नवम अधिकार छह कालों का प्ररूपण (भाग 1/2)
आदिमध्यान्तसञ्जातान् तुर्ये काले जगद्धितान्।
त्रिजगद्दीपकान् वन्दे ज्ञानाय परमेष्ठिनः ॥१॥
अर्थ: चतुर्थकाल के आदि, मध्य और अन्त में उत्पन्न होने वाले, त्रैलोक्य का हित करने वाले और तीनों जगत् को प्रकाशित करने के लिये दीपक के सदृश पञ्च परमेष्ठियों को ज्ञान प्राप्ति के लिये नमस्कार करता हूँ ॥१॥
अथ येऽत्र प्रवर्तन्ते कालाः षट् षट् पृथग्विधाः।
उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ भरतैरावतेषु च ॥२॥
एकैकनित्यरूपेण विदेहादिजगत्त्रये।
वक्ष्ये तेषां पृथग्भूतं स्वरूपं वर्तनादिभिः ॥३॥
अर्थ (श्लोक 2 से 3): भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों (के आर्य खण्डों) में उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी काल सम्बन्धी भिन्न-भिन्न छह-छह कालों का वर्तन होता है और विदेह आदि तीनों लोकों में अवस्थित रूप से एक-एक काल का वर्तन होता है। अब यहाँ मैं वर्तनादि के द्वारा उनका भिन्न-भिन्न स्वरूप कहूँगा ॥२-३॥
अमीषां प्रथमः कालः सुषमासुषमाह्वयः।
सुखाकरोऽवसर्पिण्यामुत्कृष्टभोगभूमिवत् ॥४॥
सागराणां चतुःकोटि कोटिप्रमाणउत्तमः।
तस्यादौ तपनीयाभास्त्रिपल्योपमजीविताः ॥५॥
क्रोशत्रयोन्नता आर्या वदरीफलमात्रकम्।
भुञ्जना दिव्यमाहारं गते दिनत्रये सति ॥६॥
उत्कृष्टपात्रदानोत्थोत्कृष्टपुण्येन सन्ततम्।
भुञ्जन्त्युत्कृष्टसद्भोगान् दशांगकल्पवृक्षजान् ॥७॥
अर्थ (श्लोक 4 से 7): अवसर्पिणी काल के इन छह कालों में से सुख के आकर स्वरूप प्रथम काल का नाम सुषमा-सुषमा है, जहाँ की रचना उत्कृष्ट भोगभूमि के सदृश होती है। इस काल का प्रमाण चार कोड़ाकोड़ी सागरोपम (४००००००००००००००० सागर) होता है। इस काल के आदि में जीवों की आयु का प्रमाण तीन पल्योपम, शरीर की कान्ति तपाये हुए स्वर्ण के सदृश और ऊँचाई तीन कोश (छह हजार धनुष) प्रमाण होती है। ‘आर्य’ इस नाम को धारण करने वाले मनुष्य तीन दिन बाद बदरीफल प्रमाण दिव्य आहार का भोजन करते हैं। उत्तम पात्रदान के फल से उत्पन्न उत्कृष्ट पुण्य के द्वारा यहाँ उत्पन्न होने वाले जीव दश प्रकार के कल्पवृक्षों से है उत्पत्ति जिनकी, ऐसे उत्कृष्ट भोगों को निरन्तर भोगते हैं ॥४-७॥
मद्यवाद्यविभूषास्रग्दीपज्योतिर्गृहाङ्गकाः ।
भोजनाङ्गस्तथा भाजनवस्त्राङ्गा दशेत्यमी ॥८॥
मद्यांगा वितरन्त्येषां ततामोदान् रसोत्कटान्।
सारान् सुधोपमान् कामोद्दीपकान् मद्यवत्तराम् ॥९॥
भेरीपटहशंखादीन्नाना वाद्यान् फलन्ति च।
वाद्याङ्गागीतनृत्यादौ वीणामृदंग-झल्लरीः ॥१०॥
स्वर्णरत्नमयान् दीप्तान् दिव्यांश्च भूषणांगकाः ।
हारकुण्डलकेयूरमुकुटादीन् ददत्यलम् ॥११॥
स्रजो नानाविधादिव्याः सर्वर्तु कुसुमांकिताः।
स्नुवन्ते भोगसौख्यायार्याणां सदा स्रगङ्गकाः ॥१२॥
ध्वस्तध्वान्ताश्च दीपांगामणिदीपैर्विभान्त्यलं।
ज्योतिरंगा महोद्योतमातन्वन्ति स्फुरद्रुचः ॥१३॥
तुंगसौधसभागृहमण्डपादीन् गृहांगकाः ।
चित्रनर्तनशालाश्च विधातुं सर्वदा क्षमाः ॥१४॥
अन्नादिचतुराहारानमृतस्वादुदायिनः ।
दिव्यांश्च षड्रसान् पुण्याद् भोजनांगा ददत्यहो ॥१५॥
हेमस्थालानि भृंगारान् चषकान् करकादिकान्।
भाजनांगा दिशन्त्याविर्भवच्छाखाग्र सत्फलाः ॥१६॥
मृदुसूक्ष्माणिवस्त्राणि पट्टकूलानि संततम्।
वितरन्ति च वस्त्रांगाः प्रावारपरिधानकान् ॥१७॥
न वनस्पतयोऽत्रैते नापिदेवैरधिष्ठिताः।
केवलं पृथ्वीसारमया निसर्गसुन्दराः ॥१८॥
अनादिनिधनाः कल्पद्रुमाः सत्पात्रदानतः।
संकल्पितमहाभोगान् दशभेदांश्च्युतोपमान् ॥१९॥
फलन्ति दानिनां प्रीत्यै यथैते पादपा भुवि।
सर्वरत्नमयं दीप्रं भात्यत्र भूतलं परम् ॥२०॥
अर्थ (श्लोक 8 से 20): प्रथम काल में मद्यांग (पानांग), वाद्यांग, भूषणांग, मालांग, दीपांग, ज्योतिरांग, गृहांग, भोजनांग, भाजनांग और वस्त्रांग ये दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं। इनमें से मद्यांग नाम के कल्पवृक्ष प्रमोद बढ़ाने वाले, मद्य के समान कामोद्दीपक, अमृत की उपमा को धारण करने वाले और श्रेष्ठ (वीर्यवर्धक) (३२ प्रकार के) उत्कृष्ट रसों को देते हैं। वाद्यांग कल्पवृक्ष, भेरी, पटह, शंख आदि तथा गीत नृत्य आदि के उपयोग में आने वाले वीणा, मृदंग और झल्लरी आदि वाद्यों को देते हैं। भूषणांग कल्पवृक्ष स्वर्ण और रत्नमय देदीप्यमान हार, कुण्डल, केयूर और मुकुट आदि दिव्य आभूषण देते हैं। स्रगंगकल्पवृक्ष वहाँ के आर्य मनुष्यों के भोग और सुख के लिये सर्व ऋतुओं के फूलों से बनी हुई नाना प्रकार की दिव्य मालाएँ देते हैं। दीपांग कल्पवृक्ष मणिमय दीपों के द्वारा अन्धकार को नष्ट करते हुए सुशोभित होते हैं। ज्योतिरांग कल्पवृक्ष देदीप्यमान ज्योति से महान् प्रकाश फैलाते हैं। गृहांग वृक्ष निरन्तर ऊँचे-ऊँचे प्रासाद सभागृह, मण्डप आदि तथा चित्र शालाएँ और नृत्य आदि शालाएँ देने में समर्थ हैं। भोजनांग कल्पवृक्ष पुण्य के प्रभाव से अन्न, पान, खाद्य और लेह्य यह चार प्रकार का अमृततुल्य, उत्तम स्वाद देने वाला, छह रसों से युक्त और दिव्य आहार देते हैं। भाजनांग कल्पवृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग पर स्वर्णमय थालियाँ, भृंगार, कटोरा और करक (जलपात्र) आदि प्रकट होते हैं। वस्त्रांग कल्पवृक्ष निरन्तर मृदु एवं बारीक रेशम आदि के वस्त्र और धोती-दुपट्टा तथा अभ्यंतर में पहनने योग्य वस्त्रों को देते हैं। ये दसों प्रकार के कल्पवृक्ष न वनस्पतिकाय हैं और न देवों के द्वारा अधिष्ठित हैं, ये तो केवल पृथ्वी के सारमय, स्वाभाविक सुन्दर और अनादिनिधन हैं। सत्पात्र दान के प्रभाव से उपमा रहित ये कल्पवृक्ष मनोवांछित उत्तम भोगों को देते हैं। पृथ्वी पर जैसे अन्य वृक्ष फल देते हैं उसी प्रकार दानियों के फल प्राप्ति के लिए ये वृक्ष फलते हैं, यहाँ की सर्व रत्नमय चमकती हुई उत्कृष्ट भूमि अत्यन्त सुशोभित होती है ॥८-२०॥
मृगाश्चरन्ति तत्रत्या मृदुस्वादुतृणान्यपि।
चतुरंगुलमानानि रसायनरसास्थया ॥२१॥
न तत्रातपजा बाधा शीतो वृष्टिर्न जातुचित्।
ऋतवो नाप्यहोरात्रं किञ्चित्त्राशर्मकारणम् ॥२२॥
अर्थ (श्लोक 21 से 22): वहाँ पर मृदु और सुस्वादु चार अंगुल प्रमाण तृण उत्पन्न होता है जिसे मृग रसायन के स्वाद की वाञ्छा से चरते हैं। वहाँ पर न गर्मी जन्य बाधा होती है, न कभी शीत जन्य, न वर्षा जन्य और न कभी ऋतुओं के परिवर्तन जन्य बाधा होती है। उन्हें रात्रि दिन में दुःख के कारण किञ्चित् भी प्राप्त नहीं होते ॥२१-२२॥
सद्यो जातार्थबालानां दिनसप्तान्तमुद्रसम्।
भवेदुत्तानशय्यायामंगुल्याहार उत्तमः ॥२३॥
ततः सप्तदिनान्येषां धरणीरङ्गरिङ्गिणाम्।
दम्पतीनां मनोज्ञः स्यात्किञ्चिद्वृद्ध्या दशान्तरः ॥२४॥
सप्ताहेनापरेणैते प्रोत्थाय कलभाषिणः।
सञ्चरन्ति स्वयं भूमौ स्खलगति सहेलया ॥२५॥
पुनः स्थिरपदन्यासैर्व्रजन्ति दिनसप्तकम्।
सप्ताहं निर्विशंत्युच्चैः कलाज्ञानादिसद्गुणैः ॥२६॥
अन्यैः सप्तदिनैस्ते स्युः सम्पूर्णनवयौवनाः।
दिव्यांशुकसुभूषाढ्याः स्त्रीनरा भोगभागिनः ॥२७॥
स्थित्वातिनिर्मले गर्भे नवमासान् स्त्रियःशुभान्।
एत्य दम्पतितामत्रोत्पद्यन्ते दानिनो नराः ॥२८॥
यदा दम्पति सम्भूतिस्तदा मृत्युः स्फुटं भवेत्।
जनयित्रोस्ततोऽमीषां संकल्पो न सुतादिजः ॥२९॥
अर्थ (श्लोक 23 से 29): तत्काल उत्पन्न हुए आर्य बालकों का सात दिन पर्यन्त शय्या पर सीधे सोते हुए अंगुली में स्थित उत्कट एवं उत्तम रस का आहार होता है। इसके पश्चात् सात दिन पर्यन्त पृथ्वी पर रेंगते हुए वे अति मनोज्ञ स्त्री पुरुष किञ्चित् बुद्धि के द्वारा अन्य दशा को प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ बड़े हो जाते हैं। अन्य सात दिनों में वे उठकर सुन्दर वचन बोलते हैं और स्वयं अपनी इच्छा से क्रीड़ा करते हुए अस्थिर गति से भूमि पर चलते हैं। पुनः सात दिन पर्यन्त स्थिर पैर रखते हुए चलते हैं और अन्य सात दिनों में वे ज्ञान कला आदि सद्गुणों के द्वारा परिपूर्ण हो जाते हैं। अन्य सात दिनों के द्वारा दिव्य वस्त्राभूषणों से युक्त और अखण्ड भोग-भोगने वाले वे स्त्री पुरुष सम्पूर्ण नवयौवन सम्पन्न हो जाते हैं। दानी मनुष्य शुभयोग से भोगभूमिज स्त्रियों के अत्यन्त निर्मल गर्भ में नौ मास स्थित रहकर उत्पन्न होते हैं और पश्चात् वे ही दम्पतिपने को प्राप्त हो जाते हैं। जब नवीन दम्पति उत्पन्न होते हैं तभी उत्पन्न करने वाले दम्पति मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, इसीलिए माता पिता पुत्रादि की उत्पत्ति के सुख से रहित होते हैं अर्थात् ये पुत्र-पुत्री हैं, इस संकल्प से रहित होते हैं ॥२३-२९॥
