आत्मानुशासन श्लोक एवं अर्थ (आचार्य गुणभद्र) | Atmanushasan Shlok Evam Arth (Acharya Gunabhadra)

आत्मानुशासन श्लोक एवं अर्थ

आचार्य गुणभद्र

आत्मानुशासन के मूल श्लोक 1 से 270, हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ, भाग नीचे अलग उत्तरों में। अर्थ संलग्न ग्रंथ में हर श्लोक की संस्कृत टीका के साथ छपे हिन्दी अर्थ से ज्यों का त्यों लिया है; संस्कृत टीका और भावार्थ नहीं लिए, वे पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक (छपाई की टिप्पणियों सहित): आत्मानुशासन मूल श्लोक (आचार्य गुणभद्र) | Atmanushasan Mool Shlok (Acharya Gunabhadra)

अनुक्रमणिका

क्र. भाग श्लोक
1 श्लोक 1 से 30 1 से 30
2 श्लोक 31 से 60 31 से 60
3 श्लोक 61 से 90 61 से 90
4 श्लोक 91 से 120 91 से 120
5 श्लोक 121 से 150 121 से 150
6 श्लोक 151 से 180 151 से 180
7 श्लोक 181 से 210 181 से 210
8 श्लोक 211 से 240 211 से 240
9 श्लोक 241 से 270 241 से 270

स्रोत: atmanushashan_hin_scn.pdf

atmanushashan_hin_scn.pdf (57645 KB)

श्लोक 1 से 30

लक्ष्मीनिवासनिलयं विलीनविलयं निधाय हृदि वीरम् ।
आत्मानुशासनमहं वक्ष्ये मोक्षाय भव्यानाम् ॥1॥ ॥1॥

अर्थ: इस शास्त्र का कर्ता मैं गुणभद्र, वीर अर्थात् वर्धमान नामक तीर्थंकर देव को अथवा जो कर्मशत्रु का नाश करने के लिए सुभट हैं उन्हें, अथवा विशिष्ट लक्ष्मी को ‘राति’ अर्थात् ग्रहण करनेवाले सभी अरहन्तादि भगवन्तों को अपने हृदय में विराजमान करके आत्मा को हित की शिक्षा देनेवाले आत्मानुशासन नामक ग्रन्थ की रचना करूँगा।


दुःखाद्विभेषि नितरामभिवाञ्छसि सुखमतोऽहमप्यात्मन् ।
दुःखापहारि सुखकरमनुशास्मि तवानुमतमेव ॥2॥ ॥2॥

अर्थ: हे आत्मा ! तू दुःख से बहुत डरता है और सुख को सर्व प्रकार से चाहता है; इसलिए मैं भी दुःख दूर करनेवाले और सुख उत्पन्न करनेवाले वाञ्छित अर्थ का उपदेश करता हूँ।


यद्यपि कदाचिदस्मिन् विपाकमधुरं तदात्वकटु किञ्चत ।
त्वं तस्मान्मा भैषीर्यथातुरो भेषजादुग्रात् ॥3॥ ॥3॥

अर्थ: यदि तुझे इस शास्त्र में कोई उपदेश तत्काल कुछ कड़वा लगे तो जिसप्रकार रोगी अति कटुक औषधि से भी नहीं डरता है उसीप्रकार तू भी उस उपदेश से मत डर ! क्योंकि वह उपदेश फल देने के काल में मीठा है ।


जना घनाश्च वाचालाः सुलभाःस्युर्वृथोत्थिताः ।
दुर्लभा ह्यन्तरार्द्रास्ते जगदभ्युज्जिहीर्षवः ॥4॥ ॥4॥

अर्थ: खोटा उपदेश देनेवाले और निरर्थक महन्तता से उद्धत मनुष्य तथा व्यर्थ गरजनेवाले निरर्थक मेघ सुलभ हैं; परन्तु अन्तरंग में धर्मबुद्धि से भीगे हुए तथा संसार के दु:खों से जीवों का उद्धार करने की इच्छावाले मनुष्य तथा अन्तरंग में जल से भीगे हुए और अन्न उत्पादन करके लोक का उपकार करने में कारणभूत मेघ दुर्लभ हैं ।


प्राज्ञः प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः प्रव्यक्तलोकस्थितिः,
प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रशमवान् प्रागेव दृष्टोत्तरः ।
प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी परानिन्दया,
ब्रूयाद्धर्मकथां गणी गुणनिधिः प्रस्पष्टमिष्टाक्षरः ॥5॥ ॥5॥

अर्थ: धर्मकथा कहनेवाले सभानायक गणी में निम्न गुण होना चाहिए :-
१. वह बुद्धिमान् होना चाहिए क्योंकि बुद्धिहीन में वक्तापना सम्भव नहीं है।
२. वह समस्त शास्त्रों के रहस्य का जानकार होना चाहिए क्योंकि शास्त्रों के सांगोपाँग ज्ञान बिना यथार्थ अर्थ भासित नहीं होता ।
३. वह लोक-व्यवहार का ज्ञाता होना चाहिए, क्योंकि लोक-रीति के ज्ञान बिना वह लोक-विरुद्ध वर्तन करेगा ।
४. वह आशावान (महत्त्वाकाँक्षी) नहीं होना चाहिए क्योंकि आशावान होने पर वह श्रोताओं का मनोरंजन करना चाहेगा, यथार्थ अर्थ का प्ररूपण नहीं करेगा ।
५. वह कान्तिमान और प्रतिभाशाली होना चाहिए, क्योंकि शोभायमान न होने पर यह महान् कार्य उसे शोभा नहीं देगा ।
६. वह उपशम परिणामवाला होना चाहिए, क्योंकि तीव्र कषायी व्यक्ति सबके लिए अनिष्टकारी और निन्दा का स्थान होगा ।
७. वह श्रोताओं द्वारा प्रश्न करने के पहले ही उत्तर का जानकार होना चाहिए, क्योंकि स्वयं ही प्रश्नोत्तर करके समाधान करने से श्रोताओं को उपदेश में दृढ़ता होगी ।
८. वह प्रचुर प्रश्नों को सहने की क्षमतावाला होना चाहिए, क्योंकि यदि वह प्रश्न करने पर नाराज होगा तो श्रोता प्रश्न नहीं करेंगे तो उनका सन्देह दूर कैसे होगा ?
९. वह प्रभुता सहित होना चाहिए, क्योंकि श्रोता उसे अपने से ऊँचा जानेंगे, तभी उसका कहना मानेंगे ।
१०. वह दूसरों का मन हरनेवाला (उन्हें अच्छा लगनेवाला) होना चाहिए, क्योंकि जो असुहावना लगे उसकी शिक्षा श्रोता कैसे मानेंगे ?
११. वह गुणों का निधान होना चाहिए, क्योंकि गुणों के बिना नायकपना शोभा नहीं देता ।
१२. वह स्पष्ट और मिष्ट वचन कहनेवाला होना चाहिए, क्योंकि स्पष्ट वचन कहे बिना लोग समझेंगे नहीं और मिष्ट वचन कहे बिना श्रोताओं को सुनने की रुचि नहीं होगी ।


श्रुतमविकलं शुद्धा वृत्तिः परप्रतिबोधने,
परणतिरुरूद्योगो मार्गप्रवर्तनसद्विधौ ।
बुधनुतिरनुत्सेको लोकज्ञता मृदुताऽस्पृहा,
यतिपतिगुणा यस्मिन्नन्ये च सोऽस्तु गुरुः सताम् ॥6॥ ॥6॥

अर्थ: जिसमें निम्न गुण हों वह सत्पुरुषों को उपदेश देनेवाला गुरु होता है ।
१. सम्पूर्ण सन्देह रहित शास्त्र-ज्ञान हो ।
२. शुद्ध, निर्दोष और यथायोग्य मन-वचन-काय की प्रवृत्ति हो ।
३. दूसरों को सम्बोधित करने की भावना हो ।
४. जिन-मार्ग का प्रवर्तन करने की भली (यथार्थ) विधि में भला उद्यम करनेवाला हो ।
५. ज्ञानीजनों द्वारा जिसे नमन (सम्मानित) किया जाता हो तथा जो विशेष ज्ञानियों को विनयभाव से नमन करता हो ।
६. उद्धतपना तथा भयवान न हो ।
७. लोकरीति का ज्ञाता हो ।
८. कोमलता सहित हो ।
९. वाञ्छा रहित हो ।
१०. यतीश्वर सम्बन्धी अन्य गुण भी हों ।


भव्यः किं कुशलं ममेति विमृशन् दुःखाद्भृशं भीतवान्
सौख्यैषी श्रवणादिबुद्धिविभवः श्रुत्वा विचार्य स्फुटम् ।
धर्मं शर्मकरं दयागुणमयं युक्त्यागमाभ्यां स्थितं
गृह्णन्धर्मकथां श्रुतावधिकृतः शास्यो निरस्ताग्रहः ॥7॥ ॥7॥

अर्थ: धर्म कथा सुनने के अधिकारी शिष्य में निम्न गुण होना चाहिए:-
१. वह भव्य होना चाहिए, क्योंकि जिसकी होनहार भली न हो उसका सुनना कार्यकारी कैसे होगा ?
२. उसे ‘मेरा कल्याण किसमें है’- इसका विचार होना चाहिए,क्योंकि जिसे अपने भले-बुरे का विचार नहीं है, वह सीख (उपदेश) क्यों सुनेगा ?
३. वह दुःखों से बहुत अधिक डरता हो, क्योंकि जिसे नरकादि का भय नहीं है, वह पाप छुड़ानेवाला शास्त्र क्यों सुनेगा ?
४. वह सुख का अभिलाषी होना चाहिए, क्योंकि जो भविष्य में सुख चाहेगा, वही धर्म-साधन करानेवाला शास्त्र सुनेगा ।
५. उसमें श्रवण आदि बुद्धि का वैभव (बौद्धिक विशेषतायें) होना चाहिए, क्योंकि इनके बिना शिष्यपना नहीं होता । वे विशेषतायें निम्नानुसार हैं :-
(क) शुश्रूषा = सुनने की इच्छा
(ख) श्रवण = सुनना
(ग) ग्रहण = मन द्वारा जानना
(घ) धारणा = नहीं भूलना
(ङ) विज्ञान = विशेष विचार करना
(च) ऊहापोह = प्रश्नोत्तर करके निर्णय करना
(छ) तत्त्वाभिनिवेश = तत्त्व-श्रद्धान का अभिप्राय
६. वह सुखदायक, दयागुणमय,तथा अनुमान और आगम से सिद्ध धर्म को सुन कर, विचार कर, ग्रहण करनेवाला होना चाहिए, क्योंकि ऐसा ही धर्म शिष्य के लिए कार्यकारी है ।
७. वह खोटे हठ (दुराग्रह) से रहित होना चाहिए, क्योंकि हठ करके आपाथापी (अपनी ही बात की स्थापना करना) करनेवाले को सीख नहीं लगती ।


पापाद् दुःखं धर्मात्सुखमिति सर्वजनसुप्रसिद्धमिदम् ।
तस्माद्विहाय पापं चरतु सुखार्थी सदा धर्मम् ॥8॥ ॥8॥

अर्थ: ‘‘पाप से दुःख होता है और धर्म से सुख होता है’’- यह कथन समस्त लोक में प्रसिद्ध है । सभी ऐसा मानते हैं और कहते हैं । इसलिए जिसे सुख चाहिए है,उसे पाप को छोड़कर सदाकाल धर्म का आचरण करना चाहिए ।


सर्वःप्रेप्सति सत्सुखाप्तिमचिरात् सा सर्वकर्मक्षयात्
सद्वृत्तात् स च तच्च बोधनियतं सोऽप्यागमात् स श्रुतेः ।
सा चाप्तात् स च सर्वदोषरहितो रागादयस्तेऽप्यतः
तं युक्त्या सुविचार्यसर्वसुखदं सन्तः श्रयन्तु श्रिये ॥9॥ ॥9॥

अर्थ: यह प्रत्यक्ष भासित होता है कि सभी जीव सच्चे सुख की शीघ्र प्राप्ति की अभिलाषा करते हैं । सुख की प्राप्ति सभी कर्मों का क्षय होने पर ही हो सकती है, क्योंकि सुख में बाधक कर्मों का क्षय हुए बिना सुख कैसे हो सकता है ? उन कर्मों का क्षय सम्यक्चारित्र से होता है,क्योंकि बुरे आचरण से उत्पन्न होनेवाले कर्म का नाश भले आचरण के बिना कैसे होगा ? वह सम्यक्चारित्र ज्ञान से ही होना निश्चित है, क्योंकि ज्ञान के बिना बुरे-भले आचरण का निश्चय कैसे होगा ? वह ज्ञान आगम से ही होता है क्योंकि आगम के बिना बुरे-भले का ज्ञान नहीं होता ।
आगम श्रुति अर्थात् वस्तु-स्वरूप के प्रकाशक मूल उपदेश (दिव्यध्वनि) के बिना नहीं होता, क्योंकि आगम की रचना किसी का अनुसरण करने पर ही सम्भव है । श्रुति यथार्थ उपदेशदाता आप्त से ही होती है,क्योंकि उपदेशदाता के बिना उपदेश कैसे सम्भव है ? वे आप्त सर्व दोषों से रहित हैं क्योंकि आप्त दोष सहित नहीं होते । वे दोष रागादि हैं, क्योंकि राग-द्वेष, काम, क्रोध, क्षुधा, निद्रा आदि दोषों के होते हुए कोई यथार्थ उपदेश नहीं दे सकता, इसलिए ये ही दोष आप्तपने के घातक हैं । इसप्रकार क्रमानुसार व्याख्यान किया ।इसलिए सत्पुरुष युक्ति पूर्वक अच्छी तरह विचार करके सुखरूपी लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सर्व सुखदाता आप्त का आश्रय करें ।


श्रद्धानं द्विविधं त्रिधा दशविधं मौढ्याद्यपोढं सदा,
संवेगादिविवर्धितं भवहरं त्र्यज्ञानशुद्धिप्रदम् ।
निश्चिन्वन् नवसप्ततत्त्वमचलप्रासादमारोहतां,
सोपानं प्रथमं विनेयविदुषामाद्येयमाराधना ॥10॥ ॥10॥

अर्थ: आत्मा का विपरीत अभिप्राय रहित श्रद्धान सम्यग्दर्शन है,वहअआत्मा का स्वरूप है । वह सम्यग्दर्शन निसर्गज और अधिगमज के भेद से दो प्रकार का है । जो उपदेशादि बाह्य निमित्तों के बिना होता है, उसे निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते हैं और जो उपदेशादि बाह्य निमित्तों से होता है, उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं ।
अथवा वह सम्यग्दर्शन, तीन प्रकार का है । जो दर्शनमोह के उपशम से हो वह औपशमिक सम्यग्दर्शन है । जो दर्शनमोह के क्षय से हो वह क्षायिक सम्यग्दर्शन है और जो दर्शनमोह के क्षयोपशम से हो वह क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन है ।
अथवा वह सम्यग्दर्शन दस प्रकार का है । (आज्ञा सम्यक्त्व आदि दस भेदों का वर्णन आगामी छन्द में करेंगे ।)
वह श्रद्धान,मूढ़ता आदि पच्चीस दोषों से रहित होता है । लोकमूढ़ता, समयमूढ़ता और देवमूढ़ता के भेद से मूढ़ता तीन प्रकार की होती है । जाति, कुल आदि के भेद से मद आठ प्रकार के होते हैं । मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र तथा इनके धारक जीव - इसप्रकार छह अनायतन होते हैं । अथवा असर्वज्ञ, असर्वज्ञ का स्थान, असर्वज्ञ का ज्ञान, असर्वज्ञ के ज्ञानयुक्त पुरुष, असर्वज्ञ का आचरण और असर्वज्ञ के आचरण सहित पुरुष - इसप्रकार ये छह अनायतन हैं । ये सम्यक्त्व के स्थान नहीं हैं इसलिए इन्हें अनायतन कहते हैं । तथा शंका, कांक्षा, विचिकित्सा और मूढ़दृष्टि - इन चार दोषों का सदभाव और उपगूहन, स्थितिकरण, वात्सल्य तथा प्रभावना - इन चार गुणों का अभाव - इसप्रकार आठ दोषों से रहित सम्यग्दर्शन होता है ।


आज्ञामार्गसमुद्भवमुपदेशात् सूत्रबीजसंक्षेपात् ।
विस्तारार्थाभ्यां भवमवपरमावादिगाढं च ॥11॥ ॥11॥

अर्थ: आज्ञा, मार्ग, उपदेश, सूत्र, बीज, संक्षेप, विस्तार और अर्थ से उत्पन्न होने के कारण आठ भेद होते हैं तथा प्रारम्भ में अव और परमाव विशेषणयुक्त गाढ़पना होने से अवगाढ़ और परमावगाढ़ - ये दो भेद मिलाकर सम्यक्त्व के कुल दस भेद जानना चाहिए।


आज्ञासम्यक्त्वमुक्तं यदुत विरुचितं वीतरागाज्ञायैव
त्यक्तग्रन्थप्रपञ्चं शिवममृतपथं श्रद्दधन्मोहशान्तेः ।
मार्गश्रद्धानमाहुः पुरुषवरपुराणोपदेशोपजाता,
या संज्ञानागमाब्धिप्रसृतिभिरुपदेशादिरादेशि दृष्टिः ॥12॥ ॥12॥

अर्थ: हे भव्य ! शास्त्र - पठन के बिना वीतराग की आज्ञा से अर्थात् वचन सुनने मात्र से होनेवाले श्रद्धान को आज्ञा सम्यक्त्व कहते हैं।
विस्तृत ग्रन्थों को सुने बिना, बाह्याभ्यन्तर परिग्रह रहित कल्याणकारी मोक्ष-मार्ग की श्रद्धा से दर्शनमोह उपशान्त होने के कारण होनेवाले सम्यक्त्व को मार्ग सम्यक्त्व कहते हैं।
तीर्थंकरादिक उत्कृष्ट पुरुषों के पुराण के उपदेश से उत्पन्न होनेवाले सम्यग्ज्ञान द्वारा जो पुरुष आगम-समुद्र में प्रवीण है; उनके उपदेश से होनेवाली दृष्टि को उपदेश सम्यक्त्व कहते हैं।


आकर्ण्याचारसूत्रं मुनिचरणविधेः सूचनं श्रद्दधानः
सूक्तासौ सूत्रदृष्टिर्दुरधिगमगतेरर्थसार्थस्य बीजैः ।
कैश्चिज्जातोपलब्धेरसमशमवशाद् बीजदृष्टिः पदार्थान्
संक्षेपेणैव बुद्ध्वा रुचिमुपगतवान् साधु संक्षेपदृष्टिः ॥13॥ ॥13॥

अर्थ: मुनियों के आचरण के विधान का प्रतिपादन करनेवाले आचार सूत्रों को सुनने से उत्पन्न होनेवाला श्रद्धान सूत्र सम्यक्त्व कहलाता है । जो यह श्रद्धान करता है, उसे भले प्रकार सूत्रदृष्टिवाला कहा जाता है ।
गणितज्ञान के कारणभूत बीजों की उपलब्धि अर्थात् श्रद्धानरूप परिणति को बीज सम्यक्त्व कहते हैं । यह श्रद्धान दर्शनमोह के उपशम से होता है । इसके द्वारा जिनका जानना अत्यन्त कठिन है - ऐसे पदार्थों के समूह का ज्ञान होता है । इस ज्ञान से युक्त करणानुयोग के ज्ञानी भव्य जीव को बीजदृष्टि होती है । पदार्थों को संक्षिप्त रूप से जानने से होनेवाले श्रद्धान को संक्षेप सम्यक्त्व कहते हैं । इस श्रद्धानयुक्त जीव को भले प्रकार संक्षेपदृष्टि होती है।


यः श्रुत्वा द्वादशाङ्गीं कृतरुचिरथ तं विद्धि विस्तारदृष्टि,
संजातार्थात् कुतश्चित् प्रवचनवचनान्यन्तरेणार्थदृष्टिः ।
दृष्टिः साङ्गाङ्गबाह्यप्रवचनमवगाह्योत्थिता यावगाढः,
कैवल्यालोकितार्थे रुचिरिह परमावादिगाढेति रूढा ॥14॥ ॥14॥

अर्थ: हे भव्य ! तू द्वादशांगरूप वाणी को सुनकर होनेवाली रुचि को विस्तार सम्यक्त्व जान। ऐसी रुचिवाले जीव को विस्तारदृष्टि कहते हैं।
जैन शास्त्रों के वचनों के बिना किसी अर्थ के निमित्त से होनेवाली दृष्टि अर्थदृष्टि है। इसे ही अर्थ सम्यक्त्व जानना चाहिए।
अंग और अंगबाह्य सहित जैन शास्त्रों में अवगाहन करने से उत्पन्न होनेवाली दृष्टि अवगाढ़ दृष्टि है। इसी को अवगाढ़ सम्यक्त्व जानना चाहिए।
केवलज्ञान द्वारा जाने गये पदार्थों का श्रद्धान परमावगाढ़ दृष्टि के नाम से प्रसिद्ध है। इसी को परमावगाढ़ सम्यक्त्व जानना चाहिए।
इसप्रकार सम्यक्त्व के दस भेदों का स्वरूप कहा।


शमबोधवृत्ततपसां पाषाणस्येव गौरवं पुंसः ।
पूज्यं महामणेरिव तदेव सम्यक्त्वसंयुक्तम् ॥15॥ ॥15॥

अर्थ: पुरुष अर्थात् आत्मा का मन्दकषाय रूप उपशम परिणाम, शास्त्राभ्यास रूप ज्ञान, पापों के त्याग रूप चारित्र और अनशनादि रूप तप का महत्ता पत्थर के बोझ समान है अर्थात् विशेष फलदायक नहीं है। किन्तु ये सब यदि सम्यक्त्व सहित हो तो महामणि के गुरुत्व के समान पूज्यनीय हैं, अर्थात् बहुत फल के दाता हैं और महिमा योग्य हैं।


मिथ्यात्वातंकवतो हिताहितप्राप्त्यनाप्तिमुग्धस्य।
वालस्येव तवेयं सुकुमारैव क्रिया क्रियते ॥16॥ ॥16॥

अर्थ: तू मिथ्यात्वरूपी महारोग से युक्त और हित-अहित की प्राप्ति-अप्राप्ति में बालक के समान नासमझ है, इसलिए तुझे यह सरल क्रिया ही करने योग्य है।


विषयविषमाशनोत्थितमोहज्वरजनिततीव्रतृष्णस्य ।
निःशक्तिकस्य भवतः प्रायः पेयाद्युपक्रमः श्रेयान् ॥17॥ ॥17॥

अर्थ: तू विषयरूपी विषम भोजन से उत्पन्न मोहरूपी ज्वर से पैदा होनेवाली तीव्र तृष्णा के कारण शक्तिहीन हो गया है, अतः तुझे अनुक्रम से पेय आदि का ग्रहण ही कल्याणकारी है।


सुखितस्य दुःखितस्य च संसारे धर्मएव तव कार्यः।
सुखितस्य तदभिवृद्ध्यै दुःखभुजस्तदुपघाताय ॥18॥ ॥18॥

अर्थ: (हे जीव !) तू संसार में सुखी हो या दुःखी, तुझे धर्म ही करना योग्य है। जो सुखी है, उसे सुख बढ़ाने के लिए और जो दुःखी है उसे दुःख का नाश करने के लिए धर्म ही करना चाहिए।


धर्मारामतरूणां फलानि सर्वेन्द्रियार्थसौख्यानि ।
संरक्ष्य तांस्ततस्तान्युच्चिनु यैस्तैरुपायैस्त्वम् ॥19॥ ॥19॥

अर्थ: समस्त इन्द्रिय-विषयों के सुख धर्मरूपी बाग के सम्यक्त्व और संयमादिक वृक्षों के फल हैं । इसलिए तू किसी भी उपाय से उन वृक्षों को सुरक्षित रखकर उनके फल को ग्रहण कर ।


धर्मः सुखस्य हेतुर्हेतुर्न विराधकः स्वकार्यस्य ।
तस्मात् सुखभंगभिया मा भूर्धर्मस्य विमुखस्त्वम् ॥20॥ ॥20॥

अर्थ: धर्म सुख का कारण है और जो सुख का कारण होता है, वह अपने कार्य का विरोधी नहीं होता, इसलिए तू सुख-भंग होने का भय करके धर्म से विमुख मत हो।


धर्मादवाप्तविभवो धर्मं प्रतिपाल्य भोगमनुभवतु।
बीजादवाप्तधान्यः कृषीवलस्तस्य बीजमिव ॥21॥ ॥21॥

अर्थ: जिसप्रकार बीज से अन्न प्राप्त करनेवाला किसान उस अन्न के बीज को सुरक्षित रखता है, उसीप्रकार जिस जीव ने धर्म से सुख-सम्पत्ति रूप वैभव प्राप्त किया है, उसे धर्म का पालन करते हुए भोग भोगना चाहिए।


संकल्प्यं कल्पवृक्षस्य चिन्त्यं चिन्तामणेरपि ।
असंकल्प्यमसंचिन्त्यं फलं धर्मादवाप्यते ॥22॥ ॥22॥

अर्थ: कल्पवृक्ष का फल तो संकल्प योग्य वचनों से याचना करने पर मिलता है और चिन्तामणि का फल भी चिन्तवन योग्य मन द्वारा याचना करने पर मिलता है, परन्तु धर्म से ऐसा अद्भुत फल मिलता है, जो संकल्प और चिन्त्वन योग्य नहीं है; अर्थात् उसकी प्राप्ति के लिए संकल्प या चिन्तवन की आवश्यकता नहीं है ।


परिणाममेव कारणमाहुः खलुः पुण्यपापयो प्राज्ञाः।
तस्मात् पापापचयः पुण्योपचयश्च सुविधेयः ॥23॥ ॥23॥

अर्थ: बुद्धिमान् पुरुष निश्चय से आत्मा के परिणाम (भावों) को ही पुण्य-पाप का कारण कहते हैं, इसलिए भले प्रकार से पाप का नाश और पुण्य का संचय करना चाहिए।


कृत्वा धर्मविघातं विषयसुखान्यनुभवन्ति ये मोहात् ।
आच्छिद्य तरून्मूलात् फलानि गृह्णन्ति ते पापाः ॥24॥ ॥24॥

अर्थ: जो जीव मोह या भ्रम के कारण धर्म का घात करते हुए विषय-सुख को भोगते हैं, वे पापी वृक्ष को मूल से उखाड़ कर फलों को ग्रहण करते हैं।


कर्तृत्वहेतुकर्तृत्वानुमतैः स्मरणचरणवचनेषु ।
यः सर्वथाभिगम्यः स कथं धर्मो न संग्राह्यः ॥25॥ ॥25॥

अर्थ: जो धर्म कृत, कारित, अनुमोदना के साथ मन, वचन, काय के द्वारा सर्व प्रकार से प्राप्त करने योग्य है, उसका संग्रह क्यो नहीं करना चाहिए


धर्मो वसेन्मनसि यावदलं स तावत्,
हन्ता न हन्तुरपि पश्य गतेऽथ तस्मिन् ।
दृष्टा परस्पर हतिर्जनकात्मजानां
रक्षा ततोऽस्य जगतः खलु धर्म एव ॥26॥ ॥26॥

अर्थ: हे शिष्य ! तू देख, जब तक मन में धर्म रहता है, तब तक यह जीव अपने घात करनेवाले का भी घात नहीं करता; तथा मन में धर्म न होने पर पिता-पुत्र में भी परस्पर घात क्रिया देखी जाती है । इसलिए यह बात प्रत्यक्ष है कि इस जगत् की रक्षा धर्म से ही है ।


न सुखानुभवात् पापं पापं तद्धेतुघातकारम्भात् ।
नाजीर्णं मिष्टान्नान्ननु तन्मात्राद्यतिक्रमणात् ॥27॥ ॥27॥

अर्थ: जिसप्रकार मिष्टान्न भोजन से अजीर्ण नहीं होता, उसकी मात्रा के उल्लंघन से अजीर्ण होता है; उसीप्रकार सुख भोगने में पाप नहीं है, सुख के कारणभूत धर्म का घात करनेवाले कार्यों का आरम्भ करने से पाप होता है ।


अप्येतन्मृगयादिकं यदि तव प्रत्यक्षदुःखास्पदं
पापैराचरितं पुरातिभयदं सौख्याय संकल्पतः ।
संकल्पं तमनुज्झितेन्द्रियसुखैरासेविते धीधनै-
र्धर्म्ये कर्मणि किं करोति न भवान् लोकद्वयश्रेयसि ॥28॥ ॥28॥

अर्थ: ये शिकारादि कार्य प्रत्यक्ष ही दुःख के स्थान है पापी जीवों द्वारा किये जाते हैं, भविष्य में नरकादि में अत्यन्त भय (दुःख) उत्पन्न करनेवाले हैं । ऐसा होने पर भी तू उनसे सुख-प्राप्ति हेतू मन के उल्लासरूप संकल्प करता है, लेकिन तू ऐसा संकल्प धर्म कार्यों में क्यों नहीं करता ? कैसे हैं वे धर्म-कार्य ? जिन्हें इन्द्रियसुख की प्राप्ति हुई है, ऐसे बुद्धिरूपी धनयुक्त पुरुषों द्वारा किये जाते हैं, और इसलोक-पर-लोक में कल्याणकारी हैं ।


भीतमूर्तीर्गतत्राणा निर्दोषा देहवित्तकाः ।
दन्तलग्नतृणा घ्नन्ति मृगीरन्येषु का कथा ॥29॥ ॥29॥

अर्थ: जिनकी मूर्ति भयवान है (मुख पर भय विद्यमान है), जिनका कोई रक्षक नहीं है, जो निर्दोष हैं, मात्र शरीर ही जिनका धन है और जिनके दातों में तृण लगा है, (जो घास खाकर जीवन यापन करती हैं) ऐसी हिरणियों को भी जो मारते हैं, औरों के प्रति उनकी निर्दयता के बारे में क्या कहा जाये ?


