श्लोक 211 से 240
भागत्रयमयं नित्यमात्मानं बन्धवर्तिनम् ।
भागद्वयात् पृथक् कर्तुं यो जानाति स तत्त्ववित् ॥211॥ ॥211॥
अर्थ: सर्वप्रथम भाग सप्त धातुमय शरीर है, उसके बाद दूसरा भाग ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म और तीसरा भाग ज्ञानादि निजभाव - इसप्रकार संसारी जीव तीन प्रकार के भागों को धारण करते हैं । अर्थात् संसारी जीव तीन भाग सहित हैं । जो इनमें दो भागरूप शरीर और कर्मों से जीव को भिन्न करने की विधि जानते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं ।
करोतु न चिरं घोरं तपः क्लेशासहो भवान् ।
चित्तसाध्यान् कषायारीन् न जयेद्यत्तदज्ञता ॥212॥ ॥212॥
अर्थ: यदि तू काय-क्लेश सहन करने में असमर्थ होने से चिरकाल तक घोर तप नहीं कर सकता तो जो मन के द्वारा ही जीते जाते हैं - ऐसे क्रोध-मान-माया-लोभ आदि शत्रुओं को तो जीत ! यदि इन्हें भी नहीं जीतता तो यह बड़ी अज्ञानता है, क्योंकि कषाय जीतने में तो कोई काय-क्लेश नहीं है, इसमें तो मन ही सुलटना है।
हृदयसरसि यावन्निर्मलेऽप्यत्यगाधे,
वसति खलु कषायग्राहचक्रं समन्तात् ।
श्रयति गुणगणोऽयं तन्न तावद्विशङ्कं,
सयमशमविशेषैस्तान् विजेतुं यतस्व ॥213॥ ॥213॥
अर्थ: जब तक तेरे निर्मल हृदयरूपी अगाध सरोवर में निश्चय से कषायरूपी जलचरों के समूह का निवास है, तब तक उसमें गुणों का समूह निःशंक होकर प्रवेश नहीं कर सकता; इसीलिए शम-दम-यम के भेदों से कषायों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए। शम अर्थात् रागादि के त्यागरूप समता भाव, दम अर्थात् मन और इन्द्रियों का निरोध तथा यम अर्थात् जीव-हिंसा आदि का त्याग।
हित्वा हेतुफले किलात्र सुधियस्तां सिद्धिमामुत्रिकीं,
वाञ्छन्तः स्वयमेव साधनतया शंसन्ति शान्तं मनः ।
तेषामाखुबिडालिकेति तदिदं धिग्धिक् कलेः प्राभवं,
येनैतेऽपि फलद्वयप्रलयनाद् दूरं विपर्यासिताः ॥214॥ ॥214॥
अर्थ: कुछ तथाकथित (कहने मात्र के) बुद्धिमान् लोग अपरिग्रहत्वादि कारणों को और मन की शान्तिरूप फल को छोड़कर पर-लोक की सिद्धि चाहते हैं और स्वयं ही अपने मन से अपनी प्रशंसा करते हैं और कषायों के वश में होते हुए अपने को शान्त-चित्त मानते हैं; परन्तु इसमें बड़ा विरोध है। क्रोधादि कषायों और उपशान्तादि गुणों में बिल्ली और चूहे के समान अनादि का परस्पर बैर है। इस कलि-काल के प्रभाव को बारम्बार धिक्कार है, जिसके प्रभाव से बुद्धिमान् लोग भी इस लोक और पर-लोक के फल को नष्ट करके ठगाए जाते हैं।
