आप्तपरीक्षा कारिका एवं अर्थ
आचार्य विद्यानन्द
आचार्य विद्यानन्द कृत आप्तपरीक्षा की संस्कृत मूल कारिकाएँ 1 से 124, हर कारिका के नीचे उसका अर्थ। अर्थ संलग्न ग्रंथ (प्रो. वीरसागर जैन) में हर कारिका के नीचे छपे हिन्दी अर्थ से ज्यों का त्यों लिया है। ग्रंथ में कई कारिकाएँ शास्त्रार्थ के रूप में हैं, वहाँ पुस्तक ने अर्थ के आगे वक्ता लिखा है (जैन, यौग आदि), वह भी वैसा ही रखा है। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।
केवल मूल कारिकाएँ (छपाई की टिप्पणियों सहित): आप्तपरीक्षा मूल कारिका (आचार्य विद्यानन्द) | Aptapariksha Mool Karika (Acharya Vidyanand)
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कारिका 1 से 31
प्रबुद्धाशेषतत्त्वार्थबोधदीधितिमालिने ।
नमः श्रीजिनचन्द्राय मोहध्वान्तप्रभेदिने ॥1॥
कारिकार्थ: जो सर्व तत्त्वार्थों को जाननेवाली ज्ञानकिरणों के स्वामी हैं और मोह-अन्धकार को विनष्ट करने वाले हैं उन ‘श्रीजिनचन्द्र’ को मेरा नमस्कार हो।
श्रेयोमार्गस्य संसिद्धिः प्रसादात्परमेष्ठिनः ।
इत्याहुस्तद्गुणस्तोत्रं शास्त्रादौ मुनिपुङ्गवाः ॥2॥
कारिकार्थ: मुनिश्रेष्ठों ने कहा है कि परमेष्ठी के प्रसाद से श्रेयोमार्ग की संसिद्धि होती है, इसलिए शास्त्र के प्रारंभ में उनका गुणस्तवन करना चाहिए।
मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्म्मभूभृताम् ।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥3॥
कारिकार्थ: जो मोक्षमार्ग के नेता हैं, कर्मपर्वतों के भेत्ता (भेदन-कर्ता, विनाशक) हैं और सर्व तत्त्वों के ज्ञाता हैं, उन (हितोपदेशी, वीतराग एवं सर्वज्ञ देव) को मैं उनके गुणों की प्राप्ति के लिए प्रणाम करता हूँ।
इत्यसाधारणं प्रोक्तं विशेषणमशेषतः ।
परसङ्कल्पिताप्तानां व्यवच्छेदप्रसिद्धये ॥4॥
कारिकार्थ: आप्त में जो उक्त तीन असाधारण गुण कहे गये हैं, वे परसंकल्पित (अन्याभिमत) आप्तों का पूर्णतः निराकरण करने के लिए कहे गये हैं।
अन्ययोगव्यवच्छेदान्निश्चिते हि महात्मनि ।
तस्योपदेशसामर्थ्यादनुष्ठानं प्रतिष्ठितम् ॥5॥
कारिकार्थ: अन्याभिमत आप्त के आप्तत्व का खण्डन और अर्हत् महात्मा के आप्तत्व का मण्डन करने पर ही अर्हन्त के उपदेश से मोक्षमार्गानुष्ठान की सिद्धि संभव है, अत: अनिवार्यत: उक्त विशेषण कहे गये हैं।
तत्रासिद्धं मुनीन्द्रस्य भेतृत्वं कर्मभूभृताम् ।
ये वदन्ति विपर्यासात्तान्प्रत्येवं प्रचक्ष्महे ॥6॥
कारिकार्थ: अब जो (यौग अर्थात् नैयायिक-वैशेषिक) यह विपरीत बात कहते हैं कि आप्त में कर्मभूभृत्भेतृत्व गुण हो ही नहीं सकता, उन्हें विस्तार से समझाते हैं।
प्रसिद्धः सर्वशास्त्रज्ञस्तेषां तावत्प्रमाणतः ।
सदा विध्वस्तनिःशेषबाधकात्स्वसुखादिवत् ॥7॥
कारिकार्थ: यौग: आप्त सर्वतत्त्वज्ञ तो है, क्योंकि इसमें समस्त बाधक प्रमाणों का अभाव है, स्वसुखादि की तरह; किन्तु वह कर्मभूभृत्भेत्ता नहीं है, क्योंकि वह सदाशिव है, सदा मुक्त है।
ज्ञाता यो विश्वतत्त्वानां स भेत्ता कर्मभूभृताम् ।
भवत्येवान्यथा तस्य विश्वतत्त्वज्ञता कुतः ॥8॥
कारिकार्थ: जैन: जो विश्वतत्त्वों का ज्ञाता होता है वह कर्मपर्वतों का भेत्ता भी अवश्य होता ही है। अन्यथा वह विश्वतत्त्वों का ज्ञाता भी कैसे हो सकता है?
नास्पृष्टः कर्म्मभिः शश्वद्विश्वदृश्वास्ति कश्चन ।
तस्यानुपायसिद्धस्य सर्वथानुपपत्तितः ॥9॥
कारिकार्थ: अनादिकाल से ही कर्मों से अस्पृष्ट कोई अनुपायसिद्ध सर्वज्ञ होता है- यह बात सर्वथा अयुक्त/असिद्ध है।
प्रणीतिर्मोक्षमार्गस्य न विनाऽनादिसिद्धितः ।
सर्वज्ञादिति तत्सिद्धिर्न परीक्षासहा स हि ॥10॥
कारिकार्थ: योग: मोक्षमार्ग का प्रणयन अनादिसिद्ध सर्वज्ञ के बिना नहीं बन सकता, अतः उसकी (अनादिसिद्ध ईश्वर की) सिद्धि हो जाती है।
जैन: नहीं, यह बात परीक्षासह नहीं है।
प्रणेता मोक्षमार्गस्य नाशरीरोऽन्यमुक्तवत् ।
सशरीरस्तु नाकर्म्मा सम्भवत्यज्ञजन्तुवत् ॥11॥
कारिकार्थ: जैन: नहीं, यह बात परीक्षासह नहीं है। बताओ- वह अनादिसिद्ध सर्वज्ञ अशरीर है या सशरीर? यदि अशरीर है तो भी वह अन्य मुक्त जीवों की तरह मोक्षमार्ग का प्रणेता नहीं हो सकता। और यदि सशरीर है तो भी वह मोक्षमार्ग का प्रणेता नहीं हो सकता, क्योंकि वह अन्य संसारी प्राणियों की तरह सकर्मा सिद्ध होता है।
न चेच्छाशक्तिरीशस्य कर्म्माभावेऽपि युज्यते ।
तदिच्छा वानभिव्यक्ता क्रियाहेतुः कुतोऽज्ञवत् ॥12॥
कारिकार्थ: यौग: ईश्वर अपनी इच्छाशक्ति से मोक्षमार्ग-प्रणयन एवं जगत्कर्तृत्व आदि कार्यों को करता है।
जैन: नहीं, कर्म के अभाव में ईश्वर के इच्छाशक्ति भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इच्छा कर्मोदय से होती है।
यौग: नहीं, उसकी इच्छाशक्ति तो अनभिव्यक्त है, व्यक्त नहीं होती है।
जैन: अनभिव्यक्त इच्छा अज्ञ प्राणी की तरह क्रिया-हेतु (कार्योत्पत्ति में कारण) नहीं हो सकती।
ज्ञानशक्त्यैव निःशेषकार्योत्पत्तौ प्रभुः किल ।
सदेश्वर इति ख्यानेऽनुमानमनिदर्शनम् ॥13॥
कारिकार्थ: यौग: ईश्वर तो वास्तव में ज्ञानशक्ति से ही सर्व कार्यों को सदा उत्पन्न करने में समर्थ है।
जैन: यह भी सत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह अनुमान उदाहरण से रहित है, अर्थात् ऐसा कहीं नहीं देखा जाता।
समीहामन्तरेणापि यथा वक्ति जिनेश्वरः ।
तथेश्वरोऽपि कार्य्याणि कुर्य्यादित्यप्यपेशलम् ॥14॥
कारिकार्थ: यौग: जिस प्रकार आपके जिनेश्वर इच्छा के बिना ही उपदेश देते हैं, उसी प्रकार ईश्वर को भी इच्छा के बिना ही कार्यों को करने वाला मान लेना चाहिए।
सति धर्म्मविशेषे हि तीर्थकृत्त्वसमाह्वये ।
ब्रूयाज्जिनश्वरो मार्ग न ज्ञानादेव केवलात् ॥15॥
कारिकार्थ: जैन: यह भी अयुक्त है, क्योंकि जिनेश्वर तो ‘तीर्थंकर’ नामक नामकर्म के उदय से ही उपदेश देते हैं, न कि केवल ज्ञान से ही।
सिद्धस्यापास्तनिःशेषकर्म्मणो वागसम्भवात् ।
विना तीर्थकरत्वेन नाम्ना नार्थोपदेशता ॥16॥
कारिकार्थ: जैन: यह भी अयुक्त है, क्योंकि जिनेश्वर तो ‘तीर्थंकर’ नामक नामकर्म के उदय से ही उपदेश देते हैं, न कि केवल ज्ञान से ही। इसीलिए तो जिनके यह कर्म नहीं रहता, उन सर्वकर्म रहित सिद्ध के तत्त्वोपदेश का कार्य नहीं होता।
तथा धर्म्मविशेषोऽस्य योगश्च यदि शाश्वतः ।
तदेश्वरस्य देहोऽस्तु योग्यन्तरवदुत्तमः ॥17॥
कारिकार्थ: यौग: हम भी ईश्वर के ऐसा ही कोई धर्मविशेष और योगविशेष स्वीकार करते हैं, जैसा कि आप जिनेश्वरों के तीर्थंकर नामक नामकर्म स्वीकार करते हैं।
जैन: यदि ऐसा स्वीकार करोगे तो फिर आपको उसके उत्तम शरीर भी स्वीकार करना पड़ेगा, उसे अशरीरी नहीं मान सकोगे।
निग्रहानुग्रहौ देहं स्वं निर्म्मायान्यदेहिनाम् ।
करोतीश्वर इत्येतन्न परीक्षाक्षमं वचः ॥18॥
कारिकार्थ: यौग: ईश्वर पहले अपने शरीर का निर्माण करता है, उसके बाद ही अन्य देहधारियों के निग्रहानुग्रहादि (दण्ड एवं उपकारादि) कार्यों को करता है।
जैन: नहीं, यह बात भी परीक्षा-क्षम नहीं है। क्योंकि-
देहान्तराद्विना तावत्स्वदेहं जनयेद्यदि ।
तदा प्रकृतकार्य्येऽपि देहाधानमनर्थकम् ॥19॥
कारिकार्थ: यदि वह ईश्वर शरीरान्तर के बिना ही अपने स्व-शरीर को उत्पन्न कर लेता है तो अन्य सर्व प्राणियों के शरीरादि कार्यों को उत्पन्न करने के लिए भी शरीर धारण करना व्यर्थ है अर्थात् स्वयं शरीर धारण करने की भी कोई आवश्यकता नहीं रहती।
देहान्तरात्स्वदेहस्य विधाने चानवस्थितिः ।
तथा च प्रकृतं कार्य्यं कुर्य्यादीशो न जातुचित् ॥20॥
कारिकार्थ: यदि वह ईश्वर शरीरान्तर के बिना ही अपने स्व-शरीर को उत्पन्न कर लेता है तो अन्य सर्व प्राणियों के शरीरादि कार्यों को उत्पन्न करने के लिए भी शरीर धारण करना व्यर्थ है अर्थात् स्वयं शरीर धारण करने की भी कोई आवश्यकता नहीं रहती।
