आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र) कारिका एवं अर्थ
आचार्य समन्तभद्र
आचार्य समन्तभद्र कृत आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र) की संस्कृत मूल कारिकाएँ 1 से 114, हर कारिका के नीचे उसका अर्थ, दसों परिच्छेद अपने शीर्षक के साथ (पोस्ट की लंबाई की सीमा के कारण दशम परिच्छेद अगले उत्तर में)। अर्थ संलग्न ग्रंथ (पं. जयचंद छाबड़ा कृत हिन्दी वचनिका) में छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है, पुरानी ढूँढारी भाषा वैसी ही रखी है; शंका-समाधान और विस्तार नहीं लिया, वह नीचे की पीडीएफ में है। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।
केवल मूल कारिकाएँ (छपाई की टिप्पणियों सहित): आप्तमीमांसा मूल कारिका (आचार्य समन्तभद्र) | Aptamimansa Mool Karika (Acharya Samantabhadra)
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प्रथम परिच्छेद (कारिका 1 से 23)
देवागमनभोयानचामरादिविभूतयः ।
मायाविष्वपि दृश्यंते नातस्त्वमसि नो महान् ॥1॥
कारिकार्थ: हे भगवन्! तुमारे देवनिका आगमन आदि तथा आकाशविषैं गमन आदि तथा चामरछत्रादि विभूति पाइये हैं इस हेतुतैं तौ हमारे मुनिनकै तुम महान् स्तुति करनें योग्य नाहीं हो, जातैं यह विभूति तौ मायावी जे मस्करी आदिक इन्द्रजालवाले तिनविषैं भी पाइये है। यातैं जो आज्ञा प्रधानी हैं ते देवनिका आगम आदि विभूति अपनां परमेष्ठी परमात्माका चिह्न मानूं अर हम सारखे परीक्षा प्रधानी तौ ऐसे चिह्नतैं परमेष्ठी स्तुति करनें योग्य नाहीं मानैं हैं। जातैं यह स्तव आगमके आश्रय है। बहुरि या स्तवनका हेतु देवनिका आगमादि विभूतिसहितपणां है सो यह हेतु भी आगम-आश्रित है। प्रतिवादीकै तौ प्रमाणसिद्ध ही नाहीं है, पैला साक्षात् देवागमादि देख्या बिना कैसैं मानैं। अर आगमप्रमाणवादीकै भी मायावी आदि विपक्षमैं वर्तनेंतैं व्यभिचारी है। साध्यकूं कैसैं साधै। बहुरि आगमप्रमाणवादी कहै - जो सांचा देवनिका आगमआदि विभूतिसहितपणां भगवानकै है ते मायात्रीनिविषैं नाहीं तातैं हेतु व्यभिचारी नाहीं, तौ तहां भी ऐसा उत्तर जो सांचे-त्रिभूति भगवानकै प्रत्यक्ष अनुमान तैं सिद्ध भये नाहीं अर आगमतैं सिद्ध किये माने तो आगमाश्रित ही भया तातैं इस हेतुतैं स्तुति करनें योग्य भगवान् आप्त सिद्ध होय नाहीं ।
अध्यात्मं बहिरप्येष विग्रहादिमहोदयः ।
दिव्यः सत्यो दिवौकष्वप्यस्ति रागादिमत्सु सः ॥2॥
कारिकार्थ: अध्यात्म कहिए आत्माश्रित-शरीराश्रित अंतरंग शरीर आदिका महान् उदय मल पशेव रहितपणां आदिक, बहुरि बाह्य देवनिकरि किया गंधोदकवृष्टि आदिक ये सांचे मायावीनिविषैं नाहीं पाइये, बहुरि दिव्य है चक्रवर्त्यादिक मनुष्यनिकै ऐसे न पाइये। सो ऐसे हेतुतैं भी भगवान् आप्त तुम हमारे स्तुति करनें योग्य नाहीं हो जातैं यहु अंतरंग बहिरंग सांचा महोदय यद्यपि पूरणादिक इन्द्रजालीनिविषैं न पाइये है तौऊ कषाय रागादिकसहित स्वर्गके देवतिनिविषैं पाइये हैं तातैं हेतु व्यभिचारी है । इस हेतुतैं भी भगवान् परमात्मा हैं ऐसैं नाहीं स्तुतिगोचर कीजिए हैं ।
तीर्थकृत्समयानां च परस्परविरोधतः ।
सर्वेषामाप्तता नास्ति कश्चिदेव भवेद्गुरुः ॥3॥
कारिकार्थ: हे भगवन्! तीर्थ कहिये जाकरि तरिये ऐसा धर्ममार्ग ताकूं करै ते तीर्थकृत् तिनके समय कहिये मत तथा आगम तिनकै परस्पर विरोध है तातैं सर्वहीकै आप्तपणां होइ नांही। तिनमैं कोई एक गुरु महान् स्तुति करनें योग्य होइ ।
दोषावरणयोर्हानिर्निःशेषास्त्यतिशायनात् ।
क्वचिद्यथा स्वहेतुभ्यो बहिरन्तर्मलक्षयः ॥4॥
कारिकार्थ: दोष अर आवरण की हानि सामान्य तौ प्रसिद्ध है । जातैं एकदेश हानितैं अल्पज्ञनिकै एकदेश निर्दोषपणां अर एकदेश ज्ञानादिक तिस हानिके कार्य देखिये हैं यातैं निर्दोष आवरणकी हानि संपूर्ण काहूविषैं देखिये हैं - साधिये हैं । इहां अतिशायन ऐसा हेतु है याका अर्थ यहू जो यहू हानि बधती बधती देखिये हैं । जैसें क्वचित् कहिए कहूं कनक पाषाणादिविषैं कीट कालिमा आदि बाह्य अभ्यन्तर मलका अपणां हेतु जो ताव देतैं सर्वथा अभाव होय है तैसैं अल्पज्ञकै तिनका नाशके हेतु जे सम्यग्दर्शनादिक तिनतैं सर्वथा दोष अर आवरणका अभाव होइ है ऐसा सिद्ध होइ है । इहां आवरण तौ ज्ञानावरणादिक कर्मपुद्गलके परिणाम हैं अर दोष अज्ञानरागादिक जीवके परिणाम हैं ।
सूक्ष्मान्तरितदूरार्थाः प्रत्यक्षाः कस्यचिद्यथा ।
अनुमेयत्वतोऽग्न्यादिरिति सर्वज्ञसंस्थितिः ॥5॥
कारिकार्थ: सूक्ष्म कहिये स्वभावकरि क्षीण परमाणु आदिक बहुरि अंतरित कहिये कालकरि जिनका अंतर पड़या ऐसे रामरावणादिक बहुरि दूरस्थ कहिये क्षेत्रकरि दूरवर्ती मेरू हिमवत् आदिक ये पदार्थ हैं ते कोईकै प्रत्यक्ष दृष्ट हैं जातैं यह अनुमेय हैं, अनुमान प्रमाणके विषैं यह जैसे अग्नि आदिक पदार्थ अनुमानका विषय है सो कोई काकूं प्रत्यक्ष भी देखै है तैसैं यह सूक्ष्म आदिक भी हैं । ऐसैं सर्वज्ञका भले प्रकार निश्चय होय है।
स त्वमेवासि निर्दोषो युक्तिशास्त्राविरोधिवाक् ।
अविरोधो यदिष्टं ते प्रसिद्धेन न बाध्यते ॥6॥
कारिकार्थ: हे भगवन्! स कहिए सो पूर्वोक्त निर्दोष कहिए आवरण अर अज्ञानरागादिक तिनतैं रहित ऐसा सर्वज्ञ वीतराग तुम ही हो, जातैं कैसे हो तुम ? युक्ति अर शास्त्र इन दोऊनतैं विरोध रहित अविरोधि हैं वचन जिनकै ऐसे हो । जैसैं कोई श्रेष्ठ वैद्य होइ तैसैं । इहां भगवान् मानूं फेर पूछया - जो हे समन्तभद्र ! हमारे वचन युक्ति - शास्त्रतैं अविरोधी कैसैं निश्चय किये ? तहां आचार्य फेरि कहैं हैं - हे भगवन् ! जो तुमारा कह्या इष्ट तत्व मोक्ष अर मोक्षका कारण, संसार अर संसारका कारण यह है सो प्रसिद्ध जो प्रमाण ताकरि नांही बाधिये हैं । जो प्रमाणकरि नाहीं बाध्या जाय सोई युक्तिशास्त्राविरोधी। इहां वैद्यका दृष्टान्त श्लोकमैं नांही है तौऊ आचार्य स्वयंभूस्तोत्रमैं आप कह्या है तातैं अष्टसहस्री टीकामैं कह्या है । वैद्यभी रोग अर रोगकी निवृत्ती अर तिनके कारणविषै निर्बाध प्रवर्त्तै है, ऐसैं वैद्यका दृष्टान्त हैं । तहाँ मोक्षादितत्व निर्बाध कैसे हैं सो दिखावैं हैं - प्रथम तौ भगवान् अरहंतका भास्या मोक्षतत्व है सो प्रमाणकरि बाध्या न जाय है । इन्द्रियजनित प्रत्यक्ष प्रमाणका तौ मोक्ष विषय ही नाहीं बाधक कैसे होय, बाधक साधक होय, सो अपने विषयहीका होय। बहुरि अनुमान अर आगमकरि मोक्षका अस्तित्वका स्थापन है ही, कहूं दोष आवरणका अत्यन्त अभाव भये अनन्त ज्ञानादिकका लाभ सो मोक्ष अनुमान आगमतैं प्रसिद्ध है । तैसैं ही मोक्षका कारणतत्व सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित्र हैं ते भी प्रमाणकीर सिद्ध हैं । जातैं कारण विना कार्यका न होनां प्रसिद्ध है । बहुरि संसारतत्व है सो भी प्रमाणकरि बाध्या न जाय है । अपने उपजाये कर्मकै वशतैं आत्माकै एक भवतैं अन्यभवकी प्राप्ति सो संसार है सो प्रत्यक्ष है अनुमानका तौ विषय ही नांहीं तिनकी बाधा कैसैं आवै । बहुरि तिनका विषय होइ तौ ते साधक ही होय, बाधक न होइ । बहुरि संसारका कारणतत्व भी प्रमाणबाधित नांहीं है जातैं कारण विनां कार्य होय नांही । मिथ्यात्वादि संसारके कारण प्रसिद्ध हैं । ऐसैं मोक्ष मोक्षका कारण अर संसार संसारका कारण तत्व प्रमाणकरि बाधे न जाँय तातैं भगवान् अरहंतके वचन युक्तिशास्त्रतैं बाधे न जांय । सो ऐसे निर्बाध वचन भगवानकै निर्दोषपणांकूं साधै ही है । इहाँ कोई कहै - सर्वज्ञ वीतरागकै इच्छा विना उपदेशरूप वचनकी प्रवृत्ति कैसैं संभवै ? ताकूं कहिए है - वचन प्रवृत्तिकूं कारण नियमकरि इच्छा ही नांही है । विनां इच्छा भी वचन प्रवृत्ति होइ है, जैसैं सूता आदिककै इच्छा विना वचन प्रवृत्ति होइ है तैसैं जाननां, यातैं सर्वज्ञ वीतराग भगवान् स्तुति करनें योग्य है यातैं हे भगावन् ! ऐसे तुम ही मोक्ष मार्गके प्राप्त करनेंवाले हो अन्य कपिल कहिये सांख्यमती आदिक ऐसे नाहीं हैं ।
त्वन्मतामृतबाह्यानां सर्वथैकान्तवादिनाम् ।
आप्ताभिमानदग्धानां स्वेष्टं दृष्टेन बाध्यते ॥7॥
कारिकार्थ: हे भगवन् ! तुम्हारा मत अनेकान्त स्वरूप वस्तु है:। तथा ताका ज्ञान है सो यहु अमृत जो मोक्ष ताका कारण हैं तातैं यहू मतभी अमृत है, सर्वथा निर्बाध है, तातैं भव्यजीवनिके परितोषका उपजावनेंवाला है यातैं बाह्य सर्वथा एकान्त है। तिसके अभिप्रायवाले तथा कहनेंवाले सांख्य आदि मतके प्ररूपक कपिल आदिक हैं ते आप्तपणांके अभिमान करि दग्ध हैं, जातै ऐसैं मानैं हैं जो हम आप्त हैं अर बाधासहित सर्वथा एकान्तके कहनेंवाले हैं तातैं झूठा अभिमानकरि दग्ध हैं तिनका मान्यां स्वेष्टतत्व है सो सर्वथा सत्, सर्वथा असत, सर्वथा एक, सर्वथा अनेक इत्यादिक है सो दृष्ट कहिए प्रत्यक्ष प्रमाणकरि बाध्या जाय है। जातैं सकल बाह्य अंतरंग वस्तु है सो अनेकान्त स्वरूप है। समस्त जगतके जीविनके अनुभवमैं ऐसा ही आवै है तातैं हम भी सर्वथा एकान्त रूप नांही देखै हैं। ऐसैं प्रत्यक्ष प्रमाणकरि बाधित है ।
कुशलाकुशलं कर्म्म परलोकश्च न क्वचित् ।
एकान्तग्रहरक्तेषु नाथः स्वपरवैरिषु ॥8॥
कारिकार्थ: हे नाथ ! जो सर्वथा एकन्तके कहनैमें आसक्त हैं अथवा सर्वथा एकान्तरूप पिशाचकै वशीभूत जिनका अभिप्राय है तिनविषैं कुशल कहिए कल्याणरूप शुभकर्म अर अकुशल कहिए अकल्याणस्वरूप अशुभकर्म बहुरि परलोक तथा परलोकका कारण धर्माधर्म, बहुरि मोक्ष आदिक एकान्तहू नाहीं संभवै है, जातैं कैसे हैं ते स्व कहिये आपके अर परके वैरी हैं, जैसैं शून्यवादी सर्वथा वस्तुकूं शून्य मांनि आपका अर परका नाश करै है तैसैं हैं । तहां स्व तौ कहा अर पर कहा सो कहैं हैं - पुण्यरूप तथा पापरूप तो कर्म अर ताका फल सुखदुःखरूप कुशलाकुशल, अर तिसका संबंधरूप परलोक ये तौ स्व हैं जातैं इनकूं सर्वथा एकान्तवादी मानै है बहुरि पर तिनकै अनेकान्त है जातैं तिननैं अनेकान्त मान्या नांहीं। बहुरि अनेकान्तका ते निषेध करै हैं। तातैं ते अनेकान्तके वेरी हैं । सो यह परका वैरीपणां है सो ही आपकै वैरी पणांकूं साधै है। जातैं अनेकान्त न मान्या तब सर्वथा सत्रूप तथा सर्वथा असत्रूप तथा सर्वथा नित्यरूप तथा सर्वथा अनित्यरूप ऐसा तत्व माननां तब ऐसैं वस्तुमैं अर्थक्रियाका अभाव सिद्ध होइ है अर अर्थक्रिया विना पुण्य-पाप कर्म आदिक नांहीं सिद्ध होय तब अनेकान्त मान्यां विना पुण्यपाप आदिकी सिद्धि न होइ तब परकै वैरीपणांतैं आपणां वैरीपणां सिद्ध भया ऐसैं सर्वथा एकान्तवादीनिकै प्रत्यक्ष अनुमान प्रमाणकरि विरुद्ध भाषीपणां है यातैं अज्ञानादि दोषनिकी सिद्धि है तातैं आप्तपणां बणैं नांही यातैं हे भगवन् ! तुम अरहन्त ही सर्वज्ञ वीतराग युक्तिशास्त्रतैं अविरोधी वचनपणांकरि निर्दोष हो, ऐसा निश्चयकरि तत्वार्थ शासनका आरम्भविषैं मुनिननैं तुमकूं स्तवन गोचर किये हैं जातैं तुम ही तत्वार्थ शासनकी सिद्धिके कारण हो ।
भावैकान्ते पदार्थानामभावानामपह्नवात् ।
सर्वात्मकमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम् ॥9॥
कारिकार्थ: हे भगवन् ! पदार्थनिकै भाव एकान्त होतैं अभावनिका लोप भया यातैं सर्वात्मक अनाद्यन्त ऐसा ठहर्या सो ऐसा वस्तुका निजरूप नांही सो तुमारा मत नांही । तहां सांख्यमतमैं तौ पदार्थ पंचीस मानैं हैं । तहां मूल प्रकृति एक विकार रहित ॥ १ ॥ एक महान् सो उत्पत्तिविनाश पर्यन्त तिष्ठनेंवाली बुद्धि ॥ १ ॥ तिस बुद्धितैं उपजे ऐसा अहंकार ॥ १ ॥ गंध रूप रस स्पर्श और शब्द ऐसैं तन्मात्रा पांच ॥ ५ ॥ ऐसैं यह सात प्रकृति की विकृति, बहुरि बुद्धि-इन्द्रिय ॥ ५ ॥ कर्म-इन्द्रिय ॥ ५ ॥ तन्मात्रातैं भये पांचभूत पृथ्वी, अप्, तेज बायु, आकाश ऐसैं ॥ ५ ॥ अर एक मन ऐसैं षोडशक याकूं विकार कहै हैं । बहुरि प्रकृति-विकृतितैं रहित एक पुरुष ऐसैं पचीस भये इनका अस्तित्व ही है, नास्तित्व नांही, ऐसैं भाव एकान्त है । सो ऐसा मानैं चार प्रकारका अभाव है ताका लोप होइ तब इतरेतराभावांका लोपतैं सर्वात्मक कहिये पचीस तत्त्व एक तत्त्व ठहरै तब भेद कहनेका विरोध आवै । बहुरि अत्यन्ताभावका लोपतैं प्रकृतिकै पुरुषका अत्यन्त ( अभाव ) है ताकूं न मानिये तब प्रकृतिकै पुरुषरूपपणां आवै तब प्रकृति-पुरुषका भिन्न लक्षण कहनेका विरोध आवै । बहुरि प्राग्भावके लोपतैं प्रकृतितैं महान् भया, महान्तैं अहंकार भया, अहंकारतैं षोडशक गण भया, पंच तन्मात्रातैं पंचमहाभूत भये, ऐसैं सृष्टिका उपजनां कहनां निषेधा जाय तब ये सर्व अनादि ठहरै । बहुरि प्रध्वंसाभावके लोपतैं ये महान् आदिकनिकूं विनाशमान अनित्य कहै ते सर्व नाशरहित ठहरै तब प्रलयका कहनां मिथ्या ठहरै । पृथ्वी आदि महाभूत तौ पांचतन्मात्रामैं लय होय है । बहुरि षोडशक गण अहंकारमैं लय होय है, अहंकार महान्मैं लय होइ है, महान् प्रकृतिमैं लय होय है ऐसैं संहारका कहनां बिगड़ै है । ऐसैं सांख्यमती तत्वका स्वरूप कहै है सो यहु तत्वका निजस्वरूप नांही तातैं अन्य स्वरूप है। ऐसैं ही अन्योन्याभाव भी न मानैं एकान्त वादीनिकै मतमैं दोष आवै है । क्योंकि अन्योन्याभाव न मानैं तब जब केवल भाव मानैं काहूका निषेध न होइ तब एकरूप तत्व ठहरै, सो है नाहीं । वेदान्तवादी तौ सत्तामात्र एक ब्रह्मकूं तत्व मानैं हैं, अर विज्ञानाद्वैतवादी बौद्धमती विज्ञानमात्र एक तत्व मानैं हैं, अर भेदभावकूं अविद्यारूप भ्रमरूप अवस्तु मानैं है सो ऐसा तत्व काहू प्रकार सिद्ध होइ नाहीं तातैं सो तुम्हारा अरहन्तका मत नांहीं जातैं तुम्हारा मतमैं कथंचित् अभावका लोप नांहीं ।
