परन्तु इस परब्रह्मस्वरूप अमृतके समुद्रमें मग्न होकर संसारसे उत्पन्न हुए सन्तापको नष्ट करनेवाले जगतमें तीन वा चार ही होते हैं अथवा नहीं भी होते ।


एते पण्डितमानिनः शमदमस्वाध्यायचिन्ताच्युताः
रागादिग्रहवञ्चिता यतिगुणप्रध्वंसकृष्णाननाः ।
व्याकृष्टा विषयैर्मदैः प्रमुदिताः शङ्काभिरङ्गीकृताः
न ध्यानं न विवेचनं न च तपः कर्तुं वराकाः क्षमाः ॥62॥

अर्थ: जो पंडित तो नहीं है, किन्तु अपनेको पंडित मानते हैं, और शम, दम, स्वाध्यायकी चिन्तासे रहित तथा रागद्वेष मोहादि पिशाचोंसे वञ्चित हैं, एवं जो मुनिपनके गुण नष्ट करनेसे अपना मुँह काला करनेवाले, विषयोंसे आकर्षित, मदोंसे प्रसन्न, शंका संदेह शल्यभयादिकसे पकडे गये हैं, ऐसे रंक पुरुष न ध्यान करनेमें समर्थ हैं, न भेदज्ञान करनेमें समर्थ हैं और न तप ही कर सकते हैं ।

सर्ग 5: ध्याता की प्रशंसा (श्लोक 1 से 29)

अथ निर्णीततत्त्वार्था धन्याः संविग्नमानसाः ।
कीर्त्यन्ते यमिनो जन्मसंभूतसुखनिःस्पृहाः ॥1॥

अर्थ: अथानन्तर जो संयमी मुनि तत्त्वार्थका (वस्तुका) यथार्थ स्वरूप जानते हैं, मनमें संवेगरूप हैं, मोक्ष तथा उसके मार्गमें अनुरागी हैं और संसारजनित सुखोंमें निःस्पृह (वांछारहित) हैं वे मुनि धन्य हैं। उनका कीर्त्तन वा प्रशंसा की जाती है ।


भवभ्रमणनिर्विण्णा भावशुद्धिं समाश्रिताः ।
सन्ति केचिच्च भूपृष्ठे योगिनः पुण्यचेष्टिताः ॥2॥

अर्थ: इस पृथ्वीतल पर अनेक योगीश्वर संसारके चक्रसे विरक्त हैं, भावोंकी शुद्धतासहित हैं तथा पवित्र चेष्टावाले हैं । यहाँ कोई यह पूछे कि “इस कालमें तो ऐसे कोई साधु दीख नहीं पडते ।” तो इसका यह उत्तर है कि यह ग्रन्थ जिस समय रचा गया था, उस समय ऐसे अनेक योगीश्वर थे और अब भी किसी दूर क्षेत्रमें हो तो क्या आश्चर्य है ? ।


विरज्य कामभोगेषु विमुच्य वपुषि स्पृहाम् ।
यस्य चित्तं स्थिरीभूतं स हि ध्याता प्रशस्यते ॥3॥

अर्थ: जिस मुनिका चित्त कामभोगोंमें विरक्त होकर और शरीरमें स्पृहाको छोडकर स्थिरीभूत हुआ है, निश्चय करके उसीको ध्याता कहा है। वही प्रशंसनीय ध्याता है ।


सत्संयमधुरा धीरैर्न हि प्राणात्ययेऽपि यैः ।
त्यक्ता महत्त्वमालम्ब्य ते हि ध्यानधनेश्वराः ॥4॥

अर्थ: जिन मुनियोंने महान् मुनिपनको अंगीकार करके प्राणोंका नाश होते भी समीचीन संयमकी धुराको नहीं छोडा है, वे ही ध्यानरूपी धनके ईश्वर (स्वामी) होते हैं। क्योंकि संयमसे च्युत होने पर ध्यान नहीं होता ।


परीषहमहाव्यालैर्ग्राम्यैर्वाक्कण्टकैर्दृढैः ।
मनागपि मनो येषां न स्वरूपात्परिच्युतम् ॥5॥

अर्थ: जिन मुनियोंका चित्त परीषहरूप दुष्ट हस्तियों अथवा सर्पोंसे तथा ग्रामीण मनुष्योंके दुर्वचनरूपी काँटोंसे किंचिन्मात्र भी अपने स्वरूपसे च्युत नहीं हुआ ।


क्रोधादिभीमभोगीन्द्रै रागादिरजनीचरैः ।
अजय्यैरपि विध्वस्तं न येषां यमजीवितम् ॥6॥

अर्थ: जिन मुनिजनोंका संयमरूपी जीवन क्रोधादि कषायरूप भयानक सर्पोंसे तथा अजेय रागादि निशाचरोंसे नष्ट नहीं हुआ ॥६॥ तथा-


मनः प्रीणयितुं येषां क्षमास्ता दिव्ययोषितः ।
मैत्र्यादयः सतां सेव्या ब्रह्मचर्येऽप्यनिन्दिते ॥7॥

अर्थ: जिन मुनियोंके अनिन्दित (प्रशंसनीय) ब्रह्मचर्यके होते हुए मनको तृप्त करनेवाली प्रसिद्ध मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ, ये चार भावनारूपी सुन्दर तथा समर्थ स्त्रियाँ हैं। अर्थात् इन भावनाओंके भावनेसे जिनके चित्तमें कामादि विकारभाव नहीं उपजते ।


तपस्तरलतीव्रार्चिःप्रचये पातितः स्मरः ।
यै रागरिपुभिः सार्द्धं पतङ्गप्रतिमीकृतः ॥8॥

अर्थ: जिन मुनियोंने तपरूपी तीव्र अग्निकी ज्वालाके समूहमें रागादि शत्रुओंके साथ कामको डाल दिया और पतंगके समान भस्म कर दिया ।


निःसङ्गत्वं समासाद्य ज्ञानराज्यं समीप्सितम् ।
जगत्त्रयचमत्कारि चित्रभूतं विचेष्टितम् ॥9॥

अर्थ: जिन्होंने निष्परिग्रहपनको अंगीकार करके तीन जगतमें चमत्कार करनेवाले तथा आश्चर्यरूप चेष्टावाले ज्ञानरूपी राज्यकी वांछा की ।


अत्युग्रतपसाऽऽत्मानं पिडयन्तोऽपि निर्दयम् ।
जगद्विध्यापयन्त्युच्चैर्ये मोहदहनक्षतम् ॥10॥

अर्थ: जो मुनि अपने आत्माको अति तीव्र तपसे निर्दयी के समान पीडा करते हैं, तो भी मोहरूपी अग्निसे जलते हुए जगतको अतिशयताके साथ बुझाते हैं अर्थात् शांत करते हैं ।


स्वभावजनिरातङ्कनिर्भरानन्दनन्दिताः ।
तृष्णार्चिःशान्तये धन्या येऽकालजलदोद्गमाः ॥11॥

अर्थ: जो धन्य मुनि तृष्णारूपी अग्निकी ज्वालाको शान्त करनेके लिये अकालमें (ग्रीष्मकालमें) स्वभावसे उत्पन्न, दाहरहित, पूर्ण आनन्दसे आनन्दरूप मेघके उदयके समान हैं ।


अशेषसंगसंन्यासवशाञ्जितमनोद्विजाः ।
विषयोद्दाममातङ्गघटासंघट्टघातकाः ॥12॥

अर्थ: जो मुनि समस्त परिग्रहके त्यागके कारण मनरूप चंचल पक्षीको जीतनेवाले हैं तथा विषयरूपी मदोन्मत्त हस्तियोंके संघट्टके (समूहके) घातक हैं ।


वाक्पथातीतमाहात्म्या विश्वविद्याविशारदाः ।
शरीराहारसंसारकामभोगेषु निःस्पृहाः ॥13॥

अर्थ: जिनका वचनपथसे अगोचर माहात्म्य है, जो समस्त विद्याओंमें विशारद हैं और शरीर-आहार-संसार-काम-भोगोंमें निःस्पृह (वांछारहित) हैं ॥१३॥ तथा-


विशुद्धबोधपीयुषपानपुण्यीकृताशयाः ।
स्थिरेतरजगज्जन्तुकरुणावारिवार्द्धयः ॥14॥

अर्थ: जिनका चित्त निर्मल ज्ञानरूप अमृतके पानसे पवित्र है और जो स्थावर त्रस भेदयुक्त जगतके जीवोंके करुणारूपी जलके समुद्र हैं ॥१४॥ तथा-


