मिथ्यात्व: परिभाषा, स्वरूप, लक्षण, भेद, प्रभेद, हेतु, कारण, कार्य | Mithyatva: Sampurn Vivechan

मिथ्यात्व को आगम में संसार का मूल कहा है। इस पोस्ट में मिथ्यात्व को आठ भागों में क्रम से समझाया गया है: परिभाषा, स्वरूप, लक्षण, भेद, प्रभेद, हेतु, कारण और कार्य। हर भाग में ग्रंथों के मूल सूत्र, गाथा और श्लोक ज्यों के त्यों दिए हैं, साथ में हिन्दी अर्थ।


१. परिभाषा

मिथ्यात्व का अर्थ है विपरीत श्रद्धान: जो तत्त्व जैसा है, उसे वैसा न मानना। इसे मिथ्यादर्शन भी कहते हैं। सम्यग्दर्शन की परिभाषा से इसका स्वरूप सीधा समझ आता है।

आचार्य उमास्वामी, तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 1:

तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् ॥२॥

अर्थ: तत्त्वार्थ का (जीव आदि सात तत्त्वों का, जैसे वे हैं वैसा) श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। इसका उल्टा, अर्थात् तत्त्वार्थ का अश्रद्धान या विपरीत श्रद्धान, मिथ्यादर्शन है।

आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती, गोम्मटसार जीवकाण्ड:

मिच्छोदयेण मिच्छत्तमसद्दहणं तु तच्च अट्ठाणं ।
एयंतं विवरीयं विणयं संसइदमण्णाणं ॥15॥

अर्थ: मिथ्यात्व कर्म के उदय से तत्त्वार्थ का जो अश्रद्धान होता है, वह मिथ्यात्व है। वह एकान्त, विपरीत, विनय, संशय और अज्ञान रूप से पाँच प्रकार का है।

पं. दौलतराम जी, छहढाला, दूसरी ढाल:

जीवादि प्रयोजनभूत तत्त्व, सरधै तिनमाँहि विपर्ययत्व।

अर्थ: मोक्षमार्ग में प्रयोजनभूत जीव आदि तत्त्वों में उल्टा श्रद्धान करना ही मिथ्यादर्शन है।


२. स्वरूप

मिथ्यात्व आत्मा की श्रद्धा का विकार है। मिथ्यादृष्टि जीव अपने चैतन्य स्वरूप को न जानकर शरीर को ही “मैं” मानता है और पर पदार्थों में अपनापन करता है।

छहढाला, दूसरी ढाल:

पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव-चाल।
ताकों न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान॥(3)

मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव।
मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीन॥(4)

अर्थ: जीव का स्वभाव पुद्गल, आकाश, धर्म, अधर्म और काल, इन पाँचों द्रव्यों से भिन्न है। उसे न जानकर जीव उल्टा मानता है और देह में ही अपनी पहचान करता है। “मैं सुखी, मैं दुखी, मैं रंक, मैं राजा, मेरा धन, घर, गाय बैल, मेरा पुत्र, मेरी स्त्री, मैं बलवान, मैं निर्बल, मैं कुरूप, मैं सुन्दर, मैं मूर्ख, मैं चतुर”, ऐसी पर्याय बुद्धि ही मिथ्यात्व का स्वरूप है।

आचार्य कुन्दकुन्द, समयसार:

मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं तहेव अण्णाणं ।
अविरदि जोगो मोहो कोहादीया इमे भावा ॥87॥

पोग्गलकम्मं मिच्छं जोगो अविरदि अणाणमज्जीवं ।
उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च जीवो दु ॥88॥

अर्थ (फोरम पर समयसार गाथा एवं अर्थ से): जीवमिथ्यात्व और अजीवमिथ्यात्व के भेद से मिथ्यात्व दो प्रकार का है। इसीप्रकार अज्ञान, अविरति, योग, मोह और क्रोधादि भी जीव और अजीव के भेद से दो दो प्रकार के होते हैं। जो मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान अजीव हैं, वे तो पौद्गलिक कर्म हैं और जो अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्व जीव हैं, वे उपयोग हैं।

अर्थात् आत्मा में होने वाला विपरीत श्रद्धान रूप भाव भाव मिथ्यात्व (जीव मिथ्यात्व) है, और उसमें निमित्त मिथ्यात्व नामक पुद्गल कर्म द्रव्य मिथ्यात्व (अजीव मिथ्यात्व) है।


३. लक्षण

मिथ्यादृष्टि को कैसे पहचानें? गोम्मटसार जीवकाण्ड में दो गाथाएँ इसके लक्षण बताती हैं:

मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणो होदि ।
ण य धम्मं रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जरिदो ॥17॥