उद्युक्तस्त्वं तपस्यस्यधिकमभिभवं त्वामगच्छन् कषायाः,
प्राभूद्बोधोऽप्यगाधो जलमिव जलधौ किं तु दुर्लक्ष्यमन्यैः ।
निर्व्यूढेऽपि प्रवाहे सलिलमिव मनाग् निम्नदेशेष्ववश्यं,
मात्सर्यं ते स्वतुल्ये भवति परवशाद् दुर्जयं तज्जहीहि ॥215॥ ॥215॥
अर्थ: तू तप का उद्यम कर रहा है, कषायें तेरे द्वारा अति अपमानित हुई हैं (अर्थात् तूने कषायों को जीत लिया है) और तुझमें समुद्र में भरे हुए अगाध जल के समान अगाध ज्ञान भरा है; फिर भी हम तुझे शिक्षा देते हैं । इस बात को अन्य लोग नहीं जानते । इस दोष को बहुत कम लोग छोड़ पाते हैं । जिसप्रकार जल के प्रवाह में थोड़ा जल निश्चितरूप से भूमि के अन्दर छिपा रहता है, इसलिए लोगों को नहीं दिखता; उसीप्रकार कर्मोदय वशात् अपने से बराबरीवालों के प्रति अदेखसका अर्थात् दूसरे को नहीं देख सकता - ऐसा ईष्या भाव होता है, जिसे शास्त्र में मात्सर्य कहते हैं । इसे जीतना अत्यन्त कठिन है, इसलिंए तू इसे छोड़ ।
चित्तस्थमप्यनवबुद्ध्य हरेण जाड्यात्
क्रुद्ध्वा बहिः किमपि दग्धमनङ्गबुध्या ।
घोरामवाप स हि तेन कृतामवस्थां
क्रोधोदयाद्भवति कस्य न कार्यहानिः ॥216॥ ॥216॥
अर्थ: देखो ! काम तो मन में उत्पन्न होता है, बाहर नहीं; परन्तु कोई किसी बाह्य वस्तु को काम समझकर उसे क्रोध से भस्म कर दे तो काम तो नहीं मरा और वह स्वयं काम के योग से सरागी हुआ और काम की घोर वेदना सही । अतः क्रोध के उदय से किसका काम नहीं बिगड़ता ?
चक्रं विहाय निजदक्षिणबाहुसंस्थं
यत् प्राव्रजन्ननु तदैव स तेन मुञ्चेत् ।
क्लेशं तमाप किल बाहुबली चिराय
मानो मनागपि हतिं महतीं करोति ॥217॥ ॥217॥
अर्थ: देखो ! बाहुबली ने अपने दाहिने हाथ में आए हुए चक्र को छोड़कर जिन-दीक्षा धारण की और तप करके संसार अवस्था से मुक्ति प्राप्त की, परन्तु कुछ संज्वलन मान का उदय शेष रहा जिससे उन्हें एक वर्ष तक केवलज्ञान नहीं हुआ । उन्होंने महा काय-क्लेश किया तो भी मान नष्ट हुए बिना मुक्त नहीं हुए । यह तुच्छ मात्र मान भी बहुत बड़ी हानि करता है, इसलिए मान त्यागने योग्य है । यह जीव तन, धन, रूप, यौवन, राजलक्ष्मी आदि का गर्व करता है, परन्तु ये सब क्षणभंगुर हैं । आत्मा तो निश्चय से सिद्ध समान है, तीन लोक का आभूषण है, अत: उक्त पदार्थों का क्या मान करना ?
सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्यं भुजे विक्रमे,
लक्ष्मीर्दानमनूनमर्थिनिचये मार्गो गतिर्निर्वृते ।
येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहङ्काराः श्रुतेर्गोचराः,
चित्रं संप्रति लेशितोऽपि न गुणास्तेषां तथाप्युद्धताः ॥218॥ ॥218॥
अर्थ: इस लोक में पहले अनेक महापुरुष हुए हैं, वे वचनों में सत्य, शास्त्रों में बुद्धि, हृदय में दया, भुजाओं में शौर्य युक्त पराक्रम, लक्ष्मी के याचकों को पूर्ण दान और निवृत्ति मार्ग में गमन आदि अनेक गुण युक्त होने पर भी अहंकार रहित थे - ऐसा शास्त्रों में कहा है। लेकिन इस कलि-काल में लेशमात्र गुण नहीं होने पर भी लोग अत्यन्त उद्धत होकर महागर्व में चूर हो रहे हैं - यह बड़े आश्चर्य की बात है।
वसति भुवि समस्तं सापि संधारितान्यैः
उदरमुपनिविष्टा सा च ते वा परस्य ।
तदपि किल परेषां ज्ञानकोणे निलीनं
वहति कथमिहान्यो गर्वमात्माधिकेषु ॥219॥ ॥219॥
अर्थ: गर्व करना झूठा है, क्योंकि गर्व करना तो तब उचित है, जब कोई अपने से अधिक न हो, परन्तु सब एक से बढ़ कर एक हैं (फिर क्या गर्व करना?) प्रत्यक्ष में देखो ! सब पदार्थ पृथ्वी पर रहते हैं, इसलिए सबका आधार पृथ्वी है । लेकिन यह त्रैलोक्य की भूमि घनोदधि, घनवात और तनुवात - इन तीन वातवलयों के आधार से है । यह पृथ्वी और ये वातवलय आकाश के उदर में हैं । तथा अनन्त आकाश केवली के ज्ञान के अंश में लीन है । सब एक से बढ़ कर एक हैं, इसलिए अपने से बहुतों को अधिक जान कर कौन गर्व करेगा ? विवेकी तो कदापि गर्व नहीं करेंगे ।
यशो मारीचीयं कनकमृगयामलिनितं
हतोऽश्वत्थामोक्त्या प्रणयिलघुरासीद्यमसुतः।
सकृष्णः कृष्णोऽभूत् कपटबटुवेषेण नितरा-
मपि छद्माल्पं तद्द्विषमिव हि दुग्धस्य महतः ॥220॥ ॥220॥
अर्थ: जैसे अत्यधिक दूध को विष का कण भी दूषित कर देता है, वैसे थोड़ा भी कपट महान् गुणों को नष्ट कर देता है । देखो ! रावण के मन्त्री मारीचि का यश कपट द्वारा स्वर्ण-मृग का रूप धरने से मलिन हुआ । राजा युधिष्ठिर का अति-निर्मल यश उनके मुख से निकले हुए ‘अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा न जानामि’(अर्थात् अश्वात्थामा मारा गया, नर या पशु, नहीं मालूम)- इस मायाचाररूप वचन से मलिन हुआ, उन्हें अपने मित्रों में नीचा देखना पड़ा; इसलिए थोड़ा भी मायाचार बहुत गुणों का घात करता है ।
भेयं मायामहागर्तान्मिथ्याघनतमोमयात् ।
यस्मिन् लीना न लक्ष्यन्ते क्रोधादिविषमाहयः ॥221॥ ॥221॥
अर्थ: जैसे अत्यधिक दूध को विष का कण भी दूषित कर देता है, वैसे थोड़ा भी कपट महान् गुणों को नष्ट कर देता है । देखो ! रावण के मन्त्री मारीचि का यश कपट द्वारा स्वर्ण-मृग का रूप धरने से मलिन हुआ । राजा युधिष्ठिर का अति-निर्मल यश उनके मुख से निकले हुए ‘अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा न जानामि’(अर्थात् अश्वात्थामा मारा गया, नर या पशु, नहीं मालूम)- इस मायाचाररूप वचन से मलिन हुआ, उन्हें अपने मित्रों में नीचा देखना पड़ा; इसलिए थोड़ा भी मायाचार बहुत गुणों का घात करता है ।
प्रच्छन्नकर्म मम कोऽपि न वेत्ति धीमान्,
ध्वंसं गुणस्य महतोऽपि हि मेति मंस्थाः ।
