सर्ग 8: अहिंसा महाव्रत (श्लोक 1 से 59)
यद्विशुद्धेः परं धाम यद्योगिजनजीवितम् ।
तद्वृत्तं सर्वसावद्यपर्युदासैकलक्षणम् ॥1॥
अर्थ: जो विशुद्धताका उत्कृष्ट धाम है तथा योगीश्वरोंका जीवन है और समस्त प्रकारकी पापरूप प्रवृत्तियोंसे दूर रहनेका लक्षण है, उसको सम्यक्चारित्र कहते हैं।
सामायिकादिभेदेन पञ्चधा परिकीर्तितम् ।
ऋषभादिजिनैः पूर्वं चारित्रं सप्रपञ्चकम् ॥2॥
अर्थ: यह चारित्र पूर्व कालमें श्री ऋषभदेव तीर्थंकर महाराजसे लेकर समस्त तीर्थंकरोंने १ सामायिक, २ छेदोपस्थापना, ३ परिहारविशुद्धि, ४ सूक्ष्मसांपराय और ५ यथाख्यातचारित्र, ऐसे पाँच प्रकारका कहा है ।
पञ्चमहाव्रतमूलं समितिप्रसरं नितान्तमनवद्यम् ।
गुप्तिफलभारनम्रं सन्मतिना कीर्त्तितं वृत्तम् ॥3॥
अर्थ: तथा वही चारित्र श्रीवर्द्धमानस्वामी तीर्थंकर भगवानने तेरह प्रकारका कहा है। पाँच महाव्रत हैं मूल जिसका तथा पाँच समिति हैं प्रसर (फैलाव) जिसका और अत्यन्त निर्दोष तीन गुप्तिरूप फलके भारसे नम्रीभूत ऐसा चारित्ररूपी वृक्ष है।
पञ्च पञ्च त्रिभिर्भेदैर्यदुक्तं मुक्तसंशयैः ।
भवभ्रमणभीतानां चरणं शरणं परम् ॥4॥
अर्थ: संशयरहित गणधरादिकोंने पाँच, पाँच और तीन भेदसे जो चारित्र कहा है वह संसारके भ्रमणसे भयभीत पुरुषोंके हेतु एक उत्तम शरण है। अर्थात् जो मुनि संसारके भयसे भयभीत हैं वे इस चारित्रका पालन करनेसे भयरहित (अभय) हो जाते हैं ।
पञ्चव्रतं समित्पञ्च गुप्तित्रयपवित्रितम् ।
श्रीवीरवदनोद्गीर्णं चरणं चन्द्रनिर्मलम् ॥5॥
अर्थ: पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्तिरूप तेरह प्रकारका चारित्र जो श्रीवीर (वर्द्धमान) तीर्थंकर भगवानके मुखसे प्रकट हुआ है वह चन्द्रमाके समान निर्मल है ।
हिंसायामनृते स्तेये मैथुने च परिग्रहे ।
विरतिर्व्रतमित्युक्तं सर्वसत्त्वानुकम्पकैः ॥6॥
अर्थ: हिंसा, अनृत, चोरी, मैथुन और परिग्रह इन पापोंमें विरति कहिये त्यागभाव होना ही व्रत है। समस्त जीवों पर दयालु मुनियोंने ऐसा ही कहा है ।
सत्याद्युत्तरनिःशेषयमजातनिबन्धनम् ।
शीलैश्वर्याद्यधिष्ठानमहिंसाख्यं महाव्रतम् ॥7॥
अर्थ: अहिंसा नामा महाव्रत सत्यादिक अगले चार महाव्रतोंका तो कारण है, क्योंकि सत्य, अचौर्यादि, विना अहिंसाके नहीं हो सकते। और शीलादिसहित उत्तरगुणोंकी चर्याका स्थान भी यह अहिंसा ही है। अर्थात् समस्त उत्तर गुण भी इस अहिंसा महाव्रतके आश्रय हैं ।
वाक्चित्ततनुभिर्यत्र न स्वप्नेऽपि प्रवर्त्तते ।
चरस्थिराङ्गिनां घातस्तदाद्यं व्रतमीरितम् ॥8॥