कार्यद्रव्यमनादि स्यात् प्रागभावस्य निन्हवे ।
प्रध्वंसस्य च धर्मस्य प्रच्यवेऽनन्ततां व्रजेत् ॥10॥
कारिकार्थ: प्रागभाव कहिए कार्यके पहले न होना ताका निन्हव कहिये लोप ताकै होतैं कार्यद्रव्य कहिये घट आदिक तथा शब्दादिक वस्तु सो अनादिके ठहरै सो ऐसे हैं नाहीं यह दोष आवै। बहुरि प्रध्वंस कहिए कार्यका विघटनांनामा धर्म ताका प्रच्यव कहिये लोप होतैं कार्यद्रव्य है सो अनन्तताकूं प्राप्त होइ अविनाशी ठहरै सो है नांहीं यह दोष आवै है। तहां घटादि कार्यद्रव्यकै अनादिता तथा अनन्तताका प्रसंगका उदाहरण तौ सांख्यमतकी अपेक्षा है बहुरि शब्दादिक कार्यद्रव्यकै अनादिता तथा अनन्तताका प्रसंगका उदाहरण मीमांसकमतकी अपेक्षा है इनकी चर्चा अष्टसहस्री टीकातैं जाननी ।
सर्वात्मकं तदेकं स्यादन्यापोहव्यतिक्रमे ।
अन्यत्र समवाये न व्यपदिश्येत सर्वथा ॥11॥
कारिकार्थ: अन्यापोह कहिए अन्यस्वभावरूप वस्तुतैं अपने स्वभावका भिन्नपणां याकूं इतरेतराभाव कहिये, याका व्यक्तिक्रम कहिये लोपताकै होतैं तत् कहिये सर्व वादीनिनैं मान्यां जो वस्तुका भिन्न भिन्न स्वरूप सो सर्व एक-सर्वात्मक होय यह दोष आवै है । आप न मान्यां ऐसा परका मान्यां तत्व सो भी आपका मान्यां ठहरै ऐसैं सर्वात्मक एक ठहरै । बहुरि अपने समवायी पदार्थकै अन्य समवायी पदार्थविषैं समवाय होना सो अत्यन्ताभावका लोप है ताकूं होतैं सर्ववादीनिका इष्टतत्व व्यपदेश कहिये नाम ताकूं नाहीं पावै है । अपनां मान्यां स्वरूपविषैं परका मान्यां स्वरूपका भी नामका प्रसंग आवै है । आपकै इष्ट तथा अनिष्ट तत्वविषैं तीन काल विषैंभी विशेषका मानना न ठहरै है, यह दोष है ।
अभावैकान्तपक्षेऽपि भावापन्हववादिनाम् ।
बोधवाक्यं प्रमाण न केन साधनदूषणम् ॥12॥
कारिकार्थ: अभाव कहिये किछू भावरूप वस्तू नांही ऐसा अभाव एकान्त पक्ष है ताकै होतैं भावका लोप भया सो इस भावके लोप कहने वाले वादीनिकै बोध कहिये ज्ञान जिसतैं अपणां अर्थ - तत्वका साधन दूषण करिये अर वाक्य कहिये परका अर्थतत्वका साधनदूषणरूप वचन इनका अभाव आया तब प्रमाणकी व्यवस्था न ठहरी तब अपणां अभावैकांत पक्ष काहेकूं थापै अर परका भावपक्ष काहेतैं दूषै ? बहुरि जो स्वपक्षका साधन दूषण मानिये तो भावपक्षकी सिद्ध होइ है। ऐसा दूषण आवै है तातैं अभावैकान्तपक्ष कल्याणकारी नांहीं है ।
विरोधान्नोभयैकान्तं स्याद्वादन्यायविद्विषां ।
अवाच्यतैकान्तेप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥13॥
कारिकार्थ: उभय कहिये भाव अर अभाव ये दोऊ एकात्म्यं कहिये एकस्वरूप सो नांही है तातैं स्याद्वादन्यायके विद्विषां कहिये शत्रु-विरोधी तिनकै भाव अभाव दोऊ एक स्वरूप कहनेंमैं परस्परपरिहारस्थितिलक्षण विरोध आवै है । बहुरि अवाच्य कहिये कहनेंमैं न आवै ऐसा अवक्तव्य एकान्त मानिये तौ वस्तु अवक्तव्य है, ऐसो कहनौं युक्ति न होइ है। तहां ऐसा जाननां जो भाव पक्षमैं अर अभाव पक्षमैं न्यारे न्यारे मानें दोष आवै ताकै दूर करनेकी इच्छाकरि दोऊकूं एकस्वरूप माननेंवालेकै विधि निषेधके परस्परपरिहारस्थितिस्वरूपपणां है । तातैं दोऊकूं एकरूप माननां युक्त होइ नांहीं, जातैं विरोध दूषण आवै । यातैं ऐसा माननां कल्याणरूप नांही । बहुरि भाव अभाव अर दोऊ इन तीनूं ही पक्षमैं दोष आया जाणि अवक्तव्य - एकान्त पक्षका ग्रहण करै ताकै अवक्तव्य तत्व है ऐसा कहनां भी न बणैं तब परकूं अपणां अवक्तव्य तत्व कैसे जणावै वचन विनां ज्ञानमात्रहीतैं तौ परकूं जनावनां बणैं नांही तातैं अवक्तव्य एकान्त मानना भी कल्याणकारी नांही ।
कथंचित्ते सदेवेष्टं कथंचिदसदेव तत् ।
तथोभयमवाच्यं च नययोगान्न सर्वथा ॥14॥
कारिकार्थ: हे भगवन् ! तुमारा इष्टतत्व है सो कथंचित् कोई प्रकार सदेव कहिए सत् ही है । बहुरि कथंचित् असदेव कहिए कोई प्रकार असत् ही है । बहुरि तैसैं ही कोई प्रकार उभयमेव कहिये कोई प्रकार सत् असत् दोऊ ही है । बहुरि तैसैं ही अवाच्य कहिए कोई प्रकार अवक्तव्य ही है । बहुरि चकारकरि तैसैं ही कोई प्रकार सदवक्तव्य है। बहुरि तैसैं ही कोई प्रकार असदवक्तव्य ही है ? बहुरि तैसैं ही कोई प्रकार सत् असत् अवक्तव्य ही है सो ऐसा काहेतैं है ? नययोगात् कहिए द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक आदि नयनिके योगतैं है, यह कोई प्रकारका प्रयोजन है । बहुरि कोई प्रकार कहनेंतैं सर्वथाका निषेध भया सोहू फेर सर्वथा नांहीं ऐसा ।नियमके अर्थि वचन है । ऐसैं प्रश्नके वशतैं एक वस्तुविषैं अविरोधकरि विधिप्रतिषेधकी कल्पनातैं सप्तभंगकी प्रवृत्ति होइ है । ऐसैं नयवाक्यमात्र ही है । विधिनिषेधके भंग सात ही हैं । इनतैं अन्य नांहीं होइ हैं । जो संयोग भंग कीजिये तौ इनहींमैं अंतर्भूत होइ हैं तथा कोई पुनरुक्त होइ हैं । बहुरि यह सातप्रकार वस्तु धर्म है - असत् कल्पनां नांहीं है । इनहीतैं वस्तुका यथार्थ ज्ञान अर वस्तुकै अर्थक्रियारूप प्रवृत्तिका निश्चय होइ है । इनमैं सत् असत् अवक्तव्य ये तीन भंग तौ एक एक ही हैं बहुरि सत्-असत् क्रमकरि कहना, अर सदवक्तव्य, असदवक्तव्य ये तीन द्विसंयोगी हैं, बहुरि सत्-असत्-अवक्तव्य यह एक त्रिसंयोगी है । सत, असत, सत् असत् - क्रमकरि कहनां ये तीन तो वक्तव्य भये अर एक अवक्तव्य का ऐसैं चार तो ये अर वक्तव्य अवक्तव्य का संयोग भंग करनेंतैं तीन फेर भये ऐसैं सात भंग भये हैं। इहां सत् आदि शब्द हैं ते तौ अनेकान्तके वाचक हैं अर कथंचित् शब्द है सो अनेकान्तका द्योतक है बहुरि याकै आगैं एवकार शब्द है सो अवधारण कहिये नियमकै अर्थि होइ है । बहुरि यह कथंचित् शब्द है सो याका पर्य्यायशब्द स्यात् ऐसा है । सो सर्व वचननि परि लगाइये हैं ऐसो जहां याका प्रयोग नांहीं होइ तहां भी जे स्याद्वाद न्यायमैं प्रवीण है ते सामर्थ्यसूं जाणि ले हैं । स्यात् शब्द विनां सर्वथा रूप ही वस्तु है इत्यादि कहनेमैं अनेक दोष आवै है तिनकी चरचा टीकातैं जाननीं ।
सदेव सर्वं को नेच्छेत् स्वरूपादिचतुष्टयात् ।
असदेव विपर्यासान्न चेन्न व्यवतिष्ठते ॥15॥
कारिकार्थ: स्वरूपादि चतुष्टयात् कहिये अपने द्रव्य क्षेत्र काल भाव रूप चतुष्टयतैं सर्व वस्तु सत् ही हैं ऐसैं लौकिक जन तथा परीक्षक जन ऐसा कौन है जो नांहीं इष्ट करै है - सव ही मानै है। बहुरि विपर्यासात् कहिये परके द्रव्य क्षेत्र काल भावरूप चतुष्टयतैं असत् ही है ऐसैं सर्व ही मानै हैं। इहां सर्व वस्तु कहनैंतैं चेतनाचेतन द्रव्य तथा पर्याय तथा भ्रान्ताभ्रान्त तथा आपकै इष्ट तथा अनिष्ट इत्यादि जाननें। जातैं जो प्रतीतिमैं आवै ताका लोप करनेंका असमर्थपणां है। बहुरि कुनयकरि विपर्यस्त भई है बुद्धि जाकी ऐसा कोई दुर्मति नाहीं इष्ट करैं - न मानैं सो काहू ही इष्ट तत्वविषैं नाहीं तिष्ठै है जातैं वस्तुविषैं जो वस्तुपणां है सो अपने स्वरूपका तौ उपादान कहिये ग्रहण अर परके स्वरूपका अपोहन कहिए त्याग इन दोऊ व्यवस्थाकरि ठहरै है। जो अपने स्वरूपकी ज्यौं पररूपकरि भी सत्व मानिये तौ चेतनादिककै अचेतनादिकपणांका प्रसंग आवै। बहुरि पररूपकी ज्यौं स्वरूपकरि भी असत्व मानिये तौ सर्वथा शून्यपणांकी प्राप्ति आवै। तैसैं ही स्वद्रव्य की ज्यौं परद्रव्यकरि भी सत्व मानिये तौ भिन्नद्रव्य न्यारे न्यारे न ठहरै बहुरि परद्रव्यकी ज्यौं स्वद्रव्यकरि भी कोईकै असत्व मानिये तौ सत्का द्रव्याश्रय न ठहरै। तैसैं ही अपने क्षेत्रकी ज्यौं परक्षेत्रतैं भी सत् मानिये तौ काहूका न्यारा क्षेत्र न ठहरै। बहुरी परक्षेत्रकी ज्यौं अपने क्षेत्रतैं भी असत् मानिये तो क्षेत्र विनां द्रव्य ठहरै। तैसैं ही अपने कालकी ज्यौं परकालतैं भी सत्व मानिये तौ अपनां अपना मान्या काल न ठहरै। बहुरि परकालकी ज्यौं अपनैं कालकंरि भी असत्व मानिये तौ वस्तुका सकल कालविषैं असंभवीपणां ठहरै। ऐसैं वह दुर्मति कहां तिष्ठै अपनां इष्ट अनिष्टकी व्यवस्था विनां कहूं ठहरना नांहीं। तातैं यहू भलै प्रकार कह्या हुआ बणै है जो सत्व असत्व एक वस्तुमैं न मानिये तौ स्वपरतत्वकी व्यवस्था न ठहरै तब सर्वथा एकान्ती कहूं ठहरै नाहीं ।
क्रमार्पितद्वयाद्द्वैतं सहावाच्यमशक्तितः ।
अवक्तव्योत्तराः शेषास्त्रयो भंगाः स्वहेतुतः ॥16॥
कारिकार्थ: क्रमार्पित कहिये पहलैं न्यारे न्यारे कहे जे सत् असत् ते दोऊ अनुक्रमतैं कहनैंतैं वस्तु द्वैत है । बहुरि सत् असत् ये दोऊ सह कहिये युगपत् एककाल अवाच्य कहिये कहनेमैं न आवै तातैं युगपत् कहनेकी वचनकै सामर्थ्य नांहीं तातैं अवक्तव्य हैं । बहुरि शेषाः कहिये अवशेष जे तीनभंग अवक्तव्य है उत्तर पद जिनकैं ऐसैं ते अपनें अपनें हेतुतैं लेणें। तहां अनुक्रमकरि अर्पण किया जो स्वरूपादि अर पररूपादिकका चतुष्टय द्रव्य क्षेत्र काल भावका द्विक तातैं तौ कोई प्रकार सत्-असत् ऐसा दोऊका एक भंग है। याकूं द्वैत ऐसा नाम कह्या सो द्वित शब्दपर स्वार्थविषैं ’ अण् ’ प्रत्ययकरि द्वैत शब्द निपजाया है। बहुरि अपनां अर परका स्वरूपादिक चतुष्टय अपेक्षा एक काल कहनेंकी अशक्तितैं अवक्तव्य है। जातैं जिस प्रकार कहनेंवाला पद तथा वाक्यका अभाव है। बहुरि वाका तीन भंग पांचमां छटमां सातमां सत् असत् उभय इनकै अवक्तव्य उत्तरपद लगाय अपने हेतुकै वशतैं कहनें, ते कैसैं ? कोई प्रकार सत् अवक्तव्य ही है, जातैं स्वरूपादि चतुष्टयकी अपेक्षा तौ सत् ऐसा वक्तव्य है परंतु सत् असत् ऐसे दोऊ एक कालवस्तुमैं हैं तातैं एक काल कहे नांहीं जाय हैं तातैं अवक्तव्य भी है, ऐसैं यह पांचमां भंग है । बहुरि ऐसैं ही कोई प्रकार असत् अवक्तव्य भी है, तातैं पररूपादि चतुष्टयकी अपेक्षा तौ असत् ऐसा कह्या जाय है अर सत् असत् ये दोऊ एक काल है परन्तु एककाल कहे जाते नांही, तातैं असत् अवक्तव्य है, ऐसैं छट्टा भंग है । बहुरि कोई प्रकार सदसदवक्तव्य ही है । जातैं सत् असत् ये दोऊ क्रमकरि कहे जाय हैं अर दोऊ एककाल कहे न जाय हैं तातैं सदसदवक्तव्य ऐसा सातमां भंग है । ऐसैं यह बक्तव्याव्रक्तव्यस्वरूप तीन भंग पूर्वोक्त च्यार भंगनितैं न्यारे ही हैं । बहुरि तिनमैं सदसद् उभय इन तीनमैंसूं एक न होय तो अवक्तव्य धर्म बणैं नांही जातैं तिन तीनूंनकूं होतैं भी तिनकी विवक्षा न करते केवल एक न्यारा ही अवक्तव्य भंग कहनेमैं बिरोध नांही है । ऐसैं इन भंगनिकी स्वमत परमत अपेक्षा संभवनैंकी चरचा अष्टसहस्रीमैं है तहांतैं जाननी ।
अस्तित्वं प्रतिषेध्येनाविनाभाव्येकधर्मिणि ।
विशेषणत्वात् साधर्म्यं यथा भेदविवक्षया ॥17॥
कारिकार्थ: अस्तित्व धर्म है सो एक धर्म्म जो जीव आदिक ताविषैं प्रतिषेध्य जो [अस्तित्वकै] नास्तित्व ताकरि अविनभावी है। नास्तित्व विना आस्तित्व नांहीं होइ, दोऊका भिन्न आधार नाहीं। जातैं या अस्तित्व नास्तित्वकै विशेषणपणां है। जो विशेषण होइ सो एक धर्मिविषैं अपना प्रतिषेध धर्म्मसूं अविनाभावी होइ। जैसैं हेतुका प्रयोगविषैं साधर्म्य है सो भेदविवक्षा कहिये वैधर्म्य ताकरि अविनाभावी है। यह सर्व हेतुवादीनिकै प्रसिद्ध है। जहां अन्वय होइ तहां व्यतिरेक भी होय जैसैं घटविषैं अस्तित्व है जैसैं यह पट नांहीं है ऐसा नास्तित्व भी है। जो इहां नास्तित्व नाहीं होय तो घट पट भी होइ जाय। ऐसैं अस्तित्व धर्म है सो एक धर्मीविषैं नास्तित्वधर्मकरि अविनाभावी जाननां ।
नास्तित्वं प्रतिषेध्येनाविनाभाव्येकधर्मिणि ।
विशेषणत्वाद्वैधर्म्यं यथाऽभेदविवक्षया ॥18॥
कारिकार्थ: नास्तित्व धर्म है सो अपना प्रतिषेध्य जो अस्तित्व धर्म ताकरि एक धर्मीविषैं अविनाभावी है । जातैं यह विशेषण है जैसैं हेतुके प्रयोगविषैं वैधर्म्य है सो अभेद विवक्षा कहिये साधर्म्यरूप प्रतिषेध्यधर्मकरि अविनाभावी है यह सर्व हेतुवादीनिकै प्रसिद्ध है, जैसैं शब्दकै अनित्यपणां साधनेंविषैं कृतकपणां हेतु आकाशादि विपक्षमैं धर्मरूप है सो घटादिसपक्षतैं समाधान धर्मरूप जो साधर्म्य ताकरि अविनाभावि विशेषण है ऐसा उदाहरण जीवादि एकधर्मीविषैं पररूपादिकरि नास्तित्वकूं स्वरूपादिककरि अस्तित्वकरि अविनाभावी साधै ही है ।
विधेयप्रतिषेध्यात्मा विशेष्यः शब्दगोचरः ।
साध्यधर्मो यथा हेतुरहेतुश्चाप्यपेक्षया ॥19॥
कारिकार्थ: विशेष्य कहिये विशेषणके योग्य सर्व ही जीवादिक पदार्थ हैं सो, विधेय कहिये विधिके योग्य अस्तित्वधर्म, अर प्रतिषेध्य कहिये निषेध योग्य नास्तित्वधर्म इनि दोऊ धर्मनिस्वरूप है । जातैं विशेषणके योग्य विशेष्य होय सो ऐसा ही होय । बहुरि इस विशेषणपणांकै साधनेकूं विशेषण (विशेष्य) है, सो कैसा है ? विशेष्यः शब्दगोचरः कहिये शब्दका विषय है अर्थात् जो शब्दकरि कहिये ऐसा विशेष्य विधिप्रतिषेधस्वरूप ही होय। अब याका उदाहरण कहैं हैं - जैसे साध्यका धर्म हेतु है सो अपेक्षाकरि विधिप्रतिषेधस्वरूप ही होय । जहां साध्यकूं साधै तहां तौ हेतु होय अर जहां साध्यकूं नांहीं साधै तहां ही अहेतु होय । जैसे शब्दकूं अनित्य साधिये तब कृतकपणां ताका धर्मकूं हेतु होय सो ताकै अनित्यपणां साधै । बहुरि सो ही कृतकपणां शब्दकूं नित्य साधनेमैं अहेतु होय । तथा जहां अग्निमानपणां साधिये तहां धूमवानपणां हेतु है सो ही ताके विपक्ष जलके निवासविषैं अहेतु है ऐसैं जानना । ऐसैं विधिप्रतिषेधस्वरूप जीवादिक पदार्थ हैं सो शब्दगोचर हैं ऐसा सिद्ध होय है ।
