सिद्धान्तसार दीपक (आचार्य सकलकीर्ति), हिन्दी अनुवाद सहित | Siddhantsar Deepak (Acharya Sakalkirti)

सिद्धान्तसार दीपक (आचार्य सकलकीर्ति), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य सकलकीर्ति
अपर नाम: त्रिलोकसार दीपक
हिन्दी अनुवाद: आर्यिका विशुद्धमति
सम्पादन: डॉ॰ चेतनप्रकाश पाटनी
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

लोकानुयोग का ग्रन्थ: लोक का आकार, अधोलोक और नरक, मध्यलोक, जम्बूद्वीप, विदेह क्षेत्र, अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल, जीवों के भेद, चार प्रकार के देव तथा पल्य आदि प्रमाणों का वर्णन, १६ अधिकारों में। बड़ी फाइल होने से PDF तीन भागों में है।

Siddhantsar Deepak (also Trilokasar Deepak) by Acharya Sakalkirti: a Lokanuyog text on the structure of the universe, with Hindi translation by Aryika Vishuddhamati. The PDF is in three parts.


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प्रथम अधिकार लोकनाड़ी का स्वरूप

श्रीमन्तं त्रिजगन्नाथं सर्वज्ञं सर्वदर्शिनम्।
सर्वयोगीन्द्रवन्द्याङ्घ्रि वन्दे विश्वार्थदीपकम् ॥१॥

अर्थ: जो अनन्त चतुष्टयरूप अन्तरंग और अष्ट प्रातिहार्यरूप बहिरंग लक्ष्मी से युक्त हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं, समस्त योगिराजों के द्वारा जिनके चरण वन्दनीय हैं तथा जो विश्व के पदार्थों को प्रकाशित करने के लिये दीपक हैं ऐसे तीन लोक के नाथ जिनेन्द्र भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥


दिव्येन ध्वनिना येन कालादौ धर्मवृत्तये।
लोकालोकपदार्थौघा विश्वतत्त्वादिभिः समम् ॥२॥

प्रोक्ता आर्यगणेशादीनग्रजं तं जिनेशिनाम्।
विश्वार्च्यं विश्वकर्तारं धर्मचक्राधिपं स्तुवे ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): जिन्होंने युग के प्रारम्भ में (तृतीय काल के अन्त में) धर्म की प्रवृत्ति चलाने के लिये दिव्यध्वनि के द्वारा आर्यगणधरादिकों को समस्त तत्त्वों के साथ लोक, अलोक के पदार्थ समूह का उपदेश दिया था, जो अन्य तेईस तीर्थंकरों के अग्रज थे, विश्व के द्वारा पूजनीय थे, कर्मभूमि की व्यवस्था करने से विश्व के कर्ता और धर्म चक्र के अधिपति थे उन प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव की स्तुति करता हूँ ॥२-३॥


प्रीणयित्वा जगद्भव्यान् यो ज्ञानामृतवर्षणैः।
विश्वमुद्योतयामास कृत्स्नाङ्गपूर्वभाषणैः ॥४॥

जगदानन्दकर्तारं धर्मामृतपयोधरम्।
नौमि चन्द्रप्रभं तं च योगिज्योतिर्गणावृतम् ॥५॥

अर्थ (श्लोक 4 से 5): जिन्होंने ज्ञानरूप अमृत की वर्षा से जगत् के भव्यजीवों को सन्तुष्ट किया, सम्पूर्ण अंग और पूर्व के व्याख्यानों द्वारा जगत् को प्रकाशित किया, जो सर्व प्रकार से जगत् में आनन्द के कर्ता एवं धर्मामृत को बरसाने के लिये मेघ स्वरूप हैं तथा जो योगिराजस्वरूप ज्योतिष्क देवों से सदा घिरे रहते हैं ऐसे उन चन्द्रप्रभ भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥४-५॥


यो दिव्यध्वनिनोच्छिद्य मोहस्मराक्षतस्करान्।
कषायशत्रुभिः सार्द्धं व्यधाच्छान्तिं जगत्सताम् ॥६॥

तं कामचक्रितीर्थेश-पदत्रितयभागिनम्।
अनन्तर्द्धिगुणाम्भोधिं स्तौमि कर्मारिशान्तये ॥७॥

अर्थ (श्लोक 6 से 7): जिन्होंने अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा जगत् के भव्य जीवों के कषायरूप शत्रुओं के साथ साथ काम, मोह और इन्द्रियरूप चोरों का विनाश किया और उन्हें शान्ति प्रदान की तथा जो कामदेव, चक्रवर्ती एवं तीर्थंकर इन तीन पदों के भोक्ता हुए हैं, जो अनन्त ऋद्धियों एवं गुणों के समुद्र हैं ऐसे उन सोलहवें तीर्थंकर श्री शान्तिनाथ भगवान् को मैं अपने ज्ञानावरणादि रूप कर्मशत्रुओं का विनाश करने के लिये नमस्कार करता हूँ ॥६-७॥


मोहकामाक्षशत्रूणां भङ्क्त्वा बाल्येऽपि यो मुखम्।
वैराग्यज्ञानमुत्पाद्य दुर्लभां संयमश्रियम् ॥८॥

गृहीत्वाहत्य कर्मारीन् शुक्लध्यानासिनाकरोत्।
मुक्तिस्त्रीं स्ववशे नौमि नेमिनाथं तमूर्जितम् ॥९॥

अर्थ (श्लोक 8 से 9): बाल्य अवस्था में ही जिन्होंने मोह, काम और इन्द्रिय रूप शत्रुओं का मुख तोड़ कर वैराग्य और ज्ञान के बल पर दुर्लभ संयमरूपी लक्ष्मी को धारण किया, शुक्लध्यानरूप तलवार से जिन्होंने कर्म शत्रुओं का सर्वथा विनाश कर मुक्तिरूपी स्त्री को अपने स्वाधीन बना लिया है उन विशिष्ट बलशाली नेमिनाथ भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥८-९॥


जित्वा यो ध्यानयोगेन वैरिदेवकृतान् परान्।
घोरोपसर्गजालांश्च महावाताम्बुवर्षणैः ॥१०॥

चकार केवलज्ञानं व्यक्तं विश्वाग्रदीपकम्।
स विश्वविघ्नहन्ता मे पार्श्वोऽस्तु विघ्नहानये ॥११॥

अर्थ (श्लोक 10 से 11): जिन्होंने अपने वैरी देव (कमठ के जीव) द्वारा प्रचण्ड वायु और वर्षाजन्य किये गये भयंकर उपसर्गों को अपने ध्यान के प्रभाव से जीतकर, तीन काल की पर्यायों से युक्त, समस्त द्रव्यों को प्रकाशित करने वाले केवलज्ञान को व्यक्त (प्राप्त) किया है, जिनके प्रभाव से संसार के समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं, ऐसे पार्श्वनाथ भगवान् मेरे विघ्नों की शान्ति करने वाले हों अर्थात् इस ग्रन्थ के निर्माण (या टीका) करने में आने वाले मेरे सम्पूर्ण विघ्नों को नष्ट करें ॥१०-११॥


येनोदितो द्विधा धर्मो यतिश्रावकसज्जनैः।
विश्वतत्त्वार्थसिद्धान्तैः सममद्यापि वर्तते ॥१२॥

स्थास्यत्यग्रे च कालान्तं स्वर्मुक्तिश्रीसुखप्रदम्।
वर्धमानं तमीडेऽहं वर्धमानगुणार्णवम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 12 से 13): जिन वर्धमान जिनेन्द्र ने श्रावक और मुनिधर्म के भेद से दो प्रकार के धर्मों का प्रतिपादन किया था वह सात तत्त्व और नव पदार्थ रूप सिद्धान्त के साथ आज भी विद्यमान है और आगे भी इस काल के अन्तपर्यन्त विद्यमान रहेगा, ऐसे स्वर्ग और मोक्ष के सुख प्रदान करने वाले उन वर्धमान गुणशाली श्री वर्धमान प्रभु की मैं स्तुति करता हूँ ॥१२-१३॥


शेषा ये तीर्थकर्तारो महान्तो धर्मचक्रिणः।
विश्वार्च्या धर्मराजा वा त्रिजगद्धितकारिणः ॥१४॥

लोकोत्तमाः शरण्याश्च विश्वमाङ्गल्यदायिनः।
तेषां पादाम्बुजान् स्तौमि जगद्वन्द्यांस्तदृद्धये ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 14 से 15): शेष जो और तीर्थंकर हैं वे भी अन्तरंग बहिरंग लक्ष्मी के अधिपति होने से महान् हैं, धर्मचक्र के प्रवर्तक हैं, विश्वपूज्य एवं धर्म के सञ्चालक हैं, जो लोक में उत्तम एवं शरणभूत हैं, विश्व के पापहर्ता और सुख के दाता हैं ऐसे तीन लोकों के हितकारक उन समस्त तीर्थंकरों के जगद्वन्दनीय चरणों की मैं उनकी ऋद्धि प्राप्ति के निमित्त स्तुति करता हूँ ॥१४-१५॥


द्वीपेष्त्वर्धतृतीयेषु ये श्रीसीमन्धरादयः।
गणैर्वृताजिनाधीशा मुक्तिमार्गं च निस्तुषम् ॥१६॥

प्रवर्तयन्ति सद्धर्मं सर्वाङ्गार्थादिभाषणैः।
वर्तमानाः सुरार्च्यास्ते स्तुता मे सन्तु सिद्धये ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 16 से 17): इस समय अढ़ाई द्वीप में गणधरादिकों के द्वारा पूजनीय विद्यमान सीमन्धर आदि तीर्थंकर हैं जो कि निष्कलंक मुक्ति मार्ग का प्रवर्तन कर रहे हैं, सम्पूर्ण (१२) अंगों एवं सात तत्त्व, नौ पदार्थ आदि के उपदेशों द्वारा सद्धर्म का प्रचार कर रहे हैं तथा देव जिनकी पूजा करते रहते हैं, मैं सिद्धि प्राप्ति की कामना से उनकी स्तुति करता हूँ ॥१६-१७॥


अन्ये तीर्थकृतो वा ये कालत्रितय सम्भवाः।
ते मया संस्तुता वन्द्या मे प्रदद्युर्निजान् गुणान् ॥१८॥

अर्थ: इसी प्रकार त्रिकालवर्ती और भी जो तीर्थंकर हैं मैं उन सबकी वन्दना करता हूँ। स्तुति करता हूँ। वे मुझे अपने सम्यग्दर्शनादि सद्गुणों को प्रदान करें। अर्थात् जो गुण उनमें प्रकट हो चुके हैं वे गुण मेरे में भी प्रकट हो जावें ऐसी भावना से मैं उनकी वन्दना और स्तुति करता हूँ ॥१८॥


अष्टकर्मारिकायादीन् ये महाध्यानयोगतः।
त्यक्त्वानन्तसुखोपेतं त्रैलोक्यशिखरं ययुः ॥१९॥

ताननन्तान् महासिद्धां-स्त्रिजगन्नाथवन्दितान्।
ध्येयानष्टगुणाधीशान् स्मरामि हृदि सिद्धये ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 19 से 20): जो परमशुक्लध्यान के प्रभाव से अष्टकर्मरूपी शत्रुओं का विनाश और परमौदारिक शरीर का परित्याग कर अनन्त सुख सम्पन्न त्रैलोक्य शिखर पर जाकर विराजमान हो गये हैं, जिन्हें त्रिकालवर्ती समस्त तीर्थंकर देव नमस्कार करते हैं एवं जो ध्यान करने योग्य हैं, अष्ट कर्मों के विनाश से जिन्हें क्षायिक-सम्यक्त्वादि आठ गुण प्राप्त हो चुके हैं ऐसे उन अनन्त और महान् सिद्ध परमेष्ठियों का सिद्धि प्राप्ति की भावना से मैं अपने हृदय में ध्यान करता हूँ ॥१९-२०॥


पञ्चाचारान्जगतख्यातान् स्वमुक्तिश्रीवशीकरान्।
स्वयं चरन्ति ये मुक्त्यै चारयन्ति च योगिनः॥२१॥

षट्त्रिंशत्सद्गुणैः पूर्णाः सूरयो विश्वबान्धवाः।
तेषां पादाम्बुजान्नौमि शिरसाचारसिद्धये ॥ २२॥

अर्थ (श्लोक 21 से 22): मुक्ति प्राप्ति की कामना से जगत्प्रसिद्ध पाँच प्रकार के आचारों (दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चरित्राचार, तप आचार, वीर्याचार) का जो स्वयं पालन करते हैं और अन्य मुनिजनों को पालन करवाते हैं, जो स्वर्ग एवं मोक्ष लक्ष्मी को अपने स्वाधीन करने वाले हैं तथा जो छत्तीस गुणों से परिपूर्ण हैं ऐसे विश्वबन्धु रूप उन आचार्यों के चरण कमलों की मैं पाँच आचारों की प्राप्ति के लिये मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ ॥२१-२२॥


येऽङ्गपूर्वप्रकीर्णाब्धींस्तरन्ति शिवसिद्धये।
स्वयं सद्बुद्धिपोतेन तारयन्ति च सन्मुनीन् ॥२३॥

रत्नत्रयतपोभूषा अज्ञानध्वान्तनाशिनः।
तेषां पाठकपूज्यानां स्तौमि क्रमाम्बुजांश्चिदे ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 23 से 24): मुक्ति प्राप्ति के उद्देश्य से अपनी सद्बुद्धिरूपी जहाज के द्वारा जो स्वयं अंग, पूर्व और प्रकीर्णक रूप समुद्र को पार कर देते हैं तथा अन्य मुनिजनों को भी पार कराते हैं, जो रत्नत्रय से विभूषित और अज्ञानान्धकार के विनाशक हैं ऐसे उन पूज्य पाठकों (उपाध्यायों) के चरणकमलों को मैं ज्ञानप्राप्ति के निमित्त नमस्कार करता हूँ-उनकी स्तुति करता हूँ ॥२३-२४॥


त्रिकाले दुष्करं योगं वृष्टीशीतोष्णसंकुले।
साधयन्ति स्वसिद्धयै ये महान्तं भीरुभीतिदम् ॥२५॥

साधवस्ते मया वन्द्या महागोरतपोन्विताः।
वनादौ ध्यानसंलीना मे भवन्तु स्वशक्तये ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 25 से 26): जो वर्षा, शीत और ग्रीष्म इन तीन ऋतुओं में वर्षा, ठण्ड और गर्मी की बाधाओं को सहन करते हुए निर्जन वनादि में स्थित होकर आत्मसिद्धि के उद्देश्य से दुष्कर योग की साधना करते हैं ऐसे उन घोर तपस्वी साधुओं को मैं नमस्कार करता हूँ, वे मुझे आत्मशक्ति की प्राप्ति में निमित्त-कारण बनें ॥२५-२६॥


श्रीमद्बृषभसेनाद्या गौतमप्रमुखाश्च ये।
समस्तर्द्धिश्चतुर्ज्ञानं - भूषितागणनायकाः ॥२७॥

महाकविगुणैः पूर्णाः पूर्वाङ्गरचने क्षमाः।
मया वन्द्या स्तुता दद्युस्ते मे स्वगुणसन्मतीः ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 27 से 28): वृषभसेन आदि और गौतम आदि समस्त गणधर जो कि सब प्रकार की ऋद्धियों एवं चार ज्ञानों से विभूषित हुए हैं, महाकवियों के श्रेष्ठ गुण वाले एवं अंगों और पूर्वों-आगमों की रचना करने में निपुण हुए हैं मैं उनकी वन्दना एवं स्तुति करता हूँ, वे मुझे आत्म गुणों की प्राप्ति में कारणभूत सन्मति-उत्तम बुद्धि प्रदान करे ॥२७-२८॥


यस्याः प्रसादतो मेऽभूद् सद्बुद्धिः श्रुतभूषिता।
रागातिगा पदार्थज्ञा सद्ग्रन्थकरणेक्षमा॥ २९॥

सा मया त्रिजगद्भव्यैर्मान्या वन्द्या स्तुता सदा।
शारदाऽर्हन्मुखोत्पन्नात्रास्तु विश्वार्थदर्शिनी ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 29 से 30): जिसकी कृपा से मेरी बुद्धि श्रुतज्ञान से विभूषित हुई, रागद्वेष आदि से रहित हुई, पदार्थों के स्वरूप को जानने एवं समझने में समर्थ हुई और निर्दोष ग्रन्थों की रचना करने में पटु हुई तथा जिसकी प्रतिष्ठा तीनों जगत् के भव्यजीवों ने की है ऐसी वह जिनेन्द्रमुख से निर्गत हुई भारती शारदा मेरे द्वारा सदा वन्दनीय एवं स्तवनीय है। वह मुझे इस ग्रन्थ के निर्माण कार्य में एवं पूर्ण रूप से अर्थ के प्रदर्शन करने में सहायक होवे ॥२९-३०॥


अन्ये ये गुरवो ज्येष्ठा दृक्-चिद्-वृत्तादिसद्गुणैः।
सर्वसिद्धान्तवेत्तारः कुन्दकुन्दादिसूरयः ॥३१॥

बाह्यान्तर्ग्रन्थनिर्मुक्ता युक्ताः सद्गुणभूतिभिः।
कवयो वन्दनीयाश्च सतां मे सन्तु शुद्धये ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 31 से 32): सर्व सिद्धान्त के ज्ञाता, बाह्य और अंतरंग परिग्रह से सर्वथा रहित, उत्तम-क्षमा आदि सद्गुणों से विभूषित, उत्तमोत्तम निर्दोष काव्यों की रचना करने में समर्थ मति वाले एवं सज्जनों द्वारा वंदनीय ऐसे कुन्दकुन्दादि आचार्यवर्य तथा सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र आदि सद्गुणों से विभूषित अन्य गुरुजन मुझे आत्मशुद्धि में निमित्तभूत बनें ॥३१-३२॥


त्रैलोक्यसौधमध्ये ये कृत्रिमाः श्रीजिनालयाः।
अकृत्रिमा जिनेन्द्राणां प्रतिमाः कृत्रिमेतराः ॥३३॥

या हेम-रत्न-धात्वश्मादि मया यानि सन्ति च।
पुण्यनिर्वाणक्षेत्राणि तांस्तास्तानि स्तुवेऽर्चये ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): तीन लोकरूपी भवन के बीच में जो कृत्रिम, अकृत्रिम श्री जिनालय हैं तथा उनमें जो हेम, रत्न, धातु एवं पाषाण आदि की बनी हुई कृत्रिम, अकृत्रिम प्रतिमाएँ हैं एवं जो पवित्र निर्वाण क्षेत्र हैं मैं उन सबकी स्तुति करता हूँ और पूजा करता हूँ ॥३३-३४॥


नत्वेति जिनतन्मूर्ति-सिद्धसिद्धान्तसद्गुरून्।
विश्वविघ्नहरान् स्वेष्टान् जगन्मांगल्यकारिणः ॥३५॥

विघ्नहान्यै च मांगल्याप्त्यै स्वान्यहितसिद्धये।
वक्ष्ये ग्रन्थं जगन्नेत्रं सिद्धान्तसारदीपकम् ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): इस ग्रन्थ निर्माण में आने वाले समस्त विघ्नों की शान्ति एवं जगत् में मंगल प्राप्ति के उद्देश्य से मैं जिनेन्द्र, जिनेन्द्रप्रतिमा सिद्ध, सिद्धान्त एवं सद्गुरु इन सबको नमस्कार करके जगत् के नेत्र स्वरूप इस सिद्धान्तसार दीपक ग्रन्थ की स्व-पर के उपकारार्थ रचना करूँगा ॥३५-३६॥


श्रुतेन येन भव्यानां करस्थामलकोपमम्।
त्रैलोक्यं निस्तुषं भाति ज्ञानं च वर्धतेतराम् ॥३७॥

संवेगादिगुणैः सार्धं रागोऽज्ञानं प्रणश्यति।
तदागमं जगच्चक्षु-र्ज्ञेयमत्रोदितं बुधैः ॥३८॥

यतः प्रोक्तं सुसाधूनां जिनैर्विश्वार्थदर्शने।
सदागममहाचक्षु - धर्मतत्त्वार्थदीपकम् ॥३९॥

तेनागमसुनेत्रेण विनान्धा इव देहिनः।
सचक्षुषोऽपि जानन्ति न किञ्चिच्च हिताहितम् ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 37 से 40): इस सिद्धान्तसार ग्रन्थ के सुनने-पढ़ने से भव्यात्माओं को यह त्रिलोक हथेली में रखे हुए आंवले की तरह प्रतीत होने लगता है और उनके तत्सम्बन्धी ज्ञान की वृद्धि भी हो जाती है तथा संवेगादिक गुणों की प्राप्ति हो जाने से उनके अज्ञान एवं रागद्वेषादिरूप विकारों का भी विनाश हो जाता है, इसी कारण बुद्धिमानों ने आगम को ‘जगत्चक्षु’ कहा है और इसीलिये जिनेन्द्रदेव ने साधुओं को ऐसा उपदेश दिया है कि यदि तुम्हें सम्पूर्ण पदार्थों को जानना है तो सर्वप्रथम जीवादिक तत्त्वों, छह द्रव्यों और नौ पदार्थों को प्रकाशित करने वाले इस निर्दोष आगम रूप महाचक्षु का अवलम्बन करो, क्योंकि यही एक अति उत्तम नेत्र है। जिन प्राणियों के पास यह आगमरूप चक्षु नहीं है वे उसके बिना नेत्रों के रहते हुए भी, अन्धे के समान हैं, क्योंकि इसके अभाव में हिताहित का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं हो सकता है ॥३७-४०॥


यत्प्राक् पूर्वमुनीन्द्राद्यै-र्विश्वसिद्धान्तवेदिभिः ।
सद्बुद्धिभिर्जगत्सारं प्रोक्तं सिद्धान्तमञ्जसा ॥४१॥

तद्दुर्गमार्थगम्भीर-मागमं विश्वगोचरम् ।
कथं स्वल्पधिया वक्तुं मया शक्यं मनोहरम् ॥४२॥

अथवा प्राग्मुनीन्द्राणां प्रणामाजितपुण्यतः ।
स्तोकं सारं प्रवक्ष्यामि सिद्धान्तं विश्वसूचकम् ॥४३॥

निजशक्त्या मुदाभ्यस्य त्रैलोक्यसार दीपकम् ।
सुगमं बालबोधाय ऽन्यान् ग्रन्थानागमोद्भावान् ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 41 से 44): समस्त सिद्धान्त शास्त्रों के ज्ञाता एवं विशिष्ट ज्ञानी पूर्व मुनिराजों ने पहले त्रिलोकसार नामक सिद्धान्तग्रन्थ की रचना की है सो वह ग्रन्थ अति दुर्गम अर्थ वाला एवं गम्भीर है अतः मुझ अल्पज्ञ द्वारा वह जैसे का तैसा कैसे जाना जा सकता है, कहा जा सकता है? परन्तु फिर भी पूर्व मुनिराजों को किये गये नमस्कारजन्य पुण्य के प्रभाव से (उसका) थोड़ा-सा सार लेकर विश्वसूचक सिद्धान्त का कथन करूँगा। पहले मैं आगमों से जिनका सम्बन्ध है ऐसे उन ग्रन्थों का अपनी शक्ति के अनुसार प्रफुल्लित मन से अभ्यास करूँगा बाद में जिस प्रकार बालजनों को सुगम पड़े उस रूप से ‘त्रैलोक्यसारदीपक’ का कथन करूँगा ॥४१-४४॥


तस्यादौ कीर्तयिष्यामि त्रैलोक्यस्थितिमूर्जिताम् ।
तदाकारं समासेन भव्याः! शृणुत सिद्धये ॥४५॥

अर्थ: सर्वप्रथम अर्थात् सिद्धान्तसारदीपक की आदि में मैं तीनों लोकों की वास्तविक स्थिति का और फिर संक्षेप से उनके आकारों का वर्णन करूँगा, अतः हे भव्यजनों! सिद्धि के लिये तुम पहले उसे सावधान होकर सुनो ॥४५॥


सर्वोऽनन्तप्रदेशोऽस्त्याकाशः सर्वज्ञगोचरः ।
नित्यस्तन्मध्यभागे स्याल्लोकाकाशस्त्रिधात्मकः ॥४६॥

असंख्यातप्रदेशोऽसौ वातत्रितयवेष्टितः ।
उडुवद्भाति खे पूर्णः षड्द्रव्यैश्चेतनेतरैः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): सर्वज्ञदेव के ज्ञान का विषयभूत सम्पूर्ण आकाश अनन्तप्रदेशी और शाश्वत है। उसके मध्यभाग में तीन प्रकार के भेदों से युक्त लोकाकाश है। जो असंख्यात प्रदेशी, तीन वातवलयों से वेष्टित और चेतन, अचेतन छह द्रव्यों से भरा हुआ है तथा अलोकाकाश में नक्षत्र के समान शोभायमान होता है ॥४६-४७॥


जीवाश्च पुद्गला धर्माधर्मकालाः स्थिताः सदा।
खे यावति विलोक्यन्ते लोकाकाशः स कथ्यते ॥४८॥

एतस्माच्च बहिर्भागे शाश्वतो द्रव्यवर्जितः।
सर्वज्ञगोचरोऽनन्तोऽलोकाकाशो जिनैर्मतः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): आकाश के जितने भाग में जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल द्रव्य शाश्वत स्थित रहते हैं उसे लोकाकाश कहते हैं और इसके (लोकाकाश के) बाह्य भाग में जिनेन्द्र के द्वारा कहा हुआ पाँच द्रव्यों से रहित, सर्वज्ञगोचर, शाश्वत और अनन्त विस्तार वाला अलोकाकाश है ॥४८-४९॥


केनचिन्न कृतो लोको ब्रह्मादिनाथवा धृतः।
न च विष्ण्वादिना जातु न हृतश्चेश्वरादिना ॥५०॥

अर्थ: यह लोक न किन्हीं ब्रह्मा आदि के द्वारा बनाया हुआ है, न किन्हीं विष्णु आदि के द्वारा धारण, रक्षण किया हुआ है और न किन्हीं महादेव आदि के द्वारा विनाश को प्राप्त होता है।


किन्तु त्वचावृतो वृक्ष इव वातत्रयावृतः।
अनादिनिधनो लोको नानाकारस्त्रिधात्मकः ॥५१॥

अर्थ: किन्तु यह लोक त्वचा (छाल) से वेष्टित, वृक्ष के सदृश तीन वातवलयों से वेष्टित, अनादिनिधन अर्थात् आदि अन्त से रहित, अनेक संस्थानों (आकारों) से युक्त और ऊर्ध्व, मध्य एवं अधोलोक के भेद से तीन भेद वाला है ॥५१॥


स्थापितस्याप्यधोभागे मुरजार्धस्य मस्तके।
धृतेऽत्र मुरजे पूर्ण ह्याकारो यादृशो भवेत् ॥५२॥

तादृशाकारलोकोऽयं सार्धैकमुरजाकृतिः।
किन्तु स्यान्मुरजो वृत्तो लोकः कोणचतुर्मयः ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 52 से 53): अर्धमुरजाकार अधोलोक के मस्तक पर पूर्ण मुरज को स्थापित करने से जैसा आकार बनता है वैसा ही अर्थात् डेढ़ मुरज के आकार वाला यह लोक है। मुरज (मृदंग) गोल होती है किन्तु लोक चार कोणों से युक्त है ॥५२-५३॥


वा प्रसारितपादस्य कटीधृतकरस्य च।
स्थितस्य पुरुषस्यैवात्राकारो यादृशो भवेत् ॥५४॥

लोकोऽयं तादृशाकारः स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकः॥
अधोमध्योर्ध्वभेदेन त्रिविधः शाश्वतः स्थितः ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 54 से 55): अथवा पैर फैलाकर, कमर पर (दोनों) हाथ रखकर उत्तरमुख स्थित पुरुष का जैसा आकार बनता है वैसे ही आकार को धारण करने वाला यह लोक (षड्द्रव्यों की अपेक्षा) उत्पाद, व्यय और ध्रुव स्वभाव की त्रिविधता से युक्त, अथवा ऊर्ध्व, मध्य और अधोलोक के भेद की त्रिविधता से युक्त नित्य ही स्थित है ॥५४-५५॥


अधोवेत्रासनाकारो मध्येऽयं झल्लरीसमः।
मृदङ्गसदृशश्चोर्ध्वे त्रिधेति तस्य संस्थितिः ॥५६॥

अर्थ: अधोलोक का आकार वेत्रासन सदृश, मध्यलोक का झल्लरी सदृश और ऊर्ध्वलोक का आकार मृदंग के सदृश है, इस प्रकार लोक की संस्थिति (आकार) तीन प्रकार कहा गया है ॥५६॥


आमूलादूर्ध्वपर्यन्तं लोकोऽयमुन्नतो मतः।
विचित्राकार आप्तज्ञैः स्याच्चतुर्दशरज्जुभिः ॥५७॥

अर्थ: आप्त को जानने वालों के द्वारा नाना प्रकार के आकारों को धारण करने वाले इस लोक की नीचे से ऊर्ध्वलोक पर्यन्त की ऊँचाई चौदह राजू कही गई है ॥५७॥


आमूलान्मध्यलोकान्तमाम्नाता योन्नतिर्जनैः।
सप्तरज्जुप्रमाणास्या-धोलोकस्य जिनागमे ॥५८॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा जिनागम में आदि-मूल से मध्यलोक के अन्त तक की जो सात राजू प्रमाण आकाशोन्नति कही गई है वही अधोलोक की ऊँचाई है। अर्थात् अधोलोक की ऊँचाई सात राजू प्रमाण है ॥५८॥


मध्यलोकाद् बुधैर्ज्ञेया ब्रह्मकल्पान्तमुच्छ्रितिः।
अस्योर्ध्वलोकभागस्य सार्धरज्जुत्रयप्रमा ॥५९॥

अर्थ: विद्वानों के द्वारा मध्यलोक से ब्रह्मकल्प के अन्त तक की जो साढ़े तीन राजू प्रमाण ऊँचाई ज्ञात की गई है वही इस ऊर्ध्वलोक के एक भाग की ऊँचाई है। अर्थात् मध्यलोक से ब्रह्मलोक तक के ऊर्ध्वलोक की ऊँचाई ३ १/२ राजू प्रमाण है ॥५९॥


ब्रह्मलोकात्ततोऽप्यूर्ध्वं यावल्लोकाग्रमस्तकम्।
उत्सेधोऽस्यागमे प्रोक्तः सार्धत्रिरज्जुसन्मितः ॥६०॥

अर्थ: ब्रह्मलोक से ऊपर लोक के मस्तक पर्यन्त जितना उत्सेध आगम में कहा है वह साढ़े तीन राजू प्रमाण है। अर्थात् ब्रह्मलोक से लोक के अन्त पर्यन्त ऊर्ध्वलोक की ऊँचाई ३ १/२ राजू प्रमाण है ॥६०॥


अस्यायामोऽस्ति सर्वत्र दक्षिणोत्तरभागयोः।
सप्तरज्जुप्रमाणः किलामूलमस्तकान्तयोः ॥६१॥

अर्थ: इस लोक के दक्षिणोत्तर भाग का आदि से अन्त पर्यन्त अर्थात् नीचे से ऊपर तक का आयाम (दीर्घता) सर्वत्र सात राजू प्रमाण है। अर्थात् लोक दक्षिणोत्तर भाग में सर्वत्र सात राजू प्रमाण है ॥६१॥


पूर्वापरेणलोकस्य ह्रासवृद्धीस्मृते बुधैः।
मूलेऽस्य विस्तृति र्ज्ञेया सप्तरज्जुप्रमाखिला ॥६२॥

क्रमहान्या ततोऽप्यस्य मध्यलोके जिनागमे।
रज्ज्वेको व्यास आम्नातो गणाधीशैर्गणान् प्रति ॥६३॥

ततश्च क्रमवृद्ध्यास्य ब्रह्मलोकेऽस्ति विस्तृतिः।
पञ्चरज्जुप्रमा मूर्ध्नि रज्ज्वेका क्रमहानितः ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 62 से 64): ज्ञानियों के द्वारा लोक के पूर्व-पश्चिम भाग का विस्तार हानि-वृद्धि रूप माना गया है। लोक के मूल में पूर्व पश्चिम विस्तार सात राजू प्रमाण है। इसके बाद क्रम से हानि होते होते मध्यलोक पर पूर्व-पश्चिम विस्तार जिनागम में जिनेन्द्रों के द्वारा मुनिसमूह के लिए एक राजू प्रमाण कहा है। मध्यलोक के ऊपर क्रम से वृद्धि होते होते ब्रह्मलोक पर लोक का विस्तार पाँच राजू और वहाँ से क्रमशः हानि होते होते लोक के मस्तक का विस्तार एक राजू प्रमाण है ॥६२-६४॥


अधोभागेऽस्य लोकस्य व्यासेन सप्तरज्जवः।
रज्ज्वेकामध्यभागे च तयोः पिण्डीकृते सति ॥६५॥

जायन्ते रज्जवोऽप्यष्टौ तासामर्धी कृते पुनः।
चतस्रो रज्जवः स्युस्ता गुणिताः सप्तरज्जुभिः ॥६६॥

अष्टाविंशतिसंख्याश्चोत्पद्यन्ते रज्जवः पुनः।
अष्टाविंशतिसंख्यास्ता गुणिताः सप्तरज्जुभिः ॥६७॥

शतैकं षण्णवत्यग्रं भवन्ति रज्जवोऽखिलाः।
पिण्डीकृता घनाकारेणाधोलोकस्य निश्चितम् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 65 से 68): इस लोक के अधोभाग में व्यास सात राजू और मध्यभाग (मध्यलोक) पर व्यास एक राजू प्रमाण है। इन दोनों को जोड़ देने से (७+१) आठ राजू होता है और इसे आधा करने पर (८/२) चार राजू प्राप्त होते हैं। (अधोलोक से मध्यलोक तक की ऊँचाई सात राजू है अतः) इन चार को सात से गुणित करने पर (४x७)=२८ वर्ग राजू अधोलोक का क्षेत्रफल उत्पन्न हो जाता है और इस २८ वर्ग राजू क्षेत्रफल को (दक्षिणोत्तर मोटाई) सात राजू से गुणित कर देने पर सम्पूर्ण अधोलोक का घनफल (२८x७)=१९६ घनराजू प्रमाण प्राप्त होता है। अर्थात् अधोलोक का क्षेत्रफल २८ वर्गराजू और घनफल १९६ घनराजू प्रमाण है ॥६५-६८॥


ब्रह्मकल्पेऽस्य विस्तारः पञ्चरज्जुप्रमाणकः।
मध्यभागे च रज्ज्वेकस्तयोर्मेलापके कृते ॥६९॥

षड्रज्जवो भवेयुश्च तासामर्धी कृते सति।
गृह्यन्ते रज्जवस्तिस्रः सप्तभिर्गुणिताश्च ताः ॥७०॥

एकविंशतिसंख्याता जायन्ते रज्जवः पुनः।
ताः सर्वा वर्गिताः सार्धत्रिकैर्भवन्ति पिण्डिताः ॥७१॥

रज्जवोऽप्यूर्ध्वभागेऽस्य ब्रह्मलोकान्तमञ्जसा।
घनाकारेण सर्वत्र सार्धत्रिसप्तति प्रमाः ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 69 से 72): इस लोक का विस्तार ब्रह्मकल्प पर पाँच राजू और मध्यलोक पर एक राजू प्रमित है। इन दोनों को जोड़ देने से (५+१)=६ राजू होते हैं और उन्हें आधा करने पर (६/२)=३ राजू प्राप्त होते हैं। मध्यलोक से ब्रह्मलोक की ऊँचाई ३ १/२ राजू है अतः तीन को ३ १/२ राजू ऊँचाई से गुणित करने पर ( ७/२ × ३/१ ) = २१/२ वर्ग राजू मध्यलोक से ब्रह्मलोक पर्यन्त अर्थात् अर्ध ऊर्ध्वलोक का क्षेत्रफल प्राप्त हुआ इसके उत्तर-दक्षिण सात राजू मोटाई से गुणित कर देने पर ब्रह्मलोक पर्यन्त ऊर्ध्वलोक का घनफल ( २१/२ × ७/१ ) = १४७/२ अर्थात् ७३ १/२ घनराजू प्रमाण प्राप्त होता है ॥६९-७२॥


व्यासोऽस्य ब्रह्मकल्पान्ते रज्जुपञ्चप्रमः क्रमात्।
हीयमानश्च रज्ज्वेको मस्तकाग्रे तयोः प्रति ॥७३॥

पिण्डीकृते प्रजायन्ते षड्रज्जवोऽखिलास्ततः।
द्विभागीसंस्कृते तासां तिस्रः स्यू रज्जवश्च ताः ॥७४॥

सप्तभिर्गुणिता जायन्ते ह्येकविंश रज्जवः।
पुनस्ता वर्गीताः सार्धत्रिभिः सार्धत्रिसप्ततिः ॥७५॥

पिण्डीकृता भवन्त्यूर्ध्वलोकस्य रज्जवोऽखिलाः।
घनाकारेण लोकाग्रपर्यन्तं ब्रह्मकल्पतः ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 73 से 76): ब्रह्मकल्प पर लोक का व्यास पाँच राजू प्रमाण है, और क्रम से हीन होते होते लोक के अग्रभाग का व्यास एक राजू प्रमित रह जाता है। इन दोनों को जोड़ देने से (५+१)=६ राजू होते हैं। इन्हें आधा करने पर (६ २) = ३ राजू प्राप्त होते हैं। इन तीन को ३ १/२ ऊँचाई से गुणित करने पर अर्ध ऊर्ध्वलोक का क्षेत्रफल (३ × ७/२) = २१/२ अर्थात् १० १/२ वर्ग राजू प्राप्त होता है। इसको सात राजू मोटाई से गुणित कर देने पर (२१/२ × ७/१) = १४७/२ अर्थात् ७३ १/२ घनराजू प्रमाण घनफल अर्ध ऊर्ध्वलोक का अर्थात् ब्रह्मलोक से लोकाग्र पर्यन्त का जानना चाहिए। लोक के दोनों अर्ध ऊर्ध्व भागों का घनफल मिला देने से सम्पूर्ण ऊर्ध्वलोक का घनफल (७३ १/२ + ७३ १/२) = १४७ घनराजू प्रमाण होता है ॥७३-७६॥


इति लोकत्रयस्यास्य सघनाकारेण रज्जवः।
शतत्रयत्रिचत्वारिंशदग्रप्रमिता मताः ॥७७॥

अर्थ: इस प्रकार तीनों लोकों का सम्पूर्ण घनफल (अधोलोक का १९६ घनराजू और ऊर्ध्वलोक का १४७ घनराजू, १९६+१४७)=३४३ घनराजू प्रमाण जानना चाहिए। अर्थात् सम्पूर्ण लोकाकाश के यदि एक राजू लम्बे, एक राजू चौड़े और एक राजू मोटे टुकड़े किये जायें तो सम्पूर्ण टुकड़ों की संख्या ३४३ प्राप्त होगी ॥७७॥


लोकस्य परिधिर्ज्ञेया पूर्वपश्चिमभागयोः।
रज्जूनां साधिकैकोन चत्वारिंशत्प्रमाखिलाः ॥७८॥

अर्थ: लोक की पूर्व पश्चिम भाग की सम्पूर्ण परिधि कुछ अधिक ३९ राजू प्रमाण जानना चाहिए ॥७८॥


ख्यातास्य परिधिर्दक्षैर्दक्षिणोत्तरपार्श्वयोः।
मूलाग्रयोश्च रज्जुद्विचत्वारिंशन्मिता स्मृता ॥७९॥

अर्थ: लोक की दक्षिणोत्तर दिशा में दोनों पार्श्वभागों की तथा मूल और अग्रभाग की सम्पूर्ण परिधि दक्ष-ज्ञानी जनों के द्वारा ४२ राजू प्रमाण कही गई है ॥७९॥


घनोदधिघनाख्यश्च तनुवात इमे त्रयः।
सर्वतो लोकमावेष्ट्य नित्यास्तिष्ठन्ति वायवः ॥८०॥

आद्यो गोमूत्रवर्णोयं मुद्गवर्णो द्वितीयकः।
पञ्चवर्णस्तृतीयः स्याद् बहिर्वलयमारुतः ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 80 से 81): सम्पूर्ण लोक को परिवेष्टित करते हुए घनोदधि, घन और तनु ये तीन पवन नित्य ही स्थित रहते हैं। इनमें आद्य अर्थात् घनोदधि वातवलय का वर्ण गोमूत्र के सदृश, दूसरे घनवातवलय का वर्ण मूँग (अन्न) के सदृश और तीसरे तनुवातवलय का वर्ण पञ्चवर्णों के सदृश है ॥८०-८१॥


लोकस्याधस्तले भागे महातमःप्रभाक्षितेः।
पार्श्वयोरेकरज्ज्वन्तमन्तरेष्वपि सप्तसु ॥८२॥

सप्तनारक पृथ्वीनां स्थूलत्वं मरुतां मतम्।
प्रत्येकं योजनानां च सहस्रविंशतिप्रमम् ॥८३॥

दण्डाकारा भवन्त्येते लोकाधोभूतलान्तरे।
दण्डाकारा घनीभूता लोकान्ते वायवस्त्रयः ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 82 से 84): लोकाकाश के अधोभाग में, सातवें नरक से नीचे नीचे अर्थात् दोनों पार्श्व भागों में नीचे से ऊपर की ओर एक राजू की ऊँचाई (निगोद स्थान) पर्यन्त, लोक के अभ्यन्तर भाग में सातों नरक पृथिवियों के नीचे सातों नरकों की जो सात पृथिवियाँ हैं (और ८ वीं ईषत्प्राग्भार पृथ्वी के नीचे) उनमें दण्डाकार (रज्जू आकार) प्रत्येक पवन बीस बीस हजार योजन की मोटाई को लिये हुए हैं। इस प्रकार ये तीनों पवन अधोलोक में सातों पृथिवियों के नीचे, लोक के अन्त में अर्थात् लोक के ऊपर प्राग्भार पृथ्वी के नीचे अर्थात् आठों पृथिवियों के नीचे सघन और दण्ड के आकार को धारण करने वालीं हैं ॥८२-८४॥


महातमः प्रभापार्श्वे वातानां स्थौल्यमञ्जसा।
सप्तैव पञ्चचत्वारि प्रत्येकं योजनान्यपि ॥८५॥

नृलोके क्रमहान्यात्र पञ्चचत्वारि त्रीणि च।
स्थौल्यं वातत्रयाणां हि योजनानि पृथक् पृथक् ॥८६॥

बाहुल्यं ब्रह्मलोकान्ते वायूनां योजनानि च।
सप्तपञ्चैव चत्वारि प्रत्येकं क्रमवृद्धितः ॥८७॥

क्रमहान्योर्ध्वलोकान्तेऽमीषां स्थूलत्वमञ्जसा।
प्रत्येकं पञ्च चत्वारि त्रीणि सद्योजनानि च ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 85 से 88): सप्तम नरक के दोनों पार्श्व भागों में घनोदधिवातवलय सात योजन, घनवातवलय पाँच योजन और तनुवातवलय चार योजन मोटाई वाले हैं। इसके ऊपर क्रम से घटते हुए मनुष्य (मध्य) लोक के समीप तीनों वातवलय क्रम से पृथक्-पृथक् पाँच योजन, चार योजन और तीन योजन बाहुल्य वाले प्राप्त होते हैं तथा यहाँ से ब्रह्मलोक पर्यन्त क्रमशः बढ़ते हुए सात योजन, पाँच योजन और चार योजन मोटाई वाले हो जाते हैं और ब्रह्मलोक से क्रमानुसार हीन होते हुए तीनों पवन लोक के अन्त में अर्थात् ऊर्ध्वलोक के निकट क्रमशः पाँच योजन, चार योजन और तीन योजन बाहुल्य वाले हो जाते हैं ॥८५-८८॥


घनोदधौ च लोकाग्रे स्थौल्यं क्रोशाद्वयं मतम्।
क्रोशैकं घनवाते च तनुवाते धनूंषि वै ॥८९॥

पञ्चसप्तति युक्तानि शतपञ्चदशोत्थयम्।
सर्वतोप्यावृतो लोकः सर्वो वातत्रयैर्भवेत् ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 89 से 90): लोक के अग्रभाग पर घनोदधिवातवलय की मोटाई २ कोश, घनवातवलय की एक कोश और तनुवातवलय की मोटाई १५७५ धनुष प्रमाण है। इस प्रकार यह लोक सभी ओर से तीन वातवलयों के द्वारा वेष्टित है ॥८९-९०॥


उदूखलस्य मध्याधोभागे छिद्र कृते यथा।
वंशादिनालिका क्षिप्ता चतुष्कोणा तथास्य च॥९१॥

अर्थ: ऊखली के मध्य बीचों बीच अधोभाग पर्यन्त छिद्र करके उसमें बाँस आदि की चतुष्कोण नाली डाल देने पर जैसा आकार बनता है वैसा ही आकार लोक नाली का है ॥९१॥


लोकस्य मध्यभागेऽस्ति त्रसनाडी त्रसान्विता॥
चतुर्दशमहारज्जूत्सेधा रज्ज्येक विस्तृता॥९२॥

त्रसनाड्या बहिर्भागे त्रसाः सन्ति न जातुचित्।
समुद्घातौ विना केवलिमारणान्तिकात्मनौ ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 92 से 93): लोक के मध्यभाग में त्रस जीवों से समन्वित, चौदह राजू ऊँची और एक राजू चौड़ी त्रसनाड़ी (नाली) है। इस त्रस नाड़ी के बाह्य भाग में केवलि समुद्घात, मारणान्तिक समुद्घात (और उपपाद) के बिना कभी भी अर्थात् अन्य किसी भी अवस्थाओं में त्रस जीव नहीं पाये जाते ॥८२-८३॥


इति बहुविधरूपां लोकनाडीं समग्रां,
जिनगणधरदेवैः प्रोदितामङ्गपूर्वे।
शिवगतिसुखकामाश्चावबुद्ध्याश्रयध्वं ,
सकलचरणयोगैर्लोकमूर्ध्वस्थमोक्षम् ॥९४॥

अर्थ: हे मोक्ष सुख के इच्छुक! श्रेष्ठ गणधरदेवों के द्वारा अंगपूर्व में कही गई अनेक स्वरूप वाली सम्पूर्ण लोकनाड़ी को जानकर सकल चारित्र के योग द्वारा लोक के अग्रभाग में स्थित मोक्ष का आश्रय करो ॥९४॥


अधिकार गत अन्तिम मङ्गलाचरण


तन्निर्वाणमनन्तसौख्यजनकं ये सिद्धनाथाः श्रिता-
स्तीर्थेशाश्च तपोवरैः सुचरणैर्गन्तुं द्रुतं प्रोद्यताः।
पञ्चाचार परायणाश्च गणिनो ये पाठकाः साधव-
स्तेषां पादसरोरुहान् स्वशिरसा तद्भूतये नौम्यहम्॥९५॥

अर्थ: जो सिद्ध परमेष्ठी और तीर्थंकर देव अनन्त सुख को उत्पन्न करने वाले निर्वाण का आश्रय ले चुके हैं, तथा उत्कृष्ट तप और सम्यक्चारित्र के द्वारा पञ्चाचार परायण आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय एवं साधुगण शीघ्र ही मोक्ष में जाने के लिये उद्यमवान् हो रहे हैं ऐसे उन पञ्चपरमेष्ठियों के चरण कमलों को मैं मोक्ष की विभूति के लिये शिर से नमस्कार करता हूँ ॥९५॥

द्वितीय अधिकार अधोलोक में श्वभ्र स्वरूप

लोकनाडिगतान् पञ्च महतः परमेष्ठिनः।
स्वर्गमुक्तिकरान् वन्दे सतां श्वभ्रनिवारकान् ॥१॥

अर्थ: लोकनाड़ी में स्थित, स्वर्ग और मुक्ति सुखों को करने-देने वाले तथा सज्जन पुरुषों का नरकगति से निवारण करने वाले परमोत्कृष्ट पञ्चपरमेष्ठियों को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ वैराग्यसंसिद्ध्यै पाप्यङ्गिभीतिहेतवे।
अधोलोकं प्रवक्ष्येऽहं लोकस्य श्वभ्रवर्णनैः॥२॥

अर्थ: वैराग्य की प्राप्ति के लिए और लोक के पापी जीवों को भय उत्पन्न कराने के लिए अब मैं नरकों के वर्णन द्वारा अधोलोक को कहूँगा। अर्थात् नरकों के दुःखों को सुनकर-पढ़कर वैराग्य की प्राप्ति हो और पापों से भय हो इसलिए नरकों के कथन द्वारा आचार्य अधोलोक का विस्तृत वर्णन करेंगे।


महामेरोरधोभागे रज्ज्वैकैकान्तरस्थिताः।
स्पृशन्त्यः सर्वलोकान्तं सप्तेमाः श्वभ्रभूमयः ॥३॥

आद्या रत्नप्रभाशर्कराप्रभाबालुकाप्रभा।
पङ्कधूमप्रभाभिख्ये तमोमहातमःप्रभे ॥४॥

इतिप्रभोत्थनामानि पृथ्वीनां श्रीजिना विदुः।
तथा पर्यायनामानीमानि ज्ञेयानि कोविदैः॥५॥

अर्थ (श्लोक 3 से 5): सुदर्शनमेरु के अधोभाग में सात नरक भूमियाँ लोक के अन्त को स्पर्श करती हुई एक एक राजू के अन्तराल से स्थित हैं। इनमें १. रत्नप्रभा, २. शर्कराप्रभा, ३. बालुका प्रभा, ४. पङ्कप्रभा ५. धूमप्रभा, ६. तमःप्रभा और ७. महातमःप्रभा नाम वाली पृथिवियाँ हैं, अपनी अपनी प्रभा से उत्पन्न होने वाले ये पृथिवियों के नाम जिनेन्द्र भगवान ने कहे हैं तथा विद्वानों के द्वारा जाने गये इन्हीं पृथिवियों के पर्यायवाची नाम आगे कहे जावेंगे ॥३-५॥


घर्मावंशाह्वयामेघाञ्जनारिष्टाभिधाततः ।
मघवीमाघवी चैता अधोऽधः सप्तभूमयः ॥६॥

अर्थ: (१) घर्मा, (२) वंशा, (३) मेघा, (४) अञ्जना, (५) अरिष्टा, (६) मघवी और (७) माघवी ये सात पृथ्वियाँ नीचे-नीचे अर्थात् क्रमशः एक के नीचे एक हैं ॥६॥


सप्तानां श्वभ्रपृथ्वीनामधो भागेऽस्ति केवलम्।
एक रज्जुप्रमं क्षेत्रं पृथिवीरहितं भृतम्॥७॥

नानाभेदैर्निगोदादिपञ्चस्थावरदेहिभिः ।
रत्नप्रभाधरायाश्च त्रयो भेदा इमे स्मृताः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): सातों नरक पृथ्वियों के नीचे एक राजू प्रमाण क्षेत्र नरक पृथ्वी से रहित है, उसमें केवल पञ्चस्थावरों के शरीर को धारण करने वाले नाना प्रकार के निगोद आदि स्थावर जीव रहते हैं। रत्नप्रभा पृथिवी के आगे कहे जाने वाले तीन भेद जानना चाहिए ॥७-८॥


खरभागोऽथ पङ्कांशस्ततोऽप्यब्बहुलांशकः ।
खरभागे भवन्त्यस्याः इमे षोडशभूमयः ॥९॥

चित्रावज्राथ वैडूर्या लोहिता च मसारिका।
गोमेदा हि प्रवालाख्याः ज्योतिरसाञ्जनाह्वया ॥१०॥

अञ्जनाभाभिधा मूला स्फटिकाख्याथ चन्दना।
सपर्वावकुलाशैला खरे पृथ्व्यो हि षोडश ॥११॥

एकैकस्याः१ सुबाहुल्यं सहस्रगुणयोजनम्।
भूमेश्चैव तदात्मासौ खरभागो मतो बुधैः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 9 से 12): प्रथम रत्नप्रभा पृथिवी खरभाग, पङ्कभाग और अब्बहुल भाग के भेद से तीन प्रकार की है, जिसमें खरभाग में नीचे कही जाने वाली सोलह भूमि पडत हैं। १. चित्रा, २. वज्रा, ३. वैडूर्या, ४. लोहिता, ५. मसारिका, ६. गोमेदा, ७. प्रवाला, ८. ज्योतिरसा, ९. अञ्जना, १०. अञ्जनाभा, ११. मूला, १२. स्फटिका, १३. चन्दना, १४. सपर्वा, १५. वकुला और १६. शैला, ये खर भाग में सोलह पृथ्वियों के पडत हैं। इनमें प्रत्येक पृथिवी (परत) का बाहुल्य (मोटाई) एक एक हजार योजन प्रमाण है। इन सोलह पृथिवी पडतात्मक भूमि ही विद्वानों के द्वारा खरभाग माना गया है। अर्थात् खरभाग सोलह हजार योजन मोटा है जिसमें एक एक हजार योजन मोटी सोलह पृथ्वियाँ (परत) हैं अतः सोलह पृथिवी पडतात्मक ही खर भाग है ऐसा कहा गया है ॥९-१२॥


खरभागे वसन्त्यत्र सप्तधा व्यन्तरामराः॥
राक्षसानां कुलं मुक्त्वा नवभेदाश्च भावनाः ॥१३॥

असुराणां कुलं त्यक्त्वा पङ्कभागेऽसुरव्रजाः।
राक्षसाश्च वसन्त्येव तृतीयांशे च नारकाः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 13 से 14): राक्षस कुल को छोड़कर शेष सात प्रकार के व्यन्तर देव और असुरकुमार देवों को छोड़ कर शेष नौ प्रकार के भवनवासी देव खरभाग में व राक्षस और असुरकुमार पंक भाग में रहते हैं, तथा तृतीय अब्बहुल भाग में नारकी जीवों का वास है ॥१३-१४॥


रत्नप्रभात्रिपृथिवीनामिदं स्थौल्यं त्रिधा मतम्।
योजनानि खरांशस्य स्युः सहस्राणि षोडश ॥१५॥

योजनानां सहस्राणि ह्यशीतिश्चतुरोत्तरा।
स्थूलत्वं पङ्कभागस्य तृतीयांशस्य निश्चितम् ॥१६॥

अशीतिसहस्राणि त्रिभूमीनां पिण्डितानि च।
लक्षाशीतिसहस्राणि सर्वाणि योजनान्यपि ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 15 से 17): इस (कहे जाने वाले) रत्नप्रभा पृथिवी के तीनों भेदों का बाहुल्य भी तीन प्रकार का माना गया है। यथा-प्रथम खरभाग की मोटाई १६००० योजन, द्वितीय पंकभाग की मोटाई ८४००० योजन और तृतीय अब्बहुल भाग की मोटाई ८०००० योजन की है। इन तीनों पृथ्वियों के बाहुल्य को जोड़ने से (१६०००+८४०००+ ८००००)=१८०००० एक लाख अस्सी हजार योजन प्राप्त होते हैं, अतः रत्नप्रभा पृथिवी की मोटाई १८०००० योजन मानी गई है ॥१५-१७॥


शेषषट् श्वभ्रभूमीनां बाहुल्यं कथ्यतेऽधुना।
स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राणि स्थूलत्वं शर्कराक्षितेः ॥१८॥

अष्टाविंशतिमानानि सहस्रयोजनानि च।
बाहुल्यं वालुका पृथ्व्याः सन्ति पङ्कप्रभावनेः ॥१९॥

योजनानां चतुर्विंशति सहस्राणि शाश्वतम्।
स्थौल्यं धूमक्षितेर्विंशति सहस्राणि सम्मतम्॥२०॥

तमःप्रभावनेः स्थौल्यं सहस्राणि च षोडश।
योजनाष्टसहस्राणि महातमः प्रभाक्षितेः॥२१॥

अर्थ (श्लोक 18 से 21): अब अवशेष छह नरक पृथिवियों का बाहुल्य (मोटाई) कहते हैं। शर्करा पृथिवी की मोटाई ३२००० योजन, वालुका प्रभा पृथिवी की २८००० योजन, पंकप्रभा की २४००० योजन, धूमप्रभा पृथिवी की २०००० योजन, तमःप्रभा पृथिवी की १६००० योजन और महातमः पृथिवी की मोटाई ८००० योजन है ॥१८-२१॥


घर्मादिषड्धराणां प्रत्येकमूर्ध्वेऽप्यधस्तले।
सहस्रयोजनान्मुक्त्वा भवेयुः पटलानि च॥२२॥

पटलं मध्यभागेऽस्ति महातमः प्रभाक्षितेः।
इदानीं सप्तभूमीनां विलसंख्योच्यते क्रमात्॥२३॥

अर्थ (श्लोक 22 से 23): प्रथम पृथिवी के अब्बहुल भाग में और वंशा आदि शेष पाँच अर्थात् घर्मा आदि छह पृथिवियों में ऊपर नीचे एक एक हजार योजन की मोटाई छोड़ कर पटलों की स्थिति है और सातवीं महातमःप्रभा पृथिवी के मध्य भाग में एक ही पटल है। अब सातों पृथिवियों के बिलों की संख्या क्रम से कहते हैं॥२२-२३॥


प्रथमादि पृथ्वियों में बिलों का निरूपण


आदिमे नरके त्रिंशल्लक्षाणि स्युर्बिलानि च।
पञ्चविंशतिलक्षाणि द्वितीये दुष्कराण्यपि॥२४॥

तृतीये नरके पञ्चदशलक्ष बिलानि च।
चतुर्थे दशलक्षाणि लक्षत्रयाणि पञ्चमे॥२५॥

षष्ठे बिलानि पञ्चोनैक लक्षप्रमितानि च।
सप्तमे नरके सन्ति बिलानि पञ्च केवलम्॥२६॥

पिण्डीकृतानि सर्वाणि बिलानि सप्तभूमिषु।
लक्षाश्चतुरशीतिः स्युर्विश्वदुः खाकराण्यपि॥२७॥

अर्थ (श्लोक 24 से 27): प्रथम नरक में ३०००००० (तीस लाख) बिल हैं। दूसरे नरक में २५००००० (पच्चीस लाख), तीसरे में १५००००० (पन्द्रह लाख), चौथे में १०००००० (दश लाख), पाँचवें में ३००००० (तीन लाख), छठवें में पाँच कम एक लाख (९९९९५) और सातवें नरक में मात्र ५ (पाँच) बिल हैं। सम्पूर्ण दुःखों के आकर (खानि) स्वरूप इन सातों नरकों के सम्पूर्ण बिलों को जोड़ देने से योगफल (३० लाख + २५ लाख+१५ लाख+१० लाख + ३ लाख+ ९९९९५+५)=८४००००० (चौरासी लाख) प्रमाण होता है। अर्थात् सातों नरकों में ८४ लाख बिल हैं ॥२४-२७॥


आदिमे नरके सन्ति प्रतराणि त्रयोदश।
एकादश द्वितीये तृतीये नव चतुर्थके॥२८॥

सप्ताथ पञ्चमे पञ्च षष्ठे त्रीणि च सप्तमे।
एकमेकोन पञ्चाशत्सर्वाणि प्रतराणि च॥२९॥

आद्यः सीमन्तकाभिख्यो नारकाख्यश्च रौरवः।
भ्रान्तोभ्रान्तौ हिसम्भ्रान्तोऽथासम्भ्रान्तश्च सप्तमः ॥३०॥

विभ्रान्ताख्योऽष्टमो ज्ञेयस्त्रसस्त्रसित संज्ञकः।
वक्रान्तः स्यादवक्रान्तो विक्रान्तः प्रथमावनौ ॥३१॥

ततकस्तवको नाम्ना वनको मनकाह्वयः।
खटकः खटिकाभिख्यो जिह्वाख्यो जिह्विकाभिधः ॥३२॥

लोलो लोलुपसंज्ञोऽथ तनलोलुपनामकः।
अमी एकादश प्रोक्ता वंशायां प्रतरा जिनैः ॥३३॥

तप्ताख्यस्तपिताभिख्यस्तपनस्तपनाह्वयः ।
निदाघसंज्ञकोऽथोज्ज्वलितः प्रज्वलिताख्यकः ॥३४॥

ततः संज्वलितः संप्रज्वलितो वालुकाक्षितौ॥
आरस्ताराभिधो मारशच्चारुख्यस्तपनीयकः ॥३५॥

घटः संघटनामैते चतुर्थ्यां प्रतरा मताः।
तमो भूमः शङ्खाख्योऽन्धस्तमिस्रः पञ्चमीक्षितौ ॥३६॥

हिमाख्यो मर्दको लल्लकः षष्ठ्यां प्रतरास्त्रयः।
अवधिस्थाननामैको महातमःप्रभावनौ ॥३७॥

सर्वेष्वेकोनपञ्चाशत्प्रतरेषु भवन्ति च।
तत्समा इन्द्रकाः श्रेणीबद्धाः प्रकीर्णका बिलाः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 28 से 38): प्रथम नरक में तेरह (१३) पटल हैं। दूसरे में ग्यारह (११), तीसरे में नव (९), चौथे में सात (७), पाँचवें में पाँच (५), छठवें में ३ और सातवें नरक में १ पटल है। इस प्रकार सातों नरकों के सम्पूर्ण पटल ४९ हैं। पटलों के नाम- १ सीमन्त, २ नारक, ३ रौरव, ४ भ्रान्त, ५ उद्भ्रान्त, ६ सम्भ्रान्त, ७ असम्भ्रान्त, ८ विभ्रान्त, ९ त्रस, १० त्रसित, ११ वक्रान्त, १२ अवक्रान्त और १३ विक्रांत, ये १३ पटल प्रथम पृथिवी अर्थात् अब्बहुल भाग में हैं। १ ततक, २ स्तवक, ३ वनक, ४ मनक, ५ खटक, ६ खटिका, ७ जिह्वा, ८ जिह्विका, ९ लोलो, १० लोलुप और ११ तनलोलुप नाम के ये ११ पटल द्वितीय शर्करा प्रभा पृथिवी में हैं। १ तप्त, २ तपित, ३ तपन, ४ तापन, ५ निदाघ, ६ उज्ज्वलित, ७ प्रज्वलित, ८ सज्ज्वलित और ९ सम्प्रज्वलित नाम के ९ पटल तृतीय वालुका प्रभा पृथिवी में हैं। १ आर, २ तार, ३ मार, ४ चञ्चा, ५ तपनीय, ६ घट और ७ संघातन नाम वाले ये ७ पटल चतुर्थ पंकप्रभा पृथिवी में हैं। १ तम, २ भ्रम, ३ शंख, ४ अन्ध और ५ तमिस्र नामक ये ५ पटल पञ्चम धूमप्रभा पृथिवी में हैं। (१) हिम, (२) मर्दक और (३) लल्लक ये ३ पटल तमःप्रभा पृथिवी में हैं तथा अवधिस्थान नाम का १ पटल सप्तम महातमः पृथिवी में है। ये सम्पूर्ण पटल ४९ हैं और इनसे सम्बन्धित इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिल भी होते हैं॥२८-३८॥


सर्वेषां प्रतराणां स्युर्मध्यभागेषु चेन्द्रकाः।
श्रेणीबद्धाः क्रमात् पङ्क्त्याकारेणैव दिगष्टसु॥३९॥

श्रेणीबद्धाश्चतुर्दिक्षु प्रथमे पटले पृथक्।
भवन्त्येकोनपञ्चाशत् प्रत्येकं चतुरस्रकाः ॥४०॥

अस्यादि पटलस्यापि चतुर्विदिक्षुसंस्थिताः।
श्रेणीबद्धाश्च सन्त्यष्टचत्वारिंशत् पृथक् पृथक् ॥४१॥

ततः क्रमाद् द्वितीयादि पटलानां दिगष्टसु।
अष्टावैकैक रूपेण श्रेणीबद्धाः पृथक् पृथक् ॥४२॥

हीयन्ते तावदेवान्तिमे यावत् पटले स्फुटम्।
श्रेणीबद्धा हि चत्वारस्तिष्ठन्ति तुर्यदिग्गताः ॥४३॥

सन्ति प्रकीर्णकाः सर्वे श्रेणीबद्धान्तराष्टसु।
इन्द्रकश्रेणिसम्बन्धहीनाः पृथक् पृथक् स्थिताः ॥४४॥

प्रकीर्णका न सप्तभ्यां श्रेणीबद्धा महत्तराः।
स्युश्चतुर्दिक्षु चत्वारो मध्ये चैकेन्द्रको भवेत् ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 39 से 45): सम्पूर्ण पटलों के मध्यभाग में एक एक इन्द्रक बिल होता है और इस इन्द्रक की आठों दिशाओं में क्रम से पंक्ति के आकार श्रेणीबद्ध बिल होते हैं। प्रथम पृथ्वी के प्रथम पटल (सीमन्त नामक इन्द्रक बिल) की चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में चतुष्कोण आकार को धारण करने वाले ४९, ४९ श्रेणीबद्ध बिल हैं और इसी पटल के इसी इन्द्रक की चारों विदिशाओं में से प्रत्येक विदिशा में पृथक्-पृथक् ४८, ४८ श्रेणीबद्ध बिल हैं। इसी प्रकार क्रम से द्वितीयादि पटलों की आठों दिशा, विदिशाओं में से प्रत्येक दिशा, विदिशा में ये एक एक कम होते हुए एक पटल में एक साथ आठ श्रेणीबद्ध बिल घट जाते हैं, और ये इस प्रकार तब तक घटते जाते हैं जब तक कि अवधिस्थान नाम के अन्तिम इन्द्रक की चारों दिशाओं में चार श्रेणीबद्ध बिल रह जाते हैं। [ छह नरकों में ] श्रेणीबद्ध बिलों के आठ अन्तरालों में इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिलों के सम्बन्ध से रहित प्रकीर्णक बिल पृथक् पृथक् अर्थात् पुष्पों की भाँति यत्र तत्र स्थित हैं। सातवें नरक में चार दिशाओं में चार महान् श्रेणीबद्ध बिल हैं और इनके मध्य में एक इन्द्रक है। यहाँ प्रकीर्णक नहीं होते ॥३९-४५॥ उपर्युक्त गद्य में सातों नरकों में स्थित ४९ पटलों में से प्रत्येक पटल के श्रेणीबद्ध बिलों की संख्या पृथक् पृथक् दर्शाई गई है, जिसका अर्थ निम्नांकित तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया गया है।


घर्मायामिन्द्रकास्त्रयोदश, श्रेणीबद्धा विंशत्यधिक चतुश्चत्वारिंशच्छतानि, प्रकीर्णका: एकोन
त्रिंशल्लक्ष-पञ्चनवतिसहस्र-पञ्चशत-सप्तषष्टिसंख्याश्च भवन्ति। वंशायां एकादशेन्द्रका:।
चतुरशीत्यधिकषड्विंशतिशतप्रमा: श्रेणीबद्धा:। चतुर्विंशतिलक्ष-सप्तनवतिसहस्र-त्रिशतपञ्चोत्तर प्रमाणा:
प्रकीर्णका:। मेघायां नवेन्द्रका:। षट्सप्तत्यधिकचतुर्दशशतसंख्या: श्रेणीबद्धा:। चतुर्दशलक्षाष्टनवति
सहस्रपञ्चशतपञ्चदशप्रमा: प्रकीर्णका:। अञ्जनायां इन्द्रका: सप्त। सप्तशत श्रेणीबद्धा:। नवलक्ष-
नवनवतिसहस्र-द्विशत-त्रिनवति प्रमाणाः प्रकीर्णकाः। अरिष्टायां इन्द्रकाः पञ्च। श्रेणीबद्धाः षष्ट्यधिक-द्विशतप्रमाः। प्रकीर्णकाः द्विलक्ष-नवनवतिसहस्र-सप्तशत-पञ्चत्रिंशत्संख्याः स्युः। मघव्यां इन्द्रकाः त्रयः। श्रेणीबद्धाः षष्टिश्च। प्रकीर्णकाः नवनवतिसहस्रनवशतद्वात्रिंशत्प्रमाः भवन्ति। माघव्यां इन्द्रकः एकोऽस्ति। श्रेणीबद्धाः चत्वारः सन्ति।

अर्थ: सातों पृथ्वियों में से प्रत्येक पृथ्वी के इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलों की पृथक् पृथक् संख्या-


बिलानि सप्तभूमीनां चतुर्भागाश्रितानि च।
असंख्ययोजन व्यासानि प्रोक्तानि जिनागमे ॥४६॥

तेषां पञ्चमभागस्थ-बिलानि दुष्कराणि च।
संख्ययोजनविस्ताराणि बीभत्साशुभान्यपि ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): जिनागम में सातों नरकों में से अपने-अपने नरक बिलों की संख्या का ४/५ भाग असंख्यात योजन विस्तार वाले बिलों का प्रमाण कहा गया है, और उन्हीं अपने सम्पूर्ण बिलों का १/५ भाग वीभत्स, अशुभ और दुःखोत्पादक संख्यात योजन विस्तार वाले बिलों का प्रमाण कहा है ॥४६-४७॥


योजनानां च संख्यातविस्तारा इन्द्रका मताः।
श्रेणीबद्धा असंख्यातविस्तृता दुःखभाजनाः ॥४८॥

केचित् प्रकीर्णका ज्ञेयाः संख्ययोजनविस्तराः।
असंख्ययोजनव्यासाः केचित्तु प्रकीर्णकाः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): दुःख के भाजनस्वरूप सम्पूर्ण इन्द्रक बिल संख्यात योजन विस्तार वाले और सम्पूर्ण श्रेणीबद्ध असंख्यात योजन विस्तार वाले हैं। पुष्पों के सदृश यत्र तत्र स्थित प्रकीर्णक बिलों में कुछ प्रकीर्णक बिल संख्यात योजन विस्तार वाले और कुछ असंख्यात योजन विस्तार वाले जानना चाहिए ॥४८-४९॥


योजनैः पञ्चचत्वारिंशल्लक्षैर्विस्तरान्वितः ।
सीमन्तकेन्द्रकश्चाद्यः प्रथमे पटलेमतः ॥५०॥

वृत्ताकारोऽन्तिमेऽवभ्रेऽवधिस्थानेन्द्रकोऽन्तिमः ॥
लक्षैकयोजनव्यासो निष्कृष्टो दुःखपूरितः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 50 से 51): प्रथम पृथिवी के प्रथम पटल में स्थित सीमन्त नामक प्रथम इन्द्रक बिल (गोलाकार) ४५००००० (४५ लाख) योजन विस्तार वाला है और अन्तिम (सप्तम) नरक का गोलाकार, निकृष्ट और जीवों को दुःखों से पूरित करने वाला अवधिस्थान नाम का अन्तिम इन्द्रक बिल १००००० योजन विस्तार वाला है ॥५०-५१॥


सहस्रैकानवत्याष्टशतैः षट्षष्टि संयुतैः ।
योजनानां द्वित्रिभागाभ्यां शेषाः सर्वेन्द्रका मताः ॥५२॥

व्यासेन क्रमतो हीयमानाश्च पटलं प्रति।
जम्बूद्वीपप्रमो यावत्स्यादेकश्चरमेन्द्रकः ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 52 से 53): २/३ भाग से संयुक्त ९१६६६ योजन व्यास प्रत्येक पटल के प्रत्येक इन्द्रक के व्यास में से तब तक हीन करते जाना चाहिए जब तक कि अन्तिम इन्द्रक का व्यास जम्बूद्वीप अर्थात् १००००० योजन का प्राप्त होता है ॥५२-५३॥


एक चत्वारिंशल्लक्षत्रयस्त्रिंशत् सहस्र त्रिशतत्रयस्त्रिंशच्च एको भागः। षष्ठे चत्वारिंशल्लक्षैक-
चत्वारिंशत्सहस्र षट्शतषट्षष्टिश्च द्वौ भागौ। सप्तमे एकोन चत्वारिंशल्लक्षपञ्चाशतसहस्राणि अष्टमे
अष्टत्रिंशल्लक्षाष्ट पञ्चाशतसहस्र त्रिशतत्रयस्त्रिंशत् एको भागः। नवमे सप्तत्रिंशल्लक्षषट्षष्टि-
सहस्रषट्षष्टिश्च द्वौ भागौ। दशमे षट्त्रिंशल्लक्षपञ्चसप्तति-सहस्राणि। एकादशे पञ्चत्रिंशल्लक्ष्यशीति-
सहस्रत्रिशत त्रयस्त्रिंशच्चैको भागः। द्वादशे चतुस्त्रिंशल्लक्षैका-नवतिसहस्रषट्शत षट्षष्टिश्च द्वौ भागौ।
त्रयोदशे पटले इन्द्रकस्य विस्तारः चतुस्त्रिंशल्लक्षाणि। वंशायां आद्ये इन्द्रके विस्तारः त्रयस्त्रिंशल्लक्षाष्ट-
सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशच्चैको भागः। द्वितीये द्वात्रिंशल्लक्ष षोडशसहस्र षट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। तृतीये
एकत्रिंशल्लक्ष पञ्चविंशतिसहस्राणि चतुर्थे त्रिंशल्लक्षत्रयस्त्रिंशत्सहस्र त्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। पञ्चमे
एकोन त्रिंशल्लक्षैकचत्वारिंशत्सहस्र षट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। षष्ठे अष्टाविंशतिलक्षपञ्चाशतसहस्राणि।
सप्तमे सप्तविंशति लक्षाष्टपञ्चाशतसहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशच्चैको भागः। अष्टमे षड्विंशतिलक्षषट्षष्टिसहस्र
षट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। नवमे पञ्चविंशतिलक्षपञ्चसप्ततिसहस्राणि। दशमे चतुर्विंशतिलक्षत्र्यशीति-
सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। एकादशे इन्द्रके विस्तारः योजनानां त्रयोविंशतिलक्षैकनवति
सहस्रषट्शतषट्षष्टिश्च त्रिभागीकृते योजनस्य द्वौ भागौ। मेघायामादिमे इन्द्रके व्यासः योजनानां
त्रयोविंशतिलक्षाणि। द्वितीये द्वाविंशतिलक्षाष्टसहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। तृतीये एकविंशति-
लक्षषोडशसहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। चतुर्थे विंशतिलक्षपंचविंशतिसहस्राणि। पञ्चमे एकोनविंशति-
लक्षत्रयस्त्रिंशत् सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशच्चैको भागः। षष्ठे अष्टादशलक्षैकचत्वारिंशत् सहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ
भागौः। सप्तमे सप्तदशलक्षपञ्चाशतसहस्राणि। अष्टमे षोडशलक्षाष्टपञ्चाशत् सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको
भागः। नवमे इन्द्रके पञ्चदशलक्षषट्षष्टिसहस्रषट्शत षट्षष्टियोंजनत्रिभागीकृतस्य द्वौ भागौ। अञ्जनायां
प्रथमे इन्द्रके विस्तृतिः योजनानां चतुर्दशलक्ष पञ्चसप्ततिसहस्राणि। द्वितीये त्रयोदशलक्ष्यशीति-
सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। तृतीये द्वादशलक्षैकनवतिसहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। चतुर्थे
द्वादशलक्षाः। पञ्चमे एकादशलक्षाष्टसहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। षष्ठे दशलक्षषोडश-सहस्रषट्शत-
षट्षष्टिर्द्वौ भागौ। सप्तमे नवलक्षपञ्चविंशति सहस्राणि। अरिष्टायां आदिमे इन्द्रके अष्टलक्ष
त्रयस्त्रिंशत्सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशच्चैको भागः। द्वितीये सप्तलक्षैकचत्वारिंशत्सहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ।
तृतीये षट् लक्षपञ्चाशतसहस्राणि। चतुर्थे पञ्चलक्षाष्टपञ्चाशत् सहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशदेको भागः। पञ्चमे
इन्द्रके व्यासो योजनानां चतुर्लक्षषट्षष्टिसहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। मघव्यां प्रथमे इन्द्रके विस्तृतिः
योजनानां त्रिलक्षपञ्चसप्ततिसहस्राणि। द्वितीये द्विलक्ष्यशीतिसहस्रत्रिशतत्रयस्त्रिंशत् योजनस्य त्रिभागानां
मध्ये चैको भागः। तृतीये एकलक्षकनवतिसहस्रषट्शतषट्षष्टिर्द्वौ भागौ। माघव्यां इन्द्रके विस्तारः
लक्षयोजनं प्रमाणः।

अर्थ: घर्मा पृथ्वी के प्रथम सीमन्त नामक इन्द्रक बिल का व्यास ४५ लाख योजन है, इसमें से ९१६६६ २/३ योजन घटाते जाने पर उसी पृथ्वी के द्वितीयादि इन्द्रकों का विस्तार प्राप्त होता जाता है क्योंकि हानि चय का प्रमाण सर्वत्र ९१६६६ २/३ योजन ही है। इस हानि चय आदि के निकालने की विधि इसी अधिकार के नं. ५२-५३ श्लोकों के विशेषार्थ में देखना चाहिए। उपर्युक्त सम्पूर्ण गद्यभाग का अर्थ निम्नांकित तालिका में अन्तर्निहित कर दिया गया है। [ उपर्युक्त गद्य भाग की तालिका पृष्ठ सं० ३२-३३ पर देखें ]


आद्यश्वभ्रेन्द्रकाणास्यात्स्थौल्यं क्रोशैकसम्मितम्॥
शेषश्वभ्रेन्द्रकाणां च क्रोशार्धार्धाधिकं क्रमात्॥५४॥

अर्थ: प्रथम पृथिवी के इन्द्रक बिलों का बाहुल्य एक कोश प्रमाण है और अन्य शेष पृथिवियों के बिलों का बाहुल्य क्रमशः आधा-आधा कोश अधिक अधिक है। अर्थात् प्रत्येक पृथिवियों के इन्द्रकों का बाहुल्य क्रमशः १ कोश, १ १/२, २, २ १/२, ३, ३ १/२ और ४ कोश प्रमाण है ॥५४॥


स्थूलत्वं प्रथमे श्वभ्रे श्रेणीबद्धेषुकीर्तितम्।
क्रोशैकं ज्ञानिभिः क्रोशतृतीयभागसंयुतम्॥५५॥

ततः षट्श्वभ्रभूमीनां श्रेणीबद्धेषुनिश्चितम्।
स्थौल्यं क्रोशद्विभागाभ्यां प्रत्येकमधिकं क्रमात्॥५६॥

अर्थ (श्लोक 55 से 56): प्रथम पृथिवी के श्रेणीबद्ध बिलों का बाहुल्य ज्ञानियों के द्वारा १ १/३ कोश माना गया है, और शेष छह पृथिवियों में से प्रत्येक भूमि के श्रेणीबद्धों का प्रमाण २/३ भाग अधिक अधिक माना गया है। अर्थात् प्रत्येक पृथिवी के श्रेणीबद्ध बिलों का प्रमाण क्रमशः १ १/३ कोश, २ कोश, २ २/३ कोश, ३ १/३ कोश, ४ कोश, ४ २/३ कोश और ५ १/३ कोश है ॥५५-५६॥


पिण्डतं यच्च बाहुल्यमिन्द्रकश्रेणिबद्धयोः।
पृथक् षट्पृथिवीनां तत् प्रकीर्णकेषु सम्मतम्॥५७॥

अर्थ: प्रथम आदि छह पृथिवियों के इन्द्रक और श्रेणीबद्ध बिलों के बाहुल्य का जो प्रमाण है उसे पृथक् पृथक् पृथ्वी का जोड़ने पर जो प्रमाण प्राप्त होता है वही उस पृथ्वी के प्रकीर्णक बिलों के बाहुल्य का प्रमाण माना गया है। अर्थात् १(१+१ १/३)=२ १/३ कोश, २(१ १/२+२)=३ १/२ कोश। ३ (२+२ २/३)=४ २/३ कोश। ४ (२ १/२ +३ १/३)=५ ५/६ कोश। ५(३+४)=७ कोश। ६ (३ १/२+४ २/३)=८ १/६ कोश, सातवीं पृथ्वी में प्रकीर्णक बिलों का अभाव है ॥५७॥


पृथ्वीनां पटलव्याप्तक्षेत्रं प्रतरसंख्यकैः।
समभागैर्विभक्तं युक्त्योर्ध्वाधश्चान्तरं मतम् ॥५८॥

अर्थ: पृथिवी के पटल व्याप्त क्षेत्र को एक कम प्रतर संख्या से (श्लोक में समभागैः पद है इससे ज्ञात होता है कि पटलों के अन्तरालों का ग्रहण किया है क्योंकि सभी नरकों में पटलों की संख्या विषम और अन्तरालों की संख्या पटल संख्या से एक कम अर्थात् सम रूप है) भाग देने पर ऊपर के पटल से उसके नीचे के पटल का अन्तर प्राप्त होता है। जैसे प्रथम पृथिवी में पटल व्याप्त क्षेत्र ७८००० योजन है। पटल संख्या १३ है, १३ पटलों में (१३-१) बारह अन्तराल हुए, अतः ७८००० योजन को १२ से भाग देने पर (७८००० १२)=६५०० योजन प्रति पटल अन्तर का प्रमाण प्राप्त होता है। इसी प्रकार द्वितीया आदि पृथिवियों में जानना चाहिए ॥५८॥


चतुर्दशसहस्राणि। माधव्यां बिलव्याप्तक्षेत्रं पञ्चक्रोशाः क्रोशत्रिभागानामेको भागः।

अर्थ: घर्मा पृथ्वी में बिल व्याप्त क्षेत्र का प्रमाण ७८००० योजन, वंशा में ३०००० योजन, मेघा में २६००० योजन, अञ्जना में २२००० योजन, अरिष्टा में १८००० योजन, मघवी में १४००० योजन और माधवी पृथ्वी में बिल व्याप्त क्षेत्र का प्रमाण ५ १/३ कोश (महाकोश) है।


क्रमेणैवेन्द्रकश्रेणी-बद्धप्रकीर्णकेष्वपि ।
संख्यातयोजनव्यास, बिलानामन्तरं स्मृतम्॥५९॥

तिर्यगन्तं जघन्येन, सार्धयोजनमागमे।
योजनत्रिकमुत्कृष्टं, मध्यमं बहुधा च तत् ॥६०॥

असंख्यायोजनव्यास, बिलानां तिर्यगन्तरम्॥
जघन्यं योजनानां स्यात्, सप्तसहस्रसम्मितम् ॥६१॥

सर्वोत्कृष्टमसंख्यातयोजनानन्तरं स्मृतम्।
जघन्योत्कृष्टयोर्मध्ये मध्यमं बहुभेदभाक् ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 59 से 62): जिनागम में इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलों में से संख्यात योजन विस्तार वाले बिलों का तिर्यग् अन्तर जघन्य १ १/२ योजन, उत्कृष्ट ३ योजन और मध्यम अन्तर अनेक भेद वाला कहा गया है, तथा असंख्यात योजन व्यास वाले बिलों का तिर्यग् अन्तर जघन्य सात हजार योजन, उत्कृष्ट असंख्यात योजन और जघन्य, उत्कृष्ट के मध्य में रहने वाले मध्यम भेदों का तिर्यग् अन्तर अनेक प्रकार का कहा गया है ॥५९-६२॥


प्रथमे पटले सीमन्तके चायुर्लघुस्थितिः।
दशवर्ष सहस्राणि, प्रोत्कृष्टेनायूरूर्जितम् ॥६३॥

नवतिश्च सहस्राणि, द्वितीये स्थितिरुत्तमा।
लक्षाश्च नवतिश्चासंख्य पूर्वकोटि सम्मिता ॥६४॥

तृतीयेऽन्येषु सर्वेषु, पटलं प्रतिवर्धते।
समुद्रदशभागाना-मेको भागोऽप्यनुक्रमात् ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 63 से 65): प्रथम पृथ्वी के प्रथम सीमन्त पटल के नारकी जीवों की जघन्य आयु दश हजार (१००००) वर्ष और उत्कृष्ट आयु नब्बे हजार (९००००) वर्ष है। दूसरे पटल की उत्कृष्ट आयु नब्बे लाख वर्ष, तीसरे पटल की असंख्यात पूर्वकोटि और चौथे पटल की उत्कृष्ट आयु एक सागर के दशवें भाग अर्थात् १/१० सागर प्रमाण है। इसके आगे सम्पूर्ण पटलों की उत्कृष्ट आयु का वृद्धि चय १/१० सागर है अर्थात् पूर्व पूर्व पटलों की उत्कृष्ट आयु में १/१० सागर जोड़ने से आगे-आगे के पटलों की उत्कृष्ट आयु प्राप्त होती जाती है ॥६३-६५॥


प्रथमे पटले ज्येष्ठं, यश्चायुस्तद्द्वितीयेके।
जघन्यं समयेनाधिकं सर्वत्रेति संस्थितिः ॥६६॥

अन्तिमे प्रतरेऽस्यायु-रुत्कृष्टं सागरोपमम्।
द्वितीयादिष्वितिज्येष्ठ-मायुः स्यात्पटलेऽन्तिमे ॥६७॥

सागराश्च त्रयः सप्त-दशसप्तदशक्रमात्।
द्वाविंशतिस्त्रयस्त्रिंश-दित्युत्कृष्टायुषः स्थितिः ॥६८॥

विभक्तं समभागेना-युर्भागैः प्रतरप्रमैः।
श्वभ्राणां पटलेषु स्यात् क्रमवृद्ध्या पृथक् पृथक् ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 66 से 69): प्रथम (ऊपर के) पटल की जो उत्कृष्ट आयु है उसमें एक समय अधिक कर देने पर वही द्वितीय (नीचे के) पटल की जघन्य आयु बन जाती है यह विधि सर्वत्र जानना चाहिए। प्रथम पृथिवी के अन्तिम पटल की उत्कृष्ट आयु एक सागर प्रमाण है। इसी प्रकार द्वितीयादि पृथिवियों के अन्तिम पटलों की उत्कृष्ट आयु क्रमशः ३, ७, १०, १७, २२, और ३३ सागरोपम प्रमाण है। प्रत्येक नरक की उत्कृष्ट आयु में से जघन्य आयु को घटाकर शेष को पटल संख्या से भाग देने पर नरकों के प्रत्येक पटल की आयु वृद्धि का प्रमाण प्राप्त होता है। जैसे द्वितीय नरक की जघन्यायु एक सागर, उत्कृष्टायु तीन सागर है, अतः वृद्धि का प्रमाण (३-१)=२ सागर है, पटल संख्या ११ से दो सागर वृद्धि को भाग देने पर २/११ सागर प्रति पटल वृद्धि का प्रमाण प्राप्त होता है ॥६६-६९॥


सप्तदण्डास्त्रयोहस्ताः षडंगुलास्तनून्नतिः।
उत्कृष्टानारकाणां च घर्मायाः पटलेऽन्तिमे॥७०॥

जघन्येन त्रयो हस्ताः आदिमे प्रतरे ततः।
शेषषड्नरकेषु स्याद् द्विगुणा द्विगुणोच्छ्रितिः॥७१॥

भागैः पटलसंख्यानैः भूमीनां पटलेषु च।
पृथग् विभक्त उत्सेधः क्रमाद् वृद्धियुतो मतः॥७२॥

अर्थ (श्लोक 70 से 72): धर्मा नामक प्रथम पृथ्वी के अन्तिम पटल में स्थित नारकियों के शरीर का उत्कृष्ट उत्सेध ७ धनुष, ३ हाथ और छह अंगुल है। शेष छह नरकों के अन्तिम पटलों में स्थित नारकियों के शरीर का उत्कृष्ट उत्सेध इससे दूना-दूना होता गया है। प्रथम नरक के प्रथम पटल का जघन्य उत्सेध तीन हाथ प्रमाण है। वृद्धि के प्रमाण को पटल संख्या से विभाजित करने पर जो प्रति पटल वृद्धि का प्रमाण आवे, उसको जोड़ देने से प्रत्येक पटल में शरीर का उत्सेध प्राप्त होता है ॥७०-७२॥


खरशूकरमार्जार-कपिश्वानदि गोमुखाः।
मधुकृतजालसादृश्या घण्टाधोमुखसन्निभाः ॥७३॥

वृत्तास्त्र्यस्त्राश्चतुःकोणा-दुःस्पर्शा दुःखखानयः।
वज्राभा प्रति बीभत्सा दुर्गन्धाश्च घृणास्पदाः॥७४॥

तमश्चयावृता निन्द्याः समस्त श्वभ्रभूमिषु।
इन्द्रकाद्येषु कृत्स्नेषु योनयः सन्ति दुष्कराः ॥७५॥

क्रोशैको द्वौ त्रयः क्रोशाः योजनैको द्वयं त्रयम्।
योजनानां शतं चेति व्यासः प्रोक्तोऽप्यनुक्रमात् ॥७६॥

सप्तानां श्वभ्रयोनीनां क्रोशाः पञ्चततो दश-
तथा पञ्चदश क्रोशाः पञ्चैव योजनानि च॥७७॥

दश पञ्चदशां ते योजनानां शतपञ्चकम्।
इति दैर्घ्यं क्रमात्प्रोक्तं सर्वासु श्वभ्रयोनिषु॥७८॥

अर्थ (श्लोक 73 से 78): सातों नरक भूमियों में इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिलों से सम्बन्धित योनियाँ-जन्म भूमियाँ गधा, सूकर, बिल्ली, बन्दर, कुत्ता और गाय आदि के मुख सदृश (ऊपर सँकरी भीतर चौड़ी), मधुकृत जाल सदृश, घण्टाकार और अधोमुख हैं, उनके आकार गोल, त्रिकोण और चतुष्कोण हैं तथा वे जन्मभूमियाँ दुःस्पर्श अर्थात् तीक्ष्ण, रूक्ष एवं घन स्पर्श से सहित, दुःखों की खान (आकर), वज्राभा अर्थात् वज्र सदृश कठोर तलभाग एवं दीवारों से युक्त, अत्यन्त ग्लानि एवं दुर्गन्ध उत्पादक, घृणास्पद, अन्धकार से व्याप्त, निन्दनीय और दुष्कर अर्थात् भयंकर हैं। उन सातों नरक भूमियों से सम्बन्धित सम्पूर्ण जन्म योनियों का व्यास क्रमशः १ कोश, २ कोश, ३ कोश, १ योजन, २ योजन, ३ योजन, और १०० योजन प्रमाण कहा गया है। इसी प्रकार उनकी दीर्घता भी क्रमशः ५ कोश, १० कोश, १५ कोश, ५ योजन, १० योजन, १५ योजन और ५०० योजन प्रमाण कही गई है ॥७३-७८॥


ये सप्तव्यसनासक्ता बह्वारम्भकृतोद्यमाः।
अत्यसन्तोषिणो नीच-सङ्गश्रीसंग्रहोद्यताः ॥७९॥

अतृप्ताः कामसेवाद्यै र्विषयामिषलम्पटाः।
अखाद्यखादका निन्द्या अपेयपानपायिनः ॥८०॥

अत्यन्तनिर्दयाः क्रूराः क्रूरकर्मविधायिनः।
रौद्रध्यानरता रौद्राः कृष्णलेश्या मदोद्धताः ॥८१॥

जिनमार्ग बहिर्भूतास्तीव्रमिथ्यात्व वासिताः।
कुशास्त्राध्ययनोद्युक्ता मिथ्यैकान्तमताश्रिताः ॥८२॥

पापकर्मरतानित्यं धर्मकर्मातिगाः शठाः।
पात्रदानजिनेन्द्रार्चा व्रतशीलादिदूरगाः ॥८३॥

हिंसादिपञ्चपापाढ्या नास्तिका धर्मदूषकाः।
धर्मविघ्नकरा मिथ्या पापमार्गप्रवर्तकाः ॥८४॥

जिनशासनजैनानां श्रावकाणां च धर्मिणाम्।
मुनीनां तीर्थकर्तॄणां शास्त्राणां निन्दकाः खलाः ॥८५॥

इत्यादि निन्द्यदुष्कर्म कारिणः पापपण्डिताः।
नरा याश्चस्त्रियो दुष्टा-स्तिर्यञ्चो रौद्रमानसाः ॥८६॥

रौद्रध्यानेन मृत्वान्ते ते ता यान्ति च पापिनः।
पापोदयेन तद्योग्याः सप्तेमाः श्वभ्रदुर्गतीः ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 79 से 87): दुष्ट चित्त वाले जो स्त्री और पुरुष निरन्तर सप्तव्यसनों में आसक्त, बहु आरम्भ, परिग्रह में उद्यमशील, अत्यन्त असन्तोषी, नीच लक्ष्मी के संग्रह में सदा प्रयत्नशील, अतृप्त, कामसेवन आदि विषयों के और मांस भक्षण के लम्पटी, अभक्ष्य भक्षण में रत, निन्द्य कार्य करने वाले, अपेय अर्थात् शराब आदि का सेवन करने वाले, अत्यन्त निर्दय, क्रूर परिणामी, क्रूरकर्म करने में संलग्न, रौद्रध्यान रत, रौद्रता एवं कृष्णलेश्या से अनुरञ्जित, मद से उद्धत, जिनमार्ग से बहिर्भूत, तीव्र मिथ्यात्व से युक्त कुशास्त्रों के अध्ययन में उद्यत, एकान्त आदि मिथ्यात्व को आश्रयदाता, पापकर्म रत, धर्म कर्म से निरन्तर दूर रहने वाले, शठ, पात्रदान, जिनेन्द्र पूजन और व्रतशील आदि सत्कर्मों से अति दूर, हिंसादि पाँच पापों से युक्त, नास्तिक, समीचीन धर्म को दूषण लगाने वाले, धार्मिक कार्यों में विघ्न डालने वाले, मिथ्या और पापमार्ग के प्रवर्तक, जिनशासन, जैनधर्मानुयायी, श्रावक श्राविकाओं, धर्मात्माओं, मुनिराजों, तीर्थंकरों और शास्त्रों की निन्दा करने वाले, दुष्ट स्वभावी, निन्द्य और दुष्कर्म करने वाले तथा जो पाप के पण्डित हैं वे मनुष्य एवं स्त्री तथा रौद्र परिणाम वाले दुष्ट पशु (तिर्यञ्च), अपनी आयु के अन्त में रौद्रध्यान से मरकर वे पापी पापोदय से अपने अपने परिणामों की योग्यतानुसार रत्नप्रभा आदि सातों नरक भूमियों में दुर्गति को प्राप्त होते हैं ॥७९-८७॥


अन्तर्मुहूर्त कालेन ते तासु श्वभ्रयोनिषु।
षट् पर्याप्तीरवाप्याथ स्वोर्ध्वपादाह्यधोमुखाः ॥८८॥

परं रावं प्रकुर्वाणाः पतन्त्यधोमहीतले।
वज्रकण्टकशस्त्राग्रे ततोऽतिदुःखविह्वलाः ॥८९॥

इव सूत्रावृताः पिण्डाः स्वयमेवोत्पतन्ति च।
क्रोशत्रयं चतुर्भागाधिकं योजनसप्तकम् ॥९०॥

घर्मायां शेष पृथ्वीषु द्विगुणं द्विगुणं ततः।
क्रमादुत्पतनं ज्ञेयं नारकाणां सुदुष्करम् ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 88 से 91): उन नारक भूमियों में अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा छह पर्याप्तियाँ पूर्ण कर ऊपर पैर और नीचे हैं मुख जिनके तथा जो भयङ्कर शब्द कर रहे हैं ऐसे वे नारकी नीचे भूमितल पर गिरते हैं, और वज्र एवं कण्टक के सदृश कठोर तथा शस्त्रों के अग्रभाग के सदृश तीक्ष्ण भूमि के स्पर्श जन्य अत्यन्त दुःख से विह्वल होते हुए गेंद के समान स्वयं ऊपर उछलते हैं। उन नारकी जीवों का अत्यन्त दुष्कर उत्पतन घम्मा पृथ्वी में सात योजन, तीन कोश और एक कोश का चतुर्थ भाग (५०० धनुष) (१/४ कोस अधिक ३ कोस) प्रमाण और अन्य शेष छह पृथिवियों में इससे दूना-दूना जानना चाहिए ॥८८-९१॥ (सातवीं पृथ्वी में ५०० योजन प्रमाण ऊपर उछलते हैं)


घर्मायां स्याज्जघन्या दु-र्लेश्या कापोतसंज्ञिका।
वंशायां मध्यमा कापो-ताख्या नारकजन्मनाम्॥९२॥

मेघायां सा खिलोत्कृष्टा, जघन्या नीलनामिका।
अञ्जनायां च लेश्यास्ति, नीलाख्यामध्यमाशुभा॥९३॥

अरिष्टायां भवेन्नीलोत्कृष्टा कृष्णा जघन्यका।
मघव्यां मध्यमा कृष्ण, लेश्या स्यात्सुष्ठु निन्दिता॥९४॥

माघव्यां सकलोत्कृष्टा, कृष्णलेश्याऽशुभाकरा।
इमास्तिस्रोऽशुभालेश्या दुःखाद्याक्लेशमातरः॥९५॥

अर्थ (श्लोक 92 से 95): जो दुःखों को देने वालीं हैं और क्लेश की माता हैं नरकों में ऐसी तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं। उनमें से घम्मा पृथ्वी में स्थित नारकी जीवों के परिणाम जघन्य कापोत लेश्या से युक्त, वंशा में मध्यम कापोत, मेघा में उत्कृष्ट कापोत और जघन्य नील, अञ्जना में मध्यम नील, अरिष्टा में उत्कृष्ट नील और जघन्य कृष्ण, मघवी में मध्यम कृष्ण और माघवी पृथ्वी में उत्पन्न नारकी जीवों के परिणाम निन्दनीय उत्कृष्ट कृष्णलेश्या से अनुरञ्जित होते हैं ॥९२-९५॥


आद्यान् श्वभ्रत्रयान् यान्ति, षट्संहनन संयुताः।
पञ्चमश्वभ्रपर्यन्तं, पञ्चसंहननान्विताः॥९६॥

षट् पृथ्व्यन्तं च गच्छन्ति, चतुः संहननाङ्किताः।
पापिनः सप्तपृथ्व्यन्तमादि संहननाङ्गिनः॥९७॥

अर्थ (श्लोक 96 से 97): आदि के तीन नरकों तक छह संहननों से युक्त जीव जन्म लेते हैं, पाचवें नरक पर्यन्त सुपाटिका को छोड़ कर शेष पाँच संहनन वाले, छठवें नरक पर्यन्त सुपाटिका और कीलक को छोड़कर शेष चार संहनन वाले तथा सातवें नरक में (७ वें नरक पर्यन्त) एक वज्रवृषभनाराचसंहनन से युक्त पापी जीव ही जन्म लेते हैं ॥९६-९७॥


असंज्ञिनोऽति पापेन व्रजन्ति प्रथमां क्षितिम्।
सरीसृपा द्वितीयान्तं यान्त्युत्कृष्टकुपापतः॥९८॥

मांसाशिपक्षिणः क्रूरास्तृतीयान्तं व्रजन्ति च।
भुजङ्गमाश्चतुर्थ्यन्तमत्यन्तक्रूरकर्मभिः ॥९९॥

दंष्ट्रिणः सिंहव्याघ्राद्याः पञ्चम्यन्तं प्रयान्ति च।
निःशीला अतिपापाढ्याः षष्ट्यन्तं योषिताः क्रमात् ॥१००॥

सप्तमीक्षितिपर्यन्तं महामत्स्याश्चिरायुषः।
महापापभराक्रान्ता नराश्च यान्ति दुर्धियः ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 98 से 101): अत्यन्त पाप के कारण असंज्ञी जीव प्रथम पृथिवी तक ही जाते हैं। उत्कृष्ट पाप प्रवृत्ति से सरीसृप दूसरी पृथिवी (१ ली+२ री) पर्यन्त जाते हैं। मांसभक्षी पक्षी क्रूर परिणामों के कारण तीसरी पृथिवीपर्यन्त (१ ली से ३ री तक) जन्म लेते हैं। अत्यन्त क्रूर कर्मरत होने से सर्प चौथी पृथिवी (१ ली से ४ थी) पर्यन्त जन्म लेते हैं। दाढ़ वाले सिंह, व्याघ्र आदि पाँचवीं पृथिवी पर्यन्त ही जाते हैं। शील रहित एवं बहुत पाप से युक्त स्त्री छठवीं पृथिवी पर्यन्त तथा दीर्घ आयु को धारण करने वाले महामत्स्य और महापाप के भार से आक्रान्त और खोटी बुद्धि को धारण करने वाले मनुष्य सातवीं पृथिवी (१ ली से ७ वीं) पर्यन्त जाते हैं ॥९८-१०१॥


उत्कृष्टेन स्वसन्तत्या सोऽसंज्ञी प्रथमावनौ।
अष्टवारान् क्रमाद् गच्छेत् सरिसर्पोऽति पापतः ॥१०२॥

सप्तवारान् द्वितीयायां तृतीयायां खगो व्रजेत्।
षड् वारांश्च चतुर्थ्यां हि पञ्चवारान् भुजङ्गमाः ॥१०३॥

पञ्चम्यां च चतुर्वारान् याति सिंहो निरन्तरम्।
षष्ठ्यां योषित् त्रिवारं सप्तम्यां वारद्वयं पुमान् ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 102 से 104): पाप के कारण यदि कोई असंज्ञी जीव उत्कृष्ट रूप से प्रथम पृथिवी में उत्पन्न हो तो आठ बार, सरीसृप यदि वंशा में निरन्तर उत्पन्न हो तो सात बार, पक्षी यदि मेघा में निरन्तर उत्पन्न हो तो छह बार, सर्प यदि अञ्जना में निरन्तर उत्पन्न हो तो पाँच बार, सिंह यदि अरिष्टा में निरन्तर हो तो चार बार, स्त्री यदि मघवी पृथिवी में निरन्तर उत्पन्न हो तो तीन बार और यदि कोई मत्स्य एवं मनुष्य माघवी पृथिवी में उत्पन्न हो तो दो बार उत्पन्न हो सकते हैं ॥१०२-१०४॥


श्वभ्रेभ्यो निर्गता ये ते तिर्यग् नरगतिद्वये।
कर्मभूमिषु जायन्ते गर्भजाः संज्ञिनः स्फुटम् ॥१०५॥

अवश्यं नारकाः क्रूरा निर्गताः सप्तमीक्षिते।
क्रूरजातिषु तिर्यक्त्वं लभन्ते श्वभ्रसाधकम् ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 105 से 106): प्रथम पृथ्वी से षष्ठ पृथ्वी तक के नारकी जीव नरक से निकलकर मनुष्य और तिर्यञ्च इन दो गतियों में कर्मभूमिज, गर्भज (पर्याप्तक) और संज्ञी होते हैं तथा सातवीं पृथ्वी से निकले हुए क्रूर स्वभावी नारकी जीव पुनः नरक के साधनभूत क्रूर स्वभाव वाली जाति में तिर्यञ्चपने को प्राप्त करते हैं अर्थात् सातवीं पृथ्वी से निकले हुए नारकी जीव नियम से कर्मभूमिज, गर्भज, पर्याप्तक और संज्ञी तिर्यञ्च होते हैं ॥१०५-१०६॥


निर्गत्य नरकाज्जीवाश्चक्रे शबलकेशवाः।
तच्छत्रवो न जायन्ते चायान्त्येते च्युता दिवः ॥१०७॥


चतुर्थनरकादेत्य न स्युस्तीर्थकरा भुवि।
निर्गत्य पञ्चमश्वभ्राच्चरमाङ्गा भवन्ति न ॥१०८॥


जीवाः षष्ठान् किलागत्य जायन्ते यतयो न च।
सप्तमश्वभ्रतः सासादना मिश्रादृगन्विताः ॥१०९॥


प्रथमे पटले निन्द्य पूतिगन्धोऽति दुस्सहः।
मृत्तिकाया भ्रमेद् व्यापन् क्रोशार्धं घ्राणदुःखदः ॥११०॥

ततोऽधोधः समस्तान्य पटलेष्वप्यनुक्रमात्।
अन्तिमं पटलं यावत् क्रोशार्धं स प्रवर्धते ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 110 से 111): प्रथम पटल में निन्दनीय, खोटी दुर्गन्ध युक्त, अति दुस्सह और घ्राण इन्द्रिय को दुःख देने वाली मिट्टी अर्ध कोश पर्यन्त फैलती है, और उससे नीचे-नीचे के सम्पूर्ण अन्य पटलों में अनुक्रम से अर्ध-अर्ध कोश वृद्धिंगत होते हुए अन्तिम पटल में उसका फैलाव २४ १/२ कोस हो जाता है ॥११०-१११॥


एकं योजनपर्यन्तं घर्मायामवधिर्मतः।
सार्धक्रोशत्रयं स्याच्च वंशायां नारकाङ्गिनाम् ॥११२॥

मेघायां च त्रिगव्यूतिरञ्जनायां भवोद्भवः।
सार्धक्रोशद्वयान्तं चारिष्टायां क्रोशयुग्मकम् ॥११३॥

मधव्यां सार्धगव्यूतिरवधिर्वैरसूचकः।
भवप्रत्यय एवाहो माधव्यां क्रोशसम्मितः ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 112 से 114): धम्मा पृथ्‍वी के नारकी जीव बैर भाव का सूचक अपने भवप्रत्यय अवधिज्ञान से एक योजन पर्यन्त, वंशा पृथ्‍वी के नारकी जीव ३ १/२ कोश, मेघा के ३ कोश, अञ्जना के २ १/२ कोस, अरिष्टा के २ कोस, मधवी के १ १/२ कोस और माधवी पृथ्‍वी के नारकी जीव मात्र १ कोस पर्यन्त जान सकते हैं, (इसके आगे नहीं) ॥११२-११४॥


प्रथमे नरके ज्येष्ठ-मुत्पत्तौ मरणेऽन्तरम्।
चतुर्विंशतिसंख्याता मुहूर्ता द्वितीयेऽङ्गिनाम् ॥११५॥


दिनानि सप्त च श्वभ्रे, तृतीये पक्ष संख्यकम्।
चतुर्थे चैक मासो हि पञ्चमे मास युग्मकम् ॥११६॥


षष्ठे मास चतुष्कं च सप्तमे नरकात्मनाम्।
षण्मासा अन्तरं निःसरण प्रवेशयोर्महत् ॥११७॥

अर्थ: यदि कोई भी जीव प्रथम पृथिवी में जन्म या मरण न करे तो अधिक से अधिक २४ मुहूर्त तक, द्वितीय में ७ दिन तक, तृतीय में १ पक्ष तक, चतुर्थ में १ माह तक, पञ्चम में २ माह तक, षष्ठ में ४ माह तक और सप्तम पृथिवी में उत्कृष्टतः ६ माह तक न करे ॥१९५-१९७॥


पृथिवीषु चतुराद्यासु तीव्रमुष्णं च केवलं।
पञ्चम्यां हि चतुर्भागानां त्रिभागेषु दुस्सहम् ॥११८॥


पञ्चम्याश्च चतुर्थे हि, भागे षष्ठ्यां दुराश्रयम्।
सप्तम्यां शैत्यमत्यन्तं, सर्वाङ्गदाहकं महत् ॥११९॥


लक्षकैकाणि भवेयुः सहस्त्राणि पञ्चसप्ततिः।
विश्वदुःख निधानानि, ह्यतिशैत्यबिलानि च ॥१२०॥

अर्थ: रत्नप्रभा आदि चार पृथिवियों में और पञ्चम पृथ्वी के ३/४ भाग पर्यन्त स्थित बिलों में अत्यन्त उष्ण वेदना है, तथा पञ्चम पृथ्वी के अवशेष १/४ भाग से सप्तम पृथ्वी पर्यन्त स्थित बिलों में सम्पूर्ण अङ्गों को दाह करने वाली अत्यन्त शीत वेदना है। इस प्रकार ३०००००० + २५००००० + १५००००० + १०००००० + ( ३०००००/४ × ३ ) २२५००० = ८२२५००० (ब्यासी लाख पच्चीस हजार) बिलों में भयङ्कर दुःख उत्पन्न करने वाली मात्र उष्ण वेदना है और ( ३०००००×१/४ ) = ७५००० + ९९९९९ + ५ = १७५००० (एक लाख पचहत्तर हजार) बिलों में सम्पूर्ण दुःखों के स्थान स्वरूप शीत वेदना है ॥१९८-२०१॥


यदा तदासुरा एत्य नरकत्रयभूमिषु।
निवारयन्ति तद् भक्त्योपसर्गांश्च कदर्थनाम् ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 122 से 123): जो भविष्य में तीर्थंकर होने वाले हैं, नरक जन्य असाता और दुःखों का वेदन कर रहे हैं ऐसे रत्नप्रभा से तृतीय पृथ्वी पर्यन्त स्थित तीर्थंकर प्रकृति के बन्ध व सत्त्व वाले नारकी जीवों की आयु में जब ६ माह अवशेष रहते हैं तब असुरकुमार जाति के देव (भावी तीर्थंकर की) भक्ति से प्रेरित होकर उनके उपसर्ग एवं पीड़ाओं का निवारण कर देते हैं ॥१२२-१२३॥


इति बहुविधरूपाऽधःस्थ लोकं विदित्वा,
जिनवरगणिनोक्तं विश्वदुःखैकवार्द्धिम्।
दृगवगमचरित्रै-स्तद्विहान्यै शिवाप्त्यै,
चरत कुनरकघ्नं दुःखभीताः सुधर्मम् ॥१२४॥

अर्थ: इस प्रकार जिनेन्द्र एवं गणधर देवों द्वारा नाना प्रकार से कथित, सम्पूर्ण दुःखों का समुद्र ऐसे अधोलोक का स्वरूप जानकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के द्वारा उन दुःखों के निवारण (विनाश) हेतु और मोक्ष सुख की प्राप्ति हेतु दुःखों से भयभीत भव्यजन कुगति को नाश करने वाले रत्नत्रय स्वरूप धर्म का आचरण करें ॥१२४॥


धर्मः स्वर्गगृहाङ्गणः सुखनिधि-१धर्मोथकर्मौघहा,
धर्मः श्वभ्र निवारकोऽसुखहरो, धर्मोगुणैकार्णवः।
धर्मोमुक्ति निबन्धनो निरुपमः, सर्वार्थसिद्धिप्रदो,
यः सोऽत्राचरितो मया सुचरणै-र्मेऽस्तु स्तुतः सिद्धये ॥१२५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र है लक्षण जिसका ऐसा धर्म स्वर्गरूप गृह का आंगन है, सुख का खजाना है, कर्म समूह को नाश करने वाला है, नरकों का निवारक है। ऐसा धर्म ही गुणों का अद्वितीय समुद्र है, मुक्ति का निबन्धक है, उपमातीत है, सर्व अर्थों (प्रयोजनों) की सिद्धि करने वाला है, तथा जो चारित्रवानों के द्वारा आचरित और मेरे द्वारा स्तुत्य है ऐसा वह रत्नत्रय धर्म मेरी सिद्धि अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के लिये हो ॥१२५॥

तृतीय अधिकार नरक दुःख वर्णन

अधोगत्येनसां हंतॄन् स्वभुक्तिमुक्तिकारकान्।
जगद्धितान् जिनान् वन्दे तद्गत्यै धर्मचक्रिणः ॥१॥

अर्थ: अधोगति के जनक पापाचरणों को नाश करने वाले, स्वर्ग एवं मोक्ष सम्पदा प्राप्त कराने वाले, जगत् हितकारक, धर्मचक्रवर्ती जिनेन्द्र भगवान् को मैं उनकी गति मोक्ष की प्राप्ति के लिए नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ वक्ष्ये स्वरूपादीन् दुःखौघान्यशुभानि च।
श्वभ्रेषु नारकाणां कुपापिनां भीतिहेतवे ॥२॥

अर्थ: अब मैं पापी जीवों को भय उत्पत्ति के हेतु नरक बिलों में रहने वाले नारकी जीवों का दुःखसमूह से युक्त और महा अशुभ स्वरूप आदि कहूँगा ॥२॥


घनवज्राऽशुभा भित्तिभागा व्रणसमानकाः।
वृत्तत्रिचतुरस्त्रादिनानाकाराः शुभाऽतिगाः ॥३॥

बन्दीगेहाधिकातीवबीभत्सास्तासु भूमिषु।
विश्वदुःखाकरीभूता बिलौघाः सन्ति भीतिदाः ॥४॥

अर्थ (श्लोक 3 से 4): शरीर में उत्पन्न हुए व्रण (घाव या फोड़े) के सदृश (मुख सकरा भीतर चौड़ा) वहाँ के बिलों की भूमियाँ एवं दीवारें वज्र के समान कठोर और अशुभ हैं, जो गोल त्रिकोण एवं चतुष्कोण आदि नाना प्रकार के आकार वाली हैं। तथा वहाँ के बिल यहाँ के कारागृहों से भी अत्यधिक ग्लानि युक्त सम्पूर्ण दुःखों के स्थान और भय उत्पन्न कराने वाले हैं ॥३-४॥


सहस्रवृश्चिकेभ्योऽपि दष्टेभ्योधिक वेदना।
वज्रकण्टकसङ्कीर्णे श्वभ्रभूम्यस्पर्शनाद् भवेद् ॥५॥

मार्जारश्वानगोमायु दंष्ट्रि खगादिदेहिनाम्।
तत्रात्यऽशुभदुर्गन्धाः स्युः कलेवरराशयः ॥६॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): एक साथ हजारों बिच्छुओं के काटने पर जो वेदना होती है उससे भी अधिक वेदना वज्रमय कांटों से व्याप्त नरक भूमि के स्पर्श मात्र से होती है। बिल्ली, कुत्ता, शृगाल, व्याघ्र, हाथी और पक्षियों के मृतक शरीरों की राशि समूह से जो दुर्गन्ध निकलती है उससे भी अति अशुभ और भयंकर दुर्गन्ध वहाँ निरन्तर व्याप्त रहती है ॥५-६॥


क्षारश्रोणितदुर्गन्धवारि वीचिचयाकुलाः।
वहन्ति वैतरण्याख्या नद्योऽत्र मांसकर्दमाः ॥७॥

असिपत्रनिभैः पत्रैराकीर्णानि ह्यनेकशाः।
दुराश्रयाणि सन्त्यासु चासिपत्रवनानि वै ॥८॥

अधोमध्याग्रभागेषु सर्वत्र तीक्ष्णकण्टकैः।
चिताः शाल्मलिवृक्षौघाः भवन्ति ते दुःखस्पृशाः ॥९॥

किरन्तोऽग्निकणाभानि रजांसि वायवोऽशुभाः।
तेषु वान्त्यऽतिदुःस्पर्शाः सर्वाङ्गदुःखहेतवः ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): उन नरक भूमियों में मांसरूप कीचड़ और क्षार एवं दुर्गन्धित रक्तरूप जल की कल्लोलों से व्याप्त वैतरणी नाम की नदियाँ बहतीं हैं। उन नरकों में असिपत्र के सदृश हैं पत्ते जिनमें ऐसे वृक्षों से युक्त अनेक असिपत्र नाम के वन हैं जो नारकी जीवों को दुःखसमूह की उत्पत्ति के कारणभूत हैं जिनका स्पर्श अति दुखद है और जो जड़ भाग से मस्तक पर्यन्त तीक्ष्ण काँटों से युक्त हैं, ऐसे शाल्मलि नाम के वृक्ष समूहों से वे नरक भूमियाँ व्याप्त हैं। जिसका स्पर्श सम्पूर्ण शरीर को भयंकर दुःख का कारण है, जो असुहावनी है और जिसमें खिरने वाले अग्नि कणों के सदृश रज का मिश्रण है ऐसी वायु वहाँ नित्य ही बहती रहती है ॥७-१०॥


भीमा गिरिगुहा बह्वयः सिंह व्याघ्रादिभिर्भृताः।
क्रूरैर्मांसाशिभिर्नागैर्भवन्ति नरकेषु च ॥११॥

वज्रचञ्चुपुटाः क्रूराः पक्षिणोऽतिभयङ्कराः।
उत्पतन्ति वनेष्वत्र नारकाङ्गादिभक्षकाः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): नरकों में पर्वतों की भयंकर गुफाएँ हैं, जो सदा नागों, सिंहों और व्याघ्र आदि मांसभक्षी एवं क्रूर परिणामी पशुओं से व्याप्त रहती हैं, तथा वहाँ के वनों में वज्र के सदृश कठोर चोंच वाले दुष्ट और भयंकर पक्षी उड़ते रहते हैं जो नारकियों के शरीर का भक्षण करके उन्हें दुःख पहुँचाते हैं ॥११-१२॥


करपत्रसमातीव कर्कशाङ्गाः कुरूपिणः।
कुत्सिता हुण्डसंस्थाना रक्तनेत्रा भयानकाः ॥१३॥

रौद्ररूपाश्च दुःप्रेक्षा दुःखदानैक पण्डिताः।
विकरालमुखाः क्रूरा रौद्रध्यानपरायणाः ॥१४॥

प्रचण्डा कालरूपाढ्या-स्तीव्ररोषाः कषायिणः।
निर्दया नारका निन्द्या निन्द्यकर्मकराः खलाः ॥१५॥

संख्यातिगा वसन्त्येषु, नपुंसकाः कलिप्रियाः।
विश्वदुःखाब्धि मध्यस्था-निःकारणरणोद्धताः ॥१६॥

व्याघ्रसिंहादिरूपाद्यैर्नाना प्रहरणादिभिः।
स्वेच्छया विक्रियन्ते ते, रणायविक्रियांगताः ॥१७॥

विभङ्गावधि कुज्ञानं, प्राग्वैरभवसूचकम्।
सहजं नारकाणां स्यात्स्वान्येषां दुःखकारणम् ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 13 से 18): नरक भूमियों में जो नारकी जीव रहते हैं, उनके शरीर असिपत्र के सदृश अत्यन्त कठोर और तीक्ष्ण होते हैं। उनका रूप ग्लानि उत्पादक, रौद्र, कुत्सित और दुष्प्रेक्ष्य (अदर्शनीय) होता है। भयानक और लाल-लाल नेत्रों वाले उन जीवों का संस्थान हुण्डक, मुख विकराल और परिणाम अति रौद्र एवं क्रूर होता है। वे एक दूसरे को दुःख देने में अत्यन्त चतुर होते हैं। प्रचण्ड काल के सदृश वर्ण वाले, तीव्र क्रोध के साथ-साथ सम्पूर्ण कषायों के वशीभूत, निर्दय निन्द्य तथा निरन्तर निन्द्य कार्यों में ही रत, दुष्ट स्वभावी, कलह प्रिय, नपुंसक वेद से युक्त और सम्पूर्ण दुःखों के समुद्र वे नारकी जीव निष्कारण युद्ध करने के लिये उद्धत रहते हैं। युद्ध के लिये भयंकर सिंह, व्याघ्र आदि के रूप एवं नाना प्रकार के शस्त्र आदि बना लेने में वे स्वच्छन्दता पूर्वक विक्रिया करते रहते हैं उन नारकी जीवों को पूर्व भव के बैर की सूचना आदि देने की शक्ति से समर्थ विभङ्गावधि खोटा ज्ञान सहज ही होता है जिससे वे परस्पर में एक दूसरे को दुःख देते हुए स्वयं भी दुःखी होते हैं ॥१३-१८॥


कुष्ठोदरव्यथाशूलादयो ये दुस्सहा भुवि।
रोगास्ते नारकाङ्गेषु सर्वे सन्ति निसर्गतः ॥१९॥

अर्थ: भुवि-मध्यलोक में कुष्ठ एवं उदरशूल आदि जितने भी दुस्सह दुःख देने वाले रोग हैं वे सम्पूर्ण रोग स्वभाव से ही नारकियों के शरीर में एक साथ होते हैं ॥१९॥


कृत्स्नान्न भक्षणासाध्या, सर्वाङ्गोद्वेगकारिणी।
नारकाणां क्षुधातीव्रा, जायतेऽन्तःप्रदाहिनी ॥२०॥

तया बाह्यान्तरङ्गेषु, तरां सन्तापिताश्च ते।
अशितुं तिलतुल्यान्नं, लभन्ते जातु नाशुभात् ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 20 से 21): नारकी जीवों के हृदय को दग्ध कर देने वाली, सम्पूर्ण अंगों में उद्वेग उत्पन्न करने वाली तथा (तीन लोक के) सम्पूर्ण अन्न का भक्षण करने पर भी जो शमन को प्राप्त न हो ऐसी तीव्र क्षुधा वेदना उत्पन्न होती है। उससे बाह्य और अंतरंग में अत्यन्त सन्ताप उत्पन्न होता है किन्तु अशुभ कर्म के योग से उन्हें तिल के बराबर भी अन्न कभी खाने को नहीं मिलता ॥२०-२१॥


समुद्रनीरपानाद्यै-रशाम्या तृट् कुवेदना।
विश्वाङ्गशोषिका तीव्रो-त्पद्यते श्वभ्रजन्मिनाम् ॥२२॥

तयातिदग्धकायास्ते, नारका दुःखविह्वलाः।
बिन्दुमात्रं जलं पातुं, प्राप्नुवन्ति न पापतः ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 22 से 23): समुद्र के सम्पूर्ण जलपान द्वारा भी जो शमन को प्राप्त न हो ऐसी सर्वांगों को शोषित करने वाली तीव्र तृषा वेदना उन नारकी जीवों के उत्पन्न होती है, जिससे शरीर अति दग्ध हो जाता है और वे नारकी जीव निरन्तर अति विह्वल होते रहते हैं, फिर भी पाप कर्म के उदय से उन्हें कभी बिन्दु मात्र भी जल पीने को प्राप्त नहीं होता ॥२२-२३॥


नरक गत शीत-उष्ण वेदना का कथन


ज्वलन्ति नारकावासाः सदान्तर्दुस्सहोष्मभिः।
अन्धकाराकुला निन्द्याः पूर्णा नारकपापिभिः ॥२४॥

लक्षयोजनमानोऽयः पिण्ड क्षिप्तोत्र तत्क्षणम्।
बहूष्मानलतापाद्यैः शतखण्डं प्रयाति भोः ॥२५॥

शीतश्वभ्रेषु निक्षिप्तोऽयः पिण्डो मेरुमानकः।
सद्यो विलीयते तीव्रतुषाराद्यैर्न संशयः ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 24 से 26): निरन्तर दुस्सह अन्तर्दाह में जलने वाले पापी जीवों से जो परिपूर्ण हैं, अन्धकार से व्याप्त हैं और निन्दनीय हैं, ऐसे नारकावास सतत उष्ण रहते हैं। भो भव्यजनो! ऐसे उन गरम नारकावासों में यदि एक लाख योजन का (सुमेरु सदृश) गोला भी डाल दिया जाय तो वह भी वहाँ की भयंकर अग्निताप के द्वारा सैकड़ों खण्डों को प्राप्त हो जाता है। शीत बिलों में यदि मेरु पर्वत के समान लोह का पिण्ड डाल दिया जाय तो वह तीव्र तुषार के कारण शीघ्र ही विलीन हो जाता है इसमें संशय नहीं है ॥२४-२६॥


विभिन्न प्रकार के दुःखों का विवेचन


यत् किञ्चिद् दुःखदं द्रव्यं पञ्चाक्षाङ्गमनोऽप्रियम्।
तत् सर्वं तेषु तेषां स्यात् पिण्डितं पापकर्मभिः ॥२७॥

अर्थ: पञ्चेन्द्रियों के विषय सम्बन्धी जितने भी दुःख उत्पादक, अप्रिय एवं अभोग्य पदार्थ हैं, वे सब पापकर्म के उदय से नरकों में उन नारकी जीवों के लिये एकत्रित हैं ॥२७॥


इत्यशर्मनिधानेषु पापिनः पापपाकतः।
अधोमुखाः पतन्त्येषु पापिनामुन्नतिः कुतः ॥२८॥

अर्थ: इस प्रकार दुःखों के निदान स्वरूप इन नरकों में पापी जीव पापोदय से अधोमुख गिरते हैं, क्योंकि पापियों की ऊर्ध्वगति कहाँ? अर्थात् पाप के भार से युक्त जीव ऊपर कैसे जा सकते हैं ॥२८॥


तत्रात्युष्णाग्निसन्तप्ता वराकाः पतिताश्च ते।
निपतन्त्युत्पतन्त्याशु ततभ्राष्ट्रतिला इव ॥२९॥

अर्थ: जिस प्रकार तप्त भार में डाले गये तिल (या चना आदि अन्य धान्य) तुरन्त ही ऊपर उचट कर फिर नीचे गिरते हैं, उसी प्रकार वे बेचारे दीन नारकी जीव अग्नि से सन्तप्त अति उष्ण भूमि में पड़ने के बाद शीघ्र ही (अनेकों बार) ऊपर उछल उछल कर नीचे गिरते हैं ॥२९॥


ततोऽति वेदनाक्रान्तास्ते तत्क्षेत्रं भयानकम्।
प्रचण्डान्नारकान् वीक्ष्येतिचित्ते चिन्तयन्ति च ॥३०॥

अहो! निन्द्यमिदं क्षेत्रं किमापदां किलाकरम्।
केऽमी च नारका रौद्रा मारणैकपरायणाः ॥३१॥

न चात्र स्वजनः स्वामी भृत्यो वा जातु दृश्यते।
निमेषार्धं सुखं सारं सुखकृत् वस्तु नो परम् ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 30 से 32): इस प्रकार उस क्षेत्र सम्बन्धी भयंकर वेदना से आक्रान्त जब वे नारकी जीव अन्य भयावह नारकियों को देखते हैं, तब विचार करते हैं कि हाय! आपदाओं की खान स्वरूप यह निन्द्य क्षेत्र कौन है? मार-काट में परायण ये दुष्ट नारकी कौन हैं? यहाँ कहीं भी मेरे कोई कुटुम्बीजन, स्वामी और नौकर आदि दिखाई नहीं देते तथा न अर्धनिमेष मात्र सुख और न सुख उत्पन्न करने वाली अन्य कोई वस्तुएँ ही दिखाई देतीं हैं ॥३०-३२॥


वयं केन त्विहानीता रौद्रस्थाने कुकर्मणा।
कृत्स्न दुःखाकरीभूते पापारिकवलीकृताः ॥३३॥

अर्थ: खोटे कर्मों में रत और पापी शत्रुओं द्वारा भक्षण किये जाने वाले हम सब इस सम्पूर्ण दुःखों के खान स्वरूप रौद्रस्थान में किस पापकर्म के द्वारा लाये गये हैं ॥३३॥


पूर्व जन्म में किये हुए पापों का चिन्तन एवं पश्चात्ताप


इत्यादि चिन्तनात्तेषां प्रादुर्भवति दुःखदः।
विभङ्गावधिरेव स्व प्राग्जन्म वैरसूचकः ॥३४॥

तेन विज्ञायते सर्वं भवानाचारमञ्जसा।
पश्चात्तापाग्नि सन्तप्ताः शोचन्तीति स्वदुग्विधीन् ॥३५॥

अहो! दुष्कर्मकोटिभिरस्माभिः स्वात्मनाशकम्।
यन्निन्द्यमर्जितं पापं महत् पञ्चाक्षवञ्चितैः ॥३६॥

तेनास्माकं निरौपम्या दुःखक्लेशादि कोटयः।
प्रादुरासन् जगन्निन्द्या अस्मिन् क्षेत्रं सुखातिगे ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 34 से 37): इस प्रकार के चिन्तन मात्र से उन नारकी जीवों को अपने पूर्व जन्म के वैर का सूचक और दुःख उत्पत्ति का कारण कुअवधिज्ञान (जातिस्मरणज्ञान) स्वयं प्रकट हो जाता है। जिसके द्वारा वे अपने पूर्व भव के अनाचारों को और अपनी सम्पूर्ण दुष्ट क्रियाओं को शीघ्र ही जान लेते हैं, अतः पश्चाताप की अग्नि से सन्तप्त होते हुए इस प्रकार विचार करते हैं कि अहो! पञ्चेन्द्रियों के विषयों से ठगे हुए एवं करोड़ों दुष्कर्मों के द्वारा हमने अपनी आत्मा के नाशक अत्यन्त निन्द्य जो महान् पाप अर्जित किये हैं, उनके द्वारा ही इस दुःखदाई क्षेत्र में निन्दनीय और उपमा रहित करोड़ों दुःख एवं क्लेश प्रकट हो रहे हैं ॥३४-३७॥


हा! सर्षपाक्षसौख्यार्थं लम्पटैस्तदघं कृतम्।
अस्माभिः प्राग् भवे येनाभूद् दुःखं मेरुसम्मितम् ॥३८॥

अर्थ: हा! पूर्व जन्म में इन्द्रिय लम्पट होकर मैंने सरसों बराबर इन्द्रिय सुखों के लिये जो पाप किये थे उनसे ये मेरु सदृश दुःख मुझे प्राप्त हो रहे हैं ॥३८॥


अभक्ष्य भक्षण और पाँच पापों का चिन्तन


यतोऽति विषयासक्त्या, खादितानि बहूनि च।
अखाद्यान्यशुभापेया-नि पीतानि स्वशर्मणे ॥३९॥

अस्माभिर्निर्दयैः पूर्वं, जीवराशिर्हतो बलात्।
असत्यकटुकादीनि, दुर्वचांस्युदितानि च ॥४०॥

हतानि परवस्तूनि, मायाकौटिल्यकोटिभिः।
सेविताः पररामाद्या दौष्ट्याद् रागान्धमानसैः ॥४१॥

भूयान् परिग्रहो लोभान्, मेलितः स्वाक्षशर्मणे।
बह्वारम्भः कृतो नित्यम् श्रीस्त्रीकुटुम्बहेतवे ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 39 से 42): अपने इन्द्रिय सुख के लिये विषयासक्त मेरे द्वारा बहुत से अखाद्य (मांस, अण्डा, आलू, मूली आदि कन्दमूल एवं अभक्ष्य) पदार्थ खाये गये हैं और अपेय (शराब एवं बाजार की चाय, दूध आदि) पदार्थ पिये गये हैं पूर्व भव में मुझ निर्दयी ने जबरदस्ती (संकल्प पूर्वक) अनन्त जीव राशि मारी है। असत्य, कटुक एवं निन्दा आदि के दुर्वचन कहे हैं। करोड़ों प्रकार की वञ्चना एवं कुटिलता द्वारा पर वस्तुओं का हरण किया है। राग से अन्धे होते हुए मैंने दुष्टता पूर्वक परस्त्री का सेवन किया है। अपने इन्द्रिय सुखों के लिये लोभ से ग्रसित होकर मैंने महान् परिग्रह एकत्रित किया है, और लक्ष्मी (धन संचय), स्त्री एवं कुटुम्ब आदि के लिये नित्य ही बहुत भारी आरम्भ किया है ॥३९-४२॥


धर्मचरण रहित एवं कुधर्म सेवन पूर्वक पूर्वभव व्यतीत करने का पश्चात्ताप


निःशीलैर्विषयान्धैश्च, पञ्चाक्षाणि निरन्तरम्।
सेवितानि पुरास्माभिः सौख्याय नष्टबुद्धिभिः ॥४३॥

श्रेयसेऽनुष्ठितं मौढ्यान् मिथ्यात्वं केवलं महत्।
कुदेव कुगुरुशास्त्र-कुत्सिताचार कोटिभिः ॥४४॥

अतीवव्यसनासक्तः पालितं न मनाग्व्रतम्।
शीलं वा न कृतं पुण्यं दानपूजार्चनादिभिः ॥४५॥

धर्मिणो धर्ममत्यर्थं, दिशंतोपि पुरा मुहुः।
श्वभ्रगामिभिरस्माभिः कटुवाक्यैरमानिताः ॥४६॥

इत्याद्यन्यैर्दुराचारै-र्दुष्कर्माण्यर्जितानि च।
तानि पूर्वमिहापन्नान्यैनौ दुःखादिराशयः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 43 से 47): नष्ट बुद्धि, विषयान्ध और व्रतशील आदि से रहित मैंने पूर्व भव में अल्प सुख के लिये निरन्तर पंचेन्द्रियों के विषयों का सेवन किया है। मैंने अज्ञानता से पुण्यार्जन के लिये करोड़ों खोटे आचरणों (३ मूढ़ता, ६ अनायतनों के द्वारा एवं बलि आदि के) द्वारा महान् मिथ्यात्व और मिथ्या देव, शास्त्र, गुरुओं का सेवन किया है। सप्त व्यसनों में अत्यन्त आसक्ति होने के कारण मैंने किञ्चित् भी व्रतों का पालन नहीं किया और न शील, दान, पूजा एवं अर्चना आदि के द्वारा किञ्चित् भी पुण्य उपार्जन किया। पूर्व भव में धर्मात्मा पुरुषों ने धर्म धारण करने के लिये मुझे बार-बार उपदेश दिया किन्तु कठोर और कटु वचन बोलने वाले मुझ नरकगामी ने उनके उपदेश नहीं माने। इस प्रकार के तथा और भी अन्य प्रकार के दुराचारों द्वारा जो दुष्कर्म उत्पन्न किये थे वही पाप यहाँ पर दुःख की राशि रूप से उपस्थित हुए हैं ॥४३-४७॥


पश्चात्ताप रूप भीषण सन्ताप का विवेचन


कैश्चित्पुण्यजनैः शक्त्या, नृभवे साधितो महान्।
स्वर्गो मोक्षोविचारज्ञैः सत्तपश्चरणादिभिः ॥४८॥

दुर्लभे नृभवे प्राप्ते, धर्मस्वर्मुक्तिसाधके।
अस्माभिरर्जितं श्वभ्रं, दुराचारैः स्वघातकम् ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): मनुष्य भव में समीचीन तपश्चरण आदि को धारण करने वाले विचारवान् पुण्य पुरुषों के द्वारा अपनी शक्ति के अनुरूप स्वर्ग, मोक्ष का महान् साधन किया जाता है, किन्तु स्वर्गमुक्ति का साधक दुर्लभ मनुष्यभव प्राप्त होने पर भी मैंने धर्म पालन तो नहीं किया परन्तु दुराचारों के सेवन द्वारा स्व आत्मा का घात करने वाले नरक का अर्जन किया है अर्थात् इतना घोर पाप उपार्जन किया जिससे नरक आना पड़ा ॥४८-४९॥


येषां स्त्रीपुत्रबन्धूनां भूत्यर्थं पापमञ्जसा।
कृतं ते तत्फलं भोक्तुं नात्रामास्माभिरागताः ॥५०॥

पोषिता येऽङ्गपञ्चाक्षा नानाभोगैः पुराः खलाः।
तेष्वस्मान् पातयित्वात्र श्वभ्रे गता इवारयः ॥५१॥

अतो मन्यामहेऽत्रैवं स्वजनाः पापहेतवः।
शत्रवः स्युश्च पञ्चाक्षाः काला नागा न चापरे ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 50 से 52): जिन स्त्री, पुत्र, बन्धु बान्धवों के वैभव या उन्नति के लिये यथार्थ में मैंने बहुत पाप किये थे वे कुटुम्बी जन उस पाप का फल भोगने के लिये मेरे साथ अभी यहाँ नहीं आये। पूर्व भव में नाना प्रकार के भोग्य पदार्थों द्वारा मैंने जिनके शरीर और पञ्चेन्द्रियों का पोषण किया था, वे दुष्ट शत्रु, सदृश बन्धुजन मुझको यहाँ नरक में पटककर चले गये, इसलिए मैं ऐसा मानता हूँ कि पाप के कारणभूत स्वजन तो शत्रु हैं और पञ्चेन्द्रियों के विषय काले नाग हैं, इससे अधिक कुछ नहीं ॥५०-५२॥


यदुक्तं सूरिभिः पूर्वं, सहगामि शुभाशुभम्।
प्रत्यक्षतामगात्रोऽद्य, तदत्र पाकसूचकम् ॥५३॥

पुराकृतानि पापानि मनसापि स्मृतानि च।
अन्तर्मर्माणि कृन्तन्त्यधुना नः क्रकचानि वा ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 53 से 54): पूर्व में आचार्यों के द्वारा जो कुछ कहा गया था वह पापोदय का सूचक सहगामी शुभाशुभ आज यहाँ मेरी प्रत्यक्षता को प्राप्त हो रहा है। पूर्व जन्म में किये गये पाप आज मन से स्मरण करने पर मेरे अन्तःस्थल के मर्म को करोंत के समान छेद रहे हैं ॥५३-५४॥


अत्र प्राक्कृत पापोत्थ-दुःखौघग्रसिता वयम्।
क्व यामः कं च पृच्छामः, किं कुर्मोब्रूम एव किम् ॥५५॥

व्रजामः शरणं कस्या-त्रास्माद्दुःखौघ सन्ततेः।
सोढव्याः कथमस्माभि-र्महत्यः श्वभ्रवेदनाः ॥५६॥

पूर्वदुष्कर्मपाकोत्थ-मिमं दुःखार्णवं परम्।
दुस्तरं चोत्तरिष्यामः, कथमायुः क्षयं विना ॥५७॥

यतोऽत्र मरणं न स्यान् नारकाणां कदाचन।
सत्यायुषि निजेऽल्पेऽपि, तिलतुल्याङ्गं खण्डनैः ॥५८॥

इति प्राक्कृतदुष्कर्मज पश्चात्तापवह्निभिः।
दह्यमानान्तरङ्गाणां, नारकाणां दुरात्मनाम् ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 55 से 59): पूर्व जन्म में किये हुए पापों से उत्पन्न होने वाला यह दुखों का समूह यहाँ हमें खा रहा है। अब हम कहाँ जाएँ? किससे पूछे? क्या करें? और क्या कहें? किसकी शरण जाएँ? यहाँ दुःख समूह से निरन्तर होने वाली यह महान् नरक वेदना सहन करने में हम कैसे समर्थ हों। पूर्व दुष्कर्मों के पाक से उत्पन्न होने वाला यह दुस्तर महान् दुःखरूपी समुद्र आयु क्षय बिना कैसे पार करें, क्योंकि अपनी भुज्यमान आयु के पूर्ण हुए बिना शरीर के तिल बराबर खण्ड-खण्ड कर देने पर भी यहाँ नारकी जीवों का असमय में मरण नहीं होता। इस प्रकार दुरात्मा नारकी जीवों के अन्तःकरण पूर्व जन्म में किये गये पापों से उत्पन्न होने वाली पश्चाताप रूपी अग्नि से निरन्तर जलते रहते हैं ॥५५-५९॥


शतचूर्णीं प्रकुर्वन्ति, सर्वगात्राणि नारकाः।
मुद्गरादिप्रहारौधै र्निभर्त्स्य कटुकाक्षरैः ॥६०॥

अर्थ: नारकी जीव भर्त्सनापूर्वक कटुक वचनों द्वारा एवं मुद्गर आदि प्रहार समूहों द्वारा सम्पूर्ण शरीर के सैकड़ों टुकड़े कर देते हैं ॥६०॥


उत्पाटयन्ति नेत्राणि चक्षुर्विकारजाशुभैः।
अङ्गोपाङ्गानिकृन्तन्ति चाङ्गोपाङ्गकृताहतः ॥६१॥

अर्थ: पूर्व जन्म में अन्य जीवों के नेत्र फोड़ देने से एवं अंगोपांगों की छेदन-भेदन आदि कर देने से जो पाप एवं अशुभ कर्म संचय हुआ है उसी के कारण नारकी नेत्र उखाड़ लेते हैं और अंगोपांग काट लेते हैं ॥६१॥


चित्तोत्थपापपाकेन विदार्य जठरं बलात्॥
केचित् क्रुद्धाश्च केषाञ्चित् त्रोटयन्त्यन्त्रमालिकाम् ॥६२॥

अर्थ: अन्य जीवों के बुरे चिन्तन आदि से चित्त में जो विकार उत्पन्न होता है उस पापोदय के फलस्वरूप कोई नारकी क्रोधित होते हुए बल पूर्वक पेट विदीर्ण कर देते हैं और कोई यन्त्रादिकों में पीस देते हैं ॥६२॥


मुखं विदार्य संदंशैर्ज्वलत्ताम्ररसं बलात्।
क्षिप्यते नारकैस्तेषां मद्यपानोत्थ पापतः ॥६३॥

अर्थ: मद्य आदि अनेक प्रकार के अपेय पदार्थ पीने से जो पाप संचय हुआ था उससे ये नारकी जीव सण्डासी से मुख फाड़ कर बलपूर्वक उसमें जलता हुआ ताम्ररस डाल रहे हैं ॥६३॥


दृढमालिङ्गनं केचित् कारयन्ति बलाद् गले।
तप्तलोहाङ्गनाभिश्च परस्त्रीसङ्गजाततः ॥६४॥

अर्थ: परस्त्री सेवन से उत्पन्न पाप के फल स्वरूप वे नारकी जीव बल पूर्वक गले में तप्त लोहे की स्त्री से दृढ़ आलिंगन करा रहे हैं ॥६४॥


विधाय नारकाङ्गानां, सूक्ष्मखण्डानि कर्त्तनैः।
निःपीडयन्ति यन्त्रेषु, दलन्त्यश्मपुटादिभिः ॥६५॥

क्वाथयन्ति च कुम्भीषु, निर्दयाः नारकाः परे।
चूर्णयन्त्यस्थिजालं च, ताडयन्तिपरस्परम् ॥६६॥

गृध्रास्ताम्रमयास्तत्र, लोहतुण्डाश्च वायसाः।
मर्माणि दारयन्त्येषां, चञ्चुभिर्नखरैः खरैः ॥६७॥

छिन्नभिन्नानि गात्राणि, सम्बन्धं यान्ति तत्क्षणम्।
दण्डाहतानि वारीणी-व तेषां दुर्विधेर्वशात् ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 65 से 68): [मनुष्य पर्याय में जो धनान्ध तेल आदि के मील खोल कर और बड़ी-बड़ी चक्कियाँ लगा कर बिना शोधन किये अनाज आदि पिसवा कर महान् पाप संचय करते हैं] उन नारकी जीवों के शरीरों के कैंची द्वारा छोटे-छोटे टुकड़े करके यन्त्रों में (घानी में) पेलते हैं और पत्थर की चक्कियों द्वारा उन्हें पीसते हैं। वे दुष्ट और निर्दयी नारकी दूसरों को हाण्डियों में पकाते हैं, हड्डियों का चूर्ण कर देते हैं और आपस में एक दूसरे को मारते हैं। वहाँ (नरकों में) ताम्रमय गृद्धपक्षी और लोहे के मुख वाले कौए अपनी तीक्ष्ण चोंचों एवं नखों से (मनुष्य पर्याय में जो पशुओं के मर्म स्थानों का छेदन-भेदन करते हैं तथा उनके शरीर में हो जाने वाले घावों की पक्षियों से रक्षा नहीं करते) उन नारकियों के मर्म स्थानों का छेदन करते हैं। खोटे कर्मोदय के वश से उन नारकी जीवों के छिन्न-भिन्न किये हुए शरीर डण्डे से ताड़ित जल के समान तत्क्षण सम्बन्ध को प्राप्त हो जाते हैं ॥६५-६८॥


खादन्ति नारकास्तेषां मांस भक्षणपापतः।
शूलपक्वानि मांसानि पुरा ये मांसभक्षिणः ॥६९॥

अर्थ: जिन्होंने पहले मांस भक्षण किया था, पाप से उन मांसभक्षी जीवों के मांस को अन्य नारकी शूल से (मांस पकाने का कांटा) पका कर खाते हैं ॥६९॥


काञ्चिल्लोहाङ्गनालिङ्गनाच्च मूर्च्छामुपागतान्।
लोहारदण्डकैरन्यैः खलास्तुदन्ति मर्मसु ॥७०॥

अर्थ: लोहे की (तप्त) स्त्री के आलिंगन से मूर्च्छा को प्राप्त होने वाले नारकों के मर्म स्थानों पर अन्य दुष्ट नारकी लोह दण्ड के द्वारा चोटें मारते हैं ॥७०॥


सर्वाङ्गकण्टकाकीर्णेषु शाल्मलिद्रुमेषु च।
भस्त्राग्निदीपितेष्वन्यान्नारोपयन्ति नारकाः ॥७१॥

अर्थ: सर्वांग में तीक्ष्ण काँटों से व्याप्त शाल्मलि वृक्षों पर और अग्नि से देदीप्यमान भट्टों पर उन नारकी जीवों को चढ़ाते हैं ॥७१॥


निघर्षन्त्यपरे तेषु सर्वाङ्गेषु द्रुमेषु तान्।
गृहीत्वान्ये च पादेषु घ्नन्त्याहत्य धरातले ॥७२॥

अर्थ: अन्य कोई नारकी उन कण्टकाकीर्ण सम्पूर्ण वृक्षों पर उन्हें घसीटते हैं और अन्य कोई उन बेचारों को जमीन पर पटककर तथा पैरों में फँसा कर मारते हैं ॥७२॥


नित्यस्नानोत्थ पापेन, वैतरण्यम्बु वीचिषु।
यान्त्यत्यन्ताकुलीभावं, केचित्कैश्चित्प्रमज्जिताः ॥७३॥

केचिच्च स्वयमागत्यतीव्रोष्णाग्निकरालिताः।
क्षारपूतिजलेतस्या, मज्जन्ति तापशान्तये ॥७४॥

तेन दुःस्पर्शनीरेण, नितरां ते कदर्थिताः।
असिपत्रवनान्याशु, विश्रामाय श्रयन्ति भोः ॥७५॥

तेषु तीव्रो मरुद्वाति, विस्फुलिङ्गकणान् किरन्।
तेन पत्राणि पात्यन्ते, खड्गधारासमानि च ॥७६॥