तथा यदि शरीरान्तर से स्वशरीर का निर्माण करता है तो अनवस्था नामक दोष उत्पन्न होता है। अत: सत्य यह है कि शरीरादि कार्यों को ईश्वर भी नहीं करता।
स्वयं देहाविधाने तु तेनैव व्यभिचारिता ।
कार्य्यत्वादेः प्रयुक्तस्य हेतोरीश्वरसाधने ॥21॥
कारिकार्थ: तथा यदि ऐसा माना जाए कि ईश्वर स्व-शरीर का निर्माण नहीं करता परन्तु उसके शरीर होता अवश्य है तो ईश्वर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि उसकी (ईश्वर की) सिद्धि में जो कार्यत्वात् - ऐसा हेतु आप प्रस्तुत करते हैं वह उस ईश्वर-देह के साथ ही व्यभिचरित (अनैकान्तिक) हो जाएगा।
यथानीशः स्वदेहस्य कर्ता देहान्तरान्मतः ।
पूर्वस्मादित्यनादित्वान्नानवस्था प्रसज्यते ॥22॥
कारिकार्थ: शंका (शंकरमतानुयायी): जिस प्रकार अनीश (संसारी अज्ञानी प्राणी) अपने शरीर का कर्ता उसके पूर्ववर्ती अन्य शरीर से माना जाता है और वह पूर्ववर्ती शरीर भी उससे पूर्ववर्ती शरीर से माना जाता है और इस प्रकार अनादि शरीर-परम्परा मानने से अनवस्था दोष नहीं आता है।
तथेशस्यापि पूर्वस्माद्देहाद्देहान्तरोद्भवात् ।
नानवस्थेति यो ब्रूयात्तस्यानीशत्वमीशितुः ॥23॥
कारिकार्थ: शंका: उसी प्रकार ईश्वर के पूर्व-पूर्व शरीरों से उत्तर-उत्तर शरीरों का उद्भव स्वीकार कर लेना चाहिए। इससे अनवस्था दोष नहीं आएगा।
समाधान: ऐसा मानने से ईश को भी अनीशत्व प्राप्त होगा अर्थात् वह ईश्वर भी संसारी अज्ञानी प्राणी के समान सिद्ध होगा।
अनीशः कर्म्मदेहेनानादिसन्तानवर्तिना ।
यथैव हि सकर्म्मा नस्तद्वन्न कथमीश्वरः ॥24॥
कारिकार्थ: जैन: ऐसा मानने से ईश को भी अनीशत्व प्राप्त होगा अर्थात् वह ईश्वर भी संसारी अज्ञानी प्राणी के समान सिद्ध होगा। जिस प्रकार संसारी अज्ञानी प्राणी अनादि शरीर-परम्परा के कारण सकर्मा (कर्म-सहित) माना जाता है, उसी प्रकार ईश्वर भी सकर्मा (कर्म-सहित) कैसे नहीं सिद्ध होगा अर्थात् अवश्य सिद्ध हो जाएगा।
तात्पर्य यह हुआ कि ऐसी स्थिति में तो ईश्वर और संसारी अज्ञानी प्राणी में कोई अन्तर नहीं रहेगा।
ततो नेशस्य देहोऽस्ति प्रोक्तदोषानुषङ्गतः ।
नापि धर्म्मविशेषोऽस्य देहाभावे विरोधतः ॥25॥
कारिकार्थ: अतः यही निष्कर्ष निकला कि ईश्वर के देह नहीं है, क्योंकि उसमें पूर्वोक्त अनेक दोष आते हैं। तथा उसके अन्य कोई धर्म विशेष भी नहीं है, क्योंकि उसका सद्भाव शरीर के सद्भाव में ही सिद्ध होता है, शरीर के अभाव में नहीं; अतः यह उदाहरण देना भी ठीक नहीं है कि वह जिनेश्वर की तरह इच्छा के बिना ही कार्यप्रवर्तन करता है।
येनेच्छामन्तरेणापि तस्य कार्ये प्रवर्तनम् ।
जिनेन्द्रवद् घटेतेति नोदाहरणसम्भवः ॥26॥
कारिकार्थ: अतः यही निष्कर्ष निकला कि ईश्वर के देह नहीं है, क्योंकि उसमें पूर्वोक्त अनेक दोष आते हैं। तथा उसके अन्य कोई धर्म विशेष भी नहीं है, क्योंकि उसका सद्भाव शरीर के सद्भाव में ही सिद्ध होता है, शरीर के अभाव में नहीं; अतः यह उदाहरण देना भी ठीक नहीं है कि वह जिनेश्वर की तरह इच्छा के बिना ही कार्यप्रवर्तन करता है।
ज्ञानमीशस्य नित्यं चेदशरीरस्य न क्रमः ।
कार्य्याणामक्रमाद्धेतोः कार्यक्रमविरोधतः ॥27॥
कारिकार्थ: यदि उस अशरीरी ईश्वर का ज्ञान नित्य है तो जगत्कार्यों में क्रम नहीं होना चाहिए था, क्योंकि अक्रम हेतु से कार्यों के क्रम का विरोध सिद्ध होता है।
तद्बोधस्य प्रमाणत्वे फलाभावः प्रसज्यते ।
ततः फलावबोधस्येष्टौ च स्वस्य मतक्षतिः ॥28॥
कारिकार्थ: ईश्वर का नित्य ज्ञान यदि प्रमाण माना जाए तो फल का अभाव सिद्ध होता है। और यदि बाद में उत्पन्न होने वाले अनित्य ज्ञान को फल माना जाए तो आपके स्वसिद्धान्त की हानि होती है।
फलत्वे तस्य नित्यत्वं न स्यान्मानात्समुद्भवात् ।
ततोऽनुद्भवने तस्य फलत्वं प्रतिहन्यते ॥29॥
कारिकार्थ: ईश्वर का नित्य ज्ञान यदि प्रमाण माना जाए तो फल का अभाव सिद्ध होता है। और यदि बाद में उत्पन्न होने वाले अनित्य ज्ञान को फल माना जाए तो आपके स्वसिद्धान्त की हानि होती है।
तथा यदि उस नित्य ज्ञान को फल माना जाए तो वह नित्य नहीं सिद्ध होता, क्योंकि वह तो प्रमाण से उत्पन्न होता है। यदि उसे उत्पन्न न मानें तो वह फल नहीं हो सकता।
अनित्यत्वे तु तज्ज्ञानस्यानेन व्यभिचारिता ।
कार्यत्वादेर्महेशेनाकरणेऽस्य स्वबुद्धितः ॥30॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर के ज्ञान को अनित्य माना जाए तो कार्यत्व हेतु के साथ व्यभिचार आता है, क्योंकि उसे ईश्वर ने स्वबुद्धि से नहीं किया (बनाया) है।
यदि कहते हो कि उसे ईश्वर ने स्वबुद्धि से किया है तो फिर उस स्वबुद्धि को किसने किया -यह बताइए। इसमें तो अनवस्था दोष उत्पन्न होगा।
तथा यदि बुद्धि की अनादि-परम्परा स्वीकार करोगे तो वह कर्म-सन्तति के बिना नहीं मानी जा सकेगी।
तथा यदि ऐसा स्वीकार करोगे तो पुनः वही स्थिति उपस्थित होगी कि ईश्वर और अज्ञानी संसारी प्राणी में कोई अन्तर नहीं रहेगा, जैसा कि देह वाले प्रकरण में सिद्ध किया जा चुका है।
बुद्ध्यन्तरेण तद्बुद्धेः करणे चानवस्थितिः ।
नानादिसन्ततिर्युक्ता कर्म्मसन्तानतो विना ॥31॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर के ज्ञान को अनित्य माना जाए तो कार्यत्व हेतु के साथ व्यभिचार आता है, क्योंकि उसे ईश्वर ने स्वबुद्धि से नहीं किया (बनाया) है।
यदि कहते हो कि उसे ईश्वर ने स्वबुद्धि से किया है तो फिर उस स्वबुद्धि को किसने किया -यह बताइए। इसमें तो अनवस्था दोष उत्पन्न होगा।
तथा यदि बुद्धि की अनादि-परम्परा स्वीकार करोगे तो वह कर्म-सन्तति के बिना नहीं मानी जा सकेगी।
तथा यदि ऐसा स्वीकार करोगे तो पुनः वही स्थिति उपस्थित होगी कि ईश्वर और अज्ञानी संसारी प्राणी में कोई अन्तर नहीं रहेगा, जैसा कि देह वाले प्रकरण में सिद्ध किया जा चुका है।
कारिका 32 से 62
अव्यापि च यदि ज्ञानमीश्वरस्य तदा कथम् ।
सकृत्सर्वत्र कार्य्याणामुत्पत्तिर्घटते ततः ॥32॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर का ज्ञान अव्यापक है तो उससे एक साथ सर्वत्र कार्यों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
यद्येकत्र स्थितं देशे ज्ञानं सर्वत्र कार्यकृत् ।
तदा सर्वत्र कार्याणां सकृत्किन्न समुद्भवः ॥33॥
कारिकार्थ: यदि वह एक जगह रहकर ही सब जगह कार्य कर लेता है तो सब जगह के कार्य एक साथ क्यों नहीं उत्पन्न हो जाते?
कारणान्तरवैकल्यात्तथानुत्पत्तिरित्यपि ।
कार्याणामीश्वरज्ञानाहेतुकत्वं प्रसाधयेत् ॥34॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर का ज्ञान अव्यापक है तो उससे एक साथ सर्वत्र कार्यों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
यदि वह एक जगह रहकर ही सब जगह कार्य कर लेता है तो सब जगह के कार्य एक साथ क्यों नहीं उत्पन्न हो जाते?
यदि कहो कि अन्य कारणों के अभाव से सब जगह के कार्य एक साथ उत्पन्न नहीं होते तो इससे यह सिद्ध होगा कि वे कार्य ईश्वर-ज्ञान-हेतुक नहीं हैं, क्योंकि सर्वत्र सर्वदा ईश्वर ज्ञान का व्यतिरेक अप्रसिद्ध है।
तथा व्यतिरेक के अप्रसिद्ध होने से अन्वय में भी सन्देह है। अतः जगत् के कार्य ईश्वर-ज्ञान-हेतुक सिद्ध कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते।
सर्वत्र सर्वदा तस्य व्यतिरेकाप्रसिद्धितः ।
अन्वयस्यापि सन्देहात्कार्य्यं तद्धेतुकं कथम् ॥35॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर का ज्ञान अव्यापक है तो उससे एक साथ सर्वत्र कार्यों की उत्पत्ति नहीं हो सकती है।
यदि वह एक जगह रहकर ही सब जगह कार्य कर लेता है तो सब जगह के कार्य एक साथ क्यों नहीं उत्पन्न हो जाते?
