बृहद् द्रव्यसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ (आचार्य नेमिचन्द्र) | Brihad Dravyasangrah Gatha Evam Gatharth (Acharya Nemichandra)

बृहद्द्रव्यसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव कृत बृहद्द्रव्यसंग्रह की 58 प्राकृत मूल गाथाएँ, हर गाथा के नीचे उसका गाथार्थ। तीनों अधिकार इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ हैं। गाथार्थ संलग्न ग्रंथ (श्री ब्रह्मदेव विरचित संस्कृत वृत्ति और हिन्दी अनुवाद सहित, पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, चतुर्थ संस्करण 2006) में छपे “गाथार्थ” से ज्यों का त्यों लिया है, अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल गाथाएँ (छपाई की टिप्पणियों सहित): बृहद् द्रव्य संग्रह मूल गाथा (आचार्य नेमिचन्द्र) | Brihad Dravyasangrah Mool Gatha (Acharya Nemichandra)

स्रोत: Bruhad_dravya_sangrah_hindi.pdf

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षड्द्रव्य-पंचास्तिकाय अधिकार (गाथा 1 से 27)

जीवमजीवं दव्वं जिणवरवसहेण जेण णिद्दिट्ठं ।
देविंदविंदवंदं वंदे तं सव्वदा सिरसा ॥1॥

गाथार्थ: मैं (नेमिचन्द्र सिद्धान्तिदेव), जिस जिनवरवृषभने जीव और अजीव द्रव्यका वर्णन किया है, उस देवेन्द्रोंके समूहसे वंद्य तीर्थंकर-परमदेवको सदा मस्तक द्वारा नमस्कार करता हूँ ।


जीवो उवओगमओ अमुत्ति कत्ता सदेहपरिमाणो ।
भोत्ता संसारत्थो सिद्धो सो विस्ससोड्ढगई ॥2॥

गाथार्थ: जो जीता है, उपयोगमय है, अमूर्तिक है, कर्ता है, स्वदेहप्रमाण है, भोक्ता है, संसारस्थ है, सिद्ध है और स्वभावसे ऊर्ध्वगमन करनेवाला है वह जीव है ।


तिक्काले चदुपाणा इंदियबलमाउआणपाणो य ।
ववहारा सो जीवो णिच्छयणयदो दु चेदणा जस्स ॥3॥

गाथार्थ: तीनों कालोंमें इन्द्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास - इन चार प्राणोंको जो धारण करता है वह व्यवहारनयसे जीव है । निश्चयनयसे जिसको चेतना है वह जीव है ।


उवओगो दुवियप्पो दंसणणाणं च दंसणं चदुधा ।
चक्खु अचक्खू ओही दंसणमध केवलं णेयं ॥4॥

गाथार्थ: उपयोग दो प्रकारका है : दर्शन और ज्ञान । उसमें दर्शनोपयोग चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन - इस प्रकार चार प्रकारका जानना ।


णाणं अट्ठवियप्पं मदिसुदिओही अणाणणाणाणि ।
मणपज्जवकेवलमवि पच्चक्खपरोक्खभेयं च ॥5॥

गाथार्थ: कुमति, कुश्रुत, कुअवधि, मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान - इस प्रकार आठ प्रकारका ज्ञान है । इसमें भी प्रत्यक्ष और परोक्षरूप भेद है ।


अट्ठ चदु णाणदंसण सामण्णं जीवलक्खणं भणियं ।
ववहारा सुद्धणया सुद्धं पुण दंसणं णाणं ॥6॥

गाथार्थ: व्यवहारनयसे आठ प्रकारका ज्ञान और चार प्रकारका दर्शन - यह सामान्यरूपसे जीवका लक्षण कहा है । शुद्धनयकी अपेक्षासे शुद्ध ज्ञान - दर्शनको जीवका लक्षण कहा है ।


वण्ण रस पंच गंधा दो फासा अट्ठ णिच्छया जीवे ।
णो संति अमुत्ति तदो ववहारा मुत्ति बंधादो ॥7॥