तेषां गात्राणि छिद्यन्ते, भिद्यन्ते चाखिलानि तैः।
ततस्ते वेदनाक्रान्ताः, पूत्कुर्वन्ति वराककाः ॥७७॥

तस्मात्ते च गलद्रक्त-धारातीव कुरूपिणः।
प्रविशन्ति स्वयं स्थित्यै, गत्वाशु पर्वतान्तरम् ॥७८॥

तत्रापि नारका एतान् खादन्ति दारयन्ति च।
व्याघ्रसिंहाहि पक्ष्यादिरूपैः स्वविक्रियोद्भवैः ॥७९॥

केचित्तान नारकान् दीनान् धृत्वा पादेष्वधो मुखान्।
पर्वताग्रादधो भागं पातयन्ति महीतलम् ॥८०॥

तद् घातात् खण्डखण्डाङ्ग-भूतांस्तान् शरणार्थिनः।
वज्रमुष्टिप्रहाराद्यैर्घ्नन्त्यन्ये रौद्ररूपिणः ॥८१॥

व्रणजर्जरितान् कांश्चिदतीववेदनाकुलान्।
भद्रं कुर्वेवमित्युक्ता सिंचन्ति क्षारवारिभिः ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 73 से 82): नित्य ही अगालित एवं अप्रमाण जल से स्नान करने के कारण जो पाप उत्पन्न हुए थे उन्हीं के फलस्वरूप कोई जीव वैतरणी नदी की कल्लोल मालाओं के बीच आकुलीभाव को प्राप्त होते हैं, कोई जीव अन्य नारकियों द्वारा उसमें डुबोये जाते हैं और कोई असह्य तीव्र उष्ण अग्नि की ताप के कारण आक्रन्दन करते हुए उस नदी पर आकर ताप शान्ति के लिये नदी के क्षार एवं दुर्गन्धित जल में स्वयं डूब जाते हैं। किन्तु भो भव्य जनो! उस जल के दुःस्पर्श से अत्यन्त पीड़ित होते हुए वे नारकी विश्रान्ति के लिये शीघ्र ही असिपत्र वनों का आश्रय लेते हैं। जिनमें (अग्नि के) विस्फुलिंग कणों को फैलाती हुई वायु बहती है जिससे असिधारा के समान पत्ते नीचे गिरते हैं, जो उन नारकियों के सम्पूर्ण शरीर को छेद देते हैं और भेद देते हैं, इसलिए वे बेचारे असह्य वेदना से आक्रान्त होते हुए चीत्कार (हा हा कार) करते हैं। शरीर भेदन के कारण बहती हुई रक्त धारा से जो अत्यन्त कुरूप हो रहे हैं ऐसे वे नारकी सुख से स्थित होने के लिये शीघ्र ही पर्वत के ऊपर जाकर स्वयं ही उनकी गुफाओं में प्रवेश करते हैं, किन्तु वहाँ भी अपनी विक्रिया (अपृथक् विक्रिया) से उत्पन्न हुए व्याघ्र, सिंह, सर्प आदि हिंसक पशु अपने शरीरों के द्वारा उन नारकियों को विदारण कर देते हैं और खा लेते हैं। कोई दुष्ट नारकी अधोमुख उन बेचारे दीन नारकियों को अपने पैरों पर रख कर पर्वत के ऊपर से नीचे पृथ्वी पर पटक देते हैं, जिसके घात से खण्ड-खण्ड हो गये हैं शरीर जिनके ऐसे शरण के इच्छुक उन नारकियों को अन्य कोई दुष्ट नारकी वज्रमुष्टियों के प्रहारों से मारते हैं। तुम्हारे इन गहरे घावों से होने वाली तीव्र वेदना को मैं शीघ्र ही ठीक करता हूँ ऐसा कहकर अन्य कोई नारकी उन घावों को क्षार जल से सींचते हैं ॥७३-८२॥


पुरार्जितानि पापानि गर्वाद्यैरुद्धतैश्चयैः ।
तप्तलोहासनेष्वत्र तानासयन्ति नारकाः ॥८३॥

अर्थ: पूर्व जन्म में नाना प्रकार के बढ़ते हुए मद समूह से सञ्चित पाप के फलस्वरूप उन नारकी जीवों को अन्य नारकी तपायमान लोहे के आसनों पर बैठाते हैं ॥८३॥


परस्त्रीनिकतातीवमृदुशय्योत्थपापतः ।
शाययन्ति परे कांश्चिच्छितायःकण्टकान्तरे ॥८४॥

अर्थ: पूर्व भव में परस्त्री के साथ अति मृदुल शय्या पर सोने से जो पाप बंध किया था उससे अन्य कोई नारकी उन्हें लोहे के तीक्ष्ण काँटों के ऊपर सुलाते हैं ॥८४॥


सप्तव्यसन सेवोत्था-घोदयादिह नारकान् ।
केचित् निशात शूलाग्रे-ष्वारोपयन्त्यशर्मणे ॥८५॥

बद्ध्वा शृङ्खलया स्तम्भे, कांश्चिच्च क्रकचैः खलाः ।
दारयन्त्यखिलांगेषु, स्वाक्रन्दं कुर्वतो बलात् ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 85 से 86): पूर्व भव में सप्त व्यसनों का सेवन करके, जो पाप उपार्जन किया, उसके उदय से नरक में उन नारकी जीवों को कोई नारकी भयंकर दुःख देने के लिये तीक्ष्ण शूल के अग्रभाग पर चढ़ा देते हैं और कोई दुष्ट आक्रन्दन करते (दुःख से चिल्लाते) हुए उन जीवों के सम्पूर्ण शरीर को जबरदस्ती सांकल द्वारा खम्भे पर बाँधकर करोंत से चीरते हैं ॥८५-८६॥


केचित् प्राग्जन्मवैरादीन्, स्मारयित्वा निरूप्य च।
मुहुर्निर्भर्त्स्य दुर्वाक्यैः, स्थित्वारणांगणे क्रुधा ॥८७॥

स्वविक्रियांग सञ्जातै-र्नानाशितायुधव्रजैः।
छेदयन्त्यखिलांगानि, घ्नन्ति क्रुद्धाः परस्परम् ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 87 से 88): कोई-कोई नारकी जीव पूर्व भव के वैर का स्मरण करके और बार-बार भर्त्सना युक्त खोटे वाक्यों द्वारा उस वैर भाव को कह कर क्रोधित होते हुए रणांगण में स्थित होकर अपने शरीर की अपृथक् विक्रिया से उत्पन्न हुए नाना प्रकार के तीक्ष्ण शस्त्र समूह के द्वारा उनके सम्पूर्ण शरीर को छेद देते हैं तथा क्रोधित होते हुए परस्पर में एक दूसरे को मारते हैं ॥८७-८८॥


उद्विग्नस्तान् क्वचिद्दीनान् युद्धार्द्देनारकान् स्थितान्।
रौद्राशयाः सुरा एत्य स्मारयित्वा पुरातनम् ॥८९॥

आगतं वैरमन्योन्यं योधयन्ति रणांगणे।
स्थित्वा स्वशर्मणे हिंसानन्दं कुर्वन्त उल्बणम् ॥९०॥

विस्फुलिंगमयीं शय्यां ज्वलन्तीं शायिताः परे।
शेरते शुष्कसर्वांगा दीर्घनिद्रासुखाप्तये ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 89 से 91): युद्ध आदि से हतोत्साह होकर खड़े हुए किन्हीं दीन नारकियों को दुष्ट अभिप्राय वाले असुरकुमार देव आकर पूर्व भव को याद दिलाते हुए उसी पूर्व वैर के कारण आपस में एक दूसरे नारकियों को युद्ध में लड़ाते हैं और स्वयं की सुख प्राप्ति के लिये महा हिंसानन्दी रौद्रध्यान करते हैं अन्य कोई अग्निकणिकामय जलती हुई शय्या पर उन्हें सुला देते हैं तथा शुष्क हो गया है शरीर जिनका ऐसे कोई नारकी मृत्यु द्वारा सुख प्राप्त करने की इच्छा से उस पर स्वयं सो जाते हैं ॥८९-९१॥


शारीरं मानसं क्षेत्रोद्भवं परस्परप्रजम्।
असुरोदीरितं पञ्चप्रकारमिति दुस्सहम् ॥९२॥

क्षणक्षणभवं तीव्रं, कविवाचामगोचरम्।
सहन्ते नारकानित्यं, महद्दुःखं च्युतोपमम् ॥९३॥

चतुर्थश्वभ्रतः पूर्वं, ह्यसुरोदीरितासुखम्।
भवेच्छेषचतुःश्वभ्रेषु च दुःखं प्रवर्द्धितम् ॥९४॥

एषां दुःखाब्धिमग्नानां, पापारिग्रसितात्मनाम्।
चक्षुरुन्मेषमात्रं न, सुखं श्वभ्रेषु जातुचित् ॥९५॥

इत्यसह्य तरां, तीव्रां, वेदनां प्राप्य नारकीम्।
उद्विग्नानां मनस्येषां चिन्तेषां जायते तराम् ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 92 से 96): नरकों में शारीरिक, मानसिक, क्षेत्र जन्य, परस्पर एक-दूसरे के द्वारा उत्पन्न और असुरकुमारों द्वारा दिया हुआ-ये पाँच प्रकार के दुस्सह दुःख होते हैं। क्षणक्षण में उत्पन्न होने वाले, तीव्र-असाता के तीव्र अनुभाग से युक्त, कवियों के वचन अगोचर अर्थात् कवि जिसका वर्णन करने में असमर्थ, उपमारहित महान् दुःखों को नारकी जीव नित्य ही सहन करते हैं। चतुर्थ पृथिवी से पूर्व अर्थात् तृतीय मेघा पृथिवी पर्यन्त ही असुर कुमारों द्वारा दिया हुआ दुःख है। शेष चार नरक भूमियों में शेष चार प्रकार के ही दुःख होते हैं। पाप रूपी शत्रुओं से ग्रसित है आत्मा जिनकी ऐसे दुःखरूपी समुद्र में डूबे हुए नारकियों को नरकों में कदाचित् भी नेत्र के उन्मेष मात्र सुख नहीं है। इस प्रकार असह्य तीव्र वेदना को प्राप्त कर उद्विग्न मन वाले इन नारकियों के हृदय में यह बहुत भारी चिन्ता उत्पन्न हो रही है ॥९२-९६॥


नारकियों द्वारा चिन्तित विषयों का वर्णन


अहो! दुराश्रया भूमिः प्रज्वलन्ती-यमस्पृशा।
दुःस्पर्शा मरुतो वान्ति स्फुलिङ्गकणवाहिनः ॥९७॥

एता दीप्ता दिशोप्रेक्ष्या एतत् क्षेत्रं भयास्पदम्।
सन्तप्तपांशु दुर्वृष्टिं वर्षन्त्यम्बुमुचोऽम्बरात् ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 97 से 98): अहो ! मृत्यु से स्पर्शित दुःखों के आश्रयभूत यह भूमि जल रही है। दुखद है स्पर्श जिसका ऐसी अग्निकणों को फैलाने वाली वायु बह रही है। दिशाओं का आभोग दीप्त हो रहा है, यह क्षेत्र अति भयास्पद है और यहाँ मेघों से नित्य ही सन्तप्त रेत की दुर्वृष्टि हो रही है॥९७-९८॥


विषारण्यमिदं विष्वग् विषवल्लीद्रुमैश्चितम्।
असिपत्रवनं चैतदसिपत्रैर्भयङ्करम् ॥९९॥

उद्दीपयन्ति कामाग्निं वृथेमा लोहपुत्रिकाः।
योधयन्ति बलादस्मान् केचित्क्रूराः इमे खलाः ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 99 से 100): ये विष वन चारों ओर विष लताओं से युक्त वृक्षों द्वारा व्याप्त हैं। ये भयंकर असिपत्र वन असिपत्रों द्वारा व्याप्त हैं। ये लोहमय स्त्रियाँ वृथा ही कामाग्नि को बढ़ा रही हैं। ये क्रूर और दुष्ट असुरकुमार देव हम लोगों को जबरदस्ती लड़ा रहे हैं ॥९९-१००॥


खरोष्ट्रमनलोद्गारि ज्वलज्वालाकरालितम्।
खरा-रटितमुत्प्रोथं गिलितुं नोऽभिधावति ॥१०१॥

नारका भीषणा एते कृपाणकृतपाणयः।
निष्ठुरास्तर्जयन्त्यस्मान् निष्कारणरणोद्धताः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 101 से 102): ऊपर उठाये हैं थुथने (मुख का अग्रभाग) जिनने और जो जलती हुई ज्वाला से युक्त आग उगल रहे हैं ऐसे ये गधे और ऊँट हमें निगलने के लिये पीछे-पीछे दौड़ रहे हैं। हाथ में है तलवार जिनके ऐसे ये निष्कारण युद्ध करने वाले निर्दय और भयंकर नारकी हम लोगों को ताड़ना दे रहे हैं ॥१०१-१०२॥


पक्षिणः परुषापाता इते नोऽभिद्रवन्त्यलम्।
सारमेयाश्च खादन्तो भीषयन्तोऽप्यमीतराम् ॥१०३॥

इतः स्फूरन्ति दुर्ध्यानान् नारकाणां प्रधावताम्।
इतश्च करुणाक्रन्दस्वराः कदर्थितात्मनाम् ॥१०४॥

अन्धकूपसमा एते प्रज्वलन्त्यन्तरूष्मणा।
दुर्गन्धा नारकावासा विश्वविक्लेशाशुभकराः ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 103 से 105): पक्षियों के कठोर आक्रमण से हम लोग अत्यन्त दुखी किये जा रहे हैं, और कुत्ते हम लोगों को खा रहे हैं तथा भय उत्पन्न करा रहे हैं। आर्तरोद्र आदि दुर्ध्यान से युक्त यहाँ-वहाँ दौड़ने वाले दुःखी नारकियों के करुणा उत्पादक स्वर व्याप्त रहे हैं। अन्धकूप के समान दुर्गन्धित, सम्पूर्ण क्लेशों और अशुभ सामग्रियों की खान तथा अन्तःस्थल में अति उष्ण ये नरक के आवास जला रहे हैं ॥१०३-१०५॥


दुस्सहावेदनाह्येषां दुर्निवारश्च नारका।
अकाले दुस्त्यजाः प्राणाः कृत्स्नमत्रासुखावहम् ॥१०६॥

अतः प्रागर्जिता श्रेयसा वयं कवलीकृताः।
क्व यामः क्व च तिष्ठामः कोऽपि त्राता न जातु नः ॥१०७॥

तरिष्यामः कदात्रेमम-पारं दुःखवारिधिम्।
नो यास्यति कथं कालो बहुसागर-जीवितम् ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 106 से 108): यह दुस्सह वेदना, ये दुर्निवार नारकी और अकाल में प्राणों का नहीं छूटना इस प्रकार यहाँ दुःख देने वाले सम्पूर्ण साधन हैं। ये पूर्व जन्म में उपार्जित पाप ही हमें खा रहे हैं। हम कहाँ जायें? कहाँ बैठे? यहाँ कोई भी हमारा रक्षक नहीं है। हम यहाँ यह दुःखरूपी समुद्र कैसे पार करें तथा बहुत सागर जीवित रहने का यह काल कैसे पूरा करें ॥१०६-१०८॥


इत्थं चिन्तयतां तेषां शोकिनां क्लेश भोगिनाम्।
अन्तर्बाह्याङ्गदाहिन्यो जायन्ते व्याधयस्त्रयः ॥१०९॥

महत्यः शोकसन्तापदुःखक्लेशादिखानयः।
ताः को वर्णयितुं शक्तो विद्वांस्तेषां च्युतोपमाः ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 109 से 110): कौन विद्वान् समर्थ हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं ॥१०९-११०॥


कटुकालाबुकाञ्जीराणां यादृशो रसः कटुः।
अनिष्टश्चाधिकस्तस्मात् तद्गात्रेषु रसोऽशुभः ॥१११॥

श्वमार्जारखरोष्ट्रादि कुणपेभ्योऽतिदुःसहः
नारकाङ्गेषु दुर्गन्धः सविशेषो घृणाकरः ॥११२॥

यादृशाः करपत्रेषु गोक्षुरेषु च दुःस्पृहाः।
तादृशाः कर्कशस्पर्शास्तेषां गात्रेषु विद्यते ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 111 से 113): उन नारकी जीवों के शरीरों में कड़वी तूमड़ी और काञ्जीर से भी अधिक कटु, अशुभ और अनिष्ट कारक रस होता है। कुत्ता, बिल्ली, गधा, ऊँट और सर्प आदि जानवरों के मरे हुए शरीरों में जो दुर्गन्ध आती है, उससे भी कहीं अधिक, दुःसह और घृणास्पद दुर्गन्ध उन नारकी जीवों के शरीरों में आती है। करोत और गोखुरू आदि पदार्थों में जैसा दुःस्पर्श होता है, वैसा ही स्पर्श उन नारकी जीवों के शरीरों में होता है ॥१११-११३॥


अपृथग्विक्रियास्त्येषां परपीडाविधायिनी।
निन्द्याशुभतराङ्गेभ्यः क्ववधिर्दुरितोदयात् ॥११४॥

अर्थ: उन नारकी जीवों के पाप कर्म के उदय से अपृथक् विक्रिया होती है और पर पीड़ा का सम्पादन करने वाला, निन्द्य कुअवधिज्ञान अशुभतर अंगों से उत्पन्न होता है ॥११४॥


इत्याद्यन्यजगन्निन्द्य-मनिष्टं दुःखकारणम्।
यद्द्रव्यं तत्समस्तं स्यात्, नारकाङ्गेषु पिण्डितम् ॥११५॥

किमत्र बहुनोक्तेन, विविधा दुःखसन्ततीः।
अधोधः सप्तपृथ्वीषु-संख्यातगुण वर्धिता ॥११६॥

महतीश्च निरौपम्या मुक्त्वा केवलिनं जिनम्।
नान्यो वर्णयितुं शक्तो, मन्येऽहमिति निश्चितम् ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 115 से 117): इस प्रकार और भी जो अन्य द्रव्य जगत् निन्द्य, अनिष्ट और दुःख कारक हैं, वे सब नारकियों के शरीरों में एकत्रित होते हैं। यहाँ अधिक कहने से क्या? नाना प्रकार के दुःखों की परम्परा नीचे नीचे सातों नरकों में असंख्यात गुण, असंख्यात गुण वृद्धि को लिये हुए हैं। निश्चय से मैं ऐसा मानता हूँ कि केवली और जिन के द्वारा कही हुई उस महान् और उपमा रहित वेदना का वर्णन करने के लिये अन्य कोई समर्थ नहीं है ॥११५-११७॥


एतन्नरकदुःखादि भीरूणां सुखकांक्षिणाम्।
पापारिं सर्वथा हत्वा कार्यो धर्मः प्रयत्नतः ॥११८॥

अर्थ: इस प्रकार उन नरकों के दुःखों से भयभीत और सुख की इच्छा करने वाले जीवों का कर्तव्य है कि वे पाप रूप शत्रु को सर्वथा नष्ट करके प्रयत्न पूर्वक धर्म कार्य करें ॥१९८॥


यतो नरक पातालाद् धर्म उद्धर्तुमङ्गिनः।
क्षमः स्थापयितुं मोक्षे कल्पे वानुत्तरादिषु ॥११९॥


पापं शत्रुरिहामुत्र धर्मो बन्धुर्न चापरः।
सहगामी जिनेन्द्रोक्तो मुक्तिमार्गप्रसाधकः ॥१२०॥

अर्थ: जीवों को नरक रूप गड्ढे से निकालने में और मोक्ष, कल्पवासी एवं अनुत्तर आदि उत्तम स्थानों में पहुँचाने के लिये एक धर्म ही समर्थ है। इस लोक में जीव धर्म से सारभूत ऊर्ध्वगति, पाप से निन्दनीय अधोगति और पाप - पुण्य दोनों से मध्यम गति (मनुष्य, तिर्यञ्च गति) प्राप्त करते हैं। इस लोक और पर लोक में जीवों को जिनेन्द्र भगवान् द्वारा कहे हुए मोक्षमार्ग का साधनभूत धर्म के समान अन्य कोई बन्धु नहीं है और पाप के समान कोई शत्रु नहीं है ॥१९९-२०१॥


मत्वेति भो! बुधजनाः सकलं निहत्य,
पापारिमाशु - नरकादिकदुःखमूलम्।
स्वमुक्तिशर्मजनकं परमार्थभूतम् ।
धर्म कुरुध्वमनिशं व्रतसंयमाद्यैः ॥१२१॥

अर्थ: ऐसा मानकर हे भव्यजनो! नरकादि गतियों में होने वाले भयंकर दुःखों का जो मूल है ऐसे पाप रूप शत्रु को शीघ्र ही नष्ट करके व्रत, संयम आदि चारित्र के द्वारा स्वर्ग और मोक्ष सुख का जनक परमार्थभूत धर्म करो ॥२०२॥ धर्म ही नरकरूप गृह का अर्गल है, सुख देने वाला है, धर्म ही मोक्ष लक्ष्मी का प्रदाता है, धर्म ही इन्द्र, धरणेन्द्र एवं चक्रवर्ती आदि पदों पर प्रतिष्ठित करने वाला है, धर्म ही गुणों का खजाना है, धर्म ही तीर्थंकर आदि वैभवों को उत्पन्न करने वाला पिता है और धर्म ही सर्व प्रयोजनों की सिद्धि करने वाला है, अतः यह तद् तद् गुणों के द्वारा पूर्णरूप से सेवन किया गया तथा स्तवन किया धर्म मुझे मोक्ष के लिये हो। इस प्रकार भट्टारक सकलकीर्ति विरचित सिद्धान्तसारदीपक नाम के महाग्रन्थ में नरकों के दुःखों का वर्णन करने वाला तीसरा अधिकार समाप्त हुआ।

चतुर्थ अधिकार मध्यलोक वर्णन

नमामि मध्यलोकस्थान् सर्वांश्च परमेष्ठिनः।
जिनालयान् जिनार्चादीन् मोक्षाय कृत्रिमेतरान् ॥१॥

अर्थ: मध्यलोक में स्थित सम्पूर्ण पञ्चपरमेष्ठियों को, कृत्रिम, अकृत्रिम जिनमन्दिरों को और कृत्रिम, अकृत्रिम जिन प्रतिमाओं को मैं मोक्ष की प्राप्ति के लिये नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ वक्ष्ये समासेन मध्यलोकं जिनागमात्।
एकरज्जुप्रमव्यासासंख्यद्वीपाब्धिपूरितम् ॥२॥

लक्षैकयोजनोत्सेधो मध्यलोकोऽभिधीयते।
चित्राभूतलतन्मेरुशिरःपर्यन्त ऊर्जितः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): अब मैं जिनागम से अर्थात् जिनागम के अनुसार संक्षेप से मध्यलोक का वर्णन करूँगा। इस मध्यलोक का व्यास एक राजू प्रमाण है, जो असंख्यात द्वीप समुद्रों से व्याप्त है। चित्रा पृथ्वी के तलभाग से लेकर सुमेरु पर्वत के शिखर पर्यन्त अर्थात् एक लाख योजन इस लोक की ऊँचाई है ॥२-३॥


आद्यो द्वीपोऽत्र जम्ब्वाख्यो धातकीखण्डसंज्ञकः।
पुष्करादिवरश्चान्यस्तृतीयो वारुणीवरः ॥४॥

ततः क्षीरवरो द्वीपो नाम्ना घृतवरो परः।
द्वीपः क्षौद्रवरो नन्दीश्वरोऽष्टमोऽरुणाभिधः ॥५॥

द्वीपोऽथारुणभासाख्यः कुण्डलादिवरस्ततः।
द्वीपः शङ्खवराभिख्यो रुचकादिवराह्वयः ॥६॥

भुजगादिवरो द्वीपस्तथा कुशवराख्यकः।
द्वीपः क्रौञ्चवरो नामेत्याद्यन्वेनमभियुताः ॥७॥

अर्थ (श्लोक 4 से 7): मध्यलोक में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जम्बूद्वीप (२) धातकीखण्ड (३) पुष्करवर (४) वारुणीवर (५) क्षीरवर (६) घृतवर (७) क्षौद्रवर (८) नन्दीश्वर (९) अरुणवर (१०) अरुणाभासवर (११) कुण्डलवर (१२) शङ्खवर (१३) रुचकवर (१४) भुजगवर (१५) कुशवर और (१६) क्रौञ्चवर हैं ये आदि के १६ द्वीप हैं। इसके बाद असंख्यात द्वीप समुद्रों को छोड़कर अन्त के १६ द्वीपों के नाम भी हैं ॥५-७॥


शुभैः संख्यातिगा द्वीपसमुद्राः परिवेष्ट्य च।
परस्परं हि तिष्ठन्ति बलयाकृतिधारिणः ॥८॥

अर्थ: शुभ नाम वाले असंख्यात द्वीप समुद्र वलयाकृति और परस्पर में एक-दूसरे को परिवेष्टित करते हुए (घेरे हुए) स्थित हैं ॥८॥


जम्बूद्वीपे समुद्रः स्यात्, लवणाभिध आदिमः।
द्वीपे च धातकीखण्डे, कालोदधिसमाह्वयः ॥९॥

शेषासंख्यसमुद्राणां, नामानि विविधानि च।
स्वस्वद्वीपसमानानि, ज्ञातव्यानि शुभान्यपि ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 9 से 10): जम्बूद्वीप में अर्थात् जम्बूद्वीप को वेष्टित किये हुए लवणसमुद्र नाम का प्रथम समुद्र है, और धातकीखण्ड सम्बन्धी कालोदधि नाम वाला दूसरा समुद्र है। इसके बाद अपने-अपने द्वीप के समान अनेकों शुभ नामों को धारण करने वाले असंख्यात समुद्र जानना चाहिए। ये सब भी बलयाकृति और अपने-अपने द्वीपों को वेष्टित किये हुए हैं ॥९-१०॥


अर्धाधकद्वयोधाराब्धीनां रोमाणि सन्ति वै।
यावन्ति तत्प्रमा ज्ञेया, असंख्यद्वीप वार्द्धयः ॥११॥

अर्थ: अढ़ाई आधार-उद्धार सागर के रोमों का जितना प्रमाण होता है, उतना ही प्रमाण असंख्यात द्वीप समुद्रों का जानना चाहिए ॥११॥


अमीषां मध्यभागेऽस्ति, जम्बूद्वीपोऽखिलादिमः।
लक्षयोजनविस्तीर्णो, वृत्तो जम्बूद्रुमाङ्कितः ॥१२॥

ततो द्विगुणविस्तारो, लवणार्णवशाश्वतः।
अस्माच्च द्विगुणव्यासो, धातकीखण्डइत्यपि ॥१३॥

द्विगुणद्विगुणव्यासाः, सर्वे ते द्वीपसागराः।
स्वयम्भूरमणाब्ध्यन्ता, अकृत्रिमाः क्षयोज्झिताः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 12 से 14): सम्पूर्ण द्वीप समुद्रों के मध्यभाग में जम्बूद्वीप नाम का प्रथम द्वीप है, जो गोल है, एक लाख योजन व्यास वाला और जम्बू वृक्ष से अलंकृत है। जम्बूद्वीप से दुगुने विस्तार वाला लवण समुद्र है, जो शाश्वत है और लवण समुद्र से भी दुगुने विस्तार वाला धातकीखण्ड है। इसी प्रकार अन्तिम स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त सर्व द्वीप समुद्र दुगुने-दुगुने विस्तार वाले, अकृत्रिम और क्षय से रहित हैं ॥१२-१४॥


द्वीपाब्धीनां हि संलग्ना गणनायोजनैश्च या।
ऋज्वीततद्वयान्ता सा सूची बुधैर्निगद्यते ॥१५॥

अर्थ: योजनों द्वारा द्वीप या समुद्र के मध्य के माप का अथवा द्वीप या समुद्र के एक तट से दूसरे तट पर्यन्त तक के सीधे माप का जो प्रमाण है वह विद्वानों के द्वारा सूची नाम से कहा गया है ॥१५॥


योजनानां च लक्षैकं, सूचीद्वीपादिमस्य वै।
लवणाब्धेर्भवेत्पञ्च, लक्षयोजनसम्मिता ॥१६॥

सूची च धातकीखण्डस्य लक्षाणित्रयोदश।
योजनानां तथैकोनत्रिंशत्कालोदधेस्ततः ॥१७॥

सूची स्यात्पञ्चचत्वारिं-शल्लक्षयोजनप्रमा।
पुष्करार्धस्यसाज्ञेया-न्येषामेवं श्रुते बुधैः ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 16 से 18): आगम में जम्बूद्वीप के सूची व्यास का प्रमाण एक लाख योजन, लवण समुद्र के सूची व्यास का प्रमाण पाँच लाख योजन, धातकीखण्ड के तेरह लाख योजन, कालोदधि समुद्र के उन्तीस लाख योजन और पुष्करार्ध द्वीप के सूची व्यास का प्रमाण गणधरादि ज्ञानियों के द्वारा ४५ लाख योजन कहा गया है ॥१६-१८॥


व्यासात्त्रिगुणः स्थूलः परिधिः प्रोच्यते जिनैः।
दशधनव्यासवर्गस्य मूलं सूक्ष्मश्च वर्ण्यते ॥१९॥

अर्थ: बादर परिधि, व्यास की तिगुनी होती है और व्यास का वर्ग कर दश से गुणित करना, तथा गुणनफल का वर्गमूल निकालना जो लब्ध प्राप्त हो वही सूक्ष्म परिधि का प्रमाण होता है। ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है ॥१९॥


परिवेषहताद् व्यासाच्चतुर्भि-र्भाजितात्फलम्।
स्थूलं सूक्ष्मं तदेवोक्तं वृत्तक्षेत्रफलं स्फुटम् ॥२०॥

अर्थ: स्थूल परिधि को व्यास से गुणित कर चार से भाजित करने पर गोलक्षेत्र का स्थूल क्षेत्रफल प्राप्त होता है और सूक्ष्म परिधि को व्यास से गुणित कर ४ से भाजित करने पर सूक्ष्म क्षेत्रफल प्राप्त होता है ॥२०॥


सूच्योर्योगस्य विस्तारदलघ्नस्य कृतिर्द्विधा।
त्रिघ्नदशघ्नयोर्मूले स्थूलान्ये वलये फले ॥२१॥

अर्थ: अन्तसूची और आदि सूची को जोड़ कर अर्ध विस्तार (अर्धरुन्द्रव्यास) से गुणित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उसे दो जगह स्थापित कर एक स्थान के प्रमाण को तिगुना करने से बादर क्षेत्रफल और दूसरे स्थान के प्रमाण का वर्ग कर जो लब्ध प्राप्त हो उसको दश से गुणित कर गुणनफल का वर्गमूल निकालने पर जो लब्ध प्राप्त होता है वह वलयाकार क्षेत्र के सूक्ष्म क्षेत्रफल का प्रमाण होता है ॥२१॥


अथ जम्बूमति द्वीपे महामेरोः सुदर्शनात्।
दक्षिणं भागमारभ्येमानि क्षेत्राणि सप्तवै ॥२२॥

आदिमं भारतं क्षेत्रं ततो हेमवताह्वयम्।
हरिसंज्ञं विदेहाख्यं जम्बूद्वीपे च रम्यकम् ॥२३॥

हैरण्यवतनामाथै-रावतं क्षेत्रमन्तिमम्।
सप्तैतानि सुवर्षाण्यन्तरितानि कुलाचलैः ॥२४॥

प्रथमो हिमवच्छैलस्ततोमहाहिमाचलः।
निषधः पर्वतो नीलो रुक्मी च शिखरीति षट् ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 22 से 25): जम्बूद्वीप के मध्यभाग में सुदर्शन नाम का महामेरु है, इस सुदर्शन मेरु के दक्षिणभाग से प्रारम्भ कर सात क्षेत्र हैं। सर्वप्रथम भरतक्षेत्र, (२) हैमवत, (३) हरिक्षेत्र, (४) विदेह, (५) रम्यकक्षेत्र, (६) हैरण्यवत क्षेत्र और अन्तिम (७) ऐरावत नाम का क्षेत्र है। इन सातों क्षेत्रों को अन्तरित करने वाले छह कुलाचल पर्वत हैं, जिसमें प्रथमादि कुलाचलों के नाम हिमवान्, (२) महाहिमवान्, (३) निषध, (४) नील पर्वत, (५) रुक्मी और (६) शिखरिन् हैं ॥२२-२५॥


कनकार्जुनहेमाभास्त्रयो दक्षिणभूधराः।
वैडूर्यरजतस्वर्ण-मयाः कुलाद्रयस्त्रयः ॥२६॥

अर्थ: दक्षिण दिशा के तीन कुलाचलों का वर्ण क्रमशः कनक, अर्जुन और हेम के सदृश है तथा उत्तर दिशा के तीन कुलाचलों का वर्ण क्रमशः वैडूर्य, रजत और स्वर्णमय है ॥२६॥


नवत्यग्रशतैर्भागै-र्जम्बूद्वीपस्य विस्तरः।
विभक्तो भरतस्यैको भागो व्यासोमतोजिनैः ॥२७॥

अर्थ: जम्बूद्वीप के विस्तार (१ लाख यो.) को १९० भागों से भाजित करने पर जो एक भाग प्राप्त होता है वही भरत क्षेत्र का व्यास जिनेन्द्र भगवान् द्वारा माना गया है ॥२७॥


योजनानां च षड़्विंशत्यग्रपञ्चशतान्यपि।
एकोनविंशभागानां कृतानां योजनस्य वै ॥२८॥

षट्भागा इति विष्कम्भो भरतस्य भवेत्ततः।
द्विगुणः पर्वतस्येति द्विगुणो द्विगुणोऽपरः ॥२९॥

व्यासो विदेहपर्यन्तं ततो नीलादिषु क्रमात्।
पूर्वोक्त विधि हान्याैरावतान्तं विस्तरो मतः ॥३०॥

क्षेत्राच्चतुर्गुणं क्षेत्रमद्रेरद्रिश्चतुर्गुणम्।
भरतादि विदेहान्तं नीलादौ चतुराहतम् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 28 से 31): भरतक्षेत्र का विष्कम्भ ५२६ ६/१९ योजन प्रमाण है। हिमवन् पर्वत का इससे दुगुना है, इस प्रकार विदेह क्षेत्र पर्यन्त प्रत्येक क्षेत्र एवं पर्वत का विष्कम्भ क्रमशः दुगुना-दुगुना होता गया है, और नील पर्वत से ऐरावत क्षेत्र पर्यन्त इसी क्रम से हानि होती गई है। भरतक्षेत्र से विदेह क्षेत्र पर्यन्त प्रत्येक क्षेत्र से क्षेत्र का विष्कम्भ चौगुना है और प्रत्येक पर्वत से पर्वत का चौगुना है। इसके आगे नीलादि पर्वतों एवं रम्यक आदि क्षेत्रों का पूर्वोक्त क्रम से ही चौगुना-चौगुना हीन होता गया है ॥२८-३१॥


कुलाचलों के व्यास आदि का वर्णन


एते कुलाद्रयो रम्याः क्षेत्रैरन्तरिता हि षट्।
पूर्वापराब्धिसंलग्ना वनवेद्याद्यलंकृताः ॥३२॥

मूलोपरिसमव्यासाः शाश्वतास्तुङ्गमूर्तयः।
नानामणिविचित्रोभयपार्श्वाः श्रीजिनैर्मताः ॥३३॥

अर्थ (श्लोक 32 से 33): क्षेत्रों के द्वारा अन्तरित ये रमणीक छह कुलाचल पर्वत पूर्व पश्चिम समुद्र को स्पर्श करने वाले, वनवेदी आदि से अलंकृत, मूल से अग्रभागपर्यन्त सम व्यास वाले, शाश्वत, दीवाल के सदृश ऊँचे और नाना प्रकार की मणियों से खचित दोनों पार्श्वभागों से युक्त हैं ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥३२-३३॥


कुलाचलों की ऊँचाई का वर्णन


शतैक योजनोतुङ्गो हिमवान् द्विशतप्रमैः।
महाद्रिहिमवांस्तुङ्गो योजनैश्चचतुःशतैः ॥३४॥

निषधस्तत्समो नीलो रुक्मी शतद्वयोन्नतः।
योजनानां शतोच्छ्रायः शिखरीति जिनोदितः ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 34 से 35): हिमवान् पर्वत की ऊँचाई १०० योजन (४००००० मील), महाहिमवान् की २०० योजन (८००००० मील), निषध पर्वत की ४०० योजन (१६००००० मील) नील पर्वत की ४०० योजन, रुक्मी की २०० योजन और शिखरिन् पर्वत की ऊँचाई १०० योजन प्रमाण है ॥३४-३५॥


नवत्यग्रशतांशेन वृत्तद्वीपस्य विस्तृतिः।
वाणस्तद् द्विगुणाः शेषास्तेषां जीवा धनुः पृथक् ॥३६॥

पूर्वापराब्धिपर्यन्तं दक्षिणोत्तरभागयोः।
क्षेत्राद्रीणां य आयामः सा जीवा कथ्यते बुधैः ॥३७॥

यच्चापाकारवर्षाद्रीणां पृष्ठभागमञ्जसा।
पृष्ठं शरासनस्येव तद् धनुः पृष्ठमुच्यते ॥३८॥

लघ्व्या गुर्व्याश्च जीवा या आयामस्य यदन्तरम्।
वर्षाद्रीणां च तस्यार्धं यत् सोक्ता चूलिकागमे ॥३९॥

लघुज्येष्ठधनुः पृष्ठयोर्दीर्घस्य यदन्तरम् ।
क्षेत्राद्रीणां च तस्यार्धं यत् सा पार्श्वभुजा मता ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 36 से 40): गोलाकार जम्बूद्वीप के विस्तार (१ ला. योजन) का एक सौ नब्बे वाँ भाग भरतक्षेत्र का वाण है। उससे आगे के पर्वतों तथा क्षेत्रों का वाण उससे दुगुना-दुगुना होता गया है। उनके जीवा एवं धनुपृष्ठ पृथक्-पृथक् हैं। क्षेत्र या पर्वत के दक्षिण की ओर या उत्तर की ओर जो समुद्र पर्यन्त क्षेत्र या पर्वत की पूर्व-पश्चिम लम्बाई है, वह दक्षिण जीवा व उत्तर जीवा है, ऐसा ज्ञानियों ने कहा है। क्षेत्र या पर्वत का जो चाप के आकार पृष्ठभाग है, तथा जो पृष्ठ तीर के आसन के समान है, वह धनुः पृष्ठ कहलाता है। क्षेत्र व पर्वतों की लघु जीवा की लम्बाई और गुरु (बड़ी) जीवा की लम्बाई का जो अन्तर है, उसका आधा चूलिका है। क्षेत्र एवं पर्वतों के छोटे धनुपृष्ठ व बड़े धनुपृष्ठ का जो अन्तर है, उसका अर्धप्रमाण पार्श्व भुजा कहलाती है, ऐसा जानना चाहिए ॥३६-४०॥


एकोनत्रिंशत्शतानि एकविंशत्यधिकानि अष्टादश कलाः। पार्श्वभुजा षोडशसहस्र-अष्टशतत्र्यशीतिः
कला, अष्टाविंशतिः कला इति हरिवंशोक्तिः।

अर्थ: भरतक्षेत्र, ऐरावत क्षेत्र के दो विजयार्धों की अभ्यन्तर जीवा का प्रमाण ९७४८ १२/१९ योजन (१२ कला से कुछ अधिक) है। बाह्य जीवा अर्थात् विजयार्ध की बाह्य जीवा का प्रमाण १०७२० ११/१९ योजन (१२ कला में कुछ कम) है। इसी विजयार्ध की चूलिका ४८६ योजन है। इसी का लघुधनुपृष्ठ ९७६६ योजन है। विजयार्ध का बृहद् धनुःपृष्ठ १०७४३ १५/१९ योजन और पार्श्वभुजा ४८८१ ६ १/२/१९ योजन है। हिमवन् पर्वत की दक्षिण दिशा वाली लघुजीवा अर्थात् भरत की उत्तर जीवा का प्रमाण १४४७१ ५/१९ योजन है। इसी हिमवन् के उत्तर भाग में बृहद् जीवा अर्थात् हैमवत क्षेत्र की दक्षिण जीवा का प्रमाण २४९३२ योजन है। हिमवन् पर्वत की चूलिका ५२३० ७/१९ योजन प्रमाण है। इसी पर्वत का लघुधनुपृष्ठ अर्थात् भारत का उत्तर धनुपृष्ठ १४५२८ ११/१९ योजन और ज्येष्ठ धनुःपृष्ठ अर्थात् हैमवत क्षेत्र का लघुधनुः पृष्ठ २५२३० ९/१९ योजन है। हिमवन् पर्वत की पार्श्वभुजा ५३५० १५ १/२/१९ योजन प्रमाण है। हिमवन् पर्वत के दक्षिण भाग में जो जीवा और धनुपृष्ठ का प्रमाण कहा है वही प्रमाण भरत क्षेत्र के उत्तर का जानना चाहिए। जिस प्रकार भरत क्षेत्र और हिमवान् पर्वत की जीवा, धनुपृष्ठ, चूलिका और पार्श्व भुजा के प्रमाण का व्याख्यान किया है, उसी प्रकार जम्बूद्वीप के उत्तर भाग में ऐरावत क्षेत्र और शिखरिन् पर्वत का जानना चाहिए। महाहिमवन् पर्वत से कनिष्ठ (छोटे) पार्श्वभाग का पूर्व पश्चिम आयाम अर्थात् हैमवत क्षेत्र की उत्तरी जीवा का प्रमाण ३७६७४ ६/१९ योजन है, और ज्येष्ठ (बड़े)पार्श्वभाग का आयाम अर्थात् महाहिमवन् पर्वत की ज्येष्ठ जीवा अर्थात् हरिक्षेत्र की दक्षिण जीवा का प्रमाण ५३९३१ ६/१९ योजन है। इसकी चूलिका का प्रमाण ८१२८ ४ १/२/१९ योजन है। महाहिमवन् के लघुधनुःपृष्ठ अर्थात् हैमवत क्षेत्र के ज्येष्ठ धनुष का प्रमाण ३८७४० १०/१९ योजन, इसके बृहद् धनुपृष्ठ अर्थात् महाहिमवन् पर्वत के बृहद् धनुष का अर्थात् हरिक्षेत्र के लघु धनुपृष्ठ का प्रमाण ५७२९३ १०/१९ योजन और इसी पर्वत की पार्श्व भुजा का प्रमाण ९२७६ ९ १/२/१९ योजन है। महाहिमवन् पर्वत की लघु जीवा और लघुधनुः पृष्ठ का जो प्रमाण कहा गया है वही प्रमाण हैमवत क्षेत्र की उत्तरी जीवा एवं धनुष का जानना चाहिए। [हैमवत क्षेत्र की चूलिका ६३७१ ३/१९ योजन तथा पार्श्व भुजा का प्रमाण ६७५५ २ १/२/१९ योजन है ] जिस प्रकार हैमवत क्षेत्र और महाहिमवन् पर्वत की जीवा, चूलिका धनुष और पार्श्वभुजा के प्रमाण का कथन किया है। हैरण्यवत क्षेत्र और रुक्मी पर्वत के जीवा धनुष आदि का प्रमाण भी उसी प्रकार जानना चाहिए।


सम्पूर्ण क्षेत्र एवं कुलाचलों की जीवा, चूलिका, धनुष और पार्श्वभुजा का वर्णन


एकादशमहाकूटैः शिखरेऽलंकृतो महान्।
हिमवान् राजतेऽगाधः पञ्चविंशतियोजनैः ॥४१॥

अष्टकूटैर्युतो मूर्ध्नि पञ्चाशद्योजनैर्वरः।
भूमध्ये भाति तेजोभिर्महादि हिमवान् गिरिः ॥४२॥

नवकूटाङ्कितो मूर्ध्नि शतयोजनकन्दयुक्।
निषधश्च तथा नीलः कन्दकूटैर्हि तत्समः ॥४३॥

पञ्चाशद्योजनागाधो रुक्मी कूट्राष्टभूषितः।
शिखरीकन्दकूटाभ्यां भवेद् हिमवता समः ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 41 से 44): हिमवान् पर्वत की गाध (नींव) २५ योजन प्रमाण है और इसका शिखर ग्यारह महाकूटों द्वारा अलंकृत है। महाहिमवान् पर्वत की नींव ५० योजन प्रमाण है और इसका ऊर्ध्वभाग (शिखर) देदीप्यमान आठ कूटों से शोभायमान है। निषध और नील पर्वतों की नींव समान अर्थात् सौ सौ (१००) योजन प्रमाण है और इनके अग्रभाग भी ९-९ महाकूटों से अलंकृत हैं। रुक्मी कुलाचल की नींव ५० योजन है और उसका शिखर आठ कूटों से सुशोभित है। इसी प्रकार शिखरिन् कुलाचल की नींव २५ योजन प्रमाण है, और उसका ऊर्ध्वभाग ११ महाकूटों से अलंकृत है ॥४१-४४॥


छह कुलाचलस्थ ५६ महाकूटों के नाम और स्वामी


सिद्धायतननामाढ्यं हिमवत्कूटमूर्जितम्।
अपरं भरताभिख्यमिलाकूटं चतुर्थकम् ॥४५॥

गङ्गाकूटं श्रियःकूटं रोहितासिन्धुसंज्ञके।
सुराहैमवते कूटे कूटं वैश्रवणान्तिमम् ॥४६॥

इत्येकादशकूटानि मूर्ध्नि स्यु हिमवद्गिरेः।
सिद्धायतन कूटाख्यं महाहिमवताह्वयम् ॥४७॥

कूटं हैमवतं रोहित्कूटंह्रीकूटनामकं।
कूटं च हरिकान्ताख्यं हरिवर्षाभिधं ततः ॥४८॥

वैडूर्यमष्टकूटानीति स्युर्महाहिमाचले।
सिद्धाख्यं निषधाभिख्यं हरिकूटं विदेहकम् ॥४०॥

ह्रीकूटं धृतिकूटाख्यं सीतोदाकूटसंज्ञकं।
विदेहं भुजगाख्यं स्युः कूटानि निषधे नव ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 45 से 50): १. सिद्धायतन, २. हिमवत् कूट, ३. भरत, ४. इला, ५. गंगाकूट, ६. श्रीकूट, ७. रोहितास्या, ८. सिन्धु, ९. सुराकूट, १०. हैमवत और ११. वैश्रवण; ये ११ कूट हिमवान् कुलाचल के शिखर पर क्रम से स्थित हैं। १. सिद्धायतन कूट, २. महाहिमवन्, ३. हैमवत, ४. रोहिता, ५. ह्री कूट, ६. हरिकान्ता, ७. हरिवर्ष और ८. वैडूर्य नाम के ये ८. कूट महाहिमवन् पर्वत के शिखर पर हैं। १. सिद्ध कूट, २. निषध, ३. हरि (वर्ष) कूट, ४. (पूर्व) विदेह कूट, ५. ह्री (हरि) कूट, ६. धृति कूट, ७. सीतोदा, ८. (अपर) विदेह कूट और ९. भुजग नामक कूट हैं। ये ९ ही कूट क्रमशः निषध कुलाचल के ऊपर हैं ॥४५-५०॥


सिद्धं नीलाह्वयं कूटं विदेह कूटनामकं।
सीताख्यं कीर्तिकूटं च नरकान्तासमाह्वयम् ॥५१॥

ततोऽपरविदेहाख्यं कूटंरम्यक संज्ञकं।
आदर्शकमिमानि स्यु नीले कूटानि वै नव ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 51 से 52): १. सिद्धकूट, २. नील कूट, ३. (पूर्व) विदेह, ४. सीता कूट, ५. कीर्ति कूट, ६. नरकान्ता, ७. (अपर) विदेह, ८. रम्यक और ९. आदर्शक नाम के ये ९. कूट नील कुलाचल के अग्रभाग पर स्थित हैं ॥५१-५२॥


सिद्धाख्यं रुक्मि कूटं च कूटं रम्यकनामकं।
नारीकूटं हि बुद्ध्याख्यं रूप्यकूलाभिधं ततः ॥५३॥

हैरण्यवतकूटाख्यं मणिभद्रसमाह्वयं।
स्युरेतान्यष्टकूटानि रुक्मिणः शिखरे वरे ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 53 से 54): १. सिद्ध कूट, २. रुक्मी, ३. रम्यक, ४. नारी कूट, ५. बुद्धि कूट, ६. रूप्यकूला, ७. हैरण्यवत और ८. मणिभद्र नाम के ये ८ कूट रुक्मी कुलाचल पर स्थित हैं ॥५३-५४॥


सिद्धं शिखरि कूटाख्यं हैरण्यवतसंज्ञकं।
सुरदेवाख्यकं कूटं ततो रक्ताभिधानकम् ॥५५॥

लक्ष्मीकूटं सुवर्णाख्यं रक्तवत्याख्यकं ततः।
कूटं गन्धवती संज्ञं कूटमैरावताभिधम् ॥५६॥

मणिकाञ्चनकूटं स्युरिमान्येकादश स्फुटं।
कूटानिशिखरे रम्याण्यद्रेः शिखरिणः क्रमात् ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 55 से 57): १. सिद्ध कूट, २. शिखरी, ३. हैरण्यवत, ४. सुरदेव, ५. रक्ता, ६. लक्ष्मी कूट, ७. सुवर्ण, ८. रक्तवती, ९. गन्धवती, १०. ऐरावत और ११. मणिकाञ्चन नाम के ११ रमणीक कूट क्रमशः शिखरिन् पर्वत के ऊपर स्थित हैं ॥५५-५७॥


सिद्धायतनकूटेषु सर्वेषु श्री जिनालयाः।
खगेशदेववन्द्यार्च्या राजन्ते रत्नरश्मिभिः ॥५८॥

अर्थ: सम्पूर्ण सिद्धायतन कूटों के ऊपर खगेन्द्र और देवसमूह से अर्चनीय श्री जिनमन्दिर विद्यमान हैं, जो रत्न किरणों से सुशोभित होते हैं ॥५८॥


योजनानां च सार्धद्विक्रोशपञ्चदशप्रमैः।
समानायामविस्तारा रत्नस्वर्णमया गृहाः ॥५९॥

तुङ्गाः क्रोशाधिकैक त्रिंशद्योजनैर्मनोहराः।
कूटानां शिखरेषु स्युः क्रोशागाधाः स्फुरद्रुचः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 59 से 60): कुलाचलस्थ कूटों के शिखरों पर पन्द्रह योजन अढ़ाई कोस लम्बे, १५ योजन २ १/२ कोस चौड़े इकतीस (३१) योजन एक कोस ऊँचे और एक कोस गाध (नींव) से युक्त, फैल रहीं हैं किरणें जिनमें से ऐसे रत्न और स्वर्णमय मनोहर गृह (भवन) बने हैं ॥५९-६०॥


योजनाष्टसमुत्तुङ्गश्चतुर्योजन विस्तृताः।
गृहेषु तोरणद्वारा राजन्ते मणितेजसा ॥६१॥

अर्थ: उन भवनों में मणियों की दीप्ति से शोभायमान आठ योजन ऊँचे और चार योजन विस्तार वाले तोरणद्वार हैं ॥६१॥


शैलेषु यानि कूटानि नदीनामयुतान्यपि।
देव्यो गङ्गादयस्तेषां वसन्ति मणिसद्मसु ॥६२॥

शेषकूटेषु रम्येषु यानि नामानि धामसु।
तैर्नामभिर्युताः पुण्याद् वसन्ति व्यन्तरामराः ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 62 से 63): ६ कुलाचलों पर जैसे ये ५६ कूट हैं वैसे नदियों (की वेदियों) पर भी कूट हैं। इन कूटों में से [स्त्रीलिंग (इला, गंगा, रोहितास्या सुरा आदि) नामधारी ] कुछ कूटों पर स्थित मणिमय गृहों में व्यन्तर देवांगनाएँ निवास करती हैं। अवशेष कूटस्थ रमणीक भवनों में पूर्व पुण्य वशात् अपने-अपने कूटनामधारी व्यन्तर देव निवास करते हैं ॥६२-६३॥


अद्र्यायामसमायामे क्रोशद्वयसुविस्तृते।
भवतो द्वे वने रम्ये शैलानामुभयोर्दिशोः ॥६४॥

अर्थ: कुलाचलों के दोनों पार्श्वभागों में पर्वतों की लम्बाई बराबर लम्बे और दो कोस चौड़े अत्यन्त रमणीक दो-दो वन हैं ॥६४॥


वनपर्यन्त - भागेषु सर्वतो वनवेदिका।
हेमरत्नमया रम्याकृत्रिमास्ति मनोहरा ॥६५॥

क्रोशद्वयसमुत्सेधा क्रोशस्य पादविस्तृता।
चतुर्दिक्षु महादीप्ता द्वारतोरणभूषिता ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 65 से 66): वन को सब ओर से वेष्टित किये हुए, स्वर्ण एवं रत्नमय, अत्यन्त रमणीक, मन को हरण करने वाली और अकृत्रिम वेदियाँ हैं। जो दो कोस ऊँची, पाव कोस चौड़ी और चारों दिशाओं में महादेदीप्यमान तोरण द्वारों से विभूषित हैं ॥६५-६६॥


पर्वतोपरि सर्वत्र विज्ञेया पद्मवेदिका।
नानारत्नमया दिव्या चतुर्गोपुर शोभिता ॥६७॥

सप्ताष्टदशभूम्याद्यनेक भूमण्डितोन्नतैः।
नानारत्नमयैर्दीव्यैः सहस्रस्तम्भ शोभितैः ॥६८॥

चतुरस्त्राद्यनेकाकार संस्थानैर्मनोहरैः।
प्रासादैर्भूषितान्युच्चैर्जिनसिद्धालयोर्जितैः ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 67 से 69): पर्वतों के ऊपर अनेक प्रकार के रत्नमय, दिव्य और चार गोपुर द्वारों से युक्त, पद्म वेदिकाएँ स्थित हैं। श्लोक ७० में कहे गये वे नगर नाना प्रकार के रत्नमय, दिव्य, हजार खम्भों से सुशोभित, कोई सात, कोई आठ, कोई दस और कोई अनेक भूमियों अर्थात् तल या खण्डों से भूषित, उन्नत, मनोहर, जिन भवनों एवं सिद्धभवनों के समूह से युक्त, चतुष्कोण और कोई अनेक आकारों से परिणत ऐसे अनुपम प्रासादों अर्थात् भवनवासी देवों के भवनों से अत्यन्त शोभायमान हैं ॥६७-६९॥


वनोपवनवापीभिः प्राकारगोपुरादिभिः।
अलङ्कृतानि देवानां पुराणि सन्त्यनेकशः ॥७०॥

गिरिकूटेषु सर्वेषु तथाद्रि शिखरेषु च।
शैलपार्श्व वनेषूच्चै र्भासमानानि सर्वदा ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 70 से 71): सम्पूर्ण पर्वतों के कूटों पर, पर्वत शिखरों पर तथा पर्वतों के पार्श्वभागों में स्थित वनों में भी देवों के वनों, उपवनों, वापियों, आकारों (कोट) एवं गोपुर द्वारों से अलंकृत अत्यन्त प्रकाशमान अनेक नगर हैं ॥७०-७१॥


कूटव्यासोनितं दैर्घ्यं निजाद्रेः कूटसंख्यया।
विभक्तमन्तरं ज्ञेयं कूटानां श्रीजिनागमे ॥७२॥

अर्थ: अपनी-अपनी लम्बाई में से कूटों के व्यासों को घटाकर शेष को कूट संख्या से विभाजित करने पर कूटों का अन्तर प्राप्त होता है, ऐसा जिनागम में कहा गया है ॥७२॥


पर्वतस्य चतुर्थांशः कूटानामुदयो भवेत्।
तत्समो विस्तरो मूले मूलार्धं शिखरे तथा ॥७३॥

मूलमस्तकयोर्व्यासयोरेकत्री कृतस्य च।
अर्धं मध्येऽस्ति विष्कम्भोऽत्रास्यैव विस्तरं शृणु ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 73 से 74): सर्व कूटों की ऊँचाई अपने-अपने पर्वतों की ऊँचाई का चतुर्थ भाग है। मूल में अर्थात् भू व्यास का प्रमाण भी ऊँचाई के प्रमाण सदृश ही है। शिखर पर अर्थात् मुखव्यास, भूव्यास के अर्ध भाग प्रमाण है और मूल एवं मस्तक (भूव्यास+मुखव्यास) के विस्तार को जोड़ कर आधा करने पर कूट के मध्यभाग के विस्तार का प्रमाण प्राप्त होता है। इसी को विस्तार पूर्वक कहते हैं, सुनो! ॥७३-७४॥


हिमवच्छिखरिणोः कूटानामुत्सेधः पञ्चविंशतियोजनानि। मूले विस्तारः पञ्चविंशतियोजनानि
मध्ये च त्रिक्रोशाधिकाष्टादशयोजनानि शिखरे च सार्धद्वादशयोजनानि।
महाहिमवद्रुक्मिणोः कूटानामुदयो योजनानि पञ्चाशत्। मूले व्यासश्च पञ्चाशत्। मध्ये
सार्धसप्तत्रिंशद्योजनानि। मस्तके पञ्चविंशतिश्च। निषधनीलयोः कूटानामुन्नतिर्योजनानां शतं स्यात्।
मूले विस्तृतिश्च शतं भवेत्। मध्ये च पञ्चसप्ततिः शिखरे पञ्चाशदेव।

अर्थ: हिमवन् और शिखरिन् कुलाचलों पर स्थित कूटों की ऊँचाई २५ योजन मूल का विस्तार २५ योजन, मध्यविस्तार १८ ३/४ योजन और शिखर पर अर्थात् मुखव्यास १२ १/२ योजन प्रमाण है। महाहिमवन् और रुक्मी पर्वतस्थ कूटों की ऊँचाई ५० योजन, मूल में विस्तार ५० योजन, मध्यविस्तार ३७ १/२ योजन और शिखर पर २५ योजन विस्तार है। इसी प्रकार निषध और नील पर्वतस्थ कूटों की ऊँचाई १०० योजन, मूल में विस्तार १०० योजन, मध्यविस्तार ७५ योजन और शिखर का विस्तार ५० योजन प्रमाण है।


आद्यः पद्मो महापद्मस्तिगिञ्छः केसरी ततः।
महादिपुण्डरीकः पुण्डरीकः षडिमे हृदाः ॥७५॥

सहस्रयोजनायामौ तदर्धविस्तरन्वितौ।
स्तः पद्मपुण्डरीकौ द्वौ ह्यगाधौ दशयोजनैः ॥७६॥

योजनद्विसहस्रायामौ सहस्रैक विस्तृतौ।
योजनानां च विंशत्यागाधौ स्यातां हृदौ समौ ॥७७॥

महापद्म महापुण्डरीकाख्यकौ ततो परौ।
आयामौ योजनै र्ज्ञेयौ चतुःसहस्रसम्मितौ ॥७८॥

द्विसहस्रप्रमैर्यासौ चत्वारिंशत्प्रमाणकैः।
अवगाहौ तिगिञ्छाभिधकेसरिसमाह्वयौ ॥७९॥

एते नित्या हृदा षट्स्युः पूर्वापरसमायताः।
शैलानां मध्यभागेषु तोयास्वादु जलैर्भृताः ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 75 से 80): पूर्व कहे हुए छह कुलाचलों के ऊपर, मध्य भाग में क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक नाम के छह सरोवर हैं। इनमें से पद्म और पुण्डरीक ये दो सरोवर १००० योजन लम्बे, ५०० योजन चौड़े और १० योजन गहरे हैं। महापद्म और महापुण्डरीक नाम के सरोवर २००० योजन लम्बे, १००० योजन चौड़े और २० योजन गहरे हैं तथा तिगिञ्छ और केसरी नाम के दो सरोवर ४००० योजन लम्बे, २००० योजन चौड़े और ४० योजन प्रमाण गहरे हैं। इस प्रकार ये छह सरोवर पूर्व-पश्चिम लम्बे, जल के स्वाद के सदृश, जल से भरे हुए और शाश्वत हैं ॥७५-८०॥


पद्मह्रदान्तरे नित्योऽम्बुजो योजनविस्तृतः ।
क्रोशैककर्णिकायुक्तः प्रफुल्लं स्यात् सुगन्धवान् ॥८१॥

सार्धक्रोशायतान्याद्ये पद्मे पत्राणि सर्वतः ।
एकादशसहस्त्राणि शाश्वतानि भवन्ति च ॥८२॥

सर्वत्र क्रोशबाहुल्यं जलात् क्रोशद्वयोच्छ्रितम् ।
अम्बुजेऽम्बुजं नालं स्यात् वैडूर्यरत्नमयम् ॥८३॥

ततः पद्मादिविस्तारो द्विगुणद्विगुणो मतः ।
वृद्धौ ह्रदद्वये ह्रासः क्रमाच्चान्यह्रदत्रिषु ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 81 से 84): पद्म सरोवर के मध्य में एक योजन विस्तार (चौड़ा) वाला, एक कोस की कणिका से युक्त, नवविकसित सुगन्धवान और शाश्वत कमल है। इस कमल के एक पत्ते की लम्बाई १ १/२ कोस है, ऐसे इसमें ११००० पत्ते शाश्वत होते हैं। कमल में कमल की नाल नीचे से ऊपर तक एक कोस मोटी है और जल से दो कोस (१/२ योजन) ऊपर रहती है तथा वैडूर्य मणियों से निर्मित है। पद्म आदि सरोवरों का विस्तार पूर्व की अपेक्षा दूना-दूना है, अतः कमल आदि का विस्तार आदि भी तीन सरोवरों तक जिस क्रम से वृद्धिंगत होगा, आगे के तीन सरोवरों में उसी क्रम से दुगुणी हानि को प्राप्त हीगा ॥८१-८४॥


आद्याब्जकर्णिकायां स्याद् वैडूर्यरत्नभास्वरम्।
श्रीगृहं सन्मणिद्वारतोरणादिविभूषितम् ॥८५॥

मुक्तास्रग्भूषभूषाढ्यं क्रोशायाममनोहरं।
क्रोशाधंविस्तरं पादोनं क्रोशेकोन्नतं शुभम् ॥८६॥

ततोऽम्बुजद्वये सन्ति द्विगुणद्विगुणाः क्रमात्।
गेहव्यासादयोऽन्येषु त्रिषु पद्मेषु हानितः ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 85 से 87): प्रथम सरोवर की पद्मकर्णिका पर वैडूर्य मणियों की दीप्ति से दीप्तिमान, उत्तम मणियों के तोरणद्वार आदि से विभूषित, लटकती हुई मुक्ता मालाओं (मोतियों के फानूसों) से अलंकृत और मन को हरण करने वाला एक कोश लम्बा, आधा कोस चौड़ा एवं पौन कोस ऊँचा श्री देवी का भवन है। इसके आगे दो कमलों पर क्रम से दुगुने-दुगुने विस्तार वाले और उससे आगे तीन कमलों पर क्रम से दुगुनी हानि को लिये हुए व्यास आदि से युक्त भवन हैं ॥८५-८७॥


श्रीह्रींधृतिश्च कीर्तिश्च बुद्धिलक्ष्मीरिमा हि षट्।
वसन्ति क्रमतो देव्यः आसु षड्द्रह पंक्तिषु ॥८८॥

स्यादासां सर्वदेवीनामायुः पल्यैकसम्मितम्।
परिवारामराः सन्ति नानापरिषदादयः ॥८९॥

श्री ह्री धृत्याख्यदेवीनां स्वामीसौधर्मनायकः।
ऐशानश्चोत्तरस्त्रीणां सर्वत्रैवं व्यवस्थितिः ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 88 से 90): श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी ये छह देवियाँ क्रम से पंक्तिबद्ध छह सरोवरों में रहती हैं। इन सर्व देवियों की आयु एक पल्य की होती है, तथा इनके परिषद् आदि नाना प्रकार के परिवार देव १४०११५ हैं। श्री, ह्री और धृति देवियों का नायक (स्वामी) सौधर्मेन्द्र है और कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी ये तीन देवियाँ ऐशानेन्द्र के आधीन हैं। सर्वत्र अर्थात् अन्य सरोवरों में स्थित देवियों की भी ऐसी ही व्यवस्था है ॥८८-९०॥


स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राण्यन्ता परिषत्सुधाभुजाम्।
श्री गेहादब्जगेहानि ह्याग्नेयदिशि निश्चितम्॥९१॥

चत्वारिंशत्सहस्त्राणि दक्षिणाख्यदिशिस्फुटम्।
स्युर्मध्य परिषद्देवानां पद्मस्थ गृहाणि च ॥९२॥

भवेयुरष्टचत्वारिंशत्सहस्त्राब्जसद्गृहाः ।
नैर्ऋत्यदिग्विभागे बाह्यपरिषत्सुधाशिनाम्॥ ९३॥

आद्यायाः पतिरेव स्यात्सूर्यः परिषदोऽमरः।
चन्द्रमा मध्यमायास्तु बाह्याया यदुपो महान् ॥९४॥

चतुःसहस्रपद्मा वायुकोणेशान कोणयोः।
सामानिकाख्य देवानां सन्तिपद्मालयाः शुभाः॥ ९५॥

सप्तानीकामराणां स्युः पश्चिमायां दिशि स्थिताः।
प्रत्येकं सप्तभेदानां सप्ताम्भोजगृहाः शुभाः॥९६॥

कमलान्यङ्गरक्षाणां सहस्त्राणि तु षोडश।
श्रियोऽम्भोजसमीपानि पूर्वादिदिक्चतुष्टये॥९७॥

श्रीपद्मं परितोऽष्टासु दिग्वि दिक्ष्वम्बुजालयाः।
प्रतीहारोत्तमानां स्युरष्टोत्तरशतप्रमाः ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 91 से 98): श्री देवी के मूल कमल की आग्नेय दिशा में आभ्यन्तर परिषद् देवों के ३२००० भवन, ३२००० कमलों पर स्थित हैं। इनके प्रमुख देव (स्वामी) का नाम सूर्य है, इसी प्रकार चन्द्र नाम का देव है स्वामी जिनका, ऐसे मध्यपरिषद् के ४०००० कमलस्थ भवन (मूल कमल की) दक्षिण दिशा में स्थित हैं तथा यदुप नाम का देव है स्वामी जिनका, ऐसे बाह्य परिषद् देवों के ४८००० भवन ४८००० कमलों पर (श्री देवी के मूल कमल की) नैऋत्य दिशा में स्थित हैं। श्री देवी के मूल कमल की ईशान और वायव्य दिशा में ४००० भवन ४००० कमलों पर स्थित हैं। मूल कमल की पश्चिम दिशा में सात प्रकार के अनीक देवों के सात भवन सात कमलों पर स्थित हैं। ये प्रत्येक अनीक सात-सात कक्षाओं से युक्त हैं श्री देवी के मूल कमल की चारों दिशाओं में चार-चार हजार अर्थात् १६००० तनुरक्षक देवों के कमलस्थ भवन हैं। इसी प्रकार श्री देवी के मूल कमल के चारों ओर अर्थात् चार दिशाओं में (१४, १४) और चारों विदिशाओं में (१३-१३) प्रतिहार महत्तरों के कमलस्थ भवन १०८ हैं ॥९१-९८॥


लक्षकैकाग्रसहस्राणि चत्वारिंशत्तथाशतम्।
एकं पञ्चदशैत्येषां सर्वाब्जगणना मताः ॥९९॥

अर्थ: श्री देवी के सम्पूर्ण परिवार कमलों का प्रमाण एक लाख चालीस हजार एक सौ पन्द्रह है॥९९॥


देवकुमारियों के भवनों का व्यास आदि एवं परिवार कमलों का प्रमाण


जलान्ते समनालानि नानामणिमयानि च।
परिवारामराब्जानि श्र्यादिष्टदेव योषिताम् ॥१००॥

कमलेभ्योऽर्धमानानि व्यासायामादिभिस्तथा।
गृहेभ्यः परिवाराणां गृहाण्यर्धमितानि च ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 100 से 101): श्री आदि छह देवकुमारियों के परिवार कमल जल के मध्य में नाना प्रकार की मणियों से रचित और समान ऊँचाई पर (अर्थात् जल के बाहर जिनकी नाल समान निकली हुई है) स्थित हैं। श्री आदि देवी के मूल कमलों से परिवार कमलों का व्यास आदि अर्ध प्रमाण है, इसी प्रकार उनके मूल भवन से परिवार देवों के भवनों का व्यास आदि भी अर्ध प्रमाण है ॥१००-१०१॥


एते महागृहारम्या उक्तसंख्या बुधैः स्मृताः।
एतेभ्यो बहवोऽन्येऽत्र ज्ञातव्याः क्षुल्लकालयाः ॥१०२॥

सर्वे स्युरुत्तमा गेहाः पूर्वाभिमुख शाश्वताः।
तेषामभिमुखा अन्ये सन्ति जघन्य सद्गृहाः ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 102 से 103): इस प्रकार विद्वानों के द्वारा श्री देवी के परिवार महागृहों की संख्या १४०११५ कही गई है। इन महागृहों से भिन्न और लघुगृह भी अनेक हैं, ऐसा जानना चाहिए। ये सर्व महागृह शाश्वत और पूर्वाभिमुख हैं अर्थात् सम्पूर्ण महागृहों का मुख पूर्व दिशा की ओर है, तथा अन्य सभी लघु गृहों के मुख महागृहों की ओर हैं अर्थात् पश्चिम दिशा की ओर हैं ॥१०२-१०३॥


विश्वेषु पद्मगेहेषु शाश्वताः श्रीजिनालयाः।
अब्जालय प्रमा ज्ञेया देवदेवीगणार्चिताः ॥१०४॥

दिव्याष्ट मङ्गलद्रव्यैः प्रतिहार्याष्टभूतिभिः।
भासमानाः स्वतेजोभिर्लार्हत्प्रतिमाभृताः ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 104 से 105): सम्पूर्ण पद्म भवनों में देव देवियों के समूह से अर्चित, दिव्य अष्ट मंगल द्रव्यों (भृंगार, ताल, कलश, ध्वज, सुप्रतीक, श्वेतातपत्र, दर्पण और चामर) और अष्ट प्रातिहार्यों से युक्त एवं अपने तेज से देदीप्यमान ऐसे रत्नमय अर्हन्त प्रतिमाओं से समन्वित शाश्वत श्री जिनमन्दिर हैं। इनका प्रमाण पद्मालयों के प्रमाण बराबर ही है, अर्थात् कमलों की जितनी संख्या है, उतने ही (कमलों के ऊपर) भवन हैं और प्रत्येक भवन में एक-एक अकृत्रिम श्रीजिनालय है अतः कमलभवनों के प्रमाण ही जिनमन्दिरों का प्रमाण है ॥१०४-१०५॥


उपपादगृहा रम्या अभिषेकगृहाः शुभाः।
मण्डनाख्यगृहा दीप्ताः सभास्थानगृहा वराः ॥१०६॥

रम्याः क्रीडनसद्गेहा विचित्रा नाटकालयाः।
रतिगेहाः परेदोलागृहाः सङ्गीतसद्गृहाः ॥१०७॥

विस्फुरन्तो भवन्त्यत्र विचित्रमणिदीप्तिभिः।
मृदङ्गतूर्यनादाद्यै धूपामोदैश्च वासिताः ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 106 से 108): उन उपर्युक्त पद्मभवनों में नाना मणियों के प्रकाशमान किरणों से युक्त दोलागृह, मृदंग एवं तूर्य के शब्दों से गम्भीर उत्तम संगीतगृह, धूप की सुगन्ध से वासित सम्भोगगृह, रमणीक उपपाद (जन्म) गृह, शुभ अभिषेक गृह, प्रकाशमान मण्डनगृह, उत्कृष्ट सभास्थान, शोभनीक क्रीड़ागृह और नाना प्रकार के नाटकगृह आदि होते हैं ॥१०६-१०८॥


न वनस्पतयो नैते निर्मिता व्यन्तरामरैः।
पृथ्‍वी सारमयाः किन्तु नित्याः पद्मादयोऽखिलाः ॥१०९॥

अर्थ: ये पद्म, पद्मभवन एवं जिनमन्दिर आदि न तो वनस्पतिकाय हैं और न किन्हीं व्यन्तर देवों के द्वारा रचित हैं किन्तु ये सभी पृथिवी के विकार स्वरूप हैं। अर्थात् पृथ्‍वीकाय और अकृत्रिम हैं ॥१०९॥


सर्वेषां कमलानां चोपरिज्येष्टालयोन्नताः।
स्फुरन्मणिमया भान्ति प्राकारद्वारतोरणैः ॥११०॥

अर्थ: इस प्रकार सम्पूर्ण कमलों के ऊपर नाना प्रकार के तोरण द्वारों आदि से युक्त, मणिमय और उन्नत उत्तम गृह हैं ॥११०॥


गजा अश्वारथास्तुंगा वृषागन्धर्व निर्जराः।
नर्त्तक्यो भृत्यपादातयोऽमूनिप्रस्फुरन्ति च ॥१११॥

सप्तानीकानि युक्तानि कक्षाभिः सप्तसप्तभिः।
प्रत्येकं श्रीगृहद्वारे भूत्यैवं श्र्यादयोषिताम् ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 111 से 112): श्रीदेवी के गृह द्वार पर गज, अश्व, ऊँचे-ऊँचे रथ, बैल, गन्धर्वदेव, नृत्यकी और दास अर्थात् पदाति ये सात-सात कक्षाओं से युक्त सप्त सेनाएँ शोभायमान होती हैं, इसी प्रकार ही आदि प्रत्येक देवकुमारियों के भी जानना चाहिए ॥१११-११२॥


प्रथमे या गजानीके गजसंख्या च सा ततः।
द्वितीये द्विगुणात्रैव सप्तसु द्विगुणोत्तराः ॥११३॥

तथान्याश्वाद्यनीकानां गणनाश्वादिसंख्यया।
प्रत्येकं सप्तकक्षासु द्विगुणा द्विगुणा मता॥११४॥

अर्थ (श्लोक 113 से 114): गज अनीक की प्रथम कक्षा में गजों की जो संख्या है, द्वितीय कक्षा में वह संख्या दुगुनी है। इस प्रकार गज अनीक की सातों कक्षाओं में क्रम से दुगुनी-दुगुनी संख्या है। इसी प्रकार अश्व आदि सातों अनीकों की प्रथम कक्षा की अश्व आदि की संख्या से द्वितीय कक्षा की अश्व आदि की संख्या उत्तरोत्तर दुगुनी मानी गई है ॥११३-११४॥


एता दिव्यविभूतयः सुखकराः, सत्सौधसैन्यादिकाः।
प्राप्ताः श्र्यादि सुदेवताभिरखिला, मान्यप्रभुत्वादयः।
अन्ये चावधि विक्रियर्धि सुगुणाः, प्रागर्जितश्रेयसा।
मत्त्वेतीह जनाः कुरुध्वमनिशं, श्रेयोऽर्जनं सद्व्रतैः ॥११५॥

अर्थ: इस प्रकार श्री ही आदि देव कुमारियों को जो दिव्य विभूतियाँ, सुखों का समूह, उत्तम भवन, उत्तम सैन्य आदि का वैभव तथा प्रभुत्व आदि का ऐश्वर्य एवं और भी जो अवधिज्ञान, विक्रिया आदि ऋद्धियाँ एवं अन्य उत्तम गुण प्राप्त हुए हैं, वे सब पूर्व उपार्जित पुण्य कर्म से ही प्राप्त हुए हैं, ऐसा मानकर हे भव्यजनो ! इस लोक में अर्थात् मनुष्य पर्याय में उत्तम चारित्र के द्वारा निरन्तर पुण्य उपार्जन करो ॥११५॥


श्रेयः श्रेयनिबन्धनोऽसुखहरः श्रेयं श्रयन्त्युत्तमाः
श्रेयेनात्र च लभ्यतेऽखिलसुखं श्रेयाय शुद्धा क्रियाः ।
श्रेयाच्छ्रेयकरोऽपरो न च महान् श्रेयस्य मूलं सुदृक् ।
श्रेये यत्नमनारतं बुधजनाः कुर्वन्तु दृक्चिद्व्रतैः ॥११६॥

अर्थ: पुण्य कल्याण का निबन्धक अर्थात् कल्याण प्राप्त कराने वाला और दुःखों का हरण करने वाला है, इसलिये सज्जन पुरुष पुण्य का आश्रय लेते हैं अर्थात् पुण्य अर्जन करते हैं। पुण्य से ही सम्पूर्ण सुखों की प्राप्ति होती है, अतः पुण्य अर्जन के लिये शुद्ध क्रियाएँ (कुल एवं पद के योग्य क्रियाएँ) करना चाहिए। पुण्य से अधिक कल्याणकारी और कोई महान् नहीं है। पुण्य की जड़ सम्यग्दर्शन है, इसलिये बुद्धिमानों को रत्नत्रय धर्म के द्वारा पुण्य में अर्थात् पुण्यार्जन के लिये अनवरत प्रयत्न करना चाहिये ॥११६॥

पञ्चम अधिकार महानदी, गिरि वर्णन

अथ नत्वा जिनेन्द्रादींस्तदर्चाश्च जिनालयान्।
नदीगङ्गादिका वक्ष्ये निर्गमस्थानविस्तरैः ॥१॥

अर्थ: अब मैं जिनेन्द्र आदि पञ्च परमेष्ठियों को, जिन प्रतिमाओं को और जिनालयों को नमस्कार करके गंगा आदि नदियों के निर्गम स्थान आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन करूँगा ॥१॥


गङ्गासिन्धुनदीरोहिद्रोहितास्या हरित्सरित्।
हरिकान्ता च सीताख्या सीतोदावाहिनी ततः ॥२॥

नारी च नरकान्ता सुवर्णकूलाह्वया नदी।
रूप्यकूलाभिधा रक्ता रक्तोदैताश्चतुर्दश ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित्, हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा ये चौदह नदियाँ हैं ॥२-३॥


पूर्वोक्ताः सप्तगङ्गाद्या नद्यः पूर्वाब्धिगा मताः।
शेषाः सिन्ध्वादयः सप्त चापाम्बुधि मध्यगाः ॥४॥

अर्थ: उपर्युक्त १४ नदियों में से पूर्व कथित गंगा आदि सात नदियाँ पूर्व समुद्र में और शेष सिन्धु आदि सात नदियाँ पश्चिम समुद्र में गिरतीं हैं ॥४॥


तेषां च षड्रहाणां स्यात् सर्वत्र रत्नवेदिका।
तटे क्रोशद्वयोत्तुङ्गा क्रोशैकपादविस्तृता ॥५॥

अर्थ: उन पद्म आदि छह द्रहों के तट पर चारों ओर रत्नवेदिका है, जो दो कोस ऊँची और सवा कोस चौड़ी है ॥५॥


पद्मद्रहस्य पूर्वस्मिन् दिग्भागे तोरणान्वितम्।
वज्रद्वारं भवेत्क्रोशाग्रषड्योजनविस्तृतम् ॥६॥

उन्नतं सार्धगव्यूति संयुक्तनव योजनैः।
द्वारस्य तोरणं ज्ञेयं जिनबिम्बाद्यऽलङ्कृतम् ॥७॥

अर्थ (श्लोक 6 से 7): पद्मसरोवर की पूर्व दिशा में गंगा नदी को निकलने के लिये तोरण से संयुक्त एक वज्रमय द्वार है, जो ६ योजन एक कोश अर्थात् सवा छह (६ १/४) योजन चौड़ा और ९ योजन १ १/२ कोस ऊँचा है। इस द्वार का तोरण जिनबिम्ब और दिक्कन्याओं के आवासों से अलंकृत है ॥६-७॥


पूर्ववत्पश्चिमद्वारं ह्रदस्यास्य समानकम्।
शेषद्विद्विनदीनां सीतोदान्तानां भवन्ति च ॥८॥

ह्रदस्थनिर्गमद्वार व्यासाद्यै र्द्विगुणोत्तराः।
नार्यादिवाहिनीनां स्युः क्रमह्रासास्ततोऽखिलाः ॥९॥

अर्थ (श्लोक 8 से 9): पद्मसरोवर की पूर्व दिशा के समान पश्चिम दिशा में भी एक निर्गम द्वार है, जिससे सिन्धु नदी निकलती है। इस प्रकार अन्य सरोवरों में भी सीतोदा नदी पर्यन्त दो-दो निर्गम द्वार हैं, जिनका व्यास आदि उत्तरोत्तर दूना-दूना होता गया है। इसके आगे अवशेष तीन सरोवरों से निकलने वाली नारी, नरकान्ता आदि नदियों के निर्गम द्वारों का व्यास आदि क्रम से दुगुना-हीन होता गया है ॥८-९॥


तस्मात्पद्मद्रहद्वाराद्गङ्गा निर्गत्य विस्तृता।
क्रोशाग्रयोजनैः षड्भिर्हैमवद्गिरि मस्तके ॥१०॥

अर्धक्रोशावगाहाढ्या याता पञ्च शतानि च।
योजनानि चलद्वेगा गङ्गाकूटस्य सन्मुखा ॥११॥

गङ्गाकूटं ततस्त्यक्त्वा योजनार्धेन दूरतः।
दक्षिणाभिमुखीभूय शतपञ्चक योजनान् ॥१२॥

संयुतान् साधिकार्धक्रोश त्रयोविंशयोजनैः।
सा गिरेस्तटमायाता तत्रास्ति गोमुखाकृतिः ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 10 से 13): ६ १/४ योजन चौड़ी और १/२ कोस गहरी गंगा नदी पद्मसरोवर की पूर्व दिशा में स्थित वज्रद्वार से निकलकर हिमवान् पर्वत के ऊपर ५०० योजन (हिमवान् पर्वत पर स्थित) गंगाकूट के सम्मुख अर्थात् पूर्व दिशा की ओर जाकर गंगाकूट को अर्धयोजन दूर से ही छोड़ती हुई दक्षिण दिशा में मुड़ जाती है, तथा उसी दक्षिण दिशा की ओर साधिक अर्धकोस से अधिक ५२३ योजन आगे जाकर वह गंगा हिमवान् पर्वत के तटभाग पर स्थित गोमुखाकृति प्रणालीका (नाली) को प्राप्त हो जाती है ॥१०-१३॥


द्विक्रोशदीर्घता युक्ता द्वि क्रोशस्थूलता युता।
प्रणालीयोजनैः षड्भिः क्रोशाग्रैर्विस्तरान्विता ॥१४॥

नित्यायता जलाभेद्या सिंहवच्छ्रुति जिह्विका।
ज्ञेयास्या दीर्घ विस्तारैः समासिन्धुप्रणालिका ॥१५॥

शेषाः प्रणालिका व्यासाद्यै विदेहान्त मज्जसा।
द्विगुणाद्विगुणाः स्युश्च तथालघ्वास्ततोऽपराः ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): [हिमवान् पर्वत के तट पर स्थित वह ] जिह्विका नाम की प्रणालीका (नाली) दो कोस लम्बी, दो कोस मोटी और ६ योजन एक कोश अर्थात् ६ १/४ योजन चौड़ी है। यह प्रणालीका शाश्वत और जल से अभेद्य अर्थात् नष्ट भ्रष्ट होने के स्वभाव से रहित है। इसकी मुखाकृति गाय के सदृश है किन्तु इसके कान सिंह के कान सदृश हैं। [गंगा नदी इसी नाली में जाकर हिमवान् पर्वत से नीचे गिरती है।] सिन्धु नदी की प्रणालीका की लम्बाई चौड़ाई भी इसी के समान है। इसके बाद विदेह पर्यन्त की शेष प्रणालिकाओं का व्यास आदि उत्तरोत्तर दूना दूना और उसके आगे क्रमशः हीन-हीन होता गया है ॥१४-१६॥


काहलाकारमाश्रित्य पतिता भरतावनौ।
दशयोजनविस्तीर्णा धारा तस्या अखण्डिता ॥१७॥

धारापर्वतयोर्मध्ये ह्यन्तरं पञ्चविंशतिः।
योजनानि ततोऽन्येषां द्विगुणद्विगुणं क्रमात् ॥१८॥

धाराया उन्नतिश्चात्र शतैकयोजनप्रमा।
द्विगुणा द्विगुणान्याद्रिद्वयेऽर्धाऽर्धाऽचलत्रये ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 17 से 19): (हिमवान् पर्वत को छोड़कर) काहला (एक प्रकार के बाजा) के आकार को धारण करने वाली, दस योजन विस्तार वाली तथा अखण्ड धारा से युक्त गंगा नदी भरत भूमि पर गिरती है। जहाँ धारा गिरती है उस स्थान के और पर्वत के मध्य में पच्चीस योजनों का अन्तराल है अर्थात् गंगा नदी हिमवान् पर्वत से पच्चीस योजन दूरी पर गिरती है। विदेह पर्यन्त यह अन्तर क्रमशः दूना और उससे आगे क्रमशः हीन होता गया है। इस स्थान पर गंगा की धारा की ऊँचाई सौ योजन प्रमाण है। विदेह पर्यन्त धारा की ऊँचाई क्रम से दूनी-दूनी प्राप्त होती है और उसके आगे तीन कुलाचलों पर यह ऊँचाई क्रमशः अर्ध-अर्ध प्राप्त होती है ॥१७-१९॥


तत्राद्रि पार्श्वभूभागे कुण्डवज्रमयं भवेत्।
वृत्तं नित्यं सुविस्तीर्णं सार्धं द्विषष्टियोजनैः ॥२०॥

वेष्टितं रत्नवेद्या चावगाहं दशयोजनैः।
तस्य मध्य प्रदेशेऽस्ति सद्दीपः सलदाह्वयः ॥२१॥

अष्ट योजन विस्तीर्णो जलात् क्रोशाद्वयोच्छ्रितः।
तन्मध्ये स्याद्गिरिर्वज्रमयस्तुङ्गश्चयोजनैः ॥२२॥

दशभिर्विस्तृतो मूले चतुभिर्मध्य विस्तरः।
द्वाभ्यां च योजनाभ्यां मूर्ध्नेक योजन विस्तृतः ॥२३॥

तस्याद्रेः श्रीगृहं मूर्ध्नि दिव्यं क्रोश समुन्नतम्।
भूतले सार्धगव्यूति दीर्घमायाम संयुतम् ॥२४॥

क्रोशेनैकेन मध्येग्रे क्रोशार्धं दीर्घताश्रितम्।
स्फुरद्रत्नमयं सार्धं शतद्विचाप विस्तृतम् ॥२५॥

चतुर्गोपुरयुक्तस्य वेदिका वेष्टितस्य च।
गङ्गा कूटाभिधस्यास्य द्वारं मणिमयं भवेत् ॥२६॥

चत्वारिंशद्धनुर्व्यासं चापाशीत्युच्छ्रितं शुभं।
गंगादेवीवसेदत्र प्रासादे वनभूषिते ॥२७॥

प्रासादमस्तकेऽत्रास्ति शाश्वतं कमलोर्जितं।
तत्कर्णिकोपरिस्फीतं रत्नसिंहासनोन्नतम् ॥२८॥

तस्योपरिस्फुरद्रत्नमयी नित्या मनोहरा।
जिनेन्द्र प्रतिमा तुङ्गा तेजो मूर्तिरिवास्ति च ॥२९॥

तस्याः शिरसि सर्वाङ्गे पतन्त्यचलमस्तकात्।
महाभिषेक धारेव गङ्गासरिद्रवाकुला ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 20 से 30): हिमवान् पर्वत के पार्श्व भाग (मूल) में पृथ्वी पर एक वज्रमय अकृत्रिम गोल कुण्ड है, जो ६२ १/२ योजन व्यास अर्थात् चौड़ा और १० योजन गहरा तथा रत्नों की वेदी से वेष्टित है। इस कुण्ड के मध्य में सलद (जलद) नाम का एक उत्तम द्वीप (टापू) है, जो आठ योजन विस्तृत और जल से दो कोस (१/२ योजन) ऊँचा है। उस द्वीप के मध्य में वज्रमय दस योजन ऊँचा एक पर्वत है। उस पर्वत का व्यास मूल में चार योजन, मध्य में दो योजन और शिखर पर एक योजन प्रमाण है। उस पर्वत के शिखर पर शोभायुक्त गृह है, जो एक कोस ऊँचा, रत्नमय दिव्य भवन है, जो भूतल पर १ १/२ कोस (३००० धनुष) लम्बा (व्यास) मध्य में एक कोस (२००० धनुष) तथा अग्रभाग में १/२ कोस (१००० धनुष) लम्बा (व्यास) है। इस गृह (गंगा कूट) का अभ्यन्तर व्यास २५० धनुष है। गंगा कूट है नाम जिसका, ऐसा यह गंगा देवी का गृह चार गोपुरों से युक्त और वेदिका से वेष्टित है। इसके द्वार अर्थात् दोनों किवाड़ अत्यन्त शुभ और रत्नमय हैं, जिनकी चौड़ाई ४० धनुष और ऊँचाई ८० धनुष है। वन से विभूषित इस महल में गंगा नाम की देवी रहती है। इस महल के मस्तक-अग्रभाग पर एक शाश्वत और उन्नत कमल है, जिसकी कर्णिका के ऊपर देदीप्यमान रत्नमय उन्नत-विशाल सिंहासन है। उस सिंहासन पर तेज की मूर्ति ही हो मानो इस प्रकार की अत्यन्त भास्वर, मनोहर और अकृत्रिम, रत्नमय उत्तुंग जिनेन्द्र प्रतिमा अवस्थित है, नदी के कलकल शब्दों से युक्त, महा अभिषेक की धारा के समान गंगा नदी हिमवान् पर्वत के मस्तक से उन प्रतिमा के सिर पर से सम्पूर्ण शरीर पर गिरती है ॥२०-३०॥


तत् कुण्ड देहली द्वारान्निर्गत्य सा सतोरणात्।
ततः खण्डप्रपाताख्या गुहासन्मुखमागता ॥३१॥

रूप्याचल तले तस्या गुहाया योजनानि च।
द्वादशव्यासआयामः पञ्चाशद्योजनान्यपि ॥३२॥

उन्नतिर्योजनान्यष्टौ द्वौ स्तो वज्रकपाटकौ।
षट्षड्योजनविस्तारौ ह्यष्टाष्टयोजनोन्नतौ ॥३३॥

देहल्या विजयार्धस्य प्रविष्टैषाप्यधस्तले।
अष्टयोजनविस्तीर्णा सर्वत्रात्र गुहान्तरे ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 31 से 34): गंगा नदी उस कुण्ड के तोरण सहित दक्षिण द्वार से निकलकर [दक्षिण की ओर बहती हुई विजयार्ध पर्वत की] खण्डप्रपात नाम की गुफा की ओर जाती है और गुफा के तोरण सहित (दक्षिण) द्वार की देहली के नीचे से निकलकर [गुफा की ५० योजन लम्बाई को पार करती हुई] आठ योजन विस्तार वाली गंगा उसी गुफा के उत्तर द्वार की देहली के नीचे से निकल जाती है विजयार्ध पर्वत के नीचे स्थित गुफा और गुफा द्वार दोनों बारह-बारह योजन चौड़े और आठ-आठ योजन ऊँचे हैं। गुफा की लम्बाई ५० योजन है (क्योंकि विजयार्ध ५० यो. ही चौड़ा है)। गुफा के (दक्षिण उत्तर) दोनों द्वारों पर प्रत्येक छह-छह योजन चौड़े और आठ-आठ योजन ऊँचे वज्रमय कपाट लगे हैं ॥३१-३४॥


उन्मग्नानिम्नगा संज्ञे द्विर्द्वियोजन विस्तृते।
द्विर्द्वियोजन दीर्घे द्वे नद्यौ विनिर्गते घने ॥३५॥

पूर्वापरगुहाभित्ति भूकुण्डाभ्यो क्षयोज्झिते।
गुहामध्ये प्रविष्टे स्तः प्रवाहेऽस्याद्विपार्श्वयोः ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): [विजयार्ध की खण्डप्रपात गुफा ५० योजन लम्बी है। २५ योजन पर अर्थात्] गुफा के ठीक मध्य में पूर्व पश्चिम दोनों दीवारों के निकट भूमि पर दो कुण्ड हैं, इन कुण्डों से दो-दो योजन चौड़ी और दो-दो योजन लम्बी उन्मग्ना और निम्नग्ना नाम की दो नदियाँ निकलती हैं तथा विनाश रहित और मेघसदृश ये दोनों नदियाँ दोनों पार्श्वभागों से गंगा के प्रवाह में प्रविष्ट हो जाती हैं ॥३५-३६॥


ततस्त्यक्त्वाद्रिमागत्य दक्षिणाभिमुखा सरित्।
दक्षिणभरतस्यार्धं भूतलं प्राग्मुखी ततः ॥३७॥

वलित्वा विस्तृता सार्धद्विषष्टियोजनैःपरा।
पञ्चक्रोशावगाहा सा प्रविष्टा पूर्वसागरम् ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 37 से 38): इस प्रकार विजयार्ध पर्वत को छोड़कर दक्षिणाभिमुख बहती हुई गंगा दक्षिणभारत के अर्धभाग (११९ ३/३८ योजन) पर्यन्त सीधी आती है। पश्चात् पूर्व दिशा के सम्मुख मुड़ती हुई, ६२ १/२ योजन चौड़ी और ५ कोस गहरी वह गंगा महानदी अन्ततः (मागध द्वार से) पूर्व समुद्र में प्रवेश कर जाती है ॥३७-३८॥


तन्मागधामरद्वारं गङ्गाप्रवेश कारणम्।
क्रोशाद्वयावगाहं द्विक्रोशबाहुल्य संयुतम् ॥३९॥

गङ्गाव्याससमव्यासं रत्नतोरण भूषितम्।
योजनत्रिनवत्यामा त्रिक्रोशोनोच्छ्रितं भवेत् ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 39 से 40): पूर्व लवण समुद्र में गंगा के प्रवेश का कारणभूत मागध नाम का द्वार है। अर्थात् मागधद्वार से भीतर जाकर गंगा समुद्र में प्रवेश करती है। इस द्वार के रक्षकदेव का नाम मागध है। यह द्वार रत्नों के तोरण से विभूषित है, द्वार की नींव दो कोस, मोटाई दो कोस, ऊँचाई तीन कोस अधिक ९३ योजन और चौड़ाई गंगा के व्यास सदृश अर्थात् ६२ १/२ योजन प्रमाण है ॥३८-४०॥


स्युस्तत्रतोरणद्वारे जिनबिम्बान्यनेकशः।
मङ्गलद्रव्यभूषाणि दीप्तरत्नमयानि च ॥४१॥

तोरणोपरिचोत्तुङ्गा मणिप्रासादपंक्तयः।
दिक्कुमारीव्रजापूर्णा नित्याः सन्ति मनोहराः ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 41 से 42): मागधद्वार के ऊपर जो तोरणद्वार है, उसके ऊपर दिक्कुमारियों के समूह से व्याप्त, मन को हरण करने वाले, अनादिनिधन, उत्तुंग और पंक्तिबद्ध मणिमय भवन हैं और इन भवनों के ऊपर मंगल द्रव्यों से विभूषित, देदीप्यमान रत्नमय अनेक जिनबिम्ब अवस्थित हैं ॥४१-४२॥


ह्रदस्य निर्गमद्वारं कुण्डस्य च महाम्बुधेः।
प्रवेशद्वारमस्त्येव व्यासेन समविस्तृतम् ॥४३॥

अर्थ: पद्म सरोवर गंगा के निर्गम द्वार की चौड़ाई गंगा के निर्गम व्यास के सदृश अर्थात् ६ १/४ योजन है। कुण्ड का व्यास और लवण समुद्र के गंगा प्रवेश द्वार का व्यास गंगा के प्रवेश व्यास के सदृश अर्थात् ६२ १/२ योजन प्रमाण है ॥४३॥


गङ्गाया द्वारविस्तारात्सर्वे ते द्वारतोरणाः।
अर्धाधिकेन तद्व्यासेनोन्नता निखिला मताः ॥४४॥
ह्रदकुण्डसमुद्राणां निर्गमद्वारपंक्तिषु।
प्रवेशद्वारसर्वेषु गंगादिसरितां भवेत् ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 44 से 45): गंगा के समस्त तोरण द्वारों का जितना-जितना विस्तार है, अपने-अपने उन व्यासों (विस्तारों) का डेढ़ गुणा उन तोरण द्वारों की ऊँचाई है। गंगा आदि सभी नदियों के तालाब, कुण्ड और समुद्र सम्बन्धी निर्गम द्वार व प्रवेश द्वार होते हैं ॥४४-४५॥


क्रोशद्वयावगाहत्वं तोरणानि महान्ति च।
तोरणेषु जिनेन्द्राणां प्रतिमा दिव्यमूर्तयः ॥४६॥
तोरणोपरिभागेषु दिक्कन्यावास पंक्तयः।
भवन्ति शाश्वता रम्या विश्वेषु मणितेजसः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): दो कोस है नींव जिनकी, ऐसे महान् तोरण द्वारों के उपरिम भाग में दिक्कन्याओं के अकृत्रिम, रमणीक और पंक्तिबद्ध आवास भवन हैं और उन समस्त तोरण भवनों पर जिनेन्द्र भगवान् की देदीप्यमान मणिमय दिव्य प्रतिमाएँ हैं ॥४६-४७॥


कुण्डतद्दीपशैलानां तद्गृहाणां च वारिधेः।
गंगादिक प्रवेशद्वाराणां व्यासाद्योऽखिलाः ॥४८॥
द्विगुण द्विगुणा ज्ञेयाः सीतोदान्तास्ततोऽपरे।
अर्धार्धश्च भवेयुस्त्रि क्षेत्रेषु रम्यकादिषु ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): सीतोदा नदी अर्थात् विदेह पर्यन्त स्थित नदी पतन के कुण्ड, कुण्ड सम्बन्धी उपद्वीप (टापू), इनके ऊपर स्थित पर्वत और पर्वतों के ऊपर स्थित गृह तथा समुद्र में गंगानदियों के प्रवेश द्वारों की चौड़ाई एवं ऊँचाई का प्रमाण उत्तरोत्तर दूना-दूना और इसके आगे रम्यक आदि तीन क्षेत्र सम्बन्धी नारी नरकान्ता आदि नदियों के पतन सम्बन्धी कुण्ड आदि का प्रमाण क्रमशः अर्ध-अर्ध हीन जानना चाहिए ॥४८-४९॥


गंगादिसरितामादौ स्वह्रदान्निर्गमे च यः।
स्वव्यासो योऽवगाहः स भवेद् दशगुणो हि सः ॥५०॥

अर्थ: अपने-अपने सरोवरों से निकलने वाली गंगा आदि नदियों के अपने-अपने निर्गम व्यास और अवगाह से अपना-अपना प्रवेश व्यास और अवगाह दस गुणित होता है ॥५०॥


अब्धेः प्रवेशासद्द्वारेषु गंगायाः समानका।
ऋजुव्यासावगाहाद्यैः सिन्धुर्गतापरार्णवम् ॥५१॥

अर्थ: पश्चिम समुद्र में जाने वाली सिन्धु नदी के समुद्र प्रवेश द्वार आदि में व्यास, अवगाह एवं सीधे प्रवाह आदि का प्रमाण गंगा के सदृश है ॥५१॥


रोहिन्महादिपद्मस्य दक्षिणद्वार निर्गता।
क्षेत्रं हैमवतं प्राप्य गता पूर्वाख्यसागरम् ॥५२॥

पद्मस्यास्योत्तरद्वाराद्रोहिताख्या विनिर्गता।
जघन्यभोगभूमध्येन पश्चिमाम्बुधिं गता ॥५३॥

इत्येवं सरितस्तिस्रः पद्मह्रदाद् विनिर्गताः।
पुण्डरीकह्रदात्तिस्रो नद्यः शेषेभ्य एव च ॥५४॥

ह्रदेभ्यो निर्गते द्वे द्वे नद्यौ ह्यान्योन्य मिश्रिते।
विस्तरं सुखबोधाय संवक्ष्येऽतः पृथक् पृथक् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 52 से 55): रोहित् नदी महापद्म सरोवर के दक्षिण द्वार से निकलकर हैमवत क्षेत्र अर्थात् जघन्य भोगभूमि को प्राप्त करती हुई पूर्व समुद्र में गिरी है। रोहितास्या नदी पद्मसरोवर के उत्तर द्वार से निकलकर जघन्य भोगभूमि अर्थात् हैमवत क्षेत्र के मध्य में से बहती हुई पश्चिम समुद्र को प्राप्त हुई है। इस प्रकार पद्मह्रद से गंगा, सिन्धु और रोहितास्या ये तीन नदियाँ निकलीं हैं और पुण्डरीक सरोवर से सुवर्णकूला, रक्ता और रक्तोदा ये तीन नदियाँ निकलीं हैं शेष सरोवरों से एक दूसरे से मिश्रित होती हुई दो-दो नदियाँ निकलीं हैं। अर्थात् महापद्म से रोहित् और हरिकान्ता, तिगिञ्छ से हरित् और सीतोदा, केसरी से सीता और नरकान्ता तथा महापुण्डरीक से नारी और रूप्यकूला ये दो-दो नदियाँ निकलीं हैं। (महापद्म से रोहित् और हरिकान्ता तथा तिगिञ्छ से हरित् और सीतोदा आदि का निकलना ही अन्योन्य मिश्रण है)। सरलतापूर्वक ज्ञान प्राप्त कराने के अभिप्राय से अब इन नदियों का पृथक् पृथक् वर्णन क्रिया जा रहा है ॥५२-५५॥


रोहित् नदी का विवेचन / रोहितास्या नदी का वर्णन / हरित् नदी का सविस्तार वर्णन / हरिकान्ता नदी का वर्णन / सीता नदी का वर्णन / सीतोदा नदी का विवेचन / नारी नदी का वर्णन / नरकान्ता नदी का विवेचन / सुवर्णकूला नदी का वर्णन / रूप्यकूला नदी / रक्ता नदी / रक्तोदा नदी / अथ महानदीनां परिवारनदीसंख्या प्रोच्यते


गंगासिन्ध्वोः प्रत्येकं परिवार नद्यश्च चतुर्दशसहस्राणि भवन्ति। रोहित् रोहितास्ययोरष्टा-
विंशतिसहस्राणि च। हरिद्धरिकान्तयोः पृथक् पृथक् परिवारनद्यः षट् पञ्चाशतसहस्राणि भवेयुः। सीतायाः
परिवारनद्यश्चतुरशीतिसहस्राणि, तथासीतोदायाश्च। नारीनरकान्तयोः प्रत्येकं परिवारनद्यः
षट्पञ्चाशतसहस्राणि। सुवर्णरूप्यकूलयोरष्टाविंशति सहस्राणि। रक्तायाः परिवारनद्यः चतुर्दशसहस्राणि,
रक्तोदायाश्च। पूर्वापर विदेहस्थ द्वादश विभङ्गानदी रहित चतुःषष्टि मूलनदीनां प्रत्येकं प्रत्येकं चतुर्दश
चतुर्दश सहस्त्र परिवारनद्यो भवन्ति। सर्वा मेलिताः परिवार नद्योऽष्टलक्षषण्णवतिसहस्राणि भवन्ति।
द्वादशविभङ्गानाम् एकां एकां नदीं प्रति अष्टाविंशति-अष्टाविंशति सहस्राणि परिवारनद्यो भवन्ति।
सर्वाः परिवारनद्यः पिण्डीकृताः त्रिलक्ष षट्त्रिंशत्सहस्राः। समस्त विदेहस्थ सीतादि सर्वनदीनां परिवरनद्यः
चतुर्दशलक्षाणि। गंगादि षण्णां नदीनां एकत्रीकृताः सर्वाः परिवारनद्यः एकलक्षषण्णवति सहस्राणि।
नार्यादिशेषनदीनां चैकलक्ष षण्णवति सहस्राणि भवन्ति। चतुर्दशगंगादयः, द्वादशविभङ्गानद्यः, चतुःषष्टि
विदेहजा गंगादयः समस्तक्षेत्राणां नवतिमूलनद्यः। एताः एकत्रपिण्डीकृताः समस्तानद्यः जम्बूद्वीपे
सप्तदशलक्ष-द्विनवतिसहस्रनवति प्रमाः ज्ञातव्या। एतत्पञ्चभिर्गुणिताः नरलोके सर्वा नद्यः ८९६०४५०
भवन्ति॥

अर्थ: गंगा नदी की (पूर्व दिशा सम्बन्धी ढाई म्लेच्छ खण्डों से ग्रहण की हुई) १४००० परिवार नदियाँ और सिन्धु नदी की (पश्चिम ढाई म्लेच्छ खण्डों की) १४०००, परिवार नदियाँ हैं। रोहित् नदी की (पूर्व जघन्य भोगभूमि सम्बन्धी) २८००० और रोहितास्या की (पश्चिम जघन्य भोगभूमि सम्बन्धी) २८००० परिवार नदियाँ हैं। हरित् नदी की (पूर्व मध्यम भोगभूमि सम्बन्धी) ५६००० परिवार नदियाँ और हरिकान्ता नदी की (पश्चिम मध्यम भोगभूमि सम्बन्धी) ५६००० परिवार नदियाँ है। सीता महानदी की (उत्तरकुरु अर्थात् पूर्व उत्तम भोगभूमि सम्बन्धी) ८४००० और सीतोदा महानदी की (देवकुरु अर्थात् पश्चिम उत्तम भोग भूमि सम्बन्धी) ८४००० परिवार नदियाँ हैं। नारी नदी की ५६००० और नरकान्ता की ५६००० परिवार नदियाँ हैं। सुवर्णकूला की २८००० और रूप्यकूला की २८००० परिवार नदियाँ हैं। इसी प्रकार रक्ता नदी की १४००० हजार और रक्तोदा नदी की भी १४००० परिवार नदियाँ हैं। पूर्व पश्चिम विदेह में १२ विभङ्गा नदियाँ और (३२ क्षेत्र सम्बन्धी) ६४ गंगा-सिन्धु नदियाँ हैं। इनमें से १२ विभङ्गा को छोड़कर ६४ गंगा-सिन्धु नदियों में प्रत्येक की परिवार नदियाँ चौदह-चौदह हजार हैं तथा इन सब का एकत्रित योग कर लेने पर ६४ मूल नदियों की परिवार संख्या (१४००० × ६४) = ८९६००० अर्थात् आठ लाख ९६ हजार होती है। १२ विभङ्गा नदियों में से प्रत्येक की अट्ठाईस-अट्ठाईस हजार परिवार नदियाँ हैं। इन सब का एकत्रित योग करने पर (२८०००×१२)=३३६००० अर्थात् तीन लाख ३६ हजार होता है। इस प्रकार पूर्वापर विदेहस्थ सीता-सीतोदा की समस्त परिवार नदियाँ (८४००० + ८४००० + ८९६००० + ३३६०००) = १४००००० प्रमाण होती हैं अर्थात् सीता नदी की उत्तरकुरु की ८४०००+(६ विभङ्गा की) १६८०००+(पूर्व विदेह सम्बन्धी ३२ गंगासिन्धु की) ४४८०००+६ विभङ्गा+३२ गंगा+सिन्ध=७०००३८ परिवार नदियाँ सीता नदी की हैं और इसी प्रकार की ७०००३८ सहायक सीतोदा की हैं। जम्बूद्वीपस्थ ९० प्रमुख नदियों का चित्रण निम्नप्रकार है- इनमें से (३८+३८)=७६ तो मूल नदियाँ हैं और १४००००० सहायक हैं। गंगा, सिन्धु, रोहित्, रोहितास्या, हरित् और हरिकान्ता इन ६ मूल नदियों की परिवार नदियों का एकत्रित योग (१४००० + १४००० + २८००० + २८००० + ५६००० + ५६०००) = १९६००० अर्थात् एक लाख ९६ हजार होता है। इसी प्रकार नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा इन ६ मूल नदियों के परिवार का योग भी एक लाख ९६ हजार होता है। जम्बूद्वीप के समस्त क्षेत्रों की मूल नदियाँ ९० हैं। यथा-गंगादि महानदियाँ १४+विभंगा नदियाँ १२+ विदेहजगंगादि ६४=९०।


सर्वासां सरिता सन्ति रत्नसोपानपंक्तयः।
उभयोः पार्श्वयोर्नानाद्रुमवल्लीवनानि च ॥५६॥

जिनेन्द्रप्रतिमार्लद्वारतोरण भूषिताः।
द्विक्रोशप्रोन्नता दिव्या क्रोशांघ्रि व्यास वेदिका ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 56 से 57): समस्त नदियों में पंक्तिबद्ध रत्नों की सीढ़ियाँ हैं तथा सरिताओं के दोनों पार्श्वभागों में नाना प्रकार के वृक्षों एवं वल्लियों से युक्त वन हैं। इनके तोरणद्वार रत्नमय प्रतिमाओं से विभूषित हैं, और इनके दोनों पार्श्वभागों में दो कोस ऊँची और सवा कोस चौड़ी वेदिकाएँ हैं ॥५६-५७॥


अथास्ति विजयार्धाद्रिर्मध्येऽस्य भरतस्य च।
श्वेतरत्नमयस्तुङ्गः पञ्चविंशतियोजनैः ॥५८॥

पञ्चाशद्योजनैरेष विस्तृतो भूतले ततः।
उभयोः पार्श्वयोर्मुक्त्वा दशास्य योजनानि च ॥५९॥

दशयोजन विस्तीर्णे दक्षिणोत्तरसंज्ञिके।
पूर्वापराब्धि संलग्ने द्वे श्रेण्यौ भवतः शुभे ॥६०॥

पूर्वापराब्धिदीर्घोऽयं विद्येशपुर सौधभूत्।
त्रिंशद्योजनविस्तीर्णो ह्यत्र स्यात् सुन्दराकृतिः ॥६१॥

दशयोजन संख्यं खं त्यक्त्वा तोऽस्यद्वि पार्श्वयोः।
प्रागुक्तायाम विस्तारे श्रेण्यौद्वेस्तोऽपरे शुभे ॥६२॥

दशयोजन विस्तीर्णोऽत्रैषोऽमर पुराङ्कितः।
नवकूटाङ्कितोमूर्ध्नि त्यक्त्वाऽनुपञ्चयोजनात् ॥६३॥

निजोदय चतुर्थांशावगाहो राजतेऽचलः ।
खगेशवाचारणैः श्वेतमणिभिः शुक्लपुञ्जवत् ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 58 से 64): भरत क्षेत्र के ठीक मध्य में विजयार्ध नाम का एक श्वेतरत्नमय पर्वत है। जो पच्चीस योजन ऊँचा और भूतल पर ५० योजन चौड़ा है। यह ५० योजन की चौड़ाई १० योजन की ऊँचाई तक जाती है। इसके ऊपर (दक्षिणोत्तर) दोनों पार्श्वभागों में दस-दस योजन (की कटनी) छोड़कर १० योजन की ऊँचाई पर्यन्त ३० योजन चौड़ा है। इसी प्रथम कटनी पर १० योजन चौड़ी, पूर्व-पश्चिम समुद्र को स्पर्श करने वाली और दक्षिण-उत्तर नाम वाली दो शुभ श्रेणियाँ हैं। इन पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र पर्यन्त लम्बी उत्तर-दक्षिण दोनों श्रेणियों पर विद्याधरों के सुन्दर आकृति को धारण करने वाले महलों से युक्त नगर हैं। ३० योजन चौड़ाई में भी दोनों पार्श्वभागों में १०-१० योजन (की कटनी) छोड़कर पाँच योजन की ऊँचाई पर्यन्त केवल १० योजन चौड़ा जाता है। इस दूसरी कटनी पर पूर्वोक्त आयाम और विस्तार (१० योजन चौड़ी और पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक लम्बी) वाली अन्य दो श्रेणियाँ हैं, जो व्यन्तर देवों के नगरों से प्रलंकृत हैं। इन श्रेणियों से पाँच योजन ऊपर अर्थात् विजयार्ध का अग्रभाग नवकूटों से संयुक्त है। इस विजयार्ध पर्वत की नींव अपनी ऊँचाई (२५ योजन) का चतुर्थभाग अर्थात् ६ १/४ योजन प्रमाण है। श्वेत मणियों के साथ-साथ चारण ऋद्धिधारी मुनीश्वरों और विद्याधरों से व्याप्त यह विजयार्ध ऐसा शोभायमान होता है मानो शुक्लता का पुञ्ज ही हो ॥५८-६४॥


संत्यस्य दक्षिणश्रेण्यां पञ्चाशन्नगराणि च।
षष्टिरेवोत्तरश्रेण्यां रम्याणि व्योमगामिनाम् ॥६५॥

किन्नामनगरं किन्नरगीतं नरगीतकम्।
बहुकेतपुरं पुण्डरीकं सिंहध्वजाह्वयम् ॥६६॥

पुरं श्वेतध्वजाभिख्यं गरुडध्वज संज्ञकम्।
श्रीप्रभं श्रीधराख्यं च लोहार्गलमरिज्जयम् ॥६७॥

वैरार्गलं हि वैराख्यं विगतोर्जपुरं जयम्।
शकटाख्यं चतुर्वक्त्रं पुरं बहुमुखाभिधम् ॥६८॥

अरजं विरजाभिख्यं रथनूपुरनामकम्।
मेखलाग्रपुरं क्षेमवर्यं ततोऽपराजितम् ॥६९॥

पुरं कामपुराभिख्यं वियच्चर समाह्वयम्।
विजयादि चराख्यं च शक्ताभिधानकं पुरम् ॥७०॥

सञ्जयन्तं जयन्ताख्यं विजयं वैजयन्तकम्।
क्षेमाकरं सुचन्द्राभं सूर्याभासं पुरोत्तमम् ॥७१॥

चित्रकूटं महाकूटं हैमकूटं त्रिकूटकम्।
मेघकूटं विचित्रादिकूटं वैश्रवणाभिधम् ॥७२॥

सूर्यप्रभाह्वयं चन्द्रप्रभाभिधानकं पुरम्।
नित्य प्रद्योतसंज्ञं च नित्याभाख्यं पुरं ततः ॥७३॥

विमुखाख्य पुरं नित्यवाहिसंज्ञमिमान्यपि।
स्युः श्रेण्यां दक्षिणाख्यायां पञ्चाशात्सत् पुराणि च ॥७४॥

पुरं बसुपुराभिख्यमर्जुनं चारुणाभिधम्।
कैलासं वारुणं विद्युत्प्रभं किलिकिलित्पुरम् ॥७५॥

चूडामणिपुरं नामशशिप्रभपुरं ततः।
विशालं पुष्पचूलाख्यं हंसगर्भं बलाहकम् ॥७६॥

शिवङ्करं च श्री सौधं चमरं शिवमन्दिरम्।
वसुमतापुरी नाम्नी ततो वसुमतीपुरी ॥७७॥

सिद्धार्थनगरी शत्रुञ्जयाभिधानिकापुरी।
केतुमालेन्द्रकान्ता गगनानन्दिशोकिका ॥७८॥

विशोकावीतशोकाख्या चालका तिलकापुरी।
अपूर्वतिलका नाम्नी पुरी मन्दिरसंज्ञिका ॥७९॥

कुमुदाख्यंपुरं कुन्दपुरं गगनवल्लभम्।
दिव्यादि तिलकं पृथ्वी तिलकाख्यं पुरं ततः ॥८०॥

गन्धर्वाख्यं पुरर्मुक्ताहारं च नैमिषाह्वयम्।
अग्निजालं महाजालं श्रीनिकेतं जयाह्वयम् ॥८१॥

श्रीगृहं मणिवज्राख्यं भद्राश्वं च धनञ्जयम्।
गोक्षीरफेनमक्षोभं शैलशेखरसंज्ञकम् ॥८२॥

पृथ्वीधरं पुरं दुर्गं दुर्धराख्यं सुदर्शनम्।
पुरं महेन्द्रसंज्ञं विजयं सुगन्धिनामकम् ॥८३॥

पुरं वैराधनामाथरत्नाकराह्वयम् पुरम्।
ततो रत्नपुरम् चेमानि पुराणि खगामिनाम् ॥८४॥

षष्टिः स्युरुत्तरश्रेण्यां शाश्वतानि शुभानि च।
पश्चिमां दिशामारभ्य स्वःपुरा भान्यनुक्रमात् ॥८५॥

पुराणिदक्षिणश्रेण्यां प्रागुक्तानि भवन्ति वै।
पंचाशत् पूर्वदिग्भागमादिं कृत्वा क्रमेण च ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 65 से 86): (भरतैरावत सम्बन्धी विजयार्धों की पूर्व पश्चिम लम्बाई में) दक्षिण श्रेणी पर विद्याधरों के रमणीक ५० नगर और उत्तर श्रेणी पर ६० नगर हैं। पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर दक्षिण श्रेणीगत ५० नगरों के नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-१ किन्नाम, २ किन्नरगति, ३ नरगीत, ४ बहुकेतपुर, ५ पुण्डरीक, ६ सिंहध्वज, ७ श्वेतध्वज, ८ गरुड़ध्वज, ९ श्रीप्रभ, १० श्रीधर, ११ लोहार्गल, १२ अरिञ्जय, १३ वैरागल, १४ वैराख्य, १५ विगतोज्जपुर, १६ जय, १७ शकट, १८ चतुर्वक्र, १९ बहुमुख, २० अरजा, २१ विरजा, २२ रथनूपुर, २३ मेखलाग्रपुर, २४ क्षेमवर्य, २५ अपराजित, २६ कामपुर, २७ वियच्चर (गगनचर), २८ विजयचर, २९ शक्तपुर, ३० सञ्जयन्त, ३१ जयन्तपुर, ३२ विजय, ३३ वैजयन्त, ३४ क्षेमङ्कर, ३५ चन्द्राभ. ३६ सूर्याभा, ३७ पुरोत्तम, ३८ चित्रकूट, ३९ महाकूट, ४० हैमकूट, ४१ त्रिकूट, ४२ मेघकूट, ४३ विचित्रकूट, ४४ वैश्रवणकूट, ४५ सूर्यप्रभ, ४६ चन्द्रप्रभ, ४७ नित्यप्रद्योत, ४८ नित्याभा, ४९ विमुख और अन्तिम ५० नित्यवाहनी नाम वाले ५० नगर दक्षिण श्रेणी पर हैं। उत्तर दिशा में पश्चिम श्रेणी से प्रारम्भ कर क्रमशः १ वसुपुर, २ अर्जुन, ३ अरुण, ४ कैलाश, ५ वारुणपुर, ६ विद्युत्प्रभ, ७ किलिकिलितपुर, ८ चूड़ामणि, ९ शशिप्रभ, १० विशालपुर, ११ पुष्पचूल, १२ हंसगर्भपुर, १३ बलाहकपुर, १४ शिवङ्कर, १५ श्री सौधपुर, १६ चमरपुर, १७ शिव मन्दिर, १८ वसुमत्ता, १९ वसुमति, २० सिद्धार्थनगरी, २१ शत्रुञ्जयपुरी, २२ केतुमाल, २३ इन्द्रकान्तपुर, २४ गगननन्दिनी, २५ अशोकापुर, २६ विशोकापुर, २७ वीतशोकापुरी, २८ अलकापुरी, २९ तिलकापुरी, ३० अपूर्वतिलकापुरी, ३१ मन्दरपुरी, ३२ कुमुदपुर, ३३ कुन्दपुर, ३४ गगनवल्लभ, ३५ दिव्यतिलक, ३६ पृथ्वीतिलक, ३७ गन्धर्वपुर, ३८ मुक्ताहारपुर, ३९ नैमिषपुर, ४० अग्निजालपुर, ४१ महाजालपुर, ४२ श्रीनिकेतनपुर, ४३ जयावहपुर, ४४ श्रीवासपुर, ४५ मणिवज्रपुर, ४६ भद्राश्वपुर, ४७ धनञ्जयपुर, ४८ गोक्षीरफेनपुर, ४९ प्रक्षोभपुर, ५० शैलशेखरपुर, ५१ पृथ्वीधरपुर, ५२ दुर्गपुर, ५३ दुर्धरनगर, ५४ सुदर्शननगर, ५५ महेन्द्रपुर, ५६ विजयपुर, ५७ सुगन्धिनीनगर, ५८ वैराधपुर, ५९ रत्नाकरपुर और अन्तिम ६० रत्नाकर नाम वाले ६० नगर हैं। ये विद्याधरों के समस्त नगर रत्नमय हैं। पश्चिम दिशा से प्रारम्भ कर क्रमशः श्रेणीबद्ध उत्तर श्रेणी के ये ६० नगर शाश्वत, शुभ नाम वाले और स्वर्गपुरी की शोभा को धारण करने वाले हैं, इसी प्रकार पूर्व दिशा से प्रारम्भ कर क्रमशः पूर्व कहे हुए दक्षिण श्रेणी के ५० नगर हैं ॥६५-८६॥


दण्डैकैकान्तरास्तिस्रो जलान्ताः खातिकाः शुभाः।
प्रत्येकं नगराणां स्युर्मणिस्वर्णैष्टकाचिताः ॥८७॥

स्याच्चतुस्तरखातानां तासामन्तर्महीतले।
चतुर्दण्डान्तरो रम्यो हेमरत्नेष्टकामयः ॥८८॥

मुरजैः कपिशीर्षैश्च विरचिताग्रः पुराणि च।
परितः शाश्वतस्तुङ्गः आकारो हि पृथक् पृथक् ॥८९॥

विष्कम्भचतुरस्राः स्युः शालाट्टलक पंक्तयः।
त्रिंशच्चापान्तरास्तुङ्गा नानारत्नादि चित्रिताः ॥९०॥

उत्सेधसदृशारोहसोपानाश्चारूमूर्तयः।
द्वयोरट्टालयोर्मध्ये रत्नतोरणभूषितम् ॥९१॥

पञ्चाशद्धनुरुत्सेधं गोपुरं विस्तृतं महत्।
पञ्चविंशति दण्डैश्च कपाटयुगलाङ्कितम् ॥९२॥

इत्यादि रचनाढ्यानि पूर्वमुखस्थितानि च।
दक्षिणोत्तर दीर्घाणि योजनैर्द्वादश प्रमैः ॥९३॥

पूर्वापरेण विस्तारान्वितानि नवयोजनैः।
स्वः पुराणीव राजन्तेऽत्राखिलानि पुराण्यपि ॥९४॥

सहस्रगोपुरैः मार्गैः सहस्रद्वादशप्रमैः।
शतपंचलघुद्वारैः सहस्रैकचतुःपथैः ॥९५॥

कोटिग्रामाभवन्त्यत्रनगरं प्रतिशाश्वताः।
बहुखेटमटंवाद्या निवेशाश्च मनोहराः ॥९६॥

नगरादिषु सर्वेषु जिनसिद्धालयाः शुभाः ।
वनोपवन वाप्याद्याः स्युस्तुङ्गसौधपंक्तयः ॥९७॥

प्रागर्जितमहापुण्याविद्येशाश्चारुलक्षणाः ।
धर्मार्थादि विधातारो वसन्ति रत्नधामसु ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 87 से 98): [विजयार्ध पर्वत की प्रथम श्रेणी विद्याधरों के (६०+५०)=११० नगरों से व्याप्त है] प्रत्येक नगर के चारों ओर मणियों से खचित स्वर्ण की ईंटों से बनी हुई तथा जल से भरी हुई, एक-एक धनुष के अन्तराल से तीन शुभ परिखाएँ (खाई) हैं। उन चारों परिखाओं के अन्दर भूमितल पर चार धनुष के अन्तर से जिनके शीर्ष पर वुरज व कंगूरे हैं ऐसे स्वर्ण व रत्नमयी ईंटों से बने हुए पुर हैं। जिनके चारों ओर शाश्वत उत्तुङ्ग, मेडियों की पंक्तियों सहित चार धनुष चौड़े पृथक्-पृथक् आकार हैं। तीस धनुष अन्तराल से उत्तुङ्ग, नाना रत्नों से खचित उत्सेध के सदृश चढ़ने के लिए सुन्दर आकार वाली (सोपान) सीढ़ियाँ हैं। दो-दो छज्जों के बीच में रत्न के तोरणों से विभूषित, कपाट युगलों से अलंकृत, ५० धनुष ऊँचे और २५ धनुष विस्तृत गोपुरद्वार हैं। इन सब को आदि लेकर और अनेक प्रकार की रचनाओं से युक्त तथा पूर्व दिशा की ओर हैं मुख जिनके ऐसे दक्षिणोत्तर बारह योजन लम्बे और पूर्व पश्चिम ९ योजन चौड़े समस्त नगर स्वर्गपुरी के सदृश शोभायमान होते हैं। यहाँ के प्रत्येक नगर एक हजार गोपुर द्वारों से, पाँच सौ लघु द्वारों से, एक हजार चतुःपथों, बारह हजार मार्गों, करोड़ों ग्राम, बहुखेट एवं मटंब आदि की रचनाओं से मनोहर हैं। यहाँ के समस्त नगरों में जिनेन्द्र भगवान् एवं सिद्ध भगवान् के शुभ मन्दिर हैं तथा वन, उपवन, वापी आदि एवं ऊँचे ऊँचे महलों की पंक्तियाँ हैं। पूर्वोपार्जित महान् पुण्योदय से सुन्दर लक्षणों से युक्त विद्याधर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थों को करते हुए यहाँ रत्नों के महलों में रहते हैं ॥८७-९८॥


द्वितीयमेखलायां चाचलस्योभयपार्श्वयोः ।
प्रतोली वेदिकाढ्यानि जिनालयान्वितानि च॥९९॥

कल्पद्रुमादियुक्तानि पुराणि सन्त्यनेकशः ।
सौधर्मेशानयोराभियोगिकानां सुधाभुजाम् ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 99 से 100): विजयार्ध पर्वत की द्वितीय श्रेणी के दोनों पार्श्व भागों में प्रतोली और वेदिका आदि से सहित, जिनालयों से समन्वित तथा कल्पवृक्षों से युक्त अनेक नगर हैं। जिनमें सौधर्म ईशान इन्द्रों के आभियोग (वाहन) जाति के देव निवास करते हैं ॥९९-१००॥


शिखरेऽस्यातिरम्याणि नवकूटान्यमून्यपि।
सिद्धायतनकूटं च दक्षिणार्धक नामकम् ॥१०१॥

कूटं खण्डप्रपाताख्यं पूर्णभद्रसमाह्वयं।
विजयार्धाभिधं माणिभद्रं तिमिस्रसंज्ञकम् ॥१०२॥

उत्तरार्धाख्यकं वैश्रवणं कूटान्यमून्यपि।
नवोन्नतानि सक्रोशयोजनैः षट्प्रमाणकैः ॥१०३॥

मूलेऽमीषां च गव्यूत्यग्रषड्योजन सम्मिताः।
मध्येसार्धद्वि गव्यूत्यग्रचतुर्योजनप्रमः ॥१०४॥

वयासोस्ति नवकूटानामूर्ध्नि त्रियोजनप्रमः।
आदौ च परिधिविंशतियोजनैश्चसम्मिता ॥१०५॥

मध्येतुल्या च किञ्चिन्न्यूनपञ्चदशयोजनैः।
मस्तके योजनानां सविशेषा नवसंख्यकाः ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 101 से 106): विजयार्ध पर्वत के शिखर पर अत्यन्त रमणीक नौ कूट हैं। उनमें सब कूटों के (पूर्व दिशा की ओर से) प्रथम सिद्धायतन कूट, २ दक्षिणार्ध (भरत) कूट, ३ खण्डप्रपात, ४ पूर्णभद्र, ५ विजयार्धकूट, ६ माणिभद्र, ७ तिमिश्र, ८ उत्तरार्ध (भरत) कूट और (पश्चिम दिशा के अन्त में ९ वैश्रवण नाम का कूट है। ये सभी कूट ६ १/४ योजन ऊँचे, मूल में ६ १/४ योजन, मध्य में अढ़ाई कोस सहित ४ योजन और शिखर पर तीन योजन प्रमाण चौड़े (एवं लम्बे) हैं। इन नव कूटों की प्रथम परिधि (कुछ कम) बीस योजन प्रमाण, मध्यम परिधि कुछ कम पन्द्रह योजन प्रमाण और मस्तक पर कुछ अधिक नौ योजन प्रमाण मानी गई है ॥१०१-१०६॥


सिद्धायतन कूट का वर्णन


क्रोशायामो जिनेन्द्राणां क्रोशार्धविस्तरान्वितः।
चैत्यालयश्चपादोनक्रोशोत्तुङ्गः स्फुरत्प्रभः ॥१०७॥

मणिस्वर्णमयेबिम्बैर्दिव्योपकरणैः परैः।
प्राकारतोरणैर्नाना मण्डपाद्यैरलंकृतः ॥१०८॥

सङ्गीतनाट्यशालाभिषेकक्रीडनसद्गृहैः।
मणिमुक्ताफलस्वर्णमालाजालेश्चशोभितः ॥१०९॥

वनोपवनकेत्वाद्यैर्मङ्गलद्रव्यभूतिभिः।
भासमानोऽस्ति सिद्धायतन कूटोमनोहरः ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 107 से 110): विजयार्ध पर्वत के अग्रभाग पर पूर्व दिशा की ओर जिनेन्द्र भगवान का सिद्धायतन नाम का एक चैत्यालय है। जो देदीप्यमान प्रभा से युक्त, एक कोस लम्बा, अर्ध कोस चौड़ा और ३/४ (पौन) कोस ऊँचा है। वह मन को मोहित करने वाला सिद्धायतन कूट मणि एवं स्वर्ण बिम्बों से समन्वित, कोट, नाना प्रकार के तोरण द्वार तथा मण्डप आदि से अलंकृत, संगीतशाला, नाट्यशाला, अभिषेक गृह एवं उत्तम क्रीड़ागृह आदि से व्याप्त, मणियों, मुक्ताफलों और स्वर्ण मालाओं के समूहों से सुशोभित वन, उपवन आदि से वेष्टित और ध्वजा आदि मंगलद्रव्य रूपी विभूति से भासमान है ॥१०७-११०॥


अवशेष कूटों के स्वामी


शेष कूटस्थसौधेषु वसन्ति व्यन्तरामराः।
स्व-स्वकूटोत्थ नामाढ्या विशेषेषु दीप्तिशालिषु ॥१११॥

अर्थ: अवशेष समस्त कूटों पर स्थित अपनी दीप्ति से मनोहर भवनों में अपने-अपने कूटों के सदृश नाम वाले व्यन्तर देव रहते हैं ॥१११॥


विजयार्ध सम्बन्धी वनों का विवेचन चार श्लोकों द्वारा करते हैं


वनं द्विक्रोशविस्तीर्णं नानाद्रुमङ्कितं महत्।
पूर्वापराब्धिपर्यन्तं स्यादस्योभयपार्श्वयोः ॥११२॥

द्विक्रोशोन्नतापञ्चशतचापसुविस्तृता ।
बहुतोरणयुक्तात्र दीप्तास्तिवनवेदिका ॥११३॥

वनमध्येपुराणि स्युर्व्यन्तराणां महान्ति च।
सप्तभूमियुतोत्तुङ्गं रत्नधामाङ्कितान्यपि ॥११४॥

चैत्यालययुतान्युच्चैः शालाद्यलंकृतानि वै।
इत्येषा वर्णनात्रैरावतरूप्याचले भवेत् ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 112 से 115): विजयार्ध पर्वत के दोनों पार्श्व भागों में पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्रपर्यन्त अर्थात् पर्वतों के बराबर ही लम्बे, दो कोस चौड़े और नाना प्रकार के वृक्षों से संयुक्त महान् वन हैं। ये दोनों वन दो कोस ऊँची, ५०० धनुष चौड़ी, नाना तोरणों से युक्त और प्रकाशमान वनवेदिका से विभूषित हैं। उन वनों के मध्य में सात तलों वाले, उत्तुंग, रत्नमय गृहों से व्याप्त, चैत्यालयों से विभूषित और ऊँचे-ऊँचे कोटों आदि से अलंकृत व्यन्तर देवों के श्रेष्ठ नगर हैं। जैसा वर्णन भरतक्षेत्र स्थित विजयार्ध का किया गया है वैसा ही ऐरावत क्षेत्र में स्थित विजयार्ध पर्वत का जानना चाहिए ॥११२-११५॥


भरत क्षेत्र के छह खण्ड और आर्यों के स्वरूप का अवधारण करते हैं


अखिलं भारतं क्षेत्रं षट्खण्डीकृतमादिमम्।
गङ्गासिन्धुनदीभ्यां स्याद्विजयार्धचलेन च ॥११६॥

रूप्याद्रेर्दक्षिणे भागेह्युत्तरे लवणाम्बुधेः।
गङ्गासिन्धुर्द्वयोर्मध्येऽस्त्यार्य खण्डं शुभाकरम् ॥११७॥

यत्रार्याः स्वर्गमोक्षादीन् साधयन्तितपोबलात्।
स्वर्मुक्तिश्रीसुखाधारमार्यखण्डं तदुत्तमम् ॥११८॥

अर्थ (श्लोक 116 से 118): विजयार्ध पर्वत और गंगा-सिन्धु इन दो नदियों के द्वारा समस्त भरतक्षेत्र के छह खण्ड होते हैं। इनमें विजयार्ध के दक्षिण में, लवण-समुद्र के उत्तर में और गंगा-सिन्धु इन दोनों नदियों के मध्य में शुभ क्रियाओं का आकर आर्यखण्ड है। स्वर्ग-लक्ष्मी और मुक्ति-लक्ष्मी के सुख का आधार यह उत्तम आर्यखण्ड ही है, अतः यहाँ आर्य जन अपने तपोबल से स्वर्ग और मोक्ष का साधन करते हैं ॥११६-११८॥


तस्यपूर्वे परे भागे भरतार्धेऽचलोत्तरे।
स्युः पञ्चम्लेच्छखण्डानि धर्माचारातिगानि च ॥११९॥

धर्मकर्मबहिर्भूता म्लेच्छानीचकुलान्विताः।
वसन्तिविषयासक्तास्तेषुदुर्गतिगामिनः ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 119 से 120): आर्य खण्ड के पूर्व-पश्चिम भाग में, अर्ध भरत क्षेत्र में विजयार्ध की उत्तर दिशा में धर्म आचरण से रहित पाँच म्लेच्छखण्ड हैं। जिनमें धर्म, कर्म से बहिर्भूत, नीचकुल से समन्वित, विषयासक्त और दुर्गति जाने वाले म्लेच्छ जीव रहते हैं ॥११९-१२०॥


आर्यखण्डस्थ मध्ये स्याद्गङ्गासिन्ध्वोस्तदन्तरे।
अयोध्यानगरी चक्रवर्ति भोग्या परा भवेत् ॥१२१॥

अयोध्यालवणाम्बुध्योर्मध्येऽर्धचन्द्रसन्निभः।
नानाजलचराकीर्णोपसमुद्रोस्ति चोर्मिभाक् ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 121 से 122): गंगा-सिन्धु नदियों के अन्तराल में आर्यखण्ड है और आर्यखण्ड के मध्य में चक्रवर्ती राजाओं के द्वारा भोग्य श्रेष्ठ अयोध्या नगरी है तथा अयोध्या और लवणसमुद्र के मध्य में नाना प्रकार के जलचर जीवों से आकीर्ण और कल्लोल मालाओं से व्याप्त अर्धचन्द्र के सदृश एक उपसमुद्र है ॥१२१-१२२॥


उत्तरे भारते क्षेत्रे म्लेच्छखण्डे च मध्यमे।
योजनानां शतोत्सेधो मूलेशतैकविस्तृतः ॥१२३॥

विस्तीर्णो मध्यभागे स्यात् पञ्चसप्ततियोजनैः।
पञ्चाशद्योजनव्यासो मस्तके शाश्वतो महान् ॥१२४॥

गतचक्रेशनामौधैश्चितो जिनालयाङ्कितः।
वनतोरणसद्वेदी नानाभवन भूषितः ॥१२५॥

वृत्ताकारो हि चक्रेशगर्वहृद् वृषभाचलः।
ऐरावतेऽप्ययं ज्ञेय ईदृशोऽद्रिः स्फुरत्प्रभः ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): उत्तरभरतक्षेत्रस्थ मध्यम म्लेच्छ खण्ड के मध्य में चक्रवर्तियों के मान को मर्दन करने वाला वृत्ताकार एक वृषभाचल पर्वत है। जो १०० योजन ऊँचा, मूल में १०० योजन विस्तृत, मध्य में ७५ योजन विस्तृत और शिखर पर ५० योजन विस्तृत तथा भूतकालीन चक्रवर्तियों के नाम समूह से व्याप्त, जिनालय से अलंकृत, वन, तोरणद्वार, उत्तम वेदी एवं अनेक भवनों से विभूषित, अकृत्रिम और महान् है ॥१२३-१२६॥


हिमवन्तमथोल्लङ्घ्य क्षेत्रं हैमवताह्वयम्।
दशाधाकल्पवृक्षाढ्यं जघन्यं भोगभूतलम् ॥१२७॥

मद्यवाद्यान्नदीपांगा वस्त्रभाजनदामदाः।
ज्योतिर्भूषागृहांगाश्चदशधाकल्पशाखिनः ॥१२८॥

पात्रदानफलेनैते तत्रोत्पन्नार्यदेहिनाम्।
ददतेदशधाभोगान् सारान्सङ्कल्पितान्वरान् ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 127 से 129): हिमवान् पर्वत का उल्लंघन करने पर हैमवत नाम का क्षेत्र प्राप्त होता है, जिसमें शाश्वत जघन्य भोगभूमि है। जिसका भूमितल निरन्तर दस प्रकार के कल्पवृक्षों से व्याप्त रहता है। पात्र दान के फल से जो जीव यहाँ उत्पन्न होते हैं, उन आर्यों को १ मद्य (पानांग), २ वाद्य (तूर्यांग), ३ अन्न (आहारांग), ४ दीपांग, ५ वस्त्रांग, ६ भाजन (पात्रांग), ७ दाम (पुष्पांग), ८ ज्योतिरांग, ९ भूषणांग और १० गृहांग ये दस प्रकार के कल्पवृक्ष संकल्प मात्र से दस प्रकार के उत्तम भोग देते हैं ॥१२७-१२९॥


शब्दवान् प्रथमो नाभिगिरिर्विकृतिवांस्ततः।
गन्धवान् माल्यवानेते चत्वारो नाभिपर्वताः ॥१३०॥

सहस्रयोजनोत्सेधावृत्ताः सर्वत्र सन्निभाः।
सहस्रयोजनव्यासावनवेद्यादिभूषिताः ॥१३१॥

प्रत्येकं मूर्ध्निचैतेषांजिनेन्द्रभवनाङ्कितम्।
सप्तभूम्युन्नतैः सौधैर्वनवेदीसुतोरणैः ॥१३२॥

युतं स्यान्नगरं रम्यं व्यन्तराणां च शाश्वतम्।
क्षेत्रे हैमवते शब्दवानाद्यो नाभिपर्वतः ॥१३३॥

शब्दवान्नाभिशैलाग्र पुरे राजामरार्चितः।
स्वातिनामाऽमरोमान्यः पल्यैकायुष्कऊर्जितः ॥१३४॥

स्याद्धरिक्षेत्रमध्येविकृतिवान्नाभिसद्गिरिः।
तदद्रिस्थपुरेराजारुणप्रभामरोमहान् ॥१३५॥

रम्यकक्षेत्रमध्येस्याद्गन्धवान्नाभिपर्वतः।
तन्मूर्धस्थपुरेभूपः पद्मप्रभाह्वयः सुरः ॥१३६॥

स्याद्धैरण्यवतेवर्षैशैलो नाम्ना हि माल्यवान्।
तदग्रस्थपुरे स्वामी प्रभासाख्योऽमरोऽद्भुतः ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 130 से 137): (शरीर के मध्य नाभि के सदृश जो पर्वत क्षेत्र के ठीक मध्य में स्थित रहते हैं उन्हें नाभिगिरि कहते हैं)। शब्दवान्, विकृतिवान्, गन्धवान् और माल्यवान् ये चार नाभि पर्वत हैं। वन एवं वेदी आदि से विभूषित ये वृत्ताकार (गोल) पर्वत १००० योजन ऊँचे और १००० योजन चौड़े हैं। प्रत्येक नाभि पर्वतों के शिखर पर व्यन्तर देवों के वन वेदी से वेष्टित, उत्तम तोरणों से युक्त, अत्यन्त रमणीक एवं शाश्वत नगर हैं, जो जिन चैत्यालयों से अलंकृत और सात तल ऊँचे श्रेष्ठ भवनों से युक्त हैं। हैमवत क्षेत्र के मध्य में प्रथम शब्दवान् नाम का नाभिपर्वत स्थित है। उस शब्दवान् नाभिपर्वत के शिखर पर स्थित नगर का राजा (हजारों) देवों से पूजित और एक पल्य की उत्कृष्ट आयु वाला स्वाति नाम का देव है। हरिक्षेत्र के मध्य में विकृति (विजटा) वान् नाभिगिरि अवस्थित है, जिसके शिखर पर स्थित नगर का राजा अरुणप्रभ नाम का श्रेष्ठ देव है। रम्यक क्षेत्र के मध्य में गन्धवान् नाम का नाभिगिरि पर्वत है, जिसके शिखर पर स्थित नगर का राजा पद्मप्रभ नाम का देव है। इसी प्रकार हैरण्यवत क्षेत्र के मध्य में स्थित माल्यवान् नाभिगिरि है जिसके शिखर पर स्थित नगर का स्वामी प्रभास नाम का अद्भुत बलशाली देव है ॥१३०-१३७॥


ततोमहाहिमाद्रिं चोल्लङ्घ्यकल्पद्रुमाश्रितम्।
तृतीयं हरिसत्क्षेत्रां मध्यमं भोग-भूतलम् ॥१३८॥

अर्थ: महाहिमवान् पर्वत के बाद जो हरि नाम का तृतीय क्षेत्र है, उसमें शाश्वत मध्यम भोगभूमि है और उसकी भूमि निरन्तर कल्पवृक्षों को आश्रय देती है। अर्थात् कल्पवृक्षों से व्याप्त रहती है ॥१३८॥


एते सद्भरतादयोत्र विधिना वर्षास्त्रयो वर्णिताः,
व्यासाद्यैश्च यथा तथा बुधजनैरेरावताद्यास्त्रयः।
ज्ञेयाः कर्मसुभोगभूमिकलिता आर्येतराद्यैश्चिताः,
पुण्यापुण्यफलप्रदाबहुविधाः सर्वज्ञदृग् गोचराः ॥१३९॥

अर्थ: इस प्रकार सर्वज्ञ प्रभु के ज्ञानगोचर होने वाले भरत आदि तीन क्षेत्रों के व्यास आदि का उपयुक्त विधि के अनुसार जैसा वर्णन किया है वैसा ही ज्ञानीजनों के द्वारा ऐरावत आदि तीन क्षेत्रों का भी जान लेना चाहिए। अनेक प्रकार के पुण्य और पाप के फल को प्रदान करने वालीं ये कर्मभूमियाँ एवं भोगभूमियाँ आर्य जनों से एवं अन्य जनों से निरन्तर व्याप्त रहतीं हैं ॥१३९॥


अधिकारान्त मङ्गलाचरण


सर्वज्ञान् श्रीगणेशान् श्रुतसकलकृतः संयतान्विश्ववन्द्यान्,
पञ्चाचारादि भूषांस्त्रिभुवनमहितान् पाठकान् ज्ञातविश्वान्।
प्राप्तान्सर्वाङ्गपारं त्रिकसमयसुयोगोग्रदीप्तादि सर्वैः,
सारैर्युक्तांस्तपोभिस्तदसमगुणसिद्धयै च साधून् नमामि ॥१४०॥

अर्थ: विश्ववन्दनीय सर्व अरहन्तों को, द्वादशांग की रचना करने वाले गणधर देवों को, संयम एवं पञ्चाचार से विभूषित जगत् पूज्य आचार्यों को, द्वादशांग के पार पहुँचकर प्राप्त किया है समस्त तत्त्वों का ज्ञान जिन्होंने, ऐसे उपाध्यायों को तथा तीनों समयों (ऋतुओं) में उत्तम आतापन आदि योगों एवं उग्र और दीप्त आदि सारभूत सर्व तपों को धारण करने वाले साधु परमेष्ठियों को मैं उन अनुपम गुणों की सिद्धि के लिये नमस्कार करता हूँ ॥१४०॥

षष्ठ अधिकार विदेहक्षेत्र वर्णन

विदेहस्थान् जिनेन्द्रादीन् प्रणम्य परमेष्ठिनः।
तन्मूर्त्यादींश्च वक्ष्येऽहं विदेहक्षेत्रमुत्तमम् ॥१॥

अर्थ: विदेह क्षेत्रों में स्थित विद्यमान तीर्थंकरों को, उन [अर्हन्तों] की प्रतिमाओं को तथा पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार करके मैं उत्तम विदेह क्षेत्र को कहूँगा अर्थात् विदेह क्षेत्र का विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा ॥१॥


तस्यमध्ये महामेरुः सुदर्शनाह्वयोमहान्।
नवाधिकनवत्या चोच्छ्रितःसहस्त्रयोजनैः ॥२॥

योजनानां सहस्त्रैककन्दस्त्रिक्षण ऊर्जितः।
विचित्राकारसंस्थानोनाभिवद्भाति सुन्दरम् ॥३॥