पैशुन्यदैन्यदम्भस्तेयानृतपातकादिपरिहारात् ।
लोकद्वयहितमर्जय धर्मार्थयशःसुखायार्थम् ॥30॥ ॥30॥

अर्थ: हे भव्य ! तू दुष्टता और दीनता, कपट और चोरी, असत्य और हत्या आदि पाप कार्यों का त्याग करके दोनों लोक सम्बन्धी हित का उपार्जन कर ! धर्म, अर्थ, यश, सुख और पुण्य के प्रयोजन से यह कार्य कर ! इसप्रकार हम तुझे प्रेरित करते हैं ।

श्लोक 31 से 60

पुण्यं कुरुष्व कृतपुण्यमनीदृशोऽपि,
नोपद्रवोऽभिभवति प्रभवेच्च भूत्यै ।
संतापयन् जगदशेषमशीतरश्मिः,
पद्येषु पश्य विदधाति विकासलक्ष्मीम् ॥31॥ ॥31॥

अर्थ: हे भव्य ! तुम पुण्य करो, क्योंकि पुण्य करनेवाले को, जिसके समान दूसरा कोई न हो ऐसा उपसर्ग भी पीड़ित नहीं करता । जिसप्रकार जगत् को आताप देनेवाला सूर्य कमलों को विकासरूप लक्ष्मी प्रदान करता है, उसीप्रकार वह उपसर्ग तुझे विभूति का कारण हो जाता है ।


नेता यत्र वृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुरा सैनिकाः,
स्वर्गो दुर्गमनुग्रहः खलु हरेरैरावणो वारणः ।
इत्याश्चर्यबलान्वितोऽपि बलभिद्भग्नः परैः संगरे,
तद्व्यक्तं ननु दैवमेव शरणं धिग्धिग्वृथा पौरुषम् ॥32॥ ॥32॥

अर्थ: वृहस्पति जिसका मन्त्री है, वज्र जिसका हथियार है, देव जिसके सैनिक है, स्वर्ग जिसका गढ़ है, हरि अर्थात् ईश्वर का अनुग्रह जिसका सहायक है, ऐरावत हाथी जिसके पास है - ऐसा आश्चर्यजनक बलवान इन्द्र भी युद्ध में दूसरों से हार गया । इससे निश्चित होता है कि दैव ही शरण सहाय है । निष्फल पुरुषार्थ को धिक्कार है, धिक्कार है ।


भर्तारः कुलपर्वता इव भुवो मोहं विहाय स्वयं,
रत्नानां निधयः पयोधय इव व्यावृत्तवित्तस्पृहाः ।
स्पृष्टाः कैरपि नो नभो विभुतया विश्वस्य विश्रान्तये,
सन्त्यद्यापि चिरन्तनान्तिकचराः सन्तः कियन्तोऽप्यमी ॥33॥ ॥33॥

अर्थ: चिरकालवर्ती महामुनियों के मार्ग पर चलनेवाले शिष्य आज भी प्रत्यक्ष देखे जाते हैं । वे सत्पुरुष, कुलाचल (पर्वत) के समान पृथ्वी के स्वामी हैं । जिसप्रकार पर्वत पृथ्वी को धारण करता है परन्तु उसके प्रति मोह से रहित होता है, उसीप्रकार सत्पुरुष पृथ्वी में स्थित जीवों का पोषण करते हैं, परन्तु उनके प्रति मोह से रहित हैं । जिसप्रकार समुद्र मोती आदि रत्नों की खान होने पर भी धन की अभिलाषा से रहित हैं, उसीप्रकार वे सन्त पुरुष भी सम्यग्दर्शन आदि रत्नों की खान होने पर भी धन आदि की अभिलाषा से रहित हैं । और कैसे हैं सत्पुरुष ? आकाश के समान अस्पर्शी हैं और सबसे बड़े होने से जगत् के जीवों के लिए विश्राम के स्थान हैं । जिसप्रकार आकाश किसी पदार्थ से लिप्त नहीं है और अखण्डरूप से सर्व जगत् के रहने का स्थान है, उसीप्रकार वे सन्त पुरुष किसी परभाव से लिप्त नहीं हैं और महानपने से सर्व जगत् के दुःख दूर करने के स्थान हैं ।


पिता पुत्रं पुत्रः पितरमभिसंधाय बहुधा ।
विमोहादीहेते सुखलवमवाप्तुं नृपपदम् ॥
अहो मुग्धो लोको मृतिजननदंष्ट्रान्तरगतो ।
न पश्यत्यश्रान्तं तनुमपहरन्तं यमममुम् ॥34॥ ॥34॥

अर्थ: मोह के कारण जिसमें सुख का अंश भासित होता है - ऐसे राजपद की अभिलाषा से पिता पुत्र को और पुत्र पिता को ठगता है । अहो ! बड़ा आश्चर्य है कि मूर्ख लोग जन्म-मरण रूपी दाढ़ के मध्य में स्थित, शरीर को निरंतर हरण करने वाले यम को नहीं देखते हैं ।


अन्धादयं महानन्धो विषयान्धीकृतेक्षणः ।
चक्षुषाऽन्धो न जानाति विषयान्धो न केनचित् ॥35॥ ॥35॥

अर्थ: जिसके सम्यग्ज्ञानरूपी नेत्र विषयों से अन्धे हो रहे हैं, वह अन्धों से भी महा अन्ध है; क्योंकि जो अन्धा है वह मात्र नेत्रों से ही नहीं जान पाता, परन्तु जो विषयों से अन्धा है वह किसी भी इन्द्रिय से नहीं जानता।


आशागर्तः प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपमम् ।
कस्य किं कियदायाति वृथा वो विषयैषिता । ॥36॥ ॥36॥

अर्थ: अहो प्राणी ! प्रत्येक प्राणी में आशारूपी गड्ढा इतना गहरा है कि जिसमें तीन लोक की विभूति अणु के समान सूक्ष्म है । यदि तीन लोक की विभूति एक प्राणी को मिल जाये तो भी उसकी तृष्णा शान्त नहीं होगी, तो फिर बँटवारे में किसको कितनी विभूति मिलेगी, (कि सबकी तृष्णा शान्त हो जाये) इसलिए तेरी विषयों की इच्छा व्यर्थ है ।


आयुः श्रीवपुरादिकं यदि भवेत् पुण्यं पुरोपार्जितं,
स्यात् सर्वं न भवेन्न तच्च नितरामायातितेऽप्यात्मनि।
इत्यार्याः सुविचार्य कार्यकुशलाः कार्येऽत्र मंदोद्यमा,
द्रागागामिभवार्थमेव सततं प्रीत्या यतन्तेतराम् ॥37॥ ॥37॥

अर्थ: इस जीव को देव-मनुष्य आदि भवों में दीर्घायु, लक्ष्मी, सुन्दर शरीरादि पूर्वजन्म में उपार्जित पुण्य से होते हैं । जिसने पुण्योपार्जन किया है, उसे सभी अनुकूलतायें होती हैं । यदि पूर्वकृत पुण्य न हो तो अनेक प्रयत्न करके खेद करने पर भी कुछ भी अनुकूलता नहीं होती । इसलिए कार्यकुशल पुरुष भलीभाँति विचार करके वर्तमान भव सम्बन्धी कार्य में मन्द उद्यमी होते हैं और आगामी भव के कार्य में तत्काल प्रीति सहित निरन्तर अत्यन्त प्रयत्न करते हैं ।


कः स्वादो विषयेष्वसौ कटुविषप्रख्येष्वलं दुःखिना,
यानन्वेष्टुमिव त्वयाऽशुचिकृतं येनाभिमानामृतम् ।
आज्ञातं करणैर्मनः प्रणिधिभिः पित्तज्वराविष्टवत्,
कष्टं रागरसैः सुधीस्त्वमपि सन् व्यत्यासितास्वादनः ॥38॥ ॥38॥

अर्थ: जिनकी तृष्णा से अत्यन्त दुःखी होकर इन्हें भोगने के लिए तूने अपनी महानता रूपी अमृत को मलिन किया और मन की सेवक इन्द्रियों का आज्ञाकारी होकर इनमें प्रवृत्ति की, उन कड़वे विष के समान विषयों में क्या स्वाद है ? जिसप्रकार पित्त ज्वर से आक्रान्त व्यक्तियों को वस्तु का स्वाद विपरीत भासित होता है, उसीप्रकार परन्तु बुद्धिमान् होते हुए भी विषयाभिलाषा के कारण तुझे रागरस के कारण विषयों का विपरीत स्वाद आता है (अर्थात् उनका कटुक स्वाद मधुर लगता है) - यह अत्यन्त कष्ट की बात है ।


अनिवृत्तेर्जगत्सर्वं मुखादवशिनष्टि यत् ।
तत्तस्याशक्तितो भोक्तुं वितनोर्भानुसोमवत् ॥39॥ ॥39॥

अर्थ: निवृत्ति रहित होने से तू सर्व जगत् की माया अंगीकार करने की अभिलाषा रखता है, इसलिए भावों से तो तूने कुछ भी नहीं छोड़ा। जिसप्रकार राहु, सूर्य और चन्द्रमा को निगलना चाहता है, परन्तु निगल नहीं पाया, इसलिए वे बच गये। उसीप्रकार तेरे मुख से जो कुछ भी बचा है वह तेरी भोजन करने में अशक्ति (ग्रहण करने की क्षमता में कमी) के कारण बचा है।


साम्राज्यं कथमप्यवाप्य सुचिरात् संसारसारं पुनः,
तत्त्यक्त्वैव यदि क्षितीश्वरवराः प्राप्ताः श्रियं शाश्वतीम्।
त्वं प्रागेव परिग्रहान् परिहर त्याज्यान् गृहीत्वापि ते,
मा भूभौंतिकमोदकव्यतिकरं संपाद्य हास्यास्पदम् ॥40॥ ॥40॥

अर्थ: हे भव्य ! किसी पुण्य के उदय से संसार में सारभूत (सर्वश्रेष्ठ) चक्रवर्ती पद को चिरकाल भोगकर भी पूर्व में बड़े-बड़े राजाओं ने शाश्वत निर्वाणपद को प्राप्त किया, अत: परिग्रह त्याग को ही निर्वाण पद का कारण जानकर तू परिग्रह का त्याग करके कुमारावस्था में ही मुनिपद धारण कर । बाल-ब्रह्मचर्य के समान श्रेष्ठ अन्य कोई नहीं है । यह परिग्रह, त्याग करने योग्य ही है । जिन्होंने चक्रवर्ती पद भोगा उनने भी उसका त्याग किया तभी वे मुक्त हुए । जो राज्य नहीं करते और विवाह नहीं करते उनके समान और कोई नहीं है । यदि तू सोचता है कि पहले परिग्रह ग्रहण करूँगा, फिर त्याग करूँगा तो तू कीचड़ में पड़े हुए लड्डू को उठानेवाले भेषधारी के समान लोक में हास्यास्पद मूर्खता मत कर ।


सर्वं धर्ममयं क्वचित् क्वचिदपि प्रायेण पापात्मकं,
क्वाप्येतद् द्वयवत्करोति चरितं प्रज्ञाधनानामपि ।
तस्मादेष तदन्धरज्जुवलनं स्नानं गजस्याथवा,
मत्तोन्मत्तविचेष्टितं न हि हितो गेहाश्रमः सर्वथा ॥41॥ ॥41॥

अर्थ: यह गृहस्थाश्रम इस जीव का कल्याण करने वाला सर्वथा नहीं है। जिसप्रकार मतवाला व्यक्ति अनेक प्रकार की उन्मत्त चेष्टायें करता है, उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम बुद्धिमान् पुरुषों के भी अनेक प्रकार के चरित्र करता है। कभी तो सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रोषधोपवास आदि से जीव को धर्ममय करता है; कभी स्त्री-सेवनादि द्वारा पापमय करता है और कभी पूजा, प्रभावना, तीर्थयात्रा, चैत्य-चैत्यालय निर्माण इत्यादि कार्यों द्वारा पुण्य-पाप दोनों रूप करता है। इसलिए यह गृहस्थाश्रम अन्धे द्वारा रस्सी बुनने जैसी या गज-स्नान करने जैसी पागलों की चेष्टा है।


कृष्ट्वोप्त्वा नृपतीन्निषेव्य बहुशो भ्रान्त्वा वनेऽम्भोनिधौ
किं क्लिश्नासि सुखार्थमत्र सुचिरं हा कष्टमज्ञानतः ।
तैलं त्वं सिकतास्वयं मृगयसे वाञ्छेद्विषाज्जीवितुं
नन्वाशाग्रहनिग्रहात्तव सुखं न ज्ञातमेतत् त्वया ॥42॥ ॥42॥

अर्थ: हे जीव ! तू इस गृहस्थाश्रम में सुख के लिए चिरकाल से व्यर्थ क्लेश करता है, परन्तु इसमें सुख नहीं है । तू हल से खेत जोतकर बीज बोता है, खड्ग धारण करके राजा आदि की सेवा करता है, लेखन वृत्ति से उद्यम करता है, व्यापार के लिए वन और समुद्र में भटकता है । तूने अज्ञान के कारण चिरकाल से ये कष्ट सहन किये है । हाय-हाय ! तेरी यह चेष्टा बालू में से तेल निकालने के समान और विष से जीवित रहने के समान है । अहो प्राणी ! तुझे आशारूपी ग्रह शान्त करने से ही सुख होगा, तृष्णा से नहीं - ऐसा न जानकर अज्ञानी होता हुआ तू व्यर्थ परिश्रम करता है ।


आशाहुताशनग्रस्त- वस्तूच्चैर्वंशजां जनाः ।
हा किलैत्य सुखच्छायां दुःखघर्मापनोदिनः ॥43॥ ॥43॥

अर्थ: आशारूपी अग्नि से दग्ध तथा कनक-कामिनी आदि वस्तुओं को निश्चय से भला जाननेवाला व्यक्ति गर्मी में शीतलता प्राप्त करने के लिए बाँस की छाया ग्रहण करता है, परन्तु उसका यह प्रयास व्यर्थ है क्योंकि उससे धूप की गर्मी नहीं मिटती।


क्षारं वार्युदगात्तदप्युपहतं पूति कृमिश्रेणिभिः,
शुष्कं तच्च पिपासतोऽस्य सहसा कष्टं विधेश्चेष्टितम् ॥44॥ ॥44॥

अर्थ: विधि की चेष्टा (कर्मों की उदयागति) कष्टदायक है । वास्तव में इस प्यासे की प्यास कभी नहीं बुझती, (अर्थात् तृष्णा की पूर्ति कभी नहीं होती) किसी व्यक्ति ने जल-प्राप्ति की आशा से कुँआ खोदना प्रारम्भ किया, खोदते हुए जमीन में शिला निकली तब भी वह पाताल तक कुँआ खोदता गया । अत्यन्त कष्ट सहने के बाद उसे दुर्गन्धयुक्त, खारा और कीड़ों से भरा थोड़ा-सा जल मिला और वह भी तत्काल सूख गया । अतः ऐसे उद्यम (पुरुषार्थ) से क्या लाभ है ?


शुद्धैर्धनैर्विवर्धन्ते सतामपि न संपदः ।
नहि स्वच्छाम्बुभिः पूर्णाः कदाचिदपि सिन्धवः ॥45॥ ॥45॥

अर्थ: जिसप्रकार निर्मल जल से कभी भी समुद्र पूरा नहीं भरता उसीप्रकार अहो प्राणी ! न्यायोपार्जित धन से सज्जनों की भी सम्पदा नहीं बढ़ती है ।


स धर्मो यत्र नाधर्मस्तत्सुखं यत्र नासुखम् ।
तज्ज्ञानं यत्र नाज्ञानं सा गतिर्यत्र नागतिः ॥46॥ ॥46॥

अर्थ: धर्म वही है, जिसमें अधर्म नहीं; सुख वही है, जिसमें दुःख नहीं; ज्ञान वही है, जिसमें अज्ञान नहीं और गति वही है, जिसमें आगति (पुनरागमन) नहीं।


तच्चेष्टितं यदि सकृत् परलोकबुद्ध्या
न प्राप्यते ननु पुनर्जननादि दुःखम् ॥47॥ ॥47॥

अर्थ: हे विषय-लोलुपी ! विचार हीन !! इस लोक में धनोपार्जन के लिए असि, मसि, कृषि, वाणिज्यादि प्रयत्नों से तू जो कष्ट बारम्बार करता है, यदि एक बार पर-लोक के लिए ऐसा प्रयत्न करे तो तुझे जन्म-मरणादि दुःख न होंगे। अतः तू धन का साधन छोड़कर धर्म का साधन कर।


संकल्प्येदमनिष्टमिष्टमिदमित्यज्ञात याथात्म्यको
बाह्ये वस्तुनि किं वृथैव गमयस्यासज्य कालं मुहुः ।
अन्तः शान्तिमुपैहि यावददयप्राप्तान्तकप्रस्फुर-
ज्ज्वालाभीषणजाठरानलमुखे भस्मीभवेन्नो भवान् ॥48॥ ॥48॥

अर्थ: हे जीव ! तू वस्तु का यथार्थ स्वरूप न जानकर ‘यह इष्ट है’ और ‘यह अनिष्ट है’ - ऐसी कल्पना करके बाह्य वस्तुओं में आसक्त होकर व्यर्थ ही काल क्यों गँवाता है । जब तक निर्दय काल उदय को प्राप्त होकर अपनी दैदीप्यमान ज्वालाओं के भयानक मुख में तुझे भस्म न कर ले उससे पहले ही तू अन्तरंग में राग-द्वेष त्याग कर परम शान्त दशा प्राप्त कर ले ।


आयातोऽस्यतिदूरमङ्ग परवानाशासरित्प्रेरितः,
किं नावैषि ननु त्वमेव नितरामेनां तरीतुं क्षमः ।
स्वातन्त्र्यं व्रज यासि तीरमचिरान्नो चेद् दुरन्तान्तक-
ग्राहव्याप्तगभीरवक्त्रविषमे मध्ये भवाब्धेर्भवेः ॥49॥ ॥49॥

अर्थ: हे मित्र ! तू पर-वस्तुओं का अभिलाषी होता हुआ आशारूपी नदी के प्रवाह में बहते-बहते अनादिकाल से अनन्त जन्म धारण करते हुए बहुत दूर से आया है । क्या यह तू नहीं जानता कि इस आशारूपी नदी से पार होने का आत्मज्ञान के अलावा और कोई उपाय नहीं है ? तथा तू स्वयं ही उससे तिरने में समर्थ है; इसलिए अब शीघ्र ही स्वाधीन होकर आशारूपी नदी को तैर कर उस पार हो जा, नहीं तो इस नदी में बहते-बहते भव समुद्र में डूब जाएगा। यह भवसागर दुःखमय अन्तवाले कालरूपी मगरमच्छ के विशाल मुख के कारण अत्यन्त भयानक है ।


आस्वाद्याद्य यदुज्झितं विषयिभिर्व्यावृत्तकौतूहलै-
स्तद्भूयोऽप्यविकुत्सयन्नभिलषस्यप्राप्तपूर्वं यथा ।
जन्तो ! किं तव शान्तिरस्ति न भवान् यावद्दुराशामिमा-
मंहः संहतिवीरवैरिपृतनाश्रीवैजयन्तीं हरेत् ॥50॥ ॥50॥

अर्थ: इस संसार में भोगों को भोग लेने के कारण कौतूहल नष्ट हो जाने से विषयी जीवों ने जिन पदार्थों को भोगकर छोड़ दिया है, तू उन पदार्थों की अभिलाषा करता है और उनमें तू ऐसा रागी हो गया है कि मानो पूर्व में तुझे कभी ये विषय नहीं मिले हों; जबकि तूने इन्हें अनन्त बार भोगा है और अनन्त जीवों ने भी इन्हें अनन्त बार भोगा है; तो भी तुझे इनसे घृणा नहीं होती। दूसरों की तथा अपनी उच्छिष्ट (उल्टी से निकला हुआ भोजन) से सबको घिन आती है। इन विषयों से तुझे तथा अन्य जीवों को कब शान्ति मिली है ? कभी नहीं अतः जब तक तू अपराधों के समूहरूप प्रबल शत्रु की सेना की विजय-पताका के समान इस दुष्ट आशा को नहीं जीत लेगा, तब तक तुझे शान्ति नहीं मिलेगी।


भङ्क्त्वा भाविभवांश्च भोगिविषमान् भोगान् बुभुक्षुर्भृशं
मृत्वापि स्वयमस्तभीतिकरुणः सर्वाङ्घिघांसुर्मुधा ।
यद्वत् साधुविगर्हितं हतमतिस्तस्यैव धिक् कामुकः
कामक्रोधमहाग्रहाहितमनाः किं किं न कुर्याज्जनः ॥51॥ ॥51॥

अर्थ: हे जीव ! तू काले नाग के समान प्राणघातक भोगों को भोगने की अति अभिलाषा से अपनी होनहार (भविष्य के भव को) बिगाड़ कर अपण्डित मरण करके व्यर्थ ही सुखों का घात करता है। तू अविवेकी, पर-लोक के भय से रहित, निर्दय, कठोर परिणामी तथा सज्जनों द्वारा निंद्य वस्तुओं का अभिलाषी हो रहा है। जिनका मन काम-क्रोध रूपी महाग्रहों के वश में है - ऐसे प्राणी क्या-क्या नहीं करते, सभी अकार्य करते हैं। कामी पुरुषों को धिक्कार है।


श्वो यस्याजनि यः स एव दिवसो ह्यस्तस्य संपद्यते
स्थैर्यं नाम न कस्यचिज्जगदिदं कालानिलोन्मूलितम्।
भ्रातर्भ्रान्तिमपास्य पश्यसि तरां प्रत्यक्षमक्ष्णोर्न किं
येनात्रैव मुहुर्मुहुर्बहुतरं बद्धस्पृहो भ्राम्यसि ॥52॥ ॥52॥

अर्थ: हे भाई ! तू भ्रम छोड़ ! क्या तुझे आँखों से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, कि यह जगत् कालरूपी पवन के द्वारा निर्मूल किया जाता है। यहाँ कोई रञ्चमात्र भी स्थिर नहीं है। जो दिवस (प्रातः) उदित होता है वही अस्त को प्राप्त होता है इसलिए तू बारम्बार जगत् की आशा रखकर भ्रमण क्यों करता है?


संसारे नरकादिषु स्मृतिपथेप्युद्वेगकारिण्यलं,
दुःखानि प्रतिसेवितानि भवता तान्येवमेवासताम् ।
तत्तावत्स्मर सस्मरस्मितशितापाङ्गैरनङ्गायुधै-
र्वामानां हिमदग्धमुग्धतरुवद्यत्प्राप्तवान् निर्धनः ॥53॥ ॥53॥

अर्थ: हे जीव! इस संसार में नरकादि योनि में तूने जो अत्यन्त दुःख भोगे हैं, उनके स्मरण मात्र से आकुलता उत्पन्न होती है; उन दुःखों की बात तो दूर, इस मनुष्य भव में ही तू जो दुःख भोग रहा है, उनका ही विचार कर ले ! तू निर्धन होकर भी अनेक प्रकार के भोगों का अभिलाषी है और कामासक्त स्त्रियों के द्वारा मन्द हास्य तथा उनके तीक्ष्ण कटाक्षरूपी काम-बाणों से घायल होकर तेरी दशा दाह-ग्रस्त बाल-वृक्ष (कोमल पौधे) के समान हो रही है ।


उत्पन्नोऽस्यसिदोषधातुमलवद्देहोऽसि कोपादिवान्,
साधिव्याधिरसि प्रहीणचरितोऽस्यस्यात्मनो वञ्चकः।
मृत्युव्यात्तमुखान्तरोऽसि जरसा ग्रास्योऽसि जन्मिन्!वृथा,
किं मत्तोऽस्यसि किं हितारिरहिते किं वासि बद्धस्पृहः ॥54॥ ॥54॥

अर्थ: हे अनन्त जन्मों को धारण करनेवाले अज्ञानी जीव ! तूने इस संसार में अनेक योनियों में उत्पन्न होकर धातु और मल से निर्मित महादोषरूप देह धारण की है । क्रोध, मान, माया और लोभ के कारण तू मन की चिंताओं तथा तन की व्याधियों से पीड़ित है । तू अभक्ष्य-भक्षण आदि हीन और अयोग्य आचरण करनेवाला दुराचारी होकर अपने आप को ठग रहा है । तू जन्म-मरण के मुख में पड़ा है, जरा (बुढ़ापा) से ग्रस्त है । मोह से व्यर्थ ही उन्मत्त हो रहा है । क्या तू आत्म-कल्याण का शत्रु है ? यदि नहीं तो फिर तू अकल्याण की कामना क्यों कर रहा हैं ?


उग्रग्रीष्मकठोर- घर्मकिरणस्फूर्जद्गभस्तिप्रभैः
संतप्तः सकलेन्द्रियैरयमहो संवृद्धतृष्णो जनः ।
अप्राप्याभिमतं विवेकविमुखः पापप्रयासाकुल-
स्तोयोपान्तदुरन्तकर्दमगतक्षीणोक्षवत् क्लिश्यते ॥55॥ ॥55॥

अर्थ: यह प्राणी विवेक से विमुख होता हुआ इन्द्रिय-विषयों से तप्तायमान हो रहा है। मनोवाञ्छित वस्तुओं को न पाकर अति-तृष्णा से पीड़ित होता हुआ अनेक पापरूप उपायों से व्याकुल होता है। कीचड़ में फँसे हुए बूढ़े बैल के समान दुःखी होता है। ये इन्द्रियाँ उग्र ग्रीष्म ऋतु के प्रचन्ड सूर्य की तप्त किरणों के समान आतापकारी हैं।


लब्धेन्धनोज्वलत्यग्निः प्रशाम्यति निरन्धनः
ज्वलत्युभयथाप्युच्चैरहो मोहाग्निरुत्कटः ॥56॥ ॥56॥

अर्थ: हे भव्य जीव ! ईधन की उपलब्धि से अग्नि प्रज्जवलित होती है और ईधन के अभाव में बुझ जाती है, परन्तु यह मोहरूपी अति प्रबल अग्नि परिग्रहरूपी ईंधन की उपलब्धि से तृष्णारूप होकर और परिग्रह के अभाव में व्याकुलतारूप होकर प्रज्जवलित होती है । यह दोनों स्थिति में प्रज्जवलित होती है, इसलिए मोहाग्नि के समान और कोई अग्नि नहीं है ।


किं मर्माण्यभिनन्न भीकरतरो दुष्कर्मगर्मुद्गणः,
किं दुःखज्वलनावलीविलसितैर्नालेढि देहश्चिरम् ।
किं गर्जद्यमतूरभैरवरवान्नाकर्णयन्निर्णयं,
येनायं न जहाति मोहविहितां निद्रामभद्रां जनः ॥57॥ ॥57॥

अर्थ: क्या जीव के मर्मस्थल को भेदता हुआ पापकर्मरूपी मुन्दर अत्यन्त भयानक नहीं है ? सर्वथा भयानक ही है । क्या दुःखरूपी अग्नि के प्रज्वलित होने पर देह नहीं जलती ? अवश्य जलती है । क्या यह जीव गजरते हुए यमराज के वाद्यों के भयंकर शब्द नहीं सुनता है ? सदा सुनता है । फिर यह भोंदू (मूर्ख) अकल्याणरूप मोह-निद्रा को क्यों नहीं छोड़ता ?