आजन्ममरणान्तं नार्याणां रोगो मनाक् क्वचित्।
न चेष्टादिवियोगो नानिष्टसंयोगशोचनम् ॥३०॥
न चिन्ता दीनता नैव नाप्युन्मेषनिमेषणम्।
न निद्रा नातितन्द्रा नो लाला स्वेदोद्भवो न च ॥३१॥
मलं मूत्रं न शारीरं कामभोगे न खण्डता।
विरहो नाशुभोन्मादो नेर्ष्या न च पराभवः ॥३२॥
विषादो न भयं ग्लानिर्न च किञ्चिद् विरूपकम्।
अन्यद् वा जायते दुःखहेतुः स्वप्नेऽपि भोगिनाम् ॥३३॥
आदि संहनना आदि संस्थाना दिव्यरूपिणः।
समभोगोपभोगास्ते सर्वे मन्दकषायिणः ॥३४॥
स्वभावसुन्दराकाराः स्वभावसौम्यमूर्तयः।
स्वभावमधुरालापाः स्वभावगुणभूषिताः ॥३५॥
अर्थ (श्लोक 30 से 35): भोगभूमिज मनुष्यों के जन्म से मरण पर्यन्त न कभी किंचित् भी रोग होता है, न इष्ट आदि का वियोग, न अनिष्ट आदि का संयोग और न शोक आदि होता है, न चिन्ता है, न दैन्यता है और न नेत्रों का उन्मेषनिमेष अर्थात् पलकों का झपकना है। न अति निद्रा है, न प्रतितन्द्रा, न मुख से लार और न शरीर से पसीना की उद्भूति होती है, शरीर सम्बन्धी मल-मूत्र भी नहीं होता, और न काम भोग में कभी खंडता आती है, न कभी विरह होता है, न अशुभ उन्माद होता है, न ईर्ष्या भाव है, न पराभव है, न विषाद है, न भय है, न ग्लानि है, और न शरीर आदि में किञ्चित् भी विरूपता होती है। उन भोगी जीवों के स्वप्न में भी अन्य कोई दुःख के कारण उत्पन्न नहीं होते। वे सर्व भोगभूमिज जीव प्रथम (वज्रवृषभवज्रनाराच) संहनन और प्रथम समचतुरस्र संस्थान से युक्त, दिव्य रूप सम्पन्न, मन्द कषायी एवं समान भोग उपभोग वाले होते हैं। वे स्वभावतः सुन्दर आकार वाले, स्वभावतः सौम्य मूर्ति, स्वभावतः मधुर भाषी और स्वभावतः अनेक गुण विभूषित होते हैं ॥३०-३५॥
आर्या आर्यस्वभावास्ते सत्पात्रदानपुण्यतः।
दशधाकल्पवृक्षोत्थान् भोगान् भुञ्जन्त्यहर्निशम् ॥३६॥
भद्रकाः पात्रदानेन केचिद् दानानुमोदतः।
स्त्रीनरा चात्र तिर्यञ्चो जायन्ते भोगभागिनः ॥३७॥
अव्रता दृष्टिहीनाश्च कुपात्रदानतो मृगाः।
उत्पद्यन्तेऽल्पशर्माणो युग्मरूपेण भद्रकाः ॥३८॥
अर्थ (श्लोक 36 से 38): सत्पात्रदान के पुण्य से जीव भोगभूमि में आर्य और आर्या भाव से उत्पन्न होकर अहर्निश दश प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं। कुटिलता रहित भद्र परिणामी कोई जीव पात्रदान के फल से और कोई दान की अनुमोदना से वहाँ पर भोग भोगने वाले स्त्री, पुरुष और तिर्यञ्च होते हैं। व्रत रहित और सम्यक्त्व रहित कोई जीव कुपात्रों को दान देते हैं और उसके फलस्वरूप भोगभूमि में अल्प सुख से युक्त, युगल रूप से भद्र परिणामी मृग आदि पर्यायों में उत्पन्न होते हैं ॥३६-३८॥
आयुषोऽन्ते विमुच्यासून् क्षुता जृम्भकया ततः।
आर्याः स्त्रियो दिवं यान्त्यार्जवभावेन नान्यथा ॥३९॥
अर्थ: आयु के अन्त में पुरुष और स्त्री क्रमशः छींक एवं जम्भाई के द्वारा प्राणों को छोड़कर आर्जव (सरल) भावों के कारण स्वर्ग ही जाते हैं, अन्य गतियों में नहीं जाते ॥३९॥
ततः कालो द्वितीयोऽस्ति सुषमाख्यः सुखाङ्कितः।
त्रिकोटीकोटिवाराशिप्रमो मध्यमभोगकृत् ॥४०॥
तस्यादौ पूर्णचन्द्राभा द्विक्रोशोच्चसुविग्रहाः।
द्विपल्याखण्डितायुष्का अक्षमानान्नभोजिनः ॥४१॥
दिनद्वये गते मध्यमपात्रदानजाच्छुभात्।
भोगान् दशविधानार्या भजन्ति कल्पवृक्षजान् ॥४२॥
अन्यत्सर्वं समानं स्यादत्राद्यकालवर्तिनैः।
ततस्तृतीयकालोऽस्ति सुषमादुःषमाभिधः ॥४३॥
जघन्यभोगभूयुक्त आद्यसौख्यान्तदुःखधृत्।
द्विकोटीकोटिपूर्णाब्धिस्थितिः कल्पद्रुमाश्रितः ॥४४॥
अस्यादौ मानवाः सन्ति पल्यैकाखण्डजीविनः।
प्रियंगुश्यामवर्णाङ्गाः क्रोशैकोन्नतविग्रहाः ॥४५॥
दिनान्तरेण सौख्यायामलकाभान्नभोगिनः।
कृत्स्नमन्यत्समं स्यात्प्रागुक्तकालवर्तिनैः ॥४६॥
कालत्रयोद्भवार्याणां सहसा स्वायुषः क्षये।
दिव्याङ्गानि विलीयन्ते यथाभ्रपटलानि च ॥४७॥
अर्थ (श्लोक 40 से 47): प्रथम काल के बाद सुखों से युक्त सुखमा नाम का दूसरा काल आता है, इसमें मध्यम भोगभूमि की रचना होती है और इसका प्रमाण तीन कोड़ाकोड़ी (३००००००००००००००) सागरोपम होता है। द्वितीय काल के प्रारम्भ में मनुष्यों के शरीर की प्रभा पूर्ण चन्द्रमा के सदृश और ऊँचाई दो कोश प्रमाण होती है। ये दो पल्य प्रमाण अखण्डित आयु से युक्त और दो दिन बाद अक्ष (हरड़) फल प्रमाण अन्न का भोजन करने वाले होते हैं। मध्यम पात्रदान से उत्पन्न पुण्य फल के प्रभाव से ये आर्य दस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं। अन्य और सर्व वर्णन प्रथम काल के वर्णन के सदृश ही होता है। इसके बाद सुखमा-दुखमा नाम का तृतीय काल आता है। इसकी रचना जघन्य भोगभूमि के सदृश होती है और इस काल के प्रारम्भ में सुख तथा अन्त में दुःख होता है। इस काल की स्थिति दो कोड़ाकोड़ी (२००००००००००००००) सागरोपम प्रमाण होती है, तथा इस काल के प्रारम्भ में मनुष्य कल्पवृक्षों के आश्रय से अखण्डित एक पल्य पर्यन्त जीवित रहते हैं। मनुष्यों के शरीर की आभा प्रियंगुमणि सदृश हरित और श्याम वर्ण होती है, ऊँचाई एक कोस प्रमाण होती है। ये एक दिन के अन्तर से सुख प्राप्ति के लिए आँवले के बराबर भोजन करते हैं। इस काल का अन्य और समस्त वर्तन पहले कहे हुए प्रथम काल के वर्तन के सदृश ही होता है। तीनों कालों में उत्पन्न होने वाले आर्यों (जीवों) के दिव्य शरीर अपनी-अपनी आयु पूर्ण हो जाने पर सहसा अभ्रपटल (मेघों के समूह के) सदृश विलीन हो जाते हैं ॥४०-४७॥
यदा तृतीयकालस्यान्तिमे पल्याष्टमे क्रमात्।
अवशिष्टे स्थिते भागेऽत्रेमे कुलकरास्तदा ॥४८॥
आर्याणां हितकर्तारो जाता दक्षाश्चतुर्दश।
बभूव प्रथमस्तेषां प्रतिश्रुत्यभिधानकः ॥४९॥
स्वयंप्रभापतिर्धीमान् हेमवर्णोऽतिरूपवान्।
अष्टादशशतानां च धनुषामुच्चविग्रहः ॥५०॥
पल्यस्य दशभागानामेकभागस्वजीवितः।
तत्काले ज्योतिरङ्गानां व्युच्छित्तौखेऽति भास्वरौ ॥५१॥
प्रादुर्बभूवतुश्चन्द्रादित्यौ ते दर्शनात्तयोः।
आर्या भीता द्रुतं प्रापुः शरणं तं प्रतिश्रुतिम् ॥५२॥
सोऽपि विद्वान् निरूप्याशु गिरा स्वरूपमञ्जसा।
चन्द्रेनोदयकालानां तेषां भयमपाकरोत् ॥५३॥
‘हा’ नीत्यादान्नृणां शिक्षां तदनन्तरमेव हि।
गते पल्योपमाशीत्येकभागेऽभून्महान्मनुः ॥५४॥
सन्मत्याख्यो द्वितीयोऽत्र भर्ता यशस्वतोस्त्रियः।
त्रयोदशशतानां च चापानां तुङ्गदेहभाक् ॥५५॥
पल्यस्य शतभागानामेकभागायूरूर्जितः।
स्वर्णवर्णस्तदा सर्व ज्योतिरङ्ग क्षयान्नभः ॥५६॥
आपूर्य ग्रहताराद्याः प्रादुरासन् स्फुरत्प्रभाः।
ते भीता दर्शनात्तेषां जग्मुस्तं सन्मतिं विभुम् ॥५७॥
भयनाशाय तेषां स इत्याख्यत्प्रवरं वचः।
हे भद्रका! ग्रहा एते ह्यमीतारादयः शुभाः ॥५८॥
ज्योतिश्चक्रेण वोऽनेन किञ्चिन्नास्तिभयादिकम्।
किंत्वद्यप्रभृति ज्योतिष्कैर्वर्तते दिनं निशा ॥५९॥
इति तद्वचनात्प्रीतास्तं स्तुत्वाऽगुर्निजास्पदम्।
क्वचित् तान् कृतदोषान् स हा नीत्यातर्जयत्सुधीः ॥६०॥
अर्थ (श्लोक 48 से 60): जब तृतीय काल के अन्त में पल्य का आठवाँ भाग अवशेष रहता है तब यहाँ आर्यों का हित करने में प्रवीण ऐसे चौदह कुलकर क्रम से उत्पन्न होते हैं। उनमें से प्रथम कुलकर प्रतिश्रुति नाम के हुए, जिनकी पत्नी का नाम स्वयंप्रभा था। जो हेमवर्ण की आभा से युक्त अति रूपवान एवं बुद्धिमान् थे। उनके शरीर की ऊँचाई १८०० धनुष और आयु का प्रमाण पल्य के दश भागों में से एक भाग ( १/१० पल्य) प्रमाण थी। तत्काल ही अर्थात् पल्य का आठवाँ भाग अवशेष रहने पर ज्योतिरांग कल्पवृक्षों की कान्ति नष्ट हो जाने पर आकाश में (आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन) सूर्य और चन्द्र का प्रादुर्भाव होता है, उन रवि शशि के दर्शन से भयभीत हुए वे सब आर्य और आर्या शीघ्र ही प्रतिश्रुति कुलकर की शरण में पहुँचते हैं, तब वे बुद्धिमान् प्रतिश्रुति कुलकर शीघ्र ही अपने प्रिय वचनों द्वारा सूर्य चन्द्र के उदयकाल आदि के स्वरूप का वर्णन करके उनका भय दूर करते हैं। उसी समय ही उन्होंने मनुष्यों को ‘हा’ इस दण्ड नीति की शिक्षा दी थी अर्थात् अपराध करने वाले मनुष्यों को ‘हा’ इस प्रकार के दण्ड का स्थापन किया था। इसके बाद अर्थात् इस कुलकर की मृत्यु के बाद पल्योपम के अस्सी भाग समाप्त हो चुकने पर यशस्वति स्त्री के स्वामी सन्मति नाम के द्वितीय महामनु यहाँ उत्पन्न हुए। इनके शरीर की ऊँचाई १३०० धनुष, आयु पल्य के सौ भागों में से एक भाग ( १/१०० पल्य) प्रमाण और शरीर की कान्ति स्वर्ण सदृश थी। सर्व ज्योतिरांग कल्पवृक्षों के क्षय हो जाने से चमकती हुई प्रभा से युक्त प्रकट होते हुए ग्रहों एवं तारागणों ने आकाश मण्डल को आपूर्ण कर दिया अर्थात् भर दिया, जिसके दर्शन से भयभीत हुए लोक जन सन्मति प्रभु की शरण को प्राप्त हुए। उनके भय को नाश करने के लिए वे इस प्रकार श्रेष्ठ वचन बोले कि-हे भद्र जनों ! ये ग्रह हैं, और ये शुभ तारा गण आदि हैं। इस ज्योतिष चक्र से आप लोगों को किंचित् भी भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि अब इन्हीं ज्योतिषी देवों के द्वारा आप लोगों को दिन और रात्रि के भेद का ज्ञान होगा। इस प्रकार मनु के वचनों से सन्तोष को प्राप्त होकर तथा उनकी स्तुति करके वे सब अपने अपने स्थान को चले गये। दोष करने वाले लोगों को वे उत्तम बुद्धि के धारक सन्मति मनु ‘हा’ इसी दण्ड नीति से तर्जन करते थे ॥४८-६०॥
