सिद्धान्तसार दीपक (आचार्य सकलकीर्ति), हिन्दी अनुवाद सहित | Siddhantsar Deepak (Acharya Sakalkirti)

पञ्चदश अधिकार ऊर्ध्वलोक वर्णन (भाग 1/2)

त्रिसहस्रोनपञ्चाशीति लक्षश्रीजिनालयान् ।
त्रयोविंशतिसंयुक्तान् वन्दे वन्द्यान्नरामरैः ॥१॥

अर्थ: मनुष्यों और देवों के द्वारा वन्दनीक चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस जिनालयों को मैं (सकलकीर्त्याचार्य) नमस्कार करता हूँ ॥१॥


अथोर्ध्वलोकभागस्थान् स्वर्गग्रैवेयकादिकान्।
इन्द्रादिनाकिनां भूतिस्थितियुक्त्यादिकान् ब्रुवे ॥२॥

अर्थ: अब ऊर्ध्वलोक में स्थित सौधर्मादि स्वर्ग और ग्रैवेयक आदि की स्थिति आदि को तथा इन्द्रादिक देवों की विभूति एवं स्थिति आदि को कहता हूँ ॥२॥


सौधर्मेशानकल्पौ द्वौ दक्षिणोत्तरयोः स्थितौ।
सनत्कुमारमाहेन्द्रौ ब्रह्मब्रह्मोत्तराह्वयौ ॥३॥

स्वर्गौ लान्तवकापिष्टौ दक्षिणोत्तरदिक्श्रितौ।
द्वौ च शुक्रमहाशुक्रौ युग्मरूपव्यवस्थितौ ॥४॥

द्वौ शतारसहस्रारावानतप्राणताभिधौ।
आरणाच्युतनामानौ चैते स्वर्गाश्च षोडश ॥५॥

अर्थ (श्लोक 3 से 5): सौधर्म और ऐशान कल्प, क्रमशः दक्षिण और उत्तर में अवस्थित हैं, सनत्कुमार-माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर तथा लान्तव और कापिष्ट ये स्वर्ग भी दक्षिण-उत्तर दिशाओं के आश्रित अवस्थित हैं। शुक्र और महाशुक्र ये युग्म रूप से अवस्थित हैं। शतार-सहस्रार, आनत-प्राणत तथा आरण और अच्युत ये भी एक के बाद एक युग्म रूप से अवस्थित हैं, इस प्रकार ये सोलह स्वर्ग ऊर्ध्वलोक में अवस्थित हैं ॥३-५॥


चतुर्णामाद्यनाकानां चत्वारो वासवा पृथक्।
चतुः स्वर्मध्ययुग्मानां चत्वारः स्वर्गनायकाः ॥६॥

चतुस्तदग्रनाकानामिन्द्राश्चत्वार ऊर्जिताः।
इतीन्द्रसंख्यया कल्पाः कथ्यन्ते द्वादशागमे ॥७॥

अर्थ (श्लोक 6 से 7): आदि के चार स्वर्गों के पृथक्-पृथक् चार इन्द्र हैं। अर्थात् सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र हैं। मध्य के चार युगलों (आठ स्वर्गों) के चार इन्द्र हैं। अर्थात् ब्रह्म, लान्तव, महाशुक्र और सहस्रार स्वर्गों में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र है। ब्रह्मोत्तर, कापिष्ट, शुक्र और शतार स्वर्गों में इन्द्र नहीं हैं। शेष ऊपर के आनत, प्राणत, आरण और अच्युत में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र है। इस प्रकार आगम में बारह इन्द्र और बारह ही कल्प कहे गये हैं ॥६-७॥


सौधर्मेन्द्र यः शक्रः सनत्कुमारदेवराट्।
ब्रह्मेन्द्रो लान्तवेन्द्रश्चानतेन्द्र आरणाधिपः ॥८॥

षडेते दक्षिणेन्द्राः स्युर्नूनमेकावतारिणः।
पूर्वार्जितमहापुण्यजिनभक्तिभराङ्किताः ॥९॥

ईशानेन्द्रो हि माहेन्द्रः शुक्रेन्द्रः शुक्रनाकभाक्।
शतारेन्द्रस्ततः प्राणतेन्द्रोऽच्युतेन्द्र उत्तमः ॥१०॥

एते षडुत्तरेन्द्राः स्युर्जिनपूजापरायणाः।
सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः सर्वामरनतक्रमाः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 8 से 11): सौधर्म, सनत्कुमार, ब्रह्म, लान्तव, आनत और आरण नाम के ये छह इन्द्र दक्षिणेन्द्र हैं। ये छहों एक भवतारी, पूर्वोपार्जित महापुण्य से युक्त और जिनेन्द्र भगवान् की अपूर्व भक्ति के रस से सहित होते हैं। सर्व देवों से नमस्कृत, सम्यग्दर्शन से शुद्ध और जिनेन्द्र की पूजा में तल्लीन रहने वाले ईशान, माहेन्द्र, शुक्र स्वर्ग का शुक्र, शतार, प्राणत और अच्युत नाम के ये छह इन्द्र उत्तरेन्द्र हैं ॥८-११॥


उपर्युपरि सन्त्येते स्वर्गाः षोडशसम्मताः।
दक्षिणोत्तरदिग्भागस्था युग्मरूपिणः शुभाः ॥१२॥

स्वर्गाणामुपरि स्युश्चाद्याधोग्रैवेयकास्त्रयः।
तेषामुपरिसन्त्येव मध्यग्रैवेयकास्त्रयः ॥१३॥

एषामुपरि तिष्ठन्ति चोर्ध्वग्रैवेयकास्त्रयः।
अमीषामुपरि स्याच्च नवानुदिशनामकम् ॥१४॥

तस्य सन्ति चतुर्दिक्षु चत्वारश्च विमानकाः।
विदिक्षु तेऽपितावन्तो मध्ये ह्येकं विमानकम् ॥१५॥

तस्योपरि च पञ्चानुत्तराख्यं पटलं भवेत्।
तच्चतुर्दिक्षु चत्वारि विमानानि भवन्ति वै ॥१६॥

मध्ये सर्वार्थसिद्ध्याख्यं स्याद्विमानं च्युतोपमम्।
ततो मुक्तिशिलादिव्या गत्वा द्वादशयोजनान् ॥१७॥

अर्थ (श्लोक 12 से 17): दक्षिण और उत्तर दिशाओं में षोडश स्वर्ग युग्म रूप से ऊपर-ऊपर अवस्थित हैं, अर्थात् एक युगल के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरा इत्यादि। सोलह स्वर्गों के ऊपर तीन अधो ग्रैवेयकों की (एक के ऊपर एक) अवस्थिति है। इनके ऊपर तीन मध्यम ग्रैवेयक और उनके ऊपर तीन ऊर्ध्व ग्रैवेयक स्थित हैं। इन ग्रैवेयकों के ऊपर चार दिशाओं में चार, चार विदिशाओं में चार और एक मध्य में इस प्रकार नव अनुदिशों की अवस्थिति है। नव अनुदिशों के ऊपर पाँच अनुत्तर विमान हैं, जो चार दिशाओं में चार हैं और मध्य में उपमा रहित सर्वार्थसिद्धि नामक विमान अवस्थित है। सर्वार्थसिद्धि विमान से बारह योजन ऊपर जाकर दिव्य रूप वाली सिद्धशिला अवस्थित है ॥१२-१७॥


मेरोस्तलाच्च सार्धैका रज्जुपर्यन्तमादिमौ।
स्यातां स्वर्गौ ततोऽन्यौ द्वौ सार्ध रज्ज्वन्तमञ्जसा ॥१८॥

अर्धार्धरज्जुपर्यन्तं शेषषट्स्वर्गयुग्मकाः।
प्रत्येकं स्युः पृथग्भूतास्ततो ग्रैवेयकादयः ॥१९॥

सर्वार्थसिद्धिमोक्षान्ता एक रज्ज्वन्तमाश्रिताः।
इत्यूर्ध्व लोककल्पाद्याः स्युः सप्तरज्जुमध्यगाः ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 18 से 20): मेरुतल से डेढ़ राजू में सौधर्मैशान स्वर्ग है, इसके ऊपर डेढ़ राजू में सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्ग हैं, इसके ऊपर-ऊपर प्रत्येक अर्ध-अर्ध राजू की ऊँचाई में क्रम से अन्य छह युगल अवस्थित हैं। इस प्रकार छह राजू में सोलह स्वर्ग स्थित हैं। इनके ऊपर एक राजू में नौ ग्रैवेयक, नव अनुदिश, पाँच अनुत्तर और सिद्धशिला अवस्थित है। इस प्रकार मेरु तल से ऊर्ध्वलोक के सात राजू क्षेत्र में स्वर्गादिक हैं ॥१८-२०॥ यथा- [ऊर्ध्वलोक का चित्र अगले पृष्ठ में है]


आद्ये स्वर्ग्युगले चैक त्रिंशत्स्युः पटलान्यपि।
द्वितीये तानि सप्तैव चत्वारि तृतीये ततः ॥२१॥

चतुर्थे युगले द्वे स्तः पटले पञ्चमे भवेत्।
पटलैकं युगे षष्ठे ह्येकं सत्पटलं मतम् ॥२२॥

सप्तमे युगले त्रीण्यष्टमे त्रिपटलान्यपि।
त्रीण्येव पटलानि स्युरधोग्रैवेयकत्रये ॥२३॥

सन्ति त्रिपटलान्येव मध्यग्रैवेयकत्रये।
ततस्त्रिपटलानि स्युरूर्ध्वग्रैवेयकत्रिके ॥२४॥

नवानुदिशसंज्ञं स्यात्पटलैकं ततः परम्।
पञ्चानुत्तरनामैकं पटलं चेति तान्यपि ॥२५॥

पिण्डीकृतानि सर्वाणि त्रिषष्टि पटलानि वै।
स्युरुपर्युपरिस्थानि कल्पकल्पातिगानि च ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 21 से 26): सौधर्म नामक प्रथम युगल में ३१ पटल हैं। दूसरे सानत्कुमार युगल में सात, तीसरे ब्रह्म युगल में चार, चौथे लान्तव युगल में दो, पाँचवें शुक्र युगल में एक, छठे शतार युगल में एक, सातवें आनत युगल में तीन, आठवें आरण युगल में तीन, अधो ग्रैवेयक में तीन, मध्यम ग्रैवेयक में तीन, ऊर्ध्व ग्रैवेयक में तीन, नव अनुदिशों में एक और पाँच अनुत्तरों में एक पटल है। इस प्रकार सौधर्म स्वर्ग से ऊपर-ऊपर कल्प और कल्पातीत सर्व स्वर्गों के पटलों की संख्या एकत्रित करने पर (३१+७+४+२+१+१+३+३+३+३+३+१+१=) ६३ होती है। अर्थात् कुल ६३ पटल हैं ॥२१-२६॥


सौधर्मे स्युर्विमानानि लक्षा द्वात्रिंशदेव च।
ऐशाने सद्दिमाना लक्षा अष्टाविंशति प्रमाः ॥२७॥

सनत्कुमारकल्पे द्वादशलक्षविमानकाः।
विमानाः सन्ति माहेन्द्रे चाष्टलक्षप्रमाणकाः ॥२८॥

ब्रह्मकल्पे द्विलक्षेमा षण्णवत्या सहस्रकैः।
ब्रह्मोत्तरे च ते लक्षैकं सहस्रचतुर्युतम् ॥२९॥

लान्तवे सद्दिमानानि द्विचत्वारिंशता समम्।
पञ्चविंशति संख्यानि सहस्राणि भवन्ति च ॥३०॥

कापिष्ठे स्युर्विमानानि ह्यष्टपञ्चाशता सह।
नवसंख्यशतैर्युक्ताश्चतुर्विंशसहस्रकाः ॥३१॥

शुक्रेविंशतियुक्तानि सहस्राणि तु विंशतिः।
विमानानि महाशुक्रेऽशीत्यानवशतैर्युताः ॥३२॥

एकोनविंशसंख्यानसहस्राः स्युः शतारेके।
एकोनविंशसंयुक्तत्रिसहस्रा विमानकाः ॥३३॥

सहस्रारे तथैकोनविंशोनत्रिसहस्रकाः।
आनतप्राणताभिख्यकल्पद्वयोर्विमानकाः ॥३४॥

चतुःशतानि चत्वारिंशद् युतान्यारणाच्युते।
विमानाः षष्टि संयुक्त शतद्वयप्रमाणकाः ॥३५॥

ततः सन्ति विमानानि ह्यधोग्रैवेयकत्रिके।
एकादशोत्तरं चैक शतं ततो विमानकाः ॥३६॥

शतैकं सप्तसंयुक्तं मध्यग्रैवेयकत्रिके।
एकानवतिसंख्याना ऊर्ध्वग्रैवेयकत्रिके ॥३७॥

ततो नवविमानानि नवानुदिशसंज्ञके।
पञ्चदिव्यविमानानि पञ्चानुत्तर नामके ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 27 से 38): उपर्युक्त १२ श्लोकों का समस्त अर्थ निम्नांकित तालिका में निहित है।


आद्यस्वर्गयुगे चाद्यमुडुवाख्यं विमलाभिधम्।
चन्द्रं वल्गु च वीराख्यमरुणं नन्दनाह्वयम् ॥३९॥

नलिनं काञ्चनं रोहिच्छञ्चाख्यं मरुदाख्यकम्।
ऋद्धिशं ह्यथवैडूर्यं ततो रुचकनामकम् ॥४०॥

रुचिराभिधमङ्गाख्यं स्फाटिकं तपनीयकम्।
मेघमभ्रं तु हारिद्रं पद्माभिधानकं ततः ॥४१॥

लोहिताख्यं ततो वज्रं नन्द्यावर्तं प्रभाकरम्।
पिष्टकं च गजाभासं मित्राख्यं प्रभसंज्ञकम् ॥४२॥

इत्युक्तशुभनामान एकत्रिशत्प्रमेन्द्रकाः।
मध्यस्थाः पटलानां स्युः सौधर्मैशान कल्पयोः ॥४३॥

अञ्जनं वनमालाख्यं नागं च गरुडाह्वयम्।
लाङ्गलं बलभद्राख्यं चक्रं सप्तेन्द्रका अमी ॥४४॥

सनत्कुमार माहेन्द्र कल्पयोः श्रेणिमध्यगाः।
अरिष्टं देवसौमाख्यं ब्रह्मब्रह्मोत्तराख्यकम् ॥४५॥

ब्रह्मब्रह्मोत्तरे सन्ति चत्वार इन्द्रका इमे।
ब्रह्मादिहृदयाभिख्यं लान्तवं चेन्द्रकाविमौ ॥४६॥

द्वौ स्तो लान्तवकापिष्ठे शुक्राख्यैकोऽस्ति चेन्द्रकः।
शुक्रद्वये शताराख्येन्द्रकः शतारकद्वये ॥४७॥

आनतं प्राणतं पुष्पमिमे स्युरिन्द्रकास्त्रयः।
उपर्युपरिभागेष्वानतप्राणतयोर्द्वयोः ॥४८॥

सातकं चारणाभिख्यमच्युताख्यमिमे त्रयः।
इन्द्रकाः क्रमशः सन्त्यारणाच्युतद्विकल्पयोः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 39 से 49): सौधर्मैश्रान नामक प्रथम युगल में १. ऋतु, २. विमल, ३. चन्द्र, ४. वल्गु, ५. वीर, ६. अरुण, ७. नन्दन, ८. नलिन, ९. काञ्चन, १०. रोहित, ११. चञ्च, १२. मरुत्, १३. ऋद्धीश, १४. वैडूर्य, १५. रुचक, १६. रुचिर, १७. अंक, १८. स्फटिक, १९. तपनीय, २०. मेघ, २१. अभ्र, २२. हारिद्र, २३. पद्म, २४. लोहित, २५. वज्र, २६. नन्द्यावर्त, २७. प्रभाकर, २८. पृष्ठक, २९. गज, ३०. मित्र और ३१. प्रभ ये शुभ नाम वाले ३१ इन्द्रक विमान पटलों के मध्य में अवस्थित हैं। १. अञ्जन, २. वनमाल, ३. नाग, ४. गरुड़, ५. लांगल, ६. बलभद्र और ७. चक्र ये सात इन्द्रक विमान सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्प में स्थित श्रेणीबद्ध विमानों के मध्य में अवस्थित हैं। अरिष्ट, देवसौम, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर नाम के ये चार इन्द्रक ब्रह्म युगल में, ब्रह्महृदय और लान्तव ये दो इन्द्रक लान्तव-कापिष्ट युगल में, शुक्र नामक इन्द्रक शुक्र-महाशुक्र युगल में, शतार नामक इन्द्रक शतार-सहस्रार युगल में आनत, प्राणत और पुष्पक ये तीन इन्द्रक आनत प्राणत स्वर्गों के उपरिम भागों में तथा शातक, आरण और अच्युत ये तीन इन्द्रक आरण-अच्युत इन दो कल्पों में अवस्थित हैं ॥३९-४९॥


सुदर्शनममोघाख्यं सुप्रबुद्धं यशोधरम्।
सुभद्रं सुविशालं तु सुमनस्काभिधानकम् ॥५०॥

सौमनस्काह्वयं प्रीतिङ्करमेते नवेन्द्रकाः।
नवग्रैवेयकेष्वेव सन्त्युपुर्युपरि क्रमात् ॥५१॥

प्राच्यामर्चिर्विमानं दक्षिणदिश्यर्चिमालिनी।
वैरोचनमपाच्यां चोत्तराशायां प्रभासकम् ॥५२॥

आग्नेयदिशि सौमाख्यं नैऋत्यां सौम्यरूपकम्।
वायव्यामङ्कनामैशानकोणे स्फाटिकाभिधम् ॥५३॥

एषां मध्येऽस्ति चादित्यमालिन्याख्यं विमानकम्।
विमानानि नवैतानि स्युर्नवानुदिशाभिधे ॥५४॥

विजयं पूर्वदिग्भागे वैजयन्तं च दक्षिणे।
जयन्तं पश्चिमाशायामुत्तरेऽस्त्यपराजितम् ॥५५॥

अमीषां मध्यभागे स्यात्सर्वार्थसिद्धिनामकम्।
एते पञ्चविमानाः स्युः पञ्चानुत्तरसंज्ञके ॥५६॥

अर्थ (श्लोक 50 से 56): नव ग्रैवेयकों में क्रमशः ऊपर-ऊपर सुदर्शन, अमोघ, सुप्रबुद्ध, यशोधर, सुभद्र, सुविशाल, सुमनस, सौमनस और प्रीतंकर नाम के ये नव इन्द्रक विमान हैं। नव अनुदिशों की पूर्व दिशा में अर्चि विमान, दक्षिण में अर्चिमालिनी, पश्चिम में वैरोचन, उत्तर में प्रभास, आग्नेय दिशा में सौम, नैऋत्य में सौम्य रूप, वायव्य में अंक और ईशान कोण में स्फटिक नामक विमान हैं, इन आठों विमानों के मध्य में आदित्य मालिनी नामक इन्द्रक विमान है। इस प्रकार नव अनुदिशों में नव विमान हैं। पञ्चानुत्तर की पूर्व दिशा में विजय, दक्षिण में वैजयन्त, पश्चिम में जयन्त और उत्तर दिशा में अपराजित नामक विमान हैं। इन सबके मध्य में सर्वार्थसिद्धि नामक इन्द्रक विमान है। इस प्रकार पञ्चानुत्तर में पाँच विमान हैं ॥५०-५६॥


सुदर्शनमहामेरोश्चूलिकोर्ध्वनभस्तले ।
रोममात्रान्तरं मुक्त्वा तिष्ठेदृतुत्वाख्य इन्द्रकः ॥५७॥

स्वस्वान्त्यपटलेष्वन्त्य स्वस्वेन्द्रकस्य यच्च यत्।
ध्वजाग्रं तत्र तत्र स्थितेन्द्रस्य स्वामिता भवेत् ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 57 से 58): सुदर्शन मेरु की चूलिका के ऊपर आकाश में बाल के अग्रभाग प्रमाण अन्तर छोड़कर ऋतु नाम का प्रथम इन्द्रक विमान है। अपने-अपने अन्तिम पटल के अन्तिम इन्द्रक के ध्वजादण्ड पर्यन्त वहाँ स्थित अपने-अपने इन्द्रों का स्वामित्व है। जैसे-सौधर्म इन्द्र का स्वामित्व प्रभा नामक अन्तिम इन्द्रक के ध्वजदण्ड पर्यन्त है। इसी प्रकार आगे भी जानना ॥५७-५८॥


नरक्षेत्रप्रमाणं स्यादृतुत्वाख्यं प्रथमेन्द्रकम्।
सर्वार्थसिद्धिनामान्त्यं जम्बूद्वीपसमानकम् ॥५९॥

शेषाणामिन्द्रकाणां स्यादेकोनेन्द्रकसंख्यया।
विभक्तैर्योजनैः शेषैः क्रमह्रासो हि विस्तरः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 59 से 60): प्रथम ऋतु इन्द्रक विमान का विस्तार मनुष्य क्षेत्र (ढाई द्वीप) के बराबर और सर्वार्थसिद्धि नामक अन्तिम इन्द्रक का प्रमाण जम्बूद्वीप के बराबर है। उन दोनों के प्रमाण को परस्पर घटाकर शेष में एक कम इन्द्रक प्रमाण का भाग देने पर हानि-वृद्धि चय का प्रमाण प्राप्त होता है। जैसे-ऋतु नामक प्रथम इन्द्रक का प्रमाण ४५००००० योजन और सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक का प्रमाण १००००० योजन है। इन दोनों को परस्पर में घटा कर एक कम इन्द्रक का भाग देने से (४५००००० - १००००० / ६३ - १ =) ७०९६७ २३/३१ योजन हानि चय का प्रमाण है ॥५९-६०॥


आद्येन्द्रकस्य विद्यन्ते चतुर्दिक्षु विमानकाः।
श्रेणीबद्धा द्विषष्टिस्तु महान्तोऽनुक्रमात् पृथक् ॥६१॥

आद्येन्द्रकाच्चतुर्दिक्षु सर्वोर्ध्वपटलेष्वपि।
श्रेणीबद्धाः प्रहीयन्ते चतुश्चतुप्रमाः क्रमात् ॥६२॥

यावच्चानुदिशाभिख्ये पटले दिक्चतुष्टये।
श्रेणीबद्धा हि तिष्ठन्ति प्रान्त्याश्चत्वारइन्द्रकाः ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 61 से 63): प्रथम ऋतु इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में अनुक्रम से पृथक्-पृथक् बासठ-बासठ श्रेणीबद्ध विमान अवस्थित हैं। इसके ऊपर द्वितीयादि पटलों के इन्द्रकों की चारों दिशाओं में क्रम से प्रथम इन्द्रक के श्रेणीबद्धों के प्रमाण से चार-चार श्रेणीबद्ध तब तक हीन-हीन होते जाते हैं, जब तक अन्तिम पटल की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसीलिये अनुदिश (और अनुत्तर) इन्द्रक की चारों दिशाओं में (प्रत्येक दिशा में एक-एक) चार ही श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥६१-६३॥


श्रेणीबद्धान्तरेषु स्युश्चतुर्विदिक्षु सर्वतः।
इन्द्राः श्रेणीसम्बन्धक्रमहीना इतोऽमुतः ॥६४॥

प्रकीर्णक विमानाश्च पुष्पप्रकीर्णका इव।
पञ्चानुत्तरसंज्ञे तथाधोग्रैवेयकत्रये ॥६५॥

प्रकीर्णक विमानानि न सन्त्यन्येषु सन्ति च।
एकोनषष्टिसंख्येषु पटलेषु प्रकीर्णकाः ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 64 से 66): अहो ! श्रेणीबद्ध के अन्तरालों की चारों विदिशाओं में सब ओर इन्द्रक और श्रेणीबद्ध के सदृश क्रम से रहित पुष्पों के सदृश यत्र-तत्र स्थित विमानों को प्रकीर्णक विमान कहते हैं। पाँच अनुत्तर (के एक पटल) में और अधो ग्रैवेयक (के सुदर्शन, अमोघ और सुप्रबुद्ध इन तीन पटलों में प्रकीर्णक विमान नहीं होते। शेष [६३-(३+१) ]=५९ पटलों में प्रकीर्णक विमान होते हैं ॥६४-६६॥ प्रत्येक स्वर्ग के इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक विमानों की पृथक्-पृथक् संख्या कहते हैं। उपर्युक्त संस्कृत गद्य का सम्पूर्ण अर्थ निम्नांकित तालिका में निहित है-


संख्ययोजनविस्तारा इन्द्रका: सकला मता:।
श्रेणीबद्धा असंख्यातकोटीयोजन विस्तरा: ॥६७॥

केचित्प्रकीर्णकासंख्य कोटीयोजन विस्तृताः।
केचिदसंख्यकोटीनां योजनै र्विस्तरान्विताः ॥६८॥

अच्युतान्तस्थ सर्वेषां विमानानां हि पञ्चमः।
भागः संख्येय कोटिप्रमाणयोजनविस्तृतः ॥६९॥

ततः शेषा हि चत्वारो भागाः सर्वेषु सन्ति च।
विमानानामसंख्यातकोटीयोजनविस्तराः ॥७०॥

संख्यातयोजनव्यासा अधोग्रैवेयक त्रये।
सन्तीन्द्रक विमानास्त्रयः श्रेणीमध्यभागगाः ॥७१॥

अष्टादशविमानाः स्युर्मध्यग्रैवेयक त्रिके।
संख्ययोजनविष्कम्भाः प्रकीर्णकेन्द्रकोभयोः ॥७२॥

संख्येययोजनव्यासाः ऊर्ध्वग्रैवेयक त्रये।
स्युः सप्तदशसंख्याना विमानारत्नशालिनः ॥७३॥

नवानुदिशसंज्ञे च पञ्चानुत्तरनामनि।
संख्ययोजनविस्तार एकैक इन्द्रकः पृथक् ॥७४॥

एतेभ्यो ये परे सन्ति श्रेणीबद्ध प्रकीर्णकाः।
ते सर्वे स्युरसंख्यातकोटीयोजन विस्तृताः ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 67 से 75): समस्त इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तार वाले और श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात योजन कोटि विस्तार वाले हैं। प्रकीर्णक विमानों में से कुछ प्रकीर्णक संख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले और कुछ प्रकीर्णक असंख्यात कोटि योजन विस्तार वाले हैं। सौधर्म स्वर्ग से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त के कल्पों में अपनी-अपनी विमान राशि के पाँचवें भाग प्रमाण विमान संख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं, इनसे अवशेष विमान असंख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं। अथवा अपनी-अपनी राशि के ४/५ वें भाग प्रमाण विमान असंख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं। जैसे-सौधर्म कल्प की कुल विमान राशि ३२००००० - ६४०००० संख्यात योजन व्यास वाले = २५६०००० असंख्यात योजन व्यास वाले हैं। अथवा ३२००००० × ४ / ५ = २५६०००० विमान असंख्यात योजन व्यास वाले हैं। तीनों अधो-ग्रैवेयकों में श्रेणीबद्ध विमानों के मध्य अवस्थित रहने वाले तीन इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। तीनों मध्यम ग्रैवेयकों में इन्द्रक और प्रकीर्णक दोनों मिलाकर १८ विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। तीनों ऊर्ध्व ग्रैवेयकों में रत्नमयी १७ विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। नव अनुदिशों और पञ्चानुत्तरों में जो एक-एक इन्द्रक हैं, वे ही संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। संख्यात योजन व्यास वाले प्रकीर्णकों से रहित अन्य प्रकीर्णक और सर्व श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात कोटि योजन विस्तार वाले हैं ॥६७-७५॥


सौधर्मेशानयोः षष्टिलक्षसंख्याविमानकाः ।
जलाधारेण तिष्ठन्ति शाश्वता नभसि स्वयम् ॥७६॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्विमाना दिवौकसाम् ।
सन्ति-विंशतिलक्षाः खे वाताधारेण केवलम् ॥७७॥

ब्रह्मादिकसहस्रारान्ताष्टानां स्युर्विमानकाः ।
षण्णवतिसहस्राग्र चतुर्लक्षप्रमाणकाः ॥७८॥

जलवातद्वयाधारेणैव व्योम्नि मनोहराः ।
शेषानतादिकल्पानां चतुर्णां च विमानकाः ॥७९॥

ग्रैवेयकादिपञ्चानुत्तरान्तानां भवन्ति खे ।
निराधारास्त्रयो विंशाग्रसहस्रप्रमाः स्वयम् ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 76 से 80): सौधर्मेशान कल्प के (३२ लाख + २८ लाख)=६० लाख विमान आकाश में स्वयमेव जल के आधार अवस्थित हैं। सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्गस्थ देवों के (१२ लाख + ८ लाख)=२० लाख विमान आकाश में मात्र वायु के आधार अवस्थित हैं। ब्रह्म स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्गपर्यन्त अर्थात् आठ स्वर्गों के अति मनोज्ञ (४०००००+५००००+४००००+६०००)=४९६००० विमान आकाश में जल-वायु (उभयाधार) के आधार अवस्थित हैं। शेष आनतादि चार कल्पों के, नव ग्रैवेयकों के, नव अनुदिशों के और पाँच अनुत्तर विमानों के (७०० + १११ + १०७ + ९१ + ९ + ५)=१०२३ विमान निराधार हैं। अर्थात् शुद्ध आकाश के आधार ही अवस्थित हैं ॥७६-८०॥