स्वर्णाचल इवाकम्प्या ज्योतिःपथ इवामलाः ।
समीर इव निःसङ्गा निर्ममत्वं समाश्रिताः ॥15॥

अर्थ: जो मेरुपर्वतके समान अचल है, आकाशवत् निर्मल हैं, पवनके समान निःसंग हैं और निर्ममताको जिन्होंने आश्रय दिया है ।।१५।। तथा-


हितोपदेशपर्जन्यैर्भव्यसारङ्गतर्पकाः ।
निरपेक्षाः शरीरेऽपि सापेक्षाः सिद्धिसङ्गमे ॥16॥

अर्थ: वे मुनि हितोपदेशरूप शब्दायमान मेघोंसे भव्य जीवरूपी चातक वा मयूरोंको तृप्त करनेवाले हैं तथा शरीरमें निरपेक्ष हैं, तो भी मुक्तिके संगम करनेमें सापेक्ष हैं ।


इत्यादिपरमोदारपुण्याचरणलक्षिताः ।
ध्यानसिद्धेः समाख्याताः पात्रं मुनिमहेश्वराः ॥17॥

अर्थ: इत्यादिक परम उदार पवित्र आचरणोंसे चिह्नित, मुनियोंमें प्रधान, मुनीश्वर ध्यानकी सिद्धिके पात्र कहे गये हैं ।


तवारोढुं प्रवृत्तस्य मुक्तेर्भवनमुन्नतम् ।
सोपानराजिकाऽमीषां पदच्छाया भविष्यति ॥18॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हे आत्मन् ! मुक्तिरूपी मंदिर पर चढनेकी प्रवृत्ति करते हुए तुझे पूर्वोक्त प्रकारके मुनियोंके चरणोंकी छाया ही सोपानकी पंक्ति समान होवेगी ।


ध्यानसिद्धिर्मता सूत्रे मुनीनामेव केवलम् ।
इत्याद्यमलविख्यातगुणलीलावलम्बिनाम् ॥19॥

अर्थ: सूत्रमें (सिद्धान्तमें) उपर्युक्त गुणोंको आदि लेकर निर्मल प्रसिद्ध गुणोंमें प्रवर्त्तनरूप क्रीडाके अवलम्बन करनेवाले केवल मुनियोंके ही ध्यानकी सिद्धि मानी है। अर्थात् मुक्तिके कारणस्वरूप ध्यानकी सिद्धि अन्यके नहीं हो सकती ।


निष्पन्दीकृतचित्तचण्डविहगाः पञ्चाक्षकक्षान्तकाः
ध्यानध्वस्तसमस्तकल्मषविषा विद्याम्बुधेः पारगाः ।
लीलोन्मूलितकर्मकन्दनिचयाः कारुण्यपुण्याशया
योगीन्द्रा भवभीमदैत्यदलनाः कुर्वन्तु ते निर्वृतिम् ॥20॥

अर्थ: पूर्वोक्त गुणोंके धारक योगीन्द्र गण हमारे तथा भव्य पुरुषोंके निर्वृति (सुख) रूप मोक्षको करो। कैसे हैं वे योगीन्द्र ? निश्चलरूप किया है चित्तरूपी प्रचंड पक्षी जिन्होंने, पंचेन्द्रियरूप वनको दग्ध करनेवाले हैं, ध्यानसे समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं, विद्यारूप समुद्रके पारगामी हैं, क्रीडामात्रसे कर्मोंके मूलको उखाडनेवाले हैं, करुणाभावरूप पुण्यसे पवित्र चित्तवाले हैं और संसाररूप भयानक दैत्यको चूर्ण करनेवाले हैं ।


विन्ध्याद्रिर्नगरं गुहा वसतिकाः शय्या शिला पार्वती
दीपाश्चन्द्रकरा मृगाः सहचरा मैत्री कुलीनाङ्गना ।
विज्ञानं सलिलं तपः सदशनं येषां प्रशान्तात्मनां
धन्यास्ते भवपङ्कनिर्गमपथप्रोद्देशकाः सन्तु नः ॥21॥

अर्थ: जिन प्रशान्तात्मा मुनि महाराजाओंके विन्ध्याचल पर्वत नगर है, पर्वतकी गुफायें वसतिका (गृह) हैं, पर्वतकी शिला शय्यासमान हैं, चन्द्रमाकी किरणें दीपकवत् हैं, मृग सहचारी हैं, सर्वभूतमैत्री (दया) कुलीन स्त्री है, विज्ञान पीनेका जल और तप उत्तम भोजन है, वे ही धन्य हैं। ऐसे मुनिराज हमको संसाररूप कर्दमसे निकलनेके मार्गका उपदेश देनेवाले हों ।


रुद्धे प्राणप्रचारे वपुषि नियमिते संवृतेऽक्षप्रपञ्चे
नेत्रस्पन्दे निरस्ते प्रलयमुपगतेऽन्तर्विकल्पेन्द्रजाले ।
भिन्ने मोहान्धकारे प्रसरति महसि क्वापि विश्वप्रदीपे
धन्यो ध्यानावलम्बी कलयति परमानन्दसिन्धुप्रवेशम् ॥22॥

अर्थ: श्वासोच्छ्वासके रुकते हुए, शरीरके निश्चल होते हुए, इन्द्रियोंके प्रचारका संवरण होते हुए, नेत्रोंकी चलनक्रियाके रहित होते हुए, समस्त विकल्परूप इन्द्रजालका प्रलय होते हुए, मोहान्धकारके दूर होते हुए, और समस्त वस्तुओंको प्रकाश करनेवाले तेजःपुंजको अपने हृदयमें विस्तारते हुए जो धन्य मुनि ध्यानावलंबी होते हैं, वे ही परमानन्दरूपी समुद्रमें प्रवेश करनेका अभ्यास करते हैं ।


अहेयोपादेयं त्रिभुवनमपीदं व्यवसितः
शुभं वा पापं वा द्वयमपि दहन्कर्म महसा ।
निजानन्दास्वादव्यवधिविधुरीभूतविषयः
प्रतीत्योच्चैः कश्चिद्विगलितविकल्पं विहरति ॥23॥

अर्थ: अपने स्वाभाविक आनंदके स्वादसे दूर हैं इन्द्रियविषय जिसके, ऐसा कोई मुनि अपने तेजसे शुभाशुभ कर्मोंका दहन करता हुआ, भले प्रकार प्रतीतिगोचर करके इस अहेयोपादेयरूप त्रिभुवनमें विकल्परहित भ्रमण करता है।


दुःप्रज्ञाबललुप्तवस्तुनिचया विज्ञानशून्याशयाः
विद्यन्ते प्रतिमन्दिरं निजनिजस्वार्थोद्यता देहिनः ।
आनन्दामृतसिन्धुशीकरचयैर्निर्वाप्य जन्मज्वरं
ये मुक्तेर्वदनेन्दुवीक्षणपरास्ते सन्ति द्वित्रा यदि ॥24॥

अर्थ: बुद्धिके बल वस्तुसमूहको लोपनेवाले (नास्तिक), सत्यार्थ ज्ञानसे शून्य चित्तवाले तथा अपने विषयादिकके प्रयोजनमें उद्यमी ऐसे प्राणी तो घरघरमें विद्यमान हैं; परन्तु आनन्दरूप अमृतके समुद्रके कणसमूहसे संसाररूप ज्वरके दाहको (अग्निको) बुझाकर मुक्तिरूपी स्त्रीके मुखरूपी चन्द्रमाके विलोकन करनेमें जो तत्पर हैं, वे यदि हैं तो दो तीन ही होंगे ।


यैः सुप्तं हिमशैलशृङ्गसुभगप्रासादगर्भान्तरे
पल्यङ्के परमोपधानरचिते दिव्याङ्गनाभिः सह ।
तैरेवाद्य निरस्तविश्वविषयैरन्तःस्फुरज्ज्योतिषि
क्षोणीरन्ध्रशिलादिकोटरगतैर्धन्यैर्निशा नीयते ॥25॥