ततोऽष्टशतभागानां पल्यस्यातिक्रमे सति।
एकभागे मनुर्जज्ञे क्षेमङ्करो विशारदः ॥६१॥
सुनन्दायाः स्त्रियोभर्त्ताप्रोद्यमी काञ्चनच्छविः।
शताष्टधनुरुत्तुङ्ग एकभागायुरुत्तमः ॥६२॥
पल्यस्य कृतभागानां सहस्रसंख्यया तदा।
तत्रत्याः भद्रकाः प्रापुः क्रूरतां कालतो मृगाः ॥६३॥
तद् बाधामक्षमाः सोढुमार्याः क्षेमङ्करं भयात्।
आश्रित्याशु स्वबाधानाशायेदं सद्वाचोऽवदन् ॥६४॥
प्रभो! ये प्राग्मृगा भद्रा अस्माभिलालिताः करैः।
अधुना क्रूरतां प्राप्तास्ते घ्नन्त्यस्मान् नखादिभिः ॥६५॥
तान् प्रत्याह मनुश्चेत्थमेतेऽहो कालदोषतः।
सहसा परिहर्तव्या अन्तरे विकृतिं गताः ॥६६॥
भवद्भिर्नाद्य विश्वासः कर्तव्यः क्रूरजन्मनाम्।
एतान् स्वक्षेमशिक्षादीन् श्रुत्वा ते तत्स्तवं व्यधुः ॥६७॥
प्रीतः सोपि प्रजानां स्वहाकारदण्डमादिशेत्।
पुनर्भागे गते पल्याष्टसहस्त्रैकमानके ॥६८॥
धीमान् कुलकरोऽत्रासीत् क्षेमन्धरः सुक्षेमकृत्।
विमलाभामिनीकान्तः कनककाञ्चनभाङ्गभृत् ॥६९॥
तस्योन्नतिश्च दण्डानां पादोनाष्टशतप्रमा।
पल्यस्य दशसहस्त्रैकभागाङ्गजीवितम् ॥७०॥
तदाति क्रूरताप्तेभ्यो मृगादिभ्यः स धीरधीः।
यष्ट्यादिताडनैस्तासां बाधां न्यवारयद्द्रुतम् ॥७१॥
प्रजानां कृतदोषाणां सोऽपि हाकारदण्डभृत्।
पल्याशीतिसहस्त्रैकभागे गते ततोऽभवत् ॥७२॥
मनुः सीमङ्करो ज्ञानी पतिर्मनोहरिस्त्रियः।
सार्धसप्तशतैश्चापैरून्नतः कनकप्रभः ॥७३॥
पल्यलक्षैकभागायुर्हाकारदण्डदायकः।
कल्पवृक्षा यदा चासन् विरला मन्दकाः फलैः ॥७४॥
तदार्याणां विसम्वादस्तत्कृतोऽभूत् परस्परम्।
ततः सीमावधिं तेषां स व्यधात् क्षेमवृत्तये ॥७५॥
अर्थ (श्लोक 61 से 75): इसके बाद पल्य के ८०० भाग व्यतीत हो जाने पर एक भाग में क्षेमङ्कर नाम के अति निपुण मनु हुए, जो सुनन्दा स्त्री के स्वामी, उद्यमवान और स्वर्णाभा के सदृश सुन्दर शरीर के धारक थे। इनके शरीर की ऊँचाई ८०० धनुष और आयु का प्रमाण पल्य के एक हजार भागों में से एक भाग (१/१००० पल्य) था। इन्हीं मनु के जीवन काल में वहाँ रहने वाले मृग, शेर आदि काल दोष के प्रभाव से क्रूरता को प्राप्त हो गये तब उनकी बाधा को सहन करने में असमर्थ होते हुए आर्यजन भय से शीघ्र ही क्षेमंकर के समीप जाकर अपनी बाधा नाश करने के लिये इस प्रकार उत्तम वचन बोले हे प्रभो! ये मृग, सिंह आदि पहले भद्र परिणामी थे और हम लोगों के हाथों से इनका लालन पालन किया गया है, किन्तु आज ये क्रूरता को प्राप्त होकर हमें अपने नाखूनों से मारते हैं। उन आर्यजनों को प्रति उत्तर देते हुए मनु बोले-कि काल दोष के प्रभाव से इनके मनों में विकार उत्पन्न हो गया है, अतः इनको शीघ्र ही छोड़ देना चाहिए! आप लोगों को अब इनका विश्वास नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अपने कल्याण की शिक्षा आदि को सुनकर उन्होंने मनु की बहुत स्तुति की। प्रजा जनों को प्रीति (कल्याण) के लिए उन्होंने भी ‘हा’ दण्ड नीति का ही आदेश दिया। पुनः पल्य के आठ हजार (८०००) प्रमाण भाग व्यतीत हो जाने पर अत्यन्त कल्याण करने वाले, बुद्धिमान क्षेमन्धर नाम के कुलकर उत्पन्न हुए, जो विमला महादेवी के स्वामी और स्वर्ण सदृश आभा को धारण करने वाले थे। उनके शरीर की ऊँचाई ७७५ धनुष और आयु पल्य के दश हजार भागों में से एक भाग (१/१०००० पल्य) प्रमाण थी। उस समय मृगादि पशु अत्यन्त क्रूरता को प्राप्त हो गये थे, अतः उन उत्तम बुद्धि को धारण करने वाले मनु ने लकड़ी आदि के द्वारा ताड़न आदि करने की शिक्षा देकर शीघ्र ही उनकी बाधा को दूर किया। प्रजा के द्वारा किये हुए दोषों पर उन्होंने भी ‘हा’ इस दण्ड नीति का प्रयोग किया। पल्य के अस्सी हजार भाग व्यतीत हो जाने के बाद मनोहारी स्त्री के अत्यन्त विद्वान् पति सीमंकर नाम के मनु हुए। जिनके शरीर की ऊँचाई ७५० धनुष और कान्ति स्वर्ण के सदृश थी। इनकी आयु पल्य के एक लाख भागों में से एक भाग (१/१००००० पल्य) प्रमाण थी, तथा ये भी ‘हा’ दण्ड नीति का ही प्रयोग करते थे। आपके समय में जब कल्पवृक्ष विरले और मन्द फल देने वाले हो गये तब आर्य जन परस्पर में विसम्वाद करने लगे, उस समय आपने प्रजा के कल्याण के लिये उनकी अलग सीमा बाँध दी थी ॥६१-७५॥
ततः पल्याष्टलक्षैकभागे गतेऽभवन्मनुः।
सीमन्धरोऽङ्गहेमाभोऽत्र यशोधारिणीप्रियः ॥७६॥
पल्यस्य दशलक्षैकभागायुस्तुङ्गविग्रहः।
शतसप्तप्रमैश्चापैः पञ्चविंशति संयुतैः ॥७७॥
हा-मा-नीतिकरस्तस्मिन् कालेऽतिविरलाः स्वयम्।
जाताः कल्पद्रुमा मन्दफलाश्च कालहानितः ॥७८॥
तत्कारणैस्तदाऽमीषां विसम्वादः परोऽजनि।
ततो गुल्मादि चिह्नैः स तेषां सीमां न्यधात् सुधीः ॥७९॥
पल्यस्याशीति लक्षैकभागे गते ततोऽभवत्।
सुमतिस्त्रीप्रभुर्दक्षो मनुविमलवाहनः ॥८०॥
स्वर्णकान्तिर्महाँस्तुङ्गः शतसप्तशरासनैः।
पल्यकोट्येकभागायुर्हा-मा-नीतिकृतोद्यमः ॥८१॥
अकारयत्प्रजानां तदांकुशाद्यायुधैर्बुधः।
आरोहणं गजादीनामुपरि स्फुटमञ्जसा ॥८२॥
पुनः पल्याष्टकोट्येकभागे गतेऽभवत्सुधीः।
चक्षुष्मान् कुलकर्तात्र धारिणीप्रिय उन्नतः ॥८३॥
दण्डैः षट्शतसंख्यैस्तैः पञ्चसप्ततिसंश्रितैः।
पल्यस्य दशकोट्येकभागजीववधीक्षणः ॥८४॥
प्रियंगुवर्णदीप्ताङ्गस्तदा सुसूनुदर्शनैः।
बभूवादृष्टपूर्वैश्चार्याणां भयं सुजीविनाम् ॥८५॥
तत् क्षणं स निवेद्य स्वपुत्रोत्पत्तिं सुखाप्तये।
सन्तानवृद्धिभूतां च तेषां निराकरोद्भयम् ॥८६॥
तेनैष सार्थनामाभूद्धा-मा-नीतिप्रदोऽङ्गिनाम्।
पल्यस्याशीतिकोट्येकभागेऽतीते ततः शुभात् ॥८७॥
यशस्वी कुलकर्तासीत् कान्तिमालापतिर्बुधः।
सार्धषट्शतचापोच्च प्रियंगुप्रभदेहवान् ॥८८॥
पल्यस्य शतकोट्येकभागायुर्ज्ञानलोचनः।
यशसा भूषितो वाग्मी हा-मा-नीतिप्रवर्तकः ॥८९॥
तदासौ कारयामास पुत्रजातमहोत्सवम्।
अनन्तरं प्रसूतेस्तु पितॄणां चिरजीविनाम् ॥९०॥
अर्थ (श्लोक 76 से 90): इसके बाद पल्य के आठ लाख भाग व्यतीत हो जाने के बाद यहाँ पर हेम सदृश आभा को धारण करने वाले, यशोधारणी प्रिया के स्वामी सीमन्धर नाम के मनु उत्पन्न हुए थे। इनकी आयु पल्य के दस लाख भागों में से एक भाग (१/१०००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की ऊँचाई ७२५ धनुष प्रमाण थी। आपके द्वारा “हा-मा” दण्डनीति निर्धारित की गई थी। इस समय में काल हानि के प्रभाव से कल्पवृक्ष अत्यन्त विरले एवं अत्यन्त मन्द फल प्रदान करने वाले हो गये थे, इस कारण से आर्य जनों के परस्पर में बहुत कलह होने लगा था, तब अति निपुण आपने झाड़ी, डाली, भौंरा, गुच्छा एवं फल आदि चिह्नों के द्वारा उनकी सीमा बाँध दी थी। इसके बाद पल्य के अस्सी लाख भाग व्यतीत हो जाने पर सुमति महादेवी के स्वामी अत्यन्त निपुण विमलवाहन नाम के मनु उत्पन्न हुए। इनके शरीर की कान्ति स्वर्ण के सदृश और ऊँचाई ७०० धनुष थी। आयु पल्य के एक करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००० पल्य) प्रमाण थी। आपके द्वारा भी “हा-मा” नीति निर्धारित की गई थी। इन्होंने प्रजा को अंकुश आदि आयुधों का धारण व प्रयोग करना तथा हाथी आदि पर चढ़ना (सवारी करना) बतलाया था। पश्चात् पल्य के आठ करोड़ भाग व्यतीत हो जाने के बाद यहाँ पर धारिणी प्रिया के स्वामी महान् कुलकर चक्षुष्मान् हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ६७५ धनुष और कान्ति प्रियंगुमणि के सदृश हरित वर्ण की थी। आयु का प्रमाण पल्य के दश करोड़ भागों में से एक भाग (१/१०००००००० पल्य) प्रमाण था। अवधिज्ञान ही आपके नेत्र थे अर्थात् आप अवधिज्ञान से देखते थे। उस समय पूर्व में कभी नहीं देखे हुए अपने पुत्र के दर्शन से जीवित रहने वाले आर्य जनों को बहुत भय उत्पन्न हुआ, उसी क्षण कुलकर ने अपने पुत्र की उत्पत्ति सुख प्राप्ति के लिए होती है, ऐसा कहकर सन्तान वृद्धि से होने वाले उन जीवों के भय को दूर कर दिया। सार्थक नाम को धारण करने वाले उन चक्षुष्मान् कुलकर के द्वारा भी प्रजाजनों को “हा-मा” का ही दण्ड दिया जाता था। इसके पश्चात् पल्य के अस्सी करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर कान्तिमाला के पति बुद्धिमान् यशस्वी नाम के कुलकर उत्पन्न हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ६५० धनुष और कान्ति प्रियंगु मणि के सदृश थी। पल्य के सौ करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००००० पल्य) प्रमाण आयु थी। ज्ञान नेत्र एवं यश से विभूषित आपने भी “हा-मा” दण्ड नीति का ही प्रवर्तन किया था। उस समय पुत्र उत्पत्ति के बाद माता पिता बहुत काल तक जीवित रहने लगे तब कुलकर ने पुत्र उत्पत्ति का महामहोत्सव करने का उपदेश दिया अर्थात् पुत्र उत्पत्ति के बाद लोगों से महोत्सव करवाये ॥७६-९०॥
