ज्ञानार्णव श्लोक एवं अर्थ (आचार्य शुभचन्द्र) | Gyanarnav Shlok Evam Arth (Acharya Shubhchandra)

सर्ग 8: अहिंसा महाव्रत (श्लोक 1 से 59)

यद्विशुद्धेः परं धाम यद्योगिजनजीवितम् ।
तद्वृत्तं सर्वसावद्यपर्युदासैकलक्षणम् ॥1॥

अर्थ: जो विशुद्धताका उत्कृष्ट धाम है तथा योगीश्वरोंका जीवन है और समस्त प्रकारकी पापरूप प्रवृत्तियोंसे दूर रहनेका लक्षण है, उसको सम्यक्चारित्र कहते हैं।


सामायिकादिभेदेन पञ्चधा परिकीर्तितम् ।
ऋषभादिजिनैः पूर्वं चारित्रं सप्रपञ्चकम् ॥2॥

अर्थ: यह चारित्र पूर्व कालमें श्री ऋषभदेव तीर्थंकर महाराजसे लेकर समस्त तीर्थंकरोंने १ सामायिक, २ छेदोपस्थापना, ३ परिहारविशुद्धि, ४ सूक्ष्मसांपराय और ५ यथाख्यातचारित्र, ऐसे पाँच प्रकारका कहा है ।


पञ्चमहाव्रतमूलं समितिप्रसरं नितान्तमनवद्यम् ।
गुप्तिफलभारनम्रं सन्मतिना कीर्त्तितं वृत्तम् ॥3॥

अर्थ: तथा वही चारित्र श्रीवर्द्धमानस्वामी तीर्थंकर भगवानने तेरह प्रकारका कहा है। पाँच महाव्रत हैं मूल जिसका तथा पाँच समिति हैं प्रसर (फैलाव) जिसका और अत्यन्त निर्दोष तीन गुप्तिरूप फलके भारसे नम्रीभूत ऐसा चारित्ररूपी वृक्ष है।


पञ्च पञ्च त्रिभिर्भेदैर्यदुक्तं मुक्तसंशयैः ।
भवभ्रमणभीतानां चरणं शरणं परम् ॥4॥

अर्थ: संशयरहित गणधरादिकोंने पाँच, पाँच और तीन भेदसे जो चारित्र कहा है वह संसारके भ्रमणसे भयभीत पुरुषोंके हेतु एक उत्तम शरण है। अर्थात् जो मुनि संसारके भयसे भयभीत हैं वे इस चारित्रका पालन करनेसे भयरहित (अभय) हो जाते हैं ।


पञ्चव्रतं समित्पञ्च गुप्तित्रयपवित्रितम् ।
श्रीवीरवदनोद्गीर्णं चरणं चन्द्रनिर्मलम् ॥5॥

अर्थ: पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप तेरह प्रकारका चारित्र जो श्रीवीर (वर्द्धमान) तीर्थंकर भगवानके मुखसे प्रकट हुआ है वह चन्द्रमाके समान निर्मल है ।


हिंसायामनृते स्तेये मैथुने च परिग्रहे ।
विरतिर्व्रतमित्युक्तं सर्वसत्त्वानुकम्पकैः ॥6॥

अर्थ: हिंसा, अनृत, चोरी, मैथुन और परिग्रह इन पापोंमें विरति कहिये त्यागभाव होना ही व्रत है। समस्त जीवों पर दयालु मुनियोंने ऐसा ही कहा है ।


सत्याद्युत्तरनिःशेषयमजातनिबन्धनम् ।
शीलैश्वर्याद्यधिष्ठानमहिंसाख्यं महाव्रतम् ॥7॥

अर्थ: अहिंसा नामा महाव्रत सत्यादिक अगले चार महाव्रतोंका तो कारण है, क्योंकि सत्य, अचौर्यादि, विना अहिंसाके नहीं हो सकते। और शीलादिसहित उत्तरगुणोंकी चर्याका स्थान भी यह अहिंसा ही है। अर्थात् समस्त उत्तर गुण भी इस अहिंसा महाव्रतके आश्रय हैं ।


वाक्चित्ततनुभिर्यत्र न स्वप्नेऽपि प्रवर्त्तते ।
चरस्थिराङ्गिनां घातस्तदाद्यं व्रतमीरितम् ॥8॥

अर्थ: जिसमें मनवचनकायसे त्रस और स्थावर जीवोंका घात स्वप्नमें भी न हो उसे आद्यव्रत (प्रथम महाव्रत-अहिंसा) कहते हैं ।


मृते वा जीविते वा स्याज्जन्तुजाते प्रमादिनाम् ।
बन्ध एव न बन्धः स्याद्धिंसायाः संवृतात्मनाम् ॥9॥

अर्थ: जीवोंके मरते वा जीते प्रमादी पुरुषोंको तो निरन्तर ही हिंसाका पापबन्ध होता ही रहता है और जो संवरसहित अप्रमादी हैं उनको जीवोंकी हिंसा होते हुए भी हिंसारूप पापका बंध नहीं होता।


संरम्भादित्रिकं योगैः कषायैर्व्याहतं क्रमात् ।
शतमष्टाधिकं ज्ञेयं हिंसाभेदैस्तु पिण्डितम् ॥10॥

अर्थ: संरंभ, समारंभ और आरंभ इस त्रिकको मनवचनकायकी तीन-तीन प्रवृत्तियोंसे तथा क्रोध, मान, माया, लोभ, इन चार कषायों और कृत, कारित, अनुमोदना (अनुमति वा सम्मति) से क्रमसे गुणन करने पर हिंसाके भेद (१०८) होते हैं, तथा अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन कषायोंके उत्तरभेदोंसे गुणन करनेसे ४३२ भेद भी हिंसाके होते हैं ।


अतः प्रमादमुत्सृज्य भावशुद्ध्याङ्गिसन्ततिम् ।
यमप्रशमसिद्ध्यर्थं बंधुबुद्ध्या विलोकय ॥11॥

अर्थ: उपर्युक्त संरंभादिक हिंसापरिणामके १०८ अथवा ४३२ भेद हैं । अतः हे आत्मन् ! तू प्रमादको छोडकर भावोंकी शुद्धिके लिये जीवोंकी सन्ततिको (समूहको) बन्धु (भाई, हित, मित्र) की दृष्टिसे अवलोकन किया कर । अर्थात् प्राणीमात्रसे शत्रुभाव न रख कर सबसे मित्रभाव रख और सबकी रक्षामें मनवचनकायादिकसे प्रवृत्ति कर ।


यज्जन्तुवधसंजातकर्मपाकाच्छरीरिभिः ।
श्वभ्रादौ सह्यते दुःखं तद्वक्तुं केन पार्यते ॥12॥

अर्थ: जीवोंके घात (हिंसा) करनेसे पापकर्म उपार्जन होता है उसका जो फल अर्थात् दुःख नरकादिक गतिमें जीव भोगते हैं वह वचनके अगोचर है। अर्थात् वचनसे कहनेमें नहीं आ सकता ।


हिंसैव नरकागारप्रतोली प्रांशुविग्रहा ।
कुठारीव द्विधा कर्तुं भेत्तुं शूलोऽतिनिर्दया ॥13॥

अर्थ: यह हिंसा ही नरकरूपी घरमें प्रवेश करनेके लिये प्रतोली (मुख्य दरवाजा) है तथा जीवोंको काटनेके लिये कुठार (कुल्हाडा) और विदारनेके लिये निर्दय शूली है ।


क्षमादिपरमोदारैर्यमैर्यो वर्द्धितश्चिरम् ।
हन्यते स क्षणादेव हिंसया धर्मपादपः ॥14॥

अर्थ: जो धर्मरूप वृक्ष उत्तम क्षमादिक परम उदार संयमोंसे बहुत कालसे बढाया है वह इसी हिंसारूप कुठारसे क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है ।


तपोयमसमाधीनां ध्यानाध्ययनकर्मणां ।
तनोत्यविरतं पीडां हृदि हिंसा क्षणस्थिता ॥15॥

अर्थ: हृदयमें क्षणभर भी स्थान पाई हुई यह हिंसा, तप, यम, समाधि और ध्यानाध्ययनादि कार्योंको निरंतर पीडा देती है।


अहो व्यसनविध्वस्तैर्लोकः पाखण्डिभिर्बलात् ।
नीयते नरकं घोरं हिंसाशास्त्रोपदेशकैः ॥16॥

अर्थ: आचार्य महाराज आश्चर्यके साथ कहते हैं कि देखो ! धर्म तो दयामयी जगतमें प्रसिद्ध है परन्तु विषयकषायसे पीडित पाखण्डी हिंसाका उपदेश देनेवाले (यज्ञादिकमें पशु होमने तथा देवी आदिके बलिदान करने आदि हिंसाविधान करनेवाले) शास्त्रोंको रचकर जगतके जीवोंको बलात्कार भयानक नरकादिकमें ले जाते हैं। यह बडा ही अनर्थ है ।


रौरवादिषु घोरेषु विशन्ति पिशिताशनाः ।
तेष्वेव हि कदर्थ्यन्ते जन्तुघातकृतोद्यमाः ॥17॥

अर्थ: जो मांसके खानेवाले हैं वे सातवें नरकके रौरवादि बिलोंमें प्रवेश करते हैं और वहीं पर जीवोंको घात करनेवाले शिकारी आदिक भी पीडित होते हैं ।


शान्त्यर्थं देवपूजार्थं यज्ञार्थमथवा नृभिः ।
कृतः प्राणभृतां घातः पातयत्यविलम्बितम् ॥18॥

अर्थ: अपनी शान्तिके अर्थ अथवा देवपूजाके तथा यज्ञके अर्थ जो मनुष्य जीवघात (जीवहिंसा) करते हैं वह घात भी जीवोंको शीघ्र ही नरकमें डालता है ।


हिंसैव दुर्गतेर्द्वारं हिंसैव दुरितार्णवः ।
हिंसैव नरकं घोरं हिंसैव गहनं तमः ॥19॥

अर्थ: हिंसा ही दुर्गतिका द्वार है, पापका समुद्र है तथा हिंसा ही घोर नरक और महा अन्धकार है ।


निःस्पृहत्वं महत्त्वं च नैराश्यं दुष्करं तपः ।
कायक्लेशश्च दानं च हिंसकानामपार्थकम् ॥20॥

अर्थ: जो हिंसक पुरुष है उनकी निःस्पृहता, महत्ता, आशारहितता, दुष्कर तप करना, कायक्लेश और दान करना आदि समस्त धर्मकार्य व्यर्थ हैं अर्थात् निष्फल हैं ।


कुलक्रमागता हिंसा कुलनाशाय कीर्तिता ।
कृता च विघ्नशान्त्यर्थं विघ्नौघायैव जायते ॥21॥

अर्थ: कुलक्रमसे जो हिंसा चली आई है वह उस कुलको नाश करनेके लिये ही कही गई है तथा विघ्नकी शान्तिके अर्थ जो हिंसा की जाती है वह विघ्नसमूहको बुलानेके लिये ही है ।


सौख्यार्थे दुःखसन्तानं मङ्गलार्थेऽप्यमङ्गलम् ।
जीवितार्थे ध्रुवं मृत्युं कृता हिंसा प्रयच्छति ॥22॥

अर्थ: सुखके अर्थ की हुई हिंसा दुःखकी परिपाटी करती है, मंगलार्थ की हुई हिंसा अमंगल करती है तथा जीवनार्थ की हुई हिंसा मृत्युको प्राप्त कराती है । इस बातको निश्चय जानना ।


तितीर्षति ध्रुवं मूढः स शिलाभिर्नदीपतिम् ।
धर्मबुद्ध्याऽधमो यस्तु घातयत्यङ्गिसंचयम् ॥23॥

अर्थ: जो मूढ अधम धर्मकी बुद्धिसे जीवोंको मारता है सो पाषाणकी शिलाओं पर बैठकर समुद्रको तैरनेकी इच्छा करता है । क्योंकि वह नियमसे डूबेगा ।


प्रमाणीकृत्य शास्त्राणि यैर्वधः क्रियतेऽधमैः ।
सह्यते परलोके तैः श्वभ्रे शूलाधिरोहणम् ॥24॥

अर्थ: जो अधम शास्त्रोंका प्रमाण देकर जीवोंका वध करना धर्म बताते हैं वे मृत्यु होने पर नरकमें शूली पर चढाये जाते हैं ।


निर्दयेन हि किं तेन श्रुतेनाचरणेन च ।
यस्य स्वीकारमात्रेण जन्तवो यान्ति दुर्गतिम् ॥25॥

अर्थ: जिसमें दया नहीं है ऐसे शास्त्र तथा आचरणसे क्या लाभ ? क्योंकि ऐसे शास्त्रके वा आचरणके अंगीकार मात्रसे ही जीव दुर्गतिको चले जाते हैं ।


वरमेकाक्षरं ग्राह्यं सर्वसत्त्वानुकम्पनम् ।
न त्वक्षपोषकं पापं कुशास्त्रं धूर्त्तचर्चितम् ॥26॥

अर्थ: सर्व प्राणियों पर दया करनेवाला तो एक अक्षर श्रेष्ठ है और ग्रहण करने योग्य है; परन्तु धूर्त तथा विषयकषायी पुरुषोंका रचा हुआ इंद्रियोंको पोषनेवाला ज़ो पापरूप कुशास्त्र है वह श्रेष्ठ नहीं है ।


चरुमन्त्रौषधानां वा हेतोरन्यस्य वा क्वचित् ।
कृता सती नरैर्हिंसा पातयत्यविलम्बितम् ॥27॥

अर्थ: देवताकी पूजाके लिये रचे हुए नैवेद्य तथा मंत्र और औषधके निमित्त अथवा अन्य किसी भी कार्यके लिये की हुई हिंसा जीवोंको नरकमें ले जाती हैं ।


विहाय धर्मं शमशीललाञ्छितं दयावहं भूतहितं गुणाकरम् ।
मदोद्धता अक्षकषायवञ्चिता दिशन्ति हिंसामपि दुःखशान्तये ॥28॥

अर्थ: जो पुरुष गर्वसे उद्धत हैं और इन्द्रियोंके विषय तथा कषायोंसे ठगे गये हैं वे ही मन्दकषाय तथा उपशमरूप शीलसे चिह्नित दयामयी जीवोंके हित करनेवाले गुणोंकी खानि दयाधर्मको छोडकर दुःखकी शान्तिके लियें हिंसाको भी धर्म कहकर उपदेश करते हैं ।


धर्मबुद्ध्याऽधमैः पापं जन्तुघातादिलक्षणम् ।
क्रियते जीवितस्यार्थे पीयते विषमं विषं ॥29॥

अर्थ: जो पापी धर्मकी बुद्धिसे जीवघातरूपी पापको करते हैं वे अपने जीवनकी इच्छासे हलाहल विषको पीते हैं ।


एतत्समयसर्वस्वमेतत्सिद्धान्तजीवितम् ।
यज्जन्तुजातरक्षार्थं भावशुद्ध्या दृढं व्रतम् ॥30॥

अर्थ: वही तो मतका सर्वस्व है और वही सिद्धान्तका रहस्य है जो जीवोंके समूहकी रक्षाके लिये है एवं वही भावशुद्धिपूर्वक दृढ व्रत है ।


श्रूयते सर्वशास्त्रेषु सर्वेषु समयेषु च ।
“अहिंसालक्षणो धर्मः” तद्विपक्षश्च पातकम् ॥31॥

अर्थ: समस्त मतोंके समस्त शास्त्रोंमें यही सुना जाता है कि अहिंसालक्षण तो धर्म है और इसका प्रतिपक्षी हिंसा करना ही पाप है । इस सिद्धान्तसे जो विपरीत वचन हो वह सब विषयाभिलाषी जिह्वालंपट जीवोंके दूरसे ही तजने योग्य जानना चाहिये ।


अहिंसैव जगन्माताऽहिंसैवानन्दपद्धतिः ।
अहिंसैव गतिः साध्वी श्रीरहिंसैव शाश्वती ॥32॥

अर्थ: अहिंसा ही तो जगतकी माता है क्योंकि समस्त जीवोंकी प्रतिपालना करनेवाली है । अहिंसा ही आनन्दकी सन्तति अर्थात् परिपाटी है । अहिंसा ही उत्तम गति और शाश्वती लक्ष्मी है । जगतमें जितने उत्तमोत्तम गुण हैं वे सब इस अहिंसामें ही हैं ।


अहिंसैव शिवं सूते दत्ते च त्रिदिवश्रियं ।
अहिंसैव हितं कुर्याद् व्यसनानि निरस्यति ॥33॥

अर्थ: यह अहिंसा ही मुक्तिको करती है तथा स्वर्गकी लक्ष्मीको देती है और अहिंसा ही आत्माका हित करती है तथा समस्त कष्टरूप आपदाओंको नष्ट करती है ।


सप्तद्वीपवतीं धात्रीं कुलाचलसमन्विताम् ।
नैकप्राणिवधोत्पन्नं दत्वा दोषं व्यपोहति ॥34॥

अर्थ: यदि कुलाचल पर्वतोंके सहित सात द्वीपकी पृथ्वी भी दान कर दी जाय तो भी एक प्राणीको मारनेका पाप दूर नहीं हो सकता है ।


सकलजलधिवेलावारिसीमां धरित्रीं
नगरनगसमग्रां स्वर्णरत्नादिपूर्णाम् ।
यदि मरणनिमित्ते कोऽपि दद्यात्कथंचित्
तदपि न मनुजानां जीविते त्यागबुद्धिः ॥35॥

अर्थ: यदि कोई किसी मनुष्यको मर जानेके बदलेमें नगर, पर्वत तथा सुवर्ण रत्न धन धान्यादिसे भरी हुई समुद्रपर्यन्तकी पृथ्वीका दान करें तो भी अपने जीवनको त्याग करनेमें उसकी इच्छा नहीं होगी ।


आत्मैवोत्क्षिप्य तेनाशु प्रक्षिप्तः श्वभ्रसागरे ।
स्नेहभ्रमभयेनापि येन हिंसा समर्थिता ॥36॥

अर्थ: जिस पुरुषने किसीकी प्रीतिके भ्रमसे अथवा किसीके भयसे हिंसाका समर्थन किया कि हिंसा करना बुरा नहीं है तो ऐसा समझो कि उसने अपने आत्माको उसी समय नरकरूपी समुद्रमें डाल दिया ।


शूलचक्रासिकोदण्डैरुद्युक्ताः सत्त्वखण्डने ।
येऽधमास्तेऽपि निस्त्रिंशैर्देवत्वेन प्रकल्पिताः ॥37॥

अर्थ: जो पापी त्रिशूल, चक्र, तलवार और धनुष इत्यादि शस्त्रोंसे जीवोंको घात करनेमें उद्यत हैं ऐसे चंडी, काली, भैरवादिकोंको भी निर्दय पुरुष देवता मानकर उनकी स्थापना करते हैं ।


बलिभिर्दुर्बलस्यात्र क्रियते यः पराभवः ।
परलोके स तैस्तस्मादनन्तः प्रविषह्यते ॥38॥

अर्थ: जो बलवान् पुरुष इस लोकमें निर्बलका पराभव करता वा सताता है वह परलोकमें उससे अनन्तगुणा पराभव सहता है । अर्थात्-जो कोई बलवान् निर्बलको दुःख देता है तो उसका अनन्त गुणा दुःख वह स्वयं अगले जन्ममें भोगता है ।


भयवेपितसर्वाङ्गाननाथान् जीवितप्रियान् ।
निघ्नद्भिः प्राणिनः किं तैः स्वं ज्ञातमजरामरं ॥39॥

अर्थ: जिनके सब अंग भयसे कंपित हैं, जिनका कोई रक्षक नहीं, जो अनाथ हैं, जिनको जीवन ही एक मात्र प्रिय वस्तु है, ऐसे प्राणियोंको जो मारते हैं उन्होंने क्या अपनेको अजरामर जान लिया ?


स्वपुत्रपौत्रसन्तानं वर्द्धयन्त्यादरैर्जनाः ।
व्यापादयन्ति वान्येषामत्र हेतुर्न बुद्ध्यते ॥40॥

अर्थ: यह बडा आश्चर्य है कि अपने पुत्रपौत्रादि सन्तानको तो बडे यत्नसे पालते और बढाते हैं परन्तु दूसरोंकी सन्तानका घात करते हैं । न मालूम कि इसमें क्या हेतु हैं ?


परमाणोः परं नाल्पं न महद्गगनात्परं ।
यथा किञ्चित्तथा धर्मो नाहिंसालक्षणात्परः ॥41॥

अर्थ: इस लोकमें जैसे परमाणुसे तो कोई छोटा वा अल्प नहीं है और आकाशसे कोई बडा नहीं है, इसी प्रकार अहिंसारूप धर्मसे बडा कोई धर्म नहीं है; यह जगत्प्रसिद्ध लोकोक्ति है । यथा-“अहिंसा परमो धर्मः हिंसा सर्वत्र गर्हिता” ।


तपः श्रुतयमज्ञानध्यानदानादिकर्मणां ।
सत्यशीलव्रतादीनामहिंसा जननी मता ॥42॥

अर्थ: तप, श्रुत (शास्त्रका ज्ञान), यम (महाव्रत), ज्ञान (बहुत जानना), ध्यान और दान करना तथा सत्य शील व्रतादिक जितने उत्तम कार्य हैं उन सबकी माता एक अहिंसा ही है । अहिंसाव्रतके पालन विना उपर्युक्त गुणोमेंसे एक भी नहीं होता, इस कारण अहिंसा ही समस्त धर्मकार्योकी उत्पन्न करनेवाली माता है ।


करुणार्द्रं च विज्ञानवासितं यस्य मानसम् ।
इन्द्रियार्थेषु निःसङ्गं तस्य सिद्धं समीहितम् ॥43॥

अर्थ: जिस पुरुषका मन करुणासे आर्द्र (गीला) हो तथा विशिष्ट ज्ञानसहित हो और इन्द्रियोंके विषयोंसे दूर हो, उसीको मनोवांछित कार्यकी सिद्धि होती है ।


निस्त्रिंश एव निस्त्रिंशं यस्य चेतोऽस्ति जन्तुषु ।
तपःश्रुताद्यनुष्ठानं तस्य क्लेशाय केवलम् ॥44॥

अर्थ: जिस पुरुषका चित्त जीवोंके लिये शस्त्रके समान निर्दय है उसका तप करना और शास्त्रका पढना आदि कार्य केवल कष्टके लिये ही होता है किन्तु कुछ भलाईके लिये नहीं होता ।


द्वयोरपि समं पापं निर्णीतं परमागमे ।
वधानुमोदयोः कर्त्रोरसत्संकल्पसंश्रयात् ॥45॥

अर्थ: घात करनेवाला और घात करनेवालेकी प्रशंसा करनेवाला इन दोनोंका पाप परमागममें समान ही निर्णय किया गया है क्योंकि जैसे घात करनेवालेको जो पाप हुआ सो भी अशुभ परिणामोंसे हुआ है, उसी प्रकार भले जाननेवालेके भी अशुभ संकल्प हुए विना उसकी अनुमोदना नहीं हो सकती है इस कारण हिंसा करने और उसको भला जाननेवालेको पाप बराबर लगता है ।


संकल्पाच्छालिमत्स्योऽपि स्वयंभूरमणार्णवे ।
महामत्स्याशुभेन स्वं नियोज्य नरकं गतः ॥46॥

अर्थ: देखो, स्वयंभूरमणसमुद्रमें शालिमत्स्य महामत्स्यके परिणामोंसे अपने परिणाम मिला कर नरकको गया । यह, अन्य कोई हिंसा करें उसका जो आप अनुमोदन करें तो उसके संकल्प मात्रसे उसीके समान पाप होनेका उदाहरण है ।


अहिंसैकाऽपि यत्सौख्यं कल्याणमथवा शिवम् ।
दत्ते तद्देहिनां नायं तपःश्रुतयमोत्करः ॥47॥

अर्थ: यह अहिंसा अकेली ही जीवोंको जो सुख, कल्याण वा अभ्युदय देती है वह तप, स्वाध्याय और यमनियमादि नहीं दे सकते हैं । क्योंकि धर्मके समस्त अङ्गोंमें अहिंसा ही एक मात्र प्रधान है ।


दूयते यस्तृणेनापि स्वशरीरे कदर्थिते ।
स निर्दयः परस्याङ्गे कथं शस्त्रं निपातयेत् ॥48॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने शरीरमें तिनका चुभने पर भी अपनेको दुःखी हुआ मानता है वह निर्दय होकर परके शरीर पर शस्त्र कैसे चलाता है ? यह बडा अनर्थ है ।


जन्मोग्रभयभीतानामहिंसैवौषधिः परा ।
तथाऽमरपुरीं गन्तुं पाथेयं पथि पुष्कलम् ॥49॥

अर्थ: इस संसाररूप तीव्र भयसे भयभीत होनेवाले जीवोंको यह अहिंसा ही एक परम औषधि है । क्योंकि यह सबका भय दूर करती है तथा स्वर्ग जानेके लिये अहिंसा ही मार्गमें अतिशय वा पुष्टिकारक पाथेयस्वरूप (भोजनादिकी सामग्री) है ।


किन्त्वहिंसैव भूतानां मातेव हितकारिणी ।
तथा रमयितुं कान्ता विनेतुं च सरस्वती ॥50॥

अर्थ: यह अहिंसा इतनी ही नहीं है, किन्तु जीवोंके लिये माताके समान रक्षा करनेवाली और स्त्रीके समान चित्तको आनन्द देनेवाली है तथा सदुपदेश देनेके लिये सरस्वतीके समान है ।


स्वान्ययोरप्यनालोक्य सुखं दुःखं हिताहितम् ।
जन्तून् यः पातकी हन्यात्स नरत्वेऽपि राक्षसः ॥51॥

अर्थ: जो पापी नर अपने और अन्यके सुख-दुःख वा हित-अहितको न विचार कर जीवोंको मारता है वह मनुष्यजन्ममें भी राक्षस है । क्योंकि मनुष्य होता तो अपना वा परका हिताहित विचारता ।


अभयं यच्छ भूतेषु कुरु मैत्रीमनिन्दिताम् ।
पश्यात्मसदृशं विश्वं जीवलोकं चराचरम् ॥52॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे भव्य ! तू जीवोंके लिये अभयदान दे तथा उनसे प्रशंसनीय मित्रता कर और समस्त त्रस व स्थावर जीवोंको अपने समान देख ।


जायन्ते भूतयः पुंसां याः कृपाक्रान्तचेतसाम् ।
चिरेणापि न ता वक्तुं शक्ता देव्यपि भारती ॥53॥

अर्थ: जिनका चित्त दयालु है उन पुरुषोंको जो सम्पदा होती है, उनका वर्णन सरस्वतीदेवी भी बहुत कालपर्यंत करे तो भी उससे नहीं हो सकता; फिर अन्यसे तो किया ही कैसे जा सकता है ? ।


किं न तप्तं तपस्तेन किं न दत्तं महात्मना ।
वितीर्णमभयं येन प्रीतिमालम्ब्य देहिनाम् ॥54॥

अर्थ: जिस महापुरुषने जीवोंको प्रीतिका आश्रय देकर अभयदान दिया उस महात्माने कौनसा तप नहीं किया और कौनसा दान नहीं दिया ! अर्थात् उस महापुरुषने समस्त तप, दान किया । क्योंकि अभयदानमें सब तप, दान आ जाते हैं ।


यथा यथा हृदि स्थैर्यं करोति करुणा नृणाम् ।
तथा तथा विवेकश्रीः परां प्रीतिं प्रकाशते ॥55॥

अर्थ: पुरुषोंके हृदयमें जैसे जैसे करुणाभाव स्थिरताको प्राप्त करता है तैसे तैसे विवेकरूपी लक्ष्मी उससे परम प्रीति प्रकट करती रहती है ।


अन्ययोगव्यवच्छेदादहिंसा श्रीजिनागमे ।
परैश्च योगमात्रेण कीर्तिता सा यदृच्छया ॥56॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के मार्गमें तो अहिंसा अन्ययोगव्यवच्छेदसे कही है अर्थात् अन्यमतोंमें ऐसी अहिंसाका योग ही नहीं है । इस जिनमतमें तो हिंसाका सर्वथा निषेध ही है और अन्यमतियोंने जो अहिंसा कही है सो योगमात्रसे ही कही है अर्थात् कहीं अहिंसा कही है और कहीं हिंसाका पोषण किया है, सो स्वेच्छापूर्वक उन्मत्तकी तरह कही है ।


तन्नास्ति जीवलोके जिनेन्द्रदेवेन्द्रचक्रकल्याणम् ।
यत्प्राप्नुवन्ति मनुजा न जीवरक्षानुरागेण ॥57॥

अर्थ: इस जीवलोकमें (जगतमें) मनुष्य जीवरक्षाके अनुरागसे समस्त कल्याणरूप पदको प्राप्त होते हैं। ऐसा कोई भी तीर्थंकर देवेन्द्र चक्रवर्त्तित्वरूप कल्याणपद लोकमें नहीं है जो दयावान् नहीं पावें। अर्थात् अहिंसा (दया) सर्वोत्तम पदकी देनेवाली है ।


यत्किंचित्संसारे शरीरिणां दुःखशोकभयबीजम् ।
दौर्भाग्यादि समस्तं तद्धिंसासंभवं ज्ञेयम् ॥58॥

अर्थ: संसारमें जीवोंके जो कुछ दुःख शोक भयका बीज कर्म है तथा दुर्भाग्यादिक हैं वे समस्त एक मात्र हिंसासे उत्पन्न हुए जानो ।


ज्योतिश्चक्रस्य चन्द्रो हरिरमृतभुजां चण्डरोचिर्ग्रहाणाम्
कल्पाङ्गं पादपानां सलिलनिधिरपां स्वर्णशैलो गिरीणाम् ।
देवः श्रीवीतरागस्त्रिदशमुनिगणस्यात्र नाथो यथाऽयम्
तद्वच्छीलव्रतानां शमयमतपसां विद्ध्यहिंसां प्रधानाम् ॥59॥

अर्थ: हे भव्य जीव ! जिस प्रकार ज्योतिश्चक्रोंमें प्रधान स्वामी चन्द्रमा है तथा देवोंमें इन्द्र, ग्रहोंमें सूर्य, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, जलाशयोंमें समुद्र, पर्वतोंमें मेरु और देवोंमें मुनियोंके नाथ (स्वामी) श्रीवीतराग देव प्रधान हैं उसी प्रकार शील और व्रतोंमें तथा शमभाव, यम (महाव्रत) और तपोंमें अहिंसाको प्रधान जानो । ऐसे अहिंसा महाव्रतका वर्णन किया गया ।

सर्ग 9: सत्य महाव्रत (श्लोक 1 से 42)

यः संयमधुरां धत्ते धैर्यमालम्ब्य संयमी ।
स पालयति यत्नेन वाग्वने सत्यपादपम् ॥1॥

अर्थ: जो संयमी मुनि धैर्यावलंबन करके संयमकी धुराको (मुनिदीक्षाको) धारण करता है वह मुनि वचनरूपी वनमें सत्यरूपी वृक्षको यत्नके साथ पालन करता है ।


अहिंसाव्रतरक्षार्थं यमजातं, जिनैर्मतम् ।
नारोहति परां कोटिं तदेवासत्यदूषितम् ॥2॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्ने जो यमनियमादि व्रतोंका समूह कहा है वह एक मात्र अहिंसा व्रतकी रक्षाके लिये ही कहा है । क्योंकि अहिंसाव्रत यदि असत्य वचनसे दूषित हो तो वह उत्कृष्ट पदको प्राप्त नहीं होता अर्थात् असत्य वचनके होनेसे अहिंसा व्रत पूर्ण नहीं होता ।


असत्यमपि तत्सत्यं यत्सत्त्वाशंसकं वचः ।
सावद्यं यच्च पुष्णाति तत्सत्यमपि निन्दितम् ॥3॥

अर्थ: जो वचन जीवोंका इष्ट हित करनेवाला हो, वह असत्य हो तो भी सत्य है और जो वचन पापसहित हिंसारूप कार्यको पुष्ट करता हो, वह सत्य हो तो भी असत्य और निन्दनीय है ।


अनेकजन्मजक्लेशशुद्ध्यर्थं यस्तपस्यति ।
सर्वं सत्त्वहितं शश्वत्स ब्रूते सूनृतं वचः ॥4॥

अर्थ: जो मुनि अनेक जन्ममें उत्पन्न क्लेशों (दुःखों) की शान्तिके लिये तपश्चरण करता है वह जीवोंके हितरूप निरन्तर सत्य वचन ही बोलता है । क्योंकि असत्य वचन बोलनेसे मुनिपन नहीं संभवता है ।


सूनृतं करुणाक्रान्तमविरुद्धमनाकुलम् ।
अग्राम्यं गौरवाश्लिष्टं वचः शास्त्रे प्रशस्यते ॥5॥

अर्थ: जो वचन सत्य हो, करुणासे व्याप्त हो, विरुद्ध न हो, आकुलतारहित हो, छोटे ग्रामकासा गँवारीवचन न हो और गौरवसहित हो अर्थात् जिसमें हलकापन नहीं हो वह वचन शास्त्रोंमें प्रशंसित किया गया है ।


मौनमेव हितं पुंसां शश्वत्सर्वार्थसिद्धये ।
वचो वाचि प्रियं तथ्यं सर्वसत्त्वोपकारि यत् ॥6॥

अर्थ: पुरुषोंको प्रथम तो समस्त प्रयोजनोंका सिद्ध करनेवाला निरंतर मौन ही अवलंबन करना हितकारी है। और यदि वचन कहना ही पडे तो ऐसा कहना चाहिये जो सबको प्यारा हो, सत्य हो और समस्त जनोंका हित करनेवाला हो ।


यो जिनैर्जगतां मार्गः प्रणीतोऽत्यन्तशाश्वतः ।
असत्यबलतः सोऽपि निर्दयैः कथ्यतेऽन्यथा ॥7॥

अर्थ: जिनेन्द्र सर्वज्ञ देवाधिदेवने जगत्के जीवोंको जो अन्तरहित शाश्वत (सनातन, ध्रुव) मार्ग कहा है, उस मार्गको भी निर्दय पुरुषोंने असत्यके बलसे अन्यथा वर्णन किया है ।


विचर्च्यासत्यसंदोहं खलैर्लोकः खलीकृतः ।
कुशास्त्रैः स्वमुखोद्गीर्णैरुत्पाद्य गहनं तमः ॥8॥

अर्थ: दुष्ट निःसार पुरुषोंने असत्यके समूहका विशेष प्रकारसे आन्दोलन करके अपने कपोलकल्पित मिथ्या शास्त्रों द्वारा गहन अज्ञानान्धकारको उत्पन्न करके इस जगतको दुष्ट वा निःसार बना दिया है। सो ठीक है जो स्वार्थी होते हैं वे ऐसी ही दुष्टता करते हैं, किन्तु परके हिताहितमें कुछ भी विचार न करके जिस किसी प्रकारसे अपना स्वार्थ साधन करते हैं ।


जयन्ति ते जगद्वन्द्या यैः सत्यकरुणामये ।
अवञ्चकेऽपि लोकोऽयं पथि शश्वत्प्रतिष्ठितः ॥9॥

अर्थ: जिन पुरुषोंने इस लोकको सत्यरूप, करुणामय तथा वंचनारहित मार्गमें निरन्तर चलाया वे ही जयशाली हैं और वे ही जगतमें वन्दनीय व पूजनीय हैं ।


असद्वदनवल्मीके विशाला विषसर्पिणी ।
उद्वेजयति वागेव जगदन्तर्विषोल्बणा ॥10॥

अर्थ: दुष्ट पुरुषोंके मुखरूपी बाँबीमें अन्तरंगमें विषसे उत्कृष्ट ऐसी विस्तीर्ण विषवाली जो असत्य वाणीरूपी सर्पिणी रहती है, वह जगतभरको दुःख देती है ।


न सास्ति काचिद्व्यवहारवर्तिनी न यत्र वाग्विस्फुरति प्रवर्तिका ।
ब्रुवन्नसत्यामिह तां हताशयः करोति विश्वव्यवहारविप्लवम् ॥11॥

अर्थ: इस जगतमें व्यवहारमें प्रवर्तनेवाली वाणी ऐसी नहीं है कि जिसमें समस्त व्यवहारोंको सिद्ध करनेवाली स्याद्वादरूप सत्यार्थ वाणी स्फुरायमान न हो, किन्तु ऐसी स्याद्वादरूप सत्यार्थ वाणी को भी मिथ्यादृष्टि नष्टचित्तपुरुष असत्य कहते हुए समस्त व्यवहारका लोप करते हैं ।


पृष्टैरपि न वक्तव्यं न श्रोतव्यं कथंचन ।
वचः शङ्काकुलं पापं दोषाढ्यं चाभिसूयकम् ॥12॥

अर्थ: जो वचन सन्देहरूप हो तथा पापरूप हो और दोषोंसे संयुक्त हो एवं ईर्षाको उत्पन्न करनेवाला हो वह अन्यके पूछने पर भी नहीं कहना चाहिये तथा किसी प्रकार सुनना भी नहीं चाहिये ।


मर्मच्छेदि मनःशल्यं च्युतस्थैर्यं विरोधकम् ।
निर्दयं च वचस्त्याज्यं प्राणैःकण्ठगतैरपि ॥13॥

अर्थ: तथा मर्मका छेदनेवाला, मनमें शल्य उपजानेवाला, स्थिरतारहित (चंचलरूप), विरोध उपजानेवाला तथा दयारहित वचन कण्ठगत प्राण होनेपर भी नहीं बोलना चाहिये ।


धन्यास्ते हृदये येषामुदीर्णः करुणाम्बुधिः ।
वाग्वीचिसञ्चयोल्लासैर्निर्वापयति देहिनः ॥14॥

अर्थ: इस जगतमें वे पुरुष धन्य है, जिनके हृदयमें करुणारूप समुद्र उदय होकर वचनरूप लहरोंके समूहोंके उल्लासोंसे जीवोंको शान्ति प्रदान करता है ।


धर्मनाशे क्रियाध्वंसे सुसिद्धान्तार्थविप्लवे ।
अपृष्टैरपि वक्तव्यं तत्स्वरूपप्रकाशने ॥15॥

अर्थ: जहाँ धर्मका नाश हो, क्रिया बिगडती हो तथा समीचीन सिद्धान्तका लोप होता हो उस जगह समीचीन धर्मक्रिया और सिद्धान्तके प्रकाशनार्थ बिना पूछे भी विद्वानोंको बोलना चाहिये क्योंकि यह सत्पुरुषोंका कार्य है ।


या मुहुर्मोहयत्येव विश्रान्ता कर्णयोर्जनम् ।
विषमं विषमृत्सृज्य साऽवश्यं पन्नगी न गीः ॥16॥

अर्थ: जो वाणी लोकके कानोंमें बारबार पडी हुई तथा विषम विषको उगलती हुई जीवोंको मोहरूप करती है और समीचीन मार्गको भुलाती है वह वाणी नहीं है किन्तु सर्पिणी है ।


असत्येनैव विक्रम्य चार्वाकद्विजकौलिकैः ।
सर्वाक्षपोषकं धूर्तैः पश्य पक्षं प्रतिष्ठितम् ॥17॥

अर्थ: इस असत्य वचनके प्रभावसे ही चार्वाक (नास्तिकमती) और ब्राह्मणकुल (मीमांसक आदि) पाखण्डियोंने सत्यार्थ मार्गसे च्युत होकर समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको पोषनेवाला अपना पक्ष (मत) स्थापन किया है ।


मन्ये पुरजलावर्त्तप्रतिमं तन्मुखोदरम् ।
यतो वाचः प्रवर्त्तन्ते कश्मलाः कार्यनिष्फलाः ॥18॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि मैं ऐसा मानता हूँ कि चार्वाक आदि अन्यमती तथा अन्य अनेक असत्यवादियोंके मुखका जो छिद्र है वह नगरके जल निकलनेके पौनाले (मोरी) के समान है । क्योंकि जैसे नगरके पौनालेका जल मैला होता है तथा किसीके कामका नहीं होता, वैसे ही उनके मुखसे जो वचन निकलते हैं वे भी मलिन हैं व कार्यसे शून्य और निःसार है ।


प्राप्नुवन्त्यतिघोरेषु रौरवादिषु संभवम् ।
तिर्यक्ष्वथ निगोदेषु मृषावाक्येन देहिनः ॥19॥

अर्थ: इस असत्य वचनसे प्राणी अति तीव्र रौरवादि नरकोंके बिलोंमें तथा तिर्यग्योनि एवं निगोदमें उत्पन्न हुए दुःखोंको प्राप्त होते हैं ।


न तथा चन्दनं चन्द्रो मणयो मालतीस्रजः ।
कुर्वन्ति निर्वृतिं पुंसां यथा वाणी श्रुतिप्रिया ॥20॥

अर्थ: जीवोंको जिस प्रकार कर्णप्रिय वाणी सुखी करती है, उसी प्रकार चन्दन, चंद्रमा, चन्द्रमणि, मोती तथा मालतीके पुष्पोंकी माला आदि शीतल पदार्थ सुखी नहीं कर सकते यह प्रसिद्ध लोकोक्ति है ।


अपि दावानलप्लुष्टं शाड्वलं जायते वनम् ।
न लोकः सुचिरेणापि जिह्वानलकदर्थितः ॥21॥

अर्थ: दावानल अग्निसे दग्ध हुआ वन तो किसी कालमें हरित (हरा) हो भी जाता है परन्तु जिह्वारूपी अग्निसे (कठोर मर्मच्छेदी वचनोंसे) पीडित हुआ लोक बहुत काल बीत जाने पर भी हरित (प्रसन्नमुख) नहीं होता ।


सर्वलोकप्रिये तथ्ये प्रसन्ने ललिताक्षरे ।
वाक्ये सत्यपि किं ब्रूते निकृष्टः परुषं वचः ॥22॥

अर्थ: जो वचन सर्वलोकको प्रिय, सत्य तथा प्रसन्न करनेवाले व ललिताक्षरवाले हैं उनके होते हुए भी नीचपुरुष कठोर वचन किसलिये कहते है, सो मालूम नहीं होता है ।


सतां विज्ञाततत्त्वानां सत्यशीलावलम्बिनाम् ।
चरणस्पर्शमात्रेण विशुद्ध्यति धरातलम् ॥23॥

अर्थ: जो महापुरुष सत्यवचन बोलनेवाले हैं, तत्त्वोंके यथार्थ स्वरूपको जानते हैं और सत्य शीलादिके अवलंबी हैं उनके चरणोंके स्पर्शमात्रसे यह धरातल पवित्र होता है । ऐसे ही लोग उत्तम पुरुष हैं और जो असत्य बोलते हैं, वे ही नीच हैं ।


यमव्रतगुणोपेतं सत्यश्रुतसमन्वितम् ।
यैर्जन्म सफलं नीतं ते धन्या धीमतां मताः ॥24॥

अर्थ: जिन पुरुषोंने अपना जन्म यमव्रतादि गुणोंसे युक्त सत्यशास्त्रोंके अध्ययनपूर्वक सफल किया है, वे ही धन्य और विद्वानोंके द्वारा पूजनीय हैं ।


नृजन्मन्यपि यः सत्यप्रतिज्ञाप्रच्युतोऽधमः ।
स केन कर्मणा पश्चाज्जन्मपङ्कात्तरिष्यति ॥25॥

अर्थ: जो अधम पापी नीचपुरुष मनुष्य जन्म पाकर भी सत्य प्रतिज्ञासे रहित है वह पापी फिर संसाररूप कर्दमसे किस कार्यसे पार होगा ?


अदयैः संप्रयुक्तानि वाक्शस्त्राणीह भूतले ।
सद्यो मर्माणि कृन्तन्ति शितास्त्राणीव देहिनाम् ॥26॥

अर्थ: निर्दय पुरुषोंके द्वारा चलाये हुए वचनरूप शस्त्र इस पृथ्वीतल पर जीवोंके मर्मको तीक्ष्ण शस्त्रोंके समान तत्काल छेदन करते हैं, क्योंकि असत्य वचनके समान दूसरा कोई भी शस्त्र नहीं है ।


व्रतश्रुतयमस्थानं विद्याविनयभूषणम् ।
चरणज्ञानयोर्बीजं सत्यसंज्ञं व्रतं मतम् ॥27॥

अर्थ: यह सत्यनामा व्रत, व्रत श्रुत और यमोंका तो स्थान है तथा विद्या और विनयका भूषण हैं क्योंकि विद्या और विनय सत्य वचनसे ही शोभाको प्राप्त होते हैं। और सम्यक्चारित्र तथा सम्यग्ज्ञानका बीज उत्पन्न करनेका कारण सत्य वचन ही है ।


न हि सत्यप्रतिज्ञस्य पुण्यकर्मावलम्बिनः ।
प्रत्यूहकरणे शक्ता अपि दैत्योरगादयः ॥28॥

अर्थ: सत्य प्रतिज्ञावाले पुण्यकर्मावलंबी पुरुषका दुष्ट दैत्य तथा सर्पादिक कुछ भी बुरा करनेको समर्थ नहीं हो सकते हैं ।


चन्द्रमूर्तिरिवानन्दं वर्द्धयन्ती जगत्त्रये ।
स्वर्गिभिर्ध्रियते मूर्ध्ना कीर्त्तिः सत्योत्थिता नृणां ॥29॥

अर्थ: तीन लोकमें चन्द्रमाके समान आनन्दको बढानेवाली सत्य वचनसे उत्पन्न हुई मनुष्योंकी कीर्तिको देवता भी मस्तक पर धारण करते हैं ।


खण्डितानां विरूपाणां दुर्विधानां च रोगिणाम् ।
कुलजात्यादिहीनानां सत्यमेकं विभूषणम् ॥30॥

अर्थ: जिनके हाथ नाक आदि अवयव कटे हों तथा जो विरूप हों, और जो दरिद्री तथा रोगी हों, वा कुलजात्यादिसे हीन हों उनका भूषण सत्यवचन बोलना ही है, अर्थात् यही उनकी शोभा करनेवाला है । क्योंकि जो उक्त समस्त बातोंसे हीन और सत्यवचन बोलता हो, उसकी सब कोई प्रशंसा करते हैं ।


यस्तपस्वी जटी मुण्डो नग्नो वा चीवरावृतः ।
सोऽप्यसत्यं यदि ब्रूते निन्द्यः स्यादन्त्यजादपि ॥31॥

अर्थ: जो तपस्वी हो, जटाधारी हो, मस्तक मुडाये हो अथवा नग्न (दिगम्बर) हो, वा वस्त्रधारी हो और असत्य बोलता हो तो वह चंडालसे भी बुरा और अतिशय निंदनीय है ।


कुटुम्बं जीवितं वित्तं यद्यसत्येन वर्द्धते ।
तथाऽपि युज्यते वक्तुं नासत्यं शीलशालिभिः ॥32॥

अर्थ: यदि असत्य वचनसे अपने कुटुम्ब, जीवन और धनकी वृद्धि हो तो भी शीलसे शोभित पुरुषोंको असत्य वचन कहना उचित नहीं हैं ।


एकतः सकलं पापं असत्योत्थं ततोऽन्यतः ।
साम्यमेव वदन्त्यार्यास्तुलायां धृतयोस्तयोः ॥33॥

अर्थ: आर्य पुरुषोंने तराजूमें एक तरफ तो समस्त पापोंको रक्खा और एक तरफ असत्यसे उत्पन्न हुए पापको रखकर तौला तो दोनों समान हुए ।


मूकता मतिवैकल्यं मूर्खता बोधविच्युतिः ।
बाधिर्यं मुखरोगित्वमसत्यादेव देहिनाम् ॥34॥

अर्थ: गूंगापन, बुद्धिकी विकलता, मूर्खता, अज्ञानता, बधिरता तथा मुखमें रोग होना इत्यादि जो सब ही जीवोंके होते हैं, वे असत्य वचन बोलनेके पापसे ही होते हैं ।


श्वपाकोलूकमार्जारवृकगोमायुमण्डलाः ।
स्वीक्रियन्ते क्वचिल्लोकैर्न सत्यच्युतचेतसः ॥35॥

अर्थ: चंडाल, उल्लू (घूघू), बिलाव, भेडिया और कुत्ता आदि यद्यपि निंदित हैं तथापि इन्हें अनेक लोग अंगीकार करते हैं, परन्तु असत्यवादियोंको कोई अंगीकार नहीं करता, अतएव असत्यवादी इन सबसे भी अधिक निंदनीय है ।


प्रसन्नोन्नतवृत्तानां गुणानां चन्द्ररोचिषाम् ।
सङ्घातं घातयत्येव सकृदप्युदितं मृषा ॥36॥

अर्थ: एक बार भी बोला हुआ असत्य वचन चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रसन्न (निर्मल) तथा उन्नत गुणोंके समूहको नष्ट करता है ।


न हि स्वप्नेऽपि संसर्गमसत्यमलिनैः सह ।
कश्चित्करोति पुण्यात्मा दुरितोल्मुकशङ्कया ॥37॥

अर्थ: जो असत्यसे मलिन पुरुष हैं, उनके साथ, पापरूप कालिमाके भयसे कोई पुण्यात्मा पुरुष स्वप्नमें भी साक्षात् (मुलाकात) नहीं करते ।


जगद्वन्द्ये सतां सेव्ये भव्यव्यसनशुद्धिदे ।
शुभे कर्मणि योग्यः स्यान्नासत्यमलिनो जनः ॥38॥

अर्थ: जगतके वंदनीय, सत्पुरुषोंके पूजनीय, संसारके कष्ट आपदाओंसे शुद्धिके देनेवाले शुभ कार्योंमें असत्यसे मैले पुरुष योग्य नहीं गिने जाते ।


महामतिभिर्निष्ट्यूतं देवदेवैर्निषेधितम् ।
असत्यं पोषितं पापैर्दुःशीलाधमनास्तिकैः ॥39॥

अर्थ: बडे-बडे बुद्धिमानोंने तो असत्य वचनको त्याग दिया है और देवाधिदेव सर्वज्ञ वीतरागने इसका निषेध किया है, किन्तु खोटे स्वभाववाले नीच नास्तिक पापियोंने इसका पोषण किया है । ठीक ही है, पापियोंको पाप ही इष्ट होता है । महापुरुष जिसकी निंदा करते हैं, नीच उसकी प्रशंसा ही किया करते हैं ।


सुतस्वजनदारादिवित्तबन्धुकृतेऽथवा ।
आत्मार्थे न वचोऽसत्यं वाच्यं प्राणात्ययेऽथवा ॥40॥

अर्थ: पुत्र, स्वजन, स्त्री, धन और मित्रोंके लिये अथवा अपने लिये प्राण जाने पर भी असत्य वचन नहीं बोलना चाहिये, यही उपदेश है ।


परोपरोधादतिनिन्दितं वचो ब्रुवन्नरो गच्छति नारकीं पुरीं ।
अनिन्द्यवृत्तोऽपि गुणी नरेश्वरो वसुर्यथाऽगादिति लोकविश्रुतिः ॥41॥

अर्थ: मनुष्य अन्यके अनुरोधसे (प्रार्थनासे) अन्यके लिये अति निन्दनीय असत्य कह कर नरकपुरीको चला ज़ाता है । जैसे वसु राजा अनिन्द्य आचरणवाला और गुणी था, परन्तु अपने सहाध्यायी गुरुपुत्र (पर्वत) के लिये झूठी साक्षी देनेसे नरकको गया । यह जगत्प्रसिद्ध वार्त्ता है (इसकी कथा पुराणोंमें प्रसिद्ध है) । इस कारण परके लिये भी झूठ बोलना नरकको ले जांता है ।


चञ्चन्मस्तकमौलिरत्नविकटज्योतिश्छटाडम्बरे -
र्देवाः पल्लवयन्ति यच्चरणयोः पीठे लुठन्तोऽप्यमी ।
कुर्वन्ति ग्रहलोकपालखचरा यत् प्रातिहार्यं नृणां
शाम्यन्ति ज्वलनादयश्च नियतं तत्सत्यवाचः फलम् ॥42॥

अर्थ: जगत्प्रसिद्ध देव भी अपने देदीप्यमान (चमकते हुए) मस्तक परके मुकुटोंके रत्नोंकी उत्कट ज्योतिकी छटाके आडंबरोंसे जिन मनुष्योंके चरणयुगलोंके नीचेके सिंहासनके निकट लोटते हुए चरणोंकी शोभाको प्रफुल्लित करते हैं (बढाते हैं) तथा सूर्यादिक ग्रह, लोकपाल और विद्याधर जिनके द्वार पर द्वारपाल होकर रहते हैं और अग्नि, जलादिक नियमसे उपशमरूप हो जाते हैं, उनके सत्य वचन बोलनेका ही यह फल है ।

सर्ग 10: अस्तेय महाव्रत (श्लोक 1 से 20)

अनासाद्य व्रतं नाम तृतीयं गुणभूषणम् ।
नापवर्गपथि प्रायः क्वचिद्धत्ते मुनिः स्थितिम् ॥1॥

अर्थ: मुनि गुणोंके भूषणस्वरूप तीसरे अस्तेयनामा महाव्रतको अंगीकार नहीं करें तो मोक्षमार्गमें प्रायः कहीं भी स्थिरताको प्राप्त नहीं होता ।


यः समीप्सति जन्माब्धेः पारमाक्रमितुं सुधीः ।
स त्रिशुद्ध्यातिनिःशङ्को नादत्ते कुरुते मतिम् ॥2॥

अर्थ: जो पुरुष संसारसमुद्रसे पार होनेकी इच्छा रखता है, वह सुबुद्धि निःशंक (निःशल्य) होकर मनवचनकायसे अदत्त (बिना दी हुई) वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करता ।


वित्तमेव मतं सूत्रे प्राणा बाह्याः शरीरिणाम् ।
तस्यापहारमात्रेण स्युस्ते प्रागेव घातिताः ॥3॥

अर्थ: धन शास्त्रोंमें जीवोंका बाह्यप्राण कहा गया है, इस कारण उस धनका हरण करनेसे जीवोंके प्राण घातित हो जाते हैं ।


गुणा गौणत्वमायान्ति यान्ति विद्या विडम्बनाम् ।
चौर्येणाकीर्तयः पुंसां शिरस्यादधते पदम् ॥4॥

अर्थ: चोरी करनेवालेके गुण तो गौणताको प्राप्त हो जाते हैं तथा विद्या विडंबनाको प्राप्त होती है और अकीर्तियाँ (निंदायें) मस्तक पर पग धरती हैं ।


पुण्यानुष्टानजातानि प्रणश्यन्तीह देहिनाम् ।
परवित्तामिषग्रासलालसानां धरातले ॥5॥

अर्थ: इस पृथ्वीमें परधनरूपी मांसके ग्रासमें आसक्त जनोंके पुण्यरूपी आचरणोंके समूह इसी लोकमें नष्ट हो जाते हैं ।


परद्रव्यग्रहार्त्तस्य तस्करस्येह निर्दया ।
गुरुबन्धुसुतान्हन्तुं प्रायः प्रज्ञा प्रवर्त्तते ॥6॥

अर्थ: परद्रव्यका ग्रह कहिये ग्रहण करना अथवा परद्रव्यरूपी पिशाचसे पीडित चोरके गुरु, भाई और पुत्रको मार डालनेकी निर्दय बुद्धि प्रायः हो जाया करती है ।


हृदि यस्य पदं धत्ते परवित्तामिषस्पृहा ।
करोति किं न किं तस्य कण्ठलग्नेव सर्पिणी ॥7॥

अर्थ: जिस पुरुषके हृदयमें परधनरूप मांस भक्षणकी इच्छा स्थान पा लेती है, वह उसके कंठमें लगी हुई सर्पिणीके समान क्या क्या नहीं करती ? अर्थात् सब ही अनिष्ट करती है ।


चुराशीलं विनिश्चित्य परित्यजति शङ्किता ।
वित्तापहारदोषेण जनन्यपि सुतं निजम् ॥8॥

अर्थ: जिसका स्वभाव चोरी करनेका हो जाता है, ऐसे अपने पुत्रको माता भी यह जानकर अपने धन हरे जानेके भयसे भयभीत होकर छोड देती है। अन्यकी तो कथा ही क्या ? ।


भ्रातरः पितरः पुत्राः स्वकुल्या मित्रबान्धवाः ।
संसर्गमपि नेच्छन्ति क्षणार्द्धमिह तस्करैः ॥9॥

अर्थ: भाई, पिता, पुत्र, निज स्त्री, मित्र तथा हितू आदि कोई भी चोरका संसर्ग क्षणभरके लिये नहीं चाहते अर्थात् चोरका कोई भी सगा (संघाती) नहीं होता ।


न जने न वने चेतः स्वस्थं चौरस्य जायते ।
मृगस्येवोद्धतव्याधादाशङ्क्य वधमात्मनः ॥10॥

अर्थ: चोरका चित्त न तो मनुष्योंमें बैठने पर स्थिर होता है और न बनमें ही निश्चिन्त रहता है। जैसे किसी मृगके पीछे शिकारी लग जाय तो अपना घात होनेके भयसे उसका चित्त ठिकाने नहीं रहता, उसी प्रकार चोरको भी अपने पकडे जानेका भय निरंतर रहा करता है ।


संत्रासोद्भ्रान्तचेतस्कश्चौरो जागर्त्यहर्निशम् ।
वध्येयात्र ध्रियेयात्र मार्येयात्रेति शङ्कितः ॥11॥

अर्थ: मैं यहाँ पकडा जाऊँगा या मारा जाऊँगा तथा यहाँ पर पीटा जाऊँगा इत्यादि आकुलतासे पागल-सा होकर चोर रातदिन जागता रहता है, अर्थात् सचेत रहता है, वह कभी असावधान नहीं रहता ।


नात्मरक्षां न दाक्षिण्यं नोपकारं न धर्मतां ।
न सतां शंसितं कर्म चौरः स्वप्नेऽपि बुद्ध्यति ॥12॥

अर्थ: चोर अपनी रक्षाको नहीं जानता, और सब चतुराई भूल जाता है, वह परोपकार तथा धर्मको भी नहीं जानता और न सत्पुरुषोंके करने योग्य कार्योंको स्वप्नमें भी याद करता है।


गुरवो लाघवं नीता गुणिनोऽप्यत्र खण्डिताः ।
चौरसंश्रयदोषेण यतयो निधनं गताः ॥13॥

अर्थ: इस लोकमें चोरकी संगतिसे बडे-बडे महापुरुष तो लघुताको प्राप्त हुए तथा गुणी पुरुष खंडित किये गये और मुनिगण भी मारे गये।


तृणाङ्कुरमिवादाय घातयन्त्यविलम्बितम् ।
चौरं विज्ञाय निःशङ्कं धीमन्तोऽपि धरातले ॥14॥

अर्थ: इस पृथ्वीतलमें चोर जानने पर बुद्धिमान् पुरुष भी तत्काल उसे तृणांकुरके समान पकड कर निःशंक हो मारने-पीटने लग जाते हैं।


विशन्ति नरकं घोरं दुःखज्वालाकरालितं ।
अमुत्र नियतं मूढाः प्राणिनश्चौर्यचर्विताः ॥15॥