अर्थ: जिन्होंने पूर्वावस्थामें हिमालयके शिखरसमान सुंदर महलोंमें उत्कृष्ट उपधान हंसतुलिकादिसे रची हुई शय्यामें सुंदर स्त्रियोंके साथ शयन किया था, वे ही समस्त संसारके विषयोंके निरस्त करनेवाले पुण्यशाली पुरुष अन्तरंगमें ज्ञानज्योतिके स्फुरण होनेसे पृथ्वीमें तथा पर्वतोंकी गुफाओंमें एवं शिलाओं पर अथवा वृक्षके कोटरोंमें प्राप्त होकर रात्रि बिताते हैं, उन्हें धन्य है ।


चित्ते निश्चलतां गते प्रशमिते रागाद्यविद्यामये
विद्राणेऽक्षकदम्बके विघटिते ध्वान्ते भ्रमारम्भके।
आनन्दे प्रविजृम्भिते पुरपतेर्ज्ञाने समुन्मीलिते
त्वां द्रक्ष्यन्ति कदा वनस्थमभितः पुस्तेच्छया श्वापदाः ॥26॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तेरे मनमें निश्चलता होते हुए, रागादि अविद्यारूप रोगोंमें उपशमता होते हुए, इन्द्रियोंके समूहके विषयोंमें नहीं प्रवर्तते हुए, भ्रमोत्पादन करनेवाले अज्ञानांधकारके नष्ट होते हुए, और आनंदको विस्तारते हुए आत्मज्ञानके प्रकट होने पर ऐसा कौनसा दिन होगा जब तुझे वनमें चारों ओरसे मृगादि पशु चित्रलिखित मूर्ति अथवा सूखे हुए वृक्षके ठूंठके समान देखेंगे। जिस समय तू ऐसी निश्चलमूर्तिमें ध्यानस्थ होगा, उसी समय धन्य होगा ।


आत्मन्यात्मप्रचारे कृतसकलबहिःसंगसन्यासवीर्या-
दन्तर्ज्योतिःप्रकाशाद्विलयगतमहामोहनिद्रातिरेकः ।
निर्णीते स्वस्वरूपे स्फुरति जगदिदं यस्य शून्यं जडं वा
तस्य श्रीबोधवार्धेर्दिशतु तव शिवं पादपङ्केरुहश्रीः ॥27॥

अर्थ: जिसका आत्मामें अपना प्रवर्तन है, परद्रव्यमें नहीं है और बाह्यपरिग्रहके त्यागसे तथा अंतरंगविज्ञानज्योतिके प्रकाश होनेसे जिसका महामोहरूप निद्राका उत्कर्ष नष्ट हो गया है और जिसको स्वरूपका निश्चय होनेसे यह जगत् शून्यवत् वा जडवत् प्रतिभासता है, ऐसे श्रीज्ञानसमुद्र मुनिके चरणकमलकी लक्ष्मी (शोभा) तुमको मोक्षपद प्रदान करें, ऐसा आशीर्वादात्मक उपदेश है ।


आत्मायत्तं विषयविरतं तत्त्वचिन्तावलीनं
निर्व्यापारं स्वहितनिरतं निर्वृतानन्दपूर्णं ।
ज्ञानारूढं शमयमतपोध्यानलब्धावकाशं
कृत्वाऽऽत्मानं कलय सुमते दिव्यबोधाधिपत्यम् ॥28॥

अर्थ: हे सुबुद्धि ! अपनेको प्रथम तो आत्मायत्त कहिये पराधीनतासे छुडा कर स्वाधीन कर । दूसरे- इन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्त कर । तीसरे- तत्त्वचिन्तामें मग्न (लीन) कर । चौथे - सांसारिक व्यापारसे रहित निश्चल कर । पाँचवें- अपने हितमें लगा । छट्ठे- निर्वृत अर्थात् क्षोभरहित आनंदसे परिपूर्ण कर । सातवें- ज्ञानारूढ कर । आठवें- शम यम दम तपमें अवकाश मिलें ऐसा करके फिर दिव्यबोध कहिये केवलज्ञानके अधिपतिपनेको प्राप्त कर ।


दृश्यन्ते भुवि किं न ते कृतधियः संख्याव्यतीताश्चिरम्
ये लीलाः परमेष्ठिनः प्रतिदिनं तन्वन्ति वाग्भिः परम् ।
तं साक्षादनुभूय नित्यपरमानन्दाम्बुराशिं पुन-
र्ये जन्मभ्रममुत्सृजन्ति पुरुषा धन्यास्तु ते दुर्लभाः ॥29॥

अर्थ: इस पृथ्वी पर परमेष्ठीकी नित्यप्रति केवल वचनोंसे बहुत कालपर्यन्त लीलास्तवनको विस्तृत करनेवाले कृतबुद्धि क्या गणनासे अतीत नहीं है ? अपितु असंख्येय देखनेमें आते हैं। परन्तु नित्यपरमानन्दामृतकी राशिरूप उस परमेष्ठीको साक्षात् अनुभवगोचर कर संसारके भ्रमको दूर करते हैं, ऐसे पुरुष दुर्लभ हैं और ऐसे ही पुरुष धन्य हैं ।

सर्ग 6: सम्यग्दर्शन (श्लोक 1 से 59)

सुप्रयुक्तैः स्वयं साक्षात्सम्यग्दृग्बोधसंयमैः ।
त्रिभिरेवापवर्गश्रीर्घनाश्लेषं प्रयच्छति ॥1॥

अर्थ: भलेप्रकार प्रयुक्त किये हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंसे अर्थात् तीनोंकी एकता होनेसे मोक्षरूपी लक्ष्मी उस रत्नत्रययुक्त आत्माको स्वयं दृढालिंगन देती है ।


तैरेव हि विशीर्यन्ते विचित्राणि बलीन्यपि ।
दृग्बोधसंयमैः कर्मनिगडानि शरीरिणाम् ॥2॥

अर्थ: इस सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे ही जीवोंकी नाना प्रकारकी बलवान कर्मरूपी बेडियाँ झरती हैं (टूटती हैं) ।


त्रिशुद्धिपूर्वकं ध्यानमामनन्ति मनीषिणः ।
व्यर्थ स्यात्तामनासाद्य तदेवात्र शरीरिणाम् ॥3॥

अर्थ: विद्वानोंने दर्शनज्ञानचारित्रकी शुद्धतापूर्वक ही ध्यान कहा है, ऐसी आम्नाय है। इस कारण इन तीनोंकी शुद्धता पाये विना जीवोंका ध्यान करना व्यर्थ है। क्योंकि वह ध्यान मोक्षफलके अर्थ नहीं है ।


रत्नत्रयमनासाद्य यः साक्षाद्ध्यातुमिच्छति ।
खपुष्पैः कुरुते मूढः स वन्ध्यासुतशेखरम् ॥4॥

अर्थ: जो पुरुष साक्षात् रत्नत्रयको (सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रको) प्राप्त न होकर ध्यान करना चाहता है, वह मूर्ख आकाशके फूलोंसे वन्ध्याके पुत्रके लिये सेहरा (मौर) बनाना चाहता है ।


तत्त्वरुचिः सम्यक्त्वं तत्त्वप्रख्यापकं भवेज्ज्ञानम् ।
पापक्रियानिवृत्तिश्चरित्रमुक्तं जिनेन्द्रेण ॥5॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवानने तत्त्वोंकी रुचि अर्थात् श्रद्धाप्रतीतिको सम्यक्त्व (सम्यग्दर्शन), तत्त्वोंको प्रकर्षरूप कहने अर्थात् जाननेको सम्यग्ज्ञान और पापक्रियाओंसे निवृत्त होनेको सम्यक्चारित्र कहा है ।


यज्जीवादिपदार्थानां श्रद्धानं तद्धि दर्शनम् ।
निसर्गेणाधिगत्या वा तद्भव्यस्यैव जायते ॥6॥

अर्थ: जो जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना है वही नियमसे दर्शन है। यह सम्यग्दर्शन निसर्गसे (स्वभावसे) अथवा अधिगमसे (परोपदेशसे) भव्य जीवोंके ही उत्पन्न होता है, अभव्यके नहीं होता ।


क्षीणप्रशान्तमिश्रासु मोहप्रकृतिषु क्रमात् ।
तत् स्याद्द्रव्यादिसामग्र्या पुंसां सद्दर्शनं त्रिधा ॥7॥

अर्थ: यह सम्यग्दर्शन पुरुषोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सामग्रीसे दर्शनमोह कर्मकी तीन प्रकृतियोंके क्षय, उपशम तथा क्षयोपशमरूप होनेसे क्रमशः तीन प्रकारका है- १ क्षायिकसम्यक्त्व, २ उपशमसम्यक्त्व, और ३ क्षयोपशमसम्यक्त्व ।