सहस्त्रयोजनैर्वज्रमयश्चित्राधरान्तगः ।
नानारत्नमयो मध्ये स्यादेकषष्टिसम्मितैः ॥४॥

सहस्त्रयोजनेश्चाग्रेशातकुम्भमयोगिरिः ।
नित्यो दीप्तोयमन्त्राष्टत्रिंशत्सहस्त्रयोजनैः ॥५॥

अर्थ (श्लोक 2 से 5): विदेह क्षेत्र के मध्य में सुदर्शन नाम का एक श्रेष्ठ महामेरु है, जो ९९००० योजन ऊँचा, १००० योजन की जड़ वाला, अनादिनिधन, श्रेष्ठ, सुन्दर और नानाप्रकार के आकारों से युक्त तथा जम्बूद्वीप की नाभि के सदृश शोभायमान होता है। यह सुमेरु पर्वत चित्रा पृथ्वी के अन्त पर्यन्त अर्थात् मूल में एक हजार योजन प्रमाण वज्रमय, मध्य में इकसठ हजार योजन पर्यन्त अनेकों रत्नमय और अग्रभाग में ३८००० योजन पर्यन्त देदीप्यमान स्वर्णमय एवं अकृत्रिम है ॥२-५॥


अथेन्द्रस्यैरावतदन्तिनः किञ्चिद् वर्णनं करोमिः


जम्बूद्वीपप्रमाणाङ्गं, वृत्ताकारं शंखेन्दु कुन्दधवलं नानाभरणघण्टाकिंकिणी तारिकाहेमकक्षादि भूषितं
कामगं कामरूपधारिणं महोन्नतं ऐरावतगजेन्द्रं नागदत्ताख्याभियोग्येशो वाहनामरो विकरोति। तस्यदन्तिनः
बहुवर्णा, विचित्रतानि रम्याणि द्वात्रिंशद्वदनानि १एकैकस्मिन् वदने मृदुस्थूलायता अष्टौदन्ताः स्युः।
एकैकस्मिन् दन्ते एकैकं चलत्कल्लोलरम्यं सरोवरं स्यात्। एकैकस्मिन्सरसि एकैका कमलिनी भवति।
एकैकस्याः कमलिन्या एकैकस्मिन् दिग्भागे मणिवेदिकाङ्कितं एकैकं तोरणं भवेत्। प्रफुल्लद्द्वात्रिंशत्कमलानि
च सन्ति। एकैकस्मिन् कमले एकैकयोजन सुगन्ध्यायतानि द्वात्रिंशन्मनोहर पत्राणि स्युः। एकैकस्मिन् पत्रे
दिव्यररूपाः सरसा द्वात्रिंशन्नाटिकाः स्युः। एकस्मिन्नेकस्मिन् प्रत्येकं नाटके दिव्यररूपा द्वात्रिंशत्सुरनर्तक्यो


ऐरावतो हि शक्रस्य कीदृशो भवति प्रभो।
लक्षयोजनप्रोतुङ्गो विस्तरोपि तथा भवेत् ॥६॥

अर्थ: सुमेरुपर्वत की चारों दिशाओं में भद्रशाल वन है जिसमें उत्कृष्ट चार जिनालय हैं, अब मैं (आचार्य) उन जिनालयों का प्रसन्नतापूर्वक वर्णन करता हूँ ॥६॥


द्वात्रिंशद्वदनान्यस्य दन्ता अष्टौ मुखं प्रति।
दन्तं प्रतिसरश्चैकं नलिन्यैकासरंप्रति ॥७॥

अर्थ (श्लोक 1 से 7): अब इन्द्र के ऐरावत हाथी का संक्षिप्त वर्णन करते हैं- आभियोग्य देवों का अधिपति नागदत्त नामक वाहन जाति का देव जम्बूद्वीप प्रमाण अर्थात् एक लाख योजन प्रमाण गोल देह की विक्रिया करके इन्द्र का ऐरावत हाथी बनता है। जो शंख, चन्द्र और कुन्द पुष्प के समान धवल अलंकारों, घण्टा, किंकिणी, तारिकाओं (धवल बिन्दुओं) एवं स्वर्ण कक्षा अर्थात् हाथी के पेट पर बाँधने की रस्सी आदि से विभूषित, अत्यन्त सुन्दर, विक्रियारूप को धारण करने वाला तथा महा उन्नत होता है। उस हाथी के अनेक वर्णों से युक्त रमणीक बत्तीस मुख होते हैं। एक-एक मुख में कोमल, मोटे और लम्बे आठ-आठ दाँत होते हैं। (३२ मुखx८= २५६ दाँत हुए)। एक-एक दाँत पर उठती हुई कल्लोलों से रमणीक एक-एक सरोवर होता है। (२५६ सरोवर हुए)। एक एक सरोवर में एक एक कमलिनी होती है। एक एक कमलिनी पर एक-एक दिशा में मणियों की वेदिकाओं से अलंकृत एक एक तोरण होता है, प्रत्येक कमलिनी के साथ प्रफुल्लित रहने वाले बत्तीस बत्तीस कमल होते हैं (२५६x३२=८१९२ कमल होंगे)। एक-एक कमल में एक एक योजन पर्यन्त सुगन्ध फैलाने वाले बत्तीस बत्तीस पत्र होते हैं-(८ १९२ कमल x३२=२६२१४४ पत्र हुए)। एक-एक पत्र पर दिव्य रूप को धारण करने वाले अतिमनोज्ञ बत्तीस नाटक (नाट्यशाला) होते हैं (२६२१४४x३२= ८३८८६०८) और एक-एक नाट्यशालाओं में दिव्यरूप को धारण करने वाली बत्तीस-बत्तीस अप्सराएँ नृत्य करती हैं (८३८८६०८ × ३२ = २६८४३५४५६ अप्सराएँ)। जो अनेक प्रकार की विक्रिया धारण करके मृदंग आदि वादियों द्वारा, नाना प्रकार के चरण विन्यास द्वारा, हाथ रूपी पल्लवों द्वारा और कटितट आदि की लय के द्वारा आनन्द पूर्वक नृत्य करती हैं। ये समस्त सत्ताईस करोड़ अप्सराएँ, आठ महादेवियाँ और एक लाख बल्लभिकाएँ उस ऐरावत हाथी की पीठ पर चढ़ कर उस जन्म महोत्सव में जाते हैं।


द्वात्रिंशत्कमलान्येव चैकैकां पद्मिनीं प्रति।
द्वात्रिंशदस्य पत्राणि प्रतिपद्मं विराजते ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): नाम का एक अद्भुत जिनालय है, जो सौ योजन लम्बा, पचास योजन चौड़ा, पचहत्तर योजन ऊँचा और अर्ध योजन अवगाह (नींव) वाला है ॥७-८॥


प्रतिपत्रं च द्वात्रिंशन्नृत्यन्त्यप्सरसो वराः।
केषाञ्चित्संयतानां तु श्रूयतां भो! मतान्तरं ॥९॥


नर्तकीनां प्रतिपद्ममष्टोत्तरशतं परं।
एवं वैभवसंयुक्तं गजं शक्रः स्थितोमुदा ॥१०॥

अर्थ: जिस प्रकार दक्षिणेन्द्र के सात अनीकों की संख्या का वर्णन किया है। उसी प्रकार की संख्या आदि उत्तरेन्द्र के भी होती है। ऐशान इन्द्र भी दिव्य अश्वों पर चढ़कर अपने परिवार से अलंकृत होता हुआ, महाविभूति के साथ जन्माभिषेक में आता है। शेष सनत्कुमार इन्द्र आदि को लेकर अच्युत इन्द्र पर्यन्त के सभी देवेन्द्र सात अनीकों एवं तीन परिषदों से वेष्टित, अपने-अपने वाहनरूपी विभूति का आश्रय लेकर समस्त देवों के साथ यहाँ आते हैं। भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिष देवों के इन्द्र भी सात अनीकों एवं तीन परिषदों से वेष्टित होते हुए, अपने-अपने वाहन एवं विमान आदि पर चढ़कर महाविभूति से युक्त होते हुए अपनी-अपनी देवियों के साथ यहाँ आते हैं। समस्त अहमिन्द्र आसन कम्पायमान होने से जिनेन्द्र के जन्म उत्सव को जानकर और सात पैर आगे जाकर मस्तक से अपने स्थान पर स्थित होकर ही जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार करते हैं। इस प्रकार परम विभूति से युक्त होते हुए चतुर्णिकाय के इन्द्र अपने समस्त देवों के साथ नाना प्रकार के देववादित्रों के शब्दों द्वारा दिशाओं को बहरी करते हुए तथा ध्वजा, छत्र, चामर और विमान आदि के साथ आकाशतल को व्याप्त करते हुए स्वर्ग से उस नगर में आते हैं, जहाँ तीर्थंकर की उत्पत्ति होती है।


तत्रेन्द्राणी प्रसवागारं प्रविश्य मातुरन्ते परं मायाशिशुं निधाय तीर्थेशं प्रणम्यादाय गूढवृत्त्यानीय सौधर्मेन्द्रस्य करे ददाति। सोपितं तीर्थंकरं मुदाप्रणम्यस्तुत्वामहोत्सवेन मेरुमानीयपरीत्य पाण्डुकशिलास्थ मध्यसिंहासने धत्ते। ततः क्षीराब्धेः क्षीराम्बुभृतैः अष्टयोजनगम्भीरैर्योजनैकमुख विस्तृतैर्मुक्ता- दामाम्भोजचन्दनाद्यलंकृतैरष्टोत्तरसहस्रैः, कनत्काञ्चनकलशैर्गीतनृत्यभ्रूवोत्क्षेप्यादि [भ्रूक्षेपादि] महोत्सवशतैः, परया भक्त्या विभूत्या च नाकेन्द्राः सम्भूय जिनेन्द्रं स्नपयन्ति। यदि चेत्ता महत्योजलधारा यस्याद्रेरुपरि पतन्ति सोऽद्रिस्तत्क्षणं शतखण्डतां याति। अप्रमाणमहावीर्यः परमेश्वरस्तद्वारापतनं जलविन्दुवनमन्यते। इतिध्वनद्वाद्यशतैर्जयजयादि निर्घोषैः शुद्धाम्बुस्नपनं सम्पूर्ण विधायान्ते सुगन्धिद्रव्य- मिश्रितैः गन्धोदक कुम्भैर्गन्धोदकस्नपनं शक्रा अस्य कुर्वन्ति। ततस्तद्गन्धोदक्रमभिवन्द्य दिव्यगन्धादिभिः स्वर्गोपनीतैरमहापूजाद्रव्यैर्जिनं प्रपूज्योत्तमांगेनदेवेन्द्रा इन्द्राणीदेवादिभिः सहोच्चैः प्रणमन्ति। पुनः शची नानासुगन्धद्रव्यदिव्यांशुक शाश्वत मणिनेपथ्यैस्तीर्थेशस्य महत् मण्डनं करोति, तदा सौधर्मेन्द्रो जगद्गुरोर्महारूप सम्पदोवीक्ष्य तृप्तिमप्राप्य पुनर्व्वीक्षितुं सहस्रनयनानि विदधाति। ततः परमानन्देन परमेश्वरं स्तुतिशतैः स्तुत्वा तत्पुरं नीत्वा पित्रोः समर्प्य तत्रानन्दनाटकं कृत्वा परं पुण्यमुपार्ज्य चतुर्णिकाय देवेशाः स्वस्वस्थानं गच्छन्ति।

अर्थ: प्रभु के जन्म नगर में आकर इन्द्राणी प्रसूतिगृह में प्रवेश करके माता के समीप जाकर सर्वप्रथम बाल तीर्थंकर को प्रणाम करती है और उसी समय माता के समीप मायामयी बालक रखकर भगवान् को उठाकर तथा गूढ़वृत्ति से लाकर सौधर्म इन्द्र के हाथों में दे देती है। वह इन्द्र भी उन तीर्थंकर प्रभु को प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम करके एवं स्तुति करके महामहोत्सव के साथ मेरुपर्वत पर लाकर और मेरु की तीन प्रदक्षिणा देकर पाण्डुक शिला पर स्थित मध्य के सिंहासन पर प्रभु को विराजमान कर देता है। इसके बाद क्षीरसागर के क्षीर सदृश जल से भरे हुए आठ योजन (६४ मील) गहरे, एक योजन (८ मील) मुख विस्तार वाले, मोतियों की माला, कमल एवं चन्दन आदि से अलंकृत, अत्यन्त शोभायमान स्वर्ण के एक हजार आठ कलशों के द्वारा, गीत, नृत्य एवं भ्रूउपक्षेपण [भ्रू उत्क्षेपण] आदि सैकड़ों महा उत्सवों के साथ, उत्कृष्ट भक्ति एवं परम विभूति से सभी इन्द्र एकत्रित होकर जिनेन्द्र भगवान् को स्नान कराते हैं। भगवान् के ऊपर गिरने वाली वह महान् जल की धारा यदि कहीं उस पर्वत के ऊपर गिर जाये तो उस पर्वत के उसी क्षण सौ खण्ड हो जायें किन्तु अपरिमित महावीर्य को धारण करने वाले बाल जिनेन्द्र उन धाराओं के पतन को जलबिन्दु के समान मानते हैं। इस प्रकार शब्द करते हुए सैकड़ों वादित्रों और जय-जय आदि शब्दों के द्वारा शुद्ध जल का अभिषेक समाप्त करके अन्त में इन्द्र सुगन्धित द्रव्यों से मिश्रित, सुगन्धित जल से भरे हुए घड़ों के द्वारा सुगन्धित जल से अभिषेक करता है। पश्चात् उस गन्धोदक की अभिवन्दना करके महापूजा के लिये स्वर्ग से लाये हुए दिव्य गन्ध आदि द्रव्यों के द्वारा बाल जिनेन्द्र की पूजा करके इन्द्र अपनी इन्द्राणी एवं अन्य देवों के साथ उत्साहपूर्वक प्रणाम करते हैं। इसके बाद शची अनेक प्रकार के सुगन्धित द्रव्यों से, दिव्य वस्त्रों से और मणियों के आभूषणों से तीर्थेश का महान् श्रृंगार करती है। उस समय सौधर्म इन्द्र जगद्गुरु की महारूप स्वरूप सम्पदा को देखकर तृप्त नहीं होता और पुनः-पुनः देखने के लिये एक हजार नेत्र बनाता है। ततः उत्कृष्ट आनन्द से युक्त होता हुआ भगवान् की सैकड़ों स्तुतियाँ करता है अर्थात् सहस्रों प्रकार से भगवान् की स्तुति करता है। इसके बाद नगर में लाकर पिता को सौंप देता है, पश्चात् पितृगृह के प्राङ्गण में आनन्द नाम का नाटक करके, तथा उत्कृष्ट पुण्य का उपार्जन करके इन्द्र एवं चतुर्निकाय के देव अपने-अपने स्थानों को वापिस चले जाते हैं।


क्रोशद्वयावगाहश्च विचित्रमणिचित्रितः।
अद्भुतः स्याज्जिनागारस्त्रैलोक्यतिलकाह्वयः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 9 से 11): इस त्रैलोक्य तिलक जिनभवन के पूर्व, उत्तर और दक्षिण में रत्न एवं स्वर्णमय एक एक उत्कृष्ट द्वार हैं। उत्तर-दक्षिण दोनों द्वारों के मध्य पूर्व दिशा में स्थित प्रथम द्वार अत्यन्त शोभायमान है, जिसकी ऊँचाई सोलह योजन और चौड़ाई आठ योजन प्रमाण है। जिनालय की दक्षिणोत्तर दिशा में जो एक-एक द्वार सुशोभित हैं, उनकी ऊँचाई आठ योजन और चौड़ाई चार योजन प्रमाण है ॥९-११॥


राजते नितरां द्वारं तयोः पूर्वस्थमादिमम्।
अष्टयोजनविस्तीर्णं तुङ्गं षोडशयोजनैः ॥१२॥

दक्षिणोत्तरदिग्भागस्थे द्वे द्वारे परे शुभे।
भातोऽष्टयोजनोत्तुङ्गे चतुर्योजन विस्तरे ॥१३॥

भवनस्यास्य चाभ्यन्तरे पूर्वे विस्फुरन्त्यलम्।
विचित्रमणिमालाश्चाष्टसहस्त्राणिलम्बिताः ॥१४॥

तासामन्तरभागेषु चतुर्विंशतिसम्मिताः।
सहस्त्राणां विराजन्ते माला रत्नांशुसञ्चयैः ॥१५॥

चतुर्विंशसहस्राणि दिव्या धूपघटाः शुभाः।
सुगन्धि द्रव्य धूपैः स्युः सुगन्धीकृतदिङ्मुखाः ॥१६॥

स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राणि कलशा भानुतेजसः।
सुगन्धिदामराशीनां सन्मुखा मणिहेमजाः ॥१७॥

तद्बहिर्भागदेशेषु मणिमालाः प्रलम्बिताः।
चत्वारि च सहस्राणि सन्ति दीप्ता मनोहराः ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 12 से 18): उस जिनालय के अभ्यन्तर भाग में स्थित पूर्व दिशा के द्वार पर अत्यन्त देदीप्यमान नाना प्रकार की मणियों की आठ हजार मालाएँ लटकतीं हैं, और इनके मध्य में रत्नकिरणों से उपचित चौबीस हजार मालाएँ विराजमान होती हैं। सुगन्धित द्रव्य एवं धूप के द्वारा दिशाओं को सुगंधित करने वाले चौबीस हजार धूपघट स्थित हैं। सुगन्धित माला समूहों के अभिमुख, सूर्य सदृश तेज पुञ्ज से संयुक्त बत्तीस हजार मणि एवं स्वर्णमय कलश स्थित हैं। मुख्यद्वार के बाह्य भाग में जो द्वार हैं, उन पर अति मनोहर और दीप्तवान चार हजार मणिमय मालाएँ और बारह हजार स्वर्णमय मालाएँ हैं। इनके भी बाह्य भाग में बारह हजार प्रमाण दिव्य धूपघट और स्फुरायमान होने वाली अपनी किरणों से दीप्त सोलह हजार स्वर्ण कलश स्थित हैं ॥१२-१८॥


द्वादशैवसहस्राणि स्युः काञ्चनस्रजोऽमलाः।
तस्मिन्नेव बहिर्भागे दिव्याधूपघटाः स्मृताः ॥१९॥

द्विषट्सहस्त्रसंख्याताः सहस्त्रषोडशप्रमाः।
दीप्ताः काञ्चनकुम्भाश्च स्फुरन्तिस्वाङ्गरश्मिभिः ॥२०॥

मणिसोपान पंक्तिः स्यात्तत्रदीर्घा च योजनैः।
द्व्यष्टभिरष्टभिर्व्यासाषड्योजनोन्नता शुभा ॥२१॥

क्रोशद्वयावगाहास्यादष्टोत्तर शतान्यपि।
सोपानानि भवन्त्येवप्रोन्नतानि चतुःशतैः ॥२२॥

किञ्चिदूनैश्चचापैः पञ्चचत्वारिंशदग्रगैः।
पीठपर्यन्तभागेऽस्ति दिव्याःसद्रत्नवेदिकाः ॥२३॥

क्रोशद्वयोन्नताः पञ्चशतचापप्रविस्तृताः।
तेषु पीठेषु दिव्याङ्गा अष्टोत्तरशतप्रमाः ॥२४॥

स्फुरन्नानामणिस्वर्णमय्योऽविनश्वराः शुभाः।
धनुः पञ्चशतोत्तुङ्गामनोज्ञावीक्षणप्रियाः ॥२५॥

निराभरणदीप्ताश्च निरम्बरमनोहराः।
कोट्येकभानुतेजोऽधिक सुतेजो विराजिताः ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 19 से 26): त्रैलोक्यतिलक जिनभवन में वज्र एवं इन्द्रनीलमणिमय एक पीठ है, जो कुछ अधिक सोलह योजन लम्बा, आठ योजन चौड़ा, दो योजन ऊँचा, अत्यन्त शुभ और परमोत्कृष्ट है। वहाँ पर सोलह योजन लम्बी, आठ योजन चौड़ी, छह योजन ऊँची और अर्ध योजन नींव से युक्त मणिमय सोपान पंक्ति है, तथा उस सोपान पंक्ति में एक सौ आठ सोपान हैं, जिनमें से प्रत्येक सोपान कुछ कम चार सौ पैंतालीस धनुष ऊँचे हैं। पीठ पर दिव्य और उत्तम रत्न वेदियाँ हैं, जो अर्ध धनुष ऊँची और पाँच सौ धनुष चौड़ी हैं। उन वेदिकाओं पर श्री जिनेन्द्र भगवान् की ऐसी एक सौ आठ प्रतिमाएँ सुशोभित हैं, जो अत्यन्त विभावान् मणि एवं स्वर्णमय हैं। अविनश्वर अर्थात् अकृत्रिम हैं। अत्यन्त शुभ, मनोज्ञ, देखने में अति प्रिय और दिव्य अंग वालीं हैं। पाँच सौ धनुष ऊँची हैं, वस्त्राभूषणों से रहित अर्थात् दिगम्बर मुद्रा युक्त हैं और करोड़ों सूर्यों के तेज से भी अधिक कान्तिवान हैं ॥१९-२६॥


लक्षणैर्व्यञ्जनैर्युक्ताः पल्यङ्कासनसंस्थिताः।
पूर्णसोममुखाः सौम्याः समस्तविक्रियातिगाः ॥२७॥

दिव्यभामण्डलान्तर्बाह्योच्छेदिततमश्चयाः ।
प्रफुल्लपद्मसद्गहस्ता (सादृश्या) आरक्तचरणाम्बुजाः ॥२८॥

अञ्जनाभमहाकेशा अताम्रनयनोत्पलाः।
विद्रुमाभाधराः छत्रत्रयशोभितमस्तकाः ॥२९॥

दिव्यसिंहासनारूढा भामण्डलात्तविग्रहाः।
महार्चनार्चितायक्षैर्वीज्यमानाः प्रकीर्णकैः ॥३०॥

निरौपम्या जगन्नेत्रप्रियाः पुण्याकरा इव।
हसन्त्यो वा वदन्त्यो वा मुखचन्द्रेण संततम् ॥३१॥

त्रिजगन्नृसुराराध्यावन्द्याः स्तुत्यामया सदा।
राजन्ते श्रीजिनेन्द्राणां प्रतिमादिव्य मूर्तयः ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 27 से 32): वे जिन प्रतिमाएँ (१०८) लक्षणों एवं (९००) व्यञ्जनों से युक्त तथा पूर्ण चन्द्र के सदृश मुख वालीं हैं। उनकी शरीराकृति अत्यन्त सौम्य और सर्व विकारों से रहित है, वे सभी पद्मासन से स्थित हैं। उनका भामण्डल अन्तर-बाह्य अन्धकार के समूह को नष्ट करने वाला है। उनके करकमल एवं चरणकमल खिले हुए कमल सदृश अर्थात् कुछ कुछ लाल हैं, केश अञ्जन सदृश काले, नेत्र कमल लालिमा से रहित, होंठ विद्रुम की आभा सदृश लाल और मस्तक तीन छत्रों से सुशोभित है। दिव्य सिंहासन पर विराजमान उनका शरीर अत्यन्त कान्तिवान् है। वे महापूजा से पूज्य, यक्षों द्वारा वीज्यमान चामरों से युक्त, उपमा रहित, तीन लोक के नेत्रों को अत्यन्त प्रिय और पुण्य की खान के समान हैं। वे जिन प्रतिमाएँ शोभायमान मुख चन्द्र से मानो निरन्तर हँस रहीं हैं और बोल रहीं हैं तथा तीन लोक के मनुष्यों एवं देवों से पूज्य और मेरे द्वारा सदा वन्दनीय एवं स्तुत्य हैं ॥२७-३२॥


धर्मापकरणों (मङ्गल द्रव्यों) का वर्णन


अकृत्रिमा महाभूत्या धर्मोपकरणैः परैः।
प्रत्येकं भिन्नभिन्नैर्मुदाष्टोत्तरशतप्रमैः ॥३३॥

अशोकवृक्षशोभाढ्यादेवदुन्दुभिभूषिताः ।
सुरैः कृतमहापुष्पवृष्ट्याच्छादितमूर्तयः ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): अकृत्रिम और महाविभूति स्वरूप भिन्न-भिन्न मंगल द्रव्यों (झारी, कलश, दर्पण, पंखा, ध्वजा, चामर, छत्र और ठोनो) की संख्या एक सौ आठ-एक सौ आठ है। वे प्रतिमाएँ छत्र, चमर, सिंहासन, भामण्डल, अशोक वृक्ष की शोभा से युक्त, देव दुन्दुभि से विभूषित और देवों द्वारा की हुई महापुष्पवृष्टि से आच्छादित (व्याप्त) होती हैं ॥३३-३४॥


शुद्धस्फटिकभित्त्याढ्यं वैडूर्यस्तम्भशोभितम्।
नानारत्नप्रभाकीर्णं दिव्यामोदात्तदिङ्मुखम् ॥३५॥

जिनेन्द्रप्रतिमानां तद्देवच्छन्दान्यनामधृत्।
गर्भगृहं जगत्सारं राजते नितरांश्रिया ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): शुद्ध-निर्विकार स्फटिक मणिमय दीवारों से युक्त, वैडूर्यमणिमय खम्भों से सुशोभित, अनेक प्रकार के रत्नों की प्रभा से व्याप्त, दिव्य आमोद से ग्रहण-सुगन्धित किया है दिशाओं को जिसने, ऐसा जगत् के सार स्वरूप जिनेन्द्र प्रतिमाओं सम्बन्धी देवच्छन्द नाम का गर्भगृह अत्यन्त शोभा से सुशोभित होता है ॥३५-३६॥


सद्रत्नवेदिकाग्रेषु सुपीठ शिखरेषु च।
मणिस्तम्भेषु राजन्ते महान्तोऽत्र ध्वजोत्कराः ॥३७॥


सिंहहस्तिध्वजा हंसवृषभाब्ज शिखिध्वजा।
मकरध्वजचक्रातपत्राख्यागरुडध्वजाः ॥३८॥


एते महाध्वजा रम्या दशभेद युताः शुभाः।
प्रत्येकं च पृथग्रूपा अष्टोत्तरशतप्रमाः ॥३९॥


एकैक सद्ध्वजानां सम्बन्धिनः क्षुल्लकध्वजाः।
अष्टाग्रशतसंख्याताः सन्ति मुक्तास्रगन्विताः ॥४०॥


एते सर्वे ध्वजव्राता गोपुरेभ्यः समुन्नताः।
मुखमण्डपसंज्ञानां त्रयाणां स्युर्बहिर्दिशि ॥४१॥

सुवर्णमणिसद्रूप्यमयाश्च योजनोच्छ्रिताः।
स्युः प्राकारास्त्रयस्तत्र महान्तो रचनान्विताः ॥४२॥

प्राकारं प्रति चत्वारि सद्रत्नगोपुराण्यपि।
सन्त्युत्तुङ्गानि दीप्तानि योजनैः षोडशप्रमैः ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 41 से 43): ये समस्त ध्वजाओं के समूह गोपुरों से ऊँचे हैं। तीनों मुखमण्डपों के बाहर तीन कोट हैं। ये तीनों कोट, स्वर्ण, मणि एवं रजतमय हैं, एक योजन ऊँचे तथा महान रचना से सहित हैं। प्रत्येक कोट में उत्तम रत्नों से भास्वर एवं उत्तुङ्ग चार-चार गोपुरद्वार (प्रतोली) हैं, जो सोलह योजन ऊँचे हैं ॥४१-४३॥


शतैकयोजनायामाः पञ्चाशद्विस्तरान्विताः।
क्रोशद्वयावगाहाः प्रोन्नताः षोडशयोजनैः ॥४४॥

संतप्तहेमदीप्ताङ्गा विचित्ररत्नचित्रिताः।
नित्योत्सवयुतारम्या विज्ञेया मुखमण्डपाः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 37 से 45): श्रेष्ठ रत्न वेदिकाओं के अग्रभाग पर, पीठ के शिखर पर और मणिमय खम्भों के ऊपर महान् ध्वजाओं के समूह शोभायमान होते हैं। वे अत्यन्त रमणीय महा ध्वजा समूह सिंह, हाथी, हंस, वृषभ, कमल, मयूर, मकरध्वज, चक्र, आतपत्र और गरुड़ के भेद से दश प्रकार के हैं। इन प्रत्येक भेदों की भिन्न-भिन्न एक सौ आठ-एक सौ आठ (१०८x१०=१०८०) ध्वजाएँ होतीं हैं और उन १०८ ध्वजाओं के भी पृथक्-पृथक् एक सौ आठ, एक सौ आठ छोटी ध्वजाएँ (१०८०x१०८=११६६४०) मुक्ता की मालाओं से सुशोभित होती हैं ॥३७-४०॥


तदग्रे योजनानां च शतैकायामविस्तराः।
भवन्त्यर्धावगाहाः प्रोत्तुङ्गाः षोडशयोजनैः ॥४६॥

नानारत्नमया रम्याः प्रेक्षागृहा मनोहराः।
तेषां च पुरतः सन्तितुङ्गाः षोडशयोजनैः ॥४७॥

योजनानां चतुःषष्टिदीर्घव्यासान्विताः पराः।
हेमरत्नमयास्तेजोजालावृताः सभागृहाः ॥४८॥

तेषां सभागृहाणां कांचन पीठानिसन्ति च।
अशीतियोजनायामविस्तृतानि शुभान्यपि ॥४९॥

द्वियोजनोच्छ्रितान्युच्चैः पद्मवेदीयुतानि वै।
मनोहराणि रम्याणि प्रदीप्तैर्मणि तोरणैः ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 46 से 50): उन मुखमण्डपों के आगे सौ योजन लम्बे, सौ योजन चौड़े, सोलह योजन ऊँचे, अर्ध योजन नींव से युक्त अनेक रत्नों से व्याप्त, अत्यन्त रमणीक और मन को हरण करने वाले प्रेक्षागृह हैं। उन प्रेक्षागृहों के आगे सोलह योजन ऊँचे, चौंसठ योजन लम्बे, चौंसठ योजन चौड़े, दीप्ति समूह से आवृत्त स्वर्ण एवं रत्नमय उत्तम सभागृह हैं। उन सभागृहों के पीठ स्वर्णमय हैं तथा अस्सी योजन लम्बे, अस्सी योजन चौड़े और अत्यन्त सुन्दर हैं। वे पीठ देदीप्यमान मणियों के दो योजन ऊँचे तोरणों से संयुक्त, अत्यन्त रमणीक और मनोहर पद्मवेदी से रम्य हैं ॥४६-५०॥


तेषां सभालयानां पुरतः स्तूपा नवोर्जिताः।
योजनानां चतुःषष्ट्यायामव्यासोन्नताः शुभाः ॥५१॥

जिनेन्द्रप्रतिमापूर्णा मेखलात्रयसंयुताः ।
चतुर्विंशतिसद्धेमवेदीभिर्वेष्टिताः पराः ॥५२॥

रत्नपीठेषु चत्वारिंशद्योजनोच्छ्रितेषु च।
स्फुरद्रत्नमयाः सन्ति स्थितादेवखगार्चिताः ॥५३॥

गोपुराणां बहिर्भागे वीथीनां मध्यभूमिषु।
मानस्तम्भा भवन्त्युच्चै दीप्ता घण्टाद्यलंकृताः ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 51 से 54): उन सभागृहों के आगे चालीस योजन ऊँचे रत्नमय पीठों पर देव और विद्याधरों से पूजित देदीप्यमान रत्नमय जिनेंद्र प्रतिमाओं से संयुक्त, तीन मेखलाओं से वेष्टित चौंसठ योजन लम्बे, चौंसठ योजन चौड़े और चौंसठ योजन ऊँचे, श्रेष्ठ स्वर्णमय चौबीस वेदियों से परिवेष्टित, अति उत्तम और अत्यन्त सुन्दर नव स्तूप हैं। गोपुरों के बाह्य भाग में तथा वीथियों (गलियों) की मध्यभूमि में अतिशय प्रभावान और घण्टा आदि से अलंकृत मानस्तम्भ हैं ॥५१-५४॥


स्तूपानां पुरतोगत्वा हेमपीठं भवेन्महत्।
सहस्रयोजनायाम विस्तारं मणिभास्वरम् ॥५५॥

युतं द्वादशवेदीभिर्वरंतोरणमण्डितम्।
पीठस्योपरिसन्ति प्रोन्नताः षोडशयोजनैः ॥५६॥

अष्टयोजनविस्तीर्णाश्चैत्यवृक्षाः शुभप्रदाः ।
रम्याः सिद्धार्थनामानो महान्तः सुरपूजिताः ॥५७॥

एकं लक्षं च चत्वारिंशत्सहस्त्रं तथा शतम्।
विंशत्यग्रमिमासंख्याविज्ञेया चैत्यशाखिनाम् ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 55 से 58): स्तूपों के आगे (पूर्व दिशा की ओर) जाकर एक हजार योजन लम्बा और एक हजार योजन चौड़ा, मणियों की प्रभा से दीप्तवान, बारह वेदियों से वेष्टित तथा उत्तम तोरणों से मण्डित एक स्वर्णमय पीठ है। उस पीठ के ऊपर सोलह योजन ऊँचा और आठ योजन चौड़ा अति शोभायुक्त, रमणीक और देवों से पूजित एक सिद्धार्थ नाम का महान् चैत्यवृक्ष है। उस चैत्यवृक्ष के परिवार वृक्षों की संख्या एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस जानना चाहिए ॥५५-५८॥


द्रुमाणां भूतलाद्गत्वा चत्त्वारियोजनानि च।
चतुर्दिक्षुचतस्रः स्युर्द्विषट्कयोजनायताः ॥५९॥

योजनैकसुविस्तीर्णा महाशाखाः क्षयातिगाः ।
मूलेषु चैत्यवृक्षाणां चतुर्दिक्षु मनोहराः ॥६०॥

जिनेन्द्रप्रतिमाः शाश्वताः पल्यङ्कासन स्थिताः ।
भवेयुर्मणिदीप्ताङ्गा प्रातिहार्यश्रियार्चिताः ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 59 से 61): चैत्यवृक्ष के भूमितल भाग से चार योजन ऊपर जाकर बारह योजन लम्बी और एक योजन चौड़ी प्रमाण वाली तथा विनाश से रहित चार महाशाखाएँ चारों दिशाओं में फैली हैं। चैत्यवृक्षों के मूलभाग की चारों दिशाओं में पल्यंकासन (पद्मासन) से स्थित एक एक जिनेन्द्र प्रतिमाएँ हैं। जो अपनी सुन्दरता से मन को हरण करने वाली, उत्पत्ति विनाश से रहित, मणियों की दीप्ति से भास्वर शरीर वाली तथा अष्ट प्रातिहार्य आदि लक्ष्मी से सेव्यमान हैं ॥५९-६१॥


ततश्चैत्यद्रुमेभ्योऽनुगत्वा प्राग्दिग्महीतले।
महत्पीठं ध्वजौघानां स्याद्वेदीद्वादशाङ्कितम् ॥६२॥

पीठस्योपरिचोत्तुङ्गाः सन्ति षोडशयोजनैः।
क्रोशव्यासामहास्तम्भाः सद्द्वैडूर्यमयाः शुभाः ॥६३॥

स्तम्भानां शिखरेष्वस्युर्नानावर्णान्विता ध्वजाः।
छत्रत्रयांकिता मूर्ध्निदिव्यरूपाऽच्युतोपमाः ॥६४॥

ध्वजानांपुरतो वाप्यो दीर्घाः शतैकयोजनैः।
पञ्चाशद्विस्तृताः स्युश्चावगाहा दशयोजनैः ॥६५॥

युताः काञ्चनवेदीभिर्मणि तोरणभूषिताः।
निर्जन्तुजलसम्पूर्णाः शाश्वताः कमलाश्रिताः ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 62 से 66): उस चैत्यवृक्ष से पुनः पूर्व दिशा में जाकर पृथ्वी पर बारह वेदियों से संयुक्त ध्वजा समूहों का एक विशाल पीठ है। उस पीठ के शिखर पर सोलह योजन ऊँचे और एक कोस विस्तार से युक्त वैडूर्यमणिमय अति शोभायुक्त महास्तम्भ (खम्भे) हैं। इन खम्भों के शिखरों पर विविध वर्णों से समन्वित, शिखर पर तीन छत्रों से सुशोभित, दिव्य रूप से सम्पन्न और अनुपम ध्वजाएँ हैं। उन ध्वजाओं के आगे सौ योजन लम्बी, पचास योजन चौड़ी और दश योजन गहरी, स्वर्ण वेदियों से वेष्टित, मणिमय तोरणों से विभूषित, निर्जन्तु अर्थात् स्वच्छ जल से परिपूर्ण और कमलों से व्याप्त, शाश्वत विद्यमान रहने वाली वापियाँ हैं ॥६२-६६॥


वापीनां प्राक्तने भागे ह्युत्तरे दक्षिणे शुभाः।
स्वर्णरत्नमयाः सन्ति प्रासादाः कृत्रिमातिगाः ॥६७॥

पञ्चाशद्योजनोत्सेधाः पञ्चविंशति योजनैः।
आयामव्याससंयुक्ता रत्नवेद्याद्यलंकृताः ॥६८॥

एषु क्रीडागृहेषूच्चैः देवाः क्रीडां प्रकुर्वते।
तेभ्यः पूर्वदिशांगत्वा विचित्रं रत्नतोरणम् ॥६९॥

स्याद्योजनशताधौच्चं पञ्चविंशति विस्तरम्।
मुक्तादामांकितं रम्यं वरघण्टाचयान्वितम् ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 67 से 70): उन वापियों के पूर्व, उत्तर और दक्षिण भागों में अत्यन्त शुभ, स्वर्ण एवं रत्नमय तथा अकृत्रिम क्रीड़ा प्रासाद हैं। वे क्रीड़ागृह पचास योजन ऊँचे, पच्चीस योजन लम्बे एवं चौड़े और रत्नों की वेदी आदि से अलंकृत हैं। उन क्रीड़ागृहों में देवगण नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हैं। उन क्रीड़ागृहों से आगे पूर्व दिशा में जाकर रत्नों से व्याप्त विचित्र तोरण है, जो पचास योजन ऊँचा, इससे आधा अर्थात् पच्चीस योजन चौड़ा, मुक्ता माला से संयुक्त, रमणीय एवं उत्तम घण्टा समूह से समन्वित है ॥६७-७०॥


ततोऽस्यतोरणस्यैव पार्श्वयोः स्तो द्वयोः परौ।
द्वौ द्वौ सद्द्त्नगेहौ च शतैकयोजनोन्नतौ ॥७१॥

ततः परं विचित्राः स्युर्ध्वजव्राताः समुन्नताः।
नानावर्णामहान्तोऽशीतिसहस्रप्रमाणकाः ॥७२॥

शततोरण संयुक्ता वनवेदी प्रवेष्टिताः।
ततः परे महीभागे वनखण्डं स्फुरत्प्रभम् ॥७३॥

वनवेदीयुतं रत्नतोरणाढ्यं मनोहरम्।
विचित्रमणिपीठाग्रस्थितद्रुमौघशोभितम् ॥७४॥

विद्रुमोत्थमहाशाखं हेमपुष्पौघशोभितम् ।
वैडूर्यफलपूर्णमरकताश्मसुपत्रकम् ॥७५॥

चम्पकाशोकवृक्षाम्रसप्तपर्णद्रुमैश्चितम् ।
कल्पपादपसंकीर्णंशाश्वतं स्यात् ख शर्मदम् ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 71 से 76): इसके आगे तोरण के दोनों पार्श्वभागों में सौ सौ योजन ऊँचे और उत्तम रत्नों के दो-दो भवन हैं। इसके आगे विविध वर्ण के, समुन्नत और महान् एक हजार अस्सी (१०८ × १० = १०८०) संख्या प्रमाण विचित्र ध्वजाओं के समूह हैं, जो सौ तोरणों से संयुक्त और उत्तम वनवेदी से परिवेष्टित हैं। इसके आगे पृथ्वीतल पर देदीप्यमान प्रभा से भासुर वनखण्ड हैं, जो वनवेदी से युत, रत्नतोरणों से संयुक्त, मन को हरण करने वाले, नाना प्रकार की मणि पीठों के अग्रभाग पर स्थित वृक्ष समूहों से सुशोभित, विद्रुम अर्थात् प्रवालमय शाखाओं की शोभा से युक्त, स्वर्ण के पुष्प समूह से समृद्ध, वैडूर्यमय फलों से व्याप्त, मरकत मणि के पत्थरमय उत्तम पत्रों से संकीर्ण, चम्पक, अशोकवृक्ष, आम्र एवं सप्तपर्ण के वृक्षों द्वारा गहन, अन्य कल्पवृक्षों से परिपूर्ण, अनाद्यनिधन और इन्द्रियों को सुख देने वाले हैं ॥७१-७६॥


तेषां कल्पद्रुमाणां सन्मूले स्युजिनमूर्तयः ।
चतुर्दिक्षुमहादीप्ताः प्रातिहार्याद्यलंकृताः ॥७७॥

इत्यादि रचनाभिश्च यथा यं श्रीजिनालयः ।
वर्णितः पूर्वदिग्भागे मेरोराद्यवनेऽखिलः ॥७८॥

तथापरे जिनेन्द्राणां मेरोर्दिक्तित्रषु संस्थिताः ।
समानवर्णनोपेताज्ञेयाश्चैत्यालयास्त्रयः ॥७९॥

इत्येवं वर्णनैः सर्वे जिनालया अकृत्रिमाः ।
समानाः सदृशाज्ञेयाः स्थितालोकतयेपरे ॥८०॥

किन्त्वन्येषां जिनेन्द्रालयानां स्याद्वर्णनापृथक् ।
मध्यमानां जघन्यानामायामोत्सेधविस्तरैः ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 77 से 81): उन कल्पवृक्षों के मूलभाग की चारों दिशाओं में महादीप्तवान एवं प्रातिहार्य आदि से अलंकृत जिनेन्द्रों की प्रतिमाएँ हैं। जिस प्रकार सुदर्शन मेरु के प्रथम- भद्रशाल वन के पूर्व भाग में स्थित श्री जिनमन्दिर का अनेक प्रकार की रचना आदि के द्वारा सम्पूर्ण वर्णन किया है, उसी प्रकार सुदर्शन मेरु सम्बन्धी भद्रशाल वन में तीनों दिशाओं में स्थित तीन चैत्यालयों का वर्णन जानना चाहिए। इस प्रकार तीन लोक में स्थित अन्य समस्त अकृत्रिम जिनालयों की रचना आदि का समस्त वर्णन उपर्युक्त वर्णन के सदृश ही जानना चाहिए परन्तु अन्य जिनालयों अर्थात् मध्यम जिनालयों और जघन्य जिनालयों के आयाम, उत्सेध और विस्तार आदि का वर्णन पृथक्-पृथक् है ॥७७-८१॥


एषु श्रीजिनगेहेषु कुर्वन्त्युच्चैर्महामहम् ।
जिनेन्द्र दिव्यमूर्तीनामागत्य भक्तिनिर्भराः ॥८२॥

चतुर्णिकायदेवेशा देवदेव्यादिभिः समम् ।
प्रत्यहं स्वर्गलोकोत्थैर्महार्घ द्रव्य भूरिभिः ॥८३॥

खगेशाः खचरीभिश्च सहाभ्येत्यात्र पूजनम् ।
अर्हतां विविधं कुर्युर्भक्त्या दिव्याष्टधार्चनैः ॥८४॥

चारणा ऋषयो नित्यं जिनेन्द्रगुणरञ्जिताः ।
अत्रैत्य जिनचैत्यादीन् प्रणमन्ति स्तुवन्ति च ॥८५॥

अन्येऽपि बहवो भव्या प्राप्तविद्या वृषोत्सुकाः ।
जिनार्चा अर्चयन्त्यत्र भक्त्या नरोत्तमाः सदा ॥८६॥

एषु चाप्सरसो नित्यं कुर्वन्ति नृत्यमूर्जितम्।
जिनेशगणभृद्दिव्य चरित्रैरीक्षणप्रियम् ॥८७॥

दिव्यकण्ठाश्च किन्नर्यो गन्धर्वा वीणया समम्।
गायन्ति सारगीतानि तीर्थेश गुणजान्यपि ॥८८॥

इत्युत्सवशतैः पूर्णा विश्व चैत्यालया इमे।
संक्षेपेण मया प्रोक्ता महापुण्य निबन्धनाः ॥८९॥

यतोऽमीषां पराः शोभा महतीरचनाभुवि॥
मुक्त्वा गणाग्रिमं कोऽत्र बुधो वर्णयितुं क्षमः॥९०॥

अर्थ (श्लोक 82 से 90): अपूर्व भक्तिरस से भरे हुए चारों निकाय के इन्द्र उत्कृष्ट विभूति, देव देवियों एवं स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुई महापूजा के योग्य अपरिमित द्रव्य सामग्री के साथ आकर उपर्युक्त वर्णित श्री जिनालयों में स्थित जिनेन्द्र देव की दिव्य मूर्तियों की प्रतिदिन महामह पूजन करते हैं। विद्याधरों के अधिपति भी अन्य विद्याधर एवं विद्याधरियों के साथ यहाँ (अकृत्रिम जिन चैत्यालयों में)आकर भक्तिपूर्वक अष्ट प्रकार की दिव्य सामग्री के द्वारा अर्हन्त भगवान् की नाना प्रकार से पूजन करते हैं। जिनेन्द्र के गुणों में अनुरञ्जित है मन जिनका, ऐसे चारणऋद्धिधारी मुनिराज नित्य ही मेरु आदि पर आकर जिनेन्द्र प्रतिमाओं को प्रणाम करते हैं और स्तुति करते हैं। अन्य भी और बहुत से विद्या प्राप्त, धर्म उत्सुक एवं मनुष्यों में श्रेष्ठ भव्य जीव भक्ति से प्रेरित होकर यहाँ नित्य ही जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करते हैं और वहाँ पर अप्सराएँ नित्य ही जिनेन्द्र भगवान् एवं गणधर देवों के सर्वोत्तम चारित्र के अभिनय द्वारा, देखने में अत्यन्त प्रिय और श्रेष्ठ नृत्य करती हैं। दिव्य कण्ठ वालीं किन्नरियाँ और गन्धर्व वीणा द्वारा जिनेश तीर्थंकरों के गुणों से उत्पन्न हुए गीत तथा और भी सारगर्भित उत्तम गीत गाते हैं। इस प्रकार ये समस्त अकृत्रिम चैत्यालय सहस्रों महोत्सवों से व्याप्त रहते हैं। महा पुण्य बन्ध के हेतुभूत इन चैत्यालयों का वर्णन मेरे (आचार्य) द्वारा संक्षिप्त रूप से किया गया है, क्योंकि लोक में उत्कृष्ट शोभा और महान रचनाओं से व्याप्त इन अकृत्रिम चैत्यालयों का सम्पूर्ण वर्णन करने के लिये तीर्थंकर को छोड़कर अन्य कौन विद्वान् समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं है ॥८२-९०॥


पञ्चाशद्योजनायामाः पञ्चविंशति विस्तृताः।
सार्धसप्ताधिकैस्त्रिंशद्योजनैः प्रोन्नताः शुभाः ॥९१॥

द्विगव्यूत्यवगाहाः स्युर्मध्यमाः श्रीजिनालया।
अमीषां मुख्य सुद्वारमुत्तुङ्गमष्टयोजनैः ॥९२॥

चतुर्योजनविस्तीर्णं चान्यद् द्वारद्वयं भवेत्।
चतुर्भियोंजनैस्तुङ्गं योजनद्वयविस्तरम् ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 91 से 93): मध्यम अकृत्रिम जिनालय पचास योजन लम्बे, पच्चीस योजन चौड़े, साढ़े सैंतीस योजन ऊँचे और अर्ध योजन नींव से युक्त होते हैं। इनके उत्तम प्रधान द्वार की ऊँचाई आठ योजन और चौड़ाई चार योजन प्रमाण है, तथा अन्य दो द्वारों की ऊँचाई चार योजन और चौड़ाई दो योजन प्रमाण होती है ॥९१-९३॥


पञ्चविंशति संख्यानैर्योजनैरायताः परे।
क्रोशद्वयाधिकद्वादश योजन सुविस्तृताः ॥९४॥

त्रिक्रोशाधिकाष्टादशयोजन समुन्नताः ।
द्वयक्रोशावगाहाः स्युर्जघन्याः श्रीजिनालयाः ॥९५॥

एतेषामग्रिमं द्वारं स्याच्चतुर्योजनोन्नतम् ।
योजनद्वय विस्तीर्णं लघुद्वारद्वयं परम्॥९६॥

द्वियोजनोच्छ्रितं च स्यादेकयोजन विस्तृतम्।
अपरा वर्णना प्रोक्ता समाना श्रीजिनागमे ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 94 से 97): जघन्य अकृत्रिम जिनालय पच्चीस योजन लम्बे, साढ़े बारह योजन चौड़े, १८ ३/४ योजन ऊँचे और अर्ध योजन नींव से युक्त होते हैं। इन चैत्यालयों के प्रधान द्वार चार योजन ऊँचे और दो योजन चौड़े होते हैं तथा दोनों लघु द्वार दो योजन ऊँचे और एक योजन चौड़े होते हैं। जिनागम में इन तीनों प्रकार के अकृत्रिम जिनालयों का अवशेष वर्णन समान ही कहा गया ॥९४-९७॥


भद्रशालेषु सर्वेषु मेरूंणां नन्दनेषु च।
वनेषु स्वर्विमानेषु नन्दीश्वरेषु सन्ति ये॥९८॥

उत्कृष्टायामविस्तारोत्सेधैर्युक्ता जिनालयाः।
उत्कृष्टास्ते जिनैः प्रोक्ता सर्वे पूज्या नरामरैः ॥९९॥

मेरुसौमनसोद्यानेषु विश्वेषु कुलाद्रिषु।
वक्षारगजदन्तेषु चेष्वाकारनगेष्वपि ॥१००॥

कुण्डले रुचकेशैले मानुषोत्तरनामनि।
ये स्युश्चैत्यालयास्तेऽत्र दीर्घायैर्मध्यमा मताः ॥१०१॥

ये पाण्डुकवने ते स्युर्जघन्याः श्रीजिनालयाः।
सर्वेषां विजयार्धानां जम्बूशाल्मलिशाखिनाम् ॥१०२॥

क्रोशायामाः परे क्रोशार्धव्यासाः प्रोन्नताः शुभाः।
क्रोशपादत्रयैर्ज्ञेया विश्वे श्रीजिनमन्दिराः ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 98 से 103): जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए और मनुष्यों एवं देवों द्वारा पूज्य उत्कृष्ट जिनालय पंचमेरु सम्बन्धी भद्रशाल वनों और नन्दन वनों में तथा नन्दीश्वर द्वीप और वैमानिक देवों के विमानों में हैं। इनका आयाम, विस्तार एवं ऊँचाई उत्कृष्ट ही कही गई है। पंचमेरु सम्बन्धी सौमनस वनों में समस्त कुलाचलों पर, वक्षार पर्वतों पर, गजदन्त पर्वतों पर, इष्वाकार पर्वतों पर, कुण्डलगिरि, रुचकगिरि और मानुषोत्तर पर्वतों पर जो जिनालय हैं, उनकी दीर्घता आदि का प्रमाण मध्यम माना गया है। पंचमेरु सम्बन्धी पाण्डुक वनों में जो जिनालय अवस्थित हैं, उनका व्यासादिक जघन्य प्रमाण वाला है। समस्त विजयार्धों, जम्बूवृक्षों एवं शाल्मलि वृक्षों पर स्थित जिनालय एक कोस लम्बे, अर्ध कोस चौड़े और पौन कोस ऊँचे हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥९८-१०३॥


भावनव्यन्तरज्योतिष्क विमानेषु सन्ति ये।
चैत्यालयाश्च ते जम्बूवृक्ष चेत्यालयैः समाः ॥१०४॥

अन्येषु वन सौधाद्रिपुरादिषु सुधाभुजाम्।
भवन्ति ये जिनागारा बहवो विविधाश्च ते ॥१०५॥

आयामविस्तरोत्सेधैर्बुधैर्ज्ञेया वरागमे।
यतोऽत्र सन्ति सर्वत्र जिनागाराजगत्त्रये ॥१०६॥

भृङ्गारकलशादर्श व्यञ्जनध्वजचामराः।
सुप्रतिष्ठातपत्राश्च मङ्गलद्रव्यसम्पदा ॥१०७॥

प्रत्येकं हि पृथग्भूता अष्टोत्तरशतप्रमाः।
एता भवन्ति सर्वेषु जिनचैत्यालयेष्वपि ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 104 से 108): भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिष देवों के विमानों अर्थात् भवनों में जो चैत्यालय हैं, उनका प्रमाण जम्बूवृक्ष स्थित चैत्यालयों के प्रमाण सदृश ही है। अन्य वन, प्रासाद और नगर आदि में स्थित देवों के आवास सम्बन्धी जिनालय बहुत और नाना प्रकार के हैं। इनका आयाम, विस्तार एवं उत्सेध आदि भी जिनागम में अनेक प्रकार का कहा है, जो विद्वानों के द्वारा जानने योग्य है। तीन लोक में सर्वत्र जितने भी अकृत्रिम जिन मन्दिर हैं। उन समस्त जिनालयों में भृङ्गार, कलश, दर्पण, बीजना, ध्वजा, चामर, ठोना और छत्र ये अष्ट द्रव्यरूप सम्पदा पृथक्-पृथक् एक सौ आठ-एक सौ आठ प्रमाण होते हैं। अर्थात् एक-एक जाति के उपकरण एक सौ आठ-एक सौ आठ (१०८x८=८६४) होते हैं ॥१०४-१०८॥


ये त्रैलोक्ये स्थिताः श्रीजिनवरनिलया मेरुनन्दीश्वरेषु,
चेष्वाकारेभदन्तेषु वरकुलनगेष्वेवरूप्याचलेषु।
मान्वादौषोत्तरे कुण्डलगिरिरुचके जम्बुवृक्षेत्रेषु,
वक्षारेष्वेव सर्वेष्वपि शिवगतये स्तौमि तांस्तज्जिनार्चाः ॥१०९॥

अर्थ: जो तीन लोक में स्थित अर्थात् विमानवासी, भवनवासी, व्यन्तरवासी एवं ज्योतिष्क देवों के स्थानों पर स्थित तथा पंचमेरु सम्बन्धी-भद्रशाल आदि वनों के ८०, चार इष्वाकारों के ४, बीस गजदन्तों के २०, तीस कुलाचल पर्वतों के ३०, एक सौ सत्तर विजयार्ध पर्वतों के १७०, एक मानुषोत्तर के ४, दश जम्बू एवं शाल्मलि वृक्षों के दश तथा अस्सी वक्षार पर्वतों के ८०, नरलोक सम्बन्धी और नन्दीश्वर द्वीप के ५२, कुण्डलगिरि के ४ और रुचकगिरि के ४, इस प्रकार मध्यलोक सम्बन्धी ४५८ जिनालय एवं उनमें स्थित जिन प्रतिमाएँ हैं, उन सबकी मैं मोक्ष प्राप्ति के लिये स्तुति करता हूँ ॥१०९॥


त्रिभुवनपतिपूज्यांस्तीर्थनाथांश्च सिद्धान्,
त्रिभुवनशिखरस्थान् पञ्चधाचारदक्षान्।
मुनिगणपतिसूरीन् पाठकान् विश्वसाधून्,
ह्यसमगुणसमुद्रान्नौम्यहं तद्गुणाप्त्यै ॥११०॥

अर्थ: त्रिभुवनपति अर्थात् शतेन्द्र पूज्य अर्हन्त परमेष्ठियों की, त्रैलोक्य शिखर पर स्थित सिद्ध परमेष्ठियों को, पञ्चाचार पालन में दक्ष ऐसे मुनिसमूह के अधिपति आचार्य परमेष्ठियों को और अनुपम गुणों के समुद्र समस्त उपाध्याय एवं साधु परमेष्ठियों को मैं उनके गुणों की प्राप्ति के लिये नमस्कार करता हूँ ॥११०॥

सप्तम अधिकार देवकुरु, उत्तरकुरु, कच्छदेश तथा चक्रवर्ती की दिग्विजय एवं विभूति वर्णन (भाग 1/2)

जिनालयान् जिनाचांश्च जिनेन्द्रान् जिनलिङ्गिनः।
जिननिर्वाणभूम्यादीन् वन्दे जिनागमध्वनीन् ॥१॥

अर्थ: जिनमन्दिरों, जिनप्रतिमाओं, जिनेन्द्र देवों, जिन साधुओं, जिन निर्वाणभूमि आदिकों को तथा जिनागम को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥


आग्नेयदिशिमेरोः स्यान्महान्सौमनसाह्वयः।
गजदन्तश्च रूपाभः सप्तकूटाग्र मण्डितः ॥२॥

नैऋत्यादिशि तस्यैव विद्युत्प्रभाभिधो भवेत्।
गजदन्तः सुवर्णाभो नवकूटाङ्कितोऽद्भुतः ॥३॥

ऐशान्यां दिशिसन्मेरोर्गजदन्तोऽस्ति माल्यवान्।
वैडूर्यरत्नदीप्ताङ्गो नवकूटान्वितः शुभः ॥४॥

वायव्यां दिशि रम्यः स्याद्गन्धमादन संज्ञकः।
सप्तकूटाङ्कितो मूर्ध्नि शातकुम्भप्रभोऽचलः ॥५॥

अर्थ (श्लोक 2 से 5): सुदर्शन मेरु की आग्नेय दिशा में सात कूटों से मण्डित रजतमय महासौमनस नाम का गजदन्त है। नैऋत्य दिशा में नवकूटों से अलंकृत अद्भुत शोभा युक्त स्वर्णमय विद्युत्प्रभ नाम का गजदन्त है। ईशान दिशा में नवकूटों से समन्वित, वैडूर्यरत्नों की दीप्ति से युक्त उत्तम माल्यन् गजदन्त है तथा वायव्य दिशा में शिखर पर सात कूटों से संयुक्त, स्वर्णमय एवं रमणीक गन्धमादन नाम का गजदन्त पर्वत है ॥२-५॥


तेषां त्रिंशत्सहस्त्राणि नवाधिकशतद्वयम्।
योजनानां कलाषट्प्रमाणैक योजनस्य च ॥६॥

भागानां सकलैकोन विंशति प्रमितात्मनाम्।
आयामो गजदन्तानां व्यासः पञ्चशतानि च ॥७॥

नीलस्य निषधस्यान्तेऽमीषां चतुः शतान्यपि।
योजनानां समुच्छ्रायो गजदन्तमहीभृताम् ॥८॥

क्रमवृद्ध्या समीपे ते मेरोः पञ्चशतानि च।
निजोन्नतेश्चतुर्थांशः सर्वत्रास्त्यवगाहता ॥९॥

अर्थ (श्लोक 6 से 9): इन चारों ही गजदन्तों की लम्बाई तीस हजार दो सौ नौ योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से छह भाग (३०२०९ ६/१९ योजन) प्रमाण है तथा इनका व्यास पाँच सौ योजन प्रमाण है। इन गजदन्त पर्वतों की ऊँचाई नील और निषध पर्वतों के समीप चार सौ योजन प्रमाण है। आगे वह क्रम से वृद्धिंगत होती हुई मेरु के समीप में पाँच सौ योजन प्रमाण हो जाती है। इन पर्वतों का अवगाह (नींव) सर्वत्र अपनी ऊँचाई का चतुर्थांश अर्थात् नील-निषध के पास सौ योजन और मेरु के समीप सवा सौ योजन प्रमाण है ॥६-९॥


सिद्धि सौमनसं देवकुरुकूटं च मङ्गलम्।
विमलं काञ्चनं कूटं विशिष्टाख्य मिमानि च ॥१०॥

स्युरत्रसप्तकूटानि सौमनसस्य मस्तके।
सिद्धं विद्युत्प्रभाभिख्यं स्याद्देवकुरु संज्ञकम् ॥११॥

पद्माख्यं स्वस्तिकं कूटं तपनं च शितोज्ज्वलम्।
सीतोदानामकं कूटं हरिकूटमिमान्यपि ॥१२॥

विद्युत्प्रभगिरेः सन्ति नवकूटानि मूर्धनि।
सिद्धाख्यं माल्यवत्कूटं तथोत्तरकुरूक्तिकम् ॥१३॥

कच्छाख्यं सागराभिख्यं रजतं पूर्णभद्रकम्।
सीताख्यं हरिकूटं नवेमानि माल्यवद्गिरौ ॥१४॥

सिद्धायतननामाढ्यं गन्धमादन संज्ञकम्।
तथोत्तरकुरुप्राख्यं गन्धमालिनिकाभिधम् ॥१५॥

स्फटिकं लोहितं कूटमानन्दाख्यममून्यपि।
भवन्ति रत्नदीप्तानि गन्धमादन मस्तके ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 10 से 16): सिद्ध, सौमनस, देवकुरु, मंगल, विमल, काञ्चन और विशिष्ट नाम के ये सात कूट महासौमनस के शिखर पर अवस्थित हैं। सिद्ध, विद्युत्प्रभ, देवकुरु, पद्म, स्वस्तिक, तपन, शितोज्ज्वल सीतोदा और हरि नाम वाले ये नव कूट विद्युत्प्रभ के ऊपर स्थित हैं। सिद्ध, माल्यवान्, उत्तरकुरु, कच्छ, सागर, रजत, पूर्णभद्र, सीता और हरि नाम के नवकूट माल्यवान् पर्वत के ऊपर हैं तथा सिद्धायतन, गन्धमादन, उत्तरकुरु, गन्धमालिनी, स्फटिक, लोहित और आनन्दकूट नाम के ये रत्नों की दीप्ति से भास्वर सात कूट गन्धवान् गजदन्त के मस्तक पर अवस्थित हैं ॥१०-१६॥


सिद्धकूटोऽस्ति सर्वत्र प्रोन्नते मेरु सन्निधौ।
प्रागुक्तवर्णनोपेतो जिनचैत्यालयो महान् ॥१७॥

कुलाचलसमीपस्थ कूटयोश्च द्वयोर्द्वयोः।
वसतो दिग्वधूसंज्ञे द्वे द्वे देव्याविमे शुभे ॥१८॥

चतुर्णां गजदन्तानां रत्नसौधे निजे निजे।
मित्रादेवी सुमित्राख्या वारिषेणाचलाह्वयाः ॥१९॥

भोगाभोगवतीदेवी सुभोगाभोगमालिनी।
इमान्यष्टसु नामान्यष्टदिग्वधुषु योषिताम् ॥२०॥

शेष मध्यस्थकूटानां वेश्मसु व्यन्तरा मराः।
स्वस्वकूटसमैः स्युर्नामभियुक्ताः प्रियान्विताः ॥२१॥

स्वस्वाद्रीणां चतुर्थांशः कूटानामुदयः स्मृतः।
आद्यन्तानां तु शेषाणां ह्रासो वृद्धिः पृथक् पृथक् ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 17 से 22): चारों गजदन्तों पर मेरु के समीप जिनेन्द्रदेव सम्बन्धी सिद्धायतन कूट हैं, जो एक सौ पच्चीस योजन ऊँचे हैं। इन चैत्यालयों का समस्त वर्णन पूर्वोक्त जिन चैत्यालय के वर्णन सदृश ही है। चारों गजदन्तों पर कुलाचलों के समीप जो दो दो कूट हैं, उनमें दिग्वधू नाम की उत्तम दो-दो देवियाँ निवास करतीं हैं। चारों गजदन्तों के अपने-अपने रत्नमय महलों में अर्थात् महासौमनस गजदन्त के विमल और काञ्चन कूटों में मित्रा और सुमित्रा देवी, विद्युत्प्रभ गजदन्त के स्वस्तिक और तपन कूटों पर क्रमशः वारिषेणा और अचला, माल्यवान् के सागर एवं रजतकूटों पर क्रमशः भोगा और भोगवती तथा गन्धवान् गजदन्त के स्फटिक और लोहित कूटों पर क्रमशः सुभोगा और भोगमालिनी नाम की (ये आठ) व्यन्तर देवियाँ निवास करतीं हैं। मध्य में स्थित अवशेष कूटों के गृहों में अपने-अपने कूटों के नामधारी और अपनी-अपनी देवांगनाओं से युक्त व्यन्तरदेव रहते हैं। कूटों की ऊँचाई अपने-अपने गजदन्तों की ऊँचाई का चतुर्थ भाग माना गया है। आदि और अन्तिम कूट को छोड़कर शेष कूटों के ह्रास एवं वृद्धि का प्रमाण पृथक्-पृथक् है ॥१७-२२॥


मूर्ध्नि वै गजदन्तानामुभयोः पार्श्वयोर्भुवि ।
वेदिकातोरणैर्युक्तं रम्यं च शाश्वतं वनम् ॥२३॥

स्यात् पूर्वभद्रशालाख्यापराभद्रादिशालयोः ।
अन्तरं वेदिकायाश्च गजदन्तमहीभृताम् ॥२४॥

शतपञ्चप्रमाणानि योजनानि पृथक् पृथक् ।
निषधस्योत्तरे भागे गजदन्तद्वयावृतम् ॥२५॥

यच्चापाकारसत्क्षेत्रमुत्कृष्टभोगभूतलम् ।
तद्दैवकुरुनाम स्याद् विश्वकल्पद्रुमैश्चितम् ॥२६॥

नीलस्य दक्षिणे पार्श्वे गजदन्तद्विवेष्टितम् ।
तादृशं भोगभूभागमन्योत्तर कुरूक्तिकम् ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 23 से 27): गजदन्तों के दोनों पार्श्वभागों की उपरिम भूमि पर वेदिका और तोरणों से संयुक्त पूर्व भद्रशाल एवं पश्चिम भद्रशाल नाम के रमणीक और शाश्वत वन हैं। इन पूर्व भद्रशाल और पश्चिम भद्रशाल वनों की (चारों) वेदिकाओं से, (चारों) गजदन्तों के (अन्तरंग भाग का) पृथक् पृथक् अंतर पाँच सौ, पाँच सौ योजन प्रमाण है। (क्योंकि गजदन्तों का व्यास ५०० योजन है) निषध पर्वत की उत्तर दिशा में विद्युत्प्रभ और महासौमनस इन दो गजदन्तों से वेष्टित धनुषाकार शुभ क्षेत्र है वही समस्त प्रकार के कल्पवृक्षों से युक्त देवकुरु नाम की उत्कृष्ट भोगभूमि है। इसी प्रकार नील पर्वत की दक्षिण दिशा में गन्धमादन और माल्यवान् इन दो गजदन्तों से वेष्टित उत्तरकुरु नाम की उत्कृष्ट भोगभूमि है ॥२३-२७॥


य एकत्रीकृतायामोऽनयोर्द्विग्गजदन्तयोः।
तद्धि देवकुरोश्चोत्तरकुरोर्धनुरुच्यते ॥२८॥

अर्थ: विद्युत्प्रभ और सौमनस गजदन्तों की लम्बाई जोड़ने से देवकुरु के और गन्धमादन एवं माल्यवान् गजदन्तों की लम्बाई जोड़ देने से उत्तर कुरु के धनुःपृष्ठ का प्रमाण प्राप्त होता है ॥२८॥


देवकुरूत्तरकुरुभोगभूम्योः प्रत्येकं धनुःपृष्ठं षष्ठिसहस्र चतुःशताष्टादशयोजनानि योजनैकोन-
विंशतिभागानां द्वादशभागाः॥

अर्थ: देवकुरु उत्तमभोगभूमि के धनुःपृष्ठ का प्रमाण ६०४१८ १२/१९ योजन और उत्तरकुरु भोगभूमि के धनुःपृष्ठ का प्रमाण ६०४१८ १२/१९ योजन है।


भद्रशालवनं द्विघ्नं मेरुव्यासेन योजितम्।
सहस्रोनं भवेज्जीवामध्ये वेदिकयोर्द्वयोः ॥२९॥

अर्थ: भद्रशाल वन के प्रमाण को दूना करके उसमें मेरु का व्यास जोड़ना चाहिए। जो प्रमाण प्राप्त हो उसमें से दोनों वेदिकाओं और गजदन्तों के मध्य का अन्तर अर्थात् गजदन्तों की मोटाई (५००+५००)=एक हजार योजन घटा देने पर भोगभूमियों की जीवा का प्रमाण प्राप्त होता है ॥२९॥


देवोत्तरकुरुभोगभूम्योः प्रत्येकं कुलाद्रिपार्श्वे जीवा त्रिपञ्चाशत्सहस्र योजनानि।

अर्थ: निषध और नील कुलाचल के समीप में देवकुरु और उत्तरकुरु अर्थात् प्रत्येक उत्कृष्ट भोगभूमि की जीवा का प्रमाण ५३००० योजन है।


विदेहक्षेत्रविस्तारोऽखिलो यो मेरुवर्जितः।
तस्यार्धं यत् पृथक् क्षेत्रं सा वाणदीर्घतोच्यते ॥३०॥

अर्थ: विदेह क्षेत्र के विस्तार में से मेरुगिरि का भूव्यास घटाकर आधा करने पर कुरु क्षेत्र के विष्कम्भ का प्रमाण होता है, और यही कुरु क्षेत्र के वाण की दीर्घता का प्रमाण है ॥३०॥


देवकुरुतरक्षेत्रयोः प्रत्येकं वाणः एकादशसहस्राष्टशतद्विचत्वारिंशद्योजनानि योजनैकोनविंशति भागानां द्वौ भागौ।

अर्थ: देवकुरु और उत्तरकुरु इन दोनों क्षेत्रों का और इन क्षेत्रों में से प्रत्येक के वाण का प्रमाण ११८४२ २/१९ योजन है।


भद्रा निर्दर्शनाजीवास्त्रिधा सत्पात्रदानतः।
जायन्ते भोगिनश्चार्याः क्रमाद् भोगमहीत्रिषु ॥३१॥

न रोगो न भयो ग्लानिर्नाल्पमृत्युर्न दीनता।
न वृद्धत्वं न नीहारो नाहो! षडृतु संक्रमः ॥३२॥

नानिष्टसङ्गमो नेष्टवियोगो नापमानता।
नान्यद् दुःखादिकं किञ्चित् क्षेत्रसद्भावतो नृणाम् ॥३३॥

केवलं मृत्यपर्यन्तं पात्रदानज-पुण्यतः।
दशधाकल्पवृक्षोत्थान् भोगान् भुञ्जति तेऽनिशम् ॥३४॥

उत्पादोमृतिरार्याणां युग्मरूपेण जायते।
क्षुतात् मृत्युर्नराणां स्यान् स्त्रीणां जृम्भिकयात्र च ॥३५॥

ततस्ते स्वार्थभावेनार्या यान्ति देवसद्गतिम्।
सत्पात्रदानपुण्येनामीषां नास्त्यपरा-गतिः ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 31 से 36): भद्रमिथ्यादृष्टि जीव उत्तम, मध्यम और जघन्य सत्पात्रों के दान के फल से क्रमशः उत्तम, मध्यम और जघन्य इन तीन भोगभूमियों में आर्य और आर्या रूप से उत्पन्न होते हैं। उत्तम क्षेत्र के सद्भाव से वहाँ के जीवों के रोग नहीं होते, न वहाँ भय है, न ग्लानि है, न अल्पकाल में मृत्यु होती है, न दीनता है, न जीवों को वृद्धता आती है, न निहार होता है, अहो! और न छह ऋतुओं का सञ्चार होता है, न अनिष्ट का संयोग होता है, न इष्ट का वियोग होता है, न अपमान आदि का दुःख है, और न अन्य ही किञ्चित् दुःख वहाँ प्राप्त होते हैं किन्तु वे पात्रदान से उत्पन्न होने वाले पुण्य के फल से मरणपर्यन्त दस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न होने वाले भोगों को निरन्तर भोगते हैं। वहाँ पर स्त्री-पुरुष युगल रूप से एक साथ उत्पन्न होते हैं और एक ही साथ मरते हैं। पुरुषों की मृत्यु छींक से और स्त्रियों की मृत्यु जम्भाई से होती है। भोगभूमि के जीव अपने आर्य एवं आर्या भाव से अर्थात् सरल परिणामी होने से मरण के बाद देवगति को ही प्राप्त करते हैं, सत्पात्रों को दिये हुए दान के फल से उन जीवों को नरक, तिर्यञ्च एवं मनुष्य गति की प्राप्ति नहीं होती ॥३१-३६॥


मेरोरीशानदिक्कोणे सीतायाः प्राक्तटस्थले।
कुरुभूकोणसंस्थाने नीलाद्रेः सन्निधौ भवेत् ॥३७॥

जम्बूवृक्षो महान् जम्बूवृक्षाकारश्च शाश्वतः।
पृथिवीकायपुद्गलमयो मणिद्रुमावृतः ॥३८॥

अस्यादौ पीठिकावृत्ता वेदिका तोरणाङ्किता।
दिव्या स्वर्णमया पञ्चशतयोजनविस्तृता ॥३९॥

मध्येऽष्टयोजनोत्तुङ्गास्त्यन्तेऽर्धयोजनोच्छ्रिता ।
तन्मध्ये पीठिकाहैमी योजनाष्टोन्नता परा ॥४०॥

मूले च द्वादशव्यासा मध्यव्यासाष्टयोजनैः।
अग्रे स्याद् विस्तृता रम्या चतुर्भियोजनैः परा ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 37 से 41): नील कुलाचल के समीप, सीता महानदी के पूर्व तट पर, मेरु पर्वत को ईशान दिशा में, उत्तरकुरु क्षेत्र के कोने में, जामुन वृक्ष के आकार सदृश, शाश्वत, पृथ्वीकाय, उत्तम रत्नमय तथा मणिमय अनेक वृक्षों से समन्वित एक महान् जम्बूवृक्ष स्थित है। इस जम्बूवृक्ष की प्रथम पीठिका (स्थली) गोल, वेदिकाओं एवं तोरणों से अलंकृत, दिव्य, स्वर्णमय तथा पाँच सौ योजन विस्तृत, मध्य में आठ योजन ऊँची और अन्त में अर्ध योजन ऊँची है। इस स्थली के मध्य में आठ योजन ऊँची एक अन्य रमणीक और स्वर्णमय पीठिका है, जिसका मूल व्यास बारह योजन, मध्य व्यास आठ योजन और अग्रभाग का व्यास चार योजन प्रमाण है ॥३७-४१॥


तस्या मध्यप्रदेशेऽस्ति मूर्ध्नि छत्रत्रयाङ्कितः
वज्रस्कन्धः सुवैडूर्यरत्नपत्रफलावृतः ॥४२॥

जम्बूवृक्षो महादीप्तोऽनेकपादपमध्यगः।
तस्य जम्बूद्रुमस्यास्ति स्कन्धो द्वियोजनोन्नतः ॥४३॥

योजनार्धावगाहो द्विक्रोशविस्तारसंयुतः।
तदूर्ध्वे प्रवराः शाखाश्चतस्रः सन्ति शाश्वताः ॥४४॥

गव्यूतिद्वयविस्तीर्णा योजनाष्टसमायताः।
दिव्यगेहयुता दीप्ता रम्या मरकताश्मजाः ॥४५॥

तासामुत्तरशाखायां जिनचैत्यालयोऽव्ययः।
अनावृतादि यक्षौघैः पूज्यो वन्द्यस्तुतोऽन्वहम् ॥४६॥

शेषशाखात्रयस्थोच्चसौधेष्वनावृतामरः ।
यक्षान्वयी वसेद् भूत्वा जम्बूद्वीपस्य रक्षकः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 42 से 47): इस पीठ के मध्यभाग में ऊपर तीन छत्रों से अन्वित, वज्रमय स्कन्ध, उत्तम वैडूर्यरत्नों के पत्र एवं फलों से संकुलित, अनेक लघु जम्बूवृक्षों के मध्य में महादेदीप्यमान जम्बूवृक्ष है। उस जम्बूवृक्ष का स्कन्ध (पीठ से) दो योजन ऊँचा, दो कोस चौड़ा और अर्ध योजन अवगाह (नींव) से युक्त है। उस वृक्ष के अर्ध भाग से शाश्वत और उत्तम चार शाखाएँ निकलती हैं जो दो कोस चौड़ी, आठ योजन लम्बी, दिव्य प्रासादों से युक्त, ज्योतिर्मान, सुन्दर और मरकतमणिमय हैं। इनमें से उत्तर दिशा की शाखा पर अनावृत आदि यक्ष समूह से निरन्तर पूज्य, वन्दनीय एवं स्तुत्य शाश्वत अर्थात् अकृत्रिम जिन चैत्यालय है। शेष तीन शाखाओं पर स्थित उन्नत प्रासादों में जम्बूद्वीप का रक्षक और यक्षकुलोत्पन्न अनावृत नाम का देव अपनी परम विभूति के साथ निवास करता है ॥४२-४७॥


यावन्तः स्युः श्रियो देव्याः परिवाराब्जसद्गृहाः ।
परिषत् त्र्यादिदेवानां संख्यायाखिलदिक्स्थिताः ॥४८॥

तावन्तोऽत्रास्य देवस्य परिवारसुधाभुजाम् ।
सर्वे जम्बूद्रुमा ज्ञेयाः शाखाग्रसौधसंयुताः ॥४९॥

व्यासायामोन्नता जम्बूवृक्षस्यार्धोच्छ्रितादिभिः ।
एकैक श्रीजिनागारालंकृताः क्षयदूरगाः ॥५०॥

विशेषोऽयं भवेदत्र चतुर्दिक्षु गृहद्रुमाः ।
चत्वारोऽस्याग्रदेवीनां स्युः पद्मरागतन्मयाः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 48 से 51): [पद्मद्रह में स्थित] श्री देवी की चारों दिशाओं में स्थित तीन परिषद् आदि के समस्त परिवार देवों के कमल स्थित प्रासादों की जितनी संख्या है, उतनी ही संख्या इस अनावृत देव के परिवार देवों की है। ये समस्त परिवार जम्बूवृक्ष शाखा के अग्रभाग पर प्रासादों से संयुक्त हैं ऐसा जानना चाहिए। इन परिवार जम्बूवृक्षों की चौड़ाई, लम्बाई एवं ऊँचाई मूल जम्बूवृक्ष के अर्ध प्रमाण है और प्रत्येक परिवार जम्बूवृक्ष एक एक अकृत्रिम जिन चैत्यालय से अलंकृत है। अर्थात् जितने (१४०१२०) जम्बूवृक्ष हैं, उतने ही अकृत्रिम जिन चैत्यालय हैं। श्रीदेवी के परिवार कमलों से यहाँ इतना विशेष है कि प्रधान जम्बूवृक्ष की चारों दिशाओं में अनावृत देव की चार पट्टदेवाङ्गनाओं के पद्मरागमणिमय चार गृहद्रुम अधिक हैं ॥४८-५१॥ प्रधान जम्बूवृक्ष की आग्नेय दिशा में अन्तः पारिषद देवों के बत्तीस हजार गृहों के आधारभूत जम्बूवृक्ष हैं। दक्षिण दिशा में मध्य पारिषद देवों के चालीस हजार गृह जम्बूवृक्ष हैं। नैऋत्य दिशा में बाह्य पारिषद देवों के अड़तालीस हजार प्रासाद जम्बूवृक्ष हैं। वायव्य और ईशान दिशा में सामानिक देवों के चार हजार गृहवृक्ष हैं। पश्चिम दिशा में सात अनीक देवों के सात गृहद्रुम हैं। चारों दिशाओं में अंगरक्षक देवों के सोलह हजार सौधवृक्ष हैं। चारों दिशाओं और चारों विदिशाओं में प्रतीहार देवों के उत्तम एक सौ आठ गृहों के आधारभूत वृक्ष हैं। चारों दिशाओं में अनावृत देव की चार पट्टदेवांगनाओं के भवनों से समन्वित चार वृक्ष हैं। प्रधान जम्बूवृक्ष के साथ इन सब प्रासाद युक्त जम्बूवृक्षों को एकत्रित करने पर-(१+३२०००+४००००+४८०००+४०००+७+१६०००+१०८+४)=१४०१२० अर्थात् एक लाख चालीस हजार एक सौ बीस प्रमाण होते हैं।


मेरोर्नैऋत्यदिग्भागे सीतोदापश्चिमे तटे।
निषधाद्रिसमीपेऽस्ति देवादिकुरुभूतले ॥५२॥

उत्सेधायामविस्तारैर्जम्बूवृक्षसमो महान्।
परिवारद्रुमैः सर्वैः शाल्मली वृक्ष ऊर्जितः ॥५३॥

तस्य दक्षिणशाखायां रत्नशाली जिनालयः।
वेणुदेवादिभिः पूज्यो जिनबिम्बभूतो भवेत् ॥५४॥

शेषशाखात्रयाग्रस्थप्रासादेषु वसेत् सुरः।
गरुडान्वयजो वेणुदेवो देवैः समं महान् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 52 से 55): सुदर्शन मेरु की नैऋत्य दिशा में, सीतोदा नदी के पश्चिम तट पर, निषध कुलाचल के समीप देवकुरु क्षेत्र में जम्बूवृक्ष के सदृश उत्सेध, आयाम एवं विस्तार से युक्त तथा समस्त (१४०१२०) परिवार वृक्षों से समन्वित एक अति शोभा सम्पन्न शाल्मली वृक्ष है। इसकी दक्षिण शाखा पर वेणुधारी आदि देवों द्वारा पूज्य और अनेक जिनबिम्बों से संकुलित रत्नमय जिनालय है। शेष तीन शाखाओं पर स्थित प्रासादों में अनेक परिवार देवों के साथ गरुड़कुलोत्पन्न वेणु नाम का महान् देव निवास करता है ॥५२-५५॥


नीलाद्रेर्दक्षिणे गत्वा सहस्त्रयोजनानि च।
भवेतां यमकाद्री द्वौ सीतायाः पार्श्वयोर्द्वयोः ॥५६॥

सहस्त्रयोजनोच्चौ यमककूटकाञ्चनाह्वयौ।
सहस्त्रयोजनव्यासौ मूले मध्ये च योजनैः ॥५७॥

सार्धसप्तशतैर्विस्तृतौ मूर्ध्नि शतपञ्चकैः।
परस्परान्तरौ दीप्रौ द्वौ पञ्चशतयोजनैः ॥५८॥

मूले भूमितले मूर्ध्नि वनवेदीयुतौ शुभौ।
जिनालयान्यधोऽधोच्चतोरणाद्यग्रभूषितौ ॥५९॥

तयोश्च शिखरे रत्नप्रासादेषून्नतेषु च।
सार्धद्विषष्टिसंख्यानै र्योजनैर्मणिशालिषु ॥६०॥

योजनैरेकगव्यूत्यग्रैकत्रिंशत्प्रमाणकैः।
व्यासायामेषु देवौ यमदेवकाञ्चनाभिधौ ॥६१॥

वसतः परिवाराढ्यौ पल्योपमैकजीवितौ।
तथान्येऽचलयोर्मूर्ध्नि सन्ति प्रासादपङ्क्तयः ॥६२॥

सप्तानीकसुसामान्यकाङ्गरक्षसुधाभुजाम् ।
चतुरग्रसुदेवीनां परिषत्त्रिसुधाशिनाम् ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 56 से 63): नील कुलाचल से दक्षिण में एक हजार योजन आगे जाकर सीता नदी के दोनों तटों पर यमककूट और काञ्चनगिरि नाम के दो यमकगिरि पर्वत हैं। ये दोनों यमकगिरि एक हजार योजन ऊँचे, मूल में एक हजार योजन चौड़े, मध्य में साढ़े सात सौ योजन और शिखर तल पर पाँच सौ योजन चौड़े हैं। इन दोनों देदीप्यमान शैलों का परस्पर का अन्तर भी पाँच सौ योजन प्रमाण है। इन दोनों पर्वतों के मूल में अर्थात् पृथ्वीतल पर और शिखरतल पर रमणीय वनवेदी से युक्त जिनालय हैं तथा जिनालयों के अग्रभाग तोरणों से सुशोभित हैं। दोनों पर्वतों के शिखरों पर स्थित मणियों से शोभायमान उन्नत रत्नमय उन्नत प्रासादों में एक पल्योपम प्रमाण आयु वाले यमक और काञ्चन नाम के देव अपने परिवार सहित निवास करते हैं। इनके ये प्रासाद साढ़े बासठ योजन ऊँचे और सवा इकतीस योजन प्रमाण लम्बे एवं चौड़े हैं। इन्हीं दोनों पर्वतों के शिखरों पर सात अनीकों के, सामानिक देवों के, अंगरक्षकों के, चार पट्ट देवांगनाओं के और तीनों परिषदों के देवों के भवन पंक्तिबद्ध स्थित हैं ॥५६-६३॥


निषधस्योत्तरे गत्वा सहस्रयोजनान्यपि।
स्तौ द्वौ यमकशैलौ सीतोदायास्तटयोर्द्वयोः ॥६४॥

विचित्रचित्राकूटाख्यौ पूर्वोक्त यमकप्रमौ।
चैत्यालयगृहारामव्यासोत्सेधादिवर्णनैः ॥६५॥

अनयो मूर्ध्नि सौधेषु प्रागुक्तोच्चादि शालिषु।
चित्रविचित्रनामानौ गीर्वाणौ वसतोऽद्भुतौ ॥६६॥

पूर्वोदिताङ्गरक्षादि सर्वदेवाग्रयोषिताम्।
एतयोः शिखरे सन्ति प्रासादतोरणादयः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): निषध कुलाचल से उत्तर में एक हजार योजन आगे जाकर सीतोदा नदी के दोनों तटों पर विचित्र और चित्र कूट नाम के दो यमकगिरि हैं। इन पर्वतों पर स्थित जिन चैत्यालयों, प्रासादों एवं वनों के व्यास एवं उत्सेध आदि का समस्त वर्णन पूर्वकथित दोनों यमक शैलों के सदृश है। इन दोनों शैलों के शिखर पर स्थित पूर्वोक्त ऊँचाई आदि से युक्त शोभायमान प्रासादों में चित्र, विचित्र नाम के अद्भुत पुण्यशाली देव निवास करते हैं। इन पर्वतों के शिखरों पर पूर्वकथित अंगरक्षक आदि सर्व देवों के और दोनों देवों की चार-चार प्रमुख देवांगनाओं के तोरण आदि से युक्त प्रासाद हैं ॥६४-६७॥


यमकाद्री परित्यज्य यावत् पञ्चशतान्तरम्।
योजनानां सरित्सीताया उत्तरकुरुक्षितेः ॥६८॥

मध्ये पञ्चद्रहाः सन्ति श्रीपद्मह्रद सन्निभाः।
शतपञ्चप्रमैर्योजनैरन्तरान्तरस्थिताः ॥६९॥

ह्रदोनीलाह्वयोऽत्राद्यस्तथोत्तरकुरुर्द्रहः ।
चन्द्राैरावतो माल्यवानेतन्नामसंयुताः ॥७०॥

सीतामध्यस्थिता एते ज्ञेयाः पंचद्रहाः शुभाः।
देवी नीलकुमारी चोत्तराद्यन्तकुमारिका ॥७१॥

चन्द्रकुमारिकाथैरावत कुमारिका तथा।
माल्यवतीति नामाढ्या पंच नागकुमारिका ॥७२॥

पुण्यलक्षणभूषाढ्या वसन्ति पुण्यपाकतः॥
द्रहस्थपद्मगेहेषु स्वपरिवारवेष्टिताः ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 68 से 73): यमकगिरि से पाँच सौ योजन जाकर उत्तरकुरु भोगभूमि स्थित सीता सरित् के मध्य में पद्मद्रह के सदृश पाँच द्रह हैं। ये पाँचों द्रह पाँच-पाँच सौ योजन के अन्तराल से स्थित हैं तथा नीलवान्, उत्तरकुरु, चन्द्रद्रह, ऐरावतद्रह और माल्यवान् नाम से संयुक्त हैं। ये शुभ पाँच द्रह सीता नदी के मध्य में स्थित हैं, ऐसा जानना चाहिए। इन पाँचों द्रहों में स्थित कमलों पर निर्मित प्रासादों में अपने-अपने परिवारों से वेष्टित और पूर्वोपार्जित पुण्य के फल से शुभ लक्षण और शुभ वस्त्राभूषणों से अलंकृत नीलकुमारी, उत्तर (कुरु) कुमारी, चन्द्रकुमारी, ऐरावत कुमारी और माल्यवती नाम की पाँच नागकुमारियाँ क्रमशः निवास करती हैं ॥६८-७३॥


त्यक्त्वान्यौ यमकाद्री योजनपंचशतान्तरम्।
स्युर्द्रहाः पंचसीतोदामध्ये देवकुरुक्षितौ ॥७४॥

प्रथमो निषधाभिख्यो ततो देवकुरुर्द्रहः।
सूर्याख्यः सुलसो विद्युत्प्रभ इत्याख्यनामकाः ॥७५॥

ज्ञेयाः पंचद्रहा रम्याः समाः श्रीह्रदवर्णनैः।
निषधादिकुमारीदेवादिकुरुकुमारिकाः ॥७६॥

देवी सूर्यकुमारी सुलसा विद्युत्प्रभाह्वया।
वसन्तिद्रहगेहेषु पंचेमा नागकन्यकाः ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 74 से 77): अन्य दो (विचित्र और चित्र) यमकगिरि पर्वतों से पाँच सौ योजन जाकर देवकुरु भोगभूमि में स्थित सीतोदा नदी के मध्य में पाँच द्रह हैं। इन पाँचों द्रहों का नाम निषध द्रह, देवकुरुद्रह, सूर्यद्रह, सुलसद्रह और विद्युत्प्रभद्रह है। इन रमणीक पाँचों द्रहों का समस्त वर्णन श्रीदेवी के पद्मद्रह के सदृश है। द्रह स्थित कमलों पर निर्मित प्रासादों में क्रमशः निषधकुमारी, देव (कुरु) कुमारी, सूर्य कुमारी, सुलसा कुमारी और विद्युत्प्रभा नाम की पाँच नागकुमारियाँ निवास करती हैं ॥७४-७७॥


पुनः पंच द्रहाः पूर्वभद्रशालवने परे।
मध्ये सीतामहानद्याः स्युः प्राग्नामादि संयुताः ॥७८॥

पश्चिमे भद्रशालेऽन्ये सन्ति पंच द्रहा युताः।
निषधाद्याख्यदेवीभिः सीतोदाभ्यन्तरे क्रमात् ॥७९॥

एते पिण्डीकृताः सर्वे द्रहाः विंशतिरूर्जिताः।
वज्रमूलाः सपद्मा योजनपंचशतान्तराः ॥८०॥

सहस्त्रयोजनायामा दक्षिणोत्तरपार्श्वयोः ।
पूर्वापर सुविस्तीर्णाः शतपंचसुयोजनैः ॥८१॥

जलान्तसमवैडूर्यनालक्रोशाद्वयोच्छ्रिताः ।
जलाद्दशावगाहाः स्युर्वेदिकातोरणाङ्किताः ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 78 से 82): इसके पश्चात् पूर्व भद्रशाल वन में स्थित सीता महानदी के मध्य में पूर्व कथित नीलवान् उत्तरकुरु आदि नामों से युक्त अन्य पाँच द्रह हैं। जिनमें नीलवान् आदि देवियाँ-निवास करती हैं। पश्चिम भद्रशाल वन में स्थित सीतोदा नदी के मध्य में निषधवान् आदि पूर्वोक्त नाम वाले अन्य पाँच द्रह हैं, जिनमें निषध आदि नाम वालीं पाँच नागकुमारियाँ क्रमशः निवास करती हैं। ये सभी द्रह एकत्रित जोड़ने से बीस होते हैं। अर्थात् ५ द्रह उत्तरकुरु सम्बन्धी और ५ पूर्व भद्रशाल सम्बन्धी सीता नदी के मध्य में हैं, तथा ५ देवकुरु और ५ पश्चिम भद्रशाल सम्बन्धी सीतोदा के मध्य में हैं। वज्रमय है मूल जिनका, ऐसे कमलों से युक्त इन पाँचों द्रहों का पारस्परिक अन्तर पाँच सौ योजन प्रमाण है। ये पाँचों द्रह दक्षिणोत्तर दिशा में एक हजार योजन लम्बे और पूर्व-पश्चिम पाँच सौ योजन चौड़े हैं। एक एक द्रह दश योजन गहरे, रत्नमय वेदिकाओं से युक्त और मणिमय तोरणों से मण्डित हैं। प्रत्येक द्रहों में स्थित कमल समूहों की नाल वैडूर्यमय है और जल से दो कोस ऊँची है। अर्थात् पद्मनाल की कुल लम्बाई साढ़े दश योजन प्रमाण है, इसलिये दश योजन गहरे सरोवर को व्याप्त करती हुई जल से अर्ध योजन (दो कोस) प्रमाण ऊँची है ॥७८-८२॥ प्रत्येक सरोवरों के मध्य में एक एक अकृत्रिम कमल हैं, जो एक योजन चौड़े और और जल से दो कोस प्रमाण ऊँचे हैं तथा डेढ़ कोस लम्बाई वाले ग्यारह हजार पत्रों से युक्त और एक कोस विस्तार वाली कर्णिका से समन्वित हैं। प्रत्येक कमल की कर्णिका पर अनेक मणियों से निर्मित, रत्नमय वेदिका एवं तोरण आदि से अलंकृत, एक कोस लम्बे, अर्ध कोस चौड़े और पौन कोस ऊँचे एक एक भवन हैं। इन समस्त (२०) भवनों में अपने-अपने परिवार देवों से आवृत, पूर्वोक्त नाम वालीं दिव्य रूप धारणी नागकुमारियाँ निवास करतीं हैं। इन देवियों के प्रधान कमल स्थित भवनों से आग्नेय दिशा में अभ्यन्तर परिषद् देवों के ३२००० पद्मालय हैं।
दक्षिण दिशा में मध्य परिषद् देवों के ४०००० कमलयुक्त भवन हैं। नैऋत्य दिशा में बाह्य परिषद् देवों के ४८००० पद्मालय हैं। वायव्य और ईशान दिशा में सामानिक देवों के ४००० अम्भोज प्रासाद हैं। पश्चिम दिशा में सात-सात सेनाओं से मण्डित सात अनीकों के सात (७) पद्म गृह हैं। पूर्व आदि चारों दिशाओं में अंगरक्षक देवों के १६००० पद्मांकित भवन हैं। देवियों के प्रधान कमलों के चारों ओर अर्थात् आठों दिशाओं में प्रतीहार देवों के १०८ कमलगृह हैं (प्रत्येक दिशा में चौदह, चौदह और विदिशाओं में तेरह-तेरह इस प्रकार एक सौ आठ हैं) इस प्रकार उपयुक्त सर्व पद्मगृहों का एकत्रित योग (३२०००+४००००+४८०००+१६०००+४०००+१०८+७+१)=१४०११६ प्रमाण होता है। इन परिवार कमलालयों का आयाम, व्यास एवं उत्सेध प्रधान पद्मालय के आयाम आदि से अर्ध-अर्ध प्रमाण है। ये सभी सुगन्धित पद्माश्रित रत्नप्रासाद एक-एक जिनालय, रत्नमय वेदिका एवं तोरण आदि से अलंकृत जानना चाहिए। नागकुमारियों के प्रधान कमलों के साथ-साथ बीसों सरोवरों के समस्त कमलों का प्रमाण (१४०११६x२०)=२८०२३२० अर्थात् अट्ठाइस लाख दो हजार तीन सौ बीस है। जितने ये कमल हैं, इन पर स्थित उतने ही प्रासाद हैं (और उतने ही अकृत्रिम जिन चैत्यालय हैं)।


एषां सर्वद्रहाणां च पूर्वपश्चिमभागयोः।
प्रत्येकं पञ्च पञ्चैव पर्वताः काञ्चनाह्वयाः ॥८३॥

शतैकयोजनोत्सेधा मूले शतैकविस्तृताः।
पञ्चसप्ततिविस्तारा मध्येऽग्रे व्याससंयुताः ॥८४॥

पञ्चाशद्योजनैः स्वोच्चचतुर्थांशधरान्तगाः।
मूलाग्रेऽलंकृताः सन्ति वनवेदीसुतोरणैः ॥८५॥

एषां द्विशतसंख्यानां शिखरेषु महोन्नतैः।
जिनचैत्यालयै रत्नमयैः प्रासादपंक्तिभिः ॥८६॥

वेदिकातोरणाद्यैश्च भूषितानि पुराणि वै।
कल्पद्रुमादि युक्तानि भवन्ति शाश्वतानि भोः ॥८७॥

पुरेषु तेषु राजानः कांचनाख्याः सुरोत्तमाः।
दशचापोच्चदिव्याङ्गा वसन्ति पल्यजीविनः ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 83 से 88): इन उपयुक्त बीस द्रहों में से प्रत्येक द्रह के पूर्व पश्चिम (दोनों) तटों पर पाँच-पाँच (पूर्व तट पर २०×५=१०० और पश्चिम तट पर १००) काञ्चन नाम के पर्वत हैं। जो सौ योजन ऊँचे, मूल में-पृथ्वीतल पर सौ योजन चौड़े, मध्य में पचहत्तर योजन और शिखर पर पचास योजन चौड़े हैं। जमीन में इनका अवगाह (नींव) अपनी ऊँचाई का चतुर्थ भाग अर्थात् (१००/४)=२५ योजन प्रमाण है। ये पर्वत मूल और अग्र भाग में वन, वेदी एवं उत्तम तोरणों से युक्त हैं। उन दो सौ कांचन शैलों के शिखरों पर महा उन्नत रत्नमय जिन चैत्यालयों, प्रासाद पंक्तियों, वेदिकाओं एवं तोरणों आदि से विभूषित तथा शाश्वत कल्पवृक्षों से युक्त नगर हैं। उन काञ्चनगिरि के नगरों में दस धनुष उन्नत, उत्तम देह से संयुक्त और पल्योपम प्रमाण आयु के धारक काञ्चन नाम के उत्तम देव अधिपति स्वरूप से निवास करते हैं ॥८३-८८॥


योजनानां सहस्त्रे द्वे द्व्याग्रा नवतिः कले।
द्वे, हृदोभयवेद्योः सर्वेषां प्रत्येकमन्तरम् ॥८९॥

अर्थ: सीता-सीतोदा के मध्य स्थित अन्तिम ह्रद और उत्तर-दक्षिण भद्रशाल की वेदी इस सब में से प्रत्येक के बीच के अन्तर का प्रमाण २०९२ २/११ योजन है। अर्थात् अन्तिम द्रह से २०९२ २/११ योजन आगे जाकर भद्रशाल की वेदी अवस्थित है ॥८९॥


कुरुभूम्योर्द्वयोः पूर्वापरादि भद्रशालयोः ।
मध्ये च द्वि महानद्योः पार्श्वयोर्दिक्षुपर्वतौ ॥९०॥

द्वौ द्वौ दिग्गजनामानौ शतैकयोजनोन्नतौ ।
शतयोजनविस्तारौ मूलेऽग्रे विस्तरान्वितौ ॥९१॥

पंचाशद्योजनै रत्नप्रासादतोरणाङ्कितौ ।
वनवेदीजिनागारालंकृतौ भवतोऽद्भुतौ ॥९२॥

पद्मनीलाह्वयौ शैलौ सौवस्ति-कांजनाह्वयौ ।
कुमुदाद्रिपलाशाख्याववतं शाद्रिरोचनौ ॥९३॥

इति नामाश्रिता अष्टौ पूर्वादिदिक्षु दिग्गजाः ।
ज्ञेया एषां च मूर्धस्थमणिवेश्मसु पुण्यतः ॥९४॥

स्वस्वाद्रिनामसंयुक्ता अष्टौ व्यन्तरनिर्जराः।
देवदेवीपरिवारयुक्ता वसन्ति शर्मणा ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 90 से 95): देवकुरु, उत्तरकुरु इन दो भोगभूमियों में तथा पूर्व भद्रशाल और पश्चिम भद्रशाल वनों के मध्य में महानदी सीता और सीतोदा के दोनों तटों पर दो-दो दिग्गज पर्वत अवस्थित हैं। इन (आठों) दिग्गज पर्वतों की ऊँचाई सौ योजन, भूविस्तार सौ योजन और शिखर तल का विस्तार पचास योजन प्रमाण है। इन पर्वतों के शिखर तोरण आदि से युक्त रत्नमय प्रासादों, वनों, वेदियों एवं अद्भुत वैभवशाली जिन चैत्यालयों से अलंकृत हैं। पूर्वादि दिशाओं में पद्म, नील, स्वस्तिक, अञ्जन, कुमुद, पलाश, अवतंश और रोचन नाम के आठ दिग्गज पर्वत हैं। अर्थात् सुदर्शनमेरु के पूर्व दिशा गत भद्रशालवन के मध्य से बहने वाली सीता के उत्तर तट पर पद्मोत्तर और दक्षिण तट पर नीलवान् नाम के दिग्गज हैं। इसी मेरु की दक्षिणदिशा गत देवकुरु भोगभूमि के मध्य सीतोदा महानदी के पूर्व तट पर स्वस्तिक और पश्चिम तट पर अञ्जन नाम के दिग्गज हैं। सुमेरु की पश्चिम दिशागत भद्रशाल वन के मध्य सीतोदा नदी के दक्षिण तट पर कुमुद और उत्तर तट पर पलाश नाम के दिग्गज हैं तथा मेरु को उत्तर दिशागत उत्तरकुरु भोगभूमि के मध्य सीता के पश्चिम तट पर अवतंश और पूर्व तट पर रोचन नाम के दिग्गज पर्वत हैं। इन दिग्गजों के शिखरों पर स्थित मणिमय भवनों में पूर्व पुण्य के उदय से अपने-अपने पर्वतों सदृश नामों से युक्त आठ व्यन्तर देव अपने-अपने देव देवियों के परिवार से युक्त होते हुए सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥९०-९५॥


विदेहा मुनयो यत्र भवन्त्यनेकशोऽनिशम्।
रत्नत्रयतपोयोगैः ससार्थनामभृन्महान् ॥९६॥

विदेहो राजते वेदिवक्षाराद्रयन्तराश्रितः।
विभङ्गाभिर्युतः पूर्वापरद्व्यनेकभेदभाक् ॥९७॥

विभक्तः सीतया पूर्वविदेहोऽसौ द्विधा भवेत्।
उत्तराख्योऽपरो दक्षिणश्चेति स द्विनामभृत् ॥९८॥

सीतोदया कृतो द्वेधा परदिग्भागसंस्थितः।
दक्षिणोत्तरभेदाभ्यां स्याद्विदेहोऽपराभिधः ॥९९॥

सीताया उत्तरे भागे नीलाद्रेर्दक्षिणेऽस्ति च।
उत्तरप्राग्विदेहः पूर्वे ह्युत्तरकुरुक्षितेः ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 96 से 100): रत्नत्रय और तप के योग से यहाँ पर अनेक मुनिराज निरन्तर देह से रहित अर्थात् सिद्ध होते हैं, इसलिए वह ‘विदेह’ इस महान् सार्थक नाम को धारण किये हुए है। वेदियों और वक्षार पर्वतों से अन्तरित, विभंगानदियों से युक्त तथा दो और अनेक भेदों को धारण करता हुआ विदेह क्षेत्र शोभायमान है (सुदर्शन मेरु से अन्तरित होता हुआ) पूर्व विदेह सीता महानदी के द्वारा उत्तर विदेह और दक्षिण विदेह के नाम से दो प्रकार का है। इसी प्रकार सीतोदा महानदी द्वारा विभाजित किया गया पश्चिम विदेह, दक्षिण विदेह और उत्तर विदेह के भेद से दो प्रकार का है। सीतानदी के उत्तर में, नील कुलाचल के दक्षिण में और उत्तरकुरु भोगभूमि के पूर्व में उत्तर-पूर्व विदेह क्षेत्र है ॥९६-१००॥


अस्यादौ भद्रशालस्य रत्नवेदी क्षयातिगा।
शतपंचधनुर्व्यासाद्द्विक्रोशप्रोन्नता भवेत् ॥१०१॥

योजनानां सहस्त्राणि शतपंचाग्रषोडश।
तथा द्विनवतिर्भागौ द्वौ कृतैकोनविंशतेः ॥१०२॥

इत्यायामोऽस्ति वेद्याश्च तथान्या वनवेदिकाः।
सप्तैवास्याः समाना विज्ञेयादीर्घोच्चविस्तरैः ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 101 से 103): इस उत्तर-पूर्व विदेह क्षेत्र के प्रारम्भ में भद्रशाल वन की क्षय से रहित रत्नमय वेदी है। यह वन वेदी दो कोस ऊँची, पाँच सौ धनुष चौड़ी और १६५९२ २/१९ योजन लम्बी है। इसी प्रकार अन्य सात (३ वेदिकाएँ भद्रशाल की, २ देवारण्य और २ भूतारण्य की =७) वन वेदिकाओं की दीर्घता एवं विस्तार आदि का प्रमाण जानना चाहिए। अर्थात् आठों वन वेदिकाएँ दो कोस ऊँची, ५०० धनुष चौड़ी और १६५९२ २/१९ योजन लम्बी हैं ॥१०१-१०३॥


ततोऽस्याः पूर्वदिग्भागे दक्षिणे नीलशैलतः।
सीताया उत्तरे कच्छाख्यः स्याद् विषय ऊर्जितः ॥१०४॥

योजनानां सहस्रे द्वे द्वादशाग्रशतद्वयम्।
सार्धक्रोशत्रयं चेति व्यासोऽस्य पूर्वपश्चिमे ॥१०५॥

आयामो वेदिकातुल्यो दक्षिणोत्तरभागयोः।
विदेहविस्तृतेः सीताव्यासोनस्यार्धसम्मितः ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 104 से 106): इस भद्रशाल वन वेदी के पूर्व में, नील कुलाचल के दक्षिण में और सीता सरित् के उत्तर में कच्छ नाम का एक महान् देश है। इस देश की पूर्व-पश्चिम चौड़ाई दो हजार दो सौ बारह योजन (२२१२ योजन) और ३ १/२ कोश है तथा दक्षिणोत्तर लम्बाई वेदिका की लम्बाई प्रमाण अर्थात् १६५९२ २/१९ योजन है। विदेह के विस्तार में सीतानदी का व्यास घटाकर आधा करने पर कच्छ देश के आयाम का प्रमाण प्राप्त हो जाता है। यथा-विदेह का विस्तार ३३६८४ ४/१९ योजन और सीता का विस्तार ५०० योजन प्रमाण है, अतः ३३६८४ ४/१९ -५००÷२=१६५९२ २/१९ योजन कच्छ देश के आयाम का प्रमाण प्राप्त होता है ॥१०४-१०६॥


अस्य देशस्य मध्येऽर्द्धे विजयार्धाचलो महान्।
शुक्लवर्णः समुत्तुङ्गः पंचविंशतियोजनैः ॥१०७॥

पंचाशद्योजनव्यासो भूम्यवगाहसंयुतः।
क्रोशाग्रयोजनैः षड्भिः स्याद्विद्येशामराश्रितः ॥१०८॥

विजयव्यासमानेन पूर्वापरायतः समः।
मूर्ध्नि स्वोच्चचतुर्थांशतुङ्गकूटनवाङ्कितः ॥१०९॥

दशयोजनमभ्येत्यभूमेरस्य द्वयो र्दिशोः।
श्रेण्यौ द्वे भवतो रम्ये दक्षिणोत्तरसंज्ञिके ॥११०॥

अद्रिदीर्घसमायामे दशयोजनविस्तृते।
तन्मध्येऽस्त्यद्रिविस्तीर्णस्त्रिंशत्प्रमाणयोजनैः ॥१११॥

तयोः श्रेण्योर्द्वयोः सन्ति नगराणि खगामिनाम्।
महान्ति पंचपंचाशत्प्रत्येकं भूषितानि च ॥११२॥

जिनागारैर्महासौधैः शालगोपुरसद्द्मनैः।
प्रागुक्तनामदीर्घादिवर्णनान्तर्युतान्यपि ॥११३॥

पुनर्द्धयोर्दिशोर्गत्वा दशैवास्य योजनानि च।
प्रागुक्तायामविस्तारे श्रेण्यौ द्वे स्तो मनोहरे ॥११४॥

सन्त्येतयोर्द्वयोः श्रेण्योर्बहुदिव्यपुराणि च।
सौधर्मेशानकल्पस्थाभियोगिक सुधाशिनाम् ॥११५॥

ततोऽप्यूर्ध्वं महाद्रेश्च गत्वा सप्तञ्च योजनान्।
दशयोजनविस्तीर्णं मस्तकं स्यान्मनोहरम् ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 107 से 116): इस कच्छ देश के मध्य में विजय-देश को आधा करने वाला शुक्ल वर्ण का एक महान् विजयार्ध नाम का पर्वत है। जिसकी ऊँचाई पच्चीस योजन, भूव्यास पचास योजन, अवगाह (नींव) सवा छह योजन तथा पूर्व पश्चिम लम्बाई कच्छ देश के व्यास सदृश अर्थात् २२१२ योजन ३ १/२ कोश है। इस पर्वत पर विद्याधर और देवगण निरन्तर निवास करते हैं। इसके शिखर तल पर पर्वत की ऊँचाई के चतुर्थ भाग प्रमाण ऊँचाई वाले नौ कूट अवस्थित हैं। पर्वत की उत्तर-दक्षिण दोनों दिशाओं में भूमि से दश योजन ऊपर दक्षिण-उत्तर नाम वाली दो रमणीक श्रेणियाँ हैं, जिनका विस्तार दस योजन और पूर्व-पश्चिम आयाम पर्वत के आयाम सदृश अर्थात् २२१२ योजन ३ १/२ कोश प्रमाण है। दस-दस योजन की दोनों श्रेणियाँ निकल जाने के बाद पर्वत के मध्य में विजयार्ध का विस्तार तीस योजन प्रमाण रहता है। उन उत्तर-दक्षिण दोनों श्रेणियों में से प्रत्येक श्रेणी पर विद्याधरों की पचपन-पचपन नगरियाँ हैं, जो जिनचैत्यालयों, उन्नत प्रासादों, प्राकारों, गोपुरों एवं उत्तम वनों से विभूषित हैं। इन नगरों के नाम एवं दीर्घता आदि के प्रमाण का वर्णन पूर्वोक्त प्रकार ही है। इसके बाद पुनः पर्वत की ऊँचाई में दस योजन ऊपर जाकर उत्तर-दक्षिण दोनों दिशाओं में पूर्वोक्त आयाम (२२१२ योजन ३ १/२ कोश) और विस्तार (१० योजन) से युक्त दो मनोहर श्रेणियाँ हैं। इन दोनों श्रेणियों पर सौधर्मेशान कल्पवासी देव सम्बन्धी आभियोग्य देवों के अनेक दिव्य नगर हैं। पर्वत की ऊँचाई में इससे भी पाँच योजन ऊपर जाकर अत्यन्त मनोहर और दश योजन चौड़ा शिखर तल प्राप्त होता है ॥१०७-११६॥


सिद्धाख्यं दक्षिणार्धं च खण्डप्रपातसंज्ञकम्।
पूर्णभद्राह्वयं कूटं विजयार्धाभिधं ततः ॥११७॥

माणिभद्रं तमिस्राख्यमुत्तरार्धाभिधानकम्।
कूटं वैश्रवणं तत्र नवकूटान्यमून्यपि ॥११८॥

सिद्धकूटे जिनागारः प्राग्वर्णनायुतो भवेत्।
खण्डप्रपातकूटाग्रे नट्टमाली सुरो वसेत् ॥११९॥

तमिस्रे कृतमाली च षट्कूटाग्रस्थवेश्मसु।
स्वकूटसमनामानो वसन्ति व्यन्तरामराः ॥१२०॥

व्यासो मूले च कूटानां क्रोशाग्रयोजनानि षट्।
मध्ये सार्द्धद्विगव्यूत्यग्रयोजनचतुष्टयम् ॥१२१॥

योजनत्रितयं मूर्ध्नि ह्यादौ परिधिरुत्तमा।
विस्तृता योजनैर्विंश प्रमैर्मध्ये च मध्यमा ॥१२२॥

परिधिः स्याद्धि किञ्चिन्न्यूनपञ्चदशयोजनैः।
शिखरे योजनानां सविशेषा नवसंख्यया ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 117 से 123): विजयार्ध पर्वत के दश योजन विस्तीर्ण शिखर तल पर सिद्ध, दक्षिणार्ध, खण्डप्रपात, पूर्णभद्र, विजयार्ध, माणिभद्र, तमिस्रगुह, उत्तरार्ध और वैश्रवण नाम के नौ कूट हैं। इनमें से प्रथम सिद्धकूट पर पूर्व वर्णन के अनुसार ही जिनचैत्यालय है। खण्डप्रपातकूट पर नट्टमाली (नृत्यमाल) और तमिस्रगुह कूट पर कृतमाली तथा अवशेष छह कूटस्थ प्रासादों में अपने-अपने कूट नामधारी व्यंतर देव रहते हैं। कूटों की चौड़ाई मूल में सवा छह (६ १/४) योजन, मध्य में चार योजन ढाई कोस (४ योजन २ १/२ कोस) और शिखर पर तीन (३) योजन प्रमाण है। कूट के मूलभाग की अर्थात् आदि की उत्तम परिधि का प्रमाण बीस योजन, कूट के मध्य भाग की मध्यम परिधि का प्रमाण कुछ कम पन्द्रह योजन और शिखर पर कूटों की परिधि का प्रमाण कुछ अधिक नौ योजन प्रमाण है ॥११७-१२३॥


पञ्चाशद्योजनायामे योजनाष्टसमुन्नते।
गुहे तमिस्रकाण्डप्रपाताख्ये स्तोऽत्र पर्वते ॥१२४॥

योजनद्वादशव्यासे तिमिरोष्माभिपूरिते।
महावज्रकपाटद्वयाङ्किते शाश्वते शुभे ॥१२५॥

अस्योभयोर्दिशोर्नित्यं वनं द्विक्रोशविस्तृतम्।
वेदिकातोरणैर्युक्तं जिनालयपुरादिभिः ॥१२६॥

इत्येषा वर्णना सर्वा विदेहे द्विविधेऽखिले।
द्वात्रिंशद्विजयार्धानां समानास्त्युन्नतादिभिः ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 124 से 127): इस विजयार्ध पर्वत में तमिस्र और प्रपात नाम की दो गुफाएँ हैं, जो पचास योजन लम्बी, आठ योजन ऊँची बारह योजन चौड़ी, अन्धकार और उष्णता से भरी हुई, दो महावज्र कपाटों से युक्त, शाश्वत और शुभ हैं। पर्वत की दोनों दिशाओं में जिन चैत्यालयों, नगरों, वेदिकाओं एवं तोरणों से युक्त दो कोस चौड़े शाश्वत वन हैं। इसी प्रकार का यह समस्त वर्णन पूर्व विदेह, अपर विदेह में अथवा बत्तीस विदेहों में और बत्तीस विजयार्धों की ऊँचाई आदि में समान रूप से है ॥१२४-१२७॥


नीलाद्र्यधःस्थ भूभागे सार्धद्विषष्टियोजनैः।
विस्तृते चावगाहाढ्ये दशयोजनसंख्यया ॥१२८॥

वेदिकातोरणद्वारोपेते स्वच्छाम्बुबिभृते।
द्वे कुण्डे स्तः पृथग् रक्तरक्तोदोत्पत्तिकारणे ॥१२९॥

इत्युक्तविस्तृताद्यैः सर्वाणि कुण्डानि धीधनैः।
सदृशानि चतुःषष्टिर्ज्ञेयानि शाश्वतानि च ॥१३०॥

नीलाद्रिनिषधाधःस्थभूमिष्वति शुभान्यपि।
चतुःषष्ठिनदीनां स्वोत्पत्तिभूतानि नान्यथा ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 128 से 131): नीलपर्वत के अधोभाग में भूमि पर साढ़े बासठ योजन चौड़े, दस योजन गहरे, वेदिका और तोरणों से संकुलित तथा स्वच्छ जल से भरे हुए रक्ता-रक्तोदा महानदियों की उत्पत्ति के कारण भूत पृथक्-पृथक् दो कुण्ड हैं। इस प्रकार विद्वानों के द्वारा समस्त चौंसठ (६४) ही शाश्वत कुण्ड पूर्वोक्त कुण्डों के विस्तार आदि के सदृश ही कहे गये हैं, ऐसा जानना चाहिए। नील और निषध कुलाचलों के अधोभाग में पृथ्वी पर (विदेहस्थ गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदा इन) चौंसठ नदियों के (पतन और) उत्पत्ति के कारणभूत अत्यन्त शुभ चौंसठ कुण्ड हैं, इसमें संशय नहीं है ॥१२८-१३१॥


कुण्डयोर्दक्षिणद्वाराभ्यां निर्गत्योर्म्मिसंकुले ।
क्रोशाग्रयोजनैः षड्भिरादौ विस्तारसंयुते ॥१३२॥

अर्धक्रोशावगाहे द्वे रक्ता रक्तोदसंज्ञिके।
नद्यौगुहास्थदेहल्या-अधोभागे विनिर्गते ॥१३३॥

अद्रेर्गुहान्तरे ज्ञेयो विस्तारः खण्डवर्जितः।
अष्टयोजनसंख्यो द्विनद्योः सर्वत्र सन्निभः ॥१३४॥

ततोऽभ्येत्य क्रमाद्नद्यौ सार्धद्विषष्टियोजनैः।
विस्ताराद्यवगाहे द्वे पञ्चक्रोशैर्मनोहरे ॥१३५॥

सीतायास्तोरणद्वाराभ्यां प्रविष्टे क्षयोज्झिते।
द्विपार्श्वस्थमहावेदीवनतोरणभूषिते ॥१३६॥

चतुर्दशसहस्राणि वनवेद्याद्यलंकृताः।
प्रत्येकमनयोः सन्ति परिवाराख्यनिम्नगाः ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 132 से 137): कल्लोलावलियों से व्याप्त, सवा छह योजन चौड़ी और अर्ध कोस गहरी रक्ता-रक्तोदा नाम की दोनों नदियाँ निषध कुलाचल के मूल में स्थित कुण्डों के दक्षिण द्वारों से निकलकर विजयार्ध स्थित गुफा की देहली के नीचे से जाती हुई गुफा में प्रवेश करती हैं। गुफा के भीतर इन सरिताओं का विस्तार हानि-वृद्धि से रहित सर्वत्र समान रूप से आठ योजन प्रमाण जानना चाहिए। इसके बाद मन को हरण करने वाली ये दोनों नदियाँ क्रमशः साढ़े बासठ योजन विस्तार और पाँच कोस के अवगाह को प्राप्त होतीं हुई, दोनों पार्श्वभागों में महान् वेदियों, वनों एवं तोरणों से विभूषित और अनाद्यनिधन सीता-सीतोदा की वेदियों के तोरण द्वारों से होती हुई सीता-सीतोदा में प्रवेश करतीं हैं। इन दोनों में से प्रत्येक की वन वेदी आदि से अलंकृत चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥१३२-१३७॥


सीतायास्तोरणद्वारयोरायामः पृथग्विधः।
सार्धद्विषष्टिसंख्यानि योजनानि तथोन्नतिः ॥१३८॥

योजनानां च पादोनचतुर्नवतिसम्मिता।
अर्धयोजनविस्तारो बह्व्यो, जिनेन्द्रमूर्तयः ॥१३९॥

तयोर्गोपुरयोर्मूर्ध्नि स्युः पुराणि सुधाभुजाम्।
युक्तानि वनवेद्याद्यैस्तुङ्गधामजिनालयैः ॥१४०॥

इत्येषा वर्णना सर्वा ज्ञातव्या सदृशी बुधैः।
चतुःषष्टिनदीनां चावगाहविस्तरादिभिः ॥१४१॥

सीतासीतोदयोर्नद्योर्द्वाराणां तटयोर्द्वयोः।
चतुःषष्टिप्रमाणानां सरित्प्रवेशादायिनाम् ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 138 से 142): सीता और सीतोदा के तोरण द्वारों का पृथक्-पृथक् आयाम साढ़े बासठ योजन, ऊँचाई एक पाद से कम चौरानवे (९३ ३/४) योजन और नींव अर्ध योजन प्रमाण है। इन दोनों नदियों के गोपुरों के ऊपर अत्यधिक जिनेन्द्र मूर्तियाँ और देवों के नगर हैं, वे नगर उत्तम जिनालयों, उन्नत प्रासादों, वनों एवं वेदियों आदि से संयुक्त हैं। सीता-सीतोदा नदियों के दोनों तटों पर स्थित नदियों को प्रवेश देने वाले चौंसठ (प्रवेश) द्वारों का तथा गंगा-सिन्धु (३२) और रक्ता-रक्तोदा (३२) इन ६४ नदियों के विस्तार एवं अवगाह आदि के प्रमाण का समस्त वर्णन विद्वानों के द्वारा इसके सदृश ही जानने योग्य है ॥१३८-१४२॥


विजयार्धाद्रिणा रक्तारक्तोदाभ्यां बभूव च।
कच्छादेशः षट्खण्ड आर्यैकम्लेच्छपञ्चभृत् ॥१४३॥

सीताया उत्तरे भागे विजयार्धस्य दक्षिणे।
रक्तारक्तोदयोर्मध्येऽस्त्यार्यखण्डं शुभाकरम् ॥१४४॥

अन्यानि म्लेच्छखण्डानि धर्मदूराणि पञ्च हि।
धर्मकर्मबहिर्भूतैः म्लेच्छैर्भृतानि दुःकुलैः ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 143 से 145): विजयार्ध पर्वत और रक्ता-रक्तोदा इन दो नदियों से कच्छा देश के छह खण्ड होते हैं, उनमें से एक आर्य और पाँच म्लेच्छ खण्ड हैं। सीतानदी के उत्तर में, विजयार्ध के दक्षिण में और रक्ता-रक्तोदा के मध्य में अत्यन्त शुभ चेष्टाओं से युक्त आर्य खण्ड है। शेष पाँच म्लेच्छ खण्ड धर्म रहित हैं और धर्म कर्म से बहिर्भूत तथा खोटे कुलोत्पन्न म्लेच्छों से भरे हैं ॥१४३-१४५॥


नीलाचलसमीपे त्रिखण्डानां विस्तरः पृथक्।
योजनानां त्रयस्त्रिंशदग्रसप्तशतानि च ॥१४६॥

क्रोशैकस्य षडंशेनोनद्विक्रोशयुतान्यपि।
षट्खण्डानां तथायामोऽष्टौ सहस्राणि द्वे शते ॥१४७॥

एकसप्ततिसंयुक्ते योजनानां पृथक् पृथक्।
एकोनविंश भागानां भागैको योजनस्य च ॥१४८॥

मूले रजतशैलस्य विस्तारः सरितो द्वयोः।
योजनानि चतुस्त्रिंशत् सार्धक्रोशायुतान्यपि ॥१४९॥

विजयार्धसमीपे हि त्रिखण्डानां सुविस्तृतिः।
योजनानां द्विसप्ताधिकानि सप्तशतानि च ॥१५०॥

तथा पञ्चसहस्त्राणि धनुषां षट्शतानि च।
षट्षष्टिरेव हस्तौ द्वावंगुलान्यपि षोडश ॥१५१॥

अर्थ (श्लोक 146 से 151): नील कुलाचल के समीप में कच्छ देश के तीन खण्डों का पृथक्-पृथक् विस्तार सात सौ तैंतीस योजन छह भागों से हीन दो कोस (७३३ ११/२४ योजन) प्रमाण है, तथा छह खण्डों का पृथक्-पृथक् आयाम आठ हजार दो सौ इकहत्तर योजन और एक कला (८२७१ १/१९ योजन) प्रमाण है। विजयार्ध पर्वत के मूल में रक्ता-रक्तोदा नदियों में से प्रत्येक का विस्तार चौंतीस योजन और डेढ़ कोस से कुछ अधिक है। अर्थात् ३४ ३/८ योजन प्रमाण है। विजयार्ध पर्वत के समीप में तीनों खण्डों में से प्रत्येक खण्ड का विस्तार ७१४ योजन पाँच हजार छह सौ छियासठ धनुष, दो हाथ और सोलह अंगुल प्रमाण है ॥१४६-१५१॥


रक्तारक्तोदाव्यासोनकच्छादेशत्रिभागीकृतः विजयार्ध पार्श्वे आर्य म्लेच्छखण्डानां प्रत्येक विष्कम्भः
चतुर्दशाग्रसप्तशतयोजनानि पंचसहस्रषट्शतषट्षष्टिध्नूंषि च द्वौ करौ षोडशांगुलानि।

अर्थ: रक्ता-रक्तोदा के व्यास से हीन कच्छा देश के व्यास को तीन से भाजित करने पर विजयार्ध के समीप आर्यादि छह खण्डों में से प्रत्येक खण्ड का विस्तार प्राप्त होता है। यथा-कच्छा देश के विष्कम्भ का प्रमाण २२१२ ७/८ - (३४ ३/८ x २ रक्ता-रक्तोदा का वि.) ÷ ३ = ७१४ योजन, ५६६६ धनुष, २ हाथ और १६ अंगुल प्रत्येक खण्ड का विस्तार है।


सीतातटे त्रिखण्डानां विष्कम्भः षट्शतानि च।
षण्णवत्यधिकान्येव योजनानां पृथक् पृथक् ॥१५२॥

गव्यूत्येकषडंशेनोनानि क्षेमाह्वया पुरी।
आर्यखण्डस्य मध्येऽस्ति महती धर्ममातृका ॥१५३॥

योजनद्वादशायामा नवयोजनविस्तृता।
सहस्रगोपुरद्वारेः क्षुल्लकद्वारपंक्तिभिः ॥१५४॥

शतपञ्चप्रमै रत्नमयैः खातिकयावृता।
चतुष्पथसहस्रैः सहस्रद्वादशवीथिभिः ॥१५५॥

तुङ्गसौधजिनागारै-जैनसंघैर्जिनादिभिः ।
धर्मोत्सवशतैर्नित्यं भाति धर्मखनीव सा ॥१५६॥

मिथ्यात्वमठदुःशास्त्रकुदेवलिङ्गिवर्जिता ।
मिथ्यामतकुपाखण्डिडूरा वर्णत्रयान्विता ॥१५७॥

अत्रसप्तमहामेघा भ्रमराञ्जनसन्निभाः।
वर्षाकाले च वर्षन्ति सप्तसप्तदिनान्यपि ॥१५८॥

कुन्देन्दु सदृशा द्रोणमेघा द्वादशसंख्यकाः।
महासलिलसम्पूर्णा योग्यं कुर्वन्ति वर्षणम् ॥१५९॥

एकैकस्य सुमेघस्य सन्ति श्रीपतनाः शुभाः।
स्थूला नीरौघसंयुक्ता विंशत्यग्रशतत्रयम् ॥१६०॥

ततोऽतिवृष्ट्यनावृष्टिदुर्भिक्षाद्याः किलेतयः।
जायन्तेऽत्र न च निष्ठा अन्ये प्रजाऽसुखप्रदाः ॥१६१॥

उत्पद्यन्तेऽत्र तीर्थेशास्त्रिजगन्नाथसेविताः।
गणेशा गणनातीताश्चरमाङ्गाश्च योगिनः ॥१६२॥

चक्रिणो वासुदेवाश्च बलदेवास्तयोद्विषः।
नारदाः कामदेवाद्या जायन्ते नृसुरार्चिताः ॥१६३॥

राजा तथाधिराजश्च महाराजोऽर्धमण्डली।
मण्डलीको महामण्डलीकस्त्रिखण्डभूपतिः ॥१६४॥

अर्थ (श्लोक 152 से 164): सीता महानदी के तीर पर तीनों खण्डों का पृथक्-पृथक् विस्तार छठे भाग से हीन छह सौ छियानवे योजन (६९६२३/२८ यो.) प्रमाण है। आर्य खण्ड के मध्य में श्रेष्ठ धर्ममाता के सदृश क्षेमा नाम की नगरी है। इस नगरी का आयाम बारह योजन और विस्तार नौ योजन प्रमाण है तथा यह नगरी एक हजार गोपुर द्वारों एवं पाँच सौ क्षुल्लक (लघु) द्वारों से युक्त तथा रत्नमय खाई से वेष्टित है। धर्म की खान (आकर) के समान यह क्षेमा नगरी एक हजार चतुष्पथों, बारह हजार वीथियों, उन्नत प्रासादों, जिन चैत्यालयों, जिनसंघों, जिन प्रतिमाओं एवं नित्य प्रति होने वाले सहस्रों धर्म महोत्सवों के द्वारा शोभायमान रहती है। मिथ्या मठों अर्थात् मिथ्यात्व के पोषक मिथ्या आयतनों, कुशास्त्रों, कुदेवों एवं कुलिंगियों से रहित, मिथ्यामत और पाखण्डियों से विहीन यह नगरी तीन वर्णों के मनुष्यों से सदा समन्वित रहती है। यहाँ पर वर्षा काल में भ्रमर एवं अञ्जन के सदृश सात प्रकार के महामेघ सात-सात दिन तक वर्षा करते हैं। कुन्द पुष्प और चन्द्र के सदृश प्रभा वाले तथा प्रचुर जल से परिपूर्ण बारह द्रोणमेघ भी योग्य वर्षा करते हैं। इनमें से एक-एक के स्थूल जल के समूह से युक्त अत्यन्त शुभ तीन सौ बीस श्रीपतन (सरित्प्रपात) होते हैं। इस नगरी में कभी अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष आदि तथा और भी अन्य ईतियाँ (अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूसक, सलभ, शुक, स्वचक्र और परचक्र ये सात ईतियाँ हैं) नहीं होती। प्रजा को दुख देने वाले अन्य भी कोई अनिष्ट वहाँ नहीं होते। वहाँ पर तीन लोक के इन्द्रों (१०० इन्द्रों) से सेवित तीर्थंकर देव, गणनातीत गणधर एवं चरमशरीरी मुनिराज उत्पन्न होते हैं। मनुष्यों और देवों से पूजित चक्रवर्ती, वासुदेव, प्रतिवासुदेव, बलदेव, नारद और कामदेव आदि भी उत्पन्न होते हैं तथा राजा, अधिराजा, महाराजा, अर्धमण्डल, मण्डलीक, महामण्डलीक और त्रिखण्डपति भी उत्पन्न होते हैं ॥१५२-१६४॥


चक्रीषट्खण्डभूनाथः शतपञ्चमहीभृताम्।
पतिः स्यादधिराजश्च सहस्रभूभुजां पतिः ॥१६५॥

महाराजो महीपानां द्विसहस्रप्रमाजुषाम्।
स्वाम्यर्धमण्डलीकः स्याच्चतुः सहस्रभूभृताम् ॥१६६॥

नायको मण्डलीकश्चाष्टसहस्रमहीभुजाम्।
पतिर्भवेन्महामण्डलीको भूपशिरोमणिः ॥१६७॥

सहस्रषोडशानां सद्राज्ञां मुकुटशालिनाम्।
पतिः स्यादर्धचक्री च नृविद्येशसुरार्चितः ॥१६८॥

द्विषोडशसहस्त्राणां राज्ञां शेखरशालिनाम्।
स्वामी षट्खण्डभूनाथश्चक्रीरत्ननिधीश्वरः ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 165 से 169): (अठारह श्रेणियों के स्वामी को अथवा एक करोड़ ग्रामों के अधिपति को राजा कहते हैं।) ५०० राजाओं का अधिपति अधिराजा, एक हजार राजाओं का स्वामी महाराजा, दो हजार राजाओं का स्वामी अर्धमण्डलीक, चार हजार राजाओं का स्वामी मण्डलीक, आठ हजार राजाओं का स्वामी महामण्डलीक, सोलह हजार मुकुटबद्ध राजाओं का अधिपति अर्धचक्री (त्रिखण्डाधिपति) और बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं का स्वामी छह खण्डों का अधिपति, चौदह रत्न एवं नौ निधियों का अधीश्वर चक्रवर्ती होता है ॥१६५-१६९॥


षट्खण्डभरतनाथं द्वात्रिंशद्वरणपतिं सहस्त्राणाम्।
दिव्यमानुष्य भोगागारं विदुरिह धरम् ॥१७०॥

अर्थ: क्षेमापुरी की चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में फलों एवं पुष्पों से युक्त तीन सौ साठ-तीन सौ साठ उत्तम वन हैं ॥१७०॥


तत्रोत्पन्नो हि चक्रेशः प्राप्य रत्नचतुर्दश।
निधीन्नवषडङ्गाढ्यो निर्याति दिग्जयाप्तये ॥१७१॥

क्रमात् स साधयन् भूपान् दक्षिणाभिमुखेन च।
गत्वा सीतासरिद्वारे स्वसैन्येन वसेत्सुधीः ॥१७२॥

तत्र सेनापतिं चक्री नियोज्य बलरक्षणे।
दिव्यं रथमुदारुह्य सरिद् द्वारं प्रविश्य च ॥१७३॥

गत्वा नद्यन्तरे द्वादशयोजनानि सद्धनुः।
आदाय तन्निनादेन कम्पयन् नृखगाऽमरान् ॥१७४॥

अमोघाख्यं स्फुरद्दीप्रं शरं मुञ्चति पाणिना।
मागधावासमुद्दिश्य मागधद्वीपसंस्थितम् ॥१७५॥

चक्रिनामाङ्कितो बाणः कुर्वन् स्वध्वनिना द्रुतम्।
भयं तद्वासिदेवानां पतेद्देवसभाक्षितौ ॥१७६॥

मागधाख्योऽमराधीशः चक्रिनामाङ्कितं शरम्।
तं वीक्ष्य सहसादाय ज्ञात्वा चक्र्यागमं ध्रुवम् ॥१७७॥

अभ्येत्य शिरसा नत्वा चक्रेशं पूजयेन्मुदा।
दिव्याभरणरत्नाद्यैस्तदाज्ञां प्रोद्वहन्स्वयम् ॥१७८॥

अनेन विधिनाऽसौ वरतनुं व्यन्तराधिपम्।
शक्त्या वरतनु द्वीपाधीशं प्रभासनिर्जरम् ॥१७९॥

सीतान्तःस्थं प्रभासाख्यं द्वीपनाथं प्रसाध्य च।
ताभ्यां नेपथ्य रत्नादीन् बहून् गृह्णाति लीलया ॥१८०॥

इति दक्षिणदिग्भागे वासिनोऽमरभूपतीन्।
जित्त्वोत्तरदिशां जेतुमायाति स जयन् नृपान् ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 171 से 181): उस क्षेमापुरी नगरी में उत्पन्न होने वाले चक्रवर्ती चौदह रत्न, नौ निधियों को प्राप्त कर सेना से युक्त होते हुए दिग्विजय की प्राप्ति के लिये निकलते हैं। क्षेमापुरी से निकलकर सर्वप्रथम दक्षिणाभिमुख जाते हैं, वहाँ के सर्व नरेन्द्रों को क्रम से जीतते हुए उत्तम बुद्धि का धारक वह चक्रवर्ती सीता नदी के द्वार पर जाकर अपनी सेना के साथ ठहर जाते हैं। वहाँ सेना की रक्षा में सेनापति को नियुक्त कर आप स्वयं दिव्य रथ पर चढ़कर सीता नदी के द्वार में प्रवेश करते हुए नदी के भीतर बारह योजन पर्यन्त जाकर उत्तम धनुष बाण ग्रहण करते हैं, जिसकी टंकार से मनुष्यों विद्याधरों एवं देवों को कम्पायमान करते हुए मागधद्वीप में स्थित मागध देव के निवास स्थान का उद्देश्य कर अमोघ नाम के देदीप्यमान वाण को अपने हाथों से छोड़ते हैं। चक्रवर्ती के नाम से अंकित वह वाण अपनी ध्वनि से वहाँ के निवासी देवों को भय उत्पन्न कराता हुआ देव सभा के मध्य में गिरता है। देवों का अधीश्वर मागध नाम देव, चक्रवर्ती के नाम से अंकित उस वाण को देखकर तथा उसे ग्रहण करके और निश्चय से चक्रवर्ती का आगमन जानकर शीघ्र ही वहाँ आकर उन्हें शिर से नमस्कार करता है, तथा दिव्य वस्त्राभूषणों एवं रत्नसमूहों से प्रसन्नतापूर्वक चक्रवर्ती की पूजा करता हुआ उनकी आज्ञा को स्वयं अपने शिर पर धारण करता है। इसी प्रकार वह चक्री अपनी शक्ति विशेष से वरतनुद्वीप के अधीश्वर वरतनु नाम को व्यन्तराधिप को और सीता के तट पर स्थित प्रभास द्वीप के स्वामी प्रभास देव को अपने आधीन करके उनके बहुत से वस्त्राभरण और रत्न आदि क्रीड़ा मात्र में ग्रहण कर लेता है। इसी प्रकार दक्षिण दिशा में निवास करने वाले देवों एवं राजाओं को जीतकर वह चक्री उत्तर दिशा गत राजाओं को जीतने की इच्छा से उत्तर में आता है ॥१७१-१८१॥


क्रमेण विजयार्धाद्रि समीपेऽसौ बलावृतः।
रूप्याद्रि म्लेच्छखण्डादि साधनाय चिरं वसेत् ॥१८२॥

चक्र्यादेशेन सेनानीरश्वरत्नं खगामिनम्।
आरुह्याभ्येत्य रूप्याद्रेर्गुहाद्वारं सुदुर्गमम् ॥१८३॥

तमिश्राख्यं स्फुरद्दण्डरत्नेन घातयेत्तराम्।
तत् क्षणं स खमुत्पत्य म्लेच्छखण्डं व्रजेन्सुधीः ॥१८४॥

दण्डघातेन तद् द्वारकपाटोद्घाटनं भवेत्।
तन्मध्यादूष्मदाहौघो निर्याति दुस्सहस्तदा ॥१८५॥

षण्मासैर्यावदूष्मौघः शान्तः स्याच्छीतला गुहा।
तावत्सेनापतिम्लेच्छखण्डमेकं च साधयेत् ॥१८६॥

ततश्चक्रिमहासेना ह्यागत्याद्रिगुहामुखम्।
प्रविश्य यत्नतो गच्छेन्नद्या उभयपार्श्वयोः ॥१८७॥

क्रमेणास्य गुहामध्यभागे गत्वा नदीद्वयात्।
अग्रे गन्तुमशक्तं तत्सैन्यं चिन्तापरं वसेत् ॥१८८॥

गिरिद्विपार्श्वभित्तिस्थभूकुण्डाभ्यां विनिर्गते।
द्वे चोन्मग्नजलासंज्ञे निमग्नजलाह्वये ॥१८९॥

नद्यौ द्वियोजनायामे महोर्मिचयसंकुले।
रक्तामध्ये प्रविष्टे प्रवहत्तस्तत्र दुर्गमे ॥१९०॥

तदा चक्रधरादेशात् स्थपत्याख्यो नृरत्नवाक्।
दिव्यशक्त्यानयोर्नद्योः सेतुबन्धं प्रबन्धयेत् ॥१९१॥

तेनोत्तीर्य शनैर्नद्यौ पुण्येन सैन्य मूर्जितम्।
गुहाया उत्तरद्वारेण निर्गच्छति शर्मणा ॥१९२॥

अर्थ (श्लोक 182 से 192): चक्रवर्ती म्लेच्छ आदि खण्डों को जीतने के लिये उत्तर दिशा में क्रम से जाते हुए अपनी महान् सेना सहित विजयार्ध के समीप बहुत काल तक रहता है। चक्रवर्ती के आदेश से सेनापति आकाशगामी घोड़े (अश्वरत्न) पर चढ़कर विजयार्ध पर्वत को तमिश्र नाम की गुफा द्वार को देदीप्यमान दण्डरत्न से अत्यन्त जोर से घात करता (ठोकर मारता) है और वह उत्तम बुद्धि का धारी सेनापति तत्क्षण आकाश में उड़ता हुआ म्लेच्छ खण्ड को जाता है। दण्डघात के द्वारा उस गुफा के दोनों द्वार खुल जाते हैं और उसके भीतर से अत्यन्त दुस्सह ऊष्मा (उष्णता) का समूह निकलता है। छह मास के बाद वह उष्णता का समूह शान्त होता है और गुफा शीतल होती है तब तक सेनापति एक म्लेच्छ खण्ड को साध (जीत) लेता है। इसके बाद चक्रवर्ती की महान् सेना विजयार्ध गुफा द्वार के मुख में प्रवेश करके नदी के दोनों पार्श्वभागों में यत्नपूर्वक चलती हुई क्रम से गुफा के मध्यभाग में पहुँचकर उन्मग्नजला और निमग्नजला इन दोनों नदियों को पार करने में असमर्थ होती हुई चिन्तातुर होकर ठहर गई। विजयार्ध पर्वत के दोनों पार्श्वभागों की भित्ति (मूल में) स्थित दो कुण्डों से निकलने वालीं उन्मग्नजला और निमग्नजला नाम की दोनों नदियाँ दो योजन लम्बी और महान् कल्लोलों के समूह से संकुलित होकर बहतीं हुई अति दुर्गम रक्ता महानदी के मध्य में प्रविष्ट होती हैं। तब चक्रवर्ती के आदेश से स्थपति नाम का (बढ़ई) मनुष्य रत्न दिव्य शक्ति के द्वारा दोनों नदियों पर सेतुबन्ध का प्रबन्ध करता है। पुण्ययोग से समस्त सेना उन दोनों नदियों को शनैः शनैः उत्तीर्ण कर गुफा के उत्तर द्वार से सुखपूर्वक निकल जाती है ॥१८४-१९२॥


मध्यस्थम्लेच्छखण्डस्य धरामाक्रम्य चक्रभृत्।
तिष्ठेत् षडङ्गसंयुक्तो जेतुं म्लेच्छनृपान् बहून् ॥१९३॥

चक्रायागमं तदालोक्य म्लेच्छभूपा भयातुराः।
विज्ञापयन्ति चाभ्येत्याराध्य स्वकुलनिर्जरान् ॥१९४॥

तच्छ्रुत्वा ते क्रुधागत्यामरा मेघमुखाव्हयाः।
तत्सैन्यसुभटादीनां कुर्वन्त्युपद्रवं महत् ॥१९५॥

व्याघ्राद्यैर्भीषणैरूपैर्विविधैश्चक्रिपुण्यतः ।
मनाक् क्षोभं न गच्छन्ति सैन्यकास्तैरुपद्रवैः ॥१९६॥

पुनस्ते मेघधाराद्यैः स्थूलैः स्वविक्रियाकृतैः।
कुर्वते महतीं वृष्टिं विद्युतपातादि गर्जनैः ॥१९७॥

उपर्यस्य सुसेनायाः सप्ताहोरात्र मज्जसा।
तदात्रैकार्णवः स्याच्च मज्जयन् वनपादपान् ॥१९८॥

तदम्बुजलधौ चर्मरत्नं विस्तरति स्फुटम्।
द्विषड्योजनपर्यन्तं जलाभेद्यं हि वज्रवत् ॥१९९॥

तस्योपरि महत्सैन्यं तिष्ठेत्तस्मिन्नुपद्रवे।
तच्चर्मोपरि सेनाया मेघवाधादिहानये ॥२००॥

छत्ररत्नं जलाभेद्यं चर्मरत्नान्तमज्जसा।
प्रसरेदिति तद्द्वयं स्यादण्डकोपमम् ॥२०१॥

चतुर्द्वाराङ्कितस्यास्य मध्ये चक्रेशपुण्यतः।
निराबाधतया कृत्स्नं सैन्यं तिष्ठेत्स्वशर्मणा ॥२०२॥

ततश्चक्रधरो ज्ञात्वा तद्देवोत्थमुपद्रवम्।
देवानुद्दिश्य दिव्याङ्गं तथा वाणं विमुञ्चति ॥२०३॥

तथा ते निर्जरादुष्टा जायन्ते निःप्रभास्ततः।
ते निर्जिता विलोक्योच्चैश्चक्रिमाहात्म्यमूर्जितम् ॥२०४॥

देवा म्लेच्छनृपाश्चैव सेवां कुर्वन्ति चक्रिणः।
हस्त्यश्वरत्नकन्यादिदानैः प्रणाम भक्तिभिः ॥२०५॥