गाथार्थ: निश्चयसे जीवमें पांच वर्ण, पांच रस, दो गंध और आठ स्पर्श नहीं हैं अतः जीव अमूर्तिक है; व्यवहारनयकी अपेक्षासे कर्मबंध होनेसे जीव मूर्तिक है ।


पुग्गलकम्मादीणं कत्ता ववहारदो दु णिच्छयदो ।
चेदणकम्माणादा सुद्धणया सुद्धभावाणं ॥8॥

गाथार्थ: आत्मा व्यवहारनयसे पुद्गलकर्मादिका कर्ता है, निश्चयनयसे चेतनकर्मोंका कर्ता है और शुद्धनयसे शुद्धभावोंका कर्ता है ।


ववहारा सुहदुक्खं पुग्गलकम्मप्फलं पभुंजेदि ।
आदा णिच्छयणयदो चेदणभावं खु आदस्स ॥9॥

गाथार्थ: व्यवहारनयसे आत्मा सुख - दुःखरूप पुद्गलकर्मके फलको भोगता है और निश्चयनयसे अपने चेतनभावको भोगता है ।


अणुगुरुदेहपमाणो उवसंहारप्पसप्पदो चेदा ।
असमुहदो ववहारा णिच्छयणयदो असंखदेसो वा ॥10॥

गाथार्थ: समुद्घातके अतिरिक्त, यह जीव व्यवहारनयकी अपेक्षासे संकोच - विस्तारके कारण अपने छोटे अथवा बड़े शरीरप्रमाण रहता है और निश्चयनयकी अपेक्षासे असंख्यात प्रदेशी है ।


पुढविजलतेयवाऊ वणप्फदी विविहथावरेइंदी ।
विगतिगचदुपंचक्खा तसजीवा होंति संखादी ॥11॥

गाथार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति आदि विविध प्रकारके स्थावर, एकेन्द्रिय जीव हैं और शंखादि दो, तीन, चार तथा पांच इन्द्रियवाले त्रस जीव हैं।


समणा अमणा णेया पंचिंदिय णिम्मणा परे सव्वे ।
बादरसुहमेइंदी सव्वे पज्जत्त इदरा य ॥12॥

गाथार्थ: पंचेन्द्रिय जीव संज्ञी और असंज्ञी ऐसे दो प्रकारके जानना । शेष सब जीव मनरहित असंज्ञी हैं । एकेन्द्रिय जीव बादर और सूक्ष्म दो प्रकारके हैं । ये सब जीव पर्याप्त और अपर्याप्त होते हैं ।


मग्गणगुणठाणेहि य चउदसहि हवंति तह असुद्धणया ।
विण्णेया संसारी सव्वे सुद्धा हु सुद्धणया ॥13॥

गाथार्थ: सर्व संसारी जीव अशुद्धनयसे मार्गणास्थान और गुणस्थानकी अपेक्षासे चौदह-चौदह प्रकारके हैं। शुद्धनयसे यथार्थमें सब संसारी जीव शुद्ध जानना।


णिक्कम्मा अट्ठगुणा किंचूणा चरमदेहदो सिद्धा ।
लोयग्गठिदा णिच्चा उप्पादवएहिं संजुत्ता ॥14॥

गाथार्थ: सिद्ध भगवान् कर्मोंसे रहित हैं, आठ गुणोंके धारक हैं, अन्तिम शरीरसे कुछ न्यून (कम) आकारवाले हैं, लोकके अग्रभागमें स्थित हैं, नित्य हैं और उत्पाद-व्ययसे युक्त हैं ।


अज्जीवो पुण णेओ पुग्गलधम्मो अधम्म आयासं ।
कालो पुग्गल मुत्तो रूवादिगुणो अमुत्ति सेसा दु (हु) ॥15॥

गाथार्थ: पुद्गल, धर्म, अधर्म आकाश और काल - ये अजीव द्रव्य जानना, रूपादि गुणका धारक पुद्गल मूर्त द्रव्य है और शेष (चार) अमूर्त हैं ।