कृष्णानीलास्तथा रक्ताः पीताः शुक्ला इति द्वयोः ।
सौधर्मेशानयोः पञ्चवर्णा विमानतद्गृहाः ॥८१॥

नीला रक्तास्तथा पीताः शुक्ला इमे विमानकाः ।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोश्चतुर्वर्णभूषिताः ॥८२॥

रक्ता पीताः सिता एते त्रिवर्णाश्च विमानकाः ।
ब्रह्मादिकचतुर्णांस्युर्दिव्याः प्रासादपङ्क्तयः ॥८३॥

शुक्रादीनां चतुर्णां स्युः पीताः शुक्ला विमानकाः ।
शेषानतादि कल्पेषु सर्वग्रैवेयकादिषु ॥८४॥

केवलं शुक्ल वर्णा विमानप्रासादपङ्क्तयः ।
स्फुरद् रत्नांशु संघातैरुद्योतितदिशाम्बराः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 81 से 85): सौधर्मेशान इन दो स्वर्गों के विमान एवं उनमें स्थित गृह काले, नीले, लाल, पीले और श्वेत अर्थात् पञ्च वर्ण वाले हैं। सनत्कुमार माहेन्द्र कल्प के विमान कृष्ण के बिना चार वर्ण के अर्थात् नीले, लाल, पीले और श्वेत वर्ण के हैं। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर-लांतव और कापिष्ट स्वर्ग के विमान एवं दिव्य प्रासाद पंक्तियाँ लाल, पीले और श्वेत इस प्रकार तीन वर्ण वाले हैं। शुक्र-महाशुक्र, शतार और सहस्रार इन चार स्वर्गों के विमान पीत और शुक्ल वर्ण के हैं। इसके आगे शेष आनत आदि कल्पों में, सर्व ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में और पाँच अनुत्तरों में देदीप्यमान रत्नों की किरणों के समूह से नभमण्डलस्थ दिशाओं को प्रकाशित करने वाली विमान एवं प्रासाद पंक्तियाँ मात्र शुक्ल वर्ण की हैं ॥८१-८५॥


सर्व - श्रेणिविमानार्धं स्वयम्भूरमणोपरि।
द्वीपाब्धीनां ततोऽन्येषामर्धार्धमुपरिस्थितम् ॥८६॥

अर्थ: सर्व श्रेणीबद्ध (ऋतु इन्द्रक की एक दिशा गत ६२ श्रेणीबद्ध) विमानों का अर्ध भाग (३१) स्वयम्भूरमण समुद्र के ऊपर अवस्थित है तथा शेष अर्ध (३१) भाग का अर्ध-अर्ध भाग स्वयम्भूरमण समुद्र से अर्वाचीन द्वीप समुद्रों के ऊपर अवस्थित है ॥८६॥


स्वामी च दक्षिणाशायाः पूर्वपश्चिमयोर्दिशोः।
श्रेणीबद्ध विमानेषु ह्यग्निनैऋत्यकोणयोः ॥८७॥

प्रकीर्णकविमानेषु सौधर्मेन्द्रो महान् भवेत्।
सर्वेषु पटलेष्वेवं सौधर्मेशानकल्पयोः ॥८८॥

पतिरस्त्युत्तरश्रेण्या वायव्यैशानयोर्दिशोः।
श्रेणीबद्धप्रकीर्णेषु चैशानेन्द्रोऽमरावृतः ॥८९॥

इत्येवं स्याद्विमानानां स्वामित्वं च पृथक्-पृथक्।
सनत्कुमारमाहेन्द्रकल्पनायकयोर्द्वयोः ॥९०॥

ब्रह्मेन्द्राद्याश्चतवारश्चतुर्युग्मेषु नायकाः।
चतुःश्रेणिविदिक् सर्वविमानानां भवन्ति च ॥९१॥

आनतेन्द्रादयः शेषाश्चतुः कल्पेषु नायकाः।
त्र्येकश्रेणिविदिग् द्वि द्वि विमानानां च पूर्ववत्॥९२॥

अर्थ (श्लोक 87 से 92): सौधर्मेशान कल्प के सर्व पटलों सर्व इन्द्रक (३१), पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशा, आग्नेय एवं वायव्य विदिशा सम्बन्धी सर्व (४३७१) श्रेणीबद्ध विमानों एवं सर्व प्रकीर्णक विमानों में सौधर्मेन्द्र का ही स्वामित्व है अर्थात् इनमें सौधर्म इन्द्र की आज्ञा का प्रवर्तन होता है। उत्तर दिशा सम्बन्धी और वायव्य एवं ईशान कोण सम्बन्धी श्रेणीबद्धों एवं प्रकीर्णक विमानों में ईशान इन्द्र का स्वामित्व है। इसी प्रकार सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्पस्थ विमानों में सनत्कुमार-माहेन्द्र इन्द्रों का पृथक्-पृथक् स्वामित्व है। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ट, शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार इन चार युगल सम्बन्धी इन्द्रक, चारों दिशा विदिशा सम्बन्धी श्रेणीबद्धों और प्रकीर्णक विमानों के स्वामी ब्रह्म, लान्तव, शुक्र और शतार नाम के चार इन्द्र हैं। आनत आदि दो कल्पों में पूर्व, दक्षिण और पश्चिम इन तीन दिशाओं के आग्नेय और वायव्य इन दो विदिशाओं के श्रेणीबद्धों एवं प्रकीर्णक विमानों का स्वामी प्राणत इन्द्र है तथा उत्तर दिशागत, वायव्य ईशान कोण गत श्रेणीबद्धों एवं सर्व प्रकीर्णक विमानों का स्वामी आनत नाम का इन्द्र है। अर्थात् स्वामित्व की जो व्यवस्था प्रथम युगल में है, उसी प्रकार यहाँ जानना चाहिए ॥८७-९२॥


वसतश्चादिकल्पेशावन्तिमे पटले निजे।
अष्टादशे विमाने हि दक्षिणोत्तरयोर्दिशोः ॥९३॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रौ तिष्ठतः पटलेऽन्तिमे।
विमाने षोडशे श्रेण्योर्दक्षिणोत्तर भागयोः ॥९४॥

ब्रह्मेन्द्रो दक्षिणाशायां चरमे पटले वसेत्।
मुदा चतुर्दशे दिव्ये श्रेणीबद्ध विमानके ॥९५॥

तिष्ठेद्दक्षिणदिग्भागे द्वितीये पटलेऽनिशम्।
लान्तवेन्द्रो विमाने द्वादशमे स्त्रीसुरावृतः ॥९६॥

शुक्रेन्द्रो दशमे रम्ये विमाने वसति स्वयं।
दक्षिणश्रेणिभागस्थ पटलस्यामरैः समम् ॥९७॥

शतारेन्द्रो वसेत्सार्धं देव्याद्यैः पटले निजे।
दक्षिणश्रेणि सम्बन्ध विमाने प्रवरेऽष्टमे ॥९८॥

आनतेन्द्रादयः शेषाश्चत्वारः पटलेन्तिमे।
दक्षिणोत्तरदिक् श्रेण्योः सन्ति षष्ठे विमानके ॥९९॥

अच्युतस्वर्गपर्यन्तमिन्द्राः सन्ति पृथक्-पृथक्।
अहमिन्द्रस्ततोऽप्यूर्ध्वे सर्वेग्रैवेयकादिषु ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 93 से 100): प्रथम युगल के प्रभ नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशा में स्थित १८ वें श्रेणीबद्ध विमान में सौधर्म इन्द्र रहता है और इसी पटल की उत्तर दिशागत १८ वें श्रेणीबद्ध विमान में ईशान इन्द्र निवास करता है। द्वितीय युगल के चक्र नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशागत १६ वें श्रेणीबद्ध में सनत्कुमार इन्द्र और इसी पटल की उत्तर दिशा गत १६ वें श्रेणीबद्ध में माहेन्द्र इन्द्र निवास करता है। तृतीय युगल के ब्रह्मोत्तर नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशागत १४ वें श्रेणीबद्ध विमान में ब्रह्मोत्तर नाम इन्द्र का अवस्थान है। चतुर्थ युगल के लान्तव नामक द्वितीय (अन्तिम) पटल की दक्षिण दिशागत १२ वें श्रेणीबद्ध विमान में लान्तव इन्द्र अपनी देवांगनाओं और अन्य देवों से वेष्टित लान्तव इन्द्र निरन्तर निवास करता है। पंचम युगल के शुक्र नामक पटल की दक्षिण दिशागत १० वें श्रेणीबद्ध विमान में अन्य देव गणों के साथ शुक्र इन्द्र निवास करता है। षष्ठ युगल के शतार पटल की दक्षिण दिशागत ८ वें श्रेणीबद्ध विमान में अनेक देव देवियों के साथ शतार इन्द्र निवास करता है। सप्तम और अष्टम युगल के आनत पटल की दक्षिण दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में आनत इन्द्र और उत्तर दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में प्राणत इन्द्र रहता है तथा आरण पटल की दक्षिण दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में आरण इन्द्र और इसी पटल की उत्तर दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध विमान में अच्युत इन्द्र निवास करता है। अच्युत स्वर्ग पर्यन्त ही पृथक्-पृथक् इन्द्र हैं। इन कल्पों के ऊपर ग्रैवेयक आदि सर्व विमानों में सभी अहमिन्द्र हैं ॥९३-१००॥


अधुना मौलिचिह्नानि प्रवक्ष्यामि पृथक्-पृथक्।
सौधर्ममुख्यकल्पस्थेन्द्रादिसर्वसुधाभुजाम् ॥१०१॥

सौधर्मे मुकुटे चिह्नं वराहोऽस्ति दिवौकसाम्।
ऐशाने मकरो मौलि चिह्नं च विस्फुरत्प्रभम् ॥१०२॥

सनत्कुमारनाके स्यान्महिषो मौलिलाञ्छनम्।
माहेन्द्रेऽस्ति शक्रादीनां मत्स्यचिह्नं च शेखरे ॥१०३॥

ब्रह्मस्वर्गेऽमरेशादीनां कच्छपोऽस्ति लाञ्छनम्।
ब्रह्मोत्तरे भवेच्चिह्नं मुकुटे दर्द्दुरो महान् ॥१०४॥

लान्तवे तुरगचिह्नं कापिष्टे च गजः शुभः।
शुक्रेऽस्ति चन्द्रमा नागो महाशुक्रेऽस्ति लाञ्छनम् ॥१०५॥

शतारे लाञ्छनं खड्गी स्यादिन्द्राद्यमृताशिनाम्।
सहस्रारे भवेच्छागो मौलि चिह्नं दिवौकसाम् ॥१०६॥

आनतप्राणतस्वर्गयोश्चिह्नं वृषभोस्ति च।
आरणाच्युतयोश्चिह्नं कल्पवृक्षः सुधाभुजाम् ॥१०७॥

अहमिन्द्रसमस्तानां मौलि चिह्नानि जातु न।
वक्ष्येऽथात्रामरेशानां वाहनानि पृथक्-पृथक् ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 101 से 108): अब मैं (आचार्य) सौधर्मादि कल्पस्थित सर्व देवों के मुकुट स्थित चिह्नों को पृथक्-पृथक् कहूँगा। सौधर्म स्वर्गस्थ देवों के मुकुटों में वराह का चिह्न तथा ऐशान स्वर्गस्थ देवों के मुकुटों में मगर का चिह्न है। सनत्कुमार स्वर्ग के देवों के मुकुटों में महिष का चिह्न और माहेन्द्र स्वर्ग स्थित इन्द्रादि देवों के मुकुटों में मत्स्य का लाञ्छन है। ब्रह्म स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में कछुाए (कच्छप) का तथा ब्रह्मोत्तर स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में मेंढक का चिह्न है। लान्तव स्वर्ग स्थित देवों के घोड़े का, कापिष्ट स्वर्ग में हाथी का, शुक्र स्वर्ग में चन्द्रमा का और महाशुक्र स्थित देवों के मुकुटों का चिह्न सर्प है। शतार स्वर्ग स्थित इन्द्रादि सर्व देवों के मुकुटों में खड्गी का और सहस्रार स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में बकरी का चिह्न है। आनत-प्राणत स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में बैल का तथा आरण-अच्युत स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में कल्पवृक्ष का चिह्न है। कल्पातीत स्वर्गों में स्थित सर्व अहमिन्द्रों के मुकुटों में कोई भी चिह्न नहीं हैं। अब मैं (आचार्य) सौधर्म आदि इन्द्रों के वाहनों का कथन करूँगा ॥१०१-१०८॥


सौधर्मे देवराजस्य गजेन्द्रो वाहनं महत्।
ईशाने तुरगः स्यात्सनत्कुमारे मृगाधिपः ॥१०९॥

माहेन्द्रे वृषभो ब्रह्मस्वर्गे सारसवाहनम्।
ब्रह्मोत्तरे पिकः प्रोक्तो लान्तवे हंसवाहनम् ॥११०॥

कापिष्टे कोक एवास्ति शुक्रे गरुडवाहनम्।
महाशुक्रे च देवानां मकरो वाहनं भवेत् ॥१११॥

शतारे च मयूरः स्यात्सहस्रारेऽम्बुजं भवेत्।
आनतादिचतुष्केषु विमानं पुष्पकाह्वयम् ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 109 से 112): सौधर्म स्वर्ग में इन्द्र का वाहन गजेन्द्र है, ईशन स्वर्ग में घोड़ा, सनत्कुमार स्वर्ग में सिंह, माहेन्द्र में बैल, ब्रह्म स्वर्ग में सारस, ब्रह्मोत्तर में कोयल, लान्तव में हंस, कापिष्ट में चक्रवाल, शुक्र में गरुड़, महाशुक्र में मगर, शतार में मयूर, सहस्रार में कमल और आनतादि चार स्वर्गों में पुष्पक विमान ही वाहन है ॥१०९-११२॥


स्वस्वेन्द्रविमानस्य स्वस्वकल्पाह्वयस्य च।
स्युश्चत्वारि विमानानि पूर्वादि दिक् चतुष्टये ॥११३॥

आद्यं वैडूर्य साराख्यं रौप्यसाराभिधं ततः।
अशोकसारसंज्ञं च मिश्रसारमिमान्यपि॥११४॥

पूर्वाद्यासु चतुर्दिक्षु चत्वारः स्युर्विमानकाः।
सर्वेषां दक्षिणेन्द्राणां विमानानामनुक्रमात् ॥११५॥

रुचकं मन्दराभिख्यमशोकं सप्तपर्णकम्।
चत्वारोऽमी विमानाः स्युः प्राच्यादि दिक् चतुष्टये ॥११६॥

ईशानेन्द्रादि सर्वोत्तरेन्द्राणां क्रमशः परे।
विमानानामयं ज्ञेयः क्रमोऽच्युतान्तमञ्जसा ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 113 से 117): अपने-अपने कल्प का नाम ही अपने-अपने इन्द्र स्थित विमान का नाम है। इन्द्र स्थित विमान की पूर्व-दक्षिण आदि चारों दिशाओं में क्रम से वैडूर्य सार, रौप्य सार (रजत), अशोक सार और मिश्र सार (मृत्कसार) नाम वाले चार विमान अवस्थित हैं। सर्व दक्षिणेन्द्रों के विमानों की पूर्वादि चारों दिशाओं में अनुक्रम से उपर्युक्त नाम वाले चार-चार विमान हैं। ईशान इन्द्र आदि सर्व उत्तरेन्द्रों के विमानों की पूर्वादि चारों दिशाओं में अनुक्रम से रुचक, मन्दर, अशोक और सप्तपर्ण नाम के चार-चार विमान हैं। दक्षिणेन्द्रों-उत्तरेन्द्रों के विमानों की यह व्यवस्था क्रमशः अच्युत कल्प पर्यन्त जानना चाहिए ॥११३-११७॥


षट् युग्मशेषकल्पेषु ग्रैवेयकत्रिक त्रिषु।
शेषेषु च विमानानां तलबाहुल्यमुच्यते ॥११८॥

योजनान्येकविंशाग्रशतान्येकादशक्रमात् ।
ततो नवनवत्या हीनान्युपर्य्युपरिस्फुटम् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 118 से 119): सौधर्मादि छह कल्पों में, अवशेष आनतादि चार कल्पों में, अधो आदि तीन-तीन ग्रैवेयकों में तथा अन्य शेष अनुदिशों आदि में स्थित विमानों का तल बाहुल्य कहते हैं। सौधर्म स्वर्ग स्थित विमानों का तल बाहुल्य ११२१ योजन प्रमाण है, इसके बाद ऊपर-ऊपर क्रमशः ९९-९९ योजन हीन होता गया है ॥११८-११९॥


सौधर्मादि चतुःस्वर्गे चतुर्युग्मेष्वतोऽग्रतः।
शेषेषु चतुरस्राणां पुराणं वच्मि विस्तरम् ॥१२०॥

अशीतिश्चतुरग्रा स्यात्सहस्राणामथोनता।
चत्वार्यष्टौ सहस्राणि योजनानामनुक्रमात् ॥१२१॥

द्वे सहस्रे ततोऽप्यूने शेषेषु च दशोनता।
अमीषां सुखबोधाय व्याख्यानं पुनरुच्यते ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 120 से 122): सौधर्मादि चार स्वर्गों में, इनसे आगे के चार युगलों में और इसके आगे शेष आनतादि स्वर्गों में स्थित इन्द्रों के समचतुरस्र नगरों का विस्तार कहता हूँ। सौधर्मादि कल्पों में नगरों का विस्तार क्रमशः ८४ हजार योजन, चार हीन अर्थात् ८० हजार योजन, आठ हजार योजन हीन अर्थात् ७२ हजार योजन, दो हजार हीन अर्थात् ७० हजार योजन, शेष चार स्वर्गों में दस-दस हजार हीन अर्थात् ६० हजार योजन, ५० हजार योजन, ४० हजार योजन और ३० हजार योजन है। शेष स्वर्गों में नगरों का विस्तार २०-२० हजार योजन प्रमाण है। सुगमतापूर्वक समझने के लिए अब इसी विषय का व्याख्यान पुनः किया जाता है ॥१२०-१२२॥ आनत-प्राणत-आरण और अच्युत स्वर्गों के चतुरस्र नगरों का व्यास २०-२० हजार योजन है।


त्रिंशतान्याद्ययुग्मे तत्प्राकाराणां समुच्छ्रयः।
योजनानां त्रियुग्मेषु पञ्चाशत् पृथगूनता॥१२३॥

ततस्त्रिंशद्विहीनानि योजनानि च पंचमे।
षष्ठे युग्मे च शेषेषु हीनानि विंशतिः पृथक् ॥१२४॥

अर्थ (श्लोक 123 से 124): प्रथम युगल में प्राकारों की ऊँचाई ३०० योजन है, आगे के तीन युगलों में पृथक्-पृथक् ५०-५० योजन हीन है, पाँचवें युगल में ३० योजन हीन, छठे युगल में और शेष आनतादि स्वर्गों में पृथक्-पृथक् २०-२० योजन हीन है ॥१२३-१२४॥ सौधर्मैशान कल्प में स्थित नगरों के प्राकारों की ऊँचाई ३०० योजन, सानत्कुमार माहेन्द्र कल्प स्थित प्राकारों की २५० योजन, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में २०० योजन, लान्तव-कापिष्ट में १५० योजन, शुक्र-महाशुक्र में १२० योजन, शतार-सहस्रार के प्राकारों की १०० योजन और आनतप्राणत-आरण और अच्युत स्वर्गों में स्थित नगरों के प्राकारों की ऊँचाई ८०-८० योजन प्रमाण है।


षट्सु युग्मेषु शेषेषु सप्तस्थानेष्वितिक्रमात्।
प्राकाराणां पृथग्व्यासोऽवगाहश्चाभिधीयते ॥१२५॥

योजनानां च पञ्चाशत्ततोऽर्धार्धं पृथक् त्रिषु।
ततः क्रमेण चत्वारि त्रीणि सार्धं द्वि योजने ॥१२६॥

चतुस्त्रिद्वयसंगुण्यं शतषष्ट्यधिकं शतम्।
विंशत्या त्रिषु तद्धीन गोपुराणां समुन्नतिः ॥१२७॥

योजनानां शतं व्यासस्ततो दशोनता पृथक्।
विंशोनं पञ्चमे स्थाने दशोनं च पृथक् द्वये ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 125 से 128): छह युगलों के छह स्थान और अवशेष आनतादि स्वर्गों का एक स्थान इस प्रकार ७ स्थानों में उपर्युक्त प्राकारों के पृथक्-पृथक् व्यास और अवगाह का प्रमाण कहते हैं। प्रथम युगल में प्राकारों की नींव और व्यास का प्रमाण ५० योजन प्रमाण है, उसके आगे तीन स्थानों में क्रमशः इसका आधा-आधा है। पाँचवें स्थान का ४ योजन, छठे स्थान का ३ योजन और सातवें स्थान का प्रमाण २ १/२ योजन है। सातों स्थानों के प्राकारों की चारों दिशाओं में उनकी ऊँचाई का प्रमाण क्रमशः ४०० योजन, ३०० योजन, २०० योजन, १६० योजन, १४० योजन, १२० योजन और १०० योजन है। इन्हीं सातों स्थानों के गोपुरों का विस्तार क्रमशः १०० योजन, ९० योजन, ८० योजन, ७० योजन, ५० योजन, ४० योजन और ३० योजन प्रमाण है ॥१२५-१२८॥


षट्सु युग्मेषु शेषेषु ग्रैवेयकत्रिक त्रिषु।
नवानुदिशपञ्चानुत्तरे पृथग्गृहोदयः ॥१२९॥

योजनां शतान्येव षट् ततः शतपञ्चकम्।
शतार्धं तदृणं शेषाणामन्ते पंचविंशतिः ॥१३०॥

हर्म्याणामुदयस्यास्यायामोऽस्ति पञ्चमांशकः।
विष्कम्भो दशमो भागः सर्वत्रैवं व्यवस्थितिः ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 129 से 131): सौधर्मादि छह युगलों में अवशेष आनतादि स्वर्गों में, अधो, मध्य एवं उपरिम इन नव अनुदिशों में एवं पंचानुत्तरों में अर्थात् (६ + १ + ३ + १ + १ =) १२ स्थानों में गृहों की पृथक्-पृथक् ऊँचाई कहते हैं। प्रथम युगल में गृहों की ऊँचाई ६०० योजन और दूसरे युगल में ५०० योजन है। इसके आगे ११ वें स्थान तक ५०-५० कम होते हुए क्रमशः ४५०, ४००, ३५०, ३००, २५०, २००, १५०, १०० और ५० योजन है। अन्तिम स्थान के गृहों की ऊँचाई २५ योजन है। प्रत्येक स्थानों के गृहों की लम्बाई अपनी-अपनी ऊँचाई का पाँचवाँ (६००/५ =१२०) भाग है और प्रत्येक स्थानों के गृहों की चौड़ाई अपनी-अपनी ऊँचाई का १० वाँ (६००/१० =६०) भाग प्रमाण है। जैसे-लम्बाई क्रमशः १२० योजन, १००, ९०, ८०, ७०, ६०, ५०, ४०, ३०, २०, १० और ५ योजन प्रमाण है। इसी प्रकार चौड़ाई क्रमशः ६०, ५०, ४५, ४०, ३५, ३०, २५, २०, १५, १०, ५ और २ १/२ योजन प्रमाण है।


इन्द्रक्रीडानिवासस्य प्राकारात्प्रथमाद्बहिः।
आदिशालसमव्यासोत्सेधाश्चत्वार ऊर्जिताः ॥१३२॥

महान्तोऽन्ये च विद्यन्ते प्राकारा अन्तरान्तरे।
प्राकारस्यादिमस्यैव योजनानां किलान्तरम् ॥१३३॥

त्रयोदशैव लक्षाणि द्वितीयस्यास्य चान्तरम्।
त्रिषष्टिरेव लक्षाणि तृतीयस्य तथान्तरम् ॥१३४॥

चतुःषष्टिस्तु लक्षाणि तुर्यशालस्य चान्तरम्।
लक्षाणि योजनानां चतुरशीतिप्रमाणि वै ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 132 से 135): इन्द्र के क्रीड़ा निवास (अर्थात् नगर) के प्रथम प्राकार से बाहर समुन्नत (व्यास के समान उन्नत) एवं महान् एक दूसरे के अन्तराल से, चार प्राकार और हैं। जिनका व्यास एवं उत्सेध प्रथम प्राकार के सदृश है। प्रथम कोट (प्राकार) से दूसरे कोट का अन्तर १३ लाख योजन (१०४००००० मील) है। दूसरे कोट से तीसरे कोट का अन्तर ६३ लाख योजन (५०४००००० मील) है। तीसरे कोट से चौथे कोट का अन्तर ६४ लाख योजन (५१२००००० मील) है और चौथे कोट से पाँचवें कोट का अन्तराल ८४ लाख योजन (६७२००००० मील) प्रमाण है ॥१३२-१३५॥


आद्यप्राकारभूमध्ये सैन्यनाथा वसन्ति च।
शालान्तरे द्वितीयस्याङ्गरक्षकसुधाभुजः ॥१३६॥

तृतीयशालभूभागे निर्जराः परिषत्स्थिताः।
अन्तरे तुर्यशालस्य सामानिका वसन्ति च ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 136 से 137): प्रथम कोट के मध्य में सेनापति और दूसरे कोट के मध्य में अंगरक्षक देव रहते हैं। तीसरे कोट के मध्य में परिषद् देव तथा चौथे कोट के अन्तराल में सामानिक देव निवास करते हैं ॥१३६-१३७॥


चतुर्णामाद्य नाकानामशीतिश्चतुरुत्तरा।
सहस्त्राणामशीतिश्च द्विसप्ततिस्तुसप्ततिः ॥१३८॥

चतुर्णामूर्ध्वयुग्मानां सहस्राण्ययुतं विना।
शेषाणां स्युः सहस्राविंशतिः सामान्यकामराः ॥१३९॥

तेभ्यश्चतुर्गुणाः सन्ति ह्यङ्गरक्षकनाकिनः।
वृषभाद्याः पृथक् सप्तसप्तानीकाः क्रमादिमे ॥१४०॥

वृषभाः प्रवरा अश्वा रथा गजाः पदातयः।
गन्धर्वा देवनर्तक्यः सप्तानीका अमी पृथक् ॥१४१॥

सप्तानामादिमं सैन्यं स्वस्वसामानिकैः समम्।
स्युः शेषाः षड्वरानीका द्विगुणा द्विगुणाः पृथक् ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 138 से 142): आदि चार अर्थात् सौधर्म, ऐशान, सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में सामानिक देवों का प्रमाण क्रमशः ८४०००, ८००००, ७२००० और ७०००० है। इनके ऊपर के चार युगलों में दस-दस हजार हीन हैं। अर्थात् तृतीय युगल में ६००००, चतुर्थ युगल में ५००००, पंचम युगल में ४०००० और षष्ठ युगल में ३०००० सामानिक देव हैं तथा शेष आनतादि चार कल्पों के एक स्थान २०००० सामानिक देव हैं। प्रत्येक स्थान में अंगरक्षक देवों का प्रमाण सामानिक देवों के प्रमाण से चौगुना है। जैसे-सौधर्म स्वर्ग में ८४०००x४=३३६००० अंगरक्षक, ऐशान में ८००००x४=३२०००० अंगरक्षक इत्यादि। प्रथम आदि स्वर्गों में वृषभ को आदि लेकर क्रमश: पृथक्-पृथक् सात-सात अनीक सेनाएँ होती हैं। श्रेष्ठ एवं अनुपम वृषभ, अश्व, रथ, हाथी, पदाति, गन्धर्व और नर्तकी, ये पृथक्-पृथक् सात अनीक सेनाएँ नव स्थानों में होती हैं। इन सातों सेनाओं में से जो वृषभ नाम की सात प्रकार की आद्य सेना है, उसमें वृषभों का प्रमाण अपने-अपने सामानिक देवों के प्रमाण सदृश है तथा अवशेष छह अनीकों में वृषभों का प्रमाण पृथक्-पृथक् क्रमश: दूना-दूना होता गया है ॥१३८-१४२॥


दामाख्यो हरिदामाख्यो मातलिनामकस्ततः।
ऐरावताह्वयो वायुनामारिष्टयशोभिधः ॥१४३॥

नीलाञ्जनामरी चैते सप्तसेनमहत्तराः।
षण्णां स्युर्दक्षिणेन्द्राणां सप्तसैन्याग्रिमाः पृथक् ॥१४४॥

महादामाभिधः स्वेच्छागामी च रथमन्थनः।
पुष्पदन्तो महावीर्यो गीतप्रीतिर्महामतिः ॥१४५॥

इमे महत्तराः सप्त वसन्ति स्वसैनिकाग्रिमाः।
क्रमेण सप्त सैन्यानामुत्तरेन्द्रा खिलात्मनाम् ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 143 से 146): छह दक्षिणेन्द्रों के सात अनीक सेनाओं के आगे-आगे चलने वाले पृथक्-पृथक् दाम, हरिदाम, मातलि, ऐरावत, वायु, अरिष्टयशा और नीलाञ्जना नाम छह दक्षिणेन्द्रों के ये सात-सात प्रधान हैं। इसी प्रकार छह उत्तरेन्द्र अपनी-अपनी सेनाओं के आगे-आगे चलने वाले क्रमश: महादाम, स्वेच्छागामी (अमितगति), रथमन्थन, पुष्पदन्त, महावीर्य, गीतप्रीति और महापति नाम के ये सात-सात प्रधान छहों उत्तरेन्द्रों के पृथक्-पृथक् हैं ॥१४३-१४६॥