अर्थ (श्लोक 193 से 205): चक्रवर्ती विजयार्ध गुफा के उत्तर द्वार से निकलकर मध्य में स्थित मध्यम म्लेच्छ खण्ड की भूमि को प्राप्त कर अनेक म्लेच्छ राजाओं को जीतने के लिये षट् (छह) अंगों की सेना सहित ठहर गया। तब चक्रवर्ती के आगमन को देखकर भय से आकुलित म्लेच्छ राजा अपने कुल देवताओं के पास आकर और उनकी आराधना करके अपने भय का कारण कहने लगे। उसे सुनकर वे देवगण क्रोधित हो उठे और मेघमुख नाम के देव ने आकर चक्रवर्ती की सेना के सुभटों पर घोर उपद्रव किया। अनेक प्रकार के व्याघ्र आदि भीषण रूपों के द्वारा किये हुए अनेक उपद्रव चक्रवर्ती के पुण्य से सेना को किञ्चित मात्र भी क्षोभ नहीं पहुँचा सके। तब वे देव अपनी विक्रिया के द्वारा जल की मोटी-मोटी धारा के द्वारा जल की महान् वृष्टि, विद्युतपात एवं मेघगर्जन आदि करने लगे। सेना के ऊपर यह उपर्युक्त वर्षा सात दिन रात पर्यन्त होती रही, जिससे वहाँ वन के वृक्ष आदिकों को डुबाने वाला एक समुद्र हो गया। उस जल समुद्र के ऊपर बारह योजन पर्यन्त जल के द्वारा अभेद्य और वज्र के समान एक चर्मरत्न फैला दिया गया। उसके ऊपर वह महान् सेना उस उपद्रव के समय में ठहर गई। सेना की मेघ आदि की बाधा को दूर करने के लिये उस चर्मरत्न के ऊपर जल के द्वारा अभेद्य और चर्मरत्न के बराबर एक छत्ररत्न फैला दिया गया। ये दोनों रत्न मिलकर (एक ऊपर एक नीचे) अण्डा की आकृति के सदृश हो गये। चक्रवर्ती के पुण्य से चार द्वारों से युक्त इन दोनों रत्नों के बीच में समस्त सेना निराबाध और सुखपूर्वक ठहरी रही। इसके बाद “यह उपद्रव देवों द्वारा उत्पन्न किया गया है” यह जानकर चक्रवर्ती उन देवों का चिन्तन (लक्ष्य) करके ही एक दिव्य बाण छोड़ता है। उस एक ही बाण से वे दुष्ट देव कान्ति हीन हो गये तथा म्लेच्छ राजाओं के साथ-साथ वे सब देव चक्रवर्ती के महान् माहात्म्य को देखकर उनके पास आये और हाथी, अश्व, रत्न एवं कन्या आदि दान के द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी सेवा करने लगे ॥१९३-२०५॥


ततो म्लेच्छाधिपांश्चक्री साधयन् याति पुण्यतः।
मध्यमम्लेच्छखण्डस्थ वृषभाचलसन्निधिम् ॥२०६॥

तदा चक्राधिपो देवखगभूपजयोद्भवम्।
उद्वहन् परमं गर्वं वाञ्छन् स्वनामलेखनैः ॥२०७॥

स्वकीर्तिं निश्चलां कर्तुमभ्येत्याद्रिं निरीक्ष्य तम्।
निर्मदो जायतेऽनेक चक्रेशनामवीक्षणात् ॥२०८॥

अर्थ (श्लोक 206 से 208): म्लेच्छ खण्ड के राजाओं को जीतता हुआ चक्रवर्ती पुण्य के प्रभाव से मध्यम म्लेच्छ खण्ड में स्थित वृषभाचल के समीप पहुँचता है। देव एवं विद्याधर आदि राजाओं को जीत लेने से उत्पन्न होने वाले महान गर्व को धारण करता हुआ वह अपने नाम लेखन के द्वारा अपनी कीर्ति निश्चल करने की इच्छा से वृषभाचल को प्राप्त करता हुआ उसे देखता है तथा अनेक चक्रवर्तियों के नाम देखकर तत्क्षण निर्मद हो जाता है ॥२०६-२०८॥


शतयोजनविस्तीर्णो मूले मध्ये च योजनैः।
पंचसप्ततिसंख्यानैर्विस्तृतो मस्तके महान् ॥२०९॥

पंचाशत्संख्यकैर्भाति स योजनशतोन्नतः।
वनतोरणवेद्याद्यैर्मानहृद् वृषभाचलः ॥२१०॥

अनेन वर्णनेनात्र विदेहवृषभाद्रयः।
द्वात्रिंशन्निखिला ज्ञेयाः समाना उन्नतादिभिः ॥२११॥

तत्राचले निरस्याशु कस्यचिन्नाम चक्रभृत्।
लिखेत्स्वकुलनामाद्यैः प्रशस्तिं कीर्तये भुवि ॥२१२॥

अर्थ (श्लोक 209 से 212): चक्रवर्तियों के मान को हरण करने वाला यह वृषभाचल पर्वत सौ योजन ऊँचा, मूल में सौ योजन चौड़ा, मध्य में पचहत्तर योजन चौड़ा और शिखर पर पचास योजन चौड़ा है तथा वन, तोरण एवं वेदी आदि से सहित है। विदेह स्थित बत्तीस वृषभाचलों की ऊँचाई आदि का समस्त वर्णन इसी वृषभाचल के सदृश जानना चाहिए। इस वृषभाचल पर्वत पर चक्रवर्ती पृथ्वी पर अपनी कीर्ति स्थाई करने के लिये अन्य किसी चक्रवर्ती का नाम मिटाकर अपने कुल नामादि से युक्त प्रशस्ति लिखता है ॥२०९-२१२॥


ततः खण्डत्रयोत्पन्नान् जित्वा खगनृपामरान्।
तत्सारवस्तु कन्यादीन् गृहीत्वा याति पुण्यतः ॥२१३॥

रूप्याद्र्यपरभागस्थ गुहाद्वारेण चक्रभृत्।
प्राग्वच्चोद्घाटितेनैव तच्चमूपतिना स्वयम् ॥२१४॥

इति षट्खण्डभूवासिसुरभूपखगाधिपान्।
साधयित्वा क्रमात्तेभ्यः कन्यारत्नान्यनेकशः ॥२१५॥

वस्तुवाहनकोटींश्चादाय पुण्यात् स्वलीलया।
वज्रीव स्वपुरीं चक्री प्रविशेच्च षडङ्गभृत् ॥२१६॥

तत्रातिपुण्यपाकेन भुङ्क्ते भोगांश्च्युतोपमान्।
चक्रीदशविधान् कुर्वन् जिनधर्ममनारतम् ॥२१७॥

अर्थ (श्लोक 213 से 217): इसके बाद तीन खण्ड में उत्पन्न विद्याधरों, राजाओं और देवों को जीतकर पुण्य प्रताप से वहाँ की कन्या आदि सार वस्तुओं को लेकर चक्रवर्ती वापस आता है। जब चक्रवर्ती विजयार्ध पर्वत के पश्चिमस्थ गुफा द्वार पर आता है तब सेनापति स्वयं पूर्व के समान उस गुफा द्वार को खोलता है। इस प्रकार छह खण्डवासी देवों, नरेन्द्रों और विद्याधरों को क्रमशः जीतकर तथा अतिशय पुण्य से करोड़ों वस्तु, वाहन आदिकों को क्रीड़ा मात्र में ग्रहण करके चक्रवर्ती छह अंगों की सेना सहित इन्द्र पुरी के समान अपनी नगरी में प्रवेश करता है और वहाँ अत्यन्त पुण्योदय से उपमा रहित भोगों को भोगता हुआ जिनधर्म में है रत मन जिसका, ऐसा चक्रवर्ती दस प्रकार के धर्मों का पालन करता है ॥२१३-२१७॥


भवन्ति विषये चक्रिणो ये ग्रामपुरादयः।
भोग्याः सम्पद्बलाद्यास्तान् समासेनदिशाम्यहम् ॥२१८॥

स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्त्राणि देशास्तस्य च शाश्वताः।
नृपा मुकुटबद्धास्तावन्तो नमन्ति तत्क्रमौ ॥२१९॥

वृत्यावृता महा ग्रामाः कोटीषण्णवतिप्रमाः।
चतुर्गोपुरशालाद्यैर्वेष्टितानि पुराणि च ॥२२०॥

षड्विंशति सहस्त्राणि ग्रामैः पञ्चशतैर्युताः।
प्रत्येकं च मटम्बाः स्युश्चतुःसहस्रसम्मिताः ॥२२१॥

सरित्पर्वतयोर्मध्ये सहस्त्राण्येव षोडश।
खेटानि स्युर्भृतान्युच्चैर्जिनालयसुधार्मिकैः ॥२२२॥

चतुर्विंशसहस्त्राणि कर्वटान्यवृतानि च।
पर्वतेन जिनागारश्रावकादियुतान्यपि ॥२२३॥

पत्तनान्यष्टचत्त्वारिंशत्सहस्त्राणि सन्ति च।
रत्नोत्पत्त्यादिहेतूनि युक्तानि धनिधर्मिभिः ॥२२४॥

सहस्त्राणि नवाग्रा नवतिर्द्रोणमुखानि च।
सीतानदीजलोत्पन्नोपसमुद्रतटेष्वपि ॥२२५॥

चतुर्दशसहस्त्राणि संवाहनानि सन्ति वै।
पर्वताग्रेषु युक्तानि रत्नसौधजिनालयैः ॥२२६॥

अष्टाविंशसहस्राणि स्युर्दुर्गाणि महान्ति च।
अगम्यान्यस्य शत्रूणां धनिधर्मिभृतानि च ॥२२७॥

अन्तर्दीपा भवेयुः षट्पञ्चाशद्रत्नराशिभिः।
भृता उपसमुद्रस्य मध्ये सीतोत्तरे तटे ॥२२८॥

षड्विंशतिसहस्त्राणि रत्नाक‌रा महोन्नतैः।
सौधचैत्यालयैः पूर्णा रत्नभूसार वस्तुभिः ॥२२९॥

रत्नकुक्षिनिवासाः स्यु रत्नस्थानधरान्विताः।
शतसप्तप्रमा रम्या जिनधामादिधार्मिकैः ॥२३०॥

सीताया उत्तरे भागे क्षेमापुर्याश्च दक्षिणे।
भवत्युपसमुद्रोऽविनश्वरः स्वोर्मिसंकुलः ॥२३१॥

अर्थ (श्लोक 218 से 231): चक्रवर्ती के देश में जो ग्राम एवं पुर आदि होते हैं, उनका तथा उनके योग्य भोग्य सामग्री, सम्पदा एवं बल आदि का संक्षिप्त वर्णन करता हूँ। चक्रवर्ती के शाश्वत बत्तीस हजार देश होते हैं, जिनके बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा क्रम से उन्हें नमस्कार करते हैं। जो वृत्ति बाड़ से आवृत्त (घिरे हुए) होते हैं, उन्हें ग्राम कहते हैं, ऐसे छियानवे करोड़ महा ग्राम; चार गोपुर एवं उन्नत कोट आदि से वेष्टित छब्बीस हजार पुर, जो पाँच सौ ग्रामों से संयुक्त होते हैं, ऐसे चार हजार मडम्ब, (प्रत्येक मडम्ब चार हजार ग्रामों से युक्त होता है) नदियों और पर्वतों के मध्य रहना है लक्षण जिनका, ऐसे उन्नत जिनालयों एवं धार्मिक जनों से भरे हुए सोलह हजार खेट होते हैं। जो मात्र पर्वतों से घिरे हुए होते हैं, उन्हें कर्वट कहते हैं। ऐसे मुनि और श्रावकों से युक्त चौबीस हजार कर्वट होते हैं। धनी और धार्मिक जनों से युक्त तथा रत्न आदि उत्पत्ति के कारण भूत अड़तालीस हजार पत्तन हैं। सीता नदी के जल से उत्पन्न होने वाले उपसमुद्रों के तटों पर निन्यानवे हजार (९९०००) द्रोणमुख होते हैं। रत्नप्रासादों एवं जिनालयों से सहित पर्वतों के शिखरों पर चौदह हजार संबाह हैं जो अन्य शत्रुओं आदिकों को अगम्य हैं तथा धनी और धार्मिक जनों से भरे हैं ऐसे अट्ठाइस हजार (२८०००) महादुर्ग हैं। सीता के उत्तर तट पर उपसमुद्र के मध्य में रत्नों की राशियों से भरे हुए छप्पन (५६) अन्तर्द्वीप हैं। महा उन्नत प्रासादों से परिपूर्ण और रत्नों एवं भूमि की अन्य सारभूत वस्तुओं से समृद्ध छब्बीस हजार (२६०००) रत्नाकर हैं। रत्नों की स्थानभूत पृथ्वी से समन्वित तथा रमणीक जिनभवनों और धार्मिक जनों से अंचित सात सौ रत्नकुक्ष्निवास हैं। सीता के उत्तर भाग में और क्षेमापुरी के दक्षिण में अपने आप में उठने वालीं कल्लोलों से संकुलित और अविनश्वर उपसमुद्र है ॥२१८-२३१॥

सप्तम अधिकार देवकुरु, उत्तरकुरु, कच्छदेश तथा चक्रवर्ती की दिग्विजय एवं विभूति वर्णन (भाग 2/2)

लक्षाश्चतुरशीतिः स्युर्गजेन्द्राः पर्वतोपमाः।
तावन्तश्चक्रिणो रम्यारथावाजिद्वयाङ्किताः ॥२३२॥

शीघ्रगामिन एवास्याश्वा अष्टादशकोटयः।
कोटयश्चतुरशीतिः स्युर्द्रुतगामिपदातयः ॥२३३॥

स्याद्वज्रास्थिमयं वज्रवलयैर्वेष्टितं वपुः।
निर्भिन्नं वज्रनाराचैरभेद्यं तस्य सुन्दरम् ॥२३४॥

आदिमं च सुसंस्थानं चतुःषष्टिसुलक्षणैः।
व्यञ्जनैर्बहुभिर्युक्तं हेमाभं च च्युतोपमम् ॥२३५॥

षट्खण्डवासिभूपानां पिण्डीकृतं हि यद्बलं।
ततोऽधिकं महावीर्यं चक्रिणः स्यान्निसर्गतः ॥२३६॥

स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राण्यार्यखण्डस्थ नृपात्मजाः।
तावत्यो वररूपाश्च म्लेच्छराजसुताः शुभाः ॥२३७॥

तत्प्रमाः खचराधीशपुत्र्योविद्याकलान्विताः।
नाटकाः शर्मदा द्वात्रिंशत्सहस्त्रप्रमाः शुभाः ॥२३८॥

स्थाल्यः स्वर्णमयाः कोटिप्रमा अस्य महानसे।
स्यादेककोटिलक्षश्च हलानां पामरैः समम् ॥२३९॥

स्युस्तिस्रो व्रजकोट्योऽस्य गोकुलैः संकुलाः शुभाः।
अष्टादशसहस्त्राश्च म्लेच्छराजानमन्ति तम् ॥२४०॥

अर्थ (श्लोक 232 से 240): चक्रवर्ती के पर्वत की उपमा को धारण करने वाले चौरासी लाख हाथी और दो-दो घोड़ों से युक्त तथा रम्य चौरासी लाख ही रथ होते हैं। अठारह करोड़ शीघ्रगामी घोड़े और द्रुतगामी चौरासी करोड़ पदाति होते हैं। वज्रमय बाणों से अभेद्य, सन्धि रहित, वज्रमय अस्थि एवं वज्रवलय से वेष्टित चक्रवर्ती का शरीर अत्यन्त सुन्दर, समचतुरस्र संस्थान, चौंसठ उत्तम लक्षणों और अनेकों व्यञ्जनों से युक्त, हेम वर्ण एवं उपमा रहित होता है। छह खण्डवर्ती समस्त राजाओं के बल को एकत्रित करने पर जो बल होता है, उससे भी अधिक बल अर्थात् महावीर्य चक्रवर्ती के स्वभावतः होता है। आर्य खण्डस्थ राजाओं की बत्तीस हजार कन्याएँ, अनुपम रूप एवं शुभ लक्षणों से युक्त म्लेच्छ राजाओं की बत्तीस हजार कन्याएँ तथा विद्याओं एवं कलाओं से समन्वित विद्याधरों की बत्तीस हजार कन्याएँ अर्थात् चक्रवर्ती के छियानवे हजार रानियाँ होती हैं। सुख उत्पन्न करने वाले शोभनीक बत्तीस हजार नाटकगण, रसोई गृह में स्वर्णमय एक करोड़ प्रमाण थालियाँ अथवा हण्डियाँ होती हैं। एक लाख करोड़ किसानों के साथ-साथ एक लाख करोड़ प्रमाण ही हल होते हैं। नाना वर्णों की अत्यन्त शुभ लक्षण वाली गायों से भरे हुए तीन करोड़ व्रज होते हैं और चक्रवर्ती को अठारह हजार म्लेच्छ राजा नमस्कार करते हैं ॥२३२-२४०॥


कालाह्वयो महाकालो नैःसर्पः पाण्डुकाभिधः।
पद्माख्यो माणवः पिङ्गलाभिख्यः शंखसंज्ञकः ॥२४१॥

सर्वरत्न इमे सन्ति चक्रिणो निधयो नव।
निधिः कालोऽस्य पुण्येन पुस्तकानि ददाति च ॥२४२॥

सर्वलौकिकशब्दादि वार्तानामन्वहं तथा।
मनोज्ञानिन्द्रियार्थांश्च वीणावंशानकादिकान् ॥२४३॥

असिमस्यादिष्टकर्मसाधनद्रव्यसम्पदः ।
महाकालनिधिर्दत्ते पुण्यात्पुण्यनिधेः प्रभोः ॥२४४॥

शय्यासनालयादीनि नैःसर्पो वितरेद्विभोः ।
पाण्डुकोऽखिल धान्यानि षड्रसांश्च मनोरहान् ॥२४५॥

पट्टकूलादि वस्त्राणि दत्ते पद्मो महान्ति च।
रत्नाभरणविश्वानि दीप्तिशालीनि पिङ्गलः ॥२४६॥

शस्त्राणि नीतिशास्त्राणि सूते कृत्स्नानि माणवः।
शंखः प्रदक्षिणावर्तः सुवर्णानि महान्ति च ॥२४७॥

सर्वरत्ननिधिर्दद्याद्विशिष्टरत्नानि चक्रिणः।
सर्वेऽमी शकटाकारा निधयोऽद्भुतपुण्यजाः ॥२४८॥

चतुरक्षाष्टचक्राढ्या योजनाष्टसमुन्नताः।
नवयोजनविस्ताराः प्रत्येकं रक्षिताः सुरैः ॥२४९॥

सहस्रसंख्यकैर्द्वादशयोजनायताः शुभाः।
ज्ञेयाः पुण्यनिधेस्तस्य नित्यं स्वेहितवस्तुदाः ॥२५०॥

अर्थ (श्लोक 241 से 250): चक्रवर्ती के काल, महाकाल, नैसर्प, पाण्डु, पद्म, माणव, पिंगल, शंख और सर्वरत्न ये नव निधियाँ होती हैं। चक्रवर्ती के पुण्य से प्रेरित इन नौ निधियों में से काल नाम की प्रथम निधि तर्क, व्याकरण, छन्द, अलंकार आदि के, लोक व्यवहार सम्बन्धी एवं व्यापार सम्बन्धी शास्त्रों को तथा इन्द्रियों के मनोज्ञ विषयों को एवं वीणा, बाँसुरी, पटह आदि वाद्यों को निरन्तर देती है। पुण्य की खान स्वरूप चक्री के शुभोदय से महाकाल निधि असि, मसि कृष्यादि षट् कर्मों के साधनभूत द्रव्यों को और अन्य सम्पदा को भी देती है। नैःसर्प निधि चक्रवर्ती को शय्या, आसन और प्रासाद आदि देती है। पाण्डु निधि सम्पूर्ण धान्य एवं मनोहर षट्रसों को देती है। पद्म नाम की पञ्चम निधि रेशमी और सूती आदि सभी प्रकार के महान् वस्त्र देती है। पिंगल निधि कान्तिमान समस्त प्रकार के रत्नाभरण आदि देती है। माणव निधि समस्त प्रकार के आयुध और नीति शास्त्र देती है। प्रदक्षिणावर्त शंख निधि महान स्वर्ण और सर्वरत्न नाम की ९ वीं निधि समस्त प्रकार के रत्न चक्रवर्ती को देती हैं। अद्भुत पुण्य से उत्पन्न होने वालीं ये नौ निधियाँ शकटाकार होती हैं। चार खूटियों (चक्रधारा) एवं आठ पहियों से संयोजित ये कल्याणप्रद नौ निधियाँ पृथक्-पृथक् आठ योजन ऊँची, नौ योजन चौड़ी, बारह योजन लम्बी और एक-एक हजार देवों से रक्षित हैं तथा पुण्य के भंडार स्वरूप चक्रवर्ती की नित्य ही स्व इच्छित पदार्थ देती हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥२४१-२५०॥


चक्रं छत्रमसिर्दण्डो मणिश्च चर्मकाकिणी।
इमानि सप्तरत्नान्यजीवानि साधनान्यपि ॥२५१॥

सेनागृहपतीभाश्वस्थपतिस्त्रीपुरोधसः ।
सप्तरत्नानि चैतानि सजीवानि महान्ति वै ॥२५२॥

चक्रच्छत्रासिदण्डाश्च जायन्तेऽस्यायुधालये ।
काकिणीमणिचर्माणि पुण्येन श्रीगृहान्तरे ॥२५३॥

स्त्रीगजाश्वाः त्रिरत्नान्युत्पद्यन्ते रजताचले ।
चत्वारिशेषरत्नानि क्षेमापुर्यां महान्ति च ॥२५४॥

सरत्नानिधयो नार्यः सैन्यं शय्यासने पुरी ।
भोज्यं सभाजनं नाट्यं वाहनं हीति चक्रभृत् ॥२५५॥

दशाङ्गभोगसाराणि भुनक्ति पुण्यपाकतः ।
गणबद्धामराभृत्याः सहस्रषोडशास्य च ॥२५६॥

अर्थ (श्लोक 251 से 256): चक्रवर्ती के महापुण्य योग से चक्र, छत्र, तलवार, दण्ड, मणि, चर्म रत्न और काकणी ये सात अजीव रत्न अनेक कार्यों को साधने वाले होते हैं तथा सेनापति, गृहपति, हाथी, अश्व, स्थपति, स्त्री और पुरोहित ये सात सजीव रत्न हैं। चक्र, छत्र, असि और दण्ड ये चार रत्न चक्रवर्ती की आयुधशाला में उत्पन्न होते हैं। काकणी, मणि और चर्मरत्न ये तीन रत्न श्रीगृह अर्थात् चक्री के खजाने में तथा स्त्री, हाथी एवं अश्व ये तीन रत्न विजयार्ध पर्वत पर उत्पन्न होते हैं शेष चार रत्न अर्थात् सेनापति, गृहपति, स्थपति और पुरोहित ये महान् चार रत्न क्षेमापुरी में ही उत्पन्न होते हैं। चक्रवर्ती १. चौदह रत्नों सहित नौ निधियाँ, २. स्त्री, ३. सेना, ४. शय्या, ५. आसन, ६. पुरी, ७. भोजन, ८. भाजन, ९. नाटक और १०. वाहन; ये दस प्रकार के सारभूत भोगों को भोगता है। महा पुण्योदय से सोलह हजार गणबद्ध देव भृत्यों के सदृश सेवा करते हैं ॥२५१-२५६॥


क्षितिसाराह्वयस्तुङ्गः प्राकारोऽस्ति गृहावृतिः ।
गोपुरं सर्वतोभद्रमुल्लसद्रत्नतोरणम् ॥२५७॥

निवेशः शिविरस्यास्य नन्द्यावर्त्ताभिधो भवेत् ।
प्रासादो वैजयन्ताख्य सर्वत्र शर्मसाधकः ॥२५८॥

दिक्स्वस्तिका सभाभूमिः परार्द्ध्यमणिकुट्टिमा ।
अस्य चंक्रमणीयष्टिः सुविधिर्मणिनिर्मिता ॥२५९॥

गिरिकूटाख्यकंसौधं तुङ्गं दिगवलोकने ।
वर्धमानकनामास्य प्रेक्षागारं सुसुन्दरम् ॥२६०॥

धारागृहाभिधो रम्यो घर्मान्तकोऽस्ति शीतलः ।
गृहकूटकसंज्ञोऽस्य वर्षावासो मनोहरः ॥२६१॥

हर्म्यं स्यात्पुष्करावर्त्ताह्वयं रम्यां सुधासितम्।
कुवेरकान्तनामास्य भाण्डागारं क्षयातिगम् ॥२६२॥

अव्ययं वसुधाराख्यां कोष्ठागारं च चक्रिणः।
जीमूतनामकं स्याच्च मज्जनागारमूर्जितम् ॥२६३॥

रत्नमालातिरोचिष्णुः सुप्रोच्चास्यवतन्सिका।
देवरम्याह्वयारम्या स्मृता दूष्यकुटीपृथुः ॥२६४॥

सिंहैर्भयानकैरूढा सुशय्यासिंहवाहिनी।
अनुत्तराख्यां दिव्यं तुङ्गं सिंहासनं महत् ॥२६५॥

रम्याणि चामराण्‍यस्यानुपमाख्यानि सन्ति च।
भास्वत्सूर्यप्रभं छत्रं दीप्तं सद्रत्नभूषितम् ॥२६६॥

विद्युत्प्रभाह्वये स्यातां रुचिरे मणिकुण्डले।
अभेद्याख्यं तनुत्राणमभेद्यं शत्रुजैः शरैः ॥२६७॥

रत्नांशु जटिलाः सन्ति पादुका विषमोचिकाः।
परांह्रिस्पर्शमात्रेण मुञ्चन्त्यो विषमुल्बणम् ॥२६८॥

रथोऽजितञ्जयाख्यः स्याद्वज्रकाण्डं महद्धनुः।
चक्रिणोऽमोघपाताः स्युरमोघाख्यमहेषवः ॥२६९॥

अर्थ (श्लोक 257 से 269): चक्रवर्ती के नगर के चारों ओर क्षितिसार नाम का उत्तुंग और वृत्ताकार प्राकार है। कान्तिमान उत्तम रत्नों का सर्वतोभद्र नाम का गोपुर है। शिविर (डेरा, तम्बू) के निवेश द्वार का नाम नन्द्यावर्त है। सर्व ऋतुओं में सुख देने वाला वैजयन्त नाम का प्रासाद है। परार्द्धर्य मणि का है आंगन (भूमि) जिसका, ऐसा दिक्वस्तिका नाम का सभा स्थल और चक्रवर्ती के हाथ में लेने की घूमने वाली सुविधि नाम की मणि निर्मित छड़ी है। दिशाओं का अवलोकन करने के लिये गिरिकूट नाम का उन्नत प्रासाद है और अति रमणीक वर्धमान नाम का प्रेक्षागार है। आताप का विनाश करने वाला शीतल और रम्य धारागृह नाम का भवन है, वर्षाकाल में सर्व सुखों को देने वाला, मन को अभिराम गृहकूट नाम का भवन है। चूने की कलई से उज्ज्वल और रम्य पुष्करावर्त नाम का उत्तम भवन है जिसमें अक्षय निधि से परिपूर्ण कुवेरकान्त नाम का भाण्डारगार है। चक्रवर्ती के क्षय से रहित वसुधारा नाम का कोष्ठागार है और अत्यन्त तेज कान्ति से युक्त जीमूत नामका मज्जनागार (स्नानगृह) है। चक्रवर्ती की अति देदीप्यमान रत्नों की माला है और सुप्रोच्चा नाम की उत्तम टोपी है। अति सुन्दर और महान विस्तार वाली देवरम्य नाम की दूष्य कुटी अर्थात् वस्त्रागार कहा गया है। भयावह (बड़े-बड़े) सिंहों पर आरूढ़ सिंहवाहिनी नाम की उत्तम शय्या है और अनुत्तर नाम का दिव्य और उन्नत श्रेष्ठ सिंहासन है। अनुपम नाम के श्रेष्ठ चामर और उत्तम रत्नों से रचित देदीप्यमान सूर्यप्रभ नाम के छत्र हैं। विद्युत्प्रभ नाम के सुन्दर मणिकुण्डल और शत्रुओं के बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न न होने वाला अभेद्य नाम का कवच है। चक्रवर्ती की रत्नजड़ित विषमोचिका नाम की दो पादुकाएँ हैं, जो अन्य जनों के पैरों के स्पर्श करने मात्र से उनके अतितीव्र विष का मोचन (हरण) कर लेती हैं। अजितञ्जय नाम का रथ और चक्रवर्ती को विजय प्राप्त कराने वाले अमोघ नाम के बाणों से युक्त वज्रकाण्ड नाम का महान् धनुष है ॥२५७-२६९॥


वज्रतुण्डाभिधा शक्तिर्वज्रोद्भावारिखण्डिनी।
कुन्तः सिंहाटको रत्नदण्डः सिंहनखाङ्कितः ॥२७०॥

तस्यासिपुत्रिका दीप्ता महती लोहवाहिनी।
कणयोस्ति मनोवेगोऽसिश्च सौनन्दकाख्यकः ॥२७१॥

पृथुभूतमुखं खेटं सार्थं भूतमुखान्वितम्।
सुदर्शनाह्वयं चक्रं षट्खण्डाक्रमणक्षमम् ॥२७२॥

चण्डवेगाभिधोदण्डो गुहाद्वारद्विभेदकृत्।
चर्मरत्नं जलाभेद्यं महद्वज्रमयाभिधम् ॥२७३॥

मणिरत्नं तमोहन्तृ चूडामण्यभिधानकम्।
ऊर्जितं काकिणीरत्नं चिन्तामणि समाह्वयम् ॥२७४॥

सेनापतिरयोध्याख्यो नररत्नं भवेत्प्रभोः।
पुरोधाः पुरुधीर्दक्षो बुद्धिसागरनामकः ॥२७५॥

वास्तुविद्याप्रवीणः स्थपति र्भद्रमुखोऽद्भुतः।
श्रीमान् गृहपतिः कामवृष्टिनामास्यभीष्टदः ॥२७६॥

व्ययोपचयचिन्तायां नियुक्तश्चक्रवर्तिनः।
यागहस्तीमहाकायोऽद्र्योभो विजयपर्वतः ॥२७७॥

पवनञ्जयसंज्ञोऽश्वः सुभद्रास्त्री च्युतोपमा।
इमानि दिव्यरत्नानि रक्षितानि सुरैर्विभोः ॥२७८॥

राज्याङ्गभोगकर्तृणि पुण्यात्सन्ति चतुर्दश।
तद्गृहेऽपररत्नानां संख्यां को वेत्ति बुद्धिमान् ॥२७९॥

आनन्दिन्योऽब्धिनिर्घोषाभेर्यो द्वादशसम्मिताः।
द्विषड्योजनपर्यन्तं ध्वनन्त्यापूर्यदग्मुखम् ॥२८०॥

प्रभोर्विजयघोषाख्याः पटहा द्वादशप्रमाः।
चतुर्विंशति शङ्खाः स्युर्गम्भीरावर्तसंज्ञकाः ॥२८१॥

अर्थ (श्लोक 270 से 281): चक्रवर्ती के पास शत्रुओं को नाश करने वाली वज्रमय वज्रतुण्डा नाम की शक्ति, सिंहाटक नाम का कुन्तल और सिंह नखों के सदृश आकार से अंचित रत्नदण्ड होता है। महा दीप्ति से युक्त लोहवाहिनी नाम का खड्ग, मनोवेग नाम की करधनी और सौनन्द नाम की तलवार होती है। भूतमुख से सहित अपने नाम को सार्थक करने वाली पृथुभूतमुख नाम की ढाल और षट्खण्डों पर आक्रमण करने में समर्थ ऐसा सुदर्शन नाम का चक्र होता है। दोनों गुफा द्वारों को भेदने में समर्थ चण्डवेग नाम का दण्ड और जल के द्वारा अभेद्य वज्रमय नाम का महान चर्मरत्न होता है। अन्धकार को नाश करने वाला चूडामणि नाम का मणिरत्न और महाप्रकाशवान् चिन्तामणि नाम का काकिणी रत्न होता है। चक्रवर्ती के अयोध्यसेन नाम का सेनापति नररत्न और विशाल बुद्धि का धारक तथा अतिदक्ष बुद्धिसागर नाम का पुरोहित होता है। आवास विद्या अर्थात् निवास स्थानों का निर्माण करने में प्रवीण भद्रमुख नाम का अद्भुत स्थपति (सिलावट) और मनोवाञ्छित पदार्थों को देने वाला कामवृष्टि नाम का गृहपति होता है। जिसे चक्रवर्ती अपने व्यय-उपचय (हानि-वृद्धि या देय-आदेय या लघु-दीर्घ चिन्तनवत्) की चिन्ता सौंपकर निश्चिन्त हो जाता है। पर्वत के सदृश महाकाय विजयपर्वत नाम का पट्ट हाथी, पवनञ्जय नाम का घोड़ा और उपमा से रहित सुभद्रा नाम की स्त्री होती है। चक्रवर्ती के इन दिव्य रत्नों की रक्षा देवों द्वारा होती है। महान् पुण्योदय से चक्रवर्ती के पास राज-अंग स्वरूप ये चौदह रत्न नाना प्रकार के भोगों के कर्ता हैं। उनके प्रासाद में अन्य और कितने रत्न हैं? इसकी संख्या कौन बुद्धिमान् जान सकता है? अर्थात् कोई नहीं। समुद्र के सदृश निर्घोष करने वालीं आनन्द नाम की बारह भेरियाँ हैं, जो अपनी ध्वनि से बारह योजन पर्यन्त समस्त दिशाओं को व्याप्त कर देती हैं। इसी प्रकार चक्रेश के यहाँ विजयघोष नाम के बारह पटह और गम्भीरावर्त नाम के चौबीस शंख हैं ॥२७०-२८१॥


दीप्ता वीराङ्गदाभिख्या कटका मणिनिर्मिताः।
पताका अष्टचत्वारिंशत्कोट्योऽति मनोहराः ॥२८२॥

महाकल्याणकाभिख्यां तुङ्गं दिव्यासनं महत्।
अस्यान्यसारवस्तूनि गदितुं को बुधः क्षमः ॥२८३॥

भक्ष्यायेऽमृतगर्भाख्याः सद्गन्धस्वादुशालिनः।
शक्ता जरयितुं तस्य नान्ये तान् सुरसोत्कटान् ॥२८४॥

स्वाद्वं चामृतकल्पाख्यं हृद्यास्वादं सुसंस्कृतम्।
रसायनरसं दिव्यं पानकं ह्यमृताह्वयम् ॥२८५॥

अर्थ (श्लोक 282 से 285): मणियों से निर्मित और विशाल कान्तिमान वीरांगद नाम का कड़ा है। अड़तालीस करोड़ अति मनोज्ञ पताकाएँ होती हैं। महाकल्याण नाम का उन्नत, दिव्य और विशाल आसन होता है। चक्रवर्ती के पास और भी अनेक सार वस्तुएँ होती हैं जिनका कथन करने के लिये कौन बुद्धिमान् समर्थ हो सकता है? अर्थात् कोई नहीं। चक्रवर्ती के भोजन के लिये उत्तम गन्ध और शुभ स्वाद युक्त अमृतगर्भ नाम के मोदक होते हैं। उत्तम रसों से उत्कट उन मोदकों को पचाने की शक्ति चक्रवर्ती में ही होती है अन्य किसी में नहीं। चक्रवर्ती के द्वारा सेव्यमान अमृतकल्प नाम का स्वाद्य पदार्थ हृदय को प्रिय और भली-भाँति संस्कृत होता है तथा अमृत नाम के पेय पदार्थ भी दिव्य एवं रसायन रस के सदृश होते हैं ॥२८२-२८५॥


पुण्यकल्पद्रुमोद्भूता एताः सर्वाः सुसम्पदः।
फलभूता महाभोगा जानन्तु चक्रवर्तिनः ॥२८६॥
मत्वेति व्रतशीलाद्यैः शर्मकामाः सुयत्नतः।
अर्जयन्तु सदा धर्मं स्वर्गमुक्तिश्रीवशीकरम् ॥२८७॥

अर्थ (श्लोक 286 से 287): चक्रवर्ती के पूर्वोपार्जित पुण्यरूपी कल्पवृक्ष से उत्पन्न होने वाली ये सब उत्तम सम्पदाएँ और उसी वृक्ष के फल स्वरूप ये उत्कृष्ट भोग हैं ऐसा जानो और सुख की इच्छा करने वाले मनुष्यों ! इसे धर्म का प्रसाद मानते हुए ही व्रत और शील आदि के द्वारा समीचीन पुरुषार्थ द्वारा स्वर्ग और मोक्ष लक्ष्मी को वश करने वाले धर्म का निरन्तर अर्जन (संचय) करो ॥२८६-२८७॥


यथास्य चक्रिणः प्रोक्ता भूतयो दिग्जयादयः।
तथा ज्ञेया विदेहेऽस्मिन् सकले चक्रवर्तिनाम् ॥२८८॥
व्यावर्णनं कृतं यद्वत् क्षेमापुर्या मयाऽखिलम्।
विदेहेऽन्य पुरीणां च तद्वद्ज्ञेयं न चान्यथा ॥२८९॥
कच्छाविषयषट्खण्डानां प्रोक्तावर्णना यथा।
तथा द्विधा विदेहे स्याद्देशखण्डाऽखिलात्मनाम् ॥२९०॥

अर्थ (श्लोक 288 से 290): जिस प्रकार इस चक्रवर्ती की विभूति एवं दिग्विजय आदि का वर्णन किया गया है उसी प्रकार इस विदेह क्षेत्र सम्बन्धी समस्त चक्रवर्तियों का जानना चाहिए। मेरे (आचार्य) द्वारा क्षेमापुरी नगरी का सम्पूर्ण वर्णन जिस प्रकार किया गया है, विदेह क्षेत्र में स्थित अन्य पुरों का समस्त वर्णन इसी प्रकार जानना चाहिए, अन्य प्रकार नहीं। कच्छा देश में जिस प्रकार छह खण्डों का वर्णन किया गया है, पूर्व-पश्चिम विदेह स्थित देशों के छह खण्डों का समस्त वर्णन इसी प्रकार है ॥२८८-२९०॥


इति सुकृतविपाकाच्चक्रिलक्ष्म्यो महत्यो,
निरुपमसुखसारा रत्ननिध्यादयश्च।
त्रिजगतिसुपदाद्याः स्युः सतां हीति मत्वा,
भजत चरणयोगैः कोविदा! धर्ममेकम्॥२९१॥

अर्थ: इस प्रकार महान् पुण्य विपाक से सज्जन पुरुषों को चक्रवर्ती की विशाल सम्पत्ति, निरुपम सुख, चौदह रत्न और नौ निधियाँ आदि तथा देवेन्द्र, धरणेन्द्र, खगेन्द्र आदि विविध प्रकार के उत्तम पद प्राप्त होते हैं, ऐसा मानकर-हे प्रवीण जनों! व्रत, तप, संयम आदि शुभ योगों के द्वारा निरन्तर एक धर्म का ही सेवन करो॥२९१॥


सद्धर्मः क्रियते मया प्रतिदिनं धर्मं भजे यत्नतो,
धर्मेणैव ममास्तु शाश्वतसुखं धर्माय कुर्वे तपः।
धर्मात्परमाश्रये सुगतये धर्मस्य सेवे गुणान्,
धर्मे चित्तमहं दधे भवभयं मे धर्म! दूरीकुरु॥२९२॥

अर्थ: मेरे द्वारा प्रतिदिन समीचीन धर्म का सेवन किया जाता है, मैं यत्नपूर्वक धर्म को धारण करता हूँ। धर्म के द्वारा ही मुझे शाश्वत सुख की प्राप्ति हो, मैं धर्म के लिये तप करता हूँ। उत्तम गति के लिये धर्म से अपर अन्य कोई आश्रय नहीं है। धर्म के गुणों को धारण करो। मैं अपने चित्त को धर्म में लगाता हूँ। हे धर्म! मेरे भव भय को दूर करो॥२९२॥

अष्टम अधिकार विदेहक्षेत्रस्थ देशों का वर्णन

मंगलाचरण


देहातिगान् जिनाधीशान् वन्द्यान् सूरींश्च पाठकान्।
त्रिजगत्पतिभिः साधून् विदेहस्थान् नमाम्यहम् ॥१॥

अर्थ: तीन लोक के अधिपतियों द्वारा वन्दनीय देह रहित सिद्धों को, विदेह क्षेत्रों में स्थित अरहन्तों को, आचार्यों को, उपाध्याय परमेष्ठियों को और साधुओं को मैं सकलकीर्ति (आचार्य) नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ कच्छामहादेशात्पूर्वे वक्षारपर्वतः।
प्रथमश्चित्रकूटाख्यश्चतुः कूटविराजितः ॥२॥


भवेदश्वमुखाकारस्तप्तचामीकरच्छविः ।
तोरणैर्वनवेद्याद्यैर्जिनदेवालयैर्युतः ॥३॥


नद्यन्ते योजनानां च शतपञ्चभिरुन्नतः।
कुलाचलसमीपे योजनैश्चतुःशतप्रमैः ॥४॥

स्वोच्चतुर्यांश भूमध्यः कच्छादेशसमायतः।
शतपञ्चप्रमाणैश्च योजनैर्विस्तृतोऽद्भुतम् ॥५॥

अर्थ (श्लोक 4 से 5): कच्छा महादेश के पूर्व में चार कूटों से सुशोभित चित्रकूट नाम का प्रथम वक्षार पर्वत है, जो अश्व के मुख सदृश आकार वाला, तपाये हुए स्वर्ण के सदृश कान्तिवान् और तोरणों, वनों, वेदियों और जिनालयों से समन्वित है। इस पर्वत की ऊँचाई सीता नदी के समीप पाँच सौ योजन और नील कुलाचल के समीप चार सौ योजन प्रमाण है। भूमध्य (नींव) में इसकी ऊँचाई का चतुर्थ भाग प्रमाण पृथ्वी के भीतर है। पर्वत की लम्बाई कच्छा देश की लम्बाई के प्रमाण अर्थात् १६५९२ ३/२१ योजन और विस्तार पाँच सौ योजन प्रमाण है ॥४-५॥


सिद्धकूटं च कच्छाख्यं सुकच्छासंज्ञकं ततः।
चित्रकूटाह्वयं कूटं चतुःकूटान्यमूनि वै ॥६॥

वक्षारोच्चचतुर्थांशतुङ्गानि स्युः शुभान्यपि।
अर्हत्सुरलयाढ्यानि सीतासमीपतः क्रमात् ॥७॥

दिव्योपकरणैः पूर्णः सिद्धकूटे जिनालयः।
नीलाद्र्यन्तेऽन्तिमे कूटे दिवकन्याः सन्ति धामसु ॥८॥

मध्यकूटद्वयस्थोच्चरत्नवेश्मसु पुण्यतः।
वसतः स्वस्वकूटोत्थ नामानौ व्यन्तरामरौ ॥९॥

अर्थ (श्लोक 6 से 9): चित्रकूट नामक प्रथम वक्षार पर्वत पर सिद्धकूट, कच्छाकूट, सुकच्छाकूट और चित्रकूट नाम के चार कूट हैं। इन शुभ कूटों की ऊँचाई वक्षार पर्वत की ऊँचाई के चतुर्थ भाग प्रमाण है अर्थात् सीता महानदी के समीप स्थित सिद्धकूट की ऊँचाई (५००/४ =) १२५ योजन और नील पर्वत के समीप चित्रकूट की ऊँचाई (४००/४) = १०० योजन प्रमाण है, शेष दो कूटों की क्रमशः हानिवृद्धि को लिये हुए है। सीता के समीप से क्रमशः अर्हन्त भगवान और देवों से युक्त कूट हैं। सिद्धकूट के ऊपर दिव्य उपकरणों से परिपूर्ण जिन चैत्यालय है और नील पर्वत के समीप अन्तिम चित्रकूट पर अनेक प्रासाद हैं, जिनमें दिक्कुमारियाँ निवास करती हैं। मध्य में स्थित शेष दो कूटों में रत्न के प्रासाद हैं जिनमें पुण्योदय से अपने-अपने कूटों के सदृश ही नाम वाले व्यन्तर देव निवास करते हैं ॥६-९॥


कुलगिरि निकटस्थे प्रथमे कूटे उत्सेधः शतयोजनानि। द्वितीये च तृतीय भागाधिकाष्टोत्तरशतयोजनानि। तृतीये षोडशाग्रशतयोजनानि योजनत्रिभागानां द्वौ भागौ। चतुर्थे कूटे उन्नतिः पञ्चविंशत्यधिक शतयोजनानि।

अर्थ: नील कुलाचल के समीप स्थित प्रथम कूट की ऊँचाई १०० योजन, द्वितीय कूट की १०८ १/३ योजन, तृतीय कूट की ११६ २/३ योजन और चतुर्थ कूट की ऊँचाई १२५ योजन प्रमाण है।


इत्थं सुवर्णना ज्ञेया विदेहे सकलेऽखिला।
षोडशप्रमवक्षाराणां सर्वेषां समानका ॥१०॥

ततः प्राग्वर्णनोपेतः सुकच्छाविषयो भवेत्।
द्विनदीविजयार्द्धैश्च षट्खण्डीकृत ऊर्जितः ॥११॥

तस्यार्यखण्डमध्येऽस्ति रम्या क्षेमपुरी पुरी।
प्रागुक्तनगरीतुल्या व्यासाद्यैर्धर्ममातृका ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 10 से 12): इस प्रकार विदेह क्षेत्र स्थित सोलह वक्षार पर्वतों का समस्त वर्णन भी इस चित्रकूट वक्षार पर्वत के सदृश ही जानना चाहिए। पूर्व कथित कच्छादेश के वर्णन के समान ही सुकच्छा देश का वर्णन है। इस देश के भी रक्ता-रक्तोदा और विजयार्ध पर्वत से छह खण्ड हुए हैं। इन छह खण्डों में से आर्य खण्ड के मध्य में व्यास आदि से क्षेमापुरी नगरी के समान अतिरम्य और धर्म की माता के सदृश क्षेमपुरी नाम की नगरी है ॥१०-१२॥


ततो नीलाद्रिपार्श्वस्थ कुण्डस्य शाश्वतस्य च।
निर्गत्य दक्षिणद्वारेण विभङ्गा नदी शुभा ॥१३॥

अष्टाविंशसहस्त्राणां परिवारसरिद्युता।
कुण्डहीनायता ग्राहवतीसंज्ञोर्मिसंकुला ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 13 से 14): इसके बाद नील कुलाचल के पार्श्वभाग में एक शाश्वत कुण्ड स्थित है उस कुण्ड के दक्षिण द्वार से निकलकर ग्राहवती नाम वाली, अत्यन्त रमणीक विभंगा नदी अट्ठाइस हजार परिवार नदियों से युक्त होती हुई, कुण्ड व्यास से हीन आयत वाली अनेक उर्मियों से व्याप्त होकर बहती है ॥१३-१४॥


रोहित्सरित्समव्यासा हेमसोपानशालिनी।
तोरणैर्वनवेदीभिरलंकृता मनोहरा ॥१५॥

योजनैः पञ्चविंशत्यग्रशतैक प्रमाणकैः।
विस्तीर्णान्ते हि सीतायाः प्रविष्टाभ्यन्तरे परा ॥१६॥

तस्याः प्रवेशसद्द्वारस्य पूर्वापरदीर्घता।
पञ्चविंशति संयुक्तशतैक योजनानि च ॥१७॥

तोरणस्योच्छ्रितः सार्धसप्ताशीत्यधिकं शतम्।
योजनानां तथास्मिन्स्युर्जिनेन्द्र प्रतिमादयः ॥१८॥

इत्येषा वर्णना सर्वा विभङ्गासरितां समा।
सीताप्रवेश सद्द्वाराणां विज्ञेया न चान्यथा ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 15 से 19): ग्राहवती विभंगा नदी का व्यास रोहित् महानदी के सदृश है। स्वर्ण सोपानों से सुशोभित, तोरणों, वनों एवं वेदियों से अलंकृत यह मनोज्ञ नदी अन्त में एक सौ पच्चीस (१२५) योजन विस्तीर्ण होती हुई सीता महानदी के मध्य प्रवेश कर जाती है। इस नदी की सीता प्रवेश द्वार की पूर्व-पश्चिम दीर्घता एक सौ पच्चीस योजन है तथा जिस पर जिनेन्द्र आदि प्रतिमाएँ अवस्थित हैं, ऐसे तोरण की ऊँचाई एक सौ साढ़े सत्तासी (१८७ १/२) योजन प्रमाण है। इस प्रकार का यह सब वर्णन सर्व विभंगा नदियों का और सीता प्रवेश द्वारों का सदृश ही जानना चाहिए, अन्यथा नहीं ॥१५-१९॥


नद्याः पूर्वे महाकच्छाविषयः प्राक्तनोपमः।
धर्मशर्माकरीभूतः स्यात् षट्खण्डधराङ्कितः ॥२०॥

तस्य मध्ये परारिष्टानगरी विद्यते शुभा।
जिन जैनालयैस्तुङ्गैर्भूषिता धर्मकर्मभिः ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 20 से 21): ग्राहवती नदी की पूर्व दिशा में पूर्वोक्त (कच्छा देश सदृश) उपमाओं से युक्त महाकच्छ नाम का देश है। जो धर्म और सुख की खान तथा छह खण्ड पृथ्वियों से समन्वित है। उस देश के मध्य में एक अत्यन्त शुभ और श्रेष्ठ अरिष्टा नाम की नगरी है, जो जैन धर्मावलम्बियों के प्रासादों, उन्नत जिन चैत्यालयों एवं धर्म-कर्म से विभूषित है ॥२०-२१॥


ततोस्ति पद्मकूटाख्यो वक्षारपर्वतो महान्।
सिद्धकूटं महाकच्छाह्वयं कूटं ततः परम् ॥२२॥

कूटं च कच्छकावत्याख्यं पद्मकूटसंज्ञकम्।
एतैश्चतुर्महाकूटैः शिखरेऽलंकृतोऽस्ति सः ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 22 से 23): महा कच्छ देश के आगे पद्मकूट नाम का एक महान वक्षार पर्वत है। सिद्धकूट, महाकच्छ कूट, कच्छकावती कूट और पद्मकूट इन चार महाकूटों के द्वारा उसका शिखर अलंकृत है ॥२२-२३॥


ततोऽस्ति विषयः कच्छकावती संज्ञकोऽद्भुतः।
मध्येऽरिष्टपुरी तस्य भवेद् धर्मसुखाकरा ॥२४॥

ततो द्रहवतीसंज्ञा विभङ्गा निम्नगा भवेत्।
पूर्वोक्तवर्णनायुक्ता कुण्डात्सीतान्तरागता ॥२५॥

तस्याः पूर्वे महान्देश आवर्त्ताख्योऽस्ति शाश्वतः।
तन्मध्ये नगरी रम्या खड्गाख्या च शुभाकरा ॥२६॥

ततो नलिनकूटाख्यो वक्षाराद्रिर्महान् भवेत्।
चतुःकूटाङ्कितो हेममयो जिनालयादिभृत् ॥२७॥

सिद्ध चावर्त्तसंज्ञं च लाङ्गलावर्तनामकम्।
नलिनाख्यं चतुःकूटैरमीभिर्मूर्द्ध्नि सोऽन्वितः ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 24 से 28): पद्म कूट वक्षार पर्वत के आगे कच्छकावती नाम का अनुपम देश है। उसके मध्य में धर्म और सुख की खान स्वरूप अरिष्ट नाम की नगरी है। कच्छकावती देश के आगे पूर्वोक्त (ग्राहवती नदी के) वर्णन युक्त द्रहवती नदी है जो कुण्ड से निकलकर सीता नदी पर्यन्त लम्बी है। इस द्रहवती विभंगा के पूर्व में एक आवर्ता नाम का महान और शाश्वत देश है, जिसके मध्य में अत्यन्त रम्य और कल्याणों की खान सदृश खड्गा नाम की नगरी है। उसके आगे (पूर्व में) नलिनकूट नाम का एक महान् वक्षार पर्वत है, जो चारकूटों से अञ्चित और स्वर्णमय जिन चैत्यालयों आदि से परिपूर्ण है। उस वक्षार पर्वत का शिखर सिद्ध, आवर्ता, लांगलावर्त और नलिन इन चारकूटों से समन्वित है ॥२४-२८॥


ततोऽस्ति विषयो लांगलावर्ताह्वय ऊर्जितः।
षट्खण्डमण्डितो युक्तो नदीकाननपर्वतैः ॥२९॥

तन्मध्ये नगरीरम्या मञ्जूषाख्या विराजते।
मञ्जूषेव नृरत्नानां जिनकेवलिधर्मिणाम् ॥३०॥

पुनः पङ्कवतीनाम्नी विभंगा प्रवरा नदी।
दशक्रोशावगाहास्याद्रोहित्समानविस्तृता ॥३१॥

नद्याः पूर्वे शुभोदेशः पुष्कलाख्योऽविनश्वरः।
ग्रामखेटादिभिः पूर्णो जिनैर्जैनैश्च धार्मिकैः ॥३२॥

औषधी नगरी रम्या तस्य मध्ये विभात्यलम्।
औषधीव सतां जन्मजरामृत्यु रुजापहा ॥३३॥

ततः स्यादेक शैलाख्यो वक्षाराद्रिर्मनोहरः।
चतुःकूटैर्युतो मूर्ध्नि जिनामरालयान्वितैः ॥३४॥

सिद्धं च पुष्कलाख्यं पुष्कलावती समाह्वयम्।
एकशैलाह्वयं ह्येतैश्चतुः कूटैः सभात्यलम् ॥३५॥

ततः पूर्वे भवेत् पुष्कलावती विषयो महान्।
नद्यद्रिग्रामसीमाद्यैर्भृतो धार्मिक योगिभिः ॥३६॥

तन्मध्ये नगरी नित्या राजते पुण्डरीकिणी।
तुङ्गचैत्यालयैर्भव्य पुण्डरीकैः सुकर्मभिः ॥३७॥

ततो रत्नमयी दिव्या शाश्वती वनवेदिका।
पूर्वोक्तवर्णनोपेतोत्सेधव्यासादि तोरणैः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 29 से 38): नलिन वक्षार के आगे लांगलावर्त नाम का श्रेष्ठ देश है, जो छह खण्डों से मण्डित तथा नदी, वन और पर्वत आदि से युक्त है। इस देश के मध्य में अति मनोज्ञ मंजूषा नाम की नगरी सुशोभित है, जो जिनेन्द्र देव, केवली और धार्मिक मनुष्यरूपी रत्नों को मञ्जूषा (पेटी) के सदृश सार्थक नाम वाली है। इसके आगे पंकवती नाम की श्रेष्ठ विभंगा नदी है, जो दस कोस गहरी और रोहित् नदी के सदृश विस्तृत है। इस विभंगा नदी के पूर्व में पुष्कल नाम का विनाश रहित और श्रेष्ठ देश है, जो ग्राम खेट आदि से तथा अर्हन्तों, जैनों और धर्मात्मा जनों से परिपूर्ण है। जिसके मध्य में औषधी नाम की मनोज्ञ नगरी शोभायमान है, जो सज्जन पुरुषों के जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु और रोग आदि दोषों को दूर करने के लिये औषधि के सदृश है। इसके बाद एक शैल नाम का मन को हरण करने वाला वक्षार पर्वत है, जो शिखर पर जिनचैत्यालय और अन्य देवों के प्रासादों से समन्वित चार कूटों से युक्त है। सिद्धकूट, पुष्कलकूट, पुष्कलावतीकूट और एक शैल इन चार कूटों से वह पर्वत शोभायमान है। इस वक्षार पर्वत के पूर्व में पुष्कलावती नाम का महान देश है, जो नदी, पहाड़, ग्राम की सीमा आदि से तथा मुनिराजों एवं धार्मिक पुरुषों से परिपूर्ण है। इसके मध्य में पुण्डरीकिणी नाम की शाश्वत नगरी सुशोभित होती है, जो उन्नत चैत्यालयों, भव्यों, तीर्थंकरों, गणधरादि योगियों एवं उत्तम क्रिया करने वाले सज्जन पुरुषों से व्याप्त है। इसके बाद शाश्वत, दिव्य और रत्नमय वनवेदिका है, जो पूर्व कथित उत्सेध एवं व्यासादि वाले तोरणों से युक्त है ॥२९-३८॥


तस्याः पूर्वे समुद्रस्यापरेभागे मनोहरम्।
नाना द्रुमौघ संकीर्णं देवारण्याह्वयं वनम् ॥३९॥

द्वे सहस्रे शतान्येव नवद्वाविंशतिस्तथा।
योजनानामिति व्यासः पूर्वापरेण कथ्यते ॥४०॥

वनस्यास्याखिलायामो देशाद्यायामसंन्निभः।
देवारण्यवने तस्मिन् प्रासादाः सन्त्यनेकशः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 39 से 41): उस रत्नमय वन वेदी के पूर्व में और लवण समुद्र के पश्चिम में अनेक प्रकार के वृक्ष समूहों से व्याप्त देवारण्य नाम का मनोहर वन है। जिसका पूर्व पश्चिम व्यास दो हजार नौ सौ बाईस (२९२२) योजन प्रमाण है और आयाम देश के आयाम सदृश अर्थात् १६५९२ २/११ योजन प्रमाण है। इस देवारण्य वन में अनेक प्रकार के प्रासाद हैं ॥३९-४१॥


नानारत्नमयास्तुङ्गा वनवेद्याद्यलंकृताः।
जिनालयाङ्किता दिव्या मणितोरणभूषिताः ॥४२॥

प्रचुराः पुष्करण्यश्च क्रीडाशालाः सभागृहाः।
उपादालयस्तुङ्गा बाह्यान्तर्मणिचित्रिताः ॥४३॥

चतुर्विदिक्षुगेहाः स्युरात्मरक्षसुधाभुजाम्।
परिषत् त्रयदेवानां प्रासादा दक्षिणादिशि ॥४४॥

सप्तानीकामराणां च दिग्भागे पश्चिमे गृहाः।
किल्विषाख्यदेवानांमभियोग्यामृताशिनाम् ॥४५॥

सम्मोहनिर्जराणां च कन्दर्पाख्यसुरात्मनाम्।
प्रत्येकं स्युः पृथग्भूताः प्रासादाः शाश्वताः शुभाः ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 42 से 46): देवारण्य वन में स्थित प्रासाद नाना रत्नमय, उन्नत, वन वेदी आदि से अलंकृत और जिनालयों से विभूषित हैं। वहाँ बहुत से तालाब, क्रीड़ा शालाएँ, सभागृह और बाह्य एवं अभ्यन्तर में मणियों से रचित तथा उन्नत उपपाद भवन हैं। चारों विदिशाओं में आत्मरक्षक देवों के भवन हैं। दक्षिण दिशा में तीनों परिषद् देवों के प्रासाद हैं और पश्चिम दिशा में सात प्रकार के अनीक देवों के गृह हैं। किल्विष देवों,आभियोग, सम्मोह और कन्दर्प जाति के देवों में से प्रत्येक के पृथक्-पृथक् शाश्वत और शोभायुक्त प्रासाद हैं ॥४२-४६॥


ततः सीतामहानद्या-भागेऽस्ति दक्षिणे परम्।
देवारण्यं च पूर्वोक्त व्यासाद्यैस्तत्समं महत् ॥४७॥

वनेऽस्मिन् सन्ति देवानां बहूनि नगराणि च।
प्राकारगोपुराद्यैश्च तुङ्गधामजिनालयैः ॥४८॥

अलंकृतानि वापीभिर्नगरेषु सुरोत्तमाः।
भूपाश्चतुर्महादेवीयुक्ता वसन्ति पुण्यतः ॥४९॥

परिषत् त्रितयैः सप्तसप्तानीकैः पृथग्विधैः।
सामानिकात्मरक्षाद्यैर्वेष्टिता जिनभक्तिकाः ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 47 से 50): सीता महानदी के दक्षिण भाग में एक दूसरा देवारण्य नाम का वन है जिसके व्यास आदि का प्रमाण पूर्वोक्त देवारण्य के सदृश ही है। इस वन में भी देवों के बहुत से नगर हैं। प्राकार, गोपुर आदि, उत्तुंग प्रासाद, जिनालय और वापी आदि से अलंकृत इन नगरों में पूर्व पुण्य प्रताप से इन्द्र उत्तम देवों एवं चार महादेवियों से युक्त निवास करते हैं तथा तीन प्रकार के पारिषद देवों, पृथक्-पृथक् सात-सात अनीकों, सामानिक देवों और आत्मरक्षक आदि देवों से वेष्टित होकर जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति करते हैं ॥४७-५०॥


ततः पश्चिमदिग्भागे दिव्यास्ति वनवेदिका।
क्रोशाद्धैर्नावगाहा च प्रागुक्तोत्सेधविस्तृता ॥५१॥

वेद्याश्च पश्चिमाशायां वत्साख्यो विषयो महान्।
गंगासिन्धुनदीरूप्यादिभिः षट्खण्डसंयुतः ॥५२॥

तदार्यखण्डमध्ये स्यात् सुसीमानगरी परा।
धर्मसीमाकरीभूता यतिश्रावकधार्मिकैः ॥५३॥

ततो भवेत् त्रिकूटाख्यो वक्षारशैल ऊर्जितः।
चतुःकूटैर्युतोमूर्ध्नि चैत्यदेवालयाङ्कितैः ॥५४॥

सिद्धकूटं च वत्साख्यं सुवत्साकूटसंज्ञकम्।
त्रिकूटाह्वयमेतानि कूटानि शिखरेऽस्य वै ॥५५॥

तदनन्तरमेवास्ति सुवत्सा विषयः शुभः।
मुनिकेवलिसंघाद्यैर्भूषितोऽद्रिसरिद्वनैः ॥५६॥

तन्मध्ये विद्यते दिव्या कुण्डला नगरी युता।
रत्नशालप्रतोल्याद्यैश्चेत्यालयैश्च धर्मिभिः ॥५७॥

ततस्तप्तजलाभिख्या विभंगा निम्नगा भवेत्।
कुण्डोत्थादेशसीमान्ता वनवेद्यादिवेष्टिता ॥५८॥

पुनर्महान्महावत्सा विषयोऽस्ति शुभाकरः।
ग्रामपत्तन्खेटाद्यैर्जिनेन्द्रभवनांकितैः ॥५९॥

तन्मध्ये नाभिवद्भाति नगरी चापराजिता।
जितेन्द्रियैर्जिनागारैर्जनकल्याणकोत्सवैः ॥६०॥

ततो वैश्रवणोनाम्ना वक्षारोहेमसन्निभः।
सिद्धकूटं महावत्सानामकूटं द्वितीयकम् ॥६१॥

कूटं च वत्सकावत्याख्यं वैश्रवणसंज्ञकम्।
एतैश्चैत्यसुरागारैर्युतैः कूटैः स मण्डितः ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 51 से 62): देवारण्य के आगे पश्चिम दिशा में अर्ध कोश अवगाह (नींव) और पूर्वोक्त उत्सेध एवं विस्तार से युक्त एक दिव्य वन वेदी है। वेदी की पश्चिम दिशा में महान् वत्सा नामक देश है, जिसके गंगा, सिन्धु नदी और विजयार्ध पर्वत के द्वारा छह खण्ड हुए हैं, उनमें से आर्य खण्ड के मध्य में सुसीमा नाम की एक श्रेष्ठ नगरी है, जो धर्म की सीमा को करने वाली अर्थात् धर्म की सीमा यहीं तक ही है मानो ऐसे सार्थक नाम को धारण करने वाली और मुनिगणों एवं धार्मिक श्रावक गणों के द्वारा सुशोभित है। वत्सा देश के आगे पश्चिम में त्रिकूट नामक श्रेष्ठ वक्षार पर्वत है, जिसके शिखर पर जिनचैत्यालय और देवालयों से अंकित चार कूट हैं। सिद्ध कूट, वत्सा कूट, सुवत्सा कूट और त्रिकूट ये चार कूट उस वक्षार पर्वत के शिखर पर हैं। इसके बाद ही मन को अभिराम सुवत्सा नाम का देश है, जो मुनिगणों, केवलियों और चतुर्विध संघों से विभूषित तथा पर्वतों, सरिताओं और वनों आदि से संयुक्त है। उस देश के मध्य में रत्नों के शाल (परकोटा) प्रतोली आदि से एवं चैत्यालयों से युक्त तथा धार्मिक जनों से व्याप्त कुण्डला नाम की दिव्य नगरी है। सुवत्सा देश के पश्चिम में तप्तजला नाम की विभंगा नदी है, जो कुण्ड से निकली है, देश के बराबर लम्बी है और वन वेदी आदि से वेष्टित है। इस विभंगा के पश्चिम में कल्याण की खान सदृश महान् महावत्सा नाम का देश है, जो ग्राम पत्तन और खेटों आदि से युक्त और जिनेन्द्र भवनों से सम्पन्न है। उसके मध्य में नाभि सदृश अपराजिता नाम की नगरी है, जो जितेन्द्रियों, जिन साधुओं और जिन कल्याणक महोत्सवों से विभूषित रहती है। महावत्सा देश के पश्चिम में कञ्चन सदृश वैश्रवण नाम का वक्षार पर्वत है, जिसका शिखर सिद्धकूट, महावत्सा कूट, वत्सकावती कूट और वैश्रवण कूट जो कि जिन चैत्यालयों और व्यन्तर देवों के प्रासादों से मण्डित है ॥५१-६२॥


ततः परं भवेद्वत्सकावतीविषयोऽद्भुतः।
षट्खण्डाद्रिनदीयुक्तः स्वर्मुक्तिसुखसाधनः ॥६३॥

तन्मध्ये महती नित्या प्रभंकरा पुरी भवेत्।
जिनेन्द्रजैनसंघाद्यैश्चैत्यागारैर्भृतापरैः ॥६४॥

ततो मत्तजलासंज्ञा विभङ्गा सरिदुत्तमा।
सीतामध्ये प्रविष्टा च कुण्डद्वारेण निर्गता ॥६५॥

तस्या अपरभागेऽस्ति रम्याख्यो विषयः शुभः।
रम्यो रम्यैर्जिनागारैर्धर्मकर्ममहोत्सवैः ॥६६॥

अंकाख्या नगरी रम्या तदार्य खण्डमध्यगा।
भातिधर्मखनीवोच्चैर्धर्मिभिर्धर्मप्रवर्तनैः ॥६७॥

ततोऽञ्जनगिरिर्नाम्ना वक्षारस्तुङ्गविग्रहः।
हेमवर्णश्चतुः कूट चैत्यदेवाल्यान्वितः ॥६८॥

सिद्धकूटं च रम्याख्यं कूटं सुरम्यनामकम्।
अञ्जनाह्वयमेतैः सकूटैरग्रेऽप्यलंकृतः ॥६९॥

ततः सुरम्य देशोऽस्ति रमणीयः शुभावहः।
चैत्यागारसुसङ्घाढ्यैर्ग्रामखेटपुरादिभिः ॥७०॥

पुरी पद्मावतीनाम्नी तदार्यखण्डभूस्थिता।
श्रीमद्भिर्धार्मिकैर्भव्यैर्भाति पद्मेव शाश्वता ॥७१॥

ततो नदीविभङ्गास्ति परोन्मत्तजलाभिधा।
जिनेन्द्रप्रतिमायुक्तैर्वेदिका तोरणैर्युता ॥७२॥

तस्या अपरभागेस्याद् रमणीयाभिधो महान्।
धर्मिधामजिनागारैः सार्थोदेशोऽतिसुन्दरः ॥७३॥

तन्मध्ये राजते रम्या शुभाख्या नगरी शुभा।
शुभध्यानशुभाचारैः शुभैः शुभखनीव च ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 63 से 74): वैश्रवण वक्षार पर्वत के आगे वत्सकावती नाम का अद्भुत देश है। जो छह खण्डों, पर्वतों और नदियों से युक्त तथा स्वर्ग और मोक्ष सुख का साधन है। उस देश के मध्य में प्रभंकरा नाम की शाश्वत और महान् नगरी है, जो अर्हन्त परमेष्ठियों, जिनसंघों और जिनमन्दिरों से निरन्तर भरी रहती है। इस वत्सकावती देश के बाद मत्तजला नाम की उत्तम विभंगा नदी है, जो कुण्ड के द्वार से निकलकर सीता महानदी के मध्य में प्रविष्ट हुई है। इस नदी के पश्चिम भाग में रम्या नाम का श्रेष्ठ देश है, जो मनोज्ञ जिनचैत्यालयों एवं धार्मिक और लौकिक महोत्सवों से निरंतर रम्य-शोभित रहता है, इस देश के मध्य में सुन्दर आर्य खण्ड है, जिसके मध्य में अंका नाम की नगरी है, जो धर्म की खान के सदृश है और धर्म प्रवर्तन करने वाले उत्कृष्ट धर्मात्माओं से सुशोभित है। रम्या देश के पश्चिम भाग में अञ्जनगिरि नाम का उत्तुंग वक्षार पर्वत है, जो हेमवर्ण का है और चार कूटों, चैत्यालयों तथा अन्य देवगणों के प्रासादों से समन्वित है। इस पर्वत का शिखर सिद्धकूट, रम्यकूट, सुरम्यकूट और अञ्जन इन चार कूटों से अलंकृत है। इस अंजनगिरि वक्षार के पश्चिम में मन को अभिराम और पुण्य प्रवेश का कारणभूत सुरम्य नाम का देश है, जो जिनचैत्यालयों, जिनसंघों, ग्रामों, खेतों और अनेक नगरों से युक्त है। इसके मध्य में आर्य खण्ड है, जिसके मध्य में शाश्वत पद्मावती नाम की नगरी है, जो धनवानों और धार्मिक भव्यजनों के द्वारा पद्म के समान शोभायमान होती है। इस सुरम्य देश के पश्चिम में उन्मत्तजला नाम की श्रेष्ठ विभंगा नदी है, जो जिनेन्द्र प्रतिमाओं, वेदिकाओं एवं तोरणों से संयुक्त है। इस नदी के पश्चिम में धर्म स्थानों एवं जिन चैत्यालयों से रम्य सार्थक नाम वाला रमणीय नाम का सुन्दर देश है, जिसके मध्य में शुभा नाम की शुभ शोभा युक्त नगरी है, जो शुभ-कल्याण की खान के सदृश, शुभ-उत्तम ध्यान और शुभ आचरणों से सुशोभित है ॥६३-७४॥


तत आदर्शनाभिख्यो वक्षारोऽतीवसुन्दरः।
सिद्धायतनकूटं च रमणीयसमाह्वयम् ॥७५॥

कूटं हि मङ्गलावत्याख्यमादर्शनसंज्ञकम्।
चैत्यदेवालयशस्तैरैतैः कूटैः स संयुतः ॥७६॥

ततोऽस्तिविषयो मंगलावतीसंज्ञकोऽद्भुतः।
धर्मकर्मोत्थ माङ्गल्यैर्जिनाद्यैर्मङ्गलोत्तमैः ॥७७॥

तन्मध्येनगरी भाति महती रत्नसञ्चया।
दृग्ज्ञानव्रतरत्नाढ्यैर्नृस्त्रीरत्नैस्तथापरैः ॥७८॥

ततोत्तरदिशाभागे नित्या प्राग्वेदिकासमा।
स्यात्पूर्वभद्रशालाख्य वनस्य रत्नवेदिका ॥७९॥

ततो नैर्ऋत्य दिग्भागे मेरोश्चदक्षिणे तटे।
सीतोदाया महानद्या विदेहेऽपरसंज्ञके ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 75 से 80): रमणीय महादेश के पश्चिम में आदर्शन नाम का अतीव सुन्दर वक्षार पर्वत है, जिसका शिखर जिनचैत्यालय एवं अन्य व्यन्तर देवों के प्रासादों से संयुक्त सिद्धायतन, रमणीय, मंगलावती और आदर्शन नामक कूटों से अलंकृत है। इस आदर्शन वक्षार के पश्चिम में धर्म और अन्य क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले मंगलों से तथा जिनेन्द्र भगवान् रूप उत्तम मंगलों से संयुक्त मंगलावती नाम का अद्भुत देश है। उसके मध्य में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूप रत्नों से, स्त्री पुरुष रूप रत्नों से (वहाँ के स्त्री पुरुष रत्नों के समान हैं) और अन्य रत्नों से युक्त रत्नसञ्चया नाम की विशाल नगरी सुशोभित है। इस देश के पश्चिम भाग में पूर्वकथित भद्रशाल की वेदिका के समान पूर्व भद्रशालवन की शाश्वत, रत्नमय वेदिका है। इस पूर्व भद्रशाल वन वेदी के आगे मेरु पर्वत की नैऋत्य दिशा में और सीतोदा महानदी के दक्षिण तट पर पश्चिम विदेह क्षेत्र की अवस्थिति है ॥७५-८०॥


निषधस्योत्तरे भागे शाश्वता मणिवेदिका।
भवेत् पश्चिमसंज्ञस्य भद्रशालवनस्य च ॥८१॥

वेद्याः पश्चिमदिग्भागे पद्माख्यो विषयः शुभः।
स्याद् गंगासिन्धु रूपाद्रिभिः षड्खण्डीकृतोऽखिलः ॥८२॥

तन्मध्येऽश्वपुरी नाम्नी नगरी पुण्यमातृका।
पुण्यवद्भिर्बुधैः पूर्णा जिनधामादिशोभिता ॥८३॥

ततोऽस्ति शब्दवान्नाम्ना वक्षारो हाटकप्रभः।
चतुःकूटाङ्कितो मूर्ध्नि वनवेद्याद्यलंकृतः ॥८४॥

सिद्धकूटं च पद्माख्यं सुपद्माकूटनामकम्।
शब्दवत् कूटमेतानि स्युः कूटान्यस्य मस्तके ॥८५॥

ततो भवेत् सुपद्माख्य देशः पद्मालयोपमः।
साध्यते यत्र धर्माद्यैः पद्मलोकत्रये स्थिता ॥८६॥

तत्र सिंहपुरीसंज्ञा नगरी राजते तराम्।
कर्मेभहननोद्युक्तैःनरसिंहैः सुधार्मिकैः ॥८७॥

ततो नदी विभंगास्ति क्षीरोदाख्या मनोहरा।
कुण्डान्निर्गत्य सीतोदा मध्यायाता क्षयातिगा ॥८८॥

पुनर्देशो महापद्माह्वयः षट्खण्डराजितः।
नद्यद्रिवनसद्ग्रामपुराद्यैर्धर्मिभिःशुभैः ॥८९॥

तन्मध्ये नगरी रम्या महापुरी समाह्वया।
साधयन्ति महान्तोऽस्याः स्वर्गं मोक्षं तपोवृषात् ॥९०॥

ततो विकटवान्नाम्ना वक्षारोऽस्ति सुराश्रितः।
सिद्धायतनकूटं च महापद्माख्यकं ततः ॥९१॥

कूटं हि पद्मकावत्याह्वयं विकटवत् परम्।
नाम्नेमानि चतुःकूटानि सन्ति शिखरेऽस्य च ॥९२॥

ततोऽस्ति विषयः पद्मकावतीसंज्ञको महान्।
यत्र केवलिनः पुंसां विहरन्ति शिवाप्तये ॥९३॥

तन्मध्ये राजधानी स्यात् विजयापरमापुरी।
यस्यां मोक्षाय धर्माय स्वजन्मेच्छन्ति नाकिनः ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 81 से 94): निषध पर्वत के उत्तर भाग में पश्चिम भद्रशाल की मणिमय और शाश्वत वेदी है। वेदी के पश्चिम भाग में पद्म नाम का सुन्दर देश है, जिसके विजयार्ध पर्वत और गंगा-सिन्धु नदियों के द्वारा छह खण्ड होते हैं। इस देश के मध्य में पुण्य की जननी के सदृश अश्वपुरी नाम की नगरी है, जो पुण्यवान् पुरुषों एवं विद्वज्जनों से परिपूर्ण और जिनचैत्यालयों से सुशोभित है। इस देश के पश्चिम में शिखर पर चार कूटों से युक्त एवं वन वेदी आदि से अलंकृत हेमवर्ण वाला शब्दवान् नामक वक्षार पर्वत है। इस पर्वत के अग्रभाग में सिद्धकूट, पद्मकूट, सुपद्म और शब्दवान् नाम के चार कूट अवस्थित हैं। इस वक्षार के पश्चिम में लक्ष्मी के आलय की उपमा को धारण करने वाला सुपद्म नाम का देश है, जहाँ भव्यजन धर्मादि के द्वारा त्रैलोक्य स्थित लक्ष्मी का साधन करते हैं। इस देश के मध्य में सिंहपुरी नाम की नगरी शोभायमान है, जहाँ के उत्तम धार्मिक मनुष्यरूपी सिंह निरन्तर कर्मरूपी हाथियों को मारने में उद्यत रहते हैं। इस देश के पश्चिम में क्षीरोदा नाम की मनोहर विभंगा नदी है, जो क्षय रहित है और कुण्ड से निकलकर सीतोदा महानदी के मध्य में प्रवेश करती है। इस विभंगा के पश्चिम में छह खण्डों से सुशोभित महापद्म नाम का देश है, जो नदी, पर्वत, वन, उत्तम ग्राम और नगरों से तथा शुभाचरण से युक्त धार्मिक जनों से परिपूर्ण है। इस देश के मध्य में अति रम्य महापुरी नाम की नगरी है, जहाँ पर महान् पुरुष तपरूपी वृक्ष से स्वर्ग और मोक्ष का साधन करते हैं। इस देश के पश्चिम में देवों के आश्रयभूत विकटवान् नाम का वक्षार पर्वत है, जिसके शिखर पर सिद्धायतन, महापद्म, पद्मकावती और विकटवान् नाम के चार कूट अवस्थित हैं। विकटवान् वक्षार की पश्चिम दिशा में पद्मकावती नाम का महान् देश है, जहाँ पर भव्यों को मोक्ष प्राप्त कराने के लिये केवली भगवान् निरन्तर विहार करते हैं। इस देश के मध्य में विजयापरमपुरी नामक नगरी है, जो देश की राजधानी है। धर्म और मोक्ष के लिये जिस नगरी में देवगण भी अपने जन्म लेने की वाञ्छा करते हैं ॥८१-९४॥


पुनर्नदी विभङ्गा स्यात् सीतोदाख्या विभूषिता।
कुण्डव्यासोन्देशस्य ह्यायामेन समायता॥९५॥

तस्याः पश्चिमभागेऽस्ति देशः शङ्खाख्य ऊर्जितः।
शलाकापुरुषा यत्र जायन्ते गणनातिगाः॥९६॥

तन्मध्येऽस्त्यरजाभिख्या पुरी स्वर्मुक्तिदायिनी।
यस्याः सन्तोऽन्वहं यान्ति धर्माचारैर्दिवं शिवम् ॥९७॥

तत आशीविषोनाम्ना वक्षारः काञ्चनच्छविः।
देशायामसमायामश्चतुःकूटाश्रितोऽद्भुतः ॥९८॥

सिद्धकूटं च शङ्खाख्यं कूटं नलिनसंज्ञकम्।
कूटमाशीविषं हीति कूटानि तस्य मस्तके॥९९॥

ततो नलिनदेशोऽस्ति यत्र सन्मार्गवृत्तये।
विहरन्ति गणेशाश्च सूरयः पाठकाः सदा ॥१००॥

भवेत्तस्यार्यखण्डे च विरजा नगरी परा।
यस्यां कर्मरजांस्युच्चै निर्धूयस्युर्विदोऽमलाः ॥१०१॥

तदनन्तरमेवात्र स्यान्नदी श्रोतवाहिनी।
वनतोरणवेदीभिर्भूषिता तटयोर्द्वयोः ॥१०२॥

ततोऽस्ति कुमुदाभिख्यो देशोधर्मसुखाकरः।
दृश्यन्ते योगिनो धीरा यत्रारण्याचलादिषु ॥१०३॥

अशोकानगरी तत्रातीतशोकैर्बुधैर्भृता।
अर्जयन्ति सदा धर्मं यस्यां दक्षाव्रतादिभिः ॥१०४॥

ततः सुखावहो नाम्ना वक्षारोऽस्ति सुखाकरः।
तत्रत्यानामिहामुत्र संततं पुण्यकर्मभिः ॥१०५॥

सिद्धाख्यं कुमुदाभिख्यं सरिताह्वयमेव हि।
सुखावहमिमान्यस्य चतुःकूटानि मस्तके ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 95 से 106): पद्माकावती देश के आगे सीतोदा नाम की विभंगा नदी है, जिसका आयाम कुण्ड व्यास से हीन देश के आयाम प्रमाण है। विभंगा के पश्चिम भाग में शंखा नामक श्रेष्ठ देश है, जहाँ पर गणनातीत अर्थात् असंख्यात शलाका पुरुष उत्पन्न होते हैं। उसके मध्य में स्वर्ग और मोक्ष देने वाली अरजा नाम की नगरी है, जहाँ से भव्यजन धर्माचरण के द्वारा निरन्तर स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस देश के आगे देश की लम्बाई प्रमाण आयाम से युक्त, चार कूटों से अलंकृत और कञ्चन की आभा को धारण करने वाला आशीविष नाम का वक्षार पर्वत है। उसके मस्तक पर सिद्धकूट, शंखाकूट, नलिन और आशीविष नाम के चार कूट हैं। वक्षार पर्वत के आगे नलिन नाम का देश है, जहाँ पर धर्म मार्ग के प्रकाशन हेतु अथवा सन्मार्ग की प्रवृत्ति हेतु गणधरदेव, आचार्य और उपाध्याय निरन्तर विहार करते हैं। इस देश के आर्यखण्ड में विरजा नाम की श्रेष्ठ नगरी है, जहाँ पर विद्वज्जन कर्मरूपी रज-धूल को भली प्रकार नष्ट करके निर्मल होते हैं अर्थात् मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस देश के बाद ही दोनों तटों पर वनों, तोरणों एवं वेदियों से विभूषित श्रोतवाहिनी विभंगा नदी है। विभंगा के पश्चिम में धर्म और सुख का आकर (खान) कुमुद नाम का देश है, जहाँ के वनों और पर्वतों पर निरन्तर धीर-वीर योगिगण (साधु) दिखाई देते हैं। वहाँ शोक आदि से रहित बुद्धिमान् मनुष्यों से भरी हुई अशोक नामक नगरी है। जहाँ पर व्रत आदि करने में चतुर भव्यजन सदा धर्म का अर्जन करते हैं। उस कुमुद देश के आगे सुखोत्पादक सुखावह नाम का वक्षार पर्वत है, जहाँ के मनुष्य सदा पुण्य क्रियाओं के द्वारा इह लोक और परलोक में सुख प्राप्त करते हैं और जिसके शिखर पर सिद्ध कूट, कुमुद, सरिता और सुखावह नामक चार कूट हैं ॥९५-१०६॥


ततोऽस्ति सरिताभिख्यो महान् जनपदः शुभः।
यत्रायान्त्यन्वहं देवाः पूजाभवत्यै परात्मनाम् ॥१०७॥

वीतशोकापुरी तत्र यस्यां शोकातिगा विदः।
स्वर्गमोक्षसुखाद्याप्त्यै कुर्वन्ते धर्ममुत्तमम् ॥१०८॥

ततो हेममया रम्या स्यात् परा वनवेदिका।
पूर्वोक्तवेदिकातुल्या व्यासायामोच्छ्रितादिभिः ॥१०९॥

वेद्या अपरभागे स्याद् भूतारण्याख्यसद्मनम्।
देवारण्यसमं चैत्यालयदेवपुरान्वितम् ॥११०॥

तस्योत्तरदिशाभागे जिनेन्द्रभवनाश्रितम्।
भूतारण्यं भवेदन्यत्सुरसौधपुरान्वितम् ॥१११॥

वनात्पूर्वदिशाभागे सीतोदायास्तटोत्तरे।
नीलाद्रेर्दक्षिणे पार्श्वेस्याद्वलवनवेदिका ॥११२॥

ततः पूर्वे भवेद्देशो वप्राख्यो भृत उत्तमैः।
यतिश्रावकचैत्याद्यैः कुलिङ्ग्यादिविवर्जितः ॥११३॥

तस्य मध्ये पुरी रम्या विजयाख्या जयन्ति च।
दुःकर्माक्षकषायारीन् यस्यां योगैर्मुमुक्षवः ॥११४॥

ततः पूर्वेस्ति चन्द्राख्यो वक्षारोहेमभानिभः।
जिनेन्द्रसुरधामाग्रैश्चतुः कूटैः शिरोऽङ्कितः ॥११५॥

सिद्धकूटं च वप्राख्यं सुवप्राभिधमन्तिमम्।
चन्द्रकूटमिमानि स्युः शिखरेऽस्य शुभान्यपि ॥११६॥

ततः स्याद्विषयो रम्यः सुवप्राह्वय ऊर्जितः।
यत्रार्हद्गणियोगीन्द्रा विरहन्ति सुरार्चिताः ॥११७॥

तदार्य खण्डभूभागे वैजयन्तीपुरी परा।
वसन्ति तुङ्गसौधेषु यस्यां विजयशालिनः ॥११८॥

ततो नदी विभङ्गास्ति गम्भीरमालिनी परा।
नीलाद्र्यधःस्थकुण्डोत्था सीतोदामध्यमाश्रिता ॥११९॥

तस्याः पूर्वे महावप्राभिधो देशः शुभाकरः।
शुभैर्ग्रामपुराद्यैश्च सतां शुभप्रवर्तनैः ॥१२०॥

तन्मध्ये नगरी भाति जयन्ती संज्ञिका परा।
जिनेन्द्रापरधामौघैः पुण्यवद्भिर्जयोद्धतैः ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 107 से 121): सुखावह वक्षार पर्वत के पश्चिम में सरिता नाम का एक महान् श्रेष्ठ देश है, जहाँ पर जिनेन्द्र भगवान की पूजा भक्ति के लिये निरन्तर देवगण आते रहते हैं। इस देश के मध्य में वीतशोका नाम की नगरी है, जहाँ पर बुद्धिमान् जीव शोक से रहित होते हैं और स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिये सदा उत्तम धर्म का आचरण करते हैं। सरिता देश के आगे कञ्चनमय, अत्यन्त रम्य और श्रेष्ठ वेदिका है, जिसके व्यास आदि का प्रमाण पूर्वकथित वेदिका के व्यास, आयाम और ऊँचाई के सदृश है। इस वेदी के पश्चिम में भूतारण्य नाम का उत्तम वन है, जो देवारण्य के सदृश जिनचैत्यालयों और देवों के नगरों से संयुक्त है। इस वन की उत्तर दिशा में जिन चैत्यालयों से युक्त तथा प्रासादों से संयुक्त देवों के नगरों से समन्वित अन्य भूतारण्य वन है। इस भूतारण्य वन की पूर्व दिशा में, सीतोदा महानदी के उत्तर तट पर और नील कुलाचल के दक्षिण भाग में एक रत्नमय वेदिका है। इस वेदी की पूर्व दिशा में कुलिंगी साधुओं आदि से रहित और उत्तम मुनिगणों, श्रावकों एवं जिनचैत्यालयों से परिपूर्ण वप्रा नाम का देश है। जिसके मध्य में विजया नाम की अति रम्य नगरी है, जहाँ पर मोक्षाभिलाषी भव्यजन मन, वचन और काय की स्थिरता द्वारा अथवा ध्यान आदि के द्वारा दुष्ट कर्मों, इन्द्रियों और कषायरूपी बैरियों को जीतते हैं। इस वप्रा देश के पूर्व में स्वर्णाभा के सदृश कान्तिवान चन्द्रा नाम का वक्षार पर्वत है, जो जिनचैत्यालय और देवालयों से समन्वित चार कूटों से सुशोभित हैं। इसके शिखर पर सिद्धकूट, वप्रा, सुवप्रा और चन्द्रकूट नाम के चार उत्तम कूट हैं। इस वक्षार के पूर्व में सुवप्रा नाम का रम्य और श्रेष्ठ देश है, जहाँ पर अरहन्तदेव, गणधरदेव और मुनि समूह निरन्तर विहार करते हैं। इस देश के आर्य खण्ड में विजयन्ती नाम की श्रेष्ठ नगरी है, जहाँ के उन्नत भवनों में विजय स्वभावी भव्य जीव रहते हैं। इसके बाद गम्भीरमालिनी नाम की श्रेष्ठ विभंगा नदी है, जो नील कुलाचल के अधोभाग में स्थित कुण्ड से निकली है और सीतोदा के मध्य प्रवेश करती है। इसके पूर्व में उत्तम ग्राम, नगर आदि से युक्त और सज्जनों की शुभ प्रवृत्तियों से सुशोभित पुण्य की खान सदृश महावप्रा नाम का उत्तम देश है। जिसके मध्य में जयन्ती नाम की उत्तम नगरी शोभायमान होती है, जो जिनचैत्यालयों, अन्य प्रासाद समूहों, पुण्यवान भव्य जीवों एवं जितेन्द्रिय जीवों से सदा परिपूर्ण रहती है ॥१०७-१२१॥


ततः सूराह्वयोऽद्रिः स्याद्वक्षारोऽमरसंयुतः।
सिद्धकूटं महावप्राभिधानकूटमेव हि ॥१२२॥

कूटं च वप्रकावत्याख्यं सूरकूट मन्तिमम्।
तस्याग्रे स्यात्सुरोपेत मेतत्कूट चतुष्टयम् ॥१२३॥

ततो जनपदो वप्रकावत्याख्यो महान्भवेत्।
यत्र प्रवर्तते धर्मो मोक्षमार्गोऽविनश्वरः ॥१२४॥

धर्मशर्मकरा तस्य मध्येऽपराजिता पुरी।
कर्मारिनिर्जयोद्युक्तैर्विद्वद्भोराजतेतराम् ॥१२५॥

ततो नदी विभङ्गास्ति शाश्वता फेनमालिनी।
रत्नतोरणसद्वेदी वनाङ्किततटद्वया ॥१२६॥

ततो गन्धाह्वयो देशा एकार्यखण्डभूषितः।
धर्मशर्मकरः पञ्चम्लेच्छखण्डयुतोऽक्षयः ॥१२७॥

तन्मध्ये नगरी चक्राह्वया भाति जिनालयैः।
शालगोपुरसौधाद्यैश्चक्रयादि पुरुषोत्तमैः ॥१२८॥

ततो नागाभिधः शैलो वक्षारः शिखरेऽङ्कितः।
अर्हत्सुरलयाग्रस्थैस्तुङ्गकूटचतुष्टयैः ॥१२९॥

सिद्धकूटं च गन्धाख्यं सुगन्धाह्वयमेव च।
नागकूटमिमान्युच्चैः स्फुरन्ति शैलमस्तके ॥१३०॥

तस्य पूर्वे भवेद्देशः सुगन्धाह्वयो महोत्तमः।
धर्मचैत्यालयोपेतैः ग्रामारामपुरादिभिः ॥१३१॥

तन्मध्ये राजते खड्गापुरी रत्नजिनालयैः।
पुण्यवद्भिर्बुधैर्नित्यं धर्मोत्सवशतैः परैः ॥१३२॥

ततः पराविभङ्गा च नदीस्यादूर्मिमालिनी।
दक्षिणोत्तर दिग्दीर्घा पूर्वपश्चिमविस्तरा ॥१३३॥

तदनन्तरमत्रास्ति विषयो गन्धिलाख्यकः ॥
जिनधर्मोत्तमाचारैर्जैनैश्च धर्मिभिर्भृतः ॥१३४॥

तत्रायोध्यापुरी भाति भटैः कर्मजयोद्यतैः।
जिनचैत्यालयैर्दक्षैः खनीवधर्मधर्मिणाम् ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 122 से 135): महावप्रा देश के पूर्व में देवों से संयुक्त सूर नामक वक्षार पर्वत है। उसके शिखर पर जिनचैत्यालय और देव प्रासादों से युक्त सिद्धकूट, महावप्रा, वप्रकावती और सुर नाम वाले चार कूट अवस्थित हैं। सूर वक्षार के पूर्व में वप्रकावती नाम का श्रेष्ठ देश है, जहाँ पर धर्म और मोक्षमार्ग शाश्वत प्रवर्तते हैं। उस देश के मध्य में धर्म और सुख की खान स्वरूप अपराजित नाम की नगरी है, जो कर्म शत्रुओं को जीतने में उद्यत भव्य जीवों से और विद्वज्जनों से अत्यन्त शोभायमान रहती है। उस देश के आगे शाश्वत बहने वाली फेनमालिनी नाम की विभंगा नदी है, जिसके दोनों तट रत्नों के तोरणों, उत्तम वेदियों और वनों से अञ्चित हैं। विभंगा नदी के आगे धर्म और सुख के आकर स्वरूप एक आर्य खण्ड से विभूषित और पाँच म्लेच्छ खण्डों से युक्त गन्ध नाम का शाश्वत देश है। जिसके मध्य में जिन चैत्यालयों, शाल, गोपुर एवं प्रासादों और चक्रवर्ती आदि महापुरुषों से विभूषित चक्र नाम की नगरी है। गन्ध देश के पूर्व में शिखर पर अंकित हैं जिनचैत्यालय और देवों के आलय जिनके, ऐसे चार कूटों से संयुक्त नागा (धिप) नाम का वक्षार पर्वत है। जिसके मस्तक पर सिद्धकूट, गन्धकूट, सुगन्धकूट और नागकूट नाम के चार महान् कूट स्फुरायमान होते हैं। नाग वक्षार के पूर्व में जिनचैत्यालयों, नगरों, ग्रामों और उद्यानों से सहित सुगन्ध नाम का महा उत्तम देश है। उसके मध्य में खड्गापुरी नगरी है, जो रत्नों के जिनालयों से, पुण्यवान् पुरुषों, बुद्धिमानों और धार्मिक महोत्सवों में तल्लीन ऐसे अन्य भव्यजनों से सदा शोभायमान रहती है। सुगन्ध देश के आगे ऊर्मि नाम की विशाल विभंगा नदी है, जो दक्षिण-उत्तर लम्बी और पूर्व-पश्चिम चौड़ी है। उसके बाद जैनधर्म जन्य उत्तम आचरणों, जैन बन्धुओं एवं धर्मात्माओं से परिपूर्ण गन्धिला नाम का देश है। उसके मध्य में धर्म और धर्मात्माओं की खान के सदृश अयोध्या नाम की नगरी है, जो पण्डित जनों, जिन चैत्यालयों एवं कर्मों पर विजय प्राप्त करने में प्रयत्नशील भव्यजनों से सदा सुशोभित रहती है ॥१२२-१३५॥


ततो देवाद्विनामास्ति वक्षार ऊर्जितोऽव्ययः।
प्रथमं सिद्धकूटाख्यं द्वितीयं गन्धिलाह्वयम् ॥१३६॥

कूटं च गन्धमाल्याख्यं देवकूटमन्तिमम्।
मणिकूटैरमीभिः सोऽलंकृतः शिखरे वरे ॥१३७॥

तत्पार्श्वे विषयो गन्धमालिनीसंज्ञकोऽद्भुतः।
द्विनदीविजयार्धैश्च षट्खण्डीकृत उत्तमः ॥१३८॥

तत्सीतोदोत्तरे भागे स्यादवध्यापुरी परा।
पुण्यकर्मारिकरीभूतास्वर्मुक्ति धर्ममातृका ॥१३९॥

तदन्ते शाश्वती दिव्या वेदिका स्थूलविग्रहा।
वनस्यापर भद्रादिशालस्यांघ्रिप-शालिनः ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 136 से 140): गन्धिला नाम देश के आगे अनादि निधन देवाद्वि नाम का श्रेष्ठ वक्षार पर्वत है। इसके शिखर पर सिद्धकूट, गन्धिला, गन्धमालिनी और देवकूट नाम के चार कूट हैं, इन्हीं मणिमय चार कूटों से वह पर्वत अलंकृत है। देवाद्वि वक्षार के आगे गन्धमालिनी नाम का अद्भुत देश है, जिसके दो नदियों और विजयार्ध पर्वत के द्वारा छह खण्ड हुए हैं। इस देश के मध्य में और सीता महानदी की उत्तर दिशा में अवध्या नाम की श्रेष्ठ नगरी है, जो पुण्यकर्म की खान स्वरूप और स्वर्ग मोक्ष देने वाले धर्म की माता के समान है। इस देश के बाद अन्त में अंघ्रिप वृक्षों से सुशोभित, अनादि निधन, स्थूलकाय और दिव्य, पश्चिम भद्रशाल वन की वेदी है ॥१३६-१४०॥


देवारण्यद्वयोर्भूतारण्याख्ययोर्वनद्वयोः ।
अष्टानां वनवेदीनां द्व्यष्टवक्षारभूभृताम् ॥१४१॥

द्वात्रिंशद्विषयाणां चायामः स कीर्तितो बुधैः।
सीताव्यासेन विस्तारो विदेहार्धस्य यो भुवि ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 141 से 142): सीता नदी के विस्तार (५०० यो.) को विदेह के विस्तार (३३६८४ ४/१९ यो.) में से घटा (३३६८४ ४/१९ -५००) कर शेष को आधा (३३१८४ ४/१९ ÷ २) करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतना ही आयाम प्रमाण (१६५९२ २/१९ यो.) दो देवारण्यों, दो भूतारण्य वनों, आठ वन वेदियों, सोलह वक्षार पर्वतों और बत्तीस देशों का है ऐसा विद्वानों के द्वारा कहा गया है ॥१४१-१४२॥


द्वादशप्रमकुण्डानां विभङ्गोत्पत्तिकारिणाम्।
योजनानां शतं व्यासः पञ्चविंशतिसंयुतम् ॥१४३॥

सर्वत्र चावगाहो योजनविंशतिसम्मितः।
महांस्तोरणद्वारवेद्याद्याः सन्ति शाश्वताः ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 143 से 144): बारह विभंगा नदियों की उत्पत्ति के कारण भूत बारह कुण्डों का व्यास एक सौ पच्चीस (१२५) योजन प्रमाण है और अवगाह सर्वत्र बीस योजन प्रमाण है। ये कुण्ड अनाद्यनिधन और विशाल तोरण द्वारों एवं वन वेदियों से युक्त हैं ॥१४३-१४४॥


द्विषट्प्रमविभङ्गानामायामः प्रोदितः श्रुते।
कुण्डव्यासोनदेशायामेन सादृश्य आश्रितः ॥१४५॥

अर्थ: देश के आयाम (१६५९२ २/१९ यो.) में से कुण्ड का व्यास (१२५ यो.) घटाने पर जो प्रमाण (१६५९२ २/१९ - १२५ = १६४६७ २/१९ यो.) रहता है, उसी के सदृश प्रत्येक विभंगा नदियों का आयाम आगम में कहा गया है। बारह विभंगा नदियों में से प्रत्येक विभंगा की दीर्घता (लम्बाई) सोलह हजार चार सौ सड़सठ योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से दो भाग प्रमाण अर्थात् १६४६७ २/१९ योजन है।


चतुःषष्टिप्रमाणानां रक्तादिसरितां स्फुटम्।
स्वकुण्डविस्तरोनोयो देशायामः स एव हि ॥१४६॥

अर्थ: विदेहस्थ गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदा इन ६४ नदियों में से प्रत्येक के आयाम का प्रमाण अपने-अपने कुण्ड के विस्तार (६२ १/२ यो.) से हीन देश के आयाम (१६५९२ २/१९ - ६२ १/२ = १६५२९ योजन और दो कोश) प्रमाण ही है ॥१४६॥ रक्ता, रक्तोदा, गंगा और सिन्धु इन ६४ नदियों में से प्रत्येक नदी की लम्बाई सोलह हजार पाँच सौ उन्तीस योजन दो कोस और एक योजन के उन्नीस भागों में से दो भाग प्रमाण है। अर्थात् १६५२९ २/१९ योजन और दो कोस प्रमाण है।


विदेहक्षेत्रदेशेषु सर्वेषु च पुरादिषु।
मणिहेममयास्तुङ्गा जिनप्रासादपंक्तयः ॥१४७॥


उत्तुङ्गतोरणादीप्ता रत्नबिम्बशतैर्भृताः।
रत्नोपकरणैः पूर्णा न कुदेवालयाः क्वचित् ॥१४८॥


सन्ति बह्व्यः स्फुरद्दीप्ताजिनेन्द्रदिवयमूर्तयः।
नृसुरैश्चार्चिता वन्द्या न नीचदेवमूर्तयः ॥१४९॥


तत्रत्यैः सर्वदा दक्षैरर्च्यन्ते जिनमूर्तयः।
विश्वाभ्युदयसर्वार्थसिद्धयै नाना विधानैः ॥१५०॥


विवाहजातकर्मादि मङ्गलेष्वखिलेषु च।
परमेष्ठिन एवाहो न क्षेत्रपालकादयः ॥१५१॥


जिनेन्द्राः समवसृत्याश्रिता द्विषड्गणावृताः।
सतां धर्मोपदेशादीन् ददतो विहरन्ति च ॥१५२॥


मुक्तिमार्गप्रवृत्त्यर्थं गणेशागणवेष्टिताः।
चतुर्ज्ञानमहर्द्धीशा विहारं कुर्वतेऽनिशम् ॥१५३॥


शिष्यादिपरिवारेणावृताः सूरय ऊर्जिताः।
विहरन्तोऽत्र दृश्यन्ते पञ्चाचारपराः सदा ॥१५४॥


पठन्तः पाठयन्तोऽन्यानङ्गपूर्वाण्यनेकशः।
रत्नत्रयतपोभूषाः सन्त्युपाध्याययोगिनः ॥१५५॥


गिरिकन्दरदुर्गादिवनेषु निर्जनेषु च।
साधवो ध्यानसंलीना महाघोरतपोऽङ्किताः ॥१५६॥


प्रवर्तका गुणैर्वृद्धा अन्ये वा संयतव्रजाः।
सुभव्यैर्वन्दिताः पूज्या दृश्यन्तेऽत्र पदे पदे ॥१५७॥


इत्याद्या जिनयोगीन्द्रा निर्ग्रन्थाः स्युरनेकशः।
मोक्षमार्गे स्थिता धीरा न स्वप्नेऽपि कुलिङ्गिनः ॥१५८॥


अङ्गपूर्वाणि सर्वाणि पठ्यन्ते यत्र योगिभिः।
श्रूयन्ते श्रावकैर्नित्यं न कुशास्त्राणि जातुचित् ॥१५९॥


अहिंसालक्षणो धर्म्मः शाश्वतो वर्ततेऽनिशम्।
सागारयमिनां द्वेधा स्वर्मुक्तिसुखसाधकः ॥१६०॥


व्रतशीलोपवासाद्यैर्जिनप्रणीत ऊर्जितः।
न धूर्तजल्पितश्चान्यो हिंसोत्थो दुर्गतिप्रदः ॥१६१॥


वैश्याश्चक्षत्रियाः शूद्रा इति वर्णत्रयान्विता।
प्रजा भद्रा विवेकज्ञा जिनधर्मपरायणा ॥१६२॥


न्यायमार्गरता नित्यं दृक्सद्वृत्ताद्यलंकृता।
कुमार्गगा द्विजा नात्र न दुर्मतोत्थदुधियः ॥१६३॥


जैनसङ्घादिभेदो न पाखण्डदर्शनानि न।
न मतान्तर एकोपि ह्येकं जिनमतं विना ॥१६४॥


वहत्येवानिशं मोक्षमार्गोऽत्रानन्तसौख्यदः।
रत्नत्रयात्मकः सत्यो जिनेन्द्रोक्तो महात्मनाम् ॥१६५॥


अत्रत्याः श्रावका दक्षाः श्रावकव्रतधर्मतः।
षोडशस्वर्गपर्यन्तं गच्छन्ति श्राविकास्तथा ॥१६६॥


केचिद्भोगमहीं पात्रदानपुण्येन भद्रकाः।
जिनार्चा स्तुतिभक्त्याद्यैर्य्यान्ति चेन्द्रास्पदं विदः ॥१६७॥


नाकिनः कृतपुण्या येतेऽत्र स्वमोक्षसिद्धये।
सत्कुलेषु प्रजायन्ते बहुश्रीभोगिनो बुधाः ॥१६८॥


यत्रोत्पन्नैः प्रयत्नेन साक्षान्मोक्षो हि साध्यते।
रत्नत्रयतपोधोरैस्तत्र का वर्णना परा ॥१६९॥


यथैषां वर्णना प्रोक्ता विदेहे द्विविधेऽखिला।
तथा शेषविदेहेषु ज्ञेया द्वीपापरद्वये ॥१७०॥


द्वीपेष्वर्ध तृतीयेषूत्कृष्टेन श्रीजिनेश्वराः।
उत्पद्यन्ते क्वचित्सर्वे सप्तत्यग्रं शतं परम् ॥१७१॥


तावन्तश्चक्रिणश्चैव जायन्ते नृसुरार्चिताः।
सप्तत्यग्रशतेष्वार्यखण्डेष्वेवैकसंख्यकाः ॥१७२॥


जघन्येन जिनाधीशा भवन्ति विंशति प्रमाः।
चक्राधिपाश्च सर्वत्र नृदेवखचरार्चिताः ॥१७३॥

अर्थ: विदेहक्षेत्रस्थ देशों के सर्व नगरों एवं ग्रामों आदि में मणिमय और स्वर्णमय जिन चैत्यालयों की पंक्तियाँ हैं। वे जिनमन्दिर उन्नत और प्रकाशमान तोरणों से युक्त, रत्नमय सहस्रों जिन बिम्बों से भरे हुए और रत्नमय उपकरणों से परिपूर्ण हैं, वहाँ कहीं भी कुदेवालय नहीं हैं। वहाँ पर मनुष्यों एवं देवगणों से पूजित और वन्दित तथा प्रकाशमान दीप्ति से युक्त जिनेन्द्र भगवान् की दिव्यमूर्तियाँ ही प्रचुर मात्रा में हैं, नीच देवों की मूर्तियाँ नहीं हैं। वहाँ उत्पन्न होने वाले प्रवीण पुरुष समस्त अभ्युदय सुख एवं अन्य समस्त सर्व अर्थ की सिद्धि के लिये नानाप्रकार की पूजनविधि से जिनेन्द्र भगवान को ही पूजते हैं। विवाह एवं जन्म आदि कार्यों में तथा अन्य समस्त मंगल कार्यों में एक परमेष्ठी अर्थात् अर्हन्त, सिद्ध आदि का ही पूजन होता है, क्षेत्रपाल आदि का नहीं। समवसरण के आश्रित होने वाली बारह सभाओं से घिरे हुए जिनेन्द्र भगवान् सज्जन पुरुषों को उपदेश देते हैं और विहार भी करते हैं। चार ज्ञान के धारी, महाऋद्धियों के अधीश्वर तथा मुनिगणों से वेष्टित गणधरदेव मुक्ति मार्ग की प्रवृत्ति के लिये निरन्तर विहार करते हैं। विदेह क्षेत्र में पञ्चाचार परायण तथा शिष्य आदि परिवार से वेष्टित महान् आचार्य निरंतर विहार करते हुए दिखाई देते हैं। वहाँ पर अंग और पूर्व रूप जिनागम को स्वयं पढ़ते हुए और अन्य मुनिगणों को पढ़ाते हुए तथा रत्नत्रय एवं तप से विभूषित अनेक उपाध्याय परमेष्ठी हैं। वहाँ पर उत्तम ध्यान में संलग्न तथा महाघोर तप से आलीढ़ साधु पर्वतों पर, कन्दराओं में, दुर्ग आदि में, वनों में तथा और भी अन्य निर्जन स्थानों में निवास करते हैं। विदेह क्षेत्र में उत्तम भव्य जीवों के द्वारा वन्दित एवं पूजित प्रवर्तक साधु, गुणसमूह से वृद्ध-महान् साधु तथा अन्य और भी यति समूह पद-पद पर दिखाई देते हैं। इस प्रकार इनको आदि लेकर जिनेन्द्र भगवान् योगियों के अधिनायक आचार्य आदि तथा अनेक प्रकार के धैर्यवान् निर्ग्रन्थ साधु मोक्षमार्ग में स्थित रहते हैं। वहाँ स्वप्न में भी कुलिंगी साधुओं के दर्शन नहीं होते। योगिजन अंग पूर्व आदि के समस्त आगम को पढ़ते हैं और श्रावक गण नित्य ही सुनते हैं। खोटे शास्त्र वहाँ पर कभी भी नहीं सुनते। स्वर्ग और मोक्ष सुख का जो साधक है, श्रावक धर्म और मुनि धर्म के भेद से जो दो प्रकार है तथा अहिंसा ही जिसका लक्षण है, ऐसा अनाद्यनिधन धर्म ही वहाँ निरंतर प्रवर्तित रहता है। वहाँ पर व्रत, शील और उपवास आदि के द्वारा जिनेन्द्र देव द्वारा प्रतिपादित श्रेष्ठ धर्म का ही सेवन होता है। धूर्तों के द्वारा कहा हुआ तथा अन्य हिंसा आदि से उत्पन्न और दुर्गति प्रदाता धर्म नहीं है। वहाँ की प्रजा क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों से समन्वित है, भद्र परिणामी अर्थात् कुटिलता रहित है, विवेकवान एवं ज्ञानवान है, जिनधर्म परायण, न्यायमार्ग में आरूढ़ और सम्यग्दर्शन ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र से अलंकृत है। वहाँ पर मिथ्यामतों से उत्पन्न होने वाली खोटी बुद्धि को धारण करने वाले मनुष्य नहीं हैं तथा कुमार्गगामी द्विज-ब्राह्मण भी नहीं हैं ॥१४७-१६३॥


जम्बूद्वीपे महामेरूरेकः षट्कुलपर्वताः।
चत्वारो गजदन्ताश्च द्व्यष्टवक्षारभूधराः ॥१७४॥

अष्टौ दिग्गजशैलाः स्युश्चत्वारो यमकाद्रयः।
चत्वारो नाभिशैलाश्च द्वेशते काञ्चनाद्रयः ॥१७५॥

विजयार्धाश्चतुस्त्रिंशत्तावन्तो वृषभाद्रयः।
सर्वे पिण्डीकृता एते त्रिशतैकादशोत्तराः ॥१७६॥

अर्थ (श्लोक 174 से 176): जम्बूद्वीप में एक सुदर्शनमेरु, छह कुलाचल पर्वत, चार गजदन्त, सोलह वक्षार पर्वत, आठ दिग्गज पर्वत, चार यमकगिरि, चार नाभिगिरि, दो सौ काञ्चन पर्वत, चौंतीस विजयार्ध और चौंतीस वृषभाचल पर्वत हैं। इन सबको एकत्रित करने पर जम्बूद्वीपस्थ (१ + ६ + ४ + १६ + ८ + ४ + ४ + २०० + ३४ + ३४) = ३११ पर्वत होते हैं ॥१७४-१७६॥


एतेभ्यो द्विगुणाः सन्ति मेर्वाद्या अद्रयोऽखिलाः।
द्वीपे च धातकीषण्डे पुष्करार्धे तथापरे ॥१७७॥

अर्थ: धातकीखण्ड में और पुष्करार्ध द्वीप में मेरु आदि पर्वतों की संख्या जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है अर्थात् धातकीखण्ड में ६२२ पर्वत और पुष्करार्ध द्वीप में ६२२ पर्वत हैं ॥१७७॥


जम्बूद्वीपे वनेद्वेस्तो भद्रशालाह्वये परे।
जम्बूशाल्मलिवृक्षौ च कुलाचलस्थ षड्द्रहाः ॥१७८॥

सीतासीतोदयोर्मध्ये हृदाः स्युर्विंशति प्रमाः।
जघन्यमध्यमोत्कृष्ट भेदैः षड् भोगभूमयः ॥१७९॥

चतुस्त्रिंशन्महादेशा भरतैरावतान्विताः।
स्युर्नगर्य्यश्चतुस्त्रिंशदार्यखण्डान्तर स्थिताः ॥१८०॥

भवन्त्युपसमुद्राश्चतुस्त्रिंशच्छाश्वतेतराः ।
देवारण्यवनेद्वेस्तो द्वे भूतारण्यसद्मने ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 178 से 181): जम्बूद्वीप में पूर्व भद्रशाल और पश्चिम भद्रशाल नाम के दो वन हैं। जम्बू और शाल्मली नाम के दो वृक्ष हैं। छह कुलाचलों पर छह सरोवर हैं। सीता सीतोदा के मध्य में बीस ह्रद हैं। दो जघन्य भोगभूमियाँ, दो मध्यम और दो उत्कृष्ट, इस प्रकार छह भोगभूमियाँ हैं। भरतैरावत सहित चौंतीस महादेश हैं और आर्य खण्डों में स्थित चौंतीस ही नगरी (राजधानियाँ) हैं। अनाद्यनिधन चौंतीस उपसमुद्र हैं एवं देवारण्य नाम के दो तथा भूतारण्य नाम के दो उत्तम वन हैं ॥१७८-१८१॥


द्वादशैव विभाङ्गाख्या नद्यस्तास्ताश्च पिण्डिताः।
परिवाराह्वयानद्यस्त्रिलक्षसहितान्यपि ॥१८२॥

स्युः षट्त्रिंशत्सहस्राणि विदेहक्षेत्रमध्यगाः।
गङ्गाद्याः क्षुल्लिका नद्यश्चतुःषष्टिप्रमाणकाः ॥१८३॥

आसां पिण्डीकृताः सर्वाः परिवाराख्यनिम्नगाः।
षण्णवतिसहस्राणिह्यष्टलक्षयुतान्यपि ॥१८४॥

चतुर्दशमहानद्यः सप्तक्षेत्रान्तराध्वगाः।
गङ्गादिप्रमुखास्तासां परिवारनदीव्रजाः ॥१८५॥

मेलिताः पञ्चलक्षाग्रसहस्रषष्टिसम्मिताः।
सप्ताग्रदशलक्षाणि द्वियुता नवतिस्तथा ॥१८६॥

सहस्राणि नवत्या सहेति संख्या जिनोदिता।
मूलोत्तरनदीनां सर्वासां द्वीपे किलादिमे ॥१८७॥

अर्थ (श्लोक 182 से 187): विदेह क्षेत्र में विभंगा नदियाँ १२ हैं, (प्रत्येक नदी की सहायक नदियाँ २८००० हैं, अतः २८००० × १२) = इनकी समस्त परिवार नदियों का योग ३३६००० होता है। विदेह देशस्थ गंगा-सिन्धु और रक्ता-रक्तोदा ६४ हैं, (इनमें प्रत्येक की परिवार नदियाँ १४००० हैं) अतः इनकी परिवार नदियों का कुल योग (१४००० × ६४) = ८९६००० होता है। जम्बूद्वीपस्थ सात क्षेत्रों के मध्य में बहने वाली गंगादि चौदह महानदियाँ हैं, जिनकी परिवार नदियों का कुल योग (गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदा की १४००० × ४ = ५६००० + रोहित, रोहितास्या, स्वर्णकूला, रूप्यकूला की २८००० × ४ = ११२००० + हरि, हरिकांता, नारी, नरकान्ता की ५६००० × ४ = २२४००० + और सीता, सीतोदा की १६८००० =) १७९२००० है। इनमें मूल नदियाँ (१४ + १२ + ६४ =) ९० और मिला देने से जम्बूद्वीपस्थ कुल नदियों का योग १७९२०९० होता है ॥१८२-१८७॥ जम्बूद्वीपस्थ भरतादि सात क्षेत्रों में मूल और परिवार नदियों का सर्व योग १७९२०९० प्रमाण जानना चाहिए।


गङ्गादिपातदेशेषु कुण्डान्येव चतुर्दश।
विभंगाक्षुल्लकानिम्नगाश्च षट्सप्ततिः स्फुटम् ॥१८८॥

भद्रशालसरिज्जम्बूवृक्षादयोऽखिला अमी।
द्विगुणा धातकीखण्डे पुष्करार्धे भवन्ति च॥१८९॥

अर्थ (श्लोक 188 से 189): जम्बूद्वीप में गंगादि चौदह महानदियों के पतन स्वरूप चौदह कुण्ड हैं और बारह विभंगा एवं ६४ गंगादि छोटी नदियों के निकलने के (६४ + १२) छिहत्तर (७६) कुण्ड हैं। इस प्रकार कुल ९० कुण्ड हैं। जम्बूद्वीप में भद्रशाल आदि वन, जम्बू आदि वृक्ष एवं नदियों आदि का जो-जो प्रमाण कहा है, धातकीखण्ड और पुष्करार्ध द्वीप में वह सब प्रमाण दूना-दूना जानना चाहिए ॥१८८-१८९॥


यत्रोच्चैः पदसिद्धये सुकृतिनोजन्माश्रयन्तेऽमरा,
यस्मान्मुक्तिपदं प्रयान्तितपसा केचिच्चनाकं व्रतैः।
तीर्थेशा गणनायकाश्च गणिनः श्रीपाठकाः साधवः,
सङ्घाढ्याविहरन्ति सोऽत्रजयतान्नित्यो विदेहो गुणैः ॥१९०॥

अर्थ: जहाँ पर पुण्यशाली देवगण मोक्षपद की प्राप्ति के लिये जन्म लेते हैं। जहाँ से कितने ही भव्य जन समीचीन तप के द्वारा मोक्षपद प्राप्त करते हैं, कितने ही व्रतों के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करते हैं तथा जहाँ पर तीर्थंकर देव, गणधर देव, आचार्य, उपाध्याय और साधुगण संघ सहित विहार करते हैं और जहाँ से रत्नत्रय आदि गुणों के द्वारा देह से रहित होते हैं, ऐसा वह विदेह क्षेत्र नित्य ही जयवन्त रहे ॥१९०॥


अधिकारान्त मंगलाचरण


ये तीर्थेशाः सुरार्च्या जगति हितकराः सद्विदेहे च जाता,
अस्माद्ये मोक्षमाप्ता हतविविधवपुषोज्ञानरूपाश्च सिद्धाः।
आचार्याः पाठका ये गुणगणनिलयाः साधवः साधितार्था-
स्ते सर्वे सङ्गहीना निजगुणगतये वन्दिताः सन्तुमेऽद्य ॥१९१॥

अर्थ: विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले, जगत् का सर्वोपरि हित करने वाले और देवसमूह से अर्चित तीर्थंकर देव, कर्म और शरीर को नाश करके मोक्ष प्राप्त करने वाले ज्ञानशरीरी सिद्ध परमेष्ठी, गुणसमूह के आलय आचार्य और उपाध्याय परमेष्ठी तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन करने वाले समस्त निर्ग्रन्थ साधु, जो कि आज मेरे द्वारा वन्दित हैं, वे सब मेरे निजगुणों की प्राप्ति के लिये हों, अर्थात् मुझे मोक्षगति प्राप्त करने में सहायक हों ॥१९१॥

नवम अधिकार छह कालों का प्ररूपण (भाग 1/2)

आदिमध्यान्तसञ्जातान् तुर्ये काले जगद्धितान्।
त्रिजगद्दीपकान् वन्दे ज्ञानाय परमेष्ठिनः ॥१॥

अर्थ: चतुर्थकाल के आदि, मध्य और अन्त में उत्पन्न होने वाले, त्रैलोक्य का हित करने वाले और तीनों जगत् को प्रकाशित करने के लिये दीपक के सदृश पञ्च परमेष्ठियों को ज्ञान प्राप्ति के लिये नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ येऽत्र प्रवर्तन्ते कालाः षट् षट् पृथग्विधाः।
उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ भरतैरावतेषु च ॥२॥

एकैकनित्यरूपेण विदेहादिजगत्त्रये।
वक्ष्ये तेषां पृथग्भूतं स्वरूपं वर्तनादिभिः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): भरत एवं ऐरावत क्षेत्रों (के आर्य खण्डों) में उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणी काल सम्बन्धी भिन्न-भिन्न छह-छह कालों का वर्तन होता है और विदेह आदि तीनों लोकों में अवस्थित रूप से एक-एक काल का वर्तन होता है। अब यहाँ मैं वर्तनादि के द्वारा उनका भिन्न-भिन्न स्वरूप कहूँगा ॥२-३॥


अमीषां प्रथमः कालः सुषमासुषमाह्वयः।
सुखाकरोऽवसर्पिण्यामुत्कृष्टभोगभूमिवत् ॥४॥

सागराणां चतुःकोटि कोटिप्रमाणउत्तमः।
तस्यादौ तपनीयाभास्त्रिपल्योपमजीविताः ॥५॥

क्रोशत्रयोन्नता आर्या वदरीफलमात्रकम्।
भुञ्जना दिव्यमाहारं गते दिनत्रये सति ॥६॥

उत्कृष्टपात्रदानोत्थोत्कृष्टपुण्येन सन्ततम्।
भुञ्जन्त्युत्कृष्टसद्भोगान् दशांगकल्पवृक्षजान् ॥७॥

अर्थ (श्लोक 4 से 7): अवसर्पिणी काल के इन छह कालों में से सुख के आकर स्वरूप प्रथम काल का नाम सुषमा-सुषमा है, जहाँ की रचना उत्कृष्ट भोगभूमि के सदृश होती है। इस काल का प्रमाण चार कोड़ाकोड़ी सागरोपम (४००००००००००००००० सागर) होता है। इस काल के आदि में जीवों की आयु का प्रमाण तीन पल्योपम, शरीर की कान्ति तपाये हुए स्वर्ण के सदृश और ऊँचाई तीन कोश (छह हजार धनुष) प्रमाण होती है। ‘आर्य’ इस नाम को धारण करने वाले मनुष्य तीन दिन बाद बदरीफल प्रमाण दिव्य आहार का भोजन करते हैं। उत्तम पात्रदान के फल से उत्पन्न उत्कृष्ट पुण्य के द्वारा यहाँ उत्पन्न होने वाले जीव दश प्रकार के कल्पवृक्षों से है उत्पत्ति जिनकी, ऐसे उत्कृष्ट भोगों को निरन्तर भोगते हैं ॥४-७॥


मद्यवाद्यविभूषास्रग्दीपज्योतिर्गृहाङ्गकाः ।
भोजनाङ्गस्तथा भाजनवस्त्राङ्गा दशेत्यमी ॥८॥

मद्यांगा वितरन्त्येषां ततामोदान् रसोत्कटान्।
सारान् सुधोपमान् कामोद्दीपकान् मद्यवत्तराम् ॥९॥

भेरीपटहशंखादीन्नाना वाद्यान् फलन्ति च।
वाद्याङ्गागीतनृत्यादौ वीणामृदंग-झल्लरीः ॥१०॥

स्वर्णरत्नमयान् दीप्तान् दिव्यांश्च भूषणांगकाः ।
हारकुण्डलकेयूरमुकुटादीन् ददत्यलम् ॥११॥

स्रजो नानाविधादिव्याः सर्वर्तु कुसुमांकिताः।
स्नुवन्ते भोगसौख्यायार्याणां सदा स्रगङ्गकाः ॥१२॥

ध्वस्तध्वान्ताश्च दीपांगामणिदीपैर्विभान्त्यलं।
ज्योतिरंगा महोद्योतमातन्वन्ति स्फुरद्रुचः ॥१३॥

तुंगसौधसभागृहमण्डपादीन् गृहांगकाः ।
चित्रनर्तनशालाश्च विधातुं सर्वदा क्षमाः ॥१४॥

अन्नादिचतुराहारानमृतस्वादुदायिनः ।
दिव्यांश्च षड्रसान् पुण्याद् भोजनांगा ददत्यहो ॥१५॥

हेमस्थालानि भृंगारान् चषकान् करकादिकान्।
भाजनांगा दिशन्त्याविर्भवच्छाखाग्र सत्फलाः ॥१६॥

मृदुसूक्ष्माणिवस्त्राणि पट्टकूलानि संततम्।
वितरन्ति च वस्त्रांगाः प्रावारपरिधानकान् ॥१७॥

न वनस्पतयोऽत्रैते नापिदेवैरधिष्ठिताः।
केवलं पृथ्वीसारमया निसर्गसुन्दराः ॥१८॥

अनादिनिधनाः कल्पद्रुमाः सत्पात्रदानतः।
संकल्पितमहाभोगान् दशभेदांश्च्युतोपमान् ॥१९॥

फलन्ति दानिनां प्रीत्यै यथैते पादपा भुवि।
सर्वरत्नमयं दीप्रं भात्यत्र भूतलं परम् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 8 से 20): प्रथम काल में मद्यांग (पानांग), वाद्यांग, भूषणांग, मालांग, दीपांग, ज्योतिरांग, गृहांग, भोजनांग, भाजनांग और वस्त्रांग ये दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते हैं। इनमें से मद्यांग नाम के कल्पवृक्ष प्रमोद बढ़ाने वाले, मद्य के समान कामोद्दीपक, अमृत की उपमा को धारण करने वाले और श्रेष्ठ (वीर्यवर्धक) (३२ प्रकार के) उत्कृष्ट रसों को देते हैं। वाद्यांग कल्पवृक्ष, भेरी, पटह, शंख आदि तथा गीत नृत्य आदि के उपयोग में आने वाले वीणा, मृदंग और झल्लरी आदि वाद्यों को देते हैं। भूषणांग कल्पवृक्ष स्वर्ण और रत्नमय देदीप्यमान हार, कुण्डल, केयूर और मुकुट आदि दिव्य आभूषण देते हैं। स्रगंगकल्पवृक्ष वहाँ के आर्य मनुष्यों के भोग और सुख के लिये सर्व ऋतुओं के फूलों से बनी हुई नाना प्रकार की दिव्य मालाएँ देते हैं। दीपांग कल्पवृक्ष मणिमय दीपों के द्वारा अन्धकार को नष्ट करते हुए सुशोभित होते हैं। ज्योतिरांग कल्पवृक्ष देदीप्यमान ज्योति से महान् प्रकाश फैलाते हैं। गृहांग वृक्ष निरन्तर ऊँचे-ऊँचे प्रासाद सभागृह, मण्डप आदि तथा चित्र शालाएँ और नृत्य आदि शालाएँ देने में समर्थ हैं। भोजनांग कल्पवृक्ष पुण्य के प्रभाव से अन्न, पान, खाद्य और लेह्य यह चार प्रकार का अमृततुल्य, उत्तम स्वाद देने वाला, छह रसों से युक्त और दिव्य आहार देते हैं। भाजनांग कल्पवृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग पर स्वर्णमय थालियाँ, भृंगार, कटोरा और करक (जलपात्र) आदि प्रकट होते हैं। वस्त्रांग कल्पवृक्ष निरन्तर मृदु एवं बारीक रेशम आदि के वस्त्र और धोती-दुपट्टा तथा अभ्यंतर में पहनने योग्य वस्त्रों को देते हैं। ये दसों प्रकार के कल्पवृक्ष न वनस्पतिकाय हैं और न देवों के द्वारा अधिष्ठित हैं, ये तो केवल पृथ्वी के सारमय, स्वाभाविक सुन्दर और अनादिनिधन हैं। सत्पात्र दान के प्रभाव से उपमा रहित ये कल्पवृक्ष मनोवांछित उत्तम भोगों को देते हैं। पृथ्वी पर जैसे अन्य वृक्ष फल देते हैं उसी प्रकार दानियों के फल प्राप्ति के लिए ये वृक्ष फलते हैं, यहाँ की सर्व रत्नमय चमकती हुई उत्कृष्ट भूमि अत्यन्त सुशोभित होती है ॥८-२०॥


मृगाश्चरन्ति तत्रत्या मृदुस्वादुतृणान्यपि।
चतुरंगुलमानानि रसायनरसास्थया ॥२१॥

न तत्रातपजा बाधा शीतो वृष्टिर्न जातुचित्।
ऋतवो नाप्यहोरात्रं किञ्चित्त्राशर्मकारणम् ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 21 से 22): वहाँ पर मृदु और सुस्वादु चार अंगुल प्रमाण तृण उत्पन्न होता है जिसे मृग रसायन के स्वाद की वाञ्छा से चरते हैं। वहाँ पर न गर्मी जन्य बाधा होती है, न कभी शीत जन्य, न वर्षा जन्य और न कभी ऋतुओं के परिवर्तन जन्य बाधा होती है। उन्हें रात्रि दिन में दुःख के कारण किञ्चित् भी प्राप्त नहीं होते ॥२१-२२॥


सद्यो जातार्थबालानां दिनसप्तान्तमुद्रसम्।
भवेदुत्तानशय्यायामंगुल्याहार उत्तमः ॥२३॥

ततः सप्तदिनान्येषां धरणीरङ्गरिङ्गिणाम्।
दम्पतीनां मनोज्ञः स्यात्किञ्चिद्वृद्ध्या दशान्तरः ॥२४॥

सप्ताहेनापरेणैते प्रोत्थाय कलभाषिणः।
सञ्चरन्ति स्वयं भूमौ स्खलगति सहेलया ॥२५॥

पुनः स्थिरपदन्यासैर्व्रजन्ति दिनसप्तकम्।
सप्ताहं निर्विशंत्युच्चैः कलाज्ञानादिसद्गुणैः ॥२६॥

अन्यैः सप्तदिनैस्ते स्युः सम्पूर्णनवयौवनाः।
दिव्यांशुकसुभूषाढ्याः स्त्रीनरा भोगभागिनः ॥२७॥

स्थित्वातिनिर्मले गर्भे नवमासान् स्त्रियःशुभान्।
एत्य दम्पतितामत्रोत्पद्यन्ते दानिनो नराः ॥२८॥

यदा दम्पति सम्भूतिस्तदा मृत्युः स्फुटं भवेत्।
जनयित्रोस्ततोऽमीषां संकल्पो न सुतादिजः ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 23 से 29): तत्काल उत्पन्न हुए आर्य बालकों का सात दिन पर्यन्त शय्या पर सीधे सोते हुए अंगुली में स्थित उत्कट एवं उत्तम रस का आहार होता है। इसके पश्चात् सात दिन पर्यन्त पृथ्वी पर रेंगते हुए वे अति मनोज्ञ स्त्री पुरुष किञ्चित् बुद्धि के द्वारा अन्य दशा को प्राप्त होते हैं अर्थात् कुछ बड़े हो जाते हैं। अन्य सात दिनों में वे उठकर सुन्दर वचन बोलते हैं और स्वयं अपनी इच्छा से क्रीड़ा करते हुए अस्थिर गति से भूमि पर चलते हैं। पुनः सात दिन पर्यन्त स्थिर पैर रखते हुए चलते हैं और अन्य सात दिनों में वे ज्ञान कला आदि सद्गुणों के द्वारा परिपूर्ण हो जाते हैं। अन्य सात दिनों के द्वारा दिव्य वस्त्राभूषणों से युक्त और अखण्ड भोग-भोगने वाले वे स्त्री पुरुष सम्पूर्ण नवयौवन सम्पन्न हो जाते हैं। दानी मनुष्य शुभयोग से भोगभूमिज स्त्रियों के अत्यन्त निर्मल गर्भ में नौ मास स्थित रहकर उत्पन्न होते हैं और पश्चात् वे ही दम्पतिपने को प्राप्त हो जाते हैं। जब नवीन दम्पति उत्पन्न होते हैं तभी उत्पन्न करने वाले दम्पति मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, इसीलिए माता पिता पुत्रादि की उत्पत्ति के सुख से रहित होते हैं अर्थात् ये पुत्र-पुत्री हैं, इस संकल्प से रहित होते हैं ॥२३-२९॥


आजन्ममरणान्तं नार्याणां रोगो मनाक् क्वचित्।
न चेष्टादिवियोगो नानिष्टसंयोगशोचनम् ॥३०॥

न चिन्ता दीनता नैव नाप्युन्मेषनिमेषणम्।
न निद्रा नातितन्द्रा नो लाला स्वेदोद्भवो न च ॥३१॥

मलं मूत्रं न शारीरं कामभोगे न खण्डता।
विरहो नाशुभोन्मादो नेर्ष्या न च पराभवः ॥३२॥

विषादो न भयं ग्लानिर्न च किञ्चिद् विरूपकम्।
अन्यद् वा जायते दुःखहेतुः स्वप्नेऽपि भोगिनाम् ॥३३॥

आदि संहनना आदि संस्थाना दिव्यरूपिणः।
समभोगोपभोगास्ते सर्वे मन्दकषायिणः ॥३४॥

स्वभावसुन्दराकाराः स्वभावसौम्यमूर्तयः।
स्वभावमधुरालापाः स्वभावगुणभूषिताः ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 30 से 35): भोगभूमिज मनुष्यों के जन्म से मरण पर्यन्त न कभी किंचित् भी रोग होता है, न इष्ट आदि का वियोग, न अनिष्ट आदि का संयोग और न शोक आदि होता है, न चिन्ता है, न दैन्यता है और न नेत्रों का उन्मेषनिमेष अर्थात् पलकों का झपकना है। न अति निद्रा है, न प्रतितन्द्रा, न मुख से लार और न शरीर से पसीना की उद्भूति होती है, शरीर सम्बन्धी मल-मूत्र भी नहीं होता, और न काम भोग में कभी खंडता आती है, न कभी विरह होता है, न अशुभ उन्माद होता है, न ईर्ष्या भाव है, न पराभव है, न विषाद है, न भय है, न ग्लानि है, और न शरीर आदि में किञ्चित् भी विरूपता होती है। उन भोगी जीवों के स्वप्न में भी अन्य कोई दुःख के कारण उत्पन्न नहीं होते। वे सर्व भोगभूमिज जीव प्रथम (वज्रवृषभवज्रनाराच) संहनन और प्रथम समचतुरस्र संस्थान से युक्त, दिव्य रूप सम्पन्न, मन्द कषायी एवं समान भोग उपभोग वाले होते हैं। वे स्वभावतः सुन्दर आकार वाले, स्वभावतः सौम्य मूर्ति, स्वभावतः मधुर भाषी और स्वभावतः अनेक गुण विभूषित होते हैं ॥३०-३५॥


आर्या आर्यस्वभावास्ते सत्पात्रदानपुण्यतः।
दशधाकल्पवृक्षोत्थान् भोगान् भुञ्जन्त्यहर्निशम् ॥३६॥

भद्रकाः पात्रदानेन केचिद् दानानुमोदतः।
स्त्रीनरा चात्र तिर्यञ्चो जायन्ते भोगभागिनः ॥३७॥

अव्रता दृष्टिहीनाश्च कुपात्रदानतो मृगाः।
उत्पद्यन्तेऽल्पशर्माणो युग्मरूपेण भद्रकाः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 36 से 38): सत्पात्रदान के पुण्य से जीव भोगभूमि में आर्य और आर्या भाव से उत्पन्न होकर अहर्निश दश प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं। कुटिलता रहित भद्र परिणामी कोई जीव पात्रदान के फल से और कोई दान की अनुमोदना से वहाँ पर भोग भोगने वाले स्त्री, पुरुष और तिर्यञ्च होते हैं। व्रत रहित और सम्यक्त्व रहित कोई जीव कुपात्रों को दान देते हैं और उसके फलस्वरूप भोगभूमि में अल्प सुख से युक्त, युगल रूप से भद्र परिणामी मृग आदि पर्यायों में उत्पन्न होते हैं ॥३६-३८॥


आयुषोऽन्ते विमुच्यासून् क्षुता जृम्भकया ततः।
आर्याः स्त्रियो दिवं यान्त्यार्जवभावेन नान्यथा ॥३९॥

अर्थ: आयु के अन्त में पुरुष और स्त्री क्रमशः छींक एवं जम्भाई के द्वारा प्राणों को छोड़कर आर्जव (सरल) भावों के कारण स्वर्ग ही जाते हैं, अन्य गतियों में नहीं जाते ॥३९॥


ततः कालो द्वितीयोऽस्ति सुषमाख्यः सुखाङ्कितः।
त्रिकोटीकोटिवाराशिप्रमो मध्यमभोगकृत् ॥४०॥

तस्यादौ पूर्णचन्द्राभा द्विक्रोशोच्चसुविग्रहाः।
द्विपल्याखण्डितायुष्का अक्षमानान्नभोजिनः ॥४१॥

दिनद्वये गते मध्यमपात्रदानजाच्छुभात्।
भोगान् दशविधानार्या भजन्ति कल्पवृक्षजान् ॥४२॥

अन्यत्सर्वं समानं स्यादत्राद्यकालवर्तिनैः।
ततस्तृतीयकालोऽस्ति सुषमादुःषमाभिधः ॥४३॥

जघन्यभोगभूयुक्त आद्यसौख्यान्तदुःखधृत्।
द्विकोटीकोटिपूर्णाब्धिस्थितिः कल्पद्रुमाश्रितः ॥४४॥

अस्यादौ मानवाः सन्ति पल्यैकाखण्डजीविनः।
प्रियंगुश्यामवर्णाङ्गाः क्रोशैकोन्नतविग्रहाः ॥४५॥

दिनान्तरेण सौख्यायामलकाभान्नभोगिनः।
कृत्स्नमन्यत्समं स्यात्प्रागुक्तकालवर्तिनैः ॥४६॥

कालत्रयोद्भवार्याणां सहसा स्वायुषः क्षये।
दिव्याङ्गानि विलीयन्ते यथाभ्रपटलानि च ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 40 से 47): प्रथम काल के बाद सुखों से युक्त सुखमा नाम का दूसरा काल आता है, इसमें मध्यम भोगभूमि की रचना होती है और इसका प्रमाण तीन कोड़ाकोड़ी (३००००००००००००००) सागरोपम होता है। द्वितीय काल के प्रारम्भ में मनुष्यों के शरीर की प्रभा पूर्ण चन्द्रमा के सदृश और ऊँचाई दो कोश प्रमाण होती है। ये दो पल्य प्रमाण अखण्डित आयु से युक्त और दो दिन बाद अक्ष (हरड़) फल प्रमाण अन्न का भोजन करने वाले होते हैं। मध्यम पात्रदान से उत्पन्न पुण्य फल के प्रभाव से ये आर्य दस प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोगों को भोगते हैं। अन्य और सर्व वर्णन प्रथम काल के वर्णन के सदृश ही होता है। इसके बाद सुखमा-दुखमा नाम का तृतीय काल आता है। इसकी रचना जघन्य भोगभूमि के सदृश होती है और इस काल के प्रारम्भ में सुख तथा अन्त में दुःख होता है। इस काल की स्थिति दो कोड़ाकोड़ी (२००००००००००००००) सागरोपम प्रमाण होती है, तथा इस काल के प्रारम्भ में मनुष्य कल्पवृक्षों के आश्रय से अखण्डित एक पल्य पर्यन्त जीवित रहते हैं। मनुष्यों के शरीर की आभा प्रियंगुमणि सदृश हरित और श्याम वर्ण होती है, ऊँचाई एक कोस प्रमाण होती है। ये एक दिन के अन्तर से सुख प्राप्ति के लिए आँवले के बराबर भोजन करते हैं। इस काल का अन्य और समस्त वर्तन पहले कहे हुए प्रथम काल के वर्तन के सदृश ही होता है। तीनों कालों में उत्पन्न होने वाले आर्यों (जीवों) के दिव्य शरीर अपनी-अपनी आयु पूर्ण हो जाने पर सहसा अभ्रपटल (मेघों के समूह के) सदृश विलीन हो जाते हैं ॥४०-४७॥


यदा तृतीयकालस्यान्तिमे पल्याष्टमे क्रमात्।
अवशिष्टे स्थिते भागेऽत्रेमे कुलकरास्तदा ॥४८॥

आर्याणां हितकर्तारो जाता दक्षाश्चतुर्दश।
बभूव प्रथमस्तेषां प्रतिश्रुत्यभिधानकः ॥४९॥

स्वयंप्रभापतिर्धीमान् हेमवर्णोऽतिरूपवान्।
अष्टादशशतानां च धनुषामुच्चविग्रहः ॥५०॥

पल्यस्य दशभागानामेकभागस्वजीवितः।
तत्काले ज्योतिरङ्गानां व्युच्छित्तौखेऽति भास्वरौ ॥५१॥

प्रादुर्बभूवतुश्चन्द्रादित्यौ ते दर्शनात्तयोः।
आर्या भीता द्रुतं प्रापुः शरणं तं प्रतिश्रुतिम् ॥५२॥

सोऽपि विद्वान् निरूप्याशु गिरा स्वरूपमञ्जसा।
चन्द्रेनोदयकालानां तेषां भयमपाकरोत् ॥५३॥

‘हा’ नीत्यादान्नृणां शिक्षां तदनन्तरमेव हि।
गते पल्योपमाशीत्येकभागेऽभून्महान्मनुः ॥५४॥

सन्मत्याख्यो द्वितीयोऽत्र भर्ता यशस्वतोस्त्रियः।
त्रयोदशशतानां च चापानां तुङ्गदेहभाक् ॥५५॥

पल्यस्य शतभागानामेकभागायूरूर्जितः।
स्वर्णवर्णस्तदा सर्व ज्योतिरङ्ग क्षयान्नभः ॥५६॥

आपूर्य ग्रहताराद्याः प्रादुरासन् स्फुरत्प्रभाः।
ते भीता दर्शनात्तेषां जग्मुस्तं सन्मतिं विभुम् ॥५७॥

भयनाशाय तेषां स इत्याख्यत्प्रवरं वचः।
हे भद्रका! ग्रहा एते ह्यमीतारादयः शुभाः ॥५८॥

ज्योतिश्चक्रेण वोऽनेन किञ्चिन्नास्तिभयादिकम्।
किंत्वद्यप्रभृति ज्योतिष्कैर्वर्तते दिनं निशा ॥५९॥

इति तद्वचनात्प्रीतास्तं स्तुत्वाऽगुर्निजास्पदम्।
क्वचित् तान् कृतदोषान् स हा नीत्यातर्जयत्सुधीः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 48 से 60): जब तृतीय काल के अन्त में पल्य का आठवाँ भाग अवशेष रहता है तब यहाँ आर्यों का हित करने में प्रवीण ऐसे चौदह कुलकर क्रम से उत्पन्न होते हैं। उनमें से प्रथम कुलकर प्रतिश्रुति नाम के हुए, जिनकी पत्नी का नाम स्वयंप्रभा था। जो हेमवर्ण की आभा से युक्त अति रूपवान एवं बुद्धिमान् थे। उनके शरीर की ऊँचाई १८०० धनुष और आयु का प्रमाण पल्य के दश भागों में से एक भाग ( १/१० पल्य) प्रमाण थी। तत्काल ही अर्थात् पल्य का आठवाँ भाग अवशेष रहने पर ज्योतिरांग कल्पवृक्षों की कान्ति नष्ट हो जाने पर आकाश में (आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन) सूर्य और चन्द्र का प्रादुर्भाव होता है, उन रवि शशि के दर्शन से भयभीत हुए वे सब आर्य और आर्या शीघ्र ही प्रतिश्रुति कुलकर की शरण में पहुँचते हैं, तब वे बुद्धिमान् प्रतिश्रुति कुलकर शीघ्र ही अपने प्रिय वचनों द्वारा सूर्य चन्द्र के उदयकाल आदि के स्वरूप का वर्णन करके उनका भय दूर करते हैं। उसी समय ही उन्होंने मनुष्यों को ‘हा’ इस दण्ड नीति की शिक्षा दी थी अर्थात् अपराध करने वाले मनुष्यों को ‘हा’ इस प्रकार के दण्ड का स्थापन किया था। इसके बाद अर्थात् इस कुलकर की मृत्यु के बाद पल्योपम के अस्सी भाग समाप्त हो चुकने पर यशस्वति स्त्री के स्वामी सन्मति नाम के द्वितीय महामनु यहाँ उत्पन्न हुए। इनके शरीर की ऊँचाई १३०० धनुष, आयु पल्य के सौ भागों में से एक भाग ( १/१०० पल्य) प्रमाण और शरीर की कान्ति स्वर्ण सदृश थी। सर्व ज्योतिरांग कल्पवृक्षों के क्षय हो जाने से चमकती हुई प्रभा से युक्त प्रकट होते हुए ग्रहों एवं तारागणों ने आकाश मण्डल को आपूर्ण कर दिया अर्थात् भर दिया, जिसके दर्शन से भयभीत हुए लोक जन सन्मति प्रभु की शरण को प्राप्त हुए। उनके भय को नाश करने के लिए वे इस प्रकार श्रेष्ठ वचन बोले कि-हे भद्र जनों ! ये ग्रह हैं, और ये शुभ तारा गण आदि हैं। इस ज्योतिष चक्र से आप लोगों को किंचित् भी भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि अब इन्हीं ज्योतिषी देवों के द्वारा आप लोगों को दिन और रात्रि के भेद का ज्ञान होगा। इस प्रकार मनु के वचनों से सन्तोष को प्राप्त होकर तथा उनकी स्तुति करके वे सब अपने अपने स्थान को चले गये। दोष करने वाले लोगों को वे उत्तम बुद्धि के धारक सन्मति मनु ‘हा’ इसी दण्ड नीति से तर्जन करते थे ॥४८-६०॥


ततोऽष्टशतभागानां पल्यस्यातिक्रमे सति।
एकभागे मनुर्जज्ञे क्षेमङ्करो विशारदः ॥६१॥

सुनन्दायाः स्त्रियोभर्त्ताप्रोद्यमी काञ्चनच्छविः।
शताष्टधनुरुत्तुङ्ग एकभागायुरुत्तमः ॥६२॥

पल्यस्य कृतभागानां सहस्रसंख्यया तदा।
तत्रत्याः भद्रकाः प्रापुः क्रूरतां कालतो मृगाः ॥६३॥

तद् बाधामक्षमाः सोढुमार्याः क्षेमङ्करं भयात्।
आश्रित्याशु स्वबाधानाशायेदं सद्वाचोऽवदन् ॥६४॥

प्रभो! ये प्राग्मृगा भद्रा अस्माभिलालिताः करैः।
अधुना क्रूरतां प्राप्तास्ते घ्नन्त्यस्मान् नखादिभिः ॥६५॥

तान् प्रत्याह मनुश्चेत्थमेतेऽहो कालदोषतः।
सहसा परिहर्तव्या अन्तरे विकृतिं गताः ॥६६॥