कामं गिलन् धवलदीधितिधौतदाहं,
गूढोऽप्यबोधि न विधुं स विधुन्तुदः कैः ॥222॥ ॥222॥
अर्थ: हे जीव ! तू ऐसा भ्रम मत कर, कि मेरा गुप्त पाप कोई नहीं जानेगा । बुद्धिमान् भी नहीं जान सकते, तो अन्य लोग कैसे जानेंगे । यह पाप मेरे महान् गुणों को कैसे ढकेगा ? तू ऐसा बिलकुल मत मान । प्रत्यक्ष देख ! अपनी उज्जवल किरणों से जगत् के आताप को दूर करनेवाले चन्द्रमा को भी गुप्तरूप से राहु ग्रस लेता है,लेकिन इस बात को कौन नहीं जानता ? अर्थात् सभी जानते हैं।
वनचरभयाद् धावन् दैवाल्लताकुलबालधिः,
किल जडतया लोलो बालव्रजेऽविचलं स्थितः।
वत स चमरस्तेन प्राणैरपि प्रवियोजितः,
परिणततृषां प्रायेणैवंविधा हि विपत्तयः ॥223॥ ॥223॥
अर्थ: देखो ! लोक में प्रसिद्ध है कि वन में घूमने वाले शिकारी भील अथवा व्याघ्र के भय से भागती हुई चमर या सुरई गाय की पूँछ झाड़ियों में उलझ जाने पर वह मूढ़ता से पूँछ के बालों के लोभ में खड़ी रहती है, और शिकारी के द्वारा मारी जाती है। इसलिए जानना चाहिए कि तृष्णा करनेवालों पर अधिकतया ऐसी अनेक विपत्तियाँ आती हैं।
नियमितमनोवृत्तिर्भक्तिर्जिनेषु दयालुता,
भवति कृतिनः संसाराब्धेस्तटे निकटे सति ॥224॥ ॥224॥
अर्थ: विवेकी जीवों को संसार- समुद्र का किनारा निकट आने पर विषयों से विरक्तता, परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, शम (शान्ति अर्थात् रागादि का त्याग) दम (मन और इन्द्रियों का निरोध) और यम (जीवन पर्यन्त हिंसादि पापों का त्याग) - इनका धारण, तत्त्व का अभ्यास, तपश्चरण का उद्यम, मन की वृत्तियों का निरोध, जिनेन्द्र भक्ति और जीवों की दया इत्यादि सामग्री प्राप्त होती है ।
यमनियमनितान्तः शान्तबाह्यान्तरात्मा,
परिणमितसमाधिः सर्वसत्त्वानुकम्पी ।
विहितहितमिताशी क्लेशजालं समूलं,
दहति निहतनिद्रो निश्चिताध्यात्मसारः ॥225॥ ॥225॥
अर्थ: यम और नियम योग के मूल हैं, यम अर्थात् अयोग्य क्रियाओं का आजीवन त्याग और नियम अर्थात् घड़ी, पल, प्रहर, पक्ष, मास, चातुर्मास आदि की मर्यादा में संवर या त्याग। इनके पालन में साधु सदैव तत्पर रहते हैं। वे महा शान्त-चित्तवाले होते हैं। उनके भावों में देहादि बाह्य पदार्थों से निर्वृत्ति हो जाती है। समाधि अर्थात् निर्विकल्प दशा रूप परिणमित होते हैं। सभी जीवों के प्रति दया भाव रखते हैं। विहित अर्थात् शास्त्रोक्त विधि से योग्य अल्प आहार लेते हैं। निद्राजयी होते हैं। अध्यात्म के सारभूत आत्म स्वभाव का निश्चय करनेवाले होते हैं। निरंतर आत्मानुभव में मग्न होते हैं।
समाधिगतसमस्ताः सर्वसावद्यदूराः,
स्वहितनिहितचित्ताः शान्तसर्वप्रचाराः ।
स्वपरसफलजल्पाः सर्वसंकल्पमुक्ताः,
कथमिह न विमुक्तेर्भाजनं ते विमुक्ताः ॥226॥ ॥226॥
अर्थ: जो समस्त त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य वस्तुओं का स्वरूप भलीभाँति जानते हैं, हिंसादि सभी पापों से दूर हैं, जिनका चित्त आत्म-कल्याण के कारणभूत सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र में स्थित है, सर्व इन्द्रियों के विषयों से निर्वृत्त हो गए हैं, जिनके वचन स्व और पर का कल्याण करनेवाले हैं और जो समस्त संकल्प-विकल्पों से रहित हैं - वे महापुरुष सर्व प्रपञ्चों से रहित होते हुए मुक्ति के भाजन (पात्र) क्यों न होंगे ? अर्थात् वे निःसंदेह शिव-सुख के पात्र होंगे ।