अर्थ: जिसमें मनवचनकायसे त्रस और स्थावर जीवोंका घात स्वप्नमें भी न हो उसे आद्यव्रत (प्रथम महाव्रत-अहिंसा) कहते हैं ।
मृते वा जीविते वा स्याज्जन्तुजाते प्रमादिनाम् ।
बन्ध एव न बन्धः स्याद्धिंसायाः संवृतात्मनाम् ॥9॥
अर्थ: जीवोंके मरते वा जीते प्रमादी पुरुषोंको तो निरन्तर ही हिंसाका पापबन्ध होता ही रहता है और जो संवरसहित अप्रमादी हैं उनको जीवोंकी हिंसा होते हुए भी हिंसारूप पापका बंध नहीं होता।
संरम्भादित्रिकं योगैः कषायैर्व्याहतं क्रमात् ।
शतमष्टाधिकं ज्ञेयं हिंसाभेदैस्तु पिण्डितम् ॥10॥
अर्थ: संरंभ, समारंभ और आरंभ इस त्रिकको मनवचनकायकी तीन-तीन प्रवृत्तियोंसे तथा क्रोध, मान, माया, लोभ, इन चार कषायों और कृत, कारित, अनुमोदना (अनुमति वा सम्मति) से क्रमसे गुणन करने पर हिंसाके भेद (१०८) होते हैं, तथा अनन्तानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन कषायोंके उत्तरभेदोंसे गुणन करनेसे ४३२ भेद भी हिंसाके होते हैं ।
अतः प्रमादमुत्सृज्य भावशुद्ध्याङ्गिसन्ततिम् ।
यमप्रशमसिद्ध्यर्थं बंधुबुद्ध्या विलोकय ॥11॥
अर्थ: उपर्युक्त संरंभादिक हिंसापरिणामके १०८ अथवा ४३२ भेद हैं । अतः हे आत्मन् ! तू प्रमादको छोडकर भावोंकी शुद्धिके लिये जीवोंकी सन्ततिको (समूहको) बन्धु (भाई, हित, मित्र) की दृष्टिसे अवलोकन किया कर । अर्थात् प्राणीमात्रसे शत्रुभाव न रख कर सबसे मित्रभाव रख और सबकी रक्षामें मनवचनकायादिकसे प्रवृत्ति कर ।
यज्जन्तुवधसंजातकर्मपाकाच्छरीरिभिः ।
श्वभ्रादौ सह्यते दुःखं तद्वक्तुं केन पार्यते ॥12॥
अर्थ: जीवोंके घात (हिंसा) करनेसे पापकर्म उपार्जन होता है उसका जो फल अर्थात् दुःख नरकादिक गतिमें जीव भोगते हैं वह वचनके अगोचर है। अर्थात् वचनसे कहनेमें नहीं आ सकता ।
हिंसैव नरकागारप्रतोली प्रांशुविग्रहा ।
कुठारीव द्विधा कर्तुं भेत्तुं शूलोऽतिनिर्दया ॥13॥
अर्थ: यह हिंसा ही नरकरूपी घरमें प्रवेश करनेके लिये प्रतोली (मुख्य दरवाजा) है तथा जीवोंको काटनेके लिये कुठार (कुल्हाडा) और विदारनेके लिये निर्दय शूली है ।
क्षमादिपरमोदारैर्यमैर्यो वर्द्धितश्चिरम् ।
हन्यते स क्षणादेव हिंसया धर्मपादपः ॥14॥
अर्थ: जो धर्मरूप वृक्ष उत्तम क्षमादिक परम उदार संयमोंसे बहुत कालसे बढाया है वह इसी हिंसारूप कुठारसे क्षणमात्रमें नष्ट हो जाता है ।
तपोयमसमाधीनां ध्यानाध्ययनकर्मणां ।
तनोत्यविरतं पीडां हृदि हिंसा क्षणस्थिता ॥15॥
अर्थ: हृदयमें क्षणभर भी स्थान पाई हुई यह हिंसा, तप, यम, समाधि और ध्यानाध्ययनादि कार्योंको निरंतर पीडा देती है।