द्रव्यादिकमथासाद्य तज्जीवैः प्राप्यते क्वचित् ।
पञ्चविंशतिमुत्सृज्य दोषांस्तच्छक्तिघातकम् ॥8॥

अर्थ: अथवा यह सम्यग्दर्शन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सामग्रीको प्राप्त होकर तथा सम्यक्दर्शनकी शक्तिके घात करनेवाले पच्चीस दोषोंको छोडनेसे क्वचित् प्राप्त होता है ।


जीवाजीवास्रवा बन्धः संवरो निर्जरा तथा ।
मोक्षश्चैतानि सप्तैव तत्त्वान्यूचुर्मनीषिणः ॥9॥

अर्थ: पंडितोंने जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात ही तत्त्व कहे हैं ।


अनन्तः सर्वदा सर्वो जीवराशिर्द्विधा स्थितः ।
सिद्धेतरविकल्पेन त्रैलोक्यभुवनोदरे ॥10॥

अर्थ: इस तीन लोकरूपी भुवनमें जीवराशि सदाकाल सर्व (अनन्त) है, और वह दो भेदरूप है- १. सिद्ध तथा २. संसारी ।


सिद्धस्त्वेकस्वभावः स्याद्दृग्बोधानन्दशक्तिमान् ।
मृत्यूत्पादादिजन्मोत्थक्लेशप्रचयविच्युतः ॥11॥

अर्थ: उन दो भेदोंमेंसे जो सिद्ध है, सो तो दर्शन-ज्ञान-सुख-वीर्यसहित एक स्वभाव है, और मरण जन्म आदि सांसारिक क्लेशोंसे रहित है ।


चरस्थिरभवोद्भूतविकल्पैः कल्पिताः पृथक् ।
भवन्त्यनेकभेदास्ते जीवाः संसारवर्तिनः ॥12॥

अर्थ: और संसारी जीव त्रस और स्थावररूप संसारसे उत्पन्न हुए भेदोंसे भिन्न-भिन्न अनेक प्रकारके हैं ।


पृथिव्यादिविभेदेन स्थावराः पञ्चधा मताः ।
त्रसास्त्वनेकभेदास्ते नानायोनिसमाश्रिताः ॥13॥

अर्थ: संसारी जीवोंमें स्थावर जीव पृथिवी, अप, तेज, वायु और वनस्पति भेदसे पाँच प्रकारके हैं और त्रस द्वीन्द्रियादिक भेदोंसे अनेक भेदरूप हैं तथा अनेक प्रकारकी योनिके आश्रित हैं ।


चतुर्धा गतिभेदेन भिद्यन्ते प्राणिनः परम् ।
मनुष्यामरतिर्यञ्चो नारकाश्च यथायथम् ॥14॥

अर्थ: और संसारी जीव गतिके भेदसे मनुष्य, देव, तिर्यंच और नारक चार प्रकारके हैं ।


भ्रमन्ति नियतं जन्मकान्तारे कल्मषाशयाः ।
दुरन्तकर्मसम्पातप्रपञ्चवशवर्तिनः ॥15॥

अर्थ: ये पापाशयरूपी संसारी जीव दुरन्त कर्मके संपातके प्रपंचके वशवर्ती होकर संसाररूपी वनमें निरन्तर भ्रमण करते हैं ।


किन्तु तिर्यग्गतावेव स्थावरा विकलेन्द्रियाः ।
असंज्ञिनश्च नान्यत्र प्रभवन्त्यङ्गिनः क्वचित् ॥16॥

अर्थ: किन्तु स्थावर, विकलेन्द्रिय (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय) और असंज्ञी (मनरहित पंचेन्द्रिय) ये तिर्यंचगतिमें ही होते हैं, अन्यत्र नहीं होते ।


उपसंहारविस्तारधर्मा दृग्बोधलाञ्छनः ।
कर्ता भोक्ता स्वयं जीवस्तनुमात्रोऽप्यमूर्त्तिमान् ॥17॥

अर्थ: जीव संकोच विस्तार धर्मसे युक्त और दर्शन ज्ञान लक्षण सहित है और स्वयं कर्ता, भोक्ता तथा शरीरप्रमाण होकर अमूर्तिमान् है ।


एको द्विधा त्रिधा जीवः चतुःसंक्रान्तिपञ्चमः ।
षट्कर्म सप्तभङ्गोऽष्टाश्रयो नवदशस्थितिः ॥18॥

अर्थ: जीव सामान्य चैतन्यरूपसे एक प्रकारके हैं। त्रस स्थावर भेदसे दो प्रकारके हैं। एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, सकलेन्द्रिय भेदसे तीन प्रकारके हैं। एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, संज्ञी, असंज्ञी भेदसे चार प्रकारके हैं। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय भेदसे पाँच प्रकारके हैं। पाँच स्थावर और एक त्रस इस प्रकार भेद करनेसे छह प्रकारके हैं। पाँच स्थावर, विकलेन्द्रिय, सकलेन्द्रिय, ऐसे भेद करनेसे सात प्रकारके हैं। पाँच स्थावर, विकलेन्द्रिय, संज्ञी, असंज्ञी ऐसे आठ प्रकारके हैं। पाँच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय, एक सकलेन्द्रिय ऐसे नव प्रकारके हैं, और पाँच स्थावर, तीन विकलेन्द्रिय और संज्ञी तथा असंज्ञी ऐसे भेद करनेसे दश प्रकार भी हैं। इस प्रकार सामान्य विशेषके भेदसे जीव संख्यात असंख्यात तथा अनन्त भेदरूप हैं ।


भव्याभव्यविकल्पोऽयं जीवराशिर्निसर्गजः ।
मतः पूर्वोऽपवर्गाय जन्मपङ्काय चेतरः ॥19॥

अर्थ: यह जीवराशि स्वभावसे भव्य और अभव्य भेद स्वरूप है। पहिला भव्य अपवर्ग अर्थात् मोक्षके लिए और इतर अर्थात् दूसरा अभव्य संसारके लिए माना गया है, अर्थात् भव्य मोक्षगामी होता है और अभव्यको कभी मोक्ष नहीं होता ।


सम्यग्ज्ञानादिरूपेण ये भविष्यन्ति जन्तवः ।
प्राप्य द्रव्यादिसामग्रीं ते भव्या मुनिभिर्मताः ॥20॥

अर्थ: जो जीव द्रव्यक्षेत्रकालभावरूप सामग्रीको पाकर सम्यग्ज्ञानादिरूप परिणमेंगे, उन्हींको आचार्योंने ‘भव्य’ कहा है ।


अन्धपाषाणकल्पं स्यादभव्यत्वं शरीरिणाम् ।
यस्माज्जन्मशतेनापि नात्मतत्त्वं पृथग्भवेत् ॥21॥

अर्थ: जीवोंका अभव्यपन अन्धपाषाणके समान है, जिससे सैंकडों जन्मोंमें भी आत्मतत्त्व पृथक् नहीं होता ।


अभव्यानां स्वभावेन सर्वदा जन्मसंक्रमः ।
भव्यानां भाविनी मुक्तिर्निःशेषदुरितक्षयात् ॥22॥

अर्थ: अभव्यजीवोंका स्वभावसे संसारमें सर्वदा ही जन्म, संक्रम अर्थात् भ्रमण होता है और भव्य जीवोंको समस्त कर्मोंके क्षयसे मुक्ति होती ही है ।


यथा धातोर्मलैः सार्द्धं सम्बन्धोऽनादिसंभवः ।
तथा कर्ममलैर्ज्ञेयः संश्लेषोऽनादिदेहिनाम् ॥23॥

अर्थ: जिस प्रकार सुवर्णादि धातुओंका मलके साथ अनादि संबंध है, उसी प्रकार जीवोंका कर्ममलसे अनादिकालका संबंध है, ऐसे जानना चाहिए ।


द्वयोरनादिसंसारः सान्तः पर्यन्तवर्जितः ।
वस्तुस्वभावतो ज्ञेयो भव्याभव्याङ्गिनोः क्रमात् ॥24॥

अर्थ: भव्य अभव्य दोनोंको ही संसार आदिरहित है; परन्तु भव्यका संसार तो अन्तसहित है (क्योंकि इसको मुक्ति होती है) और अभव्यका अन्तरहित है, (क्योंकि इसको मुक्ति नहीं होती) ऐसा वस्तुस्वभावसे ही जानना चाहिए। इसमें कोई अन्य हेतु नहीं है ।