यदि कहो कि अन्य कारणों के अभाव से सब जगह के कार्य एक साथ उत्पन्न नहीं होते तो इससे यह सिद्ध होगा कि वे कार्य ईश्वर-ज्ञान-हेतुक नहीं हैं, क्योंकि सर्वत्र सर्वदा ईश्वर ज्ञान का व्यतिरेक अप्रसिद्ध है।
तथा व्यतिरेक के अप्रसिद्ध होने से अन्वय में भी सन्देह है। अतः जगत् के कार्य ईश्वर-ज्ञान-हेतुक सिद्ध कैसे हो सकते हैं? नहीं हो सकते।
एतेनैवेश्वरज्ञानं व्यापि नित्यमपाकृतम् ।
तस्येशवत्सदा कार्य्यक्रमहेतुत्वहानितः ॥36॥
कारिकार्थ: उपर्युक्त विवेचन से ही ईश्वर के ज्ञान को व्यापक व नित्य मानने का भी निराकरण हुआ समझ लेना चाहिए, क्योंकि वह (व्यापक-नित्य ज्ञान) भी ईश्वर की ही तरह कार्यों का क्रम से हेतु (कारण/कर्ता) नहीं हो सकता।
अस्वसंविदितं ज्ञानमीश्वरस्य यदीष्यते ।
तदा सर्वज्ञता न स्यात्स्वज्ञानस्याप्रवेदनात् ॥37॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाए तो उसका ज्ञान अन्य से और उस अन्य का भी ज्ञान किसी अन्य से मानना पड़ेगा, जिससे अनवस्था नामक महादोष उत्पन्न होगा।
यदि कहीं दूर तक पहुँचकर किसी भी एक अन्य ज्ञान को स्वसंवेदी माना जाएगा तो उससे अच्छा यही था कि प्रथम ज्ञान को ही स्वसंवेदी मान लिया जाए।
तात्पर्य यही हुआ कि यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाएगा तो ईश्वर ‘सर्वज्ञ’ भी सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वह भले ही अन्य सबको जानता हो, पर स्व को तो नहीं जानता।
ज्ञानान्तरेण तद्वित्तौ तस्याप्यन्येन वेदनम् ।
वेदनेन भवेदेवमनवस्था महीयसी ॥38॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाए तो उसका ज्ञान अन्य से और उस अन्य का भी ज्ञान किसी अन्य से मानना पड़ेगा, जिससे अनवस्था नामक महादोष उत्पन्न होगा।
यदि कहीं दूर तक पहुँचकर किसी भी एक अन्य ज्ञान को स्वसंवेदी माना जाएगा तो उससे अच्छा यही था कि प्रथम ज्ञान को ही स्वसंवेदी मान लिया जाए।
तात्पर्य यही हुआ कि यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाएगा तो ईश्वर ‘सर्वज्ञ’ भी सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वह भले ही अन्य सबको जानता हो, पर स्व को तो नहीं जानता।
गत्वा सुदूरमप्येवं स्वसंविदितवेदने ।
इष्यमाणे महेशस्य प्रथमं तादृगस्तु वः ॥39॥
कारिकार्थ: यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाए तो उसका ज्ञान अन्य से और उस अन्य का भी ज्ञान किसी अन्य से मानना पड़ेगा, जिससे अनवस्था नामक महादोष उत्पन्न होगा।
यदि कहीं दूर तक पहुँचकर किसी भी एक अन्य ज्ञान को स्वसंवेदी माना जाएगा तो उससे अच्छा यही था कि प्रथम ज्ञान को ही स्वसंवेदी मान लिया जाए।
तात्पर्य यही हुआ कि यदि ईश्वर-ज्ञान को अस्वसंवेदी माना जाएगा तो ईश्वर ‘सर्वज्ञ’ भी सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वह भले ही अन्य सबको जानता हो, पर स्व को तो नहीं जानता।
तत्स्वार्थव्यवसायात्मज्ञानं भिन्नं महेश्वरात् ।
कथं तस्येति निर्देश्यमाकाशादिवदञ्जसा ॥40॥
कारिकार्थ: यदि महेश्वर-ज्ञान को स्वसंवेदी - ‘स्वार्थव्यवसायात्मक’ कहा जाए तो भी उसे आपके (वैशेषिक के) मतानुसार महेश्वर से भिन्न मानना होगा और ऐसी स्थिति में वह उसका ही है- ऐसा निश्चयपूर्वक कैसे कहा जा सकेगा? वह तो आकाशादि की भाँति महेश्वर से भिन्न ही सिद्ध होगा।
समवायेन तस्यापि तद्भिन्नस्य कुतो गतिः ।
इहेदमिति विज्ञानादबाध्याद्व्यभिचारि तत् ॥41॥
कारिकार्थ: यदि महेश्वर-ज्ञान को स्वसंवेदी - ‘स्वार्थव्यवसायात्मक’ कहा जाए तो भी उसे आपके (वैशेषिक के) मतानुसार महेश्वर से भिन्न मानना होगा और ऐसी स्थिति में वह उसका ही है- ऐसा निश्चयपूर्वक कैसे कहा जा सकेगा? वह तो आकाशादि की भाँति महेश्वर से भिन्न ही सिद्ध होगा।
यदि कहा जाए कि समवाय से उनमें स्व-स्वामी भाव बन जाएगा अर्थात् यह उसका ही है- ऐसा निश्चयपूर्वक कहा जा सकेगा क्योंकि उनमें आधार-आधेय सम्बन्ध है, तो हम पूछते हैं कि ‘इस कुण्ड (घट) में दही है’- यहाँ भी तो आधार-आधेय सम्बन्ध है, किन्तु यह तो समवाय रूप नहीं है, इनमें तो स्व-स्वामी सम्बन्ध नहीं बनता है, यह तो मात्र संयोग सम्बन्ध है; अत: इसमें व्यभिचार दोष उपस्थित होता है।
यदि कहो कि सम्बन्धमात्र ही आपका साध्य है, अत: व्यभिचार दोष नहीं आएगा तो यह तो हमारे लिए सिद्ध-साधन ही हुआ।
इसप्रकार आपके मतानुसार महेश्वर-ज्ञान को स्वसंवेदी, महेश्वर से भिन्न मानना भी सत्य सिद्ध नहीं होता।
इह कुण्डे दधीत्यादिविज्ञानेन स विद्विषा ।
साध्ये सम्बन्धमात्रे तु परेषां सिद्धसाधनम् ॥42॥
कारिकार्थ: यदि महेश्वर-ज्ञान को स्वसंवेदी - ‘स्वार्थव्यवसायात्मक’ कहा जाए तो भी उसे आपके (वैशेषिक के) मतानुसार महेश्वर से भिन्न मानना होगा और ऐसी स्थिति में वह उसका ही है- ऐसा निश्चयपूर्वक कैसे कहा जा सकेगा? वह तो आकाशादि की भाँति महेश्वर से भिन्न ही सिद्ध होगा।
यदि कहा जाए कि समवाय से उनमें स्व-स्वामी भाव बन जाएगा अर्थात् यह उसका ही है- ऐसा निश्चयपूर्वक कहा जा सकेगा क्योंकि उनमें आधार-आधेय सम्बन्ध है, तो हम पूछते हैं कि ‘इस कुण्ड (घट) में दही है’- यहाँ भी तो आधार-आधेय सम्बन्ध है, किन्तु यह तो समवाय रूप नहीं है, इनमें तो स्व-स्वामी सम्बन्ध नहीं बनता है, यह तो मात्र संयोग सम्बन्ध है; अतः इसमें व्यभिचार दोष उपस्थित होता है।
यदि कहो कि सम्बन्धमात्र ही आपका साध्य है, अतः व्यभिचार दोष नहीं आएगा तो यह तो हमारे लिए सिद्ध-साधन ही हुआ।
इसप्रकार आपके मतानुसार महेश्वर-ज्ञान को स्वसंवेदी, महेश्वर से भिन्न मानना भी सत्य सिद्ध नहीं होता।
सत्यामयुतसिद्धौ चेन्नेदं साधु विशेषणम् ।
शास्त्रीयायुतसिद्धत्वविरहात्समवायिनोः ॥43॥
कारिकार्थ: यदि कहो कि अयुतसिद्धि से व्यभिचार दोष नहीं आएगा और उनमें (महेश्वर और उसके ज्ञान में) स्व-स्वामी भाव बन जाएगा तो यह कथन भी समीचीन सिद्ध नहीं होता; क्योंकि- अवयव-अवयवी रूप अयुतसिद्धि दो प्रकार की है- शास्त्रीया (वैशेषिक शास्त्र-सम्मत) और लौकिकी (लोक-सम्मत)। शास्त्रीया अयुतसिद्धि तो यहाँ इसलिए नहीं बनती क्योंकि आपके शास्त्रानुसार द्रव्य (गुणी) तो अपने अवयवों में रहता है और गुण द्रव्य में रहता है, दोनों का आश्रय एक नहीं है, दोनों भिन्न-भिन्न आश्रय में रहते हैं। और लौकिकी अयुतसिद्धि तो दूध और पानी में भी मानी जाती है।
द्रव्यं स्वावयवाधारं गुणो द्रव्याश्रयो यतः ।
लौकिक्ययुतसिद्धिस्तु भवेद्दुग्धाम्भसोरपि ॥44॥
कारिकार्थ: यदि कहो कि अयुतसिद्धि से व्यभिचार दोष नहीं आएगा और उनमें (महेश्वर और उसके ज्ञान में) स्व-स्वामी भाव बन जाएगा तो यह कथन भी समीचीन सिद्ध नहीं होता; क्योंकि- अवयव-अवयवी रूप अयुतसिद्धि दो प्रकार की है- शास्त्रीया (वैशेषिक शास्त्र-सम्मत) और लौकिकी (लोक-सम्मत)। शास्त्रीया अयुतसिद्धि तो यहाँ इसलिए नहीं बनती क्योंकि आपके शास्त्रानुसार द्रव्य (गुणी) तो अपने अवयवों में रहता है और गुण द्रव्य में रहता है, दोनों का आश्रय एक नहीं है, दोनों भिन्न-भिन्न आश्रय में रहते हैं। और लौकिकी अयुतसिद्धि तो दूध और पानी में भी मानी जाती है।
पृथगाश्रयवृत्तित्वं युतसिद्धिर्न चानयोः ।
सास्तीशस्य विभुत्वेन परद्रव्याश्रितिच्युतेः ॥45॥
कारिकार्थ: ‘‘पृथक् आश्रय में रहना युतसिद्धि है और वह इन दोनों (ईश्वर और ईश्वरज्ञान) में नहीं है, क्योंकि ईश्वर विभु (सर्वत्र व्यापक) है, वह दूसरे द्रव्य में नहीं रहता और उसका ज्ञान भी दूसरे द्रव्य में नहीं पाया जाता, अत: इनमें युतसिद्धि नहीं है, अयुतसिद्धि है’’- ऐसा जो (वैशेषिक) समाधान प्रस्तुत करते हैं उनसे हम (जैन) पूछते हैं कि-
विभु द्रव्य अन्य द्रव्यों में नहीं रहते हैं, अत: उनके युतसिद्धि कैसे बनेगी? उनके तो अयुतसिद्धि ही बन सकेगी, इसलिए उनमें और एक द्रव्य में रहने वाले गुणों में अयुतसिद्धि प्राप्त होने पर परस्पर में समवाय सम्बन्ध प्राप्त होता है। यदि उनमें अयुतसिद्धि न मानें तो युतसिद्धि और अयुतसिद्धि दोनों का अभाव होने पर महान् व्याघात उपस्थित होगा।
ज्ञानस्यापीश्वरादन्यद्रव्यवृत्तित्वहानितः ।
इति येऽपि समादध्युस्तांश्च पर्य्यनुयुंजमहे ॥46॥
कारिकार्थ: “पृथक् आश्रय में रहना युतसिद्धि है और वह इन दोनों (ईश्वर और ईश्वरज्ञान) में नहीं है, क्योंकि ईश्वर विभु (सर्वत्र व्यापक) है, वह दूसरे द्रव्य में नहीं रहता और उसका ज्ञान भी दूसरे द्रव्य में नहीं पाया जाता, अत: इनमें युतसिद्धि नहीं है, अयुतसिद्धि है”- ऐसा जो (वैशेषिक) समाधान प्रस्तुत करते हैं उनसे हम (जैन) पूछते हैं कि-
विभु द्रव्य अन्य द्रव्यों में नहीं रहते हैं, अत: उनके युतसिद्धि कैसे बनेगी? उनके तो अयुतसिद्धि ही बन सकेगी, इसलिए उनमें और एक द्रव्य में रहने वाले गुणों में अयुतसिद्धि प्राप्त होने पर परस्पर में समवाय सम्बन्ध प्राप्त होता है। यदि उनमें अयुतसिद्धि न मानें तो युतसिद्धि और अयुतसिद्धि दोनों का अभाव होने पर महान् व्याघात उपस्थित होगा।
विभुद्रव्यविशेषाणामन्याश्रयविवेकतः ।
युतसिद्धिः कथं नु स्यादेकद्रव्यगुणादिषु ॥47॥