पल्याष्टशतकोट्येकभागेऽतीते ततोऽभवत्।
अभिश्चन्द्रो मनुर्ज्ञानी श्रीमतीकान्त उन्नत: ॥९१॥
पञ्चविंशतिसंयुक्तैश्चापैः षट्शतसम्मितैः।
पल्यकोटिसहस्रैकभागायुः कनकच्छविः ॥९२॥
चन्द्रादिदर्शनैः रात्रौ चिरजीविप्रजात्मनाम्।
सूनोर्वीक्ष्य मुखं प्रीत्यै क्रीडनं वचसादिशत् ॥९३॥
तेन तत्कृतनामासीद्धा-मा-नीतिविधिं व्यधात्।
पल्याष्टाष्टसहस्रप्रमकोट्येकप्रमाणके ॥९४॥
गते भागे ततोऽभूच्चन्द्राभश्चन्द्रवर्णवान्।
प्रभावतीप्रियस्तुङ्गो दण्डैः षट्शतसंख्यकैः ॥९५॥
पल्यस्य दशसहस्रकोट्यैकांशआत्मजीवितः।
आर्याणां कृतदोषाणां हा-मा-धिक्कारदण्डकृत् ॥९६॥
तदासौ स्वगिरा दक्षः पितॄणां चिरजीविनाम्।
व्यवहारं व्यधात् प्रीत्यै पितृपुत्रादिकल्पनैः॥९७॥
अर्थ (श्लोक 91 से 97): तत्पश्चात् पल्य के आठ सौ करोड़ भाग व्यतीत हो जाने के बाद श्रीमती कान्ता के पति, ज्ञानवान एवं श्रेष्ठ मनु अभिचन्द्र उत्पन्न हुए। इनकी ऊँचाई ६२५ धनुष, आयु पल्य के हजार करोड़ भागों में से एक भाग (१/१०००००००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की कान्ति स्वर्णाभा सदृश थी। सार्थक नाम को धारण करने वाले इन कुलकर ने अपनी वाणी द्वारा बहुत काल तक जीवित रहने वाली अपनी प्रजा को रात्रि में चन्द्रमा आदि के दर्शन द्वारा अर्थात् अपने बालकों को चन्द्रमा दिखा-दिखाकर प्रीतिपूर्वक उनका मुख देखकर क्रीड़ा कराने (रमाने) का उपदेश दिया। इनके द्वारा भी “हा-मा” दण्ड नीति का ही विधान किया गया था। पश्चात् पल्य के आठ हजार करोड़ प्रमाण भाग बीत जाने पर यहाँ चन्द्रमा की कान्ति को धारण करने वाले प्रभावती प्रिया के स्वामी चन्द्राभ नाम के मनु हुए। इनके शरीर की ऊँचाई ६०० धनुष प्रमाण और आयु पल्य के दश हजार करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००००००० पल्य) प्रमाण थी। दोष करने वाले आर्यों को ये हा-मा और धिक्कार का दण्ड देते थे। उस समय आपने अपने वचनों द्वारा बहुत काल तक जीवित रहने वाले माता पिता को पिता पुत्र आदि के सम्बन्ध की कल्पना द्वारा प्रीतिपूर्वक व्यवहार करने का उपदेश दिया ॥९१-९७॥
पल्याशीति सहस्रादि कोट्येक सम्मिते गते।
भागे ततो मरुद्देवो बभूवानुपमाप्रियः ॥९८॥
पञ्चसप्ततिसंयुक्त धनुः पञ्चशतोन्नतः।
पल्यस्य लक्षकोट्येकभागायुः कनकद्युतिः ॥९९॥
हा-मा-धिक्कारनीत्युक्तस्तत्काले वार्धयः स्वयम्।
प्रादुरासंश्च नद्यौघा-मेघा-नानाविधाः शुभाः ॥१००॥
नद्यब्ध्युत्तरणे पोतनौद्रोण्यादीन् ह्यकारयत्।
आरोहणे स गिर्यादि सुधीः सोपानमालिकाः ॥१०१॥
पल्याष्टलक्षकोट्येकभागे व्यतिक्रमे ततः।
प्रियंगुकान्ति सत्कायो जज्ञे मनुः प्रसेनजित् ॥१०२॥
तुङ्गः शरासनैः सार्धशतपञ्चप्रमैर्बुधः।
पल्यस्य दशलक्षादिःकोट्येकभागजीवितः ॥१०३॥
हा-मा-धिग्नीति दण्डोक्तस्तस्यामितगतिः पिता।
वरकन्यकया सार्धं विवाहं विधिना व्यधात् ॥१०४॥
कुलकृच्चैक एवात्रोत्पन्नः स युगलं विना।
तदा प्रभृति युग्मानामुत्पत्तौ नियमो गतः ॥१०५॥
कालेऽस्यैव सुतोत्पत्तिर्जरायुपटलावृता।
अभूत् तत् कर्षणास्नानान् प्रजानां सोऽदिशद्गिरा ॥१०६॥
पल्यस्याशीति लक्षादिकोट्येकप्रमिते गते।
भागे ततोऽभवत्पुण्यान् नाभिः कुलकरोऽद्भुतः ॥१०७॥
मरुदेवीप्रियो विद्वान् हेमकान्तिः सुरार्चितः।
पंचविंशतिसंयुक्त धनुः पंचशतोच्छ्रितः ॥१०८॥
पूर्वकोटिप्रमायुष्को हा-मा-धिक्नीतिकारकः।
काले तस्य सुतोत्पत्तिर्नाभिनालयुताजनि ॥१०९॥
तत्कर्तनं स पितॄणां सुखाय विधिनादिशत्।
ततोऽसौ सार्थकं स्वस्य नाम प्रापप्रजोदितम् ॥११०॥
तस्मिन् काले नभो व्याप्य तडिदम्बरगर्जनैः।
सार्धं मुहुर्महावृष्टीर्मेघाधाराव्रजैर्व्यधुः ॥१११॥
तदा शनैः शनैर्भूषु सर्वतो विरलं स्वयम्।
वृद्धान्यासंश्च सस्यानि पूर्णपक्वान्यनेकfields? No, it is: वृद्धान्यासंश्च सस्यानि पूर्णपक्वान्यनेकणः or अनेकशः? Let’s write verbatim: वृद्धान्यासंश्च सस्यानि पूर्णपक्वान्यनेकfields
Wait, it is: वृद्धान्यासंश्च सस्यानि पूर्णपक्वान्यनेकfields → let’s look at text: ‘वृद्धान्यासंश्च सस्यानि पूर्णपक्वान्यनेकशः ॥११२॥’
आम्राद्या इति तत्प्रोक्तं श्रुत्वा प्रीता प्रशस्यतम्।
नत्वा तद् दर्शितां वृत्तिं भेजुः कालोचितां प्रजाः ॥११३॥
अर्थ: पश्चात् पल्य के अस्सी हजार करोड़ भाग समाप्त हो जाने पर अनुपमा प्रिया के स्वामी मरुदेव कुलकर उत्पन्न हुए। आपकी ऊँचाई ५७५ धनुष, आयु पल्य के एक लाख करोड़ भागों में से एक भाग ( १/१०००००००००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की कान्ति स्वर्णभा सदृश थी। आपने भी हा-मा और धिक्कार दण्ड नीति का ही प्रयोग किया था। इस समय समुद्र, नदियों के समूह और नाना प्रकार के श्रेष्ठ मेघों का स्वयं ही प्रादुर्भाव हुआ था। मरुदेव कुलकर ने नदी और समुद्र आदि को पार करने के लिए पुल, नाव और द्रोणी आदि का तथा पर्वत आदि पर चढ़ने के लिए सोपान मालिका-सीढ़ियों की पंक्तियों का विधान किया था। इसके पश्चात् पल्य के आठ लाख करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर प्रियंगुमणि की हरित आभा के सदृश उत्तम शरीर द्युति से युक्त प्रसेनजित् मनु उत्पन्न हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ५५० धनुष और आयु पल्य के दस लाख करोड़ भागों में से एक भाग ( १/१००००००००००००० पल्य) प्रमाण थी। प्रसेनजित् मनु के द्वारा भी हा-मा और धिक्कार नीति का ही प्रयोग किया गया था। आपके पिता अमितगति ने आपका विवाह उत्तम कन्या से विधिपूर्वक किया था। यह एक ही कुलकर बिना युगल के उत्पन्न हुए हैं और इसी समय से युगल उत्पत्ति का नियम समाप्त हुआ है, अर्थात् युगल ही उत्पन्न हों, ऐसा नियम नहीं रहा। इसी समय में पुत्रों (सन्तानों) की उत्पत्ति जरायु पटल से आवृत्त होने लगी थी। उस समय आपने अपनी मृदु वाणी के द्वारा प्रजा को जरायु आदि काटने का तथा स्नान आदि कराने का उपदेश दिया था। पश्चात् पल्य के अस्सी लाख करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर पुण्य उदय से चौदहवें कुलकर नाभिराय उत्पन्न हुए। मरुदेवी कान्ता के स्वामी, विद्वान्, हेमकान्ति को धारण करने वाले और देवों द्वारा पूजित आपकी ऊँचाई ५२५ धनुष प्रमाण तथा आयु एक पूर्व कोटि प्रमाण थी। आप भी हा-मा और धिक् दण्ड नीति का ही प्रयोग करते थे। इस काल में सन्तान की उत्पत्ति नाभि नाल से युक्त होने लगी थी। आपने माता-पिता के सुख के लिए उस नाल को काटने का उपदेश दिया था, इसीलिये प्रजा ने आपका सार्थक नाम नाभिराय रखा था। इसी काल में नभ को व्याप्त करके बिजली सहित मेघ गम्भीर गर्जना के साथ-साथ स्थूल जलधारा के द्वारा बार-बार महावृष्टि करने लगे थे। वर्षा होने के बाद ही पृथ्वी पर धीरे-धीरे चारों ओर पूर्णरूपेण पके हुए अनेक प्रकार के धान्य की वृद्धि होने लगी थी, जिसमें शालि चावल, कलम, व्रीहि आदि और अनेक प्रकार के चावल, जौ, गेहूँ, कांगणी, श्यामक (एक प्रकार का धान्य) कोदों, मोट, नीवार (कोई धान्य), वरवटी, तिल, अलसी, मसूर, सरसों, धना, जीरा, उड़द, मूँग, अरहड़, चौला, निष्पावक (बालोर), चना, कुलथी और त्रिपुटा (तेवड़ा) आदि भेद वाले धान्य हो गये थे तथा कल्पवृक्षों की सम्पूर्णरूपेण समाप्ति हो जाने पर प्रजा के जीवनोपयोगी कौसुम्भ और कपास आदि की भी उसी समय उत्पत्ति हो गई थी। कल्पवृक्षों का अभाव हो जाने से जीवों में आहार की तीव्र वाञ्छा उत्पन्न होने लगी, उस समय सर्व अंगों का शोषण करने वाली क्षुधा वेदना से प्रजा अन्तरंग में अत्यन्त दुःखी होती हुई नाभिराय मनु के समीप जाकर तथा नमस्कार करके दीन वचनों से इस प्रकार कहने लगी कि-हे स्वामिन्! हम लोगों का पुण्य क्षय हो जाने से समस्त कल्पवृक्ष नष्ट हो गये हैं और उनके स्थान पर और कोई नाना प्रकार के अनेक वृक्ष स्वयमेव उत्पन्न हुए हैं, इनमें से कौन से वृक्ष छोड़ने योग्य हैं और कौन से भोगने योग्य हैं, यह समझाते हुए आप हमें ऐसा सर्वोत्तम उपाय बतलाइए जिससे हम लोगों की जीविका चले। इसके बाद नाभिराय इस प्रकार बोले कि हे भद्र! इनमें ये तो उत्तम वृक्ष भोगने योग्य और काम में लेने योग्य हैं तथा ये विष आदि के वृक्ष हैं, जो शीघ्र ही छोड़ने योग्य हैं। इनमें ये वृक्ष महा औषधि रूप हैं, ये आम्र आदि खाने योग्य हैं और ये गन्ना आदि हैं, जिनका यन्त्र के द्वारा रस निकालकर पीना चाहिए। इस प्रकार राजा के वचनों को सुनकर और भली प्रकार प्रीतिपूर्वक उन्हें नमस्कार करके प्रजा उनके द्वारा दर्शायी हुई कालोचित वृत्ति का सेवन करने लगी ॥९८-१२२॥