क्रमात् परिषदा संख्येयं द्वादश चतुर्दश।
षोडशैव सहस्त्राणि नवानां प्रथमे पदे ॥१४७॥

ततो द्वि द्वि सहस्त्रोनं यावत् षष्ठं पदं ततः।
अर्धार्धक्रमतो हीनं स्याद्यावन्नवमं पदम् ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 147 से 148): सौधर्म स्वर्ग आदि के नव स्थानों में से प्रथम स्थान में अभ्यन्तर परिषद् में देवों की संख्या १२००० मध्य परिषद् में १४००० और बाह्य परिषद् में १६००० है। इसके आगे छह पदों तक इस प्रमाण में क्रमश: दो-दो हजार की हानि होती गई है तथा इसके आगे नवम पद पर्यन्त यह संख्या क्रमश: अर्ध-अर्ध प्रमाण हीन होती गई है ॥१४७-१४८॥ सौधर्म आदि नव स्थानों के सामानिक देव, अंग रक्षक, अनीक और अभ्यन्तर आदि परिषदों के देवों का प्रमाण विस्तार रूप से कहते हैं-सौधर्म स्वर्ग में सामानिक देवों का प्रमाण ८४०००, अंगरक्षकों का तीन लाख छत्तीस हजार (३३६०००), वृषभों की प्रथम अनीक में बैलों का प्रमाण ८४०००, दूसरी कक्ष में १६८०००, तीसरी कक्ष में ३३६०००, चतुर्थ कक्ष में ६७२०००, पाँचवीं कक्ष में १३४४०००, छठी कक्ष में २६८८००० और सातवीं कक्ष में ५३७६००० बैलों का प्रमाण है। इन सातों कक्षाओं के समस्त बैलों को एकत्रित करने से १०६६८००० प्रमाण (मात्र बैलों का) होता है। शेष अश्व, गज आदि अनीकों के भी सात-सात भेद हैं, जिनकी अनीकों का प्रमाण वृषभ अनीकों के सदृश ही जानना चाहिए। इन वृषभ आदि सातों अनीकों में वृषभ से लेकर नर्तकी पर्यन्त का सर्व प्रमाण एकत्रित करने पर ७४६७६००० होता है। इसी प्रकार अन्यत्र जानना चाहिए। उपर्युक्त सम्पूर्ण गद्य का अर्थ निम्नलिखित तालिका में निहित किया गया है। अन्तर केवल इतना है विस्तार भय से तालिका में सातों कक्षाओं का पृथक्-पृथक् प्रमाण नहीं दिया गया, प्रत्येक स्थान की केवल प्रथम कक्ष


तत इन्द्रपुराद्बाह्ये चतुर्दिक्षु विमुच्य च।
लक्षार्धं योजनानां स्युश्चत्वारिंशद्वनान्यपि ॥१४९॥

अशोकं सप्तपर्णाख्यं चम्पकाह्वयमाम्रकम्।
इति नामाङ्कितान्येव शाश्वतानि वनान्यपि ॥१५०॥

योजनानां सहस्रेणायतानि विस्तृतानि च।
सहस्रार्धेन रम्याणि भवन्ति सफलानि वै ॥१५१॥

अमीषां मध्यभागेषु चत्वारश्चैत्यपादपाः।
जम्बूद्रुमसमानाः स्युरशोकाद्या मनोहराः ॥१५२॥

एषां मूले चतुर्दिक्षु जिनेन्द्रप्रतिमाः शुभाः।
देवार्च्या बद्धपर्यङ्काः सन्ति भास्वरमूर्तयः ॥१५३॥

एषु वनेषु सर्वेषु सन्त्यावासा मनोहराः।
वाहनादिक देवानां योषिद्वृन्दसमाश्रिताः ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 149 से 154): इन्द्रों के नगरों से बाहर पूर्वादि चारों दिशाओं में पचास-पचास हजार योजन छोड़कर अशोक, सप्तपर्ण, चम्पक और आम्र नाम के शाश्वत चार वन हैं। उत्तम फलों से युक्त इन प्रत्येक रमणीक वनों की लम्बाई एक हजार योजन और चौड़ाई पाँच सौ योजन प्रमाण है। इन चारों वनों के मध्य भाग में जम्बूवृक्ष सदृश प्रमाण वाले, अत्यन्त मनोहर अशोक आदि चार चैत्य वृक्ष हैं। इन चारों वृक्षों में से प्रत्येक वृक्ष के मूल में चारों दिशाओं में, देव समूहों से पूज्य, पद्मासन एवं देदीप्यमान शरीर की कान्ति से युक्त जिनेन्द्र भगवान् की एक-एक प्रतिमाएँ हैं। इन चारों वनों में देवांगनाओं के समूह से युक्त वाहन आदि जाति के देवों के मनोहारी आवास हैं ॥१४९-१५४॥


ततो मुक्त्वा चतुर्दिक्षु बहूनि योजनानि च।
चतुर्णां लोकपालानां प्रासादाः सन्ति शाश्वताः ॥१५५॥

पञ्चविंशसहस्राग्रलक्षयोजन विस्तृताः।
इन्द्रस्याथ यमस्यैव वरुणाख्यकुबेरयोः ॥१५६॥

अर्थ (श्लोक 155 से 156): चारों दिशाओं में उन वन खण्डों को बहुत दूर छोड़कर अर्थात् वनों से बहुत योजन आगे जाकर इन्द्र (सोम), यम, वरुण और कुबेर इन चारों लोकपालों के शाश्वत प्रासाद हैं, जिनका विस्तार १२५०००० (साढ़े बारह लाख) योजन प्रमाण है ॥१५५-१५६॥


आग्नेयादिविदिक्षुस्युरावासाः काञ्चनोद्भवाः ।
गणिकामहत्तरीणां विस्तारायामसंयुताः ॥१५७॥

लक्षैकं योजनैर्दीप्ता देवीनिकर संश्रिताः ।
कामाख्या प्रथमादेवी कामिनी पद्मगन्धिनी ॥१५८॥

अलम्बुषेति नामान्यासं चतुर्मुख्य योषिताम् ।
एष एव क्रमोज्ञेयः सर्वेन्द्राणां पुरादिषु ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 157 से 159): जहाँ लोकपाल देवों के नगर हैं, वहीं आग्नेय आदि चारों विदिशाओं में गणिका महत्तरियों के स्वर्णमय आवास (नगर) हैं, जो एक-एक लाख योजन लम्बे, एक-एक लाख योजन चौड़े, देदीप्यमान एवं देवियों के समूहों से युक्त हैं। इन चारों-चारों विदिशाओं में स्थित चार प्रधान गणिका महत्तरियों के नाम कामा, कामिनी, पद्मगन्धिनी एवं अलम्बुषा है। सर्व इन्द्रों के नगरों आदि का क्रम इसी प्रकार जानना चाहिए ॥१५७-१५९॥


षड् युग्मेष्वानताद्येषु सप्तस्थानेष्विति क्रमात्।
एकैकस्य सुरेन्द्रस्य देवी संख्योच्यते पृथक् ॥१६०॥

स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राणि ततोऽष्टौ द्वे सहस्त्रके।
सहस्रार्धं तदर्धार्थं त्रिषष्टि वल्लभास्त्रियः ॥१६१॥

विद्यन्ते पूर्वदिग्भागे देवेन्द्रस्तम्भसद्मनः।
वल्लभानां मनोज्ञाः सत्प्रासादा मणिमूर्तयः ॥१६२॥

तत्प्रासादोदयः पूर्वो योजनैः शतपञ्चभिः।
तद्धीनश्च शतार्धेन व्यासायामौ हि पूर्ववत् ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 160 से 163): सौधर्मादि छह एवं आनतादि का एक, इस प्रकार सातों स्थानों में स्थित एक-एक इन्द्र की वल्लभा देवांगनाओं का पृथक्-पृथक् प्रमाण क्रमश: कहते हैं। प्रत्येक स्थान की संख्या क्रमश: ३२०००, ८०००, २०००, ५००, २५०, १२५ और ६३ है। प्रत्येक इन्द्रों के स्तम्भ मन्दिरों (प्रासादों) की पूर्व दिशा में वल्लभ देवांगनाओं के अति मनोज्ञ मणिमय प्रासाद हैं। इनमें प्रथम स्थान के प्रासाद की ऊँचाई ५०० योजन है, इसके आगे क्रमश: पचास-पचास योजन हीन होती गई है। इन प्रासादों का व्यास और आयाम भी पूर्ववत् जानना चाहिए ॥१६०-१६३॥ उपर्युक्त गद्य का सम्पूर्ण अर्थ निम्नलिखित तालिका में निहित है। विशेष इतना है कि प्रत्येक स्थानों में जो प्रमाण दर्शाया जा रहा है, वह प्रमाण सौधर्मादि प्रत्येक इन्द्रों का पृथक्-पृथक् समझना चाहिए।


सप्तस्थानेषु सर्वेषामिन्द्राणां दिव्यमूर्तयः।
प्रत्येकं स्युर्महादेव्योऽष्टौ विश्वाक्षसुखप्रदाः ॥१६४॥

शची पद्मा शिवा श्यामा कालिंदी सुलसार्जुना।
भानेति दक्षिणेन्द्राणां देवीनामानि सर्वतः ॥१६५॥

श्रीमती संज्ञिका रामा सुसीमा विजयावती।
जयसेना सुषेणाख्या सुमित्राथ वसुन्धरा ॥१६६॥

सर्वत्रैवोत्तरेन्द्राणां देवीनामान्यमून्यपि।
एकैका च महादेवी विक्रियेर्धि प्रभावतः ॥१६७॥

विना मूलशरीरं चाद्ये युग्मे विकरोत्यपि।
स्वसमानि सहस्त्राणि विक्रियाङ्गानि षोडश ॥१६८॥

तेभ्य ऊर्ध्वेषु षट्स्थानेष्वैकैकावासवाङ्गना।
द्विगुण द्विगुण्यान्याशु कुर्याद् रूपाणि योषिताम् ॥१६९॥

एकैकस्या महादेव्याः परिवारवरस्त्रियः।
स्युः षोडशसहस्राणि प्रीता प्रथम युग्मके ॥१७०॥

ततः स्थानेषु शेषेषु परिवारसुराङ्गनाः।
अर्धार्धाः स्युः क्रमादेकैक शच्या विनयाङ्किताः ॥१७१॥

अर्थ (श्लोक 164 से 171): सातों स्थानों में प्रत्येक इन्द्रों के दिव्य मूर्ति को धारण करने वाली एवं समस्त इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वाली आठ-आठ महादेवियाँ हैं। समस्त दक्षिणेन्द्रों की आठ-आठ महादेवियों के नाम शची, पद्मा, शिवा, श्यामा, कालिंदी, सुलसा, अर्जुना और भान हैं तथा सर्व उत्तरेन्द्रों की महादेवियों के नाम श्रीमती, रामा, सुसीमा, विजयावती, जयसेना, सुषेणा, सुमित्रा और वसुन्धरा हैं। प्रथम युगल में पृथक्-पृथक् एक-एक महादेवी विक्रिया ऋद्धि के प्रभाव से मूल शरीर के बिना अपने समान सोलह-सोलह हजार विक्रिया शरीर को धारण करने वाली हैं। प्रथम युगल से ऊपर छह स्थानों में प्रत्येक इन्द्र की एक-एक महादेवी दूनी-दूनी विक्रिया धारण करती हैं। प्रथम युगल में एक-एक महादेवी की सोलह-सोलह हजार परिवार देवियाँ हैं तथा शेष छह स्थानों में क्रम से एक-एक महादेवी की विनय से युक्त परिवार देवांगनाओं का प्रमाण क्रमशः अर्ध-अर्ध होता गया है ॥१६४-१७१॥


महादेवीसमस्तप्रासादानामुदयोधिकः ।
विंशत्यायोजनानां स्याद्वल्लभाभवनोदयात् ॥१७२॥

प्रासादानां तथायामः स्वोत्सेधात् पञ्चमांशकः।
पूर्ववद्दशमो भागो विष्कम्भः सर्वतो भवेत् ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 172 से 173): समस्त महादेवियों के प्रासादों की ऊँचाई वल्लभा देवांगनाओं के प्रासादों की ऊँचाई से बीस-बीस योजन अधिक है, आयाम अपनी-अपनी ऊँचाई का पाँचवाँ भाग और विष्कम्भ पूर्व के सदृश अपनी-अपनी ऊँचाई के दसवें भाग प्रमाण है ॥१७२-१७३॥


मध्येऽमरावतीसंज्ञे पुरस्यैशानसद्दिशि।
इन्द्रस्तम्भगृहस्यास्ति सभास्थानसुमण्डपः ॥१७४॥

सुधर्मसंज्ञकस्तुङ्गः पञ्चसप्ततियोजनैः।
शतैकयोजनायामः पञ्चाशद्विस्तरान्वितः ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 174 से 175): अमरावती नामक नगर के मध्य में इन्द्रस्तम्भ प्रासाद की ईशान दिशा में सभा स्थान नामक सुन्दर मण्डप है, जिसका नाम सुधर्म सभा है। इस सुधर्म सभा की ऊँचाई ७५ योजन (६०० मील), लम्बाई १०० योजन (८०० मील) और चौड़ाई ५० योजन (४०० मील) प्रमाण है ॥१७४-१७५॥


पूर्वोत्तरदिशोर्दक्षिणाशायां तस्य सन्ति च।
द्व्यष्टयोजनतुङ्गानि विस्तृतान्यष्टयोजनैः ॥१७६॥

रत्नद्वाराणि देव्योघैर्दुर्गमाणि सुरोत्करैः।
तन्मध्ये स्वर्गनाथस्य दिव्यं स्याद्धरिविष्टरम् ॥१७७॥

अर्थ (श्लोक 176 से 177): आस्थान मण्डप की पूर्व, उत्तर और दक्षिण दिशा में १६ योजन ऊँचे और ८ योजन चौड़ाई के प्रमाण को लिए हुए, एक-एक दरवाजा है। ये द्वार रत्नों से निर्मित और देव देवियों के समूह से अलङ्घनीय हैं। मण्डप के मध्य भाग में इन्द्र का एक दिव्य सिंहासन है ॥१७६-१७७॥


तस्य सिंहासनस्यात्र तिष्ठन्ति सन्मुखानि च।
अष्टानां तन्महादेवीनां महान्त्यासनान्यपि ॥१७८॥

पूर्वादिदिक्षु तिष्ठन्ति लोकपालासनानि च।
अन्येषां देवसङ्घानां यथार्हमासनान्यपि ॥१७९॥

अर्थ (श्लोक 178 से 179): उस सिंहासन के सम्मुख (आगे) अष्ट महादेवांगनाओं के महान् आसन अवस्थित हैं। महादेवियों के आसनों से बाहर पूर्वादि दिशाओं में चारों लोकपालों के आसन हैं तथा दक्षिण आदि दिशाओं में अन्य देवों के योग्य आसन हैं। अर्थात् इन्द्र के सिंहासन की आग्नेय, दक्षिण और नैऋत्य में अभ्यन्तर आदि परिषदों के, नैऋत्य में त्रायस्त्रिंश देवों के, पश्चिम में सेना नायकों के, वायव्य एवं ईशान में सामानिक देवों के तथा पूर्वादि चारों दिशाओं में अंगरक्षक देवों के आसन हैं ॥१७८-१७९॥


तस्याग्रे रत्नपीठस्थो मानस्तम्भोऽस्ति मानहृत्।
षड्त्रिंशद्योजनोत्तुङ्गो योजनव्यास ऊर्जितः ॥१८०॥

वज्रकायः स्फुरत्कान्तिर्महाध्वजविभूषितः।
मस्तके जिनबिम्बाढ्यः स्वांशूद्द्योतित दिग्मुखः ॥१८१॥

क्रौशैकक्रमविस्तीर्ण कोटिद्वादशराजितः।
अधोभागे विहायास्य क्रोशोन योजनानि षट् ॥१८२॥

ऊर्ध्वभागे परित्यज्य क्रोशाग्रयोजनानि षट्।
तिष्ठन्ति मणिमञ्जूषा रत्नरज्जु विलम्बिताः ॥१८३॥

क्रोशायाम युताः क्रोशचतुर्थभागविस्तृताः।
सुभूषणा जिनेन्द्राणां विद्यन्ते तासु सञ्चिताः ॥१८४॥

भरतैरावतोत्पन्नानां सुरत्नमयाः परे।
निरौपम्या क्रमायाताः सौधर्मेशानकल्पयोः ॥१८५॥

पूर्वापरविदेहोत्थार्हतां विभूषणा इति।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः सन्ति रत्नशालिनः ।१८६॥

अर्थ (श्लोक 180 से 186): उस सभामण्डप के आगे रत्नमयी पीठ पर मान को हरण करने वाला, ३६ योजन (२८८ मील) ऊँचा, एक योजन (८ मील) चौड़ा, वज्रमयी देदीप्यमान कान्ति वाली महाध्वजा से विभूषित, शिखर (मस्तक) पर जिनबिम्बों से युक्त एवं अपनी किरणों से दसों दिशाओं को प्रकाशित करने वाला एक मानस्तम्भ है। इसमें क्रमशः एक-एक कोश विस्तार वाली सूर्य सदृश प्रकाशमान बारह धाराएँ हैं। इन ३६ योजन ऊँचाई वाले मानस्तम्भों के अधोभाग में पौने छह योजन और उपरिम भाग में सवा छह योजन छोड़कर शेष मध्य भाग में रत्नमयी रस्सियों के सहारे लटकते हुए मणिमय करण्ड (पिटारे) हैं। इन पिटारों की लम्बाई एक कोश एवं चौड़ाई पाव कोश प्रमाण है। इन करण्डों में जिनेन्द्र देवों (तीर्थंकरों) के पहनने योग्य अनेक प्रकार के आभरण आदि संचित रहते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले तीर्थंकरों के उत्तम रत्नमयी एवं उपमा रहित आभूषण सौधर्म स्वर्गस्थ मानस्तम्भ पर, ऐरावत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के ऐशान स्वर्गस्थ मानस्तम्भों पर, पूर्व विदेह क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के सानत्कुमार स्वर्गस्थ मानस्तम्भ पर एवं पश्चिम विदेह क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के रत्नमयी आभूषण माहेन्द्र स्वर्गस्थ मानस्तम्भों पर स्थित मञ्जूषाओं में अवस्थित रहते हैं ॥१८०-१८६॥


तस्य पार्श्वेऽस्ति शक्रस्योपपादगृहमूर्जितम्।
अष्टयोजनविस्तारायामोन्नति युतं परम् ॥१८७॥

तस्मिन्गृहान्तरे रत्नशिलायुग्मं च विद्यते।
शिलासम्पुटयोर्गर्भे रत्नशय्यातिकोमला ॥१८८॥

कृतपुण्यस्य शक्रस्य तस्यां जन्मसुखाब्धिगम्।
सुखेन जायतेऽङ्गं सम्पूर्णमन्तर्मुहूर्तः ॥१८९॥

अर्थ (श्लोक 187 से 189): मानस्तम्भ के पार्श्वभाग में ८ योजन चौड़ा, ८ योजन लम्बा, ८ योजन ऊँचा एवं अति श्रेष्ठ इन्द्र का उपपाद गृह है। उस उपपाद गृह के भीतर रत्नों की दो शिलाएँ हैं तथा उन शिलाओं के मध्य में अत्यन्त कोमल रत्न शय्याएँ हैं। उन शय्याओं पर पूर्वभव में किया है पुण्य जिन्होंने, ऐसे इन्द्रों की उत्पत्ति सुखपूर्वक होती है तथा उनका सुख समुद्र सदृश सम्पूर्ण शरीर अन्तर्मुहूर्त में पूर्ण हो जाता है ॥१८७-१८९॥


षडलक्षसद्धिमानानि सौधर्मे सन्ति केवलम्।
स्वर्गदेवीसमुत्पादस्थानानि शाश्वतानि च ॥१९०॥

ईशाने स्युश्चतुर्लक्षं विमानाः सुरयोषिताम्।
लभन्ते केवलं येषु जन्म देव्यो न चामराः ॥१९१॥

एभ्य स्ताः स्वस्वसम्बन्धिनीर्देवीश्च समुद्भवाः।
सनत्कुमारकल्पाद्यच्युतान्तवासिनोऽमराः ॥१९२॥

स्वस्वास्थानं नयन्त्याशु विज्ञायावधिना निजाः।
शेष कल्पेषु देवीनामुत्पादो नास्तिजातुचित् ॥१९३॥

सौधर्मेशानयोः शेषा ये विमाना हि तेषु च।
प्राप्नुवन्ति निजं जन्म देवा देव्यः शुभोदयात् ॥१९४॥

अर्थ (श्लोक 190 से 194): सौधर्म स्वर्ग में उत्तम और शाश्वत छह लाख विमान शुद्ध हैं, जिनमें (अच्युत स्वर्ग पर्यन्त के दक्षिण कल्पों की) मात्र देवांगनाओं की उत्पत्ति होती है तथा ईशान स्वर्ग में चार लाख विमान शुद्ध हैं, जिनमें (उत्तर कल्पों की) मात्र देवांगनाओं का जन्म होता है, इन (दस लाख) विमानों में देवों की उत्पत्ति नहीं होती। उत्पत्ति के तुरन्त बाद ही सनत्कुमार कल्प से अच्युत कल्प पर्यन्त के देव अपनी अपनी नियोगिनी देवांगनाओं को अवधिज्ञान से जानकर अपने-अपने स्थानों पर ले जाते हैं। सौधर्मेशान स्वर्गों को छोड़कर शेष स्वर्गों में देवांगनाओं की उत्पत्ति कदापि नहीं है। सौधर्म स्वर्गस्थ अवशेष (३२ लाख-६ लाख=२६ लाख) विमानों में तथा ऐशान स्वर्गस्थ अवशेष (२८ लाख-४ लाख=२४ लाख) विमानों में शुभ कर्मोदय से युक्त देव एवं देवांगनाओं-दोनों की उत्पत्ति होती है ॥१९०-१९४॥


सौधर्मेशानयोर्ज्योतिष्कभौमभावनेषु च।
सुखं कायप्रवीचारं देवा देव्यो भजन्ति च ॥१९५॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिदेवस्त्रियां भवेत्।
सुखं स्पर्शप्रवीचारमालिङ्गनादिजं महत् ॥१९६॥

स्याद्ब्रह्मादिचतुःस्वर्गस्थ देववरयोषिताम्।
सुखं रूपप्रवीचारं रूपादिदर्शनोद्भवम् ॥१९७॥

ततः शुक्रादिकल्पेषु चतुर्षु सुरयोषिताम्।
सुखं शब्दप्रवीचारं भवेद् गीतस्वरादिजम् ॥१९८॥

आनतादिचतुःस्वर्गवासिदेवी दिवौकसाम्।
सुखं मनःप्रवीचारं स्याद्देवी स्मरणोद्भवम् ॥१९९॥

अहमिन्द्राः परे विश्वे प्रवीचार सुखातिगाः।
कामदाहोज्झिताः सन्ति महाशर्माब्धिमध्यगाः ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 195 से 200): [काम सेवन को प्रवीचार कहते हैं] सौधर्मेशान कल्पों, ज्योतिष्कों, भवनवासियों और व्यन्तरवासियों में देव एवं देवांगनाएँ काय (शरीर) प्रवीचार पूर्वक सुख भोगते हैं अर्थात् देव अपनी देवांगनाओं के साथ मनुष्यों के सदृश काम सेवन करते हैं किन्तु उनके वीर्य स्खलन नहीं होता क्योंकि उनका शरीर सप्त धातुओं से रहित है। सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों के देव अपनी देवांगनाओं के आलिंगन आदि से उत्पन्न होने वाले स्पर्श प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर और लांतव-कापिष्ठ कल्पों के देव अपनी देवांगनाओं के रूपादिक के अवलोकन से उत्पन्न होने वाले रूप प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार स्वर्गों के देव अपनी देवांगनाओं के गीत एवं स्वर आदि के सुनने से उत्पन्न होने वाला शब्द प्रवीचार रूप सुख भोगते हैं तथा आनतादि चार कल्पों के देव देवियों के स्मरण मात्र से उत्पन्न होने वाले मनः प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। इसके आगे नव ग्रैवेयक से सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त के सभी देव अहमिन्द्र हैं। ये प्रवीचार (काम वासना) से रहित, काम दाह से रहित एवं अप्रवीचार जन्य महासुख समुद्र के मध्य अवगाहन करते हैं ॥१९५-२००॥


सौधर्मेशानकल्पस्था देवाः पश्यन्ति चावधेः।
प्रथमक्षितिपर्यन्तान् रूपिद्रव्यांश्चराचरान् ॥२०१॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिनोऽवधिना स्वयम्।
लोकयन्ति द्वितीया क्ष्मा पर्यन्तं वस्तुसञ्चयान् ॥२०२॥

ब्रह्माख्यादिचतुःस्वर्गस्थाः प्रपश्यन्ति निर्जराः।
तृतीयभूमिपर्यन्तस्थितद्रव्याणि चावधेः ॥२०३॥

शुक्रादिक चतुःस्वर्गवासिनोऽवधिनेत्रतः।
चतुर्थी क्षिति सीमान्ताल्लोकन्ते द्रव्यसञ्चयान् ॥२०४॥

आनतादिचतुःकल्प वासिनः स्वावधेर्बलात्।
पञ्चमीक्ष्मान्तगान् रूपिद्रव्यान् पश्यन्ति चाखिलान् ॥२०५॥

नवग्रैवेयकस्थाहमिन्द्रा आलोकयन्ति च।
पदार्थान् रूपिणः षष्ठीधरान्तस्थान् निजावधेः ॥२०६॥

नवानुदिशपञ्चानुत्तरवास्यहमिन्द्रकाः ।
रूपिद्रव्यान् प्रपश्यन्ति सप्तमी क्ष्मान्तमञ्जसा ॥२०७॥

लोकनाडीगतान् विश्वान् रूपिद्रव्यांश्चराचरान्।
लोकन्तेऽवधिनेत्रेण पञ्चानुत्तरवासिनः ॥२०८॥

सौधर्ममुख्य पञ्चानुत्तरवासि सुधाभुजाम्।
प्रथमापृथिवीमुख्यलोकनाड्यन्तमध्यगाः ॥२०९॥

अवधिज्ञानतुल्यास्तिविक्रियर्द्धिर्नेकधा ।
सप्तमी क्षितिपर्यन्तगमनागमन क्षमा ॥२१०॥

मतिश्रुतावधिज्ञानानि सदृष्टिदिवौकसाम्।
सम्यग्भवन्ति रूप्यर्थप्रत्यक्षज्ञायकान्यपि ॥२११॥

मिथ्यादृष्टिकुदेवानां विपरीतानि तानि च।
कुज्ञानानि प्रजायन्ते विपरीतार्थ वेदनात् ॥२१२॥

अर्थ (श्लोक 201 से 212): सौधर्मेशान कल्प स्थित देव अपने अवधिज्ञान से नरक की प्रथम पृथ्वीपर्यन्त के रूपी द्रव्यों को चराचर देखते हैं। सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्प स्थित देव अपने अवधि नेत्र से दूसरी वंशा पृथ्वी पर्यन्त के समस्त रूपी द्रव्यों को जानते हैं। ब्रह्मादि चार स्वर्गस्थ देव तीसरी मेघा पृथ्वी पर्यन्त के रूपी द्रव्यों को अवधि द्वारा जानते हैं। शुक्रादि चार स्वर्गस्थ देव अपने अवधि नेत्र से चौथी अञ्जना पृथ्वी पर्यन्त के सकल रूपी द्रव्यों को जानते हैं। आनतादि चार स्वर्गस्थ देव अपने अवधिज्ञान के बल से पाँचवीं अरिष्टा पृथ्वी पर्यन्त के समस्त रूपी द्रव्यों को देखते हैं। नव ग्रैवेयक स्वर्गों में स्थित देव छठी मधवी पृथ्वी पर्यन्त के सकल रूपी द्रव्यों को अपने अवधिज्ञान से जानते हैं। नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर अर्थात् चौदह विमानों में स्थित अहमिन्द्र सातवीं माधवी पृथ्वी पर्यन्त के रूपी द्रव्यों को जानते हैं और पाँच अनुत्तर विमानवासी देव अपने अवधि नेत्र से लोकनाड़ी पर्यन्त के सर्व रूपी द्रव्यों को अपने अवधि नेत्र से चराचर देखते हैं। सौधर्म स्वर्ग से लेकर पाँच अनुत्तर पर्यन्त के देव क्रमशः नरक की प्रथम पृथ्वी से लोकनाड़ी के भीतर सप्तम पृथ्वी पर्यन्त अवधिज्ञान के सदृश ही अनेक प्रकार की विक्रिया करने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं तथा इसी प्रकार सप्तम पृथ्वी पर्यन्त गमनागमन की शक्ति से भी सयुक्त होते हैं। स्वर्गों में सम्यग्दृष्टि देवों के मति, श्रुत एवं अवधिज्ञान समीचीन होते हैं, जिससे ये रूपी पदार्थों को प्रत्यक्ष जानते हैं, किन्तु मिथ्यादृष्टि देवों के ये तीनों ज्ञान मिथ्या होते हैं, क्योंकि वे (कारणादि विपर्यास के कारण) पदार्थों (तत्त्वों) को विपरीत जानते हैं अतः उनका ज्ञान कुज्ञान कहलाता है ॥२०१-२१२॥