तादात्म्यं तनुभिः सदानुभवनं पाकस्य दुष्कर्मणो,
व्यापारः समयं प्रति प्रकृतिभिर्गाढं स्वयं बन्धनम् ।
निद्रा विश्रमणं मृतेः प्रतिभयं शश्वन्मृतिश्च ध्रुवं,
जन्मिन ! जन्मनि ते तथापि रमसे तत्रैव चित्रं महत् ॥58॥ ॥58॥

अर्थ: निरन्तर जन्म-मरण धारण करनेवाले हे संसारी जीव ! इस संसार में वास्वत में अनेक दुःख हैं, तो भी तू इस संसार में ही अनुराग करता है - यह बड़े आश्चर्य की बात है । जरा इन दुःखों का विचार तो कर ! जिस शरीर से तेरा सम्बन्ध है, वह महाक्लेश का कारण है । तू सदा एक देह को छोड़कर दूसरी देह धारण करता है और निरन्तर पाप कर्म के फलरूप दुःख को भोगता है । तू प्रतिसमय कर्म प्रकृतियों से बँधने का ही व्यापार स्वयं करता है । निद्रा आने पर विश्राम करता है, काल से डरते हुए भी निश्चितरूप से मरण को प्राप्त करता है ।


अस्थिस्थूलतुलाकलापघटितं नद्धं शिरास्नायुभि-
श्चर्माच्छादितमस्रसान्द्रपिशितैर्लिप्तं सुगुप्तं खलैः ।
कर्मारातिभिरायुरुद्घनिगलालग्नं शरीरालयं
कारागारमवैहि ते हतमते प्रीतिं वृथा मा कृथाः ॥59॥ ॥59॥

अर्थ: हे बुद्धिहीन ! तू बन्दीगृह के समान इस शरीर से व्यर्थ प्रीति मत कर ! यह शरीररूपी बन्दीगृह, अस्थिरूपी स्थूल पाषाणों के समूह द्वारा बनाया गया है, नसों के जालरूप रस्सियों से बँधा है, चमड़े से ढका है, रुधिर सहित गीले माँस से लिप्त है, दुष्ट कर्मरूपी शत्रुओं द्वारा निर्मित है और आयुकर्मरूपी प्रगाढ़ तथा भारी (वजनदार) बेड़ियों से युक्त है ।


शरणमशरणं वो बन्धवो बन्धमूलं,
चिरपरिचितदारा द्वारमापद्गृहाणाम् ।
विपरिमृशत पुत्राः शत्रवः सर्वमेतत्,
त्यजत भजत धर्मं निर्मलं शर्मकामाः ॥60॥ ॥60॥

अर्थ: जहाँ तुझे कोई बचानेवाला नहीं - ऐसा घर शरण रहित है, बन्धुजन बन्ध के मूल है, तेरी अति परिचित स्त्री आपदारूप घर का द्वार है और पुत्र शत्रु है - इसप्रकार यह सर्व परिवार दुःख का ही कारण है। यदि तू सुख चाहता है तो इन सबका स्वरूप विचार कर इन्हें छोड़ और निर्मल धर्म को भज।

श्लोक 61 से 90

किं मोहाहिमहाबिलेन सदृशा देहेन गेहेन वा
देहिन् याहि सुखाय ते सममुं मा गाः प्रमादं मुधा ॥61॥ ॥61॥

अर्थ: हे प्राणी ! तू व्यर्थ ही प्रमाद मत कर ! सुखी होने के लिए समभाव को धारण कर । आशारूपी अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ईंधन के समान धन से तुझे क्या लाभ है ? हे मित्र ! निरन्तर पाप उत्पन्न करनेवाले इन बन्धुओं और सम्बन्धियों से ममत्व करने से तुझे क्या लाभ है ? और महामोहरूपी सर्प के बिल के समान इस देह या घर से तुझे क्या लाभ है ? सुख की प्राप्ति के लिए तू केवल समभाव को धारण कर । प्रमादी होकर व्यर्थ ही रागादिभावरूप परिणमन मत कर ।


आदावेव महाबलैरविचलं पट्टेन बद्धा स्वयं,
रक्षाध्यक्षभुजासिपञ्जरवृता सामन्तसंरक्षिता ।
लक्ष्मीर्दीपशिखोपमा क्षितिमतां हा पश्यतां नश्यति,
प्रायः पातितचामरानिलहतेवान्यत्र काऽशा नृणाम् ॥62॥ ॥62॥

अर्थ: हाय - हाय ! दीप-शिखा के समान तथा ढुरते हुए चँवरों के समान अति चंचल यह राज्य-लक्ष्मी भी पवन के समान देखते-देखते ही विलीन हो जाती है, तो फिर साधारण मनुष्यों की लक्ष्मी के स्थिर रहने की क्या आशा की जाये ? इस राज्य लक्ष्मी को चञ्चल जानकर बलवान पुरुष स्वयं पट्ट-बन्ध बाँधने के बहाने इसे निश्चल करते हैं तथा रक्षाधिकारी सामन्तों की खड्ग सहित भुजाओं रूपी वज्रपंजर से इसकी रक्षा की जाती है, तो भी यह स्थिर नहीं रहती ; देखते ही देखते नष्ट हो जाती है ।


दीप्तो भयाग्रवातारिदारूदरगकीटवत् ।
जन्ममृत्युसमाश्लिष्टे शरीरे बत सीदसि ॥63॥ ॥63॥

अर्थ: जिसप्रकार दोनों ओर से जलती हुई एरन्ड की लकड़ी के बीच स्थित कीड़ा, अति खेद-खिन्न होता है, उसी प्रकार जन्म-मरण से व्याप्त इस शरीर में तू खेद-खिन्न होता है।


नेत्रादीश्वरचोदितः सकलुषो रूपादिविश्वाय किं,
प्रेष्यः सीदसि कुत्सितव्यतिकरैरंहांस्यलं बृंहयन् ।
नीत्वा तानि भुजिष्यतःपकलुषो विश्वं विसृज्यात्मवा-
नात्मानं धिनु सत्सुखी धुतरजाः सद्वृत्तिर्भिनिर्वृतः ॥64॥ ॥64॥

अर्थ: हे जीव ! तू कर्मोदय के वश होकर नेत्रादि इन्द्रियों से प्रेरित होता हुआ रूपादि समस्त विषयों की प्राप्ति के लिए खेद-खिन्न होकर अति व्याकुल क्यों हो रहा है ? तू इन इन्द्रियों का गुलाम होकर विषयों को भोगने में अनेक दुराचरण करके पाप को बढ़ाता हुआ अनन्त भवों में दुःखी हुआ । अब आकुलता छोड़कर ज्ञानी होकर समस्त विषयों का त्याग करके ध्यानामृत से आत्मा को पुष्ट करके सुखी हो । मोहरज को धोकर उत्तम वृत्ति धारण कर और निवृत्त हो जा ।


अर्थिनो धनमप्राप्य धनिनोप्यवितृप्तितः ।
कष्टं सर्वेंऽपि सीदन्ति परमेको मुनिः सुखी ॥65॥ ॥65॥

अर्थ: सभी वस्तुओं के अभिलाषी निर्धन, धर्न रहित होने से महादुःखी हैं और जो धनवान हैं, वे भी तृप्ति रहित होने से तृष्णा के कारण महादुःखी हैं । इसप्रकार जगत् के सभी जीव दुःखी हैं ।
वास्तव में विचार करें तो सन्तोषी महामुनि ही महासुखी हैं । पराधीन सुख से स्वाधीन दुःख ही श्रेष्ठ है, यदि ऐसा न हो तो तपस्वी मुनियों को सुखी कैसे कहा जाए ?


परायत्तात् सुखाद् दुःखं स्वायत्तं केवलं वरम् ।
अन्यथा सुखिनामानः कथमासंस्तपस्विनः ॥66॥ ॥66॥

अर्थ: सभी वस्तुओं के अभिलाषी निर्धन, धर्न रहित होने से महादुःखी हैं और जो धनवान हैं, वे भी तृप्ति रहित होने से तृष्णा के कारण महादुःखी हैं । इसप्रकार जगत् के सभी जीव दुःखी हैं ।
वास्तव में विचार करें तो सन्तोषी महामुनि ही महासुखी हैं । पराधीन सुख से स्वाधीन दुःख ही श्रेष्ठ है, यदि ऐसा न हो तो तपस्वी मुनियों को सुखी कैसे कहा जाए ?


यदेतत्स्वच्छन्दं विहरणमकार्पण्यमशनं,
सहायैः संवासः श्रुतमुपशमैकश्रमफलम् ।
मनो मन्दस्पन्दं बहिरपि चिरायाति विमृशन्,
न जाने कस्येयं परिणतिरुदारस्य तपसः ॥67॥ ॥67॥

अर्थ: मुनियों की क्या महिमा कही जाए ? वे स्वाधीन विहार करते हैं, दीनता रहित भोजन करते हैं और मुनिसंघ में वास करते हैं । उनके मन का वेग मन्द हो गया है, जिससे शान्त भावों को प्राप्त करके वे निरन्तर आत्मविचार में लीन रहते हुए कभी-कभी बाह्य क्रियायें करते हैं । उनकी ऐसी परमदशा किस उदार (महान्) तप की परिणति है - हम नहीं जानते ।


विरतिरतुला शास्त्रे चिन्ता तथा करुणा परा,
मतिरपि सदैकान्तध्वान्तप्रपञ्चविभेदनी ।
अनशनतपश्चर्या चान्ते यथोक्तविधानतो,
भवति महतां नाल्पस्येदं फलं तपसो विधेः ॥68॥ ॥68॥

अर्थ: अतुल वैराग्य, शास्त्र का चितवन, सर्वोत्कृष्ट सर्व जीव दया, एक नय के हठाग्रह स्वरूप एकान्तवाद रूपी महा-अन्धकार के विस्तार को नष्ट करने के लिए सूर्य की किरण के समान बुद्धि, तथा अन्त समय में शास्त्रोक्त विधि से अनशन पूर्वक शरीर त्याग आदि क्रियायें सत्पुरुषों को अल्प तप का नहीं, अपितु महातप का फल है ।


उपायकोटिदूरक्षे स्वतस्तत इतोऽन्यतः,
सर्वतः पतनप्राये काये कोऽयं तवाग्रहः ॥69॥ ॥69॥

अर्थ: हे प्राणी ! करोड़ों उपायों से स्वयं के द्वारा या अन्य के द्वारा जिसकी रक्षा नहीं की जा सकती, तुझे ऐसे शरीर की रक्षा करने का आग्रह क्यों है ? जिस प्रकार डाभ की अनी पर पड़ी ओस की बूँद का पतन अवश्य होगा, उसीप्रकार इस शरीर का पतन भी अवश्य होगा । यह आयु और शरीर दोनों विनाशीक हैं । इनका ममत्व छोड़कर अविनाशी पद प्राप्त करने का अवसर तुझे सहज प्राप्त हुआ है ।


अवश्यं नश्वरैरेभिरायुःकायादिभिर्यदि ।
शाश्वतं पदमायाति मुधाऽऽयातमवेहि ते ॥70॥ ॥70॥

अर्थ: हे प्राणी ! करोड़ों उपायों से स्वयं के द्वारा या अन्य के द्वारा जिसकी रक्षा नहीं की जा सकती, तुझे ऐसे शरीर की रक्षा करने का आग्रह क्यों है ? जिस प्रकार डाभ की अनी पर पड़ी ओस की बूँद का पतन अवश्य होगा, उसीप्रकार इस शरीर का पतन भी अवश्य होगा । यह आयु और शरीर दोनों विनाशीक हैं । इनका ममत्व छोड़कर अविनाशी पद प्राप्त करने का अवसर तुझे सहज प्राप्त हुआ है ।


गन्तुमुच्छ्वासनिःश्वासैरभ्यस्यत्येष संततम् ।
लोकः पृथगितो वाञ्छत्यात्मानमजरामरम् ॥71॥ ॥71॥

अर्थ: यह आयु उच्छ्वास-निश्वास द्वारा निरन्तर गमन करने का अभ्यास करती है, परन्तु यह अज्ञानी जीव अपने को ऐसी आयु से अजर-अमर होना चाहता है । अधिकतर यह आयु अरहट की घड़ी के जल के समान क्षण-क्षण गलती है और आयु के साथ-साथ इस शरीर का भी निरंतर पतन होता है । काया तो आयु की सहचरी है अर्थात् उसी के साथ लगी है । जब आयु और काया की यह स्थिति है तो इस जीव के पुत्र, स्त्री, धन-धान्यादि अन्य पदार्थों की क्या बात करें ? वे तो प्रत्यक्ष ही जीव से भिन्न हैं । जीवन के मूल कारण आयु और काया दोनों ही क्षणभंगुर हैं । जिसप्रकार नाँव में बैठा हुआ मनुष्य अपने को भ्रम से स्थिर मानता है, उसीप्रकार यह मूर्ख बहिरात्मा जीव भी भ्रान्ति से अपने को स्थिर मानता है ।


गलत्यायुः प्रायः प्रकटितघटीयन्त्रसलिलं,
खलः कायोऽप्यायुर्गतिमनुपतत्येष सततम् ।
किमस्यान्यैरन्यैर्द्वयमयमिदं जीवितमिह,
स्थितो भ्रान्त्या नावि स्वमिव मनुते स्थास्नुमपधीः ॥72॥ ॥72॥

अर्थ: यह आयु उच्छ्वास-निश्वास द्वारा निरन्तर गमन करने का अभ्यास करती है, परन्तु यह अज्ञानी जीव अपने को ऐसी आयु से अजर-अमर होना चाहता है । अधिकतर यह आयु अरहट की घड़ी के जल के समान क्षण-क्षण गलती है और आयु के साथ-साथ इस शरीर का भी निरंतर पतन होता है । काया तो आयु की सहचरी है अर्थात् उसी के साथ लगी है । जब आयु और काया की यह स्थिति है तो इस जीव के पुत्र, स्त्री, धन-धान्यादि अन्य पदार्थों की क्या बात करें ? वे तो प्रत्यक्ष ही जीव से भिन्न हैं । जीवन के मूल कारण आयु और काया दोनों ही क्षणभंगुर हैं । जिसप्रकार नाँव में बैठा हुआ मनुष्य अपने को भ्रम से स्थिर मानता है, उसीप्रकार यह मूर्ख बहिरात्मा जीव भी भ्रान्ति से अपने को स्थिर मानता है ।


उच्छ्वासः खेदजन्यत्वाद् दुःखमेषोऽत्र जीवितम् ।
तद्विरामो भवेन्मृत्युर्नृणां भण कुतः सुखम् ॥73॥ ॥73॥

अर्थ: यह उच्छ्वास खेदपूर्वक उत्पन्न होती है इसलिए दुःख ही है इसके होने पर ही जीवन है और इसके अभाव में मरण। अतः कहो ! प्राणियों को सुख कहाँ से होगा ?


जन्मतालद्रुमाज्जन्तुफलानि प्रच्युतान्यधः ।
अप्राप्य मृत्युभूभागमन्तरे स्युः कियच्चिरम् ॥74॥ ॥74॥

अर्थ: जन्मरूपी ताल-वृक्ष से जीवरूपी फल मृत्युरूपी भूमि पर ही गिरता है, बीच में तो बहुत कम समय ही रहता है, अधिक समय तक नहीं रहता।


क्षितिजलधिभिः संख्यातीतैर्बहिः पवनैस्त्रिभिः
परिवृत्तमतः खेनाधस्तात् खलासुरनारकान् ।
उपरि दिविजान् मध्ये कृत्वा नरान् विधिमन्त्रिणा
पतिरपि नृणां त्राता नैको ह्यलंघ्यतमोऽन्तकः ॥75॥ ॥75॥

अर्थ: विधिरूप मन्त्री ने मनुष्यों की रक्षा के लिए अनेक उपाय किये तो भी वह उनकी रक्षा नहीं कर सका । उसने मनुष्यों को अन्दर से असंख्यात द्वीप-समुद्रों के कोट के बीच में रखा और उनके बाहर तीन वातवलय का कोट बनाकर रक्षा की तथा उन वातवलयों को अनन्त अलोकाकाश में स्थापित किया । दुष्ट परिणामी नारकीय जीवों को अधोलोक में रखा; तथा ऊर्ध्वलोक में देवों को स्थापित किया । सबके बीच में मनुष्यों को रखा तो भी वे मरण से नहीं बचे । इससे निश्चित होता हैं कि मनुष्यों के पति विधाता अथवा चक्रवर्ती, इन्द्र आदि कोई भी मनुष्यों की रक्षा नहीं कर सकता । यह काल अत्यन्त अलंघ्य हैं ।


अविज्ञातस्थानो व्यपगततनुः पापमलिनः,
खलो राहुर्भास्वद्दशशतकराक्रान्तभुवनम्।
स्फुरन्तं भास्वन्तं किल गिलति हा कष्टमपरः,
परिप्राप्ते काले विलसति विधौ को हि बलवान् ॥76॥ ॥76॥

अर्थ: निश्चय से आयु के पूर्ण होने पर काल (मृत्यु) को आने से कौन बलवान रोक सकता है ? या रक्षा कर सकता है, अर्थात् कोई भी रक्षा नहीं कर सकता । हा ! यह बड़े कष्ट की बात है ? जिसप्रकार सम्पूर्ण जगत् के पदार्थों को अपनी हजारों किरणों से प्रकाशित करने में समर्थ सूर्य को भी नव ग्रहों में दुष्ट राहू ग्रहण के समय ग्रस लेता है उसे टालने में कोई समर्थ नहीं है, उसीप्रकार आयु का अन्त समय पाकर कालरूपी राहू जीवरूपी सूर्य को ग्रसित कर लेता है । जिसप्रकार सूर्य सहस्त्र किरणों से युक्त है, उसीप्रकार जीव अनन्त ज्योति - अनन्त प्रकाश (ज्ञान) स्वरूप है ।
राहू और काल दोनों का स्थान अज्ञात है, काल की दशा तो सभी प्रत्यक्ष जानते हैं, तथा राहू का कोई वार (दिन) निश्चित नहीं है, इसलिए लोक में इसे भी स्थान रहित कहा गया है । काल तो शरीर रहित (अमूर्तिक) है ही, राहु को भी अतनु (अशरीरी) कहा गया है । जीवों को ग्रसने के कारण काल को पापी कहा जाता है, तथा जो पापी है वह मलिन है । राहु को भी पापग्रह कहा जाता है । श्याम वर्ण होने से उसकी तुलना भी काल से की जाती है ।


उत्पाद्य मोहमदविह्वलमेव विश्वं,
वेधाः स्वयं गतघृणष्ठकवद्यथेष्टम् ।
संसारभीकरमहागहनान्तराले हन्ता,
निवारयितुमत्र हि कः समर्थः ॥77॥ ॥77॥

अर्थ: निर्दयी ठग के समान पूर्वोपार्जित कर्म मोह-मद उत्पन्न करके तीन लोक के जीवों को विह्वल करके संसाररूपी भयानक वन में मारते हैं, वहाँ उनका निवारण करने में कौन समर्थ है ?


कदा कथं कुतः कस्मिन्नित्यतर्क्यः खलोऽन्तकः ।
प्राप्नोत्येव किमित्याध्वं यतध्वं श्रेयसे बुधाः ॥78॥ ॥78॥

अर्थ: पण्डितजन अर्थात् सम्यग्दृष्टि जीव ! आत्मकल्याण के लिए प्रयत्न करो। काल के आने पर कुछ भी प्रयत्न नहीं किया जा सकता। काल कब, किस प्रकार, किस जगह और कहाँ से आ जाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। दुष्ट काल अचानक ही आ जाता है इसलिए आत्मध्यान करके अविनाशी होने का प्रयत्न करना चाहिए।


असामवायिकं मृत्योरेकमालोक्य कञ्चन ।
देशं कालं विधिं हेतुं निश्चिन्ताः सन्तु जन्तवः ॥79॥ ॥79॥

अर्थ: हे प्राणी ! यदि किसी भी क्षेत्र, काल, विधि और कारण को मृत्यु से अगोचर (असम्बद्ध) जानो, तो तुम निश्चिन्त हो जाओ ।


अपिहितमहाघोरद्वारं न किं नरकापदा-
मुपकृतवतो भूयः किं तेन चेदमपाकरोत् ।
कुशलविलयज्वालाजाले कलत्रकलेवरे,
कथमिव भवानत्र प्रीतः पृथग्जनदुर्लभे ॥80॥ ॥80॥

अर्थ: तू इस स्त्री के कलेवर (शरीर) में क्यों प्रीति करता है ? यह कलेवर कल्याण को भस्म करने के लिए अग्नि-ज्वाला का समूह है । क्या तू प्रत्यक्ष नहीं देखता कि यह स्त्री का शरीर नरक की आपदा का खुला द्वार है । तू स्त्री के शरीर से बारम्बार अनुराग करके उसका उपकार करता है, जबकि वह तुझे सदा विघ्न करता है, इसलिए तू तरुणी के तन की प्रीति छोड़ । यद्यपि अज्ञानीजन इसे दुर्लभ मानते हैं लेकिन यह कुछ वस्तु ही नहीं है ।


व्यापत्पर्वमयं विरामविरसं मूलेऽप्यभोग्योचितं,
विश्वक्क्षुत्क्षतपातकुष्टकुथिताद्युग्रामयैश्छिद्रितम् ।
मानुष्यं घुणभक्षितेक्षुसदृशं नामैकरम्यं पुनः,
निस्सारं परलोकबीजमचिरात् कृत्वेह सारीकुरु ॥81॥ ॥81॥

अर्थ: यह मनुष्य शरीर घुन के द्वारा खाये हुए काने गन्ने के समान है, इसमें अनेक आपदारूपी गाँठें हैं, यह अन्त में नीरस है तथा मूल में भी खान योग्य नहीं है । इसके सर्वाङ्ग में क्षुधा, गूमड़ा, कोढ़, आदि भयानक रोगरूपी कुत्सित छिद्र हैं । इसका मात्र नाम ही रमणीय है, और तो यह सब प्रकार से असार है, अतः धर्म-साधन द्वारा पर-लोक का बीज बनाकर तू इसे शीघ्र सफल कर ।


प्रसुप्तो मरणाशंकां प्रबुद्धो जीवितोत्सवम् ।
प्रत्यहं जनयत्येष तिष्ठेत् काये कियच्चिरम् ॥82॥ ॥82॥

अर्थ: प्रतिदिन सोते समय मरण की आशंका उत्पन्न करता है और जागते हुए जीवन का उत्सव करता है - ऐसी दशा वाला यह जीव, शरीर में क्या चिरकाल तक रहेगा ? अपितु नहीं रहेगा ।


सत्यं वदात्र यदि जन्मनि बन्धुकृत्य-
माप्तं त्वया किमपि बन्धुजनाद्धितार्थम् ।
एतावदेव परमस्ति मृतस्य पश्चात्
संभूय कायमहितं तव भस्मयन्ति ॥83॥ ॥83॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू सत्य कह ! क्या तूने इस संसार में बन्धुओं को उनके द्वारा करने योग्य हितरूप कार्य करते हुए पाया है ? हमें तो कुटुम्बियों द्वारा तेरा कुछ भी हित हुआ नहीं दिखता । उनका केवल इतना ही उपकार भासित होता है कि वे तेरे मरने के बाद इकट्ठे होकर तेरे इस शरीररूपी शत्रु को जला देते हैं ।


जन्मसन्तानसंपादिविवाहादिविधायिनः ।
स्वाः परेऽस्य सकृत्प्राणहारिणो न परे परे ॥84॥ ॥84॥

अर्थ: संसार की परम्परा बढ़ानेवाले विवाहादि कार्य करानेवाले अपने कुटुम्बीजन ही इस जीव के बैरी हैं। अरे एक बार प्राण हरनेवाले अन्य बैरी जन वास्तविक बैरी नहीं हैं।


धनरन्धनसंभारं प्रक्षिप्याशाहुताशने ।
ज्वलन्तं मन्यते भ्रान्तः शान्तं संधुक्षणक्षणे ॥85॥ ॥85॥

अर्थ: यह जीव भ्रम सहित होने से आशारूपी अग्नि में धनरूपी ईंधन के समूह को डालकर उसकी वृद्धिरूप संधुक्षण के समय जलते हुए अपने आत्मा को शान्त और सुखी हुआ मानता है।


षलितच्छलेन देहान्निर्गच्छति शुद्धिरेव तव बुद्धेः ।
कथमिव परलोकार्थं जरी वराकस्तदा स्मरति ॥86॥ ॥86॥

अर्थ: श्वेत केशों के बहाने इस शरीर से तेरी बुद्धि की शुद्धता ही निकल कर बाहर जा रही है । अतः वृद्धावस्था में असमर्थ होने पर तू पर-लोक के लिए विचार कैसे कर सकता है ? क्योंकि इस अवस्था में तो कुछ भी विचार ही नहीं हो सकता है ।


इष्टार्थोद्यदनाशितं भवसुखक्षाराम्भसि प्रस्फुरन्-
नानामानसदुःखवाडवशिखासंदीपिताभ्यन्तरे ।
मृत्यूत्पत्तिजरातरङ्गचपले संसारघोरार्णवे
मोहग्राहविदारितास्यविवराद् दूरे चरा दुर्लभाः ॥87॥ ॥87॥

अर्थ: संसार-समुद्र में मोहरूपी ग्राह (मगरमच्छ) के फाड़े हुए मुख से दूर रहनेवाले जीव दुर्लभ हैं । यह संसार-समुद्र इष्ट विषयों से उत्पन्न सुखरूपी खारे जल से भरा है । जिसप्रकार समुद्र का खारा जल पीने पर भी प्यास नहीं बुझती, उसीप्रकार संसार-समुद्र के विषय-सुखरूपी जल से तृप्ति नहीं होती ।
यह संसार-समुद्र अनेक प्रकार के मानसिक दु:खरूपी बडवानल से तप्त है । जिसप्रकार बड़वाग्नि द्वारा समुद्र का जल सोखा जाता है, उसीप्रकार संसार के मानसिक दुःख, विषय-सुख नहीं भोगने देते, अत: ये संतापरूप हैं ।
यह संसार-समुद्र जन्म-मरण-जरारूपी तरंगो से चञ्चल है । जिसप्रकार समुद्र में लहरें उछलती हैं, उसीप्रकार संसार में जन्म-जरा-मरणादि अवस्थायें होती रहती हैं ।
ऐसे संसार-समुद्र में मोहरूपी मगरमच्छ अपना मुख फाड़ रहा है अर्थात् उसका उदय व्यक्त हो रहा है । मोहरूपी मगरमच्छ के मुख से दूर रहनेवाले अर्थात् मोह के उदय में तद्रूप होकर विकारी न होनेवाले जीव थोड़े हैं । यदि संसार में ऐसे जीव अधिक हों तो संसार कैसे चलेगा ? अत: ऐसे जीव थोड़े ही हैं, इसलिए संसार चल रहा है ।


अव्युच्छिन्नैः सुखपरिकरैर्लालिता लोलरम्यैः
श्यामाङ्गीनां नयनकमलैरर्चिता यौवनान्तम्।
धन्योऽसि त्वं यदि तनुरियं लब्धबोधेर्मृगीभि
र्दग्धारण्ये स्थलकमलिनीशंकयालोक्यते ते ॥88॥ ॥88॥

अर्थ: ग्रहस्थाश्रम में अविच्छिन्न सुखों में पला और मनोहर अंगों से युक्त स्त्रियों के चपल नेत्र-कमलों द्वारा सम्मानित एवं रमणीय शरीर था परन्तु अब यौवन अवस्था में बोधि प्राप्त एवं पूज्य होने पर तेरा वह शरीर भस्म हो गया,अत: वन में हिरणियों द्वारा कमलिनी की आशंका से देखा जाता है; अत: तू धन्य है ।


बाल्ये वेत्सि न किंचिदप्यपरिपूर्णाङ्गो हितं वाहितं,
कामान्धः खलु कामिनीद्रुमघने भ्राम्यन् वने यौवने ।
मध्येवृद्धतृषार्जितुं वसु पशुः क्लिश्नासि कृष्यादिभि-
वार्द्धिक्येऽर्धमृतः क्व जन्म फलि ते धर्मो भवेन्निर्मलः ॥89॥ ॥89॥

अर्थ: बाल्यावस्था में अविकसित अंगों सहित होने से तू हित या अहित कुछ भी नहीं जानता है । यौवन में स्त्रीरूपी वृक्षों से युक्त सघन वन में भ्रमण करते हुए कामान्ध होता है । मध्य वय में अति तृष्णा से धन कमाने के लिए खेती आदि कार्यों में पशुओं के समान भार वहन करता हुआ दुःखी होता है और वृद्धावस्था में अर्धमृतक हो जाता है । इसप्रकार तेरा मनुष्यभव सफल कैसे होगा ? और तुझे निर्मल धर्म कब प्राप्त होगा ?