सद्दो बंधो सुहुमो थूलो संठाणभेदतमछाया ।
उज्जोदादवसहिया पुग्गलदव्वस्स पज्जाया ॥16॥

गाथार्थ: शब्द, बंध, सूक्ष्म, स्थूल, संस्थान, भेद, तम, छाया, उद्योत और आतप पुद्गल द्रव्यकी पर्यायें हैं ।


गइपरिणयाण धम्मो पुग्गलजीवाण गमणसहयारी ।
तोयं जह मच्छाणं अच्छंत्ताणेव सा णेई ॥17॥

गाथार्थ: गमन करनेमें परिणत पुद्गल और जीवोंको गमनमें सहकारी धर्मद्रव्य है; जिस प्रकार मछलियोंको गमन करनेमें जल सहकारी है उसी प्रकार गमन नहीं करते हुए जीव और पुद्गलोंको वह (धर्मद्रव्य) गमन नहीं कराता ।


ठाणजुदाण अधम्मो पुग्गलजीवाण ठाणसहयारी ।
छाया जह पहियाणं गच्छंता णेव सो धरई ॥18॥

गाथार्थ: स्थितियुक्त पुद्गल और जीवोंको स्थितिमें सहकारीकारण अधर्मद्रव्य है; जिस प्रकार छाया यात्रियोंकी स्थितिमें सहकारी है उसी प्रकार । गमन करते हुए जीव और पुद्गलोंको अधर्मद्रव्य स्थिर नहीं करता है ।


अवगासदाणजोग्गं जीवादीणं वियाण आयासं ।
जेण्हं लोगागासं अल्लोगागासमिदि दुविहं ॥19॥

गाथार्थ: जो जीवादि द्रव्योंको अवकाश देनेके योग्य है उसे जिनेन्द्रदेव द्वारा कथित आकाशद्रव्य जानो । लोकाकाश और अलोकाकाश इस भांति आकाश दो प्रकारका है ।


धम्माऽधम्मा कालो पुग्गलजीवा य संति जावदिये ।
आयासे सो लोगो तत्ता परदो अलोगुत्ति ॥20॥

गाथार्थ: धर्म, अधर्म, काल, पुद्गल और जीव - ये पांच द्रव्य जितने आकाशमें रहते हैं वह लोकाकाश है; उस लोकाकाशसे बाहर अलोकाकाश है ।


दव्वपरिवट्टरूवो जो सो कालो हवेइ ववहारो ।
परिणामादीलक्खो वट्टणलक्खो य परमट्ठो ॥21॥

गाथार्थ: जो द्रव्योंके परिवर्तनरूप है (अर्थात् द्रव्य परिवर्तनकी स्थितिरूप है) और परिणामादिसे लक्षित होता है वह व्यवहारकाल है; वर्तना लक्षणयुक्त काल निश्चयकाल है।


लोयायासपदेसे इक्किक्के जे ठिया हु इक्किक्का ।
रयणाणं रासी इव ते कालाणू असंखदव्वाणि ॥22॥

गाथार्थ: जो लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर रत्नोंकी राशिकी भांति भिन्न-भिन्नरूपसे एक-एक स्थित हैं वे कालाणु असंख्य द्रव्य हैं ।


एवं छब्भेयमिदं जीवाजीवप्पभेददो दव्वं ।
उत्तं कालविजुत्तं णादव्वा पंच अत्थिकाया दु ॥23॥

गाथार्थ: इस प्रकार जीव और अजीवके प्रभेदसे द्रव्य छह प्रकारके हैं। कालद्रव्यके अतिरिक्त शेष पांच द्रव्योंको अस्तिकाय जानना ।


संति जदो तेणेदे अत्थित्ति भणंति जिणवरा जह्मा ।
काया इव बहुदेसा तह्मा काया य अत्थिकाया य ॥24॥