सौधर्मैशानयोः प्रोक्तमुत्पत्तौ मरणेऽन्तरम्।
उत्कृष्टेन च देवानां दिनानि सप्त नान्यथा ॥२१३॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिनां कर्मपाकतः।
सम्भवे मरणेख्यातं पक्षैकमन्तरं परम् ॥२१४॥

अन्तरं ब्रह्मनाकादि चतुःस्वर्ग निवासिनाम्।
उत्पत्तौ च्यवने स्याच्च महन्मासैकमेवहि ॥२१५॥

अन्तरं मरणोत्पत्तौ भवेच्च नाकिनां विधेः।
मासौ द्वौ परमं शुक्रादिकस्वर्ग चतुष्टये ॥२१६॥

आनतादि चतुःस्वर्गवासिनामुत्तमान्तरम्।
चतुर्मासावधिर्ज्ञेयं मरणे सम्भवे तथा ॥२१७॥

नवग्रैवेयकाद्येषु मरणे च समुद्भवे।
सर्वेषामहमिन्द्राणां मासषट्कं परान्तरम् ॥२१८॥

अर्थ (श्लोक 213 से 218): [उत्कृष्टता से जितने काल तक किसी भी जीव का जन्म न हो उसे जन्मान्तर और मरण न हो उसे मरणान्तर कहते हैं] सौधर्मैशान इन कल्पों में यदि कोई भी जीव जन्म न ले तो अधिक से अधिक सात दिन पर्यन्त न ले। इसी प्रकार मरण न करे तो सात दिन पर्यन्त न करे, इसलिये वहाँ देवों के जन्म-मरण का अन्तर सात दिन कहा गया है। सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्पवासी देवों के कर्म उदयानुसार जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर एक पक्ष है। ब्रह्म आदि चार स्वर्गों के देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर एक माह है। शुक्र आदि चार स्वर्गों के देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर दो मास है। आनतादि चार स्वर्गों में निवास करने वाले देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर चार माह का जानना चाहिए। नव ग्रैवेयक आदि उपरिम सर्व विमानों में उत्पन्न होने वाले सर्व अहमिन्द्रों का उत्कृष्ट जन्मान्तर एवं मरणान्तर छह माह का है ॥२१३-२१८॥


इन्द्रस्य च महादेव्या लोकपालस्य दुस्सहः।
जायते विरहो मासषट्कं हि च्यवने महान् ॥२१९॥

त्रायस्त्रिंशसुराणां च सामानिकसुधाशिनाम्।
अङ्गरक्षकदेवानां च्यवने सति दुस्सहम् ॥२२०॥

परिषदत्रयदेवानां वियोगोद्भवमन्तरे।
मानसं जायते दुःखं चतुर्मासान्तमुत्तमम् ॥२२१॥

अर्थ (श्लोक 219 से 221): इन्द्र, इन्द्र की महादेवी और लोकपाल इनका दुस्सह उत्कृष्ट विरहकाल छह माह प्रमाण है। अर्थात् इनका मरण होने पर कोई अन्य जीव उस स्थान पर अधिक से अधिक छह माह तक जन्म नहीं लेगा। त्रायस्त्रिंश, सामानिक, अंगरक्षक और परिषद देवों का मरण होने के बाद उनके दुस्सह वियोग से उत्पन्न होने वाला मानसिक दुःख उत्कृष्ट रूप से चार माह पर्यन्त होता है। अर्थात् इनका उत्कृष्ट विरहकाल चार माह है ॥२१९-२२१॥


ईशानान्तं प्रजायन्ते कन्दर्पाः कुत्सिताः सुराः।
लान्तवस्वर्गपर्यन्तं नीचाः किल्विषिकामराः ॥२२२॥

अच्युतान्तेषु कल्पेषूत्पद्यन्ते वाहनामराः।
आभियोगिकसंज्ञाश्च स्वपापपुण्यपाकतः ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 222 से 223): (कन्दर्प परिणामी मनुष्य) अपने-अपने पाप एवं पुण्योदय से कुत्सित परिणामी कन्दर्प जाति के देवों में ईशान कल्प पर्यन्त, (किल्विषिक परिणामी मनुष्य) नीच परिणामी किल्विष जाति के देवों में लान्तव कल्प पर्यन्त और (अभियोग्य भावना से युक्त मनुष्य) आभियोगिक है नाम जिनका, ऐसे वाहन जाति के देवों में अच्युत कल्प पर्यन्त उत्पन्न होते हैं, इससे ऊपर नहीं (इनकी उत्पत्ति क्षेत्र सम्बन्धी जघन्यायु होती है) ॥२२२-२२३॥


आयुः पल्यं जघन्यं स्यादुत्कृष्टं सागरार्धकम्।
सौधर्मस्यादिमेऽन्ते पटले सार्धौ द्विसागरौ ॥२२४॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः सार्धसप्तसागराः।
ब्रह्मब्रह्मोत्तरे चायुर्महत्सार्धदशाब्धयः ॥२२५॥

आयुर्लान्तवकापिष्टे सार्धद्विसप्तवार्धयः।
तथा शुक्रमहाशुक्रयोः सार्धषोडशाब्धयः ॥२२६॥

शतारादिद्वये चायुः सार्धाष्टादशसागराः।
आनतप्राणतस्वर्गे प्रोत्कृष्टं विंशवार्धयः ॥२२७॥

आरणाच्युतयोर्देवानां तद् द्वाविंशसागराः।
ततः सागर एकैक आदिग्रैवेयकादिषु ॥२२८॥

वर्धते चाहमिन्द्राणां यावद्ग्रैवेयकान्तिमे।
आयुस्तिष्ठति वार्धीनामेकत्रिंशन्मितं परम् ॥२२९॥

नवानुदिशदेवानामायुर्द्वात्रिंशदब्धयः ।
पञ्चानुत्तरदेवानां त्रयस्त्रिंशच्च सागराः ॥२३०॥

इत्युत्कृष्टं पृथक् प्रोक्तमायुश्च नाकिनां क्रमात्।
अधःस्थे पटले ज्येष्ठं यत्तदूर्ध्वजघन्यकम् ॥२३१॥

अर्थ (श्लोक 224 से 231): सौधर्मेशान कल्प के प्रथम पटल में जघन्य आयु एक पल्य और उत्कृष्ट आयु अर्ध सागर प्रमाण तथा अन्तिम पटल में उत्कृष्ट आयु २ १/२ सागर प्रमाण है। सनत्कुमार-माहेन्द्र की उत्कृष्ट आयु ७ १/२ सागर तथा ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर की १० १/२ सागर प्रमाण है। लान्तव-कापिष्ठ कल्पों की १४ सागर एवं शुक्र-महाशुक्र युगल की उत्कृष्ट आयु १६ १/२ सागर प्रमाण है। शतार-सहस्रार की १८ सागर और आनत-प्राणत युगल की उत्कृष्ट आयु २० सागर प्रमाण है। आरण-अच्युत स्वर्गों की उत्कृष्ट आयु २२ सागर प्रमाण है। इसके आगे प्रथमादि नव ग्रैवेयकों में स्थित अहमिन्द्रों की आयु में क्रमशः एक-एक सागर की वृद्धि (२३, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३० सागर) होते हुए अन्तिम ग्रैवेयक की उत्कृष्ट आयु ३१ सागर प्रमाण है। नव अनुदिश स्थित देवों की आयु ३२ सागर तथा पंच अनुत्तरों में स्थित देवों की उत्कृष्ट आयु ३३ सागर प्रमाण है। इस प्रकार देवों की पृथक्-पृथक् उत्कृष्ट आयु क्रमशः कही गई है। नीचे-नीचे के पटलों (कल्पों) की जो उत्कृष्ट आयु होती है, ऊपर-ऊपर के पटलों की वही जघन्य आयु कही जाती है ॥२२४-२३१॥

पञ्चदश अधिकार ऊर्ध्वलोक वर्णन (भाग 2/2)

पुनर्विस्तरेण पटलं पटलं प्रति देवानां पृथगायुरुच्यते-
सौधर्मेशानयोः प्रथमे पटले देवानां जघन्यायुः पल्योपमं, उत्कृष्टं अर्धसागरः। द्वितीये चोत्कृष्टमायुः
सागरत्रिंशद् भागानां सप्तदशभागाः। तृतीये त्रिंशद् भागानां एकोनविंशतिभागाश्च। चतुर्थे आयुस्त्रिंशद्
भागानां एकविंशतिभागाः। पञ्चमे चायुः त्रिंशद् भागानां त्रयोविंशतिभागाः। षष्ठे त्रिंशद् भागानां
पञ्चविंशति भागाश्च सप्तमे त्रिंशद्भागानां सप्तविंशतिभागाः। अष्टमे सागरत्रिंशद्भागानां एकोनत्रिंशद्
भागाः। नवमे चायुः सागरैकः, सागरस्य त्रिंशद्भागानामेकोभागः। दशमे सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां
त्रयो भागाः। एकादशमे आयु सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां पञ्चभागाः। द्वादशमे सागरैकः सागरत्रिंशद्
भागानां सप्तभागाश्च। त्रयोदशमे सागरैकः सागरत्रिंशद् भागानां नवभागाः। चतुर्दशमे सागरैकः सागर
त्रिंशद्भागानां एकादशभागाः। पञ्चदशे आयुः सागरैकः सागर त्रिंशद्भागानां त्रयोदशभागाः। षोडशे
सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां पञ्चदशभागाः। सप्तदशे सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां सप्तदशभागाः।
अष्टादशे सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां एकोनविंशतिभागाः। एकोनविंशे सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां
एकविंशति भागाः। विंशे सागरैकः सागरत्रिंशद् भागानां त्रयोविंशतिभागाः। एकविंशे सागरैकः सागरत्रिंशद्
भागानां पञ्चविंशतिभागाः। द्वाविंशे सागरैकः सागरत्रिंशद्भागानां सप्तविंशति भागाः। त्रयोविंशे सागरैकः
सागरत्रिंशद्भागानां एकोनत्रिंशद्भागाः। चतुर्विंशे आयुः सागरौ द्वौ सागरत्रिंशद्भागानामेको भागः।
पञ्चविंशे द्वौ सागरौ सागरत्रिंशद्भागानां त्रयोभागाः। षड्विंशे द्वौ सागरौ सागरत्रिंशद्भागानां पञ्चभागाः।
सप्तविंशे द्वौ सागरौ सागरविंशद् भागानां सप्तभागाश्च। अष्टाविंशे द्वौ सागरौ सागरत्रिंशद्भागानां
नवभागाश्च। एकोनत्रिंशत्पटले द्वौ सागरौ सागरत्रिंशद्भागानां एकादशभागाः। त्रिंशत्संख्यके द्वौ सागरौ
सागरत्रिंशद्भागानां त्रयोदशभागाः। अन्तिमे पटले देवानामुरुष्टमायुश्च सार्धौ द्वौ सागरौ।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः नाकिनामादिमे पटले आयुरुत्कृष्टं त्रयोऽब्धयः अब्धि चतुर्दशभागानां त्रयोभागाः।
द्वितीये चायुः सागरास्त्रयः सागरचतुर्दशभागानां त्रयोदशभागाः। तृतीये आयुश्चत्वारः सागराः सागर-
चतुर्दशभागानां नवभागाः। चतुर्थे पञ्चसागराः सागरचतुर्दशभागानां पञ्चभागाः। पञ्चमे षट् सागराः
सागर चतुर्दशभागानामेको भागः। षष्ठे षट्सगराः सागरचतुर्दशभागानां एकादशभागाः। सप्तमे पटले
देवानां परमायुः सार्धसप्तसागराः। ब्रह्मब्रह्मोत्तरयोः प्रथमे पटले देवानामुरुष्टमायुः सपादा अष्टौ
सागराः। द्वितीये चायुर्नवसागराः। तृतीये पादोन दशसागराः। चतुर्थे पटले नाकिनामुत्कृष्टास्थितिः
सार्धदशसागरोपमानि। लान्तव-कापिष्ठयोरमराणामुरुष्टमायुः प्रथमे पटले सार्धद्वादशाब्ध्यः। द्वितीये
चायुः सार्धचतुर्दशसागरोपमानि। शुक्रमहाशुक्रयो पटलैकस्मिन् नाकिनां परमायुः सार्धषोडशसागरोपमाणि।
शतारसहस्रारयोरेकस्मिन् पटले देवानां ज्येष्ठमायुः सार्धाष्टादशसागरोपमाणि। आनतप्राणतयोः प्रथमे
पटले देवानां परास्थितिरैकोन विंशतिवार्धयः। द्वितीये च सार्धैकोनविंशति सागराः। तृतीये नाकिनां
परमायुः विंशतिसागरोपमानि। आरणाच्युतयोरुत्कृष्टमायुः स्वर्णिणां प्रथमे पटले सागराः विंशतिः
सागरत्रिभागीकृतस्य द्वौ भागौ। द्वितीये चायुरेकविंशतिसागराः सागरस्य तृतीयो भागः। तृतीये पटले
देवानां परास्थितिः द्वाविंशतिसागरोपमानि। ततः अधः प्रथमग्रैवेयके अहमिन्द्राणां परमायुस्त्रयो
विंशतिवार्धयः अधो द्वितीयग्रैवेयके चायुश्चतुर्विंशतिसागराः। अधस्तृतीयग्रैवेयके परास्थितिः पञ्चविंशति
जलधयः। मध्यप्रथमग्रैवेयके चायुः षड्विंशतिवार्धयः। मध्य द्वितीयग्रैवेयके चायुः सप्तविंशतिसागराः,
मध्यतृतीयग्रैवेयके परास्थितिरष्टाविंशतिसागरोपमाणि। ऊर्ध्वप्रथमग्रैवेयके परमायुरेकोनत्रिंशद्वार्धयः।
ऊर्ध्वद्वितीयग्रैवेयके चायुस्त्रिंशत्सागराः। ऊर्ध्वतृतीयग्रैवेयके अहमिन्द्राणां परा स्थितिः एकत्रिंशत्-
सागरोपमाणि। नवानुदिशे अहमिन्द्राणां परमायुर्द्वात्रिंशत्सागरोपमाणि। पञ्चानुत्तरे अहमिन्द्राणां
परास्थितिस्त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि अधःस्थ पटले यदुत्कृष्टायुः तदूर्ध्वपटले जघन्यं ज्ञातव्यं।

अर्थ: उपर्युक्त संस्कृत गद्य में प्रत्येक कल्पों के प्रत्येक पटलों की उत्कृष्ट आयु का पृथक्-पृथक् दिग्दर्शन कराया गया है, जिसका सम्पूर्ण अर्थ निम्नांकित तालिका में निहित है- नव अनुदिशों में स्थित अहमिन्द्रों की उत्कृष्ट आयु ३२ सागर प्रमाण एवं पाँच अनुत्तरों में स्थित अहमिन्द्रों की उत्कृष्ट आयु ३३ सागर प्रमाण होती है।
सौधर्मेशान कल्प के प्रथम पटल में स्थित देवों की जघन्यायु एक पल्योपम प्रमाण होती है। इसके आगे नीचे नीचे के पटलों की जो उत्कृष्ट आयु होती है, वही ऊर्ध्व-ऊर्ध्व पटलों में स्थित देवों की जघन्यायु जानना चाहिए।


ससम्यक्त्वस्य देवस्य सागरार्धं हि वर्धते।
आयुर्यावत्सहस्रारं मिथ्यात्वारिविघातनात् ॥२३२॥

मिथ्यात्वागत देवस्य सम्यक्त्वरत्ननाशनात्।
हीयते सागरार्धायुरिति स्थितिश्च नाकिनाम् ॥२३३॥

ज्योतिर्भावनभौमेषु सम्यक्त्वप्राप्तितोऽङ्गिनः।
किञ्चिद् व्रततपः पुण्यादुत्पद्यन्ते भवाध्वगाः ॥२३४॥

सम्यक्त्वप्राप्तिधर्मेण स्वायुर्भवनवासिनाम्।
सागरार्धं प्रवर्द्धेत मिथ्यात्वशत्रुघातनात् ॥२३५॥

ज्योतिष्कव्यन्तराणां चायुः पल्यार्धं प्रवर्धते।
मिथ्यात्वारिविनाशेन सम्यक्त्वमणिलाभतः ॥२३६॥

सर्वत्र विश्वदेवानां मिथ्यात्वदुर्विषोज्झनात्।
सम्यक्त्वामृत पानेन स्वायुः सम्वर्धतेतराम् ॥२३७॥

पल्यैकस्याप्यसंख्यातभागप्रममिति स्फुटम्।
स्थितिं वदन्ति देवानामागमे स्थितिवेदिनः ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 232 से 238): सौधर्म स्वर्ग से सहस्रार स्वर्ग पर्यन्त मिथ्यात्वरूपी शत्रु का नाश करने वाले सम्यग्दृष्टि देवों की आयु में अर्ध सागर की वृद्धि होती है तथा सम्यक्त्वरूपी रत्न का नाश होने से मिथ्यात्व को प्राप्त हुए देवों की आयु में से यह अर्ध सागर हीन हो जाती है। जिन मनुष्यों को सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं हुई, वे किञ्चित् व्रत एवं तप आदि से उपार्जित पुण्योदय से ज्योतिषी, भवनवासी एवं व्यन्तर वासी देवों में उत्पन्न होते हैं और पुनः संसाररूपी मार्ग में भ्रमण करते हैं। मिथ्यात्वरूपी शत्रु के नाश से तथा सम्यक्त्व प्राप्तिरूप धर्म से भवनवासी देवों की अपनी-अपनी आयु में अर्ध सागर की वृद्धि होती है तथा मिथ्यात्वरूपी शत्रु के विनाश एवं सम्यक्त्व मणि के लाभ से ज्योतिष्क तथा व्यन्तर वासी देवों को आयु में अर्ध पल्य की वृद्धि होती है। स्थिति आदि को जानने वाले गणधरादि देवों ने आगम में मिथ्यात्वरूपी विष को छोड़ने और सम्यक्त्वामृत के पान से युक्त सर्वत्र अर्थात् बारहवें स्वर्ग पर्यन्त समस्त देवों की अपनी-अपनी (घात) आयु में पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण (जघन्य) वृद्धि कही है ॥२३२-२३८॥


सौधर्मे च जघन्यायुः पादाग्रपल्यसंख्य कम्।
देवीनामायुरुत्कृष्टं पञ्चपल्योपमानि च ॥२३९॥

ईशाने सप्तपल्यानि ज्येष्ठा युर्देवयोषिताम्।
सनत्कुमारकल्पे च नवपल्योपमान्यपि ॥२४०॥

माहेन्द्रे योषितामायुः पल्यैकादशसम्मितम्।
ब्रह्मकल्पे परायुश्च पल्योपमास्त्रयोदश ॥२४१॥

ब्रह्मोत्तरे स्थितिः स्त्रीणां पल्यपञ्चदशप्रमा।
लान्तवे च परायुष्कं पल्यं सप्तदशप्रमम् ॥२४२॥

कापिष्ठे जीवितं पल्योपमान्येकोनविंशतिः।
शुक्रे स्त्रीणां परायुश्च पल्यानि ह्येकविंशतिः ॥२४३॥

महाशुक्रे स्थितिः पल्यत्रयोविंशतिसम्मिता।
शतारे योषितामायुः पल्यानि पञ्चविंशतिः ॥२४४॥

सहस्रारे स्थितिः स्त्रीणां पल्यानि सप्तविंशतिः।
आनते जीवितं पल्यचतुस्त्रिंशत्प्रमं भवेद् ॥२४५॥

प्राणते जीवितं पल्यैकचत्वारिंशदुत्तमम्।
आरणे योषितां पल्याष्टचत्वारिंशदूर्जितम् ॥२४६॥

अच्युते पञ्चपञ्चाशत्पल्यान्यायुश्च योषिताम्।
पुनरासां ब्रुवेऽप्यायुरन्यशास्त्रोक्तमञ्जसा ॥२४७॥

अर्थ (श्लोक 239 से 247): सौधर्म स्वर्ग में स्थित देवियों की जघन्य आयु १/४ पल्य एवं उत्कृष्ट आयु पाँच पल्य प्रमाण होती है। ईशान स्वर्गस्थ देवियों की आयु सात पल्य एवं सनत्कुमार कल्प स्थित देवियों की उत्कृष्ट आयु नव पल्य होती है। माहेन्द्र स्वर्गस्थ देवियों की आयु ग्यारह पल्य तथा ब्रह्म कल्प स्थित देवियों की उत्कृष्ट आयु तेरह पल्य प्रमाण होती है। ब्रह्मोत्तर स्वर्ग स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु पन्द्रह पल्य प्रमाण होती है तथा लान्तव स्वर्गस्थ देवांगनाओं की आयु सत्रह पल्य होती है। कापिष्ठ कल्प स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु उन्नीस पल्य एवं शुक्र कल्प में इक्कीस पल्य प्रमाण होती है। महाशुक्र स्थित की तेईस पल्य तथा शतार कल्प स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु पच्चीस पल्य प्रमाण होती है। सहस्रार कल्प में स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु २७ पल्य तथा आनत कल्प स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ३४ पल्य प्रमाण है। प्राणत कल्प स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ४१ पल्य तथा आरण स्वर्ग स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ४८ पल्य प्रमाण है और अच्युत कल्प स्थित देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ५५ पल्य प्रमाण होती है।


सौधर्मेशानयोश्चायुर्देवीनां पल्यपञ्चकम्।
द्वितीये युगले चायुः पल्यसप्तदशप्रमम् ॥२४८॥

स्थितिर्युग्मे तृतीये च पल्यानि पञ्चविंशतिः।
चतुर्थे योषितां पल्याः पञ्चत्रिंशच्च जीवितम् ॥२४९॥

पञ्चमे जीवितं चत्वारिंशत्पल्यानि योषिताम्।
षष्ठे पल्योपमाः पञ्चचत्वारिंशत् स्थितिः परा ॥२५०॥

सप्तमे युगले स्त्रीणां पञ्चाशत्पल्यजीवितम्।
अष्टमे पञ्चपञ्चाशत्पल्यायुर्देवयोषिताम् ॥२५१॥

ग्राह्य एकोपदेशो मध्येऽनयोरुपदेशयोः।
प्रमाणीकृत्य तीर्थेशवचः छद्मस्थयोगिभिः ॥२५२॥

अर्थ (श्लोक 248 से 252): सौधर्मेशान नामक प्रथम युगल में देवियों की उत्कृष्ट आयु पाँच पल्य, एवं द्वितीय युगल में सात पल्य प्रमाण होती है। तृतीय युगल में २५ पल्य तथा चतुर्थ युगल में देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ३५ पल्य प्रमाण होती है। पंचम युगल में ४० पल्य और षष्ठ युगल में देवांगनाओं की उत्कृष्ट आयु ४५ पल्य प्रमाण होती है। सप्तम युगल में देवांगनाओं की आयु ५० पल्य एवं अष्टम युगल में देवियों की उत्कृष्ट आयु ५५ पल्य प्रमाण होती है। तीर्थंकर देव के वचनों को प्रमाण करके छद्मस्थ योगिराजों के द्वारा उपर्युक्त दोनों उपदेशों में से एक उपदेश ही ग्रहण करना चाहिए ॥२४८-२५२॥


सौधर्मेशानयोर्देवदेहः सप्तकरोन्नतः।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवानां च षट्करः ॥२५३॥

स्याद् ब्रह्मादि चतुःस्वर्गे कायः पञ्चकरोच्छ्रितः।
शुक्रादिकचतुर्नाके देवाङ्गोच्चः चतुः करैः ॥२५४॥

आनतप्राणते देवाङ्गः सार्धत्रिकरोदयः।
आरणच्युतयोः कायो देवानां त्रिकरोन्नतः ॥२५५॥

सार्धद्विकरदेहोच्चोऽस्त्यधोग्रैवेयकत्रिषु ।
देवानां द्विकराङ्गोच्चो मध्यग्रैवेयकत्रिषु ॥२५६॥

सार्धैकहस्तदेहोच्च ऊर्ध्वग्रैवेयकत्रिषु ।
नवानुदिशसंज्ञेऽङ्गं सपादैक करोन्नतम् ॥२५७॥

पञ्चानुत्तरसंज्ञेऽहमिन्द्राणां विस्फुरत्प्रभः।
एकहस्तोन्नतो दिव्यः कायोवैक्रियिको भवेत् ॥२५८॥

अर्थ (श्लोक 253 से 258): सौधर्मेशान कल्प स्थित देवों के शरीर की ऊँचाई सात (७) हस्त प्रमाण एवं सानत्कुमार-माहेन्द्र में ६ हस्त प्रमाण है। ब्रह्मादि चार स्वर्गों में ऊँचाई ५ हस्त एवं शुक्रादि चार स्वर्गों में देवों के शरीर की ऊँचाई ४ हस्त प्रमाण होती है। आनत-प्राणत कल्प में शरीर का उत्सेध ३ १/२ हस्त प्रमाण तथा आरण-अच्युत स्वर्ग में देवों के शरीर का उत्सेध ३ हस्त प्रमाण है। तीनों अधो ग्रैवेयकों में उत्सेध २ १/२ हस्त तथा तीनों मध्य ग्रैवेयकों में देवों के शरीर का उत्सेध २ हस्त प्रमाण है। तीनों ऊर्ध्व ग्रैवेयकों में देह का उत्सेध १ १/२ हस्त एवं नव अनुदिशों में काय उत्सेध १ १/४ हस्त प्रमाण है। पंच अनुत्तरों में अहमिन्द्रों के तेजोमय, दिव्य वैक्रियिक शरीर का उत्सेध एक हस्त प्रमाण होता है ॥२५३-२५८॥


सौधर्मादियुगे देवानां द्विसहस्रवत्सरैः।
गतैराहारउच्छ्वासो भवेत्पक्षद्वये गते ॥२५९॥

द्वितीये युगले सप्तसहस्राब्दैर्विनिर्गतैः।
देवानां मानसाहार उच्छ्वासः पक्षसप्तके ॥२६०॥

तृतीयेऽब्दसहस्त्राणां नाकिनां दशभिर्गतैः।
सुधाहारोऽस्ति चोच्छ्वासो मनाक् पक्षदशातिगैः ॥२६१॥

चतुर्थे युगले वर्षचतुर्दशसहस्रकैः।
गतैराहार उच्छ्वासो द्विसप्तपक्षनिर्गमैः ॥२६२॥

पञ्चमे वत्सराणां गतैः षोडशसहस्रकैः।
सुधाहारो वरोच्छ्वासः पक्षैः षोडशभिर्गतैः ॥२६३॥

षष्ठेऽतिगैश्च वर्षाणामष्टादशसहस्रकैः।
मानसाहार उच्छ्वासः पक्षैरष्टादशैर्गतैः ॥२६४॥

सप्तमे युगले वर्षैर्गतैर्विंशसहस्रकैः।
सुधाहारो लघूच्छ्वासो विंशपक्षैर्विनिर्गतैः ॥२६५॥

अष्टमे नाकिनां चाहारो द्वाविंशसहस्रकैः।
वर्षैर्गतैः शुभोच्छ्वासः पक्षैर्द्वाविंशनिर्गमैः ॥२६६॥

आद्ये ग्रैवेयकेऽतीतैस्त्रयोविंशसहस्रकैः ।
वर्षैराहार उच्छ्वासः पक्षोनवर्षनिर्गमे ॥२६७॥

द्वितीये चाहमिन्द्राणां चतुर्विंशसहस्रकैः ।
अब्दैराहार उच्छ्वासो गतेवर्षेर्मनागपि ॥२६८॥

तृतीये स्यात् सुधाहारः पञ्चविंशसहस्रकैः ।
गतैर्वर्षैः शुभोच्छ्वासः पक्षाग्रवत्सरे गते ॥२६९॥

चतुर्थे मानसाहारोऽब्दषड्विंशसहस्रकैः ।
गतैःसुगन्धिरुच्छ्वासः पक्षैः षड्विंशतिप्रमैः ॥२७०॥

पञ्चमे वत्सराणां च सप्तविंशसहस्रकैः ।
गतैराहार उच्छ्वासस्त्रिपक्षाग्राब्दनिर्गमे ॥२७१॥

षष्ठे ग्रैवेयकेऽष्टाविंशाब्दसहस्रनिर्गतैः ।
दिव्याहारो लघूच्छ्वासो मासैश्चतुर्दशप्रमैः ॥२७२॥

सप्तमेऽमृतनाहार एकोनत्रिंशदब्दकैः ।
सहस्राणां शुभोच्छ्वासो मासैः सार्धचतुर्दशैः ॥२७३॥

अष्टमेऽस्ति हृदाहारस्त्रिंशद्वर्षसहस्रकैः ।
गतैश्च वर उच्छ्वासस्त्रिंशत्पक्षातिगैर्मनाक् ॥२७४॥

ग्रैवेयकेऽन्तिमे चाहारो ह्येकत्रिंशदब्दकैः ।
सहस्राणां सदुच्छ्वासस्तावत्पक्षैश्च निर्गतैः ॥२७५॥

नवानुदिशदेवानां स्याद्द्वात्रिंशत् सहस्रकैः ।
वर्षैराहार उच्छ्वासो गतैर्मासैश्च षोडशैः ॥२७६॥

पञ्चानुत्तरदेवानां त्रयस्त्रिंशत्सहस्रकैः ।
वर्षैश्चाहार उच्छ्वासो मासानां सार्धषोडशैः ॥२७७॥

