पद्मपुराण श्लोक एवं अर्थ (आचार्य रविषेण) | Padma Puran Shlok evam Arth (Acharya Ravishena)

पद्मपुराण (पद्मचरित) श्लोक एवं अर्थ

श्रीमद् रविषेणाचार्य, हिन्दी अनुवाद डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य

पद्मपुराण के १२३ पर्वों के संस्कृत मूल श्लोक, और हर श्लोक समूह के नीचे उसका हिन्दी अर्थ, जैसा अनुवाद में छपा है (कई जगह एक अर्थ कई श्लोकों का साथ में है)। श्लोक और अर्थ भारतीय ज्ञानपीठ (मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला, संस्कृत ग्रन्थांक २१, २४, २६; सम्पादन एवं हिन्दी अनुवाद डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य; भाग १ आठवाँ संस्करण २०००, भाग २ सातवाँ संस्करण १९९९, भाग ३ दसवाँ संस्करण २००४) के संस्करण से ज्यों का त्यों लिए हैं। पाद टिप्पणियाँ और पाठभेद नहीं लिए। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल श्लोक: पद्मपुराण मूल श्लोक (आचार्य रविषेण) | Padma Puran Mool Shlok (Acharya Ravishena)

पूर्ण ग्रन्थ (प्रस्तावना एवं श्लोकानुक्रमणिका सहित, तीनों भाग PDF): पद्मपुराण (आचार्य रविषेण), हिंदी अनुवाद सहित, भाग 1 से 3 | Padma Puran (Acharya Ravishena), Parts 1 to 3

स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/59944, t.me/jainegranth/59945, t.me/jainegranth/59946

अनुक्रमणिका (पर्व):

१. प्रथमं पर्व (सूत्रविधानं)
२. द्वितीयं पर्व (श्रेणिकचिन्ताभिधानं)
३. तृतीयं पर्व (विद्याधरलोकाभिधानं)
४. चतुर्थं पर्व (ऋषभमाहात्म्याभिधानं)
५. पञ्चमं पर्व (राक्षसवंशाधिकारः)
६. षष्ठं पर्व (वानरवंशाभिधानं)
७. सप्तमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं)
८. अष्टमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं)
९. नवमं पर्व (बालिनिर्वाणाभिधानं)
१०. दशमं पर्व (दशग्रीवप्रस्थाने सहस्ररश्म्यनरण्य-श्रामण्याभिधानं)
११. एकादश पर्व (मरुत्वयज्ञध्वंसनपदानुगाभिधानं)
१२. द्वादशं पर्व (इन्द्रपराभवाभिधानं)
१३. त्रयोदशं पर्व (इन्द्रनिर्वाणाभिधानं)
१४. चतुर्दशं पर्व (अनन्तबलधर्माभिधानं)
१५. पञ्चदशं पर्व (अञ्जनासुन्दरीविवाहाभिधानं)
१६. षोडशं पर्व (पवनाञ्जनासंभोगाभिधानं)
१७. सप्तदशं पर्व (हनूमत्संभवाभिधानं)
१८. अष्टादशं पर्व (पवनाञ्जनासमागमाभिधानं)
१९. एकोनविंशतितमं पर्व (रावणसाम्राज्याभिधानं)
२०. विंशतितमं पर्व (तीर्थंकरभवानुकीर्तनं)
२१. एकविंशतितमं पर्व (सुव्रत-वज्रबाहु-कीर्तिमाहात्म्यवर्णनं)
२२. द्वाविंशतितमं पर्व (सुकोशलमाहात्म्ययुक्त-दशरथोत्पत्त्यभिधानं)
२३. त्रयोविंशतितमं पर्व (विभीषणव्यसनवर्णनं)
२४. चतुर्विंशतितमं पर्व (केकयावरप्रदानं)
२५. पञ्चविंशतितमं पर्व (चतुर्भ्रातृसंभवाभिधानं)
२६. षड्विंशतितमं पर्व (सीताभामण्डलोत्पत्त्यभिधानं)
२७. सप्तविंशतितमं पर्व (म्लेच्छपराजयसंकीर्तनं)
२८. अष्टाविंशतितमं पर्व (रामलक्ष्मणरत्नमालाभिधानं)
२९. एकोनत्रिंशत्तमं पर्व (दशरथवैराग्यसर्वभूतहितागमाभिधानं)
३०. त्रिंशत्तमं पर्व (भामण्डलसमागमाभिधानं)
३१. एकत्रिंशत्तमं पर्व (दशरथप्रव्रज्याभिधानं)
३२. द्वात्रिंशत्तमं पर्व (दशरथरामभरतानां प्रव्रज्यावनप्रस्थानराज्याभिधानं)
३३. त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व (वज्रकर्णोपाख्यानं)
३४. चतुस्त्रिंशत्तमं पर्व (वालिखिल्योपाख्यानं)
३५. पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व (कपिलोपाख्यानं)
३६. षट्त्रिंशत्तमं पर्व (वनमालाभिधानं)
३७. सप्तत्रिंशत्तमं पर्व (अतिवीर्यनिष्क्रमणाभिधानं)
३८. अष्टत्रिंशत्तमं पर्व (जितपद्मोपाख्यानं)
३९. एकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व (देशकुलभूषणोपाख्यानं)
४०. चत्वारिंशत्तमं पर्व (रामगिर्युपाख्यानं)
४१. एकचत्वारिंशत्तमं पर्व (जटायूपाख्यानं)
४२. द्विचत्वारिंशत्तमं पर्व (दण्डकारण्यनिवासाभिधानं)
४३. त्रिचत्वारिंशत्तमं पर्व (शम्बूकवधाभिधानं)
४४. चतुश्चत्वारिंशत्तमं पर्व (सीताहरणरामविलापाभिधानं)
४५. पञ्चचत्वारिंशत्तमं पर्व (सीतावियोगदाहाभिधानं)
४६. षट्चत्वारिंशत्तमं पर्व (मायाप्रकाराभिधानं)
४७. सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व (विटसुग्रीववधाख्यानं)
४८. अष्टचत्वारिंशत्तमं पर्व (कोटिशिलोत्क्षेपणाभिधानं)
४९. एकोनपञ्चाशत्तमं पर्व (हनुमत्प्रस्थानं)
५०. पञ्चाशत्तमं पर्व (महेन्द्रदुहितासमागमाभिधानं)
५१. एकपञ्चाशत्तमं पर्व (पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं)
५२. द्विपञ्चाशत्तमं पर्व (हनूमल्लङ्कासुन्दरीकन्यालाभाभिधानं)
५३. त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व (हनुमत्प्रत्यभिगमनं)
५४. चतुःपञ्चाशत्तमं पर्व (लङ्काप्रस्थानं)
५५. पञ्चपञ्चाशत्तमं पर्व (विभीषणसमागमाभिधानं)
५६. षट्पञ्चाशत्तमं पर्व (उभयबलप्रमाणविधानं)
५७. सप्तपञ्चाशत्तमं पर्व (रावणबलनिर्गमनं)
५८. अष्टपञ्चाशत्तमं पर्व (हस्तप्रहस्तवधाभिधानं)
५९. एकोनषष्टितमं पर्व (हस्तप्रहस्तनलनीलपूर्वभवानुकीर्त्तनं)
६०. षष्टितमं पर्व (विद्यालाभो)
६१. एकषष्टितमं पर्व (सुग्रीवभामण्डलसमाश्वासनं)
६२. द्वाषष्टितमं पर्व (शक्तिसंतापाभिधानं)
६३. त्रिषष्टितमं पर्व (शक्तिभेदरामविलापाभिधानं)
६४. चतुःषष्टितमं पर्व (विशल्यापूर्वभवाभिधानं)
६५. पञ्चषष्टितमं पर्व (विशल्यासमागमाभिधानं)
६६. षट्षष्टितमं पर्व (रावणदूतागमागमाभिधानं)
६७. सप्तषष्टितमं पर्व (शान्तिगृहकीर्तनं)
६८. अष्टषष्टितमं पर्व (फाल्गुनाष्टाह्निकामहिमविधानं)
६९. एकोनसप्ततितमं पर्व (लोकनियमकरणाभिधानं)
७०. सप्ततितमं पर्व (सम्यग्दृष्टिदेवप्रातिहार्यकीर्तनं)
७१. एकसप्ततितमं पर्व (बहुरूपविद्यासंनिधानाभिधानं)
७२. द्वासप्ततितमं पर्व (युद्धनिश्चयकीर्तनाभिधानं)
७३. त्रिसप्ततितमं पर्व (उद्योगाभिधानं)
७४. चतुःसप्ततितमं पर्व (रावण-लक्ष्मणयुद्धवर्णनाभिधानं)
७५. पंचसप्ततितमं पर्व (चक्ररत्नोत्पत्तिवर्णनं)
७६. षट्सप्ततितमं पर्व (दशग्रीववधाभिधानं)
७७. सप्तसप्ततितमं पर्व (प्रीतिङ्करोपाख्यानं)
७८. अष्टसप्ततितमं पर्व (इन्द्रजितादिनिष्क्रमणाभिधाने)
७९. एकोनाशीतितमं पर्व (सीतासमागमाभिधानं)
८०. अशीतितमं पर्व (मयोपाख्यानं)
८१. एकाशीतितमं पर्व (साकेतनगरीवर्णनं)
८२. द्व्यशीतितमं पर्व (रामलक्ष्मणसमागमाभिधानं)
८३. त्र्यशीतितमं पर्व (त्रिभुवनालङ्कारक्षोभाभिधानं)
८४. चतुरशीतितमं पर्व (त्रिभुवनालङ्कारशमाभिधानं)
८५. पञ्चाशीतितमं पर्व (भरतत्रिभुवनालङ्कारसमाध्यनुभवानुकीर्त्तनं)
८६. षडशीतितमं पर्व (भरतकेकयानिष्क्रमणाभिधानं)
८७. सप्ताशीतितमं पर्व (भरतनिर्वाणगमनं)
८८. अष्टाशीतितमं पर्व (राज्याभिषेकाभिधानं विभागदर्शनं)
८९. नवाशीतितमं पर्व (मधुसुन्दरवधाभिधानं)
९०. नवतितमं पर्व (मथुरोपसर्गाभिधानं)
९१. एकनवतितमं पर्व (शत्रुघ्नभवानुकीर्तनं)
९२. द्विनवतितमं पर्व (मथुरापुरीनिवेशऋषिदानगुणोपसर्गहनननाभिधानं)
९३. त्रिनवतितमं पर्व (मनोरमालंभाभिधानं)
९४. चतुर्णवतितमं पर्व (रामलक्ष्मणविभूतिदर्शनीयाभिधानं)
९५. पञ्चनवतितमं पर्व (जिनेन्द्रपूजादोहदाभिधानं)
९६. षण्णवतितमं पर्व (जनपरीवादचिन्ताभिधानं)
९७. सप्तनवतितमं पर्व (सीतानिर्वासनविप्रलापवज्रजङ्घगमनाभिधानं)
९८. अष्टनवतितमं पर्व (सीतासमाश्वासनं)
९९. नवनवतितमं पर्व (रामशोकाभिधानं)
१००. शतं पर्व (लवणांकुशोद्भवाभिधानं)
१०१. एकाधिकशतं पर्व (लवणाङ्कुशदिग्विजयकीर्तनं)
१०२. द्व्युत्तरशतं पर्व (लवणाङ्कुशसमेतयुद्धाभिधानं)
१०३. त्र्युत्तरशतं पर्व (रामलवणांकुशसमागमाभिधानं)
१०४. चतुरुत्तरशतं पर्व (सकलभूषणदेवागमनाभिधानं)
१०५. पञ्चोत्तरशतं पर्व (रामधर्मश्रवणाभिधानं)
१०६. षडुत्तरशतं पर्व (सपरिवर्गरामदेवपूर्वभवाभिधानं)
१०७. सप्तोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते प्रव्रजितसीताभिधानं)
१०८. अष्टोत्तरशतं पर्व (रविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशपूर्वभवाभिधानं)
१०९. नवोत्तरशतं पर्व (मधूपाख्यानं)
११०. दशाधिकशतं पर्व
१११. एकादशोत्तरशतं पर्व (भामण्डलपरलोकाभिगमनं)
११२. द्वादशोत्तरशतं पर्व (हनुमन्निर्वेदं)
११३. त्रयोदशोत्तरशतं पर्व (हनूमन्निर्वाणाभिधानं)
११४. चतुर्दशोत्तरशतं पर्व (रविषेणाचार्यप्रणीते शक्रसुरसंकथाभिधानं)
११५. पञ्चदशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशतपोऽभिधानं)
११६. षोडशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते रामदेवविप्रलापं)
११७. सप्तदशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लक्ष्मणवियोगविभीषणसंसारस्थितिवर्णनं)
११८. अष्टादशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते लक्ष्मणसंस्कारकरणं कल्याणमित्रदेवाभिगमाभिधानं)
११९. एकोनविंशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाऽऽचार्यप्रणीते बलदेवनिष्क्रमणाभिधानं)
१२०. विंशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पुरसंक्षोभाभिधानं)
१२१. एकविंशोत्तरशतं पर्व (दानप्रसङ्गाभिधानं)
१२२. द्वाविंशत्युत्तरशतं पर्व (पद्मस्य केवलोत्पत्त्यभिधानं)
१२३. त्रयोविंशोत्तरशतं पर्व (बलदेवसिद्धिगमनाभिधानं)

१. प्रथमं पर्व (सूत्रविधानं)

सिद्धं संपूर्णभव्यार्थं सिद्धेः कारणमुत्तमम् । प्रशस्तदर्शनज्ञानचारित्रप्रतिपादिनम् ॥१॥

सुरेन्द्रमुकुटाश्लिष्टपादपद्मांशुकेशरम् । प्रणमामि महावीरं लोकत्रितयमङ्गलम् ॥२॥

अर्थ: जो स्वयं कृतकृत्य हैं, जिनके प्रसादसे भव्यजीवोंके मनोरथ पूर्ण होते हैं, जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका प्रतिपादन करनेवाले हैं, जिनके चरणकमलोंकी किरणरूपी केशर इन्द्रोंके मुकुटोंसे आश्लिष्ट हो रही है तथा जो तीनों लोकोंमें मंगलस्वरूप हैं ऐसे महावीर भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१-२॥


प्रथमं चावसर्पिण्यामृषभं जिनपुङ्गवम् । योगिनं सर्वविद्यानां विधातारं स्वयंभुवम् ॥३॥

अर्थ: जो योगी थे, समस्त विद्याओंके विधाता और स्वयम्भू थे ऐसे अवसर्पिणी कालके प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभजिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥३॥


अजितं विजिताशेषबाह्यशारीरशात्रवम् । शम्भवं शं भवत्यस्मादित्यभिख्यामुपागतम् ॥४॥

अर्थ: जिन्होंने समस्त अन्तरंग और बहिरंग शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली ऐसे अजितनाथ भगवान्को तथा जिनसे शम् अर्थात् सुख प्राप्त होता है ऐसे सार्थक नामको धारण करनेवाले शम्भवनाथ भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥४॥


अभिनन्दितनिःशेषभुवनं चाभिनन्दनम् । सुमतिं सुमतिं नाथं मतान्तरनिरासिनम् ॥५॥

अर्थ: समस्त संसारको आनन्दित करनेवाले अभिनन्दन भगवान्को एवं सम्यग्ज्ञानके धारक और अन्य मत-मतान्तरोंका निराकरण करनेवाले सुमतिनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥५॥


उद्यदर्ककरालीढपद्माकरसमप्रभम् । पद्मप्रभं सुपार्श्वं च सुपार्श्वं सर्ववेदिनम् ॥६॥

अर्थ: उदित होते हुए सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त कमलोंके समूहके समान कान्तिको धारण करनेवाले पद्मप्रभ भगवान्को तथा जिनकी पसली अत्यन्त सुन्दर थीं ऐसे सर्वज्ञ सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥६॥


शरत्सकलचन्द्राभं परं चन्द्रप्रभं प्रभुम् । पुष्पदन्तं च संफुल्लकुन्दपुष्पप्रभद्विजम् ॥७॥

अर्थ: जिनके शरीरकी प्रभा शरद्ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान थी ऐसे अत्यन्त श्रेष्ठ चन्द्रप्रभ स्वामीको और जिनके दाँत फूले हुए कुन्द पुष्पके समान कान्ति के धारक थे ऐसे पुष्पदन्त भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥७॥


शीतलं शीतलध्यानदायिनं परमेष्ठिनम् । श्रेयांसं भव्यसत्त्वानां श्रेयांसं धर्मदेशिनम् ॥८॥

अर्थ: जो शीतल अर्थात् शान्तिदायक ध्यानके देनेवाले थे ऐसे शीतलनाथ जिनेन्द्रको तथा जो कल्याण रूप थे एवं भव्य- जीवोंको धर्मका उपदेश देते थे ऐसे श्रेयांसनाथ भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥८॥


वासुपूज्यं सतामीशं वसुपूज्यं जितद्विषम् । विमलं जन्ममूलानां मलानामतिदूरगम् ॥९॥

अर्थ: जो सज्जनोंके स्वामी थे एवं कुबेरके द्वारा पूज्य थे ऐसे वासुपूज्य भगवान्को और संसारके मूलकारण मिथ्यादर्शन आदि मलोंसे बहुत दूर रहनेवाले श्रीविमलनाथ भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥९॥


अनन्तं दधतं ज्ञानमनन्तं कान्तदर्शनम् । धर्मं धर्मध्रुवाधारं शान्तिं शान्तिजिताहितम् ॥१०॥

अर्थ: जो अनन्त ज्ञानको धारण करते थे तथा जिनका दर्शन अत्यन्त सुन्दर था ऐसे अनन्तनाथ जिनेन्द्रको, धर्मके स्थायी आधार धर्मनाथ स्वामीको और शान्तिके द्वारा ही शत्रुओंको जीतनेवाले शान्तिनाथ तीर्थंकरको नमस्कार करता हूँ ॥१०॥


कुन्थुप्रभृतिसत्त्वानां कुन्थुं हितनिरूपितम् । अशेषक्लेशनिर्मोक्षपूर्वसौख्यारणादरम् ॥११॥

अर्थ: जिन्होंने कुन्थु आदि समस्त प्राणियोंके लिए हितका निरूपण किया था ऐसे कुन्थुनाथ भगवान्को और समस्त दुःखोंसे मुक्ति पाकर जिन्होंने अनन्तसुख प्राप्त किया था ऐसे अरनाथ जिनेन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥११॥


संसारस्य निहन्तारं मल्लं मल्लिं मलोज्झितम् । नमिं च प्रणताशेषं सुरासुरगुरुं विभुम् ॥१२॥

अर्थ: जो संसारको नष्ट करनेके लिए अद्वितीय मल्ल थे ऐसे मलरहित मल्लिनाथ भगवान्को और जिन्हें समस्त लोग प्रणाम करते थे तथा सुर-असुर सभीके गुरु थे ऐसे नमिनाथ स्वामीको नमस्कार करता हूँ ॥१२॥


अरिष्टनेमिमन्यूनारिष्टनेमिं महाद्युतिम् । पार्श्वं नागेन्द्रसंसक्तपरिपार्श्वं विशां पतिम् ॥१३॥

अर्थ: जो बहुत भारी अरिष्ट अर्थात् दुःखसमूहको नष्ट करनेके लिए नेमि अर्थात् चक्रधाराके समान थे साथ ही अतिशय कान्तिके धारक थे ऐसे अरिष्टनेमि नामक बाईसवें तीर्थंकरको तथा जिनके समीपमें धरणेन्द्र आकर बैठा था साथ ही जो समस्त प्रजाके स्वामी थे ऐसे पार्श्वनाथ भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥१३॥


सुव्रतं सुव्रतानां च देशकं दोषदारिणम् । यस्य तीर्थे समुत्पन्नं पद्मस्य चरितं शुभम् ॥१४॥

अर्थ: जो उत्तम व्रतोंका उपदेश देनेवाले थे, जिन्होंने क्षुधा, तृषा आदि दोष नष्ट कर दिये थे और जिनके तीर्थमें पद्म अर्थात् कथानायक रामचन्द्रजीका शुभचरित उत्पन्न हुआ था ऐसे मुनि सुव्रतनाथ भगवान्को नमस्कार करता हूँ ॥१४॥


अन्यानपि महाभागान् मुनीन् गणधरादिकान् । प्रणम्य मनसा वाचा कायेन च पुनः पुनः ॥१५॥

अर्थ: इनके सिवाय महाभाग्यशाली गणधरों आदिको लेकर अन्यान्य मुनिराजोंको मन, वचन, कायसे बार-बार प्रणाम करता हूँ ॥१५॥


पद्मस्य चरितं वक्ष्ये पद्मालिङ्गितवक्षसः । प्रफुल्लपद्मवक्त्रस्य पुरुपुण्यस्य धीमतः ॥१६॥

अनन्तगुणगेहस्य तस्योदारविचेष्टिनः । गदितुं चरितं शक्तः केवलं श्रुतकेवली ॥१७॥

यादृशोऽपि वदत्येव चरितं यस्य यत्पुमान् । तच्चरितं क्रमायातं परमं देशदेशनात् ॥१८॥

अर्थ: इस प्रकार प्रणाम कर मैं उन रामचन्द्रजीका चरित्र कहूँगा जिनका कि वक्षःस्थल पद्मा अर्थात् लक्ष्मी अथवा पद्म नामक चिह्नसे आलिंगित था, जिनका मुख प्रफुल्लित कमलके समान था, जो विशाल पुण्यके धारक थे, बुद्धिमान् थे, अनन्त गुणोंके गृहस्वरूप थे और उदार-उत्कृष्ट चेष्टाओंके धारक थे। उनका चरित्र कहनेमें यद्यपि श्रुतकेवली ही समर्थ हैं तो भी आचार्य-परम्पराके उपदेशसे आये हुए उस उत्कृष्ट चरित्रको मेरे जैसे क्षुद्र पुरुष भी कर रहे हैं सो उसका कारण स्पष्ट ही है ॥१६-१८॥


मत्तवारणसंक्षुण्णे व्रजन्ति हरिणाः पथि । प्रविशन्ति भटा युद्धं महाभटपुरस्सराः ॥१९॥

अर्थ: मदोन्मत्त हाथियोंके द्वारा संचरित मार्गमें हरिण भी चले जाते हैं तथा जिनके आगे बड़े-बड़े योद्धा चल रहे हैं ऐसे साधारण योद्धा भी युद्धमें प्रवेश करते ही हैं ॥१९॥


भास्वता भासितानर्थान् सुखेनालोकते जनः । सूचीमुखविनिर्भिन्नं मणिं विशति सूत्रकम् ॥२०॥

अर्थ: सूर्यके द्वारा प्रकाशित पदार्थोंको साधारण मनुष्य सुखपूर्वक देख लेते हैं और सुईके अग्रभागसे बिदारे हुए मणिमें सूत अनायास ही प्रवेश कर लेता है ॥२०॥


बुधपङ्क्तिक्रमायातं चरितं रामगोचरम् । भक्त्या प्रणोदिता बुद्धिः प्रष्टुं मम समुद्यता ॥२१॥

अर्थ: रामचन्द्रजीका जो चरित्र विद्वानोंकी परम्परा से चला आ रहा है उसे पूछनेके लिए मेरी बुद्धि भक्तिसे प्रेरित होकर ही उद्यत हुई है ॥२१॥


विशिष्टचिन्तयायातं यच्च श्रेयः क्षणान्महत् । तेनैव रक्षिता याता चारुतां मम भारती ॥२२॥

अर्थ: विशिष्ट पुरुषोंके चिन्तवनसे तत्काल जो महान् पुण्य प्राप्त होता है उसीके द्वारा रक्षित होकर मेरी वाणी सुन्दरताको प्राप्त हुई है ॥२२॥


व्यक्ताकारादिवर्णा वाग् लम्भिता या न सत्कथाम् । सा तस्य निष्फला जन्तोः पापादानाय केवलम् ॥२३॥

अर्थ: जिस पुरुषकी वाणीमें अकार आदि अक्षर तो व्यक्त है पर जो सत्पुरुषोंकी कथाको प्राप्त नहीं करायी गयी है उसकी वह वाणी निष्फल है और केवल पाप-संचयका ही कारण है ॥२३॥


वृद्धिं व्रजति विज्ञानं यशश्चरति निर्मलम् । प्रयाति दुरितं दूरं महापुरुषकीर्तनात् ॥२४॥

अर्थ: महा-पुरुषोंका कीर्तन करनेसे विज्ञान वृद्धिको प्राप्त होता है, निर्मल यश फैलता है और पाप दूर चला जाता है ॥२४॥


अल्पकालमिदं जन्तोः शरीरं रोगनिर्भरम् । यशस्तु सत्कथाजन्म यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥२५॥

अर्थ: जीवोंका यह शरीर रोगोंसे भरा हुआ है तथा अल्प काल तक ही ठहरनेवाला है परन्तु सत्पुरुषोंकी कथासे जो यश उत्पन्न होता है वह जबतक सूर्य, चन्द्रमा और तारे रहेंगे तब-तक रहता है ॥२५॥


तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पुरुषेणात्मवेदिना । शरीरं स्थास्नु कर्त्तव्यं महापुरुषकीर्तनम् ॥२६॥

अर्थ: इसलिए आत्मज्ञानी पुरुषको सब प्रकारका प्रयत्न कर महापुरुषोंके कीर्तनसे अपना शरीर स्थायी बनाना चाहिए अर्थात् यश प्राप्त करना चाहिए ॥२६॥


लोकद्वयफलं तेन लब्धं भवति जन्तुना । यो विधत्ते कथां रम्यां सज्जनानन्ददायिनीम् ॥२७॥

अर्थ: जो मनुष्य सज्जनोंको आनन्द देनेवाली मनोहारिणी कथा करता है वह दोनों लोकोंका फल प्राप्त कर लेता है ॥२७॥


सत्कथाश्रवणौ यौ च श्रवणौ तौ मतौ मम । अन्यौ विदूषकस्येव श्रवणाकारधारिणौ ॥२८॥

अर्थ: मनुष्यके जो कान सत्पुरुषोंकी कथाका श्रवण करते हैं मैं उन्हें ही कान मानता हूँ बाकी तो विदूषकके कानोंके समान केवल कानोंका आकार ही धारण करते हैं ॥२८॥


सच्चेष्टावर्णना वर्णा घूर्णन्ते यत्र मूर्धनि । अयं मूर्द्धाऽन्यमूर्द्धा तु नालिकेरकरङ्कवत् ॥२९॥

अर्थ: सत्पुरुषोंकी चेष्टाको वर्णन करनेवाले वर्ण-अक्षर जिस मस्तकमें घूमते हैं वही वास्तवमें मस्तक है बाकी तो नारियलके करंक–कड़े आवरणके समान हैं ॥२९॥


सत्कीर्तनसुधास्वादसक्तं च रसनं स्मृतम् । अन्यच्च दुर्वचोधारं कृपाणदुहितुः फलम् ॥३०॥

अर्थ: जो जिह्वा सत्पुरुषोंके कीर्तन रूपी अमृतका आस्वाद लेनेमें लीन है मैं उन्हें ही जिह्वा मानता हूँ बाकी तो दुर्वचनोंको कहनेवाली छुरीका मानो फलक ही है ॥३०॥


श्रेष्ठावोष्ठौ च तावेव यौ सुकीर्तनवर्तिनौ । न शम्बूकास्यसंभुक्तजलौकापृष्ठसंनिभौ ॥३१॥

अर्थ: श्रेष्ठ ओंठ वे ही हैं जो कि सत्पुरुषोंका कीर्तन करनेमें लगे रहते हैं बाकी तो शम्बूक नामक जन्तुके मुखसे भुक्त जोंकके पृष्ठके समान ही हैं ॥३१॥


दन्तास्त एव ये शान्तकथासंगमरञ्जिताः । शेषाः सश्लेष्मनिर्वाणद्वारबन्धाय केवलम् ॥३२॥

अर्थ: दाँत वही हैं जो कि शान्त पुरुषोंकी कथाके समागमसे सदा रंजित रहते हैं - उसीमें लगे रहते हैं बाकी तो कफ निकलनेके द्वारको रोकनेवाले मानो आवरण ही हैं ॥३२॥


मुखं श्रेयःपरिप्राप्तेर्मुखं मुख्यकथारतम् । अन्यत्तु मलसंपूर्णं दन्तकीटाकुलं विलम् ॥३३॥

अर्थ: मुख वही है जो कल्याणकी प्राप्तिका प्रमुख कारण है और श्रेष्ठ पुरुषोंकी कथा कहनेमें सदा अनुरक्त रहता है बाकी तो मलसे भरा एवं दन्तरूपी कीड़ोंसे व्याप्त मानो गड्ढा ही है ॥३३॥


वदिता योऽथवा श्रोता श्रेयसां वचसां नरः । पुमान् स एव शेषस्तु शिल्पिकल्पितकायवत् ॥३४॥

अर्थ: जो मनुष्य कल्याणकारी वचनोंको कहता है अथवा सुनता है वास्तवमें वही मनुष्य है बाकी तो शिल्पकारके द्वारा बनाये हुए मनुष्यके पुतलेके समान हैं ॥३४॥


गुणदोषसमाहारे गुणान् गृह्णन्ति साधवः । क्षीरवारिसमाहारे हंसः क्षीरमिवाखिलम् ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार दूध और पानीके समूहमें-से हंस समस्त दूधको ग्रहण कर लेता है उसी प्रकार सत्पुरुष गुण और दोषोंके समूहमें-से गुणोंको ही ग्रहण करते हैं ॥३५॥


गुणदोषसमाहारे दोषान् गृह्णन्त्यसाधवः । मुक्ताफलानि संत्यज्य काका मांसमिव द्विपात् ॥३६॥

अर्थ: और जिस प्रकार काक हाथियोंके गण्डस्थलसे मुक्ता फलोंको छोड़कर केवल मांस ही ग्रहण करते हैं उसी प्रकार दुर्जन गुण और दोषोंके समूहमें-से केवल दोषोंको ही ग्रहण करते हैं ॥३६॥


अदोषामपि दोषाक्तां पश्यन्ति रचनां खलाः । रविमूर्तिमिवोलूकास्तमालदलकालिकाम् ॥३७॥

अर्थ: जिस प्रकार उलूक पक्षी सूर्यकी मूर्तिको तमालपत्रके समान काली-काली ही देखते हैं उसी प्रकार दुष्ट पुरुष निर्दोष रचनाको भी दोषयुक्त ही देखते हैं ॥३७॥


सरो-जलागमद्वारजालकानीव दुर्जनाः । धारयन्ति सदा दोषान् गुणबन्धनवर्जिताः ॥३८॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी सरोवरमें जल आनेके द्वारपर लगी हुई जाली जलको तो नहीं रोकती किन्तु कूड़ा-कर्कटको रोक लेती है उसी प्रकार दुष्ट मनुष्य गुणोंको तो नहीं रोक पाते किन्तु कूड़ा-कर्कटके समान दोषोंको ही रोककर धारण करते हैं ॥३८॥


स्वभावमिति संचिन्त्य सज्जनस्येतरस्य च । प्रवर्तन्ते कथाबन्धे स्वार्थमुद्दिश्य साधवः ॥३९॥

अर्थ: सज्जन और दुर्जनका ऐसा स्वभाव ही है यह विचारकर सत्पुरुष स्वार्थ - आत्मप्रयोजनको लेकर ही कथाकी रचना करनेमें प्रवृत्त होते हैं ॥३९॥


सत्कथाश्रवणाद् यच्च सुखं संपद्यते नृणाम् । कृतिनां स्वार्थ एवासौ पुण्योपार्जनकारणम् ॥४०॥

अर्थ: उत्तम कथाके सुननेसे मनुष्योंको जो सुख उत्पन्न होता है वही बुद्धिमान् मनुष्योंका स्वार्थ - आत्मप्रयोजन कहलाता है तथा यही पुण्योपार्जनका कारण होता है ॥४०॥


वर्द्धमानजिनेन्द्रोक्तः सोऽयमर्थो गणेश्वरम् । इन्द्रभूतिं परिप्राप्तः सुधर्मं धारणीभवम् ॥४१॥

प्रभवं क्रमतः कीर्तिं ततोऽनु( नू )त्तरवाग्मिनम् । लिखितं तस्य संप्राप्य रवेर्यत्नोऽयमुद्गतः ॥४२॥

अर्थ: श्री वर्धमान जिनेन्द्रके द्वारा कहा हुआ यह अर्थ इन्द्रभूति नामक गौतम गणधरको प्राप्त हुआ । फिर धारिणीके पुत्र सुधर्माचार्यको प्राप्त हुआ । फिर प्रभवको प्राप्त हुआ, फिर कीर्तिधर आचार्यको प्राप्त हुआ । उनके अनन्तर उत्तरवाग्मी मुनिको प्राप्त हुआ । तदनन्तर उनका लिखा प्राप्त कर यह रविषेणाचार्यका प्रयत्न प्रकट हुआ है ॥४१-४२॥


स्थितिर्वंशसमुत्पत्तिः प्रस्थानं संयुगं ततः । लवणाङ्कुशसंभूतिर्भवोक्तिः परिनिर्वृतिः ॥४३॥

भवान्तरभवैर्भूरिप्रकारैश्चारुपर्वभिः । युक्ताः सप्त पुराणेऽस्मिन्नधिकारा इमे स्मृताः ॥४४॥

अर्थ: इस पुराणमें निम्नलिखित सात अधिकार हैं - ( १ ) लोकस्थिति, ( २ ) वंशोंकी उत्पत्ति, ( ३ ) वनके लिए प्रस्थान, ( ४ ) युद्ध, ( ५ ) लवणांकुशकी उत्पत्ति, ( ६ ) भवान्तर निरूपण और ( ७ ) रामचन्द्रजीका निर्वाण । ये सातों ही अधिकार अनेक प्रकारके सुन्दर-सुन्दर पर्वोंसे सहित हैं ॥४३-४४॥


पद्मचेष्टितसंबन्धकारणं तावदेव च । त्रैशलादिगतं वक्ष्ये सूत्रं संक्षेपि तद्यथा ॥४५॥

वीरस्य समवस्थानं कुशाग्रगिरिमूर्द्धनि । श्रेणिकस्य परिप्रश्नमिन्द्रभूतेर्महात्मनः ॥४६॥

तत्र प्रश्ने युगे यत्तामुत्पत्तिं कुलकारिणाम् । भीतीश्च जगतो दुःखकारणाकस्मिकेक्षणात् ॥४७॥

अर्थ: रामचन्द्रजीकी कथा-का सम्बन्ध बतलानेके लिए भगवान् महावीर स्वामीकी भी संक्षिप्त कथा कहूँगा जो इस प्रकार है । एक बार कुशाग्र पर्वत - विपुलाचल के शिखरपर भगवान् महावीर स्वामी समवसरण सहित आकर विराजमान हुए । जिसमें राजा श्रेणिकने जाकर इन्द्रभूति गणधरसे प्रश्न किया । उस प्रश्नके उत्तरमें उन्होंने सर्वप्रथम युगोंका वर्णन किया । फिर कुलकरोंकी उत्पत्तिका वर्णन हुआ । अकस्मात् दुःखके कारण देखनेसे जगत्के जीवोंको भय उत्पन्न हुआ इसका वर्णन किया ॥४५-४७॥


ऋषभस्य समुत्पत्तिमभिषेकं नगाधिपे । उपदेशं च विविधं लोकस्यार्तिविनाशनम् ॥४८॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवकी उत्पत्ति, सुमेरु पर्वतपर उनका अभिषेक और लोककी पीड़ाको नष्ट करनेवाला उनका विविध प्रकारका उपदेश बताया गया ॥४८॥


श्रामण्यं केवलोत्पत्तिमैश्वर्यं विष्टपातिगम् । सर्वामराधिपायानं निर्वाणसुखसंगमम् ॥४९॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवने दीक्षा धारण की, उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ, उनका लोकोत्तर ऐश्वर्य प्रकट हुआ, सब इन्द्रोंका आगमन हुआ और भगवान्को मोक्ष-सुखका समागम हुआ ॥४९॥


प्रधनं बाहुबलिनो भरतेन समं महत् । समुद्भवं द्विजातीनां कुतीर्थिकगणस्य च ॥५०॥

अर्थ: भरतके साथ बाहुबलीका बहुत भारी युद्ध हुआ, ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति और मिथ्याधर्मको फैलानेवाले कुतीर्थियोंका आविर्भाव हुआ ॥५०॥


इक्ष्वाकुप्रभृतीनां च वंशानां गुणकीर्तनम् । विद्याधरसमुद्भूतिं विद्युद्दंष्ट्रसमुद्भवम् ॥५१॥

उपसर्गं जयन्तस्य केवलज्ञानसंपदम् । नागराजस्य संक्षोभं विद्याहरणतर्जने ॥५२॥

अर्थ: इक्ष्वाकु आदि वंशोंकी उत्पत्ति, उनकी प्रशंसाका निरूपण, विद्याधरों की उत्पत्ति तथा उनके वंशमें विद्युद्दंष्ट्र विद्याधरके द्वारा संजयन्त मुनिको उपसर्ग हुआ । मुनिराज उपसर्ग सह केवलज्ञानी होकर निर्वाणको प्राप्त हुए । इस घटनासे धरणेन्द्रको विद्युद्दंष्ट्रके प्रति बहुत क्षोभ उत्पन्न हुआ जिससे उसने उसकी विद्याएँ छीन लीं तथा उसे बहुत भारी तर्जना दी ॥५१-५२॥


अजितस्यावतरणं पूर्णाम्बुदसुतासुखम् । विद्याधरकुमारस्य शरणं प्रतिसंश्रयम् ॥५३॥

रक्षोनाथपरिप्राप्तिं रक्षोद्वीपसमाश्रयम् । सगरस्य समुद्भूतिं दुःखदीक्षणनिर्वृती ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर श्री अजितनाथ भगवान्का जन्म, पूर्णमेघ विद्याधर और उसकी पुत्रीके सुखका वर्णन, विद्याधर कुमारका भगवान् अजितनाथकी शरणमें आना, राक्षस द्वीपके स्वामी व्यन्तर देवका आना तथा प्रसन्न होकर पूर्णमेघके लिए राक्षस द्वीपका देना, सगर चक्रवर्तीका उत्पन्न होना, पुत्रोंका मरण सुन उसके दुःखसे उन्होंने दीक्षाधारण की तथा निर्वाण प्राप्त किया ॥५३-५४॥


अतिक्रान्तमहारक्षोजन्मनः परिकीर्तनम् । शाखामृगध्वजानां च प्रज्ञप्तिमतिविस्तरात् ॥५५॥

अर्थ: पूर्णमेघके वंशमें महारक्षका जन्म तथा वानरवंशी विद्याधरोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन ॥५५॥


तडित्केशस्य चरितमुदधेरमरस्य च । किष्किन्धान्ध्रखगोत्पादं श्रीमालाखेचरागमम् ॥५६॥

अर्थ: विद्युत्केश विद्याधरका चरित्र, तदनन्तर उदधिविक्रम और अमरविक्रम विद्याधरका कथन, वानर-वंशियोंमें किष्किन्ध और अन्ध्रक नामक विद्याधरोंका जन्म लेना, श्रीमाला विद्याधरीका संगम होना ॥५६॥


वधाद् विजयसिंहस्य कोपं चाशनिवेगजम् । अन्ध्रकान्तमरिप्राप्तिं पुरस्य विनिवेशनम् ॥५७॥

किष्किन्धपुरविन्यासं मधुपर्वतमूर्द्धनि । सुकेशनन्दनादीनां लङ्काप्राप्तिनिरूपणम् ॥५८॥

अर्थ: विजयसिंहके वधसे अशनिवेगको क्रोध उत्पन्न होना, अन्ध्रकका मारा जाना और वानरवंशियोंका मधुपर्वतके शिखरपर किष्किन्धपुर नामक नगर बसाकर उसमें निवास करना । सुकेशीके पुत्र आदिको लंकाकी प्राप्ति होना ॥५७-५८॥


निर्घातवधहेतुं च मालिनः संपदं पराम् । दक्षिणे विजयार्धस्य भागे च रथनूपुरे ॥५९॥

पुरे जननमिन्द्रस्य सर्वविद्याभृतां विभोः । मालिनः पञ्चतावाप्तिं जन्म वैश्रवणस्य च ॥६०॥

अर्थ: निर्घात विद्याधरके वधसे मालीको बहुत भारी सम्पदाका प्राप्त होना, विजयार्ध पर्वतके दक्षिणभाग सम्बन्धी रथनूपुर नगरमें समस्त विद्याधरोंके अधिपति इन्द्रनामक विद्याधरका जन्म लेना, मालीका मारा जाना और वैश्रवणका उत्पन्न होना ॥५९-६०॥


पुष्पान्तकसमावेशं तनयस्य सुमालिनः । कैकस्या सह संयोगं चारुस्वप्नावलोकनम् ॥६१॥

अर्थ: सुमालीके पुत्र रत्नश्रवाका पुष्पान्तक नामक नगर बसाना, कैकसीके साथ उसका संयोग होना, और केकसीका शुभ स्वप्नोंका देखना ॥६१॥


दशाननस्य प्रजनिं विद्यानां समुपासनम् । अनावृतस्य संक्षोभमागमं च सुमालिनः ॥६२॥

अर्थ: रावणका उत्पन्न होना और विद्याओंका साधन करना, अनावृत नामक देवको क्षोभ होना तथा सुमालीका आगमन होना ॥६२॥


मन्दोदर्याः परिप्राप्तिं कन्यकानां निरीक्षणम् । चेष्टितैर्भानुकर्णस्य कोपं वैश्रवणोद्भवम् ॥६३॥

अर्थ: रावणको मन्दोदरीकी प्राप्ति होना, साथ ही अन्य अनेक कन्याओंका अवलोकन होना और भानुकर्णकी चेष्टाओंसे वैश्रवणका कुपित होना ॥६३॥


यक्षराक्षससंग्रामं धनदस्य तपस्यनम् । लङ्कागमं दशास्यस्य प्रश्न[प्रत्न]चैत्यावलोकनम् ॥६४॥

अर्थ: यक्ष और राक्षस नामक विद्याधरोंका संग्राम, वैश्रवणका तप धारण करना, रावणका लंकामें आना और श्रेष्ठ चैत्यालयोंका अवलोकन करना ॥६४॥


श्रीमतो हरिषेणस्य माहात्म्यं पापनाशनम् । त्रिजगद्भूषणाभिख्यद्विरदेन्द्रविलोकनम् ॥६५॥

अर्थ: पापोंको नष्ट करनेवाला हरिषेण चक्रवर्तीका माहात्म्य, त्रिलोकमण्डन हाथी का अवलोकन ॥६५॥


यमस्थानच्युतिं चार्करजः किष्किन्धसंगमम् । चोरणं कैकसेय्याश्च खरालङ्कारसंश्रयम् ॥६६॥

अर्थ: यमनामक लोकपालको अपने स्थानसे च्युत करना तथा वानरवंशी राजा सूर्यरजको किष्किन्धापुरका संगम करना। तदनन्तर रावणकी बहन शूर्पणखाको खर-दूषण द्वारा हर ले जाना और उसीके साथ विवाह देना और खर-दूषणका पाताल लंका जाना ॥६६॥


अनुराधामहादुःखं चन्द्रोदरवियोगतः । विराधितपुरभ्रंशं सुग्रीवश्रीसमागमम् ॥६७॥

अर्थ: चन्द्रोदरका युद्धमें मारा जाना और उसके वियोगसे उसकी रानी अनुराधाको बहुत दुःख उठाना, चन्द्रोदरके पुत्र विराधितका नगरसे भ्रष्ट होना तथा सुग्रीवको राज्यलक्ष्मीकी प्राप्ति होना ॥६७॥


वालेः प्रव्रजनं क्षोभमष्टापदमहीभृतः । सुग्रीवस्य सुताराया लाभं साहसगामिनः ॥६८॥

संतापं विजयार्द्धाद्रिगमनं रावणस्य च । … ॥६९॥

अर्थ: बालिका दीक्षा लेना, रावणका कैलासपर्वतको उठाना, सुग्रीवको सुताराकी प्राप्ति होना, सुताराकी प्राप्ति न होनेसे साहसगति विद्याधरको सन्तापका होना तथा रावणका विजयार्ध पर्वतपर जाना ॥६८-६९॥


अनरण्यसहस्रांशुवैराग्यं यज्ञनाशनम् । मधुपूर्वभवाख्यातमुपरम्भाभिभाषणम् ॥७०॥

अर्थ: राजा अनरण्य और सहस्ररश्मिका विरक्त होना, रावणके द्वारा यज्ञका नाश हुआ उसका वर्णन, मधुके पूर्वभवोंका व्याख्यान और रावणकी पुत्री उपरम्भाका मधुके साथ अभिभाषण ॥७०॥


विद्यालाभं महेन्द्रस्य राज्यलक्ष्मीपरिक्षयम् । दशास्यमेरुगमनं पुनश्च विनिवर्तनम् ॥७१॥

अर्थ: रावणको विद्याका लाभ होना, इन्द्रकी राज्यलक्ष्मीका क्षय होना, रावणका सुमेरु पर्वतपर जाना और वहाँसे वापस लौटना ॥७१॥


अनन्तवीर्यकैवल्यं दशास्यनियमक्रियाम् । हनूमतः समुत्पत्तिं कपिकेतोर्महात्मनः ॥७२॥

अर्थ: अनन्तवीर्य मुनिको केवलज्ञान उत्पन्न होना, रावणका उनके समक्ष यह नियम ग्रहण करना कि ‘जो परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे नहीं चाहूँगा’, तदनन्तर वानरवंशी महात्मा हनुमान्के जन्म का वर्णन ॥७२॥


अष्टापदे महेन्द्रेण प्रह्लादस्याभिभाषणम् । वायोः कोपं प्रसादं च तज्जायाप्रजनोज्झने ॥७३॥

अर्थ: कैलास पर्वतपर अंजनाके पिता राजा महेन्द्रका पवनंजयके पिता राजा प्रह्लादसे यह भाषण होना कि हमारी पुत्रीका तुम्हारे पुत्रसे सम्बन्ध हो, पवनंजयके साथ अंजनाका विवाह, पवनंजयका कुपित होना। तदनन्तर चकवा-चकवीका वियोग देख प्रसन्न होना, अंजनाके गर्भ रहना और सासु द्वारा उसका घरसे निकाला जाना ॥७३॥


दिगम्बरेण कथनं हनूमत्पूर्वजन्मनः । सूतिं हनूरुहप्राप्तिं प्रतिसूर्येण कारिताम् ॥७४॥

अर्थ: मुनिराजके द्वारा हनुमान्के पूर्वजन्मका कथन होना, गुफामें हनुमान्का जन्म होना और अंजनाके मामा प्रतिसूर्यके द्वारा अंजना तथा हनुमान्को हनुरुह द्वीपमें ले जाना ॥७४॥


भूताटवीं प्रविष्टस्य वायोरिभविलोकनम् । विद्याधरसमायोगमञ्जनादर्शनोत्सवम् ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर पवनंजयका भूताटवीमें प्रवेश, वहाँ उसका हाथी देख प्रतिसूर्य विद्याधरका आगमन और अंजनाको देखनेका पवनंजयको बहुत भारी हर्ष हुआ इसका वर्णन ॥७५॥


वायुपुत्रसहायत्वं दारुणं परमं रणम् । रावणस्य महाराज्यं जैनमुत्सेधमन्तरम् ॥७६॥

अर्थ: हनुमान्के द्वारा रावणको सहायता-की प्राप्ति तथा वरुणके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध होना । रावणके महान् राज्यका वर्णन तथा तीर्थंकरोंकी ऊँचाई और अन्तराल आदिका निरूपण ॥७६॥


रामकेशवतच्छत्रुषट्खण्डपरिचेष्टितम् । दशस्यन्दनसंभूतिं कैकय्या वरसंपदम् ॥७७॥

अर्थ: बलभद्र, नारायण और उनके शत्रु प्रतिनारायण आदिकी छह खण्डोंमें होनेवाली चेष्टाओंका वर्णन, राजा दशरथकी उत्पत्ति और कैकयीको वरदान देनेका कथन ॥७७॥


पद्मलक्ष्मणशत्रुघ्नभरतानां समुद्भवम् । सीतोत्पत्तिं प्रभाचक्रैर्हृतिं तन्मातृशोचनम् ॥७८॥

अर्थ: राजा दशरथके राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरतका जन्म होना, राजा जनकके सीताकी उत्पत्ति और भामण्डलके हरणसे उसकी माताको शोक उत्पन्न होना ॥७८॥


नारदालिखितां सीतां दृष्ट्वा भ्रातुर्विमूढताम् । स्वयंवराय वृत्तान्तं चापरत्नस्य चोद्भवम् ॥७९॥

अर्थ: नारदके द्वारा चित्रमें लिखी सीताको देख भाई भामण्डलको मोह उत्पन्न होना, सीताके स्वयंवर का वृत्तान्त और स्वयंवरमें धनुषरत्नका प्रकट होना ॥७९॥


सर्वभूतशरण्यस्य दशस्यन्दनदीक्षणम् । भाचक्रान्यभवज्ञानं विदेहायाश्च दर्शनम् ॥८०॥

अर्थ: सर्वभूतशरण्य नामक मुनिराजके पास राजा दशरथका दीक्षा लेना, सीताको देखकर भामण्डलको अन्य भवोंका ज्ञान होना ॥८०॥


कैकय्या वरतो राज्यप्रापणं भरतस्य च । वैदेहीपद्मसौमित्रिगमनं दक्षिणाशया ॥८१॥

अर्थ: कैकयीके वरदानके कारण भरतको राज्य मिलना और सीता, राम तथा लक्ष्मणका दक्षिण दिशाकी ओर जाना ॥८१॥


चेष्टितं वज्रकर्णस्य लाभं कल्याणयोषितः । रुद्रभूतिवशीकारं बालिखिल्यविमोचनम् ॥८२॥

अर्थ: वज्रकर्णका चरित्र, लक्ष्मणको कल्याणमाला स्त्रीका लाभ होना, रुद्रभूतिको वशमें करना और बालखिल्यको छुड़ाना ॥८२॥


निकारमरुणग्रामे रामपुर्यां निवेशनम् । संगमं वनमालाया अतिवीर्यसमुन्नतिम् ॥८३॥

अर्थ: अरुण ग्राममें श्रीरामका आना, वहाँ देवोंके द्वारा बसायी हुई रामपुरी नगरी में रहना, लक्ष्मणका वनमालाके साथ समागम होना और अतिवीर्यकी उन्नतिका वर्णन ॥८३॥


प्राप्तिं च जितपद्मायाः कौलदेशविभूषणम् । चरितं कारणं रामचैत्यानां वंशपर्वते ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणको जितपद्माकी प्राप्ति होना, कूलभूषण और देवभूषण मुनिका चरित्र, श्रीरामने वंशस्थल पर्वतपर जिनमन्दिर बनवाये उनका वर्णन ॥८४॥


जटायुनियमप्राप्तिं पात्रदानफलोदयम् । महानागरथारोहं शम्बूकैर्विनिपातनम् ॥८५॥

अर्थ: जटायु पक्षीको व्रतप्राप्ति, पात्रदानके फलकी महिमा, बड़े-बड़े हाथियोंसे जुते रथपर राम-लक्ष्मण आदि का आरूढ़ होना, तथा शम्बूकका मारा जाना ॥८५॥


कैकसेय्याश्च वृत्तान्तं खरदूषणविग्रहम् । सीताहरणशोकं च शोकं रामस्य दुर्धरम् ॥८६॥

अर्थ: शूर्पणखाका वृत्तान्त, खर-दूषणके साथ श्रीरामके युद्धका वर्णन, सीताके वियोगसे रामको बहुत भारी शोकका होना ॥८६॥


विराधितस्यागमनं खरदूषणपञ्चताम् । विद्यानां रत्नजटिनश्छेदं सुग्रीवसंगमम् ॥८७॥

अर्थ: विराधित नामक विद्याधरका आगमन, खरदूषणका मरण, रावणके द्वारा रत्नजटी विद्याधरकी विद्याओंका छेदा जाना तथा सुग्रीवका रामके साथ समागम होना ॥८७॥


निधनं साहसगतेः सीतोदन्तं विहायसा । यानं विमीषणायानं विद्याप्तिं हरिपक्षयोः ॥८८॥

अर्थ: सुग्रीवके निमित्त रामने साहसगतिको मारा, रत्नजटीने सीताका सब वृत्तान्त रामसे कहा, रामने आकाशमार्गसे लंकापर चढ़ाई की, विभीषण रामसे आकर मिला और राम तथा लक्ष्मणको सिंहवाहिनी गरुडवाहिनी विद्याओंकी प्राप्ति हुई ॥८८॥


इन्द्रजित्कुम्भकर्णाब्दस्वरपन्नगबन्धनम् । सौमित्रशक्तिनिर्भेदविशल्याशल्यताकृतिम् ॥८९॥

अर्थ: इन्द्रजित्, कुम्भकर्ण और मेघनादका नागपाशसे बाँधा जाना, लक्ष्मणको शक्ति लगना और विशल्याके द्वारा शल्यरहित होना ॥८९॥


रावणस्य प्रवेशं च जिनेश्वरगृहे स्तुतिम् । लङ्काभिभवनं प्रातिहार्यं देवैः प्रकल्पितम् ॥९०॥

अर्थ: बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करनेके लिए रावणका शान्तिनाथ भगवान्के मन्दिरमें प्रवेश कर स्तुति करना, रामके कटकके विद्याधरकुमारोंका लंकापर आक्रमण करना, देवोंके प्रभावसे विद्याधर कुमारोंका पीछे कटकमें वापस आना ॥९०॥


चक्रोत्पत्तिं च सौमित्रेः कैकसेयस्य हिंसनम् । विलापं तस्य नारीणां कैवल्यागमनं ततः ॥९१॥

अर्थ: लक्ष्मणको चक्ररत्नकी प्राप्ति होना, रावणका मारा जाना, उसकी स्त्रियोंका विलाप करना तथा केवलीका आगमन ॥९१॥


दीक्षामिन्द्रजिदादीनां सीतया सह संगमम् । नारदस्य च संप्राप्तिमयोध्याया निवेशनम् ॥९२॥

अर्थ: इन्द्रजित् आदिका दीक्षा लेना, रामका सीताके साथ समागम होना, नारदका आना और श्रीरामका अयोध्यामें वापस आकर प्रवेश करना ॥९२॥


पूर्वजन्मानुचरितं गजस्य भरतस्य च । तत्प्राव्रज्यं महाराज्यं सीरचक्रप्रहारिणोः ॥९३॥

अर्थ: भरत और त्रिलोकमण्डन हाथीके पूर्वभवका वर्णन, भरतका वैराग्य, राम तथा लक्ष्मणके राज्यका विस्तार ॥९३॥


लाभं मनोरमायाश्च लक्ष्म्यालिङ्गितवक्षसः । संयुगे मरणप्राप्तिं सुमधोर्लवणस्य च ॥९४॥

अर्थ: जिसका वक्षःस्थल राजलक्ष्मीसे आलिंगित हो रहा था ऐसे लक्ष्मणके लिए मनोरमाकी प्राप्ति होना, युद्धमें मधु और लवणका मारा जाना ॥९४॥


मथुरायां सदेशायामुपसर्गविनाशनम् । सप्तर्षिसंश्रयात् सीतानिर्वासपरिदेवने ॥९५॥

अर्थ: अनेक देशोंके साथ मथुरा नगरीमें धरणेन्द्रके कोपसे मरीरोगका उपसर्ग और सप्तर्षियोंके प्रभावसे उसका दूर होना, सीताको घरसे निकालना तथा उसके विलापका वर्णन ॥९५॥


वज्रजङ्घपरित्राणं लवणांकुशसंभवम् । अन्यराज्यपराभूतिं पित्रा सह महाहवम् ॥९६॥

अर्थ: राजा वज्रजंघके द्वारा सीताकी रक्षा होना, लवणांकुशका जन्म लेना, बड़े होनेपर लवणांकुशके द्वारा अन्य राजाओंका पराभव होकर वज्रजंघके राज्यका विस्तार किया जाना और अन्तमें उनका अपने पिता रामचन्द्रजीके साथ युद्ध होना ॥९६॥


सर्वभूषणकैवल्यसंप्राप्तावमरागमम् । प्रातिहार्यं च वैदेह्या विभीषणभवान्तरम् ॥९७॥

अर्थ: सर्वभूषण मुनिराजको केवलज्ञान प्राप्त होनेके उपलक्ष्यमें देवोंका आना, अग्निपरीक्षा द्वारा सीताका अपवाद दूर होना, विभीषणके भवान्तरोंका निरूपण ॥९७॥


तपः कृतान्तवक्रस्य परिक्षोभं स्वयंवरे । श्रमणत्वं कुमाराणां प्रभामण्डलदुर्मृतिम् ॥९८॥

अर्थ: कृतान्तवक्र सेनापतिका तप लेना, स्वयंवरमें राम और लक्ष्मणके पुत्रोंमें क्षोभ होना, लक्ष्मणके पुत्रोंका दीक्षा धारण करना और विद्युत्पातसे भामण्डलका दुर्मरण होना ॥९८॥


दीक्षां पवनपुत्रस्य नारायणपरासुताम् । रामात्मजतपःप्राप्तिं पद्मशोकं च दारुणम् ॥९९॥

अर्थ: हनुमान्का दीक्षा लेना, लक्ष्मणका मरण होना, रामके पुत्रोंका तप धारण करना और भाईके वियोगसे रामको बहुत भारी शोकका उत्पन्न होना ॥९९॥


पूर्वाप्तदेवजनिताद् बोधान्निर्ग्रन्थताश्रयम् । केवलज्ञानसंप्राप्तिं निर्वाणपदसंगतिम् ॥१००॥

अर्थ: पूर्वभवके मित्र देवके द्वारा उत्पादित प्रतिबोधसे रामका दीक्षा लेना, केवल- ज्ञान प्राप्त होना और निर्वाणपदकी प्राप्ति करना ॥१००॥


एतत्सर्वं समाधाय मनः श्रृणुत सज्जनाः । सिद्धास्पदपरिप्राप्तेः सोपानममिसौख्यदम् ॥१०१॥

अर्थ: हे सत्पुरुषो ! रामचन्द्रका यह चरित्र मोक्षपदरूपी मन्दिरकी प्राप्तिके लिए सीढ़ीके समान है तथा सुखदायक है इसलिए इस सब चरित्र-को तुम मन स्थिर कर सुनो ॥१०१॥


पद्मादीन् मुनिसत्तमान् स्मृतिपथे तावन्नृणां कुर्वतां दूरं भावभरानतेन मनसा मोदं परं बिभ्रताम् । पापं याति भिदां सहस्रगणनैः खण्डैश्चिरं सञ्चितं निःशेषं चरितं तु चन्द्रधवलं किं श्रृण्वतामुच्यते ॥१०२॥

अर्थ: जो मनुष्य श्रीराम आदि श्रेष्ठ मुनियोंका ध्यान करते हैं और उनके प्रति अतिशय भक्ति-भावसे नम्रीभूत हृदयसे प्रमोदकी धारणा करते हैं उनका चिरसंचित पाप-कर्म हजार टूक होकर नाशको प्राप्त होता है फिर जो उनके चन्द्रमाके समान उज्ज्वल समस्त चरित्रको सुनते हैं उनका तो कहना ही क्या है ? ॥१०२॥


एतत्तैः कृतमुत्तमं परिहृतं तैश्चेदमेनस्करं कर्मात्यन्तविवेकचित्तचतुराः सन्तः प्रशस्ता जनाः । सेवध्वं चरितं पुराणपुरुषैरासेवितं शक्तितः सन्मार्गे प्रकटीकृते हि रविणा कश्चारुदृष्टिः स्खलेत् ॥१०३॥

अर्थ: आचार्य रविषेण कहते हैं कि इस तरह यह चरित्र उन्हीं इन्द्रभूति गणधरके द्वारा किया हुआ है और पाप उत्पन्न करनेवाला यह अशुभ कर्म उन्हींके द्वारा नष्ट किया गया है, इसलिए हे विवेकशाली चतुर पुरुषो, प्राचीन पुरुषोंके द्वारा सेवित इस परम पवित्र चरित्रकी तुम सब शक्तिके अनुसार सेवा करो - इसका पठन-पाठन करो क्योंकि जब सूर्यके द्वारा समीचीन मार्ग प्रकट कर दिया जाता है तब ऐसा कौन भली दृष्टिका धारक होगा जो स्खलित होगा - चूककर नीचे गिरेगा ॥१०३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते सूत्रविधानं नाम प्रथमं पर्व ।


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यनिर्मित पद्म-चरितमें वर्णनीय विषयोंका संक्षेपमें निरूपण करनेवाला प्रथम पर्व पूर्ण हुआ ।

२. द्वितीयं पर्व (श्रेणिकचिन्ताभिधानं)

अथ जम्बूमति द्वीपे क्षेत्रे भरतनामनि । मगधाभिख्यया ख्यातो विषयोऽस्ति समुज्ज्वलः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर - जम्बू द्वीपके भरत क्षेत्रमें मगध नामसे प्रसिद्ध एक अत्यन्त उज्ज्वल देश है ॥१॥


निवासः पूर्णपुण्यानां वासवावाससंनिभः । व्यवहारैरसंकीर्णैः कृतलोकव्यवस्थितिः ॥२॥

अर्थ: वह देश पूर्ण पुण्यके धारक मनुष्योंका निवासस्थान है, इन्द्रकी नगरीके समान जान पड़ता है और उदारतापूर्ण व्यवहारसे लोगोंकी सब व्यवस्था करता है ॥२॥


क्षेत्राणि दधते यस्मिन्नुत्खातान् लाङ्गलाननैः । स्थलाब्जमूलसंघातान् महीसारगुणानिव ॥३॥

अर्थ: जिस देशके खेत हलोंके अग्रभागसे विदारण किये हुए स्थल-कमलोंकी जड़ोंके समूहको इस प्रकार धारण करते हैं मानो पृथिवीके श्रेष्ठ गुणोंको ही धारण कर रहे हों ॥३॥


क्षीरसेकादिवोद्भूतैर्मन्दानिलचलद्दलैः । पुण्ड्रेक्षुवाटसंतानैर्व्याप्तानन्तरभूतलः ॥४॥

अर्थ: जो दूधके सिंचनसे ही मानो उत्पन्न हुए थे और मन्द-मन्द वायुसे जिनके पत्ते हिल रहे थे ऐसे पौड़ों और ईखोंके वनोंके समूहसे जिस देशका निकटवर्ती भूमिभाग सदा व्याप्त रहता है ॥४॥


अपूर्वपर्वताकारैर्विभक्तैः खलधामभिः । सस्यकूटैः सुविन्यस्तैः सीमान्ता यस्य सङ्कटाः ॥५॥

अर्थ: जिस देशके समीपवर्ती प्रदेश खलिहानों- में जुदी-जुदी लगी हुई अपूर्व पर्वतोंके समान बड़ी-बड़ी धान्यकी राशियोंसे सदा व्याप्त रहते हैं ॥५॥


उद्घाटकघटीसिक्तैर्यत्र जीरकजूटकैः । नितान्तहरितैरुर्वी जटालेव विराजते ॥६॥

अर्थ: जिस देशकी पृथिवी रँहटकी घड़ियोंसे सींचे गये अत्यन्त हरे-भरे जीरों और धानों- के समूहसे ऐसी जान पड़ती है मानो उसने जटाएँ ही धारण कर रखी हों ॥६॥


उर्वरायां वरीयोभिः यः शालेयैरलंकृतः । मुद्गकोशीपुटैर्यस्मिन्नुद्देशाः कपिलत्विषः ॥७॥

अर्थ: जहाँकी भूमि अत्यन्त उपजाऊ है, जो धानके श्रेष्ठ खेतोंसे अलंकृत है और जिसके भू-भाग मूँग और मौठकी फलियोंसे पीले-पीले हो रहे हैं ॥७॥


तापस्फुटितकोशीकै राजमाषैर्निरन्तराः । उद्देशा यस्य किर्मीरा निक्षेत्रियतृणोद्गमाः ॥८॥

अर्थ: गर्मीके कारण जिनकी फली चटक गयी थी ऐसे रोंसा अथवा वर्वटीके बीजोंसे वहाँके भू-भाग निरन्तर व्याप्त होकर चित्र-विचित्र दिख रहे हैं और ऐसे जान पड़ते हैं कि वहाँ तृणके अंकुर उत्पन्न ही नहीं होंगे ॥८॥


अधिष्ठितः स्थलीपृष्ठैः श्रेष्ठगोधूमधामभिः । प्रशस्यैरन्यसस्यैश्च युक्तैः प्रत्यूहवर्जितैः ॥९॥

अर्थ: जो देश उत्तमोत्तम गेहुँओंकी उत्पत्तिके स्थानभूत खेतोंसे सहित है तथा विघ्न-रहित अन्य अनेक प्रकारके उत्त- मोत्तम अनाजोंसे परिपूर्ण है ॥९॥


महामहिषपृष्ठस्थगायद्गोपालपालितैः । कीटातिलम्पटोद्ग्रीववलाकानुगताध्वभिः ॥१०॥

विवर्णसूत्रसंबद्धघण्टारटितहारिभिः । क्षरद्भिरजरत्रासात् पीतक्षीरोदवत् पयः ॥११॥

सुस्वादरससंपन्नैर्बाष्पच्छेद्यैरनन्तरैः । तृणैस्तृप्तिं परिप्राप्तैर्गोधनैः सितकक्षभूः ॥१२॥

अर्थ: बड़े-बड़े भैंसोंकी पीठपर बैठे गाते हुए ग्वाले जिनकी रक्षा कर रहे हैं, शरीरके भिन्न-भिन्न भागोंमें लगे हुए कीड़ोंके लोभसे ऊपरको गरदन उठाकर चलने- वाले बगले मार्गमें जिनके पीछे लग रहे हैं, रंग-विरंगे सूत्रोंमें बँधे हुए घण्टाओंके शब्दसे जो बहुत मनोहर जान पड़ती हैं, जिनके स्तनोंसे दूध झर रहा है और उससे जो ऐसी जान पड़ती हैं मानो पहले पिये हुए क्षीरोदकको अजीर्णके भयसे छोड़ती रहती हैं, मधुर रससे सम्पन्न तथा इतने कोमल कि मुँहकी भाप मात्रसे टूट जावें ऐसे सर्वत्र व्याप्त तृणोंके द्वारा जो अत्यन्त तृप्तिको प्राप्त थीं ऐसी गायोंके द्वारा उस देशके वन सफेद-सफेद हो रहे हैं ॥१०-१२॥


सारीकृतसमुद्देशः कृष्णसारैर्विसारिभिः । सहस्रसंख्यैर्गीर्वाणस्वामिनो लोचनैरिव ॥१३॥

अर्थ: जो इन्द्रके नेत्रोंके समान जान पड़ते हैं ऐसे इधर-उधर चौकड़ियाँ भरनेवाले हजारों श्याम हरिणसे उस देशके भू-भाग चित्र-विचित्र हो रहे हैं ॥१३॥


केतकीधूलिधवला यस्य देशाः समुन्नताः । गङ्गापुलिनसंकाशा विभान्ति जनसेविताः ॥१४॥

अर्थ: जिस देशके ऊँचे-ऊँचे प्रदेश केतकीकी धूलिसे सफेद-सफेद हो रहे हैं और ऐसे जान पड़ते हैं मानो मनुष्योंके द्वारा सेवित गंगाके पुलिन ही हों ॥१४॥


शाककन्दलवाटेन श्यामलश्रीधरः क्वचित् । वनपालकृतास्वादैर्नालिकेरैर्विराजितः ॥१५॥

अर्थ: जो देश कहीं तो शाकके खेतोंसे हरी-भरी शोभाको धारण करता है और कहीं वनपालोंसे आस्वादित नारियलोंसे सुशोभित है ॥१५॥


कोटिभिः शुकचञ्चूनां तथा शाखामृगाननैः । संदिग्धकुसुमैर्युक्तः पृथुभिर्दाडिमीवनैः ॥१६॥

अर्थ: जिनके फूल तोताओंकी चोचोंके अग्रभाग तथा वानरोंके मुखोंका संशय उत्पन्न करनेवाले हैं ऐसे अनारके बगीचोंसे वह देश युक्त है ॥१६॥


वत्स [वन] पालीकराघृष्टमातुलिङ्गीफलाम्भसा । लिप्ताः कुङ्कुमपुष्पाणां प्रकरैरुपशोभिताः ॥१७॥

फलस्वादपयःपानसुखसंसुप्तमार्गगाः । वनदेवीप्रपाकारा द्राक्षाणां यत्र मण्डपाः ॥१८॥

अर्थ: जो वनपालियों के हाथसे मर्दित बिजौराके फलोंके रससे लिप्त हैं, केशरके फूलोंके समूहसे शोभित हैं, तथा फल खाकर और पानी पीकर जिनमें पथिक जन सुखसे सो रहे हैं ऐसे दाखोंके मण्डप उस देशमें जगह-जगह इस प्रकार छाये हुए हैं मानो वनदेवीके प्याऊके स्थान ही हों ॥१७-१८॥


विलुप्यमानैः पथिकैः पिण्डखर्जूरपादपैः । कपिभिश्च कृताच्छोटैर्मोचानां निचितः फलैः ॥१९॥

अर्थ: जिन्हें पथिक जन तोड़-तोड़कर खा रहे हैं ऐसे पिण्ड खर्जूरके वृक्षोंसे तथा वानरोंके द्वारा तोड़कर गिराये हुए केलाके फलोंसे वह देश व्याप्त है ॥१९॥


तुङ्गार्जुनवनाकीर्णतटदेशैर्महोदरैः । गोकुलाकलितोदारस्वरवत्कूलधारिभिः ॥२०॥

विस्फुरच्छफरीनालैर्विकसल्लोचनैरिव । हसद्भिरिव शुक्लानां पङ्कजानां कदम्बकैः ॥२१॥

तुङ्गैस्तरङ्गसंघातैर्नर्तनप्रसृतैरिव । गायद्भिरिव संसक्तहंसानां मधुरस्वनैः ॥२२॥

सामोदजनसंघातैः समासेवितसत्तटैः । सरोभिः सारसाकीर्णैर्वनरन्ध्रेषु भूषितः ॥२३॥ [ कलापकम् ]

अर्थ: जिनके किनारे ऊँचें-ऊँचे अर्जुन वृक्षोंके वनोंसे व्याप्त हैं, जो गायोंके समूहके द्वारा किये हुए उत्कट शब्दसे युक्त कूलोंको धारण कर रहे हैं, जो उछलती हुई मछलियोंके द्वारा नेत्र खोले हुएके समान और फूले हुए सफेद कमलोंके समूहसे हँसते हुएके समान जान पड़ते हैं, ऊँची-ऊँची लहरोंके समूहसे जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो नृत्यके लिए ही तैयार खड़े हों, उपस्थित हंसोंकी मधुर ध्वनिसे जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो गान ही कर रहे हों, जिनके उत्तमोत्तम तटोंपर हर्षसे भरे मनुष्योंके झुण्डके झुण्ड बैठे हुए हैं और जो कमलोंसे व्याप्त हैं ऐसे सरोवरोंसे वह देश प्रत्येक वन-खण्डोंमें सुशोभित है ॥२०-२३॥


संक्रीडनैर्वपुष्मद्भिराविकोष्ट्रकतार्णकैः । कृतसंबाधसर्वाशो हितपालकपालितैः ॥२४॥

अर्थ: हितकारी पालक जिनकी रक्षा कर रहे हैं ऐसे खेलते हुए सुन्दर शरीर के धारक भेड़, ऊँट तथा गायोंके बछड़ोंसे उस देशकी समस्त दिशाओंमें भीड़ लगी रहती है ॥२४॥


दिवाकररथाश्वानां लोभनार्थमिवोचितैः । पृष्ठैः कुङ्कुमपङ्केन चलत्प्रोथपुटैर्मुखैः ॥२५॥

उदरस्थकिशोराणां जवायेव प्रभञ्जनम् । स्वच्छन्दमापिबन्तीनां वडवानां गणैश्चितः ॥२६॥ [युग्मम्]

अर्थ: सूर्यके रथके घोड़ोंको लुभानेके लिए ही मानो जिनके पीठके प्रदेश केशरकी पंकसे लिप्त हैं और जो चंचल अग्रभागवाले मुखोंसे वायुका स्वच्छन्दतापूर्वक इसलिए पान कर रही हैं मानो अपने उदरमें स्थित बच्चोंको गतिके वेगकी शिक्षा ही देनी चाहती हों ऐसी घोड़ियोंके समूहसे वह देश व्याप्त हो ॥२५-२६॥


चरद्भिर्हंससंघातैर्घनैर्जनगुणैरिव । रवेणाकृष्टचेतोभिरत्यन्तधवलः क्वचित् ॥२७॥

अर्थ: जो मनुष्योंके बहुत भारी गुणोंके समूहके समान जान पड़ते हैं तथा जो अपने शब्दसे लोगोंका चित्त आकर्षित करते हैं ऐसे चलते-फिरते हंसोंके झुण्डोंसे वह देश कहीं-कहीं अत्यधिक सफेद हो रहा है ॥२७॥


संगीतस्वनसंयुक्तैर्मयूररवमिश्रितैः । यस्मिन्मुरजनिर्घोषैर्मुखरं गगनं सदा ॥२८॥

अर्थ: संगीतके शब्दोंसे युक्त तथा मयूरोंके शब्दसे मिश्रित मृदंगोंकी मनोहर आवाजसे उस देशका आकाश सदा शब्दायमान रहता है ॥२८॥


शरन्निशाकरश्वेतवृत्तैर्मुक्ताफलोपमैः । आनन्ददानचतुरैर्गुणवद्भिः प्रसाधितः ॥२९॥

अर्थ: जो शरद् ऋतुके चन्द्रमाके समान श्वेतवृत्त अर्थात् निर्मल चरित्रके धारक हैं ( पक्षमें श्वेतवर्ण गोलाकार हैं ), मुक्ताफलके समान हैं, तथा आनन्दके देनेमें चतुर हैं ऐसे गुणी मनुष्योंसे वह देश सदा सुशोभित रहता है ॥२९॥


तर्पिताध्वगसंघातैः फलैर्वरतरूपमैः । महाकुटुम्बिभिर्नित्यं प्राप्तोऽभिगमनीयताम् ॥३०॥

अर्थ: जिन्होंने आहार आदि की व्यवस्थासे पथिकोंके समूहको सन्तुष्ट किया है तथा जो फलोंके द्वारा श्रेष्ठ वृक्षोंके समान जान पड़ते हैं ऐसे बड़े-बड़े गृहस्थोंके कारण उस देशमें लोगोंका सदा आवागमन होता रहता है ॥३०॥


सारङ्गमृगसद्गन्धमृगरोमभिरावृतैः । हिमवत्पाददेशीयैः कृतस्थैर्यो महत्तरैः ॥३१॥

अर्थ: कस्तूरी आदि सुगन्धित द्रव्य तथा भाँति-भाँतिके वस्त्रोंसे वेष्टित होनेके कारण जो हिमालयके प्रत्यन्त पर्वतों (शाखा) के समान जान पड़ते हैं ऐसे बड़े-बड़े लोग उस देशमें निवास करते हैं ॥३१॥


हताः कुदृष्टयो यस्मिन् जिनप्रवचनाञ्जनैः । पापकक्षं च निर्दग्धं महामुनितपोऽग्निभिः ॥३२॥

अर्थ: उस देशमें मिथ्यात्वरूपी दृष्टिके विकार जैनवचनरूपी अंजनके द्वारा दूर होते रहते हैं और पापरूपी वन महा-मुनियोंकी तपरूपी अग्निसे भस्म होता रहता है ॥३२॥


तत्रास्ति सर्वतः कान्तं नाम्ना राजगृहं पुरम् । कुसुमामोदसुभगं भुवनस्येव यौवनम् ॥३३॥

अर्थ: उस मगध देशमें सब ओरसे सुन्दर तथा फूलोंकी सुगन्धिसे मनोहर राजगृह नामका नगर है जो ऐसा जान पड़ता है मानो संसारका यौवन ही हो ॥३३॥


महिषीणां सहस्रैर्यत्कुङ्कुमाञ्चितविग्रहैः । धर्मान्तःपुरनिर्भासं धत्ते मानसकर्षणम् ॥३४॥

अर्थ: वह राजगृह नगर धर्म अर्थात् यमराजके अन्तःपुरके समान सदा मनको अपनी ओर खींचता रहता है क्योंकि जिस प्रकार यमराजका अन्तःपुर केशरसे युक्त शरीरको धारण करनेवाली हजारों महिषियों अर्थात् भैंसोंसे युक्त होता है उसी प्रकार वह राजगृह नगर भी केशरसे लिप्त शरीरको धारण करने-वाली हजारों महिषियों अर्थात् रानियोंसे सुशोभित है । भावार्थ - महिषी नाम भैंसका है और जिसका राज्याभिषेक किया गया ऐसी रानीका भी है । लोकमें यमराज महिषवाहन नामसे प्रसिद्ध हैं इसलिए उसके अन्तःपुरमें महिषोंकी स्त्रियों - महिषियोंका रहना उचित ही है और राजगृह नगरमें राजाकी रानियोंका सद्भाव युक्तियुक्त ही है ॥३४॥


मरुदुद्धूतचमरैर्बालव्यजनशोभितैः । प्रान्तैरमरराजस्य च्छायां यदवलम्बते ॥३५॥

अर्थ: उस नगरके प्रदेश जहाँ-तहाँ बालव्यजन अर्थात् छोटे-छोटे पंखोंसे सुशोभित थे और जहाँ-तहाँ उनमें मरुत अर्थात् वायुके द्वारा चमर कम्पित हो रहे थे इसलिए वह नगर इन्द्रकी शोभाको प्राप्त हो रहा था क्योंकि इन्द्रके समीपवर्ती प्रदेश भी बालव्यजनोंसे सुशोभित होते हैं और उनमें मरुत् अर्थात् देवोंके द्वारा चमर कम्पित होते रहते हैं ॥३५॥


संतापमपरिप्राप्तैः कृतमीश्वरमार्गणैः । मनुजैर्यत्करोतीव त्रिपुरस्य जिगीषुताम् ॥३६॥

अर्थ: वह नगर, मानो त्रिपुर नगरको जीतना ही चाहता है क्योंकि जिस प्रकार त्रिपुर नगरके निवासी मनुष्य ईश्वरमार्गणैः अर्थात् महादेवके बाणोंके द्वारा किये हुए सन्तापको प्राप्त हैं उस प्रकार उस नगरके मनुष्य ईश्वरमार्गणैः अर्थात् धनिक-वर्गकी याचनासे प्राप्त सन्तापको प्राप्त नहीं थे - सभी सुखसे सम्पन्न हैं ॥३६॥


सुधारससमासंगपाण्डुरागारपङ्क्तिभिः । टङ्ककल्पितशीतांशुशीलाभिरिव कल्पितम् ॥३७॥

अर्थ: वह नगर चूनासे पुते सफेद महलोंकी पंक्तिसे लसा जान पड़ता है मानो टाँकियोंसे गढ़े चन्द्रकान्त मणियोंसे ही बनाया गया हो ॥३७॥


मदिरामत्तवनिताभूषणस्वनसंभृतम् । कुबेरनगरस्येव द्वितीयं संनिवेशनम् ॥३८॥

अर्थ: वह नगर मदिराके नशामें मस्त स्त्रियोंके आभूषणोंकी झनकारसे सदा भरा रहता है इसलिए ऐसा जान पड़ता है मानो कुबेरकी नगरी अर्थात् अलकापुरीका द्वितीय प्रति-बिम्ब ही हो ॥३८॥


तपोवनं मुनिश्रेष्ठैर्वेश्याभिः काममन्दिरम् । लासकैर्नृत्तभवनं शत्रुभिर्यमपत्तनम् ॥३९॥

अर्थ: उस नगरको श्रेष्ठ मुनियोंने तपोवन समझा था, वेश्याओंने कामका मन्दिर माना था, नृत्यकारोंने नृत्यभवन समझा था और शत्रुओंने यमराजका नगर माना था ॥३९॥


शस्त्रिभिर्वीरनिलयोऽभिलाषमणिरर्थिभिः । विद्यार्थिभिर्गुरोः सद्म वन्दिभिर्धूर्तपत्तनम् ॥४०॥

अर्थ: शस्त्रधारियोंने वीरोंका घर समझा था, याचकोंने चिन्तामणि, विद्यार्थियोंने गुरुका भवन और वन्दीजनोंने धूर्तोंका नगर माना था ॥४०॥


गन्धर्वनगरं गीतशास्त्रकौशलकोविदैः । विज्ञानग्रहणोद्युक्तैर्मन्दिरं विश्वकर्मणः ॥४१॥

अर्थ: संगीत शास्त्रके पारगामी विद्वानोंने उस नगरको गन्धर्वोंका नगर और विज्ञानके ग्रहण करनेमें तत्पर मनुष्योंने विश्वकर्माका भवन समझा था ॥४१॥


साधूनां संगमः सद्भिर्भूमिर्लाभस्य वाणिजैः । पञ्जरं शरणप्राप्तैर्वज्रदारुविनिर्मितम् ॥४२॥

अर्थ: सज्जनोंने सत्समागमका स्थान माना था, व्यापारियोंने लाभकी भूमि और शरणागत मनुष्योंने वज्रमय लकड़ीसे निर्मित-सुरक्षित पंजर समझा था ॥४२॥


वार्तिकैरसुरच्छिद्रं विदग्धैर्विटमण्डली । परिणामो मनोज्ञस्य कर्मणो मार्गवर्तिभिः ॥४३॥

अर्थ: समाचार प्रेषक उसे असुरोंके बिल-जैसा रहस्यपूर्ण स्थान मानते थे, चतुर जन उसे विटमण्डली - विटोंका जमघट समझते थे, और समीचीन मार्गमें चलनेवाले मनुष्य उसे किसी मनोज्ञ - उत्कृष्ट कर्मका सुफल मानते थे ॥४३॥


चारणैरुत्सवावासः कामुकैरप्सरःपुरम् । सिद्धलोकश्च विदितं यत्सदा सुखिभिर्जनैः ॥४४॥

अर्थ: चारण लोग उसे उत्सवोंका निवास, कामीजन अप्सराओंका नगर और सुखीजन सिद्धोंका लोक मानते थे ॥४४॥


यत्र मातङ्गगामिन्यः शीलवत्यश्च योषितः । श्यामाश्च पद्मरागिण्यो गौर्यश्च विमवाश्रयाः ॥४५॥

अर्थ: उस नगरकी स्त्रियाँ यद्यपि मातंगगामिनी थीं अर्थात् चाण्डालोंके साथ गमन करनेवाली थीं फिर भी शीलवती कहलाती थीं ( पक्षमें हाथियोंके समान सुन्दर चालवाली थीं तथा शीलवती अर्थात् पातिव्रत्य धर्मसे सुशोभित थीं । ) श्यामा अर्थात् श्यामवर्णवाली होकर भी पद्मरागिण्यः अर्थात् पद्मराग मणि-जैसी लाल क्रान्तिसे सम्पन्न थीं ( पक्षमें श्यामा अर्थात् नवयौवनसे युक्त होकर पद्मरागिण्यः अर्थात् कमलोंमें अनुराग रखनेवाली थीं अथवा पद्मराग मणियोंसे युक्त थीं ) । साथ ही गौरी अर्थात् पार्वती होकर भी विभवाश्रया अर्थात् महादेवके आश्रयसे रहित थीं ( पक्षमें गौर्यः अर्थात् गौर वर्ण होकर विभवाश्रयाः अर्थात् सम्पदाओंसे सम्पन्न थीं ) ॥४५॥


चन्द्रकान्तशरीराश्च शिरीषसुकुमारिकाः । भुजङ्गानामगम्याश्च कञ्चुकावृतविग्रहाः ॥४६॥

अर्थ: उन स्त्रियोंके शरीर चन्द्रकान्त मणियोंसे निर्मित थे फिर भी वे शिरीषके समान सुकुमार थीं ( पक्षमें उनके शरीर चन्द्रमाके समान कान्त–सुन्दर थे और वे शिरीषके फूलके समान कोमल शरीरवाली थीं । वे स्त्रियाँ यद्यपि भुजंगों अर्थात् सर्पोंके अगम्य थीं फिर भी उनके शरीर कंचुक अर्थात् काँचलियोंसे युक्त थे ( पक्षमें भुजंगों अर्थात् विटपुरुषोंके अगम्य थीं और उनके शरीर कंचुक अर्थात् चोलियोंसे सुशोभित थे ) ॥४६॥


महालावण्ययुक्ताश्च मधुराभाषतत्पराः । प्रसन्नोज्ज्वलवक्त्राश्च प्रमादरहितेहिताः ॥४७॥

अर्थ: वे स्त्रियाँ यद्यपि महालावण्य अर्थात् बहुत भारी खारापनसे युक्त थीं फिर भी मधुराभास-तत्परा अर्थात् मिष्ट भाषण करनेमें तत्पर थीं ( पक्षमें महालावण्य अर्थात् बहुत भारी सौन्दर्यसे युक्त थीं और प्रिय वचन बोलनेमें तत्पर थीं ) । उनके मुख प्रसन्न तथा उज्ज्वल थे और उनकी चेष्टाएँ प्रमादसे रहित थीं ॥४७॥


कलत्रस्य पृथोर्लक्ष्मीं दधतेऽथ च दुर्विधाः । मनोज्ञा नितरां मध्ये सुवृत्ताश्चायतिं गताः ॥४८॥

अर्थ: वे स्त्रियाँ अत्यन्त सुन्दर थीं, स्थूल नितम्बोंकी शोभा धारण करती थीं, उनका मध्यभाग अत्यन्त मनोहर था, वे सदाचारसे युक्त थीं और उत्तम भविष्यसे सम्पन्न थीं । ( इस श्लोकमें भी ऊपरके श्लोकोंके समान विरोधाभास अलंकार है जो इस प्रकार घटित होता है - वहाँ की स्त्रियाँ दुर्विधा अर्थात् दरिद्र होकर भी कलत्र अर्थात् स्त्री-सम्बन्धी भारी लक्ष्मी सम्पदाको धारण करती थीं और सुवृत्त अर्थात् गोलाकार होकर भी आयति गता अर्थात् लम्बाईको प्राप्त थीं । ( इस विरोधाभासका परिहार अर्थमें किया गया है) ॥४८॥


लोकान्तपर्वताकारं यत्र प्राकारमण्डलम् । समुद्रोदरनिर्मासपरिखाकृतवेष्टनम् ॥४९॥

अर्थ: उस राजगृह नगरका जो कोट था वह (मनुष्य) लोकके अन्तमें स्थित मानुषोत्तर पर्वतके समान जान पड़ता था तथा समुद्रके समान गम्भीर परिखा उसे चारों ओरसे घेरे हुई थी ॥४९॥


आसीत्तत्र पुरे राजा श्रेणिको नाम विश्रुतः । देवेन्द्र इव बिभ्राणः सर्ववर्णधरं धनुः ॥५०॥

अर्थ: उस राजगृह नगरमें श्रेणिक नामका प्रसिद्ध राजा रहता था जो कि इन्द्रके समान सर्ववर्णधर अर्थात् ब्राह्मणादि समस्त वर्णोंकी व्यवस्था करनेवाले ( पक्षमें लाल-पीले आदि समस्त रंगोंको धारण करनेवाले ) धनुषको धारण करता था ॥५०॥


कल्याणप्रकृतित्वेन यश्च पर्वतराजवत् । समुद्र इव मर्यादालङ्घनत्रस्तचेतसा ॥५१॥

अर्थ: वह राजा कल्याणप्रकृति था अर्थात् कल्याणकारी स्वभावको धारण करनेवाला था (पक्षमें सुवर्णमय था ) इसलिए सुमेरुपर्वतके समान जान पड़ता था और उसका चित्त मर्यादाके उल्लंघनसे सदा भयभीत रहता था अतः वह समुद्रके समान प्रतीत होता था ॥५१॥


कलानां ग्रहणे चन्द्रो लोकधृत्या धरामयः । दिवाकरः प्रतापेन कुबेरो धनसंपदा ॥५२॥

अर्थ: राजा श्रेणिक कलाओंके ग्रहण करनेमें चन्द्रमा था, लोकको धारण करनेमें पृथिवीरूप था, प्रतापसे सूर्य था और धन-सम्पत्तिसे कुबेर था ॥५२॥


शौर्यरक्षितलोकोऽपि नयानुगतमानसः । लक्ष्म्यापि कृतसंबन्धो न गर्वग्रहदूषितः ॥५३॥

अर्थ: वह अपनी शूरवीरतासे समस्त लोकोंकी रक्षा करता था फिर भी उसका मन सदा नीतिसे भरा रहता था और लक्ष्मीके साथ उसका सम्बन्ध था तो भी अहंकाररूपी ग्रहसे वह कभी दूषित नहीं होता था ॥५३॥


जितजेयोऽपि नो शस्त्रव्यायामेषु पराङ्मुखः । विधुरेष्वप्यसंभ्रान्तः प्रणतेष्वपि पूजकः ॥५४॥

अर्थ: उसने यद्यपि जीतने योग्य शत्रुओंको जीत लिया था तो भी वह शस्त्र-विषयक व्यायामसे विमुख नहीं रहता था । वह आपत्तिके समय भी कभी व्यग्र नहीं होता था और जो मनुष्य उसके समक्ष नम्रीभूत होते थे उनका वह सम्मान करता था ॥५४॥


रत्नबुद्धिरभूद् यस्य मलमुक्तेषु साधुषु । पृथिवीभेदविज्ञानं पाषाणशकलेषु तु ॥५५॥

अर्थ: वह दोषरहित सज्जनोंको ही रत्न समझता था, पाषाणके टुकड़ोंको तो केवल पृथ्वीका एक विशेष परिणमन ही मानता था ॥५५॥


क्रियासु दानयुक्तासु महासाधनदर्शनम् । बृहत्कीटपरिज्ञानं मदोत्कटगजेषु तु ॥५६॥

अर्थ: जिनमें दान दिया जाता था, ऐसी क्रियाओंको - धार्मिक अनुष्ठानोंको ही वह कार्यकी सिद्धिका श्रेष्ठ साधन समझता था । मदसे उत्कट हाथियोंको तो वह दीर्घकाय कीड़ा ही मानता था ॥५६॥


सर्वस्याग्रेसरे प्रीतिर्यशस्यत्यन्तमुन्नता । जरत्तृणसमा बुद्धिर्जीविते तु विनश्वरे ॥५७॥

अर्थ: सबके आगे चलनेवाले यशमें ही वह बहुत भारी प्रेम करता था । नश्वर जीवनको तो वह जीर्ण तृणके समान तुच्छ मानता था ॥५७॥


प्रसाधनमतिः प्राप्तकरास्वाशासु संततम् । आत्मीयासु तु मार्यासु विबोधश्चार्यपुत्रकः ॥५८॥

अर्थ: वह आर्यपुत्र कर प्रदान करनेवाली दिशाओंको ही सदा अपना अलंकार समझता था । स्त्रियोंसे तो सदा विमुख रहता था ॥५८॥


गुणावनमिते चापे प्रतिपत्तिः सहायजा । न पिण्डमात्रसंतुष्टे भृत्यवर्गेऽपचारिणि ॥५९॥

अर्थ: गुण अर्थात् डोरीसे झुके धनुषको ही वह अपना सहायक समझता था । भोजनसे सन्तुष्ट होनेवाले अपकारी सेवकोंके समूहको वह कभी भी सहायक नहीं मानता था ॥५९॥


वातोऽपि नाहरत्किंचिद्यत्र रक्षति मेदिनीम् । प्रावर्तन्त न हिंसायां क्रूराः पशुगणा अपि ॥६०॥

अर्थ: उसके राज्यमें वायु भी किसीका कुछ हरण नहीं करती थी फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या थी । इसी प्रकार दुष्ट पशुओंके समूह भी हिंसामें प्रवृत्त नहीं होते थे फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या थी ॥६०॥


वृषघातीनि नो यस्य चरितानि हरेरिव । नैश्वर्यचेष्टितं दक्षवर्गतापि पिनाकिवत् ॥६१॥

अर्थ: हरि अर्थात् विष्णुकी चेष्टाएँ तो वृषघाती अर्थात् वृषासुरको नष्ट करनेवाली थीं पर उसकी चेष्टाएँ वृषघाती अर्थात् धर्मका घात करनेवाली नहीं थीं । इसी प्रकार महादेवजीका वैभव दक्षवर्गतापि अर्थात् राजा दक्षके परिवारको सन्ताप पहुँचानेवाला था परन्तु उसका वैभव दक्षवर्गतापि अर्थात् चतुर मनुष्योंके समूहको सन्ताप पहुँचानेवाला नहीं था ॥६१॥


गोत्रनाशकरी चेष्टा नामराधिपतेरिव । नातिदण्डग्रहप्रीतिर्दक्षिणाशाविभोरिव ॥६२॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्रकी चेष्टा गोत्रनाशकरी अर्थात् पर्वतोंका नाश करनेवाली थी उस प्रकार उसकी चेष्टा गोत्रनाशकारी अर्थात् वंशका नाश करनेवाली नहीं थी और जिस प्रकार दक्षिण दिशाके अधिपति यमराजके अतिदण्डग्रहप्रीति अर्थात् दण्डधारण करनेमें अधिक प्रीति रहती है उस प्रकार उसके अतिदण्डग्रहप्रीति अर्थात् बहुत भारी सजा देनेमें प्रीति नहीं रहती थी ॥६२॥


वरुणस्येव न द्रव्यं निस्त्रिंशग्राहरक्षितम् । निःफला संनिधिप्राप्तिर्नोत्तराशापतेरिव ॥६३॥

अर्थ: जिस प्रकार वरुणका द्रव्य मगरमच्छ आदि दुष्ट जलचरोंसे रहित होता है उस प्रकार उसका द्रव्य दुष्ट मनुष्योंसे रक्षित नहीं था अर्थात् उसका सब उपभोग कर सकते थे और जिस प्रकार कुबेरकी सन्निधि अर्थात् उत्तमनिधिका पाना निष्फल है उस प्रकार उसको सन्निधि अर्थात् सज्जनरूपी निधिका पाना निष्फल नहीं था ॥६३॥


बुद्धस्येव न निर्मुक्तमर्थवादेन दर्शनम् । न श्रीर्बहुलदोषोपघातिनी शीतगोरिव ॥६४॥

अर्थ: जिस प्रकार बुद्धका दर्शन अर्थात् अर्थवाद-वास्तविकवादसे रहित होता है उस प्रकार उसका दर्शन अर्थात् साक्षात्कार अर्थवाद-धनप्राप्तिसे रहित नहीं होता था और जिस प्रकार चन्द्रमाकी भी बहुलदोषोपघातिनी अर्थात् कृष्णपक्षकी रात्रिसे उपहत - नष्ट हो जाती है उस प्रकार उसकी भी बहुलदोषोपघातिनी अर्थात् बहुत भारी दोषोंसे नष्ट होनेवाली नहीं थी ॥६४॥


त्यागस्य नार्थिनो यस्य पर्याप्तिं समुपागताः । प्रज्ञायाश्च न शास्त्राणि कवित्वस्य न भारती ॥६५॥

अर्थ: याचकगण उसके त्यागगुणकी पूर्णताको प्राप्त नहीं हो सके थे अर्थात् वह जितना त्याग-दान करना चाहता था उतने याचक नहीं मिलते थे । शास्त्र उसकी बुद्धिकी पूर्णताको प्राप्त नहीं थे, अर्थात् उसकी बुद्धि बहुत भारी थी और शास्त्र अल्प थे । इसी प्रकार सरस्वती उसकी कवित्व शक्तिकी पूर्णताको प्राप्त नहीं थी अर्थात् वह जितनी कविता कर सकता था उतनी सरस्वती नहीं थी - उतना शब्द-भण्डार नहीं था ॥६५॥


साहसानि महिम्नो न नोत्साहस्य च चेष्टितम् । दिगाननानि नो कीर्तेर्न संख्या गुणसंपदः ॥६६॥

अर्थ: साहसपूर्ण कार्य उसकी महिमाका अन्त नहीं पा सके थे, चेष्टाएँ उसके उत्साहकी सीमा नहीं प्राप्त कर सकी थीं, दिशाओंके अन्त उसकी कीर्तिका अवसान नहीं पा सके थे और संख्या उसकी गुणरूप सम्पदाकी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकी थी अर्थात् उसकी गुणरूपी सम्पदा संख्यासे रहित थी - अपरिमित थी ॥६६॥


चित्तानि नानुरागस्य जनस्याखिलभूतले । कला न कुशलत्वस्य न प्रतापस्य शत्रवः ॥६७॥

अर्थ: समस्त पृथिवीतलपर मनुष्योंके चित्त उसके अनुरागकी सीमा नहीं पा सके थे, कला चतुराई उसकी कुशलताकी अवधि नहीं प्राप्त कर सकी थीं और शत्रु उसके प्रताप-तेजकी पूर्णता प्राप्त नहीं कर सके थे ॥६७॥


कथमस्मद्विधैस्तैय शक्यन्ते गदितुं गुणाः । यस्येन्द्रसदसि ज्ञातं सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥६८॥

अर्थ: इन्द्रकी सभामें जिसके उत्तम सम्यग्दर्शनकी चर्चा होती थी उस राजा श्रेणिकके गुण हमारे जैसे तुच्छ शक्तिके धारक पुरुषोंके द्वारा कैसे कहे जा सकते हैं ॥६८॥


उद्धतेषु सता तेन वज्रदण्डेन शत्रुषु । तपोधनसमृद्धेषु नॅमता वेतसायितम् ॥६९॥

अर्थ: वह राजा, उद्दण्ड शत्रुओंपर तो वज्रदण्डके समान कठोर व्यवहार करता था और तपरूपी धनसे समृद्ध गुणी मनुष्योंको नमस्कार करता हुआ उनके साथ बेंतके समान आचरण करता था ॥६९॥


रक्षिता बाहुदण्डेन सकला तस्य मेदिनी । पुरस्य स्थितिमात्रं तु प्राकारपरिखादिकम् ॥७०॥

अर्थ: उसने अपने भुजदण्डसे ही समस्त पृथिवीकी रक्षा की थी - नगरके चारों ओर जो कोट तथा परिखा आदिक वस्तुएँ थीं वह केवल शोभाके लिए ही थीं ॥७०॥


तत्पत्नी चेलनानाम्नी शीलाम्बरविभूषणा । सम्यग्दर्शनसंशुद्धा श्रावकाचारवेदिनी ॥७१॥

अर्थ: राजा श्रेणिककी पत्नीका नाम चेलना था। वह शीलरूपी वस्त्राभूषणोंसे सहित थी। सम्यग्दर्शनसे शुद्ध थी तथा श्रावकाचारको जाननेवाली थी ॥७१॥


एकदा तु पुरस्यास्य समीपं जिनसत्तमः । श्रीमान् प्राप्तो महावीरः सुरासुरनतक्रमः ॥७२॥

अर्थ: किसी एक समय, अनन्त चतुष्टयरूपी लक्ष्मीसे सम्पन्न• तथा सुर और असुर जिनके चरणोंको नमस्कार करते थे ऐसे महावीर जिनेन्द्र उस राजगृह नगरके समीप आये ॥७२॥


मातुरप्युदरे यस्य दिक्कुमारीविशोधिते । ज्ञानत्रयसमेतस्य सुखमासीत् सुरेन्द्रजम् ॥७३॥

अर्थ: वे महावीर जिनेन्द्र, जो कि दिक्-कुमारियोंके द्वारा शुद्ध किये हुए माताके उदरमें भी मति, श्रुत तथा अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे तथा जिन्हें उस गर्भवासके समय भी इन्द्रके समान सुख प्राप्त था ॥७३॥


जन्मनोऽर्वाक्पुरस्ताच्च यस्य शक्रनिदेशतः । अपूरयत् पितुः सद्म धनदो रत्नवृष्टिभिः ॥७४॥

अर्थ: जिनके जन्म लेनेके पहले और पीछे भी इन्द्रके आदेशसे कुबेरने उनके पिताका घर रत्नोंकी वृष्टिसे भर दिया था ॥७४॥


जननाभिषवे यस्य नगराजस्य मूर्द्धनि । चक्रे महोत्सवो देवैराखण्डलसमन्वितैः ॥७५॥

अर्थ: जिनके जन्माभिषेकके समय देवोंने इन्द्रोंके साथ मिलकर सुमेरु पर्वतके शिखरपर बहुत भारी उत्सव किया था ॥७५॥


पादाङ्गुष्ठेन यो मेरुमनायासेन कम्पयन् । लेभे नाम महावीर इति नाकालयाधिपात् ॥७६॥

अर्थ: जिन्होंने अपने पैरके अँगूठेसे अनायास ही सुमेरु पर्वतको कम्पित कर इन्द्रसे ‘महावीर’ ऐसा नाम प्राप्त किया था ॥७६॥


अमृतेन निषिक्तेन यस्याङ्गुष्ठेऽमरेशिना । वृत्तिरासीच्छरीरस्य बालस्याबालकर्मणः ॥७७॥

अर्थ: बालक होनेपर भी अबालकोचित कार्य करनेवाले जिन महावीर जिनेन्द्रके शरीरकी वृत्ति इन्द्रके द्वारा अँगूठेमें सींचे हुए अमृतसे होती थी ॥७७॥


सुत्रामप्रहितैर्यस्य कान्तैः सुरकुमारकैः । कुमारचेष्टितैश्चारुविनीतैरनुसेवितम् ॥७८॥

अर्थ: बालकों जैसी चेष्टा करनेवाले, मनोहर विनयके धारक, इन्द्रके द्वारा भेजे हुए सुन्दर देवकुमार सदा जिनकी सेवा किया करते थे ॥७८॥


आनन्दः परमां वृद्धिं येन सार्धमुपागतः । पित्रोर्बन्धुसमूहस्य त्रयस्य भुवनस्य च ॥७९॥

अर्थ: जिनके साथ ही साथ माता-पिताका, बन्धु-समूहका और तीनों लोकोंका आनन्द परम वृद्धिको प्राप्त हुआ था ॥७९॥


यत्र जाते पितुः सर्वे नृपाश्चिरविरोधिनः । महाप्रभावसंपन्ना जाता प्रणतमस्तकाः ॥८०॥

अर्थ: जिनके उत्पन्न होते ही पिताके चिरविरोधी प्रभावशाली समस्त राजा उनके प्रति नतमस्तक हो गये थे ॥८०॥


रथैर्मत्तगजेन्द्रैश्च वायुवेगैश्च वाजिभिः । प्राभृतद्रव्यसंयुक्तैः क्रमेलककुलैस्तथा ॥८१॥

उत्सृष्टचामरच्छत्रवाहनादिपरिच्छदैः । काङ्क्षद्भिः प्रतिसामन्तै राजेन्द्रालोकनोत्सवम् ॥८२॥

नानादेशसमायातैर्महत्तरगणैस्तथा । पितुर्यस्यानुभावेन चुक्षोभ भवनाजिरम् ॥८३॥

अर्थ: जिनके पिताके भवनका आँगन रथोंसे, मदोन्मत्त हाथियोंसे, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंसे, उपहारके अनेक द्रव्योंसे युक्त ऊँटोंके समूहसे, छत्र, चमर, वाहन आदि विभूतिका त्याग कर राजाधिराज महाराजके दर्शनकी इच्छा करनेवाले अनेक मण्डलेश्वर राजाओंसे तथा नाना देशोंसे आये हुए अन्य अनेक बड़े-बड़े लोगोंसे सदा क्षोभको प्राप्त होता रहता था ॥८१-८३॥


अल्पकर्मकलङ्कत्वाद्यस्य भोगेषु हारिषु । चित्तं न सङ्गमायातं पयःस्विव सरोरुहम् ॥८४॥

अर्थ: जिस प्रकार कमल जलमें आसक्तिको प्राप्त नहीं होता - उससे निर्लिप्त ही रहता है उसी प्रकार जिनका चित्त कर्मरूपी कलंककी मन्दतासे मनोहारी विषयोंमें आसक्तिको प्राप्त नहीं हुआ था - उससे निर्लिप्त ही रहता था ॥८४॥


विद्युद्विलसिताकारां ज्ञात्वा यः सर्वसंपदम् । प्रवव्राज स्वयंबुद्धः कृतलौकान्तिकागमः ॥८५॥

अर्थ: जो स्वयंबुद्ध भगवान् समस्त सम्पदाको बिजलीकी चमकके समान क्षणभंगुर जानकर विरक्त हुए और जिनके दीक्षाकल्याणकमें लौकान्तिक देवोंका आगमन हुआ था ॥८५॥


सम्यग्दर्शनसंबोधचारित्रत्रितयं प्रभुः । यः समाराध्य चिच्छेद घातिकर्मचतुष्टयम् ॥८६॥

अर्थ: जिन्होंने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र इन तीनोंकी आराधना कर चार घातिया कर्मोंका विनाश किया था ॥८६॥


संप्राप्य केवलज्ञानं लोकालोकावलोककम् । धर्मतीर्थं कृतं येन लोकार्थं कृतिना सता ॥८७॥

अर्थ: जिन्होंने लोक और अलोकको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्राप्त कर लोककल्याणके लिए धर्मतीर्थका प्रवर्तन किया था तथा स्वयं कृतकृत्य हुए थे ॥८७॥


अवाप्तप्रापणीयस्य कृतनिष्ठात्मकर्मणः । भास्करस्येव यस्याभूत् परकृत्याय चेष्टितम् ॥८८॥

अर्थ: जो प्राप्त करने योग्य समस्त पदार्थ प्राप्त कर चुके थे और करने योग्य समस्त कार्य समाप्त कर चुके थे इसीलिए जिनकी समस्त चेष्टाएँ सूर्यके समान केवल परोपकारके लिए ही होती थीं ॥८८॥


मलस्वेदविनिर्मुक्तं क्षीरसप्रभशोणितम् । स्वाकारगन्धसंघातं शक्त्या युक्तमनन्तया ॥८९॥

चारुलक्षणसंपूर्णं हितसंमितभाषणम् । अप्रमेयगुणागारं यो बभार परं वपुः ॥९०॥

अर्थ: जो जन्मसे ही ऐसे उत्कृष्ट शरीरको धारण करते थे, जो कि मल तथा पसीनासे रहित था, दूधके समान सफेद जिसमें रुधिर था, जो उत्तम संस्थान, उत्तम गन्ध और उत्तम संहननसे सहित था, अनन्त बलसे युक्त था, सुन्दर-सुन्दर लक्षणोंसे पूर्ण था, हित मित वचन बोलनेवाला था और अपरिमित गुणोंका भण्डार था ॥८९-९०॥


यस्मिन् विहरणप्राप्ते योजनानां शतद्वये । दुर्भिक्षपरपीडानामीतीनां च न संभवः ॥९१॥

अर्थ: जिनके विहार करते समय दो सौ योजन तक दुर्भिक्ष आदि दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेवाले कार्य तथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि ईतियोंका होना सम्भव नहीं था ॥९१॥


विद्यानां यः समस्तानां परमेश्वरतां गतः । विशुद्धस्फटिकच्छायं छायामपि न यद्वपुः ॥९२॥

अर्थ: जो समस्त विद्याओंकी परमेश्वरताको प्राप्त थे, स्फटिकके समान निर्मल कान्तिवाला जिनका शरीर छायाको प्राप्त नहीं होता था अर्थात् जिनके शरीरकी परछाईं नहीं पड़ती थी ॥९२॥


पक्ष्मस्पन्दविनिर्मुक्ते प्रशान्ते यस्य लोचने । समा नखा महानीलस्निग्धच्छायाश्च मूर्द्धजा ॥९३॥

अर्थ: जिनके नेत्र टिमकारसे रहित अत्यन्त शान्त थे, जिनके नख और महानील मणिके समान स्निग्ध कान्तिको धारण करनेवाले बाल सदा समान थे अर्थात् वृद्धिसे रहित थे ॥९३॥


मैत्री समस्तविषया विहारानुगवायुता । विहृतिश्च प्रभोर्यस्य भुवनानन्दकारणम् ॥९४॥

अर्थ: समस्त जीवोंमें मैत्रीभाव रहता था, विहारके अनुकूल मन्द-मन्द वायु चलती थी, जिनका विहार समस्त संसारके आनन्दका कारण था ॥९४॥


सर्वर्तुफलपुष्पाणि धारयन्ति महीरुहाः । यस्मिन्नासन्नमायाते धरणी दर्पणायते ॥९५॥

अर्थ: वृक्ष सब ऋतुओंके फल-फूल धारण करते थे और जिनके पास आते ही पृथिवी दर्पणके समान आचरण करने लगती थी ॥९५॥


सुगन्धिमरुतो यस्य योजनान्तरभूतलम् । कुर्वते पांसुपाषाणकण्टकादिभिरुज्झितम् ॥९६॥

अर्थ: जिनके एक योजनके अन्तरालमें वर्तमान भूमिको सुगन्धित पवन सदा धूलि, पाषाण और कण्टक आदिसे रहित करती रहती थी ॥९६॥


विद्युन्मालाकृताभिख्यैस्तदेव स्तनितामरैः । सुगन्धिसलिलैः सिक्तं सोत्साहैर्यस्य सादरैः ॥९७॥

अर्थ: बिजलीकी मालासे जिनकी शोभा बढ़ रही है ऐसे स्तनितकुमार - मेघ कुमार जातिके देव बड़े उत्साह और आदरके साथ उस योजनान्तरालवर्ती भूमिको सुगन्धित जलसे सींचते रहते थे ॥९७॥


अप्रमेयमृदुत्वानि यस्य पद्मानि गच्छतः । धरण्यामुपजायन्ते यस्य व्योमविहारिणः ॥९८॥

अर्थ: जो आकाशमें विहार करते थे और विहार करते समय जिनके चरणोंके तले देव लोग अत्यन्त कोमल कमलोंकी रचना करते थे ॥९८॥


अत्यन्तफलसंपत्तिनम्रशाल्यादिभूषिता । धरणी जायते यस्मिन् समेते सस्यकारणम् ॥९९॥

अर्थ: जिनके समीप आनेपर पृथिवी बहुत भारी फलोंके भारसे नम्रीभूत धान आदिके पौधोंसे विभूषित हो उठती थी तथा सब प्रकारका अन्न उसमें उत्पन्न हो जाता था ॥९९॥


शरत्सरःसमाकारं जायते विमलं नभः । धूमकादिविनिर्मुक्ता दिशस्तु सुखदर्शनाः ॥१००॥

अर्थ: आकाश शरद् ऋतुके तालाबके समान निर्मल हो जाता था और दिशाएँ धूमक आदि दोषोंसे रहित होकर बड़ी सुन्दर मालूम होने लगती थीं ॥१००॥


स्फुरितारसहस्रेण प्रभामण्डलचारुणा । यत्पुरो धर्मचक्रेण स्थीयते जितभानुना ॥१०१॥

अर्थ: जिसमें हजार आरे देदीप्यमान हैं, जो कान्तिके समूहसे जगमगा रहा है और जिसने सूर्यको जीत लिया है ऐसा धर्मचक्र जिनके आगे स्थित रहता था ॥१०१॥


अवस्थानं चकारासौ विपुले विपुलाह्वये । नानानिर्झरनिस्यन्दमधुरारावहारिणि ॥१०२॥

पुष्पोपशोभितोद्देशे लतालिङ्गितपादपे । अधित्यकासु विस्रब्धनिर्वैरव्यालसेविते ॥१०३॥

नमतीव सदायानैर्घूर्णितोदारपादपैः । हसतीव समुत्सर्पन्निर्झरामलशीकरैः ॥१०४॥

कूजितैः पक्षिसंघानां जल्पतीव मनोहरम् । भ्रमराणां निनादेन गायतीव मदश्रिताम् ॥१०५॥

आलिङ्गतीव सर्वाशाः समीरेण सुगन्धिना । नानाधातुप्रभाजालमण्डितोत्तुङ्गश्टङ्गके ॥१०६॥

गुहामुखसुखासीनदृष्टाननमृगाधिपे । घनपादपखण्डाधःस्थितयूथपतिद्विपे ॥१०७॥

महिम्ना सर्वमाकाशं संछाद्येव व्यवस्थिते । पर्वतेऽष्टापदे रम्ये भगवानिव नाभिजः ॥१०८॥

अर्थ: ऊपर कही हुई विशेषताओंसे सहित भगवान् वर्धमान जिनेन्द्र राजगृहके समीपवर्ती उस विशाल विपुलाचलपर अवस्थित हुए जो कि नाना निर्झरोंके मधुर शब्दसे मनोहर था, जिसका प्रत्येक स्थान फूलोंसे सुशोभित था, जिसके वृक्ष लताओंसे आलिंगित थे, सिंह, व्याघ्र आदि दुष्ट जीव वैररहित होकर निश्चिन्ततासे जिसकी अधित्यकाओं (उपरितनभागों) पर बैठे थे, वायुसे हिलते हुए वृक्षोंसे जो ऐसा जान पड़ता था मानो नमस्कार ही कर रहा हो, ऊपर उछलते हुए झरनोंके निर्मल छींटोंसे जो ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो, पक्षियोंके कलरवसे ऐसा जान पड़ता था मानो मधुर भाषण ही कर रहा हो, मदोन्मत्त भ्रमरों की गुंजारसे ऐसा जान पड़ता था मानो गा ही रहा हो, सुगन्धित पवनसे जो ऐसा जान पड़ता था मानो आलिंगन ही कर रहा हो। जिसके ऊँचे-ऊँचे शिखर नाना धातुओंकी कान्तिके समूहसे सुशोभित थे, जिसकी गुफाओंके अग्रभागमें सुखसे बैठे हुए सिंहोंके मुख दिख रहे थे, जिसकी सघन वृक्षावलीके नीचे गजराज बैठे थे और जो अपनी महिमासे समस्त आकाशको आच्छादित कर स्थित था। जिस प्रकार अत्यन्त रमणीय कैलास पर्वतपर भगवान् वृषभदेव विराजमान हुए थे उसी प्रकार उक्त विपुलाचलपर भगवान् वर्धमान जिनेन्द्र विराजमान हुए ॥१०२-१०८॥


तत्रास्य जगती जाता योजनं परिमाणतः । नाम्ना समवपूर्वेण सरणेन प्रकीर्तिता ॥१०९॥

अर्थ: उस विपुलाचलपर एक योजन विस्तारवाली भूमि समवसरणके नामसे प्रसिद्ध थी ॥१०९॥


आसनाभिमुखे तत्र जिने जितभवद्विषि । चुक्षोभ त्रिदशेन्द्रस्य मृगेन्द्रैरूढमासनम् ॥११०॥

अर्थ: संसाररूपी शत्रुको जीतनेवाले वर्धमान जिनेन्द्र जब उस समवसरण भूमिमें सिंहासनारूढ़ हुए तब इन्द्रका आसन कम्पायमान हुआ ॥११०॥


प्रभावात् कस्य मे कम्पं सिंहासनमिदं गतम् । इत्यालोक्य विबुद्धोऽसौ ज्ञानेनावधिना ततः ॥१११॥

अर्थ: इन्द्रने उसी समय विचार किया कि मेरा यह सिंहासन किसके प्रभावसे कम्पायमान हुआ है। विचार करते ही उसे अवधिज्ञानसे सब समाचार विदित हो गया ॥१११॥


आज्ञापयर्दनुध्यातक्षणायातं कृताञ्जलिम् । सेनापतिं यथा देवाः क्रियन्तामिति वेदिनः ॥११२॥

जिनेन्द्रो भगवान् वीरः स्थितो विपुलभूधरे । तद्वन्दनाय युष्माभिः समेतैर्गम्यतामिति ॥११३॥

अर्थ: इन्द्रने सेनापतिका स्मरण किया और सेनापति तत्काल ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। इन्द्रने उसे आदेश दिया कि सब देवोंको यह समाचार मालूम कराओ कि भगवान् वर्धमान जिनेन्द्र विपुलाचलपर विराजमान हैं इसलिए आप सब लोग एकत्रित होकर उनकी वन्दनाके लिए चलिए ॥११२-११३॥


ततः शारदजीमूतमहानिचयसंनिभम् । जम्बूनदतटाघातपिङ्गकोटिमहारदम् ॥११४॥

सुवर्णकक्षया युक्तं कैलासमिव जङ्गमम् । सरिता रजसाब्जानां पिञ्जरीकृततोयया ॥११५॥

मदान्धमधुपश्रेणीश्रितगण्डविराजितम् । धूलीकदम्बसंवादि सौरभैर्व्याप्तविष्टपम् ॥११६॥

कर्णतालसमासक्तसमीपालक्ष्यशङ्खकम् । वमन्तमिव पद्मानां वनान्यरुणतालुना ॥११७॥

दलन्तमिव दर्पेण श्वसन्तमिव शौर्यतः । मदान्मूर्छामिवायान्तं गुह्यन्तमिव यौवनात् ॥११८॥

स्निग्धं नखप्रदेशेषु परुषं रोमगोचरे । सच्छिष्यं विनयावाप्तौ परमं गुरुमानने ॥११९॥

मृदुमूर्द्धानमत्यन्तदृढं परिचयग्रहे । दीर्घमायुषि ह्रस्वत्वं दधतं स्कन्धबन्धने ॥१२०॥

दरिद्रमुदरे नित्यं प्रवृत्तं दानवर्त्मनि । नारदं कलहप्रीतौ गरुडं नागनाशने ॥१२१॥

प्रदोषमिव राजन्तं चारुनक्षत्रमालया । महाघण्टाकृतारावं रक्तचामरमण्डितम् ॥१२२॥

सिन्दूरारुणितोत्तुङ्गकुम्भकूटमनोहरम् । ऐरावतं समारुह्य प्रावर्तत सुराधिपः ॥१२३॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्र स्वयं उस ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होकर चला जो कि शरद्ऋतुके मेघोंके किसी बड़े समूहके समान जान पड़ता था, सुवर्णमय तटोंके आघातसे जिसकी खीसोंका अग्रभाग पीला-पीला हो रहा था, जो सुवर्णकी मालाओंसे युक्त था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो कमलों की परागसे जिसका जल पीला हो रहा है ऐसी नदीसे परिवृत कैलास गिरि ही हो । जो मदान्ध भ्रमरोंकी पंक्तिसे युक्त गण्डस्थलोंसे सुशोभित था, कदम्बके फूलोंकी परागसे मिलती-जुलती सुगन्धिसे जिसने समस्त संसारको व्याप्त कर लिया था, जिसके कानोंके समीप शंख नामक आभरण दिखाई दे रहे थे, जो अपने लाल तालुसे कमलोंके वनको उगलता हुआ-सा जान पड़ता था, जो दर्पके कारण ऐसा जान पड़ता था मानो साँस ही ले रहा हो, मदसे ऐसा प्रतीत होता था मानो मूर्च्छाको ही प्राप्त हो रहा हो और यौवनसे ऐसा विदित होता था मानो मोहित ही हो रहा हो । जिसके नखोंके प्रदेश चिकने और शरीरके रोम कठोर थे, विनयके ग्रहण करनेमें जो समीचीन शिष्यके समान जान पड़ता था, जो मुखमें परम गुरु था अर्थात् जिसका मुख बहुत विस्तृत था, जिसका मस्तक कोमल था, जो परिचयके ग्रहण करनेमें अत्यन्त दृढ़ था, जो आयुमें दीर्घता और स्कन्धमें ह्रस्वता धारण करता था अर्थात् जिसकी आयु विशाल थी और गरदन छोटी थी, जो उदरमें दरिद्र था अर्थात् जिसका पेट कृश था, जो दानके मार्गमें सदा प्रवृत्त रहता था अर्थात् जिसके गण्डस्थलोंसे सदा मद झरता रहता था, जो कलहसम्बन्धी प्रेमके धारण करनेमें नारद था अर्थात् नारदके समान कलह-प्रेमी था, जो नागोंका नाश करनेके लिए गरुड़ था, जो सुन्दर नक्षत्रमाला ( सत्ताईस दानोंवाली माला पक्षमें नक्षत्रोंके समूह ) से प्रदोष - रात्रिके प्रारम्भके समान जान पड़ता था, जो बड़े-बड़े घण्टाओंका शब्द कर रहा था, जो लालरंगके चमरोंसे विभूषित था और जो सिन्दूरके द्वारा लाल-लाल दिखनेवाले उन्नत गण्डस्थलोंके अग्रभागसे मनोहर था ॥११४-१२३॥


प्राप्तश्च सहितो देवैरारूढनिजवाहनैः । जिनेन्द्रादर्शनोत्साहोत्फुल्लाननसरोरुहैः ॥१२४॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के दर्शन सम्बन्धी उत्साहसे जिनके मुखकमल विकसित हो रहे थे ऐसे समस्त देव अपने-अपने वाहनों-पर सवार होकर इन्द्रके साथ आ मिले ॥१२४॥


कमलायुधमुख्याश्च नभश्चरजनाधिपाः । संप्राप्ताः सहपत्नीका नानालंकारधारिणः ॥१२५॥

अर्थ: देवोंके सिवाय नाना अलंकारोंको धारण करनेवाले कमलायुध आदि विद्याधरोंके राजा भी अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ आकर एकत्रित हो गये ॥१२५॥


ततस्तुष्टाव देवेन्द्रो वचसाश्चर्यमीयुषा । गुणैरवितथैर्दिव्यैरत्यन्तविमलैरिति ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर भगवान्के वास्तविक, दिव्य तथा अत्यन्त निर्मल गुणोंके द्वारा आश्चर्यको प्राप्त हुए वचनोंसे इन्द्रने निम्न प्रकार स्तुति की ॥१२६॥


त्वया नाथ जगत्सुप्तं महामोहनिशागतम् । ज्ञानभास्करबिम्बेन बोधितं पुरुतेजसा ॥१२७॥

अर्थ: हे नाथ ! महामोहरूपी निशाके बीच सोते हुए इस समस्त जगत्को आपने अपने विशाल तेजके धारक ज्ञानरूपी सूर्यके बिम्बसे जगाया है ॥१२७॥


नमस्ते वीतरागाय सर्वज्ञाय महात्मने । यताय दुर्गमं कूलं संसारोदन्वतः परम् ॥१२८॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप वीतराग हो, सर्वज्ञ हो, महात्मा हो, और संसाररूपी समुद्रके दुर्गम अन्तिम तटको प्राप्त हुए हो अतः आपको नमस्कार हो ॥१२८॥


भवता सार्थवाहेन भव्यचेतनवाणिजाः । यास्यन्ति वितनुस्थानं दोषचौरैरलुण्ठिताः ॥१२९॥

अर्थ: आप उत्तम सार्थवाह हो, भव्य जीवरूपी व्यापारी आपके साथ निर्वाण धामको प्राप्त करेंगे और मार्गमें दोषरूपी चोर उन्हें नहीं लूट सकेंगे ॥१२९॥


प्रवर्तितस्त्वया पन्था विमलः सिद्धगामिनाम् । कर्मजालं च निर्दग्धं ज्वलितध्यानवह्निना ॥१३०॥

अर्थ: आपने मोक्षाभिलाषियोंको निर्मल मोक्षका मार्ग दिखाया है और ध्यानरूपी देदीप्यमान अग्निके द्वारा कर्मोंके समूहको भस्म किया है ॥१३०॥


निर्बन्धूनामनाथानां दुःखाग्निपरिवर्तिनाम् । बन्धुर्नाथश्च जगतां जातोऽसि परमोदयः ॥१३१॥

अर्थ: जिनका कोई बन्धु नहीं और जिनका कोई नाथ नहीं ऐसे दुःखरूपी अग्निमें वर्तमान संसारके जीवोंके आप ही बन्धु हो, आप ही नाथ हो तथा आप ही परम अभ्युदयके धारक हो ॥१३१॥


कथं कुर्यात्तव स्तोत्रं यस्यान्तपरिवर्जिताः । उपमानेन निर्मुक्ता गुणाः केवलिगोचराः ॥१३२॥

अर्थ: हे भगवन् ! हम आपके गुणोंका स्तवन कैसे कर सकते हैं जब कि वे अनन्त हैं, उपमासे रहित हैं तथा केवलज्ञानियोंके विषय हैं ॥१३२॥


इति स्तुतिं प्रयुज्यासौ विधाय च नमस्कृतिम् । मूर्द्धजानुकराम्भोजमुकुलप्राप्तभूतलः ॥१३३॥

अर्थ: इस प्रकार स्तुति कर इन्द्रने भगवान्को नमस्कार किया। नमस्कार करते समय उसने मस्तक, घुटने तथा दोनों हस्तरूपी कमलोंके कुड्मलोंसे पृथिवीतलका स्पर्श किया था ॥१३३॥


विस्मयं प्राप्तवान् दृष्ट्वा स्थानं तज्जिनपुङ्गवम् । इति यस्य समासेन कथ्यते रूपवर्णनम् ॥१३४॥

अर्थ: वह इन्द्र भगवान्का समवसरण देखकर आश्चर्यको प्राप्त हुआ था इसलिए यहाँ संक्षेपसे उसका वर्णन किया जाता है ॥१३४॥


इन्द्रस्य पुरुषैरस्य प्रकारत्रितयं कृतम् । नानावर्णमहारत्नसुवर्णमयमुत्तमम् ॥१३५॥

अर्थ: इन्द्रके आज्ञाकारी पुरुषोंने सर्वप्रथम समवसरणके तीन कोटोंकी रचना की थी जो अनेक वर्णके बड़े-बड़े रत्नों तथा सुवर्णसे निर्मित थे ॥१३५॥


प्रधानाशामुखैस्तुङ्गैर्महावापीसमन्वितैः । चतुर्भिर्गोपुरैर्युक्तं रत्नच्छायार्पटावृतैः ॥१३६॥

अर्थ: उन कोटोंकी चारों दिशाओंमें चार गोपुर द्वार थे जो बहुत ही ऊँचे थे, बड़ी-बड़ी बावड़ियोंसे सुशोभित थे, तथा रत्नोंकी कान्तिरूपी परदासे आवृत थे ॥१३६॥


आवृतं तेन तत्स्थानमष्टमङ्गलकोचितम् । वचसां गोचरातीतामदधत् कामपि श्रियम् ॥१३७॥

अर्थ: गोपुरोंका वह स्थान अष्ट मंगलद्रव्योंसे युक्त था तथा वचनोंसे अगोचर कोई अद्भुत शोभा धारण कर रहा था ॥१३७॥


तत्र स्फटिकभित्त्यङ्का विभागा द्वादशाभवन् । प्रादक्षिण्यपथत्यक्तप्रदेशसमवस्थिताः ॥१३८॥

अर्थ: उस समवसरणमें स्फटिककी दीवालोंसे बारह कोठे बने हुए थे जो प्रदक्षिणा रूपसे स्थित थे ॥१३८॥


तस्थुरेकत्र निर्ग्रन्था गणनाथैरधिष्ठिताः । अन्यत्र सेन्द्रपत्नीकाः कल्पवासिसुराङ्गनाः ॥१३९॥

अपरत्रार्यिकासंघो गणपालीसमन्वितः । द्योतिषां योषितोऽन्यत्र वैयन्तर्योऽपरत्र च ॥१४०॥

एकत्र भावनस्त्रीणामन्यत्र द्योतिषां गणः । व्यन्तराणां गणोऽन्यत्र सङ्घोऽन्यत्र च भावनः ॥१४१॥

कल्पवासिन एकस्मिन्नपरत्र च मानुषाः । वैरानुभावनिर्मुक्तास्तिर्यञ्चोऽन्यत्र सुस्थिताः ॥१४२॥

अर्थ: उन कोठोंमेंसे प्रथम कोठेमें गणधरोंसे सुशोभित मुनिराज बैठे थे, दूसरेमें इन्द्राणियोंके साथ-साथ कल्पवासी देवोंकी देवांगनाएँ थीं, तीसरेमें गणिनियोंसे सहित आर्यिकाओंका समूह बैठा था, चौथेमें ज्योतिषी देवोंकी देवांगनाएँ थीं, पाँचवेंमें व्यन्तर देवोंकी अंगनाएँ बैठी थीं, छठेमें भवनवासी देवोंकी अंगनाएँ बैठी थीं, सातवेंमें ज्योतिषी देव थे, आठवेंमें व्यन्तर देव थे, नौवेंमें भवनवासी देव थे, दसवेंमें कल्पवासी देव थे, ग्यारहवेंमें मनुष्य थे और बारहवेंमें वैरभावसे रहित तिर्यंच सुखसे बैठे थे ॥१३९-१४२॥


ततो मगधराजोऽपि निश्चक्राम महाबलः । संपतत्सुरसंघातजातविस्मयमानसः ॥१४३॥


दूरादेव हि संत्यज्य वाहनादिपरिच्छदम् । स्तुतिपूर्वं जिनं नत्वा स्वदेशे समुपाविशत् ॥१४४॥

अर्थ: तदनन्तर सब ओरसे आनेवाले देवोंके समूहसे जिसके मनमें आश्चर्य उत्पन्न हो रहा था ऐसा महाबलवान् अथवा बहुत बड़ी सेनाका नायक राजा श्रेणिक भी अपने नगरसे बाहर निकला उसने वाहन आदि राजाओंके उपकरणोंका दूरसे ही त्याग कर दिया, फिर समवसरणमें प्रवेश कर स्तुतिपूर्वक जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर अपना स्थान ग्रहण किया ॥१४४॥


अक्रूरो वारिषेणोऽथ कुमारोऽभयपूर्वकः । विजयावहनामा च तथाऽन्ये नृपसूनवः ॥१४५॥

स्तुतिं कृत्वा प्रणेमुस्ते मस्तकन्यस्तपाणयः । उपविष्टा यथादेशं दधाना विनयं परम् ॥१४६॥

अर्थ: दयालु वारिषेण, अभयकुमार, विजयावह तथा अन्य राजकुमारोंने भी हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये, स्तुति पढ़कर भगवान्‌को नमस्कार किया । तदनन्तर बहुत भारी विनयको धारण करते हुए वे सब अपने योग्य स्थानोंपर बैठ गये ॥१४५-१४६॥


वैडूर्यविटपस्याधो मृदुपल्लवशोभिनः । पुष्पस्तबकमाजालव्याप्ताशस्य विलासिनः ॥१४७॥

कल्पपादपरम्यस्य जनशोकापहारिणः । हरिद्धनपलाशस्य नानारत्नगिरेरिव ॥१४८॥

अशोकपादपस्याधो निविष्टः सिंहविष्टरे । नानारत्नसमुद्योतजनितेन्द्रशरासने ॥१४९॥

दिव्यांशुकपरिच्छन्नैर्मृदुस्पर्शमनोहरे । अमरेन्द्रशिरोरत्नप्रभोत्सर्पविघातिनि ॥१५०॥

त्रिलोकेश्वरताचिह्नच्छत्रत्रितयराजिते । सुरपुष्पसमाकीर्णे भूमिमण्डलवर्तिनि ॥१५१॥

यक्षराजकरासक्तचलच्चामरचारुणि । दुन्दुभिध्वनितोद्भूतप्रशान्तप्रतिशब्दके ॥१५२॥

अर्थ: भगवान् वर्धमान समवसरणमें जिस अशोक वृक्षके नीचे सिंहासनपर विराजमान थे उसकी शाखाएँ वैडूर्य ( नील ) मणिकी थीं, वह कोमल पल्लवोंसे शोभायमान था, फूलोंके गुच्छोंकी कान्तिसे उसने समस्त दिशाएँ व्याप्त कर ली थीं, वह अत्यन्त सुशोभित था, कल्पवृक्षके समान रमणीय था, मनुष्योंके शोकको हरनेवाला था, उसके पत्ते हरे रंगवाले तथा सघन थे, और वह नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित पर्वतके समान जान पड़ता था । उनका वह सिंहासन भी नाना रत्नोंके प्रकाशसे इन्द्रधनुषको उत्पन्न कर रहा था । दिव्य वस्त्रसे आच्छादित था, कोमल स्पर्शसे मनोहारी था, इन्द्रके सिरपर लगे हुए रत्नोंकी कान्तिके विस्तारको रोकनेवाला था, तीन लोककी ईश्वरताके चिह्नस्वरूप तीन छत्रोंसे सुशोभित था, देवोंके द्वारा बरसाये हुए फूलोंसे व्याप्त था, भूमिमण्डलपर वर्तमान था, यक्षराजके हाथोंमें स्थित चंचल चमरोंसे सुशोभित था, और दुन्दुभिबाजोंके शब्दोंकी शान्तिपूर्ण प्रतिध्वनि उससे निकल रही थी ॥१४७-१५२॥


गतित्रयगतप्राणिभाषारूपनिवृत्तया । घनाघनघनध्वानधीरनिर्घोषया गिरा ॥१५३॥

अर्थ: भगवान्‌की जो दिव्यध्वनि खिर रही थी वह तीन गति सम्बन्धी जीवोंकी भाषा-रूप परिणमन कर रही थी तथा मेघोंकी सान्द्र गर्जनाके समान उसकी बुलन्द आवाज थी ॥१५३॥


परिभूतरविद्योतप्रभामण्डलमध्यगः । लोकायेत्यवदद् धर्मं पृष्टो गणभृता जिनः ॥१५४॥

अर्थ: वहाँ सूर्यके प्रकाशको तिरस्कृत करनेवाले प्रभामण्डलके मध्यमें भगवान् विराजमान थे । गणधरके द्वारा प्रश्न किये जानेपर उन्होंने लोगोंके लिए निम्न प्रकारसे धर्मका उपदेश दिया था ॥१५४॥


सत्तैका प्रथमं तत्त्वं जीवाजीवौ ततः परम् । सिद्धाः संसारवन्तश्च जीवास्तु द्विविधाः स्मृताः ॥१५५॥

अर्थ: उन्होंने कहा था कि सबसे पहले एक सत्ता ही तत्त्व है उसके बाद जीव और अजीवके भेदसे तत्त्व दो प्रकारका है । उनमें भी जीवके सिद्ध और संसारीके भेदसे दो भेद माने गये हैं ॥१५५॥


पाक्यापाक्यतया माषसस्यवत्प्रविभागतः । सेत्स्यन्तो गदिता भव्या अभव्यास्तु ततोऽन्यथा ॥१५६॥

भव्याभव्यद्वयेनात्र जीवार्थाः परिकीर्तिताः । धर्माधर्मादिभिर्भेदैर्द्वितीयो भिद्यते पुनः ॥१५७॥

अर्थ: इनके सिवाय जीवोंके भव्य और अभव्य इस प्रकार दो भेद और भी हैं । जिस प्रकार उड़द आदि अनाजमें कुछ तो ऐसे होते हैं जो पक जाते हैं - सीझ जाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं कि जो प्रयत्न करनेपर भी नहीं पकते हैं - नहीं सीझते हैं । उसी प्रकार जीवोंमें भी कुछ जीव तो ऐसे होते हैं जो कर्म नष्ट कर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हो सकते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो प्रयत्न करनेपर भी सिद्ध अवस्थाको प्राप्त नहीं हो सकते । जो सिद्ध हो सकते हैं वे भव्य कहलाते हैं और जो सिद्ध नहीं हो सकते हैं वे अभव्य कहलाते हैं । इस तरह भव्य और अभव्यकी अपेक्षा जीव दो तरहके हैं और अजीव तत्त्वके धर्म, अधर्म, आकाश, काल तथा पुद्गलके भेदसे पाँच भेद हैं ॥१५६-१५७॥


जिनदेशिततत्त्वानां श्रद्धाश्रद्धानमेतयोः । लक्षणं तत्प्रभेदश्च पुनरेकेन्द्रियादयः ॥१५८॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए तत्त्वोंका श्रद्धान होना भव्योंका लक्षण है और उनका श्रद्धान नहीं होना अभव्योंका लक्षण है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ये भव्य तथा अभव्य जीवोंके उत्तर भेद हैं ॥१५८॥


गत्या कायैस्तथा योगैर्वेदैर्लेश्याकषायतः । ज्ञानदर्शनचारित्रैर्गुणश्रेण्यधिरोहणैः ॥१५९॥

निसर्गशास्त्रसम्यक्त्वैर्नामादिन्यासभेदतः । सदाद्यष्टानुयोगैश्च भिद्यते चेतनः पुनः ॥१६०॥

अर्थ: गति, काय, योग, वेद, लेश्या, कषाय, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, गुणस्थान, निसर्गज एवं अधिगमज सम्यग्दर्शन, नामादि निक्षेप और सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव तथा अल्प बहुत्व इन आठ अनुयोगोंके द्वारा जीव-तत्त्वके अनेक भेद होते हैं ॥१५९-१६०॥


तत्र संसारिजीवानां केवलं दुःखवेदिनाम् । सुखं संज्ञावमूढानां तत्रैव विषयोद्भवे ॥१६१॥

अर्थ: सिद्ध और संसारी इन दो प्रकारके जीवोंमें संसारी जीव केवल दुःखका ही अनुभव करते रहते हैं। पंचेन्द्रियोंके विषयोंसे जो सुख होता है उन्हें संसारी जीव भ्रमवश सुख मान लेते हैं ॥१६१॥


चक्षुषः पुटसंकोचो यावन्मात्रेण जायते । तावन्तमपि नो कालं नारकाणां सुखासनम् ॥१६२॥

अर्थ: जितनी देरमें नेत्रका पलक झपता है उतनी देरके लिए भी नारकियोंको सुख नहीं होता ॥१६२॥


दमनैस्ताडनैर्दोहैर्वाहादिभिरुपद्रवैः । तिरश्चां सततं दुःखं तथा शीतातपादिभिः ॥१६३॥

अर्थ: दमन, ताडन, दोहन, वाहन आदि उपद्रवोंसे तथा शीत, घाम, वर्षा आदिके कारण तिर्यंचोंको निरन्तर दुःख होता रहता है ॥१६३॥


प्रियाणां विप्रयोगेन तथानिष्टसमागमात् । ईप्सितानामलाभाच्च दुःखं मानुषगोचरम् ॥१६४॥

अर्थ: प्रियजनोंके वियोगसे, अनिष्ट वस्तुओंके समागमसे तथा इच्छित पदार्थोंके न मिलनेसे मनुष्य गतिमें भारी दुःख है ॥१६४॥


यथोत्कृष्टसुराणां च दृष्ट्वा भोगं महागुणम् । च्यवनाच्च परं दुःखं देवानामुपजायते ॥१६५॥

अर्थ: अपनेसे उत्कृष्ट देवोंके बहुत भारी भोगोंको देखकर तथा वहाँसे च्युत होनेके कारण देवोंको दुःख उत्पन्न होता है ॥१६५॥


घनदुःखावबद्धेषु चतुर्गतिगतेष्विति । कर्मभूमिं समासाद्य धर्मोपार्जनमुत्तमम् ॥१६६॥

अर्थ: इस प्रकार जब चारों गतियोंके जीव बहुत अधिक दुःखसे पीड़ित हैं तब कर्मभूमि पाकर धर्मका उपार्जन करना उत्तम है ॥१६६॥


मनुष्यभावमासाद्य सुकृतं ये न कुर्वते । तेषां करतलप्राप्तममृतं नाशमागतम् ॥१६७॥

अर्थ: जो मनुष्य भव पाकर भी धर्म नहीं करते हैं मानो उनकी हथेलीपर आया अमृत नष्ट हो जाता है ॥१६७॥


संसारे पर्यटन्नेष बहुयोनिसमाकुले । मनुष्यभावमायाति चिरेणात्यन्तदुःखतः ॥१६८॥

अर्थ: अनेक योनियोंसे भरे इस संसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव बहुत समयके बाद बड़े दुःखसे मनुष्य भवको प्राप्त होता है ॥१६८॥


तत्र लुब्धेषु पापेषु शबरादिषु जायते । आर्यदेशेऽपि संप्राप्ते दुःकुलेषूपजायते ॥१६९॥

अर्थ: उस मनुष्य भवमें यह जीव अधिकांश लोभी तथा पाप करनेवाले शबर आदि नीच पुरुषोंमें ही जन्म लेता है । यदि कदाचित् आर्य देश प्राप्त होता है तो वहाँ भी नीच कुलमें ही उत्पन्न होता है ॥१६९॥


लब्धेऽपि सुकुले काणकुण्ठादितनुसंभवः । संपूर्णकायबन्धेऽपि दुर्लभा हीनरोगता ॥१७०॥

अर्थ: यदि भाग्यवश उच्च कुल भी मिलता है तो काना-लूला आदि शरीर प्राप्त होता है । यदि कदाचित् शरीरकी पूर्णता होती है तो नीरोगताका होना अत्यन्त दुर्लभ रहता है ॥१७०॥


एवं सर्वमपि प्राप्य प्रशस्तानां समागमम् । दुर्लभो धर्मसंवेगो विषयास्वादलोभतः ॥१७१॥

अर्थ: इस तरह यदि कदाचित् समस्त उत्तम वस्तुओंका समागम भी हो जाता है तो विषयोंके आस्वादका लोभ रहनेसे धर्मानुराग दुर्लभ ही रहा आता है ॥१७१॥


ततः केचिद् भृतिं कृत्वा जठरस्यापि पूरणम् । कुर्वतेऽत्यन्तदुःखेन दूरतो विभवोद्भवः ॥१७२॥

अर्थ: इस संसारमें कितने ही लोग ऐसे हैं जो दूसरोंकी नौकरी कर बहुत भारी कष्टसे पेट भर पाते हैं उन्हें वैभवकी प्राप्ति होना तो दूर रहा ॥१७२॥


रक्तकर्दमबीभत्सशस्त्रसंपातभीषणम् । केचिद् विशन्ति संग्रामं जिह्वाकामवशीकृताः ॥१७३॥

अर्थ: कितने ही लोग जिह्वा और काम इन्द्रियके वशीभूत होकर ऐसे संग्राम-में प्रवेश करते हैं जो कि रक्तकी कीचड़से घृणित तथा शस्त्रोंकी वर्षासे भयंकर होता है ॥१७३॥


समस्तजन्तुसंबाधं कृत्वाऽन्ये भूमिकर्षणम् । कुटुम्बभरणक्लेशात् कुर्वते नृपपीडिताः ॥१७४॥

अर्थ: कितने ही लोग अनेक जीवोंको बाधा पहुँचानेवाली भूमि जोतनेकी आजीविका कर बड़े क्लेशसे अपने कुटुम्बका पालन करते हैं और उतनेपर भी राजाओंकी ओरसे निरन्तर पीड़ित रहते हैं ॥१७४॥


एवं यद्यत्प्रकुर्वन्ति कर्म सौख्याभिलाषिणः । तत्र तत्र प्रपद्यन्ते जन्तवो दुःखमुत्तमम् ॥१७५॥

अर्थ: इस तरह सुखकी इच्छा रखनेवाले जीव जो कार्य करते हैं वे उसीमें बहुत भारी दुःखको प्राप्त करते हैं ॥१७५॥


अवाप्यापि धनं क्लेशाच्चोराग्निजलराजतः । पालयन् परमं दुःखमवाप्नोत्याकुलः सदा ॥१७६॥

अर्थ: यदि किसी तरह कष्टसे धन मिल भी जाता है तो चोर, अग्नि, जल और राजासे उसकी रक्षा करता हुआ यह प्राणी बहुत दुःख पाता है और उससे सदा व्याकुल रहता है ॥१७६॥


संप्राप्तं रचितं द्रव्यं भुञ्जानस्यापि नो शमः । प्रतिवासरसंवृद्धगर्द्धाग्निपरिवर्तनात् ॥१७७॥

अर्थ: यदि प्राप्त हुआ धन सुरक्षित भी रहता है तो उसे भोगते हुए इस प्राणीको कभी शान्ति नहीं होती क्योंकि उसकी लालसारूपी अग्नि प्रति दिन बढ़ती रहती है ॥१७७॥


प्राप्नोति धर्मसंवेगं कथंचित् पूर्वकर्मतः । संसारपदवीमेव नीयतेऽन्यैर्दुरात्मभिः ॥१७८॥

अर्थ: यदि किसी तरह पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके उदयसे धर्म भावनाको प्राप्त होता भी है तो अन्य दुष्टजनोंके द्वारा पुनः उसी संसारके मार्गमें ला दिया जाता है ॥१७८॥


अन्यैस्ते नाशिताः सन्तो नाशयन्त्यपरान् जनान् । धर्मसामान्यशब्देन सेवमानाः परम्पराम् ॥१७९॥

अर्थ: अन्य पुरुषोंके द्वारा नष्ट हुए सत्पुरुष अन्य लोगोंको भी नष्ट कर देते हैं - पथभ्रष्ट कर देते हैं और धर्मसामान्यकी अपेक्षा केवल रूढ़िका ही पालन करते हैं ॥१७९॥


कथं चेतोविशुद्धिः स्यात् परिग्रहवतां सताम् । चेतोविशुद्धिमूला च तेषां धर्मे स्थितिः कुतः ॥१८०॥

अर्थ: परिग्रही मनुष्योंके चित्तमें विशुद्धता कैसे हो सकती है और जिसमें चित्तकी विशुद्धता ही मूल कारण है ऐसी धर्मकी स्थिति उन परिग्रही मनुष्योंमें कहाँसे हो सकती है ॥१८०॥


यावत्परिग्रहासक्तिस्तावत्प्राणिनिपीडनम् । हिंसातः संसृतेर्मूलं दुःखं संसारसंज्ञकम् ॥१८१॥

अर्थ: जब तक परिग्रहमें आसक्ति है तब तक प्राणियोंकी हिंसा होना निश्चित है । हिंसा ही संसारका मूल कारण है और दुःखको ही संसार कहते हैं ॥१८१॥


परिग्रहपरिष्वङ्गाद् द्वेषो रागश्च जायते । रागद्वेषौ च संसारे दुःखस्योत्तमकारणम् ॥१८२॥

अर्थ: परिग्रहके सम्बन्धसे राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं तथा राग और द्वेष ही संसार सम्बन्धी दुःखके प्रबल कारण हैं ॥१८२॥


लब्ध्वापि दर्शनं सम्यक् प्रशमाद्दर्शनावृतेः । चारित्रं न प्रपद्यन्ते चारित्रावरणावृताः ॥१८३॥

अर्थ: दर्शनमोह कर्मका उपशम होनेसे कितने ही प्राणी यद्यपि सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेते हैं तथापि चारित्र मोहके आवरणसे आवृत रहनेके कारण वे सम्यक् चारित्रको प्राप्त नहीं कर सकते ॥१८३॥


चारित्रमपि संप्राप्ताः कुर्वन्तः परमं तपः । परीषहैः पुनर्भङ्गं नीयन्ते दुःखविक्रमैः ॥१८४॥

अर्थ: कितने ही लोग सम्यक् चारित्रको पाकर श्रेष्ठ तप भी करते हैं परन्तु दुःखदायी परिषहोंके निमित्तसे भ्रष्ट हो जाते हैं ॥१८४॥


अणुव्रतानि सेवन्ते केचिद् भङ्गमुपागताः । केचिद्दर्शनमात्रेण भवन्ति परितोषिणः ॥१८५॥

अर्थ: परिषहोंके निमित्तसे भ्रष्ट हुए कितने ही लोग अणुव्रतोंका सेवन करते हैं और कितने ही केवल सम्यग्दर्शनसे सन्तुष्ट रह जाते हैं अर्थात् किसी प्रकारका व्रत नहीं पालते हैं ॥१८५॥


केचिद् गम्भीरसंसारकूपहस्तावलम्बनम् । सम्यग्दर्शनमुत्सृज्य मिथ्यादृष्टिमुपासते ॥१८६॥

अर्थ: कितने ही लोग संसाररूपी गहरे कुएँसे हस्तावलम्बन देकर, निकालनेवाले सम्यग्दर्शनको छोड़कर फिरसे मिथ्यादर्शनकी सेवा करने लगते हैं ॥१८६॥


मिथ्यादर्शनसंयुक्तास्ते पुनर्भवसंकटे । भ्राम्यन्ति सततं जीवा दुःखाग्निपरिवर्तिनः ॥१८७॥

अर्थ: तथा ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव निरन्तर दुःखरूपी अग्निके बीच रहते हुए संकटपूर्ण संसारमें भ्रमण करते रहते हैं ॥१८७॥


केचित्तु पुण्यकर्माणश्चारित्रमवलम्बितम् । निर्वहन्ति महाशूरा यावत्प्राणविवर्जनम् ॥१८८॥

अर्थ: कितने ही ऐसे महाशूरवीर पुण्यात्मा जीव हैं जो ग्रहण किये हुए चारित्रको जीवन पर्यन्त धारण करते हैं ॥१८८॥


ते समाधिं समासाद्य कृत्वा देहविसर्जनम् । वासुदेवादितां यान्ति निदानकृतदोषतः ॥१८९॥

अर्थ: और समाधिपूर्वक शरीर त्याग कर निदानके दोषसे नारायण आदि पदको प्राप्त होते हैं ॥१८९॥


ते पुनः परपीडायां रता निर्दयचेतसः । नरकेषु महादुःखं प्राप्नुवन्ति सुदुस्तरम् ॥१९०॥

अर्थ: जो नारायण होते हैं वे दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेमें तत्पर रहते हैं तथा उनका चित्त निर्दय रहता है इसलिए वे मरकर नियमसे नरकोंमें भारी दुःख भोगते हैं ॥१९०॥


केचित्तु सुतपः कृत्वा यान्ति गीर्वाणनाथताम् । अपरे बलदेवत्वमन्येऽनुत्तरवासिताम् ॥१९१॥

अर्थ: कितने ही लोग सुतप करके इन्द्र पदको प्राप्त होते हैं । कितने ही बलदेव पदवी पाते हैं और कितने ही अनुत्तर विमानोंमें निवास प्राप्त करते हैं ॥१९१॥


केचित्प्राप्य महासत्त्वा जिनकर्माणि षोडश । तीर्थकृत्त्वं प्रपद्यन्ते त्रैलोक्यक्षोभकारणम् ॥१९२॥

अर्थ: कितने ही महाधैर्यवान् मनुष्य षोडश कारण भावनाओंका चिन्तवन कर तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले तीर्थंकर पद प्राप्त करते हैं ॥१९२॥


केचिन्निरन्तरायेण त्रितयाराधने रताः । द्वित्रैर्भवैर्विमुच्यन्ते कर्माष्टककलङ्कतः ॥१९३॥

अर्थ: और कितने ही लोग निरन्तराय रूपसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक् चारित्रकी आराधनामें तत्पर रहते हुए दो-तीन भवमें ही अष्ट कर्मरूप कलंकसे मुक्त हो जाते हैं ॥१९३॥


संप्राप्ताः परमं स्थानं मुक्तानामुपमोज्झितम् । अनन्तं निःप्रतिद्वन्द्वं लभन्ते सुखमुत्तमम् ॥१९४॥

अर्थ: वे फिर मुक्त जीवोंके उत्कृष्ट एवं निरुपम स्थानको पाकर अनन्त काल तक निर्बाध उत्तम सुखका उपभोग करते हैं ॥१९४॥


ततस्ते निर्गतं धर्मं जिनवक्त्रारविन्दतः । श्रुत्वा हर्षं परं जग्मुस्तिर्यक्त्रिदशमानवाः ॥१९५॥

अर्थ: इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्‌के मुखारविन्दसे निकले हुए धर्मको सुनकर मनुष्य, तिर्यंच तथा देव तीनों गतिके जीव परम हर्षको प्राप्त हुए ॥१९५॥


अणुव्रतानि संप्राप्ताः केचित् केचिन्निरम्बरम् । तपश्चरितुमारब्धाः संसारोद्विग्नमानसाः ॥१९६॥

अर्थ: धर्मोपदेश सुनकर कितने ही लोगोंने अणुव्रत धारण किये और संसारसे भयभीत चित्त होकर कितने ही लोगोंने दिगम्बर दीक्षा धारण की ॥१९६॥


सम्यग्दर्शनमायाताः केचित् केचित्स्वशक्तितः । विरतिं जगृहुः पापसमुपार्जनकर्मणः ॥१९७॥

अर्थ: कितने ही लोगोंने केवल सम्यग्दर्शन ही धारण किया और कितने ही लोगोंने अपनी शक्तिके अनुसार पाप कार्योंका त्याग किया ॥१९७॥


श्रुत्वा धर्मं जिनं स्तुत्वा प्रणम्य च यथाविधि । धर्मसुस्थितचित्तास्ते याताः स्थानं यथायथम् ॥१९८॥

अर्थ: इस तरह धर्म श्रवण कर सबने श्रीवर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति कर उन्हें विधिपूर्वक नमस्कार किया और तदनन्तर धर्ममें चित्त लगाते हुए सब यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥१९८॥


श्रेणिकोऽपि महाराजो राजमानो नृपश्रिया । वर्णश्रवणहृष्टात्मा प्रविवेश निजं पुरम् ॥१९९॥

अर्थ: धर्म श्रवण करनेसे जिसकी आत्मा हर्षित हो रही थी ऐसे महाराज श्रेणिकने भी राजलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए अपने नगरमें प्रवेश किया ॥१९९॥


अथ तीर्थकरोदारतेजोमण्डलदर्शनात् । विलक्ष इव तिग्मांशुरब्धिमैच्छन्निषेवितुम् ॥२००॥

अर्थ: तदनन्तर सूर्यने पश्चिम समुद्रमें अवगाहन करनेकी इच्छा की सो ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान्‌के उत्कृष्ट तेज पुंजको देखकर वह इतना अधिक लज्जित हो गया था कि समुद्रमें डूबकर आत्मघात ही करना चाहता था ॥२००॥


अस्ताचलसमीपस्थः सरोरुहरुचामिव । मणीनां किरणैश्छन्नो जगामात्यन्तशोणताम् ॥२०१॥

अर्थ: सन्ध्याके समय सूर्य अस्ताचलके समीप पचकर अत्यन्त लालिमाको धारण करने लगा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे आच्छादित होकर ही लालिमा धारण करने लगा था ॥२०१॥


अमन्दायन्त किरणा नित्यमस्यानुयायिनः । कस्य वा तेजसो वृद्धिः स्वामिन्यापदमागते ॥२०२॥

अर्थ: निरन्तर सूर्यका अनुगमन करनेवाली किरणें भी मन्द पड़ गयीं सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीके विपत्तिग्रस्त रहते हुए किसके तेजकी वृद्धि हो सकती है ? अर्थात् किसीके नहीं ॥२०२॥


ततो विलोचनैः सास्रैरीक्षितः कोकयोषिताम् । अदर्शनं ययौ मन्दं कृपयेव विरोचनः ॥२०३॥

अर्थ: तदनन्तर चकवियोंने अश्रु भरे नेत्रोंसे सूर्यकी ओर देखा इसलिए उनपर दया करनेके कारण ही मानो वह धीरे-धीरे अदृश्य हुआ था ॥२०३॥


धर्मश्रवणतो मुक्तो यो रागः प्राणिनां गणैः । सन्ध्याच्छलेन तेनैव ककुभां चक्रमाश्रितम् ॥२०४॥

अर्थ: धर्म श्रवण करनेसे प्राणियोंने जो राग छोड़ा था सन्ध्याके छलसे मानो उसीने दिशाओंके मण्डलको आच्छादित कर लिया था ॥२०४॥


उपकारे प्रवृत्तोऽयमस्मास्वप्रार्थितः परम् । इतीव चक्षुर्लोकस्य मित्रेणैव समं गतम् ॥२०५॥

अर्थ: जिस प्रकार मित्र बिना प्रार्थना किये ही लोगोंके उपकार करनेमें प्रवृत्त होता है उसी प्रकार सूर्य भी बिना प्रार्थना किये ही हम लोगोंके उपकार करनेमें प्रवृत्त रहता है इसलिए सूर्यका अस्त हो रहा है मानो मित्र ही अस्त हो रहा है ॥२०५॥


व्रजतो दिननाथस्य रागं प्रलयगामिनम् । संकुचन्त्यरविन्दानि कवलैरिव गृह्णते ॥२०६॥

अर्थ: उस समय कमल संकुचित हो रहे थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो अस्तंगामी सूर्यके प्रलयोन्मुख राग ( लालिमा ) को ग्रास बना-बनाकर ग्रहण ही कर रहे थे ॥२०६॥


समीकृतततोत्तुङ्गं निरूपणाविवर्जितम् । तमः प्रकटतामार दुर्जनस्येव चेष्टितम् ॥२०७॥

अर्थ: जिसने विस्तार और ऊँचाईको एक रूपमें परिणत कर दिया था, तथा जिसका निरूपण नहीं किया जा सकता था ऐसा अन्धकार प्रकटताको प्राप्त हुआ । जिस प्रकार दुर्जनकी चेष्टा उच्च और नीचको एक समान करती है तथा विषमताके कारण उसका निरूपण करना कठिन होता है उसी प्रकार वह अन्धकार भी ऊँचे-नीचे प्रदेशोंको एक समान कर रहा था और विषमताके कारण उसका निरूपण करना भी कठिन था ॥२०७॥


पिदधे सान्ध्यमुद्योतं सकलं बहलं तमः । पटलं धूमसंबन्धि प्रशाम्यन्तमिवानलम् ॥२०८॥

अर्थ: जिस प्रकार धूमका पटल बुझती हुई अग्निको आच्छादित कर लेता है उसी प्रकार बढ़ते हुए समस्त अन्धकारने सन्ध्या सम्बन्धी अरुण प्रकाशको आच्छादित कर लिया था ॥२०८॥


चम्पकक्षारकाकारप्रदीपप्रकरोऽगमत् । कम्पितो मन्दवातेन यामिनीकर्णपूरताम् ॥२०९॥

अर्थ: चम्पाकी कलियोंके आकारको धारण करनेवाला दीपकोंका समूह वायुके मन्द-मन्द झोंकेसे हिलता हुआ ऐसा जान पड़ता था मानो रात्रिरूपी स्त्रीके कर्णफूलोंका समूह ही हो ॥२०९॥


तृप्ता रसेन पद्मानां धूतपक्षा मृणालकैः । कृत्वा कण्डूयनं निद्रां राजहंसाः सिषेविरे ॥२१०॥

अर्थ: जो कमलोंका रस पीकर तृप्त हो रहे थे तथा मृणालके द्वारा खुजली कर अपने पंख फड़फड़ा रहे थे ऐसे राजहंस पक्षी निद्राका सेवन करने लगे ॥२१०॥


धम्मिल्लमल्लिकाबन्धग्राही सायंतनो मरुत् । वातुं प्रववृते मन्दं निशानिःश्वाससंनिभः ॥२११॥

अर्थ: जो स्त्रियोंकी चोटियोंमें गुथी मालतीकी मालाओंको हरण कर रही थी ऐसी सन्ध्या समयकी वायु रात्रिरूपी स्त्रीके श्वासो-च्छ्वासके समान धीरे-धीरे बहने लगी ॥२११॥


उच्चकेसरकोटीनां संकटेषु कदम्बकैः । कुशेशयकुटीरेषु शिश्ये षट्पदसंहतिः ॥२१२॥

अर्थ: ऊँची उठी हुई केशरकी कणिकाओंके समूहसे जिनकी संकीर्णता बढ़ रही थी ऐसी कमलकी कोटरोंमें भ्रमरोंके समूह सोने लगे ॥२१२॥


नितान्तविमलैश्चक्रे रम्यं तारागणैर्नभः । त्रैलोक्यं जिननाथस्य सुभाषितचयैरिव ॥२१३॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्के अत्यन्त निर्मल उपदेशोंके समूहसे तीनों लोक रमणीय हो जाते हैं उसी प्रकार अत्यन्त उज्ज्वल ताराओंके समूहसे आकाश रमणीय हो गया था ॥२१३॥


तमोऽथ विमलैर्भिन्नं शशाङ्ककिरणाङ्कुरैः । एकान्तवादिनां वाक्यं नयैरिव जिनोदितैः ॥२१४॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए नयसे एकान्तवादियोंके वचन खण्ड-खण्ड हो जाते हैं उसी प्रकार चन्द्रमाकी निर्मल किरणोंके प्रादुर्भावसे अन्धकार खण्ड-खण्ड हो गया था ॥२१४॥


उज्जगाम च शीतांशुर्लोकनेत्राभिनन्दितः । वपुर्बिभ्रत् कृताकम्पं ध्वान्तकोपादिवारुणम् ॥२१५॥

अर्थ: तदनन्तर लोगोंके नेत्रोंने जिसका अभिनन्दन किया था और जो अन्धकारके ऊपर क्रोध धारण करनेके कारण ही मानो कुछ-कुछ काँपते हुए लाल शरीरको धारण कर रहा था ऐसे चन्द्रमाका उदय हुआ ॥२१५॥


चन्द्रालोके ततो लोकैः करग्राह्यत्वमागते । आरेभे तमसा खिन्नः क्षीरोदाङ्क इवासितुम् ॥२१६॥

अर्थ: जब चन्द्रमाकी उज्ज्वल चाँदनी सब ओर फैल गयी तब यह संसार ऐसा जान पड़ने लगा मानो अन्धकारसे खिन्न होकर क्षीरसमुद्रकी गोदमें ही बैठनेकी तैयारी कर रहा हो ॥२१६॥


आमृष्टानि करैरिन्दोर्वहन्त्यामोदमुत्तमम् । सहसातीव यातानि कुमुदानि विकासिताम् ॥२१७॥

अर्थ: सहसा कुमुद फूल उठे सो वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चन्द्रमाकी किरणोंका स्पर्श पाकर ही बहुत भारी आमोद - हर्ष ( पक्षमें गन्ध ) को धारण कर रहे थे ॥२१७॥


इति स्पष्टे समुद्भूते प्रदोषे जनसौख्यदे । प्रवृत्तदम्पतिप्रीतिप्रवृद्धसमदोत्सवे ॥२१८॥

तरङ्गभङ्गुराकारगङ्गापुलिनसंनिभे । रत्नच्छायापरिष्वक्तनिःशेषभवनोदरे ॥२१९॥

गवाक्षमुखनिर्यातकुसुमोत्तमसौरभे । पार्श्वस्थवारवनिताकलगीतमनोरमे ॥२२०॥

ज्वलन्नातिसमीपस्थस्फटिकच्छन्नदीपके । अप्रमत्तशिरोरक्षिगणकल्पितरक्षणे ॥२२१॥

प्रसूनप्रकरावाप्तमण्डनक्ष्मातलस्थिते । उपधाङ्गसुविन्यस्तसुकुमारोपधानके ॥२२२॥

जिनेशपादपूताशाकृतमस्तकधामनि । प्रतिपादकविन्यस्ततनुविस्तीर्णपट्टके ॥२२३॥

विधाय भूभुजः कृत्यं कृतजैनेन्द्रसंकथः । शयनीये सुखं शिश्ये कुशाग्रनगराधिपः ॥२२४॥

अर्थ: इस प्रकार स्त्री-पुरुषोंकी प्रीतिसे जिसमें अनेक समद - उत्सवोंकी वृद्धि हो रही थी और जो जनसमुदायको सुख देनेवाला था ऐसा प्रदोष काल जब स्पष्ट रूपसे प्रकट हो चुका तब राजकार्य निपटाकर जिनेन्द्र भगवान्की कथा करता हुआ श्रेणिक राजा उस शय्यापर सुखसे सो गया जो कि तरंगोंके कारण क्षत-विक्षत हुए गंगाके पुलिनके समान जान पड़ती थी । जड़े हुए रत्नोंकी कान्तिसे जिसने महलके समस्त मध्यभागको आलिंगित कर दिया था, जिसके फूलोंकी उत्तम सुगन्धि झरोखोंसे बाहर निकल रही थी, पासमें बैठी वेश्याओंके मधुरगानसे जो मनोहर थी, जिसके पास ही स्फटिकमणिनिर्मित आवरणसे आच्छादित दीपक जल रहा था, अंगरक्षक लोग प्रमाद छोड़कर जिसकी रक्षा कर रहे थे, जो फूलोंके समूहसे सुशोभित पृथिवीतलपर बिछी हुई थी, जिसपर कोमल तकिया रखा हुआ था, जिनेन्द्र भगवान्के चरणकमलोंसे पवित्र दिशाकी ओर जिसका सिरहाना था, तथा जिसके प्रत्येक पायेपर सूक्ष्म किन्तु विस्तृत पट्ट बिछे हुए थे ॥२१८-२२४॥


जिनेन्द्रमेव चापश्यत् स्वप्नेऽपि च पुनः पुनः । पर्यपृच्छच्च संदेहं पपाठ च जिनोदितम् ॥२२५॥

अर्थ: राजा श्रेणिक स्वप्नमें भी बार-बार जिनेन्द्र भगवान्के दर्शन करता था, बार-बार उन्हींसे संशयकी बात पूछता था और उन्हींके द्वारा कथित तत्त्वका पाठ करता था ॥२२५॥


ततो मदकलेभेन्द्रनिद्राविद्रावकारिणा । गेहकक्षातिगम्भीरगुहागोचरगामिना ॥२२६॥

महाजलदसंघातधीरघोषणहारिणा । प्रभाततूर्यवादेन विबुद्धो मगधाधिपः ॥२२७॥

अर्थ: तदनन्तर - मदोन्मत्त गजराजकी निद्राको दूर करनेवाले, महलकी कक्षाओंरूपी गुफाओंमें गूँजनेवाले एवं बड़े-बड़े मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको हरनेवाले प्रातःकालीन तुरहीके शब्द सुनकर राजा श्रेणिक जागृत हुआ ॥२२६-२२७॥


अचिन्तयच्च वीरेण भाषितं धर्महेतुकम् । चक्रवर्त्यादिवीराणां संभवं प्रणिधानतः ॥२२८॥

अर्थ: जागते ही उसने भगवान् महावीरके द्वारा भाषित, चक्रवर्ती आदि वीर पुरुषोंके धर्मवर्धक चरितका एकाग्रचित्तसे चिन्तवन किया ॥२२८॥


अथास्य चरिते पद्मसंबन्धिनि गतं मनः । संदेह इव चेत्यासीद्रक्षःसु प्लवगेषु च ॥२२९॥

अर्थ: अथानन्तर उसका चित्त बलभद्र पदके धारक रामचन्द्रजीके चरितकी ओर गया और उसे राक्षसों तथा वानरोंके विषयमें सन्देह-सा होने लगा ॥२२९॥


कथं जिनेन्द्रधर्मेण जाताः सन्तो नरोत्तमाः । महाकुलीना विद्वांसो विद्याद्योतितमानसाः ॥२३०॥

श्रूयन्ते लौकिके ग्रन्थे राक्षसा रावणादयः । वसाशोणितमांसादिपानभक्षणकारिणः ॥२३१॥

अर्थ: वह विचारने लगा कि अहो ! जो जिनधर्मके प्रभावसे उत्तम मनुष्य थे, उच्चकुलमें उत्पन्न थे, विद्वान् थे और विद्याओंके द्वारा जिनके मन प्रकाशमान थे ऐसे रावण आदिक लौकिक ग्रन्थोंमें चर्बी, रुधिर तथा मांस आदिका पान एवं भक्षण करनेवाले राक्षस सुने जाते हैं ॥२३०-२३१॥


रावणस्य किल भ्राता कुम्भकर्णो महाबलः । घोरनिद्रापरीतः षण्मासान् शेते निरन्तरम् ॥२३२॥

अर्थ: रावणका भाई कुम्भकर्ण महाबलवान् था और घोर निद्रासे युक्त होकर छह माह तक निरन्तर सोता रहता था ॥२३२॥


मत्तैरपि गजैस्तस्य क्रियते मर्दनं यदि । तप्ततैलकटाहैश्च पूर्येते श्रवणौ यदि ॥२३३॥

भेरीशङ्खनिनादोऽपि सुमहानपि जन्यते । तथापि किल नायाति कालेऽपूर्णे विबुद्धताम् ॥२३४॥

अर्थ: यदि मदोन्मत्त हाथियोंके द्वारा भी उसका मर्दन किया जाये, तपे हुए तेलके कड़ाहोंसे उसके कान भरे जावें और भेरी तथा शंखोंका बहुत भारी शब्द किया जाये तो भी समय पूर्ण न होने पर वह जागृत नहीं होता था ॥२३३-२३४॥


क्षुत्तृष्णाव्याकुलश्चासौ विबुद्धः सन्महोदरः । भक्षयत्यग्रतो दृष्ट्वा हस्त्यादीनपि दुर्द्धरः ॥२३५॥

अर्थ: बहुत बड़े पेटको धारण करनेवाला वह कुम्भकर्ण जब जागता था तब भूख और प्याससे इतना व्याकुल हो उठता था कि सामने हाथी आदि जो भी दिखते थे उन्हें खा जाता था । इस प्रकार वह बहुत ही दुर्धर था ॥२३५॥


तिर्यग्भिर्मानुषैर्देवैः कृत्वा तृप्तिं ततः पुनः । स्वपित्येव विमुक्तान्यनिःशेषपुरुषस्थितिः ॥२३६॥

अर्थ: तिर्यंच, मनुष्य और देवोंके द्वारा वह तृप्ति कर पुनः सो जाता था उस समय उसके पास अन्य कोई भी पुरुष नहीं ठहर सकता था ॥२३६॥


अहो कुकविभिर्मूर्खैर्विद्याधरकुमारकः । अभ्याख्यानमिदं नीतो दुःकृतग्रन्थकत्थकैः ॥२३७॥

अर्थ: अहो ! कितने आश्चर्य की बात है कि पापवर्धक खोटे ग्रन्थोंकी रचना करनेवाले मूर्ख कुकवियोंने उस विद्याधर कुमारका कैसा बीभत्स चरित चित्रण किया है ॥२३७॥


एवंविधं किल ग्रन्थं रामायणमुदाहृतम् । शृण्वतां सकलं पापं क्षयमायाति तत्क्षणात् ॥२३८॥

अर्थ: जिसमें यह सब चरित्र-चित्रण किया गया है वह ग्रन्थ रामायणके नामसे प्रसिद्ध है और जिसके विषयमें यह प्रसिद्धि है कि वह सुननेवाले मनुष्योंके समस्त पाप तत्क्षणमें नष्ट कर देता है ॥२३८॥


तापत्यजनचित्तस्य सोऽयमग्निसमागमः । शीतापनोदकामस्य तुषारानिलसंगमः ॥२३९॥

अर्थ: सो जिसका चित्त तापका त्याग करनेके लिए उत्सुक है उसके लिए यह रामायण मानो अग्निका समागम है और जो शीत दूर करनेकी इच्छा करता है उसके लिए मानो हिममिश्रित शीतल वायुका समागम है ॥२३९॥


हैयङ्गवीनकाङ्क्षस्य तदिदं जलमन्थनम् । सिकतापीडनं तैलमवाप्तुमभिवाञ्छतः ॥२४०॥

अर्थ: घीकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यका जिस प्रकार पानीका बिलोवना व्यर्थ है और तेल प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यका बालूका पेलना निःसार है उसी प्रकार पाप त्यागकी इच्छा करनेवाले मनुष्यका रामायणका आश्रय लेना व्यर्थ है ॥२४०॥


महापुरुषचारित्रकूटदोषविभाविषु । पापैरधर्मशास्त्रेषु धर्मशास्त्रमतिः कृता ॥२४१॥

अर्थ: जो महापुरुषोंके चारित्रमें प्रकट करते हैं ऐसे अधर्म शास्त्रोंमें भी पापी पुरुषोंने धर्मशास्त्रकी कल्पना कर रखी है ॥२४१॥


अमराणां किलाधीशो रावणेन पराजितः । आकर्णाकृष्टनिर्मुक्तैर्बाणैर्मर्मविदारिभिः ॥२४२॥

अर्थ: रामायणमें यह भी लिखा है कि रावणने कान तक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे देवोंके अधिपति इन्द्रको भी पराजित कर दिया था ॥२४२॥


देवानामधिपः क्वासौ वराकः क्वैष मानुषः । तस्य चिन्तितमात्रेण यायाद् यो भस्मराशिताम् ॥२४३॥

अर्थ: अहो ! कहाँ तो देवोंका स्वामी इन्द्र और कहाँ वह तुच्छ मनुष्य जो कि इन्द्रकी चिन्तामात्रसे भस्मकी राशि हो सकता है ? ॥२४३॥


ऐरावतो गजो यस्य यस्य वज्रं महायुधम् । समेरुवारिधिं क्षोणीं योऽनायासात् समुद्धरेत् ॥२४४॥

अर्थ: जिसके ऐरावत हाथी था और वज्र जैसा महान् शस्त्र था तथा जो सुमेरु पर्वत और समुद्रोंसे सुशोभित पृथिवीको अनायास ही उठा सकता था ॥२४४॥


सोऽयं मानुषमात्रेण विद्याभाजाऽल्पशक्तिना । आनीयते कथं भङ्गं प्रभुः स्वर्गनिवासिनाम् ॥२४५॥

अर्थ: ऐसा इन्द्र अल्प शक्ति के धारक विद्याधरके द्वारा जो कि एक साधारण मनुष्य ही था कैसे पराजित हो सकता था ॥२४५॥


वन्दीगृहगृहीतोऽसौ प्रभुणा रक्षसां किल । लङ्कायां निवसन् कारागृहे नित्यं सुसंयतः ॥२४६॥

अर्थ: उसमें यह भी लिखा है कि राक्षसोंके राजा रावणने इन्द्रको अपने बन्दीगृहमें पकड़कर रखा था और उसने बन्धनसे बद्ध होकर लंकाके बन्दीगृहमें चिरकाल तक निवास किया था ॥२४६॥


मृगैः सिंहवधः सोऽयं शिलानां पेषणं तिलैः । वधो गण्डूपदेनाहेर्गजेन्द्रशसनं शुना ॥२४७॥

अर्थ: सो ऐसा कहना मृगोंके द्वारा सिंहका वध होना, तिलोंके द्वारा शिलाओंका पीसा जाना, पनिया साँपके द्वारा नागका मारा जाना और कुत्ताके द्वारा गजराजका दमन होनेके समान है ॥२४७॥


व्रतप्राप्तेन रामेण सौवर्णो रुरुराहतः । सुग्रीवस्याग्रजः स्त्र्यर्थं जनकेन समस्तथा ॥२४८॥

अर्थ: व्रतके धारक रामचन्द्रजीने सुवर्ण मृगको मारा था, और स्त्रीके पीछे सुग्रीवके बड़े भाई वालीको जो कि उसके पिताके समान था, मारा था ॥२४८॥


अश्रद्धेयमिदं सर्वं वियुक्तमुपपत्तिभिः । भगवन्तं गणाधीशं श्वोऽहं प्रष्टास्मि गौतमम् ॥२४९॥

अर्थ: यह सब कथानक युक्तियोंसे रहित होनेके कारण श्रद्धान करनेके योग्य नहीं है । यह सब कथा मैं कल भगवान् गौतम गणधरसे पूछूँगा ॥२४९॥


एवं चिन्तयतस्तस्य महाराजस्य धीमतः । वन्दिभिस्तूर्यनादान्ते जयशब्दो महान् कृतः ॥२५०॥

अर्थ: इस प्रकार बुद्धिमान् महाराज श्रेणिक चिन्ता कर रहे थे कि तुरहीका शब्द बन्द होते ही वन्दीजनोंने जोरसे जयघोष किया ॥२५०॥


कुलपुत्रेण चासन्नस्वामिनो बोधमीयुषा । निसर्गेणैव पठितः श्लोकोऽयं जरठायुषः ॥२५१॥

प्रष्टव्या गुरवो नित्यमर्थं ज्ञातमपि स्वयम् । स तैर्निश्चयमानीतो ददाति परमं सुखम् ॥२५२॥

अर्थ: उसी समय महाराज श्रेणिकके समीपवर्ती चिरजीवी कुलपुत्रने जागकर स्वभाववश निम्न श्लोक पढ़ा कि जिस पदार्थको स्वयं जानते हैं उस पदार्थको भी गुरुजनोंसे नित्य ही पूछना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा निश्चयको प्राप्त कराया हुआ पदार्थ परम सुख प्रदान करता है ॥२५१-२५२॥


एतदानन्दयँश्चारु निमित्तं मगधाधिपः । शयनीयात् समुत्तस्थौ स्वस्त्रीभिः कृतमङ्गलः ॥२५३॥

अर्थ: इस सुन्दर निमित्तसे जो आनन्दको प्राप्त थे तथा अपनी स्त्रियोंने जिनका मंगलाचार किया था ऐसे महाराज श्रेणिक शय्यासे उठे ॥२५३॥


अथ कुसुमपटान्तःसुप्तनिष्क्रान्तभृङ्ग-प्रहितमधुरवादात्यन्तरम्यैकदेशात् । जडपवनविधूताकम्पितापाण्डुदीपान् निरगमदवनीशः श्रीमतो वासगेहात् ॥२५४॥

अर्थ: तदनन्तर - पुष्परूपी पटके भीतर सोकर बाहर निकले हुए भ्रमरोंकी मधुर गुंजारसे जिसका एक भाग बहुत ही रमणीय था, जिसके भीतर जलते हुए निष्प्रभ दीपक प्रातःकालको शीत वायुके झोंकेसे हिल रहे थे और जो बहुत ही शोभासम्पन्न था ऐसे निवासगृहसे राजा श्रेणिक बाहर निकले ॥२५४॥


रदनशिखरदष्टस्पष्टबिम्बौष्ठपृष्ठ-प्रतिहतजयनादं श्रीसमानद्युतीनाम् । करमुकुलनिबद्धव्यक्तपद्माकराणां श्रवणपथमनैषीच्चैष वाराङ्गनानाम् ॥२५५॥

अर्थ: बाहर निकलते ही उन्होंने लक्ष्मीके समान कान्तिवाली तथा करकुड्मलोंके द्वारा कमलोंकी शोभाको प्रकट करनेवाली वारांगनाओंके नुकीले दाँतोंसे दष्ट श्रेष्ठ बिम्बसे निर्गत जयनादको सुना ॥२५५॥


अतिशयशुभचिन्तासङ्गनिष्कम्पभावान्नरपतिरुपनीताशेषतत्कालभावः । धवलकमलभासो वासगेहादपेतो रविरिव शरदभ्रोदारवृन्दादभासीत् ॥२५६॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त शुभ ध्यानके प्रभावसे निश्चलताको प्राप्त हुए शुभ भावसे जिन्हें तत्कालके उपयोगी समस्त शुभ भावोंकी प्राप्ति हुई थी ऐसे महाराज श्रेणिक, सफेद कमलके समान कान्तिवाले निवासगृहसे बाहर निकलकर शरद् ऋतुके मेघोंके समूहसे बाहर निकले हुए सूर्यके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२५६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते श्रेणिकचिन्ताभिधानं नाम द्वितीयं पर्व ॥२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यविरचित पद्म-चरितमें महाराज श्रेणिककी चिन्ताको प्रकट करनेवाला दूसरा पर्व पूर्ण हुआ ॥२॥

३. तृतीयं पर्व (विद्याधरलोकाभिधानं)

आस्थानमण्डपेऽथासौ कृताशेषतनुस्थितिः । सर्वालंकारसंपन्नो निविष्टो भद्रविष्टरे ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर दूसरे दिन शरीर सम्बन्धी समस्त क्रियाओंको पूर्ण कर सर्व आभरणोंसे सुशोभित महाराज श्रेणिक सभामण्डपमें आकर उत्तम सिंहासनपर विराजमान हुए ॥१॥


सामन्तैश्च प्रतीहारदत्तद्वारैरुपागतैः । केयूरकोटिसंघट्टपाटितप्रवरांशुकैः ॥२॥

पलद्भ्रमरसंगीतमौलिमालावतंसकैः । कटकांशुचयच्छन्नकराग्रस्पृष्टभूतलैः ॥३॥

ललत्प्रालम्बतरलप्रभापटलसारितैः । प्रणतः सद्गुणग्रामसमावर्जितमानसैः ॥४॥

अर्थ: उसी समय द्वारपालोंने जिन्हें प्रवेश कराया था ऐसे आये हुए सामन्तोंने उन्हें नमस्कार किया । नमस्कार करते समय उन सामन्तोंके श्रेष्ठ वस्त्र, बाजूबन्दोंके अग्रभागके संघर्षणसे फट रहे थे. जिनपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे ऐसी मुकुटमें लगी हुई श्रेष्ठ मालाएँ नीचे पड़ रही थीं, वलयकी किरणोंके समूहसे आच्छादित पाणितलसे वे पृथिवीतलका स्पर्श कर रहे थे, हिलती हुई मालाके मध्यमणि सम्बन्धी प्रभाके समूहसे व्याप्त थे, और महाराजके उत्तमोत्तम गुणोंके समूहसे उनके मन महाराजकी ओर आसक्त हो रहे थे ॥२-४॥


ततस्तैरनुयातोऽसावारूढवरवाहनैः । पृष्ठाहितकुथाशोभां भद्रामारुह्य वासताम् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर श्रेष्ठ वाहनोंपर आरूढ़ हुए उन्हीं सब सामन्तोंसे अनुगत महाराज श्रेणिक, पीठपर पड़ी झूलसे सुशोभित उत्तम हथिनीपर सवार होकर श्रीवर्धमान जिनेन्द्रके समवसरणकी ओर चले ॥५॥


गृहीतमण्डलाग्रेण बद्धसायकधेनुना । प्रकोष्ठे दधता वामे कटकं हेमनिर्मितम् ॥६॥

दूरमुड्डीयमानेन वायुमार्गं मुहुर्मुहुः । मृगाणामिव यूथेन नमस्वदनुगामिना ॥७॥

याहि याहि पुरोमार्गादवसर्प व्रज व्रज । चल किं स्तम्भितोऽसीति पादातेन कृतध्वनिः ॥८॥

अर्थ: जिन्होंने अपने हाथमें तलवार ले रखी थी, कमरमें छुरी बाँध रखी थी, जो बायें हाथमें सुवर्ण निर्मित कड़ा पहने हुए थे, बार-बार आकाशमें दूर तक छलांग भर रहे थे और इसीलिए जो वायुके पीछे चलनेवाले वातप्रमी मृगोंके झुण्डके समान जान पड़ते थे तथा जो ‘चलो चलो, मार्ग छोड़ो, हटो आगे क्यों खड़े हो गये’ इस प्रकारके शब्दोंका उच्चारण कर रहे थे ऐसे भृत्योंका समूह उनके आगे कोलाहल करता जाता था ॥६-८॥


निश्चक्राम पुरो राजा वन्दिनः पठतोऽग्रतः । आकर्णयन् समाधानन्यस्तचित्तः सुभाषितम् ॥९॥

प्राप्तश्च तमसौ देशं यस्मिन्मुनिभिरावृतः । सर्वश्रुतजलस्नाननिर्मलीकृतचेतनः ॥१०॥

शुद्धध्यानसमाविष्टस्तत्त्वाख्यानपरायणः । उपविष्टः सुखस्पर्शे लब्ध्युत्पन्ने मयूरके ॥११॥

कान्त्या तारापतेस्तुल्यो दीप्त्या मास्करसंनिमः । अशोकपल्लवच्छायपाणिपादोम्बुजेक्षणः ॥१२॥

प्रशान्तेन शरीरेण भुवनं शमयन्निव । पतिर्गणस्य साधूनां गौतमाख्योऽवतिष्ठते ॥१३॥

अर्थ: आगे-आगे वन्दीजन सुभाषित पढ़ रहे थे सो महाराज उन्हें चित्त स्थिर कर श्रवण करते जाते थे। इस प्रकार नगरसे निकलकर राजा श्रेणिक उस स्थानपर पहुँचे जहाँ गौतम गणधर विराजमान थे। गौतम स्वामी अनेक मुनियोंसे घिरे हुए थे, समस्त शास्त्ररूपी जलमें स्नान करनेसे उनकी चेतना निर्मल हो गयी थी, शुद्ध ध्यानसे सहित थे, तत्त्वोंके व्याख्यानमें तत्पर थे, सुखकर स्पर्शसे सहित एवं लब्धियोंके कारण प्राप्त हुए मयूराकार आसनपर विराजमान थे, कान्तिसे चन्द्रमाके समान थे, दीप्तिसे सूर्यके सदृश थे, उनके हाथ और पैर अशोकके पल्लवोंके समान लाल-लाल थे, उनके नेत्र कमलोंके समान थे, अपने शान्त शरीरसे संसारको शान्त कर रहे थे, और मुनियोंके अधिपति थे ॥९-१३॥


दूरादेवावतीर्णश्च करेणोश्चरणायनः । प्रमोदोत्फुल्लनयनो ढुढौके विनयानतः ॥१४॥

ततस्तं त्रिपरीत्यासौ प्रणम्य च कृताञ्जलिः । दत्ताशीर्गणनाथेन धरायां समुपाविशत् ॥१५॥

अर्थ: राजा श्रेणिक दूरसे ही हस्तिनीसे नीचे उतरकर पैदल चलने लगे, उनके नेत्र हर्षसे फूल गये, और उनका शरीर विनयसे झुक गया । वहाँ जाकर उन्होंने तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, हाथ जोड़कर प्रणाम किया और फिर गणधर स्वामीका आशीर्वाद प्राप्त कर वे पृथ्वीपर ही बैठ गये ॥१४-१५॥


अथ दन्तप्रभाजालधवलीकृतभूतलः । पर्यपृच्छदिदं राजा कुशलप्रश्नपूर्वकम् ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर - दाँतोंकी प्रभासे पृथ्वी-तलको सफेद करते हुए राजा श्रेणिकने कुशल-प्रश्न पूछनेके बाद गणधर महाराजसे यह पूछा ॥१६॥


भगवन् पद्मचरितं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । उत्पादितान्यथैवास्मिन् प्रसिद्धिः कुमतानुगैः ॥१७॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! मैं रामचन्द्रजीका वास्तविक चरित्र सुनना चाहता हूँ क्योंकि कुधर्मके अनुगामी लोगोंने उनके विषयमें अन्य प्रकारकी ही प्रसिद्धि उत्पन्न कर दी है ॥१७॥


राक्षसो हि स लङ्केशो विद्यावान् मानवोऽपि वा । तिर्यग्भिः परिभूतोऽसौ कथं क्षुद्रकवानरैः ॥१८॥

अर्थ: लंकाका स्वामी रावण, राक्षस वंशी विद्याधर मनुष्य होकर भी तिर्यंचगतिके क्षुद्र वानरोंके द्वारा किस प्रकार पराजित हुआ ॥१८॥


अत्ति चात्यन्तदुर्गन्धं कथं मानुषविग्रहम् । कथं वा रामदेवेन वालिश्छिद्रेण नाशितः ॥१९॥

गत्वा वा देवनिलयं मङ्क्त्वोपवनमुत्तमम् । वन्दीगृहं कथं नीतो रावणेनामराधिपः ॥२०॥

सर्वशास्त्रार्थकुशलो रोगवर्जितविग्रहः । शेते च स कथं मासान् षडेतस्य वरोऽनुजः ॥२१॥

कथं चात्यन्तगुरुभिः पर्वतैरलमुन्नतः । सेतुः शाखामृगैर्बद्धो यः सुरैरपि दुर्घटः ॥२२॥

अर्थ: वह, अत्यन्त दुर्गन्धित मनुष्य शरीरका भक्षण कैसे करता होगा ? रामचन्द्रजीने कपटसे बालिको कैसे मारा होगा ? देवोंके नगरमें जाकर तथा उसके उत्तम उपवनको नष्ट कर रावण इन्द्रको बन्दीगृहमें किस प्रकार लाया होगा ? उसका छोटा भाई कुम्भकर्ण तो समस्त शास्त्रोंके अर्थ जाननेमें कुशल था तथा नीरोग शरीरका धारक था फिर छह माह तक किस प्रकार सोता रहता होगा ? जो देवोंके द्वारा भी अशक्य था ऐसा बहुत ऊँचा पुल भारी-भारी पर्वतोंके द्वारा वानरोंने कैसे बनाया होगा ? ॥१९-२२॥


प्रसीद भगवन्नेतत्सर्वं कथयितुं मम । उत्तारयन् बहून् भव्यान् संशयोदारकर्दमात् ॥२३॥

अर्थ: हे भगवन् ! मेरे लिए यह सब कहनेके अर्थ प्रसन्न हूजिए और संशयरूपी भारी कीचड़से अनेक भव्य जीवोंका उद्धार कीजिए ॥२३॥


एवमुक्तो गणेशैः स निर्गतैर्दशनांशुभिः । क्षालयन्निव निःशेषं कुसुमैर्मलिनं जगत् ॥२४॥

लताभवनमध्यस्थान्नर्तयन्नुरगद्विषः । गम्भीराम्भोदनिर्घोषधीरयोदाहरद् गिरा ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार राजा श्रेणिकके पूछनेपर गौतम गणधर, अपने दाँतोंकी किरणोंसे समस्त मलिन संसारको धोकर फूलोंसे सजाते हुए और मेघ गर्जनाके समान गम्भीर वाणीके द्वारा लतागृहोंके मध्यमें स्थित मयूरोंको नृत्य कराते हुए कहने लगे ॥२४-२५॥


श्रृण्वायुष्मन् महीपाल देवानांप्रिय यत्नतः । मम वाक्यं जिनेन्द्रोक्तं तत्त्वशंसनतत्परम् ॥२६॥

अर्थ: कि हे आयुष्मन् ! हे देवोंके प्रिय ! भूपाल ! तू यत्नपूर्वक मेरे वचन सुन । मेरे वचन जिनेन्द्र भगवान्‌के द्वारा उपदिष्ट हैं, तथा पदार्थका सत्यस्वरूप प्रकट करनेमें तत्पर हैं ॥२६॥


रावणो राक्षसो नैव न चापि मनुजाशनः । अलीकमेव तत्सर्वं यद्वदन्ति कुवादिनः ॥२७॥

अर्थ: रावण राक्षस नहीं था और न मनुष्योंको ही खाता था। मिथ्यावादी लोग जो कहते हैं सो सब मिथ्या ही कहते हैं ॥२७॥


न विना पीठबन्धेन विधातुं सद्म शक्यते । कथाप्रस्तावहीनं च वचनं छिन्नमूलकम् ॥२८॥

अर्थ: जिस प्रकार नींवके बिना भवन नहीं बनाया जा सकता है उसी प्रकार कथाके प्रस्तावके बिना कोई वचन नहीं कहे जा सकते हैं क्योंकि इस तरहके वचन निर्मूल होते हैं और निर्मूल होनेके कारण उनमें प्रामाणिकता नहीं आती है ॥२८॥


यतः श्रृणु ततस्तावत्क्षेत्रकालोपवर्णनम् । महतां पुरुषाणां च चरितं पापनाशनम् ॥२९॥

अर्थ: इसलिए सबसे पहले तुम क्षेत्र और कालका वर्णन सुनो। तदनन्तर पापोंको नष्ट करनेवाला महापुरुषोंका चरित्र सुनो ॥२९॥


अनन्तालोकनमसो मध्ये लोकस्त्रिधा स्थितः । तालोलूखलसंकाशो वलयैस्त्रिभिरावृतः ॥३०॥

अर्थ: अनन्त अलोकाकाशके मध्यमें तीन वातवलयोंसे वेष्टित तीन लोक स्थित हैं । अनन्त अलोकाकाशके बीचमें यह उन्नताकार लोक ऐसा जान पड़ता है मानो किसी उदूखलके बीच बड़ा भारी तालका वृक्ष खड़ा किया गया हो ॥३०॥


तिर्यग्लोकस्य मध्येऽस्मिन् संख्यातिक्रममागतैः । वेष्टितो वलयाकारैर्द्वीपैरम्भोधिभिस्तथा ॥३१॥

अर्थ: इस लोकका मध्यभाग जो कि तिर्यग्लोकके नामसे प्रसिद्ध है चूड़ीके आकारवाले असंख्यात द्वीप और समुद्रोंसे वेष्टित है ॥३१॥


कुलालचक्रसंस्थानो जम्बूद्वीपोऽयमुत्तमः । लवणाम्भोधिमध्यस्थः सर्वतो लक्षयोजनः ॥३२॥

अर्थ: कुम्भकारके चक्रके समान यह जम्बूद्वीप है। यह जम्बूद्वीप सब द्वीपोंमें उत्तम है, लवणसमुद्रके मध्यमें स्थित है और सब ओरसे एक लाख योजन विस्तारवाला है ॥३२॥


तस्य मध्ये महामेरुर्मूले वज्रमयोऽक्षयः । ततो जाम्बूनदमयो मणिरत्नमयस्ततः ॥३३॥

अर्थ: इस जम्बूद्वीपके मध्यमें सुमेरु पर्वत है। यह पर्वत कभी नष्ट नहीं होता, इसका मूल भाग वज्र अर्थात् हीरोंका बना है और ऊपरका भाग सुवर्ण तथा मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित है ॥३३॥


संध्यानुरक्तमेघौघसदृशोत्तुङ्गशृङ्गकः । कलाग्रमात्रविवरास्पष्टसौधर्ममौमिकः ॥३४॥

अर्थ: इसकी ऊँची चोटी सन्ध्याके कारण लाल-लाल दिखनेवाले मेघोंके समूहके समान जान पड़ती है। सौधर्म स्वर्गकी भूमि और इस पर्वतके शिखरमें केवल बालके अग्रभाग बराबर ही अन्तर रह जाता है ॥३४॥


योजनानां सहस्त्राणि नवतिर्नव चोच्छ्रितः । सहस्त्रमवगाडश्च स्थितो वज्रमयः क्षितौ ॥३५॥

अर्थ: यह निन्यानबे हजार योजन ऊपर उठा है और एक हजार योजन नीचे पृथिवीमें प्रविष्ट है। पृथिवीके भीतर यह पर्वत वज्रमय है ॥३५॥


विपुलं शिखरे चैकं धरण्यां दशसंगुणम् । राजते तिर्यगाकाशं मातुं दण्ड इवोच्छ्रितः ॥३६॥

अर्थ: यह पर्वत पृथिवीपर दस हजार योजन और शिखरपर एक हजार योजन चौड़ा है और ऐसा जान पड़ता है मानो मध्यम लोकके आकाशको नापनेके लिए एक दण्ड ही खड़ा किया गया है ॥३६॥


द्वौ च तत्र कुरुद्वीपे क्षेत्रैः सप्तभिरन्विते । षट् क्षेत्राणां विभक्तारो राजन्ते कुलपर्वताः ॥३७॥

अर्थ: यह जम्बूद्वीप भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत इन सात क्षेत्रोंसे सहित है। तथा इसीके विदेह क्षेत्रमें देवकुरु और उत्तरकुरु नामसे प्रसिद्ध दो कुरु प्रदेश भी हैं। इन सात क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले छह कुलाचल भी इसी जम्बूद्वीपमें सुशोभित हैं ॥३७॥


द्वौ महापादपौ ज्ञेयौ विद्याधरपुरीशतम् । अधिकं दशमिस्तत्र विजयार्द्धेष्वथैकशः ॥३८॥

अर्थ: जम्बू और शाल्मली ये दो महावृक्ष हैं। जम्बूद्वीपमें चौंतीस विजयार्ध पर्वत हैं और प्रत्येक विजयार्ध पर्वतपर एक सौ दस एक सौ दस विद्याधरोंकी नगरियाँ हैं ॥३८॥


त्रिंशच्चतसृभिर्युक्ता राजधान्यः प्रकीर्तिताः । चतुर्दश महानद्यो जम्बूवृक्षे जिनालयः ॥३९॥

अर्थ: जम्बूद्वीपमें बत्तीस विदेह, एक भरत और एक ऐरावत ऐसे चौंतीस क्षेत्र हैं और एक-एक क्षेत्रमें एक-एक राजधानी है इस तरह चौंतीस राजधानियाँ हैं, चौदह महानदियाँ हैं, जम्बूवृक्षके ऊपर अकृत्रिम जिनालय है ॥३९॥


षड् भोगक्षितयः प्रोक्ता अष्टौ जिनगृहाणि च । अष्टषष्टिर्गुहामानं भवनानां च तत्स्मृतम् ॥४०॥

अर्थ: हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक, हैरण्यवत, देवकुरु और उत्तरकुरु इस प्रकार छह भोगभूमियाँ हैं । मेरु, गजदन्त, कुलाचल, वक्षारगिरि, विजयार्ध, जम्बूवृक्ष और शाल्मलीवृक्ष, इन सात स्थानोंपर अकृत्रिम तथा सर्वत्र कृत्रिम इस प्रकार आठ जिनमन्दिर हैं। बत्तीस विदेह क्षेत्रके तथा भरत और ऐरावतके एक-एक इस प्रकार कुल चौंतीस विजयार्ध पर्वत हैं। उनमें प्रत्येकमें दो-दो गुफाएँ हैं इस तरह अड़सठ गुफाएँ हैं। और इतने ही भवनोंकी संख्या है ॥४०॥


सिंहासनानि चत्वारि त्रिंशच्च गदितानि तु । विजयार्द्धनगौ द्वौ च राजतौ परिकीर्तितौ ॥४१॥

अर्थ: बत्तीस विदेह क्षेत्र तथा एक भरत और एक ऐरावत इन चौंतीस स्थानोंमें एक साथ तीर्थंकर भगवान् हो सकते हैं इसलिए समवसरणमें भगवान्के चौंतीस सिंहासन हैं। विदेहके सिवाय भरत और ऐरावत क्षेत्रमें रजतमय दो विजयार्ध पर्वत कहे गये हैं ॥४१॥


वक्षारगिरियुक्तेषु समस्तेषु नगेषु तु । भवनानि जिनेन्द्राणां राजन्ते रत्नराशिभिः ॥४२॥

अर्थ: वक्षारगिरियोंसे युक्त समस्त पर्वतोंपर जिनेन्द्र भगवान्के मन्दिर हैं जो कि रत्नोंकी राशिसे सुशोभित हो रहे हैं ॥४२॥


जम्बूभरतसंज्ञायां क्षोण्यां दक्षिणयाशया । सुमहान् राक्षसो द्वीपो जिनबिम्बसमन्वितः ॥४३॥

अर्थ: जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रकी दक्षिण दिशामें जिन-प्रतिमाओंसे सुशोभित एक बड़ा भारी राक्षस नामका द्वीप है ॥४३॥


महाविदेहवर्षस्य जगत्यां पश्चिमाशया । विशालः किन्नरद्वीपो जिनबिम्बोज्ज्वलः शुभः ॥४४॥

अर्थ: महाविदेह क्षेत्रकी पश्चिम दिशामें जिनबिम्बोंसे देदीप्यमान किन्नरद्वीप नामका विशाल शुभद्वीप है ॥४४॥


तथैरावतवर्षस्य क्षित्यामुत्तरया दिशा । गन्धर्वो नामतो द्वीपः सच्चैत्यालयभूषितः ॥४५॥

अर्थ: ऐरावत क्षेत्रकी उत्तर दिशामें गन्धर्व नामका द्वीप है जो कि उत्तमोत्तम चैत्यालयोंसे विभूषित है ॥४५॥


मेरोः पूर्वविदेहस्य जगत्यां पूर्वयाशया । रराज धरणद्वीपो जिनायतनसंकुलः ॥४६॥

अर्थ: मेरु पर्वतसे पूर्वकी ओर जो विदेह क्षेत्र है उसकी पूर्व दिशामें धरणद्वीप सुशोभित हो रहा है । यह धरण द्वीप भी जिन-मन्दिरोंसे व्याप्त है ॥४६॥


भरतैरावतक्षेत्रे वृद्धिहानिसमन्विते । शेषास्तु भूमयः प्रोक्तास्तुल्यकालव्यवस्थिताः ॥४७॥

अर्थ: भरत और ऐरावत ये दोनों क्षेत्र वृद्धि और हानिसे सहित हैं । अन्य क्षेत्रोंकी भूमियाँ व्यवस्थित हैं अर्थात् उनमें कालचक्रका परिवर्तन नहीं होता ॥४७॥


जम्बूवृक्षस्य भवने सुरोऽनावृतशब्दितः । शतैः किल्विषकाख्यानामास्ते बहुभिरावृतः ॥४८॥

अर्थ: जम्बूवृक्षके ऊपर जो भवन है उसमें अनावृत नामका देव रहता है । यह देव किल्विष जातिके अनेक शत देवोंसे आवृत रहता है ॥४८॥


अस्मिँश्च भरतक्षेत्रं पुरोत्तरकुरूपमम् । कल्पपादपसंकीर्णं सुषमायां विराजते ॥४९॥

अर्थ: इस भरत क्षेत्रमें जब पहले सुषमा नामका पहला काल था तब वह उत्तरकुरुके समान कल्पवृक्षोंसे व्याप्त था अर्थात् यहाँ उत्तम भोगभूमिकी रचना थी ॥४९॥


तरुणादित्यसंकाशा गव्यूतित्रयमुच्छ्रिताः । सर्वलक्षणसंपूर्णाः प्रजा यत्र विरेजिरे ॥५०॥

अर्थ: उस समय यहाँके लोग मध्याह्नके सूर्यके समान देदीप्यमान, दो कोश ऊँचे और सर्वलक्षणोंसे पूर्ण-सुशोभित होते थे ॥५०॥


युग्ममुत्पद्यते तत्र पल्यानां त्रयमायुषा । प्रेमबन्धनबद्धं च म्रियते युगलं समम् ॥५१॥

अर्थ: यहाँ स्त्री-पुरुषका जोड़ा साथ-ही-साथ उत्पन्न होता था, तीन पल्यकी उनकी आयु होती थी और प्रेम बन्धनबद्ध रहते हुए साथ-ही-साथ उनकी मृत्यु होती थी ॥५१॥


काञ्चनेन चिता भूमी रत्नैश्च मणिभिस्तथा । कालानुभावतश्चित्रैः सर्वकामफलप्रदा ॥५२॥

अर्थ: यहाँकी भूमि सुवर्ण तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे खचित थी और कालके प्रभावसे सबके लिए मनोवांछित फल प्रदान करनेवाली थी ॥५२॥


चतुरङ्गुलमानैश्च चित्रैर्गन्धेन चारुभिः । विमलातिमृदुस्पर्शैस्तृणैश्छन्ना विराजिता ॥५३॥

अर्थ: सुगन्धित, निर्मल तथा कोमल स्पर्शवाली, चतुरंगुल प्रमाण घाससे वहाँ की भूमि सदा सुशोभित रहती थी ॥५३॥


सर्वर्तुफलपुष्पैश्च तरवो रेजुरुज्ज्वलाः । स्वतन्त्राश्च सुखेनास्थुर्गोमहिष्याविकादयः ॥५४॥

अर्थ: वृक्ष सब ऋतुओंके फल और फूलोंसे सुशोभित रहते थे तथा गाय, भैंस, भेड़ आदि जानवर स्वतन्त्रतापूर्वक सुखसे निवास करते थे ॥५४॥


कल्पवृक्षसमुत्पन्नं मक्षयन्तो यथेप्सितम् । अन्नं सिंहादयः सौम्या हिंसां तत्र न चक्रिरे ॥५५॥

अर्थ: वहाँके सिंह आदि जन्तु कल्पवृक्षोंसे उत्पन्न हुए मनवांछित अन्नको खाते हुए सदा सौम्य - शान्त रहते थे । कभी किसी जीवकी हिंसा नहीं करते थे ॥५५॥


पद्मादिजलजच्छन्नाः सौवर्णमणिशोभनाः । सम्पूर्णा रेजिरे वाप्यो मधुक्षीरघृतादिभिः ॥५६॥

अर्थ: वहाँ की वापिकाएँ पद्म आदि कमलोंसे आच्छादित, सुवर्ण और मणियोंसे सुशोभित तथा मधु, क्षीर एवं घृत आदिसे भरी हुई अत्यधिक शोभायमान रहती थीं ॥५६॥


गिरयोऽत्यन्तमुत्तुङ्गाः पञ्चवर्णसमुज्ज्वलाः । नानारत्नैकरच्छन्नाः सर्वप्राणिसुखावहाः ॥५७॥

अर्थ: वहाँके पर्वत अत्यन्त ऊँचे थे, पाँच प्रकारके वर्णोंसे उज्ज्वल थे, नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्तिसे व्याप्त थे तथा सर्वप्राणियोंको सुख उपजानेवाले थे ॥५७॥


नद्यो निर्जन्तुका रम्याः क्षीरसर्पिर्मधूदकाः । अत्यन्तसुरसास्वादा रत्नोद्योतितरोधसः ॥५८॥

अर्थ: वहाँ की नदियाँ मगरमच्छादि जन्तुओंसे रहित थीं, सुन्दर थीं, उनका जल दूध, घी और मधुके समान था, उनका आस्वाद अत्यन्त सुरस था और उनके किनारे रत्नोंसे देदीप्यमान थे ॥५८॥


नातिशीतं न चात्युष्णं तीव्रमारुतवर्जितम् । सर्वप्रतिमयैर्मुक्तं नित्योद्भूतसमुत्सवम् ॥५९॥

अर्थ: वहाँ न तो अधिक शीत पड़ती थी, न अधिक गर्मी होती थी, न तीव्र वायु चलती थी । वह सब प्रकारके भयोंसे रहित था और वहाँ निरन्तर नयेनये उत्सव होते रहते थे ॥५९॥


ज्योतिर्द्रुमप्रभाजालच्छन्नेन्दुरविमण्डलम् । सर्वेन्द्रियसुखास्वादप्रदकल्पमहातरु ॥६०॥

अर्थ: वहाँ ज्योतिरंग जातिके वृक्षोंकी कान्तिके समूहसे सूर्य और चन्द्रमाके मण्डल छिपे रहते थे - दिखाई नहीं पड़ते थे तथा सर्व इन्द्रियोंको सुखास्वादके देनेवाले कल्पवृक्ष सुशोभित रहते थे ॥६०॥


प्रासादास्तत्र वृक्षेषु विपुलोद्यानभूमयः । शयनासनमद्येष्टस्वादुपानाशनानि च ॥६१॥

अर्थ: वहाँ बड़े-बड़े बाग-बगीचे और विस्तृत भूभागसे सहित महल, शयन, आसन, मद्य, इष्ट और मधुर पेय, भोजन, वस्त्र, अनुलेपन, तुरहीके मनोहर शब्द और दूर तक फैलनेवाली सुन्दर गन्ध तथा इनके सिवाय और भी अनेक प्रकारकी सामग्री कल्पवृक्षोंसे प्राप्त होती थी ॥६१॥


वस्त्रानुलेपनादीनि तूर्यशब्दा मनोहराः । आमोदिनस्तथा गन्धाः सर्वं चान्यत्तरूद्भवम् ॥६२॥

दशभेदेषु तेष्वेवं कल्पवृक्षेषु चारुषु । रेमिरे तत्र युग्मानि सुरलोक इवानिशम् ॥६३॥

अर्थ: इस प्रकार वहाँके दम्पती, दस प्रकारके सुन्दर कल्पवृक्षोंके नीचे देवदम्पतीके समान रात-दिन क्रीड़ा करते रहते थे ॥६२-६३॥


एवं प्रोक्ते गणेशेन पुनः श्रेणिकभूपतिः । भोगभूमौ समुत्पत्तेः कारणं परिपृष्टवान् ॥६४॥

अर्थ: इस तरह गणधर भगवान्के कह चुकनेपर राजा श्रेणिकने उनसे भोगभूमिमें उपजनेका कारण पूछा ॥६४॥


कथितं च गणेशेन तत्रत्ये प्रगुणा जनाः । साधुदानसमायुक्ता भवन्त्येते सुमानुषाः ॥६५॥

अर्थ: उत्तरमें गणधर भगवान् कहने लगे कि जो सरलचित्तके धारी मनुष्य मुनियोंके लिए आहार आदि दान देते हैं वे ही इन भोग- भूमियोंमें उत्तम मनुष्य होते हैं ॥६५॥


ये पुनः कुत्सिते दानं ददते भोगतृष्णया । तेऽपि हस्त्यादितां गत्वा भुञ्जते दानजं फलम् ॥६६॥

अर्थ: तथा जो भोगोंकी तृष्णासे कुपात्रके लिए दान देते हैं वे भी हस्ती आदिकी पर्याय प्राप्त कर दानका फल भोगते हैं ॥६६॥


नितान्तं मृदुनि क्षेत्रे दूरं कृष्टे हलाननैः । क्षिप्तं बीजं यथानन्तगुणं सस्यं प्रयच्छति ॥६७॥

यथा चेक्षुषु निक्षिप्तं माधुर्यं वारि गच्छति । पीतं च धेनुभिस्तोयं क्षीरत्वेन विवर्तते ॥६८॥

एवं साधौ तपोऽगारे व्रतालंकृतविग्रहे । सर्वग्रन्थविनिर्मुक्ते दत्तं दानं महाफलम् ॥६९॥

अर्थ: जिस प्रकार हलकी नोंकसे दूर तक जुते और अत्यन्त कोमल क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अनन्तगुणा धान्य प्रदान करता है अथवा जिस प्रकार ईखोंमें दिया हुआ पानी मधुरताको प्राप्त होता है और गायोंके द्वारा पिया हुआ पानी दूध रूपमें परिणत हो जाता है उसी प्रकार तपके भण्डार और व्रतोंसे अलंकृत शरीरके धारक सर्व-परिग्रह रहित मुनिके लिए दिया हुआ दान महाफलको देनेवाला होता है ॥६७-६९॥


खिले गतं यथा क्षेत्रे बीजमल्पफलं भवेत् । निम्बेषु च तथा क्षिप्तं कटुत्वं वारि गच्छति ॥७०॥

यथा च पन्नगैः पीतं क्षीरं संजायते विषम् । कुपात्रेषु तथा दत्तं दानं कुफलदं भवेत् ॥७१॥

अर्थ: जिस प्रकार ऊषर क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अल्पफल देता है अथवा नीमके वृक्षोंमें दिया हुआ पानी जिस प्रकार कड़आ हो जाता है और साँपोंके द्वारा पिया हुआ पानी जिस प्रकार विष रूपमें परिणत हो जाता है उसी प्रकार कुपात्रोंमें दिया हुआ दान कुफलको देनेवाला होता है ॥७०-७१॥


एवं दानस्य सदृशो धरेन्द्र फलसंभवः । यद्यदाधीयते वस्तु दर्पणे तस्य दर्शनम् ॥७२॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जो जैसा दान देता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है । दर्पणके सामने जो-जो वस्तु रखी जाती है वही-वही दिखाई देती है ॥७२॥


यथा शुक्लं च कृष्णं च पक्षद्वयमनन्तरम् । उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योरेवं क्रमसमुद्भवः ॥७३॥

अर्थ: जिस प्रकार शुक्ल और कृष्णके भेदसे दो पक्ष एकके बाद एक प्रकट होते हैं उसी प्रकार उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी ये दो काल क्रमसे प्रकट होते हैं ॥७३॥


अर्थ कालान्त्यतो हानिं तेषु यातेष्वनुक्रमात् । कल्पपादपखण्डेषु शृणु कौलकरीं स्थितिम् ॥७४॥

अर्थ: अथानन्तर तृतीय कालका अन्त होनेके कारण जब क्रमसे कल्पवृक्षोंका समूह नष्ट होने लगा तब चौदह कुलकर उत्पन्न हुए उस समयकी व्यवस्था कहता हूँ सो हे श्रेणिक ! सुन ॥७४॥


प्रतिश्रुतिरिति ज्ञेय आद्यः कुलकरो महान् । श्रुत्वा तस्य वचः सर्वाः प्रजाः सौस्थित्यमागताः ॥७५॥

अर्थ: सबसे पहले प्रतिश्रुति नामके प्रथम कुलकर हुए । उनके वचन सुनकर प्रजा आनन्दको प्राप्त हुई ॥७५॥


जन्मत्रयमतीतं यो जानाति स्म निजं विभुः । शुभचेष्टासमुद्युक्तौ व्यवस्थानां प्रदेशकः ॥७६॥

अर्थ: वे अपने तीन जन्म पहलेकी बात जानते थे, शुभचेष्टाओंके चलानेमें तत्पर रहते थे और सब प्रकारकी व्यवस्थाओंका निर्देश करनेवाले थे ॥७६॥


ततो वर्षसहस्राणामतिक्रान्तासु कोटिषु । बह्वीषु स मनुः प्राप्तो जन्म सन्मतिसंज्ञितः ॥७७॥

अर्थ: उनके बाद अनेक करोड़ हजार वर्ष बीतनेपर सन्मति नामके द्वितीय कुलकर उत्पन्न हुए ॥७७॥


ततः क्षेमंकरो जातः क्षेमधृत्तदनन्तरम् । अभूत् सीमंकरस्तस्मात् सीमधृच्च ततः परम् ॥७८॥

अर्थ: उनके बाद क्षेमंकर, फिर क्षेमन्धर, तत्पश्चात् सीमंकर और उनके पीछे सीमन्धर नामके कुलकर उत्पन्न हुए ॥७८॥


चक्षुष्मानपरस्तस्मात्तं गत्वा सभयाः प्रजाः । अपृच्छन्नाथ कावेतौ दृश्येते गगनार्णवे ॥७९॥

अर्थ: उनके बाद चक्षुष्मान् कुलकर हुए । उनके समय प्रजा सूर्य चन्द्रमाको देखकर भयभीत हो उनसे पूछने लगी कि हे स्वामिन् ! आकाशरूपी समुद्रमें ये दो पदार्थ क्या दिख रहे हैं ? ॥७९॥


ततो जगाद चक्षुष्मान् विदेहे यच्छ्रुतं जिनात् । युक्तो जन्मान्तरस्मृत्या यथाकालपरिक्षये ॥८०॥

क्षीणेषु द्युतिवृक्षेषु समुद्भूतप्रभाविमौ । चन्द्रादित्याविति ख्यातौ ज्योतिर्देवौ स्फुटौ स्थितौ ॥८१॥

अर्थ: प्रजाका प्रश्न सुनकर चक्षुष्मान्को अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया । उस समय उन्होंने विदेह क्षेत्रमें भी जिनेन्द्रदेवके मुखसे जो कुछ श्रवण किया था वह सब स्मरणमें आ गया । उन्होंने कहा कि तृतीय कालका क्षय होना निकट है इसलिए ज्योतिरंग जातिके कल्प वृक्षोंकी कान्ति मन्द पड़ गयी है और चन्द्रमा तथा सूर्यकी कान्ति प्रकट हो रही है । ये चन्द्रमा और सूर्य नामसे प्रसिद्ध दो ज्योतिषी देव आकाशमें प्रकट दिख रहे हैं ॥८०-८१॥


ज्यौतिषा भावनाः कल्पा व्यन्तराश्च चतुर्विधाः । देवा भवन्ति योग्येन कर्मणा जन्तवो भवे ॥८२॥

अर्थ: ज्योतिषी, भवनवासी, व्यन्तर और कल्पवासीके भेदसे देव चार प्रकारके होते हैं। संसारके प्राणी अपने-अपने कर्मोंकी योग्यताके अनुसार इनमें जन्म ग्रहण करते हैं ॥८२॥


तत्रायं चन्द्रमाः शीतस्तीव्रगुस्त्येष भास्करः । एतौ कालस्वभावेन दृश्येते गगनामरौ ॥८३॥

अर्थ: इनमें जो शीत किरणोंवाला है वह चन्द्रमा है और जो उष्ण किरणोंका धारक है वह सूर्य है। कालके स्वभावसे ये दोनों आकाशगामी देव दिखाई देने लगे हैं ॥८३॥


भानावस्तंगते तीव्रे कान्तिर्भवति शीतगोः । व्योम्नि नक्षत्रचक्रं च प्रकटत्वं प्रपद्यते ॥८४॥

अर्थ: जब सूर्य अस्त हो जाता है तब चन्द्रमाकी कान्ति बढ़ जाती है। सूर्य और चन्द्रमाके सिवाय आकाशमें यह नक्षत्रोंका समूह भी प्रकट हो रहा है ॥८४॥


स्वभावमिति कालस्य ज्ञात्वा त्यजत भीततम् । इत्युक्ता भयमत्यस्य प्रजा याता यथागतम् ॥८५॥

अर्थ: यह सब कालका स्वभाव है ऐसा जानकर आप लोग भयको छोड़ें। चक्षुष्मान् कुलकरने जब प्रजासे यह कहा तब वह भय छोड़कर पहलेके समान सुखसे रहने लगी ॥८५॥


चक्षुष्मति ततोऽतीते यशस्वीति समुद्गतः । विज्ञेयो विपुलस्तस्मादभिचन्द्रः परस्ततः ॥८६॥

चन्द्राभश्च परस्तस्मान्मरुदेवस्तदुत्तरः । ततः प्रसेनजिज्जातो नाभिरन्त्यस्ततोऽभवत् ॥८७॥

अर्थ: जब चक्षुष्मान् कुलकर स्वर्गगामी हो गये तो उनके बाद यशस्वी नामक कुलकर उत्पन्न हुए। उनके बाद विपुल, उनके पीछे अभिचन्द्र, उनके पश्चात् चन्द्राभ, उनके अनन्तर मरुदेव, उनके बाद प्रसेनजित् और उनके पीछे नाभिनामक कुलकर उत्पन्न हुए। इन कुलकरोंमें नाभिराज अन्तिम कुलकर थे ॥८६-८७॥


एते पितृसमाः प्रोक्ताः प्रजानां कुलकारिणः । शुभैः कर्मभिरुत्पन्नाश्चतुर्दश समा धिया ॥८८॥

अर्थ: ये चौदह कुलकर प्रजाके पिताके समान कहे गये हैं, पुण्य कर्मके उदयसे इनकी उत्पत्ति होती है और बुद्धिकी अपेक्षा सब समान होते हैं ॥८८॥


अथ कल्पद्रुमो नाभेरस्य क्षेत्रस्य मध्यगः । स्थितः प्रासादरूपेण विभात्यत्यन्तमुन्नतः ॥८९॥

अर्थ: अथानन्तर चौदहवें कुलकर नाभिराजके समयमें सब कल्पवृक्ष नष्ट हो गये। केवल इन्हींके क्षेत्रके मध्यमें स्थित एक कल्पवृक्ष रह गया जो प्रासाद अर्थात् भवनके रूपमें स्थित था और अत्यन्त ऊँचा था ॥८९॥


मुक्तादामचितो हेमरत्नकल्पितभित्तिकः । क्षितौ स एक एवासीद् वाप्युद्यानविभूषितः ॥९०॥

अर्थ: उनका वह प्रासाद मोतियोंकी मालाओंसे व्याप्त था, सुवर्ण और रत्नोंसे उसकी दीवालें बनी थीं, वापी और बगीचासे सुशोभित था तथा पृथिवीपर एक अद्वितीय ही था ॥९०॥


गृहीतहृदया तस्य बभूव वनितोत्तमा । प्रचलत्तारका भार्या रोहिणीव कलावतः ॥९१॥

अर्थ: नाभिराजके हृदयको हरनेवाली मरुदेवी नामकी उत्तम रानी थी। जिस प्रकार चन्द्रमाकी भार्या रोहिणी प्रचलत्तारका अर्थात् चंचल तारा रूप होती है उसी प्रकार मरुदेवी भी प्रचलत्तारका थी अर्थात् उसकी आँखोंकी पुतली चंचल थी ॥९१॥


गङ्गेव वाहिनीशस्य महाभूभृत्कुलोद्गता । हंसीव राजहंसस्य मानसानुगमक्षमा ॥९२॥

अर्थ: जिस प्रकार समुद्रकी स्त्री गंगा महाभूभृत्कुलोद्गता है अर्थात् हिमगिरि नामक उच्च पर्वतके कुलमें उत्पन्न हुई है उसी प्रकार मरुदेवी भी महाभूभृत्कुलोद्गता अर्थात् उत्कृष्ट राजवंशमें उत्पन्न हुई थी और राजहंसकी स्त्री जिस प्रकार मानसानुगमक्षमा अर्थात् मानस सरोवरकी ओर गमन करनेमें समर्थ रहती है उसी प्रकार मरुदेवी भी मानसानुगमक्षमा अर्थात् नाभिराजके मनके अनुकूल प्रवृत्ति करनेमें समर्थ थी ॥९२॥


अरुन्धतीव नाथस्य नित्यं पार्श्वानुवर्तिनी । हंसीव गमने वाचि परपुष्टवधूसमा ॥९३॥

अर्थ: जिस प्रकार अरुन्धती सदा अपने पतिके पास रहती थी उसी प्रकार मरुदेवी भी निरन्तर पतिके पास रहती थी । वह गमन करनेमें हंसीके समान थी और मधुर वचन बोलनेमें कोयलके अनुरूप थी ॥९३॥


चक्राह्वेव पतिप्रीतावित्यादिसमुदाहृतम् । यां प्रति प्रतिपद्येत सर्वं हीनोपमानताम् ॥९४॥

अर्थ: वह पतिके साथ प्रेम करनेमें चकवीके समान थी इत्यादि जो कहा जाता है वह सब मरुदेवी के प्रति हीनोपमा दोषको प्राप्त होता है ॥९४॥


पूजिता सर्वलोकस्य मरुदेवीति विश्रुता । यथा त्रिलोकवन्द्यस्य धर्मस्य श्रुतदेवता ॥९५॥

अर्थ: जिस प्रकार तीनों लोकोंके द्वारा वन्दनीय धर्मकी भार्या श्रुतदेवताके नामसे प्रसिद्ध है उसी प्रकार नाभिराजकी वह भार्या मरुदेवी नामसे प्रसिद्ध थी तथा समस्त लोकोंके द्वारा पूजनीय थी ॥९५॥


ऊष्माभावेन या चन्द्रकलाभिरिव निर्मिता । दर्पणश्रीजिगीषेव प्रतिपाणिगृहीतिषु ॥९६॥

अर्थ: उसमें रंच मात्र भी ऊष्मा अर्थात् क्रोध या अहंकार की गर्मी नहीं थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो चन्द्रमाकी कलाओंसे ही उसका निर्माण हुआ हो । उसे प्रत्येक मनुष्य अपने हाथमें लेना चाहता था - स्वीकृत करना चाहता था इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो दर्पणकी शोभाको जीतना चाहती हो ॥९६॥


निर्मितात्मस्वरूपेव परचित्तप्रतीतिषु । सिद्धजीवस्वभावेव त्रिलोकव्याप्तकर्मणि ॥९७॥

अर्थ: वह दूसरेके मनोगत भावको समझनेवाली थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो आत्मासे ही उसके स्वरूपकी रचना हुई हो । उसके कार्य तीनों लोकोंमें व्याप्त थे इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो मुक्त जीवके समान ही उसका स्वभाव था ॥९७॥


पुण्यवृत्तितया जैन्या श्रुत्येव परिकल्पिता । अमृतात्मेव तृष्यत्सु भृत्येषु वसुवृष्टिवत् ॥९८॥

अर्थ: उसकी प्रवृत्ति पुण्यरूप थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो जिनवाणीसे ही उसकी रचना हुई हो । वह तृष्णासे भरे भृत्योंके लिए धनवृष्टिके समान थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो अमृत स्वरूप ही हो ॥९८॥


सखीषु निर्वृतेस्तुल्या विलासान्मदिरात्मिका । रूपस्य परमावस्था रतेरिव तनुस्थितिः ॥९९॥

अर्थ: सखियोंको सन्तोष उपजानेवाली थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो निर्वृंति अर्थात् मुक्तिके समान ही हो । उसका शरीर हाव-भाव-विलाससे सहित था इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो मदिरास्वरूप ही हो । वह सौन्दर्यकी परम काष्ठाको प्राप्त थी अर्थात् अत्यन्त सुन्दरी थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो रतिकी प्रतिमा ही हो ॥९९॥


मण्डनं मुण्डमालाया यस्याश्चक्षुरभूद् वरम् । असितोत्पलदामानि केवलं भारमात्रकम् ॥१००॥

अर्थ: उसके मस्तकको अलंकृत करनेके लिए उसके नेत्र ही पर्याप्त थे, नील कमलोंकी मालाएँ तो केवल भारस्वरूप ही थीं ॥१००॥


अलकभ्रमरा एव भूषा भालान्तयोः सदा । दलानि तु तमालस्य पुनरुक्तानि केवलम् ॥१०१॥

अर्थ: भ्रमरके समान काले केश ही उसके ललाटके दोनों भागोंके आभूषण थे, तमालपुष्पकी कलिकाएँ तो केवल भार मात्र थीं ॥१०१॥


प्राणेशसंकथा एव सुभगं कर्णभूषणम् । डम्बरो रत्नकनककुण्डलादिपरिग्रहः ॥१०२॥

अर्थ: प्राणवल्लभकी कथा-वार्ता सुनना ही उसके कानोंका आभूषण था, रत्न तथा सुवर्णके कुण्डल आदिका धारण करना आडम्बर मात्र था ॥१०२॥


कपोलावेव सततं स्फुटालोकस्य कारणम् । रत्नप्रभाप्रदीपास्तु विभवायैव केवलम् ॥१०३॥

अर्थ: उसके दोनों कपोल ही निरन्तर स्पष्ट प्रकाशके कारण थे, रत्नमय दीपकोंकी प्रभा केवल वैभव बतलानेके लिए ही थी ॥१०३॥


हासा एव च सद्गन्धाः पटवासाः सितत्विषः । कर्पूरपांशवः कान्तिव्याघातायैव केवलम् ॥१०४॥

अर्थ: उसकी मन्द मुसकान ही उत्तम गन्धसे युक्त सुगन्धित चूर्ण थी, कपूरकी सफेद रज केवल कान्तिको नष्ट करनेवाली थी ॥१०४॥


वाण्येव मधुरा वीणा वाद्यश्रुतिकुतूहलम् । कृतं तु परिवर्गेण तन्त्रीनिकरताडनम् ॥१०५॥

अर्थ: उसकी वाणी ही मधुर वीणा थी, परिकरके द्वारा किया हुआ जो बाजा सुननेका कौतूहल था वह मात्र तारोंके समूहको ताडन करना था ॥१०५॥


कान्तिरेवावरोद्भूता रागोऽङ्गस्य समुज्ज्वलः । निर्गुणः कौङ्कुमः पङ्को लावण्यस्य कलङ्कनम् ॥१०६॥

अर्थ: उसके अधरोष्ठसे प्रकट हुई कान्ति ही उसके शरीरका देदीप्यमान अंगराग था। कुंकुम आदिका लेप गुणरहित तथा सौन्दर्यको कलंकित करनेवाला था ॥१०६॥


परिहासप्रहाराय भुजावेव सुकोमलौ । प्रयोजनमतीतानि मृणालशकलानि तु ॥१०७॥

अर्थ: उसकी कोमल भुजाएँ ही परिहासके समय पतिपर प्रहार करनेके लिए पर्याप्त थीं, मृणालके टुकड़े निष्प्रयोजन थे ॥१०७॥


यौवनोष्मसमुद्भूता मण्डनं स्वेदबिन्दवः । कुचयोर्हारभारस्तु वृथैव परिकल्पितः ॥१०८॥

अर्थ: यौवनकी गरमीसे उत्पन्न हुई पसीनेकी बूँदें ही उसके दोनों स्तनोंका आभूषण थीं, उनपर हारका बोझ तो व्यर्थ ही डाला गया था ॥१०८॥


शिलातलविशाला च श्रोणी विस्मयकारणम् । निमित्तेन विना जाता भवने मणिवेदिका ॥१०९॥

अर्थ: शिलातलके समान विशाल उसकी नितम्बस्थली ही आश्चर्यका कारण थी, महलके भीतर जो मणियोंकी वेदी बनायी गयी थी वह बिना कारण ही बनायी गयी थी ॥१०९॥


भूषणं भ्रमरा एव निलीनाः कमलाशया । पादयोरैन्द्रनीले च नूपुरे निःप्रयोजने ॥११०॥

अर्थ: कमल समझकर बैठे हुए भ्रमर ही उसके दोनों चरणोंके आभूषण थे, उनमें जो इन्द्रनील मणिके नूपुर पहनाये गये थे वे व्यर्थ थे ॥११०॥


तस्या नाभिसमेताया भोगं कल्पतरूद्भवम् । भुञ्जानाया दुराख्यानं ग्रन्थकोटिशतैरपि ॥१११॥

अर्थ: नाभिराजके साथ, कल्पवृक्षसे उत्पन्न हुए भोगोंको भोगनेवाली मरुदेवीके पुण्यवैभवका वर्णन करना करोड़ों ग्रन्थोंके द्वारा भी अशक्य है ॥१११॥


इन्द्राज्ञापरितुष्टाभिर्दिक्कुमारीभिरादरात् । कस्मिंश्चित्समये प्राप्ते परिचर्या प्रवर्तिता ॥११२॥

अर्थ: जब भगवान् ऋषभदेवके गर्भावतारका समय प्राप्त हुआ तब इन्द्रकी आज्ञासे सन्तुष्ट हुई दिक्कुमारी देवियाँ बड़े आदरसे मरुदेवीकी सेवा करने लगीं ॥११२॥


नन्दाज्ञापय जीवेति कृतशब्दाः ससंभ्रमम् । प्रतीयुः शासनं तस्या लक्ष्मीश्रीधृतिकीर्तयः ॥११३॥

अर्थ: ‘वृद्धिको प्राप्त होओ’, ‘आज्ञा देओ’, ‘चिरकाल तक जीवित रहो’ इत्यादि शब्दोंको सम्भ्रमके साथ उच्चारण करनेवाली लक्ष्मी, श्री, धृति और कीर्ति आदि देवियाँ उसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करने लगीं ॥११३॥


स्तुवन्ति काश्चित्तत्काले तां गुणैर्हृदयंगमैः । काश्चित्परमविज्ञाना उपगायन्ति वीणया ॥११४॥

अर्थ: उस समय कितनी ही देवियाँ हृदयहारी गुणोंके द्वारा उसकी स्तुति करती थीं, और उत्कृष्ट विज्ञानसे सम्पन्न कितनी ही देवियाँ वीणा बजाकर उसका गुणगान करती थीं ॥११४॥


अत्यन्तमद्भुतं काश्चिद्गायन्ति श्रवणामृतम् । पादयोर्लोटनं काश्चित्कुर्वते मृदुपाणिकाः ॥११५॥

अर्थ: कोई कानोंके लिए अमृतके समान आनन्द देनेवाला आश्चर्यकारक उत्तम गान गाती थीं और कोमल हाथोंवाली कितनी ही देवियाँ उसके पैर पलोटती थीं ॥११५॥


ताम्बूलदायिनी काचित्काचिदासनदायिनी । मण्डलाग्रकरा काचित् सततं पालनोद्यता ॥११६॥

अर्थ: कोई पान देती थी, और कोई आसन देती थी और कोई तलवार हाथमें लेकर सदा रक्षा करनेमें तत्पर रहती थी ॥११६॥


काश्चिदभ्यन्तरद्वारे बाह्यद्वारे तथा परा । गृहीतकुन्तसौवर्णवेत्रदण्डासिहेतयः ॥११७॥

अर्थ: कोई महलके भीतरी द्वारपर और कोई महलके बाहरी द्वारपर भाला, सुवर्णकी छड़ी, दण्ड और तलवार आदि हथि- यार लेकर पहरा देती थीं ॥११७॥


चामरग्राहिणी काचित्काचिच्छत्रस्य धारिका । आनेत्री वाससां काचिद् भूषणानां ततः परा ॥११८॥

अर्थ: कोई चमर ढोलती थीं, कोई वस्त्र लाकर देती थी और कोई आभूषण लाकर उपस्थित करती थी ॥११८॥


शयनीयविधौ काचित् सक्ता सन्मार्जने परा । पुष्पप्रकरणे काचित्काचिद्गन्धानुलेपने ॥११९॥

अर्थ: कोई शय्या बिछानेके कार्यमें लगी थी, कोई बुहा- रनेके कार्यमें तत्पर थी, कोई पुष्प बिखेरनेमें लीन थी और कोई सुगन्धित द्रव्यका लेप लगानेमें व्यस्त थी ॥११९॥


पानाशनविधौ काचित् काचिदाह्वानकर्मणि । एवं कर्तव्यतां तस्याः सर्वाः कुर्वन्ति देवताः ॥१२०॥

अर्थ: कोई भोजन-पानके कार्यमें व्यग्र थी और कोई बुलाने आदिके कार्यमें लीन थी। इस प्रकार समस्त देवियाँ उसका कार्य करती थीं ॥१२०॥


चिन्ताया अपि न क्लेशं प्रपेदे नृपवल्लभा । अन्यदा शयनीये स्वे सुप्ता सात्यन्तकोमले ॥१२१॥

पटांशुकपरिच्छन्ने प्रान्तयोः सोपधानके । तस्या मध्ये सुखं लब्धा स्वपुण्यपरिपाकतः ॥१२२॥

अर्थ: इस प्रकार नाभिराजकी प्रिय- वल्लभा मरुदेवीको किसी बातकी चिन्ताका क्लेश नहीं उठाना पड़ता था अर्थात् बिना चिन्ता किये ही समस्त कार्य सम्पन्न हो जाते थे । एक दिन वह चीनवस्त्रसे आच्छादित तथा जिसके दोनों ओर तकिया रखे हुए थे, ऐसी अत्यन्त कोमल शय्यापर सो रही थी और उसके बीच अपने पुण्यकर्मके उदयसे सुखका अनुभव कर रही थी ॥१२१-१२२॥


गृहीतामलशस्त्राभिर्देवीभिः पर्युपासिता । अद्राक्षीत् षोडश स्वप्नानिति श्रेयोविधायिनः ॥१२३॥

अर्थ: निर्मल शस्त्र लेकर देवियाँ उसकी सेवा कर रही थीं उसी समय उसने कल्याण करनेवाले निम्नलिखित सोलह स्वप्न देखे ॥१२३॥


करटच्युतदानाम्बुगन्धसंबद्धषट्पदम् । वारणं चन्द्रधवलं मन्द्रगर्जितकारणम् ॥१२४॥

अर्थ: पहले स्वप्नमें गण्डस्थलसे च्युत मदजलकी गन्धसे जिसपर भ्रमर लग रहे थे ऐसा तथा चन्द्रमाके समान सफेद और गम्भीर गर्जना करनेवाला हाथी देखा ॥१२४॥


वृषभं दुन्दुभिस्कन्धं दधतं ककुदं शुभम् । नदन्तं शरदम्भोदसंघाताकारधारिणम् ॥१२५॥

अर्थ: दूसरे स्वप्नमें ऐसा बैल देखा जिसका कि स्कन्ध दुन्दुभि नामक बाजेके समान था, जो शुभ कान्दीलको धारण कर रहा था, शब्द कर रहा था और शरदृऋतुके मेघ समूहके समान आकारको धारण करनेवाला था ॥१२५॥


शीतांशुकिरणश्वेतकेसरालीविराजितम् । शशिरेखासदृग्दंष्ट्राद्वन्द्वयुक्तं मृगाधिपम् ॥१२६॥

अर्थ: तीसरे स्वप्नमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान धवल सटाओंके समूहसे सुशोभित एवं चन्द्रमाकी रेखाके समान दोनों दाँड़ोंसे युक्त सिंहको देखा ॥१२६॥


सिच्यमानां श्रियं नागैः कुम्भैः सौवर्णराजितैः । उत्फुल्लपुण्डरीकस्य स्थितामुपरि निश्चलाम् ॥१२७॥

अर्थ: चौथे स्वप्नमें हाथी, सुवर्ण तथा चाँदीके कलशोंसे जिसका अभिषेक कर रहे थे, तथा जो फूले हुए कमलपर निश्चल बैठी हुई थो ऐसी लक्ष्मी देखी ॥१२७॥


पुन्नागमालतीकुन्दचम्पकादिप्रकल्पिते । नितान्तं दामनी दीर्घे सौरभाकृष्टषट्पदे ॥१२८॥

अर्थ: पाँचवें स्वप्नमें पुन्नाग, मालती, कुन्द तथा चम्पा आदिके फूलोंसे निर्मित और अपनी सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकृष्ट करनेवाली दो बहुत बड़ी मालाएँ देखीं ॥१२८॥


उदयाचलमूर्द्धस्थं प्रध्वस्ततिमिरोद्भवम् । विश्रब्धदर्शनं भानुं मुक्तं मेघाद्युपद्रवैः ॥१२९॥

अर्थ: छठवें स्वप्नमें उदयाचलके मस्तकपर स्थित, अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाला, एवं मेघ आदिके उपद्रवोंसे रहित, निर्भय दर्शनको देनेवाला सूर्य देखा ॥१२९॥


बन्धु कुमुदखण्डानां मण्डनं रात्रियोषितः । धवलीकृतसर्वाशं किरणैस्तारकापतिम् ॥१३०॥

अर्थ: सातवें स्वप्नमें ऐसा चन्द्रमा देखा कि जो कुमुदोंके समूहका बन्धु था - उन्हें विकसित करनेवाला था, रात्रिरूपी स्त्रीका मानो आभूषण था, किरणोंके द्वारा समस्त दिशाओंको सफ़ेद करनेवाला था और ताराओंका पति था ॥१३०॥


अन्योन्यप्रेमसंबन्धं प्रस्फुरद्विमले जले । विद्युद्दण्डसमाकारं मीनयोर्युगलं शुभम् ॥१३१॥

अर्थ: आठवें स्वप्नमें जो परस्परके प्रेमसे सम्बद्ध थे, निर्मल जलमें तैर रहे थे, बिजलीके दण्डके समान जिनका आकार था ऐसे मीनोंका शुभ जोड़ा देखा ॥१३१॥


हारोपशोभितग्रीवं पुष्पमालापरिष्कृतम् । मणिभिः कलशं पूर्णं पञ्चवर्णैः समुज्ज्वलम् ॥१३२॥

अर्थ: नौवें स्वप्नमें जिसकी ग्रीवा हारसे सुशोभित थी, जो फूलोंकी मालाओंसे सुसज्जित था और जो पंचवर्णके मणियोंसे भरा हुआ था, ऐसा उज्ज्वल कलश देखा ॥१३२॥


पद्मेन्दीवरसंछन्नं विमलाम्बुमहासरः । नानापक्षिगणाकीर्णं चारुसोपानमण्डितम् ॥१३३॥

अर्थ: दसवें स्वप्नमें कमलों और नील कमलोंसे आच्छादित, निर्मल जलसे युक्त, नाना पक्षियोंसे व्याप्त तथा सुन्दर सीढ़ियोंसे सुशोभित विशाल सरोवर देखा ॥१३३॥


चलन्मीनमहानक्रजनितोत्तुङ्गवीचिकम् । मेघपङ्क्तिसमासक्तं नमस्तुल्यं नदीपतिम् ॥१३४॥

अर्थ: ग्यारहवें स्वप्नमें, चलते हुए मीन और बड़े-बड़े नक्रोंसे जिनमें ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थीं, जो मेघोंसे युक्त था तथा आकाशके समान जान पड़ता था ऐसा सागर देखा ॥१३४॥


साटोपहरिभिर्युक्तं नानारत्नसमुज्ज्वलम् । चामीकरमयं चारु विष्टरं दूरमुन्नतम् ॥१३५॥

अर्थ: बारहवें स्वप्नमें बड़े-बड़े सिंहोंसे युक्त, अनेक प्रकारके रत्नोंसे उज्ज्वल, सुवर्णनिर्मित, बहुत ऊँचा सुन्दर सिंहासन देखा ॥१३५॥


सुमेरुशिखराकारं सुमानं रत्नराजितम् । विमानं बुद्बुदादर्शचामरादिविभूषणम् ॥१३६॥

अर्थ: तेरहवें स्वप्नमें ऐसा विमान देखा कि जिसका आकार सुमेरु पर्वतके शिखरके समान था, जिसका विस्तार बहुत था, जो रत्नोंसे सुशोभित था तथा गोले दर्पण और चमर आदिसे विभूषित था ॥१३६॥


कल्पद्रुमगृहाकारं भावनं बहुभूमिकम् । मुक्तादामकृतच्छायं रत्नांशुपटलावृतम् ॥१३७॥

अर्थ: चौदहवें स्वप्नमें ऐसा भवन देखा कि जिसका आकार कल्पवृक्षनिर्मित प्रासादके समान था, जिसके अनेक खण्ड थे, मोतियोंकी मालाओंसे जिसकी शोभा बढ़ रही थी और जो रत्नोंकी किरणोंके समूहसे आवृत था ॥१३७॥


पञ्चवर्णमहारत्नराशिमत्यन्तमुन्नतम् । अन्योऽन्यकिरणोद्योतजनितेन्द्रशरासनम् ॥१३८॥

अर्थ: पन्द्रहवें स्वप्नमें, परस्पर-की किरणोंके प्रकाशसे इन्द्रधनुषको उत्पन्न करनेवाली, अत्यन्त ऊँची पाँच प्रकारके रत्नोंकी राशि देखी ॥१३८॥


ज्वालाजटालमनलं धूमसंभववर्जितम् । प्रदक्षिणकृतावर्तमनिन्धनसमुद्भवम् ॥१३९॥

अर्थ: और सोलहवें स्वप्नमें ज्वालाओंसे व्याप्त, धूमसे रहित, दक्षिण दिशाकी ओर आवर्त ग्रहण करनेवाली एवं ईन्धनमें रहित अग्नि देखी ॥१३९॥


अनन्तरं च स्वप्नानां दर्शनाच्चारुदर्शना । सा प्रबोधं समायाता जयमङ्गलनिस्वनैः ॥१४०॥

अर्थ: स्वप्न देखनेके बाद ही सुन्दरांगी मरुदेवी वन्दीजनोंकी मंगलमय जय-जय ध्वनिसे जाग उठी ॥१४०॥


त्वद्वक्त्रकान्तिसंभूतत्रपयेव निशाकरः । एष संप्रति संजातः छायया परिवर्जितः ॥१४१॥

अर्थ: उस समय वन्दीजन कह रहे थे कि हे देवि ! यह चन्द्रमा तुम्हारे मुखकी कान्तिसे उत्पन्न हुई लज्जाके कारण ही इस समय छाया अर्थात् कान्तिसे रहित हो गया है ॥१४१॥


अयं भाति सहस्रांशुरुदयाचलमस्तके । कलशो मङ्गलार्थं च सिन्दूरेणेव गुण्ठितः ॥१४२॥

अर्थ: उदयाचलके शिखरपर यह सूर्य ऐसा जान पड़ता है मानो मंगलके लिए सिन्दूरसे अनुरंजित कलश ही हो ॥१४२॥


संप्रति त्वस्मितेनैव तिमिरं यास्यति क्षयम् । इतीव स्वस्य वैयर्थ्यात् प्रदीपाः पाण्डुतां गताः ॥१४३॥

अर्थ: इस समय तुम्हारी मुसकानसे ही अन्धकार नष्ट हो जायेगा इसलिए दीपक मानो अपने आपकी व्यर्थताका अनुभव करते हुए ही निष्प्रभ हो गये हैं ॥१४३॥


कुलमेतच्छकुन्तानां कलकोलाहलाकुलम् । मङ्गलं ते करोतीव निजनीडसुखस्थितम् ॥१४४॥

अर्थ: यह पक्षियोंका समूह अपने घोंसलोंमें सुखसे ठहरकर जो मनोहर कोलाहल कर रहा है सो ऐसा जान पड़ता है मानो तुम्हारा मंगल ही कर रहा है ॥१४४॥


अमी प्रभातवातेन जडमन्देन संगताः । निद्राशेषादिवेदानीं घूर्णन्ते गृहपादपाः ॥१४५॥

अर्थ: ये घरके वृक्ष प्रातःकालकी शीतल और मन्द वायुसे संगत होकर ऐसे जान पड़ते हैं मानो अवशिष्ट निद्राके कारण ही झूम रहे हैं ॥१४५॥


एषापि गृहवाप्यन्ते भानुबिम्बावलोकनात् । हृष्टाह्वयति जीवेशं चक्रवाकी कलस्वनम् ॥१४६॥

अर्थ: घरकी बावड़ीके समीप जो यह चकवी खड़ी है वह सूर्यका बिम्ब देखकर हर्षित होती हुई मधुर शब्दोंसे अपने प्राणवल्लभको बुला रही है ॥१४६॥


त्वद्गतिप्रेक्षणेनैते कृतोत्कण्ठा इवाधुना । कुर्वन्ति कूजितं हंसा निद्रानिर्वासकारणम् ॥१४७॥

अर्थ: ये हंस तुम्हारी सुन्दर चालको देखनेके लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं इसीलिए मानो इस समय निद्रा दूर करनेके लिए मनोहर शब्द कर रहे हैं ॥१४७॥


उल्लिख्यमानकंसोत्थनिःस्वनप्रतिमो महान् । अलं सारसचक्राणां क्रेङ्कारोऽयं विराजते ॥१४८॥

अर्थ: जिसकी तुलना उकेरे जानेवाले काँसेसे उत्पन्न शब्दके साथ ठीक बैठती है ऐसे यह सारस पक्षियोंका क्रेंकार शब्द अत्यधिक सुशोभित हो रहा है ॥१४८॥


निशान्त इत्ययं स्पष्टो जातो निर्मलचेष्टिते । देवि मुञ्चाधुना निद्रामिति वन्दिकृतस्तवा ॥१४९॥

अमुञ्चच्छयनीयं च समुद्भूततरङ्गकम् । सुमनोभिः समाकीर्णं साभ्रतारनभःसमम् ॥१५०॥

अर्थ: हे निर्मल चेष्टाकी धारक देवि ! अब स्पष्ट ही प्रातःकाल हो गया है इसलिए इस समय निद्राको छोड़ो । इस तरह वन्दीजन जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐसी मरुदेवीने, जिसपर चद्दरकी सिकुड़नसे मानो लहरें उठ रही थीं तथा जो फूलोंसे व्याप्त होनेके कारण मेघ और नक्षत्रोंसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी, ऐसी शय्या छोड़ दी ॥१४९-१५०॥


वासगेहाच्च निःक्रान्ता प्रत्यात्मकृतकर्मिका । ययौ नाभिसमीपं सा दिनश्रीरिव भास्करम् ॥१५१॥

अर्थ: निवासगृहसे निकलकर जिसने समस्त कार्य सम्पन्न किये थे ऐसी मरुदेवी नाभिराजके पास इस तरह पहुँची जिस तरह कि दिनकी लक्ष्मी सूर्यके पास पहुँचती है ॥१५१॥


भद्रासननिविष्टाय तस्मै खर्वासनस्थिता । कराभ्यां कुड्मलं कृत्वा क्रमात् स्वप्नान्न्यवेदयत् ॥१५२॥

अर्थ: वहाँ जाकर वह नीचे आसनपर बैठी और उत्तम सिंहासनपर आरूढ़ हृदयवल्लभके लिए हाथ जोड़कर क्रमसे स्वप्न निवेदित करने लगी ॥१५२॥


इति चिन्ताप्रमोदेन परायत्तीकृतः पतिः । जगाद त्वयि संभूतस्त्रैलोक्यस्य गुरुः शुभे ॥१५३॥

अर्थ: इस प्रकार रानीके स्वप्न सुनकर हर्षसे विवश हुए नाभिराजने कहा कि हे देवि ! तुम्हारे गर्भमें त्रिलोकीनाथने अवतार ग्रहण किया है ॥१५३॥


इत्युक्ता सा परं हर्षं जगाम कमलेक्षणा । मूर्तिरिन्दोरिवोदारा दधती कान्तिसंहतीः ॥१५४॥

अर्थ: नाभिराजके इतना कहते ही कमललोचना मरुदेवी परम हर्षको प्राप्त हुई और चन्द्रमाकी उत्कृष्ट मूर्तिके समान कान्तिके समूहको धारण करने लगी ॥१५४॥


संभविष्यति षण्मासाज्जिने शक्राज्ञयामुचत् । रत्नवृष्टिं धनाधीशो मासान्पञ्चदशादृतः ॥१५५॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के गर्भस्थ होनेमें जब छह माह बाकी थे तभीसे इन्द्रकी आज्ञानुसार कुबेरसे बड़े आदरके साथ रत्नवृष्टि करना प्रारम्भ कर दिया था ॥१५५॥


तस्मिन् गर्भस्थिते यस्माज्जाता वृष्टिर्हिरण्मयी । हिरण्यगर्भनाम्नासौ स्तुतस्तस्मात् सुरेश्वरैः ॥१५६॥

अर्थ: चूँकि भगवान्के गर्भस्थित रहते हुए यह पृथिवी सुवर्णमयी हो गयी थी इसलिए इन्द्रने ‘हिरण्यगर्भ’ इस नामसे उनकी स्तुति की थी ॥१५६॥


ज्ञानैर्जिनस्त्रिभिर्युक्तः कुक्षौ तस्याश्चचाल न । माभूत् संचलनादस्याः पीडेति कृतमानसः ॥१५७॥

अर्थ: भगवान्, गर्भमें भी मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानोंसे युक्त थे तथा हमारे हलन-चलनसे माताको कष्ट न हो इस अभिप्रायसे वे गर्भमें चल-विचल नहीं होते थे ॥१५७॥


यथा दर्पणसंक्रान्तछायामात्रेण पावकः । आधाता न विकारस्य तथा तस्या बभूव सः ॥१५८॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें अग्निकी छाया पड़नेसे कोई विकार नहीं होता है उसी प्रकार भगवान्के गर्भमें स्थित रहते हुए भी माता मरुदेवीके शरीरमें कुछ भी विकार नहीं हुआ था ॥१५८॥


निश्चक्राम ततो गर्भात् पूर्णे काले जिनोत्तमः । मलस्पर्शविनिर्मुक्तः स्फोटिकादिव सद्मतः ॥१५९॥

अर्थ: जब समय पूर्ण हो चुका तब भगवान् मलका स्पर्श किये बिना ही गर्भसे इस प्रकार बाहर निकले जिस प्रकार कि किसी स्फटिकमणि निर्मित घरसे बाहर निकले हों ॥१५९॥


ततो महोत्सवश्चक्रे नाभिना सुतजन्मनि । समानन्दितनिःशेषजनो युक्त्या यथोक्तया ॥१६०॥

अर्थ: तदनन्तर - नाभिराजने पुत्रजन्मका यथोक्त महोत्सव किया जिससे समस्त लोग हर्षित हो गये ॥१६०॥


त्रैलोक्यं शोभमायातमैन्द्रं कम्पितमासनम् । सुरासुराश्च संजाताः किंकिमेतदितिस्वनाः ॥१६१॥

अर्थ: तीन लोक क्षोभको प्राप्त हो गये, इन्द्रका आसन कम्पित हो गया और समस्त सुर तथा असुर ‘क्या है ?’ यह शब्द करने लगे ॥१६१॥


अनाध्मातस्ततः शङ्खो दध्वान भवनश्रिताम् । व्यन्तराधिपगेहेषु रराट पटहः स्वयम् ॥१६२॥

ज्योतिषां निलये जातमकस्मात् सिंहबृंहितम् । कल्पाधिपगृहे स्पष्टं घण्टारत्नं रराण च ॥१६३॥

अर्थ: उसी समय भवनवासी देवोंके भवनोंमें बिना बजाये ही शंख बजने लगे, व्यन्तरोंके भवनोंमें अपने आप ही भेरियोंके शब्द होने लगे, ज्योतिषी देवोंके घरमें अकस्मात् सिंहोंकी गर्जना होने लगी और कल्पवासी देवोंके घरोंमें अपने-अपने घण्टा शब्द करने लगे ॥१६२-१६३॥


एवंविधशुभोत्पातैर्ज्ञाततीर्थकरोद्भवाः । प्रचलद्भिः किरीटैश्च प्रयुक्तावधयस्ततः ॥१६४॥

अर्थ: इस प्रकारके शुभ उत्पातोंसे तथा मुकुटोंके नम्रीभूत होनेसे इन्द्रोंने अवधिज्ञानका उपयोग किया और उसके द्वारा उन्हें तीर्थंकरके जन्मका समाचार विदित हो गया ॥१६४॥


प्रातिष्ठन्त महोत्साहा इन्द्रा नामीयमालयम् । वारणेन्द्रसमारूढाः कृतमण्डनविग्रहाः ॥१६५॥

अर्थ: तदनन्तर जो बहुत भारी उत्साहसे भरे हुए थे तथा जिनके शरीर आभूषणोंसे जगमगा रहे थे ऐसे इन्द्रने गजराज - ऐरावत हाथीपर आरूढ़ होकर नाभिराजके घरकी ओर प्रस्थान किया ॥१६५॥


ततः कन्दर्पिणः केचित् सुरा नृत्यं प्रचक्रिरे । चक्रुरास्फोटनं केचिद् बलानां केचिदुन्नतम् ॥१६६॥

केचित् केसरिणो नादं मुमुचुर्व्याप्तविष्टपम् । विकुर्वन्ति बहून् वेषान् केचित् केचिज्जगुर्वरम् ॥१६७॥

अर्थ: उस समय कामसे युक्त कितने ही देव नृत्य कर रहे थे, कितने ही तालियाँ बजा रहे थे, कितने ही अपनी सेनाको उन्नत बना रहे थे, कितने ही समस्त लोकमें फैलनेवाला सिंहनाद कर रहे थे, कितने ही विक्रियासे अनेक वेष बना रहे थे, और कितने ही उत्कृष्ट गाना गा रहे थे ॥१६६-१६७॥


उत्पतद्भिः पतद्भिश्च ततो देवैरिदं जगत् । महारावसमापूर्णं स्थानभ्रंशमिवागतम् ॥१६८॥

अर्थ: उस समय बहुत भारी शब्दोंसे भरा हुआ यह संसार ऊपर जानेवाले और नीचे आनेवाले देवोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो स्वकीय स्थानसे भ्रष्ट ही हो गया हो ॥१६८॥


ततः साकेतनगरं धनदेन विनिर्मितम् । विजयार्द्धनगाकारप्राकारेण समावृतम् ॥१६९॥

अर्थ: तदनन्तर कुबेरने अयोध्या नगरीकी रचना की। वह अयोध्या नगरी विजयार्ध पर्वतके समान आकारवाले विशाल कोटसे घिरी हुई थी ॥१६९॥


पातालोदरगम्भीरपरिखाकृतवेष्टनम् । तुङ्गगोपुरकूटाग्रदूरनष्टान्तरिक्षकम् ॥१७०॥

अर्थ: पाताल तक गहरी परिखा उसे चारों ओरसे घेरे हुए थी और ऊँचे-ऊँचे गोपुरोंके शिखरोंके अग्रभागसे वहाँका आकाश दूर तक विदीर्ण हो रहा था ॥१७०॥


नानारत्नकरोद्योतपटप्रावृतसद्मकम् । इन्द्राः क्षणेन संप्रापुर्महाभूतिसमन्विताः ॥१७१॥

अर्थ: महाविभूतिसे युक्त इन्द्र क्षणभरमें नाभिराजके उस घर जा पहुँचे जो कि नाना रत्नोंकी किरणोंके प्रकाशरूपी वस्त्रसे आवृत था ॥१७१॥


पुरं प्रदक्षिणीकृत्य त्रिः शक्रः सहितोऽमरैः । प्रविष्टः प्रसवागारात् पौलोम्यानाययज्जिनम् ॥१७२॥

अर्थ: इन्द्रने पहले देवोंके साथ-साथ नगरकी तीन प्रदक्षिणाएँ दीं । फिर नाभिराजके घरमें प्रवेश किया और तदनन्तर इन्द्राणीके द्वारा प्रसूतिका-गृहसे जिन-बालकको बुलवाया ॥१७२॥


जिनमातुस्ततः कृत्वा मायाबालं प्रणामिनी । बालमानीय शक्रस्य शची चक्रे करद्वये ॥१७३॥

अर्थ: इन्द्राणीने प्रसूतिका-गृहमें जाकर पहले जिन-माताको नमस्कार किया । फिर माताके पास मायामयी बालक रखकर जिन-बालकको उठा लिया और बाहर लाकर इन्द्रके हाथोंमें सौंप दिया ॥१७३॥


रूपं पश्यन् जिनस्यासौ सहस्रनयनोऽपि सन् । तृप्तिमिन्द्रो न संप्राप त्रैलोक्यातिशयस्थितम् ॥१७४॥

अर्थ: यद्यपि इन्द्र हजार नेत्रोंका धारक था तथापि तीनों लोकोंमें अतिशय पूर्ण भगवान्का रूप देखकर वह तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ था ॥१७४॥


ततस्तमङ्कमारोप्य समारुह्य गजाधिपम् । गृहीतचामरच्छत्रो भक्त्या परमया स्वयम् ॥१७५॥

अर्थ: तदनन्तर - सौधर्मेन्द्र भगवान्को गोदमें बैठाकर ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुआ और श्रेष्ठ भक्तिसे सहित अन्य देवोंने चमर तथा छत्र आदि स्वयं ही ग्रहण किये ॥१७५॥


अवाप मेरुशिखरं सर्वैर्देवैः समन्वितः । वैडूर्यादिमहारत्नमरीचिनिचयोज्ज्वलम् ॥१७६॥

अर्थ: इस प्रकार इन्द्र समस्त देवोंके साथ चलकर वैडूर्य आदि महारत्नोंकी कान्तिके समूहसे उज्ज्वल सुमेरु पर्वतके शिखरपर पहुँचा ॥१७६॥


पाण्डुकम्बलसंज्ञायां शिलायां सिंहविष्टरे । ततो जिनः सुरेशेन स्थापितः पृष्ठवर्तिना ॥१७७॥

अर्थ: वहाँ पाण्डुकम्बल नामकी शिलापर जो अकृत्रिम सिंहासन स्थित है उसपर इन्द्रने जिन-बालकको विराजमान कर दिया और स्वयं उनके पीछे खड़ा हो गया ॥१७७॥


ततः समाहता भेर्यः क्षुब्धसागरनिःस्वना । मृदङ्गशङ्खशब्दाश्च साट्टहासाः कृताः सुरैः ॥१७८॥

अर्थ: उसी समय देवोंने क्षुभित समुद्रके समान शब्द करनेवाली भेरियाँ बजायीं, मृदंग और शंखके जोरदार शब्द किये ॥१७८॥


यक्षकिन्नरगन्धर्वाः सह तुम्बुरुनारदाः । विश्वावसुसमायुक्ताः कुर्वाणा मूर्च्छना वराः ॥१७९॥

गायन्ति सह पत्नीभिर्मनःश्रोत्रहरं तदा । वीणावादनमारब्धा कर्तुं लक्ष्मीश्च सादरा ॥१८०॥

अर्थ: यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद और विश्वावसु उत्कृष्ट मूर्च्छनाएँ करते हुए अपनी-अपनी पत्नियोंके साथ मन और कानोंको हरण करनेवाले सुन्दर गीत गाने लगे । लक्ष्मी भी बड़े आदरके साथ वीणा बजाने लगी ॥१७९-१८०॥


हावभावसमेताश्च नृत्यन्त्यप्सरसो वरम् । अङ्गहारं यथावस्तु कुर्वाणाः कृतभूषणाः ॥१८१॥

अर्थ: हाव-भावोंसे भरी एवं आभूषणोंसे सुशोभित अप्सराएँ यथायोग्य अंगहार करती हुई उत्कृष्ट नृत्य करने लगीं ॥१८१॥


एवं तत्र महातोद्ये जनितेऽमरसत्तमैः । अभिषेकाय देवेन्द्रो जग्राह कलशं शुभम् ॥१८२॥

अर्थ: इस प्रकार जब वहाँ उत्तमोत्तम देवोंके द्वारा गायन-वादन और नृत्य हो रहा था तब सौधर्मेन्द्रने अभिषेक करनेके लिए शुभ कलश हाथमें लिया ॥१८२॥


ततः क्षीरार्णवाम्भोभिः पूर्णैः कुम्भैर्महोदरैः । चामीकरमयैः पद्मच्छन्नवक्त्रैः सपल्लवैः ॥१८३॥

अभिषेकं जिनेन्द्रस्य चकार त्रिदशाधिपः । कृत्वा वैक्रियसामर्थ्यादात्मानं बहुविग्रहम् ॥१८४॥

अर्थ: तदनन्तर जो क्षीरसागरके जलसे भरे थे, जिनकी अवगाहना बहुत भारी थी, जो सुवर्ण निर्मित थे, जिनके मुख कमलोंसे आच्छादित थे तथा लाल-लाल पल्लव जिनकी शोभा बढ़ा रहे थे, ऐसे एक हजार आठ कलशोंके द्वारा इन्द्रने विक्रियाके प्रभावसे अपने अनेक रूप बनाकर जिन-बालकका अभिषेक किया ॥१८३-१८४॥


यमो वैश्रवणः सोमो वरुणोऽन्ये च नाकिनः । शेषशक्रादयः सर्वे चक्रुर्भक्त्याभिषेचनम् ॥१८५॥

अर्थ: यम, वैश्रवण, सोम, वरुण आदि अन्य देवोंने और साथ ही शेष बचे समस्त इन्द्रोंने भक्तिपूर्वक जिन-बालकका अभिषेक किया ॥१८५॥


इन्द्राणीप्रमुखा देव्यः सद्गन्धैरनुलेपनैः । चक्रुरुद्वर्तनं भक्त्या करैः पल्लवकोमलैः ॥१८६॥

अर्थ: इन्द्राणी आदि देवियोंने पल्लवोंके समान कोमल हाथोंके द्वारा समीचीन गन्धसे युक्त अनुलेपनसे भगवान्को उद्वर्तन किया ॥१८६॥


महीध्रमिव तं नाथं कुम्भैर्जलधरैरिव । अभिषिच्य समारब्धाः कर्तुमस्य विभूषणम् ॥१८७॥

अर्थ: जिस प्रकार मेघोंके द्वारा किसी पर्वतका अभिषेक होता है उसी प्रकार विशाल कलशोंके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक कर देव उन्हें आभूषण पहनानेके लिए तत्पर हुए ॥१८७॥


चन्द्रादित्यसमे तस्य कर्णयोः कुण्डले कृते । तत्क्षणं सुरनाथेन वज्रसूचीविभिन्नयोः ॥१८८॥

अर्थ: इन्द्रने तत्काल ही वज्रकी सूचीसे विभिन्न किये हुए उनके कानोंमें चन्द्रमा और सूर्यके समान कुण्डल पहनाये ॥१८८॥


पद्मरागमणिः शुद्धश्चूडायां विनिवेशितः । जटालमिव संपन्नं शिरो यस्य मरीचिभिः ॥१८९॥

अर्थ: चोटीके स्थानपर ऐसा निर्मल पद्मरागमणि पहनाया कि जिसकी किरणोंसे भगवान्‌का सिर जटाओंसे युक्तके समान जान पड़ने लगा ॥१८९॥


अर्द्धचन्द्राकृतिर्न्यस्ता चन्दनेन ललाटिका । बाहुमूले कृते जात्यहेमकेयूरमण्डिते ॥१९०॥

अर्थ: भालपर चन्दनके द्वारा अर्धचन्द्राकार ललाटिका बनायी । भुजाओंके मूलभाग उत्तम सुवर्णनिर्मित केयूरोंसे अलंकृत किये ॥१९०॥


नक्षत्रस्थूलमुक्ताभिः कल्पितेन मयूखिना । हारेण भूषितं वक्षः श्रीवत्सकृतभूषणम् ॥१९१॥

अर्थ: श्रीवत्स चिह्नसे सुशोभित वक्षःस्थलको नक्षत्रोंके समान स्थूल मुक्ताफलोंसे निर्मित एवं किरणोंसे प्रकाशमान हारसे अलंकृत किया ॥१९१॥


हरिन्मणिसरोजश्रीरत्नस्थूलमरीचिभिः । संजातपल्लवेनेव प्रालम्बेन विराजितः ॥१९२॥

अर्थ: हरितमणि और पद्मराग मणियोंकी बड़ी मोटी किरणोंसे जिसमें मानो पल्लव ही निकल रहे थे ऐसी बड़ी मालासे उन्हें अलंकृत किया था ॥१९२॥


लक्षणाभरणश्रेष्ठौ प्रकोष्ठौ दधतुः श्रियम् । मणिबन्धनचारुभ्यां कटकाभ्यां सुसंहती ॥१९३॥

अर्थ: लक्षणरूपी आभरणोंसे श्रेष्ठ उनकी दोनों भरी कलाइयाँ रत्नखचित सुन्दर कड़ोंसे बहुत भारी शोभाको धारण कर रही थीं ॥१९३॥


पट्टांशुकोपरिन्यस्तकटिसूत्रेण राजितम् । नितम्बफलकं संध्यादाम्नेवावनिभृत्तटम् ॥१९४॥

अर्थ: रेशमी वस्त्रके ऊपर पहनायी हुई करधनीसे सुशोभित उनका नितम्बस्थल ऐसा जान पड़ता था मानो सन्ध्याकी लाल-लाल रेखासे सुशोभित किसी पर्वत-का तट ही हो ॥१९४॥


सर्वाङ्गुलीषु विन्यस्तं मुद्रिकाभूषणं वरम् । नानारत्नपरिष्वक्तचामीकरविनिर्मितम् ॥१९५॥

अर्थ: उनकी समस्त अंगुलियोंमें नाना रत्नोंसे खचित सुवर्णमय अँगूठियाँ पहनायी गयी थीं ॥१९५॥


भक्त्या कृतमिदं देवैः सर्वमण्डनयोजनम् । त्रैलोक्यमण्डनस्यास्य कुतोऽन्यन्मण्डनं परम् ॥१९६॥

अर्थ: देवोंने भगवान्‌के लिए जो सब प्रकारके आभूषण पहनाये थे वे भक्तिवश ही पहनाये थे वैसे भगवान् स्वयं तीन लोकके आभरण थे अन्य पदार्थ उनकी क्या शोभा बढ़ाते ? ॥१९६॥


चन्दनेन समालभ्य रोचनाः स्थासकाः कृताः । रेजुस्ते स्फटिकक्षोण्यां कनकाम्बुद्रमा इव ॥१९७॥

अर्थ: उनके शरीरपर चन्दनका लेप लगाकर जो रोचनके पीले-पीले बिन्दु रखे गये थे, वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो स्फटिककी भूमिपर सुवर्ण कमल ही रखे गये हों ॥१९७॥


उत्तरीयं च विन्यस्तमंशुकं कृतपुष्पकम् । अत्यन्तनिर्मलं रेजे सतारमिव तन्नभः ॥१९८॥

अर्थ: जिसपर कसीदासे अनेक फूल बनाये गये थे ऐसा उत्तरीय वस्त्र उनके शरीरपर पहनाया गया था और वह ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंसे सुशोभित निर्मल आकाश ही हो ॥१९८॥


पारिजातकसंतानकुसुमैः परिकल्पितम् । षट्पदालीपरिष्वक्तं पिनद्धं स्थूलशेखरम् ॥१९९॥

अर्थ: पारिजात और सन्तानक नामक कल्पवृक्षोंके फूलोंसे जिसकी रचना हुई थी, तथा जिसपर भ्रमरोंके समूह लग रहे थे ऐसा बड़ा सेहरा उनके सिरपर बाँधा गया था ॥१९९॥


तिलकेन भ्रुवोर्मध्यं सद्गन्धेन विभूषितम् । तिलकत्वं त्रिलोकस्य बिभ्रतश्चारुचेष्टितैः ॥२००॥

अर्थ: चूँकि सुन्दर चेष्टाओंको धारण करने-वाले भगवान् तीन लोकके तिलक थे इसलिए उनकी दोनों भौंहोंका मध्यभाग सुगन्धित तिलकसे अलंकृत किया गया था ॥२००॥


ततस्तं भूषितं सन्तं त्रिलोकस्य विभूषणम् । तुष्टास्तुष्टुवुरित्थं ते देवाः शक्रपुरस्सराः ॥२०१॥

अर्थ: इस प्रकार तीन लोकके आभरणस्वरूप भगवान् जब नाना अलंकारों से अलंकृत हो गये तब इन्द्र आदि देव उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥२०१॥


नष्टधर्मे जगत्यस्मिन्नज्ञानतमसावृते । भ्राम्यतां भव्यसत्त्वानामुदितस्त्वं दिवाकरः ॥२०२॥

अर्थ: हे भगवन् ! धर्मरहित तथा अज्ञानरूपी अन्धकारसे आच्छादित इस संसारमें भ्रमण करनेवाले लोगोंके लिए आप सूर्यके समान उदित हुए हो ॥२०२॥


किरणैर्जिनचन्द्रस्य विमलैस्तव वाङ्मयैः । प्रबोधं यास्यतीदानीं भव्यसत्त्वकुमुद्वती ॥२०३॥

अर्थ: हे जिनराज ! आप चन्द्रमाके समान हो सो आपके उपदेशरूपी निर्मल किरणोंके द्वारा अब भव्य जीवरूपी कुमुदिनी अवश्य ही विकासको प्राप्त होगी ॥२०३॥


भव्यानां सत्त्वदृष्टयर्थं केवलानलसंभवः । ज्वलितस्त्वं प्रदीपोऽसि स्वयमेव जगद्गृहे ॥२०४॥

अर्थ: हे नाथ ! आप इस संसाररूपी घरमें ‘भव्य जीवोंको जीव-अजीव आदि तत्त्वोंका ठीक-ठीक दर्शन हो’ इस उद्देश्यसे स्वयं ही जलते हुए वह महान् दीपक हो कि जिसकी उत्पत्ति केवलज्ञानरूपी अग्निसे होती है ॥२०४॥


पापशत्रुनिघाताय जातस्त्वं शितसायकः । कर्ता भवाटवीदाहं त्वमेव ध्यानवह्निना ॥२०५॥

अर्थ: पापरूपी शत्रुओंको नष्ट करनेके लिए आप तीक्ष्ण बाण हैं । तथा आप ही ध्यानरूपी अग्निके द्वारा संसाररूपी अटवीका दाह करेंगे ॥२०५॥


दुष्टेन्द्रियमहानागदमनाय त्वमुद्गतः । वैनतेयो महावायुः संदेहघनसंपदाम् ॥२०६॥

अर्थ: हे प्रभो ! आप दुष्ट इन्द्रियरूप नागोंका दमन करनेके लिए गरुड़के समान उदित हुए हो, तथा आप ही सन्देहरूपी मेघोंको उड़ानेके लिए प्रचण्ड वायुके समान हो ॥२०६॥


धर्माम्बुबिन्दुसंप्राप्तितृषिता भव्यचातकाः । उन्मुखास्त्वामुदीक्षन्ते नाथामृतमहाघनम् ॥२०७॥

अर्थ: हे नाथ ! आप अमृत प्रदान करनेके लिए महामेघ हो इसलिए धर्मरूपी जलकी बूँदोंकी प्राप्तिके लिए तृषातुर भव्य जीवरूपी चातक ऊपरकी ओर मुख कर आपको देख रहे हैं ॥२०७॥


नमस्ते त्रिजगद्गीतनितान्तामलकीर्तये । नमस्ते गुणपुष्पाय तरवे कामदायिने ॥२०८॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! आपकी अत्यन्त निर्मल कीर्ति तीनों लोकोंके द्वारा गायी जाती है इसलिए आपको नमस्कार हो । हे नाथ ! आप गुणरूपी फूलोंसे सुशोभित तथा मनोवांछित फल प्रदान करनेवाले वृक्षस्वरूप हैं अतः आपको नमस्कार हो ॥२०८॥


कर्मकाष्ठकुठाराय तीक्ष्णधाराय ते नमः । नमस्ते मोहतुङ्गाद्रिभङ्गवज्रात्मने सदा ॥२०९॥

अर्थ: आप कर्मरूपी काष्ठको विदारण करनेके लिए तीक्ष्ण धारवाली कुठारके समान हैं अतः आपको नमस्कार हो । इसी प्रकार आप मोहरूपी उन्नत पर्वतको भेदनेके लिए वज्रस्वरूप हो इसलिए आपको नमस्कार हो ॥२०९॥


विध्मापकाय दुःखाग्नेर्नमस्ते सलिलात्मने । रजःसङ्गविहीनाय नमस्ते गगनात्मने ॥२१०॥

अर्थ: आप दुःखरूपी अग्निको बुझानेके लिए जलस्वरूप रजके संगमसे रहित आकाशस्वरूप हो अतः आपको नमस्कार हो ॥२१०॥


इति स्तुत्वा विधानेन प्रणम्य च पुनः पुनः । तमारोप्य गजं जग्मुरयोध्याभिमुखाः सुराः ॥२११॥

अर्थ: इस तरह देवोंने विधि-पूर्वक भगवान्की स्तुति की, बार-बार प्रणाम किया और तदनन्तर उन्हें ऐरावत हाथीपर सवार कर अयोध्याकी ओर प्रयाण किया ॥२११॥


मातुरङ्के ततः कृत्वा शक्रः शच्या जिनार्भकम् । विधाय परमानन्दं स्वस्थानं ससुरोऽगमत् ॥२१२॥

अर्थ: अयोध्या आकर इन्द्रने जिन-बालकको इन्द्राणीके हाथसे माताकी गोदमें विराजमान करा दिया, आनन्द नामका उत्कृष्ट नाटक किया और तदनन्तर वह अन्य देवोंके साथ अपने स्थानपर चला गया ॥२१२॥


ततस्तमम्बरैर्दिव्यैरलङ्कारैश्च भूषितम् । दिग्धं च परमामोदघ्राणहार्यानुलेपनैः ॥२१३॥

तुष्टा संवीक्ष्य तनयमङ्कस्थं जननी तदा । निजच्छायापरिष्वङ्गपिञ्जरीकृतदिङ्मुखम् ॥२१४॥

अर्थ: अथानन्तर दिव्य वस्त्रों और अलंकारोंसे अलंकृत, तथा उत्कृष्ट सुगन्धिके कारण नासिकाको हरण करनेवाले विलेपनसे लिप्त एवं अपनी कान्तिके सम्पर्कसे दिशाओंके अग्रभागको पीला करनेवाले अंकस्थ पुत्रको देखकर उस समय माता मरुदेवी बहुत ही सन्तुष्ट हो रही थी ॥२१३-२१४॥


आलिङ्गन्ती मृदुस्पर्शं कौतुकव्याप्तमानसा । दुराख्यानपरावस्थमवतीर्णा सुखार्णवम् ॥२१५॥

अर्थ: जिसका हृदय कौतुकसे भर रहा था ऐसी मरुदेवी कोमल स्पर्शवाले पुत्रका आलिंगन करती हुई वर्णनातीत सुखरूपी सागरमें जा उतरी थी ॥२१५॥


अङ्कप्राप्तेन सा तेन रराज प्रमदोत्तमा । नवोदितेन पूर्वाशा बिम्बेन सवितुर्यथा ॥२१६॥

अर्थ: वह उत्तम नारी मरुदेवी गोदमें स्थित जिन-बालकसे इस प्रकार सुशोभित हो रही थी जिस प्रकार कि नवीन उदित सूर्यके बिम्बसे पूर्व दिशा सुशोभित होती है ॥२१६॥


नाभिश्च तत्सुतं दृष्ट्वा दिव्यालङ्कारधारिणम् । त्रैलोक्यैश्वर्यसंयुक्तं मेने स्वं परमद्युतिम् ॥२१७॥

अर्थ: नाभिराजने दिव्य अलंकारोंको धारण करनेवाले एवं उत्कृष्ट कान्तिसे युक्त उस पुत्रको देखकर अपने आपको तीन लोकके ऐश्वर्यसे युक्त माना था ॥२१७॥


सुतगात्रसमासंगसंजातसुखसंपदः । मीलिताक्षत्रिभागस्य मनोऽस्य द्रवतां गतम् ॥२१८॥

अर्थ: पुत्रके शरीरके सम्बन्धसे जिन्हें सुखरूप सम्पदा उत्पन्न हुई है तथा उस सुखका आस्वाद करते समय जिनके नेत्रका तृतीय भाग निमीलित हो रहा है ऐसा नाभिराजका मन उस पुत्रको देखकर द्रवीभूत हो गया था ॥२१८॥


सुरेन्द्रपूजया प्राप्तः प्रधानत्वं जिनो यतः । ततस्तमृषभाभिख्यां निन्यतुः पितरौ सुतम् ॥२१९॥

अर्थ: चूँकि वे जिनेन्द्र इन्द्रके द्वारा की हुई पूजासे प्रधानताको प्राप्त हुए थे इसलिए माता-पिताने उनका ‘ऋषभ’ यह नाम रखा ॥२१९॥


तयोरन्योन्यसंबद्धं प्रेम यद् वृद्धिमागतम् । तज्जातमधुना बाले पूर्ववच्च तयोरपि ॥२२०॥

अर्थ: माता-पिताका जो परस्पर सम्बन्धी प्रेम वृद्धिको प्राप्त हुआ था वह उस समय बालक ऋषभदेवमें केन्द्रित हो गया था ॥२२०॥


कराङ्गुष्ठे ततो न्यस्तममृतं वज्रपाणिना । पिबन् क्रमेण संप्राप देहस्योपचयं जिनः ॥२२१॥

अर्थ: इन्द्रने भगवान्के हाथके अँगूठेमें जो अमृत निक्षिप्त किया था उसका पान करते हुए वे क्रमशः शरीर सम्बन्धी वृद्धिको प्राप्त हुए थे ॥२२१॥


ततः कुमारकैर्युक्तो वयस्यैरिन्द्रनोदितैः । अनवद्यां चकारासौ क्रीडां पित्रोः सुखावहाम् ॥२२२॥

अर्थ: तदनन्तर, इन्द्रके द्वारा अनुमोदित समान अवस्थावाले देव-कुमारोंसे युक्त होकर भगवान् माता-पिताको सुख पहुँचानेवाली निर्दोष क्रीड़ा करने लगे ॥२२२॥


आसनं शयनं यानं भोजनं वसनानि च । चारणादिकमन्यच्च सकलं तस्य शक्रजम् ॥२२३॥

अर्थ: आसन, शयन, वाहन, भोजन, वस्त्र तथा चारण आदिक जितना भी उनका परिकर था वह सब उन्हें इन्द्रसे प्राप्त होता था ॥२२३॥


कनीयसैव कालेन परां वृद्धिमवाप सः । मेरुभित्तिसमाकारं बिभ्रद्वक्षः समुन्नतम् ॥२२४॥

अर्थ: वे थोड़े ही समयमें परम वृद्धिको प्राप्त हो गये। उनका वक्षःस्थल मेरु पर्वतकी भित्तिके समान चौड़ा और उन्नत हो गया ॥२२४॥


आशास्तम्बेरमालानस्तम्भसंस्थानतां गतौ । बाहू तस्य समस्तस्य जगतः कल्पपादपौ ॥२२५॥

अर्थ: समस्त संसारके लिए कल्पवृक्षके समान जो उनकी भुजाएँ थीं, वे आशा-रूपी दिग्गजोंको बाँधनेके लिए खम्भोंका आकार धारण कर रही थीं ॥२२५॥


ऊरुदण्डद्वयं दध्रे स्वकान्तिकृतचर्चनम् । त्रैलोक्यगृहधृत्यर्थं स्तम्भद्वयसमुच्छ्रितम् ॥२२६॥

अर्थ: उनके दोनों ऊरु-दण्ड अपनी निजकी कान्तिके द्वारा किये हुए लेपनको धारण कर रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो तीन लोकरूपी घरको धारण करनेके लिए दो खम्भे हो खड़े किये गये हों ॥२२६॥


द्वयं बभार तद्वक्त्रमन्योन्यस्य विरोधकम् । कान्त्या जितनिशानाथं दीप्त्या च जितभास्करम् ॥२२७॥

अर्थ: उनके मुखने कान्तिसे चन्द्रमाको जीत लिया था और तेजने सूर्यको परास्त कर दिया था इस तरह वह परस्परके विरोधी दो पदार्थों - चन्द्रमा और सूर्यको धारण कर रहा था ॥२२७॥


करौ तस्यारुणच्छायौ पल्लवादपि कोमलौ । धूलीकारे समस्तानां भूभृतामथ च क्षमौ ॥२२८॥

अर्थ: यद्यपि लाल-लाल कान्तिके धारक उनके दोनों हाथ पल्लवसे भी अधिक कोमल थे तथापि वे समस्त पर्वतोंको चूर्ण करनेमें ( पक्षमें समस्त राजाओंका पराजय करनेमें ) समर्थ थे ॥२२८॥


निविडः केशसंघातः स्निग्धोऽत्यन्तं बभूव च । नीलाञ्जनशिलाकारो मूर्ध्नि हेमगिरेरिव ॥२२९॥

अर्थ: उनके केशोंका समूह अत्यन्त सघन तथा सचिक्कण था और ऐसा जान पड़ता था मानो मेरु पर्वतके शिखरपर नीलांजनकी शिला ही रखी हो ॥२२९॥


धर्मात्मनापि लोकस्य तेन सर्वस्य लोचने । उपमानमतीतेन हृते रूपेण शंभुना ॥२३०॥

अर्थ: यद्यपि वे भगवान् धर्मात्मा थे - हरण आदिको अधर्म मानते थे तथापि उन्होंने अपने अनुपम रूपसे समस्त लोगोंके नेत्र हरण कर लिये थे । भावार्थ - भगवान्का रूप सर्वजननयनाभिराम था ॥२३०॥


तस्मिन् काले प्रणष्टेषु कल्पवृक्षेष्वशेषतः । अकृष्टपच्यसस्येन मही सर्वा विराजते ॥२३१॥

अर्थ: उस समय कल्पवृक्ष पूर्णरूपसे नष्ट हो चुके थे इसलिए समस्त पृथिवी अकृष्टपच्य अर्थात् बिना जोते, बिना बोये ही अपने आप उत्पन्न होनेवाली धान्यसे सुशोभित हो रही थी ॥२३१॥


वाणिज्यव्यवहारेण शिल्पैश्च रहिताः प्रजाः । अभावाद् धर्मसंज्ञायाः पाखण्डैश्च विवर्जिताः ॥२३२॥

अर्थ: उस समयकी प्रजा वाणिज्य - लेन-देनका व्यवहार तथा शिल्पसे रहित थी और धर्मका तो नाम भी नहीं था इसलिए पाखण्डसे भी रहित थी ॥२३२॥


आसीदिक्षुरसस्तासामाहारः षड्रसान्वितः । स्वयं छिन्नच्युतः कान्तिवीर्यादिकरणक्षमः ॥२३३॥

अर्थ: जो छह रसोंसे सहित था, स्वयं ही कटकर शाखासे झड़ने लगता था और बल-वीर्य आदिके करनेमें समर्थ था ऐसा इक्षुरस ही उस समयकी प्रजाका आहार था ॥२३३॥


सोऽपि कालानुभावेन स्वयं गलति नो यदा । यन्त्रनिष्पीडनज्ञश्च न लोकोऽनुपदेशतः ॥२३४॥

अर्थ: पहले तो वह इक्षुरस अपने आप निकलता था पर कालके प्रभावसे अब उसका स्वयं निकलना बन्द हो गया और लोग बिना कुछ बताये यन्त्रोंके द्वारा ईखको पेलनेकी विधि जानते नहीं थे ॥२३४॥


पश्यन्त्योऽपि तदा सस्यं तत्संस्कारविधौ जडाः । क्षुधासंतापिताः सत्यः प्रजा व्याकुलतां गताः ॥२३५॥

अर्थ: इसी प्रकार सामने खड़ी हुई धानको लोग देख रहे थे पर उसके संस्कारकी विधि नहीं जानते थे इसलिए भूखसे पीड़ित होकर अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥२३५॥


ततः शरणमीयुस्ता नाभिं संघातमागताः । ऊचुश्चेति वचः स्तुत्वा प्रणम्य च महार्तयः ॥२३६॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत भारी पीड़ासे युक्त वे लोग इकट्ठे होकर नाभिराजकी शरणमें पहुँचे और स्तुति तथा प्रणाम कर निम्नलिखित वचन कहने लगे ॥२३६॥


नाथ याताः समस्तास्ते प्रक्षयं कल्पपादपाः । क्षुधा संतापितानस्मांस्त्रायस्व शरणागतान् ॥२३७॥

अर्थ: हे नाथ ! जिनसे हमारा भरण-पोषण होता था वे कल्पवृक्ष अब सबके सब नष्ट हो गये हैं इसलिए भूखसे सन्तप्त होकर आपकी शरणमें आये हुए हम सब लोगोंकी आप रक्षा कीजिए ॥२३७॥


भूमिजं फलसंपन्नं किमप्येतच्च दृश्यते । विधिमस्य न जानीमः संस्कारे भक्षणोचितम् ॥२३८॥

अर्थ: पृथिवीपर उत्पन्न हुई यह कोई वस्तु फलोंसे युक्त दिखाई दे रही है, यह वस्तु संस्कार किये जानेपर खानेके योग्य हो सकती है पर हम लोग इसकी विधि नहीं जानते हैं ॥२३८॥


स्वच्छन्दचारिणामेतद्गोकुलानां स्तनान्तरात् । क्षरद्भक्ष्यमभक्ष्यं किं कथं चेति वद प्रभो ॥२३९॥

अर्थ: स्वच्छन्द विचरनेवाली गायोंके स्तनोंके भीतरसे यह कुछ पदार्थ निकल रहा है सो वह भक्ष्य है या अभक्ष्य है ? हे स्वामिन् ! यह बतलाइए ॥२३९॥


व्याघ्रसिंहादयः पूर्वं क्रीडास्वालिङ्गनोचिताः । अधुना त्रासयन्त्येते प्रजाः कलहतत्पराः ॥२४०॥

अर्थ: ये सिंह, व्याघ्र आदि जन्तु पहले क्रीड़ाओंके समय आलिंगन करने योग्य होते थे पर अब ये कलहमें तत्पर होकर प्रजाको भयभीत करने लगे हैं ॥२४०॥


मनोहराणि दिव्यानि स्थलानि जलजानि च । दृश्यन्ते न तु जानीमः सुखमेभिर्यथा भवेत् ॥२४१॥

अर्थ: और ये आकाश, स्थल तथा जलमें उत्पन्न हुए कितने ही महामनोहर पदार्थ दिख रहे हैं सो इनसे हमें सुख किस तरह होगा यह हम नहीं जानते हैं ॥२४१॥


अतः संस्करणोपायमेतेषां वद देव नः । यतः सुखेन जीवामस्त्वत्प्रसादेन रक्षिताः ॥२४२॥

अर्थ: इसलिए हे देव ! हम लोगोंको इनके संस्कार करनेका उपाय बतलाइए जिससे कि प्रसादसे सुरक्षित होकर हम लोग सुखसे जीवित रह सकें ॥२४२॥


एवमुक्तः प्रजाभिः स नाभिः कारुण्यसंगतः । जगाद वचनं धीरो वृत्तेर्दर्शनकारणम् ॥२४३॥

अर्थ: प्रजाके ऐसा कहनेपर नाभिराजाका हृदय दयासे भर गया और वे आजीविकाके उपाय दिखलानेके लिए धीरताके साथ निम्न प्रकार वचन कहने लगे ॥२४३॥


उत्पत्तिसमये यस्य रत्नवृष्टिरभूच्चिरम् । आगमश्च सुरेन्द्राणां लोकक्षोभनकारणम् ॥२४४॥

अर्थ: जिनकी उत्पत्तिके समय चिरकाल तक रत्न-वृष्टि हुई थी और लोकमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला देवोंका आगमन हुआ था ॥२४४॥


महातिशयसंपन्नं तमुपेत्य समं वयम् । ऋषभं परिपृच्छामः कारणं जीवनप्रदम् ॥२४५॥

अर्थ: महान् अतिशयोंसे सम्पन्न ऋषभदेवके पास चलकर हम लोग उनसे आजीविकाके कारण पूछें ॥२४५॥


तस्य देवस्य लोकेऽस्मिन् सदृशो नास्ति मानवः । सर्वेषां तमसामन्ते तस्यात्मा संप्रतिष्ठितः ॥२४६॥

अर्थ: इस संसारमें उनके समान कोई मनुष्य नहीं है। उनकी आत्मा सर्व प्रकारके अज्ञानरूपी अन्धकारोंसे परे है ॥२४६॥


इत्युक्तास्तेन ताः साकं नाभेयस्यान्तिकं गताः । दृष्ट्वा च पितरं देवो विधिं चक्रे यथोचितम् ॥२४७॥

अर्थ: नाभिराजाने जब प्रजासे उक्त वचन कहे तो वह उन्हींको साथ लेकर ऋषभनाथ भगवान्के पास गयी। भगवान्ने पिताको देखकर उनका यथायोग्य सत्कार किया ॥२४७॥


उपविष्टस्ततो नाभिर्नाभेयश्च यथासनम् । अथैनं स्तोतुमारब्धाः प्रजाः प्रणतिपूर्वकम् ॥२४८॥

अर्थ: तदनन्तर नाभिराजा और भगवान् ऋषभदेव जब अपने-अपने योग्य आसनोंपर आरूढ़ हो गये तब प्रजाके लोग नमस्कार कर भगवान्की इस प्रकार स्तुति करनेके लिए तत्पर हुए ॥२४८॥


लोकं सर्वमतिक्रम्य तेजसा ज्वलितं वपुः । सर्वलक्षणसंपूर्णं तवैतन्नाथ शोभते ॥२४९॥

अर्थ: हे नाथ ! समस्त लक्षणोंसे भरा हुआ आपका यह शरीर तेजके द्वारा समस्त जगत्को आक्रान्त कर देदीप्यमान हो रहा है ॥२४९॥


गुणैस्तव जगत्सर्वं व्याप्तमत्यन्तनिर्मलैः । प्रह्लादकरणोद्युक्तैः शशाङ्ककिरणैरिव ॥२५०॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समान आनन्द उत्पन्न करनेवाले आपके अत्यन्त निर्मल गुणोंसे समस्त संसार व्याप्त हो रहा है ॥२५०॥


वयं प्रभुं समायाताः पितरं तव कार्यिणः । गुणान् ज्ञानसमुद्भूतान् स चैष तव भाषते ॥२५१॥

अर्थ: हम लोग कार्य लेकर आपके पिताके पास आये थे परन्तु ये ज्ञानसे उत्पन्न हुए आपके गुणोंका बखान करते हैं ॥२५१॥


स त्वं कोऽपि महासत्त्वो महात्मातिशयान्वितः । एवंविधोऽपि यं गत्वा निश्चयार्थं निषेवते ॥२५२॥

अर्थ: जबकि ऐसे विद्वान् महाराज नाभिराज भी आपके पास आकर पदार्थोंका निश्चय कर देते हैं तब यह बात स्पष्ट हो जाती है कि आप अतिशयों-से सुशोभित, धैर्यको धारण करनेवाले कोई अनुपम महात्मा हैं ॥२५२॥


स त्वमेवंविधो भूत्वा रक्ष नः क्षुत्प्रपीडितान् । उपायस्योपदेशेन सिंहादिभयतस्तथा ॥२५३॥

अर्थ: इसलिए आप, भूखसे पीड़ित हुए हम लोगोंकी रक्षा कीजिए तथा सिंह आदि दुष्ट जन्तुओंसे जो भय हो रहा है उसका भी उपाय बतलाइए ॥२५३॥


ततः कृपासमासक्तहृदयो नाभिनन्दनः । शशास चरणप्राप्ता बद्धाञ्जलिपुटाः प्रजाः ॥२५४॥

अर्थ: तदनन्तर - जिनका हृदय दयासे युक्त था ऐसे भगवान् वृषभदेव हाथ जोड़कर चरणोंमें पड़ी हुई प्रजाको उपदेश देने लगे ॥२५४॥


शिल्पानां शतमुद्दिष्टं नगराणां च कल्पनम् । ग्रामादिसन्निवेशाश्च तथा वेश्मादिकारणम् ॥२५५॥

अर्थ: उन्होंने प्रजाको सैकड़ों प्रकारकी शिल्पकलाओंका उपदेश दिया। नगरोंका विभाग, ग्राम आदिका बसाना, और मकान आदिके बनानेकी कला प्रजाको सिखायी ॥२५५॥


क्षतत्राणे नियुक्ता ये तेन नाथेन मानवाः । क्षत्रिया इति ते लोके प्रसिद्धिं गुणतो गताः ॥२५६॥

अर्थ: भगवान्ने जिन पुरुषोंको विपत्तिग्रस्त मनुष्योंकी रक्षा करनेमें नियुक्त किया था वे अपने गुणोंके कारण लोकमें ‘क्षत्रिय’ इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए ॥२५६॥


वाणिज्यकृषिगोरक्षाप्रभृतौ ये निवेशिताः । व्यापारे वैश्यशब्देन ते लोके परिकीर्तिताः ॥२५७॥

अर्थ: वाणिज्य, खेती, गोरक्षा आदिके व्यापारमें जो लगाये गये थे वे लोकमें वैश्य कहलाये ॥२५७॥


ये तु श्रुताद् द्रुतिं प्राप्ता नीचकर्मविधायिनः । शूद्रसंज्ञामवापुस्ते भेदैः प्रेष्यादिभिस्तथा ॥२५८॥

अर्थ: जो नीच कार्य करते थे तथा शास्त्रसे दूर भागते थे उन्हें शूद्र संज्ञा प्राप्त हुई। इनके प्रेष्य दास आदि अनेक भेद थे ॥२५८॥


युगं तेन कृतं यस्मादित्थमेतत्सुखावहम् । तस्मात्कृतयुगं प्रोक्तं प्रजाभिः प्राप्तसंपदम् ॥२५९॥

अर्थ: इस प्रकार सुखको प्राप्त करानेवाला वह युग भगवान् ऋषभदेवके द्वारा किया गया था तथा उसमें सब प्रकारकी सम्पदाएँ सुलभ थीं इसलिए प्रजा उसे कृतयुग कहने लगी थी ॥२५९॥


नाभेयस्य सुनन्दाऽभून्नन्दा च वनिताद्वयम् । भरतादय उत्पन्नास्तयोः पुत्रा महौजसः ॥२६०॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवके सुनन्दा और नन्दा नामकी दो स्त्रियाँ थीं। उनसे उनके भरत आदि महाप्रतापी पुत्र उत्पन्न हुए थे ॥२६०॥


शतेन तस्य पुत्राणां गुणसंबन्धचारुणा । अभूदलंकृता क्षोणी नित्यप्राप्तसमुत्सवा ॥२६१॥

अर्थ: भरत आदि सौ भाई थे तथा गुणोंके सम्बन्धसे अत्यन्त सुन्दर थे इसलिए यह पृथ्वी उनसे अलंकृत हुई थी तथा निरन्तर ही अनेक उत्सव प्राप्त करती रहती थी ॥२६१॥


तस्यानुपममैश्वर्यं भुञ्जानस्य जगद्गुरोः । प्रयातः सुमहान् कालो नाभेयस्यामितत्विषः ॥२६२॥

अर्थ: अपरिमित कान्तिको धारण करनेवाले जगद्गुरु भगवान् ऋषभदेवको अनुपम ऐश्वर्यका उपभोग करते हुए जब बहुत भारी काल व्यतीत हो गया ॥२६२॥


अथ नीलाञ्जनाख्यायां नृत्यन्त्यां सुरयोषिति । इयं तस्य समुत्पन्ना बुद्धिर्वैराग्यकारणम् ॥२६३॥

अर्थ: तब एक दिन नीलांजना नामक देवीके नृत्य करते समय उन्हें वैराग्यकी उत्पत्तिमें कारणभूत निम्न प्रकारकी बुद्धि उत्पन्न हुई ॥२६३॥


अहो जना विडम्ब्यन्ते परतोषणचेष्टितैः । उन्मत्तचरिताकारैः स्ववपुःखेदकारणैः ॥२६४॥

अर्थ: वे विचारने लगे कि अहो ! संसारके ये प्राणी दूसरोंको सन्तुष्ट करनेवाले कार्योंसे विडम्बना प्राप्त कर रहे हैं। प्राणियोंके ये कार्य पागलोंकी चेष्टाके समान हैं तथा अपने शरीरको खेद उत्पन्न करनेके लिए कारणस्वरूप हैं ॥२६४॥


अत्र कश्चित् पराधीनो लोके भृत्यत्वमागतः । आज्ञां ददाति कश्चिच्च तस्मै गर्वस्खलद्वचाः ॥२६५॥

अर्थ: संसारकी विचित्रता देखो, यहाँ कोई तो पराधीन होकर दासवृत्तिको प्राप्त होता है और कोई गर्वसे स्खलित वचन होता हुआ उसे आज्ञा प्रदान करता है ॥२६५॥


एवं धिगस्तु संसारं यस्मिन्नुत्पाद्यते परैः । दुःखमेव सुखाभिख्यां नीतं संमूढमानसैः ॥२६६॥

अर्थ: इस संसारको धिक्कार हो कि जिसमें मोही जीव दुःखको ही, सुख समझकर, उत्पन्न करते हैं ॥२६६॥


तस्मादिदं परित्यज्य कृत्रिमं क्षयवत्सुखम् । सिद्धसौख्यसमावाप्त्यै करोम्याशु विचेष्टितम् ॥२६७॥

अर्थ: इसलिए मैं तो इस विनाशीक तथा कृत्रिम सुखको छोड़कर सिद्ध जीवोंका सुख प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही प्रयत्न करता हूँ ॥२६७॥


यावदेवं मनस्तस्य प्रवृत्तं शुभचिन्तने । तावल्लौकान्तिकैर्देवैरिदमागत्य भाषितम् ॥२६८॥

अर्थ: इस तरह यहाँ भगवान्का चित्त शुभ विचारमें लगा हुआ था कि वहाँ उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर निम्न प्रकार निवेदन करना प्रारम्भ कर दिया ॥२६८॥


साधु नाथावबुद्धं ते त्रैलोक्यहितकारणम् । विच्छिन्नस्य महाकालो मोक्षमार्गस्य वर्तते ॥२६९॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हे नाथ ! आपने जो तीन लोकके जीवोंका हित करनेका विचार किया है सो बहुत ही उत्तम बात है । इस समय मोक्षका मार्ग बन्द हुए बहुत समय हो गया है ॥२६९॥


एते विपरिवर्तन्ते भवदुःखमहार्णवे । उपदेशस्य दातारमन्तरेणासुधारिणः ॥२७०॥

अर्थ: ये प्राणी उपदेश-दाताके बिना संसाररूपी महासागरमें गोता लगा रहे हैं ॥२७०॥


व्रजन्तु सांप्रतं जीवा देशितेन पथा त्वया । युक्तमक्षयसौख्येन लोकाग्रेऽवस्थितं पदम् ॥२७१॥

अर्थ: इस समय प्राणी आपके द्वारा बतलाये हुए मार्गसे चलकर अविनाशी सुखसे युक्त तथा लोकके अग्रभागमें स्थित मुक्त जीवोंके पदको प्राप्त हों ॥२७१॥


इति तस्य प्रबुद्धस्य स्वयमेव महात्मनः । सुरैरुदाहृता वाचः प्रयाताः पुनरुक्तताम् ॥२७२॥

अर्थ: इस प्रकार देवोंके द्वारा कहे हुए वचन स्वयम्बुद्ध भगवान् आदिनाथके समक्ष पुनरुक्तताको प्राप्त हुए थे ॥२७२॥


इति निष्क्रमणे तेन चिन्तिते तदनन्तरम् । आगताः पूर्ववद्देवाः पुरन्दरपुरस्सराः ॥२७३॥

अर्थ: ज्यों ही भगवान्ने गृहत्यागका निश्चय किया त्यों ही इन्द्र आदि देव पहलेकी भाँति आ पहुँचे ॥२७३॥


आगत्य च सुरैः सर्वैः स्तुतः प्रणतिपूर्वकम् । चिन्तितं साधु नाथेति भाषितं च पुनः पुनः ॥२७४॥

अर्थ: आकर समस्त देवोंने नमस्कारपूर्वक भगवान्की स्तुति की और ‘हे नाथ ! आपने बहुत अच्छा विचार किया है’ यह शब्द बार-बार कहे ॥२७४॥


ततो रत्नप्रभाजालजटिलीकृतदिङ्मुखाम् । चन्द्रांशुनिकराकारप्रचलच्चारुचामराम् ॥२७५॥

पूर्णचन्द्रनिभादर्शकृतशोभां सबुद्बुदाम् । अर्द्धचन्द्रकसंयुक्तामंशुकध्वजभूषिताम् ॥२७६॥

दिव्यस्रग्भिः कृतामोदां मुक्ताहारविराजिताम् । सुदर्शनां विमानाभां किङ्किणीभिः कृतस्वनाम् ॥२७७॥

सुरनाथार्पितस्कन्धां देवशिल्पिविनिर्मिताम् । आरुह्य शिबिकां नाथो निर्जगाम निजालयात् ॥२७८॥

अर्थ: तदनन्तर, जिसने रत्नोंकी कान्तिके समूहसे दिशाओंके अग्रभागको व्याप्त कर रखा था, जिसके दोनों ओर चन्द्रमाकी किरणोंके समूहके समान सुन्दर चमर ढोले जा रहे थे, पूर्ण चन्द्रमाके समान दर्पणसे जिसकी शोभा बढ़ रही थी, जो बुद्बुदके आकार मणिमय गोलकोंसे सहित थी, अर्द्धचन्द्राकारसे सहित थी, पताकाओंके वस्त्रसे सुशोभित थी, दिव्य मालाओंसे सुगन्धित थी, मोतियोंके हारसे विराजमान थी, देखनेमें बहुत सुन्दर थी, विमानके समान जान पड़ती थी, जिसमें लगी हुई छोटी-छोटी घण्टियाँ रुन-झुन शब्द कर रही थीं, और इन्द्रने जिसपर अपना कन्धा लगा रखा था ऐसी देवरूपी शिल्पियोंके द्वारा निर्मित पालकीपर सवार होकर भगवान् अपने घरसे बाहर निकले ॥२७५-२७८॥


ततः शब्देन तूर्याणां नृत्यतां च दिवौकसाम् । त्रिलोकविवरापूरश्चक्रे प्रतिनिनादिना ॥२७९॥

अर्थ: तदनन्तर बजते हुए बाजों और नृत्य करते हुए देवोंके प्रतिध्वनि पूर्ण शब्दसे तीनों लोकोंका अन्तराल भर गया ॥२७९॥


ततोऽत्यन्तमहाभूत्या भक्त्या देवैः समन्वितः । तिलकाह्व तमुद्यान संप्राप जिनपुङ्गवः ॥२८०॥

अर्थ: बहुत भारी वैभव और भक्तिसे युक्त देवोंके साथ भगवान् तिलक नामक उद्यानमें पहुँचे ॥२८०॥


प्रजाग इति देशोऽसौ प्रजाभ्योऽस्मिन् गतो यतः । प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः प्रयागस्तेन कीर्तितः ॥२८१॥

अर्थ: भगवान् वृषभदेव प्रजा अर्थात् जन समूहसे दूर हो उस तिलक नामक उद्यानमें पहुँचे थे इसलिए उस स्थानका नाम ‘प्रजाग’ प्रसिद्ध हो गया अथवा भगवान्ने उस स्थानपर बहुत भारी याग अर्थात् त्याग किया था, इसलिए उसका नाम ‘प्रयाग’ भी प्रसिद्ध हुआ ॥२८१॥


आपृच्छनं ततः कृत्वा पित्रोर्बन्धुजनस्य च । नमः सिद्धेभ्य इत्युक्त्वा श्रामण्यं प्रत्यपद्यत ॥२८२॥

अर्थ: वहाँ पहुँचकर भगवान्ने माता-पिता तथा बन्धुजनोंसे दीक्षा लेनेकी आज्ञा ली और फिर ‘नमः सिद्धेभ्यः’ - सिद्धोंके लिए नमस्कार हो यह कह दीक्षा धारण कर ली ॥२८२॥


अलंकारैः समं त्यक्त्वा वसनानि महामुनिः । चकारासौ परित्यागं केशानां पञ्चमुष्टिभिः ॥२८३॥

अर्थ: महामुनि वृषभदेवने सब अलंकारोंके साथ ही साथ वस्त्रोंका भी त्याग कर दिया और पंचमुष्टियोंके द्वारा केश उखाड़कर फेंक दिये ॥२८३॥


ततो रत्नपुटे केशान् प्रतिपद्य सुराधिपः । चिक्षेप मस्तके कृत्वा क्षीराकूपारवारिणि ॥२८४॥

अर्थ: इन्द्रने उन केशोंको रत्नमयी पिटारेमें रख लिया और तदनन्तर मस्तकपर रखकर उन्हें क्षीर-सागरमें क्षेप आया ॥२८४॥


महिमानं ततः कृत्वा जिनदीक्षानिमित्तकम् । यथा यातं सुरा जग्मुर्मनुष्याश्च त्रिचेतसः ॥२८५॥

अर्थ: समस्त देव दीक्षाकल्याणक सम्बन्धी उत्सव कर जिस प्रकार आये थे उसी प्रकार चले गये, साथ ही मनुष्य भी अपना हृदय हराकर यथास्थान चले गये ॥२८५॥


सहस्राणि च चत्वारि नृपाणां स्वामिभक्तितः । तदाकूतमजानन्ति प्रतिपन्नानि नग्नताम् ॥२८६॥

अर्थ: उस समय चार हजार राजाओंने जो कि भगवान्‌के अभिप्रायको नहीं समझ सके थे केवल स्वामि-भक्तिसे प्रेरित होकर नग्न अवस्थाको प्राप्त हुए थे ॥२८६॥


ततो वर्षार्द्धमात्रं स कायोत्सर्गेण निश्चलः । धराधरेन्द्रवत्तस्थौ कृतेन्द्रियसमस्थितिः ॥२८७॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रियोंकी समान अवस्था धारण करनेवाले भगवान् वृषभदेव छह माह तक कायोत्सर्गसे सुमेरु पर्वतके समान निश्चल खड़े रहे ॥२८७॥


वातोद्धूता जटास्तस्य रेजुराकुलमूर्तयः । धूमाल्य इव सद्ध्यानवह्निसक्तस्य कर्मणः ॥२८८॥

अर्थ: हवासे उड़ी हुई उनकी अस्त-व्यस्त जटाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो समीचीन ध्यानरूपी अग्निसे जलते हुए कर्मके धूमकी पंक्तियाँ ही हों ॥२८८॥


ततः षडपि नो यावन्मासा गच्छन्ति भूभृताम् । भग्नस्तावदसौ सङ्घः परीषहमहाभटैः ॥२८९॥

अर्थ: तदनन्तर छह माह भी नहीं हो पाये थे कि साथ-साथ दीक्षा लेनेवाले राजाओंका समूह परीषहरूपी महायोद्धाओंके द्वारा परास्त हो गया ॥२८९॥


केचिन्निपतिता भूमौ दुःखानिलसमाहताः । केचित् सरसवीर्यत्वादुपविष्टा महीतले ॥२९०॥

अर्थ: उनमें-से कितने ही राजा दुःखरूपी वायुसे ताड़ित होकर पृथिवीपर गिर गये और कितने ही कुछ सबल शक्तिके धारक होनेसे पृथिवीपर बैठ गये ॥२९०॥


कायोत्सर्गं परित्यज्य गताः केचित् फलाशनम् । संतप्तमूर्तयः केचित् प्रविष्टाः शीतलं जलम् ॥२९१॥

अर्थ: कितने ही भूखसे पीड़ित हो कायोत्सर्ग छोड़कर फल खाने लगे। कितने ही सन्तप्त शरीर होनेके कारण शीतल जलमें जा घुसे ॥२९१॥


केचिन्नागा इवोद्वृत्ता विविशुर्गिरिगह्वरम् । परावृत्य मनः केचित् प्रारब्धा जिनमीक्षितुम् ॥२९२॥

अर्थ: कितने ही चारित्रका बन्धन तोड़ उन्मत्त हाथियोंकी तरह पहाड़ोंकी गुफाओंमें घुसने लगे और कितने ही फिरसे मनको लौटाकर जिनेन्द्रदेवके दर्शन करनेके लिए उद्यत हुए ॥२९२॥


मानी तत्र मरीचिस्तु दधत्काषायवाससी । परिव्राडासनं चक्रे वल्किभिः प्रत्यवस्थितः ॥२९३॥

अर्थ: उन सब राजाओंमें भरतका पुत्र मरीचि बहुत अहंकारी था इसलिए वह गेरुआ वस्त्र धारण कर परिव्राजक बन गया तथा वल्कलोंको धारण करनेवाले कितने ही लोग उसके साथ हो गये ॥२९३॥


ततः फलादिकं तेषां नग्नरूपेण गृह्णताम् । विचेरुर्गगने वाचोऽदर्शनानां सुधाभुजाम् ॥२९४॥

अनेन नग्नरूपेण न वर्तत इदं नृपाः । समाचरितुमत्यर्थं दुःखहेतुरयं हि वः ॥२९५॥

अर्थ: वे राजा लोग नग्नरूपमें ही फलादिक ग्रहण करनेके लिए जब उद्यत हुए तब अदृश्य देवताओंके निम्नांकित वचन आकाशमें प्रकट हुए। हे राजाओ ! तुम लोग नग्नवेषमें रहकर यह कार्य न करो क्योंकि ऐसा करना तुम्हारे लिए अत्यन्त दुःखका कारण होगा ॥२९४-२९५॥


ततः परिदधुः केचित् पत्राण्यन्ये तु वल्कलम् । चर्माणि केचिदन्ये तु वासः प्रथममुज्झितम् ॥२९६॥

अर्थ: देवताओंके वचन सुनकर कितने ही लोगोंने वृक्षोंके पत्ते पहन लिये, कितने ही लोगोंने वृक्षोंके वल्कल धारण कर लिये, कितने ही लोगोंने चमड़ेसे शरीर आच्छादित कर लिया और कितने ही लोगोंने पहले छोड़े हुए वस्त्र ही फिरसे ग्रहण कर लिये ॥२९६॥


लज्जिताः स्वेन रूपेण केचित्तु कुशचीवरम् । प्राप्तामीभिस्ततस्तृप्तिः फलैः शीतजलेन च ॥२९७॥

अर्थ: अपने नग्न वेषसे लज्जित होकर कितने ही लोगोंने कुशाओंका वस्त्र धारण किया । इस प्रकार पत्र आदि धारण करनेके बाद वे सब फलों तथा शीतल जलसे तृप्तिको प्राप्त हुए ॥२९७॥


संभूय ते ततो भग्ना दुर्दशाचारवर्तिनः । विश्रब्धाः कर्तुमारब्धा दूरं गत्वा प्रधारणम् ॥२९८॥

अर्थ: तदनन्तर जिनकी बुरी हालत हो रही थी ऐसे भ्रष्ट हुए सब राजा लोग एकत्रित हो दूर जाकर निःशंक भावसे परस्परमें सलाह करने लगे ॥२९८॥


तेषां केनचिदित्युक्तास्ततो भूपेन ते नृपाः । एतेन कथितं किंचित्कस्मैचिद्भवतामिति ॥२९९॥

अर्थ: उनमेंसे किसी राजाने अन्य राजाओंको सम्बोधित करते हुए कहा कि आप लोगोंमेंसे किसीसे भगवान्ने कुछ कहा था ॥२९९॥


नैतेन कथितं किंचिदस्मभ्यमिति ते ध्रुवम् । ततोऽन्येनोदितं वाक्यमिति भोगाभिलाषिणा ॥३००॥

उत्तिष्ठत निजान् देशान् व्रजामोऽत्र स्थितेन किम् । प्राप्नुमः पुत्रदारादिवक्त्रालोकनजं सुखम् ॥३०१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें अन्य राजाओंने कहा कि इन्होंने हम लोगोंमें-से किसीसे कुछ भी नहीं कहा है । यह सुनकर भोगोंकी अभिलाषा रखनेवाले किसी राजाने कहा कि तो फिर यहाँ रुकनेसे क्या लाभ है ? उठिए, हम लोग अपने-अपने देश चलें और पुत्र तथा स्त्री आदिका मुख देखनेसे उत्पन्न हुआ सुख प्राप्त करें ॥३००-३०१॥


अपरेणेति तत्रोक्तं व्रजामो विह्वला वयम् । नहि किंचिदकर्तव्यं विद्यतेऽस्माकमार्तितः ॥३०२॥

नाथेन तु विनायातान्निरीक्ष्य भरतो रुषा । मारयिष्यति नोऽवश्यं देशान् वापहरिष्यति ॥३०३॥

अर्थ: उन्हींमें-से किसीने कहा कि चूँकि हम लोग दुःखी हैं अतः चलनेके लिए तैयार हैं । इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं जिसे दुःखके कारण हम कर न सकें परन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि हम लोगोंको स्वामीके बिना अकेला ही वापिस आया देखकर भरत मारेगा और अवश्य ही हम लोगोंके देश छीन लेगा ॥३०२-३०३॥


नाभेयो वा पुनर्यस्मिन् काले राज्यं प्रपत्स्यते । तदास्य दर्शयिष्यामो निस्त्रपाः कथमाननम् ॥३०४॥

अर्थ: अथवा भगवान् ऋषभदेव जब फिरसे राज्य प्राप्त करेंगे - वनवास छोड़कर पुनः राज्य करने लगेंगे तब हम लोग निर्लज्ज होकर इन्हें मुख कैसे दिखावेंगे ? ॥३०४॥


तस्मादत्रैव तिष्ठामो भक्षयन्तः फलादिकम् । सेवामस्यैव कुर्वाणा भ्राम्यन्तः सुखमिच्छया ॥३०५॥

अर्थ: इसलिए हम लोग फलादिका भक्षण करते हुए यहीं पर रहें और इच्छानुसार सुखपूर्वक भ्रमण करते हुए इन्हींकी सेवा करते रहें ॥३०५॥


प्रतिमास्थस्य तस्याथ नमिश्च विनमिस्तथा । तस्थतुः पादयोर्नत्वा भोगयाचनतत्परौ ॥३०६॥

अर्थ: अथानन्तर - भगवान् ऋषभदेव प्रतिमायोगसे विराजमान थे कि भोगोंकी याचना करनेमें तत्पर नमि और विनमि उनके चरणोंमें नमस्कार कर वहीं पर खड़े हो गये ॥३०६॥


याचमानौ विदित्वा तावासनस्य प्रकम्पनात् । आयातो धरणो नाम्ना नागराजस्त्वरान्वितः ॥३०७॥

अर्थ: उसी समय आसनके कम्पायमान होनेसे नागकुमारोंके अधिपति धरणेन्द्रने यह जान लिया कि नमि और विनमि भगवान्से याचना कर रहे हैं । यह जानते ही वह शीघ्रतासे वहाँ आ पहुँचा ॥३०७॥


विकृत्य जिनरूपं स ताभ्यां विद्ये वरे ददौ । प्राप्य विद्ये वरे यातौ विजयार्द्धनगे क्षणात् ॥३०८॥

अर्थ: धरणेन्द्रने विक्रियासे भगवान्का रूप धरकर नमि और विनमिके लिए दो उत्कृष्ट विद्याएँ दीं । उन विद्याओंको पाकर वे दोनों उसी समय विजयार्द्ध पर्वतपर चले गये ॥३०८॥


योजनानि दशारुह्य तत्र विद्याभृदालयाः । नानादेशपुराकीर्णाभोगैर्भोगक्षितेः समाः ॥३०९॥

अर्थ: समान भूमि- तलसे दश योजन ऊपर चलकर विजयार्ध पर्वतपर विद्याधरोंके निवास-स्थान बने हुए हैं। उनके वे निवास-स्थान नाना देश और नगरोंसे व्याप्त हैं तथा भोगोंसे भोगभूमिके समान जान पड़ते हैं ॥३०९॥


उपर्यथ समारुह्य योजनानि पुनर्दश । गन्धर्वकिन्नरादीनां नगराणि सहस्रशः ॥३१०॥

अर्थ: विद्याधरोंके निवास-स्थानसे दश योजन ऊपर चलकर गन्धर्व और किन्नर देवोंके हजारों नगर बसे हुए हैं ॥३१०॥


अतोऽपि समतिक्रम्य पञ्चयोजनमन्तरम् । अर्हद्भवनसंछन्नो भाति नन्दीश्वराद्रिवत् ॥३११॥

अर्थ: वहाँसे पांच योजन और ऊपर चलकर वह पर्वत अर्हन्त भगवान्के मन्दिरोंसे आच्छादित है तथा नन्दीश्वर द्वीपके पर्वतके समान जान पड़ता है ॥३११॥


भवनेष्वर्हतां तेषु स्वाध्यायगतचेतसः । मुनयश्चारणा नित्यं तिष्ठन्ति परमौजसः ॥३१२॥

अर्थ: अर्हन्त भगवान्के उन मन्दिरोंमें स्वाध्यायके प्रेमी, चारणऋद्धिके धारक परम तेजस्वी मुनिराज निरन्तर विद्यमान रहते हैं ॥३१२॥


दक्षिणे विजयार्द्धस्य भागे पञ्चाशदाहिताः । रथनूपुरसंध्याभ्रप्रभृतीनां पुरां ततः ॥३१३॥

उत्तरेण तथा षष्टिर्नगराणां निवेशिता । आकाशवल्लभादीनि यानि नामानि बिभ्रति ॥३१४॥

अर्थ: उस विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीपर रथनूपुर तथा सन्ध्याभ्रको आदि लेकर पचास नगरियाँ हैं और उत्तर श्रेणीपर गगनवल्लभ आदि साठ नगरियाँ हैं ॥३१३-३१४॥


देशग्रामसमाकीर्णं [ मटम्बाकारसंकुलम् । सखेटकर्वटाटोपं तत्रैकैकं पुरोत्तमम् ॥३१५॥

अर्थ: ये प्रत्येक नगरियाँ एकसे एक बढ़कर हैं, नाना देशों और गाँवोंसे व्याप्त हैं, मटम्बोंसे संकीर्ण हैं, खेट और कर्वटोंके विस्तरसे युक्त हैं ॥३१५॥


उदारगोपुराट्टालं हेमप्राकारतोरणम् । वाप्युद्यानसमाकीर्णं ] स्वर्गभोगोत्सवप्रदम् ॥३१६॥

अकृष्टसर्वसस्याढ्यं सर्वपुष्पफलद्रुमम् । सर्वौषधिसमाकीर्णं सर्वकामप्रसाधनम् ॥३१७॥

अर्थ: बड़े-बड़े गोपुरों और अट्टालिकाओंसे विभूषित हैं, सुवर्णमय कोटों और तोरणोंसे अलंकृत हैं, वापिकाओं और बगीचोंसे व्याप्त हैं, स्वर्ग सम्बन्धी भोगोंका उत्सव प्रदान करनेवाली हैं, बिना जोते ही उत्पन्न होनेवाले सर्व प्रकारके फलोंके वृक्षोंसे सहित हैं, सर्व प्रकारकी औषधियोंसे आकीर्ण हैं, और सबके मनोरथोंको सिद्ध करनेवाली हैं ॥३१६-३१७॥


भोगभूमिसमं शश्वद् राजते यत्र भूतलम् । मधुक्षीरघृतादीनि वहन्ते तत्र निर्झराः ॥३१८॥

सरांसि पद्मयुक्तानि हंसादिकलितानि च । मणिकाञ्चनसोपानाः स्वच्छमिष्टमधूदकाः ॥३१९॥

सरोरुहरजश्छन्ना विरेजुस्तत्र दीर्घिकाः । सवत्सकामधेनूनां संपूर्णेन्दुसमत्विषाम् ॥३२०॥

सुवर्णखुरशृङ्गाणां संघाः शालासु तत्र च । [ नेत्रानन्दकरीणां च वसन्ति यत्र धेनवः ] ॥३२१॥

अर्थ: उनका पृथिवीतल हमेशा भोगभूमिके समान सुशोभित रहता है, वहाँके निर्झर सदा मधु, दूध, घी आदि रसोंको बहाते हैं, वहाँके सरोवर कमलोंसे युक्त तथा हंस आदि पक्षियोंसे विभूषित हैं। वहाँकी वापिकाओंकी सीढ़ियाँ मणियों तथा सुवर्णसे निर्मित हैं, उनमें मधुके समान स्वच्छ और मीठा पानी भरा रहता है, तथा वे स्वयं कमलोंकी परागसे आच्छादित रहती हैं। वहाँकी शालाओंमें बछड़ोंसे सुशोभित उन कामधेनुओंके झुण्डके झुण्ड बँधे रहते हैं जिनकी कि कान्ति पूर्ण चन्द्रमाके समान है, जिनके खुर और सींग सुवर्णके समान पीले हैं तथा जो नेत्रोंको आनन्द देनेवाली हैं ॥३१८-३२१॥


यासां वर्चश्च मूत्रं च शुभगन्धं तुरुष्कवत् । कान्तिवीर्यप्रदं तासां पयः केनोपमीयते ॥३२२॥

अर्थ: वहाँ वे गायें रहती हैं जिनका कि गोबर और मूत्र भी सुगन्धिसे युक्त है तथा रसायनके समान कान्ति और वीर्यको देनेवाला है, फिर उनके दूधकी तो उपमा ही किससे दी जा सकती है ? ॥३२२॥


नीलनीरजवर्णानां तथा पद्मसमत्विषाम् । महिषीणां सपुत्राणां सर्वासामत्र पङ्क्तयः ॥३२३॥

अर्थ: उन नगरियोंमें नील कमलके समान श्यामल तथा कमलके समान लाल कान्तिको धारण करनेवाली भैंसोंकी पंक्तियाँ अपने बछड़ोंके साथ सदा विचरती रहती हैं ॥३२३॥


धान्यानां पर्वताकाराः पल्यौघाः क्षयवर्जिताः । वाप्युद्यानपरिक्षिप्ताः प्रासादाश्च महाप्रभाः ॥३२४॥

अर्थ: वहाँ पर्वतोंके समान अनाजकी राशियाँ हैं, वहाँकी खत्तियों ( अनाज रखनेकी खोड़ियों ) का कभी क्षय नहीं होता, वापिकाओं और बगीचोंसे घिरे हुए वहाँके महल बहुत भारी कान्तिको धारण करनेवाले हैं ॥३२४॥


रेणुकण्टकनिर्मुक्ता रथ्यामार्गाः सुखावहाः । महातरुकृतच्छायाः प्रपाः सर्वरसान्विताः ॥३२५॥

अर्थ: वहाँके मार्ग धूलि और कण्टकसे रहित, सुख उपजानेवाले हैं । जिनपर बड़े-बड़े वृक्षोंकी छाया हो रही है तथा जो सर्वप्रकारके रसोंसे सहित हैं ऐसी वहाँकी प्याऊँ हैं ॥३२५॥


मासांश्च चतुरस्तत्र श्रोत्रानन्दकरध्वनिः । देशे काले च पर्जन्यः कुरुतेऽमृतवर्षणम् ॥३२६॥

अर्थ: जिनकी मधुर आवाज कानोंको आनन्दित करती है ऐसे मेघ वहाँ चार मास तक योग्य देश तथा योग्य कालमें अमृतके समान मधुर जलकी वर्षा करते हैं ॥३२६॥


हिमानिलविनिर्मुक्तो हेमन्तः सुखभागिनाम् । यथेप्सितपरिप्राप्तवाससां साधु वर्तते ॥३२७॥

अर्थ: वहाँकी हेमन्त ऋतु हिममिश्रित शीतल वायुसे रहित होती है तथा इच्छानुसार वस्त्र प्राप्त करनेवाले सुखके उपभोगी मनुष्योंके लिए आनन्ददायी होती है ॥३२७॥


मृदुतापो निदाघेऽपि शङ्कावानिव भास्करः । नानारत्नप्रभाक्रान्तो बोधकः पद्मसंपदाम् ॥३२८॥

अर्थ: वहाँ ग्रीष्म ऋतुमें भी सूर्य मानो शंकित होकर ही मन्द तेजका धारक रहता है और नाना रत्नोंकी प्रभासे युक्त होकर कमलोंको विकसित करता है ॥३२८॥


ऋतवोऽन्येऽपि चेतःस्थवस्तुसंप्रापणोचिताः । नीहारादिविनिर्मुक्ताः शोभन्ते निर्मला दिशः ॥३२९॥

अर्थ: वहाँकी अन्य ऋतुएँ भी मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करानेवाली हैं तथा वहाँकी निर्मल दिशाएँ नीहार ( कुहरा ) आदिसे रहित होकर अत्यन्त सुशोभित रहती हैं ॥३२९॥


न कश्चिदेकदेशोऽपि तस्मिन्नस्ति सुखो न यः । रमन्ते सततं सर्वा भोगभूमिष्विव प्रजाः ॥३३०॥

अर्थ: वहाँ ऐसा एक भी स्थान नहीं है जो कि सुखसे युक्त न हो । वहाँकी प्रजा सदा भोगभूमिके समान क्रीड़ा करती रहती है ॥३३०॥


योषितः सुकुमाराङ्गाः सर्वाभरणभूषिताः । इङ्गितज्ञानकुशलाः कीर्तिश्रीह्रीधृतिप्रभाः ॥३३१॥

अर्थ: वहाँकी स्त्रियाँ अत्यन्त कोमल शरीरको धारण करनेवाली हैं, सब प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित हैं, अभिप्रायके जाननेमें कुशल हैं, कीर्ति, लक्ष्मी, लज्जा, धैर्य और प्रभाको धारण करनेवाली हैं ॥३३१॥


काचित्कमलगर्भाभा काचिदिन्दीवरप्रभा । काचिच्छिरीषसंकाशा काचिद्विद्युत्समद्युतिः ॥३३२॥

अर्थ: कोई स्त्री कमलके भीतरी भागके समान कान्तिवाली है, कोई नील कमलके समान श्यामल प्रभाकी धारक है, कोई शिरीषके फूलके समान कोमल तथा हरित वर्णकी है और कोई बिजलीके समान पीली कान्तिसे सुशोभित है ॥३३२॥


नन्दनस्येव वातेन निर्मितास्ताः सुगन्धतः । वसन्तादिव संभूताश्चारुपुष्पविभूषणात् ॥३३३॥

अर्थ: वे स्त्रियाँ सुगन्धिसे तो ऐसी जान पड़ती हैं मानो नन्दन वनकी वायुसे ही रची गई हों और मनोहर फूलोंके आभरण धारण करनेके कारण ऐसी प्रतिभासित होती हैं मानो वसन्त ऋतुसे ही उत्पन्न हुई हों ॥३३३॥


चन्द्रकान्तिविनिर्माणशरीरा इव चापराः । कुर्वन्ति सततं रामा निजज्योत्स्नासरस्तराम् ॥३३४॥

अर्थ: जिनके शरीर चन्द्रमाकी कान्तिसे बने हुए के समान जान पड़ते थे ऐसी कितनी ही स्त्रियाँ अपनी प्रभारूपी चाँदनीसे निरन्तर सरोवर भरती रहती थीं ॥३३४॥


त्रिवर्णनेत्रशोभिन्यो गत्या हंसवधूसमाः । पीनस्तन्यः कृशोदर्यः सुरस्त्रीसमविभ्रमाः ॥३३५॥

अर्थ: वे स्त्रियाँ लाल, काले और सफ़ेद इस तरह तीन रंगोंको धारण करनेवाले नेत्रोंसे सुशोभित रहती हैं, उनकी चाल हंसियोंके समान है, उनके स्तन अत्यन्त स्थूल हैं, उदर कृश हैं, और उनके हाव-भाव-विलास देवांगनाओंके समान हैं ॥३३५॥


नराश्चन्द्रमुखाः शूराः सिंहोरस्का महाभुजाः । आकाशगमने शक्ताः सुलक्षणगुणक्रियाः ॥३३६॥

अर्थ: वहाँके मनुष्य भी चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले हैं, शूरवीर हैं, सिंहके समान चौड़े वक्षःस्थलसे युक्त हैं, लम्बी भुजाओंसे विभूषित हैं, आकाशमें चलनेमें समर्थ हैं, उत्तम लक्षण, गुण और क्रियाओंसे सहित हैं ॥३३६॥


न्यायवर्तनसंतुष्टाः स्वर्गवासिसमप्रभाः । विचरन्ति सनारीका यथेष्टं कामरूपिणः ॥३३७॥

अर्थ: न्यायपूर्वक प्रवृत्ति करनेसे सदा सन्तुष्ट रहते हैं, देवोंके समान प्रभाके धारक हैं, कामके समान सुन्दर हैं और इच्छानुसार स्त्रियों सहित जहाँ-तहाँ घूमते हैं ॥३३७॥


श्रेण्योरेवं रम्ययोस्तन्नितान्तं विद्याजायासंपरिष्वक्तचित्ताः । इष्टान् भोगान् भुञ्जते भूमिदेवा धर्मासक्तानन्तरायेण मुक्ताः ॥३३८॥

अर्थ: इस प्रकार जिनका चित्त विद्यारूपी स्त्रियोंमें आसक्त रहता है ऐसे भूमिनिवासी देव अर्थात् विद्याधर, अन्तराय रहित हो विजयार्ध पर्वतकी दोनों मनोहर श्रेणियोंमें धर्मके फलस्वरूप प्राप्त हुए मनोवांछित भोगोंको भोगते रहते हैं ॥३३८॥


एवंरूपा धर्मलाभेन सर्वे संप्राप्यन्ते प्राणिनां भोगलाभाः । तस्मात्कर्तुं धर्ममेकं यतध्वं भित्वा ध्वान्तं खे रवेस्तुल्यचेष्टाः ॥३३९॥

अर्थ: इस प्रकारके समस्त भोग प्राणियोंको धर्मके द्वारा ही प्राप्त होते हैं इसलिए हे भव्य जीवो ! जिस प्रकार आकाशमें सूर्य अन्धकारको नष्ट करता है, उसी प्रकार तुम लोग भी अपने अन्तरंग सम्बन्धी अज्ञानान्धकारको नष्ट कर एक धर्मको ही प्राप्त करनेका प्रयत्न करो ॥३३९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते विद्याधरलोकाभिधानं नाम तृतीयं पर्व ॥३॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध तथा रविषेणाचार्यके द्वारा कहे हुए पद्मचरितमें विद्याधर लोकका वर्णन करनेवाला तीसरा पर्व समाप्त हुआ ॥३॥

४. चतुर्थं पर्व (ऋषभमाहात्म्याभिधानं)

अथासौ भगवान् ध्यानी शातकुम्भप्रभः प्रभुः । हिताय जगते कर्तुं दानधर्मं समुद्यतः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर सुवर्णके समान प्रभाके धारक ध्यानी भगवान् ऋषभदेव प्रभु जगत्के कल्याणके निमित्त दान धर्मकी प्रवृत्ति करनेके लिए उद्यत हुए ॥१॥


निःशेषदोषनिर्मुक्तो मौनमाश्रित्य नैष्ठिकम् । संहृत्य प्रतिमां धीरो बभ्राम धरणीतलम् ॥२॥

अर्थ: धीर-वीर भगवान्ने छह माहके बाद प्रतिमा योग समाप्त कर पृथिवी तलपर भ्रमण करना प्रारम्भ किया। भगवान् समस्त दोषोंसे रहित थे और मौन धारण कर ही विहार करते थे ॥२॥


ददृशुस्तं प्रजा देवं भ्राम्यन्तं तुङ्गविग्रहम् । देहप्रभापरिच्छन्नं द्वितीयमिव भास्करम् ॥३॥

अर्थ: जिनका शरीर बहुत ही ऊँचा था तथा जो अपने शरीरकी प्रभासे आस-पासके भूमण्डलको आलोकित कर रहे थे ऐसे भ्रमण करनेवाले भगवान्के दर्शन कर प्रजा यह समझती थी मानो दूसरा सूर्य ही भ्रमण कर रहा है ॥३॥


यत्र यत्र पदन्यासमकरोत् स जिनेश्वरः । तस्मिन् विकचपद्मानि भवन्तीव महीतले ॥४॥

अर्थ: वे जिन-राज पृथिवीतलपर जहाँ-जहाँ चरण रखते थे वहाँ ऐसा जान पड़ता था मानो कमल ही खिल उठे हों ॥४॥


मेरुकूटसमाकारभासुरांसैः समाहितः । स रेजे भगवान् दीर्घजटाजालहृतांशुमान् ॥५॥

अर्थ: उनके कन्धे मेरुपर्वतके शिखरके समान ऊँचे तथा देदीप्यमान थे, उनपर बड़ी-बड़ी जटाएँ किरणोंकी भाँति सुशोभित हो रही थीं और भगवान् स्वयं बड़ी सावधानीसे - ईर्यासमितिसे नीचे देखते हुए विहार करते थे ॥५॥


अन्यदा हास्तिनपुरं विहरन् स समागतः । अविशच्च दिनस्यार्द्धे गते मेरुरिव श्रिया ॥६॥

अर्थ: जो शोभासे मेरु पर्वतके समान जान पड़ते थे ऐसे भगवान् ऋषभदेव किसी दिन विहार करते-करते मध्याह्नके समय हस्तिनापुर नगरमें प्रविष्ट हुए ॥६॥


मध्याह्नरविसंकाशं दृष्ट्वा तं पुरुषोत्तमम् । सर्वे नराश्च नार्यश्च मुमूर्च्छुरतिविस्मयात् ॥७॥

अर्थ: मध्याह्नके सूर्यके समान देदीप्यमान उन पुरुषोत्तमके दर्शन कर हस्तिनापुरके समस्त स्त्री-पुरुष बड़े आश्चर्यसे मोहको प्राप्त हो गये अर्थात् किसीको यह ध्यान नहीं रहा कि यह आहारकी वेला है इसलिए भगवान्को आहार देना चाहिए ॥७॥


नानावर्णानि वस्त्राणि रत्नानि विविधानि च । हस्त्यश्वरथयानानि तस्मै ढौकितवान् जनः ॥८॥

अर्थ: वहाँके लोग नाना वर्णोंके वस्त्र, अनेक प्रकारके रत्न और हाथी, घोड़े, रथ तथा अन्य प्रकारके वाहन ला-लाकर उन्हें समर्पित करने लगे ॥८॥


मुग्धाः पूर्णेन्दुवदनाः कन्यास्तामरसेक्षणाः । उपनिन्युर्नराः केचिद् विनीताकारधारिणः ॥९॥

अर्थ: विनीत वेषको धारण करनेवाले कितने ही लोग पूर्णचन्द्रमाके समान मुखवाली तथा कमलोंके समान नेत्रोंसे सुशोभित सुन्दर-सुन्दर कन्याएँ उनके पास ले आये ॥९॥


तस्मै न रुचिताः सत्यः स्वस्याप्यप्रियतां गताः । कन्यास्ता निरलंकारा ध्यायन्त्यस्तं व्यवस्थिताः ॥१०॥

अर्थ: जब वे पतिव्रता कन्याएँ भगवान्के लिए रुचिकर नहीं हुईं तब वे निराश होकर स्वयं अपने आपसे ही द्वेष करने लगीं और आभूषण दूर फेंक भगवान्का ध्यान करती हुई खड़ी रह गयीं ॥१०॥


अथ प्रासादशिखरे स्थितः श्रेयान् महीपतिः । दृष्ट्वैनं स्निग्धया दृष्ट्या पूर्वजन्म समस्मरत् ॥११॥

अर्थ: अथानन्तर - महलके शिखरपर खड़े हुए राजा श्रेयांसने उन्हें स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और देखते ही उसे पूर्वजन्मका स्मरण हो आया ॥११॥


उत्थाय च नृसिंहोऽसौ सान्तःपुरसुहृज्जनः । कृताञ्जलिपुटः स्तोत्रन्यगोष्टपुटपङ्कजः ॥१२॥

तस्य प्रदक्षिणां कुर्वन् रराज स नराधिपः । मेरोर्नितम्बमण्डल्यां भ्राम्यन्निव दिवाकरः ॥१३॥

अर्थ: राजा श्रेयांस महलसे नीचे उतरकर अन्तःपुर तथा अन्य मित्रजनोंके साथ उनके पास आया और हाथ जोड़कर स्तुति-पाठ करता हुआ प्रदक्षिणा देने लगा। भगवान्की प्रदक्षिणा देता हुआ राजा श्रेयांस ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मेरुके मध्य भागकी प्रदक्षिणा देता हुआ सूर्य ही हो ॥१२-१३॥


ततः कुन्तलभारेण प्रमृज्य चरणद्वयम् । तस्यानन्दाश्रुभिः पूर्वं क्षालितं तेन भूभृता ॥१४॥

अर्थ: सर्वप्रथम राजाने अपने केशोंसे भगवान्के चरणोंका मार्जन कर आनन्दके आँसुओंसे उनका प्रक्षालन किया ॥१४॥


रत्नपात्रेण दत्वार्घं कृततत्पदमार्जनः । शुचौ देशे स्थितायास्मै विधिना परमेण सः ॥१५॥

रसमिक्षोः समादाय कलशस्थं सुशीतलम् । चकार परमं श्राद्धं तद्गुणाकृष्टमानसः ॥१६॥

अर्थ: रत्नमयी पात्रसे अर्घ देकर उनके चरण धोये, पवित्र स्थानमें उन्हें विराजमान किया और तदनन्तर उनके गुणोंसे आकृष्ट चित्त हो, कलशमें रखा हुआ इक्षुका शीतल जल लेकर विधिपूर्वक श्रेष्ठ पारणा करायी - आहार दिया ॥१५-१६॥


ततः प्रमुदितैर्देवैः साधुशब्दौघमिश्रितः । नभोगैर्दुन्दुभिध्वानश्चक्रे दिक्चक्रपूरणः ॥१७॥

अर्थ: उसी समय आकाशमें चलनेवाले देवोंने प्रसन्न होकर साधु-साधु, धन्य-धन्य शब्दोंके समूहसे मिश्रित एवं दिग्मण्डलको मुखरित करनेवाला दुन्दुभि बाजोंका भारी शब्द किया ॥१७॥


पुष्पाणां पञ्चवर्णानां वृष्टीश्च प्रमथाधिपाः । अहो दानमहो दानमित्युक्त्वा ववृषुर्मुदा ॥१८॥

अर्थ: प्रमथ जातिके देवोंके अधिपतियोंने ‘अहो दानं अहो दानं’ कहकर हर्षके साथ पाँच रंगके फूल बरसाये ॥१८॥


अनिलोऽरिमुखस्पर्शो दिशः सुरमयन् ववौ । पूरयन्ती नभोभागं वसुधारा पपात च ॥१९॥

अर्थ: अत्यन्त सुखकर स्पर्शसे सहित, दिशाओंको सुगन्धित करनेवाले वायु बहने लगी और आकाशको व्याप्त करती हुई रत्नोंकी धारा बरसने लगी ॥१९॥


संप्राप्तः सुरसन्मानं त्रिजगद्विस्मयप्रदम् । पूजितो भरतस्यापि श्रेयान् प्रीतिसमुत्कटम् ॥२०॥

अर्थ: इस प्रकार उधर राजा श्रेयांस तीनों जगत्को आश्चर्यमें डालनेवाले देवकृत सम्मानको प्राप्त हुआ और इधर सम्राट् भरतने भी बहुत भारी प्रीतिके साथ उसकी पूजा की ॥२०॥


अथ प्रवर्तनं कृत्वा पाणिपात्रव्रतस्य सः । शुभध्यानं समाविष्टो भूयोऽपि विजितेन्द्रियः ॥२१॥

अर्थ: अथानन्तर इन्द्रियोंको जीतनेवाले भगवान् ऋषभदेव, दिगम्बर मुनियोंका व्रत कैसा है ? उन्हें किस प्रकार आहार दिया जाता है ? इसकी प्रवृत्ति चलाकर फिरसे शुभध्यानमें लीन हो गये ॥२१॥


ततस्तस्य सितध्यानाद् गते मोहे परिक्षयम् । उत्पन्नं केवलज्ञानं लोकालोकावलोकनम् ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर शुक्लध्यानके प्रभावसे मोहनीय कर्मका क्षय हो जानेपर उन्हें लोक और अलोकको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥२२॥


तेनैव तच्च संजातं तेजसो मण्डलं महत् । कालं (लस्य) विकिरद्भेदं रात्रिवासरसंभवम् ॥२३॥

अर्थ: केवलज्ञानके साथ ही बहुत भारी भामण्डल उत्पन्न हुआ। उनका वह भामण्डल रात्रि और दिनके कारण होनेवाले कालके भेदको दूर कर रहा था अर्थात् उसके प्रकाशके कारण वहाँ रात-दिनका विभाग नहीं रह पाता था ॥२३॥


तद्देशे विपुलस्कन्धो रत्नपुष्पैरलंकृतः । अशोकपादपोऽभूच्च विलसद्रक्तपल्लवः ॥२४॥

अर्थ: जहाँ भगवान्को केवलज्ञान हुआ था वहीं एक अशोक वृक्ष प्रकट हो गया। उस अशोक वृक्षका स्कन्ध बहुत मोटा था, वह रत्नमयी फूलोंसे अलंकृत था तथा उसके लाल-लाल पल्लव बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे ॥२४॥


प्रकीर्णा सुमनोवृष्टिरामोदाकृष्टषट्पदा । नमःस्थैरमरैर्नानारूपसंभवगामिनी ॥२५॥

अर्थ: आकाशमें स्थित देवोंने सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकर्षित करनेवाली एवं नाना आकारमें पड़नेवाली फूलोंकी वर्षा की ॥२५॥


महादुन्दुभयो नेदुः क्षुब्धसागरनिस्वनाः । अदृष्टविग्रहैर्देवैराहताः करपल्लवैः ॥२६॥

अर्थ: जिनके शब्द, क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके शब्दके समान भारी थे ऐसे बड़े-बड़े दुन्दुभि बाजे, अदृश्य शरीरके धारक देवोंके द्वारा करपल्लवोंसे ताडित होकर विशाल शब्द करने लगे ॥२६॥


यक्षौ पद्मपलाशाक्षौ सर्वालङ्कारभूषितौ । चालयाञ्चक्रतुः स्वैरं चामरे चन्द्रहासिनी ॥२७॥

अर्थ: जिनके नेत्र कमलकी कलिकाओंके समान थे तथा जो सर्व प्रकारके आभूषणोंसे सुशोभित थे ऐसे दोनों ओर खड़े हुए दो यक्ष, चन्द्रमाकी हँसी उड़ानेवाले - सफेद चमर इच्छानुसार चलाने लगे ॥२७॥


मेरुमस्तकसंकाशं मुकुटं भूमियोषितः । सिंहासनं समुत्पन्नं कराहतदिवाकरम् ॥२८॥

अर्थ: जो मेरुके शिखरके समान ऊँचा था, पृथिवीरूपी स्त्रीका मानो मुकुट ही था, और अपनी किरणोंसे सूर्यको तिरस्कृत कर रहा था ऐसा सिंहासन उत्पन्न हुआ ॥२८॥


त्रिलोकविभुताचिह्नं मुक्ताजालकभूषितम् । छत्रत्रयं समुद्भूतं तस्येव विमलं यशः ॥२९॥

अर्थ: जो तीन लोककी प्रभुताका चिह्नस्वरूप था, मोतियोंकी लड़ियोंसे विभूषित था और भगवान्के निर्मल यशके समान जान पड़ता था ऐसा छत्र-त्रय उत्पन्न हुआ ॥२९॥


सिंहासनस्थितस्यास्य सरणं समवान्वितम् । प्राप्तस्य गदितुं शोभां केवली केवलं प्रभुः ॥३०॥

अर्थ: आचार्य रविषेण कहते हैं कि समवसरणके बीच सिंहासनपर विराजमान हुए भगवान्की शोभाका वर्णन करनेके लिए मात्र केवलज्ञानी ही समर्थ हैं, हमारे जैसे तुच्छ पुरुष उस शोभाका वर्णन कैसे कर सकते हैं ॥३०॥


ततस्तमवधिज्ञानादवगम्य सुराधिपाः । वन्दितुं सपदि प्राप्ताः परिवारसमन्विताः ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर अवधिज्ञानके द्वारा, भगवान्को केवलज्ञान उत्पन्न होनेका समाचार जानकर सब इन्द्र अपने-अपने परिवारोंके साथ वन्दना करनेके लिए शीघ्र ही वहाँ आये ॥३१॥


ख्यातो वृषभसेनोऽस्य संजातो गणभृत्ततः । अन्ये च श्रमणा जाता महावैराग्ययोगिनः ॥३२॥

अर्थ: सर्व प्रथम वृषभसेन नामक मुनिराज इनके प्रसिद्ध गणधर हुए थे। उनके बाद महावैराग्यको धारण करने-वाले अन्य-अन्य मुनिराज भी गणधर होते रहे थे ॥३२॥


यथास्थानं ततस्तेषु सरणे समवान्विते । यत्यादिषु निविष्टेषु गणेशेन प्रचोदितः ॥३३॥

अर्थ: उस समवसरणमें जब मुनि, श्रावक तथा देव आदि सब लोग यथास्थान अपने-अपने कोठोंमें बैठ गये तब गणधरने भगवान्से उपदेश देनेकी प्रेरणा की ॥३३॥


छादयन्तीं स्वनादेन देवदुन्दुभि निःस्वनम् । जगाद भगवान् वाचं तत्त्वार्थपरिशंसिनीम् ॥३४॥

अर्थ: भगवान् अपने शब्दसे देव-दुन्दुभियोंके शब्दको तिरोहित करते एवं तत्त्वार्थको सूचित करनेवाली निम्नांकित वाणी कहने लगे ॥३४॥


अस्मिंस्त्रिभुवने कृत्स्ने जीवानां हितमिच्छताम् । शरणं परमो धर्मस्तस्माच्च परमं सुखम् ॥३५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि इस त्रिलोकात्मक समस्त संसारमें हित चाहनेवाले लोगोंको एक धर्म ही परम शरण हैं, उसीसे उत्कृष्ट सुख प्राप्त होता है ॥३५॥


सुखार्थं चेष्टितं सर्वं तच्च धर्मनिमित्तकम् । एवं ज्ञात्वा जना यत्नात् कुरुध्वं धर्मसंग्रहम् ॥३६॥

अर्थ: प्राणियोंकी समस्त चेष्टाएँ सुखके लिए हैं और सुख धर्मके निमित्तसे होता है, ऐसा जानकर हे भव्य जन ! तुम सब धर्मका संग्रह करो ॥३६॥


वृष्टिर्विना कुतो मेघैः क्व सस्यं बीजवर्जितम् । जीवानां च विना धर्मात् सुखमुत्पद्यते कुतः ॥३७॥

अर्थ: बिना मेघोंके वृष्टि कैसे हो सकती है और बिना बीजके अनाज कैसे उत्पन्न हो सकता है। इसी तरह बिना धर्मके जीवोंको सुख कैसे उत्पन्न हो सकता है ? ॥३७॥


गन्तुकामो यथा पङ्गुर्मूको वक्तुं समुद्यतः । अन्धो दर्शनकामश्च तथा धर्मादृते सुखम् ॥३८॥

अर्थ: जिस प्रकार पंगु मनुष्य चलनेको इच्छा करे, गूँगा मनुष्य बोलनेकी इच्छा करे, और अन्धा मनुष्य देखनेकी इच्छा करे उसी प्रकार धर्मके बिना सुखप्राप्त करना है ॥३८॥


परमाणोः परं स्वल्पं न चान्यन्नभसो महत् । धर्मादन्यश्च लोकेऽस्मिन् सुहृन्नास्ति शरीरिणाम् ॥३९॥

अर्थ: जिस प्रकार इस संसारमें परमाणुसे छोटी कोई चीज नहीं है और आकाशसे बड़ी कोई वस्तु नहीं है उसी प्रकार प्राणियोंका धर्मसे बड़ा कोई मित्र नहीं है ॥३९॥


मनुष्यभोगः स्वर्गश्च सिद्धसौख्यं च धर्मतः । प्राप्यते यत्तदन्येन व्यापारेण कृतेन किम् ॥४०॥

अर्थ: जब धर्मसे ही मनुष्य सम्बन्धी भोग, स्वर्ग और मुक्त जीवोंको सुख प्राप्त हो जाता है तब दूसरा कार्य करनेसे क्या लाभ है ? ॥४०॥


अहिंसानिर्मलं धर्मं सेवन्ते ये विपश्चितः । तेषामेवोर्द्ध्वगमनं यान्ति तिर्यगधोऽन्यथा ॥४१॥

अर्थ: जो विद्वज्जन अहिंसासे निर्मल धर्मकी सेवा करते हैं उन्हींका ऊर्ध्वगमन होता है अन्य जीव तो तिर्यग्लोक अथवा अधोलोकमें ही जाते हैं ॥४१॥


यद्यप्यूर्ध्वं तपःशक्त्या व्रजेयुः परलिङ्गिनः । तथापि किङ्करा भूत्वा ते देवान् समुपासते ॥४२॥

अर्थ: यद्यपि अन्यलिंगी - हंस-परमहंस - परिव्राजक आदि भी तपश्चरणकी शक्तिसे ऊपर जा सकते हैं - स्वर्गोंमें उत्पन्न हो सकते हैं तथापि वे वहाँ किंकर होकर अन्य देवोंकी उपासना करते हैं ॥४२॥


देवदुर्गतिदुःखानि प्राप्य कर्मवशात्ततः । स्वर्गच्युताः पुनस्तिर्यग्योनिमायान्ति दुःखिनः ॥४३॥

अर्थ: वे वहाँ देव होकर भी कर्मके वश दुर्गतिके दुःख पाकर स्वर्गसे च्युत होते हैं और दुःखी होते हुए तिर्यंच योनि प्राप्त करते हैं ॥४३॥


सम्यग्दर्शनसंपन्नाः स्वभ्यस्तजिनशासनाः । दिवं गत्वा च्युता बोधिं प्राप्य यान्ति परं शिवम् ॥४४॥

अर्थ: जो सम्यग्दर्शनसे सम्पन्न हैं तथा जिन्होंने जिनशासनका अच्छी तरह अभ्यास किया है वे स्वर्ग जाते हैं और वहाँसे च्युत होनेपर रत्नत्रयको पाकर उत्कृष्ट मोक्षको प्राप्त करते हैं ॥४४॥


सागाराणां यतीनां च धर्मोऽसौ द्विविधः स्मृतः । तृतीयं ये तु मन्यन्ते दग्धास्ते मोहवह्निना ॥४५॥

अर्थ: वह धर्म गृहस्थों और मुनियोंके भेदसे दो प्रकारका है। इन दोके सिवाय जो तीसरे प्रकारका धर्म मानते हैं वे मोहरूपी अग्निसे जले हुए हैं ॥४५॥


अणुव्रतानि पञ्च स्युस्त्रिप्रकारं गुणव्रतम् । शिक्षाव्रतानि चत्वारि धर्मोऽयं गृहमेधिनाम् ॥४६॥

अर्थ: पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत, यह गृहस्थोंका धर्म है ॥४६॥


सर्वारम्भपरित्यागं कृत्वा देहेऽपि निःस्पृहाः । कालधर्मेण संयुक्ता गतिं ते यान्ति शोभनाम् ॥४७॥

अर्थ: जो गृहस्थ अन्त समय सब प्रकारके आरम्भका त्याग कर शरीरमें भी निःस्पृह हो जाते हैं तथा समता भावसे मरण करते हैं वे उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं ॥४७॥


महाव्रतानि पञ्च स्युस्तथा समितयो मताः । गुप्तयस्तिस्र उद्दिष्टा धर्मोऽयं व्योमवाससाम् ॥४८॥

अर्थ: पांच महाव्रत, पाँच समितियाँ और तीन गुप्तियाँ यह मुनियोंका धर्म है ॥४८॥


धर्मेणानेन संयुक्ताः शुभध्यानपरायणाः । यान्ति नाकं च मोक्षं च हित्वा पूतिकलेवरम् ॥४९॥

अर्थ: जो मनुष्य मुनि धर्मसे युक्त होकर शुभ ध्यानमें तत्पर रहते हैं वे इस दुर्गन्धिपूर्ण बीभत्स शरीरको छोड़कर स्वर्ग अथवा मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥४९॥


येऽपि जातस्वरूपाणां परमब्रह्मचारिणाम् । स्तुतिं कुर्वन्ति भावेन तेऽपि धर्ममवाप्नुयुः ॥५०॥

अर्थ: जो मनुष्य उत्कृष्ट ब्रह्मचारी दिगम्बर मुनियोंकी भावपूर्वक स्तुति करते हैं वे भी धर्मको प्राप्त हो सकते हैं ॥५०॥


तेन धर्मप्रभावेण कुगतिं न व्रजन्ति ते । लभन्ते बोधिलाभं च मुच्यन्ते येन किल्विषात् ॥५१॥

अर्थ: वे उस धर्मके प्रभावसे कुगतियोंमें नहीं जाते किन्तु उस रत्नत्रयरूपी धर्मको प्राप्त कर लेते हैं जिसके कि प्रभावसे पापबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं ॥५१॥


इत्यादि देवदेवेन भाषितं धर्ममुत्तमम् । श्रुत्वा देवा मनुष्याश्च परमामोदमागताः ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् वृषभदेवके द्वारा कहे हुए उत्तम धर्मको सुनकर देव और मनुष्य सभी परम हर्षको प्राप्त हुए ॥५२॥


केचित् सम्यग्मतिं भेजुर्गृहिधर्ममथापरे । अनगारव्रतं केचित् स्वशक्तेरनुगामिनः ॥५३॥

अर्थ: कितने ही लोगोंने सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानको धारण किया । कितने ही लोगोंने गृहस्थ धर्म अंगीकार किया और अपनी शक्तिका अनुसरण करनेवाले कितने ही लोगोंने मुनिव्रत स्वीकार किया ॥५३॥


ततः समुद्यता गन्तुं जिनं नत्वा सुरासुराः । स्तुत्वा च निजधामानि गता धर्मविभूषिताः ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर जानेके लिए उद्यत हुए सुर और असुरोंने जिनेन्द्र देवको नमस्कार किया, उनकी स्तुति की और फिर धर्मसे विभूषित होकर सब लोग अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥५४॥


यं यं देशं स सर्वज्ञः प्रयाति गतियोगतः । योजनानां शतं तत्र जायते स्वर्गविभ्रमम् ॥५५॥

अर्थ: भगवान्का गमन इच्छावश नहीं होता था फिर भी वे जिस-जिस देशमें पहुँचते थे वहाँ सौ योजन तकका क्षेत्र स्वर्गके समान हो जाता था ॥५५॥


स भ्रमन् बहुदेशेषु भव्यराशीनुपागतान् । रत्नत्रितयदानेन संसारादुदतीरत् ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार अनेक देशोंमें भ्रमण करते हुए जिनेन्द्र भगवान्ने शरणागत भव्य जीवोंको रत्नत्रयका दान देकर संसार-सागरसे पार किया था ॥५६॥


तस्यासीद् गणपालानामशीतिश्चतुरुत्तरा । सहस्राणि च तावन्ति साधूनां सुतपोभृताम् ॥५७॥

अर्थ: भगवान्के चौरासी गणधर थे और चौरासी हजार उत्तम तपस्वी साधु थे ॥५७॥


अत्यन्तशुद्धचित्तास्ते रविचन्द्रसमप्रभाः । एभिः परिवृतः सर्वां जिनो विहरते महीम् ॥५८॥

अर्थ: वे सब साधु अत्यन्त निर्मल हृदयके धारक थे तथा सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रभासे संयुक्त थे । इन सबसे परिवृत्त होकर भगवान्ने समस्त पृथिवीपर विहार किया था ॥५८॥


चक्रवर्तिश्रियं तावत्प्राप्तो भरतभूपतिः । यस्य क्षेत्रमिदं नाम्ना जगत्प्रकटतां गतम् ॥५९॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवका पुत्र राजा भरत चक्रवर्तीकी लक्ष्मीको प्राप्त हुआ था और उसीके नामसे यह क्षेत्र संसारमें भरत क्षेत्रके नामसे प्रसिद्ध हुआ था ॥५९॥


ऋषभस्य शतं पुत्रास्तेजस्कान्तिसमन्विताः । श्रमणव्रतमास्थाय संप्राप्ताः परमं पदम् ॥६०॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवके सौ पुत्र थे जो एकसे एक बढ़कर तेज और कान्तिसे सहित थे तथा जो अन्तमें श्रमणपद - मुनिपद धारण कर परमपद–निर्वाणधामको प्राप्त हुए थे ॥६०॥


तन्मध्ये भरतश्चक्री बभूव प्रथमो भुवि । विनीतानगरे रम्ये साधुलोकनिषेविते ॥६१॥

अर्थ: उन सौ पुत्रोंके बीच भरत चक्रवर्ती प्रथम पुत्र था जो कि सज्जनोंके समूहसे सेवित अयोध्या नामकी सुन्दर नगरीमें रहता था ॥६१॥


अक्षया निधयस्तस्य नवरत्नादिसंभृताः । आकराणां सहस्राणि नवतिर्नवसंयुताः ॥६२॥

त्र्यं सुरभिकोटीनां हलकोटिस्तथोदिताः । चतुर्भिरधिकाशीतिर्लक्षाणां वरदन्तिनाम् ॥६३॥

कोट्यश्चाष्टौ दशोद्दिष्टा वाजिनां वातरंहसाम् । द्वात्रिंशच्च सहस्राणि पार्थिवानां महौजसाम् ॥६४॥

तावन्त्येव सहस्राणि देशानां पुरसंपदाम् । चतुर्दश च रत्नानि रक्षितानि सदा सुरैः ॥६५॥

पुरन्ध्रीणां सहस्राणि नवतिः षड्भिरन्विताः । ऐश्वर्यं तस्य निःशेषं गदितुं नैव शक्यते ॥६६॥

अर्थ: उसके पास नव रत्नोंसे भरी हुई अक्षय नौ निधियाँ थीं, निन्यानबे हजार खानें थीं, तीन करोड़ गायें थीं, एक करोड़ हल थे, चौरासी लाख उत्तम हाथी थे, वायुके समान वेगवाले अठारह करोड़ घोड़े थे, बत्तीस हजार महाप्रतापी राजा थे, नगरोंसे सुशोभित बत्तीस हजार ही देश थे, देव लोग सदा जिनकी रक्षा किया करते थे ऐसे चौदह रत्न थे, और छियानबे हजार स्त्रियाँ थीं । इस प्रकार उसके समस्त ऐश्वर्यका वर्णन करना अशक्य है - कठिन कार्य है ॥६२-६६॥


पोदनाख्ये पुरे तस्य स्थितो बाहुबली नृपः । प्रतिकूलो महासत्त्वस्तुल्योत्पादकमानतः ॥६७॥

अर्थ: पोदनपुर नगरमें भरतका सौतेला भाई राजा बाहुबली रहता था । वह अत्यन्त शक्तिशाली था तथा ‘मैं और भरत एक ही पिताके दो पुत्र हैं’ इस अहंकारसे सदा भरतके विरुद्ध रहता था ॥६७॥


तस्य युद्धाय संप्राप्तो भरतश्चक्रगर्वितः । सैन्येन चतुरङ्गेण छादयन् धरणीतलम् ॥६८॥

अर्थ: चक्ररत्नके अहंकारसे चकनाचूर भरत अपनी चतुरंग सेनाके द्वारा पृथिवीतलको आच्छादित करता हुआ उसके साथ युद्ध करनेके लिए पोदनपुर गया ॥६८॥


तयोगजघटाटोपसंघट्टरवसंकुलम् । संजातं प्रथमं युद्धं बहुसत्त्वक्षयावहम् ॥६९॥

अर्थ: वहाँ उन दोनोंमें हाथियोंके समूहकी टक्करसे उत्पन्न हुए शब्दसे व्याप्त प्रथम युद्ध हुआ। उस युद्धमें अनेक प्राणी मारे गये ॥६९॥


अथोवाच विहस्यैवं भरतं बाहुविक्रमी । किं वराकेन लोकेन निहतेनामुनावयोः ॥७०॥

अर्थ: यह देख भुजाओंके बलसे सुशोभित बाहुबलीने हँसकर भरतसे कहा कि इस तरह निरपराध दीन प्राणियोंके वधसे हमारा और आपका क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ॥७०॥


यदि निःस्पन्दया दृष्ट्या भवताऽहं पराजितः । ततो निर्जित एवास्मि दृष्टियुद्धे प्रवर्त्यताम् ॥७१॥

अर्थ: यदि आपने मुझे निश्चल दृष्टिसे पराजित कर दिया तो मैं अपने आपको पराजित समझ लूँगा अतः दृष्टियुद्धमें ही प्रवृत्त होना चाहिए ॥७१॥


दृष्टियुद्धे ततो भग्नस्तथा बाहुरणादिषु । वधार्थं भरतो भ्रातुश्चक्ररत्नं विसृष्टवान् ॥७२॥

अर्थ: बाहुबलीके कहे अनुसार दोनोंका दृष्टियुद्ध हुआ और उसमें भरत हार गया। तदनन्तर जल-युद्ध और बाहु-युद्ध भी हुए उनमें भी भरत हार गया। अन्तमें भरतने भाईका वध करनेके लिए चक्ररत्न चलाया ॥७२॥


तत्तस्यान्त्यशरीरत्वादक्षमं विनिपातने । तस्यैव पुनरायातं समीपं विफलक्रियम् ॥७३॥

अर्थ: परन्तु बाहुबली चरमशरीरी थे अतः वह चक्ररत्न उनका वध करनेमें असमर्थ रहा और निष्फल हो लौटकर भरतके समीप वापस आ गया ॥७३॥


ततो भ्रात्रा समं वैरमवबुध्य महामनाः । संप्राप्तो भोगवैराग्यं परमं भुजविक्रमी ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर भाईके साथ बैरका मूल कारण जानकर उदारचेता बाहुबली भोगोंसे अत्यन्त विरक्त हो गये ॥७४॥


संत्यज्य स ततो भोगान् भूत्वा निर्वस्त्रभूषणः । वर्षं प्रतिमया तस्थौ मेरुवन्निःप्रकम्पकः ॥७५॥

अर्थ: उन्होंने उसी समय समस्त भोगोंका त्यागकर वस्त्राभूषण उतारकर फेंक दिये और एक वर्ष तक मेरु पर्वतके समान निष्प्रकम्प खड़े रहकर प्रतिमा योग धारण किया ॥७५॥


वल्मीकविवरोद्यातैरत्युग्रैः स महोरगैः । श्यामादीनां च वल्लीभिः वेष्टितः प्राप केवलम् ॥७६॥

अर्थ: उनके पास अनेक बामियाँ लग गयीं जिनके बिलोंसे निकले हुए बड़े-बड़े साँपों और श्यामा आदिकी लताओंने उन्हें वेष्टित कर लिया। इस दशामें उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया ॥७६॥


ततः शिवपदं प्रापदायुषः कर्मणः क्षये । प्रथमं सोऽवसर्पिण्यां मुक्तिमार्गं व्यशोधयत् ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर आयुकर्मका क्षय होनेपर उन्होंने मोक्ष पद प्राप्त किया और इस अवसर्पिणी कालमें सर्वप्रथम उन्होंने मोक्षमार्ग विशुद्ध किया - निष्कण्टक बनाया ॥७७॥


भरतस्त्वकरोद् राज्यं कण्टकैः परिवर्जितम् । षड्भिर्भागैर्विभक्तायां सर्वस्यां भरतक्षितौ ॥७८॥

अर्थ: भरत चक्रवर्तीने छह भागोंसे विभक्त भरत क्षेत्रकी समस्त भूमिपर अपना निष्कण्टक राज्य किया ॥७८॥


विद्याधरपुराकारा ग्रामाः सर्वसुखावहाः । देवलोकप्रकाराश्च पुरः परमसंपदः ॥७९॥

अर्थ: उनके राज्यमें भरत क्षेत्रके समस्त गाँव विद्याधरोंके नगरोंके समान सर्व सुखोंसे सम्पन्न थे, समस्त नगर देवलोकके समान उत्कृष्ट सम्पदाओंसे युक्त थे ॥७९॥


देवा इव जनास्तेषु रेजुः कृतयुगे सदा । मनोविषयसंप्राप्तविचित्राम्बरभूषणाः ॥८०॥

अर्थ: और उनमें रहनेवाले मनुष्य, उस कृत युगमें देवोंके समान सदा सुशोभित होते थे। उस समयके मनुष्योंको मनमें इच्छा होते ही तरह-तरहके वस्त्राभूषण प्राप्त होते रहते थे ॥८०॥


देशा भोगभुवा तुल्या लोकपालोपमा नृपाः । अप्सरःसदृशो नार्यो मदनावासभूमयः ॥८१॥

अर्थ: वहाँके देश भोगभूमियोंके समान थे, राजा लोकपालोंके तुल्य थे और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान कामकी निवासभूमि थीं ॥८१॥


एवमेकातपत्रायां पृथिव्यां भरतोऽधिपः । आखण्डल इव स्वर्गे भुङ्क्ते कर्मफलं शुभम् ॥८२॥

अर्थ: इस तरह जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गमें अपने शुभकर्मका फल भोगता है उसी प्रकार भरत चक्रवर्ती भी एकछत्र पृथिवीपर अपने शुभकर्मका फल भोगता था ॥८२॥


रक्षितं यस्य यक्षाणां सहस्रेण प्रयत्नतः । सर्वेन्द्रियसुखं रत्नं सुभद्राख्यं व्यराजत ॥८३॥

अर्थ: एक हजार यक्ष प्रयत्नपूर्वक जिसकी रक्षा करते थे ऐसा समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला उसका सुभद्रा नामक स्त्रीरत्न अतिशय शोभायमान था ॥८३॥


पञ्च पुत्रशतान्यस्य यैरिदं भरताह्वयम् । क्षेत्रं विभागतो भुक्तं पित्रा दत्तमकण्टकम् ॥८४॥

अर्थ: भरत चक्रवर्तीके पाँच सौ पुत्र थे जो पिताके द्वारा विभाग कर दिये हुए निष्कण्टक भरत क्षेत्रका उपभोग करते थे ॥८४॥


अथैवं कथितं तेन गौतमेन महात्मना । श्रेणिकः पुनरप्याह वाक्यमेतत्कुतूहली ॥८५॥

अर्थ: इस प्रकार महात्मा गौतम गणधरने भगवान् ऋषभदेव तथा उनके पुत्र और पौत्रोंका वर्णन किया जिसे सुनकर कुतूहलसे भरे हुए राजा श्रेणिकने फिरसे यह कहा ॥८५॥


वर्णत्रयस्य भगवन्संभवो मे त्वयोदितः । उत्पत्तिं सूत्रकण्ठानां ज्ञातुमिच्छामि सांप्रतम् ॥८६॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपने मेरे लिए क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णोंकी उत्पत्ति तो कही अब मैं इस समय ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति और जानना चाहता हूँ ॥८६॥


प्राणिघातादिकं कृत्वा कर्म साधुजुगुप्सितम् । परं वहन्त्यमी गर्वं धर्मप्राप्तिनिमित्तकम् ॥८७॥

अर्थ: ये लोग धर्मप्राप्तिके निमित्त, सज्जनोंके द्वारा निन्दित प्राणिहिंसा आदि कार्य कर बहुत भारी गर्वको धारण करते हैं ॥८७॥


तदेषां विपरीतानामुत्पत्तिं वक्तुमर्हसि । कथं चैषां गृहस्थानां भक्तो लोकः प्रवर्तते ॥८८॥

अर्थ: इसलिए आप इन विपरीत प्रवृत्ति करनेवालोंकी उत्पत्ति कहनेके योग्य हैं। साथ ही यह भी बतलाइए कि इन गृहस्थ ब्राह्मणोंके लोग भक्त कैसे हो जाते हैं ? ॥८८॥


एवं पृष्टो गणेशोऽसाविदं वचनमब्रवीत् । कृपाङ्गनापरिष्वक्तहृदयो हतमत्सरः ॥८९॥

अर्थ: इस प्रकार दयारूपी स्त्री जिनके हृदयका आलिंगन कर रही थी तथा मत्सर भावको जिन्होंने नष्ट कर दिया था ऐसे गौतम गणधरने राजा श्रेणिकके पूछनेपर निम्नांकित वचन कहे ॥८९॥


श्रेणिक श्रूयतामेषा यथाजातसमुद्भवः । विपरीतप्रवृत्तीनां मोहावष्टब्धचेतसाम् ॥९०॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! जिनका हृदय मोहसे आक्रान्त है और इसीलिए जो विपरीत प्रवृत्ति कर रहे हैं ऐसे इन ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति जिस प्रकार हुई वह मैं कहता हूँ तू सुन ॥९०॥


साकेतनगरासन्ने प्रदेशे प्रथमो जिनः । आसाञ्चक्रेऽन्यदा देवतिर्यग्मानववेष्टितः ॥९१॥

ज्ञात्वा तं भरतस्तुष्टो ग्राहयित्वा सुसंस्कृतम् । अन्नं जगाम यत्यर्थं बहुभेदप्रकल्पितम् ॥९२॥

प्रणम्य च जिनं भक्त्या समस्तांश्च दिगम्बरान् । भूमौ करद्वयं कृत्वा वागीमेतामभाषत ॥९३॥

अर्थ: एक बार अयोध्या नगरीके समीपवर्ती प्रदेशमें देव, मनुष्य तथा तिर्यंचोंसे वेष्टित भगवान् ऋषभदेव आकर विराजमान हुए । उन्हें आया जानकर राजा भरत बहुत ही सन्तुष्ट हुआ और मुनियोंके उद्देश्यसे बनवाया हुआ नाना प्रकारका उत्तमोत्तम भोजन नौकरोंसे लिवाकर भगवान्के पास पहुँचा । वहाँ जाकर उसने भक्तिपूर्वक भगवान् ऋषभदेवको तथा अन्य समस्त मुनियोंको नमस्कार किया और पृथ्वीपर दोनों हाथ टेककर यह वचन कहे ॥९१-९३॥


प्रसादं भगवन्तो मे कर्तुमर्हथ याचिताः । प्रतीच्छत मया भिक्षां शोभनामुपपादिताम् ॥९४॥

अर्थ: हे भगवन् ! मैं याचना करता हूँ कि आप लोग मुझपर प्रसन्न होइए और मेरे द्वारा तैयार करायी हुई यह उत्तमोत्तम भिक्षा ग्रहण कीजिए। ॥९४॥


इत्युक्ते भगवानाह भरतेयं न कल्पते । साधूनामीदृशी भिक्षा या तदुद्देशसंस्कृता ॥९५॥

अर्थ: भरतके ऐसा कहनेपर भगवान्ने कहा कि हे भरत ! जो भिक्षा मुनियोंके उद्देश्यसे तैयार की जाती है वह उनके योग्य नहीं है - मुनिजन उद्दिष्ट भोजन ग्रहण नहीं करते ॥९५॥


एते हि तृष्णया मुक्ता निर्जितेन्द्रियशत्रवः । विधायापि बहून् मासानुपवासं महागुणाः ॥९६॥

भिक्षां परगृहे लब्धां निर्दोषां मौनमास्थिताः । भुञ्जते प्राणधृत्यर्थं प्राणा धर्मस्य हेतवः ॥९७॥

अर्थ: ये मुनि तृष्णासे रहित हैं, इन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रुओंको जीत लिया है, तथा महान् गुणोंके धारक हैं । ये एक-दो नहीं अनेक महीनोंके उपवास करनेके बाद भी श्रावकोंके घर ही भोजनके लिए जाते हैं और वहां प्राप्त हुई निर्दोष भिक्षाको मौन-से खड़े रहकर ग्रहण करते हैं । उनकी यह प्रवृत्ति रसास्वादके लिए न होकर केवल प्राणोंकी रक्षाके लिए ही होती है क्योंकि प्राण धर्मके कारण हैं ॥९६-९७॥


धर्मं चरन्ति मोक्षार्थं यत्र पीडा न विद्यते । कथंचिदपि सत्त्वानां सर्वेषां सुखमिच्छताम् ॥९८॥

अर्थ: ये मुनि मोक्ष-प्राप्तिके लिए उस धर्मका आचरण कर रहे हैं जिसमें कि सुखकी इच्छा रखनेवाले समस्त प्राणियोंको किसी भी प्रकारकी पीड़ा नहीं दी जाती है ॥९८॥


श्रुत्वा तद्वचनं सम्राडचिन्तयदिदं चिरम् । अहो बत महाकष्टं जैनेश्वरमिदं व्रतम् ॥९९॥

तिष्ठन्ति मुनयो यत्र स्वस्मिन् देहेऽपि निःस्पृहाः । जातरूपधरा धीराः सर्वभूतदयापराः ॥१००॥

अर्थ: भगवान्के उक्त वचन सुनकर सम्राट् भरत चिरकाल तक यह विचार करता रहा और कहता रहा कि अहो ! जिनेन्द्र भगवान्का यह व्रत महान् कष्टोंसे भरा है । इस व्रतके पालन करनेवाले मुनि अपने शरीरमें निःस्पृह रहते हैं, दिगम्बर होते हैं, धीरवीर तथा समस्त प्राणियोंपर दया करनेमें तत्पर रहते हैं ॥९९-१००॥


इदानीं भोजयाम्येतान् सागारव्रतमाश्रितान् । लक्षणं हेमसूत्रेण कृत्वैतेन महान्धसा ॥१०१॥

अर्थ: इस समय जो यह महान् भोजन-सामग्री तैयार की गयी है इससे गृहस्थका व्रत धारण करनेवाले पुरुषोंको भोजन कराता हूँ तथा इन गृहस्थोंको सुवर्णसूत्रसे चिह्नित करता हूँ ॥१०१॥


प्रकाममन्यदप्येभ्यो दानं यच्छामि भक्तितः । कनीयान् मुनिधर्मस्य धर्मोऽमीभिः समाश्रितः ॥१०२॥

अर्थ: भोजनके सिवाय अन्य आवश्यक वस्तुएँ भी इनके लिए भक्तिपूर्वक अच्छी मात्रामें देता हूँ क्योंकि इन लोगोंने जो धर्म धारण किया है वह मुनि धर्मका छोटा भाई ही तो है ॥१०२॥


सम्यग्दृष्टिजनं सर्वं ततोऽसौ धरणीतले । न्यमन्त्रयन् महावेगैः पुरुषैः स्वस्य संमतैः ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर - सम्राट् भरतने महावेगशाली अपने इष्ट पुरुषोंको भेजकर पृथिवीतलपर विद्यमान समस्त सम्यग्दृष्टिजनोंको निमन्त्रित किया ॥१०३॥


महान् कलकलो जातः सर्वस्यामवनौ ततः । मो भो नरा महादानं भरतः कर्तुमुद्यतः ॥१०४॥

अर्थ: इस कार्यसे समस्त पृथिवीपर बड़ा कोलाहल मच गया । लोग कहने लगे कि अहो ! मनुष्यजन हो ! सम्राट् भरत बहुत भारी दान करनेके लिए उद्यत हुआ है ॥१०४॥


उत्तिष्ठताशु गच्छामो वस्त्ररत्नादिकं धनम् । आनयामो नरा ह्येते प्रेषितास्तेन सादराः ॥१०५॥

अर्थ: इसलिए उठो, शीघ्र चलें, वस्त्र-रत्न आदिक धन लावें, देखो ये आदरसे भरे सेवकजन उसने भेजे हैं ॥१०५॥


उक्तमन्यैरिदं तत्र पूजयत्येष संमतान् । सम्यग्दृष्टिजनान् राजा गमनं तत्र नो वृथा ॥१०६॥

अर्थ: यह सुनकर उन्हीं लोगोंमें-से कोई कहने लगे कि यह भरत अपने इष्ट सम्यग्दृष्टिजनोंका ही सत्कार करता है इसलिए हम लोगोंका वहाँ जाना वृथा है ॥१०६॥


ततः सम्यग्दृशो याता हर्षं परममागताः । समं पुत्रैः कलत्रैश्च पुरुषा विनयस्थिताः ॥१०७॥

अर्थ: यह सुनकर जो सम्यग्दृष्टि पुरुष थे वे परम हर्षको प्राप्त हो स्त्री-पुत्रादिकोंके साथ भरतके पास गये और विनयसे खड़े हो गये ॥१०७॥


मिथ्यादृशोऽपि संप्राप्ता मायया वसुतृष्णया । भवनं राजराजस्य शक्रप्रासादसन्निभम् ॥१०८॥

अर्थ: जो मिथ्यादृष्टि थे वे भी धनकी तृष्णासे मायामयी सम्यग्दृष्टि बनकर इन्द्रभवनकी तुलना करनेवाले सम्राट् भरतके भवनमें पहुँचे ॥१०८॥


अङ्गणोप्तयवव्रीहिमुद्गमाषाङ्कुरादिभिः । उच्चित्य लक्षणैः सर्वान् सम्यग्दर्शनसंस्कृतान् ॥१०९॥

अलक्षयत् सरत्नेन सूत्रचिह्नेन चारुणा । चामीकरमयेनासौ प्रावेशयदथो गृहम् ॥११०॥

अर्थ: सम्राट् भरतने भवनके आँगनमें बोये हुए जौ, धान, मूँग, उड़द आदिके अंकुरोंसे समस्त सम्यग्दृष्टि पुरुषोंकी छाँट अलग कर ली तथा उन्हें जिसमें रत्न पिरोया गया था ऐसे सुवर्णमय सुन्दर सूत्रके चिह्नसे चिह्नित कर भवनके भीतर प्रविष्ट करा लिया ॥१०९-११०॥


मिथ्यादृशोऽपि तृष्णार्ताश्चिन्तया व्याकुलीकृताः । जल्पन्तो दीनवाक्यानि प्रविष्टा दुःखसागरम् ॥१११॥

अर्थ: तृष्णासे पीड़ित मिथ्यादृष्टि लोग भी चिन्तासे व्याकुल हो दीन वचन कहते हुए दुःखरूपी सागरमें प्रविष्ट हुए ॥१११॥


ततो यथेप्सितं दानं श्रावकेभ्यो ददौ नृपः । पूजितानां च चिन्तेयं तेषां जाता दुरात्मनाम् ॥११२॥

अर्थ: तदनन्तर - राजा भरतने उन श्रावकोंके लिए इच्छानुसार दान दिया । भरतके द्वारा सम्मान पाकर उनके हृदयमें दुर्भावना उत्पन्न हुई और वे इस प्रकार विचार करने लगे ॥११२॥


वयं केऽपि महापूता जगते हितकारिणः । पूजिता यन्नरेन्द्रेण श्रद्धयाऽत्यन्ततुङ्गया ॥११३॥

अर्थ: कि हम लोग वास्तवमें महापवित्र तथा जगत्का हित करनेवाले कोई अनुपम पुरुष हैं इसीलिए तो राजाधिराज भरतने बड़ी श्रद्धाके साथ हम लोगोंकी पूजा की है ॥११३॥


ततस्ते तेन गर्वेण समस्ते धरणीतले । प्रवृत्ता याचितुं लोकं दृष्ट्वा द्रव्यसमन्वितम् ॥११४॥

अर्थ: तदनन्तर वे इसी गर्वसे समस्त पृथिवीतलपर फैल गये और किसी धन-सम्पन्न व्यक्तिको देखकर याचना करने लगे ॥११४॥


ततो मतिसमुद्रेण भरताय निवेदितम् । यथाद्येति मया जैने वचनं सदसि श्रुतम् ॥११५॥

अर्थ: तत्पश्चात् किसी दिन मतिसमुद्र नामक मन्त्रीने राजाधिराज भरतसे कहा कि आज मैंने भगवान्के समवसरणमें निम्नांकित वचन सुना है ॥११५॥


वर्द्धमानजिनस्यान्ते भविष्यन्ति कलौ युगे । एते ये भवता सृष्टाः पाखण्डिनो महोद्धताः ॥११६॥

अर्थ: वहाँ कहा गया है कि भरतने जो इन ब्राह्मणोंकी रचना की है सो वे वर्द्धमान तीर्थंकरके बाद कलियुग नामक पंचम काल आनेपर पाखण्डी एवं अत्यन्त उद्धत हो जायेंगे ॥११६॥


प्राणिनो मारयिष्यन्ति धर्मबुद्ध्या विमोहिताः । महाकषायसंयुक्ताः सदा पापक्रियोद्यताः ॥११७॥

अर्थ: धर्म बुद्धिसे मोहित होकर अर्थात् धर्म समझकर प्राणियोंको मारेंगे, बहुत भारी कषायसे युक्त होंगे और पाप कार्यके करनेमें तत्पर होंगे ॥११७॥


कुग्रन्थं वेदसंज्ञं च हिंसाभाषणतत्परम् । वक्ष्यन्ति कर्तृनिर्मुक्तं मोहयन्तोऽखिलाः प्रजाः ॥११८॥

अर्थ: जो हिंसाका उपदेश देनेमें तत्पर रहेगा ऐसे वेद नामक खोटे शास्त्रको कर्तासे रहित अर्थात् ईश्वर प्रणीत बतलावेंगे और समस्त प्रजाको मोहित करते फिरेंगे ॥११८॥


महारम्भेषु संसक्ताः प्रतिग्रहपरायणाः । करिष्यन्ति सदा निन्दां जिनभाषितशासने ॥११९॥

अर्थ: बड़े-बड़े आरम्भोंमें लीन रहेंगे, दक्षिणा ग्रहण करेंगे और जिनशासनकी सदा निन्दा करेंगे ॥११९॥


निर्ग्रन्थमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधं यास्यन्ति पापिनः । उपद्रवाय लोकस्य विषवृक्षाङ्कुरा इव ॥१२०॥

अर्थ: निर्ग्रन्थ मुनिको आगे देखकर क्रोधको प्राप्त होंगे और जिस प्रकार विषवृक्षके अंकुर जगत्के उपद्रव अर्थात् अपकारके लिए हैं उसी प्रकार ये पापी भी जगत्के उपद्रवके लिए होंगे - जगत्में सदा अनर्थ उत्पन्न करते रहेंगे ॥१२०॥


तच्छ्रुत्वा भरतः क्रुद्धः तान् सर्वान् हन्तुमुद्यतः । त्रासितास्ते ततस्तेन नाभेयं शरणं गताः ॥१२१॥

अर्थ: मतिसमुद्र मन्त्रीके वचन सुनकर भरत कुपित हो उन सब विप्रोंको मारनेके लिए उद्यत हुआ । तदनन्तर वे भयभीत होकर भगवान् ऋषभदेवकी शरणमें गये ॥१२१॥


यस्मान्मा हननं पुत्र कार्षीरिति निवारितम् । ऋषभेण ततो याता ‘माहना’ इति ते श्रुतिम् ॥१२२॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवने ‘हे पुत्र ! इनका ( मा हननं कार्षीः ) हनन मत करो’ यह शब्द कहकर इनकी रक्षा की थी इसलिए ये आगे चलकर ‘माहन’ इस प्रसिद्धिको प्राप्त हो गये अर्थात् ‘माहन’ कहलाने लगे ॥१२२॥


रक्षितास्ते यतस्तेन जिनेन शरणागताः । त्रातारमिन्द्रमित्युच्चैस्ततस्तं विबुधा जगुः ॥१२३॥

अर्थ: चूँकि इन शरणागत ब्राह्मणोंकी ऋषभ जिनेन्द्रने रक्षा की थी इसलिए देवों अथवा विद्वानोंने भगवान्को त्राता अर्थात् रक्षक कहकर उनकी बहुत भारी स्तुति की थी ॥१२३॥


ये च ते प्रथमं भग्ना नृपा नाथानुगामिनः । व्रतान्तरममी चक्रुः स्वबुद्धिपरिकल्पितम् ॥१२४॥

अर्थ: दीक्षाके समय भगवान् ऋषभदेवका अनुकरण करनेवाले जो राजा पहले ही च्युत हो गये थे उन्होंने अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार दूसरे-दूसरे व्रत चलाये थे ॥१२४॥


तेषां शिष्याः प्रशिष्याश्च मोहयन्तः कुहेतुभिः । जगद् गर्वपरायत्ताः कुशास्त्राणि प्रचक्रिरे ॥१२५॥

अर्थ: उन्हींके शिष्य-प्रशिष्योंने अहंकारसे चूर होकर खोटी-खोटी युक्तियोंसे जगत्को मोहित करते हुए अनेक खोटे शास्त्रोंकी रचना की ॥१२५॥


भृगुरङ्गिशिरा वह्निः कपिलोऽत्रिर्विदस्तथा । अन्ये च बहवोऽज्ञानाज्जाता वल्कलतापसाः ॥१२६॥

अर्थ: भृगु, अंगिशिरस, वह्नि, कपिल, अत्रि तथा विद आदि अनेक साधु अज्ञानवश वल्कलोंको धारण करनेवाले तापसी हुए ॥१२६॥


स्त्रियं दृष्ट्वा कुचित्तास्ते पुंलिङ्गं प्राप्तविक्रियम् । पिदधुर्मोहसंछन्नाः कौपीनेन नराधमाः ॥१२७॥

अर्थ: स्त्रीको देखकर उनका चित्त दूषित हो जाता था और जननेन्द्रियमें विकार दिखने लगता था इसलिए उन अधम मोही जीवोंने जननेन्द्रियको लँगोटसे आच्छादित कर लिया ॥१२७॥


सूत्रकण्ठा पुरा तेन ये सृष्टाश्चक्रवर्तिना । बीजवत्प्रसृतास्तेऽत्र संतानेन महीतले ॥१२८॥

अर्थ: कण्ठमें सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले जिन ब्राह्मणोंकी चक्रवर्ती भरतने पहले बीजके समान थोड़ी ही रचना की थी वे अब सन्ततिरूपसे बढ़ते हुए समस्त पृथ्वी तलपर फैल गये ॥१२८॥


प्रस्तावगतमेतत्ते कथितं द्विजकल्पनम् । इदानीं प्रकृतं वक्ष्ये राजन् शृणु समाहितः ॥१२९॥

अर्थ: गौतम गणधर राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! यह ब्राह्मणोंकी रचना प्रकरणवश मैंने तुझसे कही है । अब सावधान होकर प्रकृत बात कहता हूँ सो सुन ॥१२९॥


अथासौ लोकमुत्तार्य प्रभूतं भवसागरात् । कैलासशिखरे प्राप निर्वृतिं नाभिनन्दनः ॥१३०॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेव संसार-सागरसे अनेक प्राणियोंका उद्धार कर कैलास पर्वतकी शिखरसे मोक्षको प्राप्त हुए ॥१३०॥


ततो भरतराजोऽपि प्रव्रज्यां प्रतिपन्नवान् । साम्राज्यं तृणवत् त्यक्त्वा लोकविस्मयकारणम् ॥१३१॥

अर्थ: तदनन्तर चक्रवर्ती भरत भी लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाले साम्राज्यको तृणके समान छोड़कर दीक्षाको प्राप्त हुए ॥१३१॥


स्थित्यधिकारोऽयं ते श्रेणिक गदितः समासतस्त्वेनम् । वंशाधिकारमधुना पुरुषरवे विद्धि सादरं वच्मि ॥१३२॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! यह स्थिति नामका अधिकार मैंने संक्षेपसे तुझे कहा है, हे श्रेष्ठ पुरुष ! अब वंशाधिकारको कहता हूँ सो आदरसे श्रवण कर ॥१३२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते ऋषभमाहात्म्याभिधानं नाम चतुर्थं पर्व ॥४॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य प्रणीत पद्मचरितमें ऋषभदेवका माहात्म्य वर्णन करनेवाला चतुर्थ पर्व पूर्ण हुआ ॥४॥

५. पञ्चमं पर्व (राक्षसवंशाधिकारः)

जगत्यस्मिन् महावंशाश्चत्वारः प्रथिता नृप । एषां रहस्यसंयुक्ताः प्रभेदा बहुधोदिताः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर, गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस संसारमें चार महावंश प्रसिद्ध हैं और इन महावंशोंके अनेक अवान्तर भेद कहे गये हैं। ये सभी भेद अनेक प्रकारके रहस्योंसे युक्त हैं ॥१॥


इक्ष्वाकुः प्रथमस्तेषामुन्नतो लोकभूषणः । ऋषिवंशो द्वितीयस्तु शशाङ्ककरनिर्मलः ॥२॥

अर्थ: उन चार महावंशोंमें पहला इक्ष्वाकुवंश है जो अत्यन्त उत्कृष्ट तथा लोकका आभूषणस्वरूप है। दूसरा ऋषिवंश अथवा चन्द्रवंश है जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल है ॥२॥


विद्याभृतां तृतीयस्तु वंशोऽत्यन्तमनोहरः । हरिवंशो जगत्ख्यातश्चतुर्थः परिकीर्तितः ॥३॥

अर्थ: तीसरा विद्याधरोंका वंश है जो अत्यन्त मनोहर है और चौथा हरिवंश है जो संसारमें प्रसिद्ध कहा गया है ॥३॥


तस्यादित्ययशाः पुत्रो भरतस्योदपद्यत । ततः सितयशा जातो वलाङ्कस्तस्य चाभवत् ॥४॥

जज्ञे च सुबलस्तस्मात्ततश्चापि महाबलः । तस्मादतिबलो जातस्ततश्चामृतशब्दितः ॥५॥

सुभद्रः सागरो भद्रो रवितेजास्तथा शशी । प्रभूततेजास्तेजस्वी तपनोऽथ प्रतापवान् ॥६॥

अतिवीर्यः सुवीर्यश्च तथोदितपराक्रमः । महेन्द्रविक्रमः सूर्य इन्द्रद्युम्नो महेन्द्रजित् ॥७॥

प्रभुर्विभुरविध्वंसी वीतभीर्वृषभध्वजः । गरुडाङ्को मृगाङ्कश्च तथान्ये पृथिवीभृतः ॥८॥

राज्यं सुतेषु निक्षिप्य संसारार्णवभीरवः । शरीरेष्वपि निःसंगा निर्ग्रन्थव्रतमाश्रिताः ॥९॥

अर्थ: इक्ष्वाकुवंशमें भगवान् ऋषभदेव उत्पन्न हुए, उनके भरत हुए और उनके अर्ककीर्ति महाप्रतापी पुत्र हुए । अर्क नाम सूर्यका है इसलिए इनका वंश सूर्यवंश कहलाने लगा । अर्ककीर्तिके सितयशा नामा पुत्र हुए, उनके बलांक, बलांकके सुबल, सुबलके महाबल, महाबलके अतिबल, अतिबलके अमृत, अमृतके सुभद्र, सुभद्रके सागर, सागरके भद्र, भद्रके रवितेज, रवितेजके शशी, शशीके प्रभूततेज, प्रभूततेजके तेजस्वी, तेजस्वीके प्रतापी तपन, तपनके अतिवीर्य, अतिवीर्यके सुवार्य, सुवीर्यके उदितपराक्रम, उदितपराक्रमके महेन्द्रविक्रम, महेन्द्रविक्रमके सूर्य, सूर्यके इन्द्रद्युम्न, इन्द्रद्युम्नके महेन्द्रजित्, महेन्द्रजित्के प्रभु, प्रभुके विभु, विभुके अविध्वंस, अविध्वंसके वीतभी, वीतभीके वृषभध्वज, वृषभध्वजके गरुडांक और गरुडांकके मृगांक पुत्र हुए । इस प्रकार इस वंशमें अन्य अनेक राजा हुए । ये सभी संसारसे भयभीत थे अतः पुत्रोंके लिए राज्य सौंपकर शरीरसे भी निःस्पृह हो निर्ग्रन्थ व्रतको प्राप्त हुए ॥४-९॥


अयमादित्यवंशस्ते कथितः क्रमतो नृप । उत्पत्तिः सोमवंशस्य साम्प्रतं परिकीर्त्यते ॥१०॥

अर्थ: हे राजन् ! मैंने क्रमसे तुझे सूर्यवंशका निरूपण किया है अब सोमवंश अथवा चन्द्रवंशकी उत्पत्ति कही जाती है ॥१०॥


ऋषभस्याभवत् पुत्रो नाम्ना बाहुबलीति यः । ततः सोमयशा नाम सौम्यः सूनुरजायत ॥११॥

ततो महाबलो जातस्ततोऽस्य सुबलोऽभवत् । स्मृतो भुजबली तस्यादेवमाद्या नृपाधिपाः ॥१२॥

शशिवंशे समुत्पन्नाः क्रमेण सितचेष्टिताः । श्रामण्यमनुभूयाशु संप्राप्ताः परमं पदम् ॥१३॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवकी दूसरी रानीसे बाहुबली नामका पुत्र हुआ था, उसके सोमयश नामका सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ था। सोम नाम चन्द्रमाका है सो उसी सोमयशसे सोमवंश अथवा चन्द्रवंशकी परम्परा चली है। सोमयशके महाबल, महाबलके सुबल और सुबलके भुजबलि इस प्रकार इन्हें आदि लेकर अनेक राजा इस वंशमें क्रमसे उत्पन्न हुए हैं । ये सभी राजा निर्मल चेष्टाओंके धारक थे तथा मुनिपदको धारण कर ही परमपद ( मोक्ष ) को प्राप्त हुए ॥११-१३॥


केचित्तु तनुकर्माणो भुञ्जानास्तपसः फलम् । स्वर्गे चक्रुरवस्थानमासन्नभवनिर्गमाः ॥१४॥

अर्थ: कितने ही अल्पकर्म अवशिष्ट रह जानेके कारण तपका फल भोगते हुए स्वर्गमें देव हुए तथा वहाँसे आकर शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करेंगे ॥१४॥


एष ते सोमवंशोऽपि कथितः पृथिवीपते । वैद्याधरमतो वंशं कथयामि समासतः ॥१५॥

अर्थ: हे राजन् ! यह मैंने तुझे सोमवंश कहा अब आगे संक्षेपसे विद्याधरोंके वंशका वर्णन करता हूँ ॥१५॥


नमेर्विद्याधरेन्द्रस्य रत्नमाली सुतोऽभवत् । रत्नवज्रस्ततो जातस्ततो रत्नरथोऽभवत् ॥१६॥

रत्नचित्रोऽभवत्तस्माजातश्चन्द्ररथस्ततः । जज्ञेऽतो वज्रजङ्घाख्यो वज्रसेनश्रुतिस्ततः ॥१७॥

उद्भूतो वज्रदंष्ट्रोऽतस्ततो वज्रध्वजोऽभवत् । वज्रायुधश्च वज्रश्च सुवज्रो वज्रभृत्तथा ॥१८॥

वज्राभो वज्रबाहुश्च वज्राङ्को वज्रसंज्ञकः । वज्रास्यो वज्रपाणिश्च वज्रजातुश्च वज्रवान् ॥१९॥

विद्युन्मुखः सुवक्त्रश्च विद्युद्दंष्ट्रश्च तत्सुतः । विद्युद्वान् विद्युदामश्च विद्युद्वेगोऽथ वैद्युतः ॥२०॥

इत्याद्या बहवः शूरा विद्याधरपुराधिपाः । गता दीर्घेण कालेन चेष्टितोचितमाश्रयम् ॥२१॥

अर्थ: विद्याधरोंका राजा जो नमि था उसके रत्नमाली नामका पुत्र हुआ । रत्नमालीके रत्नवज्र, रत्नवज्रके रत्नरथ, रत्नरथके रत्नचित्र, रत्नचित्रके चन्द्ररथ, चन्द्ररथके वज्रजंघ, वज्रजंघके वज्रसेन, वज्रसेनके वज्रदंष्ट्र, वज्रदंष्ट्रके वज्रध्वज, वज्रध्वजके वज्रायुध, वज्रायुधके वज्र, वज्रके सुवज्र, सुवज्रके वज्रभृत्, वज्रभृत्के वज्राभ, वज्राभके वज्रबाहु, वज्रबाहुके वज्रसंज्ञ, वज्रसंज्ञके वज्रास्य, वज्रास्यके वज्रपाणि, वज्रपाणिके वज्रजातु, वज्रजातुके वज्रवान्, वज्रवान्के विद्युन्मुख, विद्युन्मुखके सुवक्त्र, सुवक्त्रके विद्युद्दंष्ट्र, विद्युद्दंष्ट्रके विद्युत्वान्, विद्युत्वान्के विद्युदाभ, विद्युदाभके विद्युद्वेग और विद्युद्वेगके वैद्युत नामक पुत्र हुए । ये ही नहीं, इन्हें आदि लेकर अनेक शूरवीर विद्याधरोंके राजा हुए । ये सभी दीर्घ काल तक राज्य कर अपनी-अपनी चेष्टाओंके अनुसार स्थानोंको प्राप्त हुए ॥१६-२१॥


सुतेषु प्रभुतां न्यस्य जिनदीक्षामुपाश्रिताः । हित्वा द्वेषं च रागं च केचित्सिद्धिमुपागताः ॥२२॥

अर्थ: इनमें-से कितने ही राजाओंने पुत्रोंके लिए राज्य सौंपकर जिनदीक्षा धारण की और राग-द्वेष छोड़कर सिद्धिपद प्राप्त किया ॥२२॥


केचिद्विनाशमप्राप्ते समस्ते कर्मबन्धने । संकल्पकृतसांनिध्यं सौरभोगमभुञ्जत ॥२३॥

अर्थ: कितने ही राजा समस्त कर्मबन्धनको नष्ट नहीं कर सके इसलिए संकल्प मात्रसे उपस्थित होनेवाले देवोंके सुखका उपभोग करने लगे ॥२३॥


केचित्तु कर्मपाशेन बद्धाः स्नेहगरीयसा । तत्रैव निधनं याता वागुरायां मृगा इव ॥२४॥

अर्थ: कितने ही लोग स्नेहके कारण गुरुतर कर्मरूपी पाशसे बँधे रहे और जालमें बँधे हरिणोंके समान उसी कर्मरूपी पाशमें बँधे हुए मृत्युको प्राप्त हुए ॥२४॥


अथ विद्युद्दृढो नाम्ना प्रभुः श्रेण्योर्द्वयोरपि । विद्याबलसमुन्नद्धो बभूवोन्नतविक्रमः ॥२५॥

अर्थ: अथानन्तर इसी विद्याधरोंके वंशमें एक विद्युद्दृढ़ नामका राजा हुआ जो दोनों श्रेणियोंका स्वामी था, विद्याबलमें अत्यन्त उद्धत और विपुल पराक्रमका धारी था ॥२५॥


अन्यदा स गतोऽपश्यद् विदेहं गगनस्थितः । निर्ग्रन्थं योगमारूढं शैलनिश्चलविग्रहम् ॥२६॥

अर्थ: किसी एक समय वह विमानमें बैठकर विदेह क्षेत्र गया था वहाँ उसने आकाशसे ही निर्ग्रन्थ मुद्राके धारी संजयन्त मुनिको देखा, उस समय वे ध्यानमें आरूढ़ थे और उनका शरीर पर्वतके समान निश्चल था ॥२६॥


स्थापितस्तेन नीत्वासौ नाम्ना पञ्चगिरौ गिरौ । कुरुध्वं वधमस्येति विद्यावन्तश्च चोदिताः ॥२७॥

अर्थ: विद्युद्दृढ़ विद्याधरने उन मुनिराजको लाकर पंचगिरि नामक पर्वतपर रख दिया और ‘इनका वध करो’ इस प्रकार विद्याधरोंको प्रेरित किया ॥२७॥


तस्य लोष्टुभिरन्यैश्च हन्यमानस्य योगिनः । बभूव समचित्तस्य संक्लेशो न मनागपि ॥२८॥

अर्थ: राजाकी प्रेरणा पाकर विद्याधरोंने उन्हें पत्थर तथा अन्य साधनोंसे मारना शुरू किया परन्तु वे तो सम चित्तके धारी थे अतः उन्हें थोड़ा भी संक्लेश उत्पन्न नहीं हुआ ॥२८॥


ततोऽस्य सहमानस्य संजयन्तस्य दुःसहम् । उपसर्गं समुत्पन्नं केवलं सर्वभासनम् ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर दुःसह उपसर्गको सहन करते हुए उन संजयन्त मुनिराजको समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥२९॥


धरणेन ततो विद्या हृता विद्युद्दृढस्थिताः । ततोऽसौ हृतविद्यः सन् ययावुपशमं परम् ॥३०॥

अर्थ: उसी समय मुनिराजका पूर्व भवका भाई धरणेन्द्र आया। उसने विद्युद्दृढ़की सब विद्याएँ हर लीं जिससे वह विद्यारहित होकर अत्यन्त शान्त भावको प्राप्त हुआ ॥३०॥


ततोऽनया पुनर्लब्धा विद्यानेन व्यवस्थया । प्रणतेनाञ्जलिं कृत्वा संजयन्तस्य पादयोः ॥३१॥

तपःक्लेशेन भवतां विद्याः सेत्स्यन्ति भूरिणा । सिद्धा अपि तथा सत्यश्छेदं यास्यन्ति दुष्कृतात् ॥३२॥

अर्हद्विम्बसनाथस्य चैत्यस्योपरि गच्छताम् । साधूनां च प्रमादेऽपि विद्या नंक्ष्यन्ति वः क्षणात् ॥३३॥

अर्थ: विद्याओंके अभावमें बहुत दुःखी होकर उसने हाथ जोड़कर नम्र भावसे धरणेन्द्रसे पूछा कि अब हमें किसी तरह विद्याएँ सिद्ध हो सकती हैं या नहीं ? तब धरणेन्द्रने कहा कि तुम्हें इन्हीं संजयन्त मुनिराजके चरणोंमें तपश्चरण सम्बन्धी क्लेश उठानेसे फिर भी विद्याएँ सिद्ध हो सकती हैं परन्तु खोटा कार्य करनेसे वे विद्याएँ सिद्ध होनेपर भी पुनः नष्ट हो जायेंगी । जिनप्रतिमासे युक्त मन्दिर और मुनियोंका उल्लंघन कर प्रमादवश यदि ऊपर गमन करोगे तो तुम्हारी विद्याएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी । धरणेन्द्रके द्वारा बतायी हुई व्यवस्थाके अनुसार विद्युद्दृढ़ने संजयन्त मुनिराजके पादमूलमें तपश्चरण कर फिर भी विद्या प्राप्त कर ली ॥३१-३३॥


धरणेन ततः पृष्टः संजयन्तः कुतूहलात् । विद्युद्दृढेन भगवन् कस्मादेवं विचेष्टितम् ॥३४॥

अर्थ: यह सब होनेके बाद धरणेन्द्रने कुतूहलवश संजयन्त मुनिराजसे पूछा कि हे भगवन् ! विद्युद्दृढ़ने आपके प्रति ऐसी चेष्टा क्यों की है ? वह किस कारण आपको हर कर लाया और किस कारण विद्याधरोंसे उसने उपसर्ग कराया ? ॥३४॥


उवाच भगवानेवं संसारेऽस्मिन् चतुर्गतौ । भ्राम्यन्नहं समुत्पन्नो ग्रामे शकटनामनि ॥३५॥

वणिग्घितकरो नाम्ना प्रियवादी दयान्वितः । स्वभावार्जवसंपन्नः साधुसेवापरायणः ॥३६॥

अर्थ: धरणेन्द्रका प्रश्न सुनकर भगवान् संजयन्त केवली इस प्रकार कहने लगे - इस चतुर्गतिरूप संसारमें भ्रमण करता हुआ मैं एक बार शकट नामक गाँवमें हितकर नामक वैश्य हुआ था । मैं अत्यन्त मधुरभाषी, दयालु, स्वभावसम्बन्धी सरलतासे युक्त तथा साधुओंकी सेवामें तत्पर रहता था ॥३५-३६॥


कालधर्मं ततः कृत्वा राजा श्रीवर्द्धनाह्वयः । अभवत् कुमुदावत्यां व्यवस्थापालनोद्यतः ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर मैं कुमुदावती नामकी नगरीमें मर्यादाके पालन करनेमें उद्यत श्रीवर्द्धन नामका राजा हुआ ॥३७॥


ग्रामे तत्रैव विप्रोऽभूत् स कृत्वा कुत्सितं तपः । कुदेवोऽत्र ततश्च्युत्वा राज्ञः श्रीवर्द्धनस्य तु ॥३८॥

ख्यातो वह्निशिखो नाम्ना सत्यवादीति विश्रुतः । अभूत् पुरोहितो रौद्रो गुप्ताकार्यकरो महान् ॥३९॥

अर्थ: उसी ग्राममें एक ब्राह्मण रहता था जो खोटा तप कर कुदेव हुआ था और वहाँसे च्युत होकर मुझ श्रीवर्द्धन राजाका वह्निशिख नामका पुरोहित हुआ था । वह पुरोहित यद्यपि सत्यवादी रूपसे प्रसिद्ध था परन्तु अत्यन्त दुष्टपरिणामी था और छिपकर खोटे कार्य करता था ॥३८-३९॥


वणिग्नियमदत्तस्य स च द्रव्यमपाहृत । राज्ञ्या द्यूतं ततः कृत्वा निर्जितः सोऽङ्गुलीयकम् ॥४०॥

अर्थ: उस पुरोहितने एक बार नियमदत्त नामक वणिक्का धन छिपा लिया तब रानीने उसके साथ जुआ खेलकर उसकी अँगूठी जीत ली ॥४०॥


तेनाभिज्ञानदानेन दास्या गत्वा तदालयम् । उपनीतानि रत्नानि वणिजे दुःखवर्तिने ॥४१॥

ततो गृहीतसर्वस्वः खलीकृत्य द्विजाधमः । पुरो निर्वासितो दीनस्तपः परममाचरत् ॥४२॥

अर्थ: रानीकी दासी अँगूठी लेकर पुरोहितके घर गयी और वहाँ उसकी स्त्रीको दिखाकर उससे रत्न ले आयी। रानीने वे रत्न नियमदत्त वणिक्को जो कि अत्यन्त दुःखी था वापस दे दिये। तदनन्तर मैंने उस दुष्ट ब्राह्मणका सब धन छीन लिया तथा उसे तिरस्कृत कर नगरसे बाहर निकाल दिया। उस दीन-हीन ब्राह्मणको सुबुद्धि उत्पन्न हुई जिससे उसने उत्कृष्ट तपश्चरण किया ॥४१-४२॥


मृत्वा कल्पं स माहेन्द्रं प्राप्तस्तस्मात्परिच्युतः । खेचराणामधीशोऽयममूद्विद्युद्दृढध्वनिः ॥४३॥

अर्थ: अन्तमें मरकर वह माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ और वहाँसे च्युत होकर यह विद्युद्दृढ़ नामक विद्याधरोंका राजा हुआ है ॥४३॥


श्रीवर्द्धनस्तपः कृत्वा मृत्वा कल्पमुपागतः । संजयन्तश्रुविर्जातो विदेहेऽहं ततश्च्युतः ॥४४॥

अर्थ: मेरा जीव श्रीवर्द्धन भी तपश्चरण कर मरा और स्वर्गमें देव हुआ। वहाँसे च्युत होकर मैं विदेह क्षेत्रमें संजयन्त हुआ हूँ ॥४४॥


तेन दोषानुबन्धेन दृष्ट्वा मां क्रोधमूर्च्छितः । उपसर्गं व्यधादेष कर्मणां वशतां गतः ॥४५॥

अर्थ: उस पूर्वोक्त दोषके संस्कारसे ही यह विद्याधर मुझे देखकर क्रोधसे एकदम मूर्च्छित हो गया और कर्मोंके वशीभूत होकर उसी संस्कारसे इसने यह उपसर्ग किया है ॥४५॥


योऽसौ नियमदत्तोऽभूत् स कृत्वा तपसोऽर्जनम् । राजा नागकुमाराणां जातस्त्वं शुभमानसः ॥४६॥

अर्थ: और जो वह नियमदत्त नामक वणिक् था वह तपश्चरण कर उसके फलस्वरूप उज्ज्वल हृदयका धारी तू नागकुमारोंका राजा धरणेन्द्र हुआ है ॥४६॥


अथ विद्युद्दृढस्याभून्नाम्ना दृढरथः सुतः । तत्र राज्यं स निक्षिप्य तपः कृत्वा गतो दिवम् ॥४७॥

अर्थ: अथानन्तर - विद्युद्दृढ़के दृढरथ नामक पुत्र हुआ सो विद्युद्दृढ़ उसके लिए राज्य सौंपकर तथा तपश्चरण कर स्वर्ग गया ॥४७॥


अश्वधर्माऽभवत्तस्मादश्वायुरभवत्ततः । अश्वध्वजस्ततो जातस्ततो पद्मनिभोऽभवत् ॥४८॥

पद्ममाली ततो भूतोऽभवत् पद्मरथस्ततः । सिंहयानो मृगोद्धर्मा मेघाख्यः सिंहसप्रभुः ॥४९॥

सिंहकेतुः शशाङ्कास्यश्चन्द्राह्वश्चन्द्रशेखरः । इन्द्रचन्द्ररथाभिख्यौ चक्रधर्मा तदायुधः ॥५०॥

चक्रध्वजो मणिग्रीवो मण्यङ्को मणिभासुरः । मणिस्यन्दनमण्यास्यौ बिम्बोष्ठो लम्बिताधरः ॥५१॥

रक्तोष्ठो हरिचन्द्रश्च पूश्चन्द्रः पूर्णचन्द्रमाः । बालेन्दुश्चन्द्रमश्चूडो व्योमेन्दुरुडुपालनः ॥५२॥

एकचूडो द्विचूडश्च त्रिचूडश्च ततोऽभवत् । वज्रचूडस्ततस्तस्माद्भूरिचूडार्कचूडकौ ॥५३॥

तस्माद्वह्निजटी जातो वह्नितेजास्ततोऽभवत् । बहवश्चैवमन्येऽपि कालेन क्षयमागताः ॥५४॥

अर्थ: इधर दृढरथके अश्वधर्मा, अश्वधर्माके अश्वायु, अश्वायुके अश्वध्वज, अश्वध्वजके पद्मनिभ, पद्मनिभके पद्ममाली, पद्ममालीके पद्मरथ, पद्मरथके सिंहयान, सिंहयानके मृगोद्धर्मा, मृगोद्धर्माके सिंहसप्रभु, सिंहसप्रभुके सिंहकेतु, सिंहकेतुके शशांकमुख, शशांकमुखके चन्द्र, चन्द्रके चन्द्रशेखर, चन्द्रशेखरके इन्द्र, इन्द्रके चन्द्ररथ, चन्द्ररथके चक्रधर्मा, चक्रधर्माके चक्रायुध, चक्रायुधके चक्रध्वज, चक्रध्वजके मणिग्रीव, मणिग्रीवके मण्यंक, मण्यंकके मणिभासुर, मणिभासुरके मणिस्यन्दन, मणिस्यन्दनके मण्यास्य, मण्यास्यके बिम्बोष्ठ, बिम्बोष्ठके लम्बिताधर, लम्बिताधरके रक्तोष्ठ, रक्तोष्ठके हरिचन्द्र, हरिचन्द्रके पूश्चन्द्र, पूश्चन्द्रके पूर्णचन्द्र, पूर्णचन्द्रके बालेन्दु, बालेन्दुके चन्द्रचूड, चन्द्रचूडके व्योमेन्दु, व्योमेन्दुके उडुपालन, उडुपालनके एकचूड, एकचूडके द्विचूड, द्विचूडके त्रिचूड, त्रिचूडके वज्रचूड, वज्रचूडके भूरिचूड, भूरिचूडके अर्कचूड, अर्कचूडके वह्निजटी, वह्निजटोके वह्नितेज नामका पुत्र हुआ । इसी प्रकार और भी बहुत-से पुत्र हुए जो कालक्रमसे मृत्युको प्राप्त होते गये ॥४८-५४॥


पालयित्वा श्रियं केचिन्न्यस्य पुत्रेषु तां पुनः । कृत्वा कर्मक्षयं याताः सिद्धैरध्यासितां महीम् ॥५५॥

अर्थ: इनमें-से कितने ही विद्याधर राजा लक्ष्मी-का पालन कर तथा अन्तमें पुत्रोंको राज्य सौंपकर कर्मोंका क्षय करते हुए सिद्धभूमिको प्राप्त हुए ॥५५॥


एवं वैद्याधरोऽयं ते राजन् वंशः प्रकीर्तितः । अवतारो द्वितीयस्य युगस्यातः प्रचक्ष्यते ॥५६॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस प्रकार यह विद्याधरोंका वंश कहा । अब द्वितीय युगका अवतार कहा जाता है सो सुन ॥५६॥


अस्य नाभेयचिह्नस्य युगस्य विनिवर्तने । हीनाः पुरातना भावाः प्रशस्ता अत्र भूतले ॥५७॥

शिथिलायितुमारब्धा परलोकक्रियारतिः । कामार्थयोः समुत्पन्ना जनस्य परमा मतिः ॥५८॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवका युग समाप्त होनेपर इस पृथिवीपर जो प्राचीन उत्तम भाव थे वे हीन हो गये, लोगोंकी परलोक सम्बन्धी क्रियाओंमें प्रीति शिथिल होने लगी तथा काम और अर्थ पुरुषार्थमें ही उनकी प्रवर बुद्धि प्रवृत्त होने लगी ॥५७-५८॥


अथेक्ष्वाकुकुलोत्थेषु तेष्वतीतेषु राजसु । पुत्रः श्रियां समुत्पन्नो धरणीधरनामतः ॥५९॥

अयोध्यानगरे श्रीमान् प्रख्यातस्त्रिदशंजयः । इन्दुरेखा प्रिया तस्य जितशत्रुस्तयोः सुतः ॥६०॥

अर्थ: अथानन्तर इक्ष्वाकु वंशमें उत्पन्न हुए राजा जब कालक्रमसे अतीत हो गये तब अयोध्या नगरीमें एक धरणीधर नामक राजा उत्पन्न हुए । उनकी श्रीदेवी नामक रानीसे प्रसिद्ध लक्ष्मीका धारक त्रिदशंजय नामका पुत्र हुआ । इसकी स्त्रीका नाम इन्दुरेखा था, उन दोनोंके जितशत्रु नामका पुत्र हुआ ॥५९-६०॥


पुरे पोदनसंज्ञेऽथ व्यानन्दस्य महीपतेः । जातामम्भोजमालायां नामतो विजयां सुताम् ॥६१॥

जितशत्रोः समायोज्य प्रव्रज्यं त्रिदशंजयः । निर्वाणं च परिप्राप्तः कैलासधरणीधरे ॥६२॥

अर्थ: पोदनपुर नगरमें व्यानन्द नामक राजा रहते थे, उनकी अम्भोजमाला नामक रानीसे विजया नामकी पुत्री उत्पन्न हुई थी । राजा त्रिदशंजयने जितशत्रुका विवाह विजयाके साथ कराकर दीक्षा धारण कर ली और तपश्चरण कर कैलास पर्वतसे मोक्ष प्राप्त किया ॥६१-६२॥


अथाजितजिनो जातस्तयोः पूर्वविधानतः । अभिषेकादिदेवेन्द्रैः कृतं नाभेयवर्णितम् ॥६३॥

अर्थ: अथानन्तर राजा जितशत्रु और रानी विजयाके अजितनाथ भगवान्का जन्म हुआ । इन्द्रादिक देवोंने भगवान् ऋषभदेवका जैसा अभिषेक आदि किया था वैसा ही भगवान् ऋषभदेवका किया ॥६३॥


तस्य पित्रा जिताः सर्वे तज्जन्मनि यतो द्विषः । ततोऽसावजिताभिख्यां संप्राप्तो धरणीतले ॥६४॥

अर्थ: चूँकि उनका जन्म होते ही पिताने समस्त शत्रु जीत लिये थे इसलिए पृथिवीतलपर उनका ‘अजित’ नाम प्रसिद्ध हुआ ॥६४॥


आसन् सुनयनानन्देत्यादयस्तस्य योषितः । यासां शच्यपि रूपेण शक्ता नानुकृतिं प्रति ॥६५॥

अर्थ: भगवान् अजितनाथकी सुनयना, नन्दा आदि अनेक रानियाँ थीं । वे सब रानियाँ इतनी सुन्दर थीं कि इन्द्राणी भी अपने रूपसे उनकी समानता नहीं कर सकती थी ॥६५॥


अन्यदा रम्यमुद्यानं गतः सान्तःपुरोऽजितः । पूर्वाह्णे फुल्लमैक्षिष्ट पङ्कजानां वनं महत् ॥६६॥

अर्थ: अथानन्तर - भगवान् अजितनाथ एक दिन अपने अन्तःपुरके साथ सुन्दर उपवनमें गये । वहाँ उन्होंने प्रातःकालके समय फूला हुआ कमलोंका एक विशाल वन देखा ॥६६॥


तदेव संकुचद्वीक्ष्य भास्करेऽस्तं यियासति । अनित्यतां श्रियो गत्वा निर्वेदं परमं गतः ॥६७॥

अर्थ: उसी वनको उन्होंने जब सूर्य अस्त होनेको हुआ तब संकुचित होता देखा । इस घटनासे वे लक्ष्मीको अनित्य मानकर परम वैराग्यको प्राप्त हो गये ॥६७॥


ततः पितरमापृच्छ्य मातरं च स बान्धवान् । नाथः पूर्वविधानेन प्रव्रज्यां प्रतिपन्नवान् ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर - पिता, माता और भाइयोंसे पूछकर उन्होंने पूर्व विधिके अनुसार दीक्षा धारण कर ली ॥६८॥


क्षत्रियाणां सहस्त्राणि दशानेन समं ततः । निष्क्रान्तानि परित्यज्य राज्यबन्धुपरिग्रहम् ॥६९॥

अर्थ: इनके साथ अन्य दस हजार क्षत्रियोंने भी राज्य, भाई-बन्धु तथा सब परिग्रहका त्याग कर दीक्षा धारण की थी ॥६९॥


षष्ठोपवासयुक्ताय तस्मै नाथाय पारणाम् । ब्रह्मदत्तो ददौ भक्त्या साकेतनगरोद्भवः ॥७०॥

अर्थ: भगवान्ने तेलाका उपवास धारण किया था सो तीन दिन बाद अयोध्या निवासी ब्रह्मदत्त राजाने उन्हें भक्ति-पूर्वक पारणा करायी थी - आहार दिया था ॥७०॥


चतुर्दशस्वतीतेषु वर्षेष्वस्य ततोऽभवत् । केवलज्ञानमार्हन्त्यं तथा विश्वस्य पूजितम् ॥७१॥

अर्थ: चौदह वर्ष होनेपर उन्हें केवलज्ञान तथा समस्त संसारके द्वारा पूजनीय अर्हन्तपद प्राप्त हुआ ॥७१॥


ततश्चातिशयास्तस्य चतुस्त्रिंशत्समुत्थिताः । अष्टौ च प्रातिहार्याणि द्रष्टव्यानीह पूर्ववत् ॥७२॥

अर्थ: जिस प्रकार भगवान् ऋषभदेवके चौंतीस अतिशय और आठ प्रातिहार्य प्रकट हुए थे उसी प्रकार इनके भी प्रकट हुए ॥७२॥


नवतिस्तस्य संजाता गणेशाः पादसंश्रिताः । साधूनां चोदितं लक्षं दिवाकरसमत्विषाम् ॥७३॥

अर्थ: इनके पाद-मूलमें रहनेवाले नब्बे गणधर थे तथा सूर्यके समान कान्तिको धारण करनेवाले एक लाख साधु थे ॥७३॥


कनीयान् जितशत्रोस्तु ख्यातो विजयसागरः । पत्नी सुमङ्गला तस्य तत्सुतः सगरोऽभवत् ॥७४॥

अर्थ: जितशत्रुके छोटे भाई विजयसागर थे, उनकी स्त्रीका नाम सुमंगला था, सो उन दोनोंके सगर नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥७४॥


बभूवासौ शुभाकारो द्वितीयश्चक्रवर्तिनाम् । निधानैर्नवभिः ख्यातिं यो गतो वसुधातले ॥७५॥

अर्थ: यह सगर शुभ आकारका धारक दूसरा चक्रवर्ती हुआ और पृथ्वीतलपर नौ निधियोंके कारण परम प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ था ॥७५॥


अस्मिन् यदन्तरे वृत्तं श्रेणिकेदं निशम्यताम् । अस्तीह चक्रवालाख्यं पुरं दक्षिणगोचरम् ॥७६॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! इसके समय जो वृत्तान्त हुआ उसे तू सुन । भरतक्षेत्रके विजयार्धकी दक्षिण श्रेणीमें एक चक्रवाल नामका नगर है ॥७६॥


तत्र पूर्णघनो नाम विभुर्व्योमविहारिणाम् । महाप्रभावसंपन्नो विद्याबलसमुन्नतः ॥७७॥

विहायस्तिलकेशं स ययाचे वरकन्यकाम् । नैमित्तिकाज्ञया दत्ता सगराय तु तेन सा ॥७८॥

अर्थ: उसमें पूर्णधन नामका विद्याधरोंका राजा राज्य करता था । वह महा-प्रभावसे युक्त तथा विद्याओंके बलसे उन्नत था । उसने विहायस्तिलक नगरके राजा सुलोचनसे उसकी कन्याकी याचना की पर सुलोचनने अपनी कन्या पूर्णघनको न देकर निमित्तज्ञानीकी आज्ञानुसार सगर चक्रवर्तीके लिए दी ॥७७-७८॥


युद्धं सुलोचनस्योग्रं यावत्पूर्णघनस्य च । गृहीत्वा भगिनीं तावत्सहस्रनयनोऽगमत् ॥७९॥

अर्थ: इधर राजा सुलोचन और पूर्णधनके बीच जब-तक भयंकर युद्ध होता है तबतक सुलोचनका पुत्र सहस्रनयन अपनी बहनको लेकर अन्यत्र चला गया ॥७९॥


निपूत्य च सुनेत्रं स पुरं पूर्णघनोऽविशत् । अदृष्ट्वा च स तां कन्यां स्वपुरं पुनरागतः ॥८०॥

अर्थ: पूर्णधनने सुलोचनको मारकर नगरमें प्रवेश किया परन्तु जब कन्या नहीं देखी तो अपने नगरको वापस लौट आया ॥८०॥


ततः पितृवधात् क्रुद्धः सहस्रनयनोऽबलः । अरण्ये शरमाक्रान्ते स्थितश्छिद्रेक्षणावृतैः ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर पिताका वध सुनकर सहस्रनयन पूर्णमेघपर बहुत ही कुपित हुआ परन्तु निर्बल होनेसे कुछ कर नहीं सका। वह अष्टापद आदि हिंसक जन्तुओं-से भरे वनमें रहता था और सदा पूर्णमेघके छिद्र देखता रहता था ॥८१॥


ततश्चक्रधरोऽश्वेन हृतस्तं देशमागतः । दिष्ट्या चोत्पलमत्यासौ दृष्ट्वा भ्रात्रे निवेदितः ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर एक माया-मयी अश्व सगर चक्रवर्तीको हर ले गया सो वह उसी वनमें आया जिसमें कि सहस्रनयन रहता था। सौभाग्यसे सहस्रनयनकी बहन उत्पलमतीने चक्रवर्तीको देखकर भाईसे यह समाचार कहा ॥८२॥


तुष्टेन तेन सा तस्मै दत्ता सगरचक्रिणे । चक्रिणाप्ययमानीतो विद्याधरमहीशताम् ॥८३॥

अर्थ: सहस्रनयन यह समाचार सुनकर बहुत ही सन्तुष्ट हुआ और उसने उत्पलमती, सगर चक्रवर्तीके लिए प्रदान कर दी। चक्रवर्तीने भी पूर्णघनको विद्याधरोंका राजा बना दिया ॥८३॥


स्त्रीरत्नं तदसौ लब्ध्वा परं तोषमुपागतः । षट्खण्डाधिपतिः सर्वैः पार्थिवैः कृतशासनः ॥८४॥

अर्थ: जो छह खण्डका अधिपति था तथा समस्त राजा जिसका शासन मानते थे ऐसा चक्रवर्ती सगर उस स्त्रीको पाकर बहुत भारी सन्तोषको प्राप्त हुआ ॥८४॥


प्राप्तविद्याभृदैश्येन पुरं पौर्णघनं ततः । रुद्धं सहस्रनेत्रेण प्राकारेणेव सर्वतः ॥८५॥

अर्थ: विद्याधरोंका आधिपत्य पाकर सहस्रनयनने पूर्णघनके नगरको चारों ओरसे कोटके समान घेर लिया ॥८५॥


ततो महति संग्रामे प्रवृत्ते जनसंक्षये । नीतः सहस्रनेत्रेण पूर्णमेघः परासुताम् ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर दोनोंके बीच मनुष्योंका संहार करनेवाला बहुत भारी युद्ध हुआ जिसमें सहस्रनयनने पूर्णमेघको मार डाला ॥८६॥


पुत्रः पूर्णघनस्याथ नाम्ना तोयदवाहनः । परैरुद्वासितश्चक्रवालाद् भ्राम्यन् नभोऽङ्गणे ॥८७॥

अर्थ: तदनन्तर पूर्णघनके पुत्र मेघवाहनको शत्रुओंने चक्रवाल नगरसे निर्वासित कर दिया सो वह आकाशरूपी आँगनमें भ्रमण करने लगा ॥८७॥


खेचरैर्बहुभिः क्रुद्धैरनुयातः सुदुःखितः । अजितं शरणं यातस्त्रैलोक्यसुखकारणम् ॥८८॥

अर्थ: उसे देखकर बहुत-से कुपित विद्याधरोंने उसका पीछा किया सो वह अत्यन्त दुःखी होकर तीन लोकके जीवोंको सुख उत्पन्न करनेवाले भगवान् अजितनाथकी शरणमें पहुँचा ॥८८॥


ततो वज्रधरेणासौ पृष्टस्त्रासस्य कारणम् । अब्रवीत् सगरं प्राप्य मम बन्धुक्षयैः कृतः ॥८९॥

अस्मत्पित्रोरभूद् वैरं नैकजीवविनाशनम् । तेनानुबन्धदोषेण नितान्तक्रूरचेतसा ॥९०॥

सहस्रनयनेनाहं त्रासितः शत्रुणा भृशम् । हंसैः समं समुत्पत्य प्रासादादागतो द्रुतम् ॥९१॥

अर्थ: वहाँ इन्द्रने उससे भयका कारण पूछा। तब मेघवाहनने कहा कि हमारे पिता पूर्णघन और सहस्रनयनके पिता सुलोचनमें अनेक जीवोंका विनाश करनेवाला वैर-भाव चला आ रहा था सो उसी संस्कारके दोषसे अत्यन्त क्रूरचित्तके धारक सहस्रनयनने सगर चक्रवर्तीका बल पाकर मेरे बन्धुजनोंका क्षय किया है। इस शत्रुने मुझे भी बहुत भारी त्रास पहुँचाया है सो मैं महलसे हंसोंके साथ उड़कर शीघ्र ही यहाँ आया हूँ ॥८९-९१॥


ततो जिनसमीपे तं गृहीतुमसहैर्नृपैः । निवेदिते सहस्राक्षः संप्रतस्थे स्वयं रुषा ॥९२॥

कोऽपरोऽस्ति मदुद्वीर्यो येनासौ परिरक्ष्यते । इति संचिन्तयन् प्राप्तो जिनस्य धरणीमसौ ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर जो राजा मेघवाहनका पीछा कर रहे थे उन्होंने सहस्रनयनसे कहा कि वह इस समय भगवान् अजितनाथके समीप है अतः हम उसे पकड़ नहीं सकते। यह सुनकर सहस्रनयन रोषवश स्वयं ही चला और मन ही मन सोचने लगा कि देखें मुझसे अधिक बलवान् दूसरा कौन है जो इसकी रक्षा कर सके। ऐसा सोचता हुआ वह भगवान्के समवसरणमें आया ॥९२-९३॥


प्रभामण्डलमेवासौ दृष्ट्वा दूरे जिनोद्भवम् । सर्वं गर्वं परित्यज्य प्रणनामाजितं विभुम् ॥९४॥

जिनपादसमीपे तौ मुक्तवैरौ ततः स्थितौ । तत्पित्रोश्चरितं पृष्टो गणिना च जिनाधिपः ॥९५॥

अर्थ: सहस्रनयनने ज्यों ही दूरसे भगवान्का प्रभामण्डल देखा त्यों ही उसका समस्त अहंकार चूर-चूर हो गया। उसने भगवान् अजितनाथको प्रणाम किया। सहस्रनयन और मेघवाहन दोनों ही परस्परका वैर-भाव छोड़कर भगवान्के चरणोंके समीप जा बैठे। तदनन्तर गणधरने भगवान्से उन दोनोंके पिताका चरित्र पूछा सो भगवान् निम्न प्रकार कहने लगे ॥९४-९५॥


इदं प्रोवाच भगवान् जम्बूद्वीपस्य भारते । पुरे सदृतुसंज्ञाके भावनो नाम वाणिजः ॥९६॥

भातकीत्यङ्गना तस्य हरिदासश्च तत्सुतः । चतुःकोटीश्वरो भूत्वा यात्रोद्युक्तः स भावनः ॥९७॥

अर्थ: जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें सदृतु नामका नगर था । उसमें भावन नामका एक वणिक् रहता था । उसकी आतकी नामक स्त्री और हरिदास नामक पुत्र था । वह भावन यद्यपि चार करोड़ द्रव्यका स्वामी था तो भी धन कमानेकी इच्छासे देशान्तरकी यात्राके लिए उद्यत हुआ ॥९६-९७॥


पुत्राय सकलं द्रव्यं न्यासत्वेन समर्पयन् । द्यूतादिवर्जनार्थं च शिक्षामस्मै ददौ परम् ॥९८॥

सद्देतुसर्वदोषेभ्य उपदिश्य निवर्तनम् । पुत्राय वाणिजो यातः पोतेन धनतृष्णया ॥९९॥

अर्थ: उसने अपना सब धन धरोहरके रूपमें पुत्रके लिए सौंपते हुए, जुआ आदि व्यसनोंके छोड़नेकी उत्कृष्ट शिक्षा दी । उसने कहा कि ‘हे पुत्र ! ये जुआ आदि व्यसन समस्त दोषोंके कारण हैं इसलिए इनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है’ ऐसा उपदेश देकर वह भावन नामका वणिक् धनकी तृष्णासे जहाजमें बैठकर देशान्तरको चला गया ॥९८-९९॥


उपचारेण वेश्यायामासक्त्या द्यूतमण्डले । सुरायामभिमानेन चतुःकोट्योऽपि नाशिताः ॥१००॥

अर्थ: पिताके चले जानेपर हरिदासने वेश्या-सेवन, जुआकी आसक्ति तथा मदिराके अहंकारवश चारों करोड़ द्रव्य नष्ट कर दिया ॥१००॥


यदासौ निर्जितो द्यूते तदा राज्ञो गृहं गतः । हरिदासो दुराचारो द्रविणार्थं सुरङ्गया ॥१०१॥

आनीयासौ ततो द्रव्यं क्रियाः सर्वाश्चकार सः । स भावनोऽन्यदा गेहमायातो नेक्षते सुतम ॥१०२॥

हरिदासो गतः क्वेति तेन पृष्टा कुटुम्बिनी । सावोचदनया यातश्चौर्यार्थं च सुरङ्गया ॥१०३॥

अर्थ: इस प्रकार जब वह जुआमें सब कुछ हार गया और अन्य जुवाड़ियोंका देनदार हो गया तब वह दुराचारी धनके लिए सुरंग लगाकर राजाके घरमें घुसा तथा वहांसे धन लाकर अपने सब व्यसनोंकी पूर्ति करने लगा । अथानन्तर कुछ समय बाद जब उसका पिता भावन देशान्तरसे घर लौटा तब उसने पुत्रको नहीं देखकर अपनी स्त्रीसे पूछा कि हरिदास कहाँ गया है ? स्त्रीने उत्तर दिया कि वह इस सुरंगसे चोरी करनेके लिए गया है ॥१०१-१०३॥


ततोऽसौ तस्य मरणं शङ्कमानः सुरङ्गया । प्रस्थितश्चौर्यशान्त्यर्थं गृहाभ्यन्तरदत्तया ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर भावनको शंका हुई कि कहीं इस कार्यमें इसका मरण न हो जावे इस शंकासे वह चोरी छुड़ानेके लिए घरके भीतर दी हुई सुरंगसे चला ॥१०४॥


आगच्छता च पुत्रेण कोऽपि वैरी ममेत्यसौ । मण्डलाग्रेण पापेन वराको विनिपातितः ॥१०५॥

अर्थ: उधरसे उसका पुत्र हरिदास वापस लौट रहा था, सो उसने समझा कि यह कोई मेरा वैरी आ रहा है ऐसा समझकर उस पापीने बेचारे भावनको तलवारसे मार डाला ॥१०५॥


विज्ञातोऽसौ ततस्तेन नखश्मश्रुसटादिभिः । स्पृष्ट्वा मम पितेत्येष प्राप्तो दुःखं च दुःसहम् ॥१०६॥

अर्थ: पीछे जब नख, दाढ़ी, मूँछ तथा जटा आदिके स्पर्शसे उसे विदित हुआ कि अरे ! यह तो मेरा पिता है, तब वह दुःसह दुःखको प्राप्त हुआ ॥१०६॥


जनकस्य ततो मृत्युं कृत्वासौ भयविद्रुतः । पर्यटन् दुःखतो देशान् यातः कालेन पञ्चताम् ॥१०७॥

अर्थ: पिताकी हत्या कर वह भयसे भागा और अनेक देशोंमें दुःखपूर्वक भ्रमण करता हुआ मरा ॥१०७॥


कौलेयकौ श्रृगालौ च वृषदंशौ वृषौ तथा । नकुलौ महिषावेतौ जातौ च वृषभौ पुनः ॥१०८॥

अन्योऽन्यस्य ततो घातं कृत्वा तौ भवसंकटे । विदेहे पुष्कलावत्यां मनुष्यत्वमुपागतौ ॥१०९॥

अर्थ: पिता-पुत्र दोनों श्वान हुए, फिर श्रृगाल हुए, फिर मार्जार हुए, फिर बैल हुए, फिर नेवला हुए, फिर भैंसा हुए और फिर बैल हुए । ये दोनों ही परस्परमें एक दूसरेका घात कर मरे और संसाररूपी वनमें भटकते रहे । अन्तमें विदेह क्षेत्रकी पुष्कलावती नगरीमें मनुष्य हुए ॥१०८-१०९॥


उग्रं कृत्वा तपस्तस्मिन्नुत्तरानुत्तराह्वयौ । गत्वा सतारमायातौ जनकौ भवतोरिमौ ॥११०॥

योऽसौ भावननामासीज्जातोऽसौ पूर्णतोयदः । आसीत्तस्य तु यः पुत्रः संजातः स सुलोचनः ॥१११॥

अर्थ: फिर उग्र तपश्चरण कर शतार नामक ग्यारहवें स्वर्गमें उत्तर और अनुत्तर नामक देव हुए । वहाँसे आकर जो भावन नामका पिता था वह पूर्णमेघ विद्याधर हुआ और जो उसका पुत्र था वह सुलोचन नामका विद्याधर हुआ । इसी वैरके कारण पूर्णमेघने सुलोचनको मारा है ॥११०-१११॥


पित्रोरेवं परिज्ञाय भवदुःखविवर्तनम् । भजतं शममुज्झित्वा वैरं संसारकारणम् ॥११२॥

अर्थ: गणधर देवने सहस्रनयन और मेघवाहनको समझाया कि तुम दोनों इस तरह अपने पिताओंके सांसारिक दुःखमय परिभ्रमणको जानकर संसारका कारणभूत वैरभाव छोड़कर साम्यभावका सेवन करो ॥११२॥


चक्रवर्ती ततोऽपृच्छदेतयोः पूर्वजन्मनि । वैरकारणमेवं च भाषितं धर्मचक्रिणा ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर सगर चक्रवर्तीने पूछा कि हे भगवन् ! मेघवाहन और सहस्रनयनका पूर्व जन्ममें वैर क्यों हुआ ? तब धर्मचक्रके अधिपति भगवान्ने उनके वैरका कारण निम्न प्रकार समझाया ॥११३॥


जम्बूद्वीपस्य भरते पुरे पद्मकनामनि । सांख्यिको रम्भनामासीद् विषये प्रथितो धनी ॥११४॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी पद्मक नामक नगरमें गणित शास्त्रका पाठी महाधनवान् रम्भ नामका एक प्रसिद्ध पुरुष रहता था ॥११४॥


शश्यावलिसमाह्वानौ तस्य मैत्रीसमन्वितौ । शिष्यावत्यन्तविख्यातौ धनवन्तौ गुणोत्कटौ ॥११५॥

अर्थ: उसके दो शिष्य थे - एक चन्द्र और दूसरा आवलि । ये दोनों ही परस्पर मैत्री भावसे सहित थे । अत्यन्त प्रसिद्ध धनवान् और गुणोंसे युक्त थे ॥११५॥


मा भूदाभ्यां ममोद्वर्तः संहताभ्यामिति द्रुतम् । तयोः स भेदमकरोन्नयशास्त्रविचक्षणः ॥११६॥

अर्थ: नीतिशास्त्रमें निपुण रम्भने यह विचारकर कि यदि ये दोनों परस्परमें मिले रहेंगे तो हमारा पद भंग कर देंगे, दोनोंमें फूट डाल दी ॥११६॥


गोपालकेन संमन्त्र्य शशी मूल्यार्थमन्यदा । चिक्रीषुर्गां गृहं यावदायातो निजलीलया ॥११७॥

क्रीत्वा दैवनियोगात्तामागच्छन्नावली पुरम् । गच्छता शशिना क्रोधान्निहतो म्लेच्छतामितः ॥११८॥

अर्थ: एक दिन चन्द्र गाय खरीदना चाहता था सो गोपालके साथ सलाह कर मूल्य लेनेके लिए वह सहज ही अपने घर आया था कि भाग्यवश आवलि उसी गायको खरीदकर अपने गांवकी ओर आ रहा था । बीचमें चन्द्रने क्रोधवश उसे मार डाला । आवलि मरकर म्लेच्छ हुआ ॥११७-११८॥


मृतः शशी बलीवर्दो जातो म्लेच्छेन तेन च । हत्वा वैरानुबन्धेन भक्ष्यतामुपपादितः ॥११९॥

अर्थ: और चन्द्र मरकर बैल हुआ सो म्लेच्छने पूर्व वैरके कारण उसे मारकर खा लिया ॥११९॥


तिर्यग्नारकपान्थः सन्म्लेच्छो मूषकतां गतः । अभूच्छश्यपि मार्जारस्तेन हत्वा स भक्षितः ॥१२०॥

अर्थ: म्लेच्छ तिर्यंच तथा नरक योनिमें भ्रमण कर चूहा हुआ और चन्द्रका जीव बैल मरकर बिलाव हुआ सो बिलावने चूहेको मारकर भक्षण किया ॥१२०॥


पापकर्मनियोगेन प्राप्तौ नरकभूमिषु । प्राप्यते सुमहद् दुःखं जन्तुभिर्भवसागरे ॥१२१॥

अर्थ: पाप कर्मके कारण दोनों ही मरकर नरकमें उत्पन्न हुए सो ठीक ही है क्योंकि प्राणी संसाररूपी सागरमें बहुत भारी दुःख पाते ही हैं ॥१२१॥


भूयः संसृत्य काश्यां तौ दासौ जातौ सहोदरौ । दास्याः संभ्रमदेवस्य कूटकार्पटिकाह्वयौ ॥१२२॥

जिनवेश्मनि तौ तेन नियुक्तौ प्रेत्य पुण्यतः । रूपानन्दः सुरूपश्च जातौ भूतगणाधिपौ ॥१२३॥

अर्थ: नरकसे निकलकर दोनों ही बनारसमें संभ्रमदेवकी दासीके कूट और कार्पटिक नामके पुत्र हुए । ये दोनों ही भाई दास थे - दासवृत्तिका काम करते थे सो संभ्रमदेवने उन्हें जिनमन्दिरमें नियुक्त कर दिया । अन्तमें मरकर दोनों ही पुण्यके प्रभावसे रूपानन्द और सुरूप नामक व्यन्तर देव हुए ॥१२२-१२३॥


शशिपूर्वो रजोवल्यां च्युत्वाऽभूत् कुलपुत्रकः । कुलंधरोऽपरः पुष्पभूतिः पुत्रः पुरोधसः ॥१२४॥

अर्थ: रूपानन्द चन्द्रका जीव था और सुरूप आवलिका जीव था सो रूपानन्द चय कर रजोवली नगरीमें कुलन्धर नामका कुलपुत्रक हुआ और सुरूप, पुरोहितका पुत्र पुष्पभूति हुआ ॥१२४॥


मित्रौ तौ सैरिकस्यार्थे प्राप्तौ वैरं ततः स्थितम् । पुष्पभूतिं ततो हन्तुं प्रावर्तत कुलंधरः ॥१२५॥

अर्थ: यद्यपि कुलन्धर और पुष्पभूति दोनों ही मित्र थे तथापि एक हलवाहकके निमित्तसे उन दोनोंमें शत्रुता हो गयी । फलस्वरूप कुलन्धर पुष्पभूतिको मारनेके लिए प्रवृत्त हुआ ॥१२५॥


वृक्षमूलस्थसाधोश्च धर्मं श्रुत्वा प्रशान्तवान् । राज्ञा परीक्षितश्चाभूत् सामन्तः पुण्ययोगतः ॥१२६॥

अर्थ: मार्गमें उसे एक वृक्षके नीचे विराजमान मुनिराज मिले सो उनसे धर्म श्रवण कर वह शान्त हो गया । राजाने उसकी परीक्षा ली और पुण्यके प्रभावसे उसे मण्डलेश्वर बना दिया ॥१२६॥


पुष्पभूतिरिमं दृष्ट्वा धर्माद् विभवमागतम् । जैनो भूत्वा मृतो जातस्तृतीये सुरविष्टपे ॥१२७॥

अर्थ: पुष्पभूतिने देखा कि धर्मके प्रभावसे ही कुलन्धर वैभवको प्राप्त हुआ है इसलिए वह भी जैनी हो गया और मरकर तीसरे स्वर्गमें देव हुआ ॥१२७॥


कुलंधरोऽपि तत्रैव च्युतौ तौ मन्दरावरे । विदेहे धातकीखण्डे जयवत्यामरिंजये ॥१२८॥

सहस्रशिरसो भृत्यौ क्रूरामरधनश्रुती । जातावत्यन्तविक्रान्तावन्तरङ्गौ सुविश्रुतौ ॥१२९॥

अर्थ: कुलन्धर भी उसी तीसरे स्वर्गमें देव हुआ । दोनों ही च्युत होकर धातकी खण्ड द्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें अरिंजय पिता और जयवती माताके पुत्र हुए । एकका नाम क्रूरामर, दूसरेका नाम धनश्रुति था । ये दोनों भाई अत्यन्त शूरवीर एवं सहस्रशीर्ष राजाके विश्वासपात्र प्रसिद्ध सेवक हुए ॥१२८-१२९॥


अन्यदेशः समं ताभ्यां बद्धुं प्रातिष्ठत द्विपम् । प्रीतिमैक्षिष्ट सत्त्वानां जन्मनैव विरोधिनाम् ॥१३०॥

अर्थ: किसी एक दिन राजा सहस्रशीर्ष इन दोनों सेवकोंके साथ हाथी पकड़नेके लिए वनमें गया । वहाँ उसने जन्मसे ही विरोध रखनेवाले सिंह-मृगादि जीवोंको परस्पर प्रेम करते हुए देखा ॥१३०॥


शमिनोऽमी कथं व्याला इति विस्मयमागतः । अविशत् स महारण्यमपश्यच्च महामुनिम् ॥१३१॥

अर्थ: ‘ये हिंसक प्राणी शान्त क्यों हैं ?’ इस प्रकार आश्चर्यको प्राप्त हुए राजा सहस्रशीर्षने ज्यों ही महावनमें प्रवेश किया त्यों ही उसकी दृष्टि महामुनि केवली भगवान्के ऊपर पड़ी ॥१३१॥


ततो राजा समं ताभ्यां तस्य केवलिनोऽन्तिके । प्रव्रज्य निर्वृतिं प्रापच्छतारं तु गताविमौ ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर राजा सहस्रशीर्षने दोनों सेवकोंके साथ केवली भगवान्के पास दीक्षा धारण कर ली । फलस्वरूप राजा तो मोक्षको प्राप्त हुआ और क्रूरामर तथा धनश्रुति शतार स्वर्ग गये ॥१३२॥


शशिपूर्वस्ततश्च्युत्वा जातोऽयं मेघवाहनः । आवली तु सहस्राक्षो वैरं तेनानयोरिदम् ॥१३३॥

अर्थ: इनमें चन्द्रका जीव क्रूरामर तो स्वर्गसे चयकर मेघवाहन हुआ है और आवलिका जीव धनश्रुति सहस्रनयन हुआ है । इस प्रकार पूर्वभवके कारण इन दोनोंमें वैरभाव है ॥१३३॥


प्रीतिर्ममाधिका कस्मात् सहस्रनयने विभो । इति पृष्टो जिनोऽवोचत् सगरेण ततः पुनः ॥१३४॥

भिक्षादानेन साधूनां रम्भोऽमरकुरुं गतः । सौधर्मं च ततश्च्युत्वा जातश्चन्द्रपुरे हरेः ॥१३५॥

नरेन्द्रस्य धरादेव्यां दयितव्रतकीर्तनः । श्रामण्यान्नाकमारुह्य विदेहे त्ववरे च्युतः ॥१३६॥

महाघोषेण चन्द्रिण्यामुत्पन्नो रत्नसंचये । पयोबलो मुनीभूय प्राणतं कल्पमाश्रितः ॥१३७॥

अर्थ: तदनन्तर सगर चक्रवर्तीने भगवान्से पूछा कि हे प्रभो ! सहस्रनयनमें मेरी अधिक प्रीति है सो इसका क्या कारण है ? उत्तरमें भगवान्ने कहा कि जो रम्भ नामा गणित शास्त्रका पाठी था वह मुनियोंको आहारदान देनेके कारण देवकुलमें आर्य हुआ, फिर सौधर्म स्वर्ग गया, वहाँसे च्युत होकर चन्द्रपुर नगरमें राजा हरि और धरा नामकी रानीके व्रतकीर्तन नामका प्यारा पुत्र हुआ । वह मुनिपद धारण कर स्वर्ग गया, वहाँसे च्युत होकर पश्चिम विदेह क्षेत्रके रत्नसंचय नगरमें राजा महाघोष और चन्द्रिणी नामकी रानीके पयोबल नामका पुत्र हुआ । वह मुनि होकर प्राणत नामक चौदहवें स्वर्गमें देव हुआ ॥१३४-१३७॥


प्रच्युत्य भरते जातो नगरे पृथिवीपुरे । यशोधरनरेन्द्रेण जयायां जयकीर्तनः ॥१३८॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर भरत क्षेत्रके पृथिवीपुर नगरमें राजा यशोधर और जया नामकी रानीके जयकीर्तन नामका पुत्र हुआ ॥१३८॥


प्रव्रज्य च पितुः पार्श्वे मृत्वा विजयमाश्रितः । च्युत्वा ततो भवान् जातः सगरश्चक्रलाञ्छनः ॥१३९॥

अर्थ: वह पिताके निकट जिनदीक्षा ले विजय विमानमें उत्पन्न हुआ और वहाँसे चय कर तू सगर चक्रवर्ती हुआ है ॥१३९॥


रम्भस्य भवतो यस्मादावली दयितोऽभवत् । तत्पूर्वोऽयं प्रियोऽद्यापि सहस्राक्षस्ततस्तव ॥१४०॥

अर्थ: जब तू रम्भ था तब आवलिके साथ तेरा बहुत स्नेह था। अब आवलि ही सहस्रनयन हुआ है। इसलिए पूर्वसंस्कारके कारण अब भी तेरा उसके साथ गाढ़ स्नेह है ॥१४०॥


अवगम्य जिनेन्द्रस्यादात्मपित्रोर्भवान्तरम् । उत्पन्नो धर्मसंवेगस्तयोरत्यन्तमुन्नतः ॥१४१॥

अर्थ: इस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्‌के मुखसे अपने तथा पिताके भवान्तर जानकर मेघवाहन और सहस्राक्ष दोनोंको धर्ममें बहुत भारी रुचि उत्पन्न हुई ॥१४१॥


महतो धर्मसंवेगाज्जातौ जातिस्मृतौ ततः । श्रद्धावन्तौ समारब्धौ स्तोतुं तावजितं जिनम् ॥१४२॥

अर्थ: उस धार्मिक रुचिके कारण दोनोंको जाति-स्मरण भी हो गया। तदनन्तर श्रद्धासे भरे मेघवाहन और सहस्रनयन अजितनाथ भगवान्‌की इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥१४२॥


वालिशानामनाथानां सत्त्वानां कारणाद् विना । उपकारं करोषि त्वमाश्चर्यं किमतः परम् ॥१४३॥

अर्थ: हे भगवन् ! जो बुद्धिसे रहित हैं तथा जिनका कोई नाथ - रक्षक नहीं है ऐसे संसारी प्राणियोंका आप बिना कारण ही उपकार करते हैं इससे अधिक आश्चर्य और क्या हो सकता है ॥१४३॥


उपमामुक्तरूपस्य वीर्येणाप्रमितस्य ते । निरीक्षणेन कस्तृप्तो विद्यतेऽस्मिन् जगत्त्रये ॥१४४॥

अर्थ: आपका रूप उपमासे रहित है तथा आप अतुल्य वीर्यके धारक हैं । हे नाथ ! इन तीनों लोकोंमें ऐसा कौन पुरुष है जो आपके दर्शनसे सन्तृप्त हुआ हो ॥१४४॥


लब्धार्थः कृतकृत्योऽपि सर्वदर्शी सुखात्मकः । अचिन्त्यो ज्ञातविज्ञेयस्तथापि जगते हितः ॥१४५॥

अर्थ: हे भगवन् ! यद्यपि आप प्राप्त करने योग्य समस्त पदार्थ प्राप्त कर चुके हैं, कृतकृत्य हैं, सर्वदर्शी हैं, सुखस्वरूप हैं, अचिन्त्य हैं, और जानने योग्य समस्त पदार्थोंको जान चुके हैं तथापि जगत्‌का हित करनेके लिए उद्यत हैं ॥१४५॥


सारधर्मोपदेशाख्यं जीवानां त्वं जिनोत्तम । पततां भवपाताले हस्तालम्बं प्रयच्छसि ॥१४६॥

अर्थ: हे जिनराज ! संसाररूपी अन्धकूपमें पड़ते हुए जीवोंको आप श्रेष्ठ धर्मोपदेशरूपी हस्तावलम्बन प्रदान करते हैं ॥१४६॥


इति तौ गद्गदालापौ वाष्पविप्लुतलोचनौ । परमं हर्षमायातौ प्रणम्य विधिवत्स्थितौ ॥१४७॥

अर्थ: इस प्रकार जिनकी वाणी गद्गद हो रही थी और नेत्र आँसुओंसे भर रहे थे ऐसे परम हर्षको प्राप्त हुए मेघवाहन और सहस्रनयन विधिपूर्वक स्तुति और नमस्कार कर यथास्थान बैठ गये ॥१४७॥


शक्राद्या देववृषभाः सगराद्या नृपाधिपाः । साधवः सिंहवीर्याद्या ययुः परममद्भुतम् ॥१४८॥

अर्थ: सिंहवीर्य आदि मुनि, इन्द्र आदि देव और सगर आदि राजा परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥१४८॥


सदस्यथ जिनेन्द्रस्य रक्षसामधिपाविदम् । ऊचतुर्वचनं भीमसुभीमाविति विश्रुतौ ॥१४९॥

खेचरार्भक धन्योऽसि यस्त्वं शरणमागतः । सर्वज्ञमजितं नाथं तुष्टावावामतस्तव ॥१५०॥

शृणु संप्रति ते स्वास्थ्यं यथा भवति सर्वतः । तं प्रकारं प्रवक्ष्यावः पालनीयस्त्वमावयोः ॥१५१॥

अर्थ: अथानन्तर - जिनेन्द्र भगवान्‌के समवसरणमें राक्षसोंके इन्द्र भीम और सुभीम प्रसन्न होकर मेघवाहनसे कहने लगे कि हे विद्याधरके बालक ! तू धन्य है जो सर्वज्ञ अजित जिनेन्द्रकी शरणमें आया है, हम दोनों तुझपर सन्तुष्ट हुए हैं अतः जिससे तेरी सर्वप्रकारसे स्वस्थता हो सकेगी वह बात हम तुझसे इस समय कहते हैं सो तू ध्यानसे सुन, तू हम दोनोंकी रक्षाका पात्र है ॥१४९-१५१॥


सन्त्यत्र लवणाम्भोधावत्युग्रग्राहसंकटे । अत्यन्तदुर्गमा रम्या महाद्वीपाः सहस्रशः ॥१५२॥

अर्थ: बहुत भारी मगरमच्छोंसे भरे हुए इस लवणसमुद्रमें अत्यन्त दुर्गम्य तथा अतिशय सुन्दर हजारों महाद्वीप हैं ॥१५२॥


क्वचित् क्रीडन्ति गन्धर्वाः किन्नराणां क्वचिद् गणाः । क्वचिच्च यक्षसंघाताः क्वचित्किंपुरुषामराः ॥१५३॥

अर्थ: उन महाद्वीपोंमें कहीं गन्धर्व, कहीं किन्नरोंके समूह, कहीं यक्षोंके झुण्ड और कहीं किंपुरुषदेव क्रीड़ा करते हैं ॥१५३॥


तत्र मध्येऽस्ति स द्वीपो रक्षसां क्रीडनः शुभः । योजनानां शतान्येष सर्वतः सप्त कीर्तितः ॥१५४॥

अर्थ: उन द्वीपोंके बीच एक ऐसा द्वीप है जो राक्षसोंकी शुभ क्रीड़ाका स्थान होनेसे राक्षस द्वीप कहलाता है और सात सौ योजन लम्बा तथा उतना ही चौड़ा है ॥१५४॥


तन्मध्ये मेरुवद् भाति त्रिकूटाख्यो महागिरिः । अत्यन्तदुःप्रवेशो यः शरण्यः सद्गुहागृहैः ॥१५५॥

अर्थ: उस राक्षस द्वीपके मध्यमें मेरु पर्वतके समान त्रिकूटाचल नामक विशाल पर्वत है। वह पर्वत अत्यन्त दुःप्रवेश है और उत्तमोत्तम गुहारूपी गृहोंसे सबको शरण देनेवाला है ॥१५५॥


शिखरं तस्य शैलेन्द्रचूडाकारं मनोहरम् । योजनानि नवोत्तुङ्गं पञ्चाशद्विपुलत्वतः ॥१५६॥

अर्थ: उसकी शिखर सुमेरु पर्वतकी चूलिकाके समान महामनोहर है, वह नौ योजन ऊँचा और पचास योजन चौड़ा है ॥१५६॥


नानारत्नप्रभाजालच्छन्नहेममहातटम् । चित्रवल्लीपरिष्वक्तकल्पद्रुमसमाकुलम् ॥१५७॥

अर्थ: उसके सुवर्णमय किनारे नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्तिके समूहसे सदा आच्छादित रहते हैं तथा नाना प्रकारकी लताओंसे आलिंगित कल्पवृक्ष वहाँ संकीर्णता करते रहते हैं ॥१५७॥


त्रिंशद्योजनमानाधः सर्वतस्तस्य राक्षसी । लङ्केति नगरी भाति रत्नजाम्बूनदालया ॥१५८॥

अर्थ: उस त्रिकूटाचलके नीचे तीस योजन विस्तारवाली लंका नगरी है, उसमें राक्षस वंशियोंका निवास है, और उसके महल नाना प्रकारके रत्नों एवं सुवर्णसे निर्मित हैं ॥१५८॥


मनोहारिभिरुद्यानैः सरोभिश्च सवारिजैः । महद्भिश्चैत्यगेहैश्च सा महेन्द्रपुरीसमा ॥१५९॥

अर्थ: मनको हरण करनेवाले बागबगीचों, कमलोंसे सुशोभित सरोवरों और बड़े-बड़े जिन-मन्दिरोंसे वह नगरी इन्द्रपुरीके समान जान पड़ती है ॥१५९॥


गच्छ तां दक्षिणाशायां मण्डनत्वमुपागताम् । समं बान्धववर्गेण विद्याधर सुखी भव ॥१६०॥

अर्थ: वह लंका नगरी दक्षिण दिशाकी मानो आभूषण ही है। हे विद्याधर ! तू अपने बन्धुवर्गके साथ उस नगरीमें जा और सुखी हो ॥१६०॥


एवमुक्त्वा ददावस्मै हारं राक्षसपुङ्गवः । देवताधिष्ठितं ज्योत्स्नां कुर्वाणं करकोटिभिः ॥१६१॥

अर्थ: ऐसा कहकर राक्षसोंके इन्द्र भीमने उसे देवाधिष्ठित एक हार दिया। वह हार अपनी करोड़ों किरणोंसे चाँदनी उत्पन्न कर रहा था ॥१६१॥


जन्मान्तरसुतप्रीत्या भीमश्चैवं तमब्रवीत् । हारोऽयं तेऽन्त्यदेहस्य युगश्रेष्ठस्य चोदितः ॥१६२॥

अर्थ: जन्मान्तर सम्बन्धी पुत्रकी प्रीतिके कारण उसने वह हार दिया था और कहा था कि हे विद्याधर ! तू चरमशरीरी तथा युगका श्रेष्ठ पुरुष है इसलिए तुझे यह हार दिया है ॥१६२॥


धरण्यन्तर्गतं चान्यद्दत्तं स्वाभाविकं पुरम् । विस्तीर्णभरतार्द्धार्धमधः षड्योजनीगतम् ॥१६३॥

अर्थ: उस हारके सिवाय उसने पृथ्वीके भीतर छिपा हुआ एक ऐसा प्राकृतिक नगर भी दिया जो छह योजन गहरा तथा एक सौ साढ़े इकतीस योजन और डेढ़ कलाप्रमाण चौड़ा था ॥१६३॥


दुःप्रवेशमरातीनां मनसापि महद्गृहम् । अलंकारोदयाभिख्यं स्वर्गतुल्यमभिख्यया ॥१६४॥

अर्थ: उस नगरमें शत्रुओंका शरीर द्वारा प्रवेश करना तो दूर रहा मनसे भी प्रवेश करना अशक्य था। उसमें बड़े-बड़े महल थे, अलंकारोदय उसका नाम था और शोभासे वह स्वर्गके समान जान पड़ता था ॥१६४॥


परचक्रसमाक्रान्तः कदाचिच्चेद्भवेरसिम् । आश्रित्य तत्तदा तिष्ठे रहस्यं वंशसंततेः ॥१६५॥

अर्थ: यदि तुझपर कदाचित् परचक्रका आक्रमण हो तो इस नगरमें खड्गका आश्रय ले सुखसे रहना। यह तेरी वंश-परम्पराके लिए रहस्य-सुरक्षित स्थान है ॥१६५॥


इत्युक्तो राक्षसेशाभ्यां प्राप पूर्णघनात्मजः । प्रमोदं परमं देवं प्रणनाम च सोऽजितम् ॥१६६॥

अर्थ: इस प्रकार राक्षसोंके इन्द्र भीम और सुभीमने पूर्णघनके पुत्र मेघवाहनसे कहा जिसे सुनकर वह परम हर्षको प्राप्त हुआ। वह अजितनाथ भगवान्को नमस्कार कर उठा ॥१६६॥


लब्ध्वा च राक्षसीं विद्यामारुह्येप्सितगत्वरम् । विमानं कामगं नाम प्रस्थितस्तां पुरीमसौ ॥१६७॥

अर्थ: राक्षसोंके इन्द्र भीमने उसे राक्षसी विद्या दी। उसे लेकर इच्छानुसार चलनेवाले कामग नामक विमानपर आरूढ़ हो वह लंकापुरीकी ओर चला ॥१६७॥


ज्ञात्वा लब्धवरं चैतं रक्षोभ्यां सर्वबान्धवाः । याता विकासमम्भोजसंघा इव दिवानने ॥१६८॥

अर्थ: ‘राक्षसोंके इन्द्रने इसे वरदानस्वरूप लंका नगरी दी है’ यह जानकर मेघवाहनके समस्त भाई बान्धव इस प्रकार हर्षको प्राप्त हुए जिस प्रकार कि प्रातःकालके समय कमलोंके समूह विकास भावको प्राप्त होते हैं ॥१६८॥


विमलामलकान्ताद्या विद्याभाजस्तमृद्धिभिः । सुप्रीताः शीघ्रमायाता नन्दयन्तः सुभाषितैः ॥१६९॥

अर्थ: विमल, अमल, कान्त आदि अनेक विद्याधर परम प्रसन्न वैभवके साथ शीघ्र ही उसके समीप आये और अनेक प्रकारके मीठे-मीठे शब्दोंसे उसका अभि- नन्दन करने लगे ॥१६९॥


वेष्टितोऽसौ ततस्तुष्टैः पार्श्वतः पृष्ठतोऽग्रतः । कैश्चिद् द्विरदपृष्ठस्थैः कैश्चित्तुरगयायिभिः ॥१७०॥

जयशब्दकृतारावैः प्राप्तदुन्दुभिनिस्वनैः । श्वेतच्छत्रकृतच्छायैर्ध्वजमालाविभूषितैः ॥१७१॥

विद्याधराणां संघातैः कृताशीर्नमनक्रियः । गच्छन्नभस्तलेऽपश्यँल्लवणार्णवमाकुलम् ॥१७२॥

अर्थ: सन्तोषसे भरे भाई-बन्धुओंसे वेष्टित होकर मेघवाहनने लंकाकी ओर प्रस्थान किया । उस समय कितने ही विद्याधर उसकी बगलमें चल रहे थे, कितने ही पीछे चल रहे थे, कितने ही आगे जा रहे थे, कितने ही हाथियोंकी पीठपर सवार होकर चल रहे थे, कितने ही घोड़ोंपर आरूढ़ होकर चल रहे थे, कितने ही जय-जय शब्द कर रहे थे, कितने ही दुन्दुभियों- का मधुर शब्द कर रहे थे, कितने ही लोगोंपर सफेद छत्रोंसे छाया हो रही थी तथा कितने ही ध्वजाओं और मालाओंसे सुशोभित थे । पूर्वोक्त विद्याधरोंमें कोई तो मेघवाहनको आशीर्वाद दे रहे थे और कोई नमस्कार कर रहे थे । उन सबके साथ आकाशमें चलते हुए मेघवाहनने लवणसमुद्र देखा ॥१७०-१७२॥


आकाशमिव विस्तीर्णं पातालमिव निस्तलम् । तमालवनसंकाशमूर्मिमालासमाकुलम् ॥१७३॥

अर्थ: वह लवणसमुद्र आकाशके समान विस्तृत था, पातालके समान गहरा था, तमालवनके समान श्याम था और लहरोंके समूहसे व्याप्त था ॥१७३॥


अयं जलगतः शैलो ग्राहोऽयं प्रकटो महान् । चलितोऽयं महामीनः समीपैरिति भाषितः ॥१७४॥

अर्थ: मेघवाहनके समीप चलनेवाले लोग कह रहे थे कि देखो यह जलके बीच पर्वत दीख रहा है, यह बड़ा भारी मकर छलांग भर रहा है और इधर यह बृहदाकार मच्छ चल रहा है ॥१७४॥


त्रिकूटशिखराधस्तान्महाप्राकारगोपुराम् । सन्ध्यामिव विलिम्पन्तीं छाययारुणया नभः ॥१७५॥

कुन्दशुभ्रैः समुत्तुङ्गैर्वैजयन्त्युपशोभितैः । मण्डितां चैत्यसंघातैः सप्राकारैः सतोरणैः ॥१७६॥

प्रविष्टो नगरीं लङ्कां प्रविश्य च जिनालयम् । वन्दित्वा स्वोचितागारमध्युवास समङ्गलम् ॥१७७॥

अर्थ: इस प्रकार समुद्रकी शोभा देखते हुए मेघवाहनने त्रिकूटाचलके शिखरके नीचे स्थित लंकापुरीमें प्रवेश किया। वह लंका बहुत भारी प्राकार और गोपुरोंसे सुशोभित थी, अपनी लाल-कान्तिके द्वारा सन्ध्याके समान आकाशको लिप्त कर रही थी, कुन्दके समान सफेद, ऊँचे पताकाओंसे सुशोभित, कोट और तोरणोंसे युक्त जिनमन्दिरोंसे मण्डित थी। लंकानगरीमें प्रविष्ट हो सर्वप्रथम उसने जिनमन्दिरमें जाकर जिनेन्द्रदेवकी वन्दना की और तदनन्तर मंगलोपकरणोंसे युक्त अपने योग्य महलमें निवास किया ॥१७५-१७७॥


इतरेऽपि यथा सद्म निविष्टास्तस्य बान्धवाः । रत्नशोभासमाकृष्टमनोनयनपङ्क्तयः ॥१७८॥

अर्थ: रत्नोंकी शोभासे जिनके नेत्र और नेत्रोंके पंक्तियाँ आकर्षित हो रही थीं ऐसे अन्य भाई-बन्धु भी यथायोग्य महलोंमें ठहर गये ॥१७८॥


अथ किन्नरगीताख्ये पुरे रतिमयूखतः । अनुमत्यां समुत्पन्नां सुप्रमां नाम कन्यकाम् ॥१७९॥

चक्षुर्मानसयोश्चौरीं वसतिं पुष्पधन्वनः । कौमुदीं श्रीकुमुद्वत्या लावण्यजलदीर्घिकाम् ॥१८०॥

संपदा परयोवाह भूषणानां विभूषणीम् । हृषीकाणामशेषाणां प्रमोदस्य विधायिकाम् ॥१८१॥ (विशेषकम्)

अर्थ: अथानन्तर - किन्नरगीत नामा नगरमें राजा रतिमयूख और अनुमति नामक रानीके सुप्रभा नामक कन्या थी । वह कन्या नेत्र और मनको चुरानेवाली थी, कामकी वसतिका थी, लक्ष्मीरूपी कुमुदिनीको विकसित करनेके लिए चाँदनीके समान थी, लावण्यरूपी जलकी वापिका थी, आभूषणोंकी आभूषण थी, और समस्त इन्द्रियोंको हर्ष उत्पन्न करनेवाली थी । राजा मेघवाहनने बड़े वैभवसे उसके साथ विवाह किया ॥१७९-१८१॥


ततः खेचरलोकेन मस्तकोपात्तशासनः । पुरन्दर इव स्वर्गे तत्रासाववसच्चिरम् ॥१८२॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त विद्याधर लोग जिसकी आज्ञाको सिरपर धारण करते थे ऐसा मेघवाहन लंकापुरीमें चिर काल तक इस प्रकार रहता रहा जिस प्रकार कि इन्द्र स्वर्गमें रहता है ॥१८२॥


अथ तस्याभवत् पुत्रः पुत्रजन्माभिकाङ्क्षिणः । महारक्ष इति ख्यातिं यो गतः कौलदेवतीम् ॥१८३॥

अर्थ: कुछ समय बाद पुत्र-जन्मकी इच्छा करनेवाले राजा मेघवाहनके पुत्र उत्पन्न हुआ । वह पुत्र कुल-परम्पराके अनुसार महारक्ष इस नामको प्राप्त हुआ ॥१८३॥


वन्दनायान्यदा यातोऽजितं तोयदवाहनः । वन्दित्वा च निजस्थाने स्थितो विनयसंनतः ॥१८४॥

अर्थ: किसी एक दिन राजा मेघवाहन वन्दनाके लिए अजितनाथ भगवान्‌के समवसरणमें गया । वहाँ वन्दना कर बड़ी विनयसे अपने योग्य स्थानपर बैठ गया ॥१८४॥


तावदन्यकथाच्छेदे प्रणम्य सगरोऽजितम् । पृच्छतीदं शिरः कृत्वा पाणिपङ्कजदन्तुरम् ॥१८५॥

अर्थ: वहाँ जब चलती हुई अन्य कथा पूर्ण हो चुकी तब सगर चक्रवर्तीने हाथ मस्तकसे लगा नमस्कार कर अजितनाथ जिनेन्द्रसे पूछा ॥१८५॥


भगवन्नवसर्पिण्यां भवद्विधजिनेश्वराः । स्वामिनो धर्मचक्रस्य भविष्यन्त्यपरे कति ॥१८६॥

अर्थ: कि हे भगवन् ! इस अवसर्पिणी कालमें आगे चलकर आपके समान धर्मचक्रके स्वामी अन्य कितने तीर्थंकर होंगे ? ॥१८६॥


कति वा समतिक्रान्ता जगत्त्रयसुखप्रदाः । भवद्विधनरोत्पत्तिराश्चर्यं भुवनत्रये ॥१८७॥

अर्थ: और तीनों जगत्‌के जीवोंको सुख देनेवाले कितने तीर्थंकर पहले हो चुके हैं ? यथार्थमें आप जैसे मनुष्योंकी उत्पत्ति तीनों लोकोंमें आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली है ॥१८७॥


कति वा रत्नचक्राङ्कलक्ष्मीभाजः प्रकीर्तिताः । हलिनो वासुदेवाश्च कियन्तस्तद्द्विषस्तथा ॥१८८॥

अर्थ: चौदह रत्न और सुदर्शन चक्रसे चिह्नित लक्ष्मीके धारक चक्रवर्ती कितने होंगे ? इसी तरह बलभद्र, नारायण और प्रति-नारायण भी कितने होंगे ॥१८८॥


एवं पृष्टो जिनो वाक्यमुवाच सुरदुन्दुभेः । तिरस्कुर्वन्महाध्वानं जनितश्रवणोत्सवम् ॥१८९॥

अर्थ: इस प्रकार सगर चक्रवर्तीके पूछनेपर भगवान् अजितनाथ निम्नांकित वचन बोले । उसके वे वचन देव-दुन्दुभिके गम्भीर शब्दका तिरस्कार कर रहे थे तथा कानोंके लिए परम आनन्द उत्पन्न करनेवाले थे ॥१८९॥


भाषाऽर्द्धमागधी तस्य भाषमाणस्य नाधरौ । चकार स्पन्दसंयुक्तावहो चित्रमिदं परम् ॥१९०॥

अर्थ: भगवान्‌की भाषा अर्धमागधी भाषा थी और बोलते समय उनके ओठोंको चंचल नहीं कर रही थी। यह बड़े आश्चर्य की बात थी ॥१९०॥


उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योर्धर्मतीर्थप्रवर्तिनः । चतुर्विंशतिसंख्यानाः प्रत्येकं सगरोदिताः ॥१९१॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे सगर ! प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीमें धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति करनेवाले चौबीस-चौबीस तीर्थंकर होते हैं ॥१९१॥


मोहान्धध्वान्तसंछन्नं कृत्स्नमासीदिदं जगत् । धर्मसंचेतनामुक्तं निष्पाखण्डमराजकम् ॥१९२॥

यदा तदा समुत्पन्नो नाभेयो जिनपुङ्गवः । राजन् तेन कृतः पूर्वः कालः कृतयुगाभिधः ॥१९३॥

अर्थ: जिस समय यह समस्त संसार मोहरूपी गाढ़ अन्धकारसे व्याप्त था, धर्मकी चेतनासे शून्य था, समस्त पाखण्डोंका घर और राजासे रहित था उस समय राजा नाभिके पुत्र ऋषभदेव नामक प्रथम तीर्थंकर हुए थे, हे राजन् ! सर्वप्रथम उन्हींके द्वारा इस कृत युगकी स्थापना हुई थी ॥१९२-१९३॥


कल्पिताश्च त्रयो वर्णाः क्रियाभेदविधानतः । सस्यानां च समुत्पत्तिर्जायते कल्पतोयतः ॥१९४॥

अर्थ: उन्हींने क्रियाओंमें भेद होनेसे क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णोंकी कल्पना की थी । उनके समयमें मेघोंके जलसे धान्योंकी उत्पत्ति हुई थी ॥१९४॥


सृष्टाः काले च तस्यैव माहनाः सूत्रधारिणः । सुतेन भरताख्येन तस्य तत्समतेजसा ॥१९५॥

अर्थ: उन्हींके समय उनके समान तेजके धारक भरतपुत्रने यज्ञोपवीतको धारण करनेवाले ब्राह्मणोंकी भी रचना की थी ॥१९५॥


आश्रमश्च समुत्पन्नः सागारेतरभेदतः । विज्ञानानि कलाश्चैव नाभेयेनैव देशिताः ॥१९६॥

अर्थ: सागार और अनगारके भेदसे दो प्रकारके आश्रम भी उन्हींके समय उत्पन्न हुए थे । समस्त विज्ञान और कलाओंके उपदेश भी उन्हीं भगवान् ऋषभदेवके द्वारा दिये गये थे ॥१९६॥


दीक्षामास्थाय तेनैव जन्मदुःखानलाहताः । भव्याः कृतात्मकृत्येन नीताः सौख्यं शमाम्बुना ॥१९७॥

अर्थ: दीक्षा लेकर भगवान् ऋषभदेवने अपना कार्य किया और जन्म सम्बन्धी दुःखाग्निसे पीड़ित अन्य भव्य जीवोंको शान्तिरूप जलके द्वारा सुख प्राप्त कराया ॥१९७॥


त्रैलोक्यमपि संभूय यस्यौपम्यादपेयुषाम् । गुणानामशकं गन्तुमन्तमात्मसमुद्यतेः ॥१९८॥

अर्थ: तीन लोकके जीव मिलकर इकट्ठे हो जावें तो भी आत्मतेजसे सुशोभित भगवान् ऋषभदेवके अनुपम गुणोंका अन्त प्राप्त करनेके लिए समर्थ नहीं हो सकते ॥१९८॥


अष्टापदनगारूढो यः शरीरविसृष्टये । दृष्टः सुरासुरैर्हेमकूटाकारः सविस्मयैः ॥१९९॥

अर्थ: शरीर त्याग करनेके लिए जब भगवान् ऋषभदेव कैलास पर्वतपर आरूढ़ हुए थे तब आश्चर्यसे भरे सुर और असुरोंने उन्हें सुवर्णमय शिखरके समान देखा था ॥१९९॥


शरणं प्राप्य तं नाथं मुनयो भरतादयः । महाव्रतधरा याताः पदं सिद्धेः समाश्रिताः ॥२००॥

अर्थ: उनकी शरणमें जाकर महाव्रत धारण करनेवाले कितने ही भरत आदि मुनि निर्वाण धामको प्राप्त हुए हैं ॥२००॥


पुण्यं केचिदुपादाय स्वर्गसौख्यमुपागताः । स्वभावार्जवसंपन्नाः केचिन्मानुष्यकं परम् ॥२०१॥

अर्थ: कितने ही पुण्य उपार्जन कर स्वर्ग सुखको प्राप्त हैं, और स्वभावसे ही सरलताको धारण करनेवाले कितने ही लोग उत्कृष्ट मनुष्य पदको प्राप्त हुए हैं ॥२०१॥


नितान्तोज्ज्वलमप्यन्ये ददृशुस्तस्य नो मतम् । कुदृष्टिरागसंयुक्ताः कौशिका इव भास्करम् ॥२०२॥

अर्थ: यद्यपि उनका मत अत्यन्त उज्ज्वल था तो भी मिथ्यादर्शनरूपी रागसे युक्त मनुष्य उसे उस तरह नहीं देख सके थे जिस तरह कि उल्लू सूर्यको नहीं देख सकते हैं ॥२०२॥


ते कुधर्मं समास्थाय कुदेवत्वं प्रपद्य च । पुनस्तिर्यक्षु दुश्चेष्टा भ्रमन्ति नरकेषु च ॥२०३॥

अर्थ: ऐसे मिथ्यादृष्टि लोग कुधर्मकी श्रद्धा कर नीचे देवोंमें उत्पन्न होते हैं । फिर तिर्यंचोंमें दुष्ट चेष्टाएँ कर नरकोंमें भ्रमण करते हैं ॥२०३॥


अनेकेऽत्र ततोऽतीते काले रत्नालयोपमे । नाभेययुगविच्छेदे जाते नष्टसमुत्सवे ॥२०४॥

अवतीर्य दिवो मूर्ध्नः कर्तुं कृतयुगं पुनः । उद्भूतोऽस्मि हिताधायी जगतामजितो जिनः ॥२०५॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत काल व्यतीत हो जानेपर जब समुद्रके समान गम्भीर ऋषभदेवका युग - तीर्थ विच्छिन्न हो गया और धार्मिक उत्सव नष्ट हो गया तब सर्वार्थसिद्धिसे चयकर फिरसे कृतयुगकी व्यवस्था करनेके लिए जगत्का हित करनेवाला मैं दूसरा अजितनाथ तीर्थंकर उत्पन्न हुआ हूँ ॥२०४-२०५॥


आचाराणां विघातेन कुदृष्टीनां च संपदा । धर्मं ग्लानिपरिप्राप्तमुच्छ्रयन्ते जिनोत्तमाः ॥२०६॥

अर्थ: जब आचारके विघात और मिथ्यादृष्टियोंके वैभवसे समीचीन धर्म ग्लानिको प्राप्त हो जाता है - प्रभावहीन होने लगता है तब तीर्थंकर उत्पन्न होकर उसका उद्योत करते हैं ॥२०६॥


ते तं प्राप्य पुनर्धर्मं जीवा बान्धवमुत्तमम् । प्रपद्यन्ते पुनर्मार्गं सिद्धस्थानाभिगामिनः ॥२०७॥

अर्थ: संसारके प्राणी उत्कृष्ट बन्धुस्वरूप समीचीन धर्मको पुनः प्राप्त कर मोक्षमार्गको प्राप्त होते हैं और मोक्ष स्थानकी ओर गमन करने लगते हैं अर्थात् विच्छिन्न मोक्षमार्ग फिरसे चालू हो जाता है ॥२०७॥


ततो मयि गते मोक्षमुत्पत्स्यन्ते जिनाधिपाः । द्वाविंशतिः क्रमादन्ये त्रिलोकोद्योतकारिणः ॥२०८॥

अर्थ: तदनन्तर जब मैं मोक्ष चला जाऊँगा तब क्रमसे तीनों लोकोंका उद्योत करनेवाले बाईस तीर्थंकर और उत्पन्न होंगे ॥२०८॥


ते च मत्सदृशाः सर्वे कान्तिवीर्यादिभूषिताः । त्रैलोक्यपूजनप्राप्तेर्ज्ञानदर्शनरूपतः ॥२०९॥

अर्थ: वे सभी तीर्थंकर मेरे ही समान कान्ति, वीर्य आदिसे विभूषित होंगे, मेरे ही समान तीन लोकके जीवोंसे पूजाको प्राप्त होंगे और मेरे ही समान ज्ञानदर्शनके धारक होंगे ॥२०९॥


चक्राङ्कितां श्रियं भुक्त्वा तेषां मध्ये त्रयो जिनाः । प्राप्स्यन्ति ज्ञानसाम्राज्यमनन्तसुखकारणम् ॥२१०॥

अर्थ: उन तीर्थंकरोंमें तीन तीर्थंकर ( शान्ति, कुन्थु, अर ) चक्रवर्तीकी लक्ष्मीका उपभोग कर अनन्त सुखका कारण ज्ञानका साम्राज्य प्राप्त करेंगे ॥२१०॥


तेषां नामानि सर्वेषां मङ्गलानि जगत्त्रये । महात्मनामहं वक्ष्ये मनःशुद्धिकराणि ते ॥२११॥

अर्थ: अब मैं उन सभी महापुरुषोंके नाम कहता हूँ। उनके ये नाम तीनों जगत्में मंगलस्वरूप हैं तथा हे राजन् सगर ! तेरे मनकी शुद्धता करनेवाले हैं ॥२११॥


ऋषभो वृषभः पुंसामतीतः प्रथमो जिनः । वर्तमानोऽजितश्चाहं परिशेषास्तु भाविनः ॥२१२॥

अर्थ: पुरुषोंमें श्रेष्ठ ऋषभनाथ प्रथम तीर्थंकर थे जो हो चुके हैं, मैं अजितनाथ वर्तमान तीर्थंकर हूँ और बाकी बाईस तीर्थंकर भविष्यत् तीर्थंकर हैं ॥२१२॥


संभवः संभवो मुक्तेर्भव्यनन्द्याभिनन्दनः । सुमतिः पद्मतेजाश्च सुपार्श्वश्चन्द्रसंनिभः ॥२१३॥

पुष्पदन्तोऽष्टकर्मान्तः शीतलः शीलसागरः । श्रेयान् श्रेयान् सुचेष्टासु वासुपूज्योऽर्चितः सताम् ॥२१४॥

विमलानन्तधर्माश्च शान्तिकुन्थ्वरकीर्तिताः । मल्लिसुव्रतनामानौ नमिनेमी च विश्रुतौ ॥२१५॥

पार्श्वो वीरजिनेन्द्रश्च जिनशैलीधुरंधरः । देवाधिदेवता एते जीवस्वाम्यव्यवस्थिताः ॥२१६॥

अर्थ: मुक्तिके कारण सम्भवनाथ, भव्य जीवोंको आनन्दित करनेवाले अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ, पद्मप्रभ, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ, अष्टकर्मोंको नष्ट करनेवाले पुष्पदन्त, शीलके सागरस्वरूप शीतलनाथ, उत्तम चेष्टाओंके द्वारा कल्याण करनेवाले श्रेयोनाथ, सत्पुरुषोंके द्वारा पूजित वासुपूज्य, विमलनाथ, अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, सुव्रतनाथ, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और जिनमार्गके धुरन्धर वीरनाथ। ये इस अवसर्पिणी युगके चौबीस तीर्थंकर हैं। ये सभी देवाधिदेव और जीवोंका कल्याण करनेवाले होंगे ॥२१३-२१६॥


जन्मावतारः सर्वेषां रत्नवृष्ट्यभिनन्दितः । मेरौ जन्माभिषेकश्च सुरैः क्षीरोदवारिणा ॥२१७॥

अर्थ: इन सभीका जन्मावतरण रत्नोंकी वर्षासे अभिनन्दित होगा तथा देव लोग क्षीरसागरके जलसे सुमेरु पर्वतपर सबका जन्मा- भिषेक करेंगे ॥२१७॥


उपमानविविर्मुक्तं तेजोरूपं सुखं बलम् । सर्वे जन्मरिपोर्लोके विध्वंसनविधायिनः ॥२१८॥

अर्थ: इन सभीका तेज, रूप, सुख और बल उपमासे रहित होगा और सभी इस संसारमें जन्मरूपी शत्रुका विध्वंस करनेवाले होंगे अर्थात् मोक्षगामी होंगे ॥२१८॥


अस्तं याते महावीरजिनतिग्मांशुमालिनि । लोके पाखण्डखद्योतास्तेजः प्राप्स्यन्ति भूरयः ॥२१९॥

अर्थ: जब भगवान् महावीररूपी सूर्य अस्त हो जायेगा तब इस संसारमें बहुत-से पाखण्डरूपी जुगनू तेजको प्राप्त करेंगे ॥२१९॥


चतुर्गतिकसंसारकूपे ते पतिताः स्वयम् । पातयिष्यन्ति मोहान्धानन्यानप्यसुधारिणः ॥२२०॥

अर्थ: वे पाखण्ड पुरुष इस चतुर्गतिरूप संसार कूपमें स्वयं गिरेंगे तथा मोहसे अन्धे अन्य प्राणियोंको भी गिरावेंगे ॥२२०॥


एकस्त्वत्सदृशोऽतीतश्चक्रचिह्नैः श्रियः पतिः । भवानेको महावीर्यो जनिष्यन्ति दशापरे ॥२२१॥

अर्थ: तुम्हारे समान चक्रांकित लक्ष्मीका अधिपति एक चक्रवर्ती तो हो चुका है, अत्यन्त शक्तिशाली द्वितीय चक्रवर्ती तुम हो और तुम दो के सिवाय दस चक्रवर्ती और होंगे ॥२२१॥


प्रथमो भरतोऽतीतस्सगरस्त्वं च वर्तसे । चक्रलाञ्छितभोगेशा भविष्यन्ति परे नृपाः ॥२२२॥

अर्थ: चक्रवर्तियोंमें प्रथम चक्रवर्ती भरत हो चुके हैं, द्वितीय चक्रवर्ती सगर तुम विद्यमान ही हो और तुम दोके सिवाय चक्रचिह्नित भोगोंके स्वामी निम्नांकित दस चक्रवर्ती राजा और भी होंगे ॥२२२॥


सनत्कुमारविख्यातिर्मघवा नामतोऽपरः । शान्तिकुन्थ्वरनामानः सुभूमध्वनिकीर्तितः ॥२२३॥

अर्थ: ३ सनत्कुमार, ४ मघवा, ५ शान्ति, ६ कुन्थु, ७ अर, ८ सुभूम, ९ महापद्म, १० हरिषेण, ११ जयसेन और १२ ब्रह्मदत्त ॥२२३॥


महापद्मः प्रसिद्धश्च हरिषेणध्वनिस्तथा । जयसेननृपश्चान्यो ब्रह्मदत्तो भविष्यति ॥२२४॥

वासुदेवा भविष्यन्ति नव सार्धं प्रतीश्वरैः । बलदेवाश्च तावन्तो धर्मविन्यस्तचेतसः ॥२२५॥

अर्थ: नौ प्रतिनारायणोंके साथ नौ नारायण होंगे और धर्ममें जिनका चित्त लग रहा है ऐसे बलभद्र भी नौ होंगे ॥२२४-२२५॥


प्रोक्ता एतेऽवसर्पिण्यां जिनप्रभृतयस्तथा । तथैवोत्सर्पिणीकाले भरतैरावताख्ययोः ॥२२६॥

अर्थ: हे राजन् ! जिस प्रकार हमने अवसर्पिणी कालमें होनेवाले तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदिका वर्णन किया है उसी प्रकारके तीर्थंकर आदि उत्सर्पिणी कालमें भी भरत तथा ऐरावत क्षेत्रमें होंगे ॥२२६॥


एवं कर्मवशं श्रुत्वा जीवानां भवसंकटम् । महापुरुषभूतिं च कालस्य च विवर्तनम् ॥२२७॥

अष्टकर्मविमुक्तानां सुखं चोपमयोज्झितम् । जीमूतवाहनश्चक्रे चेतसीदं विचक्षणः ॥२२८॥

अर्थ: इस प्रकार कर्मोंके वश होनेवाला जीवोंका संसारभ्रमण, महापुरुषोंकी उत्पत्ति, कालचक्रका परिवर्तन और आठ कर्मोंसे रहित जीवोंको होनेवाला अनुपम सुख इन सबका विचारकर बुद्धिमान् मेघवाहनने अपने मनमें निम्न विचार किया ॥२२७-२२८॥


कष्टं यैरेव जीवोऽयं कर्मभिः परितप्यते । तान्येवोत्सहते कर्तुं मोहितः कर्ममायया ॥२२९॥

अर्थ: हाय हाय, बड़े दुःखकी बात है कि जिन कर्मोंके द्वारा यह जीव आतापको प्राप्त होता है कर्मरूपी मदिरासे उन्मत्त हुआ यह उन्हीं कर्मोंको करनेके लिए उत्साहित होता है ॥२२९॥


आपातमात्ररम्येषु विषवद् दुःखदायिषु । विषयेषु रतिः का वा दुःखोत्पादनवृत्तिषु ॥२३०॥

अर्थ: जो प्रारम्भमें ही मनोहर दिखते हैं और अन्तमें विषके समान दुःख देते हैं अथवा दुःख उत्पन्न करना ही जिनका स्वभाव है। ऐसे विषयोंमें क्या प्रेम करना है ? ॥२३०॥


कृत्वापि हि चिरं सङ्गं धने कान्तासु बन्धुषु । एकाकिनैव कर्तव्यं संसारे परिवर्तनम् ॥२३१॥

अर्थ: यह जीव धन, स्त्रियों तथा भाई-बन्धुओंका चिरकाल तक संग करता है तो भी संसारमें इसे अकेले ही भ्रमण करना पड़ता है ॥२३१॥


तावदेव जनः सर्वः प्रियत्वेनानुवर्तते । दानेन गृह्यते यावत्सारमेयशिशुर्यथा ॥२३२॥

अर्थ: जिस प्रकार कुत्ताके पिल्लेको जबतक रोटीका टुकड़ा देते रहते हैं तभी तक वह प्रेम करता हुआ पीछे लगा रहता है इसी प्रकार इन संसारके सभी प्राणियोंको जब तक कुछ मिलता रहता है तभी तक ये प्रेमी बनकर अपने पीछे लगे रहते हैं ॥२३२॥


इयता चापि कालेन को गतः सह बन्धुभिः । परलोकं कलत्रैर्वा सुहृद्भिर्बान्धवेन वा ॥२३३॥

अर्थ: इतना भारी काल बीत गया पर इसमें कौन मनुष्य ऐसा है जो भाई-बन्धुओं, स्त्रियों, मित्रों तथा अन्य इष्ट जनोंके साथ परलोकको गया हो ॥२३३॥


नागभोगोपमा भोगा भीमा नरकपातिनः । तेषु कुर्यान्नरः सङ्गं को वा यः स्यात्सचेतनः ॥२३४॥

अर्थ: ये पंचेन्द्रियोंके भोग साँपके शरीरके समान भयंकर एवं नरकमें गिरानेवाले हैं। ऐसा कौन सचेतन - विचारक पुरुष है जो कि इन विषयोंमें आसक्ति करता हो ? ॥२३४॥


अहो परमिदं चित्रं सद्भावेन यदाश्रितान् । लक्ष्मीः प्रतारयत्येव दुष्टत्वं किमतः परम् ॥२३५॥

अर्थ: अहो, सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बातका है कि जो मनुष्य लक्ष्मीका सद्भावनासे आश्रय लेते हैं यह लक्ष्मी उन्हें ही धोखा देती है - ठगती है, इससे बढ़कर दुष्टता और क्या होगी ? ॥२३५॥


स्वप्ने समागमो यद्वत्तद्वद् बन्धुसमागमः । इन्द्रचापसमानं च क्षणमात्रं च तैः सुखम् ॥२३६॥

अर्थ: जिस प्रकार स्वप्नमें होनेवाला इष्ट जनोंका समागम अस्थायी है उसी प्रकार बन्धुजनोंका समागम भी अस्थायी है । तथा बन्धुजनोंके समागमसे जो सुख होता है वह इन्द्रधनुषके समान क्षणमात्रके लिए ही होता है ॥२३६॥


जलबुद्बुदवत्कायः सारेण परिवर्जितः । विद्युल्लताविलासेन सदृशं जीवितं चलम् ॥२३७॥

अर्थ: शरीर पानीके बबूलेके समान सारसे रहित है तथा यह जीवन बिजलीकी चमकके समान चंचल है ॥२३७॥


तस्मात्सर्वमिदं हित्वा संसारावासकारणम् । सहायं परिगृह्णामि धर्ममव्यभिचारिणम् ॥२३८॥

अर्थ: इसलिए संसार-निवासके कारणभूत इस समस्त परिकरको छोड़कर मैं तो कभी धोखा नहीं देनेवाले एक धर्मरूप सहायकको ही ग्रहण करता हूँ ॥२३८॥


महारक्षसि निक्षिप्य राज्यभारं ततः कृती । प्राव्रजत् सोऽजितस्यान्ते महावैराग्यकङ्कटः ॥२३९॥

अर्थ: तदनन्तर ऐसा विचारकर वैराग्यरूपी कवचको धारण करनेवाले बुद्धिमान् मेघवाहन विद्याधरने महाराक्षस नामक पुत्रके लिए राज्यभार सौंपकर अजितनाथ भगवान्के समीप दीक्षा धारण कर ली ॥२३९॥


दशाधिकं शतं तेन साकं खेचरभोगिनाम् । निर्वेदमाप्य निष्क्रान्तं गेहचारकवासतः ॥२४०॥

अर्थ: राजा मेघवाहनके साथ अन्य एक सौ दस विद्याधर भी वैराग्य प्राप्त कर घररूपी बन्दीगृहसे बाहर निकले ॥२४०॥


महारक्षःशशाङ्कोऽपि विश्राणनकरोत्करैः । पूरयन् बान्धवाम्भोधिं रेजे लङ्कानभोऽङ्गणे ॥२४१॥

अर्थ: इस महाराक्षसरूपी चन्द्रमा भी दानरूपी किरणोंके समूहसे बन्धुजनरूपी समुद्रको हुलसाता हुआ लंकारूपी आकाशांगणके बीच सुशोभित होने लगा ॥२४१॥


प्राप्य स्वप्नेऽपि तस्याज्ञां महाविद्याधराधिपाः । संभ्रमाद् बोधमायान्ति कृतमस्तकपाणयः ॥२४२॥

अर्थ: उसका ऐसा प्रभाव था कि बड़े-बड़े विद्याधरोंके अधिपति स्वप्नमें भी उसकी आज्ञा प्राप्त कर हड़बड़ाकर जाग उठते थे और हाथ जोड़कर मस्तकसे लगा लेते थे ॥२४२॥


प्रथिता विमलाभास्य जाता प्राणसमप्रिया । यस्यानुवर्तनं चक्रे छायेव सततानुगा ॥२४३॥

अर्थ: उसकी विमलाभा नामकी प्राणप्रिया वल्लभा थी जो छायाके समान सदा उसके साथ रहती थी ॥२४३॥


अमरोदधिभानुभ्यः परां रक्षःश्रुतिं श्रिताः । तस्य तस्यां समुत्पन्नाः पुत्राः सर्वार्थसंमिताः ॥२४४॥

अर्थ: उसके अमररक्ष, उदधिरक्ष और भानुरक्ष नामक तीन पुत्र हुए । ये तीनों ही पुत्र सब प्रकारके अर्थोंसे परिपूर्ण थे ॥२४४॥


विचित्रकर्मसंपूर्णास्तुङ्गा विस्तारभाजिनः । प्रसिद्धास्तस्य ते पुत्रास्त्रयो लोका इवाभवन् ॥२४५॥

अर्थ: विचित्र-विचित्र कार्योंसे युक्त थे, उत्तुंग अर्थात् उदार थे और जन-धनसे विस्तारको प्राप्त थे इसलिए ऐसे जान पड़ते मानो तीन लोक ही हों ॥२४५॥


प्रवर्त्याजितनाथोऽपि भव्यानां मुक्तिगामिनाम् । पन्थानं प्राप संमेदे निजां प्रकृतिमात्मनः ॥२४६॥

अर्थ: भगवान् अजितनाथ भी मुक्तिगामी भव्य जीवोंको मोक्षका मार्ग प्रवर्ताकर सम्मेद शिखरपर पहुँचे और वहाँसे आत्मस्वभावको प्राप्त हुए - सिद्ध पदको प्राप्त हुए ॥२४६॥


सगरस्य च पत्नीनां सहस्राणां षडुत्तराः । नवतिः शक्रपत्नीनामभवन् तुल्यतेजसाम् ॥२४७॥

सपुत्राणां च पुत्राणां बिभ्रतां शक्तिमुत्तमाम् । जाताः षष्टिः सहस्राणां रत्नस्तम्भसमत्विषाम् ॥२४८॥

अर्थ: सगर चक्रवर्तीके इन्द्राणीके समान तेजको धारण करनेवाली छयानबे हजार रानियाँ थीं और उत्तम शक्तिको धारण करनेवाले एवं रत्नमयी खम्भोंके समान देदीप्यमान साठ हजार पुत्र थे । उन पुत्रोंके भी अनेक पुत्र थे ॥२४७-२४८॥


ते कदाचिदथो याताः कैलासं वन्दनार्थिनः । कम्पयन्तः पदन्यासैर्वसुधां पर्वता इव ॥२४९॥

अर्थ: किसी समय वे सभी पुत्र वन्दनाके लिए कैलास पर्वतपर गये । उस समय वे चरणोंके विक्षेपसे पृथिवीको कँपा रहे थे और पर्वतोंके समान जान पड़ते थे ॥२४९॥


विधाय सिद्धबिम्बानां वन्दनां प्रश्रयान्विताः । गिरेस्ते दण्डरत्नेन परिक्षेपं प्रचक्रिरे ॥२५०॥

अर्थ: कैलास पर्वतपर स्थित सिद्ध प्रतिमाओंकी उन्होंने बड़ी विनयसे वन्दना की और तदनन्तर वे दण्डरत्नसे उस पर्वतके चारों ओर खाईं खोदने लगे ॥२५०॥


आरसातलमूलां तां दृष्ट्वा खातां वसुंधराम् । तेषामालोचनं चक्रे नागेन्द्रः क्रोधदीपितः ॥२५१॥

अर्थ: उन्होंने दण्डरत्नसे पाताल तक गहरी पृथिवी खोद डाली यह देख नागेन्द्रने क्रोधसे प्रज्वलित हो उनकी ओर देखा ॥२५१॥


क्रोधवह्नेस्ततस्तस्य ज्वालाभिर्लीढविग्रहाः । भस्मसाद्भावमायाताः सुतास्ते चक्रवर्तिनः ॥२५२॥

अर्थ: नागेन्द्रकी क्रोधाग्निकी ज्वालाओंसे जिनका शरीर व्याप्त हो गया था ऐसे वे चक्रवर्तीके पुत्र भस्मीभूत हो गये ॥२५२॥


तेषां मध्ये न दग्धौ द्वौ कथमप्यनुकम्पया । जीवितात्मकया शक्त्या विषतो जातया यथा ॥२५३॥

अर्थ: जिस प्रकार विषकी मारक शक्तिके बीच एक जीवक शक्ति भी होती है और उसके प्रभावसे वह कभी-कभी औषधिके समान जीवनका भी कारण बन जाती है इसी प्रकार उस नागेन्द्रकी क्रोधाग्निमें भी जहाँ जलानेकी शक्ति थी वहाँ एक अनुकम्पारूप परिणति भी थी । उसी अनुकम्पारूप परिणतिके कारण उन पुत्रोंके बीचमें भीम, भगीरथ नामक दो पुत्र किसी तरह भस्म नहीं हुए ॥२५३॥


सागरीणामिमं मृत्युं दृष्ट्वा युगपदागतम् । दुःखितौ सगरस्यान्तं यातौ भीमभगीरथौ ॥२५४॥

अर्थ: सगर चक्रवर्तीके पुत्रोंकी इस आकस्मिक मृत्युको देखकर वे दोनों ही दुःखी होकर सगरके पास आये ॥२५४॥


अकस्मात् कथिते मायं प्राणांस्त्याक्षीत्क्षणादिति । पण्डितैरिति संचिन्त्य निषिद्धौ तौ निवेदने ॥२५५॥

अर्थ: सहसा इस समाचारके कहनेपर चक्रवर्ती कहीं प्राण न छोड़ दें ऐसा विचारकर पण्डितजनोंने भीम और भगीरथको यह समाचार चक्रवर्तीसे कहनेके लिए मना कर दिया ॥२५५॥


ततः संभूय राजानो मन्त्रिणश्च कुलागताः । नानाशास्त्रविबुद्धाश्च विनोदज्ञा मनीषिणः ॥२५६॥

अविभिन्नमुखच्छायाः पूर्ववेषसमन्विताः । विनयेन यथापूर्वं सगरं समुपागताः ॥२५७॥

अर्थ: तदनन्तर राजा, कुल क्रमागत मन्त्री, नाना शास्त्रोंके पारगामी और विनोदके जानकार विद्वज्जन एकत्रित होकर चक्रवर्तीके पास गये । उस समय उन सबके मुखकी कान्तिमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं था तथा वेशभूषा भी सबकी पहलेके ही समान थी । सब लोग विनयसे जाकर पहले ही के समान चक्रवर्ती सगरके समीप पहुँचे ॥२५६-२५७॥


नमस्कृत्योपविष्टैस्तैर्यथास्थानं प्रचोदितैः । संज्ञया प्रवयाः कश्चिदिदं वचनमब्रवीत् ॥२५८॥

अर्थ: नमस्कार कर सब लोग जब यथास्थान बैठ गये तब उनके संकेतसे प्रेरित हो एक वृद्धजनने निम्नांकित वचन कहना शुरू किया ॥२५८॥


राजन् सगर पश्य त्वं जगतीमामनित्यताम् । संसारं प्रति यां दृष्ट्वा मानसं न प्रवर्तते ॥२५९॥

अर्थ: हे राजन् सगर ! आप संसारकी इस अनित्यताको तो देखो जिसे देखकर फिर संसारकी ओर मन प्रवृत्त नहीं होता ॥२५९॥


राजासीद्भरतो नाम्ना त्वया समपराक्रमः । दासीव येन षट्खण्डा कृता वश्या वसुंधरा ॥२६०॥

अर्थ: पहले तुम्हारे ही समान पराक्रमका धारी राजा भरत हो गया है जिसने इस छहखण्डकी पृथ्वीको दासीके समान वश कर लिया था ॥२६०॥


तस्यादित्ययशाः पुत्रो बभूवोन्नतविक्रमः । प्रसिद्धो यस्य नाम्नायं वंशः संप्रति वर्तते ॥२६१॥

अर्थ: उसके महापराक्रमी अर्ककीर्ति नामक ऐसा पुत्र हुआ था कि जिसके नामसे यह सूर्यवंश अब तक चल रहा है ॥२६१॥


एवं तस्याप्यभूत् पुत्रस्तस्याप्यन्योऽपरस्ततः । गतास्ते चाधुना सर्वे दर्शनानामगोचरम् ॥२६२॥

अर्थ: अर्ककीर्तिके भी पुत्र हुआ और उसके पुत्रको भी पुत्र हुआ परन्तु इस समय वे सब दृष्टिगोचर नहीं हैं ॥२६२॥


आसतां तावदेते वा नाकलोकेश्वरा अपि । ज्वलिता विभवैर्याताः क्षणाद् दुःखेन भस्मताम् ॥२६३॥

अर्थ: अथवा इन सबको रहने दो, स्वर्गलोकके अधिपति भी जो कि वैभवसे देदीप्यमान रहते हैं क्षणभरमें दुःखसे भस्म हो जाते हैं ॥२६३॥


येऽपि तीर्थंकरा नाम त्रैलोक्यस्याभिनन्दकाः । शरीरं तेऽपि संत्यज्य गच्छन्त्यायुःपरिक्षये ॥२६४॥

अर्थ: अथवा इन्हें भी जाने दो, तीन लोकको आनन्दित करनेवाले जो तीर्थंकर हैं वे भी आयु समाप्त होनेपर शरीरको छोड़कर चले जाते हैं ॥२६४॥


महातरौ यथैकस्मिन्नुषित्वा रजनीं पुनः । प्रभाते प्रतिपद्यन्ते ककुभो दश पक्षिणः ॥२६५॥

एवं कुटुम्ब एकस्मिन् संगमं प्राप्य जन्तवः । पुनः स्वां स्वां प्रपद्यन्ते गतिं कर्मवशानुगाः ॥२६६॥

अर्थ: जिस प्रकार पक्षी रात्रिके समय किसी बड़े वृक्षपर बसकर प्रातःकाल दशों दिशाओंमें चले जाते हैं उसी प्रकार अनेक प्राणी एक कुटुम्बमें एकत्रित होकर कर्मोंके अनुसार फिर अपनी गतिको चले जाते हैं ॥२६५-२६६॥


कैश्चित्तच्चेष्टितं तेषां वपुश्चात्यन्तशोभनम् । विषयीकृतमक्षिभ्यामस्माकं तु कथागतम् ॥२६७॥

अर्थ: किन्हींने उन पूर्व पुरुषोंकी चेष्टाएँ तथा उनका अत्यन्त सुन्दर शरीर अपनी आँखोंसे देखा है परन्तु हम कथामात्रसे उन्हें जानते हैं ॥२६७॥


बलवद्भ्यो हि सर्वेभ्यो मृत्युरेव महाबलः । आनीता निधनं येन बलवन्तो बलीयसा ॥२६८॥

अर्थ: मृत्यु सभी बलवानोंसे अधिक बलवान् है क्योंकि इसने अन्य सभी बलवानोंको परास्त कर दिया है ॥२६८॥


कथं स्फुटति नो वक्षः स्मृत्वा तेषां महात्मनाम् । विनाशं भरतादीनामहो चित्रमिदं परम् ॥२६९॥

अर्थ: अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है कि भरत आदि महापुरुषोंके विनाशका स्मरण कर हमारी छाती नहीं फट रही है ॥२६९॥


फेनोर्मीन्द्रधनुःस्वप्नविद्युद्बुद्बुदसंनिभाः । संपदः प्रियसंपर्का विग्रहाश्च शरीरिणाम् ॥२७०॥

अर्थ: जीवोंकी धनसम्पदाएँ, इष्टसमागम और शरीर, फेन, तरंग, इन्द्रधनुष, स्वप्न, बिजली और बबूलाके समान हैं ॥२७०॥


नास्ति कश्चिन्नरो लोके यो व्रजेदुपमानताम् । यथायममरस्तद्वद्वयं मृत्यूज्झिता इति ॥२७१॥

अर्थ: संसारमें ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है जो इस विषयमें उपमान हो सके कि जिस तरह यह अमर है उसी तरह हम भी अमर रहेंगे ॥२७१॥


येऽपि शोषयितुं शक्ताः समुद्रं ग्रामसंकुलम् । कुर्युर्वा करयुग्मेन चूर्णं मेरुमहीधरम् ॥२७२॥

उद्धर्तुं धरणीं शक्ता ग्रसितुं चन्द्रभास्करौ । प्रविष्टास्तेऽपि कालेन कृतान्तवदनं नराः ॥२७३॥

अर्थ: जो मगरमच्छोंसे भरे समुद्रको सुखानेके लिए समर्थ हैं अथवा अपने दोनों हाथोंसे सुमेरु पर्वतको चूर्ण करनेमें समर्थ हैं अथवा पृथ्वीको ऊपर उठानेमें और चन्द्रमा तथा सूर्यको ग्रसनेमें समर्थ हैं वे मनुष्य भी काल पाकर यमराजके मुखमें प्रविष्ट हुए हैं ॥२७२-२७३॥


मृत्योर्दुर्लङ्घितस्यास्य त्रैलोक्ये वशतां गते । केवलं व्युज्झिताः सिद्धा जिनधर्मसमुद्भवाः ॥२७४॥

अर्थ: तीनों लोकोंके प्राणी इस दुर्लंघनीय मृत्युके वश हो रहे हैं। यदि कोई बाकी छूटे हैं तो जिनधर्मसे उत्पन्न हुए सिद्ध भगवान् ही छूटे हैं ॥२७४॥


यथा ते बहवो याताः कालेन निधनं नृपाः । यास्यामो वयमप्येवं सामान्यं जगतामिदम् ॥२७५॥

अर्थ: जिस प्रकार बहुत-से राजा कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुए हैं उसी प्रकार हम लोग भी विनाशको प्राप्त होंगे। संसारका यह सामान्य नियम है ॥२७५॥


तत्र त्रिलोकसामान्ये वस्तुन्यस्मिन् समागते । शोकं कुर्याद्विबुद्धात्मा को नरो भवकारणम् ॥२७६॥

अर्थ: जो मृत्यु तीन लोकके जीवोंको समान रूपसे आती है उसके प्राप्त होनेपर ऐसा कौन विवेकी पुरुष होगा जो संसारके कारणभूत शोकको करेगा ॥२७६॥


कथायामिति जातायां वीक्ष्यापत्यद्वयं पुनः । मानसे चक्रवर्तीदं चकारेङ्गितकोविदः ॥२७७॥

अर्थ: इस प्रकार वृद्ध मनुष्यके द्वारा यह चर्चा चल रही थी इधर चेष्टाओंके जाननेमें निपुण चक्रवर्तीने सामने सिर्फ दो पुत्र देखे। उन्हें देखकर वह मनमें विचार करने लगा ॥२७७॥


सर्वदा युगपत्सर्वे मां नमन्ति स्म देहजाः । अद्य द्वौ दीनवदनौ नूनं शेषा गताः क्षयम् ॥२७८॥

अर्थ: कि हमेशा सब पुत्र मुझे एक साथ नमस्कार करते थे पर आज दो ही पुत्र दिख रहे हैं और उतनेपर भी इनके मुख अत्यन्त दीन दिखाई देते हैं। जान पड़ता है कि शेष पुत्र क्षयको प्राप्त हो चुके हैं ॥२७८॥


एते चान्यापदेशेन कथयन्ति समागताः । नृपाः कथयितुं साक्षादुदारं दुःखमक्षमाः ॥२७९॥

अर्थ: ये आगत राजा लोग इस भारी दुःखको साक्षात् कहनेमें समर्थ नहीं है इसलिए अन्योक्ति - दूसरेके बहाने कह रहे हैं ॥२७९॥


ततः शोकोरगेणासौ दष्टोऽपि न समत्यजन् । प्राणान् सभ्यवचोमन्त्रैः प्रतिपद्य प्रतिक्रियाम् ॥२८०॥

अर्थ: तदनन्तर सगर चक्रवर्ती यद्यपि शोकरूपी सर्पसे डँसा गया था तो भी सभासदजनोंके वचनरूपी मन्त्रोंसे प्रतिकार - सान्त्वना पाकर उसने प्राण नहीं छोड़े थे ॥२८०॥


कदलीगर्भनिःसारमवेत्य मवजं सुखम् । भगीरथे श्रियं न्यस्य दीक्षां स समशिश्रियत् ॥२८१॥

अर्थ: उसने संसारके सुखको केलेके गर्भके समान निःसार जानकर भगीरथको राज्यलक्ष्मी सौंपी और स्वयं दीक्षा धारण कर ली ॥२८१॥


त्यजतोऽस्य धरित्रीयं नगराकरमण्डिता । मनस्युदात्तलीलस्य जरत्तृणसमाभवत् ॥२८२॥

अर्थ: उत्कृष्ट लीलाको धारण करनेवाला राजा सगर जब इस पृथ्वीका त्याग कर रहा था तब नाना नगर और सुवर्णादिकी खानोंसे सुशोभित यह पृथ्वी उसके मनमें जीर्णतृणके समान तुच्छ जान पड़ती थी ॥२८२॥


सार्द्धं भीमरथेनासौ प्रतिपद्याजितं विभुम् । केवलज्ञानमुत्पद्य सिद्धानां पदमाश्रयत् ॥२८३॥

अर्थ: तदनन्तर सगर चक्रवर्ती भीमरथ नामक पुत्रके साथ अजितनाथ भगवान्की शरणमें गया। वहाँ दीक्षा धारण कर उसने केवलज्ञान प्राप्त किया और तदनन्तर सिद्धपदका आश्रय लिया अर्थात् मुक्त हुआ ॥२८३॥


तनयः सागरेर्जह्नोः कुर्वन् राज्यं भगीरथः । श्रुतसागरयोगीन्द्रं पृष्टवानेवमन्यदा ॥२८४॥

अर्थ: सगर चक्रवर्तीका पुत्र जह्नु का लड़का भगीरथ राज्य करने लगा। किसी एक दिन उसने श्रुतसागर मुनिराजसे पूछा ॥२८४॥


पितामहस्य मे नाथ तनया युगपत्कुतः । कर्मणो मरणं प्राप्ता मध्ये तेषामहं तु न ॥२८५॥

अर्थ: कि हमारे बाबा सगरके पुत्र एक साथ किस कर्मके उदयसे मरणको प्राप्त हुए हैं और उनके बीचमें रहता हुआ भी मैं किस कर्मसे बच गया हूँ ॥२८५॥


अवोचद् भगवान् संघो वन्दनार्थं चतुर्विधः । संमेदं प्रस्थितोऽवापदन्तिकग्रामदर्शनम् ॥२८६॥

अर्थ: भगवान् अजितनाथने कहा कि एक बार चतुर्विधसंघ सम्मेदशिखरकी वन्दनाके लिए जा रहा था सो मार्गमें वह अन्तिक नामक ग्राममें पहुँचा ॥२८६॥


दृष्ट्वा तमन्तिकग्रामो दुर्वचाः सकलोऽहसत् । कुम्भकारस्तु तत्रैको निषिध्य कृतवान् स्तुतिम् ॥२८७॥

अर्थ: संघको देखकर उस अन्तिक ग्रामके सब लोग कुवचन कहते हुए संघकी हँसी करने लगे परन्तु उस ग्राममें एक कुम्भकार था उसने गाँवके सब लोगोंको मना कर संघकी स्तुति की ॥२८७॥


तद्ग्रामवासिनैकेन कृते चौर्ये स भूभृता । परिवेष्ट्याखिलो दग्धो ग्रामो भूर्यपराधकः ॥२८८॥

अर्थ: उस गाँवमें रहनेवाले एक मनुष्यने चोरी की थी सो अविवेकी राजाने सोचा कि यह गाँव ही बहुत अपराध करता है इसलिए घेरा डालकर साराका सारा गाँव जला दिया ॥२८८॥


भस्मसाद्भावमापन्नो यस्मिन् ग्रामोऽत्र वासरे । कुम्भकारो गतः क्वापि मध्यचेता निमन्त्रितः ॥२८९॥

अर्थ: जिस दिन वह गाँव जलाया गया था उस दिन मध्यस्थ परिणामोंका धारक कुम्भकार निमन्त्रित होकर कहीं बाहर गया था ॥२८९॥


कुम्भकारोऽभवन्मृत्वा वाणिजः सुमहाधनः । वराटकसमूहस्तु ग्रामः प्राप्तश्च तेन सः ॥२९०॥

अर्थ: जब कुम्भकार मरा तो वह बहुत भारी धनका अधिपति वैश्य हुआ और गाँवके सब लोग मरकर कौड़ी हुए। वैश्यने उन सब कौड़ियों-को खरीद लिया ॥२९०॥


कुम्भकारोऽभवद्राजा ग्रामोऽसौ मातृवाहकाः । हस्तिना चूर्णितास्तस्य ते चिरं भवमभ्रमन् ॥२९१॥

अर्थ: तदनन्तर कुम्भकारका जीव मरकर राजा हुआ और गाँवके जीव मरकर गिंजाई हुए सो राजाके हाथीसे चूर्ण होकर वे सब गिंजाइयोंके जीव संसारमें भ्रमण करते रहे ॥२९१॥


राजा च श्रमणो भूत्वा देवीभूय च्युतो भवान् । भगीरथः समुत्पन्नो ग्रामस्तु सगराङ्गजाः ॥२९२॥

अर्थ: कुम्भकारके जीव राजाने मुनि होकर देवपद प्राप्त किया और वहाँसे च्युत होकर तू भगीरथ हुआ है तथा गाँवके सब लोग मरकर सगर चक्रवर्तीके पुत्र हुए हैं ॥२९२॥


संघस्य निन्दनं कृत्वा मृत्युमेति भवे भवे । तेनासौ युगपद्ग्रामो जातः स्तुत्या त्वमीदृशः ॥२९३॥

अर्थ: मुनि संघकी निन्दा कर यह मनुष्य भव-भवमें मृत्युको प्राप्त होता है । इसी पापसे गाँवके सब लोग भी एक साथ मृत्युको प्राप्त हुए थे और संघकी स्तुति करनेसे तू इस तरह सम्पन्न तथा दीर्घायु हुआ है ॥२९३॥


श्रुत्वा पूर्वमवानेवमुपशान्तो भगीरथः । बभूव मुनिमुख्यश्च तपोयोग्यं पदं ययौ ॥२९४॥

अर्थ: इस प्रकार भगीरथ भगवान्‌के मुखसे पूर्वभव सुनकर अत्यन्त शान्त हो गया और मुनियोंमें मुख्य बनकर तपके योग्य पदको प्राप्त हुआ ॥२९४॥


वृत्तान्तगतमेतत्ते चरितं सगराश्रितम् । कथितं प्रस्तुतं वक्ष्ये शृणु श्रेणिक सांप्रतम् ॥२९५॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! प्रकरण पाकर यह सगरका चरित्र मैंने तुझसे कहा । अब इस समय प्रकृत कथा कहूँगा सो सुन ॥२९५॥


योऽसौ तत्र महारक्षो नाम विद्याधराधिपः । लङ्कायां कुरुते राज्यं कण्टकैः परिवर्जितम् ॥२९६॥

सोऽन्यदा कमलच्छन्नदीर्घिकाकृतमण्डनम् । नानारत्नप्रभोत्तुङ्गक्रीडापर्वतकारितम् ॥२९७॥

आमोदिकुसुमोद्भासि तरुखण्डविराजितम् । कलकूजितविभ्रान्तशकुन्तगणसंकुलम् ॥२९८॥

रत्नभूमिपरिक्षिप्तं विकासिविविधद्युति । घनपल्लवसच्छायलतामण्डपमण्डितम् ॥२९९॥

अगमत् प्रमदोद्यानमन्तःपुरसमन्वितः । महत्या संपदा युक्तो विद्याबलसमुच्छ्रयः ॥३००॥

अर्थ: अथानन्तर - जो महारक्ष नामा विद्याधरोंका राजा लंकामें निष्कण्टक राज्य करता था विद्याबलसे समुन्नत वह राजा एक समय अन्तःपुरके साथ क्रीड़ा करनेके लिए बड़े वैभवसे उस प्रमदवनमें गया जो कि कमलोंसे आच्छादित वापिकाओंसे सुशोभित था, जिसके बीचमें नाना रत्नोंकी प्रभासे ऊँचा दिखनेवाला क्रीड़ापर्वत बना हुआ था, खिले हुए फूलोंसे सुशोभित वृक्षोंके समूह जिसकी शोभा बढ़ा रहे थे, अव्यक्त मधुर शब्दोंके साथ इधर-उधर मँडराते हुए पक्षियोंके समूहसे व्याप्त था, जो रत्नमयी भूमिसे वेष्टित था, जिसमें नाना प्रकारकी कान्ति विकसित हो रही थी, और जो सघन पल्लवोंकी समीचीन छायासे युक्त लतामण्डपोंसे सुशोभित था ॥२९६-३००॥


तत्र क्रीडितुमारेभे वनिताभिरसौ समम् । कुसुमैस्ताड्यमानश्च ताडयंश्च यथोचितम् ॥३०१॥

अर्थ: राजा महारक्ष उस प्रमदवनमें अपनी स्त्रियोंके साथ कीड़ा करने लगा । कभी स्त्रियाँ उसे फूलोंसे ताड़ना करती थीं और कभी वह फूलोंसे स्त्रियोंको ताड़ना करता था ॥३०१॥


काञ्चित्पादप्रणामेन कुपितामीर्ष्यया स्त्रियम् । सान्त्वयन्नन्यया तेन सान्त्व्यमानः सुलीलया ॥३०२॥

अर्थ: कोई स्त्री अन्य स्त्रीके पास जानेके कारण यदि ईर्ष्यासे कुपित हो जाती थी तो उसे वह चरणोंमें झुककर शान्त कर लेता था । इसी प्रकार कभी आप स्वयं कुपित हो जाता था तो लीलासे भरी स्त्री इसे प्रसन्न कर लेती थी ॥३०२॥


उरसा प्रेरयन् काञ्चित्त्रिकूटतटशोभिना । पीवरस्तनरम्येण प्रेर्यमाणस्तथान्यया ॥३०३॥

अर्थ: कभी यह त्रिकूटाचलके तटके समान सुशोभित अपने वक्षःस्थलसे किसी स्त्री को प्रेरणा देता था तो अन्य स्त्री उसे भी अपने स्थूल स्तनोंके आलिंगनसे प्रेरणा देती थी ॥३०३॥


पश्यन् प्रच्छन्नगात्राणि क्रीडाव्याकुलयोषिताम् । रतिसागरमध्यस्थो नन्दनेऽमरराजवत् ॥३०४॥

अर्थ: इस तरह क्रीड़ामें निमग्न स्त्रियोंके प्रच्छन्न शरीरोंको देखता हुआ यह राजा रतिरूप सागरके मध्यमें स्थित होता हुआ प्रमदवनमें इस प्रकार क्रीड़ा करता रहा जिस प्रकार कि नन्दन वनमें इन्द्र क्रीड़ा करता है ॥३०४॥


अथ वक्त्रे त्रियामायाः परं संकोचमीयुषि । राजीवसंपुटेऽपश्यद् द्विरेफं स निपीडितम् ॥३०५॥

अर्थ: अथानन्तर सूर्य अस्त हुआ और रात्रिका प्रारम्भ होते ही कमलोंके सम्पुट संकोचको प्राप्त होने लगे । राजा महारक्षने एक कमल सम्पुटके भीतर मरा हुआ भौंरा देखा ॥३०५॥


दृष्ट्वा चास्य समुत्पन्ना चिन्तेयं भवनाशिनी । कर्मणो मोहनीयस्य याते शिथिलतां गुणे ॥३०६॥

अर्थ: उसी समय मोहनीय कर्मका उदय शिथिल होनेसे उसके हृदयमें संसार-भ्रमणको नष्ट करनेवाली निम्नांकित चिन्ता उत्पन्न हुई ॥३०६॥


मकरन्दरसासक्तो मूढस्तृप्तिमनागतः । मृतिं मधुकरः प्राप्तो धिगिच्छामन्तवर्जिताम् ॥३०७॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि देखो मकरन्दके रसमें आसक्त हुआ यह मूढ़ भौंरा तृप्त नहीं हुआ इसलिए मरणको प्राप्त हुआ । आचार्य कहते हैं कि इस अन्तरहित अनन्त इच्छाको धिक्कार हो ॥३०७॥


यथायमत्र संसक्तः प्राप्तो मृत्युं मधुव्रतः । प्राप्स्यामो वयमप्येवं सक्ताः स्त्रीमुखपङ्कजे ॥३०८॥

अर्थ: जिस प्रकार इस कमलमें आसक्त हुआ यह भौंरा मृत्युको प्राप्त हुआ है उसी प्रकार स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंमें आसक्त हुए हम लोग भी मृत्युको प्राप्त होंगे ॥३०८॥


यदि तावदयं ध्वस्तो घ्राणेन रसनेन च । कैव वार्ता तदास्मासु पञ्चेन्द्रियवशात्मसु ॥३०९॥

अर्थ: जब कि यह भौंरा घ्राण और रसना इन्द्रियके कारण ही मृत्युको प्राप्त हुआ है तब हम तो पाँचों इन्द्रियोंके वशीभूत हो रहे हैं अतः हमारी बात ही क्या है ? ॥३०९॥


तिर्यग्जातिसमेतस्य युक्तं वास्येदमीहितुम् । वयं तु ज्ञानसंपन्नाः सङ्गमत्र कथं गताः ॥३१०॥

अर्थ: अथवा यह भौंरा तिर्यंच जातिका है - अज्ञानी है अतः इसका ऐसा करना ठीक भी है परन्तु हम तो ज्ञानसे सम्पन्न हैं फिर भी इन विषयोंमें क्यों आसक्त हो रहे हैं ? ॥३१०॥


मधुदिग्धासिधाराया लेहने कीदृशं सुखम् । रसनं प्रत्युतायाति शतधा यत्र खण्डनम् ॥३११॥

अर्थ: शहद लपेटी तलवारकी उस धारके चाटनेमें क्या सुख होता है ? जिसपर पड़ते ही जीभके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं ॥३११॥


विषयेषु तथा सौख्यं कीदृशं नाम जायते । यत्र प्रत्युत दुःखानामुपर्युपरि संततिः ॥३१२॥

अर्थ: विषयोंमें कैसा सुख होता है सो जान पड़ता है उन विषयोंमें जिनमें कि सुखकी बात दूर रही किन्तु दुःखकी सन्तति ही उत्तरोत्तर प्राप्त होती है ॥३१२॥


किम्पाकफलतुल्येभ्यो विषयेभ्यः पराङ्मुखाः । ये नरास्तान्नमस्यामि कायेन वचसा धिया ॥३१३॥

अर्थ: किंपाक फलके समान विषयोंसे जो मनुष्य विमुख हो गये हैं मैं उन सब महापुरुषोंको मन-वचन-कायसे नमस्कार करता हूँ ॥३१३॥


हा कष्टं वञ्चितः पापो दीर्घकालमहं खलैः । विषयैर्विषमासङ्गैर्विषवन्मारणात्मकैः ॥३१४॥

अर्थ: हाय-हाय, बड़े खेदकी बात है कि मैं बहुत समय तक इन दुष्ट विषयोंसे वंचित होता रहा - धोखा खाता रहा । इन विषयोंकी आसक्ति अत्यन्त विषम है तथा विषके समान मारनेवाली है ॥३१४॥


अथात्र समये प्राप्तस्तदुद्यानं महामुनिः । अर्थानुगतया युक्तः श्रुतसागरसंज्ञया ॥३१५॥

अर्थ: अथानन्तर उसी समय उस वनमें श्रुतसागर इस सार्थक नामको धारण करनेवाले एक महामुनिराज वहाँ आये ॥३१५॥


पूर्णः परमरूपेण ह्रेपयन् कान्तितो विधुम् । तिरस्कुर्वन् रविं दीप्त्या जयं स्थैर्येण मन्दरम् ॥३१६॥

अर्थ: श्रुतसागर मुनिराज अत्यन्त सुन्दर रूपसे युक्त थे, वे कान्तिसे चन्द्रमाको लज्जित करते थे, दीप्तिसे सूर्यका तिरस्कार करते थे और धैर्यसे सुमेरुको पराजित करते थे ॥३१६॥


धर्मध्यानप्रसक्तात्मा रागद्वेषविवर्जितः । भग्नत्रिदण्डसंपर्कः कषायाणां शमे रतः ॥३१७॥

अर्थ: उनकी आत्मा सदा धर्मध्यानमें लीन रहती थी, वे राग-द्वेषसे रहित थे, उन्होंने मन-वचन-कायकी निरर्थक प्रवृत्तिरूपी तीन दण्डोंको भग्न कर दिया था, कषायोंके शान्त करनेमें वे सदा तत्पर रहते थे ॥३१७॥


वशीकर्ता हृषीकाणां षट्कायप्राणिवत्सलः । भीतिभिः सप्तभिर्मुक्तो मदाष्टकविवर्जितः ॥३१८॥

अर्थ: वे इन्द्रियोंको वश करनेवाले थे, छह कायके जीवोंसे स्नेह रखते थे, सात भयों और आठ मदोंसे रहित थे ॥३१८॥


साक्षादिव शरीरेण धर्मः संबन्धमागतः । सहितो यतिसङ्घेन महता चारुचेष्टिना ॥३१९॥

अर्थ: उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो साक्षात् धर्म ही शरीरके साथ सम्बन्धको प्राप्त हुआ है। वे मुनिराज उत्तम चेष्टाके धारक बहुत बड़े मुनिसंघसे सहित थे ॥३१९॥


स तत्र विपुले शुद्धे भूतले जन्तुवर्जिते । उपविष्टस्तनुच्छायास्थगिताशेषदिङ्मुखः ॥३२०॥

अर्थ: जिन्होंने अपने शरीरकी कान्तिसे समस्त दिशाओंके अग्रभागको आच्छादित कर दिया था ऐसे वे मुनिराज उस उद्यानके विस्तृत, शुद्ध एवं निर्जन्तुक पृथिवी-तलपर विराजमान हो गये ॥३२०॥


तत्रासीनं विदित्वैनं मुखेभ्यो वनरक्षिणाम् । अभीयाय महारक्षो बिभ्रदुत्कण्ठितं मनः ॥३२१॥

अर्थ: जब राजा महारक्षको वनपालोंके मुखसे वहाँ विराजमान इन मुनिराजका पता चला तो वह उत्कृष्ट हृदयको धारण करता हुआ उनके सम्मुख गया ॥३२१॥


अथास्यातिप्रसन्नास्यकान्तितोयेन पादयोः । कुर्वन् प्रक्षालनं राजा पपात शिवदायिनोः ॥३२२॥

अर्थ: अथानन्तर - अत्यन्त प्रसन्न मुखकी कान्तिरूपी जलके द्वारा प्रक्षालन करता हुआ राजा महारक्ष मुनिराजके कल्याणदायी चरणोंमें जा पड़ा ॥३२२॥


प्रणम्य शेषसङ्घं च पृष्ट्वा क्षेमं च धर्मगम् । अवस्थाय क्षणं धर्मं पर्यपृच्छत् स भक्तितः ॥३२३॥

अर्थ: उसने शेष संघको भी नमस्कार किया, सबसे धर्म सम्बन्धी कुशल-क्षेम पूछी और फिर क्षणभर ठहरकर भक्तिभावसे धर्मका स्वरूप पूछा ॥३२३॥


अथोपशमचन्द्रस्य चित्तस्थस्येव निर्मलैः । दन्तांशुपटलैः कुर्वन् ज्योत्स्नां मुनिरभाषत ॥३२४॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजके हृदयमें जो उपशम भावरूपी चन्द्रमा विद्यमान था उसकी किरणोंके समान निर्मल दाँतोंकी किरणोंके समूहसे चाँदनीको प्रकट हुए मुनिराज कहने लगे ॥३२४॥


अहिंसा नृप सद्भावो धर्मस्योक्तो जिनेश्वरैः । परिवारोऽस्तु शेषोऽस्य सत्यभाषादिरिष्यते ॥३२५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! जिनेन्द्र भगवान्ने एक अहिंसाके सद्भावको ही धर्म कहा है, बाकी सत्यभाषण आदि सभी इसके परिवार हैं ॥३२५॥


यां यां जीवाः प्रपद्यन्ते गतिं कर्मानुभावतः । तत्र तत्र रतिं यान्ति जीवनं प्रतिमोहिताः ॥३२६॥

अर्थ: संसारी प्राणी कर्मोंके उदयसे जिस-जिस गतिमें जाते हैं जीवनके प्रति मोहित होते हुए वे उसी-उसीमें प्रेम करने लगते हैं ॥३२६॥


त्रैलोक्यस्य परित्यज्य लाभं मरणभीरवः । इच्छन्ति जीवनं जीवा नान्यदस्ति ततः प्रियम् ॥३२७॥

अर्थ: एक ओर तीन लोककी प्राप्ति हो रही हो और दूसरी ओर मरणकी सम्भावना हो तो मरणसे डरनेवाले ये प्राणी तीन लोकका लोभ छोड़कर जीवित रहनेकी इच्छा करते हैं इससे जान पड़ता है कि प्राणियोंको जीवनसे बढ़कर और कोई वस्तु प्रिय नहीं है ॥३२७॥


किमत्र बहुनोक्तेन स्वसंवेद्यमिदं ननु । यथा स्वजीवितं कान्तं सर्वेषां प्राणिनां तथा ॥३२८॥

अर्थ: इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है? यह बात तो अपने अनुभवसे ही जानी जा सकती है कि जिस प्रकार हमें अपना जीवन प्यारा है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको भी अपना जीवन प्यारा होता है ॥३२८॥


तस्मादेवंविधं मूढा जीवितं ये शरीरिणाम् । हरन्ति रौद्रकर्माणः पापं तैर्न च किं कृतम् ॥३२९॥

अर्थ: इसलिए जो क्रूरकर्म करनेवाले मूर्ख प्राणी, जीवोंके ऐसे प्रिय जीवनको नष्ट करते हैं उन्होंने कौन-सा पाप नहीं किया ? ॥३२९॥


जन्तूनां जीवितं नीत्वा कर्मभारगुरूकृताः । पतन्ति नरके जीवा लोहपिण्डवदम्भसि ॥३३०॥

अर्थ: जीवोंके जीवनको नष्ट कर प्राणी कर्मोंके भारसे इतने वजनदार हो जाते हैं कि वे पानीमें लोहपिण्ड- के समान सीधे नरकमें ही पड़ते हैं ॥३३०॥


मधु स्रवन्ति ये वाचा हृदये विषदारुणाः । वशे स्थिता हृषीकाणां त्रिःसंध्या दग्धमानसाः ॥३३१॥

अर्थ: जो वचनसे तो मानो मधु झरते हैं पर हृदयमें विषके समान दारुण हैं। जो इन्द्रियोंके वशमें स्थित हैं और बाहरसे जिनका मन त्रैकालिक सन्ध्याओंमें निमग्न रहता है ॥३३१॥


साध्वाचारविनिर्मुक्ता यथाकामविधायिनः । ते भ्रमन्ति दुरात्मानस्तिर्यग्गर्भपरम्पराम् ॥३३२॥

अर्थ: जो योग्य आचारसे रहित हैं और इच्छानुसार मनचाही प्रवृत्ति करते हैं ऐसे दुष्ट जीव तिर्यंचयोनिमें परिभ्रमण करते हैं ॥३३२॥


दुर्लभं सति जन्तुत्वे मनुष्यत्वं शरीरिणाम् । तस्मादपि सुरूपत्वं ततो धनसमृद्धता ॥३३३॥

ततोऽप्यार्यत्वसंभूतिस्ततो विद्यासमागमः । ततोऽप्यर्थज्ञता तस्माद्दुर्लभो धर्मसंगमः ॥३३४॥

अर्थ: सर्वप्रथम तो जीवोंको मनुष्यपद प्राप्त होना दुर्लभ है, उससे अधिक दुर्लभ सुन्दर रूपका पाना है, उससे अधिक दुर्लभ धनसमृद्धिका पाना है, उससे अधिक दुर्लभ आर्यकुलमें उत्पन्न होना है, उससे अधिक दुर्लभ विद्याका समागम होना है, उससे अधिक दुर्लभ हेयोपादेय पदार्थको जानना है और उससे अधिक दुर्लभ धर्मका समागम होना है ॥३३३-३३४॥


कृत्वा धर्मं ततः केचित् सुखं प्राप्य सुरालये । देव्यादिपरिवारेण कृतं मानसगोचरम् ॥३३५॥

अर्थ: कितने ही लोग धर्म करके उसके प्रभावसे स्वर्गमें देवियों आदिके परिवारसे मानसिक सुख प्राप्त करते हैं ॥३३५॥


च्युत्वा गर्भगृहे भूयो विण्मूत्रकृतलेपने । चलत्कृमिकुलाकीर्णे दुर्गन्धेऽत्यन्तदुस्सहे ॥३३६॥

अर्थ: वहाँसे चयकर, विष्ठा तथा मूत्रसे लिप्त बिलबिलाते कीड़ाओंसे युक्त, दुर्गन्धित एवं अत्यन्त दुःसह गर्भगृहको प्राप्त होते हैं ॥३३६॥


चर्मजालकसंछन्नाः पित्तश्लेष्मादिमध्यगाः । जनन्याहारनिष्यन्दं लिहन्तो नाडिकाच्युतम् ॥३३७॥

अर्थ: गर्भमें यह प्राणी चर्मके जालसे आच्छादित रहते हैं, पित्त, श्लेष्मा आदिके बीचमें स्थित रहते हैं और नालद्वारसे च्युत माता द्वारा उपभुक्त आहारके द्रवका आस्वादन करते रहते हैं ॥३३७॥


पिण्डीकृतसमस्ताङ्गा दुःखभारसमर्दिताः । उषित्वा निर्गता लब्ध्वा मनुष्यत्वमनिन्दितम् ॥३३८॥

अर्थ: वहाँ उनके समस्त अंगोपांग संकुचित रहते हैं, और दुःखके भारसे वे सदा पीड़ित रहते हैं। वहाँ रहनेके बाद निकलकर उत्तम मनुष्य पर्याय प्राप्त करते हैं ॥३३८॥


जन्मनः प्रभृति क्रूरा नियमाचारवर्जिताः । सद्दृष्टिरहिताः पापा विषयान् समुपासते ॥३३९॥

अर्थ: सो कितने ही ऐसे पापी मनुष्य जो कि जन्मसे ही क्रूर होते हैं, नियम, आचार-विचारसे विमुख रहते हैं और सम्यग्दर्शनसे शून्य होते हैं, विषयोंका सेवन करते हैं ॥३३९॥


ये कामवशतां याताः सम्यक्त्वपरिवर्जिताः । प्राप्नुवन्तो महादुःखं ते भ्रमन्ति भवार्णवे ॥३४०॥

अर्थ: जो मनुष्य कामके वशीभूत होकर सम्यक्त्व से भ्रष्ट हो जाते हैं वे महादुःख प्राप्त करते हुए संसाररूपी समुद्रमें परिभ्रमण करते हैं ॥३४०॥


परपीडाकरं वाक्यं वर्जनीयं प्रयत्नतः । हिंसायाः कारणं तद्धि सा च संसारकारणम् ॥३४१॥

अर्थ: दूसरे प्राणियोंको पीड़ा उत्पन्न करनेवाला वचन प्रयत्नपूर्वक छोड़ देना चाहिए क्योंकि ऐसा वचन हिंसाका कारण है और हिंसा संसारका कारण है ॥३४१॥


तथा स्तेयं स्त्रियाः सङ्गं महाद्रविणवाञ्छनम् । सर्वमेतत्परित्याज्यं पीडाकारणतां गतम् ॥३४२॥

अर्थ: इसी प्रकार चोरी, परस्त्रीका समागम तथा महापरिग्रहकी आकांक्षा, यह सब भी छोड़नेके योग्य है क्योंकि यह सभी पीड़ाके कारण हैं ॥३४२॥


श्रुत्वा धर्मं समाविष्टो वैराग्यं खेचराधिपः । पप्रच्छ प्रणतिं कृत्वा व्यतीतं भवमात्मनः ॥३४३॥

अर्थ: विद्याधरोंका राजा महारक्ष, मुनिराजके मुखसे धर्मका उपदेश सुनकर वैराग्यको प्राप्त हो गया। तदनन्तर उसने नमस्कार कर मुनिराजसे अपना पूर्व भव पूछा ॥३४३॥


चतुर्ज्ञानोपगूढात्मा विनयेनोपसेदुषे । इति तस्मै समासेन जगाद श्रुतसागरः ॥३४४॥

अर्थ: चार ज्ञानके धारी श्रुतसागरमुनि विनयसे समीपमें बैठे हुए महारक्ष विद्याधरसे संक्षेपपूर्वक कहने लगे ॥३४४॥


भरते पोदनस्थाने हितो नामधरोऽभवत् । माधवीति च भार्यास्य प्रीत्याख्यस्त्वं तयोः सुतः ॥३४५॥

अर्थ: हे राजन् ! भरत क्षेत्रके पोदनपुर नगरमें एक हित नामका मनुष्य रहता था । माधवी उसकी स्त्रीका नाम था और तू उन दोनोंके प्रीति नामका पुत्र था ॥३४५॥


अथ तत्रैव नगरे नृपोऽभूदुदयाचलात् । अर्हच्छ्रियां समुत्पन्नो नाम्ना हेमरथो महान् ॥३४६॥

अर्थ: उसी पोदनपुर नगरमें उदयाचल राजा और अहंच्छी नामकी रानीसे उत्पन्न हुआ हेमरथ नामका राजा राज्य करता था ॥३४६॥


प्रासादे सोऽन्यदा जैने श्रद्धया परयान्वितः । चकार महतीं पूजां लोकविस्मयकारिणीम् ॥३४७॥

अर्थ: एक दिन उसने जिनमन्दिरमें, बड़ी श्रद्धाके साथ, लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाली बड़ी पूजा की ॥३४७॥


तस्मादुत्थितमाकर्ण्य जयशब्दं जनैः कृतम् । जयेत्यानन्दपूर्णेन त्वयापि परिघोषितम् ॥३४८॥

अर्थ: उस पूजाके समय लोगोंने बड़े जोरसे जय-जय शब्द किया, उसे सुनकर तूने भी आनन्दविभोर हो जय-जय शब्द उच्चारण किया ॥३४८॥


अमाते च ततस्तस्मिन् गृहाभ्यन्तरतो मुदा । शिखिनेव घनध्वानान्नर्तनं कृतमङ्गणे ॥३४९॥

अर्थ: तू इस आनन्दके कारण घरके भीतर ठहर नहीं सका इसलिए बाहर निकलकर आँगनमें इस तरह नृत्य करने लगा जिस प्रकार कि मयूर मेघका शब्द सुनकर नृत्य करने लगता है ॥३४९॥


तस्मादुपात्तकुशलो गतः कालेन पञ्चताम् । अजायत महान् यक्षो यक्षनेत्रसमुत्सवः ॥३५०॥

अर्थ: इस कार्यसे तूने जो पुण्य बन्ध किया था उसके फलस्वरूप तू मरकर यक्षोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाला यक्ष हुआ ॥३५०॥


अवरस्मिन् विदेहेऽथ पुरे काञ्चननामनि । साधूनां शत्रुभिः कर्तुमुपसर्गः प्रवर्तितः ॥३५१॥

अर्थ: तदनन्तर किसी दिन पश्चिम विदेहक्षेत्रके कांचनपुर नगरमें शत्रुओंने मुनियोंके ऊपर उपसर्ग करना शुरू किया ॥३५१॥


निर्धाट्य तान् त्वया शत्रून् मुनीनां धर्मसाधनम् । शरीरं रक्षितं तस्मात् पुण्यैराशिरुपार्जितः ॥३५२॥

अर्थ: सो तूने उन शत्रुओंको अलग कर धर्मसाधनमें सहायभूत मुनियोंके शरीरकी रक्षा की । इस कार्यसे तूने बहुत भारी पुण्यका संचय किया ॥३५२॥


विजयार्द्धे ततश्च्युत्वा तडिदङ्गदखेचरात् । श्रीप्रभायां समुद्भूत उदितो नाम विश्रुतः ॥३५३॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँसे च्युत होकर तू विजयार्ध पर्वतपर तडिदंगद विद्याधर और श्रीप्रभा विद्याधरीके उदित नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥३५३॥


वन्दनाय समायातं नाम्ना चामरविक्रमम् । दृष्टवानसि विद्येशं निदानमकरोत्ततः ॥३५४॥

अर्थ: एक बार अमरविक्रम नामक विद्याधरोंका राजा मुनियोंकी वन्दनाके लिए आया था सो उसे देखकर तूने निदान किया कि मेरे भी ऐसा वैभव हो ॥३५४॥


ततो महत्तपस्तप्त्वा कल्पमैशानमाश्रितः । एष प्रच्युत्य भूतोऽसि सांप्रतं घनवाहनिः ॥३५५॥

अर्थ: तदनन्तर महातपश्चरण कर तू दूसरे ऐशान स्वर्गमें देव हुआ और वहाँसे च्युत होकर मेघवाहनका पुत्र महारक्ष हुआ है ॥३५५॥


भास्करस्यन्दनस्येव चक्रेण परिवर्तनम् । कृतं त्वया तु संसारे स्त्रीजिह्वावशवर्तिना ॥३५६॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्यके रथका चक्र निरन्तर भ्रमण करता रहता है इसी प्रकार तूने भी स्त्री तथा जिह्वा इन्द्रियके वशीभूत होकर संसारमें परिभ्रमण किया है ॥३५६॥


यावन्तः समतिक्रान्तास्तव देहा भवान्तरे । पिण्ड्यन्ते यदि ते लोके संभवेयुर्न जातुचित् ॥३५७॥

अर्थ: तूने दूसरे भवोंमें जितने शरीर प्राप्त कर छोड़े हैं यदि वे एकत्रित किये जावें तो तीनों लोकोंमें कभी न समावें ॥३५७॥


कल्पानां कोटिभिस्तृप्तिं सुरभोगैर्न यो गतः । खेचराणां च भोगेन स्वेच्छाकल्पितवृत्तिना ॥३५८॥

अष्टभिर्दिवसैः स त्वं कथं प्राप्स्यसि तर्पणम् । स्वप्नजालोपमैर्भोगैरधुना भज्यतां शमः ॥३५९॥

अर्थ: जो करोड़ों कल्प तक प्राप्त होनेवाले देवोंके भोगोंसे तथा विद्याधरोंके मनचाहे भोग-विलाससे सन्तुष्ट नहीं हो सका वह तू केवल आठ दिन तक प्राप्त होनेवाले स्वप्न अथवा इन्द्रजाल सदृश भोगोंसे कैसे तृप्त होगा ? इसलिए अब भोगोंकी अभिलाषा छोड़ और शान्ति भाव धारण कर ॥३५८-३५९॥


ततस्तस्य विषादोऽभून्नायुःक्षयसमुत्थितः । किंतु संसारचक्रस्थजन्मान्तरविवर्तनात् ॥३६०॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजके मुखसे अपनी आयुका क्षय निकटस्थ जानकर उसे विषाद नहीं हुआ किन्तु ‘इस संसार-चक्रमें अब भी मुझे अनेक भव धारण करना है’ यह जानकर कुछ खेद अवश्य हुआ ॥३६०॥


स्थापयित्वा ततो राज्ये तनयं देवरक्षसम् । युवराजप्रतिष्ठायां तथा भास्कररक्षसम् ॥३६१॥

अर्थ: तदनन्तर उसने अमररक्ष नामक ज्येष्ठ पुत्रको राज्यपदपर स्थापित कर भानुरक्ष नामक लघु पुत्र-को युवराज बना दिया ॥३६१॥


त्यक्त्वा परिग्रहं सर्वं परमार्थपरायणः । स्तम्भतुल्यो महारक्षा लोभेनाभवदुज्झितः ॥३६२॥

अर्थ: और स्वयं समस्त परिग्रहका त्याग कर परमार्थमें तत्पर हो स्तम्भ-के समान निश्चल होता हुआ लोभसे रहित हो गया ॥३६२॥


पानाहारादिकं त्यक्त्वा सर्वं देहस्य पालनम् । समः शत्रौ च मित्रे च मनः कृत्वा सुनिश्चलम् ॥३६३॥

मौनव्रतं समास्थाय जिनप्रासादमध्यगः । कृत्वा समहतीं पूजामर्हतामभिषेकिणीम् ॥३६४॥

अर्थ: शरीरका पोषण करनेवाले आहार-पानी आदि समस्त पदार्थोंका त्याग कर वह शत्रु तथा मित्रमें सम - मध्यस्थ बन गया और मनको निश्चल कर मौन व्रत ले जिन-मन्दिरके मध्यमें बैठ गया । इन सब कार्योंके पहले उसने अर्हन्त भगवान्की अभिषेकपूर्वक विशाल पूजा की ॥३६३-३६४॥


अर्हत्पदपरिध्यानपवित्रीकृतचेतनः । कृत्वा समाधिना कालं स बभूव सुरोत्तमः ॥३६५॥

अर्थ: अर्हन्त भगवान्के चरणोंके ध्यानसे जिसकी चेतना पवित्र हो गयी थी ऐसा वह विद्याधर समाधिमरण कर उत्तम देव हुआ ॥३६५॥


अथ किन्नरगीताख्ये पुरे श्रीधरनामतः । विद्याजातां रतिं जायां देवरक्षाः प्रपन्नवान् ॥३६६॥

अर्थ: अथानन्तर अमररक्षने, किन्नरगीत नामक नगरमें श्रीधर राजा और विद्या रानीसे समुत्पन्न रति नामक स्त्रीको प्राप्त किया अर्थात् उसके साथ विवाह किया ॥३६६॥


गन्धर्वगीतनगरे सुरसंनिभनामतः । गान्धारीगर्भसंभूतां गन्धर्वां भानुरूढवान् ॥३६७॥

अर्थ: और भानुरक्षने गन्धर्व-गीत नगरमें राजा सुरसन्निभ और गान्धारी रानीके गर्भसे उत्पन्न, गन्धर्वा नामकी कन्याके साथ विवाह किया ॥३६७॥

५. पञ्चमं पर्व (राक्षसवंशाधिकारः) (जारी)

सुता दश समुत्पन्ना मनोज्ञा देवरक्षसः । देवाङ्गनासरूपाश्च षट् कन्या गुणभूषणाः ॥३६८॥

अर्थ: अमररक्षके अत्यन्त सुन्दर दस पुत्र और देवांगनाओंके समान सुन्दर रूप-वाली, गुणरूप आभूषणोंसे सहित छह पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥३६८॥


तावन्त एव चोत्पन्नाः सुताः कन्याश्च तत्समाः । आदित्यरक्षसो राज्ञः कीर्तिव्याप्तदिगन्तराः ॥३६९॥

अर्थ: इस प्रकार भानुरक्षके भी अपनी कीर्तिके द्वारा दिग्दिगन्तको व्याप्त करनेवाले दस पुत्र और छह पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥३६९॥


स्वनामसहनामानि महान्ति नगराणि तैः । निवेशितानि रम्याणि श्रेणिकैतानि जित्वरैः ॥३७०॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! उन विजयी राजपुत्रोंने अपने नामके समान नामवाले बड़े-बड़े सुन्दर नगर बसाये ॥३७०॥


सन्ध्याकारः सुवेलश्च मनोह्लादो मनोहरः । हंसद्वीपो हरिर्योधः समुद्रः काञ्चनस्तथा ॥३७१॥

अर्धस्वर्गोत्कटश्चापि निविशाः स्वर्गसंनिभाः । गीर्वाणरक्षसः पुत्रैर्महाबुद्धिपराक्रमैः ॥३७२॥

अर्थ: उन नगरोंके नाम सुनो - १ सन्ध्याकार, २ सुवेल, ३ मनोह्लाद, ४ मनोहर, ५ हंसद्वीप, ६ हरि, ७ योध, ८ समुद्र, ९ कांचन और १० अर्धस्वर्गोत्कृष्ट । स्वर्गकी समानता रखनेवाले ये दस नगर, महाबुद्धि और पराक्रमको धारण करनेवाले अमररक्षके पुत्रोंने बसाये थे ॥३७१-३७२॥


आवर्तविघटाम्भोदा उत्कटस्फुटदुर्ग्रहाः । तटतोयावलीरत्नद्वीपाश्चाभान्ति राक्षसैः ॥३७३॥

अर्थ: इसी प्रकार १ आवर्त, २ विघट, ३ अम्भोद, ४ उत्कट, ५ स्फुट, ६ दुर्ग्रह, ७ तट, ८ तोय, ९ आवली और रत्नद्वीप ये दस नगर भानुरक्षके पुत्रोंने बसाये थे ॥३७३॥


नानारत्नकृतोद्योता हेमभित्तिप्रभासुराः । राक्षसानां बभूवुस्ते निवासाः क्रीडनार्थिनाम् ॥३७४॥

अर्थ: जिनमें नाना रत्नोंका उद्योत फैल रहा था तथा जो सुवर्णमयी दीवालोंके प्रकाशसे जगमगा रहे थे ऐसे वे सभी नगर क्रीड़ाके अभिलाषी राक्षसोंके निवास हुए थे ॥३७४॥


तत्रैव खेचरैरेभिर्द्वीपान्तरसमाश्रितैः । संनिवेशा महोत्साहैर्नगराणां प्रकल्पिताः ॥३७५॥

अर्थ: वहींपर दूसरे द्वीपोंमें रहनेवाले विद्याधरोंने बड़े उत्साहसे अनेक नगरोंकी रचना की थी ॥३७५॥


ततस्तौ पुत्रयो राज्यं दत्वा दीक्षां समाश्रितौ । महातपोधनौ भूत्वा पदं यातौ सनातनम् ॥३७६॥

अर्थ: अथानन्तर - अमररक्ष और भानुरक्ष दोनों भाई, पुत्रोंको राज्य देकर दीक्षाको प्राप्त हुए और महातमरूपी धनके धारक हो सनातन सिद्ध पदको प्राप्त हुए ॥३७६॥


एवं महति संताने प्रवृत्ते घानवाहने । महापुरुषनिर्व्यूढराज्यप्राव्रज्यवस्तुनि ॥३७७॥

अर्थ: इस प्रकार जिसमें बड़े-बड़े पुरुषों द्वारा पहले तो राज्य पालन किया गया और तदनन्तर दीक्षा धारण की गयी ऐसी राजा मेघवाहनकी बहुत बड़ी सन्तानकी परम्परा क्रमपूर्वक चलती रही ॥३७७॥


रक्षसस्तनयो जातो मनोवेगाङ्कधारिणः । राक्षसो नाम यस्यायं नाम्नां वंशः प्रकीर्त्यते ॥३७८॥

अर्थ: उसी सन्तान-परम्परामें एक मनोवेग नामक राक्षसके, राक्षस नामका ऐसा प्रभावशाली पुत्र हुआ कि उसके नामसे यह वंश ही राक्षस वंश कहलाने लगा ॥३७८॥


तस्यादित्यगतिर्जातो बृहत्कीर्तिश्च नन्दनः । योषायां सुप्रभाख्यायां रविचन्द्रसमप्रभौ ॥३७९॥

अर्थ: राजा राक्षसके सुप्रभा नामकी रानी थी, उससे उसके आदित्यगति और बृहत्कीर्ति नामके दो पुत्र हुए। ये दोनों ही पुत्र सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिसे युक्त थे ॥३७९॥


वृषभौ तौ समासज्य राज्यस्यन्दनजे मरे । श्रमणत्वं समाराध्य देवलोकं समाश्रितः ॥३८०॥

अर्थ: राजा राक्षस, राज्यरूपी रथका भार उठानेमें वृषभके समान उन दोनों पुत्रोंको संलग्न कर तप धर स्वर्गको प्राप्त हुए ॥३८०॥


जाता सदनपद्माख्या भार्यादित्यगतेर्वरा । बृहत्कीर्तिस्तथा पुष्पनखेति परिकीर्तिता ॥३८१॥

अर्थ: उन दोनों भाइयोंमें बड़ा भाई आदित्यगति राजा था और छोटा भाई बृहत्कीर्ति युवराज था। आदित्यगतिकी स्त्रीका नाम सदनपद्मा था और बृहत्कीर्तिकी स्त्री पुष्पनखा नामसे प्रसिद्ध थी ॥३८१॥


अथादित्यगतेः पुत्रो नाम्ना भीमप्रभोऽभवत् । सहस्रं यस्य पत्नीनामभूद्देवाङ्गनारुचाम् ॥३८२॥

अर्थ: आदित्यगतिके भीमप्रभ नामका पुत्र हुआ जिसकी देवांगनाओंके समान कान्तिवाली एक हजार स्त्रियाँ थीं ॥३८२॥


आसीदष्टोत्तरं तस्य पुत्राणां शतमूर्जितम् । स्तम्भैरिव निजं राज्यं धारितै यैः समन्ततः ॥३८३॥

अर्थ: उन स्त्रियोंसे उसके एक सौ आठ बलवान् पुत्र हुए थे। ये पुत्र स्तम्भोंके समान चारों ओरसे अपने राज्यको धारण किये थे ॥३८३॥


आत्मजाय ततो राज्यं वितीर्य ज्यायसे प्रभुः । भीमप्रभः प्रवव्राज प्राप्तश्च परमं पदम् ॥३८४॥

अर्थ: तदनन्तर राजा भीमप्रभने अपने बड़े पुत्रके लिए राज्य देकर दीक्षा धारण कर ली और क्रमसे तपश्चरण कर परमपद प्राप्त कर लिया ॥३८४॥


देवेन राक्षसेन्द्रेण राक्षसद्वीपमण्डले । कृतानुकम्पना ऊषुः सुखेनाम्बरगामिनः ॥३८५॥

अर्थ: इस प्रकार राक्षस देवोंके इन्द्र भीम-सुभीमने जिनपर अनुकम्पा की थी ऐसे मेघवाहनकी वंश-परम्पराके अनेक विद्याधर राक्षसद्वीपमें सुखसे निवास करते रहे ॥३८५॥


रक्षन्ति रक्षसां द्वीपं पुण्येन परिरक्षिताः । राक्षसा नामतो द्वीपं प्रसिद्धं तदुपागतम् ॥३८६॥

अर्थ: पुण्य जिनकी रक्षा कर रहा था ऐसे राक्षसवंशी विद्याधर चूँकि उस राक्षसजातीय देवोंके द्वीपकी रक्षा करते थे इसलिए वह द्वीप राक्षस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ और उस द्वीपके रक्षक विद्याधर राक्षस कहलाने लगे ॥३८६॥


एष राक्षसवंशस्य संभवः परिकीर्तितः । वंशप्रधानपुरुषान् कीर्तयिष्याम्यतः परम् ॥३८७॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! यह राक्षसवंशकी उत्पत्ति मैंने तुझसे कही । अब आगे इस वंशके प्रधान पुरुषोंका उल्लेख करूँगा । सो सुन ॥३८७॥


पुत्रो भीमप्रभस्याद्यः पूजार्हो नाम विश्रुतः । प्रवव्राज श्रियं न्यस्य तनये जितभास्करे ॥३८८॥

अर्थ: भीमप्रभका प्रथम पुत्र पूजार्ह नामसे प्रसिद्ध था सो वह अपने जितभास्कर नामक पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर दीक्षित हुआ ॥३८८॥


सोऽपि संपरिकीर्त्याख्ये स्थापयित्वा श्रियं सुते । प्राव्रजत् सोऽपि सुग्रीवे निधाय प्राप दीक्षणम् ॥३८९॥

अर्थ: जितभास्कर सम्परिकीर्ति नामक पुत्रको राज्य दे मुनि हुआ और सम्परिकीर्ति सुग्रीवके लिए राज्य सौंप दीक्षाको प्राप्त हुआ ॥३८९॥


सुग्रीवोऽपि हरिग्रीवं संनिवेश्य निजे पदे । उग्रं तपः समाराध्य बभूव सुरसत्तमः ॥३९०॥

अर्थ: सुग्रीव, हरिग्रीवको अपने पदपर बैठाकर उग्र तपश्चरणकी आराधना करता हुआ उत्तम देव हुआ ॥३९०॥


हरिग्रीवोऽपि निक्षिप्य श्रीग्रीवे राज्यसंपदम् । गृहीतश्रमणाचारो वनान्तरमशिश्रियत् ॥३९१॥

अर्थ: हरिग्रीव भी श्रीग्रीवके लिए राज्यसम्पत्ति देकर मुनिव्रत धार वनमें चला गया ॥३९१॥


आरोप्य सुमुखे राज्यं श्रीग्रीवो जनकाश्रितम् । मार्गमाश्रितवान् वीरः सुव्यक्ते सुमुखस्तथा ॥३९२॥

अर्थ: श्रीग्रीव सुमुखके लिए राज्य देकर पिताके द्वारा अंगीकृत मार्गको प्राप्त हुआ और बलवान् सुमुखने सुव्यक्त नामक पुत्रको राज्य देकर दीक्षा धारण कर ली ॥३९२॥


सुव्यक्तोऽमृतवेगाख्ये न्यस्तवान् राक्षसीं श्रियम् । स चापि भानुगत्याह्वे स च चिन्तागतौ सुते ॥३९३॥

अर्थ: सुव्यक्तने अमृतवेग नामक पुत्रके लिए राक्षसवंशकी सम्पदा सौंपकर तप धारण किया । अमृतवेगने भानुगतिको और भानुगतिने चिन्तागतिको वैभव समर्पित कर साधुपद स्वीकृत किया ॥३९३॥


इन्द्र इन्द्रप्रभो मेघो मृगारिदमनः पविः । इन्द्रजिद्भानुवर्मा च भानुर्भानुसमप्रभः ॥३९४॥

सुरारिस्त्रिजटो भीमो मोहनोद्धारकौ रविः । चकारो वज्रमध्यश्च प्रमोदः सिंहविक्रमः ॥३९५॥

चामुण्डो मारणो भीष्मो द्विपवाहोऽरिमर्दनः । निर्वाणभक्तिरुग्रश्रीरर्हद्भक्तिरनुत्तरः ॥३९६॥

गतभ्रमोऽनिलश्चण्डो लङ्काशोको मयूरवान् । महाबाहुर्मनोरम्यो भास्करामो बृहद्गतिः ॥३९७॥

बृहत्कान्तोऽरिसंत्रासश्चन्द्रावर्तो महारवः । मेघध्वानगृहक्षोभनक्षत्रदमनादयः ॥३९८॥

अभिधाः कोटिशस्तेषां द्रष्टव्याम्बरचारिणाम् । मायावीर्यसमेतानां विद्याबलमहारुचाम् ॥३९९॥

अर्थ: इस प्रकार इन्द्र, इन्द्रप्रभ, मेघ, मृगारिदमन, पवि, इन्द्रजित्, भानुवर्मा, भानु, भानुप्रभ, सुरारि, त्रिजट, भीम, मोहन, उद्धारक, रवि, चकार, वज्रमध्य, प्रमोद, सिंहविक्रम, चामुण्ड, मारण, भीष्म, द्विपवाह, अरिमर्दन, निर्वाण-भक्ति, उग्रश्री, अर्हद्भक्ति, अनुत्तर, गतभ्रम, अनिल, चण्ड, लंकाशोक, मयूरवान्, महाबाहु, मनोरम्य, भास्कराभ, बृहद्गति, बृहत्कान्त, अरिसन्त्रास, चन्द्रावर्त, महारव, मेघध्वान, गृहक्षोभ और नक्षत्रदमन आदि करोड़ों विद्याधर उस वंशमें हुए । ये सभी विद्याधर माया और पराक्रमसे सहित थे तथा विद्या, बल और महाकान्तिके धारक थे ॥३९४-३९९॥


विद्यानुयोगकुशलाः सर्वे श्रीसक्तवक्षसः । लङ्कायां स्वामिनः कान्ताः प्रायशः स्वर्गतश्च्युताः ॥४००॥

अर्थ: ये सभी लंकाके स्वामी, विद्यानुयोगमें कुशल थे, सबके वक्षःस्थल लक्ष्मीसे सुशोभित थे, सभी सुन्दर थे और प्रायः स्वर्गसे च्युत होकर लंकामें उत्पन्न हुए थे ॥४००॥


स्वेषु पुत्रेषु निक्षिप्य लक्ष्मीं वंशक्रमागताम् । संविग्ना राक्षसाधीशा महाप्राव्रज्यमास्थिताः ॥४०१॥

अर्थ: ये राक्षसवंशी राजा, संसारसे भयभीत हो वंश-परम्परासे आगत लक्ष्मी अपने पुत्रोंके लिए सौंपकर दीक्षाको प्राप्त हुए थे ॥४०१॥


केचित् कर्मविशेषेण त्रिलोकशिखरं गताः । दिवमीयुः परे केचित् पुण्यपाकानुभावतः ॥४०२॥

अर्थ: कितने ही राजा कर्मोंको नष्ट कर त्रिलोकके शिखरको प्राप्त हुए, और कितने ही पुण्योदयके प्रभावसे स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे ॥४०२॥


एवं तेष्वप्यतीतेषु घनप्रभसुतोऽभवत् । लङ्कायामधिपः कीर्तिधवलो नाम विश्रुतः ॥४०३॥

पद्मागर्भे समुद्भूतः खेचरैः कृतशासनः । संभुङ्क्ते परमैश्वर्यं सुनासीरो यथा दिवि ॥४०४॥

अर्थ: इस प्रकार बहुत-से राजा व्यतीत हुए । उनमें लंकाका अधिपति एक घनप्रभ नामक राजा हुआ । उसकी पद्मा नामक स्त्रीके गर्भमें उत्पन्न हुआ कीर्तिधवल नामका प्रसिद्ध पुत्र हुआ । समस्त विद्याधर उसका शासन मानते थे और जिस प्रकार स्वर्गमें इन्द्र परमेश्वर्यका अनुभव करता है उसी प्रकार वह कीर्तिधवल भी लंकामें परमैश्वर्यका अनुभव करता था ॥४०३-४०४॥


एवं भवान्तरकृतेन तपोबलेन संप्राप्नुवन्ति पुरुषा मनुजेषु भोगान् । देवेषु चोत्तमगुणा गुणभूषिताङ्गा निर्दग्धकर्मपटलाश्च भवन्ति सिद्धाः ॥४०५॥

दुष्कर्मसक्तमतयः परमां लभन्ते निन्दां जना इह भवे मरणात्परं च । दुःखानि यान्ति बहुधा पतिताः कुयोनौ ज्ञात्वेति पापतमसो रवितां भजध्वम् ॥४०६॥

अर्थ: इस तरह पूर्वभवमें किये तपश्चरणके बलसे पुरुष, मनुष्यगति तथा देवगतिमें भोग भोगते हैं, वहाँ उत्तम गुणोंसे युक्त तथा नाना गुणोंसे भूषित शरीरके धारक होते हैं, कितने ही मनुष्य कर्मोंके पलटको भस्म कर सिद्ध हो जाते हैं, तथा जिनकी बुद्धि दुष्कर्ममें आसक्त है ऐसे मनुष्य इस लोकमें भारी निन्दाको प्राप्त होते हैं और मरनेके बाद कुयोनिमें पड़कर अनेक प्रकारके दुःख भोगते हैं । ऐसा जानकर हे भव्य जीवो ! पापरूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए सूर्यकी सदृशता प्राप्त करो ॥४०५-४०६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते राक्षसवंशाधिकारः पञ्चमं पर्व ॥५॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें राक्षसवंशका निरूपण करनेवाला पंचम पर्व समाप्त हुआ ॥५॥

६. षष्ठं पर्व (वानरवंशाभिधानं)

वंशो रक्षोनभोगानां मया ते परिकीर्तितः । शृणु वानरकेतूनां संतानमधुना नृप ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर - गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् श्रेणिक ! मैंने तेरे लिए राक्षसवंशी विद्याधरोंका वृत्तान्त तो कहा, अब तू वानरवंशियोंका वृत्तान्त सुन ॥१॥


विजयार्द्धगिरेर्भागे दक्षिणे स्वर्गसंनिभे । पुरं मेघपुरं नाम्ना तुङ्गप्रासादशोभितम् ॥२॥

अर्थ: स्वर्गके समान विजयार्ध पर्वतकी जो दक्षिण श्रेणी है उसमें एक मेघपुर नामका नगर है। यह नगर ऊँचे-ऊँचे महलोंसे सुशोभित है ॥२॥


विद्याभृतां पतिस्तस्मिन्नतीन्द्रो नाम विश्रुतः । अतिक्रम्येव यः शक्रं स्थितो भोगादिसंपदा ॥३॥

अर्थ: वहाँ विद्याधरोंका राजा अतीन्द्र निवास करता था। राजा अतीन्द्र अत्यन्त प्रसिद्ध था और भोग-सम्पदाके द्वारा मानो इन्द्रका उल्लंघन करता था ॥३॥


श्रीमती नाम तस्यासीत् कान्ता श्रीसमविभ्रमा । यस्याः सति मुखे पक्षो ज्योत्स्नयेव सदाभवत् ॥४॥

अर्थ: उसकी लक्ष्मीके समान हाव-भाव-विलाससे सहित श्रीमती नामकी स्त्री थी। उसका मुख इतना सुन्दर था कि उसके रहते हुए सदा चाँदनीसे युक्त पक्ष ही रहा करता था ॥४॥


तयोः श्रीकण्ठनामाभूत् सुतः श्रुतिविशारदः । यस्य नाम्नि गते कर्णं हर्षमीयुर्विचक्षणाः ॥५॥

अर्थ: उन दोनोंके श्रीकण्ठ नामका पुत्र था। वह पुत्र शास्त्रोंमें निपुण था और जिसका नाम कर्णगत होते ही विद्वान् लोग हर्षको प्राप्त कर लेते थे ॥५॥


स्वसा तस्याभवच्चार्वी देवी नाम कनीयसी । बाणतां नयने यस्या गते कुसुमधन्वनः ॥६॥

अर्थ: उसके महामनोहरदेवी नामकी छोटी बहन थी। उस देवीके नेत्र क्या थे मानो कामदेवके बाण ही थे ॥६॥


अथ रत्नपुरं नाम पुरं तत्र मनोहरम् । तत्र पुष्पोत्तरो नाम विद्याधारी महाबलैः ॥७॥

अर्थ: अथानन्तर - रत्नपुर नामका एक सुन्दर नगर था जिसमें अत्यन्त बलवान् पुष्पोत्तर नामका विद्याधर राजा निवास करता था ॥७॥


तस्य पद्मोत्तराभिख्यः सुतो येन विलोचने । विषयान्तरसंबन्धाज्जनानां विनिवर्तिते ॥८॥

अर्थ: अपने सौन्दर्यरूपी सम्पत्तिके द्वारा देवकन्याके समान सबके मनको आनन्दित करनेवाली पद्माभा नामकी पुत्री और पद्मोत्तर नामका पुत्र था। यह पद्मोत्तर इतना सुन्दर था कि उसने अन्य मनुष्योंके नेत्र दूसरे पदार्थोंके सम्बन्धसे दूर हटा दिये थे अर्थात् सब लोग उसे ही देखते रहना चाहते थे ॥८॥


तस्मै पुष्पोत्तरः कन्यां बहुशस्तामयाचत । श्रीकण्ठेन न सा तस्मै दत्ता कर्मानुभावतः ॥९॥

सा तेन कीर्तिशुभ्राय दत्ता बान्धववाक्यतः । विवाहं च परेणास्या विधिना निरवर्तयत् ॥१०॥

अर्थ: राजा पुष्पोत्तरने अपने पुत्र पद्मोत्तरके लिए राजा अतीन्द्रकी पुत्री देवीकी बहुत बार याचना की परन्तु श्रीकण्ठ भाईने अपनी बहन पद्मोत्तरके लिए नहीं दी, लंकाके राजा कीर्तिधवलके लिए दी और बड़े वैभवके साथ विधिपूर्वक उसका विवाह कर दिया ॥९-१०॥


न मेऽभिजनतो दोषो न मे दारिद्र्यसंभवः । न च पुत्रस्य बैरूप्यं न किंचिद्वैरकारणम् ॥११॥

तथापि मम पुत्राय वितीर्णा तेन न स्वसा । इति पुष्पोत्तरो ध्यात्वा कोपावेशं परं गतः ॥१२॥

अर्थ: यह बात सुन राजा पुष्पोत्तरने बहुत कोप किया। उसने विचार किया कि देखो, न तो हमारे वंशमें कोई दोष है, न मुझमें दरिद्रतारूपी दोष है, न मेरे पुत्रमें कुरूपपना है और न मेरा उनसे कुछ वैर भी है फिर भी श्रीकण्ठने मेरे पुत्रके लिए अपनी बहन नहीं दी ॥११-१२॥


चैत्यानां वन्दनां कर्तुं श्रीकण्ठः सुरपर्वतम् । गतोऽन्यदा विमानेन वायुवेगेन चारुणा ॥१३॥

अर्थ: किसी एक दिन श्रीकण्ठ अकृत्रिम प्रतिमाओंकी वन्दना करनेके लिए वायुके समान वेगवाले सुन्दर विमानके द्वारा सुमेरुपर्वत पर गया था ॥१३॥


तस्मान्निवर्तमानोऽसौ चेतःश्रोत्रापहारिणम् । भृङ्गाणामिव झंकारमशृणोद् गीतनिःस्वनम् ॥१४॥

अर्थ: वहाँसे जब वह लौट रहा था तब उसने मन और कानोंको हरण करनेवाला, भ्रमरोंकी झंकारके समान सुन्दर संगीतका शब्द सुना ॥१४॥


रम्यप्रक्वणमिश्रेण तेन गीतस्वनेन सः । धृतो ऋजुगुणेनेव बद्ध्वा निश्चलविग्रहः ॥१५॥

अर्थ: वीणाके स्वरसे मिले हुए संगीतके शब्दसे उसका शरीर ऐसा निश्चल हो गया मानो सीधी रस्सीसे ही बाँधकर उसे रोक लिया हो ॥१५॥


अलोकनमथो चक्रे ततोऽपश्यत् स कन्यकाम् । गुरुणाधिष्ठितां कान्तां संगीतकगृहाङ्गणे ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर उसने सब ओर देखा तो उसे संगीतगृहके आँगनमें गुरुके साथ बैठी हुई पुष्पोत्तरकी पुत्री पद्माभा दिखी ॥१६॥


तस्या रूपसमुद्रेऽसौ निमग्नं मानसं द्रुतम् । न शशाक समुद्धर्तुं धर्तुं नागानिव प्रभुः ॥१७॥

अर्थ: उसे देखकर श्रीकण्ठका मन पद्माभाके सौन्दर्यरूपी सागरमें शीघ्र ही ऐसा निमग्न हो गया कि वह उसे निकालनेमें असमर्थ हो गया । जिस प्रकार कोई हाथियोंको पकड़नेमें समर्थ नहीं होता उसी प्रकार वह मनको स्थिर करनेमें समर्थ नहीं हो सका ॥१७॥


स्थितश्चैषोऽन्तिकव्योम्नि तया नीलोत्पलाभया । वध्वेव पीवरस्कन्धो दृष्ट्याकृष्टो मनोमुषा ॥१८॥

अर्थ: श्रीकण्ठ उस कन्याके समीप ही आकाशमें खड़ा रह गया । श्रीकण्ठ सुन्दर शरीरका धारक तथा स्थूल कन्धोंसे युक्त था । पद्माभाने भी चित्तको चुरानेवाली अपनी नीली-नीली दृष्टिसे उसे आकर्षित कर लिया था ॥१८॥


ततो दर्शनमन्योन्यं तयोर्माधुर्यपेशलम् । चकार वरणं प्रेमबद्धभावस्य सूचनम् ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर दोनोंका परस्परमें जो मधुर अवलोकन हुआ उसीने दोनोंका वरण कर दिया अर्थात् मधुर अवलोकनसे ही श्रीकण्ठने पद्माभाको और पद्माभाने श्रीकण्ठको वर लिया । उनका यह वरना पारस्परिक प्रेम भावको सूचित करनेवाला था ॥१९॥


ततस्तामिङ्गिताभिज्ञो भुजपञ्जरमध्यगाम् । कृत्वा नमस्तले यातः स्पर्शामीलितलोचनः ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर अभिप्रायको जाननेवाला श्रीकण्ठ पद्माभाको अपने भुजपंजरके मध्यमें स्थित कर आकाशमें ले चला । उस समय पद्माभाके स्पर्शसे उसके नेत्र कुछ-कुछ बन्द हो रहे थे ॥२०॥


परिवर्गस्ततस्तस्याः प्रलापमुखरीकृतः । पुष्पोत्तराय कन्यायाः श्रीकण्ठेन हृतिं जगौ ॥२१॥

अर्थ: प्रलापसे चिल्लाते हुए परिजनके लोगोंने राजा पुष्पोत्तरको खबर दी कि श्रीकण्ठने आपकी कन्याका अपहरण किया है ॥२१॥


सर्वोद्योगेन संनह्य ततः पुष्पोत्तरो रुषा । तस्यानुपदवीं यातो दन्तदष्टरदच्छदः ॥२२॥

अर्थ: यह सुन पुष्पोत्तर भी बहुत क्रुद्ध हुआ । वह क्रोधवश दाँतोंसे ओठ चाबने लगा और सब प्रकारसे तैयार हो श्रीकण्ठके पीछे गया ॥२२॥


तेनानुधावमानेन व्रजता सुनभस्तले । शशीव घनवृन्देन श्रीकण्ठः शुशुभेऽधिकम् ॥२३॥

अर्थ: श्रीकण्ठ आगे-आगे जा रहा था और पुष्पोत्तर उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था जिससे आकाशके बीच श्रीकण्ठ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मेघसमूह जिसके पीछे उड़ रहा है ऐसा चन्द्रमा ही हो ॥२३॥


आयान्तं पृष्ठतो दृष्ट्वा श्रीकण्ठस्तं महाबलम् । त्वरितं प्रस्थितो लङ्कां नीतिशास्त्रविशारदः ॥२४॥

अर्थ: नीतिशास्त्रमें निपुण श्रीकण्ठने जब अपने पीछे महाबलवान् पुष्पोत्तरको आता देखा तो वह शीघ्र ही लंकाकी ओर चल पड़ा ॥२४॥


तत्र स्वसुः पतिं गत्वा शरणं स समाश्रयत् । कालप्राप्तं नयं सन्तो युञ्जानां यान्ति तुङ्गताम् ॥२५॥

अर्थ: वहाँ वह अपने बहनोई कीर्तिधवलकी शरणमें पहुँचा सो ठीक ही है । क्योंकि जो समयानुकूल नीतियोग करते हैं वे उन्नतिको प्राप्त होते ही हैं ॥२५॥


सोदरो मम कान्ताया इति स स्नेहनिर्भरम् । संभ्रमेण परिष्वज्य तं चकारासपूजनम् ॥२६॥

अर्थ: ‘यह मेरी स्त्रीका भाई है’ यह जानकर कीर्तिधवलने बड़े स्नेहसे उसका आलिंगन कर अतिथिसत्कार किया ॥२६॥


तयोः कुशलवृत्तान्तप्रश्नो यावत्प्रवर्तते । तावत्पुष्पोत्तरः प्राप्तो महाबलसमन्वितः ॥२७॥

अर्थ: जबतक उन दोनोंके बीच कुशल-समाचारका प्रश्न चलता है कि तबतक बड़ी भारी सेनाके साथ पुष्पोत्तर वहाँ जा पहुँचा ॥२७॥


कीर्तिशुक्लस्ततोऽपश्यद् गगनं सर्वतश्रितम् । विद्याधरसमूहेन प्रदीप्तमुरुतेजसा ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर कीर्तिधवलने आकाशकी ओर देखा तो वह आकाश सब ओरसे विद्याधरोंके समूहसे व्याप्त था, विशाल तेजसे देदीप्यमान हो रहा था ॥२८॥


असिकुन्तादिभिः शस्त्रैर्विकरालं महारवम् । स्थानभ्रंशमिवागच्छद् बलं खेचरसंगमात् ॥२९॥

अर्थ: तलवार, भाले आदि शस्त्रोंसे महाभयंकर था, बड़ा भारी शब्द उसमें हो रहा था, विद्याधरोंके समागमसे वह सेना ऐसी जान पड़ती थी मानो अपने स्थानसे भ्रष्ट होनेके कारण ही उसमें वह महाशब्द हो रहा था ॥२९॥


वाजिभिर्वायुरंहोभिर्गजैश्च जलदोपमैः । विमानैश्च महामानैः सिंहैश्च प्रचलत्सटैः ॥३०॥

दृष्ट्वोत्तरां दिशं व्याप्तां विहस्य क्रोधमिश्रितम् । सचिवानां समादेशं कीर्तिशुक्लो युधे ददौ ॥३१॥

अर्थ: वायुके समान वेगवाले घोड़ों, मेघोंकी उपमा रखनेवाले हाथियों, बड़े-बड़े विमानों और जिनकी गरदनके बाल हिल रहे थे ऐसे सिंहोंसे उत्तर दिशाको व्याप्त देख कीर्तिधवलने क्रोधमिश्रित हँसी हँसकर मन्त्रियोंके लिए युद्धका आदेश दिया ॥३०-३१॥


अकार्येण ततः स्वेन श्रीकण्ठोऽयं त्रपानतः । कीर्तिशुभ्रमिदं वाक्यं जगाद त्वरयान्वितम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर अपने अकार्य - खोटे कार्यके कारण लज्जासे अवनत श्रीकण्ठने शीघ्रता करनेवाले कीर्तिधवलसे निम्नांकित वचन कहे ॥३२॥


एतं बन्धुजनं रक्ष त्वं मदीयमिहाधुना । करोमि निर्जितं यावत्प्रतिपक्षं तवाश्रयात् ॥३३॥

अर्थ: कि जबतक मैं आपके आश्रयसे शत्रुको परास्त करता हूँ तबतक आप यहाँ मेरे इष्टजन ( स्त्री ) की रक्षा करो ॥३३॥


एवमुक्ते जगादासौ वचनं नयसंगतम् । तवायुक्तमिदं वक्तुं प्राप्यं मां भीतिभेदनम् ॥३४॥

अर्थ: श्रीकण्ठके ऐसा कहनेपर कीर्तिधवलने उससे नीतियुक्त वचन कहे कि भयका भेदन करनेवाले मुझको पाकर तुम्हारा यह कहना युक्त नहीं है ॥३४॥


यदि नामैष नो साम्ना शमं यास्यति दुर्जनः । ततः पश्य प्रविष्टोऽयं मृत्योर्वक्त्रं मदीरितः ॥३५॥

अर्थ: यदि यह दुर्जन साम्यभावसे शान्तिको प्राप्त नहीं होता है तो तुम निश्चित देखना कि यह मेरे द्वारा प्रेरित होकर यमराजके ही मुखमें प्रवेश करेगा ॥३५॥


स्थापयित्वेति विश्रब्धं प्रियायाः सोदरं नृपः । उत्कृष्टवयसो धीरान् दूतान् द्रुतमजीगमत् ॥३६॥

अर्थ: ऐसा कह अपनी स्त्रीके भाईको तो उसने निश्चिन्त कर महलमें रखा और शीघ्र ही उत्कृष्ट अवस्थावाले धीर-वीर दूतोंको पुष्पोत्तरके पास भेजा ॥३६॥


उपर्युपरि ते गत्वा क्रमेणेदं बभाषिरे । पुष्पोत्तरं महाप्राज्ञा मधुरालापकोविदाः ॥३७॥

अर्थ: अतिशय बुद्धिमान् और मधुरभाषण करनेमें निपुण दूतोंने लगे हाथ जाकर पुष्पोत्तरसे यथाक्रम निम्नांकित वचन कहे ॥३७॥


पुष्पोत्तर वदत्येतद्भवन्तं कीर्तिनिर्मलः । अस्मद्वदनविन्यस्तैः पदैरादरसंगतैः ॥३८॥

अर्थ: हे पुष्पोत्तर ! हम लोगोंके मुखमें स्थापित एवं आदरपूर्ण वचनोंसे कीर्तिधवल राजा आपसे यह कहता है ॥३८॥


महाकुलसमुत्पन्नो भवान् विमलचेष्टितः । सर्वस्मिन् जगति ख्यातिं गतः शास्त्रार्थकोविदः ॥३९॥

अर्थ: कि आप उच्चकुलमें उत्पन्न हैं, निर्मल चेष्टाओंके धारक हैं, समस्त संसारमें प्रसिद्ध हैं और शास्त्रार्थमें चतुर हैं ॥३९॥


आगता गोचरं का ते न मर्यादा महामते । कर्णजाहें निधीयेत यास्माभिरधुना तव ॥४०॥

अर्थ: हे महाबुद्धिमान् ! कौन-सी मर्यादा आपके कानोंमें नहीं पड़ी है जिसे इस समय हम लोग आपके कानोंके समीप रखें ॥४०॥


श्रीकण्ठोऽपि कुले जातः शशाङ्ककरनिर्मले । वित्तवान् विनयोपेतः कान्तः सर्वकलान्वितः ॥४१॥

अर्थ: श्रीकण्ठ भी चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कुलमें उत्पन्न हुआ है, धनवान् है, विनयसे युक्त है, सुन्दर है, और सब कलाओंसे सहित है ॥४१॥


तस्य योग्या गुणैः कन्या रूपेण च कुलेन च । समानयोः समायोगं करोतु विधिरिष्यताम् ॥४२॥

अर्थ: तुम्हारी कन्या गुण, रूप तथा कुल सभी बातोंमें उसके योग्य है । इस प्रकार अनुकूल भाग्य, दो समान व्यक्तियोंका संयोग करा दे तो उत्तम है ॥४२॥


न चास्ति कारणं किंचित् सेनयोः संक्षये कृते । स्वभाव एव कन्यानां यत्परागारसेवनम् ॥४३॥

अर्थ: जब कि दूसरेके घरकी सेवा करना यह कन्याओंका स्वभाव ही है तब दोनों पक्षकी सेनाओंका क्षय करनेमें कोई कारण दिखाई नहीं देता ॥४३॥


दूतो यावद्ब्रवीत्येवं तावद्दूती समागता । पद्मया प्रेषिता तस्य दुहित्रेदमभाषत ॥४४॥

अर्थ: दूत इस प्रकार कह ही रहा था कि इतनेमें पुत्री पद्माभाके द्वारा भेजी हुई दूती आकर पुष्पोत्तरसे कहने लगी ॥४४॥


ब्रवीति देव पद्मेदं कृत्वा चरणवन्दनम् । स्वयं ते गदितुं शक्ता त्रपया नेति नागता ॥४५॥

अर्थ: कि हे देव ! पद्मा आपके चरणोंमें नमस्कार कर कहती है कि मैं लज्जाके कारण आपसे स्वयं निवेदन करनेके लिए नहीं आ सकी हूँ ॥४५॥


तात स्वल्पापि नास्त्यत्र श्रीकण्ठस्यापराधिता । मया कर्मानुभावेन स्वयमेव प्रचोदितः ॥४६॥

अर्थ: हे तात ! इस कार्यमें श्रीकण्ठका थोड़ा भी अपराध नहीं है । कर्मोंके प्रभावसे मैंने इसे स्वयं प्रेरित किया था ॥४६॥


यतः सत्कुलजातानां गतिरेषैव योषिताम् । विमुच्यैनमतोऽन्यस्य नरस्य नियमो मम ॥४७॥

अर्थ: चूँकि सत्कुलमें उत्पन्न हुई स्त्रियोंकी यही मर्यादा है अतः इसे छोड़कर अन्य पुरुषका मेरे नियम है - त्याग है ॥४७॥


इति विज्ञापितो दूत्या चिन्तामेतामसौ श्रितः । किंकर्तव्यं विमूढेन चेतसा विक्लवीकृतः ॥४८॥

अर्थ: इस प्रकार दूतीके कहनेपर ‘अब क्या करना चाहिए’ इस चिन्ताको प्राप्त हुआ । उस समय वह अपने किंकर्तव्यविमूढ़ चित्तसे बहुत दुःखी हो रहा था ॥४८॥


शुद्धाभिजनता मुख्या गुणानां वरभाजिनाम् । तस्मिँश्च संभवत्येषे पक्षं च बलिनं श्रितः ॥४९॥

अर्थ: उसने विचार किया कि वरमें जितने गुण होना चाहिए उनमें शुद्ध वंशमें जन्म लेना सबसे प्रमुख है । यह गुण श्रीकण्ठमें है ही उसके सिवाय यह बलवान् पक्षकी शरणमें आ पहुँचा है ॥४९॥


अभिमानात्तथाप्येनं विनेतुं शक्तिरस्ति मे । स्वयमेव तु कन्यायै रोचते क्रियतेऽत्र किम् ॥५०॥

अर्थ: यद्यपि इसका अभिमान दूर करनेकी मुझमें शक्ति है, पर जब कन्याके लिए यह स्वयं रुचता है तब इस विषयमें क्या किया जा सकता है ? ॥५०॥


अभिप्रायं ततस्तस्य ज्ञात्वा ते हर्षनिर्भराः । समं दूत्या गता दूता शशासुश्च यथोदितम् ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर पुष्पोत्तरका अभिप्राय जानकर हर्षसे भरे दूत, दूतीके साथ वापस चले गये और सबने जो बात जैसी थी वैसी ही राजा कीर्तिधवलसे कह दी ॥५१॥


सुताविज्ञापनात् त्यक्तक्रोधभारोऽभिमानवान् । पुष्पोत्तरो गतः स्थानमात्मीयं परमार्थवित् ॥५२॥

अर्थ: पुत्रीके कहनेसे जिसने क्रोधका भार छोड़ दिया था ऐसा अभिमानी तथा परमार्थको जाननेवाला राजा पुष्पोत्तर अपने स्थानपर वापस चला गया ॥५२॥


शुक्लायां मार्गशीर्षस्य पक्षेतावथ शोभने । मुहूर्ते विधिना वृत्तं पाणिग्रहणमेतयोः ॥५३॥

अर्थ: अथानन्तर मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाके दिन शुभमुहूर्तमें दोनोंका विधिपूर्वक पाणिग्रहण संस्कार हुआ ॥५३॥


इति श्रीकण्ठमाहेदं प्रीत्यात्यन्तमुदारया । प्रेरितः कीर्तिधवलो वचनं कृतनिश्चयम् ॥५४॥

अर्थ: एक दिन उदार प्रेमसे प्रेरित कीर्तिधवलने श्रीकण्ठसे निश्चयपूर्ण निम्नांकित वचन कहे ॥५४॥


वैरिणो बहवः सन्ति विजयार्द्धगिरौ तव । अप्रमत्ततया कालं क्रियन्तं गमयिष्यसि ॥५५॥

अर्थ: चूँकि विजयार्ध पर्वतपर तुम्हारे बहुत-से वैरी हैं अतः तुम सावधानी-से कितना काल बिता सकोगे ॥५५॥


अतस्तिष्ठ त्वमत्रैव रम्ये रत्नालयान्तरे । निजाभिरुचिते स्थाने स्वेच्छया कृतचेष्टितः ॥५६॥

अर्थ: लाभ इसीमें है कि तुम्हें जो स्थान रुचिकर हो वहीं स्वेच्छासे क्रिया करते हुए यहीं अत्यन्त सुन्दर रत्नमयी महलोंमें निवास करो ॥५६॥


पर्याप्नोति परित्यक्तुं न च त्वां मम मानसम् । मत्प्रीतिवागुरां छित्वा कथं वा त्वं गमिष्यसि ॥५७॥

अर्थ: मेरा मन तुम्हें छोड़नेको समर्थ नहीं है और तुम भी मेरे प्रेमपाशको छोड़कर कैसे जाओगे ॥५७॥


श्रीकण्ठमभिधायैवं सचिवं निजमब्रवीत् । पितामहक्रमायातमानन्दाख्यं महामतिम् ॥५८॥

अर्थ: श्रीकण्ठसे ऐसा कहकर कीर्तिधवलने अपने पितामहके क्रमसे आगत महाबुद्धिमान् आनन्द नामक मन्त्रीको बुलाकर कहा ॥५८॥


सारासारं त्वया दृष्टं मदीयानां चिरं पुराम् । उपदिश्यतामतः सारं श्रीकण्ठायात्र यत्पुरम् ॥५९॥

अर्थ: .कि तुम चिरकालसे मेरे नगरोंकी सारता और असारताको अच्छी तरह जानते हो अतः श्रीकण्ठके लिए जो नगर सारभूत हो सो कहो ॥५९॥


इत्युक्तः सचिवः प्राह सितेन हृदयस्थितम् । कूर्चेन स्वामिनं भक्त्या चामरेणेव बीजयन् ॥६०॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर वृद्ध मन्त्री कहने लगा। जब वह वृद्ध मन्त्री कह रहा था तब उसकी सफेद दाढ़ी वक्षःस्थलपर हिल रही थी और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो हृदयमें विराजमान स्वामीको चमर ही ढोर रहा हो ॥६०॥


नरेन्द्र तव नास्त्येव पुरं यन्न मनोहरम् । तथापि स्वयमन्विष्य गृह्णातु रुचिदर्शनम् ॥६१॥

अर्थ: उसने कहा कि हे राजन् ! यद्यपि आपके नगरोंमें ऐसा एक भी नगर नहीं है जो सुन्दर न हो तथापि श्रीकण्ठ स्वयं ही खोजकर इच्छानुसार - जो इन्हें रुचिकर हो, ग्रहण कर लें ॥६१॥


मध्ये सागरमेतस्मिन् द्वीपाः सन्त्यतिभूरयः । कल्पद्रुमसमाकारैः पादपैर्व्याप्तदिङ्मुखाः ॥६२॥

अर्थ: इस समुद्रके बीचमें ऐसे बहुतसे द्वीप हैं जहाँ कल्पवृक्षोंके समान आकारवाले वृक्षोंसे दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं ॥६२॥


आचिता विविधै रत्नैस्तुङ्गशृङ्गा महौजसः । गिरयो येषु देवानां सन्ति क्रीडनहेतवः ॥६३॥

अर्थ: इन द्वीपोंमें ऐसे अनेक पर्वत हैं जो नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त हैं, ऊँचे-ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित हैं, महादेदीप्यमान हैं और देवोंकी क्रीड़ाके कारण हैं ॥६३॥


भीमातिभीमदाक्षिण्यात्ते चान्यैरपि वः कुले । अनुज्ञाताः सुरैः सर्वैः पूर्वमित्येवमागमः ॥६४॥

अर्थ: राक्षसोंके इन्द्र-भीम, अतिभीम तथा उनके सिवाय अन्य सभी देवोंने आपके वंशजोंके लिए वे सब द्वीप तथा पर्वत दे रखे हैं ऐसा पूर्व परम्परासे सुनते आते हैं ॥६४॥


पुराणि तेषु रम्याणि सन्ति काञ्चनसद्मभिः । संपूर्णानि महारत्नैः करदष्टदिवाकरैः ॥६५॥

अर्थ: उन द्वीपोंमें सुवर्णमय महलोंसे मनोहर और किरणोंसे सूर्यको आच्छादित करनेवाले महारत्नोंसे परिपूर्ण अनेक नगर हैं ॥६५॥


संध्याकारो मनोह्लादः सुवेलः काञ्चनो हरिः । योधनो जलधिध्वानो हंसद्वीपो मरक्षमः ॥६६॥

अर्द्धस्वर्गोत्कटावर्तौ विघटो रोधनोऽमलः । कान्तः स्फुटतटो रत्नद्वीपस्तोयावली सरः ॥६७॥

अलङ्घनो नभोभानुः क्षेममित्येवमादयः । आसन् ये रमणोद्देशा देवानां निरुपद्रवाः ॥६८॥

अर्थ: उन नगरोंके नाम इस प्रकार हैं - सन्ध्याकार, मनोह्लाद, सुवेल, कांचन, हरि, योधन, जलधिध्वान, हंसद्वीप, भरक्षम, अर्धस्वर्गोत्कट, आवर्त, विघट, रोधन, अमल, कान्त, स्फुटतट, रत्नद्वीप, तोयावली, सर, अलंघन, नभोभानु और क्षेम इत्यादि अनेक सुन्दर-सुन्दर स्थान हैं । इन स्थानोंमें देव भी उपद्रव नहीं कर सकते हैं ॥६६-६८॥


त एव सांप्रतं जाता भूरिपुण्यैरुपार्जिताः । पुराणां संनिवेशा वो नानारत्नवसुंधराः ॥६९॥

अर्थ: जो बहुत भारी पुण्यसे प्राप्त हो सकते हैं और जहाँकी वसुधा नाना प्रकारके रत्नोंसे प्रकाशमान है ऐसे वे समस्त नगर इस समय आपके अधीन हैं ॥६९॥


दूतोऽवरोत्तरे भागे समुद्रपरिवेष्टिते । शतत्रयमतिक्रम्य योजनानामलं पृथुः ॥७०॥

अतिशाखामृगद्वीपः प्रसिद्धो भुवनत्रये । यस्मिन्नवान्तरद्वीपाः सन्ति रम्याः सहस्रशः ॥७१॥

अर्थ: यहाँ पश्चिमोत्तर भाग अर्थात् वायव्य दिशामें समुद्रके बीच तीन सौ योजन विस्तारवाला बड़ा भारी वानर द्वीप है। यह वानर द्वीप तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है और उसमें महामनोहर हजारों अवान्तर द्वीप हैं ॥७०-७१॥


पुष्परागमणेर्भाभिः क्वचित् प्रज्वलतीव यः । सस्यैरिव क्वचिच्छन्नो हरिन्मणिमरीचिभिः ॥७२॥

अर्थ: यह द्वीप कहीं तो पुष्पराग मणियोंकी लाल-लाल प्रभासे ऐसा जान पड़ता है मानो जल ही रहा हो, कहीं हरे मणियोंकी किरणोंसे आच्छादित होकर ऐसा सुशोभित होता है मानो धानके हरे-भरे पौधोंसे ही आच्छादित हो ॥७२॥


इन्द्रनीलप्रभाजालैस्तमसेव चितः क्वचित् । पद्माकरश्रियं धत्ते पद्मरागचयैः क्वचित् ॥७३॥

अर्थ: कहीं इन्द्रनील मणियोंके कान्तिसे ऐसा लगता है मानो अन्धकारके समूहसे व्याप्त ही हो, कहीं पद्मराग मणियोंकी कान्तिसे ऐसा जान पड़ता है मानो कमलाकरकी शोभा धारण कर रहा हो ॥७३॥


भ्रमता यत्र वातेन गगने गन्धचारुणा । हृता जानन्ति नो यस्मिन्पताम इति पक्षिणः ॥७४॥

अर्थ: जहाँ आकाशमें भ्रमती हुई सुगन्धित वायुसे हरे गये पक्षी यह नहीं समझ पाते हैं कि हम गिर रहे हैं ॥७४॥


स्फटिकान्तरविन्यस्तैः पद्मरागैः समत्विषः । ज्ञायन्ते चलनाद्यत्र सरःसु कमलाकराः ॥७५॥

अर्थ: स्फटिकके बीच-बीचमें लगे हुए पद्मराग मणियोंके समान जिनकी कान्ति है ऐसे तालाबोंके बीच प्रफुल्लित कमलोंके समूह जहाँ हलन-चलनरूप क्रियाके द्वारा ही पहचाने जाते हैं ॥७५॥


मत्तैर्मध्वासवास्वादाच्छकुन्तैः कलनादिभिः । संभाषत इति द्वीपान् यः समीपव्यवस्थितान् ॥७६॥

अर्थ: जो द्वीप मकरन्दरूपी मदिराके आस्वादनसे मनोहर शब्द करनेवाले मदोन्मत्त पक्षियोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो समीपमें स्थित अन्य द्वीपोंसे वार्तालाप ही कर रहा हो ॥७६॥


यत्रौषधिप्रभाजालैस्तमो दूरं निराकृतम् । चक्रे बहुलपक्षेऽपि समावेशं न रात्रिषु ॥७७॥

अर्थ: जहाँ रात्रिमें चमकनेवाली औषधियोंकी कान्तिके समूहसे अन्धकार इतनी दूर खदेड़ दिया गया था कि वह कृष्ण पक्षकी रात्रियोंमें भी स्थान नहीं पा सका था ॥७७॥


यत्रच्छत्रसमाकाराः फलपुष्पसमन्विताः । पादपा विपुलस्कन्धाः कलस्वनशकुन्तयः ॥७८॥

अर्थ: जहाँके वृक्ष छत्रोंके समान आकारवाले हैं, फल और फूलोंसे सहित हैं, उनके स्कन्ध बहुत मोटे हैं और उनपर बैठे हुए पक्षी मनोहर शब्द करते रहते हैं ॥७८॥


सस्यैः स्वभावसंपन्नैर्वीर्यकान्तिवितारिभिः । चलद्भिर्मन्दवातेन मही यत्र सकञ्चुका ॥७९॥

अर्थ: स्वभावसम्पन्न - अपने आप उत्पन्न, वीर्य और कान्तिको देनेवाले, एवं मन्द-मन्द वायुसे हिलते धानके पौधोंसे जहाँकी पृथिवी ऐसी जान पड़ती है मानो उसने हरे रंगकी चोली ही पहन रखी हो ॥७९॥


धिकचेन्दीवरैर्यत्र षट्पदौघसमन्वितैः । नयनैरिव वीक्षन्ते दीर्घिका भ्रूविलासिभिः ॥८०॥

अर्थ: जहाँकी वापिकाओंमें भ्रमरोंके समूहसे सुशोभित नील कमल फूल रहे हैं और उनसे वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो भौंहोंके सञ्चारसे सुशोभित नेत्रोंसे ही देख रही हों ॥८०॥


पवनाकम्पनाद्यस्मिन् सात्कारश्रोत्रहारिभिः । पुण्ड्रेक्षोर्विपुलैर्वाटैः प्रदेशाः पवनोज्झिताः ॥८१॥

अर्थ: हवाके चलनेसे समुत्पन्न अव्यक्त ध्वनिसे कानोंको हरनेवाले पौंडों और ईखोंके बड़े-बड़े बगीचोंसे जहाँके प्रदेश वायुके संचारसे रहित हैं अर्थात् जहाँ पौंडे और ईखके सघन वनोंसे वायुका आवागमन रुकता रहता है ॥८१॥


रत्नकाञ्चनविस्तीर्णशिलासंघातशोभनः । मध्ये तस्य महानस्ति किष्कुर्नाम महीधरः ॥८२॥

अर्थ: उस वानरद्वीपके मध्यमें रत्न और सुवर्णकी लम्बी-चौड़ी शिलाओंसे सुशोभित किष्कु नामका बड़ा भारी पर्वत है ॥८२॥


त्रिकूटेनेव तेनासौ शृङ्गबाहुभिरायतैः । आलिङ्गिता दिशः कान्ताः श्रियमारोपिताः पराम् ॥८३॥

अर्थ: जैसा यह त्रिकूटाचल है वैसा ही वह किष्कु पर्वत है सो उसकी शिखररूपी लम्बी-लम्बी भुजाओंसे आलिंगित दिशारूपी स्त्रियाँ परम शोभाको प्राप्त हो रही हैं ॥८३॥


आनन्दवचनादेव सानन्दं परमं गतः । श्रीकण्ठः कीर्तिधवलं प्राहैवमति भारतीम् ॥८४॥

अर्थ: आनन्द मन्त्रीके ऐसे वचन सुनकर परम आनन्दको प्राप्त हुआ श्रीकण्ठ अपने बहनोई कीर्तिधवलसे कहने लगा कि जैसा आप कहते हैं वैसा मुझे स्वीकार है ॥८४॥


ततश्चैत्रस्य दिवसे प्रथमे मङ्गलार्चिते । ययौ सपरिवारोऽसौ द्वीपं वानरलाञ्छितम् ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर चैत्र मासके मंगलमय प्रथम दिनमें श्रीकण्ठ अपने परिवारके साथ वानरद्वीप गया ॥८५॥


पश्यन्नीलमणिच्छायं गतं नभ इव क्षितिम् । महाग्राहकृताकम्पं समुद्रं विस्मयाकुलः ॥८६॥

अर्थ: प्रथम ही वह समुद्रको देखकर आश्चर्यसे चकित हो गया । वह समुद्र नीलमणिके समान कान्तिवाला था इससे ऐसा जान पड़ता था मानो नीला आकाश ही पृथिवीपर आ गया हो तथा बड़े-बड़े मगरमच्छ उसमें कम्पन पैदा कर रहे थे ॥८६॥


ततश्च तं वरद्वीपं प्राप्तः स्वर्गमिवापरम् । व्याहरन्तमिवात्युच्चैः स्वागतं निर्झरस्वनैः ॥८७॥

अर्थ: तदनन्तर उसने वानरद्वीपमें प्रवेश किया । वह द्वीप क्या था मानो दूसरा स्वर्ग ही था, और झरनोंके उच्च स्वरसे ऐसा जान पड़ता था मानो स्वागत शब्दका उच्चारण ही कर रहा था ॥८७॥


निर्झराणामतिस्थूलैः शीकरैर्व्योमगामिभिः । हसन्तमिव तोषेण श्रीकण्ठागमजन्मना ॥८८॥

अर्थ: झरनोंके बड़े-बड़े छींटे उछलकर आकाशमें पहुँच रहे थे उनसे वह द्वीप ऐसा लगता था मानो श्रीकण्ठके आगमनसे उत्पन्न सन्तोषसे हँस ही रहा हो ॥८८॥


विचित्रमणिसंभूतप्रभाजालेन चारुणा । उच्छ्रिता इव संघातास्तोरणानां समुन्नताः ॥८९॥

अर्थ: नाना मणियोंकी सुन्दर कान्तिके समूहसे ऐसा जान पड़ता था मानो ऊँचे-ऊँचे तोरणोंके समूह ही वहाँ खड़े किये गये हों ॥८९॥


ततस्तमवतीर्णोऽसौ द्वीपमाश्चर्यसंकुलम् । विक्षिपन् दिक्षु सर्वासु दृष्टिं नीलोत्पलद्युतिम् ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त दिशाओंमें अपनी नीली दृष्टि चलाता हुआ श्रीकण्ठ आश्चर्यसे भरे हुए उस वानरद्वीपमें उतरा ॥९०॥


खर्जूरामलकीनीपकपित्थागुरुचन्दनैः । प्लक्षार्जुनकदम्बाम्रप्रियालकदलीधवैः ॥९१॥

दाडिमीपूगकङ्कोललवङ्गवकुलैस्तथा । रम्यैरन्यैश्च विविधैः पादपैरुपशोभितम् ॥९२॥

अर्थ: वह द्वीप खजूर, आँवला, नीप, कैंथा, अगरु चन्दन, बड़, कौहा, कदम्ब, आम, अचार, केला, अनार, सुपारी, कंकोल, लौंग तथा अन्य अनेक प्रकारके सुन्दर-सुन्दर वृक्षोंसे सुशोभित था ॥९१-९२॥


मणिवृक्षा इवोद्भिद्य क्षितिं ते तत्र निःसृताः । स्वस्मिन् निपतितां दृष्टिं नेतुमन्यत्र नो ददुः ॥९३॥

अर्थ: वहाँ वे सब वृक्ष इतने सुन्दर जान पड़ते थे मानो पृथिवीको विदीर्ण कर मणिमय वृक्ष ही बाहर निकले हों और इसीलिए वे अपने ऊपर पड़ी हुई दृष्टिको अन्यत्र नहीं ले जाने देते थे ॥९३॥


प्रगुणाः काण्डदेशेषु विस्तीर्णाः स्कन्धबन्धने । उपरिच्छत्रसंकाशा घनपल्लवराशयः ॥९४॥

शाखाभिः सुप्रकाशाभिर्नताभिः कुसुमोत्करैः । फलैश्च सरसाः स्वादैः प्राप्ताः संतानमुत्तमम् ॥९५॥

अर्थ: उन सब वृक्षोंके तने सीधे थे, जहाँसे डालियाँ फूटती हैं ऐसे स्कन्ध अत्यन्त मोटे थे, ऊपर सघन पत्तोंकी राशियाँ छत्रोंके समान सुशोभित थीं, देदीप्यमान तथा कुछ नीचे की ओर झुकी हुई शाखाओंसे, फूलोंके समूहसे और मधुर फलोंसे वे सब उत्तम सन्तानको प्राप्त हुए-से जान पड़ते थे ॥९४-९५॥


नात्यन्तमुन्नतिं याता न च याता निखर्वताम् । अनायासाङ्गनाप्राप्य प्रसूनफलपल्लवाः ॥९६॥

अर्थ: वे सब वृक्ष न तो अत्यन्त ऊँचे थे, न अत्यन्त नीचे थे, हाँ, इतने अवश्य थे कि स्त्रियाँ उनके फूल, फल और पल्लवोंको अनायास ही पा लेती थीं ॥९६॥


स्तबकस्तनरम्याभिर्भृङ्गनेत्राभिरादरात् । आलिङ्गिताः सुवल्लीभिश्चलपल्लवपाणिभिः ॥९७॥

अर्थ: जो गुच्छेरूपी स्तनोंसे मनोहर थीं, भ्रमर ही जिनके नेत्र थे, और चंचल पल्लव ही जिनके हाथ थे ऐसी लतारूपी स्त्रियाँ बड़े आदरसे उन वृक्षोंका आलिंगन कर रही थीं ॥९७॥


परस्परसमुल्लापं कुर्वाणा इव पक्षिणाम् । मनोहरेण नादेन गायन्त इव षट्पदैः ॥९८॥

अर्थ: पक्षियोंके मनोहर शब्दसे वे वृक्ष ऐसे जान पड़ते थे मानो परस्परमें वार्तालाप ही कर रहे हों और भ्रमरों की मधुर झंकारसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो गा ही रहे हों ॥९८॥


केचिच्छङ्खदलच्छायाः केचिद्धेमसमत्विषः । केचित्पङ्कजसंकाशाः केचिद्वैडूर्यसंनिभाः ॥९९॥

अर्थ: कितने ही वृक्ष शंखके टुकड़ोंके समान सफेद कान्तिवाले थे, कितने ही स्वर्णके समान पीले रंगके थे, कितने ही कमलके समान गुलाबी रंगके थे और कितने ही वैदूर्यमणिके समान नीले वर्णके थे ॥९९॥


एवं नानाविधास्तस्मिन् देशा विविधपादपैः । मण्डिता यान् समालोक्य स्वर्गभूरपि नेक्ष्यते ॥१००॥

अर्थ: इस तरह नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वहाँके प्रदेश नाना रंगके दिखाई देते थे। वे प्रदेश इतने सुन्दर थे कि उन्हें देखकर फिर स्वर्गके देखनेकी इच्छा नहीं रहती थी ॥१००॥


जीवंजीवकयुग्मानां व्यक्तवाचां समं शुकैः । आलापः सारिकाभिश्च तस्मिन्नद्भुतकारणम् ॥१०१॥

अर्थ: तोताओंके समान स्पष्ट बोलनेवाले चकोर और चकोरीका जो मैनाओंके साथ वार्तालाप होता था वह उस वानरद्वीपमें सबसे बड़ा आश्चर्यका कारण था ॥१०१॥


ततः नानातरुच्छायामण्डलस्थेषु हारिषु । रत्नकाञ्चनदेहेषु पुष्पामोदानुलेपिषु ॥१०२॥

शिलातलेषु विश्रब्धं निविष्टः सेनया समम् । करणीयं च निःशेषं स चक्रे वपुषः सुखम् ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर वह श्रीकण्ठ, नाना प्रकारके वृक्षोंकी छायामें स्थित, फूलोंकी सुगन्धिसे अनुलिप्त, रत्नमय तथा सुवर्णमय शिलातलोंपर सेनाके साथ बैठा और वहीं उसने शरीरको सुख पहुँचानेवाले समस्त कार्य किये ॥१०२-१०३॥


ततो नानाप्रसूनानां हंससारसनादिनाम् । विमलोदकपूर्णानां सरसां मीनकम्पिनाम् ॥१०४॥

किरतां पुष्पनिकरं तरूणां च महात्विषाम् । जयशब्दमिवोदात्तं कुर्वतां पक्षिनिःस्वनैः ॥१०५॥

नानारत्नचितानां च भूभागानां सुशोभया । युक्तं भ्रमति स द्वीपमितश्चेतश्च तं सुखी ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर - जिनमें नाना प्रकारके पुष्प फूल रहे थे, हंस और सारस पक्षी शब्द कर रहे थे, स्वच्छ जल भरा हुआ था और जो मछलियोंके संचारसे कुछ-कुछ कम्पित हो रहे थे ऐसे मालाओंकी, तथा फूलोंके समूहकी वर्षा करनेवाले, महाकान्तिमान् और पक्षियोंकी बोलीके बहाने मानो जोर-जोरसे जय शब्दका उच्चारण करनेवाले वृक्षोंकी, एवं नाना प्रकारके रत्नोंसे व्याप्त भूभागों - प्रदेशोंकी सुषमासे युक्त उस वानर द्वीपमें श्रीकण्ठ जहाँ-तहाँ भ्रमण करता हुआ बहुत सुखी हुआ ॥१०४-१०६॥


ततः स विहरंस्तस्मिन्वने नन्दनसंनिभे । यथेच्छं क्रीडतोऽपश्यद् वानरान् बहुविभ्रमान् ॥१०७॥

अर्थ: तदनन्तर नन्दन वनके समान उस वनमें विहार करते हुए श्रीकण्ठने इच्छानुसार क्रीड़ा करनेवाले अनेकप्रकारके वानर देखे ॥१०७॥


अचिन्तयच्च दृष्ट्वैतां सृष्टेरतिविचित्रताम् । तिर्यग्योनिगता ह्येते कथं मानुषसंनिभाः ॥१०८॥

अर्थ: सृष्टिकी इस विचित्रताको देखकर श्रीकण्ठ विचार करने लगा कि देखो ये वानर तिर्यंच योनिमें उत्पन्न हुए है फिर भी मनुष्यके समान क्यों हैं ? ॥१०८॥


वदनं पाणिपादं च शेषांश्चावयवानमी । दधते मानुषाकारांश्चेष्टां तेषां च संनिभाम् ॥१०९॥

अर्थ: ये वानर मुख, पैर, हाथ तथा अन्य अवयव भी मनुष्यके अवयवोंके समान ही धारण करते हैं। न केवल अवयव ही, इनकी चेष्टा भी मनुष्योंके समान है ॥१०९॥


ततस्तैर्महती रन्तुं प्रीतिरस्य समुच्छ्रिता । यथा स्थिरोऽप्यसौ राजा नितान्तं प्रवणीकृतः ॥११०॥

अर्थ: तदनन्तर उन वानरोंके साथ क्रीड़ा करनेकी श्रीकण्ठके बहुत भारी इच्छा उत्पन्न हुई। यद्यपि वह स्थिर प्रकृतिका राजा था तो भी अत्यन्त उत्सुक हो उठा ॥११०॥


जगाद च समासन्नान् पुरुषान् वदनेक्षिणः । एतानानयत क्षिप्रमिति विस्मितमानसः ॥१११॥

अर्थ: उसने विस्मित चित्त होकर मुखकी ओर देखनेवाले निकटवर्ती पुरुषोंको आज्ञा दी कि इन वानरोंको शीघ्र ही यहाँ लाओ ॥१११॥


इत्युक्तैः शतशस्तस्य प्लवङ्गा गगनायनैः । उपनीताः प्रमोदेन कृतकेलिकलस्वनाः ॥११२॥

अर्थ: कहनेकी देर थी कि विद्याधरोंने सैकड़ों वानर लाकर उनके समीप खड़े कर दिये। वे सब वानर हर्षसे कल-कल शब्द कर रहे थे ॥११२॥


सुशीलैस्तैरसौ साकं रन्तुं प्रववृते नृपः । नर्तयन् तालशब्देन बाहुभ्यां च परामृशन् ॥११३॥

वीक्षमाणः सितान् दन्तान् दाडिमीपुष्पलोहिते । अवटीटे मुखे तेषां भास्वत्काञ्चनतारके ॥११४॥

अर्थ: राजा श्रीकण्ठ उत्तम स्वभावके धारक उन वानरोंके साथ क्रीड़ा करने लगा। कभी वह ताली बजाकर उन्हें नचाता था, कभी अपनी भुजाओंसे उनका स्पर्श करता था और कभी अनारके फूलके समान लाल, चपटी नाकसे युक्त एवं चमकीली सुनहली कनीनिकाओंसे युक्त उनके मुखमें उनके सफेद दाँत देखता था ॥११३-११४॥


यूकापनयनं पश्यन् विनयेन परस्परम् । प्रेम्णा च कलहं रम्यं कृतखोत्कारनिःस्वनम् ॥११५॥

अर्थ: वे वानर परस्परमें विनयपूर्वक एक दूसरेके जुएँ अलग कर रहे थे, और प्रेमसे खो-खो शब्द करते हुए मनोहर कलह करते थे। राजा श्रीकण्ठने यह सब देखा ॥११५॥


शालिशूकसमच्छायान्मृदिमातिशयान्वितान् । विधूतान् मृदुवातेन केशान् सीमन्तभाजिनः ॥११६॥

कर्णान् विदूषकासक्तश्रवणाकारधारिणः । नितान्तकोमलश्लक्ष्णानचलद्वपुषां स्पृशन् ॥११७॥

अर्थ: उन वानरोंके बाल धानके छिलकेके समान पीले थे, अत्यन्त कोमल थे, मन्द-मन्द वायुसे हिल रहे थे और माँगसे सुशोभित थे। इसी प्रकार उनके कान विदूषकके कानोंके समान कुछ अटपटा आकारवाले, अत्यन्त कोमल और चिकने थे। राजा श्रीकण्ठ उनका बड़े प्रेमसे स्पर्श कर रहा था और इस मोहनी सुरसुरीके कारण उनके शरीर निष्कम्प हो रहे थे ॥११६-११७॥


विलोमानि नयँल्लोमान्युदरे मुष्टमापिनि । उत्क्षिपंश्च भ्रुवोऽपाङ्गदेशान् रेखावतस्तथा ॥११८॥

अर्थ: उन वानरोंके कृश पेटपर जो-जो रोम अस्तव्यस्त थे उन्हें यह अपने स्पर्शसे ठीक कर रहा था, साथ ही भौंहोंको तथा रेखासे युक्त कटाक्ष-प्रदेशोंको कुछ-कुछ ऊपरकी ओर उठा रहा था ॥११८॥


ततस्ते तेन बहवः पुरुषाणां समर्पिताः । मृष्टाशनादिभिः कर्तुं पोषणं रतिहेतवः ॥११९॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीकण्ठने प्रीतिके कारणभूत बहुत-से वानर मधुर अन्न-पान आदिके द्वारा पोषण करनेके लिए सेवकोंको सौंप दिये ॥११९॥


ग्राहयित्वा च तान् किष्कुमारोहद्धृतमानसः । ग्रावकूटैर्लताभिश्च निर्झरैस्तरुभिस्तथा ॥१२०॥

अर्थ: इसके बाद पहाड़के शिखरों, लताओं, निर्झरनों और वृक्षोंसे जिसका मन हरा गया था ऐसा श्रीकण्ठ उन वानरोंको लिवाकर किष्कु पर्वतपर चढ़ा ॥१२०॥


तत्रापश्यत् स विस्तीर्णां वैषम्यरहितां भुवम् । गुप्तां प्रान्ते महामानैर्ग्रावभिः सोन्नतद्रुमैः ॥१२१॥

अर्थ: वहाँ उसने लम्बी-चौड़ी, विषमतारहित तथा अन्तमें ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंसे सुशोभित उत्तुंग पहाड़ोंसे सुरक्षित भूमि देखी ॥१२१॥


पुरं तत्र महेच्छेन ख्यातं किष्कुपुराख्यया । निवेशितमरातीनां मानसस्यापि दुर्गमम् ॥१२२॥

अर्थ: उसी भूमिपर उसने किष्कुपुर नामका एक नगर बसाया। यह नगर शत्रुओंके शरीरकी बात तो दूर रहे मनके लिए भी दुर्गम था ॥१२२॥


प्रमाणं योजनान्यस्य चतुर्दश समन्ततः । त्रिगुणं परिवेषेण लेशतश्चाधिकं भवेत् ॥१२३॥

अर्थ: यह नगर चौदह योजन लम्बा-चौड़ा था और इसकी परिधि - गोलाई बयालीस योजनसे कुछ अधिक थी ॥१२३॥


संमुखद्वारविन्यासा मणिकाञ्चनभित्तयः । प्रग्रीवकसमायुक्ता रत्नस्तम्भसमुच्छ्रिताः ॥१२४॥

कपोतपाल्युपान्तेषु महानीलविनिर्मिताः । रत्नभाभिर्निरस्तस्य ध्वान्तस्येवानुकम्पिताः ॥१२५॥

देहलीपिण्डिकाभागं पद्मरागविनिर्मितम् । ताम्बूलेनेव सच्छायं धारयन्त्यो रदच्छदम् ॥१२६॥

द्वारोपरि समायुक्तमुक्तादामांशुसंपदा । हसन्त्य इव शेषाणां भवनानां सुरूपताम् ॥१२७॥

शशाङ्कसदृशाकारैर्मणिभिः शिखराहितैः । रजनीष्वपि कुर्वाणा संदेहं रजनीकरे ॥१२८॥

चन्द्रकान्तमणिच्छायाकल्पितोदारचन्द्रिकाः । नानारत्नप्रभापङ्क्तिसंदिग्धोत्तुङ्गतोरणाः ॥१२९॥

मणिकुट्टिमविन्यस्तरत्नपद्मावलिक्रियाः । पङ्क्तयस्तत्र गेहानां खेचरैर्विनिवेशिताः ॥१३०॥

अर्थ: इस नगरमें विद्याधरोंने महलोंकी ऐसी-ऐसी ऊँची श्रेणियाँ बनाकर तैयार की थीं कि जिनके सामने उत्तुंग दरवाजे थे, जिनकी दीवालें मणि और सुवर्णसे निर्मित थीं, जो अच्छे-अच्छे बरण्डोंसे सहित थीं, रत्नोंके खम्भोंपर खड़ी थीं । जिनकी कपोतपालीके समीपका भाग महानील मणियोंसे बना था और ऐसा जान पड़ता था कि रत्नोंकी कान्तिने जिस अन्धकारको सब जगहसे खदेड़कर दूर कर किया था मानो उसे यहाँ अनुकम्पावश स्थान ही दिया गया था । जिन महलोंकी देहरी पद्मरागमणियोंसे निर्मित होनेके कारण लाल-लाल दिख रही थीं इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो ताम्बूलके द्वारा जिसकी लाली बढ़ गयी थी ऐसा ओठ ही धारण कर रही हों । जिनके दरवाजोंके ऊपर अनेक मोतियोंकी मालाएँ लटकायी गयी थीं और जिनकी किरणोंसे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो अन्य भवनोंकी सुन्दरताकी हँसी ही उड़ा रही हों । शिखरोंके ऊपर चन्द्रमाके समान आकारवाले मणि लगे हुए थे उनसे जो रात्रिके समय असली चन्द्रमाके विषयमें संशय उत्पन्न कर रहे थे । अर्थात् लोग संशयमें पड़ जाते थे कि असली चन्द्रमा कौन है ? चन्द्रकान्त मणियोंकी कान्तिसे जो भवन उत्तम चाँदनीकी शोभा प्रकट कर रहे थे तथा जिनमें लगे नाना रत्नोंकी प्रभासे ऊँचे-ऊँचे तोरणद्वारोंका सन्देह हो रहा था जिनके मणिनिर्मित फर्शोंपर रत्नमयी कमलोंके चित्राम किये गये थे ॥१२४-१३०॥


शुष्कसागरविस्तीर्णा मणिकाञ्चनवालुकाः । राजमार्गाः कृतास्तस्मिन् कौटिल्यपरिवर्जिताः ॥१३१॥

अर्थ: उस नगरमें कुटिलतासे रहित–सीधे ऐसे राजमार्ग बनाये गये थे जिनमें कि मणियों और सुवर्णकी धूलि बिखर रही थी तथा जो सूखे सागरके समान लम्बे-चौड़े थे ॥१३१॥


प्राकारस्तत्र विन्यस्तो रत्नच्छायाकृतावृतिः । शिखराग्रैः श्रिया दर्पात् सौधर्ममिव ताडयन् ॥१३२॥

अर्थ: उस नगरमें ऊँचे-ऊँचे गोपुर बनाये गये थे जो मणियोंकी किरणोंसे सदा आच्छादित-से रहा करते थे ॥१३२॥


गोपुराणि च तुङ्गानि न्यस्तान्यत्र मरीचिभिः । मणीनां यानि लक्ष्यन्ते स्थगितानीव सर्वदा ॥१३३॥

अर्थ: इन्द्रपुरके समान सुन्दर उस नगरमें राजा श्रीकण्ठ अपनी पद्माभा प्रियाके साथ, इन्द्र-इन्द्राणीके समान चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहा ॥१३३॥


पुरन्दरपुराकारे पुरे तस्मिन् चिराय सः । पद्मया सहितो रेमे शच्येव विबुधाधिपः ॥१३४॥

अर्थ: भद्रशालवन, सौमनसवन तथा नन्दनवनमें ऐसी कोई वस्तु नहीं थी जो उसे दुर्लभ रही हो ॥१३४॥


भद्रशालवने यानि तथा सौमनसे वने । नन्दने वा न तान्यस्य द्रव्याण्यापुर्दुरापताम् ॥१३५॥

कदाचिदथ तत्रासौ तिष्ठन् प्रासादमूर्धनि । व्रजन्तं वन्दनामस्या द्वीपं नन्दीश्वरश्रुतिम् ॥१३६॥

पाकशासनमैक्षिष्ट सत्रा देवैश्चतुर्विधैः । मुकुटानां प्रभाजालैः पिशङ्गितनभस्तलम् ॥१३७॥

कुर्वन्तं वधिरं लोकं समस्तं तूर्यनिःस्वनैः । हस्तिभिर्वाजिभिर्हंसैर्मेषैरुष्ट्रैर्वृकैर्मृगैः ॥१३८॥

अन्यैश्च विविधैर्यानैः परिवर्गैरधिष्ठितैः । अन्वीयमानं दिव्येन गन्धेन व्याप्तविष्टपम् ॥१३९॥

अर्थ: अथानन्तर किसी एक दिन राजा श्रीकण्ठ महलकी छतपर बैठा था उसी समय नन्दीश्वर द्वीपकी वन्दना करनेके लिए चतुर्विध देवोंके साथ इन्द्र जा रहा था । वह इन्द्र मुकुटोंकी कान्तिसे आकाशको पीतवर्ण कर रहा था, तुरही बाजोंके शब्दसे समस्त लोकको बधिर बना रहा था, अपने-अपने स्वामियोंसे अधिष्ठित हाथी, घोड़े, हंस, मेढ़ा, ऊँट, भेड़िया तथा हरिण आदि अन्य अनेक वाहन उसके पीछे-पीछे चल रहे थे, और उसकी दिव्य गन्धसे समस्त लोक व्याप्त हो रहा था ॥१३५-१३९॥


ततस्तेन श्रुतं पूर्वं मुनिभ्यः संकथागतम् । स्मृतं नन्दीश्वरद्वीपं नन्दनं स्वर्गवासिनाम् ॥१४०॥

अर्थ: श्रीकण्ठने पहले मुनियोंके मुखसे नन्दीश्वर द्वीपका वर्णन सुना था सो देवोंको आनन्दित करनेवाला वह नन्दीश्वर द्वीप उसकी स्मृतिमें आ गया ॥१४०॥


स्मृत्वा च विबुधैः सार्द्धमकरोद् गमने मतिम् । खेचरैश्च समं सर्वैः समारूढो मरुत्पथम् ॥१४१॥

अर्थ: स्मृतिमें आते ही उसने देवोंके साथ नन्दीश्वर द्वीप जानेका विचार किया । विचारकर वह समस्त विद्याधरोंके साथ आकाशमें आरूढ़ हुआ ॥१४१॥


स गच्छन् क्रौञ्चयुक्तेन विमानेन सहाङ्गनः । मानुषोत्तरशैलेन निवारितगतिः कृतः ॥१४२॥


अतिक्रान्ताँस्ततो दृष्ट्वा मानुषोत्तरपर्वतम् । गीर्वाणनिवहान् सर्वान् परमं शोकमागतः ॥१४३॥

अर्थ: जिसमें विद्यानिर्मित क्रौंचपक्षी जुते थे ऐसे विमानपर अपनी प्रिया पद्माभाके साथ बैठकर राजा श्रीकण्ठ आकाशमार्गसे जा रहा था परन्तु जब मानुषोत्तर पर्वतपर पहुँचा तो उसका आगे जाना रुक गया ॥१४३॥


परिदेवमथो चक्रे भग्नोत्साहो गतद्युतिः । हा कष्टं क्षुद्रशक्तीनां मनुष्याणां धिगुन्नतिम् ॥१४४॥

अर्थ: इसकी गति तो रुक गयी परन्तु देवोंके समूह मानुषोत्तर पर्वतको उल्लंघ कर आगे निकल गये। यह देख श्रीकण्ठ परम शोकको प्राप्त हुआ ॥१४४॥


नन्दीश्वरे जिनेन्द्राणां प्रतिमानां महात्विषाम् । अकृत्रिमेण भावेन करिष्यामीति दर्शनम् ॥१४५॥

अर्थ: उसका उत्साह भग्न हो गया और कान्ति नष्ट हो गयी। तदनन्तर वह विलाप करने लगा कि हाय-हाय, क्षुद्रशक्तिके धारी मनुष्योंकी उन्नतिको धिक्कार हो ॥१४५॥


पूजां च विविधैः पुष्पैर्धूपैर्गन्धैश्च हारिभिः । नमस्कारं च शिरसा धरासंसक्तमौलिना ॥१४६॥

ये कृता मन्दभाग्येन मया चारुमनोरथाः । कथं ते कर्मभिर्भग्ना अशुभैः पूर्वसंचितैः ॥१४७॥

अर्थ: ‘नन्दीश्वर द्वीपमें जो जिनेन्द्र भगवान्की महाकान्तिशाली प्रतिमाएँ हैं मैं निश्छलभावसे उसके दर्शन करूँगा, नाना प्रकारके पुष्प, धूप और मनोहारी गन्धसे उनकी पूजा करूँगा तथा पृथ्वीपर मुकुट झुकाकर शिरसे उन्हें नमस्कार करूँगा’ मुझ मन्दभाग्यने ऐसे जो सुन्दर मनोरथ किये थे वे पूर्वसंचित अशुभ कर्मोंके द्वारा किस प्रकार भग्न कर दिये गये ? ॥१४६-१४७॥


अथवा श्रुतमेवासीन्मया मानुषपर्वतम् । अतिक्रम्य न गच्छन्ति मानुषा इत्यनेकशः ॥१४८॥

तथापि श्रद्धया तन्मे नितान्तं वृद्धियुक्तया । विस्मृतं गन्तुमुद्युक्तो यतोऽस्मि स्वल्पशक्तिकः ॥१४९॥

अर्थ: अथवा यद्यपि यह बात मैंने अनेक बार सुनी थी कि मनुष्य मानुषोत्तर पर्वतका उल्लंघन कर नहीं जा सकते हैं तथापि अतिशय वृद्धिको प्राप्त हुई श्रद्धाके कारण मैं इस बातको भूल गया और अल्पशक्तिका धारी होकर भी जानेके लिए तत्पर हो गया ॥१४८-१४९॥


तस्मात् करोमि कर्माणि तानि यैरन्यजन्मनि । यातुं नन्दीश्वरं द्वीपं गतिर्मे न विहन्यते ॥१५०॥

अर्थ: इसलिए अब मैं ऐसे कार्य करता हूँ कि जिससे अन्य जन्ममें नन्दीश्वर द्वीप जानेके लिए मेरी गति रोकी न जा सके ॥१५०॥


इति निश्चित्य मनसा न्यस्य राज्यभरं सुते । अभून्महामुनिर्धीरस्त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥१५१॥

अर्थ: ऐसा हृदयसे निश्चय कर श्रीकण्ठ, पुत्रके लिए राज्य सौंपकर, समस्त परिग्रहका त्यागी महामुनि हो गया ॥१५१॥


वज्रकण्ठस्ततः सार्द्धं चारुण्या श्रियमुत्तमाम् । भुक्त्वा किष्कुपुरे रम्ये श्रुत्वोपाख्यानकं पितुः ॥१५२॥

ऐश्वर्यं तनये क्षिप्त्वा प्राप दैगम्बरीं क्रियाम् । कीदृशं तदुपाख्यानमित्युक्तो गणभृज्जगौ ॥१५३॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीकण्ठका पुत्र वज्रकण्ठ अपनी चारुणी नामक वल्लभाके साथ महामनोहर किष्कुपुरमें उत्कृष्ट राज्यलक्ष्मीका उपभोग कर रहा था कि उसने एक दिन वृद्धजनोंसे अपने पिताके पूर्वभव सुने। सुनते ही उसका वैराग्य बढ़ गया और पुत्रके लिए ऐश्वर्य सौंपकर उसने जिनदीक्षा धारण कर ली। यह सुनकर राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि श्रीकण्ठके पूर्वभवका वर्णन कैसा था जिसे सुनकर वज्रकण्ठ तत्काल विरक्त हो गया। उत्तरमें गणधर भगवान् कहने लगे ॥१५२-१५३॥


वणिजौ भ्रातरावास्तां प्रीतौ स्त्रीभ्यां वियोजितौ । कनीयान् दुर्विधो ज्येष्ठः स्वापतेयी गृहीतवाक् ॥१५४॥


श्रेष्ठिनः संगमादेव प्राप्तः श्रावकतां पराम् । मृगयाजीविना भ्रात्रा परमं दुःखितोऽभवत् ॥१५५॥


अलीकस्वाहतस्वामिपुरुषस्य विसर्जने । परीक्ष्य भ्रातरं प्रीतं ददावस्मै महद्धनम् ॥१५६॥

दुष्टां ततः स्त्रियं त्यक्त्वा संगीर्यानुजबोधनम् । प्रव्रज्यायमभूदिन्द्रः कनीयांस्तु शमी मृतः ॥१५७॥

देवीभूयश्च्युतो जातः श्रीकण्ठस्तत्प्रबुद्धये । आत्मानं दर्शयन्निन्द्रः श्रीमान्नन्दीश्वरं गतः ॥१५८॥

सुरेन्द्रं वीक्ष्य पित्रा ते जातस्मरणमीयुषा । इदं कथितमस्माकमिति वृद्धास्तमूचिरे ॥१५९॥

अर्थ: कि पूर्वभवमें दो भाई वणिक् थे, दोनोंमें परम प्रीति थी परन्तु स्त्रियोंने उन्हें पृथक्-पृथक् कर दिया। उनमें छोटा भाई दरिद्र था और बड़ा भाई धनसम्पन्न था। बड़ा भाई किसी सेठका आज्ञाकारी था सो उसके समागमसे वह श्रावक अवस्थाको प्राप्त हुआ परन्तु छोटा भाई शिकार आदि कुव्यसनोंमें फँसा था। छोटे भाईकी इस दशासे बड़ा भाई सदा दुःखी रहता था एक दिन उसने अपने स्वामीका एक सेवक छोटे भाईके पास भेजकर झूठ-मूठ ही अपने आहत होनेका समाचार भेजा । उसे सुनकर प्रेमसे भरा छोटा भाई दौड़ा आया । इस घटनासे बड़े भाईने परीक्षा कर ली कि यह हमसे स्नेह रखता है । यह जानकर उसने छोटे भाईके लिए बहुत धन दिया । धन देनेका समाचार जब बड़े भाईकी स्त्रीको मिला तो वह बहुत ही कुपित हुई । इस अनबनके कारण बड़े भाईने अपनी दुष्ट स्त्रीका त्याग कर दिया और छोटे भाईको उपदेश देकर दीक्षा ले ली । समाधिसे मरकर बड़ा भाई इन्द्र हुआ और छोटा भाई शान्त परिणामोंसे मरकर देव हुआ । वहाँसे च्युत होकर छोटे भाईका जीव श्रीकण्ठ हुआ । श्रीकण्ठको सम्बोधनेके लिए बड़े भाईका जीव जो वैभवशाली इन्द्र हुआ था अपने आपको दिखाता हुआ नन्दीश्वरद्वीप गया था । इन्द्रको देखकर तुम्हारे पिता श्रीकण्ठको जातिस्मरण हो गया । यह कथा मुनियोंने हमसे कही थी ऐसा वृद्धजनोंने वज्रकण्ठसे कहा ॥१५६-१५९॥


एतदाख्यानकं श्रुत्वा वज्रकण्ठोऽभवन्मुनिः । इन्द्रायुधप्रभोऽप्येवं न्यस्य राज्यं शरीरजे ॥१६०॥

तत इन्द्रमतो जातो मेरुस्तस्माच्च मन्दरः । समीरणगतिस्तस्मात्तस्मादपि रविप्रभः ॥१६१॥

ततोऽमरप्रभो जातस्त्रिकूटेन्द्रसुतास्य च । परिणेतुं समानीता नाम्ना गुणवती शुभा ॥१६२॥

अर्थ: यह कथा सुनकर वज्रकण्ठ अपने वज्रप्रभ पुत्रके लिए राज्य देकर मुनि हो गया । वज्रप्रभ भी अपने पुत्र इन्द्रमतके लिए राज्य देकर मुनि हुआ । तदनन्तर इन्द्रमतसे मेरु, मेरुसे मन्दर, मन्दरसे समीरणगति, समीरणगतिसे रविप्रभ और रविप्रभसे अमरप्रभ नामक पुत्र हुआ । अमरप्रभ लंकाके धनीकी पुत्री गुणवतीको विवाहनेके लिए अपने नगर ले गया ॥१६०-१६२॥


अथासौ दर्पणच्छाये वेदीसंबन्धिभूतले । मणिभिः कल्पितं चित्रं पश्यन्नाश्चर्यकारणम् ॥१६३॥

भ्रमरालीपरिष्वक्तमारविंदं क्वचिद्वनम् । ऐन्दीवरं वनं चार्द्धपद्मेन्दीवरकं तथा ॥१६४॥

चञ्चूपात्तमृणालानां हंसानां युगलानि च । क्रौञ्चानां सारसानां च तथाऽन्येषां पतत्रिणाम् ॥१६५॥

रत्नचूर्णैरतिश्लक्ष्णैः पञ्चवर्णसमन्वितैः । रचितान् खेचरस्त्रीभिः तत्रापश्यत् प्लवङ्गमान् ॥१६६॥

स तान् दृष्ट्वा परं तोषं जगामाम्बरगाधिपः । मनोज्ञं प्रायशो रूपं धीरस्यापि मनोहरम् ॥१६७॥

अर्थ: जहाँ विवाहकी वेदी बनी थी वहाँकी भूमि दर्पणके समान निर्मल थी तथा वहाँ विद्याधरोंकी स्त्रियोंने मणियोंसे आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले अनेक चित्र बना रखे थे । कहीं तो भ्रमरोंसे आलिंगित कमलोंका वन बना हुआ था, कहीं नील कमलोंका वन था, कहीं आधे लाल और नीले कमलोंका वन था, कहीं चोंचसे मृणाल दबाये हुए हंसोंके जोड़े बने थे और कहीं क्रौंच, सारस तथा अन्य पक्षियोंके युगल बने थे । उन्हीं विद्याधरोंने कहीं अत्यन्त चिकने पांच वर्णके रत्नमयी चूर्णसे वानरोंके चित्र बनाये थे सो इन्हें देखकर विद्याधरोंका स्वामी राजा अमरप्रभ परम सन्तोषको प्राप्त हुआ सो ठीक ही है क्योंकि सुन्दररूप प्रायःकर धीर-वीर मनुष्यके भी मनको हर लेता है ॥१६३-१६७॥


अथ पाणिगृहीत्यस्य दृष्ट्वा तान् विकृताननान् । प्रत्यङ्गवेपथुं प्राप्ता प्रचलत्सर्वभूषणा ॥१६८॥

निःशेषदृश्यविश्रान्ततारकाकुललोचना । दर्शयन्तीव रोमाञ्चप्रोद्गमादेहवद्भयम् ॥१६९॥

स्वेदोदबिन्दुसंबद्धविसर्पत्तिलकालिका । भीरुरप्यतिसच्चेष्टा प्राविशद्भुजपञ्जरम् ॥१७०॥

अर्थ: इधर राजा अमरप्रभ तो परम सन्तुष्ट हुआ, उधर वधू गुणवती विकृत मुखवाले उन वानरोंको देखकर भयभीत हो गयी । उसका प्रत्येक अंग काँपने लगा, सब आभूषण चंचल हो उठे, सबके देखते-देखते ही उसकी आँखोंकी पुतलियां भयसे घूमने लगीं, उसके सारे शरीरसे रोमांच निकल आये और उनसे वह ऐसे जान पड़ने लगी मानो शरीरधारी भयको ही दिखा रही हो । उसके ललाटपर जो तिलक लगा था वह स्वेदजलकी बूँदोंसे मिलकर फैल गया । यद्यपि वह भयभीत हो रही थी तो भी उसकी चेष्टाएँ उत्तम थीं । अन्तमें वह इतनी भयभीत हुई कि राजा अमरप्रभसे लिपट गयी ॥१६८-१७०॥


दृष्ट्वा यान् मुदितः पूर्वं तेभ्योऽकुप्यत् पुनर्वरः । कान्ताभिप्रायसामर्थ्यात् सुरूपमपि नेष्यते ॥१७१॥

अर्थ: राजा अमरप्रभ पहले जिन वानरोंको देखकर प्रसन्न हुआ था अब उन्हीं वानरोंके प्रति अत्यन्त क्रोध करने लगा सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रीका अभिप्राय देखकर सुन्दर वस्तु भी रुचिकर नहीं होती ॥१७१॥


ततोऽसावब्रवीत् केन विवाहे मम चित्रिताः । कपयो विविधाकारा अमी वित्रासकारिणः ॥१७२॥

अर्थ: तदनन्तर उसने कहा कि हमारे विवाहमें अनेक आकारोंके धारक तथा भय उत्पन्न करनेवाले ये वानर किसने चित्रित किये हैं? ॥१७२॥


नूनं कश्चिन्ममास्तेऽस्मिन् जनो मत्सरसंगतः । क्षिप्रमन्विष्यतामेष करोम्यस्य वधं स्वयम् ॥१७३॥

अर्थ: निश्चित ही इस कार्यमें कोई मनुष्य मुझसे ईर्ष्या करनेवाला है सो शीघ्र ही उसकी खोज की जाये, मैं स्वयं ही उसका वध करूँगा ॥१७३॥


ततस्तं कोपगम्भीरगुहागह्वरवर्तिनम् । वर्षीयांसो महाप्राज्ञा मधुरं मन्त्रिणोऽब्रुवन् ॥१७४॥

अर्थ: तदनन्तर राजा अमरप्रभको क्रोधरूपी गहरी गुहाके मध्य वर्तमान देखकर महाबुद्धिमान् वृद्ध मन्त्री मधुर शब्दोंमें कहने लगे ॥१७४॥


तात नास्मिन् जनः कोऽपि विद्वेष्टा तव विद्यते । त्वयि वा यस्य विद्वेषः कुतस्तस्याति जीवितम् ॥१७५॥

अर्थ: कि हे स्वामिन् ! इस कार्यमें आपसे द्वेष करनेवाला कोई भी नहीं है । भला, आपके साथ जिसका द्वेष होगा उसका जीवन ही कैसे रह सकता है? ॥१७५॥


स त्वं भव प्रसन्नात्मा श्रूयतामत्र कारणम् । विवाहमङ्गले न्यस्ता यतः प्लवगपङ्क्तयः ॥१७६॥

अर्थ: आप प्रसन्न होइए और विवाह-मंगलमें जिस कारणसे वानरोंकी पंक्तियां चित्रित की गयी हैं वह कारण सुनिए ॥१७६॥


अन्वये भवतामासीच्छ्रीकण्ठो नाम विश्रुतः । येनेदं नाकसंकाशं सृष्टं किष्कुपुरोत्तमम् ॥१७७॥

अर्थ: आपके वंशमें श्रीकण्ठ नामका प्रसिद्ध राजा हो गया है जिसने स्वर्गके समान सुन्दर इस किष्कुपुर नामक उत्तम नगरकी रचना की थी ॥१७७॥


सकलस्यास्य देशस्य विविधाकारभाजिनः । अभवत् स नृपः स्रष्टा प्रपञ्चः कर्मणामिव ॥१७८॥

अर्थ: जिस प्रकार कर्मोंका मूल कारण रागादि प्रपंच हैं उसी प्रकार अनेक आकारको धारण करनेवाले इस देशका मूल कारण वही श्रीकण्ठ राजा है ॥१७८॥


यस्याद्यापि वनान्तेषु लतागृहसुखस्थिताः । गुणान् गायन्ति किन्नर्यः स्थानकं प्राप्य किन्नरैः ॥१७९॥

अर्थ: वनोंके बीच निकुंजोंमें सुखसे बैठे हुए किन्नर उत्तमोत्तम स्थान पाकर आज भी उस राजाके गुण गाया करते हैं ॥१७९॥


चञ्चलत्वसमुद्भूतमयशो येन शोधितम् । स्थिरप्रकृतिना लक्ष्म्या वासवोपमशक्तिना ॥१८०॥

अर्थ: जिसकी प्रकृति स्थिर थी तथा जो इन्द्रतुल्य पराक्रमका धारक था ऐसे उस राजाने चंचलताके कारण उत्पन्न हुआ लक्ष्मीका अपयश दूर कर दिया था ॥१८०॥


स एतान् प्रथमं दृष्ट्वा वानरानत्र रूपिणः । मानुषाकारसंयुक्तान् जगाम किल विस्मयम् ॥१८१॥

अर्थ: सुनते हैं कि वह राजा सर्वप्रथम इस नगरमें सुन्दर रूपके धारक तथा मनुष्यके समान आकारसे संयुक्त इन वानरोंको देखकर आश्चर्यको प्राप्त हुआ था ॥१८१॥


रेमे च मुदितोऽमीभिः समं विविधचेष्टितैः । मृष्टाशनादिभिश्चामी नितान्तं सुस्थिताः कृताः ॥१८२॥

अर्थ: वह राजा नाना प्रकारकी चेष्टाओंको धारण करनेवाले इन वानरोंके साथ बड़ी प्रसन्नतासे क्रीड़ा करता था तथा उसीने इन वानरोंको मधुर आहार-पानी आदिके द्वारा सुखी किया था ॥१८२॥


ततः प्रभृति ये जाताः कुले तस्य महाद्युतेः । तस्य भक्त्या रतिं तेऽपि चक्रुरेभिर्नरोत्तमाः ॥१८३॥

अर्थ: तदनन्तर महाकान्तिके धारक राजा श्रीकण्ठके वंशमें जो उत्तमोत्तम राजा हुए वे भी उसकी भक्तिके कारण इन वानरोंसे प्रेम करते रहे ॥१८३॥


युष्माकं पूर्वजैर्यस्मादमी मङ्गलवस्तुषु । प्रकल्पिताः ततस्तेऽपि मङ्गले संनिधापिताः ॥१८४॥

अर्थ: चूँकि आपके पूर्वजोंने इन्हें मांगलिक पदार्थोंमें निश्चित किया था अर्थात् इन्हें मंगलस्वरूप माना था इसलिए ये सब चित्रामरूपसे इस मंगलमय कार्यमें उपस्थित किये गये हैं ॥१८४॥


मङ्गलं यस्य यत्पूर्वं पुरुषैः सेवितं कुले । प्रत्यवायेन संबन्धे निरासे तस्य जायते ॥१८५॥

अर्थ: जिस कुलमें जिस पदार्थकी पहलेसे पुरुषोंके द्वारा मंगलरूपमें उपासना होती आ रही है यदि उसका तिरस्कार किया जाता है तो नियमसे विघ्न-बाधाएँ उपस्थित होती हैं ॥१८५॥


क्रियमाणं तु तद्भक्त्या करोति शुभसंपदम् । तस्मादासेव्यतामेतद्भवतापि सुचेतसा ॥१८६॥

अर्थ: यदि वही कार्य भक्तिपूर्वक किया जाता है तो वह शुभ सम्पदाओंको देता है । हे राजन् । आप उत्तम हृदयके धारक हैं - विचारशील हैं अतः आप भी इन वानरोंके चित्रामकी उपासना कीजिए ॥१८६॥


इत्युक्ते मन्त्रिभिः सोन्त्वं प्रत्युवाचामरप्रभः । त्यजन् क्षणेन कोपोत्थविकारं वदनार्पितम् ॥१८७॥

अर्थ: मन्त्रियोंके ऐसा कहनेपर राजा अमरप्रभने बड़ी सान्त्वनासे उत्तर दिया । क्रोधके कारण उसके मुखपर जो विकार आ गया था उत्तर देते समय उसने उस विकारका त्याग कर दिया था ॥१८७॥


मङ्गलं सेविताः पूर्वैर्यथस्माकममी ततः । किमित्यालिखिता भूमौ यस्यां पादादिसंगमः ॥१८८॥

अर्थ: उसने कहा कि यदि हमारे पूर्वजोंने इनकी मंगलरूपसे उपासना की है तो इन्हें इस तरह पृथिवीपर क्यों चित्रित किया गया है जहाँ कि पैर आदिका संगम होता है ॥१८८॥


नमस्कृत्य वहाम्येतान् शिरसा गुरुगौरवात् । रत्नादिघटितान् कृत्वा लक्षणान्मौलिकोटिषु ॥१८९॥

ध्वजेषु गृहशृङ्गेषु तोरणानां च मूर्द्धसु । शिरस्सु चातपत्राणामेतानाशु प्रयच्छत ॥१९०॥

ततस्तैस्तत्प्रतिज्ञाय तथा सर्वमनुष्ठितम् । यथा दिगीक्ष्यते या या तत्र तत्र प्लवङ्गमाः ॥१९१॥

अर्थ: गुरुजनोंके गौरवसे मैं इन्हें नमस्कार कर शिरपर धारण करूँगा । रत्न आदिके द्वारा वानरोंके चिह्न बनवाकर मुकुटोंके अग्रभागमें, ध्वजाओंमें, महलोंके शिखरोंमें, तोरणोंके अग्रभागमें तथा छत्रोंके ऊपर इन्हें शीघ्र ही धारण करो । इस प्रकार मन्त्रियोंको आज्ञा दी सो उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर राजाकी आज्ञानुसार सब कुछ किया । जिस दिशामें देखो उसी दिशामें वानर ही वानर दिखाई देते थे ॥१८९-१९१॥


अथैतस्य समं देव्या भुञ्जानस्य परं सुखम् । विजयार्द्धजिगीषायामकरोन्मानसं पदम् ॥१९२॥

प्रतस्थे च ततो युक्तः सेनया चतुरङ्गया । कपिध्वजः कपिच्छत्रः कपिमौलिः कपिस्तुतः ॥१९३॥

अर्थ: अथानन्तर रानीके साथ परम सुखका उपभोग करते हुए राजा अमरप्रभके मनमें विजयार्ध पर्वतको जीतनेकी इच्छा हुई सो चतुरंग सेनाके साथ उसने प्रस्थान किया । उस समय उसकी ध्वजामें वानरोंका चिह्न था और सब वानरवंशी उसकी स्तुति कर रहे थे ॥१९२-१९३॥


श्रेणिद्वयं विजित्यासौ रणे सत्त्वविमर्दिनि । आस्थापयद्वशे राजा जग्राह न धनं तयोः ॥१९४॥

अर्थ: प्राणियों-का मान मर्दन करनेवाले युद्धमें दोनों श्रेणियोंको जीतकर उसने अपने वश किया पर उनका धन नहीं ग्रहण किया ॥१९४॥


अभिमानेन तुङ्गानां पुरुषाणामिदं व्रतम् । नमयन्त्येव यच्छत्रुं द्रविणे विगताशयाः ॥१९५॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि अभिमानी मनुष्योंका यह व्रत है कि वे शत्रुको नम्रीभूत ही करते हैं, उसके धनकी आकांक्षा नहीं करते ॥१९५॥


ततोऽसौ पुनरागच्छत् पुरं किष्कु प्रकीर्तितम् । विजयार्द्धप्रधानेन जनेनानुगतायनः ॥१९६॥

अर्थ: तदनन्तर विजयार्द्ध पर्वतके प्रधान पुरुष जिसके पीछे-पीछे आ रहे थे ऐसा राजा अमरप्रभ दिग्विजय कर किष्कु नगर वापस आया ॥१९६॥


आधिपत्यं समस्तानां प्राप्य विद्याभृतामसौ । निश्चला बुभुजे लक्ष्मीं निगडैरिव संयुताम् ॥१९७॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त विद्याधरोंका आधिपत्य पाकर उसने चिरकाल तक लक्ष्मीका उपभोग किया । लक्ष्मी चंचल थी सो उसने बेड़ी डालकर ही मानो उसे निश्चल बना दिया था ॥१९७॥


ततस्तस्य सुतो जातः कपिकेतुरभिख्यया । श्रीप्रभा कामिनी यस्य बभूव गुणधारिणी ॥१९८॥

अर्थ: तदनन्तर राजा अमरप्रभके कपिकेतु नामका पुत्र हुआ । उसके अनेक गुणोंको धरनेवाली श्रीप्रभा नामकी रानी थी ॥१९८॥


ततो विक्रमसंपन्नं स तं वीक्ष्य शरीरजम् । राज्यलक्ष्म्यां समायोज्य निरगाद् गृहबन्धनात् ॥१९९॥

अर्थ: पुत्रको पराक्रमी देख राजा अमरप्रभ उसे राज्यलक्ष्मी सौंपकर गृहरूपी बन्धनसे बाहर निकला ॥१९९॥


दत्त्वा प्रतिबलाख्याय लक्ष्मीं सोऽपि विनिर्ययौ । प्रायशो विषवल्लीव दृष्टा पूर्वैर्नृपद्युतिः ॥२००॥

अर्थ: तदनन्तर कपिकेतु भी प्रतिबल नामक पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी देकर घरसे चला गया सो ठीक ही है क्योंकि पूर्व पुरुष राज्यलक्ष्मीको प्रायः विषकी वेलके समान देखते थे ॥२००॥


पूर्वोपार्जितपुण्यानां पुरुषाणां प्रयत्नतः । संजातासु न लक्ष्मीषु भावः संजायते महान् ॥२०१॥

अर्थ: जिन्होंने पूर्व पर्यायमें पुण्य उपार्जित किया है ऐसे पुरुषोंका प्रयत्नोपार्जित लक्ष्मीमें बड़ा अनुराग नहीं होता ॥२०१॥


यथैव ताः समुत्पन्नास्तेषामल्पप्रयत्नतः । तथैव त्यजतामेषां पीडा तासु न जायते ॥२०२॥

अर्थ: पुण्यात्मा मनुष्योंको चूँकि लक्ष्मी थोड़े ही प्रयत्नसे अनायास ही प्राप्त हो जाती है इसलिए उसका त्याग करते हुए उन्हें पीड़ा नहीं होती ॥२०२॥


तथा कथंचिदासाद्य सन्तो विषयजं सुखम् । तेषु निर्वेदमागत्य वाञ्छन्ति परमं पदम् ॥२०३॥

अर्थ: सत्पुरुष, विषय सम्बन्धी सुखको किसी तरह प्राप्त करते भी हैं तो उससे शीघ्र ही विरक्त हो परम पद - मोक्षकी इच्छा करने लगते हैं ॥२०३॥


यन्नोपकरणैः साध्यमात्मायत्तं निरन्तरम् । महदन्तेव निर्मुक्तं सुखं तत् को न वाञ्छति ॥२०४॥

अर्थ: जो सुख उपकरणोंके द्वारा साध्य न होकर आत्माके अधीन है, अन्तररहित है, महान् है तथा अन्तसे रहित है उस सुखकी भला कौन नहीं इच्छा करेगा ॥२०४॥


सुतः प्रतिबलस्यापि गगनानन्दसंज्ञितः । तस्यापि खेचरानन्दस्तस्यापि गिरिनन्दनः ॥२०५॥

अर्थ: प्रतिबलके गगनानन्द नामका पुत्र हुआ, गगनानन्दके खेचरानन्द और खेचरानन्दके गिरिनन्दन पुत्र हुआ ॥२०५॥


एवं वानरकेतूनां वंशे संख्या विवर्जिताः । आत्मीयैः कर्मभिः प्राप्ताः स्वर्गं मोक्षं च मानवाः ॥२०६॥

अर्थ: इस प्रकार ध्वजामें वानरोंका चिह्न धारण करनेवाले वानरवंशियोंके वंशमें संख्यातीत राजा हुए सो उनमें अपने-अपने कर्मानुसार कितने ही स्वर्गको प्राप्त हुए और कितने ही मोक्ष गये ॥२०६॥


वंशानुसरणच्छाया मात्रमेतत्प्रकीर्त्यते । नामान्येषां समस्तानां शक्तः कः परिकीर्तितुम् ॥२०७॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि राजन् ! यह तो वंशमें उत्पन्न हुए पुरुषोंका छाया मात्रका निरूपण है । इन सब पुरुषोंका नामोल्लेख करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२०७॥


लक्षणं यस्य यल्लोके स तेन परिकीर्त्यते । सेवकः सेवया युक्तः कर्षकः कर्षणात्तथा ॥२०८॥

धानुष्को धनुषो योगाद् धार्मिको धर्मसेवनात् । क्षत्रियः क्षततस्त्राणाद् ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यतः ॥२०९॥

इक्ष्वाकवो यथा चैते नमेश्च विनमेस्तथा । कुले विद्याधरा जाता विद्याधरणयोगतः ॥२१०॥

परित्यज्य नृपो राज्यं श्रमणो जायते महान् । तपसा प्राप्य संबन्धं तपो हि श्रम उच्यते ॥२११॥

अर्थ: लोकमें 'जिसका जो लक्षण होता है उसका उसी लक्षणसे उल्लेख होता है । जैसे सेवा करनेवाला सेवक, खेती करनेवाला किसान, धनुष धारण करनेवाला धानुष्क, धर्म सेवन करनेवाला धार्मिक, दुःखी जीवोंकी रक्षा करनेवाला क्षत्रिय और ब्रह्मचर्य धारण करनेवाला ब्राह्मण कहा जाता है । जिस प्रकार इक्ष्वाकु वंशमें उत्पन्न हुए पुरुष इक्ष्वाकु कहलाते हैं और नमि-विनमिके वंशमें उत्पन्न हुए पुरुष विद्या धारण करनेके कारण विद्याधर कहे गये हैं । जो राजा राज्य छोड़कर तपके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ते हैं वे श्रमण कहलाते हैं क्योंकि श्रम करे सो श्रमण और तपश्चरण ही श्रम कहा जाता है ॥२०८-२११॥


अयं तु व्यक्त एवास्ति शब्दोऽन्यत्र प्रयोगवान् । यष्टिहस्तो यथा यष्टिः कुन्तः कुन्तकरस्तथा ॥२१२॥

मञ्चस्थाः पुरुषा मञ्चा यथा च परिकीर्तिताः । साहचर्यादिभिर्धर्मैरेवमाद्या उदाहृताः ॥२१३॥

अर्थ: इसके सिवाय यह बात तो स्पष्ट ही है कि शब्द कुछ है और उसका प्रयोग कुछ अन्य अर्थमें होता है जैसे जिसके हाथमें यष्टि है वह यष्टि, जिसके हाथमें कुन्त है वह कुन्त और जो मंचपर बैठा है वह मंच कहलाता है । इस तरह साहचर्य आदि धर्मोंके कारण शब्दोंके प्रयोगमें भेद होता है इसके उदाहरण दिये गये हैं ॥२१२-२१३॥


तथा वानरचिह्नेन छत्रादिविनिवेशिना । विद्याधरा गताः ख्यातिं वानरा इति विष्टपे ॥२१४॥

अर्थ: इसी प्रकार जिन विद्याधरोंके छत्र आदिमें वानरके चिह्न थे वे लोकमें ‘वानर’ इस प्रसिद्धिको प्राप्त हुए ॥२१४॥


श्रेयसो देवदेवस्य वासुपूज्यस्य चान्तरे । अमरप्रभसंज्ञेन कृतं वानरलक्षणम् ॥२१५॥

तत्कृतात् सेवनाज्जाताः शेषा अपि तथाक्रियाः । परां हि कुरुते प्रीतिं पूर्वाचरितसेवनम् ॥२१६॥

अर्थ: देवाधिदेव श्रेयान्सनाथ और वासुपूज्य भगवान्के अन्तरालमें राजा अमरप्रभने अपने मुकुट आदिमें वानरका चिह्न धारण किया था सो उसकी परम्परामें जो अन्य राजा हुए वे भी ऐसा ही करते रहे । यथार्थमें पूर्वजोंकी परिपाटीका आचरण करना परम प्रीति उत्पन्न करता है ॥२१५-२१६॥


एवं संक्षेपतः प्रोक्तः कपिवंशसमुद्भवः । प्रवक्ष्यामि परां वार्तामिमां श्रेणिक तेऽधुना ॥२१७॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह संक्षेपसे वानर-वंशकी उत्पत्ति कही है अब एक दूसरी बात कहता हूँ सो सुन ॥२१७॥


महोदधिरवो नाम खेचराणामभूत् पतिः । कुले वानरकेतूनां किष्कुनाम्नि पुरूत्तमे ॥२१८॥

विद्युत्प्रकाशा नामास्य पत्नी स्त्रीगुणसंपदाम् । निधानमभवद् भावगृहीतपतिमानसा ॥२१९॥

रामाणामभिरामाणां शतशो योपरि स्थिता । सौभाग्येन तु रूपेण विज्ञानेन तु कर्मभिः ॥२२०॥

अर्थ: अथानन्तर किष्कुनामक उत्तम नगरमें इसी वानर-वंशमें महोदधि नामक विद्याधर राजा हुआ । इसकी विद्युत्प्रकाशा नामकी रानी थी जो स्त्रियोंके गुणरूपी सम्पदाओंकी मानो खजाना थी । उसने अपनी चेष्टाओंसे पतिका हृदय वश कर लिया था, वह सौभाग्य, रूप, विज्ञान तथा अन्य चेष्टाओंके कारण सैकड़ों सुन्दरी स्त्रियोंकी शिरोमणि थी ॥२१८-२२०॥


पुत्राणां शतमेतस्य साष्टकं वीर्यशालिनाम् । येषु राज्यमरं न्यस्य स भोगान् बुभुजे सुखम् ॥२२१॥

अर्थ: राजा महोदधिके एक सौ आठ पराक्रमी पुत्र थे सो उनपर राज्यभार सौंपकर वह सुखसे भोगोंका उपभोग करता था ॥२२१॥


मुनिसुव्रतनाथस्य तीर्थे यः परिकीर्तितः । व्यापारैरद्भुतैर्नित्यमनुरञ्जितखेचरः ॥२२२॥

अर्थ: मुनि सुव्रत भगवान्के तीर्थमें राजा महोदधि प्रसिद्ध विद्याधर था । वह अपने आश्चर्यजनक कार्योंसे सदा विद्याधरोंको अनुरक्त रखता था ॥२२२॥


लङ्कायां स तदा स्वामी रक्षोवंशनमोविधुः । विद्युत्केश इति ख्यातो बभूव जनताप्रियः ॥२२३॥

अर्थ: उसी समय लंकामें विद्युत्केश नामक प्रसिद्ध राजा था । जो राक्षस वंशरूप आकाशका मानो चन्द्रमा था और लोगोंका अत्यन्त प्रिय था ॥२२३॥


गत्यागमनसंवृद्धमभूत् प्रेम परं तयोः । यतश्चित्तमभूदेकं पृथक्त्वं देहमात्रतः ॥२२४॥

अर्थ: महोदधि और विद्युत्केशमें परम स्नेह था जो कि एक दूसरेके यहाँ आने-जानेके कारण परम वृद्धिको प्राप्त हुआ था । उन दोनोंका चित्त तो एक था केवल शरीर मात्रसे ही दोनोंमें पृथक्पना था ॥२२४॥


तडित्केशस्य विज्ञाय श्रामण्यमुदधिस्वनः । श्रमणत्वं परिप्राप्तः परमार्थविशारदः ॥२२५॥

अर्थ: विद्युत्केशने मुनिदीक्षा धारण कर ली यह समाचार जानकर परमार्थके जाननेवाले महोदधिने मुनिदीक्षा धारण कर ली ॥२२५॥


तडित्केशः कुतो हेतोराश्रितो दुर्द्धराकृतिम् । संपृष्टः श्रेणिकेनैवमुवाच गणनायकः ॥२२६॥

अर्थ: यह कथा सुनकर श्रेणिक राजाने गौतम गणधरसे पूछा कि हे स्वामिन् ! विद्युत्केशने किस कारण कठिन दीक्षा धारण की । इसके उत्तरमें गणधर भगवान् इस प्रकार कहने लगे ॥२२६॥


अन्यदाथ तडित्केशः प्रमदाख्यं मनोहरम् । निष्क्रान्तो रन्तुमुद्यानं कृतक्रीडनकालयम् ॥२२७॥

पद्मेन्दीवररम्येषु सरःसु स्वच्छवारिषु । उद्यत्तरङ्गभङ्गेषु द्रोणीसंचारचारुषु ॥२२८॥

अर्थ: कि किसी समय विद्युत्केश जिसमें क्रीड़ाके अनेक स्थान बने हुए थे ऐसे अत्यन्त सुन्दर प्रमदनामक वनमें क्रीड़ा करनेके लिए गया था सो वहाँ कभी तो वह उन सरोवरोंमें क्रीड़ा करता था जो कमल तथा नील कमलोंसे मनोहर थे, जिनमें स्वच्छ जल भरा था, जिनमें बड़ी-बड़ी लहरें उठ रही थीं तथा नावोंके संचारसे महामनोहर दिखाई देते थे ॥२२७-२२८॥


दोलासु च महार्हासु रचितासनभूमिषु । तुङ्गपादपसक्तासु दूरप्रेङ्खाप्रवृद्धिषु ॥२२९॥

अर्थ: कभी उन बेशकीमती झूलोंपर झूलता था जिनमें बैठनेका अच्छा आसन बनाया गया था, जो ऊँचे वृक्षसे बँधे थे तथा जिनकी उछाल बहुत लम्बी होती थी ॥२२९॥


सतः सोपानमार्गेषु रत्नरञ्जितसानुषु । द्रुमखण्डपरीतेषु हेमपर्वतकेषु च ॥२३०॥

अर्थ: कभी उन सुवर्णमय पर्वतोंपर चढ़ता था जिनके ऊपर जानेके लिए सीढ़ियोंके मार्ग बने हुए थे, जिनके शिखर रत्नोंसे रंजित थे, और जो वृक्षोंके समूहसे वेष्टित थे ॥२३०॥


फलपुष्पमनोज्ञेषु चलत्पल्लवशालिषु । लतालिङ्गितदेहेषु महीरुहचयेषु च ॥२३१॥

अर्थ: कभी उन वृक्षोंकी झुरमुटमें क्रीड़ा करता था जो फल और फूलोंसे मनोहर थे, जो हिलते हुए पल्लवोंसे सुशोभित थे और जिनके शरीर अनेक लताओंसे आलिंगित थे ॥२३१॥


मुनिक्षोभनसामर्थ्ययुक्तविभ्रमसंपदाम् । पुष्पादिप्रचयासक्तपाणिपल्लवशोभिनाम् ॥२३२॥

नितम्बवहनायासजातस्वेदाम्बुविप्रुषाम् । कुचकम्पोच्छलत्स्थूलमुक्ताहारपुरुत्विषाम् ॥२३३॥

निमज्जदुद्भवत्सूक्ष्मवलिमध्यविराजिताम् । निःश्वासाकृष्टमत्तालिवारणाकुलचेतसाम् ॥२३४॥

स्रस्ताम्बरसमालम्बिकराणां चलचक्षुषाम् । मध्यमास्थाय दाराणां स रेमे राक्षसाधिपः ॥२३५॥

अर्थ: कभी उन स्त्रियोंके बीच बैठकर क्रीड़ा करता था कि जिनके हाव-भाव-विलासरूप सम्पदाएँ मुनियोंको भी क्षोभित करनेकी सामर्थ्य रखती थीं, जो फूल आदि तोड़नेकी क्रियामें लगे हुए हस्तरूपी पल्लवोंसे शोभायमान थीं, स्थूल नितम्ब धारण करनेके कारण जिनके शरीरपर स्वेद जलकी बूँदें प्रकट हो रही थीं, स्तनोंके कम्पनसे ऊपरकी ओर उछलनेवाले बड़े-बड़े मोतियोंके हारसे जिनकी कान्ति बढ़ रही थी, जिसकी सूक्ष्म रेखाएँ कभी अन्तर्हित हो जाती थीं और कभी प्रकट दिखाई देती थीं ऐसी कमरसे जो सुशोभित थीं, श्वासोच्छ्वाससे आकर्षित मत्त भौंरोंके निराकरण करनेमें जिनका चित्त व्याकुल था, जो नीचे खिसके हुए वस्त्रको अपने हाथसे थामे हुई थीं तथा जिनके नेत्र इधर-उधर चल रहे थे । इस प्रकार राक्षसोंका राजा विद्युत्केश अनेक स्त्रियोंके बीच बैठकर क्रीड़ा कर रहा था ॥२३२-२३५॥


अथ क्रीडनसक्ताया देव्यास्तस्य पयोधरौ । श्रीचन्द्राख्यां दधानायाः कपिना नखकोटिभिः ॥२३६॥

अर्थ: अथानन्तर राजा विद्युत्केशकी रानी श्रीचन्द्रा इधर क्रीड़ामें लीन थी उधर किसी वानरने आकर अपने नाखूनोंके अग्रभागसे उसके दोनों स्तन विदीर्ण कर दिये ॥२३६॥


विपाटितौ स्वभावेन विनयप्रच्युतात्मना । नितान्तं खेद्यमानेन रुषा विकृतचक्षुषा ॥२३७॥

अर्थ: जिस वानरने उसके स्तन विदीर्ण किये थे वह स्वभावसे ही अविनयी था, क्रोधसे अत्यन्त खेदको प्राप्त हो रहा था, उसके नेत्र विकृत दिखाई देते थे ॥२३७॥


समाश्वास्य ततः कान्तां प्रगलत्स्तनशोणिताम् । निहतो बाणमाकृष्य तडित्केशेन वानरः ॥२३८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके स्तनसे खून झड़ रहा था ऐसी वल्लभाको सान्त्वना देकर उसने बाण द्वारा वानरको मार डाला ॥२३८॥


वेगेन स ततो गत्वा पतितस्तत्र भूतले । तिष्ठन्ति मुनयो यत्र विहायस्तलचारिणः ॥२३९॥

अर्थ: घायल वानर वेगसे भागकर वहाँ पृथ्वीपर पड़ा जहाँ कि आकाशगामी मुनिराज विराजमान थे ॥ ॥२३९॥


ततस्तं वेपथुग्रस्तं सबाणं वीक्ष्य वानरम् । मुनीनामनुकम्पाऽभूत् संसारस्थितिवेदिनाम् ॥२४०॥

अर्थ: जिसके शरीरमें कँपकँपी छूट रही थी तथा बाण छिदा हुआ था ऐसे वानरको देखकर संसारकी स्थितिके जानकार मुनियोंके हृदयमें दया उत्पन्न हुई ॥२४०॥


तस्मै पञ्चनमस्कारः सर्वत्यागसमन्वितः । धर्मदानसमुद्युक्तैरुपदिष्टस्तपोधनैः ॥२४१॥

अर्थ: उसी समय धर्मदान करनेमें तत्पर एवं तपरूपी धनके धारक मुनियोंने उस वानरके लिए सब पदार्थोंका त्याग कराकर पंचनमस्कार मन्त्रका उपदेश दिया ॥२४१॥


ततः स विकृतां त्यक्त्वा तनुं वानरयोनिजाम् । महोदधिकुमारोऽभूत् क्षणेनोत्तमविग्रहः ॥२४२॥

अर्थ: उसके फलस्वरूप वह वानर योनिमें उत्पन्न हुए अपने पूर्वविकृत शरीरको छोड़कर क्षणभरमें उत्तम शरीर-का धारी महोदधिकुमार नामक भवनवासी देव हुआ ॥२४२॥


ततो यावदसौ हन्तुं खेचरोऽन्यान् समुद्यतः । कपींस्तावदयं प्राप्तः कृतस्वतनुपूजनः ॥२४३॥

अर्थ: तदनन्तर इधर राजा विद्युत्केश जब-तक अन्य वानरोंको मारनेके लिए उद्यत हुआ तबतक अवधिज्ञानसे अपना पूर्वभव जानकर महोदधिकुमार देव वहाँ आ पहुँचा। आकर उसने अपने पूर्व शरीरका पूजन किया ॥२४३॥


हन्यमानां नरैः क्रूरैर्दृष्ट्वा वानरसंहतिम् । चक्रे वैक्रियसामर्थ्यात् कपीनां महतीं चमूम् ॥२४४॥

अर्थ: दुष्ट मनुष्योंके द्वारा वानरोंके समूह मारे जा रहे हैं यह देख उसने विक्रियाकी सामर्थ्यसे वानरोंकी एक बड़ी भारी सेना बनायी ॥२४४॥


दंष्ट्राङ्कुरकरालैस्तैर्वदनैर्भ्रूविकारिभिः । सिन्दूरसदृशच्छायैः कृतभीषणनिःस्वनैः ॥२४५॥

अर्थ: उन वानरोंके मुख दाँढ़ोंसे विकराल थे, उनकी भौंहें चढ़ी हुई थीं, सिन्दूरके समान लाल-लाल उनका रंग था और वे भयंकर शब्द कर रहे थे ॥२४५॥


उत्क्षिप्य पर्वतान् केचित् केचिदुन्मूल्य पादपान् । आहत्य धरणीं केचित् पाणिनास्फाल्य चापरे ॥२४६॥

अर्थ: कोई वानर पर्वत उखाड़कर हाथमें लिये थे, कोई वृक्ष उखाड़कर हाथमें धारण कर रहे थे, कोई हाथोंसे जमीन कूट रहे थे और कोई पृथ्वी झुला रहे थे ॥२४६॥


क्रोधसंभाररौद्राङ्गा दूरोत्प्लवनकारिणः । बभणुर्वानराध्यक्षं खेचरं भिन्नचेतसम् ॥२४७॥

अर्थ: क्रोधके भारसे जिनके अंग महारुद्र - महाभयंकर दिख रहे थे और जो दूर-दूर तक लम्बी छलांगें भर रहे थे ऐसे मायामयी वानरोंने अतिशय कुपित वानरवंशी राजा विद्युत्केश विद्याधरसे कहा ॥२४७॥


तिष्ठ तिष्ठ दुराचार मृत्योः संप्रति गोचरे । निहत्य वानरं पाप तवाद्य शरणं कुतः ॥२४८॥

अर्थ: कि अरे दुराचारी ! ठहर-ठहर, अब तू मृत्युके वश आ पड़ा है, अरे पापी ! वानरको मारकर अब तू किसकी शरणमें जायेगा ? ॥२४८॥


अभिधायेति तैः सर्वं व्योम पर्वतपाणिभिः । व्याप्तं तथा यथा तस्मिन् सूचीभेदोऽपि नेक्ष्यते ॥२४९॥

अर्थ: ऐसा कहकर हाथोंमें पर्वत धारण करनेवाले उन मायामयी वानरोंने समस्त आकाशको इस प्रकार व्याप्त कर लिया कि सुई रखनेको भी स्थान नहीं दिखाई देता था ॥२४९॥


ततो विस्मयमापन्नस्तडित्केशो व्यचिन्तयत् । नेदं बलं प्लवङ्गानां किमप्यन्यदिदं भवेत् ॥२५०॥

अर्थ: तदनन्तर आश्चर्यको प्राप्त हुआ विद्युत्केश विचार करने लगा कि यह वानरोंका बल नहीं है, यह तो कुछ और ही होना चाहिए ॥२५०॥


ततो निरीहदेहोऽसौ माधुर्यमितया गिरा । वानरान्विनयेनेदमब्रवीन्नयपण्डितः ॥२५१॥

अर्थ: तब शरीरकी आशा छोड़ नीतिशास्त्रका पण्डित विद्युत्केश मधुरवाणी द्वारा विनयपूर्वक वानरोंसे बोला ॥२५१॥


सन्तो वदत के यूयं महाभासुरविग्रहाः । न प्रकृत्या प्लवङ्गानां शक्तिरेषा समीक्ष्यते ॥२५२॥

अर्थ: कि हे सत्पुरुषो ! कहो आप लोग कौन हो ? तुम्हारे शरीर अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे हैं, तुम्हारी यह शक्ति वानरोंकी स्वाभाविक शक्ति तो नहीं दिखाई पड़ती ॥२५२॥


ततस्तं विनयोपेतं दृष्ट्वा खेचरपुङ्गवम् । महोदधिकुमारेण वाक्यमेतदुदाहृतम् ॥२५३॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याधरोंके राजा विद्युत्केशको विनयावनत देखकर महोदधिकुमारने यह वचन कहे ॥२५३॥


तिर्यग्जातिस्वभावेन नितान्तं चपलस्त्वया । अपराद्धः स्वजायायां हतो योऽसौ प्लवङ्गमः ॥२५४॥

सोऽहं साधुप्रसादेन संप्राप्तो देवतामिमाम् । महाशक्तिसमायुक्तां यथेच्छावाप्तसंपदाम् ॥२५५॥

अर्थ: कि पशुजातिके स्वभावसे जो अत्यन्त चपल था तथा इसी चपलताके कारण जिसने तुम्हारी स्त्रीका अपराध किया था ऐसे जिस वानरको तूने मारा था वह मैं ही हूँ । साधुओं-के प्रसादसे इस देवत्व पर्यायको प्राप्त हुआ हूँ । यह पर्याय महाशक्तिसे युक्त है तथा इच्छानुसार इसमें संपदाएँ प्राप्त होती हैं ॥२५४-२५५॥


विभूतिं मम पश्य त्वमिति चोक्त्वा परां श्रियम् । स तस्मै प्रकटीचक्रे महोदधिसुरोचिताम् ॥२५६॥

अर्थ: तुम मेरी विभूतिको देखो यह कह कर उसने मनोदधि कुमारदेवके योग्य अपनी उत्कृष्ट लक्ष्मी उसके सामने प्रकट कर दी ॥२५६॥


ततोऽसौ वेपथुं प्राप्तो भयात् सर्वशरीरगम् । विदीर्णहृदयो दृष्टरोमा विभ्रान्तलोचनः ॥२५७॥

अर्थ: यह देख भयसे विद्युत्केशका सर्व शरीर काँपने लगा, उसका हृदय विदीर्ण हो गया, रोमांच निकल आये और आँखे घूमने लगीं ॥२५७॥


महोदधिकुमारेण मा भैषीरिति चोदितः । जगाद गद्गदं वाक्यं किं करोमीति दुःखितः ॥२५८॥

अर्थ: तब महोदधिकुमारने कहा कि डरो मत । देवकी वाणी सुन, दुःखी होते हुए विद्युत्केशने गद्गद वाणीमें कहा कि मैं क्या करूँ ? जो आप आज्ञा करो सो करूँ ॥२५८॥


ततस्तेन सुरेणासौ गुर्वन्तिकमुपाहृतः । ताभ्यां प्रदक्षिणीकृत्य कृतं तस्यांघ्रिवन्दनम् ॥२५९॥

अर्थ: तदनन्तर वह देव राजा विद्युत्केशको जिन्होंने पंच नमस्कार मन्त्र दिया था उन गुरुके पास ले गया । वहाँ जाकर देव तथा राजा विद्युत्केश दोनोंने प्रदक्षिणा देकर गुरुके चरणोंमें नमस्कार दिया ॥२५९॥


वानरेण सता प्राप्तं मया देवत्वमीदृशम् । गुरुं भवन्तमासाद्य वत्सलं सर्वदेहिनाम् ॥२६०॥

देवेनेत्यभिधायासौ स्तुतो वाग्भिः पुनः पुनः । अर्चितश्च महास्त्रग्भिः पादयोः प्रणतस्तथा ॥२६१॥

अर्थ: महोदधिकुमार देवने मुनिराजकी यह कहकर बार-बार स्तुति की कि मैं यद्यपि वानर था तो भी समस्त प्राणियोंसे स्नेह रखनेवाले आप ऐसे गुरुको पाकर मैंने यह देव पर्याय प्राप्त की है । यह कहकर उसने महामालाओंसे मुनिराज की पूजा की तथा चरणोंमें नमस्कार किया ॥२६०-२६१॥


तदाश्चर्यं ततो दृष्ट्वा खेचरेण तपोधनः । संपृष्टः किं करोमीति जगाद वचनं हितम् ॥२६२॥

चतुर्ज्ञानोपगूढात्मा ममास्त्यत्र समीपगः । गुरुस्तस्यान्तिकं याम एष धर्मः सनातनः ॥२६३॥

अर्थ: यह आश्चर्य देखकर विद्याधर विद्युत्केशने मुनिराजसे पूछा कि हे देव ! मैं क्या करूँ ? मेरा क्या कर्तव्य है ? इसके उत्तरमें मुनिराजने निम्नांकित हितकारी वचन कहे कि चार ज्ञानके धारी हमारे गुरु पास ही विद्यमान हैं सो हम लोग उन्हींके समीप चलें, यही सनातन धर्म है ॥२६२-२६३॥


आचार्ये ध्रियमाणे यस्तिष्ठत्यन्तिकगोचरे । करोत्याचार्यकं मूढः शिष्यतां दूरमृत्सृजन् ॥२६४॥

नासौ शिष्यो न चाचार्यो निर्धर्मः स कुमार्गगः । सर्वतो भ्रंशमायातः स्वाचारात् साधुनिन्दितः ॥२६५॥

अर्थ: आचार्यके समीप रहने पर भी जो उनके पास नहीं जाता है और स्वयं उपदेशादि देकर आचार्यका काम करता है वह मूर्ख शिष्य, शिष्यपनाको दूरसे ही छोड़ देता है । वह न तो शिष्य रहता है और न आचार्य ही कहलता है, वह धर्मरहित है, कुमार्गगामी है, अपने समस्त आचारसे भ्रष्ट है और साधुजनोंके द्वारा निन्दनीय है ॥२६४-२६५॥


इत्युक्ते विस्मयोपेतौ जातौ देवनभश्चरौ । चक्रतुश्चेतसीदं च परिवारसमन्वितौ ॥२६६॥

अहो परममाहात्म्यं तपसो भुवनातिगम् । मुनेरेवंविधस्यापि यदन्यो विद्यते गुरुः ॥२६७॥

अर्थ: मुनिराजके ऐसा कहनेपर देव और विद्याधर दोनों ही परम आश्चर्यको प्राप्त हुए । अपने-अपने परिवारके साथ उन्होंने मनमें विचार किया कि अहो तपका कैसा लोकोत्तर माहात्म्य है कि ऐसे सर्वगुणसम्पन्न मुनिराजके भी अन्य गुरु विद्यमान हैं ॥२६६-२६७॥


ततस्तस्योपकण्ठे ते साधुनाधिष्ठिता ययुः । देवाश्च व्योमयानाश्च धर्मोत्कण्ठितचेतसः ॥२६८॥

अर्थ: तदनन्तर धर्मके लिए जिनका चित्त उत्कण्ठित हो रहा था ऐसे देव और विद्याधर उक्त मुनिराजके साथ उनके गुरुके समीप गये ॥२६८॥


गत्वा प्रदक्षिणीकृत्य प्रणम्यादरतो मुनिम् । नातिदूरे न चात्यन्तसमीपे स्थितिमाश्रिताः ॥२६९॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने बड़े आदरके साथ प्रदक्षिणा देकर गुरुको नमस्कार किया और नमस्कारके अनन्तर न तो अत्यन्त दूर और न अत्यन्त पास किन्तु कुछ दूर हट कर बैठ गये ॥२६९॥


ततस्तां परमां मूर्तिं तपोराशिसमुत्थया । प्रज्वलन्तीं मुनेर्दीप्त्या दृष्ट्वा देवनभश्चराः ॥२७०॥

चिन्तां कामपि संप्राप्ता धर्माचारसमुद्भवाम् । प्रफुल्लनयनाम्भोजा महाविनयसंगताः ॥२७१॥

अर्थ: तदनन्तर तपकी राशिसे उत्पन्न दीप्तिसे देदीप्यमान मुनिराजकी उस उत्कृष्ट मुद्राको देखकर देव और विद्याधर धर्माचारसे समुद्भूत किसी अद्भुत चिन्ताको प्राप्त हुए। उस समय हर्ष और आश्चर्यसे सबके नेत्र-कमल प्रफुल्लित हो रहे थे तथा सभी महाविनयसे युक्त थे ॥२७०-२७१॥


ततो देवनभोयानावञ्जलिं न्यस्य मस्तके । पप्रच्छतुर्मुनिं धर्मं फलं चास्य यथोचितम् ॥२७२॥

अर्थ: तत्पश्चात् देव और विद्याधर दोनोंने हाथ जोड़ मस्तकसे लगाकर मुनिराजसे धर्म तथा उसके यथायोग्य फलको पूछा ॥२७२॥


ततो जन्तुहितासंगनित्यप्रस्थितमानसः । संसारकारणासंगदूरीकृतसमीहितः ॥२७३॥

सजलाम्भोदगम्भीरधीरया श्रमणो गिरा । जगाद परमं धर्मं जगतोऽभ्युदयावहम् ॥२७४॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका मन सदा प्राणियोंके हितमें लगा रहता था तथा जिनकी समस्त चेष्टाएँ संसारके कारणोंके सम्पर्कसे सदा दूर रहती थीं ऐसे मुनिराज सजल मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर वाणीसे जगत्का कल्याण करनेवाले उत्कृष्ट धर्मका निरूपण करने लगे ॥२७३-२७४॥


तस्मिन् गदति तद्देशे लतामण्डपसंश्रिताः । ननृतुः शिखिसंघाता मेघनादविशङ्किनः ॥२७५॥

अर्थ: जब मुनिराज बोल रहे थे तब लतामण्डपमें स्थित मयूरोंके समूह मेघ गर्जनाकी शंका कर हर्षसे नृत्य करने लगे थे ॥२७५॥


समाधाय मनो धर्मः श्रूयतां सुरखेचरौ । यथा जिनैः समुद्दिष्टो भुवनानन्दकारिभिः ॥२७६॥

अर्थ: मुनिराजने कहा कि हे देव और विद्याधरो ! संसारका कल्याण करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्ने धर्मका जैसा स्वरूप कहा है वैसा ही मैं कहता हूँ आप-लोग मन स्थिर कर सुनो ॥२७६॥


धर्मशब्दनमात्रेण बहवः प्राणिनोऽधमाः । अधर्ममेव सेवन्ते विचारजडचेतसः ॥२७७॥

अर्थ: जिनका चित्त विचार करनेमें जड़ है ऐसे बहुत-से अधम प्राणी धर्मके नाम पर अधर्मका ही सेवन करते हैं ॥२७७॥


मार्गोऽयमिति यो गच्छेद् दिशमज्ञाय मोहवान् । द्राघीयसापि कालेन नेष्टं स्थानं स गच्छति ॥२७८॥

अर्थ: जो मोही प्राणी गन्तव्य दिशाको जाने बिना ‘यही मार्ग है’ ऐसा समझ विरुद्धदिशामें जाता है वह दीर्घकाल बीत जाने पर भी इष्ट स्थान पर नहीं पहुँच सकता है ॥२७८॥


कथाकल्पितधर्माख्यमधर्मं मन्दमानसाः । प्राणिघातादिभिर्जातं सेवन्ते विषयाश्रिताः ॥२७९॥

अर्थ: विचार करनेकी क्षमतासे रहित विषयलम्पटी मनुष्य, कथा-कहानियों द्वारा जिसे धर्म संज्ञा दी गई है ऐसे जीवघात आदिसे उत्पन्न अधर्मका ही सेवन करते हैं ॥२७९॥


ते तं भावेन संसेव्य मिथ्यादर्शनदूषिताः । तिर्यग्नरकदुःखानां प्रपद्यन्ते निधानताम् ॥२८०॥

अर्थ: मिथ्यादर्शनसे दूषित मनुष्य ऐसे अधर्मका अभिप्रायपूर्वक सेवनकर तिर्यंच तथा नरकगतिके दुःखोंके पात्र होते हैं ॥२८०॥


कुहेतुजालसंपूर्णग्रन्थार्थैर्गुरुदण्डकैः । धर्मोपलिप्सया मूढास्ताडयन्ति नमस्तलम् ॥२८१॥

अर्थ: कुयुक्तियोंके जालसे परिपूर्ण ग्रन्थोंके अर्थसे मोहित प्राणी धर्म प्राप्त करनेकी इच्छासे बड़े-बड़े दण्डोंके द्वारा आकाशको ताडित करते हैं अर्थात् जिन कार्योंमें धर्मकी गन्ध भी नहीं उन्हें धर्म समझकर करते हैं ॥२८१॥


यद्यपि स्यात् क्वचित्किञ्चिद्धर्मं प्रति कुशासने । हिंसादिरहिताचारे शरीरश्रमदेशिनि ॥२८२॥

सम्यग्दर्शनहीनत्वान्मूलच्छिन्नं तथापि तत् । नाज्ञानं क्षुद्रचारित्रं तेषां भवति मुक्तये ॥२८३॥

अर्थ: जिसमें प्रतिपादित आचार, हिंसादि पापोंसे रहित है तथा जिसमें शरीर-श्रम - कायक्लेशका उपदेश दिया गया है ऐसे किसी मिथ्याशासनमें भी यद्यपि थोड़ा धर्मका अंश होता है तो भी सम्यग्दर्शनसे रहित होनेके कारण वह निर्मूल ही है । ऐसे जीवोंका ज्ञानरहित क्षुद्र चारित्र मुक्तिका कारण नहीं है ॥२८२-२८३॥


पार्थिवो लोष्टलेशोऽपि वैडूर्यमपि पार्थिवम् । न पार्थिवत्वसामान्यात्तयोस्तुल्यं गुणादिकम् ॥२८४॥

अर्थ: मिट्टीका ढेला भी पार्थिव है और वैडूर्य मणि भी पार्थिव है सो पार्थिवत्व सामान्यकी अपेक्षा दोनोंके गुण आदिक एक समान नहीं हो जाते ॥२८४॥


लोष्टुलेशसमो धर्मो मिथ्यादृग्भिः प्रकीर्तितः । वैडूर्यसदृशो जैनो धर्मसंज्ञा तु सर्वगा ॥२८५॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टियोंके द्वारा निरूपित धर्म मिट्टीके ढेलेके समान है और जिनेन्द्र भगवान्‌के द्वारा निरूपित धर्म वैडूर्य मणिके समान है जब कि धर्म संज्ञा दोनोंमें ही समान है ॥२८५॥


धर्मस्य हि दया मूलं तस्या मूलमहिंसनम् । परिग्रहवतां पुंसा हिंसनं संततोद्भवम् ॥२८६॥

अर्थ: धर्मका मूल दया है और दयाका मूल अहिंसा रूप परिणाम है। परिग्रही मनुष्योंके हिंसा निरन्तर होती रहती है ॥२८६॥


तथा सत्यवचो धर्मस्तच्च यन्न परासुखम् । अदत्तादानमुक्तिश्च परनार्याश्च वर्जनम् ॥२८७॥

द्रविणाप्तिषु संतोषो हृषीकाणां निवारणम् । तनूकृतिः कषायाणां विनयो ज्ञानसेविनाम् ॥२८८॥

व्रतमेतद् गृहस्थानां सम्यग्दर्शनचारिणाम् । आगाररहितानां तु शृणु धर्मं यथाविधि ॥२८९॥

अर्थ: दयाके सिवाय सत्य वचन भी धर्म है परन्तु सत्य वचन वह कहलाता है कि जिससे दूसरेको दुःख न हो । अदत्तादानका त्याग करना, परस्त्रीका छोड़ना, धनादिकमें सन्तोष रखना, इन्द्रियोंका निवारण करना, कषायोंको कृश करना और ज्ञानी मनुष्योंकी विनय करना, यह सम्यग्दृष्टि गृहस्थोंका व्रत अर्थात् धर्मका विधिपूर्वक निरूपण करता हूँ सो सुनो ॥२८७-२८९॥


पञ्चोदारव्रतोत्तुङ्गमातङ्गस्कन्धवर्तिनः । त्रिगुप्तिदृढनीरन्ध्रकङ्कटच्छन्नविग्रहाः ॥२९०॥

पादातेन समायुक्ताः समित्या पञ्चभेदया । नानातपोर्महातीक्ष्णशस्त्रयुक्तमनस्कराः ॥२९१॥

वृत्तं कषायसामन्तैर्मोहवारणवर्तिनम् । मवारातिं विनिघ्नन्ति निरम्बरमहानृपाः ॥२९२॥

अर्थ: जो पंच महाव्रत रूपी उन्नत हाथीके स्कन्धपर सवार हैं, तीन गुप्ति रूपी मजबूत तथा निश्छिद्र कवचसे जिनका शरीर आच्छादित है, जो पंच समितिरूपी पैदल सिपाहियोंसे युक्त है, और जो नाना तपरूपी महातीक्ष्ण शस्त्रोंके समूहसे सहित हैं ऐसे दिगम्बर यति रूपी महाराजा, कषाय रूपी सामन्तोंसे परिवृत तथा मोह रूपी हाथीपर सवार संसार रूपी शत्रुको नष्ट करते हैं ॥२९०-२९२॥


सर्वारम्भपरित्यागे सम्यग्दर्शनसंगते । धर्मः स्थितोऽनगाराणामेष धर्मः समासतः ॥२९३॥

अर्थ: जब सब प्रकारके आरम्भका त्याग किया जाता है और सम्यग्दर्शन धारण किया जाता है तभी मुनियोंका धर्म प्राप्त होता है। यह संक्षेपमें धर्मका स्वरूप समझो ॥२९३॥


त्रिलोकश्रीपरि प्राप्तेर्धर्मोऽयं हेतुतां गतः । एष एव परं प्रोक्तो मङ्गलं पुरुषोत्तमैः ॥२९४॥

अर्थ: यह धर्म ही त्रिलोक सम्बन्धी लक्ष्मीकी प्राप्तिका कारण है । उत्तम पुरुषोंने इस धर्मको ही उत्कृष्ट मंगलस्वरूप कहा है ॥२९४॥


अन्यः कस्तस्य कथ्येत धर्मस्य परमो गुणः । त्रिलोकशिखरं येन प्राप्यते सुमहासुखम् ॥२९५॥

अर्थ: जिस धर्मके द्वारा महासुखदायी त्रिलोकका शिखर अर्थात् मोक्ष प्राप्त हो जाता है उस धर्मका और दूसरा कौन उत्कृष्ट गुण कहा जावे ? अर्थात् धर्मका सर्वोपरि गुण यही है कि उससे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ॥२९५॥


सागारेण जनः स्वर्गे भुङ्क्ते भोगान्महागुणान् । देवीनिवहमध्यस्थो मानसेन समाहृतान् ॥२९६॥

निर्वाससां तु धर्मेण मोक्षं प्राप्नोति मानवः । अनौपम्यमनाबाधं सुखं यत्रान्तवर्जितम् ॥२९७॥

अर्थ: गृहस्थ धर्मके द्वारा यह मनुष्य स्वर्गमें देवीसमूहके मध्यमें स्थित हो संकल्प मात्रसे प्राप्त उत्तमोत्तम भोगोंको भोगता है और मुनि धर्मके द्वारा उस मोक्षको प्राप्त होता है जहाँ कि इसे अनुपम, निर्बाध तथा अनन्त सुख मिलता है ॥२९६-२९७॥


स्वर्गगास्तु पुनश्च्युत्वा प्राप्य दैगम्बरीं क्रियाम् । द्वित्रैर्भवैः प्रपद्यन्ते प्रकृष्टाः परमं पदम् ॥२९८॥

अर्थ: स्वर्गगामी उत्कृष्ट मनुष्य स्वर्गसे च्युत होकर पुनः मुनिदीक्षा धारण करते हैं और दो तीन भवोंमें ही परम पद - मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥२९८॥


काकतालीययोगेन प्राप्ता अपि सुरालयम् । कुयोनिषु पुनः पापा भ्रमन्त्येव कुतीर्थिनः ॥२९९॥

अर्थ: परन्तु जो पापी - मिथ्यादृष्टि जीव हैं वे काकतालीयन्यायसे यद्यपि स्वर्ग प्राप्त कर लेते हैं तो भी वहाँसे च्युत हो कुयोनियोंमें ही भ्रमण करते रहते हैं ॥२९९॥


जैनमेवोत्तमं वाक्यं जैनमेवोत्तमं तपः । जैन एव परो धर्मो जैनमेव परं मतम् ॥३००॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कथित वाक्य अर्थात् शास्त्र ही उत्तम वाक्य हैं, जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा निरूपित तप ही उत्तम तप है, जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा प्रोक्त धर्म ही परम धर्म है और जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा उपदिष्ट मत ही परम मत है ॥३००॥


नगरं व्रजतः पुंसो वृक्षमूलादिसंगमः । नान्तरीयकतामेति यथा खेदनिवारणः ॥३०१॥

प्रस्थितस्य तथा मोक्षं जिनशासनवर्त्मना । देवविद्याधरादिश्रीरनुषङ्गेण जायते ॥३०२॥

अर्थ: जिस प्रकार नगरकी ओर जानेवाले पुरुषको खेद निवारण करनेवाला जो वृक्षमूल आदिका संगम प्राप्त होता है वह अनायास ही प्राप्त होता है उसी प्रकार जिन शासन रूपी मार्गसे मोक्षकी ओर प्रस्थान करनेवाले पुरुषको जो देव तथा विद्याधर आदिकी लक्ष्मी प्राप्त होती है वह अनुषंगसे ही प्राप्त होती है - उसके लिए मनुष्यको प्रयत्न नहीं करना पड़ता है ॥३०१-३०२॥


विबुधेन्द्रादिभोगानां हेतुत्वं यत्प्रपद्यते । जिनधर्मो न तच्चित्रं ते ह्यस्मात् सुकृतादपि ॥३०३॥

अर्थ: ‘जिनधर्म, इन्द्र आदिके भोगोंका कारण होता है’ इसमें आश्चर्यकी बात नहीं है .क्योंकि इन्द्र आदिके भोग तो साधारण पुण्य मात्रसे भी प्राप्त हो जाते हैं ॥३०३॥


विपरीतं यदेतस्माद् गृहिश्रमणधर्मतः । चरितं तस्य संज्ञानमधर्मं इति कीर्तितम् ॥३०४॥

अर्थ: इस गृहस्थ और मुनिधर्मके विपरीत जो भी आचरण अथवा ज्ञान है वह अधर्म कहलाता है ॥३०४॥


भ्रमन्ति येन तिर्यक्षु नानादुःखप्रदायिषु । वाहनात्ताडनाच्छेदाद्भेदाच्छीतोष्णसंगमात् ॥३०५॥

अर्थ: इस अधर्मके कारण यह जीव वाहन, ताडन, छेदन, भेदन तथा शीत उष्णकी प्राप्ति आदि कारणोंसे नाना दुःख देनेवाले तिर्यंचोंमें भ्रमण करता है ॥३०५॥


नित्यान्धकारयुक्तेषु नरकेषु च भूरिषु । तुषारपवनाघातकृतकम्पेषु केषुचित् ॥३०६॥

स्फुरत्स्फुलिङ्गरौद्राग्निज्वालालीढेषु केषुचित् । नानाकारमहारावयन्त्रव्याप्तेषु केषुचित् ॥३०७॥

सिंहव्याघ्रवृकश्येनगृध्ररुद्धेषु केषुचित् । चक्रक्रकचकुन्तासिमोचिवृक्षेषु केषुचित् ॥३०८॥

विलीनत्रिपुसीसादिपानदायिषु केषुचित् । तीक्ष्णतुण्डस्फुरत्क्रूरमक्षिकादिषु केषुचित् ॥३०९॥

कृमिप्रकारसंमिश्ररक्तपङ्केषु केषुचित् । परस्परसमुद्भूतबाधाहेतुषु केषुचित् ॥३१०॥

अर्थ: इसी अधर्मके कारण यह जीव निरन्तर अन्धकारसे युक्त रहनेवाले अनेक नरकोंमें भ्रमण करता है । इन नरकोंमें कितने ही नरक तो ऐसे हैं जिनमें ठण्डी हवाके कारण निरन्तर शरीर काँपता रहता हैं । कितने ही ऐसे हैं जो निकलते हुए तिलगोंसे भयंकर दिखनेवाली अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हैं । कितने ही ऐसे हैं जो नाना प्रकारके महाशब्द करनेवाले यन्त्रोंसे व्याप्त हैं । कितने ही ऐसे हैं जो विक्रियानिर्मित सिंह, व्याघ्र, वृक, बाज तथा गीध आदि जीवोंसे भरे हुए हैं । कितने ही ऐसे हैं जो चक्र, करौंत, भाला, तलवार आदिकी वर्षा करनेवाले वृक्षोंसे युक्त हैं । कितने ही ऐसे हैं जिनमें पिघलाया हुआ रांगा, सीसा आदि पिलाया जाता है । कितने ही ऐसे हैं जिनमें तीक्ष्णमुखवाली दुष्ट मक्खियाँ आदि विद्यमान हैं । कितने ही ऐसे हैं जिनमें रक्तकी कीचमें कृमिके समान अनेक छोटे-छोटे जीव बिलबिलाते रहते हैं और कितने ही ऐसे हैं जिनमें परस्पर - एक दूसरेके द्वारा दुःखके कारण उत्पन्न होते रहते हैं ॥३०६-३१०॥


एवंविधेषु जीवानां सदा दुःखविधायिषु । दुःखं यन्नरकेषु स्यात् कः शक्तस्तत्प्रकीर्तितुम् ॥३११॥

अर्थ: इस प्रकारके सदा दुःखदायी नरकोंमें जीवोंको जो दुःख प्राप्त होता है उसे कहनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥३११॥


यतो यथा पुरा भ्रान्तौ युवां दुःखासु योनिषु । तथा पर्यटनं भूयः प्राप्स्यतो धर्मवर्जितौ ॥३१२॥

अर्थ: जिस प्रकार तुम दोनोंने पहले दुःख देनेवाली अनेक कुयोनियोंमें भ्रमण किया था यदि अब भी तुम धर्मसे वंचित रहते हो तो पुनः अनेक कुयोनियोंमें भ्रमण करना पड़ेगा ॥३१२॥


इत्युक्ताभ्यां परिपृष्टस्ताभ्यां श्रमणसत्तमः । कथं कुयोनिषु भ्रान्तावावामिति मुने वद ॥३१३॥

अर्थ: मुनिराजके यह कहनेपर देव तथा विद्याधरने उनसे पूछा कि हे भगवन् ! हम दोनोंने किस कारण कुयोनियोंमें भ्रमण किया है ? सो कहिए ॥३१३॥


जन्मान्तरं ततोऽवोचत्तयोः संयममण्डनः । मनो निधीयतां वत्सावित्युक्त्वा मधुरं वचः ॥३१४॥

अर्थ: तदनन्तर - ‘हे वत्सो ! मन स्थिर करो’ इस प्रकारके मधुर वचन कहकर संयमरूपी आभूषणसे विभूषित मुनिराज उन दोनोंके भवान्तर कहने लगे ॥३१४॥


पर्यटन्तौ युवामत्र संसारे दुःखदायिनि । परस्परस्य कुर्वाणौ वधं मोहपरायणौ ॥३१५॥

अर्थ: इस दुःखदायी संसारमें मोहसे उन्मत्त हो तुम दोनों एक दूसरेका वध करते हुए चिरकाल तक भ्रमण करते रहे ॥३१५॥


मानुष्यभावमायातौ कथंचित् कर्मयोगतः । अयं हि दुर्लभो लोके धर्मोपादानकारणम् ॥३१६॥

अर्थ: तदनन्तर किसी प्रकार कर्मयोगसे मनुष्य भवको प्राप्त हुए। निश्चयसे संसारमें धर्मप्राप्तिका कारणभूत मनुष्यभवका मिलना अत्यन्त कठिन है ॥३१६॥


व्याधस्तयोरभूदेको विषये काशिनामनि । श्रावस्त्यामपरोऽमात्यपदे स्थैर्यमुपागतः ॥३१७॥

अर्थ: उनमें-से एक तो काशी देशमें श्रावस्ती नगरीमें राजाका सुयशोदत्तनामा मन्त्री हुआ। सुयशोदत्त अत्यन्त रूपवान् था, कारण पाकर उसने दीक्षा ले ली और महातपश्चरणसे युक्त हो पृथ्वीपर विहार करने लगा ॥३१७॥


सुयशोदत्तनामासौ प्रव्रज्यामाश्रितः क्षितौ । चचार तपसा युक्तो महतात्यन्तरूपवान् ॥३१८॥

ततस्तं सुस्थितं देशे काश्यां प्राणविवर्जिते । पूजनार्थं समायाताः सम्यग्दृष्टिकुलाङ्गनाः ॥३१९॥

स्त्रीभिस्ततः परीतं तं व्याधोऽसौ वीक्ष्य योगिनम् । अतक्ष्णोद्वाग्भिरुग्राभिः शस्त्रैः कुर्वन् विभीतिकाम् ॥३२०॥

अर्थ: विहार करते हुए सुयशोदत्तमुनि काशी देशमें आकर किसी निर्जन्तु स्थानमें विराजमान हो गये । उनकी पूजाके लिए अनेक सम्यग्दृष्टि स्त्रियाँ आयी थीं सो पापी व्याध, स्त्रियोंसे घिरे उन मुनिको देख तीक्ष्ण वचनरूपी शस्त्रोंसे भय उत्पन्न करता हुआ बेधने लगा ॥३१८-३२०॥


निर्लज्जो वस्त्रमुक्तोऽयं स्नानवर्जितविग्रहः । मृगयायां प्रवृत्तस्य जातो मेऽमङ्गलं महत् ॥३२१॥

अर्थ: यह निर्लज्ज नग्न, तथा स्नानरहित मलिन शरीरका धारक, शिकारके लिए प्रवृत्त हुए मुझको महा अमंगलरूप हुआ है ॥३२१॥


वदत्येवं ततो व्याधे धनुर्भीषणकारिणि । मुनेः कलुषतां प्राप्तं ध्यानं दुःखेन संभृतम् ॥३२२॥

अर्थ: धनुषसे भय उत्पन्न करनेवाला व्याध जब उक्त प्रकारके वचन कह रहा था तब दुःखके कारण मुनिका ध्यान कुछ कलुषताको प्राप्त हो गया ॥३२२॥


इति वाचिन्तयत् क्रोधान्मुष्टिघातेन पापिनम् । कणशश्चूर्णयाम्येनं व्याधं रूक्षवचोमुचम् ॥३२३॥

अर्थ: क्रोधवश वे विचारने लगे कि रूक्ष वचन कहनेवाले इस पापी व्याधको मैं एक मुट्ठीके प्रहारसे कण-कण कर चूर्ण कर डालता हूँ ॥३२३॥


ततः कापिष्ठगमनं मुनिना यदुपार्जितम् । तदस्य क्रोधसंभारात् क्षणाद् भ्रंशमुपागतम् ॥३२४॥

अर्थ: मुनिने तपश्चरणके प्रभावसे कापिष्ठ स्वर्गमें जाने योग्य जो पुण्य उपार्जन किया था वह क्रोधके कारण क्षणभरमें नष्ट हो गया ॥३२४॥


ततोऽसौ कालधर्मेण युक्तो ज्योतिःसुरोऽभवत् । ततः प्रच्युत्य जातस्त्वं विद्युत्केशो नभश्चरः ॥३२५॥

अर्थ: तदनन्तर कुछ समताभावसे मरकर वह ज्यौतिषीदेव हुआ । वहाँसे आकर तू विद्युत्केश नामक विद्याधर हुआ है ॥३२५॥


व्याधोऽपि सुचिरं भ्रान्त्वा भवद्रुममहावने । लङ्कायां प्रमदोद्याने शाखामृगगतिं गतः ॥३२६॥

अर्थ: और व्याधका जीव चिरकाल तक संसाररूपी अटवीमें भ्रमणकर लंकाके प्रमदवनमें वानर हुआ ॥३२६॥


ततोऽसौ निहतः स्त्र्यर्थं त्वया बाणेन चापलात् । प्राप्य पञ्चनमस्कारं जातोऽयं सागरामरः ॥३२७॥

अर्थ: सो चपलता करनेके कारण स्त्रीके निमित्त तूने इसे बाणसे मारा । वही अन्तमें पंचनमस्कार मन्त्र प्राप्त कर महोदधि नामका देव हुआ है ॥३२७॥


एवं ज्ञात्वा पुनर्वैरं मुञ्चतं देवखेचरौ । मा भूद् भूयोऽपि संसारे भवतोः परिहिण्डनम् ॥३२८॥

अर्थ: ऐसा विचारकर हे देव विद्याधरो ! तुम दोनों अब अपना वैर-भाव छोड़ दो जिससे फिर भी संसारमें भ्रमण नहीं करना पड़े ॥३२८॥


वाञ्छतं नरमात्रेण शक्यं यन्न प्रशंसितुम् । सिद्धानां तत्सुखं भद्रौ मद्राचारपरायणौ ॥३२९॥

अर्थ: हे भद्र-पुरुषो ! तुम भद्र आचरण करनेमें तत्पर हो इसलिए सिद्धोंके उस सुखकी अभिलाषा करो जिसकी मनुष्य-मात्र प्रशंसा नहीं कर सकता ॥३२९॥


नमितं प्रणतं देवैराखण्डलपुरस्सरैः । भक्त्या परमया युक्तौ मुनिसुव्रतमीश्वरम् ॥३३०॥

अर्थ: इन्द्र आदि देव जिन्हें नमस्कार करते हैं ऐसे मुनिसुव्रत भगवान्को परमभक्तिसे युक्त हो नमस्कार करो ॥३३०॥


शरणं प्राप्य तं नाथं निष्ठितात्मप्रतिक्रियम् । परकृत्यसमुद्युक्तं प्राप्स्यथः परमं सुखम् ॥३३१॥

अर्थ: वे भगवान् आत्महितका कार्य पूर्ण कर चुके हैं । अब परहितकारी कार्य करनेमें ही संलग्न हैं सो तुम दोनों उनको शरणमें जाकर परम सुखको प्राप्त करोगे ॥३३१॥


ततो मुनिमुखादित्यान्निर्गतेन वचोंऽशुना । परं प्रबोधमानीतस्तडित्केशः सरोजवत् ॥३३२॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजके मुखरूपी सूर्यसे निर्गत वचनरूपी किरणोंसे विद्युत्केश कमलके समान परम प्रबोधको प्राप्त हुआ ॥३३२॥


सुकेशसंज्ञके पुत्रे संक्रमय्य निजं पदम् । शिष्यतामगमद्धीरो मुनेरम्बरचारिणः ॥३३३॥

अर्थ: फलस्वरूप वह धीर वीर, सुकेश नामक पुत्रके लिए अपना पद सौंपकर चारण ऋद्धि धारी मुनिराजका शिष्य हो गया अर्थात् उनके समीप उसने दीक्षा धारण कर ली ॥३३३॥


सम्यग्दर्शनसंज्ञानसच्चारित्रत्रयं ततः । समाराध्यगतः कालं बभूवामरसत्तमः ॥३३४॥

अर्थ: तदनन्तर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्-चारित्र इन तीनोंकी आराधना कर वह अन्तमें समाधिके प्रभावसे उत्तम देव हुआ ॥३३४॥


ततः किष्कुपुरस्वामी महोदधिरवाभिधः । कान्ताभिः सहितस्तिष्ठन् विद्युत्सदृशदीप्तिभिः ॥३३५॥

चन्द्रपादाश्रये रम्ये महाप्रासादमूर्द्धनि । चारुगोष्ठीसुधास्वादं विन्दन् देवेन्द्रवत्सुखम् ॥३३६॥

अर्थ: इधर किष्कपुरका स्वामी महोदधि, बिजलीके समान कान्तिको धारण करने वाली स्त्रियोंके साथ, जिस पर चन्द्रमाकी किरणें पड़ रहीं थीं ऐसे महामनोहर उत्तुंग भवनके शिखरपर सुन्दर गोष्ठी रूपी अमृतका स्वाद लेता हुआ इन्द्रके समान सुखसे बैठा था ॥३३५-३३६॥


वेगेन महतागत्य धवलाम्बरधारिणा । खेचरेणाग्रतो भूत्वा कृत्वा प्रणतिमादरात् ॥३३७॥

निवेदितस्तडित्केशः प्रव्रज्यां कारणान्विताम् । प्राप्य भोगेषु निर्वेदं दीक्षणे मतिमादधे ॥३३८॥

अर्थ: कि उसी समय शुक्ल वस्त्रको धारण करने वाले एक विद्याधरने बड़े वेगसे आकर तथा सामने खड़े होकर आदर पूर्वक प्रणाम किया और तदनन्तर विद्युत्केश विद्याधरके दीक्षा लेनेका समाचार कहा । समाचार सुनते ही महोदधिने भोगोंसे विरक्त होकर दीक्षा लेनेका विचार किया ॥३३७-३३८॥


प्रव्रजामीति चानेन गदितेऽन्तःपुरान्महान् । उदतिष्ठद् गृहान्तेषु विलापः प्रतिनादवान् ॥३३९॥

अर्थ: महोदधिके यह कहते ही कि मैं दीक्षा लेता हूँ अन्तःपुरसे विलापका बहुत भारी शब्द उठ खड़ा हुआ। उस विलापकी प्रतिध्वनि समस्त महलोंमें गूँजने लगी ॥३३९॥


तन्त्रीवंशादिसंमिश्रमृदङ्गध्वनितोपमः । प्रविलापः सुनारीणां मुनेरप्यहरन्मनः ॥३४०॥

अर्थ: वीणा-बाँसुरी आदिके शब्दोंसे मिश्रित मृदंग ध्वनिकी तुलना करनेवाला स्त्रियोंका वह विलाप साधारण मनुष्यकी बात जाने दो मुनिके भी चित्तको हर रहा था अर्थात् करुणासे द्रवीभूत कर रहा था ॥३४०॥


तवार्पितः परप्रीत्या तडित्केशेन बालकः । सुकेशो नवराज्यस्थः पालनीयः सुतोऽधुना ॥३४१॥

इति विज्ञाप्यमानोऽपि युवराजेन सादरम् । नेत्रामेयजलस्थूलधारावर्षविधायिना ॥३४२॥

अर्थ: उसी समय युवराज भी वहाँ आ गया। वह नेत्रोंमें नहीं समानेवाले जलकी बड़ी मोटी धाराको बरसाता हुआ आदरपूर्वक बोला कि विद्युत्केश अपने पुत्र सुकेशको परमप्रीतिके कारण आपके लिए सौंप गया है। वह नवीन राज्यपर आरूढ़ हुआ है इसलिए आपके द्वारा रक्षा करने योग्य है ॥३४१-३४२॥


निष्कण्टकमिदं राज्यं भुङ्क्ष्व तावन्महागुणम् । पुरन्दर इवोदारैर्भोगैर्मानय यौवनम् ॥३४३॥

एवं संचोद्यमानोऽपि मन्त्रिभिर्दूनमानसैः । बहुभेदान्युदाहृत्य शास्त्राणि नयकोविदैः ॥३४४॥

अर्थ: जिनका हृदय दुखी हो रहा था ऐसे नीतिनिपुण मन्त्रियोंने भी अनेक शास्त्रोंके उदाहरण देकर प्रेरणा की कि इस महावैभवशाली निष्कण्टक राज्यका इन्द्रके समान उपभोग करो और उत्कृष्ट भोगोंसे यौवनको सफल करो ॥३४३-३४४॥


अनाथान्नाथ नः कृत्वा त्वन्मनःस्थितमानसान् । विहाय प्रस्थितः क्वासि लता इव महातरुः ॥३४५॥

इति प्रसाद्यमानोऽपि चरणानतमूर्द्धभिः । गुणोद्यत्प्रियकारीभिर्नारीभिः क्षरदश्रुभिः ॥३४६॥

अर्थ: जिनके मस्तक चरणोंमें नम्रीभूत थे, जो अपने गुणोंके द्वारा उत्कट प्रेम प्रकट कर रही थीं तथा जिनकी आँखोंसे आँसू झर रहे थे ऐसी स्त्रियोंने भी यह कहकर उसे प्रसन्न करनेका प्रयत्न किया कि हे नाथ! जिनके हृदय आपके हृदयमें स्थित हैं ऐसी हम सबको अनाथ बनाकर लताओंको छोड़ वृक्षके समान आप कहाँ जा रहे हैं? ॥३४५-३४६॥


गुणैर्नाथ तवोदारैर्बद्धां कालं चिरं सतीम् । प्रतिभज्य महालक्ष्मीं योजितां ललितां सदा ॥३४७॥

व्रजसि क्वेति सामन्तैर्गण्डान्तैरश्रुधारिभिः । समं विज्ञाप्यमानोऽपि नृपाटोपविवर्जितैः ॥३४८॥

अर्थ: हे नाथ! यह मनोहर राज्यलक्ष्मी पतिव्रता स्त्रीके समान चिरकालसे आपके उत्कृष्ट गुणोंसे बद्ध है - आपमें आरक्त है इसे छोड़कर आप कहाँ जा रहे हैं? और जिनके कपोलोंपर अश्रु बह रहे थे ऐसे सामन्तोंने भी राजकीय आडम्बरसे रहित हो एक साथ प्रार्थना की पर सब मिलकर भी उसके मानसको नहीं बदल सके ॥३४७-३४८॥


छित्वा स्नेहमयान् पाशान् त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहम् । प्रतिचन्द्राभिधानाय दत्त्वा पुत्राय संपदम् ॥३४९॥

विग्रहेऽपि निरासङ्गो जग्राहोग्रां समग्रधीः । धीरो दैगम्बरीं लक्ष्मीं क्ष्मातलस्थिरचन्द्रमाः ॥३५०॥

अर्थ: अन्तमें उसने स्नेहरूपी पाशको छेदकर तथा समस्त परिग्रहका त्याग कर प्रतिचन्द्र नामक पुत्रके लिए राज्य सौंप दिया और शरीरमें भी निःस्पृह होकर कठिन दैगम्बरी लक्ष्मी - मुनिदीक्षा धारण कर ली । वह पूर्ण बुद्धिको धारण करनेवाला अतिशय गम्भीर था और अपनी सौम्यताके कारण ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी तलपर स्थिर रहनेवाला चन्द्रमा ही हो ॥३४९-३५०॥


ततो ध्यानगजारूढस्तपस्तीक्ष्णपतत्रिणा । शिरश्छित्वा भवारातेः प्रविष्टः सिद्धकाननम् ॥३५१॥

अर्थ: तदनन्तर ध्यानरूपी हाथीपर बैठे हुए मुनिराज महोदधि तपरूपी तीक्ष्ण बाणसे संसाररूपी शत्रुका शिर छेदकर सिद्धवन अर्थात् मोक्षमें प्रविष्ट हुए ॥३५१॥


प्रतीन्दुरपि पुत्राय किष्किन्धाय ददौ श्रियम् । यौवराज्यं कनिष्ठाय तस्मै चान्ध्रकरूढये ॥३५२॥

अन्येद्युः प्रतिपन्नश्च जैनमार्गं निरम्बरम् । सिद्धैरासेवितं स्थानं गतश्चामलयोगतः ॥३५३॥

अर्थ: तदनन्तर प्रतिचन्द्र भी अपने ज्येष्ठ पुत्र किष्किन्धके लिए राज्यलक्ष्मी और अन्ध्रकरूढि नामक छोटे पुत्रके लिए युवराज पद देकर निर्ग्रन्थ दीक्षाको प्राप्त हुआ और निर्मल ध्यानके प्रभावसे सिद्धालयमें प्रविष्ट हो गया अर्थात् मोक्ष चला गया ॥३५२-३५३॥


ततस्तावुद्यतौ कृत्यं भ्रातरौ भुवि चक्रतुः । अन्योन्याक्रान्ततेजस्कौ सूर्याचन्द्रमसाविव ॥३५४॥

अर्थ: तदनन्तर - जिनका तेज एक दूसरेमें आक्रान्त हो रहा था ऐसे सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी दोनों भाई किष्किन्ध और अन्ध्रकरूढि पृथिवीपर अपना कार्यभार फैलानेको उद्यत हुए ॥३५४॥


अत्रान्तरे नभोगानां पर्वते दक्षिणक्षितौ । रथनूपुरनामास्ति पुरं सुरपुराकृति ॥३५५॥

अर्थ: इसी समय विजयार्ध पर्वतकी दक्षिणश्रेणीमें इन्द्रके समान रथनूपुर नामका नगर था ॥३५५॥


आसीत्तत्रोभयोः श्रेण्योः स्वामी भूरिपराक्रमः । दधावशनिवेगाख्यां यः शत्रुत्रासकारिणीम् ॥३५६॥

अर्थ: उसमें दोनों श्रेणियोंका स्वामी महापराक्रमी तथा शत्रुओंको भय उत्पन्न करनेवाला राजा अशनिवेग रहता था ॥३५६॥


पुत्रो विजयसिंहोऽस्य नाम्नाऽऽदित्यपुरं परम् । वाञ्छन् रूपावलेपेन प्रयातोऽथ स्वयंवरम् ॥३५७॥

विद्यामन्दरसंज्ञस्य सुतामम्बरचारिणः । वेगवत्यां समुत्पन्नां कान्तिदिग्धनभस्तलाम् ॥३५८॥

अथासौ यौवनप्राप्तां वीक्ष्य पुत्रीं मनोहराम् । स्वजनानुमतो मोहात् स्वयंवरमरीरचत् ॥३५९॥

अर्थ: अशनिवेगका पुत्र विजयसिंह था। आदित्यपुरके राजा विद्यामन्दर विद्याधरकी वेगवती रानीसे समुत्पन्न एक श्रीमाला नामकी पुत्री थी। वह इतनी सुन्दरी थी कि अपनी कान्ति-से आकाशतलको लिप्त करती थी। विद्यामन्दरने पुत्रीको यौवनवती देख आत्मीयजनोंकी अनुमति-से स्वयंवर रचवाया। अशनिवेगका पुत्र विजयसिंह श्रीमालाको चाहता था इसलिए रूपके गर्वसे प्रेरित हो स्वयंवरमें गया ॥३५७-३५९॥


अपरेऽपि खगाः सर्वे विमानैर्मणिशालिभिः । पूरयन्तो नभः शीघ्रं गता भूषितविग्रहाः ॥३६०॥

अर्थ: जिनके शरीर भूषित थे ऐसे अन्य समस्त विद्याधर भी मणियोंसे सुशोभित विमानोंके द्वारा आकाशको भरते हुए स्वयंवरमें पहुँचे ॥३६०॥


ततो मञ्चेषु रम्येषु रत्नस्तम्भधृतात्मसु । तुङ्गासनसमृद्धेषु स्फुरन्मणिमरीचिषु ॥३६१॥

मितेन परिवारेण युक्ता देहोपयोगिना । उपविष्टा यथास्थानं प्रधाना व्योमचारिणः ॥३६२॥

अर्थ: तदनन्तर जो रत्नमय खम्भोंपर खड़े थे, ऊँचे-ऊँचे सिंहासनोंसे युक्त थे तथा जिनमें खचित मणियोंकी किरणें फैल रही थीं ऐसे मनोहर मंचोंपर प्रमुख-प्रमुख विद्याधर यथास्थान आरूढ़ हुए। उन विद्याधरोंके साथ उनकी शरीर-रक्षाके लिए उपयोगी परिमित परिवार भी था ॥३६१-३६२॥


श्रीमालायां ततस्तेषां सर्वेषां व्योमचारिणाम् । मध्यस्थायां समं पेतुर्दृष्टीन्दीवरपङ्क्तयः ॥३६३॥

अर्थ: तदनन्तर मध्यमें विराजमान श्रीमाला पुत्रीपर सब विद्याधरोंके नेत्ररूपी नीलकमल एक साथ पड़े ॥३६३॥


अथ स्वयंवराशानां प्रवृत्ता व्योमचारिणाम् । मदनाश्लिष्टचित्तानामिति सुन्दरविभ्रमाः ॥३६४॥

अर्थ: तदनन्तर जिनकी आशा स्वयंवरमें लग रही थी और जिनका चित्त कामसे आलिंगित था ऐसे विद्याधरोंमें निम्नांकित सुन्दर चेष्टाएँ प्रकट हुईं ॥३६४॥


निष्कम्पमपि मूर्द्धस्थं मुकुटं कश्चिदुन्नतम् । अकरोत् किल निष्कम्पं रत्नांशुच्छन्नपाणिना ॥३६५॥

अर्थ: किसी विद्याधरके मस्तकपर स्थित उन्नत मुकुट, यद्यपि निश्चल था तो भी वह उसे रत्नोंकी किरणोंसे आच्छादित हाथके द्वारा निश्चल कर रहा था ॥३६५॥


कश्चित् कूर्परमाधाय कटिपार्श्वे सजृम्भणः । चक्रदेहस्य वलनं स्फुटत्सन्धिकृतस्वनम् ॥३६६॥

अर्थ: कोई विद्याधर कोहनी कमरके पास रख जमुहाई लेता हुआ शरीरको मोड़ रहा था - अँगड़ाई ले रहा था। उसकी इस क्रियासे शरीरके सन्धि-स्थान चटककर शब्द कर रहे थे ॥३६६॥


प्रदेशेऽपि स्थितां कश्चिदुज्ज्वलामसिपुत्रिकाम् । असारयत् कराग्रेण कटाक्षकृतवीक्षणाम् ॥३६७॥

अर्थ: कोई विद्याधर बगलमें रखी हुई देदीप्यमान छुरीको हाथके अग्रभागसे चला रहा था तथा बार-बार उसकी ओर कटाक्षसे देखता था ॥३६७॥


पार्श्वगे पुरुषे कश्चिचलयत्येव चामरम् । सलीलमंशुकान्तेन चक्रे वीजनमानने ॥३६८॥

अर्थ: यद्यपि पासमें खड़ा पुरुष चमर ढोर रहा था तो भी कोई विद्याधर वस्त्रके अंचलसे लीलापूर्वक मुखके ऊपर हवा कर रहा था ॥३६८॥


सव्येन वक्त्रमाच्छाद्य कश्चिदुत्तलपाणिना । संकोच्य दक्षिणं बाहुं व्याक्षिपद् बद्धमुष्टिकम् ॥३६९॥

अर्थ: कोई एक विद्याधर, जिसकी हथेली ऊपरकी ओर थी ऐसे बायें हाथसे मुँह ढँककर, जिसकी मुट्ठी बँधी थी ऐसी दाहिनी भुजाको संकुचित कर फैला रहा था ॥३६९॥


पादासनस्थितं कश्चिदुद्यम्य चरणं शनैः । वामोरुफलके चक्रे दक्षिणं रतिदक्षिणः ॥३७०॥

अर्थ: कोई एक रतिकुशल विद्याधर, पादासनपर रखे दाहिने पाँवको उठाकर धीरे-से बायीं जाँघपर रख रहा था ॥३७०॥


पादाङ्गुष्ठेन कश्चिच्च नेत्रान्तेक्षितकन्यकः । कृत्वा पाणितले गण्डं लिलेख चरणासनम् ॥३७१॥

अर्थ: कन्याकी ओर कटाक्ष चलाता हुआ कोई एक युवा हथेलीपर कपोल रखकर पैरके अँगूठेसे पादासनको कुरेद रहा था ॥३७१॥

६. षष्ठं पर्व (वानरवंशाभिधानं) (जारी)

गाढमप्यपरो बद्धमुन्मुच्य कटिसूत्रकम् । बबन्ध शनकैर्भूयः शेषाणमपि चक्रकम् ॥३७२॥

अर्थ: जिसमें लगा हुआ मणियोंका समूह शेषनागके समान जान पड़ता था ऐसे कसकर बँधे हुए कटिसूत्र-को खोलकर कोई युवा उसे फिर से धीरे-धीरे बाँध रहा था ॥३७२॥


स्फुटदन्योऽन्यसंदष्टप्रोत्तानविकराङ्गुलिः । वक्षः कश्चित्समुद्यम्य बहुतोरणमूद्ध्वयन् ॥३७३॥

अर्थ: कोई एक युवा दोनों हाथोंकी चटचटाती अँगुलियोंको एक दूसरेमें फँसाकर ऊपरकी ओर कर रहा था तथा सीना फुलाकर भुजाओंका तोरण खड़ा कर रहा था ॥३७३॥


पार्श्वस्थस्यापरो हस्तं सख्युरास्फाल्य सस्मितम् । कथां चक्रे विना हेतोः कन्याक्षिप्तचलेक्षणः ॥३७४॥

अर्थ: जिसकी चंचल आँखें कन्याकी ओर पड़ रही थीं ऐसा कोई एक युवा बगलमें बैठे हुए मित्रका हाथ अपने हाथमें ले मुसकराता हुआ निष्प्रयोजन कथा कर रहा था - गप-शप लड़ा रहा था ॥३७४॥


कृतचन्दनचर्चेऽन्यः कुङ्कुमस्थासकाचिते । चक्षुर्वक्षसि चिक्षेप विशाले कृतहस्तके ॥३७५॥

अर्थ: कोई एक युवा, जिसपर चन्दनका लेप लगानेके बाद केशरका तिलक लगाया था तथा जिसपर हाथ रखा था ऐसे विशाल वक्षस्थलपर दृष्टि डाल रहा था ॥३७५॥


कश्चित्कुन्तलमालस्थां गृहीत्वा केशवल्लरीम् । कुटिलामपि वामायां प्रदेशिन्यामयोजयत् ॥३७६॥

अर्थ: कोई एक विद्याधर ललाटपर लटकते हुए घुँघराले बालोंको बायें हाथकी प्रदेशिनी अँगुलीमें फँसा रहा था ॥३७६॥


अधरं कश्चिदाकृष्य वामहस्तेन मन्थरम् । स्वच्छताम्बूलसच्छायमैक्षिष्ट भ्रुवमुन्नयन् ॥३७७॥

अर्थ: कोई एक युवा स्वच्छ ताम्बूल खानेसे लाल-लाल दिखनेवाले ओठको धीरे-धीरे बायें हाथसे खींचकर भौंह ऊपर उठाता हुआ देख रहा था ॥३७७॥


अपरोऽभ्रमयत् पद्मं बद्धभ्रमरमण्डलम् । सव्येतरेण हस्तेन विसर्पन् कर्णिकारजः ॥३७८॥

अर्थ: और कोई एक युवा कर्णिकाकी परागको फैलाता हुआ दाहिने हाथसे जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे ऐसा कमल घुमा रहा था ॥३७८॥


वीणाभिर्वेणुभिः शङ्खैर्मृदङ्गैर्झल्लरैस्तथा । जनितोऽथ महानादः काहलानकमर्दकैः ॥३७९॥

अर्थ: उस समय स्वयंवर मण्डपमें वीणा, बाँसुरी शंख, मृदंग, झालर, काहल, भेरी और मर्दक नामक बाजोंसे उत्पन्न महाशब्द हो रहा था ॥३७९॥


मङ्गलानि प्रयुक्तानि वन्दिभिर्बद्धवृन्दकैः । महापुरुषचेष्टाभिर्निबद्धानि प्रमोदिभिः ॥३८०॥

अर्थ: महापुरुषोंकी चेष्टाएँ देख जो मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे तथा जिन्होंने अलग-अलग अपने झुण्ड बना रखे थे ऐसे बन्दीजनोंके द्वारा मंगल पाठका उच्चारण हो रहा था ॥३८०॥


महानादस्य तस्यान्ते धात्री नाम्ना सुमङ्गला । वामेतरकरोपात्तहेमवेत्रलता ततः ॥३८१॥

जगाद वचनं कन्यां विनयादानताननाम् । प्राप्तकल्पलताकारां मणिहेमविभूषणैः ॥३८२॥

अर्थ: तदनन्तर महाशब्दके शान्त होनेके बाद दाहिने हाथमें स्वर्णमय छड़ीको धारण करनेवाली सुमंगला धाय कन्यासे निम्न वचन बोली । उस समय कन्याका मुख विनयसे अवनत था मणिमयी आभूषणोंसे वह कल्पलताके समान जान पड़ती थी ॥३८१-३८२॥


सख्यं सन्यस्तविश्रंसिमृदुपाणिसरोरुहाम् । ऊर्ध्वस्थिता स्थितामूर्ध्वं मकरध्वजवर्णिनीम् ॥३८३॥

अर्थ: वह अपना कोमल हस्तकमल यद्यपि सखीके कन्धेपर रखी थी तो भी वह नीचेकी ओर खिसक रहा था। वह पालकीपर सवार थी और कामको प्रकट करनेवाली थी ॥३८३॥


नभस्तिलकनाम्नोऽयं नगरस्य पतिः सुते । उत्पन्नो विमलायां च चन्द्रकुण्डलभूपतेः ॥३८४॥

अर्थ: आगत राजकुमारोंका परिचय देती हुई सुमंगला धाय बोली कि हे पुत्रि ! यह नभस्तिलक नगरका राजा, चन्द्रकुण्डल भूपालकी विमला नामक रानीसे उत्पन्न हुआ है ॥३८४॥


मार्तण्डकुण्डलो नाम्ना मार्तण्डविजयी रुचा । प्रकाण्डतां परां प्राप्तो मण्डलाग्रो गुणात्मकः ॥३८५॥

अर्थ: मार्तण्डकुण्डल इसका नाम है, अपनी कान्तिसे सूर्यको जीत रहा है, सन्धि, विग्रह आदि गुणोंसे युक्त है तथा इन्हीं सब कारणोंसे यह अपने मण्डलमें परम प्रमुखताको प्राप्त हुआ है ॥३८५॥


गुणचिन्ताप्रवृत्तासु गोष्ठीष्वस्यादितो बुधाः । नाम गृह्णन्ति रोमाञ्चकण्टकव्याप्तविग्रहाः ॥३८६॥

अर्थ: जब गोष्ठियोंमें राजाओंके गुणोंकी चर्चा शुरू होती है तब विद्वज्जन सबसे पहले इसीका नाम लेते हैं और हर्षातिरेकके कारण उस समय विद्वज्जनोंके शरीर रोमांचरूपी कण्टकोंसे व्याप्त हो जाते हैं ॥३८६॥


साकमेतेन रन्तुं चेदस्ति ते मनसः स्पृहा । वृणीष्वैनं ततो दृष्टसमस्तग्रन्थगर्भकम् ॥३८७॥

अर्थ: हे पुत्रि ! यदि इसके साथ रमण करनेकी तेरे मनकी इच्छा है तो जिसने समस्त शास्त्रोंका सार देखा है ऐसे इस मार्तण्डकुण्डलको स्वीकृत कर ॥३८७॥


ततस्तं यौवनादीषत्प्रच्युतं खेचराधिपम् । आननानतिमात्रेण प्रत्याख्यातवती शुभा ॥३८८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका यौवन कुछ ढल चुका था ऐसे विद्याधरोंके राजा मार्तण्डकुण्डलका श्रीमालाने मुख नीचा करने मात्रसे ही निराकरण कर दिया ॥३८८॥


भूयोऽवदत्ततो धात्री तनये यच्छ लोचने । पुरुषाणामधीशेऽस्मिन् कान्तिदीप्तिविभूतिभिः ॥३८९॥

अर्थ: तदनन्तर सुमंगला धाय बोली कि हे पुत्रि ! कान्ति, दीप्ति और विभूतिके द्वारा जो समस्त पुरुषोंका अधीश्वर है ऐसे इस राजकुमारपर अपनी दृष्टि डालो ॥३८९॥


अयं रत्नपुराधीशो लक्ष्मीविद्याङ्गयोः सुतः । नाम्ना विद्यासमुद्घातो बहुविद्याधराधिपः ॥३९०॥

अर्थ: यह रत्नपुरका स्वामी है, राजा विद्यांग और रानी लक्ष्मीका पुत्र है, विद्यासमुद्घात इसका नाम है तथा समस्त विद्याधरोंका स्वामी है ॥३९०॥


अस्य नाम्नि गते कर्णजाहं वीरप्रवर्तने । शत्रवो गृह्णते वायुधूताश्वत्थदलस्थितम् ॥३९१॥

अर्थ: वीरोंमें हलचल मचानेवाला इसका नाम सुनते ही शत्रु भयसे वायुके द्वारा कम्पित पीपलके पत्तेकी दशाको प्राप्त होते हैं अर्थात् पीपलके पत्तेके समान काँपने लगते हैं ॥३९१॥


अस्य वक्षसि विस्तीर्णे कृतहारोपधानके । कुनृपभ्रान्तिभिः खिन्ना लक्ष्मीर्विश्रान्तमागता ॥३९२॥

अर्थ: अनेक क्षुद्र राजाओंके पास भ्रमण करनेसे जो थक गयी थी ऐसी लक्ष्मी, हाररूपी तकियासे सुशोभित इसके विस्तृत वक्षःस्थलपर मानो विश्रामको प्राप्त हुई है ॥३९२॥


अस्याङ्के यदि ते प्रीतिः स्थातुमस्ति मनोहरे । गृहाणैनं तडिन्माला युज्यतां मन्दराद्रिणा ॥३९३॥

अर्थ: यदि इसकी गोदमें बैठनेकी तेरी अभिलाषा है तो इसे स्वीकार कर। बिजली सुमेरुपर्वतके साथ समागमको प्राप्त हो ॥३९३॥


ततः प्रत्याचचक्षे तं चक्षुषैवर्जुदर्शनात् । वाञ्छिते हि वरत्वेन दृष्टिश्चञ्चलतां व्रजेत् ॥३९४॥

अर्थ: श्रीमाला उसे अपने नेत्रोंसे सरलतापूर्वक देखती रही इसीसे उसका निराकरण हो गया सो ठीक ही है क्योंकि कन्या जिसे वररूपसे पसन्द करती है उसपर उसकी दृष्टि चंचल हो जाती है ॥३९४॥


ततोऽसौ तदभिप्रायवेदिनी तां सुमङ्गला । अपरं दर्शनं निन्ये नरेशमिति चावदत् ॥३९५॥

अर्थ: तदनन्तर उसका अभिप्राय जाननेवाली सुमंगला उसे दूसरे राजाके पास ले जाकर बोली ॥३९५॥


वज्रायुधस्य पुत्रोऽयं वज्रशीलाङ्कसंभवः । वज्रपञ्जरनामानमधितिष्ठति पत्तनम् ॥३९६॥

अर्थ: कि यह राजा वज्रायुध और रानी वज्रशीलाका पुत्र खेचरभानु वज्रपंजर नामक नगरमें रहता है ॥३९६॥


अस्य बाहुद्वये लक्ष्मीर्दिनेशकरमासुरे । चञ्चलापि स्वभावेन संयतेवावतिष्ठते ॥३९७॥

अर्थ: लक्ष्मी यद्यपि स्वभावसे चंचल है तो भी सूर्यकी किरणोंके समान देदीप्यमान इसकी दोनों भुजाओंपर बँधी हुई के समान सदा स्थिर रहती है ॥३९७॥


सत्यमन्येऽपि विद्यन्ते नाममात्रेण खेचराः । तेषां खद्योततुल्यानामयं भास्करतां गतः ॥३९८॥

अर्थ: यह सच है कि नाममात्रके अन्य विद्याधर भी हैं परन्तु वे सब जुगनूके समान हैं और यह उनके बीच सूर्यके समान देदीप्यमान है ॥३९८॥


मानेन तुङ्गतामस्य प्राप्तस्य शिरसः पराम् । संप्राप्तं पुनरुत्कर्षं मुकुटं स्फुटरत्नकम् ॥३९९॥

अर्थ: यद्यपि इसका मस्तक स्वाभाविक प्रमाणसे ही परम ऊँचाईको प्राप्त है फिर भी इसपर जो जगमगाते रत्नोंसे सुशोभित मुकुट बाँधा गया है सो केवल उत्कर्ष प्राप्त करनेके लिए ही बाँधा गया है ॥३९९॥


सुरूपे प्रतिपद्यस्व पतिं विद्याभृतामिमम् । विषयांश्लेत्समान् शच्या भोक्तुं धीस्तव विद्यते ॥४००॥

अर्थ: हे सुन्दरि ! यदि इन्द्राणीके समान समस्त भोग भोगनेकी तेरी इच्छा है तो इस विद्याधरोंके अधिपतिको स्वीकृत कर ॥४००॥


ततः खेचरभानुं तं दृष्ट्वा कन्या कुमुद्वती । संकोचं परमं याता धात्र्येति गदिता पुनः ॥४०१॥

अर्थ: तदनन्तर उस खेचरभानुरूपी सूर्यको देखकर कन्यारूपी कुमुदिनी परम संकोचको प्राप्त हो गयी । यह देख सुमंगला धायने कुछ आगे बढ़कर कहा ॥४०१॥


चित्राम्बरस्य पुत्रोऽयं पद्मश्रीकुक्षिसंभवः । नित्यं चन्द्रपुराधीशो नाम्ना चन्द्राननो नृपः ॥४०२॥

पश्य वक्षोऽस्य विस्तीर्णं चारुचन्दनचर्चितम् । चन्द्ररश्मिपरिष्वक्तं कैलासतटसंनिभम् ॥४०३॥

अर्थ: कि यह राजा चित्राम्बर और रानी पद्मश्रीका पुत्र चन्द्रानन है, चन्द्रपुर नगरका स्वामी है । देखो, सुन्दर चन्दनसे चर्चित इसका वक्षःस्थल कितना चौड़ा है ? यह चन्द्रमाकी किरणोंसे आलिंगित कैलास पर्वतके तटके समान कितना भला मालूम होता है ? ॥४०२-४०३॥


उच्छलत्करभारोऽस्य हारो वक्षसि राजते । उत्सर्पत्सीकरो दूरं कैलास इव निर्झरः ॥४०४॥

अर्थ: छलकती हुई किरणोंसे सुशोभित हार इसके वक्षःस्थलपर ऐसा सुशोभित हो रहा है जैसा कि उठते हुए जलकणोंसे सुशोभित निर्झर कैलासके तटपर सुशोभित होता है ॥४०४॥


नामाक्षरकरैरस्य मनः श्लिष्टमरेरपि । प्रयाति परमं ह्लादं दुःखतापविवर्जितम् ॥४०५॥

अर्थ: इसके नामके अक्षररूपी किरणोंसे आलिंगित शत्रुका भी मन परम हर्षको प्राप्त होता है तथा उसका सब दुःखरूपी सन्ताप छूट जाता है ॥४०५॥


याति चेदिह ते चेतः प्रसादं सौम्यदर्शने । रजनीव शशाङ्केन लभस्वेतेन संगमम् ॥४०६॥

अर्थ: हे सौम्यदर्शने ! यदि तेरा चित्त इसपर प्रसन्नताको प्राप्त है तो चन्द्रमाके साथ रात्रिके समान तू इसके साथ समागमको प्राप्त हो ॥४०६॥


ततस्तस्मिन्नपि प्रीतिं न मनोऽस्याः समागतम् । कमलिन्या यथा चन्द्रे नयनानन्दकारिणि ॥४०७॥

अर्थ: तदनन्तर नेत्रोंको आनन्दित करनेवाले चन्द्रमापर जिस प्रकार कमलिनीका मन प्रीतिको प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार राजा चन्द्राननपर श्रीमालाका मन प्रीतिको प्राप्त नहीं हुआ ॥४०७॥


पुनराह ततो धात्री कन्ये पश्य पुरन्दरम् । अवतीर्णं महीमेतं भवतीसंगलालसम् ॥४०८॥

अर्थ: तब धाय बोली कि हे कन्ये ! इस राजा पुरन्दरको देखो । यह पुरन्दर क्या है मानो तुम्हारे संगमकी लालसासे पृथिवीपर अवतीर्ण हुआ साक्षात् पुरन्दर अर्थात् इन्द्र ही है ॥४०८॥


सुतोऽयं मेरुकान्तस्य श्रीरम्भागर्भसंभवः । स्वामी मन्दरकुञ्जस्य पुरस्याम्भोधरध्वनिः ॥४०९॥

अर्थ: यह राजा मेरुकान्त और रानी श्रीरम्भाका पुत्र है, मन्दरकुंज नगरका स्वामी है, मेघके समान इसकी जोरदार आवाज है ॥४०९॥


शक्ता यस्य न संग्रामे दृष्टिं संमुखमागताम् । प्रतिपत्तुं कुतो बाणान् शत्रवो भयदारिताः ॥४१०॥

अर्थ: युद्धमें भयसे पीड़ित शत्रु इसकी सम्मुखागत दृष्टिको सहन करनेमें असमर्थ रहते हैं फिर बाणोंकी तो बात ही अलग है ॥४१०॥


संभावयामि देवानां नाथोऽप्यस्माद् व्रजेद् भयम् । अभग्नप्रसरो ह्यस्य प्रतापो भ्रमति क्षितिम् ॥४११॥

अर्थ: मुझे तो लगता है कि देवोंका अधिपति इन्द्र भी इससे भयभीत हो सकता है, वास्तवमें इसका अखण्डित प्रताप समस्त पृथ्वीमें भ्रमण करता है ॥४११॥


उन्नतं चरणेनास्य शिरस्ताडय सुस्वने । प्रस्तावे प्रेमयुक्तेषु कलहेषु नितम्बिनि ॥४१२॥

अर्थ: हे सुन्दर शब्दोंवाली नितम्बिनि ! प्रेमपूर्ण कलहके समय तूँ इसके उन्नत मस्तकको अपने चरणसे ताडित कर ॥४१२॥


असावपि ततस्तस्या न लेभे मानसे पदम् । चित्रा हि चेतसो वृत्तिः प्रजानां कर्महेतुका ॥४१३॥

अर्थ: राजा पुरन्दर भी उसके हृदयमें स्थान नहीं पा सका सो ठीक ही है क्योंकि अपने-अपने कर्मोंके कारण लोगोंकी चित्तवृत्ति विचित्र प्रकारकी होती है ॥४१३॥


अभाषयदिमां बालां ततोऽन्यं व्योमचारिणम् । धात्री मदःसरस्यब्जं हंसीमुत्कलिका यथा ॥४१४॥

उवाच च सुते पश्य नृपमेतं महाबलम् । मनोजवेन वेगिन्यां संभूतं वायुरंहसम् ॥४१५॥

अर्थ: जिस प्रकार सरोवरमें तरंग हंसीको दूसरे कमलके पास ले जाती है उसी प्रकार धाय उस कन्याको सभारूपी सरोवरमें किसी दूसरे विद्याधरके पास ले जाकर बोली कि हे पुत्रि ! इस राजा महाबलको देख। यह राजा मनोजवके द्वारा वेगिनी नामक रानीसे उत्पन्न हुआ है। वायुके समान इसका वेग है ॥४१४-४१५॥


नाकार्द्धसंज्ञकस्यायं पुरस्य परिरक्षिता । अतिक्रम्य स्थिता यस्य गणनां विमला गुणाः ॥४१६॥

अर्थ: नाकार्धपुरका स्वामी है, इसके निर्मल गुण गणनासे परे हैं ॥४१६॥


भ्रूसमुत्क्षेपमात्रेण सर्वं यः क्षितिमण्डलम् । भ्रामयति स्वाङ्गवेगोत्थवातपातितभूधरः ॥४१७॥

अर्थ: अपने शरीरके वेगसे उत्पन्न वायुके द्वारा पर्वतोंको गिरा देनेवाला यह राजा भौंह उठाते ही समस्त पृथिवीमें चक्कर लगा देता है ॥४१७॥


विद्याबलेन यः कुर्याद् भूमिं गगनमध्यगाम् । दर्शयेद्वा ग्रहान् सर्वान् धरणीतलचारिणः ॥४१८॥

अर्थ: यह विद्याके बलसे पृथिवीको आकाशगामिनी बना सकता है और समस्त ग्रहोंको पृथिवीतलचारी दिखा सकता है ॥४१८॥


तुरीयं वा सृजेल्लोकं सूर्यं वा चन्द्रशीतलम् । चूर्णयेद्वा धराशीशं स्थापयेद्वानिलं स्थिरम् ॥४१९॥

शोषयेद् वाम्भसां नाथं मूर्तं कुर्वीत वा नभः । भाषितेनोरुणा किं वा भवेद्यस्य यथेप्सितम् ॥४२०॥

अर्थ: अथवा तीन लोकके सिवाय चतुर्थ लोककी रचना कर सकता है, सूर्यको चन्द्रमाके समान शीतल बना सकता है, सुमेरु पर्वतका चूर्ण कर सकता है, वायुको स्थिर बना सकता है, समुद्रको सुखा सकता है और आकाशको मूर्तिक बना सकता है। अथवा अधिक कहनेसे क्या ? इसकी जो इच्छा होती है वैसा ही कार्य हो जाता है ॥४१९-४२०॥


तत्रापि न मनस्तस्याश्चक्रे स्थानमयुक्तिकम् । वदत्येषेति चाज्ञासीत् सर्वशास्त्रकृतश्रमा ॥४२१॥

अर्थ: धायने यह सब कहा सही, पर कन्याका मन उसमें स्थान नहीं पा सका। कन्या सर्वशास्त्रोंको जाननेवाली थी इसलिए उसने जान लिया कि यह धाय अत्युक्तियुक्त कह रही है - इसके कहनेमें सत्यता नहीं है ॥४२१॥


अन्यानपि बहूनेवं धात्रीदर्शितसंपदः । विद्याबलसमायुक्तान् कन्या तत्याज खेचरान् ॥४२२॥

अर्थ: इस तरह धायके द्वारा जिनके वैभवका वर्णन किया गया था ऐसे बहुत-से विद्याबलधारी विद्याधरोंका परित्याग कर कन्या आगे बढ़ गयी ॥४२२॥


ततोऽसौ चन्द्रलेखेव व्यतीता यान्नभश्चरान् । पर्वता इव ते प्राप्ताः श्यामतां शोकवाहिनः ॥४२३॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार चन्द्रलेखा जिन पर्वतोंको छोड़कर आगे बढ़ जाती है वे पर्वत अन्धकारसे मलिन हो जाते हैं उसी प्रकार कन्या श्रीमाली जिन विद्याधरोंको छोड़कर आगे बढ़ गयी थी वे शोकको धारण करते हुए मलिनमुख हो गये ॥४२३॥


खेचराणां विलक्षाणां दृष्ट्वान्योन्यं गतत्विषाम् । प्रवेष्टुं धरणीमासीदभिप्रायस्त्रपावताम् ॥४२४॥

अर्थ: एक दूसरेको देखनेसे जिनकी कान्ति नष्ट हो गयी थी ऐसे लज्जायुक्त विद्याधरोंके मनमें विचार उठ रहा था कि यदि पृथिवी फट जाये तो उसमें हम प्रविष्ट हो जावें ॥४२४॥


अपकर्ण्य ततो धात्रीं खेचरद्युतिवर्णिनीम् । तस्याः पपात किष्किन्धकुमारे दृष्टिरादरात् ॥४२५॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याधरोंकी कान्तिका वर्णन करनेवाली धायकी उपेक्षा कर श्रीमालाकी दृष्टि बड़े आदरसे किष्किन्धकुमारके ऊपर पड़ी ॥४२५॥


ततो मालागुणः कण्ठे दृष्ट एवास्य संगतः । अन्योऽन्यं च समालापः स्निग्धया रचितोऽनया ॥४२६॥

अर्थ: उसने लोगोंके देखते-देखते ही वरमाला किष्किन्धकुमारके गलेमें डाल दी और उसी समय स्नेहसे भरी श्रीमालाने परस्पर वार्तालाप किया ॥४२६॥


ततो विजयसिंहस्य किष्किन्धान्ध्रकयोर्गता । दृष्टिराहूय तावेवं विद्यावीर्येण गर्वितः ॥४२७॥

अर्थ: तदनन्तर किष्किन्ध और अन्ध्रकरूढिपर विजयसिंह की दृष्टि पड़ी । विद्याके बलसे गर्वित विजयसिंहने उन दोनोंको बुलाकर कहा ॥४२७॥


विद्याधरसमाजोऽयं क भवन्ताविहागतौ । विरूपदर्शनौ क्षुद्रौ वानरौ विनयच्युतौ ॥४२८॥

अर्थ: कि अरे ! यह तो विद्याधरोंका समूह है, यहाँ आप लोग कहाँ आ गये ? तुम दोनोंका दर्शन अत्यन्त विरूप है । तुम क्षुद्र हो, वानर हो और विनयसे रहित हो ॥४२८॥


नेह देशे वनं रम्यं फलैरस्ति कृतानति । न वा निर्झरधारिण्यः सुन्दरा गिरिकन्दराः ॥४२९॥

अर्थ: न तो यहाँ फलोंसे नम्रीभूत मनोहर वन है और न निर्झरोंको धारण करनेवाली पहाड़की गुफाएँ ही हैं ॥४२९॥


वृन्दानि वानरीणां वा कुर्वन्ति कुविचेष्टितम् । मांसलोहितवक्त्राणां प्रवृत्तानां यथेप्सितम् ॥४३०॥

अर्थ: तथा जिनके मुख मांस के समान लाल-लाल हैं ऐसी इच्छानुसार प्रवृत्ति करनेवाली वानरियोंके झुण्ड भी यहाँ कुचेष्टाएँ नहीं कर रहे हैं ॥४३०॥


आहूताविह केनैतौ पशू कपिनिशाचरौ । दूताधमस्य तस्याद्य करोमि विनिपातनम् ॥४३१॥

अर्थ: इन पशुरूप वानर निशाचरोंको यहाँ कौन बुलाकर लाया है ? मैं आज उस नीच दूतका निपात - घात करूँ ॥४३१॥


निर्घाटयेतामिमावस्माद्देशाच्छाखामृगौ खलौ । वृथा विद्याधरीश्रद्धां दूरं नयत चानयोः ॥४३२॥

अर्थ: यह कह उसने अपने सैनिकोंसे कहा कि इन दुष्ट वानरोंको इस स्थानसे निकाल दो तथा इन्हें वृथा ही जो विद्याधरी प्राप्त करनेकी श्रद्धा हुई है उसे दूर कर दो ॥४३२॥


रुष्टौ ततो वचोभिस्तौ परुषैर्वानरध्वजौ । महान्तं क्षोभमायातौ सिंहाविव गजान् प्रति ॥४३३॥

अर्थ: तदनन्तर विजयसिंहके कठोर शब्दोंसे रुष्ट हो किष्किन्ध और अन्ध्रकरूढि दोनों वानरवंशी उस तरह महाक्षोभको प्राप्त हुए जिस तरह कि हाथियोंके प्रति सिंह महाक्षोभको प्राप्त होते हैं ॥४३३॥


ततः स्वामिपरीवादमहावाताहता सती । गता क्षोभं चमूवेला रौद्रचेष्टाविधायिनी ॥४३४॥

अर्थ: तदनन्तर स्वामीकी निन्दारूपी महावायुसे ताड़ित विद्याधरोंकी सेनारूपी वेला रुद्र - भयंकर चेष्टा करती हुई परम क्षोभको प्राप्त हुई ॥४३४॥


कश्चिदास्फालयद्वाममंसं दक्षिणपाणिना । वेगाघातसमुत्सर्पद्रक्तसीकरजालकम् ॥४३५॥

अर्थ: कोई सामन्त दाहिने हाथसे बायें कन्धेको पीटने लगा । उस समय उसके वेगपूर्ण आघातके कारण बायें कन्धेसे रक्तके छींटोंका समूह उछटने लगा था ॥४३५॥


कश्चिद् दृष्टिं विचिक्षेप क्षेपीयःक्षुब्धमानसः । कोपावेशारुणां भीमां प्रलयोल्कामिवारिषु ॥४३६॥

अर्थ: जिसका चित्त अत्यन्त क्षुभित हो रहा था ऐसा कोई एक सामन्त शत्रुओंपर क्रोधके आवेशसे लाल-लाल भयंकर दृष्टि डाल रहा था । उसकी वह लाल दृष्टि ऐसी जान पड़ती थी मानो प्रलय कालकी उल्का ही हो ॥४३६॥


कश्चिद्दक्षिणहस्तेन वक्षः कम्प्रेण कोपतः । अस्पृक्षत् सकलं क्रूरकर्म वाञ्छन् महास्पदम् ॥४३७॥

अर्थ: कोई सैनिक क्रोधसे काँपते हुए दाहिने हाथसे वक्षःस्थलका स्पर्श कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त क्रूर कर्म करनेके लिए किसी बड़े स्थानकी खोज ही कर रहा हो ॥४३७॥


करं करेण कश्चिच्च स्मितयुक्तमताडयत् । तथा यथा गतः पान्थः श्रुतैर्वधिरतां चिरम् ॥४३८॥

अर्थ: किसीने मुसकराते हुए अपने एक हाथसे दूसरे हाथको इतने जोरसे पीटा कि उसका शब्द सुनकर पथिक चिरकालके लिए बहरा हो गया ॥४३८॥


मूलजालदृढाबद्धमहापीठस्य शाखिनः । कश्चिदुन्मूलनं चक्रे चलत्पल्लवधारिणः ॥४३९॥

अर्थ: जिसका महापीठ जड़ोंके समूहसे पृथ्वीपर मजबूत बँधा था और जो चंचल पल्लव धारण कर रहा था ऐसे किसी वृक्षको कोई सैनिक जड़से उखाड़ने लगा ॥४३९॥


मञ्चस्य स्तम्भमादाय बभञ्जांसे परः कपिः । क्षुद्रभंगैर्नभस्तस्य व्याप्तमन्तरवर्जितैः ॥४४०॥

अर्थ: किसी वानरने मंचका खम्भा लेकर कन्धेपर इतने जोरसे तोड़ा कि उसके निरन्तर बिखरे हुए छोटे-छोटे टुकड़ोंसे आकाश व्याप्त हो गया ॥४४०॥


गात्रं बलितमेकेन स्फुटद्दृढव्रणाङ्कितम् । शोणितोदारधाराभिरुत्पातघनसंनिभम् ॥४४१॥

अर्थ: किसीने अपने शरीरको इतने जोरसे मोड़ा कि उसके पुरे हुए घाव फिरसे फट गये तथा खूनकी बड़ी मोटी धाराओंसे उसका शरीर उत्पात-कालके मेघके समान जान पड़ने लगा ॥४४१॥


कृताट्टहासमन्येन हसितं विवृताननम् । शब्दात्मकमिवाशेषं कुर्वता भुवनान्तरम् ॥४४२॥

अर्थ: किसीने मुँह फाड़कर इतने जोरसे अट्टहास किया कि मानो वह समस्त संसारके अन्तरालको शब्दमय ही करना चाहता था ॥४४२॥


धूतोऽन्येन जटाभारश्छन्नाशेषदिगाननः । छायया तस्य संजाता शर्वरीव तदा चिरम् ॥४४३॥

अर्थ: किसीने अपनी जटाओंका समूह इतनी जोरसे हिलाया कि उससे समस्त दिशाएँ व्याप्त हो गयीं और उससे ऐसा जान पड़ने लगा मानो चिरकालके लिए रात्रि ही हो गयी हो ॥४४३॥


संकोचिना भुजे कश्चिद्वामे दक्षिणपाणिना । चकार ताडनं घोरं निर्घातापातभीषणम् ॥४४४॥

अर्थ: कोई सैनिक दाहिने हाथको संकुचित कर उससे बायीं भुजाको इतनी जोरसे पीट रहा था कि उससे वज्रपातके समान भयंकर घोर शब्द हो रहा था ॥४४४॥


सहध्वं ध्वंसनं वाचः परुषायाः फलं खलाः । दुःखगा इति तारेण ध्वनिना मुखराननः ॥४४५॥

अर्थ: ‘अरे दुष्ट विद्याधरो ! तुमने जो कठोर वचन कहे हैं उसके फलस्वरूप इस विध्वंसको सहन करो’ इस प्रकारके उच्च शब्दोंसे किसीका मुख शब्दायमान हो रहा था अर्थात् कोई चिल्ला-चिल्लाकर उक्त शब्द कह रहा था ॥४४५॥


अपूर्वायाः पराभूतेस्ततस्ते सहसा भृशम् । कपयोऽभिमुखीभूता हन्तुं खेचरवाहिनीम् ॥४४६॥

अर्थ: तदनन्तर उस अपूर्व तिरस्कारके कारण वानरवंशी, विद्याधरोंकी सेनाको नष्ट करनेके लिए सम्मुख आये ॥४४६॥


गजा गजैस्तता सार्द्धं रथारूढा रथस्थितैः । पदातयश्च पादातैश्चक्रुर्युद्धं सुदारुणम् ॥४४७॥

अर्थ: तत्पश्चात् हाथी हाथियोंसे, रथोंके सवार रथके सवारोंसे और पैदल सिपाही पैदल सिपाहियोंके साथ भयंकर युद्ध करने लगे ॥४४७॥


सेनयोरुभयोर्जातस्ततस्तत्र रणो महान् । दूरस्थितामरव्रातजनितोदारविस्मयः ॥४४८॥

अर्थ: इस प्रकार दोनों सेनाओंमें वहाँ महायुद्ध हुआ । ऐसा महायुद्ध कि जो दूर खड़े देवोंके समूहको महान् आश्चर्य उत्पन्न कर रहा था ॥४४८॥


श्रुत्वा च तत्क्षणं युद्धं सुकेशो राक्षसाधिपः । मनोरथ इवायातः किष्किन्धान्ध्रकयोः सुहृत् ॥४४९॥

अर्थ: किष्किन्ध और अन्ध्रकका मित्र जो सुकेश नामका राक्षसोंका राजा था वह युद्धका समाचार सुन तत्काल हो मनोरथके समान वहाँ आ पहुँचा ॥४४९॥


अकम्पनसुताहेतोर्यथा युद्धमभूत् परम् । तथेदमपि संवृत्तं बीजं युद्धस्य योषितः ॥४५०॥

अर्थ: पहले अकम्पनकी पुत्री सुलोचनाके निमित्त जैसा महायुद्ध हुआ था वैसा ही युद्ध उस समय हुआ सो ठीक ही है क्योंकि युद्धका कारण स्त्रियाँ ही हैं ॥४५०॥


यावच्च तुमुलं तेषां वर्तते खगरक्षसाम् । तावदादाय तां कन्यां किष्किन्धः कृतितां गतः ॥४५१॥

अर्थ: इधर जबतक विद्याधर और राक्षसोंके बीच भयंकर युद्ध होता है उधर तबतक कन्याको लेकर किष्किन्ध कृतकृत्य हो गया अर्थात् उसे लेकर युद्धसे भाग गया ॥४५१॥


आहूय चाभियातस्य तावदन्ध्रकभूभृता । कृपाणेन शिरस्तुङ्गं जयसिंहस्य पातितम् ॥४५२॥

अर्थ: विद्याधरोंका राजा विजयसिंह ज्यों ही सामने आया त्यों ही अन्ध्रकरूढिने ललकारकर उसका उन्नत मस्तक तलवारसे नीचे गिरा दिया ॥४५२॥


तेनैकेन विना सैन्यमितश्चेतश्च तद्गतम् । आत्मनेव विना देहे हृषीकाणां कुलं घनम् ॥४५३॥

अर्थ: जिस प्रकार एक आत्माके बिना शरीरमें इन्द्रियोंका समूह जहाँ-तहाँ बिखर जाता है उसी प्रकार एक विजयसिंहके विना समस्त सेना इधर-उधर बिखर गयी ॥४५३॥


ततः सुतवधं श्रुत्वा वज्रेणेव समाहतः । शोकेनाशनिवेगोऽभून्मूर्च्छान्धतमसावृतः ॥४५४॥

अर्थ: जब अशनिवेगने पुत्रके वधका समाचार सुना तो वह शोकके कारण वज्रसे ताड़ित हुएके समान परम दुखी हो मूर्छारूपी गाढ़ अन्धकारसे आवृत हो गया ॥४५४॥


ततः स्वदारनेत्राम्बुसिक्तवक्षःस्थलश्चिरात् । गतः प्रबोधमाकारं बभार क्रोधभीषणम् ॥४५५॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी स्त्रियोंके नयन जलसे जिसका वक्षःस्थल भीग रहा था ऐसा अशनिवेग, जब प्रबोधको प्राप्त हुआ तब उसने क्रोधसे भयंकर आकार धारण किया ॥४५५॥


ततस्तस्य समाकारं परिवर्गोऽपि नेक्षितुम् । शशाक प्रलयोत्पातभास्कराकारसन्निभम् ॥४५६॥

अर्थ: तदनन्तर प्रलयकालके उत्पातसूचक भयंकर सूर्यके समान उसके आकारको परिकरके लोग देखनेमें भी समर्थ नहीं हो सके ॥४५६॥


सर्वविद्याधरैः सार्द्धं ततोऽसौ शस्त्रभासुरैः । गत्वा किष्कुपुरस्याभूत्तुङ्गशाल इवापरः ॥४५७॥

अर्थ: तदनन्तर उसने शस्त्रोंसे देदीप्यमान समस्त विद्याधरोंके साथ जाकर किसी दूसरे ऊँचे कोटके समान किष्कुपुरको घेर लिया ॥४५७॥


विदित्वा नगरं रुद्धं ततस्तौ वानरध्वजौ । तडित्केशिसमायुक्तौ निष्क्रान्तौ रणलालसौ ॥४५८॥

अर्थ: तदनन्तर नगरको घिरा जान दोनों भाई युद्धकी लालसा रखते हुए सुकेशके साथ बाहर निकले ॥४५८॥


गदाभिः शक्तिभिर्बाणैः पाशैः प्रासैर्महासिभिः । ततो दानवसैन्यं तद्ध्वस्तं वानरराक्षसैः ॥४५९॥

अर्थ: फिर वानर और राक्षसोंकी सेनाने गदा, शक्ति, बाण, पाश, भाले तथा बड़ी-बड़ी तलवारोंसे विद्याधरोंकी सेनाको विध्वस्त कर दिया ॥४५९॥


दिशा ययान्ध्रको यातः किष्किन्धो वा महाहवे । सुकेशो वा तया याता मार्गाश्चूर्णितखेचराः ॥४६०॥

अर्थ: उस महायुद्धमें अन्ध्रक, किष्किन्ध और सुकेश जिस दिशामें निकल जाते थे उसी दिशाके मार्ग चूर्णीकृत वानरोंसे भर जाते थे ॥४६०॥


तत्र पुत्रवधक्रोधवह्निज्वालाप्रदीपितः । अन्ध्रकाभिमुखो जातो वज्रवेगः कृतध्वनिः ॥४६१॥

अर्थ: तदनन्तर पुत्रवधसे उत्पन्न क्रोधरूपी अग्निकी ज्वालाओंसे प्रदीप्त हुआ अशनिवेग जोरका शब्द करता हुआ अन्ध्रकके सामने गया ॥४६१॥


बालोऽयमन्ध्रकः पापोऽशनिवेगोऽयमुद्धतः । इति ज्ञात्वोत्थितो योद्धुं किष्किन्धोऽशनिरंहसा ॥४६२॥

अर्थ: तब किष्किन्धने विचारा कि अन्ध्रक अभी बालक है और यह पापी अशनिवेग महा उद्धत है, ऐसा विचारकर वह अशनिवेगके साथ युद्ध करनेके लिए स्वयं उठा ॥४६२॥


विद्युद्वाहननाम्नासौ तत्सुतेन पुरस्कृतः । अभवच्च तयोर्युद्धं दारजातं पराभवम् ॥४६३॥

अर्थ: सो अशनिवेगके पुत्र विद्युद्वाहनने उसका सामना किया और फलस्वरूप दोनोंमें घोर युद्ध हुआ सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें जितना पराभव होता है वह स्त्रीके निमित्त ही होता है ॥४६३॥


यावच्च तत्तयोर्युद्धं वर्ततेऽत्यन्तभीषणम् । निहतोऽशनिवेगेन तावदन्ध्रकवानरः ॥४६४॥

अर्थ: इधर जबतक किष्किन्ध और विद्युद्वाहनमें भयंकर युद्ध चलता है उधर तबतक अशनिवेगने अन्ध्रकको मार डाला ॥४६४॥


ततोऽसौ पतितो बालः क्षितौ तेजोविवर्जितः । प्रत्यूषशशिनश्छायां बभार गतचेतनः ॥४६५॥

अर्थ: तदनन्तर बालक अन्धक, तेजरहित पृथिवीपर गिर पड़ा और निष्प्राण हो प्रातःकालके चन्द्रमाकी कान्तिको धारण करने लगा अर्थात् प्रातःकालीन चन्द्रमाके समान कान्तिहीन हो गया ॥४६५॥


किष्किन्धेनापि निक्षिप्ता विद्युद्वाहनवक्षसि । शिला स ताडितो मूर्छां प्राप्य बोधं पुनर्गतः ॥४६६॥

आदाय तां शिलां तेन ततो वक्षसि ताडितः । किष्किन्धोऽपि गतो मूर्छां घूर्णितेक्षणमानसः ॥४६७॥

अर्थ: इधर किष्किन्धने एक शिला विद्युद्वाहनके वक्षःस्थलपर फेंकी जिससे तड़ित् हो वह मूर्च्छित हो गया परन्तु कुछ ही समयमें सचेत होकर उसने वही शिला किष्किन्धके वक्षःस्थलपर फेंकी जिससे वह भी मूर्च्छाको प्राप्त हो गया । उस समय शिलाके आघातसे उसके नेत्र तथा मन दोनों ही घूम रहे थे ॥४६६-४६७॥


लङ्केन्द्रेण ततो नीतः प्रेमसंसक्तचेतसा । किष्कुं प्रमादमुत्क्षिप्य चिरात् प्राप्तश्च चेतनाम् ॥४६८॥

अर्थ: तदनन्तर प्रेमसे जिसका चित्त भर रहा था ऐसा लंकाका राजा सुकेश उसे प्रमाद छोड़कर शीघ्र ही किष्कपुर ले गया। वहाँ चिरकालके बाद उसे चेतना प्राप्त हुई ॥४६८॥


उन्मील्य स ततो नेत्रे यदा नापश्यदन्धकम् । तदापृच्छन्मम भ्राता वर्तते क्वेति पार्श्वगान् ॥४६९॥

अर्थ: जब उसने आँखें खोलीं और सामने अन्धक को नहीं देखा तब समीपवर्ती लोगोंसे पूछा कि हमारा भाई कहाँ है ? ॥४६९॥


ततः प्रलयवातेन क्षोभितस्याम्बुधेः समम् । शुश्रावान्तःपुराक्रन्दमन्धकध्वंसहेतुकम् ॥४७०॥

अर्थ: उसी समय उसने प्रलयकी वायुसे क्षोभित समुद्रके समान, अन्धककी मृत्युसे उत्पन्न अन्तःपुरके रोनेका शब्द सुना ॥४७०॥


विप्रलापं ततश्चक्रे प्रतप्तः शोकवह्निना । चिरं भ्रातृगुणध्यानकृतदुःखोर्मिसंततिः ॥४७१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके हृदयमें भाईके गुणोंके चिन्तवनसे उत्पन्न दुःखकी लहरें उठ रही थीं ऐसा किष्किन्ध शोकाग्निसे सन्तप्त हो चिरकाल तक विलाप करता रहा ॥४७१॥


हा भ्रातर्मयि सत्येवं कथं प्राप्तोऽसि पञ्चताम् । दक्षिणः पतितो बाहुस्त्वयि मे पातमागते ॥४७२॥

अर्थ: हे भाई ! मेरे रहते हुए तू मृत्युको कैसे प्राप्त हो गया ? तेरे मरनेसे मेरी दाहिनी भुजा ही भंगको प्राप्त हुई ॥४७२॥


दुरात्मना कथं तेन पापेन विनिपातितम् । शस्त्रं बाले त्वयि क्रूरं धिक् तमन्यायवर्तिनम् ॥४७३॥

अर्थ: उस पापी दुष्टने तुझ बालकपर शस्त्र कैसे चलाया ? अन्यायमें प्रवृत्ति करनेवाले उस दुष्टको धिक्कार है ॥४७३॥


अपश्यन्नाकुलोऽभूवं यो भवन्तं निमेषतः । सोऽहं वद कथं प्राणान् धारयिष्यामि सांप्रतम् ॥४७४॥

अर्थ: जो तुझे निमेष मात्र भी नहीं देखता था तो आकुल हो जाता था वही मैं अब प्राणोंको किस प्रकार धारण करूँगा सो कह ॥४७४॥


अथवा निर्मितं चेतो वज्रेण मम दारुणम् । यज्ज्ञात्वापि भवन्मृत्युं शरीरं न विमुञ्चति ॥४७५॥

अर्थ: अथवा मेरा कठोर चित्त वज्रसे निर्मित है इसीलिए तो वह तेरी मृत्यु जानकर भी शरीर नहीं छोड़ रहा है ॥४७५॥


बाल ते स्मितसंयुक्तं वीरगोष्ठीसमुद्भवम् । स्मरन् स्फुटसमुल्लासं दुःखं प्राप्नोमि दुःसहम् ॥४७६॥

अर्थ: हे बालक ! मन्द-मन्द मुसकानसे युक्त, वीर पुरुषोंकी गोष्ठीमें समुत्पन्न जो तेरा प्रकट हर्षोल्लास था उसका स्मरण करता हुआ मैं दुःसह दुःख प्राप्त कर रहा हूँ ॥४७६॥


यद्यद्विचेष्टितं सार्द्धं क्रियमाणं त्वया पुरा । प्रसेकममृतेनेव कृतवत्सर्वगात्रकम् ॥४७७॥

अर्थ: पहले तेरे साथ जो-जो चेष्टाएँ-कौतुक आदि किये थे वे समस्त शरीरमें मानो अमृतका ही सिंचन करते थे ॥४७७॥


स्मर्यमाणं तदेवेदमधुना मरणं कथम् । प्रयच्छति विषेणेव सेकं मर्मविदारणम् ॥४७८॥

अर्थ: पर आज वे ही सब स्मरणमें आते ही विषके सिंचनके समान मर्मघातक मरण क्यों प्रदान कर रहे हैं अर्थात् जो पहले अमृतके समान सुखदायी थे वे ही आज विषके समान दुःखदायी क्यों हो गये ? ॥४७८॥


ततोऽसौ विलपन् भूरि भ्रातृस्नेहातिविक्लवः । सुकेशादिभिरानीतः प्रबोधमिति भाषणात् ॥४७९॥

अर्थ: इस प्रकार भाईके स्नेहसे दुःखी हुआ किष्किन्ध बहुत विलाप करता रहा । तदनन्तर सुकेश आदिने उसे इस प्रकार समझाकर प्रबोधको प्राप्त कराया ॥४७९॥


युक्तमेतन्न धीराणां कर्तुं क्षुद्रविचेष्टितम् । शोको हि पण्डितैर्दृष्टः पिशाचो भिन्ननामकः ॥४८०॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि धीर-वीर मनुष्योंको क्षुद्र पुरुषोंके समान शोक करना उचित नहीं है । यथार्थमें पण्डितजनोंने शोकको भिन्न नामवाला पिशाच ही कहा है ॥४८०॥


कर्मणां विनियोगेन वियोगः सह बन्धुना । प्राप्ते तत्रापरं दुःखं शोको यच्छति संततम् ॥४८१॥

अर्थ: कर्मोंके अनुसार इष्टजनोंके साथ वियोगका अवसर आनेपर यदि शोक होता है तो वह आगे के लिए और भी दुःख देता है ॥४८१॥


प्रेक्षापूर्वप्रवृत्तेन जन्तुना सप्रयोजनः । व्यापारः सततं कृत्यः शोकश्चायमनर्थकः ॥४८२॥

अर्थ: विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मनुष्यको सदा वही कार्य करना चाहिए जो प्रयोजनसे सहित हो । यह शोक प्रयोजनरहित है अतः बुद्धिमान् मनुष्यके द्वारा करने योग्य नहीं है ॥४८२॥


प्रत्यागमः कृते शोके प्रेतस्य यदि जायते । ततोऽन्यानपि संगृह्य विदधीत जनः शुचम् ॥४८३॥

अर्थ: यदि शोक करनेसे मृतक व्यक्ति वापस लौट आता हो तो दूसरे लोगोंको भी इकट्ठा कर शोक करना उचित है ॥४८३॥


शोकः प्रत्युत देहस्य शोषीकरणमुत्तमम् । पापानामयमुद्रेको महामोहप्रवेशनः ॥४८४॥

अर्थ: शोकसे कोई लाभ नहीं होता बल्कि शरीरका उत्कट शोषण ही होता है । यह शोक पापोंका तीव्रोदय करनेवाला और महामोहमें प्रवेश करानेवाला है ॥४८४॥


तदेवं वैरिणं शोकं परित्यज्य प्रसन्नधीः । कृत्ये कुरु मतिन्यासं नानुबन्धं त्यजत्यरिः ॥४८५॥

अर्थ: इसलिए इस वैरी शोकको छोड़कर बुद्धिको स्वच्छ करो और करने योग्य कार्यमें मन लगाओ क्योंकि शत्रु अपना संस्कार छोड़ता नहीं है ॥४८५॥


मूढाः शोकमहापङ्के मग्नाः शेषामपि क्रियाम् । नाशयन्ति तदायत्तजीवितैर्वीक्षिता जनैः ॥४८६॥

अर्थ: मोही मनुष्य शोकरूपी महापंकमें निमग्न होकर अपने शेष कार्योंको भी नष्ट कर लेते हैं । मोही मनुष्योंका शोक तब और भी अधिक बढ़ता है जबकि अपने आश्रित मनुष्य उनकी ओर दीनता-भरी दृष्टिसे देखते हैं ॥४८६॥


बलीयान् वज्रवेगोऽयमस्मन्नाशस्य चिन्तकः । प्रतिकर्तव्यमस्माभिश्चिन्तनीयमिहाधुना ॥४८७॥

अर्थ: हमारे नाशका सदा ध्यान रखनेवाला अशनिवेग चूँकि अत्यन्त बलवान् है इसलिए इस समय हम लोगोंको इसके प्रतिकारका विचार अवश्य करना चाहिए ॥४८७॥


बलीयसि रिपौ गुप्तिं प्राप्य कालं नयेद् बुधः । तत्र तावदवाप्नोति न निकारमरातिकम् ॥४८८॥

अर्थ: यदि शत्रु अधिक बलवान् है तो बुद्धिमान् मनुष्य किसी जगह छिपकर समय बिता देता है । ऐसा करनेसे वह शत्रुसे प्राप्त होनेवाले पराभवसे बच जाता है ॥४८८॥


प्राप्य तत्र स्थितः कालं कुतश्चिद् द्विगुणं रिपुम् । साधयेन्नहि भूतीनामेकस्मिन् सर्वदा रतिः ॥४८९॥

अर्थ: छिपकर रहनेवाला मनुष्य जब योग्य समय पाता है तब अपनेसे दूनी शक्तिको धारण करनेवाले शत्रुको भी वश कर लेता है सो ठीक ही है क्योंकि सम्पदाओंकी सदा एक ही व्यक्तिमें प्रीति नहीं रहती ॥४८९॥


अतः परम्परायातमस्माकं कुलगोचरम् । अलङ्कारपुरं नाम स्थानं मे स्मृतिमागतम् ॥४९०॥

अर्थ: अतः परम्परासे चला आया हमारे वंशका निवासस्थल अलंकारपुर (पाताल लंका) इस समय मेरे ध्यानमें आया है ॥४९०॥


कुलवृद्धास्तदस्माकं शंसन्त्यविदितं परैः । प्राप्य तत् स्वर्गलोकेऽपि न कुर्वीत पदं मनः ॥४९१॥

अर्थ: हमारे कुलके वृद्धजन उसकी बहुत प्रशंसा करते हैं तथा शत्रुओंको भी उसका पता नहीं है । वह इतना सुन्दर है कि उसे पाकर फिर मन स्वर्गलोकको आकांक्षा नहीं करता ॥४९१॥


तस्मादुत्तिष्ठ गच्छामस्तत्पुरं रिपुदुर्गमम् । अनयो हि महानेष यत्कालस्य न यापनम् ॥४९२॥

अर्थ: इसलिए उठो हम लोग शीघ्र ही शत्रुओंके द्वारा अगम्य उस अलंकारपुर नगरमें चलें । इस स्थितिमें यदि वहाँ जाकर संकटका समय नहीं निकाला जाता है तो यह बड़ी अनीति होगी ॥४९२॥


एवमन्विष्य नो शोको यदा तीव्रो निवर्तते । श्रीमालादर्शनादस्य ततोऽसौ विनिवर्तिनः ॥४९३॥

अर्थ: इस प्रकार लंकाके राजा सुकेशने किष्किन्धको बहुत समझाया पर उसका शोक दूर नहीं हुआ । अन्तमें रानी श्रीमालाके देखनेसे उसका शोक दूर हो गया ॥४९३॥


ततस्तौ परिवर्गेण समस्तेन समन्वितौ । प्रस्थितौ दर्शनं प्राप्तौ विद्युद्वाहनविद्विषः ॥४९४॥

अर्थ: तदनन्तर राजा किष्किन्ध और सुकेश अपने समस्त परिवारके साथ अलंकारपुरकी ओर चले परन्तु विद्युद्वाहन शत्रुने उन्हें देख लिया ॥४९४॥


ततोऽसौ पृष्ठतो गन्तुं प्रवृत्तो धावतोस्तयोः । भ्रातृघातेन संक्रुद्धः शत्रुनिर्मूलनोद्यतः ॥४९५॥

अर्थ: वह भाई विजयसिंहके घातसे अत्यन्त क्रुद्ध था तथा शत्रुका निर्मूल नाश करनेमें सदा उद्यत रहता था इसलिए भागते हुए सुकेश और किष्किन्धके पीछे लग गया ॥४९५॥


भग्नाः किलानुसर्तव्याः शत्रवो नेति भाषितम् । नीतिशास्त्रशरीरज्ञैः पुरुषैः शुद्धबुद्धिभिः ॥४९६॥

अर्थ: यह देख नीतिशास्त्रके मर्मज्ञ तथा शुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाले पुरुषोंने विद्युद्वाहनको समझाया कि भागते हुए शत्रुओंका पीछा नहीं करना चाहिए ॥४९६॥


निहतश्च तव भ्राता येन पापेन वैरिणा । प्रापितोऽसौ महानिद्रां विशिखैरन्ध्रको मया ॥४९७॥

अर्थ: पिता अशनिवेगने भी उससे कहा कि जिस पापी वैरीने तुम्हारे भाई विजयसिंहको मारा था उस अन्ध्रकको मैंने बाणोंके द्वारा महानिद्रा प्राप्त करा दी है अर्थात् मार डाला है ॥४९७॥


तस्मात्पुत्र निवर्तस्व नैतेऽस्माकं कृतागसः । अनुकम्पा हि कर्तव्या महता दुःखिते जने ॥४९८॥

अर्थ: इसलिए हे पुत्र ! लौटो, ये हमारे अपराधी नहीं हैं । महापुरुषको दुःखी जनपर दया करनी चाहिए ॥४९८॥


पृष्ठस्य दर्शनं येन कारितं कातरात्मना । जीवन्मृतस्य तस्यान्यत्क्रियतां किं मनस्विना ॥४९९॥

अर्थ: जिस भीरु मनुष्यने अपनी पीठ दिखा दी वह तो जीवित रहनेपर भी मृतकके समान है, तेजस्वी मनुष्य भला उसका और क्या करेंगे ॥४९९॥


यावदेवं सुतं शास्ति वज्रवेगो वशस्थितिम् । अलङ्कारपुरं प्राप्तास्तावद्वानरराक्षसाः ॥५००॥

अर्थ: इधर इस प्रकार अशनिवेग जबतक पुत्रको अपने अधीन रहनेका उपदेश देता है उधर तबतक वानर और राक्षस अलंकारपुर (पाताललंका) में पहुँच गये ॥५००॥


पातालावस्थिते तत्र रत्नालोकचिते पुरे । तस्थुः शोकं प्रमोदं च वहन्तो भयवर्जिताः ॥५०१॥

अर्थ: वह नगर पातालमें स्थित था तथा रत्नोंके प्रकाशसे व्याप्त था सो उस नगरमें वे दोनों शोक तथा हर्षको धारण करते हुए रहने लगे ॥५०१॥


अन्यदाशनिवेगोऽथ दृष्ट्वा शरदि तोयदम् । क्षणाद्विलयमायातं विरक्तो राज्यसंपदि ॥५०२॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन अशनिवेग शरदृतुके मेघको क्षणभरमें विलीन होता देख राज्यसम्पदासे विरक्त हो गया ॥५०२॥


सुखं विषययोगेन विज्ञाय क्षणभङ्गुरम् । मनुष्यजन्म चात्यन्तदुर्लभं भवसंकटे ॥५०३॥

अर्थ: विषयोंके संयोगसे जो सुख होता है वह क्षणभंगुर है तथा चौरासी लाख योनियोंके संकटमें मनुष्य जन्म पाना अत्यन्त दुर्लभ है ॥५०३॥


सहस्रारं सुतं राज्ये स्थापयित्वा विधानतः । समं विद्युत्कुमारेण बभूव श्रमणो महान् ॥५०४॥

अर्थ: ऐसा जानकर उसने सहस्रार नामक पुत्रको तो विधिपूर्वक राज्य दिया और स्वयं विद्युत्कुमारके साथ वह महाश्रमण अर्थात् निर्ग्रन्थ साधु हो गया ॥५०४॥


शशासात्रान्तरे लङ्कां निर्घातो नाम खेचरः । नियुक्तोऽशनिवेगेन महाविद्यापराक्रमः ॥५०५॥

अर्थ: इस अन्तरालमें अशनिवेगके द्वारा नियुक्त महाविद्या और महापराक्रमका धारी निर्घात नामका विद्याधर लंकाका शासन करता था ॥५०५॥


एकदोत्थाय बलिवत्पातालनगरोदरात् । सवनक्ष्माधरं पश्यन् शनैरवनिमण्डलम् ॥५०६॥

विदित्वोपशमप्राप्तान् शत्रून् मयविवर्जितः । सश्रीमालो गतो मेरुं किष्किन्धो वन्दितुं जिनम् ॥५०७॥

अर्थ: एक दिन किष्किन्ध बलिके समान पातालवर्ती अलंकारपुर नगरसे निकलकर वन तथा पर्वतोंसे सुशोभित पृथिवीमण्डलका धीरे-धीरे अवलोकन कर रहा था । इसी अवसरपर उसे पता चला कि शत्रु शान्त हो चुके हैं । यह जानकर वह निर्भय हो अपनी श्रीमाला रानीके साथ जिनेन्द्रदेवकी वन्दना करनेके लिए सुमेरु पर्वतपर गया ॥५०६-५०७॥


प्रत्यागच्छंस्ततोऽपश्यद्दक्षिणोदन्वतस्तटे । अटवीं सुरकुर्वाभां पृथ्वीकर्णतटाभिधाम् ॥५०८॥

अर्थ: वन्दना कर वापस लौटते समय उसने दक्षिणसमुद्रके तटपर पृथिवी-कर्णतटा नामकी अटवी देखी। यह अटवी देवकुरुके समान सुन्दर थी ॥५०८॥


श्रीमालां चाब्रवीदेवं वीणामिव सुखस्वराम् । वक्षःस्थलस्थितां वामबाहुना कृतधारणाम् ॥५०९॥

अर्थ: किष्किन्धने, जिसका स्वर वीणाके समान सुखदायी था, जो वक्षःस्थलसे सटकर बैठी थी और बायीं भुजासे अपनेको पकड़े थी ऐसी रानी श्रीमालासे कहा ॥५०९॥


देवि पश्याटवीं रम्यां कुसुमाञ्चितपादपाम् । सीमन्तिनीमिव स्वेच्छमन्दगत्यापगाम्भसाम् ॥५१०॥

अर्थ: कि हे देवि ! देखो, यह अटवी कितनी सुन्दर है, यहाँके वृक्ष फूलोंसे सुशोभित हैं, तथा नदियोंके जलकी स्वच्छ एवं मन्द गतिसे ऐसी जान पड़ती है मानो इसने सीमन्त - माँग ही निकाल रखी हो ॥५१०॥


शरज्जलधराकारो राजतेऽयं महीधरः । मध्येऽस्याः शिखरैस्तुङ्गैर्धरणीमौलिसंज्ञितः ॥५११॥

अर्थ: इसके बीचमें यह शरदृतुके मेघका आकार धारण करनेवाला तथा ऊँची-ऊँची शिखरोंसे सुशोभित धरणीमौलि नामका पर्वत सुशोभित हो रहा है ॥५११॥


कुन्दशुभ्रसमावर्तफेनमण्डलमण्डितैः । निर्झरैर्हसतावायमट्टहासेन भासुरः ॥५१२॥

अर्थ: कुन्दके फूलके समान शुक्ल फेनपटलसे मण्डित निर्झरनोंसे यह देदीप्यमान पर्वत ऐसा जान पड़ता है मानो अट्टहास ही कर रहा हो ॥५१२॥


पुष्पाञ्जलिं प्रकीर्यायं तरुशाखाभिरादरात् । अभ्युत्थानं करोतीव चलत्तरुवनेन नौ ॥५१३॥

अर्थ: यह वृक्षकी शाखाओंसे आदरपूर्वक पुष्पांजलि बिखेरकर वायुकम्पित वृक्षोंके वनसे हम दोनोंको आता देख आदरसे मानो उठ ही रहा है ॥५१३॥


पुष्पामोदसमृद्धेन वायुना घ्राणलेपिना । प्रत्युद्गतिं करोतीव नमनं च नमत्तरुः ॥५१४॥

अर्थ: फूलोंकी सुगन्धिसे समृद्ध तथा नासिकाको लिप्त करनेवाली वायुसे यह पर्वत मानो हमारी अगवानी ही कर रहा है तथा झुकते हुए वृक्षोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो हम लोगोंको नमस्कार ही कर रहा है ॥५१४॥


बद्ध्वेव धृतवान् गाढं व्रजन्तं मामयं गुणैः । अतिक्रम्य न शक्नोमि गन्तुमेनं महीधरम् ॥५१५॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता है कि आगे जाते हुए मुझे इस पर्वतने अपने गुणोंसे मजबूत बाँधकर रोक लिया है इसीलिए तो मैं इसे लाँघकर आगे जानेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥५१५॥


आलयं कल्पयाम्यत्र भूचरैरतिदुर्गमम् । प्रसादं मानसं गच्छत्सूचयत्येव मे शुभम् ॥५१६॥

अर्थ: मैं यहाँ भूमिगोचरियोंके अगोचर सुन्दर महल बनवाता हूँ। इस समय चूँकि मेरा मन अत्यन्त प्रसन्न हो रहा है इसलिए वह आगामी शुभकी सूचना देता है ॥५१६॥


अलङ्कारपुरावासे पातालोदरवर्तिनि । खिन्नं खिन्नं मम स्वान्तं रतिमत्र प्रयास्यति ॥५१७॥

अर्थ: पातालके बीचमें स्थित अलंकारपुरमें रहते-रहते मेरा मन्न खिन्न हो गया है सो यहाँ अवश्य ही प्रीतिको प्राप्त होगा ॥५१७॥


इत्युक्त्वानुमतालापः प्रियया विस्मयाकुलः । उत्सारयन् घनव्रातमवतीर्णो धराधरम् ॥५१८॥

अर्थ: प्रिया श्रीमालाने किष्किन्ध-के इस कथनका समर्थन किया तब आश्चर्यसे भरा किष्किन्ध मेघसमूहको चीरता हुआ पर्वतपर उतरा ॥५१८॥


सर्वबान्धवयुक्तेन तेन स्वर्गसमं पुरम् । क्षणात्तुङ्गप्रमोदेन रचितं गिरिमूर्द्धनि ॥५१९॥

अर्थ: समस्त बान्धवोंसे युक्त, भारी हर्षको धारण करनेवाले राजा किष्किन्धने पर्वतके शिखरपर क्षण-भरमें स्वर्णके समान नगरकी रचना की ॥५१९॥


अभिधानं कृतं चास्य निजमेव यशस्विना । यतोऽद्यापि पृथिव्यां तत् किष्किन्धपुरमुच्यते ॥५२०॥

अर्थ: जो अपना नाम था यशस्वी किष्किन्धने वही नाम उस नगरका रखा। यही कारण है कि वह पृथिवीमें आज भी किष्किन्धपुर कहा जाता है ॥५२०॥


पर्वतोऽपि स किष्किन्धः प्रख्यातस्तस्य संगमात् । पूर्वं तु मधुरित्यासीन्नाम तस्य जगद्गतम् ॥५२१॥

अर्थ: पहले उस पर्वतका ‘मधु’ यह नाम संसारमें प्रसिद्ध था परन्तु अब किष्किन्धपुरके समागमसे उसका नाम भी किष्किन्धगिरि प्रसिद्ध हो गया ॥५२१॥


सम्यग्दर्शनयुक्तोऽसौ जिनपूजासमुद्यतः । भुञ्जानः परमान् भोगान् सुखेन न्यवसच्चिरम् ॥५२२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनसे सहित तथा जिनपूजामें उद्यत रहनेवाला राजा किष्किन्ध उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ चिर काल तक उस पर्वतपर निवास करता रहा ॥५२२॥


तस्माच्च संभवं प्राप श्रीमालायां सुतद्वयम् । ज्येष्ठः सूर्यरजा नाम ख्यातो यक्षरजास्तथा ॥५२३॥

अर्थ: तदनन्तर राजा किष्किन्ध और रानी श्रीमालाके दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़ेका नाम सूर्यरज और छोटेका नाम यक्षरज था ॥५२३॥


सुता च सूर्यकमला जाता कमलकोमला । यया विद्याधराः सर्वे शोभया विक्लवीकृताः ॥५२४॥

अर्थ: इन दो पुत्रोंके सिवाय उनके कमलके समान कोमल अंगको धारण करनेवाली सूर्यकमला नामकी पुत्री भी उत्पन्न हुई। वह पुत्री इतनी सुन्दरी थी कि उसने अपनी शोभाके द्वारा समस्त विद्याधरोंको बेचैन कर दिया था ॥५२४॥


अथ मेघपुरे राजा मेरुर्नाम नभश्चरः । मघोन्यां तेन संभूतो मृगारिदमनः सुतः ॥५२५॥

अर्थ: अथानन्तर मेघपुरनगरमें मेरु नामका विद्याधर राजा राज्य करता था। उसकी मघोनी नामकी रानीसे मृगारिदमन नामका पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५२५॥


तेन पर्यटता दृष्टा किष्किन्धतनयान्यदा । तस्यामुत्कण्ठितो लेभे न स नक्तंदिवा सुखम् ॥५२६॥

अर्थ: एक दिन मृगारिदमन अपनी इच्छानुसार भ्रमण कर रहा था कि उसने किष्किन्धकी पुत्री सूर्यकमलाको देखा। उसे देख मृगारिदमन इतना उत्कण्ठित हुआ कि वह न तो रातमें सुख पाता था और न दिनमें ही ॥५२६॥


अभ्यर्थिता सुहृद्भिः सा तदर्थं सादरैस्ततः । संप्रधार्य समं देव्या दत्ता किष्किन्धभूभृता ॥५२७॥

अर्थ: तदनन्तर मित्रोंने आदरके साथ उसके लिए सूर्यकमलाकी याचना की और राजा किष्किन्धने रानी श्रीमालाके साथ सलाह कर देना स्वीकृत कर लिया ॥५२७॥


निर्वृत्तं च विधानेन तयोर्वीवाहमङ्गलम् । किष्किन्धनगरे रम्ये ध्वजादिकृतभूषणे ॥५२८॥

अर्थ: ध्वजा-पताका आदिसे विभूषित, महामनोहर किष्किन्ध नगरमें विधिपूर्वक मृगारिदमन और सूर्यकमलाका विवाह-मंगल पूर्ण हुआ ॥५२८॥


प्रतिगच्छन् स तामूढ्वा न्यवसत्कर्णपर्वते । कर्णकुण्डलमेतेन नगरं तत्र निर्मितम् ॥५२९॥

अर्थ: मृगारिदमन सूर्यकमलाको विवाहकर जब वापस जा रहा था तब वह कर्ण नामक पर्वतपर ठहरा। वहाँ उसने कर्णकुण्डल नामका नगर बसाया ॥५२९॥


अलङ्कारपुरेशस्य सुकेशस्याथ सूनवः । इन्द्राण्या जन्म संप्रापुः क्रमेण पुरुविक्रमाः ॥५३०॥

अर्थ: अलंकारपुरके राजा सुकेशकी इन्द्राणी नामक रानीसे क्रमपूर्वक तीन महाबलवान् पुत्रोंने जन्म प्राप्त किया ॥५३०॥


अमीषां प्रथमो माली सुमाली चेति मध्यमः । कनीयान् माल्यवान् ख्यातो विज्ञानगुणभूषणः ॥५३१॥

अर्थ: उनमें-से पहलेका नाम माली, मझलेका नाम सुमाली और सबसे छोटेका नाम माल्यवान् था। ये तीनों ही पुत्र परमविज्ञानी तथा गुणरूपी आभूषणोंसे सहित थे ॥५३१॥


अहरन्मानसं पित्रोर्बन्धूनां द्विषतां तथा । तेषां क्रीडा कुमाराणां देवानामिव सोद्भुता ॥५३२॥

अर्थ: उन कुमारोंकी क्रीड़ा देवोंकी क्रीड़ाके समान अद्भुत थी तथा माता-पिता, बन्धुजन और शत्रुओंके भी मनको हरण करती थी ॥५३२॥


सिद्धविद्यासमुद्भूतवीर्योद्वृत्तक्रियास्ततः । निवारिताः पितृभ्यां ते यत्नादिति पुनः पुनः ॥५३३॥

रन्तुं चेद्यात किष्किन्धं पुत्राः कौमारचापलात् । मा व्राजिष्ट समीपं त्वं जातुचिद्दक्षिणाम्बुधेः ॥५३४॥

अर्थ: सिद्ध हुई विद्याओंसे समुत्पन्न पराक्रमके कारण जिनकी क्रियाएँ अत्यन्त उद्धत हो रही थीं ऐसे उन कुमारोंको माता-पिता बड़े प्रयत्नसे बार-बार मना करते थे कि हे पुत्रो ! यदि तुम लोग अपनी बालचपलताके कारण क्रीड़ा करनेके लिए किष्किन्ध-गिरि जाओ तो दक्षिण समुद्रके समीप कभी नहीं जाना ॥५३३-५३४॥


ततः प्रणम्य तैः पृष्टौ पितरौ तत्र कारणम् । कुतूहलस्य बाहुल्याद्वीर्यशैशवसंभृतान् ॥५३५॥

अनाख्येयमिदं वत्सा इति तौ विहितोत्तरौ । सुतरामनुबन्धेन सुतैः पृष्टौ सचाटुभिः ॥५३६॥

ततस्तेभ्यः सुकेशेन कथितं श्रृणुतात्मजाः । हेतुना विदितेनात्र यद्यवश्यं प्रयोजनम् ॥५३७॥

अर्थ: पराक्रम तथा बाल्य अवस्थाके कारण समुत्पन्न कुतूहलकी बहुलतासे वे पुत्र प्रणाम कर माता-पितासे इसका कारण पूछते थे तो वे यही उत्तर देते थे कि हे पुत्रो ! यह बात कहनेकी नहीं है । एक बार पुत्रोंने बड़े अनुनय-विनयके साथ आग्रह कर पूछा तो पिता सुकेशने उनसे कहा कि हे पुत्रो ! यदि तुम्हें इसका कारण अवश्य ही जाननेका प्रयोजन है तो सुनो ॥५३५-५३७॥


पुर्यामशनिवेगेन लङ्कायां स्थापितः पुरा । निर्घातो नामतः क्रूरः खेचरो बलवानलम् ॥५३८॥

कुलक्रमेण सास्माकमागता नगरी शुभा । रिपोस्तस्माद् भयात्त्यक्ता नितान्तमसुवत् प्रिया ॥५३९॥

अर्थ: बहुत पहलेकी बात है कि अशनिवेगने लंकामें शासन करनेके लिए निर्घात नामक अत्यन्त क्रूर एवं बलवान् विद्याधरको नियुक्त किया है । वह लंका नगरी कुल-परम्परासे चली आयी हमारी शुभ नगरी है । वह यद्यपि हमारे लिए प्राणोंके समान प्रिय थी तो भी बलवान् शत्रुके भयसे हमने उसे छोड़ दिया ॥५३८-५३९॥


देशे देशे चरास्तेन नियुक्ताः पापकर्मणा । दत्तावधानाः सततमस्मच्छिद्रगवेषणे ॥५४०॥

अर्थ: पाप कर्ममें तत्पर शत्रुने जगह-जगह ऐसे गुप्तचर नियुक्त किये हैं जो सदा हम लोगोंके छिद्र खोजनेमें सावधान रहते हैं ॥५४०॥


यन्त्राणि च प्रयुक्तानि यानि कुर्वन्ति मारणम् । विदित्वा रमणासक्तान् भवतो गगनाङ्गणे ॥५४१॥

अर्थ: उसने जगह-जगह ऐसे यन्त्र बना रखे हैं कि जो आकाशांगणमें क्रीड़ा करते हुए आप लोगोंको जानकर मार देते हैं ॥५४१॥


निघ्नन्ति तानि रन्ध्रेषु कृत्वा रूपेण लोभनम् । प्रमदाचरणानीवाशक्तं तपसि योगिनम् ॥५४२॥

अर्थ: वे यन्त्र अपने सौन्दर्यसे प्रलोभन देकर दर्शकोंको भीतर बुलाते हैं और फिर उस तरह नष्ट कर देते हैं कि जिस तरह तपश्चरणके समय होनेवाले प्रमाद-पूर्ण आचरण असमर्थ योगीको नष्ट कर देते हैं ॥५४२॥


एवं निगदितं श्रुत्वा पितृदुःखानुचिन्तनात् । निःश्वस्य मालिना दीर्घं समुद्भूताश्रुचक्षुषा ॥५४३॥

अर्थ: इस प्रकार पिताका कहा सुन और उनके दुःखका विचारकर माली लम्बी साँस छोड़ने लगा तथा उसकी आँखोंसे आँसू बहने लगे ॥५४३॥


क्रोधसंपूर्णचित्तेन कृत्वा गर्वस्मितं चिरम् । निरीक्ष्य बाहुयुगलं प्रगल्भमिति भाषितम् ॥५४४॥

अर्थ: उसका चित्त क्रोधसे भर गया, वह चिरकाल तक गर्वसे मन्द-मन्द हँसता रहा और फिर अपनी भुजाओंका युगल देख इस प्रकार गम्भीर स्वरसे बोला ॥५४४॥


इयन्तं समयं तात कस्मान्नो न निवेदितम् । अहो स्नेहापदेशेन गुरुणा वञ्चिता वयम् ॥५४५॥

अर्थ: हे पिताजी ! इतने समय तक यह बात तुमने हम लोगोंसे क्यों नहीं कही ? बड़े आश्चर्यकी बात है कि आपने बड़े भारी स्नेहके बहाने हम लोगोंको धोखा दिया ॥५४५॥


अविधाय नराः कार्यं ये गर्जन्ति निरर्थकम् । महान्तं लाघवं लोके शक्तिमन्तोऽपि यान्ति ते ॥५४६॥

अर्थ: जो मनुष्य कार्य न कर केवल निष्प्रयोजन गर्जना करते हैं वे लोकमें शक्तिशाली होनेपर भी महान् अनादरको पाते हैं ॥५४६॥


आस्तां ततः फलेनैव शमतां तात यास्यसि । तन्मर्यादं कृतं चेदं मया चूडाविमोक्षणम् ॥५४७॥

अर्थ: अथवा रहने दो, यह सब कहनेसे क्या ? हे तात ! आप फल देखकर ही शान्तिको प्राप्त होंगे । जबतक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता है तबतकके लिए मैं यह चोटी खोलकर रखूँगा ॥५४७॥


अथामङ्गलभीताभ्यां वाचा ते न निवारिताः । पितृभ्यां तनया यात स्निग्धदृष्ट्यानुवीक्षिताः ॥५४८॥

अर्थ: अथानन्तर अमंगलसे भयभीत माता-पिताने उन्हें वचनोंसे मना नहीं किया । केवल स्नेहपूर्ण दृष्टिसे उनकी ओर देखकर कहा कि हे पुत्रो ! जाओ ॥५४८॥


पातालादथ निर्गत्य यथा भवनवासिनः । जग्मुः प्रत्यरि सोत्साहा भ्रातरः शस्त्रभासुराः ॥५४९॥

अर्थ: तदनन्तर वे तीनों भाई भवनवासी देवोंके समान पातालसे निकलकर शत्रुकी ओर चले । उस समय वे तीनों भाई उत्साहसे भर रहे थे तथा शस्त्रोंसे देदीप्यमान हो रहे थे ॥५४९॥


तेषामनुपदं लग्ना ततो राक्षसवाहिनी । चलदायुधधारोर्मिमाला व्याप्य नभस्तलम् ॥५५०॥

अर्थ: तदनन्तर चंचल शस्त्रोंकी धारा ही जिसमें लहरोंका समूह था ऐसी राक्षसोंकी सेनारूपी नदी आकाशतलको व्याप्त कर उनके पीछे लग गयी ॥५५०॥


निरीक्षिताः पितृभ्यां ते यावल्लोचनगोचरम् । व्रजन्तः स्नेहसंपूर्णमानसाभ्यां समङ्गलम् ॥५५१॥

अर्थ: तीनों पुत्र आगे बढ़े जा रहे थे और जिनके हृदय स्नेहसे परिपूर्ण थे ऐसे माता-पिता उन्हें जब तक वे नेत्रोंसे दिखते रहे तब तक मंगलाचार पूर्वक देखते रहे ॥५५१॥


त्रिकूटशिखरेणासौ ततस्तैरुपलक्षिता । दृष्ट्वैव प्रौढया ज्ञाता गृहीतेति पुरी वरा ॥५५२॥

अर्थ: तदनन्तर त्रिकूटाचलकी शिखरसे उपलक्षित लंकापुरीको उन्होंने गम्भीर दृष्टिसे देखकर ऐसा समझा मानो हमने उसे ले ही लिया है ॥५५२॥


व्रजद्भिरेव तैः केचिद्दैत्या मृत्युवशीकृताः । केचिन्नवणतां नीताः केचित् स्थानान्निमोचिताः ॥५५३॥

अर्थ: जाते-जाते ही उन्होंने कितने ही दैत्य मौतके घाट उतार दिये, कितने ही वश कर लिये और कितने ही स्थानसे च्युत कर दिये ॥५५३॥


विशद्भिः सैन्यमागत्य प्रणतैः शत्रुगोचरैः । ते सामन्तैरलं जाता महान्तः पृथुकीर्तयः ॥५५४॥

अर्थ: शत्रुपक्षके सामन्त नम्रीभूत होकर सेनामें आकर मिलते जाते थे इससे विशालकीर्तिके धारक तीनों ही कुमार एक बड़ी सेनासे युक्त हो गये थे ॥५५४॥


शत्रूणामागमं श्रुत्वा निर्घातो निर्ययौ ततः । युद्धौण्डश्चलच्छत्रच्छायाच्छन्नदिवाकरः ॥५५५॥

अर्थ: युद्धमें निपुण तथा चंचल छत्रकी छायासे सूर्यको आच्छादित करनेवाला निर्घात शत्रुओंका आगमन सुन लंकासे बाहर निकला ॥५५५॥


ततोऽभवन्महायुद्धं सेनयोः सत्त्वदारणम् । वाजिभिर्वारणैर्मत्तैर्विमानैः स्यन्दनैस्तथा ॥५५६॥

अर्थ: तदनन्तर दोनों सेनाओंमें महायुद्ध हुआ । उनका वह महायुद्ध घोड़ों, मदोन्मत्त हाथियों तथा अपरिमित रथोंसे जीवोंको नष्ट करनेवाला था ॥५५६॥


महीमयमिवोत्पन्नं गगनं दन्तिनां कुलैः । तथा जलात्मकं जातं तेषां गण्डच्युताम्भसा ॥५५७॥

वातात्मकं च तत्कर्णतालसंजातवायुना । तेजोमयं तथान्योऽन्यशस्त्राघातोत्थवह्निना ॥५५८॥

अर्थ: हाथियोंके समूहसे आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो पृथ्वीमय ही हो, उनके गण्डस्थलसे च्युत जलसे ऐसा जान पड़ता था मानो जलमय ही हो, उनके कर्णरूपी तालपत्रसे उत्पन्न वायुसे ऐसा जान पड़ता था मानो वायुरूप ही हो और परस्परके आघातसे उत्पन्न अग्निसे ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निरूप ही हो ॥५५७-५५८॥


दीनैः किमपरैरत्र निहतैः क्षुद्रखेचरैः । क्वासौ क्वासौ गतः पापो निर्घात इति चोदयन् ॥५५९॥

अर्थ: युद्धमें दीन-हीन अन्य क्षुद्र विद्याधरोंके मारनेसे क्या लाभ है ? वह पापी निर्घात कहाँ है ? कहाँ है ? इस प्रकार प्रेरणा करता हुआ माली आगे बढ़ रहा था ॥५५९॥


दृष्ट्वा माली शितैर्बाणैः कृत्वा स्यन्दनवर्जितम् । निर्घातमसिनिर्घाताच्चक्रे संप्राप्तपञ्चतम् ॥५६०॥

अर्थ: अन्तमें मालीने निर्घातको देखकर पहले तो उसे तीक्ष्ण बाणोंसे रथरहित किया और फिर तलवारके प्रहारसे उसे समाप्त कर दिया ॥५६०॥


निर्घातं निहतं ज्ञात्वा दानवा भ्रष्टचेतसः । यथास्वं निलयं याता विजयार्द्धनगाश्रितम् ॥५६१॥

अर्थ: निर्घातको मरा जानकर जिनका चित्त भ्रष्ट हो गया था ऐसे दानव विजयार्ध पर्वतपर स्थित अपने-अपने भवनोंमें चले गये ॥५६१॥


केचित्कण्ठे समासाद्य कृपाणं कृपणोद्यताः । मालिनं त्वरया याताः शरणं रणकातराः ॥५६२॥

अर्थ: युद्धसे डरनेवाले कितने ही दीन-हीन दानव कण्ठमें तलवार लटकाकर शीघ्र ही मालीकी शरणमें पहुँचे ॥५६२॥


प्रविष्टास्ते ततो लङ्कां भ्रातरो मङ्गलार्चितम् । समागमं च संप्राप्ताः पितृप्रभृतिबान्धवैः ॥५६३॥

अर्थ: तदनन्तर माली आदि तीनों भाइयोंने मंगलमय पदार्थोंसे सुशोभित लंकानगरीमें प्रवेश किया । वहीं माता-पिता आदि इष्ट जनोंके साथ समागमको प्राप्त हुए ॥५६३॥


ततो हेमपुरेशस्य सुतां हेमखचारिणः । भोगवत्यां समुत्पन्नां नाम्ना चन्द्रवतीं शुभाम् ॥५६४॥

उवाह विधिना माली मानसोत्सवकारिणीम् । स्वभावचपलस्वान्तहृषीकमृगवागुराम् ॥५६५॥

अर्थ: तदनन्तर हेमपुरके राजा हेमविद्याधरकी भोगवती रानीसे उत्पन्न चन्द्रवती नामक शुभ पुत्रीको मालीने विधिपूर्वक विवाहा । चन्द्रवती मालीके मनमें आनन्द उत्पन्न करनेवाली थी तथा स्वभावसे ही चपल मन और इन्द्रियरूपी मृगोंको बाँधनेके लिए जालके समान थी ॥५६४-५६५॥


प्रीतिकूटपुरेशस्य प्रीतिकान्तस्य चात्मजाम् । प्रीतिमत्यङ्गजां लेभे सुमाली प्रीतिसंज्ञिताम् ॥५६६॥

अर्थ: प्रीतिकूटपुरके स्वामी राजा प्रीतिकान्त और रानी प्रीतिमतीकी पुत्री प्रीतिको सुमालीने प्राप्त किया ॥५६६॥


कनकाभपुरेशस्य कनकस्य सुतां यथा । उवाह कनकश्रीजां माल्यवान् कनकावलीम् ॥५६७॥

अर्थ: कनकाभनगरके स्वामी राजा कनक और रानी कनकश्रीकी पुत्री कनकावलीको माल्यवान्ने विवाहा ॥५६७॥


एतेषां प्रथमा जाया एता हृदयसंश्रयाः । अङ्गनानां सहस्रं तु प्रत्येकमधिकं स्मृतम् ॥५६८॥

अर्थ: सदा हृदयमें निवास करनेवाली ये इनकी प्रथम स्त्रियाँ थीं वैसे प्रत्येककी कुछ अधिक एक-एक हजार स्त्रियाँ थीं ॥५६८॥


श्रेणीद्वयं ततस्तेषां पराक्रमवशीकृतम् । शेषामिव बभाराज्ञां शिरसा रचिताञ्जलिम् ॥५६९॥

अर्थ: तदनन्तर विजयार्ध पर्वतकी दोनों श्रेणियाँ उनके पराक्रमसे वशीभूत हो शेषाक्षतके समान उनकी आज्ञाको हाथ जोड़कर शिरसे धारण करने लगीं ॥५६९॥


दृढबद्धपदापत्यनियुक्तनिजसंपदौ । जातौ सुकेशकिष्किन्धौ निर्ग्रन्थौ शान्तचेतसौ ॥५७०॥

अर्थ: अन्तमें अपने-अपने पदोंपर अच्छी तरह आरूढ़ पुत्रोंके लिए अपनी-अपनी सम्पदा सौंपकर सुकेश और किष्किन्ध शान्त चित्त हो निर्ग्रन्थ साधु हो गये ॥५७०॥


भुक्त्वा भुक्त्वा विषयजनितं सौख्यमेवं महान्तो लब्ध्वा जैनं भवशतमलध्वंसनं मुक्तिमार्गम् । याताः प्रायः प्रियजनगुणस्नेहपाशादपेताः सिद्धिस्थानं निरुपमसुखं राक्षसा वानराश्च ॥५७१॥

अर्थ: इस प्रकार प्रायः कितने ही बड़े-बड़े राक्षसवंशी और वानरवंशी राजा विषय सम्बन्धी सुखका उपभोग कर अन्तमें संसारके सैकड़ों दोषोंको नष्ट करनेवाला जिनेन्द्र प्रणीत मोक्ष मार्ग पाकर, प्रियजनोंके गुणोत्पन्न स्नेह रूपी बन्धनसे दूर हट अनुपम सुखसे सम्पन्न मोक्ष स्थानको प्राप्त हुए ॥५७१॥


कृत्वाप्येवं सुबहु दुरितं ध्यानयोगेन दग्ध्वा
सिद्धावासे निहितमतयो योगिनस्त्यक्तसंगाः ।
एवं ज्ञात्वा सुचरितगुणं प्राणिनो यात शान्तिं
मोहोच्छेदात् कृतजयरविः प्राप्नुत ज्ञानराज्यम् ॥५७२॥

अर्थ: कितने ही लोगोंने यद्यपि गृहस्थ अवस्थामें बहुत भारी पाप किया था तो भी उसे निर्ग्रन्थ साधु हो ध्यानके योगसे भस्म कर दिया था और मोक्षमें अपनी बुद्धि लगायी थी। इस प्रकार सम्यक्चारित्रके प्रभावको जानकर हे भक्त प्राणियो ! शान्तिको प्राप्त होओ, मोहका उच्छेद कर विजयरूपी सूर्यको प्राप्त होओ और अन्तमें ज्ञानका राज्य प्राप्त करो ॥५७२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते वानरवंशाभिधानं नाम षष्ठं पर्व ॥६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य प्रोक्त पद्मचरितमें वानरवंशका कथन करनेवाला छठा पर्व पूर्ण हुआ ॥६॥

७. सप्तमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं)

अत्रान्तरे पुरे राजा रथनूपुरनामनि । सहस्रार इति ख्यातो बभूवात्यन्तमुद्धतः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रथनूपुर नगरमें अत्यन्त पराक्रमका धारी राजा सहस्रार राज्य करता था ॥१॥


तस्य भार्या बभूवेष्टा नाम्ना मानससुन्दरी । सुन्दरी मानसेनालं शरीरेण च सद्गुणा ॥२॥

अर्थ: उसकी मानससुन्दरी नामक प्रिय स्त्री थी। मानससुन्दरी मन तथा शरीर दोनोंसे ही सुन्दर थी और अनेक उत्तमोत्तम गुणोंसे युक्त थी ॥२॥


अन्तर्वत्नीं सतीमेतामत्यन्तकृशविग्रहाम् । भर्तापृच्छत् श्लथाशेषभूषणां वीक्ष्य सादरम् ॥३॥

बिभ्रत्यङ्गानि ते कस्मान्नितान्तं तनुतां प्रिये । किं तवाकाङ्क्षितं राज्ये मम जायेत दुर्लभम् ॥४॥

अर्थ: वह गर्भिणी हुई । गर्भके कारण उसका समस्त शरीर कृश हो गया और समस्त आभूषण शिथिल पड़ गये । उसे बड़े आदरके साथ देखकर राजा सहस्रारने पूछा कि हे प्रिये ! तेरे अंग अत्यन्त कृशताको क्यों धारण कर रहे हैं ? तेरी क्या अभिलाषा है ? जो मेरे राज्यमें दुर्लभ हो ॥३-४॥


गत्वा प्रगल्भतां ब्रूहि तवाद्यैव समीहितम् । संपादयामि निःशेषं देवि प्राणगरीयसि ॥५॥

अर्थ: हे प्राणोंसे अधिक प्यारी देवि ! कह तेरी क्या अभिलाषा है ? मैं आज ही उसे अच्छी तरह पूर्ण करूँगा ॥५॥


कर्तुं शक्तोऽस्मि ते कान्ते सुरस्त्रीकृतशासनाम् । शचीमपि कराग्राभ्यां पादसंवाहकारिणीम् ॥६॥

अर्थ: हे कान्ते ! देवांगनाओंपर शासन करनेवाली इन्द्राणीको भी मैं ऐसा करनेमें समर्थ हूँ कि वह अपनी हथेलियोंसे तेरे पादमर्दन करे ॥६॥


इत्युक्ता सा ततस्तेन वरारोहाङ्कसंश्रिता । जगाद विनयादेवं वचनं लीलयान्वितम् ॥७॥

अर्थ: पतिके ऐसा कहनेपर उसकी सुन्दर गोदमें बैठी मानससुन्दरी, विनयसे लीलापूर्वक इस प्रकार-के वचन बोली ॥७॥


यस्मादारभ्य मे गर्भे संभवं कोऽप्ययं गतः । ततः प्रभृति वाञ्छामि भोक्तुमिन्द्रस्य संपदम् ॥८॥

अर्थ: हे नाथ ! जबसे यह कोई बालक मेरे गर्भमें आया है तभीसे इन्द्रकी सम्पदा भोगनेकी मेरी इच्छा है ॥८॥


इमे मनोरथा नाथ परित्यज्य मया त्रपाम् । परायत्ततयात्यन्तं भवतो विनिवेदिताः ॥९॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! अत्यन्त विवशताके कारण ही मैंने लज्जा छोड़कर ये मनोरथ आपके लिए प्रकट किये हैं ॥९॥


इत्युक्ते कल्पिता भोगसंपत्तस्याः सुरेन्द्रजा । विद्याबलसमृद्धेन सहस्रारेण तत्क्षणात् ॥१०॥

अर्थ: वल्लभाके ऐसा कहते ही विद्याबलसे समृद्ध सहस्रारने तत्क्षण ही उसके लिए इन्द्र जैसी भोग सम्पदा तैयार कर दी ॥१०॥


संपूर्णदोहदा जाता सा ततः पूर्णविग्रहा । धारयन्ती दुराख्यानां द्युतिं कान्तिं च भामिनी ॥११॥

अर्थ: इस प्रकार दोहद पूर्ण होनेसे उसका समस्त शरीर पुष्ट हो गया और वह कहनेमें न आवे ऐसी दीप्ति तथा कान्ति धारण करने लगी ॥११॥


व्रजता रविणाप्यूर्ध्वं खेदं जग्राह तेजसा । अभ्यवाञ्छच्च सर्वासां दातुमाज्ञां दिशामपि ॥१२॥

अर्थ: उसका इतना तेज बढ़ा कि वह ऊपर आकाशमें जाते हुए सूर्यसे भी खिन्न हो उठती थी तथा समस्त दिशाओंको आज्ञा देनेकी उसकी इच्छा होती थी ॥१२॥


काले पूर्णे च संपूर्णलक्षणाङ्गमसूत सा । दारकं बान्धवानन्दसंपदुत्तमकारणम् ॥१३॥

अर्थ: समय पूर्ण होनेपर उसने, जिसका शरीर समस्त लक्षणोंसे युक्त था तथा जो बान्धवजनोंके हर्ष और सम्पदाका उत्तम कारण था ऐसा पुत्र उत्पन्न किया ॥१३॥


ततो महोत्सवं चक्रे सहस्रारः प्रमोदवान् । शङ्खतूर्यनिनादेन बधिरीकृतदिङ्मुखम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे भरे सहस्रारने पुत्र-जन्मका महान् उत्सव किया । उस समय शंख और तुरहीके शब्दोंसे दिशाएँ बहिरी हो गयी थीं ॥१४॥


सनूपुररणत्कारचरणन्यासकुट्टनैः । नृत्यन्तीभिः पुरस्त्रीभिः कृतभूतलकम्पनम् ॥१५॥

अर्थ: नगरकी स्त्रियाँ नृत्य करते समय जब नूपुरोंकी झनकारके साथ अपने पैर पृथिवीपर पटकती थीं तो पृथिवीतल काँप उठता था ॥१५॥


यथेच्छं द्रविणं दत्तं विचारपरिवर्जितम् । प्रचलोद्धर्वकरैर्नृत्तं गजैरपि सबृंहितम् ॥१६॥

अर्थ: बिना विचार किये इच्छानुसार धन दानमें दिया गया । मनुष्योंकी बात दूर रही हाथियोंने भी उस समय अपनी चंचल सूँड़ ऊपर उठाकर गर्जना करते हुए नृत्य किया था ॥१६॥


उत्पाताः शत्रुगेहेषु संजाताः शोकसूचिनः । बन्धुगेहेषु चोत्पन्नाः सूचिका भूरिसंपदः ॥१७॥

अर्थ: शत्रुओंके घरोंमें शोकसूचक उत्पात होने लगे और बन्धुजनोंके घरोंमें बहुत भारी सम्पदाओंकी सूचना देनेवाले शुभ शकुन होने लगे ॥१७॥


अभिलाषो यतस्तस्मिन्मातुर्गर्भस्थितेऽभवत् । इन्द्रभोगे ततः पित्रा कृतं तस्येन्द्रशब्दनम् ॥१८॥

अर्थ: चूँकि बालकके गर्भमें रहते हुए माताको इन्द्रके भोग भोगनेकी इच्छा हुई थी इसलिए पिताने उस बालकका इन्द्र नाम रखा ॥१८॥


बालक्रीडा बभूवास्य शक्तयूनोऽपि जित्वरी । भिदुरा रिपुदर्पाणां सृत्वरी चारुकर्मणि ॥१९॥

अर्थ: वह बालक था फिर भी उसकी क्रीड़ाएँ शक्तिसम्पन्न तरुण मनुष्यको जीतनेवाली थीं, शत्रुओंका मान खण्डित करनेवाली थीं और उत्तम कार्यमें प्रवृत्त थीं ॥१९॥


क्रमात् स यौवनं प्राप्तस्तेजोनिर्जितभास्करम् । कान्तिनिर्जितरात्रीशं स्थैर्य निर्जितपर्वतम् ॥२०॥

अर्थ: क्रम-क्रमसे वह उस यौवनको प्राप्त हुआ जिसने तेजसे सूर्य-को, कान्तिसे चन्द्रमाको और स्थैर्यसे पर्वतको जीत लिया था ॥२०॥


ग्रस्ता इव दिशस्तेन सुविस्तीर्णेन वक्षसा । दिङ्नागकुम्भतुङ्गांसस्थवोयो वृत्तबाहुना ॥२१॥

अर्थ: उसके कन्धे दिग्गजके गण्ड-स्थलके समान स्थूल और भुजाएँ गोल थीं तथा उसने विशाल वक्षःस्थलसे समस्त दिशाएँ मानो आच्छादित ही कर रखी थीं ॥२१॥


ऊरुस्तम्भद्वयं तस्य सुवृत्तं गूढजानुकम् । जगाम परमस्थैर्यं वक्षोभवनधारणात् ॥२२॥

अर्थ: जिनके घुटने मांसपेशियोंमें गूढ़ थे ऐसी उसकी दोनों गोल जाँघें स्तम्भोंकी तरह वक्षःस्थलरूपी भवनको धारण करनेके कारण परम स्थिरताको प्राप्त हुई थीं ॥२२॥


विजयार्द्धगिरौ तेन सर्वे विद्याधराधिपाः । ग्राहिता वैतसीं वृत्तिं महाविद्याबलर्द्धिना ॥२३॥

अर्थ: बहुत भारी विद्याबल और ऋद्धिसे सम्पन्न उस तरुण इन्द्रने विजयार्ध पर्वतके समस्त विद्याधर राजाओंको बेंतके समान नम्रवृत्ति धारण करा रखी थी अर्थात् सब उसके आज्ञाकारी थे ॥२३॥


इन्द्रमन्दिरसंकाशं भवनं तस्य निर्मितम् । चत्वारिंशत्सहाष्टाभिः सहस्राणि च योषिताम् ॥२४॥

षड्विंशतिसहस्राणि ननृतुर्नाटकानि च । दन्तिनां व्योममार्गाणां वाजिनां च निरन्तता ॥२५॥

अर्थ: उसने इन्द्रके महलके समान सुन्दर महल बनवाया । अड़तालीस हजार उसकी स्त्रियाँ थीं । छब्बीस हजार नृत्यकार नृत्य करते थे । आकाशमें चलनेवाले हाथियों और घोड़ोंकी तो गिनती ही नहीं थी ॥२४-२५॥


शशाङ्कधवलस्तुङ्गो गगनाङ्गणगोचरः । दुर्निवार्यो महावीर्यो दंष्ट्राष्टकविराजितः ॥२६॥

दन्तिराजो महावृत्तकरार्गलितदिङ्मुखः । ऐरावताभिधानेन गुणैश्च प्रथितो भुवि ॥२७॥

अर्थ: एक हाथी था, जो चन्द्रमाके समान सफेद था, ऊँचा था, आकाशरूपी आँगनमें चलनेवाला था, जिसे कोई रोक नहीं सकता था, महाशक्तिशाली था, आठ दाँतोंसे सुशोभित था, बड़ी मोटी गोल सूँड़से जो दिशाओंमें मानो अर्गल लगा रखता था, तथा गुणोंके द्वारा पृथिवीपर प्रसिद्ध था, उसका उसने ऐरावत नाम रखा था ॥२६-२७॥


शक्त्या परमया युक्तं लोकपालचतुष्टयम् । शची च महिषी रम्या सुँधर्माख्या तथा सभा ॥२८॥

अर्थ: चारों दिशाओंमें परम शक्तिसे युक्त चार लोकपाल नियुक्त किये, पट्टरानीका नाम शची और सभाका नाम सुधर्मा रखा ॥२८॥


वज्रं प्रहरणं त्रीणि सदांस्यप्सरसां गणाः । नाम्ना हरिणकेशी च सेनायास्तस्य चाधिपः ॥२९॥

अश्विनौ वसवश्चाष्टौ चतुर्भेदा दिवौकसः । नारदस्तुम्बुरू विश्वावसुप्रभृतिगायकाः ॥३०॥

उर्वशी मेनका मञ्जुस्वन्याद्यप्सरसो वराः । मन्त्री बृहस्पतिः सर्वमेवं तस्य सुरेन्द्रवत् ॥३१॥

अर्थ: वज्र नामका शस्त्र, तीन सभाएँ, अप्सराओंके समूह, हरिणकेशी सेनापति, अश्विनीकुमार वैद्य, आठ वसु, चार प्रकारके देव, नारद, तुम्बुरु, विश्वावसु आदि गायक, उर्वशी, मेनका, मंजुस्वनी आदि अप्सराएँ, और बृहस्पति मन्त्री आदि समस्त वैभव उसने इन्द्रके समान ही निश्चित किया था ॥२९-३१॥


ततोऽसौ नमिवज्जातः सर्वविद्याभृतां पतिः । ऐश्वर्यं सुरनाथस्य बिभ्राणः पुण्यसंभृतम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर यह, नमि विद्याधरके पुण्योदयसे प्राप्त इन्द्रका ऐश्वर्य धारण करता हुआ समस्त विद्याधरोंका अधिपति हुआ ॥३२॥


अत्रान्तरे महामानो माली लङ्कापुरीपतिः । पूर्वयैव धिया सर्वान् शास्ति खेचरपुङ्गवान् ॥३३॥

अर्थ: इसी समय लंकापुरीका स्वामी महामानी माली था सो समस्त विद्याधरोंपर पहले ही के समान शासन करता था ॥३३॥


विजयार्द्धनगस्थेषु समस्तेषु पुरेषु वा । लङ्कागतः करोत्यैश्यं स्वभ्रातृबलगर्वितः ॥३४॥

अर्थ: अपने भाइयोंके बलसे गर्वको धारण करनेवाला माली, लंकामें रहकर ही विजयार्ध पर्वतके समस्त नगरोंमें अपना शासन करता था ॥३४॥


वेश्या यानं विमानं वा कन्या वासांसि भूषणम् । यद्यच्छ्रेणीद्वये सारं वस्तु चारैर्निवेद्यते ॥३५॥

तत्तत्सर्वं बलाद्धीरः क्षिप्रमानययत्यसौ । पश्यन्नात्मानमेवैकं बलविद्याविभूतिभिः ॥३६॥

अर्थ: वेश्या, वाहन, विमान, कन्या, वस्त्र तथा आभूषण आदि जो-जो श्रेष्ठ वस्तु, दोनों श्रेणियोंमें गुप्तचरोंसे इसे मालूम होती थी उस सबको धीर-वीर माली जबरदस्ती शीघ्र ही अपने यहाँ बुलवा लेता था। वह बल, विद्या, विभूति आदिसे अपने आपको ही सर्वश्रेष्ठ मानता था ॥३५-३६॥


इन्द्राश्रयात् खगैराज्ञां भग्नां श्रुत्वास्य चान्यदा । प्रस्थितो भ्रातृकिष्किन्धसुतैः साकं महाबलः ॥३७॥

अर्थ: अब इन्द्रका आश्रय पाकर विद्याधर मालीकी आज्ञा भंग करने लगे सो यह समाचार सुन महाबलवान् माली भाई तथा किष्किन्धके पुत्रोंके साथ विजयार्ध गिरिको ओर चला ॥३७॥


विमानैर्विविधच्छायैः संध्यामेघैरिवोन्नतैः । महाप्रासादसंकाशैः स्यन्दनैः काञ्चनाञ्चितैः ॥३८॥

गजैर्घनाघनाकारैः सप्तिभिश्चित्तगामिभिः । शार्दूलैर्मृगरैर्गोभिर्मृगराजैः क्रमेलकैः ॥३९॥

वालेयैर्महिषैर्हंसैर्वृकैरन्यैश्च वाहनैः । खाङ्गणं छादयन्सर्वं महामासुरविग्रहैः ॥४०॥

अर्थ: कोई अनेक प्रकारकी कान्तिको धारण करनेवाले तथा सन्ध्याकालके मेघोंके समान ऊँचे विमानोंपर बैठकर जा रहे थे, कोई बड़े-बड़े महलोंके समान सुवर्णजटित रथोंमें बैठकर चल रहे थे, कोई मेघोंके समान श्यामवर्ण हाथियोंपर बैठे थे, कोई मनके समान शीघ्र गमन करनेवाले घोड़ोंपर सवार थे, कोई शार्दूलोंपर, कोई चीतोंपर, कोई बैलोंपर, कोई सिंहोंपर, कोई ऊँटोंपर, कोई गधोंपर, कोई भैंसोंपर, कोई हंसोंपर, कोई भेड़ियोंपर तथा कोई अन्य वाहनोंपर बैठकर प्रस्थान कर रहे थे। इस प्रकार महादेदीप्यमान शरीरके धारक अन्यान्य वाहनोंसे समस्त आकाशांगणको आच्छादित करता हुआ माली विजयार्धके निकट पहुँचा ॥३८-४०॥


अथ मालिनमित्यूचे सुमाली भ्रातृवत्सलः । प्रदेशेऽत्रैव तिष्ठामो भ्रातरद्य न गम्यते ॥४१॥

लङ्कां वा प्रतिगच्छामः शृणु कारणमत्र मे । अनिमित्तानि दृश्यन्ते पुनः पुनरिहायने ॥४२॥

अर्थ: अथानन्तर भाईके स्नेहसे भरे सुमालीने मालीसे कहा कि हे भाई ! हम सब आज यहीं ठहरें, आगे न चलें अथवा लंकाको वापस लौट चलें। इसका कारण यह है कि आज मार्गमें बार-बार अपशकुन दिखाई देते हैं ॥४१-४२॥


एकं संकोच्य चरणमत्यन्ताकुलमानसः । स्थितः शुष्कद्रुमस्याग्रे धुन्वन् पक्षान् पुनः पुनः ॥४३॥

शुष्ककाष्ठं दधच्चञ्च्वा वीक्षमाणो दिवाकरम् । रसन् क्रूरमयं ध्वाङ्क्षो निवारयति नो गतिम् ॥४४॥

अर्थ: देखो उधर सूखे वृक्षके अग्रभागपर बैठा कौआ एक पैर संकुचित कर बार-बार पंख फड़फड़ा रहा है। उसका मन अत्यन्त व्याकुल दिखाई देता है, सूखा काठ चोंचमें दबाकर सूर्यकी ओर देखता हुआ क्रूर शब्द कर रहा है मानो हम लोगोंको आगे जानेसे रोक रहा है ॥४३-४४॥


ज्वालारौद्रमुखी चेयं शिवा नो भुजदक्षिणे । घोरं विरौति रोमाणि दृष्टा निदधती मुहुः ॥४५॥

अर्थ: इधर ज्वालाओंसे जिसका मुख अत्यन्त रुद्र मालूम होता है ऐसी यह शृगाली दक्षिण दिशामें रोमांच धारण करती हुई भयंकर शब्द कर रही है ॥४५॥


अयं पतङ्गबिम्बे च परिवेषिणि दृश्यते । कबन्धो भीषणो वृष्टकीलाललवजालकः ॥४६॥

अर्थ: देखो, परिवेषसे युक्त सूर्यके बिम्बमें वह भयंकर कबन्ध दिखाई दे रहा है और उससे खूनकी बूँदोंका समूह बरस रहा है ॥४६॥


घोराः पतन्ति निर्घाताः कम्पिताखिलपर्वताः । दृश्यन्ते वनिताः कृत्स्ना मुक्तकेश्यो नभस्तले ॥४७॥

अर्थ: उधर समस्त पर्वतोंको कम्पित करनेवाले भयंकर वज्र गिर रहे हैं तो इधर आकाशमें खुले केश धारण करनेवाली समस्त स्त्रियाँ दिखाई दे रहीं हैं ॥४७॥


खरं खरः समुत्क्षिप्य मुखं मुखरयन्नभः । क्षितिं खनन् खुराग्रेण दक्षिणः कुरुते स्वरम् ॥४८॥

अर्थ: देखो, दाहिनी ओर वह गर्दभ ऊपरको मुख उठाकर आकाशको बड़ी तीक्ष्णतासे मुखरित कर रहा है तथा खुरके अग्रभागसे पृथिवीको खोदता हुआ भयंकर शब्द कर रहा है ॥४८॥


प्रत्युवाच ततो माली सुमालिनमिति स्फुटम् । कृत्वा स्मितं दृढं बाहू केयूराभ्यां निपीडयन् ॥४९॥

अभिप्रेत्य वधं शत्रोरारुह्य जयिनं द्विपम् । प्रस्थितः पौरुषं बिभ्रत्कथं भूयो निवर्तते ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर बाजूबन्दोंसे दोनों भुजाओंको अच्छी तरह पीड़ित करते हुए मालीने मुसकराकर सुमालीको इस प्रकार स्पष्ट उत्तर दिया कि शत्रुके वधका संकल्प कर तथा विजयी हाथीपर सवार हो जो पुरुषार्थका धारी युद्धके लिए चल पड़ा है वह वापस कैसे लौट सकता है ॥४९-५०॥


दंष्ट्रयोः प्रेङ्खणं कुर्वन् क्षरद्दानस्य दन्तिनः । चक्षुर्वित्रासितारातिः पूर्यमाणः शितैः शरैः ॥५१॥

दन्तदष्टाधरो बद्धभ्रुकुटीकुटिलाननः । विस्मितैरमरैर्दृष्टो भटः किं विनिवर्तते ॥५२॥

अर्थ: जो मदमत्त हाथीकी दाढ़ोंको हिला रहा है, अपनी आँखोंसे ही जिसने शत्रुओंको भयभीत कर दिया है, जो तीक्ष्ण बाणोंसे परिपूर्ण है, दाँतोंसे जिसने अधरोष्ठ चाब रखा है, तनी हुई भ्रकुटियोंसे जिसका मुँह कुटिल हो रहा है तथा देव लोग जिसे आश्चर्यचकित हो देखते हैं ऐसा योद्धा क्या वापस लौटता है ? ॥५१-५२॥


कन्दरासु रतं मेरोर्नन्दने चारुनन्दने । चैत्यालया जिनेन्द्राणां कारिता गगनस्पृशः ॥५३॥

अर्थ: मैंने मेरु पर्वतकी कन्दराओं तथा सुन्दर नन्दन वनमें रमण किया है, गगनचुम्बी जिनमन्दिर बनवाये हैं ॥५३॥


दत्तं किमिच्छकं दानं भुक्ता भोगा महागुणाः । यशो धवलिताशेषभुवनं समुपार्जितम् ॥५४॥

अर्थ: किमिच्छक दान दिया है, उत्तमोत्तम भोग भोगे हैं और समस्त संसारको उज्ज्वल करनेवाला यश उपार्जित किया है ॥५४॥


जन्मनेत्थं कृतार्थोऽस्मि यदि प्राणान्महाहवे । परित्यजामि कियता कृतमन्येन वस्तुना ॥५५॥

अर्थ: इस प्रकार जन्म लेनेका जो कार्य था उसे मैं कर चुका हूँ - कृतकृत्य हुआ हूँ, अब युद्धमें मुझे प्राण भी छोड़ना पड़े तो इससे क्या ? मुझे अन्य वस्तुकी आवश्यकता नहीं ॥५५॥


असौ पलायितो भीतो वराक इति भाषितम् । कथमाकर्णयद्धीरो जनतायाः सुचेतसः ॥५६॥

अर्थ: ‘वह बेचारा भयभीत हो युद्धसे भाग गया’ जनताके ऐसे शब्दोंको धीरवीर मनुष्य कैसे सुन सकता है ॥५६॥


इति संभाषमाणोऽसौ भ्रातरं भासुराननः । विजयार्द्धस्य मूर्द्धानं क्षणादविदितं ययौ ॥५७॥

अर्थ: क्रोधसे जिसका मुख तमतमा रहा था ऐसा माली भाईसे इस प्रकार कहता हुआ तत्क्षण बिना जाने ही विजयार्धके शिखरपर चला गया ॥५७॥


ततोऽपमानितं यैर्यैः शासनं खेचराधिपैः । तत्पुराणि स सामन्तैर्ध्वंसयामास दारुणैः ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर जिन-जिन विद्याधरोंने उसका शासन नहीं माना था उन सबके नगर उसने क्रूर सामन्तोंके द्वारा नष्ट-भ्रष्ट कर दिये ॥५८॥


उद्यानानां महाध्वंसो जनितः क्रोधिभिः खगैः । यथा कमलखण्डानां मातङ्गैर्मदमन्थरैः ॥५९॥

अर्थ: जिस प्रकार मदमाते हाथी कमल वनोंको विध्वस्त कर देते हैं उसी प्रकार क्रोधसे भरे विद्याधरोंने वहाँके उद्यान - बाग-बगीचे विध्वस्त कर दिये ॥५९॥


ततः संबाध्यमाना सा प्रजा गगनचारिणाम् । जगाम शरणं त्रस्ता सहस्रारं सवेपथुः ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर मालीके सामन्तों द्वारा पीड़ित विद्याधरोंको प्रजा भयसे काँपती हुई सहस्रारकी शरणमें गयी ॥६०॥


पादयोश्च प्रणम्योचे वचो दीनमिदं भृशम् । सुकेशस्य सुतैर्ध्वस्तां समस्तां नाथ पालय ॥६१॥

अर्थ: और उसके चरणोंमें नमस्कार कर इस प्रकार दीनता-भरे शब्द कहने लगी - हे नाथ ! सुकेशके पुत्रोंने समस्त प्रजाको क्षत-विक्षत कर दिया है सो उसकी रक्षा करो ॥६१॥


सहस्रारस्ततोऽवोचत् खगा गच्छत मत्सुतम् । विज्ञापयत युष्माकं सपरित्राणकारणम् ॥६२॥

अर्थ: तब सहस्रारने विद्याधरोंसे कहा कि आप लोग मेरे पुत्र - इन्द्रके पास जाओ और उससे अपनी रक्षाकी बात कहो ॥६२॥


त्रिविष्टपं यथा शक्रो रक्षत्यूर्जितशासनः । एवं लोकमिमं पाति स सर्वं वृत्रसूदनः ॥६३॥

अर्थ: जिस प्रकार बलिष्ठ शासनको धारण करनेवाला इन्द्र स्वर्गकी रक्षा करता है उसी प्रकार पापको नष्ट करनेवाला मेरा पुत्र इस समस्त लोककी रक्षा करता है ॥६३॥


एवमुक्तास्ततो जग्मुरिन्द्राभ्यासं नभश्चराः । कृत्वाञ्जलिं प्रणेमुश्च वृत्तान्तं च न्यवेदयन् ॥६४॥

अर्थ: इस प्रकार सहस्रारका उत्तर पाकर विद्याधर इन्द्रके समीप गये और हाथ जोड़ प्रणाम करनेके बाद सब समाचार उससे कहने लगे ॥६४॥


इन्द्रस्ततोऽवदत् क्रुद्धो दर्पस्मितसिताननः । पार्श्वे व्यवस्थिते वज्रे दत्त्वा लोहितलोचने ॥६५॥

अर्थ: तदनन्तर गर्वपूर्ण मुसकानसे जिसका मुख सफेद हो रहा था ऐसे क्रुद्ध इन्द्रने पासमें रखे वज्रपर लाल-लाल नेत्र डालकर कहा कि ॥६५॥


यत्नेन महतान्विष्य हन्तव्या लोककण्टकाः । किं पुनः स्वयमायाताः समीपं लोकपालिनः ॥६६॥

अर्थ: जो लोकके कण्टक हैं मैं उन्हें बड़े प्रयत्नसे खोज-खोजकर नष्ट करना चाहता हूँ फिर आप लोग तो स्वयं ही मेरे पास आये हैं और मैं लोकका रक्षक कहलाता हूँ ॥६६॥


ततो मत्तद्विपालानस्तम्भभङ्गस्य कारणम् । रणसंज्ञाविधानार्थं विषमं तूर्यमाहतम् ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे सुनकर मदोन्मत्त हाथी अपने बन्धनके खम्भोंको तोड़ देते थे ऐसा तुरहीका विषम शब्द उसने युद्धका संकेत करनेके लिए कराया ॥६७॥


संनाहमण्डनोपेता निरीयुश्च नभश्चराः । हेतिहस्ताः परं हर्षं बिभ्राणा रणसंभ्रमम् ॥६८॥

अर्थ: उसे सुनते ही जो कवचरूपी आभूषणसे सहित थे, हथियार जिनके हाथमें थे और जो युद्ध सम्बन्धी परम हर्ष धारण कर रहे थे ऐसे विद्याधर अपने-अपने घरोंसे बाहर निकल पड़े ॥६८॥


रथैरश्वैर्गजैरुष्ट्रैः सिंहैर्व्याघ्रैर्वृकैर्मृगैः । हंसच्छागैर्वृषैर्मेषैर्विमानैर्वर्हिणैः खरैः ॥६९॥

अर्थ: वे विद्याधर मायामयी रथ, घोड़े, हाथी, ऊँट, सिंह, व्याघ्र, भेड़िया, मृग, हंस, बकरा, बैल, मेढ़ा, विमान, मोर और गर्दभ आदि वाहनोंपर बैठे थे ॥६९॥


लोकपालाश्च निर्जग्मुर्निजवर्गसमन्विताः । नानाहेतिप्रभाश्लिष्टा भ्रूभङ्गविषमाननाः ॥७०॥

अर्थ: इनके सिवाय जो नाना प्रकारके शस्त्रोंकी प्रभासे आलिंगित थे तथा भौंहोंके भंगसे जिनके मुख विषम दिखाई देते थे ऐसे लोकपाल भी अपने-अपने परिकरके साथ बाहर निकल पड़े ॥७०॥


ऐरावतं समारुह्य कङ्कटच्छन्नविग्रहः । समुच्छ्रितसितच्छत्रो निरैदिन्द्रः समं सुरैः ॥७१॥

अर्थ: जिसका शरीर कवचसे आच्छादित था, और जिसके ऊपर सफेद छत्र फिर रहा था ऐसा इन्द्र विद्याधर भी ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो देवोंके साथ बाहर निकला ॥७१॥


युगान्तघनभीमानां ततः प्रववृते रणः । देवानां राक्षसानां च दुःप्रेक्ष्यः क्रूरचेष्टितः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर प्रलयकालके मेघोंके समान भयंकर देवों और राक्षसोंके बीच ऐसा विकट युद्ध हुआ कि जो बड़ी कठिनाईसे देखा जाता था तथा क्रूर चेष्टाओंसे भरा था ॥७२॥


सप्तिना पात्यते वाजी रथेन क्षोद्यते रथः । भज्यते दन्तिना दन्ती पादातं च पदातिभिः ॥७३॥

अर्थ: घोड़ा घोड़ाको गिरा रहा था, रथ रथको चूर्ण कर रहा था, हाथी हाथीको भग्न कर रहा था और पैदल सिपाही पैदल सिपाहीको नष्ट कर रहा था ॥७३॥


प्रासमुद्गरचक्रासिभुषण्डीमुसलेषुभिः । गदाकनकपाशैश्च छन्नं कृत्स्नं नभस्तलम् ॥७४॥

अर्थ: भाले, मुद्गर, चक्र, तलवार, बन्दूक, मुसल, बाण, गदा, कनक और पाश आदि शस्त्रोंसे समस्त आकाश आच्छादित हो गया था ॥७४॥


महोत्साहमथो सैन्यं पुरस्सरणदक्षिणम् । दक्षिणं चलितोद्योगं देवानां निवहैः कृतम् ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर देव कहानेवाले विद्याधरोंने एक ऐसी सेना बनायी जो महान् उत्साहसे युक्त थी, आगे चलनेमें कुशल थी, उदार थी और शत्रुके उद्योगको विचलित करनेवाली थी ॥७५॥


विद्युद्वान् चारुयानश्च चन्द्रो नित्यगतिस्तथा । चलज्योतिःप्रभाढ्यश्च रक्षसामक्षिणोद् बलम् ॥७६॥

अथर्क्षसूर्यरजसावुत्तुङ्गकपिकेतुकौ । सीदतो राक्षसान् वीक्ष्य दुर्द्धरौ योद्धुमुद्यतौ ॥७७॥

अर्थ: देवोंकी सेनाके प्रधान विद्युत्वान्, चारुदान, चन्द्र, नित्यगति तथा चलज्ज्योति प्रभाढ्य आदि देवोंने राक्षसोंकी सेनाको क्षत-विक्षत बना दिया । तब वानरवंशियोंमें प्रधान दुर्धर पराक्रमके धारी ऋक्षरज और सूर्यरज राक्षसोंको नष्ट होते देख युद्ध करनेके लिए तैयार हुए ॥७६-७७॥


दर्शिताः पृष्ठमेताभ्यां सर्वे ते सुरपुङ्गवाः । क्षणादन्यत्र दृष्टाभ्यां दधद्भ्यां वैद्युतं जवम् ॥७८॥

अर्थ: ये दोनों ही वीर विजयी जैसे वेगको धारण करते थे इसलिए क्षण-क्षणमें अन्यत्र दिखाई देते थे । इन दोनोंने देवोंको इतना मारा कि उनसे पीठ दिखाते ही बनी ॥७८॥


यातुधाना अपि प्राप्य बलं ताभ्यां समुद्यता । योद्धुं शस्त्रसमूहेन कुर्वाणा ध्वान्तमम्बरे ॥७९॥

अर्थ: इधर राक्षस भी इन दोनोंका बल पाकर शस्त्रोंके समूहसे आकाशमें अन्धकार फैलाते हुए युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥७९॥


ध्वंस्यमानं ततः सैन्यं दैवं यातुकपिध्वजैः । दृष्ट्वा क्रुद्धः समुत्तस्थौ स्वयं योद्धुं सुराधिपः ॥८०॥

अर्थ: उधर जब इन्द्रने देखा कि राक्षसों और वानरवंशियोंके द्वारा देवोंकी सेना नष्ट की जा रही है तब वह क्रुद्ध हो स्वयं युद्ध करनेके लिए उठा ॥८०॥


कपियातुधनैर्व्याप्तस्ततो देवेन्द्रभूधरः । शस्त्रवर्षं विमुञ्चद्भिस्तारगर्जनकारिभिः ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर शस्त्र वर्षा और गम्भीर गर्जना करनेवाले वानर तथा राक्षसरूपी मेघोंने उस इन्द्ररूपी पर्वतको घेर लिया ॥८१॥


निजगाद ततः शक्रः पालयन् लोकपालिनः । सर्वतो विशिखैर्मुक्तैर्बभञ्ज कपिराक्षसान् ॥८२॥

अर्थ: तब लोकपालोंकी रक्षा करते हुए इन्द्रने जोरसे गर्जना की और सब ओर छोड़े हुए बाणोंसे वानर तथा राक्षसोंको नष्ट करना शुरू कर दिया ॥८२॥


अथ माली समुत्तस्थौ सैन्यं दृष्ट्वा समाकुलम् । तेजसा क्रोधजातेन दीपयन् सकलं नभः ॥८३॥

अर्थ: तदनन्तर सेनाको व्याकुल देख माली स्वयं उठा । उस समय वह क्रोधसे उत्पन्न तेजसे समस्त आकाशको देदीप्यमान कर रहा था ॥८३॥


अभवच्च ततो युद्धं मालीन्द्रमतिदारुणम् । विस्मयव्याप्तचित्ताभ्यां सेनाभ्यां कृतदर्शनम् ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर माली और इन्द्रका अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ । आश्चर्यसे जिनके चित्त भर रहे थे ऐसी दोनों ओरकी सेनाएँ उनके उस युद्धको बड़े गौरवसे देख रही थीं ॥८४॥


मालिनो मालदेशेऽथ स्वकनामाङ्कितं शरम् । आकर्णाकृष्टनिर्मुक्तं निचखान सुराधिपः ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रने, जो कान तक खींचकर छोड़ा गया था तथा अपने नामसे चिह्नित था ऐसा एक बाण मालीके ललाटपर गाड़ दिया ॥८५॥


संस्ताम्भ्य वेदनां क्रोधान्मालिनाप्यमरोत्तमः । ललाटस्य तटे शक्त्या हतो वेगविमुक्तया ॥८६॥

अर्थ: इधर मालीने भी उसकी पीड़ा रोककर वेगसे छोड़ी हुई शक्तिके द्वारा इन्द्रके ललाटके समीप ही जमकर चोट पहुँचायी ॥८६॥


रक्तारुणितदेहं च माली द्राक् तमुपागतः । क्रोधारुणः सहस्रांशुर्यथास्तधरणीधरम् ॥८७॥

अर्थ: खूनसे जिसका शरीर लाल हो रहा था ऐसा क्रोधयुक्त माली शीघ्र ही इन्द्रके पास इस तरह पहुँचा जिस तरह कि सूर्य अस्ताचलके समीप पहुँचता है ॥८७॥


भानुबिम्बसमानेन चक्रेणास्य ततः शिरः । आभिमुख्यमुपेतस्य लूनं पत्या दिवौकसाम् ॥८८॥

अर्थ: तदनन्तर माली ज्यों ही सामने आया त्यों ही इन्द्रने सूर्यबिम्बके समान चक्रसे उसका सिर काट डाला ॥८८॥


भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा नितान्तं दुःखितस्ततः । चिन्तयित्वा महावीर्यं चक्रिणं व्योमगामिनाम् ॥८९॥

परिवारेण सर्वेण निजेन सहितः क्षणात् । रणात् पलायनं चक्रे सुमाली नयपेशलः ॥९०॥

अर्थ: भाईको मरा देख सुमाली बहुत दुःखी हुआ। उसने विचार किया कि विद्याधरोंका चक्रवर्ती इन्द्र महाशक्तिशाली है अतः इसके सामने हमारा स्थिर रहना असम्भव है। ऐसा विचारकर नीतिकुशल सुमाली अपने समस्त परिवारके साथ उसी समय युद्धसे भाग गया ॥८९-९०॥


तद्वधार्थं गतं शक्रमनुमार्गेण गत्वरम् । उवाच प्रणतः सोमः स्वामिभक्तिपरायणः ॥९१॥

विद्यमाने प्रभो भृत्ये मादृशे शत्रुमारणे । प्रयत्नं कुरुषे कस्मात् स्वयं मे यच्छ शासनम् ॥९२॥

अर्थ: उसका वध करनेके लिए इन्द्र उसी मार्गसे जानेको उद्यत हुआ तब स्वामिभक्तिमें तत्पर सोमने नम्र होकर प्रार्थना की कि हे प्रभो ! शत्रुको मारनेवाले मुझ-जैसे भृत्यके रहते हुए आप स्वयं क्यों प्रयत्न करते हैं ? मुझे आज्ञा दीजिए ॥९१-९२॥


एवमस्त्विति चोक्तेऽसावनुमार्गं रिपोर्गतः । बाणपुञ्जं विमुञ्चञ्च करौघमिव शत्रुगम् ॥९३॥

अर्थ: ‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार इन्द्रके कहते ही सोम शत्रुके पीछे उसी मार्गसे चल पड़ा। वह शत्रु तक पहुँचनेवाली किरणोंके समूहके समान बाणोंके समूहकी वर्षा करता जाता था ॥९३॥


ततस्तदाहतं सैन्यं विशिखैः कपिरक्षसाम् । धाराहतं गवां यद्वत्कुलमाकुलतां गतम् ॥९४॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार जलवृष्टिसे पीड़ित गायोंका समूह व्याकुलताको प्राप्त होता है उसी प्रकार सोमके बाणोंसे पीड़ित वानर और राक्षसोंकी सेना व्याकुलताको प्राप्त हुई ॥९४॥


पाप न क्षत्रमर्यादां त्वं जानासि मनागपि । जडवर्गपरिक्षिप्त इत्युक्ता प्राप्तकारिणा ॥९५॥

निवृत्य क्रोधदीप्तेन ततो माल्यवता शशी । गाढं स्तनान्तरे भिन्नो भिण्डिमालेन मूर्च्छितः ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर अवसरके योग्य कार्य करनेवाले, क्रोधसे देदीप्यमान माल्यवान्ने मुड़कर सोमसे कहा कि अरे पापी ! तू मूर्ख लोगोंसे घिरा है अतः तू युद्धकी मर्यादाको नहीं जानता। यह कहकर उसने भिण्डिमाल नामक शस्त्रसे सोमके वक्षःस्थलमें इतनी गहरी चोट पहुँचायी कि वह वहीं मूर्च्छित हो गया ॥९५-९६॥


अयं त्वाश्वास्यते यावन्मूर्च्छामीलितलोचनः । अन्तर्द्धानं गतास्तावद् यातुधानप्लवङ्गमाः ॥९७॥

अर्थ: मूर्च्छाके कारण जिसके नेत्र निमीलित थे ऐसा सोम जब तक कुछ विश्राम लेता है तबतक राक्षस और वानर अन्तर्हित हो गये ॥९७॥


पुनर्जन्मेव ते प्राप्ता अलंकारोदयं पुरम् । सिंहस्येव विनिःक्रान्ता जठरादागताः सुखम् ॥९८॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई सिंहके उदरसे सुरक्षित निकल आवे उसी प्रकार वे भी सोमकी चपेटसे सुरक्षित निकलकर अलंकारोदयपुर अर्थात् पाताल लंकामें वापस आ गये। उस समय उन्हें ऐसा लगा मानो पुनर्जन्मको ही प्राप्त हुए हों ॥९८॥


प्रतिबुद्धः शशाङ्कोऽपि दिशो वीक्ष्य रिपूज्झिताः । स्तूयमानो जयेनारेर्ययौ मघवतोऽन्तिकम् ॥९९॥

अर्थ: इधर जब सोमकी मूर्च्छा दूर हुई तो उसने दिशाओंको शत्रुसे खाली देखा । निदान, शत्रुकी विजयसे जिसकी स्तुति हो रही थी ऐसा सोम इन्द्रके समीप वापस पहुँचा ॥९९॥


ध्वस्तशत्रुश्च सुत्रामा वन्दिना निवहैः स्तुतः । अन्वितो लोकपालानां चक्रवालेन तोषिणा ॥१००॥

ऐरावतं समारूढश्चामरानिलवीजितः । सितच्छत्रकृतच्छायो नृत्यत्सुरपुरःसरः ॥१०१॥

रत्नांशुकध्वजन्यस्तशोभमुच्छ्रिततोरणम् । आगुल्फपुष्पविशिखं सिक्तं कुङ्कुमवारिणा ॥१०२॥

गवाक्षन्यस्तसन्नारीनयनालीनिरीक्षितः । युक्तः परमया भूत्या विवेश रथनूपुरम् ॥१०३॥

अर्थ: जिसने शत्रुओंको नष्ट कर दिया था तथा वन्दीजनोंके समूह जिसकी स्तुति कर रहे थे ऐसे इन्द्र विद्याधरने सन्तोषसे भरे लोकपालोंके साथ रथनूपुर नगरमें प्रवेश किया । वह ऐरावत हाथीपर सवार था, उसके दोनों ओर चमर ढोले जा रहे थे, सफेद छत्रकी उसपर छाया थी, नृत्य करते हुए देव उसके आगे-आगे चल रहे थे, तथा झरोखोंमें बैठी उत्तम स्त्रियाँ अपने नयनोंसे उसे देख रही थीं । उस समय रत्नमयी ध्वजाओंसे रथनूपुर नगरकी शोभा बढ़ रही थी, उसमें ऊँचे-ऊँचे तोरण खड़े किये गये थे, उसकी गलियोंमें घुटनों तक फूल बिछाये गये थे और केशरके जलसे समस्त नगर सींचा गया था । ऐसे रथनूपुर नगरमें उसने बड़ी विभूतिके साथ प्रवेश किया ॥१००-१०३॥


पित्रोश्च विनयात् पादौ प्रणनाम कृताञ्जलिः । तौ च पस्पृशतुर्गात्रं कम्पिना तस्य पाणिना ॥१०४॥

अर्थ: राजमहलमें पहुँचनेपर उसने हाथ जोड़कर माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार किया और माता-पिताने भी काँपते हुए हाथसे उसके शरीरका स्पर्श किया ॥१०४॥


शत्रूनेवं स निर्जित्य परमानन्दमागतः । आस्वादयन् परं भोगं प्रजापालनतत्परः ॥१०५॥

अर्थ: इस प्रकार शत्रुओंको जीतकर वह परम हर्षको प्राप्त हुआ और उत्कृष्ट भोग भोगता हुआ प्रजापालनमें तत्पर रहने लगा ॥१०५॥


सुतरां स ततो लोके प्रसिद्धिं शक्रतां गतः । प्राप्तः स्वर्गप्रसिद्धिं च विजयार्द्धश्च भूधरः ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर वह लोकमें इन्द्रकी प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ और विजयार्द्ध पर्वत स्वर्ग कहलाने लगा ॥१०६॥


उत्पत्तिं लोकपालानां तस्य वक्ष्यामि सांप्रतम् । एकाग्रं मानसं कृत्वा श्रेणिकैषां निबुध्यताम् ॥१०७॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! अब लोकपालोंकी उत्पत्ति कहता हूँ सो मनको एकाग्र कर सुनो ॥१०७॥


स्वर्गलोकाच्च्युतो जातो मकरध्वजखेचरात् । संभूतो जठरेऽदित्या लोकपालोऽभवच्छशी ॥१०८॥

कान्तिमानेष शक्रेण द्योतिःसङ्गे पुरोत्तमे । पूर्वस्यां ककुभि न्यस्तो मुमुदे परमर्द्धिकः ॥१०९॥

अर्थ: स्वर्ग लोकसे च्युत होकर मकरध्वज विद्याधरकी अदिति नामा स्त्रीके उदरसे सोम नामका लोकपाल उत्पन्न हुआ था । यह बहुत ही कान्तिमान् था । इन्द्रने इसे द्योतिःसंग नामक नगरकी पूर्व दिशामें लोकपाल स्थापित किया था । इस तरह यह परम ऋद्धिका धारी होता हुआ हर्षसे समय व्यतीत करता था ॥१०८-१०९॥


जातो मेघरथाभिख्याद्वरुणायां महाबलः । खेचरो वरुणो नाम संप्राप्तो लोकपालताम् ॥११०॥

पुरे मेघपुरे न्यस्तः पश्चिमायामसौ दिशि । पाशं प्रहरणं श्रुत्वा यस्य बिभ्यति शत्रवः ॥१११॥

अर्थ: मेघरथ नामा विद्याधरकी वरुणा नामा स्त्रीसे वरुण नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। इन्द्रने इसे मेघपुर नगरकी पश्चिम दिशामें स्थापित किया था। इसका शस्त्र पाश था जिसे सुनकर शत्रु दूरसे ही भयभीत हो जाते थे ॥११०-१११॥


संभूतः कनकावल्यां किंसूर्येण महात्मना । कुबेराख्यो नभोगामी विभूत्या परयान्वितः ॥११२॥

काञ्चनाख्ये पुरे चायमुदीच्यां दिशि योजितः । संप्राप परमं भोगं प्रख्यातो जगति श्रिया ॥११३॥

अर्थ: महात्मा किंसूर्य विद्याधरकी कनकावली स्त्रीसे कुबेर नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। यह परम विभूतिसे युक्त था। इन्द्रने इसे कांचनपुर नगरकी उत्तर दिशामें स्थापित किया था। यह संसारमें लक्ष्मीके कारण प्रसिद्ध था तथा उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त था ॥११२-११३॥


संभूतः श्रीप्रभागर्भे कालाग्निव्योमचारिणः । चण्डकर्मा यमो नाम तेजस्वी परमोऽभवत् ॥११४॥

अर्थ: कालाग्नि नामा विद्याधरकी श्रीप्रभा स्त्रीके गर्भसे यम नामका लोकपाल विद्याधर उत्पन्न हुआ था। यह रुद्रकर्मा तथा परम तेजस्वी था ॥११४॥


दक्षिणोदन्वतो द्वीपे किष्कुनाम्नि पुरोत्तमे । स्थापितोऽसौ स्वपुण्यानां प्राप्नुवन्नूर्जितं फलम् ॥११५॥

अर्थ: इन्द्रने इसे दक्षिण सागरके द्वीपमें विद्यमान किष्कु नामक नगरकी दक्षिण दिशामें स्थापित किया था। इस प्रकार यह अपने पुण्यके प्रबल फलको भोगता हुआ समय व्यतीत करता था ॥११५॥


पुरस्य यस्य यन्नाम पृथिव्यां ख्यातिमागतम् । तेनैव ख्यापिता नाम्ना पौरास्तत्र सुरेशिना ॥११६॥

अर्थ: जिस नगरका जो नाम पृथिवीपर प्रसिद्ध था इन्द्रने उस नगरके निवासियोंको उसी नामसे प्रसिद्ध कराया था ॥११६॥


असुराख्ये नभोगानां नगरे निवसन्ति ये । असुराख्या इमे जाताः सकले धरणीतले ॥११७॥

अर्थ: विद्याधरोंके असुर नामक नगरमें जो विद्याधर रहते थे पृथिवीतलपर वे असुर नामसे प्रसिद्ध हुए ॥११७॥


यक्षगीते पुरे यक्षाः किन्नराह्वे च किन्नराः । गन्धर्वसंज्ञया ख्याताः पुरे गन्धर्वनामनि ॥११८॥

अर्थ: यक्षगीत नगरके विद्याधर यक्ष कहलाये। किन्नर नामा नगरके निवासी विद्याधर किन्नर कहलाये और गन्धर्वनगरके रहनेवाले विद्याधर गन्धर्व नामसे प्रसिद्ध हुए ॥११८॥


अश्विनौ वसवो विश्वे वैश्वानरपुरस्सराः । कुर्वन्ति त्रिदशक्रीडां विद्याबलसमन्विताः ॥११९॥

अर्थ: अश्विनीकुमार, विश्वावसु तथा वैश्वानर आदि विद्याधर विद्याबलसे सहित हो देवोंकी क्रीड़ा करते थे ॥११९॥


अवाप्य संभवं योनौ प्राप्य श्रीविस्तरं भुवि । प्रणतो भूरिलोकेन मन्यते स्वं सुरेश्वरम् ॥१२०॥

अर्थ: इन्द्र यद्यपि मनुष्य योनिमें उत्पन्न हुआ था फिर भी वह पृथिवीपर लक्ष्मीका विस्तार पाकर अपने आपको इन्द्र मानने लगा। सब लोग उसे नमस्कार करते थे ॥१२०॥


इन्द्रः स्वर्गः सुराश्चान्ये समस्तास्तस्य विस्मृताः । संपद्भी रतिमेतस्य नित्योत्सवविधायिनः ॥१२१॥

अर्थ: सम्पदाओंसे परम प्रीतिको प्राप्त तथा निरन्तर उत्सव करनेवाले उस इन्द्र विद्याधरकी समस्त प्रजा यह भूल गयी थी कि यथार्थमें कोई इन्द्र है, स्वर्ग है अथवा देव हैं ॥१२१॥


स्वामिन्द्रं पर्वतं स्वर्गं लोकपालान् खगेश्वरान् । निजांश्च सकलान् देवान् स मेने भूतिगर्वितः ॥१२२॥

अर्थ: वैभवके गर्वमें फँसा इन्द्र, अपने आपको इन्द्र, विजयार्द्ध गिरिको स्वर्ग, विद्याधरोंको लोकपाल और अपनी समस्त प्रजाको देव मानता था ॥१२२॥


मत्तोऽस्ति न महान् कश्चित्पुरुषो भुवनत्रये । अहमेवास्य विश्वस्य प्रणेता विदिताखिलः ॥१२३॥

अर्थ: तीनों ही लोकोंमें मुझसे अधिक महापुरुष और कोई दूसरा नहीं है। मैं ही इस समस्त जगत्का प्रणेता तथा सब पदार्थोंको जाननेवाला हूँ ॥१२३॥


विद्याभृच्चक्रवर्तित्वमिति प्राप्य स गर्वितः । फलमन्वभवत् पूर्वजन्मोपात्तसुकर्मणः ॥१२४॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याधरोंका चक्रवर्तीपना पाकर गर्वसे फूला इन्द्र विद्याधर अपने पूर्व जन्मोपार्जित पुण्य कर्मका फल भोगता था ॥१२४॥


भागेऽत्र यो व्यतिक्रान्तस्तं वृत्तान्तमतः शृणु । धनदस्य समुत्पत्तिः श्रेणिक ज्ञायते यथा ॥१२५॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस भागका जो वृत्तान्त निकल चुका है उसे सुनो जिसमें धनदकी उत्पत्तिका ज्ञान हो सके ॥१२५॥


व्योमबिन्दुरिति ख्यातः पुरे कौतुकमङ्गले । भार्या नन्दवती तस्यामुत्पन्नं दुहितृद्वयम् ॥१२६॥

अर्थ: कौतुकमंगल नामा नगरमें व्योमबिन्दु नामका विद्याधर रहता था। उसकी नन्दवती भार्याके उदरसे दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं ॥१२६॥


कौशिकी ज्यायसी तत्र केकसी च कनीयसी । ज्येष्ठा विश्रवसे दत्ता पुरे यक्षविनिर्मिते ॥१२७॥

तस्यां वैश्रवणो जातः शुभलक्षणविग्रहः । शतपत्रेक्षणः श्रीमानङ्गनानयनोत्सवः ॥१२८॥

अर्थ: उनमें बड़ीका नाम कौशिकी और छोटीका नाम केकसी था। बड़ी पुत्री कौशिकी यक्षपुरके धनी विश्रवसके लिए दी गयी। उससे वैश्रवण नामका पुत्र हुआ। इसका समस्त शरीर शुभ लक्षणोंसे सहित था, कमलके समान उसके नेत्र थे, वह लक्ष्मीसम्पन्न था तथा स्त्रियोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाला था ॥१२७-१२८॥


एवमुक्तः स चाहूय शक्रेण कृतपूजनः । व्रज लङ्कापुरीं शाधि प्रियस्त्वं मम खेचरान् ॥१२९॥

अर्थ: इन्द्र विद्याधरने वैश्रवणको बुलाकर उसका सत्कार किया और कहा कि तुम मुझे बहुत प्रिय हो इसलिए लंका नगरी जाकर विद्याधरोंपर शासन करो ॥१२९॥


चतुर्णां लोकपालानामद्य प्रभृति पञ्चमः । लोकपालो भव त्वं मे मत्प्रसादान्महाबलः ॥१३०॥

अर्थ: तुम चूँकि महाबलवान् हो अतः मेरे प्रसादके कारण आजसे लेकर चार लोकपालोंके सिवाय पंचम लोकपाल हो ॥१३०॥


यदाज्ञापयसीत्युक्त्वा कृत्वा चरणवन्दनाम् । आपृच्छ्य पितरौ नत्वा निर्गतोऽसौ सुमङ्गलम् ॥१३१॥

अर्थ: ‘जो आपकी आज्ञा है वैसा ही करूँगा’ यह कहकर वैश्रवणने उसके चरणोंमें नमस्कार किया । तदनन्तर माता-पितासे पूछकर और उन्हें नमस्कार कर वैश्रवण मंगलाचारपूर्वक अपने नगरसे निकला ॥१३१॥


अध्यतिष्ठच्च मुदितो लङ्कां शङ्काविवर्जितः । विद्याधरसमूहेन शिरसा धृतशासनः ॥१३२॥

अर्थ: विद्याधरोंका समूह जिसकी आज्ञा सिरपर धारण करते थे ऐसा वैश्रवण निःशंक हो बड़ी प्रसन्नतासे लंकामें रहने लगा ॥१३२॥


प्रीतिमत्यां समुत्पन्नः सुमालितनयस्तु यः । नाम्ना रत्नश्रवाः शूरस्त्यागी भुवनवत्सलः ॥१३३॥

अर्थ: इन्द्रसे हारकर सुमाली अलंकारपुर नगर (पाताललंका) में रहने लगा था । वहाँ उसकी प्रीतिमती रानीसे रत्नश्रवा नामका पुत्र हुआ । वह बहुत ही शूरवीर, त्यागी और लोकवत्सल था ॥१३३॥


मित्रोपकरणं यस्य जीवितं तुङ्गचेतसः । भृत्यानामुपकाराय प्रभुत्वं भूरितेजसः ॥१३४॥

अर्थ: उस उदारहृदयका जीवन मित्रोंका उपकार करनेके लिए था, उस तेजस्वीका तेज भृत्योंका उपकार करनेके लिए था ॥१३४॥


लब्धवर्णोपकाराय वैदग्ध्यं दग्धदुर्मतेः । बन्धूनामुपकाराय लक्ष्म्याश्च परिपालनम् ॥१३५॥

अर्थ: दुर्बुद्धिको नष्ट करनेवाले उस रत्नश्रवाका चातुर्य विद्वानोंका उपकार करनेके लिए था, वह लक्ष्मीकी रक्षा बन्धुजनोंका उपकार करनेके लिए करता था ॥१३५॥


ईश्वरत्वं दरिद्राणामुपकारार्थमुन्नतम् । साधूनामुपकारार्थं सर्वस्वं सर्वपालिनः ॥१३६॥

अर्थ: उसका बढ़ा-चढ़ा ऐश्वर्य दरिद्रोंका उपकार करनेके लिए था । सबकी रक्षा करनेवाले उस रत्नश्रवाका सर्वस्व साधुओंका उपकार करनेके लिए था ॥१३६॥


सुकृतस्मरणार्थं च मानसं मानशालिनः । धर्मोपकरणं चायुः वीर्योपकृतये वपुः ॥१३७॥

अर्थ: उस स्वाभिमानीका मन पुण्य कार्योंका स्मरण करनेके लिए था । उसकी आयु धर्मका उपकार करनेवाली थी और उसका शरीर पराक्रमका उपकार करनेके लिए था ॥१३७॥


पितेव प्राणिवर्गस्य यो बभूवानुकम्पकः । सुकाल इव चातीतः स्मर्यतेऽद्यापि जन्तुभिः ॥१३८॥

अर्थ: वह पिताके समान प्राणियोंके समूहपर अनुकम्पा करनेवाला था । बीते हुए सुकालको तरह आज भी प्राणी उसका स्मरण करते हैं ॥१३८॥


परस्त्री मातृवद् यस्य शीलभूषणधारिणः । परद्रव्यं च तृणवत्परश्च स्वशरीरवत् ॥१३९॥

अर्थ: शीलरूपी आभूषणको धारण करनेवाले उस रत्नश्रवाके लिए परस्त्री माताके समान थी । पर-द्रव्य तृणके समान था और पर-पुरुष अपने शरीरके समान था अर्थात् जिस प्रकार वह अपने शरीरकी रक्षा करता था उसी प्रकार पर-पुरुषकी भी रक्षा करता था ॥१३९॥


गुणिनां गणनायां यः प्रथमं गणितो बुधैः । दोषिणां च समुल्लापे स स्मृतो नैव जन्तुभिः ॥१४०॥

अर्थ: जब गुणी मनुष्योंकी गणना शुरू होती थी तब विद्वान् लोग सबसे पहले इसीको गिनते थे और जब दोषोंकी चर्चा होती थी तब प्राणी इसका स्मरण ही नहीं करते थे ॥१४०॥


अन्यैरिव महाभूतैः शरीरं तस्य निर्मितम् । अन्यथा सा कुतः शोभा बभूवास्य तथाविधा ॥१४१॥

अर्थ: उसका शरीर मानो पृथिवी आदिसे अतिरिक्त अन्य महाभूतोंसे रचा गया था अन्यथा उसकी वह अनोखी शोभा कैसे होती ? ॥१४१॥


प्रसेकममृतेनेव चक्रे संभाषणेषु सः । महादानमिवोदात्तचरितो विततार च ॥१४२॥

अर्थ: वह जब वार्तालाप करता था तब ऐसा जान पड़ता था मानो अमृत ही सींच रहा हो । वह इतना उदात्तचरित था कि मानो हमेशा महादान ही देता रहता हो ॥१४२॥


धर्मार्थकामकार्याणां मध्ये तस्य महामतेः । धर्म एव महान् यत्नो जन्मान्तरगतावभूत् ॥१४३॥

अर्थ: जन्मान्तरमें भी उस महाबुद्धिमान्ने धर्म, अर्थ, काममें-से एक धर्ममें ही महान् प्रयत्न किया था ॥१४३॥


यशो विभूषणं तस्य भूषणानां सुभूषणम् । गुणाः कीर्त्या समं तस्मिन् सकुटुम्बा इव स्थिताः ॥१४४॥

अर्थ: सब आभूषणोंका आभूषण यश ही उसका आभूषण था। गुण उसमें कीर्तिके साथ इस प्रकार रह रहे थे मानो उसके कुटुम्बी ही हों ॥१४४॥


स भूतिं परमां वाञ्छन् क्रमाद् गोत्रसमागताम् । संत्याजितो निजं स्थानं पत्या स्वर्गनिवासिनाम् ॥१४५॥

अर्थ: वह रत्नश्रवा, अपनी वंश-परम्परासे चली आयी उत्कृष्ट विभूतिको प्राप्त करना चाहता था पर इन्द्र विद्याधरने उसे अपने स्थानसे च्युत कर रखा था ॥१४५॥


परित्यज्य भयं धीरो विद्यां साधयितुं क्षमः । रौद्रं भूतपिशाचादिनादि पुष्पादिकं वनम् ॥१४६॥

अर्थ: निदान, वह धीर-वीर विद्या सिद्ध करनेके लिए, जहाँ भूत-पिशाच आदि शब्द कर रहे थे ऐसे महाभयंकर पुष्प वनमें गया ॥१४६॥


विद्यायां विदितां पूर्वमथो तद्गामिनीं सुताम् । व्योमबिन्दुर्ददावस्मै तपसे परिचारिकाम् ॥१४७॥

अर्थ: सो रत्नश्रवा तो इधर विद्या सिद्ध कर रहा था उधर विद्याके विषयमें पहलेसे ही परिज्ञान रखनेवाली तथा जो बादमें रत्नश्रवाकी पत्नी होनेवाली थी ऐसी अपनी छोटी कन्या केकसीको व्योमबिन्दुने उसकी तपकालीन परिचर्याके लिए भेजा ॥१४७॥


तस्य सा योगिनः पार्श्वे विनीता समवस्थिता । कृताञ्जलिपुटादेशं वाञ्छन्ती तन्मुखोद्गतम् ॥१४८॥

अर्थ: सो केकसी उस योगीके समीप बड़े विनयसे हाथ जोड़े खड़ी हुई उसके मुखसे निकलनेवाले आदेशकी प्रतीक्षा कर रही थी ॥१४८॥


ततः समाप्तनियमः कृतसिद्धनमस्कृतिः । एकाकिनां सतां बालां दृष्ट्वा सरललोचनाम् ॥१४९॥

अर्थ: तदनन्तर जब रत्नश्रवाका नियम समाप्त हुआ तब वह सिद्ध भगवान्को नमस्कार कर उठा। उसी समय उसकी दृष्टि अकेली खड़ी केकसीपर पड़ी। केकसीकी आँखोंसे सरलता टपक रही थी ॥१४९॥


नीलोत्पलेक्षणां पद्मवक्त्रां कुन्ददलद्विजाम् । शिरीषमालिकाबाहुं पाटलादन्तवाससम् ॥१५०॥

अर्थ: उसके नेत्र नीलकमलके समान थे, मुख कमलके समान था, दाँत कुन्दकी कलीके समान थे, भुजाएँ शिरीषकी मालाके समान थीं, अधरोष्ठ गुलाबके समान था ॥१५०॥


बकुलामोदनिःश्वासां चम्पकत्विक्समत्विषम् । कुसुमैरिव निःशेषां निर्मितां दधतीं तनुम् ॥१५१॥

अर्थ: उसकी श्वाससे मौलिश्रीके फूलोंकी सुगन्धि आ रही थी, उसकी कान्ति चम्पेके फूलके समान थी, उसका सारा शरीर मानो फूलोंसे ही बना था ॥१५१॥


मुक्तपद्मालयां पद्मां रूपेणैव वशीकृताम् । परमोत्कण्ठयानीतां पादविन्यस्तलोचनाम् ॥१५२॥

अर्थ: रत्नश्रवाके पास खड़ी केकसी ऐसी जान पड़ती थी मानो उसके रूपसे वशीभूत हो लक्ष्मी ही कमलरूपी घरको छोड़कर बड़ी उत्कण्ठासे उसके पास आयी हो और उसके चरणोंमें नेत्र गड़ाकर खड़ी हो ॥१५२॥


अपूर्वपुरुषालोकलज्जितानतविग्रहाम् । ससाध्वसविनिक्षिप्तनिःश्वासोत्कम्पितस्तनीम् ॥१५३॥

अर्थ: अपूर्व पुरुषके देखनेसे उत्पन्न लज्जाके कारण उसका शरीर नीचेकी ओर झुक रहा था तथा भयसहित निकलते हुए श्वासोच्छ्वाससे उसके स्तन कम्पित हो रहे थे ॥१५३॥


लावण्येन विलिम्पन्तीं पल्लवानन्तिकागताम् । निःश्वासाकृष्टमत्तालिकुलव्याकुलिताननाम् ॥१५४॥

अर्थ: वह अपने लावण्यसे समीपमें पड़े पल्लवोंको लिप्त कर रही थी तथा श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धिसे आकृष्ट मदोन्मत्त भ्रमरोंके समूह से वनको आकुलित कर रही थी ॥१५४॥


सौकुमार्यादिवोदाराद् बिभ्यतानतिनिर्भरम् । यौवनेन कृताश्लेषां संभूतिं योषितः पराम् ॥१५५॥

अर्थ: वह अत्यधिक सौकुमार्यके कारण इतनी अधिक नीचे को झुक रही थी कि यौवन डरते-डरते ही उसका आलिंगन कर रहा था। केकसी क्या थी मानो स्त्रीत्वकी परम सृष्टि थी ॥१५५॥


गृहीत्वेवाखिलस्त्रैणं लावण्यं त्रिजगद्गतम् । कर्मभिर्निर्मितां कर्तुमद्भुतं सार्वलौकिकम् ॥१५६॥

अर्थ: समस्त संसार सम्बन्धी आश्चर्य इकट्ठा करनेके लिए ही मानो त्रिभुवनसम्बन्धी समस्त स्त्रियोंका सौन्दर्य एकत्रित कर कर्मोंने उसकी रचना की थी ॥१५६॥


शरीरेणेव संयुक्तां साक्षाद्विद्यामुपागताम् । वशीकृतामुदारेण तपसा कान्तिशालिनीम् ॥१५७॥

अर्थ: वह केकसी ऐसी जान पड़ती थी मानो रत्नश्रवाके उत्कृष्ट तपसे वशीभूत हुई कान्तिसे सुशोभित साक्षात् विद्या ही शरीर धरकर सामने खड़ी हो ॥१५७॥


पप्रच्छ प्रियया वाचा करुणावान् स्वभावतः । प्रमदासु विशेषेण कन्यकासु ततोऽधिकम् ॥१५८॥

कस्यासि दुहिता बाले किमर्थं वा महावने । एकाकिनी मृगीवास्मिन् यूथाद् भ्रष्टावतिष्ठसे ॥१५९॥

अर्थ: रत्नश्रवा स्वभावसे ही दयालु था और विशेषकर स्त्रियोंपर तथा उनसे भी अधिक कन्याओंपर अधिक दयालु था अतः उसने प्रिय वचनोंसे पूछा कि हे बाले ! तू किसकी लड़की है ? और इस महावनमें झुण्डसे बिछुड़ी हरिणीके समान किस लिए खड़ी है ? ॥१५८-१५९॥


के वा भजन्ति ते वर्णा नाम पुण्यमनोरथे । पक्षपातो भवत्येव योगिनामपि सज्जने ॥१६०॥

अर्थ: हे पुण्य मनोरथे ! कौन-से अक्षर तेरे नामको प्राप्त हैं ? रत्नश्रवाने केकसीसे ऐसा पूछा सो उचित ही था क्योंकि सज्जनके ऊपर साधुओंका भी पक्षपात हो ही जाता है ॥१६०॥


तस्मै साकथयद् वाचा गद्गदत्वमुपेतया । दधत्यात्यन्तमाधुर्यं चेतश्चोरणदक्षया ॥१६१॥

उत्पन्ना मन्दवत्यङ्गे व्योमबिन्दोरहं सुता । केकसीति भवत्सेवां कर्तुं पित्रा निरूपिता ॥१६२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें अनन्त माधुर्यको धारण करनेवाली एवं चित्तके चुरानेमें समर्थ गद्गद वाणीसे केकसीने कहा कि मैं मन्दवतीके शरीरसे उत्पन्न राजा व्योमबिन्दुकी पुत्री हूँ, केकसी मेरा नाम है और पिताकी प्रेरणासे आपकी सेवा करनेके लिए आयी हूँ ॥१६१-१६२॥


तत्रैव समये तस्य सिद्धा विद्या महौजसः । मानससतम्भिनी नाम्ना क्षणदर्शितविग्रहा ॥१६३॥

अर्थ: उसी समय महातेजस्वी रत्नश्रवाको मानसंस्तम्भिनी नामकी विद्या सिद्ध हो गयी सो उस विद्याने उसी समय अपना शरीर प्रकट कर दिखाया ॥१६३॥


ततो विद्याप्रभावेण तस्मिन्नेव महावने । पुरं पुष्पान्तकं नाम क्षणात्तेन निवेशितम् ॥१६४॥

अर्थ: तदनन्तर उस विद्याके प्रभावसे उसने उसी वनमें तत्क्षण ही पुष्पान्तक नामका नगर बसाया ॥१६४॥


कृत्वा पाणिगृहीतां च केकसीं विधिना ततः । रेमे तत्र पुरे प्राप्य भोगान् मानसकल्पितान् ॥१६५॥

अर्थ: और केकसीको विधिपूर्वक अपनी स्त्री बनाकर उसके साथ मनचाहे भोग भोगता हुआ वह उस नगरमें क्रीड़ा करने लगा ॥१६४-१६५॥


बभूव च तयोः प्रीतिर्जाया पत्योरनुत्तरा । क्षणार्द्धमपि नो सेहे वियोगं या सुचेतसोः ॥१६६॥

अर्थ: शोभनीय हृदयको धारण करनेवाले उन दोनों दम्पतियोंमें ऐसी अनुपम प्रीति उत्पन्न हुई कि वह आधे क्षणके लिए भी उनका वियोग सहन नहीं कर सकती थी ॥१६६॥


मृतामिव स तां मेने लोचनागोचरस्थिताम् । निमेषादर्शनान्म्लानिं व्रजन्तीं मृदुमानसाम् ॥१६७॥

अर्थ: यदि केकसी क्षण-भरके लिए भी रत्नश्रवाके नेत्रोंके ओझल होती थी तो वह उसे ऐसा मानने लगता था मानो मर ही गयी हो । और केकसी भी यदि उसे पल-भरके लिए नहीं देखती थी तो म्लानिको प्राप्त हो जाती थी - उसकी मुखकी कान्ति मुरझा जाती थी । कोमल चित्त तो उसका था ही ॥१६७॥


वक्त्रचन्द्रेऽक्षिणी तस्यास्तस्य नित्यं व्यवस्थिते । सर्वेषां वा हृषीकाणां सा बभूवास्य बन्धनम् ॥१६८॥

अर्थ: रत्नश्रवाके नेत्र सदा केकसीके मुखचन्द्रपर ही गड़े रहते थे अथवा यों कहना चाहिए कि केकसी, रत्नश्रवाकी समस्त इन्द्रियोंका मानो बन्धन ही थी ॥१६८॥


अनन्यजेन रूपेण यौवनेन धनश्रिया । विद्याबलेन धर्मेण सक्तिरासीत्परं तयोः ॥१६९॥

अर्थ: अनुपम रूप, यौवन, धन-सम्पदा, विद्याबल और पूर्वोपार्जित धर्मके कारण उन दोनोंमें परस्पर परम आसक्ति थी ॥१६९॥


व्रजन्ती व्रज्यया युक्ते तिष्ठन्ती स्थितिमागते । छायेव साभवत् पत्यावनुवर्तनकारिणी ॥१७०॥

अर्थ: जब रत्नश्रवा चलता था तब केकसी भी चलने लगती थी और जब रत्नश्रवा बैठता था तो केकसी भी बैठ जाती थी। इस तरह वह छायाके समान पतिकी अनुगामिनी थी ॥१७०॥


अथासौ विपुले कान्ते क्षीराकूपारपाण्डुरे । रत्नदीपकृतालोके दुकूलपटकोमले ॥१७१॥

अर्थ: अथानन्तर - एक दिन रानी केकसी रत्नोंके महलमें ऐसी शय्यापर पड़ी थी कि जो विशाल थी, सुन्दर थी, क्षीरसमुद्रके समान सफेद थी, रत्नोंके दीपकोंका जिसपर प्रकाश फैल रहा था, जो रेशमी वस्त्रसे कोमल थी, ॥१७१॥


यथेष्टगल्लके न्यस्तनानावर्णोपधानके । निःश्वासामोदनिर्णिद्रद्विरेफसमुपासिते ॥१७२॥

अर्थ: जिसपर यथेष्ट गद्दा बिछा हुआ था, रंगबिरंगी तकियाँ रखी हुई थीं, जिसके आस-पास श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धिसे जागरूक भौंरे मँडरा रहे थे ॥१७२॥


परितः स्थितयामस्त्रीविनिद्रनयनेक्षिते । तनुदन्तविनिर्माणपट्टके शयनोत्तमे ॥१७३॥

चिन्तयन्ती गुणान् पत्युर्मनोबन्धनकारिणः । वाञ्छन्ती च सुतोत्पत्तिं सुखं निद्रामुपागता ॥१७४॥

अर्थ: चारों ओर पहरेपर खड़ी स्त्रियाँ जिसे निद्रारहित नेत्रोंसे देख रही थीं, और जिसके समीप ही हाथी-दाँतकी बनी छोटी-सी चौकी रखी हुई थी ऐसी उत्तम शय्यापर केकसी मनका बन्धन करनेवाले पतिके गुणोंका चिन्तवन करती और पुत्रोत्पत्तिकी इच्छा रखती हुई सुखसे सो रही थी ॥१७३-१७४॥


ईक्षांचक्रे परान् स्वप्नान् महाविस्मयकारिणः । अव्यक्तचलनाध्यायिसखीवीक्षितविग्रहा ॥१७५॥

अर्थ: उसी समय स्थिर होकर ध्यान करनेवाली अर्थात् सूक्ष्म देख-रेख रखनेवाली सखियाँ जिसके शरीरका निरीक्षण कर रही थीं ऐसी केकसीने महाआश्चर्य उत्पन्न करनेवाले उत्कृष्ट स्वप्न देखे ॥१७५॥


ततः प्रभाततूर्येण शङ्खशब्दानुकारिणा । मागधानां च वाणीभिः सुप्रबोधनमागता ॥१७६॥

अर्थ: तदनन्तर शंखोंके शब्दका अनुकरण करनेवाली प्रातःकालीन तुरहीकी मधुर ध्वनि और चारणोंकी रम्य वाणीसे केकसी प्रबोधको प्राप्त हुई ॥१७६॥


कृतमङ्गलकार्यार्थ्यं नेपथ्यं दधती शुभम् । सखीभिरन्वितागच्छन् मनोज्ञा भर्तुरन्तिकम् ॥१७७॥

अर्थ: सो मंगल कार्य करनेके अनन्तर शुभ तथा श्रेष्ठ नेपथ्यको धारण कर मनको हरण करती हुई, सखियोंके साथ पतिके समीप पहुँची ॥१७७॥


आसीना चाञ्जलिं कृत्वा पत्युः पार्श्वे सुविभ्रमा । भद्रासनेंऽशुकच्छन्ने क्रमात् स्वप्नान्न्यवेदयत् ॥१७८॥

अर्थ: वहाँ हाथ जोड़, हाव-भाव दिखाती हुई, पतिके समीप, उत्तम वस्त्रसे आच्छादित सोफापर बैठकर उसने स्वप्न देखनेकी बात कही ॥१७८॥


अद्य रात्रौ मया यामे चरमे नाथ वीक्षिताः । त्रयः स्वप्नाः श्रुतौ तेषां प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥१७९॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ! आज रात्रिके पिछले पहर मैंने तीन स्वप्न देखे हैं सो उन्हें सुनकर प्रसन्नता कीजिए ॥१७९॥


बृहद्वृन्दं गजेन्द्राणां ध्वंसयन् परमौजसा । कुक्षिमास्येन मे सिंहः प्रविष्टो नभसस्तलात् ॥१८०॥

अर्थ: पहले स्वप्नमें मैंने देखा है कि अपने उत्कृष्ट तेजसे हाथियोंके बड़े भारी झुण्डको विध्वस्त करता हुआ एक सिंह आकाशतलसे नीचे उतरकर मुख-द्वारसे मेरे उदरमें प्रविष्ट हुआ है ॥१८०॥


विद्रावयन् मयूखैश्च ध्वान्तं गजकुलासितम् । स्थितो विहायसो मध्यादङ्के कमलबान्धवः ॥१८१॥

अर्थ: दूसरे स्वप्नमें देखा है कि किरणोंसे हाथियोंके समूहके समान काले अन्धकारको दूर हटाता हुआ सूर्य आकाशके मध्य भागमें स्थित है ॥१८१॥


कुर्वन्मनोहरां लीलां दूरयन् तिमिरं करैः । अखण्डमण्डलो दृष्टः पुरः कुमुदनन्दनः ॥१८२॥

अर्थ: और तीसरे स्वप्नमें देखा है कि मनोहर लीलाको करता और किरणोसे अन्धकारको दूर हटाता हुआ पूर्ण चन्द्रमा हमारे सामने खड़ा है ॥१८२॥


दृष्टमात्रेषु चैतेषु विस्मयाक्रान्तमानसा । प्रभाततूर्यनादेन गताहं वीतनिद्रताम् ॥१८३॥

अर्थ: इन स्वप्नोंके दिखते ही मेरा मन आश्चर्यसे भर गया और उसी समय प्रातःकालीन तुरहीकी ध्वनिसे मेरी निद्रा टूट गयी ॥१८३॥


किमेतदिति नाथ त्वं ज्ञातुमर्हसि सांप्रतम् । ज्ञातव्येषु हि नारीणां प्रमाणं प्रियमानसम् ॥१८४॥

अर्थ: हे नाथ ! यह क्या है ? इसे आप ही जाननेके योग्य हैं क्योंकि स्त्रियोंके जानने योग्य कार्योंमें पतिका मन ही प्रमाणभूत है ॥१८४॥


ततोऽष्टाङ्गनिमित्तज्ञः कुशलो जिनशासने । रत्नश्रवाः प्रमोदेन स्वप्नार्थान् व्यवृणोत् क्रमात् ॥१८५॥

अर्थ: तदनन्तर अष्टांग निमित्तके जानकार एवं जिन-शासनमें कुशल रत्नश्रवाने बड़े हर्षसे क्रमपूर्वक स्वप्नोंका फल कहा ॥१८५॥


उत्पत्स्यन्ते त्रयः पुत्रास्त्रिजगद्गतकीर्तयः । तव देवि महासत्त्वाः कुलवृद्धिविधायिनः ॥१८६॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे देवि ! तुम्हारे तीन पुत्र होंगे। ऐसे पुत्र कि जिनकी कीर्ति तीनों लोकोंमें व्याप्त होगी, जो महापराक्रमके धारी तथा कुलकी वृद्धि करनेवाले होंगे ॥१८६॥


भवान्तरनिबद्धेन सुकृतेनोत्तमक्रियाः । वल्लभत्वं प्रपत्स्यन्ते सुरेष्वपि सुरैः समाः ॥१८७॥

अर्थ: वे तीनों ही पुत्र पूर्व भवमें संचित पुण्यकर्मसे उत्तम कार्य करनेवाले होंगे, देवोंके समान होंगे और देवोंके भी प्रीतिपात्र होंगे ॥१८७॥


कान्त्युत्सारिततारेशा दीप्त्युत्सारितभास्कराः । गाम्भीर्यजिततोयेशाः स्थैर्योत्सारितभूधराः ॥१८८॥

अर्थ: वे अपनी कान्तिसे चन्द्रमाको दूर हटावेंगे, तेजसे सूर्यको दूर भगावेंगे और स्थिरतासे पर्वतको ठुकरावेंगे ॥१८८॥


चारुकर्मफलं भुक्त्वा स्वर्गे शेषस्य कर्मणः । परिपाकमवाप्स्यन्ति सुरैरप्यपराजिताः ॥१८९॥

अर्थ: स्वर्गमें पुण्य कर्मका फल भोगनेके बाद जो कुछ कर्म शेष बचा है अब उसका फल भोगेंगे । वे इतने बलवान् होंगे कि देव भी उन्हें पराजित नहीं कर सकेंगे ॥१८९॥


दानेन कामजलदाश्चक्रवर्तिसमर्द्धयः । वरसीमन्तिनीचेतोलोचनालीमलिम्लुचाः ॥१९०॥

अर्थ: वे दानके द्वारा मनोरथ-को पूर्ण करनेवाले मेघ होंगे, चक्रवर्तियोंके समान ऋद्धिके धारक होंगे, और श्रेष्ठ स्त्रियोंके मन तथा नेत्रोंको चुरानेवाले होंगे ॥१९०॥


श्रीवत्सलक्षणात्यन्तराजितोत्तुङ्गवक्षसः । नाममात्रश्रुतिध्वस्तमहासाधनशत्रवः ॥१९१॥

अर्थ: उनका उन्नत वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्नसे अत्यन्त सुशोभित होगा, और उनका नाम सुनते ही बड़ी-बड़ी सेनाओंके अधिपति शत्रु नष्ट हो जावेंगे ॥१९१॥


भविता प्रथमस्तेषां नितान्तं जगते हितः । साहसैकरसासक्तः शत्रुपद्मक्षपाकरः ॥१९२॥

अर्थ: उन तीनों पुत्रोंमें प्रथम पुत्र जगत्का अत्यन्त हितकारी होगा, साहसके कार्यमें वह बड़े प्रेमसे आसक्त होगा तथा शत्रुरूपी कमलोंको निमीलित करनेके लिए चन्द्रमाके समान होगा ॥१९२॥


संग्रामगमनात्तस्य भविष्यति समन्ततः । शरीरं निचितं चारोरुच्चरोमाञ्चकण्टकैः ॥१९३॥

अर्थ: वह युद्धका इतना प्रेमी होगा कि युद्धमें जाते ही उसका सारा शरीर खड़े हुए रोमांचरूपी कंटकोंसे व्याप्त हो जावेगा ॥१९३॥


निधानं कर्मणामेष दारुणानां भविष्यति । वस्तुन्यूरीकृते तस्य न शक्रोऽपि निवर्तकः ॥१९४॥

अर्थ: वह घोर भयंकर कार्योंका भाण्डार होगा तथा जिस कार्यको स्वीकृत कर लेगा उससे उसे इन्द्र भी दूर नहीं हटा सकेगा ॥१९४॥


कृत्वा स्मितं ततो देवी परमप्रमदाञ्चिता । भर्त्तुराननमालोक्य विनयादित्यभाषत ॥१९५॥

अर्हन्मतामृतास्वादसुचिताभ्यां कथं प्रभो । आवाभ्यां प्राप्य जन्मायं क्रूरकर्मा भविष्यति ॥१९६॥

अर्थ: पतिके ऐसे वचन सुन परम प्रमोदको प्राप्त हुई केकसी, मन्द हासकर तथा पतिका मुख देखकर विनयसे इस प्रकार बोली कि हे नाथ ! हम दोनों का चित्त तो जिनमतरूपी अमृतके आस्वादसे अत्यन्त निर्मल है फिर हम लोगोंसे जन्म पाकर यह पुत्र क्रूरकर्मा कैसे होगा ? ॥१९५-१९६॥


आवयोर्ननु मज्जापि जिनवाक्येन भाविता । भवेदमृतवल्लीतो विषस्य प्रसवः कथम् ॥१९७॥

अर्थ: निश्चयसे हम दोनोंकी मज्जा भी जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंसे संस्कारित है फिर हमसे ऐसे पुत्रका जन्म कैसे होगा ? क्या कहीं अमृतकी वेलसे विषकी भी उत्पत्ति होती है ? ॥१९७॥


प्रत्युवाच स तामेवं प्रिये शृणु वरानने । कर्माणि कारणं तस्य न वयं कृत्यवस्तुनि ॥१९८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा रत्नश्रवाने कहा कि हे प्रिये ! हे उत्कृष्टमुखि ! इस कार्यमें कर्म ही कारण हैं हम नहीं ॥१९८॥


मूलं हि कारणं कर्मस्वरूपविनियोजने । निमित्तमात्रमेवास्य जगतः पितरौ स्मृतौ ॥१९९॥

अर्थ: संसारके स्वरूपकी योजनामें कर्म ही मूल कारण हैं माता-पिता तो निमित्त मात्र हैं ॥१९९॥


भविष्यतोऽनुजावस्य जिनमार्गविशारदौ । गुणग्रामसमाकीर्णौ सुचेष्टौ शीलसागरौ ॥२००॥

अर्थ: इसके दोनों छोटे भाई जिनमार्गके पण्डित, गुणोंके समूहसे व्याप्त, उत्तम चेष्टाओंके धारक तथा शीलके सागर होंगे ॥२००॥


सुदृढं सुकृते लग्नौ भवस्खलनभीतितः । सत्यवाक्यरतौ सर्वसत्त्वकारुण्यकारिणौ ॥२०१॥

अर्थ: संसारमें कहीं मेरा स्खलन न हो जाये इस भयसे वे सदा पुण्य कार्यमें अच्छी तरह संलग्न रहेंगे, सत्य वचन बोलनेमें तत्पर होंगे और सब जीवोंपर दया करनेवाले होंगे ॥२०१॥


तयोरपि पुरोपात्तं सौम्यकर्म मृदुस्वने । कारणं करुणोपेते यतो हेतुसमं फलम् ॥२०२॥

अर्थ: हे कोमल शब्दोंवाली तथा दयासे युक्त प्रिये ! उन दोनों पुत्रोंका पूर्वोपार्जित पुण्य कर्म ही उनके इस स्वभावका कारण होगा सो ठीक ही है क्योंकि कारणके समान ही फल होता है ॥२०२॥


एवमुक्त्वा जिनेन्द्राणां ताभ्यां पूजा प्रवर्तिता । मनसापि प्रतीतेन प्रयताभ्यामहर्दिवम् ॥२०३॥

अर्थ: ऐसा कहकर रात-दिन सावधान रहनेवाले माता-पिताने प्रसन्न चित्तसे जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की ॥२०३॥


ततो गर्भस्थिते सत्त्वे प्रथमे मातुरीहितम् । बभूव क्रूरमत्यन्तं हठनिर्जितपौरुषम् ॥२०४॥

अभ्यवाञ्छत्पदन्यासं कर्तुं मूर्धसु विद्विषाम् । रक्तकर्दमदिग्धेषु परिस्फुरणकारिषु ॥२०५॥

अर्थ: तदनन्तर जब गर्भमें प्रथम बालक आया तब माताकी चेष्टा अत्यन्त क्रूर हो गयी। वह हठपूर्वक पुरुषोंके समूहको जीतनेकी इच्छा करने लगी। वह चाहने लगी कि मैं खूनकी कीचड़से लिप्त तथा छटपटाते हुए शत्रुओंके मस्तकोंपर पैर रखूँ ॥२०४-२०५॥


आज्ञां दातुमभिप्रायः सुरराजेऽप्यजायत । हुङ्कारमुखरं चास्यमन्तरेणापि कारणम् ॥२०६॥

अर्थ: देवराज-इन्द्रके ऊपर भी आज्ञा चलानेका उसका अभिप्राय होने लगा। बिना कारण ही इसका मुख हुंकारसे मुखर हो उठता ॥२०६॥


निष्ठुरत्वं शरीरस्य निर्जितश्रमवत्तरा । कठोरा घर्घरा वाणी दृष्टिपाताः परिस्फुटाः ॥२०७॥

अर्थ: उसका शरीर कठोर हो गया था, शत्रुओंको जीतनेमें वह अधिक श्रम करती थी, उसकी वाणी कर्कश तथा घर्घर स्वरसे युक्त हो गयी थी, उसके दृष्टिपात भी निःशब्द होनेसे स्पष्ट होते थे ॥२०७॥


दर्पणे विद्यमानेऽपि सायकेऽपश्यदाननम् । कथमप्यानमन्मूर्द्धा गुरूणामपि वन्दने ॥२०८॥

अर्थ: दर्पण रहते हुए भी वह कृपाणमें मुख देखती थी और गुरुजनोंकी वन्दनामें भी उसका मस्तक किसी तरह बड़ी कठिनाईसे झुकता था ॥२०८॥


प्रतिपक्षासनाकम्पं कुर्वन्नथ विनिर्गतः । संपूर्णे समये तस्याः कुक्षेः प्राणी सदारुणैः ॥२०९॥

अर्थ: तदनन्तर समय पूर्ण होनेपर वह बालक शत्रुओंके आसन कँपाता हुआ माताके उदरसे बाहर निकला अर्थात् उत्पन्न हुआ ॥२०९॥


प्रभया तस्य जातस्य दिवाकरदुरीक्षया । परिवर्गस्य नेत्रौघाः सुवनस्थगिता इव ॥२१०॥

अर्थ: सूर्यके समान कठिनाईसे देखने योग्य उस बालककी प्रभासे प्रसूति-गृहमें काम करनेवाले परिजनोंके नेत्र ऐसे हो गये जैसे मानो किसी सघन वनसे ही आच्छादित हो गये हों ॥२१०॥


भूतैश्च ताडनाद् भूतो दुन्दुभेरुद्धतो ध्वनिः । कबन्धैः शत्रुगेहेषु कृतमुत्पातनर्तनम् ॥२११॥

अर्थ: भूतजातिके देवों द्वारा ताडित होनेके कारण दुन्दुभि बाजोंसे बहुत भारी शब्द उत्पन्न होने लगा और शत्रुओंके घरोंमें सिररहित धड़ उत्पातसूचक नृत्य करने लगे ॥२११॥


ततो जन्मोत्सवस्तस्य महान् पित्रा प्रवर्तितः । उन्मत्तिकेव यत्रासीत् प्रजा स्वेच्छाविधायिनी ॥२१२॥

अर्थ: तदनन्तर पिताने पुत्रका बड़ा भारी जन्मोत्सव किया। ऐसा जन्मोत्सव कि जिसमें प्रजा पागलके समान अपनी- अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके कार्य करती थी ॥२१२॥


अथ मेरुगुहाकारे तस्मिन् सूतिगृहोदरे । शयने सस्मितस्तिष्ठन् रक्तपादतलश्चलः ॥२१३॥

उत्तानः कम्पयन् भूमिं लीलया शयनान्तिकाम् । सद्यः समुत्थितादित्यमण्डलोपमदर्शनः ॥२१४॥

अर्थ: अथानन्तर जिसके पैरके तलुए लाल-लाल थे ऐसा वह बालक मेरुपर्वतकी गुहाके समान आकारवाले प्रसूतिकागृहमें शय्याके ऊपर मन्द-मन्द हँसता हुआ पड़ा था । हाथ-पैर हिलानेसे चंचल था, चित्त अर्थात् ऊपरकी ओर मुख कर पड़ा था, अपनी लीलासे शय्याकी समीपवर्ती भूमिको कम्पित कर रहा था, और तत्काल उदित हुए सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान था ॥२१३-२१४॥


दत्तं राक्षसनाथेन मेघवाहनरूढये । पुरा नागसहस्रेण रक्षितं प्रस्फुरत्करम् ॥२१५॥

पिनद्धं रक्षसां भीत्या न केनचिदिहान्तरे । आदरेण विना हारं करेणाकर्षदर्भकः ॥२१६॥

अर्थ: बहुत पहले मेघवाहनके लिए राक्षसोंके इन्द्र भीमने जो हार दिया था, हजार नागकुमार जिसकी रक्षा करते थे, जिसकी किरणें सब ओर फैल रही थीं और राक्षसोंके भयसे इस अन्तरालमें जिसे किसीने नहीं पहना था ऐसे हारको उस बालकने अनायास ही हाथसे खींच लिया ॥२१५-२१६॥


हारमुष्टिं ततो बालं दृष्ट्वा माता ससंभ्रमा । चकाराङ्के महास्नेहात् समाजघ्रौ च मूर्धनि ॥२१७॥

अर्थ: बालकको मुट्ठीमें हार लिये देख माता घबड़ा गयी । उसने बड़े स्नेहसे उसे उठाकर गोदमें ले लिया और शीघ्र ही उसका मस्तक सूँघ लिया ॥२१७॥


दृष्ट्वा पिता च तं बालं सहारं परमाद्भुतम् । महानेष नरः कोऽपि भवितेति व्यचिन्तयत् ॥२१८॥

अर्थ: पिताने भी उस बालकको हार लिये बड़े आश्चर्यसे देखा और विचार किया कि यह अवश्य ही कोई महापुरुष होगा ॥२१८॥


नागेन्द्रकृतरक्षेण हारेण रमतेऽमुना । कोऽन्यथा यस्य नो शक्तिर्भविष्यति जनातिगा ॥२१९॥

अर्थ: जिसकी शक्ति लोकोत्तर नहीं होगी ऐसा कौन पुरुष नागेन्द्रोंके द्वारा सुरक्षित इस हारके साथ क्रीड़ा कर सकता है ॥२१९॥


चारणेन समादिष्टं साधुना यद्वचः पुरा । इदं तद्वितथं नैव जायते यतिभाषितम् ॥२२०॥

अर्थ: चारणऋद्धिधारी मुनिराजने पहले जो वचन कहे थे वे यही थे क्योंकि मुनियोंका भाषण कदापि मिथ्या नहीं होता ॥२२०॥


दृष्टाश्चर्यं स हारोऽस्य जनन्या भीतिमुक्तया । पिनद्धो मासयन्नाशा दश जालेन रोचिषाम् ॥२२१॥

अर्थ: यह आश्चर्य देख माताने निर्भय होकर वह हार उस बालकको पहना दिया । उस समय वह हार अपनी किरणोंके समूहसे दसों दिशाओंको प्रकाशमान कर रहा था ॥२२१॥


स्थूलस्वच्छेषु रत्नेषु नवान्यानि मुखानि यत् । हारे दृष्टानि यातोऽसौ तद्दशाननसंज्ञिताम् ॥२२२॥

अर्थ: उस हारमें जो बड़े-बड़े स्वच्छ रत्न लगे हुए थे उनमें असली मुखके सिवाय नौ मुख और भी प्रतिबिम्बित हो रहे थे इसलिए उस बालकका दशानन नाम रखा गया ॥२२२॥


भानुकर्णस्ततो जातः कालेऽतीते कियत्यपि । यस्य भानुरिव न्यस्तः कर्णयोर्गण्डशोभया ॥२२३॥

अर्थ: दशाननके बाद कितना ही समय बीत जानेपर भानुकर्ण उत्पन्न हुआ । भानुकर्णके कपोल इतने सुन्दर थें कि उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो उसके कानोंमें भानु अर्थात् सूर्य ही पहना रखा हो ॥२२३॥


ततश्चन्द्रनखा जाता पूर्णचन्द्रसमानना । उद्यदर्द्धशशाङ्काभनखभासितदिङ्मुखा ॥२२४॥

अर्थ: भानुकर्णके बाद चन्द्रनखा नामा पुत्री उत्पन्न हुई । उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था और उगते हुए अर्धचन्द्रमाके समान सुन्दर नखोंकी कान्तिसे उसने समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर दिया था ॥२२४॥


ततो विभीषणो जातः कृतं येन विभीषणम् । जातमात्रेण पापानां सौम्याकारेण साधुना ॥२२५॥

अर्थ: चन्द्रनखाके बाद विभीषण हुआ । उसका आकार सौम्य था तथा वह साधु प्रकृतिका था । उसने उत्पन्न होते ही पापी लोगोंमें भय उत्पन्न कर दिया था ॥२२५॥


देहवत्त्वं जगामासौ साक्षाद्धर्म इवोत्तमः । अद्यापि गुणजा यस्य कीर्तिर्जगति निर्मला ॥२२६॥

अर्थ: विभीषण ऐसा जान पड़ता था मानो साक्षात् उत्कृष्ट धर्म ही शरीरवत्ताको प्राप्त हुआ हो। उसके गुणोंसे उत्पन्न उसकी निर्मल कीर्ति आज भी संसारमें सर्वत्र छायी हुई है ॥२२६॥


बालक्रीडापि भीमाभूद्दशग्रीवस्य भास्वतः । कनीयसोस्तु सानन्दं विदधे विद्विषामपि ॥२२७॥

अर्थ: तेजस्वी दशाननकी बालक्रीड़ा भी भयंकर होती थी जबकि उसके दोनों छोटे भाइयोंकी बालक्रीड़ा शत्रुओंको भी आनन्द पहुँचाती थी ॥२२७॥


शुशुभे भ्रातृमध्ये सा कन्या सुन्दरविग्रहा । दिवसार्कशशाङ्कानां मध्ये संध्येव सत्क्रिया ॥२२८॥

अर्थ: भाइयोंके बीच सुन्दर शरीरको धारण करनेवाली कन्या चन्द्रनखा, ऐसी सुशोभित होती थी मानो दिन सूर्य और चन्द्रमाके बीच उत्तम क्रियाओंसे युक्त सन्ध्या ही हो ॥२२८॥


मातुरङ्के स्थितोऽथासौ धृतचूडः कुमारकः । दशाननो दशाशानां कुर्वन् ज्योत्स्नां द्विजत्विषा ॥२२९॥

नभसा प्रस्थितं क्वापि द्योतयन्तं दिशस्त्विषा । युक्तं खेचरचक्रेण विभूतिबलशालिना ॥२३०॥

कक्षा विद्युत्कृतोद्योतैर्मदधाराविसर्जिभिः । वेष्टितं दन्तिजीमूतैः कर्णशङ्खबलाहकैः ॥२३१॥

महता तूर्यनादेन श्रुतिबाधिर्यकारिणा । कुर्वाणं मुखरं चक्रं दिशामुरुपराक्रमम् ॥२३२॥

ग्रसित्वेव विमुञ्चन्तं बलेन पुरतो नभः । धीरो वैश्रवणं वीक्षांचक्रे दृष्ट्या प्रगल्भया ॥२३३॥

अर्थ: अथानन्तर चोटीको धारण करनेवाला दशानन एक दिन माताकी गोदमें बैठा हुआ अपने दाँतोंकी किरणोंसे मानो दशों दिशाओंमें चाँदनी फैला रहा था, उसी समय वैश्रवण आकाश-मार्गसे कहीं जा रहा था। वह अपनी कान्तिसे दिशाओंको प्रकाशमान कर रहा था, वैभव और पराक्रमसे सुशोभित विद्याधरोंके समूहसे युक्त था तथा उन हाथीरूपी मेघोंसे घिरा था जो कि मालारूपी बिजलीके द्वारा प्रकाश कर रहे थे, मदरूपी जलकी धाराको छोड़ रहे थे, और जिनके कानोंमें लटकते हुए शंख वलाकाओंके समान जान पड़ते थे। वैश्रवण कानोंको बहरा करनेवाले तुरहीके विशाल शब्दसे दिशाओंके समूहको शब्दायमान कर रहा था। विशाल पराक्रमका धारक था और अपनी बड़ी भारी सेनासे ऐसा जान पड़ता था मानो सामनेके आकाशको ग्रसकर छोड़ ही रहा हो। दशाननने उसे बड़ी गम्भीर दृष्टिसे देखा ॥२२९-२३३॥


महिमानं च दृष्ट्वास्य पप्रच्छेति स मातरम् । निघ्नश्चपलभार्वस्य बालभावेन सस्मितः ॥२३४॥

अम्ब कोऽयमितो याति मन्यमानो निजौजसा । जगत्तृणमिवाशेषं बलेन महता वृतः ॥२३५॥

अर्थ: दशानन लड़कपनके कारण चंचल तो था ही अतः उसने वैश्रवणकी महिमा देख हँसते-हँसते मातासे पूछा कि हे मा ! अपने प्रतापसे समस्त संसारको तृणके समान समझता हुआ, बड़ी भारी सेनासे घिरा यह कौन यहाँसे जा रहा है ॥२३४-२३५॥


ततः साकथयत्तस्य मातृष्वसीय एष ते । सिद्धविद्यः श्रिया युक्तो महत्या लोककीर्तितः ॥२३६॥

शत्रूणां जनयन् कम्पं पर्यटत्येष विष्टपम् । महाविभवसंपन्नो द्वितीय इव भास्करः ॥२३७॥

अर्थ: तब माता उससे कहने लगी कि यह तेरी मौसीका लड़का है। इसे अनेक विद्याएँ सिद्ध हुई हैं, यह बहुत भारी लक्ष्मीसे युक्त है, लोकमें प्रसिद्ध है, महावैभवसे सम्पन्न हुआ दूसरे सूर्यके समान शत्रुओंको कँपकँपी उत्पन्न करता हुआ संसारमें घूमता फिरता है ॥२३६-२३७॥


भवत्कुलक्रमायातां तवोद्वास्य पितामहम् । अयं पाति पुरीं लङ्कां दत्तामिन्द्रेण वैरिणा ॥२३८॥

अर्थ: इन्द्र विद्याधरने तेरे बाबाके भाई मालीको युद्धमें मारा और बाबाको तेरी कुल-परम्परासे चली आयी लंकापुरीसे दूर हटाकर इसे दी सो उसी लंकाका पालन करता है ॥२३८॥


मनोरथशतानेष जनकस्तव चिन्तयन् । तदर्थं न दिवा निद्रां न च नक्तमवाप्नुते ॥२३९॥

अर्थ: इस लंकाके लिए तुम्हारे पिता सैकड़ों मनोरथोंका चिन्तवन करते हुए न दिनमें चैन लेते हैं न रात्रिमें नींद ॥२३९॥


अहमप्यनया पुत्र चिन्तया शोषमागता । अवाप्तं मरणं पुंसां स्वस्थानभ्रंशतो वरम् ॥२४०॥

अर्थ: हे पुत्र ! मैं भी इसी चिन्तासे सूख रही हूँ । अपने स्थानसे भ्रष्ट होनेकी अपेक्षा पुरुषोंका मरण हो जाना अच्छा है ॥२४०॥


पुत्र लक्ष्मीं कदा तु त्वं प्राप्स्यसि स्वकुलोचिताम् । विशल्यमिव यां दृष्ट्वा भविष्यत्यावयोर्मनः ॥२४१॥

अर्थ: हे पुत्र ! तू अपने कुलके योग्य लक्ष्मीको कब प्राप्त करेगा ? जिसे देख हम दोनोंका मन शल्यरहित-सा हो सके ॥२४१॥


कदा नु भ्रातरावेतौ विभूत्या तव संगतौ । द्रक्ष्यामि विहितच्छन्दौ विष्टपे वीतकण्टके ॥२४२॥

अर्थ: मैं कब तेरे इन भाइयोंको विभूतिसे युक्त तथा निष्कण्टक विश्वमें स्वच्छन्द विचरते हुए देखूँगी ? ॥२४२॥


मातुर्दीनवचः श्रुत्वा कृत्वा गर्वस्मितं ततः । विभीषणो बभाणेदमुद्यत्क्रोधविषाङ्कुरः ॥२४३॥

अर्थ: माताके दीन वचन सुनकर जिसके क्रोधरूपी विषके अंकुर उत्पन्न हो रहे थे ऐसा विभीषण गर्वसे मुसकराता हुआ बोला ॥२४३॥


धनदो वा भवत्येष देवो वा कोऽस्य वीक्षितः । प्रभावो येन मातस्त्वं करोषि परिदेवनम् ॥२४४॥

अर्थ: कि हे मा ! यह धनद हो चाहे देव हो, तुमने इसका ऐसा कौन-सा प्रभाव देखा कि जिससे तुम इस प्रकार विलाप कर रही हो ॥२४४॥


वीरप्रसविनी वीरा विज्ञातजनचेष्टिता । एवंविधा सती कस्माद् वदसि त्वं यथेतरा ॥२४५॥

अर्थ: तुम तो वीरप्रसू हो, स्वयं वीर हो, और मनुष्योंकी समस्त चेष्टाओंको जाननेवाली हो । फिर ऐसी होकर भी अन्य स्त्रीकी तरह ऐसा क्यों कह रही हो ॥२४५॥


श्रीवत्समण्डितोरस्को ध्यायताततविग्रहः । अद्भुतैकरसासक्तनित्यचेष्टो महाबलः ॥२४६॥

भस्मच्छन्नाग्निवद्भस्मीकर्तुं शक्तोऽखिलं जगत् । न मनोगोचरं प्राप्तो दशग्रीवः किमम्ब ते ॥२४७॥

अर्थ: जरा ध्यान तो करो कि जिसका वक्षःस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे चिह्नित है, विशाल शरीरको धारण करनेवाला है, जिसकी प्रतिदिनकी चेष्टाएँ एक आश्चर्य रससे ही सनी रहती हैं, जो महाबलवान् है और भस्मसे आच्छादित अग्निके समान समस्त संसारको भस्म करनेमें समर्थ है ऐसा दशानन क्या कभी तुम्हारे मनमें नहीं आया ? २४६-२४७॥


गत्या जयेदयं चित्तमनादरसमुत्थया । तटानि गिरिराजस्य पाटयेच्च चपेटया ॥२४८॥

अर्थ: यह अनादरसे ही उत्पन्न गतिके द्वारा मनको जीत सकता है और हाथकी चपेटासे सुमेरुके शिखर विदीर्ण कर सकता है ॥२४८॥


राजमार्गौ प्रतापस्य स्तम्भौ भुवनवेश्मनः । अङ्कुरौ दर्पवृक्षस्य न ज्ञातावस्य ते भुजौ ॥२४९॥

अर्थ: तुम्हें पता नहीं कि इसकी भुजाएँ प्रतापकी पक्की सड़क हैं, संसाररूपी घरके खम्भे हैं, और अहंकार रूपी वृक्षके अंकुर हैं ॥२४९॥


एवंकृतस्तवोऽथासौ भ्रात्रा गुणकलाविदा । तेजोबहुतरं प्राप सर्पिषेव तनूनपात् ॥२५०॥

अर्थ: इस प्रकार गुण और कलाके जानकार विभीषण भाईके द्वारा जिसकी प्रशंसा की गयी थी ऐसा रावण, घीके द्वारा अग्निके समान बहुत अधिक प्रतापको प्राप्त हुआ ॥२५०॥


जगाद चेति किं मातरात्मनोऽतिविकत्थया । वदामि शृणु यत्सत्यं वाक्यमेतदनुत्तरम् ॥२५१॥

अर्थ: उसने कहा कि माता ! अपनी बहुत प्रशंसा करनेसे क्या लाभ हैं ? परन्तु सच बात तुमसे कहता हूँ सो सुन ॥२५१॥


गर्विता अपि विद्याभिः संभूय मम खेचराः । एकस्यापि न पर्याप्ता भुजस्य रणमूर्द्धनि ॥२५२॥

अर्थ: विद्याओंके अहंकारसे फूले यदि सबके सब विद्याधर मिलकर युद्धके मैदानमें आवें तो मेरी एक भुजाके लिए भी पर्याप्त नहीं हैं ॥२५२॥


कुलोचितं तथापीदं विद्याराधनसंज्ञकम् । कर्म कर्तव्यमस्माभिस्तत्कुर्वाणैर्न लङ्घ्यते ॥२५३॥

अर्थ: फिर भी विद्याओंकी आराधना करना यह हमारे कुलके योग्य कार्य है अतः उसे करते हुए हमें लज्जित नहीं होना चाहिए ॥२५३॥


कुर्वन्त्याराधनं यत्नात् साधवस्तपसो यथा । आराधनं तथा कृत्यं विद्यायाः खगगोत्रजैः ॥२५४॥

अर्थ: जिस प्रकार साधु बड़े प्रयत्नसे तपकी आराधना करते हैं उसी प्रकार विद्याधरोंके गोत्रज पुरुषोंको भी बड़े प्रयत्नसे विद्याकी आराधना करनी चाहिए ॥२५४॥


इत्युक्त्वा धारयन्मानमनुजाभ्यां समन्वितः । पितृभ्यां चुम्बितो मूर्ध्नि कृतसिद्धनमस्कृतिः ॥२५५॥

प्राप्तमङ्गलसंस्कारो निश्चयस्थिरमानसः । निर्गत्य मुदितो गेहादुत्पपात नमस्तलम् ॥२५६॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर मानको धारण करता हुआ रावण अपने दोनों छोटे भाइयोंके साथ विद्या सिद्ध करने के लिए घरसे निकलकर आकाशकी ओर चला गया । जाते समय माता-पिताने उसका मस्तक चूमा था, उसने सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया था, मांगलिक संस्कार उसे प्राप्त हुए थे, उसका मन निश्चयसे स्थिर था तथा प्रसन्नतासे भरा था ॥२५५-२५६॥


क्षणात् प्राप्तं प्रविष्टश्च भीमं नाम महावनम् । दंष्ट्राकरालवदनैः क्रूरसत्त्वैर्निनादितम् ॥२५७॥

अर्थ: क्षण-भरमें ही वह भीम नामक महावनमें जा पहुँचा। जिनके मुख दाढ़ोंसे भयंकर थे ऐसे दुष्ट प्राणी उस वनमें शब्द कर रहे थे ॥२५७॥


सुप्ताजगरनिश्वासप्रेङ्खितोदारपादपम् । नृत्यद्व्यन्तरसंघातपादक्षोभितभूतलम् ॥२५८॥

अर्थ: सोते हुए अजगरोंके श्वासोच्छ्वाससे वहाँ बड़े-बड़े वृक्ष कम्पित हो रहे थे तथा नृत्य करते हुए व्यन्तरोंके चरण-निक्षेपसे वहाँका पृथिवीतल क्षोभित हो रहा था ॥२५८॥


महागह्वरदेशस्थं सूच्यभेद्यतमश्चयम् । कालेनैव स्वयं क्लृप्तसंनिधानं सुभीषणम् ॥२५९॥

अर्थ: वहाँ की बड़ी-बड़ी गुफाओंमें सूचीके द्वारा दुर्भेद्य सघन अन्धकारका समूह विद्यमान था। वह वन इतना भयंकर था कि मानो साक्षात् काल ही सदा उसमें विद्यमान रहता था ॥२५९॥


यस्योपरि न गच्छन्ति सुराश्चापि भयार्दिताः । यच्च भीमतया प्राप प्रसिद्धिं भुवनत्रये ॥२६०॥

अर्थ: देव भी भयसे पीड़ित होकर उसके ऊपर नहीं जाते थे, तथा अपनी भयंकरताके कारण तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध था ॥२६०॥


गिरयो दुर्गमा यत्र ध्वान्तव्याप्तगुहाननाः । साराश्च तरवो लोकं ग्रसितुं प्रोद्यता इव ॥२६१॥

अर्थ: जिनकी गुफाओंके अग्रभाग अन्धकारसे व्याप्त थे ऐसे वहाँ के पर्वत अत्यन्त दुर्गम थे और वहाँ के सुदृढ़ वृक्ष ऐसे जान पड़ते थे मानो लोकको ग्रसने के लिए ही खड़े हों ॥२६१॥


अभिन्नचेतसस्तत्र गृहीत्वा शममुत्तमम् । दुराशादूरितात्मानो धवलाम्बरधारिणः ॥२६२॥

पूर्णेन्दुसौम्यवदनाः शिखामणिविराजिताः । तपश्चरितुमारब्धास्त्रयोऽपि भ्रातरो महत् ॥२६३॥

अर्थ: जिनके चित्तमें किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था, जिनकी आत्माएँ खोटी आशाओंसे दूर थीं, जो शुक्ल वस्त्र धारण कर रहे थे, जिनके मुख पूर्णचन्द्रमाके समान सौम्य थे और जो चूड़ामणिसे सुशोभित थे ऐसे तीनों भाइयोंने उस भीम महावनमें उत्तम शान्ति धारण कर महान् तपश्चरण करना प्रारम्भ किया ॥२६२-२६३॥


विद्या चाष्टाक्षरा नीता वशतां जपलक्षया । सर्वकामान्नदा नाम दिवसार्द्धेन तैस्ततः ॥२६४॥

अर्थ: उन्होंने एक लाख जप कर सर्वकामान्नदा नामकी आठ अक्षरोंवाली विद्या आधे ही दिनमें सिद्ध कर ली ॥२६४॥


अन्नं यथेप्सितं तेभ्यः सोपनिन्ये यतस्ततः । क्षुधाजनितमेतेषां संबभूव न पीडनम् ॥२६५॥

अर्थ: यह विद्या उन्हें जहाँ-तहाँसे मनचाहा अन्न लाकर देती रहती थी जिससे उन्हें क्षुधा सम्बन्धी पीड़ा नहीं होती थी ॥२६५॥


ततो जपितुमारब्धाः सुचित्ताः षोडशाक्षरम् । मन्त्रं कोटिसहस्राणि यस्यावृत्तिर्दशोदिता ॥२६६॥

अर्थ: तदनन्तर हृदयको स्वस्थ कर उन्होंने सोलह अक्षरवाला वह मन्त्र जपना शुरू किया कि जिसकी दस हजार करोड़ आवृत्तियाँ शास्त्रोंमें कही गयी हैं ॥२६६॥


जम्बूद्वीपपतिर्यक्षस्तमथ स्त्रीभिरावृतः । अनावृत इति ख्यातः प्राप्तः क्रीडितुमिच्छया ॥२६७॥

अर्थ: तदनन्तर जम्बूद्वीपका अधिपति अनावृत नामका यक्ष अपनी स्त्रियोंसे आवृत हो इच्छानुसार क्रीड़ा करनेके लिए उस वनमें आया ॥२६७॥


अङ्गनानां ततस्तस्य क्रीडन्तीनां सुविभ्रमम् । ते तपोनिहितात्मानः स्थिता लोचनगोचरे ॥२६८॥

अर्थ: जिनकी आत्मा तपश्चरणमें लीन थी ऐसे तीनों भाई, हाव-भाव-पूर्वक क्रीड़ा करनेवाली उस यक्षकी स्त्रियोंके दृष्टिगोचर हुए ॥२६८॥


रूपेण तास्ततस्तेषां समाकृष्य कचेष्विव । देव्यः समीपमानीताः कौतुकाकुलचेतसः ॥२६९॥

अर्थ: तदनन्तर कौतुकसे जिनका चित्त आकुल हो रहा था ऐसी देवियाँ शीघ्र ही उनके पास इस प्रकार आयीं मानो उनके सौन्दर्यने चोटी पकड़कर ही उन्हें खींच लिया हो ॥२६९॥


ऊचुस्तासामिदं काश्चित्कुञ्चितालककलासिना । वक्त्रेण सद्विरेफेण पद्मस्य श्रियमाश्रिताः ॥२७०॥

नितान्तं सुकुमाराङ्गा विसर्पत्कान्तितेजसः । तपश्चरत किं कार्यमपरित्यक्तवाससः ॥२७१॥

अर्थ: उन देवियोंमें कुछ देवियाँ घुँघराले बालोंसे सुशोभित मुखसे भ्रमरसहित कमलकी शोभा धारण कर रही थीं। उन्होंने कहा कि जिनके शरीर अत्यन्त सुकुमार हैं, जिनकी कान्ति और तेज सब ओर फैल रहा है तथा वस्त्रका जिन्होंने त्याग नहीं किया है ऐसे आप लोग किस लिए तपश्चरण कर रहे हैं ॥२७०-२७१॥


भोगैर्विना न गात्राणामीदृशी जायते रुचिः । ईदृग्देहतया नापि शक्यते परतो भयम् ॥२७२॥

अर्थ: शरीरोंकी ऐसी कान्ति भोगोंके बिना नहीं हो सकती। तथा आपके ऐसे शरीर हैं कि जिससे आपको किसी अन्यसे भय भी उत्पन्न नहीं हो सकता ॥२७२॥


जटामुकुटभारः क्व क्व चेदं प्रथमं वयः । विरुद्धसंप्रयोगस्य स्रष्टारो यूयमुद्गताः ॥२७३॥

अर्थ: कहाँ तो यह जटारूप मुकुटोंका भार और कहाँ यह प्रथम तारुण्य अवस्था ? निश्चित ही आप लोग विरुद्ध पदार्थोंका समागम सृजनेके लिए ही उत्पन्न हुए हैं ॥२७३॥


पीनस्तनतटास्फालसुखसंगमनोचितौ । करौ शिलादिसंगेन किमर्थं प्रापितौ व्यथाम् ॥२७४॥

अर्थ: स्थूल स्तन-तटोंके आस्फालनसे उत्पन्न सुखकी प्राप्तिके योग्य अपने इन हाथोंको आप लोग शिला आदि कर्कश पदार्थोंके समागमसे पीड़ा क्यों पहुँचा रहे हैं ॥२७४॥


अहो ह्रसीयसी बुद्धिर्युष्माकं रूपशालिनाम् । भोगोचितस्य देहस्य यत्कृतं दुःखयोजनम् ॥२७५॥

अर्थ: अहो आश्चर्य है कि रूपसे सुशोभित आप लोगोंकी बुद्धि बड़ी हलकी है कि जिससे भोगोंके योग्य शरीरको आप लोग इस तरह दुःख दे रहे हैं ॥२७५॥


उत्तिष्ठत गृहं यामः किमद्यापि गतं बुधाः । सहास्माभिर्महाभोगान् प्राप्नुत प्रियदर्शनान् ॥२७६॥

अर्थ: उठो घर चलें, हे विज्ञ पुरुषो ! अब भी क्या गया है ? प्रिय पदार्थोंका अवलोकन कर हम लोगोंके साथ महाभोग प्राप्त करो ॥२७६॥


ताभिरित्युदितं तेषां न चक्रे मानसे पदम् । यथा सरोजिनीपत्रे पयसो बिन्दुजालकम् ॥२७७॥

अर्थ: उन देवियोंने यह सब कहा अवश्य, पर उनके चित्तमें ठीक उस तरह स्थान नहीं पा सका कि जिस तरह कमलिनीके पत्रपर पानीके बूँदोंका समूह स्थान नहीं पाता है ॥२७७॥


एवमूचुस्ततश्चान्याः सख्यः काष्ठमया इमे । निश्चलत्वं तथा ह्येषां सर्वेष्वङ्गेषु दृश्यते ॥२७८॥

अर्थ: तदनन्तर कुछ दूसरी देवियाँ परस्परमें इस प्रकार कहने लगीं कि हे सखियो ! निश्चय ही ये काष्ठमय हैं - लकड़ीके पुतले हैं इसीलिए तो इनके समस्त अंगोंमें निश्चलता दिखाई देती है ॥२७८॥


अभिधायेति संक्रुध्य रभसादुपसृत्य च । विशाले हृदये चक्रुरवतंसेन ताडनम् ॥२७९॥

अर्थ: ऐसा कहकर तथा कुछ कुपित हो पासमें जाकर उन देवियोंने उनके विशाल हृदयमें अपने कर्णफूलोंसे चोट पहुँचायी ॥२७९॥


तथापि ते गताः क्षोभं नैवं प्रवणचेतसः । यतः कापुरुषा एव स्खलन्ति प्रस्तुताशयात् ॥२८०॥

अर्थ: फिर भी निपुण चित्तको धारण करनेवाले तीनों भाई क्षोभको प्राप्त नहीं हुए सो ठीक ही है क्योंकि कायर पुरुष ही अपने प्रकृत लक्ष्यसे भ्रष्ट होते हैं ॥२८०॥


देवीनिवेदनाद् हृष्टो जम्बूद्वीपेशिना ततः । कृत्वा च स्मितमित्युक्ताः प्राप्तविस्मयचेतसा ॥२८१॥

अर्थ: तदनन्तर देवियोंके कहनेसे जिसके चित्तमें आश्चर्य उत्पन्न हो रहा था ऐसे जम्बूद्वीपाधिपति अनावृत यक्षने भी हर्षित हो उन तीनों भाइयोंसे मुसकराते हुए कहा ॥२८१॥


भो भोः सुपुरुषाः कस्मात्तपश्चरत दुष्करम् । आराधयत वा देवं कतरं वदताचिरात् ॥२८२॥

अर्थ: कि हे सत्पुरुषो ! आप लोग किस प्रयोजनसे कठिन तपश्चरण कर रहे हो ? अथवा किस देवकी आराधना कर रहे हो ? सो शीघ्र ही कहो ॥२८२॥


इत्युक्तास्ते यदा तस्थुः पुस्तकर्मगता इव । तदा कोपेन यक्षाणां पतिरेवममाषत ॥२८३॥

अर्थ: यक्षके ऐसा कहनेपर भी जब वे मिट्टीसे निर्मित पुतलोंकी तरह निश्चल बैठे रहे तब वह कुपित हो इस प्रकार बोला कि ॥२८३॥


विस्मृत्य मामिमे देवं कमन्यं ध्यातुमुद्यताः । अहो चपलतामीषां परमेयममेधसाम् ॥२८४॥

अर्थ: ये लोग मुझे भुलाकर अन्य किस देवका ध्यान करनेके लिए उद्यत हुए हैं । अहो ! इन मूर्खोंकी यह सबसे बड़ी चपलता है ॥२८४॥


उपद्रवार्थमेतेषां तत्क्षणं च प्रचण्डवाक् । किङ्कराणामदादाज्ञामाज्ञादानप्रतीक्षिणाम् ॥२८५॥

अर्थ: इस तरह कठोर वचन बोलनेवाले उस यक्षेन्द्रने आज्ञा देनेकी प्रतीक्षा करनेवाले अपने सेवकोंको इन तीन भाइयोंपर उपद्रव करनेकी आज्ञा दे दी ॥२८५॥


स्वभावेनैव ते क्रूराः प्राप्य त्वाज्ञां ततोऽधिकाम् । नानारूपधराश्चक्रुः पुरस्तेषामिति क्रियाः ॥२८६॥

अर्थ: वे किंकर स्वभावसे ही क्रूर थे फिर उससे भी अधिक स्वामीकी आज्ञा पा चुके थे इसलिए नाना रूप धारण कर उनके सामने तरह-तरहकी क्रियाएँ करने लगे ॥२८६॥


कश्चिदुत्प्लुत्य वेगेन गृहीत्वा पर्वतोन्नतिम् । पुरः पपात निर्घातान् घातयन्निव सर्वतः ॥२८७॥

अर्थ: कोई यक्ष वेगसे पर्वतके समान ऊँचा उछलकर उनके सामने ऐसा गिरा मानो सब ओरसे वज्र ही गिर रहा हो ॥२८७॥


सर्पेण वेष्टनं कश्चिच्चक्रे सर्वशरीरगम् । भूत्वा च केसरी कश्चिद् व्यादायास्यं समागतः ॥२८८॥

अर्थ: किसी यक्षने साँप बनकर उनके समस्त शरीरको लपेट लिया और कोई सिंह बनकर तथा मुँह फाड़कर उनके सामने आ पहुँचा ॥२८८॥


चक्रुरन्ये रवं कर्णे वधिरीकृतदिङ्मुखम् । दंशहस्तिमरुद्दावसमुद्रत्वं गतास्तथा ॥२८९॥

अर्थ: किन्हींने कानोंके पास ऐसा भयंकर शब्द किया कि उससे समस्त दिशाएँ बहरी हो गयीं । तथा कोई दंशमशक बनकर, कोई हाथी बनकर, कोई आँधी बनकर, कोई दावानल बनकर और कोई समुद्र बनकर भिन्न-भिन्न प्रकारके उपद्रव करने लगे ॥२८९॥


एवंविधैरुपायैस्ते यदा जग्मुर्न विक्रियाम् । ध्यानस्तम्भसमासक्तनिश्चलस्वान्तधारणाः ॥२९०॥

अर्थ: ध्यानरूपी खम्भेमें बद्ध रहनेके कारण जिनका चित्त अत्यन्त निश्चल था ऐसे तीनों भाई जब पूर्वोक्त उपायोंसे विकारको प्राप्त नहीं हुए ॥२९०॥


तदा म्लेच्छबलं भीमं चण्डचण्डालसंकुलम् । करालमायुधैरुग्रैर्विकृतं तैस्तमोनिमम् ॥२९१॥

अर्थ: तब उन्होंने विक्रियासे म्लेच्छोंकी एक बड़ी भयंकर सेना बनायी । वह सेना अत्यन्त क्रोधी चाण्डालोंसे युक्त थी, तीक्ष्ण शस्त्रोंसे भयंकर थी और अन्धकारके समूहके समान जान पड़ती थी ॥२९१॥


कृत्वा पुष्पान्तकं ध्वस्तं विजित्य च किलाहवे । बद्ध्वा रत्नश्रवास्तेषां दर्शितो बान्धवैः समम् ॥२९२॥

अर्थ: तब उन्होंने दिखाया कि युद्धमें जीतकर पुष्पान्तक नगरको विध्वस्त कर दिया है तथा तुम्हारे पिता रत्नश्रवाको भाई-बन्धुओं सहित गिरफ्तार कर लिया गया है ॥२९२॥


अन्तःपुरं च कुर्वाणं विप्रलापं मनश्छिदम् । युष्मासु सत्सु पुत्रेषु दुःखप्राप्तमिति ध्वनत् ॥२९३॥

अर्थ: अन्तःपुर भी हृदयको तोड़ देनेवाला विलाप कर रहा है और साथ ही साथ यह शब्द कर रहा है कि तुम्हारे जैसे पुत्रोंके रहते हुए भी हम दुःखको प्राप्त हुए हैं ॥२९३॥


पुत्रा रक्षत मां म्लेच्छैर्हन्यमानं महावने । तेषामिति पुरः पित्रा प्रयुक्तो भूरिविप्लवः ॥२९४॥

अर्थ: पिता इस प्रकार चिल्ला-चिल्लाकर उनके सामने बहुत भारी बाधा उत्पन्न कर रहा है कि हे पुत्रो ! इस महावनमें म्लेच्छ मुझे मार रहे हैं सो मेरी रक्षा करो ॥२९४॥


ताड्यमाना च चण्डालैर्माता निगडसंयुता । कचाकृष्टा विमुञ्चन्ती धारा नयनवारिणः ॥२९५॥

अर्थ: उन्होंने दिखाया कि तुम्हारी माताको चाण्डाल बेड़ीमें डालकर पीट रहे हैं, चोटी पकड़कर घसीट रहे हैं और वह आँसुओंकी धारा छोड़ रही है ॥२९५॥


जगाद पश्यतावस्थामीदृशीं मे सुता वने । नीताहं शबरैः पल्लीं कथं युष्माकमग्रतः ॥२९६॥

अर्थ: माता कह रही है कि हे पुत्रो ! देखो, वनमें मैं ऐसी अवस्थाको प्राप्त हो रही हूँ । यही नहीं तुम लोगोंके सामने ही शबर लोग मुझे अपनी पल्ली - वसतिमें लिये जा रहे हैं ॥२९६॥


संभूय मम सर्वेऽपि लब्धविद्याबला अपि । एकस्यापि न पर्याप्ता भुजस्य व्योमचारिणः ॥२९७॥

इत्युक्तं वितथं पूर्वमेकस्यापि यतोऽधुना । यूयं म्लेच्छस्य पर्याप्ता न त्रयोऽपि हतौजसः ॥२९८॥

अर्थ: तुम यह पहले झूठ-मूठ ही कहा करते थे कि विद्याबलको प्राप्त सब विद्याधर मिलकर भी मेरी एक भुजाके लिए पर्याप्त नहीं हैं। परन्तु इस समय तो तुम तीनों ही इतने निस्तेज हो रहे हो कि एक ही म्लेच्छके लिए पर्याप्त नहीं हो ॥२९७-२९८॥


दशग्रीव वृथा स्तोत्रमकरोत्ते विभीषणः । एकापि नास्ति ते ग्रीवा जननीं यो न रक्षति ॥२९९॥

अर्थ: हे दशग्रीव, यह विभीषण तेरी व्यर्थ ही स्तुति करता था। जबकि तू माताकी रक्षा नहीं कर पा रहा है तब तो मैं समझती हूँ कि तेरे एक भी ग्रीवा नहीं है ॥२९९॥


कालेन यावता यातस्त्वं मे मानेन वर्जितः । निष्क्रान्तो जठरादस्मादुच्चारस्तावता वरम् ॥३००॥

अर्थ: मानसे रहित तू जितने समय तक मेरे उदरमें रहकर बाहर निकला है उतने समय तक यदि मैं मलको भी धारण करती तो अच्छा होता ॥३००॥


भानुकर्णोऽप्ययं मुक्तः कर्णाभ्यां यो न मे स्वरम् । आर्त्तं शृणोति कुर्वत्या विगतक्रियविग्रहः ॥३०१॥

अर्थ: जान पड़ता है यह भानुकर्ण भी कर्णोंसे रहित है इसलिए तो मैं चिल्ला रही हूँ और यहाँ मेरे दुःख-भरे शब्दको सुन नहीं रहा है। देखो, कैसा निश्चल शरीर धारण किये है ॥३०१॥


विभीषणोऽप्ययं व्यर्थं नाम धत्ते विभीषणः । शक्तो यो नैककस्यापि शबरस्य मृताकृतिः ॥३०२॥

अर्थ: यह विभीषण भी इस विभीषण नामको व्यर्थ ही धारण कर रहा है और मुर्दा जैसा इतना अकर्मण्य हो गया है कि एक भी म्लेच्छका निराकरण करनेमें समर्थ नहीं है ॥३०२॥


म्लेच्छैर्विधर्म्यमाणायां दयां कुरुत नो कथम् । स्वसरि प्रेम हि प्रायः पितृभ्यां सोदरे परम् ॥३०३॥

अर्थ: देखो, ये म्लेच्छ बहन चन्द्रनखाको धर्महीन बना रहे हैं सो इसपर भी तुम दया क्यों नहीं करते हो ? माता-पिताकी अपेक्षा भाईका बहनपर अधिक प्रेम होता है पर इसकी तुम्हें चिन्ता कहाँ है ? ॥३०३॥


विद्या हि साध्यते पुत्रः स्वजनानां समृद्धये । तेषां च पितरौ श्रेष्ठौ तयोश्चैषा व्यवस्थितिः ॥३०४॥

अर्थ: हे पुत्रो ! विद्या सिद्ध की जाती है आत्मीयजनोंकी समृद्धिके लिए सो उन आत्मीयजनोंकी अपेक्षा माता-पिता श्रेष्ठ हैं और माता-पिताकी अपेक्षा बहन श्रेष्ठ है यही सनातन व्यवस्था है ॥३०४॥


भ्रूक्षेपमात्रतोऽप्येते शबरा यान्ति भस्मताम् । भवतां दृग्विषव्यालचक्षुःपातादिव द्रुमाः ॥३०५॥

अर्थ: जिस प्रकार विषधर सर्पकी दृष्टि पड़ते ही वृक्ष भस्म हो जाते हैं उसी प्रकार तुम्हारी भौंहके संचार मात्रसे म्लेच्छ भस्म हो सकते हैं ॥३०५॥


जठरेण मया यूयं धारिताः सुखलिप्सया । पुत्रा हि गदिताः पित्रोः प्रारोहा इव धारकाः ॥३०६॥

अर्थ: मैंने तुम लोगोंको सुख पानेकी इच्छासे ही उदरमें धारण किया था क्योंकि पुत्र वही कहलाते हैं जो पायेकी तरह माता-पिताको धारण करते हैं - उनकी रक्षा करते हैं ॥३०६॥


यदैवसपि न ध्यानभङ्गस्तेषामजायत । तदेति तैः समारब्धं मायाकर्मातिदारुणम् ॥३०७॥

अर्थ: इतना सब कुछ करनेपर भी जब उनका ध्यान भंग नहीं हुआ, तब उन देवोंने अत्यन्त भयंकर मायामयी कार्य करना शुरू किया ॥३०७॥


छिन्नं पित्रोः शिरस्तेषां पुरः सायकधारया । पुरो दशाननस्यापि मूर्द्धा भ्रात्रोर्निपातितः ॥३०८॥

अर्थ: उन्होंने उन तीनोंके सामने तलवारकी धारसे माता-पिताका सिर काटा तथा रावणके सामने उसके अन्य दो भाइयोंका सिर काटकर गिराया ॥३०८॥


तयोरपि पुरो मूर्द्धा दशग्रीवस्य पातितः । येन तौ कोपतः प्राप्तावीषद्ध्यानविकम्पनम् ॥३०९॥

अर्थ: इसी प्रकार उन दो भाइयोंके सामने रावण का सिर काटकर गिराया। इस कार्यसे विभीषण और भानुकर्णके ध्यानमें क्रोधवश कुछ चंचलता आ गयी ॥३०९॥


दशग्रीवस्तु भावस्य दधानोऽत्यन्तशुद्धताम् । महावीर्यो दधत्स्थैर्यं मन्दरस्य महारुचिः ॥३१०॥

अर्थ: परन्तु दशानन भावोंकी शुद्धताको धारण करता हुआ मेरुके समान स्थिर बना रहा। वह महाशक्तिशाली तथा दृढ़श्रद्धानी जो था ॥३१०॥


अवभज्य हृषीकाणां प्रसारं निजगोचरे । अचिराभाचलं चित्तं कृत्वा दासमिवाश्रवम् ॥३११॥

अर्थ: उसने इन्द्रियोंके संचारको अपने आपमें ही रोककर बिजलीके समान चंचल मनको दासके समान आज्ञाकारी बना लिया था ॥३११॥


कण्टकेन कृतत्राणः संवरेण समं ततः । ध्यानवक्तव्याताहीनो दध्यौ मन्त्रं प्रयत्नतः ॥३१२॥

अर्थ: शत्रुसे बदला लेनेकी इच्छारूपी कण्टक तथा जितेन्द्रियतारूपी संवर दोनों ही जिसकी रक्षा कर रहे थे ऐसा दशानन ध्यानसम्बन्धी दोषोंसे रहित होकर प्रयत्नपूर्वक मन्त्रका ध्यान करता रहा ॥३१२॥


यदि नाम तदा ध्यानमाविशेच्छ्रमणोत्तमः । अष्टकर्मसमुच्छेदं ततः कुर्वीत तत्क्षणात् ॥३१३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यदि ऐसा ध्यान कोई मुनिराज धारण करते तो वह उस ध्यानके प्रभावसे उसी समय अष्टकर्मोंका विच्छेद कर देते ॥३१३॥


अत्रान्तरे सदेहानां कृताञ्जलिपुटस्थितम् । सहस्रं तस्य विद्यानामनेकं वशतामितम् ॥३१४॥

अर्थ: इसी बीचमें हाथ जोड़-कर सामने खड़ी हुई अनेक हजार शरीरधारिणी विद्याएँ दशाननको सिद्ध हो गयीं ॥३१४॥


समाप्तिमेति नो यावत्संख्या मन्त्रविवर्तने । -तावदेवास्य ताः सिद्धा निश्चयात् किं न लभ्यते ॥३१५॥

अर्थ: मन्त्र जपनेकी संख्या समाप्त नहीं हो पायी कि उसके पहले ही समस्त विद्याएँ उसे सिद्ध हो गयीं, सो ठीक ही है क्योंकि दृढ़ निश्चयसे क्या नहीं मिलता है ? ॥३१५॥


निश्चयोऽपि पुरोपात्ताल्लभ्यते कर्मणः सितात् । कर्माण्येव हि यच्छन्ति विघ्नं दुःखानुभाविनः ॥३१६॥

अर्थ: दृढ़ निश्चय भी पूर्वोपार्जित उज्ज्वल कर्मसे ही प्राप्त होता है । यथार्थमें कर्म ही दुःखानुभवमें विघ्न उत्पन्न करते हैं ॥३१६॥


काले दानविधिं पात्रे क्षेमे चायुःस्थितिक्षयम् । सम्यग्बोधिफलां विद्यां नामव्यो लब्धुमर्हति ॥३१७॥

अर्थ: योग्य समय पात्रके लिए दान देना, क्षेत्रमें आयुकी स्थिति समाप्त होना तथा रत्नत्रयकी प्राप्तिरूपी फल-से युक्त विद्या प्राप्त होना, इन तीन कार्योंको अभव्य जीव कभी नहीं पाता है ॥३१७॥


कस्यचिद्दशभिर्वर्षैर्विद्या मासेन कस्यचित् । क्षणेन कस्यचित्सिद्धिं यान्ति कर्मानुभावतः ॥३१८॥

अर्थ: किसीको दस वर्षमें, किसीको एक माहमें और किसीको एक क्षणमें ही विद्याएँ सिद्ध हो जाती हैं सो यह सब कर्मोंका प्रभाव है ॥३१८॥


धरण्यां स्वपितु त्यागं करोतु चिरमन्धसः । मज्जत्वप्सु दिवानक्तं गिरेः पततु मस्तकात् ॥३१९॥

विधत्तां पञ्चतायोग्यां क्रियां विग्रहशोषिणीम् । पुण्यैर्विरहितो जन्तुस्तथापि न कृती भवेत् ॥३२०॥

अर्थ: भले ही पृथिवीपर सोवे, चिरकाल तक भोजनका त्याग रखे, रात-दिन पानीमें डूबे रहे, पहाड़की चोटीसे गिरे, और जिससे मरण भी हो जावे ऐसी शरीर सुखानेवाली क्रियाएँ करे तो भी पुण्यरहित जीव अपना मनोरथ सिद्ध नहीं कर सकता ॥३१९-३२०॥


अन्नमात्रं क्रियाः पुंसां सिद्धेः सुकृतकर्मणाम् । अकृतोत्तमकर्माणो यान्ति मृत्युं निरर्थकाः ॥३२१॥

अर्थ: जिन्होंने पूर्व भवमें अच्छे कार्य किये हैं उन्हें सिद्धि अनायास ही प्राप्त होती है । तपश्चरण आदि क्रियाएँ तो निमित्त मात्र हैं पर जिन्होंने पूर्वभवमें उत्तम कार्य नहीं किये वे व्यर्थ ही मृत्युको प्राप्त होते हैं - उनका जीवन निरर्थक जाता है ॥३२१॥


सर्वादरान्मनुष्येण तस्मादाचार्यसेवया । पुण्यमेव सदा कार्यं सिद्धिः पुण्यैर्विना कुतः ॥३२२॥

अर्थ: इसलिए मनुष्यको पूर्ण आदरसे आचार्यकी सेवा कर सदा पुण्यका ही संचय करना चाहिए क्योंकि पुण्यके बिना सिद्धि कैसे हो सकती है ? ॥३२२॥


पश्य श्रेणिक पुण्यानां प्रभावं यद्दशाननः । असंपूर्णे गतः काले विद्यासिद्धिं महामनाः ॥३२३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! पुण्यका प्रभाव देखो कि महामनस्वी दशानन, समय पूर्ण न होनेपर भी विद्याओंकी सिद्धिको प्राप्त हो गया ॥३२३॥


संक्षेपेण करिष्यामि विद्यानां नामकीर्तनम् । अर्थसामर्थ्यतो लब्धं भवावहितमानसः ॥३२४॥

अर्थ: अब मैं संक्षेपसे विद्याओंका नामोल्लेख करता हूँ । विद्याओंके ये नाम उनके अर्थ-कार्यकी सामर्थ्यसे ही प्राप्त हुए हैं - प्रचलित हैं । हे श्रेणिक ! सावधान चित्त होकर सुनो ॥३२४॥


नमःसंचारिणी कायदायिनी कामगामिनी । दुर्निवारा जगत्कम्पा प्रज्ञप्तिर्भानुमालिनी ॥३२५॥

अणिमा लघिमा क्षोभ्या मनःस्तम्भनकारिणी । संवाहिनी सुरध्वंसी कौमारी वधकारिणी ॥३२६॥

सुविधाना तपोरूपा दहनी विपुलोदरी । शुभप्रदा रजोरूपा दिनरात्रिविधायिनी ॥३२७॥

वज्रोदरी समाकृष्टिरदर्शन्यजरामरा । अनलस्तम्भनी तोयस्तम्भनी गिरिदारिणी ॥३२८॥

अवलोकन्यरिध्वंसी घोरा धीरा भुजङ्गिनी । वारुणी भुवनावध्या दारुणा मदनाशिनी ॥३२९॥

भास्करी भयसंभूतिरैशानी विजया जया । बन्धनी मोचनी चान्या वराही कुटिलाकृतिः ॥३३०॥

चित्तोद्भवकरी शान्तिः कौबेरी वशकारिणी । योगेश्वरी बलोत्सादी चण्डा भीतिः प्रवर्षिणी ॥३३१॥

एवमाद्या महाविद्याः पुरासुकृतकर्मणा । स्वल्पैरेव दिनैः प्राप दशग्रीवः सुनिश्चलः ॥३३२॥

अर्थ: संचारिणी, कामदायिनी, कामगामिनी, दुर्निवारा, जगत्कम्पा, प्रज्ञप्ति, भानुमालिनी, अणिमा, लघिमा, क्षोभ्या, मनःस्तम्भनकारिणी, संवाहिनी, सुरध्वंसी, कौमारी, वधकारिणी, सुविधाना, तपोरूपा, दहनी, विपुलोदरी, शुभप्रदा, रजोरूपा, दिनरात्रिविधायिनी, वज्रोदरी, समाकृष्टि, अदर्शनी, अजरा, अमरा, अनलस्तम्भिनी, तोयस्तम्भिनी, गिरिदारणी, अवलोकिनी, अरिध्वंसी, घोरा, धीरा, भुजंगिनी, वारुणी, भुवना, अवध्या, दारुणा, मदनाशिनी, भास्करी, भयसंभूति, ऐशानी, विजया, जया, बन्धनी, मोचनी, वाराही, कुटिलाकृति, चित्तोद्भवकरी, शान्ति, कौबेरी, वशकारिणी, योगेश्वरी, बलोत्सादी, चण्डा, भीति और प्रवर्षिणी आदि अनेक महाविद्याओंको निश्चल परिणामोंका धारी दशानन पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके उदयसे थोड़े ही दिनोंमें प्राप्त हो गया ॥३२५-३३२॥


सर्वाहा रतिसंवृद्धिर्जृम्भिणी व्योमगामिनी । निद्राणी चेति पञ्चैता भानुकर्णं समाश्रिताः ॥३३३॥

अर्थ: सर्वाहा, रतिसंवृद्धि, जृम्भिणी, व्योमगामिनी और निद्राणी ये पाँच विद्याएँ भानुकर्णको प्राप्त हुईं ॥३३३॥


सिद्धार्था शत्रुदमनी निर्व्याघाता खगामिनी । विद्या विभीषणं प्राप्ताश्चतस्रो दयिता इव ॥३३४॥

अर्थ: सिद्धार्था, शत्रुदमनी, निर्व्याघाता और आकाशगामिनी ये चार विद्याएँ प्रिय स्त्रियोंके समान विभीषणको प्राप्त हुईं ॥३३४॥


ईश्वरत्वं ततः प्राप्ता विद्यायां ते सुविभ्रमाः । जन्मान्यदिवसं प्रापुर्महासंमदकारणम् ॥३३५॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याओंके ऐश्वर्यको प्राप्त हुए वे तीनों भाई महाहर्षके कारणभूत नूतन जन्मको ही मानो प्राप्त हुए थे ॥३३५॥


ततः पत्यापि यक्षाणां दृष्ट्वा विद्याः समागताः । पूजितास्ते महाभूत्या दिव्यालंकारभूषिताः ॥३३६॥

अर्थ: तदनन्तर यक्षोंके अधिपति अनावृत यक्षने भी विद्याओंको आया देख महावैभवसे उन तीनों भाइयोंकी पूजा की और उन्हें दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत किया ॥३३६॥


स्वयंप्रभमिति ख्यातं नगरं च निवेशितम् । मेरुश्रृङ्गसमुच्छ्रायसद्मपङ्क्तिविराजितम् ॥३३७॥

अर्थ: दशाननने विद्याके प्रभावसे स्वयंप्रभ नामका नगर बसाया । वह नगर मेरुपर्वतके शिखरके समान ऊँचे-ऊँचे मकानोंकी पंक्तिसे सुशोभित था ॥३३७॥


मुक्ताजालपरिक्षिप्तगवाक्षैर्दूरमुन्नतैः । रत्नजाम्बूनदस्तम्भैरञ्चितं चैत्यवेश्मभिः ॥३३८॥

अर्थ: जिनके झरोखोंमें मोतियोंकी झालर लटक रही थी, जो बहुत ऊँचे थे तथा जिनके खम्भे रत्न और स्वर्णके बने थे ऐसे जिनमन्दिरोंसे अलंकृत था ॥३३८॥


अन्योन्यकरसंबन्धजनितेन्द्रशरासनैः । रत्नैः कृतसमुद्योतं नित्यविद्युत्समप्रभैः ॥३३९॥

अर्थ: परस्परकी किरणोंके सम्बन्धसे जो इन्द्रधनुष उत्पन्न कर रहे थे, तथा निरन्तर स्थिर रहनेवाली बिजलीके समान जिनकी प्रभा थी ऐसे रत्नोंसे वह नगर सदा प्रकाशमान रहता था ॥३३९॥


भ्रातृभ्यां सहितस्तत्र प्रासादे गगनस्पृशि । विद्याबलेन संपन्नः सुखं तस्थौ दशाननः ॥३४०॥

अर्थ: उसी नगरके गगनचुम्बी राजमहलमें विद्याबलसे सम्पन्न दशानन अपने दोनों भाइयोंके साथ सुखसे रहने लगा ॥३४०॥


जम्बूद्वीपपतिः प्राह तत एवं दशाननम् । विस्मितस्तव वीर्येण प्रसन्नोऽहं महामते ॥३४१॥

अर्थ: तदनन्तर आश्चर्यसे भरे जम्बूद्वीपके अधिपति अनावृत यक्षने एक दिन दशाननसे कहा कि हे महाबुद्धिमन् ! मैं तुम्हारे वीर्यसे बहुत प्रसन्न हूँ ॥३४१॥


चतुःसमुद्रपर्यन्ते नागव्यन्तरसंकुले । तिष्ठत्वत्र यथाच्छन्दं जम्बूद्वीपतले भवान् ॥३४२॥

अर्थ: अतः जिसके अन्तमें पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण इस प्रकार चार समुद्र हैं तथा जो नागकुमार और व्यन्तर देवोंसे व्याप्त है ऐसे इस जम्बूद्वीपमें इच्छानुसार रहो ॥३४२॥


द्वीपस्यास्य समस्तस्य वसिताहमकण्टकः । यथेप्सितं चरेस्तस्मिन्नुद्धरन् शत्रुसंहतिम् ॥३४३॥

अर्थ: मैं इस समस्त दीपका अधिपति हूँ, मेरा कोई भी प्रतिद्वन्द्वी नहीं है अतः तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम शत्रुसमूहको उखाड़ते हुए इस जम्बूद्वीपमें इच्छानुसार सर्वत्र विचरण करो ॥३४३॥


प्रसन्ने मयि ते वत्स स्मृतिमात्रपुरःस्थिते । ईप्सितव्याहतौ शक्तो न शक्रोऽपि कुतोऽपरे ॥३४४॥

अर्थ: हे वत्स ! मैं तुझपर प्रसन्न हूँ और तेरे स्मरण मात्रसे सदा तेरे सामने खड़ा रहूँगा । मेरे प्रभावसे तेरे मनोरथमें बाधा पहुँचानेके लिए इन्द्र भी समर्थ नहीं हो सकेगा फिर साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है ? ॥३४४॥


द्राघिष्ठं जीव कालं त्वं भ्रातृभ्यां सहितः सुखी । वर्द्धन्तां भूतयो दिव्या बन्धुसेव्याः सदा तव ॥३४५॥

अर्थ: तू अपने दोनों भाइयोंके साथ सुखी रहता हुआ दीर्घ काल तक जीवित रह । तेरी दिव्य विभूतियाँ सदा बढ़ती रहें और बन्धुजन सदा उनका सेवन करते रहें ॥३४५॥


इत्याशीर्भिः समानन्द्य सत्याभिस्तान् पुनः पुनः । जगाम स्वालयं यक्षः परिवारसमन्वितः ॥३४६॥

अर्थ: इस प्रकार यथार्थ आशीर्वादसे उन तीनों भाइयोंको आनन्दित कर वह यक्ष परिवारके साथ अपने स्थानपर चला गया ॥३४६॥


तं रत्नश्रवसं श्रुत्वा विद्यालिङ्गितविग्रहम् । सर्वतो रक्षसां सङ्घाः प्राप्ताः कृतमहोत्सवाः ॥३४७॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननको विद्याओंसे आलिंगित सुन चारों ओरसे राक्षसोंके समूह महोत्सव करते हुए उसके समीप आये ॥३४७॥


उन्नतं ननृतुः केचिच्चक्रुरास्फोटनं तथा । केचित् प्रमोदसंपूर्णाः संभूता न स्वविग्रहे ॥३४८॥

अर्थ: उनमें कोई तो नृत्य करते थे, कोई ताल बजाते थे, कोई हर्षसे इतने फूल गये थे कि अपने शरीरमें ही नहीं समाते थे ॥३४८॥


उदात्तं नदितं कैश्चिच्छत्रुपक्षमयंकरम् । सुधयेव नमः कैश्चिल्लिम्पद्भिर्हसितं चिरम् ॥३४९॥

अर्थ: कितने ही लोग शत्रुपक्षको भयभीत करनेवाला जोरका सिंहनाद करते थे, कोई आकाशको चूनासे लिप्त करते हुए-की तरह चिरकाल तक हँसते रहते थे ॥३४९॥


सुमाली माल्यवान् सूर्यरजा ऋक्षरजास्तथा । आगता नितरां प्रीताः समारुह्योत्तमान् रथान् ॥३५०॥

अर्थ: प्रीतिसे भरे सुमाली, माल्यवान्, सूर्यरज और ऋक्षरज उत्तमोत्तम रथोंपर सवार हो उसके समीप आये ॥३५०॥


अन्ये च स्वजनाः सर्वे विमानैर्वाजिभिर्गजैः । स्वदेशेभ्यो विनिष्क्रान्तास्त्रासेन परिवर्जिताः ॥३५१॥

अर्थ: इनके सिवाय अन्य सभी कुटुम्बीजन, कोई विमानोंपर बैठकर, कोई घोड़ोंपर सवार होकर और कोई हाथियोंपर आरूढ़ होकर आये । वे सब भयसे रहित थे ॥३५१॥


अथ रत्नश्रवाः पुत्रस्नेहसंपूर्णमानसः । वैजयन्तीभिराकाशं शुक्लीकुर्वन्निरन्तरम् ॥३५२॥

विभूत्या परया युक्तो वन्दिवृन्दैरभिष्टुतः । संप्राप्तो रथमारूढो महाप्रासादसंनिभम् ॥३५३॥

अर्थ: अथानन्तर पुत्रके स्नेहसे जिसका मन भर रहा था ऐसा रत्नश्रवा पताकाओंसे आकाशको निरन्तर शुक्ल करता हुआ बड़ी विभूतिके साथ आया । बन्दीजनोंके समूह उसकी स्तुति कर रहे थे, और वह किसी बड़े राजमहलके समान सुन्दर रथपर सवार था ॥३५२-३५३॥


एकीभूय व्रजन्तोऽमी पञ्चसंगमपर्वते । दुःखेन रजनीं निन्युररातिमययोगतः ॥३५४॥

अर्थ: ये सब मिलकर साथ ही साथ आ रहे थे सो मार्गमें पंचसंगम नामक पर्वतपर उन्होंने शत्रुके भयके कारण बहुत ही दुखसे रात्रि बितायी ॥३५४॥


ततो गुरून् प्रणामेन समाश्लेषणतः सखीन् । स्निग्धेन चक्षुषा भृत्यान् जगृहुः कैकसीसुताः ॥३५५॥

अर्थ: तदनन्तर केकसीके पुत्र दशानन आदिने आगे जाकर उन सबकी अगवानी की। उन्होंने गुरुजनोंको प्रणाम किया, मित्रोंका आलिंगन किया और भृत्योंकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा ॥३५५॥


शरीरक्षेमपृच्छादिसिद्धिवृत्तान्तसंकथा । न तेषामवगीतत्वं प्राप्तारब्धा पुनः पुनः ॥३५६॥

अर्थ: गुरुजनोंने भी दशानन आदिसे शरीरकी कुशल-क्षेम पूछी, विद्याएँ किस तरह सिद्ध हुईं आदि का वृत्तान्त भी बार-बार पूछा सो ऐसे अवसरपर किसी बातको बार-बार पूछना निन्दनीय नहीं है ॥३५६॥


ददृशुर्विस्मयापन्नाः स्वयंप्रभपुरोत्तमम् । देवलोकप्रतिच्छन्दं यातुधानप्लवङ्गमाः ॥३५७॥

अर्थ: राक्षस तथा वानर-वंशियोंने देवलोकके समान उस स्वयंप्रभनगरको बड़े आश्चर्यके साथ देखा ॥३५७॥


सवेपथुकरेणैषां गात्रमस्पृशतां चिरम् । पितरौ सप्रणामानामानन्दाचाकुलेक्षणौ ॥३५८॥

अर्थ: जिनके नेत्र आनन्दसे व्याप्त थे ऐसे माता-पिताने प्रणाम करते हुए दशानन आदिके शरीरका काँपते हुए हाथों-से चिरकाल तक स्पर्श किया ॥३५८॥


नभोमध्ये गते मानौ तेषां स्नानविधिस्ततः । दिव्याभिः कर्तुमारब्धो वनितामिर्महोत्सवः ॥३५९॥

अर्थ: जब सूर्य आकाशके मध्यभागमें था तब दिव्य वनिताओंने बड़े उत्सवके साथ उन तीनों कुमारोंकी स्नानविधि प्रारम्भ की ॥३५९॥


मुक्ताजालपरीतेषु स्नानपीठेषु ते स्थिताः । नानारत्नसमृद्धेषु जात्यजाम्बूनदात्मसु ॥३६०॥

अर्थ: जिनके चारों ओर मोतियोंके समूह व्याप्त थे तथा जो नाना प्रकारके रत्नोंसे समृद्ध थे ऐसे उत्कृष्ट स्वर्णनिर्मित स्नानकी चौकियोंपर वे आसीन हुए ॥३६०॥


पादपीठेषु चरणौ निहितौ पल्लवच्छवी । उदयाद्रिशिरोवर्तिदिवाकरसमाकृती ॥३६१॥

अर्थ: पल्लवोंके समान लाल-लाल कान्तिके धारक दोनों पैर उन्होंने पादपीठपर रखे थे और उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उदयाचलके शिखरपर वर्त-मान सूर्य ही हो ॥३६१॥


ततो रत्नविनिर्माणैः सौवर्णै राजतात्मकैः । कुम्भैः पल्लवसंछन्नवक्त्रैर्हारविराजितैः ॥३६२॥

चन्द्रादित्यप्रतिस्पर्द्धि छायावच्छादितात्मभिः । आमोदवासिताशेषदिक्चक्रजलपूरितैः ॥३६३॥

एकानेकमुखैः प्रान्तभ्रान्तभ्रमरमण्डलैः । गर्जद्भिर्जलपातेन गंभीरजलदैरिव ॥३६४॥

अर्थ: तदनन्तर रत्नमयी, सुवर्णमयी और रजतमयी उन कलशोंसे उनका अभिषेक शुरू हुआ कि जिनके मुख पल्लवोंसे आच्छादित थे, जो हारोंसे सुशोभित थे, चन्द्रमा तथा सूर्यके साथ स्पर्द्धा करनेवाली कान्तिसे जिनका आत्म-स्वरूप आच्छादित था, जो अपनी सुगन्धिसे दिङ्मण्डलको सुवासित करनेवाले जलसे पूर्ण थे, जिनमें एक तो प्रधान मुख था तथा अन्य छोटे-छोटे अनेक मुख थे, जिनके आस-पास भ्रमरोंके समूह मँडरा रहे थे और जो जलपातके कारण गम्भीर मेघके समान गरज रहे थे ॥३६२-३६४॥


गन्धैरुद्वर्तनैः कान्तिविधानकुशलैस्तथा । अभिषेकः कृतस्तेषां तूर्यनादादिनन्दितः ॥३६५॥

अर्थ: तदनन्तर शरीरकी कान्ति बढ़ानेमें कुशल उबटना आदि लगाकर सुगन्धित जलसे उनका अभिषेक किया गया। उस समय तुरही आदि वादित्रोंके मंगलमय शब्दोंसे वहाँका वातावरण आनन्दमय हो रहा था ॥३६५॥


अलंकृतस्ततो देहो दिव्यवस्त्रविभूषणैः । मङ्गलानि प्रयुक्तानि कुलनारीभिरादरात् ॥३६६॥

अर्थ: तत्पश्चात् दिव्य वस्त्राभूषणों-से उनके शरीर अलंकृत किये गये और कुलांगनाओंने बड़े आदरसे अनेक मंगलाचार किये ॥३६६॥


ततो देवकुमाराभैः स्वजनानन्ददायिभिः । गुरूणां विनयादेतैः कृतं चरणवन्दनम् ॥३६७॥

अर्थ: तदनन्तर जो देवकुमारोंके समान जान पड़ते थे और आत्मीयजनोंको आनन्द प्रदान कर रहे थे ऐसे उन तीनों कुमारोंने बड़ी विनयसे गुरुजनोंकी चरणवन्दना की ॥३६७॥


अत्याशिषस्ततो दृष्ट्वा तेषां विद्योत्थसंपदः । जीवतातिचिरं कालमिति तान् गुरवोऽब्रुवन् ॥३६८॥

अर्थ: तदनन्तर गुरुजनोंने देखा कि इन्हें जो विद्याओंसे सम्पदाएँ प्राप्त हुई हैं वे हमारे आशीर्वादसे भी अधिक है अतः उन्होंने यही कहा कि तुम लोग चिरकाल तक जीवित रहो ॥३६८॥


सुमाली माल्यवान् सूर्यरजा ऋक्षरजास्तथा । रत्नश्रवाश्च तान् स्नेहादालिलिङ्गुः पुनः पुनः ॥३६९॥

अर्थ: सुमाली, माल्यवान्, सूर्यरज, ऋक्षरज और रत्नश्रवाने स्नेहवश उनका बार-बार आलिंगन किया था ॥३६९॥


समं बान्धवलोकेन भृत्यवर्गेण चावृताः । चक्रुरभ्यवहारं ते स्वेच्छाकल्पितसंपदः ॥३७०॥

अर्थ: तदनन्तर इच्छानुसार जिन्हें सब सम्पदाएँ प्राप्त थीं ऐसे उन सब लोगोंने बन्धुजनों तथा भृत्य-वर्गसे आवृत होकर भोजन किया ॥३७०॥


गुरुषु प्राप्तपूजेषु ततो वस्त्रादिदानतः । यथार्हं भृत्यवर्गे च संप्राप्तप्रतिमानने ॥३७१॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननने वस्त्र आदि देकर गुरुजनोंकी पूजा की और यथायोग्य भृत्यवर्गका भी सम्मान किया ॥३७१॥


विश्रब्धा गुरवोऽपृच्छंस्तान् प्रीतिविकचेक्षणाः । दिवसा नियतो वत्साः सुखेन सुस्थिता इति ॥३७२॥

अर्थ: तत्पश्चात् प्रीतिसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे समस्त गुरुजन निश्चिन्ततासे बैठे थे । प्रकरण पाकर उन्होंने कहा कि हे पुत्रो ! इतने दिन तक तुम सब सुखसे रहे ? ॥३७२॥

७. सप्तमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं) (जारी)

ततस्ते मस्तके कृत्वा करयुग्मं प्रणामिनः । ऊचुर्नः कुशलं नित्यं प्रसादाद् भवतामिति ॥३७३॥

अर्थ: तब दशानन आदि कुमारोंने हाथ जोड़ सिरसे लगाकर प्रणाम करते हुए कहा कि आप लोगोंके प्रसादसे हम सबकी कुशल है ॥३७३॥


मालिनः संकथाप्राप्तं कथयन् मरणं ततः । सुमाली शोकभारेण सद्यो मूर्च्छां समागतः ॥३७४॥

अर्थ: तदनन्तर प्रकरणवश मालीके मरणकी चर्चा करते हुए सुमाली इतने शोकग्रस्त हुए कि उन्हें तत्काल ही मूर्च्छा आ गयी ॥३७४॥


रत्नश्रवःसुतेनासौ ततः शीतलपाणिना । संस्पृश्य पुनरानीतो ज्येष्ठेन व्यक्तचेतनाम् ॥३७५॥

अर्थ: तत्पश्चात् रत्नश्रवाके जेष्ठ पुत्र दशाननने अपने शीतल हाथसे स्पर्श कर उन्हें पुनः सचेत किया ॥३७५॥


आनन्दितश्च तद्वाक्यैरूर्जितैर्हिमशीतलैः । समस्तशत्रुसंघातघातबीजाङ्कुरोद्गमैः ॥३७६॥

अर्थ: तथा बर्फके समान ठण्डे और समस्त शत्रुसमूहके घातरूपी बीजके अंकुरोद्गमके समान शक्तिशाली वचनोंसे उन्हें आनन्दित किया ॥३७६॥


पुण्डरीकेक्षणं पश्यन् सुमाली तं ततोऽर्भकम् । शोकं क्षणात्समुत्सृज्य पुनरानन्दमागतः ॥३७७॥

अर्थ: तब कमलके समान नेत्रोंसे सुशोभित दशाननको देख, सुमाली तत्काल ही सब शोक छोड़कर पुनः आनन्दको प्राप्त हो गये ॥३७७॥


इति चोवाच तं हृद्यैर्वचोभिर्वितथेतरैः । अहो वत्स तवोदारं सत्त्वं तोषितदैवतम् ॥३७८॥

अर्थ: और दशाननसे हृदयहारी सत्य वचन कहने लगे कि अहो वत्स ! सचमुच ही तुम्हारा उदार बल देवताओंको सन्तुष्ट करनेवाला है ॥३७८॥


अहो द्युतिरियं जित्वा स्थिता तव दिवाकरम् । अहो गाम्भीर्यमुत्सार्य स्थितमेतन्नदीपतिम् ॥३७९॥

अर्थ: अहो ! तुम्हारी यह कान्ति सूर्यको जीतकर स्थित है और तुम्हारा गाम्भीर्य समुद्रको दूर हटाकर विद्यमान है ॥३७९॥


अहो पराक्रमः कान्त्या सहितोऽयं जैनातिगः । अहो रक्षःकुलस्यासि जातस्तात विशेषकः ॥३८०॥

अर्थ: अहो ! तुम्हारा यह कान्तिसहित पराक्रम सर्वजनातिगामी है अर्थात् सब लोगोंसे बढ़कर है । अहो पुत्र ! तुम राक्षसवंशके तिलक-स्वरूप उत्पन्न हुए हो ॥३८०॥


मन्दरेण यथा जम्बूद्वीपः कृतविभूषणः । नभस्तलं शशाङ्केन यथा तिग्मकरेण च ॥३८१॥

सुपुत्रेण तथा रक्षःकुलमेतद्दशानन । त्वया लोकमहाश्चर्यकारिचेष्टेन भूषितम् ॥३८२॥

अर्थ: हे दशानन ! जिस प्रकार सुमेरुपर्वतसे जम्बूद्वीप सुशोभित है और चन्द्रमा तथा सूर्यसे आकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार लोगोंको महान् आश्चर्यमें डालनेवाली चेष्टाओंसे युक्त तुझ सुपुत्रसे यह राक्षसवंश सुशोभित हो रहा है ॥३८१-३८२॥


आसंस्तोयदवाहाद्या नरास्त्वत्कुलपूर्वजाः । भुक्त्वा लङ्कापुरीं कृत्वा सुकृतं ये गताः शिवम् ॥३८३॥

अर्थ: मेघवाहन आदि तुम्हारे कुलके पूर्वपुरुष थे जो लंकापुरीका पालन कर तथा अन्तमें तपश्चरण कर मोक्ष गये हैं ॥३८३॥


अस्मद्व्यसनविच्छेदेपुण्यैर्जातोऽसि सांप्रतम् । वक्त्रेणैकेन ते तोषात् कथयामि कथं कथाम् ॥३८४॥

अर्थ: अब हमारे दुःखोंको दूर करनेवाले पुण्यसे तू उत्पन्न हुआ है । हे पुत्र ! एक तेरे मुखसे मुझे जो सन्तोष हो रहा है उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ ॥३८४॥


नभश्चरगणैरेभिः प्रत्याशा जीवितं प्रति । मुक्ता सती पुनर्बद्धा त्वय्युत्साहपरायणे ॥३८५॥

अर्थ: इन विद्याधरोंने तो जीवित रहनेकी आशा छोड़ दी थी अब तुझ उत्साहीके उत्पन्न होनेपर फिरसे आशा बाँधी है ॥३८५॥


कैलासमन्दरायातैरस्माभिर्वन्दितुं जिनम् । प्रणम्यातिशयज्ञानः पृष्टः श्रमणसत्तमः ॥३८६॥

भविता पुनरस्माकं कदा नाथ समाश्रयः । लङ्कायामिति सद्वाक्यमेवमाहानुकम्पकः ॥३८७॥

अर्थ: एक बार हम जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करनेके लिए कैलास पर्वतपर गये थे । वहाँ अवधिज्ञानके धारी मुनिराजको प्रणाम कर हमने पूछा था कि हे नाथ ! लंकामें हमारा निवास फिर कब होगा ? इसके उत्तरमें दयालु मुनिराजने कहा था ॥३८६-३८७॥


लप्स्यते भवतः पुत्राज्जन्म यः पुरुषोत्तमः । संभूतायां वियद्बिन्दोः स लङ्कायां प्रवेशकः ॥३८८॥

अर्थ: कि तुम्हारे पुत्रसे वियद्बिन्दुकी पुत्रीमें जो उत्तम पुरुष जन्म प्राप्त करेगा वही तुम्हारा लंकामें प्रवेश करानेवाला होगा ॥३८८॥


भरतस्य स खण्डांस्त्रीन् भोक्ष्यते बलविक्रमः । सत्त्वप्रतापविनयश्रीकीर्तिरुचिसंश्रयः ॥३८९॥

अर्थ: वह पुत्र बल और पराक्रमका धारी तथा सत्त्व, प्रताप, विनय, लक्ष्मी, कीर्ति और कान्तिका अनन्य आश्रय होगा तथा भरतक्षेत्रके तीन खण्डोंका पालन करेगा ॥३८९॥


गृहीतां रिपुणा लक्ष्मीं मोचयिष्यत्यसावपि । नैतच्चित्रं यतस्तस्यां स प्राप्स्यति परां श्रियम् ॥३९०॥

अर्थ: शत्रुके द्वारा अपने अधीन की हुई लक्ष्मीको यही पुत्र उससे मुक्त करावेगा इसमें आश्चर्यकी भी कोई बात नहीं है क्योंकि वह लंकामें परम लक्ष्मीको प्राप्त होगा ॥३९०॥


स त्वं महोत्सवो जातः कुलस्य शुभलक्षणः । उपमानविमुक्तेन रूपेण हृतलोचनः ॥३९१॥

अर्थ: सो कुलके महोत्सवस्वरूप तू उत्पन्न हो गया है, तेरे सब लक्षण शुभ हैं तथा अनुपमरूपसे तू सबके नेत्रोंको हरनेवाला है ॥३९१॥


इत्युक्तोऽसौ जगादैवमस्त्विति प्रणतानतः । शिरस्यञ्जलिमाधाय कृतसिद्धनमस्कृतिः ॥३९२॥

अर्थ: सुमालीके ऐसा कहनेपर दशाननने लज्जासे अपना मस्तक नीचा कर लिया और ‘एवमस्तु’ कह हाथ जोड़ सिरसे लगाकर सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया ॥३९२॥


प्रभावात्तस्य बालस्य बन्धुवर्गस्ततः सुखम् । अध्युवास यथास्थानमरातिभयवर्जितः ॥३९३॥

अर्थ: तदनन्तर उस बालकके प्रभावसे सब बन्धुजन शत्रुके भयसे रहित हो यथास्थान सुखसे रहने लगे ॥३९३॥


एवं पूर्वभवार्जितेन पुरुषाः पुण्येन यान्ति श्रियं कीर्तिच्छन्नदिगन्तरालभुवना नास्मिन् वयः कारणम् । अग्नेः किं न कणः करोति विपुलं भस्म क्षणात् काननं मत्तानां करिणां भिनत्ति निवहं सिंहस्य वा नार्भकः ॥३९४॥

अर्थ: तदनन्तर गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस प्रकार पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मके प्रभावसे मनुष्य कीर्तिके द्वारा दिग्दिगन्तराल तथा लोकको आच्छादित करते हुए लक्ष्मीको प्राप्त होते हैं । इसमें मनुष्यकी आयु कारण नहीं है । क्या अग्निका एक कण क्षणभरमें विशाल वनको भस्म नहीं कर देता अथवा सिंहका बालक मदोन्मत्त हाथियोंके झुण्डको विदीर्ण नहीं कर देता ? ॥३९४॥


बोधं ह्याशु कुमुद्वतीषु कुरुते शीतांशुरोचिर्लवः संतापं प्रणुदन् दिवाकरकरैरुत्पादितं प्राणिनाम् । निद्राविद्रुतिहेतुभिश्च समये जीमूतमालानिभं ध्वान्तं दूरमपाकरोति किरणैरुद्योतमात्रो रविः ॥३९५॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंका एक अंश, सूर्यकी किरणोंसे उत्पादित प्राणियोंके सन्तापको दूर करता हुआ शीघ्र ही कुमुदिनियोंमें उल्लास पैदा कर देता है और सूर्य उदित होते ही निद्राको दूर हटानेवाली अपनी किरणोंसे मेघमालाके समान मलिन अन्धकारको दूर कर देता है ॥३९५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशग्रीवाभिधानं नाम सप्तमं पर्व ॥७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यविरचित पद्मचरितमें दशाननका वर्णन करनेवाला सातवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥७॥

८. अष्टमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं)

अथासीद्दक्षिणश्रेण्यां भास्करप्रतिमो द्युतौ । सुवीरोऽसुरसंगीते पुरे मयखगेश्वरः ॥१॥

दैत्यत्वेन प्रसिद्धस्य समस्ते तस्य भूतले । नाम्ना हेमवती भार्या योषिद्गुणसमन्विता ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें असुर-संगीत नामका नगर है। वहाँ कान्तिमें सूर्यकी उपमा धारण करनेवाला प्रबल योद्धा मय नामका विद्याधर रहता था। वह पृथिवीतलमें दैत्य नामसे प्रसिद्ध था। उसकी हेमवती नामकी स्त्री थी जो स्त्रियोंके समस्त गुणोंसे सहित थी ॥१-२॥


सुता मन्दोदरी नाम सर्वावयवसुन्दरी । तनूदरी विशालाक्षी लावण्यजलवेणिका ॥३॥

अर्थ: उसकी मन्दोदरी नामकी पुत्री थी। उसके समस्त अवयव सुन्दर थे, उदर कृश था, नेत्र विशाल थे और वह सौन्दर्यरूपी जलकी धाराके समान जान पड़ती थी ॥३॥


नवयौवनसंपूर्णां दृष्ट्वा तामन्यदा पिता । चिन्ताव्याकुलितः प्राह दयितामिति सादरम् ॥४॥

आरूढा नवतारुण्यं वत्सा मन्दोदरी प्रिये । गुणितेवैतदीया मे चिन्तामानसमाश्रिता ॥५॥

अर्थ: एक दिन नवयौवनसे सम्पूर्ण उस पुत्रीको देखकर पिता चिन्तासे व्याकुल हो अपनी स्त्रीसे बड़े आदरके साथ बोला कि हे प्रिये ! पुत्री मन्दोदरी नवयौवनको प्राप्त हो चुकी है । इसे देख मेरी इस विषयकी मानसिक चिन्ता कई गुणी बढ़ गयी है ॥४-५॥


कन्यानां यौवनारम्भे संतापाग्निसमुद्भवे । इन्धनत्वं प्रपद्यन्ते पितरौ स्वजनैः समम् ॥६॥

अर्थ: किसीने ठीक ही कहा है कि सन्तापरूपी अग्निको उत्पन्न करनेवाले कन्याओंके यौवनारम्भमें माता-पिता अन्य परिजनोंके साथ ही साथ ईन्धनपनेको प्राप्त होते हैं ॥६॥


एवमर्थं ददत्यस्या जन्मनोऽनन्तरं बुधाः । लोचनाञ्जलिभिस्तोयं दुःखाकुलितचेतसः ॥७॥

अर्थ: इसीलिए तो कन्या जन्मके बाद दुःखसे आकुलित है चित्त जिनका ऐसे विद्वज्जन इसके लिए नेत्ररूपी अंजलिके द्वारा जल दिया करते हैं ॥७॥


अहो भिनत्ति मर्माणि वियोगो देहनिःसृतैः । अपत्यैर्जनितो नीतैरागत्या संस्तुतैर्जनैः ॥८॥

अर्थ: अहो, जिन्हें अपरिचित जन आकर ले जाते हैं ऐसे अपने शरीरसे समुत्पन्न सन्तान (पुत्री) के साथ जो वियोग होता है वह मर्मको भेदन कर देता है ॥८॥


तद्ब्रूहि तरुणीं कस्मै ददामैतां प्रिये वयम् । गुणैः कुलेन कान्त्या च क एतस्याः समो भवेत् ॥९॥

अर्थ: इसलिए हे प्रिये ! कहो, यह तारुण्यवती पुत्री हम किसके लिए देवें । गुण, कुल और कान्तिसे कौन वर इसके अनुरूप होगा ॥९॥


इत्युक्ता प्राह तं देवी कन्यानां देहपालने । जनन्य उपयुज्यन्ते पितरो दानकर्मणि ॥१०॥

अर्थ: पतिके ऐसा कहनेपर रानी हेमवतीने कहा कि माताएँ तो कन्याओंके शरीरकी रक्षा करनेमें ही उपयुक्त होती हैं और उनके दान करनेमें पिता उपयुक्त होते हैं ॥१०॥


यत्र ते रुचितं दानं मह्यं तत्रैव रोचते । भर्तृच्छन्दानुवर्तिन्यो भवन्ति कुलबालिकाः ॥११॥

अर्थ: जहाँ आपके लिए कन्या देना रुचता हो वहीं मेरे लिए भी रुचेगा क्योंकि कुलांगनाएँ पतिके अभिप्रायके अनुसार ही चलती हैं ॥११॥


इत्युक्तो मन्त्रिभिः सार्धं चकारासौ प्रधारणम् । केनचिन्मन्त्रिणा कश्चिदुद्दिष्टः खेचरस्ततः ॥१२॥

अर्थ: रानीके ऐसा कहने पर राजाने मन्त्रियोंके साथ सलाह की तो किसी मन्त्रीने किसी विद्याधरका उल्लेख किया ॥१२॥


अन्येनेन्द्रः समुद्दिष्टः सर्वविद्याधराधिपः । तस्माद्धि खेचराः सर्वे बिभ्यति प्रतिकूलने ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर किसी दूसरे मन्त्रीने कहा कि इसके लिए इन्द्र विद्याधर ठीक होगा क्यों कि वह समस्त विद्याधरोंका अधिपति है और सब विद्याधर उसके विरुद्ध जानेमें भयभीत भी रहेंगे ॥१३॥


ततः स्वयं मयेनोक्तं युष्माकं वेद्मि नो मनः । मह्यं तु रुचितः ख्यातः सिद्धविद्यो दशाननः ॥१४॥

अर्थ: तब राजा मयने स्वयं कहा कि मैं आप लोगोंके मनकी बात तो नहीं जानता पर मुझे जिसे समस्त विद्याएँ सिद्ध हुई हैं ऐसा प्रसिद्ध दशानन अच्छा लगता है ॥१४॥


भवितासौ महान् कोऽपि जगतोऽद्भुतकारणम् । अन्यथा जायते सिद्धिर्विद्यानामाशु नाल्पके ॥१५॥

अर्थ: निश्चित ही वह जगत्में कोई अद्भुत कार्य करनेवाला होगा अन्यथा उसे छोटी ही उमरमें शीघ्र ही अनेक विद्याएँ सिद्ध कैसे हो जातीं ॥१५॥


ततोऽनुमेनिरे तस्य तद्वाक्यं प्रमुदान्विताः । मारीचप्रमुखाः सर्वे मन्त्रिणो मन्त्रकोविदाः ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्र करनेमें निपुण मारीच आदि समस्त प्रमुख मन्त्रियोंने बड़े हर्षके साथ राजा मय की बातका समर्थन किया ॥१६॥


मन्त्रिणो भ्रातरश्चास्य मारीचाद्या महाबलाः । मारीचोऽस्य ततश्चक्रे मानसं त्वरयान्वितम् ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर महाबलवान् मारीच आदि मन्त्रियों और भाइयोंने राजा मयके मनको शीघ्रतासे युक्त किया अर्थात् प्रेरणा की कि इस कार्यको शीघ्र ही सम्पन्न कर लेना चाहिए ॥१७॥


ग्रहेष्वभिमुखस्थेषु सौम्येषु दिवसे शुभे । क्रूरग्रहेष्वपश्यत्सु लग्ने कुशलतावहे ॥१८॥

कृत्यं कालातिपातेन नेति ज्ञात्वा ततो मयः । पुष्पान्तकविमानेन प्रस्थितः कन्ययान्वितः ॥१९॥

ततो मङ्गलगीतेन प्रमदानां नमस्तलम् । तूर्यनादस्य विच्छेदे शब्दात्मकमिवाभवत् ॥२०॥

अर्थ: तब राजा मयने भी विचार किया कि समय बीत जानेसे कार्य सिद्ध नहीं हो पाता है ऐसा विचारकर वह किसी शुभ दिन, जबकि सौम्यग्रह सामने स्थित थे, क्रूर ग्रह विमुख थे और लग्न मंगलकारी थी, कन्याके साथ पुष्पान्तक विमानमें बैठकर चला । प्रस्थान करते समय तुरहीका मधुर शब्द हो रहा था और स्त्रियाँ मंगलगीत गा रही थीं । बीच-बीचमें जब तुरहीका शब्द बन्द होता था तो स्त्रियोंके मंगलगीतोंसे आकाश ऐसा गूँज उठता था मानो शब्दमय ही हो गया हो ॥१८-२०॥


पुष्पान्तकाद् विनिष्क्रम्य मीमारण्ये स्थिता इति । युवभिः कथितं तस्य निर्वृत्य प्रथमागतैः ॥२१॥

तद्देशवेदिभिश्चारैः कथितं तद्वनं ततः । चलितोऽसावपश्यच्च मेघानामिव संचयम् ॥२२॥

अर्थ: दशानन भीमवनमें है, यह समाचार, पुष्पान्तक विमानसे उतरकर जो जवान आगे गये थे उन्होंने लौटकर राजा मयसे कहा। तब राजा मय उस देशके जानकार गुप्तचरोंसे पता चलाकर भीमवनकी ओर चला। वहाँ जाकर उसने काली घटाके समान वह वन देखा ॥२१-२२॥


चारः कश्चिदुवाचेति पश्येदं देव सद्वनम् । स्निग्धध्वान्तचयाकारं निविडोत्तुङ्गपादपम् ॥२३॥

अद्रेर्वलाहकाख्यस्य सन्ध्यावर्तस्य चान्तरे । मन्दारुणमिवारण्यं संमेदाष्टापदागयोः ॥२४॥

अर्थ: दशाननके खास स्थानका पता बताते हुए किसी गुप्तचरने कहा कि हे राजन् ! जिस प्रकार सम्मेदाचल और कैलास पर्वतके बीचमें मन्दारुण नामका वन है उसी प्रकार वलाहक और सन्ध्यावर्त नामक पर्वतोंके बीचमें यह उत्तम वन देखिए । देखिए कि यह वन स्निग्ध अन्धकारकी राशिके समान कितना सुन्दर मालूम होता है और यहाँ कितने ऊँचे तथा सघन वृक्ष लग रहे हैं ॥२३-२४॥


वनस्य पश्य मध्येऽस्य शङ्खशुभ्रमहागृहम् । नगरं शरदम्भोदमहावृन्दसमद्युति ॥२५॥

अर्थ: इस वनके मध्यमें शंखके समान सफेद बड़े-बड़े घरोंसे सुशोभित जो वह नगर दिखाई दे रहा है वह शरद् ऋतुके बादलोंके समूहके समान कितना भला जान पड़ता है ? ॥२५॥


समीपे च पुरस्यास्य पश्य प्रासादमुन्नतम् । सौधर्ममिव यः प्रष्टुमीहते शृङ्गकोटिभिः ॥२६॥

अर्थ: उसी नगरके समीप देखो एक बहुत ऊँचा महल दिखाई दे रहा है। ऐसा महल कि जो अपने शिखरोंके अग्रभागसे मानो सौधर्म स्वर्गको ही छूना चाहता है ॥२६॥


अवतीर्य नभोभागात् समीपे तस्य वेश्मनः । सानीकिनी विशश्राम चकार च यथोचितम् ॥२७॥

अर्थ: राजा मयकी सेना आकाशसे उतरकर उसी महलके समीप यथायोग्य विश्राम करने लगी ॥२७॥


तूर्यादिडम्बरं त्यक्त्वा दैत्यानामधिपस्ततः । आप्तैः कतिपयैर्युक्तो विनीताकल्पशोभितः ॥२८॥

अभिमानोदयं मुक्त्वा सकन्यः प्राप्तविस्मयः । तं प्रासादं समारुक्षत्प्रतीहारनिवेदितः ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर दैत्योंका अधिपति राजा मय तुरही आदि वादित्रोंका आडम्बर छोड़कर तथा विनीत मनुष्योंके योग्य वेष-भूषा धारणकर कुछ आप्तजनोंके साथ उस महलके समीप पहुँचा । कन्या मन्दोदरी उसके साथ थी । महलको देखते ही राजा मयका जहाँ अहंकार छूटा वहाँ उसे आश्चर्य भी कम नहीं हुआ । तदनन्तर द्वारपालके द्वारा समाचार भेजकर वह महलके ऊपर चढ़ा ॥२८-२९॥


सप्तमं च तलं प्राप्तः क्रमेण निभृतक्रमः । वनदेवीमिवैक्षिष्ट मूर्तामुत्तमकन्यकाम् ॥३०॥

अर्थ: सावधानीसे पैर रखता हुआ जब वह क्रमसे सातवें खण्डमें पहुँचा तब वहाँ उसने मूर्तिधारिणी वनदेवीके समान उत्तम कन्या देखी ॥३०॥


अथेन्दुनखया तस्य कृताभ्यागतसत्क्रिया । प्रपद्यन्ते परिभ्रंशं कुलज्ञा नोपचारतः ॥३१॥

अर्थ: वह कन्या दशाननकी बहन चन्द्रनखा थी सो उसने सबका अतिथि-सत्कार किया सो ठीक ही है क्योंकि कुलके जानकार मनुष्य योग्य उपचारसे कभी नहीं चूकते ॥३१॥


ततः सुखासनासीनः स्थितां कन्योचितासने । अपृच्छत् प्रश्रयादेवं तां मयो विनयान्विताम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर जब मय सुखकारी आसनपर बैठ गया और चन्द्र-नखा भी कन्याओंके योग्य आसनपर बैठ चुकी तब विनय दिखाती हुई उस कन्यासे मयने बड़ी नम्रतासे पूछा ॥३२॥


वत्से कासि कुतो वासि कस्माद्वा कारणादिह । वससि प्रभयेऽरण्ये कस्य चेदं महागृहम् ॥३३॥

अर्थ: कि हे पुत्रि ! तू कौन है ? और किस कारणसे इस भयावह वनमें रहती है तथा यह बड़ा भारी महल किसका है ? ॥३३॥


एकाकिन्या कथं चास्मिन् धृतिरुत्पद्यते तव । वपुरुत्कृष्टमेतत्ते पीडानां नैव भाजनम् ॥३४॥

अर्थ: इस महलमें अकेली रहते हुए तुझे कैसे धैर्य उत्पन्न होता है । तेरा यह उत्कृष्ट शरीर पीड़ाका पात्र तो किसी तरह नहीं हो सकता ॥३४॥


एवं पृष्टा सती बाला स्त्रीणां स्वाभाविकी त्रपा । मन्दं वनमृगी मुग्धा जगादेति नतानना ॥३५॥

षष्ठभक्तेन संसाध्य चन्द्रहासमिमं मम । शैलराजं गतो भ्राता वन्दितुं जिनपुङ्गवान् ॥३६॥

दशवक्त्रेण तेनाहं पालनार्थं निरूपिता । आर्य तिष्ठामि चैत्येऽस्मिन् चन्द्रप्रभविराजिते ॥३७॥

यदि च स्युर्भवन्तोऽपि द्रष्टुमेतं समागताः । क्षणमात्रं ततोऽत्रैव स्थानं कुर्वन्तु सज्जनाः ॥३८॥

अर्थ: स्त्रियोंके लज्जा स्वभावसे ही होती है इसलिए मयके इस प्रकार पूछनेपर उस सती कन्याका मुख लज्जासे नत हो गया । साथ ही वनकी हरिणीके समान भोली थी ही अतः धीरे-धीरे इस प्रकार बोली कि मेरा भाई दशानन षष्ठोपवास अर्थात् तेलाके द्वारा इस चन्द्रहास खड्गको सिद्ध कर जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना करनेके लिए सुमेरु पर्वतपर गया है । दशानन मुझे इस खड्गकी रक्षा करनेके लिए कह गया है सो हे आर्य ! मैं चन्द्रप्रभ भगवान्से सुशोभित इस चैत्यालयमें स्थित हूँ । यदि आप लोग दशाननको देखनेके लिए आये हैं तो क्षण मात्र यहींपर विश्राम कीजिए ॥३५-३८॥


यावदेवं समालापो वर्तते मधुरस्तयोः । तेजसां मण्डलं तावद् दृश्यते स्म नमस्तले ॥३९॥

अर्थ: जबतक उन दोनोंमें इस प्रकारका मधुर आलाप चल रहा था तबतक आकाशतलमें तेजका मण्डल दिखाई देने लगा ॥३९॥


उक्तं च कन्यया नूनमागतोऽयं दशाननः । सहस्रकिरणं कुर्वन् प्रभया विगतप्रभम् ॥४०॥

अर्थ: उसी समय कन्याने कहा कि जान पड़ता है अपनी प्रभासे सूर्यको निष्प्रभ करता हुआ दशानन आ गया है ॥४०॥


विद्युद्दण्डेन संयुक्तं मेघानामिव तं चयम् । अवलोक्य समासन्नमुत्तस्थौ संभ्रमान्मयः ॥४१॥

अर्थ: बिजलीके सहित मेघराशिके समान उस दशाननको निकटवर्ती देख मय हड़बड़ाकर आसनसे उठ खड़ा हुआ ॥४१॥


कृत्वा यथोचिताचारमासनेषु पुनः स्थिताः । मण्डलाग्रप्रभाजालश्यामलीकृतविग्रहाः ॥४२॥

मारीचो वज्रमध्यश्च वज्रनेत्रो नमस्तडित् । उग्रनक्रो मरुद्वक्त्रो मेधावी सारणः शुकः ॥४३॥

एवमाद्या गतास्तोषं परं दृष्ट्वा दशाननम् । इत्यूचुर्मङ्गलं वाक्यं दैत्यनाथस्य मन्त्रिणः ॥४४॥

अस्मभ्यं तव दैत्येशे धिषणातिगरीयसी । नराणामुत्तमो येन मनस्येष निवेशितः ॥४५॥

अर्थ: यथायोग्य आचार प्रदर्शित करनेके बाद सब पुनः आसनोंपर आरूढ़ हुए । तलवारकी कान्तिसे जिनके शरीर श्यामल हो रहे थे ऐसे मारीच, वज्रमध्य, वज्रनेत्र, नभस्तडित्, उग्रनक्र, मरुद्वक्त्र, मेधावी, सारस और शुक आदि मयके मन्त्री लोग दशाननको देखकर परम सन्तोषको प्राप्त हुए और निम्नलिखित मंगल वचन मयसे कहने लगे कि हे दैत्यराज ! आपकी बुद्धि हम सबसे अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि आपने ही इस पुरुषोत्तमको हृदयमें स्थान दिया था । अर्थात् हम लोगोंका इसकी ओर ध्यान नहीं गया जबकि आपने इसका अपने मनमें अच्छी तरह विचार रखा ॥४२-४५॥


इति चाहुर्दशग्रीवमहो ते रूपमुज्ज्वलम् । अहो प्रश्रयसंभारो वीर्यं चातिशयान्वितम् ॥४६॥

अर्थ: मयसे इतना कहकर उन मन्त्रियोंने दशाननसे कहा कि अहो तुम्हारा उज्ज्वल रूप आश्चर्यकारी है, तुम्हारा विनयका भार अद्भुत है और तुम्हारा पराक्रम भी अतिशयसे सहित है ॥४६॥


दक्षिणस्यामयं श्रेण्यामसुरप्रथिते पुरे । दैत्यानामधिपो नाम्ना मयो भुवनविश्रुतः ॥४७॥

गुणैरेष समाकृष्टः कुमार तव निर्मलैः । आयातः कं न कुर्वन्ति सज्जना दर्शनोत्सुकम् ॥४८॥

अर्थ: यह दैत्योंका राजा दक्षिणश्रेणीके असुरसंगीत नामा नगरका रहनेवाला है तथा संसारमें मय नामसे प्रसिद्ध है । यह आपके गुणोंसे आकर्षित होकर यहाँ आया है सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुष किसे दर्शनके लिए उत्कण्ठित नहीं करते ? ॥४७-४८॥


स्वागतादिकमित्याह ततो रत्नश्रवःसुतः । सतां हि कुलविद्येयं यन्मनोहरभाषणम् ॥४९॥

अर्थ: तब रत्नश्रवाके पुत्र दशाननने कहा कि आपका स्वागत है। आचार्य कहते हैं कि जो मधुर भाषण है वह सत्पुरुषोंकी कुलविद्या है ॥४९॥


साधुना दैत्यनाथेन प्रेमदर्शनकारिणा । उचितेन नियोगेन जनोऽयमनुगृह्यताम् ॥५०॥

अर्थ: दैत्योंके अधिपति उत्तम पुरुष हैं जिन्होंने कि हमें प्रेमपूर्वक दर्शन दिये। मैं चाहता हूँ कि ये उचित आदेश देकर इस जनको अनुगृहीत करें ॥५०॥


वचः सोऽयं ततः प्राह तात युक्तमिदं तव । प्रतिकूलसमाचारा न भवन्त्येव साधवः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर मयने कहा कि हे तात ! तुम्हें यह कहना उचित है क्योंकि जो उत्तम पुरुष हैं वे विरुद्ध आचरण कभी नहीं करते ॥५१॥


दृष्टोऽसौ सचिवैस्तस्य कौतुकाक्रान्तमानसैः । कृतानन्दश्च सद्वाक्यैः पुनरुक्तैः समाकुलैः ॥५२॥

अर्थ: जिनका चित्त कौतुकसे व्याप्त था ऐसे मयके मन्त्रियोंने भी दशाननके दर्शन किये और आकुलतासे भरे तथा बार-बार कहे हुए उत्तम वचनोंसे उसे आनन्दित किया ॥५२॥


ततो गर्भगृहं रम्यं प्रविष्टोऽयं सुभावनः । चकार महतीं पूजां जिनेन्द्राणां विशेषतः ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर अच्छी भावनासे युक्त दशाननने चन्द्रप्रभ जिनालयके महामनोहर गर्भगृहमें प्रवेश किया। वहाँ उसने प्रधानरूपसे जिनेन्द्र भगवान्की बड़ी भारी पूजा की ॥५३॥


स्तवांश्च विविधानुक्त्वा रोमहर्षणकारिणः । मस्तकेऽञ्जलिमास्थाय चूडामणिविभूषिते ॥५४॥

स्पृशँल्ललाटपट्टेन जानुभ्यां च महीतलम् । पावनौ स जिनेन्द्राणां ननाम चरणौ चिरम् ॥५५॥

अर्थ: रोमांच उत्पन्न करनेवाले अनेक प्रकारके स्तवन पढ़े, हाथ जोड़कर चूड़ामणिसे सुशोभित मस्तकपर लगाये, और ललाटतट तथा घुटनोंसे पृथ्वीतलका स्पर्श कर जिनेन्द्र भगवान्के पवित्र चरणोंको देर तक नमस्कार किया ॥५४-५५॥


ततो गेहाजिनेन्द्राणां निष्क्रान्तः परमोदयः । संहितो दैत्यनाथेन निविष्टः सुखमासने ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर परम अभ्युदयको धारण करनेवाला दशानन जिनमन्दिरसे बाहर निकलकर दैत्यराज मयके साथ आसनपर सुखसे बैठा ॥५६॥


विजयार्धगिरिस्थानां पृच्छन् वार्तां खगामिनाम् । चक्षुषो गोचरीभावं निन्ये मन्दोदरीमसौ ॥५७॥

अर्थ: वार्तालापके प्रकरणमें जब वह विजयार्ध पर्वतपर रहनेवाले विद्याधरोंका समाचार पूछ रहा था तब मन्दोदरी उसके दृष्टिगोचर हुई ॥५७॥


चारुलक्षणसंपूर्णां सौभाग्यमणिभूमिकाम् । तनुस्निग्धनखोत्तुङ्गपृष्ठपादसरोरुहाम् ॥५८॥

अर्थ: मन्दोदरी सुन्दर लक्षणोंसे पूर्ण थी, सौभाग्यरूपी मणियोंकी मानो भूमि थी, उसके चरणकमलोंका पृष्ठ भाग छोटे किन्तु स्निग्ध नखोंसे ऊपरको उठा हुआ जान पड़ता था ॥५८॥


रम्भास्तम्भसमानाभ्यां तूणाभ्यां पुष्पधन्वनः । लावण्याम्भःप्रवाहाभ्यामूरुभ्यामतिराजिताम् ॥५९॥

अर्थ: वह जिन ऊरुओंसे सुशोभित थी वे केलेके स्तम्भके समान थे, कामदेवके तरकसके समान जान पड़ते थे अथवा सौन्दर्य-रूपी जलके प्रवाहके समान मालूम होते थे ॥५९॥


युक्तविस्तारमुत्तुङ्गं मन्मथास्थानमण्डपम् । नितम्बं दधतीमग्रकुकुन्दरं मनोहरम् ॥६०॥

अर्थ: वह जिस नितम्बको धारण कर रही थी वह योग्य विस्तारसे सहित था, ऊँचा उठा था, कामदेवके सभामण्डपके समान जान पड़ता था और कुछ ऊँचे उठे हुए कूल्होंसे मनोहर था ॥६०॥


वज्रमध्यामधोवक्त्रां हेमकुम्भनिभस्तनीम् । शिरीषसुमनोमालोमृदुबाहुलतायुगाम् ॥६१॥

अर्थ: उसकी कमर वज्रके समान मजबूत अथवा हीराके समान देदीप्यमान थी, लज्जाके कारण उसका मुख नीचेकी ओर था, स्वर्णकलशके समान उसके स्तन थे, और शिरीषके फूलोंकी मालाके समान कोमल उसकी दोनों भुजाएँ थीं ॥६१॥


कम्बुरेखानतग्रीवां पूर्णचन्द्रसमाननाम् । नेत्रकान्तिनदीसेतुबन्धसंनिमनासिकाम् ॥६२॥

अर्थ: उसकी गर-दन शंख जैसी रेखाओंसे सुशोभित तथा कुछ नीचेकी ओर झुकी थी, मुख पूर्णचन्द्रमाके समान था और नाक तो ऐसी जान पड़ती थी मानो नेत्रोंकी कान्तिरूपी नदीके बीचमें पुल ही बाँध दिया गया हो ॥६२॥


रक्तदन्तच्छदच्छायाच्छुरिताच्छकपोलकाम् । वीणाभ्रमरसोन्मादपरपुष्टसमस्वनाम् ॥६३॥

अर्थ: उसके स्वच्छ कपोल ओठोंकी लाल-लाल कान्तिसे व्याप्त थे तथा उसकी आवाज वीणा, भ्रमर और उन्मत्त कोयलकी आवाजके समान थी ॥६३॥


इन्दीवरारविन्दानां कुमुदानां च संहतीः । विमुञ्चन्तीमिवाशासु दृष्ट्या दूत्या मनोभुवः ॥६४॥

अर्थ: उसकी दृष्टि कामदेवकी दूतीके समान थी और उससे वह दिशाओंमें नीलकमल, लालकमल तथा सफेद कमलोंका समूह ही मानो बिखे-रती थी ॥६४॥


अष्टमीशर्वरीनाथसमानालिकपट्टिकाम् । संगतश्रवणां स्निग्धनीलसूक्ष्मशिरोरुहाम् ॥६५॥

अर्थ: उसका ललाट अष्टमीके चन्द्रमाके समान था, कान सुन्दर थे, तथा चिकने, काले और बारीक बाल थे ॥६५॥


शोभयास्यांघ्रिहस्तानां जँङ्गमामिव पद्मिनीम् । जयन्तीं करिणीं हंसीं सिंहीं च गतिविभ्रमैः ॥६६॥

अर्थ: वह मुख तथा चरणोंकी शोभासे चलती-फिरती कमलिनीको, हाथोंकी शोभासे हस्तिनीको तथा गति और विभ्रमके द्वारा क्रमशः हंसी और सिंहनीको जीत रही थी ॥६६॥


विद्यालिङ्गनजामीर्ष्यां धारयन्तीं दशानने । पद्मालयं परित्यज लक्ष्मीमिव समागताम् ॥६७॥

अर्थ: विद्याओंने दशाननका आलिंगन प्राप्त कर लिया और मैं ऐसी ही रह गयी इस प्रकार ईर्ष्या-को धारण करती हुई लक्ष्मी ही मानो कमलरूपी घरको छोड़कर मन्दोदरीके बहाने आ गयी थी ॥६७॥


अङ्गनाविषयां सृष्टिमपूर्वामिव कर्मणा । आहृत्य जगतोऽशेषं लावण्यमिव निर्मिताम् ॥६८॥

अर्थ: कर्मरूपी विधाताने संसारके समस्त सौन्दर्यको इकट्ठा कर उसके बहाने स्त्रीविषयक अपूर्व सृष्टि ही मानो रची थी ॥६८॥


दिवाकरकरस्पर्शस्वर्भानुग्रहभीतितः । तारापतिं परित्यज्य क्षितिं कान्तिमिवागताम् ॥६९॥

अर्थ: वह सूर्यकी किरणोंका स्पर्श तथा राहुग्रहके आक्रमणके भयसे चन्द्रमाको छोड़कर पृथ्वीपर आयी हुई कान्तिके समान जान पड़ती थी ॥६९॥


सीमन्तमणिभाजालरचितास्यावगुण्ठनाम् । हारेण वक्त्रलावण्यसेतुनेव विभूषिताम् ॥७०॥

अर्थ: उसने अपने सीमन्त ( माँग ) में जो मणि पहन रखा था उसकी कान्तिका समूह उसके मुखपर घूँघटका काम देता था । वह जिस हारसे सुशोभित थी वह मुखके सौन्दर्यके प्रवाहके समान जान पड़ता था ॥७०॥


कर्णयोर्बालिकालोकान्मुक्ताफलसमुत्थितात् । सितस्य सिन्दुवारस्य मञ्जरीमिव बिभ्रतीम् ॥७१॥

अर्थ: उसने अपने कानोंमें मोतीजड़ित बालियाँ पहन रखी थीं सो उनकी प्रभासे ऐसी जान पड़ती थी मानो सफेद सिन्दुवार ( निर्गुण्डी ) की मंजरी ही धारण कर रही हो ॥७१॥


कन्दर्पदर्पसंक्षोभं सहते जघनं न यत् । इतीव वेष्टितं काञ्च्या मणिचक्रककान्तया ॥७२॥

अर्थ: चूँकि जघनस्थल कामके दर्पजन्य क्षोभको सहन नहीं करता था इसलिए ही मानो उसे मणिसमूहसे सुशोभित कटिसूत्रसे वेष्टित कर रखा था ॥७२॥


मनोज्ञामपि तां दृष्ट्वा दुःखितोऽभूत् स चिन्तया । नीयन्ते विषयैः प्रायः सत्त्ववन्तोऽपि वश्यताम् ॥७३॥

अर्थ: वह मन्दोदरी अत्यन्त सुन्दर थी फिर भी दशानन उसे देख चिन्तासे दुःखी हो गया सो ठीक ही है क्योंकि धैर्यवान् मनुष्य भी प्रायः विषयोंके अधीन हो जाते हैं ॥७३॥


तस्यां माधुर्ययुक्तायां दृष्टिस्तस्य गता सती । अभवन्मधुमत्तेव प्रत्यानीतापि घूर्णिता ॥७४॥

अर्थ: मन्दोदरी माधुर्यसे युक्त थी इसलिए उसपर पड़ी दशाननकी दृष्टि स्वयं भी मानो मधुसे मत्त हो गयी थी, यही कारण था कि वह उसपर-से हटा लेनेपर भी नशामें झूमती थी ॥७४॥


अचिन्तयत्तदा नाम स्यादियं वनितोत्तमा । ह्रीः श्रीर्लक्ष्मीर्धृतिः कीर्तिः प्राप्तमूर्तिः सरस्वती ॥७५॥

अर्थ: दशानन विचारने लगा कि यह उत्तम स्त्री कौन हो सकती है ? क्या ह्री, श्री, लक्ष्मी, धृति, कीर्ति अथवा सरस्वती है ? ॥७५॥


किमूढेयमुतानूढा माया वा केनचित्कृता । अहो सृष्टिरियं मूर्ध्नि स्थिता निखिलयोषिताम् ॥७६॥

अर्थ: यह विवाहित है या अविवाहित ? अथवा किसीके द्वारा की हुई माया है ? अहो, यह तो समस्त स्त्रियोंकी शिरोधार्य सर्वश्रेष्ठ सृष्टि है ॥७६॥


प्राप्नुयाद् यदि मामैतां कन्यामिन्द्रियहारिणीम् । कृतार्थं नस्ततो जन्म जायते तृणमन्यथा ॥७७॥

अर्थ: यदि मैं इन्द्रियोंको हरनेवाली इस कन्याको प्राप्त कर सकूँ तो मेरा जन्म कृतकृत्य हो जाये अन्यथा तृणके समान तुच्छ है ही ॥७७॥


चिन्तयन्तमिमं चैवं मयोऽभिप्रायकोविदः । उपनीय सुतामाह प्रभुरस्या भवानिति ॥७८॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते हुए दशाननसे अभिप्रायके जाननेवाले मयने पुत्री मन्दोदरीको पास ले जाकर कहा कि इसके स्वामी आप हैं ॥७८॥


तेन वाक्येन सिक्तोऽसावमृतेनेव तत्क्षणात् । तोषस्येवाङ्कुरान् जातान् दध्रे रोमाञ्चकण्टकान् ॥७९॥

अर्थ: मयके इस वचनसे दशाननको इतना आनन्द हुआ मानो तत्क्षण अमृतसे ही सींचा गया हो। उसके सारे शरीरमें रोमांच उठ आये मानो सन्तोषके अंकुर ही उत्पन्न हुए हों ॥७९॥


ततोऽनयोः क्षणोद्भूतसर्ववस्तुसमागमम् । स्वजनानन्दितं वृत्तं पाणिग्रहणमङ्गलम् ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर जहाँ क्षणभरमें ही समस्त वस्तुओंका समागम हो गया था और कुटुम्बीजन जहाँ आनन्दसे फूल रहे थे ऐसा इन दोनोंका पाणिग्रहण-मंगल सम्पन्न हुआ ॥८०॥


समं तया ततो यातः स्वयंप्रभपुरं कृती । मन्यमानः श्रियं प्राप्तां समस्तभुवनाश्रिताम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर दशानन कृतकृत्य होता हुआ मन्दोदरीके साथ स्वयंप्रभनगर गया। वह मन्दोदरीको पाकर ऐसा मान रहा था मानो समस्त संसारकी लक्ष्मी ही मेरे हाथ लग गयी है ॥८१॥


मयोऽपि तनयाचिन्ता शल्योद्धारात्ससंमदः । तद्वियोगात् सशोकश्च स्थितः स्वोचितधामनि ॥८२॥

अर्थ: पुत्रीकी चिन्ता-रूपी शल्यके निकल जानेसे जिसे हर्ष हो रहा था तथा साथ ही उसके वियोगसे जिसे शोक हो रहा था ऐसा राजा मय भी अपने योग्य स्थानमें जाकर रहने लगा ॥८२॥


प्रापद्देवीसहस्रस्य प्राधान्यं चारुविभ्रमा । क्रमान्मन्दोदरी भर्तुर्गुणैराकृष्टमानसा ॥८३॥

अर्थ: जिसके हाव-भाव सुन्दर थे तथा जिसने अपने गुणोंसे पतिका मन आकृष्ट कर लिया था ऐसी मन्दोदरीने क्रमसे हजारों देवियोंमें प्रधानता प्राप्त कर ली ॥८३॥


अभिप्रेतेषु देशेषु स रेमे सहितस्तया । पुरन्दर इवेन्द्राण्या सर्वेन्द्रियमनोज्ञया ॥८४॥

अर्थ: समस्त इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाली उस रानी मन्दोदरीके साथ दशानन, इच्छित स्थानोंमें इन्द्राणीके साथ इन्द्रके समान क्रीड़ा करने लगा ॥८४॥


प्रभावं वेदितुं वाञ्छन् विद्यायामपि भूरिशः । व्यापारानित्यसौ चक्रे समेतः परया रुचा ॥८५॥

अर्थ: उत्कृष्ट कान्तिसे सहित दशानन अपनी विद्याओंका प्रभाव जाननेके लिए निम्नांकित बहुत सारे कार्य करता था ॥८५॥


एको भवत्यनेकश्च सर्वस्त्रीकृतसंगमः । वितनोत्यर्कवत्तापं ज्योत्स्नां मुञ्चति चन्द्रवत् ॥८६॥

अर्थ: वह एक होकर भी अनेक रूप धरकर समस्त स्त्रियोंके साथ समागम करता था। कभी सूर्यके समान सन्ताप उत्पन्न करता था तो कभी चन्द्रमाके समान चाँदनी छोड़ने लगता था ॥८६॥


वह्निवन्मुञ्चति ज्वालां वर्षत्यम्बुधरो यथा । वायुवच्चलयत्यद्रीन् कुरुते सुरनाथताम् ॥८७॥

अर्थ: कभी अग्निके समान ज्वालाएँ छोड़ता था तो कभी मेघके समान वर्षा करने लगता था। कभी वायुके समान बड़े-बड़े पहाड़ोंको चला देता था तो कभी इन्द्र-जैसा प्रभाव जमाता था ॥८७॥


आपगानाथतां याति पर्वतत्वं प्रपद्यते । मत्तवारणतामेति भवत्यश्वो महाजवः ॥८८॥

अर्थ: कभी समुद्र बन जाता था, कभी पर्वत हो जाता था, कभी मदोन्मत्त हाथी बन जाता था और कभी महावेगशाली घोड़ा हो जाता था ॥८८॥


क्षणादारात् क्षणाद्दूरे क्षणाद् दृश्यः क्षणाच्च नो । क्षणान्महान् क्षणात्सूक्ष्मः क्षणाद्भीमो न च क्षणात् ॥८९॥

अर्थ: वह क्षण-भरमें पास आ जाता था, क्षण-भरमें दूर पहुँच जाता था, क्षण-भरमें दृश्य हो जाता था, क्षण-भरमें अदृश्य हो जाता था, क्षण-भरमें महान् हो जाता था, क्षण-भरमें सूक्ष्म हो जाता था, क्षण-भरमें भयंकर दिखाई देने लगता था और क्षण भरमें भयंकर नहीं रहता था ॥८९॥


एवं च रममाणोऽसौ नाम्ना मेघरवं गिरिम् । प्रापत्तत्र च सद्वापीमपश्यद् विमलाम्भसम् ॥९०॥

अर्थ: इस प्रकार रमण करता हुआ वह एक बार मेघरव नामक पर्वतपर गया और वहाँ स्वच्छ जलसे भरी वापिकाके पास पहुँचा ॥९०॥


कुमुदैरुत्पलैः पद्मैः स्वच्छैरन्यैश्च वारिजैः । पर्यन्तसंचरत्क्रौञ्चहंसचक्राह्वसारसाम् ॥९१॥

अर्थ: उस वापिकामें कुमुद, नीलकमल, लालकमल, सफेद कमल तथा अन्यान्य प्रकारके कमल फूल रहे थे और उसके किनारेपर क्रौंच, हंस, चकवा तथा सारस आदि पक्षी घूम रहे थे ॥९१॥


मृदुशष्पपटच्छन्नतटां सोपानमण्डिताम् । नभसेव विलीनेन पूरितां सवितुः करैः ॥९२॥

अर्थ: उसके तट हरी-हरी कोमल घास-रूपी वस्त्रसे आच्छादित थे, सीढ़ियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं और उसका जल तो ऐसा जान पड़ता था, मानो सूर्यकी किरणोंसे पिघलकर आकाश ही उसमें भर गया हो ॥९२॥


अर्जुनादिमहोत्तुङ्गपादपव्याप्तरोधसम् । प्रस्फुरच्छफरीचक्रसमुच्छलितसीकराम् ॥९३॥

अर्थ: अर्जुन ( कोहा ) आदि बड़े-बड़े ऊँचे वृक्षोंसे उसका तट व्याप्त था । जब कभी उसमें मछलियोंके समूह ऊपरको उछलते थे तब उनसे जलके छींटे ऊपर उड़ने लगते थे ॥९३॥


भ्रूक्षेपानिव कुर्वाणां तरङ्गैरतिभङ्गुरैः । जल्पन्तीमिव नादेन पक्षिणां श्रोत्रहारिणाम् ॥९४॥

अर्थ: अत्यन्त भंगुर अर्थात् जल्दी-जल्दी उत्पन्न होने और मिटनेवाली तरंगोंसे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो भौंहें ही चला रही हो तथा पक्षियोंके मधुर शब्दसे ऐसी मालूम होती थी मानो वार्तालाप ही कर रही हो ॥९४॥


तत्र क्रीडाप्रसक्तानां दधतीनां परां श्रियम् । षट् सहस्राणि कन्यानामपश्यत् केकसीसुतः ॥९५॥

अर्थ: उस वापिकापर परम शोभाको धारण करनेवाली छह हजार कन्याएँ क्रीड़ामें लीन थीं सो दशाननने उन सबको देखा ॥९५॥


काश्चिच्छीकरजालेन रेमिरे दूरगामिना । पर्यटन्ति स्म सत्कन्या दूरं सख्या कृतागसः ॥९६॥

अर्थ: उनमें-से कुछ कन्याएँ तो दूर तक उड़नेवाले जलके फव्वारेसे क्रीड़ा कर रही थीं और कुछ अपराध करनेवाली सखियोंसे दूर हटकर अकेली-अकेली ही घूम रही थीं ॥९६॥


प्रदर्श्य रदनं काचित्पद्मषण्डे सशैवले । कुर्वन्ती पङ्कजाशङ्कां सखीनां सुचिरं स्थिता ॥९७॥

अर्थ: कोई एक कन्या शेवालसे सहित कमलोंके समूहमें बैठकर दाँत दिखा रही थी और उसकी सखियोंके लिए कमलकी आशंका उत्पन्न कर रही थी ॥९७॥


मृदङ्गनिस्वनं काचिच्चक्रे करतलाहतम् । कुर्वाणा सलिलं मन्दं गायन्ती षट्पदैः समम् ॥९८॥

ततस्ता युगपद् दृष्ट्वा कन्या रत्नश्रवःसुतम् । क्षणं त्यक्तजलक्रीडा बभूवुः स्तम्भिता इव ॥९९॥

अर्थ: कोई एक कन्या पानीको हथेलीपर रख दूसरे हाथकी हथेलीसे उसे पीट रही थी और उससे मृदंग जैसा शब्द निकल रहा था । इसके सिवाय कोई एक कन्या भ्रमरोंके समान गाना गा रही थी । तदनन्तर वे सबकी सब कन्याएँ एक साथ दशाननको देखकर जलक्रीड़ा भूल गयीं और आश्चर्यसे चकित रह गयीं ॥९८-९९॥


मध्यं तासां दशग्रीवो गतो रमणकाङ्क्षया । रन्तुमेतेन साकं ता व्यापारिण्योऽभवन् मुदा ॥१००॥

अर्थ: दशानन क्रीड़ा करनेकी इच्छासे उनके बीचमें चला गया तथा वे कन्याएँ भी उसके साथ क्रीड़ा करनेके लिए बड़े हर्षसे तैयार हो गयीं ॥१००॥


आहताश्च समं सर्वा विशिखैः पुष्पधन्वनः । दृष्टिरासामभूदस्मिन् बद्धेवानन्यचारिणी ॥१०१॥

अर्थ: क्रीड़ा करते-करते ही वे सब कन्याएँ एक साथ कामके बाणोंसे आहत ( घायल ) हो गयीं और दशाननपर उनकी दृष्टि ऐसी बँधी कि वह फिर अन्यत्र संचार नहीं कर सकी ॥१०१॥


मिश्रे कामरसे तासां त्रपया पूर्वसंगमात् । मनो दोलामिवारूढं बभूवात्यन्तमाकुलम् ॥१०२॥

अर्थ: उस अपूर्व समागमके कारण उन कन्याओंका कामरूपी रस लज्जासे मिश्रित हो रहा था अतः उनका मन दोलापर आरूढ़ हुए के समान अत्यन्त आकुल हो रहा था ॥१०२॥


सुरसुन्दरतो जाता नाम्ना पद्मवती शुभा । सर्वश्रीयोषिति स्फीतनीलोत्पलदलेक्षणा ॥१०३॥

अर्थ: अब उन कन्याओंमें जो मुख्य हैं उनके नाम सुनो । राजा सुरसुन्दरसे सर्वश्री नामकी स्त्रीमें उत्पन्न हुई पद्मावती नामकी शुभ कन्या थी । उसके नेत्र किसी बड़े नीलकमलकी कलिकाके समान थे ॥१०३॥


कन्याऽशोकलता नाम बुधस्य दुहिता वरा । मनोवेगा समुत्पन्ना नवाशोकलतासमा ॥१०४॥

अर्थ: राजा बुधकी मनोवेगा रानीसे उत्पन्न अशोकलता नामकी कन्या थी जो नूतन अशोकलताके समान थी ॥१०४॥


संध्यायां कनकाज्जाता नाम्ना विद्युत्प्रभा परा । विद्युतं प्रभया लज्जां या नयेच्चारुदर्शना ॥१०५॥

अर्थ: राजा कनकसे संध्या नामक रानीसे उत्पन्न हुई विद्युत्प्रभा नामकी श्रेष्ठ कन्या थी जो इतनी सुन्दरी थी कि अपनी प्रभासे बिजलीको भी लज्जा प्राप्त करा रही थी ॥१०५॥


महाकुलसमुद्भूता ज्येष्ठास्तासामिमाः श्रिया । विभूत्या च त्रिलोकस्य मूर्ताः सुन्दरता इव ॥१०६॥

अर्थ: ये कन्याएँ महाकुलमें उत्पन्न हुई थीं और शोभासे उन सबमें श्रेष्ठ थीं । विभूतिसे तो ऐसी जान पड़ती थीं मानो तीनों लोककी सुन्दरता ही रूप धरकर इकट्ठी हुई हो ॥१०६॥


आकल्पकं च संप्राप्तास्तं ययुस्ताः सहेतराः । सह्येतापत्रपा तावद् दुःसहाः स्मरवेदनाः ॥१०७॥

अर्थ: उक्त तीनों कन्याएँ अन्य समस्त कन्याओंके साथ दशाननके समीप आयीं सो ठीक ही है क्योंकि लज्जा तभी तक सही जाती है जब तक कि कामकी वेदना असह्य न हो उठे ॥१०७॥


गान्धर्वविधिना सर्वा निराशङ्केन तेन ताः । परिणीताः शशाङ्केन ताराणामिव संहतिः ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर किसी प्रकारकी शंकासे रहित दशाननने उन सब कन्याओंको गन्धर्व विधिसे उस प्रकार विवाह लिया कि जिस प्रकार चन्द्रमा ताराओंके समूहको विवाह लेता है ॥१०८॥


दशग्रीवेण सार्धं ताः पुनः क्रीडां प्रचक्रिरे । अन्योन्याहंयुतां प्राप्य प्रथमोपगमाकुलाः ॥१०९॥

अर्थ: तदनन्तर ‘मैं पहले पहुँचूँ, मैं पहले पहुँचूँ’ इस प्रकार परस्परमें होड़ लगाकर वे कन्याएँ दशाननके साथ पुनः क्रीड़ा करने लगीं ॥१०९॥


संप्रत्येव हि सा क्रीडा क्रियते तेन या समम् । शशाङ्केन विमुक्तानां ताराणां कामिरूपता ॥११०॥

अर्थ: जो कन्या दशाननके साथ क्रीड़ा करती थी वही भली मालूम होती थी सो ठीक ही है क्योंकि चन्द्रमासे रहित ताराओंकी क्या शोभा है ? ॥११०॥


ततः कञ्चुकिभिस्तासामाशु गत्वा निवेदितम् । जनकेभ्य इदं वृत्तं रत्नश्रवससंभवम् ॥१११॥

अर्थ: तदनन्तर जो कंचुकी इन कन्याओंके साथ वापिकापर आये थे उन्होंने शीघ्र ही जाकर कन्याओंके पितासे दशाननका यह वृत्तान्त कह सुनाया ॥१११॥


ततस्तैः प्रहिताः क्रूराः पुरुषास्तद्विनाशने । संदष्टौष्ठपुटा बद्धभ्रुकुटीकोटिसंकटाः ॥११२॥

अर्थ: तब कन्याओंके पिताने दशाननको नष्ट करनेके लिए ऐसे क्रूर पुरुष भेजे कि जो क्रोधवश ओठोंको डँस रहे थे तथा बद्ध भौंहोंके अग्रभागसे भयानक मालूम होते थे ॥११२॥


विविधानि विमुञ्चन्तस्ते शस्त्राणि समं ततः । भ्रूक्षेपमात्रकेणैव कैकसेयेन निर्जिताः ॥११३॥

अर्थ: वे सब एक ही साथ अनेक प्रकारके शस्त्र चला रहे थे पर दशाननने उन्हें भौंह उठाते ही जीत लिया ॥११३॥


भयवेपितसर्वाङ्गास्ततस्तेऽमरसुन्दरम् । व्यज्ञापयन् समागत्य शस्त्रनिर्मुक्तपाणयः ॥११४॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका सारा शरीर भयसे कांप रहा था तथा जिनके हाथसे शस्त्र छूट गये थे ऐसे वे सब पुरुष राजा सुरसुन्दरके पास जाकर कहने लगे ॥११४॥


गृहाण जीवनं नाथ हर वा नः कुलाङ्गनाः । छिन्धि ता चरणौ पाणी ग्रीवां वा न वयं क्षमाः ॥११५॥

अर्थ: कि हे नाथ ! चाहे हमारा जीवन हर लो, चाहे हमारे हाथ-पैर तथा गरदन काट लो पर हम उस पुरुषको नष्ट करनेमें समर्थ नहीं हैं ॥११५॥


कन्यानिवहमध्यस्थः कोऽपि धीरो विराजते । सुरेन्द्रसुन्दरः कान्त्या समानो रजनीपतेः ॥११६॥

अर्थ: इन्द्रके समान सुन्दर तथा कान्तिसे चन्द्रमाकी तुलना करनेवाला कोई एक धीर-वीर मनुष्य कन्याओंके बीचमें बैठा हुआ सुशोभित हो रहा है ॥११६॥


क्रुद्धस्य तस्य नो दृष्टिं देवाः शक्रपुरस्सराः । सहेरन् किमुत क्षुद्रा अस्मत्तुल्याः शरीरिणः ॥११७॥

अर्थ: सो जब वह क्रुद्ध होता है तब उसकी दृष्टिको इन्द्र आदि देव भी सहन नहीं कर सकते फिर हमारे जैसे क्षुद्र प्राणियोंकी तो बात ही क्या है ? ॥११७॥


रथनूपुरनाथेन्द्रप्रभृत्युत्तममानवाः । वीक्षिता बहवोऽस्माभिरयं तु परमादृतः ॥११८॥

अर्थ: रथनूपुर नगरके राजा इन्द्र आदि बहुत-से उत्तम पुरुष हमने देखे हैं पर यह उन सबमें परम आदरको प्राप्त है ॥११८॥


एवं श्रुत्वा महाक्रोधरक्तास्योऽमरसुन्दरः । निरैत् संनह्य संयुक्तो बुधेन कनकेन च ॥११९॥

अर्थ: यह सुनकर, बहुत भारी क्रोधसे जिसका मुँह लाल हो रहा था ऐसा राजा सुरसुन्दर राजा कनक और बुधके साथ तैयार होकर बाहर निकला ॥११९॥


अन्ये च बहवः शूराः पतयो व्योमगामिनाम् । निश्चक्रमुर्वियद्दीप्तं कुर्वाणाः शस्त्ररश्मिभिः ॥१२०॥

अर्थ: इनके सिवाय और भी बहुत-से शूरवीर विद्याधरोंके अधिपति शस्त्रोंकी किरणोंसे आकाशको देदीप्यमान करते हुए बाहर निकले ॥१२०॥


ततस्तानायतो दृष्ट्वा ता भयाकुलमानसाः । विद्याधरसुता ऊचुरिदं रत्नश्रवःसुतम् ॥१२१॥

अस्मत्प्रयोजनान्नाथ प्राप्तोऽस्यत्यन्तसंशयम् । पुण्यहीना वयं कष्टं सर्वा अप्यपलक्षणाः ॥१२२॥

अर्थ: तदनन्तर उन्हें आता देख, जिनका मन भयसे व्याकुल हो रहा था ऐसी वे विद्याधर कन्याएँ दशाननसे बोलीं कि हे नाथ ! आप हमारे निमित्तसे अत्यन्त संशयको प्राप्त हुए हैं। यथार्थमें हम सब पुण्यहीन तथा शुभलक्षणोंसे रहित हैं ॥१२१-१२२॥


उत्तिष्ठ शरणं गच्छ कंचिन्नाथ प्रसीद नः । उत्पत्य गगनं क्षिप्रं रक्ष प्राणान् सुदुर्लभान् ॥१२३॥

अर्थ: हे नाथ ! उठो और किसीकी शरणमें जाओ । हम लोगोंपर प्रसन्न होओ और शीघ्र ही आकाशमें उड़कर अपने दुर्लभ प्राणोंकी रक्षा करो ॥१२३॥


अस्मिन् वा भवने जैने भूत्वा प्रच्छन्नविग्रहः । तिष्ठ यावदिमे क्रूरा नेक्षन्ते भवतस्तनुम् ॥१२४॥

अर्थ: अथवा ये क्रूरपुरुष जबतक आपका शरीर नहीं देख लेते हैं उसके पहले ही इस जिन-मन्दिरमें छिपकर बैठ रहो ॥१२४॥


श्रुत्वा वाक्यमिदं दीनं दृष्ट्वा च निकटं बलम् । सिते कुमुदवत्तेन नेत्रे पद्मनिभे कृते ॥१२५॥

अर्थ: कन्याओंके यह दीन वचन सुनकर तथा सेनाको निकट देख दशाननने अपने कुमुदके समान सफेद नेत्र कमलके समान लाल कर लिये ॥१२५॥


उवाच च न मां नूनं विच्छयद्वदथेदृशम् । किमेभिः क्रियते काकैः संभूयापि गरुत्मतः ॥१२६॥

अर्थ: उसने कन्याओंसे कहा कि निश्चय ही आप हमारा पराक्रम नहीं जानती हो इसलिए ऐसा कह रही हों । जरा सोचो तो सही, बहुत-से कौए एक साथ मिलकर भी गरुड़का क्या कर सकते हैं ? ॥१२६॥


एकाकी पृथुकः सिंहः प्रस्फुरत्सितकेसरः । किं वा नानयते ध्वंसं यूथं समददन्तिनाम् ॥१२७॥

अर्थ: जिसकी सफेद जटाएँ फहरा रही हैं ऐसा अकेला सिंहका बालक क्या मदोन्मत्त हाथियोंके झुण्डको नष्ट नहीं कर देता ? ॥१२७॥


इदं ताः पुनरूचुस्तं यद्येवं नाथ मन्यसे । ततोऽस्माकं पितॄन् रक्ष भ्रातॄंश्च स्वजनांस्तथा ॥१२८॥

अर्थ: दशाननके वीरता भरे वचन सुन उन कन्याओंने फिर कहा कि हे नाथ ! यदि आप ऐसा मानते हैं तो हमारे पिता, भाई तथा कुटुम्बीजनों की रक्षा कीजिए, अर्थात् युद्धमें उन्हें नहीं मारिए ॥१२८॥


एवमस्तु प्रिया यूयं मा भैष्टेति स सान्त्वनम् । कुरुते यावदेतासां तावद्बलमुपागतम् ॥१२९॥

अर्थ: ‘हे प्रिया जनो ! ऐसा ही होगा, तुम सब भयभीत न होओ’ इस प्रकार दशानन जबतक उन कन्याओंको सान्त्वना देता है कि तबतक वह सेना आ पहुँची ॥१२९॥


ततो विमानमारुह्य क्षणाद्विद्याविनिर्मितम् । खमारुह्य दशग्रीवो दन्तदष्टरदच्छदः ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर क्षण-भरमें विद्या निर्मित विमानपर आरूढ़ होकर रावण आकाशमें जा पहुँचा और दाँतोंसे ओठ चबाने लगा ॥१३०॥


त एवावयवास्तस्य प्राप्य युद्धमहोत्सवम् । दुःखेन मानमाकाशे प्राप्ता रोमाञ्चकर्कशाः ॥१३१॥

अर्थ: दशाननके वे ही सब अवयव थे पर युद्धरूपी महोत्सवको पाकर इतने अधिक फूल गये और रोमांचोंसे कर्कश हो गये कि आकाशमें बड़ी कठिनाईसे समा सके ॥१३१॥


तस्योपरि ततो योधाश्चिक्षिपुः शस्त्रसंहतीः । धारा इव घनस्थूलाः पर्वतस्य घनाघनाः ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार मेघ किसी पर्वतपर बड़ी मोटी जलकी धाराएँ छोड़ते हैं उसी प्रकार सब योधा दशाननके ऊपर शस्त्रोंके समूह छोड़ने लगे ॥१३२॥


ततोऽसौ शस्त्रसंघातं काभिश्चिद् विन्यवारयत् । काभिश्चित्तु रिपुव्रातं शिलाभिर्भयमानयत् ॥१३३॥

अर्थ: तब दशाननने शिलाएँ वर्षाना शुरू किया । उसने कितनी ही शिलाओंसे तो शत्रुओंके शस्त्रसमूहको रोका और कितनी ही शिलाओंसे शत्रु-समूहको भयभीत किया ॥१३३॥


वराकैर्निहतैरेभिः खेचरैः किं ममेत्यसौ । चिन्तयित्वा प्रधानांस्त्रीन् तांश्चक्रे नेत्रगोचरम् ॥१३४॥

अर्थ: इन बेचारे दीन-हीन विद्याधरोंको मारनेसे मुझे क्या लाभ है ? ऐसा विचारकर उसने सुरसुन्दर, कनक और बुध इन तीन प्रधान विद्याधरोंको अपनी दृष्टिका विषय बनाया अर्थात् उनकी ओर देखा ॥१३४॥


तामसेन ततोऽस्त्रेण मोहयित्वा गतक्रियाः । नागपाशैस्त्रयोऽप्येते बद्ध्वा तासामुपाहृताः ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर उसने तामस शस्त्रसे मोहित कर उन्हें निश्चेष्ट बना दिया और नागपाशमें बाँधकर तीनोंको तीन कन्याओंके सामने रख दिया ॥१३५॥


मोचितास्ते ततस्ताभिः पूजां च परिलम्भिताः । शूरस्वजनसंप्राप्तेः संमदं च समागताः ॥१३६॥

अर्थ: तब कन्याओंने उन्हें छुड़वाकर उनका सत्कार कराया और तुम्हें शूरवीर वर प्राप्त हुआ है इस समाचारसे उन्हें हर्षित भी किया ॥१३६॥


ततः पाणिग्रहश्चक्रे तस्य तासां च तैः पुनः । दिवसानां त्रयं विद्याजनितश्च महोत्सवः ॥१३७॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने दशानन और उन कन्याओंका विधिपूर्वक पुनः पाणिग्रहण किया । इस उपलक्ष्यमें तीन दिन तक विद्याजनित महोत्सव होते रहे ॥१३७॥


गताश्चानुमतास्तेन यथा स्वं निलयानमी । मन्दोदरीगुणाकृष्टः स च यातः स्वयंप्रभम् ॥१३८॥

अर्थ: तत्पश्चात् ये सब दशाननकी अनुमति लेकर अपने-अपने घर चले गये और दशानन भी मन्दोदरीके गुणोंसे आकृष्ट हुआ स्वयंप्रभनगर चला गया ॥१३८॥


ततस्तं परया द्युत्या युक्तं दृष्ट्वा सयोषितम् । बान्धवाः परमं हर्षं जग्मुर्विस्तारितेक्षणाः ॥१३९॥

अर्थ: तदनन्तर श्रेष्ठ कान्तिसे युक्त दशाननको अनेक स्त्रियों सहित आया देख, बान्धवजन परम हर्षको प्राप्त हुए । हर्षातिरेकसे उनके नेत्र विस्तृत हो गये ॥१३९॥


दूरादेव च तं दृष्ट्वा भानुकर्णविभीषणौ । अभिगत्या विनिष्क्रान्तौ सुहृदोऽन्ये च बान्धवाः ॥१४०॥

अर्थ: भानुकर्ण और विभीषण तथा अन्य मित्र और इष्टजन दूरसे ही उसे देख अगवानी करनेके लिए नगरसे बाहर निकले ॥१४०॥


वेष्टितश्च प्रविष्टस्तैः स्वयंप्रभपुरोत्तमम् । रेमे च स्वेच्छया तेऽत्र प्राप्नुवन् सुखमुत्तमम् ॥१४१॥

अर्थ: उन सबसे घिरा दशानन, स्वयंप्रभनगरमें प्रविष्ट हो मनचाही क्रीड़ा करने लगा और भानुकर्ण-विभीषण आदि बन्धुजन भी उत्तम सुखको प्राप्त हुए ॥१४१॥


अथ कुम्भपुरे राजमहोदरसुतां वराम् । सुरूपाक्षीसमुद्भूतां तडिन्मालाभिधानकाम् ॥१४२॥

भास्करश्रवणो लेभे सुप्रीतः स तया समम् । चारुविभ्रमकारिण्या निमग्नो रतिसागरे ॥१४३॥

अर्थ: अथानन्तर कुम्भपुर नगरमें राजा महोदरकी सुरूपाक्षी नामा स्त्रीसे उत्पन्न तडिन्माला नामकी कन्या थी सो भानुकर्णने बड़ी प्रसन्नतासे प्राप्त की । सुन्दर हाव-भाव दिखानेवाली तडिन्मालाके साथ भानुकर्ण रतिरूपी सागरमें निमग्न हो गया ॥१४२-१४३॥


तत्र कुम्भपुरे तस्य केनचित् कृतशब्दने । श्वसुरस्नेहतः कर्णौ सततं पेततुर्यतः ॥१४४॥

कुम्भकर्ण इति ख्यातिं ततोऽसौ भुवने गतः । धर्मसक्तमतिर्वीरः कलागुणविशारदः ॥१४५॥

अर्थ: एक बार कुम्भपुर नगरपर किसी प्रबल शत्रुने आक्रमण कर हल्ला मचाया तब श्वसुरके स्नेहसे भानुकर्णके कान कुम्भपुरपर पड़े अर्थात् वहाँके दुःखभरे शब्द इसने सुने तबसे संसारमें इसका कुम्भकर्ण नाम प्रसिद्ध हुआ । इसकी बुद्धि सदा धर्ममें आसक्त रहती थी, यह शूरवीर था तथा कलाओंमें निपुण था ॥१४४-१४५॥


अयं स प्रखलैः ख्यातिमन्यथा गमितो जनैः । मांसासृग्जीवनस्त्वेन तथा षण्मासनिद्रया ॥१४६॥

आहारोऽस्य शुचिः स्वादुर्यथाकामप्रकल्पितः । सुरभिर्बन्धुयुक्तस्य प्रथमं तर्पितातिथिः ॥१४७॥

अर्थ: दुष्टजनोंने इसके विषयमें अन्यथा ही निरूपण किया है । वे कहते हैं कि यह मांस और खूनका भोजन कर जीवित रहता था तथा छह माहकी निद्रा लेता था सो इसका आहार तो इच्छानुसार परम पवित्र मधुर और सुगन्धित होता था । प्रथम ही अतिथियोंको सन्तुष्ट कर बन्धुजनोंके साथ आहार करता था ॥१४६-१४७॥


संध्यासंवेशनोत्थानमध्यकालप्रवर्तिनी । निद्रास्य शेषकालस्तु धर्मव्यासक्तचेतसः ॥१४८॥

अर्थ: सन्ध्याकाल शयन करने का और प्रातःकाल उठनेका समय है सो भानुकर्ण इसके बीचमें ही निद्रा लेता था । इसका अन्य समय धार्मिक कार्योंमें ही व्यतीत होता था ॥१४८॥


परमार्थावबोधेन वियुक्ताः पापचेतसः । कल्पयन्त्यन्यथा साधून् धिक् तान् दुर्गतिगामिनः ॥१४९॥

अर्थ: जो परमार्थज्ञानसे रहित पापी मनुष्य, सत्पुरुषोंका अन्यथा वर्णन करते हैं वे दुर्गतिमें जानेवाले हैं । ऐसे लोगोंको धिक्कार है ॥१४९॥


अथास्ति दक्षिणश्रेण्यां नाम्ना ज्योतिःप्रभं पुरम् । विशुद्धकमलस्तत्र राजा मयमहासुहृत् ॥१५०॥

अर्थ: अथानन्तर दक्षिणश्रेणीमें ज्योतिःप्रभ नामका नगर है। वहाँ विशुद्धकमल राजा राज्य करता था जो मयका महामित्र था ॥१५०॥


तस्य नन्दनमालायामुत्पन्ना वरकन्यका । राजीवसरसी नाम्ना पतिं प्राप्ता विभीषणम् ॥१५१॥

अर्थ: उसकी नन्दनमाला नामकी स्त्रीसे राजीवसरसी नामकी कन्या उत्पन्न हुई थी वह विभीषणको प्राप्त हुई ॥१५१॥


कान्तया कान्तया साकं न स प्राप रतिं कृती । देववत् परमाकारः पद्मया पद्मया तथा ॥१५२॥

अर्थ: देवोंके समान उत्कृष्ट आकारको धारण करनेवाला बुद्धिमान् विभीषण, लक्ष्मीके समान सुन्दरी उस राजीवसरसी स्त्रीके साथ क्रीड़ा करता हुआ तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ ॥१५२॥


अथ मन्दोदरी गर्भं कालयोगाददीधरत् । सद्यः कल्पितचित्तस्थदोहदाहारिविभ्रमा ॥१५३॥

अर्थ: तदनन्तर समय पाकर मन्दोदरीने गर्भ धारण किया। उस समय उसके चित्तमें जो दोहला उत्पन्न होते थे उनकी पूर्ति तत्काल की जाती थी। उसके हाव-भाव भी मनको हरण करनेवाले थे ॥१५३॥


नीता च जनकागारं प्रसूता बालकं वरम् । इन्द्रजित्ख्यातिमायातो यः समस्तमहीतले ॥१५४॥

अर्थ: राजा मय पुत्रीको अपने घर ले आया वहाँ उसने उस उत्तम बालकको जन्म दिया जो समस्त पृथ्वीतलमें इन्द्रजित् नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥१५४॥


मातामहगृहे वृद्धिं प्राप्तश्च जननन्दनः । स कुर्वन् निर्भरक्रीडां सिंहशाव इवोत्तमाम् ॥१५५॥

अर्थ: लोगोंको आनन्दित करनेवाला इन्द्रजित् अपने नानाके घर ही वृद्धिको प्राप्त हुआ। वहाँ वह सिंहके बालकके समान उत्तम क्रीड़ा करता हुआ सुखसे रहता था ॥१५५॥


ततोऽसौ पुनरानीता सपुत्रा भर्तुरन्तिकम् । दत्तदुःखा पितुः स्वस्य पुत्रस्य च वियोगतः ॥१५६॥

अर्थ: तदनन्तर मन्दोदरी पुत्र-के साथ अपने भर्त्ता दशाननके पास लायी गयी सो अपने तथा पुत्रके वियोगसे वह पिताको दुःख पहुँचानेवाली हुई ॥१५६॥


दशग्रीवोऽथ पुत्रास्यं दृष्ट्वा परममागतः । आनन्दं पुत्रतो नान्यत्प्रीतेरायतनं परम् ॥१५७॥

अर्थ: दशानन पुत्रका मुख देख परम आनन्दको प्राप्त हुआ। यथार्थमें पुत्रसे बढ़कर प्रीतिका और दूसरा स्थान नहीं है ॥१५७॥


कालक्रमात् पुनर्गर्भं दधाना पितुरन्तिकम् । नीता सुखं प्रसूता च मेघवाहनबालकम् ॥१५८॥

अर्थ: कालक्रमसे मन्दोदरीने फिर गर्भ धारण किया सो पुनः पिताके समीप भेजी गयी। अबकी बार वहाँ उसने सुखपूर्वक मेघवाहन नामक पुत्रको जन्म दिया ॥१५८॥


भर्तुरन्तिकमानीता पुनः सा भोगसागरे । पतिता स्वेच्छयातिष्ठद् गृहीतपतिमानसा ॥१५९॥

अर्थ: तदनन्तर वह पुनः पतिके पास आयी और पतिके मनको वश कर इच्छानुसार भोगरूपी सागरमें निमग्न हो गयी ॥१५९॥


दारकौ स्वजनानन्दं कुर्वाणौ चारुविभ्रमौ । तौ युवत्वं परिप्राप्तौ महोक्षविपुलेक्षणौ ॥१६०॥

अर्थ: सुन्दर चेष्टाओंके धारी दोनों बालक आत्मीयजनोंका आनन्द बढ़ाते हुए तरुण अवस्थाको प्राप्त हुए। उस समय उनके नेत्र किसी महावृषभके नेत्रोंके समान विशाल हो गये थे ॥१६०॥


अथ वैश्रवणो यासां कुरुते स्वामितां पुराम् । व्यध्वंसयदिमा गत्वा कुम्भकर्णः सहस्रशः ॥१६१॥

अर्थ: अथानन्तर वैश्रवण जिन नगरोंका राज्य करता था, कुम्भकर्ण हजारों बार जा-जाकर उन नगरोंको विध्वस्त कर देता था ॥१६१॥


तासु रत्नानि वस्त्राणि कन्यकाश्च मनोहराः । गणिकाश्चानयद्वीरः स्वयंप्रभपुरोत्तमम् ॥१६२॥

अर्थ: उन नगरोंमें जो भी मनोहर रत्न, वस्त्र, कन्याएँ अथवा गणिकाएँ होती थीं शूरवीर कुम्भकर्ण उन्हें स्वयंप्रभनगर ले आता था ॥१६२॥


अथ वैश्रवणः क्रुद्धो ज्ञात्वा पृथुकचेष्टितम् । सुमालिनोऽन्तिकं दूतं प्रजिघायातिगर्वितः ॥१६३॥

अर्थ: तदनन्तर जब वैश्रवणको कुम्भकर्णकी इस बालचेष्टाका पता चला तब उसने कुपित होकर सुमालीके पास दूत भेजा। वैश्रवण इन्द्रका बल पाकर अत्यन्त गर्वित रहता था ॥१६३॥


प्रविवेश ततो दूतः प्रतिहारनिवेदितः । उपचारं च संप्राप्तः कृतकं लोकमार्गतः ॥१६४॥

अर्थ: तदनन्तर द्वारपालके द्वारा समाचार भेजकर दूतने भीतर प्रवेश किया । दूत लोकाचारके अनुसार योग्य विनयको प्राप्त था ॥१६४॥


उवाचेदं तथा दूतो वाक्यालङ्कारसंज्ञितः । समक्षं दशवक्त्रस्य सुमालिनमिति क्रमात् ॥१६५॥

अर्थ: दूतका नाम वाक्यालंकार था सो उसने दशाननके समक्ष ही सुमालीसे इस प्रकार क्रमसे कहना शुरू किया ॥१६५॥


समस्तभुवनव्यापिकीर्तिर्वैश्रवणश्रुतिः । वदतीदं महाराजो भवन्तं कुरु चेतसि ॥१६६॥

अर्थ: जिनकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही है ऐसे वैश्रवण महाराजने आपसे जो कहा है उसे चित्तमें धारण करो ॥१६६॥


पण्डितोऽसि कुलीनोऽसि लोकज्ञोऽसि महानसि । अकार्यसंगभीतोऽसि देशकोऽसि सुवर्त्मसु ॥१६७॥

अर्थ: उन्होंने कहा है कि तुम पण्डित हो, कुलीन हो, लोक व्यवहारके ज्ञाता हो, महान् हो, अकार्यके समागमसे भयभीत हो और सुमार्गका उपदेश देनेवाले हो ॥१६७॥


एवंविधस्य ते युक्तं कुर्वन्तं शिशुचापलम् । प्रमत्तचेतसं पौत्रं निवारयितुमात्मनः ॥१६८॥

अर्थ: सो तुम्हें लड़कों जैसी चपलता करनेवाले अपने प्रमादी पौत्रको मना करना उचित है ॥१६८॥


तिरश्चां मानुषाणां च प्रायो भेदोऽयमेव हि । कृत्याकृत्यं न जानन्ति यदेकेऽन्यत्तु तद्विदः ॥१६९॥

अर्थ: तिर्यंच और मनुष्योंमें प्रायः यही तो भेद है कि तिर्यंच कृत्य और अकृत्यको नहीं जानते हैं पर मनुष्य जानते हैं ॥१६९॥


विस्मरन्ति च नो पूर्वं वृत्तान्तं दृढमानसाः । जातायामपि कस्याञ्चिद्भूतौ विद्युत्समद्युतौ ॥१७०॥

अर्थ: जिनका चित्त दृढ़ है ऐसे मनुष्य बिजलीके समान भंगुर किसी विभूतिके प्राप्त होनेपर भी पूर्व वृत्तान्तको नहीं भूलते हैं ॥१७०॥


शान्तिर्मालिवधेनैव शेषस्य स्यात् कुलस्य ते । को हि स्वकुलनिर्मूलध्वंसहेतुक्रियां भजेत् ॥१७१॥

अर्थ: तुम्हारे कुलका प्रधान माली मारा गया इसीसे समस्त कुलको शान्ति धारण करना चाहिए थी - क्योंकि ऐसा कौन पुरुष होगा जो अपने कुलका निर्मूल नाश करनेवाले काम करेगा ॥१७१॥


समुद्रवीचिसंसक्तः शक्रस्य ध्वस्तविद्विषः । प्रतापो विस्मृतः किं ते यतोऽनुचितमीहते ॥१७२॥

अर्थ: शत्रुओंको नष्ट करनेवाले इन्द्रका वह प्रताप जो कि समुद्रकी लहर-लहरमें व्याप्त हो रहा है तुमने क्यों भुला दिया ? जिससे कि अनुचित काम करनेकी चेष्टा करते हो ॥१७२॥


स त्वं क्रीडसि मण्डूको दंष्ट्राकण्टकसंकटे । वक्त्ररन्ध्रे भुजङ्गस्य विषाग्निकणमोचिनि ॥१७३॥

अर्थ: तुम मेंढकके समान हो और इन्द्र भुजंगके समकक्ष है, सो तुम इन्द्ररूपी भुजंगके उस मुखरूपी बिलमें क्रीड़ा कर रहे हो जो दाढ़रूपी कण्टकोंसे व्याप्त है तथा विषरूपी अग्निके तिलगे छोड़ रहा है ॥१७३॥


नियन्तुमथ शक्नोषि नैतं तस्करदारकम् । ततो ममार्पयाद्यैव करोम्यस्य नियन्त्रणम् ॥१७४॥

अर्थ: यदि तुम इस चोर बालकपर नियन्त्रण करनेमें समर्थ नहीं हो तो आज ही मुझे सौंप दो मैं स्वयं इसका नियन्त्रण करूँगा ॥१७४॥


नैवं चेत् कुरुते पश्य ततश्चारकवेश्मनि । निगडैः संयुतं पौत्रं याल्यमानमनेकधा ॥१७५॥

अर्थ: यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो अपने पौत्रको जेलखानेके अन्दर बेड़ियोंसे बद्ध तथा अनेक प्रकारकी यातना सहते हुए देखोगे ॥१७५॥


अलंकारोदयं त्यक्त्वा चिरं कालमवस्थितः । तदेव विवरं भूयः प्रवेष्टुमभिवाञ्छसि ॥१७६॥

अर्थ: जान पड़ता है कि तुमने अलंकारोदयपुर ( पाताललंका ) को छोड़कर बहुत समय तक बाहर रह लिया है अब फिरसे उसी बिलमें प्रवेश करना चाहते हो ॥१७६॥


कुपिते मयि शक्रे वा न तेऽस्ति शरणं भुवि । जलबुद्बुदवद्वातादचिरादेव नश्यसि ॥१७७॥

अर्थ: यह निश्चित समझ लो कि मेरे या इन्द्रके कुपित होनेपर पृथ्वीमें तुम्हारा कोई शरण नहीं है, जिस प्रकार जरा-सी हवा चलनेसे पानीका बबूला नष्ट हो जाता है उसी प्रकार तुम भी नष्ट हो जाओगे ॥१७७॥


ततः परुषवाग्वातवेगाहतमनोजलः । क्षोभं परममायातो दशाननमहार्णवः ॥१७८॥

अर्थ: तदनन्तर उस दूतके कठोर वचनरूपी वायुके वेगसे जिसका मनरूपी जल आघातको प्राप्त हुआ था ऐसा दशाननरूपी महासागर परम क्षोभको प्राप्त हुआ ॥१७८॥


प्रतीकाग्राहवच्चास्य प्रस्फुरत्स्वेदमोचिनः । चक्षुषात्यन्तरक्तेन दिग्धं सकलमम्बरम् ॥१७९॥

अर्थ: दूतके वचन सुनते ही दशाननकी ऐसी दशा हो गयी मानो किसीने उसके अंग पकड़कर झकझोर दिया हो, उसके प्रत्येक अंगसे पसीना छूटने लगा और उसकी अत्यन्त लाल दृष्टिने समस्त आकाशको लिप्त कर दिया ॥१७९॥


ततो वधिरयन्नाशाः स्वरेणाम्बरगामिना । करिणो निर्मदीकुर्वन् बभाण प्रतिनादिना ॥१८०॥

अर्थ: तदनन्तर आकाशमें गूँजनेवाले स्वरसे दिशाओंको बहरा करता हुआ दशानन, प्रतिध्वनिसे हाथियोंको मदरहित करता हुआ बोला ॥१८०॥


कोऽसौ वैश्रवणो नाम को वेन्द्रः परिभाष्यते । अस्मद्गोत्रक्रमायाता नगरी येन गृह्यते ॥१८१॥

अर्थ: कि यह वैश्रवण कौन है ? अथवा इन्द्र कौन कहलाता है ? जो कि हमारी वंश-परम्परासे चली आयी नगरीपर अधिकार किये बैठा है ? ॥१८१॥


सोऽयं श्येनायते काकः शृगालः शरभायते । इन्द्रायते स्वभृत्यानां निस्त्रपः पुरुषाधमः ॥१८२॥

अर्थ: निर्लज्ज नीचपुरुष अपने भृत्योंके सामने इन्द्र जैसा आचरण करता है सो मानो कौआ बाज बन रहा है और शृगाल अष्टापदके समान आचरण कर रहा है ॥१८२॥


आः कुदूत पुरोऽस्माकं गदतः परुषं वचः । निःशङ्कस्य शिरस्तावत् पातयामि रुषे वलिम् ॥१८३॥

अर्थ: अरे कुदूत ! हमारे सामने निःशंक होकर कठोर वचन बोल रहा है सो मैं अभी क्रोधके लिए तेरे मस्तककी बलि चढ़ाता हूँ ॥१८३॥


इत्युक्त्वा कोशतः खड्गमाचकर्ष कृतं वियत् । इन्दीवरवनेनेव येन व्याप्तं महासरः ॥१८४॥

अर्थ: यह कहकर उसने म्यानसे तलवार खींची जिससे आकाशरूपी सरोवर ऐसा दिखने लगा मनो नीलकमलरूपी वनसे ही व्याप्त हो गया हो ॥१८४॥


कुर्वाणं क्वणनं वाताद्रोषादिव सकम्पनम् । नीतं कालमिवासित्वं हिंसाया इव शावकम् ॥१८५॥

अर्थ: दशाननकी वह तलवार हवासे बात कर रही थी, क्रोधसे मानो काँप रही थी, ऐसी जान पड़ती थी मानो तलवारका रूप धरकर यमराज ही वहाँ आया हो, अथवा मानो हिंसाका बेटा ही हो ॥१८५॥


उद्गूर्णश्चायमेतेन वेगादागत्य चान्तरम् । विभीषणेन संरुद्धः सान्त्वितश्चेति सादरम् ॥१८६॥

अर्थ: दशाननने वह तलवार ऊपरको उठायी ही थी कि विभीषणने बीचमें आकर रोक दिया और बड़े आदरसे इस प्रकार समझाया कि ॥१८६॥


भृत्यस्यास्यापराधः कः क्लीबस्यापहतात्मनः । विक्रीतनिजदेहस्य शुकस्येवानुभाषिणः ॥१८७॥

अर्थ: जिसने अपना शरीर बेच दिया है और जो तोतेके समान कही बातको ही दुहराता हो ऐसे इस पापी दीन-हीन भृत्यका अपराध क्या है ? ॥१८७॥


हृदयस्थेन नाथेन पिशाचेनेव चोदिताः । दूता वाचि प्रवर्तन्ते यन्त्रदेहा इवावशाः ॥१८८॥

अर्थ: दूत जो कुछ वचन बोलते हैं सो पिशाच की तरह हृदयमें विद्यमान अपने स्वामीसे प्रेरणा पाकर ही बोलते हैं। यथार्थमें दूत यन्त्रमयी पुरुषके समान पराधीन है ॥१८८॥


तत्प्रसीद दयामार्य कुरु प्राणिनि दुःखिते । अकीर्तिरुद्भवत्युर्वीलोके क्षुद्रवधे कृते ॥१८९॥

अर्थ: इसलिए हे आर्य ! प्रसन्न होओ और दुःखी प्राणी पर दया करो। क्षुद्रका वध करनेसे संसारमें अकीर्ति ही फैलती है ॥१८९॥


शिरस्सु विद्विषामेव तव खड्गः पतिष्यति । न हि गण्डूपदान् हन्तुं वैनतेयः प्रवर्तते ॥१९०॥

अर्थ: आपकी तलवार तो शत्रुओंके ही सिर पर पड़ेगी क्योंकि गरुड़ जलमें रहनेवाले निर्विष साँपोंको मारनेके लिए प्रवृत्त नहीं होता ॥१९०॥


एवं कोपानलस्तस्य यावत्सद्वाक्यवारिणा । शममानीयते तेन साधुना न्यायवादिना ॥१९१॥

पादयोस्तावदाकृष्य दूतोऽन्यैः सुखलीकृतः । क्षिप्रं निष्कासितो गेहाद् धिग् भृत्यं दुःखनिर्मितम् ॥१९२॥

अर्थ: इस प्रकार न्याय-नीतिको जाननेवाले सत्पुरुष विभीषण, सदुपदेशरूपी जलसे जबतक दशाननकी क्रोधाग्निको शान्त करता है तबतक अन्य लोगोंने उस दूतके पैर खींचकर उसे सभाभवनसे शीघ्र ही बाहर निकाल दिया। आचार्य कहते हैं कि दुःखके लिए ही जिसकी रचना हुई है ऐसे भृत्यको धिक्कार हो ॥१९१-१९२॥


गत्वा वैश्रवणायेयमवस्था तेन वेदिता । दशग्रीवाद्विनिष्क्रान्ता वाणी चात्यन्तदुःकथा ॥१९३॥

अर्थ: दूतने जाकर अपनी यह सब दशा वैश्रवणको बतला दी और दशाननके मुखसे निकली वह अभद्रवाणी भी सुना दी ॥१९३॥


तयेन्धनविभूत्यास्य कोपवह्निः समुत्थितः । अमात इव सोऽनेन भृत्यचेतःसु वण्टितः ॥१९४॥

अर्थ: दूतके वचनरूपी ईंधनसे वैश्रवणकी क्रोधाग्नि भभक उठी । इतनी भभकी कि वैश्रवणके मनमें मानो समा नहीं सकी इसलिए उसने भृत्यजनोंके चित्तमें बाँट दी अर्थात् दूतके वचन सुनकर वैश्रवण कुपित हुआ और साथ ही उसके भृत्य भी बहुत कुपित हुए ॥१९४॥


अचीकरच्च संग्रामसंज्ञां परुषतूर्यतः । रणसज्जा यया सद्यो मणिभद्रादयः कृताः ॥१९५॥

अर्थ: उसने तुरहीके कठोर शब्दोंसे युद्धकी सूचना करवा दी जिससे मणिभद्र आदि योद्धा शीघ्र ही युद्धके लिए तैयार हो गये ॥१९५॥


निरैद् वैश्रवणो योद्धुं यक्षयोधैस्ततो वृतः । विलसत्सायकप्रासचक्राद्यायुधपाणिभिः ॥१९६॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके हाथोंमें कृपाण, भालें तथा चक्र आदि शस्त्र सुशोभित हो रहे थे ऐसे यक्षरूपी योधाओंसे घिरा हुआ वैश्रवण युद्धके लिए निकला ॥१९६॥


स निर्भराञ्जनक्षोणीधराकारैर्मतङ्गजैः । संध्यारागसमाविष्टमेघाकारैर्महारथैः ॥१९७॥

प्रस्फुरच्चामरैरश्वैर्जयद्भिर्जवतोऽनिलम् । सुरावाससमाकारैर्विमानैर्दूरमुन्नतैः ॥१९८॥

लङ्घिताश्वविमानेभस्यन्दनेनोरुतेजसा । पादातेन च संघट्टमीयुषार्णवराविणा ॥१९९॥

पूर्वमेव च निष्क्रान्तो दशग्रीवो महाबलः । भानुकर्णादिभिः सार्धं स्थितो रणमहोत्सवः ॥२००॥

अर्थ: इधर अंजनगिरिका आकार धारण करनेवाले - बड़े-बड़े काले हाथियों, सन्ध्याकी लालिमासे युक्त मेघोंके समान दिखनेवाले बड़े-बड़े रथों, जिनके दोनों ओर चमर ढुल रहे थे तथा जो वेगसे वायुको जीत रहे थे ऐसे घोड़ों, देवभवनके समान सुन्दर तथा ऊँची उड़ान भरनेवाले विमानों, तथा जो घोड़े, विमान, हाथी और रथ - सभीको उल्लंघन कर रहे थे अर्थात् इन सबसे आगे बढ़कर चल रहे थे, जिनका प्रताप बहुत भारी था, जो अधिकताके कारण एक दूसरेको धक्का दे रहे थे तथा समुद्रके समान गरज रहे थे ऐसे पैदल सैनिकों और भानुकर्ण आदि भाइयोंके साथ महाबलवान् दशानन, पहलेसे ही बाहर निकलकर बैठा था । युद्धका निमित्त पाकर दशाननके हृदयमें बड़ा उत्सव - उल्लास हो रहा था ॥१९७-२००॥


गुञ्जाख्यस्य ततो मूर्ध्नि पर्वतस्य तयोरभूत् । संपातः सेनयोः शस्त्रसंपातोद्गतपावकः ॥२०१॥

अर्थ: तदनन्तर गुंज नामक पर्वतके शिखरपर दोनों सेनाओंका समागम हुआ । ऐसा समागम कि जिसमें शस्त्रोंके पड़नेसे अग्नि उत्पन्न हो रही थी ॥२०१॥


क्वणनेन ततोऽसीनां सप्तीनां हेषितेन च । पदातीनां च नादेन गजानां गर्जितेन च ॥२०२॥

अन्योऽन्यसंगमोद्भूतरथशब्देन चारुणा । तूर्यस्वरेण चोग्रेण शीत्कारेण च पत्रिणाम् ॥२०३॥

ध्वनिः कोऽपि विमिश्रोऽभूत् प्रतिनादेन बोधितः । व्याप्नुवन् रोदसी कुर्वन् भटानां मदमुत्तमम् ॥२०४॥

अर्थ: तदनन्तर तलवारोंकी खनखनाट, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, पैदल सैनिकोंकी आवाज, हाथियोंकी गर्जना, परस्परके समागमसे उत्पन्न रथोंकी सुन्दर चीत्कार, तुरहीकी बुलन्द आवाज और बाणोंकी सनसनाहटसे उस समय कोई मिश्रित-विलक्षण ही शब्द हो रहा था । उसकी प्रतिध्वनि आकाश और पृथिवीके बीच गूँज रही थी तथा योद्धाओंमें उत्तम मद उत्पन्न कर रही थी २०२-२०४॥


कृतान्तवन्दनाकारैश्चक्रैः स्फुरितधारकैः । खड्गैस्तद्रसनाकारै रक्तसीकरवर्षिभिः ॥२०५॥

तद्रोमसंनिभैः कुन्तैस्तत्तर्जन्युपमैः शरैः । परिघैस्तद्भुजाकारैस्तन्मुष्टिसममुद्गरैः ॥२०६॥

बभूव सुमहज्जन्यं कृतविक्रान्तसंमदम् । कातरोत्पादितत्रासं शिरःक्रीतयशोधनम् ॥२०७॥

अर्थ: इस तरह जिनका आकार यमराजके मुखके समान था तथा जिनकी धार पैनी थी, ऐसे चक्रों, यमराजकी जिह्वाके समान दिखनेवाली तथा खूनकी बूँदें बरसानेवाली तलवारों, उसके रोमके समान दिखनेवाले भाले, यमराजकी प्रदेशिनी अँगुलीकी उपमा धारण करनेवाले बाणों, यमराजकी भुजाके आकार परिघ नामक शस्त्रों और उनकी मुट्ठीके समान दिखनेवाले मुद्गरोंसे दोनों सेनाओंमें बड़ा भारी युद्ध हुआ । उस युद्धसे जहाँ पराक्रमी मनुष्योंको हर्ष हो रहा था वहाँ कातर मनुष्योंको भय भी उत्पन्न हो रहा था । दोनों ही सेनाओंके शूरवीर अपना सिर दे-देकर यशरूपी महाधन खरीद रहे थे ॥२०५-२०७॥


ततो निजं बलं नीतं खेदं यक्षमटैश्चिरात् । स धारयितुमारब्धो दशास्यो रणमस्तकम् ॥२०८॥

अर्थ: तदनन्तर चिरकाल तक यक्षरूपी भटोंके द्वारा अपनी सेनाको खेद खिन्न देख दशानन उसे सँभालनेके लिए तत्पर हुआ ॥२०८॥


अभ्यायान्तं च तं दृष्ट्वा सितातपनिवारणम् । कालमेघमिवोद्र्ध्वस्थरजनीकरमण्डलम् ॥२०९॥

सचापं तमिवासक्तशचीपतिशरासनम् । हेमकण्टकसंवीतं विद्युतालमिवाचितम् ॥२१०॥

किरीटं बिभ्रतं नानारत्नसङ्गविराजितम् । युक्तं तमिव वज्रेण छादयन्तं नभस्त्विषा ॥२११॥

विलक्षाश्चाभवन् यक्षा विषण्णाक्षाः क्षतौजसः । पराङ्मुखक्रियायुक्ताः क्षणात् क्षीणरणाशयाः ॥२१२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके ऊपर सफेद छत्र लग रहा था और उससे जो उस काले मेघके समान दिखाई देता था जिसपर कि चन्द्रमाका मण्डल चमक रहा था, जो धनुषसे सहित था और उससे इन्द्रधनुष सहित श्याम मेघके समान जान पड़ता था, सुवर्णमय कवचसे युक्त होनेके कारण जो बिजलीसे युक्त श्याम मेघके समान दिखाई देता था, जो नाना रत्नोंके समागमसे सुशोभित मुकुट धारण कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो कान्तिसे आकाशको आच्छादित करता हुआ वज्रसे युक्त श्याम मेघ ही हो । ऐसे दशाननको आता हुआ देख यक्षोंकी आँखें चौंधिया गयीं, उनका सब ओज नष्ट हो गया, युद्धसे विमुख हो भागनेकी चेष्टा करने लगे और क्षण-भरमें उनका युद्धका अभिप्राय समाप्त हो गया ॥२०९-२१२॥


त्रासाकुलितचित्तेषु ततो यक्षपदातिषु । आर्वतमिव यातेषु भ्रमस्सु सुमहारवम् ॥२१३॥

स्वसेनामुखतां जग्मुर्यक्षाणां बहवोऽधिपाः । पुनरेभिः कृतं सैन्यं रणस्याभिमुखं तथा ॥२१४॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके चित्त भयसे व्याकुल हो रहे थे ऐसे यक्षोंके पैदल सैनिक महाशब्द करते हुए जब भ्रमरमें पड़ेके समान घूमने लगे तब यक्षोंके बहुत सारे अधिपति अपनी सेनाके सामने आये और उन्होंने सेनाको फिरसे युद्धके सम्मुख किया ॥२१३-२१४॥


तत उच्छेत्तुमारब्धो यक्षनाथान् दशाननः । उत्पत्योत्पत्य गगने सिंहो मत्तगजानिव ॥२१५॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार सिंह आकाशमें उछल-उछलकर मत्त हाथियोंको नष्ट करता है उसी प्रकार दशानन यक्षाधिपतियोंको नष्ट करनेके लिए तत्पर हुआ ॥२१५॥


प्रेरितः कोपवातेन दशाननतनूनपात् । शस्त्रज्वालाकुलः शत्रुसैन्यकक्षे व्यजृम्भत ॥२१६॥

अर्थ: शस्त्ररूपी ज्वालाओंसे युक्त दशाननरूपी अग्नि, क्रोधरूपी वायुसे प्रेरित होकर शत्रुसेनारूपी वनमें वृद्धिको प्राप्त हो रही थी ॥२१६॥


न सोऽस्ति पुरुषो भूमौ रथे वाजिनि वारणे । विमाने वा न यश्छिद्रः कृतो दाशाननैः शरैः ॥२१७॥

अर्थ: उस समय पृथिवी, रथ, घोड़े, हाथी अथवा विमानपर ऐसा एक भी आदमी नहीं बचा था जो रावणके बाणोंसे सछिद्र न हुआ हो ॥२१७॥


ततोऽभिमुखमायातं दृष्ट्वा दशमुखं रणे । अभजद्बान्धवस्नेहं परं वैश्रवणः क्षणात् ॥२१८॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धमे दशाननको सामने आता देख वैश्रवण, क्षण-भरमें भाईके उत्तम स्नेहको प्राप्त हुआ ॥२१८॥


विषादमतुलं चागान्निर्वेदं च नृपश्रियः । यथा बाहुबली पूर्वं शमकर्मणि संगतः ॥२१९॥

विवेदेति च धिक्कष्टं संसारं दुःखभाजनम् । चक्रवत्परिवर्तन्ते प्राणिनो यत्र योनिषु ॥२२०॥

अर्थ: साथ ही अनुपम विषाद और राज्यलक्ष्मीसे उदासीनताको प्राप्त हुआ । जिस प्रकार पहले बाहुबलि अपने भाई भरतसे द्वेष कर पछताये उसी प्रकार वैश्रवण भी भाई दशाननसे विरोध कर पछताया । वह मन ही मन शान्त अवस्थाको प्राप्त होता हुआ विचार करने लगा कि जिस संसारमें प्राणी नाना योनियोंमें चक्रकी भाँति परिवर्तन करते रहते हैं वह संसार दुःखका पात्र है, कष्ट स्वरूप है, अतः उसे धिक्कार हो ॥२१९-२२०॥


पश्यैश्वर्यविमूढेन किं वस्तु प्रस्तुतं मया । बन्धुविध्वंसनं यत्र क्रियते गर्ववत्तया ॥२२१॥

अर्थ: देखो, ऐश्वर्यमें मत्त होकर मैंने यह कौन-सा कार्य प्रारम्भ कर रखा है कि जिसमें अहंकारवश अपने भाईका विध्वंस किया जाता है ॥२२१॥


उदात्तमिति चावोचद् भो भो शृणु दशानन । किमिदं क्रियते पापं क्षणिकश्रीप्रचोदितम् ॥२२२॥

अर्थ: वह इस प्रकार उत्कृष्ट वचन कहने लगा कि हे दशानन ! सुन, क्षणिक राज्यलक्ष्मीसे प्रेरित होकर यह कौन-सा पापकर्म किया जा रहा है ? ॥२२२॥


मातृष्वसुः सुतोऽहं ते सोदरप्रीतिसंगतः । ततो बन्धुषु नो युक्तं व्यवहर्तुमसांप्रतम् ॥२२३॥

अर्थ: मैं तेरी मौसीका पुत्र हूँ अतः तुझपर सगे भाई-जैसा स्नेह करता हूँ । भाइयोंके साथ अनुचित व्यवहार करना उचित नहीं है ॥२२३॥


कृत्वा प्राणिवधं जन्तुर्मनोज्ञविषयाशया । प्रयाति नरकं भीमं सुमहादुःखसंकुलम् ॥२२४॥

अर्थ: यह प्राणी मनोहर विषयोंकी आशासे प्राणियोंका वध कर बहुत भारी दुःखोंसे युक्त भयंकर नरकमें जाता है ॥२२४॥


यथैकदिवसं राज्यं प्राप्तं संवत्सरं वधम् । प्राप्नोति सदृशं तेन निश्चये विषयैः सुखम् ॥२२५॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई मनुष्य एक दिनका तो राज्य प्राप्त करे और उसके फलस्वरूप वर्ष-भर मृत्युको प्राप्त हो उसी प्रकार निश्चयसे यह प्राणी विषयोंके द्वारा क्षणस्थायी सुख प्राप्त करता है और उसके फलस्वरूप अपरिमित काल तक दुःख प्राप्त करता है ॥२२५॥


चक्षुःपक्ष्मपुटासङ्गक्षणिकं ननु जीवितम् । न वेत्सि किं यतः कर्म कुरुते भोगकारणम् ॥२२६॥

अर्थ: यथार्थमें यह जीवन नेत्रोंकी टिमकारके समान क्षणभंगुर है सो हे दशानन ! क्या तू यह जानता नहीं है जिससे भोगोंके निमित्त यह कार्य कर रहा है ? ॥२२६॥


ततो हसन्नुवाचेदं दशास्यः करुणोज्झितः । धर्मश्रवणकालोऽयं न वैश्रवण वर्तते ॥२२७॥

अर्थ: तब दयाहीन दशाननने हँसते हुए कहा कि हे वैश्रवण ! यह धर्म-श्रवण करनेका समय नहीं है ॥२२७॥


मत्तस्तम्बेरमारूढैर्मण्डलाग्रकरैर्नरैः । क्रियते मारणं शत्रोर्न तु धर्मनिवेदनम् ॥२२८॥

अर्थ: मदोन्मत्त हाथियोंपर चढ़े तथा तलवारको हाथमें धारण करनेवाले मनुष्य तो शत्रुका संहार करते हैं न कि धर्मका उपदेश ॥२२८॥


मार्गे तिष्ठ कृपाणस्य किं व्यर्थं बहु भाषसे । कुरु वा प्रणिपातं मे तृतीयास्ति न ते गतिः ॥२२९॥

अर्थ: व्यर्थ ही बहुत क्यों बक रहा है ? या तो तलवारके मार्गमें खड़ा हो या मेरे लिए प्रणाम कर । तेरी तीसरी गति नहीं है ॥२२९॥


अथवा धनपालस्त्वं द्रविणं मम पालय । कुर्वाणो हि निजं कर्म पुरुषो नैव लज्जते ॥२३०॥

अर्थ: अथवा तू धनपाल है सो मेरे धनकी रक्षा कर । क्योंकि जिसका जो अपना कार्य होता है उसे करता हुआ वह लज्जित नहीं होता ॥२३०॥


ततो वैश्रवणो भूय उवाचेति दशाननम् । नूनमायुस्तव स्वल्पं क्रूरं येनेति भाषसे ॥२३१॥

अर्थ: तब वैश्रवण फिर दशाननसे बोला कि निश्चय ही तेरी आयु अल्प रह गयी है इसीलिए तू इस प्रकार क्रूर वचन बोल रहा है ॥२३१॥


भूयोऽपि मानसं बिभ्रत्ततो रोषणरूषितम् । अस्ति चेत्तव सामर्थ्यं जहीत्याह दशाननः ॥२३२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें रोषसे रूषित मनको धारण करनेवाले दशाननने फिर कहा कि यदि तेरी सामर्थ्य है तो मार ॥२३२॥


जगाद स ततो ज्येष्ठस्त्वं मां प्रथममाजहि । वीर्यमक्षतकायानां शूराणां नहि वर्धते ॥२३३॥

अर्थ: तब वैश्रवणने कहा कि तू बड़ा है इसलिए प्रथम तू ही मुझे मार क्योंकि जिनके शरीरमें घाव नहीं लगता ऐसे शूर वीरोंका पराक्रम वृद्धिको प्राप्त नहीं होता ॥२३३॥


ऊर्ध्वं ततो दशास्यस्य शरान् वैश्रवणोऽमुचत् । करानिवावनेर्मूर्ध्नि मध्याह्ने द्योतिषां पतिः ॥२३४॥

अर्थ: तदनन्तर मध्याह्नके समय जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणें पृथिवीके ऊपर छोड़ता है उसी प्रकार वैश्रवणने दशाननके ऊपर बाण छोड़े ॥२३४॥


चिच्छेद सायकान् तस्य ततो बाणैर्दशाननः । मण्डपं च घनं चक्रे क्षणमात्रादनाकुलः ॥२३५॥

अर्थ: तत्पश्चात् दशाननने अपने बाणोंसे उसके बाण छेद डाले और बिना किसी आकुलताके लगातार छोड़े हुए बाणोंसे उसके ऊपर मण्डप-सा तान दिया ॥२३५॥


रन्ध्रं वैश्रवणः प्राप्य शशाङ्कार्धेषुणा ततः । दशास्यस्याच्छिनच्चापं चक्रे चैतं रथच्युतम् ॥२३६॥

अर्थ: तदनन्तर अवसर पाकर वैश्रवणने अर्धचन्द्र बाणसे दशाननका धनुष तोड़ डाला और उसे रथसे च्युत कर दिया ॥२३६॥


ततोऽन्यं रथमारुह्य वेगादम्भोदनिस्वनम् । तथासत्त्वो दशग्रीवो ढुढौके पुष्पकान्तिकम् ॥२३७॥

अर्थ: तत्पश्चात् अद्भुत पराक्रमका धारी दशानन मेघके समान शब्द करनेवाले मेघनाद नामा दूसरे रथपर वेगसे चढ़कर वैश्रवणके समीप पहुँचा ॥२३७॥


उल्काकारैस्ततस्तेन वज्रदण्डैर्घनेरितैः । कणशः कवचं कीर्णं धनदस्य महारुषा ॥२३८॥

अर्थ: वहाँ बहुत भारी क्रोधसे उसने जोर-जोरसे चलाये हुए उल्काके समान आकारवाले वज्रदण्डोंसे वैश्रवण का कवच चूर-चूर कर डाला ॥२३८॥


हृदये शुक्लमालेऽथ भिण्डिमालेन वेगिना । जघान कैकसेयस्तं तथा मूर्च्छामितो यतः ॥२३९॥

अर्थ: और सफेद मालाको धारण करनेवाले उसके हृदयमें वेगशाली भिण्डिमालसे इतने जमकर प्रहार किया कि वह वहीं मूर्छित हो गया ॥२३९॥


ततो जातो महाक्रन्दः सैन्ये वैश्रवणाश्रिते । तोषाच्च रक्षसां सैन्ये जातः कलकलो महान् ॥२४०॥

अर्थ: यह देख वैश्रवणकी सेनामें रुदनका महाशब्द होने लगा और राक्षसोंकी सेनामें हर्षके कारण बड़ा भारी कल-कल शब्द होने लगा ॥२४०॥


ततो भृत्यैः समुद्धृत्य वीरशय्याप्रतिष्ठितः । क्षिप्रं यक्षपुरं नीतो धनदो भृशदुःखितः ॥२४१॥

अर्थ: तब अतिशय दुःखी और वीरशय्यापर पड़े वैश्रवणको उसके भृत्यगण शीघ्र ही यक्षपुर ले गये ॥२४१॥


दशास्योऽपि जितं शत्रुं ज्ञात्वा निववृते रणात् । वीराणां शत्रुभङ्गेन कृतत्वं न धनादिना ॥२४२॥

अर्थ: रावण भी शत्रुको पराजित जान युद्धसे विमुख हो गया सो ठीक ही है क्योंकि वीर मनुष्योंका कृतकृत्यपना शत्रुओंके पराजयसे ही हो जाता है । धनादिकी प्राप्तिसे नहीं ॥२४२॥


अथ प्रतिक्रिया चक्रे धनदस्य चिकित्सकैः । प्राप्तश्च पूर्ववद्देहमिति चक्रे स चेतसि ॥२४३॥

अर्थ: अथानन्तर वैद्योंने वैश्रवणका उपचार किया सो वह पहलेके समान स्वस्थ शरीरको प्राप्त हो गया । स्वस्थ होनेपर उसने मनमें विचार किया ॥२४३॥


द्रुमस्य पुष्पमुक्तस्य भग्नस्य वृषभस्य च । सरसश्चाप्यपद्मस्य वर्तेऽहं सदृशोऽधुना ॥२४४॥

अर्थ: कि इस समय मैं पुष्परहित वृक्ष, फूटे हुए घट अथवा कमलरहित सरोवरके समान हूँ ॥२४४॥


मानमुद्वहतः पुंसो जीवतः संसृतौ सुखम् । तच्च मे सांप्रतं नास्ति तस्मान्मुक्त्यर्थमार्यते ॥२४५॥

अर्थ: जबतक मनुष्य मानको धारण करता है तभी तक संसारमें जीवित रहते हुए उसे सुख होता है । इस समय मेरा वह मान नष्ट हो गया है इसलिए मुक्ति प्राप्त करनेके लिए प्रयत्न करता हूँ ॥२४५॥


एतदर्थं न वाञ्छन्ति सन्तो विषयजं सुखम् । यदेतदध्रुवं स्तोकं सान्तरायं सदुःखकम् ॥२४६॥

अर्थ: चूँकि यह विषयजन्य सुख अनित्य है, थोड़ा है, सान्तराय है और दुःखोंसे सहित है इसलिए सत्पुरुष उसकी चाह नहीं रखते ॥२४६॥


नागः कस्यचिदप्यत्र कर्मणामिदमीहितम् । समस्तं प्राणिजातस्य कृतानामन्यजन्मनि ॥२४७॥

अर्थ: इसमें किसीका अपराध नहीं है, यह तो प्राणियोंने अन्य जन्ममें जो कर्म कर रखे हैं उन्हींकी समस्त चेष्टा है ॥२४७॥


निमित्तमात्रतान्येषामसुखस्य सुखस्य वा । बुधास्तेभ्यो न कुप्यन्ति संसारस्थितिवेदिनः ॥२४८॥

अर्थ: दुःख अथवा सुखके दूसरे लोग निमित्त मात्र हैं, इसलिए संसारकी स्थितिके जाननेवाले विद्वान् उनसे कुपित नहीं होते हैं अर्थात् निमित्तके प्रति हर्ष-विषाद नहीं करते हैं ॥२४८॥


कल्याणमित्रतां यातः केकसीतनयो मम । गृहावासमहापाशाद्येनाहं मोचितोऽमतिः ॥२४९॥

अर्थ: वह दशानन मेरा कल्याणकारी मित्र है कि जिसने मुझ दुर्बुद्धिको गृहवासरूपी महाबन्धनसे मुक्त करा दिया ॥२४९॥


बान्धवो भानुकर्णोऽपि संवृत्तः सांप्रतं मम । संग्रामकारणं येन कृतं परमसंविदे ॥२५०॥

अर्थ: भानुकर्ण भी इस समय मेरा परम हितैषी हुआ है कि जिसके द्वारा किया हुआ संग्राम मेरे परम वैराग्यका कारण हुआ है ॥२५०॥


इति संचिन्त्य जग्राह दीक्षां दैगम्बरीमसौ । आराध्य च तपः सम्यक् क्रमाद्धाम परं गतः ॥२५१॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उसने दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली और समीचीन तपकी आराधना कर परम धाम प्राप्त किया ॥२५१॥


प्रक्षाल्य दशवक्त्रोऽपि पराभवमलं कुले । सुखासिकामगादुर्व्यां बन्धुभिः शेखरीकृतः ॥२५२॥

अर्थ: इधर दशानन भी अपने कुलके ऊपर जो पराभवरूपी मैल जमा हुआ था उसे धोकर पृथिवीमें सुखसे रहने लगा तथा समस्त बन्धुजनोंने उसे अपना शिरमौर माना ॥२५२॥


अथ प्रवर्तितं तस्य मनोज्ञं धानदाधिपम् । प्रत्युप्तरत्नशिखरं वातायनविलोचनम् ॥२५३॥

मुक्ताजालप्रमुक्तेन समूहेनामलत्विषाम् । समुत्सृजदिवाजस्रमश्रु स्वामिवियोगतः ॥२५४॥

पद्मरागविनिर्माणमग्रदेशं दधच्छुचा । ताडनादिव संप्राप्तं हृदयं रक्ततां पराम् ॥२५५॥

इन्द्रनीलप्रभाजालकृतप्रावरणं क्वचित् । शोकादिव परिप्राप्तं श्यामलत्वमुदारतः ॥२५६॥

चैत्यकाननबाह्यालीवाप्यन्तर्भवनादिभिः । सहितं नगराकारं नानाशस्त्रकृतक्षतम् ॥२५७॥

भृत्यैरुपाहृतं तुङ्गं सुरप्रासादसंनिभम् । विमानं पुष्पकं नाम विहायस्तलमण्डनम् ॥२५८॥

अर्थ: अथानन्तर वैश्रवणका जो पुष्पक विमान था उसे रावणके भृत्यजन रावणके समीप ले आये । वह पुष्पक विमान अत्यन्त सुन्दर था, वैश्रवण उसका स्वामी था, उसके शिखरमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए थे, झरोखे उसके नेत्र थे, उसमें जो मोतियोंकी झालर लगी थी उससे निर्मल कान्तिका समूह निकल रहा था और उससे वह ऐसा जान पड़ता था मानो स्वामीका वियोग हो जानेके कारण निरन्तर आँसू ही छोड़ता रहता हो । उसका अग्रभाग पद्मराग मणियोंसे बना था इसलिए उसे धारण करता हुआ वह ऐसा जान पड़ता था मानो शोकके कारण उसने हृदयको बहुत कुछ पीटा था इसीलिए वह अत्यन्त लालिमाको धारण कर रहा था । कहीं-कहीं इन्द्रनील मणियोंकी प्रभा उसपर आवरण कर रही थी जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो शोकके कारण ही वह अत्यन्त श्यामलताको प्राप्त हुआ हो । चैत्यालय, वन, मकानोंके अग्रभाग, वापिका तथा महल आदिसे सहित होनेके कारण वह किसी नगरके समान जान पड़ता था । नाना शस्त्रोंने उस विमानमें चोटें पहुँचायी थीं, वह बहुत ही ऊँचा था, देवभवनके समान जान पड़ता था और आकाशतलका मानो आभूषण ही था ॥२५३-२५८॥


अरातिभङ्गचिह्नत्वादियेषेदं स मानवान् । अन्यथा तस्य किं नास्ति यानं विद्याविनिर्मितम् ॥२५९॥

अर्थ: मानी दशाननने शत्रुकी पराजयका चिह्न समझ उस पुष्पक विमानको अपने पास रखनेकी इच्छा की थी अन्यथा उसके पास विद्यानिर्मित कौन-सा वाहन नहीं था ? ॥२५९॥


स तं विमानमारुह्य सामात्यः सहवाहनः । सपौरः सात्मजः सार्धं पितृभ्यां सहबन्धुभिः ॥२६०॥

अर्थ: वह उस विमानपर आरूढ़ होकर मन्त्रियों, वाहनों, नागरिकजनों, पुत्रों, माता-पिताओं तथा बन्धुजनोंके साथ चला ॥२६०॥


अन्तःपुरमहापद्मखण्डमध्यगतः सुखी । अव्याहतगतिः स्वेच्छाकृतविभ्रमभूषणः ॥२६१॥

अर्थ: वह उस विमानके अन्दर अन्तःपुररूपी महाकमलवनके बीचमें सुखसे बैठा था, उसकी गतिको कोई नहीं रोक सकता था, तथा अपनी इच्छानुसार उसने हावभावरूपी आभूषण धारण कर रखे थे ॥२६१॥


चापत्रिशूलनिस्त्रिंशप्रासपाशादिपाणिभिः । भृत्यैरनुगतो भक्तैर्विहिताद्भुतकर्मभिः ॥२६२॥

अर्थ: चाप, त्रिशूल, तलवार, भाला तथा पाश आदि शस्त्र जिनके हाथमें थे तथा जिन्होंने अनेक आश्चर्यजनक कार्य करके दिखलाये थे ऐसे अनेक सेवक उसके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥२६२॥


कृतशत्रुसमूहान्तैः सामन्तैर्बद्धमण्डलैः । गुणप्रवणचेतोभिर्महाविभवशोभितैः ॥२६३॥

अर्थ: जिन्होंने शत्रुओंके समूहका अन्त कर दिया था, जो चक्राकार मण्डल बनाकर पास खड़े थे, जिनका चित्त गुणोंके अधीन था तथा जो महावैभवसे शोभित थे ऐसे अनेक सामन्त उसके साथ जा रहे थे ॥२६३॥


वरविद्याधरीपाणिगृहीतैश्चारुचामरैः । वीज्यमानो विलिप्ताङ्गो गोशीर्षादिविलेपनैः ॥२६४॥

अर्थ: गोशीर्ष आदि विलेपनोंसे उसका सारा शरीर लिप्त था तथा उत्तमोत्तम विद्याधरियाँ हाथमें लिये हुए सुन्दर चमरोंसे उसे हवा कर रही थीं ॥२६४॥


उच्छ्रितेनातपत्रेण रजनीकरशोभिना । यशसेवागतः शोभां लब्धेनारातिभङ्गतः ॥२६५॥

अर्थ: वह चन्द्रमाके समान सुशोभित ऊपर तने हुए छत्रसे ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो शत्रुकी पराजयसे उत्पन्न यशसे ही सुशोभित हो रहा हो ॥२६५॥


उदारं भानुवत्तेजो दधानः पुण्यजं फलम् । विन्दन् दक्षिणमम्भोधिं ययाविन्द्रसमः श्रिया ॥२६६॥

अर्थ: वह सूर्यके समान उत्कृष्ट तेजको धारण कर रहा था तथा लक्ष्मीसे इन्द्रके समान जान पड़ता था । इस प्रकार पुण्यसे उत्पन्न फलको प्राप्त होता हुआ वह दक्षिणसमुद्रकी ओर चला ॥२६६॥


तस्यानुगमनं चक्रे कुम्भकर्णो गजस्थितः । विभीषणो रथस्थश्च स्वगर्वविभवान्वितः ॥२६७॥

अर्थ: हाथीपर बैठा हुआ कुम्भकर्ण और रथपर बैठा तथा स्वाभिमान रूपी वैभवसे युक्त विभीषण इस प्रकार दोनों भाई उसके पीछे-पीछे जा रहे थे ॥२६७॥


महादैत्यो मयोऽप्येनमन्वियाय सबान्धवः । सामन्तैः सहितः सिंहशरभादियुतै रथैः ॥२६८॥

अर्थ: भाई-बान्धवों एवं सामन्तोंसे सहित महादैत्य मय भी, जिनमें सिंह-शरभ आदि जन्तु जुते थे ऐसे रथोंपर बैठकर जा रहा था ॥२६८॥


मारीचोऽम्बरविद्युच्च वज्रो वज्रोदरो बुधः । वज्राक्षः क्रूरनक्रश्च सारणः सुनयः शुकः ॥२६९॥

मयस्य मन्त्रिणोऽन्ये च बहवः खेचराधिपाः । अनुजग्मुरुदारेण विभवेन समन्विताः ॥२७०॥

अर्थ: मरीच, अम्बरविद्युत्, वज्र, वज्रोदर, बुध, वज्राक्ष, क्रूरनक्र, सारण और सुनय ये राजा मयके मन्त्री तथा उत्कृष्ट वैभवसे युक्त अन्य अनेक विद्याधरोंके राजा उसके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥२६९-२७०॥


दक्षिणाशामशेषां स वशीकृत्य ततोऽन्यतः । विजहार महीं पश्यन् सवनाद्रिसमुद्रगाम् ॥२७१॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त दक्षिण दिशाको वश कर वह वन, पर्वत तथा समुद्रसे सहित पृथ्वीको देखता हुआ अन्य दिशाकी ओर चला ॥२७१॥


अथासावन्यदापृच्छत् सुमालिनमुदद्भुतः । उच्चैर्गगनमारूढो विनयानतविग्रहः ॥२७२॥

सरसीरहितेऽमुष्मिन् पूज्यपर्वतमूर्द्धनि । वनानि पश्य पद्मानां जातान्येतन्महाद्भुतम् ॥२७३॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन विनयसे जिसका शरीर झुक रहा था, ऐसा दशानन आकाशमें बहुत ऊँचे चढ़कर अपने दादा सुमालीसे आश्चर्यचकित हो पूछता है कि हे पूज्य ! इधर इस पर्वतके शिखरपर सरोवर तो नहीं है पर कमलोंका वन लहलहा रहा है सो इस महाआश्चर्यको आप देखें ॥२७२-२७३॥


तिष्ठन्ति निश्चलाः स्वामिन् कथमत्र महीतले । पतिता विविधच्छायाः सुमहान्तः पयोमुचः ॥२७४॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! यहाँ पृथ्वीतलपर पड़े रंगबिरंगे बड़े-बड़े मेघ निश्चल होकर कैसे खड़े हैं ? ॥२७४॥


नमः सिद्धेभ्य इत्युक्त्वा सुमाली तमथागदत् । नामूनि शतपत्राणि न चैते वत्स तोयदाः ॥२७५॥

अर्थ: तब सुमालीने ‘नमः सिद्धेभ्यः’ कहकर दशाननसे कहा कि हे वत्स ! न तो ये कमल हैं और न मेघ ही हैं ॥२७५॥


सितकेतुकृतच्छायाः सहस्राकारतोरणाः । शृङ्गेषु पर्वतस्यामी विराजन्ते जिनालयाः ॥२७६॥

अर्थ: किन्तु सफेद पताकाएँ जिनपर छाया कर रही हैं तथा जिनमें हजारों प्रकारके तोरण बने हुए हैं ऐसे ऐसे ये जिन-मन्दिर पर्वतके शिखरोंपर सुशोभित हो रहे हैं ॥२७६॥


कारिता हरिषेणेन सज्जनेन महात्मना । एतान् वत्स नमस्य त्वं भव पूतमनाः क्षणात् ॥२७७॥

अर्थ: ये सब मन्दिर महापुरुष हरिषेण चक्रवर्तीके द्वारा बनवाये हुए हैं । हे वत्स ! तू इन्हें नमस्कार कर और क्षण-भरमें अपने हृदयको पवित्र कर ॥२७७॥


ततस्तत्रस्थ एवासौ नमस्कृत्य जिनालयान् । उवाच विस्मयापन्नो धनदस्य विमर्दकः ॥२७८॥

आसीत्किं तस्य माहात्म्यं हरिषेणस्य कथ्यताम् । प्रतीक्ष्यतम येनासौ भवद्भिरिति कीर्तितः ॥२७९॥

अर्थ: तदनन्तर वैश्रवणका मानमर्दन करनेवाले दशाननने वहीं खड़े रहकर जिनालयोंको नमस्कार किया और आश्चर्यचकित हो सुमालीसे पूछा कि पूज्यवर ! हरिषेणका ऐसा क्या माहात्म्य था कि जिससे आपने उनका इस तरह कथन किया है ? ॥२७८-२७९॥


सुमाली न्यगदच्चैवं साधु पृष्टं दशानन । चरितं हरिषेणस्य शृणु पापविदारणम् ॥२८०॥

अर्थ: तब सुमालीने कहा कि हे दशानन ! तूने बहुत अच्छा प्रश्न किया । अब पापको नष्ट करनेवाला हरिषेणका चरित्र सुन ॥२८०॥


काम्पिल्यनगरे राजा नाम्ना मृगपतिध्वजः । बभूव यशसा व्याप्तसमस्तभुवनो महान् ॥२८१॥

अर्थ: काम्पिल्य नगरमें अपने यशके द्वारा समस्त संसार-को व्याप्त करनेवाला सिंहध्वज नामका एक बड़ा राजा रहता था ॥२८१॥


महिषी तस्य वप्राह्वा प्रमदागुणशालिनी । अभूत् सौभाग्यतः प्राप्ता पत्नीशतललामताम् ॥२८२॥

अर्थ: उसकी वप्रा नामकी पटरानी थी जो स्त्रियोंके योग्य गुणोंसे सुशोभित थी तथा अपने सौभाग्यके कारण सैकड़ों रानियोंमें आभूषणपनाको प्राप्त थी ॥२८२॥


हरिषेणः समुत्पन्नः स ताभ्यां परमोदयः । चतुःषष्ठ्या शुभैर्युक्तो लक्षणैः क्षतदुष्कृतः ॥२८३॥

अर्थ: उन दोनोंसे परम अभ्युदयको धारण करनेवाला हरिषेण नामका पुत्र हुआ । वह पुत्र उत्तमोत्तम चौंसठ लक्षणोंसे युक्त था तथा पापोंको नष्ट करनेवाला था ॥२८३॥


वप्रया चान्यदा जैने मते भ्रमयितुं रथे । आष्टाह्निकमहानन्दे नगरे धर्मशीलया ॥२८४॥

अर्थ: किसी एक समय आष्टाह्निक महोत्सव आया सो धर्मशील वप्रा रानीने नगरमें जिनेन्द्र भगवान्‌का रथ निकलवाना चाहा ॥२८४॥


महालक्ष्मीरिति ख्याता सौभाग्यमदविह्वला । अवृत्तमवदत्तस्याः सपत्नी दुर्विचेष्टिता ॥२८५॥

पूर्वं ब्रह्मरथो यातु मदीयः पुरवर्त्मनि । भ्रमिष्यति ततः पश्चाद्वप्रया कारितो रथः ॥२८६॥

अर्थ: राजा सिंहध्वजकी महालक्ष्मी नामक दूसरी रानी थी जो कि सौभाग्यके गर्वसे सदा विह्वल रहती थी । अनेक खोटी चेष्टाओंसे भरी महालक्ष्मी वप्राकी सौत थी इसलिए उसने उसके विरुद्ध आवाज उठायी कि पहले मेरा ब्रह्मरथ नगरकी गलियोंमें घूमेगा । उसके पीछे वप्रा रानीके द्वारा बनवाया हुआ जैनरथ घूम सकेगा ॥२८५-२८६॥


इति श्रुत्वा ततो वप्रा कुलिशेनेव ताडिता । हृदये दुःखसंतप्ता प्रतिज्ञामकरोदिमाम् ॥२८७॥

भ्रमिष्यति रथोऽयं मे प्रथमं नगरे यदि । पूर्ववत्पुनराहारं करिष्येऽतोऽन्यथा तु न ॥२८८॥

अर्थ: यह सुनकर वप्राको इतना दुःख हुआ कि मानो उसके हृदयमें वज्रकी ही चोट लगी हो । दुःखसे सन्तप्त होकर उसने प्रतिज्ञा की कि यदि मेरा यह रथ नगरमें पहले घूमेगा तो मैं पूर्वकी तरह पुनः आहार करूँगी अन्यथा नहीं ॥२८७-२८८॥


इत्युक्त्वा च बबन्धासौ प्रतिज्ञालक्ष्मवेणिकाम् । व्यापाररहितावस्थाशोकम्लानास्यपङ्कजा ॥२८९॥

ततः श्वासान् विमुञ्चन्तीमश्रुबिन्दूननारतम् । हरिषेणः समालोक्य जननीमित्यवोचत ॥२९०॥

मातः कस्मादिदं पूर्वं स्वप्नेऽपि न निषेवितम् । त्वया रोदनमारब्धममङ्गलमलं वद ॥२९१॥

अर्थ: यह कहकर उसने प्रतिज्ञाके चिह्नस्वरूप वेणी बाँध ली और सब काम छोड़ दिया। उसका मुखकमल शोकसे मुरझा गया, वह निरन्तर मुखसे श्वास और नेत्रोंसे आँसू छोड़ रही थी। माताकी ऐसी दशा देख हरिषेणने कहा कि हे मातः ! जिसका पहले कभी स्वप्नमें भी तुमने सेवन नहीं किया वह अमांगलिक रुदन तुमने क्यों प्रारम्भ किया ? अब बस करो और रुदनका कारण कहो ॥२८९-२९१॥


तयोक्तं स ततः श्रुत्वा हेतुमेवं व्यचिन्तयत् । किं करोमि गुरोः पीडा प्राप्तेयं कथमीरिता ॥२९२॥

अर्थ: तदनन्तर माताका कहा कारण सुनकर हरिषेणने इस प्रकार विचार किया कि अहो ! मैं क्या करूँ ? यह बहुत भारी पीड़ा प्राप्त हुई है सो पितासे इसे कैसे कहूँ ? ॥२९२॥


पितायं जननी चैषा द्वावप्येतौ महागुरू । करोमि कं प्रतिद्वेषमहो मग्नोऽस्मि संकटे ॥२९३॥

अर्थ: वह पिता हैं और यह माता हैं। दोनों ही मेरे लिए परम गुरु हैं। मैं किसके प्रति द्वेष करूँ ? आश्चर्य है कि मैं बड़े संकटमें आ पड़ा हूँ ॥२९३॥


असमर्थस्ततो द्रष्टुं मातरं साश्रुलोचनाम् । निष्क्रम्य भवनाद्यातो वनं व्यालसमाकुलम् ॥२९४॥

अर्थ: कुछ भी हो पर मैं रुदन करती माताको देखनेमें असमर्थ हूँ। ऐसा विचारकर वह महलसे निकल पड़ा और हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए वनमें चला गया ॥२९४॥


तत्र मूलफलादीनि भक्षयन् विजने वने । सरस्सु च पिबन्नम्भो विजहार भयोज्झितः ॥२९५॥

अर्थ: वहाँ वह निर्जन वनमें मूल, फल आदि खाता और सरोवरमें पानी पीता हुआ निर्भय हो घूमने लगा ॥२९५॥


रूपमेतस्य तं दृष्ट्वा पशवोऽपि सुनिर्दयाः । क्षणेनोपशमं जग्मुर्भव्यः कस्य न संमतः ॥२९६॥

अर्थ: हरिषेणका ऐसा रूप था कि उसे देखकर दुष्ट पशु भी क्षण-भरमें उपशम भावको प्राप्त हो जाते थे सो ठीक ही है क्योंकि भव्य जीव किसे नहीं प्रिय होता है ? ॥२९६॥


तत्रापि स्मर्यमाणं तत्कृतं मात्रा प्ररोदनम् । ववाधे तं प्रलापश्च कृतो गद्गदकण्ठया ॥२९७॥

अर्थ: निर्जन वनमें भी जब हरिषेणको माताके द्वारा किये हुए रुदनकी याद आती थी तब वह अत्यन्त दुःखी हो उठता था। माताने गद्गद कण्ठसे जो भी प्रलाप किया वह सब स्मरण आनेपर उसे बहुत कुछ बाधा पहुँचा रहा था ॥२९७॥


रम्येष्वपि प्रदेशेषु वने तत्रास्य नो धृतिः । बभूव कुर्वतो नित्यं भ्रमणं मृदुचेतसा ॥२९८॥

अर्थ: कोमल चित्तसे निरन्तर भ्रमण करनेवाले हरिषेणको वनके भीतर एक-से-एक बढ़कर मनोहर स्थान मिलते थे पर उनमें उसे धैर्य प्राप्त नहीं होता था ॥२९८॥


वनदेव इति भ्रान्ति कुर्वाणोऽसावनारतम् । दूरविस्तारिताक्षीभिर्मृगीभिः कृतवीक्षणः ॥२९९॥

अर्थ: क्या यह वनदेव है ? इस प्रकारकी भ्रान्ति वह निरन्तर करता रहता था और हरिणियाँ उसे दूर तक आँख फाड़-फाड़कर देखती रहती थीं ॥२९९॥


समियायाङ्गिरःशिष्यशतमन्युवनाश्रमम् । विरोधं दूरमुज्झित्वा वनप्राणिभिराश्रितम् ॥३००॥

अर्थ: इस प्रकार घूमता हुआ हरिषेण, जहाँ वनमें प्राणी परस्परका वैरभाव दूर छोड़कर शान्तिसे रहते थे ऐसे अंगिरस ऋषिके शिष्य शतमन्युके आश्रममें पहुँचा ॥३००॥


चम्पायामथ रुद्धायां कालकल्पाख्यभूभृता । रुद्रेण साधनं भूरि बिभ्रता पुरुतेजसा ॥३०१॥

अर्थ: अथानन्तर एक कालकल्प नामका राजा था जो महाभयंकर, महाप्रतापी और बहुत बड़ी सेनाको धारण करनेवाला था सो उसने चारों ओरसे चम्पा नगरीको घेर लिया ॥३०१॥


यावत्तेन समं युद्धं चकार जनमेजयः । पूर्वं रचितया तावत्सुदूरगसुरङ्गया ॥३०२॥

नाम्ना नागवती तस्या माता तनुजया समम् । पूर्वमेव गता देशं शतमन्युयतिश्रितम् ॥३०३॥

अर्थ: चम्पाका राजा जनमेजय जबतक उसके साथ युद्ध करता है तबतक पहलेसे बनवायी हुई लम्बी सुरंगसे माता नागवती अपनी पुत्रीके साथ निकलकर शतमन्यु ऋषिके उस आश्रममें पहलेसे ही पहुँच गयी थी ॥३०२-३०३॥


नागवत्याः सुता तस्मिन् दृष्ट्वा तं रूपशालिनम् । मन्मथस्य शरैर्विद्धा तनुविक्लवताकरैः ॥३०४॥

अर्थ: वहाँ नागवतीकी पुत्री सुन्दर रूपसे सुशोभित हरिषेणको देखकर शरीरमें बेचैनी उत्पन्न करनेवाले कामदेवके बाणोंसे घायल हो गयी ॥३०४॥


ततस्तामन्यथाभूतां दृष्ट्वा नागवती जगौ । सुते भव विनीता त्वं स्मर वाक्यं महामुनेः ॥३०५॥

अर्थ: तदनन्तर पुत्रीको अन्यथा देख नागवतीने कहा कि हे पुत्री ! सावधान रह, तू महामुनिके वचन स्मरण कर ॥३०५॥


पूर्वं हि मुनिना प्रोक्तं यथा त्वं चक्रवर्तिनः । भविता वनितारत्नमिति संज्ञानचक्षुषा ॥३०६॥

अर्थ: सम्यग्ज्ञानरूपी चक्षुको धारण करनेवाले मुनिराजने पहले कहा था कि तू चक्रवर्तीका स्त्रीरत्न होगी ॥३०६॥


रक्तां च तस्य तां ज्ञात्वा भृशं भीतैरकीर्तितः । आश्रमात्तापसैर्मूढैर्हरिषेणो निराकृतः ॥३०७॥

अर्थ: तपस्वियोंको जब मालूम हुआ कि नागवतीकी पुत्री हरिषेणसे बहुत अनुराग रखती है तो अपकीर्तिसे डरकर उन मूढ़ तपस्वियोंने हरिषेणको आश्रमसे निकाल दिया ॥३०७॥


ततो दग्धोऽपमानेन कन्यामादाय चेतसा । बभ्राम सततं श्लिष्टो भ्रामर्येव स विद्यया ॥३०८॥

अर्थ: तब अपमानसे जला हरिषेण हृदयमें कन्याको धारण कर निरन्तर इधर-उधर घूमता रहा । ऐसा जान पड़ता था मानो वह भ्रामरी विद्यासे आलिंगित होकर ही निरन्तर घूमता रहता था ॥३०८॥


नाशने शयनीये न पुष्पपल्लवकल्पिते । फलानां भोजने नैव पाने वा सरसोऽम्भसः ॥३०९॥

न ग्रामे नगरे नोपवने रम्यलतागृहे । धृतिं लेभे समुत्कण्ठभराक्रान्तः स शोकवान् ॥३१०॥

अर्थ: उत्कण्ठाके भारसे दबा हरिषेण निरन्तर शोकग्रस्त रहता था । उसे न भोजनमें, न पुष्प और पल्लवोंसे निर्मित शय्यामें, न फलोंके भोजनमें, न सरोवरका जल पीनेमें, न गाँवमें, न नगरमें और न मनोहर निकुंजोंसे युक्त उपवनमें धीरज प्राप्त होता था ॥३०९-३१०॥


दावाग्निसदृशास्तेन पद्मखण्डा निरीक्षिताः । वज्रसूचीसमास्तस्य बभूवुश्चन्द्ररश्मयः ॥३११॥

अर्थ: कमलोंके समूहको वह दावानलके समान देखता था और चन्द्रमाकी किरणें उसे वज्रकी सुईके समान जान पड़ती थीं ॥३११॥


विशालपुलिनाश्चास्य स्वच्छतोयाः समुद्रगाः । मनो वहन्ति चाकृष्टकन्याजघनसाम्यतः ॥३१२॥

अर्थ: विशाल तटोंसे सुशोभित एवं स्वच्छ जलको धारण करनेवाली नदियाँ इसके मनको इसलिए आकर्षित करती थीं, क्योंकि उनके तट, इसके प्रति आकर्षित कन्याके नितम्बोंकी समानता रखते थे ॥३१२॥


मनोऽस्य केतकीसूची कुन्तयष्टिरिवाभिनत् । चक्रवच्च कदम्बानां पुष्पं सुरभि चिच्छिदे ॥३१३॥

अर्थ: केतकीकी अनी भालेके समान इसके मनको भेदती रहती थी और कदम्बवृक्षोंके सुगन्धित फूल चक्रके समान छेदते रहते थे ॥३१३॥


कुटजानां विधूतानि कुसुमानि नमस्वता । मर्माणि चिच्छिदुस्तस्य मन्मथस्येव सायकाः ॥३१४॥

अर्थ: वायुके मन्द-मन्द झोंकेसे हिलते हुए कुटज वृक्षोंके फूल कामदेवके बाणोंके समान उसके मर्मस्थल छेदते रहते थे ॥३१४॥


इति चाचिन्तयल्लप्स्ये स्त्रीरत्नं यदि नाम तत् । ततः शोकमहं मातुरपनेष्याम्यसंशयम् ॥३१५॥

अर्थ: हरिषेण ऐसा विचार करता रहता था कि यदि मैं उस स्त्रीरत्नको पा सका तो निःसन्देह माताका शोक दूर कर दूँगा ॥३१५॥


प्राप्तनेव ततो मन्ये पतित्वं भरतेऽखिले । आकृतिर्न हि सा तस्याः स्तोकभोगविधायिनी ॥३१६॥

अर्थ: यदि वह कन्या मिल गयी तो मैं यही समझूँगा कि मुझे समस्त भरत क्षेत्रका स्वामित्व मिल गया है । क्योंकि उसकी जो आकृति है वह अल्पभोगोंको भोगनेवाली नहीं है ॥३१६॥


नदीकूलेष्वरण्येषु ग्रामेषु नगरेषु च । पर्वतेषु च चैत्यानि कारयिष्याम्यहं ततः ॥३१७॥

अर्थ: यदि मैं उसे पा सका तो नदियोंके तटोंपर, वनोंमें, गाँवोंमें, नगरोंमें और पर्वतोंपर जिन-मन्दिर बनवाऊँगा ॥३१७॥


मातुः शोकेन संतप्तो मृतः स्यां यदि तामहम् । न पश्येयं धृतो जीवो मम तत्संगमाशया ॥३१८॥

अर्थ: यदि मैं उसे नहीं देखता तो माताके शोकसे सन्तप्त होकर कभीका मर जाता । वास्तवमें मेरे प्राण उसीके समागमकी आशासे रुके हुए हैं ॥३१८॥


चिन्तयन्निति चान्यच्च बहुदुःखितमानसः । विस्मृतो जननीशोकं स बभ्राम ग्रही यथा ॥३१९॥

अर्थ: जिसका मन अत्यन्त दुःखी था ऐसा हरिषेण इस प्रकार तथा अन्य प्रकारकी चिन्ता करता हुआ माताका शोक भूल गया । अब तो वह भूताक्रान्त मानवके समान इधर-उधर घूमने लगा ॥३१९॥


पर्यटंश्च बहून् देशान् प्राप्तः सिन्धुनदं पुरम् । तदवस्थोऽपि वीर्येण तेजसा चोरुणान्वितः ॥३२०॥

अर्थ: इस प्रकार अनेक देशोंमें घूमता हुआ सिन्धुनद नामक नगरमें पहुँचा । यद्यपि उसकी वैसी अवस्था हो रही थी तो भी वह बहुत भारी पराक्रम और विशाल तेजसे युक्त था ॥३२०॥


बहिः क्रीडाविनिष्क्रान्तस्तत्र तं वीक्ष्य योषितः । स्तम्भिता इव निश्चेष्टाः स्पष्टाक्ष्यः शतशोऽभवन् ॥३२१॥

अर्थ: उस नगरकी जो स्त्रियाँ क्रीड़ा करनेके लिए नगरके बाहर गयी थीं वे हरिषेणको देखकर आश्चर्यचकितकी तरह निश्चेष्ट हो गयीं । वे सैकड़ों बार आँखें फाड़-फाड़कर उसे देखती थीं ॥३२१॥


पुण्डरीकेक्षणं मेरुकटकोदारवक्षसम् । दिङ्मतङ्गजकुम्भांसमिभस्तम्भसमोरुकम् ॥३२२॥

उन्मत्तत्वमुपेतानामनन्यगतचेतसाम् । पश्यन्तीनां न तं तृप्तिर्बभूव पुरयोषिताम् ॥३२३॥

अर्थ: जिसके नेत्र कमलके समान थे, जिसका वक्षःस्थल मेरुपर्वतके कटकके समान लम्बा-चौड़ा था, जिसके कन्धे दिग्गजके गण्डस्थलके समान थे, और जिसकी जाँघें हाथी बाँधनेके खम्भेके समान सुपुष्ट थीं ऐसे हरिषेणको देखकर वे स्त्रियाँ पागल-सी हो गयीं, उनके चित्त ठिकाने नहीं रहे तथा उसे देखने-देखते उन्हें तृप्ति नहीं हुई ॥३२२-३२३॥


अथाञ्जनगिरिच्छायः प्रगलद्दाननिर्भरः । आजगाम गजस्तासां स्त्रीणामभिमुखो बलात् ॥३२४॥

अर्थ: अथानन्तर-अंजनगिरिके समान काला और झरते हुए मदसे भरा एक हाथी बलपूर्वक उन स्त्रियोंके सामने आया ॥३२४॥


न शक्नोमि गजं धर्तुं कुरुताशु पलायनम् । यदि शक्तियुताः नार्य इत्यारोहेण चोदितम् ॥३२५॥

अर्थ: हाथीका महावत जोर-जोरसे चिल्ला रहा था कि हे स्त्रियो ! यदि तुम लोगोंमें शक्ति है तो शीघ्र ही भाग जाओ, मैं हाथीको रोकनेमें असमर्थ हूँ ॥३२५॥


नरवृन्दारकासक्तचेतनास्ता न तद्वचः । चक्रुः श्रवणयोर्नापि समर्थाः प्रपलायितुम् ॥३२६॥

अर्थ: पर स्त्रियाँ तो श्रेष्ठ पुरुष हरिषेणके देखनेमें आसक्त थीं इसलिए महावतके वचन नहीं सुन सकीं और न भागनेमें ही समर्थ हुईं ॥३२६॥


मुहुः प्रचण्डमारोहे ततो रटति चेतितम् । वनिताभिर्बभूवुश्च भयव्याकुलचेतसः ॥३२७॥

अर्थ: जब महावतने बार-बार जोरसे चिल्लाना शुरू किया तब स्त्रियोंने उस ओर ध्यान दिया और तब वे भयसे व्याकुल हो गयीं ॥३२७॥


ततस्ताः शरणं जग्मुस्तं नरं कृतकम्पनाः । भयेनोपकृतं तासां तत्समागमचेतसाम् ॥३२८॥

अर्थ: तदनन्तर काँपती हुई वे स्त्रियाँ हरिषेणकी शरणमें गयीं । इस तरह उसके साथ समागमकी इच्छा करनेवाली स्त्रियोंका भयने उपकार किया ॥३२८॥


ततः स करुणायुक्तो हरिषेणो व्यचिन्तयत् । संभ्रान्तोत्तमरामाङ्गसंगमात् पुलकाञ्चितः ॥३२९॥

अर्थ: तत्पश्चात् घबड़ायी हुई उत्तम स्त्रियोंके शरीरके सम्पर्कसे जिसे रोमांच उठ आये थे ऐसे हरिषेणने दयायुक्त हो विचार किया ॥३२९॥


इतः सिन्धुर्गभीरोऽयमितः शालो गजोऽन्यतः । संकटे तु परिप्राप्ते करोमि प्राणिपालनम् ॥३३०॥

अर्थ: कि इस ओर गहरा समुद्र है, उस ओर प्राकार है और उधर हाथी है इस तरह संकट उपस्थित होनेपर मैं प्राणियोंकी रक्षा अवश्य करूँगा ॥३३०॥


वृषः खनति वल्मीकं शृङ्गाभ्यां न तु भूधरम् । पुरुषः कदलीं छिन्ते सायकेन शिलां तु न ॥३३१॥

अर्थ: जिस प्रकार बैल अपने सींगोंसे वामीको खोदता है पर्वतको नहीं । और पुरुष बाणसे केलेके वृक्षको छेदता है शिलाको नहीं ॥३३१॥


मृदुं पराभवत्येष लोकः प्रखलचेष्टितः । उद्धृत्याप्यसुखं कर्तुं नाभिवाञ्छति कर्कशे ॥३३२॥

अर्थ: इसी प्रकार दुष्ट चेष्टाओंसे भरा मानव कोमल प्राणीका ही पराभव करता है, कठोर प्राणीको दुःख पहुँचानेकी वह इच्छा भी नहीं करता ॥३३२॥


क्लीबास्ते तापसा येन क्षमा तेषां मया कृता । सारङ्गसमवृत्तीनां निर्वासेन कृतागसाम् ॥३३३॥

वसतां गुरुगेहेषु क्षमात्यन्तगरीयसी । कृता सा हि हितात्यन्तं संजाता परमोदया ॥३३४॥

अर्थ: वे तपस्वी तो अत्यन्त दीन थे इसलिए मैंने उनपर क्षमा धारण की थी। उन तपस्वियोंने आश्रमसे निकालकर यद्यपि अपराध किया था पर उनकी वृत्ति हरिणोंके समान दीन थी साथ ही वे गुरुओंके घर रहते थे इसलिए उनपर क्षमा धारण करना अत्यन्त श्रेष्ठ था। यथार्थमें मैंने उनपर जो क्षमा की थी वह मेरे लिए अत्यन्त हितावह तथा परमाभ्युदयका कारण हुई है ॥३३३-३३४॥


उक्तमेवं ततस्तेन तारनिष्ठुरया गिरा । भो भो हस्तिपकान्येन नय देशेन वारणम् ॥३३५॥

अर्थ: तदनन्तर हरिषेणने बड़े जोरसे चिल्लाकर कहा कि रे महावत ! तू हाथी दूसरे स्थानसे ले जा ॥३३५॥


ततो हस्तिपकेनोक्तमहो ते धृष्टता परा । यन्मनुष्यं गजं वेत्सि स्वं च वेत्सि मतङ्गजम् ॥३३६॥

अर्थ: 'तब महावतने कहा कि अहो ! तेरी बड़ी धृष्टता है कि जो तू हाथीको मनुष्य समझता है और अपनेको हाथी मानता है ॥३३६॥


नूनं मृत्युसमीपोऽसि यन्मदं वहसे गजे । ग्रहेण वा गृहीतोऽसि व्रजास्मादाशु गोचरात् ॥३३७॥

अर्थ: जान पड़ता है कि तू मृत्युके समीप पहुँचनेवाला है इसलिए तो हाथीके विषयमें गर्व धारण कर रहा है अथवा तुझे कोई भूत लग रहा है। यदि भला चाहता है तो शीघ्र ही इस स्थानसे चला जा। ॥३३७॥


विहस्य स ततः कोपाल्लीलया कृतनर्तनः । सान्त्वयित्वाङ्गनाः कृत्वा पृष्ठतो गजमभ्यगात् ॥३३८॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधवश लीलापूर्वक नृत्य करते हुए हरिषेणने जोरसे अट्टहास किया, स्त्रियोंको सान्त्वना दी और स्वयं स्त्रियोंको अपने पीछे कर हाथीके सामने गया ॥३३८॥


विद्युद्विलसितेनासौ करुणेन ततो नभः । उत्पत्य दशने पादं कृत्वाऽरुक्षन्मतङ्गजम् ॥३३९॥

अर्थ: तदनन्तर बिजलीकी चमकके समान शीघ्र ही आकाशमें उछलकर और खीशपर पैर रखकर वह हाथीपर सवार हो गया ॥३३९॥


ततः क्रीडितुमारेभे गजेन सह लीलया । दृष्टनष्टः समस्तेषु गात्रेष्वस्य पुनर्भुवि ॥३४०॥

अर्थ: तदनन्तर उसने लीलापूर्वक हाथीके साथ क्रीड़ा करना शुरू किया । क्रीड़ा करते-करते कभी तो वह दिखाई देता था और कभी अदृश्य हो जाता था । इस तरह उसने हाथीके समस्त शरीरपर क्रीड़ा की पश्चात् पृथ्वीपर नीचे उतरकर भी उसके साथ नाना क्रीड़ाएँ कीं ॥३४०॥


पारम्पर्यं ततः श्रुत्वा कृत्वा कलकलं महत् । विनिष्क्रान्तं पुरं सर्वं द्रष्टुमेतन्महाद्भुतम् ॥३४१॥

अर्थ: तदनन्तर परम्परासे इस महान् कल-कलको सुनकर नगरके सब लोग इस महाआश्चर्यको देखनेके लिए बाहर निकल आये ॥३४१॥


वातायनगताश्चेक्षांचक्रिरे तं महाङ्गनाः । चक्रुर्मनोरथान् कन्यास्तत्समागमसंगतान् ॥३४२॥

अर्थ: बड़ी-बड़ी स्त्रियोंने झरोखोंमें बैठकर उसे देखा तथा कन्याओंने उसके साथ समागमकी इच्छाएँ कीं ॥३४२॥


आस्फालनैर्महाशब्दैर्मुहुर्गात्रविधूननैः । कृतोऽसौ निर्मदस्तेन क्षणमात्रेण वारणः ॥३४३॥

अर्थ: आस्फालन अर्थात् पीठपर हाथ फेरनेसे, जोरदार डाँट-डपटके शब्दोंसे और बार-बार शरीरके कम्पनसे हरिषेणने उस हाथीको क्षण-भरमें मदरहित कर दिया ॥३४३॥


हर्म्यपृष्ठगतो दृष्ट्वा तदाश्चर्यं पुराधिपः । सिन्धुनामाखिलं तस्मै प्रजिघाय परिच्छदम् ॥३४४॥

अर्थ: नगरका राजा सिन्ध, महलकी छतपर बैठा हुआ यह सब आश्चर्य देख रहा था । वह इतना प्रसन्न हुआ कि उसने हरिषेणको बुलानेके लिए अपना समस्त परिकर भेजा ॥३४४॥


ततः कुथाकृतच्छाये नानावर्णकमासुरे । आरूढः स गजे तस्मिन् विभूत्या परयान्वितः ॥३४५॥

अर्थ: तदनन्तर रंग-बिरंगी झूलसे जिसकी शोभा बढ़ रही थी तथा नाना रंगोंके चित्रामसे जो शोभायमान था ऐसे उसी हाथीपर वह बड़े वैभवसे आरूढ़ हुआ ॥३४५॥


अर्थ: जो पसीनेकी बूँदोंके बहाने मानो मोतियोंसे सहित था ऐसा हरिषेण अपने सौन्दर्यरूपी हाथसे नगरकी स्त्रियोंका मन संचित करता हुआ नगरमें प्रविष्ट हुआ ॥३४५॥


मनांसि पौरनारीणामुच्चिन्वन् रूपपाणिना । प्रविवेश पुरं स्वेदबिन्दुमुक्ताफलान्वितः ॥३४६॥


नराधिपस्य कन्यानां परिणीतं ततः शतम् । तेन सर्वत्र चासक्ता हरिषेणमयी कथा ॥३४७॥

अर्थ: तदनन्तर उसने राजाकी सौ कन्याओंके साथ विवाह किया। इस प्रकारसे जहाँ देखो वहीं-सर्वत्र हरिषेणकी चर्चा फैल गयी ॥३४७॥


महान्तमपि संप्राप्तः संमानं स नरेश्वरात् । स्त्रीरत्नेन विना मेने तां वर्षमिव शर्वरीम् ॥३४८॥

अर्थ: यद्यपि उसने राजासे बहुत भारी सम्मान प्राप्त किया था तो भी तपस्वियोंके आश्रममें जो स्त्रीरत्न देखा था उसके बिना उसने एक रातको वर्षके समान समझा ॥३४८॥


अचिन्तयच्च नूनं सा मया विरहिताधुना । मृगीवाकुलतां प्राप्ता परमां विषमे वने ॥३४९॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि इस समय निश्चय ही वह कन्या मेरे बिना विषम वनमें हरिणीके समान परम आकुलताको प्राप्त होती होगी ॥३४९॥


सकृदेषा कथंचिच्चेत् त्रियामा क्षयमेष्यति । गमिष्यामि ततो बालामेतां द्रागनुकम्पितुम् ॥३५०॥

अर्थ: यदि यह रात्रि किसी तरह एक बार भी समाप्त हो जाये तो मैं शीघ्र ही उस बालापर दया करनेके लिए दौड़ पड़ूँगा ॥३५०॥


विचिन्तत्येवमेतस्मिन् शयनीयेऽतिशोभने । चिरेण निद्रया लब्धं पदमत्यन्तकृच्छ्रतः ॥३५१॥

अर्थ: यह अत्यन्त सुशोभित शय्यापर पड़ा हुआ ऐसा विचार करता रहा। विचार करते-करते बड़ी देर बाद बहुत कठिनाईसे उसे नींद आयी ॥३५१॥


स्वप्नेऽपि च स तामेव ददर्शाम्भोजलोचनाम् । प्रायो हि मानसस्यास्य सैव गोचरतामगात् ॥३५२॥

अर्थ: स्वप्नमें भी यह उसी कमल-लोचनाको देखता रहा सो ठीक ही है क्योंकि प्रायः करके इसके मनका वही एक विषय रह गयी थी ॥३५२॥


अथ वेगवती नाम्ना कलागुणविशारदा । खेचराधिपकन्यायाः सखी तमहरत् क्षणात् ॥३५३॥

अर्थ: अथानन्तर विद्याधर राजाकी कन्याकी सहेली वेगवती जो कि सर्व प्रकारकी कलाओं और गुणोंमें विशारद थी, सोते हुए हरिषेणको क्षण एकमें हर कर ले गयी ॥३५३॥


ततो निद्राक्षये दृष्ट्वा ह्रियमाणं स्वमम्बरे । पापे हरसि मां कस्मादिति व्याहृत्य कोपतः ॥३५४॥

अर्थ: जब उसकी निद्रा भग्न हुई तो उसने अपने आपको आकाशमें हरा जाता देख क्रोधपूर्वक वेगवतीसे कहा कि री पापिनि! तू मुझे किस लिए हर लिये जा रही है? ॥३५४॥


दृष्टनिःशेषताराक्षः संदष्टरदनच्छदः । मुष्टिं बबन्ध तां हन्तुं वज्रमुद्गरसंनिभाम् ॥३५५॥

अर्थ: जिसके नेत्रोंकी समस्त पुतलियाँ दिख रही थीं तथा जिसने ओंठ डँस रखा था ऐसे हरिषेणने उस वेगवतीको मारनेके लिए वज्रमय मुद्गरके समान मुट्ठी बाँधी ॥३५५॥


ततस्तं कुपितं दृष्ट्वा पुरुषं चारुलक्षणम् । विद्याबलसमृद्धापि शङ्किता सेत्यमाषत ॥३५६॥

आरूढस्तरुशाखायां छिन्ते तस्या यथा नरः । मूलं तथा करोषि त्वं ममायुष्मन् विहिंसनम् ॥३५७॥

अर्थ: तदनन्तर सुन्दर लक्षणोंके धारक हरिषेणको कुपित देख वेगवती यद्यपि विद्याबलसे समृद्ध थी तो भी भयभीत हो गयी। उसने उससे कहा कि हे आयुष्मन्! जिस प्रकार वृक्षकी शाखापर चढ़ा कोई मनुष्य उसीकी जड़को काटता है उसी प्रकार मुझपर आरूढ़ हुए तुम मेरा ही घात कर रहे हो ॥३५६-३५७॥


यदर्थं नीयते तात त्वं मया तद्गतो भवान् । सत्यं ज्ञास्यसि नह्यस्य वपुषस्तव दुःखिता ॥३५८॥

अर्थ: हे तात! मैं तुझे जिस लिए ले जा रही हूँ तुम जब उसको प्राप्त होओगे तब मेरे वचनोंकी यथार्थता जान सकोगे। यह निश्चित समझो कि वहाँ जाकर तुम्हारे इस शरीरको रंचमात्र भी दुःख नहीं होगा ॥३५८॥


अचिन्तयच्च भद्रेयं वनिता चारुभाषिणी । आकृतिः कथयत्यस्याः परपीडा निवृत्तताम् ॥३५९॥

अर्थ: वेगवतीका कहा सुनकर हरिषेणने विचार किया कि यह स्त्री मन्द्र तथा मधुरभाषिणी है। इसकी आकृति ही बतला रही है कि यह पर-पीड़ासे निवृत्त है अर्थात् कभी किसीको पीड़ा नहीं पहुँचाती ॥३५९॥


यथेदं स्पन्दते चक्षुर्दक्षिणं मम सांप्रतम् । तथा च कल्पयाम्येषा प्रियसंगमकारिणी ॥३६०॥

अर्थ: और चूँकि इस समय मेरी दाहिनी आँख फड़क रही है इससे निश्चय होता है कि यह अवश्य ही प्रियजनोंका समागम करावेगी ॥३६०॥


पुनश्चानेन सा पृष्टा भद्रे वेदय कारणम् । ललामसंकथासंगात् कर्णौ तावत्प्रतर्पय ॥३६१॥

अर्थ: तब हरिषेणने उससे फिर पूछा कि हे भद्रे ! तू ठीक-ठीक कारण बता और मनोहर कथा सुनाकर मेरे कानोंको सन्तुष्ट कर ॥३६१॥


जगाद चेति राजास्ति पुरे सूर्योदये वरे । नाम्ना शक्रधनुस्तस्य भार्या धीरिति कीर्तिता ॥३६२॥

गुणरूपमदग्रस्ता जयचन्द्रा तयोः सुता । पुरुषद्वेषिणी जाता पितृवाक्यापकर्णिनी ॥३६३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें वेगवतीने कहा कि सूर्योदय नामक श्रेष्ठ नगरमें राजा शक्रधनु रहता है । उसकी स्त्री धी नामसे प्रसिद्ध है । उन दोनोंके जयचन्द्रा नामकी पुत्री है जो कि गुण तथा रूपके अहंकारसे ग्रस्त है, पुरुषोंके साथ द्वेष रखती है और पिताके वचनोंकी अवहेलना करती है ॥३६२-३६३॥


यो यस्तस्या मयालिख्य पट्टके दर्शितः पुरा । सकले भरतक्षेत्रे नासौ तस्या रुचौ स्थितः ॥३६४॥

अर्थ: समस्त भरत क्षेत्रमें जो-जो उत्तम पुरुष थे उन सबके चित्रपट बनाकर मैंने पहले उसे दिखलाये हैं पर उसकी रुचिमें एक भी नहीं आया ॥३६४॥


ततो भवान् मया तस्या दर्शितः पट्टकस्थितः । गाढाकल्पकशल्येन शल्यिता चेदमब्रवीत् ॥३६५॥

कामभोगोपमानेन समं यदि न युज्यते । मृत्युं ततः प्रपत्स्येऽहं न त्वन्यमधमं वरम् ॥३६६॥

अर्थ: तब मैंने आपका चित्रपट उसे दिखलाया सो उसे देखते ही वह तीव्र उत्कण्ठारूपी शल्यसे विद्ध होकर बोली कि कामदेवके समान इस पुरुषके साथ यदि मेरा समागम न होगा तो मैं मृत्युको भले ही प्राप्त हो जाऊँगी पर अन्य अधम मनुष्यको प्राप्त नहीं होऊँगी ॥३६५-३६६॥


प्रतिज्ञा च पुरस्तस्या मयेयं दुष्करा कृता । शोकमत्युत्कटं दृष्ट्वा तद्गुणाकृष्टचित्तया ॥३६७॥

यदि तं नानये शीघ्रं त्वन्मानसमलिम्लुचम् । ज्वालाजटालमनिलं प्रविशामि ततः सखि ॥३६८॥

अर्थ: उसके गुणोंसे जिसका चित्त आकृष्ट हो रहा था ऐसी मैंने उसका बहुत भारी शोक देखकर उसके आगे यह कठिन प्रतिज्ञा कर ली कि तुम्हारे मनको चुरानेवाले इस पुरुषको यदि मैं शीघ्र नहीं ले आऊँ तो हे सखि ! ज्वालाओंसे युक्त अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी ॥३६७-३६८॥


प्रतिज्ञायेति पुण्येन प्राप्तोऽसि महता मया । त्वत्प्रसादात्करिष्यामि प्रतिज्ञां फलसंगताम् ॥३६९॥

अर्थ: मैंने ऐसी प्रतिज्ञा की ही थी कि बड़े भारी पुण्योदय से आप मिल गये । अब आपके प्रसादसे अपनी प्रतिज्ञाको अवश्य ही सफल बनाऊँगी ॥३६९॥


सूर्योदयपुरं चैषा प्राप्ता स च निवेदितः । आनीतः शक्रचापाय कन्यायै च मनोहरः ॥३७०॥

अर्थ: ऐसा कहती हुई वह सूर्योदयपुर आ पहुँची । वहाँ आकर उसने राजा शक्रधनु और कन्या जयचन्द्राके लिए सूचना दे दी कि तुम्हारे मनको हरण करनेवाला हरिषेण आ गया है ॥३७०॥


ततः पाणिग्रहश्चक्रे तयोरद्भुतरूपयोः । विस्मयापन्नचेतोभिः स्वजनैरभिनन्दितः ॥३७१॥

अर्थ: तदनन्तर आश्चर्यकारी रूपको धारण करनेवाले दोनों-वरकन्याका पाणिग्रहण किया गया । जिनका चित्त आश्चर्यसे भर रहा था ऐसे सभी आत्मीय जनोंने उनके उस पाणिग्रहणका अभि- नन्दन किया था ॥३७१॥


संपादितप्रतिज्ञा च प्राप्ता वेगवती परम् । संमानं राजकन्याभ्यां प्रमदं च तथा यशः ॥३७२॥

अर्थ: जिसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी थी ऐसी वेगवतीने राजा और कन्या - दोनोंकी ओरसे परम सन्मान प्राप्त किया था । उसके हर्ष और सुयशका भी ठिकाना नहीं था ॥३७२॥

८. अष्टमं पर्व (दशग्रीवाभिधानं) (जारी)

त्यक्त्वा नौ धरणीवासो गृहीतः पुरुषोऽनया । इति संचिन्त्य कुपितौ तस्यैमैथुनिकौ च तौ ॥३७३॥

आवाञ्छतां रणं कर्तुं महासाधनसंयुतौ । दूषितावपमानेन गङ्गाधरमहीधरौ ॥३७४॥

अर्थ: ‘इस कन्याने हम लोगोंको छोड़कर भूमिगोचरी पुरुष स्वीकृत किया’ ऐसा विचारकर कन्याके मामाके लड़के गंगाधर और महीधर बहुत ही कुपित हुए । कुपित ही नहीं हुए अपमानसे प्रेरित हो बड़ी भारी सेना लेकर युद्ध करनेकी भी इच्छा करने लगे ॥३७३-३७४॥


ततः शक्रधनुः साकं सुचापाख्येन सूनुना । हरिषेणं जगादैवं करुणासक्तचेतनः ॥३७५॥

तिष्ठ त्वमिह जामातः संख्यं कर्तुं व्रजाम्यहम् । त्वन्निमित्तं रिपू क्रुद्धावुद्धतौ दुःखचारिणौ ॥३७६॥

अर्थ: तदनन्तर करुणामें आसक्त है चित्त जिसका ऐसे राजा शक्रधनुने अपने सुचाप नामक पुत्रके साथ हरिषेणसे इस प्रकार निवेदन किया कि हे जामातः ! तुम यहीं ठहरो, मैं युद्ध करनेके लिए जाता हूँ। तुम्हारे निमित्तसे दो उत्कट शत्रु कुपित होकर दुःखका अनुभव कर रहे हैं ॥३७५-३७६॥


स्मित्वा ततो जगादासौ परकार्येषु यो रतः । कार्ये तस्य कथं स्वस्मिन्नौदासीन्यं भविष्यति ॥३७७॥

अर्थ: तब हँसकर हरिषेणने कहा कि जो परकीय कार्योंमें सदा तत्पर रहता है उसके अपने ही कार्यमें उदासीनता कैसे हो सकती है ? ॥३७७॥


कुरु पूज्य प्रसादं मे यच्छ युद्धाय शासनम् । भृत्यं मत्सदृशं प्राप्य स्वयं किमिति युध्यसे ॥३७८॥

अर्थ: हे पूज्य ! प्रसन्नता करो और मेरे लिए युद्धका आदेश दो। मेरे जैसा भृत्य पाकर आप इस प्रकार स्वयं क्यों युद्ध करते हो ? ॥३७८॥


ततोऽमङ्गलभीतेन वाञ्छताप्यनिवारितः । श्वसुरेण कृतासङ्गमश्वैः पवनगामिभिः ॥३७९॥

अस्त्रैर्नानाविधैः पूर्णं शूरसारथिनेतृकम् । वेष्टितं योधचक्रेण हरिषेणो रथं ययौ ॥३८०॥

अर्थ: तदनन्तर अमंगलसे भयभीत श्वसुरने चाहते हुए भी उसे नहीं रोका। फलस्वरूप जिसमें हवाके समान शीघ्रगामी घोड़े जुते थे, जो नाना प्रकारके शस्त्रोंसे पूर्ण था, जिसका सारथि शूरवीर था और जो योद्धाओंके समूहसे घिरा था ऐसे रथको हरिषेण प्राप्त हुआ ॥३७९-३८०॥


तस्य चानुपदं जग्मुरश्वैर्नागैश्च खेचराः । कृत्वा कलकलं तुङ्गं शत्रुमानसदुःसहम् ॥३८१॥

अर्थ: उसके पीछे विद्याधर लोग शत्रुके मनको असहनीय बहुत भारी कोलाहल कर घोड़ों और हाथियोंपर सवार होकर जा रहे थे ॥३८१॥


ततो महति संजाते संयुगे शूरधारिते । भग्नं शक्रधनुःसैन्यं दृष्ट्वा वाप्रेय उत्थितः ॥३८२॥

अर्थ: तदनन्तर शूरवीर मनुष्य जिसकी व्यवस्था बनाये हुए थे ऐसा महायुद्ध प्रवृत्त हुआ सो कुछ ही समय बाद शक्रधनुकी सेनाको पराजित देख हरिषेण युद्धके लिए उठा ॥३८२॥


ततो यया दिशा तस्य प्रावर्तत रथोत्तमः । तस्यां नाश्वो न मातङ्गो न मनुष्यो रथो न च ॥३८३॥

अर्थ: तदनन्तर जिस दिशासे उसका उत्तम रथ निकल जाता था उस दिशामें न घोड़ा बचता था, न हाथी दिखाई देता था, न मनुष्य शेष रहता था और न रथ ही बाकी बचता था ॥३८३॥


शरैस्तेन समं युक्तैरतिबलमाहतम् । जगाम क्वाप्यनालोक्यं पृष्ठं स्खलितजूतिकम् ॥३८४॥

अर्थ: उसने एक साथ डोरीपर चढ़ाये हुए बाणोंसे शत्रुकी सेनाको इस प्रकार मारा कि वह पीछे बिना देखे ही एकदम सरपट कहींपर भाग खड़ी हुई ॥३८४॥


पृथुवेपथवः केचिदिदमूचुर्भयार्दिताः । कृतं गङ्गाधरेणेदं भूधरेण च दुर्म्मतम् ॥३८५॥

अर्थ: जिनके शरीरमें बहुत भारी कँपकँपी छूट रही थी ऐसे भयसे पीड़ित कितने ही योद्धा कह रहे थे कि गंगाधर और महीधरने यह बड़ा अनिष्ट कार्य किया है ॥३८५॥


अयं कोऽपि रणे भाति सूर्यवत्पुरुषोत्तमः । करानिव शरान्मुञ्चन् सर्वाशासु समं बहून् ॥३८६॥

अर्थ: यह कोई अद्भुत पुरुष युद्धमें सूर्यकी भाँति सुशोभित हो रहा है। जिस प्रकार सूर्य समस्त दिशाओंमें किरणें छोड़ता है उसी प्रकार यह भी समस्त दिशाओंमें बहुत बाण छोड़ रहा है ॥३८६॥


ध्वंस्यमानं ततः सैन्यं दृष्ट्वा तेन महात्मना । गतौ क्वापि भयग्रस्तौ गङ्गाधरमहीधरौ ॥३८७॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी सेनाको उस महात्माके द्वारा नष्ट होती देख भयसे ग्रस्त हुए गंगाधर और महीधर दोनों ही कहीं भाग खड़े हुए ॥३८७॥


ततो जातेषु रत्नेषु तत्क्षणं सुकृतोदयात् । दशमो हरिषेणोऽभूच्चक्रवर्ती महोदयः ॥३८८॥

अर्थ: तदनन्तर उसी समय पुण्योदयसे रत्न प्रकट हो गये जिससे हरिषेण महान् अभ्युदयको धारण करनेवाला दसवाँ चक्रवर्ती प्रसिद्ध हुआ ॥३८८॥


तथापि परया युक्तश्चक्रलाञ्छनया श्रिया । रहितं मदनावल्या स्वं स मेने तृणोपमम् ॥३८९॥

अर्थ: यद्यपि वह चक्ररत्नसे चिह्नित परम लक्ष्मीसे युक्त हो गया था तो भी मदनावलीसे रहित अपने आपको तृणके समान तुच्छ समझता था ॥३८९॥


ततः संवाहयन् प्राप्तो बलं द्वादशयोजनम् । सतापसवनोद्देशं नमयन् सर्वविद्विषः ॥३९०॥

अर्थ: तदनन्तर बारह योजन लम्बी-चौड़ी सेनाको चलाता और समस्त शत्रुओंको नम्रीभूत करता हुआ वह तपस्वियोंके आश्रममें पहुँचा ॥३९०॥


ततः स तापसैर्भीतैर्विज्ञाय फलपाणिभिः । दत्तार्घः पूजितो वाक्यैराशीर्दानपुरस्सरैः ॥३९१॥

अर्थ: जब तपस्वियोंको इस बातका पता चला कि यह वही है जिसे हम लोगोंने आश्रमसे निकाल दिया था तो बहुत ही भयभीत हुए । निदान, हाथोंमें फल लेकर उन्होंने हरिषेणको अर्घ दिया और आशीर्वादसे युक्त वचनोंसे उसका सम्मान किया ॥३९१॥


शतमन्योश्च पुत्रेण जनमेजयरूढिना । तुष्टया नागवत्या च सा कन्यास्मै समर्पिता ॥३९२॥

अर्थ: शतमन्युके पुत्र जनमेजय और माता नागवतीने सन्तुष्ट होकर वह कन्या इसके लिए समर्पित कर दी ॥३९२॥


विधिना च ततो वृत्तं तयोर्वीवाहमङ्गलम् । प्राप्य चैतां पुनर्जन्म प्राप्तं मेने नृपोत्तमः ॥३९३॥

अर्थ: तदनन्तर उन दोनोंका विधिपूर्वक विवाहोत्सव हुआ । इस कन्याको पाकर राजा हरिषेणने अपना पुनर्जन्म माना ॥३९३॥


ततः काम्पिल्यमागत्य युक्तश्चक्रधरश्रिया । द्वात्रिंशता नरेन्द्राणां सहस्राणां समन्वितः ॥३९४॥

अर्थ: तदनन्तर चक्रवर्तीकी लक्ष्मीसे युक्त होकर वह काम्पिल्यनगर आया । बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा उसके साथ थे ॥३९४॥


शिरसा मुकुटन्यस्तमणिप्रकरभासिना । ननाम चरणौ मातुर्विनीतो रचिताञ्जलिः ॥३९५॥

अर्थ: उसने मुकुटमें लगे मणियोंके समूहसे सुशोभित शिर झुकाकर तथा हाथ जोड़कर बड़ी विनयसे माताके चरणोंमें नमस्कार किया ॥३९५॥


ततस्तं तद्विधं दृष्ट्वा पुत्रं वप्रा दशानन । संभूता न स्वगात्रेषु तोषाश्रुव्याप्तलोचना ॥३९६॥

अर्थ: सुमाली दशाननसे कहते हैं कि हे दशानन ! उस समय उक्त प्रकारके पुत्रको देखकर वप्राके हर्षका पार नहीं रहा । वह अपने अंगोंमें नहीं समा सकी तथा हर्षके आँसुओंसे उसके दोनों नेत्र भर गये ॥३९६॥


ततो भ्रामयता तेन सूर्यवर्णान् महारथान् । काम्पिल्यनगरे मातुः कृतं सफलमीप्सितम् ॥३९७॥

अर्थ: तदनन्तर उसने सूर्यके समान तेजस्वी बड़े-बड़े रथ काम्पिल्यनगरमें घुमाये और इस तरह अपनी माताका मनोरथ सफल किया ॥३९७॥


श्रमणश्रावकाणां च जातः परमसंमदः । बहवश्च परिप्राप्ताः शासनं जिनदेशितम् ॥३९८॥

अर्थ: इस कार्यसे मुनि और श्रावकोंको परम हर्ष हुआ तथा बहुत-से लोगोंने जिन-धर्म धारण किया ॥३९८॥


तेनामी कारिता भान्ति नानावर्णजिनालयाः । भूपर्वतनदीसङ्गपुरग्रामादिषून्नताः ॥३९९॥

अर्थ: पृथिवी, पर्वत, नदियोंके समागम स्थान, नगर तथा गाँव आदिमें जो नाना रंगके ऊँचे-ऊँचे जिनालय शोभित हो रहे हैं वे सब उसीके बनवाये हैं ॥३९९॥


कृत्वा चिरमसौ राज्यं प्रव्रज्य सुमहामनाः । तपः कृत्वा परं प्राप्तस्त्रिलोकशिखरं विभुः ॥४००॥

अर्थ: उदार हृदयको धारण करनेवाले हरिषेणने चिर काल तक राज्य कर दीक्षा ले ली और परम तपश्चरण कर तीन लोकका शिखर अर्थात् सिद्धालय प्राप्त कर लिया ॥४००॥


हरिषेणस्य चरितं श्रुत्वा विस्मयमागतः । कृत्वा जिननमस्कारं दशास्यः प्रस्थितः पुनः ॥४०१॥

अर्थ: इस प्रकार हरिषेण चक्रवर्तीका चरित्र सुनकर दशानन आश्चर्यको प्राप्त हुआ । तदनन्तर जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर वह आगे बढ़ा ॥४०१॥


अथ विज्ञाय जयिनं दशवक्त्रं दिवाकरः । नेत्रयोर्गोचरीभावं भयादिव समत्यजत् ॥४०२॥

अर्थ: अथानन्तर सन्ध्या काल आया और सूर्य डूब गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो सूर्यने दशाननको विजयी जानकर भयसे ही उसके नेत्रोंका गोचर-स्थान छोड़ दिया था ॥४०२॥


संध्यारागेण चच्छन्नं समस्तं भुवनान्तरम् । संजातेनानुरागेण कैकसेयादिवोरुणा ॥४०३॥

अर्थ: सन्ध्या-की लालिमासे समस्त लोक व्याप्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो दशाननसे उत्पन्न हुए बहुत भारी अनुरागसे ही व्याप्त हो गया था ॥४०३॥


ध्वस्तसंध्येन च व्याप्तं ध्वान्तेन क्रमतो नभः । दशास्यस्येव कालेन कर्तुमेतेन सेवनम् ॥४०४॥

अर्थ: क्रम-क्रमसे सन्ध्याको नष्ट कर काला अन्धकार आकाशमें व्याप्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो दशाननकी सेवा करनेके लिए ही व्याप्त हुआ था ॥४०४॥


संमेदभूधरस्यान्ते ततः संस्थलिभूभृतः । चकार शिविरं कुक्षाववतीर्य नभस्तलात् ॥४०५॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननने आकाशसे उतरकर सम्मेदाचलके समीप संस्थलि नामक पर्वतके ऊपर अपना डेरा डाला ॥४०५॥


घनौघादिव निर्घातः प्रावृषेण्यादथ ध्वनिः । येन तत्सकलं सैन्यं कृतं साध्वसपूरितम् ॥४०६॥

अर्थ: अथानन्तर - जिस प्रकार वर्षाकालीन मेघोंके समूहसे वज्रका शब्द निकलता है इसी प्रकार कहींसे ऐसा भयंकर शब्द निकला कि जिसने समस्त सेनाको भयभीत कर दिया ॥४०६॥


भङ्गमालानवृक्षाणां चक्रुः स्तम्बेरमोत्तमाः । हेषितं सप्तयश्चोच्चैरुत्कर्णाः स्फुरत्त्वचः ॥४०७॥

अर्थ: बड़े-बड़े हाथियोंने अपने आलानभूत वृक्ष तोड़ डाले और घोड़े कान खड़े कर फरूरी लेते हुए हिनहिनाने लगे ॥४०७॥


किं किमेतदिति क्षिप्रं जगाद च दशाननः । अपराधनिभेनायं मर्तुं कोऽद्य समुद्यतः ॥४०८॥

अर्थ: वह शब्द सुनकर दशानन शीघ्रतासे बोला कि यह क्या है ? क्या है ? अपराधके बहाने मरनेके लिए आज कौन उद्यत हुआ है ? ॥४०८॥


नूनं वैश्रवणः प्राप्तः सोमो वा रिपुचोदितः । विश्रब्धं वा स्थितं मत्वा ममान्यः शत्रुगोचरः ॥४०९॥

अर्थ: जान पड़ता है कि वैश्रवण आया है अथवा शत्रुसे प्रेरित हुआ सोम आया है अथवा मुझे निश्चिन्त रूपसे ठहरा जानकर शत्रु पक्षका कोई दूसरा व्यक्ति यहाँ आया है ॥४०९॥


तदादिष्टः प्रहस्तोऽथ तं देशं समुपागतः । अपश्यत्पर्वताकारं लीलायुक्तमनेकपम् ॥४१०॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननकी आज्ञा पाकर प्रहस्त नामा मन्त्री उस स्थानपर गया जहांसे कि वह शब्द आ रहा था । वहाँ जाकर उसने पर्वतके समान आकारवाला, क्रीड़ा करता हुआ एक हाथी देखा ॥४१०॥


निवेदितं ततस्तेन दशास्याय सविस्मयम् । महाराशिमिवाब्दानां देव पश्य मतङ्गजम् ॥४११॥

अर्थ: वहाँसे लौटकर प्रहस्तने बड़े आश्चर्यके साथ दशाननको सूचना दी कि हे देव ! मेघोंकी महाराशिके समान उस हाथीको देखो ॥४११॥


ईक्षितः पूर्वमप्येष दन्तिवृन्दारको मया । इन्द्रेणाप्युज्झितो धर्तुमसमर्थेन वारणः ॥४१२॥

मन्ये पुरन्दरस्यापि दुर्ग्रहोऽयं सुदुस्सहः । गजः किमुत तुङ्गौजाः शेषाणां प्राणधारिणाम् ॥४१३॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता है कि इस हाथीको मैंने पहले भी कभी देखा है, इन्द्र विद्याधर भी इसे पकड़नेमें समर्थ नहीं था इसीलिए उसने इसे छोड़ दिया है, अथवा इन्द्र विद्याधरकी बात जाने दो साक्षात् देवेन्द्र भी इसे पकड़नेमें असमर्थ है, इसे कोई सहन नहीं कर सकता। नहीं जान पड़ता कि यह हाथी है या समस्त प्राणियोंका एकत्रित तेजका समूह है ? ॥४१२-४१३॥