अर्थ: चोरी करनेवाले मूढ पुरुष परलोकमें दुःखरूपी ज्वालासे भयानक घोर नरकमें नियमपूर्वक प्रवेश करते हैं ।


सरित्पुरगिरिग्रामवनवेश्मजलादिषु ।
स्थापितं पतितं नष्टं परस्वं त्यज सर्वथा ॥16॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे आत्मन् ! नदी, नगर, पर्वत, ग्राम, वन, घर तथा जल इत्यादिमें रक्खे हुए, गिरे हुए तथा नष्ट हुए धनको मन-वचन कायसे ग्रहण करना छोड ।


चिदचिद्रूपतापन्नं यत्परस्वमनेकधा ।
तत्त्याज्यं संयमोद्दामसीमासंरक्षणोद्यमैः ॥17॥

अर्थ: परधनके दो भेद हैं; एक चेतन दूसरा अचेतन; चेतन तो दासी, दास, पुत्र, पौत्र, स्त्री, गौ, महिष तथा घोडे आदि हैं; और अचेतन धन, धान्य, सुवर्णादि हैं, वे अनेक प्रकारके हैं । अतः यदि संयमकी उत्तम मर्यादा (प्रतिज्ञा) की रक्षा करनी हो तो उनको अवश्य छोडना योग्य है अर्थात् परद्रव्य कुछ भी नहीं लेना चाहिए ।


आस्तां परधनादित्सां कर्त्तुं स्वप्नेऽपि धीमताम् ।
तृणमात्रमपि ग्राह्यं नादत्तं दन्तशुद्धये ॥18॥

अर्थ: बुद्धिमानोंको परधन ग्रहण करनेकी इच्छा करनी तो स्वप्नमें भी दूर हैं, किन्तु दन्त धोनेको तृण (दांतोन) भी विना दिया हुआ परका ग्रहण करना योग्य नहीं है ।


अतुलसुखसिद्धिहेतो - र्धर्मयशश्चरणरक्षणार्थं च ।
इह परलोकहितार्थं कलयत चित्तेऽपि मा चौर्यम् ॥19॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे भव्य जीवों ! तुम इस चोरीको उपर्युक्त प्रकारसे निंद्य जानकर अतुल्य सुखकी सिद्धिके लिये एवं धर्म, यश और चारित्रकी रक्षाके लिये तथा उभय लोकमें हितके लिये चित्तमें भी इसे मत विचारो अर्थात् चोरी करना तो दूर रहा, इसको चित्तमें भी न लाओ ।


विषयविरतिमूलं संयमोद्दामशाखम्
यमदलशमपुष्पं ज्ञानलीलाफलाढ्यम् ।
विबुधजनशकुन्तैः सेवितं धर्मवृक्षं
दहति मुनिरपीह स्तेयतीव्रानलेन ॥20॥

अर्थ: जिस धर्मरूपी वृक्षकी जड विषयोंसे विरक्त होना है, जिसकी संयमरूपी बडी शाखायें हैं, यम नियमादि पत्र हैं, उपशम-भाव पुष्प हैं, ज्ञानानन्दरूपी फलोंसे भरा है और जो पण्डित तथा देवतारूपी पक्षियोंसे सेवित हैं, ऐसे धर्मरूपी वृक्षको मुनि भी चोरीरूपी तीव्र अग्निसे जला देता है तो अन्य साधारणकी तो कथा ही क्या ! इस कारण चोरीका संसर्ग करना भी महापाप है । इस प्रकार अस्तेय महाव्रतका वर्णन किया गया ।

सर्ग 11: ब्रह्मचर्य महाव्रत (श्लोक 1 से 48)

विदन्ति परमं ब्रह्म यत्समालम्ब्य योगिनः ।
तद्व्रतं ब्रह्मचर्यं स्याद्धीरधौरेयगोचरम् ॥1॥

अर्थ: जिस व्रतका आलंबन करके योगीगण परब्रह्म परमात्माको जानते हैं अर्थात् उसे अनुभवते हैं और जिसको धीरवीर पुरुष ही धारण कर सकते हैं, किन्तु सामान्य पुरुष धारण नहीं कर सकते, वह ब्रह्मचर्य नामक महाव्रत है ।


सप्रपञ्चं प्रवक्ष्यामि ज्ञात्वेदं गहनं व्रतम् ।
स्वल्पोऽपि न सतां क्लेशः कार्योऽस्यालोक्य विस्तरम् ॥2॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि मैं इस व्रतको गहन जानकर विस्तारके साथ कहूँगा; परन्तु सत्पुरुषोंको इसके विस्तारको देखकर स्वल्प भी क्लेश न करना चाहिये ।


एकमेव व्रतं श्लाघ्यं ब्रह्मचर्यं जगत्त्रये ।
यद्विशुद्धिं समापन्नाः पूज्यन्ते पूजितैरपि ॥3॥

अर्थ: इन तीन जगतोंमें ब्रह्मचर्य नामका व्रत ही प्रशंसा करने योग्य है, क्योंकि जिन पुरुषोंने इस व्रतकी निर्मलता निरतिचारतापूर्वक प्राप्त की है; वे पूज्य पुरुषोंके द्वारा भी पूजे जाते हैं।


ब्रह्मव्रतमिदं जीयाच्चरणस्यैव जीवितम् ।
स्युः सन्तोऽपि गुणा येन विना क्लेशाय देहिनाम् ॥4॥

अर्थ: आचार्य महाराज आशीर्वादपूर्वक कहते हैं कि यह ब्रह्मचर्यनामा महाव्रत जयवन्त हो; क्योंकि यह चारित्रका तो एक मात्र जीवन है और इसके बिना अन्य जितने गुण हैं, वे सब जीवोंके क्लेशके ही कारण होते हैं ।


नाल्पसत्त्वैर्न निःशीलैर्न दीनैर्नाक्षनिर्जितैः ।
स्वप्नेऽपि चरितुं शक्यं ब्रह्मचर्यमिदं नरैः ॥5॥

अर्थ: जो अल्पशक्ति पुरुष हैं, शीलरहित हैं, दीन हैं और इन्द्रियोंसे जीते गये हैं, वे इस ब्रह्मचर्यको धारण करनेको स्वप्नमें भी समर्थ नहीं हो सकते अर्थात् बडी शक्तिके धारक पुरुष ही ऐसे कठिन व्रतके आचरण करनेके लिये समर्थ होते हैं ।


पर्यन्तविरसं विद्धि दशधान्यच्च मैथुनम् ।
योषित्संगाद्विरक्तेन त्याज्यमेव मनीषिणा ॥6॥

अर्थ: इस ब्रह्मचर्य व्रतका प्रतिपक्षी मैथुन (कामसेवन) है, सो दश प्रकारका है, और अन्तमें विरस हैं। इसलिये जो पुरुष स्त्रीसे विरक्त हैं तथा बुद्धिमान् हैं, उनको अवश्य ही त्यागना योग्य है ।


आद्यं शरीरसंस्कारो द्वितीयं वृष्यसेवनम् ।
तौर्यत्रिकं तृतीयं स्यात्संसर्गस्तुर्यमिष्यते ॥7॥

अर्थ: प्रथम तो शरीरका संस्कार करना (शृंगारादि करना), दूसरा - पुष्टरसका सेवन करना, तीसरा - तौर्यत्रिक कहिये गीतनृत्यवादित्रका देखना सुनना, चौथा - स्त्रीका संसर्ग करना, पाँचवाँ - स्त्रीमें किसी प्रकारका संकल्प वा विचार करना, छट्ठा - स्त्रीके अंग देखना, सातवाँ - उस देखनेका संस्कार (हृदयमें अंकित) रहना, आठवाँ - पूर्वमें किये हुए संभोगका स्मरण करना, नववाँ - आगामी भोगनेकी चिन्ता करना और दशवाँ - शुक्रका क्षरण । इस प्रकार मैथुनके दश भेद हैं; इन्हें ब्रह्मचारीको सर्वथा त्यागना चाहिये ।


योषिद्विषयसंकल्पः पञ्चमं परिकीर्त्तितम् ।
तदङ्गवीक्षणं षष्ठं संस्कारः सप्तमं मतम् ॥8॥

अर्थ: प्रथम तो शरीरका संस्कार करना (शृंगारादि करना), दूसरा - पुष्टरसका सेवन करना, तीसरा - तौर्यत्रिक कहिये गीतनृत्यवादित्रका देखना सुनना, चौथा - स्त्रीका संसर्ग करना, पाँचवाँ - स्त्रीमें किसी प्रकारका संकल्प वा विचार करना, छट्ठा - स्त्रीके अंग देखना, सातवाँ - उस देखनेका संस्कार (हृदयमें अंकित) रहना, आठवाँ - पूर्वमें किये हुए संभोगका स्मरण करना, नववाँ - आगामी भोगनेकी चिन्ता करना और दशवाँ - शुक्रका क्षरण । इस प्रकार मैथुनके दश भेद हैं; इन्हें ब्रह्मचारीको सर्वथा त्यागना चाहिये ।


पूर्वानुभोगसंभोगस्मरणं स्यात्तदष्टमम् ।
नवमं भाविनी चिन्ता दशमं वस्तिमोक्षणम् ॥9॥

अर्थ: प्रथम तो शरीरका संस्कार करना (शृंगारादि करना), दूसरा - पुष्टरसका सेवन करना, तीसरा - तौर्यत्रिक कहिये गीतनृत्यवादित्रका देखना सुनना, चौथा - स्त्रीका संसर्ग करना, पाँचवाँ - स्त्रीमें किसी प्रकारका संकल्प वा विचार करना, छट्ठा - स्त्रीके अंग देखना, सातवाँ - उस देखनेका संस्कार (हृदयमें अंकित) रहना, आठवाँ - पूर्वमें किये हुए संभोगका स्मरण करना, नववाँ - आगामी भोगनेकी चिन्ता करना और दशवाँ - शुक्रका क्षरण । इस प्रकार मैथुनके दश भेद हैं; इन्हें ब्रह्मचारीको सर्वथा त्यागना चाहिये ।


किम्पाकफलसंभोगसन्निभं तद्धि मैथुनम् ।
आपातमात्ररम्यं स्याद्विपाकेऽत्यन्तभीतिदम् ॥10॥

अर्थ: जिस प्रकार किंपाकफल (इन्द्रायणका फल) देखने, सूंघने और खानेमें रमणीय (सुस्वादु) है और विपाक होनेपर हलाहल(विष)का काम करता है, उसी प्रकार यह मैथुन भी कुछ कालपर्यन्त रमणीक वा सुखदायक मालूम होता है, परन्तु विपाक समयमें (अन्तमें) बहुत ही भयका देनेवाला है ।


विरज्य कामभोगेषु ये ब्रह्म समुपासते ।
एते दश महादोषास्तैस्त्याज्या भावशुद्धये ॥11॥

अर्थ: जो पुरुष काम और भोगोंमें विरक्त होकर ब्रह्मचर्यका सेवन करते हैं, उनको भावशुद्धिके लिए उपर्युक्त दश प्रकारके मैथुन त्याग देने चाहिये, क्योंकि इन दोषोंके त्यागे बिना भावोंकी शुद्धि नहीं होती ।


स्मरप्रकोपसंभूतान्स्त्रीकृतान्मैथुनोत्थितान् ।
संसर्गप्रभवान्ज्ञात्वा दोषान् स्त्रीषु विरज्यताम् ॥12॥

अर्थ: हे आत्मन् ! कामके प्रकोपसे उत्पन्न हुए दोषों तथा स्त्रीके किये दोषों और मैथुनकृत दोषों तथा संसर्गजन्य दोषोंको जानकर स्त्रियोंसे विरक्त हो ।


सिक्तोऽप्यम्बुधरव्रातैः प्लावितोऽप्यम्बुराशिभिः ।
न हि त्यजति संतापं कामवह्निप्रदीपितः ॥13॥

अर्थ: कामरूपी अग्निका ताप ऐसा होता है कि वह प्रज्वलित होने पर मेघके समूहोंका सिंचन होने पर भी दूर नहीं होता अथवा कामाग्निसे प्रज्वलित पुरुषको समुद्रमें डूबा रक्खो तो भी सन्ताप दूर नहीं होता ।


मूले ज्येष्टस्य मध्याह्ने व्यभ्रे नभसि भास्करः ।
न प्लोषति तथा लोकं यथा दीप्तः स्मरानलः ॥14॥

अर्थ: कामरूपी अग्नि प्रज्वलित होकर जिस प्रकार लोकको सन्तापित करती है, उस प्रकार जेठ महीनेके मूल नक्षत्रमें बादल रहित आकाशमें प्रकाशमान मध्याह्नका सूर्य भी नहीं कर सकता ।


हृदि ज्वलति कामाग्निः पूर्वमेव शरीरिणाम् ।
भस्मसात्कुरुते पश्चादङ्गोपाङ्गानि निर्दयः ॥15॥

अर्थ: कामरूपी निर्दय अग्नि प्रथम तो जीवोंके हृदयमें प्रज्वलित होती है, तत्पश्चात् जब वृद्धिको प्राप्त होती है, तब शरीरके अंग उपांगोंको भस्म कर देती है अर्थात् सुखा देती है ।


अचिन्त्यकामभोगीन्द्रविषव्यापारमूर्छितम् ।
वीक्ष्य विश्वं विवेकाय यतन्ते योगिनः परं ॥16॥

अर्थ: जो परम योगी हैं, वे इस लोकको अचिन्त्य कामरूपी सर्पके विषकी क्रियासे मूर्छित हुआ देखकर अपने आत्मस्वरूपके भेदविज्ञानार्थ यत्न करते हैं।


स्मरव्यालविषोद्गारैर्वीक्ष्य विश्वं कदर्थितम् ।
यमिनः शरणं जग्मुर्विवेकविनतासुतम् ॥17॥

अर्थ: कामरूपी सर्पके विषोद्गारसे पीडित समस्त जगतको देखकर संयमी मुनिगण विवेकरूपी गरुडकी शरणमें प्राप्त हुए हैं।


एक एव स्मरो वीरः स चैकोऽचिन्त्यविक्रमः ।
अवज्ञयैव येनेदं पादपीठीकृतं जगत् ॥18॥

अर्थ: इस जगतमें वीर एक मात्र काम ही है और वह अद्वितीय है; क्योंकि जिसका अचिन्त्य पराक्रम है, जिसने अवज्ञा मात्रसे इस जगतको अपने पांवो तले दबा लिया है अर्थात् वशीभूत कर लिया है। जैसे कोई किसीको तिरस्कार मात्र कर वश कर ले, उसी प्रकार वश कर लिया है ।


एकाक्यपि नयत्येष जीवलोकं चराचरम् ।
मनोभूर्भङ्गमानीय स्वशक्त्याऽव्याहतक्रमः ॥19॥

अर्थ: जिसका पराक्रम अव्याहत अर्थात् अखण्डित है, ऐसा यह काम अकेला ही इस चराचर स्वरूप जगतको अपनी शक्तिसे भंगताको प्राप्त करता है अर्थात् भिन्न-भिन्नको अपने मार्गमें चलाता है ।


पीडयत्येव निःशङ्को मनोभूर्भुवनत्रयम् ।
प्रतीकारशतेनापि यस्य भङ्गो न भूतले ॥20॥

अर्थ: यह काम निर्भय होकर इस तीन भुवनको पीडित (दुःखित) करता है और इस पृथ्वी पर सैंकडों उपाय करने पर भी इसका भंग (नाश) नहीं होता ।


कालकूटादहं मन्ये स्मरसंज्ञं महाविषम् ।
स्यात्पूर्वं सप्रतीकारं निःप्रतीकारमुत्तरम् ॥21॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस कामस्वरूपी विषको मैं कालकूट (हलाहल) विषसे भी महाविष मानता हूँ, क्योंकि पहिला जो कालकूट विष है, वह तो उपाय करनेसे मिट जाता है, परन्तु दूसरा जो कामरूपी विष है, वह उपायरहित है अर्थात् इलाज करनेसे भी नहीं मिटता है ।


जन्तुजातमिदं मन्ये स्मरवह्निप्रदीपितम् ।
मज्जत्यगाधमध्यास्य पुरन्ध्रीकायकर्दमम् ॥22॥

अर्थ: फिर भी कहते हैं कि मैं इस जीवोंके समूहको कामरूपी अग्निसे जलता हुआ मानता हूँ। क्योंकि यह प्राणीसमूह स्त्रीके शरीररूपी कीचडमें प्रवेश करके डूबता है।


अनन्तव्यसनासारदुर्गे भवमरुस्थले ।
स्मरज्वरपिपासार्त्ता विपद्यन्ते शरीरिणः ॥23॥

अर्थ: ये संसारी जीव कामज्वरके दाहसे उत्पन्न हुई तृषासे पीडित होकर अनन्त कष्टोंके समूहस्वरूप दुर्गम संसाररूपी मरुस्थलमें दुःख सहन करते हैं ।


घृणास्पदमतिक्रूरं पापाढ्यं योगिदूषितम् ।
जनोऽयं कुरुते कर्म स्मरशार्दूलचर्वितः ॥24॥

अर्थ: कामरूपी सिंहसे चर्वित हुआ यह मनुष्य योगियोंसे निन्दित, पापसे भरे, अतिशय क्रूरतारूप तथा घृणास्पद कार्यको भी करता है ।


दिग्मूढमथ विभ्रान्तमुन्मत्तं शङ्किताशयम् ।
विलक्ष्यं कुरुते लोकं स्मरवैरीविजृम्भितः ॥25॥

अर्थ: प्रकोपको प्राप्त हुआ यह कामरूपी वैरी लोगोंको दिशामूढ अथवा विभ्रमरूप करता है तथा उन्मत्त और भयभीत करता है; एवं विलक्ष्य कहिए लक्ष्यभ्रष्ट (इष्ट कार्यसे विमुख) करता है।


न हि क्षणमपि स्वस्थं चेतः स्वप्नेऽपि जायते ।
मनोभवशरव्रातैर्भिद्यमानं शरीरिणाम् ॥26॥

अर्थ: कामके बाणोंके समूहसे भिदता हुआ जीवोंका चित्त क्षणभरके लिये स्वप्नमें भी स्वस्थताको प्राप्त नहीं होता ।


जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
लोकः कामानलज्वालाकलापकवलीकृतः ॥27॥

अर्थ: यह लोक है सो कामरूपी अग्निकी ज्वालाके समूहसे ग्रसा हुआ जानता हुआ भी कुछ नहीं जानता और देखता हुआ भी कुछ नहीं देखता। इस प्रकार अचेत (बेखबर) हो जाता है ।


भोगिदष्टस्य जायन्ते वेगाः सप्तैव देहिनः ।
स्मरभोगीन्द्रदष्टानां दश स्युस्ते भयानकाः ॥28॥

अर्थ: सर्पसे काटे हुए प्राणीके तो सात ही वेग होते हैं; परन्तु कामरूपी सर्पके डसे हुए जीवोंके दश वेग होते हैं, जो बडे भयानक हैं ।


प्रथमे जायते चिन्ता द्वितीये द्रष्टुमिच्छति ।
तृतीये दीर्घनिश्वासाश्चतुर्थे भजते ज्वरम् ॥29॥

अर्थ: कामके उद्दीपन होने पर प्रथम ही तो चिन्ता होती है कि स्त्रीका संपर्क कैसे हो, दूसरे वेगमें उसके देखनेकी इच्छा होती है, तीसरे वेगमें दीर्घ निःश्वास लेता है और कहता है कि हाय, देखना नहीं हुआ, चौथे वेगमें ज्वर होता है अर्थात् बुखार (ताप) चढ आता है, पाँचवें वेगमें शरीर दग्ध होने लगता है, छठे वेगमें किया हुआ भोजन नहीं रुचता, सातवें वेगमें महामूर्च्छा हो जाती है अर्थात् अचेत (बेहोश) हो जाता है, आठवें वेगमें उन्मत्त (पागल) हो जाता है तथा यद्वा तद्वा प्रलाप करने (बकने) लग जाता है, नववें वेगमें प्राणोंका संदेह हो जाता है कि अब मैं जीवित नहीं रहूँगा और दशवाँ वेग ऐसा आता है कि जिससे मरण हो जाता है । इस प्रकार कामके दश वेग होते हैं । इन वेगोंसे व्याप्त हुआ जीव यथार्थ तत्त्व अर्थात् वस्तुस्वरूपको नहीं देखता । जब लोकव्यवहारका ही ज्ञान नहीं रहे तब परमार्थका ज्ञान कैसे हो ? ॥२९-३१॥


पञ्चमे दह्यते गात्रं षष्टे भुक्तं न रोचते ।
सप्तमे स्यान्महामूर्च्छा उन्मत्तत्वमथाष्टमे ॥30॥

अर्थ: कामके उद्दीपन होने पर प्रथम ही तो चिन्ता होती है कि स्त्रीका संपर्क कैसे हो, दूसरे वेगमें उसके देखनेकी इच्छा होती है, तीसरे वेगमें दीर्घ निःश्वास लेता है और कहता है कि हाय, देखना नहीं हुआ, चौथे वेगमें ज्वर होता है अर्थात् बुखार (ताप) चढ आता है, पाँचवें वेगमें शरीर दग्ध होने लगता है, छठे वेगमें किया हुआ भोजन नहीं रुचता, सातवें वेगमें महामूर्च्छा हो जाती है अर्थात् अचेत (बेहोश) हो जाता है, आठवें वेगमें उन्मत्त (पागल) हो जाता है तथा यद्वा तद्वा प्रलाप करने (बकने) लग जाता है, नववें वेगमें प्राणोंका संदेह हो जाता है कि अब मैं जीवित नहीं रहूँगा और दशवाँ वेग ऐसा आता है कि जिससे मरण हो जाता है । इस प्रकार कामके दश वेग होते हैं । इन वेगोंसे व्याप्त हुआ जीव यथार्थ तत्त्व अर्थात् वस्तुस्वरूपको नहीं देखता । जब लोकव्यवहारका ही ज्ञान नहीं रहे तब परमार्थका ज्ञान कैसे हो ? ॥२९-३१॥


नवमे प्राणसन्देहो दशमे मुच्यतेऽसुभिः ।
एतैर्वेगैः समाक्रान्तो जीवस्तत्त्वं न पश्यति ॥31॥

अर्थ: कामके उद्दीपन होने पर प्रथम ही तो चिन्ता होती है कि स्त्रीका संपर्क कैसे हो, दूसरे वेगमें उसके देखनेकी इच्छा होती है, तीसरे वेगमें दीर्घ निःश्वास लेता है और कहता है कि हाय, देखना नहीं हुआ, चौथे वेगमें ज्वर होता है अर्थात् बुखार (ताप) चढ आता है, पाँचवें वेगमें शरीर दग्ध होने लगता है, छठे वेगमें किया हुआ भोजन नहीं रुचता, सातवें वेगमें महामूर्च्छा हो जाती है अर्थात् अचेत (बेहोश) हो जाता है, आठवें वेगमें उन्मत्त (पागल) हो जाता है तथा यद्वा तद्वा प्रलाप करने (बकने) लग जाता है, नववें वेगमें प्राणोंका संदेह हो जाता है कि अब मैं जीवित नहीं रहूँगा और दशवाँ वेग ऐसा आता है कि जिससे मरण हो जाता है । इस प्रकार कामके दश वेग होते हैं । इन वेगोंसे व्याप्त हुआ जीव यथार्थ तत्त्व अर्थात् वस्तुस्वरूपको नहीं देखता । जब लोकव्यवहारका ही ज्ञान नहीं रहे तब परमार्थका ज्ञान कैसे हो ? ॥२९-३१॥


संकल्पवशतस्तीव्रा वेगा मन्दाश्च मध्यमाः ।
कामज्वरप्रकोपेन प्रभवन्तीह देहिनाम् ॥32॥

अर्थ: संकल्पके वशसे और कामज्वरके प्रकोपके तीव्र, मन्द, मध्यम होनेसे ये दश वेग तीव्र मध्यम और मंद भी होते हैं। सब ही एकसे नहीं होते ।


अपि मानसमुत्तुङ्गनगशृङ्गाग्रवर्तिनाम् ।
स्मरवीरः क्षणार्द्धेन विधत्ते मानखण्डनम् ॥33॥

अर्थ: जो पुरुष मानरूपी ऊँचे पर्वतके शिखरके अग्रभाग पर चढे हुए हैं अर्थात् बलके बडे अभिमानी हैं, उनका भी मान यह स्मरवीर आधे क्षणमें खंडित कर देता है।


शीलशालमतिक्रम्य धीधनैरपि तन्यते ।
दासत्वमन्त्यजस्त्रीणां संभोगाय स्मराज्ञया ॥34॥

अर्थ: जो बडे-बडे बुद्धिमान् हैं, वे भी कामदेवकी आज्ञासे अपने शीलरूपी कोटका उल्लंघन कर संभोगके लिये चांडालकी स्त्रीका दासत्व स्वीकार कर लेते हैं।


प्रवृद्धमपि चारित्रं ध्वंसयत्याशु देहिनाम् ।
निरुणद्धि श्रुतं सत्यं धैर्यं च मदनव्यथा ॥35॥

अर्थ: मदनकी व्यथा जब उठती है, तब वह जीवोंके बहुत दिनसे बढाये तथा पाले हुए चारित्रको ध्वंस कर देती है। एवं शास्त्राध्ययन, धैर्य और सत्य भाषणादिको भी बंद कर देती है।


नासने शयने याने स्वजने भोजने स्थितिम् ।
क्षणमात्रमपि प्राणी प्राप्नोति स्मरशल्यतः ॥36॥

अर्थ: जिसको कामरूपी काँटा चुभता रहता है, वह प्राणी बैठने, सोने, चलने, भोजन करनेमें तथा स्वजनोंमें क्षण भर भी स्थिरताको प्राप्त नहीं होता, अर्थात् सर्वत्र डामाडोल रहता है ।


वित्तवृत्तबलस्यान्तं स्वकुलस्य च लाञ्छनम् ।
मरणं वा समीपस्थं न स्मरार्त्तः प्रपश्यति ॥37॥

अर्थ: कामपीडित पुरुष अपने धन, चारित्र और बलके नाश होनेको तथा अपने कुल पर कलंक लगनेको, वा मरण भी निकट आ जाय तो उसको भी नहीं देखता है, अर्थात् उसके चित्तमें हिताहितका कुछ भी विचार नहीं रहता ।


न पिशाचोरगा रोगा न दैत्यग्रहराक्षसाः ।
पीडयन्ति तथा लोकं यथाऽयं मदनज्वरः ॥38॥

अर्थ: जैसा कष्ट यह कामज्वर जगतको देता है, वैसा पिशाच, सर्प, रोग आदि नहीं देते और न दैत्य-ग्रह-राक्षसादिक ही देते हैं।


अनासाद्य जनः कामी कामिनीं हृदयप्रियाम् ।
विषशस्त्रानलोपायैः सद्यः स्वं हन्तुमिच्छति ॥39॥

अर्थ: कामी पुरुष यदि अपनी मनकी प्यारी कामिनीको नहीं प्राप्त होता है तो विष, शस्त्र, अग्नि आदिसे त्वरित ही अपना आपघात करनेको तैयार हो जाता है।


दक्षो मूढः क्षमी क्रुद्धः शूरो भीरुर्गुरुर्लघुः ।
तीक्ष्णः कुण्ठो वशी भ्रष्टो जनः स्यात्स्मरवञ्चितः ॥40॥

अर्थ: कामसे ठगा हुआ मनुष्य चतुर भी मूर्ख हो जाता है, क्षमावान् क्रोधी हो जाता है, शूरवीर कायर हो जाता है, गुरु लघु हो जाता है, उद्यमी आलसी हो जाता है और जितेन्द्रिय भ्रष्ट हो जाता है। काम ऐसा प्रबल है ।


कुर्वन्ति वनिताहेतोरचिन्त्यमपि साहसम् ।
नराः कामहठात्कारविधुरीकृतमानसाः ॥41॥

अर्थ: कामके बलात्कार (जबरदस्ती) से जिनका चित्त दुःखित है, वे स्त्रीकी प्राप्तिके लिये ऐसे काम करनेका साहस करते हैं, जो चिन्तवनमें भी न आवें ।


उन्मूलयत्यविश्रान्तं पूज्यं श्रीधर्मपादपम् ।
मनोभवमहादन्ती मनुष्याणां निरङ्कुशः ॥42॥

अर्थ: कामरूपी हस्ती निरंकुश है, इस कारण वह मनुष्योंके निरन्तर पूजने योग्य धर्मरूपी वृक्षको जडसे उखाड डालता है ।


प्रकुप्यति नरः कामी बहुलं ब्रह्मचारिणे ।
जनाय जाग्रते चौरो रजन्यां संचरन्निव ॥43॥

अर्थ: जिस प्रकार रात्रिमें धनार्थ फिरते हुए चोर जागनेवाले मनुष्य पर कोप करते हैं, उसी प्रकार कामी पुरुष भी बहुधा ब्रह्मचारी पुरुषों पर कोप किया करता है, यह स्वाभाविक नियम है ।


स्नुषां श्वश्रूं सुतां धात्रीं गुरुपत्नीं तपस्विनीम् ।
तिरश्चीमपि कामार्तो नरः स्त्रीं भोक्तुमिच्छति ॥44॥

अर्थ: कामसे पीडित पुरुष पुत्रवधू, सास, पुत्री, दुग्ध पिलानेवाली धाय अथवा माता, गुरुकी स्त्री, तपस्विनी और तिरश्ची (पशुजातिकी स्त्री) को भी भोगनेकी इच्छा करता है, क्योंकि कामी पुरुषके योग्य अयोग्यका कुछ भी विचार नहीं होता ।


किं च कामशरव्रातजर्जरे मनसि स्थितिम् ।
निमेषमपि बध्नाति न विवेकसुधारसः ॥45॥

अर्थ: हिताहितका विचार न होनेका कारण यह है कि कामके बाणोके समूहसे जर्जरित हुए मनमें निमेषमात्र भी विवेकरूपी अमृतकी बूंद नहीं ठहर सकती ।


हरिहरपितामहाद्या बलिनोऽपि तथा स्मरेण विध्वस्ताः ।
त्यक्तत्रपा यथैते स्वाङ्कान्नारीं न मुञ्चन्ति ॥46॥

अर्थ: जैसे ये निर्लज्ज जन अपनी गोदमें स्थित स्त्रीको नहीं छोडते वैसे ही हरि, हर और ब्रह्मादिक बलिष्ठोंको कामने नष्ट कर दिया है अर्थात् वे भी स्त्रीको गोदसे कभी बाहर नहीं करते ।


यदि प्राप्तं त्वया मूढ नृत्वं जन्मोग्रसंक्रमात् ।
तदा तत्कुरु येनेयं स्मरज्वाला विलीयते ॥47॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! यदि तूने संसारमें भ्रमण करते-करते इस मनुष्यजन्मको पाया है, तो तू वह काम कर, कि जिससे तेरी कामरूपी ज्वाला नष्ट हो जाये ।


स्मरदहनसुतीव्रानन्तसन्तापविद्धं
भुवनमिति समस्तं वीक्ष्य योगिप्रवीराः ।
विगतविषयसङ्गाः प्रत्यहं संश्रयन्ते
प्रशमजलधितीरं संयमारामरम्यम् ॥48॥

अर्थ: विषयसंग रहित योगीप्रवीर (श्रेष्ठ योगीजन) इस संसारको कामाग्निके प्रचण्ड और अनंत संतापोंसे पीडित देख कर प्रतिदिन संयमरूप बगीचेसे शोभायमान ऐसे शान्तिसागरके तटका आश्रय लेते हैं ।

सर्ग 12: स्त्रीस्वरूप वर्णन (श्लोक 1 से 59)

कुर्वन्ति यन्मदोद्रेकदर्पिता भुवि योषितः ।
शतांशमपि तस्येह न वक्तुं कश्चिदीश्वरः ॥1॥

अर्थ: इस पृथ्वीतलमें मदके आधिक्यसे गर्वित स्त्रियाँ जो कर डालती हैं, उसका शतांश कहनेके लिये भी कोई समर्थ नहीं है ।


धारयन्त्यमृतं वाचि हृदि हालाहलं विषम् ।
निसर्गकुटिला नार्यो न विद्मः केन निर्मिताः ॥2॥

अर्थ: जो वाणीमें तो अमृतको और हृदयमें विषको धारण करती हैं इस प्रकार स्वभावसे ही कुटिल इन स्त्रियोंको किसने बनाया है, यह हम नहीं जानते ।


वज्रज्वलनलेखेव भोगिदंष्ट्रेव केवलम् ।
वनितेयं मनुष्याणां संतापभयदायिनी ॥3॥

अर्थ: यह स्त्री मनुष्योंको वज्राग्निकी ज्वांलाके समान और सांपकी डाढके समान भय तथा संताप देनेवाली है।


उद्वासयति निश्शङ्का जगत्पूज्यं गुणव्रजम् ।
बध्नती वसतिं चित्ते सतामपि नितम्बिनी ॥4॥

अर्थ: मनमें स्थान (अड्डा) जमाती हुई शंका रहित स्त्री सज्जनोंके भी जगतमें पूजने योग्य गुणसमूहको दूर भगा देती है ।


वरमालिङ्गिता क्रुद्धा चलल्लोलाऽत्र सर्पिणी ।
न पुनः कौतुकेनापि नारी नरकपद्धतिः ॥5॥

अर्थ: क्रोधसे फुंकार मारती चलती हुई सर्पिणीका आलिंगन करना श्रेष्ठ है, किन्तु स्त्रीको कौतुक मात्रसे भी आलिंगन करना श्रेष्ठ नहीं, क्योंकि सर्पिणी यदि दंश करे (काटे) तो एक बार ही मरण होता है और स्त्री तो नरककी पद्धतिस्वरूप है अर्थात् यह बारबार मरण करा कर नरकमें ले जानेवाली है ।


हृदि दत्ते तथा दाहं न स्पृष्टा हुतभुक्शिखा ।
वनितेयं यथा पुंसामिन्द्रियार्थप्रकोपिनी ॥6॥

अर्थ: यह स्त्री इन्द्रियोके कोपको बढानेवाली है, सो स्पर्श की हुई ऐसा दाह उत्पन्न करती है कि जैसा स्पर्श की हुई अग्निकी शिखा भी नहीं करती ।


सन्ध्येव क्षणरागाढ्या निम्नगेवाधरप्रिया ।
वक्रा बालेन्दुलेखेव भवन्ति नियतं स्त्रियः ॥7॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ सन्ध्याके समान क्षणभर राग सहित रहनेवाली (क्षणभर प्रीति रखनेवाली) हैं और नदीके समान अधरप्रिया हैं अर्थात् जैसे नदी नीची भूमिकी तरफ जाती है उसी प्रकार स्त्रियाँ भी प्रायः नीच पुरुषसे रमण करनेवाली होती हैं तथा द्वितीयाके चन्द्रमाके समान वक्र (टेढी) रहती हैं, अर्थात् स्त्रियाँ हृदयमें कपटभाव अवश्य रखती हैं ।


धूमावल्य इवाशङ्क्याः कुर्वन्ति मलिनं क्षणात् ।
मदनोन्मादसंभ्रान्ता योषितः स्वकुलं गृहम् ॥8॥

अर्थ: मदनके वेगसे उन्मादयुक्त होकर स्त्रियाँ अपने कुल और घरको क्षणभरमें मलिन (कलंकित) कर देती हैं, इस कारण धूमावलीके समान आशंका करनेयोग्य हैं, अर्थात् जिस प्रकार धूमावलीसे घर काला होनेकी शंका है, उसी प्रकार स्त्रियोंकी तरफसे भी शंका रहनी चाहिये ।


निर्दयत्वमनार्यत्वं मूर्खत्वमतिचापलम् ।
वञ्चकत्वं कुशीलत्वं स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥9॥

अर्थ: निर्दयता, अनार्यता (अपवित्रता), मूर्खता, अतिचपलता, वंचकता और कुशीलता इतने दोष प्रायः स्त्रियोंके स्वाभाविक होते हैं, अर्थात् विना सिखाये ही आ जाते हैं ।


विचरन्ति कुशीलेषु लंघयन्ति कुलक्रमम् ।
न स्मरन्ति गुरुं मित्रं पतिं पुत्रं च योषितः ॥10॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ व्यभिचारी पुरुषोंमें विचरने लग जाती हैं और अपने कुलक्रमका उल्लंघन कर देती हैं तथा अपने गुरु मित्र (हितैषी) पति पुत्रका स्मरण तक नहीं करतीं ।


वश्याञ्जनादितन्त्राणि मन्त्रयन्त्राद्यनेकधा ।
व्यर्थीभवन्ति सर्वाणि वनिताराधनं प्रति ॥11॥

अर्थ: स्त्रीकी आराधनाके लिये (प्रसन्न करनेके लिये) वशीकरण, अञ्जनादि तथा अनेक प्रकारके यन्त्र-मन्त्र-तंत्रादि समस्त व्यर्थ हो जाते हैं ।


अगाधक्रोधवेगान्धाः कर्म कुर्वन्ति तत्स्त्रियः ।
सद्यः पतति येनैतद्भुवनं दुःखसागरे ॥12॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ अगाध क्रोधके वेगसे अंधी हुई ऐसा काम करती हैं कि जिससे शीघ्र ही यह जगत् दुःखसागरमें पड जाता है ।


स्वातन्त्र्यमभिवाञ्छन्त्यः कुलकल्पमहीरुहम् ।
अविचार्यैव निध्नन्ति स्त्रियोऽभीष्टफलप्रदम् ॥13॥

अर्थ: स्वतन्त्रताकी वांछा करती हुई स्त्रियाँ अभीष्ट (मनोवांछित) फल देनेवाले अपने कुलरूपी कल्पवृक्षको विना विचारे ही मूर्खतासे काट डालती हैं ।


न दानं न च सौजन्यं न प्रतिष्ठां न गौरवम् ।
न च पश्यन्ति कामान्धा योषितः स्वान्ययोर्हितम् ॥14॥

अर्थ: कामान्ध स्त्रियाँ न तो दान सुजनताको देखती हैं, न अपने गौरव और प्रतिष्ठाका विचार करती हैं और न अपना वा पराया हित ही देखती हैं; किन्तु जो चित्तमें आया सो विना विचारे ही कर बैठती हैं।


न तत् क्रुद्धा हरिव्याघ्रव्यालानलनरेश्वराः ।
कुर्वन्ति यत्करोत्येका नरि नारी निरङ्कुशा ॥15॥

अर्थ: एक निरंकुश स्त्री ही नर (मनुष्य) के लिये वह काम करती है कि जिसको क्रोधित हुए सिंह, व्याघ्र, सर्प, अग्नि और राजा भी नहीं कर सकते ।


यामासाद्य त्वया कान्तां सोढव्या नारकी व्यथा ।
तस्या वार्त्ताऽपि न श्लाघ्या कथमालिङ्गनादिकम् ॥16॥

अर्थ: आचार्य महाराज समझाते हैं कि हे आत्मन् ! जिस स्त्रीकी संगतिसे तुझे नरकके दुःख सहने पडें, ऐसी स्त्रीकी चर्चा करना भी तेरे लिये प्रशंसनीय नहीं है, तो उससे आलिंगनादि करना कैसे प्रशंसनीय हो सकता है ? ।


स कोऽपि स्मर्यतां देवो मन्त्रो वाऽऽलम्ब्य साहसम् ।
यतोऽङ्गनापिशाचीयं ग्रसितुं नोपसर्पति ॥17॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे आत्मन् ! तू ऐसे किसी देव वा मंत्रको स्मरण कर अथवा ऐसा कोई साहस कर, जिससे यह स्त्रीरूपी पिशाचिनी तुझे भक्षण करनेको निकट न आवे ।


एकैव वनिताव्याली दुर्विचिन्त्यपराक्रमा ।
लीलयैव यया मूढ खण्डितं जगतां त्रयम् ॥18॥

अर्थ: हे मूढ आत्मन्! यह स्त्रीरूपी सर्पिणी ऐसी है कि जिसका पराक्रम अचिन्त्य है अर्थात् चिन्तवनमें नहीं आ सकता। क्योंकि लीलामात्रसे जिस अकेलीने ही इन तीनों भुवनोंको खण्डित कर दिया है, सो तू देख ।


न तद्दृष्टं श्रुतं ज्ञातं न तच्छास्त्रेषु चर्चितम् ।
यत्कुर्वन्ति महापापं स्त्रियः कामकलङ्किताः ॥19॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ कामसे कलंकित होकर ऐसा भी कोई महापाप कर बैठती हैं कि जिसको न तो किसीने देखा, न सुना तथा न शास्त्रोंमें ही जिसकी चर्चा आई हो ।


यमजिह्वानलज्वालावज्रविद्युद्विषाङ्कुरान् ।
समाहृत्य कृता मन्ये वेधसेयं विलासिनी ॥20॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि मैं ऐसा मानता हूँ कि विधाताने यमराजकी जीभ, अग्निकी ज्वाला, बिजली तथा विष इनके अंकुर (सार भाग) इन सबका संग्रह करके यह विलासिनी (स्त्री) बनाई है, क्योंकि इससे कोई भी नहीं बचता ।


मनस्यन्यद्वचस्यन्यद्वपुष्यन्यद्विचेष्टितम् ।
यासां प्रकृतिदोषेण प्रेम तासां कियत्स्थिरम् ॥21॥

अर्थ: जिन स्त्रियोंके स्वभावसे ही मनमें तो कुछ, वचनमें कुछ और शरीरसे कुछ और ही चेष्टा है, उनका प्रेम कब तक स्थिर रह सकता है ? अर्थात् बहुत समय तक नहीं ठहरता ।


अप्युत्तुङ्गाः पतिष्यन्ति नरा नार्यङ्गसंगताः ।
यथा वामिति लोकस्य स्तनाभ्यां प्रकटीकृतम् ॥22॥

अर्थ: स्त्रियोंके दोनों स्तन प्रगट करते हैं अर्थात् परस्पर कहते हैं कि देखो भाई ! स्त्रीके अंगसंगसे जिस प्रकार हमारा अधःपतन हुआ है, उसी प्रकार जगतके बडे-बडे पुरुष स्त्रीके अंगसंगसे नीचे गिरेंगे, अर्थात् नीची अवस्थाको प्राप्त होंगे ।


यदीन्दुस्तीव्रतां धत्ते चण्डरोचिश्च शीतताम् ।
दैवात्तथाऽपि नो धत्ते नरि नारी स्थिरं मनः ॥23॥

अर्थ: कदाचित् दैवयोगसे चन्द्रमा उष्णस्वभावी और सूर्य शीतल भले ही हो जाय परंतु स्त्रीका मन किसी एक पुरुषमें स्थिर नहीं हो सकता, अर्थात् उसे अन्य-अन्य पुरुषकी कामना बनी ही रहती है ।


देवदैत्योरगव्यालग्रहचन्द्रार्कचेष्टितम् ।
विदन्ति ये महाप्राज्ञास्तेऽपि वृत्तं न योषिताम् ॥24॥

अर्थ: जो महाविद्वान् देव, दैत्य, नाग, हस्ती, ग्रह, चन्द्रमा और सूर्य इन सबकी चेष्टाओंको जानते हैं, वे भी स्त्रियोंके चरित्रको नहीं जान सकते, क्योंकि स्त्रीचरित्र अगाध है, यह जगत्प्रसिद्ध उक्ति है ।


सुखदुःखजयपराजयजीवितमरणानि ये विजानन्ति ।
मुह्यन्ति तेऽपि नूनं तत्त्वविदश्चेष्टिते स्त्रीणाम् ॥25॥

अर्थ: जो तत्त्वज्ञानी सुख-दुःख, जय-पराजय और जीवित-मरण आदिकको निमित्तज्ञानके बलसे जानते हैं, वे भी स्त्रियोंकी चेष्टा जाननेमें मोहको प्राप्त होते हैं अर्थात् स्त्रियोंके चरित्र जाननेके लिये अज्ञानमूढ हो जाते हैं ।


जलधेर्यानपात्राणि ग्रहाद्या गगनस्य च ।
यान्ति पारं न तु स्त्रीणां दुश्चरित्रस्य केचन ॥26॥

अर्थ: यद्यपि समुद्र और आकाश अपार है, तथापि जहाज पर बैठनेवाले समुद्रके और ग्रहादिक आकाशके अन्तको पा सकते हैं परन्तु स्त्रियोंके दुश्चरित्रका पार कोई भी नहीं पा सकता ।


आरोपयन्ति संदेहतुलायामतिनिर्दयाः ।
नार्यः पतिं च पुत्रं च पितरं च क्षणादपि ॥27॥

अर्थ: स्त्रियाँ ऐसी निर्दय हैं कि क्षणमात्रमें अपने पति पुत्र पितादिको संदेहकी तुला पर चढा देती हैं ।


गृह्णन्ति विपिने व्याघ्रं शकुन्तं गगने स्थितम् ।
सरिद्ध्रदगतं मीनं न स्त्रीणां चपलं मनः ॥28॥

अर्थ: कई पुरुष बनमेंसे व्याघ्रको पकडते हैं, आकाशगामी पक्षीको पकडते हैं तथा नदी वा तडागमेंसे मछलीको पकडते हैं, परन्तु स्त्रियोंके मनको कोई भी पकड नहीं सकता अर्थात् वशीभूत नहीं कर सकता ।


न तदस्ति जगत्यस्मिन् मणिमन्त्रौषधाञ्जनम् ।
विद्याश्च येन सद्भावं प्रयास्यन्तीह योषितः ॥29॥

अर्थ: इस जगतमें ऐसा कोई भी मणि, मंत्र, औषध, अंजन अथवा विद्या नहीं है कि जिससे स्त्रियाँ सद्भावको प्राप्त हो अर्थात् कुटिलतारहित हो जायें ।


मनोभवसमं शूरं कुलीनं भुवनेश्वरम् ।
हत्वा पतिं स्त्रियः सद्यो रमन्ते चेटिकासुतैः ॥30॥

अर्थ: स्त्रियाँ ऐसी दुष्टा हैं कि अपना पति कामदेवके समान सुन्दर, शूरवीर, कुलीन और राजा ही क्यों न हों, तो भी उसे मारकर तत्काल दासीके पुत्रसे रमने लग जाती हैं ।


स्मरोत्सङ्गमपि प्राप्य वाञ्छन्ति पुरुषान्तरम् ।
नार्यः सर्वाः स्वभावेन वदन्तीत्यमलाशयाः ॥31॥

अर्थ: निर्मलाशय विद्वज्जन ऐसा कहते हैं कि सब ही स्त्रियाँ कामदेव सरीखे पतिको पाकर भी स्वभावसे अन्य पुरुषकी वांछा करती हैं ।


विनाञ्जनेन तन्त्रेण मन्त्रेण विनयेन च ।
वञ्चयन्ति नरं नार्यः प्रज्ञाधनमपि क्षणात् ॥32॥

अर्थ: स्त्रियोंमें कोई ऐसी ही मोहिनी विद्या है कि विना मंत्र तंत्र अंजनके अथवा विना प्रार्थनाके भी क्षणमात्रमें पंडित पुरुषको भी ठग लेती हैं, अर्थात् अपने प्रेममें फँसा लेती हैं ।


कुलजातिगुणभ्रष्टं निकृष्टं दुष्टचेष्टितम् ।
अस्पृश्यमधमं प्रायो मन्ये स्त्रीणां प्रियं नरम् ॥33॥

अर्थ: मैं ऐसा मानता हूँ कि कुल-जाति-गुणसे भ्रष्ट, निकृष्ट, दुश्चरित्र, अस्पृश्य, और नीच पुरुष ही स्त्रियोंको प्रिय होता है, क्योंकि प्रायः ऐसा ही देखनेमें आता है कि स्त्रियाँ उत्तम पुरुषको छोडकर नीचसे ही प्रीति कर लेती हैं ।


वैरिवारणदन्ताग्रे समारुह्य स्थिरीकृता ।
वीरश्रीर्यैर्महासत्त्वैर्योषिद्भिस्तेऽपि खण्डिताः ॥34॥

अर्थ: जिन महापराक्रमी वीर पुरुषोंने युद्धमें शत्रुके हस्तीके दाँतों पर चढ कर वीरश्रीको दृढ किया है, अर्थात् विजय प्राप्त की है, ऐसे शूरवीर योद्धा भी स्त्रियोंके द्वारा खण्डित (भूपतित) हो जाते हैं, अर्थात् स्त्रीके सामने किसीका भी पराक्रम नहीं चलता ।


गौरवेषु प्रतिष्ठासु गुणेष्वाराध्यकोटिषु ।
धृता अपि निमज्जन्ति दोषपङ्के स्वयं स्त्रियः ॥35॥

अर्थ: गौरव, प्रतिष्ठा और आराधना करनेयोग्य गुणोंसे भूषित कर रक्खी हुई भी स्त्रियाँ अपने दुश्चरित्ररूपी कीचडमें फँस जाती है, अर्थात् स्त्रियाँ किसीके भी वशमें नहीं रहती, किन्तु स्वच्छन्दतया वर्तने लग जाती हैं ।


दोषान्गुणेषु पश्यन्ति प्रिये कुर्वन्ति विप्रियम् ।
सन्मानिताः प्रकुप्यन्ति निसर्गकुटिलाः स्त्रियः ॥36॥

अर्थ: कुटिल स्त्रियोंका स्वभाव ऐसा है कि वे गुणोंमें तो दोष देखती हैं और जो प्यार करें उसमें अप्रियताका आचरण करती हैं और सन्मान करनेसे कुपित होती हैं ।


कृत्वाऽपकार्यलक्षाणि प्रत्यक्षमपि योषितः ।
छादयन्त्येव निःशङ्का विश्ववञ्चनपण्डिताः ॥37॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ लाखों बुरे कार्य प्रत्यक्षमें करके भी निःशंक होकर उन्हें छिपा लेती हैं, क्योंकि ये स्त्रियाँ जगतको ठगनेके लिये अतिशय चतुर हैं। इनकी मायाचातुरीका कोई भी पार नहीं पा सकता ।


दानसन्मानसंभोगप्रणतिप्रतिपत्तिभिः ।
अपि सेवापरं नाथं घ्नन्ति नार्योऽतिनिर्दयाः ॥38॥

अर्थ: ये स्त्रियाँ ऐसी निर्दय होती हैं कि दान, सन्मान, संभोग, नमस्कार करने, आदर करने आदि खुशामदके कार्योंसे सेवा करनेमें तत्पर ऐसे पतिको भी मार डालती हैं ।


विषमध्ये सुधास्यन्दं सस्यजातं शिलोच्चये ।
संभाव्यं न तु संभाव्यं चेतः स्त्रीणामकश्मलम् ॥39॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि विषमें कदाचित् अमृतका झरना अथवा पर्वत पर (शिलाओंके समूह पर) धान्यका उत्पन्न होना संभव है, परन्तु स्त्रियोंका चित्त निष्पाप कदापि न समझना, अर्थात् ये स्त्रियाँ निष्पाप (उज्ज्वल) कभी नहीं होती ।


वन्ध्याङ्गजस्य राज्यश्रीः पुष्पश्रीर्गगनस्य च ।
स्याद् दैवान्न तु नारीणां मनःशुद्धिर्मनागपि ॥40॥

अर्थ: दैवात् वन्ध्यापुत्रकी राज्यलक्ष्मी और आकाशमें पुष्पोंकी शोभा होना संभव है, परन्तु स्त्रियोंके मनकी शुद्धि किंचिन्मात्र भी नहीं होती ।


कुलद्वयमहाकक्षं भस्मसात्कुरुते क्षणात् ।
दुश्चरित्रसमीरालीप्रदीप्तो वनितानलः ॥41॥

अर्थ: दुश्चरित्ररूपी पवनसे प्रदीप्त हुई वनितारूपी अग्नि क्षणमात्रमें अपने उभय कुलरूपी वनको भस्म कर देती है ।


सुराचल इवाकम्पा अगाधा वार्द्धिवद्भृशम् ।
नीयन्तेऽत्र नराः स्त्रीभिरवधूतिं क्षणान्तरे ॥42॥

अर्थ: जो पुरुष सुमेरु पर्वतके समान अचल (अकंप) हैं तथा समुद्रके समान अतिशय अगाध अर्थात् गंभीर प्रकृति है, वे भी इस जगतमें स्त्रियोंके द्वारा क्षणमात्रमें चलायमान वा तिरस्कृत किये जाते हैं, तो अन्य सामान्य पुरुषोंकी तो कथा ही क्या ? ।


वित्तहीनो जरी रोगी दुर्बलः स्थानविच्युतः ।
कुलीनाभिरपि स्त्रीभिः सद्यो भर्ता विमुच्यते ॥43॥

अर्थ: स्त्रियोंका पति यदि धनरहित (दरिद्री) हों, वृद्ध हों, रोगी हों, निर्बल हों तथा स्थानभ्रष्ट हों, तो भले कुलकी स्त्रियाँ भी अपने भरतारको शीघ्र ही छोड देती हैं और किसी अन्यसे रमण करने लग जाती हैं ।


भेत्तुं शूलमसिं छेत्तुं कर्त्तितुं क्रकचं दृढम् ।
नरान्पीडयितुं यन्त्रं वेधसा विहिताः स्त्रियः ॥44॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षा करते हैं कि कहिये ब्रह्माने जो स्त्रियाँ बनाई हैं, वे मनुष्योंको वेधनेके लिये शूली, काटनेके लिये तरवार, कतरनेके लिये दृढ करोत (आरा), अथवा पेलनेके लिये मानों यंत्र ही बनाये हैं ।


विधुर्वधूभिर्मन्येऽहं नभःस्थोऽपि प्रतारितः ।
अन्यथा क्षीयते कस्मात्कलङ्काऽपहतप्रभः ॥45॥

अर्थ: आचार्य महाराज फिर भी उत्प्रेक्षा करते हैं कि आकाशमें रहनेवाला यह चन्द्रमा भी स्त्रियोंसे वंचित किया गया है, अर्थात् मोहित किया गया है, क्योंकि यदि ऐसा न माना जाय तो यह कलंकसे प्रभारहित होकर प्रतिदिन क्षीण क्यों होता है ? ।


यद्रागं सन्ध्ययोर्धत्ते यद्भ्रमत्यविलम्बितम् ।
तन्मन्ये वनितासार्थैर्विप्रलब्धः खरद्युतिः ॥46॥

अर्थ: यह सूर्य जो दोनों सन्ध्याओंके समय ललाईको धारण करता है और निरन्तर भ्रमण करता रहता है, सो मैं ऐसा मानता हूँ कि यह भी स्त्रियोंके समूहोंसे ठगा गया है ।


अन्तःशून्यो भृशं रौति वेलाव्याजेन वेपते ।
धीरोऽपि मथितो बद्धः स्त्रीनिमित्ते सरित्पतिः ॥47॥

अर्थ: यह समुद्र स्त्रीके निमित्त ही नारायणसे मथा गया और रामचन्द्रजीसे बाँधा गया, इस कारण अन्तःशून्य अर्थात् रत्नोंसे रहित होकर गर्जनाके बहानेसे (मिससे) तो रोता है और धीर होते हुए भी लहरोंके बहानेसे मानों कम्पायमान होता है ।


सुरेन्द्रप्रतिमा धीरा अप्यचिन्त्यपराक्रमाः ।
दशग्रीवादयो याताः कृते स्त्रीणां रसातलम् ॥48॥

अर्थ: देखो, इन्द्रके समान धीर, वीर, अचिंत्य पराक्रमी रावण आदिक बडे-बडे छत्रधारी राजा भी स्त्रियोंके निमित्त रसातलको (नरकको) चले गये तो अन्य सामान्य जनोंका तो कहना ही क्या ? ।


दुःखखानिरगाधेयं कलेर्मूलं भयस्य च ।
पापबीजं शुचां कन्दः श्वभ्रभूमिर्नितम्बिनी ॥49॥

अर्थ: यह स्त्री दुःखोंकी तो अगाध खानि है, कि जिसमेंसे दुःख ही दुःख निकलते रहते हैं और जो कलह तथा भयकी जड है, पापका बीज और चिन्ताओंका कन्द (मूल) है तथा नरककी पृथ्वी है ।


यदि मूर्त्ताः प्रजायन्ते स्त्रीणां दोषाः कथंचन ।
पूरयेयुस्तदा नूनं निःशेषं भुवनोदरम् ॥50॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षासे कहते हैं कि स्त्रियोंके दोष यदि किसी प्रकारसे मूर्तिमान हो जायें तो मैं समझता हूँ कि उन दोषोंसे निश्चय करके समस्त त्रिलोक परिपूर्ण भर जायेगा ।


कौतुकेन समाहर्तुं विश्ववर्त्त्यङ्गिसंचयम् ।
वेधसेयं कृता मन्ये नारी व्यसनवागुरा ॥51॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षासे कहते हैं कि ब्रह्माने जो स्त्री बनाई है, सो मानों उसने कौतूहलसे जगतके समस्त जीवोंका संग्रह करनेके वास्ते आकर्षण करनेके लिये कष्टरूपी फाँसी ही बनाई है ।


एकं दृशा परं भावैर्वाग्भिरन्यं तथेङ्गितैः ।
संज्ञयाऽन्यं रतैश्चान्यं रमयन्त्यङ्गना जनम् ॥52॥

अर्थ: स्त्रियाँ किसी एकको तो दृष्टिसे ही प्रसन्न कर देती हैं, किसी दूसरेको भावोंसे ही रमाती हैं, और अन्य किसी एकको वचनमात्रसे तृप्त करके किसीको इशारोंसे ही प्रसन्न कर देती हैं, और शरीरके संकेत किसी औरसे ही करती हैं और रतिसे किसी औरसे ही रमण करती हैं । इस प्रकार अनेक पुरुषोंके चित्तको प्रसन्न करके अपने वश कर लेती हैं ।


धीरैर्धैर्यं समालम्ब्य विवेकामललोचनैः ।
त्यक्ताः स्वप्नेऽपि निःसङ्गैर्नार्यः श्रीसूरिपुङ्गवैः ॥53॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जो धीर, वीर, निर्ग्रंथ, विवेकरूप निर्मल नेत्रोंके धारक और आचार्योंमें प्रधान हैं उन्होंने धीरजका अवलम्बन करके स्वप्नमें भी स्त्रियोंका त्याग कर दिया है, ऐसे महापुरुष ही धन्य हैं ।


यद्वक्तुं न बृहस्पतिः शतमखः श्रोतुं न साक्षात्क्षमः
तत्स्त्रीणामगुणव्रजं निगदितुं मन्ये न कोऽपि प्रभुः
आलोक्य स्वमनीषया कतिपयैर्वर्णैर्यदुक्तं मया
तच्छ्रुत्वा गुणिनस्त्यजन्तु वनितासम्भोगपापग्रहम् ॥54॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि स्त्रियोंके दोषसमूहको कहनेके लिये तो साक्षात् बृहस्पति समर्थ नहीं और सुननेके लिये साक्षात् इन्द्र समर्थ नहीं, इस कारण मैं ऐसा मानता हूँ कि और कोई भी स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन नहीं कर सकता। तिस पर भी मैंने स्त्रियोंके अवगुण देखकर कितने ही अक्षरोंमें कहे हैं, सो इनको सुनकर जो गुणी पुरुष हैं, वे वनिताके संभोगरूपी पापके आग्रहको छोडो, यह हमारा उपदेश है ।