अहो व्यसनविध्वस्तैर्लोकः पाखण्डिभिर्बलात् ।
नीयते नरकं घोरं हिंसाशास्त्रोपदेशकैः ॥16॥
अर्थ: आचार्य महाराज आश्चर्यके साथ कहते हैं कि देखो ! धर्म तो दयामयी जगतमें प्रसिद्ध है परन्तु विषयकषायसे पीडित पाखण्डी हिंसाका उपदेश देनेवाले (यज्ञादिकमें पशु होमने तथा देवी आदिके बलिदान करने आदि हिंसाविधान करनेवाले) शास्त्रोंको रचकर जगतके जीवोंको बलात्कार भयानक नरकादिकमें ले जाते हैं। यह बडा ही अनर्थ है ।
रौरवादिषु घोरेषु विशन्ति पिशिताशनाः ।
तेष्वेव हि कदर्थ्यन्ते जन्तुघातकृतोद्यमाः ॥17॥
अर्थ: जो मांसके खानेवाले हैं वे सातवें नरकके रौरवादि बिलोंमें प्रवेश करते हैं और वहीं पर जीवोंको घात करनेवाले शिकारी आदिक भी पीडित होते हैं ।
शान्त्यर्थं देवपूजार्थं यज्ञार्थमथवा नृभिः ।
कृतः प्राणभृतां घातः पातयत्यविलम्बितम् ॥18॥
अर्थ: अपनी शान्तिके अर्थ अथवा देवपूजाके तथा यज्ञके अर्थ जो मनुष्य जीवघात (जीवहिंसा) करते हैं वह घात भी जीवोंको शीघ्र ही नरकमें डालता है ।
हिंसैव दुर्गतेर्द्वारं हिंसैव दुरितार्णवः ।
हिंसैव नरकं घोरं हिंसैव गहनं तमः ॥19॥
अर्थ: हिंसा ही दुर्गतिका द्वार है, पापका समुद्र है तथा हिंसा ही घोर नरक और महा अन्धकार है ।
निःस्पृहत्वं महत्त्वं च नैराश्यं दुष्करं तपः ।
कायक्लेशश्च दानं च हिंसकानामपार्थकम् ॥20॥
अर्थ: जो हिंसक पुरुष है उनकी निःस्पृहता, महत्ता, आशारहितता, दुष्कर तप करना, कायक्लेश और दान करना आदि समस्त धर्मकार्य व्यर्थ हैं अर्थात् निष्फल हैं ।
कुलक्रमागता हिंसा कुलनाशाय कीर्तिता ।
कृता च विघ्नशान्त्यर्थं विघ्नौघायैव जायते ॥21॥
अर्थ: कुलक्रमसे जो हिंसा चली आई है वह उस कुलको नाश करनेके लिये ही कही गई है तथा विघ्नकी शान्तिके अर्थ जो हिंसा की जाती है वह विघ्नसमूहको बुलानेके लिये ही है ।
सौख्यार्थे दुःखसन्तानं मङ्गलार्थेऽप्यमङ्गलम् ।
जीवितार्थे ध्रुवं मृत्युं कृता हिंसा प्रयच्छति ॥22॥
अर्थ: सुखके अर्थ की हुई हिंसा दुःखकी परिपाटी करती है, मंगलार्थ की हुई हिंसा अमंगल करती है तथा जीवनार्थ की हुई हिंसा मृत्युको प्राप्त कराती है । इस बातको निश्चय जानना ।
तितीर्षति ध्रुवं मूढः स शिलाभिर्नदीपतिम् ।
धर्मबुद्ध्याऽधमो यस्तु घातयत्यङ्गिसंचयम् ॥23॥
अर्थ: जो मूढ अधम धर्मकी बुद्धिसे जीवोंको मारता है सो पाषाणकी शिलाओं पर बैठकर समुद्रको तैरनेकी इच्छा करता है । क्योंकि वह नियमसे डूबेगा ।
प्रमाणीकृत्य शास्त्राणि यैर्वधः क्रियतेऽधमैः ।
