अनुक्रमणिका · Index — दसलक्षण पर्व सामग्री
विधान · साहित्य · पूजन · पाठ · लेख · भजन (PDF/लिंक) — इसी पोस्ट में नीचे
और साहित्य व ग्रंथ (PDF)
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• दश लक्षण पूजन का भावार्थ → पोस्ट 33
Vidhaan:
दसलक्षण मण्डल विधान - पं. टेक चंद जी
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दसलक्षण मण्डल विधान - पं. राजमल जी पवैय्या
http://ptst.in/snatak/admin/download/files_suchipatra/352.%20Dash%20Lakshan%20Vidhan_%20Rajmal%20Ji%20Pavaiya.pdf (size - 0.5 mb)
दसलक्षण विधान - पं. राजमल जी पवैय्या
http://ptst.in/snatak/admin/download/files_suchipatra/Dash%20Lakshan%20Vidhan_%20Rajmal%20Ji%20Pavaiya.pdf (size -18 mb)
Literature:
धर्म के दस लक्षण - रत्नकरण्ड श्रावकाचार- पं. सदासुखदास जी
Daslakshan parv.pdf (size- 338.4 KB)
धर्म के दस लक्षण - डॉ० हुकमचंद जी भारिल्ल
http://ptst.in/snatak/admin/download/files_suchipatra/Dharma%20Ke%20Daslakshan.pdf (size- 48 mb)
Daslakshan comics (size- 2.5 mb)
Pujan:
दस लक्षण पूजन - पं. द्यानतराय जी
श्री दशलक्षण धर्म पूजन
(पं. द्यानतराय जी कृत)
(अडिल्ल छन्द)
उत्तमछिमा मारदव आरजव भाव हैं,
सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं ।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दश सार हैं,
चहुँगति दु:ख तें काढ़ि मुकति करतार हैं ॥
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि-दशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि-दशलक्षणधर्म!अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादि-दशलक्षणधर्म! अत्र मम सत्रिहितो भव भव वषट्! (सत्रिधिकरणम्)
(सोरठा छन्द)
हेमाचल की धार, मुनि-चित सम शीतल सुरभि ।
भव-आ…
दसलक्षण पूजन छंद अर्थ
उत्तम क्षमा धर्म
(सोरठा)
पीढें दुष्ट अनेक, बाँध-मार बहुविधि करे।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजे पीतमा।।
(चौपाई)
उत्तम क्षमा गहो रे भाई, यह भव जस-पर भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहे अयानो।।
(गीतिका)
कहि है अयानो वस्तु छीने, बाँध मार बहुविधि करे।
घर तें निकारे तन विदारे, बैर जो न तहँ धरे।।
जे करम पूरब किये खोटे, सहे क्यों नहीं जीयरा।
अति क्रोध अग्नि बुझाय प्राणी, साम्य-जल ले सीयरा।।
अर्थ:
आदरणीय कविवर पंडित द्यानतराय जी कहते हैं, “दुष्ट-चित्त (मन) के धारकों द्वारा अनेक…
दस लक्षण पूजन - ब्र० रवींद्र जी आत्मन्
श्री दशलक्षण धर्म पूजन
(गीतिका)
उत्तम क्षमादिक धर्म आतम का सहज निजभाव है।
सुख शान्ति का है हेतु जग में, मुक्ति का सु-उपाव है।
है मूल सम्यग्दर्श, निज में लीनतामय ये धरम।
पूजूँ सु-भाऊँ भावना, हों पूर्ण दशलक्षण धरम।।
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इत्याह्वाननम्।
ॐ ह्रीं श्रीउत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः इति स्थापनम।
ॐ ह्रीं श्री उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्म! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
छन्द-रेखता
सहज प्रासुक सु निर्मल जल, करो…
Path:
दसलक्षण धर्म का मर्म - ब्र. रवींद्र जी आत्मन्
(सोरठा)
क्षमा भाव अविकार, स्वाश्रय से प्रकटे सुखद।
आनन्द अपरम्पार, शत्रु न दीखे जगत में ।।१।।
मार्दव भाव सुधार, निज रस ज्ञानानंद मय।