अर्थ (श्लोक 259 से 277): सौधर्मैशान नामक प्रथम युगल में देवों का आहार २००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास दो पक्ष बाद होता है। द्वितीय युगल में देवों का मानसिक आहार ७००० वर्ष बाद तथा उच्छ्वास सप्त पक्ष बाद होता है। तृतीय युगल में देवों का अमृतमय आहार १०००० वर्ष बाद और उच्छ्वास दस पक्ष बाद होता है। चतुर्थ युगल में आहार १४००० वर्ष बाद तथा उच्छ्वास १४ पक्ष बाद होता है। पंचम युगल में देवों का सुधामय आहार १६००० वर्ष बाद और उच्छ्वास १६ पक्ष बाद होता है। षष्ठ युगल में मानसिक आहार १८००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास १८ पक्ष (९ माह) बाद होता है। सप्तम युगल में देवों का आहार २०००० वर्ष बाद एवं लघु उच्छ्वास २० पक्ष (१० माह) बाद होता है। अष्टम युगल में देवों का आहार २२००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास २२ पक्ष (११ माह) बाद होता है। प्रथम ग्रैवेयक स्थित अहमिन्द्रों के मानसिक आहार २३००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास ११ १/२ माह बाद होता है। द्वितीय ग्रैवेयक में आहार २४००० वर्ष बाद तथा उच्छ्वास एक वर्ष बाद होता है। तृतीय ग्रैवेयक में देवों का आहार २५००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास एक वर्ष, १ पक्ष बाद होता है। चतुर्थ ग्रैवेयक में अहमिन्द्रों का आहार २६००० वर्ष बाद और सुगन्धित उच्छ्वास एक वर्ष १ माह बाद होता है। पंचम ग्रैवेयक में अहमिन्द्रों का आहार २७००० वर्ष बादएवं उच्छ्वास एक वर्ष १ १/२ माह बाद होता है। षष्ठ ग्रैवेयक में आहार २८००० वर्ष बाद तथा उच्छ्वास एक वर्ष दो माह बाद होता है। सप्तम ग्रैवेयक में अमृतमय आहार २९००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास एक वर्ष २ १/२ माह बाद होता है। अष्टम ग्रैवेयक में अमृताहार ३०००० वर्ष बाद और किंचित् उच्छ्वास एक वर्ष ३ माह (१ १/४ वर्ष) बाद होता है। अन्तिम नवम ग्रैवेयक में सुधाहार ३१००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास ३१ पक्ष अर्थात् एक वर्ष ३ १/२ माह बाद होता है। नव अनुदिशों में अहमिन्द्रों का आहार ३२००० वर्ष बाद और उच्छ्वास एक वर्ष ४ माह बाद होता है तथा पञ्च अनुत्तरवासी अहमिन्द्रों का आहार ३३००० वर्ष बाद एवं उच्छ्वास ३३ पक्ष-एक वर्ष ४ १/२ माह बाद होता है ॥२५९-२७७॥


वसन्ति ब्रह्मलोकान्ते ये लौकान्तिकनाकिनः।
तेषां नामानि दिक् संख्या वक्ष्ये संक्षेपतः क्रमात् ॥२७८॥

सारस्वतास्तथादित्या वह्नयोऽरुणसंज्ञकाः।
ईशानादि विदिक्स्थ प्रकीर्णेषु वसन्त्यमी ॥२७९॥

प्राच्यादौ गर्दतोयाश्च वसन्ति तुषिताह्वयाः।
अव्याबाधास्ततोऽरिष्टाः श्रेणीबद्धेष्वनुक्रमात् ॥२८०॥

द्विद्वयोः सप्तयुक्तसप्तशतानि तु सहस्त्रकाः।
ततो द्वयोर्द्वयोर्वृद्धि द्वौ सहस्रौ द्वयाधिकौ ॥२८१॥

अर्थ (श्लोक 278 से 281): ब्रह्मलोक के अन्त में जो लौकान्तिक देव निवास करते हैं उनके नाम, अवस्थान की दिशाएँ एवं उनकी संख्या का प्रमाण मैं (आचार्य) संक्षेप से किन्तु क्रमशः कहूँगा। सारस्वत, आदित्य, वह्नि और अरुण नाम के लौकान्तिक देव क्रमशः ईशान, आग्नेय, नैऋत्य एवं वायव्य विदिशाओं में स्थित प्रकीर्णक विमानों में रहते हैं तथा गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध एवं अरिष्ट नाम के लौकान्तिक देव क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा गत श्रेणीबद्ध विमानों में रहते हैं। इनमें से सारस्वत देवों का प्रमाण ७०७, आदित्य लौकान्तिकों का ७०७, वह्नि देवों का ७००७ तथा अरुण लौकान्तिक देवों का प्रमाण ७००७ है। इसके आगे क्रमशः दो-दो हजार दो की वृद्धि होती गई है। यथा-गर्दतोय लौकान्तिकों का प्रमाण ९००९, तुषितों का ९००९, अव्याबाध देवों का ११००११ एवं अरिष्ट नामक लौकान्तिक देवों का प्रमाण ११००११ है ॥२७८-२८१॥


अग्निसूर्येन्दु सत्याभादेवाः श्रेयस्कराभिधाः।
क्षेमङ्करा वशिष्ठाख्या देवाः कामधराख्यकाः ॥२८२॥

निर्वाणरजसो नाम्ना दिगन्तरकृतोऽमराः।
आत्मरक्षकनामानः सर्वरक्षाश्च वायवः ॥२८३॥

वसवोऽश्चाह्वया विश्वाः षोडशैते सुराः क्रमात्।
द्वौ द्वौ सारस्वतादीनां तिष्ठतश्चान्तराष्टसु ॥२८४॥

संख्यामीषां पृथक् सप्ताधिक सप्तसहस्रकाः।
ततो ह्यग्रे सहस्रे द्वे प्रवर्धेते क्रमात् पृथक् ॥२८५॥

चतुर्लक्षस्तथा सप्तसहस्राश्च शताष्टकम्।
विंशतिर्मेलिता एते सर्वे लौकान्तिकामताः ॥२८६॥

अर्थ (श्लोक 282 से 286): अग्न्याभ, सूर्याभ, चन्द्राभ, सत्याभ, श्रेयस्कर, क्षेमंकर, वशिष्ट, कामधर, निर्वाण रजस्, दिगन्तरक्षक, आत्मरक्षक, सर्वरक्षक, मरुत्, वसव, अश्व एवं विश्व नाम के ये सोलह प्रकार के लौकान्तिक देव क्रमशः सारस्वतादि दो-दो देवों के अन्तरालों में रहते हैं। इनमें से अग्न्याभ देवों की संख्या ७००७ प्रमाण है। इसके आगे पृथक्-पृथक् क्रमशः २००२ की वृद्धि होती गई है। इस प्रकार सब लौकान्तिकों की एकत्रित संख्या ४०७८२० प्रमाण मानी गई है ॥२८२-२८६॥


नाधिका न च हीनास्ते स्वात्मध्यानपरायणाः।
विरक्ताः कामभोगेषु निसर्गब्रह्मचारिणः ॥२८७॥

चतुर्दशमहापूर्वसमुद्रपारगा विदः।
सम्बोधनविधातारो दीक्षा कल्याणकेऽर्हताम् ॥२८८॥

देवर्षयः स्तुता वन्द्याः पूज्याश्चेन्द्रादिनाकिभिः।
एकावतारिणोऽत्यन्त स्वल्पमोहाः शुभाशयाः ॥२८९॥

विरागा जिनदीक्षादानेऽति प्रमोदकारिणः।
केवलं ब्रह्मकल्पान्ते सन्ति लौकान्तिकामराः ॥२९०॥

अत्यन्त स्त्रीविरक्ता ये तपस्यन्ति विरागिनः।
मुनयः प्राग् भवे ते स्युल्लौकान्तिकाः स्त्रियोऽतिगाः ॥२९१॥

सारस्वतादि सप्तानां देवर्षीणां परा स्थितिः।
अखण्डाः सागरा अष्टौ संसाराब्ध्यन्तगामिनाम् ॥२९२॥

आयुश्चारिष्टदेवानां नवैव सागरोपमाः ।
पुनरेषां ब्रुवे किञ्चित् सुखबोधाय वर्णनम् ॥२९३॥

अर्थ (श्लोक 287 से 293): ये सभी लौकान्तिक देव परस्पर में ऋद्धि आदि से हीनाधिक नहीं होते, ये आत्मध्यान परायण, काम एवं भोगों से विरक्त तथा निसर्गतः ब्रह्मचारी होते हैं। चतुर्दश महापूर्व रूपी समुद्र के पारगामी, विद्वान् एवं दीक्षा कल्याणक के समय अर्हन्तों को सम्बोधन करने वाले होते हैं। इन्द्रादि समस्त देवों द्वारा पूजनीय, वन्दनीय एवं स्तुत्य ये सर्व देवर्षि संज्ञा वाले देव एक भवावतारी, अत्यन्त अल्प मोह युक्त एवं शुभ भावनाओं से युक्त होते हैं। राग से रहित जिनेन्द्र भगवान की दीक्षा के समय अत्यन्त प्रमोद को धारण करने वाले ये लौकान्तिक देव ब्रह्म कल्प के अन्त में निवास करते हैं। पूर्वभव में जो मुनि स्त्री जन्य राग से अत्यन्त विरक्त होते हैं तथा राग रहित अत्यन्त उग्र तप करते हैं, वे स्वर्ग में आकर स्त्रियों के राग से रहित लौकान्तिक देव होते हैं। संसाररूपी समुद्र के अन्त को प्राप्त होने वाले सारस्वतादि सात देवर्षियों की उत्कृष्ट अखण्ड आयु आठ सागर प्रमाण होती है। अरिष्ट नामक लौकान्तिक देवों की उत्कृष्ट आयु ९ सागर प्रमाण होती है। अब इनके भेद प्रभेदों के प्रमाण का सुखपूर्वक बोध कराने के लिए उसी प्रमाण को पुनः कहते हैं ॥२८७-२९३॥ सारस्वत नामक लौकान्तिक देवों का प्रमाण ७०७ है ये ब्रह्मलोक के अन्त में ईशान दिशा स्थित प्रकीर्णक विमानों में रहते हैं। ७०७ है प्रमाण जिनका, ऐसे आदित्य देव आग्नेय दिशागत प्रकीर्णक विमानों में रहते हैं। वह्नि देवों का प्रमाण ७००७ है, ये नैऋत्य दिशागत प्रकीर्णकों में रहते हैं। अरुण देवों का प्रमाण भी ७००७ है. ये वायव्य कोण स्थित प्रकीर्णकों में रहते हैं। पूर्व दिशागत श्रेणीबद्धों में निवास करने वाले गर्दतोय देवों का प्रमाण ९००९ है। दक्षिण दिशागत श्रेणीबद्धों में निवास करने वाले तुषित देवों का प्रमाण ९००९ है। पश्चिम दिशागत श्रेणीबद्धों में निवास करने वाले अव्याबाध देवों का प्रमाण ११०११ है। उत्तर दिशागत श्रेणीबद्ध विमानों में निवास करने वाले अरिष्ट देवों का प्रमाण ११०११ है। ७००७ अग्न्याभ देव और ९००९ सूर्याभदेव, सारस्वत एवं गर्दतोय इन दोनों के मध्य में रहते हैं। ११०११ चन्द्राभ तथा १३०१३ सत्याभ देव, गर्दतोय एवं आदित्य इन दोनों के मध्य में रहते हैं। १५०१५ श्रेयस्कर तथा १७०१७ क्षेमंकर देव, आदित्य एवं तुषित इन दोनों के मध्य में रहते हैं। १९०१९ वशिष्ट तथा २१०२१ कामधर देव, तुषित एवं वह्नि इन दोनों के मध्य में रहते हैं। २३०२३ निर्वाणरजस् तथा २५०२५ दिगन्तरकृत देव, वह्नि एवं अव्यावाध देवों के मध्य में निवास करते हैं। २७०२७ आत्मरक्षक और २९०२९ सर्वरक्षक देव, अव्यावाध एवं अरुण इन दोनों के मध्य में निवास करते हैं। ३१०३१ मरुत् तथा ३३०३३ वसव देव, अरुण और अरिष्ट के मध्य में रहते हैं। ३५०३५ अश्व देव एवं ३७०३७ विश्व देव अरिष्ट और सारस्वत इन दोनों के मध्य में रहते हैं। इन सब लौकान्तिक देवों का एकत्रित प्रमाण ४०७८२० होता है।


सौधर्माद्यष्टनाकेषु षट्संहननसंयुताः।
यान्ति शुक्रादिकल्पेषु चान्तिमं विना ॥२९४॥

पञ्चसंहनना आनताद्येष्वन्य चतुर्षु च।
चतुः संहनना जीवा गच्छन्ति पुण्यपाकतः ॥२९५॥

नवग्रैवेयकेषु त्र्युत्तमसंहनान्विताः।
जायन्ते मुनयो दक्षा नवानुदिशनामनि ॥२९६॥

अन्त्य द्विसंहननाढ्या यान्ति रत्नत्रयार्जिताः।
पञ्चानुत्तरसंज्ञे चादिसंहननभूषिताः ॥२९७॥

अर्थ (श्लोक 294 से 297): सौधर्मादि आठ कल्पों में छहों संहनन वाले जीव उत्पन्न होते हैं। शुक्रादि चार कल्पों में अन्तिम (असम्प्राप्तसृपाटिका) संहनन को छोड़कर पाँच संहनन वाले जीव तथा आनतादि चार कल्पों में असम्प्राप्त और कीलक संहनन को छोड़कर शेष चार संहनन वाले जीव पुण्योदय से उत्पन्न होते हैं। नव ग्रैवेयकों में तीन उत्तम संहननधारी मुनिराज, नव अनुदिशों में आदि के दो संहननों से युक्त रत्नत्रयधारी मुनिराज एवं पाँच अनुत्तरों में मात्र वज्रवृषभनाराच संहनन वाले मुनिराज उत्पन्न होते हैं और इसी संहनन से मोक्ष भी जाते हैं ॥२९४-२९७॥


तेजोलेश्या जघन्यास्ति भावनादित्रयेषु च।
सौधर्मेशानयोर्नित्यं तेजोलेश्या हि मध्यमा ॥२९८॥

सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवानां शुभाशये।
तेजोलेश्याखिलोत्कृष्टा पद्मांशोऽतिजघन्यकः ॥२९९॥

ब्रह्मादिषट् सुदेवानां पद्मलेश्यास्ति मध्यमा।
शतारादिद्वये पद्मोत्कृष्टा शुक्ला जघन्यवाक् ॥३००॥

आनतादिचतुःकल्प नवग्रैवेयकेषु च।
देवानामहमिन्द्राणां शुक्ललेश्यास्ति मध्यमा। ३०१॥

नवानुदिशसंज्ञे च पञ्चानुत्तरनामके।
शुक्ललेश्यामहोत्कृष्टाऽहमिन्द्राणां भवेत्सदा ॥३०२॥

अर्थ (श्लोक 298 से 302): भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिषी देवों में जघन्य पीत लेश्या होती है एवं सौधर्मेशान कल्प में मध्यम पीत लेश्या होती है। सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों (के अधस्तन बहुभाग) में उत्कृष्ट पीत लेश्या एवं (उपरिम एक भाग में) अति जघन्य पद्म लेश्या के अंश होते हैं। ब्रह्मादि छह कल्पों में देवों के मध्यम पद्म लेश्या होती है एवं शतार-सहस्रार कल्पों के देवों में पद्मलेश्या उत्कृष्ट तथा उपरिम एक भाग में जघन्य शुक्ल लेश्या होती है। आनतादि चार कल्पों में स्थित देवों में तथा नव ग्रैवेयक-वासी अहमिन्द्रों में मध्यम शुक्ललेश्या होती है। नव अनुदिश तथा पंच अनुत्तरवासी अहमिन्द्रों के निरन्तर उत्कृष्ट शुक्ललेश्या होती है ॥२९८-३०२॥


संस्थानं प्रथमं दिव्यं दिव्याकारं जगत्प्रियम्।
वपुर्वैक्रियिकं रम्यं सप्तधातुमलोज्झितम् ॥३०३॥

सुगन्धीकृतदिग्भागं शुभस्निग्धाणु निर्मितम्।
निरौपम्यं च देवानां निसर्गेणास्ति सुन्दरम् ॥३०४॥

अर्थ (श्लोक 303 से 304): वैमानिक देवों के जगत् प्रिय एवं दिव्य समचतुरस्र नामक प्रथम संस्थान होता है। इनका वैक्रियिक शरीर होता है, जो दिव्याकार वाला, अत्यन्त रमणीक, सप्त धातु रहित तथा मल से रहित होता है। देवों का शरीर स्वभावतः अतिसुन्दर, उपमा रहित तथा दसों दिशाओं को सुगन्धित कर देने वाले सौरभ युक्त, शुभ एवं स्निग्ध परमाणुओं से निर्मित तथा उपमा रहित होता है ॥३०३-३०४॥


अणिमादिगुणा अष्टौ विक्रियर्द्धिभवाः सदा।
विश्वकार्यकराः सन्ति नाकिनां स्वर्गभूमिषु ॥३०५॥

गावः कामदुघाः सर्वे कल्पवृक्षाश्च पादपाः।
स्वभावेन च रत्नानि चिन्तामणय एव हि ॥३०६॥

अर्थ (श्लोक 305 से 306): स्वर्गों में देवों का समस्त कार्य करने वाली विक्रिया ऋद्धि से उत्पन्न अणिमा आदि आठ ऋद्धियाँ हैं तथा वहाँ स्वभावतः कामधेनु गायें हैं, वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और रत्न चिन्तामणि रत्न हैं ॥३०५-३०६॥


नेत्रस्पन्दो न जात्वेषां न स्वेदो न मलादि च।
नखकेशादिकं नैव न वार्धक्यं न रोगिता ॥३०७॥

निशादिनविभागो न विद्यते त्रिदशास्पदे।
केवलं रत्नरश्म्यौघैरुद्योतो वर्ततेतराम् ॥३०८॥

वर्षादिदुःखकृत्कालो नात्रनैवर्त्तु संक्रमः।
नानिष्टसंगमोऽमीषां नाल्पमृत्युर्न दीनता ॥३०९॥

किन्तु शर्मप्रदोऽस्त्येकः साम्यकालः सुधाभुजाम्।
सम्पदो विविधा बह्व्यः सुखं वाचामगोचरम् ॥३१०॥

अर्थ (श्लोक 307 से 310): स्वर्गों में देवों के नेत्रों का परिस्पन्दन नहीं होता। उनके न पसीना आता है, न मल मूत्र आदि होता है, न नख केश आदि बढ़ते हैं, न वृद्धपना आता है और न किसी प्रकार के रोग होते हैं। स्वर्गों में रात्रि दिन का विभाग नहीं है, वहाँ निरन्तर केवल रत्न की किरणों के समूहों का उद्योत होता रहता है। वहाँ पर वर्षा, आतप आदि दुःख के कारणभूत काल एवं ऋतु आदि का परिवर्तन नहीं होता। वहाँ न अनिष्ट वस्तुओं का संयोग होता है, न अल्प मृत्यु होती है और न दीनता है किन्तु देवों के निरन्तर सुख प्रदान करने वाले काल का एक सदृश वर्तन होता है। वहाँ पर विविध प्रकार की विपुल सम्पदाएँ हैं एवं वहाँ का सुख वचन अगोचर है ॥३०७-३१०॥


तत्रोपपाददेशान्तर्मणिशय्यातले मृदौ।
प्रागर्जितमहापुण्याल्लभन्ते जन्म वासवाः ॥३११॥


ततोऽप्यन्तर्मुहूर्तेन प्राप्य सम्पूर्णयौवनम्।
दिव्यमुत्थाय शय्यायाः सुप्तोत्थिता इवात्र ते ॥३१२॥


विलोक्य तन्महाभूतीः प्रणतामरमण्डलीः।
साश्चर्यमानसाश्चित्ते चिन्तयन्तीति चात्मगम् ॥३१३॥


अहो! केऽमी महादेशाः सुखसम्पत् कुलालयाः।
के वयं केन पुण्येनानीता वात्र सुरास्पदे ॥३१४॥

विनीता के इमे देवा देव्य एता जगत्प्रियाः।
कस्येमाः सम्पदः सारा विमानान्तर्गताः पराः ॥३१५॥

इत्यादि चिन्तमानानां तेषां साश्चर्यचेतसाम्।
आगत्य सचिवा नत्वा पादाब्जान् ज्ञानचक्षुषः ॥३१६॥

पूर्वापर सुसम्बन्धं निगदन्ति मनोगतम्।
तत्पूर्वार्जित पुण्यं च स्वर्लोकस्थितिमञ्जसा ॥३१७॥

अर्थ (श्लोक 314 से 317): वहाँ पर इन्द्र आदि देव पूर्वोपार्जित महा पुण्योदय से उपपाद स्थानों में मणिमय कोमल उपपाद शय्या पर जन्म लेते हैं तथा जन्म लेने के अन्तर्मुहूर्त बाद ही पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त कर वे उस दिव्य शय्या पर से ऐसे उठते हैं जैसे मानों सोकर ही उठे हों शय्या से उठते ही नम्रीभूत होती हुई देव मण्डली को और वहाँ की महाविभूति को देखकर मन में आश्चर्यान्वित होते हुए वे अपने मन में ऐसा चिन्तन करते हैं कि अहो! सुख सम्पत्ति से युक्त यह कौन सा देश है? मैं कौन हूँ तथा किस पुण्योदय से मैं यहाँ स्वर्ग लोक में उत्पन्न हुआ हूँ। अर्थात् यहाँ लाया गया हूँ। नम्रीभूत होने वाले, जगत्प्रिय ये सब देव-देवियाँ कौन हैं एवं विमान स्थित यह समस्त विपुल तथा उत्कृष्ट सम्पत्ति किसकी है? इत्यादि अनेक प्रकार का चिन्तन करने वाले और आश्चर्ययुक्त चित्त वाले उन नवीन देवों के मनोगत भावों को अपने अवधि नेत्र से जानकर वहाँ स्थित प्रधान-मन्त्री आदि देव उनके समीप आकर तथा उनके चरण कमलों को नमस्कार करके पूर्वोपार्जित पुण्य से स्वर्ग लोक में उत्पन्न होने की स्थिति एवं अन्य पूर्वापर सम्बन्ध आदि कहकर उन नवीन देवों के मनोगत सन्देह को दूर करते हैं ॥३१४-३१७॥


ततस्तत्क्षणसञ्जातावधिज्ञानेन तेऽखिलम्।
ज्ञात्वा प्राग्जन्मधर्मस्य फलं चेति वदन्त्यपि ॥३१८॥

अहो! पूर्वभवेऽस्माभिः कृतं घोरं महत्तपः।
हता पञ्चाक्षचौराश्च स्मरवैरी निपातितः ॥३१९॥

मनो ध्यानेन संरुद्धं प्रमादा निर्जिता हृदि।
कषायविषवृक्षाश्च छिन्नाः क्षमायुधेन च ॥३२०॥

जगत्सारा महादीक्षा पालिता जिनपुङ्गवाः।
आराधिता जगन्नाथास्तद्वाक्ये निश्चयं कृतम् ॥३२१॥

सर्वं यत्नेन सद्धर्मो जिनोक्तो विश्वशर्मदः।
अहिंसा लक्षणः सारैः क्षमादिलक्षणैर्धृतः ॥३२२॥

इत्याद्यैः परमाचारैः सद्धर्मो यः पुरार्जितः।
तेनोद्धृत्याप्यधःपाताद्वयं संस्थापिता इह ॥३२३॥

अतो धर्माद्विना नान्योऽत्रामुत्र सुहितं करः।
किन्तु सद्धर्म एकोऽहो! स्वर्गमुक्तिसुखप्रदः ॥३२४॥

नरकाद् धर्म उद्धृत्य नयेद्विधर्मिणो दिवम्।
सहगामी सतां धर्मो धर्मोऽचिन्त्यविभूतिदः ॥३२५॥

धर्मः कल्पद्रुमो विश्वसंकल्पितसुखप्रदः।
धर्मश्चिन्तामणिश्चिन्तितार्थदो विश्वतर्पकः ॥३२६॥

धर्मो निधिर्जगत्सारो धर्मः कामदुधा नृणाम्।
धर्मोऽसमगुणग्रामो धर्मः सर्वार्थसिद्धिदः ॥३२७॥

ईदृशोऽहो! महान् धर्मो येन वृत्तेन चार्ज्यते।
तन्नात्र सुलभं जातु स्वर्णिणां सुखभोगिनाम् ॥३२८॥

किन्तु स्वर्गे तपो वान्ये व्रतांशो नास्ति जातुचित्।
केवलं दर्शनं स्याच्च पूजाभक्तिर्जिनेशिनाम् ॥३२९॥

अतस्तत्त्वार्थश्रद्धास्तु श्रेयसे नो जगद्धिता।
धर्ममूलार्हतां पूजाभक्तिस्तुतिः परा रुचिः ॥३३०॥

विचिन्त्येति ततः शक्रा ज्ञातधर्मफलोदयाः।
धर्मसिद्धयै समुद्युक्ता व्रजन्ति स्नानवापिकाम् ॥३३१॥

अर्थ (श्लोक 318 से 331): अन्य देवों के द्वारा सम्बोधित किये जाने के क्षण (समय) ही उन्हें अवधिज्ञान उत्पन्न हो जाता है, जिससे वे अपने समस्त पूर्व जन्म को जानकर धर्म का फल विचार करते हुए, इस प्रकार कहते हैं कि-अहो! हमने पूर्व भव में महान् एवं घोर तप किया। पंचेन्द्रियरूपी चोरों को मारा है तथा काम रूपी शत्रु को परास्त किया है। शुभध्यान के अवलम्बन से मन को हृदय में रोककर प्रमाद को जर्जरित किया है एवं क्षमारूपी आयुध से कषायरूपी विष वृक्ष की छिन्न किया है। जगत् में सारभूत महादीक्षा का यत्नपूर्वक पालन किया है, जिनेन्द्र भगवानों की आराधना की है और तीन लोक में सर्वश्रेष्ठ तीर्थंकरों के वचनों का श्रद्धान किया है। अहिंसा है लक्षण जिसका, जो सम्पूर्ण सुखों को देने वाला है, ऐसे जिनेन्द्र द्वारा कथित समीचीन धर्म का मैंने पूर्ण प्रयत्न से उत्तम क्षमादि सारभूत लक्षणों द्वारा धारण किया है इत्यादि प्रकार से परमोत्कृष्ट चारित्र आदि के द्वारा पूर्व भव में मैंने जो धर्म उपार्जन किया था, उसने मुझे दुर्गति के पतन से रोककर इस देव लोक में स्थापित कर दिया है। इस लोक और परलोक में धर्म के बिना उत्तम हितकारी अन्य और कोई नहीं है। अहो! एक समीचीन धर्म ही स्वर्ग एवं मोक्ष के सुखों को देने वाला है। विधर्मियों को भी यह धर्म नरक से निकालकर स्वर्ग ले जाता है। सज्जनों के लिए धर्म ही सहयोगी है। धर्म अचिन्त्य विभूति देने वाला है। सम्पूर्ण वाञ्छित सुखों को प्रदान करने के लिए धर्म कल्पवृक्ष है तथा सम्पूर्ण चिन्तित पदार्थों को प्रदान करने से धर्म ही चिन्तामणि रत्न है। जगत् में सारभूत निधि धर्म ही है। मनुष्यों के लिए धर्म ही कामधेनु है, धर्म ही अतुल गुणों का समूह है तथा सर्व अर्थों की सिद्धि प्रदान करने वाला एक धर्म ही है। अहो! मनुष्य लोक में जिस उत्तम चारित्र से यह महान् धर्म उपार्जित किया था वह चारित्र सुख भोगने वाले इन स्वर्ग वासियों को कभी सुलभ नहीं है, किन्तु स्वर्गों में कदाचित् भी तप व व्रतों का अंश नहीं है, यहाँ तो केवल सम्यग्दर्शन और जिनेन्द्र देवों की पूजा भक्ति मात्र है इसलिए स्वर्गों में कल्याण का हेतु जगत् की हितकारक एक तत्त्वार्थ की श्रद्धा एवं धर्म का मूल अर्हन्तों की पूजा, भक्ति तथा स्तुति ही है। इस प्रकार चिन्तन करके एवं इन्द्र आदि पदों को धर्म का फल जानकर धर्म सिद्धि के लिये उद्यत होते हुए स्नान वापिका की ओर स्नान हेतु जाते हैं ॥३१८-३३१॥


तस्यां स्नात्वामरैः सार्द्धमुत्तमं श्रीजिनालयम्।
स्फुरन्मणिमयं यान्ति धर्मरागरसोत्कटाः ॥३३२॥

तत्र नत्वोत्तमाङ्गेनार्हन्मूर्तीर्धर्मसत्खनीः।
अर्चयन्ति महाभूत्या महाभक्त्या महोत्सवैः ॥३३३॥

मणिभृङ्गारनालान्तर्निर्गताच्छजलोत्करैः ।
दिव्यामोदनभोव्याप्तैर्जगत्सारैर्विलेपनैः ॥३३४॥

पुण्याङ्कुरसमैर्दीर्घैर्मुक्ताफलमयाक्षतैः ।
कल्पवृक्षोद्भवैः दिव्यैर्नानाकुसुमदामभिः ॥३३५॥