भवद्भिर्नाद्य विश्वासः कर्तव्यः क्रूरजन्मनाम्।
एतान् स्वक्षेमशिक्षादीन् श्रुत्वा ते तत्स्तवं व्यधुः ॥६७॥

प्रीतः सोपि प्रजानां स्वहाकारदण्डमादिशेत्।
पुनर्भागे गते पल्याष्टसहस्त्रैकमानके ॥६८॥

धीमान् कुलकरोऽत्रासीत् क्षेमन्धरः सुक्षेमकृत्।
विमलाभामिनीकान्तः कनककाञ्चनभाङ्गभृत् ॥६९॥

तस्योन्नतिश्च दण्डानां पादोनाष्टशतप्रमा।
पल्यस्य दशसहस्त्रैकभागाङ्गजीवितम् ॥७०॥

तदाति क्रूरताप्तेभ्यो मृगादिभ्यः स धीरधीः।
यष्ट्यादिताडनैस्तासां बाधां न्यवारयद्द्रुतम् ॥७१॥

प्रजानां कृतदोषाणां सोऽपि हाकारदण्डभृत्।
पल्याशीतिसहस्त्रैकभागे गते ततोऽभवत् ॥७२॥

मनुः सीमङ्करो ज्ञानी पतिर्मनोहरिस्त्रियः।
सार्धसप्तशतैश्चापैरून्नतः कनकप्रभः ॥७३॥

पल्यलक्षैकभागायुर्हाकारदण्डदायकः।
कल्पवृक्षा यदा चासन् विरला मन्दकाः फलैः ॥७४॥

तदार्याणां विसम्वादस्तत्कृतोऽभूत् परस्परम्।
ततः सीमावधिं तेषां स व्यधात् क्षेमवृत्तये ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 61 से 75): इसके बाद पल्य के ८०० भाग व्यतीत हो जाने पर एक भाग में क्षेमङ्कर नाम के अति निपुण मनु हुए, जो सुनन्दा स्त्री के स्वामी, उद्यमवान और स्वर्णाभा के सदृश सुन्दर शरीर के धारक थे। इनके शरीर की ऊँचाई ८०० धनुष और आयु का प्रमाण पल्य के एक हजार भागों में से एक भाग (१/१००० पल्य) था। इन्हीं मनु के जीवन काल में वहाँ रहने वाले मृग, शेर आदि काल दोष के प्रभाव से क्रूरता को प्राप्त हो गये तब उनकी बाधा को सहन करने में असमर्थ होते हुए आर्यजन भय से शीघ्र ही क्षेमंकर के समीप जाकर अपनी बाधा नाश करने के लिये इस प्रकार उत्तम वचन बोले हे प्रभो! ये मृग, सिंह आदि पहले भद्र परिणामी थे और हम लोगों के हाथों से इनका लालन पालन किया गया है, किन्तु आज ये क्रूरता को प्राप्त होकर हमें अपने नाखूनों से मारते हैं। उन आर्यजनों को प्रति उत्तर देते हुए मनु बोले-कि काल दोष के प्रभाव से इनके मनों में विकार उत्पन्न हो गया है, अतः इनको शीघ्र ही छोड़ देना चाहिए! आप लोगों को अब इनका विश्वास नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अपने कल्याण की शिक्षा आदि को सुनकर उन्होंने मनु की बहुत स्तुति की। प्रजा जनों को प्रीति (कल्याण) के लिए उन्होंने भी ‘हा’ दण्ड नीति का ही आदेश दिया। पुनः पल्य के आठ हजार (८०००) प्रमाण भाग व्यतीत हो जाने पर अत्यन्त कल्याण करने वाले, बुद्धिमान क्षेमन्धर नाम के कुलकर उत्पन्न हुए, जो विमला महादेवी के स्वामी और स्वर्ण सदृश आभा को धारण करने वाले थे। उनके शरीर की ऊँचाई ७७५ धनुष और आयु पल्य के दश हजार भागों में से एक भाग (१/१०००० पल्य) प्रमाण थी। उस समय मृगादि पशु अत्यन्त क्रूरता को प्राप्त हो गये थे, अतः उन उत्तम बुद्धि को धारण करने वाले मनु ने लकड़ी आदि के द्वारा ताड़न आदि करने की शिक्षा देकर शीघ्र ही उनकी बाधा को दूर किया। प्रजा के द्वारा किये हुए दोषों पर उन्होंने भी ‘हा’ इस दण्ड नीति का प्रयोग किया। पल्य के अस्सी हजार भाग व्यतीत हो जाने के बाद मनोहारी स्त्री के अत्यन्त विद्वान् पति सीमंकर नाम के मनु हुए। जिनके शरीर की ऊँचाई ७५० धनुष और कान्ति स्वर्ण के सदृश थी। इनकी आयु पल्य के एक लाख भागों में से एक भाग (१/१००००० पल्य) प्रमाण थी, तथा ये भी ‘हा’ दण्ड नीति का ही प्रयोग करते थे। आपके समय में जब कल्पवृक्ष विरले और मन्द फल देने वाले हो गये तब आर्य जन परस्पर में विसम्वाद करने लगे, उस समय आपने प्रजा के कल्याण के लिये उनकी अलग सीमा बाँध दी थी ॥६१-७५॥


ततः पल्याष्टलक्षैकभागे गतेऽभवन्मनुः।
सीमन्धरोऽङ्गहेमाभोऽत्र यशोधारिणीप्रियः ॥७६॥

पल्यस्य दशलक्षैकभागायुस्तुङ्गविग्रहः।
शतसप्तप्रमैश्चापैः पञ्चविंशति संयुतैः ॥७७॥

हा-मा-नीतिकरस्तस्मिन् कालेऽतिविरलाः स्वयम्।
जाताः कल्पद्रुमा मन्दफलाश्च कालहानितः ॥७८॥

तत्कारणैस्तदाऽमीषां विसम्वादः परोऽजनि।
ततो गुल्मादि चिह्नैः स तेषां सीमां न्यधात् सुधीः ॥७९॥

पल्यस्याशीति लक्षैकभागे गते ततोऽभवत्।
सुमतिस्त्रीप्रभुर्दक्षो मनुविमलवाहनः ॥८०॥

स्वर्णकान्तिर्महाँस्तुङ्गः शतसप्तशरासनैः।
पल्यकोट्येकभागायुर्हा-मा-नीतिकृतोद्यमः ॥८१॥

अकारयत्प्रजानां तदांकुशाद्यायुधैर्बुधः।
आरोहणं गजादीनामुपरि स्फुटमञ्जसा ॥८२॥

पुनः पल्याष्टकोट्येकभागे गतेऽभवत्सुधीः।
चक्षुष्मान् कुलकर्तात्र धारिणीप्रिय उन्नत‌ः ॥८३॥

दण्डैः षट्शतसंख्यैस्तैः पञ्चसप्ततिसंश्रितैः।
पल्यस्य दशकोट्येकभागजीववधीक्षणः ॥८४॥

प्रियंगुवर्णदीप्ताङ्गस्तदा सुसूनुदर्शनैः।
बभूवादृष्टपूर्वैश्चार्याणां भयं सुजीविनाम् ॥८५॥

तत् क्षणं स निवेद्य स्वपुत्रोत्पत्तिं सुखाप्तये।
सन्तानवृद्धिभूतां च तेषां निराकरोद्भयम् ॥८६॥

तेनैष सार्थनामाभूद्धा-मा-नीतिप्रदोऽङ्गिनाम्।
पल्यस्याशीतिकोट्येकभागेऽतीते ततः शुभात् ॥८७॥

यशस्वी कुलकर्तासीत् कान्तिमालापतिर्बुधः।
सार्धषट्शतचापोच्च प्रियंगुप्रभदेहवान् ॥८८॥

पल्यस्य शतकोट्येकभागायुर्ज्ञानलोचनः।
यशसा भूषितो वाग्मी हा-मा-नीतिप्रवर्तकः ॥८९॥

तदासौ कारयामास पुत्रजातमहोत्सवम्।
अनन्तरं प्रसूतेस्तु पितॄणां चिरजीविनाम् ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 76 से 90): इसके बाद पल्य के आठ लाख भाग व्यतीत हो जाने के बाद यहाँ पर हेम सदृश आभा को धारण करने वाले, यशोधारणी प्रिया के स्वामी सीमन्धर नाम के मनु उत्पन्न हुए थे। इनकी आयु पल्य के दस लाख भागों में से एक भाग (१/१०००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की ऊँचाई ७२५ धनुष प्रमाण थी। आपके द्वारा “हा-मा” दण्डनीति निर्धारित की गई थी। इस समय में काल हानि के प्रभाव से कल्पवृक्ष अत्यन्त विरले एवं अत्यन्त मन्द फल प्रदान करने वाले हो गये थे, इस कारण से आर्य जनों के परस्पर में बहुत कलह होने लगा था, तब अति निपुण आपने झाड़ी, डाली, भौंरा, गुच्छा एवं फल आदि चिह्नों के द्वारा उनकी सीमा बाँध दी थी। इसके बाद पल्य के अस्सी लाख भाग व्यतीत हो जाने पर सुमति महादेवी के स्वामी अत्यन्त निपुण विमलवाहन नाम के मनु उत्पन्न हुए। इनके शरीर की कान्ति स्वर्ण के सदृश और ऊँचाई ७०० धनुष थी। आयु पल्य के एक करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००० पल्य) प्रमाण थी। आपके द्वारा भी “हा-मा” नीति निर्धारित की गई थी। इन्होंने प्रजा को अंकुश आदि आयुधों का धारण व प्रयोग करना तथा हाथी आदि पर चढ़ना (सवारी करना) बतलाया था। पश्चात् पल्य के आठ करोड़ भाग व्यतीत हो जाने के बाद यहाँ पर धारिणी प्रिया के स्वामी महान् कुलकर चक्षुष्मान् हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ६७५ धनुष और कान्ति प्रियंगुमणि के सदृश हरित वर्ण की थी। आयु का प्रमाण पल्य के दश करोड़ भागों में से एक भाग (१/१०००००००० पल्य) प्रमाण था। अवधिज्ञान ही आपके नेत्र थे अर्थात् आप अवधिज्ञान से देखते थे। उस समय पूर्व में कभी नहीं देखे हुए अपने पुत्र के दर्शन से जीवित रहने वाले आर्य जनों को बहुत भय उत्पन्न हुआ, उसी क्षण कुलकर ने अपने पुत्र की उत्पत्ति सुख प्राप्ति के लिए होती है, ऐसा कहकर सन्तान वृद्धि से होने वाले उन जीवों के भय को दूर कर दिया। सार्थक नाम को धारण करने वाले उन चक्षुष्मान् कुलकर के द्वारा भी प्रजाजनों को “हा-मा” का ही दण्ड दिया जाता था। इसके पश्चात् पल्य के अस्सी करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर कान्तिमाला के पति बुद्धिमान् यशस्वी नाम के कुलकर उत्पन्न हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ६५० धनुष और कान्ति प्रियंगु मणि के सदृश थी। पल्य के सौ करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००००० पल्य) प्रमाण आयु थी। ज्ञान नेत्र एवं यश से विभूषित आपने भी “हा-मा” दण्ड नीति का ही प्रवर्तन किया था। उस समय पुत्र उत्पत्ति के बाद माता पिता बहुत काल तक जीवित रहने लगे तब कुलकर ने पुत्र उत्पत्ति का महामहोत्सव करने का उपदेश दिया अर्थात् पुत्र उत्पत्ति के बाद लोगों से महोत्सव करवाये ॥७६-९०॥


पल्याष्टशतकोट्येकभागेऽतीते ततोऽभवत्।
अभिश्‍चन्द्रो मनुर्ज्ञानी श्रीमतीकान्त उन्नत: ॥९१॥

पञ्चविंशतिसंयुक्तैश्चापैः षट्शतसम्मितैः।
पल्यकोटिसहस्रैकभागायुः कनकच्छविः ॥९२॥

चन्द्रादिदर्शनैः रात्रौ चिरजीविप्रजात्मनाम्।
सूनोर्वीक्ष्य मुखं प्रीत्यै क्रीडनं वचसादिशत् ॥९३॥

तेन तत्कृतनामासीद्धा-मा-नीतिविधिं व्यधात्।
पल्याष्टाष्टसहस्रप्रमकोट्येकप्रमाणके ॥९४॥

गते भागे ततोऽभूच्चन्द्राभश्चन्द्रवर्णवान्।
प्रभावतीप्रियस्तुङ्गो दण्डैः षट्शतसंख्यकैः ॥९५॥

पल्यस्य दशसहस्रकोट्यैकांशआत्मजीवितः।
आर्याणां कृतदोषाणां हा-मा-धिक्कारदण्डकृत् ॥९६॥

तदासौ स्वगिरा दक्षः पितॄणां चिरजीविनाम्।
व्यवहारं व्यधात् प्रीत्यै पितृपुत्रादिकल्पनैः॥९७॥

अर्थ (श्लोक 91 से 97): तत्पश्चात् पल्य के आठ सौ करोड़ भाग व्यतीत हो जाने के बाद श्रीमती कान्ता के पति, ज्ञानवान एवं श्रेष्ठ मनु अभिचन्द्र उत्पन्न हुए। इनकी ऊँचाई ६२५ धनुष, आयु पल्य के हजार करोड़ भागों में से एक भाग (१/१०००००००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की कान्ति स्वर्णाभा सदृश थी। सार्थक नाम को धारण करने वाले इन कुलकर ने अपनी वाणी द्वारा बहुत काल तक जीवित रहने वाली अपनी प्रजा को रात्रि में चन्द्रमा आदि के दर्शन द्वारा अर्थात् अपने बालकों को चन्द्रमा दिखा-दिखाकर प्रीतिपूर्वक उनका मुख देखकर क्रीड़ा कराने (रमाने) का उपदेश दिया। इनके द्वारा भी “हा-मा” दण्ड नीति का ही विधान किया गया था। पश्चात् पल्य के आठ हजार करोड़ प्रमाण भाग बीत जाने पर यहाँ चन्द्रमा की कान्ति को धारण करने वाले प्रभावती प्रिया के स्वामी चन्द्राभ नाम के मनु हुए। इनके शरीर की ऊँचाई ६०० धनुष प्रमाण और आयु पल्य के दश हजार करोड़ भागों में से एक भाग (१/१००००००००००० पल्य) प्रमाण थी। दोष करने वाले आर्यों को ये हा-मा और धिक्कार का दण्ड देते थे। उस समय आपने अपने वचनों द्वारा बहुत काल तक जीवित रहने वाले माता पिता को पिता पुत्र आदि के सम्बन्ध की कल्पना द्वारा प्रीतिपूर्वक व्यवहार करने का उपदेश दिया ॥९१-९७॥


पल्याशीति सहस्रादि कोट्येक सम्मिते गते।
भागे ततो मरुद्देवो बभूवानुपमाप्रियः ॥९८॥


पञ्चसप्ततिसंयुक्त धनुः पञ्चशतोन्नतः।
पल्यस्य लक्षकोट्येकभागायुः कनकद्युतिः ॥९९॥


हा-मा-धिक्कारनीत्युक्तस्तत्काले वार्धयः स्वयम्।
प्रादुरासंश्च नद्यौघा-मेघा-नानाविधाः शुभाः ॥१००॥


नद्यब्ध्युत्तरणे पोतनौद्रोण्यादीन् ह्यकारयत्।
आरोहणे स गिर्यादि सुधीः सोपानमालिकाः ॥१०१॥


पल्याष्टलक्षकोट्येकभागे व्यतिक्रमे ततः।
प्रियंगुकान्ति सत्कायो जज्ञे मनुः प्रसेनजित् ॥१०२॥


तुङ्गः शरासनैः सार्धशतपञ्चप्रमैर्बुधः।
पल्यस्य दशलक्षादिःकोट्येकभागजीवितः ॥१०३॥


हा-मा-धिग्नीति दण्डोक्तस्तस्यामितगतिः पिता।
वरकन्यकया सार्धं विवाहं विधिना व्यधात् ॥१०४॥


कुलकृच्चैक एवात्रोत्पन्नः स युगलं विना।
तदा प्रभृति युग्मानामुत्पत्तौ नियमो गतः ॥१०५॥


कालेऽस्यैव सुतोत्पत्तिर्जरायुपटलावृता।
अभूत् तत् कर्षणास्नानान् प्रजानां सोऽदिशद्गिरा ॥१०६॥


पल्यस्याशीति लक्षादिकोट्येकप्रमिते गते।
भागे ततोऽभवत्पुण्यान् नाभिः कुलकरोऽद्भुतः ॥१०७॥


मरुदेवीप्रियो विद्वान् हेमकान्तिः सुरार्चितः।
पंचविंशतिसंयुक्त धनुः पंचशतोच्छ्रितः ॥१०८॥


पूर्वकोटिप्रमायुष्को हा-मा-धिक्नीतिकारकः।
काले तस्य सुतोत्पत्तिर्नाभिनालयुताजनि ॥१०९॥


तत्कर्तनं स पितॄणां सुखाय विधिनादिशत्।
ततोऽसौ सार्थकं स्वस्य नाम प्रापप्रजोदितम् ॥११०॥


तस्मिन् काले नभो व्याप्य तडिदम्बरगर्जनैः।
सार्धं मुहुर्महावृष्टीर्मेघाधाराव्रजैर्व्यधुः ॥१११॥


तदा शनैः शनैर्भूषु सर्वतो विरलं स्वयम्।
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आम्राद्या इति तत्प्रोक्तं श्रुत्वा प्रीता प्रशस्यतम्।
नत्वा तद् दर्शितां वृत्तिं भेजुः कालोचितां प्रजाः ॥११३॥

अर्थ: पश्चात् पल्य के अस्सी हजार करोड़ भाग समाप्त हो जाने पर अनुपमा प्रिया के स्वामी मरुदेव कुलकर उत्पन्न हुए। आपकी ऊँचाई ५७५ धनुष, आयु पल्य के एक लाख करोड़ भागों में से एक भाग ( १/१०००००००००००० पल्य) प्रमाण एवं शरीर की कान्ति स्वर्णभा सदृश थी। आपने भी हा-मा और धिक्कार दण्ड नीति का ही प्रयोग किया था। इस समय समुद्र, नदियों के समूह और नाना प्रकार के श्रेष्ठ मेघों का स्वयं ही प्रादुर्भाव हुआ था। मरुदेव कुलकर ने नदी और समुद्र आदि को पार करने के लिए पुल, नाव और द्रोणी आदि का तथा पर्वत आदि पर चढ़ने के लिए सोपान मालिका-सीढ़ियों की पंक्तियों का विधान किया था। इसके पश्चात् पल्य के आठ लाख करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर प्रियंगुमणि की हरित आभा के सदृश उत्तम शरीर द्युति से युक्त प्रसेनजित् मनु उत्पन्न हुए। आपके शरीर की ऊँचाई ५५० धनुष और आयु पल्य के दस लाख करोड़ भागों में से एक भाग ( १/१००००००००००००० पल्य) प्रमाण थी। प्रसेनजित् मनु के द्वारा भी हा-मा और धिक्कार नीति का ही प्रयोग किया गया था। आपके पिता अमितगति ने आपका विवाह उत्तम कन्या से विधिपूर्वक किया था। यह एक ही कुलकर बिना युगल के उत्पन्न हुए हैं और इसी समय से युगल उत्पत्ति का नियम समाप्त हुआ है, अर्थात् युगल ही उत्पन्न हों, ऐसा नियम नहीं रहा। इसी समय में पुत्रों (सन्तानों) की उत्पत्ति जरायु पटल से आवृत्त होने लगी थी। उस समय आपने अपनी मृदु वाणी के द्वारा प्रजा को जरायु आदि काटने का तथा स्नान आदि कराने का उपदेश दिया था। पश्चात् पल्य के अस्सी लाख करोड़ भाग व्यतीत हो जाने पर पुण्य उदय से चौदहवें कुलकर नाभिराय उत्पन्न हुए। मरुदेवी कान्ता के स्वामी, विद्वान्, हेमकान्ति को धारण करने वाले और देवों द्वारा पूजित आपकी ऊँचाई ५२५ धनुष प्रमाण तथा आयु एक पूर्व कोटि प्रमाण थी। आप भी हा-मा और धिक् दण्ड नीति का ही प्रयोग करते थे। इस काल में सन्तान की उत्पत्ति नाभि नाल से युक्त होने लगी थी। आपने माता-पिता के सुख के लिए उस नाल को काटने का उपदेश दिया था, इसीलिये प्रजा ने आपका सार्थक नाम नाभिराय रखा था। इसी काल में नभ को व्याप्त करके बिजली सहित मेघ गम्भीर गर्जना के साथ-साथ स्थूल जलधारा के द्वारा बार-बार महावृष्टि करने लगे थे। वर्षा होने के बाद ही पृथ्वी पर धीरे-धीरे चारों ओर पूर्णरूपेण पके हुए अनेक प्रकार के धान्य की वृद्धि होने लगी थी, जिसमें शालि चावल, कलम, व्रीहि आदि और अनेक प्रकार के चावल, जौ, गेहूँ, कांगणी, श्यामक (एक प्रकार का धान्य) कोदों, मोट, नीवार (कोई धान्य), वरवटी, तिल, अलसी, मसूर, सरसों, धना, जीरा, उड़द, मूँग, अरहड़, चौला, निष्पावक (बालोर), चना, कुलथी और त्रिपुटा (तेवड़ा) आदि भेद वाले धान्य हो गये थे तथा कल्पवृक्षों की सम्पूर्णरूपेण समाप्ति हो जाने पर प्रजा के जीवनोपयोगी कौसुम्भ और कपास आदि की भी उसी समय उत्पत्ति हो गई थी। कल्पवृक्षों का अभाव हो जाने से जीवों में आहार की तीव्र वाञ्छा उत्पन्न होने लगी, उस समय सर्व अंगों का शोषण करने वाली क्षुधा वेदना से प्रजा अन्तरंग में अत्यन्त दुःखी होती हुई नाभिराय मनु के समीप जाकर तथा नमस्कार करके दीन वचनों से इस प्रकार कहने लगी कि-हे स्वामिन्! हम लोगों का पुण्य क्षय हो जाने से समस्त कल्पवृक्ष नष्ट हो गये हैं और उनके स्थान पर और कोई नाना प्रकार के अनेक वृक्ष स्वयमेव उत्पन्न हुए हैं, इनमें से कौन से वृक्ष छोड़ने योग्य हैं और कौन से भोगने योग्य हैं, यह समझाते हुए आप हमें ऐसा सर्वोत्तम उपाय बतलाइए जिससे हम लोगों की जीविका चले। इसके बाद नाभिराय इस प्रकार बोले कि हे भद्र! इनमें ये तो उत्तम वृक्ष भोगने योग्य और काम में लेने योग्य हैं तथा ये विष आदि के वृक्ष हैं, जो शीघ्र ही छोड़ने योग्य हैं। इनमें ये वृक्ष महा औषधि रूप हैं, ये आम्र आदि खाने योग्य हैं और ये गन्ना आदि हैं, जिनका यन्त्र के द्वारा रस निकालकर पीना चाहिए। इस प्रकार राजा के वचनों को सुनकर और भली प्रकार प्रीतिपूर्वक उन्हें नमस्कार करके प्रजा उनके द्वारा दर्शायी हुई कालोचित वृत्ति का सेवन करने लगी ॥९८-१२२॥


सम्यक्त्वग्रहणात्पूर्वं पात्रदानशुभार्जनैः।
भोगभूमिमनुष्याणां बद्ध्वायुस्ते शुभाशयाः ॥११४॥


पश्चात् क्षायिकसम्यक्त्वं जिनान्ते काललब्धितः।
गृहीत्वा स्वायुरन्तेऽत्र सर्वे जाता विचक्षणाः ॥११५॥


तेषु जातिस्मराः केचित्केचिच्चावधिलोचनाः।
एतान् हितोपदेशादीन् प्रजानामादिशन् बुधाः ॥११६॥

अर्थ: यहाँ पर जिन प्रतिश्रुति आदि कुलकरों का वर्णन किया गया है, वे सभी पूर्व भव में विदेह क्षेत्र में उत्तम कुलोत्पन्न श्रेष्ठ राजा थे। सम्यक्त्व ग्रहण के पूर्व पात्रदान से अर्जित पुण्य फल के द्वारा उन पवित्र चित्तवृत्ति वाले सभी मनुओं ने भोगभूमि के मनुष्यों की आयु का बन्ध कर लिया था। पश्चात् काललब्धि के योग से जिनेन्द्र भगवान् के पादमूल में क्षायिक सम्यक्त्व ग्रहण करके विचक्षण बुद्धि को धारण करने वाले वे सभी आयु के अन्त में वहाँ से मरण कर यहाँ उत्पन्न होते हैं। उनमें से किन्हीं को जातिस्मरण और किन्हीं को अवधिज्ञान होता है, जिससे वे विद्वज्जन प्रजा को हितोपदेश देते हैं ॥१२३-१२६॥


नाभेः कुलकरस्यान्तिमस्यात्रासीत्सुतः परः।
ऋषभस्तीर्थकृत् पूज्यः कुलकृत् त्रिजगद्धितः ॥११७॥


हा-मा-धिग्नीतिमार्गोक्तोऽस्य पुत्रो भरतोऽग्रजः।
चक्री कुलकरो जातो बधबन्ध्वादि दण्डभृत् ॥११८॥


ततश्चतुर्थकालाच्च पूर्वं श्रियादिजिनेश्वरः।
मुक्ते मार्गं द्विधा धर्मं प्रकाश्य ध्वनिना सताम् ॥११९॥


हत्वा कृत्स्नाङ्गकर्माणि प्राप्य देवाधिपार्चनम्।
अनन्तगुणशर्माब्धिंजगामान्ते शिवालयम् ॥१२०॥


विश्वाग्रस्थं तृतीयस्य कालान्तेऽस्यान्तिमे सति।
वर्षत्रयेऽवशिष्टे च सार्धाष्टमाससंयुते ॥१२१॥

अर्थ: अन्तिम कुलकर नाभिराय के ऋषभदेव नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जो तीर्थंकर, पूज्य, कुलकर और त्रैलोक्य का हित करने वाला था। आपने भी हा-मा और धिक् दण्डनीति का ही प्रयोग किया था। आपके पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत, कुलकर रूप में उत्पन्न हुए जिन्होंने दोष करने वाली प्रजा पर बध, बन्धन आदि दण्ड नीति का प्रयोग किया। चतुर्थ काल से पूर्व ही अंतरंग बहिरंग लक्ष्मी से युक्त प्रथम तीर्थंकर हुए, जो भव्य जनों को अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा मोक्षमार्ग को तथा मुनि और श्रावक के धर्म को प्रकाश कर, सम्पूर्ण कर्मों को नष्टकर तथा देवेन्द्रों से पूजा को प्राप्त कर सम्पूर्ण तृतीय काल के अन्त में तीन वर्ष साढ़े आठ मास अवशेष रहने पर अनन्त गुण और अनन्त सुख के सागर मोक्ष को प्राप्त हुए ॥१२७-१३१॥


ततश्चतुर्थकालोऽभूत् दुःषमासुषमाह्वयः।
दुःखसौख्यकरो ह्येक कोटिकोट्यम्बुधिप्रमः ॥१२२॥


ऊनो वर्षद्विचत्वारिंशत्सहस्रप्रमैर्महान्।
शुभः कर्मधरोत्पन्नः स्वर्मोक्षसुखसाधनः ॥१२३॥


अस्यादौ मानवाः सन्ति पूर्वकोटिपरायुषः।
पञ्चवर्णा लसद्देहाश्चापपञ्चशतोच्छ्रिताः ॥१२४॥


वारैकं पूर्णमाहारं दिनं प्रत्याहरन्ति ते।
षट्कर्मकारिणोऽन्ते मोक्षचतुर्गतिगामिनः ॥१२५॥


आद्यकालत्रये भोगभूमिभागेषु येऽङ्गिनः।
न भूता दुःखदा द्वित्रिचतुरिन्द्रियजातयः ॥१२६॥


मांसाशिपक्षिणः क्रूरा अन्ये जलचरादयः।
ते सर्वे विकलाक्षाद्याः कालेऽस्मिन्स्वयमुद्गताः ॥१२७॥


चतुर्विंशतितीर्थेशाश्चक्रेशा द्वादशोत्तमाः।
बलदेवा नवैवासन् वासुदेवा नवोत्कटाः ॥१२८॥


तच्छत्रवोऽत्र तावन्तो रुद्रा एकादशाशुभाः।
चतुर्विंशतिकामाश्च दुर्वेषां नारदा नव ॥१२९॥

अर्थ: तृतीय काल के अन्त में दुखमा-सुखमा नाम का चतुर्थ काल प्रारम्भ हुआ, जो दुख और सुख दोनों का सम्पादन करने वाला था और उसका प्रमाण बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर (१००००००००००००००० सागर-४२००० वर्ष) था। इसमें शुभ कर्मों द्वारा पुण्य उपार्जन करने वाले तथा स्वर्ग और मोक्ष का साधन करने वाले जीव उत्पन्न होते थे। चतुर्थ काल के प्रारम्भ में मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटि (७०५६ के आगे १७ शून्य), शरीर की आभा पंच वर्ण की और ऊँचाई ५०० धनुष प्रमाण थी। उस समय जीव दिन में एक बार पूर्ण आहार करते थे तथा षट्कर्मों में तत्पर रहते थे और आयु के अन्त में मोक्ष एवं कर्मानुसार चारों गतियों को प्राप्त होते थे। प्रारम्भ के भोगभूमि सम्बन्धी तीनों कालों में दुखदाई द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय अर्थात् विकलत्रय जीव, मांसभक्षी एवं अन्य क्रूर पक्षी तथा जलचर आदि जो जीव उत्पन्न नहीं होते थे, वे सब इस काल में स्वयमेव उत्पन्न होने लगे थे। इस काल में चौबीस तीर्थंकर, द्वादश चक्रवर्ती, नव नारायण और नव ही प्रतिनारायण उत्कट बल के धारी हुए। ग्यारह रुद्र, शुभकार्य करने वाले चौबीस कामदेव और दुर्बुद्धिधारी नव नारद भी इसी काल में होते हैं ॥१३२-१३९॥


वृषभोऽजिततीर्थेशः सम्भवाख्योऽभिनन्दनः।
सुमतिः श्रीजिनः पद्मप्रभसुपार्श्वतीर्थकृत् ॥१३०॥


चन्द्रप्रभजिनः पुष्पदन्तः शीतलसंज्ञकः।
श्रेयान् श्रीवासुपूज्योऽर्हद्विमलोऽनन्ततीर्थकृत् ॥१३१॥


धर्मः शान्तीश्वरः कुन्थुनाथोऽरो मल्लिनामकः।
मुनिसुव्रततीर्थेशो नमिर्नेमिजिनेश्वरः ॥१३२॥


पार्श्वः श्रीवर्द्धमानाख्य एते श्रीजिननायकाः।
त्रिजगन्नाथवन्द्यार्च्याश्चतुर्विंशतिरेव च ॥१३३॥


चन्द्राभपुष्पदन्तौ द्वौ चन्द्रकान्तमणिप्रभौ।
पद्माभवासुपूज्यौ च पद्मरागमणिच्छवी ॥१३४॥


सुपार्श्वपार्श्वतीर्थेशौ स्फुरन्मरकतद्युती।
नेमीशसुव्रतौ श्यामौ शेषास्ते कनकप्रभाः ॥१३५॥


मुनिसुव्रतनेमीशौ हरिवंशशिरोमणी।
शान्तिकुन्थ्वरतीर्थेशा कुरुवंशविभूषणाः ॥१३६॥


उग्रवंशाग्रणीः पार्श्वो वीरो नाथान्वयोद्भवः।
इक्ष्वाकुकुलसञ्जाता जिनाः सप्तदशापरे ॥१३७॥


चापपञ्चशतान्याद्ये चोनं पञ्चाशदष्टसु।
दश-पञ्चसु चापानि हीनानि पञ्च चाष्टसु ॥१३८॥


नव सप्तकराः प्रोक्ताः क्रमेण पार्श्ववीरयोः।
उत्सेधास्तीर्थकर्तॄणां दिव्याङ्गेषु भवन्त्यमी ॥१३९॥


आयुश्चतुरशीतिश्च प्रथमश्रीजिनेशिनः।
ततो द्वासप्ततिः षष्टिः पूर्वलक्षाणि चार्हताम् ॥१४०॥

तेभ्यो दशविहीनानि पञ्चानां हि क्रमात् तथा।
पूर्वलक्षद्वयं ज्येष्ठायुः पूर्वलक्षमहृतः ॥१४१॥

लक्षाश्चतुरशीतिः संवत्सराणां द्विसप्ततिः।
षष्टिस्त्रिद्वेकैवायुस्ततो लक्षैकमञ्जसा ॥१४२॥

पञ्चाग्रा नवतिर्वर्षाण्यशीतिश्चतुरोत्तरा।
आयुश्च पंचपंचाशत् सहस्त्राणि पृथक् ततः ॥१४३॥

त्रिंशद्दशसहस्त्राणि सहस्त्रैकं ततः परम्।
वर्षाण्यायुः शतैकं स्याद्वर्द्धमाने द्विसप्ततिः ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 140 से 145): वृषभनाथ, अजितनाथ तीर्थंकर, सम्भवनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ जिनेन्द्र, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतलनाथ, श्रेयांसनाथ, वासुपूज्य अर्हन्त, विमलनाथ, अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रतनाथ, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वर्द्धमान नाम के ये चौबीस तीर्थंकर हुए हैं। ये चौबीसों तीर्थंकर तीनों लोकों के स्वामियों द्वारा अर्थात् सुरेन्द्र, धरणेन्द्र और नरेन्द्रों के द्वारा वन्दनीय एवं अर्चनीय हैं। इन चौबीस तीर्थंकरों में से चन्द्रप्रभ और पुष्पदन्त भगवान् के शरीर की कान्ति चन्द्रकान्तमणि की प्रभा के सदृश श्वेत, पद्मप्रभ और वासुपूज्य भगवान् के शरीर की आभा पद्मरागमणि की आभा के सदृश लाल, सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरों की कान्ति मरकत मणि की कान्ति सदृश हरित, नेमिनाथ और मुनिसुव्रतनाथ के शरीर की द्युति श्याम तथा अन्य अवशेष सोलह तीर्थंकरों के शरीर की कान्ति कनकप्रभा के सदृश थी ॥१४०-१४५॥


गतेऽत्र वृषभे निर्वाणं जातेऽजितनायके।
तयोस्तीर्थेशयोर्मध्ये गतकालो जिनान्तरः॥१४५॥


पञ्चाशल्लक्षकोट्यश्च सागराः प्रथमान्तरम्।
सार्धाष्टमाससंयुक्त त्रिवर्षाग्रमतं परम्॥१४६॥


ज्ञेयं मध्येऽन्तरस्यास्यैवाजितस्यायुरोजसा।
इत्यन्तरस्य मध्ये स्यादायूः शेषजिनेशिनाम्॥१४७॥


ततोऽब्धिलक्षकोटीनां त्रिंशद्दश नव क्रमात्।
तथा सहस्त्रकोटीनां नवतिः क्रमतो नव॥१४८॥


कोटयो नवशतान्येव कोटयो नवतिर्नव।
ततः शतोना कोट्येका जिनेन्द्रस्यान्तरं पृथक्॥१४९॥


षट्षष्टिलक्षषड्विंशसहस्त्रवत्सरोनितम् ।
सागरा हि चतुः पञ्चाशत्त्रिंशच्च नवान्तरम्॥१५०॥


चत्वारोऽम्बुधयः पादोनपल्यवर्जितास्त्रयः।
पल्यार्धं पल्य पादं सहस्त्रकोटिसमोनितम्॥१५१॥


सहस्त्रकोटिवर्षाणि मध्येऽर्हतो जिनान्तरम्।
सम्वत्सराश्चतुः पञ्चाशल्लक्षाः षट् च पञ्च हि॥१५२॥


सार्धसप्तशताग्रास्त्व्यशीतिसहस्त्रवत्सराः ।
सार्धद्विशतवर्षाणि ततोऽपरं जिनान्तरम्॥१५३॥


हीनं सार्धाष्टमासाधिकवर्षं त्रिभिरंजसा।
चतुर्विंशार्हतामित्थं पृथक् पृथग्जिनान्तरम्॥१५४॥


इत्युक्त कालमध्येषु जगन्नाथा जिनेश्वराः।
हत्वा कृत्स्नाङ्कर्मणि जग्मुर्मोक्षं जगद्धिताः॥१५५॥

यदा चतुर्थकालस्य सार्धाष्टमाससंयुते।
सति वर्षत्रये शेषे तदा वीरोऽगमच्छिवम्॥१५६॥

एषां जिनान्तराणां च मध्ये क्षिप्तेषु सत्सु वै।
ह्येकविंशसहस्राब्देषु पंचमान्त्यकालयोः ॥१५७॥

जिनान्तराणि सर्वाणि पिण्डितानि भवन्ति च।
कोटीकोट्यब्धयः कालसंख्ययात्र जिनेशिनाम् ॥१५८॥

अर्थ (श्लोक 155 से 168): वृषभदेव भगवान् के मोक्ष जाने के बाद अजितनाथ भगवान् मोक्ष गये, इन दोनों तीर्थंकरों के मध्य में जो काल व्यतीत होता है, वही तीर्थंकरों का अन्तरकाल-कहलाता है। प्रथम अन्तर पचास लाख करोड़ सागर तीन वर्ष और साढ़े आठ माह प्रमाण था। इस ऋषभनाथ और अजितनाथ के प्रथम अन्तर के मध्य में अजितनाथ भगवान् की आयु सम्मिलित ही जानना। इसी प्रकार अन्य अन्तरालों में अन्य तीर्थंकरों की आयु भी सम्मिलित है। इसके बाद दूसरे आदि अन्तराल क्रमशः तीस लाख करोड़ सागर, दश लाख करोड़ सागर, नव लाख करोड़ सागर, ९० हजार करोड़ सागर, नव हजार करोड़ सागर, ९०० करोड़ सागर, ९० करोड़ सागर, ९ करोड़ सागर और ६६ लाख २६ हजार एक सौ सागरों से हीन एक करोड़ (३३७३९००) सागर था। इस ग्यारहवें अन्तराल के बाद क्रमशः चौवन सागर, तीस सागर, नौ सागर, चार सागर, पौन पल्य कम तीन सागर, अर्ध पल्य, हजार करोड़ वर्ष कम चौथाई पल्य, हजार करोड़ वर्ष, चौवन लाख वर्ष, छह लाख वर्ष और पाँच लाख वर्ष प्रमाण जिनान्तर जानना चाहिए। इसके बाद तेरासी हजार सात सौ पचास वर्ष और अन्तिम अन्तर दो सौ पचास वर्षों में से तीन वर्ष, साढ़े आठ मास कम अर्थात् दो सौ छियालीस वर्ष तीन मास और एक पक्ष प्रमाण था। इस प्रकार चौबीस तीर्थंकरों का यह पृथक्-पृथक् अन्तरकाल जानना चाहिए। इस उपर्युक्त काल में त्रैलोक्य हितकर्ता, तीन लोक के स्वामी जिनेश्वर भगवान् द्रव्य कर्म, नोकर्म और भाव कर्मों का नाश कर मोक्ष गये। जब चतुर्थ काल के तीन वर्ष, साढ़े आठ मास अवशेष थे तब वीर प्रभु ने मोक्ष प्राप्त किया था। चौबीस जिनेन्द्रों के सम्पूर्ण अन्तर कालों को एकत्रित करके उसमें पंचम और छठे काल के ४२००० वर्ष और मिला देने पर एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम प्रमाण हो जाता है ॥१५५-१६८॥ वृषभनाथ भगवान् के मोक्ष चले जाने पर ५० लाख करोड़ सागर ३ वर्ष ८ १/२ माह व्यतीत हो जाने पर अजितनाथ भगवान् मुक्ति गये। अजितनाथ के मोक्ष जाने के बाद तीस लाख करोड़ सागर का, सम्भवनाथ भगवान् के बाद दश लाख करोड़ सागर का, अभिनन्दन नाथ के जाने पर ९ लाख करोड़ सागर का, सुमतिनाथ के बाद ९० हजार करोड़ सागर का, पद्मप्रभ के बाद नौ हजार करोड़ का, सुपार्श्वनाथ के बाद ९ सौ करोड़ सागर का, चन्द्रप्रभ के बाद ९० करोड़ सागर का, पुष्पदन्त के मोक्ष जाने के बाद ९ करोड़ सागर का, शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद (एक करोड़ सागर) १०००००००-६६२६१०० = ३३७३९०० सागर का, श्रेयांसनाथ भगवान के मोक्ष जाने के बाद ५४ सागर का, वासुपूज्य भगवान् के ३० सागर का, विमलनाथ के ९ सागर का, अनन्तनाथ के चार सागर का, धर्मनाथ के मोक्ष जाने के बाद ३/४ पल्य कम तीन सागर-अर्थात् ३ सागर ३/४ पल्य=२ सागर और ९९९९९९९९९९९९९ १/४ पल्य का, शान्तिनाथ के मोक्ष गमन के बाद अर्ध पल्य का, कुन्थुनाथ के बाद हजार करोड़ वर्ष कम १/४ पल्य (१/४ पल्य - १००० करोड़ वर्ष) का, अरनाथ के एक हजार करोड़ वर्ष का, मल्लिनाथ के ५४००० वर्ष का, मुनिसुव्रतनाथ के ६००००० वर्षों का, नमिनाथ के ५००००० वर्षों का, नेमिनाथ के ८३७५० वर्षों का और पार्श्वनाथ भगवान् के मोक्ष जाने के बाद तीन वर्ष साढ़े आठ मास कम २५० वर्ष अर्थात् (२५०-३ वर्ष ८ १/२ मास)=२४६ वर्ष, ३ मास और एक पक्ष बाद वीर प्रभु मोक्ष गये अतः यह पार्श्वजिनेन्द्र और वीरजिनेन्द्र इन दोनों के मध्य का अन्तर है। जब वर्धमान स्वामी मोक्ष गये तब चतुर्थकाल के तीन वर्ष ८ १/२ मास अवशेष थे पञ्चम और षष्ठ ये दोनों काल इक्कीस-इक्कीस हजार वर्ष के हैं, इन दोनों का एकत्रित काल ४२००० वर्ष प्रमाण है, जिनेन्द्रों के सर्व अन्तर कालों को एकत्रित करके उसमें दोनों कालों के ४२००० वर्ष जोड़ देने पर एक कोड़ाकोड़ी सागरोपम का प्रमाण हो जाता है।


पुष्पदन्तस्य कालान्ते धर्मव्युच्छित्तिरंजसा।
पल्यस्यासीच्चतुर्थांशः पल्यार्धं शीतलस्य च ॥१५९॥


श्रेयसः प्रोक्त तीर्थान्ते पादोनपल्यमेव च।
वासुपूज्यस्य पल्यैकं धर्मनाशो द्विधाभवत् ॥१६०॥


पादोनपल्यमिव श्रीविमलस्य जिनान्तरे।
धर्मनाशोऽप्यनन्तस्य पल्यार्धं कालदोषतः ॥१६१॥


धर्मनाथजिनेन्द्रस्य भागे जिनान्तरान्तिमे।
पल्यपादोऽभवद् वक्तृश्रोतृसत्ताद्यऽभावतः ॥१६२॥

अर्थ: पुष्पदन्त भगवान् के काल के अन्त में १/४ पल्य तक धर्म का व्युच्छेद रहा। शीतलनाथ के अन्तराल में अर्धपल्य, श्रेयांसनाथ के तीर्थकाल के अन्त में ३/४ पल्य और वासुपूज्य भगवान् के तीर्थकाल के अन्त में एक पल्य पर्यन्त मुनि और श्रावक इन दोनों प्रकार के धर्म का अभाव रहा। विमल जिनेन्द्र के अन्तर काल के अन्त में ३/४ पल्य तक तथा कालदोष से अनन्तनाथ के तीर्थ में अर्ध पल्य पर्यन्त धर्म का नाश रहा और धर्मनाथ जिनेन्द्र के अन्तरकाल के अन्तिम भाग में १/४ पल्य पर्यन्त वक्ता और श्रोता दोनों का सर्वथा अभाव रहा अर्थात् सुविधिनाथ और शीतलनाथ के अन्तराल में १/४ पल्य तक, शीतलनाथ और श्रेयांसनाथ के अन्तराल में १/२ पल्य तक, श्रेयांस एवं वासुपूज्य के अन्तराल में ३/४ पल्य तक, वासुपूज्य और विमलनाथ के अन्तराल में एक पल्य तक, विमल एवं अनन्तनाथ के अन्तराल में ३/४ पल्य तक, अनन्तनाथ एवं धर्मनाथ के अन्तराल में १/२ और धर्मनाथ एवं शांतिनाथ के अन्तराल में १/४ पल्य तक जैनधर्म का अत्यन्त विच्छेद रहा। अर्थात् चतुर्थकाल में ४ पल्य तक जैन धर्म के अनुयायियों का सर्वथा अभाव रहा ॥१६९-१७२॥


उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यसंख्यातेषु गतेष्वपि।
हुण्डावसर्पिणीकाल इहायाति न चान्यथा ॥१६३॥


तस्यां हुण्डावसर्पिण्यां पंचपाखण्डदर्शनम्।
शलाकापुरुषा ऊनाः सङ्घभेदा अनेकशः ॥१६४॥


जिनशासनमध्ये स्युर्विपरीता मतान्तराः।
चीवराद्यावृता निन्द्याः सग्रन्थाः सन्ति लिङ्गिनः ॥१६५॥


उपसर्गा जिनेन्द्राणां मानभङ्गश्च चक्रिणाम्।
कुदेवमठमूर्त्याद्याः कुशास्त्राणि दुरागमाः ॥१६६॥


दुर्मार्गा गुरवः काम-लालसा दुर्हृदो जनाः।
इत्याद्या अपरेऽनिष्टा जायन्ते बहवोऽशुभाः ॥१६७॥

अर्थ: असंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणियों के व्यतीत हो जाने पर इह अर्थात् भरतैरावत क्षेत्रों में एक हुण्डावसर्पिणी काल आता है, इसके पूर्व नहीं आता। इस हुण्डावसर्पिणी काल में पाँच प्रकार के पाखण्डों के दर्शन होते हैं। शलाका पुरुष कम अर्थात् ६३ न होकर ५८ होते हैं। जिनशासन के मध्य भी मूलसंघ, काष्ठासंघ आदि अनेक भेद हो जाते हैं। जैनधर्म से अत्यन्त विपरीत प्रवृत्ति वाले अनेक मतान्तरों का जन्म हो जाता है। वस्त्र आदि से युक्त तथा परिग्रह से युक्त अनेक निन्दनीय लिंग को धारण करने वाले साधु बहुत होते हैं। तीर्थंकरों पर उपसर्ग और चक्रवर्ती का मानभंग होता है। खोटे देवों के मठ तथा उनकी मूर्तियाँ, खोटे शास्त्र, खोटा आगम, खोटे मार्ग पर चलने वाले गुरु और काम आदि लालसा से युक्त तथा अत्यन्त दयनीय दशा को प्राप्त मनुष्य बहुत होते हैं। इस प्रकार और भी अनेक प्रकार के अनिष्ट और अशुभ कार्य आदि इस काल में स्वयमेव उत्पन्न होते हैं ॥१७३-१७७॥


प्रथमो भरतश्चक्री सगरो मधवाह्वयः।
सनत्कुमारचक्रेशः शान्तिकुन्थ्वरचक्रिणः ॥१६८॥


सुभौमश्च महापद्मो हरिषेणो जयोऽन्तिमः।
ब्रह्मदत्तोद्विषट् ह्येते हेमाभाः सन्ति चक्रिणः ॥१६९॥


भरतस्य समुत्सेधो धनुः पंचशतप्रमः।
आयुश्चतुरशीतिश्च पूर्वलक्षाण्यखण्डितम् ॥१७०॥


उन्नतिः सगरेशस्य सार्धशतचतुष्टयम्।
चापानां पूर्वलक्षाण्यायुर्द्विसप्ततिरेव च ॥१७१॥


उच्छ्रितिर्मघवाख्यस्य धनुः सार्धद्विसंयुता।
चत्वारिंशत्प्रमायुश्च पंचलक्षाब्द सम्मितम् ॥१७२॥


कायोत्तुङ्गश्च सार्धैक चत्वारिंशद्धनुः प्रमः।
आयुर्वर्षत्रिलक्षाणि सनत्कुमारचक्रिणः ॥१७३॥


शान्तेर्देहोन्नतिश्चत्वारिंशच्चापानि निश्चितम्।
आयुर्वत्सरलक्षैकं जिनकामपदेशिनः ॥१७४॥


कुन्थोः शरीरतुङ्गोऽस्ति पंचत्रिंशद्धनुः प्रमः।
आयुर्वर्षसहस्राणि पंचाग्रनवतिः परम् ॥१७५॥


अरस्य वपुरुत्सेधो भवेत् त्रिंशद्धनुः प्रमः।
आयुश्चतुरशीतिश्चाब्दसहस्राण्यखण्डितम् ॥१७६॥


सुभौमस्योच्छ्रितिश्चापान्यष्टाविंशतिरेव च।
आयुः षष्टिसहस्राणि वर्षाणां खण्डवर्जितम् ॥१७७॥


महापद्मस्य चोत्सेधो द्वाविंशतिधनुः प्रमः।
आयुस्त्रिंशत्सहस्राणि वत्सराणां परं ततः ॥१७८॥

प्रोन्नतिर्हरिषेणस्य चापविंशतिसम्मिता।
आयुर्दशसहस्राणि वर्षाणां चक्रवर्तिनः ॥१७९॥

जयस्य वपुरुत्तुङ्गो धनुः पञ्चदशप्रमः।
आयुः सम्वत्सराणां च त्रिसहस्त्राणि चक्रिणः ॥१८०॥

उत्सेधो ब्रह्मदत्तस्य चापसप्तप्रमाणकः।
आयुः सप्तशतान्येव वर्षाणां रत्नभोगिनः ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 178 से 191): चतुर्थकाल में (१) भरत, (२) सगर, (३) मघवान्, (४) सनत्कुमार, (५) शान्तिजिन, (६) कुन्थुजिन, (७) अरजिन, (८) सुभौम, (९) महापद्म, (१०) हरिषेण, (११) जय और अन्तिम (१२) ब्रह्मदत्त ये बारह चक्रवर्ती हुए हैं। इन सर्व चक्रवर्तियों के शरीर की आभा स्वर्ण वर्ण के सदृश थी। भरत चक्रवर्ती के शरीर का उत्सेध ५०० धनुष और आयु ८४००००० पूर्व की थी। सगर चक्रवर्ती का उत्सेध ४५० धनुष और आयु ७२००००० पूर्व की थी। मघवा का उत्सेध ४२ १/२ धनुष और आयु ५००००० वर्ष की थी। सनत्कुमार चक्रवर्ती का उत्सेध ४१ १/२ धनुष और आयु ३००००० वर्ष की थी। शान्तिनाथ का उत्सेध ४० धनुष और आयु १००००० वर्ष की थी, ये चक्रवर्ती, तीर्थंकर और कामदेव इन तीन पदों के धारी थे। कुन्थुनाथ का उत्सेध ३५ धनुष और आयु ९५००० वर्ष प्रमाण थी (आप भी तीन पदधारी थे)। अरनाथ का उत्सेध ३० धनुष और आयु ८४००० वर्ष की थी। सुभौम चक्रवर्ती का उत्सेध २८ धनुष और आयु ६०००० वर्ष प्रमाण थी। महापद्म का उत्सेध २२ धनुष और आयु ३०००० वर्ष की थी। हरिषेण का उत्सेध २० धनुष और आयु १०००० वर्ष की थी। जय चक्रवर्ती का उत्सेध १५ धनुष और आयु ३००० वर्ष प्रमाण थी। अन्तिम चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त का उत्सेध ७ धनुष प्रमाण और आयु ७०० वर्ष प्रमाण थी, ये सभी चौदह रत्नों के भोक्ता हुए हैं ॥१७८-१९१॥


काले प्रवर्त्तमानेऽभूद् भरतो वृषभस्य च।
सगरोऽजितनाथस्य वर्तमानस्य सम्प्रति ॥१८२॥


सञ्जातौ मघवाभिख्यसनत्कुमारचक्रिणौ।
जिनान्तरेऽत्र धर्मस्य चक्रिणः स्युर्जिनास्त्रयः ॥१८३॥


सुभौमचक्रभृज्जातोऽत्रारनाथजिनान्तरे ।
महापद्मसमुत्पन्नो मल्लिनाथजिनान्तरे ॥१८४॥


चक्रीशो हरिषेणो मुनिसुव्रतजिनान्तरे।
अभूच्चक्री जयाख्यश्च नमिनाथजिनान्तरे ॥१८५॥


ब्रह्मदत्ताह्वयो जातो नेमीशस्य जिनान्तरे।
इति चक्राधिपा जाता जिनकाले जिनान्तरे ॥१८६॥

अर्थ: वृषभनाथ तीर्थंकर के काल में भरत चक्रवर्ती और अजितनाथ के काल में सगर चक्रवर्ती हुए थे। मघवा और सनत्कुमार ये दो चक्रवर्ती धर्मनाथ और शान्तिनाथ के अन्तराल में, शान्ति, कुन्थु और अरनाथ ये तीन चक्रवर्ती स्वयं जिन थे। सुभौम चक्री, अरनाथ और मल्लिनाथ के अन्तराल में, महापद्म चक्रवर्ती मल्लिनाथ और मुनिसुव्रत के अन्तराल में, हरिषेण चक्रवर्ती मुनिसुव्रत और नमिनाथ के अन्तराल में उत्पन्न हुए थे। जय चक्री नमि और नेमिनाथ के अन्तराल में तथा ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती नेमिनाथ और पार्श्वनाथ के अन्तराल में उत्पन्न हुए थे, इस प्रकार बारह चक्रवर्तियों में से कोई तो जिनेन्द्र के काल में और कोई अन्तराल में उत्पन्न हुए थे ॥१९२-१९६॥


सुभौमब्रह्मदत्ताख्यौ बह्वारम्भपरिग्रहैः।
जात पापैर्विना धर्मं सप्तमं नरकं गतौ ॥१८७॥


चक्रेशौ मधवाभिख्यसनत्कुमारसंज्ञकौ।
सनत्कुमारकल्पं च जग्मतुर्व्रतपुण्यतः ॥१८८॥


शेषाष्टचक्रिणो हत्वा तपो ध्यानासिना बलात्।
कृत्स्नकर्मरिपून् जग्मुर्मोक्षं रत्नत्रयाङ्किताः ॥१८९॥

अर्थ: सुभौम और ब्रह्मदत्त ये दो चक्रवर्ती बहुत प्रारम्भ और बहुत परिग्रह से उपार्जित पाप के कारण धर्म भावना से रहित होते हुए सप्तम नरक में गये हैं। मधवा और सनत्कुमार नाम के दो चक्रवर्ती व्रत और धर्म (पुण्य) के प्रभाव से सनत्कुमार स्वर्ग में गये हैं। रत्नत्रय से अलंकृत शेष आठ चक्रवर्ती तप एवं ध्यानरूपी तलवार के बल से सम्पूर्ण कर्मरूपी शत्रुओं का नाश करके मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं ॥१९७-१९९॥


अङ्गोन्नतिश्च पद्मस्य दशदण्डप्रमा मता।
आयुर्वर्षाणि च द्वादशशतप्रमितान्यपि ॥१९०॥

अर्थ: विजय, अचल, धर्म, सुप्रभ, सुदर्शन, नन्दी, नन्दिमित्र, राम और पद्म ये बलदेव हैं। विजय बलदेव का उत्सेध ८० धनुष और आयु ८७ लाख वर्ष की थी। अचल का उत्सेध ७० धनुष और आयु ७७ लाख वर्ष, धर्म का उत्सेध ६० धनुष और आयु ६७ लाख वर्ष, सुप्रभ का उत्सेध ५० धनुष और आयु ३७ लाख वर्ष, सुदर्शन का उत्सेध ४५ धनुष और आयु १० लाख वर्ष, नन्दी बलदेव का उत्सेध २९ धनुष और आयु ६७ हजार वर्ष, नन्दिमित्र का उत्सेध २२ धनुष और आयु ३७ हजार वर्षा, राम बलदेव का उत्सेध, १६ धनुष और आयु १७ हजार वर्ष तथा नवमें बलभद्र पद्म का उत्सेध १० धनुष और आयु १२०० वर्ष प्रमाण थी ॥२००-२०९॥


पद्मोऽन्तिमो गतो ब्रह्मस्वर्गसोऽप्यमरस्ततः।
कृष्णं तीर्थेशमभ्येत्य मोक्षं यास्यति दीक्षया ॥१९१॥

अर्थ: सर्व बलभद्रों के, देवों द्वारा रक्षित गदा, रत्नमाला, मूसल और उत्कृष्ट हल ये चार रत्न, दिव्य रूप को धारण करने वालीं आठ-आठ हजार रानियाँ तथा उपमा रहित और भी अन्य बहुत सम्पत्तियाँ होती हैं। सभी बलदेवों के दिव्य शरीर की आभा कुन्द पुष्प एवं चंद्रमा सदृश होती है। धर्म स्वभावी, शुभ चित्त वाले सभी बलदेवों की स्वभावतः ऊर्ध्वगति ही होती है। विजयादि आठ बलभद्र तप एवं ध्यानरूपी शस्त्रों के बल से द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्मों का नाश कर सुख की भूमि स्वरूप मोक्ष पद को प्राप्त हुए, अन्तिम बलभद्र पद्म ब्रह्मस्वर्ग में देव हुए हैं। कृष्ण नारायण का जीव जब तीर्थंकर होगा तब ये भी दीक्षा धारण करके मोक्ष प्राप्त करेंगे ॥२१०-२१४॥


नेमिनाथस्य कालेऽभूत्पद्मः प्रवर्तमानकः।
इत्यत्रोत्पत्तिकालाः स्युर्बलभद्रादिभूभृताम् ॥१९२॥

अर्थ: विजय नामक प्रथम बलदेव श्रेयांसनाथ स्वामी के विद्यमान काल में, अचल बलभद्र वासुपूज्य स्वामी के काल में, धर्म बलभद्र विमलनाथ स्वामी के काल में, सुप्रभ अनन्तनाथ स्वामी के काल में और सुदर्शन बलदेव धर्मनाथ स्वामी के विद्यमान काल में उत्पन्न हुए थे। नन्दी बलदेव अरनाथ स्वामी के अन्तरकाल में, नन्दिमित्र मल्लिनाथ स्वामी के अन्तर काल में और राम मुनिसुव्रतनाथ के अन्तर काल में उत्पन्न हुए थे तथा अन्तिम बलभद्र-पद्म, नेमिनाथ स्वामी के विद्यमान काल में उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार यहाँ बलभद्र आदि राजाओं के उत्पत्ति काल हैं ॥२१५-२१९॥


व्रतशीलतपोहीनाः पञ्चाक्षसुखलोलुपाः।
उल्लसत्कृष्णवर्णाङ्गा-बलाङ्गोच्चसमोन्नताः ॥१९३॥

अर्थ: १ त्रिपृष्ठ, २ द्विपृष्ठ, ३ स्वयम्भू, ४ पुरुषोत्तम, ५ पुरुषसिंह, ६ (पुरुष) पुण्डरीक, ७ (पुरुष) दत्त, ८ लक्ष्मण और ९ कृष्ण ये नव वासुदेव स्वभावतः रौद्र परिणामी, व्रत, शील एवं तप से हीन, पंचेन्द्रिय सुखों के लोलुपी तथा भरतक्षेत्र में आर्यखण्ड आदि तीन खण्डों के अधिपति हुए हैं। इन सभी के शरीरों का वर्ण कृष्ण एवं उत्सेध बलदेवों के सदृश अर्थात् क्रमशः ८०, ७०, ६०, ५०, ४५, २९, २२, १६ और १० धनुष प्रमाण था ॥२२०-२२२॥


कृष्णस्य वासुदेवस्य सहस्त्रवर्षजीवितम् ।
इत्यत्र वासुदेवानां सन्त्यायूंषि क्रमात् तथा ॥१९४॥

अर्थ: प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ की आयु ८४ लाख वर्ष की, द्विपृष्ठ की ७२ लाख वर्ष की, स्वयम्भू की ६० लाख वर्ष की, पुरुषोत्तम की ३० लाख वर्ष की, पुरुषसिंह की १० लाख वर्षा की, पुण्डरीक की ६५००० वर्षा की, दत्त नारायण की ३२००० वर्ष की, लक्ष्मण की १२००० वर्ष की और अन्तिम वासुदेव कृष्ण की आयु १००० वर्षा प्रमाण थी। इस प्रकार वासुदेवों की यह आयु क्रम से होती है ॥२२३-२२७॥


अमीषां वासुदेवानां सर्वेषां भूतयोऽपराः ।
गजादिगोचरा बह्वयो विज्ञेया आगमे बुधैः ॥१९५॥

अर्थ: प्रत्येक नारायण के पास देव समूह के द्वारा रक्षित धनुष, शंख, गदा, चक्र, दण्ड, असि, और शक्ति ये सात रत्न एवं दिव्य रूप को धारण करने वाली सोलह हजार श्रेष्ठ रानियाँ होती हैं तथा मुकुटबद्ध सोलह हजार राजा इनकी सेवा करते हैं। इन सभी वासुदेवों के अन्य बहुत जनसमुदाय एवं हाथी घोड़े आदि होते हैं, जो विद्वानों के द्वारा आगम से जानने योग्य हैं ॥२२७-२३०॥


दत्तोऽगात् पंचमीं चान्ते चतुर्थीं लक्ष्मणः क्षितिम् ।
तृतीयां पृथिवीं कृष्णः स्वकर्मवशगो विधिः ॥१९६॥

अर्थ: महत्पाप के भार से प्रथम नारायण त्रिपृष्टि सप्तम नरक, द्विपृष्ट, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह और पुण्डरीक ये पाँच नारायण अर्थात् अर्धचक्रवर्ती अशुभ योग एवं व्रतरहित होने से छठे नरक, दत्तनारायण पाँचवें नरक, लक्ष्मण चौथे नरक और कृष्ण नारायण अपने स्वकर्म के वशीभूत होते हुए तीसरे नरक गये हैं ॥२३१-२३३॥


अश्वग्रीवादयोऽष्टाष्टौ तेषां मध्ये वियच्चराः ।
सन्त्यर्ध चक्रिणोऽन्त्यः स्याज्जरासंघो महीचरः ॥१९७॥

अर्थ: अश्वग्रीव, तारक, मेरक, निशुम्भ, कैटभ, मधुसूदन, बलिहन्ता, रावण और जरासिन्ध नाम के ये नौ अर्धचक्री प्रतिवासुदेव हैं। ये प्रतिवासुदेव राजा वासुदेवों के शत्रु होते हैं। इनके शरीर की कान्ति श्याम वर्ण एवं उत्सेध बलदेवों के उत्सेध सदृश होता है। ये स्वभाव से रौद्र परिणामी, गर्व युक्त और उद्धत प्रकृति के होते हैं। इनमें से अश्वग्रीव आदि आठ प्रतिनारायण विद्याधर हैं और अन्तिम अर्धचक्री जरासिन्ध भूमिगोचरी हैं ॥२३४-२३७॥


चतुर्दशसहस्राब्दान्यायुश्च रावणस्य वै।
जरासिन्धुनृपस्यायुः सहस्रवत्सरप्रमम् ॥२००॥


त्रिखण्डस्वामिनोऽप्येते बह्वारम्भधनार्जनैः।
अतीव विषयासक्त्योपार्ज्य पापं महत्परम् ॥२०१॥


धर्मादृतेनैवागुस्ताः पृथ्वीर्दुःखपूरिताः।
रौद्रध्यानेन मृत्वा या वासुदेवा गता नव ॥२०२॥


वासुदेवप्रक्षिप्तेन स्वचक्रेणाखिला अमी।
अवश्यं मरणं प्राप्य श्वभ्रं यान्ति न चान्यथा ॥२०३॥


शलाकापुरुषा एते त्रिषष्टिसंख्यकाः परे।
तुर्यकालेऽत्र जायन्ते नृपदेवखगार्चिताः ॥२०४॥

अर्थ: अश्वग्रीव आदि पाँच प्रतिवासुदेवों की आयु त्रिपृष्ठि आदि पाँच वासुदेवों के सदृश ही है। अर्थात् क्रमशः ८४ लाख वर्ष, ७२ लाख वर्ष, ६० लाख वर्ष, ३० लाख वर्ष और १० लाख वर्ष प्रमाण है। छठवें मधुसूदन प्रतिवासुदेव की ५० हजार वर्ष, बलि की ३२००० वर्ष, रावण की १४००० वर्ष और नवमें प्रतिवासुदेव जरासिन्ध की आयु १००० वर्ष प्रमाण थी। ये सब तीन खण्ड के स्वामी बहु आरम्भ, परिग्रह एवं धनार्जन के द्वारा तथा अत्यन्त विषयासक्ति से अति महान् पाप का उपार्जन करके धर्म के बिना, रौद्र ध्यान से मरण कर दुःख पूरित जिस-जिस नरक पृथ्वी में नव वासुदेव जाते हैं, उसी पृथ्वी को ये प्राप्त होते हैं। ये सभी प्रतिवासुदेव अपना चक्र वासुदेव पर छोड़ते हैं पश्चात् वासुदेव के द्वारा छोड़े हुए उसी चक्र से ये अवश्यमेव मृत्यु को प्राप्त होकर नरक जाते हैं। अन्य और किसी गति को प्राप्त नहीं होते। यहाँ चतुर्थकाल में नरेन्द्रों, देवों एवं विद्याधरों से पूजित ये त्रेसठ शलाका के पुरुष उत्पन्न होते हैं ॥२३८-२४४॥


भीमो बलिर्जितारिश्च विश्वानलाह्वयस्ततः।
सुप्रतिष्ठोऽचलाभिख्यः पुण्डरीकोऽजितन्धरः ॥२०५॥


जितनाभिस्ततः पीठः सात्वकीतनयोऽप्यमी।
व्रतभ्रष्टात्मजारुद्रा भवन्त्येकादशाशुभाः ॥२०६॥


भीमस्याङ्गसमुत्सेधो धनुः पञ्चशतानि च।
त्र्यशीतिलक्षपूर्वाण्यायुर्दीक्षापतितात्मनः ॥२०७॥


उच्छ्रितिश्च बलेश्चापसार्धचतुःशतप्रमा।
एकसप्ततिलक्षाणि पूर्वाणामायुरञ्जसा ॥२०८॥


जितारेर्वपुरुत्सेधो धनुःशतप्रमाणकः।
आयुर्द्विलक्षपूर्वाणि चारित्रचलितात्मनः ॥२०९॥


विश्वानलस्य देहोच्चो धनुर्नवतिसम्मितः ।
आयुर्लक्षैकपूर्वाणि भ्रष्टरत्नत्रयात्मनः ॥२१०॥


सुप्रतिष्ठस्य कायोच्चश्चापाशीतिप्रमो मतः ।
लक्षाश्चतुरशीतिश्च वर्षाणामायुरुत्तमम् ॥२११॥


देहोत्सेधोऽचलस्यास्ति दण्डसप्ततिमानकः ।
आयुश्च षष्टिलक्षाणि वत्सराणां चलात्मनः ॥२१२॥


उन्नतिः पुण्डरीकस्य षष्टिचापप्रमा स्मृता ।
पञ्चाशल्लक्षवर्षायुस्त्यक्तदीक्षात्मजात्मनः ॥२१३॥


तुङ्गोऽजितन्धरे कायः पंचाशद्दण्डमानकः ।
आयुर्वर्षाणि चत्वारिंशल्लक्षप्रमितानि च ॥२१४॥


उच्छ्रितिर्जितनाभेश्चाष्टाविंशतिधनुःप्रमा ।
आयुर्विंशतिलक्षाणि वर्षाणां चंचलात्मनः ॥२१५॥


चतुर्विंशतिचापानि पीठस्याङ्गसमुन्नतिः ।
आयुश्च लक्षवर्षाणि व्रतशीलच्युतस्य वै ॥२१६॥


सात्वकीतनयस्याङ्गोत्सेधः सप्तकरप्रमः ।
जीवितं त्यक्तवृत्तस्य वर्षाण्येकोनसप्तति ॥२१७॥

अर्थ: १ भीम, २ बलि, ३ जितारि, ४ विश्वानल, ५ सुप्रतिष्ठ, ६ अचल, ७ पुण्डरीक, ८ अजितन्धर, ९ जितनाभि, १० पीठ और ११ सात्विकीतनय ये ११ रुद्र अशुभ चित्तवृत्ति के धारी और चारित्र से भ्रष्ट होने वालों के पुत्र हैं। प्रथम रुद्र भीम का उत्सेध ५०० धनुष और आयु ८३ लाख पूर्व की थी, यह दीक्षा से च्युत होने वाले मुनि आर्यिका की सन्तान है। बलिरुद्र का उत्सेध ४५० धनुष और आयु ७१ लाख पूर्व की थी। जितारि का उत्सेध १०० धनुष और आयु दो लाख पूर्व की थी, यह भी चारित्र भ्रष्ट होने वालों का पुत्र है। विश्वानल के देह की ऊँचाई ९० धनुष और आयु एक लाख पूर्व की थी। यह भी रत्नत्रय से भ्रष्ट होने वालों का पुत्र है। सुप्रतिष्ठ का उत्सेध ८० धनुष और आयु ८४ लाख वर्ष की थी। अचल रुद्र का उत्सेध ७० धनुष और आयु ६० लाख वर्ष की थी, इसके माता-पिता भी चारित्ररूपी रत्न को नष्ट करने वाले थे। दीक्षा लेकर जो भ्रष्ट हो चुके थे ऐसे मुनि आर्यिका से उत्पन्न होने वाले पुण्डरीक रुद्र का उत्सेध ६० धनुष और आयु ५० लाख वर्ष की थी। अजितन्धर रुद्र का उत्सेध ५० धनुष और आयु ४० लाख वर्ष की थी। चारित्र से चलायमान हो चुकी थी आत्मा जिनकी, ऐसे मुनि आर्यिका से उत्पन्न जितनाभि रुद्र का उत्सेध २८ धनुष और आयु २० लाख वर्ष प्रमाण थी। व्रत और शील से च्युत मुनि, आर्यिका से उत्पन्न होने वाले पीठ रुद्र का उत्सेध २४ धनुष और आयु एक लाख वर्ष प्रमाण थी। अपने जीवनकाल में ही चारित्र को छोड़ देने वाले मुनि आर्यिका से उत्पन्न हुए सात्विकीतनय रुद्र का उत्सेध सात हाथ प्रमाण और आयु ६९ वर्ष प्रमाण थी ॥२४५- २५७॥


जातौ नाभेयकाले द्वावेतौ भीमवली भुवि।
पुष्पदन्तस्य कालेऽभूज्जतारिः श्रीजिनेशिनः ॥२१८॥


रुद्रो विश्वानलो जातः काले श्रीशीतलस्य च।
श्रेयसो वर्तमाने काले सुप्रतिष्ठसंज्ञकः ॥२१९॥


वासुपूज्यस्य काले प्रवर्तमानेऽचलोऽभवत्।
काले विमलनाथस्य पुण्डरीको बभूव च ॥२२०॥


काले विहरमाणस्यानन्तस्यात्राजितन्धरः।
धर्मनाथस्य कालेऽभूज्जतनाभिसमाह्वयः ॥२२१॥


शान्तेः प्रवर्तमानस्य काले पीठाभिधोऽभवत्।
सात्वकीतनयो जातः काले वीरस्य सम्प्रति ॥२२२॥

अर्थ: पुष्पदन्त जिनेन्द्र के काल में जितारि रुद्र, शीतलनाथ के काल में विश्वानल, श्रेयांसनाथ के काल में सुप्रतिष्ठ नाम के रुद्र हुए हैं। वासुपूज्य भगवान् के काल में अचलरुद्र, विमलनाथ के काल में पुण्डरीक, अनन्तनाथ के काल में अजितन्धर, धर्मनाथ के काल में जितनाभि, शान्तिनाथ के काल में पीठ रुद्र और वीर प्रभु के काल में सात्विकीतनय नामक रुद्र उत्पन्न हुए हैं ॥२५८-२६२॥


रुद्रा रौद्राशया एते दीक्षापतितसूनवः।
विद्यानुवादपाठेन प्राप्तविद्याश्चलात्मकाः ॥२२३॥


विषयासक्तदुर्बुद्ध्या त्यक्तदृग्ज्ञानसंयमाः।
दीक्षाभङ्गमहापापैर्ययुः श्वभ्रं यथोचितम् ॥२२४॥


द्वौ भीमबलिसंज्ञौ च नरकं सप्तमं गतौ।
दीक्षाभङ्गाज्जतारिश्च रुद्रो विश्वानलाख्यकः ॥२२५॥


सुप्रतिष्ठोऽचलः पुण्डरीको रुद्रा इमेऽखिलाः।
पञ्च श्वभ्रं ययुः षष्ठं रत्नत्रयतपोत्ययात् ॥२२६॥

नवम अधिकार छह कालों का प्ररूपण (भाग 2/2)

रुद्रोऽजितन्धराभिख्यो जगाम पञ्चमीं क्षितिम्।
गतौश्वभ्रं चतुर्थं जितनाभिप्रीठसंज्ञकौ ॥२२७॥


सात्विकीतनयः प्राप्तस्तृतीयां पृथिवीमहो।
एते तपस्विनो दृष्टिज्ञानसंयमभूषिताः ॥२२८॥


दीक्षाभङ्गजपापौघैर्यद्यगुश्चेदृशीं गतिम्।
ततो मन्येऽहमत्रेति दीक्षाभङ्गसमं महत् ॥२२९॥


न भूतं भुवने पापं नास्ति नाग्रे भविष्यति।
अपमानं च निन्द्यत्वं निर्लज्जत्वं जगत्त्रये ॥२३०॥


मत्वेति धीधनैः सारं वृत्तत्नं सुदुर्लभम्।
स्वप्नेऽपि नात्र नेतव्यं मलपार्श्वेऽतिनिर्मलम् ॥२३१॥


अमीषां सर्वरुद्राणां भवैः कतिपयैः स्फुटम्।
लब्धसम्यक्त्वमाहात्म्यान्निर्वाणं भविता व्रतैः ॥२३२॥

अर्थ: रौद्र परिणामी ये सभी रुद्र जैनेन्द्री दीक्षा को नष्ट कर देने वाले मुनि आर्यिकाओं के पुत्र हैं। ये सभी दिगम्बरी दीक्षा धारण करके विद्यानुवाद नामक दसवें पूर्व को पढते हैं, उससे इन्हें विद्याओं की प्राप्ति होती है, उससे इनकी आत्मा चलायमान हो जाती है और विषयों में आसक्त दुर्बुद्धि से अपने ग्रहण किये हुए दर्शन, ज्ञान और संयम को छोड़कर दीक्षाभंग के महान् पाप से यथोचित नरकों को प्राप्त करते हैं। दीक्षा भंग के पाप से भीम और बलि ये दो रुद्र सप्तम नरक को प्राप्त हुए हैं। जितारि, विश्‍वानल, सुप्रतिष्ठ, अचल और पुण्डरीक ये पाँच रुद्र रत्नत्रय एवं तप के परित्याग से छठवें नरक को प्राप्त हुए। अजितन्धर नाम का रुद्र पाँचवें नरक, जितनाभि और पीठ ये दो रुद्र चौथे नरक तथा सात्विकीतनय तीसरे नरक को प्राप्त हुए हैं। सम्यग्दर्शन, ज्ञान एवं संयम से विभूषित ये सभी तपस्वी (रुद्र) दीक्षाभंग से उत्पन्न होने वाले पाप के समूह से ही इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त होते हैं, इसलिए मैं ऐसा मानता हूँ कि इस पृथ्वी पर तीन लोक में दीक्षा भंग बराबर महान् पाप, अपमान, निन्द्यपना एवं निर्लज्जता न कभी (अन्य क्रियाओं से) भूतकाल में थी, और न कभी भविष्यकाल में होगी। त्रैलोक्य में बुद्धिमानों के द्वारा सारभूत अति दुर्लभ रत्न चारित्र ही माना गया है अतः अति निर्मल चारित्र के समीप स्वप्न में भी मल नहीं लाना चाहिए अर्थात् ग्रहण किए हुए चारित्र में स्वप्न में भी दोष नहीं लगाना चाहिए। इन सभी रुद्रों को अनेक भवान्तरों के बाद प्राप्त किये हुए सम्यक्त्व के माहात्म्य से चारित्र होगा और चारित्र के द्वारा इन्हें निर्वाण की प्राप्ति होगी ॥२६३-२७२॥


भीमाह्वयो महाभीमो रुद्रसंज्ञस्तृतीयकः।
महारुद्राभिधः कालो महाकालश्चतुर्मुखः ॥२३३॥


ततो नरमुखो नाम्नोन्मुखोऽत्र नारदा इमे।
वासुदेवसमानायुः कायोच्छाः कलहप्रियाः ॥२३४॥


हिंसानन्दपरा नित्यं कदाचिद्धर्मवत्सलाः।
जाता नवैव काले बलभद्रादित्रिभूभुजाम् ॥२३५॥


ते सर्वे नारदाः हिंसानन्दोत्थपापपाकतः।
जग्मुः श्वभ्रं यथायोग्यमन्येषां कलियोजनात् ॥२३६॥

अर्थ: १ भीम, २ महाभीम, ३ रुद्र, ४ महारुद्र, ५ काल, ६ महाकाल, ७ चतुर्मुख, ८ नरमुख और ९ उन्मुख (अधोमुख) नाम के ये ९ नारद हैं। इनकी आयु एवं शरीर का उत्सेध वासुदेव के सदृश ही होता है, अर्थात् भीम आदि नारदों की आयु यथाक्रम से ८४ लाख वर्ष, ७२ लाख वर्ष, ६० लाख वर्ष, ३० लाख वर्ष, १० लाख वर्ष, ६५ हजार वर्ष, ३२ हजार वर्ष, १२००० वर्ष और एक हजार वर्ष की हुई है। इसी प्रकार प्रथमादिक के क्रम से इनका उत्सेध क्रमशः ८०, ७०, ६०, ५०, ४५, २९, २२, १६ और १० धनुष प्रमाण था। ये सभी नारद कलह प्रिय होते हैं और नित्य ही हिंसानन्दी रौद्र ध्यान में संलग्न रहते हैं। ये कदाचिद् धर्मवत्सल भी होते हैं। ये सभी बलभद्र एवं त्रिखण्डी नारायण आदि के समय में ही उत्पन्न होते हैं। वे सभी नारद हिंसानन्दी रौद्रध्यान से उत्पन्न हुए पाप के फल से तथा अन्य जीवों को युद्ध में संयुक्त कराते रहने से यथा योग्य (परिणामों के अनुसार) नरकों में ही जाते हैं ॥२७३-२७६॥


ततोऽत्र दुष्माकालः कृत्स्नदुःख निबन्धनः।
एकविंशतिसंख्यानसहस्रवर्षसम्मितः ॥२३७॥


अस्यादौ मानवाः सन्ति सप्तहस्तोच्चविग्रहाः।
रूक्षकायाश्च विंशत्यग्रवत्सरशतायुषः ॥२३८॥


दिनमध्ये सकृद्वारमाहरन्त्यशनं जनाः।
बलसत्त्वसुबुद्ध्याद्यैर्हीनाः केचिच्च संयुताः ॥२३९॥

अर्थ: आर्य क्षेत्र में चतुर्थकाल की समाप्ति के बाद सम्पूर्ण दुःखों का निबन्धन करने (बाँधने) वाला, २१००० वर्ष प्रमाण से युक्त दुखमा नाम का पञ्चम काल प्रारम्भ होता है। इसके प्रारम्भ में मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई सात हाथ प्रमाण, कान्ति रूक्ष और आयु १२० वर्ष की होती है। उस समय मनुष्य दिन में अनेक बार भोजन करने वाले होते हैं। उस समय कोई-कोई मनुष्य बल, सत्व और उत्तम बुद्धि के धारक होते हैं किन्तु अधिकांशतः इनसे रहित ही होते हैं ॥२७७-२७९॥


त्यक्त्वा सम्वत्सरान् पञ्चाधिकषट्शतसम्मितान्।
पञ्चमासयुतान् मुक्तिं वर्धमाने गते सति ॥२४०॥


शकराजोऽभवत् ख्यातस्ततोऽब्देषु गतेष्वपि।
चतुर्नवतिसंयुक्तत्रिशतप्रमितेषु च ॥२४१॥


सप्तमासाधिकेष्वासीत् कल्कीचतुर्मुखाह्वयः।
वर्षसप्ततिजीवी सद्धर्मद्वेषीह चादिमः ॥२४२॥

अर्थ: श्री वर्धमान स्वामी के मोक्ष जाने के ६०५ वर्ष ५ मास बाद शक राजा (विक्रमादित्य) हुआ था और शक राजा के ३९४ वर्ष ७ माह अर्थात् वीर भगवान के मोक्ष जाने के ६०५ वर्ष ५ मास+३९४ वर्ष ७ माह=१००० वर्ष बाद चतुर्मुख नाम का प्रथम कल्की उत्पन्न हुआ था। इसकी आयु ७० वर्ष प्रमाण थी। यह राजा जैनधर्म का अत्यन्त विद्वेषी था ॥२८०-२८२॥


सोऽन्यदाजितभूमि प्रधानाख्यमित्थमादिशत्।
निर्ग्रन्थामुनयोऽस्माकमवश्याः सन्ति भूतले ॥२४३॥


एतेषां पाणिपात्रे सद्ग्रासं प्रदत्तमादिमम्।
त्वं गृहाण स्वशुल्कायेत्यादेशं श्वभ्रकारणम् ॥२४४॥


श्रुत्वा स मूढधीर्मन्त्री सर्वं तथाकरोत्तदा।
तदुपद्रवतोऽत्रासन् व्याकुला मुनयो नृपात् ॥२४५॥


उपसर्गं विदित्वा तं मुनीनामसुराधिपः।
चतुर्मुखं जघानाशु जिनशासनरक्षकः ॥२४६॥


ततो मृत्वा स पापात्मा कल्की पापविपाकतः।
विश्वदुःखाकरीभूतं प्रथमं नरकं गतः ॥२४७॥


तदाशु तद्भयात्तस्य सुतो जध्वं जयाह्वयः।
जिनशासनमाहात्म्यं प्रत्यक्षं वीक्ष्य तत्कृतम् ॥२४८॥


सम्यक्त्वरत्नमादाय काललब्ध्यासुरेशिनम्।
स्वसैन्यस्वजनाद्यैश्च जगाम शरणं सह ॥२४९॥


अहो! पुण्याघकर्तृणां शुभाशुभं फलं महत्।
इहैव दृश्यते साक्षात्का वार्ता परजन्मनि ॥२५०॥

अर्थ: उस चतुर्मुख कल्की ने अपने योग्य भूमि को जीतकर प्रधानमन्त्री को इस प्रकार आदेश दिया कि इस भूतल पर निर्ग्रन्थ मुनि हमारे वश में नहीं हैं अतः उनके पाणिपात्र में दिया हुआ प्रथम ग्रास तुम ग्रहण करो। नरकगति के कारणभूत आदेश को सुनकर उस मूढ़मति मन्त्री ने सर्व कार्य उसी आदेशानुसार किया, उस समय उस उपद्रव से उस क्षेत्र में रहने वाले समस्त मुनिजन राजा से बहुत व्याकुल हो गये (इस राजा के द्वारा जैनधर्म नाश हो रहा है इसलिए मुनिजन व्याकुल हुए)। मुनियों के उपसर्ग को जानकर जिनशासन के रक्षक असुरेन्द्र ने शीघ्र ही उस चतुर्मुख राजा को मार डाला। वह पापात्मा कल्की मरकर पापोदय से सम्पूर्ण दुःखों के आकर स्वरूप प्रथम नरक गया। उसी समय कल्की का पुत्र जयध्वज और स्त्री चेलका असुरेन्द्र के भय से और जैनधर्म कृत जिनशासन के माहात्म्य को प्रत्यक्ष देखकर तथा काललब्धि के प्रभाव से सम्यक्त्वरूपी महारत्न को ग्रहण करता हुआ शीघ्र ही अपनी सेना एवं स्वजन परिजनों के साथ असुरेन्द्र की शरण में गया। अहो! पुण्य करने वालों के महान् शुभ फल और पाप करने वालों के महान् अशुभ फल साक्षात् यहाँ ही दिखाई दे जाते हैं अगले जन्म की तो क्या बात ! ॥२८३-२९०॥


इति मुक्तिं गते वीरे प्रतिवर्षसहस्त्रकम्।
एकैको जायते कल्की जिनधर्मविराधकः ॥२५१॥


तेषां विंशति संख्येषु गतेष्वत्रान्तिमः खलः।
जलमन्थननामोन्मार्गस्थः कल्की भविष्यति ॥२५२॥


इन्द्राजमुनेः शिष्यो यतिर्वीराङ्गदाभिधः।
अन्तिमश्चार्यिका सर्वश्रीः श्रावकोऽग्निलाख्यकः ॥२५३॥


श्राविका च प्रिया तस्य पञ्चसेनाभिधा तदा।
कालदोषेण चत्वारोऽमीस्थास्यन्ति सुधर्मिणः ॥२५४॥


स कल्की पापधीः पापात् पूर्ववत् तस्य सन्मुनेः।
सद्ग्रासहरणाद्यैर्महोपसर्गं करिष्यति ॥२५५॥


चत्वारस्ते तदा तस्मिन्नुपसर्गे शिवाप्तये।
ग्रहीष्यन्ति सुसंन्यासं त्यक्त्वाहारां चतुर्विधम् ॥२५६॥


ततो दिनत्रयेणैव मुक्त्वा प्राणान् समाधिना।
दुःषमस्यैव कालस्यावसानस्य स्थितेषु च ॥२५७॥


सार्धष्टमाससंयुक्त-त्रिवर्षोद्धरितेष्वपि ।
पूर्वाह्ने कार्तिके मास्यमावास्यायां शुभोदयात् ॥२५८॥


अन्ते सौधर्मकल्पं ते चत्वारः सुखसागरम्।
गमिष्यन्ति महाशर्मभोक्तारो धर्मतत्पराः ॥२५९॥


राजा मध्याह्नकाले चापराह्ने वह्निरुज्जसा।
ततोऽतिदुःषमाकालः षष्ठो दुःखैकसागरः ॥२६०॥

अर्थ: इस प्रकार महावीर स्वामी के मोक्ष चले जाने पर प्रत्येक एक-एक हजार वर्ष बाद जिनधर्म का विरोधी एक-एक कल्की उत्पन्न होता है। बीस कल्की उत्पन्न हो चुकने के बाद उन्मार्गगामी एवं दुष्ट स्वभावी जलमन्थन नाम का अन्तिम कल्की होगा। उस समय इन्द्रराज मुनिराज के शिष्य वीरांगद नाम के अन्तिम मुनिराज, सर्वश्री आर्यिका, अग्निल नाम का श्रावक और उसकी प्रिया पंचसेना नाम की श्राविका कालदोष से ये चार ही धर्मात्मा जीव अवस्थित रहेंगे। पाप बुद्धि को धारण करने वाला वह जलमन्थन कल्की पापोदय से पूर्व कल्कियों के सदृश वीरांगद मुनिराज के पाणिपात्र से प्रथम ग्रास का हरण कर घोर उपसर्ग करेगा। तब उस उपसर्ग के प्राप्त होते ही वे चारों धर्मात्मा जीव चारों प्रकार के आहार का त्याग कर सुख प्राप्ति के लिए उत्तम संन्यास ग्रहण कर लेंगे। पंचम (दुःखमा) काल के अन्त में तीन वर्ष साढ़े आठ मास अवशेष रहने पर कार्तिक अमावस्या को प्रातःकाल के शुभ उदय में तीन दिनों में ही वे चारों धर्मात्मा जीव समाधिपूर्वक प्राणों को छोड़कर सुख के सागर स्वरूप सौधर्म कल्प में चले जाएँगे और वहाँ धर्म में तत्पर रहते हुए महा सुखों को भोगेंगे। स्वर्ग में वे मुनिराज खण्ड रहित एक सागर की और शेष तीनों जीव कुछ अधिक एक पल्य की आयु प्राप्त करेंगे। पंचम काल के उसी अन्तिम दिन प्रातःकाल सुख की खान स्वरूप मुनि एवं श्रावक धर्म का नाश होगा, मध्याह्न काल में राजा का और सन्ध्याकाल में अग्नि का नाश हो जायेगा ॥२९१-३०२॥


विजयार्धगिरेः सिन्धुगङ्गयोः सरितोस्तदा।
युग्मानि बहुजीवानां द्विसप्ततिमितान्यपि ॥२६१॥
बिलादिषु खगाधीशा नेष्यति कृपया स्वयम्।

अर्थ: दुखमा नामक पंचम काल की समाप्ति के बाद मात्र एक दुःख के सागर स्वरूप अतिदुखमा नाम के छठे काल का प्रारम्भ होगा। इसकी स्थिति पंचम काल के सदृश २१००० वर्ष की ही होगी। यह काल धर्म और सुख से रहित समस्त अनिष्टों के खान स्वरूप और पापी जीवों के समुदाय से व्याप्त होगा। इस काल के प्रारम्भ में बन्दरों की उपमा को धारण करने वाले मनुष्यों के शरीरों का वर्ण धूम्र के सदृश, ऊँचाई दो हाथ प्रमाण और उत्कृष्ट आयु बीस वर्ष की होगी तथा ये सब नग्न ही रहेंगे। प्रतिदिन अनेकों बार मांस आदि का भोजन करेंगे, बिलों आदि में निवास करेंगे, दुष्ट प्रकृति के होंगे और नरक एवं तिर्यञ्च इन दोनों गतियों से आकर यहाँ उत्पन्न होंगे। अत्यन्त दुराचारी, पापी, दुःख भोगने वाले, काम वासना से अन्धा माता आदि से भी व्यभिचार करने वाले तथा मरण कर नरक और तिर्यञ्च इन दोनों गतियों में जन्म लेने वाले होंगे। इस काल में मेघ अत्यन्त अशुभ एवं अल्प जल देने वाले होंगे। पृथ्वी स्वाद एवं सारयुक्त वृक्षों से रहित एवं पुरुष-स्त्री निराश्रय रहेंगे। काल के अन्त में मनुष्यों की ऊँचाई एक हाथ और आयु सोलह वर्ष प्रमाण होगी। मनुष्य कुत्सित रूप वाले एवं शीत उष्ण की बाधाओं से पीड़ित होंगे। इस अतिदुखमा काल के अन्त में जब कुछ दिन अवशेष रहेंगे, तब यहाँ की पृथ्वी फटकर सम्पूर्ण जल का शोषण कर लेगी, तब वे सभी जीव अति उष्णता से सन्तप्त होते हुए सम्पूर्ण दिशाओं में परिभ्रमण करेंगे और उनमें से दुःख के कारण अनेक जीव तो मूर्च्छित हो जाते हैं और अनेक मरण को प्राप्त हो जाते हैं। उस समय कृपावन्त विद्याधर बहत्तर कुलों में उत्पन्न जीवों के बहत्तर युगलों को विजयार्ध पर्वत की गुफाओं में, गंगा सिन्धु नदियों की वेदियों में और बिलों में ले जाकर वहाँ रख देते हैं ॥३०३-३१२॥


अन्ते प्रथमकालादिषु जघन्यादिषु तेऽखिलाः।
ज्ञातव्या अवसर्पिण्याः षट् कालानामिति स्थितिः ॥२६२॥

अर्थ: छठे काल के अन्त में सर्वप्रथम सावर्त नाम की वायु चलेगी, पश्चात् अत्यन्त शीतल जल की, पश्चात् अतिक्षार जल की और इसके बाद अत्यन्त दुस्सह विष की वृष्टि होगी। इसके पश्चात् सात-सात दिन पर्यन्त सर्व जीवों का नाश करने वाली अग्नि वृष्टि, धूलि वृष्टि और धूम की वृष्टि होगी। इन दुर्वृष्टियों से पृथ्वी, नीचे एक योजन पर्यन्त भस्म हो जाएगी और नियम से सर्व जीवों का नाश हो जायेगा। इस प्रकार सभी जिनेन्द्रों ने अवसर्पिणी काल का स्वरूप कहा है ॥३१२ (के दो चरण) ३१५॥ द्वितीय आदि कालों के प्रारम्भ में भोगभूमिज मनुष्यों की जो उत्कृष्ट आयु, उत्सेध एवं सुख आदि पूर्व में कहा गया है, वही सब प्रथम आदि कालों के अन्त में जघन्य रूप से जानना चाहिए, अर्थात् द्वितीय काल के आदि में जो उत्कृष्ट आयु आदि कही है, वह प्रथम काल के अन्त की जघन्य है। इस प्रकार अवसर्पिणी काल सम्बन्धी छह कालों की अवस्थिति जानना चाहिए ॥३१६-३१७॥


ते सर्वे मृन्मयाहारजीविनो वृद्धिसंयुताः।
आयुर्धीबलदेहाद्यैर्मताः कालान्तमञ्जसा ॥२६३॥

अर्थ: अवसर्पिणी काल की परिसमाप्ति के अनन्तर ही उत्सर्पिणी सम्बन्धी अतिदुखमा आदि छह काल होंगे, जिनमें उत्पन्न होने वाले जीव उत्सेध, आयु एवं बल आदि के द्वारा क्रम से वृद्धि को प्राप्त होंगे। अवसर्पिणी के छठे काल के सदृश उत्सर्पिणी का दुखमा-दुखमा नाम का प्रथम काल है। अन्तर केवल इतना है कि इस काल में बल, आयु और विवेक आदि की क्रमशः वृद्धि होती जायेगी। इस काल के प्रारम्भ में जगत् का सन्ताप नाश करने वाली और सुख प्रदान करने वाली सात-सात दिन पर्यन्त उत्तम जल की, दूध की, घी की, इक्षुरस की और अमृत की वर्षा होगी, जिससे पृथ्वी शीतल और सुगन्धित हो जायेगी। उस गन्ध से आकृष्ट होकर मनुष्य और तिर्यञ्चों के अनेक युगल अपनी इच्छा से उन गुफाओं आदि से निकलकर वृद्धि को प्राप्त होंगे। वे सब जीव उस प्रथम काल के अन्त पर्यन्त धर्म से रहित, मिट्टी मय आहार से जीवन यापन करने वाले तथा आयु, देह के उत्सेध, बल एवं बुद्धि आदि से निरन्तर वृद्धिंगत होते रहेंगे ॥३१८-३२३॥


महापद्म इमे प्रोक्ता भविष्या मनवोऽखिलाः।
सूचयिष्यन्ति मुग्धानां कृत्याकृत्यादि देहिनाम् ॥२६४॥

अर्थ: अवसर्पिणी काल के पञ्चम काल सदृश उत्सर्पिणी का दुखमा नाम का द्वितीय काल होगा किन्तु इसमें बुद्धि बल आदि की क्रमशः वृद्धि होती जायेगी उत्सर्पिणी के द्वितीय काल के अन्त में एक हजार वर्ष अवशेष रहने पर निम्नलिखित सोलह कुलकर होंगे। यथा-१ कनक, २ कनकप्रभ, ३ कनकराज, ४ कनकध्वज, ५ कनकपुंगव, ६ नलिन, ७ नलिनप्रभ, ८ नलिनराज, ९ नलिनध्वज, १० नलिनपुंगव, ११ पद्म, १२ पद्मप्रभ, १३ पद्मराज, १४ पद्मध्वज, १५ पद्मपुंगव और महापद्म ये १६ मनु होंगे, जो मुग्ध (भोले) जीवों को कृत्य-अकृत्य आदि कार्यों की शिक्षा देंगे अर्थात् क्षत्रिय आदि कुलों के अनुरूप आचरण और अग्नि द्वारा पाचन आदि का विधान सिखायेंगे ॥३२४-३२९॥


शेषाणां तीर्थकर्तृणां भविष्याणां जिनागमे ।
आयुरुत्सेधकालाद्या ज्ञेयाश्च भूतयेऽखिलाः ॥२६५॥

अर्थ: द्वितीय काल के बाद उत्सर्पिणी का दुःषमा-सुखमा नाम का तृतीय काल आयेगा, जो अवसर्पिणी के चतुर्थ काल सदृश होगा किन्तु इसमें आयु, बल एवं बुद्धि आदि में क्रमशः वृद्धि होती जायेगी। इस तृतीय काल में नष्ट हुए धर्म का उद्धार करने में तत्पर आगे कहे जाने वाले चौबीस तीर्थंकर क्रमशः होंगे। प्रथम तीर्थंकर (श्रेणिक राजा का जीव) १ पद्म, २ सुरदेव, ३ सुपार्श्व, ४ स्वयंप्रभ, ५ सर्वात्मभूत, ६ देवपुत्र, ७ कुलपुत्र, ८ उदंक, ९ प्रोष्ठिल, १० जयकीर्ति, ११ मुनिसुव्रत, १२ अरनाथ, १३ अपावक, १४ निष्कषाय, १५ विपुल, १६ (कृष्ण नारायण का जीव) निर्मल, १७ चित्रगुप्त, १८ समाधिगुप्त, १९ स्वयम्भू, २० अनिवर्ति, २१ जय, २२ विमल, २३ देवपाल और २४ (सात्यिकी तनुज अन्तिम रुद्र का जीव) अन्तिम तीर्थंकर अनन्तवीर्य होगा। ये चौबीस जिनेन्द्र, देवेन्द्र, धरणेन्द्र एवं नरेन्द्रों के द्वारा वन्दित और पूजित हैं, स्वर्ग एवं मोक्ष के मार्ग को दर्शाने वाले हैं, धर्म तीर्थ के प्रणेता एवं विश्व का हित करने वाले हैं, ऐसा जानना चाहिए। इन चौबीस तीर्थंकरों के मध्य, तीर्थ का प्रवर्तन करने वाले जो प्रथम तीर्थंकर होंगे वे शुद्ध सम्यक्त्व के माहात्म्य से श्रेणिक राजा का जीव ही होगा। इनकी आयु ११६ वर्ष प्रमाण और शरीर की ऊँचाई सात हाथ प्रमाण होगी। ये अपनी दिव्यध्वनि के द्वारा मनुष्यों को स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग दर्शायेंगे। सात्यिकीतनुज अन्तिम रुद्र का जीव अनन्तवीर्य नाम के अन्तिम तीर्थंकर होंगे। सन्मार्ग दर्शाने के लिये दीपक सदृश इन महान् तीर्थंकर की आयु एक पूर्व कोटि प्रमाण और शरीर का उत्सेध ५०० धनुष प्रमाण होगा। भविष्य में होने वाले अवशेष बाइस तीर्थंकरों की आयु, उत्सेध एवं काल आदि का समस्त वर्णन जिनागम से जान लेना चाहिए ॥३३०-३४०॥


अरिष्टसेननामामी भाविचक्रधरा मताः ।
द्वादशाद्भुत पुण्याढ्या नृदेव खचरार्चिताः ॥२६६॥

अर्थ: (भविष्यत् काल में भी प्रथम चक्रवर्ती का नाम भरत ही होगा, इस प्रकार)-१ भरत, २ दीर्घदन्त, ३ जयदत्त, ४ गूढदन्त, ५ श्रीषेण, ६ श्रीभूति, ७ श्रीकीर्ति, ८ पद्म, ९ महापद्म, १० चित्रवाहन, ११ विमलवाहन और १२ अरिष्टसेन नाम के ये द्वादश चक्रवर्ती अद्भुत पुण्य से युक्त और नरेन्द्रों, देवों एवं विद्याधरों से पूजित भविष्यत् काल में होंगे ॥३४१-३४३॥


शलाकाः पुरुषा एते खभूचरसुराधिपैः ।
वन्द्याः पूज्यास्त्रिषष्टिश्च भविष्यन्ति जिनादयः ॥२६७॥

अर्थ: भविष्यत् काल में चन्द्र, महाचन्द्र, चन्द्रधर, हरिचन्द्र, सिंहचन्द्र, वरचन्द्र, पूर्णचन्द्र, सुचन्द्र और श्रीचन्द्र नाम के ये नौ बलभद्र, देवों से पूज्य और ऊर्ध्वगामी होंगे। इसी प्रकार आगामी काल में नन्दी, नन्दिमित्र, नन्दिषेण, नन्दिभूत, प्रतीतबल, महाबल, अतिबल, त्रिपृष्ठ और द्विपृष्ठ ये नव नारायण होंगे। इसी प्रकार तृतीय काल में श्रीकण्ठ, हरिकण्ठ, नील कण्ठ, अश्वकंठ, सुकण्ठ, शिखिकण्ठ, अश्वग्रीव, हयग्रीव और मयूरग्रीव ये नौ त्रिखंडाधिपति प्रतिवासुदेव होंगे। पृथ्वीतल पर ये नौ प्रतिनारायण, नारायणों के शत्रु होते हैं, ऐसा जानना। विद्याधरों, राजाओं और देवों द्वारा वन्दनीय एवं पूजनीय जिनेन्द्र आदि त्रेसठ शलाका के ये सभी महापुरुष भविष्यत् काल में होंगे ॥३४४-३५०॥


प्रागुक्तत्रिकसद्भोगभूमितुल्याः सुखाकराः।
दशधा कल्पवृक्षाढ्या आयास्यन्ति पृथग्विधाः ॥२६८॥

अर्थ: इस तृतीय काल की परिसमाप्ति के अनन्तर स्थिति आदि की वृद्धि से युक्त तीन काल और होंगे, जिसमें क्रम से जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भोगभूमि की रचना होगी अर्थात् चतुर्थ सुखमा-दुखमा काल में जघन्य भोगभूमि की, पंचम सुखमा काल में मध्यम की और छठे सुखमा-सुखमा काल में उत्कृष्ट भोगभूमि की रचना होगी। पृथक्-पृथक् दस-दस प्रकार के कल्पवृक्षों से युक्त सुख की खान स्वरूप इन तीनों भोगभूमियों में पूर्वोक्त भोगभूमियों के सदृश ही रचना होगी ॥३५१-३५२॥


कालोऽतिदुःषमाभिख्यो नरकेष्वस्ति सप्तसु।
विश्वासाताकरीभूतः शाश्वतो नारकाङ्गिनाम् ॥२६९॥

अर्थ: पंचमेरु सम्बन्धी पाँच भरत और पाँच ऐरावत (इन दश) क्षेत्रों के आर्य खण्डों में वृद्धि-ह्रास युक्त छह काल उत्सर्पिणी सम्बन्धी और छह काल अवसर्पिणी सम्बन्धी इस प्रकार बारह काल निरन्तर प्रवर्तन करते रहते हैं। विजयार्ध पर्वतों की श्रेणियों में एवं भरतैरावत सम्बन्धी दश क्षेत्रों के पाँच-पाँच म्लेच्छ खण्डों में उपद्रव रहित चतुर्थ काल की वर्तना शाश्वत रहती है किन्तु भरतैरावत क्षेत्रों के चतुर्थ काल में जीवों के काय, आयु एवं सुख आदि का जिस प्रकार वृद्धि ह्रास होता है उसी के सदृश वृद्धि-ह्रास वहाँ भी होता है अर्थात् भरतैरावत क्षेत्रों के आर्य खण्डों में अवसर्पिणी के चतुर्थ काल में आदि से अन्त तक जीवों की आयु आदि में जैसी क्रमिक हानि होती है, वैसी ही हानि वहाँ होती है और आर्य खण्डों में उत्सर्पिणी काल के तृतीय काल (क्योंकि जो अवसर्पिणी का चतुर्थ काल है, वही उत्सर्पिणी का तृतीय है) में आदि से अन्त तक जैसी क्रमिक वृद्धि होती है, वैसी ही वृद्धि वहाँ (म्लेच्छ खण्डों में और विजयार्धों में) होती है। विजयार्धों की श्रेणियों में और म्लेच्छ खण्डों में शेष कालों के सदृश वर्तना कभी भी नहीं होती। अर्थात् वहाँ अवसर्पिणी के पाँचवें और छठे तथा उत्सर्पिणी के पहले और दूसरे काल सदृश वर्तना कदापि नहीं होती। पंचमेरु सम्बन्धी पाँच पूर्वविदेह और पाँच पश्चिम विदेह इस प्रकार पूर्वापर दस विदेह क्षेत्रों में मोक्षमार्ग के प्रवर्तक मात्र एक चतुर्थ काल की एक सदृश वर्तना होती है। अर्थात् जैसे यहाँ आर्य खण्डों सम्बन्धी चतुर्थ काल में आयु आदि हीनाधिक होती है वैसे वहाँ नहीं होती। यहाँ अवसर्पिणी सम्बन्धी चतुर्थ काल के प्रारम्भ में जैसी वर्तना होती है, वैसी वहाँ निरन्तर होती रहती है। यहाँ अवसर्पिणी के प्रथम काल के प्रारम्भ में आयु, उत्सेध एवं सुख आदि की जो वर्तना होती है, वैसी ही वर्तना पंचमेरुओं के उत्तर और दक्षिण में अवस्थित उत्तरकुरु, देवकुरु नामक दश उत्तम भोगभूमियों में निरन्तर रहती है। अवसर्पिणी के द्वितीय काल के प्रारम्भ सदृश पंचमेरु सम्बन्धी हरि-रम्यक क्षेत्रों की दस मध्यम भोगभूमियों में वृद्धि-ह्रास से रहित वर्तना होती है। इसी प्रकार अवसर्पिणी के तृतीय काल के प्रारम्भ सदृश हैमवत् और हैरण्यवत् क्षेत्रगत दस जघन्य भोगभूमियों में शाश्वत वर्तना होती है। मानुषोत्तर पर्वत से बाहर और स्वयम्भूरमण द्वीप के मध्य में अवस्थित नागेन्द्र पर्वत के भीतर-भीतर तिर्यग्लोक सम्बन्धी असंख्यात द्वीपों में जघन्य भोगभूमि का वर्तन होता है, अवसर्पिणी के तृतीय काल के प्रारम्भ में जघन्य भोगभूमि जन्य यहाँ जैसा वर्तन होता है, वैसा वहाँ शाश्वत होता है। नागेन्द्र पर्वत के बाह्य भाग से स्वयम्भू्रमण समुद्र के अन्त पर्यन्त अर्थात् अर्ध स्वयम्भू्रमण द्वीप में और स्वयम्भू्रमण समुद्र में अवसर्पिणी के पञ्चम काल के प्रारम्भ सदृश, हानि-वृद्धि रहित पंचम काल का ही नित्य वर्तन होता है। चतुर्निकाय देवों के स्वर्गादिक सभी स्थानों में सुख के सागर स्वरूप सुखमा-सुखमा काल के सदृश ही नित्य वर्तन होता है तथा सातों नरक भूमियों में नारकी जीवों के नित्य ही समस्त असाता की खान स्वरूप दुःखमा-दुःखमा काल के सदृश वर्तन होता है (स्वर्गों एवं नरकों में अत्यन्त सुखों एवं अत्यन्त दुःखों की विवक्षा से यह कथन किया गया है, आयु तथा उत्सेध आदि की विवक्षा से नहीं ॥३५३-३६५॥


इत्येतत् कालचक्रं भ्रमणभरयुतं तीर्थनाथैः प्रणीतम्।
षड्भेदं सौख्यदुःखास्पदमपि निखिलं भो! भ्रमन्त्येव नित्यम्॥
संसारे दुःखपूर्णे विधिगणगलिताः प्राणिनश्चेति मत्वा।
दक्षाः कालादिदूरं सुचरणसुतपोभिः शिवं साधयध्वम् ॥२७०॥

अर्थ: इस प्रकार भ्रमण के भार से युक्त, समस्त सुखों एवं दुःखों के स्थान स्वरूप यह छह भेद वाला कालचक्र भगवान् जिनेन्द्र के द्वारा कहा गया है। इस कारण कर्म समूह से प्रेरित जीव इस दुःख पूर्ण संसार में नित्य ही भ्रमण करता है, ऐसा जानकर भो चतुर भव्य जनों! आप सब उत्तम चारित्र और उत्तम तप के द्वारा कालचक्र के प्रभाव से रहित मोक्ष का साधन करो ॥३६६॥


अधिकारान्त मंगलाचरण


एषां काले चतुर्थे वसुगुणवपुषो येऽभवन् सिद्धनाथाः,
सार्धद्वीपद्वये ये सकलगुणमयस्त्यक्तदोषा जिनेन्द्राः।
अन्तातीताः सुरार्च्चा जगति हितकराः सूरयः पाठकाश्चा-
चाराढ्याः साधवस्तांस्तदसमगतये नौमि सर्वान् जिनादीन् ॥३६७॥

अर्थ: इन छह कालों के मध्य चतुर्थ काल में आठ गुण ही हैं शरीर जिनका, ऐसे सिद्ध परमेष्ठी हुए हैं। अढ़ाई द्वीप में जो अठारह दोषों से रहित, सम्पूर्ण गुणों से सहित, विनाश रहित और देव समूह से पूज्य जिनेन्द्र अर्हन्त हुए हैं तथा जगत् का हित करने वाले एवं चारित्र गुण से विभूषित आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु हुए हैं, उन सब जिनेन्द्रादि-पंच परमेष्ठियों को मैं अनुपम गति की प्राप्ति के लिए नमस्कार करता हूँ ॥३६७॥

दशम अधिकार मध्यलोक वर्णन (भाग 1/2)

अथ पंचगुरून् नत्वा धर्मसाम्राज्यनायकान्।
महत्तस्त्रिजगत्पूज्यान् प्रवक्ष्ये लवणार्णवम् ॥१॥

अर्थ: अब त्रैलोक्य पूज्य और धर्म साम्राज्य के अधिनायक पञ्च परमेष्ठियों को नमस्कार करके लवण समुद्र का वर्णन करूँगा ॥१॥


योजनानां त्रिलक्षाणि सहस्राण्यपि षोडश।
द्वेशते सप्तविंशत्यधिके क्रोशास्त्रयस्तथा ॥२॥

धनुषां शतमेकं किलाष्टाविंशतिसंयुतम्।
त्रयोदशांगुलान्यर्धांगुलं साधिकमज्जसा ॥३॥

इत्येवं संख्यया जम्बूद्वीपस्य परिधिर्मता।
सूक्ष्मः प्राकार एतस्य स्यादष्टयोजनोन्नतः ॥४॥

योजनानां द्विषड्व्यासो मूले मध्येऽष्टविस्तृतः।
चतुर्भिर्विस्तृतोऽन्ते च वज्राङ्गो वलयाकृतिः ॥५॥

अर्थ (श्लोक 2 से 5): (एक लाख योजन प्रमाण विष्कम्भ व आयाम से सहित) जम्बूद्वीप की परिधि का सूक्ष्म प्रमाण तीन लाख सोलह हजार दो सौ सत्ताईस योजन, तीन कोस, एक सौ अट्ठाईस धनुष और साढ़े तेरह अंगुल से कुछ अधिक है। अर्थात् ३१६२२७ यो., ३ कोश १२८ धनुष और १३ १/२-अंगुल से कुछ अधिक है। इस जम्बूद्वीप को चारों ओर से वेष्टित करने वाला एक वज्रमय वलयाकार कोट है, जो आठ योजन ऊँचा, मूल में बारह योजन, मध्य में आठ योजन और ऊपर चार योजन प्रमाण चौड़ा है ॥२-५॥


प्राकारोपरिभागेऽस्ति पद्मवेदी च शाश्वता।
धनुःपञ्चशतव्यासा दिव्या क्रोशद्वयोच्छ्रिता ॥६॥

अर्थ: प्राकार के उपरिम भाग में पद्म नाम की वेदी है, जो शाश्वत है पाँच सौ धनुष चौड़ी है और दो कोश ऊँची है ॥६॥


शालस्य पूर्वदिग्भागे द्वारं विजयसंज्ञकम्।
दक्षिणे वैजयन्ताख्यं द्वारं भागे च पश्चिमे ॥७॥

जयन्तमुत्तरे गोपुरद्वारमपराजितम्।
चत्वारिगोपुराणीति नानारत्नमयान्यपि ॥८॥

प्रत्येकं गोपुराणां च योजनाष्टसमुन्नतिः।
सर्वत्र व्यास आयामश्चतुर्योजनसम्मितः ॥९॥

गोपुरद्वारसर्वेषु जिनेन्द्रप्रतिमाः पराः।
सन्ति भामण्डलच्छत्रत्रय सिंहासनाश्रिताः ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): कोट की पूर्व दिशा में विजय, दक्षिण में वैजयन्त, पश्चिम में जयन्त और उत्तर में अपराजित नाम के, नाना प्रकार के रत्नमय चार गोपुर द्वार हैं। ये प्रत्येक गोपुरद्वार आठ योजन ऊँचे, चार योजन चौड़े और चार योजन लम्बे हैं, इन समस्त द्वारों पर भामण्डल, तीन छत्र एवं सिंहासन आदि से युक्त जिनेन्द्र प्रतिमाएँ हैं ॥७-१०॥


विजयो वैजयन्तोऽथ जयन्ताख्योऽपराजितः।
चत्वारो व्यन्तराधीशा एते पल्यैकजीविनः ॥११॥

देवीभिर्बहुसैन्याद्यैः समृद्धा अधिनायकाः।
पूर्वादिदिक्प्रतोलीनां दिव्यदेहा भवन्ति च ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): इन चारों द्वारों के क्रमशः विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नाम के चार व्यन्तर देव हैं। पूर्वादि दिशाओं में स्थित प्रतोलियों के ये चारों अधिनायक दिव्य देह के धारी, एक पल्य की आयु से युक्त और देवों की अनेक प्रकार की सेनाओं से समृद्ध होते हैं ॥११-१२॥


अमीषां विजयादीनां प्रत्येकं पुरमुत्तमम्।
सर्वत्रायामविष्कम्भं सहस्रद्वादशप्रमैः ॥१३॥

योजनैर्मणिसौधोच्चप्राकारगोपुराङ्कितम् ।
द्वाराणामूर्ध्वभागं च गत्वा तिष्ठति शाश्वतम् ॥१४॥

ते स्वकीये स्वकीयेऽत्र पुरे तस्मिन् मनोहरे।
स्वदेवीपरिवाराढ्या वसन्ति व्यन्तराधिपाः ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 13 से 15): चारों गोपुर द्वारों के ऊपर (गगन तल में) जाकर इन विजय आदि चारों व्यन्तराधिनायकों के अत्यन्त रमणीक और शाश्वत नगर हैं। जिनका आयाम और विस्तार पृथक्-पृथक् बारह हजार योजन प्रमाण है। ये नगर मणियों के ऊँचे-ऊँचे महलों, प्राकारों और गोपुरों आदि से संयुक्त हैं। व्यन्तर देवों के स्वामी ये विजय आदि देव अपने-अपने मनोहर नगरों में अपनी-अपनी परिवार देवियों के साथ निवास करते हैं ॥१३-१५॥


प्राकारपरिधेर्यच्चचतुर्थांशं तदेव हि।
द्वारव्यासोनितं तेषां द्वाराणामन्तरं भवेत् ॥१६॥

प्राकाराभ्यन्तरे भागे क्रोशद्वयसुविस्तरम्।
नानापादपसंकीर्णं वनमस्ति मनोहरम् ॥१७॥

वेदिका स्याद्वनस्यान्ते गोपुरादिविभूषिता।
क्रोशद्वयोन्नतादिव्या क्रोशतुर्यांशविस्तृता ॥१८॥

इत्यादिवर्णनोपेतः प्राकारोऽस्ति पृथक् पृथक्।
असंख्यद्वीपवार्धीनां पर्यन्ते वलयाकृतिः ॥१९॥

अर्थ (श्लोक 16 से 19): द्वार के व्यास से हीन कोट की परिधि के चतुर्थांश का जो प्रमाण प्राप्त होता है, वही उन द्वारों के अन्तर का प्रमाण है। अर्थात् कोट (जम्बूद्वीप) की परिधि का प्रमाण ३१६२२८ योजन है, और चारों द्वारों का व्यास १६ योजन है, इसे परिधि के प्रमाण में से घटा देने पर (३१६२२८-१६) ३१६२१२ योजन अवशेष रहते हैं। मुख्य द्वार चार हैं, अतः अवशेष को चार से भाजित करने पर ( ३१६२१२/४ ) = ७९०५३ योजन प्राप्त हुए। यही एक द्वार से दूसरे द्वार के अन्तर का प्रमाण है। प्राकार के भीतर की ओर (पृथ्वी के ऊपर) दो कोश विस्तार वाला तथा अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त महामनोहर वन है। उस वन के अन्त में गोपुर आदि द्वारों से विभूषित वेदिका है, जो दो कोश ऊँची और एक कोश का चतुर्थांश अर्थात् पाव ( १/४ ) कोश विस्तार वाली है। चूड़ी के आकार को धारण करने वाले असंख्यात द्वीप समुद्रों के अन्त में उपयुक्त वर्णन से युक्त पृथक्-पृथक् आकार-कोट हैं ॥१६-१९॥


तत्प्राकारान्तमाश्रित्य वलयाकारभृन्महान्।
द्विलक्षयोजनव्यासो नित्योऽस्ति लवणार्णवः ॥२०॥

सत्स्वामिसुस्थिताभिख्यौ देवौ दिव्याङ्गधारिणौ।
लवणाख्यसमुद्रस्य तिष्ठतः परिरक्षकौ ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 20 से 21): उस जम्बूद्वीप के कोट के अन्तिम भाग का आश्रय कर अर्थात् कोट से लगा हुआ, चूड़ी के आकार को धारण करने वाला, दो लाख योजन व्यास से युक्त शाश्वत और महान् लवण समुद्र है। इस लवण समुद्र के दिव्य अंग को धारण करने वाले सत्स्वामि और सुस्थित नाम के दो परिरक्षक देव वहाँ रहते हैं ॥२०-२१॥


समुद्राभ्यन्तरे पंचनवति प्रमितान्यपि।
योजनानां सहस्राणि चतुर्दिक्षु विहाय च ॥२२॥

स्युः पातालानि चत्वारि महान्ति शाश्वतान्यलम्।
पूर्वस्यां दिशि पातालं पश्चिमे वडवामुखम् ॥२३॥

भवेद्दक्षिणदिग्भागे कदम्बकसमाह्वयः।
उत्तराख्ये दिशाभागे नाम्नास्ति युगकेशरी ॥२४॥

अमीषामन्तरेऽत्रैव विदिक्षु मध्यमान्यपि।
चत्वारि श्रेणिरूपेण पातालानि भवन्ति च ॥२५॥

एतेषामष्टपातालानामान्तरेषु चाष्टसु।
पातालानि जघन्यानि पञ्चविंशाधिकं शतम् ॥२६॥

प्रत्येकं तानि सर्वाणि पातालानि भवन्ति च।
अष्टाधिकसहस्राणि पिण्डितानि जिनागमे ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 22 से 27): लवण समुद्र के अभ्यन्तर भाग में ९५ हजार योजन छोड़कर अर्थात् तट से ९५००० योजन पानी के भीतर जाकर चारों दिशाओं में चार महा पाताल हैं, जो शाश्वत हैं। पूर्व दिशा स्थित बड़वानल का नाम पाताल, दक्षिण दिश स्थित का नाम बड़वामुख, पश्चिम दिशा स्थित का कदम्बक और उत्तर दिशा स्थित पाताल का नाम युगकेशरी है। इन चारों पातालों के अन्तराल में चारों विदिशाओं गत श्रेणीरूप से स्थित चार मध्यम पाताल हैं और इन चार दिशा सम्बन्धी तथा चार विदिशा सम्बन्धी आठ पातालों के आठ अन्तराल हैं, जिनमें १२५-१२५ जघन्य पाताल हैं। जिनागम में इन समस्त पातालों का योग (१२५ x८=१०००+४+४)=१००८ अर्थात् एक हजार आठ कहा गया है ॥२२-२७॥


ज्येष्ठानामवगाहोऽस्तिलक्षैकयोजनप्रमः ।
मध्यभागे महाव्यासो लक्षयोजनमानकः॥२८॥

पातालानामधोभागे सहस्रदशसम्मितः।
योजनानां लघुव्यासो मुखेऽधोभागसन्निभः ॥२९॥

चतुर्णां मध्यमानां च सहस्त्राणि दशैवहि।
अवगाहोऽवगाहेन समोऽस्ति मध्यविस्तरः ॥३०॥

योजनानां सहस्रैकोऽधस्तले विस्तरो मतः।
पातालानां मुखे व्यासः सहस्रयोजनप्रमः ॥३१॥

अवगाहो जघन्यानां योजनानां सहस्त्रकम्।
मध्यभागे च विष्कम्भोऽवगाहेन समानकः ॥३२॥

शतैकयोजनव्यासः पातानामधस्तले।
योजनानां शतैकं स्याद्विस्तारस्तन्मुखे क्रमात् ॥३३॥

अर्थ (श्लोक 28 से 33): चारों दिशाओं में स्थित महा पातालों का अवगाह एक लाख योजन, मध्यभाग का व्यास एक लाख योजन, पातालों के अधोभाग का व्यास दश हजार योजन और मुख व्यास भी दश हजार योजन प्रमाण है। चारों मध्यम पातालों का अवगाह दस हजार योजन, मध्य व्यास दस हजार योजन, मुख व्यास एक हजार योजन और अधोभाग का व्यास भी एक हजार योजन प्रमाण है। एक हजार प्रमाण जघन्य पातालों का पृथक्-पृथक् अवगाह एक हजार योजन, मध्य व्यास एक हजार योजन तथा मुख और अधोभाग का व्यास सौ-सौ योजन प्रमाण है ॥२८-३३॥


पातालानां समस्तानामवगाहे निरूपिताः।
पृथक् त्रयस्त्रयो भागाः समाना आगमे जिनैः ॥३४॥

अधोभागेषु सर्वेषां केवलं वातसञ्चयः।
मध्यतृतीयभागे स्तो जलवातौ स्वभावतः॥३५॥

ऊर्ध्वस्थतृतीयांशेषु तिष्ठन्ति जलराशयः।
वीचीनां वृद्धिह्रासौ स्तो वाताधीनौ न संशयः॥३६॥

यदाधस्तान् महान् वायूरूर्ध्वमायाति तेन च।
वीचीनां हि तदा वृद्धिर्जघन्यमध्यमोत्तमा॥३७॥

यदा पातालमध्येषु प्रवेशं कुरुते मरुत्।
हानिस्तदैव वीचीनां सर्वत्र लवणाम्बुधौ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 34 से 38): आगम में जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा उन समस्त पातालों का जो पृथक्-पृथक् अवगाह निरूपण किया गया है, उसके समान रूप से तीन-तीन भाग करने पर उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य तीनों पातालों के अधोभागों में स्वभाव से ही मात्र वायु है। मध्य के तृतीय भागों में जल और वायु है तथा ऊपर के तृतीय भागों में मात्र जल है। जल कल्लोलों की वृद्धि और हानि में मात्र वायु ही कारण है, इसमें किञ्चित् भी संशय नहीं है। जब अधस्तन भाग में स्थित वायु ऊपर की ओर आती है, तब उस वायु से जल कल्लोलों में क्रमशः जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट वृद्धि होती है किन्तु जब वह वायु पाताल के अभ्यन्तर भाग में प्रवेश करती है, तब जल कल्लोलों में सर्वत्र क्रमशः हानि होती जाती है॥३४-३८॥


बीचेर्व्यासो ह्यमावस्यायां द्विलक्षप्रमाणकः।
योजनानां महीभागे शिखरे विस्तरस्तथा ॥३९॥

सार्धत्रिशतयुक्तैकोनसप्ततिसहस्त्रकाः।
एकादशसहस्त्राण्युत्सेधो जघन्य एव च ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 39 से 40): अमावस्या को समभूमि से जल की ऊँचाई ११००० योजन रहती है। यह लवण समुद्र के जल का जघन्य उत्सेध है। इस दिन अर्थात् ११००० ऊँचाई वाले जल का भूव्यास दो लाख योजन और मुख व्यास अर्थात् शिखर पर जल की चौड़ाई का प्रमाण ६९३५० योजन है ॥३९-४०॥


योजनानां त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशतानि च।
योजनस्य तृतीयांश इति संख्यादिनं प्रति ॥४१॥

वीचेर्वृद्धिः परिज्ञेया यावन् पक्षान्तिमं दिनम्।
पूर्णमास्यां महावीचेर्द्विलक्षयोजनप्रमः ॥४२॥

विस्तारो भूतले मूर्ध्नि सहस्त्रदशसम्मितः।
उत्सेधो योजनानां च सहस्त्रषोडशप्रमः ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 41 से 43): शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन ३३३ १/३ योजन की वृद्धि जल लहरों में होती है, इस प्रकार शुक्ल पक्ष के अन्त में पूर्णमासी को लवण समुद्र के जलराशि की ऊँचाई १६००० योजन हो जाती है। उस दिन भूमितल पर जल का विस्तार दो लाख योजन और शिखर पर जल का व्यास अर्थात् चौड़ाई १०००० योजन रहती है ॥४१-४३॥


नवलक्षाः सहस्राण्यष्टचत्वारिंशदेव च।
षट्शतानि त्र्यशीतिः किलेति योजनसंख्यया ॥४४॥

मध्यमा परिधिः प्रोक्तो मध्यसूच्या महाम्बुधेः।
चतुर्थभागएवास्याः परिधेर्यः पृथक् कृतः ॥४५॥

दिक् पातालमुखव्यासहीनः सोऽत्रान्तरं भवेत्।
चतुर्णां ज्येष्ठपातालानां पृथग् भूतमञ्जसा ॥४६॥

द्वौ लक्षौ च सहस्राणि सप्तविंशतिरेव हि।
शतैकं सप्ततिर्योजनानां क्रोशास्त्रयः स्फुटम् ॥४७॥

इत्येवं संख्यया तेषां ज्येष्ठानामान्तरं मतम्।
तस्यार्धं मध्यमानां स्यान्मुखव्यासोन्मन्तरम् ॥४८॥

योजनानां च लक्षैकं सहस्राणि त्रयोदश।
पंचाशीतिस्तथा सार्धक्रोशइत्यङ्क संख्यया ॥४९॥

मध्यमानां चतुर्णां पातालानामन्तरं पृथक्।
विभक्तमन्तरं चोनं मुखव्यासैस्तदेव हि ॥५०॥

पातालक्षुल्लकानां पञ्चविंशाग्रशतात्मनाम्।
अन्तरैरन्तरं प्रोक्तं षड्विंशाग्रशतप्रमैः ॥५१॥

योजनानां शतान्येव सप्ताष्टानवतिस्तथा।
योजनैकस्य भागानां षड्विंशाग्रशतात्मनाम् ॥५२॥

सप्तत्रिंशत्प्रमा भागा इत्यङ्कसंख्ययान्तरम्।
मतं क्षुल्लकपातालानां सर्वेषां जिनागमे ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 44 से 53): लवण समुद्र की मध्यम सूची व्यास की मध्यम सूक्ष्म परिधि का प्रमाण ९४८६८३ योजन प्रमाण है। इस मध्यम परिधि के चतुर्थ भाग (९४८६८३=२ ३७१७० ३/४ यो.) में से उत्कृष्ट पाताल के मुख व्यास का प्रमाण (१० हजार यो.) घटा देने पर दिशा सम्बन्धी उत्कृष्ट पातालों का पृथक्-पृथक् अन्तर (२३७१७० ३/४ - १०००० = २२७१७० ३/४ यो.) प्राप्त होता है। अर्थात् पूर्व दिशागत उत्कृष्ट पाताल के मुख से दक्षिण दिशा गत उत्कृष्ट पाताल के मुख पर्यन्त २२७१७० ३/४ योजन का अन्तर है। इसी प्रकार दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर और उत्तर से पूर्व में जानना। इन उत्कृष्ट पातालों के अन्तर प्रमाण में से मध्यम पाताल के मुख व्यास (१०००) को कम करके आधा करने पर [(२२७१७० ३/४- १०००) ÷ २=] ११३०८५ योजन और डेढ़ कोश ( ३/२ ) प्राप्त होते हैं, यही चारों विदिशाओं गत चार मध्यम पातालों का चारों दिशा गत ज्येष्ठ पातालों से पृथक्-पृथक् अन्तर का प्रमाण है। अर्थात् पूर्व दिशागत ज्येष्ठ पाताल और आग्नेय दिशा गत मध्यम पाताल के मुखों में ११३०८५ योजन और १ १/२ कोश का अन्तर है। इसी प्रकार अन्यत्र जानना। दिशागत और विदिशागत पातालों के मध्य में १०० योजन मुख व्यास, वाले १२५ जघन्य पाताल हैं, इन सबका मुख व्यास (१२५ × १०० =) १२५०० योजन होता है। ज्येष्ठ और मध्यम पाताल के अन्तर प्रमाण ११३०८५ यो. १ १/२ कोश में से मुख व्यास घटाकर अवशेष को १२६ (क्योंकि आजू बाजू के दिशागत और विदिशागत पातालों सहित १२७ पाताल हैं, अतः १२७ पातालों के १२६ अन्तराल होते हैं।) से भाजित करने पर समस्त क्षुल्लक पातालों के बीच का अंतराल जिनागम में (११३०८५ यो. १ १/२ कोश - १२५०० यो. = १००५८५ यो. १ १/२ कोश ÷ १२६) = ७९८ + ३७/१२६ + १/३३६ योजन कहा गया है (१ १/२ कोश में १२६ का भाग देने पर ३/२ × १/१२६ × १/४ =) १/३३६ योजन प्राप्त होते हैं ॥४४-५३॥


बेलन्धराधिपा नागा नागैर्वेलन्धरैः समम्।
वसन्ति पर्वताग्रस्थनगरेषु मुदाम्बुधौ ॥५४॥

नागा द्व्यधिक चत्वारिंशत्सहस्रप्रमाः सदा।
अब्ध्यभ्यन्तरजां बेलां धारयन्ति नियोगतः ॥५५॥

द्वासप्ततिसहस्त्राश्च बाह्यवेलां जलोर्जिताम्।
धारयन्त्यम्बुधौ नागा जलक्रीडापरायणाः ॥५६॥

अष्टाविंशतिसंख्यातसहस्रनागनिर्जराः ।
महद्गोदकं नित्यं धारयन्ति यथायथम् ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 54 से 57): वेलन्धर नागकुमारों के स्वामी अपने वेलन्धर नागकुमारों के साथ पर्वतों के अग्रभाग पर स्थित नगरों में प्रति प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं। लवणसमुद्र के अभ्यन्तर भाग (जम्बूद्वीप की ओर प्रविष्ट होने वाली वेला) की अपने नियोग से बयालीस हजार नागकुमार देव रक्षा करते हैं। समुद्र के बाह्यभाग (धातकीखण्ड द्वीप की ओर की वेला) को जलक्रीड़ा में परायण बहत्तर हजार नागकुमार देव धारण (रक्षा) करते हैं और जल के महान् अग्रभाग को अर्थात् सोलह हजार ऊँची जल राशि को निरन्तर अट्ठाईस हजार नागकुमार देव धारण करते हैं अर्थात् रक्षा करते हैं ॥५४-५७॥


अस्याम्बुधेश्च बाह्याभ्यन्तरवेदिकयोर्द्वयोः।
योजनानि द्विचत्वारिंशत्सहस्रप्रमाण्यपि ॥५८॥

तटमुत्सृज्य सन्त्येते चतुर्दिक्ष्वष्टपर्वताः।
कौस्तभः कौस्तभासोऽन्य एतौ पूर्वदिशि स्थितौ ॥५९॥

दक्षिणे स्त इमौ शैलौ ह्युदकाख्योदकप्रभौ।
अद्री शंखमहाशंखौ दिग्भागे पश्चिमे स्थितौ ॥६०॥

गदाद्रिगदवासाक्षो भवन्तश्चोत्तरेऽम्बुधौ।
इत्यमी पर्वता अष्टौ सहस्रयोजनोन्नताः ॥६१॥

सहस्रयोजनामूर्ध्नि विस्तीर्णाः शाश्वताः शुभाः।
कलशार्धसमाः श्वेतावनवेद्यादिभूषिताः ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 58 से 62): लवण समुद्र की बाह्याभ्यन्तर दोनों वेदियों के तटों से बयालीस हजार (४२०००) योजन आगे समुद्र में जाकर अर्थात् तट को छोड़कर पूर्वादि चारों दिशाओं में आठ पर्वत हैं, इनमें पूर्व दिशा में स्थित पर्वतों के नाम कौस्तुभ और कौस्तुभास हैं। दक्षिण दिशा में उदक एवं उदकप्रभ, पश्चिम में शंख और महाशंख तथा उत्तर दिशा में गद एवं गदवास नाम के पर्वत हैं। ये आठों पर्वत एक हजार योजन ऊँचे, शिखर पर एक हजार योजन चौड़े, शाश्वत, अत्यन्त मनोहर, अर्धकलश के आकार सदृश, श्वेत वर्ण को धारण करने वाले और वन एवं वेदियों आदि से विभूषित हैं ॥५८-६२॥


तावन्ति योजनान्यब्धेर्मुक्त्वा वेद्यो द्वयोस्तटम्।
चतुर्विदिक्षु सन्त्यन्ये शैला अष्टौ मनोहराः ॥६३॥

तथा तेषां महाद्रीणामष्टस्वन्तरदिक्षु च।
भवन्ति वनवेद्याद्यैर्युताः षोडशपर्वताः ॥६४॥

गिरयो मिलिता एते निखिलाः कौस्तभादयः।
द्वात्रिंशत्संख्यका ज्ञेया लवणाब्धौ मनोहराः ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 63 से 65): दोनों वेदियों के तटों से समुद्र को बयालीस हजार (४२०००) योजन छोड़कर चारों विदिशाओं में अत्यन्त मनोहर आठ अन्य पर्वत हैं तथा इन दिशा-विदिशा सम्बन्धी आठ युगल पर्वतों के आठ अन्तरालों में वन वेदी आदि से युक्त सोलह पर्वत हैं। इन कौस्तभ आदि समस्त पर्वतों का योग करने पर लवण समुद्र में मन को हरण करने वाले बत्तीस पर्वत जानना चाहिए ॥६३-६५॥


एषामुपरि सर्वेषां द्वीपाः स्युः प्रवरा युताः।
नाना प्रासादसद्वेदीप्रोद्यानगोपुरादिभिः ॥६६॥

तेषु द्वीपस्थसौधेषु वसन्ति व्यन्तरामराः।
तुङ्गेषु स्वस्वशैलेन समनामान ऊर्जिताः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 66 से 67): इन सम्पूर्ण पर्वतों के ऊपर द्वीप हैं, जो अनेक कमरों वाले प्रासादों से उत्तम वेदियों, उद्यानों और गोपुरों आदि से संयुक्त हैं। उन द्वीप स्थित ऊँचे ऊँचे प्रासादों में अपने-अपने पर्वतों के नाम सदृश नाम वाले व्यन्तर देव रहते हैं ॥६६-६७॥


अब्धेस्तीराद् द्विषट्संख्य सहस्रयोजनान्यपि।
शैलोऽस्ति वायुदिक्कोणे गोतमाख्योऽतिसुन्दरः ॥६८॥

तत्समोदयविस्तीर्णो वनवेद्याद्यलंकृतः।
विचित्रवर्णनोपेतः शाश्वतः सुरसंकुलः ॥६९॥

तस्योपरिमहान् द्वीपो गोतमाख्योऽतिभास्वरः।
स्वर्णवेदी स्फुरद्रत्नप्रासादवनगोपुरैः ॥७०॥

तस्याग्रे भवनं तुङ्गं सार्धद्विषष्टियोजनैः।
तदर्धविस्तरायामं क्रोशद्वयावगाहभाक् ॥७१॥

नानारत्नमयं स्याच्च द्वारेणाऽलंकृतं महत्।
अष्टयोजनतुङ्गेन चतुर्व्यासयुतेन च ॥७२॥

गोतमाख्योऽमरस्तत्र वसेत् पल्यैकजीवितः।
दशचापोच्च दिव्याङ्गः स्वदेवीसुरभूषितः ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 68 से 73): लवण समुद्र से १२००० योजन दूर जाकर वायव्य दिशा में स्थित गोतम नाम का अति सुन्दर पर्वत है, जो १२००० योजन ऊँचा, १२००० योजन चौड़ा, वन वेदियों से अलंकृत नाना प्रकार की रचना से युक्त, शाश्वत और अनेक देवगणों से युक्त है। उस पर्वत के ऊपर गोतम नाम का एक महान द्वीप है, जो स्वर्णमय वेदी, तेजोमय रत्नों के प्रासादों, वनों एवं गोपुरद्वारों से देदीप्यमान है। उस द्वीप के (ऊपर) आगे साढ़े बासठ योजन ऊँचा, सवा इकतीस (३१ १/४) योजन लम्बा और दो कोश की अवगाह (नींव) से युक्त भवन है। जो विविध प्रकार के रत्नमय, आठ योजन ऊँचे और चार योजन चौड़े द्वारों से अलंकृत है। उस भवन में एक पल्य की आयु से युक्त और दश धनुष ऊँचे दिव्य शरीर को धारण करने वाला गोतम नाम का देव अपने परिवार देव देवियों के साथ निवास करता है ॥६८-७३॥


अब्धेर्वेदीतटाद्गत्वा शतपञ्चप्रमाणि च।
योजनानि चतुर्दिक्षु सन्ति द्वीपाश्चतुःप्रमाः ॥७४॥

शतयोजनविस्तीर्णाः कुभोगभूनरान्विताः।
पुनस्त्यक्त्वाम्बुधेस्तीरं तावन्ति योजनानि च ॥७५॥

चतुर्विदिक्षु चत्वारः स्युर्द्वीपा विस्तृताः स्फुटम्।
योजनैः पञ्चपञ्चाशत्प्रमैः कुनृयुगाश्रिताः ॥७६॥

योजनानि विहायाब्धेः सार्धं पंचशतानि च।
दिग्विदिग्मध्यभागाष्टान्तरदिक्षुक्षयातिगाः ॥७७॥

पञ्चाशद्योजनव्यासा द्वीपा अष्टौ भवन्ति वै।
पार्श्वयोश्च द्वयोरब्धौ हिमवद्विजयार्धयोः ॥७८॥

रूप्याचलशिखर्योश्च प्रत्येकं योजनान्यपि।
षट्शतानि विमुच्यस्तो द्वौ द्वौ द्वीपौ पृथक् पृथक् ॥७९॥

कुलाद्रिद्वयरूप्याद्रिद्वयान्तमस्तकाश्रिताः ।
भवेयुर्मेलिता अष्टौ द्वीपाः सर्वे सुविस्तृताः ॥८०॥

योजनैः पंचविंशत्या कुत्सिताभोगभूयुताः।
समस्ताः पिण्डिता एते चतुर्विंशति सम्मिताः ॥८१॥

तोयोदयावगाहस्य संयोगेन समोन्नताः।
सर्वे द्वीपा जलादूर्ध्वं योजनैकोच्छ्रिता मताः ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 74 से 82): लवण समुद्र की वेदी के तट से ५०० योजन आगे जाकर चारों दिशाओं में सौ-सौ योजन चौड़े और कुभोगभूमिज मनुष्यों से संकुलित चार द्वीप हैं। पुनः समुद्र तीर से ५०० योजन आगे जाकर चारों विदिशाओं में ५५ योजन विस्तार वाले और कुभोगभूमिज मनुष्य युगलों से भरे हुए चार द्वीप हैं। समुद्र तट को ५५० योजन छोड़ कर दिशाओं और विदिशाओं के मध्य आठ विदिशाओं में कभी नाश न होने वाले और ५० योजन विस्तार वाले आठ द्वीप हैं। समुद्र के दोनों पार्श्व भागों में हिमवन् कुलाचल, (भरतक्षेत्र सम्बन्धी) विजयार्ध पर्वत, शिखरी कुलाचल और (ऐरावत क्षेत्र सम्बन्धी) विजयार्ध पर्वत, इन प्रत्येक को छह सौ-छह सौ योजन छोड़कर दोनों कुलाचलों और दोनों विजयार्धों के अन्तिम भागों का आश्रय कर पृथक्-पृथक् दो-दो द्वीप हैं। ये सब एकत्रित कर देने पर आठ द्वीप होते हैं। ये आठों द्वीप पच्चीस-पच्चीस योजन विस्तार वाले और कुभोगभूमिज जीवों से संकुलित हैं। इन समस्त द्वीपों का योग २४ होता है। समभूमि से नीचे जल की गहराई और समभूमि से जल की ऊँचाई इन दोनों का योग कर देने पर जल के अवगाह का प्रमाण प्राप्त होता है। अर्थात् (वेदी सहित) सर्व द्वीप जल से एक-एक योजन ऊँचे हैं ॥७४-८२॥


एकोरुकाः सशृङ्गलांगुलिनोऽथाप्यभाषिणः।
पूर्वादिषु चतुर्दिक्षु वसन्त्येते क्रमान्नराः ॥८३॥

शशकर्णाः कुमर्त्याश्च सन्ति शष्कुलि कर्णकाः।
कर्णप्रावरणा लम्बकर्णाश्चतुर्विदिक्षु वै ॥८४॥

सिंहाश्वमहिषोलूक-व्याघ्र-सूकरगोमुखाः।
कपिवक्त्रा वसन्त्यष्टान्तरदिक्षु कुमानुषाः ॥८५॥

मत्स्यकालमुखा मेघविद्युद्वक्त्रा वसन्ति च।
हिमाद्रेर्विजयार्द्धस्य पूर्वपश्चिमभागयोः ॥८६॥

गजदर्पणमेषाश्व वदनाः कुत्सिता नराः।
स्यू रूपाद्रिशिखर्यद्वयोरुभयोः पार्श्वयोः क्रमात् ॥८७॥

एषु द्वीपेषु सर्वेषु प्राप्य जन्म सुगर्भतः।
दिनैरेकोन पञ्चाशत्प्रमैर्लब्ध्वा सुयौवनम् ॥८८॥

स्त्रीमर्त्ययुग्मरूपेण रोगक्लेशादिवर्जिता।
पल्यैकजीविनः पंचवर्णाः क्रोशोन्नता नराः ॥८९॥

नानाकायमुखाकारा भुञ्जन्ति नीचपुण्यतः।
नीचान् भोगान् सदा तत्रत्याः कुभोगधरासु च ॥९०॥

एको रुका गुहायां च वसन्ति कान्तया समम्।
मधुरं मृण्मयाहारमाहरन्ति सुखावहम् ॥९१॥

स्वसमस्त्रीयुताः शेषावृक्षमूलाधिवासिनः।
भुञ्जन्ति तृप्तये सर्वे पत्रपुष्पफलानि च ॥९२॥

आयुषोऽन्तेऽप्यसून मुक्त्वा विश्वे मन्दकषायिणः।
ज्योतिर्भावनभौमानां ते जायन्ते सुवेश्मसु ॥९३॥

तेषु ये प्राप्तसम्यक्त्वाः काललब्ध्या व्रजन्ति ते।
सौधर्मेशानकल्पौ च नान्यत्र दृष्टिपुण्यतः ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 83 से 94): लवण समुद्र की पूर्वादि चारों दिशाओं के द्वीपों में क्रम से एकोरुक, सशृंग अर्थात् वैषाणिक, लांगुलिक और अभाषक ये चार प्रकार के मनुष्य रहते हैं। चारों विदिशाओं के चार द्वीपों में क्रम से शशकर्णा, शष्कुलिकर्ण, कर्णप्रावरण और लम्बकर्ण ये चार प्रकार के कुमानुष रहते हैं। आठ अन्तरालों की आठ दिशाओं में स्थित द्वीपों में क्रम से सिंह, अश्व, भैंसा, उल्लू, व्याघ्र, सूकर, गाय और बन्दर सदृश मुख वाले कुमानुष रहते हैं। हिमवान् पर्वत और विजयार्ध पर्वत के पूर्व पश्चिम भाग में मछलीमुख, कालमुख, मेघमुख और विद्युन्मुख वाले कुमनुष्य रहते हैं अर्थात् पूर्व में मछलीमुख, पश्चिम में कालमुख, पूर्व में मेघमुख और पश्चिम में विद्युन्मुख वाले मनुष्य रहते हैं। विजयार्ध और शिखरी पर्वत के दोनों पार्श्व भागों में क्रमशः गज, दर्पण, मेष और अश्वमुख अर्थात् पूर्व में गजमुख, पश्चिम में दर्पणमुख, पूर्व में मेषमुख और पश्चिम में अश्वमुख वाले कुमनुष्य निवास करते हैं। इन समस्त द्वीपों में स्त्री-पुरुष दोनों का युगल रूप से गर्भ जन्म होता है, ये रोग और क्लेश आदि से रहित होते हैं तथा ४९ दिनों में पूर्ण यौवन प्राप्त कर लेते हैं। इनकी आयु एक पल्य की, शरीर पाँच वर्णों का और शरीर की ऊँचाई एक कोश की होती है। विविध प्रकार के शरीराकार और मुखाकार को धारण करने वाले ये कुमनुष्य पूर्व जन्म में (अपने व्रतों में लगे हुए दोषों की) निन्दा, गर्हा रहित, व्रत, तप पालन करने से उत्पन्न नीच पुण्य के योग से इन कुभोग भूमियों में निरन्तर नीच भोग भोगते हैं। चारों दिशाओं में निवास करने वाले एकोरुक आदि मनुष्य अपनी स्त्रियों के साथ गुफाओं में रहते हैं और सुख प्रदान करने वाली अति मधुर मिट्टी का आहार करते हैं। शेष कुमनुष्य अपने सदृश आकार वाली अपनी-अपनी स्त्रियों के साथ वृक्षों के मूल भाग में निवास करते हैं और क्षुधा शान्ति के लिये सर्व प्रकार के पत्र, पुष्प और फल खाते हैं। ये सब भोग कुभूमिज जीव मन्दकषायी होते हैं और आयु के अन्त में प्राणों को छोड़कर भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिषी देवों के भवनों आदि में उत्पन्न होते हैं। इन कुभोगभूमिज जीवों में काललब्धि के प्रभाव से जो जीव सम्यग्दर्शन ग्रहण कर लेते हैं, वे सौधर्मैश्रान कल्प में उत्पन्न होते हैं, वे सम्यक्त्वरूपी पुण्य के प्रभाव से अन्यत्र (भवनत्रिक में) उत्पन्न नहीं होते हैं ॥८३-९४॥