चतुर्दशसमासेषु मार्गणासु गुणेषु च ।
ज्ञात्वा संसारिणो जीवाः श्रद्धेयाः शुद्धदृष्टिभिः ॥25॥

अर्थ: संसारी जीवोंको चौदह जीवसमास, चौदह मार्गणा और चौदह गुणस्थानोंमें जान करके सम्यग्दृष्टियोंको श्रद्धान करना चाहिए ।


धर्माधर्मनभःकालाः पुद्गलैः सह योगिभिः ।
द्रव्याणि षट् प्रणीतानि जीवपूर्वाण्यनुक्रमात् ॥26॥

अर्थ: जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल, योगीश्वरोंने ये छह द्रव्य अनुक्रमसे कहे हैं ।


तत्र जीवादयः पञ्च प्रदेशप्रचयात्मकाः ।
कायाः कालं विना ज्ञेया भिन्नप्रकृतयोऽप्यमी ॥27॥

अर्थ: उन छह द्रव्योंमें एक कालको छोडकर जीवादिक पाँच द्रव्य अनेक प्रदेशात्मक होनेके कारण ‘काय’ कहे जाते है । कालाणु एक ही प्रदेशस्वरूप है, अतः उसे ‘काय’ नहीं कहा । इन सब द्रव्योंको भिन्न-भिन्न स्वभाववाले जानना चाहिए ।


अचिद्रूपा विना जीवममूर्त्ताः पुद्गलं विना ।
पदार्था वस्तुतः सर्वे स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकाः ॥28॥

अर्थ: इन छह द्रव्योंमेंसे जीवके विना अन्य पाँच अचिद्रूप हैं अर्थात् चेतनारहित अजीव द्रव्य हैं। और पुद्गल द्रव्यके विना अन्य पाँच अमूर्त्त हैं। स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, गुण इनमें नहीं है। पुद्गल इन गुणोंसहित मूर्त है। तथा इन द्रव्योंको पदार्थ भी कहते हैं, क्योंकि ये उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यसहित है। पदार्थका स्वरूप द्रव्यपर्यायात्मक कहा गया है, इस कारण जो उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यरूप होता है, वही पर्यायरूप भी होता है ।


अणुस्कन्धविभेदेन भिन्नाः स्युः पुद्गला द्विधा ।
मूर्ता वर्णरसस्पर्शगुणोपेताश्च रूपिणः ॥29॥

अर्थ: अणुस्कन्ध भेदसे यहाँ पुद्गल दो प्रकारका है और वर्ण, रस, स्पर्श, गुणसहित होनेसे रूपी (मूर्त) हैं ।


किन्त्वेकं पुद्गलद्रव्यं षड्विकल्पं बुधैर्मतम् ।
स्थूलस्थूलादिभेदेन सूक्ष्मसूक्ष्मेण च क्रमात् ॥30॥

अर्थ: किन्तु एक-एक पुद्गल द्रव्यको विद्वानोंने स्थूलस्थूल और सूक्ष्मसूक्ष्मादि भेदोंके क्रमसे छह प्रकारका कहा है। यथा-स्थूलस्थूल-तो पृथ्वी पर्वतादिक हैं। स्थूल-जल दुग्धादिक तरल पदार्थ है। स्थूलसूक्ष्म-छाया आतपादि नेत्रइन्द्रियगोचर हैं। सूक्ष्मस्थूल-नेत्रके विना अन्य चार इन्द्रियोंसे ग्रहणमें आनेवाले शब्द, गन्धादिक हैं। सूक्ष्म-कर्मवर्गणा हैं। और सूक्ष्मसूक्ष्म-परमाणु हैं। इस प्रकार पुद्गलके छह भेद हैं ।


प्रत्येकमेकद्रव्याणि धर्मादीनि यथायथम् ।
आकाशान्तान्यमूर्तानि निष्क्रियाणि स्थिराणि च ॥31॥

अर्थ: धर्म, अधर्म, आकाश ये तीन द्रव्य भिन्न-भिन्न एक एक द्रव्य हैं और तीनों ही अमूर्तिक, निष्क्रिय और स्थिर हैं ।


स लोकगगनव्यापी धर्मः स्याद्गतिलक्षणः ।
तावन्मात्रोऽप्यधर्मोऽयं स्थितिलक्ष्मः प्रकीर्तितः ॥32॥

अर्थ: धर्मद्रव्य लोकाकाशमें व्यापक है और गतिमें सहकारी होना उसका लक्षण वा स्वभाव है। और अधर्म द्रव्य भी लोकाकाशव्यापी है तथा स्थिति-सहकारी उसका स्वभाव है ।


स्वयं गन्तुं प्रवृत्तेषु जीवाजीवेषु सर्वदा ।
धर्मोऽयं सहकारी स्याज्जलं यादोऽङ्गिनामिव ॥33॥

अर्थ: यह धर्मद्रव्य जीवपुद्गलका प्रेरक सहकारी नहीं है, किन्तु जीव पुद्गल स्वयं गमन करनेमें प्रवर्त्ते तो यह सर्वकाल सहकारी (सहायक) है । जैसे जलमें रहनेवाले मत्स्यादिको जल सहकारी है । जल प्रेरणा करके मत्स्यादिक जलचरोंको नहीं चलाता, किन्तु वे चलते हैं तो उनका सहायक होता है ।


दत्ते स्थितिं प्रपन्नानां जीवादीनामयं स्थितिम् ।
अधर्मः सहकारित्वाद्यथा छायाऽध्ववर्त्तिनाम् ॥34॥

अर्थ: अधर्मद्रव्य स्थितिको प्राप्त हुए जीचपुद्गलोंकी स्थिति करानेमें सहकारी है । जैसे मार्गमें चलते हुए पथिकोंको बैठनेके लिए छाया सहकारी है, उसी प्रकार अधर्मद्रव्य भी जीवोंके ठहरानेमें सहकारी है, प्रेरक नहीं है ।


अवकाशप्रदं व्योम सर्वगं स्वप्रतिष्ठितम् ।
लोकालोकविकल्पेन तस्य लक्ष्म प्रकीर्त्तितम् ॥35॥

अर्थ: आकाशद्रव्य अन्य पाँच द्रव्योंको अवकाश देनेवाला और सर्वव्यापी है तथा स्वप्रतिष्ठित है। अर्थात् अपने आपके ही आधार है, अन्य कोई आधार (आश्रय) नहीं है। यह लोक अलोकके भेदसे दो प्रकारका है ।


लोकाकाशप्रदेशेषु ये भिन्ना अणवः स्थिताः ।
परिवर्त्ताय भावानां मुख्यकालः स वर्णितः ॥36॥

अर्थ: लोकाकाशके प्रदेशोंमें जो कालके भिन्न-भिन्न अणु द्रव्योंका परिवर्तन करनेके लिए स्थित हैं उन्हें मुख्य काल अर्थात् निश्चयकाल कहते हैं ।


समयादिकृतं यस्य मानं ज्योतिर्गणाश्रितम् ।
व्यवहाराभिधः कालः स कालज्ञैः प्रपञ्चितः ॥37॥

अर्थ: जिस कालका परिमाण ज्योतिषी देवोंके समूहके गमनागमनके आश्रयसे समय आदि भेदरूप किया गया है, उसे कालके जाननेवाले विद्वानोंने व्यवहारकाल कहा है ।


यदमी परिवर्तन्ते पदार्था विश्ववर्तिनः ।
नवजीर्णादिरूपेण तत्कालस्यैव चेष्टितम् ॥38॥

अर्थ: लोकमें रहनेवाले ये समस्त पदार्थ जो नयेसे पुरानी अवस्थाको धारण करते हैं, सो सब कालकी चेष्टासे ही करते हैं । अर्थात् समस्त द्रव्योंके परिणमनेको कालकी वर्त्तना ही निमित्त है ।


भाविनो वर्तमानत्वं वर्तमानास्त्वतीतताम् ।
पदार्थाः प्रतिपद्यन्ते कालकेलिकदर्थिताः ॥39॥

अर्थ: पदार्थ कालकी ही लीला (वर्तना) से एक अवस्थासे अन्य अवस्थाको प्राप्त होते हैं । अर्थात् जो आगामी अवस्था होनेवाली है वह तो वर्त्तमानताको प्राप्त होती है और वर्त्तमान है वह अतीतपनको प्राप्त होती है । इस प्रकार समय समय अवस्था पलटती रहती है ।