परिभवफलवल्लीं दुःखदावानलालीम्
विषयजलधिवेलां श्वभ्रसौधप्रतोलीम् ।
मदनभुजगदंष्ट्रां मोहतन्द्रासवित्रीम्
परिहर परिणामैर्धैर्यमालम्ब्य नारीम् ॥55॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू धैर्यके अवलम्बनपूर्वक चित्तसे स्त्रीका प्रसंग छोड, क्योंकि यह स्त्री अपमानरूपी फलको उत्पन्न करनेके लिये तो बेल (लता) है और दुःखरूपी दावाग्निकी पंक्ति है तथा विषयरूपी समुद्रकी लहर और नरकरूपी महलमें प्रवेश करनेके लिये प्रतोली है अर्थात् प्रवेश द्वार वा घर हैं तथा कामरूपी सर्पकी दाढ और मोह वा तंद्रा (आलस्य) की माता है ।


यमिभिर्जन्मनिर्विण्णैर्दूषिता यद्यपि स्त्रियः ।
तथाऽप्येकान्ततस्तासां विद्यते नाघसंभवः ॥56॥

अर्थ: यद्यपि संसारसे विरक्त हुए संयमी मुनियोंने स्त्रियोंको दूषित ही किया है अर्थात् दोषयुक्त ही वर्णन किया है, तथापि उनमें एकान्ततासे पापका ही संभव नहीं है; किन्तु उनमेंसे किसी-किसी स्त्रीमें गुण भी होते हैं, सो ही कहते हैं ।


ननु सन्ति जीवलोके काश्चिच्छमशीलसंयमोपेताः ।
निजवंशतिलकभूताः श्रुतसत्यसमन्विता नार्यः ॥57॥

अर्थ: अहो ! इस जगतमें अनेक स्त्रियाँ ऐसी भी हैं कि जो शमभाव (मन्दकषायरूप परिणाम) और शीलसंयमसे भूषित हैं तथा अपने वंशमें तिलकभूत हैं अर्थात् अपने वंशको शोभायमान करती हैं और शास्त्राध्ययन तथा सत्य वचन करके सहित भी हैं ।


सतीत्वेन महत्त्वेन वृत्तेन विनयेन च ।
विवेकेन स्त्रियः काश्चिद् भूषयन्ति धरातलम् ॥58॥

अर्थ: अनेक स्त्रियाँ ऐसी हैं, जो अपने पतिव्रतापनसे, महत्त्वसे, चारित्रसे (सदाचरणोंसे), विनयसे और विवेकसे इस पृथ्वीतलको भूषित (शोभायुक्त) करती हैं ।


निर्विण्णैर्भवसंक्रमाच्छ्रुतधरैरेकान्ततो निःस्पृहै-
र्नार्यो यद्यपि दूषिताः शमधनैर्ब्रह्मव्रतालम्बिभिः ।
निन्द्यन्ते न तथाऽपि निर्मलयमस्वाध्यायवृत्ताङ्किता
निर्वेदप्रशमादिपुण्यचरितैर्याः शुद्धिभूता भुवि ॥59॥

अर्थ: जो संसारके भ्रमणसे विरक्त हैं, शास्त्रोंके पारगामी और स्त्रियोंसे सर्वथा निःस्पृह हैं तथा उपशमभाव ही है धन जिनके, ऐसे ब्रह्मचर्यावलंबी मुनिगणोंने यद्यपि स्त्रियोंकी निन्दा की है, तथापि जो स्त्रियाँ निर्मल और पवित्र यमनियमस्वाध्यायचारित्रादिसे भूषित हैं और वैराग्यउपशमादि पवित्राचरणोंसे पवित्र हैं, वे निंदा करने योग्य नहीं है । क्योंकि निंदा दोषोंकी ही की जाती है, किंतु गुणोंकी निंदा नहीं होतीं ।

सर्ग 13: मैथुनत्यागोपदेश (श्लोक 1 से 25)

स्मरज्वलनसंभ्रान्तो यः प्रतीकारमिच्छति ।
मैथुनेन स दुर्बुद्धिराज्येनाग्निं निषेधति ॥1॥

अर्थ: जो पुरुष कामरूपी अग्निसे पीडित होकर मैथुनसे उस पीडाको शान्त करनेकी इच्छा करता है, वह दुर्बुद्धि घृतसे अग्निको बुझाना चाहता है ।


वरमाज्यच्छटासिक्तः परिरब्धो हुताशनः ।
न पुनर्दुर्गतेर्द्वारं योषितां जघनस्थलम् ॥2॥

अर्थ: घृतकी छटाओंसे सिंचन किये हुए अग्निका आलिंगन करना श्रेष्ठ है; परन्तु स्त्रीके जघनस्थलका आलिंगन करना कदापि श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि वह दुर्गतिका द्वार है, अर्थात् अग्निसे जला हुआ तो इस जन्ममें ही किंचित् कष्ट पाता है, किन्तु स्त्रीका आलिंगन करनेसे दुर्गतिमें नाना प्रकारके कष्ट सहने पडते हैं ।


स्मरशीतज्वरातङ्कशङ्किताः शीर्णबुद्धयः ।
विशन्ति वनितापङ्के तत्प्रतीकारवाञ्छया ॥3॥

अर्थ: कामरूपी शीतज्वरके भयसे नष्टबुद्धि पुरुष उसके प्रतिकारकी वांछा करके स्त्रीरूप कर्दममें (कीचडमें) प्रवेश करते हैं, परन्तु यह समीचीन उपाय नहीं है ।


वासनाजनितं मन्ये सौख्यं स्त्रीसङ्गसंभवम् ।
सेव्यमानं यदन्ते स्याद्वैरस्यायैव केवलम् ॥4॥

अर्थ: स्त्रीके संगसे उत्पन्न हुए सुखका सेवन करना अन्तमें केवल विरसताका ही कारण है। इस कारण आचार्य महाराज कहते हैं कि इस प्राणीकी पूर्व वासना ऐसी ही है, उसीसे ऐसा होता है, किन्तु परमार्थसे विचार किया जाय तो यह सुख दुःख ही है ।


प्रपश्यति यथोन्मत्तः शश्वल्लोष्टेऽपि काञ्चनम् ।
मैथुनेऽपि तथा सौख्यं प्राणी रागान्धमानसः ॥5॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई पुरुष धतूरा खानेसे उन्मत्त होकर मिट्टीके ढेलेमें सोना समझता है, उसी प्रकार रागसे अंध हो गया है चित्त जिसका, ऐसा यह प्राणी मैथुनमें भी (दुःखमें भी) सुखानुभव करता है; किन्तु वास्तवमें इसमें सुख नहीं है ।


अपथ्यानि यथा रोगी पथ्यबुद्ध्या निषेवते ।
सुखबुद्ध्या तथाऽङ्गानि स्त्रीणां कामी गतत्रपः ॥6॥

अर्थ: जैसे रोगी पथ्यकी इच्छासे अपथ्यसेवन करता है उसी प्रकार कामी पुरुष निर्लज्ज होकर सुखकी इच्छासे स्त्रियोंके अंगोंका दर्शनस्पर्शनादि करता है; परन्तु यह उसकी बडी भूल है ।


कश्चिद् ब्रूते यथा दीपं निर्वाणमपि नन्दितम् ।
स्मरमूढः सुखं तद्वद् दुःखमप्यत्र मैथुने ॥7॥

अर्थ: जिस प्रकार दीपकके बुझ जाने पर अनेक जन कहा करते हैं कि ‘दीपक बढ गया’ उसी प्रकार काममूढ पुरुष भी मैथुनमें दुःख ही दुःख है, तो भी उसमें सुखकी कल्पना कर लेता है ।


किम्पाकफलसमानं वनितासंभोगसंभवं सौख्यम् ।
आपाते रमणीयं प्रजायते विरसमवसाने ॥8॥

अर्थ: स्त्रीके संभोगसे उत्पन्न हुआ सुख किम्पाक फल (इन्द्रायणके फल) के समान सेवन करते समय तो रमणीय भासता है; परन्तु अन्तमें विरस है ।


मैथुनाचरणे कर्म निर्घृणैः क्रियतेऽधमम् ।
पीयते वदनं स्त्रीणां लालाम्बुकलुषीकृतम् ॥9॥

अर्थ: निर्दय अथवा ग्लानिरहित पुरुष मैथुनावस्थामें कैसा नीच कर्म करते हैं, कि स्त्रियोंके मुख से निकली हुई लारोंसे मैले किये हुए मुखका पान करते हैं, अर्थात् चुंबन करते हैं। हा ! इन मूर्खोंको ग्लानि भी नहीं आती ।


कण्डूयनतनुस्वेदाद्वेत्ति कुष्टी यथा सुखम् ।
तीव्रस्मररुजातङ्कपीडितो मैथुनं तथा ॥10॥

अर्थ: जैसे कोढी पुरुष शरीरको खुजाने तथा तपानेसे सुख मानता है, उसी प्रकार तीव्र कामरूपी रोगसे दुःखित हुआ पुरुष भी मैथुनकर्मको सुख मानता है, यह बडा विपर्यय है; क्योंकि जैसे खुजानेसे खाज बढती है और अन्तमें कष्टदायक जलनको पैदा करती है, उसी प्रकार स्त्री सेवन भी कामसेवनेच्छाको उत्तरोत्तर बढाता है और अन्तमें कष्टदायक होता है ।


अशुचीन्यङ्गनाङ्गानि स्मराशीविषमूर्छिताः ।
जिह्वाभिर्विलिहन्त्युच्चैः शुनीनामिव कुक्कुराः ॥11॥

अर्थ: यद्यपि स्त्रियोंके अंग अशुचि हैं अर्थात् अपवित्र हैं परन्तु उन्हें कामरूपी सर्पसे काटे हुए अचेत पुरुष अतिशय आसक्त होकर जैसे कुत्ते कुतियाके अंगोंको चाटते हैं, उसी प्रकार चाटते हैं। हा ! इन निर्लज्जोंको ग्लानि भी नहीं आती ।


ग्लानिर्मूर्च्छा भ्रमः कम्पः श्रमः स्वेदोऽङ्गविक्रिया ।
क्षयरोगादयो दोषा मैथुनोत्थाः शरीरिणाम् ॥12॥

अर्थ: जीवोंके यद्यपि ग्लानि, मूर्च्छा, भ्रम, कंपन, श्रम (थकावट), स्वेद (पसीना), अंगविकार और क्षयरोग इत्यादि दोष मैथुनसे ही उपजते हैं, तो भी यह मूर्ख प्राणी उसको सेवता ही है ।


अनेकदुःखसन्ताननिदानं विद्धि मैथुनम् ।
कथं तदपि सेवन्ते हन्त रागान्धबुद्धयः ॥13॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस मैथुनकर्मको अनेक दुःखोंका कारण जान । आचार्य महाराज खेदपूर्वक कहते हैं कि प्रत्यक्ष दुःखदायक जान कर भी रागान्ध पुरुष इसका सेवन करते हैं, सो बडा खेद है ।


कुष्टव्रणमिवाजस्रं वाति स्रवति पूतिकम् ।
यत्स्त्रीणां जघनद्वारं रतये तद्धि रागिणाम् ॥14॥

अर्थ: स्त्रियोंका जघनद्वार जो कुष्ठके (कोढके) घावके समान निरन्तर झरता है तथा दुर्गन्धसे बासता है; वह भी रागी पुरुषोंकी रति (प्रीति) के लिये है, यह आश्चर्य है ।


काकः कृमिकुलाकीर्णे करङ्के कुरुते रतिं ।
यथा तद्वद्वराकोऽयं कामी स्त्रीगुह्यमन्थने ॥15॥

अर्थ: जैसे काक कीडोंके समूहसे भरे हाड वा फलविशेषमें रति (प्रीति) करता है, उसी प्रकार यह पामर प्राणी भी स्त्रीके गुह्यस्थानके मंथन करनेमें प्रीति करता है ।


वक्तुमपि लज्जनीये दुर्गन्धे मूत्रशोणितद्वारे ।
जघनबिले वनितानां रमते बालो न तत्त्वज्ञः ॥16॥

अर्थ: स्त्रियोंके योनिछिद्रका नाम लेते ही लज्जा आती है, फिर दुर्गन्धमय और मूत्र तथा रुधिरके झरनेका द्वार है ऐसेमें अज्ञानी ही रमता है, तत्त्वज्ञानी तो कभी नहीं रमता ।


स्वतालुरक्तं किल कुक्कुराधमैः प्रपीयते यद्वदिहास्थिचर्वणात् ।
तथा विटैर्विद्धि वपुर्विडम्बनैर्निषेव्यते मैथुनसंभवं सुखम् ॥17॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू ऐसा जान कि जैसे नीच कुत्ते हाडके चर्वण करनेसे अपने ही तालुसे निकलनेवाले रक्तका पान करके प्रसन्न होते हैं कि यह रुधिर हाडमेंसे ही निकलता है, उसी प्रकार व्यभिचारी जन अपने और स्त्रीके शरीरकी विडंबनासे उत्पन्न हुए सुखका सेवन करते हैं ।


अशुचिष्वङ्गनाङ्गेषु संगताः पश्य रागिणः ।
जुगुप्सां जनयन्त्येते लोलन्तः कृमयो यथा ॥18॥

अर्थ: देखो, जिस प्रकार अपवित्र मलादिकमें कीडे कलबलाहट करते हैं, उसी प्रकार ये चपल कामी जन स्त्रियोंके अपवित्र अंगोंकी संगति करते हुए ग्लानिको उत्पन्न करते हैं ।


योनिरन्ध्रमिदं स्त्रीणां दुर्गतेर्द्वारमग्रिमम् ।
तत्त्यजन्ति ध्रुवं धन्या न दीना दैववञ्चिताः ॥19॥

अर्थ: स्त्रियोंका योनिरन्ध्र दुर्गतिका प्रथम (मुख्य) द्वार है, इस कारण उसे जो धन्य पुरुष हैं, वे तो अवश्य ही त्यागते हैं; किन्तु जो दीन हैं अर्थात् नीच हैं, वे नहीं छोडते, क्योंकि वे दैवसे ठगे हुए अर्थात् अभागी हैं ।


मालतीव मृदून्यासां विद्धि चाङ्गानि योषितां ।
दारयिष्यन्ति मर्माणि विपाके ज्ञास्यसि स्वयम् ॥20॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू इन स्त्रियोंके अंगोंको मालती पुष्पके समान कोमल जानता है, परन्तु अन्तमें जब ये तेरे मर्मोंका विदारण करेंगे तब तुझे अपने आप मालूम हो जायगा ।


मैथुनाचरणे मूढ म्रियन्ते जन्तुकोटयः ।
योनिरन्ध्रसमुत्पन्ना लिंगसंगप्रपीडिताः ॥21॥

अर्थ: हे मूढ ! योनिरंध्रमें असंख्य जीवोंकी कोटिकी (समूहकी) उत्पत्ति होती है सो मैथुनाचरणसे वे सब जीव घाते जाते हैं, उनकी हिंसासे ही दुर्गतिमें दुःख सहने पडते हैं ।


बीभत्सानेकदुर्गन्धमलाक्तं स्वकलेवरम् ।
यत्र तत्र वपुः स्त्रीणां कस्यास्तु रतये भुवि ॥22॥

अर्थ: इस पृथ्वीमें जब अपना ही शरीर जहाँ-तहाँ बीभत्स अनेक दुर्गन्धियों तथा मलोंसे भरा है, तो फिर स्त्रियोंका शरीर किसके रति करने योग्य हो, अर्थात् किसीको प्रीतिके अर्थ नहीं हो सकता ।


उत्तानोच्छूनमण्डूकदारितोदरसन्निभे ।
चर्मरन्ध्रे मनुष्याणामपूर्वः कोऽप्यसद्ग्रहः ॥23॥

अर्थ: स्त्रियोंका योनिरन्ध्र उत्तान कहिये उलटे किये और उच्छून कहिये सूझे हुए मेंढकके विदारे फाडे हुए पेटकी आकृतिके समान घृणास्पद है। सो ही कवि कहता है कि ऐसे घृणास्पद अपवित्र स्थानमें कोई अपूर्व असमीचीन दुराग्रह है जो मनुष्य मलिनाचरण करते हैं ।


सर्वाशुचिमये काये दुर्गन्धामेध्यसंभृते ।
रमन्ते रागिणः स्त्रीणां विरमन्ति तपस्विनः ॥24॥

अर्थ: दुर्गन्ध विष्टादिकसे भरे और सर्वत्र अशुचिमय स्त्रियोंके शरीरमें रागी जन ही रमते हैं, किन्तु तपस्वी तो उससे विरक्त ही रहते हैं ।


कुथितकुणपगन्धं योषितां योनिरन्ध्रं
कृमिकुलशतपूर्णं निर्झरत्क्षारवारि ।
त्यजति मुनिनिकायः क्षीणजन्मप्रबन्धो
भजति मदनवीरप्रेरितोऽङ्गी वराकः ॥25॥

अर्थ: स्त्रियोंका योनिरन्ध्र बिगडे हुए वा सडे हुए मुर्देकीसी दुर्गन्धवाला है, कीडोंके सैंकडों समूहोंसे भरा हुआ है और क्षारजल (मूत्र) झरता रहता है। जिनके संसारका अन्त आ गया है, ऐसे मुनिगण तो इसे छोडते हैं और जो रंक कामरूपी सुभटसे प्रेरित हैं, वे इसका सेवन करते हैं ।

सर्ग 14: स्त्रीसंसर्गनिषेध (श्लोक 1 से 45)

विरज्याशेषसंगेभ्यो यो वृणीते शिवश्रियम् ।
स क्रुद्धाहेरिव स्त्रीणां संसर्गाद्विनिवर्त्तते ॥1॥

अर्थ: जो पुरुष समस्त परिग्रहोंसे विरक्त होकर, क्रुधित सर्पसे कोई जिस प्रकार दूर रहता है, उसी प्रकार स्त्रियोंके संसर्गसे दूर रहता है, वही मुक्तिरूपी लक्ष्मीको वरता है, अर्थात् प्राप्त होता है ।


यथा सद्यो विलीयन्ते गिरयो वज्रताडिताः ।
तथा मत्ताङ्गनापाङ्गप्रहारेणाल्पचेतसः ॥2॥

अर्थ: जैसे वज्रपातसे ताडे हुए पर्वत शीघ्र ही खंड-खंड हो जाते हैं, वैसे यौवनसे मदोन्मत्त स्त्रियोंके नेत्रकटाक्षोंके प्रहारसे अल्पज्ञानी खंड-खंड हो स्त्रियोंमें तन्मय हो जाते हैं अर्थात् स्त्रियोंका संसर्ग अल्पज्ञोंको खराब करता है ।


यस्तपस्वी व्रती मौनी संवृतात्मा जितेन्द्रियः ।
कलङ्कयति निःशङ्कं स्त्रीसखः सोऽपि संयमं ॥3॥

अर्थ: जो मुनि, तपस्वी, व्रती, मौनी, संवरस्वरूप तथा जितेन्द्रिय हो और स्त्रीकी संगति करता हो, वह अपने संयमको कलंक ही लगाता है ।


मासे मासे व्यतिक्रान्ते यः पिबत्यम्बु केवलम् ।
विमुह्यति नरः सोऽपि संगमासाद्य सुभ्रुवः ॥4॥

अर्थ: जो मुनि महीने-महीनेका उपवास करके केवल मात्र जल ही ग्रहण करता है, ऐसा तपस्वी भी स्त्रीकी संगति पाकर मोहित हो जाता है ।


सर्वत्राप्युपचीयन्ते संयमाद्यास्तपस्विनाम् ।
गुणाः किन्त्वङ्गनासङ्गं प्राप्य यान्ति क्षयं क्षणात् ॥5॥

अर्थ: तपस्वियोंके संयमादि गुण सब जगह वृद्धिको प्राप्त होते हैं, किन्तु अंगनाके संसर्गको प्राप्त होकर, वे गुण क्षणमात्रमें नष्ट हो जाते हैं ।


संचरन्ति जगत्यस्मिन्स्वेच्छया यमिनां गुणाः ।
विलीयन्ते पुनर्नारीवदनेन्दु विलोकनात् ॥6॥

अर्थ: संयमी जनोंके गुण इस जगतमें स्वेच्छासे यत्र-तत्र विस्तारको प्राप्त होते हैं, परन्तु स्त्रियोंके मुखरूपी चंद्रमाके देखनेसे विलीन हो जाते हैं ।


तावद्धत्ते मुनिः स्थैर्यं श्रुतं शीलं कुलक्रमं ।
यावन्मत्ताङ्गनानेत्रवागुराभिर्न रुद्ध्यते ॥7॥

अर्थ: मुनि है सो स्थिरता, शास्त्राध्ययन, शील और कुलक्रम (गुरु आम्नाय) को तब तक ही धारण करता है, जब तक यौवन-मदोन्मत्त स्त्रीके नेत्ररूपी फाँसीसे नहीं बँधता, अर्थात् स्त्रियोंके नेत्रकटाक्षपात होते ही शास्त्राध्ययनादि सब नष्ट हो जाते हैं ।


नवनीतनिभं पुंसां मनः सद्यो विलीयते ।
वनितावह्निसंतप्तं सतामपि न संशयः ॥8॥

अर्थ: पुरुषोंका मन नवनीत (मक्खन) सदृश है, सो स्त्रीरूपी अग्निका संयोग होने पर सत्पुरुषोंका चित्त भी चलायमान हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं ।


अन्तःसुप्तोऽपि जागर्त्ति स्मरः संगेन योषिताम् ।
रोगव्रज इवापथ्यसेवासंभावितात्मनाम् ॥9॥

अर्थ: जैसे अपथ्य सेवन करनेवाले मनुष्योंके रोगोंका समूह उत्पन्न हो जाता है, वैसे ही काम है सो अन्तरंग (मन) में सोता है, तो भी स्त्रीके संगममात्रसे जागता है ।


क्रियते यैर्मनः स्वस्थं श्रुतप्रशमसंयमैः ।
तेऽपि संसर्गमासाद्य वनितानां क्षयं गताः ॥10॥

अर्थ: जिन पुरुषोंने शास्त्राध्ययन, प्रशम भाव और संयमसे अपने मनको स्वस्थ (वशीभूत) कर लिया है, वे भी स्त्रियोंके संसर्गको प्राप्त होकर नष्ट हो गये हैं ।


स्थिरीकृत्य मनस्तत्त्वे तावत्तिष्ठति संयमी ।
यावन्नितम्बिनीभोगिभृकुटिं न समीक्षते ॥11॥

अर्थ: संयमी पुरुष तब तक ही मनको तत्त्वमें स्थिर करके रहता है जब तक कि स्त्रीरूपी सर्पकी भृकुटीको नहीं देखता ।


यासां संकल्पलेशोऽपि तनोति मदनज्वरम् ।
प्रत्यासत्तिर्न किं तासां रुणद्धि चरणश्रियम् ॥12॥

अर्थ: जिन स्त्रियोंके संकल्पका लेशमात्र भी मनमें हो तो वह मदनज्वरको बढा देता है, तो उनकी निकटता क्या चारित्ररूपी लक्ष्मीको नष्ट भ्रष्ट नहीं करेंगी ? ।


यस्याः संसर्गमात्रेण यतिभावः कलङ्क्यते ।
तस्याः किं न कथालापैर्भ्रूभङ्गैश्चारुविभ्रमैः ॥13॥

अर्थ: जिस स्त्रीके संसर्गमात्रसे ही मुनिपन कलंकित होता है, उसके साथ वार्तालाप करने, भौंहके टेढेपन और सुन्दर विभ्रम विलासोंके देखनेसे क्या यतिपन नष्ट नहीं होता ? अर्थात् होता ही है ।


सुचिरं सुष्टु निर्णीतं लब्धं वा वृद्धसन्निधौ ।
लुप्यते स्त्रीमुखालोकाद्वृत्तरत्नं शरीरिणाम् ॥14॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हमने बहुत काल बडोंकी संगतिमें रहकर भले प्रकार निर्णय कर लिया है तथा यह सिद्धान्त प्राप्त किया है कि स्त्रीके मुखावलोकन करनेसे जीवोंका संयमरूपी रत्न अवश्य ही नष्ट हो जाता है ।


पुस्तोपलविनिष्पन्नं दारुचित्रादिकल्पितम् ।
अपि वीक्ष्य वपुः स्त्रीणां मुह्यत्यङ्गी न संशयः ॥15॥

अर्थ: स्त्रियोंके शरीरकी आकृति पुस्त (मिट्टी आदिसे) व पाषाणसे रची हुई तथा काष्ठचित्रादिसे रची हुईको देखकर भी प्राणी मोहको प्राप्त होता है, इसमें कुछ सन्देह नहीं है। फिर साक्षात् स्त्रीको देखने क्यों नहीं मोहित होगा ? अर्थात् अवश्य ही होगा ।


दृष्टिपातो भवेत्पूर्वं व्यामुह्यति ततो मनः ।
प्रणिधत्ते जनः पश्चात्तत्कथागुणकीर्तने ॥16॥

अर्थ: प्रथम तो स्त्री पर दृष्टि पडती है, तत्पश्चात् चित्त मोहित होता है, तत्पश्चात् मनुष्य उस स्त्रीकी कथा और गुणकीर्तनमें मन लगाता है ।


ततः प्रेमानुबन्धः स्यादुभयोरपि निर्भरम् ।
उत्कण्ठते ततश्चेतः प्रेमकाष्ठप्रतिष्ठितम् ॥17॥

अर्थ: गुणकीर्तनके पश्चात् दोनोंके परस्पर प्रेमस्नेहकी अतिशयतासे प्रेमग्रंथि पड जाती है, तत्पश्चात् चित्त स्नेहकी सीमा पर स्थित हो उत्कंठित रहता है कि कब मिलाप हो ।


दानदाक्षिण्यविश्वासैरुभयोर्वर्द्धते स्मरः ।
ततः शाखोपशाखाभिः प्रीतिवल्ली विसर्पति ॥18॥

अर्थ: पूर्वोक्त प्रकारसे तथा दान-दाक्षिण्य-विश्वासादिसे दोनोंके शरीरमें कामवृद्धि होती है, तत्पश्चात् शाखा उपशाखाओंसे वह प्रीतिरूपी लता (वेल) विस्तृत हो जाती है ।


मनो मिलति चान्योऽन्यं निःशङ्कं संगलालसं ।
प्रणश्यति ततो लज्जा प्रेमप्रसरपीडिता ॥19॥

अर्थ: तत्पश्चात् निःशंक संगमका लोलुप दोनोंका मन परस्पर एक हो जाता है। तत्पश्चात् प्रेमके प्रसर (वेग) से पीडित होकर लज्जा नष्ट हो जाती है। अर्थात् दोनों ऐसे निर्लज्ज हो जाते हैं, कि बडोंके निकट रहने पर भी परस्पर वचनालाप दृष्टिसाम्यतादि निर्लज्जताके कार्य होने लगते हैं ।


निःशङ्कं कुरुते नर्म रहोजल्पावलम्बितम् ।
वीक्षणादीन्धनोद्भूतः कामाग्निः प्रविजृम्भते ॥20॥

अर्थ: तत्पश्चात् दोनों एकान्तस्थान पाते ही निःशंक हो हास्यरूप वार्तालाप करते रहते हैं। तत्पश्चात् दर्शन-स्पर्शनादि इंधनसे उत्पन्न हुई कामाग्नि प्रज्वलित (तीव्र) हो जाती है ।


बहिरन्तस्ततस्तेन दह्यमानोऽग्निना भृशम् ।
अविचार्य जनः शीघ्रं ततः पापे प्रवर्त्तते ॥21॥

अर्थ: तत्पश्चात् यह मनुष्य उस कामरूपी अग्निसे बाह्यमें तो शरीर और अन्तरंगमें चित्तके अतिशय दाहरूप होनेसे बिना विचारे ही पापकार्यमें प्रवर्त्तने लग जाता है। इस प्रकार अनुक्रमसे स्त्रीके संसर्गसे मनुष्यकी पापाचरणमें प्रवृत्ति हो जाती है ।


श्रुतं सत्यं तपः शीलं विज्ञानं वृत्तमुत्तमम् ।
इन्धनीकुरुते मूढः प्रविश्य वनितानले ॥22॥

अर्थ: इस प्रकार यह मूढ प्राणी स्त्रीरूपी अग्निमें प्रवेश करके शास्त्राध्ययन, सत्य व्रत, तप, शील (ब्रह्मचर्य), विज्ञान और उत्तम चारित्र इनको इंधनके समान जला देता है, अर्थात् स्त्रीके संसर्गसे समस्त धर्म कर्म नष्ट कर देता है ।


स्फुरन्ति हृदि संकल्पा ये स्त्रीव्यासक्तचेतसां ।
रागिणां तानि हे भ्रातर्न कोऽपि गदितुं क्षमः ॥23॥

अर्थ: हे भाई ! जिन पुरुषोंका चित्त स्त्रियोंमें आसक्त है, उन रागियोंके मनमें जो जो संकल्प होते हैं, उन्हें कहनेको कोई भी समर्थ है ? कदापि नहीं। क्योंकि कामीके मनमें क्षणक्षणमें अनेक संकल्प होते रहते हैं ।


संसर्गप्रभवा नूनं गुणा दोषाश्च देहिनाम् ।
एकान्ततः स दोषाय स्त्रीभिः सार्द्धं कृतः क्षणम् ॥24॥

अर्थ: सामान्यतासे संसर्गसे जीवोंके गुण दोष दोनों ही होते हैं; परन्तु स्त्रियोंके साथ जो संसर्ग क्षणभरके लिये भी किया जाय तो वह केवल दोषोंके लिये ही होता है ।


पुण्यानुष्टानसम्भूतं महत्त्वं क्षीयते नृणाम् ।
सद्यः कलङ्क्यते वृत्तं साहचर्येण योषिताम् ॥25॥

अर्थ: स्त्रियोंके साथ संसर्ग रहनेसे मनुष्योंका अनेक पुण्यकार्योंसे प्राप्त हुआ महत्त्व (बडप्पन) तत्काल नष्ट हो जाता है और जो व्रत चारित्र हैं, वे कलंकित हो जाते हैं ।


अपवादमहापङ्के निमज्जन्ति न संशयः ।
यमिनोऽपि जगद्वन्द्यवृत्ता रामास्पदं श्रिताः ॥26॥

अर्थ: जो संयमी मुनि जगतसे वंदनयोग्य चारित्रवाले हैं, वे भी स्त्रीके संसर्गसे अपवादरूपी महाकर्दममें निःसंदेह डूब जाते हैं अर्थात् फँस जाते हैं ।


अनन्तमहिमाकीर्णं प्रोत्तुङ्गं वृत्तपादपम् ।
वामा कुठारधारेव विच्छिनत्त्याशु देहिनाम् ॥27॥

अर्थ: जीवोंके अनन्त महिमायुक्त, बहुत ऊँचा चारित्ररूपी जो वृक्ष है, उसे स्त्री कुल्हाडेके समान तत्काल काट डालती है ।


लोचनेषु मृगाक्षीणां क्षिप्तं किञ्चित्तदञ्जनम् ।
येनापाङ्गैः क्षणादेव मुह्यत्यासां जगत्त्रयम् ॥28॥

अर्थ: आचार्य महाराज उत्प्रेक्षासे कहते हैं कि स्त्रियोंके नेत्रोंमें विधाताने कोई ऐसा ही मोहिनी अंजन डाल दिया है कि जिससे इनके कटाक्षोंको देखनेसे क्षणभरमें यह तीनों लोक मोहित हो जाते हैं ।


कौतुकेन भ्रमेणापि दृष्टिर्लग्नाङ्गनामुखे ।
क्रष्टुं न शक्यते लोकैः पङ्कमग्नेव हस्तिनी ॥29॥

अर्थ: जैसे हस्तिनी कर्दममें फँस जाती है तो उसको निकालना बडा कठिन होता है, उसी प्रकार मनुष्योंकी दृष्टि कौतुक वा भ्रमसे भी स्त्रीके मुख पर पड जाती है तो वे उसे खींचनेको असमर्थ होते हैं ।


एकत्र वसतिः साध्वी वरं व्याघ्रोरगैः सह ।
पिशाचैर्वा न नारीभिर्निमेषमपि शस्यते ॥30॥

अर्थ: व्याघ्र, सर्प तथा पिशाचोंके साथ एकत्र रहना तो श्रेष्ठ है, परन्तु स्त्रियोंके साथ निमेषमात्र भी रहना श्रेष्ठ नहीं है ।


भ्रूलताचलनैर्येषां स्खलत्यमरमण्डली ।
तेऽपि संसर्गमात्रेण वनितानां विडम्बिताः ॥31॥

अर्थ: जिनकी भौंहरूपी लताके हिलने मात्रसे देवोंका समूह स्खलित (भयभीत वा क्षुभित) हो जाता है, ऐसे चक्रवर्त्यादिक बडे-बडे महापुरुष भी स्त्रियोंके संसर्ग मात्रसे विडंबनारूप हो जाते हैं; फिर सामान्य मनुष्यका तो कहना ही क्या ? ।


त्यजन्ति वनिताचौररुद्धाश्चारित्रमौक्तिकम् ।
यतयोऽपि तपोभङ्गकलङ्कमलिनाननाः ॥32॥

अर्थ: स्त्रीरूपी चोरके रोकनेसे (ललकारने पर) तप भंग करनेके कलंकसे मलिन है मुख जिनका ऐसे मुनिगण भी अपना चारित्ररूपी मोतियोंका हार उसके सामने डाल देते हैं, अन्यकी तो कथा ही क्या ? ।


ब्रह्मचर्यच्युतः सद्यो महानप्यवमन्यते ।
सर्वैरपि जनैर्लोके विध्यात इव पावकः ॥33॥

अर्थ: यदि कोई बडा प्रतिष्ठित हो और ब्रह्मचर्यसे च्युत हो जाय तो वह भी सबके द्वारा अपमानित किया जाता है, क्योंकि जैसे अग्निके बुझ जाने पर उससे किसीको भी भय नहीं रहता, उसी प्रकार ब्रह्मचर्यसे भ्रष्ट होने पर बडे पुरुषका भी किसीको भय नहीं रहता, अर्थात् उसका अपमान हर कोई कर सकता है ।


विशुद्ध्यति जगद्येषां स्वीकृतं पादपांसुभिः ।
वञ्चिता बहुशस्तेऽपि वनितापाङ्गवीक्षणात् ॥34॥

अर्थ: जिन महापुरुषोंके चरणोंकी रजसे यह जगत् पवित्र हो जाता है, वे भी प्रायः स्त्रियोंके किये हुए कटाक्षोंके देखनेसे वञ्चित (नष्ट) हो गये हैं। ऐसे महापुरुषोंकी कथा जगतमें तथा शास्त्रोंमे बहुत है ।


तपःश्रुतकृताभ्यासा ध्यानधैर्यावलम्बिनः ।
श्रूयन्ते यमिनः पूर्वं योषाभिः कश्मलीकृताः ॥35॥

अर्थ: जिनके तप और शास्त्रोंका अभ्यास है तथा जो ध्यानमें धैर्य (दृढता) का अवलंबन करनेवाले हैं, ऐसे मुनि भी स्त्रियोंसे कलंकित हुए सुने जाते हैं, अन्य क्षुद्र पुरुषोंका तो कहना ही क्या ? ।


उह्यते यत्र मातङ्गैर्नगोत्तुङ्गैर्जलप्लवे ।
तत्र व्यूढा न संदेहः प्रागेव मृगशावकाः ॥36॥

अर्थ: क्योंकि जिस जलके प्रवाहमें पर्वत सरीखे बडे-बडे हाथी भी बह जाते हैं, उसमें यदि पहिले मृगोंके बच्चे बह गये तो इसमें क्या संदेह है ? ।


इह हि वदनकञ्जं हावभावालसाढ्यं
मृगमदललिताङ्कं विस्फुरद्भ्रूविलासम् ।
क्षणमपि रमणीनां लोचनैर्वीक्ष्यमाणं
जनयति हृदि कम्पं धैर्यनाशं च पुंसाम् ॥37॥

अर्थ: इस जगतमें हावभाव आदि विलासोंसे भरे हुए, कस्तूरीकी सुन्दर बिन्दीवाले तथा विशेषताके साथ चंचल हैं भौंहके विलास जिसमें ऐसे स्त्रियोंके मुखरूपी कमलको क्षणभर भी नेत्रोंसे देखने पर वह पुरुषोंके हृदयमें कम्प उत्पन्न करके धैर्यको नष्ट कर देता है ।


यासां सीमन्तिनीनां कुरबकतिलकाशोकमाकन्दवृक्षाः
प्राप्योच्चैर्विक्रियन्ते ललितभुजलतालिङ्गनादीन्विलासान् ।
तासां पूर्णेन्दुगौरं मुखकमलमलं वीक्ष्य लीलारसाढ्यं
को योगी यस्तदानीं कलयति कुशलो मानसं निर्विकारम् ॥38॥

अर्थ: जिन स्त्रियोंके सुन्दर भुजलताओंके आलिंगनादि विलासोंको प्राप्त होकर कुरबक, तिलक, अशोक और आम्रवृक्ष भी अतिशय विकारको प्राप्त होते हैं अर्थात् फलते-फूलते हैं, तो उन स्त्रियोंके पूर्ण चन्द्रमाके समान गौर लीलारसयुक्त मुखकमलोंको देखकर ऐसा कौनसा योगी यति प्रवीण है, जो अपने मनको उस समय निर्विकार रख सके ? अर्थात् कोई भी नहीं ।


तावद्धत्ते प्रतिष्ठां परिहरति मनश्चापलं चैष तावत्
तावत्सिद्धान्तसूत्रं स्फुरति हृदि परं विश्वतत्त्वैकदीपम् ।
क्षीराकूपारवेलावलयविलसितैर्मानिनीनां कटाक्षै-
र्यावन्नो हन्यमानं कलयति हृदयं दीर्घदोलायितानि ॥39॥

अर्थ: यह पुरुष जब तक क्षीरसमुद्रकी लहरोंके वलयसरीखे विलासरूप मानिनी स्त्रियोंके कटाक्षोंसे हननेमें आये हुए हृदयके दीर्घ दोलायमान चंचलभावको प्राप्त नहीं होता, तब तक ही यह मनुष्य प्रतिष्ठाको धारण करता है और मनकी चंचलताको छोडकर स्थिरता रख सकता है और तब तक ही समस्त तत्त्वोंका प्रकाश करनेके लिये दीपकके समान सिद्धान्तसूत्र हृदयमें स्फुरित होते हैं, अर्थात् स्त्रियोंके सुन्दर कटाक्षोंको देखनेसे किसका मन स्थिर रह सकता है ? ।


संसर्गाद्दुर्बलां दीनां संत्रस्तामप्यनिच्छतीम् ।
कुष्ठिनीं रोगिणीं जीर्णां दुःखितां क्षीणविग्रहाम् ॥40॥

अर्थ: स्त्रीके संसर्गसे भ्रष्ट हुए कामी पुरुष दुर्बल, दीन (भिखारिनी), भयभीत, विना इच्छती, कोढनी, रोगिणी, बुढिया, दुःखिनी, क्षीण शरीरवाली, निंदित (वेश्यादिक) तथा निन्द्य जातिकी चंडालनी आदि तथा स्वजातीया, तपस्विनी, बालिका और तो क्या तिर्यंचनीसे भी व्यभिचार करने लग जाते हैं । इस कारण ब्रह्मचारियोंको स्त्रीका संसर्ग सर्वथा छोडना चाहिये ॥४०-४१॥


निन्दितां निन्द्यजातीयां स्वजातीयां तपस्विनीम् ।
बालामपि तिरश्चीं स्त्रीं कामी भोक्तुं प्रवर्तते ॥41॥

अर्थ: स्त्रीके संसर्गसे भ्रष्ट हुए कामी पुरुष दुर्बल, दीन (भिखारिनी), भयभीत, विना इच्छती, कोढनी, रोगिणी, बुढिया, दुःखिनी, क्षीण शरीरवाली, निंदित (वेश्यादिक) तथा निन्द्य जातिकी चंडालनी आदि तथा स्वजातीया, तपस्विनी, बालिका और तो क्या तिर्यंचनीसे भी व्यभिचार करने लग जाते हैं । इस कारण ब्रह्मचारियोंको स्त्रीका संसर्ग सर्वथा छोडना चाहिये ॥४०-४१॥


अङ्गनापाङ्गबाणालीं प्रपतन्तीं निवारय ।
विधाय हृदयं धीर दृढं वैराग्यवर्मितम् ॥42॥

अर्थ: अब आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे धीर वीर, अपने हृदयको वैराग्यरूपी दृढ कवचसे वेष्ठित करके स्त्रियोंके कटाक्षबाणोंकी पडती हुई पंक्तिको निवारण कर ।


ब्रह्मचर्यविशुद्ध्यर्थं सङ्गः स्त्रीणां न केवलम् ।
त्याज्यः पुंसामपि प्रायो विटविद्यावलम्बिनाम् ॥43॥

अर्थ: हे भाई ! ब्रह्मचर्यकी रक्षाके लिये केवल स्त्रियोंके संसर्गका ही निषेध नहीं किया है, किन्तु विटविद्यावलम्बी व्यभिचारी स्त्रीपुरुषोंका संग भी त्यागने योग्य कहा है ।


मदान्धैः कामुकैः पापैर्वञ्चकैर्मार्गविच्युतैः ।
स्तब्धलुब्धाधमैः सार्द्धं संगो लोकद्वयान्तकः ॥44॥

अर्थ: जो मदसे अंधे हैं, कामी हैं, पापी हैं, ठग हैं, कुमार्गी हैं, स्तब्ध हैं, लोभी हैं, अधम हैं तथा नीच हैं, इनमेंसे किसीके भी साथ संसर्ग करना दोनों लोकोंका बिगाडनेवाला है, इस कारण इनकी संगति करना सर्वथा त्याज्य है ।


सूत्रे दत्तावधानाः प्रशमयमतपोध्यानलब्धावकाशाः
शश्वत्संन्यस्तसंगा विमलगुणमणिग्रामभाजः स्वयं ये ।
श्रूयन्ते कामिनीनां स्तनजघनमुखालोकनात्तेऽपि भग्ना
मज्जन्तो मोहवार्धौ जिनपतियतयः प्राक् प्रसिद्धाः कथासु ॥45॥

अर्थ: सिद्धान्तसूत्रोंमें दिया है चित्त जिन्होंने, ऐसे तथा प्रशमभाव और यम-नियम-तप-ध्यानादिमें समस्त काल बितानेवाले, निरन्तर परिग्रहके त्यागी, निर्मल गुणरूपी मणियोके समूहको धारण करनेवाले ऐसे जैन यति (रुद्रादिक) स्त्रियोंके स्तन, जघन व मुखके देखनेसे भ्रष्ट होकर मोहरूपी समुद्रमें डूबे हुए कथाओंमें प्रसिद्ध हैं अर्थात् सुने जाते हैं ।

सर्ग 15: वृद्धसेवा की प्रशंसा (श्लोक 1 से 47)

लोकद्वयविशुद्ध्यर्थं भावशुद्ध्यर्थमञ्जसा ।
विद्याविनयवृद्ध्यर्थं वृद्धसेवैव शस्यते ॥1॥

अर्थ: अनायास दोनों लोकोंकी सिद्धिके लिये, भावोंकी शुद्धताके लिये तथा विद्याविनयकी वृद्धिके लिये वृद्धपुरुषोंकी (गुरुजनोंकी) सेवाकी ही प्रशंसा की गई है ।


कषायदहनः शान्तिं याति रागादिभिः समम् ।
चेतः प्रसत्तिमाधत्ते वृद्धसेवावलम्बिनाम् ॥2॥

अर्थ: जो पुरुष वृद्धसेवा करनेवाले हैं, उनकी कषायरूपी अग्नि रागादि सहित शान्त हो जाती है और चित्त प्रसन्न वा निर्मल हो जाता है। बडोंकी सेवासे ही ये गुण होते हैं ।


निर्मलीकुरु वैराग्यं चित्तदैत्यं नियन्त्रय ।
आसादय वरां बुद्धिं दुर्बुद्धे वृद्धसाक्षिकम् ॥3॥

अर्थ: आचार्य महाराज यहाँ उपदेश करते हैं कि हे दुर्बुद्धि आत्मा ! गुरुजनोंकी साक्षीपूर्वक अर्थात् गुरुजनोंके निकट रह कर तू अपने वैराग्यको तो निर्मल कर और संसारदेहभोगोंसे लेशमात्र भी राग मत कर तथा चित्तरूपी दैत्य (राक्षस) जो कि स्वेच्छासे प्रवर्तता है, उसे वशमें कर और उत्कृष्ट बुद्धिको (विवेकिताको) अंगीकार कर, क्योंकि ये गुण गुरुजनोंकी सेवा करनेसे ही प्राप्त होते हैं ।


स्वतत्त्वनिकषोद्भूतं विवेकालोकवर्धितम् ।
येषां बोधमयं चक्षुस्ते वृद्धा विदुषां मताः ॥4॥

अर्थ: जिनके आत्मतत्त्वरूप कसोटीसे उत्पन्न भेदज्ञानरूप आलोकसे बढाया हुआ ज्ञानरूपी नेत्र है, उनको ही विद्वानोंने वृद्ध कहा है ।


तपःश्रुतधृतिध्यानविवेकयमसंयमैः ।
ये वृद्धास्तेऽत्र शस्यन्ते न पुनः पलिताङ्कुरैः ॥5॥

अर्थ: जो मुनि तप, शास्त्राध्ययन, धैर्य, ध्यान, विवेक (भेदज्ञान), यम तथा संयमादिकसे वृद्ध (बढे हुए) अर्थात् बडे हैं, वे ही वृद्ध होते हैं। केवल अवस्था (उमर) मात्र अधिक होनेसे वा केश सफेद होनेसे ही वृद्ध नहीं होते ।


प्रत्यासत्तिं समायातैर्विषयैः स्वान्तरञ्जकैः ।
न धैर्यं स्खलितं येषां ते वृद्धा विबुधैर्मताः ॥6॥

अर्थ: जिनके निकट मनको रंजन करनेवाले विषयोंके प्राप्त होने पर भी चित्तसे धीरता स्खलित (नष्ट) नहीं होती, उनको ही विद्वानोंने वृद्ध माना हैं, अर्थात् विषयोंसे चलायमान हो जाय वे बडे काहेके ?


न हिं स्वप्नेऽपि संजाता येषां सद्वृत्तवाच्यता ।
यौवनेऽपि मता वृद्धास्ते धन्याः शीलशालिभिः ॥7॥

अर्थ: जिनके सदाचरण स्वप्नमें भी कभी कलंकित (मैले) नहीं हुए, वे यौवनावस्थामें भी वृद्ध हैं और वे ही धन्य पुरुष हैं, ऐसा ब्रह्मचारी महात्माओंने माना है ।


प्रायःशरीरशैथिल्यात्स्यात्स्वस्था मतिरङ्गिनाम् ।
यौवने तु क्वचित्कुर्याद्दृष्टतत्त्वोऽपि विक्रियाम् ॥8॥

अर्थ: यद्यपि शरीरके शिथिल होनेसे (वृद्धावस्था होनेसे) जीवोंकी बुद्धि भी स्वस्थ (निश्चित) हो जाती है, परन्तु यौवनावस्थामें तो जिसने तत्त्वोंका स्वरूप जाना है, वह भी कुछ विक्रियाको धारण करता है ।


वार्धक्येन वपुर्धत्ते शैथिल्यं च यथा यथा ।
तथा तथा मनुष्याणां विषयाशा निवर्त्तते ॥9॥

अर्थ: वृद्धावस्थासे मनुष्योंका शरीर जैसे-जैसे शिथिलताको धारण करता है वैसे-वैसे ही विषयोंकी आशा घटती है । परन्तु युवावस्थामें जिनके आशाका नाश हो, यही अधिकता है ।


हीनाचरणसंभ्रान्तो वृद्धोऽपि तरुणायते ।
तरुणोऽपि सतां धत्ते श्रियं सत्संगवासितः ॥10॥

अर्थ: जो वृद्ध होकर हीनाचरणोंसे व्याकुल हो भ्रमता फिरे, वह वृद्ध होने पर भी तरुण है और जो सत्संगतिसे रहता है, वह तरुण होने पर भी सत्पुरुषोंकी सी प्रतिष्ठा पाता है, अर्थात् वास्तविक वृद्ध कहा जाता है ।


साक्षाद्वृद्धानुसेवेयं मातेव हितकारिणी ।
विनेत्री वागिवाप्तानां दीपिकेवार्थदर्शिनी ॥11॥

अर्थ: यह वृद्धसेवा साक्षात् माताके समान तो हित करनेवाली है और आप्तवाणी (जिनवाणी) के समान समीचीन शिक्षा देनेवाली है तथा दीपकके समान पदार्थोंको दिखानेवाली है ।


कदाचिद्दैववैमुख्यान्माताऽपि विकृतिं भजेत् ।
न देशकालयोः क्वापि वृद्धसेवा कृता सती ॥12॥

अर्थ: दैवके विमुख होनेसे माता तो कदाचित् पुत्रकी अहितैषिणी हो भी जाय तो आश्चर्य नहीं, किन्तु की हुई वृद्धसेवा किसी भी देश वा कालमें हानिकारक नहीं होती ।


अन्ध एव वराकोऽसौ न सतां यस्य भारती ।
श्रुतिरन्ध्रं समासाद्य प्रस्फुरत्यधिकं हृदि ॥13॥

अर्थ: सत्पुरुषोंकी पवित्र वाणी जिसके कानोंमें प्राप्त होकर हृदयमें प्रकाशमान नहीं हुई वह रंक अन्धा ही हैं, क्योंकि सत्पुरुषोंकी वाणी मनुष्यके हृदयनेत्रको खोल देती है । सो जिसके हृदयमें सत्पुरुषोंकी वाणीने प्रवेश नहीं किया, वह वास्तवमें अंधा ही है ।


सत्संसर्गसुधास्यन्दैः पुंसां हृदि पवित्रिते ।
ज्ञानलक्ष्मीः पदं धत्ते विवेकमुदिता सती ॥14॥

अर्थ: सत्पुरुषोंके सत्संसर्गरूपी अमृतके झरनेसे पुरुषोंका हृदय पवित्र होकर उसमें विवेकसे प्रसन्न हुई ज्ञानलक्ष्मी निवास करती है ।


वृद्धोपदेशघर्मांशुं प्राप्य चित्तकुशेशयम् ।
न प्राबोधि कथं तत्र संयमश्रीः स्थितिं दधे ॥15॥

अर्थ: मनुष्योंका चित्तरूपी कमल यदि वृद्ध पुरुषोंके उपदेशरूपी सूर्यको प्राप्त होकर प्रफुल्लित हो जाय तो उसमें संयमरूपी लक्ष्मी क्यों निवास न करे ? अर्थात् सत्पुरुषोंके वचन जब चित्तमें रहें तब ही संयम दृढ रहता है ।


अनुपास्यैव यो वृद्धमण्डलीं मन्दविक्रमः ।
जगत्तत्त्वस्थितिं वेत्ति स मिमीते नभः करैः ॥16॥

अर्थ: जो पुरुष अल्प शक्तिवाला है और सत्पुरुषोंकी मंडलीमें रहे बिना ही जगतके तत्त्वस्वरूपकी अवस्थाको जानना चाहता है, वह आकाशको हाथोंसे मापता है ।


शीतांशुरश्मिसंपर्काद्विसर्पति यथाम्बुधिः ।
तथा सद्वृत्तसंसर्गान्नृणां प्रज्ञापयोनिधिः ॥17॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमाकी किरणोंसे समुद्र बढता है, उसी प्रकार समीचीन वृत्तोंके धारण करनेवाले सत्पुरुषोंकी संगतिसे मनुष्योंका प्रज्ञारूपी समुद्र बढता है ।


नैराश्यमनुबध्नाति विध्याप्याशाहविर्भुजं ।
आसाद्य यमिनां योगी वाक्पथातीतसंयमम् ॥18॥

अर्थ: योगी (मुनि) संयमी पुरुषोंके महान् वचनमार्गसे अगोचर संयमको प्राप्त होकर, आशारूप अग्निको बुझा कर, निराशाका अवलंबन करता है ।


वृद्धानुजीविनामेव स्युश्चारित्रादिसम्पदः ।
भवत्यपि च निर्लेपं मनः क्रोधादिकश्मलम् ॥19॥

अर्थ: वृद्धों (सत्पुरुषों) की सेवा करनेवाले पुरुषोंके ही चारित्र आदि सम्पदा होती हैं और क्रोधादि कषायोंसे मैला मन निर्लेप (निर्मल) हो जाता है ।


सुलभेष्वपि भोगेषु नृणां तृष्णा निवर्तते ।
सत्संसर्गसुधास्यन्दैः शश्वदार्द्रीकृतात्मनाम् ॥20॥

अर्थ: जिनका आत्मा सत्पुरुषोंके संसर्गरूपी अमृतके झरनेसे आर्द्र (भीजा हुआ-गीला) रहता है, उन पुरुषोंके ही भोग सुलभ होते हैं और उनके ही उन प्राप्त हुए भोगोंमें तृष्णाकी निवृत्ति (निःस्पृहता) होती है ।


कातरत्वं परित्यज्य धैर्यमेवावलम्बते ।
सत्संगजपरिज्ञानरञ्जितात्मा जनः स्वयम् ॥21॥

अर्थ: सत्पुरुषोंकी संगतिसे उत्पन्न हुए ज्ञानसे रंजायमान हो गया हैं आत्मा जिसका ऐसा पुरुष अपनेआप ही कायरताको छोड धैर्यावलंबन करता है ।


पुण्यात्मनां गुणग्रामसीमासंसक्तमानसैः ।
तीर्यते यमिभिः किं न कुविद्यारागसागरः ॥22॥

अर्थ: पुण्यपुरुषोंके गुणग्रामकी सीमामें जिनका मन लगा हुआ है, वे मुनि क्या कुविद्यामय रागरूपी समुद्रको नहीं तिरेंगे ? अवश्य तिरेंगे । क्योंकि जब सत्पुरुषोंके गुणोंमें मन लग जाता है, तब अन्य पदार्थोंसे प्रीति हट जाती है ।


तत्त्वे तपसि वैराग्ये परां प्रीतिं समश्नुते ।
हृदि स्फुरति यस्योच्चैर्वृद्धवाग्दीपसन्ततिः ॥23॥

अर्थ: जिस मनुष्यके हृदयमें सत्पुरुषोंके वचनरूपी दीपककी सन्तति (परिपाटी) प्रकाशमान है उसकी तत्त्वोंमें, तपमें तथा वैराग्यमें अतिशय उत्कृष्ट प्रीति हो जाती है ।


मिथ्यात्वादिनगोत्तुङ्गशृङ्गभङ्गाय कल्पितः ।
विवेकः साधुसंगोत्थो वज्रादप्यजयो नृणाम् ॥24॥

अर्थ: सत्पुरुषोंकी संगतिसे उत्पन्न हुआ मनुष्योंका विवेक मिथ्यात्वादि पर्वतोंके ऊँचे शिखरोंको (विचारमें आये मिथ्यात्वादि भावोंको) खंड खंड करनेके लिये वज्रसे अधिक अजेय है ।


अप्यनादिसमुद्भूतं क्षीयते निबिडं तमः ।
वृद्धानुयायिनां च स्याद्विश्वतत्त्वैकनिश्चयः ॥25॥

अर्थ: जो वृद्ध पुरुषोंके (सत्पुरुषोंके) अनुयायी हैं, उनका अनादिकालका उत्पन्न निबिड अज्ञानरूप अन्धकार नष्ट हो जाता है और समस्त तत्त्वोंका अद्वितीय निश्चय हो जाता है अर्थात् अज्ञानका लेशमात्र भी नहीं रहता ।


अन्तःकरणजं कर्म यः स्फोटयितुमिच्छति ।
स योगिवृन्दमाराध्य करोत्यात्मन्यवस्थितिम् ॥26॥

अर्थ: जो पुरुष अन्तःकरणसे (मनसे) उपजे कर्मको दूर करनेकी इच्छा करता है, वह पुरुष योगीश्वरोंके समूहकी सेवा करता है और वही अपने आत्मामें तिष्ठता है, अर्थात् योगीश्वरोंकी सत्संगतिमें रहनेसे ही आत्मानुभवकी प्राप्ति और कर्मोंका नाश होता है ।


एकैव महतां सेवा स्याज्जेत्री भुवनत्रये ।
ययैव यमिनामुच्चैरन्तर्ज्योतिर्विजृम्भते ॥27॥

अर्थ: इस त्रिभुवनमें सत्पुरुषोंकी सेवा ही एकमात्र जयनशील (कर्मोंको जीतनेवाली) है । इससे ही मुनियोंके अन्तःकरणमें ज्ञानरूप ज्योतिका प्रकाश विस्तृत होता है ।


दृष्ट्वा श्रुत्वा यमी योगिपुण्यानुष्ठानमूर्जितम् ।
आक्रामति निरातङ्कः पदवीं तैरुपासिताम् ॥28॥

अर्थ: संयमी मुनि योगीश्वरोंके महापवित्र आचरणके अनुष्ठानको देखकर वा सुनकर उन योगीश्वरोंकी सेई हुई पदवीको निरुपद्रव प्राप्त करता है ।


विश्वविद्यासु चातुर्यं विनयेष्वतिकौशलम् ।
भावशुद्धिः स्वसिद्धान्ते सत्संगादेव देहिनाम् ॥29॥

अर्थ: जीवोंको समस्त विद्याओंमें चतुरता और विनयमें अतिप्रवीणता तथा अपने सिद्धान्तमें भावोंकी शुद्धि अर्थात् निःसंदेहता आदि गुण सत्पुरुषोंकी संगतिसे ही प्राप्त होते हैं ।


यथात्र शुद्धिमाधत्ते स्वर्णमत्यन्तमग्निना ।
मनःसिद्धिं तथा ध्यानी योगिसंसर्गवह्निना ॥30॥

अर्थ: जैसे इस जगत्में सुवर्ण अग्निके संयोगसे अत्यन्त शुद्ध (निर्मल) हो जाता है, उसी प्रकार योगीश्वरोंकी संगतिरूपी अग्निसे ध्यानी मुनि अपने मनकी शुद्धिको प्राप्त होता है ।


भयलज्जाभिमानेन धैर्यमेवावलम्बते ।
साहचर्यं समासाद्य संयमी पुण्यकर्मणाम् ॥31॥

अर्थ: संयमी मुनि पवित्राचरणवाले सत्पुरुषोंकी संगतिको प्राप्त होकर, उनके भयसे वा लज्जा तथा अभिमानसे धैर्यका ही अवलंबन करता है ।


शरीराहारसंसारकामभोगेष्वपि स्फुटम् ।
विरज्यति नरः क्षिप्रं सद्भिः सूत्रे प्रतिष्ठितः ॥32॥

अर्थ: सत्पुरुषोंके द्वारा सूत्रमें शिक्षित किया हुआ पुरुष शरीर, आहार, संसार, काम व भोगादिकमें तत्काल ही विरक्त हो जाता है। सत्पुरुषोंकी शिक्षाका फल ऐसा होता है, कि शरीरादिकमें वैराग्य होनेके कारण मोक्षमार्गसे च्युत नहीं होता। यह स्पष्टतया जानो ।