शेषभंगाश्च नेतव्या यथोक्तनययोगतः ।
न च कश्चिद्विरोधोऽस्ति मुनीन्द्र ! तव शासने ॥20॥
कारिकार्थ: शेषभंगाः कहिये बाकीके तीन भंग हैं ते पूर्वैं जे अस्तित्व नास्तित्वकी दोय कारिकामैं नय कही ताके योगतैं प्राप्त करणें, तहां हे मुनीन्द्र ! तुम्हारे शासन कहिये आज्ञा-मत तामैं किछू भी विरोध नाहीं है । यहां कारिकामैं शेष वचन है सो उत्तरके तीन भंगनिकी अपेक्षा है जातैं पहली दोय कारिकामैं अस्तित्त्व नास्तित्त्व दोऊ ही अपने अपने प्रतिपक्षीकी अपेक्षा विशेषणपणां हेतुतैं साधै । बहुरि या कारिकातैं पहलैं कारिकामैं विधिप्रतिषेधस्वरूप विशेष्यवस्तुकूं शब्दगोचरतैं साध्या सो यहू तीसरा भंग साध्या सो याकूं भी विशेषणपणां हेतुतैं अपना प्रतिपक्षीकी अपेक्षा विधिनिषेधरूप जाननां । बहुरि तैसैं सामर्थ्यतैं अवक्तव्य ही अपणां प्रतिपक्षी वक्तव्य धर्म ताकी अपेक्षा विशेषणपणां हेतुतैं विधिनिषेधरूप जानना, ऐसैं च्यार भंग तौ यह अर शेष तीन भंग अस्तित्त्वावक्तव्य, नास्तित्त्वावक्तव्य, अस्तित्त्वनास्तित्त्वावक्तव्य ऐसैं अपने अपने प्रतिपक्षीकी अपेक्षा विशेषणपणां हेतुतैं विधिप्रतिषेधरूप जाननें, ’ विशेषणत्त्वात्, ऐसा नययोग है सो सर्वके लगावणां जातैं एकधर्मी जीवादिक वस्तुविशेषनिविषैं एक धर्म विशेषण है ऐसैं सर्वज्ञके मतमैं किछू भी विरोध नाहीं है अपने प्रतिपक्षी धर्मतैं अविनाभावी विशेषणकूं जे अन्यवादी नाहीं साधै हैं तिनहांके मतमैं विरोध आवै है ।
एवं विधिनिषेधाभ्यामनवस्थितमर्थकृत् ।
नेति चेन्न यथा कार्यं बहिरन्तरुपाधिभिः ॥21॥
कारिकार्थ: एवं कहिये पूर्वोक्तप्रकार न्यायकरि सप्तभंगीविधिविषैं विधि निषेधकरि अनवस्थित जीवादिक वस्तु हैं सो अर्थकृत् कहिये अर्थक्रियाकूं करैं हैं - कार्यकारी हैं । बहुरि नेति चेत् कहिये अन्यवादी ऐसैं नाहीं ( मानैं ) तौ तिनकै बाह्य अंतरंग उपाधि कहिये कारणनिकरि कार्य तिन वादीनिनें मान्या है तैसैं नाहीं होय है । तहां जीवादि वस्तु सत् ही है अथवा असत् ही हैं ऐसैं सर्वथा न होय किन्तु कथंचित् सत् हैं अर कथंचित् असत् हैं ऐसैं होय ताकूं अनवस्थित कहिये सो ही वस्तु कार्यकरनेवाला है । बहुरि जो अन्यवादी सर्वथा एकान्तकरि सत् ही है अथवा असत् ही हैं ऐसा अवस्थित कहैं हैं तिनकै तिननें जैसा कार्यसिद्ध होना बाह्य अंतरंग सहकारी कारण अर उपादानकारणकरि मान्या है तैसा नाहीं सिद्ध होय है । याकी विशेष चरचा अष्टसहस्रीतैं जानना ।
धर्मे धर्मेऽन्य एवार्थो धर्मिणोऽनंतधर्मणः ।
अंगित्वेऽन्यतमान्तस्य शेषान्तानां तदङ्गता ॥22॥
कारिकार्थ: अनंत धर्म जामैं पाइये ऐसा जो जीव आदिक एक धर्मी ताकै एक एक अस्तित्व आदि धर्मविषैं अन्य ही अर्थ हैं भिन्न भिन्न कार्य हैं प्रयोजन हैं । सो वे प्रयोजन कहा है ? तहां कहिये - तिसकी प्रवृत्ति आदिक होना अथवा तिसका ज्ञान होना है बहुरि एक ही प्रयोजन सर्व धर्मनिकै नाहीं है जाकरि भेदाभेद पक्षकरि दूषण आवै । परन्तु कथंचित् भेदाभेदात्मक है, अनंतधर्मात्मक वस्तु जात्यंतर है, धर्मनिके स्वरूप सिवाय एक न्यारा जात्यंतर है तहां विरोधका अवकाश नाहीं । बहुरि तिन अस्तित्व आदि धर्मनिविषैं एक धर्मकैं अंगीपणां कहिये प्रधानपणां होतैं संतैं शेष अनंत धर्मनिकैं तिसका अंगपणां कहिये गौणपणां होय है । तातैं अन्य अन्यका प्रयोग युक्त है । धर्म, धर्म प्रति धर्मीकै कथंचित् स्वभावभेद बणैं है तातैं वस्तुविषैं परमार्थतैं अस्तित्व आदि धर्मनिकी व्यवस्था अंगीकार करणीं याहीतैं अस्तित्व आदि सप्तभंगनिकी प्रवृत्ति है सो सुनयके अर्पणतैं हैं । ऐसैं ‘ स्यात् अस्त्येव जीवादिः, इत्यादि सप्तभंगनिका प्रयोग युक्त है ।
एकानेकविकल्पादावुत्तरत्रापि योजयेत् ।
प्रक्रियां भंगिनीमेनां नयैर्नयविशारदः ॥23॥
कारिकार्थ: नयनिविषैं प्रवीण जे स्याद्वादी सो यहु सप्तभंगी प्रक्रिया है ताहि उत्तर प्रकरणविषैं एकपणां अनेकपणां इत्यादि विकल्पविचारविषैं भी नयनकरि युक्त करै । तहां स्यात् कहिये कथंचित् जीवादिक वस्तु एक ही हैं सत् द्रव्यनयकी अपेक्षाकरि । बहुरि सत् पर्यायनयकी अपेक्षाकरि एक नाहीं है। यहां कोई कहै - द्रव्य तौ अनंत हैं एक द्रव्य कैसे कही ? ताको उत्तर ऐसो - जो परमसंग्रहनय एक सन्मात्रका ग्राहक है ताकी अपेक्षाकरि एक कहनेमैं दोष नाहीं । बहुरि कथंचित् जीवादिक वस्तु अनेक ही हैं जातैं भेदरूप न्यारे न्यारे देखिये हैं। बहुरि क्रमकरि अर्पण किया जो एकपणां, अनेकपणां, तातैं कथंचित् एकानेकस्वरूप है । बहुरि युगपत अर्पण किया जो एकपणां, अनेकपणां ताकरि कथंचित् अवक्तव्य है । तैसैं ही कथंचित् एकावक्तव्य, कथंचित् अनेकावक्तव्य अर कथंचित् एकानेकावक्तव्य है । ऐसैं सप्तभंगीप्रक्रिया योजनी । बहुरि जैसैं पूर्वें अस्तित्वकूं नास्तित्वकरि अविनाभावी विशेषणपणां हेतुकरि साधारण कह्या था तैसैं यहां एकपणां, अनेकपणां आदि सप्तभंगीनिविषैं भी अपणां प्रतिपक्षीनिकरि विशेषणपणां हेतुतैं अविनाभावी साधना । ऐसैं एकत्व अनेकत्वनिकरि अनवस्थित जीवादिक वस्तु सप्तभंगीवाणीविषैं प्राप्त किया कार्यकारी है । सर्वथा एकान्तविषैं क्रमाक्रमकरि अर्थक्रियाका विरोधहै तातैं कार्यकारी नाहीं है ऐसैं जानना ।
द्वितीय परिच्छेद (कारिका 24 से 36)
अद्वैतैकांतपक्षेऽपि दृष्टो भेदो विरुद्ध्यते ।
कारकाणां क्रियायाश्च नैकं स्वस्मात् प्रजायते ॥24॥
कारिकार्थ: अद्वैतएकांतपक्ष होनेतैं कर्ता, कर्म आदि कारकनिके बहुरि कियानिके भेद जो प्रत्यक्षप्रमाणकरि सिद्ध हैं सो विरोधरूप होय हैं । बहुरि सर्वथा यदि एक ही रूप होय तौ आप ही कर्ता आप ही कर्म होय नाहीं । अर आपहीतैं आपकी उत्पत्ति हू नांहीं होय ।
कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं च नो भवेत् ।
विद्याविद्याद्वयं न स्याद्बन्धमोक्षद्वयं तथा ॥25॥
कारिकार्थ: पूर्वोक्त अद्वैतएकान्तपक्षतैं लौकिक अर वैदिक कर्म अथवा शुभ - अशुभकर्मका आचरण अथवा पुयण - पाप कर्म ऐसा कर्मद्वैत न ठहरै । बहुरि कर्मद्वैतका फल भला - बुरा, सुख - दुखका द्वैत न ठहरै । बहुरि फल भोगनेका आश्रय यह लोक न ठहरै । यदि यहां ऐसा कहै जो कर्म आदिका द्वैत अविद्याके उदयतैं है तौ तहां उत्तरमैं कहिये है कि धर्म - अधर्मका द्वैतका अभाव होतैं विद्या - अविद्याका द्वैत संभवै नाहीं । बहुरि विद्या - अविद्या नाहीं तब बंध - मोक्षके द्वैतका अभाव होय । बहुरि यदि विद्या - अविद्या भी कल्पित मानैं तौ शून्यवादीकी कल्पना भी मानना ठहरै सो यह युक्त नाहीं । परीक्षाप्रधानी तौ परमार्थरूप किछू फल विचारि प्रवर्तैं हैं । पुण्य - पाप, सुख - दुख, यहलोक - परलोक, विद्या - अविद्या, बंध - मोक्ष ऐसैं विशेषरहित तत्व तौ परीक्षावान आदरै नांहीं । शून्यवादकूं कौन आदरै ? ।
हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेद् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययोः ।
हेतुना चेद्विना सिद्धिर्द्वैतं वाङ्मात्रतो न किम् ॥26॥
कारिकार्थ: हे अद्वैतवादी ! जो तू हेतुतैं अद्वैतकी सिद्धि मानेगा कि “जो सर्व नाना वस्तु दीखै हैं सो प्रतिभासमैं सर्व गर्भित भये, प्रतिभासवाली होनेंतैं” ऐसैं तौ हेतु अर साध्य दोय ठहरै, तब द्वैतपणां आया । बहुरि यदि हेतु विना आगममात्रतैं अद्वैतकी सिद्धि मानैं तौ द्वैतता हू वचनमात्रतैं कैसैं न होय । तथा आगम अर अद्वैतब्रह्म ऐसैं दोय ठहरै तब द्वैतपना क्यों न आवै ।
अद्वैतं न विना द्वैतादहेतुरिव हेतुना ।
संज्ञिनः प्रतिषेधो न प्रतिषेध्यादृते क्वचित् ॥27॥
कारिकार्थ: हे अद्वैतवादिन् ! अद्वैत है सो द्वैत विना नाहीं हो सकै । अद्वैत शब्द है सो अपना अर्थका प्रतिपक्षी जो परमार्थस्वरूप द्वैत ताकी अपेक्षातैं है । जातैं यह अद्वैतशब्द निषेधपूर्वक अखंड पद है, जैसैं अहेतु शब्द है सो हेतु विना न होय है तैसैं। जहां एक अर्थका वाचक एकपद होय ताकूं अखंड पद कहिये सो यहां निषेधपूर्वक द्वैतशब्दका पृथक दोय अर्थ परमार्थभूत नांहीं हैं एक ही अर्थ है । तातैं अपना प्रतिपक्षी जो द्वैत ता विना न होय । बहुरि जहां अखरविषाण ऐसा शब्द होय ताकरि अतिप्रसंग नाहीं है । जातैं या विषाण शब्दका निषेध है सो खर शब्दकरि सहित भया तब अखंड पद न रह्या खरविषाण शब्द भया सो खंड पद भया तब याका अर्थ किछू वस्तु नांहीं ताका निषेधे भी वस्तु नांहीं ताके समान यह अद्वैत शब्द है नांहीं याका तौ प्रतिपक्षी द्वैतशब्द है ताका परमार्थभूत अर्थ विद्यमान है । ऐसैं निषेधपूर्वक अखंड पद जो द्वैत ता विना अद्वैत नाहीं है । याहीतैं सामान्यवचन ऐसा है - जो संज्ञावान पदार्थ प्रतिषेध्य कहिये निषेध करने याग्य वस्तु तिस विना प्रतिषेध कहूं नांहीं होय है । जो अखरविषाणकी तरह होय तौ ताका संज्ञावान पदार्थ ही नाहीं तातैं ऐसा शब्द प्रतिषेध्य विना भी होय है । बहुरि कहै कि दूसरेनें मान्या जो अविद्याके कारण द्वैत ताका प्रतिषेधतैं अद्वैत सिद्ध होय है तब तेरे यहां द्वैत की सिद्धि कैसैं न होय ? बहुरि अद्वैतवादी कहै - जो हम अविद्याकूं वस्तुभूत मानैं नाहीं, प्रमाणतैं अविद्या सिद्ध होय नाहीं, यातैं द्वैतकी सिद्धि न होय । जो ब्रह्मकूं अविद्यावान मानिये तौ बड़ा दोष आवै । बहुरि ब्रह्मकूं निर्दोष मानिये तौ अविद्याकै अनर्थकपणां आवै । बहुरि याकै अविद्या नाहीं है ऐसा अस्तित्व अविद्याका अविद्याहीमैं कल्पिये है । बहुरि यह अविद्या ब्रह्मद्वारें तीसरी है ऐसा कोई प्रकार भी सिद्ध न होय है । बहुरि अनुभवतैं अविद्या है ऐसैं ब्रह्म अनुभवसहित होय है । तातैं प्रमाणरूप ज्ञानतैं बाधित अविद्या होय तौ अविद्याकै अध्यात्मपणेका प्रसंग आवै है । बहुरि ब्रह्मकूं जानें विना अविद्याकूं कैसैं जानैं ? बहुरि ब्रह्मकूं जाणें अविद्याका अनुभव विना बाधना न होय है जातैं वस्तुभूत होय तब बाधा संभवै है। बहुरि अविद्यावान पुरुष अविद्याकूं निरूपण करनेकूं समर्थ न होय तातैं वस्तुके वर्तनकी अपेक्षा तौ अविद्या थपैं नांहीं जातैं वस्तु विना अन्यविषैं प्रमाणका व्यापार होय नाहीं । अर अविद्या वस्तु है नांहीं तातैं अविद्याकै अविद्यापणांविषैं असाधारण लक्षण ऐसा है जो ‘ प्रमाणकी बाधाकूं सहवेकूं समर्थ नाहीं, ऐसा जाका स्वभाव है सो अविद्या है ’ सो संसारीकै स्वानुभवके आश्रय है तातैं अद्वैतवादीकै कछू दोष नांहीं आवै है । बहुरि द्वैतवादी संसारी है सो माया प्रपंच प्रमाण बाधित हैं ताकूं अनेकप्रकार कल्पै है यातैं द्वैतवादीकै अनेक दोष आवैं हैं ? ताकूं कहिये - जो सकलप्रमाणसूं अतीत अविद्याकूं अंगीकार करै सो काहेका परीक्षावान है । अविद्याकै भी कथंचित् वस्तुपणां मानि प्रमाणका विषयपणां मानैं । प्रमाणतैं सत् असत् का निश्चय करै सो ही परीक्षावान है । बहुरि शब्दाद्वैतवादका तथा संवेदनाद्वैतवाद एकान्तपक्षका भी ब्रह्माद्वैतपक्षके समान निराकरण जानना ।
पृथक्त्वैकान्तपक्षेऽपि पृथक्त्वादपृथक्तु तौ ।
पृथक्त्वे न पृथक्त्वं स्यादनेकस्थो ह्यसौ गुणः ॥28॥
कारिकार्थ: पृथक्त्व कहिये पदार्थ सर्व भिन्न ही हैं ऐसा एकान्त पक्ष होतैं पृथक्त्वनामा गुणतैं गुण अर गुणी इन दोऊ पदार्थनिकै पृथक्पणां कहिये भिन्नपणां होतैं ते दोऊ अपृथक् कहिये अभिन्न ही ठहरै हैं । ऐसैं यह पृथक्त्वनामा गुण ही नहीं ठहरै है । जातैं पृथक्त्वगुणकूं एककूं अनेक पदार्थनिमैं ठहऱ्या मानै है सो पृथक्त्वगुण कहना निष्फल भया ।
संतानः समुदायश्च साधर्म्यं च निरंकुशः ।
प्रेत्यभावश्च तत्सर्वं न स्यादेकत्वनिन्हवे ॥29॥
कारिकार्थ: जीव आदिक द्रव्यनिकै एकपणेका लोप मानिये तथा अपने पर्यायनितैं भी एकतारूप अन्वय न मानिये तौ संतान न ठहरै । जातैं क्रमरूप पर्यायनिमैं जीवादि द्रव्य अन्वय रूप होय सो संतान है, अर सो संतान क्षणिक पक्षकरि पर्यायानिकै सर्वथा भेद ही माननेमैं संतान परमार्थभूत न बनैं । अन्य संतानकी तरह ठहरै । बहुरि समुदाय भी न ठहरै जातैं एकस्कन्धमैं अपने अवयवनितैं एकता होय सो समुदाय है; यह समुदाय भी सर्वथापृथक्त्वपक्षमैं न बनैं । बहुरि साधर्म्य भी न ठहरै । समानधर्म जिनकै हैं तिनकैं समानपरिणामनिकी एकताकूं साधर्म्य कहिये हैं सो पृथक्त्व एकान्तपक्षमैं एकताका लोप होतैं यह भी न बनैं । बहुरि प्रेत्यभाव कहिये परलोक सो भी न ठहरै । मर मर कर फेर फेर उपजना ताकूं परलोक कहिए हैं सो दोऊ भवमैं एक आत्माका लोप मानें यह भी न बनैं । तथा वर्तमानमैं इसभवमैं भी बाल्य, यौवन, वृद्धपणां आदि अनेक अवस्था होय हैं तिनमैं एकपणांका प्रत्यक्ष अनुभव है सो यह अनुभव भी पृथक्त्वएकान्तपक्षमैं विरोध्या जाय तब देने - लेनेका व्यवहार भी नष्ट होजाय है । बहुरि संतान, समुदाय, साधर्म्य अर परलोक ये निरंकुश हैं - अवश्य हैं तथा प्रमाणसिद्ध हैं तिनका अभाव कैसैं मानिये अर एकपणांका लोप होतैं पृथक्त्व - एकान्तपक्ष श्रेष्ठ नांहीं ।