अर्थ: मिथ्यात्व का वेदन (अनुभव) करने वाला जीव विपरीत श्रद्धान वाला होता है। जैसे ज्वर से पीड़ित मनुष्य को मीठा रस भी अच्छा नहीं लगता, वैसे ही उसे धर्म नहीं रुचता।

मिच्छाइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि ।
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं वा अणुवइट्ठं ॥18॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि जीव उपदेश किए गए जिन प्रवचन का श्रद्धान नहीं करता, और असद्भाव (अयथार्थ बात) का, चाहे वह किसी ने बताई हो या न बताई हो, श्रद्धान कर लेता है।

छहढाला, दूसरी ढाल, मिथ्यादृष्टि के और लक्षण:

तन उपजत अपनी उपज जान, तन नशत आपको नाश मान।
रागादि प्रगट जे दु:ख दैन, तिनही को सेवत गिनत चैन॥(5)

अर्थ: शरीर के उत्पन्न होने को अपना जन्म और शरीर के नाश को अपना नाश मानना, और जो रागादि भाव प्रगट दुख देने वाले हैं, उन्हीं के सेवन में सुख मानना।

संक्षेप में मुख्य लक्षण:

  1. देह और आत्मा को एक मानना
  2. पर द्रव्यों में “मेरा” पन और कर्ता बुद्धि
  3. रागादि दुखदायक भावों में सुख मानना
  4. धर्म का न रुचना, जिनवचन पर श्रद्धान न होना
  5. सच्चे देव, शास्त्र, गुरु के स्थान पर कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु का श्रद्धान

४. भेद

(क) दो भेद: अगृहीत और गृहीत

छहढाला, दूसरी ढाल:

यों मिथ्यात्वादि निसर्ग जेह, अब जे गृहीत सुनिये सु तेह॥(8)

  1. अगृहीत (नैसर्गिक) मिथ्यात्व: जो किसी के उपदेश के बिना, अनादि काल से जीव के साथ चला आ रहा है। यह सब संसारी जीवों में स्वभाव से (निसर्ग से) है।
  2. गृहीत मिथ्यात्व: जो इस भव में कुगुरु, कुदेव, कुधर्म के संसर्ग और उपदेश से ग्रहण किया जाता है।

(ख) पाँच भेद

आचार्य पूज्यपाद, सर्वार्थसिद्धि 8/1 (तत्त्वार्थसूत्र की टीका):

“तत्र इदमेव इत्थमेवेति धर्मिधर्मयोरभिनिवेश एकान्तः। पुरुष एवेदं सर्वम् इति वा नित्य एव वा अनित्य एवेति। सग्रन्थो निर्ग्रन्थः, केवली कवलाहारी, स्त्री सिद्ध्यतीत्येवमादिः विपर्ययः। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि किं मोक्षमार्गः स्याद्वा न वेत्यन्तरपक्षापरिग्रहः संशयः। सर्वदेवतानां सर्वसमयानां च समदर्शनं वैनयिकम्। हिताहितपरीक्षाविरहोऽज्ञानिकत्वम्।”

  1. एकान्त मिथ्यात्व: “यही है, ऐसा ही है”, इस प्रकार धर्मी और धर्म में एकान्त हठ। जैसे “यह सब पुरुष ही है”, या “वस्तु नित्य ही है”, या “अनित्य ही है”। अनेक धर्मों वाली वस्तु को एक ही धर्म वाली मानना।
  2. विपरीत मिथ्यात्व: उल्टा मानना। आचार्य के उदाहरण: परिग्रह सहित को निर्ग्रन्थ मानना, केवली को कवलाहार करने वाला मानना, स्त्री पर्याय से ही मोक्ष मानना इत्यादि।
  3. संशय मिथ्यात्व: “सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र मोक्षमार्ग है या नहीं”, इस प्रकार किसी एक पक्ष का निर्णय न करना।
  4. वैनयिक मिथ्यात्व: सब देवताओं और सब मतों को समान मानना, बिना परीक्षा सबकी एक सी विनय करना।
  5. अज्ञानिक मिथ्यात्व: हित और अहित की परीक्षा का अभाव।

यही पाँच भेद गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा 15 (ऊपर दी गई) में “एयंतं विवरीयं विणयं संसइदमण्णाणं” कहकर गिनाए हैं। आचार्य नेमिचन्द्र, बृहद् द्रव्यसंग्रह में भी भावास्रव के भेद गिनाते हुए:

मिच्छत्ताविरदिपमादजोगकोधादओऽथ विण्णेया ।
पण पण पणदस तिय चदु कमसो भेदा दु पुव्वस्स ॥30॥

अर्थ: भावास्रव के मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, योग और क्रोधादि कषाय, ये भेद जानने चाहिए। इनके क्रम से पाँच, पाँच, पन्द्रह, तीन और चार भेद हैं। अर्थात् मिथ्यात्व के पाँच भेद।