सुधापिण्डसुनैवेद्यै रत्नपात्रार्पितैः शुभैः ।
मणिदीपैर्हतध्वान्तैः सुगन्धिधूपसञ्चयैः ॥३३६॥

कल्पद्रुमफलैः सारैर्महापुण्यफलप्रदैः ।
दिव्यैश्चूर्णैश्च सद्गीतैर्नर्तनैः पुष्पवर्षणैः ॥३३७॥

ततः स्तुत्य तीर्थेशान् सार्थैस्तद्गुणभूरिभिः ।
अर्जयित्वा परं पुण्यं ते गत्वा पूजयन्ति च ॥३३८॥

वनस्थचैत्यवृक्षेषु जिनेन्द्रप्रतिमाः पराः।
स्नपयन्ति स्तुवन्त्येव प्रणमन्ति वृषाप्तये ॥३३९॥

अर्थ (श्लोक 332 से 339): वापिकाओं में स्नान करके, धर्मरागरूपी उत्कट रस से भरे हुए वे इन्द्रादि देव अन्य देव समूहों के साथ देदीप्यमान मणिमय उत्तम जिनालयों में जाते हैं। वहाँ जाकर धर्म की खानस्वरूप अर्हन्त प्रतिमाओं को उत्तमांग (सिर) से नमस्कार करके महाविभूति और अपूर्व भक्ति से महामहोत्सवों के द्वारा पूजा करते हैं। मणिमय भृंगार की नाल के मुख से निकलते हुए स्वच्छ जल समूह से, अपनी सुवास से आकाश को व्याप्त करने वाले तथा जगत् के सार स्वरूप दिव्य चन्दन के विलेपन से, पुण्य के अंकुर सदृश और दीर्घ मुक्ताफल सदृश उत्तम अक्षतों से, कल्पवृक्षों से उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के फूलों की मालाओं से, रत्नपात्रों में रखे हुए, कल्पवृक्षों से उत्पन्न और अत्यन्त शुभ नैवेद्य से, अन्धकार को नष्ट करने वाले मणिमय दीपों से, सुगन्धित धूप समूह से, महापुण्य फल प्रदान करने वाले कल्पवृक्षों के सारभूत उत्तम फलों से, दिव्य चूर्ण से, उत्तम गीत, उत्तम नृत्य और पुष्पवृष्टि आदि से जिनेन्द्र देव की पूजा भक्ति करते हैं। इसके बाद वे इन्द्र, देव समूहों के साथ तीर्थंकरों की स्तुति, पूजन द्वारा उत्कृष्ट पुण्य उपार्जन करके वहाँ से जाते हैं और वनों के मध्य चैत्यवृक्षों में स्थित उत्कृष्ट जिनेन्द्र प्रतिमाओं का धर्म प्राप्ति के लिये अभिषेक करते हैं, पूजन करते हैं, स्तुति करते हैं और नमस्कार करते हैं ॥३३२-३३९॥


तत्रोत्पन्नाः सुरा - दृष्टिहीना देवैः प्रबोधिताः।
जिनागारे जिनेन्द्रार्चां कुर्वन्ति शुभकांक्षिणः ॥३४०॥

सम्यग्दृष्ट्यमरा भक्त्या जिनेन्द्रगुणरञ्जिताः।
अर्चयन्ति जिनार्चादीन् कर्मक्षयाय केवलम् ॥३४१॥

निर्देशनाः सुराश्चित्ते मत्वा स्वकुलदेवताः।
जिनमूर्तीर्विमानस्थाः पूजयन्ति शुभाप्तये ॥३४२॥

ततोत्पन्नामरांश्चान्ये बोधयन्ति सुदृष्टयः।
धर्मोपदेशतत्त्वादि भाषणैर्दर्शनाप्तये ॥३४३॥

केचित्तद् बोधनाच्छीघ्रं काललब्ध्या शुभाशयाः।
गृह्णन्ति त्रिजगत्सारं सम्यक्त्वं भक्तिपूर्वकम् ॥३४४॥

अर्थ (श्लोक 340 से 344): स्वर्गों में उत्पन्न होने वाले मिथ्यादृष्टि देव अन्य देवों द्वारा समझाए जाने पर पुण्य की वाञ्छा से जिनमन्दिरों में जाकर जिनेन्द्र भगवान् की पूजन करते हैं, किन्तु जो सम्यग्दृष्टि देव वहाँ उत्पन्न होते हैं वे जिनेन्द्र भगवान् के गुणों में रंजायमान होते हुए कर्मक्षय के लिए भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र देव की पूजा करते हैं। मिथ्यादृष्टि देव अपने विमानों में स्थित जिनप्रतिमाओं को अपने मन में उन्हें कुलदेवता मानकर पुण्य की प्राप्ति के लिये पूजते हैं। वहाँ उत्पन्न होने वाले मिथ्यादृष्टि देवों को अन्य सम्यग्दृष्टि देव सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हेतु तत्त्व आदि के प्रतिपादन रूप धर्मोपदेश देते हैं, उनमें से कितने ही देव देशना प्राप्त करते ही काललब्धि से प्रेरित होकर शुद्ध चित्त होते हुए, त्रैलोक्य में सारभूत सम्यक्त्व को भक्ति पूर्वक शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं ॥३४०-३४४॥


नन्दीश्वरमहाद्वीपे नियमेन सुराधिपाः।
वर्षमध्ये त्रिवारं च दिनाष्टावधिमूर्जितम् ॥३४५॥

महामहं प्रकुर्वन्ति भूत्या स्नानार्चनादिभिः।
जिनालयेषु सर्वेषु प्रतिमारोपितार्हताम् ॥३४६॥

मेर्वादिविश्वशैलस्थाऽर्हन्मूर्तीस्तेऽर्चयन्ति च।
गत्वा विमानमारुह्य चापराः कृत्रिमेतराः ॥३४७॥

पञ्चकल्याणकालेषु महापूजा जिनेशिनाम्।
विभूत्या परया गत्वा भक्त्या कुर्वन्ति नाकिनः ॥३४८॥

स्थानस्था अहमिन्द्राश्च कल्याणपञ्चकेऽनिशम्।
भक्त्यार्हतः शिवप्राप्त्यै प्रणमन्ति स्तुवन्ति च ॥३४९॥

गणेशादीन्। मुनीन् सर्वान् नमन्ति शिरसा सदा।
निर्वाणक्षेत्रपूजादीन् भजन्तीन्द्राश्च सामराः ॥३५०॥

जिनेन्द्र श्री मुखोत्पन्नां वाणीं शृण्वन्ति ते सदा।
तत्त्वगर्भा सुधर्माय परिवारविराजिताः ॥३५१॥

अर्थ (श्लोक 345 से 351): सर्व देव समूहों से युक्त होकर इन्द्र नियम से वर्ष में तीन बार (आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन) नन्दीश्वर द्वीप जाते हैं और वहाँ के सर्व जिनालयों में स्थित अर्हन्त प्रतिमाओं की महाविभूति अष्ट-अष्ट दिन पर्यन्त अभिषेक आदि क्रियाओं के साथ-साथ महामह पूजा करते हैं। अपने-अपने विमानों पर आरोहण कर इन्द्र आदि देव मेरु आदि सर्व पर्वतों पर जाते हैं और वहाँ स्थित अकृत्रिम तथा कृत्रिम सर्व प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। सर्व देव पञ्च कल्याणकों के समय जाते हैं और वहाँ पर जाकर विपुल विभूति के साथ भक्ति से जिनेन्द्र देवों की पूजा करते हैं। पञ्च कल्याणकों के समय सर्व अहमिन्द्र अपने स्थानों पर स्थित रहकर ही कल्याण प्राप्ति के लिये अर्हन्त भगवान को भक्ति से प्रणाम करते हैं और अहर्निश उनकी स्तुति करते हैं। सर्व देवों के साथ इन्द्र, सर्व गणधरों को और मुनीश्वरों को निरन्तर सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं तथा निर्वाण आदि क्षेत्रों की पूजा करते हैं। इन्द्र सपरिवार समवसरण में जाकर उत्तम धर्म धारण हेतु श्री जिनेन्द्र भगवान् के मुख से उत्पन्न तत्त्व और अर्थ से भरी हुई वाणी को निरन्तर सुनते हैं ॥३४५-३५१॥


इत्यादिविविधाचारैः शुभैः पुण्यं परं समम्।
देवैः शक्राश्च देवीभिरर्जयन्ति सुखाकरम् ॥३५२॥

तत्पुण्यजनितान् भोगान् निरौपम्यानिरन्तरम्।
भुञ्जन्ति सहदेवीभिः समस्तेन्द्रियतृप्तिदान् ॥३५३॥

व्रजन्ति स्वेच्छया देवा असंख्यद्वीपवार्धिषु।
सद् विमानं मुदारुह्य क्रीडाकामसुखाप्तये ॥३५४॥

देवोद्यानेषु सौधेषु नदीक्रीडाचलेषु च।
स्वेच्छया स्वस्वदेवीभिः क्रीडां कुर्वन्ति नाकिनः ॥३५५॥

शृण्वन्ति मधुरं गीतं पश्यन्ति नर्तनं महत्।
सुशृङ्गारं विलासं चाप्सरसां ते रसावहम् ॥३५६॥

इति नाना विनोदाद्यैः परमाह्लादकारणम्।
प्रतिक्षणं परं सौख्यं लभन्ते नाकिनोऽनिशम्।३५७॥

दीर्घकालं निराबाधं यत्सुखं स्वर्गिणां भवेत्।
केवलं तच्च तेषां स्यान्नान्येषां हि च्युतोपमम् ॥३५८॥

अर्थ (श्लोक 352 से 358): इस प्रकार स्वर्ग स्थित इन्द्र अनेक देव और देवियों के साथ अनेक प्रकार के शुभ आचरणों द्वारा सुख की खानस्वरूप उत्कृष्ट पुण्य का उपार्जन करते हैं। उस पुण्य फल से उत्पन्न समस्त इन्द्रियों को तृप्त करने वाले अनुपम भोगों को देवियों के साथ-साथ निरन्तर भोगते हैं। सभी देव अपनी इच्छा से उत्तम विमानों में आरूढ़ होकर काम क्रीड़ा रूप सुख प्राप्ति के लिए असंख्यात द्वीप समुद्रों में जाते हैं। स्वर्ग स्थित देव अपनी अपनी देवांगनाओं के साथ स्वेच्छानुसार उद्यानों में, महलों में, नदियों में एवं कुलाचलों पर क्रीड़ा करते हैं एवं वे देव कभी अप्सराओं के मधुर गीत सुनते हैं, कभी सुन्दर नृत्य देखते हैं और काम रस को उत्पन्न करने वाली नाना प्रकार के श्रृंगार एवं विलास पूर्ण क्रियाएँ करते हैं। इस प्रकार देव परम आह्लाद उत्पन्न करने वालीं नाना प्रकार की विनोद पूर्ण क्रियाओं द्वारा प्रतिक्षण निरन्तर परम सुखों को भोगते हैं। दीर्घकाल तक निराबाध और अनुपम, जो सुख स्वर्गवासी देवों को प्राप्त होता है, वह सुख मात्र उन्हीं देवों को ही है, वैसा सुख अन्य किसी को भी प्राप्त नहीं है ॥३५२-३५८॥


ये तपश्चरणोद्युक्ता रत्नत्रयधनेश्वराः।
व्रतशीलमहाभूषाः सदाचाराः शुभाशयाः ॥३५९॥

जिनधर्मरता नित्यं जिनधर्मप्रभावकाः।
जिनधर्मकरा ये च जिनधर्मोपदेशकाः ॥३६०॥

जिनाङ्घ्रिपूजका येऽत्र जिनभक्ता विवेकिनः।
जिनवाणीसमासक्ता जिनसद्गुणरञ्जिताः ॥३६१॥

धर्मिणां वत्सला दक्षा धर्मवात्सल्यकारिणः।
धर्मे साहाय्यकर्तारोऽन्येषां धर्मे च प्रेरकाः ॥३६२॥

धर्मकार्योद्यता ये च पापकार्ये पराङ्मुखाः।
भवभीताः शुभध्याना जितेन्द्रिया जिताशयाः ॥३६३॥

निर्मदा निरहङ्कारा बुधा मन्दकषायिणः।
निर्लोभाः शुभलेश्याढ्या विचारचतुराश्च ये ॥३६४॥

धर्मशुक्लशुभध्यान परा दुर्ध्यान दूरगाः।
अग्रगा धर्मकार्ये च ये सर्वत्र हितोद्यताः ॥३६५॥

इत्याद्यन्यैः शुभाचारैर्भूषिता ये नरोत्तमाः।
ते सर्वे धर्मपाकेन प्राणान्मुक्त्वा समाधिना ॥३६६॥

सौधर्ममुख्यसर्वार्थसिद्धिपर्यन्तमञ्जसा ।
व्रजन्ति स्वतपो योग्यं लभन्ते चेन्द्रसत्पदम् ॥३६७॥

अर्थ (श्लोक 359 से 367): जो निरन्तर दुर्द्धर तप तपते हैं, रत्नत्रय धन के स्वामी हैं, व्रत एवं शील से विभूषित हैं, सदाचारी हैं, जिनके चित्त शुभाशय से युक्त हैं, निरन्तर जिनधर्म में रत रहते हैं, जिनधर्म की प्रभावना करने वाले हैं, जिन धर्म का उद्योत करने वाले हैं और जो जिन धर्म के उपदेशक हैं। जो यहाँ जिनेन्द्र भगवान के चरण कमलों की पूजा करते हैं, जिन भक्त हैं, विवेकी हैं, जिनवाणी में जिनका चित्त आसक्त रहता है, जिनका मन जिनेन्द्र के गुणों में रंजायमान रहता है, जो धर्मात्माओं से अत्यन्त प्रीति रखते हैं, धर्म कार्यों में दक्ष हैं, धर्म एवं धर्मात्माओं में वात्सल्य भाव रखते हैं, धर्म कार्यों में निरन्तर सहायता करते रहते हैं और अन्य जीवों को भी धर्म कार्यों की प्रेरणा देते रहते हैं। जो मनुष्य निरन्तर धर्मकार्य में उद्यत रहते हैं और पाप कार्यों से पराङ्मुख हैं, संसार से भयभीत, शुभ ध्यानों में तत्पर, जितेन्द्रिय, विषय कषायों को जीतने वाले, गर्व रहित, अहंकार रहित, ज्ञानी, मन्दकषायी, निर्लोभी, शुभ लेश्याओं से युक्त और सद्विचारों में चतुर होते हैं। धर्म, शुक्लरूप उत्कृष्ट शुभ ध्यानों में तत्पर, खोटे ध्यानों से दूर रहते हैं, धर्म कार्यों में अग्रसर एवं सर्वत्र सर्व जीवों के हित में उद्यत रहते हैं। इत्यादि प्रकार से तथा और भी अन्य शुभाचारों से जो मनुष्य विभूषित हैं, वे सब नरोत्तम समाधिपूर्वक प्राणों को छोड़कर धर्म के फल से सौधर्म स्वर्ग से लेकर सर्वार्थसिद्धिपर्यन्त जाते हैं तथा अपने-अपने तप की योग्यता के बल से इन्द्रादि के उत्कृष्ट पदों को प्राप्त करते हैं ॥३५९-३६७॥


भोगभूमिभवा आर्याः सम्यक्त्वधारिणो हि ये।
सौधर्मेशानकल्पौ ते यान्ति दृष्टिवृषोदयात् ॥३६८॥

भोगभूमिसमुत्पन्ना ये दृष्टिविकला नराः।
भावनादित्रये तेऽतः व्रजन्ति भोगकांक्षिणः ॥३६९॥

अज्ञानकष्टपाकेन भद्रा गच्छन्ति तापसाः।
आज्योतिर्लोक पर्यन्तं न स्वर्गं स्वल्पपुण्यतः ॥३७०॥

ये परिव्राजकास्तेऽत्र स्वोत्कृष्टाचरणेन च।
यान्ति ब्रह्मोत्तरं स्वर्गं यावद् भौमादिपूर्वकम् ॥३७१॥

भद्रा आजीवका दीर्घायुषः कुवेषधारिणः।
उत्कृष्टेन सहस्रारपर्यन्तं यान्ति तद् व्रतैः ॥३७२॥

इतः परं भवेज्जातुं गमनं नान्यलिङ्गिनाम्।
श्रावका आर्यिका नार्यस्तिर्यञ्चो व्रतभूषिताः ॥३७३॥

उत्कृष्टेन च गच्छन्ति स्वोत्कृष्टाचरणोद्यताः।
अच्युतस्वर्गपर्यन्तमुत्कृष्टश्रावकव्रतैः ॥३७४॥

उत्कृष्टेन तपोवृत्तैरभव्या द्रव्यलिङ्गिनः।
चिरायुषो व्रजन्त्यूर्ध्वं यावद्ग्रैवेयकान्तिमम् ॥३७५॥

ततः परं प्रगच्छन्ति स्वोत्कृष्टसत्तपोमयैः।
सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तं मुनयो भावलिङ्गिनः ॥३७६॥

अर्थ (श्लोक 368 से 376): भोगभूमि में उत्पन्न होने वाले सम्यग्दृष्टि आर्य मरण कर सम्यग्दर्शन एवं धर्म के प्रसाद से सौधर्मैशान कल्पपर्यन्त उत्पन्न होते हैं तथा भोगभूमि में उत्पन्न एवं भोगों की आकांक्षा रखने वाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य, भवनवासी, व्यन्तरवासी और ज्योतिषी देवों में उत्पन्न होते हैं। अज्ञान से अनेक प्रकार के कष्ट जिसमें हैं, ऐसा तप तपने वाले भद्र तापसी मरण कर भवनत्रिक में उत्पन्न होते हैं। अल्प पुण्य के कारण स्वर्ग नहीं जाते। जो परिव्राजक हैं, वे अपने उत्कृष्ट तपश्चरण द्वारा भवनत्रिक से ब्रह्मोत्तर स्वर्ग पर्यन्त उत्पन्न होते हैं। भद्र, दीर्घायु और कुवेषधारी आजीवक नाम के तापसी कायक्लेश आदि तपों के द्वारा उत्कृष्ट से सहस्रार स्वर्ग पर्यन्त जाते हैं। सहस्रार स्वर्ग से ऊपर कुलिंग वेषधारी जीवों की उत्पत्ति नहीं होती। अपने-अपने उत्कृष्ट चारित्र में उद्यम करने वाले श्रावक, आर्यिकाएँ, व्रती स्त्रियाँ और व्रत से विभूषित तिर्यञ्च उत्कृष्ट श्रावक व्रतों के द्वारा उत्कृष्टतः सोलह स्वर्ग पर्यन्त जाते हैं। दीर्घायु द्रव्यलिंगी मुनि और अभव्य जीव उत्कृष्ट रीति से पालन किये हुए तप और व्रताचरण के द्वारा नव ग्रैवेयक पर्यन्त जाते हैं। सर्वोत्कृष्ट व्रत और तपश्चरण के द्वारा भावलिंगी मुनिराज सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त जाते हैं ॥३६८-३७६॥


सौधर्मेन्द्रस्य दृष्ट्याप्ता महादेव्यो दिवश्च्युताः।
सर्वे च दक्षिणेन्द्रा हि चत्वारो लोकपालकाः ॥३७७॥

सर्वे लौकान्तिका विश्वे सर्वार्थसिद्धिजामराः।
निर्वाणं तपसा यान्ति संप्राप्य नृभवं शुभम् ॥३७८॥

नवानुत्तरजा देवाः पञ्चानुत्तरवासिनः।
ततश्च्युत्वा न जायन्ते वासुदेवा न तद् द्विषः ॥३७९॥

तिर्यञ्चो मानवाः सर्वे भावनादि त्रिजामराः।
शलाकापुरुषा जातु न भवन्त्यमरार्चिताः ॥३८०॥

विजयादिविमानेभ्योऽहमिन्द्रा एत्य भूतलम्।
मर्त्यजन्मद्वयं प्राप्य ध्रुवं गच्छन्ति निर्वृतिम् ॥३८१॥

अर्थ (श्लोक 377 से 381): सम्यग्दर्शन को धारण करने वाली सौधर्म इन्द्र की महादेवी, सर्व दक्षिणेन्द्र, चारों लोकपाल, सर्व लौकान्तिक देव और सर्वार्थसिद्धि के सर्व देव स्वर्ग पर्याय से च्युत होकर उत्तम मनुष्यभव प्राप्त करते हैं और फिर उत्कृष्ट तप से विभूषित होते हुए नियमपूर्वक उसी भव से मोक्ष जाते हैं। (सर्वार्थसिद्धि को छोड़कर) पञ्च पंचोत्तर और नव अनुदिश वासी देव स्वर्ग से च्युत होकर नारायण एवं प्रतिनारायण नहीं होते। सर्व मनुष्य, सर्व तिर्यञ्च और सर्व भवनत्रिकवासी देव अपनी-अपनी पर्यायों से मरण कर देवों द्वारा पूजित शलाका पुरुषों में कभी भी उत्पन्न नहीं होते। विजयादि विमानों से च्युत होकर भूतल पर आये हुए अहमिन्द्र मनुष्य के दो भव लेकर नियम से मोक्ष पद प्राप्त करते हैं ॥३७७-३८१॥


यदावतिष्ठतेऽल्पायुः शेषं षण्मासगोचरम्।
देवानां च तदा स्वाङ्गकान्तिर्गच्छति मन्दताम् ॥३८२॥

उरःस्थपुष्पसन्माला म्लानतां यान्ति दुर्विधेः।
मणयो भूषणानां हि तेजसा मन्दतां तथा ॥३८३॥

एतानि मृत्युचिह्नानि वीक्ष्य कुदृष्टि निर्जराः।
इति शोकं प्रकुर्वन्तीष्टवियोगार्तमानसाः ॥३८४॥

हा! ईदृशीर्जगत्सारा विमुच्य स्वर्गसम्पदः।
नोऽवतारोऽशुभे निन्द्ये स्त्रीदुर्गर्भे भविष्यति ॥३८५॥

अधोमुखेन तत्राहो! गर्भेविष्टाकृमाकुले।
दुस्सहा वेदना स्माभिः सोढव्या सुचिरं कथम् ॥३८६॥

इत्यार्तध्यानपापेन दिवश्च्युत्वा कुदृष्टयः।
भावनादित्रयस्थाश्च सौधर्मैशानवासिनः ॥३८७॥

भवन्ति बादराः पर्याप्ताः पृथ्व्यप्कायिका भुवि।
तथा वनस्पतिप्रत्येककायिकाः सुखातिगाः ॥३८८॥

आसहस्रारकल्पास्थाः केचित्प्रच्युत्य नाकतः।
आर्त्तध्यानेन जायन्ते दुःखिनः कर्मभूमिषु ॥३८९॥

पञ्चेन्द्रियाश्च पर्याप्तास्तिर्यञ्चो वा नरोऽपरे।
ततः परं दिवश्च्युत्वानतकल्पादिवासिनः ॥३९०॥

कर्मभूमौ मनुष्यत्वं लभन्ते केवलं शुभम्।
तिर्यक्त्वं जातु नामीषां तीव्रार्त्तध्याद्यभावतः ॥३९१॥

अर्थ (श्लोक 382 से 391): जब सर्व देवों की छह मास पर्यन्त की अल्पायु अवशेष रह जाती है, तब उनके शरीर की कान्ति मन्द हो जाती है। दुर्विपाक से गले में स्थित उत्तम पुष्पों की माला म्लान हो जाती है। और मणिमय आभूषणों का तेज मन्द हो जाता है। इस प्रकार के मृत्यु चिह्न देखकर मिथ्यादृष्टि देव अपने मन में इष्ट वियोग आर्तध्यान रूप इस प्रकार का शोक करते हैं कि-हाय! संसार की सारभूत स्वर्ग की इस प्रकार की सम्पत्ति छोड़कर अब हमारा अवतरण स्त्री के अशुभ, निन्दनीय और कुत्सित गर्भ में होगा? अहो! विष्टा और कृमि आदि से व्याप्त उस गर्भ में दीर्घकाल तक अधोमुख पड़े रहने की वह दुस्सह वेदना हमारे द्वारा कैसे सहन की जायेगी? इस प्रकार के आर्त्तध्यानरूप पाप से भवनत्रिक और सौधर्मैशान कल्प में स्थित मिथ्यादृष्टि देव स्वर्ग से च्युत होकर तिर्यग्लोक में दुःखों से युक्त बादर, पर्याप्त, पृथिवीकायिक, जलकायिक और प्रत्येक वनस्पति कायिक जीवों में जन्म लेते हैं (जहाँ गर्भ का दुःख नहीं होता)। सहस्रार कल्प पर्यन्त के मिथ्यादृष्टि देव स्वर्ग से च्युत होकर आर्तध्यान के कारण पन्द्रह कर्मभूमियों में, दुःखों से युक्त पंचेन्द्रिय, पर्याप्तक तिर्यञ्च एवं मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। आनत आदि चार कल्पों के एवं नव ग्रैवेयकों के मिथ्यादृष्टि देव स्वर्ग से च्युत होकर कर्मभूमियों में उत्तम मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। इन स्वर्गों में तीव्र आर्तध्यान का अभाव है, अतः यहाँ के मिथ्यादृष्टि देव तिर्यञ्च योनि में कभी भी उत्पन्न नहीं होते ॥३८२-३९१॥


मृत्युचिह्नानि वीक्ष्यन्ते सम्यग्दृष्टिसुरोत्तमाः।
दक्षाः कालुष्यनाशायेमं विचारं प्रकुर्वते ॥३९२॥

शक्राणामपि चात्राहो न मनाग्नियमं व्रतम्।
न तपो न च सज्ज्ञानं न शिवं शाश्वतं सुखम् ॥३९३॥

किन्तु मर्त्यभवे नॄणां तपोरत्नत्रयादयः।
व्रतशीलानि सर्वाणि जायन्ते च शिवादिकाः ॥३९४॥

अतोऽद्याद्भुतपुण्येन नृभवं प्राप्य सत्कुलम्।
साधनीयं किलास्माभिर्मोक्षोऽनन्तसुखाकरः ॥३९५॥

इत्थं विचार्य सद्देवा विधाय विविधार्चनाम्।
अर्हतां मरणान्ते च चित्तं कृत्वाति निश्चलम् ॥३९६॥

ध्यायन्तः कुड्मलीकृत्य स्वकरौ परमेष्ठिनाम्।
नमस्कारान् परान् पञ्चेहामुत्र स्वेष्टसिद्धिदान् ॥३९७॥

तिष्ठन्ति पुण्यसत्क्षेत्रे तदामीषां वपूंषि च।
अभ्राणीव विलीयन्ते सहसा स्वायुषि क्षये ॥३९८॥

ततस्ते दृग्विशुद्ध्याप्ता देवास्तत्पुण्यपाकतः।
तीर्थेशविभवं केचिल्लभन्ते विश्ववन्दितम् ॥३९९॥

केचिच्चक्रिपदं चान्ये बल-कामादिसत्पदम्।
नृभवे सुकुलं केचिद्घनाढ्यं धर्मकारणम् ॥४००॥

अर्थ (श्लोक 392 से 400): हिताहित के विचार में दक्ष सम्यग्दृष्टि उत्तम देव मानसिक कलुषता को दूर करने के लिए इस प्रकार विचार करते हैं कि- अहो ! यहाँ स्वर्गों में इन्द्रों के भी न किञ्चित् यम, नियम हैं और न तप है और न दान आदि हैं और तप आदि के बिना मोक्षरूप शाश्वत सुख की प्राप्ति हो नहीं सकती किन्तु मनुष्य भव में मनुष्यों को मोक्ष के साधनभूत तप, रत्नत्रय, व्रत एवं शील आदि सभी प्राप्त हो जाते हैं, अतः आज अद्भुत पुण्य परिपाक से हम लोगों को मनुष्य भव और उत्तम कुल की प्राप्ति हो रही है, उसे प्राप्त कर हम लोग अनन्त सुख की खान स्वरूप मोक्ष का साधन करेंगे। इस प्रकार के विचार कर उत्तम देव नाना प्रकार से अर्हन्त देव की पूजन करके मरण के अन्तिम समय में अपने चित्त को अत्यन्त निश्चल करते हुए अपने दोनों हाथ जोड़कर पंच परमेष्ठियों का ध्यान करते हैं तथा इस लोक और परलोक में आत्मसिद्धि देने वाला नमस्कार करते हैं। मरण बेला में किसी पुण्यरूप उत्तम क्षेत्र में जाकर बैठ जाते हैं, वहाँ आयु क्षय होते ही उन देवों का शरीर मेघों के सदृश शीघ्र ही विलीन हो जाता है। शुद्ध सम्यक्त्व को धारण करने वाले वे उत्तम देव वहाँ से चयकर कोई तो पुण्य प्रभाव से विश्व वन्दनीय तीर्थंकर के वैभव को प्राप्त करते हैं, कोई चक्रवर्ती पद को कोई बलदेव पद और कोई कामदेव आदि के उत्तम पद प्राप्त करते हैं एवं कोई-कोई देव मनुष्य भव तथा उत्तम कुल में धर्म के कारणभूत अति धनाढ्य होते हैं ॥३९२-४००॥