धर्माधर्मनभःकाला अर्थपर्यायगोचराः ।
व्यञ्जनाख्यस्य सम्बन्धौ द्वावन्यौ जीवपुद्गलौ ॥40॥

अर्थ: धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये चार पदार्थ तो अर्थपर्यायगोचर हैं, और अन्य दो अर्थात् जीव तथा पुद्गल व्यञ्जनपर्यायके संबंधरूप हैं ।


भावाः पञ्चैव जीवस्य द्वावन्त्यौ पुद्गलस्य च ।
धर्मादीनां तु शेषाणां स्याद्भावः पारिणामिकः ॥41॥

अर्थ: जीवके औदयिकादि पाँचों ही भाव हैं और पुद्गलके अंतिम दो अर्थात् सूत्रपाठकी अपेक्षा अंतिम औदयिक और पारिणामिक हैं तथा शेष धर्मादिक चार द्रव्योंके एक पारिणामिक भाव ही है ।


अन्योन्यसंक्रमोत्पन्नो भावः स्यात्सान्निपातिकः ।
षड्विंशद्भेदभिन्नात्मा स षष्टो मुनिभिर्मतः ॥42॥

अर्थ: जीवके इन पाँच भावोंके परस्पर संयोगसे उत्पन्न हुआ सान्निपातिक नामका एक छठा भाव भी आचार्योंने माना है । वह छब्बीस प्रभेदोंसे भेदरूप है तथा छत्तीस भेदरूप और इकतालीस भेदरूप भी कहा है । ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ नामा तत्त्वार्थसूत्रकी टीकामें भावोंका अच्छा विस्तार किया है ।


धर्माधर्मैकजीवानां प्रदेशा गणनातिगाः ।
कियन्तोऽपि न कालस्य व्योम्नः पर्यन्तवर्जिताः ॥43॥

अर्थ: धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और एक जीवद्रव्यके प्रदेश गणनासे अतीत अर्थात् असंख्यात हैं, और कालद्रव्यके एक ही अणु मात्र प्रदेश है। इस कारण कालके कितने प्रदेश हैं, ऐसी कथनी ही नहीं है और आकाशके अन्तवर्जित अनन्त प्रदेश हैं ।


एकादयः प्रदेशाः स्युः पुद्गलानां यथायथम् ।
संख्यातीताश्च संख्येया अनन्ता योगिकल्पिताः ॥44॥

अर्थ: योगीश्वरोंने पुद्गलद्रव्यके एक प्रदेशको आदि ले जैसे हैं तैसे संख्यात असंख्यात और अनन्त कहे हैं ।


मूर्त्तो व्यञ्जनपर्यायो वाग्गम्योऽनश्वरः स्थिरः ।
सूक्ष्मः प्रतिक्षणध्वंसी पर्यायश्चार्थसंज्ञिकः ॥45॥

अर्थ: व्यञ्जनपर्याय मूर्तिक है, वचनके गोचर है, अनश्वर है, स्थिर है और अर्थपर्याय सूक्ष्म है तथा क्षणविध्वंसी है ।


प्रकृत्यादिविकल्पेन ज्ञेयो बन्धश्चतुर्विधः ।
ज्ञानावृत्यादिभेदेन सोऽष्टधा प्रथमः स्मृतः ॥46॥

अर्थ: प्रकृत्यादि भेदसे बन्ध चार प्रकारका है । उनमेंसे प्रथम प्रकृति बन्ध है, जो कि ज्ञानावरण दर्शनावरणादि भेदसे आठ प्रकारका है ।


मिथ्यात्वाविरती योगः कषायाश्च यथाक्रमात् ।
प्रमादैः सह पञ्चैते विज्ञेया बन्धहेतवः ॥47॥

अर्थ: मिथ्यात्व, अविरति, योग, कषाय और प्रमाद यथाक्रमसे ये पाँच बन्धके हेतु अर्थात् कारण जानने चाहिये । अतत्त्वश्रद्धानको मिथ्यात्व, अत्यागरूप परिणामोंको अविरति, निश्चय व्यवहार चारित्रमें असावधानरूप परिणामोंको प्रमाद, क्रोध मान माया लोभ रूप परिणामोंको कषाय और मनवचनकायके निमित्तसे आत्माके चंचलरूप होनेको योग कहते हैं । इस प्रकार बन्धके हेतु कहे हैं ।


उत्कर्षेणापकर्षेण स्थितिर्या कर्मणां मता ।
स्थितिबन्धः स विज्ञेय इतरस्तत्फलोदयः ॥48॥

अर्थ: जो उत्कृष्ट, जघन्य तथा मध्यके भेदोंरूप बढती घटती कर्मोंकी स्थिति (कालकी मर्यादा) कही गई है, उसे स्थितिबंध और कर्मके फलके उदय होनेको इतर अर्थात् अनुभागबंध जानना चाहिये ।


परस्परप्रदेशानुप्रवेशो जीवकर्मणोः ।
यः संश्लेषः स निर्दिष्टो बन्धो विध्वस्तबन्धनैः ॥49॥

अर्थ: जो जीव और कर्म इन दोनोंके प्रदेशोंका परस्पर अनुप्रवेश कहिये एक क्षेत्रावगाह होनेसे संबंध होता है, उसे बंधरहित सर्वज्ञदेवने प्रदेश बंध कहा है । इस प्रकार बंधतत्त्वका वर्णन किया ।


प्रागेव भावनातन्त्रे निर्जरास्रवसंवराः ।
कथिताः कीर्त्तयिष्यामि मोक्षमार्गं सहेतुकम् ॥50॥

अर्थ: निर्जरा, आस्रव और संवरका वर्णन पहिले द्वादश भावनाके प्रकरणमें कर आये हैं, इस कारण यहाँ नहीं किया । आगे मोक्षतत्त्वका वर्णन हेतुसहित करते हैं ।


एवं द्रव्याणि तत्त्वानि पदार्थान् कायसंयुतान् ।
यः श्रद्धत्ते स्वसिद्धान्तात्स स्यान्मुक्तेः स्वयंवरः ॥51॥

अर्थ: इस प्रकार छह द्रव्य, सप्त तत्त्व, नव पदार्थ, वा पंचास्तिकायका अपने सिद्धांतसे जो आत्मा श्रद्धान करता है, वह मुक्तिका स्वयं वर होता है अर्थात् मुक्तिरूपी कन्या उसे स्वयं वरण करती है । तात्पर्य यह है कि उसे मुक्ति प्राप्त होती है ।


इति जीवादयो भावा दिङ्मात्रेणात्र वर्णिताः ।
विशेषरुचिभिः सम्यग्विज्ञेयाः परमागमात् ॥52॥

अर्थ: इस प्रकार जीवादि पदार्थोंका दिग्दर्शनमात्र इस ग्रंथमें किया गया। विशेष जाननेकी रुचि रखनेवाले पुरुषोंको परमागमसे अर्थात् तत्त्वार्थसूत्रकी टीका तथा गोम्मटसारादि अन्य शास्त्रोंसे जानना चाहिए ।


सद्दर्शनमहारत्नं विश्वलोकैकभूषणम् ।
मुक्तिपर्यन्तकल्याणदानदक्षं प्रकीर्तितम् ॥53॥

अर्थ: यह सम्यग्दर्शन महारत्न समस्त लोकका आभूषण है और मोक्ष होने पर्यन्त आत्माको कल्याण देनेवालोंमें चतुर है ।


चरणज्ञानयोर्बीजं यमप्रशमजीवितम् ।
तपःश्रुताद्यधिष्टानं सद्भिः सद्दर्शनं मतम् ॥54॥

अर्थ: इस सम्यग्दर्शनको सत्पुरुषोंने चारित्र और ज्ञानका बीज अर्थात् उत्पन्न करनेका कारण माना है। क्योंकि इसके बिना सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र होता ही नहीं, तथा यम (महाव्रतादि) और प्रशम (विशुद्धभाव) का यह जीवनस्वरूप है। इस सम्यग्दर्शनके बिना यम व प्रशम निर्जीवके समान हैं। इसी प्रकार यह तप और स्वाध्यायका आश्रय है। इसके बिना ये निराश्रय हैं। इस प्रकार जितने शमदमबोधव्रततपादि कहे हैं, उनको यह सफल करता है। इसके बिना वे मोक्षफलके दाता नहीं हो सकते ।