सदात्मना च भिन्नं चेज्ज्ञानं ज्ञेयाद् द्विधाप्यसत् ।
ज्ञानाभावे कथं ज्ञेयं बहिरन्तश्च ते द्विषाम् ॥30॥
कारिकार्थ: ज्ञान है सो ज्ञेय वस्तुतैं सत्स्वरूपकरि भी जो भिन्न मानिये तौ दोऊ ही प्रकार असत्स्वरूप होय । ज्ञानतैं सत् भिन्न मानिये तव ज्ञान असत्रूप होय अर ज्ञेयतैं सत् भिन्न मानिये तौ ज्ञेय असत्रूप होय है । बहुरि ज्ञानतैं ही सत् भिन्न मानिये तौ ज्ञानका अभावहोतैं ज्ञेयका भी अभाव ही होय जातैं ज्ञान ज्ञेयका अविनाभाव तौ परस्पर अपेक्षातैं सिद्ध है सो एकका अभाव होतैं दूजेका भी अभाव होय । यातैं आचार्य कहैं हैं - हे भगवन् ! तुह्मारे द्वेषी जे सर्वथा एकान्तवादी तिनकै बाह्य अर अंतरंग जे ज्ञेय ते कैसैं ठहरैं ? । बाह्य ज्ञेय तौ घट पट आदिक अर अंतरंग ज्ञेय जीवात्मा तथा ज्ञान आदिक इन सबनिका अभाव ठहरै । तातैं पृथक्त्व - एकान्त कहनेवाले बौद्ध तथा वैशेषिककूं यह लाहना ( प्रालम्भ - दूषण ) सत्यार्थ है ।
सामान्यार्था गिरोऽन्येषां विशेषो नाभिलप्यते ।
सामान्याभावतस्तेषां मृषैव सकला गिरः ॥31॥
कारिकार्थ: अन्येषां कहिये अन्य जे बौद्धमती तिनकै मतमैं गिरः कहिये वाणी - वचन हैं सो सामान्यार्थाः कहिए सामान्य है अर्थ जिनका ऐसे हैं तिन वचननिकरि विशेष जो वस्तुका निजलक्षण सो नाहीं कहिए है । तिन बौद्धमतीनकै सामान्यके अभावतैं समस्त वचन हैं ते मिथ्या ठहैर हैं।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥32॥
कारिकार्थ: जे स्याद्वादनयके विद्वेषी हैं तिनकै जैसें अस्तित्व, नास्तित्त्व, एकत्त्व, अनेकत्त्व, परस्पर विरोधतैं नाहीं तिष्ठै हैं तैसें ही पृथक्त्व, अपृक्त्वभाव भी परस्पर विरोधस्वरूप हैं सो एकस्वरूप नाहीं ठहरै हैं जातैं यह भी प्रतिषेधस्वरूप है । जो दोय विरुद्ध धर्मरूप होय सो सर्वथा एकान्तपक्षमैं एकरूप न ठहरैं । बहुरि जो सर्वथा अवक्तव्यतत्त्व मानैं ताकै भी “ तत्त्व अवक्तव्य है ” ऐसा वचन भी कहना युक्त न होय । तातैं अवक्तव्य एकान्त मानना भी श्रेष्ठ नांहीं ।
अनपेक्षे पृथक्त्वैक्ये ह्यवस्तु द्वययोगतः ।
तदेवैक्यं पृथक्त्वं च स्वभेदैः साधनं यथा ॥33॥
कारिकार्थ: हि कहिये निश्चयतैं पृथक्त्व अर एकत्व हैं ते परस्पर अपेक्षारहित होय तौ दोऊ ही अवस्तु ठहरैं [ जातैं अवस्तु ठहरै ] जातैं दोऊकै अवस्तुपणांका साधक परस्पर निरपेक्षपणां हेतु है । एकतत्त्वकी अपेक्षा विना पृथक्त्व अवस्तु है बहुरि पृथक्त्वकी अपेक्ष विना एकत्व अवस्तु है । ऐसैं निरपेक्ष दोऊ ही अवस्तु ठहरै हैं । बहुरि परस्परं सापेक्ष दोऊ हेतुतैं सो ही पृथक्त्व अर एकत्व परमार्थ हैं, वस्तु हैं । यहां दृष्टान्त - जैसैं साधन कहिये हेतु ताका स्वरूप बौद्धमती पक्षधर्म, सपक्षसत्त्व, विपक्षव्यावृत्ति ऐसैं अपने तीन भेदनिकरि विशिष्ट एक मानै हैं । ताकै भी अन्वय, व्यतिरेक, ये दोय भेद मानैं हैं । तहां जो दोऊ परस्पर सापेक्षपणांहीतैं दोऊ वस्तुभूत साधन ठहरै । तैसैं ही पृथक्त्व अर ऐक्य दोऊ सापेक्ष ही वस्तुरूप हैं निरपेक्ष अवस्तु हैं ।
सत्सामान्यात्तु सर्वैक्यं पृथग्द्रव्यादिभेदतः ।
भेदाभेदव्यवस्थायामसाधारणहेतुवत् ॥34॥
कारिकार्थ: तु कहिये पुनः परस्परसापेक्षातैं तौ पहली कारिकाविषैं जनाया अर यहां फेर ताका विशेषणतैं आश्रयकरि कहैं हैं । सत्सामान्यतैं तौ सर्व जीव आदिक वस्तु हैं सो ऐक्य कहिये एकस्वरूप हैं यातैं एकपणांकी प्रतीति निर्विषय नाहीं है । बहुरि न्यारे न्यारे जीव आदिक द्रव्य हैं तिनके भेदतैं पृथकपणां है यातैं पृथकपणांकी प्रतीति निर्विषय नाहीं है ऐसैं भेदाभेदकी विवक्षा होतैं असाधारण हेतु मानिये है । सामान्य तौ अभेद विवक्षाकरि हेतु एक मानिये हैं । बहुरि भेदविवक्षाकरि विशेष ताके पक्ष-धर्म आदि भेद मानिये हैं तैसैं जानना ।
विवक्षा चाविवक्षा च विशेष्येऽनंतधर्मिणि ।
यतो विशेषणस्यात्र नासतस्तैस्तदर्थिभिः ॥35॥
कारिकार्थ: अनंत हैं धर्म जामैं ऐसा जो धर्मी विशेष्य कहिये विशेषण जामैं पाइये ऐसा जीव आदिक पदार्थ ताविषैं विवक्षा बहुरि अविवक्षा करिये हैं सो सत् विशेषणकी करिये हैं, असत् विशेषणकी न करिये हैं । कोई पूछै कि ऐसी विवक्षा, अविवक्षा कौन करै है ? ताका उत्तर - जे एकत्व, पृथक्त्व आदि विशेषणनिके अर्थी हैं ते करैं हैं । यहां विवक्षा, अविवक्षा वक्ताके पदार्थ कहने की न कहनेकी इच्छारूप है सो जाकूं कहने की इच्छा करै सो सत्रूप - विद्यमान होय ताहीकी करै । असत् अविद्यमानकी तौ न करै । सर्वथा असत्के कहनेकी इच्छा किये तिसतैं कहा अर्थ साधै । सर्वथा असत् तौ गधाके सींगकी तरह अर्थक्रियाकरि शून्य है । ऐसैं पदार्थमैं एकत्व, पृथक्त्व आदि विशेषण सत्रूप होय तिनहींकूं तिनिके अर्थीनिकी विवक्षा, अविवक्षा होय है । असत्रूपकी न होय है । ऐसा जानना ।
प्रमाणगोचरौ संतौ भेदाभेदौ न संवृती ।
तावेकत्राविरुद्धौ ते गुणमुख्यविवक्षया ॥36॥
कारिकार्थ: पदार्थनिविषैं भेद अर अभेद ये दोऊ हैं ते सत्रूप परमार्थभूत हैं । जातैं ये प्रमाणगोचर हैं - प्रमाणके विषय हैं । न संवृत कहिये उपचारस्वरूप नाहीं हैं । यहां भेदपक्ष, अभेदपक्ष, भेदाभेदपक्ष, ऐसैं तीन पक्ष कथंचित् परमार्थभूत सिद्ध करने। बहुरि हे भगवन् ! तुह्मारे मतमैं भेद अर अभेद सत्यार्थरूप हैं ते एकवस्तुविषैं विरुद्धरूप नाहीं । जिनके मतमैं परस्पर निरपेक्षरूप भेदाभेद है तिनहींकै विरुद्धरूप होय है जातैं सवर्था एकान्त प्रमाणगोचर नांहीं है । बहुरि यहां प्रमाणगोचर कह्या सो प्रमाणका स्वरूप आगैं कहेंगे ।
तृतीय परिच्छेद (कारिका 37 से 60)
नित्यत्वैकान्तपक्षेऽपि विक्रिया नोपपद्यते ।
प्रागेव कारकाभावः क्व प्रमाणं क्व तत्फलम् ॥37॥
कारिकार्थ: नित्यत्वैकान्त कहिये कूटस्थ सदा एकसा रहै ऐसे वस्तुका अभिप्राय ताका पक्ष होतैं तिस कुटस्थविषैं विक्रिया कहिये परिणमन - अवस्थातैं अन्य अवस्था होना ऐसी क्रिया तथा परिस्पन्द कहिये चलना - क्षेत्रतैं अन्य क्षत्र प्राप्त होना ऐसी विविध अनेक क्रिया न बनैं । बहुरि कारक कहिये कर्ता कर्म आदिक तिनका कूटस्थमैं पहले ही अभाव है । अवस्था जाकी पलटै नाहीं तामैं कारककी प्रवृत्ति कैसैं बनैं । बहुरि जब कारकका अभाव ठहरया तब प्रमाण कहां अर प्रमाणका फल प्रमिति कहां ? । जातैं प्रमाता कर्ता होय तब प्रमाण अर प्रमिति भी संभवै । अकारक प्रमाता होय नाहीं । जो काहू ही प्रति साधन न होय सो तौ अवस्तु ठहरै तब आत्माकी भी सिद्धि न होय । ऐसैं नित्य एकान्तमैं दूषण दिखाया ।
प्रमाणकारकैर्व्यक्तं व्यक्तं चेदिन्द्रियार्थवत् ।
ते च नित्ये विकार्यं किं साधोस्ते शासनाद्बहिः ॥38॥
कारिकार्थ: नित्यत्वपक्षका एकान्तवादी सांख्यमती कहै - जो व्यक्त कहिये अभिव्यक्ति अर उत्पत्तिरूप हैं ते प्रमाण अर कारकनिकरि व्यक्त - प्रगट होय हैं । यहां दृष्टान्त कहैं हैं - जैसैं इन्द्रिय अपने विषयरूप पदार्थकूं व्यक्त - प्रगट करै है तैसैं प्रमाणकारक व्यक्तपदार्थकूं प्रगट करै है ताके निषेधकूं आचार्य कहैं हैं - जो हे भगवन् ! तिन नित्यत्वएकान्तवादीनिकै तौ ते प्रमाण अर कारक भी नित्य ही हैं । तातैं सर्वथा नित्य कारणनितैं अनित्य कार्य होय नांहीं । तातैं ते वादी तुम्हारे साधु आप्तकै शासन मततैं बाह्य हैं । तिनकै विकार्य कहिये अवस्था पलटनेरूप विकार - स्वरूपकार्य कहां सिद्ध होय ? किछू भी सिद्ध न होय । जो नित्य प्रमाण कारकनितैं अभिव्यक्ति, उत्पत्तिरूप व्यक्त पदार्थनिकूं प्रगट भये कहैं तौ बनैं नाहीं तथा तिन व्यक्तनिकै भी नित्यपणां आया चाहिये सो है नाहीं ऐसैं तिनकै नित्य एकान्तपक्षमैं विक्रिया न बनैं ।
यदि सत्सर्वथा कार्यं पुंवन्नोत्पत्तुमर्हति ।
परिणामप्रक्लृप्तिश्च नित्यत्वैकान्तबाधिनी ॥39॥
कारिकार्थ: यदि कहिये जो कार्य है सो सर्वथा सत् है, कूटस्थके समान है ऐसैं कहिये जो सांख्यमती जैसैं पुरुषकूं नित्य मानै है तैसैं कार्य भी नित्य ठहरै - उपजने योग्य न ठहरै । बहुरि कहै कि वस्तुकै अवस्थातैं अन्य अवस्था होय है ऐसैं विवर्तरूप कार्य उपजै है ? ताकूं कहिये - तौ वस्तु परिणामी ठहरै है सो यह परिणामकी पलटनेरूप प्रक्लृति कहिये केवल कल्पना ही है सो नित्यत्व एकान्तकी बाधनेवाली है ही । बहुरि कहै कि कार्य असत्रूप उपजै है तौ सांख्यमतके सिद्धान्तमैं जो यह कह्या है कि असत्का करना असंभव है सो ऐसैं सिद्धान्तका विरोध आवै है । ऐसैं नित्यत्व एकान्तके वादी जे सांख्यमती आदिक तिनकै कार्य उपजनेका अभाव आवै है ।
पुण्यपापक्रिया न स्यात् प्रेत्यभावफलं कुतः ।
बंधमोक्षौ च तेषां न येषां त्वं नासि नायकः ॥40॥
कारिकार्थ: हे भगवन् ! जिनकैं तुम अनेकान्तके उपदेशक आप्त नायक स्वामी नाहीं हो तिन सर्वथा नित्यत्त्वादि एकान्तवादीनिकै पुण्य - पापकी क्रिया - काय, वचन, मनकी शुभ, अशुभ प्रवृत्तिरूप तथा उपजनेस्वरूप क्रिया नाहीं बनै है याहीतैं परलोक भी नाहीं बनैं है । बहुरि क्रियाका फल सुख दुःख आदि काहे तैं होय अपि तु नाहीं होय । बहुरि बंध अर मोक्ष ये दोऊ भी न होय । तातैं नित्यत्वएकान्तका मत है सो परीक्षावाननिकै आदरने योग्य नाहीं है । जातैं जा मतमैं पुण्य, पाप, परलोक, बंध, मोक्ष न संभवै तिस मतकूं परीक्षावान कौन प्रयोजन आश्रय करै अर्थात् नाहीं करै ।
क्षणिकैकान्तपक्षेऽपि प्रेत्यभावाद्यसंभवः ।
प्रत्यभिज्ञाद्यभावान्न कार्यारम्भः कुतः फलम् ॥41॥
कारिकार्थ: क्षणिकएकान्तका पक्ष होतैं भी प्रेत्यभावादि कहिये परलोक, बंध, मोक्ष आदि, तिनका असंभव होय है । जातैं प्रत्यभिज्ञा कहिये पहले तथा पिछले समयविषैं अवस्था होय ताका जोड़रूप ज्ञान तथा स्मरणज्ञान आदिके अभावतैं कार्यका प्रारंभ संभवै नाहीं। बहुरि कार्यके आरंभ विना पुण्य - पाप, सुख - दुख आदिक फल काहेतैं होय अपि तु नाहीं होय । अर क्षणिकनिका संतानकूं कार्यका आरंभ करनेवाला कहै तौ संतान परमार्थभूत क्षणिकएकान्तमैं संभवै नाहीं । एक अन्वयी ज्ञाता द्रव्य आत्मद्रव्य ठहरै तब संतान सत्य ठहरै सो क्षणिक पक्षमैं ऐसा है नाहीं । तातैं क्षणिकएकान्तमत हितकारी नाहीं । जातैं परलोक, बंध, मोक्ष न संभवै सो काहेका हितकारी है। जैसा नित्यत्व आदि एकान्त है तैसा ही यह है तातैं ऐसे मतकूं परीक्षावान आदरै नाहीं ।
यद्यसत्सर्वथा कार्यं तन्मा जनि खपुष्पवत् ।
मोपादाननियामोऽभून्माश्वासः कार्यजन्मनि ॥42॥
कारिकार्थ: जो कार्य है सो सर्वथा असत् ही उपजै है ऐसैं मानिये तौ वह कार्य आकाशके फूलकी तरह मत होहु । बहुरि उपादान आदिक कार्यके उत्पन्न होनेकूं कारण हैं तिनका नियम न ठहरै । बहुरि उपादानका नियम न ठहरै तब कार्यके उपजनेका विश्वास न ठहरै । जो इस कारणतैं यही कार्य नियमकरि उपजैगा । जैसे यवं अन्न उपजनेका यवबीज ही है ऐसा उपादान कारणका नियम होय तिस कारणतैं सो ही कार्य उपजनेका विश्वास ठहरै सो क्षणिकएकान्तपक्षमैं असत् कार्य मानैं तब यह नियम न ठहरै ।
न हेतुफलभावादिरन्यभावादनन्वयात् ।
संतानान्तरवन्नैकः सन्तानस्तद्वतः पृथक् ॥43॥
कारिकार्थ: क्षणिकएकान्तपक्षविषैं हेतुभाव अर फलभाव, आदि शब्दतैं वास्य कहिये वासनायोग्य, वासक कहिये वासना लेने वाला, बहुरि कर्म अर कर्मफलके संबन्ध अर प्रवृत्ति आदि ये भाव नाहीं संभवैं हैं। जातैं ये भाव अन्वय विना होय नाहीं। जैसैं भिन्न अन्य संतान है तैसैं संतानी भी भिन्न ही हैं, ते भी अन्यसंतानकी तरह हैं। बहुरि संतानी जे क्षण तिनतैं भिन्न अन्य संतानकी ज्यौं संतान किछू वस्तु है नाहीं तिन संताननिकी एकताहीकूं संतान कहिये है। ऐसैं अन्यभावतैं अन्वय विना हेतुफलभाव आदिक न बनैं। संतान संतानीकै अन्वय होय सो ही सत्यार्थ संतान है तिसहीकै होतैं हेतुफल भावादिक बनैं हैं ।
अन्येष्वनन्यशब्दोऽयं संवृतिर्न मृषा कथम् ।
मुख्यार्थःसंवृतिर्न स्याद्विना मुख्यान्न संवृतिः ॥44॥
कारिकार्थ: यहां क्षणिकवादी बौद्ध कहै है जो अन्यविषैं अनन्य ऐसा शब्द है सो संवृति कहिये व्यवहारमात्र उपचार करि ये हैं ।
चतुष्कोटेर्विकल्पस्य सर्वान्तेषूक्तयोगतः ।
तत्वान्यत्वमवाच्यं च तयोः संतानतद्वतोः ॥45॥
कारिकार्थ: क्षणिकवादी बोद्ध ऐसें कहैं जो संतान अर संतानी दोऊ सत्रूप हैं ? कि असत्रूप हैं ? अथवा सत् असत् इन दोऊ रूप है ? या दोऊरूप नाहीं हैं ? । ऐसें सर्व ही धर्मनिविषैं इनचार विकल्परूप वचनके कहनेका अयोग है । किछू कह्या जाता नाही । ऐसें ही संतान, संतानीकें भी तत्पना, अन्यपना कहनेका अयोग है । जो वस्तुकूं धर्मनितैं अनन्य कहिये तो वस्तुमात्रही ठहरै । बहुरि वस्तुतैं अन्य कहिये तो इस वस्तुका यह धर्म है ऐसें कहना न बनें । दोऊ कहिये तो दोऊ दोष आवें । दोऊ रहित कहिये तो वस्तु निःस्वभाव ठहरै । यातैं संतान, संतानीकें तत्व, अन्यत्व पना अवक्तव्य ही सिद्ध होय है ।
अवक्तव्यचतुष्कोटिर्विकल्पोपि न कथ्यतां ।
असर्वान्तमवस्तु स्यादविशेष्यविशेषणम् ॥46॥