सम्यक्त्वग्रहणात्पूर्वं पात्रदानशुभार्जनैः।
भोगभूमिमनुष्याणां बद्ध्वायुस्ते शुभाशयाः ॥११४॥
पश्चात् क्षायिकसम्यक्त्वं जिनान्ते काललब्धितः।
गृहीत्वा स्वायुरन्तेऽत्र सर्वे जाता विचक्षणाः ॥११५॥
तेषु जातिस्मराः केचित्केचिच्चावधिलोचनाः।
एतान् हितोपदेशादीन् प्रजानामादिशन् बुधाः ॥११६॥
अर्थ: यहाँ पर जिन प्रतिश्रुति आदि कुलकरों का वर्णन किया गया है, वे सभी पूर्व भव में विदेह क्षेत्र में उत्तम कुलोत्पन्न श्रेष्ठ राजा थे। सम्यक्त्व ग्रहण के पूर्व पात्रदान से अर्जित पुण्य फल के द्वारा उन पवित्र चित्तवृत्ति वाले सभी मनुओं ने भोगभूमि के मनुष्यों की आयु का बन्ध कर लिया था। पश्चात् काललब्धि के योग से जिनेन्द्र भगवान् के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व ग्रहण करके विचक्षण बुद्धि को धारण करने वाले वे सभी आयु के अन्त में वहाँ से मरण कर यहाँ उत्पन्न होते हैं। उनमें से किन्हीं को जातिस्मरण और किन्हीं को अवधिज्ञान होता है, जिससे वे विद्वज्जन प्रजा को हितोपदेश देते हैं ॥१२३-१२६॥
नाभेः कुलकरस्यान्तिमस्यात्रासीत्सुतः परः।
ऋषभस्तीर्थकृत् पूज्यः कुलकृत् त्रिजगद्धितः ॥११७॥
हा-मा-धिग्नीतिमार्गोक्तोऽस्य पुत्रो भरतोऽग्रजः।
चक्री कुलकरो जातो बधबन्ध्वादि दण्डभृत् ॥११८॥
ततश्चतुर्थकालाच्च पूर्वं श्रियादिजिनेश्वरः।
मुक्ते मार्गं द्विधा धर्मं प्रकाश्य ध्वनिना सताम् ॥११९॥
हत्वा कृत्स्नाङ्गकर्माणि प्राप्य देवाधिपार्चनम्।
अनन्तगुणशर्माब्धिंजगामान्ते शिवालयम् ॥१२०॥
विश्वाग्रस्थं तृतीयस्य कालान्तेऽस्यान्तिमे सति।
वर्षत्रयेऽवशिष्टे च सार्धाष्टमाससंयुते ॥१२१॥
अर्थ: अन्तिम कुलकर नाभिराय के ऋषभदेव नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जो तीर्थंकर, पूज्य, कुलकर और त्रैलोक्य का हित करने वाला था। आपने भी हा-मा और धिक् दण्डनीति का ही प्रयोग किया था। आपके पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत, कुलकर रूप में उत्पन्न हुए जिन्होंने दोष करने वाली प्रजा पर बध, बन्धन आदि दण्ड नीति का प्रयोग किया। चतुर्थ काल से पूर्व ही अंतरंग बहिरंग लक्ष्मी से युक्त प्रथम तीर्थंकर हुए, जो भव्य जनों को अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा मोक्षमार्ग को तथा मुनि और श्रावक के धर्म को प्रकाश कर, सम्पूर्ण कर्मों को नष्टकर तथा देवेन्द्रों से पूजा को प्राप्त कर सम्पूर्ण तृतीय काल के अन्त में तीन वर्ष साढ़े आठ मास अवशेष रहने पर अनन्त गुण और अनन्त सुख के सागर मोक्ष को प्राप्त हुए ॥१२७-१३१॥
ततश्चतुर्थकालोऽभूत् दुःषमासुषमाह्वयः।
दुःखसौख्यकरो ह्येक कोटिकोट्यम्बुधिप्रमः ॥१२२॥
ऊनो वर्षद्विचत्वारिंशत्सहस्रप्रमैर्महान्।
शुभः कर्मधरोत्पन्नः स्वर्मोक्षसुखसाधनः ॥१२३॥
अस्यादौ मानवाः सन्ति पूर्वकोटिपरायुषः।
पञ्चवर्णा लसद्देहाश्चापपञ्चशतोच्छ्रिताः ॥१२४॥
वारैकं पूर्णमाहारं दिनं प्रत्याहरन्ति ते।
षट्कर्मकारिणोऽन्ते मोक्षचतुर्गतिगामिनः ॥१२५॥
आद्यकालत्रये भोगभूमिभागेषु येऽङ्गिनः।
न भूता दुःखदा द्वित्रिचतुरिन्द्रियजातयः ॥१२६॥
मांसाशिपक्षिणः क्रूरा अन्ये जलचरादयः।
ते सर्वे विकलाक्षाद्याः कालेऽस्मिन्स्वयमुद्गताः ॥१२७॥
चतुर्विंशतितीर्थेशाश्चक्रेशा द्वादशोत्तमाः।
बलदेवा नवैवासन् वासुदेवा नवोत्कटाः ॥१२८॥
तच्छत्रवोऽत्र तावन्तो रुद्रा एकादशाशुभाः।
चतुर्विंशतिकामाश्च दुर्वेषां नारदा नव ॥१२९॥
अर्थ: तृतीय काल के अन्त में दुखमा-सुखमा नाम का चतुर्थ काल प्रारम्भ हुआ, जो दुख और सुख दोनों का सम्पादन करने वाला था और उसका प्रमाण बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर (१००००००००००००००० सागर-४२००० वर्ष) था। इसमें शुभ कर्मों द्वारा पुण्य उपार्जन करने वाले तथा स्वर्ग और मोक्ष का साधन करने वाले जीव उत्पन्न होते थे। चतुर्थ काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटि (७०५६ के आगे १७ शून्य), शरीर की आभा पंच वर्ण की और ऊँचाई ५०० धनुष प्रमाण थी। उस समय जीव दिन में एक बार पूर्ण आहार करते थे तथा षट्कर्मों में तत्पर रहते थे और आयु के अन्त में मोक्ष एवं कर्मानुसार चारों गतियों को प्राप्त होते थे। प्रारम्भ के भोगभूमि सम्बन्धी तीनों कालों में दुखदाई द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय अर्थात् विकलत्रय जीव, मांसभक्षी एवं अन्य क्रूर पक्षी तथा जलचर आदि जो जीव उत्पन्न नहीं होते थे, वे सब इस काल में स्वयमेव उत्पन्न होने लगे थे। इस काल में चौबीस तीर्थंकर, द्वादश चक्रवर्ती, नव नारायण और नव ही प्रतिनारायण उत्कट बल के धारी हुए। ग्यारह रुद्र, शुभकार्य करने वाले चौबीस कामदेव और दुर्बुद्धिधारी नव नारद भी इसी काल में होते हैं ॥१३२-१३९॥
वृषभोऽजिततीर्थेशः सम्भवाख्योऽभिनन्दनः।
सुमतिः श्रीजिनः पद्मप्रभसुपार्श्वतीर्थकृत् ॥१३०॥
चन्द्रप्रभजिनः पुष्पदन्तः शीतलसंज्ञकः।
श्रेयान् श्रीवासुपूज्योऽर्हद्विमलोऽनन्ततीर्थकृत् ॥१३१॥
धर्मः शान्तीश्वरः कुन्थुनाथोऽरो मल्लिनामकः।
मुनिसुव्रततीर्थेशो नमिर्नेमिजिनेश्वरः ॥१३२॥
पार्श्वः श्रीवर्द्धमानाख्य एते श्रीजिननायकाः।
त्रिजगन्नाथवन्द्यार्च्याश्चतुर्विंशतिरेव च ॥१३३॥
चन्द्राभपुष्पदन्तौ द्वौ चन्द्रकान्तमणिप्रभौ।
पद्माभवासुपूज्यौ च पद्मरागमणिच्छवी ॥१३४॥
सुपार्श्वपार्श्वतीर्थेशौ स्फुरन्मरकतद्युती।
नेमीशसुव्रतौ श्यामौ शेषास्ते कनकप्रभाः ॥१३५॥
मुनिसुव्रतनेमीशौ हरिवंशशिरोमणी।
शान्तिकुन्थ्वरतीर्थेशा कुरुवंशविभूषणाः ॥१३६॥
उग्रवंशाग्रणीः पार्श्वो वीरो नाथान्वयोद्भवः।
इक्ष्वाकुकुलसञ्जाता जिनाः सप्तदशापरे ॥१३७॥
चापपञ्चशतान्याद्ये चोनं पञ्चाशदष्टसु।
दश-पञ्चसु चापानि हीनानि पञ्च चाष्टसु ॥१३८॥
नव सप्तकराः प्रोक्ताः क्रमेण पार्श्ववीरयोः।
उत्सेधास्तीर्थकर्तॄणां दिव्याङ्गेषु भवन्त्यमी ॥१३९॥
आयुश्चतुरशीतिश्च प्रथमश्रीजिनेशिनः।
ततो द्वासप्ततिः षष्टिः पूर्वलक्षाणि चार्हताम् ॥१४०॥
तेभ्यो दशविहीनानि पञ्चानां हि क्रमात् तथा।
पूर्वलक्षद्वयं ज्येष्ठायुः पूर्वलक्षमहृतः ॥१४१॥
लक्षाश्चतुरशीतिः संवत्सराणां द्विसप्ततिः।
षष्टिस्त्रिद्वेकैवायुस्ततो लक्षैकमञ्जसा ॥१४२॥
पञ्चाग्रा नवतिर्वर्षाण्यशीतिश्चतुरोत्तरा।
आयुश्च पंचपंचाशत् सहस्त्राणि पृथक् ततः ॥१४३॥
त्रिंशद्दशसहस्त्राणि सहस्त्रैकं ततः परम्।
वर्षाण्यायुः शतैकं स्याद्वर्द्धमाने द्विसप्ततिः ॥१४४॥
अर्थ (श्लोक 140 से 145): वृषभनाथ, अजितनाथ तीर्थंकर, सम्भवनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ जिनेन्द्र, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्य अर्हन्त, विमलनाथ, अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतनाथ, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्द्धमान नाम के ये चौबीस तीर्थंकर हुए हैं। ये चौबीसों तीर्थंकर तीनों लोकों के स्वामियों द्वारा अर्थात् सुरेन्द्र, धरणेन्द्र और नरेन्द्रों के द्वारा वन्दनीय एवं अर्चनीय हैं। इन चौबीस तीर्थंकरों में से चन्द्रप्रभ और पुष्पदन्त भगवान् के शरीर की कान्ति चन्द्रकान्तमणि की प्रभा के सदृश श्वेत, पद्मप्रभ और वासुपूज्य भगवान् के शरीर की आभा पद्मरागमणि की आभा के सदृश लाल, सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरों की कान्ति मरकत मणि की कान्ति सदृश हरित, नेमिनाथ और मुनिसुव्रतनाथ के शरीर की द्युति श्याम तथा अन्य अवशेष सोलह तीर्थंकरों के शरीर की कान्ति कनकप्रभा के सदृश थी ॥१४०-१४५॥