कारिकार्थ: ‘‘पृथक् आश्रय में रहना युतसिद्धि है और वह इन दोनों (ईश्वर और ईश्वरज्ञान) में नहीं है, क्योंकि ईश्वर विभु (सर्वत्र व्यापक) है, वह दूसरे द्रव्य में नहीं रहता और उसका ज्ञान भी दूसरे द्रव्य में नहीं पाया जाता, अत: इनमें युतसिद्धि नहीं है, अयुतसिद्धि है’’- ऐसा जो (वैशेषिक) समाधान प्रस्तुत करते हैं उनसे हम (जैन) पूछते हैं कि-
विभु द्रव्य अन्य द्रव्यों में नहीं रहते हैं, अत: उनके युतसिद्धि कैसे बनेगी? उनके तो अयुतसिद्धि ही बन सकेगी, इसलिए उनमें और एक द्रव्य में रहने वाले गुणों में अयुतसिद्धि प्राप्त होने पर परस्पर में समवाय सम्बन्ध प्राप्त होता है। यदि उनमें अयुतसिद्धि न मानें तो युतसिद्धि और अयुतसिद्धि दोनों का अभाव होने पर महान् व्याघात उपस्थित होगा।
समवायः प्रसज्येताऽयुतसिद्धौ परस्परम् ।
तेषां तद्द्वितयासत्त्वे स्याद्व्याघातो दुरुत्तरः ॥48॥
कारिकार्थ: “पृथक् आश्रय में रहना युतसिद्धि है और वह इन दोनों (ईश्वर और ईश्वरज्ञान) में नहीं है, क्योंकि ईश्वर विभु (सर्वत्र व्यापक) है, वह दूसरे द्रव्य में नहीं रहता और उसका ज्ञान भी दूसरे द्रव्य में नहीं पाया जाता, अतः इनमें युतसिद्धि नहीं है, अयुतसिद्धि है”- ऐसा जो (वैशेषिक) समाधान प्रस्तुत करते हैं उनसे हम (जैन) पूछते हैं कि-
विभु द्रव्य अन्य द्रव्यों में नहीं रहते हैं, अतः उनके युतसिद्धि कैसे बनेगी? उनके तो अयुतसिद्धि ही बन सकेगी, इसलिए उनमें और एक द्रव्य में रहने वाले गुणों में अयुतसिद्धि प्राप्त होने पर परस्पर में समवाय सम्बन्ध प्राप्त होता है। यदि उनमें अयुतसिद्धि न मानें तो युतसिद्धि और अयुतसिद्धि दोनों का अभाव होने पर महान् व्याघात उपस्थित होगा।
युतप्रत्ययहेतुत्वाद्युतसिद्धिरितीरणे ।
विभुद्रव्यगुणादीनां युतसिद्धिः समागता ॥49॥
कारिकार्थ: यदि ऐसा स्वीकार किया जाए कि जो पृथक् प्रत्यय (ज्ञान) में कारण है वह युतसिद्धि है तो विभुद्रव्यों और गुणादिकों में युतसिद्धि प्राप्त होती है।
ततो नायुतसिद्धिः स्यादित्यसिद्धं विशेषणम् ।
हेतोर्विपक्षतस्तावत्व्यवच्छेदं न साधयेत् ॥50॥
कारिकार्थ: इसप्रकार जब युतसिद्धि नहीं सिद्ध होती है तो उसके अभावरूप अयुतसिद्धि भी सिद्ध नहीं होती, अतः हेतु में दिया गया अयुतसिद्धत्व विशेषण असिद्ध है और इसलिए वह हेतु की विपक्ष से व्यावृत्ति नहीं करा सकता।
सिद्धेऽपि समवायस्य समवायिषु दर्शनात् ।
इहेदमिति संवित्तेः साधनं व्यभिचारि तत् ॥51॥
कारिकार्थ: यदि किसी तरह उक्त विशेषण सिद्ध भी हो जाए तो भी समवायियों में समवाय का ‘इहेदं’ प्रत्यय देखा जाता है, अतः उसके साथ हेतु व्यभिचारी सिद्ध होता है।
समवायान्तराद्वृत्तौ समवायस्य तत्त्वतः ।
समवायिषु तस्यापि परस्मादित्यनिष्ठितिः ॥52॥
कारिकार्थ: वैशेषिक: यदि समवायियों की अन्य समवाय से वृत्ति मानी जाए तो उसकी वृत्ति भी अन्य समवाय से मानी जाएगी और इस तरह अनवस्था उक्त प्रत्यय में बाधक होगी, अत: ‘अबाधितत्व’ विशेषण नहीं है जिससे कि व्यभिचारी सिद्ध हो।
तदबाधास्तीत्यबाधत्वं नाम नेह विशेषणम् ।
हेतोः सिद्धमनेकान्तो यतोऽनेनेति ये विदुः ॥53॥
कारिकार्थ: वैशेषिक: यदि समवायियों की अन्य समवाय से वृत्ति मानी जाए तो उसकी वृत्ति भी अन्य समवाय से मानी जाएगी और इस तरह अनवस्था उक्त प्रत्यय में बाधक होगी, अत: ‘अबाधितत्व’ विशेषण नहीं है जिससे कि व्यभिचारी सिद्ध हो।
तेषामिहेति विज्ञानाद्विशेषणविशेष्यता ।
समवायस्य तद्वत्सु तत एव न सिद्ध्यति ॥54॥
कारिकार्थ: जैन: इस तरह तो समवायियों में समवाय का ‘इहेदं’ ज्ञान से विशेषण-विशेष्यत्व सम्बन्ध भी सिद्ध नहीं हो सकेगा, क्योंकि वह विशेषण-विशेष्यत्व सम्बन्ध भी अपने सम्बन्धियों में अन्य विशेषण-विशेष्यत्व सम्बन्ध से रहेगा और इस तरह (समवायियों और समवाय में विशेषण-विशेष्यभाव मानने में भी) अनवस्था दोष उत्पन्न होगा।
विशेषणविशेष्यत्वसम्बन्धोऽप्यन्यतो यदि ।
स्वसम्बन्धिषु वर्तेत तदा बाधाऽनवस्थितिः ॥55॥
कारिकार्थ: जैन: क्योंकि वह विशेषण-विशेष्यत्व सम्बन्ध भी अपने सम्बन्धियों में अन्य विशेषण-विशेष्यत्व सम्बन्ध से रहेगा और इस तरह (समवायियों और समवाय में विशेषण-विशेष्यभाव मानने में भी) अनवस्था दोष उत्पन्न होगा।
विशेषणविशेष्यत्वप्रत्ययादवगम्यते ।
विशेषणविशेष्यत्वमित्यप्येतेन दूषितम् ॥56॥
कारिकार्थ: यदि यह कहा जाय कि विशेषण-विशेष्यभाव विशेषण-विशेष्यभाव-ज्ञान से जाना जाता है तो वह ज्ञान भी उपर्युक्त प्रकार से दूषित है। अर्थात् उसमें भी अनवस्था दोष आता है।
तस्यानन्त्यात्प्रपत्तृणामाकांक्षाक्षयतोऽपि वा ।
न दोष इति चेदेवं समवायादिनाऽपि किम् ॥57॥
कारिकार्थ: वैशेषिक: विशेषण-विशेष्यभाव को हमने अनंत स्वीकार किया है, इसलिए अनवस्था दोष नहीं आता। दूसरे, प्रतिपत्ता लोगों की आकांक्षा का नाश भी सम्भव है, इसलिए भी अनवस्था दोष नहीं आ सकता।
जैन: परन्तु उनका यह कहना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि इस तरह तो समवाय आदि सम्बन्धों को मानना भी व्यर्थ ठहरेगा।
गुणादिद्रव्ययोर्भिन्नद्रव्ययोश्च परस्परम् ।
विशेषणविशेष्यत्वसम्बन्धोऽस्तु निरङ्कुशः ॥58॥
कारिकार्थ: जैन: तथा गुणादिक और द्रव्य में तथा द्रव्य और द्रव्य में भी विशेषण-विशेष्यभावरूप सम्बन्ध ही मानना उचित एवं युक्त सिद्ध होगा।
संयोगः समवायो वा तद्विशेषोऽस्त्वनेकधा ।
स्वातंत्र्ये समवायस्य सर्वथैक्ये च दोषतः ॥59॥
कारिकार्थ: जैन: संयोग तथा समवाय आदि सम्बन्धों को उसी विशेषण-विशेष्यभाव के अनेक भेद स्वीकार करना चाहिए। तथा यदि समवाय को स्वतन्त्र और सर्वथा एक माना जाय तो उसमें अनेक दोष आते हैं।
स्वतंत्रस्य कथं तावदाश्रितत्वं स्वयं मतम् ।
तस्याश्रितत्ववचने स्वातत्र्यं प्रतिहन्यते ॥60॥
कारिकार्थ: यदि समवाय स्वतंत्र है तो उसमें तो आपने स्वयं आश्रितपना माना है, वह कैसे बनेगा? और आश्रित कहने पर उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है।
समवायिषु सत्स्वेव समवायस्य वेदनात् ।
आश्रितत्वे दिगादीनां मूर्त्तद्रव्याश्रितिर्न किम् ॥61॥
कारिकार्थ: यदि कहो कि समवायियों के होने पर ही समवाय का ज्ञान होता है इसलिए समवाय में आश्रितपना कहा है तो फिर दिगादि भी मूर्तद्रव्यों के आश्रित हो जाएँगे। कैसे नहीं हो जाएँगे?
कथं चानाश्रितः सिद्ध्येत्सम्बन्धः सर्वथा क्वचित् ।
स्वसम्बन्धिषु येनातः सम्भवेन्नियतस्थितिः ॥62॥
कारिकार्थ: यदि कहो कि समवाय परमार्थ से अनाश्रित ही है, आश्रितपना तो उपचार से माना है तो फिर वह सम्बन्ध ही कैसे सिद्ध होगा जिससे कि उसकी अपने सम्बन्धियों में नियत स्थिति सम्भव हो?
कारिका 63 से 93
एक एव च सर्वत्र समवायो यदीष्यते ।
तदा महेश्वरे ज्ञानं समवैति न खे कथम् ॥63॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि एक ही समवाय सर्वत्र है तो फिर महेश्वर-ज्ञान का समवाय महेश्वर में ही है, आकाशादि में नहीं -ऐसा कैसे है?
इहेति प्रत्ययोऽप्येष शङ्करे न तु खादिषु ।
इति भेदः कथं सिद्ध्येन्नियामकमपश्यतः ॥64॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि ‘इहेदम् प्रत्यय’ महेश्वर में ही होता है, आकाशादि में नहीं, इसलिए महेश्वर-ज्ञान का समवाय महेश्वर में ही है, आकाशादि में नहीं, तो इस प्रकार का भेद कैसे सिद्ध हो सकता है, क्योंकि उक्त प्रत्यय का नियामक कोई नहीं दिखाई देता ।
न चाचेतनता नत्र सम्भाव्येत नियामिका ।
शम्भावपि तदास्थानात्खादेस्तदविशेषतः ॥65॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि उक्त प्रत्यय में अचेतनपना नियामक है तो वह अचेतनपना तो महेश्वर में भी विद्यमान है और इसलिए उसमें और आकाशादि में कोई विशेषता नहीं है।
नेशो ज्ञाता न चाज्ञाता स्वयं ज्ञानस्य केवलम् ।
समवायात्सदा ज्ञाता यद्यात्मैव स किं स्वतः ॥66॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि महेश्वर स्वयं न चेतन है न अचेतन, वह तो केवल ज्ञान के समवाय से ज्ञाता है तो बतलाइए कि वह स्वतः क्या है।
यदि वह स्वतः आत्मा है तो यह भी सत्य सिद्ध नहीं होगा क्योंकि आत्मा भी आत्मत्व के समवाय से आत्मा माना गया है।
नायमात्मा न चानात्मा स्वात्मत्वसमवायतः ।
सदात्मैवेति चेदेवं द्रव्यमेव स्वतोऽसिधत् ॥67॥
कारिकार्थ: यदि आप कहें कि महेश्वर न आत्मा है न अनात्मा, वह तो केवल आत्मत्व के समवाय से सदा आत्मा है तो फिर वही प्रश्न उपस्थित होता है कि वह स्वतः क्या है?
यदि आप कहें कि स्वतः द्रव्य है तो वह द्रव्य भी स्वतः सिद्ध नहीं होता, क्योंकि द्रव्यत्व के समवाय से ही उसे द्रव्य माना गया है।
नेशो द्रव्यं न चाद्रव्यं द्रव्यत्वसमवायतः ।
सर्वदा द्रव्यमेवेति यदि सन्नेव स स्वतः ॥68॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि महेश्वर न द्रव्य है न अद्रव्य, केवल द्रव्यत्व के समवाय से सदा द्रव्य है तो फिर वही प्रश्न उपस्थित होता है कि वह स्वत: क्या है?
यदि वह स्वत: सत् है तो वह स्वत: सत् भी सिद्ध नहीं होता, क्योंकि सत्ता के समवाय से उसे सत् माना गया है।
न स्वतः सदसन्नापि सत्त्वेन समवायतः ।
सन्नेव शश्वदित्युक्तौ व्याघातः केन वार्यते ॥69॥
कारिकार्थ: यदि कहा जाए कि वह स्वतः न सत् है न असत्, केवल सत्ता के समवाय से सत् है तो कथन में जो विरोध उत्पन्न होगा उसका निवारण कैसे होगा?