कारिकार्थ: क्षणिकवादीकूं आचार्य कहैं हैं जो सर्वधर्मनिविषैं चार कोटिके विकल्प कहनेका वचन अयोगहै तौ चार कोटिका विकल्प अवक्तव्य है ये बचन भी मत कहो । बहुरि यदि किछू ही न कहना तब अन्यकों प्रतीति उपजावनका भी अयोग आवै । बहुरि ऐसें होतैं पदार्थ सर्वविकल्पनितैं रहित अवस्तु ही ठहरै है । जातैं सर्वधर्मनितैं रहित भया । तब विशेषण, विशेष्यभावतैं भी रहित भया तातैं अवस्तु ही भया ।
द्रव्याद्यन्तरभावेन निषेधःसंज्ञिनःसतः ।
असद्भेदो न भावस्तु स्थानं विधिनिषेधयोः ॥47॥
कारिकार्थ: जो सत्तासहित संज्ञी कहिये संज्ञावान पदार्थ है ताहीका द्रव्यान्तर, क्षेत्रान्तर, कालान्तर भावान्तर इनकरि अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल भावनिकी अपेक्षा निषेध कीजिये हैं । बहुरि असत्तारूपका तौ निषेध संभवै नाहीं सर्वथा अवस्तु तौ प्रतिषेधका विषय नाहीं । जातैं असत् भेदरूपहै सो तो अवस्तु है, सो तो विधि, निषेधका स्थानही नाहीं है । कथंचित् सत् विशेष पदार्थ ही विधि अर निषेधका आधार है । तातें ऐसा आया कि अन्य वादीनें मान्या जो सर्व धर्मनिकरि रहित तत्त्व सो अवस्तु है ।
अवस्त्वनभिलाप्यं स्यात् सर्वान्तैः परिवर्जितम् ।
वस्त्वेवा वस्तुतां याति प्रक्रियाया विपर्ययात् ॥48॥
कारिकार्थ: जो 'सर्वान्तैः परिवर्जितं, कहिये सर्व धर्मनिकरि रहित है सो धर्मी नाही, अवस्तु है । जातैं ऐसा पदार्थ काहू प्रमाणका विषय नाहीं सो ही अनभिलाप्य कहिये अवक्तव्य है यहां क्षणिकवादी कहै जो सर्व धर्मनिकरि रहित अवस्तु अवक्तव्य है तो अवस्तु अवक्तव्य है ऐसा भी तुम कैसे कहौ हौ । ताकूं कहिये कि हम जाकूं अवस्तु कहैं हैं सो सर्व धर्मनिकरि रहितकूं नाही कहैं हैं । सत् , असत् इत्यादि अनेकान्तात्मककूं वस्तु कहैं हैं । सो ऐसें होतें द्रव्य, क्षेत्र, काल, अपेक्षा प्रक्रियाके विपर्ययके वशतैं वस्तुकों ही अवस्तु कहैं हौं । बहुरि सर्वथा एकान्तकरि सर्व धर्मनिकरि रहित ताकूं अवस्तु माना है सो परवादीकी कल्पनाकी अपेक्षा लेकर कहनाहै । परमार्थतैं जो सर्व धर्मनिकरि रहित है तातैं अवस्तु है ऐसा कहनाभी हमारें नाहीं हैं । हमारें यहां ऐसें है - जैसें घटकू अन्य घटकी अपेक्षा अघट कहिये तैसें अन्य वस्तुकों ही अवस्तु कहिये यामें विरुद्ध नाहीं है । जैसें काहूने कह्याकि ’ अब्राह्मणकूं ल्याओ, तहीं जानना कि ब्राह्मणतैं अन्य, क्षत्रियादिककूं बुलावै है । तहां ब्राह्मणका सर्वथा अभाव न कहै है । भावहीकूं अपेक्षातैं अभाव कहिये । तैसें ही वस्तुकूं अवस्तु कहना अपेक्षातैं है । जो सर्वथा सर्व धर्मनितैं रहित है सो वस्तु तो अवक्तव्य ही है ऐसें जानना ।
सर्वान्ताश्चेदवक्तव्यास्तेषां किं वचनं पुनः ।
संवृतिश्चेन्मृषैवैषा परमार्थविपर्ययात् ॥49॥
कारिकार्थ: अन्यवादीनिकैं जो 'सर्वान्ता, कहिये सर्व धर्म हैं ते अवक्तव्य हैं । तिनकैं धर्मके उपदेशरूप तथा अपने तत्वका साधनरूप परके दूषणरूप वचन कहा ( क्या ) हैं ? अपितु किछूभी नाहीं तब मौन ही सिद्ध भया । बहुरि कहै जो संवृति कहिये व्यवहारके प्रवर्तनेकूं उपचाररूप वचन हैं । ताकूं ऐसैं कहिये । कि परमार्थसे विपर्यय हैं उपचार है सो तो मिथ्या है, असत्य है । बहुरि फेर वादि कहै जो कोई मौनी ऐसैं कहै कि ’ मेरे सदा मौन है, वाका ऐसा कहना मौन तैं विरोधी है तो भी अन्यकूं जनावनेकूं कहिये सो उपचार है । तैसैं सर्व धर्म अवक्तव्य हैं तौऊ परके जतावनेकूं उपचाररूप वचनकरि 'अवक्तव्य, ऐसा वचन कहिये है । ता वादीकूं कहिए कि अवक्तव्य कैसैं हैं ? स्वरूपकरि अवक्तव्य है ? कि पररूप करि है ?, कि दोऊरूप करि है । कि तत्वस्वरूप करि है ?, या मृषास्वरूपकरि है ? ऐसैं विचारिये तो कोई भी पक्ष न ठहरै है । जो स्वरूपकरि अवक्तव्य कहै तो अवक्तव्य कैसैं ? जो अपना रूप है सो कहनेमैं आवै है । बहुरि पररूपकरि अवक्तव्य है तो स्वरूपकरि वक्तव्य ही ठहरै । बहुरि दोऊ पक्ष माननेमैं दोऊ दूषण आवें हैं । बहुरि तत्त्वकरि अवक्तव्य कहै तो ब्यवहारकरि वक्तव्य कहना ठहरै । अर मृषापनाकरि अवक्तव्य कहना न कहना तुल्य ही है । ऐसैं बहुत कहने तैं कहा ? सर्वथा अवक्तव्य कहनेमैं तो अवक्तव्य है ऐसा कहना भी न बनै है तब अन्यकूं प्रतीति उपजावनेका अयोग है ।
अशक्यत्वादवाच्यं किमभावात्किमबोधतः ।
आद्यन्तोक्तिद्वयं न स्यात् किं व्याजेनोच्यतांस्फुटम् ॥50॥
कारिकार्थ: अवक्तव्यवादीकूं कहैं हैं जो तू अवक्तव्य कहै है । सो अशक्यत्वात् कहिये तेरे कहनेकी सामर्थ्य नाहीं है तिसपनाकरि कहै है । कि अभाव है तातैं अवक्तव्य कहै है । कि अबोधतः कहिये तेरे तत्वका ज्ञान नाहीं है तातैं अवक्तव्य कहै है । ऐसैं तीन पक्ष पूछे । इन सिवाय अन्य पक्ष कहै तो इनहीमैं अन्तर्भूत होय हैं । तहां आदिका पक्षतो अशक्यपना अर अंतका अबोध, ये दोऊपक्ष तो बनै नाहीं हैं । तातैं क्षणिक मतका आप्त बुद्ध-सुगतकैं सर्वज्ञपना कहैं हैं तथा क्षमा, मैत्री, ध्यान, दान, वीर्य, शील, प्रज्ञा, करुणा, उपाय प्रमोद, स्वरूप दश बल मानैं हैं ता बुद्धकैं अज्ञान, असमर्थता कैसैं बनै ?। वहुरि मध्यम पक्ष 'अभाव, है सो बौद्धमतीकूं कहैं हैं कि अब व्याज कहिये छलकरि कहा ( क्या ) ? प्रगटपनैं तत्त्वका सर्वथा अभाव है ऐसैं स्पष्टकरि कहो किन्तु ऐसैं कहैं ठीकपना न आवै है । मायाचारी करत अनाप्तपनाका प्रसंग आवेगा । ऐसैं सर्वथा अभाव कहतें अवक्तव्य अर शून्य मतमें किछू विशेष है नाहीं । ऐसैं बौद्धमतीकैं शून्यमतका प्रसंग आवै है । बहुरि यदि ऐसा कहैं कि क्षणक्षय तत्वका संकेत किया जाता नाहीं तातैं अवक्तव्य है । ताकूं कहिये है वस्तुका क्षणक्षय मात्र स्वरूप नाहीं सामान्य विशेष स्वरूप तथा नित्य अनित्यरूप जात्यंतर है तातैं कथंचित् संकेत करना संभवै है । प्रत्यक्षगम्य स्वलक्षणविषैं संकेत करना नाहीं है तौऊ विकल्प प्रमाणकरि गम्य है ताविषैं संकेत होय ही है । जो वचनगोचर धर्म है तिनके विषैं संकेत न संभवै ही है ऐसैं सर्वथा अवक्तव्यवादी जो क्षणिकवादी ताकैं सून्यवाद आवै है ।
हिनस्त्यनभिसंधातृ न हिनस्त्यभिसंधिमत् ।
बद्ध्यते तद्व्यापेतं चित्तं बद्धं न मुच्यते ॥51॥
कारिकार्थ: निरन्वयक्षणिक चित् है सो जो चित् प्राणीके धातनेका अभिप्राय करै है कि मैं या प्राणीकूं घातूं ऐसा अभिसंधिवाला चित् तौ नाहीं हनै है - नाहीं घातै है । जातैं जा क्षणमें अभिप्राय किया ताही क्षणमैं वह चित् है पींछें अन्यचित् उत्पन्न हुआ । वहुरि चित प्राणीके घातनेका अभिप्राय न करै सो अनभिसंधान चित् प्राणीकूं हनै है - घातै है । जातैं जानैं अभिप्राय किया था सो विनासि गया पींछें अन्यचित् उपज्या तानैं हन्या । बहुरि जो चित् हिंसनेका अभिप्राय करनेवाला चित्तैं तथा हिंसनेवाले चित्तैं ऐसैं दोऊनतैं अन्य उपज्या ता चितकैं हिंसाका फल बंध था सो भया । बहुरि जिसके बंध भया सो तो नष्ट भया तब अन्यचित् सो बंधतैं छूट्या । ऐसैं हिंसाका अभिप्राय है सो अन्यनैं किया हिंसा अन्यनैं करी, अन्य बँध्या अर अन्य छूट्या ऐसैं कियेका नाश अर विना किये कहनेका प्रसंग आवै है सो हास्यका स्थान है । बहुरि संतान तथा वासना कहै तो परमार्थतैं यह भी क्षणिकवादिकैं नाहीं बनै है बहुरि स्याद्वादीकैं कथंचित् सर्वभाव निर्बाध संभवै है ।
अहेतुकत्वान्नाशस्य हिंसाहेतुर्न हिंसकः ।
चित्तसंततिनाशश्च मोक्षो नाष्टाङ्गहेतुकः ॥52॥
कारिकार्थ: क्षणक्षय एकान्तवादी नाशकूं अहेतुक कहैं हैं । जो वस्तु विनसैं है सो स्वयमेव विना हेतु विनसै है । सो ऐसा कहते हैं तो जो हिंसा करनेवाला हिंसक है सो हिंसाका हेतु न ठहर्या । बहुरि चित्तसंतानका मूलतैं नाश होना सो मोक्ष मानैं है ताकूं आठअंग हेतु तैं भया कहै है सो न ठहरै । मोक्षका अष्टाङ्गहेतु सम्यक्त्व, संज्ञासंज्ञी, वचनकायका व्यापार, अन्तर्व्यायाम, अजीव, स्मृति, ध्यान और समाधि ये हैं । तहां सम्यक्त्व कहिये बुद्ध धर्मका अंगीकार करना, संज्ञासंज्ञी कहिये वस्तुका नाम जानना, वचन कायका व्यापार, अन्तर्व्यायाम कहिये श्वासोश्वास पवनका निरोध करना, अजीव कहिये जीवका अभाव, स्मृति कहिये पिटकत्रय शास्त्रकी चिंता, ध्यान कहिये एकाग्र होना, समाधि कहिये लय होना ऐसें अष्टांगहेतुक मोक्ष कहना न बनैं । ऐसें नाशकूं हेतु विना कहनेमें दूषण है ।
विरूपकार्यारंभाय यदि हेतु समागमः ।
आश्रयिभ्यामनन्योऽसावविशेषादयुक्तवत् ॥53॥
कारिकार्थ: विरूप कार्य कहिये हिंसा अर बंध, मोक्ष; ताके प्रारंभके अर्थ हिंसक अर सम्यक्त्व आदिक अष्टाङ्गहेतुका समागम कहिये व्यापार मानिये हैं ऐसें बौद्ध कहैं ताकूं आचार्य कहैं हैं । कि यह हेतु मान्या सो अपने आश्रयी जे नाश अर उत्पाद तिनतैं अन्य नाहीं है । अनन्य कहिये अभेदरूप है । जो नाशका कारण सो ही उत्पादका कारण है । यामें विशेष नाहीं । ऐसें अयुक्त कहिये भाव, भावी अभेदरूप होंय तिन तैं तिनका कारण भी भिन्न न होय तैसें पहले आकारका विनाश अर उत्तर आकारके उत्पादका कारण एक ही है । तातैं जो उत्पादकूं तौ हेतुतैं मानैं अर नाशकूं अहेतुक मानैं सो कैसें बनैं । जैसे मुद्गर घटके नाशका कारण है सो ही कपालके उत्पादका कारण है । उत्पाद, नाश दोऊ ही हेतु विना नाहीं ।
स्कन्धाः संततयश्चैव संवृतित्वादसंस्कृताः ।
स्थित्युत्पत्तिव्ययास्तेषां न स्युः खरविषाणवत् ॥54॥
कारिकार्थ: स्कंधाः - रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा, संस्कार ये पांच स्कन्ध हैं । तहां स्पर्श, रस, गंध, वर्णके परमाणु तो रूपस्कन्ध हैं । बहुरि सविल्पक, निर्विकल्पक ज्ञान विज्ञान स्कंध हैं । अर वस्तुनिके नाम सो संज्ञास्कन्ध हैं तथा ज्ञान, पुण्य पापकी वासना है सो संस्कार स्कंध है । तिनके संतानकूं संतति कहिये सो यह स्कंधसंतति है ते असंस्कृतहैं अकार्यरूप हैं जातैं इनकैं संवृतिपना है - उपचारकरि बुद्धिकल्पित हैं । बौद्धमती परमाणूंनिकूं सर्वथा भिन्न ही मानै है । सो संतान समुदाय आदिहैं ते कल्पनामात्र हैं तातैं तिन स्कंध संततिनिकैं स्थिति उत्पत्ति, विनाश नाहीं संभवै है । जातैं ये स्कंध संतति विना किये हैं कार्य कारणरूप नाहीं । बुद्धिकल्पितकैं काहेका स्थिति, उत्पत्ति विनाश होय ये गधाकी सींगकी तरह कल्पित हैं । तातैं पहली कारिकामैं जो कह्या था कि विरूप कार्यके लिए हेतुका व्यापार मानिये है सो कहना भी बिगड़ै है । स्कंधसंतान ही झूठे तब कौन रह्या है जाके अर्थ हेतुका व्यापार मानिये । ऐसैं क्षणिक एकांतपक्ष है सो श्रेष्ठ नाहीं है जैसें नित्य एकान्तपक्ष श्रेष्ठ नाहीं तैसैं यह भी परीक्षा किये सबाध है ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥55॥
कारिकार्थ: जे स्याद्वादन्यायके विद्वेषी हैं तिनकैं उभय कहिये नित्यत्व, अनित्यत्व ये दोऊ पक्ष एकस्वरूप नाहीं बनैं हैं जातैं दोऊ पक्षमैं विरोध हैं जैसैं जीना, मरना इनमैं विरोध है । तातैं एकस्वरूप होय नाहीं । बहुरि विरोध दूषणके भयतैं अवाच्यता कहिये अवक्तव्य एकान्त मानै तो यह भी अयुक्त है । जातैं ’ अवाच्य है, ऐसी उक्ति कहिये कहना सो भी न बनैं । ऐसैं कहैं भी अवक्तव्यपनेका एकान्त तो न रह्या ।
नियं तत् प्रत्यभिज्ञानान्नाकस्मात्तदविच्छिदा ।
क्षणिकं कालभेदात्ते बुद्ध्यसंचर दोषतः ॥56॥
कारिकार्थ: हे भगवन् ! ते, कहिये तुम जो हौ अरहंत, स्याद्वादन्यायके नायक तिनकें सर्व जीव आदिक तत्त्व हैं सो स्यात् कहिये कथंचित् नित्य ही हैं जातैं प्रत्यभिज्ञायमान हैं । प्रत्याभिज्ञान प्रमाणतैं पूर्व, उत्तर दशा विषैं 'यह सो ही है जो पूर्वैं देख्या था, ऐसैं एकपना सिद्ध होय है सीहो नित्य है । बहुरि यह प्रत्यभिज्ञान 'अकस्मात्, कहिये निर्विषय नाहीं । जातैं जाका अविछेदकरि अनुभव है ! बहुरि क्षणिकवादी कहैं जो पूर्वोत्तरदशाविषैं सदृशभाव है ताकूं एकत्व मानना भ्रम है । ताके अर्थि कहिये हैं, जो पूर्वोत्तरकालकी दोऊ दशामें अन्य अन्य हैं ऐसा अनुभव काहू प्रमाणतैं सिद्ध होय नाहीं । तातैं एकत्व प्रत्यभिज्ञान ही सत्यार्थ सिद्ध होय है । बहुरि कहैं हैं जो यह प्रत्यभिज्ञान अकस्मात् नाहीं है जातैं बुद्धिके असंचारका दोष आवै है । जो या प्रत्यभिज्ञानका विषय नित्यपना न होय तो अविच्छेदरूप अनुभव न होय तब बुद्धिका संचार कैसें होय ? निरन्वयविनाश होय तब एककूं छोड़ि दूसरे पै बुद्धि कैसैं जाय । जो मैं पहले देख्या था सो ही मैं वर्तमान कालमें ताहीकूं देखूं हूं ऐसैं एक द्रव्य बिना पूर्वोत्तर दशामें बुद्धिका संचार न होय । तातैं प्रत्यभिज्ञान निर्विषय नाहीं है । तातैं ऐसा प्रत्यभिज्ञान वस्तुकूं कथंचित् नित्य साधै है । बहुरि सर्व जीवादिक वस्तु हैं सो कथंचित् क्षणिक हैं जातैं कालका भेद है यहां भी प्रत्यभिज्ञान प्रमाण ही तैं सिद्ध है जातैं क्षणिकविनाभी प्रत्यभिज्ञान होय नाहीं यह क्षणिक भी प्रत्यभिज्ञानहीका विषय है । जातैं पूर्व उत्तर पर्यायस्वरूप कालभेद न मानिये तो बुद्धिके संचारका दोष आवै । कालभेदविना बुद्धिका संचार कैसै कहिए । पूर्वदशाका स्मरण अर वर्तमानदशा का दर्शनरूप बुद्धिका संचारण पूर्वोत्तर पर्यायविषैं होय है । तबही प्रत्यभिज्ञान उपजै है । ऐसैं कथंचित् अनित्यत्व एकवस्तुविषैं सिद्ध होय है । तामैं विरोध आदि दूषण भी नाहीं हैं । दूषण आवै है सो सर्वथा एकान्त पक्षमें ही आवै है ।