बाल्येऽस्मिन् यदनेन ते विरचितं स्मर्तुं च तन्नोचितं,
मध्ये चापि धनार्जनव्यतिकरैस्तन्नास्ति यन्नापितः ।
वार्द्धिक्येऽप्यभिभूय दन्तदलनाद्याचेष्टितं निष्ठुरं,
पश्याद्यापि विधेर्वशेन चलितुं वाञ्छस्यहो दुर्मते ॥90॥ ॥90॥

अर्थ: इस पर्याय में कर्मों ने बाल्यावस्था में तेरा जो कुछ भी बुरा किया वह याद करने योग्य भी नहीं है । मध्यावस्था में धनोपार्जन के उपायों में ऐसा कोई दुःख बाकी नहीं रहा, जो कर्मों ने तुझे न दिया हो । उन्होंने वृद्धावस्था में दाँत उखाड़ना आदि कठोर चेष्टाओं द्वारा तेरा अपमान किया - यह सब देखकर भी हे दुर्बुद्धि ! तू अब भी इन कर्मों के वश होकर रहना चाहता है ।

श्लोक 91 से 120

अश्रोत्रीव तिरस्कृतापरतिरस्कारश्रुतीनां श्रुतिः,
चक्षुर्वीक्षितुमक्षमं तव दशां दूष्यामि वान्ध्यं गतम् ।
भीत्येवाभिमुखान्तकादतितरां कायोऽप्ययं कम्पते,
निष्कम्पस्त्वमहो प्रदीप्तभवनेप्यास्से जराजर्जरे ॥91॥ ॥91॥

अर्थ: वृद्धावस्था में दूसरों द्वारा किये गये अपमान, निंदा और तिरस्कार पूर्ण वचनों को कान सुनना नहीं चाहते; इसलिए मानो वे सुनने की शक्ति रहित हो गए हैं। तेरी निंद्य दशा को देखने में नेत्र असमर्थ हैं, इसलिए मानो वे अन्धे हो गये हैं और सन्मुख आये हुए काल से डरकर शरीर काँप रहा है। इसप्रकार बुढ़ापे से जीर्ण और जलते हुए शरीररूपी भवन में तू निश्चल बैठा है - यह बड़े आश्चर्य की बात है।


अतिपरिचितेष्ववज्ञा नवे भवेत्प्रीतिरिति हि जनवादः ।
त्वं किमिति मृषा कुरुषे दोषासक्तो गुणेष्वरतः ॥92॥ ॥92॥

अर्थ: जिनसे अत्यधिक परिचय और सम्पर्क होता है, उनके प्रति अनादर भाव तथा नवीन विषयों के प्रति प्रीति भाव होता है - ऐसी लोकोक्ति है, परन्तु तू अति-परिचित रागादि दोषों में आसक्त रह कर और सम्यग्दर्शनादि नवीन गुणों में प्रीति न करके इस लोकोक्ति को मिथ्या कैसे करता है ?


हंसैर्न भुक्तमतिकर्कशमम्भसापि,
नो संगतं दिनविकासि सरोजमित्थम् ।
नालोकितं मधुकरेण मृतं वृथैव प्रायः,
कुतो व्यसनिनां स्वहिते विवेकः । ॥93॥ ॥93॥

अर्थ: यह कमल का फूल हंसों द्वारा भोग्य नहीं है, अति कठोर है, जल में भी तन्मय नहीं होता और दिन में खिलता है - इसप्रकार कमल के स्वरूप का विचार न करता हुआ भौंरा गन्ध का लोभी होकर व्यर्थ ही मृत्यु को प्राप्त होता है । उसीप्रकार व्यसनी को व्यसन की तीव्रता से अपने हित-अहित का विवेक कहाँ से होगा ? अर्थात् नहीं होगा ।


प्रज्ञे दुर्लभा सुष्टु दुर्लभा सान्यजन्मने ।
तां प्राप्य ये प्रमाद्यन्ते ते शोच्याः खलु धीमताम् ॥94॥ ॥94॥

अर्थ: संसार में विचारशक्ति रूप बुद्धि होना दुर्लभ है, और पर-लोक के लिए प्रवर्तनेवाली बुद्धि होना तो अति दुर्लभ है । अत: ऐसी बुद्धि प्राप्त करके भी प्रमादी रहनेवाले जीव ज्ञानियों द्वारा सोचने योग्य हैं ।


लोकाधिपाः क्षितिभुजो भुवि येन जाताः
तस्मिन् विधौ सति हि सर्वंजनप्रसिद्धे ।
शोच्यं तदेव यदमी स्पृहणीयवीर्या-
स्तेषां बुधाश्च वत किंकरतां प्रयान्ति ॥95॥ ॥95॥

अर्थ: जिस धर्म-साधन से राजा आदि लोक के स्वामी होते हैं, उसी लोक-प्रसिद्ध धर्म-साधन से युक्त तथा वाञ्छित पराक्रम युक्त ज्ञानी भी राजाओं के किंकरत्व(सेवकपने) को प्राप्त होते हैं - यह सोचनीय बात हैं । वे ऐसा कार्य क्यों करते हैं ? उनके बारे में विचार करने से ही हमें खेद होता है ।


यस्मिन्नस्ति स भूभृतो धृतमहावंशाः प्रदेशः परः,
प्रज्ञापारमिता धृतोन्नतिधनाः मूर्ध्ना ध्रियन्ते श्रियै ।
भूयांस्तस्य भुजङ्गदुर्गमतमो मार्गो निराशस्ततो,
व्यक्तं वक्तुमयुक्तमार्यमहतां सर्वार्यसाक्षात्कृतः ॥96॥ ॥96॥

अर्थ: इस छन्द में श्लेषालंकार का प्रयोग किया गया है। पहले अर्थ में किसी कृष्ण नाम के राजा के दुर्गम स्थान में छिपे निधान को सर्वार्य नामक मन्त्री द्वारा प्रगट करने का वर्णन किया गया है और दूसरे अर्थ में धर्म के लक्षण आदि का वर्णन किया है।
प्रथम अर्थ - पर्वतों से युक्त कोई उत्कृष्ट प्रदेश था। उस पर्वत पर इतने बड़े-बड़े बॉस थे कि जिनका अन्त बुद्धि से ही जाना जा सके। उनके शिखर मानो शोभा के लिए ऊँचाईरूपी धन से युक्त होने के कारण अत्यन्त ऊँचे थे। उन तक पहुँचने का मार्ग अत्यन्त विस्तृत था। परन्तु सर्पादि के कारण शत्रुओं के लिए अत्यन्त दुर्गम था। उस मार्ग में दिशाओं की शुद्धि नहीं थी (दिशाऐं स्पष्ट ज्ञात नहीं होती थी) अर्थात् वह प्रदेश सर्व साधारण के लिए अज्ञात और विषम था। फिर भी किसी राजा के सर्वार्य नामक मन्त्री ने वहाँ जाकर उसे प्रत्यक्ष देखा - इसप्रकार प्रथम अर्थ में सर्वार्य मन्त्री की प्रशंसा की है।
द्वितीय अर्थ - प्रदिश्यते अर्थात् जिसमें पर को सम्बोधित किया जाए - ऐसा प्रदेशरूपी धर्म उत्कृष्ट है। क्योंकि लोग लक्ष्मी के लिए राजाओं को मस्तक झुकाते हैं - यह धर्म का ही फल है। वे राजा इक्ष्वाकु आदि वंश के धारक हैं, बुद्धि के पार को प्राप्त हुए हैं (अत्यन्त बुद्धिमान् हैं), महान् हैं और धन के विपुल भंडार के धारी हैं। वे राजा जिस धर्म के होने से प्रधान होते हैं, उस धर्मरूप प्रदेश तक पहुँचने का मार्ग दान-व्रतादि के भेदों से अनेक प्रकार का है, वाञ्छा रहित है और भुजङ्गों अर्थात् कामी पुरुषों के लिए दुर्गम है, अगोचर है । अरे ! सज्जन पुरुषों में प्रधान हम जैसे लोग भी धर्म का मार्ग बताने में असमर्थ हैं, अर्थात् हमारी इतनी शक्ति नहीं है कि हम उसे प्रगट कर सकें। समस्त आर्य अर्थात् गणधरादि सत्पुरुषों द्वारा अथवा सबके द्वारा पूज्य ऐसे सर्वार्य अर्थात् सर्वज्ञ देव द्वारा धर्म का मार्ग प्रगट किया गया है, तथा यही मार्ग सबके द्वारा प्रतीति करने योग्य है।


शरीरेऽस्मिन् सर्वाशुचिनि बहुदुःखेऽपि निवसन्
व्यरंसीन्नो नैव प्रथयति जनः प्रीतिमधिकाम् ।
इमां दृष्ट्वाप्यस्माद्विरमयितुमेनं च ययते
यतिर्याताख्यानैः परहितरतिं पश्य महतः ॥97॥ ॥97॥

अर्थ: सर्व प्रकार से अपवित्र और अनेक शारीरिक व मानसिक दुःखोंवाले इस शरीर में रहता हुआ यह संसारी जीव इससे विरक्त नहीं होता, अपितु इसे देखकर अधिक प्रीति करता है। ‘‘क्या यह जीव इस शरीर को देखकर अधिक प्रीति नहीं करता, अपितु अवश्य ही करता है’’- यह काकाख्यान अर्थात् मिथ्या गुरुओं द्वारा दिया गया मिथ्या उपदेश है। परन्तु महामुनिराज इन जीवों को भी सारभूत उपदेश देकर शरीर से विरक्त करने का प्रयत्न करते हैं। महान् मुनियों का पर-हित के प्रति ऐसा अनुराग देखने योग्य है।


इत्थं तथेति बहुना किमुदीरितेन,
भूयस्त्वयैव ननु जन्मनि भुक्तभुक्तम् ।
एतावदेव कथितं तव संकलय्य,
सर्वापदां पदमिदं जननं जनानाम् ॥98॥ ॥98॥

अर्थ: यह शरीर ऐसा है, वैसा है - इसप्रकार बहुत कहने से क्या साध्य है ? हे जीव ! तूने इस संसार में शरीर को बारम्बार भोगा और छोड़ा । संक्षेप में तुझसे इतना ही कहना है कि यह शरीर ही जीवों के लिए सर्व आपदाओं का स्थान है ।


अन्तर्वान्तं वदनविवरे क्षुत्तृषार्तः प्रतीच्छन्,
कर्मायत्तः सुचिरमुदरावस्करे वृद्धगृद्ध्या ।
निष्पन्दात्मा कृमिसहचरो जन्मनि क्लेशभीतो,
मन्ये जन्मिन्नपि च मरणात्तन्निमित्ताद्विभेषि ॥99॥ ॥99॥

अर्थ: हे प्राणी ! कर्माधीन होकर तू माता के उदर रूपी विष्टा स्थान में रहा और बढ़ने के लोभ से बहुत काल तक माता के चबाए हुए अन्न को भक्षण करना चाहा । तथा पानी की एक बूँद मेरे मुख में पड़ जाए - इस आशा से मुख फाड़े रहा अर्थात् क्षुधा-तृषा से अत्यन्त पीड़ित हुआ । उदर के सिकुड़े स्थान में हिले-डुले बिना वहाँ उत्पन्न होनेवाली लटों (कीड़ों) का सहचारी होकर रहा । गर्भावस्था में ऐसी दशा होती है, इसलिए हे प्राणी ! मैं ऐसा मानता हूँ कि जन्मावस्था के क्लेश से डरकर ही तू जन्म के कारणभूत मरण से डरता है ।


अज्ञाकृपाणीयमनुष्ठितं त्वयाविकल्पमुग्धेन भवादितः पुरा।
यदत्र किञ्चित् सुखरुपमाप्यते तदार्य विद्धयन्धकवर्तकीयम् ॥100॥ ॥100॥

अर्थ: हे भोले प्राणी ! यह पर्याय प्राप्त करने के पूर्व तूने अजा-कृपाणीय के समान कार्य किया । जिसप्रकार कोई व्यक्ति किसी बकरी को मारने के लिए छुरी खोज रहा था, तब उस बकरी ने स्वयं अपने खुर से खोदकर छुरी निकाल दी और उसी से उसका मरण हुआ । उसीप्रकार जिससे अपना घात हो, अर्थात् अपना बुरा हो, तूने वही कार्य किया । तू हेय-उपादेय के विचार में मूर्ख रहा । इस संसार में सुखरूप विषयों को तू अंधकवर्तकीयक जान । अर्थात् बुरा करने जिसप्रकार अन्धा ताली बजाकर बटेर को पकड़ना चाहता है - यह बड़े आश्चर्य की बात है, उसीप्रकार संसार में थोड़ा भी सुख हौना अत्यन्त आश्चर्य की बात है ।


हा कष्टमिष्टवनिताभिरकाण्ड एव,
चण्डो विखण्डयति पण्डितमानिनोऽपि।
पश्याद्भुतं तदपि धीरतया सहन्ते,
दग्धुं तपोऽग्निभिरमुं न समुत्सहन्ते ॥101॥ ॥101॥

अर्थ: हाय ! यह बड़े कष्ट की बात है कि अपने को पण्डित, ज्ञानी यह माननेवालों को प्रचण्ड काम असमय में ही इष्ट स्त्री आदि के निमित्त से खण्डित कर देता है, उनके ज्ञानीपने को खण्ड-खण्ड करके महादुःख देता है। फिर भी यह आश्चर्य देखो कि वे अपने को खण्ड-खण्ड होते हुए धीर-वीरपने से सहन करते हैं और तपरूपी अग्नि द्वारा काम को जलाने में उत्साहित नहीं होते ।


अर्थिभ्यस्तृणवद्विचिन्त्य विषयान् कश्चिच्छ्रियं दत्तवान्,
पापां तामवितर्पिणीं विगणयन्नादात् परस्त्यक्तवान्।
प्रागेवाकुशलां विमृश्य सुभगोऽप्यन्यो न पर्यग्रहीत्,
एते ते विदितोत्तरोत्तरवराः सर्वोत्तमास्त्यागिनः ॥102॥ ॥102॥

अर्थ: कुछ त्यागीगण विषयों को तृण के समान अकार्यकारी जानकर पुत्रादिक को या अन्य याचकों को लक्ष्मी का दान करते हैं । कुछ त्यागीगण लक्ष्मी को पापरूप और तृप्ति न करनेवाली मानकर किसी को दिए बिना ऐसे ही छोड़ देते हैं और अन्य कोई सौभाग्यशाली त्यागीगण पहले से ही अकल्याणकारी जानकर ग्रहण ही नहीं करते - इसप्रकार इन तीनों सर्वोत्कृष्ट (सम्पूर्ण) त्यागियों को उत्तरोत्तर उत्कृष्ट जानो ।


विरज्य सम्पदः सन्तस्त्यजन्ति किमिहाद्भुतम् ।
मा वमीत् किं जगुप्सावान् सुभुक्तमपि भोजनम् ॥103॥ ॥103॥

अर्थ: सत्पुरुष विरक्त होकर सम्पत्ति का त्याग कर देते हैं - अरे ! इसमें क्या आश्चर्य है ? क्या पुरुष ग्लानि होने पर अच्छी तरह भक्षण किए हुए भोजन का वमन नहीं करते ? अपितु अवश्य ही करते हैं ।


श्रियं त्यजन् जडः शोकं विस्मयं सात्त्विकः स ताम्।
करोति तत्त्वविच्चित्रं न शोकं न च विस्मयम् ॥104॥ ॥104॥

अर्थ: पराक्रम रहित मूर्ख पुरुष लक्ष्मी का त्याग करने पर शोक करते हैं और सच्चे पराक्रमी पुरुष गर्व करते हैं, परन्तु तत्त्वज्ञानी पुरुष उस लक्ष्मी का त्याग करने पर न शोक करते हैं और न गर्व करते हैं - यह बड़े आश्चर्य की बात है।


विमृश्योच्चैर्गर्भात्प्रभृति मृतिपर्यन्तमखिलं
मुधाप्येतत् क्लेशाशुचिभयनिकाराद्यबहुलम्।
बुधैस्त्याज्यं त्यागाद्यदि भवति मुक्तिश्च जडधीः
स कस्त्यक्तुं नालं खलजनसमायोगसदृशम् ॥105॥ ॥105॥

अर्थ: दुष्टजन के संयोग के समान यह शरीर गर्भ से मरण तक क्लेश, अपवित्रता, भय, पराभव एवं पाप की बहुलता सहित है। इसका ऐसा स्वरूप भली-भाँति विचार कर ज्ञानियों द्वारा त्याग करने योग्य है। यदि इसके त्याग से मुक्ति की प्राप्ति होती है तो ऐसा कौन मूर्ख है, जो इसके त्याग करने में समर्थ नहीं होगा ?


कुबोधरागादिविचेष्टितैः फलं त्वयापि भूयो जननादिलक्षणम्।
प्रतीहि भव्य प्रतिलोमवृत्तिभिः ध्रुवं फलं प्राप्स्यसि तद्विलक्षणम्। ॥106॥ ॥106॥

अर्थ: हे भव्य ! तूने स्वयं कुज्ञान और रागादिरूप विपरीत चेष्टाओं के द्वारा जन्म-मरणादिरूप फल प्राप्त किया है। अतः अब तू ऐसी प्रतीति कर कि इनसे विपरीत प्रवृत्तियाँ करके उनके फल से विपरीत फल (मुक्ति) प्राप्त हो।


दयादमत्यागसमाधिसन्ततेः पथि प्रयाहि प्रगुणं प्रयत्नवान्।
नयत्यवश्यं वचसामगोचरं विकल्पदूरं परमं किमप्यसौ ॥107॥ ॥107॥

अर्थ: हे जीव ! स्व-पर की करुणा करना दया, इन्द्रिय-मन को वश करना दम, पर-पदार्थों से राग छोड़ना त्याग और वीतराग दशारूप सुखी समाधि है - इनकी परम्परारूप मार्ग पर प्रत्यनशील होता हुआ, निष्कपट होकर गमन कर - यही मार्ग तुझे वचन-अगोचर और निर्विकल्प परम पद की प्राप्ति करायेगा ।


विज्ञाननिहतमोहं कुटीप्रवेशो विशुद्धकायमिव।
त्यागः परिग्रहाणामवश्यमजरामरं कुरुते ॥108॥ ॥108॥

अर्थ: जिसप्रकार पवन साधन में कुटी प्रवेश करने से (कुम्भक प्रक्रिया द्वारा वायु रोकने से) शरीर निर्मल होता है; उसीप्रकार जो भेद-विज्ञान द्वारा मोह नष्ट करता है, उसे परिग्रह का त्याग अवश्य ही अजर-अमर कर देता है।


अभुक्त्वापि परित्यागात् स्वोच्छिष्टं विश्वमासितम्।
येन चित्रं नमस्तस्मै कौमारब्रह्मचारिणे ॥109॥ ॥109॥

अर्थ: उस कुमार-ब्रह्मचारी को हमारा नमस्कार हो, जिसने भोगे बिना ही विषयों का त्याग करके समस्त विषयों को अपनी जूठन बना दिया है - यह आश्चर्यकारी कार्य है।


अकिंचनोऽहमित्यास्स्व त्रैलोक्याधिपतिर्भवेः।
योगिगम्यं तव प्रोक्तं रहस्यं परमात्मनः ॥110॥ ॥110॥

अर्थ: “मैं अकिञ्चन हूँ, मेरा कुछ भी नहीं है” - ऐसी भावना करके तू बैठ जा ! इससे तू शीघ्र तीन लोक का स्वामी हो जाएगा। योगीश्वरों द्वारा गम्य परमात्मा बनने का यही रहस्य हमने तुझे कहा है।


दुर्लभमशुद्धमपसुखमविदितमृतिसमयमल्पपरमायुः ।
मानुष्यमिहैव तपो मुक्तिस्तपसैव तत्तपः कार्यम् ॥111॥ ॥111॥

अर्थ: यह मनुष्य पर्याय दुर्लभ है, अपवित्र है, सुख रहित है, इसका मरण समय ज्ञात नहीं है, इसमें उत्कृष्ट आयु भी अल्प है। परन्तु इस पर्याय में ही तप हो सकता है और तप से ही मुक्ति होती है, इसलिए मनुष्यपना पाकर तुझे तप करना चाहिए।


आराध्यो भगवान् जगत्त्रयगुरुर्वृत्तिः सतां संमता,
क्लेशस्तच्चरणस्मृतिः क्षतिरपि प्रप्रक्षयः कर्मणाम् ।
साध्यं सिद्धिसुखं कियान् परिमितः कालो मनः साधनं,
सम्यक् चेतसि चिन्तयन्तु विधुरं किं वा समाधौ बुधाः ॥112॥ ॥112॥

अर्थ: समाधि में तीन लोक के गुरु अर्थात् भगवान् की आराधना की जाती है। इस प्रवृत्ति की सराहना (प्रशंसा) सन्तों द्वारा की गई है। समाधि में भगवान् के चरण-स्मरण करने का ही क्लेश है और कर्मों का उत्कृष्ट रुप से क्षय होता है - बस इतना ही खर्च है, जबकि थोड़े ही काल में मात्र मन के साधन से मोक्ष-सुख की साधना का फल प्राप्त होता है। इसलिए हे ज्ञानी ! तुम अच्छी तरह मन में विचार करो कि समाधि में क्या कष्ट है।


द्रविणपवनप्राध्मातानां सुखं किमिहेक्ष्यते,
किमपि किमयं कामव्याधः खलीकुरुते खलः ।
चरणमपि किं स्प्रष्टुं शक्ताः पराभवपांसवो,
वदत तपसोऽप्यन्यन्मान्यं समीहितसाधनम् ॥113॥ ॥113॥

अर्थ: धनादिक के विचाररूपी पवन द्वारा धोंकने से तप्त जीवों को सुख कहाँ देखा जाता है ? कामरूपी व्याध अदुष्ट आत्माओं को दुष्ट कर देता है । क्या कष्टरूपी धूल, क्या चारित्र को स्पर्श करने में समर्थ है ? नहीं, तो कहो ! मनोवाञ्छित अर्थ का साधन तप से अधिक और कौन है ?


इहैव सहजान् रिपून् विजयते प्रकोपादिकान्,
गुणाः परिणमन्ति यानसुभिरप्ययं वाञ्छति ।
पुरश्च पुरुषार्थसिद्धिरचिरात्स्वयं यायिनी,
नरो न रमते कथं तपसि तापसंहारिणि ॥114॥ ॥114॥

अर्थ: तप होने पर अनादि काल से आत्मा के साथ लगे हुए क्रोधादि शत्रुओं को यहीं तत्काल जीत लिया जाता है । जिन्हें यह आत्मा अपने प्राण देकर भी प्रगट करना चाहता है - ऐसे गुण स्वयमेव प्रगट हो जाते हैं । आगामी काल में शीघ्र ही मोक्ष-पुरुषार्थ की सिद्धि हो जाती है । अत: ऐसे दु:खनाशक तप में कौन विवेकी पुरुष नहीं रमेगा ? अपितु अवश्य रमेगा ही रमेगा ।


तपोवल्ल्यां देहः समुपचितपुण्योर्जितफलः
शलाट्वग्रे यस्य प्रसव इव कालेन गलितः।
व्यशुष्यच्चायुष्यं सलिलमिव संरक्षितपयः
स धन्यः संन्यासाहुतभुजि समाधानचरमम् ॥115॥ ॥115॥

अर्थ: जिसप्रकार कच्चे फल के अग्र भाग से फूल झड़ जाता है, खिर जाता है, उसीप्रकार जिसका शरीर तपरूपी बेल में पुण्यरूपी उत्कृष्ट फल उत्पन्न करके स्वयं काल पाकर गल जाता है, नष्ट हो जाता है। तथा जिसकी आयु समाधिरूप अन्त अवस्था पाकर संन्यासरूपी अग्नि में दूध को सुरक्षित रखकर सूखनेवाले जल की तरह स्वयं सूख जाती है - वह जीव धन्य है।


अमी प्ररूढ़वैराग्यास्तनुमप्यनुपाल्य यत् ।
तपस्यन्ति चिरं तद्धि ज्ञातं ज्ञानस्य वैभवम् ॥116॥ ॥116॥

अर्थ: जिन्हें उत्कृष्ट वैराग्य होता है ऐसे जीव, शरीर को पालते हुए भी चिरकाल तक तप करते हैं - इसे हम ज्ञान का ही प्रभुत्व जानते हैं ।


क्षणार्धमपि देहेन साहचर्यं सहेत कः ।
यदि प्रकोष्ठमादाय न स्याद्बोधो निरोधकः ॥117॥ ॥117॥

अर्थ: यदि ज्ञान हाथ पकड़कर रोकनेवाला न हो तो कौन मुनि आधे क्षण के लिए भी शरीर के साथ रहना सहन करेंगे ? अर्थात् कोई भी सहन नहीं करेंगे।


समस्तं साम्राज्यं तृणमिव परित्यज्य भगवान्,
तपस्यन्निर्माणः क्षुधित इव दीनः परगृहान् ।
किलाटद्धिक्षार्थी स्वयमलभमानोऽपि सुचिरं,
न सोढव्यं किं वा परमिह परैः कार्यवशतः ॥118॥ ॥118॥

अर्थ: श्री आदिनाथ भगवान् समस्त साम्राज्य को तृणवत् छोड़कर तप करते हुए मान रहित भूखे रहकर दीन के समान भोजनार्थी होकर बहुत काल तक भोजन नहीं मिलने पर दूसरों के घर घूमते रहे किया । अत: केवल अपने कार्य के लिए अन्य के द्वारा दिये गये परीषह सहना योग्य है, औरों के लिए नहीं ।


पुरा गर्भादिन्द्रो मुकुलितकरः किंकर इव,
स्वयं स्रष्टा सृष्टेः पतिरथ निधीनां निजसुतः ।
क्षुधित्वा षण्मासान् स किल पुरुरप्याह जगती,
महो केनाप्यस्मिन् विलसितमलंघ्यं हतविधेः ॥119॥ ॥119॥

अर्थ: जिनके गर्भ में आने से पहले ही इन्द्र किंकर (दास) के समान हाथ जोड़ता है, जो स्वयं सृष्टि अर्थात् कर्मभूमि की रचना करनेवाले हैं, जिनका पुत्र नौ निधियों का स्वामी चक्रवर्ती हुआ - ऐसे महापुरुष आदिनाथ स्वामी भी छह माह तक क्षुधावान होकर पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे - यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस संसार में निकृष्ट विधाता कर्म है, उसका विलास अर्थात् चरित्र अत्यन्त अलंघ्य है, इसका निवारण करने में कोई समर्थ नहीं।


प्राक् प्रकाशप्रधानः स्यात् प्रदीप इव संयमी ।
पश्चात्तापप्रकाशाभ्यां भास्वानिव हि भासताम् ॥120॥ ॥120॥

अर्थ: संयमी पुरुष पहले तो प्रकाश की प्रधानतावाले दीपक के समान और बाद में ताप और प्रकाश दोनों से युक्त दैदीप्यमान सूर्य के समान होता है।

श्लोक 121 से 150

भूत्वा दीपोपमो धीमान् ज्ञानचारित्रभास्वरः ।
स्वमन्यं भासयत्येष प्रोद्वमन् कर्मकज्जलम् ॥121॥ ॥121॥

अर्थ: यह ज्ञानवान जीव दीपक के समान होकर ज्ञान और चारित्र से दैदीप्यमान होता हुआ कर्मरूपी काजल को धोता (बाहर निकालता) हुआ स्व-पर को प्रकाशित करता है।


अशुभाच्छुभमायातः शुद्धः स्यादयमागमात् ।
रवेरप्राप्तसंध्यस्य तमसो न समुद्गमः ॥122॥ ॥122॥

अर्थ: जिसप्रकार सान्ध्यकालीन अवस्था प्राप्त किये बिना होनेवाले सूर्य को अन्धकार प्रगट नहीं होता उसीप्रकार यह जीव आगम ज्ञान पूर्वक अशुभ से छूटकर शुभ को प्राप्त होता हुआ शुद्ध होता है।


विधूततमसो रागस्तपःश्रुतनिबंधनः ।
सन्ध्याराग इवार्कस्य जन्तोरभ्युदाय सः ॥123॥ ॥123॥

अर्थ: जिसप्रकार सूर्य की प्रातःकालीन लालिमा उसके उदय के लिए ही होती है, उसीप्रकार अज्ञान अंधकार रहित ज्ञानी जीव को तप और शास्त्र सम्बन्धी राग भाव कल्याण के उदय के लिए ही है।


विहाय व्याप्तमालोकं पुरस्कृत्य पुनस्तमः ।
रविवद्रागमागच्छन् पातालतलमृच्छति ॥124॥ ॥124॥

अर्थ: यह जीव सूर्य के समान व्याप्त प्रकाश को छोड़कर, अंधकार को आगे रखकर राग को प्राप्त होता हुआ पाताल लोक (नरक) को प्राप्त होता है।


ज्ञानं यत्र पुरःसरं सहचरी लज्जा तपः संबलं,
चारित्रं शिविका निवेशनभुवः स्वर्गा गुणा रक्षकाः ।
पन्थाश्च प्रगुणः शमाम्बुबहुलश्छाया दयाभावना,
यानं तं मुनिमापयेदभिमतं स्थानं विना विप्लवैः ॥125॥ ॥125॥

अर्थ: जहाँ ज्ञानरूपी मार्गदर्शक आगे-आगे चलता हो, लज्जारूपी सहचरी हो तपरूपी का संबल हो, चारित्ररूपी जैसा पालक हो, स्वर्ग जैसा विश्राम स्थल हो, गुणरूपी रक्षक हो, जो सीधा हो, जिसमें उपशमरूपी जल का बाहुल्य हो, दयारूपी छाया हो और भावनारूपी गमन हो - ऐसी सामग्रीयुक्त मार्ग में चलनेवाले मुनि निरापदरूप से अभीष्ट स्थान को पहुँच जाते हैं।


मिथ्यादृष्टि विषान् वदन्ति फणिनो दृष्टं तदा सुस्फुटं,
यासामर्धविलोकनैरपि जगद्दन्दह्यते सर्वतः ।
तास्त्वय्येव विलोमवर्तिनि भृशं भ्राम्यन्ति बद्धक्रुधः,
स्त्रीरूपेण विषं हि केवलमतस्तद् गोचरं मा स्म गाः ॥126॥ ॥126॥