यथा यथा मुनिर्धत्ते चेतः सत्संगवासितम् ।
तथा तथा तपोलक्ष्मीः परां प्रीतिं प्रकाशयेत् ॥33॥

अर्थ: जैसे जैसे मुनि अपने चित्तको सत्पुरुषोंकी संगतिमें लगाता है वैसे वैसे ही उससे तपरूपी लक्ष्मी उत्तम प्रीतिको प्रकाश करती है ।


तपः कुर्वन्तु वा मा वा चेद्वृद्धान्समुपासते ।
तीर्त्वा व्यसनकान्तारं यान्ति पुण्यां गतिं नराः ॥34॥

अर्थ: जो पुरुष सत्पुरुषोंकी उपासना (सेवा) करते हैं, वे तप करें अथवा न करें किन्तु दुःखरूपी वनको पार करके अवश्य ही पवित्र (उत्तम) गतिको प्राप्त होते हैं ।


कुर्वन्नपि तपस्तीव्रं विदन्नपि श्रुतार्णवम् ।
नासादयति कल्याणं चेद्वृद्धानवमन्यते ॥35॥

अर्थ: तीव्र तप करता हुआ भी तथा शास्त्ररूपी समुद्रका अवगाहन करता हुआ भी यदि वृद्धसेवा नहीं करता है अर्थात् सत्पुरुषोंकी आज्ञामें नहीं रहता है तो उसका कदापि कल्याण नहीं हो सकता ।


मनोऽभिमतनिःशेषफलसंपादनक्षमं ।
कल्पवृक्षमिवोदारं साहचर्यं महात्मनाम् ॥36॥

अर्थ: महापुरुषोंका संग करना कल्पवृक्षके समान समस्त प्रकारके मनोवांछित फलको देनेमें समर्थ हैं; अतएव सत्पुरुषोंकी संगति अवश्य करनी चाहिए ।


जायते यत्समासाद्य न हि स्वप्नेऽपि दुर्मतिः ।
मुक्तिबीजं तदेकं स्यादुपदेशाक्षरं सताम् ॥37॥

अर्थ: सत्पुरुषोंके उपदेशका एक अक्षर ही मुक्तिका बीज होता है, क्योंकि सदुपदेशके प्राप्त होनेसे स्वप्नमें भी मनुष्यके कुबुद्धिका प्रादुर्भाव नहीं होता।


तन्न लोके परं धाम न तत्कल्याणमग्रिमं ।
यद्योगिपदराजीवसंश्रितैर्नाधिगम्यते ॥38॥

अर्थ: जगतमें न तो ऐसा कोई उत्कृष्ट स्थान (मंदिर) है और न कोई ऐसा कल्याण है, जो योगीश्वरोंके चरणकमलोंकी सेवा करनेवालोंको प्राप्त न हो, अर्थात् योगीश्वरोंकी सेवा करनेवालोंको समस्त प्रकारके कल्याणकी प्राप्ति होती है ।


अन्तर्लीनमपि ध्वान्तमनादिप्रभवं नृणाम् ।
क्षीयते साधुसंसर्गप्रदीपप्रसराहतम् ॥39॥

अर्थ: अनादिकालसे उत्पन्न हुआ पुरुषोंके अन्तरंगका अज्ञानरूप अन्धकार भी साधु महात्माओंके संसर्गरूपी प्रदीपके प्रकाशसे नष्ट हो जाता है, अर्थात् साधुओंकी संगतिसे अज्ञान नहीं रहता ।


दहति दुरितकक्षं कर्मबन्ध लुनीते
वितरति यमसिद्धिं भावशुद्धिं तनोति ।
नयति जननतीरं ज्ञानराज्यं च दत्ते
ध्रुवमिह मनुजानां वृद्धसेवैव साध्वी ॥40॥

अर्थ: मनुष्योंको वृद्धोंकी (सत्पुरुषोंकी) सेवा ही करना उत्तम है, क्योंकि यह वृद्धसेवा पापरूपी वनको दग्ध करती है, कर्मके बंधोंको काटती है, चारित्रकी सिद्धिको देती है और भावोंकी शुद्धताका विस्तार करके संसारसे पार कर ज्ञानराज्यको (केवलज्ञान वा श्रुतज्ञानकी पूर्णताको) देती है ।


विरम विरम सङ्गान्मुञ्च मुञ्च प्रपंचं
विसृज विसृज मोहं विद्धि विद्धि स्वतत्त्वम् ।
कलय कलय वृत्तं पश्य पश्य स्वरूपं
कुरु कुरु पुरुषार्थं निर्वृतानन्दहेतोः ॥41॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे आत्मन् ! तू परिग्रहसे विरक्त हो विरक्त हो; प्रपंच मायाशल्यको छोड छोड, और जगतके मोहको दूर कर दूर कर, निज तत्त्वको जान जान, चारित्रका अभ्यास कर कर, अपने स्वरूपको देख देख, और मोक्षके सुखार्थ पुरुषार्थ कर कर। इस प्रकार दो दो बार कहनेसे आचार्य महाराजने अत्यन्त प्रेरणा की है, क्योंकि श्रीगुरु महाराज बडे दयालु हैं सो बारबार हितके लिये प्रेरणा करते हैं ।


अतुलसुखनिधानं ज्ञानविज्ञानबीजं
विलयगतकलङ्कं शान्तविश्वप्रचारम् ।
गलितसकलशङ्कं विश्वरूपं विशालं
भज विगतविकारं स्वात्मनात्मानमेव ॥42॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू अपने आत्माको आप ही कर भज अर्थात् सेव । तेरा आत्मा कैसा है कि अतुल्य (अतीन्द्रिय) सुखका निधान है, ज्ञान और विज्ञान (भेदज्ञान) का बीज है, जिसके मिथ्यात्वभावरूपी कलंक नष्ट हो गये हैं, जिसमें नाना प्रकारके विकल्पोंका विस्तार शान्त हो गया है, अर्थात् जो निर्विकल्प स्वरूप है तथा जिसकी समस्त शंकायें नष्ट हो गई हैं, जो समस्त ज्ञेयोंके आकारस्वरूप विश्वमय है, विशाल है, अपने गुणपर्यायोंमें फैला हुआ है और समस्त प्रकारके विकारोंसे रहित हो गया है । इस प्रकारके अपने आत्माको भजना, उसीमें लीन रहना, इसीको परम ब्रह्मचर्य कहते हैं । ब्रह्म कहिये आत्मामें चरना (लीन होना) सो ही ब्रह्मचर्य है ।


धन्यास्ते मुनिमण्डलस्य गुरुतां प्राप्ताः स्वयं योगिनः
शुद्ध्यत्येव जगत्त्रयी शमवतां श्रीपादरागाङ्किता ।
तेषां संयमसिद्धयः सुकृतिनां स्वप्नेऽपि येषां मनो
नालीढं विषयैर्न कामविशिखैर्नैवाङ्गनालोचनैः ॥43॥

अर्थ: जिन मुनियोंका मन विषयोंसे स्वप्नमें भी आलीढ (विद्ध) नहीं हुआ और कामके बाण तथा स्त्रियोंके नेत्रकटाक्षोंसे स्पृष्ट नहीं हुआ, वे ही सुकृती धन्य हैं। उनको ही संयमकी सिद्धियाँ होती है और वे ही मुनि योगीश्वरोंके समूहमें प्रधानताको (आचार्यपदको) प्राप्त होते हैं तथा उन्हीं शान्तभावयुक्त योगीश्वरोंके शोभायमान चरणोंके रागसे अङ्कित ये तीन भुवन निश्चय करके पवित्र होते हैं ।


येषां वाग्भुवनोपकारचतुरा प्रज्ञा विवेकास्पदम्
ध्यानं ध्वस्तसमस्तकर्मकवचं वृत्तं कलङ्कोज्झितम् ।
सम्यग्ज्ञानसुधातरङ्गनिचयैश्चेतश्च निर्वापितं
धन्यास्ते शमयन्त्वनङ्गविशिखव्यापारजाता रुजः ॥44॥

अर्थ: जिन योगीश्वरोंके वचन तो लोकोपकारमें चतुर हैं और प्रज्ञा (बुद्धि) विवेकका स्थान है और जिनके ध्यानने कर्मबन्धरूपी कवचको (बकतरको) नष्ट कर दिया है तथा जिनका चारित्र कलंकरहित (निर्मल) है, व जिनका चित्त सम्यग्ज्ञानरूपी अमृतकी तरंगोंके समूहसे शान्त हो गया है, वे ही योगी मुनि धन्य हैं। वे ही हमारे कामबाणके व्यापारसे उत्पन्न हुई पीडाका शमन करो ।


चञ्चद्भिश्चिरमप्यनङ्गपरशुप्रख्यैर्वधूलोचनै-
र्येषामिष्टफलप्रदः कृतधियां नाच्छेदि शीलद्रुमः ।
धन्यास्ते शमयन्तु सन्ततमिलद्दुर्वारकामानल-
ज्वालाजालकरालमानसमिदं विश्वं विवेकाम्बुभिः ॥45॥

अर्थ: जिन मुनियोंका इष्ट फलका देनेवाला शीलरूपी वृक्ष चंचल तथा चमकते हुए कामके कुठार समान स्त्रियोंके नेत्रोंसे चिरकालसे नहीं छेदा गया, वे महाभाग्य कृतबुद्धि धन्य हैं। वे मुनिमहाराज निरन्तर प्राप्त होनेवाली दुर्निवार कामरूपी अग्निकी ज्वालाओंके समूहसे जलते हुए इस जगतको विवेकरूपी जलसे शीतल करो ।


यदि विषयपिशाची निर्गता देहगेहात्
सपदि यदि विशीर्णो मोहनिद्रातिरेकः ।
यदि युवतिकरङ्के निर्ममत्वं प्रपन्नो
झगिति ननु विधेहि ब्रह्मवीथीविहारम् ॥46॥

अर्थ: हे आत्मन् ! यदि तेरे देहरूपी घरसे विषयरूपी पिशाची निकल गई हो तथा मोहरूपी निद्राकी तीव्रता क्षीण हो गई हो, और स्त्रीके शरीरमें तू निर्ममत्व (निःस्पृहता) को प्राप्त हुआ हो तो तू शीघ्र ही ब्रह्मचर्यरूपी गलीमें विहार कर (सैर कर) अर्थात् उक्त प्रकारका हो गया हो तो ब्रह्मचर्य अंगीकार करनेमें ढील मत कर ऐसा उपदेश है ।


स्मरभोगीन्द्रदुर्वारविषानलकरालितम् ।
जगद्यैः शान्तिमानीतं ते जिनाः सन्तु शान्तये ॥47॥

अर्थ: कामरूपी सर्पके दुर्निवार विषरूपी अग्निकी ज्वालासे प्रज्वलित इस जगतको जिन महात्माओंने शान्तरूप किया, ऐसे सोलहवें तीर्थंकर शान्तिनाथ भगवान् जगतको शान्तरूप करनेवाले हों ऐसा आशीर्वाद दिया है ।

सर्ग 16: परिग्रहत्याग महाव्रत (श्लोक 1 से 42)

यानपात्रमिवाम्भोधौ गुणवानपि मज्जति ।
परिग्रहगुरुत्वेन संयमी जन्मसागरे ॥1॥

अर्थ: जिस प्रकार नावमें पाषाणादिका बोझ बढनेसे गुणवान अर्थात् रस्सीसे बँधी हुई भी नाव समुद्रमें डूब जाती है, उसी प्रकार संयमी मुनि यदि गुणवान हैं तो भी परिग्रहके भारसे संसाररूपी सागरमें डूब जाता है ।


बाह्यान्तर्भूतभेदेन द्विधा ते स्युः परिग्रहाः ।
चिदचिद्रूपिणो बाह्या अन्तरङ्गास्तु चेतनाः ॥2॥

अर्थ: बाह्य अन्तरंगके भेदसे परिग्रह दो प्रकारके हैं। बाह्य परिग्रह तो चेतन और अचेतन दो प्रकारके हैं और अन्तरंग परिग्रह केवल चेतनरूप ही हैं। क्योंकि वे सब आत्माके परिणाम हैं ।


दश ग्रन्था मता बाह्या अन्तरङ्गाश्चतुर्दश ।
तान्मुक्त्वा भव निःसंगो भावशुद्ध्या भृशं मुने ॥3॥

अर्थ: बाहरके परिग्रह तो दश हैं और अन्तरंगके परिग्रह चौदह हैं, सो हे मुने ! इन दोनों प्रकारके परिग्रहोंको छोड कर अत्यन्त निःसंग (निष्परिग्रहरूप) होओ, यह उपदेश है ।


वास्तु क्षेत्रं धनं धान्यं द्विपदाश्च चतुष्पदाः ।
शयनासनयानं च कुप्यं भाण्डममी दश ॥4॥

अर्थ: वास्तु (घर), क्षेत्र (खेत), धन, धान्य, द्विपद (मनुष्य), चतुष्पद (पशु, हाथी, घोडे), शयनासन, यान, कुप्य और भांड ये बाहरके दश परिग्रह हैं ।


निःसङ्गोऽपि मुनिर्न स्यात्समूर्च्छः संगवर्जितः ।
यतो मूर्च्छैव तत्त्वज्ञैः संगसूतिः प्रकीर्तिता ॥5॥

अर्थ: जो मुनि निःसंग हो अर्थात् बाह्य परिग्रहसे रहित हो और ममत्व करता हो वह निःपरिग्रही नहीं हो सकता, क्योंकि तत्त्वज्ञानी विद्वानोंने मूर्च्छाको (ममत्वरूप परिणामोंको) ही परिग्रहकी उत्पत्तिका स्थान माना है ।


स्वजनधनधान्यदाराः पशुपुत्रपुराकरा गृहं भृत्याः ।
मणिकनकरचितशय्या वस्त्राभरणादि बाह्यार्थाः ॥6॥

अर्थ: स्वजन, धन, धान्य, स्त्री, पशु, पुत्र, पुर, खानि, घर, नौकर, माणिक, रत्न, सोना, रूपा, शय्या, वस्त्र, आभरण इत्यादि सब ही पदार्थ बाह्य परिग्रह हैं ।


संवृतस्य सुवृत्तस्य जिताक्षस्यापि योगिनः ।
व्यामुह्यति मनः क्षिप्रं धनाशाव्यालविप्लुतम् ॥7॥

अर्थ: जो मुनि संवर सहित हो , उत्तम चारित्र सहित हो तथा जितेन्द्रिय हो, उसका भी मन धनाशारूपी सर्पसे पीडित होता हुआ तत्काल ही मोहको प्राप्त होता है; इस कारण धनकी आशा अवश्य छोडनी चाहिये ।


त्याज्य एवाखिलः सङ्गो मुनिभिर्मोक्तुमिच्छुभिः ।
स चेत्त्यक्तुं न शक्नोति कार्यस्तर्ह्यात्मदर्शिभिः ॥8॥

अर्थ: मुक्त होनेके इच्छुक मुनियोंको समस्त प्रकारका परिग्रह अर्थात् सर्व पदार्थोंका संग छोडना चाहिये । कदाचित् अन्तरंगके परिग्रहमेंसे कोई परिग्रह विद्यमान रहें तो जो आत्मदर्शी बडे मुनि हों उनकी संगतिमें रहें क्योंकि मुनिको समस्त संग त्यागकर ध्यानस्थ रहना कहा है । यदि ध्यानस्थ नहीं रहा जाय तो आचार्योंके साथ संघमें रहें ।


नाणवोऽपि गुणा लोके दोषा शैलेन्द्रसन्निभाः ।
भवन्त्यत्र न सन्देहः संगमासाद्य देहिनाम् ॥9॥

अर्थ: इस लोकमें जीवोंके परिग्रहके प्राप्त होनेसे गुण तो अणुमात्र भी नहीं होते किन्तु दोष सुमेरु पर्वतसरीखे बडे-बडे होते हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।


अन्तर्बाह्यभुवोः शुद्ध्योर्योगाद्योगी विशुद्ध्यति ।
नह्येकं पत्रमालम्ब्य व्योम्नि पत्री विसर्पति ॥10॥

अर्थ: योगी बाह्याभ्यन्तर दोनों प्रकारकी शुद्धियोंका योग होनेसे ही विशुद्ध होता है, किन्तु एक प्रकारकी विशुद्धिसे ही नहीं होता; जैसे पक्षी एक ही पंखके आलम्बनसे आकाशमें नहीं उड सकता, किन्तु दोनों पंखोंके होनेसे ही उड सकता है। इसी प्रकार दोनों प्रकारकी शुद्धि होनेसे ही मुनि निर्मल हो सकता है ।


साध्वीयं स्याद्बहिःशुद्धिरन्तःशुद्ध्याऽत्र देहिनाम् ।
फल्गुभावं भजत्येव बाह्या त्वाध्यात्मिकीं विना ॥11॥

अर्थ: जीवोंके बाह्यकी शुद्धता अन्तरंगकी शुद्धतासे उत्तम होती है और फलदायक है। क्योंकि अन्तरंगकी आध्यात्मिकी शुद्धिके बिना बाह्यशुद्धि व्यर्थ ही रहती है अर्थात् निष्फल है ।


संगात्कामस्ततः क्रोधस्तस्माद्धिंसा तयाऽशुभम् ।
तेन श्वाभ्री गतिस्तस्यां दुःखं वाचामगोचरम् ॥12॥

अर्थ: परिग्रहसे काम (वांछा) होता है, कामसे क्रोध, क्रोधसे हिंसा, हिंसासे पाप और पापसे नरकगति होती है, उस नरकगतिमें वचनोंके अगोचर अति दुःख होता है। इस प्रकार दुःखका मूल परिग्रह है ।


संग एव मतः सूत्रे निःशेषानर्थमन्दिरं ।
येनासन्तोऽपि सूयन्ते रागाद्या रिपवः क्षणे ॥13॥

अर्थ: सूत्र-सिद्धान्तमें परिग्रह ही समस्त अनर्थोंका मूल माना गया है, क्योंकि जिसके होनेसे रागादिक शत्रु, न हों तो भी, क्षणमात्रमें उत्पन्न हो जाते हैं ।


रागादिविजयः सत्यं क्षमा शौचं वितृष्णता ।
मुनेः प्रच्याव्यते नूनं सङ्गैर्व्यामोहितात्मनः ॥14॥

अर्थ: परिग्रहोंसे मोहित मुनिके रागादिकोंका जीतना, सत्य, क्षमा, शौच और तृष्णारहितपना आदि गुण नष्ट हो जाते हैं ।


सङ्गाः शरीरमासाद्य स्वीक्रियन्ते शरीरिभिः ।
तत्प्रागेव सुनिःसारं योगिभिः परिकीर्तितम् ॥15॥

अर्थ: संसारी जीव शरीरको प्राप्त होकर ही परिग्रहोंको ग्रहण करते हैं, सो योगी महात्माओंने शरीरको पहिले ही निःसार कह दिया है ।


हृषीकराक्षसानीकं कषायभुजगव्रजम् ।
वित्तामिषमुपादाय धत्ते कामप्युदीर्णतां ॥16॥

अर्थ: इन्द्रियरूपी राक्षसोंकी सेना और कषायरूपी सर्पोंका समूह धनरूपी मांसको ग्रहण करके कोई ऐसी उत्कटता धारण करते हैं कि जो चिन्तवनमें ही नहीं आती ।


उन्मूलयति निर्वेदविवेकद्रुममञ्जरीः ।
प्रत्यासत्तिं समायातः सतामपि परिग्रहः ॥17॥

अर्थ: यह परिग्रह निकट प्राप्त होने पर सत्पुरुषोंके भी वैराग्य विवेकरूपी वृक्षकी मंजरियोंका उन्मूलन कर देता है ।


लुप्यते विषयव्यालैर्भिद्यते मारमार्गणैः ।
रुध्यते वनिताव्याधैर्नरः सङ्गैरभिद्रुतः ॥18॥

अर्थ: यह मनुष्य परिग्रहोंसे पीडित होकर विषयरूपी सर्पोंसे तो काटा जाता है, कामके बाणोंसे चीरा जाता है और स्त्रीरूप व्याधसे (शिकारीसे) रोका जाता है, अर्थात् बाँधा जाता है ।


यः संगपङ्कनिर्मग्नोऽप्यपवर्गाय चेष्टते ।
स मूढः पुष्पनाराचैर्विभिन्द्यात्त्रिदशाचलम् ॥19॥

अर्थ: जो प्राणी परिग्रहरूपी कीचडमें फँसा हुआ भी मोक्षप्राप्तिके लिये चेष्टा (उपाय) करता है, वह मूढ फूलोंके बाणसे मेरुपर्वतको तोडना चाहता है ।


अणुमात्रादपि ग्रन्थान्मोहग्रन्थिर्दृढीभवेत् ।
विसर्पति ततस्तृष्णा यस्यां विश्वं न शान्तये ॥20॥

अर्थ: अणुमात्र परिग्रहके रखनेसे मोहकर्मकी ग्रन्थि (गाँठ) दृढ होती है और इससे तृष्णाकी ऐसी वृद्धि हो जाती है कि उसकी शान्तिके लिये समस्त लोकके राज्यसे भी पूरा नहीं पडता ।


परीषहरिपुव्रातं तृच्छवृत्तैकभीतिदम् ।
वीक्ष्य धैर्यं विमुञ्चन्ति यतयः सङ्गसङ्गताः ॥21॥

अर्थ: परिग्रह रखनेवाले यति तुच्छवृत्तवालोंको ही भयके देनेवाले परीषहरूपी शत्रुओंके समूहको देखते ही धैर्यको छोड देते हैं अर्थात् परिग्रही मुनि परिषहोके आने पर दृढ नहीं रह सकता, किन्तु मार्गसे हट जाता है ।


सर्वसंगपरित्यागः कीर्त्यते श्रीजिनागमे ।
यस्तमेवान्यथा ब्रूते स हीनः स्वान्यघातकः ॥22॥

अर्थ: श्रीमज्जिनेन्द्र भगवानके परमागममें समस्त परिग्रहोंका त्याग ही महाव्रत कहा है, उसको जो कोई अन्यथा कहता है, वह नीच है तथा अपना और दूसरोंका घातक है ।


यमप्रशमजं राज्यं तपःश्रुतपरिग्रहं ।
योगिनोऽपि विमुञ्चन्ति वित्तवेतालपीडिताः ॥23॥

अर्थ: जो धनरूपी पिशाचसे पीडित हैं ऐसे योगी मुनि भी यम, नियम व शान्त भावोंसे उत्पन्न राज्यको, तपको और शास्त्रस्वाध्यायादिके ग्रहणको छोड देते हैं ।


पुण्यानुष्टानजातेषु निःशेषाभीष्टसिद्धिषु ।
कुर्वन्ति नियतं पुंसां प्रत्यूहं धनसंग्रहाः ॥24॥

अर्थ: धनका संग्रह पुरुषोंके पुण्य कार्योंसे उत्पन्न हुई समस्त मनोवांछितको देनेवाली सिद्धियोंमें विघ्न करता है ।


अत्यक्तसंगसन्तानो मोक्तुमात्मानमुद्यतः ।
बध्नन्नपि न जानाति स्वं धनैः कर्मबन्धनैः ॥25॥

अर्थ: नहीं तजी है परिग्रहकी वासना जिसने ऐसा पुरुष अपनेको मुक्त करनेके लिये उद्यमी है, परन्तु अपना आत्मा परिग्रहके कारण कर्मोंके दृढ बंधनोंसे बँधता है तो भी उसे नहीं जानता, क्योंकि परिग्रहलोलुप प्रायः अंधेके समान होता है ।


अपि सूर्यस्त्यजेद्धाम स्थिरत्वं वा सुराचलः ।
न पुनः संगसंकीर्णो मुनिः स्यात्संवृतेन्द्रियः ॥26॥

अर्थ: कदाचित् सूर्य तो अपना प्रकाश छोड दे और सुमेरु पर्वत स्थिरता (अचलता) छोड दे यह तो संभव है; परन्तु परिग्रहसहित मुनि कदापि जितेन्द्रिय नहीं हो सकता ।


बाह्यानपि च यः सङ्गान्परित्यक्तुमनीश्वरः ।
स क्लीबः कर्मणां सैन्यं कथमग्रे हनिष्यति ॥27॥

अर्थ: जो पुरुष बाह्य परिग्रहको भी छोडनेमें असमर्थ हैं वह नपुंसक (नामर्द वा कायर) आगे कर्मोंकी सेनाको कैसे हनेगा ? ।


स्मरभोगीन्द्रवल्मीकं रागाद्यरिनिकेतनं ।
क्रीडास्पदमविद्यानां बुधैर्वित्तं प्रकीर्तितम् ॥28॥

अर्थ: विद्वानोंने (ज्ञानी पुरुषोंने) धनको कामरूपी सर्पकी बांबी तथा रागादि दुश्मनोंके रहनेका घर और अविद्याओंके क्रीडा करनेके स्थानस्वरूप कहा है ।


अत्यल्पे धनजम्बाले निमग्नो गुणवानपि ।
जगत्यस्मिन् जनः क्षिप्रं दोषलक्षैः कलङ्क्यते ॥29॥

अर्थ: थोडेसे धनरूपी कीचड-सेवालमें फँसा हुआ गुणवान पुरुष भी इस जगतमें तत्काल लक्षावधि दोषोंसे कलंकित होता है ।


संन्यस्तसर्वसंगेभ्यो गुरुभ्योऽप्यतिशङ्क्यते ।
धनिभिर्धनरक्षार्थं रात्रावपि न सुप्यते ॥30॥

अर्थ: धनाढ्य पुरुष समस्त परिग्रहके त्यागनेवाले अपने गुरुसे भी शंकायुक्त रहता है तथा धनकी रक्षाके लिये रात्रीको सोता भी नहीं ।


सुतस्वजनभूपालदुष्टचौरारिविड्वरात् ।
बन्धुमित्रकलत्रेभ्यो धनिभिः शङ्क्यते भृशं ॥31॥

अर्थ: जो धनवान् होते हैं वे पुत्र, स्वजन, राजा, दुष्ट, चोर, वैरी, बन्धु, मित्र, स्त्री अथवा परचक्र आदिसे निरन्तर शंकित रहते हैं ।


कर्म बध्नाति यज्जीवो धनाशाकश्मलीकृतः ।
तस्य शान्तिर्यदि क्लेशाद्बहुभिर्जन्मकोटिभिः ॥32॥

अर्थ: यह जीव धनकी आशासे मलिन होकर जो कर्म बाँधता है, उस कर्मकी शान्ति बहुत ही करोडों जन्मसे और बडे कष्टसे होती है, क्योंकि एक जन्मका बाँधा हुआ कर्म अनेक जन्मोंमें क्लेश भोगने पर ही छूटता है ।


सर्वसंगविनिर्मुक्तः संवृताक्षः स्थिराशयः ।
धत्ते ध्यानधुरां धीरः संयमी वीरवर्णितां ॥33॥

अर्थ: समस्त परिग्रहोंसे तो रहित हो और इन्द्रियोंको संवररूप करनेवाला हो ऐसा स्थिरचित्त संयमी मुनि ही श्री वर्धमान भगवानकी कही हुई ध्यानकी धुराको धारण कर सकता है, क्योंकि ऐसे हुए विना ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।


सङ्गपङ्कात्समुत्तीर्णो नैराश्यमवलम्बते ।
ततो नाक्रम्यते दुःखैः पारतन्त्र्यैः क्वचिन्मुनिः ॥34॥

अर्थ: जो मुनि परिग्रहरूपी कर्दमसे निकल गया हो वही निराशताका (निःस्पृहताका) अवलंबन कर सकता है और उस निराशताके होने पर वह मुनि परतन्त्रतास्वरूप दुःखोंसे कदापि घेरा वा दबाया नहीं जाता; सो ठीक ही है, आशारहित होनेपर फिर पराधीनताका दुःख क्यों हो ?


विजने जनसंकीर्णे सुस्थिते दुःस्थितेऽपि वा ।
सर्वत्राप्रतिबद्धः स्यात्संयमी संगवर्जितः ॥35॥

अर्थ: जो परिग्रह रहित संयमी है, वह चाहे तो निर्जन वनमें रहो, चाहे वसतीमें रहो, चाहे सुखसे रहो, चाहे दुःखसे रहो, उसको कहीं भी प्रतिबद्धता नहीं है; अर्थात् वह सब जगह सम्बन्ध रहित निर्मोही रहता है ।


दुःखमेव धनव्यालविषविध्वस्तचेतसां ।
अर्जने रक्षणे नाशे पुंसां तस्य परिक्षये ॥36॥

अर्थ: धनरूपी सर्पके विषसे जिनका चित्त बिगड गया है, उन पुरुषोंको धनोपार्जनमें, रक्षा करनेमें अथवा नाश होने वा व्यय (खर्च) करनेमें सदैव दुःख ही होता है ।


स्वजातीयैरपि प्राणी सद्योऽभिद्रूयते धनी ।
यथात्र सामिषः पक्षी पक्षिभिर्बद्धमण्डलैः ॥37॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी पक्षीके पास मांसका खंड हो तो वह अन्यान्य मांसभक्षी पक्षियोंसे पीडित वा दुःखित किया जाता है, उसी प्रकार धनाढ्य पुरुष भी अपनी जातिवालोंसे दुःखित वा पीडित किया जाता है ।


आरम्भो जन्तुघातश्च कषायाश्च परिग्रहात् ।
जायन्तेऽत्र ततः पातः प्राणिनां श्वभ्रसागरे ॥38॥

अर्थ: जीवोंके परिग्रहसे इस लोकमें तो आरम्भ होता है, हिंसा होती है, और कषाय होते हैं; उससे फिर नरकरूपी सागरमें पतन होता है ।


न स्याद्ध्यातुं प्रवृत्तस्य चेतः स्वप्नेऽपि निश्चलं ।
मुनेः परिग्रहग्राहैर्भिद्यमानमनेकधा ॥39॥

अर्थ: जिस मुनिका चित्त परिग्रहरूपी पिशाचोंसे अनेक प्रकार पीडित है, उसका चित्त ध्यान करते समय कदापि स्वप्नमें भी स्थिर (निश्चल) नहीं रह सकता ।


सकलविषयबीजं सर्वसावद्यमूलं
नरकनगरकेतुं वित्तजातं विहाय ।
अनुसर मुनिवृन्दानन्दि सन्तोषराज्य -
मभिलषसि यदि त्वं जन्मबन्धव्यपायम् ॥40॥

अर्थ: अब आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे आत्मन् ! यदि तू संसारके बंधका नाश करना चाहता है तो धनके समूहको छोडकर मुनियोंके समूहको आनंद देनेवाले सन्तोषरूपी राज्यको अंगीकार कर, क्योंकि धनका समूह समस्त इन्द्रियोंके विषयका तो बीज है तथा समस्त पापोंका मूल है और नरकनगरकी ध्वजा है, सो ऐसे अनर्थकारी धनको छोड कर संतोषको अंगीकार कर, जिससे संसारका फंद कटता है ।


एनः किं न धनप्रसक्तमनसां नासादि हिंसादिना
कस्तस्यार्जनरक्षणक्षयकृतैर्नादाहि दुःखानलैः ।
तत्प्रागेव विचार्य वर्जय वरं व्यामूढ वित्तस्पृहां
येनैकास्पदतां न यासि विषयैः पापस्य तापस्य च ॥41॥

अर्थ: हे व्यामूढ आत्मन् ! जिनका मन धनमें लवलीन है उन्होंने क्या हिंसादिक कार्योंसे पापार्जन नहीं किया ? तथा उस धनके उपार्जन, रक्षण व व्यय करनेसे दुःखरूपी अग्निसे कौन नहीं जला ? इस कारण पहिले ही विचार कर इस धनकी स्पृहाको (इच्छाको) छोड; जिससे तू विषयों सहित पाप तापकी एकताको प्राप्त न हो अर्थात् विषयों और पापतापोंका संगी न हो ।


एवं तावदहं लभेय विभवं रक्षेयमेवं तत -
स्तद्वृद्धिं गमयेयमेवमनिशं भुञ्जीय चैवं पुनः ।
द्रव्याशारसरुद्धमानस भृशं नात्मानमुत्पश्यसि
क्रुद्ध्यत्क्रूरकृतान्तदन्तपटलीयन्त्रान्तरालस्थितम् ॥42॥

अर्थ: हे आत्मन् ! धनकी आशारूपी रससे मन रुक जानेसे तू ऐसा विचारता है कि ‘प्रथम तो मैं धनोपार्जन कर सम्पदाको प्राप्त होऊँगा, फिर ऐसे उसकी रक्षा करूँगा, इस प्रकार उसकी वृद्धि करूँगा तथा अमुक प्रकारसे उसको भोगकर व्यय करूँगा’ इत्यादि विचार करता रहता है; परन्तु क्रोधायमान यमके दाँतोंकी दोनों पंक्तिरूपी चक्कीके बीचमें अपनेको आया हुआ नहीं देखता, सो यह तेरा बडा अज्ञान है ।

सर्ग 17: आशा की निंदा (श्लोक 1 से 21)

बाह्यान्तर्भूतनिःशेषसंगसंन्याससिद्धये ।
आशां सद्भिर्निराकृत्य नैराश्यमवलंब्यते ॥1॥

अर्थ: जो सत्पुरुष हैं वे बाह्याभ्यन्तरके समस्त परिग्रहोंके त्यागकी सिद्धिके लिये प्रथम ही आशाको छोड कर निराशताका आलंबन करते हैं, क्योंकि आशाके छूटनेसे ही परिग्रहका त्याग होता है ।


यावद्यावच्छरीराशा धनाशा वा विसर्पति ।
तावत्तावन्मनुष्याणां मोहग्रन्थिर्दृढीभवेत् ॥2॥

अर्थ: मनुष्योंके जैसे जैसे शरीर तथा धनमें आशा फैलती है, वैसे वैसे उनके मोहकर्मकी गाँठ दृढ होती जाती है ।


अनिरुद्धा सती शश्वदाशा विश्वं प्रसर्पति ।
ततो निबद्धमूलाऽसौ पुनश्छेत्तुं न शक्यते ॥3॥

अर्थ: इस आशाको रोका नहीं जाय तो यह निरन्तर समस्त लोकपर्यन्त विस्तरती रहती है और उससे इसका मूल दृढ होता जाता है, फिर इसका काटना अशक्य हो जाता है, इसलिये इसका रोकना श्रेष्ठ है।


यद्याशा शान्तिमायाता तदा सिद्धं समीहितम् ।
अन्यथा भवसंभूतो दुःखवार्धिर्दुरुत्तरः ॥4॥

अर्थ: यदि आशा शान्तिको प्राप्त हो जाती है तो फिर उसी समय सर्व मनोवांछितकी सिद्धि हो जाती है, यदि शान्त न हुई तो फिर संसारसे उत्पन्न हुआ दुःखरूपी समुद्र दुस्तर हो जाता है।


यमप्रशमराज्यस्य सद्बोधार्कोदयस्य च ।
विवेकस्यापि लोकानामाशैव प्रतिषेधिका ॥5॥

अर्थ: लोगोंके यम, नियम वा प्रशम भावोंके राज्यका तथा सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्यके उदयका प्रतिषेध (निषेध) करनेवाली और विवेकको रोकनेवाली एक मात्र यह आशा ही है; आशाके नष्ट होनेसे ही सर्व सिद्धि है ।


आशामपि न सर्पन्तीं यः क्षणं रक्षितुं क्षमः ।
तस्यापवर्गसिद्ध्यर्थं वृथा मन्ये परिश्रमम् ॥6॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जो पुरुष बढती हुई आशाको क्षणभर भी रोकनेको असमर्थ है उसका मोक्षकी सिद्धिके लिये परिश्रम करना व्यर्थ है, ऐसा मैं मानता हूँ ।


आशैव मदिराऽक्षाणामाशैव विषमञ्जरी ।
आशा मूलानि दुःखानि प्रभवन्तीह देहिनाम् ॥7॥

अर्थ: संसारी जीवोंके आशा ही तो इन्द्रियोंको उन्मत्त करनेवाली मदिरा है और आशा ही विषको बढानेवाली मंजरी है तथा संसारमें जितने दुःख होते हैं, उनकी एक मात्र यह आशा ही मूल कारण है ।


त एव सुखिनो धीरा यैराशाराक्षसी हता ।
महाव्यसनसंकीर्णश्चोत्तीर्णः क्लेशसागरः ॥8॥

अर्थ: जिन पुरुषोंने आशारूपी राक्षसीको नष्ट किया, वे ही पुरुष धीर, वीर और सुखी हैं तथा वे ही अनेक आपदा वा कष्टोंके भरे हुए दुःखरूपी संसारसमुद्रसे पार हुए हैं ।


येषामाशा कुतस्तेषां मनःशुद्धिः शरीरिणाम् ।
अतो नैराश्यमालंब्य शिवीभूता मनीषिणः ॥9॥

अर्थ: जिन पुरुषोंको आशा लगी है, उनके मनकी शुद्धि कैसे हो ? इस कारण जो बुद्धिमान् पुरुष हैं उन्होंने निराशताका अवलंबन करके ही अपना कल्याण साधन किया है ।


सर्वाशां यो निराकृत्य नैराश्यमवलम्बते ।
तस्य क्वचिदपि स्वान्तं संगपङ्कैर्न लिप्यते ॥10॥

अर्थ: जो पुरुष समस्त आशाओंका निराकरण करके निराशाका अवलंबन करता है, उसका मन किसी कालमें भी परिग्रहरूपी कर्दमसे नहीं लिपता ।


तस्य सत्यं श्रुतं वृत्तं विवेकस्तत्त्वनिश्चयः ।
निर्ममत्वं च यस्याशापिशाची निधनं गता ॥11॥

अर्थ: जिस पुरुषके आशारूपी पिशाची नष्टताको प्राप्त हुई उसका शास्त्राध्ययन करना, चारित्र पालना, विवेक, तत्त्वोंका निश्चय और निर्ममता आदि सत्यार्थ (सच्चे) हैं वा सार्थक हैं ।


यावदाशानलश्चित्ते जाज्वलीति विशृङ्खलः ।
तावत्तव महादुःखदाहशान्तिः कुतस्तनी ॥12॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जब तक तेरे चित्तमें आशारूपी अग्नि स्वतंत्रतासे नितान्त प्रज्वलित हो रही है तब तक तेरे महा दुःखरूपी दाहकी शान्ति कहाँसे हो ? ।


निराशतासुधापूरैर्यस्य चेतः पवित्रितम् !
तमालिङ्गति सोत्कण्ठं शमश्रीर्बद्धसौहृदा ॥13॥

अर्थ: जिसका चित्त निराशतारूपी अमृतके प्रवाहोंसे पवित्र हो चुका है, उस पुरुषको प्रीतिसे बँधी हुई उपशम भावरूपी लक्ष्मी उत्कंठापूर्वक आलिंगन करती है।


न मज्जति मनो येषामाशाम्भसि दुरुत्तरे ।
तेषामेव जगत्यस्मिन्फलितो ज्ञानपादपः ॥14॥

अर्थ: इस जगतमें जिनका मन दुस्तर आशारूपी जलमें नहीं डूबता, उनके ही ज्ञानरूपी वृक्ष फलता है।


शक्रोऽपि न सुखी स्वर्गे स्यादाशानलदीपितः ।
विध्याप्याशानलज्वालां श्रयन्ति यमिनः शिवम् ॥15॥

अर्थ: स्वर्गका इन्द्र भी आशारूपी अग्निसे जलता हुआ सुखी नहीं है और मुनिगण तो आशारूपी अग्निकी ज्वालाको बुझा कर मोक्षका आश्रय कर लेते हैं अर्थात् मुनिगण निराशताका अवलंबन करके सर्वथा सुखी हो जाते हैं ।


चरस्थिरार्थजातेषु यस्याशा प्रलयं गता ।
किं किं न तस्य लोकेऽस्मिन्मन्ये सिद्धं समीहितं ॥16॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि जिस पुरुषकी चराचर (चित् अचित्) पदार्थोमें आशा नष्ट हो गई है, उसके इस लोकमें क्या-क्या मनोवांछित सिद्ध नहीं हुए ? अर्थात् सर्व मनोवांछित सिद्ध हुए, ऐसा मैं मानता हूँ ।


चापलं त्यजति स्वान्तं विक्रियाश्चाक्षदन्तिनः ।
प्रशाम्यति कषायाग्निर्नैराश्याधिष्ठितात्मनाम् ॥17॥

अर्थ: जिनके आत्माने निराशताको स्वीकृत किया है, उनका मन तो चपलताको छोड देता है और इन्द्रियरूपी हस्ती विषयविकारताको छोड देते हैं तथा कषायरूपी अग्नि शान्त हो जाती है ।


किमत्र बहुनोक्तेन यस्याशा निधनं गता ।
स एव महतां सेव्यो लोकद्वयविशुद्धये ॥18॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि बहुत कहाँ तक कहें ? इतना ही बहुत है कि जिसकी आशा नष्ट हो गई वही पुरुष उभय लोकको विशुद्धताके लिये महापुरुषोंके द्वारा सेवा करने योग्य है।


आशा जन्मोग्रपङ्काय शिवायाशाविपर्ययः ।
इति सम्यक्समालोच्य यद्धितं तत्समाचर ॥19॥

अर्थ: आशा है सो संसाररूपी कर्दममें फँसानेवाली है और उसका विपर्यय अर्थात् आशाका अभाव मोक्षका करनेवाला है। अब तू इन दोनोंका भले प्रकार विचार कर, जिसमें अपना हित समझे उसीका आचरण कर, यह उपदेश है ।


न स्याद्विक्षिप्तचित्तानां स्वेष्टसिद्धिः क्वचिन्नृणाम् ।
कथं प्रक्षीणविक्षेपा भवन्त्याशाग्रहक्षताः ॥20॥

अर्थ: जो आशारूपी पिशाचसे क्षत अर्थात् पीडित हैं, वे विक्षिप्त चित्त हैं, सो जिनका चित्त विक्षिप्त है, उन मनुष्योंकी इष्टसिद्धि कहीं भी नहीं है, उनकी विक्षिप्तता कैसे नष्ट होगी सो नहीं कहा जा सकता।


विषयविपिनवीथीसंकटे पर्यटन्ती
झटिति घटितवृद्धिः क्वापि लब्धावकाशा ।
अपि नियमिनरेन्द्रानाकुलत्वं नयन्ती
छलयति खलु कं वा नेयमाशापिशाची ॥21॥

अर्थ: विषयरूपी वनकी गलियोंमें फिरती हुई, तत्काल बढती जहाँ तहाँ स्वतंत्र (बेरोकटोक) विचरनेवाली, संयमी मुनियोंको आकुलित करनेवाली यह आशारूपी पिशाची किस-किसको नहीं छलती ? अर्थात् सबको छलती फिरती है ।

सर्ग 18: पंचसमिति आदि का वर्णन (श्लोक 1 से 39)

महत्त्वहेतोर्गुणिभिः श्रितानि महान्ति मत्वा त्रिदशैर्नुतानि ।
महासुखज्ञाननिबन्धनानि महाव्रतानीति सतां मतानि ॥1॥

अर्थ: प्रथम तो ये महाव्रत महत्ताके कारण हैं, इस कारण इनका गुणी पुरुषोंने आश्रय किया है अर्थात् धारण करते हैं । दूसरे-ये स्वयं महान् हैं इस कारण देवताओंने भी इन्हें नमस्कार किया है । तीसरे-महान् अतीन्द्रिय सुख और ज्ञानके कारण हैं, इस कारण ही सत्पुरुषोंने इनको महाव्रत माना है ।


महाव्रतविशुद्ध्यर्थं भावनाः पञ्चविंशतिः ।
परमासाद्य निर्वेदपदवीं भव्य भावय ॥2॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि हे भव्य ! ये पाँच महाव्रत कहे उनकी शुद्धताके लिये (निर्मलताके लिये) पच्चीस भावना कही हैं, उन्हें अंगीकार करके वैराग्य पदवीकी भावना कर ।


ईर्या भाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गसंज्ञकाः ।
सद्भिः समितयः पञ्च निर्दिष्टाः संयतात्मभिः ॥3॥

अर्थ: संयम सहित है आत्मा जिनका ऐसे सत्पुरुषोंने ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और उत्सर्ग ये हैं नाम जिनके ऐसी पाँच समितियाँ कहीं हैं ।


वाक्कायचित्तजानेकसावद्यप्रतिषेधकं ।
त्रियोगरोधनं वा स्याद्यत्तद्गुप्तित्रयं मतम् ॥4॥

अर्थ: मन वचन कायसे उत्पन्न अनेक पापसहित प्रवृत्तियोंका प्रतिषेध करनेवाला प्रवर्त्तन अथवा तीनों योग (मनवचनकायकी क्रिया) का रोकना ये तीन गुप्तियाँ कही गई हैं ।


सिद्धक्षेत्राणि सिद्धानि जिनबिम्बानि वन्दितुम् ।
गुर्वाचार्यतपोवृद्धान्सेवितुं व्रजतोऽथवा ॥5॥

अर्थ: जो मुनि प्रसिद्ध सिद्धक्षेत्रोंको तथा जिनप्रतिमाओंको वन्दनेके लिये तथा गुरु आचार्य वा जो तपसे बडे हों उनकी सेवा करनेके लिये गमन करता हो उसके ।


दिवा सूर्यकरैः स्पष्टं मार्गं लोकातिवाहितम् ।
दयार्द्रस्याङ्गिरक्षार्थं शनैः संश्रयतो मुनेः ॥6॥

अर्थ: तथा दिनमें सूर्यकी किरणोंसे स्पष्ट दीखनेवाले, बहुत लोग जिसमें गमन करते हो ऐसे मार्गमें दयासे आर्द्रचित्त होकर जीवोंकी रक्षा करता हुआ धीरे-धीरे गमन करें उस मुनिके ।


प्रागेवालोक्य यत्नेन युगमात्राहितेऽक्षिणः ।
प्रमादरहितस्यास्य समितीर्या प्रकीर्तिता ॥7॥

अर्थ: जो मुनि प्रसिद्ध सिद्धक्षेत्रोंको तथा जिनप्रतिमाओंको वन्दनेके लिये तथा गुरु आचार्य वा जो तपसे बडे हों उनकी सेवा करनेके लिये गमन करता हो उसके ॥५॥ तथा दिनमें सूर्यकी किरणोंसे स्पष्ट दीखनेवाले, बहुत लोग जिसमें गमन करते हो ऐसे मार्गमें दयासे आर्द्रचित्त होकर जीवोंकी रक्षा करता हुआ धीरे-धीरे गमन करें उस मुनिके ॥६॥ तथा चलनेसे पहिले ही जिसने युग (जूडे) परिमाण (चार हाथ) मार्गको भले प्रकार देख लिया हो और प्रमादरहित हो ऐसे मुनिके ईर्या समिति कही गई है ।


धूर्तकामुकक्रव्यादचौरचार्वाकसेविता ।
शङ्कासङ्केतपापाढ्या त्याज्या भाषा मनीषिभिः ॥8॥

अर्थ: धूर्त (मायावी), कामी, मांसभक्षी, चौर, नास्तिकमती चार्वाकादिसे व्यवहारमें लाई हुई भाषा तथा संदेह उपजानेवाली, वा पापसंयुक्त हो ऐसी भाषा बुद्धिमानोंको त्यागनी चाहिये तथा वचनोंके दश दोष रहित सूत्रानुसार साधुपुरुषोंको मान्य हो ऐसी भाषाको कहनेवाले मुनिके उत्कृष्ट भाषासमिति होती है ।


दशदोषविनिर्मुक्तां सूत्रोक्तां साधुसम्मताम् ।
गदतोऽस्य मुनेर्भाषां स्याद्भाषासमितिः परा ॥9॥

अर्थ: धूर्त (मायावी), कामी, मांसभक्षी, चौर, नास्तिकमती चार्वाकादिसे व्यवहारमें लाई हुई भाषा तथा संदेह उपजानेवाली, वा पापसंयुक्त हो ऐसी भाषा बुद्धिमानोंको त्यागनी चाहिये तथा वचनोंके दश दोष रहित सूत्रानुसार साधुपुरुषोंको मान्य हो ऐसी भाषाको कहनेवाले मुनिके उत्कृष्ट भाषासमिति होती है ।


उद्गमोत्पादसंज्ञैस्तैर्धूमाङ्गारादिगैस्तथा ।
दोषैर्मलैर्विनिर्मुक्तं विघ्नशङ्कादिवर्जितम् ॥10॥

अर्थ: जो उद्गमदोष १६, उत्पादनदोष १६, एषणादोष १०, धुआँ अंगार प्रमाण संयोजन, ये चार मिलकर ४६ दोषरहित तथा मांसादिक १४ मलदोष और अन्तराय शंकादिसे रहित, शुद्ध, कालमें परके द्वारा दिया हुआ, विना उद्देशा हुआ और याचना रहित आहार करें उस मुनिके उत्तम एषणासमिति कही गई है। इन दोषादिकोंका स्वरूप आचारवृत्ति आदिक ग्रन्थोंसे जानना ॥१०-११॥


शुद्धं काले परैर्दत्तमनुद्दिष्टमयाचितम् ।
अदतोऽन्नं मुनेर्ज्ञेया एषणासमितिः परा ॥11॥

अर्थ: जो उद्गमदोष १६, उत्पादनदोष १६, एषणादोष १०, धुआँ अंगार प्रमाण संयोजन, ये चार मिलकर ४६ दोषरहित तथा मांसादिक १४ मलदोष और अन्तराय शंकादिसे रहित, शुद्ध, कालमें परके द्वारा दिया हुआ, विना उद्देशा हुआ और याचना रहित आहार करें उस मुनिके उत्तम एषणासमिति कही गई है । इन दोषादिकोंका स्वरूप आचारवृत्ति आदिक ग्रन्थोंसे जानना ॥१०-११॥


शय्यासनोपधानानि शास्त्रोपकरणानि च ।
पूर्वं सम्यक्समालोच्य प्रतिलिख्य पुनः पुनः ॥12॥

अर्थ: जो मुनि, शय्या, आसन, उपधान, शास्त्र और उपकरण आदिको पहिले भले प्रकार देखकर फिर उठावें अथवा रक्खें उसके तथा बडे यत्नसे, ग्रहण करते हुएके तथा पृथ्वी पर धरते हुए साधुके अविकल (पूर्ण) आदाननिक्षेपणसमिति स्पष्टतया पलती है ।।१२-१३।।


गृह्णतोऽस्य प्रयत्नेन क्षिपतो वा धरातले ।
भवत्यविकला साधोरादानसमितिः स्फुटं ॥13॥

अर्थ: जो मुनि, शय्या, आसन, उपधान, शास्त्र और उपकरण आदिको पहिले भले प्रकार देखकर फिर उठावें अथवा रक्खें उसके तथा बडे यत्नसे ग्रहण करते हुएके तथा पृथ्वी पर धरते हुए साधुके अविकल (पूर्ण) आदाननिक्षेपणसमिति स्पष्टतया पलती है ॥१२-१३॥


विजन्तुकधरापृष्ठे मूत्रश्लेष्ममलादिकम् ।
क्षिपतोऽतिप्रयत्नेन व्युत्सर्गसमितिर्भवेत् ॥14॥

अर्थ: जीव रहित पृथ्वी पर मल, मूत्र, श्लेष्मादिकको बडे यत्नसे (प्रमादरहिततासे) क्षेपण करनेवाले मुनिके उत्सर्गसमिति होती है ।


विहाय सर्वसंकल्पान् रागद्वेषावलम्बितान् ।
स्वाधीनं कुरुते चेतः समत्वे सुप्रतिष्ठितम् ॥15॥

अर्थ: रागद्वेषसे अवलंबित समस्त संकल्पोंको छोड कर जो मुनि अपने मनको स्वाधीन करता है और समताभावोंमें स्थिर करता है तथा सिद्धान्तके सूत्रकी रचनामें निरन्तर प्रेरणारूप करता है उस बुद्धिमान् मुनिके सम्पूर्ण मनोगुप्ति होती है ॥१५-१६॥


सिद्धान्तसूत्रविन्यासे शश्वत्प्रेरयतोऽथवा ।
भवत्यविकला नाम मनोगुप्तिर्मनीषिणः ॥16॥

अर्थ: रागद्वेषसे अवलंबित समस्त संकल्पोंको छोड कर जो मुनि अपने मनको स्वाधीन करता है और समताभावोंमें स्थिर करता है तथा सिद्धान्तके सूत्रकी रचनामें निरन्तर प्रेरणारूप करता है उस बुद्धिमान् मुनिके सम्पूर्ण मनोगुप्ति होती है ॥१५-१६॥


साधुसंवृतवाग्वृत्तैर्मौनारूढस्य वा मुनेः ।
संज्ञादिपरिहारेण वाग्गुप्तिः स्यान्महामुनेः ॥17॥

अर्थ: भले प्रकार संवररूप (वश) की है वचनोंकी प्रवृत्ति जिसने ऐसे मुनिके तथा समस्यादिका त्याग कर मौनारूढ होनेवाले महामुनिके वचनगुप्ति होती है ।


स्थिरीकृतशरीरस्य पर्यङ्कसंस्थितस्य वा ।
परीषहप्रपातेऽपि कायगुप्तिर्मता मुनेः ॥18॥

अर्थ: स्थिर किया है शरीर जिसने तथा परीषह आ जाय तो भी अपने पर्यंकासनमें ही स्थिर रहें, किन्तु डिगे नहीं, उस मुनिके ही कायगुप्ति मानी गई है अर्थात् कही गई है ।


जनन्यो यमिनामष्टौ रत्नत्रयविशुद्धिदाः ।
एताभी रक्षितं दोषैर्मुनिवृन्दं न लिप्यते ॥19॥

अर्थ: पाँच समिति और तीन गुप्ति ये आठों संयमी पुरुषोंकी रक्षा करनेवाली माता हैं तथा रत्नत्रयकी विशुद्धता देनेवाली हैं, इनसे रक्षा किया हुआ मुनियोंका समूह दोषोंसे लिप्त नहीं होता ।


इति कतिपयवर्णैश्चर्चितं चित्ररूपं चरणमनघमुच्चैश्चेतसां शुद्धिधाम ।
अविदितपरमार्थैर्यन्न साध्यं विपक्षैस्तदिदमनुसरन्तु ज्ञानिनः शान्तदोषाः ॥20॥

अर्थ: उक्त प्रकारसे कितने ही अक्षरोंद्वारा वर्णन किया जो अनेकरूप निर्दोष चारित्र सो अतिशय ऊँचे चित्तवालोंको तो शुद्धताका मंदिर है और नहीं जाना है परमार्थ जिन्होंने ऐसे विपक्षियोंद्वारा जो असाध्य है अर्थात् धारण नहीं किया जा सकता, ऐसे इस चारित्रको शांतदोषी ज्ञानीपुरुष धारण करो ऐसा उपदेश है ।


सम्यगेतत्समासाद्य त्रयं त्रिभुवनार्चितम् ।
द्रव्यक्षेत्रादिसामग्र्या भव्यः सपदि मुच्यते ॥21॥

अर्थ: इस त्रिभुवनके पूजित सम्यक्रत्नत्रयको द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावरूप सामग्रीके अनुसार अंगीकार करके भव्य पुरुष शीघ्र ही कर्मोंसे छूटता है अर्थात् मुक्त होता है ।


एतत्समयसर्वस्वं मुक्तेश्चैतन्निबन्धनम् ।
हितमेतद्धि जीवानामेतदेवाग्रिमं पदम् ॥22॥

अर्थ: यह रत्नत्रय ही सिद्धान्तका सर्वस्व है और यही मुक्तिका कारण है तथा यही जीवोंका हित और प्रधान पद है ।


ये याता यान्ति यास्यन्ति यमिनः पदमव्ययम् ।
समाराध्यैव ते नूनं रत्नत्रयमखण्डितम् ॥23॥

अर्थ: निश्चय करके इस रत्नत्रयको अखंडित (परिपूर्ण) आराधन करके ही संयमी मुनि आज तक पूर्वकालमें मोक्ष गये हैं और वर्तमानमें जाते हैं तथा भविष्यमें जायेंगे ।


साक्षादिदमनासाद्य जन्मकोटिशतैरपि ।
दृश्यते न हि केनापि मुक्तिश्रीमुखपङ्कजम् ॥24॥

अर्थ: इस रत्नत्रयको प्राप्त न होकर करोडों जन्म धारण करने पर भी कोई मुक्तिरूपी लक्ष्मीके मुखरूपी कमलको साक्षात् नहीं देख सकता ।


दृग्बोधचरणान्याहुः स्वमेवाध्यात्मवेदिनः ।
यतस्तन्मय एवासौ शरीरी वस्तुतः स्थितः ॥25॥

अर्थ: जो अध्यात्मके जाननेवाले हैं वे दर्शन ज्ञान और चारित्र तीनोंको एक आत्मा ही कहते हैं, क्योंकि परमार्थदृष्टिसे देखा जाय तो यह शरीरी आत्मा उन तीनोंसे तन्मय ही है, कुछ भी पृथक् अर्थात् अन्य नहीं है; यद्यपि भाव-भाववान्के भेदसे तीन भेद किये गये हैं, तथापि वास्तवमें एक ही हैं ।


निर्णीतेऽस्मिन्स्वयं साक्षान्नापरः कोऽपि मृग्यते ।
यतो रत्नत्रयस्यैषः प्रसूतेरग्रिमं पदम् ॥26॥

अर्थ: इस आत्माको स्वयं आपसे ही साक्षात् निर्णय करनेसे और कोई भी अन्य नहीं पाया जाता; केवल मात्र यह आत्मा ही रत्नत्रयकी उत्पत्तिका मुख्य पद है ।


जानाति यः स्वयं स्वस्मिन्स्वस्वरूपं गतभ्रमः ।
तदेव तस्य विज्ञानं तद्वृत्तं तच्च दर्शनम् ॥27॥

अर्थ: जो पुरुष अपनेमें अपनेसे ही अपने निजरूपको भ्रमरहित होकर जानता है, वही उसके विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) है और वही सम्यक्चारित्र तथा सम्यग्दर्शन है, अन्य कुछ भी नहीं है ।


स्वज्ञानादेव मुक्तिः स्याज्जन्मबन्धस्ततोऽन्यथा ।
एतदेव जिनोद्दिष्टं सर्वस्वं बन्धमोक्षयोः ॥28॥

अर्थ: आत्मज्ञानसे ही मोक्ष होता है, आत्मज्ञानके विना अन्य प्रकारसे संसारका बंध होता है, यही जिनेन्द्र भगवानका कहा हुआ बंध मोक्षका सर्वस्व है ।


आत्मैव मम विज्ञानं दृग्वृत्तं चेति निश्चयः ।
मत्तः सर्वेऽप्यमी भावा बाह्याः संयोगलक्षणाः ॥29॥

अर्थ: मेरे आत्मा ही विज्ञान है, आत्मा ही दर्शन और चारित्र है ऐसा निश्चय है। इससे अन्य सब ही पदार्थ मुझसे बाह्य और संयोगस्वरूप है। इस प्रकार अनुभव करनेसे रत्नत्रयमें और आत्मामें कुछ भी भेद नहीं रहता ।