दासत्वं विषयप्रभोर्गतवतामात्मापि येषां परः,
तेषां भो गुणदोषशून्यमनसां किं तत्पुनर्नश्यति ।
भेतव्यं भवतैव यस्य भुवनप्रद्योति रत्नत्रयं,
भ्राम्यन्तीन्द्रियतस्कराश्च परितस्त्वां तन्मुहुर्जागृहि ॥227॥ ॥227॥
अर्थ: जो अविवेकी विषयरूपी राजा के दास हुए हैं, जिनका चित्त गुण-दोषों के विचार से शून्य हुआ है और जिनका आत्मा पराधीन है; उनकी दशा देखकर, हे विवेकी तू भटकना मत ! वे तो सम्यग्ज्ञानरूपी धन से रहित दरिद्री हैं, तो इनका क्या जाएगा ? परन्तु तेरे पास तो तीन लोक को प्रकाशित करनेवाला रत्नत्रय धन है इसलिए तुझे डर कर (संभलकर) रहना चाहिए । तेरे आसपास चारों तरफ इन्द्रिय रूपी चोर घूम रहे हैं । वे तेरे ज्ञान वैभव को चुरा न लें - ऐसा प्रयत्न कर, अर्थात् सदा जाग्रत रह ।
रम्येषु वस्तुवनितादिषु वीतमोहो,
मुह्येद्वृथा किमिति संयमसाधनेषु ।
धीमान् किमामयभयात् परिहृत्य भुक्तिं,
पीत्वौषधिं व्रजति जातुचिदप्यजीर्णम् ॥228॥ ॥228॥
अर्थ: हे बुद्धिमान् ! मनोग्य स्त्री आदि वस्तुओं से तो तेरा मोह चला गया है, अब तू पीछी आदि संयम के साधनों से भी व्यर्थ ही मोह क्यों करता है ? क्या कोई रोग के भय से भोजन को छोड़कर आवश्यकता से अधिक औषधि लेकर अजीर्ण करता है ? अर्थात् कभी नहीं करता ।
तपः श्रुतमिति द्वयं बहिरुदीर्य रूढं यदा,
कृषीफलमिवालये समुपलीयते स्वात्मनि ।
कृषीबल इवोज्झितः करणचौरबाधादिभिः,
तदा हि मनुते यतिः स्वकृतकृत्यतां धीरधीः ॥229॥ ॥229॥
अर्थ: जैसे खेत में बीज बोकर अन्न उपजानेवाला किसान चोर आदि की बाधाओं से रहित होकर अपने घर में अन्न लाकर रखने पर ही अपने को कृतार्थ मानता है । वैसे ही साधु तप और श्रुत की वृद्धि करके इन्द्रियादिक चोरों की बाधाओं से रहित होता हुआ अपने आत्म-स्वरूप में लीन होकर ही अपने को कृतार्थ मानते हैं ।
जैसे वह किसान भी अपने कर्तव्य का कृतार्थपना (पूर्ति होना) तभी मानता है, जब बिना किसी बाधा के अनाज घर में आ जाता है । वैसे ही धीर बुद्धिवाले साधु भी अपने संयम का कृतार्थपना तभी मानते हैं, जब इन्द्रिय आदि चोरों की बाधा से रहित तप-श्रुतरूपी बीज का ज्ञानरूपी फल अपने में धारण कर लेते हैं, अर्थात् आत्मस्वरूप में लीन हो जाते हैं ।
दृष्टार्थस्य न मे किमप्ययमिति ज्ञानावलेपादमुं,
नोपेक्षस्व जगत्त्रयैकडमरं निःशेषयाऽऽशाद्विषम् ।
पश्याम्भोनिधिमप्यगाधसलिलं बाबाध्यते वाडवः,
क्रोडीभूतविपक्षकस्य जगति प्रायेण शान्तिः कुतः ॥230॥ ॥230॥
अर्थ: यह आशारूपी शत्रु मुझ जैसे ज्ञानवन्त का कुछ नहीं बिगाड़ सकता - इसप्रकार ज्ञान के गर्व से आशारूपी शत्रु को कमजोर नहीं समझना चाहिए। यह तीनों लोकों का महाभयंकर अद्वितीय बैरी है, इसे सर्वथा दूर ही करना चाहिए - यह बात दृष्टांत द्वारा समझाते हैं। देखो ! अगाध जलवाले समुद्र को भी बड़वानल सोख लेता है। अतः जिसे शत्रु दबाए रहते हैं, उसे शान्ति कैसे हो सकती है ? जिनके रंचमात्र भी शत्रु नहीं हैं, वे ही निश्चिंत रह सकते हैं। यह आशा तो प्रबल शत्रु है, इसके होते हुए शान्ति कैसे हो सकती है ?