सह्यते परलोके तैः श्वभ्रे शूलाधिरोहणम् ॥24॥
अर्थ: जो अधम शास्त्रोंका प्रमाण देकर जीवोंका वध करना धर्म बताते हैं वे मृत्यु होने पर नरकमें शूली पर चढाये जाते हैं ।
निर्दयेन हि किं तेन श्रुतेनाचरणेन च ।
यस्य स्वीकारमात्रेण जन्तवो यान्ति दुर्गतिम् ॥25॥
अर्थ: जिसमें दया नहीं है ऐसे शास्त्र तथा आचरणसे क्या लाभ ? क्योंकि ऐसे शास्त्रके वा आचरणके अंगीकार मात्रसे ही जीव दुर्गतिको चले जाते हैं ।
वरमेकाक्षरं ग्राह्यं सर्वसत्त्वानुकम्पनम् ।
न त्वक्षपोषकं पापं कुशास्त्रं धूर्त्तचर्चितम् ॥26॥
अर्थ: सर्व प्राणियों पर दया करनेवाला तो एक अक्षर श्रेष्ठ है और ग्रहण करने योग्य है; परन्तु धूर्त तथा विषयकषायी पुरुषोंका रचा हुआ इंद्रियोंको पोषनेवाला ज़ो पापरूप कुशास्त्र है वह श्रेष्ठ नहीं है ।
चरुमन्त्रौषधानां वा हेतोरन्यस्य वा क्वचित् ।
कृता सती नरैर्हिंसा पातयत्यविलम्बितम् ॥27॥
अर्थ: देवताकी पूजाके लिये रचे हुए नैवेद्य तथा मंत्र और औषधके निमित्त अथवा अन्य किसी भी कार्यके लिये की हुई हिंसा जीवोंको नरकमें ले जाती हैं ।
विहाय धर्मं शमशीललाञ्छितं दयावहं भूतहितं गुणाकरम् ।
मदोद्धता अक्षकषायवञ्चिता दिशन्ति हिंसामपि दुःखशान्तये ॥28॥
अर्थ: जो पुरुष गर्वसे उद्धत हैं और इन्द्रियोंके विषय तथा कषायोंसे ठगे गये हैं वे ही मन्दकषाय तथा उपशमरूप शीलसे चिह्नित दयामयी जीवोंके हित करनेवाले गुणोंकी खानि दयाधर्मको छोडकर दुःखकी शान्तिके लियें हिंसाको भी धर्म कहकर उपदेश करते हैं ।
धर्मबुद्ध्याऽधमैः पापं जन्तुघातादिलक्षणम् ।
क्रियते जीवितस्यार्थे पीयते विषमं विषं ॥29॥
अर्थ: जो पापी धर्मकी बुद्धिसे जीवघातरूपी पापको करते हैं वे अपने जीवनकी इच्छासे हलाहल विषको पीते हैं ।
एतत्समयसर्वस्वमेतत्सिद्धान्तजीवितम् ।
यज्जन्तुजातरक्षार्थं भावशुद्ध्या दृढं व्रतम् ॥30॥
अर्थ: वही तो मतका सर्वस्व है और वही सिद्धान्तका रहस्य है जो जीवोंके समूहकी रक्षाके लिये है एवं वही भावशुद्धिपूर्वक दृढ व्रत है ।
श्रूयते सर्वशास्त्रेषु सर्वेषु समयेषु च ।
“अहिंसालक्षणो धर्मः” तद्विपक्षश्च पातकम् ॥31॥
अर्थ: समस्त मतोंके समस्त शास्त्रोंमें यही सुना जाता है कि अहिंसालक्षण तो धर्म है और इसका प्रतिपक्षी हिंसा करना ही पाप है । इस सिद्धान्तसे जो विपरीत वचन हो वह सब विषयाभिलाषी जिह्वालंपट जीवोंके दूरसे ही तजने योग्य जानना चाहिये ।
अहिंसैव जगन्माताऽहिंसैवानन्दपद्धतिः ।
अहिंसैव गतिः साध्वी श्रीरहिंसैव शाश्वती ॥32॥