अर्थ: सर्पों में दृष्टि-विष जाति के सर्पों का वर्णन करना मिथ्या है, क्योंकि हम इन स्त्रियों में ही दृष्टि-विषपना प्रत्यक्ष देखते हैं, क्योंकि उनके कटाक्षरूप अर्धावलोकन से भी लोक के सर्वांग में दाह उत्पन्न होता है। तथा उनका त्याग करने से तू उनके प्रतिकूल हो गया है, इसलिए वे तुझ पर क्रुद्ध होकर तुझे भ्रष्ट करने के लिए चारों तरफ घूम रही हैं। स्त्री के रूप में यह केवल विष ही है, इसलिए तू इनके वश में मत हो।


क्रुद्धाः प्राणहरा भवन्ति भुजगा दृष्ट्वैव काले क्वचित्,
तेषामौषधयश्च सन्ति बहवः सद्यो विषव्युच्छिदः ।
हन्युः स्त्रीभुजगाः पुरेह च मुहुः क्रुद्धाः प्रसन्नास्तथा,
योगीन्द्रानपि तान्निरौषधविषा दृष्टाश्च दृष्ट्वापि च ॥127॥ ॥127॥

अर्थ: सर्प तो किसी समय क्रोधित होने पर ही डस कर प्राण हरण करते हैं और उनके विष को तत्काल दूर करनेवाली औषधि भी मिलती है; परन्तु ये स्त्रीरूपी सर्प क्रोधित होने पर भी डसते हैं और प्रसन्न होने पर भी डसते हैं। ये पर-लोक में और इसलोक में बारम्बार योगीश्वरों को स्त्रियों के द्वारा देखे जाने पर या स्वयं स्त्री को देखने पर उसके द्वारा डस लिये जाते हैं। इस स्त्री रूपी सर्प के विष की कोई औषधि नहीं है।


एतामुत्तमनायिकामभिजनावर्ज्यां जगत्प्रेयसीं,
मुक्तिश्रीललनां गुणप्रणयिनीं गन्तुं तवेच्छा यदि ।
तां त्वं संस्कुरु वर्जयान्यवनितावार्तामपि प्रस्फुटं,
तस्यामेव रतिं तनुष्व नितरां प्रायेण सेर्ष्याः स्त्रियः ॥128॥ ॥128॥

अर्थ: यह मोक्ष-लक्ष्मीरूपी मनोहर स्त्री उत्तम नायिका है, सामान्य जनों के लिए इसे पाना वर्जित है; चाहे जिस व्यक्ति को इसकी प्राप्ति नहीं होती। फिर भी यह जगत् के जीवों को अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि जो इसका स्वरूप जानते हैं वे सभी इसे चाहते हैं।

यह गुणों में स्नेह रखती है अर्थात् जिसमें गुण होते हैं, उसी को इसकी प्राप्ति होती है। यदि तू इसे प्राप्त करना चाहता है तो तू इसे रत्नत्रय आदि आभूषणों से भूषित कर,तथा प्रगट में अन्य लौकिक स्त्रियों की बात भी मत कर ! क्योंकि स्त्रियाँ प्रायः ईर्ष्यालु होती हैं। तू मोक्ष-लक्ष्मी में ही अनुराग बढ़ा - इसी उपाय से तुझे वह प्राप्त होगी।


वचनसलिलैर्हास- स्वच्छैस्तरंगसुखोदरैः,
वदनकमलैर्बाह्ये रम्याः स्त्रियः सरसीसमाः।
इह हि बहवः प्रास्तप्रज्ञास्तटेऽपि पिपासवो,
विषयविषमग्राहग्रस्ताः पुनर्न समुद्गताः ॥129॥ ॥129॥

अर्थ: स्त्रियाँ सरोवरी के समान हैं । वे हास्यरूपी स्वच्छता और वक्रोक्ति आदि सुखद तरंग गर्भित वचनरूपी जल और मुखरूपी कमलों द्वारा बाहर से रमणीय लगती हैं । बहुत से बुद्धिहीन लोग इस स्त्रीरूपी सरोवरी के किनारे ही तृष्णावन्त होते हुए विषयरूपी विषम गोह (मगरमच्छ) द्वारा ग्रस लिए जाते हैं और उससे बाहर नहीं निकल पाते, अर्थात् वहीं मरण को प्राप्त होते हैं ।


पापिष्ठैर्जगतीविधीतमभितः प्रज्वाल्य रागानलं,
क्रुद्धैरिन्द्रियलुब्धकैर्भयपदैः संत्रासिताः सर्वतः ।
हन्तैते शरणैषिणो जनमृगाः स्त्रीछद्मना निर्मितं,
घातस्थानमुपाश्रयन्ति मदनव्याधादिपस्याकुलाः ॥130॥ ॥130॥

अर्थ: पापी और क्रोधी इन्द्रियरूपी शिकारी अपने शिकार के निवास स्थान के चारों ओर रागरूपी आग जलाकर सर्वप्रकार से भय उत्पन्न करते हैं, तब भयाक्रान्त मनुष्यरूपी हिरण आकुलित होकर शरण प्राप्त करने के लिए दौड़ते हैं, परन्तु हाय ! हाय !! उन शिकारियों के कामरूपी स्वामी द्वारा स्त्रीरूपी कपट से बनाए गए मरण-स्थल में पहुँच जाते हैं ।


अपत्रप तपोऽग्निना भयजुप्सयोरास्पदं,
शरीरमिदमर्धदग्धशववन्न किं पश्यसि ।
वृथा व्रजसि किं रतिं ननु न भीषयस्यातुरो,
निसर्गतरलाः स्त्रियस्तदिह ताः स्फुटं विभ्यति ॥131॥ ॥131॥

अर्थ: हे निर्लज्ज ! तेरा यह शरीर तपरूपी अग्नि से अधजले मुर्दे के समान भय और घृणा उत्पन्न करनेवाला हो रहा है, क्या तू उसे नहीं देखता ? व्यर्थ ही उसमें क्यों आसक्त हो रहा है । हे भ्रष्ट ! तू तृष्णा के वशीभूत होकर स्त्रियों से नहीं डरता, उनका संग करना चाहता है; परन्तु वे स्त्रियाँ सहज ही चञ्चल और कायर होने से तुझसे प्रगट में डरती हैं, तेरी भयानक मूर्ति देखकर दूर भागती हैं ।


उत्तुङ्ग सङ्गत कुचाचल दुर्गदूर -
माराद्बलित्रयसरिद्विषमावतारम् ।
रोमावली कुसृति मार्गमनङ्गमूढाः,
कान्ताकटीविवरमेत्य न केऽत्र खिन्नाः ॥132॥ ॥132॥

अर्थ: ऐसे कौन मूढ़ हैं जो काम-विकार से स्त्री के योनि-स्थान के समागम से खेद-खिन्न नहीं होते, अपितु सभी जीव तत्काल व भविष्य में भी महा खेद को प्राप्त करते हैं। वह स्थान, अत्यन्त ऊँचे और परस्पर मिले हुए कुचोंरूपी पर्वतों के गढ़ से दुर्लभ हैं। अत्यन्त विशाल त्रिवलीरूप नदियों के कारण उससे पार होना अति विषम है तथा रोम-पंक्तियों के कारण वहाँ पहुँचने का मार्ग अत्यन्त खोटा (कष्ट प्रद) है।


वचोगृहं विषयिणां मदनायुधस्य,
नाडीव्रणं विषमनिवृतिपर्वतस्य।
प्रच्छन्नपादुकमनङ्गमहाहिरन्ध्र -
माहुर्बुधा जघनरन्ध्रमदः सुदत्याः ॥133॥ ॥133॥

अर्थ: ज्ञानी जनों ने सुन्दर दाँतोंवाली स्त्री के जघन रंध्र अर्थात् योनिरूप छिद्र को विषयी पुरुषों का विष्टा घर, कामरूपी शस्त्र का घाव, विषम मोक्षरूपी पर्वत को आच्छादित करने वाला गड्ढा और कामरूपी महासर्प का बिल अर्थात् रहने का स्थान कहा है ।


अध्यास्यापि तपोवनं वत परे नारीकटीकोटरे,
व्याकृष्टा विषयैः पतन्ति करिणः कूटावपाते यथा।
प्रोचे प्रीतिकरीं जनस्य जननीं प्राग्जन्मभूमिं च यो,
व्यक्तं तस्य दुरात्मनो दुरुदितैर्मन्ये जगद्वञ्चितम् ॥134॥ ॥134॥

अर्थ: हा ! हा ! धर्म से भ्रष्ट होनेवाले कोई जीव तप करने के स्थान अर्थात् वन में जाकर भी विषयों से प्रेरित होकर कपट से बनाए हुए गड्ढे में गिरनेवाले हाथी के समान स्त्री के कटि-छिद्र में गिरते हैं । अरे ! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि योनि तो मनुष्य का जन्म स्थान होने से उसकी माता है और उसे प्रीति उत्पन्न करनेवाली कह कर खोटी कवितायें लिखनेवाले दुष्टात्मा कुकवियों के दुष्ट वचनों से यह जगत् ठगाया जाता है ।


कण्ठस्थः कालकूटोऽपि शम्भोः किमपि नाकरोत्।
सोऽपि दन्दह्यते स्त्रीभिः स्त्रियो हि विषमं विषम् ॥135॥ ॥135॥

अर्थ: रुद्र के कण्ठ में स्थित कालकूट विष भी कुछ नहीं कर सका, लेकिन वह रुद्र भी स्त्रियों द्वारा संतापित किया जाता है; इसलिए स्त्रियाँ अन्य विषों से भी अधिक विषम विष हैं।


तव युवतिशरीरे सर्वदोषैकपात्रे,
रतिरमृतमयूखाद्यर्थसाधर्म्यतश्चेत् ।
ननु शुचिषु शुभेषु प्रीतिरेष्वेव साध्वी,
मदनमधुमदान्धे प्रायशः को विवेकः ॥136॥ ॥136॥

अर्थ: हे प्राणी ! सभी दोषों के पात्र स्त्री-शरीर में चन्द्रमा आदि पदार्थों के समान स्वभाव मानकर जो तू प्रीति करता है, सो ये चन्द्रमा आदि पदार्थ शुभ हैं और शुचि हैं, अतः इनमें प्रीति करना ठीक है, परन्तु कामरूपी मदिरा के मद से अन्ध प्राणियों में विवेक कहाँ पाया जाता है ?


प्रियामनुभवत् स्वयं भवति कातरं केवलं,
परेष्वनुभवत्सु तां विषयिषु स्फुटं ह्लादते।
मनो ननु नपुंसकं त्विति न शब्दतश्चार्थतः,
सुधीः कथमनेन सन्नुभयथा पुमान जीयते ॥137॥ ॥137॥

अर्थ: स्त्री को भोगते समय मन तो कायर बना रहता है, क्योंकि वह उसे भोग नहीं सकता; परन्तु जब स्पर्शनादि इन्द्रियाँ स्त्रियों को भोगती हैं तब यह मात्र हर्ष करता है; इसलिए यह मन केवल शब्द से ही नहीं अपितु अर्थ से भी नपुसंक ही है । लेकिन भली बुद्धि के धारक ज्ञानी शब्द और अर्थ दोंनों से पुरुष लिंग हैं, अतः वे इस मन द्वारा कैसे जीते जा सकते हैं ? अर्थात् नहीं जीते जा सकते ।


राज्यात्तस्मात् प्रपूज्यं तप इति मनसालोच्य धीमानुदग्रं,
कुर्यादार्यः समग्रं प्रभवभयहरं सत्तपः पापभीरुः ॥138॥ ॥138॥

अर्थ: सौजन्य अर्थात् नीति सहित राज्य और शास्त्र-ज्ञान सहित तप-ये दोनों पूज्य हैं; परन्तु इनमें भी जो राज्य को छोड़कर तप करते हैं, वे लघु नहीं होते, बल्कि महानपने को प्राप्त करते हैं । तथा तप को छोड़कर राज्य करनेवाले अत्यन्त लघुत्व अर्थात् नीचपने को प्राप्त होते हैं । इसलिए राज्य की अपेक्षा तप अधिक उत्कृष्ट अर्थात् पूज्य है । इस प्रकार अपने मन से उक्त विचार करके पापों से भयभीत बुद्धिमान् आर्यपुरुष करके संसार भय को दूर करनेवाला तप करते हैं ।


पुरा शिरसि धार्यन्ते पुष्पाणि विबुधैरपि ।
पश्चात् पादोऽपि नास्प्राक्षीत् किं न कुर्याद् गुणक्षतिः ॥139॥ ॥139॥

अर्थ: पहले सुगन्ध आदि गुणों से युक्त होने पर पुष्पों को देवों द्वारा भी मस्तक पर धारण किया जाता है और बाद में गुणों के निकल जाने के बाद कोई उन्हें पैरों से भी नहीं छूता - यह न्याय युक्त भी है क्योंकि गुणों का नाश होने पर कितनी लघुता नहीं होती ? अपितु सर्व ही होती है ।


हे चन्द्रमः किमिति लाञ्छनवानभूस्त्वं तद्वान्
भवेः किमिति तन्मय एवं नाभूः ।
किं ज्योत्स्नया मलमलं तव घोषयन्त्या,
स्वर्भानुवन्ननु तथा सति नासि लक्ष्यः ॥140॥ ॥140॥

अर्थ: हे चन्द्रमा ! तू कालिमारूप लाञ्छन सहित ऐसा क्यों हुआ ? और यदि लाञ्छन सहित ही होना था तो तू सम्पूर्ण ही कालिमामय क्यों नहीं हो गया ? तेरे मल को अतिशय बलवान बताने वाली (कालिमा को और अधिक उभारनेवाली) अवशेष ज्योति से क्या सिद्धि है ? अरे, जरा विचार कर ! यदि तू राहु के समान पूरा काला होता तो किसी के द्वारा देखने और टोकने योग्य नहीं होता ।


दोषान् कांश्चन तान्प्रवर्तकतया प्रच्छाद्य गच्छत्ययं,
सार्धं तैः सहसा म्रियेद्यदि गुरुः पश्चात् करोत्येष किम्।
तस्मान्मे न गुरुर्गुरुर्गुरुतरान् कृत्वा लघूंश्च स्फुटं,
ब्रूते यः सततं समीक्ष्य निपुणं सोऽयं खलः सद्गुरुः ॥141॥ ॥141॥

अर्थ: कोई व्यक्ति गुरु-प्रवृत्ति कायम रखने के अभिप्राय से शिष्य में विद्यमान दोषों को छिपाता है और यदि उन दोषों के रहते हुए ही शिष्य का मरण हो जाए तो गुरु क्या करेगा ? इसलिए ऐसा गुरु मेरा गुरु नहीं है तथा जो मेरे दोषों को देखने में प्रवीण अर्थात् निरन्तर मेरे दोषों को अच्छी तरह देखनेवाला और मेरे थोड़े दोषों को भी बढ़ा-चढ़ाकर कहनेवाला दुर्जन भी मेरा सच्चा गुरु है ।


विकाशयन्ति भव्यस्य मनोमुकुलमंशवः ।
रवेरिवारविन्दस्य कठोराश्च गुरूक्तयः ॥142॥ ॥142॥

अर्थ: जिसप्रकार सूर्य की किरणें भी कमल को प्रफुल्लित करती हैं उसीप्रकार गुरु की कठोर वाणी भी भव्य जीव के मन को प्रफुल्लित करती है ।


लोकद्वयहितं वक्तुं श्रोतुं च सुलभाः पुरा ।
दुर्लभाः कर्तुमद्यत्वे वक्तुं श्रोतुं च दुर्लभाः ॥143॥ ॥143॥

अर्थ: पूर्व काल में दोनों लोकों में हितकारी धर्म को कहने और सुननेवाले सुलभ थे, किन्तु करनेवाले दुर्लभ थे, लेकिन इस काल में तो कहने और सुननेवाले भी दुर्लभ हो गए हैं ।


गुणागुणविवेकिभिर्विहितमप्यलं दूषणं,
भवेत् सदुपदेशवन्मतिमतामतिप्रीतये ।
कृतं किमपि धार्ष्ट्यतः स्तवनमप्यतीर्थोषितैः,
न तोषयति तन्मनांसि खलु कष्टमज्ञानता ॥144॥ ॥144॥

अर्थ: गुण-दोष के विवेक से युक्त सत्पुरुषों द्वारा अपने दोष अधिकता से प्रगट करना भी बुद्धिमानी जीवों को भले उपदेश के समान अत्यन्त प्रीति उत्पन्न करनेवाला होता है और धर्मतीर्थ का सेवन न करनेवाले (दुष्ट पुरुषों) द्वारा धीठता से किया गया गुणानुवाद भी उन बुद्धिमान् विवेकी जीवों को संतोष उत्पन्न नहीं करता। परन्तु तुझे (शंकाकार को) अन्यथा भासित होता है; तेरी इस अज्ञानता से हमें खेद होता है।


त्यक्तहेत्वन्तरापेक्षौ गुणदोषनिबन्धनौ ।
यस्यादानपरित्यागौ स एव विदुषां वरः ॥145॥ ॥145॥

अर्थ: अन्य कारणों की अपेक्षा छोड़कर जो जीव गुणों और दोषों के कारण ही ग्रहण और त्याग करते हैं, वे ही ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं।


हितं हित्वाऽहिते स्थित्वा दुर्धीर्दुःखायसे भृशम् ।
विपर्यये तयोरेधि त्वं सुखायिष्यसे सुधीः ॥146॥ ॥146॥

अर्थ: हे जीव ! तू दुर्बुद्धि होता हुआ हित को छोड़कर अहित में स्थित रहकर अपने को अत्यन्त दुःखी करता है, इसलिए अब इसका उल्टा कर ! अर्थात् सुबुद्धि होता हुआ अहित को छोड़कर हित में स्थित रहते हुए उसी की वृद्धि कर ! इससे तू अपने स्वाभाविक सुख को प्राप्त करेगा ।


इमे दोषास्तेषां प्रभवनममीभ्यो नियमतः,
गुणाश्चैते तेषामपि भवनमेतेभ्य इति यः ।
त्यजंस्त्याज्यान् हेतून् झटिति हितहेतून् प्रतिभजन्,
स विद्वान् सद्वृत्तः स हि स हि निधिः सौख्ययशसोः ॥147॥ ॥147॥

अर्थ: ये दोष हैं और ये इन कारणों से उत्पन्न होते हैं तथा ये गुण हैं और ये इन कारणों से उत्पन्न होते हैं - ऐसा निश्चय करके जो जीव त्यागने योग्य कारणों को शीघ्र छोड़ता है और हित के कारणों का सेवन करता है, वही जीव ज्ञानी है, वही सम्यक् चारित्रवान है और वही सुख और यश का निधान है।


साधारणौ सकलजन्तुषु वृद्धिनाशौ-
जन्मान्तरार्जितशुभाशुभकर्मयोगात् ।
धीमान् स यः सुगतिसाधनवृद्धिनाशः
तद्व्यत्ययाद्विगतधीरपरोऽभ्यधायि ॥148॥ ॥148॥

अर्थ: विगत पूर्व जन्मों में उपार्जित पुण्य-पाप कर्मों के उदयरूप संयोग से शरीर, धनादि की वृद्धि या हानि सभी प्राणियों में समानरूप से पायी जाती है, परन्तु बुद्धिमान् वही है, जिसको सुगति की कारणभूत वृद्धि-हानि पायी जाए तथा उनसे अन्य जिनमें दुर्गति के कारणभूत वृद्धि-हानि होती है वे निर्बुद्धि हैं - ऐसा श्री गुरु ने कहा है।


कलौ दण्डो नीतिः स च नृपतिभिस्ते नृपतयो,
नयन्त्यर्थार्थं तं न च धनमदोऽस्त्याश्रमवताम् ।
नतानामाचार्या न हि नतिरताः साधुचरिताः,
तपःस्थेषु श्रीमन्मणय इव जाताः प्रविरलाः ॥149॥ ॥149॥

अर्थ: कलि-काल में दण्ड ही नीति है, दण्ड देने से ही न्याय-मार्ग चलता है और दण्ड राजाओं द्वारा दिया जाता है । राजा के बिना कोई और दण्ड देने में समर्थ नहीं है, परन्तु वे राजा धन के लिए ही न्याद करते हैं, जहाँ धन आने का प्रयोजन सिद्ध न हो, वहाँ वे न्याय नहीं करते; लेकिन यह धन आश्रमवासी मुनियों के पास नहीं होता, क्योंकि उनका वेश ही धन रहित है । इन भ्रष्ट मुनियों को राजा न्याय मार्ग में नहीं चलाते (इन पर शासन नहीं करते) । आचार्य स्वयं की विनय-नमस्कारादि कराने के लोभी हो गए हैं, अतः वे भी विनयवान् मुनियों को न्याय में प्रवर्तन नहीं कराते । इसप्रकार इस काल में मुनियों का निर्दोष आचरण करनेवाले तपस्वी मुनि, शोभायमान उत्कृष्ट रत्नों की भाँति थोड़े ही हैं ।


एते ते मुनिमानिनः कवलिताः कान्ताकटाक्षेक्षणैः,
अङ्गालग्नशरावसन्नहरिणप्रख्या भ्रमन्त्याकुलाः ।
संधर्तुं विषयाटवीस्थलतले स्वान् क्वाप्यहो न क्षमाः,
मा व्राजीन्मरुदाहताभ्रचपलैः संसर्गमेभिर्भवान् ॥150॥ ॥150॥

अर्थ: जो प्रत्यक्ष में मुनि नहीं हैं, परन्तु अपने को मुनि मानते हैं, वे स्त्रियों के कटाक्ष भरे अवलोकन से ग्रसित, बाणों के घावों से पीड़ित हिरण के समान व्याकुल होकर भ्रमण करते हैं । वे विषयरूपी वन के स्थल भाग में कहीं भी स्वयं को स्थिर नहीं रख पाते - ऐसे पवन द्वारा खण्डित बादलों के समान चपल और चञ्चल भ्रष्ट मुनियों की संगति भव्य जीवों को नहीं करना चाहिए ।

श्लोक 151 से 180

गेहं गुहाः परिदधासि दिशो विहायः
संव्यानमिष्टमशनं तपसोऽभिवृद्धिः ।
प्राप्तागमार्थ तव सन्ति गुणाः कलत्र-
मप्रार्थ्यवृत्तिरसि यासि वृथैव याञ्चाम् ॥151॥ ॥151॥

अर्थ: यहाँ जिसने आगम का अर्थ समझ लिया है, उसे सम्बोधित करते हुए कहते हैं - हे प्राप्तागमार्थ ! गुफा तो तेरा मन्दिर है, दिशायें वस्त्र है, आकाश वाहन है, तप की वृद्धि इष्ट भोजन है और गुण स्त्री हैं । इसप्रकार किसी और के पास जो याचना करने योग्य सामग्री नहीं है, वह तेरे पास है । अब तू व्यर्थ ही याचना करता है, तुझे दीन होना योग्य नहीं है ।


परमाणोः परं नाल्पं नभसो न परं महत् ।
इति ब्रुवन् किमद्राक्षीन्नेमौ दीनाभिमानिनौ ॥152॥ ॥152॥

अर्थ: परमाणु से छोटा कोई नहीं, तथा आकाश से बड़ा और कोई नहीं - ऐसा कहनेवालों ने क्या दीन और अभिमानियों को नहीं देखा ?


याचितुर्गौरवं दातुर्मन्ये संक्रान्तमन्यथा ।
तदवस्थौ कथं स्यातामेतौ गुरुलघू तदा ॥153॥ ॥153॥

अर्थ: मैं ऐसा मानता हूँ कि याचक का गौरव दातार में संक्रमित हो गया है। यदि ऐसा न हो और अन्यथा हो तो याचना के समय याचक की अवस्था लघु और दातार की अवस्था गुरु कैसे हो जाती है ?


अधो जिघृक्षवो यान्ति यान्त्यूर्ध्वमजिघृक्षवः ।
इति स्पष्टं वदन्तौ वा नामोन्नामौ तुलान्तयोः ॥154॥ ॥154॥

अर्थ: जिन्हें ग्रहण करने की इच्छा है, वे जीव अधोगति प्राप्त करते हैं और जिन्हें ग्रहण करने की इच्छा नहीं है, वे ऊर्ध्वगति प्राप्त करते हैं । इनका ऊँचा-नीचा होना मानो तराजू के दोनों पलड़ों द्वारा स्पष्ट रूप से प्रगट किया जाता है ।


सस्वमाशासते सर्वे न स्वं तत् सर्वतर्पि यत् ।
अर्थिवैमुख्यसंपादिसस्वत्वान्निस्वता वरम् ॥155॥ ॥155॥

अर्थ: सभी लोग धनी व्यक्तियों से याचना करते हैं और सभी को तृप्त कर सके - ऐसा धन किसी के पास नहीं होता, इसलिए याचकों को विमुख करनेवाले धनी होने से तो धन रहित होना ही अच्छा है।


आशाखनिरतीवाभूदगाधा निधिभिश्च या ।
सापि येन समीभूता तत्ते मानधनं धनम् ॥156॥ ॥156॥

अर्थ: आशारूपी खान निधियों से भी अधिक गहरी है, वह भी जिससे समान हो जाती है (भर जाती है), ऐसा मानरूपी धन ही तेरा सच्चा धन है।


आशाखनिरगाधेयमधः कृतजगत्त्रया ।
उत्सर्प्योत्सर्प्य तत्रस्थानहो सद्भिः समीकृता ॥157॥ ॥157॥

अर्थ: यह आशारूपी खान अथाह है। इसने तीन लोक के जीवों को अपने आधीन कर लिया है, परन्तु यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि सत्पुरुषों द्वारा इसमें से धनादिक को निकाल-निकाल कर इसे (पृथ्वी तल के) समान किया जाता है।


विहितविधिना देहस्थित्यै तपांस्युपबृंहय-
न्नशनमपरैर्भक्त्या दत्तं क्वचित् कियदिच्छति ।
तदपि नितरां लज्जाहेतुः किलास्य महात्मनः,
कथमयमहो गृह्णात्यन्यान् परिग्रहदुर्ग्रहान् ॥158॥ ॥158॥

अर्थ: मुनिराज को कभी-कभी तप को बढ़ाने के लिए और शरीर की स्थिति के लिए गृहस्थ लोग नवधा भक्ति पूर्वक जो योग्य आहार देते हैं, उसे वे किसी काल में किञ्चित् मात्र ग्रहण करते हैं; परन्तु यह भी उन मुनि महात्माओं के लिए अतिशय लज्जा का कारण है, तो वे अन्य परिग्रहरूपी खोटे ग्रहों को कैसें ग्रहण करेंगे ? अर्थात् बिलकुल भी ग्रहण नहीं करेंगे ।


दातारो गृहचारिणः किल धनं देयं तदत्राशनं,
गृह्णन्तः स्वशरीरतोऽपि विरताः सर्वोपकारेच्छया ।
लज्जैषैव मनस्विनां ननु पुनः कृत्वा कथं तत्फलं,
रागद्वेषवशीभवन्ति तदिदं चक्रेश्वरत्वं कलेः ॥159॥ ॥159॥

अर्थ: इस मुनिधर्म में गृहस्थ दातार हैं, देने योग्य भोजन धन है तथा सबके उपकार की इच्छा से शरीर से विरक्त रहते हुए भोजन ग्रहण करना, क्रिया है - यह भी बुद्धिमानों के लिए लज्जा की बात है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि मुनि इस भोजन को भेष का फल समझकर राग-द्वेष के वशीभूत होते हैं। यह कलि-काल का चक्रवर्तीपना है।


आमृष्टं सहजं तव त्रिजगतीबोधाधिपत्यं तथा,
सौख्यं चात्मसमुद्भवं विनिहतं निर्मूलतः कर्मणा ।
दैन्यात्तद्विहितैस्त्वमिन्द्रियसुखैः संतृप्यसे निस्त्रपः,
स त्वं यश्चिरयातनाकदशनैर्बद्धस्थितस्तुष्यसि ॥160॥ ॥160॥

अर्थ: हे जीव ! जिस कर्म ने तेरे स्वभावभूत तीन लोक के ज्ञान का स्वामित्वपना नष्ट किया (केवलज्ञान प्रगट नहीं होने दिया) और जिसने तेरे आत्मजन्य (अतीन्द्रिय) सुख का मूल से ही नाश किया; फिर भी तू निर्लज्ज होकर दीनता पूर्वक उसी कर्म द्वारा उत्पन्न इन्द्रिय सुखों से तृप्त हो रहा है । तू उपवासादि के कष्ट सहने के बाद मिलनेवाले कुत्सित नीरस आहार में ही आजीविका की स्थिरता मानकर सन्तुष्ट हो रहा है ।


तृष्णा भोगेषु चेद्भिक्षो सहस्वाल्पं स्वरेव ते ।
प्रतीक्ष्य पाकं किं पीत्वा पेयं भुक्तिं विनाशयेः ॥161॥ ॥161॥

अर्थ: हे भिक्षुक मुनि ! यदि तुझे विषय-भोगों की चाह है तो, थोड़ा सहनशील हो । वे भोग स्वर्गों में हैं । रे मूर्ख ! तू पकते हुए भोजन को देखकर ! जलादि को ही पीकर भोजन का नाश क्यों करता है ? ऐसा मत कर !