५. प्रभेद

(क) अगृहीत के तीन प्रभेद

छहढाला दूसरी ढाल के अनुसार अगृहीत मिथ्यात्व तीन रूप में है:

ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञानचरण,वश भ्रमत भरत दु:ख जन्म-मरण।
तातैं इनको तजिये सुजान, सुन तिन संक्षेप कहूँ बखान॥(1)

  1. अगृहीत मिथ्यादर्शन: प्रयोजनभूत तत्त्वों में विपरीत श्रद्धान (पद 2 से 6)
  2. अगृहीत मिथ्याज्ञान: उसी विपरीत प्रतीति सहित जो कुछ ज्ञान है: “याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दु:खदायक अज्ञान जान॥(7)”
  3. अगृहीत मिथ्याचारित्र: “इन जुत विषयनि में जो प्रवृत्त, ताको जानहु मिथ्याचरित्त।(8)”

(ख) गृहीत के प्रभेद: कुदेव, कुगुरु, कुधर्म की सेवा

जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव।(9)

जे क्रिया तिन्हैं जानहु कुधर्म, तिन सरधै जीव लहै अशर्म।
याकूँ गृहीत मिथ्यात्व जान, अब सुन गृहीत जो है अज्ञान॥(12)

अर्थ: जो कुगुरु, कुदेव और कुधर्म की सेवा करते हैं, वे दीर्घ काल तक दर्शनमोह को ही पुष्ट करते हैं। हिंसा सहित क्रियाओं को धर्म मानकर उनका श्रद्धान करने से जीव दुख पाता है, इसे गृहीत मिथ्यात्व जानो। छहढाला के अनुसार इसके भी गृहीत मिथ्यादर्शन, गृहीत मिथ्याज्ञान (पद 13) और गृहीत मिथ्याचारित्र (पद 14, 15) ये तीन रूप हैं।

(ग) तीन मूढ़ता (गृहीत मिथ्यात्व के रूप)

आचार्य समन्तभद्र, रत्नकरण्ड श्रावकाचार में सम्यग्दर्शन को तीन मूढ़ता रहित कहा है:

श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टाङ्गं सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥4॥

अर्थ: परमार्थभूत आप्त (देव), आगम (शास्त्र) और तपस्वी (गुरु) का तीन मूढ़ता रहित, आठ अंग सहित और मद रहित श्रद्धान सम्यग्दर्शन है। अतः ये मूढ़ताएँ मिथ्यात्व की ही पहचान हैं:

  1. लोकमूढ़ता:

आपगा सागरस्नानमुच्चयः सिकताश्मनाम् ।
गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥22॥

अर्थ: धर्म मानकर नदी और सागर में स्नान करना, बालू और पत्थरों के ढेर लगाना, पर्वत से गिरना और अग्नि में गिरना, यह लोकमूढ़ता कही जाती है।

  1. देवमूढ़ता: वरदान की आशा से राग द्वेष से मलिन देवताओं की उपासना करना (श्लोक 23)।

  2. पाखण्डिमूढ़ता (गुरुमूढ़ता):

सग्रन्थारम्भहिंसानां संसारावर्तवर्तिनाम् ।
पाखण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाखण्डिमोहनम् ॥24॥

अर्थ: परिग्रह, आरम्भ और हिंसा सहित, संसार के भँवर में पड़े हुए पाखण्डी साधुओं का आदर सत्कार पाखण्डिमूढ़ता जानना चाहिए।

(घ) कर्म की अपेक्षा: दर्शनमोहनीय के तीन प्रभेद

तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 8:

दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबंध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥

इसमें दर्शनमोहनीय के तीन भेद बताए हैं:

  1. मिथ्यात्व प्रकृति: जिसके उदय से तत्त्वों का अश्रद्धान होता है
  2. सम्यग्मिथ्यात्व (तदुभय, मिश्र) प्रकृति: जिसके उदय से सम्यक् और मिथ्या मिले हुए परिणाम होते हैं
  3. सम्यक्त्व प्रकृति: जिसके उदय से सम्यक्त्व रहते हुए भी उसमें चल, मलिन, अगाढ़ दोष लगते हैं

(ङ) द्रव्य और भाव की अपेक्षा

समयसार गाथा 87, 88 (ऊपर स्वरूप में दी गई) के अनुसार: जीव मिथ्यात्व (भाव मिथ्यात्व) और अजीव मिथ्यात्व (द्रव्य मिथ्यात्व, पुद्गल कर्म)।


६. हेतु (बाह्य निमित्त)

इस पोस्ट में हेतु से मतलब है वे बाहरी निमित्त, जिनके संसर्ग से मिथ्यात्व ग्रहण होता है या पुष्ट होता है। (अन्तरंग कारण अगले भाग में।)