अर्थ: अहिंसा ही तो जगतकी माता है क्योंकि समस्त जीवोंकी प्रतिपालना करनेवाली है । अहिंसा ही आनन्दकी सन्तति अर्थात् परिपाटी है । अहिंसा ही उत्तम गति और शाश्वती लक्ष्मी है । जगतमें जितने उत्तमोत्तम गुण हैं वे सब इस अहिंसामें ही हैं ।
अहिंसैव शिवं सूते दत्ते च त्रिदिवश्रियं ।
अहिंसैव हितं कुर्याद् व्यसनानि निरस्यति ॥33॥
अर्थ: यह अहिंसा ही मुक्तिको करती है तथा स्वर्गकी लक्ष्मीको देती है और अहिंसा ही आत्माका हित करती है तथा समस्त कष्टरूप आपदाओंको नष्ट करती है ।
सप्तद्वीपवतीं धात्रीं कुलाचलसमन्विताम् ।
नैकप्राणिवधोत्पन्नं दत्वा दोषं व्यपोहति ॥34॥
अर्थ: यदि कुलाचल पर्वतोंके सहित सात द्वीपकी पृथ्वी भी दान कर दी जाय तो भी एक प्राणीको मारनेका पाप दूर नहीं हो सकता है ।
सकलजलधिवेलावारिसीमां धरित्रीं
नगरनगसमग्रां स्वर्णरत्नादिपूर्णाम् ।
यदि मरणनिमित्ते कोऽपि दद्यात्कथंचित्
तदपि न मनुजानां जीविते त्यागबुद्धिः ॥35॥
अर्थ: यदि कोई किसी मनुष्यको मर जानेके बदलेमें नगर, पर्वत तथा सुवर्ण रत्न धन धान्यादिसे भरी हुई समुद्रपर्यन्तकी पृथ्वीका दान करें तो भी अपने जीवनको त्याग करनेमें उसकी इच्छा नहीं होगी ।
आत्मैवोत्क्षिप्य तेनाशु प्रक्षिप्तः श्वभ्रसागरे ।
स्नेहभ्रमभयेनापि येन हिंसा समर्थिता ॥36॥
अर्थ: जिस पुरुषने किसीकी प्रीतिके भ्रमसे अथवा किसीके भयसे हिंसाका समर्थन किया कि हिंसा करना बुरा नहीं है तो ऐसा समझो कि उसने अपने आत्माको उसी समय नरकरूपी समुद्रमें डाल दिया ।
शूलचक्रासिकोदण्डैरुद्युक्ताः सत्त्वखण्डने ।
येऽधमास्तेऽपि निस्त्रिंशैर्देवत्वेन प्रकल्पिताः ॥37॥
अर्थ: जो पापी त्रिशूल, चक्र, तलवार और धनुष इत्यादि शस्त्रोंसे जीवोंको घात करनेमें उद्यत हैं ऐसे चंडी, काली, भैरवादिकोंको भी निर्दय पुरुष देवता मानकर उनकी स्थापना करते हैं ।
बलिभिर्दुर्बलस्यात्र क्रियते यः पराभवः ।
परलोके स तैस्तस्मादनन्तः प्रविषह्यते ॥38॥
अर्थ: जो बलवान् पुरुष इस लोकमें निर्बलका पराभव करता वा सताता है वह परलोकमें उससे अनन्तगुणा पराभव सहता है । अर्थात्-जो कोई बलवान् निर्बलको दुःख देता है तो उसका अनन्त गुणा दुःख वह स्वयं अगले जन्ममें भोगता है ।
भयवेपितसर्वाङ्गाननाथान् जीवितप्रियान् ।
निघ्नद्भिः प्राणिनः किं तैः स्वं ज्ञातमजरामरं ॥39॥
अर्थ: जिनके सब अंग भयसे कंपित हैं, जिनका कोई रक्षक नहीं, जो अनाथ हैं, जिनको जीवन ही एक मात्र प्रिय वस्तु है, ऐसे प्राणियोंको जो मारते हैं उन्होंने क्या अपनेको अजरामर जान लिया ?