निर्धनत्वं धनं येषां मृत्युरेव हि जीवितम् ।
किं करोति विधिस्तेषां सतां ज्ञानैकचक्षुषाम् ॥162॥ ॥162॥

अर्थ: निर्धनता ही जिनका धन है और मरण ही जिनका जीवन है और जो ज्ञान ही जिनका नेत्र है - ऐसे सन्त पुरुषों का विधाता अर्थात् कर्म क्या कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ नहीं कर सकते ।


जीविताशा धनाशा च येषां तेषां विधिर्विधिः।
किं करोति विधिस्तेषां येषामाशा निराशता ॥163॥ ॥163॥

अर्थ: जिन्हें जीने की और धन पाने की आशा है, विधाता (कर्म) उनके ही विधाता हैं; परन्तु जिनकी आशा नष्ट हो गई है, विधाता उनका क्या कर सकते हैं ? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकते ।


परां कोटिं समारूढौ द्वावेव स्तुतिनिन्दयोः ।
यस्त्यजेत्तपसे चक्रं यस्तपो विषयाशया ॥164॥ ॥164॥

अर्थ: जो तप के लिए चक्र (राज्य) को छोड़ते हैं और जो विषयों की आशा से तप को छोड़ते हैं - ये दोनों ही स्तुति और निन्दा के सर्वोत्कृष्ट भाग को प्राप्त करते हैं।


त्यजतु तपसे चक्रं चक्री यतस्तपसः फलं
सुखमनुपमं स्वोत्थं नित्यं ततो न तदद्भुतम् ।
इदमिह महच्चित्रं यत्तद्विषं विषयात्मकं
पुनरपि सुधीस्त्यक्तं भोक्तुं जहाति महत्तपः ॥165॥ ॥165॥

अर्थ: चक्रवर्ती तप के लिए राज्य छोड़ें तो छोड़ें, क्योंकि इसका फल अनुपम, आत्मजन्य शाश्वत सुख है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं है; परन्तु यह बड़े आश्चर्य की बात है कि बुद्धिमान् होकर भी छोड़े हुए विषय-विष को पुनः भोगने के लिए महान् तप को छोड़ देते हैं।


शय्यातलादपि तुकोऽपि भयंप्रपातात्,
तुङ्गात्ततः खलुविलोक्यकिलात्मपीडाम् ।
चित्रं त्रिलोकशिखरादपि दूरतुङ्गाद्,
धीमान् स्वयं न तपसः पतनाद्विभेति ॥166॥ ॥166॥

अर्थ: छोटा बालक भी पीड़ा होने के भय से ऊँची शैय्या से गिरने से डरता है, परन्तु यह सचमुच में बड़े आश्चर्य की बात है कि बुद्धिमान् व्यक्ति तीन लोक के शिखर समान अत्यन्त ऊँचे तप से गिरने में भी नहीं डरते ।


विशुध्यति दुराचारः सर्वोऽपि तपसा ध्रुवम् ।
करोति मलिनं तच्च किल सर्वाधरोऽपरः ॥167॥ ॥167॥

अर्थ: पूर्व में किए गए सभी दुराचार तप के द्वारा निश्चित रूप से शुद्ध हो जाते हैं (दूर हो जाते हैं), और जिनमत से बाह्य, सबसे अधिक निकृष्ट निंद्य जीव उस तप को भी मलिन कर देते हैं ।


सन्त्येव कौतुकशतानि जगत्सु किं तु,
विस्मापकं तदलमेतदिह द्वयं नः ।
पीत्वाऽमृतं यदि वमन्ति विसृष्टपुण्याः,
संप्राप्य संयमनिधिं यदि च त्यजन्ति ॥168॥ ॥168॥

अर्थ: तीन लोक में कौतूहल के सैकड़ों उदाहरण हैं, परन्तु इनमें हमें तो ये दो कार्य ही अत्यन्त आश्चर्य उत्पन्न करते हैं - एक तो भाग्यहीन पुरुष द्वारा अमृत पीकर उसका वमन करना और दूसरा संयम-निधान पाकर उसे छोड़ना।


इह विनिहतबह्वारम्भबाह्योरुशत्रोः,
उपचितनिजशक्तेर्नापरः कोऽप्यपायः।
अशनशयनयानस्थानदत्तावधानः कुरु,
तव परिरक्षामान्तरान् हन्तुकामः ॥169॥ ॥169॥

अर्थ: हे मुनि ! तुमने यह मुनिलिंग धारण करके बहुत आरम्भादिक पापकर्मरूप बाह्य शत्रुओं का नाश करके अपनी शक्ति संचित कर ली है, इसलिए तुम्हारा और कोई दूसरा विघ्न करनेवाला शत्रु नहीं रहा; परन्तु अब तो अन्तरंग शत्रुओं के नाश करने का अभिलाषी होकर भोजन करना, सोना, चलना, बैठना आदि क्रियाओं में सावधान रहकर अपनी रक्षा कर - ऐसी शिक्षा हम तुम्हें देते हैं।


अनेकान्तात्मार्थ प्रसवफलभारातिविनते,
वचः पर्णाकीर्णे विपुलनयशाखाशतयुते ।
समुत्तुंगे सम्यक् प्रततमतिमूले प्रतिदिनं,
श्रुतस्कन्धे धीमान् रमयतु मनो मर्कटममुम् ॥170॥ ॥170॥

अर्थ: बुद्धिमान् पुरुषों को इस मनरूपी बन्दर को सदाकाल प्रतिदिन शास्त्ररूपी वृक्ष में रमाना चाहिए। यह शास्त्र रूपी वृक्ष अनेकान्तमय पदार्थरूपी फूलों और फलों के भार से नम्रीभूत है, वचनरूपी पत्तों से व्याप्त है, नयरूपी सैकड़ों विशाल शाखाओं से युक्त है, अत्यन्त ऊँचा है और विस्तृत मतिज्ञान इसकी जड़ है।


तदेव तदतद्रूपं प्राप्नुवन्न विरंस्यति ।
इति विश्वमनाद्यन्तं चिन्तयेद्विश्ववित् सदा ॥171॥ ॥171॥

अर्थ: समस्त तत्त्वों को जाननेवाले ज्ञानी अनादिनिधन समस्त जीवादि वस्तुओं के बारे में चिन्तवन करते हैं कि वस्तु विवक्षित स्वरूप को तथा उससे प्रतिपक्षी स्वरूप को प्राप्त होने पर भी नष्ट नहीं होती।


एकमेकक्षणे सिद्धं ध्रौव्योत्पादव्ययात्मकम् ।
अबाधितान्यतत्प्रत्ययान्यथानुपपत्तितः ॥172॥ ॥172॥

अर्थ: एक ही वस्तु एक ही समय में ध्रौव्य-उत्पाद-व्यय - इन तीनों स्वरूप है, अन्यथा प्रमाण से अबाधित वस्तु में ‘यह वही है’ ऐसी प्रतीति और ‘यह अन्य है’ ऐसी प्रतीति सिद्ध नहीं होगी।


न स्थास्नु न क्षणविनाशि न बोधमात्रं,
नाभावमप्रतिहतप्रतिभासरोधात् ।
तत्त्वं प्रतिक्षणभवत्तदतत्स्वरूप-
माद्यन्तहीनमखिलं च तथा यथैकम् ॥173॥ ॥173॥

अर्थ: वस्तु सर्वथा नित्य अर्थात् स्थिर नहीं है और सर्वथा क्षणिक अर्थात् विनाशीक भी नहीं है। सर्वथा ज्ञानमात्र नहीं है और सर्वथा अभावरूप भी नहीं है, क्योंकि सर्वथा अखण्ड एक ही धर्मरूप प्रतिभासित होने में विरोध है; अविरोधरूप से ऐसा भासित नहीं होता, क्योंकि वस्तु प्रतिसमय उसरूप (अपने स्वरूप) भी है और उसरूप नहीं भी है। वस्तु का अनादिनिधन स्वरूप ऐसा ही है। जैसे एक पदार्थ ऐसा अनेकान्तरूप भासित होता है, वैसे ही सभी पदार्थों का स्वरूप जानना चाहिए।


ज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्तिरच्युतिः।
तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज्ज्ञानभावनाम् ॥174॥ ॥174॥

अर्थ: ज्ञान आत्मा का असाधारण स्वभाव है और स्वभाव की प्राप्ति विनाश रहित है; इसलिए अविनाशी अवस्था को चाहनेवाले विवेकियों को ज्ञान-भावना भाना चाहिए।


ज्ञानमेव फलं ज्ञाने ननु श्लाघ्यमनश्वरम् ।
अहो मोहस्य माहात्म्यमन्यदप्यत्र मृग्यते ॥175॥ ॥175॥

अर्थ: निश्चय से ज्ञान का फल ज्ञान ही है, वह सर्वथा प्रशंसनीय और अविनाशी है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि उससे लोग अन्य कुछ और फल चाहते हैं - इसे मोह की ही महिमा जानना चाहिए।


शास्त्राग्नौ मणिवद्भव्यो विशुद्धो भाति निर्वृतः।
अङ्गारवत् खलो दीप्तो मली व भस्म वा भवेत् ॥176॥ ॥176॥

अर्थ: भव्य जीव शास्त्ररूपी अग्नि में असली पुष्पराग रत्न के समान मल रहित होते हुए विशुद्ध निर्मलता से सुशोभित होते हैं और दुष्ट अभव्य जीव अंगार के समान प्रकाशित होते हुए मलयुक्त ही रहते हैं या भस्म हो जाते हैं।


मुहुः प्रसार्य सज्ज्ञानं पश्यन् भावान् यथास्थितान्।
प्रीत्यप्रीती निराकृत्य ध्यायेदध्यात्मविन्मुनिः ॥177॥ ॥177॥

अर्थ: आत्मा के अधिकाररूप अध्यात्म भाव को जाननेवाले मुनि बार-बार सम्यग्ज्ञान को फैलाकर पदार्थों का यथार्थ अवलोकन करते हुए राग-द्वेष का अभाव करके ध्यान करते हैं।


वेष्टनोद्वेष्टने यावत्तावद् भ्रान्तिर्भवार्णवे ।
आवृत्तिपरिवृत्तिभ्यां जन्तोर्मन्थानुकारिणः ॥178॥ ॥178॥

अर्थ: जब तक इस प्राणी का मथानी की रस्सी के समान बँधना और खुलना होता रहता है, तब तक यह संसार-समुद्र में गमन-आगमन करके भ्रमण करता रहता है ।


मुच्यमानेन पाशेन भ्रान्तिर्बन्धश्च मन्थवत् ।
जन्तोस्तथासौ मोक्तव्यो येनाभ्रान्तिरबन्धनम् ॥179॥ ॥179॥

अर्थ: मथानी की रस्सी के समान इस जीव की फाँसी (कर्म की गाँठ) खुलने पर भी उसका भ्रमण और कर्म-बन्ध होता है, इसलिए यह फाँसी इसप्रकार खोलना चाहिए कि जिससे पुनः भ्रमण और कर्म-बन्ध न हो ।


रागद्वेषकृताभ्यां जन्तोर्बन्धः प्रवृत्त्यवृत्तिभ्याम्।
तत्त्वज्ञानकृताभ्यां ताभ्यामेवेक्ष्यते मोक्षः ॥180॥ ॥180॥

अर्थ: राग-द्वेषादि भावों से की गई प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति से तो बन्ध होता है और तत्त्वज्ञान से की गई प्रवृत्ति और अप्रवृत्ति से मोक्ष दिखाई देता है।

श्लोक 181 से 210

द्वेषानुरागबुद्धिर्गुणदोषकृता करोति खलु पापम्।
तद्विपरीता पुण्यं तदुभयरहिता तयोर्मोक्षम् ॥181॥ ॥181॥

अर्थ: गुणों में द्वेष और दोषों में अनुरागरूप बुद्धि निश्चय से पाप को उत्पन्न करती है और इससे विपरीत अर्थात् गुणों में अनुराग और दोषों में द्वेषरूप बुद्धि पुण्य को उत्पन्न करती है। इन दोनों से रहित बुद्धि पुण्य और पापरूप कर्मों से मुक्त करती है।


मोहबीजाद्रतिद्वेषौ बीजान्मूलाङ्कुराविव ।
तस्माज्ज्ञानाग्निना दाह्यं तदेतौ निर्दिधिक्षुणा ॥182॥ ॥182॥

अर्थ: जैसे बीज से वृक्ष की जड़ और अंकुर होता है, वैसे मोहरूपी मूलकारण से आत्मा को राग-द्वेष होते हैं; इसलिए जो जीव राग-द्वेष का नाश करना चाहते हैं, उन्हें ज्ञानरूपी अग्नि से मोह दग्ध करना चाहिए।


पुराणो ग्रहदोषोत्थो गम्भीरः सगतिः सरुक् ।
त्यागजात्यादिना मोहव्रणः शुद्ध्यति रोहति ॥183॥ ॥183॥

अर्थ: यह मोहरूपी गूमड़ा अर्थात् फोड़ा अत्यन्त पुराना ग्रह-दोष से उत्पन्न, गम्भीर, गति सहित, कष्टदायक, त्याग जाति आदि से शुद्ध होनेवाला और रोह को प्राप्त होनेवाला है ।
यहाँ फोड़े के उदाहरण से मोह का स्वरूप समझाया गया है ।
जैसे फोड़ा बहुत समय से हुआ है, वैसे मोह अनादि काल से है । फोड़ा मंगल आदि खोटे ग्रहों के आने पर (पाप का उदय आने पर) उत्पन्न होता है, वैसे मोह परद्रव्य के ग्रहणरूप परिग्रह के दोष से उत्पन्न होता है । जैसे फोड़ा बहुत गहरा है, वैसे मोह अथाह अर्थात् अत्यन्त गहन है । जैसे फोड़े से पीप खून आदि का गमन होता रहता है (खून पीप आदि बहते रहते हैं), वैसे मोह से भी नरकादि गति की प्राप्ति होती रहती है । जैसे फोड़ा कष्ट उत्पन्न करता है, वैसे मोह आकुलता उत्पन्न करता है । जैसे फोड़ा खून आदि के त्याग और घी आदि लगाने से मिट जाता है तथा चमड़ीरूप स्वभाविक अवस्था को प्राप्त होता है, वैसे मोह परद्रव्यों के त्याग से और निजस्वरूप जाति के ग्रहण से शुद्ध होता है (अर्थात् मोह का नाश होता है) और सम्यक्त्वरूप स्वभाव की प्राप्ति होती है ।


सुहृदः सुखयन्तः स्युर्दुःखयन्तो यदि द्विषः ।
सुहृदोऽपि कथं शोच्या द्विषो दुःखयितुं मृताः ॥184॥ ॥184॥

अर्थ: जो अपने को सुखी करे, वह मित्र होता है और जो दुःखी करे, वह शत्रु होता है; इसलिए जो मित्र होते हुए भी मरकर हमें दुःखी कर रहे हैं वे तो हमारे शत्रु हुए, अतः शोक करने योग्य कैसे हुए ? अर्थात् नहीं हुए।


अपरमरणे मत्वात्मीयानलङ्घ्यतमे रुदन्,
विलपति तरां स्वस्मिन् मृत्यौ तथास्य जडात्मनः ।
विभयमरणे भूयः साध्यं यशः परजन्म वा,
कथमिति सुधीः शोकं कुर्यान्मृतेऽपि न केनचित् ॥185॥ ॥185॥

अर्थ: अपने से भिन्न स्त्री-पुत्रादि का अनिवार्य मरण होने पर भी जो उन्हें अपना जानकर रोता हुआ विलाप करता है, वह स्वयं का मरण निकट आने पर उससे भी अधिक अतिशय विलाप करता है - ऐसे मूर्ख आत्मा को भय रहित मरण से प्राप्त होनेवाला प्रचुर यश और उत्कृष्ट पर-लोक कैसे प्राप्त होगा ? अर्थात् नहीं होगा। इसलिए बुद्धिमान् जीवों को किसी का मरण होने पर भी किसी प्रकार का शोक नहीं करना चाहिए।


हानेः शोकस्ततो दुःखं लाभाद्रागस्ततः सुखम् ।
तेन हानावशोकः सन् सुखी स्यात् सर्वदा सुधीः ॥186॥ ॥186॥

अर्थ: इष्ट सामग्री की हानि से शोक होता है और उस शोक से दुःख होता है। इष्ट सामग्री की प्राप्ति से राग होता है और उस राग से सुख होता है; इसलिए बुद्धिमान् लोग इष्ट की हानि होने पर भी शोक रहित होते हुए सदा सुखी रहते हैं।


सुखी सुखमिहान्यत्र दुःखी दुःखं समश्नुते ।
सुखं सकलसन्यासी दुःखं तस्य विपर्ययः ॥187॥ ॥187॥

अर्थ: जो इस लोक में सुखी हैं वे पर-लोक में भी सुख पाते हैं और जो इस लोक में दुःखी हैं वे पर-लोक में भी दुःख पाते हैं। वस्तु का सर्व प्रकार से त्याग सुख है और इसके विपरीत परवस्तु का ग्रहण दुःख है।


मृत्योर्मृत्वन्तरप्राप्तिरुत्पत्तिरिह देहिनाम् ।
तत्र प्रमुदितान्मन्ये पाश्चात्ये पक्षपातिनः ॥188॥ ॥188॥

अर्थ: इस संसार में देहधारी प्राणियों को एक मरण से अन्य मरण की प्राप्ति होना ही उत्पत्ति है। इसलिए जो उत्पत्ति में हर्षित होते हैं, उन्हें मैं बाद में होनेवाले मरण का पक्षपाती मानता हूँ।


अधीत्य सकलं श्रुतं चिरमुपास्य घोरं तपो,
यदीच्छसि फलं तयोरिह हि लाभपूजादिकम्।
छिनत्सि सुतपस्तरोः प्रसवमेव शून्याशयः,
कथं समुपलप्स्यसे सुरसमस्य पक्वं फलम् ॥189॥ ॥189॥

अर्थ: सर्व शास्त्रों को पढ़कर और चिरकाल तक घोर तप की साधना करके यदि तू उनके फलस्वरूप इस लोक में ही यश, लाभ आदि फल चाहता है, तो तू विवेक रहित अभिप्रायवाला होता हुआ तपरूपी उत्तम वृक्ष के फूल को ही छेद रहा है, अतः तुझे इस तप के उत्तम रसवाले स्वर्ग-मोक्षादि उत्तम फल कैसे मिलेंगे ?


तथा श्रुतमधीष्व शश्वदिह लोकपंक्तिं बिना,
शरीरमपि शोषय प्रथितकायसंक्लेशनैः ।
कषायविषयद्विषो विजयसे यथा दुर्जयान्,
शमं हि फलमामनन्ति मुनयस्तपः शास्त्रयोः ॥190॥ ॥190॥

अर्थ: हे भव्य ! तू लोक की पद्धति से अलग (लौकिक जीवों में शामिल हुए बिना) ऐसा शास्त्राभ्यास कर और विस्तृत काय-क्लेश के द्वारा शरीर को भी सुखा, जिससे तू दुर्जय विषय-कषायरूपी शत्रुओं को जीत सके, क्योंकि महामुनियों ने उपशमभाव को ही शास्त्राभ्यास और तप का फल कहा है।


दृष्ट्वा जनं व्रजसि किं विषयाभिलाषं,
स्वल्पोऽप्यसौ तव महज्जनयत्यनर्थम् ।
स्नेहाद्युपक्रमजुषो हि यथातुरस्य,
दोषो निषिद्धचरणं न तथेतरस्य ॥191॥ ॥191॥

अर्थ: हे भव्य ! तू लोगों को श्रृंगार सहित देखकर विषयाभिलाषा क्यों करता है ? यह अल्प विषयाभिलाषा भी तुझे महा अनर्थकारी है । जैसे रोगी को दूध-दही-घी आदि का किञ्चित् भी सेवन अयोग्य आचरण है और वह उसे जैसा दोष उत्पन्न करता है वैसा और लोगों को नहीं करता (निरोगी को दोष उत्पन्न नहीं करता) ।


अहितविहितप्रीतिः प्रीतं कलत्रमपि स्वयं,
सकृदपकृतं श्रुत्वा सद्यो जहाति जनोऽप्ययम्।
स्वहितनिरतः साक्षाद्दोषं समीक्ष्य भवे भवे,
विषयविषवद्ग्रासाभ्यासं कथं कुरुते बुधः ॥192॥ ॥192॥

अर्थ: जिसप्रकार कोई पुरुष अपनी अत्यधिक प्रिय स्त्री का दुराचार सुनकर उसे तत्काल स्वयं छोड़ देता है, उसीप्रकार आत्म-कल्याण में सावधान विवेकी पुरुष विष मिश्रित भोजन के समान विषयों का भव-भव में दोष देखकर इनका सेवन कैसे करेंगे ? अर्थात् बिल्कुल नहीं करेंगे।


आत्मन्यात्मविलोपनात्मचरितैरासीर्दुरात्मा चिरं,
स्वात्मा स्याः सकलात्मनीनचरितैरात्मीकृतैरात्मनः ।
आत्मेत्यां परमात्मतां प्रतिपतन् प्रत्यात्मविद्यात्मकः,
स्वात्मोत्थात्मसुखो निषीदसि लसन्नध्यात्ममध्यात्मना ॥193॥ ॥193॥

अर्थ: हे आत्मन् ! तू आत्मज्ञान को नष्ट करनेवाले विषय-कषायादि की प्रवृत्ति करके चिरकाल से दुराचारी हुआ है । जब तू आत्मा का सम्पूर्ण कल्याण करनेवाले ज्ञान-वैराग्यादि निजभावों को अंगीकार करेगा, तभी श्रेष्ठ आत्मा होगा । जिसे आत्मा ही प्राप्त कर सकता है - ऐसी परमात्मदशा को प्राप्त करते हुए, केवलज्ञान स्वरूप होकर, अपने से उत्पन्न आत्मसुख से शोभायमान होकर, तू अपने शुद्धात्मभावों से अध्यात्म स्वरूप में विराजमान हो जाएगा ।


अनेन सुचिरं पुरा त्वमिह दासवद्व्राहित-
स्ततोऽनशनसाभिभक्तरसवर्जनादिक्रमैः ।
क्रमेण विलयावधि स्थिरतपोविशेषैरिदं
कदर्थय शरीरकं रिपुमिवाद्य हस्तागतम् ॥194॥ ॥194॥

अर्थ: हे जीव ! इस शरीर ने तुझे इस जगत् में अनन्त काल दास के समान भ्रमण कराया है, इसलिए जैसे कोई हाथ में आए शत्रु को क्षीण करता है, वैसे तू अब उपवास, अल्प-आहार तथा रस-परित्यागादि विधिरूप अनेक प्रकार के तपों के द्वारा अनुक्रम से इसे निरन्तर मरण पर्यन्त क्षीण कर ।


आदौ तनोर्जननमत्र हतेन्द्रियाणि,
काङ्क्षन्ति तानि विषयान् विषयाश्च मानं।
हानिप्रयासभयपापकुयोनिदाः स्युः,
मूलं ततस्तनुरनर्थपरम्पराणाम् ॥195॥ ॥195॥

अर्थ: सर्व प्रथम जैसे ही इस शरीर की उत्पत्ति होती है तो उसके साथ उत्पन्न ये दुष्ट इन्द्रियाँ विषयों को चाहती हैं । वे विषय मान-प्रतिष्ठा की हानि करते हैं और महाक्लेश के कारण बनते हैं तथा भय और पाप को उत्पन्न करनेवाले हैं, नरक-निगोदादि कुगतियों में ले जाते हैं; इसलिए यह शरीर ही अनर्थ-परम्परा का मूल कारण है ।


शरीरमपि पुष्णन्ति सेवन्ते विषयानपि ।
नास्त्यहो दुष्करं नृणां विषाद्वाञ्छन्ति जीवितुम् ॥196॥ ॥196॥

अर्थ: अहो ! मूर्ख जीव क्या-क्या नहीं करता ? शरीर का पोषण करता है और विषयों का सेवन करता है। मूर्खों को कुछ विवेक नहीं है, वे विष से जीना चाहते हैं। अविवेकियों को पाप का भय नहीं है और विचार नहीं है, वे बिना विचारे न करने योग्य कार्य करते हैं।


इतस्ततश्च त्रस्यन्तो विभावर्यां यथा मृगाः ।
वनाद्विशन्त्युपग्रामं कलौ कष्टं तपस्विनः ॥197॥ ॥197॥

अर्थ: जैसे मृग दिन के समय वन में भ्रमण करके रात्रि के समय सिंहादिक के भय से वन छोड़कर, गाँव के समीप आकर रहते हैं; वैसे कलि-काल में मुनि भी दिन के समय वन में निवास कर रात्रि के समय गाँव के समीप आ जाते हैं। सो हाय ! हाय !! यह बड़ा कष्ट है। मुनि तो महानिर्भय होते हैं, वे मृगों के समान गाँव के समीप आकर कैसे बसते हैं ?


वरं गार्हस्थ्यमेवाद्य तपसो भाविजन्मनः ।
श्वः स्त्रीकटाक्षलुण्टाकलोप्यवैराग्यसंपदः ॥198॥ ॥198॥

अर्थ: इस जगत् में स्त्रियों के कटाक्षरूप लुटेरों से अपनी वैराग्य-सम्पदा लुटाकर दीन होनेवाले और संसार के कारणभूत - ऐसे तप से गृहस्थपना ही श्रेष्ठ है ।


स्वार्थभ्रंशं त्वमविगणयंस्त्यक्तलज्जाभिमानः,
संप्राप्तोऽस्मिन् परिभवशतैर्दुःखमेतत् कलत्रम्।
नान्धेति त्वां पदमपि पदाद्विप्रलब्धोऽसि भूयः,
सख्यं साधौ यदि हि मतिमान् मा ग्रहीर्विग्रहेण ॥199॥ ॥199॥

अर्थ: हे भव्य जीव ! तू इस शरीर के होते हुए अपना प्रयोजन अर्थात् शुद्धोपयोगरूप आत्मकल्याण अथवा पञ्च महाव्रतरूप मुनिधर्म और अणुव्रतरूप श्रावक धर्म के नाश की चिन्ता न करते हुए अनेक अपमानों को सहन करके स्त्री के संयोग को प्राप्त हुआ। इस स्त्री का सम्बन्ध ही तुझे महादुःख का कारण है। अरे ! तूने लज्जा और अभिमान को छोड़ दिया है। यहाँ अभिमान का अर्थ गर्व नहीं है, बल्कि याचना वृत्ति का त्याग है, अर्थात् तू स्त्री के संग से निर्लज्ज और याचक हो गया है, इसके समान दीनता अन्य नहीं है।
हे जीव ! तूने तो शरीर के लिए अपना अर्थ (प्रयोजन) खोया और यह तेरे साथ एक कदम भी नहीं जाता, अतः तू इससे बारम्बार प्रीति करके क्यों ठगा रहा है ? इसलिए अब हम तुझसे कहते हैं कि यदि तू बुद्धिमान् है तो शरीर से प्रीति मत कर।


न कोऽप्यन्योऽन्येन व्रजति समवायं गुणवता,
गुणी केनापि त्वं समुपगतवान् रूपिभिरमा ।
न ते रूपं ते यानुपव्रजसि तेषां गतमतिः,
ततश्छेद्यो भेद्यो भवसि बहुदुःखे भववने ॥200॥ ॥200॥

अर्थ: यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि कोई गुणी अर्थात् द्रव्य किसी अन्य द्रव्य के साथ एकत्व को प्राप्त नहीं होता, फिर भी तू कर्मोदय के योगवश रूपी पदार्थों में ममत्व करता है। तू जिन शरीरादि पदार्थों में आसक्त होकर उनमें एकत्वबुद्धि कर रहा है, वे पुद्गल हैं; वे तुझरूप नहीं होते और तू निर्बुद्धि होता हुआ व्यर्थ ही एकत्व मानता है। इस अभेद बुद्धि से उनमें आसक्त होकर तू भव-वन में बहुत दुःखी होगा, छेदा जाएगा, भेदा जाएगा, भव-भव में दुःख भोगेगा; इसलिए देहादिक से स्नेह छोड़ !