वेदूँ निज अविकार, नहीं मान नहीं दीनता ।।२।।
सरल स्वभावी होय, अविनाशी वैभव लहूँ।
वांछा रहे न कोय, माया शल्य विनष्ट हो ॥३॥
परम पवित्र स्वभाव, अविरल वर्ते ध्यान में।
नाशे सर्व विभाव, सहजहि उत्तम शौच हो ।।४।।
सत्स्वरूप शुद्धात्म, जानूँ, मानूँ, आचरूँ।
प्रकटे पद परमात्म, सत्य धर्म सुखकार हो ॥५॥
संयम हो सुखकार, अहो अतीन्द्रिय ज्ञानमय ।
उपजे नहीं विकार, परम अहि…
धर्म के दशलक्षण
कविवर मंगतराय जी कृत
अब छोड़ अनादि भूल, विषय सुख तूल, जगत दुःखमूल,
कर्म भ्रमभारी, दशलक्षण धर्म विचार जीव संसारी ।।
उत्तम क्षमा
तन क्रोध घटा घनघोर, उठी चहुँ ओर, शक्ति का मोर,
जो शोर मचावे, तब हिंसा अंकुर भावभूमि जम जावे ।
नहीं गिने सबल-बलहीन, अनाथ अरु दीन, करे नित क्षीण,
रात अरु दिन में, सब भूल जाए उपकार हाय इक छिन में ।।
द्वीपायन क्रोध उपाया, द्वारावती नगर जलाया
मन समता भाव न आया, हो मुनि नरक पद पाया।।
तप ऋद्धि सिद्धि भरपूर, क्रोध कर दूर, भाव मुनि सूर,
वे शुधउपयोगी, सब…
धर्म शतक
मङ्गलाचरण
[ गीता छंद ]
अरहंत सिद्धाचार्य श्री, उवझाय साधु प्रणाम करि ।
जिनवृष जिनालय जैनबिम्ब सरस्वती को हृदय धरि ।।
ये ही परम मंगल जगोत्तम, यही शरण सहाय हैं ।
येही भवोदधि तरण तारण, भव्य जन सुखदाय हैं ॥ १ ॥
दोहा
वृषभादिक चौबीस जिन, अघहर मंगल कार |
मन वच काय संभारिकै, प्रणमूँ बारम्बार ॥ २ ॥
लघुता (सवैय्या ३१)
जैसे कोई आँधो नर तालियाँ बजाय करि,
चाहत है चंचल बटेर को पकरना ।
गूंगा नर भरे स्वर पंगु नर चढ़ै, गिरि,
बिना करवाला चाहै सागर को तरना ॥
जैसे शशि प्रतिबिम्ब लखिकै गगन मा…
(दोहा)
क्षमा मार्दव आर्जव, सत्य शौच तप त्याग ।
आकिंचन ब्रह्मचर्य दश, वृष पालें बड़भाग ॥
(उत्तम क्षमा)
क्षमा और शांति में सुखी रहै सदैव जीव,
क्रोध में न एक पल रहै सुख चैन से।
आवत ही क्रोध अङ्ग अङ्ग से पसेव गिरै,
होठ डसै, दाँत घिसै, आग झरै नैन से ||
औरन को मारै, आपनो शरीर कूट डारै,
नाक भौं चढ़ाय कुराफात बकै बैन से ।
ज्ञान-ध्यान भूल जात, आपा-पर करै घात,
ऐसे रिपु क्रोध को भगावो क्षमा सैन से ॥
(क्रोध का फल)
क्रोध कर मरै और मारै ताहि फाँसी होय,
किंचित् हू मारे बोहू जाय जेलखाने में ।
जो क…
धर्म के दशलक्षण
सम्यक् दर्शन ज्ञान सहित हैं, यही धर्म के लक्षण।
क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम।।१।।
तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य सुखकार है।
इनको धारो जीवन में, होगा बेड़ा पार है।।२।।
रचयिता-: बा. ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
Source: बाल काव्य तरंगिणी
दस लक्षण धर्म का स्वरूप (संभव जी शास्त्री - मौलिक रचना )
दशलक्षण धर्म का स्वरूप
छन्द:- (सवैया इकतीसा)
इष्ट है न कोई न अनिष्ट इस जग में
ऐसा माने जो भी उसके क्षमा धर्म होता है।
कोई नहीं बड़ा कोई छोटा नहीं जग में
ऐसा मानने पर उत्तम मार्दव धर्म होता है।
छल नहीं करना है इस जीवन में कभी
सरल भाव रखना ही आर्जव धर्म होता है।
परवस्तु अपवित्र लोभ नहीं करना कभी
आत्मा की शुचिता ही शौच धर्म होता है। 11।
झूठ कभी नहीं बोलू सत्य वचन ही बोलूं तो,
सत् रूपी आत्मा ही सत्य धर्म होता है।
वश करो पंचेन्द्रिय अहिंसा का पालन करो,
आत्म संयम ही उत्तम संयम होता है।
प…
Articles:
पर्युषण या दशलक्षण | Paryushan ya Daslakshan
दसलक्षण पर्व तिथि
पर्युषण पर्व इस माह कि इस तिथि को आने का क्या कारण है?