  1. कुदेव, कुगुरु, कुधर्म की सेवा: “जे कुगुरु कुदेव कुधर्म सेव, पोषैं चिर दर्शनमोह एव” (छहढाला 2.9)। ये दर्शनमोह को पुष्ट करते हैं।
  2. एकान्तवाद से दूषित शास्त्रों का अभ्यास:

एकान्तवाद दूषित समस्त, विषयादिक-पोषक अप्रशस्त।(13)

अर्थ: जो शास्त्र एकान्तवाद से दूषित हैं और विषय आदि को पुष्ट करने वाले हैं, उनका अभ्यास कुबोध (गृहीत मिथ्याज्ञान) है।
3. लोक की देखादेखी धर्म मानना: तीन मूढ़ता (रत्नकरण्ड श्रावकाचार 22 से 24)।
4. ख्याति, लाभ, पूजा की चाह से क्रिया करना:

जो ख्याति-लाभ पूजादि चाह, धरि करन विविध-विध देहदाह।(14)

  1. सच्चे देव, शास्त्र, गुरु का समागम न होना और तत्त्व का अभ्यास न करना।

७. कारण (अन्तरंग)

(क) निमित्त कारण: मिथ्यात्व कर्म का उदय

गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा 15 का पहला शब्द ही कारण बताता है: “मिच्छोदयेण”, अर्थात् दर्शनमोहनीय की मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से। यही द्रव्य मिथ्यात्व (समयसार गाथा 88: “पोग्गलकम्मं मिच्छं”) है।

(ख) उपादान: जीव का अपना विपरीत परिणाम

कर्म का उदय निमित्त है, पर विपरीत श्रद्धान जीव का अपना भाव है: “उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च जीवो दु” (समयसार 88)। यह भूल अनादि से है:

छहढाला, पहली ढाल:

मोह-महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि॥(2)

अर्थ: जीव ने अनादि काल से मोह रूपी महा मदिरा पी रखी है, इसलिए अपने को भूलकर व्यर्थ भटक रहा है।


८. कार्य (फल)

(क) कर्म बन्ध का पहला हेतु

तत्त्वार्थसूत्र अध्याय 8:

मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥

अर्थ: मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग, ये बन्ध के हेतु हैं। इनमें मिथ्यादर्शन सबसे पहला है। जहाँ मिथ्यात्व है वहाँ बाकी चारों भी हैं।

(ख) संसार भ्रमण

आचार्य कुन्दकुन्द, बारस अणुवेक्खा:

मिच्छोदयेण जीवो, णिंदंतो जोण्हभासियं धम्मं।
कुधम्मकुलिंगकुतित्थं, मण्णंतो भमदि संसारे ॥32॥

अन्वयार्थ (फोरम पर बारसणुपेक्खा से): मिथ्यात्व के उदय से यह जीव जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कथित धर्म की निंदा करता हुआ तथा कुलिंग और कुतीर्थ को मानता हुआ संसार में भ्रमण करता है।

छहढाला दूसरी ढाल का पहला पद भी यही कहता है: “ऐसे मिथ्यादृग-ज्ञानचरण,वश भ्रमत भरत दु:ख जन्म-मरण”, अर्थात् मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र के वश होकर जीव जन्म मरण के दुख भोगता हुआ भटकता है।

(ग) पहला गुणस्थान

मिथ्यात्व के उदय में जीव मिथ्यादृष्टि नामक पहले गुणस्थान में रहता है (गोम्मटसार जीवकाण्ड, गुणस्थान वर्णन)।

(घ) सबसे बड़ा अकल्याण

रत्नकरण्ड श्रावकाचार:

न सम्यक्त्व समं किञ्चित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि ।
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥34॥

अर्थ: तीनों कालों और तीनों लोकों में जीवों के लिए सम्यक्त्व के समान कल्याणकारी कुछ नहीं है, और मिथ्यात्व के समान अकल्याणकारी दूसरा कुछ नहीं है।


मिथ्यात्व कैसे छूटे?