माता जातिः पिता मृत्युराधिव्याधी सहोद्गतौ।
प्रान्ते जन्तोर्जरा मित्रं तथाप्याशा शरीरके ॥201॥ ॥201॥

अर्थ: इस शरीर की उत्पत्ति तो इसकी माता है और मरण इसका पिता है, आधि अर्थात् मन की चिन्तायें और व्याधि अर्थात् वायु-पित्त-कफ आदि रोग ही इसके भाई हैं और अन्त में बुढ़ापा इसका मित्र है । शरीर का ऐसा स्वरूप होने पर भी तू इससे आशा करता है - यह बड़े आश्चर्य की बात है ।


शुद्धोऽप्यशेषविषयावगमोऽप्यमूर्तोऽ,
प्यात्मन् त्वमप्यतितरामशुचीकृतोऽसि।
मूर्तं सदाऽशुचि विचेतनमन्यदत्र,
किं वा न दूषयति धिग्धिगिदं शरीरम् ॥202॥ ॥202॥

अर्थ: हे चिदानन्द ! तू तो शुद्ध अर्थात् निर्मल है । समस्त निज-पर का ज्ञाता है और अमूर्तिक है, तो भी इस जड़ (शरीर) ने तुझे अपवित्र कर दिया है । यह शरीर मूर्तिक है, अचेतन है, सदा अशुचि है तथा संसार की केशर-कपूर आदि सुगन्धित वस्तुओं को भी दुर्गन्धित करनेवाला है, इसलिए इस शरीर को धिक्कार है, धिक्कार है ।


हा हतोऽसि तरां जन्तो येनास्मिंस्तव सांप्रतम् ।
ज्ञानं कायाशुचिज्ञानं तत्त्यागः किल साहसम् ॥203॥ ॥203॥

अर्थ: हाय ! हाय !! हे प्राणी ! तू अत्यन्त ठगाया, नष्ट हुआ, शरीर के ममत्व से अति दुःखी हुआ । अरे ! काया को अशुचि जानना ही ज्ञान है और इसे पवित्र जानना ही अज्ञान है । शरीर का ममत्व छोड़ना, निरादर करके उसका त्याग करना - यही बड़े साहस की बात है ।


अपि रोगादिभिर्वृद्धैर्न मुनिः खेदमृच्छति ।
उडुपस्थस्य कः क्षोभः प्रवृद्धेऽपि नदीजले ॥204॥ ॥204॥

अर्थ: रोगादि की वृद्धि होने पर भी मुनि खेद नहीं करते । जैसे नदी का जल बढ़ने पर भी मजबूत नाव में बैठे हुए व्यक्ति को क्या चिन्ता है ? वैसे ज्ञानी मुनि को भी रोगादि की वृद्धि होने पर भी क्या विकल्प करना ?


जातामयः प्रतिविधाय तनौ वसेद्वा,
नो चेत्तनुं त्यजतु वा द्वितयी गतिः स्यात् ।
लग्नाग्निमावसति वह्निमपोह्य गेहं,
निर्याय वा व्रजति तत्र सुधीः किमास्ते ॥205॥ ॥205॥

अर्थ: इसीप्रकार अणुव्रती श्रावक को यदि कोई रोग उत्पन्न हो तो वे निर्दोष औषधि लेकर उसे शान्त करके शरीर में रहते हैं और यदि प्रबल रोग शान्त होता न जानें तो अनशन वृत्ति धारण करके शरीर को छोड़ देते हैं - ये दो ही विकल्प हैं । जिसप्रकार घर में आग लगने पर बुद्धिमान् व्यक्ति उसे बुझाकर घर में रहते हैं, परन्तु यदि आग बुझती न जानें तो वे घर छोड़कर दूर हो जाते हैं; उसीप्रकार ज्ञानी शरीर की स्थिति रहने की सम्भावना जानें तो योग्य औषधि आदि से रोग की निवृत्ति करते हैं, परन्तु यदि शरीर की स्थिति नहीं रहेगी - ऐसा जानें तो उससे निर्मम होकर उसका त्याग कर देते हैं ।


शिरःस्थं भारमुत्तार्य स्कन्धे कृत्वा सुयत्नतः ।
शरीरस्थेन भारेण अज्ञानी मन्यते सुखम् ॥206॥ ॥206॥

अर्थ: जैसे कोई सिर का बोझ उतारकर कन्धे पर रखने में सुख मानता है, वैसे जगत् के जीव रोग का भार उतारकर शरीर के भार में सुख मानते हैं।


यावदस्ति प्रतीकारस्तावत् कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ।
तथाप्यनुपशान्तानामनुद्वेगः प्रतिक्रिया ॥207॥ ॥207॥

अर्थ: जब तक रोग शान्त होने की सम्भावना हो तब तक योग्य औषधि आदि का ग्रहण करो तो करो, परन्तु यदि रोग न मिटे तो विकल्प (खेद) नहीं करना चाहिए। शरीर से उदास रहकर निर्विकल्प रहने में ही बड़ा पुरुषार्थ है।


यदादाय भवेज्जन्मी त्यक्त्वा मुक्तो भविष्यति।
शरीरमेव तत्त्याज्यं किं शेषैः क्षुद्रकल्पनैः ॥208॥ ॥208॥

अर्थ: यह संसारी जीव तैजस और कार्माण - इन दो मूल शरीरों के योग से नए-नए शरीर धारण करता हुआ भ्रमण करता है । मनुष्य और तिर्यञ्च होने पर औदारिक शरीर धारण करता है तथा देव और नारकी होने पर वैक्रियिक शरीर धारण करता है । जब तैजस और कार्माण शरीर का अभाव करके औदारिकादि शरीर धारण नहीं करता, तभी मुक्ति होती है; क्योंकि शरीर धारण करना ही संसार है, इसलिए शरीर का सम्बन्ध त्याज्य ही है । अन्य क्षुद्र विकल्पों से क्या प्रयोजन ?


नयेत्सर्वाशुचिप्रायः शरीरमपि पूज्यताम् ।
सोऽप्यात्मा येन न स्पृश्यो दुश्चरित्रं धिगस्तु तत् ॥209॥ ॥209॥

अर्थ: यह आत्मा समस्त अशुचिता के मूल - इस शरीर को पूज्य पद प्राप्त कराता है, और शरीर आत्मा को चाण्डालादि में जन्म करा कर आत्मा को अस्पृश्य बनाता है, इसलिए इस शरीर के दुराचार को धिक्कार है। आत्मा तो इस मलिन शरीर का उपकार करता है। मुनिपद धारण कर इसे देवों और मनुष्यों में पूज्य बनाता है और शरीर पाप उत्पन्न करके जीव को कुयोनि में डालकर ऐसा बना देता है कि उसे कोई छूता भी नहीं है, इसलिए इस शरीर को धिक्कार है।


रसादिराद्यो भागः स्याज्ज्ञानावृत्यादिरन्वतः ।
ज्ञानादयस्तृतीयस्तु संसार्येवं त्रयात्मकः ॥210॥ ॥210॥

अर्थ: सर्वप्रथम भाग सप्त धातुमय शरीर है, उसके बाद दूसरा भाग ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म और तीसरा भाग ज्ञानादि निजभाव - इसप्रकार संसारी जीव तीन प्रकार के भागों को धारण करते हैं । अर्थात् संसारी जीव तीन भाग सहित हैं । जो इनमें दो भागरूप शरीर और कर्मों से जीव को भिन्न करने की विधि जानते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं ।

श्लोक 211 से 240

भागत्रयमयं नित्यमात्मानं बन्धवर्तिनम् ।
भागद्वयात् पृथक् कर्तुं यो जानाति स तत्त्ववित् ॥211॥ ॥211॥

अर्थ: सर्वप्रथम भाग सप्त धातुमय शरीर है, उसके बाद दूसरा भाग ज्ञानावरणादि अष्ट कर्म और तीसरा भाग ज्ञानादि निजभाव - इसप्रकार संसारी जीव तीन प्रकार के भागों को धारण करते हैं । अर्थात् संसारी जीव तीन भाग सहित हैं । जो इनमें दो भागरूप शरीर और कर्मों से जीव को भिन्न करने की विधि जानते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानी हैं ।


करोतु न चिरं घोरं तपः क्लेशासहो भवान् ।
चित्तसाध्यान् कषायारीन् न जयेद्यत्तदज्ञता ॥212॥ ॥212॥

अर्थ: यदि तू काय-क्लेश सहन करने में असमर्थ होने से चिरकाल तक घोर तप नहीं कर सकता तो जो मन के द्वारा ही जीते जाते हैं - ऐसे क्रोध-मान-माया-लोभ आदि शत्रुओं को तो जीत ! यदि इन्हें भी नहीं जीतता तो यह बड़ी अज्ञानता है, क्योंकि कषाय जीतने में तो कोई काय-क्लेश नहीं है, इसमें तो मन ही सुलटना है।


हृदयसरसि यावन्निर्मलेऽप्यत्यगाधे,
वसति खलु कषायग्राहचक्रं समन्तात् ।
श्रयति गुणगणोऽयं तन्न तावद्विशङ्कं,
सयमशमविशेषैस्तान् विजेतुं यतस्व ॥213॥ ॥213॥

अर्थ: जब तक तेरे निर्मल हृदयरूपी अगाध सरोवर में निश्चय से कषायरूपी जलचरों के समूह का निवास है, तब तक उसमें गुणों का समूह निःशंक होकर प्रवेश नहीं कर सकता; इसीलिए शम-दम-यम के भेदों से कषायों को जीतने का प्रयत्न करना चाहिए। शम अर्थात् रागादि के त्यागरूप समता भाव, दम अर्थात् मन और इन्द्रियों का निरोध तथा यम अर्थात् जीव-हिंसा आदि का त्याग।


हित्वा हेतुफले किलात्र सुधियस्तां सिद्धिमामुत्रिकीं,
वाञ्छन्तः स्वयमेव साधनतया शंसन्ति शान्तं मनः ।
तेषामाखुबिडालिकेति तदिदं धिग्धिक् कलेः प्राभवं,
येनैतेऽपि फलद्वयप्रलयनाद् दूरं विपर्यासिताः ॥214॥ ॥214॥

अर्थ: कुछ तथाकथित (कहने मात्र के) बुद्धिमान् लोग अपरिग्रहत्वादि कारणों को और मन की शान्तिरूप फल को छोड़कर पर-लोक की सिद्धि चाहते हैं और स्वयं ही अपने मन से अपनी प्रशंसा करते हैं और कषायों के वश में होते हुए अपने को शान्त-चित्त मानते हैं; परन्तु इसमें बड़ा विरोध है। क्रोधादि कषायों और उपशान्तादि गुणों में बिल्ली और चूहे के समान अनादि का परस्पर बैर है। इस कलि-काल के प्रभाव को बारम्बार धिक्कार है, जिसके प्रभाव से बुद्धिमान् लोग भी इस लोक और पर-लोक के फल को नष्ट करके ठगाए जाते हैं।


उद्युक्तस्त्वं तपस्यस्यधिकमभिभवं त्वामगच्छन् कषायाः,
प्राभूद्बोधोऽप्यगाधो जलमिव जलधौ किं तु दुर्लक्ष्यमन्यैः ।
निर्व्यूढेऽपि प्रवाहे सलिलमिव मनाग् निम्नदेशेष्ववश्यं,
मात्सर्यं ते स्वतुल्ये भवति परवशाद् दुर्जयं तज्जहीहि ॥215॥ ॥215॥

अर्थ: तू तप का उद्यम कर रहा है, कषायें तेरे द्वारा अति अपमानित हुई हैं (अर्थात् तूने कषायों को जीत लिया है) और तुझमें समुद्र में भरे हुए अगाध जल के समान अगाध ज्ञान भरा है; फिर भी हम तुझे शिक्षा देते हैं । इस बात को अन्य लोग नहीं जानते । इस दोष को बहुत कम लोग छोड़ पाते हैं । जिसप्रकार जल के प्रवाह में थोड़ा जल निश्चितरूप से भूमि के अन्दर छिपा रहता है, इसलिए लोगों को नहीं दिखता; उसीप्रकार कर्मोदय वशात् अपने से बराबरीवालों के प्रति अदेखसका अर्थात् दूसरे को नहीं देख सकता - ऐसा ईष्या भाव होता है, जिसे शास्त्र में मात्सर्य कहते हैं । इसे जीतना अत्यन्त कठिन है, इसलिंए तू इसे छोड़ ।


चित्तस्थमप्यनवबुद्ध्य हरेण जाड्यात्
क्रुद्ध्वा बहिः किमपि दग्धमनङ्गबुध्या ।
घोरामवाप स हि तेन कृतामवस्थां
क्रोधोदयाद्भवति कस्य न कार्यहानिः ॥216॥ ॥216॥

अर्थ: देखो ! काम तो मन में उत्पन्न होता है, बाहर नहीं; परन्तु कोई किसी बाह्य वस्तु को काम समझकर उसे क्रोध से भस्म कर दे तो काम तो नहीं मरा और वह स्वयं काम के योग से सरागी हुआ और काम की घोर वेदना सही । अतः क्रोध के उदय से किसका काम नहीं बिगड़ता ?


चक्रं विहाय निजदक्षिणबाहुसंस्थं
यत् प्राव्रजन्ननु तदैव स तेन मुञ्चेत् ।
क्लेशं तमाप किल बाहुबली चिराय
मानो मनागपि हतिं महतीं करोति ॥217॥ ॥217॥

अर्थ: देखो ! बाहुबली ने अपने दाहिने हाथ में आए हुए चक्र को छोड़कर जिन-दीक्षा धारण की और तप करके संसार अवस्था से मुक्ति प्राप्त की, परन्तु कुछ संज्वलन मान का उदय शेष रहा जिससे उन्हें एक वर्ष तक केवलज्ञान नहीं हुआ । उन्होंने महा काय-क्लेश किया तो भी मान नष्ट हुए बिना मुक्त नहीं हुए । यह तुच्छ मात्र मान भी बहुत बड़ी हानि करता है, इसलिए मान त्यागने योग्य है । यह जीव तन, धन, रूप, यौवन, राजलक्ष्मी आदि का गर्व करता है, परन्तु ये सब क्षणभंगुर हैं । आत्मा तो निश्चय से सिद्ध समान है, तीन लोक का आभूषण है, अत: उक्त पदार्थों का क्या मान करना ?


सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्यं भुजे विक्रमे,
लक्ष्मीर्दानमनूनमर्थिनिचये मार्गो गतिर्निर्वृते ।
येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहङ्काराः श्रुतेर्गोचराः,
चित्रं संप्रति लेशितोऽपि न गुणास्तेषां तथाप्युद्धताः ॥218॥ ॥218॥

अर्थ: इस लोक में पहले अनेक महापुरुष हुए हैं, वे वचनों में सत्य, शास्त्रों में बुद्धि, हृदय में दया, भुजाओं में शौर्य युक्त पराक्रम, लक्ष्मी के याचकों को पूर्ण दान और निवृत्ति मार्ग में गमन आदि अनेक गुण युक्त होने पर भी अहंकार रहित थे - ऐसा शास्त्रों में कहा है। लेकिन इस कलि-काल में लेशमात्र गुण नहीं होने पर भी लोग अत्यन्त उद्धत होकर महागर्व में चूर हो रहे हैं - यह बड़े आश्चर्य की बात है।


वसति भुवि समस्तं सापि संधारितान्यैः
उदरमुपनिविष्टा सा च ते वा परस्य ।
तदपि किल परेषां ज्ञानकोणे निलीनं
वहति कथमिहान्यो गर्वमात्माधिकेषु ॥219॥ ॥219॥

अर्थ: गर्व करना झूठा है, क्योंकि गर्व करना तो तब उचित है, जब कोई अपने से अधिक न हो, परन्तु सब एक से बढ़ कर एक हैं (फिर क्या गर्व करना?) प्रत्यक्ष में देखो ! सब पदार्थ पृथ्वी पर रहते हैं, इसलिए सबका आधार पृथ्वी है । लेकिन यह त्रैलोक्य की भूमि घनोदधि, घनवात और तनुवात - इन तीन वातवलयों के आधार से है । यह पृथ्वी और ये वातवलय आकाश के उदर में हैं । तथा अनन्त आकाश केवली के ज्ञान के अंश में लीन है । सब एक से बढ़ कर एक हैं, इसलिए अपने से बहुतों को अधिक जान कर कौन गर्व करेगा ? विवेकी तो कदापि गर्व नहीं करेंगे ।


यशो मारीचीयं कनकमृगयामलिनितं
हतोऽश्वत्थामोक्त्या प्रणयिलघुरासीद्यमसुतः।
सकृष्णः कृष्णोऽभूत् कपटबटुवेषेण नितरा-
मपि छद्माल्पं तद्द्विषमिव हि दुग्धस्य महतः ॥220॥ ॥220॥

अर्थ: जैसे अत्यधिक दूध को विष का कण भी दूषित कर देता है, वैसे थोड़ा भी कपट महान् गुणों को नष्ट कर देता है । देखो ! रावण के मन्त्री मारीचि का यश कपट द्वारा स्वर्ण-मृग का रूप धरने से मलिन हुआ । राजा युधिष्ठिर का अति-निर्मल यश उनके मुख से निकले हुए ‘अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा न जानामि’(अर्थात् अश्वात्थामा मारा गया, नर या पशु, नहीं मालूम)- इस मायाचाररूप वचन से मलिन हुआ, उन्हें अपने मित्रों में नीचा देखना पड़ा; इसलिए थोड़ा भी मायाचार बहुत गुणों का घात करता है ।


भेयं मायामहागर्तान्मिथ्याघनतमोमयात् ।
यस्मिन् लीना न लक्ष्यन्ते क्रोधादिविषमाहयः ॥221॥ ॥221॥

अर्थ: जैसे अत्यधिक दूध को विष का कण भी दूषित कर देता है, वैसे थोड़ा भी कपट महान् गुणों को नष्ट कर देता है । देखो ! रावण के मन्त्री मारीचि का यश कपट द्वारा स्वर्ण-मृग का रूप धरने से मलिन हुआ । राजा युधिष्ठिर का अति-निर्मल यश उनके मुख से निकले हुए ‘अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा न जानामि’(अर्थात् अश्वात्थामा मारा गया, नर या पशु, नहीं मालूम)- इस मायाचाररूप वचन से मलिन हुआ, उन्हें अपने मित्रों में नीचा देखना पड़ा; इसलिए थोड़ा भी मायाचार बहुत गुणों का घात करता है ।


प्रच्छन्नकर्म मम कोऽपि न वेत्ति धीमान्,
ध्वंसं गुणस्य महतोऽपि हि मेति मंस्थाः ।
कामं गिलन् धवलदीधितिधौतदाहं,
गूढोऽप्यबोधि न विधुं स विधुन्तुदः कैः ॥222॥ ॥222॥

अर्थ: हे जीव ! तू ऐसा भ्रम मत कर, कि मेरा गुप्त पाप कोई नहीं जानेगा । बुद्धिमान् भी नहीं जान सकते, तो अन्य लोग कैसे जानेंगे । यह पाप मेरे महान् गुणों को कैसे ढकेगा ? तू ऐसा बिलकुल मत मान । प्रत्यक्ष देख ! अपनी उज्जवल किरणों से जगत् के आताप को दूर करनेवाले चन्द्रमा को भी गुप्तरूप से राहु ग्रस लेता है,लेकिन इस बात को कौन नहीं जानता ? अर्थात् सभी जानते हैं।


वनचरभयाद् धावन् दैवाल्लताकुलबालधिः,
किल जडतया लोलो बालव्रजेऽविचलं स्थितः।
वत स चमरस्तेन प्राणैरपि प्रवियोजितः,
परिणततृषां प्रायेणैवंविधा हि विपत्तयः ॥223॥ ॥223॥

अर्थ: देखो ! लोक में प्रसिद्ध है कि वन में घूमने वाले शिकारी भील अथवा व्याघ्र के भय से भागती हुई चमर या सुरई गाय की पूँछ झाड़ियों में उलझ जाने पर वह मूढ़ता से पूँछ के बालों के लोभ में खड़ी रहती है, और शिकारी के द्वारा मारी जाती है। इसलिए जानना चाहिए कि तृष्णा करनेवालों पर अधिकतया ऐसी अनेक विपत्तियाँ आती हैं।


नियमितमनोवृत्तिर्भक्तिर्जिनेषु दयालुता,
भवति कृतिनः संसाराब्धेस्तटे निकटे सति ॥224॥ ॥224॥

अर्थ: विवेकी जीवों को संसार- समुद्र का किनारा निकट आने पर विषयों से विरक्तता, परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, शम (शान्ति अर्थात् रागादि का त्याग) दम (मन और इन्द्रियों का निरोध) और यम (जीवन पर्यन्त हिंसादि पापों का त्याग) - इनका धारण, तत्त्व का अभ्यास, तपश्चरण का उद्यम, मन की वृत्तियों का निरोध, जिनेन्द्र भक्ति और जीवों की दया इत्यादि सामग्री प्राप्त होती है ।


यमनियमनितान्तः शान्तबाह्यान्तरात्मा,
परिणमितसमाधिः सर्वसत्त्वानुकम्पी ।
विहितहितमिताशी क्लेशजालं समूलं,
दहति निहतनिद्रो निश्चिताध्यात्मसारः ॥225॥ ॥225॥

अर्थ: यम और नियम योग के मूल हैं, यम अर्थात् अयोग्य क्रियाओं का आजीवन त्याग और नियम अर्थात् घड़ी, पल, प्रहर, पक्ष, मास, चातुर्मास आदि की मर्यादा में संवर या त्याग। इनके पालन में साधु सदैव तत्पर रहते हैं। वे महा शान्त-चित्तवाले होते हैं। उनके भावों में देहादि बाह्य पदार्थों से निर्वृत्ति हो जाती है। समाधि अर्थात् निर्विकल्प दशा रूप परिणमित होते हैं। सभी जीवों के प्रति दया भाव रखते हैं। विहित अर्थात् शास्त्रोक्त विधि से योग्य अल्प आहार लेते हैं। निद्राजयी होते हैं। अध्यात्म के सारभूत आत्म स्वभाव का निश्चय करनेवाले होते हैं। निरंतर आत्मानुभव में मग्न होते हैं।


समाधिगतसमस्ताः सर्वसावद्यदूराः,
स्वहितनिहितचित्ताः शान्तसर्वप्रचाराः ।
स्वपरसफलजल्पाः सर्वसंकल्पमुक्ताः,
कथमिह न विमुक्तेर्भाजनं ते विमुक्ताः ॥226॥ ॥226॥

अर्थ: जो समस्त त्यागने योग्य और ग्रहण करने योग्य वस्तुओं का स्वरूप भलीभाँति जानते हैं, हिंसादि सभी पापों से दूर हैं, जिनका चित्त आत्म-कल्याण के कारणभूत सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र में स्थित है, सर्व इन्द्रियों के विषयों से निर्वृत्त हो गए हैं, जिनके वचन स्व और पर का कल्याण करनेवाले हैं और जो समस्त संकल्प-विकल्पों से रहित हैं - वे महापुरुष सर्व प्रपञ्चों से रहित होते हुए मुक्ति के भाजन (पात्र) क्यों न होंगे ? अर्थात् वे निःसंदेह शिव-सुख के पात्र होंगे ।


दासत्वं विषयप्रभोर्गतवतामात्मापि येषां परः,
तेषां भो गुणदोषशून्यमनसां किं तत्पुनर्नश्यति ।
भेतव्यं भवतैव यस्य भुवनप्रद्योति रत्नत्रयं,
भ्राम्यन्तीन्द्रियतस्कराश्च परितस्त्वां तन्मुहुर्जागृहि ॥227॥ ॥227॥

अर्थ: जो अविवेकी विषयरूपी राजा के दास हुए हैं, जिनका चित्त गुण-दोषों के विचार से शून्य हुआ है और जिनका आत्मा पराधीन है; उनकी दशा देखकर, हे विवेकी तू भटकना मत ! वे तो सम्यग्ज्ञानरूपी धन से रहित दरिद्री हैं, तो इनका क्या जाएगा ? परन्तु तेरे पास तो तीन लोक को प्रकाशित करनेवाला रत्नत्रय धन है इसलिए तुझे डर कर (संभलकर) रहना चाहिए । तेरे आसपास चारों तरफ इन्द्रिय रूपी चोर घूम रहे हैं । वे तेरे ज्ञान वैभव को चुरा न लें - ऐसा प्रयत्न कर, अर्थात् सदा जाग्रत रह ।


रम्येषु वस्तुवनितादिषु वीतमोहो,
मुह्येद्वृथा किमिति संयमसाधनेषु ।
धीमान् किमामयभयात् परिहृत्य भुक्तिं,
पीत्वौषधिं व्रजति जातुचिदप्यजीर्णम् ॥228॥ ॥228॥

अर्थ: हे बुद्धिमान् ! मनोग्य स्त्री आदि वस्तुओं से तो तेरा मोह चला गया है, अब तू पीछी आदि संयम के साधनों से भी व्यर्थ ही मोह क्यों करता है ? क्या कोई रोग के भय से भोजन को छोड़कर आवश्यकता से अधिक औषधि लेकर अजीर्ण करता है ? अर्थात् कभी नहीं करता ।


तपः श्रुतमिति द्वयं बहिरुदीर्य रूढं यदा,
कृषीफलमिवालये समुपलीयते स्वात्मनि ।
कृषीबल इवोज्झितः करणचौरबाधादिभिः,
तदा हि मनुते यतिः स्वकृतकृत्यतां धीरधीः ॥229॥ ॥229॥

अर्थ: जैसे खेत में बीज बोकर अन्न उपजानेवाला किसान चोर आदि की बाधाओं से रहित होकर अपने घर में अन्न लाकर रखने पर ही अपने को कृतार्थ मानता है । वैसे ही साधु तप और श्रुत की वृद्धि करके इन्द्रियादिक चोरों की बाधाओं से रहित होता हुआ अपने आत्म-स्वरूप में लीन होकर ही अपने को कृतार्थ मानते हैं ।
जैसे वह किसान भी अपने कर्तव्य का कृतार्थपना (पूर्ति होना) तभी मानता है, जब बिना किसी बाधा के अनाज घर में आ जाता है । वैसे ही धीर बुद्धिवाले साधु भी अपने संयम का कृतार्थपना तभी मानते हैं, जब इन्द्रिय आदि चोरों की बाधा से रहित तप-श्रुतरूपी बीज का ज्ञानरूपी फल अपने में धारण कर लेते हैं, अर्थात् आत्मस्वरूप में लीन हो जाते हैं ।


दृष्टार्थस्य न मे किमप्ययमिति ज्ञानावलेपादमुं,
नोपेक्षस्व जगत्त्रयैकडमरं निःशेषयाऽऽशाद्विषम् ।
पश्याम्भोनिधिमप्यगाधसलिलं बाबाध्यते वाडवः,
क्रोडीभूतविपक्षकस्य जगति प्रायेण शान्तिः कुतः ॥230॥ ॥230॥

अर्थ: यह आशारूपी शत्रु मुझ जैसे ज्ञानवन्त का कुछ नहीं बिगाड़ सकता - इसप्रकार ज्ञान के गर्व से आशारूपी शत्रु को कमजोर नहीं समझना चाहिए। यह तीनों लोकों का महाभयंकर अद्वितीय बैरी है, इसे सर्वथा दूर ही करना चाहिए - यह बात दृष्टांत द्वारा समझाते हैं। देखो ! अगाध जलवाले समुद्र को भी बड़वानल सोख लेता है। अतः जिसे शत्रु दबाए रहते हैं, उसे शान्ति कैसे हो सकती है ? जिनके रंचमात्र भी शत्रु नहीं हैं, वे ही निश्चिंत रह सकते हैं। यह आशा तो प्रबल शत्रु है, इसके होते हुए शान्ति कैसे हो सकती है ?