न सामान्यात्मनोदेति न व्येति व्यक्तमन्वयात् ॥
व्येत्युदेति विशेषात्ते सहैकत्रोदयादि सत् ॥57॥
कारिकार्थ: वस्तु है सो सामान्यस्वरूपकरि तौ न उदेति कहिये उपजै नाहीं है - उत्पाद न होय । बहुरि ’ न व्येति, कहिये विनशै नाही है जातैं व्यक्त कहिये प्रकट अन्वयस्वरूप है । बहुरि विशेषस्वरूपकरि विनशै भी है, उपजै भी है । बहुरि युगपत् एकवस्तुविषैं देखिये तब उपजै है, विनशै भी है अर स्थिर भी है ऐसें तीन भावनिरूप सत् वस्तु है । तहां सामान्य स्वरूप तौ सर्व अवथामें साधारणस्वभाव है ताकूं अन्वयरूप द्रव्य कहिये है । बहुरि विशेष व्यतिरेकरूप पर्याय है। बहुरि यहां ’ व्यक्त, ऐसा विशेषण है सो प्रकट प्रमाणकरि अबाधित सामान्यविशेषरूप ऐसैं ही सिद्ध होय है, ऐसैं जनावै है। बहुरि युगपत् उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य तीनूं कह्या सो प्रमाणका विषय है सत्का लक्षण ऐसाही सिद्ध होय है ।
कार्योत्पादः क्षयो हेतुर्नियमाल्लक्षणात्पृथक् ।
न तौ जात्याद्यवस्थानादनपेक्षाः खपुष्पवत् ॥58॥
कारिकार्थ: हेतु कहिये उपादान कारण ताका क्षय कहिये विनाश है सो ही कार्यका उत्पाद है । जातैं हेतुके नियमतैं कार्यका उपजना है । जो कार्यतैं सर्वथा अन्य है ताकैं नियम नाहीं है । बहुरि ते उत्पाद, विनाश भिन्नलक्षणतैं न्यारे न्यारे हैं - कथंचित् भेदरूप हैं । बहुरि जाति आदिके अवस्थानतैं भिन्न नाहीं हैं - कथंचित् अभेदरूप हैं । बहुरि परस्पर अपेक्षा रहित होय तो अवस्तु है - आकाशके फूलतुल्य है । यहां, जैसैं कपालका उत्पाद अर घटका विनाशकैं हेतुका नियम है । तातैं हेतुके नियमतैं कार्यका उत्पाद है सो ही पूर्व आकारका विनाश है । अर दोऊ लक्षणभेद है ही । उत्पादका स्वरूप अन्य अर विनाशका स्वरूप अन्य ऐसैं लक्षणभेदतैं भेद है ही । बहुरि सर्वथा भेद ही नाहीं है । जैसैं कपालका उत्पाद अर घटका विनाश ये दोऊ मृतिकास्वरूप ही है तैसैं कथंचित् अभेदरूप भी हैं ऐसैं उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यस्वरूप वस्तु सिद्ध होय है । इन तीनूं भावनिकैं परस्पर अपेक्षा न होय तो तीनूं ही अवस्तु ठहरैं तब वस्तु सिद्ध न होय केवल उत्पाद ही मानिये तो नवीन वस्तु उपज्या ठहरै सो बनै नाहीं । बहुरि केवल विनाश ही मानिये तो तिस हीका फेर उपजना न ठहरै तब शून्यका प्रसंग आवै । बहुरि केवल स्थिति मानिये तो उत्पाद, विनाश हैं ते ही न ठहरैं । ऐसैं प्रत्यक्षविरोध आवै । तातैं कथंचित् त्रयात्मक वस्तु मानना युक्त है ।
घटमौलिसुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।
शोकप्रमोदमाध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥59॥
कारिकार्थ: घट, मौलि, सुवर्ण इनके अर्थी जो पुरुष हैं सो घटकूं तोड़ि मौलि करनेमैं शोक, प्रमोद, माध्यस्थ्यकूं प्राप्त हाय हैं । सो यह सब हेतु सहित है । जो घटका अर्थी है ताकें तो घटका विनाश होनेतैं शोक भया सो शोकका कारण घटका विनाश भया । बहुरि घटकूं तोड़ि मौलि ( मुकुट ) बनानेमें मौलिके अर्थी पुरुषकें हर्ष भया सो वहां हर्षका कारण मौलिका उत्पाद भया । बहुरि जो सुवर्णका अर्थी है ताकें शोक अर हर्ष न भया । मध्यस्थ रह्या । जातैं घट भी सुवर्ण था मौलि भी सुवर्ण ही है ऐसैं माध्यस्थ्यका कारण सुवर्णकी स्थिति भई । ऐसैं लौकिक जनकें उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य स्वरूप वस्तु है सो प्रतीतिभेदतैं सिद्ध है ।
पयोव्रतो न दध्यत्ति न पयोऽत्ति दधिव्रतः ।
अगोरसव्रतो नोभे तस्मात्तत्वं त्रयात्मकम् ॥60॥
कारिकार्थ: जाकें ऐसा ब्रत होय कि मैं आज दुग्ध ही ल्यूंगा सो तो दही नाहीं खाय है । बहुरि जाकें ऐसा ब्रत होय कि मैं आज दही ही खाऊंगा सो वो दूध नाहीं पीवै है । बहुरि जा पुरुषकें गोरस न लेनेका ब्रत है सो दोऊ ही नाहीं ले है । तातैं तत्व है सो त्रयात्मक है ॥
चतुर्थ परिच्छेद (कारिका 61 से 72)
कार्यकारणनानात्वं गुणगुण्यन्यतापि च ।
सामान्यतद्वन्यत्वं चैकान्तेन यदीष्यते ॥61॥
कारिकार्थ: कार्यकें अर कारणकें नानापना, बहुरि गुणकें अर गुणीकें अन्यता कहिये भेदरूप नानापना, बहुरि सामान्यकें अर ‘ तद्वत् ’ कहिये विशेषनिकें अन्यपना है ऐसें जो एकान्तकरि मानिये । ऐसा वैशेषिकमती पूर्वपक्ष करै ताका उत्तर अगली कारिकामें होगा ।
एकस्यानेकवृत्तिर्न भागाभावाद्बहूनि वा ।
भागित्वाद्वाऽस्य नैकत्वं दोषो वृत्तेरनार्हते ॥62॥
कारिकार्थ: कार्यकें अर कारणकें बहुरि गुणकें अर गुणीकें, बहुरि सामान्य अर विशेषकैं जो एकान्तकरि अन्यपना, नानापना या सर्वथा भेद ही मानिये तो एक एक द्रव्य आदि कार्यकी अनेककारणनिविषैं वृत्ति कहिये प्रवृत्तिनाहीं बनैं । जातैं कार्यादिककैं भाग कहिये खंडानिका अभाव है बहुरि जो विनाभागका सर्वस्वरूपकरि वर्तै तो एक कार्यकैं बहुत ठहरैं सो है नाहीं । बहुरि कार्यद्रव्यकूं भागसहित खंडरूप मानिये तो कार्यकैं एकपना न ठहरै । ऐसें अरहंतमततैं अन्य जो अनार्हत, ताके, मतमें वृत्तिका दोष आवै है । अर वृत्ति अवश्य माननी चाहिये, न मानिये कार्य, कारण आदि भावनिका विरोध आवै । तहां यदि एकदेशकरि वृत्ति मानिये तो बनै नाहीं जातैं कार्यद्रव्य अर गुण तथा सामान्य इनकैं अंश मान्या नहीं, निः प्रदेशी मान्या है। बहुरि सर्वस्वरूपकरि मानिये तो जेते कारण होंय तेते कार्यद्रव्य ठहरें । जैसें एक पृथ्वीके अनेक परमाणुरूप कारणनिकरि बनै है सो ऐसें तो जेते परमाणु हैं तेते घट होय सो है नाहीं । बहुरि एक संयोग आदि गुणकैं अनेक संयोग आदि गुण ठहरें सो है नाहीं । बहुरि तैसें ही एक एक सामान्यकैं अनेक सामान्य ठहरें । ऐसें कार्यादिककी कारणादिविषैं वृत्तिका दोष आवे है तातैं सर्वथा अन्यपना कर्ताकरणादिकैं बनैं नाहीं । कथंचित् भेद माननाही निर्बाधसिद्ध होय है ।
देशकालविशेषेऽपि स्याद्वृत्तिर्युतसिद्धवत् ।
समानदेशता न स्यान्मूर्तकारणकार्ययोः ॥63॥
कारिकार्थ: अवयवी जे कार्य द्रव्यादिक तिनकें अवयव जे कारणादिक तिनतैं सर्वथा भेद मानिये तो देश कालका विशेष होतैं भी वृत्ति ठहरै । जैसें दोय द्रव्य जुड़ें युतसिद्धकैं वृत्ति होय तैसें ठहरै । पर्वतकैं अर वृक्षादिककैं भेदरूप वृत्ति है तैसें ठहरै सो एसैं है नाहीं । अवयवी आदिकैं अर अवयव आदिकैं तो कथंचित् भेद है । बहुरि मूर्तिक जे कारण, कार्य तिनकैं समानदेशता कहिये एकदेशपना, मानैं तो ये भी न ठहरै अत्यन्तभिन्न अनेक मूर्तिक पदार्थकैं एकदेशमें रहना कैसें बनैं । ऐसें सर्वथा भेदपक्षमें दूषण आवै है ।
आश्रयाश्रयिभावान्न स्वातंत्र्यं समवायिनाम् ।
इत्ययुक्तः स संबंधो न युक्तः समवायिभिः ॥64॥
कारिकार्थ: वैशेषिक कहै है कि समवायी पदार्थ है तिनकैं आश्रय आश्रयी भाव है यातैं स्वाधीनपना नाहीं है तातैं कार्य कारणादिक कैं देशकालादिकका भेद करि वृत्ति नाहीं है । समवायी पदार्थ तो समवायके आधीन वरतै है । आप ही देश कालके भेद करि वृत्ति कैसें करै ? । ताकूं आचार्य कहैं हैं ।
कि हे वैशेषिक ! समवायी पदार्थनि करि समवाय संबंध भी तो भिन्नही है जुड़या नाहीं है सो युक्त नाहीं होय है । समवाय पदार्थ जुदा था ताकूं जुदे समवायी पदार्थनि तैं कोन नें जोड़्या ( मिलाया )। ऐसें सर्वथा भेद मानें तैं दूषणही आवै है ।
समान्यं समवायश्चाप्येकैकत्र समाप्तितः ।
अंतरेणाश्रयं न स्यान्नाशोत्पादिषु को विधिः ॥65॥
कारिकार्थ: सामान्य अर समवाय ये दोऊ नित्य हैं अर एक एक हैं। ते दोऊ यदि एक एक पदार्थविषैं समस्तपनेकरि वरतैं तदि एक एक नित्यपदार्थविषैं ही समाप्त होंय तब अन्य पदार्थमें कौन जाय अर इन दोऊनकैं अंश, अवयव मान्या नाहीं । तब अनित्य जे उपजने विनशने वाले कार्य आदि पदार्थ हैं ते सामान्य अर समवाय विना ठहरे । तब सामान्य अर समवाय ये दोऊ ही आश्रय विना न होंय तब उपजने, विनशनेवाले पदर्थनिकी कौंन विधि मानिये इनका सत्व अर प्रवर्तना न ठहरै । ऐसें दोष आवै ।
सर्वथानभिसंबन्धः सामान्यसमवाययोः ।
ताभ्यामर्थो न संबंधस्तानि त्रीणि खपुष्पवत् ॥66॥
कारिकार्थ: सामान्यकैं अर समवायकैं वैशेषिकनैं सर्वथा संबंध नाहीं मान्या है। बहुरि तिन दोऊनितें भिन्न पदार्थ द्रव्य गुण, कर्म ये संबंधरूप नाहीं होय है जातैं परस्पर अपेक्षा रहित सर्वथाभेद मान्या है। तातैं ऐसा ठहरै है कि परस्पर अपेक्षा विना सामान्य, समवाय अर अन्य पदार्थ ये तीनूंही आकाशके फूलकी तरह अवस्तु हैं। वैशेषिकनें कल्पनामात्र वचनजाल किया है। ऐसें कार्य कारण, गुण गुणी, सामान्य विशेष इनकैं अन्यपनेका एकान्त भेदएकान्तकी तरह श्रेष्ठ नाहीं ।
अनन्यतैकांतेऽणूनां संघातेऽपि विभागवत् ।
असंहतत्वं स्याद् भूतचतुष्कं भ्रान्तिरेव सा ॥67॥
कारिकार्थ: परमाणूनिकैं अनन्यता कहिये अन्यस्वरूप न होनेका एकान्त, होनेतैं संघात कहिये परस्पर मिल एकान्त होतैं भी. विभाग कहिये पहलें न्यारे न्यारे विभागरूप थे ताकी तरह मिले नाहीं ठहरें, जातैं मिल स्कंध स्वरूप न भये । जो मिलकरि स्कंधरूप भये मानिये तो अनन्यताका एकान्त न ठहरै कथंचित् अन्यस्वरूप भये ठहरै । बहुरि स्कंधरूप न भये ठहरै । बहुरि स्कधरूप न भये तब पृथ्वी, जल, तेज, वायु ऐसा भूतका चतुष्टय देखिये है सो भ्रान्तिरूप ठहरै । जातैं भूतचतुष्क परमाणूनिका कार्य मानिये है सो भ्रम ठहरै ।
कार्यभ्रान्तेरणुभ्रान्तिः कार्यलिङ्गं हि कारणम् ।
उभयाभावतस्तत्स्थं गुणजातीतरच्च न ॥68॥
कारिकार्थ: परमाणूनिके कार्य जो पृथ्वी आदि भूतचतुष्क तिनकूं भ्रमस्वरूप मानें तैं परमाणु भी भ्रमस्वरूप ही ठहरैं हैं । जातैं कारण है सो कार्यलिंगस्वरूप है अर कार्यलिङ्गतैं ही कारणका अनुमान करिये हैं । कार्य भ्रम ठहरै तब ताका कारण भी भ्रमही ठहरै । बहुरि कार्य कारणस्वरूप जो भूतचतुष्क अर परमाणु इन दाऊनके अभावतैं तिनकैं विषैं तिष्ठते गुण, जाति, सत्व, क्रिया, विशेष, समवाय ये भी न ठहरैं । तातैं परमाणूनिकैं कथंचित् स्कंधरूप अन्यस्वरूपता मानना युक्त है। जैसैं बौद्धमतीनिकैं परमाणूनिका अन्यस्वरूप न मानना अयुक्त है । तैसैं वैशेषिकनिका भी मत सिद्ध न होय है ।
एकत्वेन्यतराभावः शेषाभावोऽविनाभुवः ।
द्वित्वसंख्याविरोधश्च संवृतिश्चेन्मृषैव सा ॥69॥
कारिकार्थ: कार्य जो महान् आदि अर कारण जो प्रधान, ताके परस्पर एकस्वरूप तादात्म्य मानते जब तादात्म्य एकस्वरूप भया तब एकका अभाव भया, एक रह्या । बहुरि एक रह्या सो दूसरैं तैं अविनाभावि है तातैं दूसरेका अभाव होतैं शेष एक रह्या था ताका भी अभाव भया ऐसैं दोऊ ही न ठहरैं हैं । बहुरि दोयपनकी संख्या मानिये है ताका विरोध आवे है यह संख्या भी न ठहरै । बहुरि यदि कहै कि द्वित्वकी संख्या तो संवृति है, कल्पना है, उपचार है । तो कल्पना उपचार है सो मृषाही है असत्य ही है ताकी कहा ( क्या ) चर्चा ? । ऐसैं प्रधान, महान्, आदि सांख्यकल्पितकैं अनन्यता का एकान्त माननेतैं दूषण आवै है । तथा पुरुष अर चैतन्य, इनकैं भी अनन्यताका एकान्त माननेतैं दोऊका अभाव अर द्वित्व संख्यका विरोध आवै है । ऐसैं कार्यकारणादिकके अनन्यताका एकान्त नाहीं संभवै है ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकान्तेऽप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥70॥
कारिकार्थ: स्याद्वादन्यायके विद्वेषीनिकैं अन्यता अर अनन्यता दोऊकैं एकस्वरूपपना न संभवै है । अवयव अवयवी, गुण गुणी, सामान्य विशेष आदिकके भेद अर अभेद इन दोऊनका एकस्वरूपपना न बनै है जातैं भेद, अभेदमें परस्पर विरोध है । बहुरि अवाच्यताका एकान्त भी नाहीं बनै जातैं जा एकान्तमें ’ अवाच्य है,’ ऐसी उक्ति भी युक्त न होय है ।
द्रव्यपर्याययोरैक्यं तयोरव्यतिरेकतः ।
परिणामविशेषाच्च शक्तिमच्छक्तिभावतः ॥71॥
कारिकार्थ: द्रव्य अर पर्याय, इनकैं कथंचित् एकपना है जातैं दोऊनकैं अव्यतिरेक है, सर्वथा भिन्नपना नाहीं है । बहुरि तिन द्रव्य पर्यायनिकैं कथंचित् नानापना है जातैं इनकैं परिणामका विशेष है, बहुरि शक्ति अर शक्तिमानपना है, बहुरि संज्ञा का विशेष है, बहुरि संख्याका विशेष है, बहुरि स्वलक्षणका विशेष है, अर प्रयोजनका भेद है । ऐसैं छह हेतुतैं नानापना है । बहुरि आदि शब्दतैं भिन्न प्रतिभास लेना, अर भिन्नकाल लेना । ऐसैं कथंचित् भेदाभेदपना है। सर्वथा नाहीं है।
संज्ञासंख्याविशेषाच्च स्वलक्षणविशेषतः ।
प्रयोजनादिभेदाच्च तन्नानात्वं न सर्वथा ॥72॥
कारिकार्थ: द्रव्य अर पर्याय, इनकैं कथंचित् एकपना है जातैं दोऊनकैं अव्यतिरेक है, सर्वथा भिन्नपना नाहीं है। बहुरि तिन द्रव्य पर्यायनिकैं कथंचित् नानापना है जातैं इनकैं परिणामका विशेष है, बहुरि शक्ति अर शक्तिमानपना है, बहुरि संज्ञा का विशेष है, बहुरि संख्याका विशेष है, बहुरि स्वलक्षणका विशेष है, अर प्रयोजनका भेद है। ऐसैं छह हेतुतैं नानापना है। बहुरि आदि शब्दतैं भिन्न प्रतिभास लेना, अर भिन्नकाल लेना। ऐसैं कथंचित् भेदाभेदपना है। सर्वथा नाहीं है।
पंचम परिच्छेद (कारिका 73 से 75)