स्वपुत्रपौत्रसन्तानं वर्द्धयन्त्यादरैर्जनाः ।
व्यापादयन्ति वान्येषामत्र हेतुर्न बुद्ध्यते ॥40॥
अर्थ: यह बडा आश्चर्य है कि अपने पुत्रपौत्रादि सन्तानको तो बडे यत्नसे पालते और बढाते हैं परन्तु दूसरोंकी सन्तानका घात करते हैं । न मालूम कि इसमें क्या हेतु हैं ?
परमाणोः परं नाल्पं न महद्गगनात्परं ।
यथा किञ्चित्तथा धर्मो नाहिंसालक्षणात्परः ॥41॥
अर्थ: इस लोकमें जैसे परमाणुसे तो कोई छोटा वा अल्प नहीं है और आकाशसे कोई बडा नहीं है, इसी प्रकार अहिंसारूप धर्मसे बडा कोई धर्म नहीं है; यह जगत्प्रसिद्ध लोकोक्ति है । यथा-“अहिंसा परमो धर्मः हिंसा सर्वत्र गर्हिता” ।
तपः श्रुतयमज्ञानध्यानदानादिकर्मणां ।
सत्यशीलव्रतादीनामहिंसा जननी मता ॥42॥
अर्थ: तप, श्रुत (शास्त्रका ज्ञान), यम (महाव्रत), ज्ञान (बहुत जानना), ध्यान और दान करना तथा सत्य शील व्रतादिक जितने उत्तम कार्य हैं उन सबकी माता एक अहिंसा ही है । अहिंसाव्रतके पालन विना उपर्युक्त गुणोमेंसे एक भी नहीं होता, इस कारण अहिंसा ही समस्त धर्मकार्योकी उत्पन्न करनेवाली माता है ।
करुणार्द्रं च विज्ञानवासितं यस्य मानसम् ।
इन्द्रियार्थेषु निःसङ्गं तस्य सिद्धं समीहितम् ॥43॥
अर्थ: जिस पुरुषका मन करुणासे आर्द्र (गीला) हो तथा विशिष्ट ज्ञानसहित हो और इन्द्रियोंके विषयोंसे दूर हो, उसीको मनोवांछित कार्यकी सिद्धि होती है ।
निस्त्रिंश एव निस्त्रिंशं यस्य चेतोऽस्ति जन्तुषु ।
तपःश्रुताद्यनुष्ठानं तस्य क्लेशाय केवलम् ॥44॥
अर्थ: जिस पुरुषका चित्त जीवोंके लिये शस्त्रके समान निर्दय है उसका तप करना और शास्त्रका पढना आदि कार्य केवल कष्टके लिये ही होता है किन्तु कुछ भलाईके लिये नहीं होता ।
द्वयोरपि समं पापं निर्णीतं परमागमे ।
वधानुमोदयोः कर्त्रोरसत्संकल्पसंश्रयात् ॥45॥
अर्थ: घात करनेवाला और घात करनेवालेकी प्रशंसा करनेवाला इन दोनोंका पाप परमागममें समान ही निर्णय किया गया है क्योंकि जैसे घात करनेवालेको जो पाप हुआ सो भी अशुभ परिणामोंसे हुआ है, उसी प्रकार भले जाननेवालेके भी अशुभ संकल्प हुए विना उसकी अनुमोदना नहीं हो सकती है इस कारण हिंसा करने और उसको भला जाननेवालेको पाप बराबर लगता है ।
संकल्पाच्छालिमत्स्योऽपि स्वयंभूरमणार्णवे ।
महामत्स्याशुभेन स्वं नियोज्य नरकं गतः ॥46॥