येऽर्हल्लिङ्गे प्रपंचत्वादिकारिणः कुमार्गगाः ।
अनालोचनपूर्वं ये तपोवृत्तं चरन्ति च॥९५॥

परेषां ये विवाहादिपापानुमतिकारिणः ।
ज्योतिष्कमन्त्रतन्त्रादिवैद्यकर्मोपजीविनः ॥९६॥

पंचाग्न्यादितपोनिष्ठा ये दृगादिविराधिनः।
कुज्ञानकुतपोयुक्ता मौनहीनान्नभोजिनः ॥९७॥

कुकुलेषु च दुर्भावसूतकादियुतेषु वा।
आहारग्रहणोद्युक्ताः सदोषाशनसेविनः ॥९८॥

इत्यादिशिथिलाचारा मायाविनोऽक्षलम्पटाः ।
शुद्धिहीनाश्च ते सर्वे स्युः कुपात्राणि लिङ्गिनः ॥९९॥

तेभ्यः कुपात्रलिङ्गिभ्यो दानं ददति ये शठाः।
ते कुपुण्यांशतो जन्म लभन्तेऽत्र कुभूमिषु ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 95 से 100): जो कुमार्गगामी जीव जिनलिंग को धारण करके प्रपञ्च आदि करते हैं, आलोचना किये बिना ही व्रतों एवं तपों का आचरण करते हैं, जो विवाह आदि की एवं और भी अन्य सावद्य कार्यों की अनुमति देते हैं। ज्योतिष, मन्त्र, तन्त्र एवं वैद्यक आदि कार्यों द्वारा उपजीविका अर्थात् आहार आदि प्राप्त करते हैं। पंचाग्नि आदि मिथ्या तपों में निष्ठा रखते हैं। जो सम्यग्दर्शन की विराधना करते हैं, कुज्ञान और कुतप से युक्त हैं, मौन छोड़कर भोजन करते हैं। निन्द्य कुलों में, दुष्ट स्वभाव (दुर्भावना) से युक्त एवं सूतक आदि से युक्त गृहों में आहार ग्रहण करते हैं। ४६ दोषों को न टालते हुए सदोष आहार ग्रहण करते हैं, अनेक प्रकार के शिथिलाचार से युक्त हैं, मायावी हैं, इन्द्रिय लम्पट हैं और बाह्याभ्यन्तर शुद्धता से रहित हैं, वे सब लिंगी कुपात्र हैं और मर कर कुभोग भूमियों में जन्म लेते हैं और जो मूर्ख जन ऐसे कुपात्रों एवं लिंगधारियों को दान देते हैं वे सब खोटे पुण्य अंशों से कुभोगभूमियों में जन्म लेते हैं ॥९५-१००॥


जघन्यभोगभूमौ या मृत्युत्पत्त्यादिका स्थितिः ।
सा ज्ञेया कुमनुष्याणां कुत्सिता भोगभूमिषु ॥१०१॥

अर्थ: जघन्य भोगभूमि में जीवों की जन्म, मरण एवं आयु आदि की जो व्यवस्था है, कुभोगभूमिज मनुष्यों की भी सभी व्यवस्थाएँ वैसी ही जानना ॥१०१॥


तथा चेदृग्विधा द्वीपाश्चतुर्विंशतिसंख्यकाः ।
भवन्ति धातकीखण्डनिकटे लवणार्णवे ॥१०२॥

अर्थ: लवणसमुद्र में जम्बूद्वीप के निकट जिस प्रकार से चौबीस द्वीप कहे हैं, वैसे ही धातकीखण्ड के समीप भी २४ ही द्वीप हैं ॥१०२॥ इस प्रकार लवणसमुद्र में ४८ द्वीप हैं।


कालोदजलधेस्तद्वत् सन्त्येवोभयभागयोः ।
द्वीपाः सर्वेऽष्टचत्वारिंशत्कुभोगमहीयुताः ॥१०३॥

विश्वेऽमी पिण्डिता द्वीपा अब्धिद्वयान्तरे स्थिताः।
कुभोगभूनराकीर्णा ज्ञेयाः षण्णवतिप्रमाः ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 103 से 104): लवणसमुद्र के सदृश कालोदधि समुद्र के बाह्याभ्यन्तर दोनों भागों में भी चौबीस-चौबीस द्वीप हैं। ये सम्पूर्ण द्वीप ४८ कुभोगभूमियों से युक्त हैं। कालोदधि और लवण इन दोनों समुद्रों के अभ्यन्तर भाग में स्थित अड़तालीस-अड़तालीस द्वीपों का योग कर देने पर कुभोगभूमिज मनुष्यों से व्याप्त ९६ अन्तर्दीप प्राप्त होते हैं ॥१०३-१०४॥


मध्यभागेऽवगाहोऽस्य सहस्त्रयोजनप्रमः।
मक्षिकापक्षसादृश्यश्चान्ते पातालवर्जितः ॥१०५॥

पञ्चाग्रदशलक्षाणि ह्येकाशीतिप्रमाण्यपि।
सहस्त्राणि शतं चैकोनचत्वारिंशदेव हि ॥१०६॥

योजनानामिति ख्यातसंख्या लवणाम्बुधौ।
परिधिः प्रोदिता सूक्ष्मा किञ्चिदूना जिनागमे ॥१०७॥

एवं नाना गिरिद्वीपादियुतो लवणार्णवः।
जम्बूद्वीपपरिक्षेपावृतोऽत्र वर्णितो बुधैः ॥१०८॥

वेलाः पातालरन्ध्राणि वृद्धिहानिशिखादयः।
विद्यन्ते लवणाब्धौ च न शेषा संख्यवार्धिषु ॥१०९॥

यतः शेषार्णवाः सर्वे टङ्कोत्कीर्णा इवोर्जिताः।
सहस्त्रयोजनागाहा वृद्धिहासातिगाः स्मृताः ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 105 से 110): लवणसमुद्र के बड़वानलों का मध्य भाग में जल का अवगाह (गहराई) एक हजार योजन है और अन्त में अर्थात् समुद्र के किनारों पर जल मक्खी के पंख सदृश पतला है। जिनागम में लवण समुद्र की सूक्ष्म परिधि का प्रमाण कुछ कम पन्द्रह लाख इक्यासी हजार एक सौ उनतालीस (१५८११३९) योजन कही गई है। विद्वानों ने लवण समुद्र को अनेकों पर्वतों एवं द्वीपों से युक्त, जम्बूद्वीप को वेष्टित किये हुए और चूड़ी सदृश वलयाकार कहा है। वेला, पातालविवर, जल में हानि वृद्धि एवं शिखा सदृश जल की ऊँचाई अर्थात् जल की शिखा केवल लवणसमुद्र में ही है, अन्य असंख्यात समुद्रों में नहीं हैं। इसलिए शेष सब समुद्र टंकोत्कीर्ण के सदृश, एक हजार योजन अवगाह से युक्त और हानि वृद्धि रूप विकार से रहित कहे गये हैं ॥१०५-११०॥


ततोऽस्ति वलयाकारी धातकीवृक्षलक्षितः।
योजनानां चतुर्लक्षैर्विस्तीर्णो हि द्विधाव्ययः ॥१११॥

द्वितीयो धातकीखण्डद्वीपस्तस्य द्वयोर्दिशोः।
दक्षिणोत्तरयोः स्यातामिक्ष्वाकाराख्यपर्वतौ ॥११२॥

सहस्त्रयोजनव्यासौ चतुःशतसुयोजनैः।
उन्नतौ सच्चतुःकूटैः प्रत्येकं मूर्ध्नि भूषितौ ॥११३॥

एकैक श्रीजिनागारालंकृतौ काञ्चनप्रभौ।
लवणाम्बुधिकालोदवेद्यन्तस्पर्शनौ परौ ॥११४॥

ताभ्यां स धातकीखण्डो द्विधाभेदमुपाश्रितः।
पूर्वाख्यो धातकीखण्ड एकोऽन्योऽपरसंज्ञकः ॥११५॥

एतस्याभ्यन्तरा सूची पञ्चलक्षप्रमाणिका।
मध्यमा नव लक्षा च बाह्या जिनागमे मता ॥११६॥

योजनानां जिनाधीशैलैर्लक्षत्रयोदशप्रमा।
सूचीनां त्रिगुणा सर्वा स्थूला परिधिरुच्यते ॥११७॥

लक्षाः पञ्चदशैकाशीतिसहस्राः शतं तथा।
योजनानां किलैकोनचत्वारिंशदिति स्फुटम् ॥११८॥

परिधिः प्रोदिता पूर्वसूच्या दक्षैर्जिनागमे।
अष्टाविंशतिलक्षाः षट्चत्वारिंशत्सहस्रकाः ॥११९॥

तथैवैकोन पञ्चाशत् परिधिश्चेति मध्यमा।
लक्षाणि चैकचत्वारिंशद्दशैव सहस्रकाः ॥१२०॥

शतानि नव चैकाग्रषष्टिरित्यङ्कयोजनैः।
तद्द्वीपे बाह्यसूच्या हि कीर्तिता परिधिर्जनैः ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 111 से 121): लवणसमुद्र के बाद वलयाकार, धातकी वृक्ष से युक्त, चार लाख योजन प्रमाण व्यास वाला, पूर्व और पश्चिम के भेद से दो भेद वाला और अविनाशी धातकीखण्ड नाम का दूसरा द्वीप है। इस द्वीप की उत्तर-दक्षिण दोनों दिशाओं में दो इष्वाकार पर्वत हैं। जो (पूर्व-पश्चिम) एक हजार योजन चौड़े, चार सौ योजन ऊँचे (और दक्षिणोत्तर लम्बे) हैं। ये दोनों पर्वत काञ्चन वर्ण वाले हैं और इनके शिखर चार-चार कूटों से सुशोभित हैं। वे इष्वाकार पर्वत एक एक जिनमन्दिर से विभूषित हैं, तथा लवणसमुद्र और कालोदधि समुद्र की वेदियों को स्पर्श करते हैं। उन इष्वाकार पर्वतों से वह धातकीखण्ड पूर्व धातकीखण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड के नाम से दो प्रकार वाला है। जिनेन्द्र भगवंतों के द्वारा जिनागम में धातकीखण्ड का अभ्यंतर सूची व्यास पाँच लाख योजन, मध्यम सूची व्यास नौ लाख योजन और बाह्य सूची व्यास तेरह लाख योजन प्रमाण कहा गया है। तीनों सूची व्यासों का तिगुना तीनों स्थूल परिधियों का प्रमाण होता है। अर्थात् अभ्यन्तर सूची व्यास की स्थूल परिधि पन्द्रह लाख, मध्यम परिधि सत्ताइस लाख और बाह्य सूची व्यास की स्थूल परिधि का प्रमाण उन्तालीस लाख योजन है। जिनागम में विद्वानों के द्वारा धातकीखण्ड की अभ्यन्तर सूक्ष्म परिधि का प्रमाण पंद्रह लाख इक्यासी हजार एक सौ उन्तालीस (१५८११३९) योजन कहा गया है। मध्यम सूक्ष्म परिधि का प्रमाण अट्ठाइस लाख छियालीस हजार उनचास (२८४६०४९) योजन और बाह्य सूची व्यास की सूक्ष्म परिधि का प्रमाण जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा इकतालीस लाख दश हजार नौ सौ इकसठ (४११०९६१) योजन कहा गया है ॥१११-१२१॥


महामेरोश्च मेरूद्वी पूर्वापरौ हि क्षुल्लकौ।
स्तो मध्यभागयोर्धातकीखण्डद्वीपयोर्द्वयोः ॥१२२॥

मेरोर्दक्षिणदिग्भागाद् भरतादीनि सप्त च।
क्षेत्राणि योजनानां स्युश्चतुर्लक्षायतान्यपि ॥१२३॥

योजनानां चतुर्लक्षैरायामा षट् कुलाद्रयः।
हिमाद्र्याद्याः समोत्सेधा जम्बूद्वीपकुलाचलैः ॥१२४॥

आद्यद्वीपकुलाद्रिभ्यो सर्वेभ्यो विस्तरान्विताः।
प्रत्येकं द्विगुणव्यासेनैव सन्ति मनोहराः ॥१२५॥

चक्रस्येह यथाराश्च मध्ये छिद्राणि चारयोः।
द्वीपस्यास्य तथा सन्ति ह्याकाराः कुलाद्रयः ॥१२६॥

अरान्तरन्ध्रतुल्यानि क्षेत्राणि निखिलानि च।
सङ्कीर्णानि निजाभ्यन्तरे बाह्ये विस्तीर्णान्यपि ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 122 से 127): दोनों धातकीखण्ड द्वीपों (पूर्व धातकी, पश्चिम धातकी खण्डों) के ठीक मध्य भाग में पूर्व, पश्चिम दिशा में एक-एक मेरु पर्वत अवस्थित हैं। मेरु पर्वतों की दक्षिण दिशा से प्रारम्भ कर भरत, हैमवत आदि सात-सात क्षेत्र हैं, जो चार-चार लाख योजन प्रमाण लम्बे हैं। भरत आदि क्षेत्रों के मध्य हिमवान् आदि छह-छह कुलाचल पर्वत हैं। इन कुलाचलों का आयाम चार-चार लाख योजन प्रमाण और उत्सेध जम्बूद्वीपस्थ कुलाचलों के सदृश अर्थात् १००, २००, ४००, ४००, २०० और १०० योजन प्रमाण है किन्तु धातकीखण्डस्थ कुलाचलों आदि का विष्कम्भ विस्तार जम्बूद्वीपस्थ कुलाचलों के विस्तार से दुगुने-दुगुने प्रमाण वाला है। जिस प्रकार चक्र-पहिया में आरा होते हैं और आरों के मध्य भाग में छिद्र होते हैं, इसी प्रकार इस धातकीखण्ड में स्थित कुलाचल आरों के सदृश हैं और उनके मध्य स्थित क्षेत्रों में भरतादि सभी क्षेत्र स्थित हैं, जो अभ्यन्तर अर्थात् लवण समुद्र की ओर संकीर्ण तथा बाह्य अर्थात् कालोदधि की ओर विस्तीर्ण हैं ॥१२२-१२७॥


एकलक्षसहस्त्राण्यष्टसप्ततिः शताष्टकम्।
योजनानां द्विचत्वारिंशच्चेति संख्यया मतम् ॥१२८॥

तत् क्षेत्रं पर्वतै रुद्धं शेषं पर्वतवर्जितम्।
त्रिधापरिधिभेदेन क्षेत्रं त्रिविधमुच्यते ॥१२९॥

चतुर्दशैव लक्षाणि द्वे सहस्रे शतद्वयम्।
सप्ताग्रानवतिश्चेति योजनानां हि संख्यया ॥१३०॥

जघन्यपरिधेर्ज्ञेयं क्षेत्रं सर्वाचलातिगम्।
षड्विंशतिश्च लक्षाणि सप्तषष्टिसहस्रकाः ॥१३१॥

सप्तोत्तरशते द्वे चेत्यङ्कयोजनविस्तरैः।
मध्यमापरिधेः क्षेत्रं भवेत्पर्वतदूरगम् ॥१३२॥

लक्षा एकोनचत्वारिंशद् द्वात्रिंशत्सहस्रकाः।
तथा शतैकमेकोनविंशतियोजनानि च ॥१३३॥

इत्येवं पर्वतातीतं क्षेत्रं सर्वं मतं जिनैः।
उत्कृष्टपरिधेर्धातकीखण्डस्यास्य पिण्डितम् ॥१३४॥

अर्थ (श्लोक 128 से 134): धातकीखण्ड में पर्वतों से अविरुद्ध क्षेत्र का प्रमाण एक लाख अठहत्तर हजार आठ सौ बयालीस (१७८८४२ २/११) योजन है। (इस क्षेत्र को प्राप्त करने का विधान त्रिलोकसार गाथा ९२८ की टीका से ज्ञातव्य है।) इस क्षेत्र के अतिरिक्त सर्व क्षेत्र, पर्वत क्षेत्र से रहित है, जो तीन प्रकार की परिधियों के भेद से तीन प्रकार का कहा गया है। लवणोदधि के समीप जघन्य परिधि का पर्वत रहित क्षेत्र अर्थात् पर्वत रहित जघन्य परिधि का प्रमाण (१५८११३९-१७८८४२)=१४०२२९७ योजन, पर्वत रहित मध्यम परिधि का प्रमाण (२८४६०५०-१७८८४२)=२६६७२०७ योजन और पर्वत रहित बाह्य (उत्कृष्ट) परिधि का प्रमाण (४११०९६१-१७८८४२)=३९३२११९ योजन है। इस प्रकार जिनेन्द्र देव के द्वारा पर्वत रहित तीनों परिधियों का प्रमाण कहा गया है ॥१२८-१३४॥


क्षेत्राच्चतुर्गुणं क्षेत्रं विदेहान्तमिह स्मृतम्।
ततश्चतुर्गुणोनान्युत्तरक्षेत्रत्रयाणि च ॥१३५॥

जम्बूद्वीपहिमाद्रेः स्यादत्रत्यो हिमवान्महान्।
द्विगुणव्याससंयुक्तो हिमाद्रेरपराचलौ ॥१३६॥

चतुश्चतुर्गुणाव्यासैर्विस्तृतौ चोत्तराद्रयः।
नीलादयस्त्रयो ज्ञेया हिमाद्र्यादि त्रिकैः समाः ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 135 से 137): दोनों धातकीखण्डों के भरतादि क्षेत्रों का क्षेत्र से क्षेत्र के विष्कम्भ विदेह पर्यन्त चौगुने-चौगुने हैं और विदेह के बाद उत्तर दिशा सम्बन्धी क्षेत्रों का विष्कम्भ चौगुना-चौगुना हीन-हीन है। अर्थात् भरत क्षेत्र से विदेह पर्यन्त और ऐरावत क्षेत्र से विदेह पर्यन्त क्षेत्रों का विष्कम्भ क्रमशः चौगुना है। जम्बूद्वीपस्थ हिमवन् पर्वत से धातकीखण्डस्थ हिमवन् पर्वत का विष्कम्भ दूना है, और धातकीखण्डस्थ हिमवन् के विस्तार से निषध कुलाचल तक का विस्तार क्रमशः चौगुना है तथा उत्तर दिशागत नील आदि तीनों पर्वतों का विष्कम्भ निषध, महाहिमवन् और हिमवान् पर्वतों के सदृश समझना चाहिए ॥१३५-१३७॥


भरतस्याभ्यन्तरविस्तृतिः षट्सहस्र-षट्शतचतुर्दशयोजनानि योजनस्य द्विशतद्वादशोत्तरभागानां
एकोनत्रिंशदधिकशतभागाश्च। मध्यव्यासः द्वादशसहस्रपञ्चशतैकाशीतियोजनानि, द्विशतद्वादशोत्तर भागानां
षट्त्रिंशद्भागाः। बाह्यविष्कंभः अष्टादशसहस्रपञ्चशतसप्तचत्वारिंशद्योजनानि द्विशतद्वादशोत्तरभागानां
पञ्चपञ्चाशदग्रशतभागाश्च।
हैमवतस्याभ्यन्तरविस्तारः षड्विंशतिसहस्रचतुःशताष्टपञ्चाशद्योजनानि, द्विशतद्वादशोत्तर भागानां
द्विनवतिभागाः। मध्यविष्कम्भः पञ्चाशतसहस्रत्रिशतचतुर्विंशतियोजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशोत्तरभागानां
चतुश्चत्वारिंशदग्रशतभागाश्च। बाह्यव्यासः चतुःसप्ततिसहस्रैकशतनवतियोजनानि योजनस्य
द्विशतद्वादश-भागानां षट्पञ्चाशदधिकशतभागाश्च।
हरिवर्षस्याभ्यन्तरविष्कम्भ-एकलक्षपञ्चसहस्राष्टशतत्रयस्त्रिंशद्योजनानि, योजनस्य द्वादशाग्रद्विशत-
भागानां षट्पञ्चाशदधिकशतभागाश्च। मध्यव्यासः द्विलक्षकसहस्रद्विशताष्टनवतियोजनानि योजनस्य
द्विशतद्वादशभागानां द्विपञ्चाशदग्रशतभागाश्च। बाह्यविस्तारः द्विलक्षषण्णवति सहस्रसप्त-शतत्रिषष्टि-
योजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां अष्टचत्वारिंशदधिकशतभागाः।
विदेहक्षेत्रस्याभ्यन्तरविष्कम्भः-चतुर्लक्षत्रयोविंशतिसहस्रत्रिशतचतुस्त्रिंशद्योजनानि, योजनस्य
द्विशतद्वादशभागानां द्विशतभागाश्च। मध्ये विस्तृतिः अष्टलक्षपञ्चसहस्रैकशतचतुर्णवतियोजनानि,
योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां चतुरशीत्यग्रशतभागाः। बाह्यविस्तारः एकादशलक्षसप्ताशीति सहस्र-
चतुःपञ्चाशद्योजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां अष्टषष्ट्यग्रशतभागाः एवं रम्यकस्य हरिवर्ष
विष्कम्भेन समस्त्रिविधो विष्कम्भोऽस्ति। हैरण्यवतस्य त्रिधा व्यासः हैमवतव्याससमो भवेत्।
ऐरावतस्याभ्यन्तरमध्यबाह्यविष्कम्भाः भरतविष्कम्भसमानाः स्युः। इति पूर्वापरधातकीखण्डयोर्द्वयोः
भरतादिसप्तक्षेत्राणामभ्यन्तरमध्यबाह्यविष्कम्भाः ज्ञातव्याः।


धातकीखण्डमध्यस्था हृदकुण्डापगादयः।
सर्वे द्विगुणविस्ताराः कीर्तिताः श्रीजिनागमे॥१३८॥

हृदकुण्डापगादिभ्यः प्राग्द्वीपस्थेभ्य एव च।
अवगाहसमाना हि वेदीवनादिभूषिताः॥१३९॥

अर्थ (श्लोक 138 से 139): जिनागम में जम्बूद्वीपस्थ सरोवर आदि के विस्तार से धातकीखण्डस्थ समस्त हृद, कुण्ड और नदियों का विस्तार दूना-दूना कहा गया है तथा प्रथम (जम्बू) द्वीपस्थ हृद, कुण्ड और नदियों के अवगाह समान ही धातकीखण्डस्थ वन, वेदी आदि से विभूषित हृद कुण्ड और नदियों का अवगाह कहा गया है ॥१३८-१३९॥


योजनानां सहस्रे द्वे पद्मस्यायाम एव च।
सहस्रयोजनव्यासस्ततो परौ द्रहदद्वयौ॥१४०॥

द्विगुणद्विगुणव्यासदीर्घौ शेषास्त्रयोऽपरे।
ह्रदा एभिर्ह्रदैस्तुल्या धातकीखण्डयोर्द्वयोः॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 140 से 141): धातकीखण्डस्थ पद्मसरोवर का आयाम २००० योजन और विस्तार १००० योजन प्रमाण है। इसके आगे स्थित महापद्म का आयाम ४००० योजन एवं विस्तार २००० योजन है। तिगिञ्छ सरोवर का विस्तार आदि महापद्म से दूना है। इसके आगे केशरी महा पुण्डरीक और पुण्डरीक सरोवरों का प्रमाण क्रमशः तिगिञ्छ, महापद्म और पद्म सरोवरों के सदृश ही है ॥१४०-१४१॥


गङ्गाकुण्डस्य विस्तारः पञ्चविंशतियोजनैः ।
शताग्रैश्च तथा सिन्धुकुण्डस्य कीर्तितो बुधैः ॥१४२॥
सीतोदान्तनदीकुण्डानास्माद् द्विगुणः क्रमात् ।
व्यासो वृद्धियुतोऽन्येषामेभिः कुण्डैः समानकः ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 142 से 143): गणधरों के द्वारा गंगा कूट का विस्तार १२५ योजन और सिन्धु कूट का विस्तार भी १२५ योजन कहा गया है, इसके आगे सीतोदा नदी पर्यन्त यह विस्तार दुगुना-दुगुना कहा गया है। सीतोदा नदी के आगे कुण्डों का विस्तार क्रमशः उत्तर के अर्थात् गंगा आदि कुण्डों के विस्तार सदृश ही जानना चाहिए ॥१४२-१४३॥


योजनानां सहस्राणि ह्येकोनविंशतिस्तथा ।
त्रिंशतानि नवाग्राणीति गङ्गासरितो मतम् ॥१४४॥
ऋजुत्वं हिमवन्मूर्ध्निसिन्धोश्च गमनं प्रति ।
रक्तारक्तादयोस्तद्वच्छिखर्यचलमस्तके ॥१४५॥
शेषाखिलनदीनां स्यादृजुत्वगमनं द्रहात् ।
कुलाद्रितटपर्यन्तं पर्वतोपरि नान्यथा ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 144 से 146): धातकीखण्डस्थ गंगा नदी हिमवन् पर्वत पर १९३०९ योजन पर्यन्त सीधी जाती है। हिमवन् पर्वत पर सिन्धु नदी का सीधा बहाव भी इतना ही है। इसी प्रकार शिखरी पर्वत पर रक्ता-रक्तोदा नदियों का भी सीधा बहाव १९३०९ योजन प्रमाण ही है। शेष सम्पूर्ण नदियों का अपने-अपने पर्वतों के ऊपर सीधा बहाव सरोवरों से कुलाचलों के तट पर्यन्त है, अन्य प्रकार नहीं है ॥१४४-१४६॥


गङ्गसिन्ध्वोश्च विस्तारो निर्गमे योजनान्यपि ।
सार्धद्वादशवार्धन्ते पञ्चविंशाधिकं शतम् ॥१४७॥
ततोऽन्यसरितां व्यासो द्विगुणद्विगुणः क्रमात् ।
सीतोदान्तं तथान्यासां विष्कम्भो ह्राससंयुतः ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 147 से 148): निर्गम स्थान पर गंगा और सिन्धु नदियों का मुख व्यास १२ १/२ योजन प्रमाण है, इससे क्रमशः वृद्धि होते हुए समुद्र प्रवेश द्वार पर नदी का विस्तार १२५ योजन हो जाता है। इस प्रकार सीतोदा पर्यन्त अन्य नदियों का यह विस्तार दूना-दूना होता जाता है, इसके आगे जिस क्रम से वृद्धिंगत हुआ था, उसी क्रम से घटता हुआ अन्त में गंगा सिन्धु सदृश ही रह जाता है ॥१४७-१४८॥


मेरुः पूर्वविदेहस्य मध्यभागेऽस्ति क्षुल्लकः ।
सहस्रयोजनागाहो वनधामाद्यलंकृतः ॥१४९॥

तुङ्गश्चतुरशीत्या च सहस्रयोजनैः शुभः॥
द्व्यष्टचैत्यालयोपेतश्चूलिकादिविराजितः ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 149 से 150): धातकीखण्डस्थ पूर्वविदेह क्षेत्र के मध्यभाग में वन एवं प्रासाद आदि से अलंकृत विजय नाम का मेरु पर्वत स्थित है। इसका अवगाह (नींव) एक हजार योजन और ऊँचाई ८४००० योजन प्रमाण है। यह विजय मेरु सोलह अकृत्रिम जिन चैत्यालयों और चूलिका आदि से सहित होने के कारण अत्यन्त शोभायमान है ॥१४८-१५०॥


अस्य मेरोः कन्दतले विष्कम्भः योजनानां पञ्चनवत शतानि । परिधिश्च किञ्चिदूनद्विचत्वारिंशद-
धिकत्रिंशत्सहस्रयोजनानि । भूतले व्यासः नवसहस्रचतुःशतयोजनानि । परिधिश्च एकोनत्रिंशत्सहस्र-
सप्तशतपञ्चविंशतियोजनानि । भूतलादूर्ध्वं पञ्चशतयोजनानि गत्वास्य मेरोः प्रथममेखलायां प्रागुक्त
वर्णनोपेतं पञ्चशतयोजनविस्तृतं चतुश्चैत्यालयादिअलंकृतं नानापादपाकीर्णं शाश्वतं वनं स्यात् । तत्र
नन्दनवनसहितमेरोर्बाह्यविस्तारः नवसहस्रत्रिशतपञ्चाशद्योजनानि । बाह्यपरिधिः एकोनत्रिंशत्सहस्र-
पञ्चशतं-सप्तषष्टि-योजनानि । वनरहितमेरोऽभ्यन्तरविष्कम्भः अष्टसहस्रत्रिशतपञ्चाशद्योजनानि ।
अभ्यन्तरपरिधिः षड्विंशति-सहस्रचतुःशतपञ्चयोजनानि । ततः ऊर्ध्वं सार्धपञ्चपञ्चाशत्सहस्रयोजनानि
विमुच्य मेरोः चतुर्जिनालय-वापीसुरसद्मादि विभूषितं पञ्चशतयोजनविस्तीर्णं रम्यं सौमनसाख्यं वनं
विद्यते, तेषां सार्धपञ्चपञ्चा-शत्सहस्रयोजनानां मध्येऽसौ मेरुः दशसहस्रयोजनपर्यन्तं समविष्कम्भो
भवति ततः सार्धपञ्च-चत्वारिंशत्सहस्रयोजनान्तं क्रमह्रस्वश्च ।
तत्रास्य बाह्यविष्कम्भः त्रिसहस्राष्टशतयोजनानि । बाह्यपरिधिः द्वादशसहस्रकिञ्चिदूनसप्तदश
योजनानि । अभ्यन्तरव्यासः द्विसहस्राष्टशतयोजनानि । अभ्यन्तरपरिधिः अष्टसहस्राष्ट-शत-
चतुःपञ्चाशद्योजनानि । ततोऽस्यैव मेरूरूध्वं अष्टाविंशति सहस्रयोजनानि विहाय मूर्ध्निचतुर्नवतियुत-
चतुःशतयोजनव्यासं जिनालय-पाण्डुकशिलादि भूषितं पाण्डुकवनमस्ति । तेषामष्टाविंशतिसहस्रयोजनानां,
मध्ये दशसहस्रयोजनपर्यन्तं मेरुः ऋजुविष्कम्भो भवेत् । ततोऽष्टादशसहस्त्र योजनान्तं क्रमहीयमान-
ह्रस्वश्च । तत्रास्य सहस्रयोजनविस्तीर्णस्य मेरोर्मूर्ध्नि परिधिः त्रिसहस्रैकशतद्विषष्टियोजनानि साधिकः
क्रोशश्च । अत्र मेरौ अन्ये चैत्यालयदेवगृहवापी-कूटचूलिकादयः उत्सेध-व्यासावगाहादि वर्णनैः
जम्बूद्वीपस्थ महामेरोः समाना भवन्ति । ईदृग्विधवर्णनो-पेतोऽपरमेरुरपि पश्चिमधातकीखण्ड विदेहस्य
मध्ये ज्ञातव्यः ।

अर्थ: इस विजयमेरु पर्वत का मूल में अर्थात् चित्रा पृथ्वी के तल (निचले) भाग पर (जड़) विस्तार ९५०० योजन है और इस कन्द विष्कम्भ की परिधि कुछ कम ३००४२ योजन प्रमाण है। भूतल पर अर्थात् पृथ्वीतल (चित्रा पृथ्वी के उपरले भाग) पर विजयमेरु का व्यास ९४०० योजन तथा परिधि २९७२५ योजन प्रमाण है। पृथ्वीतल से ५०० योजन ऊपर जाकर विजयमेरु की प्रथम मेखला (कटनी) पर सुदर्शनमेरु की प्रथम मेखला के वर्णन के सदृश ५०० योजन विस्तृत, चार चैत्यालयों आदि से अलंकृत और अनेक प्रकार के वृक्षों से युक्त शाश्वत नन्दन नाम का वन है। उस नन्दन वन सहित विजयमेरु का बाह्य विस्तार ९३५० योजन और इसकी बाह्य परिधि २९५६७ योजन प्रमाण है। नन्दनवन के व्यास रहित मेरु का अभ्यन्तर व्यास ८३५० योजन एवं इसी व्यास की अभ्यन्तर परिधि २६४०५ योजन प्रमाण है। इस नन्दनवन से ५५५०० योजन ऊपर जाकर मेरु की दूसरी मेखला है, जिस पर चार जिन चैत्यालय, वापियाँ एवं देवों के प्रासादों आदि से विभूषित ५०० योजन विस्तृत सौमनस नाम का वन है। इस ५५५०० योजन के मध्य मेरु १०००० योजन पर्यन्त समरुन्द्र अर्थात् समान चौड़ाई से युक्त है, इसके बाद ४५५०० योजन पर्यन्त क्रमशः हीन होता गया है। यहाँ का अर्थात् सौमनस वन के बाह्य व्यास का प्रमाण ३८०० योजन और इसकी बाह्य परिधि का प्रमाण कुछ कम १२०१७ योजन है। सौमनस वन का अभ्यन्तर व्यास २८०० योजन और अभ्यन्तर व्यास की परिधि ८८५४ योजन प्रमाण है। इस सौमनस वन से २८००० योजन ऊपर जाकर चार जिनालयों एवं पाण्डुक आदि शिलाओं से युक्त ४९४ योजन विस्तृत पांडुक नाम का वन है। इन २८००० योजनों के मध्य १०००० योजन पर्यन्त मेरु का विष्कम्भ बिल्कुल सीधा है अर्थात् चौड़ाई समान है। इसके ऊपर १८००० योजनों पर्यन्त विष्कंभ क्रमशः हीन होता गया है। पांडुक वन का बाह्य विष्कम्भ १००० योजन और मेरु के ऊपर परिधि ३१६२ योजन और कुछ अधिक एक कोस प्रमाण है। यहाँ मेरु पर्वत के ऊपर चार जिन चैत्यालय, देवगृह, वापी, कूट एवं चूलिका आदि हैं, इन सब के उत्सेध, व्यास और अवगाह आदि का वर्णन जम्बूद्वीपस्थ महामेरु के सदृश ही जानना चाहिए। इसी प्रकार धातकीखण्ड स्थित पश्चिम विदेह क्षेत्र के मध्य में अचल नाम का मेरु पर्वत स्थित है, उसका सम्पूर्ण वर्णन इसी विजय मेरु पर्वत के सदृश ही जानना चाहिए।


मेरोः प्राक् पश्चिमदिगाश्रिते जिनेन्द्रचैत्यालयाद्यलंकृते एकलक्षसप्तसहस्राष्टशतैकोना-
शीतियोजनायामे पंचविंशत्यग्रद्वादशशतयोजनविस्तीर्णे पूर्वापर भद्रशालाह्वये द्वे वने भवतः। अत्रैव
मेरोर्वायव्यनैर्ऋत्यदिग्विदिगाश्रितौ त्रिलक्षषट्पंचाशत् सहस्रद्विशतसप्तविंशतियोजनायामौ प्रागुक्तकूटचैत्यालय-
वनवेद्याद्यलंकृतौ गन्धमादनविद्युत्प्रभाख्यौ द्वौ लघुगजदन्तपर्वतौ स्यातां। ईशानाग्नेयविदिक् स्थितौ
पंचलक्षैकोनसप्ततिसहस्रद्विशतै-कोनषष्टियोजनायामौ। माल्यवत्सौमनसाह्वयौ द्वौ बृहद्गजदन्ताचल्लौ
भवतः। देवकुरुउत्तरकुरुभोगभूम्योः प्रत्येकं कुलाचलसमीपे विष्कम्भः द्विलक्षत्रयोविंशति-
सहस्रैकशताष्टपंचाशद्योजनानि, कुलाचलात् मेरुपर्यन्तं वक्रायामः त्रिलक्षसप्तनवतिसहस्राष्ट-
शतसप्तनवति योजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां द्विनवतिभागाश्च। कुरूणामुभयान्तयोः
ऋज्वायामः त्रिलक्षषट्षष्टिसहस्र षट्शताशीतियोजनानि। पूर्वापरमेर्वोः पूर्वापरभद्रशालान्तयोश्चान्तराले
जम्बूद्वीपलवणसमुद्रादिसहिते सूची एकादश लक्षपंचविंशतिसहस्रैकशताष्ट-पंचाशद्योजनानि। सूच्याः
परिधिः पञ्चत्रिंशल्लक्षाष्टपंचाशतसहस्रद्विषष्टियोजनानि। पूर्वापर मेर्वोः, पूर्वापर सर्वभद्रशालवनाभ्यां
विनान्तराले सूची षड़्लक्षचतुः सप्ततिसहस्राष्टशत द्विचत्वारिंशद्योजनानि। तत्सूच्याः परिधिः
एकविंशतिलक्षचतुस्त्रिंशत् सहस्राष्टत्रिंशद्योजनानि। मेरुपूर्वापरभद्रशालदेवारण्य भूतारण्यवनैर्विना,
पूर्वापरविदेहयोः प्रत्येकं व्यासः एकाशीतिसहस्रपंचशतसप्तसप्तति योजनानि।

अर्थ: धातकीखण्डस्थ मेरु पर्वत की पूर्व और पश्चिम दिशा में मेरु के मूल अर्थात् पृथ्वीतल पर जिन चैत्यालयों आदि से अलंकृत, १०७८७९ योजन लम्बे और १२२५ योजन चौड़े पूर्व भद्रशाल एवं पश्चिम भद्रशाल नाम के दो वन हैं। इसी पश्चिम भद्रशाल वन में मेरु की वायव्य एवं नैऋत्य विदिशाओं में क्रम से ३५६२२७ योजन लम्बे और पूर्व में कहे हुए कूटों, जिन चैत्यालयों एवं वन वेदी आदि से अलंकृत गन्धमादन तथा विद्युत्प्रभ नाम के दो-दो लघु गजदन्त पर्वत हैं। पूर्व भद्रशाल वन में इसी मेरु की ऐशान और आग्नेय विदिशाओं में ५६९२५९ योजन लम्बे माल्यवान् और सौमनस नाम के दो बृहद् गजदन्त पर्वत हैं। धातकीखण्डस्थ देवकुरु उत्तरकुरु दोनों भोगभूमियों का विष्कम्भ कुलाचलों के समीप २२३१५८ योजन है। अर्थात् देवकुरु उत्तरकुरु (प्रत्येक) की जीवा २२३१५८ योजन है। कुलाचलों से मेरु पर्यन्त का वक्र आयाम (धनुःपृष्ठ) ३९७८९७ ९२/२१२ योजन है। अर्थात् प्रत्येक कुरुक्षेत्र का धनुःपृष्ठ ३९७८९७ ९२/२१२ योजन प्रमाण है। दोनों कुरुक्षेत्रों में प्रत्येक क्षेत्र के अन्त से ऋजु आयाम अर्थात् कुरुक्षेत्र का ऋजुवाण ३६६६८० योजन प्रमाण है। पूर्व पश्चिम मेरुओं के पूर्व-पश्चिम भद्रशाल वनों के अन्त तक (पूर्व मेरु के पूर्व भद्रशाल वन के अन्त से पश्चिम मेरु के पश्चिम भद्रशाल के वन के अन्त तक अर्थात् पूर्व धातकीखण्ड के ३१२५७९ योजन + लवण समुद्र २००००० यो. + जम्बूद्वीप १००००० यो. + लवण समुद्र २००००० यो. पश्चिम धातकीखण्ड के ३१२५७९ यो. = ११२५१५८ यो.) के अन्तराल का (बाह्य) सूचीव्यास जम्बूद्वीप लवणसमुद्र आदि सहित ११२५१५८ योजन है। तथा इस सूची व्यास की परिधि ३५५८०६२ योजन प्रमाण है। पूर्व-पश्चिम मेरुओं के पूर्व-पश्चिम भद्रशाल वनों के बिना, अन्तराल का (अभ्यंतर) सूची व्यास का प्रमाण ६७४८४२ योजन (पूर्व धातकीखण्ड के देवारण्य व विदेह क्षेत्र का प्रमाण ५८४४ + ८१५७७ = ८७४२१ यो. + जम्बू., लवण स. के ५००००० + पश्चिम विदेह के ८७४२१ यो. = ६७४८४२ यो.) है, और उस सूची व्यास की परिधि २१३४०३८ योजन प्रमाण है। (त्रि० सा० गाथा ९३०) मेरु पर्वत पूर्व-पश्चिम भद्रशाल वन और देवारण्य, भूतारण्य वनों के व्यास बिना पूर्व-पश्चिम दोनों विदेहों में प्रत्येक विदेह का व्यास ८१५७७ योजन प्रमाण है।


अत्र द्वौ धातकीवृक्षौ जम्बूशाल्मलि सन्निभौ।
उच्चायामादिभिः स्यातां जिनालयाद्यलंकृतौ ॥१५१॥

मेरोः पूर्वदिशाभागे विदेहपूर्वसंज्ञकः।
विभक्तः सीतया द्वेधा दक्षिणोत्तरनामभाक् ॥१५२॥

मेरोः पश्चिमदिग्भागे स्याद् विदेहोऽपराह्वयः।
दक्षिणोत्तरनामाद्य सीतोदया द्विधा कृतः ॥१५३॥

अर्थ (श्लोक 151 से 153): जम्बू शाल्मलि वृक्षों की ऊँचाई एवं आयाम आदि से युक्त धातकीखण्ड में दो मेरु सम्बन्धी दो-दो धातकी (बहेड़ा) के वृक्ष अवस्थित हैं, जो जिनालय आदि से अलंकृत हैं। मेरु की पूर्व दिशा में पूर्व विदेह नाम का क्षेत्र है, जो सीता महानदी के नाम से दक्षिण विदेह और उत्तर विदेह के नाम से दो भागों में विभक्त किया गया है। इसी प्रकार मेरु की पश्चिम दिशा में पश्चिम विदेह है, जो सीतोदा के द्वारा उत्तर दक्षिण नाम से दो भागों में विभक्त किया गया है ॥१५१-१५३॥


अत्र प्रागुक्तनामानो द्वात्रिंशद् विषया मताः।
विजयार्ध द्विनदीभ्यां षट्खण्डान्वितभूतला ॥१५४॥

पूर्वस्मान्मन्दरात् पूर्वः कच्छाख्यो विषयो महान्।
अपरादपरोन्त्यश्च देशः स्याद् गन्धमालिनी ॥१५५॥

योजनानां सहस्त्राणि नवत्यग्रशतानिषट्।
सार्धक्रोश इति व्यासो देशानां स्यात् पृथक् पृथक् ॥१५६॥

विदेह विस्तरस्यार्धं नदीव्यासोनितं च यत्।
क्षेत्रं स एव आयाम आदिमध्यान्त भेदतः ॥१५७॥

त्रिविधोऽखिलदेशानां प्रत्येकं वृद्धिह्रासभाक्।
वक्षाराचलदेवारण्यादीनां कीर्तितो जिनैः ॥१५८॥

चतुःसहस्त्रसंख्यानि तथा पञ्चशतानि च।
त्र्यशीतियोजनानां द्विशतद्वादशभागिनाम् ॥१५९॥

भागानां किल भागाः षण्णवत्यग्रशतप्रमाः।
इत्यायामप्रवृद्धिः स्यात् कच्छादि विषयं प्रति ॥१६०॥

अर्थ (श्लोक 154 से 160): धातकीखण्ड में पूर्व कहे हुए नाम वाले बत्तीस देश हैं, जिनके एक-एक विजयार्ध पर्वत और गंगा-सिन्धु नाम की दो-दो नदियों द्वारा छह छह खण्ड होते हैं। मेरु पर्वत से पूर्व दिशा में कच्छा नाम का महान् देश है और मेरु से पश्चिम दिशा में गन्धमालिनी नाम का महान् देश है। इन ३२ ही देशों में से पृथक्-पृथक् एक-एक देश का व्यास ९६० ३/८ योजन प्रमाण है। विदेहक्षेत्र के विस्तार को आधा करके उसमें से नदी का व्यास घटा देने पर प्रत्येक क्षेत्र की लम्बाई का प्रमाण प्राप्त होता है। जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा बत्तीस देशों, वक्षार पर्वतों और देवारण्य आदि वनों का आयाम आदि, मध्य और अन्त में वृद्धि-हानि को लिए हुए तीन-तीन प्रकार का कहा गया है। अर्थात् आदि आयाम से मध्य में और मध्य आयाम से अन्त में, इस प्रकार प्रत्येक में दो-दो बार स्व वृद्धि का प्रमाण बढ़ता है। इनमें से देश आयाम की वृद्धि का प्रमाण ४५८३३३ ५२६/२१२ योजन है ॥१५४-१६०॥


सहस्रयोजनव्यासाद् द्व्यष्टवक्षारपर्वताः।
भवन्ति विविधायामाः प्रागुक्तोत्सेधसम्मिताः ॥१६१॥

चतुःशतानि सप्ताग्रसप्ततिर्योजनानि च।
षष्टिभागा इहायामवृद्धिर्वक्षारभूभृतः ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 161 से 162): सोलह वक्षार पर्वतों की ऊँचाई पूर्व कहे हुए जम्बूद्वीपस्थ वक्षार पर्वतों की ऊँचाई सदृश है। लम्बाई अनेक प्रकार की है और चौड़ाई १००० योजन प्रमाण है। प्रत्येक वक्षार के आदि मध्य अन्तायाम में वृद्धि का प्रमाण ४७७ ६०/२१२ योजन है ॥१६१-१६२॥


प्रागुक्तद्विगुणव्यासे रम्ये द्वे भवतो वने।
देवारण्याख्यभूतारण्याह्वये वेदिकाङ्किते ॥१६३॥

अनयोः प्रत्येकं विष्कम्भः पंचसहस्राष्टशतचतुश्चत्वारिंशद्योजनानि।
योजनानां सहस्रे द्वे तथा सप्तशतानि च।
एकोननवतिर्द्वानवतिकला जिनागमे ॥१६४॥

द्विषट्द्विशतसंख्यानां कलानामिति कीर्तिता।
आयामवृद्धिरेतस्य द्विवनस्य पृथग्विधा ॥१६५॥

अर्थ (श्लोक 163 से 165): धातकीखण्डस्थ विदेह में वेदिका आदि से अलंकृत तथा अत्यन्त रमणीक देवारण्य भूतारण्य नाम के दो वन हैं। इनका व्यास जम्बूद्वीपस्थ वनों के व्यास के प्रमाण से दूना है। इन दोनों वनों में से प्रत्येक वन का विष्कम्भ-५८४४ योजन प्रमाण है। जिनागम में पृथक्-पृथक् दोनों वनों के आयामों में वृद्धि का प्रमाण २७८९ ९२/२१२ योजन कहा गया है ॥१६३-१६५॥


नद्यो द्वादश विस्तीर्णाः सार्धद्विशतयोजनैः।
विभङ्गाख्या भवेयुः प्राग् धातकीखण्डनामनि ॥१६६॥

कुण्डव्याससरिद् व्यासोनं विदेहस्य भूतलम्।
यदर्धं स विभङ्गानामायामोऽस्ति पृथग्विधः ॥१६७॥

शतमेकोनविंशत्याधिकं च योजनान्यपि।
द्विषड्द्विशतभागानां भागाः पञ्चाशदेव च ॥१६८॥

भागद्वयाधिका इत्यायामवृद्धिर्जिनैः स्मृता।
प्रत्येकं बहुभेदोऽत्र विभङ्गासरितां क्रमात् ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 166 से 169): पूर्व धातकीखण्ड में २५० योजन विस्तार वाली, विभंगा नाम की बारह नदियाँ हैं। विदेह क्षेत्र के व्यास में से कुण्डव्यास और नदी का व्यास कम करके अवशेष को आधा करने पर विभंगा की लम्बाई प्राप्त हो जाती है। एक-एक नदी का यह आयाम भिन्न-भिन्न प्रकार का कहा गया है। जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा विभंगा नदियों का बहुत भेद वाला यह आयाम क्रम से ११९ ५२/२१२ योजन वृद्धि के साथ कहा गया है। अर्थात् विभंगा का आद्यायाम ५२८८६१ ४४/२१२ योजन प्रमाण है, इसमें वृद्धि प्रमाण ११९ ५२/२१२ योजन मिला देने पर विभंगा का मध्य आयाम ५२८९८० ९६/२१२ योजन होता है, और इसमें पुनः वृद्धि का प्रमाण मिला देने पर विभंगा का अन्त आयाम ५२९१०९ १४८/२१२ योजन-प्रमाण हो जाता है ॥१६६-१६९॥


विभङ्गोत्पत्तिकुण्डानि सार्द्धद्विशतयोजनैः।
विस्तीर्णानि च पूर्वोक्तावगाहसदृशान्यपि ॥१७०॥

विजयार्धश्चतुस्त्रिंशत्प्रागुक्तोन्नतिसम्मिताः ।
शतयोजनविस्तीर्णा द्वीपेऽर्द्धेऽस्मिन्निरूपिताः ॥१७१॥

गङ्गाद्याः क्षुल्लकानद्यश्चतुःषष्टिप्रमाः शुभाः।
प्राक्सरिद्द्विगुणव्यासाः प्राग्नद्यागाहसन्निभाः ॥१७२॥

गङ्गाद्युत्पत्तिकुण्डानि पादाग्रशतयोजनैः।
विस्तृतानि चतुःषष्टिपूर्वागाहयुतानि च ॥१७३॥

क्रोशद्वयोन्नताः पञ्चशतचापसुविस्तृताः।
भद्रशालवनादीनां सन्त्यष्टौवेदिकाः शुभाः ॥१७४॥

अर्थ (श्लोक 170 से 174): विभंगा नदियों की उत्पत्ति जिन कुण्डों से होती है, उन कुण्डों का व्यास २५० योजन तथा अवगाह जम्बूद्वीपस्थ कुण्डों के अवगाह सदृश है। अर्ध द्वीप में अर्थात् पूर्व धातकीखण्ड में पूर्वकथित (२५ योजन) उत्सेध वाले और १०० योजन विस्तृत चौंतीस विजयार्ध पर्वत हैं। जम्बूद्वीपस्थ विदेह क्षेत्र गत गंगा आदि नदियों के अवगाह सदृश अवगाह वालीं और वहाँ की नदियों के व्यास से दुगुने व्यास वाली गंगा, सिन्धु, रोहित और रोहितास्या नाम की ६४ छोटी नदियाँ हैं। इन गंगा आदि ६४ नदियों की उत्पत्ति के स्थान स्वरूप वहाँ ६४ गंगादि कूट हैं, जो १२५ योजन विस्तृत और जम्बूद्वीपस्थ विदेह के कुण्डों की अवगाहना के सदृश अवगाहना वाले हैं। भद्रशाल आदि वनों की दो कोस ऊँची और ५०० धनुष चौड़ी अत्यन्त रमणीय आठ वेदियाँ हैं ॥१७०-१७४॥


जम्बूद्वीपविदेहे सन्नामान्युक्तानि यानि च।
देशानां नगरीणां सुविभङ्गासरितां तथा ॥१७५॥

वक्षारपर्वतादीनां तान्येव निखिलान्यपि।
ज्ञेयानि धातकीखण्डद्वीपेऽस्मिन् द्विविधेऽखिले ॥१७६॥

इत्येषा वर्णना सर्वा देश शैलादिगोचरा।
पश्चिमे धातकीखण्डे ज्ञेयाक्षेत्रादिसंख्यया ॥१७७॥

अर्थ (श्लोक 175 से 177): पूर्व और पश्चिम धातकी खण्डों में स्थित विदेह क्षेत्रों के देशों के नाम, नगरियों के नाम, विभंगा नदियों के नाम और वक्षार पर्वत आदि अन्य सभी के नाम जम्बूद्वीपस्थ विदेह के देशों, नगरियों एवं नदी-पर्वतों के नाम के सदृश ही हैं अर्थात् जो-जो नाम जम्बूद्वीपस्थ विदेह में हैं, वही-वही नाम यहाँ हैं। पूर्व धातकीखण्ड में देश, पर्वत एवं क्षेत्रादि की जो, जैसी तथा जितनी संख्या आदि कही है एवं जैसा-जैसा वर्णन किया है, वैसा-वैसा ही तथा उतनी ही संख्या प्रमाण में समस्त वर्णन पश्चिम धातकीखण्ड में जानना चाहिए ॥१७५-१७७॥


अष्टौ यमकशैला ये द्व्यष्टदिग्गजपर्वताः।
अष्टौ नाभिनगा अष्टषष्टिर्वृषभपर्वताः ॥१७८॥

चतुःशतप्रमाणा ये पिण्डिताः कनकाद्रयः।
उत्सेधविस्तराद्यैस्ते धातकीखण्डयोर्द्वयोः ॥१७९॥

सर्वे प्रथमद्वीपस्थ यमकाद्यादिसम्मिताः।
प्रागुक्तवर्णनोपेता वनवेद्याद्यलंकृताः ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 178 से 180): पूर्व और पश्चिम दोनों धातकीखण्डों में [मेरु पर्वत दो, विजयार्ध ६८] यमकगिरि ८, दिग्गज पर्वत १६, नाभि पर्वत ८, वृषभाचल ६८ और कञ्चनगिरि ४०० [१२ कुलाचल, ३२ वक्षार, ८ गजदन्त और दो इष्वाकार] ये सब ६२४ पर्वत हैं, इनका उत्सेध एवं विस्तार आदि सब जम्बूद्वीपस्थ विदेह के पर्वतों सदृश है ॥१७८-१८०॥


द्विषट् भोगधरा अत्र स्युश्चषट्कर्मभूमयः।
जम्बूद्वीपसमानाश्च सुखगत्यादि कारणैः ॥१८१॥

द्विमेरुप्रमुखाः सर्वे पिण्डिताः ख्यातपर्वताः।
चतुर्विंशतिसंयुक्तषट्शतप्रमिता मताः ॥१८२॥

पंचत्रिंशच्च लक्षाणि ह्यशीतिश्चचतुरुत्तराः।
सहस्राणि शतैकं चाशीतिरित्युक्तसंख्यया ॥१८३॥

सर्वाः पिंडीकृता नद्यो गङ्गाद्याः कीर्तिता जिनैः।
धातकीखण्डयोर्मूलपरिवाराह्वयाः श्रुते ॥१८४॥

चत्वारिंशद् द्रहाः सीतासीतोदामध्यसंस्थिताः।
अत्रादिद्वीपतोऽन्ये द्विगुणा ह्रद-वनादयः ॥१८५॥

द्वीपस्यास्य पती स्यातां प्रभासप्रियदर्शनौ।
दक्षिणोत्तरभागस्थौ जिनबिम्बात्तशेखरौ ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 181 से 186): सम्पूर्ण धातकीखण्ड में बारह भोगभूमियाँ और छह कर्मभूमियाँ हैं। इनमें सुख और गति-आगति आदि के समस्त कारण एवं सम्पूर्ण वर्णन जम्बूद्वीप सम्बन्धी भोगभूमियों एवं कर्मभूमियों के सदृश ही है। दोनों दिशा सम्बन्धी दो मेरु हैं प्रमुख जिनमें, ऐसे सम्पूर्ण धातकीखण्ड सम्बन्धी पर्वतों का एकत्रित योग (२ मेरु + ६८ विजयार्ध + ६८ वृषभाचल + १६ दिग्गज + ८ नाभिगिरि + ४०० कञ्चनगिरि + ८ यमकगिरि + १२ कुलाचल + ३२ वक्षारगिरि + ८ गजदन्त और २ इष्वाकार)=६२४ है। जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा आगम में सम्पूर्ण धातकीखण्ड की गंगा आदि मूल और इनकी परिवार नदियों की समस्त संख्या ३५८४१८० कही गई है। सीता-सीतोदा नदियों के मध्य में ४० द्रह स्थित हैं। यहाँ के अन्य हृद एवं वन आदिकों की संख्या जम्बूद्वीपस्थ द्रहादिकों की संख्या से दूनी-दूनी है। इस धातकीखण्ड के संरक्षक प्रभास और प्रियदर्शी नाम के दो अधिपति देव हैं, जो अपने मुकुटों की शिखरों पर जिनबिम्ब को धारण करते हुए क्रमशः दक्षिण और उत्तर दिशा सम्बन्धी धातकी वृक्षों पर रहते हैं ॥१८१-१८६॥


तं द्वीपं धातकीखण्डमावेष्ट्यपरितिष्ठति।
लक्षाष्टयोजनव्यासः कालोदवारिधिर्महान् ॥१८७॥

सर्वत्रास्यावगाहोऽस्ति सहस्रयोजनप्रमः।
प्रागुक्तोत्सेधविस्तारः प्राकारो वेदिकाङ्कितः ॥१८८॥

चतुर्दिक्ष्वस्य शालस्य चत्वारि गोपुराणि च।
गङ्गादि सरितां सन्ति द्वाराणि च चतुर्दश ॥१८९॥

द्वीपाः सन्त्यष्टचत्वारिंशत्कुमर्त्ययुगान्विताः।
कालोदतटयोरन्तर्भागयोरुपरि स्थिताः ॥१९०॥

पातालानि न सन्त्यत्र नोर्मिवृद्ध्यादयः क्वचित्।
टङ्कोत्कीर्ण इवास्त्येष सर्वत्र समगाहधृत् ॥१९१॥

कालाख्यो रक्षकोऽस्याब्धेः स्वामीदिग्भागदक्षिणे।
व्यन्तरश्च महाकाल उत्तराख्य दिशि स्थितः ॥१९२॥

अर्थ (श्लोक 187 से 192): उस धातकीखण्ड द्वीप को परिवेष्टित करके आठ लाख योजन विस्तार वाला कालोदधि नाम का महान् समुद्र अवस्थित है। आकार एवं वेदिका आदि से अलंकृत इस समुद्र का अवगाह सर्वत्र १००० योजन प्रमाण है तथा उत्सेध और विस्तार आदि का प्रमाण पूर्वकथित प्रमाण है। इसके कोट की चारों दिशाओं में चार गोपुर और गंगादि नदियों के समुद्र में प्रवेश करने के चौदह द्वार हैं। कालोदधि समुद्र के दोनों तटों से भीतर की ओर जल के मध्यभाग में ४८-४८ कुभोगभूमियाँ हैं, जिनमें युगल कुमानुष रहते हैं। लवण समुद्र के समान इस समुद्र में न पाताल हैं और न कभी लहरों की वृद्धि आदि ही होती है। यह समुद्र सर्वत्र समान गहराई को धारण करता हुआ टंकोत्कीर्ण के सदृश अवस्थित है। इस समुद्र का काल नाम का रक्षक देव समुद्र की दक्षिण दिशा में और महाकाल नाम का अधिपति व्यन्तर देव समुद्र की उत्तर दिशा में निवास करते हुए समुद्र की रक्षा करते हैं ॥१८७-१९२॥


एकानवति लक्षाणि सहस्त्राणि च सप्ततिः।
पञ्चाग्रषट्शतानीति कृतयोजनसंख्यया ॥१९३॥

कालोदकसमुद्रस्य परिधिः श्रीजिनोदिता।
ततो द्विगुणविस्तारो द्वीपोऽस्ति पुष्कराह्वयः ॥१९४॥

मध्येऽस्यैवाष्टलक्षाणि योजनानि विमुच्य च।
नित्यः स्वर्णमयस्तिष्ठेन्मानुषोत्तरपर्वतः ॥१९५॥

ततः सार्थकनामासौ पुष्करार्ध इहोच्यते।
विस्तृतो योजनैरष्टलक्षैः पुष्करवृक्षभृत् ॥१९६॥

इष्वाकारनगौ स्तोऽस्य दक्षिणोत्तरयोर्दिशोः।
द्वीपव्याससमायामौ दिव्यचैत्यालयाङ्कितौ ॥१९७॥

प्रागुक्तोन्नतिव्यासाढ्यौ चतुःकूटविराजितौ।
ताभ्यां द्वीपः स संजातः पूर्वापरद्विधात्मकः ॥१९८॥

मध्ये प्राक् पुष्करार्धस्य मेरुर्मन्दरसंज्ञकः।
व्यासोत्सेधपरिध्याद्यै र्धातकीखण्डमेरुवत् ॥१९९॥

तत्समः पुष्करार्धस्यापरस्य मध्यभूतले।
विद्युन्मालाह्वयो मेरुः स्यात्पूर्ववर्णनायुतः ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 193 से 200): श्री जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कालोदधि समुद्र की सूक्ष्म परिधि का प्रमाण ९१७०६०५ योजन कहा गया है। इस कालोदधि समुद्र के आगे कालोदधि समुद्र से दुगुने (१६ लाख योजन) विस्तार वाला पुष्करवर द्वीप है। इस पुष्करवर द्वीप के मध्य में आठ लाख योजन छोड़कर शाश्वत और स्वर्णमय मानुषोत्तर नाम का पर्वत अवस्थित है। इस पर्वत से पुष्करवर द्वीप के दो भाग कर दिये गये हैं, इसीलिए इस द्वीप का सार्थक नाम पुष्करार्ध कहा जाता है। पुष्करार्ध द्वीप आठ लाख योजन विस्तृत और पुष्कर (एरण्ड) के वृक्ष को धारण करने वाला है। इस पुष्करार्ध द्वीप की उत्तर और दक्षिण दिशा में दिव्य चैत्यालयों से अलंकृत दो इष्वाकार पर्वत हैं, जिनका आयाम द्वीप के व्यास अर्थात् आठ-आठ लाख योजन प्रमाण है। ये दोनों इष्वाकार पर्वत पूर्वोक्त उत्सेध और व्यास से युक्त अर्थात् ४०० योजन ऊँचे और १००० योजन चौड़े चार चार कूटों से सुशोभित हैं। इन्हीं दोनों पर्वतों के कारण पुष्करार्ध द्वीप, पूर्व पुष्करार्ध और पश्चिम पुष्करार्ध के भेद से दो प्रकार का होता है। पूर्व पुष्करार्ध के मध्य में मन्दर नाम का मेरु पर्वत है, इसके व्यास, उत्सेध और परिधि आदि का प्रमाण धातकीखण्डस्थ मेरु पर्वत सदृश है। पश्चिम पुष्करार्ध के मध्य भूतल पर मन्दर मेरु के सदृश विद्युन्माला नाम का मेरु पर्वत है, जिसका सम्पूर्ण वर्णन धातकीखण्डस्थ मेरु पर्वत सदृश है ॥१९३-२००॥


एतस्य मध्यसूचीस्यात् पुष्करार्धस्य मध्यगा।
सप्तभिः संयुता त्रिंशल्लक्षयोजनसम्मिता ॥२०१॥

एकाकोटी च लक्षाणि सप्ताधिकदशस्फुटम्।
चतुःशतानि सप्ताग्रविंशतिश्चेति योजनैः ॥२०२॥

तस्या मध्यम सूच्या हि परिधिर्वर्णितागमे।
सूक्ष्मा सूक्ष्माखिलात्मादितत्त्वविद्भिर्न चेतरा ॥२०३॥

प्रोदिता पुष्करार्धस्य बाह्यसूची जिनादिभिः।
पञ्चसंयुक्तं चत्वारिंशल्लक्षयोजनप्रमा ॥२०४॥

एकाकोटीद्विचत्वारिंशल्लक्षास्त्रिंशदेव हि।
सहस्त्र द्वे शते चैकोनपञ्चाशदिति स्फुटम् ॥२०५॥

योजनैर्बाह्यसूच्या हि परिधिः श्रीजिनैर्मता।
क्रोशद्वयाधिका मानुषोत्तराभ्यन्तरावनौ ॥२०६॥

त्रिलक्षाः पंचपंचाशत्सहस्त्राणि शतानि षट्।
तथा चतुरशीतिश्चतुःकलायोजनस्य च ॥२०७॥

एकोनविंशभागानामिति योजनसंख्यया।
पुष्करार्धस्य संरुद्धक्षेत्रं चतुर्दशाचलैः ॥२०८॥

अर्थ (श्लोक 201 से 208): इस पुष्करार्ध द्वीप के मध्य में मध्यम सूची व्यास ३७००००० लाख योजन प्रमाण है। समस्त सूक्ष्म आत्मतत्त्व आदि को जानने वाले गणधरादि देवों के द्वारा जिनागम में इस मध्यम सूची व्यास की सूक्ष्म परिधि ११७००४२७ योजन कही गई है। यह प्रमाण सूक्ष्म का है, स्थूल परिधि का नहीं। जिनेन्द्रों के द्वारा पुष्करार्ध का बाह्य सूची व्यास ४५००००० योजन कहा गया है। मानुषोत्तर पर्वत की अभ्यन्तर भूमि पर्यन्त पुष्करार्ध के बाह्य सूची व्यास की सूक्ष्म परिधि जिनेन्द्रों के द्वारा १४२३०२४९ योजन और २ कोस प्रमाण कही गई है। पुष्करार्ध द्वीप के बारह कुलाचल और दो इष्वाकार पर्वतों से अवरुद्ध क्षेत्र ३५५६८४ योजन और एक योजन के १९ भागों में से ४ भाग (४/१९) प्रमाण कहा गया है ॥२०१-२०८॥

दशम अधिकार मध्यलोक वर्णन (भाग 2/2)

द्विषट्कुलाद्रयो जम्बूद्वीपस्थाद्र्युन्नतिप्रमाः।
अष्टलक्षायता योजनानामत्र प्रकीर्तिताः ॥२०९॥

अस्त्ययं हिमवान् धातकीखण्डस्थहिमाचलात्।
द्विगुणव्यास एतस्माच्चतुर्गुणोपरो गिरिः ॥२१०॥

ततश्चतुर्गुणो व्यासो निषधोऽन्ये त्रयोऽद्रयः।
नीलाद्याः पर्वतैरेभिः क्रमहान्या समानकाः ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 209 से 211): पुष्करार्ध द्वीप में जम्बूद्वीपस्थ कुलाचलों की ऊँचाई प्रमाण उत्सेध को लिये हुए आठ- आठ लाख योजन लम्बे बारह कुलाचल पर्वत कहे गये हैं। यहाँ का हिमवान् पर्वत धातकीखण्डस्थ हिमवान् पर्वत के व्यास से दुगुने व्यास वाला है, इसके आगे-आगे निषध पर्वत पर्यन्त का व्यास हिमवन् पर्वत से चौगुना चौगुना होता गया है। इसके बाद नील आदि तीन पर्वतों का व्यास समान क्रम हानि को लिए हुए है। नील-निषध, रुक्मी-महाहिमवन् और शिखरी-हिमवान् पर्वतों का व्यास समान प्रमाण को लिए हुए है ॥२०९-२११॥


कुलाद्रयोऽत्र चक्रस्य भवन्त्यरैः समायताः।
अराणां मध्यरन्ध्रैः समक्षेत्राणि चतुर्दश ॥२१२॥

आदिमध्यान्तविस्तारैः क्रमवृद्धियुतानि च।
दीर्घाणि भरतादीनि किलाष्टलक्षयोजनैः ॥२१३॥

सहस्राण्येकचत्वारिंशत्पञ्चैव शतानि च।
एकोनाशीति युक्तानिभागाः शतद्विसप्ततिः ॥२१४॥

इत्युक्तोऽभ्यन्तरे व्यासो भरतस्यैव योजनैः।
त्रिपञ्चाशत्सहस्राणि तथा पञ्चशतानि च ॥२१५॥

द्विषड्नवनवत्यग्रशतभागा इति श्रुते।
विष्कम्भो भरतस्योक्तो मध्ये योजनसंख्यया ॥२१६॥

पञ्चषष्टिसहस्राणि चत्वारि च शतान्यपि।
षट्चत्वारिंशदेवाथ तथा भागास्त्रयोदश ॥२१७॥

इत्याम्नातोऽत्र विस्तारो बाह्ये स भरतस्य च।
अस्माद् भरततस्त्रीणि क्षेत्राणि विस्तृतानि च ॥२१८॥

चतुश्चतुर्गुणैर्व्यासैस्ततस्त्रीण्यपराणि च।
एभिस्त्रिभिः समानानि हीनव्यासानि पूर्ववत् ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 212 से 219): जिस प्रकार गाड़ी के पहिये में आरा होते हैं, उसी प्रकार पुष्करार्ध द्वीप में कुलाचल आदि पर्वत समान लम्बाई को लिए हुए लम्बे फैले हैं तथा जिस प्रकार चक्रस्थित आरों के मध्य में छिद्र होते हैं, उसी प्रकार आरों सदृश पर्वतों के मध्य में जो छिद्र (स्थान) हैं, उसमें भरतादि चौदह क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों का विस्तार आदि, मध्य और अन्त में अनुक्रम से वृद्धि को लिए हुए है तथा इनकी लम्बाई द्वीप के सदृश आठ लाख योजन प्रमाण है। जिनागम में भरत क्षेत्र का अभ्यंतर व्यास ४१५७९ १७२/२१२ योजन, मध्यम व्यास ५३५१२ १९९/२१२ है योजन और बाह्य व्यास ६५४४६ १३/२१२ योजन प्रमाण कहा गया है। इस भरत क्षेत्र से आगे के तीन क्षेत्रों का विस्तार (भरत क्षेत्र से प्रारम्भ कर) क्रमशः चौगुना-चौगुना है और उसके आगे के तीन क्षेत्रों का विस्तार क्रमशः समान हानि को लिए हुए है ॥२१२-२१९॥


चतुःसहस्रदीर्घो द्विसहस्रविस्तृतो द्रहः।
पद्मः पद्मान्महापद्मो द्विगुणो योजनैः स्मृतः ॥२२०॥

महापद्मात्तिगिञ्छोऽपि द्विगुणायामविस्तृतः।
तुल्या एभिस्त्रिभिः शेषाः क्रमह्रस्वाः त्रयो ह्रदाः ॥२२१॥

गङ्गसिन्ध्वोश्च विष्कम्भः पञ्चविंशतिसंख्यतः।
आदावन्तेऽत्र सार्धद्विशतयोजनसंख्यया ॥२२२॥

आभ्यां द्वे द्वे महानद्यौ विदेहान्तं प्रवर्धिते।
द्विगुणद्विगुणव्यासैर्ह्रीयमानास्तथापराः ॥२२३॥

षड्भिश्च सरिदाद्याभिः षड्नद्यः समविस्तराः।
द्विगुणद्विगुणैर्ह्रस्वा ऐरावतान्तमञ्जसा ॥२२४॥

गङ्गासिन्ध्वोश्च कुण्डे द्वे सार्धद्विशतविस्तृते।
ततो द्वित्रिमहानद्योर्विदेहान्तं सुविस्तृते ॥२२५॥

द्विगुणाद्विगुणव्यासैर्द्वे द्वे कुण्डे च योजनैः।
तथान्ये द्विगुणह्रासे कुण्डे नद्योर्द्वयोर्द्वयोः ॥२२६॥

द्वौ लक्षौ योजनानां सहस्राः पंचदशप्रमाः ।
सप्तशतानि चाष्टा पञ्चाशदित्युक्तसंख्यया ॥२२७॥

आयामः पुष्करार्धे स्यात् प्रत्येकं भद्रशालयोः ।
रम्ययोश्चैत्यगेहाद्यैः पूर्वापरसमाह्वयोः ॥२२८॥

लक्षाणि विंशतिश्च द्विचत्वारिंशत्सहस्रकाः ।
द्वे शते योजनानां चैकोन विंशतिरित्यपि ॥२२९॥

द्वयोः प्रत्येकमायामो ज्येष्ठयोर्गजदन्तयोः ।
लक्षाणि षोडशैवाथ षड्विंशतिसहस्रकाः ॥२३०॥

शतैकषोडशैवेति प्रोक्तयोजनसंख्यया ।
लघीयसोः समायामः प्रत्येकं गजदन्तयोः ॥२३१॥

अर्थ (श्लोक 220 से 231): पुष्करार्धस्थ पद्म सरोवर ४००० योजन लम्बा और २००० योजन चौड़ा है। पद्म सरोवर से महापद्म की लम्बाई चौड़ाई दुगुनी अर्थात् लम्बाई आठ हजार योजन और चौड़ाई ४००० योजन है, इससे तिगिञ्छ सरोवर की लम्बाई चौड़ाई दुगुनी है, इसके आगे के केशरी आदि तीनों सरोवर अनुक्रम से ह्रस्व होते हुए दक्षिणगत सरोवरों की लम्बाई चौड़ाई के समान ही लम्बे एवं चौड़े हैं। गंगा सिन्धु नदियों का आदि विष्कम्भ २५ योजन और अन्तिम विष्कम्भ २५० योजन प्रमाण है। इसके आगे विदेह तक वृद्धिंगत होता हुआ दो-दो महानदियों का यह विष्कम्भ दूना-दूना है, इसके आगे ऐरावत क्षेत्र स्थित नदियों तक का विष्कम्भ क्रमशः दुगुना-दुगुना हीन है। नारी-नरकान्ता, सुवर्णकूला-रूप्यकूला और रक्ता-रक्तोदा का व्यास दक्षिणगत छह नदियों के समान है। गंगा-सिन्धु सम्बन्धी दो कुण्डों का व्यास २५० योजन प्रमाण है। विदेह पर्यन्त दो-दो महानदियों सम्बन्धी दो-दो कुण्डों का यह व्यास दुगुने-दुगुने प्रमाण वाला प्राप्त होता है और इसके आगे के दो-दो नदियों सम्बन्धी दो-दो कुण्डों का व्यास क्रमशः दुगुना-दुगुना हीन है। पुष्करार्धस्थ चैत्यगृहों आदि से अलंकृत पूर्व भद्रशाल एवं पश्चिम भद्रशाल वनों का भिन्न-भिन्न आयाम २१५७५८ योजन प्रमाण है। बृहद् गजदन्तों में प्रत्येक का भिन्न-भिन्न व्यास २०४२२१९ योजन प्रमाण और लघु गजदन्तों में प्रत्येक का भिन्न-भिन्न व्यास १६२६११६ योजन प्रमाण कहा गया है ॥२२०-२३१॥


लक्षाः सप्तदशैवाथ सहस्राः सप्तसम्मिताः ।
शतानि सप्तसंख्यानि योजनानि चतुर्दश ॥२३२॥

इति प्रोक्तः पृथग्वाणो देवोत्तरकुरुद्वयोः ।
उत्कृष्टभोगभूम्योश्च प्रत्येकं श्रीगणाधिपैः ॥२३३॥

एकोनत्रिंशत्सहस्रास्तथासप्तशतानि च।
चतुर्नवतिरेवैकं गव्यूतमिति योजनैः ॥२३४॥

प्रोक्तः पृथक् पृथक् व्यासो देशानां द्विविदेहके।
वक्षाराणां च विष्कम्भो द्विसहस्त्राङ्कयोजनैः ॥२३५॥

शतानि पंचविस्तारो विभङ्गासरितां पृथक्।
सर्वासां योजनानां च पूर्वपश्चिमभागयोः ॥२३६॥

एकादशसहस्राणि योजनानां शतानि षट्।
अष्टाशीतिरिति व्यासो देवभूतद्वयरण्ययोः ॥२३७॥

अर्थ (श्लोक 232 से 237): जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा उत्तरकुरु देवकुरु नामक उत्तम भोगभूमियों का भिन्न-भिन्न वाण १७०७७१४ योजन प्रमाण कहा गया है। पूर्व विदेह एवं अपर विदेह का भिन्न-भिन्न व्यास २९७९४ योजन १ कोस, वक्षार पर्वतों का व्यास २००० योजन और पूर्व-पश्चिम दोनों पुष्करार्धों में स्थित समस्त विभंगा नदियों का पृथक् पृथक् व्यास ५०० योजन प्रमाण दर्शाया गया है। देवारण्य एवं भूतारण्य इन दोनों वनों का पृथक्-पृथक् व्यास ११६८८ योजन प्रमाण है ॥२३२-२३७॥


वक्षाराणां च देशानां देवाद्यरण्ययोर्द्वयोः।
आयामः स विदेहस्य योऽर्धायामोऽप्यनेकधा ॥२३८॥

नदीव्यासोनितो वृद्धिह्रासयुक्तो मतः श्रुते।
विभङ्गानां तथायामः कुण्डव्यासोनितो भवेत् ॥२३९॥

अर्थ (श्लोक 238 से 239): विदेह के आयाम में से सीता वा सीतोदा नदी का व्यास घटाकर शेष का आधा करने पर वक्षार पर्वतों का, देशों का और दोनों देवारण्य वनों का आयाम प्राप्त हो जाता है। यह आयाम वृद्धि और ह्रास के कारण अनेक प्रकार हो जाता है ऐसा श्रुत में कहा गया है। इस आयाम में से कुण्ड का व्यास (५०० यो.) कम कर देने पर विभंगा नदी का आयाम हो जाता है ॥२३८-२३९॥


योजनद्विशतव्यासाः सर्वे रूप्याचला मताः।
देशव्याससमायामाः पूर्वोन्नतिसमोन्नताः ॥२४०॥

गङ्गासिन्धुनदीभ्यां च द्वाभ्यां रूप्याद्रिणाखिलाः।
षट्खण्डीभागमापन्ना विदेहे विषयाः स्मृताः ॥२४१॥

अर्थ (श्लोक 240 से 241): पुष्करार्धस्थ समस्त विजयार्ध पर्वतों का आयाम (लम्बाई) अपने-अपने देश की चौड़ाई के प्रमाण है। अर्थात् जितने योजन देश की चौड़ाई है, उतने ही योजन विजयार्ध की लम्बाई है। रूपाचलों का व्यास २०० योजन और ऊँचाई पूर्वकथित (२५ योजन) प्रमाण है। विदेहस्थ समस्त देशों के गंगा-सिन्धु इन दो-दो नदियों और एक-एक रूपाचल (विजयार्ध) पर्वतों से छह-छह खण्ड हुए हैं ॥२४०-२४१॥


विभङ्गोत्पत्ति कुण्डानि सर्वाणि विस्तृतानि च।
द्वारतोरणयुक्तानि स्युः पञ्चशतयोजनैः ॥२४२॥

गंगादिक्षुल्लककाभ्यः प्राग् नदीभ्यः सरितोऽत्र च।
गङ्गाद्या द्विगुणव्यासाः पूर्वावगाहसम्मिताः ॥२४३॥

गंगाद्युत्पत्ति कुण्डानि सार्धद्विशतयोजनैः।
विस्तृतानि च पूर्वोक्तागाहवेदियुतान्यपि ॥२४४॥

अर्थ (श्लोक 242 से 244): विभंगा नदियों की जिनसे उत्पत्ति होती है ऐसे तोरण द्वार आदि से अलंकृत समस्त कुण्डों का विस्तार ५०० योजन प्रमाण है। धातकीखण्डस्थ विदेह में गंगा आदि छोटी नदियों का जो व्यास कहा है उससे पुष्करार्धस्थ विदेह को गंगादि क्षुल्लक नदियों का व्यास दूना और अवगाह जम्बूद्वीपस्थ विदेह की गंगादि नदियों के अवगाह प्रमाण है। गंगादि क्षुल्लक नदियों की जिनसे उत्पत्ति होती है ऐसे वेदी एवं तोरण आदि से युक्त समस्त कुण्डों का व्यास २५० योजन और अवगाह पूर्वोक्त प्रमाण है ॥२४२-२४४॥


देशानां प्रत्येकमायामवृद्धिः नवसहस्रचतुःशताष्टचत्वारिंशद्योजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां
षट्पञ्चाशद्भागाः। वक्षाराणां पृथगायाम वृद्धिः नवशतचतुः पञ्चाशद्योजनानि विंशत्यग्रशतभागाः।
विभङ्गानां प्रत्येकमायामवृद्धिः द्विशतैकोनचत्वारिंशद्योजनानि, द्विशतद्वादशभागानां भागास्त्रयोदशदेवारण्य-
भूतारण्ययोः पृथगायामवृद्धिः पञ्चसहस्रपञ्चशताष्टासप्ततियोजनानि, योजनस्य द्विशतद्वादशभागानां
चतुरशीत्यग्रशत भागाश्च।

अर्थ: कच्छादि भिन्न-भिन्न देशों की लम्बाई में वृद्धि का प्रमाण ९४४८ ५६/२१२ योजन, वक्षार पर्वतों की पृथक्-पृथक् लम्बाई में वृद्धि का प्रमाण ९५४ १२०/२१२ योजन, प्रत्येक विभंगा नदियों की लम्बाई में वृद्धि का प्रमाण २३९ १३/२१२ योजन और प्रत्येक देवारण्य और भूतारण्य की लम्बाई में वृद्धि का प्रमाण ५५७८ १८४/२१२ योजन प्रमाण है। अर्थात् कच्छादि देशों, वक्षार पर्वतों, विभंगा नदियों और देवारण्य भूतारण्य वनों की अपनी-अपनी आदिम लम्बाई में उपयुक्त अपनी-अपनी वृद्धि का प्रमाण मिला देने पर उनकी मध्यम लम्बाई का प्रमाण और मध्यम लम्बाई में भी उसी स्व, स्व वृद्धि का प्रमाण मिला देने से उनकी अपनी-अपनी अन्तिम लम्बाई का प्रमाण होता है।


मेरोर्व्यासः चतुर्नवतिशतयोजनानि। द्वयोः पूर्वापर भद्रशालवनयोः पिण्डीकृतो विस्तारः
चतुर्लक्षैकत्रिंशत्सहस्रपञ्चशतषोडशयोजनानि। षोडशविषयाणामेकत्रीकृतो विष्कम्भः त्रिलक्षषोडश-
सहस्रसप्तशताष्ट्योजनानि। अष्टवक्षाराणां पिण्डितो व्यासः षोडशसहस्रयोजनानि। षड्‌विभङ्गानदीनां
मेलिता विस्तृतित् त्रिसहस्रयोजनानि। द्वयोर्देवारण्यभूतारण्ययोरेकत्रीकृतो व्यासः त्रयोविंशतिसहस्रत्रिशत-
षट्सप्ततियोजनानि। इत्येवं पिण्डीकृतः सकलविदेहस्य विष्कम्भ अष्टलक्षयोजनप्रमो मन्तव्यः॥

अर्थ: मेरु पर्वत का व्यास ९४०० योजन, पूर्व-पश्चिम भद्रशाल वनों का एकत्रित व्यास ४३१५१६ योजन, कच्छादि १६ देशों का एकत्रित व्यास ३१६७०८ योजन, आठों वक्षार पर्वतों का एकत्रित व्यास १६००० योजन, छह विभंगा नदियों का एकत्रित व्यास ३००० योजन और देवारण्य-भूतारण्य का एकत्रित व्यास २३३७६ योजन प्रमाण है। इस प्रकार इन सब व्यासों का एकत्रित प्रमाण- (९४०० + ४३१५१६ + ३१६७०८ + १६००० + ३००० + २३३७६) = ८००००० अर्थात् आठ लाख योजन (सम्पूर्ण विदेह क्षेत्र का प्रमाण) जानना चाहिए।


जम्बूवृक्षसमोत्सेधव्यासचैत्यालयाङ्कितौ ।
प्रागुक्त परिवारौ स्तोऽत्रापि द्वौ पुष्करद्रमौ ॥२४५॥

समस्ता नाभिशैलाश्च यमका वृषभाद्रयः।
ह्रदा भोगधराः सर्वा दिग्गजाः कनकाद्रयः ॥२४६॥

वेदीकुण्डादयोऽन्ये च द्वीपेऽस्मिन् पुष्करार्धके।
विज्ञेया धातकीखण्डद्वीपस्य गणनासमाः ॥२४७॥

यावन्तो धातकीखण्डे शैला मेर्वादयोऽखिलाः।
तावन्तः पुष्करार्धे स्युर्वनवेद्याद्यलङ्कृताः ॥२४८॥

गङ्गादिप्रमुखाः सर्वा नद्योऽत्रापि भवन्ति च।
धातकीखण्डसंख्याढ्या वनवेद्यादिशोभिताः ॥२४९॥

स्वामिनौ पुष्करार्धस्य तस्य श्रीजिनभक्तिकौ।
स्तः पद्मपुण्डरीकाख्यौ दक्षिणोत्तरवासिनौ ॥२५०॥

अर्थ (श्लोक 245 से 250): जम्बूद्वीपस्थ जम्बूवृक्ष के उत्सेध और आयाम सदृश उत्सेध (१० योजन) एवं व्यास (मध्यभाग की चौड़ाई ६ योजन और अग्रभाग की ४ योजन) से युक्त, चैत्यालय आदि से अलंकृत तथा पूर्वोक्त परिवार (१४०१२०) वृक्षों से वेष्टित पूर्व-पश्चिम दोनों पुष्करार्धों में दो एरण्ड के वृक्ष स्थित हैं। पुष्करार्धद्वीपस्थ समस्त नाभिगिरि, यमकगिरि, वृषभाचल, सरोवर, सर्व भोगभूमियाँ, दिग्गज पर्वत, काञ्चन पर्वत, वेदियाँ एवं कुण्ड आदि और भी अन्य सभी की प्रमाण संख्या धातकीखण्ड द्वीपस्थ नाभिगिरि आदि की प्रमाण संख्या के समान ही जानना चाहिए। धातकीखण्ड में मेरु आदि जितने पर्वत हैं, वनवेदियों आदि से अलंकृत उतने ही पर्वत पुष्करार्ध द्वीप में हैं। गंगादि प्रमुख नदियों सहित धातकीखण्ड में जितनी नदियाँ हैं, वनवेद्यादि से सुशोभित उतनी ही नदियाँ पुष्करार्ध द्वीप में हैं। श्री जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति से युक्त, दक्षिण और उत्तर दिशा में निवास करने वाले पद्म और पुण्डरीक नाम के दो व्यन्तरदेव पुष्करार्धद्वीप के अधिपति हैं ॥२४५-२५०॥


एकोनषष्टिसंयुक्तसार्धसहस्रसम्मिताः ।
सार्धद्वीपद्वये सर्वे मेर्वादप्रमुखाद्रयः ॥२५१॥

अर्थ: ढ़ाई द्वीप के मेरु आदि प्रमुख पर्वतों का कुल योग १५५९ है। अर्थात् ढ़ाई द्वीप में कुल पर्वत १५५९ हैं ॥२५१॥


एकोननवतिर्लक्षाः सहस्राः षष्टिसंख्यकाः।
चतुःशतानि पञ्चाशदित्यङ्कसंख्ययाखिलाः ॥२५२॥

गङ्गादिप्रमुखा नद्यो मूलोत्तरसमाह्वयाः।
पिण्डीकृता भवन्त्यत्र नृक्षेत्रे च क्षयोज्झिताः ॥२५३॥

त्रिंशद्भोगधराः कर्मपृथ्व्यः पञ्चदशप्रमाः।
शतसंख्या द्रहाःसीतासीतोदामध्यसंस्थिताः ॥२५४॥

कुलाद्रिमूर्धभागस्थास्त्रिंशद्द्रहाश्चपिण्डिताः ।
गङ्गादिपातभूभागस्थानि कुण्डानि सप्ततिः ॥२५५॥

विभङ्गोत्पत्तिकुण्डानि सर्वाणि षष्टिरेव च।
गङ्गादिसरितां लघ्वीनां सन्ति जनकानि च ॥२५६॥

शतानि त्रीणि विंशत्यग्राणि कुण्डानि चाञ्जसा।
सप्तत्यग्रशतं देशानगर्योद्देशसम्मिताः ॥२५७॥

कुरुवृक्षादशेत्येवं संख्यागणनयाखिलाः।
सार्धद्वीपद्वये ज्ञेया अन्ये वा वेदिकादयः ॥२५८॥

अर्थ (श्लोक 251 से 258): सम्बन्धी ३११ पर्वत हैं, तब पंचमेरु सम्बन्धी प्रमुख पर्वतों की संख्या (३११×५)=१५५५ प्राप्त होती है किन्तु उपर्युक्त श्लोक में १५५९ कही गई है, क्योंकि इसमें ४ इष्वाकार पर्वत और लिये गये हैं। मनुष्य लोक (ढाई द्वीप) में अनाद्यनन्त गंगादि ९० मूल नदियों और उनकी परिवार नदियों का कुल योग ८९६०४५० है। अर्थात् जम्बूद्वीपस्थ भरतैरावत की गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदा इन चार की परिवार नदियाँ (१४०००×४)= ५६०००, हैमवत-हैरण्यवत क्षेत्र की रोहित, रोहितास्या, सुवर्णकूला और रूप्यकूला की परिवार नदियाँ (२८०००×४)=११२०००, हरि-रम्यक क्षेत्र स्थित हरित् हरिकान्ता, नारी और नरकान्ता को परिवार नदियाँ (५६०००×४)=२२४०००, देवकुरु-उत्तरकुरु गत सीता, सीतोदा की परिवार नदियाँ (८४०००×२)=१६८०००, बारह विभंगा नदियों की परिवार नदियाँ (२८०००×१२) = ३३६००० और बत्तीस विदेहस्थ गंगा, सिन्धु, रक्ता और रक्तोदा इन ६४ की परिवार नदियाँ (१४००० × ६४)=८९६००० हैं। इन सम्पूर्ण मूल एवं परिवार नदियों की कुल योग (४+४+४+२+१२+६४+ ५६०००+११२०००+२२४०००+१६८०००+३३६०००+८९६०००=१७९२०९० है। जबकि एक मेरु सम्बन्धी सम्पूर्ण प्रमुख नदियाँ १७९२०९० हैं, तब पंचमेरु सम्बन्धी (१७९२०९०×५)=८९६०४५० नदियों का प्रमाण प्राप्त होता है। अढ़ाई द्वीप में तीस भोगभूमियाँ, पंच भरत, पंच ऐरावत और पंच विदेह इस प्रकार १५ कर्मभूमियाँ तथा सीता-सीतोदा के मध्य स्थित १०० द्रह हैं। पंच मेरु सम्बन्धी ३० कुलाचलों के ऊपर पद्म आदि ३० सरोवर हैं, इस प्रकार ढाई द्वीप में कुल (१००+३०)=१३० सरोवर हैं। गंगादि (१४×५)=७० महानदियों का भूमि पर जहाँ पतन होता है, वहाँ कुण्ड हैं, अतः ७० कुण्ड ये, (१२×५)=६० विभंगा नदियों की उत्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाले कुण्ड ६० और गंगादि क्षुल्लक (६४ ×५)=३२० नदियों की उत्पत्ति के ३२० कुण्ड हैं। इस प्रकार ढाई द्वीप में कुल कुण्डों की संख्या (७०+६०+३२०)=४५० है। एक मेरु सम्बन्धी ३२ विदेह+१ भरत+१ ऐरावत क्षेत्र=३४ देश हैं, इसलिये पंच मेरु सम्बन्धी (३४×५)=१७० देश हैं और १७० ही नगरियाँ हैं। पंच मेरु सम्बन्धी दस कुरु क्षेत्रों में जम्बू आदि १० ही अनादि निधन वृक्ष हैं। इसी प्रकार वेदिकाएँ आदि भी जानना चाहिए। जैसे- जम्बूद्वीप में एक मेरु सम्बन्धी (३११ पर्वतों की ३११ वेदियाँ + ९० कुण्डों की ९० वेदियाँ - + २६ सरोवरों की २६ वेदियाँ + और १७९२०९० नदियों के दोनों तटों की ३५८४१८० वेदियाँ) = ३५८४६०७ वेदियाँ हैं, इसलिये पंच मेरु सम्बन्धी समस्त वेदियों का कुल योग (३५८४६०७×५) =१७९२३०३५ प्राप्त होता है। इस प्रकार यह अढ़ाई द्वीप के कुछ पर्वतों आदि का एकत्रित योग कहा गया है, अन्य का भी इसी प्रकार जानना चाहिए ॥२५१-२५८॥


षष्ट्यग्रशतदेशस्थार्यखण्डेषु जिनोदिता: ।
श्रावकैर्यतिभिर्द्वेधा धर्मोऽक्षय: प्रवर्तते ॥२५९॥

हानिवृद्ध्यादिदूरस्थो ह्यहिंसालक्षणो महान्।
स्वर्मुक्तिजनको नान्योऽङ्घिघ्नो वेदादिजल्पितः ॥२६०॥

अर्हन्तश्च गणाधीशाः सूरिपाठकसाधवः।
नृदेवसङ्घवन्द्यार्च्यः स्थविराश्च प्रवर्तकाः ॥२६१॥

धर्मोपदेशदातारो विहरन्ति निरन्तरम्।
धर्मप्रवृत्तये केवलिनो न च कुलिङ्गिनः ॥२६२॥

पुरग्रामादिसर्वेषु सर्वत्र च वनादिषु।
दीप्ता जिनालयास्तुङ्गा दृश्यन्ते जिनमूर्तयः ॥२६३॥

हेमरत्नमयाभव्यैः पूजिता वन्दिताः स्तुताः।
न जातु नीचदेवानां गृहा वा मूर्तयोऽशुभाः ॥२६४॥

शाश्वतो मुक्तिमार्गोऽत्र वर्तते योगिनां सदा।
स्वर्गो गृहाङ्गणोऽत्रस्थपुण्यभाजां सुखावहः ॥२६५॥

प्रजा वर्णत्रयोपेता जिनधर्मरताः शुभाः।
व्रतशीलतपोदृष्टिभूषिता न द्विजाः क्वचित् ॥२६६॥

मिथ्यात्वपञ्चकं नात्र स्वप्नेऽपि जातु दृश्यते।
द्रव्यभूतं न तद्युक्तो न वान्यच्च मतान्तरम् ॥२६७॥

किन्त्वेको जिनधर्मोऽत्र विलोक्यते गृहे गृहे।
पुण्यभाजां तपोदानव्रतपूजोत्सवादिभिः ॥२६८॥

इति प्रवरदेशेषु लभन्ते जन्मसत्कुले।
प्रागर्ज्जितशुभा भव्याः सद्गत्याप्त्यै न चेतराः ॥२६९॥

अर्थ (श्लोक 259 से 269): अढ़ाई द्वीपस्थ विदेहों के एक सौ साठ आर्यखण्ड हैं, उन आर्यखण्डों के एक सौ साठ (१६०) देशों में जिनेन्द्र भगवान् द्वारा कथित श्रावक धर्म और मुनि धर्म के भेद से दो प्रकार के धर्म का एक सदृश प्रवर्तन निरन्तर होता रहता है। अहिंसा लक्षण से लक्षित और स्वर्ग-मुक्ति को देने वाला यह महान् धर्म हानि-वृद्धि से रहित है। वहाँ पर जिसमें जीवों का घात होता है, ऐसा वेद आदि के द्वारा कहा हुआ हिंसामय धर्म नहीं है। वहाँ पर धर्म प्रवर्तन के लिये मनुष्यों, देवों और संघों से वन्दनीय एवं पूजनीय केवली भगवन्त, अरहन्त प्रभु, गणधरदेव, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय देव, साधु परमेष्ठी, स्थविर (वृद्धाचार्य अर्थात् तपोभार से युक्त) मुनिराज, प्रवर्तक मुनिराज और धर्मोपदेश रूपी अमृत का पान कराने वाले धर्मोपदेश दाता मुनिराज निरन्तर विहार करते हैं। वहाँ कुलिंगी साधु नहीं हैं। वहाँ पर नगरों में, ग्रामों में, वनों में तथा और भी अन्य सभी स्थानों में अत्यन्त देदीप्यमान और उत्तुंग जिनालय ही दिखाई देते हैं, जिनमें स्थित स्वर्ण और रत्नमय जिनप्रतिमाएँ भव्य जीवों के द्वारा निरन्तर पूजित, वन्दित एवं स्तुत होती हैं। अर्थात् भव्यजीव उन प्रतिमाओं की निरन्तर पूजा करते हैं, दर्शन करके वन्दना करते हैं और अनेक प्रकार की स्तुति करते हैं। वहाँ पर कभी भी नीच देवों के मन्दिर और अशुभ प्रतिमाएँ दिखाई नहीं देतीं। यहाँ पर योगियों का अनाद्यनिधन निर्ग्रन्थ मोक्षमार्ग निरन्तर प्रवर्तित रहता है। यहाँ स्थित पुण्यशाली जीवों को सुख देने वाला यह क्षेत्र स्वर्ग के आँगन सदृश है। तीन वर्णों से युक्त एवं व्रत, शील, तप और सम्यग्दर्शन से विभूषित यहाँ की प्रजा हमेशा अत्यन्त शुभ जिनधर्म में ही रत रहती है। यहाँ ब्राह्मण वर्ण कहीं भी नहीं हैं। यहाँ स्वप्न में भी कहीं पाँच प्रकार का मिथ्यात्व दिखाई नहीं देता। न यहाँ मिथ्यात्व का उपदेश देने वाले उपदेशक ही होते हैं और न कोई मतान्तर ही हैं किन्तु पुण्यवान् जीवों के तप, दान, व्रत, पूजा और अनेक धार्मिक उत्सवों के द्वारा प्रत्येक गृहों में मात्र एक जैनधर्म ही देखा जाता है। इस प्रकार के श्रेष्ठ देशों के उत्तम कुलों में स्वर्ग और मोक्ष रूप उत्तम गतियों की प्राप्ति के लिए पूर्वोपार्जित पुण्य से युक्त भव्यजीव ही जन्म लेते हैं, अन्य अर्थात् क्षीण पुण्य वाले नहीं ॥२५९-२६९॥


अथास्य पुष्करार्धस्य मध्यभागे विराजते।
शैलोऽर्हच्चैत्यगेहाद्यैः स श्रीमान्मानुषोत्तरः ॥२७०॥

चतुर्दशनदीनिर्गमनद्वारादिशालिनः ।
क्रमह्रस्वस्य चास्याद्रेरुदयो योजनैर्मतः ॥२७१॥

एकविंशतिसंयुक्तसप्ताग्रदशभिः शतैः।
भूतले विस्तरो द्वाविंशतियुक्तसहस्रकः ॥२७२॥

मध्ये व्यासस्त्रयोविंशत्यग्रसप्तशतप्रमः।
मूर्ध्निव्यासश्चतुर्विंशाग्रचतुःशतमानकः ॥२७३॥

अवगाहो गव्यूत्यग्रत्रिंशच्चतुःशतप्रमः।
क्रोशद्वयोन्नता दिव्यादीप्तास्ति मणिवेदिका ॥२७४॥

नैर्ऋत्यवायुदिग्भागौ मुक्त्वा षङ्दिग्विदिक्षु च।
स्युस्त्रीणि त्रीणि कूटानि श्रेण्याः पृथग्विधान्यपि ॥२७५॥

अग्नीशानदिशोः षट्सु कूटेषु दिव्यधामसु।
गरुडादिकुमाराश्च भूत्या वसन्ति निर्जराः ॥२७६॥

शेषद्वादशकूटेषु चतुर्दिक्षूच्चसद्मसु।
वसन्ति दिक्कुमार्योऽस्य सुपर्णकुलसम्भवाः ॥२७७॥

तथाष्टदशकूटानां तेषामभ्यन्तरेऽस्य च।
चत्वारि सन्ति कूटानि पूर्वादिदिक्कचतुष्टये ॥२७८॥

एषां चतुःसुकूटानां मूर्ध्नि सन्ति जिनालयाः।
स्वर्णरत्नमयास्तुङ्गाश्चत्वारः सुरपूजिताः ॥२७९॥

कूटानामुदयो योजनानां पञ्चशतप्रमः।
मूले पञ्चशतव्यासश्चाग्रे सार्धशतद्वयः ॥२८०॥

कैवल्याख्यसमुद्घाताच्चोपपादाद्विनाङ्गिनाम् ।
अद्रिमुल्लङ्घ्यशक्ता नेमं गन्तुं तत्परां भुवम् ॥२८१॥

विद्येशाश्चारणा वान्ये प्राप्ताऽनेकर्द्धयः क्वचित्।
ततोऽयं पर्वतो मर्त्यलोकसीमाकरो भवेत् ॥२८२॥

अर्थ (श्लोक 270 से 282): इस पुष्करार्ध द्वीप के मध्यभाग में अरहन्त भगवान् के चैत्यालयों आदि से अलंकृत, श्रीमान् अर्थात् श्रेष्ठ मानुषोत्तर पर्वत शोभायमान होता है। चौदह महानदियों के निर्गमन चौदह द्वारों से सुशोभित और क्रमशः ह्रस्व होते हुए इस मानुषोत्तर पर्वत की ऊँचाई जिनेन्द्र भगवान् ने १७२१ योजन दर्शायी है। भूतल अर्थात् मूल में इस पर्वत की चौड़ाई १०२२ योजन, मध्य में चौड़ाई ७२३ योजन और ऊपर की चौड़ाई ४२४ योजन प्रमाण है। मानुषोत्तर का अवगाह अर्थात् नींव का प्रमाण ४३० योजन और एक कोश है। इस पर्वत के शिखर पर दो कोस ऊँची (और ४००० धनुष चौड़ी) अत्यन्त देदीप्यमान और दिव्य मणिमय वेदी है। उस मानुषोत्तर पर्वत पर नैऋत्य और वायव्य इन दो दिशाओं को छोड़ कर अवशेष पूर्वादि छह दिशाओं में पंक्ति रूप से तीन-तीन कूट अवस्थित हैं। आग्नेय और ईशान दिशा सम्बन्धी छह कूटों के दिव्य प्रासादों में गरुड़ कुमार जाति के देव अपनी समस्त विभूति के साथ निवास करते हैं। दिशागत अवशेष बारह कूटों के प्रासादों की चारों दिशाओं में सुपर्ण कुलोत्पन्न दिक्कुमारी देवांगनाएँ निवास करती हैं। इन अठारह (१२+६) कूटों के अभ्यन्तर भाग में अर्थात् मनुष्य लोक की ओर पूर्वादि चारों दिशाओं में चार कूट हैं, जिनके शिखर पर देवताओं से पूज्य और उत्तुंग स्वर्ण एवं रत्नमय जिनालय हैं। इन समस्त कूटों की ऊँचाई ५०० योजन, मूल में व्यास ५०० योजन और शिखर पर व्यास का प्रमाण २५० योजन है। केवली समुद्घात, मारणान्तिक समुद्घात और उपपाद जन्म वाले देवों के सिवाय अन्य कोई भी प्राणी इस मानुषोत्तर पर्वत से युक्त पृथ्वी को उल्लंघन करके नहीं जा सकता। विद्याधर, चारणऋद्धिधारी तथा अनेक प्रकार की और भी अनेक ऋद्धियों से युक्त जीव भी इस पर्वत का उल्लंघन नहीं कर सकते, इसीलिये यह पर्वत मनुष्यलोक की सीमा का निर्धारण करने वाला है ॥२७०-२८२॥


यतो द्वीपद्वये सार्धे स्युस्तिर्यञ्चश्च मानवाः।
ततोऽपरेष्वसंख्येषु द्वीपेषु सन्ति केवलम् ॥२८३॥

तिर्यञ्चो भद्रका नान्ये ततः स कथ्यते श्रुते।
तिर्यग्लोकोऽप्यसंख्यातस्तिर्यग्भूतो नृदूरगः ॥२८४॥

अर्थ (श्लोक 283 से 284): मानुषोत्तर पर्वत ने मनुष्यों की सीमा का निर्धारण कर दिया है, इसीलिये अढ़ाई द्वीप में तो मनुष्य और तिर्यञ्च दोनों हैं किन्तु इसके आगे असंख्यात द्वीपों में केवल भद्रपरिणामी तिर्यञ्च ही हैं, अन्य कोई नहीं हैं, इसीलिये आगम में इसे तिर्यग्लोक कहा है। यह तिर्यग्लोक मनुष्यों से रहित है और असंख्यात तिर्यंचों से भरा हुआ है ॥२८३-२८४॥


पुष्करद्वीपमावेष्ट्य तं तिष्ठेत् पुष्करार्णवः।
श्रीप्रभश्रीधरौ देवौ जलधेरस्य रक्षकौ ॥२८५॥

ततोऽस्ति वारुणीद्वीपोऽस्येमौ स्तो रक्षकौ सुरौ।
वरुणो दक्षिणे भागे ह्युत्तरे वरुणप्रभः ॥२८६॥

ततः स्यात्तद्बहिर्भागे वारुणीवरसागरः।
मध्याख्यमध्यमाभिख्यौ भवतोऽस्य सुनायकौ ॥२८७॥

तस्मात् क्षीरवरद्वीपो भवेत् ख्यातोऽस्य रक्षकौ।
व्यन्तरौ पाण्डुराभिख्यपुष्पदन्तौ स्त ऊर्जितौ ॥२८८॥

ततः क्षीरसमुद्रोऽस्ति जिनेन्द्रस्नानकारणः।
अस्येमौ स्वामिनौ स्यातां विमलो विमलप्रभः ॥२८९॥

तस्माद् घृतवरद्वीपस्तस्यैतौ परिपालकौ।
दक्षिणोत्तर भागस्थौ सुप्रभाख्य महाप्रभौ ॥२९०॥

तिष्ठत्यतस्तमावेष्ट्याम्बुधिर्घृतवराह्वयः।
अस्याब्धेः स्तः पती चैतौ कनकः कनकप्रभः ॥२९१॥

तत इक्षुवरद्वीपो भवत्यस्याभिरक्षकौ।
भवतो व्यन्तरौ पूर्णपूर्णप्रभ समाह्वयौ ॥२९२॥

परितस्तं समावेष्ट्य तिष्ठतीक्षुवरार्णवः।
स्यातां गन्धमहागन्धाख्यौ देवौ तस्य सत्पती ॥२९३॥

अर्थ (श्लोक 285 से 293): पुष्करवरद्वीप को वेष्टित कर वलयाकार रूप से पुष्करवर समुद्र है, श्रीप्रभ और श्रीधर नाम के दो देव इस समुद्र की रक्षा करते हैं। इस समुद्र को वेष्टित कर वारुणीवर द्वीप है, जिसका रक्षक वरुण देव दक्षिण भाग में और वरुणप्रभ उत्तर भाग में निवास करते हैं। इस द्वीप के आगे वारुणीवर समुद्र है, जिसके अधिनायक मध्य और मध्यम नाम के दो देव हैं। इस समुद्र से आगे क्षीरवरद्वीप है, जिसके रक्षक पाण्डु और पुष्पदन्त नाम के दो देव हैं। इस द्वीप को वेष्टित करके क्षीरवर समुद्र है, जो बाल तीर्थंकर के स्नान का कारण है। इस समुद्र के अधिपति विमल और विमलप्रभ नाम के दो देव हैं। क्षीरसमुद्र को वेष्टित कर घृतवरद्वीप है, जिसके दक्षिण-उत्तर भाग में क्रम से सुप्रभ और महाप्रभ नाम के दो रक्षक देव निवास करते हैं। घृतवर द्वीप को वेष्टित कर घृतवर नाम का समुद्र है, जिसके स्वामी कनक और कनकप्रभ नाम के दो देव हैं। इसके आगे इक्षुवर नाम का द्वीप है, जिसके अधिनायक पूर्ण और पूर्णप्रभ नाम के दो देव हैं। इस द्वीप को समावेष्टित कर इक्षुवर नाम का समुद्र है, जिसके अधिपति गन्ध और महागन्ध नाम के दो देव हैं ॥२८५-२९३॥


त्रिषष्ट्यग्रशतकोटी लक्षाश्चतुरशीतिकाः।
इत्यङ्कयोजनव्यासो द्वीपो नन्दीश्वरो भवेत् ॥२९४॥

कोटयः सप्तविंशत्यधिकत्रिशतसम्मताः।
पञ्चषष्टिप्रमालक्षा इति योजनसंख्यया ॥२९५॥

आदिसूची भवेदस्य द्वीपस्य धर्मधारिणः।
द्विपञ्चाशन्महातुङ्गजिनालयादिशालिनः ॥२९६॥

योजनानां सहस्रैकं हि षड् त्रिंशच्च कोटयः।
द्विषड्लक्षाः सहस्रे द्वे तथा सप्तशतानि च ॥२९७॥

त्रिपंचाशदथ क्रोशौ द्वावित्यङ्कात्तयोजनैः।
तस्या आदिलघु सूच्या आदिमा परिधिर्मता ॥२९८॥

षट्शतानि तथा पञ्चपञ्चाशतकोटयः पुनः।
त्रयस्त्रिंशच्च लक्षाणि चेति योजनसंख्यया ॥२९९॥

अन्तिमा महती सूची प्रोदिता श्रीगणाधिपैः।
द्वीपस्यास्य जिनागारैःजगदानन्दकारिणः ॥३००॥

द्वासप्ततिसमायुक्तद्विसहस्राणि कोटयः।
त्रयस्त्रिंशत्तत्व लक्षाश्चतुः पञ्चाशतसहस्रकाः ॥३०१॥

नवत्यग्रशतं क्रोश एक इत्यङ्कयोजनैः।
अन्तिमा परिधिर्गुर्वी ह्यन्त्यसूच्या मतागमे ॥३०२॥

अर्थ (श्लोक 294 से 302): इक्षुवर समुद्र को वेष्टित किये हुए नन्दीश्वर नाम का आठवाँ द्वीप है, इसका व्यास १६३८४००००० योजन प्रमाण है। अर्थात् जम्बूद्वीप से प्रारम्भ कर आठवें नन्दीश्वर द्वीप पर्यन्त का वलयव्यास एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख प्रमाण है। धर्म को धारण करने वाले महा उत्तुंग ५२ जिनालयों से सुशोभित नन्दीश्वर द्वीप को आदिम सूची व्यास का प्रमाण ३२७६५००००० योजन है। इस आदिम सूची व्यास की परिधि १०३६१२०२७५३ योजन और दो (२) कोस मानी गई है। भव्य जिनालयों के द्वारा संसार को आनन्दित करने वाले इस नन्दीश्वर द्वीप की अन्तिम सूची व्यास का प्रमाण जिनेन्द्र भगवन्तों के द्वारा ६५५३३००००० योजन कही गई है। जिनागम में इस अन्तिम सूची व्यास की परिधि का प्रमाण २०७२३३५४१९० योजन और एक कोस कहा गया है ॥२९४-३०२॥


तस्य मध्ये चतुर्दिक्षु चत्वारोऽञ्जनपर्वताः।
राजन्ते पटहाकारा इन्द्रनीलमणिप्रभाः ॥३०३॥

योजनानां सहस्रैश्चतुरशीतिसंख्यकैः।
उन्नता विस्तृता योजनसहस्रावगाहकाः ॥३०४॥

लक्षयोजनभूभागं मुक्त्वाद्रीणां पृथग्विधाः।
प्रत्येकं च चतुर्दिक्षु चतस्रः सन्ति वापिकाः ॥३०५॥

लक्षयोजनविस्तीर्णा चतुरस्त्राः क्षयातिगाः।
सहस्रयोजनागाहा रत्नसोपानराजिताः ॥३०६॥

निर्जन्तुजलसम्पूर्णाः पद्मवेदीतटाङ्किताः।
हेमाम्बुजौघसंछन्ना महावीचीशताकुलाः ॥३०७॥

अर्थ (श्लोक 303 से 307): नन्दीश्वर द्वीप के मध्य में चारों दिशाओं में अञ्जनगिरि नाम के चार पर्वत हैं, जिनका आकार ढोल के समान और आभा इन्द्रनीलमणि के सदृश है। प्रत्येक अञ्जनगिरि की ऊँचाई ८४००० योजन, चौड़ाई ८४००० योजन और अवगाह १००० योजन है। प्रत्येक अञ्जनगिरि के चारों ओर एक-एक लाख योजन भूमि को छोड़कर भिन्न-भिन्न चारों दिशाओं में चौकोर आकार को धारण करने वाली चार-चार वापिकाएँ हैं। अर्थात् एक एक अञ्जनगिरि के चारों ओर एक-एक अर्थात् कुल सोलह वापिकाएँ हैं। ये प्रत्येक वापिकाएँ एक लाख योजन विस्तीर्ण, एक हजार योजन गहरी, चौकोर आकार वालीं, अनादि-निधन, रत्नों की सीढ़ियों से सुशोभित, जीव जन्तु रहित जल से परिपूर्ण, कमलों के समूह से आकीर्ण और सैकड़ों महा तरंगों से व्याप्त हैं। इनके तट, पद्मवेदिकाओं से अलंकृत हैं ॥३०३-३०७॥


नन्दा नन्दवती संज्ञा वापी नन्दोत्तराह्वया।
नन्दिषेणा च पूर्वाद्रेः पूर्वादि दिक्षु ताः स्थिताः ॥३०८॥

सौधर्मेन्द्रस्य भोग्याद्यैशानेन्द्रस्य द्वितीया।
तृतीया चमरेन्द्रस्यान्तिमा वैरोचनस्य सा ॥३०९॥

अरजा विरजाख्या गतशोका वीतशोकिका।
दक्षिणाञ्जनशैलस्य पूर्वादिदिक्षु ताः क्रमात् ॥३१०॥

आद्येन्द्रलोकपालानां पूर्वा सा वरुणस्य च।
भोग्या यमस्य सोमस्य क्रमाद् वैश्रवणस्य तु ॥३११॥

विजया वैजयन्ती च जयन्ती ह्यपराजिता।
एताः पूर्वादि दिक्षु स्युः पश्चिमाञ्जनसद्गिरेः ॥३१२॥

वेणुदेवस्य भोग्याद्या वेणुतालेर्द्वितीयका।
धरणस्य तृतीया स्याद् भूतानन्दस्य सान्तिमा ॥३१३॥

रम्याख्या रमणी सुप्रभोत्तराञ्जनभूभृतः।
चरिमा सर्वतोभद्रा प्राच्यादिदिक्षु च क्रमात् ॥३१४॥

ऐशानलोकपालस्य वरुणस्य यमस्य सा।
सोमस्यास्ति कुबेरस्यैकैकवापी च पूर्ववत् ॥३१५॥

पंचषष्टिसहस्त्राः पंचचत्वारिंशदित्यपि।
योजनैर्दूयष्टवापीनां प्रत्येकमादिमान्तरम् ॥३१६॥

लक्षैकयोजनानां च चत्वारो हि सहस्त्रकाः।
षट्शतानि द्वयाग्राणीति संख्यया परस्परम् ॥३१७॥

भवेन्मध्यान्तरं सर्व वापिकानां पृथक् पृथक्।
लक्षौ द्वौ च त्रयो विंशति सहस्त्राः शतानि षट् ॥३१८॥

तथैकषष्टिरित्यङ्गानां च योजनसंख्यया।
तासां षोडशवापीनां स्युर्बाह्येत्यान्तराणि वै ॥३१९॥

अर्थ (श्लोक 308 से 319): पूर्व दिशा स्थित अञ्जनगिरि की पूर्व आदि चारों दिशाओं में क्रमशः नन्दा, नन्दवती, नन्दोत्तरा और नन्दिषेणा नाम की चार वापिकाएँ स्थित हैं। प्रथम वापिका सौधर्मेन्द्र के भोग्य है, दूसरी ऐशानेन्द्र के, तीसरी चमरेन्द्र के और चतुर्थ वापिका वैरोचन के भोग्य है, दक्षिणदिश स्थित अञ्जनगिरि की पूर्वादि चारों दिशाओं में क्रमशः अरजा, विरजा, गतशोका और वीतशोका नाम की चार वापिकाएँ हैं, इनमें प्रथम वापिका सौधर्मेन्द्र के लोकपालों में से वरुण के भोग्य, द्वितीय वापिका यम के, तृतीय वापिका सोम के और चतुर्थ वापिका वैश्रवण लोकपाल के भोग्य है। पश्चिम दिशागत अञ्जनगिरि की पूर्वादि चारों दिशाओं में क्रमशः विजया, वैजयन्ती, जयन्ती और अपराजिता नाम की चार वापिकाएँ हैं, इनमें प्रथम वापिका वेणुदेव के, द्वितीय वेणुताल के, तृतीय धरणदेव के और चतुर्थ वापिका भूतानन्द देव के भोग्य है। उत्तर दिशा गत चतुर्थ अञ्जनगिरि की पूर्वादि चारों दिशाओं में क्रमशः रम्या, रमणी, सुप्रभा और सर्वतोभद्र नाम की वापिकाएँ हैं, इनमें प्रथम वापिका ऐशानेन्द्र के लोकपालों में से वरुण द्वारा भोग्य है, द्वितीय वापिका यम के, तृतीय सोम के और चतुर्थ वापिका कुबेर लोकपाल के द्वारा भोग्य है। इन सोलह वापियों में से प्रत्येक का आदि (अभ्यन्तर) अन्तर ६५०४५ योजन सर्व वापियों का पृथक्-पृथक् मध्य अन्तर १०४६०२ योजन और इसी प्रकार सर्व वापियों का भिन्न-भिन्न बाह्य अन्तर २२३६६१ योजन प्रमाण है ॥३०८-३१९॥


वापीनां मध्यभूदेशेषु सन्त्यासां दधिप्रभाः।
रम्या दधिमुखाभिख्याः श्वेताः षोडशभूधराः ॥३२०॥

पटहाकारिणस्तुङ्गा विस्तृताश्च दशप्रमैः।
सहस्रयोजनैर्योजनसहस्रावगाहिनः ॥३२१॥

अर्थ (श्लोक 320 से 321): इन सब वापियों के मध्य भूप्रदेशपर दधि की प्रभा युक्त, रमणीक और श्वेत वर्ण वाले दधिमुख नाम के १६ पर्वत हैं। इनका आकार ढोल सदृश, ऊँचाई दस हजार योजन, चौड़ाई दस हजार योजन और अवगाह (नींव) १००० योजन प्रमाण है ॥३२०-३२१॥


तासां समस्तवापीनां प्रत्येकं बाह्यकोणयोः।
द्वौ द्वौ रतिकराभिख्यौ भवतः पर्वतौ शुभौ ॥३२२॥

द्वात्रिंशदद्वयोऽत्रैते तुङ्गाः सहस्रयोजनैः।
विस्तृताः पटहाकाराः स्वोच्चतुर्थांशगाहकाः ॥३२३॥

सौवर्णाः शाश्वताः सर्वेऽत्राञ्जनाद्या महाचलाः।
पिण्डीकृता द्विपञ्चाशद् भवन्त्यतिमनोहराः ॥३२४॥

एषां सर्वमहीन्द्राणां मूर्ध्न्येकैकं जिनालयम्।
शाश्वतं सुरपूजाढ्यं भवेत् त्यक्तोपमं परम् ॥३२५॥

सर्वे पिण्डीकृतास्ते द्विपंचाशच्छ्रीजिनालयाः।
स्वर्णरत्नमया दिव्याः स्फुरद्दीप्रा मनोहराः ॥३२६॥

पूर्वोक्त वर्णनोपेताः सर्वज्येष्ठा विभान्त्यलम्।
देवसंघैर्महाभूत्या धर्मकरा इवोर्जिताः ॥३२७॥

प्राङ्मुखाः सुरनाथादीनाह्वयन्तः इवानिशम्।
जिनार्चायै शुभाप्त्यै च तुङ्गध्वजकरोत्करैः ॥३२८॥

अर्थ (श्लोक 322 से 328): उन समस्त वापियों में से प्रत्येक वापी के दोनों बाह्य कोणों पर अतीव शुभ रतिकर नाम के दो-दो पर्वत हैं, इस प्रकार १६ वापियों के दो-दो कोणों पर ३२ रतिकर पर्वत हैं, इन सभी पर्वतों की भिन्न-भिन्न ऊँचाई १००० योजन, चौड़ाई १००० योजन, अगाध (नींव) ऊँचाई का चतुर्थांश अर्थात् २५० योजन है, अनाद्यनिधन इन सब पर्वतों का आकार ढोल सदृश और वर्ण तपाये हुए स्वर्ण समान है। मन को हरण करने वाले अञ्जनादि सभी पर्वतों का योग (४+१६+३२)=५२ होता है। इन सब ५२ पर्वतों के शिखर पर शाश्वत, देवेन्द्रों से पूज्य, उपमा रहित और परमोत्कृष्ट एक-एक जिनालय हैं। अत्यन्त कान्तिमय है प्रकाश जिनका, ऐसे दिव्य और मनोहर उन स्वर्ण और रत्नमय सब जिनालयों का कुल योग (४+१६+३२)=५२ है। जो पूर्वोक्त वर्णन से सहित हैं, उत्कृष्ट आयाम आदि युक्त हैं और धर्म की खान के समान हैं, ऐसे वे ५२ चैत्यालय महाविभूति युक्त देव समूहों के द्वारा अत्यन्त शोभायमान होते हैं। वे समस्त चैत्यालय पूर्वाभिमुख हैं और उत्तुंग ध्वजाओं से ऐसे सुशोभित होते हैं मानों ये अपने ध्वजारूपी हाथों से अहर्निश परमशुभ जिनपूजा के लिए सुरेन्द्र आदिकों को ही बुला रहे हों ॥३२२-३२८॥


वापीनां पूर्वदिग्भागेऽत्राशोक वनमुल्बणम्।
एकैकं दक्षिणे भागे सप्तपर्णाह्वयं महत् ॥३२९॥

प्रदेशे पश्चिमे स्याच्च चम्पकं सुवनं पृथक्।
उत्तरायां दिशि प्रोच्चं वनमाम्राह्वयं परम् ॥३३०॥

वनान्येतानि सर्वाणि नित्यानि भान्ति भूतिभिः।
मयूरैः कोकिलालापैः शुकाद्यैश्च द्रुमोत्करैः ॥३३१॥

सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यैश्चैत्यवृक्षैः सुरालयैः।
लक्षयोजनदीर्घाणि दीर्घार्धविस्तृतानि च ॥३३२॥

वनानां मध्यदेशेषु तिस्रः स्युर्मणिपीठिकाः।
त्रिमेखलाङ्किता दिव्याः प्रत्येकं तुङ्गविग्रहाः ॥३३३॥

तासां मूर्ध्नि विराजन्ते चैत्यवृक्षाः स्फुरद्रुचः।
छत्रघण्टाजिनार्चाद्यैर्विचित्राः प्रोन्नताः शुभाः ॥३३४॥

तेषां मूले चतुर्दिक्षु महत्यो जिनमूर्तयः।
दीप्ताः शक्रादिवन्द्यार्च्याः स्युः पर्यङ्कासनस्थिताः ॥३३५॥

अर्थ (श्लोक 329 से 335): उन सोलह वापिकाओं की चारों दिशाओं में एक-एक वन है। पूर्वभाग में अशोक नाम का वन है। दक्षिण दिशा में सप्तपर्ण नाम का महान् वन है। पश्चिम दिशा में चम्पक बन और उत्तर दिशा में आम्र नामक उत्तम वन है। ये शाश्वत ६४ ही वन मयूरों, कोकिलाओं एवं शुकादिकों के सुन्दर आलापों से एवं द्रुसमूह आदि विभूति से शोभायमान हैं। सर्व ऋतुओं के फलों एवं पुष्प आदि से, चैत्यवृक्षों से देवप्रासादों से सुशोभित उन सभी वनों का पृथक्-पृथक् विस्तार पचास हजार योजन और दीर्घता (लम्बाई) एक लाख योजन प्रमाण है। उन सभी वनों के मध्यभाग में मणिमय तीन तीन पीठिकाएँ हैं। प्रत्येक पीठिका तीन तीन दिव्य और उत्तुंग मेखलाओं (कटनियों) से अलंकृत हैं। उन पीठिकाओं के ऊपर नाना प्रकार के छत्र, घण्टा और जिनार्चा आदि से युक्त प्रोन्नत, शुभ और फैलती हुई द्युति से युक्त चैत्यवृक्ष सुशोभित होते हैं। उन चैत्यवृक्षों के मूल में पूर्वादि चारों दिशाओं में कान्तिमान, इन्द्रादि देवों से वंदनीय एवं अर्चनीय तथा पद्मासन स्थित प्रभावशाली जिनमूर्तियाँ हैं ॥३२९-३३५॥


चतुःषष्टिवनानां च मध्ये सन्ति मनोहराः।
सत्प्रासादाश्चतुःषष्ठिर्वननामसुराश्रिताः ॥३३६॥

द्विषष्टि योजनोत्सेधा आयामविस्तरान्विताः।
एकत्रिंशत्प्रमाणैश्च योजनैर्द्वारभूषिताः ॥३३७॥

आषाढे कार्तिके मासे फाल्गुने च निरन्तरम्।
प्रतिवर्षं सुरैः सार्धं चतुर्निकायवासवाः ॥३३८॥

स्वस्वसद्वाहनारूढाः सकलत्राः शुभाशयाः।
विभूत्या परया भक्त्यागत्यारभ्याष्टमीदिनम् ॥३३९॥

आष्टाह्निकीं महापूजां कुर्वन्ति पुण्यमातृकाम्।
त्रिजगन्नाथमूर्तीनां विश्वचैत्यालयेषु च ॥३४०॥

अभिषेकं महन्नित्यं सुरनाथाः सुरैः समम्।
द्विद्विप्रहरपर्यन्तमेकैकदिशि शान्तये ॥३४१॥

कनत्काञ्चनकुम्भास्यनिर्गतनिर्मलाम्बुभिः ।
महोत्सवशतैर्वाद्यैर्जयकोलाहलस्वनैः ॥३४२॥

नित्यं प्रकुर्वते भूत्या विश्वविघ्नहरं शुभम्।
जिनेन्द्रदिव्यबिम्बानां गीतनृत्यस्तवैः सह ॥३४३॥

अर्थ (श्लोक 336 से 343): ६४ वनों के मध्य में वनों के सदृश नाम वाले देवों के अति मनोहर ६४ प्रासाद हैं। इन प्रासादों में से प्रत्येक प्रासाद ६२ योजन ऊँचे, ६२ योजन लम्बे, ३१ योजन चौड़े और द्वार आदि से विभूषित हैं। प्रतिवर्ष निरन्तर आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में चतुर्निकाय के इन्द्र, देवों एवं देवांगनाओं के साथ अपने-अपने उत्तम वाहनों पर चढ़कर परम विभूति और परमोत्कृष्ट भक्ति से अष्टमी को नन्दीश्वर द्वीप जाकर सर्व चैत्यालयों में स्थित जिनबिम्बों की पुण्य की माता सदृश आष्टाह्निकी नाम की महापूजा करते हैं। महा महोत्सव पूर्वक सैकड़ों वाद्यों एवं जय-जयकार शब्दों के कोलाहल से युक्त, महाविभूति से, गीत, नृत्य और सहस्रों स्तुतियाँ गाते हुए, स्वर्ण और रत्नों के घड़ों से निकलती हुई निर्मल जल की धारा द्वारा, अन्य देव समूहों के साथ साथ सर्व इन्द्र, आत्मशान्ति के लिए नित्य ही प्रत्येक दिशा में दो दो पहर जिनेन्द्रों की दिव्य प्रतिमाओं का सर्व विघ्ननाशक और कल्याणप्रद महा अभिषेक करते हैं ॥३३६-३४३॥


इत्येकेन दिनेनात्र चतुर्दिंग्जिनवेश्मसु।
एका स्यान्महती पूजा सम्पूर्णा च सुरेशिनाम् ॥३४४॥

पूर्वाशायां जिनार्चानां सौधर्मेन्द्रो महामहम्।
अष्टभेदं सुरैः सार्धं दिव्यार्चनैः करोति च ॥३४५॥

पश्चिमाशास्थगेहेषु प्रतिमानां जिनेशिनाम्।
विधत्ते परमां पूजामैशानेन्द्रोऽमरावृतः ॥३४६॥

दक्षिणाशाप्रदेशस्थ चैत्यालयेषु भक्तितः।
कुरुते जिनमूर्तीनां चमरेन्द्रो महार्चनम् ॥३४७॥

उत्तराशामहीभागे शक्रो वैरोचनो मुदा।
चैत्यालयस्थचैत्यानां करोति पूजनं परम् ॥३४८॥

इत्यमी प्रत्यहं मुख्याश्चत्वारः सुरनायकाः।
प्रदक्षिणाविधानेनात्रत्यश्रीजिनधामसु ॥३४९॥

त्रिजगद्देवदेवीभिः समं पूजामहोत्सवम्।
कुर्वते जिनमूर्तीनां पूर्णमास्यन्तमञ्जसा ॥३५०॥

अर्थ (श्लोक 344 से 350): इस प्रकार नन्दीश्वर द्वीप स्थित जिन चैत्यालयों में एक ही दिन में चारों दिशाओं में देवेन्द्र एक महान पूजा सम्पूर्ण करते हैं। अन्य देव समूहों के साथ-साथ सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र पूर्वदिशा में स्थित जिनप्रतिमाओं की अष्ट प्रकार की महामह पूजा दिव्य द्रव्य के द्वारा करता है। अनेक देवों से आवृत ऐशानेन्द्र पश्चिम दिशागत जिनालयों में स्थित जिनेन्द्र बिम्बों की परम पुनीत पूजा करता है। दक्षिण दिशागत क्षेत्र के चैत्यालयों में स्थित जिनबिम्बों की महामह पूजा चमरेन्द्र महान् भक्तिभाव से करता है। इसी प्रकार उत्तर दिशा स्थित चैत्यालयों के जिनबिम्बों की परमोत्कृष्ट पूजा वैरोचन इन्द्र अति प्रमोद पूर्वक करता है। इस उपर्युक्त विधि के अनुसार ये चारों प्रधान इन्द्र त्रैलोक्य स्थित देव देवियों के साथ प्रदक्षिणा क्रम से नन्दीश्वरद्वीपस्थ जिनचैत्यालयों के जिनबिम्बों की पूजा, महामहोत्सव के साथ पूर्णिमा पर्यन्त करते हैं। अर्थात् पूर्व दिशा में सौधर्मेन्द्र, दक्षिण में ऐशानेन्द्र, पश्चिम में चमरेन्द्र और उत्तर में वैरोचन इन्द्र अपने सुरसमूह के साथ दो-दो पहर पूजन करते हैं। दोपहर बाद सौधर्मेन्द्र दक्षिण में आ जाते हैं, तब दक्षिण वाले देव पश्चिम में और पश्चिम वाले उत्तर में तथा उत्तर दिशा वाले देव पूर्व में आकर ऐन्द्रध्वज आदि महापूजा करते हैं। यह क्रम एक दिन का है, इस प्रकार अष्टमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा पर्यन्त देवगण इसी क्रम से महामहोत्सव के साथ महामह आदि पूजन करते हैं ॥३४४-३५०॥


द्वीपस्य प्रवरस्यास्य स्यातां देवौ सुरक्षकौ।
जिनभक्तिपरौ नित्यं शुद्धप्रभमहाप्रभौ ॥३५१॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति में परायण प्रभ और महाप्रभ नाम के दो देव इस महान् नन्दीश्वर द्वीप की रक्षा करते हैं ॥३५१॥


ततस्तं परिवेष्ट्यास्ति नन्दीश्वरवराम्बुधिः।
ततः स्यादरुणो द्वीपोऽरुणप्रभसमाह्वयः ॥३५२॥

अर्थ: नन्दीश्वर द्वीप को परिवेष्टित करके नन्दीश्वर नामक महासमुद्र है, इसके आगे ९ वाँ अरुण द्वीप और १० वाँ अरुणप्रभ नाम के द्वीप हैं ॥३५२॥


अथैकादशमो द्वीपो विख्यातः कुण्डलाभिधः।
कुण्डलाकारसंस्थानकुण्डलाचलभूषितः ॥३५३॥

योजनानां सहस्त्राणि पञ्चसप्ततिरुन्नतिः।
सहस्त्रयोजनागाहोऽस्याद्रेर्मूले च विस्तरः॥३५४॥

सहस्त्रदशसंख्यातविंशाग्रद्विशतप्रमः ।
मध्ये च द्विशतत्रिंशद्युक्तसप्तसहस्रकः ॥३५५॥

अग्रे व्यासः सहस्त्राणि चत्वारि द्वे शते तथा।
योजनानि च चत्वारिंशत्कुण्डलमहीभृतः ॥३५६॥

इत्युक्तोत्सेधविस्तारः स्वर्णाभः कुण्डलाचलः।
द्वीपस्य मध्यभागेऽस्ति कुण्डलाकृतिमाश्रितः ॥३५७॥

अर्थ (श्लोक 353 से 357): अरुणप्रभद्वीप के बाद ग्यारहवाँ कुण्डल नाम का विख्यात द्वीप है, जो कुण्डल के आकार वाले कुण्डलाचल पर्वत से विभूषित है। यह पर्वत ७५००० योजन ऊँचा, १००० अवगाह (नींव) से युक्त, मूल विस्तार १०२२० योजन, मध्य विस्तार ७२३० योजन और शिखर विस्तार ४२४० योजन है। कुण्डलद्वीप के मध्यभाग में कुण्डलाकृति का धारक उपर्युक्त उत्सेध एवं विस्तार से युक्त और स्वर्णाभा के सदृश कान्ति वाला कुण्डलाचल पर्वत है ॥३५३-३५७॥


अस्याद्रेर्मस्तके सन्ति कूटानि दिक्चतुष्टये।
चत्वारि विदिशासु स्याद्रम्यं कूटचतुष्टयम् ॥३५८॥

तासामष्टदिशां मध्यान्तरेष्वष्टसु सन्ति च।
अष्टौ महान्ति कूटानीमानि कूटानि षोडश ॥३५९॥

अमीषां द्व्यष्टकूटानां मूर्धस्थरत्नसद्मसु।
पल्यैकजीविनो भूत्या नागदेवा वसन्ति च ॥३६०॥

तेषामभ्यन्तरे भागे चतुःपूर्वादिदिक्षु च।
चत्वारि मणिकूटानि सन्ति सेव्यानि निर्जरैः ॥३६१॥

कूटानां मूर्ध्निराजन्ते चत्वारः श्रीजिनालयाः।
देवसङ्घैःकृतैर्नित्यं पूजोत्सवशतादिभिः ॥३६२॥

एषां विंशतिकूटानामुदयो योजनानि च।
शतानि पञ्चमूले स्वोत्सेधेन समविस्तरः ॥३६३॥

अग्रे व्यासो मतः सार्धद्विशतैर्योजनैरिति ।
वर्णनैः कुण्डलाद्रिः स्यात् सुरसङ्घोस्तवप्रदः ॥३६४॥

अर्थ (श्लोक 358 से 364): कुण्डलगिरि पर्वत पर पूर्वादि चारों दिशाओं में चार कूट हैं और चारों विदिशाओं में भी रमणीक चार कूट हैं। इन आठों दिशाओं के मध्य आठ अन्तरालों में आठ महान् कूट हैं। इस प्रकार आठ दिशाओं और आठों अन्तरालों में कुल सोलह कूट हैं। इन सोलह कूटों के शिखर पर रत्नों के प्रासाद हैं, जिनमें एक पल्य की आयु वाले नागदेव महाविभूति के साथ रहते हैं। इन दिशागत कूटों के अभ्यन्तर भाग में पूर्वादि चारों दिशाओं में देवों द्वारा सेव्यमान चार कूट हैं। इन कूटों के शिखर पर (प्रत्येक कूट पर एक) चार जिनालय हैं, जिनमें देव समूहों के द्वारा नित्य ही सहस्रों पूजा महोत्सव किये जाते हैं। ये बीसों कूट पाँच-पाँच सौ योजन ऊँचे हैं, इनका मूल विस्तार ५०० योजन और ऊर्ध्वशिखर का विस्तार २५० योजन प्रमाण है। जहाँ नित्य देवों के द्वारा अनेक महोत्सव होते हैं ऐसे कुण्डलगिरि का वर्णन है ॥३५८-३६४॥


ततः शङ्खवरद्वीपस्तस्माच्च रुचकाह्वयः ।
राजतेऽद्रिर्जिनागारैस्त्रिदशानन्दकारकः ॥३६५॥

अस्य द्वीपस्य मध्येऽस्ति वलयाकार ऊर्जितः ।
अचलो रुचकाभिख्यः पुण्यकर्मनिबन्धनः ॥३६६॥

आदौ मध्येऽचलस्याग्रे सर्वत्र समविस्तरः ।
प्रोक्तश्चतुरशीतिश्च सहस्रयोजनानि च ॥३६७॥

स्वव्यासेन समोत्सेधो मन्तव्योऽस्य महागिरेः ।
सहस्रयोजनागाहोऽग्रे स्युः कूटान्यप्यमून्यपि ॥३६८॥

अर्थ (श्लोक 365 से 368): ११ वें कुण्डलवर द्वीप के बाद १२ वाँ शंखवर द्वीप है और शंखवर द्वीप के आगे १३ वाँ रुचकवर द्वीप है, जो जिनेन्द्र भगवान् के जिनालयों से देवों को आनन्द कारक है, ऐसे रुचकगिरि (पर्वत) से सुशोभित है। इस रुचकवर द्वीप के मध्य में शाश्वत और वलयाकार पुण्यकर्म को आकर्षण करने वाला रुचक नाम का पर्वत है। इस पर्वत का आदि, मध्य और शिखर का सर्वत्र विस्तार समान है। अर्थात् सर्वत्र ८४००० योजन प्रमाण है। इस रुचक पर्वत की ऊँचाई भी अपने विस्तार के सदृश अर्थात् ८४००० योजन प्रमाण ही है, तथा अवगाह १००० योजन है। इस महागिरि के ऊपर अनेक कूट भी हैं ॥३६५-३६८॥


पूर्वाद्यासु चतुर्दिक्ष्वष्टौ कूटानि पृथक् पृथक्।
प्रत्येकं रुचकाख्याद्रेर्बहिर्भागे च मूर्धनि ॥३६९॥

पूर्वाशास्थाष्टकूटेषु दिक्कुमार्यो वसन्ति ताः।
याः शृङ्गारविधायिन्यो जिनमातुर्भवन्ति च ॥३७०॥

दक्षिणाशाष्टकूटाग्रस्थ सौधेषु वसन्ति च।
मणिदर्पणधारिण्योऽष्टौ तस्या दिक्कुमारिकाः ॥३७१॥

पश्चिमाशाष्ट कूटेषु तिष्ठन्ति दिक्कुमारिकाः।
मूर्द्धन्यष्टौ छत्रधारिण्यो जिनाम्बाया मुदागताः ॥३७२॥

उत्तराशाष्टकूटेषु दिक्कुमार्यो वसन्ति ताः।
जिनमातुरिहायाताश्चामराण्युत् क्षिपन्ति याः ॥३७३॥

तथास्याद्रेश्चतुर्दिक्षु पङ्क्त्या कूटानि सन्ति च।
त्रीणि त्रीणि मनोज्ञानि प्रत्येकं हि ततोऽन्तरे ॥३७४॥

चतुःकूटेषु तिष्ठन्ति दिक्कुमार्यश्चतुःप्रमाः।
ता या जिनजनन्याश्च निकटे सेवनोत्सुकाः ॥३७५॥

अमीषां मध्यभागेषु चतुःकूटस्थवेश्मसु।
वसन्ति दिक्कुमारीणां सन्महत्तरिकाः पराः ॥३७६॥

तेषां मध्ये चतुःकूटेषु चतस्रो वसन्ति ताः।
या महत्तरिकाश्चार्हज्जातकर्मणि कुर्वते ॥३७७॥

अमीषां सर्वकूटानामन्तर्भागे भवन्ति च।
चत्वारि मणिकूटानि चतुर्दिक्षु महान्त्यपि ॥३७८॥

एतेषां मूर्ध्नि राजन्ते देवोत्थार्च्चोत्सवोत्करैः।
चैत्यालया जिनेन्द्राणां चत्वारो मणिभास्वराः ॥३७९॥

एषां समस्तकूटानामुदयो विस्तरो द्विधा।
मूलेऽग्रे च भवेत्कुण्डलस्थकूटैः समानकाः ॥३८०॥

अर्थ (श्लोक 369 से 380): रुचक नाम के इस पर्वत के ऊपर बहिर्भाग में पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इन चारों दिशाओं में से पृथक्-पृथक् दिशा में आठ-आठ कूट हैं। अर्थात् कुल ३२ कूट हैं। पूर्व दिशागत आठ कूटों में दिक्कुमारी देवियाँ रहती हैं और ये जिनमाता के श्रृंगार आदि की क्रियाएँ करतीं हैं। दक्षिण दिशागत कूटों के ऊपर स्थित प्रासादों में मणिमय दर्पण धारण करने वालीं आठ दिक्कुमारियाँ निवास करतीं हैं। पश्चिम दिशागत कूटों के ऊपर स्थित प्रासादों में श्वेत छत्र धारण कर हर्षित मन से जिनमाता की सेवा करने वालीं आठ दिक्कुमारियाँ रहती हैं। उत्तर दिशागत कूटों पर आठ दिक्कुमारियाँ रहतीं हैं, जो यहाँ जिनमाता के पास आकर चँवर ढोरतीं हैं तथा इसी पर्वत पर पूर्व आदि चारों दिशाओं में से पृथक्-पृथक् दिशा में (पूर्वोक्त कूटों के अभ्यन्तर की ओर) पंक्तिबद्ध प्रति मनोज्ञ तीन-तीन कूट हैं। इनमें से चारों दिशाओं के चार कूटों (एक-एक कूट) में चार दिक्कुमारियाँ रहतीं हैं, जो जिनमाता के निकट आकर हर्षोल्लासपूर्वक सेवा करतीं हैं। उपर्युक्त तीन तीन कूटों के मध्य में स्थित चारों दिशाओं के चार कूटों पर जो प्रासाद हैं, उनमें अतिनिपुण महत्तरिका दिक्कुमारियाँ निवास करतीं हैं। उन मध्य स्थित चार कूटों में जो चार महत्तरिका निवास करतीं हैं, वे तीर्थंकर के जन्म समय में जात कर्म करती हैं। इन सर्व कूटों के अभ्यन्तर की ओर चारों दिशाओं में जो रत्नमय चार महान् कूट हैं, उनके शिखर पर देवों द्वारा किये हुए महान् उत्सवों से युक्त और मणियों की प्रभा सदृश भास्वर जिनेन्द्र भगवान् के चार कूट शोभायमान होते हैं। इन समस्त (३२+१२=४४) कूटों की ऊँचाई तथा मूल और शिखर भाग के विस्तार का प्रमाण कुण्डलगिरि स्थित कूटों के समान है। अर्थात् इन समस्त कूटों का मूल विस्तार ५०० योजन, शिखर विस्तार २५० योजन और उत्सेध भी ५०० योजन प्रमाण है ॥३६९-३८०॥


अथास्ति भुजगद्वीपस्ततः कुशवराभिधः ।
द्वीपः क्रोञ्चवराभिख्यो द्वीपो मनः शिलाख्यकः ॥३८१॥

हरितालाह्वयो द्वीपो द्वीपः सेन्दुरसंज्ञकः ।
श्यामाङ्कोऽञ्जनकद्वीपो हिङ्गुलख्यश्च रूप्यकः ॥३८२॥

द्वीपः सुवर्णनामाथ द्वीपो वज्राभिधानकः ।
वैडूर्यसंज्ञको भूतवरो यक्षवराभिधः ॥३८३॥

देवद्वीपस्तथाप्यन्ये शुभनामान ऊर्जिताः ।
द्विगुणद्विगुणव्यासा द्वीपाः स्युः संख्यवर्जिताः ॥३८४॥

समस्तद्वीपराशीनां सर्वेषु चान्तरेषु वै ।
स्वस्वद्वीपोत्थनामानोऽसंख्येयाः सन्ति सागराः ॥३८५॥

एते द्वीपाब्धयोऽसंख्या न केनापि विनिर्मिताः ।
किन्त्वविनश्वरा विश्वे सन्त्यनाद्यमनोहराः ॥३८६॥

अर्थ (श्लोक 381 से 386): रुचकवर द्वीप के बाद भुजगद्वीप, पश्चात् कुशवर नामक द्वीप, पश्चात् क्रौंचवर द्वीप, पश्चात् मनःशिल द्वीप, पश्चात् हरिताल द्वीप, पश्चात् सेन्दुर द्वीप, श्यामांक द्वीप, अञ्जन द्वीप, हिंगुल द्वीप, रूप्यक द्वीप, सुवर्ण द्वीप, वज्र नामक द्वीप, वैडूर्य द्वीप, भूतवर द्वीप, यक्ष द्वीप और देव द्वीप हैं, इस प्रकार आगे-आगे शुभ नाम वाले और पूर्व-पूर्व समुद्रों से दुगुने-दुगुने विस्तार वाले असंख्यात द्वीप हैं। इन समस्त द्वीपों के अन्तरालों में अपने-अपने द्वीप के नाम सदृश नाम वाले असंख्यात ही सागर हैं। ये सर्व असंख्यात द्वीप समुद्र अकृत्रिम हैं, अर्थात् किन्हीं के द्वारा बनाये नहीं गये, ये समस्त मनोहर द्वीप समुद्र शाश्वत अर्थात् अनाद्यनन्त हैं ॥३८१-३८६॥