स्वरूपेणासतः सत्त्वसमवाये च खाम्बुजे ।
स स्यात्किन्न विशेषस्याभावात्तस्य ततोऽञ्जसा ॥70॥
कारिकार्थ: क्योंकि स्वरूप से ही असत् के भी सत्ता का समवाय माना जाए तो वह आकाश-कमल में क्यों न माना जाए, क्योंकि इसमें और उसमें कोई अन्तर नहीं रह जाएगा।
स्वरूपेण सतः सत्त्वसमवायेऽपि सर्वदा ।
सामान्यादौ भवेत्सत्त्वसमवायोऽविशेषतः ॥71॥
कारिकार्थ: तथा यदि स्वरूप से सत् के सत्ता का समवाय स्वीकार किया जाएगा तो वह समवाय सदा सामान्यादि में भी हो सकता है, क्योंकि महेश्वर और सामान्यादि में स्वरूप सत् की अपेक्षा कोई अन्तर नहीं है, दोनों समान हैं।
स्वतः सतो यथा सत्त्वसमवायस्तथास्तु सः ।
द्रव्यत्वात्मत्वबोद्धृत्वसमवायोऽपि तत्त्वतः ॥72॥
कारिकार्थ: तथा जिसप्रकार स्वतः सत् के भी सत्ता का समवाय मान लिया उसीप्रकार द्रव्यत्व, चेतनत्व, आत्मत्व का समवाय भी स्वतः सिद्ध द्रव्य, आत्मा, चेतन के सदा मानिए, क्योंकि वास्तव में जो स्वतः द्रव्यादि रूप नहीं है, उसके द्रव्यत्वादि का समवाय नहीं बन सकता।
द्रव्यस्यैवात्मनो बोद्धुः स्वयं सिद्धस्य सर्वदा ।
न हि स्वतोऽतथाभूतस्तथात्वसमवायभाक् ॥73॥
कारिकार्थ: तथा जिसप्रकार स्वत: सत् के भी सत्ता का समवाय मान लिया उसीप्रकार द्रव्यत्व, चेतनत्व, आत्मत्व का समवाय भी स्वत: सिद्ध द्रव्य, आत्मा, चेतन के सदा मानिए, क्योंकि वास्तव में जो स्वत: द्रव्यादि रूप नहीं है, उसके द्रव्यत्वादि का समवाय नहीं बन सकता।
स्वयं ज्ञत्वे च सिद्धेऽस्य महेशस्य निरर्थकम् ।
ज्ञानस्य समवायेन ज्ञत्वस्य परिकल्पनम् ॥74॥
कारिकार्थ: इसप्रकार जब महेश्वर स्वयं ही ज्ञाता सिद्ध हो जाता है तो उसके ज्ञान के समवाय से ज्ञातापने की कल्पना करना सर्वथा निरर्थक है।
तत्स्वार्थव्यवसायात्मज्ञानतादात्म्यमृच्छतः ।
कथंचिदीश्वरस्यास्ति जिनेशत्वमसंशयम् ॥75॥
कारिकार्थ: अतः ज्ञान को स्वार्थव्यवसायात्मक और महेश्वर से कथंचित् अभिन्न मानना चाहिए। तथा ऐसी स्थिति में महेश्वर को जिनेश्वरत्व प्राप्त होता है।
स एव मोक्षमार्गस्य प्रणेता व्यवतिष्ठते ।
सदेहः सर्वविन्नष्टमोहो धर्म्मविशेषभाक् ॥76॥
कारिकार्थ: और वही मोक्षमार्ग का प्रणेता सिद्ध होता है और सशरीरी सर्वज्ञ, वीतराग एवं धर्मविशेष योगी भी सिद्ध होता है,
ज्ञानादन्यस्तु निर्देहः सदेहो वा न युज्यते ।
शिवः कर्त्तोपदेशस्य सोऽभेत्ता कर्म्मभूभृताम् ॥77॥
कारिकार्थ: किन्तु ज्ञान से भिन्न महेश्वर चाहे वह सशरीरी हो या अशरीरी, मोक्षमार्गोपदेष्टा नहीं सिद्ध हो सकता, क्योंकि वह कर्मपर्वतों का भेत्ता भी सिद्ध नहीं होता। शरीर नामकर्म और तीर्थंकर नामकर्म के उदय से युक्त ही मोक्षमार्गोपदेष्टा सिद्ध होता है और वह जिनेश्वर ही है, महेश्वर नहीं।
एतेनैव प्रतिव्यूढः कपिलोऽप्युपदेशकः ।
ज्ञानादर्थान्तरत्वस्याविशेषात्सर्वथा स्वतः ॥78॥
कारिकार्थ: उपर्युक्त कथन से ही (महेश्वर के मोक्षमार्गोपदेशित्व का निराकरण कर देने से ही) कपिल के भी मोक्षमार्गोपदेशित्व का निराकरण हुआ जान लेना चाहिए, क्योंकि वह भी अपने ज्ञान से सर्वथा भिन्न कहा गया है और इसलिए वह भी सर्वज्ञ न हो सकने से मोक्षमार्ग का प्रणेता नहीं बन सकता है।
ज्ञानसंसर्गतो ज्ञत्वमज्ञस्यापि न तत्त्वतः ।
व्योमवच्चेतनस्यापि नोपपद्येत मुक्तवत् ॥79॥
कारिकार्थ: यदि ज्ञान के संसर्ग से उसे ज्ञाता -सर्वज्ञ कहा जाय तो भी वह परमार्थतः सर्वज्ञ नहीं हो सकता, जैसे- आकाश। यदि यह कहा जाय कि कपिल तो चेतन है, आकाश चेतन नहीं है, इसलिए चेतन कपिल के ज्ञानसंसर्ग से सर्वज्ञता बन जाती है तो मुक्तात्मा की तरह वह भी नहीं बनेगी अर्थात् जिस प्रकार मुक्तात्मा चेतन होते हुए भी आपके मत में सर्वज्ञ नहीं माना गया है, उसी तरह कपिल के चेतन होने पर भी वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता है।
प्रधानं ज्ञत्वतो मोक्षमार्गस्यास्तूपदेशकम् ।
तस्यैव विश्ववेदित्वाद्भेतृत्वात्कर्म्मभूभृताम् ॥80॥
कारिकार्थ: प्रधान मोक्षमार्ग का उपदेशक है, क्योंकि वह ज्ञ है और ज्ञ इसलिए है, क्योंकि वह विश्ववेदी है, सर्वज्ञ है तथा सर्वज्ञ भी इसलिए है, क्योंकि वह कर्मपर्वतों का भेदक है।
इत्यसम्भाव्यमेवास्याचेतनत्वात्पटादिवत् ।
तदसम्भवतो नूनमन्यथा निष्फलः पुमान् ॥81॥
कारिकार्थ: किन्तु सांख्यों का यह मत असम्भव है, क्योंकि उनका प्रधान वस्त्रादिक की तरह अचेतन है, इसलिए उसके कर्मपर्वतों का भेत्तापन, विश्ववेदिता या ज्ञातृता एवं मोक्षमार्ग का उपदेशकपना -ये सब असम्भव हैं। अन्यथा निश्चय ही पुरुष निरर्थक हो जायगा।
भोक्तात्मा चेत्स एवास्तु कर्ता तदविरोधतः ।
विरोधे तु तयोर्भोक्तुः स्याद्भुजौ कर्तृता कथम् ॥82॥
कारिकार्थ: अगर कहें कि पुरुष भोक्ता है इसलिए वह निरर्थक नहीं है तो वही कर्ता भी हो, क्योंकि कर्तृत्व और भोक्तृत्व में विरोध नहीं है- दोनों एक जगह बन सकते हैं। और यदि उसमें विरोध कहा जाय तो भोक्ता के भी भुजिक्रिया सम्बन्धी कर्तृता कैसे बन सकेगी?
प्रधानं मोक्षमार्गस्य प्रणेतृ स्तूयते पुमान् ।
मुमुक्षुभिरिति ब्रूयात्कोऽन्योऽकिञ्चित्करात्मनः ॥83॥
कारिकार्थ: प्रधान मोक्षमार्ग का उपदेशक है, क्योंकि वह ज्ञ है और ज्ञ इसलिए है, क्योंकि वह विश्ववेदी है, सर्वज्ञ है तथा सर्वज्ञ भी इसलिए है, क्योंकि वह कर्मपर्वतों का भेदक है।
किन्तु सांख्यों का यह मत असम्भव है, क्योंकि उनका प्रधान वस्त्रादिक की तरह अचेतन है, इसलिए उसके कर्मपर्वतों का भेत्तापन, विश्ववेदिता या ज्ञातृता एवं मोक्षमार्ग का उपदेशकपना - ये सब असम्भव हैं। अन्यथा निश्चय ही पुरुष निरर्थक हो जायगा।
अगर कहें कि पुरुष भोक्ता है इसलिए वह निरर्थक नहीं है तो वही कर्ता भी हो, क्योंकि कर्तृत्व और भोक्तृत्व में विरोध नहीं है- दोनों एक जगह बन सकते हैं। और यदि उसमें विरोध कहा जाय तो भोक्ता के भी भुजिक्रिया सम्बन्धी कर्तृता कैसे बन सकेगी?
सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रधान मोक्षमार्ग का उपदेशक है और स्तुति मुमुक्षु पुरुष की करते हैं! इस प्रकार का कथन आत्मा को अकिञ्चित्कर मानने या कहने वाले सांख्यों के सिवाय दूसरा कौन कर सकता है? अर्थात् सांख्यों के सिवाय ऐसा कथन कोई भी नहीं करता है।
सुगतोऽपि न निर्वाणमार्गस्य प्रतिपादकः ।
विश्वतत्त्वज्ञतापायात्तत्त्वतः कपिलादिवत् ॥84॥
कारिकार्थ: सुगत (गौतम बुद्ध) भी मोक्षमार्ग का प्रतिपादक नहीं है, क्योंकि उसके भी कपिलादि की तरह परमार्थतः सर्वज्ञता का अभाव कहा गया है।
संवृत्या विश्वतत्त्वज्ञः श्रेयोमार्गोपदेश्यपि ।
बुद्धो वन्द्यो न तु स्वप्नस्तादृगित्यज्ञचेष्टितम् ॥85॥
कारिकार्थ: “गौतम बुद्ध संवृति से सर्वज्ञ है और मोक्षमार्ग का उपदेशक भी है, अतएव वह वन्दनीय है, किन्तु स्वप्न वन्दनीय नहीं है, क्योंकि वह संवृति से भी सर्वज्ञ और मोक्षमार्गोपदेशक नहीं है” -यदि ऐसा कहा जाए तो यह कथन भी अज्ञानतापूर्ण है।
यत्तु संवेदनाद्वैतं पुरुषाद्वैतवन्न तत् ।
सिद्ध्येत्स्वतोऽन्यतो वापि प्रमाणात्स्वेष्टहानितः ॥86॥
कारिकार्थ: तथा जो संवेदनाद्वैतवाद (विज्ञान को ही एक मात्र तत्त्व मानना) है वह भी पुरुषाद्वैत की तरह स्वतः या परतः किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं होता, क्योंकि अन्य प्रमाण से उसकी सिद्धि मानने में स्वेष्ट-हानि का प्रसंग आता है अर्थात् संवेदनाद्वैतवाद की ही सिद्धि नहीं हो सकती है।
सोऽर्हन्नेव मुनीन्द्राणां वन्द्यः समवतिष्ठते ।
तत्सद्भावे प्रमाणस्य निर्बाधस्य विनिश्चयात् ॥87॥
कारिकार्थ: वह आप्त अर्हन्त ही है और वही आप्त होने से मुनीश्वरों द्वारा वन्दनीय सिद्ध होता है। तथा उसके सद्भाव को सिद्ध करने में सुनिश्चित साधक प्रमाण भी निर्बाध रूप से उपलब्ध है।
ततोऽन्तरिततत्त्वानि प्रत्यक्षाण्यर्हतोऽञ्जसा ।
प्रमेयत्वाद्यथास्मादृक् प्रत्यक्षार्थाः सुनिश्चिताः ॥88॥
कारिकार्थ: वह साधक प्रमाण इसप्रकार है- अन्तरित पदार्थ अर्हन्त के अत्यन्त प्रत्यक्ष हैं, क्योंकि वे प्रमेय हैं, जिसप्रकार कि हमारे सुनिश्चित पदार्थ हमें प्रत्यक्ष होते हैं।
हेतोर्न व्यभिचारोऽत्र दूरार्थैर्मन्दरादिभिः ।
सूक्ष्मैर्वा परमाण्वाद्यैस्तेषां पक्षीकृतत्वतः ॥89॥
कारिकार्थ: मन्दर (सुमेरु पर्वत) आदि दूरवर्ती पदार्थों और परमाणु आदि सूक्ष्म पदार्थों के साथ भी हमारा हेतु अनैकान्तिक नहीं है, क्योंकि यहाँ उन सबको पक्ष बनाया गया है।
तत्त्वान्यन्तरितानीह देशकालस्वभावतः ।
धर्म्मादीनि हि साध्यन्ते प्रत्यक्षाणि जिनेशिनः ॥90॥
कारिकार्थ: देश, काल और स्वभाव से अन्तरित सभी धर्मादि तत्त्व/पदार्थ अर्हन्त जिनेश के प्रत्यक्ष सिद्ध किये जाते हैं।
न चास्मादृक्समक्षाणामेवमर्हत्समक्षता ।
न सिद्ध्येदिति मन्तव्यमविवादाद्द्वयोरपि ॥91॥
कारिकार्थ: उक्त (कारिका 88 में कथित) अनुमान में दिये गये दृष्टान्त का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि हम लोगों के प्रत्यक्ष अर्थ (पदार्थ) अर्हन्त के प्रत्यक्ष सिद्ध नहीं होंगे, क्योंकि उसमें दोनों को ही विवाद नहीं है।
न चासिद्धं प्रमेयत्वं कार्त्स्नतो भागतोऽपि वा ।
सर्वथाप्यप्रमेयस्य पदार्थस्याव्यवस्थितेः ॥92॥
कारिकार्थ: प्रमेयत्वात् हेतु न तो सम्पूर्ण रूप से असिद्ध है और न ही आंशिक रूप से असिद्ध है, क्योंकि सर्वथा अप्रमेयभूत पदार्थ कोई भी नहीं है, सभी पदार्थ किसी-न-किसी प्रमाण के विषय होने से प्रमेय अवश्य हैं।
यदि षड्भिः प्रमाणैः स्यात्सर्वज्ञः केन वार्य्यते ।
इति ब्रुवन्नशेषार्थप्रमेयत्वमिहेच्छति ॥93॥
कारिकार्थ: प्रमेयत्वात् हेतु न तो सम्पूर्ण रूप से असिद्ध है और न ही आँशिक रूप से असिद्ध है, क्योंकि सर्वथा अप्रमेयभूत पदार्थ कोई भी नहीं है, सभी पदार्थ किसी-न-किसी प्रमाण के विषय होने से प्रमेय अवश्य हैं।
आप (मीमांसक) भी जब ऐसा कहते हैं कि छहों प्रमाणों से सर्वज्ञ सिद्ध हो तो उसे कौन रोकता है तो उसका आशय यही होता है कि आप भी अशेष पदार्थों को प्रमेय अवश्य स्वीकार करते हैं।
तथा आप (मीमांसक) ऐसा भी कहते हैं कि वेद से सभी पदार्थों का ज्ञान सम्भव है, अत: इससे भी सिद्ध होता है कि सभी पदार्थों में प्रत्यक्ष जैसा प्रमेयत्व है।
कारिका 94 से 124
चोदनातश्च निःशेषपदार्थज्ञानसम्भवे ।
सिद्धमन्तरितार्थानां प्रमेयत्वं समक्षवत् ॥94॥
कारिकार्थ: प्रमेयत्वात् हेतु न तो सम्पूर्ण रूप से असिद्ध है और न ही आंशिक रूप से असिद्ध है, क्योंकि सर्वथा अप्रमेयभूत पदार्थ कोई भी नहीं है, सभी पदार्थ किसी-न-किसी प्रमाण के विषय होने से प्रमेय अवश्य हैं।
आप (मीमांसक) भी जब ऐसा कहते हैं कि छहों प्रमाणों से सर्वज्ञ सिद्ध हो तो उसे कौन रोकता है तो उसका आशय यही होता है कि आप भी अशेष पदार्थों को प्रमेय अवश्य स्वीकार करते हैं।
तथा आप (मीमांसक) ऐसा भी कहते हैं कि वेद से सभी पदार्थों का ज्ञान सम्भव है, अत: इससे भी सिद्ध होता है कि सभी पदार्थों में प्रत्यक्ष जैसा प्रमेयत्व है।
यन्नार्हतः समक्षं तन्न प्रमेयं बहिर्गतः ।
मिथ्यैकान्तो यथेत्येवं व्यतिरेकोऽपि निश्चितः ॥95॥
कारिकार्थ: “जो अर्हन्त के प्रत्यक्ष नहीं है, वह प्रमेय नहीं है, जैसे कि प्रत्यक्ष-बहिर्गत मिथ्या एकान्त।” -इसप्रकार हेतु का व्यतिरेक भी सुनिश्चित है, सन्दिग्ध नहीं है।
सुनिश्चितान्वयाद्धेतोः प्रसिद्धव्यतिरेकतः ।
ज्ञाताऽर्हन् विश्वतत्त्वानामेवं सिद्ध्येदबाधितः ॥96॥
कारिकार्थ: इसप्रकार हेतु का अन्वय भी सुनिश्चित है और व्यतिरेक भी, अतः उससे अर्हंत सर्वतत्त्वों के ज्ञाता निर्बाधरूप से सिद्ध होते हैं।
प्रत्यक्षमपरिच्छिन्दत्त्रिकालं भुवनत्रयम् ।
रहितं विश्वतत्त्वज्ञैर्न हि तद्बाधकं भवेत् ॥97॥
कारिकार्थ: प्रत्यक्ष तो उसका बाधक है नहीं, क्योंकि जो तीन काल तीन लोक को जानता है, वही यह कह सकता है कि तीनों कालों और तीनों लोकों में सर्वज्ञ नहीं है।
नानुमानोपमानार्थापत्त्यागमबलादपि ।
विश्वज्ञाभावसंसिद्धिस्तेषां सद्विषयत्वतः ॥98॥
कारिकार्थ: अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और आगम - ये भी सर्वज्ञ के बाधक नहीं है, क्योंकि वे सब सत्ता को ही विषय करते हैं, असत्ता को नहीं।
नार्हन्निःशेषतत्त्वज्ञो वक्तृत्वपुरुषत्वतः ।
ब्रह्मादिवदिति प्रोक्तमनुमानं न बाधकम् ॥99॥
कारिकार्थ: ‘अर्हन्त सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है और पुरुष है। जो वक्ता है और पुरुष है वह सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, जैसे ब्रह्मा आदि’ -यह अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है; क्योंकि वक्तापन और पुरुषपन हेतुओं का विपक्ष (सर्वज्ञता) के साथ विरोध का अभाव निश्चित है। अर्थात् उक्त हेतु विपक्ष में रहते हैं और इसलिए वे अनैकान्तिक हैं। वक्तापन आदि का प्रकर्ष होने पर भी ज्ञान की हानि नहीं होती।
हेतोरस्य विपक्षेण विरोधाभावनिश्चयात् ।
वक्तृत्वादेः प्रकर्षेऽपि ज्ञानानिर्ह्राससिद्धितः ॥100॥
कारिकार्थ: प्रत्यक्ष तो उसका बाधक है नहीं, क्योंकि जो तीन काल तीन लोक को जानता है, वही यह कह सकता है कि तीनों कालों और तीनों लोकों में सर्वज्ञ नहीं है।
अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और आगम - ये भी सर्वज्ञ के बाधक नहीं है, क्योंकि वे सब सत्ता को ही विषय करते हैं, असत्ता को नहीं।
‘अर्हन्त सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है और पुरुष है। जो वक्ता है और पुरुष है वह सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, जैसे ब्रह्मा आदि’ -यह अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है; क्योंकि वक्तापन और पुरुषपन हेतुओं का विपक्ष (सर्वज्ञता) के साथ विरोध का अभाव निश्चित है। अर्थात् उक्त हेतु विपक्ष में रहते हैं और इसलिए वे अनैकान्तिक हैं। वक्तापन आदि का प्रकर्ष होने पर भी ज्ञान की हानि नहीं होती।
उपमान प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि समस्त उपमान और उपमेयभूत मनुष्यों की उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि वह असम्भव है।
अर्थापत्ति प्रमाण भी जगत् को सर्वज्ञशून्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि वह अशक्त है और अशक्त इसलिए है कि उसका साध्य के साथ अविनाभाव निश्चित नहीं है।
अपौरुषेय आगम भी सर्वज्ञ के अभाव का साधक नहीं है, क्योंकि वह यज्ञादि कार्य में ही प्रमाण मानना आप मीमांसकों को इष्ट है, अन्यथा अनिष्टसिद्धि का प्रसङ्ग आवेगा।
तथा जो पौरुषेय आगम है वह भी यदि असर्वज्ञपुरुष-रचित है तो वह सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञसिद्धि में वह अप्रमाण है, जैसे कि वह धर्मादि में अप्रमाण माना जाता है। और सर्वज्ञपुरुष-रचित आगम तो मीमांसकों को मान्य ही नहीं है और इसीलिए वह सर्वज्ञ का बाधक भी नहीं है अपितु साधक ही है।
अभाव प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि जहाँ निषेध्य का निषेध (अभाव) करना होता है उसका ज्ञान होने पर और जिसका निषेध करना होता है उसका स्मरण होने पर ही नियम से ‘नहीं है’ -ऐसा ज्ञान अर्थात् अभाव प्रमाण प्रवृत्त होता है।
लेकिन न तो किसी प्रमाणादि से समस्त संसार का ज्ञान सम्भव है जहाँ सर्वज्ञ का निषेध करना है और न ही सर्वज्ञ का पहले ज्ञान है- अनुभव है, तब उसका स्मरण कैसे हो सकता है? क्योंकि अनुभवपूर्वक ही स्मरण होता है और सर्वज्ञाभाववादी को पहले कभी
नोपमानमशेषाणां नृणामनुपलम्भतः ।
उपमानोपमेयानां तद्बाधकमसम्भवात् ॥101॥
कारिकार्थ: उपमान प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि समस्त उपमान और उपमेयभूत मनुष्यों की उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि वह असम्भव है।