छहढाला, चौथी ढाल:

तातैं जिनवर-कथित, तत्त्व अभ्यास करीजै।
संशय विभ्रम मोह त्याग, आपो लखि लीजै॥(5)

अर्थ: इसलिए जिनेन्द्र देव के कहे हुए तत्त्वों का अभ्यास करो, और संशय, विभ्रम, मोह को छोड़कर अपने आत्मा को पहचानो। तत्त्वार्थ का सच्चा श्रद्धान होते ही मिथ्यात्व छूटता है और सम्यग्दर्शन प्रकट होता है, जो छहढाला के शब्दों में “मोक्ष-महल की परथम सीढ़ी” है।


मिथ्यात्व को दर्शाने वाली कथाएँ

ऊपर के भेद पढ़कर लगता है कि मिथ्यात्व कोई कठिन सिद्धान्त है। पर जीवन में वह बहुत साधारण रूप में आता है: थोड़ा सा अभिमान, गुरु के प्रति पक्षपात, किसी बात पर पक्का निर्णय न कर पाना, या भीड़ के पीछे चल देना। नीचे दिगम्बर आचार्यों के ग्रंथों से कुछ कथाएँ हैं, जिनमें यह साफ दिखता है कि मिथ्यात्व कैसा दिखता है और कैसे छूटता है।

(१) मरीचि: तीर्थंकर बनने वाला जीव भी भटक गया

स्रोत: आदिपुराण (आचार्य जिनसेन) पर्व 18; पद्मपुराण (आचार्य रविषेण) पर्व 3 श्लोक 293; उत्तरपुराण (आचार्य गुणभद्र) पर्व 74; आराधना कथाकोश (ब्रह्म नेमिदत्त) कथा 47

मरीचि प्रथम चक्रवर्ती भरत के पुत्र और भगवान् ऋषभदेव के पौत्र थे। जब भगवान् ऋषभदेव ने दीक्षा ली, तब उनके साथ चार हजार राजाओं ने भी दीक्षा ली, उनमें मरीचि भी थे। भूख, प्यास और कठोर तप सहन न होने से बहुत से राजा मुनि मार्ग से गिर गए। समवसरण में भगवान् ने बताया कि मरीचि आगे चलकर अन्तिम तीर्थंकर महावीर होंगे। यह सुनकर मरीचि के मन में अभिमान आ गया: “मुझे तो तीर्थंकर बनना ही है, फिर नग्न रहकर कष्ट क्यों सहूँ?” उन्होंने व्रत, संयम और सम्यक्त्व छोड़ दिया, गेरुआ वस्त्र पहनकर परिव्राजक बन गए और अपनी कल्पना से नए मत चलाए। उनके साथी तो बाद में समझकर फिर जिनमार्ग में लौट आए, पर मरीचि नहीं लौटे। इस मिथ्यात्व के कारण वह जीव बहुत लम्बे समय तक अनेक कुगतियों में भटका। बहुत समय बाद फिर जिनधर्म का योग मिला, राजा नन्द के भव में मुनि बनकर तीर्थंकर प्रकृति बाँधी, और अन्त में भगवान् महावीर हुए।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: भगवान् के वचन सुनकर भी “मैं तो तीर्थंकर बनूँगा ही” की एकान्त पकड़ ने मार्ग छुड़ा दिया, और अपनी कल्पना से मत चलाना दूसरों के लिए गृहीत मिथ्यात्व का कारण बना। अगृहीत मिथ्यात्व के ऊपर गृहीत मिथ्यात्व चढ़ जाए तो तीर्थंकर होने वाला जीव भी लम्बे समय तक भटकता है।

(२) राजा वसु और “अजैर्यष्टव्यम्”: एक शब्द का उल्टा अर्थ

स्रोत: पद्मपुराण (आचार्य रविषेण) पर्व 11; उत्तरपुराण (आचार्य गुणभद्र) पर्व 67; हरिवंशपुराण (आचार्य जिनसेन) सर्ग 17; आराधना कथाकोश (ब्रह्म नेमिदत्त) कथा 26

गुरु क्षीरकदम्ब के पास तीन शिष्य पढ़ते थे: राजकुमार वसु, गुरु का पुत्र पर्वत, और नारद। गुरु ने वेद वाक्य “अजैर्यष्टव्यम्” का अर्थ बताया था कि “अज” अर्थात् ऐसे पुराने धान से यज्ञ करना चाहिए जो फिर उग न सके। गुरु के जाने के बाद पर्वत ने कहना शुरू किया कि “अज” का अर्थ बकरा है, अतः बकरे से यज्ञ करना चाहिए। नारद ने इसका विरोध किया, और दोनों ने निर्णय के लिए राजा बन चुके वसु को चुना, जो सत्यवादी के रूप में प्रसिद्ध थे। गुरुमाता ने अपने पुत्र पर्वत का पक्ष लेने के लिए वसु से आग्रह किया। वसु जानते थे कि गुरु ने धान वाला अर्थ बताया था, फिर भी भरी सभा में उन्होंने कह दिया कि अज का अर्थ बकरा ही है। कथा के अनुसार उसी समय उनका सिंहासन धरती में धँस गया और वसु मरकर सातवें नरक में गए। पर्वत लोक में निन्दित हुआ, पर हिंसा वाले यज्ञ का प्रचार उसी उल्टे अर्थ से फैला।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: हिंसा को धर्म मान लेना विपरीत मिथ्यात्व है, और शास्त्र का उल्टा अर्थ करके उसे फैलाना गृहीत मिथ्याज्ञान है (छहढाला 2.13 का “विषयादिक पोषक” कुशास्त्र)। एक व्यक्ति के पक्षपात से एक उल्टी मान्यता पूरे लोक में चल पड़ी।