गाथार्थ: क्योंकि वे विद्यमान हैं अतः जिनवरोंने इन्हें ‘अस्ति’ कहा है और ये कायकी भांति बहुप्रदेशी हैं अतः इनको ‘काय’ कहा है । दोनों मिलकर ‘अस्तिकाय’ होते हैं ।


होंति असंखा जीवे धम्माधम्मे अणंत आयासे ।
मुत्ते तिविह पदेसा कालस्सेगो ण तेण सो काओ ॥25॥

गाथार्थ: जीव, धर्म तथा अधर्मद्रव्यके असंख्य प्रदेश हैं, आकाशके अनंत प्रदेश हैं; मूर्त्तके (पुद्गलके) तीन प्रकारके (संख्यात, असंख्यात और अनंत) प्रदेश हैं । कालका एक प्रदेश है अतः वह ‘काय’ नहीं है ।


एयपदेसो वि अणू णाणाखंधप्पदेसदो होदि ।
बहुदेसो उवयारा तेण य काओ भणंति सव्वण्हु ॥26॥

गाथार्थ: एक प्रदेशी (होने पर) भी परमाणु अनेक स्कन्धरूप बहुप्रदेशी हो सकता है इस कारण सर्वज्ञदेव उपचारसे परमाणुको ‘काय’ कहते हैं ।


जावदियं आयासं अविभागीपुग्गलाणुउट्टद्धं ।
तं खु पदेसं जाणे सव्वाणुट्ठाणदाणरिहं ॥27॥

गाथार्थ: जितना आकाश अविभागी पुद्गलाणु से रोका जाता है उसे सर्व अणुओंको स्थान देनेमें योग्य प्रदेश जानो ।

सप्ततत्त्व-नवपदार्थ अधिकार (गाथा 28 से 38)

आसव बंधण संवर णिज्जर मोक्खो सपुण्णपावा जे ।
जीवाजीवविसेसा तेवि समासेण पभणामो ॥28॥

गाथार्थ: आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, पुण्य और पापरूप जो पदार्थ जीव और अजीव द्रव्यके विशेष हैं, उन्हें भी हम संक्षेपमें कहते हैं ।


आसवदि जेण कम्मं परिणामेणप्पणो स विण्णेओ ।
भावासवो जिणुत्तो कम्मासवणं परो होदि ॥29॥

गाथार्थ: आत्माके जिस परिणामसे कर्मका आस्रव होता है उसे जिनेन्द्र कथित भावास्रव जानना और जो (ज्ञानावरणादि) कर्मोंका आस्रव है वह द्रव्यास्रव है।


मिच्छत्ताविरदिपमादजोगकोधादओऽथ विण्णेया ।
पण पण पणदस तिय चदु कमसो भेदा दु पुव्वस्स ॥30॥

गाथार्थ: पहलेके ( भावास्रवके ) मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और क्रोधादि कषाय इतने भेद जानना । उनमें मिथ्यात्व आदिके अनुक्रमसे पांच, पांच, पन्द्रह, तीन और चार भेद हैं ।


णाणावरणादीणं जोग्गं जं पुग्गलं समासवदि ।
दव्वासवो स णेओ अणेयभेओ जिणक्खादो ॥31॥

गाथार्थ: ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंके योग्य जो पुद्गल आते हैं, उन्हें द्रव्यास्रव जानना; वे अनेक भेदवाले हैं ऐसा श्री जिनेन्द्रदेवने कहा है ।


बज्झदि कम्मं जेण दु चेदणभावेण भावबंधो सो ।
कम्मादपदेसाणं अण्णोण्णपवेसणं इदरो ॥32॥

गाथार्थ: जिस चेतनभावसे कर्म बंधता है वह भावबंध है और कर्म तथा आत्माके प्रदेशोंका परस्पर प्रवेश वह द्रव्यबंध है ।


पयडिट्ठिदिअणुभागप्पदेसभेदादु चदुविधो बन्धो ।
जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो होंति ॥33॥

गाथार्थ: प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश - इन भेदोंसे बंध चार प्रकारका है; योगसे प्रकृति और प्रदेशबंध होता है और कषायसे स्थिति और अनुभागबंध होता है ।