इत्थं धर्मविपाकतश्च विबुधाः स्वर्गेषु नानाविधं।
सत्सौख्यं चिरकालमक्षजमहो! भुञ्जन्ति बाधातिगम्।
ज्ञात्वेतीह बुधाः प्रयत्नमनसा सारैस्तपः सद्‌व्रतै-
र्धर्मेकं चरतानिशं किमपरैर्व्यर्थैश्चवागडम्बरैः ॥४०१॥

अर्थ: अहो ! इस प्रकार विवेकी जीव धर्म के फल से स्वर्गों में चिरकाल तक नाना प्रकार के बाधारहित इन्द्रियजन्य उत्तम सुख भोगते हैं। ऐसा जानकर विद्वानों को, मनुष्य भव में सारभूत उत्तम तप और उत्तम व्रतों के द्वारा निरन्तर मनोयोगपूर्वक एक धर्म के आचरण में ही प्रयत्न करना चाहिए, व्यर्थ के अन्य वचन आडम्बरों से क्या? ॥४०१॥


धर्मः स्वर्गगृहाङ्गणः सुखनिधिर्धर्मः शिवश्रीप्रदो,
धर्मःस्वेष्टसमीहितार्थजनको धर्मोगुणाब्धिर्महान्।
धर्मो धर्मविधायिनां द्विसुगतौ नाना सुभोगप्रद-
स्तत्किं यन्न ददाति किं तु कुरुते स्वस्थांस्त्रिलोकीपतीन् ॥४०२॥

अर्थ: धर्म से स्वर्ग लोक गृह का आँगन हो जाता है, धर्म सुख की निधि और मोक्ष लक्ष्मी को देने वाला है, धर्म अपने इष्ट एवं चिन्तित पदार्थों का जनक है, धर्म गुणों का सागर है, धर्म धारण करने वाले जीवों को धर्म उत्तम भोग प्रदायी स्वर्ग और मनुष्य गति देता है, धर्म केवल इतना ही नहीं देता किन्तु अष्ट कर्मों को नष्ट करके धर्म त्रैलोक्यपति पद अर्थात् मोक्ष पद को भी दे देता है ॥४०२॥


धर्मं येऽत्र सृजन्ति तीर्थपतयो धर्माच्छिवं ये गताः,
धर्मे ये गणिनो विदश्च मुनयस्तिष्ठन्ति धर्माप्तये।
ये स्वर्गादिजगत्सुचैत्यनिलया धर्मस्य सद्धेतवः
तीर्थेशप्रतिमादयः प्रतिदिनं वन्देऽखिलांस्तान् स्तुवे ॥४०३॥

अर्थ: जो तीर्थंकर देव यहाँ धर्म के सृजन करने वाले थे, वे धर्म से ही मोक्ष गये हैं। उन सबको, धर्म में स्थित आचार्य, उपाध्याय एवं साधुओं को, स्वर्ग आदि में स्थित धर्म के साधनभूत उत्तम जिनमन्दिरों को और लोक में जितनी भी तीर्थंकर आदि की प्रतिमाएँ हैं, उन सबको मैं प्रतिदिन नमस्कार करता हूँ और उन सबकी स्तुति करता हूँ ॥४०३॥

षोडश अधिकार पल्यादि मान वर्णन

अथ सिद्धव्रजान्नत्वा त्रिजगन्मूर्द्धिसंस्थितम्।
सिद्धक्षेत्रं प्रवक्ष्यामि सतां वन्द्यं तदाप्तये ॥१॥

अर्थ: अब सिद्धों के समूह को नमस्कार कर तीनों लोकों के मस्तक पर स्थित तथा सज्जनों के वन्दनीक सिद्ध क्षेत्र का कथन उसकी प्राप्ति के हेतु करूँगा ॥१॥


सर्वार्थसिद्धितो गत्वाप्यूर्ध्वद्वादशायोजनैः।
त्रैलोक्यमस्तके तिष्ठेत् महती वसुधाष्टमी ॥२॥
दक्षिणोत्तरदीर्घाङ्गा सप्तरज्जुभिरूर्जिता।
पूर्वापरेण रज्ज्येकव्यासा स्थूलाष्टयोजनैः ॥३॥

अर्थ (श्लोक 2 से 3): सर्वार्थसिद्धि से बारह योजन (४८००० मील) ऊपर जाकर त्रैलोक्य के मस्तक पर ईषत्प्राग्भार नाम की श्रेष्ठ अष्टम पृथ्वी अवस्थित है। उस अष्टम पृथ्वी की दक्षिणोत्तर लम्बाई सात राजू प्रमाण, पूर्व पश्चिम चौड़ाई एक राजू एवं मोटाई आठ योजन प्रमाण है ॥२-३॥


तन्मध्ये रजतच्छाया दिव्या मोक्षशिला शुभा।
उत्तानगोलकार्धेन समाना दीप्तिशालिनी ॥४॥
नृक्षेत्रसमविस्तीर्णा छत्राकारा विभात्यलम्।
मध्येऽष्टयोजनस्थूला कृशान्ते क्रमहानितः ॥५॥

अर्थ (श्लोक 4 से 5): ईषत्प्राग्भार पृथ्वी के ठीक मध्य में रजतमय, दिव्य, सुन्दर, देदीप्यमान और ऊँचे रखे हुए अर्ध गोले के सदृश मोक्षशिला है। यह अत्यन्त प्रभावयुक्त छत्राकार और मनुष्य लोक के सदृश (४५ लाख योजन) विस्तार वाली है। इस शिला की मध्य की मोटाई आठ योजन है, आगे अन्त पर्यन्त क्रमशः हीन होती गई है ॥४-५॥


तस्यां सिद्धा जगद्वन्द्यास्तनुवातान्तमस्तकाः।
अनन्तसुखसंलीना नित्याष्टगुणभूषिताः ॥६॥
कायोत्सर्गसमाः केचित् पर्यङ्कासन सन्निभाः।
केचिच्च विविधाकारा अमूर्ता ज्ञानदेहिनः ॥७॥

गतसिक्थकमूषायां आकाशाकारधारिणः ।
प्राक्कायायामविस्तार त्रिभागोनप्रदेशकाः ॥८॥

लोकोत्तमाः शरण्याश्च मङ्गलविश्वकारकाः ।
अनन्तकालमात्माप्तास्तिष्ठन्त्यन्तातिगाः सदा ॥९॥

इमे सिद्धा मया ध्येया वन्द्या विश्वमुनीश्वरैः ।
स्तुताश्च मम कुर्वन्तु स्वगतिं स्वगुणैः समम् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 6 से 10): तनुवातवलय के अन्त में हैं मस्तक जिनके, ऐसे त्रिजगद्वन्दनीय, अनन्त सुख में निमग्न और नित्य ही अष्ट गुणों से विभूषित सिद्ध परमेष्ठी उस सिद्ध शिला से ऊपर अवस्थित हैं। ज्ञान ही है शरीर जिनका, ऐसे वे अमूर्तिक सिद्ध कोई कायोत्सर्ग से और कोई पद्मासन से नाना प्रकार के आकारों से अवस्थित हैं। पुरुषाकार मोम रहित साँचे में जिस प्रकार आकाश पुरुषाकार को धारण करके रहता है, उसी प्रकार पूर्व शरीर के आयाम एवं विस्तार में से एक त्रिभाग कम पुरुषाकार प्रदेशों से युक्त, लोकोत्तम स्वरूप, शरण स्वरूप और समस्त विश्व को मंगलस्वरूप सिद्ध भगवान् अन्तरहित अनन्तकाल पर्यन्त अपनी आत्मा में ही रहते हैं। इस प्रकार के सिद्ध भगवान् विश्व के समस्त अरहंतों और मुनीश्वरों के द्वारा वन्द्य तथा स्तुत्य हैं, मैं भी उनका ध्यान करता हूँ, वे मुझे अपने गुणों के सदृश अपनी सिद्ध गति प्रदान करें ॥६-१०॥


इन्द्राहमिन्द्रदेवानां चक्रवर्त्यादिभूभुजाम् ।
भोगभूमिभवार्याणां सर्वेषां व्योमगामिनाम् ॥११॥

भूतं भावि सुखं सर्वं वर्तमानं जगत्त्रये ।
यदेकत्रीकृतं स्याच्च विषयोत्थत्रिकालजम् ॥१२॥

तस्मादक्षसुखात्कृत्स्नादनन्तगुणितं सुखम् ।
एकेन समयेनैव सिद्धा भुञ्जन्ति शाश्वतम् ॥१३॥

स्वात्मोपादानसञ्जातं वृद्धिह्रासोज्झितं परम् ।
परद्रव्य निरपेक्षं समस्तोत्कृष्टमञ्जसा ॥१४॥

निराबाधं निरौपम्यं दुःखदूरं सुखोद्भवम् ।
अत्यक्षमतुलं सारं विश्वशर्माग्रसंस्थितम् ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 11 से 15): तीनों लोकों में चतुर्निकाय के सर्व देवों, इन्द्रों, अहमिन्द्रों, पदवीधारी चक्रवर्ती आदि सर्व राजाओं, भोगभूमिज युगलों और सर्व विद्याधरों के भूत, भविष्यत्, वर्तमान के सर्व सुख को एकत्र कर लेने पर भी त्रिकालज विषयों से उत्पन्न होने वाले इस इन्द्रिय जन्य समस्त सुखों से (विभिन्न जाति का) अनन्तानन्त गुणा शाश्वत एवं अतीन्द्रिय सुख सिद्ध परमेष्ठी एक समय में भोगते हैं। लोक के अग्रभाग में स्थित सिद्ध परमेष्ठी अपनी आत्मा के उपादान से उत्पन्न, वृद्धि-ह्रास से रहित, पर द्रव्यों से निरपेक्ष, सर्व सुखों में सर्वोत्कृष्ट, बाधा रहित, उपमा रहित, दुःख रहित, अतीन्द्रिय, अनुपम सुख से उत्पन्न और समस्त सुखों में जो सारभूत है, ऐसे सुख का उपभोग निरन्तर करते हैं ॥११-१५॥


अथ पूर्वोक्तलोकस्य घनाकारेण रज्जुभिः।
अधोमध्योर्ध्वभागेषु पृथक् संख्या निगद्यते ॥१६॥

रत्नप्रभामहीभागे रज्जवो दशसम्मिताः।
शर्कराश्वभ्रभूदेशे रज्जवः षोडशप्रमाः ॥१७॥

वालुका भूतलेद्वाविंशति संख्याश्च रज्जवः।
पङ्कप्रभावनिक्षेत्रे ह्यष्टाविंशति रज्जवः ॥१८॥

धूमप्रभाक्षितौ रज्जवः चतुस्त्रिंशदज्जसा।
तमःप्रभाखिलेक्षेत्रे चत्वारिंशच्च रज्जवः ॥१९॥

महातमः प्रभान्ते षड्चत्वारिंशच्च रज्जवः।
इत्यधोलोकरज्जूनां षण्णवत्यधिकं शतम् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 16 से 20): अब सिद्धों के सुखों का वर्णन करने के बाद पूर्व में जो लोक का ३४३ घन राजू क्षेत्रफल कहा गया था, उसी को अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक इन तीन भागों में विभाजित करके अधोलोक सम्बन्धी प्रत्येक पृथ्वी के घनफल की पृथक्-पृथक् संख्या कहते हैं ॥१६॥ रत्नप्रभा पृथ्वी (उपरिम प्रथम भाग) का घनफल १० घन राजू प्रमाण है। शर्करा पृथ्वी (द्वितीय भाग) का १६ घन राजू प्रमाण, बालुका प्रभा (तृतीय भाग) का २२ घन राजू, पंकप्रभा (चतुर्थ भाग) का २८ घन राजू, धूम प्रभा (पंचम भाग) का ३४ घन राजू, तमःप्रभा (षष्ठ भाग) का ४० घन राजू और महातमःप्रभा पृथ्वी (सप्तम भाग) का घन फल ४६ घन राजू प्रमाण है। इस प्रकार अधोलोक का सर्व घन फल (१० + १६ + २२ + २८ + ३४ + ४० + ४६ =) १९६ घन राजू प्रमाण है ॥१६-२०॥


सौधर्मयुगले रज्जवः सार्धैकोनविंशतिः।
द्वितीयेयुगले सार्धसप्तत्रिंशच्च रज्जवः ॥२१॥

ब्रह्मादिद्वययुग्मे च त्रयस्त्रिंशच्च रज्जवः।
शुक्रादियुगले सन्ति सार्धद्विसप्तरज्जवः ॥२२॥

शतारयुगलेसार्धद्वादशप्रमरज्जवः ।
आनतप्राणते सार्धदशरज्जव एव हि ॥२३॥

आरणाच्युतभूक्षेत्रे सार्धष्ट रज्जवो मताः।
ग्रैवेयकादिलोकान्ते ह्येकादशैव रज्जवः ॥२४॥

इति त्रिविधलोकस्य घनाकारेण पिण्डिताः।
रज्जवः स्युस्त्रिचत्वारिंशदग्रत्रिशतप्रमाः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 21 से 25): सौधर्म युगल का घनफल १९ १/२ घन राजू प्रमाण है। दूसरे युगल का ३७ १/२ घन राजू, ब्रह्मादि दो युगलों का घनफल ३३-३३ घन राजू, शुक्र-महाशुक्र युगल का १४ १/२ घन राजू, शतार युगल का १२ १/२ घन राजू, आनत-प्राणत स्वर्ग का १० १/२ राजू, आरण-अच्युत युगल का ८ १/२ घन राजू तथा ग्रैवेयकों से लेकर लोक के अन्त पर्यन्त का घनफल ११ घन राजू प्रमाण है। इस प्रकार ऊर्ध्वलोक का सर्व घनफल (१९ १/२ + ३७ १/२ + ३३ + १४ १/२ +१२ १/२ +१० १/२ +८ १/२ +११=) १४७ घन राजू प्रमाण है और तीनों लोकों का एकत्र घनफल (१९६+१४७)= ३४३ घन राजू प्रमाण है ॥२१-२५॥


अथ मानं प्रवक्ष्यामि नानाभेदं जिनागमात्।
व्यासोत्सेधादिसंख्यार्थं त्रिधालोकस्य सर्वतः ॥२६॥

मानं लौकिकलोकोत्तर भेदाभ्यां मतं द्विधा।
लोकशास्त्रानुसारेण लौकिकं विविधं भवेत् ॥२७॥

एको दश शतं तस्मात्सहस्रमयुतं ततः।
लक्षं तथा प्रयुक्तं च कोटिर्दशगुणाः क्रमात् ॥२८॥

इत्यङ्के वर्धते युक्त्योत्तरोत्तरादिसंख्यया।
तथा प्रस्थतुलादीनि मानानि विविधानि च ॥२९॥

कीर्तितानि बुधैर्लोके व्यवहारप्रसिद्धये।
अन्यलोकोत्तरं मानं चतुर्भेदमिति ब्रुवे ॥३०॥

आदिमं द्रव्यमानं च द्वितीयं क्षेत्रमानकम्।
तृतीयं कालमानं स्याच्चतुर्थं भावमानकम् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 26 से 31): अब मैं जिनागम से तीन प्रकार के लोक का व्यास, उत्सेध एवं आयाम आदि की संख्या का निरूपण करने के हेतु नाना प्रकार के मान को कहूँगा। लौकिक और लोकोत्तर के भेद से मान दो प्रकार का है। लोकशास्त्र के अनुसार (लोक व्यवहार में) लौकिक मान अनेक प्रकार का होता है। यह लौकिक मान क्रम से एक, दस, सौ, हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, करोड़ और दस करोड़ आदि अंकों के भेद से उत्तरोत्तर संख्या रूप से वृद्धिंगत होता जाता है तथा लोकव्यवहार की सिद्धि के लिए विद्वानों द्वारा प्रस्थ एवं तुला आदि नाना प्रकार के मान कहे गये हैं एवं अन्य अर्थात् लोकोत्तर मान चार प्रकार का कहा गया है। चार प्रकार के लोकोत्तर मानों में प्रथम द्रव्यमान, द्वितीय क्षेत्रमान, तृतीय कालमान और चतुर्थ भावमान है ॥२६-३१॥


संख्योपमादि भेदाभ्यां द्रव्यमानं द्विधास्मृतम्।
संख्यामानं त्रिधाख्यातं उपमामानमष्टधा ॥३२॥

तत्संख्यातमसंख्यातमन्तं च भवेत् त्रिधा।
जघन्यमध्यमोत्कृष्टभेदैः संख्यातं त्रिधा ॥३३॥

परीतासंख्यनामाद्यं युक्तासंख्यं द्वितीयकम्।
असंख्यासंख्यकं चेत्यसंख्यातं त्रिविधं मतम् ॥३४॥

जघन्यमध्यमोत्कृष्टप्रकारैस्तत्पृथग्विधम् ।
प्रत्येकं त्रिविधं स्यादसंख्यातं नवधेत्यपि ॥३५॥

परीतानन्तनामाथ युक्तानन्ताह्वयं ततः।
अनन्तानन्तसंज्ञं चेत्यनन्तं त्रिविधं भवेत् ॥३६॥

प्रत्येकं त्रिविधं तच्च जघन्यं मध्यमाभिधम्।
उत्कृष्टमित्यनंतस्य स्युर्भेदा नवपिण्डताः ॥३७॥

एते पिण्डीकृता सर्वे भेदाः स्युरेकविंशतिः।
संख्यासंख्यात्मकानन्तानां नामभिः पृथग्विधः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 32 से 38): संख्या और उपमा के भेद से द्रव्यमान दो प्रकार का कहा गया है। इसमें संख्या मान तीन प्रकार का और उपमा मान अष्ट प्रकार का है। संख्यात, असंख्यात और अनन्त के भेद से संख्या मान तीन प्रकार का है तथा संख्यात भी जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से तीन प्रकार का है। परीतासंख्यात, युक्तासंख्यात और असंख्यातासंख्यात के भेद से असंख्यात तीन प्रकार का है। इनमें जघन्य परीतासंख्यात, मध्यम परीतासंख्यात, उत्कृष्ट परीतासंख्यात, जघन्य युक्तासंख्यात, मध्यम युक्तासंख्यात, उत्कृष्ट युक्तासंख्यात, जघन्य असंख्यातासंख्यात, मध्यम असंख्यातासंख्यात और उत्कृष्ट असंख्यातासंख्यात के भेद से असंख्यात नौ प्रकार का है। परीतानन्त, युक्तानन्त और अनन्तानन्त के भेद से अनन्त तीन प्रकार का है तथा इन तीनों के भी भिन्न-भिन्न जघन्य मध्यम और उत्कृष्ट के भेद से तीन-तीन प्रकार होते हैं, इन सबको मिला देने से अनन्तानन्त के भी नौ भेद होते हैं। संख्यात, असंख्यात और अनन्त इन तीनों के पृथक्-पृथक् सर्व भेदों को जोड़ देने से संख्या प्रमाण के सर्व भेद (३+९+९) = २१ होते हैं ॥३२-३८॥


पल्योऽथ सागरः सूच्यङ्गुलं च प्रतराङ्गुलम्।
घनाङ्गुलं जगच्छ्रेणीर्लोकप्रतर एव हि ॥३९॥

लोकोऽमी चोपमामानभेदा अष्टौ मताः श्रुते।
अमीषां विस्तराख्यानं सुखबोधाय कथ्यते ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 39 से 40): पल्य, सागर, सूच्यंगुल, प्रतरांगुल, घनांगुल, जगच्छ्रेणी, जगतप्रतर और लोक उपमा मान के ये आठ भेद आगम में कहे गये हैं। सुखपूर्वक बोध प्राप्त करने के लिए अब इन आठों का विस्तार से वर्णन करते हैं ॥३९-४०॥


सर्वत्र योजनव्यासो योजनैकावगाहकः।
समवृत्तो महान् कूपः खन्यते पल्य सिद्धये ॥४१॥

सप्ताहोरात्रजातानां मेषबालकजन्मिनाम्।
रोमखण्डैरखण्डैस्तं पूरयेत्सूक्ष्मखण्डितैः ॥४२॥

एकैकं रोमखण्डं तद्वर्षाणां च शते शते।
गते सति ततः कूपान्निःसार्यते विचक्षणैः ॥४३॥

यदा स जायते रिक्तः कालेन महता तदा।
तत्कालस्य प्रमाणं यत्स पल्यो व्यावहारिकः ॥४४॥

चतुरेकात्रिचत्वारः पञ्चद्विषट्त्रिशून्यकाः।
त्रिशून्याष्टद्विशून्यं त्र्येकसप्तसप्त सप्तकाः ॥४५॥

चतुर्नवाङ्कपञ्चैक द्वयाङ्कैक नवद्वयाः।
सप्तविंशतिरेतेऽङ्काः शून्यान्यष्टादशास्फुटम् ॥४६॥

अमीभिः पञ्चचत्वारिंशदङ्कैः श्रीजिनाधिपैः।
तद् व्यवहारपल्यस्य रोमाणां गणनोदिता ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 41 से 47): पल्य की सिद्धि के लिए एक योजन (चार प्रमाण कोस) चौड़ा और एक योजन गहरा एक गोल गड्ढा खोदना चाहिए तथा उसे (उत्तम भोगभूमि में) सात दिन रात के भेड़-बच्चों के रोमों को ग्रहण कर जिसका दूसरा खण्ड न हो सके ऐसे अखण्ड और सूक्ष्म रोम खण्डों के द्वारा उस गड्ढे को भरे तथा प्रत्येक सौ वर्ष व्यतीत होने पर एक-एक रोम खण्ड निकाले इस प्रकार सौ-सौ वर्ष में एक-एक रोम निकालते हुए जितने काल में वह गड्ढा खाली हो जाये उतने काल (के समयों की संख्या) को विद्वानों ने व्यवहार पल्य कहा है। ४१३४५२६३०३०८२०३१७७७४९५१२११९२०००००००००००००००००० इस प्रकार २७ अंकों को १८ शून्यों से युक्त करने पर ४५ अंक प्रमाण व्यवहार पल्य के रोमों की संख्या श्री जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कही गई है अर्थात् प्रत्येक सौ वर्ष बाद एक-एक रोम के निकाले जाने पर जितने काल में समस्त रोम समाप्त हों, उतने काल के समय ही व्यवहार पल्य के समयों की संख्या है ॥४१-४७॥


असंख्यकोटिवर्षाणां समयैर्गुणिताश्च ते।
रोमांशावर्धिताः सर्वे भवन्ति संख्यवर्ज्जिताः ॥४८॥

वर्षैकैकशतेनैव रोमराशेः पृथक् क्रमात्।
एकैकं ह्रियते रोमं तदन्तं यावदञ्जसा ॥४९॥

एवं कृते भवेद्यावत्कालः केवलिगोचरः।
तावत्कालप्रमाणं यदुद्धारपल्य एव सः ॥५०॥

गतासूद्धारपल्यानां द्विपञ्चकोटिकोटिषु।
द्वीपाब्धिसंख्य हेतुश्च जायेतोद्धारसागरः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 48 से 51): व्यवहार पल्य के वे रोमांश असंख्यात कोटि वर्षों के समयों द्वारा गुणित होकर वृद्धि को प्राप्त हुए असंख्यात हो जाते हैं अर्थात् उन रोमांशों को असंख्यात कोटि वर्षों के समयों से गुणा करने पर जो प्रमाण प्राप्त होता है, वह असंख्यात होता है। उस असंख्यात रोमों की राशि में से क्रम से प्रत्येक सौ वर्ष बाद एक-एक रोम निकालने पर जितना काल होता है, केवली गोचर उतना ही काल उद्धार पल्य के काल का प्रमाण है। इसी प्रकार के २५ कोड़ाकोड़ी उद्धार पल्यों अर्थात् २ १/२ उद्धार सागरों के जितने समय हैं, उतनी ही द्वीप समुद्रों की संख्या है। द्वीप समुद्रों की संख्या बतलाने के लिए उद्धार पल्य का कथन किया गया है ॥४८-५१॥


उद्धार पल्यएवासौ शताब्दसमयैः पुनः।
गुणितो जायते विद्धिराधारपल्य उत्तमः ॥५२॥

दशस्वाधारपल्यानां गतासु कोटिकोटिषु।
जायते सकलोत्कृष्ट आधारसागरोपमः ॥५३॥

कालायुः कर्मणां यत्र वर्ण्यन्ते स्थितयो बुधैः।
तत्रैतौ पल्यवार्धीस्त आधाराधारनामकौ ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 52 से 54): एक उद्धार पल्य के सम्पूर्ण रोमों को १०० (असंख्यात) वर्षों के समयों से गुणित करने पर जो संख्या प्राप्त हो वही संख्या विद्वज्जनों ने उत्कृष्ट आधार (अद्धा) पल्य की कही है। १० कोड़ाकोड़ी आधार पल्यों का एक उत्कृष्ट आधार (अद्धा) सागर होता है। विद्वानों के द्वारा उत्सर्पिणी आदि कालों का प्रमाण, आयु एवं कर्मों की स्थिति का प्रमाण इन्हीं आधार पल्य तथा आधार सागर से किया गया है ॥५२-५४॥


आधारपल्योपममर्धार्धेन तावत्प्रकर्तव्यं यावद् रोमैकं तिष्ठेत्। तत्र यावन्त्यर्धच्छेदनानि आधार-
पल्योपमस्य तावन्मात्राधारपल्यानि परस्परगुणितानि यत्प्रमाणं भवति तावन्मात्रा आकाशप्रदेशाः
ऊर्ध्वमावल्या-कारेण रचिताः, तेषां नभःप्रदेशानां यत्प्रमाणं तत्सूच्यङ्गुलं स्यात्। तत्सूच्यङ्गुलमपरेण
सूच्यङ्गुलेन गुणितं प्रतराङ्गुलं भवति। प्रतराङ्गुलं अपरेण सूच्यङ्गुलेन गुणितं घनाङ्गुलं कथ्यते।
पञ्चविंशतिकोटीकोटीनामुद्धार पल्यानां यावन्ति रूपाणि लक्ष्योजनार्धच्छेदनानि च रूपाधिकानि।
एकैकं द्विगुणीकृतानि अन्योन्याभ्यस्तानि यत्प्रमाणं सा रज्जुः। सप्तभिर्गुणिता रज्जू जगच्छ्रेणिरुच्यते।
जगच्छ्रेणिरपरया जगच्छ्रेण्या गुणिता लोकप्रतरं स्यात्। लोकप्रतरं जगच्छ्रेण्या गुणितं लोकः कथ्यते।

अर्थ: आधार पल्योपम के इस रीति से अर्ध-अर्ध भाग करना चाहिए कि अन्त में मात्र एक रोम रहे। यहाँ आधार पल्य के जितने अर्धच्छेद प्राप्त हों उतनी संख्या बार आधार पल्यों का परस्पर में गुणा करने से जो लब्ध आये, उतनी संख्या प्रमाण आकाश प्रदेशों की ऊर्ध्व पंक्ति के आकार रचना करना चाहिए। उन आकाश प्रदेशों की जितनी संख्या है, वही सूच्यंगुल का प्रमाण है। इस सूच्यंगुल को अन्य सूच्यंगुल से गुणित करने पर प्रतरांगुल होता है और प्रतरांगुल सूच्यंगुल से गुणित करने पर घनांगुल की प्राप्ति होती है।
२५ कोड़ाकोड़ी उद्धार पल्य के जितने समय हैं, उनमें एक लाख योजन के अर्धच्छेदों को जोड़कर अन्य एक-अंक और मिला देने से जो प्रमाण आये उतनी बार दो-दो रखकर उन दो-दो को परस्पर में गुणित करने पर जो राशि उत्पन्न होती है, वही राजू का प्रमाण है।


स प्रदेशोऽप्यभेद्यस्तु मूर्त्तोनेन्द्रियगोचरः।
स्पर्शादिगुणसंयुक्तः पुद्गलाणुरिहोच्यते ॥५५॥

उत्संज्ञासंज्ञकस्कन्धोऽनन्तानन्ताणुभिर्भवेत् ।
संज्ञासंज्ञात्मकस्कन्धोऽष्टभिस्तैः कीर्तितो जिनैः ॥५६॥

स्कन्धैस्तैरष्टभिः प्रोक्तो व्यवहाराणुरागमे।
अष्टभिर्व्यवहाराणुभिस्त्रसरेणुरुच्यते ॥५७॥

रथरेणुरिहाख्यातोऽप्यष्टभिस्त्रसरेणुभिः ।
रथरेण्वष्टभिः प्रोक्तो बालैकः आर्यदेहिनाम् ॥५८॥

उत्कृष्टभोगभूजातानां तैरष्टशिरोरुहैः।
केशैको मध्यमाभोगभूमिभवार्यजन्मिनाम् ॥५९॥

एतैर्बालाष्टभिः ख्यातो वालैकः पिण्डितैर्बुधैः।
जघन्यभोगभूभागोत्पन्नार्याणां शिरोरुहै ॥६०॥

तैरष्टभिश्च बालैकः कर्मभूमिजदेहिनाम्।
कर्मभूमिन्नृबालाष्टकैलिक्षैका निगद्यते ॥६१॥

