चार अभाव: ग्रन्थों से सामग्री–
- लक्षण: लघु जैन सिद्धान्त प्रवेशिका (पं. गोपालदास बरैया)
अभाव किसको कहते हैं?
एक पदार्थ की दूसरे पदार्थ में गैर मौजूदगी को अभाव कहते हैं।
अभाव के कितने भेद हैं?
चार हैं: प्राग् भाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव।
प्राग् भाव: वर्तमान पर्याय का पूर्व पर्याय में जो अभाव, उसको प्राग्भाव कहते हैं।
उदाहरण: मिट्टी के पिण्ड में घड़े का अभाव।
प्रध्वंसाभाव: आगामी पर्याय में वर्तमान पर्याय के अभाव को प्रध्वंसाभाव कहते हैं।
उदाहरण: फूटे घड़े के ठीकरों में घड़े का अभाव।
अन्योन्याभाव: पुद्गल द्रव्य की एक वर्तमान पर्याय में दूसरे पुद्गल की वर्तमान पर्याय के अभाव को अन्योन्याभाव कहते हैं।
उदाहरण: कुर्सी में मेज़ का अभाव।
अत्यन्ताभाव: एक द्रव्य में दूसरे द्रव्य के अभाव को अत्यन्ताभाव कहते हैं।
उदाहरण: जीव में पुद्गल का अभाव, तीनों काल में।
(पूरी पुस्तक: लघु जैन सिद्धान्त प्रवेशिका (पं. गोपालदास बरैया) | Laghu Jain Siddhant Praveshika (Pt. Gopaldas Baraiya))
- प्रमाण: आप्तमीमांसा (आचार्य समन्तभद्र देव)
भावैकान्ते पदार्थानामभावानामपह्नवात् ।
सर्वात्मकमनाद्यन्तमस्वरूपमतावकम् ॥9॥
अर्थ: पदार्थों को केवल भावरूप मानकर अभावों का लोप करें, तो सब कुछ सर्वात्मक (एकमेक), अनादि अनन्त और स्वरूपरहित ठहरेगा; यह जिनमत नहीं।
कार्यद्रव्यमनादि स्यात् प्रागभावस्य निन्हवे ।
प्रध्वंसस्य च धर्मस्य प्रच्यवेऽनन्ततां व्रजेत् ॥10॥
अर्थ: प्राग्भाव न मानें तो घट आदि कार्य अनादि हो जाएँगे; प्रध्वंसाभाव न मानें तो कार्य अनन्त (अविनाशी) हो जाएँगे।
सर्वात्मकं तदेकं स्यादन्यापोहव्यतिक्रमे ।
अन्यत्र समवाये न व्यपदिश्येत सर्वथा ॥11॥
अर्थ: अन्यापोह (इतरेतराभाव, अर्थात् अन्योन्याभाव) न मानें तो सब तत्त्व एक सर्वात्मक हो जाएँगे; अत्यन्ताभाव न मानें तो एक द्रव्य दूसरे में मिल जाएगा और किसी का अलग नाम ही न रहेगा।
(कारिका एवं अर्थ: आप्तमीमांसा कारिका एवं अर्थ (आचार्य समन्तभद्र) | Aptamimansa Karika Evam Arth (Acharya Samantabhadra); विस्तार अष्टसहस्री टीका में)