चेदणपरिणामो जो कम्मस्सासवणिरोहणे हेदू ।
सो भावसंवरो खलु दव्वासवरोहणे अण्णो ॥34॥

गाथार्थ: आत्माका जो परिणाम कर्मके आस्रवको रोकनेमें कारण है उसे भावसंवर कहते हैं और जो द्रव्यास्रवका रुकना वह द्रव्यसंवर है ।


वदसमिदीगुत्तीओ धम्माणुपेहा परीसहजओ य ।
चारित्तं बहुभेया णायव्वा भावसंवरविसेसा ॥35॥

गाथार्थ: व्रत, समिति, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और अनेक प्रकारका चारित्र - इन सबको भावसंवरके भेद जानना ।


जह कालेण तवेण य भुत्तरसं कम्मपुग्गलं जेण ।
भावेण सडदि णेया तस्सडणं चेदि णिज्जरा दुविहा ॥36॥

गाथार्थ: (आत्माके) जिस भावसे यथासमय अथवा तप द्वारा फल देकर कर्म पुद्गल नष्ट होते हैं उसे निर्जरा (भावनिर्जरा) जानना तथा कर्म पुद्गलोंका नष्ट होना उसे निर्जरा (द्रव्यनिर्जरा) जानना। इसप्रकार निर्जरा दो प्रकारकी है।


सव्वस्स कम्मणो जो खयहेदू अप्पणो हु परिणामो ।
णेयो स भावमुक्खो दव्वविमुक्खो य कम्मपुहभावो ॥37॥

गाथार्थ: जो सर्व कर्मोंके नाशका कारण है ऐसा आत्माका परिणाम उसे भावमोक्ष जानना; कर्मोंका आत्मासे सर्वथा पृथक् होना वह द्रव्यमोक्ष है ।


सुहअसुहभावजुत्ता पुण्णं पावं हवंति खलु जीवा ।
सादं सुहाउ णामं गोदं पुण्णं पराणि पावं च ॥38॥

गाथार्थ: शुभ और अशुभ परिणामोंसे युक्त जीव वास्तवमें पुण्य-पापरूप होते हैं; शातावेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम तथा उच्चगोत्र ये पुण्य प्रकृतियां हैं, शेष सब पाप प्रकृतियां हैं ।

मोक्षमार्ग अधिकार (गाथा 39 से 58)

सम्मद्दंसणणाणं चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे ।
ववहारा णिच्छयदो तत्तियमइओ णिओ अप्पा ॥39॥

गाथार्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको व्यवहारनयसे मोक्षका कारण जानो । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रमय निज आत्माको निश्चयसे मोक्षका कारण जानो ।


रयणत्तयं ण वट्टइ अप्पाणं मुइत्तु अण्णदवियह्मि ।
तह्मा तत्तियमइउ होदि हु मुक्खस्स कारणं आदा ॥40॥

गाथार्थ: आत्माके अतिरिक्त अन्य द्रव्यमें रत्नत्रय नहीं रहते हैं इसकारण रत्नत्रयमयी आत्मा ही मोक्षका कारण है ।


जीवादीसद्दहणं सम्मत्तं रूवमप्पणो तं तु ।
दुरभिणिवेसविमुक्कं णाणं सम्मं खु होदि सदि जह्मि ॥41॥

गाथार्थ: जीवादि पदार्थोंका श्रद्धान करना वह सम्यक्त्व है । वह सम्यक्त्व आत्माका स्वरूप है । इस सम्यक्त्वके होनेपर दुरभिनिवेशरहित सम्यक्ज्ञान होता है ।


संसयविमोहविब्भमविवज्जियं अप्पपरसरूवस्स ।
गहणं सम्मण्णाणं सायारमणेयभेयं तु ॥42॥

गाथार्थ: आत्मा और परपदार्थोंके स्वरूपको संशय, विमोह और विभ्रमरहित जानना वह सम्यक्ज्ञान है; वह साकार और अनेक भेदोंवाला है ।


जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कट्टुमायारं ।
अविसेसिदूण अट्ठे दंसणमिदि भण्णए समए ॥43॥

गाथार्थ: पदार्थोंमें विशेषपना किये बिना (भेद किये बिना), आकार अर्थात् विकल्प किये बिना, पदार्थोंका जो सामान्यरूपसे (सत्तावलोकनरूप) ग्रहण उसे परमागममें दर्शन कहा जाता है ।


दंसणपुव्वं णाणं छदमत्थाणं ण दोण्णि उवउग्गा ।
जुगवं जह्मा केवलिणाहे जुगवं तु ते दो वि ॥44॥

गाथार्थ: छद्मस्थ जीवोंको दर्शनपूर्वक ज्ञान होता है क्योंकि छद्मस्थोंको ज्ञान और दर्शन ये दोनों उपयोग एक साथ नहीं होते हैं। केवली भगवानको ज्ञान और दर्शन ये दोनों उपयोग एक साथ ही होते हैं।


असुहादो विणिवित्ती सुहे पवित्ती य जाण चारित्तं ।
वदसमिदिगुत्तिरूवं ववहारणयादु जिणभणियम् ॥45॥

गाथार्थ: अशुभकार्यकी निवृत्ति और शुभकार्यमें प्रवृत्ति - उसे (व्यवहार) चारित्र जानो । व्रत-समिति-गुप्तिरूप ऐसा वह (चारित्र) व्यवहारनयसे जिनेन्द्रदेवने कहा है ।


बहिरब्भंतरकिरियारोहो भवकारणप्पणासट्ठं ।
णाणिस्स जं जिणुत्तं तं परमं सम्मचारित्तं ॥46॥

गाथार्थ: संसारके कारणोंका नाश करनेके लिये ज्ञानीको जो बाह्य और अंतरंग क्रियाओंका निरोध है; श्री जिनेन्द्र द्वारा कथित वह परम सम्यक् चारित्र है ।


दुविहं पि मोक्खहेउं झाणे पाउणदि जं मुणी णियमा ।
तह्मा पयत्तचित्ता जूयं झाणं समब्भसह ॥47॥

गाथार्थ: ध्यान करनेसे मुनि नियमसे निश्चय और व्यवहाररूप मोक्षमार्गको प्राप्त करते हैं। अतः तुम चित्तको एकाग्र करके ध्यानका सम्यक् प्रकारसे अभ्यास करो।


मा मुज्झह मा रज्जह मा दूसह इट्ठणिट्ठअट्ठेसु ।
थिरमिच्छहि जइ चित्तं विचित्तझाणप्पसिद्धीए ॥48॥

गाथार्थ: यदि तुम विचित्र (अनेक प्रकारके) अथवा विचित्त (विकल्पजाल रहित) ध्यानकी सिद्धिके लिये चित्तको स्थिर करना चाहते हो, तो इष्ट और अनिष्ट इन्द्रिय विषयोंमें मोह, राग और द्वेष न करो ।


पणतीससोलछप्पणचउदुगमेगं च जवह ज्झाएह ।
परमेट्ठिवाचयाणं अण्णं च गुरूवएसेण ॥49॥

गाथार्थ: पंच परमेष्ठीके वाचक पैंतीस, सोलह, छह, पांच, चार, दो और एक अक्षररूप मंत्रपदोंका जाप करो, ध्यान करो; उनके अतिरिक्त अन्यका भी, गुरुके उपदेश अनुसार जाप और ध्यान करो ।


णट्ठचदुघाइकम्मो दंसणसुहणाणवीरियमईओ ।
सुहदेहत्थो अप्पा सुद्धो अरिहो विचिंतिज्जो ॥50॥

गाथार्थ: जिन्होंने चार घातियाकर्म नष्ट किये हैं, जो (अनंत) दर्शन-सुख-ज्ञान-वीर्यमय हैं, जो उत्तम देहमें विराजमान हैं और जो शुद्ध (अठारह दोष रहित) हैं: - ऐसे आत्मा अर्हंत हैं, उनका ध्यान करने योग्य है ।