लिक्षाष्टभिस्तुर्यूकैका यूकोष्टभिर्यवो मतः।
यवोदराष्टकः प्रोक्तं पर्वमानं गणाधिपैः ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 55 से 62): जो पुद्गल द्रव्य एक प्रदेशी हो, मूर्तिक हो, इन्द्रियों से अग्राह्य हो तथा स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण से युक्त हो उसे पुद्गल अणु कहते हैं। ऐसे अनन्तानन्त पुद्गल परमाणुओं से एक उत्संज्ञासंज्ञक स्कन्ध उत्पन्न होता है। जिनेन्द्र भगवान् ने आठ उत्संज्ञासंज्ञकों का एक संज्ञासंज्ञात्मक स्कन्ध कहा है। आगम में आठ संज्ञासंज्ञात्मक स्कन्ध का एक व्यवहाराणु (त्रुटिरेणु) और आठ त्रुटिरेणुओं का एक त्रसरेणु कहा गया है। आठ त्रसरेणुओं का एक रथरेणु और आठ रथरेणुओं का उत्तम भोगभूमिज मनुष्यों का एक बाल होता है। उत्कृष्ट भोगभूमिज मनुष्यों के आठ बालों का मध्यम भोगभूमिज मनुष्यों का एक बाल होता है। मध्यम भोगभूमिज आठ बालों का जघन्य भोगभूमिज मनुष्यों का एक बाल होता है। जघन्य भोगभूमिज आठ बालों का कर्मभूमिज मनुष्यों का एक बाल होता है, कर्मभूमिज मनुष्यों के आठ बालों की एक लिक्षा होती है। आठ लिक्षाओं की एक जूँ, आठ जूँ का एक यव और आठ यवों का एक अंगुल होता है, ऐसा गणधरादि देवों द्वारा कहा गया है ॥५५-६२॥


उत्सेधाङ्गुलमेवाद्यं प्रमाणाङ्गुलसंज्ञकम्।
आत्माङ्गुलमिति प्रोक्तमङ्गुलं त्रिविधं जिनैः ॥६३॥

प्रागुक्तमादिमं पञ्चशताभ्यस्तं मनीषिभिः।
उत्सेधाङ्गुलमेवैतत्प्रमाणाङ्गुलमुच्यते ॥६४॥

उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योः षट्कालोत्पन्नजन्मिनाम्।
वृद्धिह्रासशरीराणां बहुधात्माङ्गुलं भवेत् ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 63 से 65): आठ जौ (यव) से जो अंगुल उत्पन्न होता है उसको श्री जिनेन्द्रदेव ने उत्सेधांगुल, प्रमाणांगुल और आत्मांगुल के भेद से तीन प्रकार कहे हैं। ऊपर जो ८ जौ का एक अंगुल कहा गया है, वही उत्सेधांगुल या व्यवहारांगुल कहलाता है। उस उत्सेधांगुल में ५०० का गुणा करने से प्रमाणांगुल होता है, ऐसा विद्वानों ने कहा है। उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी सम्बन्धी छह कालों में ह्रस्व, दीर्घ अवगाहना को धारण कर जन्म लेने वाले मनुष्यों के अंगुल को आत्माङ्गुल कहते हैं ॥६३-६५॥


चतुर्गतिसमुद्भूतप्राणिनां वपुषां बुधैः।
उत्सेधाद्या निरूप्यन्ते उत्सेधाङ्गुलमानकैः ॥६६॥

द्वीपाब्धिक्षेत्रदेशानां नदीद्रहादिभूभृताम्।
अकृत्रिमजिनागारादीनां व्यासोदयादयः ॥६७॥

प्रमाणाङ्गुलमानैश्च कीर्तिताः श्रीगणाग्रगैः।
ध्वजच्छत्ररथावासघटशय्यासनादिषु ॥६८॥

प्रमाणं देहिनां ख्यातमात्माङ्गुलैरनेककैः।
चतुर्विंशाङ्गुलैरेको हस्तो जायेत जन्मिनाम् ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 66 से 69): चारों गतियों में उत्पन्न होने वाले जीवों के शरीर का उत्सेध उत्सेधांगुल के द्वारा किया जाता है, ऐसा विद्वानों ने कहा है। द्वीप, समुद्र, क्षेत्र, देश, नदी, द्रह आदि, कुलाचल और अकृत्रिम जिन चैत्यालयों आदि का उत्सेध, आयाम एवं व्यास आदि प्रमाणांगुल से किया जाता है, ऐसा गणधर देवों के द्वारा कहा गया है। ध्वज, छत्र, रथ, प्राणियों के आवास, घट और शय्या आदि का प्रमाण आत्मांगुल से किया जाता है। मनुष्यों के २४ अंगुलों का एक हाथ होता है ॥६६-६९॥


चतुःकरैर्धनुः प्रोक्तं धनुषां द्विसहस्रकैः।
क्रोश एक इहाम्नातश्चतुःक्रोशैश्र्च योजनम् ॥७०॥

तस्मात्साध्यं च पल्याद्यमुपमामानमञ्जसा।
क्षेत्रमानमिति प्रोक्तं पूर्वशास्त्रानुसारतः ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 70 से 71): २४ अंगुलों का एक हाथ और चार हाथ का एक धनुष होता है। दो हजार धनुष का एक कोश और चार कोश का एक योजन होता है। इन पल्य, सागर, सूच्यंगुल, प्रतरांगुल, घनांगुल, जगच्छ्रेणी, जगत्प्रतर और लोक का साधन इन्हीं योजन आदि से होता है। इस प्रकार परम्परागत शास्त्रानुसार क्षेत्रमान का प्रमाण कहा गया है ॥७०-७१॥


कालमानमतो वक्ष्ये यथाम्नातं जिनाधिपैः।
लोकाकाशप्रदेशेषु कालाणवः पृथक्-पृथक् ॥७२॥

तिष्ठन्त्येकैक रूपेणा संख्याता रत्नराशिवत्।
वर्तनालक्षणं येषां जीवपुद्गलयोर्द्वयोः ॥७३॥

तं कालाणुं लघूल्लंघ्य पुद्गलाणुं प्रयात्यपि।
यावत् कालप्रमाणेण स कालः समयाह्वयः ॥७४॥

असंख्यसमयैरेकावलिः प्रोक्ता जिनागमे।
संख्यावलिभिरुच्छ्वासः स्तोक उच्छ्वास सप्तभिः ॥७५॥

सप्तस्तोकैर्लवैका सार्धाष्टत्रिंशत्प्रमाणकैः।
लवानां घटिकैका च मुहूर्तो द्विघटीभवः ॥७६॥

क्षणैकोनो मुहूर्तः स्याद् भिन्नमुहूर्तनामकः।
तस्मादावल्यसंख्येयभागो यावच्च हानितः ॥७७॥

तावदन्तर्मुहूर्तोऽत्र नानाभेदो निगद्यते।
त्रिंशन्मुहूर्तकैः सद्भिर्ाहोरात्रं मतं श्रुते ॥७८॥

त्रिंशद्दिनैर्भवेन्मासः षण्मासैरयनं स्मृतम्।
द्व्ययनाभ्यां भवेद् वर्षं पञ्चवर्षैर्युगं मतम् ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 72 से 79): जिनेन्द्रों के द्वारा जैसा कहा गया है, काल मान का वैसा ही वर्णन मैं करता हूँ। लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर रत्नों की राशि के सदृश एक-एक काल द्रव्य के अणु पृथक्-पृथक् स्थित हैं और वे असंख्यात हैं। उन कालाणुओं अर्थात् काल द्रव्य का वर्तना लक्षण है, इसी के निमित्त से जीव और पुद्गल में परिणमन अर्थात् नई पुरानी आदि अवस्थाएँ होती हैं। पुद्गल का सबसे छोटा अणु उस कालाणु को जितने काल में उल्लंघन करता है, उतने काल प्रमाण को समय कहते हैं। जिनागम में ऐसे ही असंख्यात (जघन्य युक्तासंख्यात) समयों की एक आवली कही गई है। संख्यात आवलियों का एक उच्छ्वास और सात उच्छ्वासों का एक स्तोक होता है। सप्त स्तोकों का एक लव, ३८ १/२ लवों की एक घड़ी और दो घड़ी का एक मुहूर्त होता है। एक क्षण (१८ निमेषों की एक काष्टा, ३० काष्टा की एक कला और ३० कला का एक क्षण होता है) कम मुहूर्त (१२ क्षणों का एक मुहूर्त) को भिन्न मुहूर्त कहते हैं। इससे कम अर्थात् आवली के असंख्यातवें भाग पर्यन्त अन्तर्मुहूर्त कहलाता है। यह अन्तर्मुहूर्त अनेक भेदों वाला कहा गया है। आगम में ३० मुहूर्त का एक दिन कहा गया है। ३० दिनों का एक मास, ६ मासों का एक अयन, दो अयनों का एक वर्ष और ५ वर्षों का एक युग होता है ॥७२-७९॥


अथ पूर्वाङ्गपूर्वादीनां प्रमाणं निरूप्यते।
स्यात् पूर्वाङ्गैकमब्दानां लक्षैश्चतुरशीतिकैः ॥८०॥

पूर्वाङ्गं गुणितं पूर्वं लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
पूर्वं चतुरशीतिघ्नं पर्वाङ्गमुच्यते बुधैः ॥८१॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद् वर्गितं पर्वमिष्यते।
पर्व चतुरशीत्या नयुताङ्गं गुणितं भवेत् ॥८२॥

नयुतं ताडितं तत् स्याल्लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
हतं चतुरशीत्या तत् कुमुदाङ्गं निरूपितम् ॥८३॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद् गुणितं कुमुदं भवेत्।
मतं चतुरशीत्या हि पद्माङ्गं तच्च ताडितम् ॥८४॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद्धतं पद्मं जिनागमे।
तद्धतं नलिनाङ्गं स्यात्संख्यैश्चतुरशीतिकैः ॥८५॥

गुणितं नलिनं तत्स्याल्लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
हतं चतुरशीत्या तत्कमलाङ्गं स्मृतं बुधैः ॥८६॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद् वर्गितं कमलं भवेत्।
हतं चतुरशीत्या तत् त्रुटिताङ्गं निगद्यते ॥८७॥

लक्षैश्चतुरशीत्यैतद् गुणितं त्रुटितं मतम्।
हतं चतुरशीत्या तदटटाङ्गाभिधं भवेत् ॥८८॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद् गुणितं वाटटाख्यकम्।
हतं चतुरशीत्यैत दममाङ्गाभिधं स्मृतम् ॥८९॥

अममं गुणितं तत् स्याल्लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
तस्याच्चतुरशीत्या गुणितं हाहाङ्गसंज्ञकम् ॥९०॥

लक्षैश्चतुरशीत्यां तद् हतं हाहाख्यमुच्यते।
भवेच्चतुरशीत्यां तद् हूह्वांगं गुणितं बुधैः ॥९१॥

लक्षैश्चतुरशीत्यां तद्धतं हूहू समाह्वयम्।
भवेच्चतुरशीत्या वर्गितं विन्दुलताङ्गकम् ॥९२॥

हतं विन्दुलताख्यं तल्लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
हतं चतुरशीत्या तन्महालताङ्गमुच्यते ॥९३॥

लक्षैश्चतुरशीत्या तद्धतं महालताह्वयम्।
लक्षैश्चतुरशीत्या तद्धतं शिरः प्रकम्पितम् ॥९४॥

शिरः प्रकम्पितं नूनं लक्षैश्चतुरशीतिकैः।
वर्गितं जायते चैव हस्तप्रहेलिकाभिधम् ॥९५॥

लक्षैश्चतुरशीत्या च हस्तप्रहेलिकाभिधम्।
गुणितं श्रीजिनैः प्रोक्तमचलात्मकसंज्ञकम् ॥९६॥

पिण्डीकृता इमे सर्वेऽङ्का एकत्रिशदञ्जसा।
पदानां संख्यया प्रोक्ता अन्योन्यगुणनोद्भवा ॥९७॥

षष्ट्यङ्का निखिलाः सन्ति शून्यानि नवतिः स्फुटम्।
सर्वेकत्रीकृताः अङ्काः सार्धशतं च संख्यया ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 80 से 98): अब पूर्वांग एवं पूर्व आदि का प्रमाण कहते हैं। चौरासी लाख वर्षों का एक पूर्वांग होता है। पूर्वांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक पूर्व (७०५६०००००००००० वर्ष) होता है। पूर्व में ८४ का गुणा करने से एक पर्वांग होता है ऐसा विद्वानों ने कहा है। पर्वांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक पर्व और पर्व को ८४ से गुणित करने पर एक नयुतांग होता है। नयुतांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक नयुत और नयुत को ८४ से गुणित करने पर एक कुमुदांग कहा गया है। कुमुदांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक कुमुद और कुमुद को ८४ से गुणित करने पर एक पद्मांग होता है। पद्मांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक पद्म और पद्म को ८४ से गुणित करने पर एक नलिनांग होता है, ऐसा जिनागम में कहा है। नलिनांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक नलिन और नलिन को ८४ से गुणित करने पर एक कमलांग होता है, ऐसा विद्वानों के द्वारा कहा गया है। कमलांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक कमल और कमल को ८४ से गुणित करने पर एक त्रुटितांग होता है। त्रुटितांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक त्रुटित और त्रुटित को ८४ से गुणित करने पर अटटांग होता है। अटटांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक अटट और अटट को ८४ से गुणित करने पर एक अममांग होता है। अममांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक अमम और अमम को ८४ से गुणित करने पर एक हाहांग होता है। विद्वानों ने कहा है कि हाहांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक हाहा और हाहा को ८४ से गुणित करने पर एक हूहंग होता है। हूहंग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक हूहू और हूहू को ८४ से गुणित करने पर एक विन्दुलतांग होता है। विन्दुलतांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक विन्दुलता और विन्दुलता को ८४ से गुणित करने पर एक महालतांग होता है। महालतांग को ८४ लाख से गुणित करने पर एक महालता और महालता को ८४ लाख से गुणित करने पर एक शिरः प्रकम्पित होता है। शिरः प्रकम्पित को ८४ लाख से गुणित करने पर हस्तप्रहेलिका और हस्तप्रहेलिक को ८४ लाख से गुणित करने पर एक अचलात्म होता है, ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है।
इन सब अंकों को एकत्रित करने पर ३१ पद होते हैं, पदों की उक्त संख्या को परस्पर गुणित करने पर कुल साठ अंक और ९० शून्य होते हैं तथा इन सर्व अंकों और शून्यों को एकत्रित करने पर एक सौ पचास (१५०) अंकों की संख्या होती है ॥८०-९८॥


अपर्याप्तनिकोतानां ज्ञानमात्रं यदस्ति तत्।
जघन्यं सर्वथोत्कृष्टं ज्ञानं केवलिनां परम् ॥९९॥

मध्यमं बहुधा ज्ञानं स्याच्चतुर्गति जन्मिनाम्।
भावमानमिति ज्ञेयं ज्ञानादिगुणसम्भवम् ॥१००॥

एते लोकोत्तरस्यैव भेदाश्चत्वार ईरिताः।
सिद्धान्तार्थं परिज्ञाय श्रीतीर्थेशमुखोद्भवाः ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 99 से 101): सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव को जो ज्ञान है वह सर्व जघन्य भाव मान है तथा केवली भगवान का केवलज्ञान सर्वोत्कृष्ट भाव मान है। चारों गतियों में स्थित जीवों का ज्ञान मध्यम भाव मान है, जो अनेक प्रकार का है। इस प्रकार ज्ञानादि गुणों से सम्भावित भाव मान जानना चाहिए। श्री तीर्थंकर देव के मुख से उत्पन्न सिद्धान्त के अर्थ को जानने के लिए ये लोकोत्तर चार मान कहे गये हैं ॥९९-१०१॥


एष ग्रन्थवरो जिनेन्द्रमुखजः सिद्धान्तसारादिक-
दीपोऽनेकविधस्त्रिलोकसकल प्रद्योतने दीपकः।
नानाशास्त्रपरान् विलोक्य रचितस्त्रैलोक्यसारादिकान्
भक्त्या श्रीसकलादि कीर्तिगणिना सङ्घैर्गुणैर्नन्दतु ॥१०२॥

अर्थ: यह सिद्धान्तसार दीपक नाम का उत्कृष्ट ग्रन्थ जिनेन्द्र के मुख से उद्भूत है, स्वर्ग, नरक आदि के भेद से अनेक प्रकार के समस्त त्रैलोक्य को उद्योत करने में दीपक के समान है। त्रैलोक्य सार आदि अनेक उत्कृष्ट ग्रन्थों का आलोडन कर भक्ति से मुझ सकलकीर्ति मुनि द्वारा रचा गया है। अनेक गुण समूहों से यह ग्रन्थ सदा समृद्धिवान् हो ॥१०२॥


न कीर्तिपूजाप्रवरेच्छयायं न वा कवित्वाद्यभिमानयोगात्।
किन्त्वात्मशुद्ध्यै परमार्थबुद्ध्या ग्रन्थः कृतः स्वान्यहिताय मुक्त्यै ॥१०३॥

अर्थ: मैंने यह ग्रन्थ ख्याति-पूजा-लाभ की इच्छा से अथवा कवित्व आदि के अभिमान से नहीं लिखा किन्तु यह ग्रन्थ आत्म विशुद्धि के लिए, स्व-पर हित के लिए एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए परमार्थ बुद्धि से लिखा है ॥१०३॥


अस्मिन् सिद्धान्तसारे त्रिभुवनकथके ज्ञानगूढार्थ पूर्णे,
यत् किञ्चित् सन्धिमात्राक्षरपदरहितं प्रोदितं स्वल्पबुद्ध्या।
अज्ञानाच्च प्रमादादशुभविवशदागमे वा विरुद्धम्,
तत् सर्वं शारदेऽमा विशदमुनिगणैः प्रार्थिता मे क्षमस्व ॥१०४॥

श्रुतसकलसुवेत्तारो हिता भव्य पुंसाम्
निहितनिखिलदोषालोभगर्वादि दूराः।
विशदनिपुणबुद्ध्या सूरयः शोधयन्तु
श्रुतमिदमिहचाल्पज्ञानिना सूरिणोक्तम् ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 104 से 105): तीन लोक के कथन में और ज्ञान के गूढ़ अर्थों से परिपूर्ण इस सिद्धान्तसार दीपक महाग्रन्थ में बुद्धि की स्वल्पता से, अज्ञान से, प्रमाद से अथवा अशुभ कर्म के उदय से यदि किंचित् भी अक्षर, मात्रा, सन्धि एवं पद आदि की हीनता हो अथवा आगम के विरुद्ध कुछ लिखा गया हो तो मैं प्रार्थना करता हूँ कि जिनवाणी माता और विशिष्ट ज्ञानी मुनिजन मुझे क्षमा प्रदान करें। मुझ अल्पबुद्धि के द्वारा लिखे गये इस शास्त्र का सम्पूर्ण श्रुत के ज्ञाता, भव्य जीवों के हितकारी, समस्त दोषों से रहित लोभ एवं गर्व आदि से दूर रहने वाले तथा निर्मल (समीचीन) एवं निपुण बुद्धि से युक्त आचार्य शोधन करें ॥१०४-१०५॥


सिद्धान्तसारार्थनिरूपणाछ्री सिद्धान्तसारार्थ भृतो हि सार्थः।
सिद्धान्तसारादिकदीपकोऽयं ग्रन्थो धरित्र्यां जयतात् स्वसंघैः ॥१०६॥

अर्थ: जिनागम के सिद्धान्त के सारभूत अर्थ का निरूपण करने वाला, सिद्धान्त के सारभूत अर्थ से भरा हुआ एवं सार्थक नाम को धारण करने वाला यह सिद्धान्तसार दीपक नाम का ग्रन्थ अपने संघों द्वारा पृथ्वी पर जयवन्त हो ॥१०६॥


ये पठन्ति वरशास्त्रमिदं सद्धीधनाः सुमुनयो गुणरागात्।
ज्ञाननेत्रमचिरादिह लब्ध्वा लोकयन्ति जगतां त्रितयं ते ॥१०७॥

तेन हस्ततलसंस्थित रेखावद् विलोक्य नरकादि समस्तम्।
यान्ति भीतिमशुभाच्च चरन्ति सत्तपश्चरणमञ्जसा विदः ॥१०८॥

तेन वृत्तविशदा चरणेन प्राप्य नाकमसमं सुखखानिम्।
राज्यभूतिमनुभोगविरक्त्या सत्तपश्चरणतोऽवपुषः स्युः ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 107 से 109): जो समीचीन बुद्धि के धारक उत्तम मुनिराज गुणानुराग से इस ग्रन्थ को पढ़ते हैं, वे शीघ्र ही ज्ञानरूपी अनुपम नेत्र (केवलज्ञान) को प्राप्त कर तीन लोक स्वरूप समस्त जगत् को देख लेते हैं। वे विद्वान् उस अनुपम ज्ञान से नरकादि समस्त दुःखमय पदार्थों को हस्ततल पर स्थित रेखा के सदृश देखकर समस्त अशुभादि क्रियाओं से भयभीत होते हैं और समीचीन तपश्चरण आदि का आचरण करते हैं तथा उस निर्दोष चारित्र के आचरण से सुख की खानि स्वरूप स्वर्गों के अनुपम सुखों को प्राप्त कर मनुष्य पर्याय में आकर राज्य विभूति का अनुभोग करके वैराग्य को प्राप्त होकर उत्तम तपश्चरण करते हुए सिद्ध पर्याय को प्राप्त करते हैं ॥१०७-१०९॥


शृण्वन्ति ये बुधजनाः परया त्रिशुद्ध्या-
श्चैतच्छ्रुतं त्रिभुवनोरुगृहप्रदीपम्।
ते श्वभ्रदुःखकलनादघभीतचित्ता
धर्मे तपःसुचरणे च परायणाः स्युः ॥११०॥

ते ज्ञानदृग्यमतपश्चरणादिधर्मै-
र्भुक्त्वा सुखं निरुपमं दिवि मर्त्यलोके।
सम्प्राप्य रागविरति भवभोगकाये
सद्धीक्षया सुतपसा च भवन्ति सिद्धाः ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 110 से 111): त्रैलोक्य को प्रकाशित करने के लिए प्रदीप के सदृश इस ग्रन्थ को जो विद्वज्जन मन, वचन और काय की विशुद्धिपूर्वक श्रवण करते हैं, वे नरकों के दुःखों को भलीभाँति जान लेते हैं, इसलिए वे पापों से भयभीत चित्त होते हुए धर्म में, तप में और सम्यक्चारित्र में दत्तचित्त हो जाते हैं तथा वे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, यम, नियम और उत्तम तपश्चरण आदि धर्म के फल स्वरूप स्वर्ग एवं मध्यलोक के अनुपम सुखों को भोगकर संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होते हुए जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर उत्तम तप करके सिद्ध हो जाते हैं ॥११०-१११॥


येऽहो लिखन्ति निपुणा वरशास्त्रमेतत्
तद् वृद्धये च पठनाय तरन्ति तूर्णम्।
ते ज्ञानवारिधिमनन्तगुणैकहेतु
सिद्धान्ततीर्थपरमोद्धरणाप्तधर्मात् ॥११२॥

अर्थ: शास्त्र की वृद्धि के लिए तथा दूसरों को पढ़ने के लिए जो विद्वज्जन इस उत्तम शास्त्र को अपने हाथों से स्वयं लिखते हैं, वे सिद्धान्तरूप उत्कृष्ट तीर्थ के उद्धारस्वरूप पुण्य से अनन्त गुणों के कारणभूत ज्ञानसिन्धु को शीघ्र ही तर जाते हैं। अर्थात् पूर्ण ज्ञानी बन जाते हैं ॥१९२॥


ये लेखयन्ति धनिनो धनतः किलेदम्
सारागमं भुवि सुवर्तन हेतवे ते।
सज्ञानतीर्थविमलोद्धरणात्तपुण्याद्-
त्राप्यमुत्र सकलं श्रुतमाश्रयन्ति ॥११३॥

अर्थ: पृथ्वी पर आगम के सार को प्रकाशित करने के लिए जो श्रीमान् (धनवान) अपने धन से इस शास्त्र को लिखवाते हैं, वे समीचीन और निर्मल ज्ञानरूपी तीर्थ के उद्धार स्वरूप पुण्यफल से इस लोक और परलोक में सकल श्रुतज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, अर्थात् श्रुतकेवली हो जाते हैं ॥१९३॥


ये पाठयन्ति सुविदो वरसंयतादीन्
विश्वार्थदीपकमिमं परमागमं ते।
सज्ज्ञानदानजमहानघपुण्यपाकाज्
ज्ञातश्रुता जगति केवलिनो भवन्ति ॥११४॥

अर्थ: जो विद्वज्जन मुनि, आर्यिका, श्रावक एवं श्राविका जनों को सम्पूर्ण अर्थ के प्रकाशन में दीपक सदृश इस शास्त्र का अध्ययन कराते हैं अर्थात् पढ़ाते हैं, वे उत्तम ज्ञानदान के फल से उत्पन्न अत्यन्त शुभ पुण्योदय से संसार में सर्व श्रुत के ज्ञाता होकर पश्चात् केवली हो जाते हैं ॥१९४॥


एतज्जैनवरागमं सुरचितं लोकत्रयोद्दीपकम्
तद् रागेण मया सुशास्त्ररचना व्याजेनमोक्षाप्तये।
हत्वाज्ञानतमो मदीयमखिलं सद्वर्तमानागमम्
सर्वं मेऽत्र ततोप्यमुत्र विधिना दद्याच्छ्रुतं केवलम् ॥११५॥


अस्मिन् ग्रन्थवरे त्रिकालविषये ये वर्णिताः श्रीजिना
ग्रन्थादौ च नुताः समस्त जिनपाः सिद्धाश्च ये साधवः।
सर्वे ते कृपया ममाशुविमलं सम्पूर्ण रत्नत्रयम्
सर्वान् स्वांश्च गुणान् समाधिमरणं दद्युः स्वशत्रोर्जयम् ॥११६॥

अर्थ: यह त्रैलोक्य दीपक सदृश श्रेष्ठ जिनागम, जनकल्याण के राग से मेरे द्वारा शास्त्र की रचना के बहाने मोक्ष प्राप्ति के लिए रचा गया है, इसलिए विद्यमान यह सर्व समीचीन जिनागम मेरे सम्पूर्ण अज्ञानरूपी अंधकार को नष्टकर विधिपूर्वक इस लोक में श्रुतज्ञान को और परलोक में केवलज्ञान देवें। इस उत्तम ग्रन्थ में जिन जिनेन्द्रों ने तीन लोक का वर्णन किया है तथा ग्रन्थ के प्रारम्भ में जिन अर्हन्तों, सिद्धों एवं साधुओं को नमस्कार किया है, वे सब कृपा करके मुझे शीघ्र ही निर्मल एवं सम्पूर्ण रत्नत्रय, अपने-अपने सर्व गुण समाधिमरण और स्वशत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की शक्ति देवें ॥१९५-१९६॥


तीर्थेशाः सिद्धनाथास्त्रिभुवनमहिताः साधवो विश्ववन्द्याः
सद्धर्मास्तत्प्रणेतार इह सुशरणाविश्वलोकोत्तमाश्च।
दातारो भक्तिमुक्ती दुरितचयहराः सर्व माङ्गल्यदा ये।
ते मे वो वा प्रदद्युर्निजसकलगुणान् मङ्गलं पापहन्तृन् ॥११७॥

अर्थ: स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करने वाले, दुष्कर्मों के समूह को हरण करने वाले तथा सर्व मंगलों को देने वाले, त्रैलोक्य पूज्य एवं विश्व वन्द्य अर्हन्त परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, सर्व साधु परमेष्ठी एवं केवली प्रणीत सद्धर्म ही लोक में उत्तम मंगल हैं, उत्तमोत्तम हैं और परमोत्कृष्ट शरणभूत हैं, अतः ये सभी मुझे, आपको एवं सभी को पाप नाशक अपने-अपने सभी गुण प्रदान करें ॥१९७॥


एतत्सिद्धान्ततीर्थं जिनवरमुखजं धारितं श्रीगणेशै-
र्वन्द्यं मान्यं सदार्च्यं त्रिभुवनपतिभिर्दोषदूरं पवित्रम्।
अज्ञानध्वान्तहन्तृ प्रवरमिह परं धर्ममूलं सुनेत्रम्
विश्वालोके च भव्यैरसमगुणगणैर्यातु वृद्धिं शिवाय ॥११८॥

अर्थ: यह सिद्धान्तरूपी तीर्थ भगवान् जिनेन्द्र के मुख से निर्झरित है, गणधर देवों द्वारा धारण किया गया है, देवेन्द्र, नागेन्द्र, खगेन्द्र और चक्रवर्ती आदि त्रैलोक्य के अधिपतियों द्वारा वन्दनीय, आदरणीय एवं सदा पूज्य है। दोषों से दूर, पवित्र, अज्ञानरूपी अन्धकार के नाश में प्रवीण, धर्म का मूल और उत्तम नेत्र है, अतः मोक्ष प्राप्ति के लिए भव्यों के अनुपम गुण समूहों द्वारा यह सम्पूर्ण लोक में निरन्तर वृद्धिंगत होता रहे ॥१९८॥


ग्रन्थेऽस्मिन् पञ्चचत्वारिंशच्छतश्लोकपिण्डताः।
षोडशाग्रा बुधैर्ज्ञेयाः सिद्धान्तसारशालिनि ॥११९॥

अर्थ: सिद्धान्त के सार से युक्त इस ग्रन्थ में सब मिला कर ४५१६ श्लोक हैं, ऐसा विद्वानों के द्वारा जानने योग्य है। अर्थात् जानना चाहिए ॥११९॥


भग्नपृष्टि कटिग्रीवा वा बद्धमुष्टिरधोमुखम्।
कष्टेन लिखित ग्रन्थं यत्नेन परिपालयेत् ॥१२०॥श्री॥