गतेऽत्र वृषभे निर्वाणं जातेऽजितनायके।
तयोस्तीर्थेशयोर्मध्ये गतकालो जिनान्तरः॥१४५॥
पञ्चाशल्लक्षकोट्यश्च सागराः प्रथमान्तरम्।
सार्धाष्टमाससंयुक्त त्रिवर्षाग्रमतं परम्॥१४६॥
ज्ञेयं मध्येऽन्तरस्यास्यैवाजितस्यायुरोजसा।
इत्यन्तरस्य मध्ये स्यादायूः शेषजिनेशिनाम्॥१४७॥
ततोऽब्धिलक्षकोटीनां त्रिंशद्दश नव क्रमात्।
तथा सहस्त्रकोटीनां नवतिः क्रमतो नव॥१४८॥
कोटयो नवशतान्येव कोटयो नवतिर्नव।
ततः शतोना कोट्येका जिनेन्द्रस्यान्तरं पृथक्॥१४९॥
षट्षष्टिलक्षषड्विंशसहस्त्रवत्सरोनितम् ।
सागरा हि चतुः पञ्चाशत्त्रिंशच्च नवान्तरम्॥१५०॥
चत्वारोऽम्बुधयः पादोनपल्यवर्जितास्त्रयः।
पल्यार्धं पल्य पादं सहस्त्रकोटिसमोनितम्॥१५१॥
सहस्त्रकोटिवर्षाणि मध्येऽर्हतो जिनान्तरम्।
सम्वत्सराश्चतुः पञ्चाशल्लक्षाः षट् च पञ्च हि॥१५२॥
सार्धसप्तशताग्रास्त्व्यशीतिसहस्त्रवत्सराः ।
सार्धद्विशतवर्षाणि ततोऽपरं जिनान्तरम्॥१५३॥
हीनं सार्धाष्टमासाधिकवर्षं त्रिभिरंजसा।
चतुर्विंशार्हतामित्थं पृथक् पृथग्जिनान्तरम्॥१५४॥
इत्युक्त कालमध्येषु जगन्नाथा जिनेश्वराः।
हत्वा कृत्स्नाङ्कर्मणि जग्मुर्मोक्षं जगद्धिताः॥१५५॥
यदा चतुर्थकालस्य सार्धाष्टमाससंयुते।
सति वर्षत्रये शेषे तदा वीरोऽगमच्छिवम्॥१५६॥
एषां जिनान्तराणां च मध्ये क्षिप्तेषु सत्सु वै।
ह्येकविंशसहस्राब्देषु पंचमान्त्यकालयोः ॥१५७॥
जिनान्तराणि सर्वाणि पिण्डितानि भवन्ति च।
कोटीकोट्यब्धयः कालसंख्ययात्र जिनेशिनाम् ॥१५८॥
अर्थ (श्लोक 155 से 168): वृषभदेव भगवान् के मोक्ष जाने के बाद अजितनाथ भगवान् मोक्ष गये, इन दोनों तीर्थंकरों के मध्य में जो काल व्यतीत होता है, वही तीर्थंकरों का अन्तरकाल-कहलाता है। प्रथम अन्तर पचास लाख करोड़ सागर तीन वर्ष और साढ़े आठ माह प्रमाण था। इस ऋषभनाथ और अजितनाथ के प्रथम अन्तर के मध्य में अजितनाथ भगवान् की आयु सम्मिलित ही जानना। इसी प्रकार अन्य अन्तरालों में अन्य तीर्थंकरों की आयु भी सम्मिलित है। इसके बाद दूसरे आदि अन्तराल क्रमशः तीस लाख करोड़ सागर, दश लाख करोड़ सागर, नव लाख करोड़ सागर, ९० हजार करोड़ सागर, नव हजार करोड़ सागर, ९०० करोड़ सागर, ९० करोड़ सागर, ९ करोड़ सागर और ६६ लाख २६ हजार एक सौ सागरों से हीन एक करोड़ (३३७३९००) सागर था। इस ग्यारहवें अन्तराल के बाद क्रमशः चौवन सागर, तीस सागर, नौ सागर, चार सागर, पौन पल्य कम तीन सागर, अर्ध पल्य, हजार करोड़ वर्ष कम चौथाई पल्य, हजार करोड़ वर्ष, चौवन लाख वर्ष, छह लाख वर्ष और पाँच लाख वर्ष प्रमाण जिनान्तर जानना चाहिए। इसके बाद तेरासी हजार सात सौ पचास वर्ष और अन्तिम अन्तर दो सौ पचास वर्षों में से तीन वर्ष, साढ़े आठ मास कम अर्थात् दो सौ छियालीस वर्ष तीन मास और एक पक्ष प्रमाण था। इस प्रकार चौबीस तीर्थंकरों का यह पृथक्-पृथक् अन्तरकाल जानना चाहिए। इस उपर्युक्त काल में त्रैलोक्य हितकर्ता, तीन लोक के स्वामी जिनेश्वर भगवान् द्रव्य कर्म, नोकर्म और भाव कर्मों का नाश कर मोक्ष गये। जब चतुर्थ काल के तीन वर्ष, साढ़े आठ मास अवशेष थे तब वीर प्रभु ने मोक्ष प्राप्त किया था। चौबीस जिनेन्द्रों के सम्पूर्ण अन्तर कालों को एकत्रित करके उसमें पंचम और छठे काल के ४२००० वर्ष और मिला देने पर एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण हो जाता है ॥१५५-१६८॥ वृषभनाथ भगवान् के मोक्ष चले जाने पर ५० लाख करोड़ सागर ३ वर्ष ८ १/२ माह व्यतीत हो जाने पर अजितनाथ भगवान् मुक्ति गये। अजितनाथ के मोक्ष जाने के बाद तीस लाख करोड़ सागर का, सम्भवनाथ भगवान् के बाद दश लाख करोड़ सागर का, अभिनन्दन नाथ के जाने पर ९ लाख करोड़ सागर का, सुमतिनाथ के बाद ९० हजार करोड़ सागर का, पद्मप्रभ के बाद नौ हजार करोड़ का, सुपार्श्वनाथ के बाद ९ सौ करोड़ सागर का, चन्द्रप्रभ के बाद ९० करोड़ सागर का, पुष्पदन्त के मोक्ष जाने के बाद ९ करोड़ सागर का, शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद (एक करोड़ सागर) १०००००००-६६२६१०० = ३३७३९०० सागर का, श्रेयांसनाथ भगवान के मोक्ष जाने के बाद ५४ सागर का, वासुपूज्य भगवान् के ३० सागर का, विमलनाथ के ९ सागर का, अनन्तनाथ के चार सागर का, धर्मनाथ के मोक्ष जाने के बाद ३/४ पल्य कम तीन सागर-अर्थात् ३ सागर ३/४ पल्य=२ सागर और ९९९९९९९९९९९९९ १/४ पल्य का, शान्तिनाथ के मोक्ष गमन के बाद अर्ध पल्य का, कुन्थुनाथ के बाद हजार करोड़ वर्ष कम १/४ पल्य (१/४ पल्य - १००० करोड़ वर्ष) का, अरनाथ के एक हजार करोड़ वर्ष का, मल्लिनाथ के ५४००० वर्ष का, मुनिसुव्रतनाथ के ६००००० वर्षों का, नमिनाथ के ५००००० वर्षों का, नेमिनाथ के ८३७५० वर्षों का और पार्श्वनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के बाद तीन वर्ष साढ़े आठ मास कम २५० वर्ष अर्थात् (२५०-३ वर्ष ८ १/२ मास)=२४६ वर्ष, ३ मास और एक पक्ष बाद वीर प्रभु मोक्ष गये अतः यह पार्श्वजिनेन्द्र और वीरजिनेन्द्र इन दोनों के मध्य का अन्तर है। जब वर्धमान स्वामी मोक्ष गये तब चतुर्थकाल के तीन वर्ष ८ १/२ मास अवशेष थे पञ्चम और षष्ठ ये दोनों काल इक्कीस-इक्कीस हजार वर्ष के हैं, इन दोनों का एकत्रित काल ४२००० वर्ष प्रमाण है, जिनेन्द्रों के सर्व अन्तर कालों को एकत्रित करके उसमें दोनों कालों के ४२००० वर्ष जोड़ देने पर एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम का प्रमाण हो जाता है।
पुष्पदन्तस्य कालान्ते धर्मव्युच्छित्तिरंजसा।
पल्यस्यासीच्चतुर्थांशः पल्यार्धं शीतलस्य च ॥१५९॥
श्रेयसः प्रोक्त तीर्थान्ते पादोनपल्यमेव च।
वासुपूज्यस्य पल्यैकं धर्मनाशो द्विधाभवत् ॥१६०॥
पादोनपल्यमिव श्रीविमलस्य जिनान्तरे।
धर्मनाशोऽप्यनन्तस्य पल्यार्धं कालदोषतः ॥१६१॥
धर्मनाथजिनेन्द्रस्य भागे जिनान्तरान्तिमे।
पल्यपादोऽभवद् वक्तृश्रोतृसत्ताद्यऽभावतः ॥१६२॥
अर्थ: पुष्पदन्त भगवान् के काल के अन्त में १/४ पल्य तक धर्म का व्युच्छेद रहा। शीतलनाथ के अन्तराल में अर्धपल्य, श्रेयांसनाथ के तीर्थकाल के अन्त में ३/४ पल्य और वासुपूज्य भगवान् के तीर्थकाल के अन्त में एक पल्य पर्यन्त मुनि और श्रावक इन दोनों प्रकार के धर्म का अभाव रहा। विमल जिनेन्द्र के अन्तर काल के अन्त में ३/४ पल्य तक तथा कालदोष से अनन्तनाथ के तीर्थ में अर्ध पल्य पर्यन्त धर्म का नाश रहा और धर्मनाथ जिनेन्द्र के अन्तरकाल के अन्तिम भाग में १/४ पल्य पर्यन्त वक्ता और श्रोता दोनों का सर्वथा अभाव रहा अर्थात् सुविधिनाथ और शीतलनाथ के अन्तराल में १/४ पल्य तक, शीतलनाथ और श्रेयांसनाथ के अन्तराल में १/२ पल्य तक, श्रेयांस एवं वासुपूज्य के अन्तराल में ३/४ पल्य तक, वासुपूज्य और विमलनाथ के अन्तराल में एक पल्य तक, विमल एवं अनन्तनाथ के अन्तराल में ३/४ पल्य तक, अनन्तनाथ एवं धर्मनाथ के अन्तराल में १/२ और धर्मनाथ एवं शांतिनाथ के अन्तराल में १/४ पल्य तक जैनधर्म का अत्यन्त विच्छेद रहा। अर्थात् चतुर्थकाल में ४ पल्य तक जैन धर्म के अनुयायियों का सर्वथा अभाव रहा ॥१६९-१७२॥
उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यसंख्यातेषु गतेष्वपि।
हुण्डावसर्पिणीकाल इहायाति न चान्यथा ॥१६३॥
तस्यां हुण्डावसर्पिण्यां पंचपाखण्डदर्शनम्।
शलाकापुरुषा ऊनाः सङ्घभेदा अनेकशः ॥१६४॥
जिनशासनमध्ये स्युर्विपरीता मतान्तराः।
चीवराद्यावृता निन्द्याः सग्रन्थाः सन्ति लिङ्गिनः ॥१६५॥
उपसर्गा जिनेन्द्राणां मानभङ्गश्च चक्रिणाम्।
कुदेवमठमूर्त्याद्याः कुशास्त्राणि दुरागमाः ॥१६६॥
दुर्मार्गा गुरवः काम-लालसा दुर्हृदो जनाः।
इत्याद्या अपरेऽनिष्टा जायन्ते बहवोऽशुभाः ॥१६७॥
अर्थ: असंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के व्यतीत हो जाने पर इह अर्थात् भरतैरावत क्षेत्रों में एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है, इसके पूर्व नहीं आता। इस हुण्डावसर्पिणी काल में पाँच प्रकार के पाखण्डों के दर्शन होते हैं। शलाका पुरुष कम अर्थात् ६३ न होकर ५८ होते हैं। जिनशासन के मध्य भी मूलसंघ, काष्ठासंघ आदि अनेक भेद हो जाते हैं। जैनधर्म से अत्यन्त विपरीत प्रवृत्ति वाले अनेक मतान्तरों का जन्म हो जाता है। वस्त्र आदि से युक्त तथा परिग्रह से युक्त अनेक निन्दनीय लिंग को धारण करने वाले साधु बहुत होते हैं। तीर्थंकरों पर उपसर्ग और चक्रवर्ती का मानभंग होता है। खोटे देवों के मठ तथा उनकी मूर्तियाँ, खोटे शास्त्र, खोटा आगम, खोटे मार्ग पर चलने वाले गुरु और काम आदि लालसा से युक्त तथा अत्यन्त दयनीय दशा को प्राप्त मनुष्य बहुत होते हैं। इस प्रकार और भी अनेक प्रकार के अनिष्ट और अशुभ कार्य आदि इस काल में स्वयमेव उत्पन्न होते हैं ॥१७३-१७७॥