अयमात्मैव सिद्धात्मा स्वशक्त्याऽपेक्षया स्वयम् ।
व्यक्तीभवति सद्ध्यानवह्निनाऽत्यन्तसाधितः ॥30॥

अर्थ: यह आत्मा संसारअवस्थामें भी अपनी शक्तिकी अपेक्षासे सिद्धस्वरूप है और समीचीन ध्यानरूपी अग्निसे अत्यन्त साधनेसे व्यक्तरूप सिद्ध होता है अर्थात् अष्टकर्मका नाश होने पर सिद्धस्वरूप व्यक्त (प्रगट) होता है ।


एतदेव परं तत्त्वं ज्ञानमेतद्धि शाश्वतम् ।
अतोऽन्यो यः श्रुतस्कन्धः स तदर्थं प्रपञ्चितः ॥31॥

अर्थ: यह आत्मा ही परम तत्त्व है और यही शाश्वत ज्ञान है अतएव अन्य श्रुत-स्कन्ध द्वादशांग शास्त्ररूप रचना इस आत्माको ही जाननेके लिये विस्तृत हुआ है ।


अपास्य कल्पनाजालं चिदानन्दमये स्वयम् ।
यः स्वरूपे लयं प्राप्तः स स्याद्रत्नत्रयास्पदम् ॥32॥

अर्थ: जो मुनि कल्पनाके जालको दूर करके अपने चैतन्य और आनन्दमय स्वरूपमें लयको प्राप्त हो, वही निश्चय रत्नत्रयका स्थान (पात्र) होता है ।


सुप्तेष्वक्षेषु जागर्ति पश्यत्यात्मानमात्मनि ।
वीतविश्वविकल्पोऽसौ सः स्वदर्शी बुधैर्मतः ॥33॥

अर्थ: जो मुनि इन्द्रियोंके सोते हुए तो जागता है तथा आत्मामें ही आत्माको देखता है और समस्त विकल्पोंसे रहित है वही विद्वानोंके द्वारा आत्मदर्शी माना गया है ।


निःशेषक्लेशनिर्मुक्तममूर्त्तं परमाक्षरम् ।
निष्प्रपञ्चं व्यतीताक्षं पश्य स्वं स्वात्मनि स्थितम् ॥34॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू अपने आत्मामें ही रहता हुआ अपनेको समस्त क्लेशोंसे रहित, अमूर्तिक, परम उत्कृष्ट अविनाशी, विकल्पोंसे और इन्द्रियोंसे रहित अर्थात् अतीन्द्रिय स्वरूप देख ।


नित्यानन्दमयं शुद्धं चित्स्वरूपं सनातनम् ।
पश्यात्मनि परं ज्योतिरद्वितीयमनव्ययम् ॥35॥

अर्थ: फिर भी कहते हैं कि तू अपने आत्मामें ही अपनेको इस प्रकार टिका हुआ देख कि मैं नित्य आनन्दमय हूँ, शुद्ध हूँ, चैतन्यस्वरूप हूँ और सनातन हूँ, अविनश्वर हूँ, परमज्योतिज्ञानप्रकाशरूप हूँ, अद्वितीय हूँ और अनव्यय कहिये व्यय बिना नहीं हूँ अर्थात् पूर्वपर्यायके व्यय सहित हूँ ।


यस्यां निशि जगत्सुप्तं तस्यां जागर्ति संयमी ।
निष्पन्नं कल्पनातीतं स वेत्त्यात्मानमात्मनि ॥36॥

अर्थ: जिस रात्रिमें जगत् सोता है उस रात्रिमें संयमी मुनि जागता है और अपने आत्मामें ही अपनेको निष्पन्न, स्वयंसिद्ध तथा कल्पना रहित जानता है ।


या निशा सर्वभूतेषु तस्यां जागर्त्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥37॥

अर्थ: जो समस्त प्राणियोंमें रात्रि मानी जाती है उसमें तो संयमी जागता है और जिस रात्रिमें समस्त प्राणी जागते हैं वह अपने स्वरूपावलोकन करनेवाले मुनिकी रात्रि है ।


यस्य हेयं न वाऽऽदेयं निःशेषं भुवनत्रयम् ।
उन्मीलयति विज्ञानं तस्य स्वान्यप्रकाशकम् ॥38॥

अर्थ: जिस मुनिके समस्त त्रिभुवन हेय अथवा आदेय नहीं है उस मुनिके स्वपरप्रकाशक ज्ञानका उदय होता है, क्योंकि जब तक हेय उपादेय बुद्धिमें रहें तब तक ज्ञान निर्मलतासे नहीं फैलता (बढता) ।


दृश्यन्ते भुवि किं न तेऽल्पमतयः संख्याव्यतीताश्चिरम्
ये लीलां परमेष्ठिनो निजनिजैस्तन्वन्ति वाग्भिः परम् ।
तं साक्षादनुभूय नित्यपरमानन्दाम्बुराशिं पुन -
र्ये जन्मभ्रममुत्सृजन्ति सहसा धन्यास्तु ते दुर्लभाः ॥39॥

अर्थ: जो पुरुष अपने वचनोंसे केवल परमेष्ठीकी बहुत काल पर्यन्त लीला-गुणानुवादका विस्तार करते हैं, ऐसे अल्पमती संसारमें क्या प्रायः संख्यारहित देखनेमें नहीं आते ? अर्थात् ऐसे जीव असंख्य हैं, परन्तु जो पुरुष नित्य परमानन्दके समुद्रको साक्षात् अनुभवगोचर करके संसारके भ्रमको तत्काल ही दूर कर देते हैं, वे महाभाग्य इस पृथ्वी पर दुर्लभ हैं ।

सर्ग 19: कषाय की निंदा (श्लोक 1 से 77)

सत्संयममहारामं यमप्रशमजीवितम् ।
देहिनां निर्दहत्येव क्रोधवह्निः समुत्थितः ॥1॥

अर्थ: जीवोंके यम, नियम तथा प्रशम (शान्त भाव) ही है जीवन जिसका ऐसे उत्कृष्ट संयमरूपी उपवन (बाग) को प्रज्वलित हुई क्रोधरूपी अग्नि भस्म कर देती है ।


दृग्बोधादिगुणानर्घ्यरत्नप्रचयसंचितम् ।
भाण्डागारं दहत्येव क्रोधवह्निः समुत्थितः ॥2॥

अर्थ: तथा यह क्रोधरूपी अग्नि प्रकट होने पर सम्यग्दर्शनज्ञानादि अमूल्य रत्नोंके समूहोंसे संचित किये गुणरूपी भंडारको भी दग्ध कर देती है ।


संयमोत्तमपीयूषं सर्वाभिमतसिद्धिदम् ।
कषायविषसेकोऽयं निःसारीकुरुते क्षणात् ॥3॥

अर्थ: इस कषायरूपी विषका सिंचन करना सर्व मनोवांछित सिद्धिको देनेवाले संयमरूपी उत्तम अमृतको भी क्षणमात्रमें निःसार कर देता है ।


तपःश्रुतयमाधारं वृत्तविज्ञानवर्द्धितम् ।
भस्मीभवति रोषेण पुंसां धर्मात्मकं वपुः ॥4॥

अर्थ: चारित्र और विशिष्ट ज्ञानसे बढाया हुआ तथा तप, स्वाध्याय और संयमका आधार जो पुरुषोंका धर्मरूपी शरीर है सो क्रोधरूपी अग्निसे भस्म हो जाता है ।


अयं समुत्थितः क्रोधो धर्मसारं सुरक्षितम् ।
निर्दहत्येव निःशङ्कं शुष्कारण्यमिवानलः ॥5॥

अर्थ: प्रगट हुआ यह क्रोध सूखे वनको अग्निके समान सुरक्षित धर्मरूपी सार कहिये जल अथवा धनको निःसंदेह दग्ध कर देता है ।


पूर्वमात्मानमेवासौ क्रोधान्धो दहति ध्रुवम् ।
पश्चादन्यन्न वा लोको विवेकविकलाशयः ॥6॥

अर्थ: क्रोधसे अन्धा हुआ विवेकरहित यह लोक प्रथम तो अपनेको निश्चय करके जला देता है, तत्पश्चात् दूसरोंको जलावे अथवा नहीं भी जलावें, किन्तु पहिले अपने समीचीन परिणामोंका घात तो कर ही लेता है ।


कुर्वन्ति यतयोऽप्यत्र क्रुद्धास्तत्कर्म निन्दितम् ।
हत्वा लोकद्वयं येन विशन्ति धरणीतलम् ॥7॥

अर्थ: क्रोधित हुए मुनि भी इस जगतमें ऐसा निन्दित कार्य करते हैं कि जिससे दोनों लोक नष्ट करके नरकमें पड जाते हैं फिर अन्य सामान्य जनका तो कहना ही क्या ? ।


क्रोधाद्दीपायनेनापि कृतं कर्मातिगर्हितम् ।
दग्ध्वा द्वारावती नाम पूः स्वर्गनगरीनिभा ॥8॥

अर्थ: देखो ! दीपायन नामके मुनिने क्रोधसे ऐसा निन्द्य कार्य किया कि स्वर्गकि समान सुन्दर द्वारिकापुरी भस्म कर दी ।


लोकद्वयविनाशाय पापाय नरकाय च ।
स्वपरस्यापकाराय क्रोधः शत्रुः शरीरिणाम् ॥9॥

अर्थ: जीवोंके क्रोधरूपी शत्रु इस लोक और परलोकको नष्ट करनेवाला है तथा नरकमें ले जानेवाला और पापको करनेवाला एवं निजपर अर्थात् दोनोंका अपकार करनेवाला है ।


अनादिकालसंभूतः कषायविषमग्रहः ।
स एवानन्तदुर्वारदुःखसंपादनक्षमः ॥10॥

अर्थ: यह कषायरूपी विषम ग्रह अनादिकालसे इस प्राणीके पीछे लगा हुआ है और यही अनन्त दुर्निवार दुःखोंको प्राप्त करानेमें समर्थ है ।


तस्मात्प्रशममालम्ब्य क्रोधवैरी निवार्यताम् ।
जिनागममहाम्भोधेरवगाहश्च सेव्यताम् ॥11॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे आत्मन् ! तू शान्त भावका अवलम्बन करके क्रोधरूपी वैरीको निवारण कर और जिनागमरूपी महासमुद्रका अवगाहन कर, क्योंकि क्रोध निवारण करनेका यही एक उपाय है ।


क्रोधवह्नेः क्षमैकेयं प्रशान्तौ जलवाहिनी ।
उद्दामसंयमारामवृत्तिर्वाऽत्यन्तनिर्भरा ॥12॥

अर्थ: क्रोधरूपी अग्निको शान्त करनेके लिये क्षमा ही अद्वितीय नदी है, क्षमासे ही क्रोधाग्नि बुझती है तथा क्षमा ही उत्कृष्ट संयमरूपी बागकी रक्षा करनेके लिये अतिशय दृढ बाड है ।


जयन्ति यमिनः क्रोधं लोकद्वयविरोधकं ।
तन्निमित्तेऽपि संप्राप्ते भजन्तो भावनामिमां ॥13॥

अर्थ: इस लोक और परलोकके बिगाडनेवाले क्रोधको मुनिगण ही जीतते हैं, क्योंकि वे क्रोधके कारण प्राप्त होने पर इस प्रकार भावना करते हैं जो कि आगे कहते हैं ।


यद्यद्य कुरुते कोऽपि मां स्वस्थं कर्मपीडितम् ।
चिकित्सित्वा स्फुटं दोषं स एवाकृत्रिमः सुहृत् ॥14॥

अर्थ: मुनि महाराज ऐसी भावना करते हैं कि मैं कर्मसे पीडित हूँ, कर्मोदयसे मुझमें कोई दोष उत्पन्न हुआ है सो उस दोषको अभी कोई प्रगट करे और मुझे आत्मानुभवमें स्थापित करके स्वस्थ करे वही मेरा अकृत्रिम (स्वयं प्राप्त) मित्र (हितैषी) है ।


हत्वा स्वपुण्यसन्तानं मद्दोषं यो निकृन्तति ।
तस्मै यदिह रुष्यामि मदन्यः कोऽधमस्तदा ॥15॥

अर्थ: पुनः ऐसी भावना करते हैं कि जो कोई अपने पुण्यका क्षय करके मेरे दोषोंको काढता (कहता) है उससे यदि मैं रोष करूँ तो इस जगतमें मेरे समान नीच वा पापी कौन है ?


आक्रुष्टोऽहं हतो नैव हतो वा न द्विधाकृतः ।
मारितो न हतो धर्मो मदीयोऽनेन बन्धुना ॥16॥

अर्थ: यदि कोई अपनेको दुर्वचन कहे तो मुनि महाराज ऐसा विचार करते हैं कि इसने दुर्वचन ही तो कहे हैं, मेरा घात तो नहीं किया ? और यदि कोई घात भी करे (अर्थात् लाठी वगैरहसे मारे) तो ऐसा विचारते हैं कि इसने मुझे केवल मारा ही तो हैं, काट कर दो खंड तो नहीं किये ? यदि कोई काटने ही लगे तो मुनिमहाराज विचारते हैं कि यह मुझे मारता (काटता) है परंतु मेरा धर्म तो नष्ट नहीं करता ? मेरा धर्म तो मेरे साथ ही रहेगा; अथवा ऐसा विचार करते हैं कि यह मेरा बडा हितैषी है, क्योंकि मैं चैतन्यस्वरूप शुद्धात्मा इस शरीररूपी कारागारमें रुद्ध (कैद) हूँ सो यह इस शरीर(कारागार)को तोडकर मुझे कैदखानेसे छुडाता है, अतः यह मेरा बडा उपकार कर रहा है । इत्यादि विचारनेसे किसीपर भी क्रोध नहीं होता ।


संभवन्ति महाविघ्ना इह निःश्रेयसार्थिनाम् ।
ते चेत् किल समायाताः समत्वं संश्रयाम्यतः ॥17॥

अर्थ: जो मोक्षाभिलाषी हैं उन्हें इस लोकमें बडे-बडे विघ्न होने संभव हैं, यह प्रसिद्ध है; वे ही विघ्न यदि मेरे आवें तो इसमें आश्चर्य क्या हुआ ? इस कारण अब मैं समभावका आश्रय करता हूँ, मेरा किसी पर भी राग द्वेष नहीं है ।


चेन्मामुद्दिश्य भ्रश्यन्ति शीलशैलात्तपस्विनः ।
अमी अतोऽत्र मज्ञन्म परक्लेशाय केवलम् ॥18॥

अर्थ: फिर ऐसा भी विचार करते हैं कि यदि मैं क्रोध करूँ तो मुझे देखकर अन्यान्य तपस्वी मुनि अपने शीलस्वभावसे च्युत (भ्रष्ट) हो जायेंगे, तो फिर लोकमें मेरा जन्म केवल परके अपकारार्थ वा क्लेशके लिये ही हुआ, इस कारण मुझे क्रोध करना किसी प्रकार भी उचित नहीं है ।


प्राङ्मया यत्कृतं कर्म तन्मयैवोपभुज्यते ।
मन्ये निमित्तमात्रोऽन्यः सुखदुःखोद्यतो जनः ॥19॥

अर्थ: फिर ऐसा विचार करते हैं कि मैंने पूर्वजन्ममें जो कुछ बुरे भले कर्म किये हैं उनका फल मुझे ही भोगना पडेगा; सो जो कोई मुझे सुख दुःख देनेके लिये तत्पर हैं वे तो केवल मात्र बाह्य निमित्त हैं, ऐसा मैं मानता हूँ, तब इनसे क्रोध क्यों करना चाहिये ?


मदीयमपि चेच्चेतः क्रोधाद्यैर्विप्रलुप्यते ।
अज्ञातज्ञाततत्त्वानां को विशेषस्तदा भवेत् ॥20॥

अर्थ: फिर ऐसा विचार करते हैं कि मैं मुनि हूँ, तत्त्वज्ञानी हूँ; यदि क्रोधादिकसे मेरा भी चित्त बिगड जायगा तो फिर अज्ञानी तथा तत्त्वज्ञानीमें विशेष (भेद) ही क्या रहा ? मैं भी अज्ञानीके समान हुआ; इस प्रकार विचार करके क्रोधादिरूपसे नहीं परिणमते ।


न्यायमार्गे प्रपन्नेऽस्मिन्कर्मपाके पुरःस्थिते ।
विवेकी कस्तदात्मानं क्रोधादीनां वशं नयेत् ॥21॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारते हैं कि यह जो कर्मोंका उदय है सो न्यायमार्गमें प्राप्त है; इसके निकट होने (आगे आने) पर ऐसा कौन विवेकी है जो अपनेको क्रोधादिकके वशमें होने दे ?


सहस्व प्राक्तनासातफलं स्वस्थेन चेतसा ।
निष्प्रतीकारमालोक्य भविष्यद्दुःखशङ्कितः ॥22॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तूने पूर्वजन्ममें असाता कर्म बाँधा था उसीका फल यह दुर्वचनादिक है सो इनको उपायरहित समझकर आगामी दुःखकी शान्तिके लिये स्वस्थ चित्तसे अर्थात् चित्तको आत्मामें लगा कर सहन कर ।


उद्दीपयन्तो रोषाग्निं बहु विक्रम्य विद्विषः ।
मन्ये विलोपयिष्यन्ति क्वचिन्मत्तः शमश्रियम् ॥23॥

अर्थ: फिर विचारते हैं कि पूर्वकृत कर्म मेरे वैरी हैं सो मैं ऐसा मानता हूँ कि वे सब शत्रु अपने उदयरूप पराक्रमसे क्रोधादिके उत्पन्न करनेवाले निमित्तोंको मिलाकर मेरे क्रोधरूप अग्नि उद्दीपन करते हुए मेरी उपशमभावरूपी लक्ष्मीको लूटेंगे ।


अप्यसह्ये समुत्पन्ने महाक्लेशसमुत्करे ।
तुष्यत्यपि च विज्ञानी प्राक्कर्मविलयोद्यतः ॥24॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारते हैं कि जो विज्ञानी पूर्वोपार्जित कर्मोंको नाश करनेमें उद्यत (तत्पर) हुआ है, वह असह्य बडे-बडे क्लेशोंके प्राप्त होनेपर भी सन्तोष ही करता है, क्योंकि जो पूर्वजन्ममें कर्म उपार्जन किये थे उनका उदय अवश्य होना है, अब उदय आकर खिर गये सो अच्छा हुआ; इस प्रकार संतोष कर लेते हैं ।


यदि वाक्कण्टकैर्विद्धो नावलम्बे क्षमामहम् ।
ममाप्याक्रोशकादस्मात्को विशेषस्तदा भवेत् ॥25॥

अर्थ: दुर्वचन कहनेवाले पुरुषोंने मुझे वचनरूपी काँटोंसे वींधा (पीडित किया), अब यदि मैं क्षमा धारण नहीं करूँगा तो मेरे और दुर्वचन कहनेवालेमें क्या विशेषता होगी ? मैं यदि इसे दुर्वचन कहूँगा तो मैं भी इसके समान हो जाऊँगा, इस कारण क्षमा करना ही योग्य है ।


विचित्रैर्वधबन्धादिप्रयोगैर्न चिकित्सति ।
यद्यसौ मां तदा क्व स्यात्संचितासातनिष्क्रियः ॥26॥

अर्थ: यदि कोई मेरा अनेक प्रकारके वधबन्धादि प्रयोगोंसे इलाज नहीं करें तो मेरे पूर्वजन्मोंके संचित किये असाता कर्मरूपी रोगका नाश कैसे हो ?


यः शमः प्राक्समभ्यस्तो विवेकज्ञानपूर्वकः ।
तस्यैतेऽद्य परीक्षार्थं प्रत्यनीकाः समुत्थिताः ॥27॥

अर्थ: जो ये दुर्वचन कहनेवाले वा वधबन्धनादि करनेवाले शत्रु उत्पन्न हुए हैं, वे मानो मैंने भेदज्ञानपूर्वक शमभावका अभ्यास किया है, उसकी आज परीक्षा करनेको ही आये हैं, सो देखते हैं कि इसके शमभाव अब है कि नहीं ? ऐसा विचार करना किन्तु क्रोधरूप न होना ।


यदि प्रशममर्यादां भित्वा रुष्यामि शत्रवे ।
उपयोगः कदाऽस्य स्यात्तदा मे ज्ञानचक्षुषः ॥28॥

अर्थ: यदि मैं प्रशमभावकी मर्यादाका उल्लंघन करके वधबन्धनादि करनेवाले शत्रुसे क्रोध करूँगा तो इस ज्ञानरूपी नेत्रका उपयोग कौनसे कालमें होगा ? अर्थात् यह ज्ञानाभ्यास ऐसे ही कालके लिये किया था, सो अब शमभावसे रहना ही योग्य है, इस प्रकार विचारते हैं ।


अयत्नेनापि सैवेयं संजाता कर्मनिर्जरा ।
चित्रोपायैर्ममानेन यत्कृता भर्त्स्ययातना ॥29॥

अर्थ: फिर मुनि महाराज ऐसा विचार करते हैं कि इस शत्रुने मेरा अनेक प्रकारके उपायोंसे तिरस्कार करके जो तीव्र यातना (पीडा) दी इससे यह बडा भारी लाभ हुआ कि विना यत्न किये ही मेरे पापकर्मोंकी निर्जरा सहजमें ही हो गई। यह उपकार ही मानना, क्रोध क्यों करना ? ।


अपारयन्बोधयितुं पृथग्जनानसत्प्रवृत्तेष्वपि नाऽसदाचरेत् ।
अशक्नुवन्पीतविषं चिकित्सितुं पिबेद्विषं कः स्वयमप्यबालिशः ॥30॥

अर्थ: असमीचीन कार्योंमे प्रवर्तनेवाले अन्य पुरुषोंको उपदेश करके रोकनेमें असमर्थ हो तो क्या वह पंडित पुरुष भी असदाचरण करने लग जाय ? नहीं, कदापि नहीं । जैसे कोई पुरुष विष पी ले और उसकी चिकित्सा करनेमें वैद्य असमर्थ हो जाय तो ऐसा वैद्य पंडित कौन है जो आप भी विष पी ले ? अर्थात् ज्ञानी पंडित तो कोई नहीं पियेगा, यदि पिये तो वह अज्ञानी मूर्ख हैं । इसी प्रकार मुनि विचारते हैं कि किसीने अपने परिणाम बिगाड कर मेरा बुरा करना चाहा और मैं उसको निवारण करने (समझाने) में समर्थ न होऊँ तो क्या अपने परिणाम बिगाडकर उसीके समान बुरा करना उचित है ? कदापि नहीं ।


न चेदयं मां दुरितैः प्रकम्पयेदहं यतेयं प्रशमाय नाधिकम् ।
अतोऽतिलाभोऽयमिति प्रतर्कयन् विचाररूढा हि भवन्ति निश्चलाः ॥31॥

अर्थ: यदि मुनिको कोई दुष्ट दुर्वचनादिक उपसर्ग करे तो वह इस प्रकार विचार करता रहे कि यदि वह दुर्वचन कहनेवाला मुझे पापोंसे भय नहीं उपजावें तो मैं शान्तभावोंके लिये अधिक प्रयत्न नहीं करूँ; इस कारण इसने मुझे सावधान किया है कि मैंने पूर्वकालमें जो क्रोधादि पाप किये थे उसीका यह उपसर्ग फल है, सो मुझे यह बडा भारी लाभ हुआ; इस प्रकारके विचारमें आरूढ होकर मुनिमहाराज निश्चल रहते हैं ।


परपरितोषनिमित्तं त्यजन्ति केचिद्घनं शरीरं वा ।
दुर्वचनबन्धनाद्यैर्वयं रुषन्तो न लज्जामः ॥32॥

अर्थ: फिर मुनि महाराज ऐसा विचार करते हैं कि परको सन्तुष्ट करनेके लिये अनेक जन अपने धन वा शरीरको छोड देते हैं,और हम दूसरोंके दुर्वचन वध बन्धनादिकसे रोष करते हुए क्यों लज्जित नहीं होते ?


हन्तुर्हानिर्ममात्मार्थसिद्धिः स्यान्नात्र संशयः ।
हतो यदि न रुष्यामि रोषश्चेद् व्यत्ययस्तदा ॥33॥

अर्थ: किसीने मुझे मारा और यदि मैं रोष नहीं करूँ तो मारनेवालेकी तो हानि हुई अर्थात् पापबन्ध हुआ, परन्तु मेरे आत्माके अर्थकी सिद्धि हुई अर्थात् पाप नहीं बँधा किन्तु पूर्वके किये पापोंकी निर्जरा हुई, इसमें कोई संदेह नहीं है और मेरे कदाचित् रोष उपजे तो मेरी द्विगुण हानि हो अर्थात् एक तो पापबन्ध हो, दूसरे पूर्वकर्मोंकी निर्जरा नहीं हो; इत्यादि विचार करे ।


प्राणात्ययेऽपि सम्पन्ने प्रत्यनीकप्रतिक्रिया ।
मता सद्भिः स्वसिद्ध्यर्थं क्षमैका स्वस्थचेतसाम् ॥34॥

अर्थ: अपने प्राणका नाश होने पर भी उपसर्ग करनेवाले शत्रुका इलाज स्वस्थचित्त पुरुषोंका अपनी सिद्धिके लिये एकमात्र क्षमा करना ही सत्पुरुषोंने माना है।


इयं निकषभूरद्य सम्पन्ना पुण्ययोगतः ।
शमत्वं किं प्रपन्नोऽस्मि न वेत्यद्य परीक्ष्यते ॥35॥

अर्थ: यह क्षमा है सो इस समय मेरी परीक्षा करनेकी जगह है और पुण्ययोगसे मुझे प्राप्त हुई है, सो मेरी परीक्षा करके देखती हैं कि मैं शान्तभावको प्राप्त हूँ कि नहीं ।


स एव प्रशमः श्लाघ्यः स च श्रेयोनिबन्धनम् ।
अदयैर्हन्तुकामैर्यो न पुंसाः कश्मलीकृतः ॥36॥

अर्थ: पुरुषोंके वही प्रशम भाव प्रशंसनीय हैं और वही कल्याणका कारण है, जो मारनेकी इच्छा करके निर्दय पुरुषोंने मलिन नहीं किया।


चिराभ्यस्तेन किं तेन शमेनास्त्रेण वा फलम् ।
व्यर्थीभवति यत्कार्ये समुत्पन्ने शरीरिणाम् ॥37॥

अर्थ: जीवोंके चिरकालसे अभ्यास किये हुए शमभाव और शस्त्र चलानेका अभ्यास काम पडने पर व्यर्थ हो जाय तो उस शमभाव वा शस्त्रविद्या सीखनेसे क्या फल ?


प्रत्यनीके समुत्पन्ने यद्धैर्यं तद्धि शस्यते ।
स्यात्सर्वोऽपि जनः स्वस्थः सत्यशौचक्षमास्पदः ॥38॥

अर्थ: स्वस्थ चित्तवाले तो सब ही प्रायः सत्य शौच क्षमादि युक्त होते हैं, परन्तु उपसर्ग करनेवाले शत्रुके आने पर धैर्य रखना यह धैर्यगुण ही प्रशंसा करने योग्य है ।


वासीचन्दनतुल्यान्तर्वृत्तिमालम्ब्य केवलम् ।
आरब्धं सिद्धिमानीतं प्राचीनैर्मुनिसत्तमैः ॥39॥

अर्थ: प्राचीन बडे-बडे मुनिमहाराजोंने प्रारंभ किये हुए मोक्षकार्यको साधन किया है सो केवल बसूले और चंदनके समान अन्तर्वृत्ति (शमभावरूप वृत्ति) को आलंबन करके ही साधन किया है ।


कृतैर्वान्यैः स्वयं जातैरुपसर्गैः कलङ्कितम् ।
येषां चेतः कदाचित्तैर्न प्राप्ताः स्वेष्टसम्पदः ॥40॥

अर्थ: जिनका चित्त अन्यके किये उपसर्ग तथा अचेतन पदार्थोंसे स्वयमेव प्राप्त हुए उपसर्ग वा परीषहसे कलंकित (दूषित) हुआ उन्होंने अपने इष्टकार्यकी सम्पदाकी प्राप्ति कदापि नहीं की ।


प्राकृताय न रुष्यन्ति कर्मणे निर्विवेकिनः ।
तस्मिन्नपि च क्रुध्यन्ति यस्तदेव चिकित्सति ॥41॥

अर्थ: विवेकरहित अज्ञानी पुरुष पूर्व जन्ममें किये हुए कर्मों (पापों) के लिये तो रोष करते नहीं है और जो पुरुष क्रोधके निमित्त मिला कर उन पापकर्मोंकी निर्जरा कराता है, अर्थात् वैद्यके समान चिकित्सा करता है उसके ऊपर क्रोध करते हैं सो यह किसी प्रकार भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपने कर्मकी निर्जरा करावे वह तो वैद्यके समान उपकारी है, उसका तो उपकार मानना चाहिये, उस पर क्रोध करना बडी भारी भूल वा कृतघ्नता है ।


यः श्वभ्रान्मां समाकृष्य क्षिप्यत्यात्मानमस्तधीः ।
वधबन्धनिमित्तेऽपि कस्तस्मै विप्रियं चरेत् ॥42॥

अर्थ: जो कोई निर्बुद्धि वधबन्धनादिक उपसर्गका निमित्त मिला कर मुझे तो नरक जानेसे बचाता है अर्थात् पूर्वकर्मोंकी निर्जरा करनेका निमित्त बनता है और अपनेको नरकमें डालता है, उसके लिये कौन बुरा आचरण करें ? उसका तो उपकार मानना उचित है ।


यस्यैव कर्मणो नाशाज्जन्मदाहः प्रशाम्यति ।
तच्चेद्भुक्तिसमायातं सिद्धं तर्ह्यद्य वांछितम् ॥43॥

अर्थ: जिस कर्मके नाश होनेसे संसारका आताप नष्ट हो उस कर्मका उदय उसी कालमें भोगनेमें आ गया तो यह वांछित कार्य सिद्ध हुआ ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि कर्मका नाश तो करना ही था, सहज ही उपसर्ग आनेसे और उसके सह लेने मात्रसे निर्जरा हुई तो यह वांछित सिद्धि क्यों न हुई ? ।


अनन्तक्लेशसप्तार्चिः प्रदीप्तेयं भवाटवी ।
तत्रोत्पन्नैर्न किं सह्यस्तदुत्थो व्यसनोत्करः ॥44॥

अर्थ: यह संसाररूपी अटवी है सो अनन्त प्रकारके क्लेशरूपी अग्निसे जलती है सो उसमें उत्पन्न होनेवाले जीव क्या उस संसाररूप वनमें उत्पन्न हुए दुःखोंके समूहको नहीं सहते हैं ? अर्थात् सहते ही हैं, तब मैं यदि उपसर्गजनित अल्प दुःखोंको सह लूँगा तो फिर संसारके अनन्तदुःख नहीं होंगे; ऐसा विचार करना चाहिये ।


सम्यग्ज्ञानविवेकशून्यमनसः सिद्धान्तसूत्रद्विषो
निस्त्रिंशाः परलोकनष्टमतयो मोहानलोद्दीपिताः ।
दौर्जन्यादिकलङ्किता यदि नरा न स्युर्जगत्यां तदा
कस्मात्तीव्रतपोभिरुन्नतधियः कांक्षन्ति मोक्षश्रियम् ॥45॥

अर्थ: यदि इस जगतमें सम्यग्ज्ञान और विवेकसे शून्य चित्तवाले, सिद्धान्तशास्त्रके द्वेषी, निर्दय, परलोकको नहीं माननेवाले नास्तिक, मोहरूपी अग्निसे जलनेवाले, दुर्जनतादि कलंकसे कलंकित मनुष्य नहीं होते तो उन्नत बुद्धिवाले मुनिगण तीव्र तपस्यादिक करके मोक्षरूपी लक्ष्मीको क्यों चाहते ?


वयमिह परमात्मध्यानदत्तावधानाः
परिकलितपदार्थास्त्यक्तसंसारमार्गाः ।
यदि निकषपरीक्षासु क्षमा नो तदानीं
भजति विफलभावं सर्वथैष प्रयासः ॥46॥

अर्थ: मुनि महाराज विचार करते हैं कि इस जगतमें हम परमात्माके ध्यानमें चित्त लगानेवाले हैं, पदार्थोंके स्वरूपको जाननेवाले और संसारमार्गके त्यागी हैं, यदि हम ऐसे होकर भी उपसर्ग परीषहोंकी कसौटीसे परीक्षामें असमर्थ हो जावें अर्थात् इस समय यदि हम अपने उपशर्मभावोंकी परीक्षा नहीं करें तो हमारा मुनिधर्मके धारण करनेका समस्त प्रयास व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि जब उपसर्ग आने पर शमभाव रहे तब ही उपशमभावकी प्रशंसा होती है ।


अहो कैश्चित्कर्मानुदयगतमानीय रभसा -
दशेषं निर्द्धूतं प्रबलतपसा जन्मचकितैः ।
स्वयं यद्यायांतं तदिह मुदमालम्ब्य मनसा
न किं सह्यं धीरैरतुलसुखसिद्धेर्व्यवसितैः ॥47॥

अर्थ: अहो देखो ! अनेक मुनिगणोंने संसारसे भयभीत होकर प्रबल (तीव्र) तपादिकसे उदयमें लाकर समस्त कर्मोंको शीघ्र ही नष्ट कर दिया; वे कर्म यदि उपसर्गादिके निमित्तसे अपनी स्थिति पूरी करके स्वयं उदयमें आये हैं तो अमूल्य मोक्षसुखकी सिद्धिके लिये उद्यम करनेवाले धीर पुरुषोंको मनोभिलाषपूर्वक क्या उपसर्गादि नहीं सहने चाहिये ? अर्थात् अवश्य ही सहने चाहिये । क्योंकि जिन कर्मोंको तीव्र तप करके नष्ट करना है वे स्वयं स्थिति पूरी करके उदयमें आये हैं तो उनका फल सह लेनेसे सहजमें ही उनकी निर्जरा हो जाती हे सो यह तो उत्तम लाभ है । सो हर्षपूर्वक सहना चाहिये । तभी मोक्षसिद्धिका उद्यम सफल हो सकता है ।


कुलजातीश्वरत्वादिमदविध्वस्तबुद्धिभिः ।
सद्यः संचीयते कर्म नीचैर्गतिनिबन्धनम् ॥48॥

अर्थ: कुल, जाति, ऐश्वर्य, रूप, तप, बल, विद्या और धन इन आठ भेदोंसे जिनकी बुद्धि बिगड गई है अर्थात् मान करते हैं वे तत्काल नीच गतिके कारण कर्मको संचय करते हैं । अर्थात् कोई ऐसा समझें कि मान करनेसे मैं ऊँचा कहलाऊँगा सो इस लोकमें मानी पुरुष ऊँचे तो नहीं होते किन्तु नीच गतिको प्राप्त होते हैं ।


मानग्रन्थिर्मनस्युच्चैर्यावदास्ते दृढस्तदा ।
तावद्विवेकमाणिक्यं प्राप्तमप्यपसर्पति ॥49॥

अर्थ: हे मुने ! जब तक तेरे मनमें मानकी गाँठ अतिशय दृढ है तब तक तेरा विवेकरूपी रत्न प्राप्त हुआ भी चला जायगा, क्योंकि मानकषायके सामने हेय उपादेयका ज्ञान नहीं रहता ।


प्रोत्तुङ्गमानशैलाग्रवर्तिभिर्लुप्तबुद्धिभिः ।
क्रियते मार्गमुल्लंघ्य पूज्यपूजाव्यतिक्रमः ॥50॥

अर्थ: जो पुरुष अति ऊँचे मानपर्वतके अग्र भागमें (चोटी पर) रहते हैं वे नष्टबुद्धि हैं; ऐसे मानी समीचीन मार्गका उल्लंघन करके पूज्य पुरुषोंकी पूजा(प्रतिष्ठा)का लोप कर देते हैं।


लुप्यते मानतः पुंसां विवेकामललोचनम् ।
प्रच्यवन्ते ततः शीघ्रं शीलशैलाग्रसंक्रमात् ॥51॥

अर्थ: इस मानकषायसे पुरुषोंके भेदज्ञानरूप निर्मल लोचन (नेत्र) लोप हो जाते हैं, जिससे शीघ्र ही शीलरूपी पर्वतके शिखरके संक्रमसे (चलनेसे) डिग जाते हैं, अर्थात् शीलसे च्युत हो जाते हैं क्योंकि विवेक जब नहीं रहा तो शील कहाँ ? ।


ज्ञानरत्नमपाकृत्य गृह्णात्यज्ञानपन्नगम् ।
गुरूनपि जनो मानी विमानयति गर्वतः ॥52॥

अर्थ: मानी पुरुष गर्वसे अपने गुरुको भी अपमानित करता है सो मानो ज्ञानरूपी रत्नको दूर करके अज्ञानरूपी सर्पको ग्रहण करता है ।


करोत्युद्धतधीर्मानाद्विनयाचारलंघनम् ।
विराध्याराध्यसन्तानं स्वेच्छाचारेण वर्तते ॥53॥

अर्थ: मानसे उद्धतबुद्धि पुरुष गर्वसे विनयाचारका उल्लंघन करता है और पूज्य गुरुओंकी परिपाटी (पद्धति) को छोडकर स्वेच्छाचारसे प्रवर्त्तने लग जाता है ।


मानमालम्ब्य मूढात्मा विधत्ते कर्म निन्दितम् ।
कलङ्कयति चाशेषचरणं चन्द्रनिर्मलम् ॥54॥

अर्थ: इस मानका अवलम्बन कर मूढात्मा निंदित कार्यको करता है तथा चन्द्रमाके समान निर्मल अपने समस्त सदाचरणोंको कलंकित करता है ।


गुणरिक्तेन किं तेन मानेनार्थः प्रसिद्ध्यति ।
तन्मन्ये मानिनां मानं यल्लोकद्वयशुद्धिदम् ॥55॥

अर्थ: गुणरहित रीते मानसे कौनसे अर्थकी सिद्धि है ? वास्तवमें मानी पुरुषोंका वही मान उचित कहा जा सकता है, जो इस लोक और परलोककी शुद्धि देनेवाला हो ।


अपमानकरं कर्म येन दूरान्निषिध्यते ।
स उच्चैश्चेतसां मानः परः स्वपरघातकः ॥56॥

अर्थ: जिससे अपमान करनेवाले कार्य दूरसे ही छोड दिये जाय वही उच्चाशयवालोंका प्रशस्त मान है । इसके अतिरिक्त जो अन्य मान हैं, वे स्वपरके घातक अर्थात् अप्रशस्त हैं ।


क्व मानो नाम संसारे जन्तुव्रजविडम्बके ।
यत्र प्राणी नृपो भूत्वा विष्टामध्ये कृमिर्भवेत् ॥57॥

अर्थ: जीवमात्रकी विडंबना करनेवाले इस संसारमें मान नामका पदार्थ है ही क्या ? क्योंकि जिस संसारमें राजा भी मरकर तत्काल विष्टामें कृमि आदि कीट हो जाता है, और प्रत्यक्षमें भी देखा जाता है कि जो आज राजगद्दी पर विराजमान है वही कल राज्यरहित होकर रंक हो जाता है ।


जन्मभूमिरविद्यानामकीर्तेर्वासमन्दिरम् ।
पापपङ्कमहागर्तो निकृतिः कीर्तिता बुधैः ॥58॥

अर्थ: मायाकषाय अविद्याकी भूमि है, अपयशका घर है और पापरूपी कर्दमका बडा भारी गड्ढा है, इस प्रकार विद्वानोंने मायाका कीर्तन (कथन) किया है ।


अर्गलेवापवर्गस्य पदवी श्वभ्रवेश्मनः ।
शीलशालवने वह्निर्मायेयमवगम्यताम् ॥59॥

अर्थ: यह माया मोक्ष रोकनेको अर्गला है क्योंकि जब तक मायाशल्य रहता है तब तक मोक्षमार्गका आचरण नहीं आता और नरकरूपी घरमें प्रवेश करनेकी पदवी (द्वार) है, तथा शीलरूपी शालवृक्षके वनको दग्ध करनेके लिये अग्निसमान है, क्योंकि मायावीकी प्रकृति सदा दाहरूप रहा करती है ।


कूटद्रव्यमिवासारं स्वप्नराज्यमिवाफलम् ।
अनुष्टानं मनुष्याणां मन्ये मायावलम्बिनाम् ॥60॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि मैं मायावलम्बी पुरुषोंके अनुष्ठान-आचरणको कूटद्रव्य (नकली द्रव्य) के समान असार समझता हूँ अथवा स्वप्नमें राज्यप्राप्तिके समान निष्फल समझता हूँ, क्योंकि मायावानका आचरण सत्यार्थ नहीं होता किन्तु निष्फल होता है ।


लोकद्वयहितं केचित्तपोभिः कर्त्तुमुद्यताः ।
निकृत्या वर्त्तमानस्ते हन्त हीना न लज्जिताः ॥61॥

अर्थ: कोई पुरुष तप द्वारा उभय लोकमें अपने हितसाधनार्थ उद्यमी तो हुए हैं, परन्तु खेद है कि वे मायाचारसहित रहते हैं, सो बडे नीच हैं और निर्लज्ज हैं । ऐसा नहीं विचारते कि हम तपस्वी होकर यदि मायाचार रक्खेंगे तो लोग हमें क्या कहेंगे ? ।


मुक्तेरविप्लुतैश्चोक्ता गतिर्ऋज्वी जिनेश्वरैः ।
तत्र मायाविनां स्थातुं न स्वप्नेऽप्यस्ति योग्यता ॥62॥

अर्थ: वीतराग सर्वज्ञ भगवान्ने मुक्तिमार्गकी गति सरल कही है, उसमें मायावी जनोंके स्थिर रहनेकी योग्यता स्वप्नमें भी नहीं है ।


व्रती निःशल्य एव स्यात्सशल्यो व्रतघातकः ।
मायाशल्यं मतं साक्षात्सूरिभिर्भूरिभीतिदम् ॥63॥

अर्थ: व्रती तो निःशल्य ही होता है, शल्यसहित तो व्रतका घातक होता है और आचार्योंने मायाको साक्षात् शल्य कहा है, क्योंकि माया अतिशय भयदायक है ।


इहाकीर्तिं समादत्ते मृतो यात्येव दुर्गतिम् ।
मायाप्रपञ्चदोषेण जनोऽयं जिह्मिताशयः ॥64॥

अर्थ: इस मायाप्रपंचके दोषसे यह कुटिलाशय मनुष्य इस लोकमें तो अपयशको प्राप्त होता है और मृत्यु होने पर दुर्गतिमें ही जाता हैं ।


छाद्यमानमपि प्रायः कुकर्म स्फुटति स्वयम् ।
अलं मायाप्रपञ्चेन लोकद्वयविरोधिना ॥65॥

अर्थ: कुकर्म ढकते हुए भी प्रायः अपने आप ही प्रगट हो जाता है, इस कारण दोनों लोकोंको बिगाडनेवाले इस मायाप्रपंचसे अलं (बस) है ।


क्व मायाचरणं हीनं क्व सन्मार्गपरिग्रहः ।
नापवर्गपथि भ्रातः संचरन्तीह वञ्चकाः ॥66॥

अर्थ: मायारूप हीनाचरण तो कहाँ ! और समीचीन मार्गका ग्रहण करना कहाँ ! इनमें बडी विषमता है इस कारण आचार्य महाराज कहते हैं कि हे भाई ! मायावी ठग इस मोक्षमार्गमें कदापि नहीं विचर सकते ।


बकवृत्तिं समालम्ब्य वञ्चकैर्वञ्चितं जगत् ।
कौटिल्यकुशलैः पापैः प्रसन्नं कश्मलाशयैः ॥67॥

अर्थ: कुटिलतामें चतुर ऐसे मलिनचित्त पापी ठग बगलेके ध्यानकीसी वृत्ति (क्रिया) का आलम्बन कर इस जगतको ठगते रहते हैं ।


नयन्ति विफलं जन्म प्रयासैर्मृत्युगोचरैः ।
वराकाः प्राणिनोऽजस्रं लोभादप्राप्तवाञ्छिताः ॥68॥

अर्थ: पामर प्राणी निरन्तर लोभकषायके वशीभूत होकर वांछित फलको नहीं पाते हुए मृत्युका सामना करनेवाले अनेक उपायोंको करके अपने जन्मको व्यर्थ ही नष्ट कर देते हैं ।


शाकेनापीच्छया जातु न भर्तुमुदरं क्षमाः ।
लोभात्तथाऽपि वाञ्छन्ति नराश्चक्रेश्वरश्रियम् ॥69॥

अर्थ: अनेक मनुष्य यद्यपि अपनी इच्छासे शाकसे भी पेट भरनेको कभी समर्थ नहीं होते, तथापि लोभके वशसे चक्रवर्तीकीसी सम्पदाको वांछते हैं ।


स्वामिगुरुबन्धुवृद्धानबलाबालांश्च जीर्णदीनादीन् ।
व्यापाद्य विगतशङ्को लोभार्तो वित्तमादत्ते ॥70॥

अर्थ: इस लोभकषायसे पीडित हुआ पुरुष अपने मालिक, गुरु, बन्धु (हितैषी), वृद्ध, स्त्री, बालक तथा क्षीण, दुर्बल, अनाथ, दीनादिकोंको भी निःशंकतासे मारकर धनको ग्रहण करता है अर्थात् लोभ ऐसा अनर्थ कराता है ।


ये केचित्सिद्धान्ते दोषाः श्वभ्रस्य साधकाः प्रोक्ताः ।
प्रभवन्ति निर्विचारं ते लोभादेव जन्तूनाम् ॥71॥

अर्थ: नरकको ले जानेवाले जो दोष सिद्धान्तशास्त्रमें कहे गये हैं वे सब जीवोंके निःशंकतया लोभसे ही प्रगट होते हैं ।


शमाम्बुभिः क्रोधशिखी निवार्यताम् नियम्यतां मानमुदारमार्दवैः ।
इयं च मायाऽऽर्जवतः प्रतिक्षणं निरीहतां चाश्रय लोभशान्तये ॥72॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू शान्तभावरूप जलसे तो क्रोधरूपी अग्नि निवारण कर और उदार मार्दव अर्थात् कोमल परिणामोंसे मान (मानरूप हाथी) को नियन्त्रित (वश) कर तथा मायाको निरन्तर आर्जवसे दूर कर और लोभकी शांतिके लिये निर्लोभताका आश्रय कर । इस प्रकार चारों कषायोंको दूर करनेका उपदेश है ।


यत्र यत्र प्रसूयन्ते तव क्रोधादयो द्विषः ।
तत्तत्प्रागेव मोक्तव्यं वस्तु तत्सूतिशान्तये ॥73॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तेरे जिस जिस पदार्थमें क्रोधादिक शत्रु उत्पन्न होते हैं, वही वही वस्तु उन क्रोधादिकी शांतिके लिये प्रथमसे ही त्याग देनी चाहिये । इस प्रकार कषायोंके बाह्य कारणोंके त्यागका उपदेश है ।


येन येन निवार्यन्ते क्रोधाद्याः परिपन्थिनः ।
स्वीकार्यमप्रमत्तेन तत्तत्कर्म मनीषिणा ॥74॥

अर्थ: तथा जिस जिस कार्यके करनेसे क्रोधादिक शत्रुओंका निवारण हो, बुद्धिमानको वह-वह कार्य निरालस्य हो स्वीकार करना चाहिये ।


गुणाधिकतया मन्ये स योगी गुणिनां गुरुः ।
तन्निमित्तेऽपि नाक्षिप्तं क्रोधाद्यैर्यस्य मानसं ॥75॥

अर्थ: जिस मुनिका मन क्रोधादिक कषायोंके निमित्त मिलनेपर भी क्रोधादिकसे विक्षिप्त न हो अर्थात् जिसके क्रोधादिक उत्पन्न न हों वही गुणाधिकतासे योगी व गुणीजनोंका गुरु है ऐसा मैं मानता हूँ। यहाँ क्रोधादिकका कारण मिलने पर भी जिनके क्रोधादिक न हो उनकी प्रशंसा की गई हैं ।


यदि क्रोधादयः क्षीणास्तदा किं खिद्यते वृथा ।
तपोभिरथ तिष्टन्ति तपस्तत्राप्यपार्थकम् ॥76॥

अर्थ: हे मुने ! यदि तेरे क्रोधादिक कषाय क्षीण हो गये तो तप करके खेद करना व्यर्थ है, क्योंकि क्रोधादिकका जीतना ही तप है; और यदि क्रोधादिक तेरे तिष्ठते हैं तो भी तप करना व्यर्थ है क्योंकि कषायीका तप करना व्यर्थ ही होता है ।


स्वसंवित्तिं समायाति यमिनां तत्त्वमुत्तमम् ।
आसमन्ताच्छमं नीते कषायविषमज्वरे ॥77॥

अर्थ: संयमी मुनियोंके कषायरूपी विषमज्वरके सर्व प्रकारसे उपशमताको प्राप्त होने पर उत्तम तत्त्व (परमात्माका स्वरूप) स्वसंवेदनताको प्राप्त होता है ।

सर्ग 20: इन्द्रियजय का उपदेश (श्लोक 1 से 38)

अजिताक्षः कषायाग्निं विनेतुं न प्रभुर्भवेत् ।
अतः क्रोधादिकं जेतुमक्षरोधः प्रशस्यते ॥1॥

अर्थ: जिसने इन्द्रियोंको नहीं जीता, वह कषायरूपी अग्निका निर्वाण करनेमें असमर्थ है; इस कारण क्रोधादिकको जीतनेके लिये इन्द्रियोंके विषयका रोध करना प्रशंसनीय कहा जाता है ।


विषयाशाभिभूतस्य विक्रियन्तेऽक्षदन्तिनः ।
पुनस्त एव दृश्यन्ते क्रोधादिगहनं श्रिताः ॥2॥

अर्थ: जो पुरुष इन्द्रियोंके विषयोंकी आशासे पीडित हैं, उनके इन्द्रियरूपी हस्ती विकारताको (मन्दोन्मत्तताको) प्राप्त हो जाते हैं, फिर वे ही पुरुष क्रोधादिक कषायोंकी गहनताके आश्रित हुए देखे जाते हैं ।


इदमक्षकुलं धत्ते मदोद्रेकं यथा यथा ।
कषायदहनः पुंसां विसर्पति तथा तथा ॥3॥

अर्थ: इन्द्रियोंका समूह जैसे-जैसे मदकी उत्कटताको धारण करता है वैसे-वैसे पुरुषोंके कषायरूप अग्नि विस्तृत होती जाती है ।


कषायवैरिव्रजनिर्जयं यमी करोतु पूर्वं यदि संवृतेन्द्रियः ।
किलानयोर्निग्रहलक्षणो विधिर्न हि क्रमेणात्र बुधैर्विधीयते ॥4॥

अर्थ: संयमी मुनि यदि जितेन्द्रिय हैं तो पहिले कषायरूपी शत्रुओंके समूहका जय करो, क्योंकि पंडितोंने उन दोनों (कषाय और इन्द्रियों) के निग्रह करनेकी विधिका किसी क्रमसे विधान नहीं किया है कि पहले एकको जीतें और फिर दूसरेको जीतें ।


यदक्षविषयोद्भूतं दुःखमेव न तत्सुखम् ।
अनन्तजन्मसन्तानक्लेशसंपादकं यतः ॥5॥

अर्थ: इन्द्रियोंके विषयसेवनसे जो सुख हुआ है वह दुःख ही है, क्योंकि यह इन्द्रियजनित सुख अनन्त संसारकी संततिके क्लेशोंको संपादन करनेका कारण है, और विद्वानोंने दुःख तथा दुःखके कारणको एक ही कहा है ।


दुर्दमेन्द्रियमातङ्गाशीलशाले नियन्त्रय ।
धीर विज्ञानपाशेन विकुर्वन्तो यदृच्छया ॥6॥

अर्थ: हे धीर वीर पुरुष ! स्वतन्त्रतासे विकारको करते हुए इन दुर्दम इन्द्रियरूपी हस्तियोंको शीलरूपी शालके वृक्षमें विज्ञानरूपी रस्सेसे दृढतासे बाँध । क्योंकि शील ही अर्थात् ब्रह्मचर्य और विज्ञान ही इनके वश करनेका एकमात्र उपाय है ।


हृषीकभीमभोगीन्द्रक्रुद्धदर्पोपशान्तये ।
स्मरन्ति वीरनिर्दिष्टं योगिनः परमाक्षरम् ॥7॥

अर्थ: इन्द्रियरूपी भयानक सर्पोके क्रोधकी शान्तिके लिये योगीगण श्री वर्द्धमान तीर्थंकर भगवानके उपदेश किये हुए परमाक्षर (परमेष्ठीके नाममंत्र) को स्मरण करते हैं ।


निरुध्य बोधपाशेन क्षिप्ता वैराग्यपञ्जरे ।
हृषीकहरयो येन स मुनीनां महेश्वरः ॥8॥

अर्थ: जिस मुनिने इन्द्रियरूपी बंदरोंको ज्ञानरूपी फाँसीसे बाँध कर वैराग्यके पींजरेमें बंद कर दिया वह मुनि ही मुनियोंमें महेश्वर (मुनीश्वर) है ।


हृदि स्फुरति तस्योच्चैर्बोधिरत्नं सुनिर्मलम् ।
शीलशालो न यस्याक्षदन्तिभिः प्रविदारितः ॥9॥

अर्थ: जिस मुनिका शीलरूपी शाल (हस्तिशाला) वा वृक्ष इन्द्रियरूपी हस्तियोंने नहीं विदारा अर्थात् नहीं तोडा उस मुनिके हृदयमें ही अति पवित्र बोधिरूपी रत्न उत्तमतासे स्फुरित (प्रकाशित) होता है ।


दुःखमेवाक्षजं सौख्यमविद्याव्याललालितम् ।
मूर्खास्तत्रैव रज्यन्ते न विद्मः केन हेतुना ॥10॥

अर्थ: इस जगतमें इन्द्रियजनित सुख ही दुःख है, क्योंकि यह सुख अविद्यारूप सर्पसे लालित है; परन्तु मूढजन इसीमें ही रंजायमान रहते हैं; सो हम नहीं जानते कि इसमें क्या कारण है ? ।


यथा यथा हृषीकाणि स्ववशं यान्ति देहिनाम् ।
तथा तथा स्फुरत्युच्चैर्हृदि विज्ञानभास्करः ॥11॥

अर्थ: जीवोंके इन्द्रियाँ जैसे-जैसे वश होती है, वैसे-वैसे उनके हृदयमें विज्ञानरूपी सूर्य उच्चतासे (उत्तमतासे) प्रकाशमान होता है ।


विषयेषु यथा चित्तं जन्तोर्मग्नमनाकुलम् ।
तथा यद्यात्मनस्तत्त्वे सद्यः को न शिवीभवेत् ॥12॥

अर्थ: जिस प्रकार जीवोंका चित्त विषयसेवनमें निराकुलरूप तल्लीन होता है, उस प्रकार यदि आत्मतत्त्वमें लीन हो जाय तो ऐसा कौन है जो मोक्षस्वरूप न हो ? ।


अतृप्तिजनकं मोहदाववह्नेर्महेन्धनम् ।
असातसन्ततेर्बीजमक्षसौख्यं जगुर्जिनाः ॥13॥

अर्थ: इस इन्द्रियजनित सुखको जिनेन्द्र भगवानने तृप्तिका उत्पन्न करनेवाला नहीं कहा है । क्योंकि जैसे-जैसे यह सेवन किया जाता है, वैसे-वैसे भोगलालसा बढती जाती है । तथा यह इन्द्रिय-जनित सुख मोहरूपी दावानलकी वृद्धि करनेके लिये ईन्धनके समान है, और आगामी कालमें दुःखकी सन्ततिका बीज (कारण) है ।


नरकस्यैव सोपानं पाथेयं वा तदध्वनि ।
अपवर्गपुरद्वारकपाटयुगलं दृढम् ॥14॥

अर्थ: यह इन्द्रियोंके विषयसे उत्पन्न हुआ सुख नरकका तो सोपान (सीढी, जीना) है; अर्थात् नरकका स्थान पृथ्वीसे नीचे है सो उसमें उतरनेकी सीढी विषयसुख ही है, और उस नरकके मार्गमें चलनेके लिये पाथेय (राहखर्च वगैरह) भी यही है तथा मोक्षनगरके द्वार बंद करनेको दृढ कपाटयुगल (किवाडोंकी जोडी) भी है तथा यह सुख विघ्नोंका बीज, विपत्तिका मूल, पराधीन, भयका स्थान तथा इन्द्रियोंसे ही ग्रहण करने योग्य है, यदि इन्द्रियाँ बिगड जाय तो फिर इसकी प्राप्ति नहीं होती । इस प्रकारका यह इन्द्रियजनित सुख है ॥१४-१५॥


विघ्नबीजं विपन्मूलमन्यापेक्षं भयास्पदम् ।
करणग्राह्यमेतद्धि यदक्षार्थोत्थितं सुखम् ॥15॥

अर्थ: यह इन्द्रियोंके विषयसे उत्पन्न हुआ सुख नरकका तो सोपान (सीढी, जीना) है; अर्थात् नरकका स्थान पृथ्वीसे नीचे है सो उसमें उतरनेकी सीढी विषयसुख ही है, और उस नरकके मार्गमें चलनेके लिये पाथेय (राहखर्च वगैरह) भी यही है तथा मोक्षनगरके द्वार बंद करनेको दृढ कपाटयुगल (किवाडोंकी जोडी) भी है तथा यह सुख विघ्नोंका बीज, विपत्तिका मूल, पराधीन, भयका स्थान तथा इन्द्रियोंसे ही ग्रहण करने योग्य है, यदि इन्द्रियाँ बिगड जाय तो फिर इसकी प्राप्ति नहीं होती । इस प्रकारका यह इन्द्रियजनित सुख है ॥१४-१५॥


जगद्वञ्चनचातुर्यं विषयाणां न केवलम् ।
नरान्नरकपाताले नेतुमप्यतिकौशलम् ॥16॥

अर्थ: इन विषयोमें केवल जगतको ठगनेकी ही चतुराई नहीं है, किन्तु मनुष्योंको नरकके निम्न भागमें (सातवें नरकमें) ले जानेकी भी प्रवीणता है ।


निसर्गचपलैश्चित्रैविषयैर्वञ्चितं जगत् ।
प्रत्याशा निर्दयेष्वेषु कीदृशी पुण्यकर्मणाम् ॥17॥

अर्थ: स्वभावसे चंचल नाना प्रकारके इन विषयोंने जगत्को ठगा तो फिर इन निर्दय स्वरूप विषयोंमें पवित्राचरणवालोंको आशा ही कैसी ?