(३) सोमदत्त माली और अंजन चोर: शंका करने वाला चूक गया

स्रोत: आराधना कथाकोश (ब्रह्म नेमिदत्त) कथा 6; बृहत्कथाकोश (आचार्य हरिषेण) कथा 4; रत्नकरण्ड श्रावकाचार (आचार्य समन्तभद्र) श्लोक 19

राजगृह में जिनदत्त सेठ रहते थे। एक बार दो देव धर्म की परीक्षा करने निकले। पहले उन्होंने पंचाग्नि तप करने वाले एक तापस की परीक्षा ली, वह अपने ध्यान से डिग गया। फिर श्मशान में ध्यान कर रहे श्रावक जिनदत्त पर भयानक उपसर्ग किया, पर वे अडिग रहे, और देवों ने उन्हें आकाशगामिनी विद्या दी। सोमदत्त नाम के माली ने भी वह विद्या माँगी। विधि यह थी कि पेड़ पर एक सौ आठ लड़ों का सींका बाँधो, नीचे नुकीले शस्त्र गाड़ो, णमोकार मंत्र जपकर सींके की लड़ें काट दो। सोमदत्त सींके पर बैठा, पर नीचे के शस्त्र देखकर सोचने लगा: “अगर सेठ ने झूठ कहा हो तो?” वह बार बार चढ़ता उतरता रहा, सींका काटने का साहस नहीं कर सका। तभी पहरेदारों से भागता अंजन चोर वहाँ आया, उसने पूरी बात सुनी और सोचा, “सेठ का कहा मेरे लिए प्रमाण है”। वह मंत्र भूल गया, फिर भी निःशंक होकर एक झटके में सींका काट दिया, और विद्या उसी को सिद्ध हुई। आगे चलकर अंजन ने दीक्षा ली और कैलाश से मोक्ष गए।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: सोमदत्त की “सच है या नहीं” वाली डोलती बुद्धि संशय मिथ्यात्व का चित्र है, जो कोई भी निर्णय नहीं करने देती। और कथा की शुरुआत में पंचाग्नि तपस्वी का डिग जाना बताता है कि बिना सच्ची श्रद्धा का कठोर तप भी टिकता नहीं।

(४) कमठ का जीव, पंचाग्नि तापस: ज्ञान के बिना तप

स्रोत: उत्तरपुराण (आचार्य गुणभद्र) पर्व 73; पार्श्वपुराण (महाकवि भूधरदास)

कमठ और मरुभूति सगे भाई थे। कमठ ने बैर में मरुभूति को मार डाला, और वह बैर अनेक भवों तक चलता रहा: मरुभूति का जीव हर भव में आगे बढ़ा, कमठ का जीव हर भव में बदला लेता रहा। अन्त में मरुभूति का जीव पार्श्वकुमार हुआ और कमठ का जीव महीपाल नाम का राजा हुआ, जो रानी के वियोग में तापस बन गया। वह जटा और भस्म धारण कर वन में पंचाग्नि तप करता था, लोग उसे बड़ा तपस्वी मानते थे। एक दिन पार्श्वकुमार वहाँ से निकले और देखा कि जो लकड़ी वह आग के लिए चीरने जा रहा है, उसमें नाग नागिन का जोड़ा है। उन्होंने कहा, “इसे मत चीरो, इसमें जीव हैं”। तापस ने इसे अपना अपमान समझा और लकड़ी चीर दी, नाग युगल घायल हो गया। पार्श्वकुमार ने उन्हें णमोकार मंत्र सुनाया, जिससे वे धरणेन्द्र और पद्मावती हुए। तापस बैर लेकर मरा और शम्बर देव बना, जिसने बाद में ध्यानस्थ भगवान् पार्श्वनाथ पर घोर उपसर्ग किया। अन्त में वह भी शान्त हुआ और उसने सम्यग्दर्शन प्राप्त किया।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: अग्नि में जीव जलें, फिर भी उसे धर्म मानना अज्ञान मिथ्यात्व और विपरीत श्रद्धान है; भूधरदास जी के शब्दों में यह “ज्ञानहीन तप” है। और ऐसे परिग्रह सहित, हिंसा सहित तपस्वी को पूजना वही पाखण्डिमूढ़ता है जो रत्नकरण्ड श्लोक 24 में बताई गई है।