यद्यापेक्षिकसिद्धिःस्यान्न द्वयं व्यवतिष्ठते ।
अनापेक्षिकसिद्धौ च न सामान्यविशेषता ॥73॥
कारिकार्थ: जो धर्म्म धर्म्मी आदि कै एकांत करि आपाक्षिक सिद्धि मानिए, तो धर्म्म धर्म्मी दोऊ हीन ठहरै । बहुरि अपेक्षा बिना एकांत करि सिद्धि मानिए तो सामान्य विशेषपणां न ठहरै । तहां बौद्धमती ऐसैं मानैं हैं । प्रत्यक्ष बुद्धि में धर्म्म अथवा धर्म्मी न प्रति भासै है । प्रत्यक्ष देखें पीछें विकल्प बुद्धि होय । तिस तैं धर्म्म धर्म्मी कल्पिये है । ऐसैं कल्पना मात्र है जाकों धर्म्म कल्पिये सो ही धर्म्मी हो जाय धर्म्मी धर्म्म हो जाय । ऐसैं कहूँ ठहरै नाहीं, जैसैं शब्द अपेक्षा सत्त्व आदि कूं धर्म्म कल्पिये सो ही ज्ञेयपणां की अपेक्षा धर्म्मी हो जाय । ऐसैं विशेष्य विशेषण पणा गुण गुणी पणां क्रिया क्रियावान पणां कार्य कारण पणां साध्य साधन पणां ग्राह्य ग्राहक पणां इत्यादि परस्पर अपेक्षा मात्र ही तैं सिद्ध है । ऐसैं बौद्धमती की ज्यौं एकान्त करि मानिए तो दोऊ न ठहरैं, तातैं अपेक्षा मात्र सिद्धि का एकान्त सिद्ध नाहीं, श्रेष्ठ नाहीं ॥ बहुरि धर्म्म धर्म्मी की सर्वथा अपेक्षा बिना ही सिद्धि नैयायिक मानै है । कहै है - धर्म्म धर्म्मी भिन्न ज्ञान के विषय हैं । इनके परस्पर अपेक्षा नाहीं ऐसैं एकान्त करि मानैं है । ताकै भी अन्वय व्यतिरेक न ठहरै जातैं भेद अभेद है । ते परस्पर अपेक्षा बिना सिद्धि न होय । अन्वय तौ सामान्य है अर व्यतिरेक विशेष है, ते परस्पर अपेक्षा स्वरूप हैं । तिन दोऊ के परस्पर अपेक्षा न मानिये तो सामान्य विशेष भाव न ठहरै तातैं अपेक्षा अनपेक्षा ये दोऊ ही एकान्त तैं बनै नाहीं एकान्त तैं वस्तु की व्यवस्था नहीं हैं ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषां ।
अवाच्यतैकांतेप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥74॥
कारिकार्थ: अपेक्षा अनपेक्षा दोऊका एकान्त मानै तौ दोऊ एक स्वरूप होय नाहीं जातैं स्याद्वाद न्यायके विद्वेषीनकैं विरोध नामा दूषण आवै है । जैसे सत् असत् एकान्त में आवै तैसैं तातैं ये भी एकान्त श्रेष्ठ नाहीं है । बहुरि अवाच्यताका एकान्त करै तो अवाच्य हैं । ऐसैं कहना ही न बणैं तातैं अवक्तव्य एकान्त भी श्रेष्ठ नाहीं ।
धर्म्मधर्म्यविनाभावसिध्यत्यन्योन्यवीक्षया,
न स्वरूपं स्वतो ह्येतत् कारकज्ञापकांगवत् ॥75॥
कारिकार्थ: धर्म्म अर धर्म्मी के अविना भाव हैं, सो तौ परस्पर अपेक्षा करि सिद्ध है । धर्म्म बिना धर्म्मी नाहीं । बहुरि धर्म्म, धर्म्मी का स्वरूप है । सो परस्पर अपेक्षा करि सिद्ध नांही है । स्वरूप है सो स्वतः सिद्ध है । आपही पहलैं ही स्वयमेव सिद्ध है जैसे कारक के अंग कर्ता-कर्म्म आदि हैं तथा ज्ञायक के अंग ज्ञेय ज्ञायक है तैसैं कर्त्ता बिना कर्म्म नाहीं अर कर्म्म बिना कर्त्ता नाहीं । ऐसैं अपेक्षा सिद्ध है । बहुरि कर्त्ता का करनेवालापणां स्वरूप है सो पहलैं आपै आप सिद्ध है ही तैसे ही कर्म्म आपै आप सिद्ध है स्वरूप मैं अपेक्षा सिद्ध पणां है नाहीं ऐसैं ही सामन्य विशेष गुण गुणी कार्य कारण प्रमाण प्रमेय इत्यादि जानना । कथंचित् आपेक्षक सिद्ध है कथंचित् अनापेक्षक सिद्ध है कथंचित् दोऊ करि सिद्ध है कथंचित् अवक्तव्य है कथंचित् आपेक्षिक अवक्तव्य है. कथंचित् अनापेक्षिक अवक्तव्य है कथंचित् दोऊ हैं अर अवक्तव्य है । दोऊ के अविनाभाव अर निज स्वरूप हेतु लगावणा । ऐसैं सप्तभंगी प्रक्रिया पूर्वोक्त प्रकार लगावणी ।
षष्ठ परिच्छेद (कारिका 76 से 78)
सिद्धिं चेद्धेतुतःसर्वं न प्रत्यक्षादितो गतिः ।
सिद्धं चेदागमात्सर्वं विरुद्धार्थमतान्यपि ॥76॥
कारिकार्थ: जो अपना वांछित कार्य सर्व एकांत करि हेतु तैं ही सिद्ध होना मानिये तो प्रत्यक्षादिक तैं होय है सो न ठहरै । बहुरि एकान्त करि आगम ही तैं सिद्ध होना मानिये, तौ प्रत्यक्षादि तैं विरुद्ध तथा परस्पर विरुद्ध है पदार्थ जिनकैं ऐसैं आगमोक्त मत ते भी सिद्ध ठहरैं । ऐसैं दोष आवै है यहां ऐसा जानना जो समस्त ही लौकिक जन तथा परीक्षक जन अपने आदरने योग्य उपेय तत्त्व कूँ निश्चय करि अर तिसका उपाय तत्त्व का निश्चय करैं हैं सो यहां मोक्ष के अर्थीन कूं भी मोक्षका स्वरूप का निश्चय करि अर तिसका उपाय का निश्चय करावना, वहां केई अन्यमती अनुमान ही तैं उपेय तत्त्व की सिद्धि मानैं हैं । तिनकैं प्रत्यक्षादिक तैं गति कहिये वस्तु की प्राप्ति तथा ज्ञान न होय, जातैं अनुमान होय है । जो आदि में लिंग का प्रत्यक्ष दर्शन होय तथा दृष्टान्त प्रत्यक्ष होय तब होय है । यातैं प्रत्यक्ष बिना अनुमान की भी सिद्धि नाहीं होय है-तातैं हेतु तैं एकान्त करि सिद्धि मानना श्रेष्ठ नाहीं बहुरि केई मीमांसक आदि आगम हीतैं एकान्त करि सिद्ध होना मानैं हैं । तिनकैं परस्पर विरुद्ध अर्थ जिनमैं पाइए एसैं सर्व ही मत सिद्ध ठहरैं । जातैं आगम की प्रमाणता-युक्ति हेतु आदि करि कियें बिना प्रमाण ठहरै तब सम्यक् मिथ्या का विभाग कैसैं ठहरै तातैं आगम तैं भी सिद्ध होना एकान्त करि मानना श्रेष्ठ नाहीं । अैसैं दोंऊ ही एकान्त बाधा करि सहित हैं । आगें दोऊ तैं सिद्ध मानने का एकान्त विषैं दोष दिखावैं हैं ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकांतेऽप्युक्तिर्नावाच्यमितियुज्यते ॥77॥
कारिकार्थ: स्वाद्वाद न्याय के विद्वेषी एकान्त वादीन कै हेतु अर आगम दोऊ एक स्वरुप मानना मति होहु जातैं दोऊ मैं एकान्त करि माननैं मैं विरोध दूषण आवै है बहुरि अवक्तव्य एकान्त मानैं । अवक्तव्य है ऐसैं कहना न बणैं । कहतै वक्तव्य भी ठहरै, तब एकान्त कहना न बणैं । ऐसैं एकान्त में दूषण है आगैं हेतु का अर अहेतु का अनेकान्त कूँ दिखावैं हैं ।
वक्तर्व्यर्थनाप्तेयद्धेतोः, साध्यं तद्धेतुसाधितं ।
आप्तेवक्तरितद्वाक्यात्साध्यमागमसाधितं ॥78॥
कारिकार्थ: वक्ता अनाप्त होतैं जो हेतुतैं साध्य होय सो तो हेतु साधित है । बहुरि वक्ता आप्त होतैं तिसके बचनतैं साध्य होय सो आगम साधित है । यहां आप्त अनाप्तका स्वरूप पूर्वैं कह्या था जो दोष आवरण रहित सर्वज्ञ वीतराग है सो ऐसा अरहंत भगवान् जातैं ताके बचन युक्ति आगमतैं अविरोधरूप हैं अर ताकें कहे भाषे तत्त्व प्रमाणतैं बाधे न जाय हैं । बहुरि जो दोष सहित है सर्वज्ञ बीतराग नाहीं सो अनाप्त है ताके वचन इष्टतत्व प्रत्यक्ष बाधित हैं तातैं आप्तके तो वचन ही प्रमाण करने अर अनाप्त के बचन परीक्षा करि प्रमाण करनै इत्यादि चर्चा अष्ट सहस्री तैं जानना अैसैं कथंचित् सर्व हेतु तैं सिद्ध है । जातैं जहां आप्त के वचन की अपेक्षा नाहीं बहुरि कथंचित् आगमतैं सिद्ध है जातैं जहां इंद्रिय प्रत्यक्ष अर लिंग की अपेक्षा नाहीं इत्यादि पूर्व प्रकार की जैसें सप्तभंगी प्रक्रिया जोड़णी ।
सप्तम परिच्छेद (कारिका 79 से 87)
अंतरंगार्थतैकांते बुद्धिवाक्यं मृषाखिलं ।
प्रमाणाभासमेवातस्तत्प्रमाणादृते कथं ॥79॥
कारिकार्थ: अंतरंगार्थ कहिये अपने ही संवेदन अनुभव मैं आवै जो ज्ञान ताका एकान्त जो बाह्य पदार्थ नैं मानना, ताकै होतैं बुद्धिवाक्य कहिये हेतुबाद का कारण उपाध्याय शिष्य का वाक्य सो सर्व ही मृषा कहिये असत्य झूठा ठहरै । जातैं वाक्य है सो वाह्य पदार्थ है सो अंतरंग एकान्त मैं काहे का ठहरै । बहुरि जब बुद्धि वाक्य झूठे ठहरैं तब पर कूं प्रतीत उपजावनें कूं प्रमाण वाक्य करना सो भी प्रमाणा भास ही ठहरा बहुरि प्रमाणाभास है सो प्रमाण बिना कैसे होई ? नाहीं होय ।
ऐसैं दूषण आवै । इहां अंतरंगार्थ एकान्त माननेवाला विज्ञानाद्वैतवादी बौद्ध है सो बाह्य पदाथ मानने वालेकूं दूषण दे है सो वचनि करि दे है । अरि वचनिकूं परमार्थ भूत मानैं नाहीं तब झूंठे वचन हैं सो प्रमाण भूत नाहीं प्रमाणाभास हैं । तब दूषण देना सत्यार्थ कैसे होय बहुरि अपना स्वसंवेदनरूप अंतरंग तत्व स्वतै ही सिद्ध न होय है । जातैं स्वसंवेदनकूं अद्वैतता मानै है । तब द्वैत मानै विना साध्य साधनादि भेद नाहीं बणै है भेद मानै तौ अद्वैत एकान्त न ठहरै बहुरि स्वतः सिद्ध ठहरै । तब अन्य बाह्य तत्व मानै है तिनका मानना सत्यार्थ ठहरै तिनकौं निषेधै तौ काहे तैं निषेधै । इत्यादि अंतरंग एकान्त माननै मैं दूषण है ।
साध्यसाधनविज्ञप्तेर्यदि विज्ञप्तिमात्रता ।
न साध्यं न च हेतुश्च, प्रतिज्ञा हेतु दोषतः ॥80॥
कारिकार्थ: विज्ञानाद्वैतवादी ऐसैं कहै जो साध्य साधनका विज्ञप्ति कहिये विज्ञान है ताकै विज्ञप्तिमात्रता कहिये विज्ञान मात्र पणा ही है। तातैं नतौ साध्य ठहरै न हेतु ठहरै जातैं याकै प्रतिज्ञा अर हेतुका दोष आवै है साध्य युक्त पक्षका वचन सो तौ प्रतिज्ञा, अर साधनका वचन सो हेतु, सो ताके कहनैं मैं अपने वचन ही तैं विरोध आवै है। जातैं वह विज्ञानाद्वैततत्वकूं ऐसैं साधै है। नीला पदार्थ अर नीला की बुद्धि इनका साथ ग्रहणका नियम है तातैं अभेद है। जैसै नेत्र विकारीकूं दोय चन्द्रमा दीषें सो परमार्थतैं एक ही है। तैसै नील पदार्थ अर नील बुद्धिकूं दोय मानना भ्रम है। ऐसै अपना तत्वकूं साधै ताकै अपने वचन ही तैं विरोध आवै है। साध्य साधनरूप संवेदन दोय देषि अर एकपणांका एकान्त कहै ताकै विरोध कैसै न आवै है। यहां धर्म्म धर्म्मीका भेद वचन कह्या संवदन दोयका वचन कह्या। बहुरि ज्ञान अर वचन ये दोय कह्या बहुरि हेतु दृष्टान्तका भेदका वचन कह्या तो अभेद कहने मैं विरोध कैसैं न आवै बहुरि वचनतैं विरोधका भय करि अवक्तव्य कहै अवक्तव्यका वचनभी वणैं। बहुरि कहै जो अन्य कोई द्वैत मानै है ताकी मान्य के निषेध कूँ मैं भी भेदका वचन कहूं हौं तौ अद्वैत एकान्त माननेतैं तौ अन्य दूजा ठहरै ही नाहीं। निषेध कौंन कूँ है। इत्यादि दूषण आवै है। तातैं संवेदना द्वैत वादी मिथ्या दृष्टि है। ऐसैं अंतरंगार्थ एकान्त पक्ष मैं बुद्धि वाक्य तथा सम्यक् प्रकार उपाय तत्व नाहीं संभवै है। तातैं श्रेष्ठ नाहीं ।
बहिरंगार्थतैकांते, प्रमाणाभासनिन्हवात् ॥
सर्वेषां कार्य्यसिद्धिः, स्याद्विरुद्धार्थाभिधायिनाम् ॥81॥
कारिकार्थ: बहिरंगार्थ. कहिये बाह्य घट पट आदि पदार्थ तिनका एकान्त कहिये वाह्य पदार्थ ही परमार्थ भूत है । अंतरंगार्थ ज्ञान है सो परमार्थ नाहीं । ऐसा पक्ष होतैं प्रमाणाभास का लोप होय है । ताके लोप तैं सर्व ही परस्पर विरुद्ध पदार्थ का स्वरूप कहने वालेनिकैं कार्यसिद्धि ठहरै है प्रमाण अप्रमाण का विभाग नाहीं ठहरै जातैं प्रमाण अप्रमाण स्वरूप तौ ज्ञान है सो ज्ञान परमार्थ भूत नाहीं । तब अप्रमाण काहे का विरुद्ध स्वरूप कहने वाले भी साँचे ठहरें हैं ऐसैं दोष आवै है ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषाम् ।
अवाच्यतैकांतेप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥82॥
कारिकार्थ: स्वाद्वाद न्याय के विद्वेषीनिकैं उभय कहिये अंतरंग तत्व ज्ञान अर बाह्य तत्व ज्ञेय ये दोऊ एक स्वरूप न होय हैं जातैं इनमें परस्पर विरोधहै । बहुरि विरोधके भयस अवाच्यता कहिये अवक्तव्य पक्ष का एकान्त ग्रहण करै तो अवाच्य है । ऐसा उक्ति कहिये कहना न वणैं ऐसैं दोष है ।
भावप्रमेयापेक्षायां प्रमाणाभासनिह्नवः ।
बहि प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तन्निभं च ते ॥83॥
कारिकार्थ: भावप्रमेय कहिये ज्ञान है ते सर्व ही भेदनि सहित स्वसंवेदन रूप है अपना ज्ञानकाहू क्षयकूं जानूं। ज्ञान मात्र करि तौ अपनें आस्वाद मैं आवै है तिसकी अपेक्षा तौ सर्व ज्ञान स्वसंवेदन प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप है । प्रमाणाभास किछू भी नाहीं है । बहुरि बाह्य प्रमेय की अपेक्षा कहूं प्रमाण है कहूं अप्रमाण है । प्रमाणाभास है तहां विसंवाद होय बाधा आवै तहां तौ प्रमाणाभास है बहुरि जहां निरबाध होय तहां प्रमाण है । जातैं एक ही जीव कैं ज्ञान के आवरण के अभाव सद्भाव के विशेष तैं सत्य असत्य संवेदन परिणाम की सिद्धि है । और ते कहिये तुम्हारे अर्हंत के मत विषैं सिद्धि होय है ।
जीवशब्दः स वाह्यार्थःसंज्ञात्वाद्धेतुशब्दवत् ।
मायादिभ्रान्तिसंज्ञाश्च, मायाद्यैः स्वैः प्रमोक्तिवत् ॥84॥