नार्थापत्तिरसर्वज्ञं जगत्साधयितुं क्षमा ।
क्षीणत्वादन्यथाभावाभावात्तत्तदबाधिका ॥102॥
कारिकार्थ: अर्थापत्ति प्रमाण भी जगत् को सर्वज्ञशून्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि वह अशक्त है और अशक्त इसलिए है कि उसका साध्य के साथ अविनाभाव निश्चित नहीं है।
नागमोऽपौरुषेयोऽस्ति सर्वज्ञाभावसाधनः ।
तस्य कार्य्ये प्रमाणत्वादन्यथानिष्टसिद्धितः ॥103॥
कारिकार्थ: अपौरुषेय आगम भी सर्वज्ञ के अभाव का साधक नहीं है, क्योंकि वह यज्ञादि कार्य में ही प्रमाण मानना आप मीमांसकों को इष्ट है, अन्यथा अनिष्टसिद्धि का प्रसङ्ग आवेगा।
पौरुषेयोऽप्यसर्वज्ञप्रणीतो नास्य बाधकः ।
तत्र तस्याप्रमाणत्वाद्धर्मादाविव तत्त्वतः ॥104॥
कारिकार्थ: प्रत्यक्ष तो उसका बाधक है नहीं, क्योंकि जो तीन काल तीन लोक को जानता है, वही यह कह सकता है कि तीनों कालों और तीनों लोकों में सर्वज्ञ नहीं है।
अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और आगम - ये भी सर्वज्ञ के बाधक नहीं है, क्योंकि वे सब सत्ता को ही विषय करते हैं, असत्ता को नहीं।
‘अर्हन्त सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है और पुरुष है। जो वक्ता है और पुरुष है वह सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, जैसे ब्रह्मा आदि’ -यह अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है; क्योंकि वक्तापन और पुरुषपन हेतुओं का विपक्ष (सर्वज्ञता) के साथ विरोध का अभाव निश्चित है। अर्थात् उक्त हेतु विपक्ष में रहते हैं और इसलिए वे अनैकान्तिक हैं। वक्तापन आदि का प्रकर्ष होने पर भी ज्ञान की हानि नहीं होती।
उपमान प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि समस्त उपमान और उपमेयभूत मनुष्यों की उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि वह असम्भव है।
अर्थापत्ति प्रमाण भी जगत् को सर्वज्ञशून्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि वह अशक्त है और अशक्त इसलिए है कि उसका साध्य के साथ अविनाभाव निश्चित नहीं है।
अपौरुषेय आगम भी सर्वज्ञ के अभाव का साधक नहीं है, क्योंकि वह यज्ञादि कार्य में ही प्रमाण मानना आप मीमांसकों को इष्ट है, अन्यथा अनिष्टसिद्धि का प्रसङ्ग आवेगा।
तथा जो पौरुषेय आगम है वह भी यदि असर्वज्ञपुरुष-रचित है तो वह सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञसिद्धि में वह अप्रमाण है, जैसे कि वह धर्मादि में अप्रमाण माना जाता है। और सर्वज्ञपुरुष-रचित आगम तो मीमांसकों को मान्य ही नहीं है और इसीलिए वह सर्वज्ञ का बाधक भी नहीं है अपितु साधक ही है।
अभाव प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि जहाँ निषेध्य का निषेध (अभाव) करना होता है उसका ज्ञान होने पर और जिसका निषेध करना होता है उसका स्मरण होने पर ही नियम से ‘नहीं है’ -ऐसा ज्ञान अर्थात् अभाव प्रमाण प्रवृत्त होता है।
लेकिन न तो किसी प्रमाणादि से समस्त संसार का ज्ञान सम्भव है जहाँ सर्वज्ञ का निषेध करना है और न ही सर्वज्ञ का पहले ज्ञान है- अनुभव है, तब उसका स्मरण कैसे हो सकता है? क्योंकि अनुभवपूर्वक ही स्मरण होता है और सर्वज्ञाभाववादी को पहले कभी भी अनुभव नहीं है, अतः सर्वज्ञ का स्मरण भी नहीं बनता है। जिससे सम्पूर्ण संसार में प्रस्तुत सर्वज्ञ का अभाव किया जाय। यदि कहा जाय कि सर्वज्ञवादी सर्वज्ञ को स्वीकार करते हैं अतः उनके स्वीकार से हम सर्वज्ञ का अभाव करते हैं तो इसमें आपके इष्ट की बाधा आती है।
मिथ्या एकान्तों का अभाव तो अनेकान्त की सिद्धि से युक्त है। तात्पर्य यह कि यद्यपि हम (जैन) सर्वथा एकान्तों का निषेध करते हैं, पर वह दूसरों के स्वीकार से नहीं करते हैं। किन्तु वस्तु अनेकान्तरूप सिद्ध होने से सर्वथा एकान्त निषिद्ध हो जाते हैं और इसलिए उनको स्वीकार न करने पर भी उनका अभाव बन जाता है। लेकिन सर्वज्ञाभाववादी असर्वज्ञ जगत् की सिद्धि बतलाकर सर्वज्ञ का निषेध नहीं कर सकते हैं अर्थात् वे यह नहीं कह सकते कि ‘चूँकि जगत् असर्वज्ञ सिद्ध है, इसलिए सर्वज्ञ निषिद्ध हो जाता है’, क्योंकि असर्वज्ञ जगत् अर्थात् जगत् में कहीं भी सर्वज्ञ नहीं है -यह बात किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, परन्तु वस्तु सभी प्रमाणों से अनेकान्तात्मक सिद्ध है।
अभावोऽपि प्रमाणं ते निषेध्याधारवेदने ।
निषेध्यस्मरणे च स्यान्नास्तिताज्ञानमञ्जसा ॥105॥
कारिकार्थ: अभाव प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि जहाँ निषेध्य का निषेध (अभाव) करना होता है उसका ज्ञान होने पर और जिसका निषेध करना होता है उसका स्मरण होने पर ही नियम से ‘नहीं है’ -ऐसा ज्ञान अर्थात् अभाव प्रमाण प्रवृत्त होता है।
न चाशेषजगज्ज्ञानं कुतश्चिदुपपद्यते ।
नापि सर्वज्ञसंवित्तिः पूर्वं तत्स्मरणं कुतः ॥106॥
कारिकार्थ: लेकिन न तो किसी प्रमाणादि से समस्त संसार का ज्ञान सम्भव है जहाँ सर्वज्ञ का निषेध करना है और न ही सर्वज्ञ का पहले ज्ञान है- अनुभव है, तब उसका स्मरण कैसे हो सकता है? क्योंकि अनुभवपूर्वक ही स्मरण होता है और सर्वज्ञाभाववादी को पहले कभी भी अनुभव नहीं है, अतः सर्वज्ञ का स्मरण भी नहीं बनता है।
येनाशेषजगत्यस्य सर्वज्ञस्य निषेधनम् ।
परोपगमतस्तस्य निषेधे स्वेष्टबाधनम् ॥107॥
कारिकार्थ: प्रत्यक्ष तो उसका बाधक है नहीं, क्योंकि जो तीन काल तीन लोक को जानता है, वही यह कह सकता है कि तीनों कालों और तीनों लोकों में सर्वज्ञ नहीं है।
अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और आगम - ये भी सर्वज्ञ के बाधक नहीं है, क्योंकि वे सब सत्ता को ही विषय करते हैं, असत्ता को नहीं।
‘अर्हन्त सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है और पुरुष है। जो वक्ता है और पुरुष है वह सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, जैसे ब्रह्मा आदि’ -यह अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है; क्योंकि वक्तापन और पुरुषपन हेतुओं का विपक्ष (सर्वज्ञता) के साथ विरोध का अभाव निश्चित है। अर्थात् उक्त हेतु विपक्ष में रहते हैं और इसलिए वे अनैकान्तिक हैं। वक्तापन आदि का प्रकर्ष होने पर भी ज्ञान की हानि नहीं होती।
उपमान प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि समस्त उपमान और उपमेयभूत मनुष्यों की उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि वह असम्भव है।
अर्थापत्ति प्रमाण भी जगत् को सर्वज्ञशून्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि वह अशक्त है और अशक्त इसलिए है कि उसका साध्य के साथ अविनाभाव निश्चित नहीं है।
अपौरुषेय आगम भी सर्वज्ञ के अभाव का साधक नहीं है, क्योंकि वह यज्ञादि कार्य में ही प्रमाण मानना आप मीमांसकों को इष्ट है, अन्यथा अनिष्टसिद्धि का प्रसङ्ग आवेगा।
तथा जो पौरुषेय आगम है वह भी यदि असर्वज्ञपुरुष-रचित है तो वह सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञसिद्धि में वह अप्रमाण है, जैसे कि वह धर्मादि में अप्रमाण माना जाता है। और सर्वज्ञपुरुष-रचित आगम तो मीमांसकों को मान्य ही नहीं है और इसीलिए वह सर्वज्ञ का बाधक भी नहीं है अपितु साधक ही है।
अभाव प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि जहाँ निषेध्य का निषेध (अभाव) करना होता है उसका ज्ञान होने पर और जिसका निषेध करना होता है उसका स्मरण होने पर ही नियम से ‘नहीं है’ -ऐसा ज्ञान अर्थात् अभाव प्रमाण प्रवृत्त होता है।
लेकिन न तो किसी प्रमाणादि से समस्त संसार का ज्ञान सम्भव है जहाँ सर्वज्ञ का निषेध करना है और न ही सर्वज्ञ का पहले ज्ञान है- अनुभव है, तब उसका स्मरण कैसे हो सकता है? क्योंकि अनुभवपूर्वक ही स्मरण होता है और सर्वज्ञाभाववादी को पहले कभी भी अनुभव नहीं है, अतः सर्वज्ञ का स्मरण भी नहीं बनता है। जिससे सम्पूर्ण संसार में प्रस्तुत सर्वज्ञ का अभाव किया जाय। यदि कहा जाय कि सर्वज्ञवादी सर्वज्ञ को स्वीकार करते हैं अतः उनके स्वीकार से हम सर्वज्ञ का अभाव करते हैं तो इसमें आपके इष्ट की बाधा आती है।
मिथ्या एकान्तों का अभाव तो अनेकान्त की सिद्धि से युक्त है। तात्पर्य यह कि यद्यपि हम (जैन) सर्वथा एकान्तों का निषेध करते हैं, पर वह दूसरों के स्वीकार से नहीं करते हैं। किन्तु वस्तु अनेकान्तरूप सिद्ध होने से सर्वथा एकान्त निषिद्ध हो जाते हैं और इसलिए उनको स्वीकार न करने पर भी उनका अभाव बन जाता है। लेकिन सर्वज्ञाभाववादी असर्वज्ञ जगत् की सिद्धि बतलाकर सर्वज्ञ का निषेध नहीं कर सकते हैं अर्थात् वे यह नहीं कह सकते कि ‘चूँकि जगत् असर्वज्ञ सिद्ध है, इसलिए सर्वज्ञ निषिद्ध हो जाता है’, क्योंकि असर्वज्ञ जगत् अर्थात् जगत् में कहीं भी सर्वज्ञ नहीं है -यह बात किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, परन्तु वस्तु सभी प्रमाणों से अनेकान्तात्मक सिद्ध है।
मिथ्यैकान्तनिषेधस्तु युक्तोऽनेकान्तसिद्धितः ।
नासर्वज्ञजगत्सिद्धेः सर्वज्ञप्रतिषेधनम् ॥108॥
कारिकार्थ: प्रत्यक्ष तो उसका बाधक है नहीं, क्योंकि जो तीन काल तीन लोक को जानता है, वही यह कह सकता है कि तीनों कालों और तीनों लोकों में सर्वज्ञ नहीं है।
अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और आगम - ये भी सर्वज्ञ के बाधक नहीं है, क्योंकि वे सब सत्ता को ही विषय करते हैं, असत्ता को नहीं।
‘अर्हन्त सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, क्योंकि वह वक्ता है और पुरुष है। जो वक्ता है और पुरुष है वह सर्व तत्त्वों का ज्ञाता नहीं है, जैसे ब्रह्मा आदि’ -यह अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है; क्योंकि वक्तापन और पुरुषपन हेतुओं का विपक्ष (सर्वज्ञता) के साथ विरोध का अभाव निश्चित है। अर्थात् उक्त हेतु विपक्ष में रहते हैं और इसलिए वे अनैकान्तिक हैं। वक्तापन आदि का प्रकर्ष होने पर भी ज्ञान की हानि नहीं होती।