प्रथमो भरतश्चक्री सगरो मधवाह्वयः।
सनत्कुमारचक्रेशः शान्तिकुन्थ्वरचक्रिणः ॥१६८॥
सुभौमश्च महापद्मो हरिषेणो जयोऽन्तिमः।
ब्रह्मदत्तोद्विषट् ह्येते हेमाभाः सन्ति चक्रिणः ॥१६९॥
भरतस्य समुत्सेधो धनुः पंचशतप्रमः।
आयुश्चतुरशीतिश्च पूर्वलक्षाण्यखण्डितम् ॥१७०॥
उन्नतिः सगरेशस्य सार्धशतचतुष्टयम्।
चापानां पूर्वलक्षाण्यायुर्द्विसप्ततिरेव च ॥१७१॥
उच्छ्रितिर्मघवाख्यस्य धनुः सार्धद्विसंयुता।
चत्वारिंशत्प्रमायुश्च पंचलक्षाब्द सम्मितम् ॥१७२॥
कायोत्तुङ्गश्च सार्धैक चत्वारिंशद्धनुः प्रमः।
आयुर्वर्षत्रिलक्षाणि सनत्कुमारचक्रिणः ॥१७३॥
शान्तेर्देहोन्नतिश्चत्वारिंशच्चापानि निश्चितम्।
आयुर्वत्सरलक्षैकं जिनकामपदेशिनः ॥१७४॥
कुन्थोः शरीरतुङ्गोऽस्ति पंचत्रिंशद्धनुः प्रमः।
आयुर्वर्षसहस्राणि पंचाग्रनवतिः परम् ॥१७५॥
अरस्य वपुरुत्सेधो भवेत् त्रिंशद्धनुः प्रमः।
आयुश्चतुरशीतिश्चाब्दसहस्राण्यखण्डितम् ॥१७६॥
सुभौमस्योच्छ्रितिश्चापान्यष्टाविंशतिरेव च।
आयुः षष्टिसहस्राणि वर्षाणां खण्डवर्जितम् ॥१७७॥
महापद्मस्य चोत्सेधो द्वाविंशतिधनुः प्रमः।
आयुस्त्रिंशत्सहस्राणि वत्सराणां परं ततः ॥१७८॥
प्रोन्नतिर्हरिषेणस्य चापविंशतिसम्मिता।
आयुर्दशसहस्राणि वर्षाणां चक्रवर्तिनः ॥१७९॥
जयस्य वपुरुत्तुङ्गो धनुः पञ्चदशप्रमः।
आयुः सम्वत्सराणां च त्रिसहस्त्राणि चक्रिणः ॥१८०॥
उत्सेधो ब्रह्मदत्तस्य चापसप्तप्रमाणकः।
आयुः सप्तशतान्येव वर्षाणां रत्नभोगिनः ॥१८१॥
अर्थ (श्लोक 178 से 191): चतुर्थकाल में (१) भरत, (२) सगर, (३) मघवान्, (४) सनत्कुमार, (५) शान्तिजिन, (६) कुन्थुजिन, (७) अरजिन, (८) सुभौम, (९) महापद्म, (१०) हरिषेण, (११) जय और अन्तिम (१२) ब्रह्मदत्त ये बारह चक्रवर्ती हुए हैं। इन सर्व चक्रवर्तियों के शरीर की आभा स्वर्ण वर्ण के सदृश थी। भरत चक्रवर्ती के शरीर का उत्सेध ५०० धनुष और आयु ८४००००० पूर्व की थी। सगर चक्रवर्ती का उत्सेध ४५० धनुष और आयु ७२००००० पूर्व की थी। मघवा का उत्सेध ४२ १/२ धनुष और आयु ५००००० वर्ष की थी। सनत्कुमार चक्रवर्ती का उत्सेध ४१ १/२ धनुष और आयु ३००००० वर्ष की थी। शान्तिनाथ का उत्सेध ४० धनुष और आयु १००००० वर्ष की थी, ये चक्रवर्ती, तीर्थंकर और कामदेव इन तीन पदों के धारी थे। कुन्थुनाथ का उत्सेध ३५ धनुष और आयु ९५००० वर्ष प्रमाण थी (आप भी तीन पदधारी थे)। अरनाथ का उत्सेध ३० धनुष और आयु ८४००० वर्ष की थी। सुभौम चक्रवर्ती का उत्सेध २८ धनुष और आयु ६०००० वर्ष प्रमाण थी। महापद्म का उत्सेध २२ धनुष और आयु ३०००० वर्ष की थी। हरिषेण का उत्सेध २० धनुष और आयु १०००० वर्ष की थी। जय चक्रवर्ती का उत्सेध १५ धनुष और आयु ३००० वर्ष प्रमाण थी। अन्तिम चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त का उत्सेध ७ धनुष प्रमाण और आयु ७०० वर्ष प्रमाण थी, ये सभी चौदह रत्नों के भोक्ता हुए हैं ॥१७८-१९१॥
काले प्रवर्त्तमानेऽभूद् भरतो वृषभस्य च।
सगरोऽजितनाथस्य वर्तमानस्य सम्प्रति ॥१८२॥
सञ्जातौ मघवाभिख्यसनत्कुमारचक्रिणौ।
जिनान्तरेऽत्र धर्मस्य चक्रिणः स्युर्जिनास्त्रयः ॥१८३॥
सुभौमचक्रभृज्जातोऽत्रारनाथजिनान्तरे ।
महापद्मसमुत्पन्नो मल्लिनाथजिनान्तरे ॥१८४॥
चक्रीशो हरिषेणो मुनिसुव्रतजिनान्तरे।
अभूच्चक्री जयाख्यश्च नमिनाथजिनान्तरे ॥१८५॥
ब्रह्मदत्ताह्वयो जातो नेमीशस्य जिनान्तरे।
इति चक्राधिपा जाता जिनकाले जिनान्तरे ॥१८६॥
अर्थ: वृषभनाथ तीर्थंकर के काल में भरत चक्रवर्ती और अजितनाथ के काल में सगर चक्रवर्ती हुए थे। मघवा और सनत्कुमार ये दो चक्रवर्ती धर्मनाथ और शान्तिनाथ के अन्तराल में, शान्ति, कुन्थु और अरनाथ ये तीन चक्रवर्ती स्वयं जिन थे। सुभौम चक्री, अरनाथ और मल्लिनाथ के अन्तराल में, महापद्म चक्रवर्ती मल्लिनाथ और मुनिसुव्रत के अन्तराल में, हरिषेण चक्रवर्ती मुनिसुव्रत और नमिनाथ के अन्तराल में उत्पन्न हुए थे। जय चक्री नमि और नेमिनाथ के अन्तराल में तथा ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती नेमिनाथ और पार्श्वनाथ के अन्तराल में उत्पन्न हुए थे, इस प्रकार बारह चक्रवर्तियों में से कोई तो जिनेन्द्र के काल में और कोई अन्तराल में उत्पन्न हुए थे ॥१९२-१९६॥
सुभौमब्रह्मदत्ताख्यौ बह्वारम्भपरिग्रहैः।
जात पापैर्विना धर्मं सप्तमं नरकं गतौ ॥१८७॥
चक्रेशौ मधवाभिख्यसनत्कुमारसंज्ञकौ।
सनत्कुमारकल्पं च जग्मतुर्व्रतपुण्यतः ॥१८८॥
शेषाष्टचक्रिणो हत्वा तपो ध्यानासिना बलात्।
कृत्स्नकर्मरिपून् जग्मुर्मोक्षं रत्नत्रयाङ्किताः ॥१८९॥
अर्थ: सुभौम और ब्रह्मदत्त ये दो चक्रवर्ती बहुत प्रारम्भ और बहुत परिग्रह से उपार्जित पाप के कारण धर्म भावना से रहित होते हुए सप्तम नरक में गये हैं। मधवा और सनत्कुमार नाम के दो चक्रवर्ती व्रत और धर्म (पुण्य) के प्रभाव से सनत्कुमार स्वर्ग में गये हैं। रत्नत्रय से अलंकृत शेष आठ चक्रवर्ती तप एवं ध्यानरूपी तलवार के बल से सम्पूर्ण कर्मरूपी शत्रुओं का नाश करके मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं ॥१९७-१९९॥
अङ्गोन्नतिश्च पद्मस्य दशदण्डप्रमा मता।
आयुर्वर्षाणि च द्वादशशतप्रमितान्यपि ॥१९०॥
अर्थ: विजय, अचल, धर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नन्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म ये बलदेव हैं। विजय बलदेव का उत्सेध ८० धनुष और आयु ८७ लाख वर्ष की थी। अचल का उत्सेध ७० धनुष और आयु ७७ लाख वर्ष, धर्म का उत्सेध ६० धनुष और आयु ६७ लाख वर्ष, सुप्रभ का उत्सेध ५० धनुष और आयु ३७ लाख वर्ष, सुदर्शन का उत्सेध ४५ धनुष और आयु १० लाख वर्ष, नन्दी बलदेव का उत्सेध २९ धनुष और आयु ६७ हजार वर्ष, नन्दिमित्र का उत्सेध २२ धनुष और आयु ३७ हजार वर्षा, राम बलदेव का उत्सेध, १६ धनुष और आयु १७ हजार वर्ष तथा नवमें बलभद्र पद्म का उत्सेध १० धनुष और आयु १२०० वर्ष प्रमाण थी ॥२००-२०९॥
पद्मोऽन्तिमो गतो ब्रह्मस्वर्गसोऽप्यमरस्ततः।
कृष्णं तीर्थेशमभ्येत्य मोक्षं यास्यति दीक्षया ॥१९१॥
अर्थ: सर्व बलभद्रों के, देवों द्वारा रक्षित गदा, रत्नमाला, मूसल और उत्कृष्ट हल ये चार रत्न, दिव्य रूप को धारण करने वालीं आठ-आठ हजार रानियाँ तथा उपमा रहित और भी अन्य बहुत सम्पत्तियाँ होती हैं। सभी बलदेवों के दिव्य शरीर की आभा कुन्द पुष्प एवं चंद्रमा सदृश होती है। धर्म स्वभावी, शुभ चित्त वाले सभी बलदेवों की स्वभावतः ऊर्ध्वगति ही होती है। विजयादि आठ बलभद्र तप एवं ध्यानरूपी शस्त्रों के बल से द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मों का नाश कर सुख की भूमि स्वरूप मोक्ष पद को प्राप्त हुए, अन्तिम बलभद्र पद्म ब्रह्मस्वर्ग में देव हुए हैं। कृष्ण नारायण का जीव जब तीर्थंकर होगा तब ये भी दीक्षा धारण करके मोक्ष प्राप्त करेंगे ॥२१०-२१४॥
नेमिनाथस्य कालेऽभूत्पद्मः प्रवर्तमानकः।
इत्यत्रोत्पत्तिकालाः स्युर्बलभद्रादिभूभृताम् ॥१९२॥
अर्थ: विजय नामक प्रथम बलदेव श्रेयांसनाथ स्वामी के विद्यमान काल में, अचल बलभद्र वासुपूज्य स्वामी के काल में, धर्म बलभद्र विमलनाथ स्वामी के काल में, सुप्रभ अनन्तनाथ स्वामी के काल में और सुदर्शन बलदेव धर्मनाथ स्वामी के विद्यमान काल में उत्पन्न हुए थे। नन्दी बलदेव अरनाथ स्वामी के अन्तरकाल में, नन्दिमित्र मल्लिनाथ स्वामी के अन्तर काल में और राम मुनिसुव्रतनाथ के अन्तर काल में उत्पन्न हुए थे तथा अन्तिम बलभद्र-पद्म, नेमिनाथ स्वामी के विद्यमान काल में उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार यहाँ बलभद्र आदि राजाओं के उत्पत्ति काल हैं ॥२१५-२१९॥
व्रतशीलतपोहीनाः पञ्चाक्षसुखलोलुपाः।
उल्लसत्कृष्णवर्णाङ्गा-बलाङ्गोच्चसमोन्नताः ॥१९३॥
अर्थ: १ त्रिपृष्ठ, २ द्विपृष्ठ, ३ स्वयम्भू, ४ पुरुषोत्तम, ५ पुरुषसिंह, ६ (पुरुष) पुण्डरीक, ७ (पुरुष) दत्त, ८ लक्ष्मण और ९ कृष्ण ये नव वासुदेव स्वभावतः रौद्र परिणामी, व्रत, शील एवं तप से हीन, पंचेन्द्रिय सुखों के लोलुपी तथा भरतक्षेत्र में आर्यखण्ड आदि तीन खण्डों के अधिपति हुए हैं। इन सभी के शरीरों का वर्ण कृष्ण एवं उत्सेध बलदेवों के सदृश अर्थात् क्रमशः ८०, ७०, ६०, ५०, ४५, २९, २२, १६ और १० धनुष प्रमाण था ॥२२०-२२२॥