णट्ठट्ठकम्मदेहो लोयालोयस्स जाणओ दट्ठा ।
पुरिसायारो अप्पा सिद्धो झाएह लोयसिहरत्थो ॥51॥

गाथार्थ: जिसने आठकर्मका और देहका नाश किया है, जो लोकालोकका ज्ञाता और दृष्टा है तथा जो पुरुषाकार है, - ऐसा आत्मा सिद्ध है; लोकके शिखर पर विराजमान उस सिद्ध परमेष्ठीका तुम ध्यान करो ।


दंसणणाणपहाणे वीरियचारित्तवरतवायारे ।
अप्पं परं च जुंजइ सो आइरिओ मुणी झेओ ॥52॥

गाथार्थ: दर्शनाचार, ज्ञानाचारकी मुख्यता सहित वीर्याचार, चारित्राचार और तपाचार - इन पांच आचारोंमें जो अपनेको तथा परको जोड़ता है वह आचार्य मुनि ध्यान करने योग्य है ।


जो रयणत्तयजुत्तो णिच्चं धम्मोवदेसणे णिरदो ।
सो उवज्झाओ अप्पा जदिवरवसहो णमो तस्स ॥53॥

गाथार्थ: जो रत्नत्रयसहित, निरंतर धर्मका उपदेश देनेमें तत्पर है, वह आत्मा उपाध्याय है, मुनिवरोंमें प्रधान है; उसे नमस्कार हो ।


दंसणणाणसमग्गं मग्गं मोक्खस्स जो हु चारित्तं ।
साधयदि णिच्चसुद्धं साहू स मुणी णमो तस्स ॥54॥

गाथार्थ: दर्शन और ज्ञानसे पूर्ण, मोक्षमार्गस्वरूप, सदा शुद्ध ऐसे चारित्रको जो साधता है, वह मुनि - ‘साधु परमेष्ठी’ है, उसको मेरा नमस्कार हो ।


जं किंचिवि चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा साहू ।
लद्धूण य एयत्तं तदाहु तं तस्स णिच्छयं ज्झाणं ॥55॥

गाथार्थ: ध्येयमें एकत्व प्राप्त करके किसी भी पदार्थका ध्यान करता हुआ साधु जब निस्पृह वृत्तिवाला होता है तब उसका वह ध्यान निश्चयध्यान कहलाता है ।


मा चिट्ठह मा जंपह मा चिन्तह किंवि जेण होइ थिरो ।
अप्पा अप्पम्मि रओ इणमेव परं हवे ज्झाणं ॥56॥

गाथार्थ: (हे भव्यों ! ) कुछ भी चेष्टा मत करो, कुछ भी मत बोलो, कुछ भी चिंतवन मत करो, जिससे आत्मा निजात्मामें तल्लीनरूपसे स्थिर हो जाय । यही (आत्मामें लीनता ही) परमध्यान है ।


तवसुदवदवं चेदा ज्झाणरहधुरंधरो हवे जम्हा ।
तम्हा तत्तियणिरदा तल्लद्धीए सदा होह ॥57॥

गाथार्थ: क्योंकि तप, श्रुत और व्रतका धारक आत्मा ध्यानरूपी रथकी धुरा धारण करने वाला होता है, इसलिये हे भव्य पुरुषों ! तुम उस ध्यानकी प्राप्तिके लिये निरंतर तप, श्रुत और व्रतमें तत्पर होओ ।


दव्वसंगहमिणं मुणिणाहा दोससंचयचुदा सुदपुण्णा ।
सोधयंतु तणुसुत्तधरेण णेमिचन्दमुणिणा भणियं जं ॥58॥

गाथार्थ: अल्पश्रुतके धारक नेमिचन्द्र मुनिने जो यह द्रव्यसंग्रह रचा है उसका, दोषोंसे रहित और श्रुतज्ञानसे पूर्ण ऐसे आचार्य शोधन करें ।