उपमान प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि समस्त उपमान और उपमेयभूत मनुष्यों की उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि वह असम्भव है।
अर्थापत्ति प्रमाण भी जगत् को सर्वज्ञशून्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं है, क्योंकि वह अशक्त है और अशक्त इसलिए है कि उसका साध्य के साथ अविनाभाव निश्चित नहीं है।
अपौरुषेय आगम भी सर्वज्ञ के अभाव का साधक नहीं है, क्योंकि वह यज्ञादि कार्य में ही प्रमाण मानना आप मीमांसकों को इष्ट है, अन्यथा अनिष्टसिद्धि का प्रसङ्ग आवेगा।
तथा जो पौरुषेय आगम है वह भी यदि असर्वज्ञपुरुष-रचित है तो वह सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञसिद्धि में वह अप्रमाण है, जैसे कि वह धर्मादि में अप्रमाण माना जाता है। और सर्वज्ञपुरुष-रचित आगम तो मीमांसकों को मान्य ही नहीं है और इसीलिए वह सर्वज्ञ का बाधक भी नहीं है अपितु साधक ही है।
अभाव प्रमाण भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है, क्योंकि जहाँ निषेध्य का निषेध (अभाव) करना होता है उसका ज्ञान होने पर और जिसका निषेध करना होता है उसका स्मरण होने पर ही नियम से ‘नहीं है’ -ऐसा ज्ञान अर्थात् अभाव प्रमाण प्रवृत्त होता है।
लेकिन न तो किसी प्रमाणादि से समस्त संसार का ज्ञान सम्भव है जहाँ सर्वज्ञ का निषेध करना है और न ही सर्वज्ञ का पहले ज्ञान है- अनुभव है, तब उसका स्मरण कैसे हो सकता है? क्योंकि अनुभवपूर्वक ही स्मरण होता है और सर्वज्ञाभाववादी को पहले कभी भी अनुभव नहीं है, अतः सर्वज्ञ का स्मरण भी नहीं बनता है। जिससे सम्पूर्ण संसार में प्रस्तुत सर्वज्ञ का अभाव किया जाय। यदि कहा जाय कि सर्वज्ञवादी सर्वज्ञ को स्वीकार करते हैं अतः उनके स्वीकार से हम सर्वज्ञ का अभाव करते हैं तो इसमें आपके इष्ट की बाधा आती है।
मिथ्या एकान्तों का अभाव तो अनेकान्त की सिद्धि से युक्त है। तात्पर्य यह कि यद्यपि हम (जैन) सर्वथा एकान्तों का निषेध करते हैं, पर वह दूसरों के स्वीकार से नहीं करते हैं। किन्तु वस्तु अनेकान्तरूप सिद्ध होने से सर्वथा एकान्त निषिद्ध हो जाते हैं और इसलिए उनको स्वीकार न करने पर भी उनका अभाव बन जाता है। लेकिन सर्वज्ञाभाववादी असर्वज्ञ जगत् की सिद्धि बतलाकर सर्वज्ञ का निषेध नहीं कर सकते हैं अर्थात् वे यह नहीं कह सकते कि ‘चूँकि जगत् असर्वज्ञ सिद्ध है, इसलिए सर्वज्ञ निषिद्ध हो जाता है’, क्योंकि असर्वज्ञ जगत् अर्थात् जगत् में कहीं भी सर्वज्ञ नहीं है -यह बात किसी भी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, परन्तु वस्तु सभी प्रमाणों से अनेकान्तात्मक सिद्ध है।
एवं सिद्धः सुनिर्णेतासम्भवद्बाधकत्वतः ।
सुखवद्विश्वतत्त्वज्ञः सोऽर्हन्नेव भवानिह ॥109॥
कारिकार्थ: इसप्रकार बाधक प्रमाणों का अभाव अच्छी तरह निश्चित होने से सुख की तरह विश्वतत्त्वों का ज्ञाता- सर्वज्ञ सिद्ध होता है और वह सर्वज्ञ इस समस्त लोक में हे जिनेन्द्र! आप अर्हन्त ही हैं।
स कर्म्मभूभृतां भेत्ता तद्विपक्षप्रकर्षतः ।
यथा शीतस्य भेत्तेह कश्चिदुष्णप्रकर्षतः ॥110॥
कारिकार्थ: और जो सर्वज्ञ है वही कर्मपर्वतों का भेत्ता (भेदन करने वाला) है, क्योंकि उसके कर्मपर्वतों के विपक्षी का प्रकर्ष पाया जाता है, जैसे कोई उष्ण के प्रकर्ष से शीत का भेदक होता है।
तेषामागामिनां तावद्विपक्षः संवरो मतः ।
तपसा सञ्चितानान्तु निर्जरा कर्म्मभूभृताम् ॥111॥
कारिकार्थ: कर्म दो प्रकार के हैं- आगामी और पूर्वसंचित। आगामी कर्मों का विपक्ष संवर है और संचित कर्मों का विपक्ष तप से होने वाली निर्जरा है।
तत्प्रकर्ष पुनः सिद्धः परमः परमात्मनि ।
तारतम्यविशेषस्य सिद्धेरुष्णप्रकर्षवत् ॥112॥
कारिकार्थ: कर्मों के विपक्ष का परम प्रकर्ष परमात्मा में सिद्ध होता है, क्योंकि उसका तारतम्य-विशेष (न्यूनता-अधिकता के स्तर) पाया जाता है, जैसे कि उष्ण प्रकर्ष।
कर्म्माणि द्विविधान्यत्र द्रव्यभावविकल्पतः ।
द्रव्यकर्म्माणि जीवस्य पुद्गलात्मान्यनेकधा ॥113॥
कारिकार्थ: जीव के कर्म दो प्रकार के हैं- द्रव्यकर्म और भावकर्म। द्रव्यकर्म तो पुद्गलात्मक हैं और अनेक प्रकार के हैं। तथा भावकर्म आत्मा में होने वाले चैतन्य-विवर्त (परिणाम) हैं जो क्रोधादि रूप हैं, स्वसंवेद्य हैं और आत्मा से कथञ्चित् अभिन्न भी हैं।
यहाँ इन कर्मों की स्कन्धराशि को ही संक्षेप में ‘भूभृत्’ अर्थात् ‘पर्वत’ कहा गया है। तथा यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि उनका जीव से विश्लेषण (अलग) हो जाना ही उनका भेदन है, न कि सर्वथा विनाश, क्योंकि सत् का कभी सर्वथा नाश नहीं होता।
भावकर्म्माणि चैतन्यविवर्त्तात्मानि भान्ति नुः ।
क्रोधादीनि स्ववेद्यानि कथंचिच्चिदभेदतः ॥114॥
कारिकार्थ: तथा भावकर्म आत्मा में होने वाले चैतन्य-विवर्त (परिणाम) हैं जो क्रोधादि रूप हैं, स्वसंवेद्य हैं और आत्मा से कथञ्चित् अभिन्न भी हैं।
तत्स्कन्धराशयः प्रोक्ता भूभृतोऽत्र समाधितः ।
जीवाद्विश्लेषणं भेदः सतो नात्यन्तसंक्षयः ॥115॥
कारिकार्थ: जीव के कर्म दो प्रकार के हैं- द्रव्यकर्म और भावकर्म। द्रव्यकर्म तो पुद्गलात्मक हैं और अनेक प्रकार के हैं। तथा भावकर्म आत्मा में होने वाले चैतन्य-विवर्त (परिणाम) हैं जो क्रोधादि रूप हैं, स्वसंवेद्य हैं और आत्मा से कथञ्चित् अभिन्न भी हैं।
यहाँ इन कर्मों की स्कन्धराशि को ही संक्षेप में ‘भूभृत्’ अर्थात् ‘पर्वत’ कहा गया है। तथा यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि उनका जीव से विश्लेषण (अलग) हो जाना ही उनका भेदन है, न कि सर्वथा विनाश, क्योंकि सत् का कभी सर्वथा नाश नहीं होता।
स्वात्मलाभस्ततो मोक्षः कृत्स्नकर्म्मक्षयान्मतः ।
निर्जरासंवराभ्यां नुः सर्वसद्वादिनामिह ॥116॥
कारिकार्थ: संवर-निर्जरा के द्वारा सम्पूर्ण कर्मों का क्षय होने पर जो स्वात्मलाभ होता है वही मोक्ष है - ऐसा सभी आस्तिकों द्वारा मान्य है।
नास्तिकानान्तु नैवास्ति प्रमाणं तन्निराकृतौ ।
प्रलापमात्रके तेषां नावधेयं महात्मनाम् ॥117॥
कारिकार्थ: नास्तिक लोग मोक्ष का निराकरण करते हैं, किन्तु उस निराकरण का कोई प्रमाण नहीं है, अत: उनका कहना प्रलाप मात्र है और इसीलिए महात्माओं द्वारा ध्यान देने योग्य नहीं है।
मार्गो मोक्षस्य वै सम्यग्दर्शनादित्रयात्मकः ।
विशेषेण प्रपत्तव्यो नान्यथा तद्विरोधतः ॥118॥
कारिकार्थ: मोक्ष का मार्ग वास्तव में सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकता रूप ही मानना चाहिए, अन्यथा नहीं; क्योंकि अन्यथा मानने से विरोध आता है।
प्रणेता मोक्षमार्गस्याबाध्यमानस्य सर्वथा ।
साक्षाद्य एव स ज्ञेयो विश्वतत्त्वज्ञताश्रयः ॥119॥
कारिकार्थ: अर्हन्त ही सर्व प्रकार से अबाधित मोक्षमार्ग का साक्षात् प्रणेता है और वही विश्वतत्त्वज्ञ है- सर्वज्ञ है।
वीतनिःशेषदोषोऽतः प्रवन्द्योऽर्हन् गुणाम्बुधिः ।
तद्गुणप्राप्तये सद्भिरिति संक्षेपतोऽन्वयः ॥120॥
कारिकार्थ: अर्हन्त दोषों से रहित और गुणों के समुद्र हैं। वे सज्जनों द्वारा उनके इन्हीं उत्तम गुणों की प्राप्ति के लिए वन्दनीय हैं। यही ‘मोक्षमार्गस्य नेतारं…’ इत्यादि कारिका का संक्षेप में व्याख्यान है।
मोहाक्रान्तान्न भवति गुरोर्मोक्षमार्गप्रणीति-
र्नर्ते तस्याः सकलकुलषध्वंसजा स्वात्मलब्धिः ।
तस्यै वन्द्यः परगुरुरिह क्षीणमोहस्त्वमर्हन्-
साक्षात्कुर्वन्नमलकमिवाशेषतत्त्वानि नाथ! ॥121॥
कारिकार्थ: जो मोहाक्रान्त है, वह गुरु (आप्त) नहीं हो सकता, क्योंकि वह मोक्षमार्ग का प्रणयन नहीं कर सकता। मोक्षमार्ग के प्रणयन बिना सकल कलुषों के ध्वंस से उत्पन्न होने वाली स्वात्मलब्धि (शिष्यों को) नहीं हो सकती। यही कारण है कि हे अर्हन् ! हे नाथ! आप ही क्षीणमोह होने से और सर्व तत्त्वों के हस्तामलकवत् (हाथ पर रखी हुई स्फटिक मणि के समान) स्पष्ट, निर्मल ज्ञाता होने से स्वात्मोपलब्धि के लिए परम गुरु (आप्त) हो, परम वन्दनीय हो।
न्यक्षेणाप्तपरीक्षा प्रतिपक्षं क्षपयितुं क्षमा साक्षात् ।
प्रेक्षावतामभीक्ष्णं विमोक्षलक्ष्मीक्षणाय संलक्ष्या ॥122॥
कारिकार्थ: यह ‘आप्तपरीक्षा’ प्रतिपक्षों (आप्ताभासों) का पूर्णतया निराकरण करने में अत्यन्त समर्थ है, अत: विद्वानों को इसे सदैव मोक्षलक्ष्मी का दर्शन करने के लिए ध्यान में रखना चाहिए।
श्रीमत्तत्त्वार्थशास्त्राद्भुतसलिलनिधेरिद्धरत्नोद्भवस्य,
प्रोत्थानारम्भकाले सकलमलभिदे शास्त्रकारैः कृतं यत् ।
स्तोत्रं तीर्थोपमानं प्रथितपृथुपथं स्वामिमीमांसितं तत्,
विद्यानंदैः स्वशक्त्या कथमपि कथितं सत्यवाक्यार्थसिद्ध्यै ॥123॥
कारिकार्थ: श्रीमत् ‘तत्त्वार्थसूत्र’ नामक शास्त्र तो महान् रत्नों को उत्पन्न करने वाला अद्भुत समुद्र है। इसके प्रारम्भ में शास्त्रकार (आचार्य उमास्वामी मुनिराज) ने समस्त पापों को नष्ट करने के लिए जो मंगल स्तोत्र ‘मोक्षमार्गस्य नेतारं…’ आदि लिखा है वह ‘तीर्थोपमानं’ है अर्थात् तीर्थ के समान है, सुन्दर पथ प्रशस्त करने वाला है और श्री समन्तभद्र स्वामी द्वारा भी (‘गन्धहस्तिमहाभाष्य’ या ‘आप्तमीमांसा’ के रूप में) मीमांसित है। वही मंगल स्तोत्र मुझ विद्यानन्द के द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार किसी तरह सत्य वाक्य और अर्थ की सिद्धि के लिए ‘आप्तपरीक्षा’ के रूप में कहा गया है।
इति तत्त्वार्थशास्त्रादौ मुनीन्द्रस्तोत्रगोचरा ।
प्रणीताप्तपरीक्षेयं कुविवादनिवृत्तये ॥124॥
कारिकार्थ: इसप्रकार ‘तत्त्वार्थशास्त्र’ अर्थात् ‘तत्त्वार्थसूत्र’ नामक शास्त्र के प्रारम्भ में समागत मुनीन्द्र-स्तोत्र को विषय बनाने वाली यह ‘आप्तपरीक्षा’ सर्व विवादों की विनिवृत्ति के लिए तैयार की गई है।