स्नेहानुबद्धहृदयो ज्ञानचारित्रान्वितोऽपि न श्लाघ्यः।
दीप इवापादयिता कज्जलमलिनस्य कार्यस्य ॥231॥ ॥231॥

अर्थ: मोह से युक्त हृदयवाले पुरुष यदि शास्त्रज्ञान और शुभाचरण से शोभित हैं, तो भी प्रशंसा योग्य नहीं हैं। जैसे - तेल युक्त होने से दीपक काजल उत्पन्न करता है वैसे राग युक्त जीव पाप अर्थात् अशुभ कर्म रूप मलिनता को उत्पन्न करता है - ऐसा जानकर जगत् से स्नेह (राग) छोड़ना चाहिए।


रतेररतिमायातः पुना रतिमुपागतः ।
तृतीयं पदमप्राप्य बालिशो वत सीदसि ॥232॥ ॥232॥

अर्थ: रे अज्ञानी ! तू विषयों की रुचि से अरुचि में आता है और फिर इन्हीं में रुचि करता है, इसलिए तू जगत् से उदासीनता रूप वैराग्य प्राप्त न करके दुःखी है । अतः ऐसा जानकर यदि तू कल्याण करना चाहता है तो तू राग-द्वेष को छोड़कर वैराग्य का सेवन कर ।


तावद् दुःखाग्नितप्तात्माऽयःपिण्डः सुखसीकरैः।
निर्वासि निर्वृताम्भोधौ यावत्त्वं न निमज्जसि ॥233॥ ॥233॥

अर्थ: तू लोह-पिण्ड के समान दुःखरूपी अग्नि से तप्त है, अतः जब तक मोक्ष सुखरूपी समुद्र में मग्न नहीं होता, तब तक इन्द्रियों से उत्पन्न लेशमात्र विषय-सुख से अपने को सुखी मानना व्यर्थ है।


मंक्षु मोक्षं सुसम्यक्त्वसत्यंकारस्वसात्कृतम् ।
ज्ञानचारित्रसाकल्यमूल्येन स्वकरे कुरु ॥234॥ ॥234॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र की पूर्णतारूपी धन से तू शीघ्र ही निर्वाण की प्राप्ति कर ले । जब तू सत्यरूपी मुक्ति को अपने वश में करेगा, तब कृतार्थ होगा ।


अशेषमद्वैतमभोग्यभोग्यं ,
निवृत्तिवृत्त्योः परमार्थकोट्याम् ।
अभोग्यभोग्यात्मविकल्पबुद्ध्या,
निवृत्तिमभ्यस्यतु मोक्षकांक्षी ॥235॥ ॥235॥

अर्थ: यह सम्पूर्ण जगत् अद्वैत अर्थात् एकरूप है । विषय-कषायों से निवृत्ति की अपेक्षा भोगने योग्य नहीं है, त्यागने योग्य है और विषय-कषाय की प्रवृत्ति की अपेक्षा भोगने योग्य है । इसप्रकार प्रवृत्ति और निवृत्ति की अपेक्षा इस जगत् को भोग्य और अभोग्य जानकर मोक्षाभिलाषियों को निवृत्ति का अभ्यास करना चाहिए। प्रवृत्ति का फल संसार और निवृत्ति का फल निर्वाण है ।


निवृत्तिं भावयेद्यावन्निवृत्यं तदभावतः ।
न वृत्तिर्न निवृत्तिश्च तदेव पदमव्ययम् ॥236॥ ॥236॥

अर्थ: जब तक त्यागने योग्य मन-वचन-काय का सम्बन्ध न छूटे तब तक निवृत्ति का ही अभ्यास करना चाहिए तथा पर-वस्तुओं का अभाव होने पर न प्रवृत्ति होती है और न निवृत्ति रहती है, केवल शुद्ध स्वरूप ही रहता है, क्योंकि पर-पदार्थों से सर्वथा रहित होना ही अविनाशी पद (मोक्ष) है ।


रागद्वेषौ प्रवृत्तिः स्यान्निवृत्तिस्तन्निषेधनम् ।
तौ च बाह्यार्थसंबद्धौ तस्मात्तांश्च परित्यजेत् ॥237॥ ॥237॥

अर्थ: राग-द्वेष होना ही प्रवृत्ति है और इनका निषेध ही निवृत्ति है । ये दोनों बाह्य पदार्थों के सम्बन्ध से हैं, इसलिए धन-धान्यादि बाह्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए ।


भावयामि भवावर्ते भावनाः प्रागभाविताः ।
भावये भाविता नेति भवाभावाय भावनाः ॥238॥ ॥238॥

अर्थ: मैं इस संसार में भ्रमण करते हुए, अब भ्रमण का नाश करने के लिए पूर्व में कभी नहीं भायीं - ऐसी सम्यग्दर्शनादि भावनाओं को भाता हूँ । पूर्व में अनादि काल से भायी हुई मिथ्यादर्शनादि भावनाओं को नहीं भाता ।


शुभाशुभे पुण्यपापे सुखदुःखे च षट् त्रयम् ।
हितमाद्यमनुष्ठेयं शेषत्रयमथाहितम् ॥239॥ ॥239॥

अर्थ: शुभ अर्थात् उत्तम वचन, करुणारूप मन और संयमरूप काया - ये प्रंशसा योग्य हैं और अशुभ अर्थात् खोटे वचन, निर्दयीचित्त और अव्रतरूप काया - ये निन्दा योग्य हैं । इन दोनों से पुण्य और पाप होते हैं । शुभ से पुण्य और अशुभ से पाप होता है । पुण्य से सुख और पाप से दुःख होता है । इसप्रकार शुभ-अशुभ, पुण्य-पाप और सुख-दुःख - इन छह में से आदि के तीन शुभ, पुण्य और सुख हितकारी हैं इसलिए आदरणीय या ग्रहण करने योग्य हैं और अंत के तीन अशुभ, पाप और दुःख अहितकारी हैं, इसलिए त्यागने योग्य हैं ।


तत्राप्याद्यं परित्याज्यं शेषौ न स्तः स्वतः स्वयम्।
शुभं च शुद्धे त्यक्त्वान्ते प्राप्नोति परमं पदम् ॥240॥ ॥240॥

अर्थ: पहले तो अहित रुप अशुभ छूटता है, उसके अभाव से पाप और दुःख भी छूट जाते हैं । फिर शुद्धोपयोग के प्रभाव से शुभ भी छूट जाता है, जिससे पुण्य और स्वर्गादि सुख भी नहीं होते । कारण के अभाव से कार्य का अभाव भी हो जाता है । यह जीव शुभ छूटने पर परम वीतराग भावरूप शुद्धोपयोग में स्थित होकर परमपद प्राप्त करता है । वह परम पद शुभ और अशुभ दोनों से रहित है और दोनों का अन्त होने पर होता है ।

श्लोक 241 से 270

अस्त्यात्माऽस्तमितादिबन्धनगतस्तद्बन्धनान्यास्रवैः
ते क्रोधादिकृताः प्रमादजनिताः क्रोधादयस्तेऽव्रतात्।
मिथ्यात्वोपचितात् सएवसमलः कालादिलब्धौ क्वचित्
सम्यक्त्वव्रतदक्षताऽकलुषतायोगैः क्रमान्मुच्यते ॥241॥ ॥241॥

अर्थ: आत्मा जातिस्मरण से अपने पूर्वभवों को जानता है, भूत आदि भी अपना पूर्व भव बताते हैं तो जीवों को पूर्वभव की प्रतीति होती है - इससे आत्मा की सत्ता सिद्ध होती है। वह आत्मा अनादि काल से कर्मों से बँधा है, कर्म-बन्ध आस्रवों से होता है और आस्रव क्रोधादि से होते हैं, क्रोधादि प्रमाद से होते हैं, प्रमाद हिंसादि अव्रतों से होता है और अव्रत मिथ्यात्व से पुष्ट होता है। इसप्रकार आत्मा मिथ्यादर्शनादि से मलिन है और काललब्धि पाकर किसी एक मनुष्य भव में सम्यक्त्व, व्रत, विवेक (अप्रमाद), निःकषायता के साथ योग से क्रमानुसार मुक्त होता है।


ममेदमहमस्येति प्रीतिरीतिरिवोत्थिता ।
क्षेत्रे क्षेत्रीयते यावत्तावत् काशा तपःफले ॥242॥ ॥242॥

अर्थ: “यह शरीर मेरा है और मैं इसका हूँ”- ऐसी प्रीतिरूप ईति (आपत्ति) अनादि से चली आ रही है जो अनेक उपद्रवों को करनेवाली है। जब तक यह जीव शरीररूपी क्षेत्र का क्षेत्री अर्थात् स्वामी हो रहा है तब तक तप के फलरूप मोक्ष की क्या आशा करना ? अर्थात् तब तक मोक्ष नहीं होगा।


मामन्यमन्यं मां मत्वा भ्रान्तो भ्रान्तौ भवार्णवे ।
नान्योऽहमहमेवाहमन्योऽन्योऽहमस्मि न ॥243॥ ॥243॥

अर्थ: इस जीव ने भ्रान्ति के कारण अपने को अन्यरूप अर्थात् शरीर को अपनेरूप जाना है और इसी मिथ्याज्ञान से यह भव-समुद्र में भ्रमण कर रहा है । अतः अब तू ऐसा जान कि मैं पर-पदार्थरूप नहीं हूँ, मैं जो हूँ सो मैं ही हूँ और पर-पदार्थ पर ही हैं; उनमें मैं नहीं और मुझमें वे नहीं ।


बन्धो जन्मनि येन येन निबिडं निष्पादितो वस्तुना,
बाह्यार्थैकरतेः पुरा परिणतप्रज्ञात्मनः साम्प्रतम् ।
तत्तत् तन्निधनाय साधनमभूद्वैराग्यकाष्ठास्पृशो,
दुर्बोधं हि तदन्यदेव विदुषामप्राकृतं कौशलम् ॥244॥ ॥244॥

अर्थ: इस संसार में जिसे बाह्य-पदार्थों में अद्वितीय प्रीति है, उसे जिन-जिन मन-वचन-काय आदि वस्तुओं के द्वारा कर्म-बन्ध हुआ; लेकिन अब उत्कृष्ट वैराग्य को प्राप्त होने पर तथा पदार्थों का यथावत् ज्ञान होने पर वे ही वस्तुयें बन्ध का नाश करने के लिए कारणरूप हुईं। इसलिए जिस अज्ञान के कारण मैं रागादिरूप परिणमता हूँ वह अज्ञान जुदा ही है और जो विवेकियों की अपूर्व प्रवीणता है, वह जुदी ही है।


अधिकः क्वचिदाश्लेषः क्वचिद्धीनः क्वचित्समः ।
क्वचिद्विश्लेष एवायं बन्धमोक्षक्रमो मतः ॥245॥ ॥245॥

अर्थ: किसी जीव में कर्म का बन्धन अधिक है और निर्जरा अल्प है, किसी जीव में कर्म का बन्ध अल्प है और निर्जरा अधिक है, किसी जीव में बन्ध और निर्जरा समान हैं और किसी जीव में केवल कर्म की निर्जरा ही है। - इसप्रकार कर्म से बँधने और छूटने का अनुक्रम है।


यस्य पुण्यं च पापं च निष्फलं गलति स्वयम् ।
स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनरास्रवः ॥246॥ ॥246॥

अर्थ: जिस विरक्त जीव के पुण्य और पाप, फल दिये बिना ही खिर जायें अर्थात् पुण्य का फल स्वर्ग और पाप का फल नरक न दे सकें - वही योगी है; उसे निर्वाण ही होता है, पुन: आस्रव नहीं होता ।


महातपस्तडागस्य संभृतस्य गुणाम्भसा ।
मर्यादापालिबन्धेऽल्पामप्युपेक्षिष्ट मा क्षतिम् ॥247॥ ॥247॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनादि गुणरूपी जल से भरा हुआ महा-तपरूपी तालाब प्रतिज्ञारूपी किनारों के बाँध में रंचमात्र भी क्षति सहन नहीं कर सकता ।


दृढगुप्तिकपाटसंवृत्तिर्धृतिभित्तिर्मतिपादसंभृतिः ।
यतिरल्पमपि प्रपद्य रन्ध्रं कुटिलैर्विक्रियते गृहाकृतिः ॥248॥ ॥248॥

अर्थ: इस मुनिपदरूप घर में महादृढ़ मनोगुप्ति, वचन-गुप्ति और काय-गुप्तिरूप दरवाजे हैं, उत्तम धैर्यरूप दीवारें हैं, और बुद्धिरूपी गहरी नींव है । लेकिन किञ्चित भी व्रत-भंगरूपी छिद्र होने पर महाकुटिल रागादि सर्प इस घर को दूषित कर देते हैं ।


स्वान् दोषान् हन्तुमुद्युक्तस्तपोभिरतिदुर्धरैः ।
तानेव पोषयत्यज्ञः परदोषकथाशनैः ॥249॥ ॥249॥

अर्थ: यदि कोई अत्यन्त दुद्धर तप करके अपने दोषों को दूर करने में उद्यमी होता है; फिर भी यदि कदाचित् वह ईर्ष्या के कारण दूसरों की निन्दा करता है तो अज्ञानी पर-दोष कथारूपी भोजन से अपने रागादि दोषों को ही पुष्ट करता है ।


दोषः सर्वगुणाकरस्य महतो दैवानुरोधात् क्वचि-
ज्जातो यद्यपि चन्द्रलाञ्छनसमस्तं द्रष्टुमन्धोऽप्यलम् ।
द्रष्टाप्नोति न तावतास्य पदवीमिन्दोः कलङ्कं जगद्,
विश्वं पश्यति तत्प्रभाप्रकटितं किं कोऽप्यगात्तत्पदम् ॥250॥ ॥250॥

अर्थ: समस्त गुणों की खान महापुरुष में पूर्व कर्म के उदय से किसी मूलगुण आदि में चन्द्रमा के लांछन समान अल्प दोष भी उत्पन्न हो जाए तो उसे देखने में अन्ध अर्थात् मूढ़ दृष्टिवाले अविवेकी लोग भी समर्थ हो जाते हैं । जगत् की दृष्टि में वह दोष ही दिखता है, क्योंकि गुणवान का पद अल्प दोष से भी कलंकित हो जाता है । जैसे चन्द्रमा का कलंक उसकी प्रभा ही प्रगट करती है तभी उसे सारा जगत् देखता है, कोई चन्द्रमा में जाकर तो नहीं देखता । वैसे ही महापुरुषों के अवगुण को उनके गुण ही प्रगट करते हैं । कोई उनके घर जाकर तो नहीं देखता ।


यद्यदांचरितं पूर्वं तत्तदज्ञानचेष्टितम् ।
उत्तरोत्तरविज्ञानाद्योगिनः प्रतिभासते ॥251॥ ॥251॥

अर्थ: पूर्व में जो-जो आचरण किया अर्थात् दूसरों के दोष कहे और अपने गुण प्रगट किये; वह सब उत्तरोत्तर उत्कृष्टदशा होने पर योगीश्वरों को अज्ञान चेष्टा भासित होती है ।


अपि सुतपसामाशावल्लीशिखा तरुणायते
भवति हि मनोमूले यावन्ममत्वजलार्द्रता ।
इति कृतधियः कृच्छ्रारम्भैश्चरन्ति निरन्तरं
चिरपरिचिते देहेऽप्यस्मिन्नतीव गतस्पृहाः ॥252॥ ॥252॥

अर्थ: वास्तव में महा-तपस्वियों की भी आशारूपी बेल की शिखा तरुण रहती है, क्योंकि जब तक मनरूपी जड़ के माध्यम से ममतारूपी जल आ रहा है, तब तक वह आशारूपी बेल कैसे सूखेगी ? - ऐसा जानकर विवेकी पुरुष अपनी इस देह के प्रति भी अत्यन्त उदास रहते हैं, जीवन-मरण की अभिलाषा नहीं करते । यद्यपि इस जीव का शरीर के साथ चिरकाल से परिचय है तथापि मुनि को शरीर के प्रति ममता नहीं होती है, निस्पृह भाव रहता है । वे कष्ट-साध्य त्रिकाल योगादि से निरंतर शरीर का दमन करते हैं । शीतकाल में जलाशय के किनारे, ग्रीष्मकाल में पर्वत के शिखर पर और वर्षाकाल में वृक्ष के नीचे निवास करना त्रिकाल योग कहलाता है ।


क्षीरनीरवदभेदरूपतस्तिष्ठतोरपि च देहदेहिनोः ।
भेद एव यदि भेदवत्स्वलं बाह्यवस्तुषु वदात्र का कथा ॥253॥ ॥253॥

अर्थ: निश्चय से जीव और शरीर ही भिन्न-भिन्न हैं तो अत्यन्त भिन्न स्त्री, पुत्रादि अथवा शिष्यादि बाह्य वस्तुओं की क्या कथा (बात) ? वे तो प्रत्यक्ष ही भिन्न हैं । यद्यपि जीव और देह दूध-पानी के समान अभेदरूप हैं, तथापि वे निश्चय से भिन्न ही हैं ।


तप्तोऽहं देहसंयोगाज्जलं वाऽनलसंगमात् ।
इति देह परित्यज्य शीतीभूताः शिवैषिणः ॥254॥ ॥254॥

अर्थ: कल्याण के इच्छुक महामुनि देह से राग छोड़कर आनन्दरूप किस प्रकार होते हैं ? इसका समाधान करते हैं :- जैसे अग्नि के संयोग से जल तप्त हो जाता है वैसे मैं देह के संयोग से तप्त हो रहा हूँ - ऐसा जानकर अपने कल्याण के इच्छुक महामुनि देह से ममत्व तजकर आनन्दरूप होते हैं ।


अनादिचयसंवृद्धो महामोहो हृदि स्थितः ।
सम्यग्योगेन यैर्वान्तस्तेषामूर्ध्वं विशुद्धयति ॥255॥ ॥255॥

अर्थ: जिन महापुरुषों ने सम्यक् योग से अर्थात् स्वरूप में चित्त के निरोधरूप औषधि से अनादि कालीन कर्मों के संचय से हृदय में स्थित महा-मोह का वमन कर दिया है, उन्हीं का पर-लोक शुद्ध होता है ।


एकैश्वर्यमिहैकतामभिमतावाप्तिं शरीरच्युतिं,
दुःखं दुष्कृतिनिष्कृतिं सुखमलं संसारसौख्योज्झनम्।
सर्वत्यागमहोत्सवव्यतिकरं प्राणव्ययं पश्यतां,
किं तद्यन्न सुखाय तेन सुखिनः सत्यं सदा साधवः ॥256॥ ॥256॥

अर्थ: जो एकाकीपन को ही एक अद्वितीय चक्रवर्तीपना मानते हैं, शरीर के विनाश को मनोवाञ्छित पदार्थों की प्राप्ति मानते हैं, अशुभ कर्म की निर्जरा और शुभ कर्म के उदय को दुःख मानते हैं, संसार सुखों के सर्वथा परिहार को सुख मानते हैं, सर्वत्याग को महोत्सव मानते हैं और संग्रह को प्राणत्याग मानते हैं - ऐसी जिनकी दृष्टि है उन्हें ऐसा कौन-सा पदार्थ है, जो सुख का निमित्त नहीं होगा ? अर्थात् सभी सुख के कारण होंगे। इसलिए यह बात सत्य है कि साधु सदा सुखी ही हैं।


आकृष्योग्रतपोबलैरुदयगोपुच्छं यदानीयते,
तत्कर्म स्वयमागतं यदि विदः को नाम खेदस्ततः।
यातव्यो विजिगीषुणा यदि भवेदारम्भकोऽरिः स्वयं,
वृद्धिः प्रत्युत नेतुरप्रतिहता तद्विग्रहे कः क्षयः ॥257॥ ॥257॥

अर्थ: जो उदय में नहीं आए हुए कर्म को उग्र तप के बल से उदय में लाकर क्षय करते हैं तो स्वयमेव कर्म उदय में आने पर खेद क्यों करेंगे ? मुनि को खेद का नामोनिशान भी नहीं होता। (किञ्चित भी खेद नहीं होता)। जैसे - जिसे शत्रु को जीतने की इच्छा है, वह उसके पास जाकर उसे जीतता है; परन्तु यदि शत्रु स्वयं ही युद्ध की घोषणा करके युद्ध करने के लिए पास आ जाए तो इसमें क्या हानि है? यह तो अधिक प्रसन्नता की बात है।


एकाकित्वप्रतिज्ञाः सकलमपि समुत्सृज्य सर्वंसहत्वाद्,
भ्रान्त्याऽचिन्त्याः सहायं तनुमिव सहसालोच्य किंचित्सलज्जाः।
सज्जीभूताः स्वकार्ये तदपगमविधिं बद्धपल्यङ्कबन्धाः,
ध्यायन्ति ध्वस्तमोहा गिरिगहनगुहागुह्यगेहे नृसिंहाः ॥258॥ ॥258॥

अर्थ: पुरुषों में प्रधान जो नरसिंह पर्वतों की गुफा, गहन वन और एकान्त स्थान में बैठकर आत्म स्वरूप को ध्याते हैं, जिन्होंने मोह का नाश किया है, एकाकी रहने की प्रतिज्ञा की है और जो समस्त संग को छोड़कर परीषहों को सहते हैं; उनकी महिमा अचिन्त्य है । शरीर को अपना सहायक मानने में उन्हें किञ्चित् लज्जा आती है, क्योंकि यह जड़ शरीर हमारी क्या सहायता करेगा, हमने भ्रम से इसे अपना सहायक माना है, परन्तु यह सहायक नहीं है । वे अपना कार्य करने में स्वयं उद्यमी होते हुए पल्यंकासन में बैठकर निज स्वरूप का ध्यान करते हैं और शरीर रहित होने की विधि विचारते हैं कि अब हमें इस शरीर का संयोग न हो । वे शरीर का निरादर करके उसे त्यागने का उद्यम करते हैं ।


येषां भूषणमङ्गसङ्गतरजः स्थानं शिलायास्तलं,
शय्या शर्करिला मही सुविहितं गेहं गुहा द्वीपिनाम् ।
आत्मात्मीयविकल्पवीतमतयस्त्रुट्यत्तमोग्रन्थयः,
ते नो ज्ञानधना मनांसि पुनतां मुक्तिस्पृहा निस्पृहाः ॥259॥ ॥259॥

अर्थ: जिनके लिए शरीर में लगी हुई धूल ही आभूषण है, पत्थर की शिला ही आवास है, कंकरीली पृथ्वी ही शैय्या है, जिनमें सिंहादिक रहते हैं - ऐसी गुफायें ही घर है, ‘‘देह मेरी है और मैं इसका हूँ’’- ऐसे विकल्प रहित जिनकी बुद्धि है और जिनकी अज्ञानरूप ग्रन्थि टूट गई है; वे ज्ञान-धन, मुक्ति के पात्र, परम निस्पृह (मुनिराज) हमारे मन को पवित्र करें ।


दूरारूढतपोऽनुभावजनितज्योतिः समुत्सर्पणैः,
अन्तस्तत्त्वमदः कथं कथमपि प्राप्य प्रसादं गताः ।
विश्रब्धं हरिणीविलोलनयनैरापीयमाना वने,
धन्यास्ते गमयन्त्यचिन्त्यचरितैर्धीराश्चिरं वासरान् ॥260॥ ॥260॥

अर्थ: जिन्हें अतिशय तप के प्रभाव से उत्पन्न ज्ञान-ज्योति के प्रकाश से निजात्म तत्त्व की प्राप्ति होने से अतिशय आनन्द उत्पन्न हुआ है, जिनसे वन के प्राणियों को विश्रान्ति मिलती है, जिन्हें हिरणी के चञ्चल नेत्र भी जिन्हें विश्वास से देखते हैं तथा जो अचिन्त्य चारित्र सहित वन में बहुत दिन व्यतीत करते हैं - ऐसे वे धीर धन्य हैं।


येषां बुद्धिरलक्ष्यमाणभिदयोराशात्मनोरन्तरं,
गत्वोच्चैरविधाय भेदमनयोरारान्न विश्राम्यति ।
यैरन्तर्विनिवेशिताः शमधनैर्बाढं बहिर्व्याप्तयः,
तेषां नोऽत्र पवित्रयन्तु परमाः पादोस्थिताः पांसवः ॥261॥ ॥261॥

अर्थ: जिनमें भिन्नता भासित नहीं होती - ऐसी जगत् की आशा और आत्मा के मध्य जिनकी बुद्धि स्थित हुई है, अर्थात् जो इन दोनों में अच्छी तरह भिन्नता जाने बिना विश्राम नहीं लेते - ऐसे महामुनि शान्त भावरूप धन के धनी हैं, क्योंकि इन्होंने बाह्य पदार्थों में जानेवाली चित्तवृत्ति को अन्तरंग में स्थापित किया है - ऐसे महा-मुनियों के चरण-कमलों की श्रेष्ठ धूल जगत् में किसे पवित्र नहीं करती ? अर्थात् सभी को पवित्र करती है और हमें भी पवित्र करे !


यत् प्राग्जन्मनि संचितं तनुभृता कर्माशुभं वा शुभं,
तद्दैवं तदुदीरणादनुभवन् दुःखं सुखं वागतम् ।
कुर्याद्यः शुभमेव सोऽप्यभिमतो यस्तूभयोच्छित्तये,
सर्वारम्भपरिग्रहगृहपरित्यागी स वन्द्यः सताम् ॥262॥ ॥262॥

अर्थ: इस जीव के द्वारा पूर्वोपार्जित शुभाशुभ कर्मों को दैव कहते हैं। उनकी प्रेरणा से यह जीव सुख-दुःख भोगता है। जो अशुभ को छोड़कर शुभ को ग्रहण करता है, वह भी भला कहलाता है; परन्तु जो शुभाशुभ दोनों का नाश करने के लिए सर्व आरम्भ-परिग्रहरूप क्रूर ग्रह का त्याग करते हैं, वे योगीश्वर वन्दनीय हैं।


सुखं दुःखं वा स्यादिह विहितकर्मोदयवशात्,
कुतः प्रीतिस्तापः कुत इति विकल्पाद्यदि भवेत्।
उदासीनस्तस्य प्रगलति पुराणं न हि नवं,
समास्कन्दत्येष स्फुरति सुविदग्धो मणिरिव ॥263॥ ॥263॥

अर्थ: सुख या दुःख पूर्वोपार्जित कर्म के उदय से होते हैं । अतः यदि कदाचित् सुख में प्रीति और दुःख में आताप मानें तो नए कर्म अवश्य बँधेंगे; परन्तु जो महापुरुष हर्ष-विषाद नहीं करते अर्थात् ‘‘किससे प्रीति करें और किससे आताप मानें’’- ऐसा विचार कर अत्यन्त उदासीन रहते हैं, उनके पुराने कर्म खिर जाते हैं और नए कर्म नहीं बँधते । वे विवेकी महामणि के समान सदैव प्रकाशरूप ही रहते हैं ।


सकलविमलबोधो देहगेहे विनिर्यन्,
ज्वलन इव स काष्ठं निष्ठुरं भस्मयित्वा।
पुनरपि तदभावे प्रज्वलत्युज्ज्वलः सन्,
भवति हि यतिवृत्तं सर्वथाश्चर्यभूमिः ॥264॥ ॥264॥

अर्थ: जिसप्रकार अग्नि काष्ठ को पूरी तरह भस्म करके उसके अभाव में अति निर्मलरूप से प्रज्जवलित होती है, उसीप्रकार निर्मल ज्ञान देह-गृहादि का अभाव करके निर्मल प्रकाश करता है । अहो ! यति का आचरण सर्वथा आश्चर्य का स्थान है ।


गुणी गुणमयस्तस्य नाशस्तन्नाश इष्यते ।
अत एव हि निर्वाणं शून्यमन्यैर्विकल्पितम् ॥265॥ ॥265॥

अर्थ: गुणी अर्थात् आत्मा ज्ञानादि गुणमय है, अतः ज्ञानादि का नाश होने पर आत्मा का नाश हो जाता है । जैसे - उष्णता के अभाव में अग्नि का भी अभाव है ।
कुछ लोग दीपक के बुझने के समान ज्ञान का अन्त होने पर निर्वाण मानते हैं, परन्तु निर्वाण का ऐसा स्वरूप नहीं है । ज्ञान की पूर्णता ही मुक्ति है । द्रव्य गुणमय होता है, इसलिए गुण का नाश होने पर द्रव्य का भी नाश हो जाएगा ।


अजातोऽनश्वरोऽमूर्तः कर्ता भोक्ता सुखी बुधः।
देहमात्रो मलैर्मुक्तो गत्वोर्ध्वमचलः प्रभुः ॥266॥ ॥266॥

अर्थ: आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होता और कभी नष्ट नहीं होता । उसकी कोई मूर्ति नहीं है, अतः वह अमूर्तिक है । व्यवहारनय से कर्मों का कर्ता है और निश्चयनय से अपने स्वभाव का कर्ता है । व्यवहारनय से सुख-दुःख का भोक्ता है और निश्चयनय से अपने स्वभाव का भोक्ता है । वह अज्ञान से इन्द्रियजन्य सुख को सुख मानता है और निश्चयनय से परमानन्दमय और ज्ञानस्वरूपी है । व्यवहारनय से देह मात्र है । निश्चयनय से चेतना मात्र है तथा कर्ममल से रहित होकर वह लोक के शिखर पर जाकर प्रभु होकर अचलरूप से स्थित हो जाता है ।


स्वाधीन्याद्दुःखमप्यासीत् सुखं यदि तपस्विनाम्।
स्वाधीनसुखसंपन्ना न सिद्धाः सुखिनः कथम् ॥267॥ ॥267॥

अर्थ: जब मुनियों के स्वाधीन काय-क्लेशरूप दुःख को भी सुख कहा है तो सिद्धों को सुखी क्यों न कहें ? वे तो सदा स्वाधीन सुखमय ही हैं ।


इति कतिपयवाचां गोचरीकृत्य कृत्यं,
रचितमुचितमुच्चैश्चेतसां चित्तरम्यम् ।
इदमविकलमन्तः संततं चिन्तयतः,
सपदि विपदपेतामाश्रयन्ते श्रियं ते ॥268॥ ॥268॥

अर्थ: कतिपय वचन-रचना से उदार चित्तवाले महामुनियों को रमणीक यह निर्दोष आत्मानुशासन ग्रन्थ भले प्रकार रचा गया है । जो अन्तःकरण में निरन्तर महापुरुषों के गुणों का चिन्त्वन करता है वह शीघ्र ही आपदा रहित अविनाशी लक्ष्मी प्राप्त करता है ।


जिनसेनाचार्यपादस्मरणाधीनचेतसाम् ।
गुणभद्रभदन्तानां कृतिरात्मानुशासनम् ॥269॥ ॥269॥

अर्थ: जिन-सेना अर्थात् मुनि-मंडली के आचार्य अर्थात् गणधरदेव के चरण-कमलों के स्मरण के आधीन जिनका चित्त है - ऐसे गुणों से भद्र अर्थात् कल्याणरूप और भदन्त अर्थात् पूज्य पुरुष जैनाचार्य की यह आत्मानुशासन कृति है।


ऋषभो नाभिसूनूर्यो भूयात्स भविकाय वः ।
यज्ज्ञानसरसि विश्वं सरोजमिव भासते ॥270॥ ॥270॥

अर्थ: जिनके ज्ञानरूपी सरोवर में समस्त जगत् कमल के समान भासित होता है, वे नाभि राजा के पुत्र ऋषभदेव तुम्हारे महा-कल्याण के निमित्त हों।