कृष्णस्य वासुदेवस्य सहस्त्रवर्षजीवितम् ।
इत्यत्र वासुदेवानां सन्त्यायूंषि क्रमात् तथा ॥१९४॥
अर्थ: प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ की आयु ८४ लाख वर्ष की, द्विपृष्ठ की ७२ लाख वर्ष की, स्वयम्भू की ६० लाख वर्ष की, पुरुषोत्तम की ३० लाख वर्ष की, पुरुषसिंह की १० लाख वर्षा की, पुण्डरीक की ६५००० वर्षा की, दत्त नारायण की ३२००० वर्ष की, लक्ष्मण की १२००० वर्ष की और अन्तिम वासुदेव कृष्ण की आयु १००० वर्षा प्रमाण थी। इस प्रकार वासुदेवों की यह आयु क्रम से होती है ॥२२३-२२७॥
अमीषां वासुदेवानां सर्वेषां भूतयोऽपराः ।
गजादिगोचरा बह्वयो विज्ञेया आगमे बुधैः ॥१९५॥
अर्थ: प्रत्येक नारायण के पास देव समूह के द्वारा रक्षित धनुष, शंख, गदा, चक्र, दण्ड, असि, और शक्ति ये सात रत्न एवं दिव्य रूप को धारण करने वाली सोलह हजार श्रेष्ठ रानियाँ होती हैं तथा मुकुटबद्ध सोलह हजार राजा इनकी सेवा करते हैं। इन सभी वासुदेवों के अन्य बहुत जनसमुदाय एवं हाथी घोड़े आदि होते हैं, जो विद्वानों के द्वारा आगम से जानने योग्य हैं ॥२२७-२३०॥
दत्तोऽगात् पंचमीं चान्ते चतुर्थीं लक्ष्मणः क्षितिम् ।
तृतीयां पृथिवीं कृष्णः स्वकर्मवशगो विधिः ॥१९६॥
अर्थ: महत्पाप के भार से प्रथम नारायण त्रिपृष्टि सप्तम नरक, द्विपृष्ट, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह और पुण्डरीक ये पाँच नारायण अर्थात् अर्धचक्रवर्ती अशुभ योग एवं व्रतरहित होने से छठे नरक, दत्तनारायण पाँचवें नरक, लक्ष्मण चौथे नरक और कृष्ण नारायण अपने स्वकर्म के वशीभूत होते हुए तीसरे नरक गये हैं ॥२३१-२३३॥
अश्वग्रीवादयोऽष्टाष्टौ तेषां मध्ये वियच्चराः ।
सन्त्यर्ध चक्रिणोऽन्त्यः स्याज्जरासंघो महीचरः ॥१९७॥
अर्थ: अश्वग्रीव, तारक, मेरक, निशुम्भ, कैटभ, मधुसूदन, बलिहन्ता, रावण और जरासिन्ध नाम के ये नौ अर्धचक्री प्रतिवासुदेव हैं। ये प्रतिवासुदेव राजा वासुदेवों के शत्रु होते हैं। इनके शरीर की कान्ति श्याम वर्ण एवं उत्सेध बलदेवों के उत्सेध सदृश होता है। ये स्वभाव से रौद्र परिणामी, गर्व युक्त और उद्धत प्रकृति के होते हैं। इनमें से अश्वग्रीव आदि आठ प्रतिनारायण विद्याधर हैं और अन्तिम अर्धचक्री जरासिन्ध भूमिगोचरी हैं ॥२३४-२३७॥
चतुर्दशसहस्राब्दान्यायुश्च रावणस्य वै।
जरासिन्धुनृपस्यायुः सहस्रवत्सरप्रमम् ॥२००॥
त्रिखण्डस्वामिनोऽप्येते बह्वारम्भधनार्जनैः।
अतीव विषयासक्त्योपार्ज्य पापं महत्परम् ॥२०१॥
धर्मादृतेनैवागुस्ताः पृथ्वीर्दुःखपूरिताः।
रौद्रध्यानेन मृत्वा या वासुदेवा गता नव ॥२०२॥
वासुदेवप्रक्षिप्तेन स्वचक्रेणाखिला अमी।
अवश्यं मरणं प्राप्य श्वभ्रं यान्ति न चान्यथा ॥२०३॥
शलाकापुरुषा एते त्रिषष्टिसंख्यकाः परे।
तुर्यकालेऽत्र जायन्ते नृपदेवखगार्चिताः ॥२०४॥
अर्थ: अश्वग्रीव आदि पाँच प्रतिवासुदेवों की आयु त्रिपृष्ठि आदि पाँच वासुदेवों के सदृश ही है। अर्थात् क्रमशः ८४ लाख वर्ष, ७२ लाख वर्ष, ६० लाख वर्ष, ३० लाख वर्ष और १० लाख वर्ष प्रमाण है। छठवें मधुसूदन प्रतिवासुदेव की ५० हजार वर्ष, बलि की ३२००० वर्ष, रावण की १४००० वर्ष और नवमें प्रतिवासुदेव जरासिन्ध की आयु १००० वर्ष प्रमाण थी। ये सब तीन खण्ड के स्वामी बहु आरम्भ, परिग्रह एवं धनार्जन के द्वारा तथा अत्यन्त विषयासक्ति से अति महान् पाप का उपार्जन करके धर्म के बिना, रौद्र ध्यान से मरण कर दुःख पूरित जिस-जिस नरक पृथ्वी में नव वासुदेव जाते हैं, उसी पृथ्वी को ये प्राप्त होते हैं। ये सभी प्रतिवासुदेव अपना चक्र वासुदेव पर छोड़ते हैं पश्चात् वासुदेव के द्वारा छोड़े हुए उसी चक्र से ये अवश्यमेव मृत्यु को प्राप्त होकर नरक जाते हैं। अन्य और किसी गति को प्राप्त नहीं होते। यहाँ चतुर्थकाल में नरेन्द्रों, देवों एवं विद्याधरों से पूजित ये त्रेसठ शलाका के पुरुष उत्पन्न होते हैं ॥२३८-२४४॥
भीमो बलिर्जितारिश्च विश्वानलाह्वयस्ततः।
सुप्रतिष्ठोऽचलाभिख्यः पुण्डरीकोऽजितन्धरः ॥२०५॥
जितनाभिस्ततः पीठः सात्वकीतनयोऽप्यमी।
व्रतभ्रष्टात्मजारुद्रा भवन्त्येकादशाशुभाः ॥२०६॥
भीमस्याङ्गसमुत्सेधो धनुः पञ्चशतानि च।
त्र्यशीतिलक्षपूर्वाण्यायुर्दीक्षापतितात्मनः ॥२०७॥
उच्छ्रितिश्च बलेश्चापसार्धचतुःशतप्रमा।
एकसप्ततिलक्षाणि पूर्वाणामायुरञ्जसा ॥२०८॥
जितारेर्वपुरुत्सेधो धनुःशतप्रमाणकः।
आयुर्द्विलक्षपूर्वाणि चारित्रचलितात्मनः ॥२०९॥
विश्वानलस्य देहोच्चो धनुर्नवतिसम्मितः ।
आयुर्लक्षैकपूर्वाणि भ्रष्टरत्नत्रयात्मनः ॥२१०॥
सुप्रतिष्ठस्य कायोच्चश्चापाशीतिप्रमो मतः ।
लक्षाश्चतुरशीतिश्च वर्षाणामायुरुत्तमम् ॥२११॥
देहोत्सेधोऽचलस्यास्ति दण्डसप्ततिमानकः ।
आयुश्च षष्टिलक्षाणि वत्सराणां चलात्मनः ॥२१२॥
उन्नतिः पुण्डरीकस्य षष्टिचापप्रमा स्मृता ।
पञ्चाशल्लक्षवर्षायुस्त्यक्तदीक्षात्मजात्मनः ॥२१३॥
तुङ्गोऽजितन्धरे कायः पंचाशद्दण्डमानकः ।
आयुर्वर्षाणि चत्वारिंशल्लक्षप्रमितानि च ॥२१४॥
उच्छ्रितिर्जितनाभेश्चाष्टाविंशतिधनुःप्रमा ।
आयुर्विंशतिलक्षाणि वर्षाणां चंचलात्मनः ॥२१५॥
चतुर्विंशतिचापानि पीठस्याङ्गसमुन्नतिः ।
आयुश्च लक्षवर्षाणि व्रतशीलच्युतस्य वै ॥२१६॥
सात्वकीतनयस्याङ्गोत्सेधः सप्तकरप्रमः ।
जीवितं त्यक्तवृत्तस्य वर्षाण्येकोनसप्तति ॥२१७॥
अर्थ: १ भीम, २ बलि, ३ जितारि, ४ विश्वानल, ५ सुप्रतिष्ठ, ६ अचल, ७ पुण्डरीक, ८ अजितन्धर, ९ जितनाभि, १० पीठ और ११ सात्विकीतनय ये ११ रुद्र अशुभ चित्तवृत्ति के धारी और चारित्र से भ्रष्ट होने वालों के पुत्र हैं। प्रथम रुद्र भीम का उत्सेध ५०० धनुष और आयु ८३ लाख पूर्व की थी, यह दीक्षा से च्युत होने वाले मुनि आर्यिका की सन्तान है। बलिरुद्र का उत्सेध ४५० धनुष और आयु ७१ लाख पूर्व की थी। जितारि का उत्सेध १०० धनुष और आयु दो लाख पूर्व की थी, यह भी चारित्र भ्रष्ट होने वालों का पुत्र है। विश्वानल के देह की ऊँचाई ९० धनुष और आयु एक लाख पूर्व की थी। यह भी रत्नत्रय से भ्रष्ट होने वालों का पुत्र है। सुप्रतिष्ठ का उत्सेध ८० धनुष और आयु ८४ लाख वर्ष की थी। अचल रुद्र का उत्सेध ७० धनुष और आयु ६० लाख वर्ष की थी, इसके माता-पिता भी चारित्ररूपी रत्न को नष्ट करने वाले थे। दीक्षा लेकर जो भ्रष्ट हो चुके थे ऐसे मुनि आर्यिका से उत्पन्न होने वाले पुण्डरीक रुद्र का उत्सेध ६० धनुष और आयु ५० लाख वर्ष की थी। अजितन्धर रुद्र का उत्सेध ५० धनुष और आयु ४० लाख वर्ष की थी। चारित्र से चलायमान हो चुकी थी आत्मा जिनकी, ऐसे मुनि आर्यिका से उत्पन्न जितनाभि रुद्र का उत्सेध २८ धनुष और आयु २० लाख वर्ष प्रमाण थी। व्रत और शील से च्युत मुनि, आर्यिका से उत्पन्न होने वाले पीठ रुद्र का उत्सेध २४ धनुष और आयु एक लाख वर्ष प्रमाण थी। अपने जीवनकाल में ही चारित्र को छोड़ देने वाले मुनि आर्यिका से उत्पन्न हुए सात्विकीतनय रुद्र का उत्सेध सात हाथ प्रमाण और आयु ६९ वर्ष प्रमाण थी ॥२४५- २५७॥
जातौ नाभेयकाले द्वावेतौ भीमवली भुवि।
पुष्पदन्तस्य कालेऽभूज्जतारिः श्रीजिनेशिनः ॥२१८॥
रुद्रो विश्वानलो जातः काले श्रीशीतलस्य च।
श्रेयसो वर्तमाने काले सुप्रतिष्ठसंज्ञकः ॥२१९॥
वासुपूज्यस्य काले प्रवर्तमानेऽचलोऽभवत्।
काले विमलनाथस्य पुण्डरीको बभूव च ॥२२०॥
काले विहरमाणस्यानन्तस्यात्राजितन्धरः।
धर्मनाथस्य कालेऽभूज्जतनाभिसमाह्वयः ॥२२१॥
शान्तेः प्रवर्तमानस्य काले पीठाभिधोऽभवत्।
सात्वकीतनयो जातः काले वीरस्य सम्प्रति ॥२२२॥
अर्थ: पुष्पदन्त जिनेन्द्र के काल में जितारि रुद्र, शीतलनाथ के काल में विश्वानल, श्रेयांसनाथ के काल में सुप्रतिष्ठ नाम के रुद्र हुए हैं। वासुपूज्य भगवान् के काल में अचलरुद्र, विमलनाथ के काल में पुण्डरीक, अनन्तनाथ के काल में अजितन्धर, धर्मनाथ के काल में जितनाभि, शान्तिनाथ के काल में पीठ रुद्र और वीर प्रभु के काल में सात्विकीतनय नामक रुद्र उत्पन्न हुए हैं ॥२५८-२६२॥
रुद्रा रौद्राशया एते दीक्षापतितसूनवः।
विद्यानुवादपाठेन प्राप्तविद्याश्चलात्मकाः ॥२२३॥
विषयासक्तदुर्बुद्ध्या त्यक्तदृग्ज्ञानसंयमाः।
दीक्षाभङ्गमहापापैर्ययुः श्वभ्रं यथोचितम् ॥२२४॥
द्वौ भीमबलिसंज्ञौ च नरकं सप्तमं गतौ।
दीक्षाभङ्गाज्जतारिश्च रुद्रो विश्वानलाख्यकः ॥२२५॥
सुप्रतिष्ठोऽचलः पुण्डरीको रुद्रा इमेऽखिलाः।
पञ्च श्वभ्रं ययुः षष्ठं रत्नत्रयतपोत्ययात् ॥२२६॥