अप्येकं दर्शनं श्लाघ्यं चरणज्ञानविच्युतम् ।
न पुनः संयमज्ञाने मिथ्यात्वविषदूषिते ॥55॥

अर्थ: यह सम्यग्दर्शन चारित्रज्ञानके न होने पर भी प्रशंसनीय कहलाता है और इसके बिना संयम (चारित्र) और ज्ञान मिथ्यात्वरूपी विषसे दूषित होते हैं अर्थात् सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिके बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान और चारित्र कुचारित्र कहाता है ।


अत्यल्पमपि सूत्रज्ञैर्दृष्टिपूर्वं यमादिकम् ।
प्रणीतं भवसम्भूतक्लेशप्राग्भारभेषजम् ॥56॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनसहित यम नियम तपादिक थोडे भी हों तो उन्हें सूत्रके ज्ञाता आचार्योंने संसारसे उत्पन्न हुए क्लेशदुःखोंके बडे भारको भी औषधिके समान कहा है ।


मन्ये मुक्तः स पुण्यात्मा विशुद्धं यस्य दर्शनं ।
यतस्तदेव मुक्त्यङ्गमग्रिमं परिकीर्तितम् ॥57॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जिसको निर्मल अतिचाररहित सम्यग्दर्शन है, वही पुण्यात्मा वा महाभाग्य मुक्त है, ऐसा मैं मानता हूँ। क्योंकि सम्यग्दर्शन ही मोक्षका मुख्य अंग कहा गया है। मोक्षमार्गके प्रकरणमें सम्यग्दर्शन ही मुख्य कहा गया है ।


प्राप्नुवन्ति शिवं शश्वच्चरणज्ञानविश्रुताः ।
अपि जीवा जगत्यस्मिन्न पुनर्दर्शनं विना ॥58॥

अर्थ: इस जगतमें जो जीव चारित्र और ज्ञानके कारण सदा जगतमें प्रसिद्ध है, वे भी सम्यग्दर्शनके बिना मोक्षको नहीं पाते ।


अतुलसुखनिधानं सर्वकल्याणबीजं
जननजलधिपोतं भव्यसत्त्वैकपात्रम् ।
दुरिततरुकुठारं पुण्यतीर्थप्रधानं
पिबत जितविपक्षं दर्शनाख्यं सुधाम्बुम् ॥59॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हे भव्य जीवों ! तुम सम्यग्दर्शन नामक अमृतका पान करो। क्योंकि यह सम्यग्दर्शन अतुल्य सुखका निधान (खजाना) है, समस्त कल्याणोंका बीज अर्थात् कारण है, संसाररूपी समुद्रसे तारनेके लिए जहाज है, तथा इसको धारण करनेवाले एक मात्र पात्र भव्य जीव ही हैं। अभव्य जीव इसके पात्र कदापि नहीं हो सकते। और यह सम्यग्दर्शन पापरूपी वृक्षको काटनेके लिये कुठार (कुल्हाडे) के समान है, तथा पवित्र तीर्थोंमें यही प्रधान है, अर्थात् मुख्य है। और जीत लिया है अपने विपक्ष अर्थात् मिथ्यात्वरूपी शत्रुको जिसने ऐसा यह सम्यग्दर्शन है। अतः भव्यजीवोंको सबसे पहिले इसे ही अंगीकार करना चाहिए ।

सर्ग 7: सम्यग्ज्ञान (श्लोक 1 से 23)

त्रिकालगोचरानन्तगुणपर्यायसंयुताः ।
यत्र भावाः स्फुरन्त्युच्चैस्तज्ज्ञानं ज्ञानिनां मतम् ॥1॥

अर्थ: जिसमें तीन कालके गोचर अनन्तगुणपर्यायसंयुक्त पदार्थ अतिशयताके साथ प्रतिभासित होते हैं, उसको ज्ञानी पुरुषोंने ज्ञान कहा है। यह सामान्यतासे पूर्णज्ञानका स्वरूप है। आकाशद्रव्य अनन्तानन्तप्रदेशी है। उसके मध्यमें असंख्यातप्रदेशी लोकाकाश है। उसमें जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ये अनन्तद्रव्य हैं। उनके तीन काल संबंधी अनन्त-अनन्त-भिन्न भिन्न पर्याय है। उन सबको युगपत् (एक समयमें) जाननेवाला पूर्णज्ञान आत्माका निश्चय स्वभाव है। कर्मके निमित्तसे उसके भेद हो गये हैं ।


ध्रौव्यादिकलितैर्भावैर्निर्भरं कलितं जगत् ।
बिम्बितं युगपद्यत्र तज्ज्ञानं योगिलोचनम् ॥2॥

अर्थ: उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-स्वभावी पदार्थोंसे अतिशय भरा हुआ यह जगत् जिस ज्ञानमें युगपत् प्रतिबिम्बित हो वही ज्ञान योगीश्वरोंके नेत्रके समान है।


मतिश्रुतावधिज्ञानं मनःपर्ययकेवलम् ।
तदित्थं सान्वयैर्भेदैः पञ्चधेति प्रकल्पितम् ॥3॥

अर्थ: यह ज्ञान मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल इन भेदोंसे पाँच प्रकारका कल्पना किया गया है।


अवग्रहादिभिर्भेदैर्बह्वाद्यन्तर्भवैः परैः ।
षट्त्रिंशत्त्रिशतं प्राहुर्मतिज्ञानं प्रपञ्चतः ॥4॥

अर्थ: अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा तथा बहु, बहुविधि, आदि बारह भेदोंसे विस्तार करनेसे मतिज्ञानके तीन सौ छत्तीस भेद होते हैं। सो तत्त्वार्थसूत्रकी टीकाओंसे जानना चाहिये ।


प्रसृतं बहुधाऽनेकैरङ्गपूर्वैः प्रकीर्णकैः ।
स्याच्छब्दलाञ्छितं तद्धि श्रुतज्ञानमनेकधा ॥5॥

अर्थ: ग्यारह अंग, चौदह पूर्व और चौदह प्रकीर्णक इनसे बहुत प्रकारसे विस्तृत, स्यात् शब्दसे चिह्नित श्रुतज्ञान अनेक प्रकारका है।


देवनारकयोर्ज्ञेयस्त्ववधिर्भवसम्भवः ।
षड्विकल्पश्च शेषाणां क्षयोपशमलक्षणः ॥6॥

अर्थ: देव और नारकी जीवोंको तो अवधिज्ञान भवसे ही उत्पन्न होता है । उसका कारण नरकगति वा देवगति ही है, इस कारण उसे भवप्रत्यय अवधि कहते हैं । और मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंको जो क्षयोपशमसे होता है सो छह प्रकारका होता है, जैसे- १ अनुगामी, २ अननुगामी, ३ हीयमान, ४ वर्द्धमान, ५ अवस्थित, ६ अनवस्थित, इस प्रकार छह भेद हैं ।


ऋजुर्विपुल इत्येवं स्यान्मनःपर्ययो द्विधा ।
विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषोऽवगम्यताम् ॥7॥

अर्थ: मनःपर्ययज्ञान, ऋजुमति तथा विपुलमति भेदसे दो प्रकारका है। इन दोनोंमें विशुद्धता और अप्रतिपातकी विशेषता है ।


अशेषद्रव्यपर्यायविषयं विश्वलोचनम् ।
अनन्तमेकमत्यक्षं केवलं कीर्तितं बुधैः ॥8॥

अर्थ: जो समस्त द्रव्योंके पर्यायोंको जाननेवाला है, सब जगतके देखने जाननेका नेत्र है तथा अनंत है, एक है और अतीन्द्रिय है अर्थात् मति श्रुत ज्ञानके समान इन्द्रियजनित नहीं है, केवल आत्मासे ही जानता है, उसको विद्वानोंने केवलज्ञान कहा है ।


कल्पनातीतमभ्रान्तं स्वपरार्थावभासकम् ।
जगज्ज्योतिरसंदिग्धमनन्तं सर्वदोदितम् ॥9॥

अर्थ: तथा केवलज्ञान कल्पनातीत है, विषयको जाननेमें किसी प्रकारकी कल्पना नहीं है, स्पष्ट जानता है तथा आपको और परको दोनोंको जानता है। जगतका प्रकाश करनेवाला संदेहरहित, अनन्त और सदाकाल उदयरूप है तथा इसका किसी समयमें किसी प्रकारसे भी अभाव नहीं होता है ।