(५) रेवती रानी: न ब्रह्मा के वेश से डिगी, न नकली तीर्थंकर से

स्रोत: आराधना कथाकोश (ब्रह्म नेमिदत्त) कथा 9; बृहत्कथाकोश (आचार्य हरिषेण) कथा 7; रत्नकरण्ड श्रावकाचार (आचार्य समन्तभद्र) श्लोक 19

विद्याधर राजा चन्द्रप्रभ क्षुल्लक बनकर तीर्थयात्रा पर निकले। उनके आचार्य ने उत्तर मथुरा के एक मुनि को नमस्कार और रानी रेवती को धर्मवृद्धि भेजी, पर वहाँ के ग्यारह अंग के ज्ञाता भव्यसेन मुनि के लिए कुछ नहीं कहा। क्षुल्लक ने कारण जानने के लिए परीक्षा ली: भव्यसेन मुनि हरी घास पर बिना परवाह चल दिए और नियम छोड़कर सरोवर में शुद्धि कर ली। क्षुल्लक समझ गए कि शास्त्र पढ़कर भी इन्हें जिनवचन पर श्रद्धा नहीं है। फिर उन्होंने विद्या से नगर के बाहर चार दिन चार वेश बनाए: पहले दिन ब्रह्मा, दूसरे दिन विष्णु, तीसरे दिन शंकर, और चौथे दिन समवसरण सहित एक “पच्चीसवें तीर्थंकर” का। राजा, भव्यसेन मुनि और सारी प्रजा हर दिन दर्शन करने दौड़ी। रानी रेवती एक बार भी नहीं गई। उसका निर्णय था कि तीर्थंकर चौबीस ही होते हैं, पच्चीसवाँ कहाँ से आएगा, यह कोई मायावी है। अन्त में क्षुल्लक ने रोगी बनकर उसकी सेवा भावना भी परखी, फिर अपना असली रूप बताकर उसके अमूढ़दृष्टि अंग की प्रशंसा की।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: हर नए वेश को बिना परखे नमस्कार करने दौड़ती भीड़ में देवमूढ़ता और विनय मिथ्यात्व (सबको एक समान पूजना) दोनों दिखते हैं। और भव्यसेन मुनि बताते हैं कि ग्यारह अंग का ज्ञान और मुनि वेश होते हुए भी, श्रद्धा न हो तो जीव मिथ्यादृष्टि ही है (गोम्मटसार जीवकाण्ड 18: “उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि”)।

(६) राजा श्रेणिक, यशोधर मुनि और रानी चेलना: कुगुरु श्रद्धा से सच्ची श्रद्धा तक

स्रोत: श्रेणिक चरित्र (आचार्य शुभचन्द्र) सर्ग 9; उत्तरपुराण (आचार्य गुणभद्र) पर्व 74

मगध के राजा श्रेणिक पहले बौद्ध गुरुओं के भक्त थे और उनकी रानी चेलना जिनधर्म की दृढ़ श्रद्धालु थी। दोनों के बीच धर्म को लेकर खिंचाव चलता रहता था, और श्रेणिक रानी से बदला लेने का अवसर खोजते थे। एक दिन शिकार पर उन्हें वन में ध्यान में खड़े दिगम्बर मुनि यशोधर दिखे, और पता चला कि ये रानी के गुरु हैं। श्रेणिक ने उन पर पाँच सौ शिकारी कुत्ते छोड़ दिए, पर मुनि की शान्त मुद्रा देखकर कुत्ते शान्त होकर उनकी प्रदक्षिणा करने लगे। श्रेणिक ने इसे मंत्र का खेल समझा, और गुस्से में एक साँप मारकर मुनि के गले में डाल दिया। ग्रंथ कहता है कि उसी क्षण के क्रूर परिणाम से उन्होंने सातवें नरक की आयु बाँध ली। चौथे दिन उन्होंने हँसते हुए रानी को यह बताया। चेलना रो पड़ी, और बोली कि मेरे सच्चे गुरु होंगे तो ध्यान छोड़कर साँप नहीं हटाएँगे। रात को दोनों वहाँ पहुँचे तो मुनि वैसे ही खड़े थे, चींटियों से उनका शरीर छलनी हो चुका था। चेलना ने साँप हटाया, चीनी डालकर चींटियाँ दूर कीं और सेवा की। सूर्योदय पर ध्यान पूरा होने पर मुनि ने गले में साँप डालने वाले राजा तथा सेवा करने वाली रानी, दोनों को एक समान “धर्मवृद्धि” दी। यह समता देखकर श्रेणिक का हृदय बदल गया, और आगे वे भगवान् महावीर के प्रमुख श्रोता बने।

इसमें मिथ्यात्व कहाँ है: परखे बिना केवल अपने कुल या पक्ष के गुरुओं को मानना और सच्चे वीतरागी गुरु से द्वेष करना गृहीत मिथ्यात्व और गुरुमूढ़ता का रूप है। श्रेणिक का बदलना यह भी दिखाता है कि मिथ्यात्व बहस से नहीं, सच्चे स्वरूप के दर्शन से छूटता है।