वर्द्धते गृद्धिरश्रान्तं सन्तोषश्चापसर्पति ।
विवेको विलयं याति विषयैर्वञ्चितात्मनाम् ॥18॥

अर्थ: जिनका आत्मा इन विषयोंसे ठगा गया है अर्थात् विषयोंमें मग्न हो गया है उनकी विषयेच्छा तो बढ जाती है और सन्तोष नष्ट हो जाता है तथा विवेक भी विलीन हो जाता है ।


विषस्य कालकूटस्य विषयाख्यस्य चान्तरम् ।
वदन्ति ज्ञाततत्त्वार्थाः मेरुसर्षपयोरिव ॥19॥

अर्थ: वस्तुस्वरूपके जाननेवाले विद्वानोंने कालकूट (हलाहल) विष और विषयोंमें मेरु पर्वत और सरसोंके समान अन्तर कहा है, अर्थात् कालकूट विष तो सरसोंके समान छोटा है और विषयविष सुमेरु पर्वतके समान है ।


अनासादितनिर्वेदं विषयैर्व्याकुलीकृतम् ।
पतत्येव जगज्जन्मदुर्गे दुःखाग्निदीपिते ॥20॥

अर्थ: इस जगतनें कभी विरागताको नहीं पाया इस कारण इसे विषयोंने व्याकुल (दुःखी) कर दिया है और यह दुःखरूपी अग्निसे प्रज्वलित हुए इस संसाररूपी दुर्गमें (जेलखानेमें) पडता है ।


इन्द्रियाणि न गुप्तानि नाभ्यस्तश्चित्तनिर्जयः ।
न निर्वेदः कृतो मित्र नात्मा दुःखेन भावितः ॥21॥

अर्थ: हे मित्र ! अनेक मूर्ख ऐसे हैं कि जिन्होंने इन्द्रियोंको कभी वश नहीं किया, चित्तको जीतनेका कभी अभ्यास नहीं किया और न कभी वैराग्यको प्राप्त हुए तथा न कभी आत्माको दुःखी ही समझा और वृथा ही मोक्षप्राप्तिके लिये ध्यानसाधनमें प्रवृत्त हो गये । उन्होंने अपने आत्माको ठग लिया और वे इस लोक और परलोक दोनोंसे ही भ्रष्ट हो गये ।


एवमेवापवर्गाय प्रवृत्तैर्ध्यानसाधने ।
स्वमेव वञ्चितं मूढैर्लोकद्वयपथच्युतैः ॥22॥

अर्थ: हे मित्र ! अनेक मूर्ख ऐसे हैं कि जिन्होंने इन्द्रियोंको कभी वश नहीं किया, चित्तको जीतनेका कभी अभ्यास नहीं किया और न कभी वैराग्यको प्राप्त हुए तथा न कभी आत्माको दुःखी ही समझा और वृथा ही मोक्षप्राप्तिके लिये ध्यानसाधनमें प्रवृत्त हो गये । उन्होंने अपने आत्माको ठग लिया और वे इस लोक और परलोक दोनोंसे ही भ्रष्ट हो गये ।


अध्यात्मजं यदत्यक्षं स्वसंवेद्यमनश्वरम् ।
आत्माधीनं निराबाधमनन्तं योगिनां मतम् ॥23॥

अर्थ: योगियोंका अध्यात्मसे उत्पन्न अतीन्द्रिय सुख आत्माके (अपने) ही आधीन है अर्थात् स्वयं ही उत्पन्न हुआ है; किन्तु इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंसे नहीं हुआ है, तथा आत्मासे ही जानने (भोगने) योग्य है अर्थात् स्वानुभवगम्य है और अविनाशी है, अर्थात् इन्द्रियजनित सुखके समान विनाशी नहीं है, स्वाधीन है, व बाधारहित है अर्थात् जिसमें कुछ भी बिगाड वा विघ्न नहीं होता, तथा अनन्त अर्थात् अन्तरहित है। जो कोई यह समझते हैं कि इन्द्रियोंके विना सुख कैसा ? उनको यह अतीन्द्रिय सुखका स्वरूप बतलाया गया है ।


अपास्य करणग्रामं यदात्मन्यात्मना स्वयम् ।
सेव्यते योगिभिस्तद्धि सुखमाध्यात्मिकं मतम् ॥24॥

अर्थ: जो इन्द्रियोंके विषयोंके विना ही अपने आत्मामें आत्मासे ही सेवन करनेमें आता है उसको ही योगीश्वरोंने आध्यात्मिक सुख कहा है ।


आपातमात्ररम्याणि विषयोत्थानि देहिनाम् ।
विषपाकानि पर्यन्ते विद्धि सौख्यानि सर्वथा ॥25॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जीवोंके विषयजनित सुख कैसे हैं कि सेवनके आरंभमात्रमें तो कुछ रम्य भासते हैं परन्तु विपाकसमयमें सर्वथा विषके समान ही जानो ।


हृषीकतस्करानीकं चित्तदुर्गान्तराश्रितम् ।
पुंसां विवेकमाणिक्यं हरत्येवानिवारितम् ॥26॥

अर्थ: यह इन्द्रियरूपी चोरोंकी सेना (फौज) चित्तरूपी दुर्ग (किले) के आश्रयमें रहती है, जो पुरुषोंके विवेकरूपी रत्नको हरती है अर्थात् चुराती है और रोकी भी नहीं रुकती है ।


त्वामेव वञ्चितुं मन्ये प्रवृत्ता विषया इमे ।
स्थिरीकुरु तथा चित्तं यथैतैर्न कलङ्क्यते ॥27॥

अर्थ: हे आत्मन् ! ये इन्द्रियोंके विषय तुझको ही ठगनेके लिये प्रवृत्त हुए हैं ऐसा मैं मानता हूँ; इस कारण चित्तको ऐसा स्थिर कर कि जिस प्रकार उन विषयोंसे कलङ्कित न हो ।


उदधिरुदकपूरैरिन्धनैश्चित्रभानु -
र्यदि कथमपि दैवात्तृप्तिमासादयेताम् ।
न पुनरिह शरीरी कामभोगैर्विसंख्यै -
श्चिरतरमपि भुक्तैस्तृप्तिमायाति कैश्चित् ॥28॥

अर्थ: इस जगतमें समुद्र तो जलके प्रवाहोंसे (नदियोंके मिलनेसे) तृप्त नहीं होता और अग्नि ईन्धनोंसे तृप्त नहीं होती, सो कदाचित् दैवयोगसे किसी प्रकार ये दोनों तृप्त हो भी जाय परन्तु यह जीव चिरकालपर्यन्त नाना प्रकारके कामभोगादिके भोगनेपर भी कभी तृप्त नहीं होता ।


यद्यपि दुर्गतिबीजं तृष्णासन्तापपापसंकलितम् ।
तदपि न सुखसंप्राप्यं विषयसुखं वाञ्छितं नृणाम् ॥29॥

अर्थ: यद्यपि विषयजनित सुख दुर्गतिका बीजभूत कारण है और तृष्णा-सन्तापादि सहित है तथापि यह सुख विना कष्टके इच्छानुसार मनुष्योंको प्राप्त होना कठिन है ।


अपि संकल्पिताः कामाः संभवन्ति यथा यथा ।
तथा तथा मनुष्याणां तृष्णा विश्वं विसर्पति ॥30॥

अर्थ: मनुष्योंको जैसे-जैसे इच्छानुसार संकल्पित भोगोंकी प्राप्ति होती है वैसे-वैसे ही इनकी तृष्णा उत्तरोत्तर बढती हुई समस्त लोकपर्यन्त विस्तारताको प्राप्त होती है ।


अनिषिध्याक्षसंदोहं यः साक्षान्मोक्तुमिच्छति ।
विदारयति दुर्बुद्धिः शिरसा स महीधरम् ॥31॥

अर्थ: जो पुरुष इन्द्रियसमूहको वश नहीं करके साक्षात् मोक्ष (कर्मरहित) होना चाहता है वह दुर्बुद्धि अपने मस्तककी टक्कर लगाकर पर्वतको तोडना चाहता है । ऐसी अवस्थामें उसका मस्तक ही फूटेगा, पर्वत तो किसी प्रकार तूटेगा ही नहीं ।


इदमिह विषयोत्थं यत्सुखं तद्धि दुःखं
व्यसनविपिनबीजं तीव्रसंतापविद्धम् ।
कटुतरपरिपाकं निन्दितं ज्ञानवृद्धैः
परिहर किमिहान्यैर्धूर्त्तवाचां प्रपञ्चैः ॥32॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस जगतमें विषयजनित जो सुख है सो वास्तवमें दुःख ही है, क्योंकि यह कष्ट अर्थात् आपदारूपी वृक्षोंका तो बीज है और तीव्र संतापोंसे विंधा हुआ है तथा जिसका परिपाक (फल) अतिशय कटु है और जो ज्ञानसे वृद्ध विद्वानोंके द्वारा निंदनीय है, इस कारण हे भाई ! इसको छोड, धूर्तोंके प्रपंचवाक्योंके माननेसे क्या लाभ ? ।


तत्तत्कारकपारतन्त्र्यमचिरान्नाशः सतृष्णान्वयै-
स्तैरेभिर्निरुपाधिसंयमभृतो बाधानिदानैः परैः ।
शर्मभ्यः स्पृहयन्ति हन्त विषयानाश्रित्य यद्देहिन-
स्तत्क्रुध्यत्फणिनायकाग्रदशनैः कण्डूविनोदः स्फुटम् ॥33॥

अर्थ: यद्यपि विषयजनित पूर्वोक्त सुखको दुःख ही कहा है, सो ठीक भी है, क्योंकि उस सुखको कारकोंकी पराधीनता है अर्थात् वह सुख अन्यके द्वारा होता है, और तत्काल नाशवान् भी है; तथापि ये संसारी जीव उपाधिरहित संयमके धारक होनेपर भी तृष्णाके साथ संबंध करते हुए बाधाके कारण ऐसे, अन्य धनादिकोंके द्वारा सुखके लिये विषयोंकी इच्छा करते हैं सो क्या करते हैं कि मानों क्रोधायमान नागेन्द्रके अगले दाँतोंसे (विषके दाँतोंसे) खुजलानेका साक्षात् विनोद ही करते हैं ।


निःशेषाभिमतेन्द्रियार्थरचनासौन्दर्यसंदानितः
प्रीतिप्रस्तुतलोभलंघितमनाः को नाम निर्वेद्यताम् ।
अस्माकं तु नितान्तघोरनरकज्वालाकलापः पुरः
सोढव्यः कथमित्यसौ तु महती चिन्ता मनः कृन्तति ॥34॥

अर्थ: अहो ! खेद है कि समस्त मनोवांछित इन्द्रियोंके विषयोंकी रचनाके सौंदर्यसे जिसका मन बँधा हुआ है तथा प्रीतिके प्रस्ताव (चक्र) में आनेसे लोभसे खंडित हो गया है मन जिसका ऐसे जीवोंमेंसे कौन ऐसा है जो विषयोंसे उदासीन होनेके लिये तत्पर हो ? यहाँ आचार्य महाराज कहते हैं कि ये संसारी जीव विषयोंसे विरक्त तो नहीं होते परन्तु इन विषयोंसे उत्पन्न हुए अतिशयरूप तीव्र नरकाग्निकी ज्वालाके समूहको भविष्यत्में कैसे सहेंगे ? यही महाचिंता हमारे मनको दुःखित कर रही है ।


मीना मृत्युं प्रयाता रसनवशमिता दन्तिनः स्पर्शरुद्धाः
बद्धास्ते वारिबन्धे ज्वलनमुपगताः पत्रिणश्चाक्षिदोषात् ।
भृङ्गाः गन्धोद्धताशाः प्रलयमुपगताः गीतलोलाः कुरङ्गाः
कालव्यालेन दष्टास्तदपि तनुभृतामिन्द्रियार्थेषु रागः ॥35॥

अर्थ: अरे देखो ! रसना इन्द्रियके वश तो मत्स्य (मछलियाँ) हैं वे अपने गलेको छिदा कर मृत्युको प्राप्त हुए, और हस्ती स्पर्श इन्द्रियके वशीभूत हो गड्ढेमें बाँधे गये तथा नेत्र इन्द्रियके विषयदोषसे पतंग (छोटे-छोटे जीव) दीपकादिकी ज्वालामें जल कर मरणको प्राप्त हुए और भ्रमर नासिका इन्द्रियके वशीभूत होकर सुगन्धसे मुग्ध हो नाशको प्राप्त हुए, इसी प्रकार हरिण भी गीत (राग) के लोलुप हो कर्ण इन्द्रियके विषयसे कालरूप सर्पसे मारे गये; ऐसे एक-एक इन्द्रियके विषयसे उक्त जीव नष्ट होते देखते हैं तो भी संसारी जीवोंकी इन्द्रियविषयोंमें प्रीति (अनुराग) होती है सो यह बडा खेद अथवा आश्चर्य है ।


एकैककरणपरवशमपि मृत्युं याति जन्तुजातमिदम् ।
सकलाक्षविषयलोलः कथमिह कुशली जनोऽन्यः स्यात् ॥36॥

अर्थ: जो यह पूर्वोक्त एक-एक इन्द्रियके वश हुआ जीवोंका समूह मरणको प्राप्त हुआ तो जो अन्य प्राणी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं उसका भला किस प्रकार हो सकता है, अर्थात् वह किस प्रकार सुखी हो सकता है ? ।


संवृणोत्यक्षसैन्यं यः कूर्मोऽङ्गानीव संयमी ।
स लोके दोषपङ्काढ्ये चरन्नपि न लिप्यते ॥37॥

अर्थ: जिस प्रकार कछुआ अपने अंगोको संकोचता है उसी प्रकार जो संयमी मुनि इंद्रियोंके सेनासमूहको संवररूप करता है अर्थात् संकोचता वा वशीभूत करता है वही मुनि दोषरूपी कर्दमसे भरे इस लोकमें विचरता हुआ भी दोषोंसे लिप्त नहीं होता ।


अयत्नेनापि जायन्ते तस्यैता दिव्यसिद्धयः ।
विषयैर्न मनो यस्य मनागपि कलङ्कितम् ॥38॥

अर्थ: जिस मुनिका मन इन्द्रियोंके विषयोसे किंचिन्मात्र भी कलंकित नहीं होता उस मुनिके जो दिव्य सिद्धियाँ आगे कही जायेंगी वे बिना यत्नके ही उत्पन्न होती हैं ।

सर्ग 21: त्रितत्त्व वर्णन (श्लोक 1 से 27)

अयमात्मा स्वयं साक्षाद्गुणरत्नमहार्णवः ।
सर्वज्ञः सर्वदृक् सार्वः परमेष्ठी निरञ्जनः ॥1॥

अर्थ: यह आत्मा स्वयं साक्षात् गुणरूपी रत्नोंका भरा हुआ समुद्र है तथा यही आत्मा सर्वज्ञ है, सर्वदर्शी है, सबके हितरूप है, समस्त पदार्थोमें व्याप्त है, परमेष्ठी (परमपदमें स्थित) है और निरंजन है अर्थात् जिसके किसी प्रकारकी कालिमा नहीं है । शुद्ध नयका विषयभूत आत्मा ऐसा ही है ।


तत्स्वरूपमजानानो जनोऽयं विधिवञ्चितः ।
विषयेषु सुखं वेत्ति यत्स्यात्पाके विषान्नवत् ॥2॥

अर्थ: उस आत्माके स्वरूपको नहीं जानता हुआ यह मनुष्य कर्मोसे वंचित हो इन्द्रियोंके विषयोंमें सुख जानता है सो बडी भूल है क्योंकि इन्द्रियोंका विषय विपाकसमयमें विषमिश्रित अन्नके समान होता है ।


यत्सुखं वीतरागस्य मुनेः प्रशमपूर्वकम् ।
न तस्यानन्तभागोऽपि प्राप्यते त्रिदशेश्वरैः ॥3॥

अर्थ: जो सुख वीतराग मुनिके प्रशमरूप (मंदकषायरूप) विशुद्धतापूर्वक है उसका अनन्तवाँ भाग भी इन्द्रको प्राप्त नहीं है ।


अनन्तबोधवीर्यादिनिर्मला गुणिभिर्गुणाः ।
स्वस्मिन्नेव स्वयं मृग्या अपास्य करणान्तरम् ॥4॥

अर्थ: अनन्त ज्ञान, अनन्त वीर्यादि गुण गुणी पुरुषोंके द्वारा अपने आत्मामें ही अन्य इन्द्रियादिकी सहायताको छोड अपने आप ही खोजने चाहिए ।


अहो अनन्तवीर्योऽयमात्मा विश्वप्रकाशकः ।
त्रैलोक्यं चालयत्येव ध्यानशक्तिप्रभावतः ॥5॥

अर्थ: अहो देखो, यह आत्मा अनन्त वीर्यवान् है तथा समस्त वस्तुओंको प्रकाशित करनेवाला है तथा ध्यानशक्तिके प्रभावसे तीनों लोकोंको भी चलायमान कर सकता है ।


अस्य वीर्यमहं मन्ये योगिनामप्यगोचरम् ।
यत्समाधिप्रयोगेण स्फुरत्यव्याहतं क्षणे ॥6॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि इस आत्माकी शक्तिको मैं ऐसा समझता हूँ कि वह योगियोंके भी अगोचर है, क्योंकि वह समाधि ध्यानमें लय स्वरूपके प्रयोगसे क्षणमात्रमें अव्याहत प्रकाश होती है ।


अयमात्मा स्वयं साक्षात्परमात्मेति निश्चयः ।
विशुद्धध्याननिर्धूत-कर्मेन्धनसमुत्करः ॥7॥

अर्थ: जिस समय विशुद्ध ध्यानके बलसे कर्मरूपी ईन्धनोंको भस्म कर देता है उस समय यह आत्मा ही स्वयं साक्षात्परमात्मा हो जाता है; यह निश्चय है ।


ध्यानादेव गुणग्राममस्याशेषं स्फुटी भवेत् ।
क्षीयते च तथानादिसंभवा कर्मसन्ततिः ॥8॥

अर्थ: इस आत्माके गुणोंका समस्त समूह ध्यानसे ही प्रगट होता है तथा ध्यानसे ही अनादिकालकी संचित की हुई कर्मसन्तति नष्ट होती है ।


शिवोऽयं वैनतेयश्च स्मरश्चात्मैव कीर्त्तितः ।
अणिमादिगुणानर्घ्यरत्नवार्धिर्बुधैर्मतः ॥9॥

अर्थ: विद्वानोंने इस आत्माको ही शिव, गरुड और काम कहा है, क्योंकि यह आत्मा ही अणिमा महिमादि अनर्घ्य (अमूल्य) गुणरूपी रत्नोंका समुद्र है ।


यथान्तर्बहिर्भूतनिजनिजानन्दसन्दोहसंपाद्यमानद्रव्यादिचतुष्कसकलसामग्रीस्वभावप्रभा-
वात्परिस्फुरितरत्नत्रयातिशयसमुल्लसितस्वशक्तिनिराकृतसकलतदावरणप्रादुर्भूतशुक्लध्यानानल-
बहुलज्वालाकलापकवलितगहनान्तरालादिसकलजीवप्रदेशघनघटितसंसारकारणज्ञानावरणादि-
द्रव्यभावबन्धनविश्लेषस्ततो युगपत्प्रादुर्भूतानन्तचतुष्टयो घनपटलविगमे सवितुः प्रतापप्रकाशाभि-
व्यक्तिवत् स खल्वयमात्मैव परमात्मव्यपदेशभाग्भवतीति शिवतत्त्वम् ॥10॥

अर्थ: यथा जैसी चाहिए वैसी, अन्तरंग और बहिर्भूत, तथा निज (अपनी) निजानन्दसन्दोह अर्थात् अपने आनन्द स्वरूप विशुद्धता सहित परिणामोंके समूहसे संपाद्यमान - अर्थात् उत्पन्न की हुई वा प्राप्त की हुई द्रव्यक्षेत्रकालभावके चतुष्कस्वरूप समस्त सामग्रीरूप स्वभावके प्रभावसे प्रगट हुआ जो सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप रत्नत्रय उसके अतिशयसे (प्रकर्ष) उल्लासरूप हुई (उदयरूप हुई) अपनी शक्तिसे निराकरण किया हुआ तदावरण मोहकर्मका उदय, उससे प्रगट हुई शुक्लध्यानरूप अग्निकी ज्वालाके पृथक्त्ववितर्क-वीचार आदि भेदरूप विशुद्धताके समूहसे ग्रसीभूत किये हैं सघन और अंतरालवर्ती अनादिकालके जीवके प्रदेशोंमें समूहरूप ठहरे हुए संसारके कारणस्वरूप ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म भावकर्मके बंधनके विशेष जिसने ऐसा, तत्पश्चात् प्रगट हुआ है युगपत् (एक ही कालमें) अनन्त ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्यरूप चतुष्टय जिसके ऐसा, जैसे मेघपटलोंके दूर होनेसे सूर्यका प्रताप और प्रकाश युगपत् (एक साथ) प्रकट होता है उसी प्रकार प्रकट हुआ आत्मा ही निश्चय करके परमात्माके व्यपदेश (नाम) का धारक होता है ।


अविरलमरीचिमञ्जरीपुञ्जपिञ्जरितभासुरतरशिरोमणिमण्डलीसहस्रमण्डितविकटतरफूत्कार-
मारुतपरंपरोत्पातप्रेङ्खोलितकुलाचलसंमिलितशिखिशिखासन्तापद्रवत्काञ्चनकान्तिकपिशनिज-
कायकान्तिच्छटापटलजटिलितदिग्वलयक्षत्रियभुजङ्गपुङ्गवद्वितयपरिक्षिप्तक्षितिबीजविसृष्टप्रकट-
पविपञ्जरपिनद्धसवनगिरिचतुरस्रमेदिनीमण्डलावलम्बनगजपतिपृष्ठप्रतिष्ठितपरिकलितकुलि-
शकरशचीप्रमुखविलासिनीशृङ्गारदर्शनोल्लसितलोचनसहस्रश्रीत्रिदशपतिमुद्रालंकृतसमस्त-
भुवनावलम्बिसुनासीर-परिकलितजानुद्वयः । इति पृथ्वीतत्त्वम् ॥11॥

अर्थ: प्रचुर अविच्छेदरूप किरणोंकी लताओंके समूहसे पीतवर्ण देदीप्यमान (चमकते हुए) मस्तकमणियोंकी सहस्र मंडलियोंसे मंडित और अतिशय विकट निकलते हुए फूत्काररूप पवनकी परंपरा (पंक्तिरूप परिपाटी) के पडनेसे द्रवते हुए सुवर्णकी कान्तिके समान कपिश (पीतरक्ततास्वरूप), अपने शरीरकी कान्तिकी छटाओंके पटलोंसे तद्रूप जटिलित किया है दिशाओंका वलय जिन्होंने, ऐसे दो विशेषणयुक्त क्षत्रिय जातिके सर्पोंमें प्रधान दो सर्पोंसे (जिनके नाम वासुकी और शंखराज हैं) वेष्टित ऐसा पृथ्वीमंडल हैं जो क्षितिके बीजाक्षरों सहित हैं तथा वज्रपञ्जर (वज्रसहित रेखा) के चतुष्टयसे बँधा हुआ और सवनगिरि (मेरु पर्वत) सहित चौकोण, (इस प्रकार पाँच विशेषण पृथ्वीमंडलके हैं) ऐसा पृथ्वीमंडल है आधार जिसका (यह इन्द्रका विशेषण है) और ऐरावत हस्तीके स्कन्ध पर चढा हुआ, हाथमें वज्र है, शची अदि सुन्दर देवांगनाओंके शृंगार देखनेमें प्रफुल्लित हैं हजार नेत्र जिसके ऐसी देवेन्द्रकी मुद्रासे शोभायमान है, ऐसे समस्त भुवनका आलंबन करनेवाले सुनासीर (इन्द्र) के द्वारा रचनारूप किये हैं दोनों जानु जिसने ऐसा गरुड है। यहाँ तक पृथ्वीतत्त्वसहित गरुडका विशेषण है।


तदुपरिपुनरानाभिविपुलतरसुधासमुद्रसन्निभसमुल्लसन्निजशरीरप्रभापटलव्याप्तसकलगगना-
न्तरालवैश्याशीविषधरावनद्धवारुणबीजाक्षरमण्डनपुण्डरीकलक्ष्मोपलक्षितपारावारमयखण्डेन्दु-
मण्डलाकारवरुणपुरप्रतिष्ठितविपुलतरप्रचण्डमुद्राग्रहेति विकीर्णशिशिरतरपयःकणाक्रान्ति-
कर्बुरितसकलककुप्चक्रकरिमकरमारूढप्रशस्तपाशपाणिवरुणामृतमुद्राबन्धविधुरितनिःशेषविषानल-
संतानभगवद्वरुणनिर्गूढोत्संगप्रदेशः । इति अप्तत्त्वम् ॥12॥

अर्थ: तथा उस जानुद्वयके उपरि नाभिपर्यन्त अप्तत्त्व है। वहाँ अतिविस्तीर्ण जो सुधासमुद्र (क्षीरसमुद्र) समान शुक्लवर्ण, उल्लासको प्राप्त होते अपने शरीरकी प्रभाके पटल (तेजसमूह) से व्याप्त किया है समस्त आकाशका मध्य भाग जिन्होंने ऐसे वैश्यजातिके कर्कोट और पद्म हैं नाम जिनके ऐसे दो आशीविष सर्पोंसे वेष्टित अप्मण्डल है। और वारुण बीजों (जलके बीजाक्षरों) से शोभित और पुंडरिक अर्थात् पंचपत्रोपलक्षित श्वेत कमलके चिह्नसे चिह्नित पारावारमय कहिये क्षीरसमुद्रमय, खंडेन्दु कहिये अर्द्धचंद्राकारके मंडलके समान, वरुणपुरमें तिष्ठता अतिविस्तीर्ण प्रचंड मुद्रावाला और अग्रहेति कहिये मुख्य किरणोंसे बिखरे हुए अतिशीतल जलके कणोंकी आक्रान्ति (व्याप्ति) से कर्बुरित (नाना वर्णवाला) किया है समस्त दिशाओंका समूह जिसने ऐसा, और करिमकर कहिये जलहस्तीपर चढा हुआ सुन्दर नागपाश है हाथमें जिसके ऐसा जो वरुण दिकूपाल उसके अमृतकी मुद्राके बन्धसे दूर किया है सम्पूर्ण विषरूप अग्निका समूह जिसने ऐसे समर्थ वरुण दिकूपालके द्वारा रचित है उत्संग स्थान (कटिस्थान) जिसका ऐसा यह गरुडका दूसरा विशेषण है ।


विस्फुरितनिजवपुर्बहुलज्वालावलीपरिकलितसकलदिग्वलयद्विजदन्दशूकरक्षिताशुशुक्षणिवर्ण-
विस्फुरितविस्तीर्णस्वस्तिकोपपन्नत्रिकोणतेजोमयपुरमध्यबद्धवसतिवस्ताधिरूढज्वलदलातहस्तानल-
मुद्रोद्दीपितसकललोकवह्निविरचितोरःप्रदेशः । इति वह्नितत्त्वम् ॥13॥

अर्थ: सर्वत्र फैलती हुई अपने शरीरकी ज्वालाकी पंक्तिसे व्याप्त किया है समस्त दिशाओंका वलय (मण्डल) जिन्होंने ऐसे अनन्त और कुवलिक नाम धारक ब्राह्मण जातिके दो सर्पोंसे रक्षित और रंकाररूप बीजाक्षरसे स्फुरायमान विस्तीर्ण तीन कूटों पर तीन स्वस्तिक (साथिया) सहित ऐसा त्रिकोण तेजोमय देदीप्यमान पुर अग्निमण्डल उसके बीचमें बाँधी है बस्ती जिसने ऐसा, तथा वस्ताधिरूढ कहिये बकरे पर चढा हुआ, प्रज्वलित आलात कहिये जलता हुआ काष्ठ है हाथमें जिसके ऐसी अग्निकी मुद्रासे समस्त लोकको उद्योत करनेवाले वह्नि दिक्पालसे रक्षित है उरःप्रदेश जिसका ऐसा तीसरा गरुडका विशेषण हुआ । यह अग्नितत्त्वका स्वरूप है ।


अविरतपरिस्फुरत्स्फूत्कारमारुतान्दोलितसकलभुवनाभोगपरिभूतषट्चरणचक्रवाल-
कालिमानिजतनुसमुच्छलद्बहुलकान्तिपटलपिहितनिखिलनभस्तलशूद्रकाद्रवेयवलयितमरुन्मुद्रो-
पपन्नबिन्दुसन्दोहसुन्दरमहामारुतवलयत्रितयात्मकसकलभुवनाभोगवायुपरिमण्डलनभ-
स्वत्पुरान्तर्गतवाहनकुरङ्गवेगविहरणदुर्ललितकरतलकलितचलविटपकोटिकिशलयशालशालि-
मरुन्मुद्रोच्छलितसकलभुवनपवनमयवदनारविन्दः इति वायुतत्त्वम् ॥14॥

अर्थ: निरन्तर स्फुरायमान होता जो फूत्कारसे बहता हुआ पवन, उसके द्वारा कम्पायमान किया जो सकल भुवनका आभोग (मध्य) उसके द्वारा उडाये हुए भ्रमरोंके समूहकी कालिमाके समान तथा उनसे मिली अपने शरीरकी उछलती हुई प्रचुर कान्तिके पटल (समूह) से आच्छादित किया है समस्त आकाशमंडल जिन्होंने ऐसे तक्षक और महापद्म नामक शूद्र जातिके दो सर्पोंसे वेष्टित, और मरुत् मुद्रासे मंडित और बिन्दुओं (जलकणों) के समूहसे सुन्दर महा मारुत प्रचंड पवनके वलयके त्रितय (त्रिक) स्वरूप सकल भुवनके मध्यमें वायुके परिमंडल स्वरूप नभस्तलपुटके अन्तर्गत तिष्ठा हुआ ऐसा, और वाहन जो वातप्रमी जातिका हिरण उसके वेगसे विहार करनेमें दुर्ललित (लीलायुक्त) हाथोंसे पकडे हुए चलायमान शाखाओंके अग्रभागमें किशलय (कोंपल) जिसके ऐसे शालवृक्षकी शोभा सहित, मरुत् मुद्रासे उत्पन्न हुआ सकल भुवनोंमें पवन उसमय है मुखकमल जिसका ऐसा यह गरुडका चौथा विशेषण हुआ; और वायुतत्त्वका स्वरूप कहा गया ।


गगनगोचरामूर्त्तजयविजयभुजङ्गभूषणोऽनन्ताकृतिपरमविभुर्नभस्तलनिलीनसमस्त-
तत्त्वात्मकः समस्तज्वररोगविषधरोड्डामरडाकिनीग्रहयक्षकिन्नरनरेन्द्रारिमारिपरयन्त्रतन्त्र-
मुद्रामण्डलज्वलनहरिशरभशार्दूलद्विपदैत्यदुष्टप्रभृतिसमस्तोपसर्गनिर्मूलनकारिसामर्थ्यः
परिकलितसमस्तगारुडमुद्रामण्डलाडम्बरसमस्ततत्त्वात्मकः सन्नात्मैव गारुडगीर्गोचरत्वमवगाहते ।
इति विपतत्त्वम् ॥15॥

अर्थ: आकाशगोचर ही है मूर्ति जिनकी ऐसे जय विजय नामके दो सर्प है भूषण जिसके, तथा अनन्ताकृति परमविभु अर्थात् आकाशकी आकृतिस्वरूप सर्वव्यापक, तथा आकाशमंडलमें लीन है पृथ्वी वरुण वह्नि वायुनामा समस्त तत्त्व जिसमें, तथा समस्त वात पित्त श्लेष्मसे उत्पन्न ज्वर आदि रोग, अनेक जातिके सर्प आदि विषधर जीव, महाभय, डाकिनी, कुत्सित (खोटे) मंत्रकर्तृक ग्रह पिशाच, यक्ष भैरवादि, किन्नर, अश्वमुख व्यंतर, नरेन्द्र (राजा), शत्रु, महामारी, तथा परके किये यन्त्र, तन्त्र, मुद्रामंडल, तथा अग्नि, सिंह, शरभ-अष्टापद, शार्दूल, व्याघ्र, हस्ती, दैत्य, व्यन्तरादिक दुष्ट-दुर्जनादिक सबके किये हुए उपसर्गको निर्मूलन करनेवाला है सामर्थ्य जिसका ऐसा, तथा रचा है समस्त गारुड मुद्रामंडलका आडंबर जिसने ऐसा, तथा पृथ्वी आदि तत्त्वस्वरूप हुआ है आत्मा जिसका ऐसा, गारुडगीके नामको अवगाहन करनेवाला गारुड ऐसा नाम आत्मा ही पाता है ।


यदि पुनरसौ सकलजगच्चमत्कारिकार्मुकास्पदनिवेशितमण्डलीकृतसरसेक्षुकाण्डस्वरसहित-
कुसुमसायकविधिलक्ष्यीकृतदुर्लभमोक्षलक्ष्मीसमागमोत्कण्ठितकठोरतरमुनिमनाः । स्फुरन्मकर-
केतुः । कमनीयसकलललनावृन्दवन्दितसौन्दर्यरतिकेलिकलापदुर्ललितचेताश्चतुरश्चेष्टितभ्रूभङ्गमात्र-
वशीकृतजगत्त्रयस्त्रैणसाधनो दुरधिगमागाधगहनरागसागरान्तर्दोलितसुरासुरनरभुजगयक्ष-
सिद्धगन्धर्वविद्याधरादिवर्गः । स्त्रीपुरुषभेदभिन्नसमस्तसत्त्वपरस्परमनःसंघटनसूत्रधारः ।
विविधवनराजिमञ्जरीपरिमलपरिमिलितमधुकरकुलविकसितकुसुमस्तबकतरलितकटाक्ष-
प्रकटसौभाग्येन सहकारलताकिशलयकरोन्मुक्तमञ्जरीपरागपिष्टातकपिशुनितप्रवेशोत्सवेन
मदमुखरमधुकरकुटुम्बिनीकोमलालापसंवलितमांसलितकोकिलाकुलकणत्कारसंगीतकप्रियेण
मलयगिरिमेखलावनकृतनिलयचन्दनलतालास्योपदेशकुशलैः सुरतभरखिन्नपन्नगनितम्बिनी-
जनवदनकवलितशिखैरपि विरहिणीनिश्वासमांसलीकृतकायैः केरलीकुरलान्दोलनदक्षैरुत्कम्पित-
कुन्तलकामिनीकुन्तलैः परिगतसुरतखेदोन्मिषितलाटीललाटस्वेदाम्बुकणिकापानदोहदवद्भिरासा-
दितानेकनिर्ज्झरशिशिरशीकरैर्बकुलामोदसन्दर्भनिर्भरैः परिलुण्ठितपाटलासौरभैः परिमिलितनव-
मालिकामोदैर्मन्दसंचरणशीलैराकुलीकृतसकलभुवनजनमनोभिर्मलयमारुतैः समुल्लसितसौभाग्येन
वसन्तसुहृदा दूरमारोपितप्रतापः । प्रारब्धोत्तमतपस्तपनश्रान्तमुनि-जनप्रार्थितप्रवेशोत्सवेन
स्वर्गापवर्गद्वारसंविघटनवज्रार्गलः । सकलजगद्विजयवैजयन्तीकृतचतुर-कामिनीभ्रूविभ्रमः ।
क्षोभणादिमुद्राविशेषशाली । सकलजगद्वशीकरणसमर्थः इति चिन्त्यते तदायमात्मैव कामोक्ति-
विषयतामनुभवतीति कामतत्त्वम् ॥16॥

अर्थ: पुनः यदि कामतत्त्व चित्तमें ध्याया जाय वा विचारा जाय तो ऐसा है - ‘असौ’ कहिये स्वसंवेदनगोचर सकल जगतको चमत्कार करनेवाले धनुषके स्थानमें निवेशित किया और खींच कर कुंडलाकार किया हुआ रससहित इक्षुकांडके समान स्वरसहित उन्मादन, मोहन, संतापन, शोषण, मारण इन पाँच बाणोंकी विधि (आरोपण) से लक्ष्यरूप (निशानेरूप) किया है दुर्लभ परोक्ष मोक्षलक्ष्मीके समागम होनेके लिये उत्कंठित अतिकठोर मुनियोंका मन जिसने ऐसा काम है । तथा - स्फुरायमान मकराकार चित्रित ध्वजा है जिसकी, और कमनीय - सुंदर समस्त स्त्रियोंके समूह द्वारा वंदनीय है सुंदरता जिसकी ऐसी रतिनामा कामकी स्त्री सहित जो केलि (क्रीडा) उसके कलापमें (समूहमें) दुर्ललित है (अनिवार्य है) चित्त जिसका ऐसा है । तथा - चतुरोंकी चेष्टारूप भ्रूभंगमात्रसे वशीभूत किया स्त्रियोंका समूह ही है साधन सेना जिसके ऐसा है । पुनः दुरधिगम, अगाध (गहन) है मध्य भाग जिसका ऐसे विस्तृत रागरूप समुद्रमें डुलाये हैं सुर (कल्पवासी देव), असुर (भुवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी देव), नर (राजादि लोक), भुजग-धरणीन्द्र (शेषनागादिक), यक्ष (धनदादिक), सिद्ध (जिनके अंजनगुटिका रसायनादि विद्या सिद्ध हो), लोकको रंजायमान करनेवाले गन्धर्व (गानके अधिकारी देवादिक), विद्याधर (आकाशमें विमानों द्वारा चलनेवाले), हरिहरब्रह्मादिकके समूह जिसने ऐसा, तथा स्त्रीपुरुषके भेदसे भिन्न समस्त प्राणियोंके मन मिलानेके लिये सूत्रधार (शिक्षा देनेवाला आचार्य) है । तथा वसन्तऋतुरूपी मित्रने अतिशयरूप कर दिया है प्रताप जिसका ऐसा, क्योंकि वह वसन्तऋतु ऐसी है कि - विविध प्रकारकी वनकी पंक्तिके सुगन्धित परागमें मिले भ्रमरोंके समूह जिसमें ऐसे प्रफुल्लित पुष्पोंके गुच्छेरूपी चंचल कटाक्षोंसे प्रगट है सौभाग्यसुंदरता जिसकी, तथा - सहकारलता (आमकी मंजरी) के किशलय (अंकुर) रूपी हाथोंसे बखेरा है मंजरीका पराग वही हुआ पिष्टातक (सुगंधित अबीर) उसके द्वारा प्रगट किया है अपने प्रवेशका उत्सव जिसने ऐसा तथा - मदसे वाचालित भ्रमरियोंके कोमल शब्दोंके मिलनेसे पुष्ट हुए कोकिलाओंके समूहोंके शब्दरूपी संगीत हैं प्रिय जिसको ऐसा, तथा - मलयाचलके सुगंधित पवनसे उदय हुआ है सौभाग्य जिसका, वह मलयाचलका सुगंधित पवन कैसा है कि - मलयगिरिके चौतरफके वनमें रहनेवाले चंदनकी लतामंजरीको नृत्यके उपदेश देनेमें प्रवीण हैं, अर्थात् पवनसे चंदनलतायें हिलती हैं उसकी उत्प्रेक्षा की गई है कि मानो पवन है सो इन लताओंको नृत्यकी शिक्षा दे रहा है । तथा फिर कैसा है मलयाचलका पवन कि - संभोगकी अतिशयतासे खेदखिन्न जो सर्पोंकी सर्पिणी उनके मुखसे ग्रासीभूत हो गई है शिखा जिनकी, तो भी विरहिणी जो विप्रलब्धा वियोगिनी स्त्री उनके निश्वासोंसे पुष्ट हुआ है काय जिसका ऐसा, तथा केरलीज अर्थात् केरलदेशकी स्त्रियोंके कुरलोंको (मुखके जलक्षेपणको) कंपित करनेमें चतुर है - तथा उत्कंपित किये हैं कुन्तलदेशकी स्त्रियोंके केश जिसने तथा प्राप्त हुए संभोगके खेदसे उत्पन्न हुए लाटदेशकी स्त्रियोंके ललाटस्थ पसीनेके जलकणोंके पान करनेमें इच्छावान् है तथा ग्रहण किये हैं अनेक निर्झरके शीतल जलके कण जिसने तथा बकुलसिरी (मौलसिरी) आदि सुगंधित वृक्षोंके आमोदित परागोंके समूहसे भरा हुआ - फिर कैसा है पवन ? कि समस्त प्रकार लूट लिया है पाटलवृक्षोंका सौरभपराग जिसने तथा संपूर्णतासे मिला है मालतीका सुगंध जिसमें तथा मंद संचरण करनेका है स्वभाव जिसमें तथा विषयोंमें आकुलित किया है समस्त भुवनोंके जीवोंका मन जिसने, ऐसे मलयके पवनसे बसंतऋतुकी सुभगता प्रगट होती है । फिर कैसा है काम ? आरंभ किया जो उत्तम तप उसको तपनेसे खेदखिन्न हुए मुनिजनों द्वारा वांछित जो प्रवेशका उत्सव उसके द्वारा स्वर्ग मोक्षके द्वारका जो उघडना (खुलना) उसमें वज्रमयी अर्गलाके समान है, अर्थात् मुनिजनोंके स्वर्गमोक्षके प्रवेशद्वारको बंद करनेवाला है । तथा समस्त जगतको जीतनेकी वैजयन्ती ध्वजारूप किया है चतुर स्त्रियोंके भौंहरूपी विभ्रमको जिसने ऐसा, तथा क्षोभण कहिये चित्तके चलने आदि मुद्राविशेषमें (आकारविशेषमें) शाली कहिये चतुर है, अर्थात् समस्त जगतके चित्तको चलायमान करनेवाले आकारोंको प्रगट करनेवाला है । इस प्रकार समस्त जगतको वशीभूत करनेवाले कामकी कल्पंना करके अन्यमती जो ध्यान करते हैं, सो यह आत्मा ही कामकी उक्ति कहिये नाम वा संज्ञाको धारण करनेवाला है ।


तदेवं यदिह जगति शरीरविशेषसमवेतं किमपि सामर्थ्यमुपलभामहे तत्सकलमात्मन एवेति
विनिश्चयः । आत्मप्रवृत्तिपरंपरोत्पादितत्त्वाद्विग्रहग्रहणस्येति ॥17॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि - इस कारणसे पूर्वोक्त प्रकार शिवतत्त्व-गरुडतत्त्व-कामतत्त्वमें इस जगतमें शरीरविशेषसे मिली हुई जो कुछ सामर्थ्य हम देखते हैं सो सब आत्माकी ही है। यह हमको भले प्रकार निश्चय है। क्योंकि, शरीरके ग्रहण करनेमें आत्माकी प्रवृत्तिकी परंपरा (परिपाटी) को उत्पत्तिहेतुता है।


यदिह जगति किञ्चिद्विस्मयोत्पत्तिबीजं भुजगमनुजदेवेष्वस्ति सामर्थ्यमुच्चैः ।
तदखिलमपि मत्वा नूनमात्मैकनिष्ठं भजत नियतचित्ताः शश्वदात्मानमेव ॥18॥

अर्थ: हे भव्य जीवों ! इस जगतमें जो कुछ अधोलोकमें भवनवासी देवोंकी, मध्यलोकमें मनुष्योंकी और ऊर्ध्वलोकमें देवोंकी सामर्थ्य विस्मय उत्पन्न करनेका कारण है सो सब ही सामर्थ्य निश्चय करके इस एक आत्मामें ही है; इस कारण हम उपदेश करते हैं कि निश्चलचित्त होकर, तुम एक आत्माको ही निरन्तर भजो ।


अचिन्त्यमस्य सामर्थ्यं प्रवक्तुं कः प्रभुर्भवेत् ।
तच्च नानाविधध्यानपदवीमधितिष्ठति ॥19॥

अर्थ: इस आत्माकी शक्ति अचिन्त्य है । उसको प्रगट करनेको कोई समर्थ नहीं है । यह शक्ति (सामर्थ्य) नाना प्रकारके ध्यानकी पदवीके आश्रयसे होती है अर्थात् नाना प्रकारके ध्यानसे ही आत्माकी अचिन्त्य शक्तियाँ प्रगट होती हैं ।


तदस्य कर्तुं जगदंघ्रिलीनं तिरोहिताऽऽस्ते सहजैव शक्तिः ।
प्रबोधितस्तां समभिव्यनक्ति प्रसह्य विज्ञानमयः प्रदीपः ॥20॥

अर्थ: पूर्वोक्त आत्माकी सामर्थ्य इस जगतको अपने पदमें (प्रभावमें) लीन करनेको स्वभाव स्वरूप ही है, परन्तु वह कर्मोंसे आच्छादित है। विज्ञानरूप उत्कृष्ट दीपकको प्रज्वलित करनेसे वह उस शक्तिको प्रगट (स्वानुभवगोचररूप) करता है।


अयं त्रिजगतीभर्त्ता विश्वज्ञोऽनन्तशक्तिमान् ।
नात्मानमपि जानाति स्वस्वरूपात्परिच्युतः ॥21॥

अर्थ: यह आत्मा तीन जगतका भर्त्ता (स्वामी) है, समस्त पदार्थोंका ज्ञाता है, अनन्त शक्तिवाला है, परंतु अनादिकालसे अपने स्वरूपसे च्युत होकर अपने आपको नहीं जानता ।


अनादिकालसम्भूतैः कलङ्कैः कश्मलीकृतः ।
स्वेच्छयार्थान्समादत्ते स्वतोऽत्यन्तविलक्षणान् ॥22॥

अर्थ: यह आत्मा अनादिसे उत्पन्न हुए कलंकसे मलिन किया हुआ अत्यन्त विलक्षण अपनेसे भिन्न पदार्थोंको स्वेच्छासे ग्रहण करता है।


दृग्बोधनयनः सोऽयमज्ञानतिमिराहतः ।
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ॥23॥

अर्थ: यह आत्मा दर्शन ज्ञान नेत्रवाला है, परंतु अज्ञानरूपी अंधकारसे व्याप्त हो रहा है; इस कारण जानता हुआ भी नहीं जानता और देखता हुआ भी कुछ नहीं देखता ।


अविद्योद्भूतरागादिगरव्यग्रीकृताशयः ।
पतत्यनन्तदुःखाग्निप्रदीप्ते जन्मदुर्गमे ॥24॥

अर्थ: अविद्या (मोह) से उत्पन्न रागादिकरूपी विषके विकारसे व्यग्रचित्त होनेसे यह आत्मा दुःखरूपी अग्निसे जलते हुए दुर्गम संसारमें पडता है ।


लोष्टेष्वपि यथोन्मत्तः स्वर्णबुद्ध्या प्रवर्त्तते ।
अर्थेष्वनात्मभूतेषु स्वेच्छयाऽयं तथा भ्रमात् ॥25॥

अर्थ: जैसे धतूरा खाया उन्मत्त पुरुष पत्थरादिकमें सुवर्णबुद्धिसे प्रवृत्ति करता है उसी प्रकार यह आत्मा अज्ञानसे अपने स्वरूपसे भिन्न अन्य पदार्थोंमें स्वेच्छाचाररूप प्रवृत्ति करता है ।


वासनाजनितान्येव सुखदुःखानि देहिनाम् ।
अनिष्टमपि येनायमिष्टमित्यभिमन्यते ॥26॥

अर्थ: जीवोंके जो सुखदुःख हैं वे अनादि अविद्याकी वासनासे उत्पन्न हुए हैं इसी कारण यह आत्मा अज्ञानसे अनिष्टको भी इष्ट मानता है ।


अविश्रान्तमसौ जीवो यथा कामार्थलालसः ।
विद्यतेऽत्र यदि स्वार्थे तथा किं न विमुच्यते ॥27॥

अर्थ: यह आत्मा जिस प्रकार काम और अर्थके लिये अविश्रान्त परिश्रम करता है उस प्रकार यदि अपने स्वार्थ अर्थात् मोक्ष व मोक्षमार्गमें लालसासहित प्रवृत्ति करे तो क्या यह कर्मोंसे मुक्त न होगा ? अवश्य ही होगा ।

सर्ग 22: मन वश करने का उपदेश (श्लोक 1 से 35)

उत्साहान्निश्चयाद्धैर्यात्सन्तोषात्तत्त्वदर्शनात् ।
मुनेर्जनपदत्यागात् षड्भिर्योगः प्रसिद्ध्यति ॥1॥

अर्थ: उत्साहसे, निश्चयसे धैर्यसे, संतोषसे, तत्त्वदर्शनसे, देशके त्यागसे योगकी सिद्धि होती है ।


एतान्येवाहुः केचिच्च मनःस्थैर्याय शुद्धये ।
तस्मिन् स्थिरीकृते साक्षात्स्वार्थसिद्धिर्ध्रुवं भवेत् ॥2॥

अर्थ: कोई ऐसे कहते हैं कि ये यमादिक कहे हैं सो मनको स्थिर करनेके लिये तथा मनकी शुद्धताके लिये कहे हैं, क्योंकि मनके स्थिर होनेसे साक्षात्सर्वसिद्धि होती है ।


यमादिषु कृताभ्यासो निःसंगो निर्ममो मुनिः ।
रागादिक्लेशनिर्मुक्तं करोति स्ववशं मनः ॥3॥

अर्थ: जिसने यमादिकमें अभ्यास किया है, परिग्रह और ममतासे रहित है ऐसा मुनि ही अपने मनको रागादिकसे निर्मुक्त तथा अपने वशमें करता है ।


अष्टावङ्गानि योगस्य यान्युक्तान्यार्यसूरिभिः ।
चित्तप्रसत्तिमार्गेण बीजं स्युस्तानि मुक्तये ॥4॥

अर्थ: योगके जो आठ अंग पूर्वाचार्योंने कहे हैं वे चित्तकी प्रसन्नताके मार्गसे मुक्तिके लिये बीजभूत (कारण) होते हैं, अन्य प्रकारसे नहीं होते, इस प्रकार पूर्वाचार्योंने कहा है ।


अङ्गान्यष्टावपि प्रायः प्रयोजनवशात्क्वचित् ।
उक्तान्यत्रैव तान्युच्चैर्विदांकुर्वन्तु योगिनः ॥5॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि ये आठों अंग भी प्रयोजनानुसार प्रायः इसी ग्रंथमें कहे गये हैं, उन्हें भले प्रकार सबको जानना चाहिये ।


मनोरोधे भवेद्रुद्धं विश्वमेव शरीरिभिः ।
प्रायोऽसंवृतचित्तानां शेषरोधोऽप्यपार्थकः ॥6॥

अर्थ: जिसने मनका रोध किया उसने सब ही रोका, अर्थात् जिसने अपने मनको वश किया उसने सबको वश किया और जिसने अपने मनको वशीभूत नहीं किया उसका अन्य इन्द्रियादिकका रोकना भी व्यर्थ ही है ।


कलङ्कविलयः साक्षान्मनःशुद्ध्यैव देहिनाम् ।
तस्मिन्नपि समीभूते स्वार्थसिद्धिरुदाहृता ॥7॥

अर्थ: मनकी शुद्धतासे ही साक्षात् कलंकका विलय होता है और जीवोंके उनका समभावस्वरूप होने पर स्वार्थकी सिद्धि कही है; क्योंकि जब मन रागद्वेषरूप नहीं प्रवर्तता तब ही अपने स्वरूपमें लीन होता है, यही स्वार्थकी सिद्धि है ।


चित्तप्रपञ्चजानेकविकारप्रतिबन्धकाः ।
प्राप्नुवन्ति नरा नूनं मुक्तिकान्ताकरग्रहम् ॥8॥

अर्थ: जो पुरुष चित्तके प्रपंचसे उत्पन्न हुए अनेक प्रकारके विकारोंको रोकनेवाले हैं वे ही निश्चयतः मुक्तिरूपी स्त्रीके करग्रहणको प्राप्त होते हैं ।


अतस्तदेव संरुध्य कुरु स्वाधीनमञ्जसा ।
यदि छेत्तुं समुद्युक्तस्त्वं कर्मनिगडं दृढम् ॥9॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि अतएव हे भव्यात्मन् ! यदि तू कर्मरूपी दृढ बेडियोंको काटनेके लिये उद्यमी हुआ है तो उस मनको ही समस्त विकल्पोंसे रोककर शीघ्र ही अपने वशमें कर ।


सम्यगस्मिन्समं नीते दोषा जन्मभ्रमोद्भवाः ।
जन्मिनां खलु शीर्यन्ते ज्ञानश्रीप्रतिबन्धकाः ॥10॥

अर्थ: इस मनको भले प्रकार समभावरूप प्राप्त करनेसे संसारपरिभ्रमणसे उत्पन्न हुए जो दोष जीवोंके ज्ञानरूप लक्ष्मीकी प्राप्तिमें बाधक हैं वे निश्चयकरके नष्ट हो जाते हैं ।


एक एव मनोदैत्यजयः सर्वार्थसिद्धिदः ।
अन्यत्र विफलः क्लेशो यमिनां तज्जयं विना ॥11॥

अर्थ: संयमी मुनियोंको एक मात्र मनरूपी दैत्यका जीतना ही समस्त अर्थोंकी सिद्धिका देनेवाला है; क्योंकि इस मनको जीते बिना अन्य व्रत नियम तप व शास्त्रादिकमें क्लेश करना व्यर्थ ही है ।


एक एव मनोरोधः सर्वाभ्युदयसाधकः ।
यमेवालम्ब्य संप्राप्ता योगिनस्तत्त्वनिश्चयम् ॥12॥

अर्थ: एक मनका रोकना ही समस्त अभ्युदयोंका साधनेवाला है, क्योंकि मनोरोधका आलंबन करके ही योगीश्वर तत्त्वनिश्चयताको प्राप्त हुए हैं ।


पृथक्करोति यो धीरः स्वपरावेकतां गतौ ।
स चापलं निगृह्णाति पूर्वमेवान्तरात्मनः ॥13॥

अर्थ: जो धीरवीर पुरुष एकताको प्राप्त हुए आत्मा और शरीरादि परवस्तुको पृथक् पृथक् करके अनुभव करते हैं वे सबसे पहिले अन्तरात्माकी अर्थात् मनकी चंचलताको रोक लेते हैं ।


मनःशुद्ध्यैव शुद्धिः स्याद्देहिनां नात्र संशयः ।
वृथा तद्व्यतिरेकेण कायस्यैव कदर्थनम् ॥14॥

अर्थ: निःसंदेह मनकी शुद्धिसे ही जीवोंके शुद्धता होती है, मनकी शुद्धिके बिना केवल कायको क्षीण करना वृथा है ।


ध्यानशुद्धिं मनःशुद्धिः करोत्येव न केवलम् ।
विच्छिन्नत्त्यपि निःशङ्कं कर्मजालानि देहिनाम् ॥15॥

अर्थ: मनकी शुद्धता केवल ध्यानकी शुद्धताको ही नहीं करती है किन्तु जीवोंके कर्मजाल (कर्मोंके समूह) को भी निःसंदेह काटती है ।


पादपङ्कजसंलीनं तस्यैतद्भुवनत्रयम् ।
यस्य चित्तं स्थिरीभूय स्वस्वरूपे लयं गतम् ॥16॥

अर्थ: जिस मुनिका मन स्थिर होकर आत्मस्वरूपमें लीन हो गया उसके चरणकमलोंमें ये तीनों जगत् भले प्रकार लीन हुए समझने चाहिये ।


मनः कृत्वाशु निःसङ्गं निःशेषविषयच्युतम् ।
मुनिभृङ्गैः समालीढं मुक्तेर्वदनपङ्कजम् ॥17॥

अर्थ: जिन मुनिरूपी भ्रमरोंने अपने मनको निःसंगतासे शीघ्र ही समस्त विषयोंसे छुडाया उन्होंने ही मुक्तिरूपी स्त्रीके मुखरूपी कमलका आलिंगन किया ।


यथा यथा मनःशुद्धिर्मुनेः साक्षात्प्रजायते ।
तथा तथा विवेकश्रीर्हृदि धत्ते स्थिरं पदम् ॥18॥

अर्थ: मुनिके जैसे-जैसे मनकी शुद्धता साक्षात् होती जाती है वैसे-वैसे विवेक अर्थात् भेदज्ञानरूप लक्ष्मी अपने हृदयमें स्थिरपदको धारण करती है ।


चित्तशुद्धिमनासाद्य मोक्तुं यः सम्यगिच्छति ।
मृगतृष्णातरङ्गिण्यां स पिबत्यम्बु केवलम् ॥19॥

अर्थ: जो पुरुष चित्तकी शुद्धताको न पाकर भले प्रकार मुक्त होना चाहता है वह केवल मृगतृष्णाकी नदीमें जल पीता है ।


तद्ध्यानं तद्धि विज्ञानं तद्ध्येयं तत्त्वमेव वा ।
येनाविद्यामतिक्रम्य मनस्तत्त्वे स्थिरी भवेत् ॥20॥

अर्थ: वही तो ध्यान है, वही विज्ञान है और वही ध्येय तत्त्व है कि जिसके प्रभावसे अविद्याको उल्लंघनकर मन निजस्वरूपमें थिर हो जाय ।


विषयग्रासलुब्धेन चित्तदैत्येन सर्वथा ।
विक्रम्य स्वेच्छयाजस्रं जीवलोकः कदर्थितः ॥21॥

अर्थ: विषय ग्रहण करनेमें लुब्ध ऐसे इस चित्तरूपी दैत्य (राक्षस) ने सर्व प्रकार पराक्रम (आक्रमण) करके अपनी इच्छानुसार इस जगतको पीडित किया है ।


अवार्यविक्रमः सोऽयं चित्तदन्ती निवार्यताम् ।
न यावद्धिंसयत्येष सत्संयमनिकेतनम् ॥22॥

अर्थ: हे मुने ! यह चित्तरूपी हस्ती ऐसा प्रबल है कि इसका पराक्रम अनिवार्य है, सो जब तक यह समीचीन संयमरूपी घरको नष्ट नहीं करता, उससे पहिले-पहिले तू इसका निवारण कर; यदि यह चित्त निरर्गल (स्वच्छन्दी) रहेगा तो संयमको बिगाडेगा ।


विभ्रमद्विषयारण्ये चलच्चेतोवलीमुखः ।
येन रुद्धो ध्रुवं सिद्धं फलं तस्यैव वाञ्छितम् ॥23॥

अर्थ: यह चंचलचित्तरूपी बंदर विषयरूपी वनमें भ्रमता रहता है, सो जिस पुरुषने इसको रोका, वश किया, उसीके वांछित फलकी सिद्धि है ।


चित्तमेकं न शक्नोति जेतुं स्वातन्त्र्यवर्ति यः ।
ध्यानवार्तां ब्रुवन्मूढः स किं लोके न लज्ञते ॥24॥

अर्थ: जो पुरुष स्वतन्त्रतासे वर्तनेवाले एक मात्र चित्तको जीतनेमें समर्थ नहीं है वह मूर्ख ध्यानकी चर्चा करता हुआ लोकमें लज्जित क्यों नहीं होता ?