अनन्तानन्तभागेऽपि यस्य लोकश्चराचरः ।
अलोकश्च स्फुरत्युच्चैस्तज्ज्योतिर्योगिनां मतम् ॥10॥

अर्थ: जिस केवलज्ञानके अनन्तानन्त भाग करने पर भी यह चराचर लोक प्रतिभासित होता है तथा अलोकाकाश जो अनन्तानन्तप्रदेशी है, वह भी प्रकट प्रतिभासता है वह केवलज्ञानरूप ज्योति योगियोंके मानी गई है ।


अगम्यं यन्मृगाङ्कस्य दुर्भेद्यं यद्रवेरपि ।
तद्दुर्बोधोद्धतं ध्वान्तं ज्ञानभेद्यं प्रकीर्त्तितम् ॥11॥

अर्थ: जिस मिथ्याज्ञानरूप उत्कट अन्धकारको चन्द्रमा तथा सूर्य भी नष्ट नहीं कर सकता ऐसा दुर्भेद्य है, वह मिथ्यात्वान्धकार ज्ञानसे ही नष्ट किया जाता है। अर्थात् ज्ञान ही उसको भेद सकता है ।


दुःखज्वलनतप्तानां संसारोग्रमरुस्थले ।
विज्ञानमेव जन्तूनां सुधाम्बु प्रीणनक्षमः ॥12॥

अर्थ: इस संसाररूपी उग्रमरुस्थलमें दुःखरूप अग्निसे तप्तायमान जीवोंको यह सत्यार्थ ज्ञान ही अमृतरूप जलसे तृप्त करनेको समर्थ है ।


निरालोकं जगत्सर्वमज्ञानतिमिराहतम् ।
तावदास्ते उदेत्युच्चैर्न यावज्ज्ञानभास्करः ॥13॥

अर्थ: जब तक ज्ञानरूपी सूर्यका उदय नहीं होता तभी तक यह समस्त जगत् अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित है। अर्थात् ज्ञानरूपी सूर्यका उदय होते ही अज्ञानरूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है ।


बोध एव दृढः पाशो हृषीकमृगबन्धने ।
गारुडश्च महामन्त्रः चित्तभोगिविनिग्रहे ॥14॥

अर्थ: इन्द्रियरूपी मृगोंको बाँधनेके लिये ज्ञान ही एक दृढ फाँसी है, अर्थात् ज्ञानके बिना इन्द्रियाँ वश नहीं होती तथा चित्तरूपी सर्पका निग्रह करनेके लिये ज्ञान ही एक गारुड महामन्त्र है। अर्थात् मन भी ज्ञानसे ही वशीभूत होता है ।


निशातं विद्धि निस्त्रिंशं भवारातिनिपातने ।
तृतीयमथवा नेत्रं विश्वतत्त्वप्रकाशने ॥15॥

अर्थ: ज्ञान ही तो संसाररूप शत्रुको निपात (नष्ट) करनेके लिये तीक्ष्ण खड्ग है और ज्ञान ही समस्त तत्त्वोंको प्रकाशित करनेके लिये तीसरा नेत्र है ।


क्षीणतन्द्रा जितक्लेशा वीतसङ्गाः स्थिराशयाः ।
तस्यार्थेऽमी तपस्यन्ति योगिनः कृतनिश्चयाः ॥16॥

अर्थ: प्रमादको क्षीण करनेवाले, क्लेशोंको जीतनेवाले, परिग्रहरहित, स्थिर आशयवाले ये योगीगण उस ज्ञानकी प्राप्तिके लिये यत्नपूर्वक तपस्या करते हैं।


वेष्टयत्याऽऽत्मनात्मानमज्ञानी कर्मबन्धनैः ।
विज्ञानी मोचयत्येव प्रबुद्धः समयान्तरे ॥17॥

अर्थ: अज्ञानी पुरुष आपको अपनेसे ही कर्मरूपी बंधनोंसे वेष्टित कर लेता है। और जो भेदविज्ञानी है वह किसी कालमें सावधान होकर अपनेको कर्मबन्धनोंसे छुडा लेता है ।


यज्ञन्मकोटिभिः पापं जयत्यज्ञस्तपोबलात् ।
तद्विज्ञानी क्षणार्द्धेन दहत्यतुलविक्रमः ॥18॥

अर्थ: जो अज्ञानी है वह तों करोडों जन्म लेकर तपके प्रभावसे पापको जीतता है । और उसी पापको अतुल्य पराक्रमवाला भेदविज्ञानी आधे क्षणमें ही भस्म कर देता है ।


अज्ञानपूर्विका चेष्टा यतेर्यस्यात्र भूतले ।
स बध्नात्यात्मनात्मानं कुर्वन्नपि तपश्चिरम् ॥19॥

अर्थ: जिस यतिकी इस पृथिवी पर अज्ञानपूर्वक चेष्टा (क्रिया) है वह चिरकालसे तपस्या करता हुआ भी अपने आत्माको अपने ही कृत्यसे बाँध लेता है । क्योंकि अज्ञानपूर्वक तप बन्धका ही कारण है ।


ज्ञानपूर्वमनुष्टानं निःशेषं यस्य योगिनः ।
न तस्य बन्धमायाति कर्म कस्मिन्नपि क्षणे ॥20॥

अर्थ: जिस मुनिके समस्त आचरण ज्ञानपूर्वक होते हैं उसको किसी कालमें भी कर्मबन्ध नहीं होता ।


यत्र बालश्चरत्यस्मिन्पथि तत्रैव पण्डितः ।
बालः स्वमपि बध्नाति मुच्यते तत्त्वविद् ध्रुवम् ॥21॥

अर्थ: जिस मार्गमें अज्ञानी चलते हैं उसी मार्गमें विद्वज्जन चलते हैं, परन्तु अज्ञानी तो अपने आत्माको बाँध लेता है और तत्त्वज्ञानी बन्धरहित हो जाता है। यह ज्ञानका माहात्म्य है ।


दुरिततिमिरहंसं मोक्षलक्ष्मीसरोजं
मदनभुजगमन्त्रं चित्तमातङ्गसिंहं ।
व्यसनघनसमीरं विश्वतत्त्वैकदीपं
विषयशफरजालं ज्ञानमाराधय त्वं ॥22॥

अर्थ: हे भव्य जीव ! तू ज्ञानका आराधन कर । क्योंकि ज्ञान पापरूपी तिमिर (अंधकारको) नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है और मोक्षरूपी लक्ष्मीके निवास करनेके लिये कमलके समान है तथा कामरूपी सर्पके कीलनेको मन्त्रके समान और मनरूपी हस्तीको सिंहके समान है तथा व्यसन-आपदाकष्टरूपी मेघोंको उडानेके लिये पवनके समान और समस्त तत्त्वोंको प्रकाश करनेके लिये दीपकके समान है तथा विषयरूपी मत्स्योंको पकडनेके लिये जालके समान है ।


अस्मिन्संसारकक्षे यमभुजगविषाक्रान्तनिःशेषसत्त्वे
क्रोधाद्युत्तुङ्गशैले कुटिलगतिसरित्पातसन्तानभीमे ।
मोहान्धाः संचरन्ति स्खलनविधुरिताः प्राणिनस्तावदेते
यावद्विज्ञानभानुर्भवभयदमिदं नोच्छिनत्त्यन्धकारम् ॥23॥

अर्थ: जब तक इस संसाररूपी वनमें यह सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्य संसाररूप भयके देनेवाले अज्ञान अंधकारका उच्छेद नहीं करता तब तक ही मोहसे अंधे हुए प्राणी अपने स्वरूप उत्तम मार्गसे छूटनेसे गिरते पडते पीडित हुए चलते हैं । कैसा है संसाररूपी वन ? जिसमें कि पापरूपी सर्पके विषसे समस्त प्राणी व्याप्त हैं अर्थात् दबे हैं; तथा क्रोधादिक पापरूपी बडे बडे ऊँचे पर्वत हैं और वक्र गमनवाली दुर्गतिरूपी नदियोंमें गिरनेसे उत्पन्न हुए सन्तापसे अतिशय भयानक है । ज्ञानरूप सूर्यके प्रकाश होनेसे किसी प्रकारका दुःख वा भय नहीं रहता । इस प्रकार सम्यग्ज्ञानका वर्णन किया ।