अर्थ: देखो, स्वयंभूरमणसमुद्रमें शालिमत्स्य महामत्स्यके परिणामोंसे अपने परिणाम मिला कर नरकको गया । यह, अन्य कोई हिंसा करें उसका जो आप अनुमोदन करें तो उसके संकल्प मात्रसे उसीके समान पाप होनेका उदाहरण है ।
अहिंसैकाऽपि यत्सौख्यं कल्याणमथवा शिवम् ।
दत्ते तद्देहिनां नायं तपःश्रुतयमोत्करः ॥47॥
अर्थ: यह अहिंसा अकेली ही जीवोंको जो सुख, कल्याण वा अभ्युदय देती है वह तप, स्वाध्याय और यमनियमादि नहीं दे सकते हैं । क्योंकि धर्मके समस्त अङ्गोंमें अहिंसा ही एक मात्र प्रधान है ।
दूयते यस्तृणेनापि स्वशरीरे कदर्थिते ।
स निर्दयः परस्याङ्गे कथं शस्त्रं निपातयेत् ॥48॥
अर्थ: जो मनुष्य अपने शरीरमें तिनका चुभने पर भी अपनेको दुःखी हुआ मानता है वह निर्दय होकर परके शरीर पर शस्त्र कैसे चलाता है ? यह बडा अनर्थ है ।
जन्मोग्रभयभीतानामहिंसैवौषधिः परा ।
तथाऽमरपुरीं गन्तुं पाथेयं पथि पुष्कलम् ॥49॥
अर्थ: इस संसाररूप तीव्र भयसे भयभीत होनेवाले जीवोंको यह अहिंसा ही एक परम औषधि है । क्योंकि यह सबका भय दूर करती है तथा स्वर्ग जानेके लिये अहिंसा ही मार्गमें अतिशय वा पुष्टिकारक पाथेयस्वरूप (भोजनादिकी सामग्री) है ।
किन्त्वहिंसैव भूतानां मातेव हितकारिणी ।
तथा रमयितुं कान्ता विनेतुं च सरस्वती ॥50॥
अर्थ: यह अहिंसा इतनी ही नहीं है, किन्तु जीवोंके लिये माताके समान रक्षा करनेवाली और स्त्रीके समान चित्तको आनन्द देनेवाली है तथा सदुपदेश देनेके लिये सरस्वतीके समान है ।
स्वान्ययोरप्यनालोक्य सुखं दुःखं हिताहितम् ।
जन्तून् यः पातकी हन्यात्स नरत्वेऽपि राक्षसः ॥51॥
अर्थ: जो पापी नर अपने और अन्यके सुख-दुःख वा हित-अहितको न विचार कर जीवोंको मारता है वह मनुष्यजन्ममें भी राक्षस है । क्योंकि मनुष्य होता तो अपना वा परका हिताहित विचारता ।
अभयं यच्छ भूतेषु कुरु मैत्रीमनिन्दिताम् ।
पश्यात्मसदृशं विश्वं जीवलोकं चराचरम् ॥52॥
अर्थ: आचार्य महाराज उपदेश करते हैं कि हे भव्य ! तू जीवोंके लिये अभयदान दे तथा उनसे प्रशंसनीय मित्रता कर और समस्त त्रस व स्थावर जीवोंको अपने समान देख ।
जायन्ते भूतयः पुंसां याः कृपाक्रान्तचेतसाम् ।
चिरेणापि न ता वक्तुं शक्ता देव्यपि भारती ॥53॥
अर्थ: जिनका चित्त दयालु है उन पुरुषोंको जो सम्पदा होती है, उनका वर्णन सरस्वतीदेवी भी बहुत कालपर्यंत करे तो भी उससे नहीं हो सकता; फिर अन्यसे तो किया ही कैसे जा सकता है ? ।
किं न तप्तं तपस्तेन किं न दत्तं महात्मना ।
वितीर्णमभयं येन प्रीतिमालम्ब्य देहिनाम् ॥54॥