यदसाध्यं तपोनिष्टैर्मुनिभिर्वीतमत्सरैः ।
तत्पदं प्राप्यते धीरैश्चित्तप्रसरबन्धकैः ॥25॥

अर्थ: जो पद निर्मत्सर तपोनिष्ठ मुनियोंके द्वारा भी असाध्य है, वह पद चित्तके प्रसारको रोकनेवाले धीर पुरुषोंके द्वारा ही प्राप्त किया जाता है ।


अनन्तजन्मजानेककर्मबन्धस्थितिर्दृढा ।
भावशुद्धिं प्रपन्नस्य मुनेः प्रक्षीयते क्षणात् ॥26॥

अर्थ: जो अनन्त जन्मसे उत्पन्न हुई दृढ कर्मबन्धकी स्थिति है सो भावशुद्धिको प्राप्त होनेवाले मुनिके क्षणभरमें नष्ट हो जाती है। क्योंकि कर्मक्षय करनेमें भावोंकी शुद्धता ही प्रधान कारण है ।


यस्य चित्तं स्थिरीभूतं प्रसन्नं ज्ञानवासितम् ।
सिद्धमेव मुनेस्तस्य साध्यं किं कायदण्डनैः ॥27॥

अर्थ: जिस मुनिका चित्त स्थिरीभूत है, प्रसन्न है, रागादिककी कलुषता जिसमें नहीं है और ज्ञानकी वासनासहित है उस मुनिके साध्य अर्थात् अपने स्वरूपादिककी प्राप्ति आदि सब कार्य सिद्ध ही हैं। अतएव उस मुनिको बाह्यतपादिकसे कायको दंडनेसे कुछ लाभ नहीं है ।


तपःश्रुतयमज्ञान - तनुक्लेशादिसंश्रयम् ।
अनियन्त्रितचित्तस्य स्यान्मुनेस्तुषखण्डनम् ॥28॥

अर्थ: जिस मुनिने अपने चित्तको वश नहीं किया उसका तप, शास्त्राध्ययन, व्रतधारण, ज्ञान, कायक्लेश इत्यादि सब तुषखंडनके समान निःसार (व्यर्थ) हैं, क्योंकि मनके वशीभूत हुए विना ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।


एकैव हि मनःशुद्धिर्लोकाग्रपथदीपिका ।
स्खलितं बहुभिस्तत्रतामनासाद्य निर्मलाम् ॥29॥

अर्थ: मनकी शुद्धता ही एक मोक्षमार्गमें प्रकाश करनेवाली दीपिका (चिराग) है। उस निर्मल दीपिकाको न पानेसे अनेक मोक्षमार्गी च्युत हो गये ।


असन्तोऽपि गुणाः सन्ति यस्यां सत्यां शरीरिणाम् ।
सन्तोऽपि यां विना यान्ति सा मनःशुद्धिः शस्यते ॥30॥

अर्थ: जिस मनकी शुद्धता होते हुए अविद्यमान गुण भी विद्यमान हो जाते हैं और जिसके न होते विद्यमान गुण भी जाते रहते हैं वही मनकी शुद्धि प्रशंसा करने योग्य है ।


अपि लोकत्रयैश्वर्यं सर्वाक्षप्रीणनक्षमम् ।
भजत्यचिन्त्यवीर्योऽयं चित्तदैत्यो निरङ्कुशः ॥31॥

अर्थ: यह चित्तरूपी दैत्य अचिन्त्यपराक्रमी है सो निरंकुश होकर समस्त इन्द्रियोंको तृप्त करनेमें समर्थ ऐसे तीन लोकके ऐश्वर्यको भोगता है।


शमश्रुतयमोपेता जिताक्षाः शंसितव्रताः ।
विदन्त्यनिर्जितस्वान्ताः स्वस्वरूपं न योगिनः ॥32॥

अर्थ: जो योगी शमभाव, शास्त्राध्ययन और यम-नियमादिसे युक्त हैं और जितेन्द्रिय हैं तथा जिनके व्रत प्रशंसा करने योग्य हैं वे भी यदि मनको नहीं जीते हुए हों तो अपने स्वरूपको नहीं जान सकते।


विलीनविषयं शान्तं निःसङ्गं त्यक्तविक्रियम् ।
स्वस्थं कृत्वा मनः प्राप्तं मुनिभिः पदमव्ययम् ॥33॥

अर्थ: मुनिगणोंने अपने मनको विलीनविषय, शान्त, निःसंग (परिग्रहके ममत्वरहित), विकार रहित स्वस्थ करके ही अव्ययपद (मोक्षपद) को पाया है।


दिक्चक्रं दैत्यधिष्ण्यं त्रिदशपतिपुराण्यम्बुवाहान्तरालं
द्वीपाम्भोधिप्रकाण्डं खचरनरसुराहीन्द्रवासं समग्रम् ।
एतत्त्रैलोक्यनीडं पवनचयचितं चापलेन क्षणार्द्धे -
नाश्रान्तं चित्तदैत्यो भ्रमति तनुमतां दुर्विचिन्त्यप्रभावः ॥34॥

अर्थ: जीवोंके मनरूपी दैत्यका प्रभाव दुर्विचिन्त्य है। यह किसीके चिन्तवनमें नहीं आ सकता, क्योंकि यह अपनी चंचलताके प्रभावसे दशों दिशाओंमें, दैत्योंके समूहमें, इन्द्रके पुरोंमें, आकाशमें तथा द्वीपसमुद्रोंमे, विद्याधर मनुष्य देव धरणीन्द्रादिके निवासस्थानोंमें तथा वातवलयों सहित तीन लोकरूपी घरमें सर्वत्र आधे क्षणमें ही भ्रमण कर आता है; इसका रोकना अतिशय कठिन है। जो योगीश्वर इसे रोकते हैं वे धन्य हैं ।


प्रशमयमसमाधिध्यानविज्ञानहेतो - र्विनयनयविवेकोदारचारित्रशुद्ध्यै ।
य इह जयति चेतःपन्नगं दुर्निवारं स खलु जगति योगिव्रातवन्द्यो मुनीन्द्रः ॥35॥

अर्थ: इस जगतमें जो मुनि प्रशम (कषायोंका अभाव), यम (त्याग), समाधि (स्वरूपमें लय), ध्यान (एकाग्रचित्त), विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) अर्थात् भेदज्ञानके लिये तथा विनय व नयके स्वरूपकी प्राप्तिके लिये, विवेक और उदार चारित्रकी शुद्धिके लिये चित्तरूपी दुर्निवार सर्पको जीतते हैं वे योगियोंके समूह द्वारा वंदनीय हैं और मुनियोंमें इन्द्र हैं ।

सर्ग 23: रागद्वेष रोकने का वर्णन (श्लोक 1 से 38)

निःशेषविषयोत्तीर्णं विकल्पव्रजवर्जितम् ।
स्वतत्त्वैकपरं धत्ते मनीषी नियतं मनः ॥1॥

अर्थ: मनीषी (बुद्धिमान्) मुनि यदि अपने मनको समस्त विषयोसे रहित और ज्ञेयोंमें भ्रम या संशयरूप विकल्पोंसे वर्जित, अपने स्वरूपमें ही एकाग्र (तत्पर) करे, तथापि आत्मस्वरूपके सन्मुख स्वस्थ किया हुआ मन भी अनादिकालसे उत्पन्न हुए वा बँधे हुए रागादि शत्रुओंसे जबरदस्ती पीडित किया जाता है ।


क्रियमाणमपि स्वस्थं मनः सद्योऽभिभूयते ।
अनाद्युत्पन्नसंबद्धे रागादिरिपुभिर्बलात् ॥2॥

अर्थ: मनीषी (बुद्धिमान्) मुनि यदि अपने मनको समस्त विषयोसे रहित और ज्ञेयोंमें भ्रम या संशयरूप विकल्पोंसे वर्जित, अपने स्वरूपमें ही एकाग्र (तत्पर) करे, तथापि आत्मस्वरूपके सन्मुख स्वस्थ किया हुआ मन भी अनादिकालसे उत्पन्न हुए वा बँधे हुए रागादि शत्रुओंसे जबरदस्ती पीडित किया जाता है ।


स्वतत्त्वानुगतं चेतः करोति यदि संयमी ।
रागादयस्तथाऽप्येते क्षिपन्ति भ्रमसागरे ॥3॥

अर्थ: यद्यपि संयमी मुनि निजस्वरूपके अनुगत मनका जय कर लेता है, तथापि रागादिक भाव उसको फिर भी भ्रमरूपी समुद्रमें डाल देते है ।


आत्माधीनमपि स्वान्तं सद्यो रागैः कलङ्क्यते ।
अस्ततन्द्रैरतः पूर्वमत्र यत्नो विधीयताम् ॥4॥

अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि अपने आधीन (वश) किया हुआ मन भी रागादिक भावोंसे तत्काल कलंकित (मलिन) किया जाता है, इस कारण मुनिगणोंका यह कर्त्तव्य है कि इस विषयमें वे प्रमादरहित हो सबसे पहिले इन रागादिकके दूर करनेमें यत्न करें ।


अयत्नेनापि जायन्ते चित्तभूमौ शरीरिणाम् ।
रागादयः स्वभावोत्थज्ञानराज्याङ्गघातकाः ॥5॥

अर्थ: जीवोंके स्वाभाविक ज्ञानरूपी राज्यके अंगको घात करनेवाले रागादिक भाव चित्तरूपी पृथ्वीमेंसे बिना यत्नके ही स्वयमेव उत्पन्न होते हैं ।


इन्द्रियार्थानपाकृत्य स्वतत्त्वमवलम्बते ।
यदि योगी तथाऽप्येते छलयन्ति मुहुर्मनः ॥6॥

अर्थ: यदि योगी मुनि इन्द्रियोंके विषयोंको दूर कर निजस्वरूपका अवलंबन करे तो भी रागादिक भाव मनको बारबार छलते हैं अर्थात् विकार उत्पन्न करते हैं ।


क्वचिन्मूढं क्वचिद्भ्रान्तं क्वचिद्भीतं क्वचिद्रतम् ।
शङ्कितं च क्वचित्क्लिष्टं रागाद्यैः क्रियते मनः ॥7॥

अर्थ: ये रागादिक भाव मनको कभी तो मूढ करते हैं, कभी भ्रमरूप करते हैं, कभी भयभीत करते हैं, कभी आसक्त करते हैं, कभी शंकित करते हैं; कभी क्लेशरूप करते हैं; इत्यादि प्रकारसे स्थिरतासे डिगा देते हैं ।


अजस्रं रुध्यमानेऽपि चिराभ्यासाद् दृढीकृताः ।
चरन्ति हृदि निःशङ्का नृणां रागादिराक्षसाः ॥8॥

अर्थ: मनुष्योंके निरन्तर वश किये हुए मनमें भी चिरकालसे अभ्यस्त किये रागादिक राक्षस निःशंक हो प्रवर्त्तते हैं ।


प्रयासैः फल्गुभिर्मूढ किमात्मा दण्ड्यतेऽधिकम् ।
शक्यते न हि चेच्चेतः कर्तुं रागादिवर्जितम् ॥9॥

अर्थ: हे मूढ प्राणी ! यदि तू अपने चित्तको रागादिकसे रहित करनेको समर्थ नहीं है तो व्यर्थ ही अन्य क्लेशोंसे आत्माको दंड क्यों देता है ? क्योंकि रागादिकके मिटे बिना अन्य खेद करना निष्फल है ।


क्षीणरागं च्युतद्वेषं ध्वस्तमोहं सुसंवृतम् ।
यदि चेतः समापन्नं तदा सिद्धं समीहितम् ॥10॥

अर्थ: क्षीण हुआ है राग जिसमें और च्युत हुआ है द्वेष जिसमें तथा नष्ट हुआ है मोह जिसमें ऐसा जो मन संवरताको प्राप्त है तो वांछित सिद्धि है ।


मोहपङ्के परिक्षीणे प्रशान्ते रागविभ्रमे ।
पश्यन्ति यमिनः स्वस्मिन्स्वरूपं परमात्मनः ॥11॥

अर्थ: मोहरूपी कर्दमके क्षीण होने पर तथा रागादिक परिणामोंके प्रशान्त होने पर योगीगण अपनेमें ही परमात्माके स्वरूपको अवलोकन करते हैं वा अनुभव करते हैं ।


महाप्रशमसंग्रामे शिवश्रीसंगमोत्सुकैः ।
योगिभिर्ज्ञानशस्त्रेण रागमल्लो निपातितः ॥12॥

अर्थ: मुक्तिरूपी लक्ष्मीके संगकी वांछा करनेवाले योगीश्वरोंने महाप्रशमरूपी संग्राममें ज्ञानरूपी शस्त्रसे रागरूपी मल्लको निपातन किया, क्योंकि इसके हते बिना मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्ति नहीं हैं ।


असंक्लिष्टमविभ्रान्तमविप्लुतमनाकुलम् ।
स्ववशं च मनः कृत्वा वस्तुतत्त्वं निरूपय ॥13॥

अर्थ: हे आत्मन् ! अपने मनको संक्लेश, भ्रांति और रागादिक विकारोंसे रहित करके अपने मनको वशीभूत कर तथा वस्तुके यथार्थ स्वरूपका अवलोकन कर ।


रागाद्यभिहतं चेतः स्वतत्त्वविमुखं भवेत् ।
ततः प्रच्यवते क्षिप्रं ज्ञानरत्नाद्रिमस्तकात् ॥14॥

अर्थ: जो चित्त रागादिकसे पीडित होता है वह स्वतत्त्वसे विमुख हो जाता है । इसी कारण मनुष्य ज्ञानरूपी रत्नमय पर्वतसे च्युत हो जाता है ।


रागद्वेषभ्रमाभावे मुक्तिमार्गे स्थिरीभवेत् ।
संयमी जन्मकान्तारसंक्रमक्लेशशङ्कितः ॥15॥

अर्थ: संसाररूपी वनमें भ्रमणके क्लेशोंसे भयभीत संयमी मुनि रागद्वेषमोहका अभाव होनेसे ही मोक्षमार्गमें स्थिर होता है ।


रागादिभिरविश्रान्तं वञ्च्यमानं मुहुर्मनः ।
न पश्यति परं ज्योतिः पुण्यपापेन्धनानलम् ॥16॥

अर्थ: यह मन है सो रागादिकसे निरंतर वारंवार वंचित हुआ पुण्यपापरूपी इंधनके लिये अग्निके समान ऐसी परम ज्योतिका अवलोकन नहीं कर सकता ।


रागादिपङ्कविश्लेषात्प्रसन्ने चित्तवारिणि ।
परिस्फुरति निःशेषं मुनेर्वस्तुकदम्बकम् ॥17॥

अर्थ: रागद्वेषमोहरूपी कर्दमके अभावसे प्रसन्न चित्तरूपी जलमें मुनिको समस्त वस्तुओके समूह स्पष्ट स्फुरायमान होते हैं अर्थात् प्रतिभासते हैं ।


स कोऽपि परमानन्दो वीतरागस्य जायते ।
येन लोकत्रयैश्वर्यमप्यचिन्त्यं तृणायते ॥18॥

अर्थ: तथा जो कोई परमानन्द वीतरागके उत्पन्न होता है उसके सामने तीन लोकका अचिन्त्य ऐश्वर्य भी तृणवत् भासता है, अर्थात् परमानन्द स्वरूपके सामने तीन लोकका ऐश्वर्य भी कुछ नहीं है ।


प्रशाम्यति विरागस्य दुर्बोधविषमग्रहः ।
स एव वर्द्धतेऽजस्रं रागार्त्तस्येह देहिनः ॥19॥

अर्थ: इस संसारमें रागरहित जीवके अज्ञानरूप विषम आग्रह शान्त हो जाता है और रागसे पीडितके वही अज्ञान बढता है, घटता नहीं है ।


स्वभावजमनातङ्कं वीतरागस्य यत्सुखम् ।
न तस्यानन्तभागोऽपि प्राप्यते त्रिदशेश्वरैः ॥20॥

अर्थ: स्वभावसे उत्पन्न हुआ आतंकरहित जो सुख वीतरागके होता है उससे अनन्तवाँ भाग भी इन्द्रोंके नहीं होता ।


एतावनादि संभूतौ रागद्वेषौ महाग्रहौ ।
अनन्तदुःखसन्तानप्रसूतेः प्रथमाङ्कुरौ ॥21॥

अर्थ: ये अनादिसे उत्पन्न रागद्वेषरूपी महा पिशाच वा ग्रह है सो अनन्त दुखोंके सन्तानकी प्रसूतिके प्रथम अंकुर ही है ।


तद्विवेच्य ध्रुवं धीर ज्ञानार्कालोकमाश्रय ।
विशुष्यति च यं प्राप्य रागकल्लोलमालिनी ॥22॥

अर्थ: पूर्वोक्त अर्थका विचार करके हे धीरवीर ! तू निश्चयसे ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशका आश्रय कर, क्योंकि जिसको प्राप्त होकर रागरूपी नदी सुख जाती है ।


चिदचिद्रूपभावेषु सूक्ष्मस्थूलेष्वपि क्षणम् ।
रागः स्याद्यदि वा द्वेषः क्व तदाध्यात्मनिश्चयः ॥23॥

अर्थ: सूक्ष्म तथा स्थूल चेतन अचेतन पदार्थोमें क्षणभर भी राग अथवा द्वेष होता है तो फिर अध्यात्मका निश्चय कहाँ ? ।


नित्यानन्दमयीं साध्वीं शाश्वतीं चात्मसंभवाम् ।
वृणोति वीतसंरंभो वीतरागः शिवश्रियम् ॥24॥

अर्थ: जिसका संरंभ रागादिमयी विकल्प उद्यम बीत गये हैं ऐसा वीतराग मुनि नित्यानन्दमयी समीचीन शाश्वती आत्मासे उत्पन्न मोक्षरूपी लक्ष्मीको वरता है ।


यत्र रागः पदं धत्ते द्वेषस्तत्रेति निश्चयः ।
उभावेतौ समालम्ब्य विक्रामत्यधिकं मनः ॥25॥

अर्थ: जहाँ पर राग पैर धरे अर्थात् प्रवर्ते वहाँ द्वेष भी प्रवर्त्तता है यह निश्चय है और इन दोनोंका अवलंबन करके मन भी अधिकतर विकाररूप होता है ।


सकलज्ञानसाम्राज्यं स्वीकर्त्तुं यः समीप्सति ।
स धन्यः शमशस्त्रेण रागशत्रुं निकृन्तति ॥26॥

अर्थ: जो पुरुष समस्त ज्ञानरूप साम्राज्यके अंगीकार करनेकी इच्छा रखता है वह धन्य महाभाग उपशमभावरूप शस्त्रसे रागरूप शत्रुको काटता है ।


यथोत्पाताक्षमः पक्षी लूनपक्षः प्रजायते ।
रागद्वेषच्छदच्छेदे स्वान्तपत्ररथस्तथा ॥27॥

अर्थ: जिस प्रकार कटी हुई पाँखोंका पक्षी उडनेमें असमर्थ होता है, वैसे मनरूप पक्षी है सो रागद्वेषरूप पाँखोके कट जानेसे विकल्परूप भ्रमणसे रहित हो जाता है ।


चित्तप्लवङ्गदुर्वृत्तं स हि नूनं विजेष्यति ।
यो रागद्वेषसंतानतरुमूलं निकृन्तति ॥28॥

अर्थ: जो पुरुष रागद्वेषके संतानरूप वृक्षकी जडको काटता है वह पुरुष चित्तरूप बंदरके दुर्वृत्तविकाररूप भ्रमणको अवश्य ही जीतेगा ।


अयं मोहवशाज्जन्तुः क्रुध्यति द्वेष्टि रज्यते ।
अर्थेष्वन्यस्वभावेषु तस्मान्मोहो जगज्जयी ॥29॥

अर्थ: यह प्राणी मोहके वशसे अन्य स्वरूप पदार्थोंमें क्रोध करता है, द्वेष करता है, तथा राग भी करता है इस कारण मोह ही जगतको जीतनेवाला है ।


रागद्वेषविषोद्यानं मोहबीजं जिनैर्मतम् ।
अतः स एव निःशेषदोषसेनानरेश्वरः ॥30॥

अर्थ: इस रागद्वेषरूप विषवनका बीज मोह ही है ऐसा भगवानने कहा है । इस कारण यह मोह ही समस्त दोषोंकी सेनाका राजा है ।


असावेव भवोद्भूतदाववह्निः शरीरिणाम् ।
तथा दृढतरानन्तकर्मबन्धनिबन्धनम् ॥31॥

अर्थ: यह मोह ही जीवोंके संसारमें उत्पन्न हुआ दावानल है तथा अतिशय दृढ अनन्त कर्मबन्धनका कारण है ।


रागादिगहने खिन्नं मोहनिद्रावशीकृतम् ।
जगन्मिथ्याग्रहाविष्टं जन्मपङ्के निमज्जति ॥32॥

अर्थ: यह जगत् रागादिके गहन वनमें खेदखिन्न हुआ, मोहरूप निद्राके वशीभूत होकर, मिथ्यात्वरूपी पिशाच सहित होनेसे संसाररूपी कीचडमें डूबता है । यहाँ खेद निद्रा पिशाच ये तीनों ही बेखबर होनेके कारण हैं, यह आत्मा इन कारणोंसे अपनेको भूलकर कीचरूप संसारमें डुबाता है ।


स पश्यति मुनिः साक्षाद्विश्वमध्यक्षमञ्जसा ।
यः स्फोटयति मोहाख्यं पटलं ज्ञानचक्षुषा ॥33॥

अर्थ: जो मुनि मोहरूपी पटलको दूर करता है वह मुनि शीघ्र ही समस्त लोकको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे साक्षात्-प्रत्यक्ष (प्रगट) देखता है ।


इयं मोहमहाज्वाला जगत्त्रयविसर्पिणी ।
क्षणादेव क्षयं याति प्लाव्यमाना शमाम्बुभिः ॥34॥

अर्थ: यह मोहरूप महा अग्निकी ज्वाला तीन जगतमें फैलनेवाली है, इसको शांतभावरूप जलसे सेचन किया जाय तो यह क्षण मात्रमें क्षय हो जाती है ।


यस्मिन्सत्येव संसारी यद्वियोगे शिवीभवेत् ।
जीवः स एव पापात्मा मोहमल्लो निवार्यताम् ॥35॥

अर्थ: हे आत्मन् ! जिस मोहमल्लके होनेसे यह जीव संसारी है और जिसके वियोग होनेसे मोक्षस्वरूप होता है वही यह पापी मोहमल्ल है सो इसे निवारण कर ।


यत्संसारस्य वैचित्र्यं नानात्वं यच्छरीरिणाम् ।
यदात्मीयेष्वनात्मास्था तन्मोहस्यैव वल्गितम् ॥36॥

अर्थ: जीवोंके जो संसारकी विचित्रता, अनेकप्रकारता तथा अपने भावोंसे अनात्मपनेकी आस्था है सो ये सब मोहके ही विलास हैं अर्थात् मोहकी ही चेष्टा है ।


रागादिवैरिणः क्रूरान्मोहभूपेन्द्रपालितान् ।
निकृत्य शमशस्त्रेण मोक्षमार्गं निरूपय ॥37॥

अर्थ: हे आत्मन् ! मोहरूपी राजाके पाले हुए क्रूर रागादि शत्रुओंको शान्तभावरूप शस्त्रसे छेदन करके मोक्षमार्गका अवलोकन कर ।


इति मोहवीरवृत्तं रागादिवरूथिनीसमाकीर्णम् ।
सुनिरूप्य भावशुद्ध्या यतस्व तद्बन्धमोक्षाय ॥38॥

अर्थ: हे आत्मन् ! इस प्रकार मोहरूपी सुभटका वृत्तान्त है; सो यह रागादिरूपी सेनाके सहित है, इस कारण इसे भले प्रकार विचार करके इसके बंधसे छूटनेके लिये यत्न कर ।

सर्ग 24: साम्यभाव का वर्णन (श्लोक 1 से 33)

मोहवह्निमपाकर्त्तुं स्वीकर्त्तुं संयमश्रियम् ।
छेत्तुं रागद्रुमोद्यानं समत्वमवलम्ब्यताम् ॥1॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू मोहरूप अग्निको बुझानेके लिये और संयमरूपी लक्ष्मीको ग्रहण करनेके लिये तथा रागरूप वृक्षोंके समूहको काटनेके लिये समभावका (समताका) अवलंबन कर ऐसा उपदेश हैं।


चिदचिल्लक्षणैर्भावैरिष्टानिष्टतया स्थितैः ।
न मुह्यति मनो यस्य तस्य साम्ये स्थितिर्भवेत् ॥2॥

अर्थ: जिस पुरुषका मन चित् (पुत्र कलत्र शत्रु मित्रादि), अचित् (धन धान्य तृणकंचनादि) इष्ट अनिष्टरूप पदार्थोके द्वारा मोहको प्राप्त नहीं होता, उस पुरुषके ही साम्यभावमें स्थिति होती है । यह साम्यभावका लक्षण है ।


विरज्य कामभोगेषु विमुच्य वपुषि स्पृहाम् ।
समत्वं भज सर्वज्ञज्ञानलक्ष्मीकुलास्पदम् ॥3॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू काम और भोगादिकमें विरक्त हो, शरीरमें वांछा-आसक्तता छोडकर समताको भज (सेव), क्योंकि यह समताभाव केवलज्ञान लक्ष्मीका (लोकालोकके जाननेका) कुलगृह है अर्थात् वह लक्ष्मी समभावमें ही है ।


छित्वा प्रशमशस्त्रेण भवव्यसनवागुराम् ।
मुक्तेः स्वयंवरागारं वीर व्रज शनैः शनैः ॥4॥

अर्थ: हे आत्मन् ! हे वीर ! तू शांतभावरूपी शस्त्रसे सांसारिक कष्टरूप (आपदारूप) फाँसीको छेदकर मुक्तिरूप स्त्रीके स्वयंवरके स्थानको शनैः शनैः गमन कर ।


साम्यसूर्यांशुभिर्भिन्ने रागादितिमिरोत्करे ।
प्रपश्यति यमी स्वस्मिन्स्वरूपं परमात्मनः ॥5॥

अर्थ: संयमी मुनि समभावरूपी सूर्यकी किरणोंसे रागादि तिमिरसमूहके नष्ट होने पर परमात्माका स्वरूप अपनेमें ही अवलोकन करता है ।


साम्यसीमानमालम्ब्य कृत्वात्मन्यात्मनिश्चयम् ।
पृथक् करोति विज्ञानी संश्लिष्टे जीवकर्मणी ॥6॥

अर्थ: भेदविज्ञानी पुरुष है सो समभावकी सीमाका अवलंबन करके तथा अपनेमें ही अपने आत्माका निश्चय करके, मिले हुए जीव और कर्मको पृथक्-पृथक् करता है ।


साम्यवारिणि शुद्धानां सतां ज्ञानैकचक्षुषाम् ।
इहैवानन्तबोधादिराज्यलक्ष्मीः सखी भवेत् ॥7॥

अर्थ: जो समभावरूपी जलसे शुद्ध हुए हैं और जिनके ज्ञान ही नेत्र है ऐसे सत्पुरुषोंके इस ही जन्ममें अनन्त ज्ञानादिक लक्ष्मी सखी होती हैं ।


भावयस्व तथाऽऽत्मानं समत्वेनातिनिर्भरम् ।
न यथा द्वेषरागाभ्यां गृह्णात्यर्थकदम्बकम् ॥8॥

अर्थ: हे आत्मन् ! अपने आत्माको तू समभावसे अति निर्भररूप इस प्रकार भाव, कि जिस प्रकारसे यह आत्मा रागद्वेषादिकसे पदार्थोके समूहको ग्रहण न करे ।


रागादिविपिनं भीमं मोहशार्दूलपालितम् ।
दग्धं मुनिमहावीरैः साम्यधूमध्वजार्चिषा ॥9॥

अर्थ: यह रागादिकरूप भयानक वन है सो मोहरूपी सिंहके द्वारा रक्षित है, उस वनको मुनिरूपी महासुभटोने समभावरूप अग्निकी ज्वालासे दग्ध कर दिया है ।


मोहपङ्के परिक्षीणे शीर्णे रागादिबन्धने ।
नृणां हृदि पदं धत्ते साम्यश्रीर्विश्ववन्दिता ॥10॥

अर्थ: पुरुषोंके हृदयमें मोहरूपी कर्दमके सूखनेसे तथा रागादि बन्धनोंके दूर होने पर जगत्पूज्या समभावरूपी लक्ष्मी निवास करती है ।


आशाः सद्यो विपद्यन्ते यान्त्यविद्याः क्षयं क्षणात् ।
म्रियते चित्तभोगीन्द्रो यस्य सा साम्यभावना ॥11॥

अर्थ: जिस पुरुषके समभावकी भावना है उसके आशाएँ तो तत्काल नाश हो जाती हैं, अविद्या क्षणभरमें क्षय हो जाती है, उसी प्रकार चित्तरूपी सर्प भी मर जाता है अर्थात् भ्रमणसे रहित हो जाता है। यही समभावनाका फल है ।


साम्यकोटिं समारूढो यमी जयति कर्म यत् ।
निमिषान्तेन तज्जन्मकोटिभिस्तपसेतरः ॥12॥

अर्थ: समभावकी हदपर आरूढ हुआ संयमी मुनि जो नेत्रके टिमकार मात्रसे कर्मको जीतता है अर्थात् कर्मोंका क्षय करता है, उतना समभावरहित इतर पुरुष कोटि तपोंके करने पर भी नहीं कर सकता, यह साम्यभावका माहात्म्य है ।


साम्यमेव परं ध्यानं प्रणीतं विश्वदर्शिभिः ।
तस्यैव व्यक्तये नूनं मन्येऽयं शास्त्रविस्तरः ॥13॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि सर्वज्ञ भगवानने साम्यभावको ही उत्कृष्ट ध्यान कहा है और यह शास्त्रोंका विस्तार है सो निश्चयतः उस साम्यभावको प्रगट करनेके लिये ही है, ऐसा मैं मानता हूँ ।


साम्यभावितभावानां स्यात्सुखं यन्मनीषिणाम् ।
तन्मन्ये ज्ञानसाम्राज्यसमत्वमवलम्बते ॥14॥

अर्थ: आचार्य महाराज कहते हैं कि साम्यभावोंसे पदार्थोंके विचार करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंके जो सुख होता है सो मैं ऐसा मानता हूँ कि वह ज्ञानसाम्राज्य (केवलज्ञान) की समताको अवलम्बन करता है ।


यः स्वभावोत्थितां साध्वीं विशुद्धिं स्वस्य वाञ्छति ।
स धारयति पुण्यात्मा समत्वाधिष्ठितं मनः ॥15॥

अर्थ: जो पुरुष अपने स्वभावसे उत्पन्न हुई समीचीन विशुद्धताको चाहता है सो पुरुष अपने मनको समभावों सहित धारता है । वही पुण्यात्मा है, महाभाग्य है ।


तनुत्रयविनिर्मुक्तं दोषत्रयविवर्जितम् ।
यदा वेत्त्यात्मनात्मानं तदा साम्ये स्थितिर्भवेत् ॥16॥

अर्थ: जिस समय यह आत्मा अपने आत्माको औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंसे तथा रागद्वेषमोहसे रहित जानता है तब ही समभावमें स्थिति (स्थिरता) होती है ।


अशेषपरपर्यायैरन्यद्रव्यैर्विलक्षणम् ।
निश्चिनोति यदात्मानं तदा साम्यं प्रसूयते ॥17॥

अर्थ: जिस समय यह आत्मा अपनेको समस्त परद्रव्योंकी पर्यायोंसे तथा परद्रव्योंसे विलक्षण भिन्नस्वरूप निश्चय करता है उसी काल साम्यभाव उत्पन्न होता है ।


तस्यैवाविचलं सौख्यं तस्यैव पदमव्ययम् ।
तस्यैव बन्धविश्लेषः समत्वं यस्य योगिनः ॥18॥

अर्थ: जिस योगीश्वरके समभाव है उसके ही तो अविचल सुख है और उसके ही अविनाशी पद और कर्मबन्धकी निर्जरा है ।


यस्य हेयं न चादेयं जगद्विश्वं चराचरम् ।
स्यात्तस्यैव मुनेः साक्षाच्छुभाशुभमलक्षयः ॥19॥

अर्थ: जिस मुनिके चराचररूप समस्त जगतमें न तो कोई हेय है और न उपादेय है, उस मुनिके ही शुभाशुभरूप कर्मरूपी मैलका साक्षात् क्षय है ।


शाम्यति जन्तवः क्रूरा बद्धवैराः परस्परम् ।
अपि स्वार्थे प्रवृत्तस्य मुनेः साम्यप्रभावतः ॥20॥

अर्थ: इस साम्यके प्रभावसे अपने स्वार्थमें प्रवृत्त मुनिके निकट परस्पर वैर करनेवाले क्रूर जीव भी शान्त हो जाते हैं ।


भजन्ति जन्तवो मैत्रीमन्योऽन्यं त्यक्तमत्सराः ।
समत्वालम्बिनां प्राप्य पादपद्मार्चितां क्षितिम् ॥21॥

अर्थ: समभावका अवलंबन करनेवाले मुनियोंके चरणकमलोंके प्रभावसे पूजनीय पृथ्वीको प्राप्त होने पर प्राणीजन परस्परका ईर्ष्याभाव छोडकर मित्रताको प्राप्त हो जाते हैं ।


शाम्यन्ति योगिभिः क्रूराः जन्तवो नेति शङ्क्यते ।
दावदीप्तमिवारण्यं यथा वृष्टैर्बलाहकैः ॥22॥

अर्थ: योगीगण क्रूर जीवोंको उपाय करके शान्तरूप करते हैं ऐसी शंका कदापि नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जैसे दावानलसे जलता हुआ वन स्वयमेव मेघ बरसनेसे शान्त हो जाता है उसी प्रकार मुनियोंके तपके प्रभावसे स्वयं ही क्रूर जीव समतारूप प्रवर्तने लग जाते हैं; योगीश्वर उनको प्रेरणा कदापि नहीं करते ।


भवन्त्यतिप्रसन्नानि कश्मलान्यपि देहिनाम् ।
चेतांसि योगिसंसर्गेऽगस्त्ययोगे जलानिवत् ॥23॥

अर्थ: जिस प्रकार शरद ऋतुमें अगस्त्य ताराके संसर्ग होनेसे जल निर्मल हो जाता है, उसी प्रकार समतायुक्त योगीश्वरोंकी संगतिसे जीवोंके मलिन चित्त भी प्रसन्न अर्थात् निर्मल हो जाते हैं ।


क्षुभ्यन्ति ग्रहयक्षकिन्नरनरास्तुष्यन्ति नाकेश्वराः
मुञ्चन्ति द्विपदैत्यसिंहशरभव्यालादयः क्रूरताम् ।
रुग्वैरप्रतिबन्धविभ्रमभयभ्रष्टं जगज्जायते
स्याद्योगीन्द्रसमत्वसाध्यमथवा किं किं न सद्यो भुवि ॥24॥

अर्थ: समभावयुक्त योगीश्वरोंके प्रभावसे ग्रह यक्ष किन्नर मनुष्य ये क्षोभको प्राप्त होते हैं और नाकेश्वर अर्थात् इन्द्रगण हर्षित होते हैं तथा हाथी दैत्य सिंह अष्टापद सर्प इत्यादि क्रूर प्राणी अपनी क्रूरताको छोड देते हैं और यह जगत् रोग वैर प्रतिबन्ध विभ्रम भयादिकसे रहित हो जाता है । इस पृथ्वीमें ऐसा कौनसा कार्य है, जो योगीश्वरोंके समभावोंसे साध्य न हो अर्थात् समभावोंसे सर्व मनोवांछित सधते हैं ।


चन्द्रः सान्द्रैर्विकिरति सुधामंशुभिर्जीवलोके
भास्वानुग्रैः किरणपटलैरुच्छिनत्त्यन्धकारम् ।
धात्री धत्ते भुवनमखिलं विश्वमेतच्च वायु -
र्यद्वत्साम्याच्छमयति तथा जन्तुजातं यतीन्द्रः ॥25॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमा जगतमें किरणोंसे सघन झरता हुआ अमृत वर्षाता है और सूर्य तीव्र किरणोंके समूहसे अन्धकारका नाश करता है तथा पृथ्वी समस्त भुवनोंको धारण करती है, तथा पवन है सो इस समस्त लोकको धारण करता है, उसी प्रकार मुनीश्वर महाराज भी साम्यभावोंसे जीवोंके समूहको शान्तभावरूप करते हैं ।


सारङ्गी सिंहशावं स्पृशति सुतधिया नन्दिनी व्याघ्रपोतं
मार्जारी हंसबालं प्रणयपरवशा केकिकान्ता भुजङ्गम् ।
वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जन्तवोऽन्ये त्यजन्ति
श्रित्वा साम्यैकरूढं प्रशमितकलुषं योगिनं क्षीणमोहम् ॥26॥

अर्थ: क्षीण हो गया है मोह जिसका और शान्त हो गया है कलुष कषायरूप मैल जिसका ऐसे समभावोंमें आरूढ हुए योगीश्वरको आश्रय करके हरिणी तो सिंहके बालकको अपने पुत्रकी बुद्धिसे स्पर्श करती वा प्यार करती है और गौ है सो व्याघ्रके बच्चेको पुत्रकी बुद्धिसे प्यार करती है; मार्जारी हंसके बच्चेको स्नेहकी दृष्टिसे वशीभूत हो स्पर्शती है तथा मयूरनी सर्पके बच्चेको प्यार करती है; इसी प्रकार अन्य प्राणी भी जन्मसे जो बैर है उसको मदरहित हो छोड देते हैं। यह साम्यभावका ही प्रभाव है ।


एकः पूजां रचयति नरः पारिजातप्रसूनैः
क्रुद्ध कण्ठे क्षिपति भुजगं हन्तुकामस्ततोऽन्यः ।
तुल्या वृत्तिर्भवति च तयोर्यस्य नित्यं स योगी
साम्यारामं विशति परमज्ञानदत्तावकाशम् ॥27॥

अर्थ: जिस मुनिकी ऐसी वृत्ति हो कि कोई तो नम्रीभूत होकर पारिजातके पुष्पोंसे पूजा करता है और कोई मनुष्य क्रुद्ध होकर मारनेकी इच्छासे गलेमें सर्पकी माला पहनाता है, इन दोनोंमें ही जिसकी सदा रागद्वेषरहित समभावरूप वृत्ति हो, वही योगीश्वर समभावरूपी आराम (क्रीडावन) में प्रवेश करता है, और ऐसे समभावरूप क्रीडावनमें ही केवलज्ञानके प्रकाश होनेका अवकाश है ।


नोऽरण्यान्नगरं न मित्रमहिताल्लोष्टान्न जाम्बूनदं
न स्रग्दाम भुजङ्गमान्न दृषदस्तल्पं शशाङ्कोज्ज्वलम् ।
यस्यान्तःकरणे बिभर्ति कलया नोत्कृष्टतामीषद-
प्यार्यास्तं परमोपशान्तपदवीमारूढमाचक्षते ॥28॥

अर्थ: जिस मुनिके मनमें वनसे नगर, शत्रुसे मित्र, लोष्टसे कांचन (सुवर्ण), रस्सी व सर्पसे पुष्पमाला, पाषाणशिलासे चन्द्रमासमान उज्ज्वल शय्या, इत्यादि पदार्थ अन्तःकरणकी कल्पनासे किंचिन्मात्र भी उत्कृष्ट नहीं दीखते उस मुनिको आर्य सत्पुरुष परम उपशान्तरूप पदवीको प्राप्त हुआ कहते हैं।


सौधोत्सङ्गे स्मशाने स्तुतिशपनविधौ कर्दमे कुंकुमे वा
पल्यङ्के कण्टकाग्रे दृषदि शशिमणौ चर्मचीनांशुकेषु ।
शीर्णाङ्गे दिव्यनार्यामसमशमवशाद्यस्य चित्तं विकल्पै-
र्नालीढं सोऽयमेकः कलयति कुशलः साम्यलीलाविलासं ॥29॥

अर्थ: जिस मुनिका चित्त महलोंके शिखरमें और स्मशानमें तथा स्तुति और निन्दाके विधानमें, कीचड और केशरमें, पल्यंक-शय्या और कांटोंके अग्रभागमें, पाषाण और चन्द्रकान्त मणिमें, चर्म और चीनदेशीय रेशमके वस्त्रोंमें, और क्षीणशरीर व सुन्दर स्त्रीमें अतुल्य शान्तभावके प्रभावसे विकल्पोंसे स्पर्शित न हो, वही एक प्रवीणमुनि समभावकी लीलाके विलासका अनुभव करता है; अर्थात् वास्तविक समभाव ऐसे मुनिके ही जानना ।


चलत्यचलमालेयं कदाचिद्दैवयोगतः ।
नोपसर्गैरपि स्वान्तं मुनेः साम्यप्रतिष्ठितम् ॥30॥

अर्थ: यह प्रत्यक्ष अचल पर्वतोंकी श्रेणी कदाचित् चलायमान भी हो जाय तो आश्चर्य नहीं; किन्तु साम्यभावमें प्रतिष्ठित मुनिका चित्त उपसर्गोंसे कदापि नहीं चलता, ऐसा लीन हो जाता है ।


उन्मत्तमथ विभ्रान्तं दिग्मूढं सुप्तमेव वा ।
साम्यस्थस्य जगत्सर्वं योगिनः प्रतिभासते ॥31॥

अर्थ: साम्यभावमें स्थित मुनिको यह जगत् ऐसा भासता है कि मानों यह जगत् उन्मत्त है वा विभ्रमरूप है अथवा दिशा भूला हुआ अथवा सोता है ।


वाचस्पतिरपि ब्रूते यद्यजस्रं समाहितः ।
वक्तुं तथाऽपि शक्नोति न हि साम्यस्य वैभवम् ॥32॥

अर्थ: इस साम्यके विभवको यदि बृहस्पति भी स्थिरचित्त होकर निरन्तर कहे तो भी कहनेको समर्थ नहीं होता ।


दुष्प्रज्ञाबललुप्तवस्तुनिचया विज्ञानशून्याशया
विद्यन्ते प्रतिमन्दिरं निजनिजस्वार्थोदिता देहिनः ।
आनन्दामृतसिन्धुशीकरचयैर्निर्वाप्य जन्मानलं
ये मुक्तेर्वदनेन्दुवीक्षणपरास्ते सन्ति द्वित्रा यदि ॥33॥

अर्थ: जिन्होंने अपनी दुर्बुद्धिके बलसे समस्त वस्तुके समूहका लोप कर दिया और जिनका चित्त विज्ञानसे शून्य है ऐसे पुरुष तो घर-घरमें विद्यमान हैं, और अपने-अपने प्रयोजनको साधनेमें तत्पर हैं; किन्तु जो समभावजनित आनंदामृत समुद्रके जलकणोंके समूहसे संसाररूप अग्निको बुझा कर मुक्तिरूपी स्त्रीके वदनचन्द्रमाको देखनेमें तत्पर हैं ऐसे महापुरुष यदि हैं तो दो वा तीन ही हैं ।

सर्ग 25: आर्त्तध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 43)

साम्यश्रीर्नातिनिःशङ्कं सतामपि हृदि स्थितिम् ।
धत्ते सुनिश्चलध्यानसुधासम्बन्धवर्जिते ॥1॥

अर्थ: सत्पुरुषोंका हृदय यदि भले प्रकार निश्चल ध्यानरूप अमृतके सम्बन्धसे रहित हो तो उसमें यह साम्यरूप लक्ष्मी अति निःशंकतासे अपनी स्थिति धारण नहीं करती।


यस्य ध्यानं सुनिष्कम्पं समत्वं तस्य निश्चलम् ।
नानयोर्विद्ध्यधिष्टानमन्योऽन्यं स्याद्विभेदतः ॥2॥

अर्थ: जिस पुरुषके ध्यान निश्चल है उसके समभाव भी निश्चल है। इस दोनोंके अधिष्ठान (आधार) परस्पर भेदसे नहीं है अर्थात् ध्यानका आधार समभाव है और समभावका आधार ध्यान है ।


साम्यमेव न सद्ध्यानात्स्थिरीभवति केवलम् ।
शुद्ध्यत्यपि च कर्मौघकलङ्की यन्त्रवाहकः ॥3॥

अर्थ: समीचीन प्रशस्त ध्यानसे केवल साम्य ही स्थिर नहीं होता, किन्तु कर्मके समूहसे मलिन यह यन्त्रवाहक जीव भी शुद्ध होता है अर्थात् ध्यानसे कर्मोंका क्षय भी होता है ।


यदैव संयमी साक्षात्समत्वमवलम्बते ।
स्यात्तदैव परं ध्यानं तस्य कर्मौघघातकम् ॥4॥

अर्थ: जिस समय संयमी साक्षात् समभावका अवलंबन करता है, उसी समय उसके कर्मसमूहका घात करनेवाला ध्यान होता है !


अनादिविभ्रमोद्भूतं रागादितिमिरं घनम् ।
स्फुटयत्याशु जीवस्य ध्यानार्कः प्रविजृम्भितः ॥5॥

अर्थ: अनादिकालके विभ्रमसे उत्पन्न हुआ रागादिक अन्धकार अति निबिड (सघन) है सो ध्यानरूपी सूर्य उदय होकर जीवके उस अन्धकारको तत्काल दूर कर देता है ।


भवज्वलनसम्भूतमहादाहप्रशान्तये ।
शश्वद्ध्यानाम्बुधेर्धीरैरवगाहः प्रशस्यते ॥6॥

अर्थ: संसाररूपी अग्निसे उत्पन्न हुए बडे आतपकी प्रशान्तिके लिये धीरवीर पुरुषोंके द्वारा ध्यानरूपी समुद्रका अवगाहन (स्नान) करना ही प्रशंसा किया जाता है ।


ध्यानमेवापवर्गस्य मुख्यमेकं निबन्धनम् ।
तदेव दुरितव्रातगुरुकक्षहुताशनम् ॥7॥

अर्थ: यह प्रशस्तध्यान ही मोक्षका एक प्रधान कारण है, और यह ही पापके समूहरूपी महावनके दग्ध करनेको अग्निके समान है ।


अपास्य खण्डविज्ञानरसिकां पापवासनाम् ।
असद्ध्यानानि चादेयं ध्यानं मुक्तिप्रसाधकम् ॥8॥

अर्थ: खण्डविज्ञान कहिये क्षयोपशम रागादि सहित ज्ञानमें आसक्तरूप पापकी वासनाको तथा अन्यान्य मतावलम्बियोंके माने हुए आर्त्त रौद्रादि असत् ध्यानोंको छोडकर मुक्तिको साधनेवाले ध्यानका आदर करना चाहिये अर्थात् ग्रहण करना चाहिये ।


अहो कैश्चिन्महामूढैरज्ञैः स्वपरवञ्चकैः ।
ध्यानान्यपि प्रणीतानि श्वभ्रपाताय केवलम् ॥9॥

अर्थ: अहो ! आश्चर्य है कि अनेक महामूर्ख अज्ञानी स्वपरको वंचनेवालोंने ध्यान भी केवल नरकमें ले जानेवाले कहे हैं ।


विषायतेऽमृतं यत्र ज्ञानं मोहायतेऽथवा ।
ध्यानं श्वभ्रायते कष्टं नृणां चित्रं विचेष्टितम् ॥10॥

अर्थ: यह बडा खेद है कि जहाँ अमृत तो विषके लिये होता है और ज्ञान मोहके लिये होता है और ध्यान नरकके लिये होता है सो जीवोंकी यह विपरीत चेष्टा आश्चर्य उत्पन्न करती है।


अभिचारपरैः कैश्चित्कामक्रोधादिवञ्चितैः ।
भोगार्थमरिघातार्थं क्रियते ध्यानमुद्धतैः ॥11॥

अर्थ: अभिचार कहिये वश्यांजनादिक व्यापार ही है आशय जिनके ऐसे तथा कई एक कामक्रोधादिकसे वंचित हुए उद्धत पुरुषोंके द्वारा भोगोंके लिये और शत्रुओंके घातके लिये ध्यान किया जाता है ।


ख्यातिपूजाभिमानार्त्तैः कैश्चिच्चोक्तानि सूरिभिः ।
पापाभिचारकर्माणि क्रूरशास्त्राण्यनेकधा ॥12॥

अर्थ: तथा कितनेक अन्यमती आचार्योंने ख्याति पूजा अभिमानसे पीडित होकर पापकार्योंकी विधिवाले अनेक शास्त्र रचे हैं सो वे पापी हैं, अनाप्त हैं, कुमार्गको चलानेवाले हैं, ठग हैं, दीन हैं, दोनों लोकके मार्गसे भ्रष्ट हैं, अनात्मज्ञ हैं अर्थात् जिनको अपने आत्माका ज्ञान नहीं है । वे मूर्खोंमें ही अत्यन्त भयके देनेवाले ध्यानका उपदेश करें, विवेकी (ज्ञानी) पुरुष तो उनका उपदेश कदापि अंगीकार नहीं करते ॥१२-१३॥


अनाप्ता वञ्चकाः पापाः दीना मार्गद्वयच्युताः ।
दिशंत्वज्ञेष्वनात्मज्ञा ध्यानमत्यन्तभीतिदम् ॥13॥

अर्थ: तथा कितनेक अन्यमती आचार्योंने ख्याति पूजा अभिमानसे पीडित होकर पापकार्योंकी विधिवाले अनेक शास्त्र रचे हैं सो वे पापी हैं, अनाप्त हैं, कुमार्गको चलानेवाले हैं, ठग हैं, दीन हैं, दोनों लोकके मार्गसे भ्रष्ट हैं, अनात्मज्ञ हैं अर्थात् जिनको अपने आत्माका ज्ञान नहीं है । वे मूर्खोंमें ही अत्यन्त भयके देनेवाले ध्यानका उपदेश करें, विवेकी (ज्ञानी) पुरुष तो उनका उपदेश कदापि अंगीकार नहीं करते ॥१२-१३॥


संसारसंभ्रमश्रान्तो यः शिवाय विचेष्टते ।
स युक्त्यागमनिर्णीते विवेच्य पथि वर्त्तते ॥14॥

अर्थ: जो पुरुष संसारके भ्रमणसे खेदखिन्न होकर मोक्षके लिये चेष्टा करता है वह तो विचारकर युक्ति और आगमसे निर्णय किये हुए मार्गमें ही प्रवर्त्तता है, उन ठगोंके प्ररूपण किये मार्गमें कदापि नहीं प्रवर्त्तता ।


उत्कृष्टकायबन्धस्य साधोरन्तर्मुहूर्त्ततः ।
ध्यानमाहुरथैकाग्रचिन्तारोधो बुधोत्तमाः ॥15॥

अर्थ: उत्कृष्ट है कायका बंध कहिये संहनन जिसके ऐसे साधुका अन्तर्मुहूर्त्तपर्यन्त एकाग्र चिन्ताके रोधनेको पंडितजन ध्यान कहते हैं। वही उमास्वामी महाराजने तत्त्वार्थसूत्रमें कहा है कि- ‘‘उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्त्तात् ॥’’ अर्थात् उत्तम संहननवाले पुरुषके एकाग्र चिन्ताका रोध ही ध्यान है सो यह अन्तर्मुहूर्त्तपर्यन्त ही रहता है। इस प्रकार पूर्वाचार्योंने ध्यानका लक्षण कहा है ।


एकचिन्तानिरोधो यस्तद्ध्यानं भावना परा ।
अनुप्रेक्षार्थचिन्ता वा तज्ज्ञैरभ्युपगम्यते ॥16॥

अर्थ: जो एक चिन्ताका निरोध है - एक ज्ञेयमें ठहरा हुआ है वह तो ध्यान है और इससे भिन्न है सो भावना है। उसे ध्यानके और भावनाके जाननेवाले विद्वान् अनुप्रेक्षा अथवा अर्थचिन्ता भी कहते हैं ।


प्रशस्तेतरसंकल्पवशात्तद्भिद्यते द्विधा ।
इष्टानिष्टफलप्राप्तेर्बीजभूतं शरीरिणाम् ॥17॥

अर्थ: वह पूर्वोक्त ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त भेदसे दो प्रकारका है, सो जीवोंके इष्टअनिष्टरूप फलकी प्राप्तिका बीजभूत है ।


अस्तरागो मुनिर्यत्र वस्तुतत्त्वं विचिन्तयेत् ।
तत्प्रशस्तं मतं ध्यानं सूरिभिः क्षीणकल्मषैः ॥18॥

अर्थ: जिस ध्यानमें मुनि अस्तराग (रागरहित) हो जाय और वस्तुस्वरूपका चिन्तवन करें उसको निष्पाप आचार्योंने प्रशस्त ध्यान माना है ।


अज्ञातवस्तुतत्त्वस्य रागाद्युपहतात्मनः ।
स्वातन्त्र्यवृत्तिर्या जन्तोस्तदसद्ध्यानमुच्यते ॥19॥

अर्थ: जिसने वस्तुका यथार्थ स्वरूप नहीं जाना तथा जिसका आत्मा रागद्वेष मोहसे पीडित है ऐसे जीवकी स्वाधीन प्रवृत्तिको अप्रशस्त ध्यान कहा जाता है ।


आर्त्तरौद्रविकल्पेन दुर्ध्यानं देहिनां द्विधा ।
द्विधा प्रशस्तमप्युक्तं धर्मशुक्लविकल्पतः ॥20॥

अर्थ: जीवोंके अप्रशस्त ध्यान आर्त्त और रौद्र भेदसे दो प्रकारका है तथा प्रशस्त ध्यान भी धर्म और शुक्ल भेदसे दो प्रकारका कहा गया है ।


स्यातां तत्रार्त्तरौद्रे द्वे दुर्ध्यानेऽत्यन्तदुःखदे ।
धर्मशुक्ले ततोऽन्ये द्वे कर्मनिर्मूलनक्षमे ॥21॥

अर्थ: उक्त ध्यानोंमें आर्त्त रौद्र नामवाले दो जो अप्रशस्त ध्यान हैं वे तो अत्यन्त दुःख देनेवाले हैं, और दूसरे धर्म शुक्ल नामके दो प्रशस्त ध्यान हैं सो कर्मोंको निर्मूल करनेमें समर्थ हैं ।


प्रत्येकं च चतुर्भेदैश्चतुष्टयमिदं मतम् ।
अनेकवस्तुसाधर्म्यवैधर्म्यालम्बनं यतः ॥22॥

अर्थ: इन आर्त्त रौद्र धर्म शुक्ल ध्यानोंका चतुष्टय है, सो प्रत्येक ध्यान भिन्न-भिन्न चार-चार भेदोंवाला माना गया है; क्योंकि यह चतुष्टय अनेक वस्तुओंके साधर्म्य वैधर्म्यका अवलम्बन करनेवाला है अर्थात् परस्पर विलक्षण है ।


ऋते भवमथार्त्तं स्यादसद्ध्यानं शरीरिणाम् ।
दिग्मोहोन्मत्ततातुल्यमविद्यावासनावशात् ॥23॥

अर्थ: ऋत कहिये पीडा-दुःखमें उपजे सो आर्त्तध्यान है, सो यह ध्यान अप्रशस्त है । जैसे किसी प्राणीके दिशाओंके भूल जानेसे उन्मत्तता होती है उसके समान है, और यह ध्यान अविद्या अर्थात् मिथ्या ज्ञानकी वासनाके वशसे उत्पन्न होता है ।


अनिष्टयोगजन्माद्यं तथेष्टार्थात्ययात्परम् ।
रुक्प्रकोपात्तृतीयं स्यान्निदानार्त्तुर्यमङ्गिनाम् ॥24॥

अर्थ: पहिला आर्त्तध्यान तो जीवोंके अनिष्ट पदार्थोंके संयोगसे होता है, दूसरा आर्त्तध्यान इष्ट पदार्थके वियोगसे होता है, तीसरा आर्त्तध्यान रोगके प्रकोपकी पीडासे होता है और चौथा आर्त्तध्यान निदान कहिये आगामी कालमें भोगोंकी वांछाके होनेसे होता है । इस प्रकार चार भेद आर्त्तध्यानके हैं ।


ज्वलनवनविषास्त्रव्यालशार्दूलदैत्यैः स्थलजलबिलसत्त्वैर्दुर्जनारातिभूपैः ।
स्वजनधनशरीरध्वंसिभिस्तैरनिष्टै - र्भवति यदिह योगादाद्यमार्त्तं तदेतत् ॥25॥

अर्थ: इस जगतमें अपना स्वजन धन शरीर इनके नाश करनेवाले अग्नि जल विष शस्त्र सर्प सिंह दैत्य तथा स्थलके जीव, जलके जीव, बिलके जीव तथा दुष्ट जन वैरी राजा इत्यादि अनिष्ट पदार्थोंके संयोगसे जो हो सो पहिला आर्त्तध्यान है ।


तथा चरस्थिरैर्भावैरनेकैः समुपस्थितैः ।
अनिष्टैर्यन्मनः क्लिष्टं स्यादार्त्तं तत्प्रकीर्तितम् ॥26॥

अर्थ: तथा चर और स्थिर अनेक अनिष्ट पदार्थोंके प्राप्त होने पर जो मन क्लेशरूप हो उसको भी आर्त्तध्यान कहा है ।


श्रुतैर्दृष्टैः स्मृतैर्ज्ञातैः प्रत्यासत्तिं च संसृतैः ।
योऽनिष्टार्थैर्मनःक्लेशः पूर्वमार्त्तं तदिष्यते ॥27॥

अर्थ: तथा जो सुने देखे स्मरणमें आये जाने हुए तथा निकट प्राप्त हुए अनिष्ट पदार्थोंसे मनको क्लेश हो उसे पहिला आर्त्तध्यान कहते हैं ।


अशेषानिष्टसंयोगे तद्वियोगानुचिन्तनम् ।
यत्स्यात्तदपि तत्त्वज्ञैः पूर्वमार्त्तं प्रकीर्त्तितम् ॥28॥

अर्थ: जो समस्त प्रकारके अनिष्ट पदार्थोंके संयोग होने पर उनके वियोग होनेका वारंवार चिन्तवन हो उसे भी तत्त्वके जाननेवालोंने पहिला अनिष्टसंयोग नामा आर्त्तध्यान कहा है ।


राज्यैश्वर्यकलत्रबान्धवसुहृत्सौभाग्यभोगात्यये
चित्तप्रीतिकरप्रसन्नविषयप्रध्वंसभावेऽथवा ।
संत्रासभ्रमशोकमोहविवशैर्यत्खिद्यतेऽहर्निशं
तत्स्यादिष्टवियोगजं तनुमतां ध्यानं कलङ्कास्पदम् ॥29॥

अर्थ: जो राज्य ऐश्वर्य स्त्री कुटुंब मित्र सौभाग्य भोगादिके नाश होने पर, तथा चित्तको प्रीति उत्पन्न करनेवाले सुन्दर इन्द्रियोंके विषयोंका प्रध्वंसभाव होते हुए, संत्रास पीडा भ्रम शोक मोहके कारण निरन्तर खेदरूप होना सो जीवोंके इष्टवियोगजनित आर्त्तध्यान है, और यह ध्यान पापका स्थान है ।


दृष्टश्रुतानुभूतैस्तैः पदार्थैश्चित्तरञ्जकैः ।
वियोगे यन्मनः खिन्नं स्यादार्त्तं तद्द्वितीयकम् ॥30॥

अर्थ: देखे सुने अनुभवे मनको रंजायमान करनेवाले पूर्वोक्त् पदार्थोका वियोग होनेसे जो मनको खेद हों वह भी दूसरा आर्त्तध्यान है ।


मनोज्ञवस्तुविध्वंसे मनस्तत्संगमार्थिभिः ।
क्लिश्यते यत्तदेतत्स्याद्द्वितीयार्त्तस्य लक्षणम् ॥31॥