क्षमापना
रचयिता- श्री मद् राजचन्द जी
हे भगवान! मैंने बड़ी भूल की, जो कि आपके अमूल्य वचनों को लक्ष्य में नहीं लिया। मैंने आपके कहे हुए अमूल्य वचनों का विचार भी नहीं किया। मैंने आपके बताये हुए उत्तम-शील स्वभाव का सेवन नहीं किया। मैंने आपके कहे हुए दया, शांति, क्षमा व पवित्रता को पहिचाना ही नहीं।
हे भगवान! मैं भूल गया, मैंने मेरी भूल से ही भ्रमण किया,
रुला और अनन्त संसार की विडम्बना में पड़ा हूँ। कर्म-कलंक का संग करने से भावकर्म से मलिन हूँ। हे विरागी भगवान ! आपके बतलाये हुए तत्त्व का ग्रहण किय…
Bhajan:
दशलक्षण के दश धर्मों का, उत्सव आया प्यारा।
धर्म ध्यान और पूजन पाठ से, ज्यों दिश हो उजियारा॥
बोलो पर्युषण की जय, बोलो दशधर्मों की जय- २॥
उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच और संयम।
जो नर इन धर्मों को पाले, धन्य- धन्य हो जीवन।
इन दशधर्मों में है समाया, समयसार यह सारा॥
धर्मध्यान… ॥१॥
तप और त्याग तो आभूषण है, इस मानव जीवन के।
आकिंचन और ब्रह्मचर्य है पूज्य है योगीजन के।
इन दश धर्मों के पालन से, सुधरे जीवन सारा॥
धर्मध्यान… ॥२॥
मुनिदशा में उत्तम पालन, इन धर्मों का होता।
इन दशधर्मों से हो…
भजन
धर्म दशलक्षण धारो जी ।
यही मोक्ष सोपान इन्हीं पर तन-मन वारो जी।
धर्म दशलक्षण धारो जी ॥टेक ॥
उत्तम क्षमा क्रोध का घाता,
उत्तम मार्दव विनय प्रदाता,
उत्तम आर्जव धर्म धार ऋजुता सिंगारो जी।
धर्म दशलक्षण धारो जी ॥ १॥
उत्तम सत्य धर्म सुखकारी,
उत्तम शौच लोभ परिहारी,
उत्तम संयम धर्म हृदय ले मुनिपद धारो जी ।
धर्म दशलक्षण धारो जी ॥ २॥
उत्तम तप निर्जरा कर्म की,
जय जय उत्तम त्याग धर्म की,
उत्तम आकिंचन से निज का रूप संवारो जी ।
धर्म दशलक्षण धारो जी ॥३॥
उत्तम ब्रह्मचर्य विख्याता,
महाशील गु…
पर्वराज पर्यूषण आया दस धर्मों की ले माला
पर्वराज पर्युषण आया दस धर्मों की ले माला
मिथ्यातम में दबी आत्मनिधि अब तो चेत परख लाला टेर।।
तू अखंड अविनाशी चेतन ज्ञाता दृष्टा सिद्ध समान।
रागद्वेष परपरणति कारण स्व सरूप को कर्यो न भान ।।
मोहजाल की भूल भुलैया समझ नरक सी है ज्वाला ॥ १ ॥
परम अहिंसक क्षमा भाव भर, तज दे मिथ्या मान गुमान।
कपट कटारी दूर फेंक दे जो चाहे अपनो कल्याण ।।
सत्य शौच संयम तप अनुपम है अमृत भर पी प्याला ॥ २ ॥
परिग्रह त्याग ब्रह्म में रमजा वीतराग दर्शन गायो।
चिंतामणी से काग उड़ा …