सर्वद्वीपाब्धि राशीनां द्वीपो ज्येष्ठोऽस्ति चान्तिमः ।
मध्यलोकस्य पर्यन्ते स्वयम्भूरमणाह्वयः ॥३८७॥

बहिर्भागे तमावेष्ट्य स्वयम्भूरमणार्णवः ।
असंख्ययोजनव्यासो रज्जुसूचीयुतोऽस्ति च ॥३८८॥

अर्थ (श्लोक 387 से 388): समस्त द्वीप समुद्रों में अर्थात् २५ कोड़ाकोड़ी पल्योपम रोम प्रमाण द्वीप समुद्रों में सबसे बड़ा अन्तिम स्वयम्भूरमण नाम का द्वीप है, यह मध्यलोक के अन्त में अवस्थित है। इस द्वीप के बहिर्भाग में स्वयम्भूरमण द्वीप को वेष्टित किये हुए असंख्यात योजन वाला स्वयम्भूरमण समुद्र है, इसका सूची व्यास एक राजू प्रमाण है ॥३८७-३८८॥


स्वयम्भूरमणद्वीपस्यार्धेऽस्ति वलयाकृतिः।
श्रीप्रभाख्यो महान् शैलो भोगभूमिधराङ्गतः ॥३८९॥

ततोऽचलाद्बहिर्भागे द्वीपार्धे सकलेऽम्बुधौ।
वर्तते कर्मपृथ्व्येका चतुर्गतिकराङ्गिनाम् ॥३९०॥

यत्रोऽत्र सन्ति तिर्यञ्चः क्रूरा व्रतादिदूरगाः।
संयतासंयताः केचित्पशवो व्रततत्पराः ॥३९१॥

अर्थ (श्लोक 389 से 391): अर्ध स्वयम्भूरमण द्वीप में अर्थात् स्वयम्भूरमण समुद्र के मध्य में, भोगभूमि की धरा से युक्त अर्थात् भोगभूमि में वलय के आकार को धारण करने वाला श्रीप्रभ (नागेन्द्र) नाम का महान् पर्वत है। इस श्रीप्रभ नामक पर्वत के बाहर अर्ध स्वयम्भूरमण द्वीप और सम्पूर्ण स्वयम्भूरमण समुद्र में वहाँ स्थित जीवों को चारों गतियाँ प्रदान करने वाली एक कर्मभूमि है। यहाँ पर व्रत आदि से रहित और प्रायः क्रूर स्वभाव वाले तिर्यञ्च रहते हैं। इनमें कुछ तिर्यञ्च संयतासंयत अर्थात् देशव्रती हैं, जो अपने व्रतों में तत्पर रहते हैं ॥३८९-३९१॥


चक्षुष्मान् हि सुचक्षुश्चेमौ देवौ परिरक्षकौ।
मानुषोत्तरशैलस्य पुष्करार्धान्तिमस्य च ॥३९२॥

एकाकोटीद्विचत्वारिंशल्लक्षाणि सहस्त्रकाः।
षड्त्रिंशच्च शतान्येव सप्त स्फुटं त्रयोदश ॥३९३॥

योजनानां च गव्यूत्येकमिति प्रोक्तसंख्यया।
परिधिः स्याद्बहिर्भागे मानुषोत्तरसद्गरेः ॥३९४॥

तस्यैव परिधेर्बाह्यभागेषु शाश्वताः स्थिताः।
स्वयं प्रभाद्रिपर्यन्ता ये द्वीपाः संख्यवर्जिताः ॥३९५॥

अर्थ (श्लोक 392 से 395): चक्षुष्मान् और सुचक्षुष्मान् ये दो देव बाह्य पुष्करार्ध द्वीप के अधिपति हैं। पुष्करार्ध के अन्त में अवस्थित मानुषोत्तर पर्वत की परिधि १४२३६७१३ योजन और एक कोस प्रमाण कही गई है। परिधि का यह प्रमाण मानुषोत्तर पर्वत के बाह्य भाग का है। इस ही परिधि के बाह्यभाग से प्रारम्भ कर स्वयंप्रभ (नागेन्द्र) पर्वत पर्यन्त असंख्यात द्वीप हैं ॥३९२-३९५॥


तेषु द्वीपेष्वसंख्येसु जघन्याभोगभूमयः।
सम्बन्धिन्यस्तिरश्चां स्युः केवलं संख्यदूरगाः ॥३९६॥

आसु सर्वासु तिर्यञ्चो गर्भजा भद्रकाः शुभाः।
युग्मरूपाश्च जायन्ते पञ्चाक्षाः क्रूरतातिगाः ॥३९७॥

एकपल्योपमायुष्का मृगादि शुभजातिजाः ।
कल्पद्रुमसमुत्पन्नभोगिनो वैरवर्जिताः ॥३९८॥

मन्दकषायिणोऽप्येते मृत्वा यान्ति सुरालयम्।
ज्योतिर्भावनभौमेषु न स्वर्गं दर्शनं विना ॥३९९॥

कुपात्रदानपुण्यांशात् कुत्सिताद्भोगकांक्षिणः।
केवलं दृग्व्रतातीता जायन्तेऽत्राबुधाङ्गिनः ॥४००॥

न सन्त्यासु समस्तासु धरासु जन्तवः क्वचित्।
कृमिकुन्थाविदंशाद्याः क्रूरा वा विकलेन्द्रियाः ॥४०१॥

अर्थ (श्लोक 396 से 401): मानुषोत्तर पर्वत के बाह्य भाग से नागेन्द्र पर्वत पर्यन्त जो असंख्यात द्वीप हैं, उनमें जघन्य भोगभूमि की रचना है। इस जघन्य भोगभूमि में मात्र तिर्यंच रहते हैं, उनकी संख्या असंख्यात है, अर्थात् असंख्यात तिर्यंच रहते हैं। इन द्वीपों में रहने वाले सभी तिर्यंच गर्भज, भद्र, शुभ परिणति से युक्त, पंचेन्द्रिय और क्रूरता रहित होते हैं। इनका जन्म युगल रूप से ही होता है। यहाँ जो तिर्यंच उत्पन्न होते हैं, वे मृग आदि शुभ जातियों में उत्पन्न होते हैं, एक पल्य की आयु के धारक एवं बैर भाव से रहित होते हैं तथा कल्पवृक्षों से उत्पन्न भोग भोगते हैं। ये जीव मन्द कषायी होते हैं। अतः मरकर स्वर्ग में जाते हैं। जिन्हें सम्यग्दर्शन नहीं होता। वे भवनत्रिक में उत्पन्न होते हैं। जो मूढ़ जीव सम्यग्दर्शन और व्रतों से रहित हैं तथा कुपात्रदान से उत्पन्न कुछ पुण्य, उससे जो कुत्सित भोगों की वांछा करते हैं, वे जीव मरकर इस भोगभूमि में उत्पन्न होते हैं। इस जघन्य भोगभूमि की समस्त धरा पर कृमि, कुन्थु एवं मच्छर आदि तुच्छ जन्तु, क्रूर परिणामी जीव एवं विकलेन्द्रिय जीव कभी भी उत्पन्न नहीं होते ॥३९६-४०१॥


किन्तु ते विकलाक्षाः स्युर्द्वीपे सार्धद्वये सदा।
स्वयम्भूरमणार्धे च स्वयम्भूरमणाद्बहिः ॥४०२॥

लवणोदे च कालोदे स्वयम्भूरमणार्णवे।
मत्स्या जलचरा अन्ये भवन्ति क्रूरमानसाः ॥४०३॥

शेषासंख्यसमुद्रेषु मत्स्याद्या जातु सन्ति न।
भोगक्ष्मामध्यभागे स्थितेषु द्वयक्षादयो न वा ॥४०४॥

स्वयम्भूरमणाम्भोधेस्तीरे पञ्चशतायताः।
योजनानां महामत्स्याः सन्ति सन्मूर्च्छनोद्भवाः ॥४०५॥

सहस्रयोजनायामा अब्धेरभ्यन्तरे स्थिताः।
मत्स्याः सन्मूर्च्छनोत्थास्तदर्धायामाश्च गर्भजाः ॥४०६॥

नद्यास्ये लवणाम्भोधौ मत्स्याः सन्मूर्च्छनोद्भवाः ।
नवयोजन दीर्घाङ्गास्तदर्द्धाङ्गाश्च गर्भजाः ॥४०७॥

अस्यैवाभ्यन्तरे तेऽष्टादशयोजनसम्मिताः ।
सम्मूर्च्छनभवा गर्भजा योजननवायताः ॥४०८॥

योजनाष्टादशायामाः कालोदस्य नदीमुखे ।
सम्मूर्च्छनजदेहास्ते गर्भजा नव योजनाः ॥४०९॥

कालोदाभ्यन्तरे मत्स्याः षट्त्रिंशद्योजनायताः ।
सन्मूर्च्छनोद्भवाश्चान्ये योजनाष्टादशायताः ॥४१०॥

सहस्रयोजनायामा ये पञ्चशतविस्तृताः ।
ते सार्द्धद्विशतोत्सेधाः स्युश्चेति सर्वमत्स्यकाः ॥४११॥

व्यासः स्यात् सर्वमत्स्यानां स्वाङ्गदीर्घार्द्धमेव च ।
व्यासाङ्गस्य यदर्धं स उत्सेधोऽन्यत्र चेत्यपि ॥४१२॥

अर्थ (श्लोक 402 से 412): किन्तु वे विकलेन्द्रिय जीव जम्बूद्वीप आदि अढ़ाई द्वीप में, अर्ध स्वयम्भूरमण द्वीप में और स्वयम्भूरमण समुद्र के बाह्य प्रदेश में होते हैं। लवणोदधि समुद्र में, कालोदधि समुद्र में और स्वयम्भूरमण समुद्र में अन्य जलचर जीव और क्रूर मन वाले मत्स्य रहते हैं। शेष असंख्यात समुद्रों में मत्स्य आदि जीव कभी भी नहीं पाये जाते। भोगभूमि क्षेत्रों में द्वीन्द्रिय आदि जीव पैदा नहीं होते। स्वयम्भूरमण समुद्र के किनारे पर सम्मूर्च्छन जन्म और ५०० योजन आयाम वाले महामत्स्य पाये जाते हैं। इसी समुद्र के मध्य में सम्मूर्च्छन जन्म से उत्पन्न १००० योजन लम्बे मत्स्य रहते हैं और गर्भज मत्स्य ५०० योजन लम्बाई वाले रहते हैं। लवणसमुद्र के नदी मुख पर ९ योजन लम्बे सम्मूर्च्छन जन्म वाले और ४ १/२ योजन लम्बे गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं। इसी समुद्र के मध्य में १८ योजन लम्बे सम्मूर्च्छन जन्म वाले और ९ योजन गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं। कालोदधि समुद्र के नदी मुख पर १८ योजन लम्बे सम्मूर्च्छन जन्म वाले और ९ योजन लम्बे गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं। कालोदधि के मध्य में ३६ योजन लम्बे सम्मूर्च्छन जन्म वाले और १८ योजन लम्बे गर्भ जन्म वाले मत्स्य रहते हैं। स्वयम्भूरमण समुद्र के महामत्स्यों का शरीर १००० योजन लम्बा, ५०० योजन चौड़ा और २५० योजन ऊँचा है। अन्य शेष समुद्रों के मत्स्यों के अपने-अपने शरीर की जितनी लम्बाई होती है, व्यास उससे आधा होता है तथा व्यास के अर्ध भाग प्रमाण शरीर की ऊँचाई होती है ॥४०२-४१२॥


सहस्रयोजनैर्दीर्घा योजनव्याससंयुताः ।
पद्माः सन्ति महाम्भोधौ द्विक्रोशोच्छ्रैः किलान्तिमे ॥४१३॥

योजनद्वादशायामा मुखे चतुष्कयोजनैः ।
व्यासान्विताः स्वदीर्घस्य पञ्चभागकृतात्मनाम् ॥४१४॥

भागैश्चतुर्भिरुत्सेधयुताः शङ्खा भवन्ति च।
त्रिक्रोशायामसंयुक्तास्तदष्टमांशविस्तराः ॥४१५॥

व्यासस्यार्धांशकोत्सेधा गोभीनां सन्ति चोत्तमाः।
भृङ्गा योजनदीर्घाङ्गाः क्रोशत्रितयविस्तृताः ॥४१६॥

क्रोशद्वयसमुत्तुङ्गा उत्कृष्टाङ्गा भवन्ति च।
द्वीपार्धेऽन्तिमाब्धौ स्युर्विकलाख्या इमे त्रयः ॥४१७॥

अर्थ (श्लोक 413 से 417): अन्तिम स्वयम्भूरमण समुद्र में १००० योजन लम्बा, एक योजन व्यास वाला तथा दो कोस की कणिका से युक्त कमल है। उत्कृष्ट अवगाहना वाले शंख की लम्बाई १२ योजन, मुख व्यास ४ योजन और १२ योजन आयाम के १२ भागों में से ५ भाग अर्थात् ५ योजन का चौथा भाग (५/४ = १ १/४ योजन) ऊँचाई (उत्सेध) है। त्रीन्द्रिय गोभी की उत्कृष्ट लम्बाई ३ कोस, चौड़ाई (३ × १/८ = ) ३/८ कोस तथा ऊँचाई व्यास (३/८) का आधा अर्थात् (३/८ × १/२) = ३/१६ कोस प्रमाण है। चतुरिन्द्रिय भौंरे की उत्कृष्ट लम्बाई एक योजन, चौड़ाई ३ कोस और ऊँचाई दो कोस प्रमाण है। स्वयम्भूरमण समुद्र के अन्तिम अर्ध भाग में ये तीनों प्रकार के विकलेन्द्रिय जीव होते हैं ॥४१३-४१७॥


लवणाब्धौ जलं क्षारं लवणस्वादमस्ति च।
वारुणी वरवाधौ स्यादुदकं मद्यसन्निभम् ॥४१८॥

क्षीराब्धौक्षीरसुस्वादसदृशाम्भो भवेन्महत्।
घृतस्वादुसमं स्निग्धं जलं स्यात् घृतवारिधौ ॥४१९॥

कालोदे पुष्कराम्भोधौ स्वयम्भूरमणार्णवे।
केवलं जलसुस्वादं जलौघं च भवेत्सदा ॥४२०॥

एतेभ्यः सप्तवार्द्धिभ्यो परेऽसंख्यातसागराः।
भवन्तीक्षुरसस्वादसमानामधुराः शुभाः ॥४२१॥

अर्थ (श्लोक 418 से 421): लवण समुद्र के जल का स्वाद नमक के सदृश खारा है। वारुणीवर समुद्र के जल का स्वाद मद्य के स्वाद सदृश है। क्षीरवर समुद्र के जल का स्वाद दूध के स्वाद समान है और घृतवर समुद्र के जल का स्वाद एवं स्निग्धता घी के सदृश है। कालोदधि पुष्करवर समुद्र और स्वयम्भूरमण समुद्रों के जल का स्वाद सुमधुर जल के स्वाद सदृश है। इन सात समुद्रों को छोड़कर अवशेष असंख्यात समुद्रों के जल का स्वाद अत्यन्त स्वादिष्ट इक्षुरस के सदृश मधुर और सुस्वादु है ॥४१८-४२१॥


समस्तद्वीपवार्धीनां व्यासात् पिण्डीकृताद्भवेत्।
स्वयम्भूरमणश्चाधिकव्यासो लक्षयोजनैः ॥४२२॥

इति प्राग्द्वीपवार्धिभ्योऽपरोद्वीपोऽथ चाम्बुधिः।
भवेदधिकविष्कम्भो लक्षैकयोजनैः स्फुटम् ॥४२३॥

अर्थ (श्लोक 422 से 423): समस्त द्वीप समुद्रों का व्यास एकत्रित करने पर जितना प्रमाण होता है, उससे स्वयम्भूरमण समुद्र का व्यास एक लाख योजन अधिक है। इसी प्रकार पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रों के व्यास से आगे-आगे के द्वीप और समुद्रों का व्यास भी एक-एक लाख योजन अधिक होता है ॥४२२-४२३॥


इत्येवं विविधं जिनेन्द्रगदितं श्रीमद्ध्यलोकं परम्,
किञ्चिच्छास्त्रधिया मया च विधिना संवर्णितं मुक्तये।
धर्मध्याननिबन्धनं सुनिपुणाः सद्धर्मसंसिद्धये,
सद्बुद्ध्या वचसा पठन्तु विमलं कृत्वा च तन्निश्चयम् ॥४२४॥

अर्थ: इस प्रकार भगवान् जिनेन्द्र के द्वारा कहा हुआ मध्यलोक का नाना प्रकार का उत्कृष्ट वर्णन मैंने मुक्ति की प्राप्ति के लिए आगमानुसार विधिपूर्वक किया है, यह वर्णन धर्मध्यान का निबंधक है। इसमें यदि कहीं कुछ भूल हुई हो तो सज्जन पुरुष उत्तम धर्म (शिव) की प्राप्ति के लिए इसे अपनी बुद्धि से शुद्ध करके पढ़े ॥४२४॥


अधिकारान्त मंगलाचरण


येऽस्मिन् सन्ति सुमद्ध्यलोकसकले श्रीमज्जिनेन्द्रालयाः,
श्रीनिर्वाणसुभूमयो बुधनुताः श्रीधर्मतीर्थाधिपाः।
अस्मात् सिद्धिपदं गता अवपुषोऽनन्तास्त्रिधा साधव-
स्तान् सर्वान् सुगुणैः स्तुवेऽहमनिशं वन्दे च तद्भूतये ॥४२५॥

अर्थ: इस उत्तम मध्यलोक में श्री जिनेन्द्र भगवान् के जितने भी जिन मन्दिर हैं उन सबको, धर्मतीर्थ के अधिपति जहाँ से मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं, ऐसे समस्त निर्वाण क्षेत्रों को और सिद्ध पद प्राप्त करने वाले अनन्त आचार्य उपाध्याय और सर्व साधुओं को मैं उनके उत्तम गुणों के साथ-साथ मोक्ष विभूति की प्राप्ति के लिए अहर्निश स्तुति करता हूँ और नमस्कार करता हूँ ॥४२५॥

एकादश अधिकार जीवों के भेद-प्रभेदों का वर्णन (भाग 1/2)

श्रीमत्तस्त्रिजगन्नाथान् स्वर्मुक्तिश्रीकरान्सताम्।
वन्दे धर्माधिपान् पञ्चपरमेष्ठिन उत्तमान् ॥१॥

अर्थ: जो तीन जगत् के नाथ हैं, सज्जन पुरुषों को स्वर्ग और मोक्ष लक्ष्मी प्रदान करने वाले हैं तथा धर्म के अधिनायक हैं, ऐसे परमोत्कृष्ट पंच परमेष्ठियों को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथ यैः पूरितो लोकः क्वचित्क्वचित्रसाङ्गिभिः।
सर्वत्र स्थावरैर्जीवैर्नानाभेदैश्च भूरिभिः ॥२॥

आयुः कायाक्षसंस्थानजातिवेदकुलादिभिः।
तांस्त्रसान् स्थावरान् सर्वान् वक्ष्ये सतां दयाप्तये ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): यह लोक कहीं-कहीं त्रस जीवों से भरा हुआ है किन्तु स्थावर जीवों से तो सर्वत्र भरा हुआ है, अतः सज्जन पुरुष दया पालन कर सकें, इसलिए मैं सर्व त्रस और स्थावर जीवों के नाना प्रकार के भेद-प्रभेद, आयु, काय, इन्द्रियाँ, संस्थान, जाति, वेद और कुल आदि का विवेचन करूँगा ॥२-३॥


सिद्धसंसारिभेदाभ्यां स्युर्द्विधा जीवराशयः।
सिद्धाभेदादिनिष्क्रान्ता अनन्ता ज्ञानमूर्तयः ॥४॥

अर्थ: सम्पूर्ण जीव राशि सिद्ध और संसारी के भेद से दो प्रकार की है, जिसमें सिद्ध जीव भेद-प्रभेदों से रहित और अनन्त ज्ञान मूर्ति स्वरूप हैं ॥४॥


त्रसस्थावरभेदाभ्यां द्विधा संसारिणोऽङ्गिनः।
पृथिव्यादिप्रकारैश्च पञ्चधा स्थावरा मताः ॥५॥

अर्थ: त्रस और स्थावर के भेद से संसारी जीव दो प्रकार के हैं, उनमें से स्थावर जीव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति कायिक के भेद से पाँच प्रकार के हैं ॥५॥


पृथ्व्यप्तेजोऽग्निमरुन्नित्येतरकायमयात्मनाम् ।
सप्तसप्तैव लक्षाणि प्रत्येकं सन्ति जातयः ॥६॥

जातयो दशलक्षाणि वनस्पतिशरीरिणाम्।
प्रत्येकं द्विद्विलक्षाणि द्वित्रितुर्येन्द्रियात्मनाम् ॥७॥

तिर्यङ्नारकदेवानां प्रत्येकं स्युश्च जातयः।
चतुर्लक्षाणि लक्षाणि चतुर्दशनृजातयः ॥८॥

इत्थं चतुरशीतिश्च लक्षाणि जीवजातयः।
अधुना विस्तरेणैषां काञ्चिज्जातिं ब्रुवे पृथक् ॥९॥

अर्थ (श्लोक 6 से 9): पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, नित्यनिगोद और इतरनिगोद इन छह प्रकार के जीवों में से प्रत्येक की सात-सात लाख जातियाँ (योनियाँ) होती हैं। वनस्पतिकायिक जीवों की दस लाख, द्वीन्द्रिय जीवों की दो लाख, त्रीन्द्रिय की दो लाख, चतुरिन्द्रिय की दो लाख, पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की चार लाख, नारकियों की चार लाख, देवों की चार लाख और मनुष्यों की चौदह लाख जातियाँ होतीं हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण संसारी जीवों की कुल जातियाँ (७ ला. + ७ ला. + ७ ला. + ७ ला. + ७ ला. + ७ ला. + १० ला. + ६ ला. + ४ ला. + ४ ला. + ४ ला. + १४ ला.) = ८४००००० अर्थात् चौरासी लाख जातियाँ (योनियाँ) होतीं हैं। अब इन जातियों में से कुछ जातियों का पृथक् पृथक् विस्तारपूर्वक कथन करते हैं ॥६-९॥


पृथ्वी पृथ्वीकायः पृथ्वीकायिकस्तथा।
पृथ्वीजीव इति ख्याता पृथ्वीभेदाश्चतुर्विधाः ॥१०॥

मार्गोपमर्दिता धूलिः पृथ्वी प्रोच्यते बुधैः।
निर्जीव इष्टिकादिश्च पृथ्वीकायो मतः श्रुते ॥११॥

सजीवा पृथ्वी सर्वा पृथ्वीकायिको भवेत्।
विग्रहाध्वानमापन्नोऽङ्गी पृथ्वीजीव उच्यते ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 10 से 12): पृथ्वी के चार भेद कहे गये हैं-पृथ्वी, पृथ्वीकाय, पृथ्वीकायिक और पृथ्वीजीव। विद्वानों के द्वारा मार्ग की उपमर्दित धूल को पृथ्वी कहा गया है तथा आगम में निर्जीव ईंट आदि को पृथ्वीकाय, सम्पूर्ण सजीव पृथ्वी को पृथ्वीकायिक और पृथ्वीकायिकों में जाते हुए, पृथ्वीकायिक नामकर्म के उदय से युक्त विग्रहगति में स्थित जीव को पृथ्वी जीव कहा है ॥१०-१२॥


अप् तथैवापशरीरं चाऽप्कायिकोऽप्जीव इत्यपि।
भेदाश्चत्वार आम्नाता जिनैरप्कायकात्मनाम् ॥१३॥

जलमान्दोलितं लोकैः सकर्दमं तथाप् भवेत्।
उष्णोदकं च निर्जीवमन्यद्वाप्काय उच्यते ॥१४॥

जलकाययुतः प्राणी चाप्कायिको निगद्यते।
अप्कायं नेतुमागच्छन् जीवोऽप्जीवो गतौ भवेत् ॥१५॥

पूर्वं तेजश्च तेजःकायस्तेजःकायिकस्तथा।
तेजोजीव इमे भेदाश्चत्वारस्तेजसां मताः ॥१६॥

भस्मनाच्छादितं तेजो मात्रं तेजः प्ररूप्यते।
जीवोज्झितं च भस्मादि तेजःकाय इहोच्यते ॥१७॥

तेजःकायमयो देही तेजःकायिक इष्यते।
तेजोऽङ्गार्थं व्रजन्मार्गे तेजोजीव मतो बुधैः ॥१८॥

वायुश्च वायुकायोऽथ तृतीयो वायुकायिकः।
वायुजीव इमे भेदाश्चत्वारो वायुदेहिनाम् ॥१९॥

रजःपुञ्जमयो वायुर्भ्रमन् वायुर्जिनैः स्मृतः।
जीवातीतो मरुत्पुद्गलो वायुकाय ईरितः ॥२०॥

वायुः प्राणमयः प्राणी प्रोदितो वायुकायिकः।
वाताङ्गार्थं व्रजन्मार्गेऽङ्गी वायुजीव उच्यते ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 13 से 21): जिनेन्द्र भगवान् ने जलकाय जीवों के जल, जलकाय, जलकायिक और जलजीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। लोगों के द्वारा आन्डोलित एवं कीचड़ सहित जल को जल कहते हैं। उष्ण निर्जीव जल को जलकाय, जलकाय युक्त जीव को जलकायिक तथा जलकाय में जन्म लेने के लिए जाते हुए विग्रहगति में स्थित जीव को जलजीव कहते हैं। पूर्ववत् तेजकाय जीवों के तेज, तेजकाय, तेजकायिक और तेज जीव इस प्रकार चार भेद कहे हैं। भस्म से आच्छादित अग्नि को अर्थात् किञ्चित उष्ण भस्म को तेज कहते हैं। जिसमें से जीव निकलकर चला गया है, उस भस्मादि को तेज काय कहते हैं। तेजकाय सहित जीव को तेजकायिक और तेज नामकर्म से युक्त जो जीव विग्रहगति में स्थित हैं उन्हें विद्वानों ने तेजजीव कहा है। वायु जीवों के वायु, वायुकाय, वायुकायिक और वायुजीव इस प्रकार चार भेद होत हैं। धूलपुञ्ज से युक्त भ्रमण करती हुई वायु (आँधियों) को जिनेन्द्रदेव ने वायु कहा है। जीव से रहित पंखे आदि की पौद्गलिक वायु देह को वायुकाय कहते हैं। प्राणयुक्त वायु को वायुकायिक और वायुगति में आने वाले विग्रह गति स्थित जीव को वायु जीव कहते हैं ॥१३-२१॥


आदौ वनस्पतिश्चाथ वनस्पतिवपुस्ततः।
वनस्पत्यादिकः कायिको वनस्पतिजीववाक् ॥२२॥

वनस्पत्या अमी भेदाश्चत्वारः कीर्तिता जिनैः ।
अन्तर्जीवयुतोबाह्यत्यक्तजीवो वनस्पतिः ॥२३॥

वनस्पतिवपुः स्मृतः छिन्नभिन्नं तृणादिकम्।
वनस्पत्यङ्गयुक्तोऽङ्गीस्याद्वनस्पतिकायिकः ॥२४॥

प्राक्शरीरपरित्यागे वनस्पत्यङ्गसिद्धये ।
प्राणान्तेऽङ्गी गतिं गच्छन् स्याद्वनस्पतिजीववाक् ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 22 से 25): वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और वनस्पति जीव ऐसे वनस्पति के चार भेद जिनेन्द्र देव के द्वारा कहे गये हैं। अभ्यन्तर भाग जीव युक्त है और बाह्य भाग जीव रहित है, ऐसे वृक्ष आदि (कटे हुए हरे वृक्ष) को वनस्पति कहते हैं। छिन्न-भिन्न किये हुए तृणादिक को वनस्पति काय माना गया है, जीव सहित वनस्पतिकाय को वनस्पतिकायिक कहते हैं और आयु के अन्त में पूर्व शरीर को त्यागकर जो जीव वनस्पतिकायिकों में उत्पन्न होने के लिये विग्रहगति में जा रहा है, उसे वनस्पति जीव कहते हैं ॥२२-२५॥


एतेषां प्राक्तनो भेदःकिञ्चित्प्राणाश्रितो मतः।
पृथ्व्यादीनां द्वितीयस्तु केवलं जीवदूरगः ॥२६॥

जीवयुक्तस्तृतीयश्चचतुर्थो भेद ईरितः ।
त्यक्तप्राग्वपुषां भाविपृथ्व्याद्यङ्गाय गच्छताम् ॥२७॥

एतान् भेदान् बुधैर्ज्ञात्वा सचेतनानचेतनान्।
पृथ्व्यादीनां सुरक्षायै कर्तव्यं यत्नमञ्जसा ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 26 से 28): इन पंच स्थावरों के चार-चार भेदों में से प्रथम भेद किंचित् जीव युक्त होता है। द्वितीय भेद मात्र अजीव होता है, तृतीय भेद जीव सहित होता है और चतुर्थ भेद में जीव पूर्व शरीर को छोड़कर पृथ्वि आदि शरीर को धारण करने के लिये जाता है अतः यह चेतन ही है। इस प्रकार विद्वानों के द्वारा कहे हुए भेदों में चेतन-अचेतन भेदों को जानकर पृथ्वी आदि पंच स्थावरों की रक्षा के लिए यत्न करना चाहिए ॥२६-२८॥


मृत्तिका वालुका लोहं लवणं सागरादिजम्।
ताम्रं रूप्यं स्वर्णं च त्रपुषः सीसकं तथा ॥२९॥

हिङ्गुलं हरितालं च मनःशिलाथ सस्यकम्।
अञ्जनं ह्यभ्रकं चाभ्रवालुकामी हि षोडश ॥३०॥

भेदा मृदुपृथ्वीकायात्मनां प्रोक्ता जिनागमे।
इदानीं खरपृथ्वीनां भेदान् मण्यादिकान् ब्रुवे ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 29 से 31): मिट्टी, बालुका, लोहा, समुद्र आदि में उत्पन्न होने वाला नमक, ताम्र, चाँदी, स्वर्ण, त्रिपुष (कथीर या रांगा), सीसा, हिंगुल, हरताल, मनःशिला, जस्ता, अञ्जन (नीलाथूथा या सुरमा), अभ्रक और भोड्ल ये सोलह भेद जिनागम में कोमल पृथ्वीकायिक जीवों के कहे गये हैं, अब खर पृथ्वी के मणि आदि भेदों को कहते हैं ॥२९-३१॥


प्रवालं शर्करा वज्रं शिलोपलं ततः परम्।
कर्केतनमणिर्नाम्ना रजकाख्यो मणिस्ततः ॥३२॥

चन्द्रप्रभोऽथ वैडूर्यकोमणिः स्फटिको मणिः।
जलकान्तो मणिःसूर्यकान्तश्च गैरिको मणिः ॥३३॥

चन्दनः पद्मरागाख्यो मणिर्मरकताह्वयः।
वको मोचो मणिवैमसृणपाषाणसंज्ञकः ॥३४॥

एते विंशतिसद्भेदाः पृथ्वीकायमयात्मनाम्।
खराख्याणां सुभव्यानां दयायैगणिभिर्मताः ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 32 से 35): प्रवाल, शर्करा, हीरा, शिला, उपल (पत्थर), कर्केतनमणि, रजकमणि, चन्द्रप्रभमणि, वैडूर्यमणि, स्फटिकमणि, जलकान्तमणि, सूर्यकान्तमणि, गैरिकमणि, चन्दनमणि, पद्मराग, मरकतमणि, वकमणि, मोचमणि, वैमसृण और पाषाण खर पृथ्वी स्वरूप पृथ्वीकायिक जीवों के ये बीस भेद भव्य जीवों के दया पालनार्थ गणधर देवों के द्वारा कहे गये हैं ॥३२-३५॥


रत्नप्रभादयः सप्तपृथ्व्यश्चैत्यद्रुमाखिलाः।
मेर्वाद्याः पर्वताः सर्वे वेदिकातोरणादयः ॥३६॥

त्रिलोकस्थ विमानानि जम्बाद्याः सकलाद्रुमाः।
नृविद्येशसुराणां च प्रासादाः कमलानि च ॥३७॥

स्तूपरत्नाकरायद्या ये पृथ्वीकायमयाश्च ते।
सर्वे ह्यन्तर्भवन्त्येषु पृथ्वीभेदेषु नान्यथा ॥३८॥

एतान् पृथ्वीमयान् जीवान् पृथ्वीकायाश्रितान् बहून्।
सम्यग्ज्ञात्वा प्रयत्नेन रक्षन्तु साधवोऽनिशम् ॥३९॥

अर्थ (श्लोक 36 से 39): रत्नप्रभा आदि सातों पृथिवियाँ, सम्पूर्ण चैत्यवृक्ष, मेरु आदि सर्व पर्वत, वेदिकाएँ एवं तोरण आदि, त्रैलोक्यस्थित विमान, जम्बू आदि समस्त वृक्ष, मनुष्यों, विद्याधरों और देवों के प्रासाद, पद्म आदि सरोवरों में स्थित कमल, स्तूप और रत्नाकर आदि ये सब पृथ्वीकायमय हैं और इन सबका अन्तर्भाव पृथ्वीकाय के भेदों में ही होता है, अन्य में नहीं। पृथ्वीकाय के आश्रित रहने वाले इन सब पृथ्वीमय जीवों को भली प्रकार जानकर सज्जन पुरुषों को अहर्निश इनकी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करना चाहिए ॥३६-३९॥


अवश्यायजलं रात्रिपश्चिमप्रहरोद्भवम्।
हिमाख्यं जलकायं च जलवन्धनसम्भवम् ॥४०॥

महिकाख्यं जलं धूमाकाराम्बु च हरज्जलम्।
स्थूलबिन्दुजलं चाणुः सूक्ष्मबिन्दुजलं तथा ॥४१॥

शुद्धाम्बुचन्द्रकान्तोत्थमुदकं निर्झरादिजम् ।
सामान्याम्बुघनाख्याम्भोऽब्धिद्रहमेघवातजम् ॥४२॥

सरित्कूपसरःकुण्डनिर्झराब्धिह्रदादयः ।
एष्वप्कायेषु सर्वेऽन्येऽन्तर्भवन्त्यम्बुकायिकाः ॥४३॥

एतानप्कायसद्भेदानप्कायाश्रितान् बहून्।
जीवान् विज्ञाय यत्नेन पालयन्त्वात्मवत्सदा ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 40 से 44): रात्रि के पिछले पहर में उत्पन्न होने वाला ओस जल, हिम नाम का जलकाय, मेघ जलकाय, कोहरे का जल, धूम आकार (धुन्ध) जल, डाभ की अणी पर स्थित जल, स्थूल बिन्दु जल, जलकण, सूक्ष्म बिन्दु जल, शुद्ध जल, चन्द्रकान्तमणि से उत्पन्न जल, झरनों आदि से उत्पन्न जल, सामान्य जल, घन जल (घनोदधि), द्रहजल, मेघ से उत्पन्न जल, घनवातज जल, नदी, कूप, तालाब, कुण्ड, झरना, समुद्र एवं सरोवर आदि सर्व जल का जलकाय में अन्तर्भाव होने से यह सब जलकायिक ही है। इन सब जलकाय के भेदों को तथा जलकाय के आश्रित रहने वाले असंख्यात जीवों को अपनी आत्मा के सदृश जानकर प्रयत्नपूर्वक निरन्तर उनकी रक्षा करना चाहिए ॥४०-४४॥


अङ्गाराणि ज्वलज्ज्वालाह्यर्चिर्दीपशिखादिका।
मुर्मराख्यो हि कार्षाग्निः शुद्धाग्निर्बहुभेदभाक् ॥४५॥

विद्युत्पाताग्निवज्राग्निसूर्यकान्तादिगोचरः ।
अग्निसामान्यरूपाग्निर्निर्धूमो वाडवादिजः ॥४६॥

नन्दीश्वरमहाधूमकुण्डिकामुकुटादिजाः ।
अग्निकाया अमीष्वन्तर्भवन्त्यनलयोनिषु ॥४७॥

इमांस्तेजो मयान् जीवांस्तेजः कायान् श्रितान् परान्।
विदित्वा सर्वयत्नेन रक्षन्तु मुनयोऽनिशम् ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 45 से 48): अंगाररूप अग्नि, ज्वालाग्नि, अर्चि अग्नि, दीपशिखाग्नि, मुर्मराग्नि, कार्षाग्नि और बहुत प्रकार की शुद्धाग्नि, विद्युत्पाताग्नि, वज्राग्नि, सूर्यकान्त आदि से उत्पन्न अग्नि, सामान्य अग्नि, निर्धूमाग्नि, बड़वाग्नि, नन्दीश्वर द्वीपस्थ महाधूम कुण्डों की अग्नि तथा मुकुट आदि से उत्पन्न अग्नि अग्निकाय होने से इन सब अग्नियों का अनिलयोनियों में अन्तर्भाव हो जाता है। तेजकाय के आश्रित रहने वाले सर्व तेजकायिक जीवों को भली प्रकार जानकर मुनिजन इनकी अहर्निश प्रयत्नपूर्वक रक्षा करते हैं ॥४५-४८॥


वात: सामान्यरूपश्चोद्भ्रमर्कूर्ध्वं भ्रमन् व्रजेत्।
उत्कलिर्मण्डलिपृथ्वीलग्नॊ भ्रमन् प्रगच्छति ॥४९॥

गुञ्जावातो महावातो वृक्षादिभङ्गकारक:।
घनोदधिश्च नाम्ना घनानिलस्तनुवातवाक् ॥५०॥

उदरस्थविमानाधारपृथ्व्यधस्तलाश्रिता: ।
त्रिलोकाच्छादका वाता अत्रैवान्तर्भवन्ति च ॥५१॥

एतान् वाताङ्गभेदांश्च जीवान् वातवपु: श्रितान्।
ज्ञात्वा नित्यं प्रयत्नेन पालयन्तु स्ववद्विद: ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 49 से 52): सामान्य रूप वायु, उद्भ्रम वायु, ऊपर भ्रमण करने वाली वायु, उत्कलि वायु, मण्डल वायु, पृथ्वी स्पर्श कर भ्रमण करने वाली वायु, गुञ्जावात, वृक्षों आदि को नष्ट करने वाली महावायु, घनोदधि वायु, घन वायु, तनुवायु, उदरस्थ वायु, विमान जिसके आधार हैं वह वायु, पृथ्वीतल के आश्रित वायु और त्रैलोक्य आच्छादक वायु, ये सर्व वायु इन्हीं पवनों में अन्तर्भूत होती हैं। ये सब भेद वायुकाय के कहे गये हैं। वायुकायिक जीव इसी वायुकाय के आश्रित रहते हैं, ऐसा जानकर विद्वज्जनों को इन्हें अपनी आत्मा के सदृश समझकर नित्य ही इनकी दया का प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए ॥४९-५२॥


असाधारणसाधारण भेदाभ्यां जिनागमे।
कीर्तिता द्विविधा: संक्षेपाद्वनस्पतिकायिका: ॥५३॥

प्रत्येकं द्विप्रकारास्ते साधारणेतराङ्गिन:।
उदकाद्यैश्च जीवोत्थ सन्मूर्च्छिद्भिर्भेदतः ॥५४॥

मूलाग्रपोरकन्दस्कन्धबीजोद्भवदेहिनः ।
त्वक्पत्राणि प्रवालानि पुष्पाणि च फलान्यपि ॥५५॥

गुच्छागुल्मानि वल्ली च तृण पर्वादि कायिकाः।
प्रत्येकादि चतुर्भेदानां सद्भेदा मता इमे ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 53 से 56): जिनागम में असाधारण (प्रत्येक) वनस्पतिकायिक और साधारण वनस्पतिकायिक के भेद से वनस्पतिकायिक जीवों के संक्षेप से दो भेद कहे गये हैं। इनमें से असाधारण अर्थात् प्रत्येक वनस्पति सप्रतिष्ठित (साधारण सहित) और अप्रतिष्ठित (साधारण रहित) के भेद से दो प्रकार की है। (मिट्टी और) जल आदि के सम्बन्ध से होने वाली सम्मूर्च्छन जन्म वालीं वनस्पतियाँ भी सप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित के भेद से दो प्रकार की होतीं हैं। मूल, अग्र, पोर, कन्द, स्कन्ध और बीज से उत्पन्न होने वाले वनस्पतिकायिक जीव तथा त्वक्, पत्र, प्रवाल, पुष्प, फल, गुच्छा, गुल्म, बल्ली, तृण और पर्व आदि प्रत्येक के वनस्पति, वनस्पतिकाय, वनस्पतिकायिक और वनस्पति जीव ये चार भेद माने गये हैं ॥५३-५६॥


एते प्रत्येककायाः स्युः केचिच्चानन्तकायिकाः
केचिद्बीजोद्भवाः केचित् सम्मूर्च्छिका हि देहिनः ॥५७॥

नित्येतरनिकोताभ्यां द्विधा साधारणामताः।
अनन्तकायिका जीवा अनन्तैकाक्ष संकुलाः ॥५८॥

यत्रैकोम्रियते प्राणी तत्रैवानन्तजन्मिनाम्
मरणं चैककालेन तत्समं ह्येककायत: ॥५९॥

यत्रैको जायते जीवस्तत्रोत्पत्तिर्भवेत्स्फुटम्।
अनन्तदेहिनां सार्धं तेन तत्क्षणमञ्जसा ॥६०॥

ततस्तेऽनन्तजीवाप्ताः प्रोक्ता अनन्तकायिकाः।
युगपन्मरणोत्पत्तेरनन्तैकेन्द्रियात्मनाम् ॥६१॥

तीव्रमिथ्यादियुक्तैर्यैर्भ्रमद्भिर्दुर्धर्वाटवीम् ।
अनन्तां प्राणिभिर्घोरदुःखकर्मग्रसितात्मभिः ॥६२॥

अनन्तकायवर्गेषु न त्रसत्वं कदाचन
प्राप्तं तेऽनन्तकायात्ताः मता नित्यनिकोतकाः ॥६३॥

अनन्तकायिका एते पञ्चभेदामता इति।
जम्बूद्वीपादि दृष्टान्तैः स्कन्धा डरादयो जिनैः ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 57 से 64): ये पूर्वकथित जीव प्रत्येक काय हैं, इनमें कोई-कोई अनन्तकाय हैं, कोई बीज से उत्पन्न होने वाले हैं और कोई जीव सम्मूर्च्छन जन्म वाले हैं। साधारण वनस्पतिकायिक जीवों के नित्यनिगोद और इतरनिगोद ये दो भेद हैं। ये अनन्तकायिक अर्थात् साधारण अनन्त एकेन्द्रिय जीव एक साथ (संकुला) बँधे हुए हैं। साधारण जीवों में जहाँ एक जीव का मरण होता है, वहाँ एक काय होने से एक ही समय में एक साथ अनन्त जीवों का मरण होता है और जहाँ एक जीव उत्पन्न होता है, वहीं उसी क्षण एक साथ अनन्त जीव जन्म लेते हैं। इन अनन्त एकेन्द्रिय जीवों का एक ही साथ मरण और एक ही साथ जन्म होता है, इसीलिए उन अनन्त जीवों के समूह को अनन्तकायिक कहते हैं। जो तीव्र मिथ्यात्व आदि से युक्त और घोर दुःकर्मों से ग्रसित हैं, ऐसे अनन्तानन्त प्राणी भयावह संसाररूपी अटवी में भ्रमण करते हैं। अनन्तकाय जीवों के समूह में जो जीव कभी भी त्रस पर्याय को प्राप्त नहीं करते उन्हें नित्यनिगोदिया कहते हैं। इन अनन्तकायिक जीवों के पाँच भेद माने गये हैं, जो जिनेन्द्र के द्वारा जम्बूद्वीप आदि के दृष्टान्तों से स्कन्ध, अंडर, आवास, पुलवि और शरीर आदि के रूप में प्रतिपादन किये गये हैं ॥५७-६४॥


जम्बूद्वीपे यथा क्षेत्रं भारतं भारतेऽस्ति च।
कोशलः कोशले देशेऽयोध्यायां सौधपङ्क्तयः ॥६५॥

तथा स्कन्धा असंख्येयलोकप्रदेशमात्रकाः।
एकैकस्मिन् पृथक् स्कन्धे ह्यण्डरा गदिता जिनैः ॥६६॥

असंख्यलोकतुल्याब्दैकैकस्मिन्नण्डरे स्मृताः।
आवासास्ते ह्यसंख्यातलोकमात्रा न संशयः ॥६७॥

एकैकस्मिन् तथावासे प्रोक्ता पुलवयोऽखिलाः।
असंख्यलोकमाना एकैकस्मिन् पुलवौ भवे ॥६८॥

असंख्यातशरीराणि लोकमानानि सन्ति च।
एकैकस्मिन्निकोतानां शरीरे प्राणिनो ध्रुवम् ॥६९॥

अतीतानन्तकालोत्थानन्तसिद्धेभ्य एव च।
सर्वेभ्य आगमे प्रोक्ता वाण्यानन्तगुणा जिनैः ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 65 से 70): जैसे जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र है, भरतक्षेत्र में कौशल देश है, कौशल देश में अयोध्या नगरी है और एक-एक अयोध्या नगरी में अनेक प्रासाद (महल) पंक्तियाँ हैं, उसी प्रकार असंख्यात लोक प्रमाण पुद्गल परमाणुओं का एक स्कन्ध और एक-एक स्कन्ध में असंख्यात लोक, असंख्यात लोक प्रमाण अण्डर जिनेन्द्र द्वारा कहे गये हैं। पृथक्-पृथक् एक-एक अण्डर में असंख्यात-असंख्यात लोक प्रमाण आवास हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। पृथक्-पृथक् एक-एक आवास में असंख्यात लोक-असंख्यात लोक प्रमाण पुलवियाँ हैं, एक-एक पुलवि में असंख्यात लोक-असंख्यात लोक प्रमाण शरीर हैं और पृथक्-पृथक् एक-एक निगोद शरीर में जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा आगम में अतीत और आगामी अनन्तकाल में होने वाले सर्व अनन्त सिद्धों के अनन्तगुणी जीव राशि कही गई है। अर्थात् अतीत और अनागत में होने वाली सर्व सिद्ध राशि का जितना प्रमाण है, उससे अनन्तगुणे जीव एक निगोद शरीर में रहते हैं ॥६५-७०॥


शैवालं पणकंनाम केणुगः कवगस्तथा।
पुष्पिकेत्यादयः सन्त्यनन्तकायाश्च बादराः ॥७१॥

अर्थ: शैवाल, पणक, केणुग, कवग और पुष्पक इत्यादि ये सब बादर अनन्तकायिक वनस्पति हैं ॥७१॥


गूढानि स्युः सिरासन्धि पर्वाणि जन्मिनां भुवि।
येषां स्यात्समभङ्गं चाहीरुकं सूत्रसन्निभम् ॥७२॥

छिन्नभिन्नशरीराणि प्ररोहन्त्यप्यनन्ततः।
तेऽत्र साधारणा जीवाः प्रत्येकास्तद्विपर्ययाः ॥७३॥

एते स्युर्बादराजीवाः क्वचिल्लोके क्वचिन्न च।
पृथ्व्यादि कायमापन्नाः पञ्चधाः स्थावराः परे ॥७४॥

सूक्ष्माः पृथ्व्यादयः पञ्चस्थावरा दृष्टयगोचराः।
एते तिष्ठन्ति सर्वत्र प्रपूर्य भुवनत्रयम् ॥७५॥

वनस्पत्यङ्गिनोऽन्ये च स्थावराः सूक्ष्मबादराः।
अनन्तविविधा एते रक्षणीयाः सदाबुधैः ॥७६॥

न प्रतिस्खलनं येषां गत्यादौ सूक्ष्मदेहिनाम्।
पृथ्वीजलाग्निवाताद्यैर्जातु ते सूक्ष्मकायिकाः ॥७७॥

प्रतिस्खलन्ति ये स्थूलाः स्थावरा गमनादिषु।
केचिद्दृश्या अदृश्यास्ते बादराः श्रीजिनैर्मताः ॥७८॥

अर्थ (श्लोक 72 से 78): जिनकी शिरा-बहिः स्नायु, सन्धि-रेखाबन्ध और पर्व-गाँठ अप्रकट हों और जिन वनस्पतियों का भंग करने पर समान भंग हो, दोनों भंगों में परस्पर सूत्र-तन्तु न लगा रहे तथा शरीरों को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी जो उग जाते हैं तथा वृद्धि आदि को प्राप्त होते हैं ऐसे अनन्तकायिक वे सब जीव यहाँ पर साधारण कहे गये हैं। जो जीव इन चिह्नों से रहित हैं, वे प्रत्येक (अप्रतिष्ठित) वनस्पतिकायिक हैं। पृथ्वी आदिक पाँच कायो को धारण करने वाले पाँचों बादर स्थावर जीव इस लोक में कहीं हैं और कहीं नहीं हैं किन्तु दृष्टि अगोचर पृथ्वीकायादि पाँचों सूक्ष्म स्थावर जीव तीनों लोकों को परिपूर्ण करते हुए सर्वत्र रहते हैं। विद्वानों को अन्य अनन्त प्रकार के सूक्ष्म और बादर वनस्पतिकायिक व स्थावर जीवों की रक्षा करना चाहिए। सूक्ष्म नामकर्म के उदय से युक्त पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक आदि के द्वारा जिन जीवों की गति आदि कभी भी रुकती नहीं है, उसे सूक्ष्मकायिक कहते हैं। जिन स्थावर जीवों की गति आदि दूसरों से रुकती है और दूसरों को रोकती है, उन्हें जिनेन्द्र भगवान् ने बादर जीव कहा है इनमें कुछ जीव दृष्टि गोचर होते हैं कुछ दृष्टि अगोचर रहते हैं॥७२-७८॥


प्राणिनो विकलाक्षाश्च सकलाक्षास्ततः परे।
इत्यमी द्विविधाः प्रोक्तास्त्रसा उद्वेगिनोऽसुखात् ॥७९॥

द्वित्रितुर्याख्यभेदाद्यैस्त्रिविधा विकलेन्द्रियाः।
स्युः कृम्याद्या नृगीर्वाणतिर्यञ्चः सकलेन्द्रियाः ॥८०॥

कृमयः शुक्तिकाः शङ्खाः बालुकाश्च कपर्दिकाः।
जलूकाद्या मताः शास्त्रे द्वीन्द्रिया द्वीन्द्रियाङ्किताः ॥८१॥

कुन्थवो मत्कुणा यूका वृश्चिकाश्च पिपीलिकाः।
उद्देहिका हि गोप्याद्यास्त्रीन्द्रियास्थ्यक्षसंयुताः ॥८२॥

मशका भ्रमरा दंशाः पतङ्गा मधुमक्षिकाः।
मक्षिका कीटकाद्याः स्युश्चतुरिन्द्रियजातयः ॥८३॥

जलस्थलनभो गामिनस्तिर्यञ्चो नरामराः।
नारकाः श्रीजिनैः प्रोक्ताः पञ्चाक्षाः सकलेन्द्रियाः ॥८४॥

एतांस्त्रसाङ्गिनः सम्यग्ज्ञात्वा गृहितपोधनाः।
पालयन्तु समित्याद्यैः सर्वत्र स्वमिवान्वहम् ॥८५॥

इति पृथ्व्यादिकायानां जातिभेदान् जिनागमात्।
आख्यायातः सतां वक्ष्ये कुलानि विविधानि च ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 79 से 86): दुःख से उद्वेगित त्रस जीव विकलेन्द्रिय और सकलेन्द्रिय के भेद से दो प्रकार के होते हैं। इनमें से कृमि आदि द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय के भेद से विकलेन्द्रिय जीव तीन प्रकार के होते हैं। मनुष्य, देव और तिर्यञ्च ये सकलेन्द्रिय त्रस हैं। कृमि, सीप, शंख, बालुका, कौड़ी और जोंक आदि दो इन्द्रियों से चिह्नित इन जीवों को द्वीन्द्रिय जीव कहते हैं। कुन्थु, खटमल, जू, बिच्छू, चींटी, दीमक और कनखजूरे आदि तीन इन्द्रियों से युक्त जीवों को त्रीन्द्रिय जीव कहते हैं। मच्छर, भौंरा, डांस, पतङ्गा, मधुमक्खी, मक्खी और कीटक आदि चतुरिन्द्रिय जीव कहलाते हैं। जल-स्थल एवं नभचर तिर्यञ्च, मनुष्य, देव और नारकी ये जीव पंचेन्द्रिय होते हैं, इन्हें ही जिनेन्द्र भगवान् ने सकलेन्द्रिय कहा है। इस प्रकार त्रस जीवों के भेद-प्रभेदों को भली प्रकार जानकर श्रावकों एवं तपोधनों को समितियों आदि के द्वारा अपनी आत्मा के सदृश ही सर्वत्र त्रस जीवों की रक्षा करना चाहिए। इस प्रकार जिनागम से पृथ्वीकाय आदि छह काय के जीवों के जाति भेदों को कहकर अब अनेक प्रकार के कुल भेदों को कहूँगा ॥७९-८६॥


द्वाविंशकोटिलक्षाणि पृथ्वीनां स्युः कुलानि च।
अप्कायासु मतां सप्तकोटी लक्षाणि तेजसाम् ॥८७॥

कुलत्रिकोटिलक्षाणि वायूनां च कुलान्यपि।
स्युः सप्तकोटिलक्षाणि वनस्पत्यङ्गिनां तथा ॥८८॥

कुलानि कोटिलक्षाणि ह्यष्टाविंशतिरेव हि।
द्वीन्द्रियाणां तथा सप्तकोटीलक्षकुलानि च ॥८९॥

त्रीन्द्रियाणां भवन्त्यष्टकोटिलक्षकुलान्यपि।
तुर्याक्षाणां नवैव स्युः कोटिलक्षकुलानि च ॥९०॥

अप्चराणां हि लक्षाणि सार्धद्वादशकोटयः।
कुलानि पक्षिणां द्वादशकोटिलक्षकानि च ॥९१॥

दशैव कोटिलक्षाणि कुलानि स्युश्चतुष्पदाम्।
नवैव कोटिलक्षाण्युरः सर्पाणां कुलानि च॥९२॥

षड्विंशकोटिलक्षाणि कुलानि स्युः सुधाभुजाम्।
पञ्चविंशतिकोटी लक्षाणि नारकजन्मिनाम् ॥९३॥

आर्यम्लेच्छ नभोगामिमनुष्याणां कुलानि च।
द्विसप्तकोटिलक्षाणीति सर्वेषां च देहिनाम् ॥९४॥

एकैवकोटिकोटीनवतिः सार्धनवाधिका।
कोटीलक्षाणि सिद्धान्ते कुलसंख्या जिनोदिता॥९५॥

इत्यङ्गकुलजात्यादीन् सम्यग्ज्ञात्वा बुधोत्तमैः।
षडङ्गिनां दया कार्या धर्मरत्नखनी सदा॥९६॥

अर्थ (श्लोक 87 से 96): (शरीर के भेदों की कारणभूत नाना प्रकार की नोकर्म वर्गणाओं को कुल कहते हैं) पृथ्वीकायिक जीवों की बाइस लाख कोटि, जलकायिक जीवों की सात लाख कोटि, अग्निकायिक जीवों की तीन लाख कोटि, वायुकायिक जीवों की सात लाख कोटि, वनस्पतिकायिक जीवों की २८ लाख कोटि, द्वीन्द्रिय जीवों की सात लाख कोटि, त्रीन्द्रिय जीवों की आठ लाख कोटि, चतुरिन्द्रिय जीवों की ९ लाख कोटि, जलचर जीवों की साढ़े बारह लाख कोटि, पक्षियों की बारह लाख कोटि, चतुष्पद (पशुओं) की दश लाख कोटि, छाती के सहारे चलने वाले सर्प आदिकों की नव लाख कोटि, देवों की २६ लाख कोटि, नारकी जीवों की २५ लाख कोटि तथा आर्य मनुष्य, म्लेच्छ मनुष्य और विद्याधरों (इन सब) की चौदह लाख कोटि, इस प्रकार सम्पूर्ण कुल कहे गये हैं। जिनेन्द्र भगवान् ने आगम में पृथ्वीकायिक से लेकर मनुष्य पर्यन्त सम्पूर्ण संसारी जीवों के कुल कोटि की संख्या का योग एक करोड़ निन्यानवे लाख पचास हजार कोटि (१९९५०००००००००००) कहा है। इस प्रकार विद्वानों को जीवों के कुल और जाति आदि के भेदों को भली प्रकार जानकर धर्मरूपी रत्नों की खान के सदृश निरन्तर छह काय जीवों की दया में उपक्रम करना चाहिए ॥८७-९६॥


सचित्ताचित्तमिश्राख्याः शीतोष्णमिश्रयोनयः।
संवृता विवृता मिश्राश्चेत्येता नवयोनयः ॥९७॥

देवानां नारकाणां चाचित्तयोनिर्विचेतना।
गर्भजानां सचित्ताचित्तयोनिश्चेतनेतरा ॥९८॥

एकाक्षद्वीन्द्रियाणां च त्र्यक्षतुर्येन्द्रियात्मनाम्।
नानापञ्चाक्षसम्मूर्च्छकानां केषाञ्चिदेव च ॥९९॥

सचित्तैकास्तिकेषाञ्चिदचित्तायोनिरञ्जसा ।
केषाञ्चिन्मिश्रयोनिश्चेति त्रिधा योनयो मताः ॥१००॥

देवानां नारकाणां च केषांचिच्छीत योनयः।
उष्णायोनिश्च केषांचिदिति द्विविध योनयः ॥१०१॥

तेजसामुष्णयोनिः स्याच्छीतयोनिर्जलाङ्गिनाम्।
शेषाणां पृथ्वीवायुवनस्पतिशरीरिणाम् ॥१०२॥

एकद्वित्रिचतुःपञ्चाक्षगर्भेतरजन्मिनाम् ।
पृथगैकैक रूपेण शीताद्याःस्युस्त्रियोनयः ॥१०३ ॥।

नारकौकाक्षदेवानां संवृतयोनिरस्ति च।
विवृता विकलाक्षाणां मिश्रा सा गर्भजन्मिनाम् ॥१०४॥

पुनर्भाङ्गियोनीनां शुभाशुभोभयात्मनाम्।
सविशेषास्त्रिधा योनीर्वक्ष्ये योन्यघहानये ॥१०५॥

शङ्खावर्ताह्वया योनिः पराकूर्मोन्नताभिधा।
तृतीया वंशपत्राख्याऽत्रेति त्रिविधयोनयः ॥१०६॥

तीर्थेशाश्चक्रिणो रामा वासुदेवाश्च तद्द्विषः।
कूर्मोन्नतमहायोनौ जायन्ते स्फटिकोपमे ॥१०७॥

वंशपत्राख्य योनौ चोत्पद्यन्ते भोगभूमिजाः।
द्वियोन्योः प्राणिनोऽन्ये शङ्खावर्तवंशपत्रयोः ॥१०८॥

शङ्खावर्तकुयोनौ च नियमेन विनश्यति।
गर्भोऽशुभोऽङ्गिनामेतद्योनीनां लक्षणं भवेत् ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 97 से 109): सचित्त, अचित्त एवं सचित्ताचित्त, शीत, उष्ण एवं शीतोष्ण, संवृत, विवृत एवं संवृत-विवृत (मिश्र) इस तरह योनियाँ नौ प्रकार की हैं। देव और नारकियों की योनियाँ आत्मप्रदेशों से रहित अचित्त होतीं हैं तथा गर्भज जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि होती है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीवों में से किन्हीं जीवों की सचित्त योनि है, किन्हीं की अचित्त योनि है और किन्हीं जीवों के सचित्ताचित्त (मिश्र) योनि है। इस प्रकार सम्मूर्च्छन जन्म वालों के तीनों प्रकार की योनियाँ मानी गई हैं। देव और नारकियों में किन्हीं की शीत योनियाँ, किन्हीं की उष्ण योनियाँ और किन्हीं की शीतोष्ण योनियाँ होतीं हैं। अग्निकायिक जीवों की उष्ण योनि, जलकायिक जीवों की शीत योनि होती है। शेष पृथिवी, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों के तथा एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और सम्मूर्च्छन जन्म वाले पंचेन्द्रिय जीवों के पृथक्-पृथक् एक-एक रूप से शीत आदि तीनों योनियाँ होती हैं। अर्थात् किन्हीं जीवों के शीत, किन्हीं के उष्ण और किन्हीं के मिश्र इस प्रकार तीनों योनियाँ होतीं हैं। देव, नारकी और एकेन्द्रिय जीवों के संवृत योनि होती है। विकलेन्द्रिय जीवों के विवृत (प्रकट) योनि और गर्भज जीवों के नियम से संवृत-विवृत (मिश्र) योनि होती है। इसके पश्चात् योनि सम्बन्धी पाप नाश के लिए शुभ अशुभ कर्मोदय से युक्त गर्भज जीवों के विशेषता पूर्वक तीन प्रकार की योनियाँ कहूँगा। प्रथम शंखावर्त, द्वितीय कूर्मोन्नत और तृतीय वंशपत्र नामक तीन प्रकार की योनियाँ होतीं हैं। स्फटिक की उपमा को धारण करने वाली कूर्मोन्नत नाम की महायोनि में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव और प्रतिवासुदेव उत्पन्न होते हैं। वंशपत्र नाम की योनि में भोगभूमिज और शंखावर्त एवं वंशपत्र इन दोनों में कर्मभूमिज आदि अन्य साधारण मनुष्य जन्म लेते हैं, किन्तु शंखावर्त नामक कुयोनि में नियम से गर्भ का विनाश होता है क्योंकि वह गर्भ अशुभ होता है। इस प्रकार जीवों की इन योनियों का लक्षण कहा है ॥९७-१०९॥


पृथ्व्यप्तेजोमरुत्कायानां सूक्ष्मबादरात्मनाम्।
अङ्गुलस्याप्यसंख्यातभागतुल्यं वपुर्भवेत् ॥११०॥

सूक्ष्मापर्याप्तजातस्य निगोदस्याङ्गिनो मतम्।
तृतीये समये सर्वजघन्याङ्गं जगत्त्रये ॥१११॥

सर्वोत्कृष्टशरीरं स्यान्मत्स्यानां महतां भुवि।
तयोर्मध्ये परेषां स्युर्नाना देहानि देहिनाम् ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 110 से 112): सूक्ष्म और बादर पृथ्‍वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक जीवों के शरीर की अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण होती है। त्रैलोक्य में सर्व जघन्य अवगाहना सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के उत्पन्न होने के तीसरे समय में होती है और शरीर की सर्वोत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यों के होती है। इन दोनों (जघन्योत्कृष्ट) के बीच में अन्य जीवों के शरीर की मध्यम अवगाहना विविध प्रकार की होती है ॥११०-११२॥


पृथ्व्यादीनां च संस्थानं मसूरिकाकणाकृतिः।
अप्कायानां हि संस्थानं दर्भाग्रबिन्दुसन्निभम् ॥११३॥

तेजः कायात्मनां तत् स्यात् सूचीकलापसम्मितम्।
संस्थानं वायुकायानां पताकाकारमेव च ॥११४॥

समादिचतुरस्रं च न्यग्रोधस्वातिकुब्जकाः।
वामनाख्यं हि हुण्डाख्यं संस्थानानीति षड्भुवि ॥११५॥

मनुष्याणां च पश्चाक्षतिरश्चां सन्ति तानि षट्।
देवानामादिसंस्थानं नारकाणां हि हुण्डकम् ॥११६॥

द्वित्रितुर्येन्द्रियाणां च सर्वेषां हरिताङ्गिनाम्।
अनेकाकारसंस्थानं हुण्डाख्यं स्याद् विरूपकम् ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 113 से 117): पृथ्वीकायिक जीवों के शरीर का आकार मसूर के कण सदृश, जलकायिक जीवों के शरीर का आकार डाभ के अग्रभाग पर रखी हुई जलबिन्दु के सदृश, अग्निकायिकों का खड़ी सुइयों के समूह सदृश और वायुकायिक जीवों के शरीर का संस्थान ध्वजा के सदृश होता है। समचतुरस्र संस्थान, न्यग्रोध, स्वाति, कुब्जक, वामन और हुण्डक ये छह संस्थान संसारी जीवों के होते हैं। मनुष्यों और पंचेन्द्रिय तिर्यंचों के छहों संस्थान होते हैं। देवों के समचतुरस्र एवं नारकियों के हुण्डक संस्थान ही होते हैं। द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों के तथा सम्पूर्ण वनस्पतिकायिक जीवों के विविध आकारों को लिए हुए विरूप आकार वाला हुण्डक संस्थान होता है ॥११३-११७॥


म्लेच्छविद्येशमर्त्यानां संज्ञिपञ्चेन्द्रियात्मनाम्।
कर्मभूमिजतिरश्चां च सन्ति संहननानि षट् ॥११८॥

असंज्ञिविकलाक्षाणां लब्ध्यपर्याप्तदेहिनाम्।
अशुभं चान्तिमं हीनं षष्ठं संहननं भवेत् ॥११९॥

वज्रर्षभादिनाराचं वज्रास्थिमयवेष्टितम्।
आद्यं च वज्रनाराचं वज्रास्थिजं द्वितीयकम् ॥१२०॥

नाराचं त्रीणि चेमानि सन्ति संहननानि च।
परिहारविशुद्ध्याख्यसंयमप्राप्तमुनीशिनाम् ॥१२१॥

चतुर्थमर्धनाराचं कीलिकाख्यं च पञ्चमम्।
असम्प्राप्तासृपाद्यादिकं त्रिसंहनानि च ॥१२२॥

इमानि स्युः स्फुटं कर्मभूमिजद्रव्ययोषिताम्।
भोगभूमिजनृस्त्रीणामाद्यं संहननं परम् ॥१२३॥

मिथ्यात्वाद्यप्रमत्तान्तगुणस्थानेषु सप्तसु।
प्रवर्तमानजीवानां सन्ति संहननानि षट् ॥१२४॥

अपूर्वकरणाभिख्येऽनिवृत्तिकरणाह्वये ।
सूक्ष्मादिसाम्परायाख्ये ह्युपशान्तकषायके ॥१२५॥

श्रेण्यामुपशमाख्यायां तिष्ठतां योगिनां पृथक्।
त्रीणि संहननानि स्युरादिमानि दृढानि च ॥१२६॥

अपूर्वकरणाख्ये चानिवृत्तिकरणाभिधे।
सूक्ष्मादिसाम्परायाख्ये क्षीणकषायनामनि ॥१२७॥

सयोगे च गुणस्थानेऽत्राद्यं संहननं भवेत्।
केवलं क्षपकश्रेण्यारोहणकृतयोगिनाम् ॥१२८॥

अयोगिजिननाथानां देवानां नारकात्मनाम्।
आहारकमहर्षीणामेकाक्षाणां वपूंषि च ॥१२९॥

यानि कार्मणकायानि व्रजतां परजन्मनि।
तेषां सर्वशरीराणां नास्ति संहननं क्वचित् ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 118 से 130): म्लेच्छ मनुष्यों, विद्याधरों, मनुष्यों, संज्ञी पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चों और कर्मभूमिज तिर्यंचों के छहों संहनन होते हैं। असंज्ञी तिर्यंचों के, विकलेन्द्रिय जीवों के और लब्ध्यपर्याप्तक जीवों के अन्तिम असम्प्राप्तसृपाटिका नाम का छठा अशुभ संहनन होता है। वज्रमय वृषभ, कीलें एवं अस्थि से युक्त और वज्रमय वेष्टन से वेष्टित पहला वज्रर्षभनाराच संहनन, वज्रमय नाराच (कीलों) व अस्थियों से युक्त दूसरा वज्रनाराच संहनन है और तीसरा नाराच संहनन है। ये तीनों संहनन परिहार विशुद्धि संयम से युक्त मुनिराजों के होते हैं। चौथा अर्धनाराच, पाँचवाँ कीलक और छठा असम्प्राप्तसृपाटिका ये तीनों संहनन कर्मभूमिज द्रव्य वेदी स्त्रियों के होते हैं। भोगभूमिज मनुष्यों और स्त्रियों के आदि का एक उत्कृष्ट संहनन होता है। मिथ्यात्व गुणस्थान से लेकर सप्तम गुणस्थान पर्यन्त सात गुणस्थानों में प्रवर्तमान जीवों के छहों संहनन होते हैं। उपशम श्रेणी गत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय और उपशान्तकषाय गुणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के आदि के तीन दृढ़ संहननों में से कोई एक होता है। क्षपक श्रेणीगत अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय, क्षीणकषाय और सयोगकेवलि गुणस्थानों में प्रवर्तमान मुनिराजों के आदि का मात्र एक वज्रर्षभनाराच संहनन ही होता है। अयोगी जिनों के, देवों के, नारकियों के, आहारक शरीरी महाऋषियों के एकेन्द्रिय जीवों के और आगामी पर्याय में जन्म लेने के लिए विग्रह गति में जाने वाले कार्मण काय युक्त जीवों के संहनन नहीं होता। अर्थात् इन जीवों का शरीर छहों संहननों से रहित होता है ॥११८-१३०॥


एकाक्षविकलाक्षाणां सर्वेषां नारकात्मनाम्।
सम्मूछर्नजपञ्चाक्षाणां वेदैको नपुंसकः ॥१३१॥

भोगभूमिभवार्याणां चतुर्विधसुधाभुजाम्।
विश्वानां भवतो वेदौ द्वौ स्त्रीपुंसंज्ञकौ भुवि ॥१३२॥

शेषाणां गर्भजानां च तिरश्चां मनुजात्मनाम्।
स्त्रीपुंनपुंसकाभिख्याः सन्ति वेदास्त्रयः पृथक् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 131 से 133): सम्पूर्ण एकेन्द्रिय जीवों के, विकलेन्द्रिय जीवों के, नारकी जीवों के और सम्मूर्च्छन पंचेन्द्रिय जीवों के एक नपुंसक वेद ही होता है। भोगभूमिज आर्यों के तथा चारों निकायों के देवों के स्त्री और पुंवेद नाम वाले दो ही वेद होते हैं। शेष सम्पूर्ण मनुष्यों एवं तिर्यंच जीवों के पृथक्-पृथक्, स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद नाम के तीनों वेद होते हैं ॥१३१-१३३॥


मृदुपृथ्वीशरीराणामुत्कृष्टमायुरूर्जसा ।
द्विषड्वर्षसहस्राणि खरपृथ्वीमयात्मनाम् ॥१३४॥

द्वाविंशतिसहस्राणि वर्षाणां जीवितं परम्।
सप्तसहस्रवर्षाण्यप्कायानां सुष्ठुजीवितम् ॥१३५॥

तेजोमयकुकायानामायुर्दिनत्रयं भवेत्।
त्रीणि वर्षसहस्राणि ह्यायुर्वाताङ्गिनां परम् ॥१३६॥

दशवर्षसहस्राण्यायुर्वनस्पति देहिनाम्।
वर्षाणि द्वादशैवायुः प्रवरं द्वीन्द्रियाङ्गिनाम् ॥१३७॥

त्रीन्द्रियाणां तथैकोनपञ्चाशद्दिनजीवितम्।
षण्मासप्रमितायुष्कं चतुरिन्द्रियजन्मिनाम् ॥१३८॥

मत्स्यानां परमायुः स्यात्पूर्वकोटिप्रमाणकम्।
सरीसृपाङ्गिनामायुर्नवपूर्वाङ्गसम्मितम् ॥१३९॥

द्वासप्ततिसहस्त्राब्दप्रममायुश्चपक्षिणाम् ।
उरगाणां द्विचत्वारिंशत्सहस्त्राब्दजीवितम् ॥१४०॥

एकाक्षद्वित्रितुर्याक्षाणां जघन्यायुरिष्यते।
कृताष्टादशभागानामुच्छ्वासस्यैक भागकः ॥१४१॥

संज्ञिनामल्पमृत्य्आदियुतापुण्यनृणां भवेत्।
अन्तर्मुहूर्तमायुष्यं सर्वजघन्यमत्र च ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 134 से 142): मृदु पृथ्वीकायिक जीवों की उत्कृष्ट आयु बारह हजार वर्ष की, खर पृथ्वीकायिक जीवों की बाइस हजार वर्ष की, जलकायिक जीवों की उत्कृष्टायु सात हजार वर्ष की, अग्निकायिक जीवों की तीन दिन की और वायुकायिक जीवों की तीन हजार वर्ष की उत्कृष्ट आयु है। वनस्पतिकायिक जीवों की उत्कृष्ट आयु दस हजार वर्ष की, द्वीन्द्रिय जीवों की बारह वर्ष, त्रीन्द्रिय जीवों की उनचास (४९) दिन की और चतुरिन्द्रिय जीवों की उत्कृष्ट आयु छह मास प्रमाण होती है। महामत्स्यों की उत्कृष्ट आयु एक कोटि पूर्व की, सरीसृप जीवों की नव पूर्वांग अर्थात् सात करोड़ ५६ लाख वर्षों की, पक्षियों की बहत्तर हजार वर्षों की और सर्पों की बयालीस हजार वर्षों की उत्कृष्ट आयु होती है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय तथा चतुरिन्द्रिय जीवों की जघन्य आयु श्वास के अठारह भागों में से एक भाग प्रमाण होती है। गर्भज संज्ञी जीवों की अल्पायु और पुण्यहीन गर्भज मनुष्यों की सर्व जघन्य आयु मात्र अन्तर्मुहूर्त प्रमाण की होती है ॥१३४-१४२॥


श्रोत्रेन्द्रियस्य संस्थानं यवनालसमाकृतिः।
चक्षुरिन्द्रियसंस्थानं वृत्तं मसूरिकासमम् ॥१४३॥

संस्थानं घ्राणखस्यास्यतिलकपुष्पसंनिभम्।
जिह्वेन्द्रियस्य संस्थानमर्धचन्द्रसमानकम् ॥१४४॥

स्पर्शनेन्द्रियसंस्थानमनेकाकारमस्ति च।
समादिचतुरस्त्रादि भेदभिन्नं च षड्विधम् ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 143 से 145): कर्णेन्द्रिय का आकार यव की नाली के सदृश, चक्षुरिन्द्रिय का आकार मसूर सदृश (गोल) घ्राणेन्द्रिय का आकार तिल के पुष्प सदृश और जिह्वा इन्द्रिय का आकार अर्धचन्द्र सदृश कहा गया है। स्पर्शनेन्द्रिय का आकार अनेक प्रकार का होता है क्योंकि समचतुरस्र आदि के भेदों से संस्थान छह प्रकार के होते हैं ॥१४३-१४५॥


द्रव्यभावविभेदाभ्यामिन्द्रियं द्विविधं स्मृतम्।
अन्तर्निर्वृत्ति बाह्योपकरणाद्द्रव्यखं द्विधा ॥१४६॥

लब्ध्युपयोग भेदाभ्यां द्विधा भावेन्द्रियं मतम्।
अन्तरात्मप्रदेशोत्थं कर्मक्षयसमुद्भवम् ॥१४७॥

अर्थ (श्लोक 146 से 147): द्रव्येन्द्रियों और भावेन्द्रियों के भेद से इन्द्रियाँ दो प्रकार की होती हैं। इनमें अभ्यन्तर में रचना और बाह्य में उपकरणों के भेद से द्रव्येन्द्रियाँ दो प्रकार की तथा लब्धि एवं उपयोग के भेद से कर्मों के क्षयोपशम से आत्म प्रदेशों में उत्पन्न होने वालीं भावेन्द्रियाँ भी दो प्रकार की हैं ॥१४६-१४७॥


पृथिव्यादिवनस्पत्यन्तैकाक्षाणां मतः श्रुते।
स्पर्शाख्यो विषयो लोके धनुःशतचतुष्टयम् ॥१४८॥

द्वीन्द्रियाणां भवेत्स्पर्शविषयो दूरतो भजन्।
स्पर्शाक्षेण विषयार्थान् धनुरष्टशतप्रमः ॥१४९॥

विषयो रसनाख्योत्थश्चतुः षष्टि धनुः प्रमः।
त्रीन्द्रियासुमतां स्पर्श विषयः स्पर्शन क्षमः ॥१५०॥

स्पर्शार्थीनां च चापानां स्यात्षोडशशतप्रमः।
जिह्वाक्ष विषयश्चापशताष्टाविंशतिर्भवेत् ॥१५१॥

घ्राणाक्षविषयव्याप्तिर्धनुषां शतमानकः।
चतुरिन्द्रियजीवानां विषयः स्पर्शनाक्षजः ॥१५२॥

द्वात्रिंशच्छतचापानि विषयो रसनाक्षजः।
धनुषां द्विशते षट् पञ्चाशदग्ररसादिवित् ॥१५३॥

घ्राणाख्यविषयश्चापशतद्वयप्रमाणकः ।
विषयश्चक्षुरक्षोत्थो दूरार्थदर्शको भवेत् ॥१५४॥

चतुःपञ्चाशदग्रैकोनत्रिंशच्छतयोजनः ।
असंज्ञिपञ्चखानां च विषयः स्पर्शनप्रजः ॥१५५॥

चापानां हि चतुःषष्टिः शतानि रसनाक्षजः।
विषयो धनुषां द्वादशाग्रपञ्चशतानि च ॥१५६॥

विषयो घ्राणरवोत्पन्नो धनुः शतचतुः प्रमः।
चक्षुरिन्द्रियसंजात विषयो रूपिदर्शकः ॥१५७॥

योजनानां किलाष्टाग्रैकोनषष्टिशतप्रमः।
श्रोत्राक्ष विषयश्चापाष्टसहस्रप्रमाणकः ॥१५८॥

संज्ञिपञ्चेन्द्रियाणां च स्पर्शाक्षस्याखिलोत्तमः।
रसनाक्षस्य हि घ्राणेन्द्रियस्य विषयो भुवि ॥१५९॥

प्रत्येकं वर्तते स्वस्वार्थेयोजननवप्रमः।
सहस्त्राः सप्तचत्वारिंशत्त्रिषष्ट्यधिके शते ॥१६०॥

द्वे महायोजनानां चैकक्रोशो धनुषां तथा।
दण्डपञ्चदशाग्राणि द्वादशैव शतानि च ॥१६१॥

हस्तैको यवतुर्याशाग्रेद्वेऽङ्गुलेऽखिलोत्तमाः।
इत्यस्ति संज्ञिनां चक्षुर्विषयो दूरदर्शकः ॥१६२॥

श्रोत्रस्य विषयो ज्येष्ठो योजनद्वादशप्रमः।
पञ्चैते विषयोत्कृष्टा ज्ञेया महर्षिचक्रिणाम् ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 148 से 163): आगम में पृथिवीकायिक से लेकर वनस्पतिकायिक पर्यन्त एकेन्द्रिय जीवों के स्पर्श का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ४०० धनुष कहा है। द्वीन्द्रिय जीवों के स्पर्श का विषय क्षेत्र ८०० धनुष है और इन्हीं द्वीन्द्रिय जीवों के रसनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ६४ धनुष प्रमाण है। त्रीन्द्रिय के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १६०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १२८ धनुष और घ्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १०० धनुष प्रमाण है। चतुरिन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र ३२०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २५६ धनुष, घ्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र २०० धनुष और चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र २९५४ योजन प्रमाण होता है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र ६४०० धनुष, रसनेन्द्रिय का ५१२ धनुष, घ्राणेन्द्रिय का ४०० धनुष, चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ५९०८ योजन और श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ८०० धनुष प्रमाण होता है। संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ९ योजन, रसनेन्द्रिय का ९ योजन, घ्राणेन्द्रिय का ९ योजन, चक्षुरिन्द्रिय का विषय क्षेत्र ४७२६३ योजन १ कोस, १२१५ धनुष, १५/१६ हाथ २ अंगुल और १/४ यव प्रमाण है, तथा श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र १२ योजन प्रमाण है, चक्षुरिन्द्रिय आदि का यह उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ऋद्धिमान् मुनिराजों एवं चक्रवर्तियों के ही होता है।


अथैकाक्षादिजीवानां प्रमाणं पृथगुच्यते।
वनस्पतौ निगोदाङ्गिनोऽनन्ताः प्रोदिता जिनैः ॥१६४॥

पृथ्वीकायिका अप्कायिकास्तेजोमयाङ्गिनः।
वायुकाया इमे सर्वे प्रत्येकं गदिता जिनैः ॥१६५॥

असंख्यलोकमात्राश्चासंख्यलोकस्य सन्त्यपि।
यावन्तोऽत्रप्रदेशास्तावन्मात्राः सूक्ष्मकायिकाः ॥१६६॥

पुनस्ते पृथ्वीकायाद्याश्चतुर्विध बादराः।
पृथग् वासंख्यमात्रा अयं विशेषोऽस्ति चागमे ॥१६७॥

द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रियास्तूर्येन्द्रियाः पञ्चेन्द्रिया मताः।
प्रत्येकं चाप्यसंख्याताः श्रेणयः परमागमे ॥१६८॥

प्रतराङ्गुलसंज्ञस्यासंख्येयभाग सम्मिताः।
अथ वक्ष्ये गुणस्थानैः संख्याश्वभ्रादिजाङ्गिनाम् ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 164 से 169): अब एकेन्द्रिय आदि जीवों का पृथक्-पृथक् प्रमाण कहते हैं। वनस्पतिकायिक जीवों में जिनेन्द्र भगवान् ने निगोद जीवों को अनन्तानन्त कहा है। जिनेन्द्रदेव के द्वारा बादर पृथ्वीकायिक, बादर जलकायिक, बादर अग्निकायिक और बादर वायुकायिक जीव असंख्यात लोक मात्र अर्थात् असंख्यातासंख्यात कहे गये हैं और असंख्यात लोक के प्रदेशों का जितना प्रमाण है पृथक्-पृथक् उतने ही प्रमाण सूक्ष्म पृथ्वीकायिक, सूक्ष्म जलकायिक, सूक्ष्म अग्निकायिक तथा सूक्ष्म वायुकायिक जीव कहे गये हैं। पुनः बादर पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक जीव पृथक्-पृथक् असंख्यात-असंख्यात ही हैं, आगम में यह विशेष है। परमागम में द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय एवं पंचेन्द्रिय जीवों का पृथक्-पृथक् प्रमाण असंख्यात श्रेणी कहा गया है अर्थात् द्वीन्द्रिय जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं, त्रीन्द्रिय जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं, इत्यादि (परन्तु पूर्व-पूर्व द्वीन्द्रियादिक की अपेक्षा उत्तरोत्तर त्रीन्द्रियादिक का प्रमाण क्रम से हीन-हीन है और इसका प्रतिभागहार आवलि का असंख्यातवाँ भाग है)। असंख्यात श्रेणी का प्रमाण प्रतरांगुल का असंख्यातवाँ भाग माना गया है। अब मैं गुणस्थानों के माध्यम से नरकादि गतियों में उत्पन्न जीवों की संख्या कहूँगा ॥१६४-१६९॥


युतद्विशतप्रमाः स्युः। क्षीणकषायगुणस्थानवर्तिनः क्षपकाः अष्टानवतियुक्तपञ्चशतसम्मिताश्च। सयोग-
गुणस्थानाश्रिताः सयोगिजिनः अष्टलक्षाष्टानवति सहस्रपञ्चशत द्विप्रमाणाः भवेयुः। अयोगगुणस्थान-
स्थिताः अयोगिजिनः अष्टानवतियुतपञ्चशत प्रमाः उत्कृष्टेन स्युः। एते सर्वे पिण्डीकृताः प्रमत्ताद्ययोगि-
गुणस्थानपर्यन्त वर्तिनस्तपोधनाः त्र्यूननवकोटिप्रमाः उत्कृष्टेन सार्धद्वीपद्वये चतुर्थकाले भवन्ति। देवगतौ
मिथ्यादृष्टयो ज्योतिष्कव्यन्तरादेवाः असंख्याताः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः। भवनवासिनः
मिथ्यादृष्टयोऽमराः असंख्याता श्रेण्यः घनाङ्गुलप्रथमवर्गमूलप्रमाणाः स्युः। सौधर्मेशानवासिनो नाकिनः
मिथ्यादृष्टयः असंख्याताः श्रेणयः घनाङ्गुलतृतीयवर्गमूलप्रमिताः। सनत्कुमारादि कल्पकल्पातीत
वासिनो मिथ्यादृष्टयोऽमराः श्रेण्य-संख्येयभागप्रमिताः असंख्यातयोजनकोटीप्रदेशमात्रा स्युः।
ज्योतिष्कव्यन्तराः भवनवासिनः सौधर्मेशाननाकिनः। सनत्कुमारादिकल्पकल्पातीतवासिनः सासादन
सम्यग्मिथ्यादृष्ट्यविरताः प्रत्येकं पल्योपमासंख्येयभागप्रमाणाः सन्ति।

अर्थ: नरकगतिगत प्रथम नरक में मिथ्यादृष्टि नारकी जीव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं, जो घनांगुल के कुछ कम द्वितीय वर्गमूल प्रमाण है। द्वितीय पृथ्वी से सप्तम पृथ्वी पर्यन्त के छह नरकों में मिथ्यादृष्टि जीव श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। सातों नरक भूमियों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवों का पृथक्-पृथक् प्रमाण पल्योपम के असंख्यातवें भाग है। तिर्यंचगति में मिथ्यादृष्टि जीव अनन्त हैं। सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और देशसंयत जीव पृथक् पृथक् पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। मनुष्यगति में मिथ्यादृष्टि मनुष्य श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं, और वह श्रेणी का असंख्यातवाँ भाग असंख्यात कोड़ाकोड़ी योजन प्रमाण है। सासादन गुणस्थानवर्ती जीव ५२ करोड़ प्रमाण हैं। तृतीय गुणस्थानवर्ती सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्य १०४ करोड़ प्रमाण, चतुर्थ गुणस्थान में अविरत सम्यग्दृष्टि मनुष्य ७०० करोड़ प्रमाण, पंचम गुणस्थान में देशसंयत मनुष्य उत्कृष्टतः १३ करोड़ प्रमाण हैं। प्रमत्त गुणस्थान में प्रमत्तसंयत मुनिराज उत्कृष्टतः ५९३९८२०६ हैं। अप्रमत्त गुणस्थान में अप्रमत्तसंयत मुनिराज २९६९९१०३ हैं। अपूर्वकरण गुणस्थान में उपशम श्रेणीगत योगी २९९ हैं और क्षपक श्रेणीगत क्षपक जीव ५९८ हैं। अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में उपशम श्रेणीगत जीव २९९ और क्षपक श्रेणीगत ५९८ हैं। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में उपशम श्रेणि आरोहित मुनिराज २९९ हैं और क्षपकश्रेणिगत मुनिराज ५९८ हैं। उपशान्तकषाय गुणस्थान स्थित मुनिराजों का प्रमाण २९९ है तथा क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती योगियों का प्रमाण ५९८ है। सयोग गुणस्थान में सयोगिजिनों की सर्वोत्कृष्ट संख्या प्रमाण ८९८५०२ है। अयोग गुणस्थान स्थित अयोगिजिनों का प्रमाण उत्कृष्टतः ५९८ होता है। चतुर्थकाल में अढ़ाई द्वीप स्थित छठे गुणस्थान से १४ वें गुणस्थान पर्यन्त के सर्व योगिराजों का योग करने पर सर्व तपोधनों का उत्कृष्ट प्रमाण ८९९९९९९७ अर्थात् तीन कम नौ करोड़ प्राप्त होता है। देवगति में ज्योतिष्क और व्यन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात श्रेणी स्वरूप प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण और भवनवासी मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्रेणी स्वरूप अर्थात् घनांगुल के प्रथम वर्गमूल प्रमाण श्रेणी हैं। सौधर्मेशान स्वर्गों में मिथ्यादृष्टि देव असंख्यात श्रेणी स्वरूप अर्थात् घनांगुल के तृतीय वर्गमूल प्रमाण श्रेणियाँ हैं। सानत्कुमारादि कल्पों में और कल्पातीत स्वर्गों में मिथ्यादृष्टि देव श्रेणी के असंख्यातवें भाग अर्थात् असंख्यात योजन करोड़ क्षेत्र के जितने प्रदेश हैं उतनी संख्या प्रमाण हैं। ज्योतिष्कों, व्यन्तरवासी देवों, सौधर्मेशान स्वर्गों, सानत्कुमारादि कल्पों और कल्पातीत विमानों में सासादन सम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवों का प्रत्येक स्थानों में पृथक्-पृथक् प्रमाण पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र है।


चतुर्गतिषु संसारे मध्ये स्युः सकलाङ्गिनाम्।
अत्यल्पा मानवाः श्रेण्यसंख्येयभागमात्रकाः ॥१७०॥

मनुष्येभ्योऽप्यसंख्यातगुणानरकयोनिषु ।
नारकाः स्युरसंख्याताः श्रेणयो दुःखविह्वलाः ॥१७१॥

नारकेभ्योऽप्यसंख्यातगुणादेवाश्चतुर्विधाः ।
भवन्ति प्रतरासंख्येयभागसम्मिताः शुभाः ॥१७२॥

देवेभ्यः सिद्धनाथाः स्युरनन्तगुणमानकाः।
सिद्धेभ्योऽखिलतिर्यञ्चः सन्त्यनन्तगुणप्रमाः ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 170 से 173): इस चतुर्गति संसार में पंचेन्द्रिय जीवों में मनुष्य सबसे स्तोक हैं, इनका प्रमाण श्रेणी के असंख्यातवें भाग मात्र है। नरक भूमियों में दुःख से विह्वल नारकी जीव मनुष्यों से असंख्यातगुणे हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं। नारकियों से असंख्यातगुणे चतुर्णिकाय के देव हैं, जो प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। देवों से अनन्त गुणे सिद्ध भगवान् हैं और सिद्धों से अनन्त गुणे तिर्यंच जीव हैं ॥१७०-१७३॥


सप्तमे नरके सन्ति सर्वस्तोकाश्च नारकाः।
तेभ्योऽपि नारकेभ्यः स्युरुपर्युपरिवर्तिषु ॥१७४॥

षट्पृथ्वी नरकेष्वत्र नारकाः सुखदूरगाः।
असंख्यातगुणाः प्रत्येकं दुःखाम्बुधिमध्यगाः ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 174 से 175): सप्तम नरक में नारकी जीव सबसे स्तोक हैं। सप्तम नरक के नारकियों से ऊपर-ऊपर की छहों नरक पृथिवियों में दुःखरूपी समुद्र के मध्य डूबे हुए अत्यन्त दुःखी नारकी जीव असंख्यात गुणे असंख्यात गुणे अधिक अधिक हैं। अर्थात् सप्तम नरक के नारकियों से छठे नरक के नारकी असंख्यात गुणे, छठे से पाँचवें में असंख्यात गुणे इत्यादि ॥१७४-१७५॥


सप्तम्यां पृथिव्यां सर्वस्तोकाः नारकाः। श्रेण्यसंख्येयभागप्रमाणाः श्रेणिद्वितीयवर्गमूलेन खण्डित-
श्रेणिमात्राः तेभ्यः सप्तमपृथ्वीनारकेभ्यः। षष्ठ्यां पृथ्व्यां नारकाः असंख्यातगुणाः, श्रेणितृतीयवर्गमूलेनापहृत्य
श्रेणि मात्राः स्युः, षष्टपृथ्वीनारकेभ्यः। पञ्चम्यां पृथ्व्यां नारकाः असंख्येयगुणाः, श्रेणि षष्ट वर्गमूलापहृतस्य
श्रेणिमात्राश्च पञ्चमपृथ्वीनारकेभ्यः। चतुर्थ्यां पृथ्व्यां नारकाः असंख्यातगुणाः, श्रेण्यष्टमवर्गमूलापहृत
श्रेणिसम्मिताः चतुर्थपृथ्वीनारकेभ्यः। तृतीयायां पृथिव्यां नारकाः असंख्येयगुणाः, श्रेणि दशमवर्गमूलापहृत
श्रेणि लब्धमात्राः, तृतीयपृथ्वीनारकेभ्यः। द्वितीयायां पृथ्व्यां नारकाः असंख्यातगुणाः श्रेणिद्वादश-
वर्गमूलखण्डित श्रेण्यैकभाग परिमिताः स्युः। द्वितीय पृथ्वी नारकेभ्यः प्रथमायां पृथ्व्यां नारका
असंख्यातगुणाः, घनाङ्गुलवर्गमूलमात्राः श्रेणयो भवन्ति।

अर्थ: सप्तम पृथ्वी में नारकी जीव सबसे कम अर्थात् श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। (सात राजू की श्रेणी होती है) श्रेणी के दूसरे वर्गमूल से श्रेणी को भाग करने पर जो लब्ध प्राप्त होता है, उतने प्रमाण सप्तम नरक के नारकी जीवों की संख्या है। सप्तम पृथ्वी से छठी पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के तृतीय वर्गमूल से श्रेणी को अपहृत (भागित) करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण नारकी जीव छठी पृथ्वी में हैं। छठी पृथ्वी से पाँचवीं पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के छठे वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतने प्रमाण पाँचवें नरक के नारकी जीवों की संख्या है। पाँचवीं पृथ्वी से चतुर्थ पृथ्वी में नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के अष्टम वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जितना लब्ध प्राप्त होता है, उतने ही प्रमाण चतुर्थ पृथ्वी के नारकी जीवों का है। चतुर्थ पृथ्वी से तृतीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं। श्रेणी के दसवें वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतनी संख्या प्रमाण जीव तृतीय पृथ्वी में हैं। तृतीय पृथ्वी से द्वितीय पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यातगुणे हैं। श्रेणी के बारहवें वर्गमूल से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो, उतने प्रमाण जीव द्वितीय पृथ्वी में हैं, वे श्रेणी के एक भाग प्रमाण प्राप्त होते हैं। द्वितीय पृथ्वी से प्रथम पृथ्वी के नारकी जीव असंख्यात गुणे हैं, वे संख्या में घनांगुल के वर्गमूल प्रमाण श्रेणियों के बराबर हैं अर्थात् श्रेणी को घनांगुल के वर्गमूल से गुणित करने पर जो संख्या प्राप्त हो तत्प्रमाण (प्रथम पृथ्वी में नारकी) हैं।


पञ्चेन्द्रिया हि तिर्यञ्चः सर्वस्तोका महीतले।
भवन्ति प्रतरासंख्यातभाग प्रमितास्ततः ॥१७६॥

पञ्चाक्षेभ्यश्चतुर्यक्षाः स्युर्विशेषाधिका भुवि।
स्वकीयराश्यसंख्यातभागमात्रेण दुःखिनः ॥१७७॥

तुर्याक्षेभ्यस्तथा द्वीन्द्रियाः विशेषाधिका मताः।
विशेषाः स्वस्वराशोश्चासंख्यातभागमात्रकाः ॥१७८॥

द्वीन्द्रियेभ्यस्तथा त्रीन्द्रिया विशेषाधिकाः स्मृताः।
विशेषः स्वस्वराशेरसंख्येयभागमात्रकाः ॥१७९॥

त्रीन्द्रियेभ्यस्तथैकाक्षा अनन्तगुणसम्मिताः।
अथ वक्ष्ये नृणां संख्याल्पबहुत्वं यथागमम् ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 176 से 180): तिर्यंच राशि की अपेक्षा संसार में पंचेन्द्रिय तिर्यंच जीव सर्व स्तोक अर्थात् प्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। पंचेन्द्रिय तिर्यंचों से अत्यन्त दुःख से युक्त चतुरिन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं। अर्थात् पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की राशि के असंख्यातवें भाग प्रमाण अधिक हैं। चतुरिन्द्रिय जीवों से द्वीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं। वह विशेष का प्रमाण अपनी-अपनी राशि अर्थात् चतुरिन्द्रिय राशि का असंख्यातवाँ भाग है। द्वीन्द्रिय जीव राशि से त्रीन्द्रिय जीव विशेष अधिक हैं। विशेष का प्रमाण अपनी-अपनी राशि अर्थात् द्वीन्द्रिय जीव राशि का असंख्यातवाँ भाग मात्र है। त्रीन्द्रिय जीव राशि के प्रमाण से एकेन्द्रिय जीव राशि अनन्तगुणी अधिक है। अब मैं आगम के अनुसार मनुष्यों की संख्या का अल्पबहुत्व कहूँगा ॥१७६-१८०॥


भवन्ति नृगतौ सर्वस्तोकाः संख्यातमानवाः।
अन्तर्द्धीपेषु विश्वेषु पिण्डितास्तेभ्य एव च ॥१८१॥

अन्तर्द्धीपमनुष्येभ्यः संख्यातगुणसम्मिताः।
दशसूत्कृष्टसद्भोग भूमिषु प्रवरा नराः ॥१८२॥

तेभ्यो मर्त्याश्च संख्यातगुणाधिका जिनैः स्मृताः।
हरिरम्यक वर्षेषु द्विपञ्चसु सुभोगिनः ॥१८३॥

तेभ्य आर्याश्च संख्यातगुणा दशसु सन्ति वै।
सु हैमवतहैरण्यवतान्त भोगभूमिषु ॥१८४॥

तेभ्योऽपि भरतैरावतेषु द्विपञ्चसु स्फुटम्।
कर्मभूमिषु संख्यातगुणा नराः शुभाशुभाः ॥१८५॥

तेभ्यः पञ्चविदेहेषु संख्यातगुणमानवाः।
तेभ्यः सम्मूर्च्छनोत्पन्ना असंख्यातगुणा नराः ॥१८६॥

भवन्ति श्रेण्यसंख्यातैकभागमात्रका अपि।
स च श्रेणेरसंख्यातभाग आख्यात आगमे ॥१८७॥

असंख्ययोजनैः कोटीकोटिप्रदेशमात्रकाः।
एते स्युर्लब्ध्यपर्याप्ता मर्त्याः सम्मूर्च्छनोद्भवाः ॥१८८॥

नाभौस्तनान्तरे योनौ कक्षायां च निसर्गतः।
सूक्ष्मा नरा इमे स्त्रीणां जायन्ते दृष्ट्यगोचराः ॥१८९॥

शेषा ये गर्भजा मर्त्याः पर्याप्तास्ते न चेतराः।
अथ देवगतौ वक्ष्येऽल्पबहुत्वं जिनागमात् ॥१९०॥

अर्थ (श्लोक 181 से 190): मनुष्यगति में लवणोदधि और कालोदधि समुद्रों में स्थित ९६ अन्तर्द्वीपों के मनुष्यों का प्रमाण एकत्रित करने पर भी वे सर्व स्तोक हैं। अन्तर्द्वीपों के मनुष्यों से पंचमेरु सम्बन्धी दस उत्कृष्ट भोगभूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं। उत्कृष्ट भोगभूमियों के मनुष्यों से पंचमेरु सम्बन्धी हरि-रम्यक नामक दश मध्यम भोगभूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं। मध्यम भोगभूमियों से हैमवत-हैरण्यवत नामक १० जघन्य भोगभूमियों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं और जघन्य भोगभूमियों के प्रमाण से पंच भरत, पंच ऐरावत नामक दस कर्मभूमियों में शुभ अशुभ कर्मों से युक्त मनुष्य संख्यात गुणे हैं। कर्मभूमिज मनुष्यों के प्रमाण से पंच विदेह क्षेत्रों के मनुष्य संख्यात गुणे हैं और विदेहस्थ मनुष्यों के प्रमाण से सम्मूर्च्छन मनुष्यों का प्रमाण असंख्यात गुणा है। जो श्रेणी के असंख्यात भागों में से एक भाग मात्र हैं। आगम में उस श्रेणी के असंख्यातवें भाग का प्रमाण असंख्यात कोड़ाकोड़ी योजन क्षेत्र के जितने प्रदेश होते हैं, उतने प्रमाण कहा है, अतः सम्मूर्च्छन जन्म वाले लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का भी यही प्रमाण है। दृष्टि अगोचर ये सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य कर्मभूमिज स्त्रियों की नाभि, योनि, स्तन और कांख में स्वभावतः उत्पन्न होते हैं। इन अपर्याप्तक मनुष्यों से अवशेष गर्भज मनुष्य पर्याप्त ही होते हैं, अपर्याप्तक नहीं। अब आगमानुसार देवगति में अल्पबहुत्व कहते हैं ॥१८१-१९०॥


विमानवासिनः स्तोकादेवा देव्यो भवन्ति च।
तेभ्योऽसंख्यगुणाः सन्ति दशधा भावनामराः ॥१९१॥

तेभ्योऽसंख्यगुणा देवा व्यन्तरा अष्टधा मताः।
तेभ्यः पञ्चविधा ज्योतिष्काः संख्यातगुणाः स्मृताः ॥१९२॥

अर्थ (श्लोक 191 से 192): देवगति में विमानवासी देव देवियों का प्रमाण सर्व स्तोक है। विमानवासी देवों के प्रमाण से दस प्रकार के भवनवासी देवों का प्रमाण असंख्यात गुणा है। भवनवासी देवों से आठ प्रकार के व्यन्तर देवों का प्रमाण असंख्यात गुणा है और व्यन्तर देवों से पाँच प्रकार के ज्योतिषी देवों का प्रमाण संख्यात गुणा है ॥१९१-१९२॥


सर्वार्थसिद्धौ स्तोका अहमिन्द्रामराः स्युः। तेभ्यो विजयवैजयन्तजयन्तापराजितानवानुत्तरेषु
अहमिन्द्राः असंख्यातगुणाः पल्योपमासंख्यातभागप्रमिताश्च । तेभ्यो नवग्रैवेयकानतप्राणतारणाच्युतेषु
देवाः असंख्यातगुणाः पल्योपमासंख्यातभागसम्मिताः । तेभ्यः शतारसहस्रार कल्पयोर्नाकिनः
असंख्यातगुणाः, श्रेणिचतुर्थ-वर्गमूलखण्डित श्रेण्‍येकभाग प्रमाः तेभ्यः शुक्रमहाशुक्रयोर्देवा असंख्यातगुणाः,
श्रेणि पञ्चमवर्गमूलखण्डित श्रेण्‍येकभागसम्मिताः । तेभ्यः लान्तवकापिष्ठयोर्गीर्वाणा असंख्यातगुणाः,
श्रेणिसप्तमवर्गमूलखण्डित श्रेण्‍येकभागप्रमिताः । तेभ्यो ब्रह्मब्रह्मोत्तरयोरमराः असंख्यातगुणाः,
श्रेणिनवमवर्गमूलखण्डित श्रेण्‍येकभागमात्राः । तेभ्यः सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवाः असंख्यातगुणाः,
श्रेण्‍येकादशमवर्गमूलखण्डित श्रेण्‍येकभागमात्राः । तेभ्यः सौधर्मेशानयोः गीर्वाणाः असंख्याताः । एते
सर्वे सौधर्मादि सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तविमानवासिनोऽमराः असंख्यातश्रेणि मात्राः घनाङ्गुलतृतीयवर्गमूल
मात्राः साधिकाः श्रेणयः। तेभ्यः असंख्यातगुणाः दशविधा भवनवासिनः असंख्यातश्रेणयः
घनाङ्गुलप्रथमवर्गमूलमात्राः श्रेणयः । तेभ्यः असंख्यातगुणाः, अष्टप्रकाराः व्यन्तरामराः प्रतरासंख्यात-
भागमात्राः संख्यातप्रतराङ्गुलैः श्रेणेर्भागे हृते यल्लब्धं तावन्मात्राः श्रेणयो भवन्ति । तेभ्यः पञ्चविधा
ज्योतिष्काः संख्यातप्रमाः प्रतरासंख्यातभागमात्राः पूर्वोक्त संख्यातगुणहीनसंख्येयप्रतराङ्गुलैः श्रेणेर्भागे
हृते तावन्मात्राः श्रेणयो भवन्ति।
आहारोऽथ शरीरं चेन्द्रियानप्राणसंज्ञकौ।
भाषा मन इमाः षट् स्युः पर्याप्तयोऽत्र संज्ञिनाम् ॥१९३॥

अर्थ: देवगति गत सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र देव सबसे स्तोक हैं। इनसे विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित में तथा नवोत्तर विमानों में स्थित सर्व अहमिन्द्र देव असंख्यात गुणे अर्थात् पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। इनसे नव ग्रैवेयक, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत स्वर्गों के देव संख्यात गुणे अर्थात् पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। इनसे शतार-सहस्रार स्वर्ग के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के चतुर्थ वर्गमूल का श्रेणी में भाग देने पर जो लब्ध प्राप्त हो उसके एक भाग प्रमाण हैं। इनसे शुक्र-महाशुक्र कल्प के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के पंचम वर्गमूल से भाजित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे लान्तव-कापिष्ठ कल्प के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के सप्तम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर कल्प के देव श्रेणी के नवम वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्प के देव असंख्यात गुणे अर्थात् श्रेणी के ग्यारहवें वर्गमूल से खण्डित श्रेणी के एक भाग प्रमाण हैं। इनसे सौधर्मेशान कल्प के देवों का प्रमाण असंख्यात गुणा है। सौधर्म स्वर्ग से सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त के सर्व विमानवासी देव असंख्यात श्रेणी प्रमाण हैं अर्थात् घनांगुल के तृतीय वर्गमूल से कुछ अधिक प्रमाण श्रेणियाँ हैं। इनसे असंख्यात गुणे दस प्रकार के भवनवासी देव हैं, जो असंख्यात श्रेणी प्रमाण अर्थात् घनांगुल के प्रथम वर्गमूल का जितना प्रमाण है, उतनी श्रेणियों के प्रमाण हैं। इनसे असंख्यात गुणे आठ प्रकार के व्यन्तर देव हैं, वे जगतप्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात् संख्यात प्रतरांगुलों से श्रेणी को भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो उतनी श्रेणियों प्रमाण हैं। इनसे संख्यात गुणे पाँच प्रकार के ज्योतिषी देव हैं। वे ज्योतिष देव जगतप्रतर के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। अर्थात् पूर्वोक्त संख्यात प्रतरांगुलों से संख्यातगुणे हीन प्रतरांगुलों द्वारा श्रेणी को खण्डित करने पर जो प्रमाण आये उतनी श्रेणियाँ हैं।


असंज्ञिविकलाक्षाणां स्युस्ताः पञ्च मनो विना।
एकाक्षाणां चतस्रश्च पर्याप्तयो वचो विना ॥१९४॥

पञ्चेन्द्रियाह्वयाः प्राणा मनोवाक्कायजास्त्रयः।
आनप्राणस्तथायुश्चामी प्राणा दश संज्ञिनाम् ॥१९५॥

असंज्ञिनां नवप्राणास्ते भवन्ति मनो विना।
चतुरिन्द्रियजीवानामष्टौ श्रोत्रं विनापरे ॥१९६॥

त्रीन्द्रियाणां च ते प्राणाः सप्त चक्षुर्विना स्मृताः।
द्वीन्द्रियाणां च षट् प्राणाः सन्ति घ्राणेन्द्रियं विना ॥१९७॥

पृथिव्यादि वनस्पत्यन्तपञ्चस्थावरात्मनाम्।
एकाक्षाणां चतुःप्राणा रसनाक्ष वचोऽतिगाः ॥१९८॥

पञ्चेन्द्रियाह्वयाः प्राणा आयुः शरीरमित्यमी।
सप्तप्राणा अपर्याप्तसंज्ञि पञ्चाक्षजन्मिनाम् ॥१९९॥

पञ्चाक्षायुः शरीराख्याः प्राणाः सप्तभवन्ति च।
असंज्ञिनामपर्याप्तपञ्चेन्द्रियात्तदेहिनाम् ॥२००॥

चत्वारइन्द्रियः प्राणा आयुः काय इमे मताः।
प्राणाः षट् भुव्यपर्याप्तचतुरिन्द्रिय जन्मिनाम् ॥२०१॥

स्पर्शाक्षरसनघ्राणाक्षायुः काया अपीत्यमी।
प्राणाः पञ्चह्यपर्याप्तत्रीन्द्रियासुमतां स्मृताः ॥२०२॥

स्पर्शाजिह्वाक्षकायायुः प्राणाश्चत्वार एव हि।
आगमे कीर्तिता द्वीन्द्रियापर्याप्ताङ्गिनां जिनैः ॥२०३॥

स्पर्शेन्द्रियशरीरायुः प्राणास्त्रयो मता जिनैः।
अपर्याप्तपृथिव्यादिपञ्चस्थावर जन्मिनाम् ॥२०४॥

अर्थ (श्लोक 193 से 204): (गृहीत आहार वर्गणा को खल-रस आदि रूप परिणमाने की जीव की शक्ति के पूर्ण होने को पर्याप्ति कहते हैं।) आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा और मन इस प्रकार पर्याप्ति के छह भेद हैं। संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के छहों पर्याप्तियाँ होतीं हैं। असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों के और विकलेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जीवों के मन पर्याप्ति के बिना पाँच तथा एकेन्द्रिय जीवों के मन और वचन के बिना चार पर्याप्तियाँ होती हैं। प्राण-(जिनके सद्भाव में जीव में जीवितपने का और वियोग होने पर मरणपने का व्यवहार हो उन्हें प्राण कहते हैं)। पाँच इन्द्रिय (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण) प्राण, मनोबल, वचनबल और कायबल के भेद से तीन बल प्राण, एक श्वासोच्छ्वास और एक आयु इस प्रकार दस प्राण होते हैं। असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के मनोबल को छोड़कर शेष नव प्राण होते हैं। चतुरिन्द्रिय जीवों के श्रोत्रेन्द्रिय को छोड़कर आठ प्राण, त्रीन्द्रिय जीवों के चक्षु को छोड़कर सात प्राण और द्वीन्द्रिय जीवों के घ्राणेन्द्रिय को छोड़कर शेष छह प्राण होते हैं। पृथ्वीकायिक से लेकर वनस्पतिकायिक पर्यन्त पाँचों स्थावर जीवों के रसनेन्द्रिय और वचनबल को छोड़कर शेष चार प्राण होते हैं। संज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पाँच इन्द्रियाँ, कायबल और आयु इस प्रकार सात प्राण होते है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्तक जीवों के पाँच इन्द्रियाँ, कायबल और आयु ये ही सात प्राण होते हैं। अपर्याप्तक चतुरिन्द्रिय जीवों के चार इन्द्रियाँ, आयु और काय बल ये छह प्राण होते हैं। अपर्याप्तक त्रीन्द्रिय जीवों के स्पर्शन, रसना और घ्राण ये तीन इन्द्रियाँ, आयु और कायबल ये पाँच प्राण होते हैं। जिनेन्द्रों के द्वारा आगम में अपर्याप्तक द्वीन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, आयु और कायबल ये चार प्राण कहे गये हैं। जिनेन्द्र के द्वारा स्पर्शनेन्द्रिय, कायबल और आयु ये तीन प्राण अपर्याप्तक पृथ्वी आदि पाँच स्थावर जीवों के कहे गये हैं ॥१९३-२०४॥

एकादश अधिकार जीवों के भेद-प्रभेदों का वर्णन (भाग 2/2)

ये पृथ्वीकायिकाप्कायिका वनस्पतिदेहिनः।
द्वित्रितुर्याक्षपञ्चाक्षा लब्ध्यपर्याप्तिकाश्च ये ॥२०५॥

पृथ्व्यादिकवनस्पत्यन्ताः सूक्ष्माः निखिलाश्च ये।
जीवाः पर्याप्तिकापर्याप्ताप्तेजोवायुकायिकाः ॥२०६॥

सूक्ष्मबादरपर्याप्तापर्याप्ताः सकलाश्च ये।
असंज्ञिनश्च सर्वेषां तेषां मध्ये विधेर्वशात् ॥२०७॥

उत्पद्यन्ते व्रतातीतास्तिर्यञ्चो मानवाः अघात्।
तस्मिन्नेव भवे मृत्वा स्वार्त्तध्यानकुलेश्यया ॥२०८॥

पृथ्वीकायास्तथाप्कायिका वनस्पतिकायिकाः।
सूक्ष्मबादरपर्याप्तपर्याप्ताविकलेन्द्रियाः ॥२०९॥

एते कर्मलघुत्वेन जायन्ते तद्भवे मृताः।
नृतिर्यग्भवयोर्मध्ये काललब्ध्या न संशयः ॥२१०॥

सूक्ष्मबादरपर्याप्तापर्याप्तानलकायिकाः ।
सूक्ष्मबादरपर्याप्तपर्याप्तवायुकायिकाः ॥२११॥

न लभ्यन्ते मनुष्यत्वं मृत्वा तस्मिन् भवे क्वचित्।
किन्त्वेते केवलं तिर्यग्योनिं यान्ति कुकर्मभिः ॥२१२॥

प्रत्येकाख्य वनपत्यङ्गिषु पृथ्व्यम्बुयोनिषु।
वादरेषु च पर्याप्तेषु जायन्ते विधेर्वशात् ॥२१३॥

आर्तध्यानेन दुर्मृत्युं प्राप्य संक्लिष्टमानसाः।
तिर्यञ्चो मानवा देवास्तस्मिन्भवे व्रतातिगाः ॥२१४॥

नृगतौ भोगभूम्यादि वर्जितायां सुरेषु च।
भावनव्यन्तरं ज्योतिष्केषु नरकादिमे ॥२१५॥

कर्मभूमिजतिर्यग्योनिषु सर्वासु तद्भवे।
तिर्यञ्चोऽसंज्ञिपर्याप्ता उत्पद्यन्ते स्वकर्मणा ॥२१६॥

तिर्यञ्चो मानवा भोगभूजास्तद्भोगजास्तथा।
यान्ति देवालयं सर्वे नूनं मन्दकषायिणः ॥२१७॥

अर्थ (श्लोक 205 से 217): पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इन लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में पर्याप्त एवं अपर्याप्तक सूक्ष्मकाय पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिकायिक जीवों में, समस्त अग्निकायिक, वायुकायिक जीवों में तथा सम्पूर्ण असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक, अपर्याप्तक जीवों में पापकर्म के वशीभूत होते हुए व्रत रहित तिर्यंच और मनुष्य उत्पन्न होते हैं तथा आर्तध्यान एवं कुलेश्याओं से युक्त सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक पृथ्वी कायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक जीव एवं पर्याप्तक-अपर्याप्तक विकलेन्द्रिय जीव इन पर्यायों से मरकर कर्मों के कुछ मंदोदय से एवं काललब्धि से मनुष्यों तथा तिर्यंचों में उत्पन्न होते हैं। सूक्ष्म, बादर, पर्याप्तक और अपर्याप्तक अग्निकायिक जीव तथा सूक्ष्म-बादर पर्याप्तक और अपर्याप्तक वायुकायिक जीव इन भवों से मरकर कभी भी मनुष्य पर्याय प्राप्त नहीं करते, दुष्कर्मों के कारण मात्र तिर्यंच योनियों में ही उत्पन्न होते हैं। संक्लेश परिणामों से युक्त तथा व्रतरहित तिर्यंच, मनुष्य और देव आर्तध्यान एवं कर्मोदय के वश से दुर्मृत्यु को प्राप्त न होकर बादर पर्याप्तक पृथ्वीकायिक, जलकायिक और प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवों में उत्पन्न होते हैं। अपने कर्मों के वशीभूत होते हुए असंज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच मरकर भोगभूमिज मनुष्यों को छोड़कर मनुष्यगति में, भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिष्क रूप देवगति में, प्रथम नरक में तथा कर्मभूमिज तिर्यंच योनि में उत्पन्न होते हैं। भोगभूमिज तिर्यंच और मनुष्य नियम से देवों में ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि वे स्वभाव से मन्दकषायी होते हैं ॥२०५-२१७॥


इति विविध सुभेदैर्जीवयोनीर्विदित्वा
गतिकुलवपुरायुः स्थानसंख्याद्यनेकैः।
स्वपरहित वृषाप्त्यै प्रोदिता ज्ञानदृष्टया,
सुचरणशिवकामाः स्वात्मवत्पालयन्तु ॥२१८॥

अर्थ: इस प्रकार उत्तम चारित्र के साथ-साथ मोक्ष की इच्छा करने वाले सज्जन पुरुषों को स्वपर हितकारी धर्म की प्राप्ति के लिए जीवों की गति, कुल, शरीर, आयु, संस्थान और संख्या आदि के द्वारा नाना प्रकार के भेदों को ज्ञान चक्षु से भली प्रकार जानकर अपनी आत्मा के सदृश ही जीवों की रक्षा करना चाहिए ॥२१८॥


अधिकारान्त मङ्गल


यैर्जीवादिपदार्थधर्मसकलाः सम्यक् प्रणीता जिनै-
र्ये तत्पालनतो गताः शिवगतिं ये सूरयः प्रत्यहम्।
तद्रक्षां भुवने वदन्ति सुविदो जीवादिरक्षाय ये,
तन्निष्ठा मुनयोऽखिला मम च ते दद्युः स्तुताः स्वान्गुणान् ॥२१९॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा सम्यक् प्रकार से कहे हुए जीवादि पदार्थों एवं सम्पूर्ण धर्मों का पालन करके जो जीव मोक्ष गये हैं, जो आचार्य आदि जीव रक्षा के लिए जीव रक्षा का उपदेश देते हैं और जो ज्ञानवान समस्त मुनिजन उस उपदेश की परम श्रद्धा करते हैं, वे सब पूज्य पंचपरमेष्ठी मुझे अपने-अपने गुण दें। अर्थात् उनके गुण मुझे प्राप्त हों ॥२१९॥

द्वादश अधिकार चतुर्निकाय के देवों का वर्णन, भवनवासी

सद्वासप्ततिलक्षांश्च सप्तकोटिजिनलयान्।
भावनामरवन्द्यार्च्यान् वन्दे तत्प्रतिमाः स्तुवे ॥१॥

अर्थ: भवनवासी देवों के द्वारा वन्दनीय और पूजनीय सात करोड़ बहत्तर लाख जिनालयों की मैं वन्दना करता हूँ तथा उनमें स्थित प्रतिमाओं की स्तुति करता हूँ ॥१॥


अथ वक्ष्ये समासेन भावनादिपुरस्सरान्।
देवांश्चतुर्विधान् नृणां सद्धर्मफलव्यक्तये ॥२॥

अर्थ: प्राप्त किया है समीचीन धर्म का फल जिन्होंने, ऐसे मनुष्यों के लिये भवनवासी आदि हैं आगे जिनके, ऐसे चार प्रकार के देवों का संक्षेप से वर्णन करूँगा ॥२॥


भावना व्यन्तरा ज्योतिष्काः कल्पवासिनोऽमराः।
इमे चतुर्विधाः प्रोक्ताः प्राप्तधर्मफला जिनैः ॥३॥

भावनव्यन्तराणां चाधोलोके भवनानि वै।
मध्यलोके गृहाः सन्ति यावत्सुदर्शनाग्रकम् ॥४॥

दशोनाष्टशतान्यूर्ध्वं गत्वा चित्रामहीतलात्।
योजनानां विमानानि ज्योतिष्काणां भवन्ति च ॥५॥

चित्राभूमितलात्क्षेत्रं सौधर्मस्वर्गसंश्रितम्।
तदाश्रयान्मतास्तेऽपि स्वर्गलोकाश्रिताः सुराः ॥६॥

अथवा देवलोकत्वादूर्ध्वलोकाश्रिताः स्मृताः।
यथास्थानस्थितान् वक्ष्ये क्रमात् तान् सह नाकिभिः ॥७॥

अर्थ (श्लोक 3 से 7): जिनेन्द्र भगवान् ने धर्म का फल प्राप्त करने वाले देव चार प्रकार के कहे हैं-१. भवनवासी, २. व्यन्तरवासी, ३. ज्योतिषी और ४. कल्पवासी (विमानवासी), भवनवासी और व्यंतरों के भवन अधोलोक में हैं किन्तु व्यन्तरों के गृह-आवास मध्यलोक में मेरु पर्वत के अग्रभाग पर्यन्त भी हैं। ज्योतिषी देवों के विमान चित्रा पृथ्वी के (ऊपरी) तल से ७९० योजन की ऊँचाई से लेकर ऊपर (नौ सौ योजन) तक हैं। चित्रा पृथ्वी के तल से सौधर्म आश्रित क्षेत्र है, उसके आश्रय से रहने वाले देव भी स्वर्ग लोक आश्रित जानना चाहिए अथवा चित्रा पृथ्वी तल पर देव रहते हैं इसलिए इसको ऊर्ध्वलोक आश्रित कहा गया है। देवों के स्थान कहाँ पर स्थित हैं उसका और उनके साथ देवों का यथाक्रम से वर्णन करूँगा ॥३-७॥


चित्राभूमिं विहायाधः खरांशे भवनेशिनाम्।
नागादीनां नवानां स्युर्महान्ति भवनानि च ॥८॥

ततोऽसुरकुमाराणां स्फुरद्रत्नमयान्यपि।
भवनान्येव विद्यन्ते पङ्कभागे द्वितीयेके ॥९॥

चित्राभूमेरधो भागेऽल्पर्द्धियुक्त सुधायिनाम्।
योजनद्विसहस्त्रान्तं भवन्ति शाश्वता गृहाः ॥१०॥

योजनानां द्विचत्वारिंशत्सहस्रान्तभूतले।
महर्द्धियुतदेवानां विद्यन्ते प्रवरा गृहाः ॥११॥

लक्षयोजनपर्यन्तं चित्राभूमेरधस्तले।
मध्यमर्द्धियुतानां स्युर्देवानां विपुलालयाः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 8 से 12): चित्रा भूमि को छोड़कर (चित्रा के) नीचे खर भाग में नागकुमार आदि नव प्रकार के भवनवासी देवों के महान वैभवशाली (विमान) भवन हैं और असुरकुमार जाति वाले भवनवासी देवों के रत्नमयी भवन दूसरे पंकभाग में हैं। चित्रा पृथ्वी के अधोभाग से दो हजार योजन नीचे तक अल्प ऋद्धिधारक भवनवासी देवों के शाश्वत भवन हैं। भूतल में बयालीस हजार तक महाऋद्धिधारक भवनवासी देवों के उत्तम भवन हैं और चित्रा भूमि से नीचे एक लाख योजन तक मध्यम ऋद्धिधारक विमानवासी देवों के विपुल भवन हैं ॥८-१२॥


घनाङ्गुलस्य यन्मूलं प्रथमं श्रेणिसंगुणम्।
तत्समा जातिभेदेन दशधा भावनामराः ॥१३॥

अर्थ: घनांगुल के प्रथम वर्ग मूल को जगत्श्रेणी से गुणित करने पर जो प्रमाण प्राप्त होता है, उतने ही दस प्रकार की जाति भेद से युक्त भवनवासी देवों का प्रमाण है ॥१३॥


असुरानागदेवाः सुपर्णाद्वीपास्तथाब्धयः।
विद्युतः स्तनिताख्या दिक्कुमारा अग्निसंज्ञकाः॥१४॥

वाताभिधा इमे देवा दशभेदाः स्वजातितः।
नाना सम्पद्युताः प्रोक्ता भावना आगमे जिनैः॥१५॥

कुमारा इव सर्वत्र क्रीडन्त्येते ततो मताः।
असुरादिकुमाराश्च सर्वे सार्थकनामकाः॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): जिनेन्द्र भगवान् ने आगम में अनेक प्रकार की सम्पत्ति से युक्त भवनवासी देवों के असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार, उदधिकुमार, विद्युतकुमार, स्तनितकुमार, दिक्कुमार, अग्निकुमार और वायुकुमार नामक दस भेद कहे हैं। ये सभी देव कुमारों के सदृश सर्वत्र क्रीड़ा करते हैं, इसलिये इनके असुर कुमार आदि दसों कुलों के अन्त में कुमार शब्द सार्थक नामवाची है ॥१४-१६॥


असुराः कृष्णसद्वर्णा नागाब्धयश्च पाण्डुराः।
स्तनिता दिक्कु माराः स्युः सुपर्णाः काञ्चनप्रभाः॥१७॥

विद्युद् द्वीपाग्नयो नीलवर्णा अत्यन्तसुन्दराः।
अरुणा मरुतोऽत्रेति वर्णभेदान्विता इमे॥१८॥

मणिर्नागस्ततो दीप्तो गरुडो गजसत्तमः।
मकरः स्वस्तिकं वज्रं सिंहश्च कलशस्ततः॥१९॥

तुरगोऽमूनि चिह्नानि राजन्ते मुकुटे क्रमात्।
दशभेदानि दीप्राणि दशानां भावनात्मनाम्॥२०॥

अर्थ (श्लोक 17 से 20): सभी असुरकुमार देव कृष्ण वर्ण के, नागकुमार और उदधिकुमार पाण्डु वर्ण के, स्तनितकुमार, दिक्कुमार और सुपर्णकुमार काञ्चन वर्ण के, विद्युत्कुमार, द्वीपकुमार एवं अग्निकुमार ये सभी देव अत्यन्त सुन्दर नीलवर्ण के हैं और वायुकुमार के देव लालवर्ण के होते हैं। इनमें इस प्रकार वर्ण भेद हैं। दसों कुलों में उत्पन्न असुरकुमार आदि भवनवासी देवों के मुकुटों में क्रम से चूड़ामणि, नाग, गरुड़, उत्तम हाथी, मगर, स्वस्तिक, वज्र, सिंह, कलश और अश्व ये देदीप्यमान दस चिह्न सुशोभित होते हैं ॥१७-२०॥


असुराणां चतुःषष्टि लक्षाणि भवनानि च।
नागानां चतुरग्राशीतिलक्षप्रमिता गृहाः॥२१॥

द्विसप्ततिश्च लक्षाणि सुपर्णानां गृहास्ततः।
द्वीपानामुदधीनां च विद्युतां स्तनितात्मनाम्॥२२॥

दिगाख्यानां तथाग्नीनां प्रत्येकं भवनानि च।
स्युः षट्सप्तति लक्षाणि वातानां गृहसत्तमाः॥२३॥

स्युः षण्णवति लक्षाण्यमी सर्वे पिण्डिता गृहाः।
द्वासप्ततिश्च लक्षाणि सप्तकोटियुतानि च॥२४॥

अर्थ (श्लोक 21 से 24): असुरकुमार देवों के चौंसठ लाख भवन हैं। नागकुमार देवों के चौरासी लाख, सुपर्णकुमार के बहत्तर लाख, द्वीपकुमार के ७६ लाख, उदधिकुमार के ७६ लाख, विद्युत्कुमार के ७६ लाख, स्तनितकुमार के ७६ लाख, दिक्कुमार के ७६ लाख, अग्निकुमार के ७६ लाख और वायुकुमार के ९६ लाख भवन हैं। इन दस कुलों के सर्व भवनों का एकत्रित योग (६४ लाख+८४ लाख+७२ लाख+(७६ लाख×६)+९६=) ७७२००००० अर्थात् सात करोड़ बहत्तर लाख है ॥२१-२४॥


प्रथमश्चमरेन्द्राख्यो वैरोचनो द्वितीयकः।
भूतानन्दस्तृतीयेन्द्रो धरणानन्दसंज्ञकः॥२५॥

वेणुश्च वेणुधारी हि पूर्णो वशिष्ठनामकः।
इन्द्रो जलप्रभाभिख्यो जलकान्त्यभिधानकः॥२६॥

हरिषेणो हरित्कान्तोऽग्निशिखी चाग्निवाहनः।
इन्द्रोऽमितगतिर्नाम्ना तथेन्द्रोऽमितवाहनः॥२७॥

घोषाख्येन्द्रो महाघोषो वेलाञ्जनः प्रभञ्जनः।
एतेऽखिलामराभ्यर्च्या दिव्यलङ्कारभूषिताः॥२८॥

असुरादिकुलानां च क्रमेण द्वि द्वि संख्यया।
भवन्ति विंशतिश्चेन्द्राः स्त्रीमहर्द्धिसुरान्विताः॥२९॥

दक्षिणायां दिशि स्वामी चमरेन्द्रो वसेन्महान्।
उत्तरदिग्विभागे च वैरोचनोऽमरैः समम्॥३०॥

एवं शेषौ पती द्वौ द्वौ दक्षिणोत्तरयोर्दिशोः।
इन्द्रौ च भवतः छत्रसिंहासनाद्यलङ्कृतौ॥३१॥

दशानामसुरादीनां द्वौ द्वौ चेन्द्रौ प्रतिस्फुटम्।
स्यातां द्वौ द्वौ प्रतीन्द्रौ च दिव्यसम्पत्सुरावृतौ॥३२॥

सर्वे पिण्डीकृता ज्ञेयाः प्रतीन्द्रा विंशतिप्रमाः।
दिव्यरूपधरा दिव्याणिमाद्यष्टर्द्धिमण्डिताः॥३३॥

अर्थ (श्लोक 25 से 33): चमर-वैरोचन, भूतानन्द-धरणानन्द, वेणु-वेणुधारी, पूर्ण-वशिष्ठ, जलप्रभ-जलकान्त, हरिषेण-हरिकान्त, अग्निशिखी-अग्निवाहन, अमितगति-अमितवाहन, घोष-महाघोष, वेलांजन और प्रभंजन ये क्रम से असुरकुमारादि दस कुलों के दो-दो इन्द्र हैं। ये बीसों इन्द्र समस्त भवनवासी देवों से सम्मानित, दिव्य अलंकारों से विभूषित, अनेक देवियों और महाऋद्धिधारी देवों से समन्वित रहते हैं। इनमें चमरेन्द्र दक्षिण दिशा का स्वामी होने से दक्षिण में रहता है और वैरोचन उत्तर दिशा का स्वामी होने से अनेक देवों के साथ उत्तर में निवास करता है। इसी प्रकार छत्र, सिंहासन आदि से अलंकृत शेष नव कुलों के दो-दो इन्द्र क्रमशः दक्षिण और उत्तर दिशा में निवास करते हैं। जिस प्रकार असुरकुमार आदि दस कुलों के दो-दो इन्द्र होते हैं, उसी प्रकार दिव्य वैभव और अनेक देवों से परिवेष्टित प्रत्येक कुल के दो-दो प्रतीन्द्र होते हैं। दिव्य रूप को धारण करने वाले और अणिमा आदि आठ दिव्य ऋद्धियों से मण्डित इन सर्व प्रतीन्द्रों की एकत्रित संख्या भी बीस ही है, ऐसा जानना चाहिए ॥२५-३३॥


प्रागुक्त भवनानां चासुरादिजाति भागिनाम्।
मध्ये स्युश्चमरेन्द्रस्य रत्नोच्चभवनान्यपि ॥३४॥

चतुस्त्रिंशच्चलक्षाणि भूतानन्दस्य सद्गृहाः।
सन्ति लक्षाश्चतुश्चत्वारिंशद्वेणोगृहाः परे ॥३५॥

अष्टात्रिंशच्च लक्षाणि पूर्णाख्यस्य सुरेशिनः।
जलप्रभाख्यशक्रस्य हरिषेणामरेशिनः ॥३६॥

ततोऽग्निशिखिनश्चामितगतेस्त्रिदशेशिनः ।
घोषेन्द्रस्य पृथग्भूताः प्रत्येकं सन्ति सद्गृहाः ॥३७॥

चत्वारिंशच्च लक्षाणि वेलाञ्जनस्य सन्ति च।
पञ्चाशल्लक्षसंख्यानि महान्ति भवनानि च ॥३८॥

वैरोचनस्य धामानि त्रिंशल्लक्षाणि सन्ति च।
धरणानन्दनाम्नश्चत्वारिंशल्लक्षसद्गृहाः ॥३९॥

स्युर्वेणुदारिणो लक्षचतुस्त्रिंशत्प्रमा गृहाः।
वशिष्ठाह्वयशक्रस्य जलकान्ति सुरेशिनः ॥४०॥

हरिकान्तामरेन्द्रस्याग्निवाहनामरेशिनः ।
तथैव ह्यमिताद्यन्तवाहनत्रिदशेशिनः ॥४१॥

महाघोषस्य विद्यन्ते प्रत्येकं भवनानि च।
षड्त्रिंशल्लक्षसंख्यानि प्रभञ्जनामरेशिनः ॥४२॥

भवनानि च षट्चत्वारिंशल्लक्षाणि सन्ति वै।
इत्युक्तसंख्ययुक्तानि नानारत्नमयानि च ॥४३॥

एकैकजिनचैत्यालालङ्कृतोन्नतान्यपि ।
दिव्यैश्चैत्यद्रुमैर्मानस्तम्भैः कूटध्वजोत्करैः ॥४४॥

भूषितानि भृतानि स्त्रीवृन्दसैन्यामरादिभिः।
गीतनर्तनवाद्यादि जिनार्चोत्सर्वकोटिभिः ॥४५॥

रम्याणि विस्फुरच्छुद्धमणिभित्तिमयान्यपि।
दिव्यामोदप्रपूर्णानि सर्वाक्षसुखदानि वै ॥४६॥

इत्युक्तवर्णनैश्चान्यैरागमोक्तसुवर्णनैः ।
राजन्ते भवनान्युच्चैर्दिव्यसम्पत्समुच्चयैः ॥४७॥

सर्वाणि च समस्तानां दक्षिणाशामरेशिनाम्।
दशानां चोत्तरेन्द्राणां भोग्यानि पुण्यपाकतः ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 34 से 48): पूर्व में असुरकुमार आदि दस कुलों के आश्रित भवनों की जो संख्या कही है, उन्हीं के मध्य में इन्द्रों के भवन अवस्थित हैं। रत्नों से निर्मित चमरेन्द्र के उच्च भवनों की संख्या ३४ लाख है। भूतानन्द के भवनों की संख्या ४४ लाख, वेणु के ३८ लाख, पूर्ण के ४० लाख, जलप्रभ इन्द्र के ४० लाख, हरिषेण के ४० लाख, अग्निशिखी के ४० लाख, अमितगति के ४० लाख और घोष नामक इन्द्र के भी ४० लाख भवन हैं तथा वेलाञ्जन के उत्तम भवन ५० लाख हैं। उत्तरेन्द्रों में वैरोचन के भवनों की संख्या ३० लाख, धरणानन्द के ४० लाख, वेणुधारी के ३४ लाख, वशिष्ठ इन्द्र के ३६ लाख, जलकान्त के ३६ लाख, हरिकान्त के ३६ लाख, अग्निवाहन के ३६ लाख, अमितवाहन के ३६ लाख, महाघोष इन्द्र के ३६ लाख और प्रभंजन इन्द्र के ४६ लाख भवन हैं। इस प्रकार उपर्युक्त (७७२ लाख) संख्या से युक्त ये सभी भवन रत्नमय हैं। ये प्रत्येक भवन उन्नत चैत्यालयों से अलंकृत हैं, दिव्य चैत्यवृक्षों, मानस्तम्भों, कूटों और ध्वजा समूहों से विभूषित हैं, देवांगनाओं के समूहों से एवं देवों के सैन्य समूहों से भरे रहते हैं, गीत, नृत्य एवं वाद्य आदि से और जिन पूजन के करोड़ों उत्सवों से रम्य हैं, देदीप्यमान उत्तम मणियों की भित्तियों से निर्मित हैं, दिव्य आमोदों से परिपूर्ण हैं और पाँचों इन्द्रिय के सम्पूर्ण सुखों को देने वाले हैं। इस प्रकार उपर्युक्त वर्णनों से, आगमोक्त एवं अन्य वर्णनों से तथा अति विशाल दिव्य सम्पत्ति समूहों से वे दक्षिणदिशागत सम्पूर्ण भवन अत्यन्त शोभायमान होते हैं। यह सब वर्णन दक्षिण दिशागत समस्त (१०) इन्द्रों का है, उत्तर दिशागत दसों इन्द्रों के भी पूर्व पुण्य के फल से सर्व भोग्य पदार्थ इसी प्रकार जानना चाहिए ॥३४-४८॥


जम्बूद्वीपप्रमव्यासा जघन्या सद्गृहा मताः।
संख्ययोजनविस्ताराः केचिच्च मध्यमाः शुभाः ॥४९॥

असंख्ययोजनव्यासा उत्कृष्टा भवनोत्कराः।
क्रमेणैतेऽसुरादीनां दशधा चैत्यपादपाः ॥५०॥

अश्वत्थः सप्तपर्णाख्यः शाश्वतः शाल्मली द्रुमः।
जम्बूश्च वेतसोवृक्षोऽथप्रियङ्गुः पलाशकः ॥५१॥

शिरीषाख्यः कदम्बश्च राजद्रुम इमे शुभाः।
रत्नपीठाश्रिता रत्नमया रत्नांशुदीपिताः ॥५२॥

असुरादिदशानां दशविधा चैत्यपादपाः।
रत्नोपकरणोपेता दीप्ता भवन्ति शाश्वताः ॥५३॥

मूलेऽमीषां चतुर्दिक्षुप्रत्येकं सुरपूजिताः।
पञ्च पञ्च प्रमाः सन्ति जिनेन्द्रप्रतिमाः पराः ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 49 से 54): भवनवासियों के जघन्य भवनों का व्यास जम्बूद्वीप प्रमाण अर्थात् एक लाख योजन है। मध्यम भवनों का व्यास संख्यात योजन और उत्कृष्ट भवनों का विस्तार असंख्यात योजन प्रमाण है। असुरकुमार आदि दस कुलों के क्रम से अश्वत्थ-पीपल, सप्तपर्ण, शाल्मलि-सेमल, जम्बू-जामुन, वेतस-वेंत का वृक्ष, प्रियंगु, पलाश-ढाक, शिरीष-सिरस, कदम्ब और राजद्रुम-कृतमाल ये दस चैत्यवृक्ष हैं। रत्नपीठ पर स्थित, रत्नमय, रत्नकिरणों से देदीप्यमान, प्रकाशमान रत्न के उपकरणों से युक्त, अत्यन्त रमणीक और शाश्वत ये दस प्रकार के चैत्यवृक्ष असुरकुमार आदि दस कुलों में से क्रमशः प्रत्येक के एक-एक हैं। इन प्रत्येक चैत्यवृक्षों के मूल में चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में देव समूहों से पूज्य परमोत्कृष्ट पाँच-पाँच जिनेन्द्र प्रतिमाएँ हैं ॥४९-५४॥


पञ्चपञ्चप्रमाणाः स्युर्मानस्तम्भा महोन्नताः।
रत्नपीठाश्रिता हेमघण्टाध्वजादि शोभिताः ॥५५॥

तीर्थेशप्रतिमासारैः शिरोभागविराजिताः।
मणिदीप्तांश्च सर्वेषां भवनानां दिशं प्रति ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 55 से 56): सम्पूर्ण भवनों (चैत्यवृक्षों) की प्रत्येक दिशा में तीर्थंकरों की सर्वोत्कृष्ट प्रतिमाओं से जिनके शिरोभाग विभूषित हैं ऐसे देदीप्यमान मणियों से निर्मित, स्वर्णमय घण्टाओं एवं ध्वजाओं से सुशोभित, रत्नपीठ पर स्थित महा उन्नत पाँच-पाँच मानस्तम्भ हैं ॥५५-५६॥


प्रतीन्द्रो लोकपालाश्च त्रायस्त्रिंशासुरास्ततः।
सामान्यकाह्वया अङ्गरक्षाश्च परिषत्सुराः ॥५७॥

सप्तानीकामरा वै प्रकीर्णका आभियोगिकाः।
किल्विषिका इति प्रोक्ता दशभेदाः परिच्छदाः ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 57 से 58): प्रत्येक कुलों में एक-एक इन्द्र के परिवार में प्रतीन्द्र, लोकपाल, त्रायस्त्रिंश, सामानिक, अंगरक्षक, तीन प्रकार के परिषद्, अनीक देव, प्रकीर्णक देव आभियोग्य और किल्विषिक ये दस-दस भेद होते हैं ॥५७-५८॥


एकैकस्यापि शक्रस्य पृथग्भूताः स्वपुण्यजाः।
इन्द्राः सर्वैऽमरैः सेव्या राजतुल्या महर्द्धिकाः ॥५९॥

युवराजसमा विश्र्वे प्रतीन्द्राः सुरसेविताः।
स्वप्रधानसमा लोकपाला देवाः प्रकीर्तिताः ॥६०॥

पुत्रादिसमस्नेहास्त्रायस्त्रिंशासुरा मताः।
मान्यपात्रसमानाः स्युः सामान्याख्यान्निर्जराः ॥६१॥

अङ्गरक्षसमा अङ्गरक्षा इन्द्रान्तवर्तिनः।
अन्तर्मध्यान्तभेदेन त्रिविधाः परिषत्सुराः ॥६२॥

सेनातुल्या अनीकाः प्रकीर्णका नागरोपमाः।
भृत्यवाहनसादृश्या आभियोगिक निर्जराः ॥६३॥

स्वपापपुण्यभोक्तारः किल्विषिका इवान्त्यजाः।
इत्यमी कार्यकर्तार इन्द्राणां च पृथग्विधाः ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 59 से 64): अपने-अपने पुण्य कर्मोदय से एक-एक इन्द्र के पृथक्-पृथक् प्रतीन्द्र आदि दस-दस प्रकार के देव होते हैं। इनमें सर्व देवों से सेव्यमान महाऋद्धि का धारक इन्द्र राजा सदृश होता है। सर्व प्रतीन्द्र युवराज सदृश, सर्व लोकपाल मन्त्री सदृश, सर्व त्रायस्त्रिंश देव स्नेह के भाजन स्वरूप पुत्र आदि के सदृश, सर्व सामानिक देव मान्यपात्र अर्थात् सम्माननीय व्यक्तियों सदृश, इन्द्र के समीप रहने वाले अंगरक्षक देव राजाओं के अंगरक्षक सदृश, तीनों प्रकार के परिषद् देव राजा की अभ्यन्तर, मध्य और बाह्य सभा के सदृश, अनीक जाति के देव सेना सदृश, प्रकीर्णक देव नागरिक-प्रजा सदृश, आभियोग्य देव दास एवं सवारी सदृश और किल्विषिक जाति के देव चाण्डालों आदि के सदृश होते हैं। अपने-अपने पाप और पुण्य के फलों को भोगते हुए ये सभी देव इन्द्र का पृथक्-पृथक् कार्य करते हैं ॥५९-६४॥


इन्द्रतुल्यः प्रतीन्द्रः स्यात्त्रायस्त्रिंश सुरास्तथा।
लोकपालाश्र्च सामान्याका इमे त्रिविधामराः ॥६५॥

विभूत्येन्द्रसमानाः स्युः किञ्चिदूनातपत्रकाः।
सोमः पूर्वदिशः स्वामी दक्षिणाशापतिर्यमः ॥६६॥

वरुणः पश्चिमाशास्थः कुवेर उत्तराधिपः।
चत्वारोऽमी हि दिग्नाथा जिनाङ्घ्रिनम्रमौलयः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 65 से 67): त्रायस्त्रिंश देव, लोकपाल और सामानिक ये तीन प्रकार के देव विभूति (आयु, परिवार, ऋद्धि और विक्रिया) आदि में इन्द्र के सदृश ही होते हैं। केवल इनके छत्र नहीं होता किन्तु प्रतीन्द्र इन्द्र तुल्य ही होते हैं। जिनेन्द्र प्रभु के चरणों में नम्र हैं मुकुट जिनके ऐसे चारों लोकपालों में से सोम पूर्वदिशा के, यम दक्षिण के, वरुण पश्चिम के और कुबेर उत्तर दिशा के स्वामी हैं ॥६५-६७॥


सर्वेन्द्राणां त्रयस्त्रिंशत् त्रायस्त्रिंशासुराः पृथक्।
सामानिकाश्चतुःषष्टिसहस्त्राश्चमरस्य च ॥६८॥

सन्ति वैरोचनेन्द्रस्य सहस्त्राः षष्टिसम्मिताः।
षट्पञ्चाशत्सहस्त्राणि भूतानन्दस्य सन्ति ते ॥६९॥

शेषसप्तदशानां धरणानन्दादिकात्मनाम्।
प्रत्येकं सन्ति सामानिकाः पञ्चाशत्सहस्त्रकाः ॥७०॥

चमरेन्द्रस्य पार्श्वस्था विद्यन्ते तनुरक्षकाः।
षट्पञ्चाशत्सहस्त्राग्रलक्षद्वय प्रमाणकाः ॥७१॥

भवन्त्येवाङ्गरक्षाश्च वैरोचनसुरेशिनः।
चत्वारिंशत्सहस्त्राग्रद्विलक्षसंख्यसम्मिताः ॥७२॥

भूतानन्दसुरेन्द्रस्य भवन्ति चाङ्गरक्षकाः।
चतुर्विंश सहस्त्राधिकलक्षद्वयसंख्यकाः ॥७३॥

धरणानन्दमुख्यानां शेषसप्तदशात्मनाम्।
प्रत्येकमङ्गरक्षाः स्युर्द्विलक्षप्रमिताः पृथक् ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 68 से 74): सभी इन्द्रों के त्रायस्त्रिंश देव पृथक्-पृथक् तैंतीस ही होते हैं। चमरेन्द्र की सभा में सामानिक देवों की संख्या ६४००० है। वैरोचन के ६००००, भूतानन्द के ५६००० और धरणानन्द आदि अवशेष सत्रह इन्द्रों में से प्रत्येक इन्द्र के सामानिक देवों की संख्या ५०, ५० हजार प्रमाण है। चमरेन्द्र के अंगरक्षक देवों का प्रमाण दो लाख ५६ हजार, वैरोचन के दो लाख ४० हजार, भूतानन्द के दो लाख २४ हजार और धरणानन्द आदि सत्रह इन्द्रों के पृथक्-पृथक् दो-दो लाख तनुरक्षक देव होते हैं ॥६८-७४॥