अर्थ: अपने मनकी प्यारी वस्तुके विध्वंस होनेपर पुनः उसकी प्राप्तिके लिये जो क्लेशरूप होना सो दूसरे आर्त्तध्यानका लक्षण है। इस प्रकार दूसरा आर्त्तध्यान कहा ।


कासश्वासभगन्दरोदरजराकुष्ठातिसारज्वरैः ।
पित्तश्लेष्ममरुत्प्रकोपजनितैरोगैः शरीरान्तकैः ।
स्यात्सत्त्वप्रबलैः प्रतिक्षणभवैर्यद्व्याकुलत्वं नृणां
तद्रोगार्त्तमनिन्दितैः प्रकटितं दुर्वारदुःखाकरं ॥32॥

अर्थ: वातपित्तकफके प्रकोपसे उत्पन्न हुए, शरीरको नाश करनेवाले, वीर्यसे प्रबल और क्षण-क्षणमें उत्पन्न होनेवाले कास श्वास भगंदर जलोदर जरा कोढ अतिसार ज्वरादिक रोगोंसे मनुष्योंके जो व्याकुलता होती है उसे अनिंदित पुरुषोने रोगपीडाचिन्तवननामा आर्त्तध्यान कहा है । यह ध्यान दुर्निवार और दुःखोंका आकर है, जो कि आगामी कालमें पापबन्धका कारण है ।


स्वल्पानामपि रोगाणां माभूत्स्वप्नेऽपि संभवः ।
ममेति या नृणां चिंता स्यादार्त्तं तत्तृतीयकम् ॥33॥

अर्थ: जीवोंके ऐसी चिंता हो कि मेरे किंचित् भी रोगकी उत्पत्ति स्वप्नमें भी न हो ऐसा चिंतवना सो तीसरा आर्त्तध्यान है ।


भोगा भोगीन्द्रसेव्यास्त्रिभुवनजयिनी रूपसाम्राज्यलक्ष्मी
राज्यं क्षीणारिचक्रं विजितसुरवधूलास्यलीलायुवत्यः ।
अन्यच्चानन्दभूतं कथमिह भवतीत्यादि चिन्तासुभाजां
यत्तद्भोगार्त्तमुक्तं परमगुणधरैर्जन्मसन्तानमूलं ॥34॥

अर्थ: धरणीन्द्रके सेवने योग्य तो भोग, और तीन भुवनको जीतनेवाली रूपसाम्राज्यकी लक्ष्मी, तथा क्षीण हो गये हैं शत्रुओंके समूह जिसमें ऐसा राज्य, और देवांगनाओंके नृत्यकी लीलाको जीतनेवाली स्त्री, इत्यादि और भी आनंदरूप वस्तुएँ मेरे कैसे हो, इस प्रकारके चिंतवनको परम गुणोंको धारण करनेवालोंने भोगार्त्त नामा चौथा आर्त्तध्यान कहा है । यह ध्यान संसारकी परिपाटीसे हुआ है और संसारका मूल कारण भी है ।


पुण्यानुष्टानजातैरभिलषति पदं यज्जिनेन्द्रामराणां
यद्वा तैरेव वांछत्यहितकुलकुजच्छेदमत्यन्तकोपात् ।
पूजासत्कारलाभप्रभृतिकमथवा याचते यद्विकल्पैः
स्यादार्त्तं तन्निदानप्रभवमिह नृणां दुःखदावोग्रधाम ॥35॥

अर्थ: जो प्राणी पुण्याचरणके समूहसे तीर्थंकरके अथवा देवोंके पदकी वांछा करे, अथवा उन ही पुण्याचरणोंसे अत्यन्त कोपके कारण शत्रुसमूहरूपी वृक्षोंके उच्छेदनेकी वांछा करे तथा उन विकल्पोंसे अपनी पूजा प्रतिष्ठा लाभादिककी याचना करे, उसको निदानजनित आर्त्तध्यान कहते हैं । यह ध्यान भी जीवोंको दुःखरूपी अग्निका तीव्र स्थान है ।


इष्टभोगादिसिद्ध्यर्थं रिपुघातार्थमेव वा ।
यन्निदानं मनुष्याणां स्यादार्त्तं तत्तुरीयकं ॥36॥

अर्थ: मनुष्योंके इष्ट भोगादिककी सिद्धिके लिये तथा शत्रुके घातके लिये जो निदान हो, सो चौथा आर्त्तध्यान है ।


इत्थं चतुर्भिः प्रथितैर्विकल्पैरार्त्तं समासादिह हि प्रणीतम् ।
अनन्तजीवाशयभेदभिन्नं ब्रूते समग्रं यदि वीरनाथः ॥37॥

अर्थ: इस प्रकार उक्त चार प्रसिद्ध भेदोंके साथ यहाँ संक्षेपसे आर्त्तध्यानका स्वरूप कहा । वैसे जीव अनन्त तथा उनके अभिप्राय भी चूँकि अनन्त हैं अतएव उक्त आर्त्तध्यानके भी अनंत भेद हो जाते हैं । उनका पूर्णतया निरूपण तो वीर जिनेन्द्र ही कर सकते हैं, अन्यकी सामर्थ्य नहीं है ।


अपथ्यमपि पर्यन्ते रम्यमप्यग्रिमक्षणे ।
विद्ध्यसद्ध्यानमेतद्धि षड्गुणस्थानभूमिकम् ॥38॥

अर्थ: हे आत्मन् ! यह आर्त्तध्यान प्रथम क्षणमें रमणीक है तथापि अन्तके क्षणमें अपथ्य है ऐसा इस अप्रशस्त ध्यानको जान । यह ध्यान छट्ठे गुणस्थान तक होता है, यहाँ तक ही इसके उत्पन्न होनेकी भूमि है ।


संयतासंयतेष्वेतच्चतुर्भेदं प्रजायते ।
प्रमत्तसंयतानां तु निदानरहितं त्रिधा ॥39॥

अर्थ: यह आर्त्तध्यान संयतासंयतनामा पाँचवें गुणस्थानपर्यन्त तो चार भेदरूप रहता है किन्तु छट्ठे प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें निदानरहित तीन ही प्रकारका उत्पन्न होता है ।


कृष्णनीलाद्यसल्लेश्याबलेन प्रविजृम्भते ।
इदं दुरितदावार्चिःप्रसूतेरिन्धनोपमं ॥40॥

अर्थ: यह आर्त्तध्यान कृष्ण नील कापोत इन अशुभ लेश्याओंके बलसे प्रगट होता है सो पापरूपी दावाग्निके उत्पन्न करनेको ईंधनके समान है ।


एतद्विनापि यत्नेन स्वयमेव प्रसूयते ।
अनाद्यसत्समुद्भूतसंस्कारादेव देहिनाम् ॥41॥

अर्थ: यह आर्त्तध्यान जीवोंके अनादिकालके अप्रशस्तरूप संस्कारसे, विना यत्नके, स्वयमेव उत्पन्न होता है, अर्थात् विना उपदेशके संस्कारवशतः अपनेआप प्रगट होता है ।


अनन्तदुःखसंकीर्णमस्य तिर्यग्गतेः फलम् ।
क्षायोपशमिको भावः कालश्चान्तर्मुहूर्त्तकः ॥42॥

अर्थ: इस आर्त्तध्यानका फल अनन्त दुःखोंसे व्याप्त तिर्यंचगति है और यह भाव क्षायोपशमिक है और इसका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है । एक ज्ञेय पर अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त ही रहता है, तत्पश्चात् ज्ञेयान्तर होता है ।


शङ्काशोकभयप्रमादकलहश्चित्तभ्रमोद्भ्रान्तयः
उन्मादो विषयोत्सुकत्वमसकृन्निद्राङ्गजाड्यश्रमाः ।
मूर्च्छादीनि शरीरिणामविरतं लिङ्गानि बाह्यान्यल-
मार्त्ताधिष्ठितचेतसां श्रुतधरैर्व्यावर्णितानि स्फुटम् ॥43॥

अर्थ: इस आर्त्तध्यानसे आश्रित चित्तवाले पुरुषोंके बाह्यचिह्न शास्त्रोंके पारगामी विद्वानोंने इस प्रकार कहे है कि प्रथम तो शंका होती है अर्थात् हर बातमें सन्देह होता है , फिर शोक होता है, भय होता है, प्रमाद होता है, सावधानी नहीं होती, कलह करता है, चित्तभ्रम हो जाता है, उद्भ्रान्ति हो जाती है, चित्त एक जगह नहीं ठहरता, विषयसेवनमें उत्कंठा रहती है, निरन्तर निद्रागमन होता है, अङ्गमें जडता (शिथिलता) होती है, खेद होता है, मूर्च्छा होती है; इत्यादि चिह्न आर्त्तध्यानीके प्रकट होते है ।

सर्ग 26: रौद्रध्यान का वर्णन (श्लोक 1 से 44)

रुद्राशयभवं भीममपि रौद्रं चतुर्विधम् ।
कीर्त्यमानं विदन्त्वार्याः सर्वसत्त्वाभयप्रदाः ॥1॥

अर्थ: हे समस्त जीवोंको अभयदान देनेवाले आर्य पुरुषों ! रुद्र आशयसे उत्पन्न हुआ भयानक रौदध्यान भी चार प्रकारका कहा है, उसे जानो ।


रुद्रः क्रूराशयः प्राणी प्रणीतस्तत्त्वदर्शिभिः ।
रुद्रस्य कर्मभावो वा रौद्रमित्यभिधीयते ॥2॥

अर्थ: तत्त्वदर्शी पुरुषोंने क्रूर आशयवाले प्र्णीको रुद्र कहा है; उस रुद्र प्राणीके कार्य अथवा उसके भाव (परिणाम) को रौद्र कहते है ।


हिंसानन्दान्मृषानन्दाच्चौर्यात्संरक्षणात्तथा ।
प्रभवत्यङ्गिनां शश्वदपि रौद्रं चतुर्विधम् ॥3॥

अर्थ: हिंसामें आनन्द माननेसे, तथा मृषामें (असत्य कहनेमें) आनन्द माननेसे, चोरीमें आनन्द माननेसे, और विषयोंकी रक्षा करनेमें आनन्द माननेसे जीवोंके रौद्रध्यान भी निरन्तर चार प्रकारका होता है; अर्थात् हिंसानंद, मृषानंद, चौर्यानंद और संरक्षणानंद ये चार भेद रौद्रध्यानके हैं ।


हते निष्पीडिते ध्वस्ते जन्तुजाते कदर्थिते ।
स्वेन चान्येन यो हर्षस्तद्धिंसारौद्रमुच्यते ॥4॥

अर्थ: जीवोंके समूहको अपनेसे तथा अन्यके द्वारा मारे जाने पर, पीडित किये जाने पर तथा ध्वंस करने पर और घातनेके सम्बन्ध मिलाये जाने पर जो हर्ष माना जाय उसे हिंसानंद नामा रौद्रध्यान कहते है ।


अनारतं निष्करुणस्वभावः स्वभावतः क्रोधकषायदीप्तः ।
मदोद्धतः पापमतिः कुशीलः स्यान्नास्तिको यः स हि रौद्रधामा ॥5॥

अर्थ: जो पुरुष निरंतर निर्दय स्वभाववाला हो तथा स्वभावसे ही क्रोध कषायसे प्रज्वलित हो तथा मदसे उद्धत हो, जिसकी बुद्धि पापरूप हो तथा जो कुशीली हो, व्यभिचारी हो, नास्तिक हो, वह रौद्रध्यानका घर है अर्थात् ऐसे पुरुषमें रौद्रध्यान वसता है ।


हिंसाकर्मणि कौशलं निपुणता पापोपदेशे भृशं
दाक्ष्यं नास्तिकशासने प्रतिदिनं प्राणातिपाते रतिः ।
संवासः सह निर्दयैरविरतं नैसर्गिकी क्रूरता
यत्स्याद्देहभृतां तदत्र गदितं रौद्रं प्रशान्ताशयैः ॥6॥

अर्थ: जीवोंके हिंसाकर्मसे प्रवीणता हो, पापोपदेशमें निपुणता हो, नास्तिक मतमें चातुर्य हो, जीव घातनेमें निरन्तर प्रीति हो तथा निर्दयी पुरुषोंकी निरंतर संगति हो, स्वभावसे ही क्रूरता हो, दुष्ट भाव हो, उसको प्रशान्त चित्तवाले महापुरुषोंने रौद्रध्यान कहा है ।


केनोपायेन घातो भवति तनुमतां कः प्रवीणोऽत्र हन्ता
हन्तुं कस्यानुरागः कतिभिरिह दिनैर्हन्यते जन्तुजातम् ।
हत्वा पूजां करिष्ये द्विजगुरुमरुतां कीर्तिशान्त्यर्थमित्थं
यत्स्याद्धिंसाभिनन्दो जगति तनुभृतां तद्धि रौद्रं प्रणीतम् ॥7॥

अर्थ: इस जगह जीवोंका घात किस उपायसे हो, यहाँ घात करनेमें कौन चतुर है, घात करनेमें किसके अनुराग है, यह जीवोंका समूह कितने दिनोंमें मारा जायेगा, इन जीवोंको मारकर बलि देकर कीर्ति और शान्तिके लिये ब्राह्मण गुरु देवोंकी पूजा करूँगा, इत्यादि प्रकारसे जीवोंकी हिंसा करनेमें जो आनन्द हो, उसको निश्चय करके रौद्रध्यान कहते हैं ।


गगनवनधरित्रीचारिणां देहभाजां
दलनदहनबन्धच्छेदघातेषु यत्नम् ।
दृतिनखकरनेत्रोत्पाटने कौतुकं यत्
तदिह गदितमुच्चैश्चेतसां रौद्रमित्थम् ॥8॥

अर्थ: नभश्चर पक्षी, जलचर मत्स्यादिक और स्थलचर पशु इन जीवोंका खंड करने, दग्ध करने, बाँधने, छेदन करने, घातने आदिमें यत्न करना तथा इनके चर्म नख हाथ नेत्रादिकके नष्ट करने (उखाडने) में जो कौतूहलरूप (क्रीडारूप) परिणाम हो वही यहाँ रौद्रध्यान है, ऐसे ऊँचे चित्तवाले पुरुषोंके वचन है ।


अस्य घातो जयोऽन्यस्य समरे जायतामिति ।
स्मरत्यङ्गी तदप्याहू रौद्रमध्यात्मवेदिनः ॥9॥

अर्थ: युद्धमें इसका घात हो और उसकी जीत हो, इस प्रकार स्मरण करे (विचारे) उसे भी अध्यात्मके जाननेवालोंने रौद्रध्यान कहा है ।


श्रुते दृष्टे स्मृते जन्तुवधाद्युरुपराभवे ।
यो हर्षस्तद्धि विज्ञेयं रौद्रं दुःखानलेन्धनम् ॥10॥

अर्थ: जीवोंके वध बंधनादि तीव्र दुःख वा अपमानके सुनने देखने वा स्मरण करनेमें जो हर्ष होता है उसे भी दुःखरूपी अग्निको इंधनके समान रौद्रध्यान जानना ।


अहं कदा करिष्यामि पूर्ववैरस्य निष्क्रियम् ।
अस्य चित्रैर्वधैश्चेति चिन्ता रौद्राय कल्पिता ॥11॥

अर्थ: इस पूर्वकालके वैरीका अनेक प्रकारके घातसे मैं किस समय बदला लूँगा ऐसी चिंता भी रौद्रध्यानके लिए कही गई है ।


किं कूर्मः शक्तिवैकल्याज्जीवन्त्यद्यापि विद्विषः ।
तर्ह्यमुत्र हनिष्यामः प्राप्य कालं तथा बलम् ॥12॥

अर्थ: फिर ऐसा विचारे कि हम क्या करे ? शक्ति न होनेके कारण शत्रु अभी तक जीते हैं, नहीं तो कभीके मार डालते; अस्तु इस समय नहीं तो न सही, परलोकमें समय और शक्तिको प्राप्त होकर किसी समय अवश्य मारेंगे । इस प्रकार संकल्प करना भी रौद्रध्यान है ।


अभिलषति नितान्तं यत्परस्यापकारं
व्यसनविशिखभिन्नं वीक्ष्य यत्तोषमेति ।
यदिह गुणगरिष्टं द्वेष्टि दृष्ट्वान्यभूतिं
भवति हृदि सशल्यस्तद्धि रौद्रस्य लिङ्गम् ॥13॥

अर्थ: जो अन्यका बुरा चाहे तथा परको कष्ट आपदारूप बाणोंसे भेदा हुआ दुःखी देखकर संतुष्ट हो तथा गुणोंसे गरुवा देख अथवा अन्यकी संपदा देखकर द्वेषरूप हो अपने हृदयमें शल्यसहित हो सो निश्चय करके रौद्रध्यानका चिह्न है ।


हिंसानन्दोद्भवं रौद्रं वक्तुं कस्यास्ति कौशलम् ।
जगज्जन्तुसमुद्भूतविकल्पशतसम्भवम् ॥14॥

अर्थ: इस हिंसानन्दसे उत्पन्न हुए रौद्रध्यानके कहनेको किसकी कुशलता (विद्वत्ता) है ? क्योंकि यह जगतके जीवोंके उत्पन्न हुए सैकडो विकल्पोंसे उत्पन्न होता है, इसके परिणाम अनेक प्राणियोंके अनेक प्रकारके होते हैं सो कहनेमें नहीं आ सकते ।


हिंसोपकरणादानं क्रूरसत्त्वेष्वनुग्रहं ।
निस्त्रिंशतादिलिङ्गानि रौद्रे बाह्यानि देहिनः ॥15॥

अर्थ: हिंसाके उपकरण शस्त्रादिकका संग्रह करना, क्रूर (दुष्ट) जीवों पर अनुग्रह करना और निर्दयतादिक भाव रौद्रध्यानके देहधारियोंके बाह्य चिह्न हैं ।


असत्यकल्पनाजालकश्मलीकृतमानसः ।
चेष्टते यज्जनस्तद्धि मृषारौद्रं प्रकीर्त्तितम् ॥16॥

अर्थ: जो मनुष्य असत्य (झूठी) कल्पनाओंके समूहसे पापरूपी मैलसे मलिनचित्त होकर जो कुछ चेष्टा करे उसे निश्चय करके मृषानन्दनामा रौद्रध्यान कहा है ।


विधाय वञ्चकं शास्त्रं मार्गमुद्दिश्य निर्दयम् ।
प्रपात्य व्यसने लोकं भोक्ष्येऽहं वाञ्छितं सुखम् ॥17॥

अर्थ: जो पुरुष इस जगतमें समीचीन सत्य धर्मके मार्गको छोड कर प्रवर्त्ते और मदसे उद्धत हो इस प्रकार चिन्तवन करे कि ठगाईके शास्त्रोंको रचकर, असत्य दयारहित मार्गको चलाकर, जगतको उस मार्गमें तथा कष्ट आपदाओंमें डाल कर, अपने मनोवांछित सुख मैं ही भोगूँ; तथा इस प्रकार विचारे कि मैं असत्य चतुराईके प्रभावसे लोगोंसे बहुत प्रकारसे धन ग्रहण करूँगा तथा घोडे, हस्ती, नगर, रत्नोंके समूह, सुंदर कन्यादिक रत्न ग्रहण करूँगा । इस प्रकार जो सद्धर्म मार्गसे च्युत होकर असत्य वचनोंकी ठगविद्यासे अत्यन्त भोले जीवोंको प्रवर्त्तावें वह मदोद्धत पुरुष रौद्रध्यानका मंदिर (घर) है अर्थात् उसमें मृषानन्दनामा रौद्रध्यान रहता है ॥ १७-१८-१९ ॥


असत्य चातुर्यबलेन लोकाद्वित्तं ग्रहीष्यामि बहुप्रकारं ।
तथाश्वमातङ्गपुराकराणि कन्यादिरत्नानि च बन्धुराणि ॥18॥

अर्थ: जो पुरुष इस जगतमें समीचीन सत्य धर्मके मार्गको छोड कर प्रवर्त्ते और मदसे उद्धत हो इस प्रकार चिन्तवन करे कि ठगाईके शास्त्रोंको रचकर, असत्य दयारहित मार्गको चलाकर, जगतको उस मार्गमें तथा कष्ट आपदाओंमें डाल कर, अपने मनोवांछित सुख मैं ही भोगूँ; तथा इस प्रकार विचारे कि मैं असत्य चतुराईके प्रभावसे लोगोंसे बहुत प्रकारसे धन ग्रहण करूँगा तथा घोडे, हस्ती, नगर, रत्नोंके समूह, सुंदर कन्यादिक रत्न ग्रहण करूँगा । इस प्रकार जो सद्धर्म मार्गसे च्युत होकर असत्य वचनोंकी ठगविद्यासे अत्यन्त भोले जीवोंको प्रवर्त्तावें वह मदोद्धत पुरुष रौद्रध्यानका मंदिर (घर) है अर्थात् उसमें मृषानन्दनामा रौद्रध्यान रहता है ॥ १७-१८-१९ ॥


असत्यवाग्वञ्चनया नितान्तं प्रवर्त्तयत्यत्र जनं वराकम् ।
सद्धर्ममार्गादतिवर्त्तनेन मदोद्धतो यः स हि रौद्रधामा ॥19॥

अर्थ: जो पुरुष इस जगतमें समीचीन सत्य धर्मके मार्गको छोड कर प्रवर्त्ते और मदसे उद्धत हो इस प्रकार चिन्तवन करे कि ठगाईके शास्त्रोंको रचकर, असत्य दयारहित मार्गको चलाकर, जगतको उस मार्गमें तथा कष्ट आपदाओंमें डाल कर, अपने मनोवांछित सुख मैं ही भोगूँ; तथा इस प्रकार विचारे कि मैं असत्य चतुराईके प्रभावसे लोगोंसे बहुत प्रकारसे धन ग्रहण करूँगा तथा घोडे, हस्ती, नगर, रत्नोंके समूह, सुंदर कन्यादिक रत्न ग्रहण करूँगा । इस प्रकार जो सद्धर्म मार्गसे च्युत होकर असत्य वचनोंकी ठगविद्यासे अत्यन्त भोले जीवोंको प्रवर्त्तावें वह मदोद्धत पुरुष रौद्रध्यानका मंदिर (घर) है अर्थात् उसमें मृषानन्दनामा रौद्रध्यान रहता है ॥ १७-१८-१९ ॥


असत्यसामर्थ्यवशादरातीन् नृपेण वान्येन च घातयामि ।
अदोषिणां दोषचयं विधाय चिन्तेति रौद्राय मता मुनीन्द्रैः ॥20॥

अर्थ: मैं अदोषियोंमें दोषसमूहको सिद्ध करके अपने असत्य सामर्थ्यके प्रभावसे अपने दुश्मनोंकी राजाके द्वारा वा अन्य किसीके द्वारा घात कराऊँगा; इस प्रकार चिन्ता करनेको भी मुनीन्द्रोंने रौद्रध्यान माना है ।


पातयामि जनं मूढं व्यसनेऽनर्थसंकटे ।
वाक्कौशल्यप्रयोगेण वाञ्छितार्थप्रसिद्धये ॥21॥

अर्थ: तथा जो इस प्रकार विचार करे कि मैं वचनकी प्रवीणताके प्रयोगोंसे वांछित प्रयोजनकी सिद्धिके लिये मूढजनोंको अनर्थके संकटमें डाल दूँ ऐसा चतुर हूँ, इस प्रकारका विचार भी रौद्रध्यान है ।


इमान् जडान् बोधविचारविच्युतान् प्रतारयाम्यद्य वचोभिरुन्नतैः ।
अमी प्रवर्त्स्यन्ति मदीयकौशला - दकार्यवर्गेष्विति नात्र संशयः ॥22॥

अर्थ: फिर इस प्रकार विचार करे कि ये ज्ञानरहित मूर्ख प्राणी हैं, इनको ऊँचे चतुराईके वचनोंसे अभी ठग लेता हूँ मैं ऐसा चतुर हूँ। तथा ये प्राणी मेरी प्रवीणतासे बडे अकार्योंमें प्रवर्त्तेंगे ही, इसमें कुछ संदेह नहीं है; ऐसे विचारको भी रौद्रध्यान कहते हैं ।


अनेकासत्यसंकल्पैर्यः प्रमोदः प्रजायते ।
मृषानन्दात्मकं रौद्रं तत्प्रणीतं पुरातनैः ॥23॥

अर्थ: इस प्रकार अन्य भी अनेक प्रकारके असत्य संकल्पोंसे जो प्रमोद (हर्ष) उत्पन्न हो उसे पुरातन पुरुषोंने मृषानन्दी रौद्रध्यान कहा है ।


चौर्योपदेशबाहुल्यं चातुर्यं चौर्यकर्मणि ।
यच्चौर्यैकपरं चेतस्तच्चौर्यानन्द इष्यते ॥24॥

अर्थ: जो चोरीके कार्योंके उपदेशकी अधिकता तथा चौर्यकर्ममें चतुरता तथा चोरीके कार्योंमें ही तत्परचित्त हो उसे चौर्यानन्दनामा रौद्रध्यान माना है ।


यच्चौर्याय शरीरिणामहरहश्चिन्ता समुत्पद्यते
कृत्वा चौर्यमपि प्रमोदमतुलं कुर्वन्ति यत्संततम् ।
चौर्येणापि हृते परैः परधने यज्जायते संभ्रम-
स्तच्चौर्यप्रभवं वदन्ति निपुणा रौद्रं सुनिन्दास्पदम् ॥25॥

अर्थ: जीवोंके चौर्यकर्मके लिये निरन्तर चिन्ता उत्पन्न हो तथा चोरीकर्म करके भी निरंतर अतुल हर्ष माने, आनंदित हो तथा अन्य कोई चोरीके द्वारा परधनको हरे उसमें हर्ष मानें, उसे निपुण पुरुष चौर्यकर्मसे उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान कहते हैं । यह ध्यान अतिशय निंदाका कारण है ।


कृत्वा सहायं वरवीरसैन्यं तथाभ्युपायांश्च बहुप्रकारान् ।
धनान्यलभ्यानि चिरार्जितानि सद्यो हरिष्यामि जनस्य धात्र्याम् ॥26॥

अर्थ: इस धरित्री (पृथिवी) में लोगोंके धन अलभ्य हैं तथा बहुत कालके संचित किये हुए हैं तो भी मैं बडे-बडे सुभटोंकी सेनाकी सहायतासे तथा अनेक उपायोंसे तत्काल ही हर लाऊँगा ऐसा चोर हूँ ।


द्विपदचतुष्पदसारं धनधान्यवराङ्गनासमाकीर्णम् ।
वस्तु परकीयमपि मे स्वाधीनं चौर्यसामर्थ्यात् ॥27॥

अर्थ: तथा परके द्विपद चौपदोंमें जो सार हैं अर्थात् उत्तम है तथा धन धान्य श्रेष्ठ स्त्री सहित अन्यकी जो वस्तुयें हैं सो मेरी चोरी कर्मकी सामर्थ्यसे मेरे ही स्वाधीन है ऐसा विचार करें ।


इत्थं चुरायां विविधप्रकारः शरीरिभिर्यः क्रियतेऽभिलाषः ।
अपारदुःखार्णवहेतुभूतं रौद्रं तृतीयं तदिह प्रणीतम् ॥28॥

अर्थ: इस प्रकार चोरीमें जीवोंके द्वारा जो अनेक प्रकारकी वांछा की जाय सो तीसरा चौर्यानन्दी रौद्रध्यान है । यह रौद्रध्यान अपार दुःखरूपी समुद्रमें पटकनेका कारणभूत है ।


बह्वारम्भपरिग्रहेषु नियतं रक्षार्थमभ्युद्यते
यत्संकल्पपरम्परां वितनुते प्राणीह रौद्राशयः ।
यच्चालम्ब्य महत्त्वमुन्नतमना राजेत्यहं मन्यते
तत्तुर्यं प्रवदन्ति निर्मलधियो रौद्रं भवाशंसिनाम् ॥29॥

अर्थ: यह प्राणी रौद्र (क्रूर) चित्त होकर बहुत आरंभ परिग्रहोंके रक्षार्थ नियमसे उद्यम करे और उसमें ही संकल्पकी परंपराको विस्तारे तथा रौद्रचित्त होकर ही महत्ताका अवलंबन करके उन्नतचित्त होकर ऐसा माने कि मैं राजा हूँ, ऐसे परिणामको निर्मल बुद्धिवाले महापुरुष संसारकी वांछा करनेवाले जीवोंके चौथा रौद्रध्यान कहते हैं ।


आरोप्य चापं निशितैः शरौघैर्निकृत्य वैरिव्रजमुद्धताशम् ।
दग्ध्वा पुरग्रामवराकराणि प्राप्स्येऽहमैश्वर्यमनन्यसाध्यम् ॥30॥

अर्थ: जगतके अद्वितीय नाथ सर्वज्ञदेवने मनुष्योंके आगे लिखे विचारोंको विषयसंरक्षणके आनंदसे उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान कहा है । जैसे मनुष्य विचारे कि मैं तीक्ष्ण बाणोंके समूहोंसे धनुषको आरोपण करके उद्धताशय वैरियोंके समूहको छेदनपूर्वक उनके पुर ग्राम श्रेष्ठ आकर (खानि) आदिको दग्ध करके दूसरोंके द्वारा साधनेमें न आवे ऐसे ऐश्वर्य व निष्कंटक राज्यको प्राप्त होऊँगा ।


आच्छिद्य गृह्णन्ति धरां मदीयां कन्यादिरत्नानि च दिव्यनारीं ।
ये शत्रवः सम्प्रति लुब्धचित्तास्तेषां करिष्ये कुलकक्षदाहम् ॥31॥

अर्थ: तथा जो वैरी इस समय मेरी पृथ्वी कन्या आदि रत्नों और सुन्दर स्त्रीको लुब्धचित्त हुए छीन कर लेते हैं उनके कुलरूपी वनको मैं दग्ध करूँगा ।


सकलभुवनपूज्यं वीरवर्गोपसेव्यं स्वजनधनसमृद्धं रत्नरामाभिरामम् ।
अमितविभवसारं विश्वभोगाधिपत्यं प्रबलरिपुकुलान्तं हन्त कृत्वा मयाप्तम् ॥32॥

अर्थ: तथा अहो ! देखो, जो समस्त भुवनोंके जीवोंके द्वारा पूजनीय, सुभटोंके समूहसे सेवने योग्य, स्वजन धनादिकसे पूर्ण, रत्न और स्त्रियोंसे सुन्दर अमर्यादित विभवके सार ऐसे समस्त भोगोंका स्वामित्व अपने शत्रुओंके समूहको नाश करके मैंने पाया है ।


भित्त्वा भुवं जन्तुकुलानि हत्वा प्रविश्य दुर्गाण्युदधिं विलङ्घ्य ।
कृत्वा पदं मूर्ध्नि मदोद्धतानां मयाधिपत्यं कृतमत्युदारम् ॥33॥

अर्थ: तथा पृथ्वीको भेद कर जीवोंके समूहको मारकर, दुर्ग (गढों) में प्रवेश करके, समुद्रको उलंघ करके, बडे गर्वसे उद्धत शत्रुओंके मस्तक पर पाँव देकर मैंने उदार स्वामिपना व राज्य किया है ।


जलानलव्यालविषप्रयोगै - र्विश्वासभेदप्रणिधिप्रपञ्चैः ।
उत्साद्य निःशेषमरातिचक्रं स्फुरत्ययं मे प्रबलप्रतापः ॥34॥

अर्थ: तथा जल अग्नि सर्प विषादिकके प्रयोगोंसे विश्वास दिलाना, भेद करना, दूतभेद करना इत्यादि प्रपंचोंसे शत्रुओंके समस्त समूहोंका नाश करके यह मेरा प्रबल प्रताप है सो स्फुरायमान है (प्रगट है), मैं ऐसा ही प्रतापी हूँ ।


इत्यादिसंरक्षणसन्निबन्धं सचिन्तनं यत्क्रियते मनुष्यैः ।
संरक्षणानन्दभवं तदेतद्रौद्रं प्रणीतं जगदेकनाथैः ॥35॥

अर्थ: जगतके अद्वितीय नाथ सर्वज्ञदेवने मनुष्योंके आगे लिखे विचारोंको विषयसंरक्षणके आनंदसे उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान कहा है । जैसे मनुष्य विचारे कि मैं तीक्ष्ण बाणोंके समूहोंसे धनुषको आरोपण करके उद्धताशय वैरियोंके समूहको छेदनपूर्वक उनके पुर ग्राम श्रेष्ठ आकर (खानि) आदिको दग्ध करके दूसरोंके द्वारा साधनेमें न आवे ऐसे ऐश्वर्य व निष्कंटक राज्यको प्राप्त होऊँगा ॥३०॥ तथा जो वैरी इस समय मेरी पृथ्वी कन्या आदि रत्नों और सुन्दर स्त्रीको लुब्धचित्त हुए छीन कर लेते हैं उनके कुलरूपी वनको मैं दग्ध करूँगा ॥३१॥ तथा अहो ! देखो, जो समस्त भुवनोंके जीवोंके द्वारा पूजनीय, सुभटोंके समूहसे सेवने योग्य, स्वजन धनादिकसे पूर्ण, रत्न और स्त्रियोंसे सुन्दर अमर्यादित विभवके सार ऐसे समस्त भोगोंका स्वामित्व अपने शत्रुओंके समूहको नाश करके मैंने पाया है ॥३२॥ तथा पृथ्वीको भेद कर जीवोंके समूहको मारकर, दुर्ग (गढों) में प्रवेश करके, समुद्रको उलंघ करके, बडे गर्वसे उद्धत शत्रुओंके मस्तक पर पाँव देकर मैंने उदार स्वामिपना व राज्य किया है ॥३३॥ तथा जल अग्नि सर्प विषादिकके प्रयोगोंसे विश्वास दिलाना, भेद करना, दूतभेद करना इत्यादि प्रपंचोंसे शत्रुओंके समस्त समूहोंका नाश करके यह मेरा प्रबल प्रताप है सो स्फुरायमान है (प्रगट है), मैं ऐसा ही प्रतापी हूँ ॥३४॥ इत्यादि मनुष्योंके विषयसंरक्षणके सन्निबंध कारणोंका जो चिंतवन करना उसको ही जिनेन्द्र भगवानने चौथा रौद्रध्यान कहा है ।


कृष्णलेश्याबलोपेतं श्वभ्रपातफलाङ्कितम् ।
रौद्रमेतद्धि जीवानां स्यात्पञ्चगुणभूमिकम् ॥36॥

अर्थ: यह रौद्रध्यान कृष्ण लेश्याके बल कर तो संयुक्त है और नरकपातके फलसे चिह्नित है तथा पंचम गुणस्थान पर्यन्त कहा गया है ।


क्रूरता दण्डपारुष्यं वञ्चकत्वं कठोरता ।
निस्त्रिंशत्वं च लिङ्गानि रौद्रस्योक्तानि सूरिभिः ॥37॥

अर्थ: तथा क्रूरता (दुष्टता), दंडकी परुषता, वञ्चकता, कठोरता, निर्दयता ये रौद्रध्यानके चिह्न आचार्योंने कहे हैं ।


विस्फुलिङ्गनिभे नेत्रे भ्रूवक्रा भीषणाकृतिः ।
कम्पः स्वेदादिलिङ्गानि रौद्रे बाह्यानि देहिनाम् ॥38॥

अर्थ: अग्निके फुलिंग समान लाल नेत्र हों, भौंहें टेढी हों, भयानक आकृति हो, देहमें कंपन हो और पसीना हो इत्यादि रौद्रध्यानके बाह्य चिह्न हैं ।


क्षायोपशमिको भावः कालश्चान्तर्मुहूर्त्तकः ।
दुष्टाशयवशादेतदप्रशस्तावलम्बनम् ॥39॥

अर्थ: यह रौद्रध्यान क्षायोपशमिक भाव है, इसका काल अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त है, और यह दुष्टाशयके वशसे अप्रशस्त वस्तुका अवलंबन करनेवाला है अर्थात् यह ध्यान खोटी वस्तु पर ही होता है ।


दहत्येव क्षणार्द्धेन देहिनामिदमुत्थितम् ।
असद्ध्यानं त्रिलोकश्रीप्रसवं धर्मपादपम् ॥40॥

अर्थ: यह अप्रशस्त ध्यान जब जीवोंके होता है तब तीन लोककी लक्ष्मीके उत्पन्न करनेवाले धर्मरूपी वृक्षको क्षणार्द्धमें जला देता है ।


इत्यार्त्तरौद्रे गृहिणामजस्रं ध्याने सुनिन्द्ये भवतः स्वतोऽपि ।
परिग्रहारम्भकषायदोषैः कलङ्कितेऽन्तःकरणे विशङ्कम् ॥41॥

अर्थ: इस प्रकार ये आर्त्त और रौद्रध्यान गृहस्थियोंके परिग्रह आरंभ और कषायादि दोषोंसे मलिन अन्तःकरणमें स्वयमेव निरन्तर होते हैं, इसमें कुछ भी शंका नहीं है। ये दोनों ध्यान निन्दनीय हैं ।


क्वचित्क्वचिदमी भावाः प्रवर्त्तन्ते मुनेरपि ।
प्राक्कर्मगौरवाच्चित्रं प्रायः संसारकारणम् ॥42॥

अर्थ: ये भाव किसी-किसी समय पूर्वकर्मके गौरवसे मुनिके भी होते हैं सो यह पूर्वकर्मके उदयकी विचित्रता है । बाहुल्यसे ये संसारके कारण हैं ।


स्वयमेव प्रजायन्ते विना यत्नेन देहिनाम् ।
अनादिदृढसंस्काराद् दुर्ध्यानानि प्रतिक्षणम् ॥43॥

अर्थ: ये दुर्ध्यान हैं सो जीवोंके अनादिकालके संस्कारसे विना ही यत्नके स्वयमेव निरन्तर उत्पन्न होते हैं । कर्मका उदय प्रबल है ।


इति विगतकलंकैर्वर्णितं चित्ररूपं
दुरितविपिनबीजं निन्द्यदुर्ध्यानयुग्मम् ।
कटुकतरफलाढ्यं सम्यगालोच्य धीर
त्यज सपदि यदि त्वं मोक्षमार्गे प्रवृत्तः ॥44॥

अर्थ: आचार्य उपदेश करते हैं कि हे धीर पुरुष ! यदि तू मोक्षमार्गमें प्रवृत्त हुआ है तो उपर्युक्त प्रकार अनेकरूप निन्दनीय दुर्ध्यानका युग्मरूप कलंक जिनका दूर हो गया हैं ऐसे महापुरुषोंने वर्णन किया है उसको भले प्रकार विचार करके शीघ्र ही छोड, क्योंकि यह दुर्ध्यानका युग्म है सो पापरूपी वनका बीज है । जितने पाप हैं, वे इनसे ही उपजे हैं, अतिशय कठिन फलसंयुक्त है, तीव्र दुःख ही इसका फल है ।

सर्ग 27: ध्यानविरुद्ध स्थानों का वर्णन (श्लोक 1 से 34)

अथ प्रशममालम्ब्य विधाय स्ववशं मनः ।
विरज्य कामभोगेषु धर्मध्यानं निरूपय ॥1॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू प्रशमताका (मन्द कषायरूप विशुद्ध भावोंका) अवलंबन करके अपने मनको वश कर और कामभोगोंकी इच्छामें अर्थात् विषयसेवनादिकमें विरक्त होकर धर्मध्यानको विचारपूर्वक देख ।


तदेव प्रक्रमायातं सविकल्पं समासतः ।
आरम्भफलपर्यन्तं प्रोच्यमानं विबुध्यताम् ॥2॥

अर्थ: वही धर्मध्यान आचार्योंकी परिपाटीसे (गुरु-आम्नायसे) चला आया भेदों सहित संक्षेपसे कहा हुआ आरंभसे फलपर्यन्त जानना चाहिये ।


ज्ञानवैराग्यसंपन्नः संवृतात्मा स्थिराशयः ।
मुमुक्षुरुद्यमी शान्तो ध्याता धीरः प्रशस्यते ॥3॥

अर्थ: इस धर्मध्यानका करनेवाला ध्याता यथार्थ वस्तुके ज्ञान और संसारसे वैराग्य सहित हो, इन्द्रिय मन जिसके वश हो, स्थिरचित्त और मुक्तिका इच्छुक हो, तथा आलस्यरहित उद्यमी और शान्तपरिणामी हो, तथा धैर्यवान् हो, वही प्रशंसनीय है ।


चतस्रो भावना धन्याः पुराणपुरुषाश्रिताः ।
मैत्र्यादयश्चिरं चित्ते ध्येया धर्मस्य सिद्धये ॥4॥

अर्थ: तथा मैत्री प्रमोद कारुण्य और माध्यस्थ इन चार भावनाओंको पुराणपुरुषोंने (तीर्थंकरादिकोंने) आश्रित किया है इस कारण धन्य (प्रशंसनीय) हैं, सो धर्मध्यानकी सिद्धिके लिये इन चारों भावनाओंको चित्तमें ध्यावना चाहिए ।


क्षुद्रेतरविकल्पेषु चरस्थिरशरीरिषु ।
सुखदुःखाद्यवस्थासु संसृतेषु यथायथम् ॥5॥

अर्थ: क्षुद्र (सूक्ष्म) इतर बादर भेदरूप त्रस स्थावर प्राणी सुखदुःखादि अवस्थाओंमें जैसे तैसे तिष्ठे हों तथा नानाभेदरूप योनियोंमें प्राप्त होनेवाले जीवोंमें समानतासे विराधनेवाली नहीं ऐसी महत्ताको प्राप्त हुई समीचीनबुद्धि मैत्रीभावना कही जाती है ॥५-६॥


नानायोनिगतेष्वेषु समत्वेनाविराधिका ।
साध्वी महत्त्वमापन्ना मतिर्मैत्रीति पठ्यते ॥6॥

अर्थ: क्षुद्र (सूक्ष्म) इतर बादर भेदरूप त्रस स्थावर प्राणी सुखदुःखादि अवस्थाओंमें जैसे तैसे तिष्ठे हों तथा नानाभेदरूप योनियोंमें प्राप्त होनेवाले जीवोंमें समानतासे विराधनेवाली नहीं ऐसी महत्ताको प्राप्त हुई समीचीनबुद्धि मैत्रीभावना कही जाती है ॥५-६॥


जीवन्तु जन्तवः सर्वे क्लेशव्यसनवर्जिताः ।
प्राप्नुवन्तु सुखं त्यक्त्वा वैरं पापं पराभवम् ॥7॥

अर्थ: इस मैत्रीभावनामें ऐसी भावना रहे कि ये सब जीव कष्ट आपदाओंसे वर्जित हो जीओ, तथा वैर पाप अपमानको छोडकर सुखको प्राप्त होओ; इस प्रकारकी भावनाको मैत्रीभावना कहते हैं ।


दैन्यशोकसमुत्त्रास रोगपीडार्दितात्मसु ।
वधबन्धनरुद्धेषु याचमानेषु जीवितम् ॥8॥

अर्थ: जो जीव दीनतासे तथा शोक भय रोगादिकक्री पीडासे दुःखित हों, पीडित हों तथा वध (घात) बंधन सहित रोके हुए हों अथवा अपने जीवनकी वांछा करते हुये कि कोई हमको बचाओ ऐसे दीन प्रार्थना करनेवाले हों तथा क्षुधा तृषा खेद आदिकसे पीडित हों, तथा शीत उष्णतादिकसे पीडित हों तथा निर्दय पुरुषोंकी निर्दयतासे रोके (पीडित किये) हुए मरणके दुःखको प्राप्त हों, इस प्रकार दुःखी जीवोंको देखने-सुननेसे उनके दुःख दूर करनेके उपाय करनेकी बुद्धि हो उसे करुणा नामकी भावना कहते हैं ॥८-१०॥


क्षुत्तृट्श्रमाभिभूतेषु शीताद्यैर्व्यथितेषु च ।
अविरुद्धेषु निस्त्रिंशैर्यात्यमानेषु निर्दयम् ॥9॥

अर्थ: जो जीव दीनतासे तथा शोक भय रोगादिककी पीडासे दुःखित हों, पीडित हों तथा वध (घात) बंधन सहित रोके हुए हों अथवा अपने जीवनकी वांछा करते हुये कि कोई हमको बचाओ ऐसे दीन प्रार्थना करनेवाले हों तथा क्षुधा तृषा खेद आदिकसे पीडित हों, तथा शीत उष्णतादिकसे पीडित हों तथा निर्दय पुरुषोंकी निर्दयतासे रोके (पीडित किये) हुए मरणके दुःखको प्राप्त हों, इस प्रकार दुःखी जीवोंको देखने-सुननेसे उनके दुःख दूर करनेके उपाय करनेकी बुद्धि हो उसे करुणा नामकी भावना कहते हैं ॥८-१०॥


मरणार्त्तेषु जीवेषु यत्प्रतीकारवाञ्छया ।
अनुग्रहमतिः सेयं करुणेति प्रकीर्त्तिता ॥10॥

अर्थ: जो जीव दीनतासे तथा शोक भय रोगादिककी पीडासे दुःखित हों, पीडित हों तथा वध (घात) बंधन सहित रोके हुए हों अथवा अपने जीवनकी वांछा करते हुये कि कोई हमको बचाओ ऐसे दीन प्रार्थना करनेवाले हों तथा क्षुधा तृषा खेद आदिकसे पीडित हों, तथा शीत उष्णतादिकसे पीडित हों तथा निर्दय पुरुषोंकी निर्दयतासे रोके (पीडित किये) हुए मरणके दुःखको प्राप्त हों, इस प्रकार दुःखी जीवोंको देखने-सुननेसे उनके दुःख दूर करनेके उपाय करनेकी बुद्धि हो उसे करुणा नामकी भावना कहते हैं ॥८-१०॥


तपःश्रुतयमोद्युक्तचेतसां ज्ञानचक्षुषाम् ।
विजिताक्षकषायाणां स्वतत्त्वाभ्यासशालिनाम् ॥11॥

अर्थ: जो पुरुष तप शास्त्राध्ययन और यमनियमादिकमें उद्यमयुक्त चित्तवाले हैं, तथा ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं, जो इन्द्रिय, मन और कषायोंको जीतनेवाले हैं तथा स्वतत्त्वाभ्यास करनेमें चतुर हैं, जगतको चमत्कृत करनेवाले चारित्रसे जिनका आत्मा अधिष्ठित (आश्रित) है ऐसे पुरुषोंके गुणोंमें प्रमोदका (हर्षका) होना सो मुदिता कहिये प्रमोदभावना है ॥११-१२॥


जगत्त्रयचमत्कारिचरणाधिष्ठितात्मनाम् ।
तद्गुणेषु प्रमोदो यः सद्भिः सा मुदिता मता ॥12॥

अर्थ: जो पुरुष तप शास्त्राध्ययन और यमनियमादिकमें उद्यमयुक्त चित्तवाले हैं, तथा ज्ञान ही जिनके नेत्र हैं, जो इन्द्रिय, मन और कषायोंको जीतनेवाले हैं तथा स्वतत्त्वाभ्यास करनेमें चतुर हैं, जगतको चमत्कृत करनेवाले चारित्रसे जिनका आत्मा अधिष्ठित (आश्रित) है ऐसे पुरुषोंके गुणोंमें प्रमोदका (हर्षका) होना सो मुदिता कहिये प्रमोदभावना है ॥११-१२॥


क्रोधविद्धेषु सत्त्वेषु निस्त्रिंशक्रूरकर्मसु ।
मधुमांससुरान्यस्त्रीलुब्धेष्वत्यन्तपापिषु ॥13॥

अर्थ: जो प्राणी क्रोधी हों, निर्दय व क्रूरकर्मी हों, तथा मधु मांस मद्य और परस्त्रीमें लुब्ध (लम्पट) तथा आसक्त व्यसनी हों, और अत्यंत पापी हों तथा देवशास्त्रगुरुओंके समूहकी निंदा करनेवाले और अपनी प्रशंसा करनेवाले हों तथा नास्तिक हों ऐसे जीवोंमें रागद्वेषरहित मध्यस्थभाव होना सो उपेक्षा कही है। उपेक्षा नाम उदासीनता (वीतरागता) का है सो यही माध्यस्थभावना है ॥१३-१४॥


देवागमयतिव्रातनिन्दकेष्वात्मशंसिषु ।
नास्तिकेषु च माध्यस्थ्यं यत्सोपेक्षा प्रकीर्त्तिता ॥14॥

अर्थ: जो प्राणी क्रोधी हों, निर्दय व क्रूरकर्मी हों, तथा मधु मांस मद्य और परस्त्रीमें लुब्ध (लम्पट) तथा आसक्त व्यसनी हों, और अत्यंत पापी हों तथा देवशास्त्रगुरुओंके समूहकी निंदा करनेवाले और अपनी प्रशंसा करनेवाले हों तथा नास्तिक हों ऐसे जीवोंमें रागद्वेषरहित मध्यस्थभाव होना सो उपेक्षा कही है। उपेक्षा नाम उदासीनता (वीतरागता) का है सो यही माध्यस्थभावना है ॥१३-१४॥


एता मुनिजनानन्दसुधास्यन्दैकचन्द्रिकाः ।
ध्वस्तरागाद्युरुक्लेशा लोकाग्रपथदीपिकाः ॥15॥

अर्थ: इस प्रकार ये चार भावनायें कहीं सो मुनिजनोंके आनंदरूप अमृतके झरनेको चन्द्रमाकी चांदनीके समान हैं। क्योंकि इनसे रागादिकका बडा क्लेश ध्वस्त हो जाता है अर्थात् जो इन भावनाओंसे युक्त हो उसके कषायरूप परिणाम नहीं होते, तथा ये भावनायें लोकाग्रपथको (मोक्षमार्गको) प्रकाश करनेके लिये दीपिका (चिराग) है ।


एताभिरनिशं योगी क्रीडन्नत्यन्तनिर्भरम् ।
सुखमात्मोत्थमत्यक्षमिहैवास्कन्दति ध्रुवम् ॥16॥

अर्थ: इन भावनाओंमें रमता हुआ योगी अत्यंत सातिशय आत्मासे उत्पन्न हुए अतीन्द्रिय सुखको इसी लोकमें निश्चय करके प्राप्त होता है ।


भावनास्वासु संलीनः करोत्यध्यात्मनिश्चयम् ।
अवगम्य जगद्वृत्तं विषयेषु न मुह्यति ॥17॥

अर्थ: तथा इन भावनाओंमें लीन हुआ मुनि जगतके वृत्तांतको जानकर अध्यात्मका निश्चय करता है, और जगतके प्रवर्त्तनमें तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें मोहको प्राप्त नहीं होता, अर्थात् स्वकीय स्वरूपके सन्मुख रहता है ।


योगनिद्रा स्थितिं धत्ते मोहनिद्रापसर्पति ।
आसु सम्यक्प्रणीतासु स्यान्मुनेस्तत्त्वनिश्चयः ॥18॥

अर्थ: इस भावनाओंको भले प्रकार गोचरीभूत (अभ्यस्त) करने पर मुनिके मोहनिद्रा तो नष्ट हो जाती है और योग(ध्यान)की निद्रा स्थितिको धारण करती है और उसी मुनिके तत्त्वोंका निश्चय होता है।


आभिर्यदानिशं विश्वं भावयत्यखिलं वशी ।
तदौदासीन्यमापन्नश्चरत्यत्रैव मुक्तवत् ॥19॥

अर्थ: जिस समय मुनि इन भावनाओंसे वशी होकर समस्त जगतको भावता है तब वह मुनि उदासीनताको प्राप्त होकर इसी लोकमें मुक्तके समान प्रवर्त्तता है; अर्थात् मुक्तिकेसे सुखानुभवको प्राप्त होता है ।


रागादिवागुराजालं निकृत्याचिन्त्यविक्रमः ।
स्थानमाश्रयते धन्यो विविक्तं ध्यानसिद्धये ॥20॥

अर्थ: जो मुनि धन्य (महाभाग्य) है वह रागादिरूप फाँसीके जालको काटकर अचिन्त्य पराक्रमवाला होकर ध्यानकी सिद्धिके लिये निर्जन (एकान्त) स्थानको आश्रय करता है, क्योंकि एकान्त स्थानमें रहे बिना ध्यानकी सिद्धि नहीं होती ।


कानिचित्तत्र शस्यन्ते दूष्यन्ते कानिचित्पुनः ।
ध्यानाध्ययनसिद्ध्यर्थं स्थानानि मुनिसत्तमैः ॥21॥

अर्थ: ध्यानकी और शास्त्राध्ययनकी सिद्धिके लिये आचार्योंने कई स्थान सराहे हैं और कई स्थान दूषे भी हैं ।


विकीर्यते मनः सद्यः स्थानदोषेण देहिनाम् ।
तदेव स्वस्थतां धत्ते स्थानमासाद्य बन्धुरम् ॥22॥

अर्थ: जीवोंका चित्त स्थानके दोषसे तत्काल विकारताको प्राप्त होता है और वही मन मनोज्ञ स्थानको पाकर स्वस्थता (निश्चलता) को प्राप्त होता है ।


म्लेच्छाधमजनैर्जुष्टं दुष्टभूपालपालितम् ।
पाषण्डिमण्डलाक्रान्तं महामिथ्यात्ववासितम् ॥23॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे । म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे । अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


कौलकापालिकावासं रुद्रक्षुद्रादिमन्दिरम् ।
उद्भ्रान्तभूतवेतालं चण्डिकाभवनाजिरम् ॥24॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


पण्यस्त्रीकृतसंकेतं मन्दचारित्रमन्दिरम् ।
क्रूरकर्माभिचाराढ्यं कुशास्त्राभ्यासवञ्चितम् ॥25॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


क्षेत्रजातिकुलोत्पन्नशक्तिस्वीकारदर्पितम् ।
मिलितानेकदुःशीलकल्पिताचिन्त्यसाहसम् ॥26॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


द्यूतकारसुरापानविटबन्दिव्रजान्वितम् ।
पापिसत्त्वसमाक्रान्तं नास्तिकासारसेवितम् ॥27॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


क्रव्यादकामुकाकीर्णं व्याधविध्वस्तश्वापदं ।
शिल्पिकारुकविक्षिप्तमग्निजीविजनाञ्चितम् ॥28॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


प्रतिपक्षशिरःशूले प्रत्यनीकावलम्बितम् ।
आत्रेयीखण्डितव्यङ्गसंसृतं च परित्यजेत् ॥29॥

अर्थ: ध्यान करनेवाला मुनि आगे लिखे स्थानोंको छोडे। म्लेच्छ पापी जनोंके रहनेका स्थान, दुष्ट राजा (जमीदार) के अधिकारका स्थान, पाखंडी भेषियोंके समूहसे घिरा हुआ स्थान, तथा महामिथ्यात्वका स्थान, कुलदेवता योगिनीका स्थान, रुद्र नीच देवादिकका मंदिर जिसमें उद्धत भूत वेताल नाचते हों, तथा चंडिका देवीके भवनका प्रांगण (चौक) तथा व्यभिचारिणी स्त्रियोंके संकेत किये स्थान, कुचारित्री पाखंडियोंका मंदिर तथा क्रूरकर्म और अभिचारसे पूर्ण स्थान, जिसमें कुशास्त्रोंका अभ्यास होता हो ऐसा स्थान, तथा जमीदारी जाति और कुलसे उत्पन्न हुई शक्तिसे अधिकारमें आ जानेसे गर्वित अर्थात् यह हमारा निवास है अन्यको प्रवेश नहीं करने दें ऐसा स्थान, तथा जिसमें अनेक दुःशील खोटे पुरुषोंने मिलकर कोई अचिंत्य साहसिक कार्य रचा हो ऐसा स्थान, अथवा द्यूतक्रीडावाले जुआरी, मद्यपानी, व्यभिचारी, बंदीजन इत्यादिके समूह सहित स्थान, तथा पापी प्राणियोंसे घिरा हुआ, तथा नास्तिकोंके द्वारा सेवित हो, तथा राक्षस कामी पुरुषोंसे व्याप्त, व्याध-शिकारियोंने जहाँ पर जीववध किया हो, तथा शिल्पी (शिलावट कारीगर), कारुक (मोची आदि) का विक्षिप्त (छोडा हुआ) हो, तथा अग्निजीवी (लुहार ठठेरे आदिक) से युक्त हो ऐसा स्थान, तथा शत्रुके मस्तक पर शूलकी समान शत्रुकी सेनाका स्थान तथा रजस्वला भ्रष्टचारित्री नपुंसक अंगहीनोंके रहनेका स्थान - इत्यादि स्थानोंको ध्यान करनेवाला छोडे। अर्थात् इन स्थानोंसे बचकर योग्य स्थानमें ध्यान करना चाहिये ॥२३-२९॥


विद्रवन्ति जना पापाः सञ्चरन्त्यभिसारिकाः ।
क्षोभयन्तीङ्गिताकारैर्यत्र नार्योऽपशङ्किताः ॥30॥

अर्थ: तथा जहाँ पर पापीजन उपद्रव करते हों, जहाँ अभिसारिका स्त्रियाँ विचरती हों, तथा जहाँ स्त्रियाँ निःशंकित होकर कटाक्ष इंगिताकारादिकसे क्षोभ उत्पन्न करती हों ऐसे स्थानका ध्यानी मुनि त्याग करे ।


किं च क्षोभाय मोहाय यद्विकाराय जायते ।
स्थानं तदपि मोक्तव्यं ध्यानविध्वंसशङ्कितैः ॥31॥

अर्थ: जो मुनि ध्यानविध्वंसके भयसे भयभीत हैं उनको क्षोभकारक, मोहक तथा विकार करनेवाला स्थान भी छोड देना चाहिये ।


तृणकण्टकवल्मीकविषमोपलकर्दमैः ।
भस्मोच्छिष्टास्थिरक्ताद्यैर्दूषितां सन्त्यजेद्भुवम् ॥32॥

अर्थ: तथा जो जगह तृण, कंटक, वल्मीक (बांबी), विषम पाषाण, कर्दम, भस्म, उच्छिष्ट, हाड, रुधिरादिक निंद्य वस्तुओंसे दूषित हो, उसको ध्यान करनेवाला छोडे ।


काककौशिकमार्जारखरगोमायुमण्डलैः ।
अवघुष्टं हि विघ्नाय ध्यातुकामस्य योगिनः ॥33॥

अर्थ: तथा जो स्थान काक उलूक बिलाव गर्दभ शृगाल श्वानादिकसे अवघुष्ट हो अर्थात् जहाँ ये शब्द करते हों वह स्थान योगी मुनिगणोंके ध्यानको विघ्नकारक है ।


ध्यानध्वंसनिमित्तानि तथान्यान्यपि भूतले ।
न हि स्वप्नेऽपि सेव्यानि स्थानानि मुनिसत्तमैः ॥34॥

अर्थ: जो जो पूर्वोक्त स्थान कहे उसी प्रकार अन्य स्थान भी जो ध्यानके विघ्नकारक हों, वे सब ही स्थान ध्यानी मुनिजनोंको छोड देने चाहिये। ऐसे स्थान स्वप्नमें भी सेवने योग्य नहीं हैं ।