स्नेहानुबद्धहृदयो ज्ञानचारित्रान्वितोऽपि न श्लाघ्यः।
दीप इवापादयिता कज्जलमलिनस्य कार्यस्य ॥231॥ ॥231॥
अर्थ: मोह से युक्त हृदयवाले पुरुष यदि शास्त्रज्ञान और शुभाचरण से शोभित हैं, तो भी प्रशंसा योग्य नहीं हैं। जैसे - तेल युक्त होने से दीपक काजल उत्पन्न करता है वैसे राग युक्त जीव पाप अर्थात् अशुभ कर्म रूप मलिनता को उत्पन्न करता है - ऐसा जानकर जगत् से स्नेह (राग) छोड़ना चाहिए।
रतेररतिमायातः पुना रतिमुपागतः ।
तृतीयं पदमप्राप्य बालिशो वत सीदसि ॥232॥ ॥232॥
अर्थ: रे अज्ञानी ! तू विषयों की रुचि से अरुचि में आता है और फिर इन्हीं में रुचि करता है, इसलिए तू जगत् से उदासीनता रूप वैराग्य प्राप्त न करके दुःखी है । अतः ऐसा जानकर यदि तू कल्याण करना चाहता है तो तू राग-द्वेष को छोड़कर वैराग्य का सेवन कर ।
तावद् दुःखाग्नितप्तात्माऽयःपिण्डः सुखसीकरैः।
निर्वासि निर्वृताम्भोधौ यावत्त्वं न निमज्जसि ॥233॥ ॥233॥
अर्थ: तू लोह-पिण्ड के समान दुःखरूपी अग्नि से तप्त है, अतः जब तक मोक्ष सुखरूपी समुद्र में मग्न नहीं होता, तब तक इन्द्रियों से उत्पन्न लेशमात्र विषय-सुख से अपने को सुखी मानना व्यर्थ है।
मंक्षु मोक्षं सुसम्यक्त्वसत्यंकारस्वसात्कृतम् ।
ज्ञानचारित्रसाकल्यमूल्येन स्वकरे कुरु ॥234॥ ॥234॥
अर्थ: सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र की पूर्णतारूपी धन से तू शीघ्र ही निर्वाण की प्राप्ति कर ले । जब तू सत्यरूपी मुक्ति को अपने वश में करेगा, तब कृतार्थ होगा ।
अशेषमद्वैतमभोग्यभोग्यं ,
निवृत्तिवृत्त्योः परमार्थकोट्याम् ।
अभोग्यभोग्यात्मविकल्पबुद्ध्या,
निवृत्तिमभ्यस्यतु मोक्षकांक्षी ॥235॥ ॥235॥
अर्थ: यह सम्पूर्ण जगत् अद्वैत अर्थात् एकरूप है । विषय-कषायों से निवृत्ति की अपेक्षा भोगने योग्य नहीं है, त्यागने योग्य है और विषय-कषाय की प्रवृत्ति की अपेक्षा भोगने योग्य है । इसप्रकार प्रवृत्ति और निवृत्ति की अपेक्षा इस जगत् को भोग्य और अभोग्य जानकर मोक्षाभिलाषियों को निवृत्ति का अभ्यास करना चाहिए। प्रवृत्ति का फल संसार और निवृत्ति का फल निर्वाण है ।
निवृत्तिं भावयेद्यावन्निवृत्यं तदभावतः ।
न वृत्तिर्न निवृत्तिश्च तदेव पदमव्ययम् ॥236॥ ॥236॥