इन कथाओं से क्या समझें

इन छह कथाओं में मिथ्यात्व कभी अभिमान बनकर आता है (मरीचि), कभी पक्षपात बनकर (वसु), कभी डोलती शंका बनकर (सोमदत्त), कभी ज्ञानहीन तप बनकर (कमठ का जीव), कभी भीड़ की देखादेखी बनकर (रेवती के नगर के लोग), और कभी अपने पक्ष के गुरु के मोह के रूप में (श्रेणिक)। हर कथा में उपाय एक ही है जो ऊपर छहढाला में आया: जिनेन्द्र कथित तत्त्व का अभ्यास और सच्चे देव, शास्त्र, गुरु की परीक्षा करके श्रद्धा।


एक नज़र में

भाग सार मुख्य आधार
परिभाषा तत्त्वार्थ का अश्रद्धान, विपरीत श्रद्धान तत्त्वार्थसूत्र 1.2, गोम्मटसार जीवकाण्ड 15
स्वरूप देह में आत्मबुद्धि, पर में अपनापन छहढाला 2.3, 2.4, समयसार 87, 88
लक्षण धर्म न रुचना, जिनवचन पर अश्रद्धा गोम्मटसार जीवकाण्ड 17, 18
भेद अगृहीत, गृहीत; एकान्त, विपरीत, संशय, वैनयिक, अज्ञान सर्वार्थसिद्धि 8/1, द्रव्यसंग्रह 30
प्रभेद मिथ्यादर्शन, ज्ञान, चारित्र; तीन मूढ़ता; तीन दर्शनमोह प्रकृति छहढाला दूसरी ढाल, रत्नकरण्ड 4, 22, 24, तत्त्वार्थसूत्र 8.9
हेतु कुदेव, कुगुरु, कुधर्म सेवा, एकान्त शास्त्र छहढाला 2.9, 2.13
कारण मिथ्यात्व कर्म का उदय (निमित्त), जीव का विपरीत भाव (उपादान) गोम्मटसार जीवकाण्ड 15, समयसार 88
कार्य बन्ध, संसार भ्रमण, सबसे बड़ा अकल्याण तत्त्वार्थसूत्र 8.1, बारस अणुवेक्खा 32, रत्नकरण्ड 34

फोरम पर मूल ग्रंथ: तत्त्वार्थसूत्र · गोम्मटसार जीवकाण्ड मूल गाथा · समयसार गाथा एवं अर्थ · बृहद् द्रव्यसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ · रत्नकरण्ड श्रावकाचार मूल श्लोक · बारसणुपेक्खा · छहढाला · आदिपुराण · उत्तरपुराण · पद्मपुराण श्लोक एवं अर्थ · आराधना कथाकोश · श्रेणिक चरित्र

सम्बन्धित चर्चा: सम्यग्दर्शन: सम्पूर्ण विवेचन (इस पोस्ट की जोड़ी) · सम्यग्दर्शन: सभी ग्रंथों से संकलन · गृहीत मिथ्यात्व · गृहीत मिथ्यात्व संबंधित · मिथ्यात्व संबंधित

स्रोत: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 1 सूत्र 2, अध्याय 8 सूत्र 1 और 9; सर्वार्थसिद्धि 8/1 (आचार्य पूज्यपाद); गोम्मटसार जीवकाण्ड गाथा 15, 17, 18 (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती); बृहद् द्रव्यसंग्रह गाथा 30 (आचार्य नेमिचन्द्र); समयसार गाथा 87, 88 और बारस अणुवेक्खा गाथा 32 (आचार्य कुन्दकुन्द); रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक 4, 22, 23, 24, 34 (आचार्य समन्तभद्र); छहढाला (पं. दौलतराम जी)। कथाओं के लिए: आदिपुराण पर्व 18 (आचार्य जिनसेन); उत्तरपुराण पर्व 67, 73, 74 (आचार्य गुणभद्र); पद्मपुराण पर्व 3 और 11 (आचार्य रविषेण); हरिवंशपुराण सर्ग 17 (आचार्य जिनसेन); आराधना कथाकोश कथा 6, 9, 26, 47 (ब्रह्म नेमिदत्त); बृहत्कथाकोश कथा 4, 7 (आचार्य हरिषेण); श्रेणिक चरित्र सर्ग 9 (आचार्य शुभचन्द्र); पार्श्वपुराण (महाकवि भूधरदास); रत्नकरण्ड श्रावकाचार श्लोक 19।

कुछ जोड़ना हो या प्रश्न हो तो नीचे लिखें। :folded_hands: