पञ्चदश अधिकार ऊर्ध्वलोक वर्णन (भाग 1/2)
त्रिसहस्रोनपञ्चाशीति लक्षश्रीजिनालयान् ।
त्रयोविंशतिसंयुक्तान् वन्दे वन्द्यान्नरामरैः ॥१॥
अर्थ: मनुष्यों और देवों के द्वारा वन्दनीक चौरासी लाख सत्तानवे हजार तेईस जिनालयों को मैं (सकलकीर्त्याचार्य) नमस्कार करता हूँ ॥१॥
अथोर्ध्वलोकभागस्थान् स्वर्गग्रैवेयकादिकान्।
इन्द्रादिनाकिनां भूतिस्थितियुक्त्यादिकान् ब्रुवे ॥२॥
अर्थ: अब ऊर्ध्वलोक में स्थित सौधर्मादि स्वर्ग और ग्रैवेयक आदि की स्थिति आदि को तथा इन्द्रादिक देवों की विभूति एवं स्थिति आदि को कहता हूँ ॥२॥
सौधर्मेशानकल्पौ द्वौ दक्षिणोत्तरयोः स्थितौ।
सनत्कुमारमाहेन्द्रौ ब्रह्मब्रह्मोत्तराह्वयौ ॥३॥
स्वर्गौ लान्तवकापिष्टौ दक्षिणोत्तरदिक्श्रितौ।
द्वौ च शुक्रमहाशुक्रौ युग्मरूपव्यवस्थितौ ॥४॥
द्वौ शतारसहस्रारावानतप्राणताभिधौ।
आरणाच्युतनामानौ चैते स्वर्गाश्च षोडश ॥५॥
अर्थ (श्लोक 3 से 5): सौधर्म और ऐशान कल्प, क्रमशः दक्षिण और उत्तर में अवस्थित हैं, सनत्कुमार-माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर तथा लान्तव और कापिष्ट ये स्वर्ग भी दक्षिण-उत्तर दिशाओं के आश्रित अवस्थित हैं। शुक्र और महाशुक्र ये युग्म रूप से अवस्थित हैं। शतार-सहस्रार, आनत-प्राणत तथा आरण और अच्युत ये भी एक के बाद एक युग्म रूप से अवस्थित हैं, इस प्रकार ये सोलह स्वर्ग ऊर्ध्वलोक में अवस्थित हैं ॥३-५॥
चतुर्णामाद्यनाकानां चत्वारो वासवा पृथक्।
चतुः स्वर्मध्ययुग्मानां चत्वारः स्वर्गनायकाः ॥६॥
चतुस्तदग्रनाकानामिन्द्राश्चत्वार ऊर्जिताः।
इतीन्द्रसंख्यया कल्पाः कथ्यन्ते द्वादशागमे ॥७॥
अर्थ (श्लोक 6 से 7): आदि के चार स्वर्गों के पृथक्-पृथक् चार इन्द्र हैं। अर्थात् सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र हैं। मध्य के चार युगलों (आठ स्वर्गों) के चार इन्द्र हैं। अर्थात् ब्रह्म, लान्तव, महाशुक्र और सहस्रार स्वर्गों में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र है। ब्रह्मोत्तर, कापिष्ट, शुक्र और शतार स्वर्गों में इन्द्र नहीं हैं। शेष ऊपर के आनत, प्राणत, आरण और अच्युत में से प्रत्येक में एक-एक इन्द्र है। इस प्रकार आगम में बारह इन्द्र और बारह ही कल्प कहे गये हैं ॥६-७॥
सौधर्मेन्द्र यः शक्रः सनत्कुमारदेवराट्।
ब्रह्मेन्द्रो लान्तवेन्द्रश्चानतेन्द्र आरणाधिपः ॥८॥
षडेते दक्षिणेन्द्राः स्युर्नूनमेकावतारिणः।
पूर्वार्जितमहापुण्यजिनभक्तिभराङ्किताः ॥९॥
ईशानेन्द्रो हि माहेन्द्रः शुक्रेन्द्रः शुक्रनाकभाक्।
शतारेन्द्रस्ततः प्राणतेन्द्रोऽच्युतेन्द्र उत्तमः ॥१०॥
एते षडुत्तरेन्द्राः स्युर्जिनपूजापरायणाः।
सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः सर्वामरनतक्रमाः ॥११॥
अर्थ (श्लोक 8 से 11): सौधर्म, सनत्कुमार, ब्रह्म, लान्तव, आनत और आरण नाम के ये छह इन्द्र दक्षिणेन्द्र हैं। ये छहों एक भवतारी, पूर्वोपार्जित महापुण्य से युक्त और जिनेन्द्र भगवान् की अपूर्व भक्ति के रस से सहित होते हैं। सर्व देवों से नमस्कृत, सम्यग्दर्शन से शुद्ध और जिनेन्द्र की पूजा में तल्लीन रहने वाले ईशान, माहेन्द्र, शुक्र स्वर्ग का शुक्र, शतार, प्राणत और अच्युत नाम के ये छह इन्द्र उत्तरेन्द्र हैं ॥८-११॥
उपर्युपरि सन्त्येते स्वर्गाः षोडशसम्मताः।
दक्षिणोत्तरदिग्भागस्था युग्मरूपिणः शुभाः ॥१२॥
स्वर्गाणामुपरि स्युश्चाद्याधोग्रैवेयकास्त्रयः।
तेषामुपरिसन्त्येव मध्यग्रैवेयकास्त्रयः ॥१३॥
एषामुपरि तिष्ठन्ति चोर्ध्वग्रैवेयकास्त्रयः।
अमीषामुपरि स्याच्च नवानुदिशनामकम् ॥१४॥
तस्य सन्ति चतुर्दिक्षु चत्वारश्च विमानकाः।
विदिक्षु तेऽपितावन्तो मध्ये ह्येकं विमानकम् ॥१५॥
तस्योपरि च पञ्चानुत्तराख्यं पटलं भवेत्।
तच्चतुर्दिक्षु चत्वारि विमानानि भवन्ति वै ॥१६॥
मध्ये सर्वार्थसिद्ध्याख्यं स्याद्विमानं च्युतोपमम्।
ततो मुक्तिशिलादिव्या गत्वा द्वादशयोजनान् ॥१७॥
अर्थ (श्लोक 12 से 17): दक्षिण और उत्तर दिशाओं में षोडश स्वर्ग युग्म रूप से ऊपर-ऊपर अवस्थित हैं, अर्थात् एक युगल के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरा इत्यादि। सोलह स्वर्गों के ऊपर तीन अधो ग्रैवेयकों की (एक के ऊपर एक) अवस्थिति है। इनके ऊपर तीन मध्यम ग्रैवेयक और उनके ऊपर तीन ऊर्ध्व ग्रैवेयक स्थित हैं। इन ग्रैवेयकों के ऊपर चार दिशाओं में चार, चार विदिशाओं में चार और एक मध्य में इस प्रकार नव अनुदिशों की अवस्थिति है। नव अनुदिशों के ऊपर पाँच अनुत्तर विमान हैं, जो चार दिशाओं में चार हैं और मध्य में उपमा रहित सर्वार्थसिद्धि नामक विमान अवस्थित है। सर्वार्थसिद्धि विमान से बारह योजन ऊपर जाकर दिव्य रूप वाली सिद्धशिला अवस्थित है ॥१२-१७॥
मेरोस्तलाच्च सार्धैका रज्जुपर्यन्तमादिमौ।
स्यातां स्वर्गौ ततोऽन्यौ द्वौ सार्ध रज्ज्वन्तमञ्जसा ॥१८॥
अर्धार्धरज्जुपर्यन्तं शेषषट्स्वर्गयुग्मकाः।
प्रत्येकं स्युः पृथग्भूतास्ततो ग्रैवेयकादयः ॥१९॥
सर्वार्थसिद्धिमोक्षान्ता एक रज्ज्वन्तमाश्रिताः।
इत्यूर्ध्व लोककल्पाद्याः स्युः सप्तरज्जुमध्यगाः ॥२०॥
अर्थ (श्लोक 18 से 20): मेरुतल से डेढ़ राजू में सौधर्मैशान स्वर्ग है, इसके ऊपर डेढ़ राजू में सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्ग हैं, इसके ऊपर-ऊपर प्रत्येक अर्ध-अर्ध राजू की ऊँचाई में क्रम से अन्य छह युगल अवस्थित हैं। इस प्रकार छह राजू में सोलह स्वर्ग स्थित हैं। इनके ऊपर एक राजू में नौ ग्रैवेयक, नव अनुदिश, पाँच अनुत्तर और सिद्धशिला अवस्थित है। इस प्रकार मेरु तल से ऊर्ध्वलोक के सात राजू क्षेत्र में स्वर्गादिक हैं ॥१८-२०॥ यथा- [ऊर्ध्वलोक का चित्र अगले पृष्ठ में है]
आद्ये स्वर्ग्युगले चैक त्रिंशत्स्युः पटलान्यपि।
द्वितीये तानि सप्तैव चत्वारि तृतीये ततः ॥२१॥
चतुर्थे युगले द्वे स्तः पटले पञ्चमे भवेत्।
पटलैकं युगे षष्ठे ह्येकं सत्पटलं मतम् ॥२२॥
सप्तमे युगले त्रीण्यष्टमे त्रिपटलान्यपि।
त्रीण्येव पटलानि स्युरधोग्रैवेयकत्रये ॥२३॥
सन्ति त्रिपटलान्येव मध्यग्रैवेयकत्रये।
ततस्त्रिपटलानि स्युरूर्ध्वग्रैवेयकत्रिके ॥२४॥
नवानुदिशसंज्ञं स्यात्पटलैकं ततः परम्।
पञ्चानुत्तरनामैकं पटलं चेति तान्यपि ॥२५॥
पिण्डीकृतानि सर्वाणि त्रिषष्टि पटलानि वै।
स्युरुपर्युपरिस्थानि कल्पकल्पातिगानि च ॥२६॥
अर्थ (श्लोक 21 से 26): सौधर्म नामक प्रथम युगल में ३१ पटल हैं। दूसरे सानत्कुमार युगल में सात, तीसरे ब्रह्म युगल में चार, चौथे लान्तव युगल में दो, पाँचवें शुक्र युगल में एक, छठे शतार युगल में एक, सातवें आनत युगल में तीन, आठवें आरण युगल में तीन, अधो ग्रैवेयक में तीन, मध्यम ग्रैवेयक में तीन, ऊर्ध्व ग्रैवेयक में तीन, नव अनुदिशों में एक और पाँच अनुत्तरों में एक पटल है। इस प्रकार सौधर्म स्वर्ग से ऊपर-ऊपर कल्प और कल्पातीत सर्व स्वर्गों के पटलों की संख्या एकत्रित करने पर (३१+७+४+२+१+१+३+३+३+३+३+१+१=) ६३ होती है। अर्थात् कुल ६३ पटल हैं ॥२१-२६॥
सौधर्मे स्युर्विमानानि लक्षा द्वात्रिंशदेव च।
ऐशाने सद्दिमाना लक्षा अष्टाविंशति प्रमाः ॥२७॥
सनत्कुमारकल्पे द्वादशलक्षविमानकाः।
विमानाः सन्ति माहेन्द्रे चाष्टलक्षप्रमाणकाः ॥२८॥
ब्रह्मकल्पे द्विलक्षेमा षण्णवत्या सहस्रकैः।
ब्रह्मोत्तरे च ते लक्षैकं सहस्रचतुर्युतम् ॥२९॥
लान्तवे सद्दिमानानि द्विचत्वारिंशता समम्।
पञ्चविंशति संख्यानि सहस्राणि भवन्ति च ॥३०॥
कापिष्ठे स्युर्विमानानि ह्यष्टपञ्चाशता सह।
नवसंख्यशतैर्युक्ताश्चतुर्विंशसहस्रकाः ॥३१॥
शुक्रेविंशतियुक्तानि सहस्राणि तु विंशतिः।
विमानानि महाशुक्रेऽशीत्यानवशतैर्युताः ॥३२॥
एकोनविंशसंख्यानसहस्राः स्युः शतारेके।
एकोनविंशसंयुक्तत्रिसहस्रा विमानकाः ॥३३॥
सहस्रारे तथैकोनविंशोनत्रिसहस्रकाः।
आनतप्राणताभिख्यकल्पद्वयोर्विमानकाः ॥३४॥
चतुःशतानि चत्वारिंशद् युतान्यारणाच्युते।
विमानाः षष्टि संयुक्त शतद्वयप्रमाणकाः ॥३५॥
ततः सन्ति विमानानि ह्यधोग्रैवेयकत्रिके।
एकादशोत्तरं चैक शतं ततो विमानकाः ॥३६॥
शतैकं सप्तसंयुक्तं मध्यग्रैवेयकत्रिके।
एकानवतिसंख्याना ऊर्ध्वग्रैवेयकत्रिके ॥३७॥
ततो नवविमानानि नवानुदिशसंज्ञके।
पञ्चदिव्यविमानानि पञ्चानुत्तर नामके ॥३८॥
अर्थ (श्लोक 27 से 38): उपर्युक्त १२ श्लोकों का समस्त अर्थ निम्नांकित तालिका में निहित है।
आद्यस्वर्गयुगे चाद्यमुडुवाख्यं विमलाभिधम्।
चन्द्रं वल्गु च वीराख्यमरुणं नन्दनाह्वयम् ॥३९॥
नलिनं काञ्चनं रोहिच्छञ्चाख्यं मरुदाख्यकम्।
ऋद्धिशं ह्यथवैडूर्यं ततो रुचकनामकम् ॥४०॥
रुचिराभिधमङ्गाख्यं स्फाटिकं तपनीयकम्।
मेघमभ्रं तु हारिद्रं पद्माभिधानकं ततः ॥४१॥
लोहिताख्यं ततो वज्रं नन्द्यावर्तं प्रभाकरम्।
पिष्टकं च गजाभासं मित्राख्यं प्रभसंज्ञकम् ॥४२॥
इत्युक्तशुभनामान एकत्रिशत्प्रमेन्द्रकाः।
मध्यस्थाः पटलानां स्युः सौधर्मैशान कल्पयोः ॥४३॥
अञ्जनं वनमालाख्यं नागं च गरुडाह्वयम्।
लाङ्गलं बलभद्राख्यं चक्रं सप्तेन्द्रका अमी ॥४४॥
सनत्कुमार माहेन्द्र कल्पयोः श्रेणिमध्यगाः।
अरिष्टं देवसौमाख्यं ब्रह्मब्रह्मोत्तराख्यकम् ॥४५॥
ब्रह्मब्रह्मोत्तरे सन्ति चत्वार इन्द्रका इमे।
ब्रह्मादिहृदयाभिख्यं लान्तवं चेन्द्रकाविमौ ॥४६॥
द्वौ स्तो लान्तवकापिष्ठे शुक्राख्यैकोऽस्ति चेन्द्रकः।
शुक्रद्वये शताराख्येन्द्रकः शतारकद्वये ॥४७॥
आनतं प्राणतं पुष्पमिमे स्युरिन्द्रकास्त्रयः।
उपर्युपरिभागेष्वानतप्राणतयोर्द्वयोः ॥४८॥
सातकं चारणाभिख्यमच्युताख्यमिमे त्रयः।
इन्द्रकाः क्रमशः सन्त्यारणाच्युतद्विकल्पयोः ॥४९॥
अर्थ (श्लोक 39 से 49): सौधर्मैश्रान नामक प्रथम युगल में १. ऋतु, २. विमल, ३. चन्द्र, ४. वल्गु, ५. वीर, ६. अरुण, ७. नन्दन, ८. नलिन, ९. काञ्चन, १०. रोहित, ११. चञ्च, १२. मरुत्, १३. ऋद्धीश, १४. वैडूर्य, १५. रुचक, १६. रुचिर, १७. अंक, १८. स्फटिक, १९. तपनीय, २०. मेघ, २१. अभ्र, २२. हारिद्र, २३. पद्म, २४. लोहित, २५. वज्र, २६. नन्द्यावर्त, २७. प्रभाकर, २८. पृष्ठक, २९. गज, ३०. मित्र और ३१. प्रभ ये शुभ नाम वाले ३१ इन्द्रक विमान पटलों के मध्य में अवस्थित हैं। १. अञ्जन, २. वनमाल, ३. नाग, ४. गरुड़, ५. लांगल, ६. बलभद्र और ७. चक्र ये सात इन्द्रक विमान सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्प में स्थित श्रेणीबद्ध विमानों के मध्य में अवस्थित हैं। अरिष्ट, देवसौम, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर नाम के ये चार इन्द्रक ब्रह्म युगल में, ब्रह्महृदय और लान्तव ये दो इन्द्रक लान्तव-कापिष्ट युगल में, शुक्र नामक इन्द्रक शुक्र-महाशुक्र युगल में, शतार नामक इन्द्रक शतार-सहस्रार युगल में आनत, प्राणत और पुष्पक ये तीन इन्द्रक आनत प्राणत स्वर्गों के उपरिम भागों में तथा शातक, आरण और अच्युत ये तीन इन्द्रक आरण-अच्युत इन दो कल्पों में अवस्थित हैं ॥३९-४९॥
सुदर्शनममोघाख्यं सुप्रबुद्धं यशोधरम्।
सुभद्रं सुविशालं तु सुमनस्काभिधानकम् ॥५०॥
सौमनस्काह्वयं प्रीतिङ्करमेते नवेन्द्रकाः।
नवग्रैवेयकेष्वेव सन्त्युपुर्युपरि क्रमात् ॥५१॥
प्राच्यामर्चिर्विमानं दक्षिणदिश्यर्चिमालिनी।
वैरोचनमपाच्यां चोत्तराशायां प्रभासकम् ॥५२॥
आग्नेयदिशि सौमाख्यं नैऋत्यां सौम्यरूपकम्।
वायव्यामङ्कनामैशानकोणे स्फाटिकाभिधम् ॥५३॥
एषां मध्येऽस्ति चादित्यमालिन्याख्यं विमानकम्।
विमानानि नवैतानि स्युर्नवानुदिशाभिधे ॥५४॥
विजयं पूर्वदिग्भागे वैजयन्तं च दक्षिणे।
जयन्तं पश्चिमाशायामुत्तरेऽस्त्यपराजितम् ॥५५॥
अमीषां मध्यभागे स्यात्सर्वार्थसिद्धिनामकम्।
एते पञ्चविमानाः स्युः पञ्चानुत्तरसंज्ञके ॥५६॥
अर्थ (श्लोक 50 से 56): नव ग्रैवेयकों में क्रमशः ऊपर-ऊपर सुदर्शन, अमोघ, सुप्रबुद्ध, यशोधर, सुभद्र, सुविशाल, सुमनस, सौमनस और प्रीतंकर नाम के ये नव इन्द्रक विमान हैं। नव अनुदिशों की पूर्व दिशा में अर्चि विमान, दक्षिण में अर्चिमालिनी, पश्चिम में वैरोचन, उत्तर में प्रभास, आग्नेय दिशा में सौम, नैऋत्य में सौम्य रूप, वायव्य में अंक और ईशान कोण में स्फटिक नामक विमान हैं, इन आठों विमानों के मध्य में आदित्य मालिनी नामक इन्द्रक विमान है। इस प्रकार नव अनुदिशों में नव विमान हैं। पञ्चानुत्तर की पूर्व दिशा में विजय, दक्षिण में वैजयन्त, पश्चिम में जयन्त और उत्तर दिशा में अपराजित नामक विमान हैं। इन सबके मध्य में सर्वार्थसिद्धि नामक इन्द्रक विमान है। इस प्रकार पञ्चानुत्तर में पाँच विमान हैं ॥५०-५६॥
सुदर्शनमहामेरोश्चूलिकोर्ध्वनभस्तले ।
रोममात्रान्तरं मुक्त्वा तिष्ठेदृतुत्वाख्य इन्द्रकः ॥५७॥
स्वस्वान्त्यपटलेष्वन्त्य स्वस्वेन्द्रकस्य यच्च यत्।
ध्वजाग्रं तत्र तत्र स्थितेन्द्रस्य स्वामिता भवेत् ॥५८॥
अर्थ (श्लोक 57 से 58): सुदर्शन मेरु की चूलिका के ऊपर आकाश में बाल के अग्रभाग प्रमाण अन्तर छोड़कर ऋतु नाम का प्रथम इन्द्रक विमान है। अपने-अपने अन्तिम पटल के अन्तिम इन्द्रक के ध्वजादण्ड पर्यन्त वहाँ स्थित अपने-अपने इन्द्रों का स्वामित्व है। जैसे-सौधर्म इन्द्र का स्वामित्व प्रभा नामक अन्तिम इन्द्रक के ध्वजदण्ड पर्यन्त है। इसी प्रकार आगे भी जानना ॥५७-५८॥
नरक्षेत्रप्रमाणं स्यादृतुत्वाख्यं प्रथमेन्द्रकम्।
सर्वार्थसिद्धिनामान्त्यं जम्बूद्वीपसमानकम् ॥५९॥
शेषाणामिन्द्रकाणां स्यादेकोनेन्द्रकसंख्यया।
विभक्तैर्योजनैः शेषैः क्रमह्रासो हि विस्तरः ॥६०॥
अर्थ (श्लोक 59 से 60): प्रथम ऋतु इन्द्रक विमान का विस्तार मनुष्य क्षेत्र (ढाई द्वीप) के बराबर और सर्वार्थसिद्धि नामक अन्तिम इन्द्रक का प्रमाण जम्बूद्वीप के बराबर है। उन दोनों के प्रमाण को परस्पर घटाकर शेष में एक कम इन्द्रक प्रमाण का भाग देने पर हानि-वृद्धि चय का प्रमाण प्राप्त होता है। जैसे-ऋतु नामक प्रथम इन्द्रक का प्रमाण ४५००००० योजन और सर्वार्थसिद्धि इन्द्रक का प्रमाण १००००० योजन है। इन दोनों को परस्पर में घटा कर एक कम इन्द्रक का भाग देने से (४५००००० - १००००० / ६३ - १ =) ७०९६७ २३/३१ योजन हानि चय का प्रमाण है ॥५९-६०॥
आद्येन्द्रकस्य विद्यन्ते चतुर्दिक्षु विमानकाः।
श्रेणीबद्धा द्विषष्टिस्तु महान्तोऽनुक्रमात् पृथक् ॥६१॥
आद्येन्द्रकाच्चतुर्दिक्षु सर्वोर्ध्वपटलेष्वपि।
श्रेणीबद्धाः प्रहीयन्ते चतुश्चतुप्रमाः क्रमात् ॥६२॥
यावच्चानुदिशाभिख्ये पटले दिक्चतुष्टये।
श्रेणीबद्धा हि तिष्ठन्ति प्रान्त्याश्चत्वारइन्द्रकाः ॥६३॥
अर्थ (श्लोक 61 से 63): प्रथम ऋतु इन्द्रक विमान की चारों दिशाओं में अनुक्रम से पृथक्-पृथक् बासठ-बासठ श्रेणीबद्ध विमान अवस्थित हैं। इसके ऊपर द्वितीयादि पटलों के इन्द्रकों की चारों दिशाओं में क्रम से प्रथम इन्द्रक के श्रेणीबद्धों के प्रमाण से चार-चार श्रेणीबद्ध तब तक हीन-हीन होते जाते हैं, जब तक अन्तिम पटल की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसीलिये अनुदिश (और अनुत्तर) इन्द्रक की चारों दिशाओं में (प्रत्येक दिशा में एक-एक) चार ही श्रेणीबद्ध विमान हैं ॥६१-६३॥
श्रेणीबद्धान्तरेषु स्युश्चतुर्विदिक्षु सर्वतः।
इन्द्राः श्रेणीसम्बन्धक्रमहीना इतोऽमुतः ॥६४॥
प्रकीर्णक विमानाश्च पुष्पप्रकीर्णका इव।
पञ्चानुत्तरसंज्ञे तथाधोग्रैवेयकत्रये ॥६५॥
प्रकीर्णक विमानानि न सन्त्यन्येषु सन्ति च।
एकोनषष्टिसंख्येषु पटलेषु प्रकीर्णकाः ॥६६॥
अर्थ (श्लोक 64 से 66): अहो ! श्रेणीबद्ध के अन्तरालों की चारों विदिशाओं में सब ओर इन्द्रक और श्रेणीबद्ध के सदृश क्रम से रहित पुष्पों के सदृश यत्र-तत्र स्थित विमानों को प्रकीर्णक विमान कहते हैं। पाँच अनुत्तर (के एक पटल) में और अधो ग्रैवेयक (के सुदर्शन, अमोघ और सुप्रबुद्ध इन तीन पटलों में प्रकीर्णक विमान नहीं होते। शेष [६३-(३+१) ]=५९ पटलों में प्रकीर्णक विमान होते हैं ॥६४-६६॥ प्रत्येक स्वर्ग के इन्द्रक, श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक विमानों की पृथक्-पृथक् संख्या कहते हैं। उपर्युक्त संस्कृत गद्य का सम्पूर्ण अर्थ निम्नांकित तालिका में निहित है-
संख्ययोजनविस्तारा इन्द्रका: सकला मता:।
श्रेणीबद्धा असंख्यातकोटीयोजन विस्तरा: ॥६७॥
केचित्प्रकीर्णकासंख्य कोटीयोजन विस्तृताः।
केचिदसंख्यकोटीनां योजनै र्विस्तरान्विताः ॥६८॥
अच्युतान्तस्थ सर्वेषां विमानानां हि पञ्चमः।
भागः संख्येय कोटिप्रमाणयोजनविस्तृतः ॥६९॥
ततः शेषा हि चत्वारो भागाः सर्वेषु सन्ति च।
विमानानामसंख्यातकोटीयोजनविस्तराः ॥७०॥
संख्यातयोजनव्यासा अधोग्रैवेयक त्रये।
सन्तीन्द्रक विमानास्त्रयः श्रेणीमध्यभागगाः ॥७१॥
अष्टादशविमानाः स्युर्मध्यग्रैवेयक त्रिके।
संख्ययोजनविष्कम्भाः प्रकीर्णकेन्द्रकोभयोः ॥७२॥
संख्येययोजनव्यासाः ऊर्ध्वग्रैवेयक त्रये।
स्युः सप्तदशसंख्याना विमानारत्नशालिनः ॥७३॥
नवानुदिशसंज्ञे च पञ्चानुत्तरनामनि।
संख्ययोजनविस्तार एकैक इन्द्रकः पृथक् ॥७४॥
एतेभ्यो ये परे सन्ति श्रेणीबद्ध प्रकीर्णकाः।
ते सर्वे स्युरसंख्यातकोटीयोजन विस्तृताः ॥७५॥
अर्थ (श्लोक 67 से 75): समस्त इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तार वाले और श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात योजन कोटि विस्तार वाले हैं। प्रकीर्णक विमानों में से कुछ प्रकीर्णक संख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले और कुछ प्रकीर्णक असंख्यात कोटि योजन विस्तार वाले हैं। सौधर्म स्वर्ग से अच्युत स्वर्ग पर्यन्त के कल्पों में अपनी-अपनी विमान राशि के पाँचवें भाग प्रमाण विमान संख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं, इनसे अवशेष विमान असंख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं। अथवा अपनी-अपनी राशि के ४/५ वें भाग प्रमाण विमान असंख्यात करोड़ योजन विस्तार वाले हैं। जैसे-सौधर्म कल्प की कुल विमान राशि ३२००००० - ६४०००० संख्यात योजन व्यास वाले = २५६०००० असंख्यात योजन व्यास वाले हैं। अथवा ३२००००० × ४ / ५ = २५६०००० विमान असंख्यात योजन व्यास वाले हैं। तीनों अधो-ग्रैवेयकों में श्रेणीबद्ध विमानों के मध्य अवस्थित रहने वाले तीन इन्द्रक विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। तीनों मध्यम ग्रैवेयकों में इन्द्रक और प्रकीर्णक दोनों मिलाकर १८ विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। तीनों ऊर्ध्व ग्रैवेयकों में रत्नमयी १७ विमान संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। नव अनुदिशों और पञ्चानुत्तरों में जो एक-एक इन्द्रक हैं, वे ही संख्यात योजन विस्तार वाले हैं। संख्यात योजन व्यास वाले प्रकीर्णकों से रहित अन्य प्रकीर्णक और सर्व श्रेणीबद्ध विमान असंख्यात कोटि योजन विस्तार वाले हैं ॥६७-७५॥
सौधर्मेशानयोः षष्टिलक्षसंख्याविमानकाः ।
जलाधारेण तिष्ठन्ति शाश्वता नभसि स्वयम् ॥७६॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोर्विमाना दिवौकसाम् ।
सन्ति-विंशतिलक्षाः खे वाताधारेण केवलम् ॥७७॥
ब्रह्मादिकसहस्रारान्ताष्टानां स्युर्विमानकाः ।
षण्णवतिसहस्राग्र चतुर्लक्षप्रमाणकाः ॥७८॥
जलवातद्वयाधारेणैव व्योम्नि मनोहराः ।
शेषानतादिकल्पानां चतुर्णां च विमानकाः ॥७९॥
ग्रैवेयकादिपञ्चानुत्तरान्तानां भवन्ति खे ।
निराधारास्त्रयो विंशाग्रसहस्रप्रमाः स्वयम् ॥८०॥
अर्थ (श्लोक 76 से 80): सौधर्मेशान कल्प के (३२ लाख + २८ लाख)=६० लाख विमान आकाश में स्वयमेव जल के आधार अवस्थित हैं। सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्गस्थ देवों के (१२ लाख + ८ लाख)=२० लाख विमान आकाश में मात्र वायु के आधार अवस्थित हैं। ब्रह्म स्वर्ग से लेकर सहस्रार स्वर्गपर्यन्त अर्थात् आठ स्वर्गों के अति मनोज्ञ (४०००००+५००००+४००००+६०००)=४९६००० विमान आकाश में जल-वायु (उभयाधार) के आधार अवस्थित हैं। शेष आनतादि चार कल्पों के, नव ग्रैवेयकों के, नव अनुदिशों के और पाँच अनुत्तर विमानों के (७०० + १११ + १०७ + ९१ + ९ + ५)=१०२३ विमान निराधार हैं। अर्थात् शुद्ध आकाश के आधार ही अवस्थित हैं ॥७६-८०॥
कृष्णानीलास्तथा रक्ताः पीताः शुक्ला इति द्वयोः ।
सौधर्मेशानयोः पञ्चवर्णा विमानतद्गृहाः ॥८१॥
नीला रक्तास्तथा पीताः शुक्ला इमे विमानकाः ।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोश्चतुर्वर्णभूषिताः ॥८२॥
रक्ता पीताः सिता एते त्रिवर्णाश्च विमानकाः ।
ब्रह्मादिकचतुर्णांस्युर्दिव्याः प्रासादपङ्क्तयः ॥८३॥
शुक्रादीनां चतुर्णां स्युः पीताः शुक्ला विमानकाः ।
शेषानतादि कल्पेषु सर्वग्रैवेयकादिषु ॥८४॥
केवलं शुक्ल वर्णा विमानप्रासादपङ्क्तयः ।
स्फुरद् रत्नांशु संघातैरुद्योतितदिशाम्बराः ॥८५॥
अर्थ (श्लोक 81 से 85): सौधर्मेशान इन दो स्वर्गों के विमान एवं उनमें स्थित गृह काले, नीले, लाल, पीले और श्वेत अर्थात् पञ्च वर्ण वाले हैं। सनत्कुमार माहेन्द्र कल्प के विमान कृष्ण के बिना चार वर्ण के अर्थात् नीले, लाल, पीले और श्वेत वर्ण के हैं। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर-लांतव और कापिष्ट स्वर्ग के विमान एवं दिव्य प्रासाद पंक्तियाँ लाल, पीले और श्वेत इस प्रकार तीन वर्ण वाले हैं। शुक्र-महाशुक्र, शतार और सहस्रार इन चार स्वर्गों के विमान पीत और शुक्ल वर्ण के हैं। इसके आगे शेष आनत आदि कल्पों में, सर्व ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में और पाँच अनुत्तरों में देदीप्यमान रत्नों की किरणों के समूह से नभमण्डलस्थ दिशाओं को प्रकाशित करने वाली विमान एवं प्रासाद पंक्तियाँ मात्र शुक्ल वर्ण की हैं ॥८१-८५॥
सर्व - श्रेणिविमानार्धं स्वयम्भूरमणोपरि।
द्वीपाब्धीनां ततोऽन्येषामर्धार्धमुपरिस्थितम् ॥८६॥
अर्थ: सर्व श्रेणीबद्ध (ऋतु इन्द्रक की एक दिशा गत ६२ श्रेणीबद्ध) विमानों का अर्ध भाग (३१) स्वयम्भूरमण समुद्र के ऊपर अवस्थित है तथा शेष अर्ध (३१) भाग का अर्ध-अर्ध भाग स्वयम्भूरमण समुद्र से अर्वाचीन द्वीप समुद्रों के ऊपर अवस्थित है ॥८६॥
स्वामी च दक्षिणाशायाः पूर्वपश्चिमयोर्दिशोः।
श्रेणीबद्ध विमानेषु ह्यग्निनैऋत्यकोणयोः ॥८७॥
प्रकीर्णकविमानेषु सौधर्मेन्द्रो महान् भवेत्।
सर्वेषु पटलेष्वेवं सौधर्मेशानकल्पयोः ॥८८॥
पतिरस्त्युत्तरश्रेण्या वायव्यैशानयोर्दिशोः।
श्रेणीबद्धप्रकीर्णेषु चैशानेन्द्रोऽमरावृतः ॥८९॥
इत्येवं स्याद्विमानानां स्वामित्वं च पृथक्-पृथक्।
सनत्कुमारमाहेन्द्रकल्पनायकयोर्द्वयोः ॥९०॥
ब्रह्मेन्द्राद्याश्चतवारश्चतुर्युग्मेषु नायकाः।
चतुःश्रेणिविदिक् सर्वविमानानां भवन्ति च ॥९१॥
आनतेन्द्रादयः शेषाश्चतुः कल्पेषु नायकाः।
त्र्येकश्रेणिविदिग् द्वि द्वि विमानानां च पूर्ववत्॥९२॥
अर्थ (श्लोक 87 से 92): सौधर्मेशान कल्प के सर्व पटलों सर्व इन्द्रक (३१), पूर्व, दक्षिण और पश्चिम दिशा, आग्नेय एवं वायव्य विदिशा सम्बन्धी सर्व (४३७१) श्रेणीबद्ध विमानों एवं सर्व प्रकीर्णक विमानों में सौधर्मेन्द्र का ही स्वामित्व है अर्थात् इनमें सौधर्म इन्द्र की आज्ञा का प्रवर्तन होता है। उत्तर दिशा सम्बन्धी और वायव्य एवं ईशान कोण सम्बन्धी श्रेणीबद्धों एवं प्रकीर्णक विमानों में ईशान इन्द्र का स्वामित्व है। इसी प्रकार सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्पस्थ विमानों में सनत्कुमार-माहेन्द्र इन्द्रों का पृथक्-पृथक् स्वामित्व है। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ट, शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार इन चार युगल सम्बन्धी इन्द्रक, चारों दिशा विदिशा सम्बन्धी श्रेणीबद्धों और प्रकीर्णक विमानों के स्वामी ब्रह्म, लान्तव, शुक्र और शतार नाम के चार इन्द्र हैं। आनत आदि दो कल्पों में पूर्व, दक्षिण और पश्चिम इन तीन दिशाओं के आग्नेय और वायव्य इन दो विदिशाओं के श्रेणीबद्धों एवं प्रकीर्णक विमानों का स्वामी प्राणत इन्द्र है तथा उत्तर दिशागत, वायव्य ईशान कोण गत श्रेणीबद्धों एवं सर्व प्रकीर्णक विमानों का स्वामी आनत नाम का इन्द्र है। अर्थात् स्वामित्व की जो व्यवस्था प्रथम युगल में है, उसी प्रकार यहाँ जानना चाहिए ॥८७-९२॥
वसतश्चादिकल्पेशावन्तिमे पटले निजे।
अष्टादशे विमाने हि दक्षिणोत्तरयोर्दिशोः ॥९३॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रौ तिष्ठतः पटलेऽन्तिमे।
विमाने षोडशे श्रेण्योर्दक्षिणोत्तर भागयोः ॥९४॥
ब्रह्मेन्द्रो दक्षिणाशायां चरमे पटले वसेत्।
मुदा चतुर्दशे दिव्ये श्रेणीबद्ध विमानके ॥९५॥
तिष्ठेद्दक्षिणदिग्भागे द्वितीये पटलेऽनिशम्।
लान्तवेन्द्रो विमाने द्वादशमे स्त्रीसुरावृतः ॥९६॥
शुक्रेन्द्रो दशमे रम्ये विमाने वसति स्वयं।
दक्षिणश्रेणिभागस्थ पटलस्यामरैः समम् ॥९७॥
शतारेन्द्रो वसेत्सार्धं देव्याद्यैः पटले निजे।
दक्षिणश्रेणि सम्बन्ध विमाने प्रवरेऽष्टमे ॥९८॥
आनतेन्द्रादयः शेषाश्चत्वारः पटलेन्तिमे।
दक्षिणोत्तरदिक् श्रेण्योः सन्ति षष्ठे विमानके ॥९९॥
अच्युतस्वर्गपर्यन्तमिन्द्राः सन्ति पृथक्-पृथक्।
अहमिन्द्रस्ततोऽप्यूर्ध्वे सर्वेग्रैवेयकादिषु ॥१००॥
अर्थ (श्लोक 93 से 100): प्रथम युगल के प्रभ नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशा में स्थित १८ वें श्रेणीबद्ध विमान में सौधर्म इन्द्र रहता है और इसी पटल की उत्तर दिशागत १८ वें श्रेणीबद्ध विमान में ईशान इन्द्र निवास करता है। द्वितीय युगल के चक्र नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशागत १६ वें श्रेणीबद्ध में सनत्कुमार इन्द्र और इसी पटल की उत्तर दिशा गत १६ वें श्रेणीबद्ध में माहेन्द्र इन्द्र निवास करता है। तृतीय युगल के ब्रह्मोत्तर नामक अन्तिम पटल की दक्षिण दिशागत १४ वें श्रेणीबद्ध विमान में ब्रह्मोत्तर नाम इन्द्र का अवस्थान है। चतुर्थ युगल के लान्तव नामक द्वितीय (अन्तिम) पटल की दक्षिण दिशागत १२ वें श्रेणीबद्ध विमान में लान्तव इन्द्र अपनी देवांगनाओं और अन्य देवों से वेष्टित लान्तव इन्द्र निरन्तर निवास करता है। पंचम युगल के शुक्र नामक पटल की दक्षिण दिशागत १० वें श्रेणीबद्ध विमान में अन्य देव गणों के साथ शुक्र इन्द्र निवास करता है। षष्ठ युगल के शतार पटल की दक्षिण दिशागत ८ वें श्रेणीबद्ध विमान में अनेक देव देवियों के साथ शतार इन्द्र निवास करता है। सप्तम और अष्टम युगल के आनत पटल की दक्षिण दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में आनत इन्द्र और उत्तर दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में प्राणत इन्द्र रहता है तथा आरण पटल की दक्षिण दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध में आरण इन्द्र और इसी पटल की उत्तर दिशागत ६ वें श्रेणीबद्ध विमान में अच्युत इन्द्र निवास करता है। अच्युत स्वर्ग पर्यन्त ही पृथक्-पृथक् इन्द्र हैं। इन कल्पों के ऊपर ग्रैवेयक आदि सर्व विमानों में सभी अहमिन्द्र हैं ॥९३-१००॥
अधुना मौलिचिह्नानि प्रवक्ष्यामि पृथक्-पृथक्।
सौधर्ममुख्यकल्पस्थेन्द्रादिसर्वसुधाभुजाम् ॥१०१॥
सौधर्मे मुकुटे चिह्नं वराहोऽस्ति दिवौकसाम्।
ऐशाने मकरो मौलि चिह्नं च विस्फुरत्प्रभम् ॥१०२॥
सनत्कुमारनाके स्यान्महिषो मौलिलाञ्छनम्।
माहेन्द्रेऽस्ति शक्रादीनां मत्स्यचिह्नं च शेखरे ॥१०३॥
ब्रह्मस्वर्गेऽमरेशादीनां कच्छपोऽस्ति लाञ्छनम्।
ब्रह्मोत्तरे भवेच्चिह्नं मुकुटे दर्द्दुरो महान् ॥१०४॥
लान्तवे तुरगचिह्नं कापिष्टे च गजः शुभः।
शुक्रेऽस्ति चन्द्रमा नागो महाशुक्रेऽस्ति लाञ्छनम् ॥१०५॥
शतारे लाञ्छनं खड्गी स्यादिन्द्राद्यमृताशिनाम्।
सहस्रारे भवेच्छागो मौलि चिह्नं दिवौकसाम् ॥१०६॥
आनतप्राणतस्वर्गयोश्चिह्नं वृषभोस्ति च।
आरणाच्युतयोश्चिह्नं कल्पवृक्षः सुधाभुजाम् ॥१०७॥
अहमिन्द्रसमस्तानां मौलि चिह्नानि जातु न।
वक्ष्येऽथात्रामरेशानां वाहनानि पृथक्-पृथक् ॥१०८॥
अर्थ (श्लोक 101 से 108): अब मैं (आचार्य) सौधर्मादि कल्पस्थित सर्व देवों के मुकुट स्थित चिह्नों को पृथक्-पृथक् कहूँगा। सौधर्म स्वर्गस्थ देवों के मुकुटों में वराह का चिह्न तथा ऐशान स्वर्गस्थ देवों के मुकुटों में मगर का चिह्न है। सनत्कुमार स्वर्ग के देवों के मुकुटों में महिष का चिह्न और माहेन्द्र स्वर्ग स्थित इन्द्रादि देवों के मुकुटों में मत्स्य का लाञ्छन है। ब्रह्म स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में कछुाए (कच्छप) का तथा ब्रह्मोत्तर स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में मेंढक का चिह्न है। लान्तव स्वर्ग स्थित देवों के घोड़े का, कापिष्ट स्वर्ग में हाथी का, शुक्र स्वर्ग में चन्द्रमा का और महाशुक्र स्थित देवों के मुकुटों का चिह्न सर्प है। शतार स्वर्ग स्थित इन्द्रादि सर्व देवों के मुकुटों में खड्गी का और सहस्रार स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में बकरी का चिह्न है। आनत-प्राणत स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में बैल का तथा आरण-अच्युत स्वर्ग स्थित देवों के मुकुटों में कल्पवृक्ष का चिह्न है। कल्पातीत स्वर्गों में स्थित सर्व अहमिन्द्रों के मुकुटों में कोई भी चिह्न नहीं हैं। अब मैं (आचार्य) सौधर्म आदि इन्द्रों के वाहनों का कथन करूँगा ॥१०१-१०८॥
सौधर्मे देवराजस्य गजेन्द्रो वाहनं महत्।
ईशाने तुरगः स्यात्सनत्कुमारे मृगाधिपः ॥१०९॥
माहेन्द्रे वृषभो ब्रह्मस्वर्गे सारसवाहनम्।
ब्रह्मोत्तरे पिकः प्रोक्तो लान्तवे हंसवाहनम् ॥११०॥
कापिष्टे कोक एवास्ति शुक्रे गरुडवाहनम्।
महाशुक्रे च देवानां मकरो वाहनं भवेत् ॥१११॥
शतारे च मयूरः स्यात्सहस्रारेऽम्बुजं भवेत्।
आनतादिचतुष्केषु विमानं पुष्पकाह्वयम् ॥११२॥
अर्थ (श्लोक 109 से 112): सौधर्म स्वर्ग में इन्द्र का वाहन गजेन्द्र है, ईशन स्वर्ग में घोड़ा, सनत्कुमार स्वर्ग में सिंह, माहेन्द्र में बैल, ब्रह्म स्वर्ग में सारस, ब्रह्मोत्तर में कोयल, लान्तव में हंस, कापिष्ट में चक्रवाल, शुक्र में गरुड़, महाशुक्र में मगर, शतार में मयूर, सहस्रार में कमल और आनतादि चार स्वर्गों में पुष्पक विमान ही वाहन है ॥१०९-११२॥
स्वस्वेन्द्रविमानस्य स्वस्वकल्पाह्वयस्य च।
स्युश्चत्वारि विमानानि पूर्वादि दिक् चतुष्टये ॥११३॥
आद्यं वैडूर्य साराख्यं रौप्यसाराभिधं ततः।
अशोकसारसंज्ञं च मिश्रसारमिमान्यपि॥११४॥
पूर्वाद्यासु चतुर्दिक्षु चत्वारः स्युर्विमानकाः।
सर्वेषां दक्षिणेन्द्राणां विमानानामनुक्रमात् ॥११५॥
रुचकं मन्दराभिख्यमशोकं सप्तपर्णकम्।
चत्वारोऽमी विमानाः स्युः प्राच्यादि दिक् चतुष्टये ॥११६॥
ईशानेन्द्रादि सर्वोत्तरेन्द्राणां क्रमशः परे।
विमानानामयं ज्ञेयः क्रमोऽच्युतान्तमञ्जसा ॥११७॥
अर्थ (श्लोक 113 से 117): अपने-अपने कल्प का नाम ही अपने-अपने इन्द्र स्थित विमान का नाम है। इन्द्र स्थित विमान की पूर्व-दक्षिण आदि चारों दिशाओं में क्रम से वैडूर्य सार, रौप्य सार (रजत), अशोक सार और मिश्र सार (मृत्कसार) नाम वाले चार विमान अवस्थित हैं। सर्व दक्षिणेन्द्रों के विमानों की पूर्वादि चारों दिशाओं में अनुक्रम से उपर्युक्त नाम वाले चार-चार विमान हैं। ईशान इन्द्र आदि सर्व उत्तरेन्द्रों के विमानों की पूर्वादि चारों दिशाओं में अनुक्रम से रुचक, मन्दर, अशोक और सप्तपर्ण नाम के चार-चार विमान हैं। दक्षिणेन्द्रों-उत्तरेन्द्रों के विमानों की यह व्यवस्था क्रमशः अच्युत कल्प पर्यन्त जानना चाहिए ॥११३-११७॥
षट् युग्मशेषकल्पेषु ग्रैवेयकत्रिक त्रिषु।
शेषेषु च विमानानां तलबाहुल्यमुच्यते ॥११८॥
योजनान्येकविंशाग्रशतान्येकादशक्रमात् ।
ततो नवनवत्या हीनान्युपर्य्युपरिस्फुटम् ॥११९॥
अर्थ (श्लोक 118 से 119): सौधर्मादि छह कल्पों में, अवशेष आनतादि चार कल्पों में, अधो आदि तीन-तीन ग्रैवेयकों में तथा अन्य शेष अनुदिशों आदि में स्थित विमानों का तल बाहुल्य कहते हैं। सौधर्म स्वर्ग स्थित विमानों का तल बाहुल्य ११२१ योजन प्रमाण है, इसके बाद ऊपर-ऊपर क्रमशः ९९-९९ योजन हीन होता गया है ॥११८-११९॥
सौधर्मादि चतुःस्वर्गे चतुर्युग्मेष्वतोऽग्रतः।
शेषेषु चतुरस्राणां पुराणं वच्मि विस्तरम् ॥१२०॥
अशीतिश्चतुरग्रा स्यात्सहस्राणामथोनता।
चत्वार्यष्टौ सहस्राणि योजनानामनुक्रमात् ॥१२१॥
द्वे सहस्रे ततोऽप्यूने शेषेषु च दशोनता।
अमीषां सुखबोधाय व्याख्यानं पुनरुच्यते ॥१२२॥
अर्थ (श्लोक 120 से 122): सौधर्मादि चार स्वर्गों में, इनसे आगे के चार युगलों में और इसके आगे शेष आनतादि स्वर्गों में स्थित इन्द्रों के समचतुरस्र नगरों का विस्तार कहता हूँ। सौधर्मादि कल्पों में नगरों का विस्तार क्रमशः ८४ हजार योजन, चार हीन अर्थात् ८० हजार योजन, आठ हजार योजन हीन अर्थात् ७२ हजार योजन, दो हजार हीन अर्थात् ७० हजार योजन, शेष चार स्वर्गों में दस-दस हजार हीन अर्थात् ६० हजार योजन, ५० हजार योजन, ४० हजार योजन और ३० हजार योजन है। शेष स्वर्गों में नगरों का विस्तार २०-२० हजार योजन प्रमाण है। सुगमतापूर्वक समझने के लिए अब इसी विषय का व्याख्यान पुनः किया जाता है ॥१२०-१२२॥ आनत-प्राणत-आरण और अच्युत स्वर्गों के चतुरस्र नगरों का व्यास २०-२० हजार योजन है।
त्रिंशतान्याद्ययुग्मे तत्प्राकाराणां समुच्छ्रयः।
योजनानां त्रियुग्मेषु पञ्चाशत् पृथगूनता॥१२३॥
ततस्त्रिंशद्विहीनानि योजनानि च पंचमे।
षष्ठे युग्मे च शेषेषु हीनानि विंशतिः पृथक् ॥१२४॥
अर्थ (श्लोक 123 से 124): प्रथम युगल में प्राकारों की ऊँचाई ३०० योजन है, आगे के तीन युगलों में पृथक्-पृथक् ५०-५० योजन हीन है, पाँचवें युगल में ३० योजन हीन, छठे युगल में और शेष आनतादि स्वर्गों में पृथक्-पृथक् २०-२० योजन हीन है ॥१२३-१२४॥ सौधर्मैशान कल्प में स्थित नगरों के प्राकारों की ऊँचाई ३०० योजन, सानत्कुमार माहेन्द्र कल्प स्थित प्राकारों की २५० योजन, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में २०० योजन, लान्तव-कापिष्ट में १५० योजन, शुक्र-महाशुक्र में १२० योजन, शतार-सहस्रार के प्राकारों की १०० योजन और आनतप्राणत-आरण और अच्युत स्वर्गों में स्थित नगरों के प्राकारों की ऊँचाई ८०-८० योजन प्रमाण है।
षट्सु युग्मेषु शेषेषु सप्तस्थानेष्वितिक्रमात्।
प्राकाराणां पृथग्व्यासोऽवगाहश्चाभिधीयते ॥१२५॥
योजनानां च पञ्चाशत्ततोऽर्धार्धं पृथक् त्रिषु।
ततः क्रमेण चत्वारि त्रीणि सार्धं द्वि योजने ॥१२६॥
चतुस्त्रिद्वयसंगुण्यं शतषष्ट्यधिकं शतम्।
विंशत्या त्रिषु तद्धीन गोपुराणां समुन्नतिः ॥१२७॥
योजनानां शतं व्यासस्ततो दशोनता पृथक्।
विंशोनं पञ्चमे स्थाने दशोनं च पृथक् द्वये ॥१२८॥
अर्थ (श्लोक 125 से 128): छह युगलों के छह स्थान और अवशेष आनतादि स्वर्गों का एक स्थान इस प्रकार ७ स्थानों में उपर्युक्त प्राकारों के पृथक्-पृथक् व्यास और अवगाह का प्रमाण कहते हैं। प्रथम युगल में प्राकारों की नींव और व्यास का प्रमाण ५० योजन प्रमाण है, उसके आगे तीन स्थानों में क्रमशः इसका आधा-आधा है। पाँचवें स्थान का ४ योजन, छठे स्थान का ३ योजन और सातवें स्थान का प्रमाण २ १/२ योजन है। सातों स्थानों के प्राकारों की चारों दिशाओं में उनकी ऊँचाई का प्रमाण क्रमशः ४०० योजन, ३०० योजन, २०० योजन, १६० योजन, १४० योजन, १२० योजन और १०० योजन है। इन्हीं सातों स्थानों के गोपुरों का विस्तार क्रमशः १०० योजन, ९० योजन, ८० योजन, ७० योजन, ५० योजन, ४० योजन और ३० योजन प्रमाण है ॥१२५-१२८॥
षट्सु युग्मेषु शेषेषु ग्रैवेयकत्रिक त्रिषु।
नवानुदिशपञ्चानुत्तरे पृथग्गृहोदयः ॥१२९॥
योजनां शतान्येव षट् ततः शतपञ्चकम्।
शतार्धं तदृणं शेषाणामन्ते पंचविंशतिः ॥१३०॥
हर्म्याणामुदयस्यास्यायामोऽस्ति पञ्चमांशकः।
विष्कम्भो दशमो भागः सर्वत्रैवं व्यवस्थितिः ॥१३१॥
अर्थ (श्लोक 129 से 131): सौधर्मादि छह युगलों में अवशेष आनतादि स्वर्गों में, अधो, मध्य एवं उपरिम इन नव अनुदिशों में एवं पंचानुत्तरों में अर्थात् (६ + १ + ३ + १ + १ =) १२ स्थानों में गृहों की पृथक्-पृथक् ऊँचाई कहते हैं। प्रथम युगल में गृहों की ऊँचाई ६०० योजन और दूसरे युगल में ५०० योजन है। इसके आगे ११ वें स्थान तक ५०-५० कम होते हुए क्रमशः ४५०, ४००, ३५०, ३००, २५०, २००, १५०, १०० और ५० योजन है। अन्तिम स्थान के गृहों की ऊँचाई २५ योजन है। प्रत्येक स्थानों के गृहों की लम्बाई अपनी-अपनी ऊँचाई का पाँचवाँ (६००/५ =१२०) भाग है और प्रत्येक स्थानों के गृहों की चौड़ाई अपनी-अपनी ऊँचाई का १० वाँ (६००/१० =६०) भाग प्रमाण है। जैसे-लम्बाई क्रमशः १२० योजन, १००, ९०, ८०, ७०, ६०, ५०, ४०, ३०, २०, १० और ५ योजन प्रमाण है। इसी प्रकार चौड़ाई क्रमशः ६०, ५०, ४५, ४०, ३५, ३०, २५, २०, १५, १०, ५ और २ १/२ योजन प्रमाण है।
इन्द्रक्रीडानिवासस्य प्राकारात्प्रथमाद्बहिः।
आदिशालसमव्यासोत्सेधाश्चत्वार ऊर्जिताः ॥१३२॥
महान्तोऽन्ये च विद्यन्ते प्राकारा अन्तरान्तरे।
प्राकारस्यादिमस्यैव योजनानां किलान्तरम् ॥१३३॥
त्रयोदशैव लक्षाणि द्वितीयस्यास्य चान्तरम्।
त्रिषष्टिरेव लक्षाणि तृतीयस्य तथान्तरम् ॥१३४॥
चतुःषष्टिस्तु लक्षाणि तुर्यशालस्य चान्तरम्।
लक्षाणि योजनानां चतुरशीतिप्रमाणि वै ॥१३५॥
अर्थ (श्लोक 132 से 135): इन्द्र के क्रीड़ा निवास (अर्थात् नगर) के प्रथम प्राकार से बाहर समुन्नत (व्यास के समान उन्नत) एवं महान् एक दूसरे के अन्तराल से, चार प्राकार और हैं। जिनका व्यास एवं उत्सेध प्रथम प्राकार के सदृश है। प्रथम कोट (प्राकार) से दूसरे कोट का अन्तर १३ लाख योजन (१०४००००० मील) है। दूसरे कोट से तीसरे कोट का अन्तर ६३ लाख योजन (५०४००००० मील) है। तीसरे कोट से चौथे कोट का अन्तर ६४ लाख योजन (५१२००००० मील) है और चौथे कोट से पाँचवें कोट का अन्तराल ८४ लाख योजन (६७२००००० मील) प्रमाण है ॥१३२-१३५॥
आद्यप्राकारभूमध्ये सैन्यनाथा वसन्ति च।
शालान्तरे द्वितीयस्याङ्गरक्षकसुधाभुजः ॥१३६॥
तृतीयशालभूभागे निर्जराः परिषत्स्थिताः।
अन्तरे तुर्यशालस्य सामानिका वसन्ति च ॥१३७॥
अर्थ (श्लोक 136 से 137): प्रथम कोट के मध्य में सेनापति और दूसरे कोट के मध्य में अंगरक्षक देव रहते हैं। तीसरे कोट के मध्य में परिषद् देव तथा चौथे कोट के अन्तराल में सामानिक देव निवास करते हैं ॥१३६-१३७॥
चतुर्णामाद्य नाकानामशीतिश्चतुरुत्तरा।
सहस्त्राणामशीतिश्च द्विसप्ततिस्तुसप्ततिः ॥१३८॥
चतुर्णामूर्ध्वयुग्मानां सहस्राण्ययुतं विना।
शेषाणां स्युः सहस्राविंशतिः सामान्यकामराः ॥१३९॥
तेभ्यश्चतुर्गुणाः सन्ति ह्यङ्गरक्षकनाकिनः।
वृषभाद्याः पृथक् सप्तसप्तानीकाः क्रमादिमे ॥१४०॥
वृषभाः प्रवरा अश्वा रथा गजाः पदातयः।
गन्धर्वा देवनर्तक्यः सप्तानीका अमी पृथक् ॥१४१॥
सप्तानामादिमं सैन्यं स्वस्वसामानिकैः समम्।
स्युः शेषाः षड्वरानीका द्विगुणा द्विगुणाः पृथक् ॥१४२॥
अर्थ (श्लोक 138 से 142): आदि चार अर्थात् सौधर्म, ऐशान, सनत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में सामानिक देवों का प्रमाण क्रमशः ८४०००, ८००००, ७२००० और ७०००० है। इनके ऊपर के चार युगलों में दस-दस हजार हीन हैं। अर्थात् तृतीय युगल में ६००००, चतुर्थ युगल में ५००००, पंचम युगल में ४०००० और षष्ठ युगल में ३०००० सामानिक देव हैं तथा शेष आनतादि चार कल्पों के एक स्थान २०००० सामानिक देव हैं। प्रत्येक स्थान में अंगरक्षक देवों का प्रमाण सामानिक देवों के प्रमाण से चौगुना है। जैसे-सौधर्म स्वर्ग में ८४०००x४=३३६००० अंगरक्षक, ऐशान में ८००००x४=३२०००० अंगरक्षक इत्यादि। प्रथम आदि स्वर्गों में वृषभ को आदि लेकर क्रमश: पृथक्-पृथक् सात-सात अनीक सेनाएँ होती हैं। श्रेष्ठ एवं अनुपम वृषभ, अश्व, रथ, हाथी, पदाति, गन्धर्व और नर्तकी, ये पृथक्-पृथक् सात अनीक सेनाएँ नव स्थानों में होती हैं। इन सातों सेनाओं में से जो वृषभ नाम की सात प्रकार की आद्य सेना है, उसमें वृषभों का प्रमाण अपने-अपने सामानिक देवों के प्रमाण सदृश है तथा अवशेष छह अनीकों में वृषभों का प्रमाण पृथक्-पृथक् क्रमश: दूना-दूना होता गया है ॥१३८-१४२॥
दामाख्यो हरिदामाख्यो मातलिनामकस्ततः।
ऐरावताह्वयो वायुनामारिष्टयशोभिधः ॥१४३॥
नीलाञ्जनामरी चैते सप्तसेनमहत्तराः।
षण्णां स्युर्दक्षिणेन्द्राणां सप्तसैन्याग्रिमाः पृथक् ॥१४४॥
महादामाभिधः स्वेच्छागामी च रथमन्थनः।
पुष्पदन्तो महावीर्यो गीतप्रीतिर्महामतिः ॥१४५॥
इमे महत्तराः सप्त वसन्ति स्वसैनिकाग्रिमाः।
क्रमेण सप्त सैन्यानामुत्तरेन्द्रा खिलात्मनाम् ॥१४६॥
अर्थ (श्लोक 143 से 146): छह दक्षिणेन्द्रों के सात अनीक सेनाओं के आगे-आगे चलने वाले पृथक्-पृथक् दाम, हरिदाम, मातलि, ऐरावत, वायु, अरिष्टयशा और नीलाञ्जना नाम छह दक्षिणेन्द्रों के ये सात-सात प्रधान हैं। इसी प्रकार छह उत्तरेन्द्र अपनी-अपनी सेनाओं के आगे-आगे चलने वाले क्रमश: महादाम, स्वेच्छागामी (अमितगति), रथमन्थन, पुष्पदन्त, महावीर्य, गीतप्रीति और महापति नाम के ये सात-सात प्रधान छहों उत्तरेन्द्रों के पृथक्-पृथक् हैं ॥१४३-१४६॥
क्रमात् परिषदा संख्येयं द्वादश चतुर्दश।
षोडशैव सहस्त्राणि नवानां प्रथमे पदे ॥१४७॥
ततो द्वि द्वि सहस्त्रोनं यावत् षष्ठं पदं ततः।
अर्धार्धक्रमतो हीनं स्याद्यावन्नवमं पदम् ॥१४८॥
अर्थ (श्लोक 147 से 148): सौधर्म स्वर्ग आदि के नव स्थानों में से प्रथम स्थान में अभ्यन्तर परिषद् में देवों की संख्या १२००० मध्य परिषद् में १४००० और बाह्य परिषद् में १६००० है। इसके आगे छह पदों तक इस प्रमाण में क्रमश: दो-दो हजार की हानि होती गई है तथा इसके आगे नवम पद पर्यन्त यह संख्या क्रमश: अर्ध-अर्ध प्रमाण हीन होती गई है ॥१४७-१४८॥ सौधर्म आदि नव स्थानों के सामानिक देव, अंग रक्षक, अनीक और अभ्यन्तर आदि परिषदों के देवों का प्रमाण विस्तार रूप से कहते हैं-सौधर्म स्वर्ग में सामानिक देवों का प्रमाण ८४०००, अंगरक्षकों का तीन लाख छत्तीस हजार (३३६०००), वृषभों की प्रथम अनीक में बैलों का प्रमाण ८४०००, दूसरी कक्ष में १६८०००, तीसरी कक्ष में ३३६०००, चतुर्थ कक्ष में ६७२०००, पाँचवीं कक्ष में १३४४०००, छठी कक्ष में २६८८००० और सातवीं कक्ष में ५३७६००० बैलों का प्रमाण है। इन सातों कक्षाओं के समस्त बैलों को एकत्रित करने से १०६६८००० प्रमाण (मात्र बैलों का) होता है। शेष अश्व, गज आदि अनीकों के भी सात-सात भेद हैं, जिनकी अनीकों का प्रमाण वृषभ अनीकों के सदृश ही जानना चाहिए। इन वृषभ आदि सातों अनीकों में वृषभ से लेकर नर्तकी पर्यन्त का सर्व प्रमाण एकत्रित करने पर ७४६७६००० होता है। इसी प्रकार अन्यत्र जानना चाहिए। उपर्युक्त सम्पूर्ण गद्य का अर्थ निम्नलिखित तालिका में निहित किया गया है। अन्तर केवल इतना है विस्तार भय से तालिका में सातों कक्षाओं का पृथक्-पृथक् प्रमाण नहीं दिया गया, प्रत्येक स्थान की केवल प्रथम कक्ष
तत इन्द्रपुराद्बाह्ये चतुर्दिक्षु विमुच्य च।
लक्षार्धं योजनानां स्युश्चत्वारिंशद्वनान्यपि ॥१४९॥
अशोकं सप्तपर्णाख्यं चम्पकाह्वयमाम्रकम्।
इति नामाङ्कितान्येव शाश्वतानि वनान्यपि ॥१५०॥
योजनानां सहस्रेणायतानि विस्तृतानि च।
सहस्रार्धेन रम्याणि भवन्ति सफलानि वै ॥१५१॥
अमीषां मध्यभागेषु चत्वारश्चैत्यपादपाः।
जम्बूद्रुमसमानाः स्युरशोकाद्या मनोहराः ॥१५२॥
एषां मूले चतुर्दिक्षु जिनेन्द्रप्रतिमाः शुभाः।
देवार्च्या बद्धपर्यङ्काः सन्ति भास्वरमूर्तयः ॥१५३॥
एषु वनेषु सर्वेषु सन्त्यावासा मनोहराः।
वाहनादिक देवानां योषिद्वृन्दसमाश्रिताः ॥१५४॥
अर्थ (श्लोक 149 से 154): इन्द्रों के नगरों से बाहर पूर्वादि चारों दिशाओं में पचास-पचास हजार योजन छोड़कर अशोक, सप्तपर्ण, चम्पक और आम्र नाम के शाश्वत चार वन हैं। उत्तम फलों से युक्त इन प्रत्येक रमणीक वनों की लम्बाई एक हजार योजन और चौड़ाई पाँच सौ योजन प्रमाण है। इन चारों वनों के मध्य भाग में जम्बूवृक्ष सदृश प्रमाण वाले, अत्यन्त मनोहर अशोक आदि चार चैत्य वृक्ष हैं। इन चारों वृक्षों में से प्रत्येक वृक्ष के मूल में चारों दिशाओं में, देव समूहों से पूज्य, पद्मासन एवं देदीप्यमान शरीर की कान्ति से युक्त जिनेन्द्र भगवान् की एक-एक प्रतिमाएँ हैं। इन चारों वनों में देवांगनाओं के समूह से युक्त वाहन आदि जाति के देवों के मनोहारी आवास हैं ॥१४९-१५४॥
ततो मुक्त्वा चतुर्दिक्षु बहूनि योजनानि च।
चतुर्णां लोकपालानां प्रासादाः सन्ति शाश्वताः ॥१५५॥
पञ्चविंशसहस्राग्रलक्षयोजन विस्तृताः।
इन्द्रस्याथ यमस्यैव वरुणाख्यकुबेरयोः ॥१५६॥
अर्थ (श्लोक 155 से 156): चारों दिशाओं में उन वन खण्डों को बहुत दूर छोड़कर अर्थात् वनों से बहुत योजन आगे जाकर इन्द्र (सोम), यम, वरुण और कुबेर इन चारों लोकपालों के शाश्वत प्रासाद हैं, जिनका विस्तार १२५०००० (साढ़े बारह लाख) योजन प्रमाण है ॥१५५-१५६॥
आग्नेयादिविदिक्षुस्युरावासाः काञ्चनोद्भवाः ।
गणिकामहत्तरीणां विस्तारायामसंयुताः ॥१५७॥
लक्षैकं योजनैर्दीप्ता देवीनिकर संश्रिताः ।
कामाख्या प्रथमादेवी कामिनी पद्मगन्धिनी ॥१५८॥
अलम्बुषेति नामान्यासं चतुर्मुख्य योषिताम् ।
एष एव क्रमोज्ञेयः सर्वेन्द्राणां पुरादिषु ॥१५९॥
अर्थ (श्लोक 157 से 159): जहाँ लोकपाल देवों के नगर हैं, वहीं आग्नेय आदि चारों विदिशाओं में गणिका महत्तरियों के स्वर्णमय आवास (नगर) हैं, जो एक-एक लाख योजन लम्बे, एक-एक लाख योजन चौड़े, देदीप्यमान एवं देवियों के समूहों से युक्त हैं। इन चारों-चारों विदिशाओं में स्थित चार प्रधान गणिका महत्तरियों के नाम कामा, कामिनी, पद्मगन्धिनी एवं अलम्बुषा है। सर्व इन्द्रों के नगरों आदि का क्रम इसी प्रकार जानना चाहिए ॥१५७-१५९॥
षड् युग्मेष्वानताद्येषु सप्तस्थानेष्विति क्रमात्।
एकैकस्य सुरेन्द्रस्य देवी संख्योच्यते पृथक् ॥१६०॥
स्युर्द्वात्रिंशत्सहस्राणि ततोऽष्टौ द्वे सहस्त्रके।
सहस्रार्धं तदर्धार्थं त्रिषष्टि वल्लभास्त्रियः ॥१६१॥
विद्यन्ते पूर्वदिग्भागे देवेन्द्रस्तम्भसद्मनः।
वल्लभानां मनोज्ञाः सत्प्रासादा मणिमूर्तयः ॥१६२॥
तत्प्रासादोदयः पूर्वो योजनैः शतपञ्चभिः।
तद्धीनश्च शतार्धेन व्यासायामौ हि पूर्ववत् ॥१६३॥
अर्थ (श्लोक 160 से 163): सौधर्मादि छह एवं आनतादि का एक, इस प्रकार सातों स्थानों में स्थित एक-एक इन्द्र की वल्लभा देवांगनाओं का पृथक्-पृथक् प्रमाण क्रमश: कहते हैं। प्रत्येक स्थान की संख्या क्रमश: ३२०००, ८०००, २०००, ५००, २५०, १२५ और ६३ है। प्रत्येक इन्द्रों के स्तम्भ मन्दिरों (प्रासादों) की पूर्व दिशा में वल्लभ देवांगनाओं के अति मनोज्ञ मणिमय प्रासाद हैं। इनमें प्रथम स्थान के प्रासाद की ऊँचाई ५०० योजन है, इसके आगे क्रमश: पचास-पचास योजन हीन होती गई है। इन प्रासादों का व्यास और आयाम भी पूर्ववत् जानना चाहिए ॥१६०-१६३॥ उपर्युक्त गद्य का सम्पूर्ण अर्थ निम्नलिखित तालिका में निहित है। विशेष इतना है कि प्रत्येक स्थानों में जो प्रमाण दर्शाया जा रहा है, वह प्रमाण सौधर्मादि प्रत्येक इन्द्रों का पृथक्-पृथक् समझना चाहिए।
सप्तस्थानेषु सर्वेषामिन्द्राणां दिव्यमूर्तयः।
प्रत्येकं स्युर्महादेव्योऽष्टौ विश्वाक्षसुखप्रदाः ॥१६४॥
शची पद्मा शिवा श्यामा कालिंदी सुलसार्जुना।
भानेति दक्षिणेन्द्राणां देवीनामानि सर्वतः ॥१६५॥
श्रीमती संज्ञिका रामा सुसीमा विजयावती।
जयसेना सुषेणाख्या सुमित्राथ वसुन्धरा ॥१६६॥
सर्वत्रैवोत्तरेन्द्राणां देवीनामान्यमून्यपि।
एकैका च महादेवी विक्रियेर्धि प्रभावतः ॥१६७॥
विना मूलशरीरं चाद्ये युग्मे विकरोत्यपि।
स्वसमानि सहस्त्राणि विक्रियाङ्गानि षोडश ॥१६८॥
तेभ्य ऊर्ध्वेषु षट्स्थानेष्वैकैकावासवाङ्गना।
द्विगुण द्विगुण्यान्याशु कुर्याद् रूपाणि योषिताम् ॥१६९॥
एकैकस्या महादेव्याः परिवारवरस्त्रियः।
स्युः षोडशसहस्राणि प्रीता प्रथम युग्मके ॥१७०॥
ततः स्थानेषु शेषेषु परिवारसुराङ्गनाः।
अर्धार्धाः स्युः क्रमादेकैक शच्या विनयाङ्किताः ॥१७१॥
अर्थ (श्लोक 164 से 171): सातों स्थानों में प्रत्येक इन्द्रों के दिव्य मूर्ति को धारण करने वाली एवं समस्त इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वाली आठ-आठ महादेवियाँ हैं। समस्त दक्षिणेन्द्रों की आठ-आठ महादेवियों के नाम शची, पद्मा, शिवा, श्यामा, कालिंदी, सुलसा, अर्जुना और भान हैं तथा सर्व उत्तरेन्द्रों की महादेवियों के नाम श्रीमती, रामा, सुसीमा, विजयावती, जयसेना, सुषेणा, सुमित्रा और वसुन्धरा हैं। प्रथम युगल में पृथक्-पृथक् एक-एक महादेवी विक्रिया ऋद्धि के प्रभाव से मूल शरीर के बिना अपने समान सोलह-सोलह हजार विक्रिया शरीर को धारण करने वाली हैं। प्रथम युगल से ऊपर छह स्थानों में प्रत्येक इन्द्र की एक-एक महादेवी दूनी-दूनी विक्रिया धारण करती हैं। प्रथम युगल में एक-एक महादेवी की सोलह-सोलह हजार परिवार देवियाँ हैं तथा शेष छह स्थानों में क्रम से एक-एक महादेवी की विनय से युक्त परिवार देवांगनाओं का प्रमाण क्रमशः अर्ध-अर्ध होता गया है ॥१६४-१७१॥
महादेवीसमस्तप्रासादानामुदयोधिकः ।
विंशत्यायोजनानां स्याद्वल्लभाभवनोदयात् ॥१७२॥
प्रासादानां तथायामः स्वोत्सेधात् पञ्चमांशकः।
पूर्ववद्दशमो भागो विष्कम्भः सर्वतो भवेत् ॥१७३॥
अर्थ (श्लोक 172 से 173): समस्त महादेवियों के प्रासादों की ऊँचाई वल्लभा देवांगनाओं के प्रासादों की ऊँचाई से बीस-बीस योजन अधिक है, आयाम अपनी-अपनी ऊँचाई का पाँचवाँ भाग और विष्कम्भ पूर्व के सदृश अपनी-अपनी ऊँचाई के दसवें भाग प्रमाण है ॥१७२-१७३॥
मध्येऽमरावतीसंज्ञे पुरस्यैशानसद्दिशि।
इन्द्रस्तम्भगृहस्यास्ति सभास्थानसुमण्डपः ॥१७४॥
सुधर्मसंज्ञकस्तुङ्गः पञ्चसप्ततियोजनैः।
शतैकयोजनायामः पञ्चाशद्विस्तरान्वितः ॥१७५॥
अर्थ (श्लोक 174 से 175): अमरावती नामक नगर के मध्य में इन्द्रस्तम्भ प्रासाद की ईशान दिशा में सभा स्थान नामक सुन्दर मण्डप है, जिसका नाम सुधर्म सभा है। इस सुधर्म सभा की ऊँचाई ७५ योजन (६०० मील), लम्बाई १०० योजन (८०० मील) और चौड़ाई ५० योजन (४०० मील) प्रमाण है ॥१७४-१७५॥
पूर्वोत्तरदिशोर्दक्षिणाशायां तस्य सन्ति च।
द्व्यष्टयोजनतुङ्गानि विस्तृतान्यष्टयोजनैः ॥१७६॥
रत्नद्वाराणि देव्योघैर्दुर्गमाणि सुरोत्करैः।
तन्मध्ये स्वर्गनाथस्य दिव्यं स्याद्धरिविष्टरम् ॥१७७॥
अर्थ (श्लोक 176 से 177): आस्थान मण्डप की पूर्व, उत्तर और दक्षिण दिशा में १६ योजन ऊँचे और ८ योजन चौड़ाई के प्रमाण को लिए हुए, एक-एक दरवाजा है। ये द्वार रत्नों से निर्मित और देव देवियों के समूह से अलङ्घनीय हैं। मण्डप के मध्य भाग में इन्द्र का एक दिव्य सिंहासन है ॥१७६-१७७॥
तस्य सिंहासनस्यात्र तिष्ठन्ति सन्मुखानि च।
अष्टानां तन्महादेवीनां महान्त्यासनान्यपि ॥१७८॥
पूर्वादिदिक्षु तिष्ठन्ति लोकपालासनानि च।
अन्येषां देवसङ्घानां यथार्हमासनान्यपि ॥१७९॥
अर्थ (श्लोक 178 से 179): उस सिंहासन के सम्मुख (आगे) अष्ट महादेवांगनाओं के महान् आसन अवस्थित हैं। महादेवियों के आसनों से बाहर पूर्वादि दिशाओं में चारों लोकपालों के आसन हैं तथा दक्षिण आदि दिशाओं में अन्य देवों के योग्य आसन हैं। अर्थात् इन्द्र के सिंहासन की आग्नेय, दक्षिण और नैऋत्य में अभ्यन्तर आदि परिषदों के, नैऋत्य में त्रायस्त्रिंश देवों के, पश्चिम में सेना नायकों के, वायव्य एवं ईशान में सामानिक देवों के तथा पूर्वादि चारों दिशाओं में अंगरक्षक देवों के आसन हैं ॥१७८-१७९॥
तस्याग्रे रत्नपीठस्थो मानस्तम्भोऽस्ति मानहृत्।
षड्त्रिंशद्योजनोत्तुङ्गो योजनव्यास ऊर्जितः ॥१८०॥
वज्रकायः स्फुरत्कान्तिर्महाध्वजविभूषितः।
मस्तके जिनबिम्बाढ्यः स्वांशूद्द्योतित दिग्मुखः ॥१८१॥
क्रौशैकक्रमविस्तीर्ण कोटिद्वादशराजितः।
अधोभागे विहायास्य क्रोशोन योजनानि षट् ॥१८२॥
ऊर्ध्वभागे परित्यज्य क्रोशाग्रयोजनानि षट्।
तिष्ठन्ति मणिमञ्जूषा रत्नरज्जु विलम्बिताः ॥१८३॥
क्रोशायाम युताः क्रोशचतुर्थभागविस्तृताः।
सुभूषणा जिनेन्द्राणां विद्यन्ते तासु सञ्चिताः ॥१८४॥
भरतैरावतोत्पन्नानां सुरत्नमयाः परे।
निरौपम्या क्रमायाताः सौधर्मेशानकल्पयोः ॥१८५॥
पूर्वापरविदेहोत्थार्हतां विभूषणा इति।
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः सन्ति रत्नशालिनः ।१८६॥
अर्थ (श्लोक 180 से 186): उस सभामण्डप के आगे रत्नमयी पीठ पर मान को हरण करने वाला, ३६ योजन (२८८ मील) ऊँचा, एक योजन (८ मील) चौड़ा, वज्रमयी देदीप्यमान कान्ति वाली महाध्वजा से विभूषित, शिखर (मस्तक) पर जिनबिम्बों से युक्त एवं अपनी किरणों से दसों दिशाओं को प्रकाशित करने वाला एक मानस्तम्भ है। इसमें क्रमशः एक-एक कोश विस्तार वाली सूर्य सदृश प्रकाशमान बारह धाराएँ हैं। इन ३६ योजन ऊँचाई वाले मानस्तम्भों के अधोभाग में पौने छह योजन और उपरिम भाग में सवा छह योजन छोड़कर शेष मध्य भाग में रत्नमयी रस्सियों के सहारे लटकते हुए मणिमय करण्ड (पिटारे) हैं। इन पिटारों की लम्बाई एक कोश एवं चौड़ाई पाव कोश प्रमाण है। इन करण्डों में जिनेन्द्र देवों (तीर्थंकरों) के पहनने योग्य अनेक प्रकार के आभरण आदि संचित रहते हैं। भरत क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले तीर्थंकरों के उत्तम रत्नमयी एवं उपमा रहित आभूषण सौधर्म स्वर्गस्थ मानस्तम्भ पर, ऐरावत क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के ऐशान स्वर्गस्थ मानस्तम्भों पर, पूर्व विदेह क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के सानत्कुमार स्वर्गस्थ मानस्तम्भ पर एवं पश्चिम विदेह क्षेत्रोत्पन्न तीर्थंकरों के रत्नमयी आभूषण माहेन्द्र स्वर्गस्थ मानस्तम्भों पर स्थित मञ्जूषाओं में अवस्थित रहते हैं ॥१८०-१८६॥
तस्य पार्श्वेऽस्ति शक्रस्योपपादगृहमूर्जितम्।
अष्टयोजनविस्तारायामोन्नति युतं परम् ॥१८७॥
तस्मिन्गृहान्तरे रत्नशिलायुग्मं च विद्यते।
शिलासम्पुटयोर्गर्भे रत्नशय्यातिकोमला ॥१८८॥
कृतपुण्यस्य शक्रस्य तस्यां जन्मसुखाब्धिगम्।
सुखेन जायतेऽङ्गं सम्पूर्णमन्तर्मुहूर्तः ॥१८९॥
अर्थ (श्लोक 187 से 189): मानस्तम्भ के पार्श्वभाग में ८ योजन चौड़ा, ८ योजन लम्बा, ८ योजन ऊँचा एवं अति श्रेष्ठ इन्द्र का उपपाद गृह है। उस उपपाद गृह के भीतर रत्नों की दो शिलाएँ हैं तथा उन शिलाओं के मध्य में अत्यन्त कोमल रत्न शय्याएँ हैं। उन शय्याओं पर पूर्वभव में किया है पुण्य जिन्होंने, ऐसे इन्द्रों की उत्पत्ति सुखपूर्वक होती है तथा उनका सुख समुद्र सदृश सम्पूर्ण शरीर अन्तर्मुहूर्त में पूर्ण हो जाता है ॥१८७-१८९॥
षडलक्षसद्धिमानानि सौधर्मे सन्ति केवलम्।
स्वर्गदेवीसमुत्पादस्थानानि शाश्वतानि च ॥१९०॥
ईशाने स्युश्चतुर्लक्षं विमानाः सुरयोषिताम्।
लभन्ते केवलं येषु जन्म देव्यो न चामराः ॥१९१॥
एभ्य स्ताः स्वस्वसम्बन्धिनीर्देवीश्च समुद्भवाः।
सनत्कुमारकल्पाद्यच्युतान्तवासिनोऽमराः ॥१९२॥
स्वस्वास्थानं नयन्त्याशु विज्ञायावधिना निजाः।
शेष कल्पेषु देवीनामुत्पादो नास्तिजातुचित् ॥१९३॥
सौधर्मेशानयोः शेषा ये विमाना हि तेषु च।
प्राप्नुवन्ति निजं जन्म देवा देव्यः शुभोदयात् ॥१९४॥
अर्थ (श्लोक 190 से 194): सौधर्म स्वर्ग में उत्तम और शाश्वत छह लाख विमान शुद्ध हैं, जिनमें (अच्युत स्वर्ग पर्यन्त के दक्षिण कल्पों की) मात्र देवांगनाओं की उत्पत्ति होती है तथा ईशान स्वर्ग में चार लाख विमान शुद्ध हैं, जिनमें (उत्तर कल्पों की) मात्र देवांगनाओं का जन्म होता है, इन (दस लाख) विमानों में देवों की उत्पत्ति नहीं होती। उत्पत्ति के तुरन्त बाद ही सनत्कुमार कल्प से अच्युत कल्प पर्यन्त के देव अपनी अपनी नियोगिनी देवांगनाओं को अवधिज्ञान से जानकर अपने-अपने स्थानों पर ले जाते हैं। सौधर्मेशान स्वर्गों को छोड़कर शेष स्वर्गों में देवांगनाओं की उत्पत्ति कदापि नहीं है। सौधर्म स्वर्गस्थ अवशेष (३२ लाख-६ लाख=२६ लाख) विमानों में तथा ऐशान स्वर्गस्थ अवशेष (२८ लाख-४ लाख=२४ लाख) विमानों में शुभ कर्मोदय से युक्त देव एवं देवांगनाओं-दोनों की उत्पत्ति होती है ॥१९०-१९४॥
सौधर्मेशानयोर्ज्योतिष्कभौमभावनेषु च।
सुखं कायप्रवीचारं देवा देव्यो भजन्ति च ॥१९५॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिदेवस्त्रियां भवेत्।
सुखं स्पर्शप्रवीचारमालिङ्गनादिजं महत् ॥१९६॥
स्याद्ब्रह्मादिचतुःस्वर्गस्थ देववरयोषिताम्।
सुखं रूपप्रवीचारं रूपादिदर्शनोद्भवम् ॥१९७॥
ततः शुक्रादिकल्पेषु चतुर्षु सुरयोषिताम्।
सुखं शब्दप्रवीचारं भवेद् गीतस्वरादिजम् ॥१९८॥
आनतादिचतुःस्वर्गवासिदेवी दिवौकसाम्।
सुखं मनःप्रवीचारं स्याद्देवी स्मरणोद्भवम् ॥१९९॥
अहमिन्द्राः परे विश्वे प्रवीचार सुखातिगाः।
कामदाहोज्झिताः सन्ति महाशर्माब्धिमध्यगाः ॥२००॥
अर्थ (श्लोक 195 से 200): [काम सेवन को प्रवीचार कहते हैं] सौधर्मेशान कल्पों, ज्योतिष्कों, भवनवासियों और व्यन्तरवासियों में देव एवं देवांगनाएँ काय (शरीर) प्रवीचार पूर्वक सुख भोगते हैं अर्थात् देव अपनी देवांगनाओं के साथ मनुष्यों के सदृश काम सेवन करते हैं किन्तु उनके वीर्य स्खलन नहीं होता क्योंकि उनका शरीर सप्त धातुओं से रहित है। सानत्कुमार-माहेन्द्र कल्पों के देव अपनी देवांगनाओं के आलिंगन आदि से उत्पन्न होने वाले स्पर्श प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर और लांतव-कापिष्ठ कल्पों के देव अपनी देवांगनाओं के रूपादिक के अवलोकन से उत्पन्न होने वाले रूप प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। शुक्र-महाशुक्र और शतार-सहस्रार स्वर्गों के देव अपनी देवांगनाओं के गीत एवं स्वर आदि के सुनने से उत्पन्न होने वाला शब्द प्रवीचार रूप सुख भोगते हैं तथा आनतादि चार कल्पों के देव देवियों के स्मरण मात्र से उत्पन्न होने वाले मनः प्रवीचार रूप सुख का अनुभव करते हैं। इसके आगे नव ग्रैवेयक से सर्वार्थसिद्धि पर्यन्त के सभी देव अहमिन्द्र हैं। ये प्रवीचार (काम वासना) से रहित, काम दाह से रहित एवं अप्रवीचार जन्य महासुख समुद्र के मध्य अवगाहन करते हैं ॥१९५-२००॥
सौधर्मेशानकल्पस्था देवाः पश्यन्ति चावधेः।
प्रथमक्षितिपर्यन्तान् रूपिद्रव्यांश्चराचरान् ॥२०१॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिनोऽवधिना स्वयम्।
लोकयन्ति द्वितीया क्ष्मा पर्यन्तं वस्तुसञ्चयान् ॥२०२॥
ब्रह्माख्यादिचतुःस्वर्गस्थाः प्रपश्यन्ति निर्जराः।
तृतीयभूमिपर्यन्तस्थितद्रव्याणि चावधेः ॥२०३॥
शुक्रादिक चतुःस्वर्गवासिनोऽवधिनेत्रतः।
चतुर्थी क्षिति सीमान्ताल्लोकन्ते द्रव्यसञ्चयान् ॥२०४॥
आनतादिचतुःकल्प वासिनः स्वावधेर्बलात्।
पञ्चमीक्ष्मान्तगान् रूपिद्रव्यान् पश्यन्ति चाखिलान् ॥२०५॥
नवग्रैवेयकस्थाहमिन्द्रा आलोकयन्ति च।
पदार्थान् रूपिणः षष्ठीधरान्तस्थान् निजावधेः ॥२०६॥
नवानुदिशपञ्चानुत्तरवास्यहमिन्द्रकाः ।
रूपिद्रव्यान् प्रपश्यन्ति सप्तमी क्ष्मान्तमञ्जसा ॥२०७॥
लोकनाडीगतान् विश्वान् रूपिद्रव्यांश्चराचरान्।
लोकन्तेऽवधिनेत्रेण पञ्चानुत्तरवासिनः ॥२०८॥
सौधर्ममुख्य पञ्चानुत्तरवासि सुधाभुजाम्।
प्रथमापृथिवीमुख्यलोकनाड्यन्तमध्यगाः ॥२०९॥
अवधिज्ञानतुल्यास्तिविक्रियर्द्धिर्नेकधा ।
सप्तमी क्षितिपर्यन्तगमनागमन क्षमा ॥२१०॥
मतिश्रुतावधिज्ञानानि सदृष्टिदिवौकसाम्।
सम्यग्भवन्ति रूप्यर्थप्रत्यक्षज्ञायकान्यपि ॥२११॥
मिथ्यादृष्टिकुदेवानां विपरीतानि तानि च।
कुज्ञानानि प्रजायन्ते विपरीतार्थ वेदनात् ॥२१२॥
अर्थ (श्लोक 201 से 212): सौधर्मेशान कल्प स्थित देव अपने अवधिज्ञान से नरक की प्रथम पृथ्वीपर्यन्त के रूपी द्रव्यों को चराचर देखते हैं। सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्प स्थित देव अपने अवधि नेत्र से दूसरी वंशा पृथ्वी पर्यन्त के समस्त रूपी द्रव्यों को जानते हैं। ब्रह्मादि चार स्वर्गस्थ देव तीसरी मेघा पृथ्वी पर्यन्त के रूपी द्रव्यों को अवधि द्वारा जानते हैं। शुक्रादि चार स्वर्गस्थ देव अपने अवधि नेत्र से चौथी अञ्जना पृथ्वी पर्यन्त के सकल रूपी द्रव्यों को जानते हैं। आनतादि चार स्वर्गस्थ देव अपने अवधिज्ञान के बल से पाँचवीं अरिष्टा पृथ्वी पर्यन्त के समस्त रूपी द्रव्यों को देखते हैं। नव ग्रैवेयक स्वर्गों में स्थित देव छठी मधवी पृथ्वी पर्यन्त के सकल रूपी द्रव्यों को अपने अवधिज्ञान से जानते हैं। नव अनुदिश एवं पाँच अनुत्तर अर्थात् चौदह विमानों में स्थित अहमिन्द्र सातवीं माधवी पृथ्वी पर्यन्त के रूपी द्रव्यों को जानते हैं और पाँच अनुत्तर विमानवासी देव अपने अवधि नेत्र से लोकनाड़ी पर्यन्त के सर्व रूपी द्रव्यों को अपने अवधि नेत्र से चराचर देखते हैं। सौधर्म स्वर्ग से लेकर पाँच अनुत्तर पर्यन्त के देव क्रमशः नरक की प्रथम पृथ्वी से लोकनाड़ी के भीतर सप्तम पृथ्वी पर्यन्त अवधिज्ञान के सदृश ही अनेक प्रकार की विक्रिया करने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं तथा इसी प्रकार सप्तम पृथ्वी पर्यन्त गमनागमन की शक्ति से भी सयुक्त होते हैं। स्वर्गों में सम्यग्दृष्टि देवों के मति, श्रुत एवं अवधिज्ञान समीचीन होते हैं, जिससे ये रूपी पदार्थों को प्रत्यक्ष जानते हैं, किन्तु मिथ्यादृष्टि देवों के ये तीनों ज्ञान मिथ्या होते हैं, क्योंकि वे (कारणादि विपर्यास के कारण) पदार्थों (तत्त्वों) को विपरीत जानते हैं अतः उनका ज्ञान कुज्ञान कहलाता है ॥२०१-२१२॥
सौधर्मैशानयोः प्रोक्तमुत्पत्तौ मरणेऽन्तरम्।
उत्कृष्टेन च देवानां दिनानि सप्त नान्यथा ॥२१३॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रवासिनां कर्मपाकतः।
सम्भवे मरणेख्यातं पक्षैकमन्तरं परम् ॥२१४॥
अन्तरं ब्रह्मनाकादि चतुःस्वर्ग निवासिनाम्।
उत्पत्तौ च्यवने स्याच्च महन्मासैकमेवहि ॥२१५॥
अन्तरं मरणोत्पत्तौ भवेच्च नाकिनां विधेः।
मासौ द्वौ परमं शुक्रादिकस्वर्ग चतुष्टये ॥२१६॥
आनतादि चतुःस्वर्गवासिनामुत्तमान्तरम्।
चतुर्मासावधिर्ज्ञेयं मरणे सम्भवे तथा ॥२१७॥
नवग्रैवेयकाद्येषु मरणे च समुद्भवे।
सर्वेषामहमिन्द्राणां मासषट्कं परान्तरम् ॥२१८॥
अर्थ (श्लोक 213 से 218): [उत्कृष्टता से जितने काल तक किसी भी जीव का जन्म न हो उसे जन्मान्तर और मरण न हो उसे मरणान्तर कहते हैं] सौधर्मैशान इन कल्पों में यदि कोई भी जीव जन्म न ले तो अधिक से अधिक सात दिन पर्यन्त न ले। इसी प्रकार मरण न करे तो सात दिन पर्यन्त न करे, इसलिये वहाँ देवों के जन्म-मरण का अन्तर सात दिन कहा गया है। सनत्कुमार-माहेन्द्र कल्पवासी देवों के कर्म उदयानुसार जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर एक पक्ष है। ब्रह्म आदि चार स्वर्गों के देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर एक माह है। शुक्र आदि चार स्वर्गों के देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर दो मास है। आनतादि चार स्वर्गों में निवास करने वाले देवों के जन्म-मरण का उत्कृष्ट अन्तर चार माह का जानना चाहिए। नव ग्रैवेयक आदि उपरिम सर्व विमानों में उत्पन्न होने वाले सर्व अहमिन्द्रों का उत्कृष्ट जन्मान्तर एवं मरणान्तर छह माह का है ॥२१३-२१८॥
इन्द्रस्य च महादेव्या लोकपालस्य दुस्सहः।
जायते विरहो मासषट्कं हि च्यवने महान् ॥२१९॥
त्रायस्त्रिंशसुराणां च सामानिकसुधाशिनाम्।
अङ्गरक्षकदेवानां च्यवने सति दुस्सहम् ॥२२०॥
परिषदत्रयदेवानां वियोगोद्भवमन्तरे।
मानसं जायते दुःखं चतुर्मासान्तमुत्तमम् ॥२२१॥
अर्थ (श्लोक 219 से 221): इन्द्र, इन्द्र की महादेवी और लोकपाल इनका दुस्सह उत्कृष्ट विरहकाल छह माह प्रमाण है। अर्थात् इनका मरण होने पर कोई अन्य जीव उस स्थान पर अधिक से अधिक छह माह तक जन्म नहीं लेगा। त्रायस्त्रिंश, सामानिक, अंगरक्षक और परिषद देवों का मरण होने के बाद उनके दुस्सह वियोग से उत्पन्न होने वाला मानसिक दुःख उत्कृष्ट रूप से चार माह पर्यन्त होता है। अर्थात् इनका उत्कृष्ट विरहकाल चार माह है ॥२१९-२२१॥
ईशानान्तं प्रजायन्ते कन्दर्पाः कुत्सिताः सुराः।
लान्तवस्वर्गपर्यन्तं नीचाः किल्विषिकामराः ॥२२२॥
अच्युतान्तेषु कल्पेषूत्पद्यन्ते वाहनामराः।
आभियोगिकसंज्ञाश्च स्वपापपुण्यपाकतः ॥२२३॥
अर्थ (श्लोक 222 से 223): (कन्दर्प परिणामी मनुष्य) अपने-अपने पाप एवं पुण्योदय से कुत्सित परिणामी कन्दर्प जाति के देवों में ईशान कल्प पर्यन्त, (किल्विषिक परिणामी मनुष्य) नीच परिणामी किल्विष जाति के देवों में लान्तव कल्प पर्यन्त और (अभियोग्य भावना से युक्त मनुष्य) आभियोगिक है नाम जिनका, ऐसे वाहन जाति के देवों में अच्युत कल्प पर्यन्त उत्पन्न होते हैं, इससे ऊपर नहीं (इनकी उत्पत्ति क्षेत्र सम्बन्धी जघन्यायु होती है) ॥२२२-२२३॥
आयुः पल्यं जघन्यं स्यादुत्कृष्टं सागरार्धकम्।
सौधर्मस्यादिमेऽन्ते पटले सार्धौ द्विसागरौ ॥२२४॥
सनत्कुमारमाहेन्द्रयोः सार्धसप्तसागराः।
ब्रह्मब्रह्मोत्तरे चायुर्महत्सार्धदशाब्धयः ॥२२५॥
आयुर्लान्तवकापिष्टे सार्धद्विसप्तवार्धयः।
तथा शुक्रमहाशुक्रयोः सार्धषोडशाब्धयः ॥२२६॥
शतारादिद्वये चायुः सार्धाष्टादशसागराः।
आनतप्राणतस्वर्गे प्रोत्कृष्टं विंशवार्धयः ॥२२७॥
आरणाच्युतयोर्देवानां तद् द्वाविंशसागराः।
ततः सागर एकैक आदिग्रैवेयकादिषु ॥२२८॥
वर्धते चाहमिन्द्राणां यावद्ग्रैवेयकान्तिमे।
आयुस्तिष्ठति वार्धीनामेकत्रिंशन्मितं परम् ॥२२९॥
नवानुदिशदेवानामायुर्द्वात्रिंशदब्धयः ।
पञ्चानुत्तरदेवानां त्रयस्त्रिंशच्च सागराः ॥२३०॥
इत्युत्कृष्टं पृथक् प्रोक्तमायुश्च नाकिनां क्रमात्।
अधःस्थे पटले ज्येष्ठं यत्तदूर्ध्वजघन्यकम् ॥२३१॥
अर्थ (श्लोक 224 से 231): सौधर्मेशान कल्प के प्रथम पटल में जघन्य आयु एक पल्य और उत्कृष्ट आयु अर्ध सागर प्रमाण तथा अन्तिम पटल में उत्कृष्ट आयु २ १/२ सागर प्रमाण है। सनत्कुमार-माहेन्द्र की उत्कृष्ट आयु ७ १/२ सागर तथा ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर की १० १/२ सागर प्रमाण है। लान्तव-कापिष्ठ कल्पों की १४ सागर एवं शुक्र-महाशुक्र युगल की उत्कृष्ट आयु १६ १/२ सागर प्रमाण है। शतार-सहस्रार की १८ सागर और आनत-प्राणत युगल की उत्कृष्ट आयु २० सागर प्रमाण है। आरण-अच्युत स्वर्गों की उत्कृष्ट आयु २२ सागर प्रमाण है। इसके आगे प्रथमादि नव ग्रैवेयकों में स्थित अहमिन्द्रों की आयु में क्रमशः एक-एक सागर की वृद्धि (२३, २४, २५, २६, २७, २८, २९, ३० सागर) होते हुए अन्तिम ग्रैवेयक की उत्कृष्ट आयु ३१ सागर प्रमाण है। नव अनुदिश स्थित देवों की आयु ३२ सागर तथा पंच अनुत्तरों में स्थित देवों की उत्कृष्ट आयु ३३ सागर प्रमाण है। इस प्रकार देवों की पृथक्-पृथक् उत्कृष्ट आयु क्रमशः कही गई है। नीचे-नीचे के पटलों (कल्पों) की जो उत्कृष्ट आयु होती है, ऊपर-ऊपर के पटलों की वही जघन्य आयु कही जाती है ॥२२४-२३१॥