अर्थ: जिस महापुरुषने जीवोंको प्रीतिका आश्रय देकर अभयदान दिया उस महात्माने कौनसा तप नहीं किया और कौनसा दान नहीं दिया ! अर्थात् उस महापुरुषने समस्त तप, दान किया । क्योंकि अभयदानमें सब तप, दान आ जाते हैं ।
यथा यथा हृदि स्थैर्यं करोति करुणा नृणाम् ।
तथा तथा विवेकश्रीः परां प्रीतिं प्रकाशते ॥55॥
अर्थ: पुरुषोंके हृदयमें जैसे जैसे करुणाभाव स्थिरताको प्राप्त करता है तैसे तैसे विवेकरूपी लक्ष्मी उससे परम प्रीति प्रकट करती रहती है ।
अन्ययोगव्यवच्छेदादहिंसा श्रीजिनागमे ।
परैश्च योगमात्रेण कीर्तिता सा यदृच्छया ॥56॥
अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के मार्गमें तो अहिंसा अन्ययोगव्यवच्छेदसे कही है अर्थात् अन्यमतोंमें ऐसी अहिंसाका योग ही नहीं है । इस जिनमतमें तो हिंसाका सर्वथा निषेध ही है और अन्यमतियोंने जो अहिंसा कही है सो योगमात्रसे ही कही है अर्थात् कहीं अहिंसा कही है और कहीं हिंसाका पोषण किया है, सो स्वेच्छापूर्वक उन्मत्तकी तरह कही है ।
तन्नास्ति जीवलोके जिनेन्द्रदेवेन्द्रचक्रकल्याणम् ।
यत्प्राप्नुवन्ति मनुजा न जीवरक्षानुरागेण ॥57॥
अर्थ: इस जीवलोकमें (जगतमें) मनुष्य जीवरक्षाके अनुरागसे समस्त कल्याणरूप पदको प्राप्त होते हैं। ऐसा कोई भी तीर्थंकर देवेन्द्र चक्रवर्त्तित्वरूप कल्याणपद लोकमें नहीं है जो दयावान् नहीं पावें। अर्थात् अहिंसा (दया) सर्वोत्तम पदकी देनेवाली है ।
यत्किंचित्संसारे शरीरिणां दुःखशोकभयबीजम् ।
दौर्भाग्यादि समस्तं तद्धिंसासंभवं ज्ञेयम् ॥58॥
अर्थ: संसारमें जीवोंके जो कुछ दुःख शोक भयका बीज कर्म है तथा दुर्भाग्यादिक हैं वे समस्त एक मात्र हिंसासे उत्पन्न हुए जानो ।
ज्योतिश्चक्रस्य चन्द्रो हरिरमृतभुजां चण्डरोचिर्ग्रहाणाम्
कल्पाङ्गं पादपानां सलिलनिधिरपां स्वर्णशैलो गिरीणाम् ।
देवः श्रीवीतरागस्त्रिदशमुनिगणस्यात्र नाथो यथाऽयम्
तद्वच्छीलव्रतानां शमयमतपसां विद्ध्यहिंसां प्रधानाम् ॥59॥
अर्थ: हे भव्य जीव ! जिस प्रकार ज्योतिश्चक्रोंमें प्रधान स्वामी चन्द्रमा है तथा देवोंमें इन्द्र, ग्रहोंमें सूर्य, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, जलाशयोंमें समुद्र, पर्वतोंमें मेरु और देवोंमें मुनियोंके नाथ (स्वामी) श्रीवीतराग देव प्रधान हैं उसी प्रकार शील और व्रतोंमें तथा शमभाव, यम (महाव्रत) और तपोंमें अहिंसाको प्रधान जानो । ऐसे अहिंसा महाव्रतका वर्णन किया गया ।