चमराख्यसुरेशस्य चान्तःपरिषदि स्फुटम्।
भवन्ति परिषद्देवा अष्टाविंशसहस्रकाः ॥७५॥

मध्यपरिषदि प्रोक्ता स्त्रिंशत्सहस्रनिर्जराः।
बाह्य परिषद्द्वात्रिंशत्सहस्रामरा मताः ॥७६॥

वैरोचनस्य चान्तः परिषदि प्रोदिताः सुराः।
षड्विंशति सहस्राणि शक्राङ्घ्रिनम्रमस्तकाः ॥७७॥

मध्यपरिषद्विख्यातास्तेऽष्टाविंशसहस्रकाः।
बाह्य परिषदि प्रोक्तास्त्रिंशत्सहस्र निर्जराः ॥७८॥

भूतानन्दस्य चान्तः परिषदि श्रीजिनोदिताः।
आद्यन्त परिषद्देवाः षट्सहस्रप्रमाणकाः ॥७९॥

सुरा अष्टसहस्त्राः स्युर्मध्यपरिषदिस्थिताः।
सहस्रदशगीर्वाणा बाह्यापरिषदिस्थिताः ॥८०॥

शेषाणां धरणान्दादि सप्तदशभागिनाम्।
चतुःसहस्रदेवाः पृथगन्तः परिषत्स्थिताः ॥८१॥

षट्सहस्रप्रमा देवा मध्यपरिषदि स्मृताः।
अष्टौ सहस्रगीर्वाणा बाह्यपरिषदि श्रिताः ॥८२॥

अन्तः परिषदो देव समित्याख्योऽस्ति नायकः।
मध्यापरिषदः स्वामी चन्द्रदेवोऽमरावृतः ॥८३॥

बाह्या परिषदो मुख्यो यदुनामामरोत्तमः।
इत्युक्ता परिषत्संख्या शक्राणामागमे जिनैः ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 75 से 84): चमरेन्द्र की अन्तः परिषद् में पार्षद देवों की संख्या २८ हजार, मध्य परिषद् में ३० हजार और बाह्य परिषद् में ३२ हजार है। वैरोचन के अन्तः परिषद् के देव २६ हजार, मध्य परिषद् के इन्द्र के चरणों में नतमस्तक होने वाले पार्षद देव २८ हजार और बाह्य परिषद् के देव ३० हजार कहे गये हैं। भूतानन्द के अन्तः परिषद् के देव जिनेन्द्र भगवान् ने छह हजार मध्य परिषद् के पार्षद देव आठ हजार और बाह्य परिषद् के दस हजार देव कहे हैं। धरणानन्द आदि सत्रह इन्द्रों के पृथक्-पृथक् अन्तः परिषद् के देव चार-चार हजार, मध्य परिषद् के छह-छह हजार और बाह्य परिषद् के पार्षद देव आठ-आठ हजार हैं। भगवान् जिनेन्द्र के द्वारा आगम में अन्तः परिषद् के अधिनायक देव का नाम समित्, मध्य परिषद् के अधिप देव का नाम चन्द्र और बाह्य परिषद् के अधिनायक देव का नाम यदु कहा है। आगम में प्रत्येक इन्द्रों के परिषद् देवों की संख्या भी पूर्वोक्त प्रकार ही कही गई है ॥७५-८४॥


महिषाः प्रवरा अश्वा रथा गजाः पदातयः।
गन्धर्वा वरनर्तक्य इमे सप्तविधा मताः ॥८५॥

अनीकाः पुण्यजाः सप्त सप्तकक्षान्विताः पृथक्।
प्रत्येकं प्रीतिदाः प्रीता असुरेन्द्रस्य सर्वदा ॥८६॥

नावश्च गरुडा हस्तिनो महामकरास्तथा।
उष्ट्राश्च खड्गिनः सिंहाः शिविका तुरगा इमे ॥८७॥

नवभेदा अनीकाः प्रत्येकं सुरेन्द्रपुण्यजाः।
सुरविक्रियजाः सप्त सप्तकक्षाङ्किताः शुभाः ॥८८॥

मुख्या आद्याश्च नागादीनां नवानां सुधाशिनाम्।
अनुक्रमेण शेषाणां शक्रप्रीतिकराः पराः ॥८९॥

शेषा ये चासुरेन्द्रस्य प्रागुक्तास्तुरगादयः।
षडनीकास्त एव स्युर्नागादीनां यथाक्रमम् ॥९०॥

चमरस्यादिमेऽनीके चतुःषष्टिसहस्त्रकाः।
महिषाः सन्ति चोत्तुङ्गा दीप्ताङ्गाः सुरमण्डिताः ॥९१॥

तेभ्यः शेषेषु सर्वेषु महिषानीकषट्स्वपि।
प्रत्येकं महिषाः सन्ति द्विगुणद्विगुणप्रमाः ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 85 से 92): असुरेन्द्र के पूर्व पुण्य के फल से उत्पन्न होने वाली, प्रीति उत्पन्न कराने वाली और पृथक्-पृथक् सात-सात कक्षाओं से युक्त महिष, श्रेष्ठ अश्व, रथ, गज, पदाति, गन्धर्व और नर्तकी ये सात अनीक-सेनाएँ (देव) होतीं हैं। अवशेष नागकुमार आदि नव भवनवासी इन्द्रों के पुण्यफल स्वरूप, देवों की विक्रिया से उत्पन्न, इन्द्रों को प्रीति उत्पन्न कराने वालों और सात-सात कक्षाओं से युक्त अनीक (सेनाएँ) होतीं हैं। इन अनीकों में प्रत्येक इन्द्र के अनुक्रम से नाव, गरुड़, गज, महामत्स्य, ऊँट, खड्गी (गेंड़ा) सिंह, शिविका और घोड़ा ये प्रमुख होती हैं, शेष छह अनीकें पूर्व में जैसे असुरेन्द्र के क्रमशः घोड़ा, रथ, हाथी आदि कहे हैं उसी प्रकार नागकुमार आदि नव इन्द्रों के भी यथाक्रम से जानना चाहिए। यथा- १. असुरकुमार-महिष, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। २. नागकुमार-नाव, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ३. सुपर्णकुमार-गरुड़, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ४. द्वीपकुमार-हाथी, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ५. उदधिकुमार-मगर, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ६. विद्युत्कुमार-ऊँट, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ७. स्तनितकुमार-खड्गी, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ८. दिक्कुमार-सिंह, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। ९. अग्निकुमार-शिविका, घोड़ा. रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। १०. वायुकुमार-अश्व, घोड़ा, रथ, हाथी, पयादे, गन्धर्व और नर्तकी। (असुरकुमार के) चमरेन्द्र के प्रथम अनीक में देदीप्यमान शरीर वाले, देवताओं से मण्डित और ऊँचे-ऊँचे ६४ हजार महिष हैं। इन्हीं चमरेन्द्र की शेष छह कक्षों में से प्रत्येक कक्ष में महिषों की संख्या का प्रमाण दूना-दूना होता गया है ॥८५-९२॥ अब सात कक्षों में से प्रत्येक कक्ष के महिषों की पृथक्-पृथक् संख्या कहते हैं- चमरेन्द्र की प्रथम कक्ष में ६४ हजार महिष हैं। द्वितीय कक्ष में एक लाख २८ हजार, तृतीय कक्ष में दो लाख ५६ हजार, चतुर्थ कक्ष में ५ लाख १२ हजार, पञ्चम कक्ष में १० लाख २४ हजार, षष्ठ कक्ष में २० लाख ४८ हजार और सप्तम कक्ष में महिषों की संख्या ४० लाख ९६ हजार है। इस प्रकार चमरेन्द्र के सातों अनीकों (कक्षाओं) के महिषों का एकत्रित योग ८१ लाख २८ हजार (८१२८०००) होता है।


इत्येवं महिषानीक समानास्तुरगादयः।
प्रोक्ता गणनयाशेषाः षडनीका पृथक् पृथक् ॥९३॥

पञ्चकोट्योऽष्टषष्टिश्च लक्षाः षण्णवतिस्तथा।
सहस्रा इति संख्याङ्कैः प्रोदिता गणना जिनैः ॥९४॥

पिण्डिता चमरेन्द्रस्य सिद्धान्ते निखिला सताम्।
महिषाश्वादि सप्तानामनीकानां शुभाप्तये ॥९५॥

वैरोचनस्य चानीके प्रथमे महिषा मताः।
षष्टिसहस्रसंख्याश्च तेभ्योऽनीकेषु षट्सुवपि ॥९६॥

शेषेषु महिषाः प्रोक्ता द्विगुणाद्विगुणाः पृथक्।
पूर्ववत्पुनरेतेषां संख्या व्यासेन चोच्यते ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 93 से 97): इस प्रकार चमरेन्द्र की सातों कक्षाओं के महिषों की जितनी संख्या कही गई है, उतनी ही संख्या अश्व आदि अवशेष छह अनीकों की पृथक्-पृथक् कही गई है। जिनेन्द्र भगवान् ने आगम में सज्जनों को शुभ (कल्याण) की प्राप्ति के लिये चमरेन्द्र की महिष, अश्व आदि सातों अनीकों की एकत्रित संख्या का योग ५ करोड़ ६८ लाख ९६ हजार (५६८९६०००) कहा है। वैरोचन की प्रथम अनीक में महिषों की संख्या ६० हजार है। इनके शेष छह कक्षों में महिषों की पृथक्-पृथक् संख्या दुगुनी-दुगुनी है, जो पृथक्-पृथक् कही जाती है ॥९३-९७॥ वैरोचनेन्द्र की प्रथम अनीक में ६० हजार महिष, द्वितीय में एक लाख २० हजार, तृतीय में दो लाख ४० हजार, चतुर्थ में ४ लाख ८० हजार, पंचम में ९ लाख ६० हजार, षष्ठ में १९ लाख २० हजार और सप्तम अनीक में ३८ लाख ४० हजार महिष हैं। इन सातों अनीकों के एकत्रित महिषों का योग ७६ लाख २० हजार (७६२००००) है।


इत्थंभूता बुधैर्ज्ञेया समाना गणनाखिला।
संख्या च शेषषष्णां ह्यश्वाद्यनीकात्मनां पृथक्॥९८॥

पञ्चकोट्यस्त्रयस्त्रिंशल्लक्षास्तथा सहस्रकाः।
चत्वारिंशदिति ज्ञेया संख्या पिण्डीकृताखिला॥९९॥

सप्तानां महिषादीनां सैन्यानां श्रीजिनागमे।
पुण्योदयेन जातानां वैरोचनामरेशिनः ॥१००॥

भूतानन्दस्य नावः स्युरनीके प्रथमेऽपराः।
षट्पञ्चाशतसहस्राणि ताभ्यः क्रमेण पूर्ववत् ॥१०१॥

द्विगुणा द्विगुणा नावः शेषानीकेषु षट्स्वपि।
सुखबोधाय चैतेषां पृथक् संख्या निगद्यते ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 98 से 102): इस प्रकार विद्वानों के द्वारा शेष अश्व आदि छह अनीकों की पृथक्-पृथक् संख्या महिषों की संख्या के सदृश ही जानना चाहिए। जिनागम में वैरोचन इन्द्र के पुण्योदय से उत्पन्न होने वाले महिष आदि सातों अनीकों का एकत्रित प्रमाण पाँच करोड़ तैंतीस लाख चालीस हजार (५३३४००००) जानना चाहिए। भूतानन्द इन्द्र के प्रथम अनीक में ५६००० नाव हैं, इसके बाद अवशेष छह कक्षों में क्रम से यह संख्या दूनी-दूनी होती गई है। सुख-पूर्वक ज्ञान कराने के लिये यह संख्या पृथक्-पृथक् कहते हैं ॥९८-१०२॥ भूतानंद की प्रथम कक्ष अनीक की प्रथम कक्ष में ५६ हजार नाव हैं, द्वितीय में एक लाख बारह हजार, तृतीय में दो लाख २४ हजार, चतुर्थ में ४ लाख ४८ हजार, पंचम में ८ लाख ९६ हजार, षष्ठ में १७ लाख ९२ हजार और सप्तम अनीक में ३५ लाख ८४ हजार नाव है। इन सातों कक्षों की सर्व नावों का एकत्रित योग ७१ लाख १२ हजार (७११२०००) है।


षण्णामश्वादिसैन्यानां शेषाणां नौसमा मता।
संख्या पृथक् पृथग्भूता नर्तक्यन्ता न संशयः॥१०३॥


चतस्रः कोटयो लक्षाः सप्ताग्रनवतिप्रमाः।
सहस्राश्चतुराशीतिश्चैषां पिण्डिताखिला॥१०४॥


सतां संख्या मता सप्तसैन्यानां श्रीजिनेशिना।
पूर्वपुण्योदयोत्थानां भूतानन्दसुरेशिनः॥१०५॥


शेषसप्तदशानां धरणानन्दादिकात्मनाम्।
अनीके प्रथमे नौप्रमुखानि वाहनानि च॥१०६॥


प्रागुक्तानि पृथक् पञ्चाशत्सहस्राणि सन्ति वै।
तेभ्यः संख्यान्यसैन्यानां द्विगुणा द्विगुणा पृथक्॥१०७॥

अर्थ: भूतानन्द इन्द्र की अश्व से लेकर नर्तकी पर्यन्त की शेष छह अनीकों का पृथक्-पृथक् प्रमाण नाव के प्रमाण सदृश ही है, इसमें संशय नहीं। जिनेन्द्र भगवान् ने भूतानन्द इन्द्र के पूर्व पुण्योदय से उत्पन्न सातों अनीकों की एकत्रित संख्या चार करोड़ सत्तानवे लाख चौरासी हजार (४९७८४०००) प्रमाण कही है। धरणानन्द आदि अवशेष सत्रह इन्द्रों के पूर्व कही गई नौ पृथक्-पृथक् प्रमुख अनीकों की प्रथम कक्ष में वाहनों की संख्या पचास हजार प्रमाण है, इनसे आगे-आगे अवशेष छह कक्षों में दूनी-दूनी कही गई है ॥१०३-१०७॥ धरणानन्द आदि अवशेष सत्रह इन्द्रों के पूर्व कहे हुए नाव, गरुड़ आदि वाहन क्रम से प्रथम अनीक के प्रथम कक्ष में ५० हजार, द्वितीय में एक लाख, तृतीय में दो लाख, चतुर्थ में ४ लाख, पंचम में ८ लाख, षष्ठ में १६ लाख और सप्तम में नाव एवं गरुड़ आदि वाहनों की संख्या ३२ लाख प्रमाण है। इस प्रकार एक-एक इन्द्र के पास नाव हैं प्रमुख जिनमें, ऐसे सातों वाहनों का एकत्रित प्रमाण त्रेसठ लाख पचास हजार (६३५००००) है।


षट्शेषाश्वादिकानीकानां संख्यागणना समा।
आद्यानीकेन विज्ञेया विशेषान्तरवर्जिता ॥१०८॥

चतुःकोट्यश्चतुश्चत्वारिंशल्लक्षाः सहस्त्रकाः।
पञ्चाशच्चेति विज्ञेया संख्या गणितकोविदैः ॥१०९॥

सर्वैकत्रीकृता सप्तानीकानां वासवं प्रति।
सप्त सप्त पृथक् कक्षायुक्तानां प्रवरागमे ॥११०॥

षण्णां क्रमाद्यनीकानां स्वामी महत्तरोऽमरः।
नर्तकीनामनीकेऽन्ये देवीमहत्तरी प्रभुः ॥१११॥

देवाः प्रकीर्णका आभियोग्याः किल्विषिकाः पृथक्।
स्वल्पसम्पत्सुखोपेताः संख्यातीताः स्मृता जिनैः ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 108 से 112): अश्व आदि छह अनीकों की संख्या का प्रमाण प्रथम अनीक प्रमाण ही जानना चाहिए, इसमें कोई अन्तर नहीं है। जिनागम में गणितज्ञ पुरुषों के द्वारा सात-सात कक्षाओं से युक्त सातों अनीकों का पृथक्-पृथक् एकत्रित योग चार करोड़ चवालीस लाख पचास हजार (४४४५००००) कहा गया है, यह प्रमाण एक-एक इन्द्र का अलग अलग है। क्रम से छह अनीकों के स्वामी महिष, घोड़ा, रथ, गज, पयादे और गन्धर्व महत्तर देव हैं तथा नृत्यकी नामक सप्तम अनीक की स्वामी महत्तरी (प्रधान) देवी होती है। प्रत्येक इन्द्र के पास अल्प सम्पत्ति और अल्प सुख से युक्त प्रकीर्णक आभियोग्य और किल्विषक जाति के पृथक्-पृथक् असंख्यात असंख्यात देव होते हैं, ऐसा जिनेन्द्र ने कहा है ॥१०८-११२॥


असुराणां च षट्पञ्चाशत्सहस्राणि योषितः।
देव्यो वल्लभिकाः सन्ति सहस्त्रषोडशप्रमाः ॥११३॥


दिव्याः पञ्चमहादेव्यः पञ्चेन्द्रियसुखप्रदाः।
नागानां च स्त्रियः पञ्चाशत्सहस्त्रप्रमास्तथा ॥१९४॥


प्रीता वल्लभिकादेव्यः सहस्रदशसम्मिताः।
दिव्यररूपा महादेव्यः पञ्चशर्मादिखानयः ॥११५॥


सुपर्णानां चतुश्चत्वारिंशत्सहस्रदेवताः।
देव्यो वल्लभिका रम्याश्चतुःसहस्रसम्मिताः ॥११६॥


सन्ति पञ्च महादेव्यो रूपादरसखानयः।
शेष द्वीपादिसप्तानामिन्द्रादीनां सुराङ्गनाः ॥११७॥


स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राणि प्रत्येकं चारूमूर्तयः।
तथा वल्लभिका देव्यो द्विसहस्रप्रमाः प्रियाः ॥११८॥


रम्याः पञ्चमहादेव्यो मनोनयनवल्लभाः।
असुरादि त्रयाणामेकैका देवी निजेच्छया ॥११९॥


विक्रियेर्द्धया सहस्राष्टदिव्यररूपाणि योषिताम्।
विकरोति विनामूलशरीरं च पृथक् पृथक् ॥१२०॥

शेषद्वीपादि सप्तानामेकैका देवता क्षणात्।
प्रत्येकं षट्सहस्राणि स्त्रीरूपाणि सृजेत्स्वयम् ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 120 से 199): असुरकुमारों के ५६००० देवांगनाएँ, १६००० वल्लभिकाएँ और पाँचों इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वालीं पाँच महादेवियाँ होती हैं। नागकुमारों के ५०००० देवांगनाएँ, १०००० वल्लभिकाएँ और पंचेन्द्रियों के सुख की खान स्वरूप, दिव्यरूप धारण करने वालीं पाँच महादेवियाँ हैं। सुपर्णकुमार देवों के ४०००० देवांगनाएँ, अत्यन्त रम्य ४००० वल्लभिकाएँ और रूप एवं रस की खान स्वरूप पाँच महादेवियाँ हैं। द्वीपकुमार आदि शेष सात इन्द्रों में से प्रत्येक इन्द्र की देवियाँ ३२०००, सुन्दर आकृति से युक्त वल्लभिकाएँ २००० और मन एवं नेत्रों को प्रिय लगने वाली अत्यन्त रम्य महादेवियाँ पाँच होती हैं। असुरकुमार, नागकुमार और सुपर्णकुमार इन्द्रों की एक-एक देवी अपनी इच्छा से मूल शरीर को छोड़कर पृथक्-पृथक् दिव्य रूप को धारण करने वाली आठ-आठ हजार देवांगना रूप विक्रिया करतीं हैं। शेष द्वीपकुमार आदि सात इन्द्रों की एक-एक देवी अपनी इच्छा से मूल शरीर को छोड़कर पृथक्-पृथक् छह-छह हजार विक्रिया रूप का सृजन करती हैं ॥१९३-१२१॥


चमरेन्द्रस्य चान्तःपरिषत्स्थित सुधाभूजः।
एकैकस्य पृथक् सन्ति देव्यः सार्धशतद्वयम् ॥१२२॥

द्वितीया परिषद्देवस्य स्त्रियो द्विशतप्रमाः।
तृतीया परिषद् गीर्वाणस्य सार्धशतस्त्रियः ॥१२३॥

वैरोचनस्य चान्तः परिषत्स्थितामृताशिनः।
एकैकस्य पृथग्भूता देव्यस्त्रिशतसम्मिताः ॥१२४॥

द्वितीया परिषत्स्थस्य सार्धद्विशतयोषितः।
तृतीया परिषत्स्थस्य शतद्वयसुराङ्गनाः ॥१२५॥

नागेन्द्रस्यादिमायां परिषद्व्यवस्थितस्य च।
एकैक निर्जरस्य प्रत्येकं देव्यः शतद्वयम् ॥१२६॥

मध्यमायां सुरैकस्य षष्ट्यग्रशतयोषितः।
अन्तिमायां च ताश्चत्वारिंशदग्रशतस्त्रियः ॥१२७॥

सुपर्णस्यादिमायां परिषद्व्यप्यमरस्य च।
एकैकस्याङ्गनाः प्रत्येकं षष्ट्यग्रशतप्रमाः ॥१२८॥

मध्यमायां च चत्वारिंशद्युक्तशतयोषितः।
अन्तिमायां सुरैकस्य विंशत्यग्रशतस्त्रियः ॥१२९॥

शेषद्वीपादिसप्तानामन्तः परिषदि स्फुटं।
देवैकैकस्य चत्वारिंशत्संयुक्तशताङ्गनाः ॥१३०॥

मध्यमापरिषत्स्थस्य विंशत्यग्रशताङ्गनाः।
अन्तिमा परिषद्देवैकस्य सन्ति शतस्त्रियः ॥१३१॥

सेनामहत्तराणां चाङ्गरक्षाणां सुराङ्गनाः।
प्रत्येकं शतसंख्याः स्युः स्वपुण्यपरिपाकजाः ॥१३२॥

सैन्यकानां च पञ्चाशत्स्त्रियः प्रत्येकमञ्जसा।
सर्वनिकृष्टदेवानां स्युर्द्वात्रिंशत्सुराङ्गनाः ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 122 से 133): चमरेन्द्र की अन्तः परिषद् में जितने देव हैं, उनमें एक-एक देव की पृथक्-पृथक् डेढ़-डेढ़ सौ देवियाँ हैं। द्वितीय परिषद् के देवों के दो-दो सौ और तृतीय परिषद् के देवों के साढ़े तीन-साढ़े तीन सौ देवियाँ हैं। वैरोचन इन्द्र की अन्तः परिषद् में जितने देव हैं, उनमें एक-एक देव के पृथक्-पृथक् तीन-तीन सौ देवियाँ हैं। द्वितीय परिषदस्थ देवों में प्रत्येक के पास ढ़ाई-ढ़ाई सौ देवियाँ हैं और तृतीय परिषद् के परिषदों के पास दो-दो सौ देवियाँ हैं। नागेन्द्र की प्रथम परिषदस्थ पारिषद देवों में एक-एक देव के अलग-अलग दो-दो सौ देवियाँ हैं। मध्यम परिषदस्थ देवों के पृथक्-पृथक् एक सौ साठ-एक सौ साठ और अन्तिम परिषदस्थ पारिषदों के एक सौ चालीस देवियाँ हैं। सुपर्ण इन्द्र की प्रथम सभा के देवों में एक-एक के पृथक्-पृथक् एक सौ साठ-एक सौ साठ देवियाँ हैं। मध्यम परिषद् के देवों की एक सौ चालीस-एक सौ चालीस और अन्तिम परिषदस्थ पारिषदों की पृथक्-पृथक् एक सौ बीस-एक सौ बीस देवियाँ हैं। अवशेष द्वीपकुमार आदि सातों प्रकार के इन्द्रों की अन्तः परिषदस्थ देवों में प्रत्येक देव के एक सौ चालीस देवियाँ हैं। मध्यम परिषदस्थ पारिषदों में प्रत्येक देव की एक सौ बीस-एक सौ बीस देवांगनाएँ हैं तथा अन्तिम परिषदस्थ पारिषदों में प्रत्येक देव की सौ-सौ देवांगनाएँ हैं। अनीक देवों के प्रत्येक सेना अधिनायकों (महत्तरों) में प्रत्येक सेनापति के और प्रत्येक अंगरक्षक के अपने-अपने पूर्व पुण्य के फल से उत्पन्न होने वालीं सौ-सौ देवांगनाएँ हैं। प्रत्येक अनीक देवों के पचास-पचास और हीन से हीन देवों के बत्तीस बत्तीस देवांगनाएँ होती हैं ॥१२२-१३३॥


असुराणां भवेदायुरुत्कृष्टं सागरोपमम्।
दशवर्षसहस्राणि जघन्यायुर्न संशयः ॥१३४॥

नागानां परमायुः स्यात्पल्योपम त्रयप्रमम्।
गरुडानां भवत्यायुः सार्धपल्यद्वयं परम् ॥१३५॥

द्वीपानामायुरुत्कृष्टं पल्यद्वयमखण्डितम्।
शेषाब्ध्यादिकषण्णां स्यात्सार्ध पल्यैकजीवितम् ॥१३६॥

अर्थ (श्लोक 134 से 136): असुरकुमारों की उत्कृष्ट आयु एक सागरोपम और जघन्यायु दस हजार वर्ष प्रमाण है। नागकुमारों की तीन पल्योपम और गरुड़कुमारों की उत्कृष्ट आयु २ १/२ पल्योपम प्रमाण है। द्वीपकुमारों की उत्कृष्ट आयु दो पल्योपम तथा शेष छह उदधिकुमारादिकों की उत्कृष्ट आयु डेढ़ (१ १/२) पल्योपम प्रमाण है (जघन्य आयु दस हजार वर्ष है) ॥१३४-१३६॥


इन्द्राणां च प्रतीन्द्राणां लोकपालामृताशिनाम्।
त्रायस्त्रिंशसुराणां च सामानिकसुधाभुजाम् ॥१३७॥

उत्कृष्टायुरिदं ख्यातं तेषां मध्ये सुधाभुजाम्।
उत्तरेन्द्रस्य सिद्धान्ते तदायुः साधिकं मतम् ॥१३८॥

पूज्याः सर्वे प्रतीन्द्राश्च लोकपालामरास्तथा।
त्रायास्त्रिंशसुराः सामानिका एते समानकाः ॥१३९॥

महान्तः स्वस्वशक्रेणायुः सम्पद्ऋद्धिशर्मभिः।
विक्रियाज्ञानदेवाद्यैः किंचिदूनातपत्रकाः ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 137 से 140): इन्द्रों की, प्रतीन्दों की, लोकपाल देवों की, त्रायस्त्रिंश देवों की और सामानिक देवों की उत्कृष्ट आयु समान होती है। इनमें उत्तरेन्द्रों की आयु सिद्धान्त में (दक्षिणेन्द्रों से) कुछ अधिक कही गई है। अन्य देवों द्वारा पूज्य समस्त प्रतीन्द्र तथा लोकपाल देव, त्रायस्त्रिंश देव और सामानिक देवों के छत्र इन्द्र के छत्र से कुछ छोटे होते हैं शेष आयु सम्पत्ति, ऋद्धि, सुख, विक्रिया शक्ति, ज्ञान और देवों के समूह आदि में ये सब अपने-अपने इन्द्र के सदृश ही होते हैं ॥१३७-१४०॥


चमरेन्द्रस्य देवीनां सार्धपल्यद्विजीवितम्।
वैरोचनस्य च स्त्रीणामायुः पल्यत्रयं महत् ॥१४१॥

नागेन्द्रस्याङ्गनानां हि पल्याष्टमांशजीवितम्।
सुपर्णस्यामरस्त्रीणां त्रिकोटिपूर्वजीवितम् ॥१४२॥

द्वीपादिशेषसप्तानां पत्नीनामायुरुत्तमम्।
अल्पमृत्युविनिःक्रान्तं त्रिकोटिवर्षसम्मितम् ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 141 से 143): चमरेन्द्र की देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु अढ़ाई (२ १/२) पल्य, वैरोचन की देवियों की तीन पल्य, नागकुमारेन्द्र की देवांगनाओं की पल्य के ८ वें भाग, सुपर्णकुमारेन्द्र की देवियों की आयु तीन पूर्व कोटि और अपघात मृत्यु से रहित द्वीपकुमार आदि शेष सात इन्द्रों की देवियों की उत्कृष्ट आयु तीन करोड़ (३०००००००) वर्ष की होती है ॥१४१-१४३॥


चमरस्याङ्गरक्षाणां सेनामहत्तरात्मनाम्।
आयुः पल्यं तथा सैन्याकानां पल्यार्धजीवितम् ॥१४४॥

तथा वैरोचनस्याङ्गरक्षकाणां स्वजीवितम्।
सेनामहत्तराणां हि स्वायुः पल्यं च साधिकम् ॥१४५॥

सैन्यकानां च पल्यार्धं साधिकं जीवितं मतम्।
नागेन्द्रस्याङ्गरक्षाणां सेनामहत्तरात्मनाम् ॥१४६॥

पूर्वकोटिप्रमाणायुः सैन्यकानामखण्डितम्।
वर्षकोटिप्रमं चायुस्ततोऽपि गरुडस्य वै ॥१४७॥

अङ्गरक्षकसेनानां महत्तराणां च जीवितम्।
कोटिवर्षप्रमं सैन्यकानां लक्षाब्दजीवितम् ॥१४८॥

शेषद्वीपादिसप्तानामङ्गरक्षामृताशिनाम् ।
सेनामहत्तराणां चायुर्लक्षवर्षमानकम् ॥१४९॥

अनीकाह्वयदेवानामायुः खण्डविवर्जितम्।
वर्षाणां प्रवरं पञ्चाशत्सहस्रप्रमाणकम् ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 144 से 150): चमरेन्द्र के अंगरक्षकों और सेना महत्तरों की आयु एक पल्य प्रमाण तथा अनीक (सेना) देवों की आयु अर्ध पल्य प्रमाण है। वैरोचन इन्द्र के अंगरक्षकों और सेना महत्तरों की आयु एक पल्य से कुछ अधिक तथा अनीक देवों की आयु अर्ध पल्य से कुछ अधिक है। नागकुमार इन्द्र के अंगरक्षकों और सेना महत्तरों की आयु एक कोटि पूर्व की और अनीक देवों की कोटि वर्ष प्रमाण आयु है। गरुड़कुमार इन्द्रों के अंगरक्षकों और सेना महत्तरों की आयु कोटि वर्ष प्रमाण तथा सैनिकों की एक लाख वर्ष प्रमाण है। शेष द्वीपकुमार आदि सात इन्द्रों के अंगरक्षक देवों और सेना महत्तरों की उत्कृष्ट आयु एक लाख वर्ष प्रमाण तथा अनीक देवों की अपघात रहित उत्कृष्ट आयु पचास हजार (५००००) वर्ष प्रमाण है ॥१४४-१५०॥


चमरस्य सुराणामाद्यायां परिषदि स्फुटम्।
सार्धपल्यद्वयं चायुर्द्वितीयायां सुधाभुजाम् ॥१५१॥

पल्यद्वयं तृतीयायां तत्सार्धपल्यसम्मितम्।
वैरोचनस्य देवानामाद्यायां परिषद्यपि ॥१५२॥

त्रिपल्यायुर्द्वितीयायां सार्धद्विपल्यजीवितम्।
तृतीयायां सुराणां चायुर्द्विपल्योपमं मतम् ॥१५३॥

नागस्य निर्जराणां प्रथमायां परिषद्यपि।
आयुः पल्याष्टमो भागो द्वितीयायां सुरात्मनाम् ॥१५४॥

पल्यषोडश भागानामेकोभागोऽस्ति जीवितम्।
तृतीयापरिषदस्थानां गीर्वाणानामखण्डितम् ॥१५५॥

द्वात्रिंशद्विहृतांशानां पल्यस्यैकांशजीवितम्।
वैनतेयस्य चाद्यायां परिषद्यमृताशिनाम् ॥१५६॥

त्रिकोटिपूर्वमानायुर्द्वितीयायां च जीवितम्।
द्विकोटिपूर्वमन्त्यायां कोटिपूर्वायुरुच्यते ॥१५७॥

द्वीपादिशेषसप्तानां देवानां परिषद्यपि।
प्रथमायां भवेदायुस्त्रिकोटिवर्षसम्मितम् ॥१५८॥

द्वितीयायां सुराणां च द्विकोटिवर्षजीवितम्।
तृतीयापरिषदस्थानां कोटिवर्षायुरुत्तमम् ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 151 से 159): चमरेन्द्र की प्रथम परिषदस्थ परिषदों की उत्कृष्ट आयु ढाई (२ १/२) पल्य, द्वितीय परिषद् के परिषदों की आयु दो पल्य की और तृतीय परिषद् के परिषदों की आयु डेढ़ (१ १/२) पल्य की होती है। वैरोचन इन्द्र की प्रथम परिषद् के परिषदों की आयु तीन पल्य, द्वितीय परिषद् के परिषदों की ढाई पल्य और तृतीय परिषद् के परिषदों की आयु दी पल्य प्रमाण है। नागकुमार इन्द्र की प्रथम परिषद् के परिषदों की आयु पल्य के आठवें भाग, द्वितीय परिषद् के परिषदों की आयु पल्य के सोलहवें भाग और तृतीय सभा के देवों की आयु पल्य के बत्तीसवें भाग प्रमाण होती है। गरुड़कुमार इन्द्र की प्रथम सभा के देवों की आयु तीन पूर्व कोटि की, द्वितीय सभा के देवों की दो पूर्व कोटि की और तृतीय सभा के देवों की एक पूर्व कोटि की आयु होती है। द्वीपकुमार आदि शेष सात इन्द्रों की प्रथम परिषद् के परिषदों की आयु तीन करोड़ (३०००००००) वर्ष, द्वितीय परिषद् के परिषदों की दो करोड़ (२०००००००) वर्ष और तृतीय परिषद् के परिषदों की उत्कृष्ट आयु एक करोड़ (१०००००००) वर्ष प्रमाण होती है ॥१५१-१५९॥


असुराणां तनूत्सेधश्चापानि पञ्चविंशतिः।
नागादिनवशेषाणां दशचापोच्चविग्रहः ॥१६०॥

असुराणां हृदाहारो गते वर्षसहस्रके।
उच्छ्वासः स्याद् गते पक्षे नागानां गरुडात्मनाम् ॥१६१॥

द्वीपानां मानसाहारः सार्धद्वादशभिर्दिनैः।
उच्छ्वासोऽपि मुहूत्तैश्च सार्धद्वादशसंख्यकैः ॥१६२॥

अब्धीनां विद्युदाख्यानां स्तनितानां सुधाभुजाम्।
भवेच्च मानसाहारो गतैर्द्वादशभिर्दिनैः ॥१६३॥

दिव्यामोदमयोच्छ्वासो मुहूर्त्तैर्द्वादशप्रमैः।
दिक्कु मारसुराणां चाग्नीनां वातामृताशिनाम् ॥१६४॥

मानसाहार एवस्ति सार्धसप्तदिनैर्गतैः।
स्यादुच्छ्वासो मुहूर्त्तैश्च सार्धसप्तप्रमैर्गतैः ॥१६५॥

अर्थ (श्लोक 160 से 165): असुरकुमार इन्द्र के शरीर का उत्सेध पच्चीस धनुष प्रमाण और शेष नागकुमार आदि नव इन्द्रों के शरीर का उत्सेध दस-दस धनुष प्रमाण है। असुरकुमार देव एक हजार वर्ष व्यतीत हो जाने पर मनसा आहार करते हैं और एक पक्ष व्यतीत हो जाने पर श्वासोच्छ्वास लेते हैं। नागकुमार, गरुड़कुमार और द्वीपकुमार १२ १/२ दिनों में मानसिक आहार करते हैं और १२ १/२ मुहूर्त में उच्छ्वास लेते हैं। उदधिकुमार, विद्युत्कुमार और स्तनितकुमार देव १२ दिन व्यतीत होने पर आहार ग्रहण करते हैं और १२ मुहूर्त व्यतीत होने पर दिव्य एवं सुगन्धमय उच्छ्वास लेते हैं। दिक्कुमार, अग्निकुमार और वायुकुमार देव ७ १/२ दिन व्यतीत हो जाने पर आहार ग्रहण करते हैं और ७ १/२ मुहूर्त व्यतीत हो जाने पर श्वासोच्छ्वास ग्रहण करते हैं ॥१६०-१६५॥


असुराणामुत्कृष्टं चावधिज्ञानं भवोद्भवम्।
योजनानामसंख्यातकोट्यो भवान्तरादिवित् ॥१६६॥

नागादिनवशेषाणां चासंख्यातसहस्रकाः।
योजनानि जघन्यं तत्सर्वेषां पञ्चविंशतिः ॥१६७॥

बहुः स्तोक इतिख्यातोऽवधिश्च दिक्कचतुष्टये।
श्वभ्रभूत्रयपर्यन्तमधोभागेऽवधिर्भवेत् ॥१६८॥

मेरोः शिखरपर्यन्तमूर्ध्वलोकेऽवधिर्मतः।
भावनामरसर्वेषां लक्षयोजनसम्मितः ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 166 से 169): असुरकुमार देवों का अवधिज्ञान का उत्कृष्ट क्षेत्र असंख्यात करोड़ योजन है। ये अपने भवान्तरों को भी जानते हैं। अवशेष नागकुमार आदि नव इन्द्रों का उत्कृष्ट क्षेत्र असंख्यात हजार योजन है। सभी इन्द्रों का जघन्य अवधि क्षेत्र २५ योजन प्रमाण है। चारों दिशाओं में यह अवधि क्षेत्र प्रति अल्प कहा गया है, वैसे सभी भवनवासी देव अपने अवधिज्ञान से नीचे तीसरे नरक पर्यन्त और ऊपर एक लाख योजनों से सम्मित मेरु पर्वत के शिखर पर्यन्त जानते हैं ॥१६६-१६९॥


सौधर्मेन्द्रेण चित्ते चमरेन्द्रः कुरुते वृथा।
सहाकिञ्चित्करामीर्ष्यां क्षेत्रसद्भाववर्तनात् ॥१७०॥

तथैशानसुरेन्द्रेण सहेर्ष्यां निःफलां मुधा।
हृदि वैरोचनेन्द्रोऽपि करोति पापकारिणीम् ॥१७१॥

अर्थ (श्लोक 170 से 171): क्षेत्रगत निमित्त कारण से चमरेन्द्र अपने चित्त में सौधर्मेन्द्र से वृथा ही कुछ ईर्ष्या करता है। इसी प्रकार वैरोचन भी अपने हृदय में ऐशानेन्द्र से पापोत्पादक और निष्फल ईर्ष्या करता है ॥१७०-१७१॥


इत्येवं करणानुयोगकथकं सर्वज्ञवाण्युद्भवम्,
धर्मध्याननिबन्धनं शुभनिधिं व्यावर्णनोत्थं परम्।
श्रीमद्भावनसंज्ञकामृतभुजां सिद्धान्तसारं श्रुतम्,
धर्मध्यानशुभाप्तये मुनिविदो यत्नात् पठन्त्वन्वहम् ॥१७२॥

अर्थ: इस प्रकार जो करणानुयोग को कहने वाला है, सर्वज्ञ की वाणी से निःसृत है, धर्मध्यान का हेतु है, शुभ का खजाना है तथा जिसमें भवनवासी देवों का महान् वर्णन है ऐसे इस सिद्धान्तसार ग्रन्थ का मुनिजन धर्मध्यानरूपी शुभ परिणामों की प्राप्ति के लिये प्रयत्नपूर्वक निरन्तर अध्ययन करें ॥१७२॥


अधिकारान्त मङ्गल


ये तीर्थेशजिनालया मणिमया नागामरैः पूजिताः
स्तुत्या भक्तिभरेण पुण्यनिधयो मेरोरधो भूतले,
या दिव्या जिनमूर्तयोऽति सुभगाश्चैत्यद्रुमेषु स्थिता-
स्तास्तानित्यसुखाप्तयेऽहमनिशं वन्दे स्तुवे भक्तितः ॥१७३॥

अर्थ: मेरु पर्वत के नीचे पृथ्वीतल पर नागकुमार आदि के द्वारा पूजित और भक्ति के भार से स्तुत्य जो जिनेन्द्र भगवान् के मणिमय जिनालय हैं तथा जो चैत्य वृक्षों पर स्थित पुण्य की निधि स्वरूप, दिव्य और अति सुभग जिन प्रतिमाएँ स्थित हैं, उन समस्त प्रतिमाओं की मैं सुख प्राप्ति के लिये भक्ति भाव से अहर्निश वन्दना करता हूँ और स्तुति करता हूँ ॥१७३॥

त्रयोदश अधिकार व्यन्तर देवों का वर्णन

असंख्यव्यन्तरावासस्थितान् सर्वान् जिनालयान्।
व्यन्तरामरवन्द्यार्च्यन् प्रतिमाभिः सह स्तुवे ॥१॥

अथ पञ्चगुरून्नत्वा विश्वकल्याणसिद्धिदान्।
करिष्ये वर्णनं सिद्धयै ह्यष्टधाव्यन्तरात्मनाम् ॥२॥

अर्थ (श्लोक 1 से 2): व्यन्तर देवों से वन्दनीय और पूजनीय व्यन्तर देवों के असंख्यात आवासों में स्थित प्रतिमाओं सहित सम्पूर्ण जिनालयों का मैं स्तवन करता हूँ। इसके बाद विश्व का कल्याण करने वाले और सिद्धि प्रदान करने वाले पंच परमेष्ठियों को नमस्कार करके अब मैं आत्म सिद्धि के लिये आठ प्रकार के व्यन्तर देवों का वर्णन करूँगा ॥१-२॥


आदिमाः किन्नरादेवाः किम्पुरुषा महोरगाः।
गन्धर्वाख्यास्ततो यक्षा राक्षसा भूतनिर्जराः ॥३॥

पिशाचाश्च ह्यमी ज्ञेया अष्टधा व्यन्तरामराः।
अमीषां वर्णभेदादीन् पृथग्वक्ष्येऽधुनाचिदे ॥४॥

अर्थ (श्लोक 3 से 4): किन्नर देव, किम्पुरुष देव, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच ये आठ प्रकार के व्यन्तर देव हैं। अब ज्ञान प्राप्ति के लिये इनके शरीर का वर्ण और इनके भेद अलग-अलग कहता हूँ ॥३-४॥


प्रियङ्गुफलभाः किन्नराश्च किम्पुरुषाः सिताः।
महोरगा हि कृष्णाङ्गा गन्धर्वयक्षराक्षसाः ॥५॥

हेमप्रभास्त्रयो भूताः कृष्णवर्णाः पिशाचकाः।
बहुलप्रभसद्गात्रा अमीषां भेद उच्यते ॥६॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): किन्नर देवों के शरीर का वर्ण प्रियंगुफल सदृश नील वर्ण, किम्पुरुषों का धवल वर्ण, महोरगों का कृष्ण वर्ण, गन्धर्व, यक्ष और राक्षसों का स्वर्ण सदृश वर्ण, भूतों का कृष्ण वर्ण और पिशाच जाति के देवों का पंक सदृश वर्ण होता है। अब इन आठों देवों के भिन्न-भिन्न भेद कहते हैं ॥५-६॥


किन्नरा दशभेदा हि किम्पुरुषा द्विपञ्चधा।
महोरगाश्च तावन्तो गन्धर्वाः स्युर्दशात्मकाः ॥७॥

प्रोक्ता द्वादशधा यक्षाः सप्तप्रकारराक्षसाः ।
भूताः सप्तविधाश्च द्विसप्तभेदाः पिशाचकाः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): किन्नर देवों के दस भेद, किम्पुरुषों के दश भेद, महोरगों के दश भेद, गन्धर्वों के दश भेद, यक्षों के बारह, राक्षसों के सात, भूतों के सात और पिशाचों के चौदह भेद होते हैं ॥७-८॥


आदिमाः किन्नरादेवाः किम्पुरुषास्ततोऽमराः ।
हृदयङ्गमगीर्वाणाः स्वरूपाः पालकामराः ॥९॥

किन्नरकिन्नराः किन्नरनिन्द्याभिधनिर्जराः ।
ततः किन्नरमान्याः किन्नरादिरम्यसंज्ञकाः ॥१०॥

किन्नरोत्तमसंज्ञाश्चैते किन्नरा द्विपञ्चधाः ।
आद्याः सत्पुरुषा देवा महापुरुषसंज्ञकाः ॥११॥

देवाः पुरुषनामानः पुरुषोत्तमनिर्जराः ।
पुरुषप्रभगीर्वाणास्तथातिपुरुषामराः ॥१२॥

वायवो मरुदेवाख्या मरुत्प्रभाभिधानकाः ।
यशोमन्त इमे किम्पुरुषा दशविधा मताः ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 9 से 13): प्रथम किन्नर नाम के व्यन्तर देवों में किन्नर और किम्पुरुष ये दो इन्द्र, हृदयंगम और स्वरूप ये प्रतीन्द्र हैं, शेष पालक किन्नरकिन्नर, किन्नरनिन्द्य, किन्नरमान्य, किन्नररम्य और किन्नरोत्तम ये दस प्रकार के किन्नर देव हैं। सत्पुरुष (इन्द्र), महापुरुष (इन्द्र), पुरुषनाम (प्रतीन्द्र), पुरुषोत्तम (प्रतीन्द्र), पुरुषप्रभ, अतिपुरुष, मरुत, मरुदेव, मरुत्प्रभ और यशोमन्त नाम के दस प्रकार के किम्पुरुष व्यन्तर देव होते हैं ॥९-१३॥


अतिकाया महाकाया भुजगाभिधनिर्जराः ।
ततो भुजगशाल्याख्याः स्कन्धशाल्यभिधानकाः ॥१४॥

मनोहराश्च अशिनाख्या महासुराह्वयामराः ।
गम्भीराः प्रियदर्श्याख्या दशधैते महोरगाः ॥१५॥

आद्यो गीतरतिर्नाम्ना गीतकीर्तिसमाह्वयः ।
हाहाख्यकोऽथ हूहूसंज्ञो नारदश्च तुम्बुरः ॥१६॥

कन्दवो वासवाभिख्यो महास्वरोऽथ धैवतः ।
गन्धर्वकुलनामानि दशधेमानि सन्ति च ॥१७॥

आदिमो मणिभद्रस्तु पूर्णभद्राह्वयस्ततः ।
शैलभद्रो मनोभद्रो भद्रकाख्यः सुभद्रकः ॥१८॥

सर्वभद्रो मनुष्योऽथ धनपालः स्वरूपकः।
यक्षोत्तमो मनोहारी यक्षा द्वादशधा ह्यमी ॥१९॥

आद्यो भीमो महाभीमो विघ्नहारि समाह्वयः।
उदङ्को राक्षसाभिख्यो महाराक्षसनामकः ॥२०॥

ब्रह्मराक्षसनामामी सप्तधा राक्षसा मताः।
स्वरूपः प्रतिरूपाख्यो भूतोत्तमाभिधोमरः ॥२१॥

प्रतिभूतो महाभूतस्ततः प्रच्छन्नसंज्ञकः।
आकाशभूत इत्येते सप्तधा भूतजातयः ॥२२॥

कालाख्योऽथ महाकालः कूष्माण्डो राक्षसोऽमरः।
यक्षः सम्मोहकाभिख्यस्तारकश्चाशुचिः शुचिः ॥२३॥

सतालो देहनामाथ महादेहाभिधानकः।
पूर्णः प्रवचनाख्योऽमी पिशाचाश्च द्विसप्तधा ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 14 से 24): अतिकाय (इन्द्र), महाकाय (इन्द्र), भुजगा (प्रतीन्द्र), भुजगशाल्य (प्रतीन्द्र), स्कंधशाल्य, मनोहर, अशनि, महासुर, गम्भीर और प्रियदर्शी ये दस प्रकार के महोरग व्यन्तर देव हैं। गीतरति (इन्द्र), गीतकीर्ति (इन्द्र), हा हा (प्रतीन्द्र), हू हू (प्रतीन्द्र), नारद, तुम्बुर, कन्दव, वासव, महास्वर और धैवत ये दस प्रकार के गन्धर्व कुल के व्यन्तर देव हैं। मणिभद्र (इन्द्र), पूर्णभद्र (इन्द्र), शैलभद्र (प्रतीन्द्र), मनोभद्र (प्रतीन्द्र), भद्रक, सुभद्रक, सर्वभद्र, मनुष्य, धनपाल, स्वरूपक, यक्षोत्तम और मनोहारी ये बारह प्रकार के यक्ष कुल के व्यन्तर देव हैं। भीम (इन्द्र), महाभीम (इन्द्र), विघ्नहारी (प्रतीन्द्र), उदंक (प्रतीन्द्र), राक्षस, महाराक्षस और ब्रह्मराक्षस ये सात प्रकार के राक्षस व्यन्तर देव हैं। स्वरूप (इन्द्र), प्रतिरूप (इन्द्र), भूतोत्तम (प्रतीन्द्र), प्रतिभूत (प्रतीन्द्र), महाभूत, प्रच्छन्न और आकाशभूत ये सात प्रकार के भूत जाति के व्यन्तर देव हैं। काल (इन्द्र), महाकाल (इन्द्र), कूष्माण्ड (प्रतीन्द्र), राक्षस (प्रतीन्द्र), यक्ष, सम्मोहक, तारक, अशुचि, शुचि, सताल, देह, महादेह, पूर्ण और प्रवचन ये चौदह प्रकार के पिशाच जाति के व्यन्तर देव हैं ॥१४-२४॥


आद्यौ द्वौ द्वाविमाविन्द्रौ पूज्यावेकं कुलं प्रति।
पृथग्भूतौ प्रतीन्द्रौ च द्वौ द्वौ देवार्चितौ परौ ॥२५॥

आद्येन्द्रः किन्नरो नाम्ना किम्पुरुषो द्वितीयकः।
ततः सत्पुरुषेन्द्रोऽथ महापुरुषदेवराट् ॥२६॥

अतिकायो महाकायः शक्रो गीतरतिस्ततः।
गीतकीर्ति समाख्यो मणिभद्रः पूर्णभद्रकः ॥२७॥

भीम इन्द्रो महाभीमः स्वरूपः प्रतिरूपकः।
कालेन्द्रोऽथ महाकाल इमे षोडश वासवाः॥२८॥

षोडशैव प्रतीन्द्राः स्युः षोडशानां सुरेशिनाम्।
द्वे द्वे तथा सहस्रे स्युर्देव्यः प्रत्येकमूर्जिताः ॥२९॥

किन्नरस्या वंतसाख्या देवी केतुमती भवेत्।
शची किम्पुरुषस्यास्ति रतिसेना रतिप्रिया ॥३०॥

स्यातां सत्पुरुषेन्द्रस्य रोहिणी नवमीस्त्रियौ।
हरिता पुष्पवत्यौ स्तो महापुरुषनायिके ॥३१॥

अतिकायस्य चेन्द्राणी भोगा भोगवती भवेत्।
महाकायस्य देवी चानिन्दिता पुष्पगन्धिनी ॥३२॥

शची गीतरतीन्द्रस्य स्वरसेना सरस्वती।
नन्दिनी प्रियदर्शा स्याद् गीतकीर्तेश्च वल्लभा ॥३३॥

माणिभद्रस्य देवी स्यात्कुन्दाख्या बहुरूपिणी
पूर्णभद्रस्य सद्देवी तारका चोत्तमा भवेत् ॥३४॥

भीमस्य वसुमित्रास्ति सुपद्मा प्राणवल्लभा
रत्नप्रभा सुवर्णाभा महाभीमस्य चाङ्गना ॥३५॥

स्वरूपस्य महादेवी स्वरूपा बहुरूपिणी
प्रतिरूपस्य चेन्द्राणी सुसीमास्ति शुभानना ॥३६॥

कालस्य कमलादेवी भवेच्च कमलप्रभा।
महाकालस्य देवी स्यादुत्पला च सुदर्शना ॥३७॥

एते द्वे द्वे महादेव्यौ रूपसौभाग्यभूषिते।
प्रत्येकं वासवानां स्तो द्वात्रिंशत्ताश्च पिण्डिताः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 25 से 38): एक-एक कुल में अन्य देवों से पूज्य दो-दो इन्द्र होते हैं और प्रत्येक कुल में देवों से पूजित दो-दो प्रतीन्द्र होते हैं। प्रथम कुल में किन्नर और किम्पुरुष दो इन्द्र हैं। द्वितीय किम्पुरुषों के कुल में सत्पुरुष और महापुरुष ये दो इन्द्र हैं। इसके आगे तृतीय आदि कुलों में अतिकाय, महाकाय, गीतरव, गीतकीर्ति, मणिभद्र, पूर्णभद्र, भीम, महाभीम, स्वरूप, प्रतिरूपक, काल और महाकाल ये सोलह इन्द्र होते हैं। सोलहों इन्द्रों के सोलह ही प्रतीन्द्र होते हैं। इन सभी इन्द्रों और प्रतीन्द्रों में से प्रत्येक के भिन्न-भिन्न दो-दो हजार देवांगनाएँ होतीं हैं। किन्नर इन्द्र के अवतन्स और केतुमती दो शची हैं। किम्पुरुष के रतिसेना और रतिप्रिया ये दो शची हैं। सत्पुरुष के रोहिणी और नवमी तथा महापुरुष के हरित और पुष्पवती ये शची हैं। अतिकाय इन्द्र के भोगा और भोगवती तथा महाकाय इन्द्र के अनिन्दिता और पुष्पगन्धिनी ये दो-दो इन्द्राणियाँ हैं। गीतरति इन्द्र के स्वरसेना और सरस्वती तथा गीतकीर्ति के नन्दिनी और प्रियदर्शा नाम की दो-दो इन्द्राणियाँ हैं। मणिभद्र देव के कुन्दा और बहुरूपिणी एवं पूर्णभद्र के तारका और उत्तमा ये दो-दो वल्लभिकाएँ हैं। भीम इन्द्र के वसुमित्रा तथा सुपद्मा और महाभीम के रत्नप्रभा एवं सुवर्णाभा ये दो-दो इन्द्राणियाँ हैं। स्वरूप इन्द्र के स्वरूपा, बहुरूपिणी तथा प्रतिरूप के सुसीमा और शुभानना ये दो-दो इन्द्राणियाँ हैं। काल इन्द्र के कमलादेवी, कमलप्रभा तथा महाकाल इन्द्र के उत्पला और सुदर्शना ये दो-दो महादेवियाँ हैं। इस प्रकार रूप एवं सौभाग्य से विभूषित दो, दो महा इन्द्राणियाँ प्रत्येक इन्द्रों के भिन्न-भिन्न हैं। इस प्रकार सोलह इन्द्रों के बत्तीस इन्द्राणियाँ हैं ॥२५-३८॥


रत्नप्रभाक्षितेः सन्ति खरभागे महागृहाः।
चतुर्दशसहस्राणि भूतानामविनश्वराः ॥३९॥

रत्नप्रभावनेः पङ्कभागे रत्नमयाः शुभाः।
आवासा राक्षसानां स्युः सहस्त्रषोडशप्रमाः ॥४०॥

शेषव्यन्तरदेवानां मध्यलोकेऽचलादिषु।
सर्वतः सन्ति चावासाश्चैत्यालयविराजिताः ॥४१॥

अञ्जनो वज्रधातुश्च द्वीपः सुवर्णनामकः।
द्वीपा मनःशिलाभिख्यो द्वीपो वज्रसमाह्वयः ॥४२॥

रजतो हिङ्गुलद्वीपो हरितालाभिधानकः।
अष्टद्वीपेषु चैतेषु समभागे समावनौ ॥४३॥

अष्टानां व्यन्तरेन्द्राणां प्रत्येकं शाश्वतानि च।
जम्बूद्वीपसमानानि पञ्चपञ्चपुराण्यपि ॥४४॥

पूर्वादिदिक्षु विद्यन्ते मानस्तम्भजिनालयैः।
चैत्यवृक्षैश्च युक्तानि स्वस्वेन्द्रनामभिः स्फुटम् ॥४५॥

अमीषां मध्यभागस्थं स्वेन्द्रनामयुतं पुरम्।
प्रभं चावर्तकं कान्तं मध्यमं चेति दिक्ष्वपि ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 39 से 46): रत्नप्रभा पृथ्वी के खरभाग में भूत नामक व्यन्तर देवों के शाश्वत चौदह हजार महागृह हैं। रत्नप्रभा पृथ्वी के पंकभाग में राक्षस कुल व्यन्तरों के रत्नमयी और अत्यन्त रमणीक सोलह हजार प्रमाण आवास हैं। शेष व्यन्तर देवों के चैत्यालयों से विभूषित आवास तिर्यग्लोक के पर्वतों पर सर्वत्र हैं। अंजन, वज्रधातु, सुवर्ण, द्वीप, मनः शिल द्वीप, वज्र द्वीप, रजत द्वीप, हिंगुल द्वीप और हरिताल द्वीप, इन आठ द्वीपों में चित्रा भूमि पर समभाग में अर्थात् भूमि के नीचे या पर्वतों के ऊपर नहीं जम्बूद्वीप सदृश समतल भूमि पर आठ प्रकार के व्यन्तर देवों में से प्रत्येक इन्द्र के जम्बूद्वीप सदृश प्रमाण वाले पाँच-पाँच नगर हैं। ये नगर मानस्तम्भों, जिनालयों और चैत्यवृक्षों से युक्त तथा अपने-अपने इन्द्रों के नाम से संयुक्त पूर्वादि चारों दिशाओं में हैं। इन नगरों में से अपने-अपने इन्द्रों के नाम से युक्त पुर नाम का नगर मध्य में स्थित है, अवशेष किन्नरप्रभ, किन्नरावर्त, किन्नरकान्त और किन्नरमध्य ये चारों नगर क्रमशः पूर्व आदि चारों दिशाओं में अवस्थित हैं ॥३९-४६॥ अंजन द्वीप के मध्य स्थित नगर का नाम किन्नरपुर है। पूर्व दिशा स्थित नगर का नाम किन्नरप्रभ है। दक्षिण दिग् स्थित नगर का नाम किन्नरावर्त है। पश्चिम दिग् स्थित नगर का नाम किन्नरकान्त है और उत्तर दिग् स्थित नगर का नाम किन्नरमध्य है। इसी प्रकार सातों द्वीपों में अपने-अपने इन्द्रों के नाम हैं पूर्व में जिनके ऐसे पुर, प्रभ, आवर्त, कान्त और मध्य नाम के नगर इसी रीति से पूर्वादि दिशाओं में अवस्थित हैं।


प्राकारा नगरेषु स्युः शाश्वताः प्रोन्नताः शुभाः।
द्विक्रोशाधिकसप्तत्रिंशद्योजनैश्च विस्तुताः ॥४७॥

मूले क्रोशद्वयाग्रद्वादशसंख्यैश्च योजनैः।
सार्धद्वियोजन व्यासा मूर्ध्नि द्वारादिभूषिताः ॥४८॥

द्वाराणामुदयोऽमीषां सार्धद्विषष्टियोजनः।
विस्तारः क्रोशसंयुक्तैकत्रिंशद्योजनप्रमः ॥४९॥

द्वाराणां मस्तकेऽमीषां प्रासादामणिसङ्कुलाः।
विद्यन्ते प्रोन्नता रम्याः पञ्चसप्ततियोजनैः ॥५०॥

विस्तृताः क्रोशसंयुक्तैकत्रिंशद्योजनैः शुभाः।
तेषां मध्ये सुधर्माख्यो राजते मणिमण्डपः ॥५१॥

योजनानां नवोत्तुङ्गः सार्धद्वादशयोजनैः।
आयतो विस्तृतः क्रोशाधिकषड्भिश्च योजनैः ॥५२॥

तस्य द्वाराणि रम्याणि द्वियोजनोन्नतानि च।
योजनव्यासयुक्तानि मण्डपस्य भवन्त्यपि ॥५३॥

इत्येवं वर्णना ज्ञेया सर्वेन्द्राणां पुरेषु च।
नगराणां चतुर्दिक्षु चत्वारश्चैत्यपादपाः ॥५४॥

रत्नपीठाश्रिता मूले चतुर्दिक्षु विराजिताः।
भौमेन्द्र पूजिताभिः स्युर्जिनेन्द्रदिव्यमूर्तिभिः ॥५५॥

मानस्तम्भाश्च चत्वारो मणिपीठत्रिकोर्ध्वगाः।
शालत्रय युताः सन्ति सिद्धबिम्बाढ्यशेखराः ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 47 से 56): उन प्रत्येक नगरों में ३७ योजन २ कोस ऊँचे, मूल में १२ १/२ योजन चौड़े, ऊपर २ १/२ योजन चौड़े, शाश्वत, शुभ और द्वारों आदि से विभूषित आकार हैं। इन आकारों में स्थित द्वारों में से प्रत्येक द्वार की ऊँचाई ६२ १/२ योजन तथा चौड़ाई ३१ १/४ योजन प्रमाण है। इन द्वारों के ऊपर ७५ योजन ऊँचे और ३१ १/४ योजन चौड़े मणिमय प्रासाद हैं। जिनके मध्य में सुधर्मा नाम के मणिमय मण्डप सुशोभित होते हैं। जो ९ योजन ऊँचे, १२ १/२ योजन चौड़े और ६ १/४ योजन चौड़े हैं। उस सभा मण्डप के द्वार अत्यन्त रमणीक, दो योजन ऊँचे और एक योजन चौड़े हैं। इसी प्रकार का वर्णन सर्व इन्द्रों (दक्षिणेन्द्रों और उत्तरेन्द्रों) के नगरों में जानना चाहिए। नगरों की चारों दिशाओं में (एक-एक) चार चैत्य वृक्ष हैं। जिनके मूल में चारों दिशाओं में रत्नपीठ के आश्रित, व्यन्तर देवों से पूजित जिनेन्द्र भगवान् के दिव्य मूर्तियाँ हैं। इन्हीं चारों वृक्षों के सामने तीन-तीन मणिमय पाठ के ऊपर, तीन कोट से युक्त चार मानस्तम्भ हैं, जिनके शिखर सिद्ध भगवान् के बिम्बों से युक्त हैं ॥४७-५६॥


अशोकश्चम्पको नागस्तुम्बुरुश्च वटद्रुमः।
बदरी तुलसी वृक्षः कदम्बोऽष्टांह्रिपा इमे ॥५७॥

मणिपीठाग्रभागस्थाः पृथ्वीसारमयोन्नताः।
भवनेषु क्रमात्सन्ति हृष्टानां व्यन्तरात्मनाम् ॥५८॥

तेषां मूले चतुर्दिक्षु चतस्रः प्रतिमाः पृथक्।
चतुस्तोरणसंयुक्ता दीप्ता दिव्या जिनेशिनाम् ॥५९॥

मानस्तंभोऽस्ति चैकैकः एकैकां प्रतिमां प्रति।
मुक्तास्रग्मणिघण्टाढ्यस्त्रिपीठशालभूषितः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 57 से 60): किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच इन आठों व्यन्तर देवों के क्रम से अशोक, चम्पक, नाग (केसर), तुम्बरु, वट, बदरी, तुलसी और कदम्ब नाम वाले चैत्यवृक्ष होते हैं। ये ऊँचे-ऊँचे वृक्ष पृथ्वी के सारमय (पृथ्वीकायिक) और मणिपीठ के अग्रभाग पर स्थित होते हैं। इन वृक्षों के मूल में चारों दिशाओं में जिनेन्द्र भगवान् की चार-चार तोरण द्वारों से युक्त, देदीप्यमान और दिव्य पृथक्-पृथक् चार प्रतिमाएँ हैं तथा एक-एक प्रतिमा के प्रति मुक्तादामों एवं मणिमय घण्टाओं से युक्त, मणिमय तीन-तीन पीठ और प्राकार से युक्त एक-एक मानस्तम्भ है ॥५७-६०॥


पुराणां च चतुर्दिक्षु त्यक्त्वा द्वे च सहस्त्रके।
योजनानां हि चत्वारि वनानि शाश्वतान्यपि ॥६१॥

लक्षयोजनदीर्घाणि लक्षार्धविस्तृतानि वै।
अशोकसप्तपर्णाग्र-चम्पकाख्यानि सन्ति च ॥६२॥

मध्येऽमीषां हि चत्वारो राजन्ते चैत्यपादपाः।
अशोक-सप्तपर्णाग्र-चम्पकाख्या जिनार्चनैः ॥६३॥

विदिक्षु नगराणां स्युर्गणिकानां पुराणि च।
सहस्रचतुरशीतियोजनैर्विस्तृतानि वै ॥६४॥

वृत्ताकाराणि नित्यानि प्राकारादियुतान्यपि।
पुराणि शेष भौमानामनेकद्वीपवार्धिषु ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 61 से 65): नगरों की चारों दिशाओं में दो-दो हजार योजन छोड़कर अशोक, सप्तपर्ण, आम्र और चम्पक नाम के चार-चार शाश्वत वन हैं, जो एक-एक लाख योजन लम्बे तथा पचास-पचास हजार योजन चौड़े हैं। इन वनों के मध्य में जिनेन्द्र भगवान् की प्रतिमाओं से युक्त अशोक, सप्तपर्ण, आम्र और चम्पक नाम के चार-चार चैत्य वृक्ष शोभायमान होते हैं। नगरों की चारों विदिशाओं में गणिकाओं के वलयाकार, शाश्वत और आकार आदि से युक्त नगर हैं, जो ८४००० योजन लम्बे और ८४००० योजन ही चौड़े हैं। शेष व्यन्तर देवों के नगर अनेक द्वीपों एवं अनेक समुद्रों में हैं ॥६१-६५॥


इन्द्रं प्रति त्विमे स्तो महत्तरिके सुराङ्गने।
गणिकासंज्ञिके द्वे द्वे पृथक् पल्यैकजीविते ॥६६॥

माधुरी मधुरालापा देवी च मधुरस्वरा।
पुरुषादिप्रियाख्या पृथुका सोमाह्वया ततः ॥६७॥

प्रदर्शनी हि भोगाख्या भोगावती भुजङ्गिनी।
नागप्रिया सुतोषाथ घोषाख्या विमलप्रिया ॥६८॥

सुस्वरानिन्दितादेवी देवी भद्रा सुभद्रका।
मालिनी पद्ममालाख्या सर्वश्री सर्वसैनिका ॥६९॥

रुद्राथ रुद्रदर्शाख्या भूतकान्ता समाह्वया।
भूतभूतप्रिया देवी दत्ता महाभुजङ्गिनी ॥७०॥

अम्बिकाथ करालाख्या सुरसेना सुदर्शना।
इन्द्राणां स्युरिमा देव्यो द्वात्रिंशद्विश्वपिण्डिताः ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 66 से 71): सोलह इन्द्रों में से प्रत्येक की गणिका नाम की दो-दो प्रधान देवांगनाएँ हैं, इनमें से प्रत्येक की आयु एक-एक पल्य प्रमाण है। माधुरी, मधुरालाप, मधुरस्वरा, पुरुषश्रिया, पृथुका, सोमा, प्रदर्शनी, भोगा, भोगवती, भुजंगिनी, नागप्रिया, सुतोषा, घोषा, विमलप्रिया, सुस्वरा, अनिंदिता, भद्रा, सुभद्रका, मालिनी, पद्ममाला, सर्वश्री, सर्वसैनिका, रुद्रा, रुद्रदर्शा, भूतकान्ता, भूतप्रिया, दत्ता, महाभुजंगिनी, अम्बिका, कराला, सुरसेना और सुदर्शना ये ३२ गणिका महत्तरिकाएँ व्यन्तरवासी इन्द्रों की हैं ॥६६-७१॥


अष्टानां व्यन्तराणां स्युः पुराणि भवनानि च।
आवासा इति विज्ञेयास्त्रिविधाः स्थानकाः शुभाः ॥७२॥

मध्यलोकस्थद्वीपाब्धिमहीषु स्यु पुराणि च।
खरांशे पङ्कभागे चाधोलोके भवनान्यपि ॥७३॥

आवासाः सन्ति चैतेषामूर्ध्वलोके क्षयोज्झिताः।
पर्वताग्रेषु कूटेपु वृक्षाग्रेषु हृदादिषु ॥७४॥

वृत्तोत्कृष्टपुराणां स्याद् व्यासो लक्षैकयोजनः।
जघन्यनगराणां किलैकयोजनविस्तरः ॥७५॥

उत्कृष्टभवनानां हि सकलोत्कृष्टविस्तरः।
योजनद्विशताग्रस्तसहस्रद्वादशप्रमः ॥७६॥

जघन्यभवनानां स्याद् विस्तरोऽतिजघन्यकः।
योजनानामधोलोके पञ्चविंशतिमानकः ॥७७॥

विष्कम्भो निखिलोत्कृष्टावासानां श्रीजिनागमे।
योजनानां जिनैः प्रोक्तः सहस्रद्वादशप्रमः ॥७८॥

आवासानां जघन्यानां व्यासः क्रोशत्रयं भवेत्।
उत्कृष्टभवनादीनां मध्ये कूटोऽस्ति भास्वरः ॥७९॥

योजनत्रिशतव्यासः शतैकयोजनोन्नततः।
जघन्यभवनादीनां मध्ये कूटी जघन्यकः ॥८०॥

एकगव्यूतिविस्तारो हेमरत्नमयोऽक्षयः।
क्रोशैकस्य त्रिभागानामेकभागसमुन्नतः ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 72 से 81): आठों प्रकार के व्यन्तर देवों के रहने के शुभ स्थान पुर, भवन और आवास के भेद से तीन प्रकार के जानना चाहिए। मध्यलोक में (सम) पृथ्वी पर स्थित द्वीप, समुद्रों में व्यन्तर देवों के जो निवास स्थान हैं, उन्हें पुर कहते हैं। अधोलोक में खर और पंकभाग में जो स्थान हैं, उन्हें भवन कहते हैं तथा ऊर्ध्वलोक में अर्थात् पृथ्वीतल से ऊपरी भागों में पर्वतों के अग्रभागों पर, कूटों पर, वृक्षों के अग्रभागों पर और पर्वतस्थ सरोवरों आदि में जो स्थान हैं, उन्हें आवास कहते हैं। ये तीनों प्रकार के निवास स्थान हानि-क्षय से रहित अर्थात् शाश्वत हैं। उत्कृष्ट पुर वृत्ताकार और एक लाख योजन विस्तार वाले हैं तथा जघन्य पुर एक योजन विस्तार वाले हैं। समस्त उत्कृष्ट भवनों का उत्कृष्ट विस्तार १२२०० योजन प्रमाण है। अधोलोक स्थित जघन्य भवनों का जघन्य विस्तार २५ योजन प्रमाण है। जिनागम में जिनेन्द्र भगवान के द्वारा सम्पूर्ण उत्कृष्ट आवासों का विष्कम्भ १२००० योजन कहा गया है तथा जघन्य आवासों का व्यास तीन कोस कहा गया है। उत्कृष्ट भवन आदि के मध्य में देदीप्यमान कूट हैं, जो ३०० योजन चौड़े और १०० योजन ऊँचे हैं। जघन्य भवनों आदि के मध्य में जघन्य कूट हैं, जो स्वर्ण और रत्नमय हैं, शाश्वत हैं तथा एक कोस चौड़े और १/३ कोस ऊँचे हैं ॥७२-८१॥


अमीषां सर्वकूटानां मध्यभागे च मूर्धनि।
स्फुरद्रत्नमयस्तुङ्ग एकैकः श्रीजिनालयः ॥८२॥

ज्येष्ठानां भवनादीनामुत्कृष्टा वेदिका मता।
प्रतोलीतोरणाद्याढ्या क्रोशद्वयोच्छ्रितोज्जिता ॥८३॥

लघूनां भवनादीनां लघ्वी सद्वेदिका भवेत्।
पञ्चविंशतिचापोच्चा गोपुरादिविभूषिता ॥८४॥

केषाञ्चिद् भौमदेवानामावासाः सन्ति केवलम्।
केषाञ्चिद् भवनैः सार्धमावासाः स्युः सुधाभुजाम् ॥८५॥

पुराणि भवनान्युच्चावासाः एते त्रयः शुभाः।
भवन्ति वसतिस्थानाः केषाञ्चित्पुण्यपाकतः ॥८६॥

तथेति त्रिविधस्थानानि स्युर्भवनवासिनाम्।
नवानामसुराणां च केवलं भवनान्यपि ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 82 से 87): इन उत्कृष्ट एवं जघन्य सर्व कूटों के ऊपर मध्य भाग में देदीप्यमान रत्नमय एक-एक उत्तुंग जिनालय हैं। उत्कृष्ट भवनों आदि की उत्कृष्ट वेदियाँ प्रतोली तथा तोरणों आदि से युक्त दो कोस ऊँची हैं तथा जघन्य भवनों आदि की जघन्य वेदियाँ गोपुर आदि से विभूषित और २५ धनुष ऊँची हैं। पूर्व पुण्योदय से किन्हीं-किन्हीं व्यन्तर देवों के मात्र आवास ही हैं, किन्हीं के आवास और भवन दोनों हैं तथा किन्हीं-किन्हीं व्यन्तर देवों के आवास, भवन और पुर ये तीनों प्रकार के अत्यन्त शुभ निवास स्थान होते हैं। भवनवासी देवों में असुरकुमारों के मात्र भवन होते हैं, अन्य शेष भवनवासियों के तीनों प्रकार के निवास स्थान होते हैं ॥८२-८७॥


प्रतिशक्रं भवेदेकः प्रतीन्द्रोऽमरावृतः।
प्रत्येकं किन्नरादीनां सर्वेन्द्राणां भवन्ति च ॥८८॥

चत्वार्येव सहस्राणि देवाः सामानिकाह्वयाः।
अङ्गरक्षामराः सन्ति सहस्त्रषोडशप्रमाः ॥८९॥

आदिमापरिषत्स्थाः स्युर्देवा अष्टशतानि च।
मध्यमापरिषद्देवाः सहस्त्रप्रमिता मताः॥९०॥

अन्तिमापरिषत्स्थामरा द्वादशशतप्रमाः।
गजा अश्वा रथास्तुङ्गा वृषभाश्च पदातयः ॥९१॥

गन्धर्वाः सुरनर्तक्यः सप्तानीकान्यमूनि च।
प्रत्येकं सर्वयुक्तानि कक्षाभिः सप्तसप्तभिः ॥९२॥

गजानां प्रथमेऽनीकेऽष्टाविंशति सहस्त्रकाः।
गजाश्च द्वितीये षट्पञ्चाशत्सहस्रहस्तिनः ॥९३॥

इत्येवं च तृतीयाद्यनीकेषु द्विगुणोत्तराः।
सप्तमानीकपर्येन्तं विद्यन्ते हस्तिनः क्रमात् ॥९४॥

सप्तानीकगजाः सर्वे सन्ति पिण्डीकृता बुधैः।
पञ्चत्रिंशच्चलक्षाणि षट्पञ्चाशतसहस्त्रकाः ॥९५॥

इत्थं गणनया ज्ञेया ह्यश्वसंख्यागजप्रमा।
तथारथाद्यनीकानि गजसंख्यासमानि च ॥९६॥

द्वे कोट्यौ चाष्टचत्वारिंशल्लक्षाणि सहस्त्रकाः।
द्व्यधिका नवतिश्चेति संख्यासर्वाजिनैर्मता ॥९७॥

पिण्डीकृताऽप्यनीकानां सप्तानां श्रीजिनागमे।
सप्तसप्तप्रकाराणां गजादीनां सुरेशिनाम् ॥९८॥

प्रकीर्णकाह्वया देवा आभियोगिकसंज्ञकाः।
किल्विषिकास्त्रयोऽत्रैते ह्यसंख्याता भवन्ति च ॥९९॥

त्रायस्त्रिंशासुरा लोकपालाः सन्ति न जातुचित्।
ततोऽस्ति व्यन्तरेन्द्राणां परिवारोऽखिलोऽष्टधा ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 88 से 100): किन्नर, किम्पुरुष आदि प्रत्येक इन्द्र के परिवार में देवों से वेष्टित एक-एक प्रतीन्द्र देव होते हैं। सामानिक देव चार (४०००) हजार और अंगरक्षक देव १६००० हजार होते हैं। अभ्यन्तर परिषद् के देव ८०० मध्यम परिषद् के १००० और बाह्य परिषद् के देव १२०० होते हैं। प्रत्येक इन्द्र के हाथी, घोड़ा, उत्तुंग रथ, वृषभ, पदाति, गन्धर्व और नर्तकी ये सात अनीक सात-सात कक्षाओं से युक्त होती हैं। सातों अनीकों में से हाथियों की अनीक की प्रथम कक्ष में २८००० हाथी, द्वितीय में ५६००० हाथी होते हैं। इस प्रकार तृतीय कक्ष से सप्तम कक्ष पर्यन्त क्रम से दुगुने-दुगुने संख्या प्रमाण हाथी होते हैं। गणधर देवों के द्वारा सातों कक्षों के हाथियों का एकत्रित योग ३५५६००० कहा गया है। इसी प्रकार सातों कक्षों के घोड़ों की संख्या तथा रथ आदि शेष पाँचों की संख्या गजों की संख्या के प्रमाण ही जानना चाहिए। जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा सात-सात कक्षाओं से युक्त सातों अनीकों की सम्पूर्ण संख्या का योग (३५५६०००x७) = २४८९२००० कहा गया है। जिनागम में सात-सात कक्षाओं से युक्त गज आदि सातों अनीकों के देवों का एकत्रित २४८९२००० योग प्रत्येक व्यन्तरेन्द्रों के पृथक्-पृथक् कहा गया है। प्रत्येक इन्द्र के परिवार में प्रकीर्णक, आभियोगिक और किल्विषिक नामक तीनों प्रकार के देव असंख्यात होते हैं। व्यन्तरेन्द्रों के परिवार में त्रायस्त्रिंश और लोकपाल देव कभी नहीं होते, इसलिए इन सभी इन्द्रों का परिवार प्रतीन्द्र, सामानिक, अंगरक्षक, पारिषद, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोगिक और किल्विष के भेद से आठ प्रकार का होता है ॥८८-१००॥


एकं हस्तान्तरं त्यक्त्वा ह्याद्यचित्रामहीतले।
नित्योत्पादक नामानो वसन्ति व्यन्तरामराः ॥१०१॥

ततो दशसहस्त्राणि हस्तानां च विहाय च।
सन्ति दिग्वासिनस्त्यक्त्वा स्मादोर्दशसहस्रकान् ॥१०२॥

वसन्त्यन्तरवासाख्याः पुनर्दशसहस्रकान्।
करांस्त्यक्त्वा च कूष्माण्डास्तिष्ठन्त्यतो विमुच्य च ॥१०३॥

हस्तविंशसहस्त्राणि वसन्त्युत्पन्न निर्जराः।
ततो विंशसहस्त्राणि कराणां प्रविहाय च ॥१०४॥

सन्त्यनुत्पन्नगीर्वाणास्तस्माद् विंशसहस्रकान्।
करान् मुक्त्वा वसन्त्येव प्रमाणकाभिधाः सुराः ॥१०५॥

ततो विंशसहस्त्राणि हस्तानां परिमुच्य च।
तिष्ठन्ति गन्धगीर्वाणास्तस्माद् विंशसहस्रकान् ॥१०६॥

हस्तांस्त्यक्त्वा महागन्धाः पुनर्विमुच्य विंशति।
सहस्त्राणि कराणां स्युर्भुजगाख्या विहाय च ॥१०७॥

पुनर्विंशसहस्त्राणि हस्तानां निवसन्ति च।
प्रीतिङ्करास्ततस्त्यक्त्वा करविंशसहस्रकान् ॥१०८॥

आकाशोत्पन्नामानो देवा वसन्ति भूतले।
एते द्वादशधा देवा विज्ञेया वानव्यन्तराः ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 101 से 109): चित्रा पृथ्वी के ऊपर एक हाथ का अन्तराल छोड़कर नित्योत्पादक नाम के व्यन्तर देव रहते हैं। इनसे १०००० हाथ छोड़कर दिग्वासी देव, इनसे १०००० हाथ छोड़कर अन्तरवासी नाम के देव रहते हैं। इनसे १०००० हाथ छोड़कर कूष्माण्ड देव रहते हैं। इनसे २०००० हाथ छोड़कर उत्पन्न देव तथा इनसे २०००० हाथ छोड़कर अनुत्पन्न देव रहते हैं। इनसे २०००० हाथ छोड़कर प्रमाणक देव, इनसे २०००० हाथ छोड़कर गन्ध देव, इनसे २० हजार हाथ छोड़कर महागन्ध नाम के देव, इनसे २० हजार हाथ छोड़कर भुजग नामक देव, इनसे २० हजार हाथ छोड़कर प्रीतिकर और इनसे २० हजार हाथ छोड़कर आकाशोत्पन्न नाम के देव निवास करते हैं। इस प्रकार भूतल पर इन बारह प्रकार के व्यन्तर देवों का निवास जानना चाहिए ॥१०१-१०९॥


नित्योत्पादकदेवानामरखण्डायुर्जिनैर्मतम् ।
दशवर्षसहस्त्राणि दिग्वासिनां च जीवितम् ॥११०॥

विंशत्यब्दसहस्राण्यन्तरवासिसुधाभुजाम् ।
त्रिंशद्वर्षसहस्राणि कूष्माण्डानां च जीवितम् ॥१११॥

चत्वारिंशत्सहस्राब्दमुत्पन्नाख्यामृताशिनाम् ।
परमायुर्भवेत् पञ्चाशतसहस्राब्दमानकम् ॥११२॥

अनुत्पन्नात्मनां षष्टिसहस्त्रवर्षजीवितम्।
प्रमाणकात्मनां सप्ततिसहस्राब्दसंस्थितिः ॥११३॥

गन्धाख्यानां तथाशीतिसहस्त्रवर्षजीवितम्।
महागन्धाख्यदेवानां श्रुते चायुर्मतं जिनैः ॥११४॥

वर्षाणां चतुरशीतिसहस्त्रप्रमाणकम्।
भुजगानां भवेदायुः पल्यैकस्याष्टमांशकः ॥११५॥

प्रीतिङ्गरात्मनां पल्यस्य चतुर्थांशजीवितस्।
आकाशोत्पन्नदेवानामायुः पल्यार्धसम्मितम् ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 110 से 116): जिनेन्द्र भगवान के द्वारा नित्योत्पादक देवों की अखण्ड आयु दश हजार वर्ष दिग्वासियों की २० हजार वर्ष, अन्तरवासी देवों की ३० हजार वर्ष, कूष्माण्ड देवों की ४० हजार वर्ष, उत्पन्न देवों की ५० हजार वर्ष, अनुत्पन्न देवों की ६० हजार वर्ष, प्रमाणक देवों की ७० हजार वर्ष, गन्ध देवों की ८० हजार वर्ष और महागन्ध देवों की उत्कृष्ट आयु ८४ हजार वर्ष कही गई है तथा जिनागम में भुजग देवों की आयु पल्य का ८ वाँ भाग, प्रीतिकर देवों की पल्य का चौथाई भाग और आकाशोत्पन्न देवों की आयु अर्ध पल्य प्रमाण कही गई है ॥११०-११६॥


उत्कृष्टं व्यन्तराणां स्यादायूः पल्योपमं क्रमात्।
दशवर्षसहस्त्राणि सर्वजघन्यजीवितम् ॥११७॥

दशचापोन्नत: कायः समस्त व्यन्तरात्मनाम्।
मानसाहार एवास्ति सार्धपञ्चदिनैर्गतैः ॥११८॥

सार्धपञ्चमुहूर्तैर्निःक्रान्तैरुच्छ्वास एव च।
व्यन्तराणामसंख्यातयोजनान्यवधिर्मतः ॥११९॥

उत्कृष्टोहि जघन्यश्च पञ्चविंशतियोजनः।
ऊर्ध्वाधोऽपि कियन्मात्रो भवप्रत्ययसम्भवः ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 117 से 120): व्यन्तर देवों की उत्कृष्ट आयु एक पल्य प्रमाण और जघन्य आयु दस हजार वर्ष प्रमाण होती है। समस्त व्यन्तर देवों के शरीर की ऊँचाई दस धनुष प्रमाण है। ५ १/२ दिन व्यतीत हो जाने के बाद व्यन्तर देव मनसा आहार करते हैं और ५ १/२ मुहूर्त व्यतीत हो जाने के बाद श्वासोच्छ्वास लेते हैं। व्यन्तर देवों का उत्कृष्ट अवधि क्षेत्र असंख्यात योजन प्रमाण और जघन्य अवधि क्षेत्र २५ योजन प्रमाण है। ये ऊर्ध्व और अधः कुछ भवों को भी यथा सम्भव जानते हैं ॥११७-१२०॥


एतद् व्यन्तरजातिभेदविभवस्थित्यादिसंसूचकम्
धर्मध्याननिबन्धनं ह्यघहरं चार्हन्मुखाब्जोद्भवम्।
सिद्धान्तं करणानुयोगममलं चित्ताक्षदन्त्यङ्कुशम्।
सद्ध्यानाय सुयोगिनः सुविधिना नित्यं पठन्त्वादरात् ॥१२१॥

अर्थ: इस प्रकार व्यन्तर देवों के जाति, भेद, वैभव और स्थिति आदि को संसूचन करने वाला, धर्मध्यान का हेतु, पापनाशक, अर्हन्त भगवान् के मुखरूपी कमल से उत्पन्न तथा मन और इन्द्रियरूपी हाथी को वश करने के लिये अंकुश के सदृश इस सिद्धान्तसाररूप निर्मल करणानुयोग को उत्तम ध्यान की सिद्धि के लिये उत्तम योगीजन विधिविधान से आदर (विनय) पूर्वक नित्य ही पढ़ो ॥१२१॥


अधिकारान्त मंगल


ये श्रीमद्भवनेषु विश्वनगरेष्वावास सर्वेषु चा-
धो मध्योर्ध्वसुभूमिसर्वगिरिषु श्रीमज्जिनेन्द्रालयाः।
तत्रस्था जिनमूर्तयोऽतिसुभगाश्चैत्यद्रुमादिस्थिता
या स्तास्ताः शिवशर्म्मभूतिजननीर्वन्दे स्तुवे मुक्तये ॥१२२॥

अर्थ: समस्त भवनों, नगरों एवं आवासों में, अधो, मध्य और ऊर्ध्व लोकों में, सर्व सुदर्शन मेरु आदि पर्वतों पर तथा अत्यन्त शोभा युक्त चैत्य आदि वृक्षों पर स्थित वैभव युक्त जितने जिन मन्दिर हैं, उन मन्दिरों में स्थित कल्याण और सुख को उत्पन्न करने के लिये माता के सदृश जो जिन प्रतिमाएँ हैं, उन सबका मैं मुक्ति प्राप्ति के लिये स्तवन करता हूँ, वन्दना करता हूँ ॥१२२॥

चतुर्दश अधिकार ज्योतिषी देवों का वर्णन

ज्योतिर्देवविमानस्थासंख्यातश्रीजिनालयान् ।
जिनबिम्बान्वितान् वन्दे स्तुवे नित्यान् शिवाय च ॥१॥

अर्थ: ज्योतिर्देवों के विमानों में स्थित जो असंख्यात जिनालय हैं, उन जिनालयों में स्थित जिन प्रतिमाओं के समूह की मैं मोक्ष प्राप्ति के हेतु नित्य ही वन्दना करता हूँ और उनका स्तव करता हूँ ॥१॥


चन्द्राः सूर्या ग्रहा नक्षत्राणि प्रकीर्णतारकाः।
एते पञ्चविधाः प्रोक्ता ज्योतिष्कदेवतागणाः ॥२॥

अर्थ: चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारा, इस प्रकार ज्योतिष देवों के समूह पाँच प्रकार के कहे गये हैं ॥२॥


दशोनाष्टशतान्यस्माद्योजनानि महीतलात्।
त्यक्त्वा सन्ति विमानानि तारकाणां नभोंगणे ॥३॥

ततोप्यूर्ध्वनभो मुक्त्वा दशयोजनसम्मितम्।
आदित्यानां विमानानि विद्यन्ते शाश्वतान्यपि ॥४॥

अशीतियोजनान्यूर्ध्वं पुनस्त्यक्त्वा भवन्ति खे।
चन्द्राणां सद्विमानान्यतो योजनचतुष्टयम् ॥५॥

मुक्त्वा नक्षत्रदेवानां विमानानि च सन्त्यनु।
त्यक्त्वा योजनचत्वारि बुधानां स्युर्विमानकाः ॥६॥

मुक्त्वातोयोजनत्रीणि शुक्राणां स्युर्विमानकाः।
त्यक्त्वाथ योजनत्रीणि बृहस्पतिविमानकाः ॥७॥

मुक्त्वातु योजनत्रीणि मङ्गलानां विमानकाः।
त्यक्त्वातो योजनत्रीणि शनैश्चरविमानकाः ॥८॥

ज्योतिः पटलबाहुल्यमित्थं दशोत्तरं शतम्।
योजनानां भवेत्सर्वं विमानव्याप्तखाङ्गणे ॥९॥

चित्रामहीतलाद्योजनानां नवशतान्तरे।
सर्वज्योतिष्कदेवानां विद्यन्ते हि विमानकाः ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 3 से 10): चित्रा पृथ्वी से ७९० योजन ऊपर जाकर आकाश में ताराओं के विमान हैं। नभ में तारागणों से दस योजन ऊपर सूर्य के शाश्वत विमान हैं, इनसे ८० योजन ऊपर आकाश में चन्द्र विमान हैं। चन्द्र से चार योजन ऊपर नक्षत्र विमान, इससे चार योजन ऊपर बुध विमान, इससे ३ योजन ऊपर शुक्र विमान, इससे तीन योजन ऊपर गुरु विमान, इससे तीन योजन ऊपर मंगल विमान और मंगल से तीन योजन ऊपर शनि का विमान है। इस प्रकार ज्योतिर्पटल के सर्व विमान आकाश में पिण्ड रूप से ११० योजन क्षेत्र को व्याप्त करके रहते हैं। समस्त ज्योतिषी देव चित्रा पृथ्वी के तल से (७९० योजन की ऊँचाई से प्रारम्भ कर) ९०० योजन (७९०+११०=९००) की ऊँचाई तक स्थित हैं ॥३-१०॥


उत्तानगोलकार्धेन समानाकृतयः शुभाः ।
वृत्ताकाराविमानाः स्युः श्वेतरत्नमयोन्नताः ॥११॥

मध्येऽमीषां पुराणि स्युर्भूषितानि जिनालयैः ।
देवीदेवभृतानि श्रीसौधानीकाङ्कितानि च ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): ऊर्ध्वमुख अर्ध गोल (गेंद) के आकार सदृश शुभ आकृति वाले सर्व ज्योतिर्विमान गोलाकार, श्वेतरत्नमय और उन्नत हैं। इन विमानों के मध्य में जिनालयों से विभूषित, देव-देवियों से भरी हुई और लक्ष्मी युक्त प्रासादों से अलंकृत रमणीक नगरियाँ हैं ॥११-१२॥


कृतैकषष्टिभागानां योजनस्य विमानकम्।
निशाकरस्य षट् पञ्चाशद्भागविस्तरं भवेत् ॥१३॥

त्रयः क्रोशाश्चतुश्चत्वारिंशदग्रशतानि च।
त्रयोदशैव चापानामिति किञ्चित्तथाधिकम् ॥१४॥

व्यासं चन्द्रविमानस्य प्रोक्तं जैनागमे जिनैः।
कृतैकषष्टिभागानां योजनस्य विमानकम् ॥१५॥

स्यात्सूर्यस्याष्ट चत्वारिंशद्भागविस्तरान्वितम्।
विमानं शुक्रदेवस्य क्रोशैकविस्तृतं भवेत् ॥१६॥

बृहस्पतिविमानं स्यात्पादोनक्रोशविस्तरम्।
मङ्गलस्य बुधस्यैव शनैश्चरस्य कोविदैः ॥१७॥

प्रत्येकं सद्विमानस्य मतार्धक्रोशविस्तृतिः।
तारकाणां विमानाश्च केचित्सर्वजघन्यकाः ॥१८॥

क्रोशैकस्य चतुर्भागविस्तरा मध्यमा क्रमात्।
क्रोशार्धं विस्तृताः केचित् पादोनक्रोशविस्तराः ॥१९॥

केचिच्च सकलोत्कृष्टाः क्रोशव्यासविमानकाः।
इति ताराविमानानां त्रिधाविष्कम्भ उच्यते ॥२०॥

नक्षत्राणां विमानाः स्युः सर्वे क्रोशैकविस्तृताः।
सर्व ज्योतिर्विमानानां व्यासार्धं स्थूलता भवेत् ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 13 से 21): चन्द्र विमान का विस्तार एक योजन के ६१ भागों में से ५६ भाग प्रमाण अर्थात् ५६/६१ योजन प्रमाण है। जिनागम में जिनेन्द्र भगवान् द्वारा चन्द्र विमान का व्यास तीन कोस और १३४४ धनुष से कुछ (१६/६१ धनुष) अधिक कहा गया है। सूर्य के विमान का विस्तार एक योजन के ६१ भागों में से ४८ भाग अर्थात् ४८/६१ भाग योजन प्रमाण और शुक्रदेव के विमान का विस्तार एक कोस प्रमाण है। बृहस्पति देव के विमान का विस्तार पौन कोश तथा मंगल, बुध और शनि देवों के विमानों का विस्तार विद्वानों के द्वारा अर्ध-अर्ध कोस प्रमाण कहा गया है। तारागणों के कुछ विमान जघन्य हैं, जिनका विस्तार एक कोश का चतुर्थ भाग अर्थात् १/४ कोश है, मध्यम विमानों में किन्हीं का प्रमाण-अर्ध (१/२) कोश और किन्हीं का पौन कोश (३/४) है। उत्कृष्ट विमानों का प्रमाण एक कोश है, इस प्रकार तारागणों के विमानों का विष्कम्भ तीन प्रकार का कहा गया है। सर्व नक्षत्रों के विमानों का व्यास एक-एक कोश है। सर्व ज्योतिर्विमानों की मोटाई अपने-अपने विस्तार के अर्धभाग प्रमाण है ॥१३-२१॥


सूर्यस्य सूर्यकान्ताश्मविमानस्य महान्ति च।
द्वादशैव सहस्त्राणि सन्त्युष्णकिरणान्यपि ॥२२॥

चन्द्रस्य चन्द्रकान्ताश्मविमानस्य भवन्त्यपि।
द्विषट्सहस्त्रसंख्यानि सच्छीतकिरणानि च ॥२३॥

स्युः शुक्रस्य विमानस्य पञ्चविंशशतांशवः।
अन्ये ज्योतिष्कदेवानां विमाना मन्दरोचिषः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 22 से 24): सूर्य का विमान सूर्यकान्त मणि से निर्मित है। सूर्य की १२००० किरणें हैं जो उष्ण हैं। चन्द्रमा का विमान चन्द्रकान्त पत्थर (मणि) से निर्मित है। इसकी भी किरणें १२००० ही हैं किन्तु वे शीतल हैं। शुक्र के विमान की २५०० किरणें हैं। (जो प्रकाश से उज्ज्वल हैं) शेष अन्य ज्योतिष्क देवों के विमानों की किरणें मन्द प्रकाश वालीं हैं ॥२२-२४॥


तारकाणां जघन्यं स्यात्तिर्यगन्तरमेव च।
क्रोशस्य सप्तमो भागः पञ्चाशद्योजनप्रमम् ॥२५॥

मध्यमं सकलोत्कृष्टं सहस्रयोजनप्रमम्।
निशाकरविमानस्य किञ्चिदूनैकयोजनम् ॥२६॥

अन्तरं प्रविधायाधो भागे राहुविमानकम्।
गच्छद्गतैश्च षण्मासैः पर्वान्ते चन्द्रमण्डलम् ॥२७॥

आच्छादयति चेत्येवं ख्यातं तद्ग्रहणं भुवि।
तथा सूर्यविमानस्य किञ्चिद्धीनैकयोजनम् ॥२८॥

कृत्वान्तरमधोभागे कृष्णं केतुविमानकम्।
व्रजन्निःक्रान्तषण्मासैः पर्वान्ते भानुमण्डलम् ॥२९॥

आच्छादयति चात्रैतत्सूर्यग्रहणमुच्यते।
राहुश्यामविमानस्य ध्वजोपरि विहाय खे ॥३०॥

चतुरङ्गुष्ठविमानान्तरं स्याच्चन्द्रविमानकम्।
अरिष्टस्य विमानस्य केतूपरि विमुच्य खे ॥३१॥

चतुरङ्गुष्ठमात्रान्तरं स्याद् भानुविमानकम्।
चन्द्रमण्डलपूर्णस्य कृष्णपक्षे दिनं प्रति ॥३२॥

कृतषोडशभागानामेकैकांशः प्रहीयते।
प्रतिपद्दिनमारभ्याधःस्थराहुगतेर्वशात् ॥३३॥

तथा चन्द्रविमानस्य शुक्लपक्षे दिनं प्रति।
वर्धते भागएकैकः पूर्णमास्यन्तमञ्जसा ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 25 से 34): एक तारा से दूसरी तारा का तिर्यग् जघन्य अन्तर एक कोश का सातवाँ भाग अर्थात् १/७ कोश (१४२ ६/७ मील) है। तिर्यग् मध्यम अन्तर ५० योजन (दो लाख मील) और उत्कृष्ट अन्तर १०० योजन (४ लाख मील है।) कुछ कम एक योजन व्यास वाला राहु का विमान चन्द्र विमान के अधोभाग में कुछ अन्तराल से गमन करता हुआ प्रत्येक छह मास बाद पर्व (पूर्णिमा) के अन्त में चन्द्र के विमान को आच्छादित कर लेता है। लोक में यही आच्छादन क्रिया चन्द्र ग्रहण के नाम से प्रसिद्ध है। इसी प्रकार कुछ कम एक योजन व्यास वाला कृष्ण वर्ण केतु का विमान सूर्य विमान के अधोभाग में कुछ अन्तराल से गमन करता हुआ प्रत्येक छह मास बाद पर्व (अमावस्या) के अन्त में सूर्य के विमान को आच्छादित कर लेता है, लोक में इसी को सूर्य ग्रहण कहते हैं। श्यामवर्ण राहु विमान की ध्वजा दण्ड से चार प्रमाणांगुल ऊपर आकाश में चन्द्र विमान अवस्थित है, इसी प्रकार श्यामवर्ण केतु विमान की ध्वजा दण्ड से चार प्रमाणांगुल ऊपर आकाश में सूर्य विमान अवस्थित है। चन्द्र विमान के नीचे स्थित अंजन वर्ण राहु के गमन विशेष के वश से कृष्णपक्ष में प्रतिपदा से प्रारम्भ कर अमावस्या पर्यन्त चन्द्र की सोलह कलाओं में से एक-एक अंश प्रतिदिन घटता जाता है। अर्थात् कृष्णरूप होता जाता है। उसी प्रकार शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से प्रारम्भ कर पूर्णिमा पर्यन्त एक-एक अंश प्रतिदिन वृद्धिंगत होता जाता है। अर्थात् शुक्लरूप होता जाता है ॥२५-३४॥


शुक्लपक्षे सदा राहुः स्वयं मन्दगतिर्भवेत्।
चन्द्रस्यैव निसर्गेण शीघ्रा गतिश्च सत्यपि ॥३५॥

कृष्णपक्षे सदा राहोर्र्मता शीघ्र गतिर्बुधैः।
स्वभावेन च चन्द्रस्य मन्दागतिर्दिनं प्रति ॥३६॥

एवं गतिवशाच्चन्द्र कलानां प्रत्यहं भवेत्।
षोडशानां कलैकैका हानिर्वृद्धिर्द्विपक्षयोः ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 35 से 37): शुक्लपक्ष में राहु की गति हमेशा स्वभाव से ही मन्द होती जाती है और स्वभावतः ही चन्द्र की गति तेज होती जाती है। इसी प्रकार कृष्णपक्ष में प्रतिदिन राहु की स्वभावतः शीघ्र गति हो जाती है और चन्द्र की मन्दगति होती जाती है, ऐसा विद्वज्जनों के द्वारा कहा गया है। इस प्रकार गति विशेष के वश से दोनों पक्षों में प्रतिदिन चन्द्र की सोलह कलाओं में हानि-वृद्धि होती है ॥३५-३७॥


सिंहरूपधरा देवाः चतुःसहस्रसम्मिताः।
लगित्वा पूर्वदिग्भागे नयन्तीन्दुविमानकम् ॥३८॥

गजवेषधरास्तुङ्गास्तावन्तो वाहनामराः।
तद्दक्षिणदिशि स्थित्वा व्योम्नि तच्चालयन्ति च ॥३९॥

सुरा वृषभरूपेण चतुःसहस्रमानकाः।
पश्चिमाशां सदाश्रित्य नयन्ति चन्द्रमण्डलम् ॥४०॥

दिव्याश्वविक्रियापन्नाश्चतुः सहस्रनिर्जराः।
लगित्वोत्तरदिग्भागे सविमाना व्रजन्ति खे ॥४१॥

एवं सूर्यविमानेऽपि सिंहादिवेषधारिणः।
सन्ति वाहनगीर्वाणाः सहस्रषोडशप्रमाः ॥४२॥

तथाशेषग्रहाणां स्युर्विमानवाहकाः सुराः।
प्रत्येकं च चतुर्दिक्षु लग्ना द्विद्विसहस्रकाः ॥४३॥

पिण्डीकृता इमे सर्वे ज्ञेया वाहननिर्जराः।
एकैकस्य ग्रहस्यापि पृथक् चाष्टसहस्रकाः ॥४४॥

सहस्रसम्मिताः सिंहास्तावन्तो गजसत्तमाः।
सहस्रवृषभास्तावन्तोऽश्वाश्चवाहनामराः ॥४५॥

एते पिण्डीकृताः सर्वे चतुःसहस्रमानकः।
नक्षत्राणां विमानेषु चतुर्दिक्षु पृथक्-पृथक् ॥४६॥

तारकाणां विमानेषु सिंहाः पञ्चशतप्रमाः।
तावन्तो दन्तिनः पञ्चशतानि वृषभामराः ॥४७॥

तावन्तोऽश्वा इमे सर्वेऽल्पपुण्या वाहनामराः।
सिंहादिविक्रियापन्ना ज्ञेया विमानवाहकाः ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 38 से 48): पूर्व दिशा में सिंह के आकार को धारण करने वाले ४००० देव चन्द्र विमान में लगकर उसे चलाते हैं। उन्नत गज आकार को धारण करने वाले वाहन जाति के ४००० देव दक्षिण दिशा में स्थित होकर चन्द्र विमान को आकाश में चलाते हैं। पश्चिम दिशा में वृषभ आकार को धारण करने वाले ४००० देव चन्द्र विमान में जुत कर उसे चलाते हैं तथा उत्तर दिशा में विक्रिया युक्त ४००० देव दिव्य अश्व के रूप को धारण और उसमें जुत कर विमान को चलाते हैं। इसी प्रकार सिंह, हाथी, वृषभ और अश्व रूप को धारण करने वाले १६००० वाहन जाति के देव सूर्य विमान में भी होते हैं। इसी प्रकार अवशेष शुक्र, गुरु, बुध, शनि और मंगल के विमानों में प्रत्येक विमानों की चारों दिशाओं में दो-दो हजार वाहन जाति के देव जुतते हैं। इन सबका योग करने पर प्रत्येक ग्रह के पृथक्-पृथक् वाहन जाति के देव आठ-आठ हजार हैं। वाहन जाति के १००० सिंह रूपधारी देव, १००० गज रूपधारी, १००० वृषभ रूपधारी और १००० अश्व रूपधारी देव प्रत्येक नक्षत्र विमानों की चारों दिशाओं में पृथक्-पृथक् होते हैं और इनका योग करने पर एक-एक नक्षत्र विमान के सर्व देव चार चार हजार होते हैं। तारागणों के प्रत्येक विमानों की चारों दिशाओं में क्रमशः ५०० सिंह, ५०० हाथी, ५०० बैल और ५०० घोड़े होते हैं, इन प्रत्येक विमानों के देवों का एकत्रित प्रमाण दो-दो हजार होता है। सिंहादिक की विक्रिया युक्त, विमान वाहक इन वाहन जाति के देवों को अल्प पुण्याधिकारी जानना चाहिए ॥३८-४८॥


जम्बूद्वीपे पृथक् स्यातां द्वौ चन्द्रौ द्वौ दिवाकरौ।
लवणोदे च चतुश्चन्द्राश्चत्वारो भानवो मताः ॥४९॥

स्युर्द्वीपे धातकीखण्डे चन्द्राद्वादशसंख्यकाः।
तावन्तो भानवः कालोदधौ चन्द्रमसः स्मृताः ॥५०॥

द्विचत्वारिंशदादित्यास्तावन्तः पुष्करार्धके।
द्विसप्ततिप्रमाश्चन्द्रास्तावन्तः स्युर्दिवाकराः ॥५१॥

इमे पिण्डीकृताः सर्वे द्वात्रिंशदधिकं शतम्।
चन्द्राः सूर्याश्च तावन्तो नृक्षेत्रे सकले मताः ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 49 से 52): जम्बूद्वीप में पृथक्-पृथक् दो चन्द्र और दो सूर्य हैं। लवणोदधि में चार चन्द्र एवं चार सूर्य हैं। धातकीखण्ड में १२ चन्द्र तथा १२ ही सूर्य हैं। कालोदधि में ४२ चन्द्र और ४२ ही सूर्य हैं, इसी प्रकार पुष्करार्धवर द्वीप में ७२ चन्द्र एवं ७२ सूर्य हैं। इन सबका एकत्रित योग करने पर सम्पूर्ण मनुष्य क्षेत्र में (२ + ४ + १२ + ४२ + ७२ =) १३२ सूर्य और १३२ ही चन्द्रमा हैं ॥४९-५२॥ जैसे- (चित्रण में जिस प्रकार जम्बूद्वीप लवण समुद्र और धातकीखण्ड के चन्द्र सूर्य दर्शाए गये हैं उसी प्रकार कालोदक एवं पुष्करार्ध क्षेत्र में भी जानना चाहिए।


चन्द्रेन्द्रस्य भवेत्सूर्यः प्रतीन्द्रो मिलिता ग्रहाः।
अष्टाशीतिश्च नक्षत्राण्यष्टाविंशतिरेव च ॥५३॥

षट्षष्टिश्च सहस्राणि तथा नवशतान्यपि।
पञ्चसप्ततिसंख्यानाः कोटीकोट्यो हि तारकाः ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 53 से 54): चन्द्रमा इन्द्र है। इसके परिवार में सूर्य प्रतीन्द्र (एक), ग्रह ८८, अभिजित् सहित अश्विनी आदि नक्षत्र २८ एवं छियासठ हजार नौ सौ पचहत्तर कोड़ाकोड़ी अर्थात् ६६९७५००००००००००००० तारागण हैं ॥५३-५४॥


तेभ्यो हिमवदाद्यद्रिवर्षेषु द्विगुणोत्तराः।
भवन्ति तारका यावद्विदेहक्षेत्रमुत्तमम् ॥५६॥

विदेहक्षेत्रतोऽर्द्धार्द्धास्तारकाः सन्त्यनुक्रमात्।
ऐरावतान्तमेवाद्रि नीलाख्य रम्यकादिषु ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 55 से 57): छियासठ हजार नौ सौ पचहत्तर कोड़ाकोड़ी तारागणों के प्रमाण को १९० से भाग देने पर जो एक भाग प्राप्त हो उतनी ताराएँ भरतक्षेत्र के ऊपर हैं, उनसे हिमवन् आदि कुलाचलों एवं विदेह पर्यंत के क्षेत्रों पर तारागणों का प्रमाण क्रमशः दुगुना-दुगुना होता गया है तथा विदेह क्षेत्र से, ऐरावत है अन्त में जिसके ऐसे रम्यक आदि क्षेत्रों पर और नील आदि कुलाचलों के ऊपर इन तारागणों का प्रमाण क्रमशः अर्ध अर्ध हीन होता गया है ॥५५-५७॥


सार्धद्वीपद्वयोश्चाब्ध्योर्द्वयोर्ज्योतिष्कनिर्जराः ।
प्रागुक्तक्रमवृद्ध्या प्रवर्धन्ते निखिला अपि ॥५८॥

अर्थ: अढ़ाई द्वीप और दो समुद्रों में समस्त ज्योतिष्क देव पूर्वोक्त क्रम वृद्धि से ही वृद्धिंगत होते हैं-


विधोः शेषपरिवारसुराः सामानिकादयः ।
अष्टभेदा हि पूर्वोक्ताः प्रतीन्द्रप्रमुखाः सदा ॥५९॥

त्रायस्त्रिंशसुरैर्लोकपालैर्विना भवन्ति च ।
सार्धद्वीपद्वये पङ्क्त्या ज्योतिर्देवा भ्रमन्त्यमी ॥६०॥

मानुषोत्तरतो बाह्ये तिष्ठन्ति ज्योतिषां गणाः ।
ये संख्यवर्जितास्तेषामचलत्वं भवेत्सदा ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 59 से 61): पूर्वोक्त दस भेदों में से त्रायस्त्रिंश और लोकपाल देवों के बिना, प्रतीन्द्र है प्रमुख जिनमें, ऐसे सामानिक आदि आठ भेद वाले देव चन्द्र के अवशेष परिवार में होते हैं। अर्थात् ज्योतिष्क देवों का इन्द्र चन्द्रमा है, इसके परिवार में प्रतीन्द्र, सामानिक, तनुरक्षक, पारिषद्, अनीक, प्रकीर्णक आभियोग्य और किल्विषिक जाति के देव होते हैं। अढ़ाई द्वीप में ज्योतिर्देवों का गमन पंक्ति पूर्वक होता है। मानुषोत्तर पर्वत के आगे असंख्यात ज्योतिष्क देवों के समूह हैं, जो निरन्तर अचल ही रहते हैं अर्थात् कभी गमन नहीं करते ॥५९-६१॥


जम्बूद्वीपे च षट्त्रिंशत्प्रमाणास्तारका ध्रुवाः।
लवणाब्धौ तथैको न चत्वारिंशद्युतं शतम् ॥६२॥

तारकाः धातकीखण्डे सहस्त्रं दशसंयुक्तम् ।
कालोदेचैक चत्वारिंशत्सहस्त्रास्तथा शतम् ॥६३॥

विंशत्यग्रं धुवाः सन्ति तारकाः पुष्करार्धके ।
त्रिपञ्चाशत् सहस्त्राणि त्रिंशदग्रं शतद्वयम् ॥६४॥

ध्रुवाः स्युस्तारका एषां चलनं जातु नास्त्यपि ।
तिर्यग्लोके समस्ताश्च ध्रुवाज्योतिष्कनिर्जराः ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 62 से 65): जम्बूद्वीप में ३६ ध्रुव ताराएँ हैं। लवण समुद्र में १३९ धातकीखण्ड में १०१०, कालोदधि के ऊपर ४११२० और पुष्करार्ध के ऊपर ५३२३० ध्रुवताराएँ हैं। इस प्रकार अढ़ाई द्वीप में (३६ + १३९ + १०१० + ४११२० + ५३२३० =) ९५५३५ ध्रुवताराएँ हैं, ये कभी भी चलायमान नहीं होतीं। अर्थात् गमन नहीं करतीं। तिर्यग्लोक में अर्थात् अढ़ाई द्वीप से बाहर के सभी ज्योतिर्देव ध्रुव हैं। अर्थात् कभी गमन नहीं करते ॥६२-६५॥


एकः विंशाधिकैकादश शतैर्योजनैश्च खे ।
तिर्यग्मेरुं विहायैते परिभ्रमन्ति सर्वतः ॥६६॥

सर्वज्योतिष्कवृन्दार्धाः स्वस्वद्वीपाम्बुधिं श्रिताः ।
ज्योतिष्का मर्त्यलोकस्यैकस्मिन् भागे चलन्ति च ॥६७॥

अन्ये ज्योतिर्गणार्धा ज्योतिष्कामराभ्रमन्त्यपि ।
खे स्वस्वसद्गिमानस्था भागेऽन्यस्मिन्निरन्तरम् ॥६८॥

लवणाद्याः स्वविष्कम्भाः सूर्यार्धमण्डलोनिताः ।
स्वसूर्यार्धेन संभक्तास्तदन्तरं द्विसूर्ययोः ॥६९॥

सूर्यान्तरं यदेवात्र तस्यार्धमन्तरं हि तत् ।
वेदिकासन्नमार्गस्य दिवाकरस्य जायते ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 66 से 70): सर्व ज्योतिर्गण सुदर्शन मेरु को तिर्यग् रूप से ११२१ योजन (४४८४००० मील) छोड़कर प्रदक्षिणा रूप से मेरु के चारों ओर आकाश में परिभ्रमण करते हैं। मनुष्य क्षेत्रस्थ द्वीप समुद्रों में से अपने-अपने द्वीप समुद्रों के ऊपर ज्योतिष्क देवों के जो देव समूह अवस्थित हैं, उनका अर्ध अर्ध भाग अपने-अपने द्वीप समुद्र के एक भाग में और अन्य दूसरा अर्ध भाग दूसरे एक भाग में संचार (गमन) करता है। लवण समुद्र एवं धातकीखण्ड आदि स्थानों में जितने-जितने सूर्य हैं, उनके अर्ध-अर्ध सूर्य बिम्बों के विष्कम्भ को लवण समुद्रादि के स्व स्व विष्कम्भों में से घटाकर अवशेष में स्वकीय सूर्यों के अर्धभाग का भाग देने पर एक सूर्य से दूसरे सूर्य का अन्तर प्राप्त होता है तथा वेदी से निकटवर्ती सूर्य का अंतर उपयुक्त अन्तर का अर्ध प्रमाण होता है। अर्थात् लवण समुद्र में चार सूर्य हैं, इनके अर्ध (२) सूर्यों के विष्कम्भ का प्रमाण (४८/६१ × २=) ९६/६१ योजन हुआ, इसे लवण समुद्र के २००००० योजन में से घटाने पर ( २०००००/१ - ९६/६१ ) = १२१९९९०४/६१ योजन अवशेष बचता है। इसमें लवण समुद्र के सूर्यों (४) के अर्ध भाग (२) का भाग देने पर ( १२१९९९०४ / ६१×२ ) ९९९९९ १३/६१ योजन लब्ध प्राप्त होता है। यही एक सूर्य से दूसरे सूर्य के अन्तर का प्रमाण है और वेदी से निकटवर्ती सूर्य का अन्तर उपयुक्त अन्तर का अर्ध (४९९९९ ३७/६१ योजन) प्रमाण है। अर्थात् लवण समुद्र की अभ्यंतर वेदी से प्रथम सूर्य ४९९९९ ३७/६१ योजन (१९९९९८४२६ १४/६१ मील) दूर रहता है। इस सूर्य से दूसरा सूर्य ९९९९९ १३/६१ यो. (३९९९९६८५२ २८/६१ मील) दूर है और इस सूर्य से लवण समुद्र की बाह्य वेदी ४९९९९ ३७/६१ यो. दूर है ॥६६-७०॥


मानुषोत्तरतो बाह्य भागे लक्षार्धयोजनान्।
मुक्त्वा ज्योतिष्कदेवानां प्रथमं वलयं भवेत् ॥७१॥

वलयेऽस्मिंश्चतुश्चत्वारिंशदग्रशत प्रमाः।
स्युश्चन्द्रांस्तत्समाः सूर्याः सर्वे ग्रहादयः क्रमात् ॥७२॥

ततो हि योजनानां च लक्षे लक्षे गते सति।
ज्योतिषां पुष्करार्धे च वलयं स्यात्पृथक्-पृथक् ॥७३॥

किन्तु चन्द्राश्च चत्वारो वलये वलये क्रमात्।
वर्धन्ते भानवो यावद्वलयं सप्तमं भवेत् ॥७४॥

पिण्डीकृतानि सर्वाणि सन्त्यष्टौ वलयान्यपि।
मानुषोत्तरशैलाद्रेर्बाह्यस्थ पुष्करार्धके ॥७५॥

ततो योजनलक्षार्धं प्रविश्य पुष्कराम्बुधौ।
तद्वेदीमूलतस्तेषां नवमं वलयं भवेत् ॥७६॥

वलयेऽस्मिन् भवन्त्यष्टाशीत्यग्रद्विशतप्रमाः।
चन्द्रास्तावन्त आदित्याः समभागे व्यवस्थिताः ॥७७॥

ततोऽत्र योजनानां च लक्षे लक्षे गते क्रमात्।
पूर्वक्षेत्रं समावेष्ट्यास्त्येकैकं वलयं पृथक् ॥७८॥

अत्रापि पूर्ववच्चन्द्राश्चत्वारो भानवस्तथा।
वर्धन्तेऽमीग्रहाद्यैश्च वलयं वलयं प्रति ॥७९॥

अनेन विधिना सन्त्यसंख्यद्वीपाब्धिषु स्फुटम्।
असंख्यवलयान्येव चन्द्रादिज्योतिषां क्रमात् ॥८०॥

योजनानां तथैकैकलक्षान्तरान्वितान्यपि।
मध्यलोकान्तपर्यन्तं चान्तिमाब्ध्यन्तमञ्जसा ॥८१॥

एषु द्वीपाब्ध्यसंख्येषु तारेशा भानवस्तथा।
वर्धन्तेऽन्योऽन्य चत्वारएकैकं वलयं प्रति ॥८२॥

अत्रस्था भास्कराः पुष्यनक्षत्रेषु प्रतिष्ठिताः।
सर्वे चन्द्राश्च तिष्ठन्त्यभिजित्सुसंख्य वर्जिताः ॥८३॥

स्वकीयस्य स्वकीयस्य स्वस्वेन्दुभानुसंख्यकैः।
वलयस्य विभक्तस्य यदन्तरं परस्परम् ॥८४॥

तदेवान्तरमेव स्याच्चन्द्राच्चन्द्रमसः पृथक्।
सूर्यात्सूर्यस्य चान्यस्मात्सर्वत्रैषान्तरस्थितिः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 71 से 85): मानुषोत्तर पर्वत के बाह्य भाग में पर्वत से पचास हजार योजन आगे जाकर सूर्य-चन्द्र आदि ज्योतिष्क देवों का प्रथम वलय है। इस प्रथम वलय में १४४ चन्द्र एवं १४४ सूर्य हैं, अन्य ग्रहों की अवस्थिति भी इसी क्रम से जानना चाहिए। इस प्रथम वलय से एक-एक लाख योजन क्रम से आगे जाते हुए पुष्करार्ध द्वीप में ज्योतिष्क देवों का पृथक्-पृथक् एक-एक वलय है तथा प्रत्येक वलय में क्रम से चार-चार चन्द्र और चार-चार सूर्यों की अपने-अपने परिवार देवों के साथ जब तक सातवाँ वलय प्राप्त नहीं होता, तब तक अभिवृद्धि होती रहती है। इस प्रकार मानुषोत्तर के बाह्य भाग से पुष्करार्ध पर्यन्त के सर्व वलयों का एकत्रित योग आठ है। इसके आगे पुष्करार्ध द्वीप की अन्तिम वेदी से प्रारम्भ कर पुष्करवर समुद्र में पचास हजार योजन भीतर जाकर ९ वाँ वलय है। इस ९ वें वलय में २८८ चन्द्र और २८८ सूर्य समान भाग में अवस्थित हैं। यहाँ से क्रमशः एक-एक लाख योजन आगे-आगे पुष्करार्ध द्वीप को समावेष्टित करते हुए पृथक्-पृथक् एक-एक वलय है। यहाँ भी पूर्व के ही सदृश अपने-अपने ग्रह आदि परिवार देवों के साथ प्रत्येक वलय में चार-चार चन्द्र और चार-चार सूर्यों की वृद्धि होती है। इसी विधि से असंख्यात द्वीप समुद्रों में क्रमशः चन्द्र आदि ज्योतिष्क देवों के असंख्यात वलय हैं। ये वलय मध्यलोक के अन्त में अवस्थित स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त हैं तथा इन सभी में एक-एक लाख योजन का अन्तर है। इन असंख्यात द्वीप समुद्रों में अवस्थित असंख्यात वलयों में से प्रत्येक वलय में अपने-अपने परिवार सहित चार-चार चन्द्रों और चार-चार सूर्यों की अभिवृद्धि होती है (किन्तु इस वृद्धि का सम्बन्ध अपने-अपने द्वीप समुद्र पर्यन्त ही होता है, अन्य द्वीप समुद्रों से नहीं। अन्य द्वीप समुद्रों के प्रथम वलय में तो इनकी संख्या पूर्व द्वीप समुद्र के प्रथम वलय से नियमतः दुगुनी हो जाती है। जैसे-बाह्य पुष्करार्ध द्वीप में कुल आठ वलय हैं। प्रथम वलय में १४४ चन्द्र हैं, इसके आगे प्रत्येक वलय में चार-चार की वृद्धि होते हुए १४८, १५२, १५६, १६०, १६४, १६८ और ८ वें वलय में १७२ चन्द्रों की प्राप्ति हुई किन्तु पुष्करवर समुद्र में अवस्थित ९ वें वलय में चन्द्रों की संख्या २८८ है, जो पुष्करार्ध द्वीप स्थित प्रथम वलय से दूनी है। इसी प्रकार सर्वत्र जानना ।) इन असंख्यात वलय में अवस्थित असंख्यात सूर्य स्व स्व परिवार सम्बन्धी पुष्य नक्षत्रों पर अवस्थित हैं और असंख्यात चन्द्र अभिजित् नक्षत्रों पर अवस्थित हैं। अपने-अपने वलय (की परिधि के प्रमाण) को स्व स्व वलय स्थित सूर्य चन्द्रों की संख्या से भाजित करने पर जो अन्तर प्राप्त होता है वही अन्तर अपने वलय में एक चन्द्र से दूसरे चन्द्र का और एक सूर्य से दूसरे सूर्य का होता है [यथा-मानुषोत्तर पर्वत का सूची व्यास ( ९/२ + २ + ४ + ८ + ८ = २२ १/२ × २ = ) ४५ लाख योजन है, इसमें बाह्य पुष्करार्ध के दोनों ओर का पचास-पचास हजार मिला देने से बाह्य पुष्करार्ध के प्रथम वलय के सूची व्यास का प्रमाण (४५+१)=४६ लाख योजन और इसकी सूक्ष्म परिधि का प्रमाण १४५४६४७७ योजन हुआ, इसमें प्रथम वलय में अवस्थित १४४ चन्द्रों का भाग देने पर एक चन्द्र से दूसरे चन्द्र का अन्तर प्रमाण (१४५४६४७७ ÷ १४४) = १०१०१७ २९/१४४ योजन प्राप्त हुआ। इसी प्रकार सर्वत्र ज्ञातव्य है] अन्य सर्वत्र भी परस्पर का अन्तर निकालने की यही प्रक्रिया है अर्थात् अन्तर की अवस्थिति इसी प्रकार है ॥७१-८५॥


पुष्करद्वीपशेषार्धेऽष्टौ सन्ति वलयानि च।
पुष्कराब्धौ क्रमेणैव द्वात्रिंशद् वलयान्यपि ॥८६॥

वलया वारुणीद्वीपे चतुःषष्टिप्रमाणकाः।
वरुणाब्धौ तथाष्टाविंशत्यग्रशतसंख्यकाः ॥८७॥

इत्येवं द्वीपसर्वेषु चासंख्येयेष्वब्धिषु क्रमात्।
द्विगुणा द्विगुणा ज्ञेया वलयासंख्यवर्जिताः ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 86 से 88): बाह्य पुष्करार्ध द्वीप में ८ वलय हैं। पुष्करवर समुद्र में ३२, वारुणीवर द्वीप में ६४ और वारुणीवर समुद्र में १२८ वलय हैं। इसी प्रकार असंख्यात द्वीप समुद्रों में असंख्यात वलय हैं, जिनका प्रमाण क्रमशः दुगुना-दुगुना जानना चाहिए ॥८६-८८॥


प्रचारक्षेत्रमेवैकं सूर्यस्य योजनानि च।
सूर्यस्य बिम्बयुक्तं दशग्रपञ्चशतान्यपि ॥८९॥

प्रचारक्षेत्रमिन्दोश्च चन्द्रबिम्बयुतं भुवि।
योजनानां जिनोक्तं दशाग्रपञ्चशतप्रमम् ॥९०॥

तन्मध्ये योजनानां चाशीत्यग्रशतसम्मितम्।
इन्दोर्भानोस्तथा चारक्षेत्रं द्वीपादिमे पृथक् ॥९१॥

तथाब्धौ योजनानां स्यात्त्रिंशदग्रशतत्रयम्।
दिवाकरस्य चन्द्रस्य चारक्षेत्रं किलादिमे ॥९२॥

सूर्यचन्द्राविमौ चाद्यद्वीपाब्ध्योर्भमतोऽन्वहम्।
नरक्षेत्रे भ्रमन्त्यन्ये स्वस्वद्वीपाब्धिगोचराः ॥९३॥

शतं चतुरशीत्यग्रं मार्गाः सूर्यस्य सन्ति च।
चारक्षेत्रेऽखिला इन्दोर्मार्गाः पञ्चदशप्रमाः ॥९४॥

एषां मध्ये व्रजेदेकं मार्गं दिनं दिनं प्रति।
दिननाथस्तथा चन्द्रः क्रमेणैषां सदागतिः ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 89 से 95): (सूर्य-चन्द्र के गमन करने की क्षेत्र गली को चार क्षेत्र कहते हैं। दो चन्द्रों और दो सूर्यों के प्रति एक-एक चार क्षेत्र होते हैं।) सूर्य बिम्ब के विस्तार ( ४८/६१ ) प्रमाण से अधिक ५१० योजन अर्थात् ५१० ४८/६१ योजन (२०४३१४७ ३३/६१ मील) विस्तार वाला एक चार क्षेत्र सूर्य का है तथा जिनेन्द्र द्वारा चन्द्र बिम्ब के विस्तार ( ५६/६१ यो.) से अधिक ५१० योजन अर्थात् ५१० ५६/६१ योजन (२०४३६७ ८/६१ मील) विस्तार वाला एक चार क्षेत्र चन्द्र का है। चन्द्र-सूर्यों के अपने-अपने चार क्षेत्रों के विस्तार में से जम्बूद्वीप में इनके चार क्षेत्र का प्रमाण मात्र १८० योजन (७२०००० मील) है। अवशेष ३३० योजन प्रमाण वाला चार क्षेत्र लवणसमुद्र में है। अर्थात् जम्बूद्वीपस्थ चन्द्र-सूर्य जम्बूद्वीप के भीतर १८० योजन में ही विचरते हैं। शेष ३३० योजन लवण समुद्र में विचरण करते हैं। इस प्रकार मनुष्य क्षेत्र में जम्बूद्वीप सम्बन्धी चन्द्र सूर्य जम्बूद्वीप और लवण समुद्र इन दोनों में भ्रमण करते हैं किन्तु अवशेष धातकीखण्ड को आदि कर पुष्करार्ध पर्यन्त द्वीप समुद्र सम्बन्धी चन्द्र सूर्यों का भ्रमण अपने-अपने द्वीप समुद्रों में ही होता है, उसके बाहर नहीं। अर्थात् वहाँ के चन्द्र सूर्यों के चार क्षेत्र अपने-अपने द्वीप समुद्रों में ही हैं। अपने-अपने प्रमाण वाले चार क्षेत्रों में चन्द्र की १५ गलियाँ तथा सूर्य की १८४ गलियाँ हैं। इन अपनी-अपनी गलियों के मध्य अनुक्रम से निरन्तर गमन करते हुए प्रतिदिन दो-दो सूर्य और दो-दो चन्द्र संचार करते हैं। अर्थात् आमने-सामने रहते हुए दो सूर्य प्रतिदिन एक गली को पूर्ण कर लेते हैं ॥८९-९५॥


आदिमार्गाश्रितौ मन्दौ बहिः शीघ्रौ च निर्गमे।
तौ मार्गान् समकालेन सर्वान् साधयतः क्रमात्॥९६॥

आदिमार्गे गजाकारा गतिर्मध्याध्वनि स्मृताः।
अश्ववद्गतिरन्ताध्वनि सिंहाभा गतिस्तयोः॥९७॥

सूर्यचन्द्रमसोश्चान्यद्वीथी वीथ्यन्तरादिकम्।
लोकानुयोगसिद्धान्ते ज्ञेयं परिधिलक्षणम्॥९८॥

अर्थ (श्लोक 96 से 98): सूर्य एवं चन्द्र प्रथम (अभ्यन्तर) वीथी में मन्द गति से गमन करते हैं किन्तु वे जैसे जैसे बाहर (द्वितीयादि गलियों में) की ओर बढ़ते जाते हैं वैसे ही उनकी गति क्रमशः तेज होती जाती है। वे दोनों समकाल (६० मुहूर्त) में ही हीनाधिक प्रमाण वाली सर्व गलियों को पूरा कर लेते हैं। प्रथम आदि गलियों में उन दोनों की चाल हाथी सदृश, मध्यम वीथी में अश्व सदृश और अन्तिम वीथी में सिंह के सदृश है। चन्द्र और सूर्यों को वीथियों का पारस्परिक अन्तर तथा इनकी परिधियों का प्रमाण आदि करणानुयोग (त्रिलोकसार गाथा ३७७-३७८-३८५-३८६-३८७ आदि) से ज्ञात कर लेना चाहिए ॥९६-९८॥


कृतिकारोहणीनाम ततो मृगशिरस्तथा।
आर्द्रा पुनर्वसुर्नाम्ना पुष्याश्लेषा मघाह्वयाः ॥९९॥

पूर्वादि फाल्गुनी चोत्तरफाल्गुनी समाह्वयम्।
हस्ता चित्रा तथा स्वाति विंशाखाभिधमेव च ॥१००॥

अनुराधाख्यकं ज्येष्ठा नक्षत्रं मूलसंज्ञकम्।
पूर्वाषाढाभिधं चोत्तराषाढाख्योऽभिजित्ततः ॥१०१॥

श्रवणाख्यं धनिष्ठा शतभिषा नामकं ततः।
पूर्वाभाद्रपदाख्यं चोत्तरभाद्रपदाख्यकम् ॥१०२॥

रेवतीसंज्ञनक्षत्रमश्विनी भरणीति च।
अष्टाविंशति नामानि नक्षत्राणामनुक्रमात् ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 99 से 103): १. कृतिका, २. रोहिणी, ३. मृगशीर्षा, ४. आर्द्रा, ५. पुनर्वसु, ६. पुष्य, ७. आश्लेषा, ८. मघा, ९. पूर्वाफाल्गुनी, १०. उत्तराफाल्गुनी, ११. हस्त, १२. चित्रा, १३. स्वाति, १४. विशाखा, १५. अनुराधा, १६. ज्येष्ठा, १७. मूल, १८. पूर्वाषाढा, १९. उत्तराषाढा, २०. अभिजित्, २१. श्रवण, २२. धनिष्ठा, २३. शतभिषा, २४. पूर्वाभाद्रपद, २५. उत्तराभाद्रपद, २६. रेवती, २७. अश्वनी और २८. भरणी नाम वाले ये २८ नक्षत्र अनुक्रम से हैं ॥९९-१०३॥


ताराः षट्पञ्चतिस्रस्तु ह्येकाष्टतिस्र ईरिताः।
षट्चतस्रोऽपि कथ्यन्ते द्वे द्वे पञ्च ततः परम् ॥१०४॥

एकैकाथ चतस्रोपि षट्तिस्रो नवतारकाः।
चतस्रस्तु चतस्रोपि तिस्रस्तिस्रस्तु पंच च ॥१०५॥

शतकमेकादशाग्रे च द्वे द्वे द्वात्रिंशदीरिताः।
पञ्च तिस्रोप्यमूस्तारासंख्यभानां क्रमाद्विदुः ॥१०६॥

एकादशसहस्राणि स्वस्वताराहतानि च।
स्मृतं परिजनस्येदं संख्यानं कृतिकादिषु ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 104 से 107): कृतिका आदि २८ नक्षत्रों के ताराओं की संख्या क्रमशः छह, पाँच, तीन, एक, छह, तीन, छह, चार, दो, दो, पाँच, एक, एक, चार, छह, तीन, नौ, चार, चार, तीन, तीन; पाँच, एक सौ ग्यारह, दो, दो, बत्तीस, पाँच और तीन है। एक हजार एक सौ ग्यारह को अपने-अपने ताराओं के प्रमाण से गुणित करने पर कृतिका आदि नक्षत्रों के परिवार ताराओं का प्रमाण प्राप्त हो जाता है ॥१०४-१०७॥


पुनर्वसुविशाखारोहिणीचोत्तरफाल्गुनी ।
उत्तराषाढसंज्ञं चोत्तरभाद्रपदाद्वयम् ॥१०८॥

एतानि षड् जघन्यानि नक्षत्राणि भवन्त्यपि।
आश्लेषा भरणी चार्द्रा स्वातिर्ज्येष्ठाभिधानकम् ॥१०९॥

ततः शतभिषैतानि षडुत्तमानि सन्ति च।
शेष षोडशनक्षत्राणि मध्यमानि निश्चितम् ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 108 से 110): पुनर्वसु, विशाखा, रोहिणी, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और उत्तराभाद्रपद ये ६ नक्षत्र जघन्य संज्ञक हैं। आश्लेषा, भरणी, आर्द्रा, स्वाति, ज्येष्ठा और शतभिषक् नाम वाले ये छह नक्षत्र उत्कृष्ट संज्ञक हैं तथा शेष अश्वनी, कृतिका, मृगशीर्षा, पुष्य, मघा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, मूल, श्रवण, धनिष्ठा और रेवती नाम वाले ये पन्द्रह नक्षत्र मध्यम संज्ञक हैं ॥१०८-११०॥


व्यञ्जनं शकटाकारं मृगशीर्षा हि दीपिका।
तोरणाभं सितच्छत्रं वल्मीकसंन्निभं तथा ॥१११॥


रेखा गोमूत्रजा हारो युगहस्तोऽम्बुजं ततः।
द्वीपस्त्वैरिणिकाहारो वीणाशृङ्गं हि वृश्चिकः ॥११२॥


भग्नवापीनिभं सिंहो गजकुम्भस्थलोपमः।
मृदङ्गाभं पतत्पक्षी सेनेभ-गात्रसञ्चयः ॥११३॥


नौः पाषाणस्तथा चुल्ली चेत्याकारा इमे क्रमात्।
प्रोदिताः कृत्तिकादीनां नक्षत्राणां जिनेश्वरैः ॥११४॥

अर्थ: कृत्तिका आदि नक्षत्रों की ताराएँ क्रमशः वीजना सदृश, गाड़ी की उड़्डिका सदृश, मृग के शिर सदृश, दीपक, तोरण, छत्र वल्मीक (बाँबी) गोमूत्र, हार, युग, हाथ, उत्पल (नील कमल), दीप, धोंकनी, वरहार, वीणाश्रृंग, वृश्चिक (बिच्छू), नष्टवापी, सिंह, कुम्भ, गज कुम्भ, मुरज (मृदंग), गिरते हुए पक्षी, सेना, हाथी के पूर्व शरीर, हाथी के उत्तर शरीर, नाव, पत्थर और चूल्हे के सदृश आकार वाली होती है ॥१९१-१९४॥


लक्षवर्षाधिकं पल्यमायुश्चन्द्रस्य कीर्तितम्।
सहस्रवर्षसंयुक्तं पल्यं सूर्यस्य जीवितम् ॥११५॥


शुक्रस्यायुश्च पल्यैकं शतवर्षाधिकं मतम्।
बृहस्पतेश्च पल्यैकमखण्डं जीवितम् भवेत् ॥११६॥


मङ्गलस्य बुधस्यापि शनैश्चरस्य जीवितम्।
स्यात्प्रत्येकं च पल्यार्धं तारकाणां तथोत्तमम् ॥११७॥


आयुः पल्यचतुर्थांशः सर्वजघन्यमेव तत्।
पल्यैकस्याष्टमोभागः सर्वनीचामृताशिनाम् ॥११८॥

अर्थ: चन्द्रमा की उत्कृष्ट आयु एक पल्य और एक लाख वर्ष, सूर्य की एक पल्य और एक हजार वर्ष, शुक्र की एक पल्य और १०० वर्ष तथा वृहस्पति की उत्कृष्ट आयु एक पल्य प्रमाण है। मंगल, बुध और शनिश्चर में प्रत्येक की उत्कृष्ट आयु अर्ध-अर्ध पल्य प्रमाण है। तारागणों की उत्कृष्ट आयु पाव ( १/४ ) पल्य है। सूर्यादि ग्रहों की जघन्य आयु पाव ( १/४ ) पल्य प्रमाण है। सर्व नीच देवों की आयु पल्य के आठवें भाग अर्थात् १/८ पल्य प्रमाण होती है ॥१९५-१९८॥


चन्द्रप्रभा सुसीमाख्या प्रभावत्यर्चिमालिनी।
चन्द्रस्येमाश्चतस्रः स्युर्महादेव्यो मनःप्रियाः ॥११९॥

देवी इन्द्रप्रभा सूर्यप्रभाघनकराह्वया।
तथार्चिमालिनी भानोश्चतस्रो बल्लभा इमाः ॥१२०॥

आसामष्टमहादेवीनां प्रत्येकं पृथक् पृथक्।
देव्यो द्वि द्वि सहस्राणि स्युः परिवारसंज्ञिकाः ॥१२१॥

स्वकीयानां स्वकीयानां देवानामायुरस्ति यत्।
तस्यार्धं स्वस्वदेवीनां ज्योतिष्काणां च जीवितम् ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 119 से 122): चन्द्रप्रभा, सुसीमा, प्रभावती और अर्चिमालनी ये चारों मन को प्रिय लगने वालीं चन्द्रमा की महादेवियाँ हैं। इन्द्रप्रभा, सूर्यप्रभा, घनकरा (प्रभंकरा) और अर्चिमालनी ये चार महादेवियाँ सूर्य की हैं। इन आठों महादेवियों में से प्रत्येक महादेवी की पृथक्-पृथक् दो-दो हजार परिवार देवियाँ हैं। पाँचों ज्योतिष देवों के समुदाय में अपने-अपने देवों की आयु का जो प्रमाण है, उनकी देवियों की आयु का प्रमाण उनसे (अपने-अपने देवों से) आधा-आधा है ॥११९-१२२॥


संख्यातीतसहस्राणि योजनानां परोऽवधिः।
ज्योतिष्काणां जघन्यश्च तिर्यक् संख्यातयोजनः ॥१२३॥

कियन्मात्रोऽवधिस्तेषामधोलोकेऽपि जायते।
भावना व्यन्तरा ज्योतिष्का गच्छन्ति स्वयं क्वचित् ॥१२४॥

तृतीयक्षितिपर्यन्तमधोलोके स्वकार्यतः।
सौधर्मैशानकल्पान्तमूर्ध्वलोके निजेच्छया ॥१२५॥

तेऽपि सर्वे सुरैर्नीता भावनाद्यास्त्रयोऽमराः।
षोडशस्वर्गपर्यन्तं प्रीत्या यान्ति सुखाप्तये ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): ज्योतिष्क देवों का उत्कृष्ट अवधि क्षेत्र असंख्यात योजन प्रमाण है। तिर्यग् रूप से जघन्य क्षेत्र संख्यात योजन प्रमाण है और इन देवों का अधोलोक में भी कुछ मात्रा तक अवधि क्षेत्र है। भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिषी देव अपने कार्य वशात् अधोलोक में तीसरी पृथ्वी पर्यन्त जाते हैं। ऊर्ध्वलोक में स्व इच्छा से तो सौधर्म-ऐशान स्वर्ग तक ही जाते हैं किन्तु सुख प्राप्ति के लिए मित्र आदि अन्य महर्द्धिक देवों द्वारा प्रीति पूर्वक सोलह स्वर्ग पर्यन्त ले जाये जाते हैं ॥१२३-१२६॥


सप्तचापतनोत्सेधः सर्वज्योतिःसुधाभुजाम्।
सर्वनिकृष्टदेवानां स्युर्द्वात्रिंशत्प्रमाङ्गनाः ॥१२७॥

उन्मार्गचारिणो येऽत्र विराधितसुदर्शनाः।
अकामनिर्जरायुक्ता बाला बालतपोऽन्विताः ॥१२८॥

शिथिलाधर्मचारित्रे मिथ्यासंयमधारिणः ।
पञ्चाग्निसाधने निष्ठाः सनिदानाश्च तापसाः ॥१२९॥

अज्ञानक्लेशिनः शैवलिङ्गिनो ये नरादयः ।
भावनादि त्रयाणां ते यान्ति नीचगति त्रयम् ॥१३०॥

ये नीचदेव संशक्ता नीचा नीचगुरुं श्रिताः ।
नीचधर्मरता नीचपाखण्डिभक्तिकाः शठाः ॥१३१॥

नीचसंयमदुर्वेषा नीचशास्त्रतपोन्विताः ।
तेऽहो सर्वत्र नीचाः स्युर्देवत्वेऽन्यत्र वा सदा ॥१३२॥

मत्वेति जैनसन्मार्गं स्वर्मोक्षदं सुखार्थिभिः ।
विमुच्य श्रेयसे जातु न ग्राह्यं दुःपथं खलम् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 127 से 133): सर्व ज्योतिष्क देवों (सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु, नक्षत्र और तारागणों) के शरीर की ऊँचाई सात धनुष प्रमाण है। सर्व निकृष्ट अर्थात् पुण्य हीन देवों में से प्रत्येक के ३२-३२ ही देवांगनाएँ होती हैं। जो जीव यहाँ उन्मार्ग का आचरण करते हैं, सम्यग्दर्शन के विराधक हैं, अकाम निर्जरा से युक्त हैं, अज्ञानी हैं, बाल अर्थात् अज्ञान तप को तपने वाले हैं, धर्माचरण में शिथिल हैं, खोटे संयम के धारी हैं, पञ्चाग्नि आदि तपों में श्रद्धा रखते हैं, निदान सहित तप तपते हैं, अज्ञान तप से शरीर को कष्ट देते हैं तथा शिवलिंग आदि के उपासक हैं, वे मनुष्य आदि मरकर भवनत्रय में जन्म लेते हैं एवं अन्य भी तीन नीच गतियों में जन्म लेते हैं। जो कुदेवों में संशक्त हैं, खोटे गुरुओं का आश्रय ग्रहण करते हैं, खोटे धर्मों में संलग्न रहते हैं, नीच और पाखण्डी गुरुओं के भक्त हैं, मूर्ख हैं, खोटे संयम को धारण कर नाना प्रकार के खोटे वेष बनाते हैं, खोटे शास्त्र और खोटे तप से युक्त हैं, खेद है कि वे सब नीच देवों (भवनत्रिक आदि) में उत्पन्न होते हैं तथा अन्यत्र भी नीच गतियों में ही निरन्तर उत्पन्न होते हैं। ऐसा मान कर सुखार्थी जीवों को स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले जैनधर्म स्वरूप समीचीन मार्ग को छोड़कर दुःख देने वाले खोटे मार्ग का आश्रय कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥१२७-१३३॥


एतत्पुण्यनिधानकं जिनमुखोद्भूतं सुधर्माकरम्,
धर्मध्यान निबन्धनं ह्यघहरं लोकानुयोगश्रुतम्।
ज्योतिष्कामरभूतिवर्णनकरं भव्यात्मनां बोधकम्
सारं ज्ञानशिवार्थिनोप्यनुदिनं सिद्ध्यै पठन्त्वादरात् ॥१३४॥

अर्थ: इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान् के मुखारविन्द से उद्भूत, पुण्य का निधान, समीचीन धर्म का आकर, धर्मध्यान का निबन्धक, पाप का नाशक, भव्य जीवों को बोध देने वाले, सारभूत और ज्योतिष्क देवों की विभूति आदि के वर्णन से युक्त इस करणानुयोग शास्त्र को केवलज्ञान एवं मोक्ष के अर्थी भव्यजन आत्मसिद्धि के लिये प्रतिदिन आदरपूर्वक पढ़ें। अर्थात् प्रतिदिन इसका स्वाध्याय करना चाहिए ॥१३४॥


अधिकारान्त मंगलाचरण


ज्योतिर्भावन भौमनाकभवनेष्वेव त्रिलोके च ये,
श्रीमच्चैत्यगृहा नृदेवमहिता नित्येतराः पुण्यदाः।
श्रीतीर्थेश्वर मूर्तयोऽति सुभगा याः श्री जिनाद्याश्च ये,
तान् सर्वान् परमेष्ठिनः सुविधिना वन्देऽर्चयेऽर्चाश्च ताः ॥१३५॥

अर्थ: भवनवासी, व्यन्तरवासी, ज्योतिषी और कल्पवासी देवों के भवनों में तथा तीन लोक में मनुष्य और देवों द्वारा पूजित, पुण्य प्रदान करने वाले अकृत्रिम और कृत्रिम जिन चैत्यालयों की, अत्यन्त सुभग तीर्थंकरों की प्रतिमाओं की तथा साक्षात् जिनेन्द्र देव आदि पंच परमेष्ठियों की और उन सब प्रतिमाओं की मैं विधिपूर्वक पूजन करता हूँ, वन्दना करता हूँ और अर्चना करता हूँ ॥१३५॥