अर्थ: जब तक त्यागने योग्य मन-वचन-काय का सम्बन्ध न छूटे तब तक निवृत्ति का ही अभ्यास करना चाहिए तथा पर-वस्तुओं का अभाव होने पर न प्रवृत्ति होती है और न निवृत्ति रहती है, केवल शुद्ध स्वरूप ही रहता है, क्योंकि पर-पदार्थों से सर्वथा रहित होना ही अविनाशी पद (मोक्ष) है ।
रागद्वेषौ प्रवृत्तिः स्यान्निवृत्तिस्तन्निषेधनम् ।
तौ च बाह्यार्थसंबद्धौ तस्मात्तांश्च परित्यजेत् ॥237॥ ॥237॥
अर्थ: राग-द्वेष होना ही प्रवृत्ति है और इनका निषेध ही निवृत्ति है । ये दोनों बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध से हैं, इसलिए धन-धान्यादि बाह्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए ।
भावयामि भवावर्ते भावनाः प्रागभाविताः ।
भावये भाविता नेति भवाभावाय भावनाः ॥238॥ ॥238॥
अर्थ: मैं इस संसार में भ्रमण करते हुए, अब भ्रमण का नाश करने के लिए पूर्व में कभी नहीं भायीं - ऐसी सम्यग्दर्शनादि भावनाओं को भाता हूँ । पूर्व में अनादि काल से भायी हुई मिथ्यादर्शनादि भावनाओं को नहीं भाता ।
शुभाशुभे पुण्यपापे सुखदुःखे च षट् त्रयम् ।
हितमाद्यमनुष्ठेयं शेषत्रयमथाहितम् ॥239॥ ॥239॥
अर्थ: शुभ अर्थात् उत्तम वचन, करुणारूप मन और संयमरूप काया - ये प्रंशसा योग्य हैं और अशुभ अर्थात् खोटे वचन, निर्दयीचित्त और अव्रतरूप काया - ये निन्दा योग्य हैं । इन दोनों से पुण्य और पाप होते हैं । शुभ से पुण्य और अशुभ से पाप होता है । पुण्य से सुख और पाप से दुःख होता है । इसप्रकार शुभ-अशुभ, पुण्य-पाप और सुख-दुःख - इन छह में से आदि के तीन शुभ, पुण्य और सुख हितकारी हैं इसलिए आदरणीय या ग्रहण करने योग्य हैं और अंत के तीन अशुभ, पाप और दुःख अहितकारी हैं, इसलिए त्यागने योग्य हैं ।
तत्राप्याद्यं परित्याज्यं शेषौ न स्तः स्वतः स्वयम्।
शुभं च शुद्धे त्यक्त्वान्ते प्राप्नोति परमं पदम् ॥240॥ ॥240॥
अर्थ: पहले तो अहित रुप अशुभ छूटता है, उसके अभाव से पाप और दुःख भी छूट जाते हैं । फिर शुद्धोपयोग के प्रभाव से शुभ भी छूट जाता है, जिससे पुण्य और स्वर्गादि सुख भी नहीं होते । कारण के अभाव से कार्य का अभाव भी हो जाता है । यह जीव शुभ छूटने पर परम वीतराग भावरूप शुद्धोपयोग में स्थित होकर परमपद प्राप्त करता है । वह परम पद शुभ और अशुभ दोनों से रहित है और दोनों का अन्त होने पर होता है ।