कारिकार्थ: जीव ऐसा शब्द है सो बाह्य पदार्थ सहित है इस शब्द का अर्थ जीव वस्तु है । जातैं यह शब्द संज्ञाहै. नाम है जे संज्ञा हैं अर नाम हैं ते बाह्य पदार्थ बिना होय नाहीं । जैसे हेतु शब्द है सो बाह्य याका अर्थ है । वादी प्रतिवादी प्रसिद्ध है । बहुरि यहां कोई कहै माया आदि भ्रांति की संज्ञा है । तिनका बाह्य पदार्थ कहा है ताकूं कहिये मायादिक भ्रान्तकी संज्ञा हैं । ते भी अपने स्वरूप रूप जो बाह्य अर्थ तिस सहित ही है । जैसे प्रमा कहिये प्रमाण की उक्ति कहिये संज्ञा है । तिन प्रमाणनिका बाह्यार्थ प्रत्यक्ष परोक्षआदि है । तैसें ही मायादिक भ्रान्ति भी संशयादिक ज्ञानके भेद रूपहै । इनका बाह्यार्थ कैसे नाहीं । बहुरि इहां चारवाकमती कहै ? जो शरीर इन्द्रीयादिका समूह है सो ही जीव शब्दका अर्थ है । इनतैं भिन्न स्वरूप तो जीव वस्तु किछु है नांही ताकूं कहिये है । जो जीव ऐसा अर्थ लोक प्रसिद्ध जीवका ग्रहण है जीव चालै है जीव गया जीव तिष्ठै है ऐसा लोक प्रसिद्ध व्यवहार है सो ऐसा व्यवहार शरीर विषैं नाहीं है । इंद्रियनि विषैं नाहीं है । बहुरि बोलनाआदि शब्दआदि विषैं नाहीं है । जो इनका भोगने वाला आत्मा है ताहीविषैं यह व्यवहार है बहुरि कोऊ चारवाक मती कहै । ऐसा जीव गर्भ तैं लेय मरणपर्यंत है अनादि अनंत नाहीं । ताकूं कहिये जो जन्मतैं पहिलैं अर मरणके पीछे भी जीवका अस्तित्व है । ऐसा जीव पृथ्वी आदिकतैं उपजै नाहीं।इनतैं जीव विलक्षण है । पृथ्वी आदि जड़ है जीव चतन्य है जे चारवाक ऐसैं तैं मानैं ताके भी तत्व की संख्या लक्षणके भेद तैं है सो न बणैं । ऐसैं काय सहित जीवके विषैं जीवका व्यवहार है । बहुरि बौद्धमती क्षणिक चित् संतान विषैं जीवका व्यवहार करै । तौ यहू भी न बणें । यातैं उपयोग स्वरूप कर्त्ता भोक्ता स्वरूप ही जीव शब्दका बाह्यार्थ है । बहुरि कोई कहै । संज्ञा हेतु तैं जीव अर्थ साध्या सो संज्ञा तौ वक्ताका अभिप्राय सारूहै । ताकूं कहिये ऐसैं नाहीं जामें अर्थ क्रिया होय सो संज्ञा का बाह्यार्थ है । कोई कहै खर बिषाण संज्ञाका कहा अर्थ है । ताकूँ कहिये अभावके विशेष की प्राप्ति याका अर्थ है सो यही भी संज्ञा बाह्य अर्थ बिना नाहीं हैं । इत्यादि जानना ।
बुद्धिशब्दार्थसंज्ञास्तास्तिस्रो बुद्ध्यादिवाचकाः ।
तुल्या बुद्ध्यादिबोधाश्च त्रयस्तत्प्रतिबिम्बकाः ॥85॥
कारिकार्थ: बुद्धि शब्द अर्थ ये तीन संज्ञा हैं ते बुद्धि शब्द अर्थ ये तीन संज्ञानितैं भिन्न बाह्यार्थ है तिनका वाचक है । बहुरि बुद्धि शब्द अर्थ इनका बोध भी तीन है ते तिनतैं तुल्य हैं समान हैं । ते तिन तीनानिका प्रतिबिंबक व्यंजक है ।
वक्तृश्रोतृप्रमातृणां बोधवाक्यप्रमाः पृथक्
भ्रांतावेव प्रभाभ्रांतौ बाह्यार्थौ तादृशेतरौ ॥86॥
कारिकार्थ: वक्ता श्रोता और प्रमाता ये इन तीनूंनका बोध वाक्य प्रमाण ये तीनूं ही भिन्न भिन्न हैं । यहां कहैं ये तीनूं ही भ्रान्ति हैं भ्रम रूप हैं तौ भ्रान्ति स्वरूप होते प्रमाण होना भी भ्रांति ही ठहरै। फेर कहै प्रमाण भी भ्रान्ति ही होहु तौ प्रमाण भ्रान्ति स्वरूप होतैं प्रमाण अप्रमाण स्वरूप बाह्य पदार्थ प्रमेय हैं ते भी भ्रान्ति स्वरूप ठहरैं हैं । ऐसैं होते अंगरंग ज्ञानका अर बाह्य पदार्थका सर्व ही का लोप होय । तब संवेदनाद्वैतवादी की भी सिद्धि नाहीं होय है । इहां ऐसा जानना जो वक्ताकै अर्थका ज्ञान बिना तौ वाक्य कैसे प्रवर्तै बहुरि वक्ताका वाक्य नैं (न) प्रवर्तै तब श्रोता कैं अर्थका ज्ञान कैसे होय । बहुरि प्रमाता, यथा अयथा, पदार्थका निर्णय करने वाला ताके पदार्थकी प्रमाणता नैं होय तौ शब्द अर अर्थ जे प्रमेय तिनका यथार्थपणा कैसे होय । तातैं वक्ता श्रोता प्रमाताका ज्ञान वाक्य प्रमाणता न्यारे न्यारे माननैं जो संवेदनाद्वैतवादी न मानैं तौ ताका संवेदना द्वैत भी सिद्ध न होय है ।
बुद्धिशब्दप्रमाणत्वं, बाह्यार्थे सति नासति ।
सत्यानृतव्यवस्थैवं, युज्यतेर्थाऽप्त्यनाप्तिषु ॥87॥
कारिकार्थ: बाह्य पदार्थके होतैं तौ बुद्धिके अर शब्दके प्रमाणपणा है । अर बाह्य पदार्थके न होतैं बुद्धिके अर शब्दकै प्रमाणपणा नाहीं है । जातैं अर्थ की प्राप्ति अर अप्राप्ति विषैं ऐसै ही सत्य की अर असत्य की व्यवस्था युक्ति होय है । बाह्य पदार्थ विना बुद्धिकैं अर शब्दक प्रमाणता नैं होय है । इहां ऐसा जानना - जो बुद्धि तौ ज्ञान है सो तौ अपने ही वस्तुके प्रातिके अर्थ है बहुरि शब्द है सो परके प्रतिपादनके अर्थ है । वचन बिना परका ज्ञान परके प्रत्यक्ष ग्रहण मैं नाहीं आवै है ॥ बहुरि स्वपक्षका साधना पर का पक्ष का दूषणां ऐसै ही होय है तातैं जो प्रमाणकूं निर्बाध मान अपनी पक्ष साध्या चाहै ताकूं बाह्य पदार्थ भी मानना वा बाह्य पदार्थ बिना प्रमाण प्रमाणाभास न ठहरै है । ऐसै बाह्य पदार्थ सिद्धि होतैं वक्ता श्रोता प्रमाता ये तीनूं सिद्ध होय हैं । बहुरि तिनके ज्ञान बचन प्रमाण ये तिनूं सिद्ध होय हैं ऐसे जीव शब्द कैं संज्ञापणा हेतु तैं बाह्यार्थ सहितपणां सिद्धि होय है । बहुरि याही तैं जीव की सिद्धि होय है याही तैं जीव पदार्थ कूं जाणि अर प्रवर्त्तनेके निर्बाध सबाध की सिद्धि है । ऐसे भाव प्रमेयकी अपेक्षा तौ कथंचित् सर्व ज्ञान अभ्रान्त सिद्ध होय । बहुरि बाह्य प्रमेय की अपेक्षा कथंचित् बाह्य पदार्थ विषैं विसंवाद तैं भ्रांति सिद्धि होय है अविसंवादतै अभ्रान्ति सिद्ध होय है। ऐसै भी कथंचित् उभय, कथंचित्अवक्तव्य, कथंचित् अभ्रांति वक्तव्य, कथंचित् भ्रान्ति अवक्तव्य, कथंचित् उभया वक्तव्य, ऐसैं पूर्ववत् सप्तभंगी प्रक्रिया जोड़नी । ऐसैं अंतरंग बाह्य तत्वका निर्णय किया कूं ज्ञायक उपाय तत्व कहिये ।
अष्टम परिच्छेद (कारिका 88 से 91)
दैवादेवार्थसिद्धिश्चेद्दैवं पौरुषतः कथं ।
दैवतश्चेदनिर्मोक्षः पौरुषं निष्फलं भवेत् ॥88॥
कारिकार्थ: जो दैव हीतैं एकान्तकरि सर्व प्रयोजन भूत कार्य सिद्धि है ऐसै मानिए तौ तहां पूछिए है । जो पुण्य पाप कर्म्म सो पुरुष के शुभ अशुभ आचरण स्वरूप व्यापार तैं कैसें उपजै है । इहां कहै अन्य दैव जो पूर्वैं था तातैं उपजै है, पौरुषतैं नाहीं ताकूं कहिए । ऐसैं तो मोक्ष होनेका अभाव ठहरै है । पूर्वैं पूर्व दैवतैं उत्तरोत्तर दैव उपजवो करै तब मोक्ष कैसे होय पौरुष करना निष्फल ठहरै । तातैं दैव एकान्त श्रेष्ठ नाहीं । इस ही कथन करि केई ऐसें ऐकान्त करै जो धर्मका अभ्युदयतैं मोक्ष होय है । ताकाभी निषेध जानना । बहुरि यहां कोई कहै जो आप पौरुष रूप न प्रवर्तैं कार्य्यका उद्यम न करै ताकैं तौ सर्व इष्टानिष्ट कार्य्य अदृष्ट जो दैव तिसमात्र तैं होय है । बहुरि जो पौरुष रूप उद्यमकरै है ताकै पौरुषमात्र तैं होय है । तहां उत्तर जो ऐसैं कहनेवाला भी परीक्षावान नाहीं जातैं साथि उद्यम करने वालेनिकैं भी कोई कैं तो कार्य निर्विघ्न सिद्ध होय कोईकैंकार्य्य तो नैं होय अर उलटा अनर्थ की प्राप्ति होय ऐसैं देखिए है । तातैं ऐसैं है योग्यता अथवा पूर्व कर्मसो तौ दैव है । सो ये दोऊ तौ अदृष्ट हैं । बहुरि इसभवमें जो पुरुष चेष्टाकरि उद्यम करै सो पौरुष है सो यहु दृष्ट है तिन दोऊनि तैं अर्थ की सिद्धि है । पोरुष वालेकैं तो नाहीं होता देखिये है । अर दैव मात्रतैं माननें विषैं वांछा करना अनर्थक ठहरै है । मोक्षभी होय है सो परम पुण्यका उदय अर चरित्रका विशेष आचरण रूप पौरुषतैं होय है । तातैं दैवका एकान्त श्रेष्ठ नाहीं ।
पौरुषादेवसिद्धिश्चेत्पौरुषं दैवतः कथं ।
पौरुषाच्चेदमोघं स्यात्सर्वप्राणिषु पौरुषं ॥89॥
कारिकार्थ: जो पौरुष ही तैं अर्थकी सिद्धि है, ऐसा एकान्त पक्ष मानै ताकूं पूछिए, जो पौरुष दैव तैं कैसें होय है, तातैं जो कार्यकी सिद्धि है सो दैव की निपजाई है सो पौरुष करावै ह । जातैं ऐसा प्रसिद्ध वचन है, जो जैसी भवितव्यता होणी होय तैसी बुद्धि उएजै है । तहां पौरुष वादी फेर कहै, जो पौरुष ही तैं पौरुष होय है तौ ताकूं कहिए ऐसें तौ पौरुष सर्व प्राणी करै है । तिनका सर्व ही का फल भया चाहिये सो है नहीं । कोई कै सफल होय है कोई कै निफल होय है। इहां कहै जो जाके सम्यक् ज्ञानपूर्वक, पौरुष होय है ताकै तौ सफल होय है बहुरि मिथ्या ज्ञान पूर्वक होय ताकै निफल होय है ताकूं कहिए जो सम्पूर्ण सम्यक् ज्ञान तौ सर्वज्ञ कैं है । बहुरि छद्मस्थ कै तौ आपके ज्ञान मै आई जे सत्यार्थ सामग्री तिनतैं भी पौरुष तैं कार्य नैं होता देखिए है । तातैं पौरुषका एकांत पक्ष भी श्रेष्ठ नाहीं ।
विरोधान्नोभयकात्म्यं, स्याद्वादन्यायविद्विषां,
अवाच्यतैकांतेप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥90॥
कारिकार्थ: स्याद्वादन्याय के विद्वेषीनिकैं दैव पौरुष दोऊ पक्ष एक स्वरूप संभवै नाहीं । जातें दोऊ पक्ष मैं परस्पर विरोध है । बहुरि दोऊका अवक्तव्य एकान्त पक्षभी नाही बणैं जातैं अवाच्य है । ऐसाभी कहना वक्तव्य पक्ष है सो न वणैं । तातैं स्याद्वादन्याय ही श्रेष्ठ है ।
अबुद्धिपूर्वापेक्षायामिष्टानिष्टं स्वदैवतः ।
बुद्धि पूर्वविपेक्षायामिष्टानिष्टं स्वपौरुषात् ॥91॥
कारिकार्थ: जो पुरुषकी बुद्धिपूर्वक नैं होय तिस अपेक्षा विषैं तौ इष्ट अनिष्ट कार्य्य है सो अपने दैव ही तैं भया कहिये तहां पारुष प्रधान नाहीं दैव का ही प्रधानपणा है । बहुरि जो पुरुष की बुद्धि पूर्वक होय तिस अपेक्षा विषैं पौरुष तैं भया इष्टानिष्ट कार्य्य कहिये । तहां दैव का गौण भाव है पौरुष ही प्रधान है । ऐसै परस्पर अपेक्षा जाननी । ऐसै कथंचित् सर्व दैवकृत है । अबुद्धि पूर्वक पणातैं बहुरि कथंचित् बुद्धिपूर्वकपणातैं सर्व पौरुष कृत ही है । कथंचित् उभय, कथंचित् अवक्तव्य, कथंचित् दैवकृत अवक्तव्य, कथंचित् पौरुष कृत अवक्तव्य कथंचित् उभयकृत अवक्तव्य, ऐसें सप्तभंगी प्रक्रिया पूर्ववत् जोड़नी ।
नवम परिच्छेद (कारिका 92 से 95)
पापं ध्रवं परे दुखात् पुण्यं च सुखतो यदि ।
अचेतना कषायौ च वध्येयातां निमित्ततः ॥92॥
कारिकार्थ: पर विषैं दुःख करनैतैं तौ ध्रुवं कहिये एकांत करि पाप बंध होय है। बहुरि पर विषैं सुख करनैतैं एकान्त करि पुण्य बंध होय है । जो ऐसा एकान्त पक्ष मानिये तौ अचेतन जे तृण कंटकादिक दुःख करनेवाले बहुरि दूध आदि सुख करने वाले अर अकषाय जो कोप रहित वीतराग मुनि आदि ते भी पुण्य पाप करि बंधै जातैं पर विषैं सुख दुःख उपजना निमित्तका सद्भाव पाइए है । इहां कहै जो चेतन ही बंध योग्य है तौ वीतराग मुनि चेतन हैं ते भी बंधैं। फेर यहां कहै वीतराग मुनिनके सुख दुःख उपजावनेका अभिप्राय नाहीं । तातैं ते न बंधै तौ ऐसैं कहैं पर विषैं सुख दुःख उपजावने मैं बंध होय ही है ऐसा एकान्त नैं रह्या । इस हेतु तैं नाहीं भी बंधै है ऐसा आया ।
पुण्यं ध्रुवं स्वतो दुःखात्पापं च सुखतो यदि ।
वीतरागो मुनिर्विद्वांस्ताभ्यां युञ्ज्यान्निमित्ततः ॥93॥
कारिकार्थ: आपके दुःख उपजानैं तैं तौ पुण्य बंध होय है अर आप के सुख उपजानैं तैं पाप बंध होय है । ऐसा ध्रुवं कहिये एकान्त करि मानिये तौ कषाय रहित अभिप्राय रहित मुनि तथा विद्वान् कहिये ज्ञानी पंडित ये भी पुण्य पाप दोऊनि करि युक्ति होय बंधै जातैं इनकौं निमित्तका सद्भाव है । वीतराग मुनि कैं तौ कायक्लेश आदि दुःखकी उत्पत्ति पाईए है, बहुरि ज्ञानी पंडित कैं तत्त्व ज्ञान संतोष रूप सुख की उत्पत्ति पाइए है यह निमित्त है । बहुरि कहैं तिनकैं सुख दुःख उपजावनेका अभिप्राय नाहीं है तातैं तिनके बंध नाहीं तौ ऐसैं अनेकान्त सिद्धभया इस हेतुतैं बंध नाहीं भी ठहर्या । बहुरि अकषाई भी बंधै तौ बंध तैं छूटना नाहीं ठहरै । ऐसैं दोऊ ही एकान्त श्रेष्ठ नाहीं, प्रत्यक्ष अनुमान तैं विरोध है ।
विरोधान्नोभयैकात्म्यं स्याद्वादन्यायविद्विषां ।
अवाच्यतैकांतेप्युक्तिर्नावाच्यमिति युज्यते ॥94॥
कारिकार्थ: दोऊ एकान्तकूं एक स्वरूप करि एकान्त मानैं तौ दोऊ एक स्वरूप होय नाहीं, जातैं दोऊ पक्षनिमैं स्याद्वादन्यायके विद्वेषीनकैं विरोध है तातैं कथंचित् मानना युक्त है । बहुरि अवक्तव्य एकान्त पक्ष मानैं तौ अवक्तव्य है । ऐसे कहना भी न बनैं तातैं स्याद्वाद ही युक्त है ।
विशुद्धिसंक्लेशाङ्गंचेत्, स्वपरस्थं सुखासुखम् ।
पुण्यपापाश्रवौ युक्तौ नचेद्व्यर्थस्तवार्हतः ॥95॥
कारिकार्थ: आप विषैं अर पर विषैं तथा दोऊ विषैं तिष्टै उपजावै उपजै जो सुख दुःख सो जो विशुद्धि और संक्लेशका अंग होय तौ पुण्य अर पापका आस्रव युक्त होय । बहुरि जो हे भगवन्? विशुद्धि संक्लेशका अंग नैं होय तौ तुम जो अरहंत तिनके मतमें व्यर्थ कह्या है । तिनतैं बंध नाहीं होय है, तहां विशुद्धतौ मंद कषाय रूप परिणामकूं कहिये है । बहुरि संक्लेश तीव्र कषाय रूप परिणामकूं कहिये है । तहां विशुद्धिका कारण विशुद्धिका कार्य्य विशुद्धिका स्वभाव ये तौ विशुद्धिके अंग हैं । बहुरि संक्लेशके कारण संक्लेशके कार्य्य मैं संक्लेशका स्वभाव ये संक्लेशके अंगहैं । बहुरि विशुद्धिके अंगतै तौ पुण्यका आस्रव होय है । बहुरि संक्लेशके अंगतैं पापका आस्रव होयहै । तहां आर्त ध्यान रौद्र ध्यान परिणाम तौ संक्लेश स्वभावहै । वहुरि आर्त्त रौद्र ध्यानका अभाव आत्माका आप विषैं तिष्ठना सो विशुद्धि स्वभावहै बहुरि आर्त्त रौद्र ध्यानके कार्य्य हिंसादिक क्रियाहैं. तेभी संक्लेशका अंग है । बहुरि मिथ्या दर्शन, अविरत, प्रमाद, कषाय, योग ये आर्त्त रौद्र ध्यानके कारण हैं तेभी संक्लेशके अंग हैं । बहुरि आर्त्त रौद्र ध्यानका अभाव सो विशुद्धिका कारण है । बहुरि सम्यग्दर्शनादिक विशुद्धिके कार्य्य हैं, बहुरि धर्म्म शुक्ल ध्यानके परिणाम हैं । ते विशुद्धिके स्वभाव हैं तिस विशुद्धिके होते ही आत्मा आप विषैं तिष्टै है । तातैं यह अनेकांत सिद्ध भया । जो स्वपरस्थ सुख दुःख हैं ते कथंचित् पुण्यआस्रवके कारण हैं । जातैं विशुद्धिके अंग हैं बहुरि कथंचित् पापआस्रवके कारण हैं जातैं संक्लेशके अंग हैं । ऐसें ही कथंचित् उभय है, कथंचित अवक्तव्य है, कथंचित् पुण्यहेतु अवक्तव्य है, कथंचित् पापहेतु अवक्तव्य है, कथंचित् उभय अवक्तव्य है, ऐसें सप्तभंगी प्रक्रिया पूर्ववत् जोड़नी ।