ततः प्रहस्य विश्रब्धं जगाद धनदार्दनः । आत्मनो युज्यते कर्तुं न प्रहस्त प्रशंसनम् ॥४१४॥

एतावत्तु ब्रवीम्येतौ भुजौ केयूरपीडितौ । छिनद्मि न क्षणादेनं यदि गृह्णाम्यनेकपम् ॥४१५॥

अर्थ: तब दशाननने हँसकर कहा कि हे प्रहस्त ! यद्यपि अपनी प्रशंसा स्वयं करना ठीक नहीं है फिर भी मैं इतना तो कहता ही हूँ कि यदि मैं इस हाथीको क्षण-भरमें न पकड़ लूँ तो बाजूबन्दसे पीड़ित अपनी इन दोनों भुजाओंको काट डालूँ ॥४१४-४१५॥


ततः कामगमारुह्य विमानं पुष्पकाभिधम् । गत्वा पश्यति तं नागं सल्लक्षणसमन्वितम् ॥४१६॥

अर्थ: तदनन्तर वह इच्छानुसार चलनेवाले पुष्पक विमानपर सवार हो, जाकर उत्तम लक्षणोंसे युक्त उस हाथीको देखता है ॥४१६॥


स्निग्धेन्द्रनीलसंकाशं राजीवप्रभतालुकम् । दीर्घवृत्तौ सुधाफेनवलक्षौ बिभ्रतं रदौ ॥४१७॥

अर्थ: वह हाथी चिकने इन्द्रनील मणिके समान था, उसका तालु कमलके समान लाल था, .वह लम्बे, गोल तथा अमृतके फेनके समान सफेद दाँतोंको धारण कर रहा था ॥४१७॥


हस्तानां सप्तकं तुङ्गं दशकं परिणाहतः । आयामतश्च नवकं मधुपिङ्गललोचनम् ॥४१८॥

अर्थ: वह सात हाथ ऊँचा, दस हाथ चौड़ा और नौ हाथ लम्बा था । उसके नेत्र मधुके समान कुछ पीतवर्णके थे ॥४१८॥


निमग्नवंशमग्राङ्गतुङ्गमायतबालधिम् । द्राघिष्ठकरमत्यन्तस्निग्धपिङ्गनखाङ्कुरम् ॥४१९॥

अर्थ: उसकी पीठकी हड्डी मांसपेशियोंमें निमग्न थी, उसके शरीरका अगला भाग ऊँचा था, पूँछ लम्बी थी, सूँड़ विशाल थी, और नखरूपी अंकुर चिकने तथा पीले थे ॥४१९॥


वृत्तपीनमहाकुम्भं सुप्रतिष्ठाङ्घ्रिमूर्जितम् । अन्तर्मधुरधीरोरुगर्जितं विनयस्थितम् ॥४२०॥

अर्थ: उसका मस्तक गोल तथा स्थूल था, उसके चरण अत्यन्त जमे हुए थे, वह स्वयं बलवान् था, उसकी विशाल गर्जना भीतरसे मधुर तथा गम्भीर थी और वह विनयसे खड़ा था ॥४२०॥


गलद्गण्डस्थलामोदसमाकृष्टालिवेणिकम् । कुर्वन्तं दुन्दुभिध्वानं कर्णतालान्तताडनैः ॥४२१॥

अर्थ: उसके गण्डस्थलसे जो मद चू रहा था उसकी सुगन्धिके कारण भ्रमरोंकी पंक्तियाँ उसके समीप खिंची चली आ रही थीं । वह कर्णरूपी तालपत्रोंकी फटकारसे दुन्दुभिके समान विशाल शब्द कर रहा था ॥४२१॥


भग्नावकाशमाकाशं कुर्वाणमिव पार्थवात् । लीलां विदधतं चित्तचक्षुश्चोरणकारिणीम् ॥४२२॥

अर्थ: वह अपनी स्थूलताके कारण आकाशको मानो निरवकाश कर रहा था और चित्त तथा नेत्रोंको चुरानेवाली क्रीड़ा कर रहा था ॥४२२॥


दृष्ट्वा च तं परां प्रीतिं प्राप रत्नश्रवःसुतः । कृतार्थमिव चात्मानं मेने हृष्टतनूरुहः ॥४२३॥

अर्थ: उस हाथीको देख दशानन परम प्रीतिको प्राप्त हुआ । उसने अपने आपको कृतकृत्य-सा माना और उसका रोम-रोम हर्षित हो उठा ॥४२३॥


ततो विमानमुज्झित्वा बद्ध्वा परिकरं दृढम् । शङ्खं तस्य पुरो दध्मौ शब्दपूरितविष्टपम् ॥४२४॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननने विमान छोड़कर अपना परिकर मजबूत बाँधा और उसके सामने शब्दसे लोकको व्याप्त करनेवाला शंख फूँका ॥४२४॥


ततः शङ्खस्वनोद्भूतचित्तक्षोभः सगर्जितः । करी दशमुखोद्देशं चलितो बलगर्वितः ॥४२५॥

अर्थ: तत्पश्चात् शंखके शब्दसे जिसके चित्तमें क्षोभ उत्पन्न हुआ था तथा जो बलके गर्वसे युक्त था ऐसा हाथी गर्जना करता हुआ दशाननके सम्मुख चला ॥४२५॥


वेगादभ्यायतस्यास्य पिण्डीकृत्य सितांशुकम् । उत्तरीयं च चिक्षेप क्षिप्रं विभ्रमदक्षिणः ॥४२६॥

अर्थ: जब हाथी वेगसे दशाननके सामने दौड़ा तो घूमनेमें चतुर दशाननने उसके सामने अपना सफेद चद्दर घरियाकर फेंक दिया ॥४२६॥


दन्ती जिघ्रति तं यावत्तावदुत्पत्य गण्डयोः । अस्पृशद्यक्षमर्दस्तं भृङ्गौघध्वनिचण्डयोः ॥४२७॥

अर्थ: हाथी जबतक उस चद्दरको सूँघता है तबतक दशाननने उछलकर भ्रमरसमूहके शब्दोंसे तीक्ष्ण उसके दोनों कपोलोंका स्पर्श कर लिया ॥४२७॥


करेण वेष्टितुं यावच्चक्रे वाञ्छां मतङ्गजः । तावद्दंष्ट्रान्तरेणासौ निःसृतो लाघवान्वितः ॥४२८॥

अर्थ: हाथी जबतक दशाननको सूँड़से लपेटनेकी इच्छा करता है कि तबतक शीघ्रतासे युक्त दशानन उसके दाँतोंके बीचसे बाहर निकल गया ॥४२८॥


अङ्गेषु च चतुर्ष्वस्य स्पृशन् दन्ततले मुहुः । भ्रान्तिविद्युच्चलश्चक्रे प्रेङ्खणं रदनाग्रयोः ॥४२९॥

अर्थ: घूमनेमें बिजलीके समान चंचल दशानन उसके चारों ओरके अंगोंका स्पर्श करता था । बार-बार दाँतोंपर टक्कर लगाता था और कभी खीसोंपर झूला झूलने लगता था ॥४२९॥


अथास्य पृष्ठमारूढः सविलासं दशाननः । विनीतश्च स्थितो दन्ती सच्छिष्य इव तत्क्षणात् ॥४३०॥

अर्थ: तदनन्तर दशानन विलासपूर्वक उसकी पीठपर चढ़ गया और हाथी उसी क्षण उत्तम शिष्यके समान विनीतभावसे खड़ा हो गया ॥४३०॥


ततः सकुसुमा मुक्ताः साधुवादाः मुहुः सुरैः । सशब्दा च महामोदं प्राप्ता खेचरवाहिनी ॥४३१॥

अर्थ: उसी समय देवोंने फूलोंकी वर्षा की, बार-बार धन्यवाद दिये, और विद्याधरोंकी सेना कल-कल करती हुई परम हर्षको प्राप्त हुई ॥४३१॥


त्रिलोकमण्डनाभिख्यां प्रापायं दशवक्त्रतः । त्रैलोक्यं मण्डितं तेन यतो मेने स मोदवान् ॥४३२॥

अर्थ: वह हाथी, दशाननसे ‘त्रिलोकमण्डन’ इस नामको प्राप्त हुआ। यथार्थमें उस हाथीसे तीनों लोक मण्डित हुए थे इसलिए दशाननने बड़े हर्षसे उसका ‘त्रिलोकमण्डन’ नाम सार्थक माना था ॥४३२॥


महोत्सवः कृतस्तस्य लाभे परमदन्तिनः । नृत्यद्भिः पर्वते रम्ये खेचरैः पुष्पसंकुलैः ॥४३३॥

अर्थ: फूलोंसे व्याप्त उस रमणीय पर्वतपर नृत्य करते हुए विद्याधरोंने उस श्रेष्ठ हाथीके मिलनेका महोत्सव किया था ॥४३३॥


तथैषां जाग्रतामेष मर्यादामात्रकारणम् । कृतः प्रभाततूर्येण नादो गह्वरपेशलः ॥४३४॥

अर्थ: इस हाथीके प्रकरणसे यद्यपि सब लोग जाग रहे थे तो भी रात्रि और दिवसकी मर्यादा बतलानेके लिए प्रभातकालीन तुरहीने ऐसा जोरदार शब्द किया कि वह पर्वतकी प्रत्येक गुफामें गूँज उठा ॥४३४॥


दिवसेन ततो बिम्बं रवेः कलशमङ्गलम् । उपनीतं दशास्याय सेवाकौशलवेदिना ॥४३५॥

अर्थ: तदनन्तर सूर्य बिम्बका उदय हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो सेवाकी चतुराईको जाननेवाले दिवसने दशाननके लिए मंगल-कलश ही समर्पित किया हो ॥४३५॥


ततः सुखासनासीने विहितस्वाङ्गकर्मणि । स्थिते दशमुखे दन्तिकथया खेचरावृते ॥४३६॥

अर्थ: तदनन्तर दशानन शारीरिक क्रियाएँ कर सोफापर बैठा था। साथ ही अन्य विद्याधर भी हाथीकी चर्चा करते हुए उसे घेरकर बैठे थे ॥४३६॥


सहसा वियतः प्राप्तः पुरुषः पुरु वेपथुः । स्वेदबिन्दुसमाकीर्णः संभ्रान्तः खेदमुद्वहन् ॥४३७॥

सप्रहारव्रणः साश्रुर्दर्शयज्जर्जरां तनुम् । व्यज्ञापयच्च कृच्छ्रेण ललाटे धारयन् करौ ॥४३८॥

अर्थ: उसी समय आकाशसे उतरकर एक पुरुष वहाँ आया। वह पुरुष अत्यन्त काँप रहा था, पसीनेकी बूँदोंसे व्याप्त था, खेदको धारण कर रहा था, प्रहारजन्य घावोंसे सहित था, आँसू छोड़ रहा था और अपना जर्जर शरीर दिखला रहा था। उसने हाथ जोड़ मस्तकसे लगा बड़े दुःखके साथ निवेदन किया ॥४३७-४३८॥


दशमेऽह्नि दिनादस्माच्चित्ते कृत्वा भवद्बलम् । अलंकारपुरावासान्निष्क्रम्योत्साहतोऽधिकात् ॥४३९॥

निजगोत्रक्रमायातं नगरं किं कुसंज्ञकम् । गृहीतुं भ्रातरौ यातौ सूर्यर्क्षरजसावुभौ ॥४४०॥

अर्थ: कि हे देव ! आजसे दस दिन पहले हृदयमें आपके बलका भरोसा कर सूर्यरज और ऋक्षरज दोनों भाई, अपनी वंश-परम्परासे चले आये किष्कु नगरको लेनेके लिए बड़े उत्साहसे अलंकारपुर अर्थात् पाताल लंकासे निकलकर चले थे ॥४३९-४४०॥


महाभिमानसंपन्नौ महाबलसमन्वितौ । विश्रब्धौ भवतो गर्वान्मन्यमानौ तृणं जगत् ॥४४१॥

अर्थ: दोनों ही भाई महान् अभिमानसे युक्त, बड़ी भारी सेनासे सहित तथा निःशंक थे। वे आपके गर्वसे संसारको तृणके समान तुच्छ मानते थे। ॥४४१॥


एताभ्यां चोदितः क्षुब्धो नितान्तं विपुलो जनः । अवस्कन्देन संपत्य प्रचक्रे किष्कुलुण्टनम् ॥४४२॥

अर्थ: इन दोनों भाइयोंकी प्रेरणासे अत्यन्त क्षोभको प्राप्त हुए बहुत-से लोग एक साथ आक्रमण कर किष्कुपुरको लूटने लगे ॥४४२॥


कृतान्तस्य ततो योद्धुमुत्थिता भटसत्तमाः । स्वप्नवद्यत्पुरोद्दिष्ट (?) हेतिव्यापृतपाणयः ॥४४३॥

ततस्तेषां महान् जातो मध्येशर्वरि संयुगः । अन्योन्यशस्त्रसंपातकृतभूरिजनक्षयः ॥४४४॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र चमक रहे थे ऐसे यम नामा दिक्पालके उत्तम योद्धा युद्ध करनेके लिए उठे सो मध्य रात्रिमें उन सबके बीच बड़ा भारी युद्ध हुआ । उस युद्धमें परस्परके शस्त्र प्रहारसे अनेक पुरुषोंका क्षय हुआ ॥४४३-४४४॥


श्रुत्वा कलकलध्वानं स्वयं योद्धुमथादरात् । यमः क्रोधेन निष्क्रान्तः संक्षुब्धार्णवदारुणः ॥४४५॥

अर्थ: अथानन्तर बड़ी गौरसे उनका कल-कल शब्द सुनकर यह दिक्पाल स्वयं क्रोधसे युद्ध करनेके लिए निकला । उस समय वह यम क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान भयंकर जान पड़ता था ॥४४५॥


आयातमात्रकेणैव तेन दुस्सहतेजसा । अस्मदीयं बलं भग्नं विविधायुधविक्षतम् ॥४४६॥

अर्थ: जिसका तेज अत्यन्त दुःसह था ऐसे यमने आते हीके साथ हमारी सेनाको नाना प्रकारके शस्त्रोंसे घायल कर भग्न कर दिया ॥४४६॥


अथासौ कथयन्नेवं दूतो मूर्च्छामुपागतः । बीजितश्च पटान्तेन प्रबोधं पुनरागतः ॥४४७॥

अर्थ: अथानन्तर वह दूत इस प्रकार कहता-कहता बीचमें ही मूर्च्छित हो गया । वस्त्रके छोरसे हवा करनेपर पुनः सचेत हुआ ॥४४७॥


किमेतदिति पृष्टश्च हृदयस्थकरोऽवदत् । जानामि देव तत्रैव वर्तेऽहमिति मूर्च्छितः ॥४४८॥

अर्थ: यह क्या है ? इस प्रकार पूछे जानेपर उसने हृदयपर हाथ रखकर कहा कि हे देव ! मुझे ऐसा जान पड़ा कि मैं वहीं पर हूँ । उसी दृश्यको सामने देख मैं मूर्च्छित हो गया ॥४४८॥


ततस्तत इति प्रोक्ते ततो विस्मयवाहिना । रत्नश्रवःसुतेनासौ विश्रम्य पुनरब्रवीत् ॥४४९॥

अर्थ: तदनन्तर आश्चर्यको धारण करनेवाले रावणने पूछा कि ‘फिर क्या हुआ ?’ इस प्रश्नके उत्तरमें वह कुछ विश्राम कर फिर कहने लगा ॥४४९॥


ततो नाथ बलं दृष्ट्वा नितान्तार्तरवाकुलम् । निजभृक्षरजा भग्नं वत्सलो योद्धुमुत्थितः ॥४५०॥

अर्थ: कि हे नाथ ! जब ऋक्षरजने देखा कि हमारी सेना अत्यन्त दुःखपूर्ण शब्दोंसे व्याकुल होती हुई पराजित हो रही है - नष्ट हुई जा रही है तब स्नेहयुक्त हो वह युद्ध करनेके लिए स्वयं उद्यत हुआ ॥४५०॥


चिरं च कृतसंग्रामो यमेनातिबलीयसा । चेतसा भेदमप्राप्तो गृहीतः शत्रुवञ्चितः ॥४५१॥

अर्थ: वह अत्यन्त बलवान् यमके साथ चिरकाल तक युद्ध करता रहा । युद्ध करते-करते उसका हृदय नहीं टूटा था फिर भी शत्रुने छलसे उसे पकड़ लिया ॥४५१॥


उत्थितो युध्यमानेऽस्मिन्नथ सूर्यरजा अपि । चिरं कृतरणो गाढप्रहारो मूर्च्छितो भृशम् ॥४५२॥

अर्थ: तदनन्तर जब ऋक्षरज युद्ध कर रहा था उसी समय सूर्यरज भी युद्धके लिए उठा । उसने भी चिरकाल तक युद्ध किया पर अन्तमें वह शस्त्रकी गहरी चोट खाकर मूर्च्छित हो गया ॥४५२॥


उद्यम्य क्षिप्रमात्मीयैः सामन्तैर्मेखला वनम् । नीत्वा स श्वासमानीतः शीतचन्दनवारिणा ॥४५३॥

अर्थ: आत्मीय लोग उसे उठाकर शीघ्र ही मेखला नामक वनमें ले गये । वहाँ वह चन्दन मिश्रित शीतल जलसे श्वासको प्राप्त हो गया अर्थात् शीतलोपचारसे उसकी मूर्च्छा दूर हुई ॥४५३॥


यमेन स्वयमात्मानं सत्यमेवावगच्छता । कारितं यातनास्थानं वैतरण्यादि पूर्वहिः ॥४५४॥

अर्थ: लोकपाल यमने अपने आपको सचमुच ही यमराज समझकर नगरके बाहर वैतरणी नदी आदि कष्ट देनेके स्थान बनवाये ॥४५४॥


ततो ये निर्जितास्तेन संयतीन्द्रेण वा जिताः । प्रेषिताः दुःखमरणं प्राप्यन्ते तत्र ते नराः ॥४५५॥

अर्थ: तदनन्तर उसने अथवा इन्द्र विद्याधरने जिन्हें युद्धमें जीता था उन सबको उसने उस कष्टदायी स्थानमें रखा सो वे वहाँ दुःखपूर्वक मरणको प्राप्त हो रहे हैं ॥४५५॥


वृत्तान्तं तमहं दृष्ट्वा कथमप्याकुलाकुलः । संभूतो दयितो भृत्यः क्रमादृक्षरजःकुले ॥४५६॥

नाम्ना शाखावली पुत्रः सुश्रेणीरणदक्षयोः । कृत्वा पलायनं प्राप्तो भवतस्त्रातुरन्तिकम् ॥४५७॥

अर्थ: इस वृत्तान्तको देख मैं बहुत ही व्याकुल हूँ। मैं ऋक्षरजकी वंशपरम्परासे चला आया प्यारा नौकर हूँ। शाखावली मेरा नाम है, मैं सुश्रोणी और रणदक्षका पुत्र हूँ। आप चूँकि रक्षक हो इसलिए किसी तरह भागकर आपके पास आया हूँ ॥४५६-४५७॥


इति स्वपक्षदौःस्थित्यमवगम्य मयोदितम् । देव प्रमाणमत्रार्थे कृत्यहं त्वन्निवेदनात् ॥४५८॥

अर्थ: इस प्रकार अपने पक्षके लोगोंकी दुर्दशा जानकर मैंने आपसे कही है । इस विषयमें अब आप ही प्रमाण हैं अर्थात् जैसा उचित समझें सो करें । मैं तो आपसे निवेदन कर कृतकृत्य हो चुका ॥४५८॥


व्रणभङ्गं ततस्तस्य कर्तुमादिश्य सादरम् । उच्चचाल महाक्रोधः स्मितं कृत्वा दशाननः ॥४५९॥

जगाद चोद्यतान् क्लेशमहार्णवमुपागतान् । वैतरण्यादिनिक्षिप्तान् वारयाम्यसुधारिणः ॥४६०॥

अर्थ: तदनन्तर महाक्रोधी रावणने अपने पक्षके लोगोंको बड़े आदरसे आदेश दिया कि इस शाखावलीके घाव ठीक किये जावें । तदनन्तर मुसकराता हुआ वह उठा और साथ ही उठे अन्य लोगोंसे कहने लगा कि मैं कष्टरूपी महासागरमें पड़े तथा वैतरणी आदि कष्टदायी स्थानोंमें डाले गये लोगोंका उद्धार करूँगा ॥४५९-४६०॥


अग्रस्कन्धेन चोदाराः प्रहस्तप्रमुखा नृपाः । प्रवृत्ताः शस्त्रतेजोभिः कुर्वाणा ज्वलितं नभः ॥४६१॥

अर्थ: प्रहस्त आदि बड़े-बड़े राजा सेनाके आगे दौड़े । वे शस्त्रोंके तेजसे आकाशको देदीप्यमान कर रहे थे ॥४६१॥


विचित्रवाहनारूढाश्छत्रध्वजसमाकुलाः । तूर्यनादसमुद्भूतमहोत्साहा महौजसः ॥४६२॥

अर्थ: नाना प्रकारके वाहनोंपर सवार थे, छत्र और ध्वजाओंको धारण करनेवाले थे । तुरहीके शब्दोंसे उनका बड़ा भारी उत्साह प्रकट हो रहा था और वे महातेजस्वी थे ही ॥४६२॥


नाथा गगनयात्राणां क्षितिं प्राप्ताः पुरान्तिकाम् । शोभया गृहपङ्क्तीनां परमं विस्मयं गताः ॥४६३॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याधरोंके अधिपति आकाशसे उतरकर पृथिवीपर आये और नगर के समीप महलोंकी पंक्तिकी शोभा देख परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥४६३॥


दिशि किष्कुपुरस्याथ दक्षिणस्यां दशाननः । ददर्श नरकावासगर्ताक्षिप्ता नृसंहतीः ॥४६४॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने किष्कुपुर नगरकी दक्षिण दिशामें कृत्रिम नरकके गर्तमें पड़े मनुष्योंके समूहको देखा ॥४६४॥


कृत्वा नरकपालानां ध्वंसनं दुःखसागरात् । उत्तारितास्ततः सर्वे बन्धुनेवामुना जनाः ॥४६५॥

अर्थ: देखते ही उसने नरककी रक्षा करनेवाले लोगोंको नष्ट किया और जिस प्रकार बन्धुजन अपने इष्ट लोगोंको कष्टसे निकालते हैं उसी प्रकार उसने सब लोगोंको नरकसे निकाला ॥४६५॥


श्रुत्वा परबलं प्राप्तं साटोपो नाम वीर्यवान् । निर्ययौ सर्वसैन्येन प्रक्षुब्ध इव सागरः ॥४६६॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुसेनाको आया सुनकर बड़े भारी आडम्बरको धारण करनेवाला, शक्तिशाली यम नाम लोकपालका साटोप नामका प्रमुख भट युद्ध करनेके लिए अपनी सब सेनाके साथ बाहर निकला । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो क्षोभको प्राप्त हुआ सागर ही हो ॥४६६॥


द्विपैर्गिरिनिभैर्भीमैर्दानधारान्धकारिभिः । तुरङ्गैश्च चलच्चारुचामरप्राप्तभूषणैः ॥४६७॥

रथैरादित्यसंकाशैर्ध्वजपङ्क्तिविभूषितैः । पिनद्धकवचैः शस्त्रैर्भटैर्वीरैरधिष्ठितैः ॥४६८॥

अर्थ: पहाड़के समान ऊँचे, भयंकर और मदकी धारासे अन्ध- कार फैलानेवाले हाथी, चलते हुए सुन्दर चामररूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले घोड़े, सूर्यके समान देदीप्यमान तथा ध्वजाओंकी पंक्तिसे सुशोभित रथ, और कवच धारण करनेवाले एवं शस्त्रों- से युक्त शूरवीर योद्धा इस प्रकार चतुरंग सेना उसके साथ थी ॥४६७-४६८॥


ततस्तं स्यन्दनारूढो हसन् यममटं क्षणात् । मङ्गं विभीषणो निन्ये बाणै रणविशारदः ॥४६९॥

अर्थ: तदनन्तर रथपर आरूढ़ एवं रणकलामें निपुण विभीषणने हँसते-हँसते ही बाणोंके द्वारा उस साटोपको क्षण-भरमें मार गिराया ॥४६९॥


यमस्य किङ्करा दीनाः कुर्वाणाः खमायतम् । बाणैः समाहताश्चक्रुः क्षिप्रं क्वापि पलायनम् ॥४७०॥

अर्थ: यमके जो दीन हीन किंकर थे वे भी बाणोंसे ताड़ित हो आकाशको लम्बा करते हुए शीघ्र ही कहीं भाग खड़े हुए ॥४७०॥


मोचितान् नारकात् श्रुत्वा साटोपं चावसादितम् । यमो यम इव क्रूरो महाशस्त्रोटवेगतः ॥४७१॥

रथोत्साहः समारुह्य चापं कोपं च धारयन् । उच्छ्रितेन प्रतापेन ध्वजेन च महाबलः ॥४७२॥

आकुलासितसर्पाभभ्रकुटीकुटिलालकः । चक्षुषात्यन्तरक्तेन दहन्निव जगद्वनम् ॥४७३॥

प्रतिबिम्बैरिवात्मीयैः सामन्तैः कृतवेष्टनः । योद्धुं वेगान्निचक्राम छादयन् तेजसा नभः ॥४७४॥

अर्थ: जब यम नाम लोकपालको पता चला कि सूर्यरज, ऋक्षरज आदिको नरकसे छुड़ा दिया है तथा साटोप नामक प्रमुख भटको मार डाला है तब यमराजके समान क्रूर तथा महाशस्त्रोंको धारण करनेवाला वह यम लोकपाल बड़े वेगसे रथपर सवार हो युद्ध करने के लिए बाहर निकला । वह धनुष तथा क्रोधको धारण कर रहा था, बढ़े हुए प्रताप और ऊँची उठी ध्वजासे युक्त था, महाबलवान् था, काले सर्पके समान भयंकर भौंहोंसे उसका ललाट कुटिल हो रहा था, वह अपने लाल-लाल नेत्रोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो जगत्रूपी वनको जला ही रहा हो । अपने ही प्रतिबिम्बके समान दिखनेवाले अन्य सामन्त उसे घेरे हुए थे तथा तेजसे वह आकाशको आच्छादित कर रहा था ॥४७१-४७४॥


ततस्तं निर्गतं दृष्ट्वा विनिवार्य विभीषणम् । दशाननो रणं कर्तुमुत्थितः कोपमुद्वहन् ॥४७५॥

अर्थ: तदनन्तर यम लोकपालको बाहर निकला देख दशाननने विभीषणको मना किया और स्वयं ही क्रोधको धारण करता हुआ युद्ध करनेके लिए उठा ॥४७५॥


साटोपव्यसनेनातिदीपितोऽथ यमः समम् । दशास्येन रणं कर्तुमारेभे भीषणाननः ॥४७६॥

अर्थ: साटोपके मारे जानेसे जो अत्यन्त देदीप्यमान दिख रहा था ऐसे भयंकर मुखको धारण करनेवाले यमने दशाननके साथ युद्ध करना शुरू किया ॥४७६॥


दृष्ट्वा च तं ततो भीता जाता राक्षसवाहिनी । दशाननसमीपं सा ढुढौके मन्दचेष्टिता ॥४७७॥

अर्थ: यमको देख राक्षसोंकी सेना भयभीत हो उठी, उसकी चेष्टाएँ मन्द पड़ गयीं और वह निरुत्साह हो दशाननके समीप भाग खड़ी हुई ॥४७७॥


रथारूढस्ततस्तस्य दशास्योऽभिमुखं ययौ । विमुञ्चन् शरसंघातं मुञ्चतः शरसंहतीः ॥४७८॥

अर्थ: तदनन्तर रथपर बैठा हुआ दशानन बाणोंकी वर्षा करता हुआ यमके सम्मुख गया । यम भी बाणोंकी वर्षा कर रहा था ॥४७८॥


ततस्तयोः शरैश्छन्नं भीमनिस्वनकारिभिः । नभो घनैरिवाशेषं घनबद्धकदम्बकैः ॥४७९॥

अर्थ: तदनन्तर सघन मण्डल बाँधनेवाले मेघोंसे जिस प्रकार समस्त आकाश व्याप्त हो जाता है उसी प्रकार उन दोनोंके भयंकर शब्द करनेवाले बाणोंसे समस्त आकाश व्याप्त हो गया ॥४७९॥


कैकसीनन्दनेनाथ शरेण कृतताडनः । भूमौ ग्रह इवापुण्यः पपात यमसारथिः ॥४८०॥

अर्थ: अथानन्तर दशाननके बाणकी चोट खाकर यमका सारथि पुण्यहीन ग्रहके समान भूमिपर गिर पड़ा ॥४८०॥


ताडितस्तीक्ष्णबाणेन कृतान्तोऽप्यरथीकृतः । उत्पपात रवेर्मार्गमन्तर्हिततनुः क्षणात् ॥४८१॥

अर्थ: यम लोकपाल भी दशाननके तीक्ष्ण बाणसे ताड़ित हो रथरहित हो गया । इस कार्यसे वह इतना घबड़ाया कि क्षण-भरमें छिपकर आकाशमें जा उड़ा ॥४८१॥


ततः सान्तःपुरः पुत्रसहितोऽमात्यसंयुतः । कम्पमानतनुर्भीत्या यातोऽसौ रथनूपुरम् ॥४८२॥

अर्थ: तदनन्तर भयसे जिसका शरीर काँप रहा था ऐसा यम अपने अन्तःपुर, पुत्र और मन्त्रियोंको साथ लेकर रथनूपुर नगरमें पहुँचा ॥४८२॥


नमस्कृत्य च संभ्रान्त इन्द्रमेवमभाषत । श्रृणु विज्ञापनं देव कृतं मे यमलीलया ॥४८३॥

अर्थ: और बड़ी घबराहटके साथ इन्द्रको नमस्कार कर इस प्रकार कहने लगा कि हे देव ! मेरी बात सुनिए । अब मुझे यमराजकी लीलासे प्रयोजन नहीं है ॥४८३॥


प्रसीद व्रज वा कोपं हर वा जीवनं विमो । कुरु वा वाञ्छितं यत्ते यमतां न करोम्यहम् ॥४८४॥

अर्थ: हे नाथ ! चाहे आप प्रसन्न हों, चाहे क्रोध करें, चाहे मेरा जीवन हरण करें अथवा चाहे जो आपकी इच्छा हो सो करें परन्तु अब मैं यमपना अर्थात् यम नामा लोकपालका कार्य नहीं करूँगा ॥४८४॥


युद्धे वैश्रवणो येन निर्जितः पुरुतेजसा । अहमप्यमुना नीतो भङ्ग कृतरणश्चिरम् ॥४८५॥

अर्थ: विशाल तेजको धारण करनेवाले जिस योधाने पहले युद्धमें वैश्रवणको जीता था उसी योद्धा दशाननने मुझे भी पराजित किया है । यद्यपि मैं चिरकाल तक उसके साथ युद्ध करता रहा पर स्थिर नहीं रह सका ॥४८५॥


सृष्टं वीररसेनेव वपुस्तस्य महात्मनः । दुरीक्ष्यो व्योममध्यस्थसवितेव निदाघजः ॥४८६॥

अर्थ: उस महातमाका शरीर ऐसा जान पड़ता है मानो वीर रससे ही बना हो । वह आकाशके मध्यमें स्थित ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान दुनिरीक्ष्य है अर्थात् उसकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता है ॥४८६॥


इति श्रुत्वा सुराधीशः संग्रामाय कृतोद्यतिः । निरुद्धो मन्त्रिवर्गेण नय याथात्म्यवेदिना ॥४८७॥

अर्थ: यह सुनकर इन्द्र युद्धके लिए उद्यत हुआ परन्तु नीतिकी यथार्थताको जाननेवाले मन्त्रिमण्डलने उसे रोक दिया ॥४८७॥


जगाद च स्मितं श्रुत्वा मातुलं क्व स यास्यति । भयं मुञ्च सुविश्रब्धो मवास्मिन्नासने सुखम् ॥४८८॥

अर्थ: इन्द्र, यमका जामाता था सो यमकी बात सुन मन्द हास्य करते हुए उसने कहा कि हे मातुल ! दशानन कहाँ जायेगा ? तुम भयको छोड़ो और निश्चिन्त होकर इस आसनपर सुखसे बैठो ॥४८८॥


जामातुरथ वाक्येन परित्यज्य रिपोर्भयम् । पुरं सुरवरोद्गीतमध्युवास यमः सुखी ॥४८९॥

अर्थ: इस प्रकार जामाताके वचनसे शत्रुका भय छोड़कर यम इन्द्रके द्वारा बतलाये हुए नगरमें सुखसे रहने लगा ॥४८९॥


विधायान्तकसंमानं सुरेशोऽन्तःपुरं ययौ । कामभोगसमुद्रेऽसौ तत्र मग्नो महामदः ॥४९०॥

अर्थ: बहुत भारी गर्वको धारण करनेवाला इन्द्र यमका सन्मानकर अन्तःपुरमें चला गया और वहाँ जाकर कामभोगरूपी समुद्रमें निमग्न हो गया ॥४९०॥


दशास्यचरितं तस्मै यच्चैतपतिनोदितम् । वनवासो धनपतेर्भङ्गिनो यश्च संयुगे ॥४९१॥

सर्वमैश्वर्यमत्तस्य विस्मृतं तस्य तत्क्षणात् । अभ्यग्रपठितं शास्त्रं यथाभ्यसनवर्जितम् ॥४९२॥

अर्थ: यमने दशाननका जो चरित्र इन्द्रके लिए कहा था तथा युद्धमें दशाननसे पराजित होकर वैश्रवणको जो वनवास करना पड़ा था, ऐश्वर्यके मदमें मस्त रहनेवाले इन्द्रके लिए वह सब क्षण-भरमें उस प्रकार विस्मृत हो गया जिस प्रकार कि पहले पढ़ा शास्त्र अभ्यास न करनेपर विस्मृत हो जाता है ॥४९१-४९२॥


कृतोपलम्भं स्वप्नेऽपि ज्ञायते वस्तुलेशतः । निरन्वयं तु तस्येदं विस्मृतं पूर्वचोदितम् ॥४९३॥

अर्थ: स्वप्नमें उपलब्ध वस्तुका कुछ तो भी स्मरण रहता है परन्तु इन्द्रके लिए पूर्व कथित बातका निर्मूल विस्मरण हो गया ॥४९३॥


प्राप्य वा सुरसंगीतपुरस्य पतितां यमः । विसस्मार परिप्राप्तां परिभूतिं दशाननात् ॥४९४॥

अर्थ: इधर इन्द्रका यह हाल हुआ उधर यम सुरसंगीत नामा नगरका स्वामित्व पाकर दशाननसे प्राप्त हुए तिरस्कारको बिलकुल भूल गया ॥४९४॥


मेने च मम सर्वश्रीर्दुहिता रूपशालिनी । सा च गीर्वाणनाथस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥४९५॥

अर्थ: वह मानता था कि मेरी पुत्री सर्वश्री अत्यन्त रूपवती है और इन्द्रको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय है ॥४९५॥


अत्यन्तमन्तरङ्गोऽयं संबन्धो महता सह । अतो जन्म कृतार्थं मे प्राप्य शक्रप्रतीक्ष्यताम् ॥४९६॥

अर्थ: इस प्रकार एक बड़े पुरुषके साथ मेरा अन्तरंग सम्बन्ध है इसलिए इन्द्रका सम्मान पाकर मेरा जन्म कृत-कृत्य अर्थात् सफल हुआ है ॥४९६॥


ततो महोदयोत्साहः श्रीमानुद्वासितान्तकः । नगरं सूर्यरजसे ददौ किष्किन्धसंज्ञकम् ॥४९७॥

अर्थ: तदनन्तर महान् अभ्युदय और उत्साहको धारण करनेवाले दशाननने यमको हटाकर किष्किन्ध नामा नगर सूर्यरजके लिए दिया ॥४९७॥


तथार्क्षरजसे किष्कुपुरं परमसंपदम् । प्राप्य गोत्रक्रमायाते नगरे तौ सुखं स्थितौ ॥४९८॥

अर्थ: और ऋक्षरजके लिए परम सम्पत्तिको धारण करनेवाला किष्कुपुर नगर दिया । इस प्रकार सूर्यरज और ऋक्षरज दोनों ही अपनी कुलपरम्परासे आगत नगरोंको पाकर सुखसे रहने लगे ॥४९८॥


ते शक्रनगराभिख्ये पुरे काञ्चनसद्मनी । उचितस्वामिसंयुक्ते जग्मतुः परमां श्रियम् ॥४९९॥

अर्थ: जिनकी शोभा इन्द्रके नगरके समान थी, और जिनमें सुवर्णमय भवन बने हुए थे ऐसे वे दोनों नगर योग्य स्वामीसे युक्त होकर परम लक्ष्मीको प्राप्त हुए ॥४९९॥


सौमालिरपि बिभ्राणः श्रियं कीर्तिं च भूयसीम् । प्रत्यवस्थितसामन्तैः प्रणमद्भिः समुत्तमः ॥५००॥

पूर्यमाणः सदा सेव्यैर्विभवैः प्रतिवासरम् । बन्धुः कुमुदखण्डानां सितपक्षे करैरिव ॥५०१॥

रत्नदामाकुलं तुङ्गं शृङ्गपङ्क्तिविराजितम् । आरुह्य पुष्पकं चारु विमानं कामगत्वरम् ॥५०२॥

युक्तः परमधैर्येण प्राप्तपुण्यफलोदयः । त्रिकूटशिखरं भूत्या परया प्रस्थितः कृती ॥५०३॥

अर्थ: बहुत भारी लक्ष्मी और कीर्तिको धारण करनेवाले दशाननने कृतकृत्य होकर बड़े वैभवके साथ त्रिकूटाचलके शिखरकी ओर प्रस्थान किया । उस समय शत्रु राजा प्रणाम करते हुए उससे मिल रहे थे । वह स्वयं उत्तम था और जिस प्रकार शुक्ल पक्षमें चन्द्रमा किरणोंसे प्रतिदिन पूर्ण होता रहता हे उसी प्रकार वह भी प्रतिदिन सेवनीय वैभवसे पूर्ण होता रहता था । रत्नमयी मालाओंसे युक्त, ऊँचे शिखरोंकी पंक्तिसे सुशोभित, सुन्दर और इच्छानुसार गमन करनेवाले पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर वह जा रहा था । वह परम धैर्यसे युक्त था तथा पुण्यके फलस्वरूप अनेक अभ्युदय उसे प्राप्त थे ॥५००-५०३॥


ततो रक्षोगणास्तस्य प्रमोदं परमं श्रिताः । चित्रालंकारसंपन्ना वरीयोवस्त्रधारिणः ॥५०४॥

जय नन्द चिरं जीव वर्धस्वोदेहि संततम् । इति मङ्गलवाक्यानि प्रयुञ्जाना महारवाः ॥५०५॥

अर्थ: तदनन्तर परम हर्षको प्राप्त, नाना अलंकारोंसे युक्त एवं उत्तमोत्तम वस्त्र धारण करनेवाले राक्षसोंके झुण्डके झुण्ड जोर-जोरसे निम्नांकित मंगल वाक्योंका उच्चारण कर रहे थे कि हे देव ! तुम्हारी जय हो, तुम समृद्धिको प्राप्त होओ, चिरकाल तक जीते रहो, बढ़ते रहो और निरन्तर अभ्युदयको प्राप्त होते रहो ॥५०४-५०५॥


सिंहशार्दूलमातङ्गवाजिहंसादिसंश्रिताः । नानाविभ्रमसंयुक्ताः प्रमोदविकचेक्षणाः ॥५०६॥

बिभ्राणास्त्रिदशाकारं तेजोव्याप्तविहायसः । आलोकितसमस्ताशाः काननाद्रिसमुद्रगाः ॥५०७॥

अर्थ: वे राक्षस, सिंह, शार्दूल, हाथी, घोड़े तथा हंस आदि वाहनोंपर आरूढ़ थे । नाना प्रकारके विभ्रमोंसे युक्त थे । हर्षसे उनके नेत्र फूल रहे थे । वे देवों-जैसी आकृतियोंको धारण कर रहे थे । अपने तेजसे उन्होंने दिशाओंको व्याप्त कर रखा था । उनकी प्रभासे समस्त दिशाएँ जगमगा रही थीं और वे वन, पर्वत तथा समुद्र आदि सर्व स्थानोंमें चल रहे थे ॥५०६-५०७॥


अदृष्टपारगम्भीरं महाग्राहसमाकुलम् । तमालवनसंकाशं गिरितुङ्गोर्मिसंहतिम् ॥५०८॥

रसातलमिवानेकनागनायकभीषणम् । नानारत्नकरव्रातरञ्जितोद्देशराजितम् ॥५०९॥

पश्यन्तो विस्मयापूर्णाः समुद्रं विविधाद्भुतम् । अनुजग्मुरहो हीति मुहुर्मुखरिताननाः ॥५१०॥

अर्थ: जिसका किनारा नहीं दीख रहा था, जो अत्यन्त गहरा था, बड़े-बड़े ग्राह - मगर-मच्छोंसे व्याप्त था, तमाल वनके समान श्याम था, पर्वतों-जैसी ऊँची-ऊँची तरंगोंके समूह उठ रहे थे, जो रसातलके समान अनेक बड़े-बड़े नागों - सर्पोंसे भयंकर था, और नाना-प्रकारके रत्नोंकी किरणोंके समूहसे अनुरक्त स्थलोंसे सुशोभित था ऐसे अनेक आश्चर्योंसे युक्त समुद्रको देखते हुए वे राक्षस आश्चर्यसे भर रहे थे । अहो, ही, आदि आश्चर्यव्यंजक शब्दोंसे उनके मुख बार-बार मुखरित हो रहे थे । इस प्रकार अनेक राक्षस दशाननके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥५०८-५१०॥


अथ भास्वन्महाशालां गम्भीरपरिखावृत्तान् । कुन्दशुभ्रैर्महानीलनीलैर्जालककुक्षिषु ॥५११॥

पद्मरागारुणैरुद्धैः क्वचित्पुष्पमणिप्रभैः । गरुत्ममणिसंकाशैरन्यत्र निचितां गृहैः ॥५१२॥

शोभमानां निसर्गेण पुनश्च कृतभूषणाम् । रक्षोनाथागमे भक्तैः पौरैरद्भुतसंमदैः ॥५१३॥

अत्यन्तमधिकां कुर्वन् शोभां गिरिनिभैर्गजैः । महाप्रासादसंकाशैः स्यन्दनै रत्नरञ्जितैः ॥५१४॥

अश्ववृन्दैः क्वणद्धेमचक्रकैश्चलचामरैः । विमानैः शिखरारूढदूराकाशैर्बहुप्रभैः ॥५१५॥

छत्रैः शशाङ्कसंकाशैर्ध्वजैरुद्धूतकोटिभिः । वन्दिवृन्दारकौघेण कृतमङ्गलनिस्वनः ॥५१६॥

वीणावेणुविमिश्रेण शङ्खनादानुगामिना । तूर्यनादेन निःशेषं दिङ्नभोविदितात्मना ॥५१७॥

प्रविवेश निजामीशो लङ्कां शङ्काविवर्जितः । त्रिदशेश इवोदारो दशास्यः शासिता हितः ॥५१८॥

अर्थ: अथानन्तर जिसमें बड़ी-बड़ी शालाएँ देदीप्यमान हो रही थीं, जो गम्भीर परिखासे आवृत थी, जो झरोखोंमें लगे हुए मणियोंसे कहीं तो कुन्दके समान सफेद, कहीं महानील मणियोंके समान नील, कहीं पद्मरागमणिके समान लाल, कहीं पुष्परागमणियोंके समान प्रभास्वर और कहीं गरुड़मणियोंके समान गहरे नील वर्णवाले महलोंसे व्याप्त थी । जो स्वभावसे ही सुशोभित थी फिर राक्षसोंके अधिपति दशाननके शुभागमनके अवसरपर आश्चर्यंकारी हर्षसे भरे भक्त नागरिकजनोंके द्वारा और भी अधिक सुशोभित की गयी थी ऐसी अपनी लंका नगरीमें हितकारी उदार शासक दशाननने निःशंक हो इन्द्रके समान प्रवेश किया । प्रवेश करते समय दशानन, पर्वतोंके समान ऊँचे-ऊँचे हाथियों, बड़े-बड़े महलोंके समान रत्नोंसे रंजित रथों, जिनकी लगामके स्वर्णमयी छल्ले शब्द कर रहे थे एवं जिनके आजूबाजू चमर ढोले जा रहे थे ऐसे घोड़ों, जिनके शिखर दूर तक आकाशमें चले गये थे ऐसे रंगबिरंगे विमानों, चन्द्रमाके समान उज्ज्वल छत्रों, और जिनका अंचल आकाशमें दूर-दूर तक फहरा रहा था ऐसी ध्वजाओंसे लंकाकी शोभाको अत्यन्त अधिक बढ़ा रहा था । उत्तमोत्तम चारणोंके झुण्ड मंगल शब्दोंका उच्चारण कर रहे थे । वीणा, बाँसुरी और शंखोंके शब्दसे मिश्रित तुरहीकी विशालध्वनिसे समस्त दिशा और आकाश व्याप्त हो रहे थे ॥५११-५१८॥


ततो गोत्रक्रमायातनाथदर्शनलालसाः । गृहीत्वार्घं फलैः पुष्पैः पत्रै रत्नैश्च कल्पितम् ॥५१९॥

गृहीतभूषणात्यन्तचारुवस्त्रादिसंपदः । नृत्यद्भिर्गणिकासङ्घैरन्विता नेत्रहारिभिः ॥५२०॥

सर्वे पौराः समागत्य प्रयुक्ताशीर्गिरो मुहुः । आनर्चुः सनमस्कारा यथावृद्धपुरस्सराः ॥५२१॥

अर्थ: तदनन्तर कुलक्रमसे आगत स्वामीके दर्शन करनेकी जिनकी लालसा बढ़ रही थी, जिन्होंने आभूषण तथा अत्यन्त सुन्दर वस्त्रादि सम्पदाएँ धारण कर रखी थीं और जो नृत्य करती हुई नयनाभिराम गणिकाओंके समूहसे युक्त थे, ऐसे समस्त पुरवासी जन, फलों-फूलों, पत्तों और रत्नोंसे निर्मित अर्घ लेकर बार-बार आशीर्वादका उच्चारण करते हुए दशाननके समक्ष आये । उन पुरवासियोंने वृद्धजनोंको अपने आगे कर रखा था । उन्होंने आते ही दशाननको नमस्कार कर उसकी पूजा की ॥५१९-५२१॥


विसर्जिताश्च ते तेन संप्राप्तप्रतिमाननाः । यथास्वं निलयं जग्मुस्तद्गुणोक्तिगताननाः ॥५२२॥

अर्थ: दशाननने सबका सम्मान कर उन्हें विदा किया और सब अपने मुखोंसे उसीका गुणगान करते हुए अपने-अपने घर गये ॥५२२॥


अथ तद्भवनं तस्य कौतुकव्याप्तबुद्धिभिः । नारीभिः कृतभूषाभिः पूरितं तद्दिदृक्षुभिः ॥५२३॥

अर्थ: अथानन्तर जिनकी बुद्धि कौतुकसे व्याप्त हो रही थी और जिन्होंने तरह-तरहके आभूषण धारण कर रखे थे ऐसी उसकी दर्शनाभिलाषी स्त्रियोंसे दशाननका घर भर गया ॥५२३॥


गवाक्षाभिमुखाः काश्चित्त्वराविस्रस्तवाससः । अन्योऽन्यवाधविच्छिन्नमुक्ताहारविभूषणाः ॥५२४॥

अर्थ: उन स्त्रियोंमें कितनी ही स्त्रियाँ झरोखोंके सम्मुख आ रही थीं । शीघ्रताके कारण उनके वस्त्र खुल रहे थे और परस्परकी धक्काधूमीसे उनके मोतियोंके हार तथा अन्य आभूषण टूट-टूटकर गिर रहे थे ॥५२४॥


पीनस्तनकृतान्योन्यपीडनाच्चलकुण्डलाः । रणत्कारि तुलाकोटिवाचालचरणद्वयाः ॥५२५॥

अर्थ: कितनी ही स्त्रियाँ अपने स्थूल स्तनोंसे एक दूसरेको पीड़ा पहुँचा रही थीं और उससे उनके कुण्डल हिल रहे थे। कितनी ही स्त्रियोंके दोनों पैर रुनझुन करते हुए नूपुरोंसे झंकृत हो रहे थे ॥५२५॥


किं न पश्यसि हा मातः पार्श्वतो भव दुर्भगे । देहि मार्गं व्रजामुष्मादपि नारि न शोभसे ॥५२६॥

अर्थ: कोई स्त्री सामने खड़ी दूसरी स्त्रीसे कह रही थी कि हे माता ! क्या देख नहीं रही हो ? अरी दुर्भगे ! जरा बगलमें हो जा, मुझे भी रास्ता दे दे । कोई कह रही थी कि अरी भली आदमिन ! तू यहाँसे चली जा, तू यहाँ शोभा नहीं देती ॥५२६॥


निगदन्त्येवमादीनि विकचाम्बुरुहाननाः । मुक्त्वा व्यापारजातानि तमैक्षन्त पुराङ्गनाः ॥५२७॥

अर्थ: इत्यादि शब्द वे स्त्रियाँ कर रहीं थीं। उस समय उनके मुखकमल हर्षसे खिल रहे थे। वे अन्य सब काम छोड़कर एक दशाननको ही देख रही थीं ॥५२७॥


पुरचूडामणौ गेहे स्वस्मिन् सत्कृतभूषणे । सुखं सान्तः पुरस्तस्थौ कृतान्तस्य विमर्दकः ॥५२८॥

अर्थ: इस प्रकार यमका मानमर्दन करनेवाला दशानन, लंका नगरीमें स्थित नूड़ामणिके समान मनोहर अपने सुसज्जित महलमें अन्तःपुर सहित सुखसे रहने लगा ॥५२८॥


शेषा अपि यथास्थानं स्थिता विद्याधराधिपाः । प्राप्नुवन्तो महानन्दं सततं त्रिदशा इव ॥५२९॥

अर्थ: इसके सिवाय अन्य विद्याधर राजा भी देवोंके समान निरन्तर महाआनन्दको प्राप्त हुए यथायोग्य स्थानमें रहने लगे ॥५२९॥


विविधरत्नसमागमसंपदः प्रबलशत्रुसमूलविमर्दनम् । सकलविष्टपगामि यशः सितं भवति निर्मितनिर्मलकर्मणाम् ॥५३०॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जो निर्मल कार्य करते हैं उन्हें नाना प्रकारके रत्नादि सम्पदाओंकी प्राप्ति होती है, उनके प्रबल शत्रुओंका समूह नष्ट होता है और समस्त संसारमें फैलनेवाला उज्ज्वल यश उन्हें प्राप्त होता है ॥५३०॥


रिपव उग्रतरा विषयाह्वया अपनयन्ति भुवस्त्रितये स्मृतिम् । बहिरवस्थितशत्रुगणः पुनः सततमानमते पदनन्तरम् ॥५३१॥

अर्थ: पंचेन्द्रियोंके विषय सबसे प्रबल शत्रु हैं सो जो निर्मल कार्य करते हैं उनके ये प्रबल शत्रु भी तीनों लोकोंमें अपनी स्मृति नष्ट कर देते हैं अर्थात् इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं कि उनका स्मरण भी नहीं रहता । इसी प्रकार बाह्यमें स्थित होनेवाला जो शत्रुओंका समूह है वह भी निर्मल कार्य करनेवाले मनुष्योंके चरणोंके समीप निरन्तर नमस्कार करता रहता है । भावार्थ - निर्मल कार्य करनेवाले मनुष्योंके अन्तरंग और बहिरंग दोनों ही शत्रु नष्ट हो जाते हैं ॥५३१॥


इति विचिन्त्य न युक्तमुपासितुं विषयशत्रुगणं पुरुचेतसः । अवटमेति जनस्तमसा ततं न तु रवेः किरणैरवभासितम् ॥५३२॥

अर्थ: ऐसा विचारकर हे श्रेष्ठ चित्तके धारक पुरुषो ! विषयरूपी शत्रुसमूहकी उपासना करना उचित नहीं है। क्योंकि उनकी उपासना करनेवाला मनुष्य अन्धकारसे युक्त नरकरूपी गर्तमें पड़ता है न कि सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशमान उत्तम स्थानको प्राप्त होता है ॥५३२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशग्रीवाभिधानं नामाष्टमं पर्व ॥८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यनिर्मित पद्मचरित ग्रन्थमें दशाननका कथन करनेवाला अष्टम पर्व समाप्त हुआ ॥८॥

९. नवमं पर्व (बालिनिर्वाणाभिधानं)

अथ सूर्यरजाः पुत्रं बालिसंज्ञमजीजनत् । इन्दुमालिन्यभिख्यायां गुणसंपूर्णयोषिति ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर सूर्यरजने अपनी चन्द्रमालिनी नामक गुणवती रानीमें बाली नामका पुत्र उत्पन्न किया ॥१॥


परोपकारिणं नित्यं तथा शीलयुतं बुधम् । दक्षं धीरं श्रिया युक्तं शूरं ज्ञानसमन्वितम् ॥२॥

कलाकलापसंयुक्तं सम्यग्दृष्टिं महाबलम् । राजनीतिविदं वीरं कृपार्द्रीकृतचेतसम् ॥ विद्यासमूहसंपन्नं कान्तिमन्तं सुतेजसम् ॥३॥

अर्थ: वह पुत्र परोपकारी था, निरन्तर शीलव्रतसे युक्त रहता था, विद्वान् था, कुशल था, धीर था, लक्ष्मीसे युक्त था, शूर-वीर था, ज्ञानवान् था, कलाओंके समूहसे युक्त था, सम्यग्दृष्टि था, महाबलवान् था, राजनीतिका जानकार था, वीर था, दयालु था, विद्याओंके समूहसे युक्त था, कान्तिमान् था और उत्तम तेजसे युक्त था ॥२-३॥


विरलस्तादृशां लोके पुरुषाणां समुद्भवः । चन्दनानामिवोदारः प्रभावः प्रथितात्मनाम् ॥४॥

अर्थ: जिस प्रकार लोकमें उत्कृष्ट चन्दनकी उत्पत्ति विरल अर्थात् कहीं-कहीं ही होती है उसी प्रकार बाली-जैसे उत्कृष्ट पुरुषोंका जन्म भी विरल अर्थात् कहीं-कहीं होता है ॥४॥


समस्तजिनबिम्बानां नमस्कारार्थमुद्यतः । त्रिकालतीर्णसंदेहो भक्त्या युक्तोऽत्युदारया ॥५॥

अर्थ: जिसका समस्त सन्देह दूर हो गया था ऐसा बाली उत्कृष्ट भक्तिसे युक्त होकर तीनों ही काल समस्त जिन-प्रतिमाओंकी वन्दना करनेके लिए उद्यत रहता था ॥५॥


चतुःसमुद्रपर्यन्तं जम्बूद्वीपं क्षणेन यः । त्रिःपरिक्षिप्य किष्किन्धं नगरं पुनरागमत् ॥६॥

अर्थ: जिसकी चारों दिशामें समुद्र घिरा हुआ है ऐसे जम्बूद्वीपकी वह क्षण भरमें तीन प्रदक्षिणाएँ देकर अपने किष्किन्ध नगरमें वापस आ जाता था ॥६॥


ईदृक्पराक्रमाधारः शत्रुपक्षस्य मर्दकः । पौरनेत्रकुमुद्वत्याः शशाङ्कः शङ्कयोज्झितः ॥७॥

अर्थ: इस प्रकारके अद्भुत पराक्रमका आधारभूत बाली शत्रुओंके पक्षका मर्दन करनेवाला था, पुरवासी लोगोंके नेत्ररूपी कुमुदिनियोंको विकसित करनेके लिए चन्द्रमाके समान था और निरन्तर शंकासे दूर रहता था ॥७॥


किष्किन्धनगरे रम्ये चित्रप्रासादतोरणे । विद्वज्जनसमाकीर्णे द्विपवाजिवराकुले ॥८॥

नानासंव्यवहाराभिरापणालीभिराकुले । रेमे कल्पे तथैशाने रत्नमालः सुरोत्तमः ॥९॥

अर्थ: जहाँ रंग-बिरंगे महलोंके तोरणद्वार थे, जो विद्वज्जनोंसे व्याप्त था, एकसे एक बढ़कर हाथियों और घोड़ोंसे युक्त था, और अनेक प्रकारके व्यापारोंसे युक्त बाजारोंसे सहित था ऐसे मनोहर किष्किन्ध नगरमें वह बाली इस प्रकार क्रीड़ा करता था जिस प्रकार कि ऐशान स्वर्गमें रत्नोंकी माला धारण करनेवाला इन्द्र क्रीड़ा किया करता है ॥८-९॥


अनुक्रमाच्च तस्याभूत् सुग्रीवामिख्ययानुजः । वीरो धीरो मनोज्ञेन युक्तो रूपेण संनयः ॥१०॥

अर्थ: अनुक्रमसे बालीके सुग्रीव नामका छोटा भाई उत्पन्न हुआ । सुग्रीव भी अत्यन्त धीर वीर, नीतिज्ञ एवं मनोहर रूपसे युक्त था ॥१०॥


विज्ञेयौ बालिसुग्रीवौ किष्किन्धकुलभूषणौ । तयोस्तु भूषणीभूता विनयप्रमुखा गुणाः ॥११॥

अर्थ: बाली और सुग्रीव - दोनों ही भाई किष्किन्ध नगरके कुलभूषण थे और विनय आदि गुण उन दोनोंके आभूषण थे ॥११॥


सुग्रीवानन्तरा कन्या रूपेणाप्रतिमा भुवि । श्रीप्रभेति समुद्भूता क्रमशः श्रीरिव स्वयम् ॥१२॥

अर्थ: सुग्रीवके बाद श्रीप्रभा नामकी कन्या उत्पन्न हुई जो पृथ्वीमें रूपसे अनुपम थी तथा साक्षात् श्री अर्थात् लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ॥१२॥


किष्कुप्रमोदनगरे हरिकान्ताख्ययोषिति । क्रमादृक्षरजाः पुत्रौ नलनीलावजीजनत् ॥१३॥

अर्थ: सूर्यरजका छोटा भाई ऋक्षरज किष्कुप्रमोद नामक नगरमें रहता था। सो उसने वहाँ हरिकान्ता नामक रानीमें क्रमसे नल और नील नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥१३॥


वितीर्णस्वजनानन्दौ रिपुशङ्कावितारिणौ । उदात्तगुणसंभारौ भूतौ तौ किष्कुमण्डनौ ॥१४॥

अर्थ: ये दोनों ही पुत्र आत्मीय जनोंको आनन्द प्रदान करते थे, शत्रुओंको भय उत्पन्न करते थे, उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त थे और किष्कुप्रमोद नगरके मानो आभूषण ही थे ॥१४॥


यौवनश्रियमालोक्य सुतस्य स्थितिपालिनीम् । विषमिश्रान्नसदृशान्विदित्वा विषयान् बुधः ॥१५॥

वितीर्य बालये राज्यं धर्मपालनकारणम् । सुग्रीवाय च सच्चेष्टो युवराजपदं कृती ॥१६॥

अर्थ: विद्वान्, कुशल एवं समीचीन चेष्टाओंको धारण करनेवाले सूर्यरजने जब देखा कि पुत्रकी यौवन लक्ष्मी कुल-मर्यादाका पालन करनेमें समर्थ हो गयी है, तब उसने पंचेन्द्रियोंके विषयोंको विषमिश्रित अन्नके समान त्याज्य, समझकर धर्म रक्षाका कारणभूत राज्य बालीके लिए दे दिया और सुग्रीवको युवराज बना दिया ॥१५-१६॥


अवगम्य परं स्वं च जनं साम्येन सज्जनः । चतुर्गति जगज्ज्ञात्वा महादुःखनिपीडितम् ॥१७॥

मुनेः पिहितमोहस्य शिष्यः सूर्यरजा अभूत् । यथोक्तचरणाधारः शरीरेऽपि गतस्पृहः ॥१८॥

नभोवदमलस्वान्तः सङ्गमुक्तः समीरवत् । विजहार स निष्क्रोधो धरण्यां मुक्तिलालसः ॥१९॥

अर्थ: सत्पुरुष सूर्यरज स्वजन और परिजनको समान जान तथा चतुर्गति रूप संसारको महादुःखोंसे पीड़ित अनुभव कर पिहितमोह नामक मुनिराजका शिष्य हो गया। जिनेन्द्र भगवान्ने मुनियोंका जैसा चारित्र बतलाया है सूर्यरज वैसे ही चारित्रका आधार था। वह शरीरमें भी निःस्पृह था। उसका हृदय आकाशके समान निर्मल था, वह वायुके समान निःसंग था, क्रोधरहित था और केवल मुक्तिकी ही लालसा रखता हुआ पृथिवीमें विहार करता था ॥१७-१९॥


अथ बालेर्ध्रुवा नाम्ना साध्वी पाणिगृहीत्यभूत् । अङ्गनानां शतस्याप प्राधान्यं या गुणोदयात् ॥२०॥

अर्थ: अथानन्तर बालीकी ध्रुवा नामकी शीलवती स्त्री थी। वह ध्रुवा अपने गुणोंके अभ्युदयसे उसकी अन्य सौ स्त्रियोंमें प्रधानताको प्राप्त थी ॥२०॥


तया सह महैश्वर्यं सोऽन्वभूच्चारुविभ्रमः । श्रीवानराङ्कमुकुटः पूजिताज्ञः खगाधिपैः ॥२१॥

अर्थ: जिसके मुकुटमें वानरका चिह्न था, तथा विद्याधर राजा जिसकी आज्ञा बड़े सम्मानके साथ मानते थे ऐसा सुन्दर विभ्रमको धारण करने वाला बाली उस ध्रुवा रानीके साथ महान् ऐश्वर्यका अनुभव करता था ॥२१॥


अत्रान्तरे छलान्वेषी मेघप्रभशरीरजः । हर्तुमिच्छति तां कन्यां लङ्केशस्य सहोदराम् ॥२२॥

अर्थ: इसी बीचमें मेघप्रभका पुत्र खरदूषण जो निरन्तर छलका अन्वेषण करता था दशाननकी बहन चन्द्रनखाका अपहरण करना चाहता था ॥२२॥


यदैव तेन सा दृष्टा सर्वगात्रमनोहरा । तदा प्रभृत्ययं देहमधत्तानङ्गपीडितम् ॥२३॥

अर्थ: जिसका सर्व शरीर सुन्दर था ऐसी चन्द्रनखाको जिस समयसे खरदूषणने देखा था उसी समयसे उसका शरीर कामसे पीड़ित हो गया था ॥२३॥


आवल्यां प्रवराज्जातां कन्यां नाम्ना तनूदरीम् । गतः स्तेनयितुं यावद्यमस्य परिमर्दकः ॥२४॥

अर्थ: एक दिन यमका मान मर्दन करनेवाला दशानन राजा प्रवरकी आवली रानीसे समुत्पन्न तनूदरी नामा कन्याका अपहरण करनेके लिए गया था ॥२४॥


ज्ञात्वाथ निष्प्रभिस्तावल्लङ्कां वीतदशाननाम् । सुखं चन्द्रनखां जह्रे विद्यामायाप्रवीणधीः ॥२५॥

अर्थ: सो विद्या और माया दोनोंमें ही कुशल खरदूषणने लंकाको दशाननसे रहित जानकर चन्द्रनखाका सुखपूर्वक - अनायास ही अपहरण कर लिया ॥२५॥


शूरौ किं कुरुतामत्र भानुकर्णविभीषणौ । यत्रारिश्छिद्रमासाद्य कन्यां हरति मायया ॥२६॥

अर्थ: यद्यपि शूरवीर भानुकर्ण और विभीषण दोनों ही लंकामें विद्यमान थे पर जब शत्रु मायासे छिद्र पाकर कन्याका अपहरण कर रहा था तब वे क्या करते ? ॥२६॥


पृष्ठतश्च ततः सैन्यं गच्छत्ताभ्यां निवर्तितम् । जीवन्नेष रणे शक्तो गृहीतुं नेति चेतसा ॥२७॥

अर्थ: उसके पीछे जो सेना जा रही थी भानुकर्ण और विभीषणने उसे यह सोचकर लौटा लिया कि यह जिन्दा युद्धमें पकड़ा नहीं जा सकता ॥२७॥


शुश्राव चागतो वार्तां तादृशीं कैकसीसुतः । जगाम च दुरीक्ष्यत्वं कोपावेशात् सुभीषणात् ॥२८॥

अर्थ: लंकामें वापस आनेपर दशाननने जब यह बात सुनी तो भयंकर क्रोधसे वह दुरीक्ष्य हो गया अर्थात् उसकी ओर देखना कठिन हो गया ॥२८॥


तत आगमनोद्भूतश्रमप्रस्वेदबिन्दुषु । स्थितेष्वेव पुनर्गन्तुमुद्यतो मानचोदितः ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर बाहरसे आनेके कारण उत्पन्न परिश्रमसे उसके शरीरपर पसीनेकी जो बूँदें उत्पन्न हुई थीं वे सूख नहीं पायी थीं, कि अभिमानसे प्रेरित हो वह पुनः जानेके लिए उद्यत हो गया ॥२९॥


सहायं खड्गमेकं च जग्राहान्यपराङ्मुखः । अन्तरङ्गः स एवैकः संग्रामे वीर्यशालिनाम् ॥३०॥

अर्थ: उसने अन्य किसीकी अपेक्षा न कर सहायताके लिए सिर्फ एक तलवार अपने साथ ली, सो ठीक ही है क्योंकि युद्धमें शक्तिशाली मनुष्योंका अन्तरंग सहायक वही एक तलवार होती है ॥३०॥


तावन्मन्दोदरी बद्ध्वा करद्वयसरोरुहम् । व्यज्ञापयदिति व्यक्तज्ञातलौकिकसंस्थितिः ॥३१॥

अर्थ: ज्योंही दशानन जानेके लिए उद्यत हुआ त्योंही स्पष्ट रूपसे लोककी स्थितिको जाननेवाली मन्दोदरी दोनों हस्तकमल जोड़कर इस प्रकार निवेदन करने लगी ॥३१॥


कन्या नाम प्रभो देया परस्मायेव निश्चयात् । उत्पत्तिरेव तासां हि तादृशी सार्वलौकिकी ॥३२॥

अर्थ: कि हे नाथ ! निश्चयसे कन्या दूसरेके लिए ही दी जाती है क्योंकि समस्त संसारमें उनकी उत्पत्ति ही इस प्रकारकी होती है ॥३२॥


खेचराणां सहस्राणि सन्ति तस्य चतुर्दश । ये वीर्यकृतसंनाहाः समरादनिवर्तिनः ॥३३॥

अर्थ: खरदूषणके पास चौदह हजार विद्याधर हैं जो अत्यधिक शक्तिशाली तथा युद्धसे कभी पीछे नहीं हटनेवाले हैं ॥३३॥


बहून्यस्य सहस्राणि विद्यानां दर्पशालिनः । सिद्धानीति न किं लोकाद्भवता श्रवणे कृतम् ॥३४॥

अर्थ: इसके सिवाय उस अहंकारीको कई हजार विद्याएँ सिद्ध हुई हैं यह क्या आपने लोगोंसे नहीं सुना ? ॥३४॥


प्रवृत्ते दारुणे युद्धे भवतोः समशौर्ययोः । संदेह एव जायेत जयस्यान्यतरं प्रति ॥३५॥

अर्थ: आप दोनों ही समान शक्तिके धारक हो अतः दोनोंके बीच भयंकर युद्ध होनेपर एक दूसरेके प्रति विजयका सन्देह ही रहेगा ॥३५॥


कथंचिच्च हतेऽप्यस्मिन् कन्याहरणदूषिता । अन्यस्मै नैव विश्राण्या केवलं विधवीभवेत् ॥३६॥

अर्थ: यदि किसी तरह वह मारा भी गया तो हरणके दोषसे दूषित कन्या दूसरेके लिए नहीं दी जा सकेगी, उसे तो मात्र विधवा ही रहना पड़ेगा ॥३६॥


किं च सूर्यरजोमुक्ते त्वत्पुरे प्रत्यवस्थितम् । अलंकारोदये नाम्ना चन्द्रोदरनभश्चरम् ॥३७॥

निर्वास्यासौ स्थितः सार्धं तव स्वस्रा महाबलः । उपकारित्वमेतस्मात्संप्राप्तः स्वजनः स ते ॥३८॥

अर्थ: इसके सिवाय दूसरी बात यह है कि तुम्हारे अलंकारोदय नगरको जब राजा सूर्यरजने छोड़ा था तब चन्द्रोदर नामा विद्याधर तुम्हारी इच्छाके प्रतिकूल उस नगरमें जम गया था सो उसे निकालकर महाबलवान् खरदूषण तुम्हारी बहनके साथ उसमें रह रहा है इस प्रकार तुम्हारे स्वजन उससे उपकारको भी प्राप्त हुए हैं ॥३७-३८॥


ततो दशाननोऽवादीत् प्रिये युद्धाद् बिभेमि न । स्थितस्त्वद्वचने किन्तु शेषैरेवास्मि कारणैः ॥३९॥

अर्थ: यह कहकर जब मन्दोदरी चुप हो रही तब दशाननने कहा कि हे प्रिये ! यद्यपि मैं युद्धसे नहीं डरता हूँ तो भी अन्य कारणों को देखता हुआ मैं तुम्हारे वचनोंमें स्थित हूँ अर्थात् तुम्हारे कहे अनुसार उसका पीछा नहीं करता हूँ ॥३९॥


अथ चन्द्रोदरे कालं प्राप्ते कर्मनियोगतः । वनितास्यानुराधाख्या वराकी शरणोज्झिता ॥४०॥

इतश्चेतश्च विद्याया बलेनाथ विवर्जिता । अन्तर्वत्नी वने भीमे बभ्राम हरिणी यथा ॥४१॥

अर्थ: अथानन्तर कर्मोंके नियोगसे चन्द्रोदर विद्याधर कालको प्राप्त हुआ सो उसकी दीन-हीन अनुराधा नामकी गर्भवती स्त्री शरणरहित हो तथा विद्याके बलसे शून्य हो हरिणीकी नांई भयंकर वनमें इधर-उधर भटकने लगी ॥४०-४१॥


असूत च सुतं कान्तं मणिकान्तमहीधरे । मृदुपल्लवपुष्पौघच्छन्ने समशिलातले ॥४२॥

अर्थ: वह भटकती-भटकती मणिकान्त नामक पर्वतपर पहुँची। वहाँ उसने कोमल पल्लव और फूलोंके समूहसे आच्छादित समशिलातलपर एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया ॥४२॥


ततोऽसौ क्रमतो वृद्धिं नीतो विपिनवासया । उद्विग्नचित्तया मात्रा तदाशास्थितजीवया ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त निरन्तर उद्विग्न रहता था, और पुत्रकी आशासे ही जिसका जीवन स्थित था ऐसी उस वनवासिनी माताने क्रम-क्रमसे उस पुत्रको बड़ा किया ॥४३॥


यतोऽयं प्रतिपक्षेण गर्भ एव विराधितः । ततो विराधिताभिख्यां प्रापितो भोगवर्जितः ॥४४॥

अर्थ: चूँकि शत्रुने उस पुत्रको गर्भमें ही विराधित किया था इसलिए भोगोंसे रहित उस पुत्रका माताने विराधित नाम रखा ॥४४॥


न तस्य गौरवं चक्रे कश्चिदप्यवनौ नरः । प्रच्युतस्य निजस्थानात् केशस्येवोत्तमाङ्गतः ॥४५॥

अर्थ: जिस प्रकार अपने स्थान - मस्तकसे च्युत हुए केशका कोई आदर नहीं करता उसी प्रकार उस विराधितका पृथिवीपर कोई भी आदर नहीं करता था ॥४५॥


प्रतिकर्तुमशक्तोऽसौ वैरं चित्तेन धारयन् । आचारागतवृत्तिस्थो देशान् पर्याट वाञ्छितान् ॥४६॥

अर्थ: वह शत्रुसे बदला लेनेमें समर्थ नहीं था इसलिए मनमें ही वैर धारण करता था और कुछ परम्परागत आचारका पालन करता हुआ इच्छित देशोंमें घूमता रहता था ॥४६॥


रेमे वर्षधराग्रेषु काननेषु च चारुषु । तथातिशयदेशेषु गीर्वाणागमनेषु च ॥४७॥

अर्थ: वह कुलाचलोंके ऊपर, मनोहर वनोंमें तथा जहाँ देवोंका आगमन होता था ऐसे अतिशय-पूर्ण स्थानोंमें क्रीड़ा किया करता था ॥४७॥


ध्वजच्छत्रादिरम्येषु संकुलेषु गजादिभिः । वीराणां विभ्रमं पश्यन् संग्रामेषु समं सुरैः ॥४८॥

अर्थ: वह ध्वजा, छत्र आदिसे सुन्दर तथा हाथियों आदिसे व्याप्त देवोंके साथ होनेवाले युद्धोंमें वीर मनुष्योंकी चेष्टाएँ देखता हुआ घूमता फिरता था ॥४८॥


नगर्यामथ लङ्कायां सुरेशस्येव तिष्ठतः । परान् प्राप्नुवतो भोगान् दशवक्त्रस्य भास्वतः ॥४९॥

अर्थ: अथानन्तर उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त करता हुआ देदीप्यमान दशानन लंकानगरीमें इन्द्रके समान रहता था ॥४९॥


प्रतिकूलितवानाज्ञां वालिर्बलसमन्वितः । विद्याभिरद्भुतं कर्म कुर्वतीभिरुपासितः ॥५०॥

अर्थ: सो आश्चर्यजनक कार्य करनेवाली विद्याओंसे सेवित बलवान् बाली उसकी आज्ञाका अतिक्रम करने लगा ॥५०॥


दशास्येन ततो दूतः प्रेषितोऽस्मै महामतिः । जगाद वानराधीशं स्वामिनो मानमुद्वहन् ॥५१॥

अनन्यसदृशः क्षेत्रे भरतेऽस्मिन् प्रतापवान् । महाबलो महातेजाः श्रीमान्नयविशारदः ॥५२॥

महासाधनसंपन्न उग्रदण्डो महोदयः । आज्ञापयति देवस्त्वां शत्रुमर्दो दशाननः ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर दशाननने बालीके पास महाबुद्धिमान् दूत भेजा। सो स्वामीके गर्वको धारण करता हुआ दूत बालीके पास जाकर कहने लगा कि दशानन इस भरत क्षेत्रमें अपनी शानी नहीं रखता। वह अतिशय प्रतापी, महाबलवान्, महातेजस्वी, लक्ष्मी-सम्पन्न, नीतिमें निपुण, महासाधन सम्पन्न, उग्रदण्ड देनेवाला, महान् अभ्युदयसे युक्त, और शत्रुओं-का मान मर्दन करनेवाला है। वह तुम्हें आज्ञा देता है कि ॥५१-५३॥


यमारातिं समुद्वास्य भवतोऽर्करजाः पिता । यया किष्किन्धनाथत्वे स्थापितो वानरान्वये ॥५४॥

अर्थ: मैंने यमरूपी शत्रुको हटाकर आपके पिता सूर्यरजको वानरवंशमें किष्किन्धपुरके राजपदपर स्थापित किया था ॥५४॥


विस्मृत्य सुकृतं कृत्यं स त्वं जनयितुः परमं । कुरुषे प्रत्यवस्थानमिति साधो न युज्यते ॥५५॥

अर्थ: तुम उस उपकारको भूलकर पिताके विरुद्ध कार्य करते हो । हे सत्पुरुष ! तुम्हें ऐसा करना योग्य नहीं है ॥५५॥


पितुस्ते सदृशीं प्रीतिमधिकां वा करोम्यहम् । अद्याप्येहि प्रणामं मे कुरु स्थातुं यथासुखम् ॥५६॥

अर्थ: मैं तेरे साथ पिताके समान अथवा उससे भी अधिक प्यार करता हूँ। तू आज भी आ और सुखपूर्वक रहनेके लिए मुझे प्रणाम कर ॥५६॥


स्वसारं च प्रयच्छेमां श्रीप्रभाख्यां मया सह । संबन्धं प्राप्य ते सर्वं भविष्यति सुखावहम् ॥५७॥

अर्थ: अथवा अपनी श्रीप्रभा नामक बहन मेरे लिए प्रदान कर। यथार्थमें मेरे साथ सम्बन्ध प्राप्त कर लेनेसे तेरे लिए समस्त पदार्थ सुखदायक हो जायेंगे ॥५७॥


इत्युक्ते विमुखं ज्ञात्वा बलिं प्रणमनं प्रति । आननस्य विकारेण दूतः पुनरुदाहरत् ॥५८॥

किमत्र बहुनोक्तेन कुरु शाखामृग श्रुतौ । मदीयं निश्चितं वाक्यमल्पलक्ष्मीविडम्बितैः ॥५९॥

अर्थ: इतना कहनेपर भी बाली दशाननको नमस्कार करनेमें विमुख रहा । तब मुख-की विकृतिसे रोष प्रकट करता हुआ दूत फिर कहने लगा कि अरे वानर! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? तू मेरे निश्चित वचन सुन, तू व्यर्थ ही थोड़ी-सी लक्ष्मी पाकर विडम्बना कर रहा है ॥५८-५९॥


कुरु सज्जौ करं दातुमादातुं वायुधं करौ । गृहाण चामरं शीघ्रं ककुभां वा कदम्बकम् ॥६०॥

अर्थ: तू अपने दोनों हाथोंको या तो कर देनेके लिए तैयार कर या शस्त्र ग्रहण करनेके लिए तैयार कर। तू या तो शीघ्र ही चामर ग्रहण कर अर्थात् दास बनकर दशाननके लिए चामर ढोल या दिशामण्डलको ग्रहण कर अर्थात् दिशाओंके अन्त तक भाग जा ॥६०॥


शिरो नमय चापं वा नयाज्ञां कर्णपूरताम् । मौर्वीं वा दुस्सहारावामात्मजीवितदायिनीम् ॥६१॥

अर्थ: तू या तो शिरको नम्र कर या धनुषको नम्रीभूत कर। या तो आज्ञाको कानोंमें पूर्ण कर या असहनीय शब्दोंसे युक्त तथा अपना जीवन प्रदान करनेवाली धनुषकी डोरीको कानोंमें पूर्ण कर अर्थात् कानों तक धनुषकी डोरी खींच ॥६१॥


मत्पादजं रजो मूर्ध्नि शिरस्त्रमथवा कुरु । घटयाञ्जलिमुद्वृत्य करिणां वा महाचयम् ॥६२॥

अर्थ: या तो मेरी चरणरजको मस्तकपर धारण कर अथवा सिरकी रक्षा करनेवाला टोप मस्तकपर धारण कर । या तो क्षमा माँगनेके लिए हाथ जोड़कर अंजलियाँ बाँध या हाथियोंका बड़ा भारी समूह एकत्रित कर ॥६२॥


विमुञ्चेषुं धरित्रीं वा मजैकं वेत्रकुन्तयोः । पश्य मेऽङ्घ्रिनखे वक्त्रमथवा खड्गदर्पणे ॥६३॥

अर्थ: या तो बाण छोड़ या पृथिवीको प्राप्त-कर । या तो वेत्र ग्रहण कर या माला ग्रहण कर । या तो मेरे चरणोंके नखोंमें अपना मुख देख या तलवाररूपी दर्पणमें मुख देख ॥६३॥


ततः परुषवाक्येन दूतस्योद्धूतमानसः । नाम्ना व्याघ्रविलम्बीति बभाण भटसत्तमः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर दूतके कठोर वचनोंसे जिसका मन उद्धूत हो रहा था ऐसा व्याघ्रविलम्बी नामक प्रमुख योद्धा कहने लगा ॥६४॥


समस्तधरणीव्यापिपराक्रमगुणोदयः । बालिदेवो न किं यातः कर्णजाहं कुरक्षसः ॥६५॥

अर्थ: कि रे दूत ! जिसके पराक्रम आदि गुणोंका अभ्युदय समस्त पृथिवीमें व्याप्त हो रहा है ऐसा बाली राजा क्या दुष्ट राक्षसके कर्णमूलको प्राप्त नहीं हुआ है ? अर्थात् उसने बालीका नाम क्या अभी तक नहीं सुना है ? ॥६५॥


यद्येवं भाषते व्यक्तं गृहीतो वा ग्रहेण सः । त्वं तु स्वस्थः किमित्येवं दूताधम विकत्थसे ॥६६॥

अर्थ: यदि वह राक्षस ऐसा कहता है तो वह निश्चित ही भूतोंसे आक्रान्त है। अरे अधम दूत ! तू तो स्वस्थ है फिर क्यों इस तरह तारीफ हाँक रहा है ? ॥६६॥


क्रोधमूर्च्छित इत्युक्त्वा दुःप्रेक्ष्यः स्पष्टवेपथुः । गृह्णानः सायकं रुद्धो बालिनेति च चोदितः ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर व्याघ्रविलम्बी क्रोधसे मूर्च्छित हो गया । उसकी ओर देखना भी कठिन हो गया । उसका शरीर स्पष्ट रूपसे काँपने लगा । इसी दशामें वह दूतको मारनेके लिए बाण उठाने लगा तो बालीने कहा ॥६७॥


किं दूतेन वराकेण हतेन प्रेषकारिणा । कुर्वन्त्येते हि नाथीयवचसः प्रतिशब्दकम् ॥६८॥

अर्थ: कि कथित बातको कहनेवाले बेचारे दूतके मारनेसे क्या लाभ है ? यथार्थमें ये लोग अपने स्वामीके वचनोंकी प्रतिध्वनि ही करते हैं ॥६८॥


दशास्यस्यैव कर्तव्यं यदभिप्रायमाश्रितम् । आयुर्नूनमियत्तस्य कुरुते यत्कुभाषितम् ॥६९॥

अर्थ: जो कुछ मनमें आया हो वह दशाननका ही करना चाहिए। निश्चय ही दशाननकी आयु अल्प रह गयी है इसीलिए तो वह कुवचन कह रहा है ॥६९॥


ततो भीतो भृशं दूतो गत्वा वृत्तान्तवेदनात् । दशास्यस्य परं क्रोधं चक्रे दुःसहतेजसः ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त भयभीत दूतने जाकर सब समाचार दशाननको सुनाये और दुःसह तेजके धारक उस दशाननके क्रोधको वृद्धिगत किया ॥७०॥


सैन्यावृतश्च संनह्य प्रस्थितस्त्वरया पुरम् । परमाणुभिरारब्धः स हि दर्पमयैरिव ॥७१॥

अर्थ: वह बड़ी शीघ्रतासे तैयार हो सेना साथ ले किष्किन्धपुरकी ओर चला सो ठीक ही है क्योंकि उसकी रचना अहंकारके परमाणुओंसे ही हुई थी ॥७१॥


ततः परबलध्वानं श्रुत्वा व्योमपिधायिनम् । निर्गन्तुं मानसं चक्रे बालिः संग्रामदक्षिणः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर आकाशको आच्छादित करनेवाला शत्रुदलका कल-कल शब्द सुनकर युद्ध करनेमें कुशल बालिने महलसे बाहर निकलनेका मन किया ॥७२॥


तावत्सागरवृद्ध्यादिमन्त्रिभिर्नयशालिभिः । ज्वलत्क्रोधेन नीतोऽसाविति वागम्बुभिः शमम् ॥७३॥

अकारणेन देवालं विग्रहेण क्षमां कुरु । अनेके हि क्षयं याताः स्वच्छन्दं संयुगप्रियाः ॥७४॥

अर्थ: तब क्रोधसे प्रज्वलित बालि-को सागरवृद्धि आदि नीतिज्ञ मन्त्रियोंने वचनरूपी जलके द्वारा इस प्रकार शान्त किया कि हे देव ! अकारण युद्ध रहने दो, क्षमा करो, युद्धके प्रेमी अनेकों राजा अनायास ही क्षयको प्राप्त हो चुके हैं ॥७३-७४॥


अर्ककीर्तिभुजाधारा रक्ष्यमाणाः सुरैरपि । अष्टचन्द्राः क्षयं प्राप्ता मेघेश्वरशरोत्करैः ॥७५॥

अर्थ: जिन्हें अर्ककीर्तिकी भुजाओंका आलम्बन प्राप्त था तथा देव भी जिनकी रक्षा कर रहे थे ऐसे अष्टचन्द्र विद्याधर जयकुमारके बाणोंके समूहसे क्षयको प्राप्त हुए थे ॥७५॥


बहुसैन्यं दुरालोकमसिरत्नगदाधरम् । अतुलां संशयतुलां ततो नारोढुमर्हसि ॥७६॥

अर्थ: साथ ही जिसे देखना कठिन था, तथा जो उत्तमोत्तम तलवार और गदाओंको धारण करनेवाली थी ऐसी बहुत भारी सेना भी नष्ट हुई थी इसलिए संशयकी अनुपम तराजूपर आरूढ़ होना उचित नहीं है ॥७६॥


जगादेति ततो बालिर्युक्तं नात्मप्रशंसनम् । तथापि परमार्थं वो मन्त्रिणः कथयाम्यहम् ॥७७॥

अर्थ: मन्त्रियोंके वचन सुनकर बालीने कहा कि यद्यपि अपनी प्रशंसा करना उचित नहीं है तथापि हे मन्त्रिगणो ! यथार्थ बात आप लोगोंको कहता हूँ ॥७७॥


भ्रूलतोत्क्षेपमात्रेण दशवक्त्रं ससैन्यकम् । शक्तोऽस्मि कणशः कर्तुं वामपाणितलाहतम् ॥७८॥

अर्थ: मैं सेनासहित दशाननको भ्रकुटिरूपी लताके उत्क्षेपमात्रसे बायें हस्ततलकी चपेटसे ही चूर्ण करनेमें समर्थ हूँ ॥७८॥ फिर


किं तर्हि दारुणं कृत्वा क्रोधाग्निज्वलितं मनः । कर्मणा येन लभ्यन्ते भोगाः क्षणविनश्वराः ॥७९॥

अर्थ: फिर फिर कठिन मनको क्रोधाग्निसे प्रज्वलित किया जाये तो कहना ही क्या है ? फिर भी मुझे उस कर्मकी आवश्यकता नहीं जिससे कि क्षण-भंगुर भोग प्राप्त होते हैं ॥७९॥


प्राप्य तान् कदलीस्तम्भनिस्सारान् मोहवाहिताः । पतन्ति नरके जीवा महादुःखमहाकुले ॥८०॥

अर्थ: मोही जीव केलाके स्तम्भ-के समान निःसार भोगोंको प्राप्त कर महादुःखसे भरे नरकमें पड़ते हैं ॥८०॥


हिंसित्वा जन्तुसंघातं नितान्तं प्रियजीवितम् । दुःखं कृतसुखाभिख्यं प्राप्यते तेन को गुणः ॥८१॥

अर्थ: जिन्हें अपना जीवन अत्यन्त प्रिय है ऐसे जीवोंके समूहको मारकर सुख नामको धारण करनेवाला दुःख ही प्राप्त होता है, अतः उससे क्या लाभ है ? ॥८१॥


अरघट्टघटीयन्त्रसदृशाः प्राणधारिणः । शश्वद्भवमहाकूपे भ्रमन्त्यत्यन्तदुःखिताः ॥८२॥

अर्थ: ये प्राणी अरहट (रहट) की घटीके समान अत्यन्त दुःखी होते हुए संसाररूपी कूपमें निरन्तर घूमते रहते हैं ॥८२॥


पादद्वयं जिनेन्द्राणां भवनिर्गमकारणम् । प्रणम्य कथमन्यस्य क्रियते प्रणतिर्मया ॥८३॥

अर्थ: संसारसे निकलनेमें कारणभूत जिनेन्द्र भगवान्‌के चरण युगलको नमस्कार कर अब मैं अन्य पुरुषके लिए नमस्कार कैसे कर सकता हूँ ? ॥८३॥


प्रबुद्धेन सता चेयं कृता संस्था मया पुरा । अन्यं न प्रणमामीति जिनपादाब्जयुग्मतः ॥८४॥

अर्थ: जब पहले मुझे सम्यग्ज्ञान प्राप्त हुआ था तब मैंने प्रतिज्ञा की थी कि मैं जिनेन्द्रदेवके चरण-कमलोंके सिवाय अन्य किसीको नमस्कार नहीं करूँगा ॥८४॥


भङ्गं करोमि नास्थाया न च प्राणिनिपातनम् । गृह्णामि संगनिर्मुक्तां प्रव्रज्यां मुक्तिदायिनीम् ॥८५॥

अर्थ: मैं न तो इस प्रतिज्ञाका भंग करना चाहता हूँ और न प्राणियोंकी हिंसा ही । मैं तो मोक्ष-प्रदान करनेवाली निर्ग्रन्थ दीक्षा ग्रहण करता हूँ ॥८५॥


यौ करौ वरनारीणां कृतौ स्तनतटोचितौ । भुजौ चालिङ्गितौ चारुरत्नकेयूरलक्षणौ ॥८६॥

अरातेर्यः प्रयुङ्क्ते तौ पुरुषोऽञ्जलिबन्धने । ऐश्वर्यं कीदृशं तस्य जीवितं वा हतात्मनः ॥८७॥

अर्थ: जो हाथ उत्तमोत्तम स्त्रियोंके स्तनतटका स्पर्श करनेवाले थे तथा मनोहर रत्नमयी बाजूबन्दोंसे सुशोभित जो भुजाएँ उत्तमोत्तम स्त्रियोंका आलिंगन करनेवाली थीं उन्हें जो मनुष्य शत्रुओंके समक्ष अंजलि बाँधनेमें प्रयुक्त करता है उस अधमका ऐश्वर्य कैसा ? और जीवन कैसा ? ॥८६-८७॥


इत्युक्त्वाहूय सुग्रीवमुवाच शृणु बालक । कुरु तस्य नमस्कारं मा वो राज्यप्रतिष्ठितः ॥८८॥

स्वसारं यच्छ मा वास्मै न ममानेन कारणम् । एषोऽस्मि निर्गतोऽद्यैव पथ्यं यत्तव तत्कुरु ॥८९॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर उसने छोटे भाई सुग्रीवको बुलाकर कहा कि हे बालक ! तू राज्यपर प्रतिष्ठित होकर दशाननको नमस्कार कर अथवा न कर और इसके लिए अपनी बहन दे अथवा न दे, मुझे इससे प्रयोजन नहीं । मैं तो आज ही घरसे बाहर निकलता हूँ । जो तुझे हितकर मालूम हो वह कर ॥८८-८९॥


इत्युक्त्वा निर्गतो गेहाद् बभूव च निरम्बरः । पार्श्वे गगनचन्द्रस्य गुरोर्गुणगरीयसः ॥९०॥

अर्थ: इतना कहकर बाली घरसे निकल गया और गुणोंसे श्रेष्ठ गगनचन्द्र गुरुके समीप दिगम्बर हो गया ॥९०॥


परमार्थहितस्वान्तःसंप्राप्तपरमोदयः । एकभावरतो वीरः सम्यग्दर्शननिर्मलः ॥९१॥

सम्यग्ज्ञानाभियुक्तात्मा सम्यक्चारित्रतत्परः । अनुप्रेक्षाभिरात्मानं भावयन्मोहवर्जितः ॥९२॥

अर्थ: अब तो उसने अपना मन परमार्थमें ही लगा रखा था । उसे अनेक ऋद्धि आदि अभ्युदय प्राप्त हुए थे । वह एक शुद्ध भावमें ही सदा रत रहता था, परी-षहोंके सहन करनेमें शूरवीर था, सम्यग्दर्शनसे निर्मल था अर्थात् शुद्ध सम्यग्दृष्टि था, उसकी आत्मा सदा सम्यग्ज्ञानमें लीन रहती थी, वह सम्यक् चारित्रमें तत्पर रहता था और मोहसे रहित हो अनुप्रेक्षाओंके द्वारा आत्माका चिन्तवन करता रहता था ॥९१-९२॥


सूक्ष्मासु मद्धियुक्तासु धर्मानुगुणभूमिषु । मुनिभिर्विमलाचारैः सेवितासु महात्मभिः ॥९३॥

विहरन् सर्वजीवानां दयमानः पिता यथा । बाह्येन तपसान्तःस्थं वर्द्धयन् सततं तपः ॥९४॥

अर्थ: सूक्ष्म जीवोंसे रहित तथा निर्मल आचारके धारी महामुनियोंसे सेवित धर्माराधनके योग्य भूमियोंमें ही वह विहार करता था। वह जीवोंपर पिताके समान दया करता था । बाह्य तपसे अन्तरंग तपको निरन्तर बढ़ाता रहता था ॥९३-९४॥


आवासतां महर्द्धीनां परिप्राप्तः प्रशान्तधीः । तपःश्रिया परिष्वक्तः परया कान्तदर्शनः ॥९५॥

अर्थ: बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंकी आवासताको प्राप्त था अर्थात् उसमें बड़ी-बड़ी ऋद्धियाँ निवास करती थीं, प्रशान्त चित्त था, उत्कृष्ट तपरूपी लक्ष्मीसे आलिंगित था, अत्यन्त सुन्दर था ॥९५॥


उच्चैरुच्चैर्गुणस्थानसोपानारोहणोद्यतः । भिन्नाध्यात्माखिलग्रन्थग्रन्थिर्ग्रन्थविवर्जितः ॥९६॥

अर्थ: ऊँचे-ऊँचे गुणस्थानरूपी सीढ़ियोंके चढ़नेमें उद्यत रहता था, उसने अपने हृदयमें समस्त ग्रन्थोंकी ग्रन्थियाँ अर्थात् कठिन स्थल खोल रखे थे, समस्त प्रकारके परिग्रहसे रहित था ॥९६॥


श्रुतेन सकलं पश्यन् कृत्याकृत्यं महागुणः । महासंवरसंपन्नः शातयन् कर्मसंततिम् ॥९७॥

अर्थ: वह शास्त्रके द्वारा समस्त कृत्य और अकृत्यको समझता था । महागुणवान् था, महासंवरसे युक्त था, और कर्मोंकी सन्ततिको नष्ट करनेवाला था ॥९७॥


प्राणधारणमात्रार्थं भुञ्जानः सूत्रदेशितम् । धर्मार्थं धारयन् प्राणान् धर्मं मोक्षार्थमर्जयन् ॥९८॥

अर्थ: वह प्राणोंकी रक्षाके लिए ही आगमोक्त विधिसे आहार ग्रहण करता था, धर्मके लिए ही प्राण धारण करता था और मोक्षके लिए ही धर्मका अर्जन करता था ॥९८॥


आनन्दं भव्यलोकस्य कुर्वन्नुत्तमविक्रमः । चरितेनोपमानत्वं जगामासौ तपस्विनाम् ॥९९॥

अर्थ: वह भव्य जीवोंको सदा आनन्द उत्पन्न करता था, उत्कृष्ट पराक्रमका धारी था और अपने चारित्रसे तपस्वीजनोंका उपमान हो रहा था ॥९९॥


दशग्रीवाय सुग्रीवो वितीर्य श्रीप्रभां सुखी । चकारानुमतस्तेन राज्यमागतमन्वयात् ॥१००॥

अर्थ: इधर सुग्रीव दशाननके लिए श्रीप्रभा बहन देकर उसकी अनुमतिसे सुखपूर्वक वंशपरम्परा- गत राज्यका पालन करने लगा ॥१००॥


विद्याधरकुमार्यो या द्यावाभूमौ मनोहराः । दशाननः समस्तास्ताः परिणिन्ये पराक्रमात् ॥१०१॥

अर्थ: पृथ्वीपर विद्याधरोंकी जो सुन्दर कुमारियाँ थीं दशाननने अपने पराक्रमसे उन सबके साथ विवाह किया ॥१०१॥


नित्यालोकेऽथ नगरे नित्यालोकस्य देहजाम् । श्रीदेवीलब्धजन्मानं नाम्ना रत्नावलीं सुताम् ॥१०२॥

उपयम्य पुरीं यातो निजां परमसंमदः । नमसा मुकुटन्यस्तरत्नरश्मिविराजिना ॥१०३॥

अर्थ: अथानन्तर एक बार दशानन नित्यालोक नगरमें राजा नित्यालोककी श्रीदेवीसे समुत्पन्न रत्नावली नामकी पुत्रीको विवाह कर बड़े हर्षके साथ आकाशमार्गसे अपनी नगरीकी ओर आ रहा था । उस समय उसके मुकुटमें जो रत्न लगे थे उनकी किरणोंसे आकाश सुशोभित हो रहा था ॥१०२-१०३॥


सहसा पुष्पकं स्तम्भमारमानसचञ्चलम् । मेरोरिव तटं प्राप्य सुमहद्वायुमण्डलम् ॥१०४॥

अर्थ: जिस प्रकार बड़ा भारी वायुमण्डल मेरुके तटको पाकर सहसा रुक जाता है उसी प्रकार मनके समान चंचल पुष्पक विमान सहसा रुक गया ॥१०४॥


तस्योच्छिन्नगतेः शब्दे भग्ने घण्टादिजन्मनि । वैलक्ष्यादिव संजातं मौनं पिण्डिततेजसः ॥१०५॥

अर्थ: जब पुष्पक विमानकी गति रुक गयी और घण्टा आदिसे उत्पन्न होनेवाला शब्द भंग हो गया तब ऐसा जान पड़ता था मानो तेजहीन होनेसे लज्जाके कारण उसने मौन ही ले रखा था ॥१०५॥


भग्नप्रवृत्तिमालोक्य विमानं कैकसीसुतः । कः कोऽत्र भो इति क्षिप्रं बभाण क्रोधदीपितः ॥१०६॥

अर्थ: विमानको रुका देख दशाननने क्रोधसे दमकते हुए कहा कि अरे यहाँ कौन है ? कौन है ? ॥१०६॥


मारीचस्तत आचक्षौ सर्ववृत्तान्तकोविदः । शृणु देवैष कैलासे स्थितः प्रतिमया मुनिः ॥१०७॥

अर्थ: तब सर्व वृत्तान्तको जाननेवाले मारीचने कहा कि हे देव ! सुनो, यहाँ कैलास पर्वत पर एक मुनिराज प्रतिमा योगसे विराजमान हैं ॥१०७॥


आदित्याभिमुखस्तस्य करानात्मकरैः किरन् । समे शिलातले रत्नस्तम्भाकारोऽवतिष्ठते ॥१०८॥

अर्थ: ये सूर्यके सम्मुख विद्यमान हैं और अपनी किरणोंसे सूर्यकी किरणोंको इधर-उधर प्रक्षिप्त कर रहे हैं । समान शिलातलपर ये रत्नोंके स्तम्भके समान अवस्थित हैं ॥१०८॥


कोऽप्ययं सुमहान् वीरः सुघोरं धारयंस्तपः । मुक्तिमाकाङ्क्षति क्षिप्रं वृत्तान्तोऽयमतोऽभवत् ॥१०९॥

अर्थ: घोर तपश्चरणको धारण करनेवाले ये कोई महान् वीर पुरुष हैं और शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं । इन्हींसे यह वृत्तान्त हुआ है ॥१०९॥


निवर्तयाम्यतो देशाद्विमानं निर्विलम्बितम् । मुनेरस्य प्रभावेण यावन्नायाति खण्डशः ॥११०॥

अर्थ: इन मुनिराजके प्रभावसे जबतक विमान खण्ड-खण्ड नहीं हो जाता है, तबतक शीघ्र ही इस स्थानसे विमानको लौटा लेता हूँ ॥११०॥


श्रुत्वा मारीचवचनमथ कैलासभूधरम् । ईक्षाञ्चक्रे यमध्वंसः स्वपराक्रमगर्वितः ॥१११॥

अर्थ: अथानन्तर मारीचके वचन सुनकर अपने पराक्रमके गर्वसे गर्वित दशाननने कैलास पर्वतकी ओर देखा ॥१११॥


नानाधातुसमाकीर्णं गणैर्युक्तं सहस्रशः । सुवर्णघटनारम्यं पदपङ्क्तिभिराचितम् ॥११२॥

अर्थ: वह कैलास पर्वत व्याकरणकी उपमा प्राप्त कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार व्याकरण भू आदि अनेक धातुओं से युक्त है उसी प्रकार वह पर्वत भी सोना-चाँदी अनेक धातुओंसे युक्त था । जिस प्रकार व्याकरण हजारों गणों - शब्द-समूहोंसे युक्त है उसी प्रकार वह पर्वत भी हजारों गणों अर्थात् साधु-समूहोंसे युक्त था । जिस प्रकार व्याकरण सुवर्ण अर्थात् उत्तमोत्तम वर्णोंकी घटनासे मनोहर है उसी प्रकार वह पर्वत भी सुवर्ण अर्थात् स्वर्णकी घटनासे मनोहर था । जिस प्रकार व्याकरण पदों अर्थात् सुबन्त तिङन्तरूप शब्दसमुदायसे युक्त है उसी प्रकार वह पर्वत भी अनेक पदों अर्थात् स्थानों या प्रत्यन्त पर्वतों अथवा चरणचिह्नोंसे युक्त था ॥११२॥


प्रकृत्यनुगतैर्युक्तं विकारैर्विलसंयुतम् । स्वरैर्बहुविधैः पूर्णं लब्धव्याकरणोपमम् ॥११३॥

अर्थ: जिस प्रकार व्याकरण प्रकृति अर्थात् मूल शब्दोंके अनुरूप विकारों अर्थात् प्रत्ययादिजन्य विकारोंसे युक्त है उसी प्रकार वह पर्वत भी प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक रचनाके अनुरूप विकारोंसे युक्त था । जिस प्रकार व्याकरण विल अर्थात् मूलसूत्रोंसे युक्त है उसी प्रकार वह पर्वत भी विल अर्थात् ऊषरपृथिवी अथवा गर्त आदिसे युक्त था । और जिस प्रकार व्याकरण उदात्त-अनुदात्त-स्वरित आदि अनेक प्रकारके स्वरोंसे पूर्ण है उसी प्रकार वह पर्वत भी अनेक प्रकारके स्वरों अर्थात् प्राणियोंके शब्दोंसे पूर्ण था ॥११३॥


तीक्ष्णैः शिखरसंघातैः खण्डयन्तमिवाम्बरम् । उत्सर्पच्छीकरैः स्पष्टं हसन्तमिव निर्झरैः ॥११४॥

अर्थ: वह अपने तीक्ष्ण शिखरोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशके खण्ड ही कर रहा था । और ऊपरकी ओर उछलते हुए छींटोंसे युक्त निर्झरोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ॥११४॥


मकरन्दसुरामत्तमधुव्रतपरैधितम् । शालौघवितताकाशं नानानोकहसंकुलम् ॥११५॥

अर्थ: मकरन्दरूपी मदिरासे मत्त भ्रमरोंके समूहसे वह पर्वत कुछ बढ़ता हुआ-सा जान पड़ता था । शालाओंके समूहसे उसने आकाशको व्याप्त कर रखा था । साथ ही नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त था ॥११५॥


सर्वर्तुजमनोहारिकुसुमादिमिराचितम् । चरत्प्रमोदवत्सत्त्वसहस्रसदुपत्यकम् ॥११६॥

अर्थ: वह सर्व ऋतुओंमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प आदिसे व्याप्त था तथा उसकी उपत्यकाओंमें हर्षसे भरे हजारों प्राणी चलते-फिरते दिख रहे थे ॥११६॥


औषधत्रासदूरस्थव्यालजालसमाकुलम् । मनोहरेण गन्धेन दधतं यौवनं सदा ॥११७॥

अर्थ: वह पर्वत औषधियोंके भयसे दूर स्थित सर्पोंके समूहसे व्याप्त था तथा मनोहर सुगन्धिसे ऐसा जान पड़ता था मानो सदा यौवनको ही धारण कर रहा हो ॥११७॥


शिलाविस्तीर्णहृदयं स्थूलवृक्षमहाभुजम् । गुहागम्भीरवदनमपूर्वपुरुषाकृतिम् ॥११८॥

अर्थ: बड़ी-बड़ी शिलाएँ ही उसका लम्बा-चौड़ा वक्षःस्थल था, बड़े-बड़े वृक्ष ही उसकी महाभुजाएँ थीं और गुफाएँ ही उसका गम्भीर मुख थीं, इस प्रकार वह पर्वत अपूर्व पुरुषकी आकृति धारण कर रहा था ॥११८॥


शरत्पयोधराकारतटसंघातसंकटम् । क्षीरेणेव जगत्सर्वं क्षालयन्तं करोत्करैः ॥११९॥

अर्थ: वह शरद्ऋतुके बादलोंके समान सफेद-सफेद किनारोंके समूहसे व्याप्त था तथा किरणोंके समूहसे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त संसारको दूधसे ही धो रहा हो ॥११९॥


क्वचिद्विश्रब्धसंसुप्तमृगाधिपदरीमुखम् । क्वचित्सुप्तशयुश्वासवाताघूर्णितपादपम् ॥१२०॥

अर्थ: कहीं उसकी गुफाओंमें सिंह निःशंक होकर सो रहे थे और कहीं सोये हुए अजगरोंकी श्वासोच्छ्वासकी वायुसे वृक्ष हिल रहे थे ॥१२०॥


क्वचित्परिसरक्रीडत्कुरङ्गककदम्बकम् । क्वचिन्मत्तद्विपव्रातकलिताधित्यकावनम् ॥१२१॥

अर्थ: कहीं उसके किनारोंके वनोंमें हरिणोंका समूह क्रीड़ा कर रहा था और कहीं उसकी अधित्यकाके वनोंमें मदोन्मत्त हाथियोंके समूह स्थित थे ॥१२१॥


क्वचित्पुलकिताकारं प्रसूनप्रकराचितम् । क्वचिदृक्षसटाभारैरुद्धतैर्भीषणाकृतिम् ॥१२२॥

अर्थ: कहीं फूलोंके समूहसे व्याप्त होनेके कारण ऐसा जान पड़ता था मानो उसके रोमांच ही उठ रहे हों और कहीं उद्धत रीछोंकी लम्बी-लम्बी सटाओंसे उसका आकार भयंकर हो रहा था ॥१२२॥


क्वाचित्पद्मवनेनेव युक्तं शाखामृगाननैः । क्वचित्खड्गिक्षतस्यन्दिसालादिसुरभीकृतम् ॥१२३॥

अर्थ: कहीं बन्दरोंके लाल-लाल मुँहोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो कमलोंके वनसे ही युक्त हो और कहीं गेंडा-हाथियोंके द्वारा खण्डित साल आदि वृक्षोंसे जो पानी झर रहा था उससे सुगन्ध फैल रही थी ॥१२३॥


क्वचिद्विद्युल्लताश्लिष्टसंभवद्घनसंततिम् । क्वचिद्दिवाकराकारशिखरैरुद्योतिताम्बरम् ॥१२४॥

अर्थ: कहीं बिजलीरूपी लताओंसे आलिंगित मेघोंकी सन्तति उत्पन्न हो रही थी और कहीं सूर्यके समान देदीप्यमान शिखरोंसे आकाश प्रकाशमान हो रहा था ॥१२४॥


पाण्डुकस्येव कुर्वाणं विजिगीषां क्वचिद्वनैः । सुरभिप्रसवोत्तुङ्गविस्तीर्णघनपादपैः ॥१२५॥

अर्थ: जिनके लम्बे-चौड़े सघन वृक्ष सुगन्धित फूलोंसे ऊँचे उठे हुए थे ऐसे वनोंसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो पाण्डुकवनको जीतना ही चाहता हो ॥१२५॥


अवतीर्णश्च तत्रासावपश्यत्तं महामुनिम् । ध्यानार्णवसमाविष्टं तेजसाबद्धमण्डलम् ॥१२६॥

अर्थ: दशाननने उस पर्वतपर उतरकर उन महामुनिके दर्शन किये । वे महामुनि ध्यानरूपी समुद्रमें निमग्न थे और तेजके द्वारा चारों ओर मण्डल बाँध रहे थे ॥१२६॥


आशाकरिकराकारप्रलम्बितभुजद्वयम् । पन्नगाभ्यामिवाश्लिष्टं महाचन्दनपादपम् ॥१२७॥

अर्थ: दिग्गजोंके शुण्डादण्डके समान उनकी दोनों भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं और उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सर्पोंसे आवेष्टित चन्दनका बड़ा वृक्ष ही हो ॥१२७॥


आतापनशिलापीठमस्तकस्थं सुनिश्चलम् । कुर्वाणं प्राणिविषयं संशयं प्राणधारिणम् ॥१२८॥

अर्थ: वे आतापन योगमें शिलापीठके ऊपर निश्चल बैठे थे और प्राणियोंके प्रति ऐसा संशय उत्पन्न कर रहे थे कि ये जीवित हैं भी या नहीं ॥१२८॥


ततो बालिरसावेष इति ज्ञात्वा दशाननः । अतीतं संस्मरन् वैरं जज्वाल क्रोधवह्निना ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर ‘यह बालि है’ ऐसा जानकर दशानन पिछले वैरका स्मरण करता हुआ क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो उठा ॥१२९॥


बद्ध्वा च भृकुटीं भीमां दष्टोष्ठः प्रखरस्वरः । बभाण भासुराकारो मुनिमेवं सुनिर्भयः ॥१३०॥

अर्थ: जो ओंठ चबा रहा था, जिसकी आवाज अत्यन्त कर्कश थी, और जो अत्यन्त देदीप्यमान आकारका धारक था ऐसा दशानन भ्रकुटी बाँधकर बड़ी निर्भयताके साथ मुनिराजसे कहने लगा ॥१३०॥


अहो शोभनमारब्धं त्वया कर्तुमिदं तपः । यदद्याप्यभिमानेन विमानं स्तम्भ्यते मम ॥१३१॥

अर्थ: कि अहो ! तुमने यह बड़ा अच्छा तप करना प्रारम्भ किया है कि अब भी अभिमानसे मेरा विमान रोका जा रहा है ॥१३१॥


क्व धर्मः क्व च संकोधो वृथा श्राम्यसि दुर्मते । इच्छस्येकत्वमाधातुममृतस्य विषस्य च ॥१३२॥

अर्थ: धर्म कहाँ और क्रोध कहाँ ? अरे दुर्बुद्धि ! तू व्यर्थ ही श्रम कर रहा है और अमृत तथा विषको एक करना चाहता है ॥१३२॥


तस्मादपनयाम्येनं दर्पमद्य तवोद्धतम् । कैलासनगमुन्मूल्य क्षिपाम्यब्धौ समं त्वया ॥१३३॥

अर्थ: इसलिए मैं तेरे इस उद्धत अहंकारको आज ही नष्ट किये देता हूँ । तू जिस कैलास पर्वतपर बैठा है उसे उखाड़कर तेरे ही साथ अभी समुद्रमें फेंकता हूँ ॥१३३॥


ततोऽसौ सर्वविद्याभिर्ध्याताभिस्तत्क्षणाद्वृतः । विकृत्य सुमहद्रूपं सुरेन्द्र इव भीषणम् ॥१३४॥

महाबाहुवनेनान्धं ध्वान्तं कृत्वा समन्ततः । प्रविष्टो धरणीं भित्त्वा पातालं पातकोद्यतः ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर उसने समस्त विद्याओंका ध्यान किया जिससे आकर उन्होंने उसे घेर लिया । अब दशाननने इन्द्रके समान महाभयंकर रूप बनाया और महाबाहुरूपी वनसे सब ओर सघन अन्धकार फैलाता हुआ वह पृथिवीको भेदकर पातालमें प्रविष्ट हुआ । पाप करनेमें वह उद्यत था ही ॥१३४-१३५॥


आरेभे च समुद्धर्तुं भुजैर्भूरिपराक्रमः । क्रोधप्रचण्डरक्ताक्षो हुङ्कारमुखराननः ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधके कारण जिसके नेत्र अत्यन्त लाल हो रहे थे, और जिसका मुख क्रोधसे मुखरित था ऐसे प्रबल पराक्रमी दशाननने अपनी भुजाओंसे कैलासको उठाना प्रारम्भ किया ॥१३६॥


ततो विषकणक्षेपिलम्बमानोरगाधरः । केसरिक्रमसंप्राप्तभ्रश्यन्मत्तमतङ्गजः ॥१३७॥

संभ्रान्तनिश्चलोत्कर्णसारङ्गककदम्बकः । स्फुटितोद्देश-निष्पीतत्रुटिताखिलनिर्झरः ॥१३८॥

पर्यस्यदुद्धतारावमहानोकहसंहतिः । स्फुटीकृतशिलाजालसन्धिशब्दैः सुदुःस्वरः ॥१३९॥

पतद्विकटपाषाणरवापूरितविष्टपः । चलितश्चालयन् क्षोणीं भृशं कैलासपर्वतः ॥१४०॥

अर्थ: आखिर, पृथिवीको अत्यन्त चंचल करता हुआ कैलास पर्वत स्वस्थानसे चलित हो गया । उस समय- वह कैलास विषकणोंको छोड़नेवाले लम्बे-लम्बे लटकते हुए साँपोंको धारण कर रहा था । सिंहोंकी चपेटमें जो मत्त हाथी आ फँसे थे वे छूटकर अलग हो रहे थे । घबड़ाये हुए हरिणोंके समूह अपने कानोंको ऊपरकी ओर निश्चल खड़ा कर इधर-उधर भटक रहे थे । फटी हुई पृथिवीने झरनोंका समस्त जल पी लिया था इसलिए उनकी धाराएँ टूट गयी थीं । बड़े-बड़े वृक्षोंका जो समूह टूट-टूटकर चारों ओर गिर रहा था उससे बड़ा भारी शब्द उत्पन्न हो रहा था । शिलाओंके समूह चटककर चट-चट शब्द कर रहे थे इससे वहाँ भयंकर शब्द हो रहा था । और बड़े-बड़े पत्थर टूट-टूटकर नीचे गिर रहे थे तथा उससे उत्पन्न होनेवाले शब्दोंसे समस्त लोक व्याप्त हो रहा था ॥१३७-१४०॥


स्फुटितावनिपीताम्बुः प्राप शोषं नदीपतिः । ऊहुः स्वच्छतया मुक्ता विपरीतं समुद्रगाः ॥१४१॥

अर्थ: विदीर्ण पृथिवीने समुद्रका सब जल पी लिया था इसलिए वह सूख गया था । समुद्रकी ओर जानेवाली नदियाँ स्वच्छतासे रहित होकर उलटी बहने लगी थीं ॥१४१॥


त्रस्ता व्यलोकयन्नाशाः प्रमथाः पृथुविस्मयाः । किं किमेतदहो हा-हा-हुं-हीति प्रसृतस्वराः ॥१४२॥

अर्थ: प्रमथ लोग भयभीत होकर दिशाओंकी ओर देखने लगे तथा बहुत भारी आश्चर्यमें निमग्न हो 'यह क्या है ? क्या है ? हा-हा-हुँ-ही आदि शब्द करने लगे ॥१४२॥


जहुरप्सरसो भीता लताप्रवरमण्डपम् । वयसां निवहाः प्राप्ताः कृतकोलाहला नमः ॥१४३॥

अर्थ: अप्सराओंने भयभीत होकर उत्तमोत्तम लताओंके मण्डप छोड़ दिये और पक्षियोंके समूह कलकल शब्द करते हुए आकाशमें जा उड़े ॥१४३॥


पातालादुत्थितैः क्रूरैरट्टहासैरनन्तरैः । दशवक्त्रैः समं दिग्भिः पुस्फोटे च नभस्तलम् ॥१४४॥

अर्थ: पातालसे लगातार निकलनेवाले दशाननके दसमुखोंकी अट्टहाससे दिशाओंके साथ-साथ आकाश फट पड़ा ॥१४४॥


ततः संवर्तकाभिख्यवायुनेवाकुलीकृते । भुवने भगवान् बालिरवधिज्ञातराक्षसः ॥१४५॥

अर्थ: तदनन्तर जब समस्त संसार संवर्तक नामक वायुसे ही मानो आकुलित हो गया था तब भगवान् बाली मुनिराजने अवधिज्ञानसे दशानन नामक राक्षसको जान लिया ॥१४५॥


अप्राप्तः पीडनं स्वस्य धीरः कोपविवर्जितः । तथावस्थितसर्वाङ्गश्चेतसीदं न्यवेशयत् ॥१४६॥

अर्थ: यद्यपि उन्हें स्वयं कुछ भी पीड़ा नहीं हुई थी और पहलेकी तरह उनका समस्त शरीर निश्चल रूपसे अवस्थित था तथापि वे धीरवीर और क्रोधसे रहित हो अपने चित्तमें इस प्रकार विचार करने लगे कि ॥१४६॥


कारितं भरतेनेदं जिनायतनमुत्तमम् । सर्वरत्नमयं तुङ्गं बहुरूपविराजितम् ॥१४७॥

अर्थ: चक्रवर्ती भरतने ये नाना प्रकारके सर्वरत्नमयी ऊँचे-ऊँचे जिन-मन्दिर बनवाये हैं। भक्तिसे भरे सुर और असुर प्रतिदिन इनकी पूजा करते हैं सो इस पर्वतके विचलित हो जाने-पर कहीं ये जिन मन्दिर नष्ट न हो जावें ॥१४७॥


प्रत्यहं भक्तिसंयुक्तैः कृतपूजं सुरासुरैः । मा विनाशि चलत्यस्मिन् पर्वते भिन्नपर्वणि ॥१४८॥

ध्यात्वेति चरणाङ्गुष्ठपीडितं गिरिमस्तकम् । चकार शोभनध्यानाददूरीकृतचेतनः ॥१४९॥

अर्थ: ऐसा विचारकर शुभध्यानके निकट ही जिनकी चेतना थी ऐसे मुनिराज बालीने पर्वतके मस्तकको अपने पैरके अँगूठेसे दबा दिया ॥१४८-१४९॥


ततो महाभराक्रान्तभग्नबाहुवनो भृशम् । दुःखाकुलश्चलद्रक्तस्पष्टमञ्जुललोचनः ॥१५०॥

भग्नमौलिशिरोगाढनिविष्टधरणीधरः । निमज्जद्भूतलन्यस्तजानुर्निर्भुग्नजङ्घकः ॥१५१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी भुजाओंका वन बहुत भारी बोझसे आक्रान्त होनेके कारण अत्यधिक टूट रहा था, जो दुखसे आकुल था, जिसकी लाल-लाल मनोहर आँखें चंचल हो रही थीं ऐसा दशानन अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसके सिरका मुकुट टूटकर नीचे गिर गया और उस नंगे सिरपर पर्वतका भार आ पड़ा। नीचे धँसती हुई पृथिवीपर उसने घुटने टेक दिये। स्थूल होनेके कारण उसकी जंघाएँ मांसपेशियोंमें निमग्न हो गयीं ॥१५०-१५१॥


सद्यः प्रगलितस्वेदधाराधौतरसातलः । बभूव संकुचद्गात्रः कूर्माकारो दशाननः ॥१५२॥

अर्थ: उसके शरीरसे शीघ्र ही पसीनाकी धारा बह निकली और उससे उसने रसातलको धो दिया। उसका सारा शरीर कछुएके समान संकुचित हो गया ॥१५२॥


रवं च सर्वयत्नेन कृत्वा रावितवान् जगत् । यतस्ततो गतः पश्चाद्रावणाख्यां समस्तगाम् ॥१५३॥

अर्थ: उस समय चूँकि उसने सर्व प्रयत्नसे चिल्लाकर समस्त संसारको शब्दायमान कर दिया था इसलिए वह पीछे चलकर सर्वत्र प्रचलित ‘रावण’ इस नामको प्राप्त हुआ ॥१५३॥


श्रुत्वा तं दीनभारावं स्वामिनः पूर्वमश्रुतम् । विद्याधरवधूलोको विललाप समाकुलः ॥१५४॥

अर्थ: रावणकी स्त्रियोंका समूह अपने स्वामीके उस अश्रुतपूर्व दीन-हीन शब्दको सुनकर व्याकुल हो विलाप करने लगा ॥१५४॥


मूढाः संनद्धुमारब्धाः संभ्रान्ताः सचिवा वृथा । पुनः पुनः स्खलद्वाचो गृहीतगलदायुधाः ॥१५५॥

अर्थ: मन्त्री लोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। वे युद्धके लिए तैयार हो व्यर्थ ही इधर-उधर फिरने लगे। उनके वचन बार-बार बीचमें ही स्खलित हो जाते थे और हथियार उनके हाथसे छूट जाते थे ॥१५५॥


मुनिवीर्यप्रभावेण सुरदुन्दुभयोऽनदन् । पपात सुमनोवृष्टिः खमाच्छाद्य सषट्पदा ॥१५६॥

अर्थ: मुनिराजके वीर्यके प्रभावसे देवोंके दुन्दुभि बजने लगे और भ्रमरसहित फूलोंकी वृष्टि आकाशको आच्छादित कर पड़ने लगी ॥१५६॥


ननृतुर्गगने क्रीडाशीला देवकुमारकाः । गीतध्वनिः सुरस्त्रीणां वंशानुगतमुद्ययौ ॥१५७॥

अर्थ: क्रीडा करना जिनका स्वभाव था ऐसे देव-कुमार आकाशमें नृत्य करने लगे और देवियोंकी संगीत ध्वनि वंशीकी मधुर ध्वनिके साथ सर्वत्र उठने लगी ॥१५७॥


ततो मन्दोदरी दीना ययाचेति मुनीश्वरम् । प्रणम्य भर्तृभिक्षां मे प्रयच्छाद्भुतविक्रम ॥१५८॥

अर्थ: तदनन्तर मन्दोदरीने दीन होकर मुनिराजको प्रणाम कर याचना की कि हे अद्भुत पराक्रमके धारी ! मेरे लिए पतिभिक्षा दीजिए ॥१५८॥


ततोऽनुकम्पयाङ्गुष्ठं महामुनिरशश्लथत् । रावणोऽपि विमुच्याद्रिं क्लेशकान्तारतो निरैत् ॥१५९॥

अर्थ: तब महामुनिने दयावश पैरका अँगूठा ढोला कर लिया और रावण भी पर्वतको जहांका तहाँ छोड़ क्लेशरूपी अटवीसे बाहर निकला ॥१५९॥


गत्वा च प्रणतिं कृत्वा क्षमयित्वा पुनः पुनः । योगेशं स्तोतुमारब्धः परिज्ञाततपोबलः ॥१६०॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने तपका बल जान लिया था ऐसे रावणने जाकर मुनिराजको प्रणाम कर बार-बार क्षमा माँगी और इस प्रकार स्तुति करना प्रारम्भ किया ॥१६०॥


जिनेन्द्रचरणौ मुक्त्वा करोमि न नमस्कृतिम् । अन्यस्येति त्वयोक्तं यत्सामर्थ्यस्यास्य तत्फलम् ॥१६१॥

अर्थ: कि हे पूज्य ! आपने जो प्रतिज्ञा की थी कि मैं जिनेन्द्रदेवके चरणोंको छोड़कर अन्यके लिए नमस्कार नहीं करूँगा यह उसीकी सामर्थ्यका फल है ॥१६१॥


अहो निश्चयसंपन्नं तपसस्ते महद्बलम् । भगवन् येन शक्तोऽसि त्रैलोक्यं कर्तुमन्यथा ॥१६२॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपके तपका महाफल निश्चयसे सम्पन्न है इसीलिए तो आप तीन लोकको अन्यथा करनेमें समर्थ हैं ॥१६२॥


इन्द्राणामपि सामर्थ्यमीदृशं नाथ नेक्ष्यते । यादृक् तपःसमृद्धानां मुनीनामल्पयत्नजम् ॥१६३॥

अर्थ: तपसे समृद्ध मुनियोंको थोड़े ही प्रयत्नसे उत्पन्न जैसी सामर्थ्य देखो जाती है हे नाथ ! वैसो सामर्थ्य इन्द्रोंकी भी नहीं देखी जाती है ॥१६३॥


अहो गुणा अहोरूपमहो कान्तिरहो बलम् । अहो दीप्तिरहो धैर्यमहो शीलमहो तपः ॥१६४॥

अर्थ: आपके गुण, आपका रूप, आपकी कान्ति, आपका बल, आपकी दीप्ति, आपका धैर्य, आपका शील और आपका तप सभी आश्चर्यकारी हैं ॥१६४॥


त्रैलोक्यादथ निःशेषं वस्त्वाहृत्य मनोहरम् । कर्मभिः सुकृताधारं शरीरं तव निर्मितम् ॥१६५॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता है मानो कर्मोंने तीनों लोकोंसे समस्त सुन्दर पदार्थ ला-लाकर पुण्यके आधारभूत आपके शरीरकी रचना की है ॥१६५॥


सामर्थ्येनामुना युक्तस्त्यक्तवानसि यत्क्षितिम् । इदमत्यद्भुतं कर्म कृतं सुपुरुष त्वया ॥१६६॥

अर्थ: हे सत्पुरुष ! इस लोकोत्तर सामर्थ्यसे युक्त होकर भी जो आपने पृथिवीका त्याग किया है यह अत्यन्त आश्चर्यजनक कार्य है ॥१६६॥


एवंविधस्य ते कर्तुं यदसाधु मयेप्सितम् । तदशक्तस्य संजातं पापबन्धाय केवलम् ॥१६७॥

अर्थ: ऐसी सामर्थ्यसे युक्त आपके विषयमें जो मैंने अनुचित कार्य करना चाहा था वह मुझ असमर्थके लिए केवल पाप-बन्धका ही कारण हुआ ॥१६७॥


धिक्शरीरमिदं चेतो वचश्च मम पापिनः । वृत्तावभिमुखं जातं यदसत्यामलं पुरा ॥१६८॥

अर्थ: मुझ पापीके इस शरीरको, हृदयको और वचनको धिक्कार है कि जो अयोग्य कार्य करनेके सम्मुख हुए ॥१६८॥


मवादृशां नृरत्नानां मद्विधानां च दुर्विशाम् । अन्तरं विगतद्वेष मेरुसर्षपयोरिव ॥१६९॥

अर्थ: हे द्वेषरहित ! आप-जैसे नर-रत्नों और मुझ-जैसे दुष्ट पुरुषोंके बीच उतना ही अन्तर है जितना कि मेरु और सरसोंके बीच होता है ॥१६९॥


मह्यं विपद्यमानाय दत्ताः प्राणास्त्वया मुने । अपकारिणि यस्येयं मतिस्तस्य किमुच्यताम् ॥१७०॥

अर्थ: हे मुनिराज ! मुझ मरते हुएके लिए आपने प्राण प्रदान किये हैं सो अपकार करनेवालेपर जिसकी ऐसी बुद्धि है उसके विषयमें क्या कहा जावे ? ॥१७०॥


शृणोमि वेद्मि पश्यामि संसारं दुःखभावकम् । पापस्तथापि निर्वेदं विषयेभ्यो न याम्यहम् ॥१७१॥

अर्थ: मैं सुनता हूँ, जानता हूँ और देखता हूँ कि संसार केवल दुःखका अनुभव करानेवाला है फिर भी मैं इतना पापी हूँ कि विषयोंसे वैराग्यको प्राप्त नहीं होता ॥१७१॥


पुण्यवन्तो महासत्त्वा मुक्तिलक्ष्मीसमीपगाः । तारुण्ये विषयांस्त्यक्त्वा स्थिता ये मुक्तिवर्त्मनि ॥१७२॥

अर्थ: जो तरुण अवस्थामें ही विषयोंको छोड़कर मोक्ष-मार्गमें स्थित हुए हैं वे पुण्यात्मा हैं, महाशक्तिशाली है और मुक्तिलक्ष्मीके समीपमें विचरनेवाले हैं ॥१७२॥


इति स्तुत्वा मुनिं भूयः प्रणम्य त्रिःप्रदक्षिणम् । नितान्तं स्वं च निन्दित्वा शूत्कारमुखराननः ॥१७३॥

अर्थ: इस प्रकार स्तुति कर उसने मुनिराजको प्रणाम कर तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, अपने आपकी बहुत निन्दा की और दुःखवश मुँहसे सू-सू शब्द कर रुदन किया ॥१७३॥


उपकण्ठं मुनेश्चैत्यभवनं त्रपयान्वितः । विरक्तो विषयासङ्गे प्रविष्टः कैकसीसुतः ॥१७४॥

अर्थ: मुनिराजके समीप जो जिन-मन्दिर था लज्जासे युक्त और विषयोंसे विरक्त रावण उसीके अन्दर चला गया ॥१७४॥


अनादरेण विक्षिप्य चन्द्रहासमसिं भुवि । आवृतो निजनारीभिश्चक्रे जिनवरार्चनम् ॥१७५॥

अर्थ: वहाँ उसने चन्द्रहास नामक खड्गको अनादरसे पृथिवीपर फेंक दिया और अपनी स्त्रियोंसे युक्त होकर जिनेन्द्रदेवकी पूजा की ॥१७५॥


निष्कृष्य च स्नसातन्त्रीं भुजे वीणामवीवदत् । भक्तिनिर्भरभावश्च जगौ स्तुतिशतैर्जिनम् ॥१७६॥

अर्थ: उसके भाव भक्तिमें इतने लीन हो गये थे कि उसने अपनी भुजाकी नाड़ीरूपी तन्त्रीको खींचकर वीणा बजायी और सैकड़ों स्तुतियोंके द्वारा जिनराजका गुणगान किया ॥१७६॥


नमस्ते देवदेवाय लोकालोकावलोकिने । तेजसातीतलोकाय कृतार्थाय महात्मने ॥१७७॥

त्रिलोककृतपूजाय नष्टमोहमहारये । वाणीगोचरतामुक्तगुणसंघातधारिणे ॥१७८॥

महैश्वर्यसमेताय विमुक्तिपथदेशिने । सुखकाष्ठासमृद्धाय दूरीभूतकुवस्तवे ॥१७९॥

निःश्रेयसस्य भूतानां हेतवेऽभ्युदयस्य च । महाकल्याणमूलाय वेधसे सर्वकर्मणाम् ॥१८०॥

ध्याननिर्दग्धपापाय जन्मविध्वंसकारिणे । गुरवे गुरुमुक्ताय प्रणतायानतात्मने ॥१८१॥

आद्यन्तपरिमुक्ताय संतताद्यन्तयोगिने । अज्ञातपरमार्थाय परमार्थावबोधिने ॥१८२॥

सर्वशून्यप्रतिज्ञाय सर्वास्तिक्योपदेशिने । सर्वक्षणिकपक्षाय कृत्स्ननित्यत्वदर्शिने ॥१८३॥

पृथक्त्वैकत्ववादाय सर्वानेकान्तदेशिने । जिनेश्वराय सर्वस्मा एकस्मै शिवदायिने ॥१८४॥

अर्थ: वह गा रहा था कि नाथ ! आप देवोंके देव हो, लोक और अलोकको देखनेवाले हो, आपने अपने तेजसे समस्त लोकको अतिक्रान्त कर दिया है, आप कृतकृत्य हैं, महात्मा हैं। तीनों लोक आपकी पूजा करते हैं, आपने मोह रूपी महा शत्रुको नष्ट कर दिया है, आप वचनागोचर गुणोंके समूहको धारण करनेवाले हैं। आप महान् ऐश्वर्यसे सहित हैं, मोक्षमार्गका उपदेश देनेवाले हैं, सुखकी परम सीमासे समृद्ध हैं, आपने समस्त कुत्सित वस्तुओंको दूर कर दिया है। आप प्राणियोंके लिए मोक्ष तथा स्वर्गके हेतु हैं, महाकल्याणोंके मूल कारण हैं, समस्त कार्योंके विधाता हैं। आपने ध्यानाग्निके द्वारा समस्त पापोंको जला दिया है, आप जन्मका विध्वंस करनेवाले हैं, गुरु हैं, आपका कोई गुरु नहीं है, सब आपको प्रणाम करते हैं और आप स्वयं किसीको प्रणाम नहीं करते। आप आदि तथा अन्तसे रहित हैं, आप निरन्तर आदि तथा अन्तिम योगी हैं, आपके परमार्थको कोई नहीं जानता पर आप समस्त परमार्थको जानते हैं। आत्मा रागादिक विकारोंसे शून्य है ऐसा उपदेश आपने सबके लिए दिया है, ‘आत्मा है’, ‘परलोक है’ इत्यादि आस्तिक्यवादका उपदेश भी आपने सबके लिए दिया है, पर्यायार्थिक नयसे संसारके समस्त पदार्थ क्षणिक हैं इस पक्षका निरूपण आपने जहाँ किया है वहाँ द्रव्यार्थिक नयसे समस्त पदार्थोंको नित्य भी आपने दिखलाया है। हमारी आत्मा समस्त परपदार्थोंसे पृथक् अखण्ड एक द्रव्य है ऐसा कथन आपने किया है, आप सबके लिए अनेकान्त धर्मका प्रतिपादन करनेवाले हैं, कर्मरूप शत्रुओंको जीतनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं, सर्व पदार्थोंको जाननेवाले होनेसे सर्वरूप हैं, अखण्ड चैतन्य पुंजके धारक होनेसे एकरूप हैं और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं अतः आपको नमस्कार हो ॥१७७-१८४॥


ऋषभाय नमो नित्यमजिताय नमो नमः । संभवाय नमोऽजस्रमभिनन्दनरूढये ॥१८५॥

नमः सुमतये पद्मप्रभाय सततं नमः । सुपार्श्वाय नमः शश्वन्नमश्चन्द्रसमत्विषे ॥१८६॥

नमोऽस्तु पुष्पदन्ताय शीतलाय नमो नमः । श्रेयसे वासुपूज्याय नमो लब्धात्मतेजसे ॥१८७॥

विमलाय नमस्त्रेधा नमोऽनन्ताय संततम् । नमो धर्माय सौख्यानां नमो मूलाय शान्तये ॥१८८॥

नमः कुन्थुजिनेन्द्राय नमोऽरस्वामिने सदा । नमो मल्लिमहेशाय नमः सुव्रतदायिने ॥१८९॥

अन्येभ्यश्च भविष्यद्भ्यो भूतेभ्यश्च सुमावतः । नमोऽस्तु जिननाथेभ्यः श्रमणेभ्यश्च सर्वदा ॥१९०॥

नमः सम्यक्त्वयुक्ताय ज्ञानायैकान्तनाशिने । दर्शनाय नमोऽजस्रं सिद्धेभ्योऽनारतं नमः ॥१९१॥

अर्थ: ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयोनाथ, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, सौख्योंके मूल कारण शान्तिनाथ, कुन्थु जिनेन्द्र, अरनाथ, मल्लि महाराज और मुनिसुव्रत भगवान् इन वर्तमान तीर्थंकरोंको मन-वचन-कायसे नमस्कार हो । इनके सिवाय जो अन्य भूत और भविष्यत् काल सम्बन्धी तीर्थंकर हैं उन्हें नमस्कार हो । साधुओंके लिए सदा नमस्कार हो । सम्यक्त्वसहित ज्ञान और एकान्तवादको नष्ट करनेवाले दर्शनके लिए निरन्तर नमस्कार हो, तथा सिद्ध परमेश्वरके लिए सदा नमस्कार हो ॥१८५-१९१॥


पवित्राण्यक्षराण्येवं लङ्कास्वामिनि गायति । चलितं नागराजस्य विष्टरं धरणश्रुतेः ॥१९२॥

अर्थ: लंकाका स्वामी रावण जब इस प्रकारके पवित्र अक्षर गा रहा था तब नागराज धरणेन्द्रका आसन कम्पायमान हुआ ॥१९२॥


ततोऽवधिकृतालोकस्तोषविस्तारितेक्षणः । स्फुरत्फणामणिच्छायादूरध्वस्ततमश्चयः ॥१९३॥

सकलामलतारेशप्रसन्नमुखशोभितः । पातालादुद्ययौ क्षिप्रं नागराजः सुमानसः ॥१९४॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम हृदयको धारण करनेवाला नागराज शीघ्र ही पातालसे निकलकर बाहर आया। उस समय अवधिज्ञानरूपी प्रकाशसे उसकी आत्मा प्रकाशमान थी, सन्तोषसे उसके नेत्र विकसित हो रहे थे, ऊपर उठे हुए फणोंमें जो मणि लगे हुए थे उनकी कान्तिसे वह अन्धकारके समूह दूर हटा रहा था और पूर्ण तथा निर्मल चन्द्रमाके समान प्रसन्न मुखसे शोभित था ॥१९३-१९४॥


विधाय च नमस्कारं जिनेन्द्राणां विधानतः । पूजां च ध्यानसंजातसमस्तद्रव्यसंपदम् ॥१९५॥

अर्थ: उसने आकर जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार किया और तदनन्तर ध्यान मात्रसे ही जिसमें समस्त द्रव्यरूपी सम्पदा प्राप्त हो गयी थी ऐसी विधिपूर्वक पूजा की ॥१९५॥


जगाद रावणं साधो साधुगीतमिदं त्वया । जिनेन्द्रस्तुतिसंबद्धं रोमहर्षणकारणम् ॥१९६॥

अर्थ: पूजाके बाद उसने रावणसे कहा कि हे सत्पुरुष ! तुमने जिनेन्द्रदेवकी स्तुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला यह बहुत अच्छा गीत गाया है । तुम्हारा यह गीत रोमांच उत्पन्न होनेका कारण है ॥१९६॥


पश्य तोपेण मे जातं पुलकं घनकर्कशम् । पातालस्थस्य यच्छान्तिर्नाद्यापि प्रतिपद्यते ॥१९७॥

अर्थ: देखो, सन्तोषके कारण मेरे शरीरमें सघन एवं कठोर रोमांच निकल आये हैं । मैं पातालमें रहता था फिर भी तुझे अब भी शान्ति प्राप्त नहीं हो रही है ॥१९७॥


राक्षसेश्वर धन्योऽसि यैः स्तौषि जिनपुङ्गवान् । बलादाकृष्य भावेन त्वदीयेनाहमाहृतः ॥१९८॥

अर्थ: हे राक्षसेश्वर ! तू धन्य है जो जिनेन्द्र भगवान्की इस प्रकार स्तुति करता है । तेरी भावनाने मुझे बलपूर्वक खींचकर यहाँ बुलाया है ॥१९८॥


वरं वृणीष्व तुष्टोऽस्मि तव भक्त्या जिनान्प्रति । ददाम्यमीप्सितं वस्तु सद्यः कुनरदुर्लभम् ॥१९९॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवके प्रति जो तेरी भक्ति है उससे मैं बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ । तू वर माँग, मैं तुझे शीघ्र ही कुपुरुषोंकी दुर्लभ इच्छित वस्तु देता हूँ ॥१९९॥


ततः कैलासकम्पेन प्रोक्तोऽसौ विदितो मम । धरणो नागराजस्त्वं पृष्टस्तावन्निवेदय ॥२००॥

अर्थ: तदनन्तर कैलासको कम्पित करनेवाले रावणने कहा कि मुझे मालूम है-आप नागराज धरणेन्द्र हैं। सो मैं आपसे ही पूछता हूँ भला आप ही बतलाइए ॥२००॥


जिनवन्दनया तुल्यं किमन्यद्विद्यते शुभम् । वस्तु यत्प्रार्थयिष्येऽहं भवन्तं दातुमुद्यतम् ॥२०१॥

अर्थ: कि जिन-वन्दनाके समान और कौन-सी शुभ वस्तु है जिसे देनेके लिए उद्यत हुए आपसे मैं माँगूँ ॥२०१॥


ततो निगदितं नागपतिना शृणु रावण । जिनेन्द्रवन्दनात्तुल्यं कल्याणं नैव विद्यते ॥२०२॥

अर्थ: तब नागराजने कहा कि हे रावण ! सुन, जिनेन्द्र-वन्दनाके समान और दूसरी वस्तु कल्याणकारी नहीं है ॥२०२॥


ददाति परिनिर्वाणसुखं या समुपासिता । जिननत्या तया तुल्यं न भूतं न भविष्यति ॥२०३॥

अर्थ: जो जिन-भक्ति अच्छी तरह उपासना करनेपर निर्वाण सुख प्रदान करती है उसके तुल्य दूसरी वस्तु न तो हुई है और न होगी ॥२०३॥


ततो दशमुखेनोक्तं नास्ति चेज्जिनवन्दनात् । अधिकं किंत्वतः प्राप्ते तस्मिन् याचे महामते ॥२०४॥

अर्थ: यह सुन रावणने कहा कि जब जिनेन्द्र-वन्दनासे बढ़कर और कुछ नहीं है और वह मुझे प्राप्त है तब हे महाबुद्धिमान् ! तुम्हीं कहो इससे अधिक और किस वस्तुकी याचना तुमसे करूँ ॥२०४॥


उक्तं च नागपतिना सत्यमेतत्सुचेष्टितम् । असाध्यं जिनभक्तेर्यत्साधु तन्नैव विद्यते ॥२०५॥

अर्थ: नागराजने फिर कहा कि तुम्हारा यह कहना सच है। वास्तवमें जो वस्तु जिन-भक्तिसे असाध्य हो वह है ही नहीं ॥२०५॥


त्वादृशा मादृशा ये च वासवाद्यैश्च संनिभाः । संपद्यन्ते सुखाधारा सर्वे ते जिनभक्तितः ॥२०६॥

अर्थ: तुम्हारे समान, हमारे समान और इन्द्र आदिके समान जो भी सुखके आधार हैं वे सब जिन-भक्तिसे ही हुए हैं ॥२०६॥


आस्तां तावदिदं स्वल्पं व्याघाति भवजं सुखम् । मोक्षजं लभ्यते भक्त्या जिनानामुत्तमं सुखम् ॥२०७॥

अर्थ: यह संसार-कः सुख तो अत्यन्त अल्प तथा बाधासे सहित है अतः इसे रहने दो, जिन-भक्तिसे तो मोक्ष-का भी उत्तम सुख प्राप्त हो जाता है ॥२०७॥


नितान्तं यद्यपि त्यागी महाविनयसंगतः । वीर्यवानुत्तमैश्वर्यो भवान् गुणविभूषितः ॥२०८॥

मद्दर्शनं तथाप्येतत्तव मा भूदनर्थकम् । अमोघमिति याचेऽहं भवन्तं ग्रहणं प्रति ॥२०९॥

अर्थ: यद्यपि तू त्यागी है, महाविनयसे युक्त है, वीर्यवान् है, उत्तम ऐश्वर्यसे सहित है और गुणोंसे विभूषित है तथापि तेरे लिए मेरा जो अमोघ दर्शन हुआ है वह व्यर्थ न हो इसलिए मैं तुझसे कुछ ग्रहण करनेकी याचना करता हूँ ॥२०८-२०९॥


अमोघविजया नाम शक्तिं रूपविकारिणीम् । विद्यां गृहाण लङ्केश मा वधीः प्रणयं मम ॥२१०॥

अर्थ: हे लंकेश ! जिससे मनचाहे रूप बनाये जा सकते हैं ऐसी अमोघविजया शक्ति नामकी विद्या मैं तुझे देता हूँ सो ग्रहण कर, मेरा स्नेह खण्डित मत कर ॥२१०॥


एकया दशया कस्य कालो गच्छति सज्जने । विपदोऽनन्तरा संपत् संपदोऽनन्तरा विपत् ॥२११॥

अर्थ: हे भलेमानुष ! एक ही दशामें किसका काल बीतता है ? विपत्तिके बाद सम्पत्ति और सम्पत्तिके बाद विपत्ति सभीको प्राप्त होती है ॥२११॥


अतो विपदि जातायामासन्नायां कुतोऽपि ते । कुर्वती परसंबाधं पालिकेयं भविष्यति ॥२१२॥

अर्थ: इसलिए यदि कदाचित् किसी कारणवश विपत्ति तेरे समीप आयेगी तो यह विद्या शत्रुको बाधा पहुँचाती हुई तेरी रक्षक होगी ॥२१२॥


आसतां मानुषास्तावद्विभ्यत्यस्याः सुरा अपि । वह्निज्वालापरीतायाः शक्तेर्विपुलशक्तयः ॥२१३॥

अर्थ: मनुष्य तो दूर रहें अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त इस शक्तिसे विपुल शक्तिके धारक देव भी भयभीत रहते हैं ॥२१३॥


अशक्नुवंस्ततः कर्तुं प्रणयस्यास्य भञ्जनम् । गृहीतृलाघवं लेभे कृच्छ्रात् कैलासकम्पन ॥२१४॥

अर्थ: आखिर, रावण नागराजके इस स्नेहको भंग नहीं कर सका और उसने बड़ी कठिनाईसे ग्रहण करनेवालेकी लघुता प्राप्त की ॥२१४॥


कृत्वाञ्जलिं नमस्यां च संभाषितदशाननः । जगाम धरणः स्थानं निजं प्रकटसंमदः ॥२१५॥

अर्थ: तदनन्तर हाथ जोड़कर और पूजा कर रावणसे वार्तालाप करता हुआ नागराज बड़े हर्षसे अपने स्थानपर चला गया ॥२१५॥


मासमात्रं दशास्योऽपि स्थित्वा कैलासमूर्धनि । प्रणिपत्य जिनं देशं प्रययावभिवाञ्छितम् ॥२१६॥

अर्थ: रावण भी एक माह तक कैलास पर्वतपर रहकर तथा जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर इच्छित स्थलको चला गया ॥२१६॥


विज्ञाय मनसः क्षोभादात्मानं बद्धदुष्कृतम् । प्रायश्चित्तं गुरोर्देशं गत्वा बालिरशिश्रियत् ॥२१७॥

अर्थ: मुनिराज बालीने मनमें क्षोभ उत्पन्न होनेसे अपने आपको पाप कर्मका बन्ध करनेवाला समझ गुरुके पास जाकर प्रायश्चित्त ग्रहण किया ॥२१७॥


निर्गतस्वान्तशल्यश्च बभूव सुखितः पुनः । बालिर्नियमनं कृत्वा यथा विष्णुर्महामुनिः ॥२१८॥

अर्थ: जिस प्रकार विष्णुकुमार महामुनि प्रायश्चित्त कर सुखी हुए थे उसी प्रकार बाली मुनिराज भी प्रायश्चित्त द्वारा हृदयकी शल्य निकल जानेसे सुखी हुए ॥२१८॥


चारित्राद् गुप्तितो धर्मादनुप्रेक्षणतः सदा । समितिभ्यः पराभूतेः परीषहगणस्य च ॥२१९॥

महासंवरमासाद्य कर्मापूर्वमनर्जयन् । नाशयंस्तपसा चात्तं प्राप्तः केवलसंगतम् ॥२२०॥

अर्थ: चारित्र, गुप्ति, धर्म, अनुप्रेक्षा, समिति और परीषह सहन करनेसे बाली मुनिराज महासंवरको प्राप्त हुए । नवीन कर्मोंका अर्जन उन्होंने बन्द कर दिया और पहलेके संचित कर्मोंका तपके द्वारा नाश करना शुरू किया । इस तरह संवर और निर्जराके द्वारा वे केवलज्ञानको प्राप्त हुए ॥२१९-२२०॥


कर्माष्टकविनिर्मुक्तो ययौ त्रैलोक्यमस्तकम् । सुखं निरुपमं यस्मिन्नवसानविवर्जितम् ॥२२१॥

अर्थ: अन्तमें आठ कर्मोंको नष्ट कर वे तीन लोकके उस शिखरपर जा पहुँचे जहाँ अनन्त सुख प्राप्त होता है ॥२२१॥


इन्द्रियाणां जये शक्तो यस्तेनास्मि पराजितः । इति विज्ञाय लङ्केशः साधूनां प्रणतोऽभवत् ॥२२२॥

अर्थ: जो इन्द्रियोंको जीतनेमें समर्थ है मैं उससे हारा हूँ यह जानकर अब रावण साधुओंके समक्ष नम्र रहने लगा ॥२२२॥


सम्यग्दर्शनसंपन्नो दृढभक्तिर्जिनेश्वरे । अतृप्तः परमैर्भोगैरतिष्ठत् स यथेप्सितम् ॥२२३॥

अर्थ: जो सम्यग्दर्शनसे सम्पन्न था, और जिनेन्द्र देवमें जिसकी दृढ़ भक्ति थी ऐसा रावण परम भोगोंसे तृप्त न होता हुआ इच्छानुसार रहने लगा ॥२२३॥


बालिचेष्टितमिदं श्रृणोति यो भावतत्परमतिः शुभो जनः । नैष याति परतः पराभवं प्राप्नुते च रविभासुरं पदम् ॥२२४॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जो उत्तम मनुष्य शुभभावोंमें तत्पर होता हुआ बाली मुनिके इस चरित्रको सुनता है वह कभी परसे पराभवको प्राप्त नहीं होता और सूर्यके समान देदीप्यमान पदको प्राप्त होता है ॥२२४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते बालिनिर्वाणाभिधानं नाम नवमं पर्व ॥९॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें बालि-निर्वाणका कथन करनेवाला नवम पर्व पूर्ण हुआ ॥९॥

१०. दशमं पर्व (दशग्रीवप्रस्थाने सहस्ररश्म्यनरण्य-श्रामण्याभिधानं)

एवं तावदिदं वृत्तं तव श्रेणिक वेदितम् । अतः परं प्रवक्ष्यामि शृणु ते परमीहितम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर - गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस तरह तुमने बालीका वृत्तान्त जाना । अब इसके आगे तेरे लिए सुग्रीव और सुताराका श्रेष्ठ चरित कहता हूँ सो सुन ॥१॥


हुताशनशिखस्यासीत् सुता ज्योतिःपुरे वरा । ह्रीसंज्ञायां समुत्पन्ना योषिति स्त्रीगुणान्विता ॥२॥

सुतारेति गता ख्यातिं शोभया सकलावनौ । पद्मवासं परित्यज्य लक्ष्मीरिव समागता ॥३॥

अर्थ: ज्योतिःपुर नामा नगरमें राजा अग्निशिखकी रानी ह्री देवीके उदरसे उत्पन्न एक सुतारा नामकी कन्या थी । शोभासे समस्त पृथिवीमें प्रसिद्ध थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो कमलरूपी आवासको छोड़कर लक्ष्मी ही आ गयी हो ॥२-३॥


चक्राङ्कतनयोऽपश्यत् पर्यटन् स्वेच्छयान्यदा । तां साहसगतिर्नाम्ना दुष्टोऽनुमतिसंभवः ॥४॥

अर्थ: एक दिन राजा चक्रांक और अनुमति रानीसे उत्पन्न साहसगति नामक दुष्ट विद्याधर अपनी इच्छासे इधर-उधर भ्रमण कर रहा था सो उसने सुतारा देखी ॥४॥


ततोऽसौ कामशल्येन शल्यितोऽत्यन्तदुःखितः । सुतारां मनसा नित्यमुवाहोन्मत्तविभ्रमः ॥५॥

अर्थ: उसे देखकर वह कामरूपी शल्यसे विद्ध होकर अत्यन्त दुःखी हुआ । वह सुताराको निरन्तर अपने मनमें धारण करता था और उन्मत्त-जैसी उसकी चेष्टा थी ॥५॥


उपर्युपरि यातैश्च तां स दूतैरयाचत । सुग्रीवोऽपि तथैवैतां याचते स्म मनोहराम् ॥६॥

अर्थ: इधर वह एकके बाद एक दूत भेजकर उसकी याचना करता था उधर सुग्रीव भी उस मनोहर कन्याकी याचना करता था ॥६॥


द्वैधीभावमुपेतेन हुताशनशिखेन च । पृष्टो मुनिर्महाज्ञानी निश्चयव्याकुलात्मना ॥७॥

अर्थ: ‘अपनी कन्या दो में से किसे दूँ’ इस प्रकार द्वैधीभावको प्राप्त हुआ राजा अग्निशिख निश्चय नहीं कर सका इसलिए उसकी आत्मा निरन्तर व्याकुल रहती थी । आखिर महाज्ञानी मुनिराजसे पूछा ॥७॥


उक्तं च मुनिचन्द्रेण न साहसगतिश्चिरम् । जीविष्यति चिरायुस्तु सुग्रीवः परमोदयः ॥८॥

अर्थ: तब महाज्ञानी मुनिचन्द्रने कहा कि साहसगति चिरकाल तक जीवित नहीं रहेगा - अल्पायु है और सुग्रीव इसके विपरीत परम अभ्युदयका धारक तथा चिरायु है ॥८॥


चक्राङ्कपक्षसंप्रीत्या हुताशस्तु विनिश्चयः । दीपौ वृषौ गजेन्द्रौ च निमित्तमकरोद् दृढम् ॥९॥

अर्थ: राजा अग्निशिख, साहसगतिके पिता चक्रांकका पक्ष प्रबल होनेसे मुनिचन्द्रके वचनोंका निश्चय नहीं कर सका तब मुनिचन्द्रने दो दीपक, दो वृष और गजराजोंको निमित्त बनाकर उसे अपनी बातका दृढ़ निश्चय करा दिया ॥९॥


ततो मुनिगिरं ज्ञात्वा नियताममृतोपमाम् । सुग्रीवाय सुता दत्तानीय पित्रा समङ्गलम् ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजके अमृत तुल्य वचनोंका निश्चय कर पिता अग्निशिखने अपनी पुत्री सुतारा लाकर मंगलाचारपूर्वक सुग्रीवके लिए दे दी ॥१०॥


कृत्वा पाणिगृहीतां तां सुग्रीवः पुण्यसंचयः । इयाय कामविषयं सारवत्तं सुसंपदम् ॥११॥

अर्थ: जिसका पुण्यका संचय प्रबल था ऐसा सुग्रीव उस कन्याको विवाह कर बड़ी सम्पदाके साथ श्रेष्ठ कामोपभोगको प्राप्त हुआ ॥११॥


ततः क्रमात्तयोः पुत्रौ जातौ रूपमहोत्सवौ । ज्यायानङ्गोऽनुजस्तस्य प्रथितोऽङ्गदसंज्ञया ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीव और सुताराके क्रमसे दो पुत्र उत्पन्न हुए । दोनों ही अत्यन्त सुन्दर थे । उनमें-से बड़े पुत्रका नाम अंग था और छोटा पुत्र अंगदके नामसे प्रसिद्ध था ॥१२॥


अद्यापि नैव निर्लज्जश्चक्राङ्कस्य शरीरजः । परित्यजति तत्राशां धिङ्मनोभवदूषिताम् ॥१३॥

अर्थ: राजा चक्रांकका पुत्र साहसगति इतना निर्लज्ज था कि वह अब भी सुताराकी आशा नहीं छोड़ रहा था सो आचार्य कहते हैं कि इस कामसे दूषित आशाको धिक्कार हो ॥१३॥


दध्यौ चेति स कामाग्निदग्धो निस्सारमानसः । केनोपायेन तां कन्यां लप्स्ये निर्वृतिदायिनीम् ॥१४॥

अर्थ: जो कामाग्निसे जल रहा था ऐसा, सारहीन मनका धारक साहसगति निरन्तर यही विचार करता रहता था कि मैं सुख देनेवाली उस कन्याको किस उपायसे प्राप्त कर सकूँगा ॥१४॥


कदा नु वदनं तस्याः शोभाजितनिशाकरम् । चुम्बिष्यामि स्फुरच्छोणच्छविच्छन्नरदच्छदम् ॥१५॥

अर्थ: जिसने अपनी शोभासे चन्द्रमाको जीत लिया है और जिसका ओंठ स्फुरायमान लाल कान्तिसे आच्छादित हैं ऐसे उसके मुखका कब चुम्बन करूँगा ? ॥१५॥


क्रीडिष्यामि कदा सार्धं तया नन्दनवक्षसि । कदा वाप्स्यामि तत्पीनस्तनस्पर्शसुखोत्सवम् ॥१६॥

अर्थ: नन्दनवनके मध्यमें उसके साथ कब क्रीड़ा करूँगा, और उसके स्थूल स्तनोंके स्पर्शजन्य सुखोत्सवको कब प्राप्त होऊँगा ॥१६॥


इत्यभिध्यायतस्तस्य तत्समागमकारणम् । सस्मार शेमुषीविद्यामाकृतेः परिवर्तिनीम् ॥१७॥

अर्थ: इस प्रकार उसके समागमके कारणोंका ध्यान करते हुए उसने रूप बदलनेवाली शेमुषी नामक विद्याका स्मरण किया ॥१७॥


हिमवन्तं ततो गत्वा गुहामाश्रित्य दुर्गमाम् । आराधयितुमारेभे दुःखितं प्रियमित्रवत् ॥१८॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रिय मित्र अपने दुःखी मित्रकी निरन्तर आराधना करता है उसी प्रकार साहसगति हिमवान् पर्वतपर जाकर उसकी दुर्गम गुहाका आश्रय ले उस विद्याकी आराधना करने लगा ॥१८॥


अत्रान्तरे विनिष्क्रान्तो दिशो जेतुं दशाननः । बभ्राम धरणीं पश्यन् गिरिकान्तारभूषिताम् ॥१९॥

अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें रावण दिग्विजय करनेके लिए निकला सो पर्वत और वनोंसे विभूषित पृथिवीको देखता हुआ भ्रमण करने लगा ॥१९॥


जित्वा विद्याधराधीशान् द्वीपान्तरगतान् वशी । भूयो न्ययोजयत् स्वेषु राष्ट्रेषु पृथुशासनः ॥२०॥

अर्थ: विशाल आज्ञाको धारण करनेवाले जितेन्द्रिय रावणने दूसरे-दूसरे द्वीपोंमें स्थित विद्याधर राजाओंको जीतकर उन्हें फिरसे अपने-अपने देशोंमें नियुक्त किया ॥२०॥


वशीकृतेषु तस्यासीत् खगसिंहेषु मानसम् । पुत्रेष्विव महेच्छा हि तुष्यन्त्यानतिमात्रतः ॥२१॥

अर्थ: जिन विद्याधर राजाओंको वह वशमें कर चुका था उन सबपर उसका मन पुत्रोंके समान स्निग्ध था अर्थात् जिस प्रकार पिताका मन पुत्रोंपर स्नेहपूर्ण होता है उसी प्रकार दशाननका मन वशीकृत राजाओंपर स्नेहपूर्ण था । सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुष नमस्कार मात्रसे सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥२१॥


रक्षसामन्वये योऽभूद् यो वा शाखामृगान्वये । उद्बलः खेचराधीशः सर्वं तं वशमानयत् ॥२२॥

अर्थ: राक्षसवंश और वानरवंशमें जो भी उद्धत विद्याधर राजा थे उन सबको उसने वशमें किया था ॥२२॥


महासाधनयुक्तस्य व्रजतोऽस्य विहायसा । वेगमारुतमप्यन्ये खेचराः सोढुमक्षमाः ॥२३॥

अर्थ: बड़ी भारी सेनाके साथ जब रावण आकाशमार्गसे जाता था तब उसकी वेगजन्य वायुको अन्य विद्याधर सहन करनेमें असमर्थ हो जाते थे ॥२३॥


संध्याकाराः सुवेलाश्च हेमापूर्णाः सुयोधनाः । हंसद्वीपाः परिह्लादा इत्याद्या जनताधिपाः ॥२४॥

गृहीतप्राभृता गत्वा नेमुस्तं मूर्धपाणयः । आश्वासिताः सुवाणीभिस्तथावस्थितसंपदः ॥२५॥

अर्थ: सन्ध्याकार, सुवेल, हेमापूर्ण, सुयोधन, हंसद्वीप और परिह्लाद आदि जो राजा थे वे सब भेंट ले-लेकर तथा हाथ जोड़ मस्तकसे लगा-लगाकर उसे नमस्कार करते थे और रावण भी अच्छे-अच्छे वचनोंसे उन्हें सन्तुष्ट कर उनकी सम्पदाओंको पूर्ववत् अवस्थित रखता था ॥२४-२५॥


श्रिता येऽपि सुदुर्गाणि स्थानान्यम्बरगाधिपाः । नमितास्तेऽपि तत्पादौ शोभनैः पूर्वकर्मभिः ॥२६॥

अर्थ: जो विद्याधर राजा अत्यन्त दुर्गम स्थानोंमें रहते थे उन्होंने भी उत्तमोत्तम शिष्टाचारके साथ रावणके चरणोंमें नमस्कार किया था ॥२६॥


बलानां हि समस्तानां बलं कर्मकृतं परम् । तस्योदये स कं जेतु न समर्थो नरेश्वरः ॥२७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि सब बलोंमें कर्मोंके द्वारा किया हुआ बल ही श्रेष्ठ बल है सो उसका उदय रहते हुए रावण किसे जीतनेके लिए समर्थ नहीं हुआ था ? अर्थात् वह सभीको जीतनेमें समर्थ था ॥२७॥


अथेन्द्रजितये गन्तुं प्रवृत्तेनामुना स्मृता । स्वसात्यन्तघनस्नेहात् पारंपर्याच्च तत्पतिः ॥२८॥

अर्थ: अथानन्तर - रावण रथनूपुर नगरके राजा इन्द्र विद्याधरको जीतनेके लिए प्रवृत्त हुआ सो उसने इस अवसरपर अपनी बहन चन्द्रनखा और उसके पति खरदूषणका बड़े भारी स्नेहसे स्मरण किया ॥२८॥


प्रस्थितश्च स तं देशं श्रुतः स्वस्रा समुत्कया । प्राप्तः स्थितः समासन्ने देशे प्रीतिसमुत्कटः ॥२९॥

अर्थ: प्रस्थान कर पाताललंकाके समीप पहुँचा। जब बहनको इस बातका पता चला कि प्रीतिसे भरा हमारा भाई निकट ही आकर स्थित है तब वह उत्कण्ठासे भर गयी ॥२९॥


ततश्चरमयामादौ क्षपायाः शयितः सुखम् । कैकसेय्या परप्रीत्या बोधितः खरदूषणः ॥३०॥

अर्थ: उस समय रात्रिका पिछला पहर था और खरदूषण सुखसे सो रहा था सो चन्द्रनखाने बड़े प्रेमसे उसे जगाया ॥३०॥


ततो निर्गत्य तेनासावलंकारोदयात् पुरात् । दशवक्त्रो महाभक्त्या पूजितः परमोत्सवैः ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर खरदूषणने अलंकारोदयपुर ( पाताललंका ) से निकलकर बड़ी भक्ति और बहुत भारी उत्सवसे रावणकी पूजा की ॥३१॥


रावणोऽपि स्वसुः प्रीत्या चक्रेऽस्य प्रतिपूजनम् । प्रायो हि सोदरस्नेहात् परः स्नेहो न विद्यते ॥३२॥

अर्थ: रावणने भी बदलेमें प्रीतिपूर्वक बहनकी पूजा की सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें भाईके स्नेहसे बढ़कर दूसरा स्नेह नहीं है ॥३२॥


चतुर्दशसहस्राणि कामरूपविकारिणाम् । दर्शितानि दशास्याय तेन व्योमविचारिणाम् ॥३३॥

अर्थ: खरदूषणने रावणके लिए इच्छानुसार रूप बदलनेवाले चौदह हजार विद्याधर दिखलाये ॥३३॥


दूषणाख्यश्च सेनायाः पतिरात्मसमः कृती । शूरो गुणसमाकृष्टसर्वसामन्तमानसः ॥३४॥

अर्थ: जो अत्यन्त कुशल था, शूरवीर था और जिसने अपने गुणोंसे समस्त सामन्तोंके मनको अपनी ओर खींच लिया था ऐसे खरदूषणको रावणने अपने समान सेनापति बनाया ॥३४॥


एतैश्च प्रस्थितः साकं कृतसर्वास्त्रकौशलैः । आवृतोऽसुरसंघातैः पातालाच्चामरो यथा ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार असुरोंके समूहसे आवृत चामरेन्द्र पातालसे निकलकर प्रस्थान करता है उसी प्रकार रावणने सर्वप्रकारके शस्त्रोंमें कौशल प्राप्त करनेवाले खरदूषण आदि विद्याधरोंके साथ पाताललंकासे निकलकर प्रस्थान किया ॥३५॥


हिडम्बो हैहिडो डिम्बो विकटस्त्रिजटो हयः । माकोटैः सुजटष्टङ्कः किष्किन्धाधिपतिस्तथा ॥३६॥

त्रिपुरो मलयो हेमपालकोलवसुन्धराः । नानायानसमारूढा नानाशस्त्रविराजिताः ॥३७॥

अर्थ: हिडम्ब, हैहिड, डिम्ब, विकट, त्रिजट, हय, माकोट, सुजट, टंक, किष्किन्धाधिपति, त्रिपुर, मलय, हेमपाल, कोल और वसुन्धर आदि राजा नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़ होकर साथ जा रहे थे। ये सभी राजा नाना प्रकारके शस्त्रोंसे सुशोभित थे ॥३६-३७॥


एवमाद्यैः खगाधीशैरापुपूरे स निर्गतः । विद्युदिन्द्रधनुर्युक्तैर्घनौघैः श्रावणो यथा ॥३८॥

अर्थ: जिस प्रकार बिजली और इन्द्रधनुषसे युक्त मेघोंके समूहसे सावनका माह भर जाता है उसी प्रकार उन समस्त विद्याधर राजाओंसे दशानन भर गया था ॥३८॥


सहस्रमधिकं जातं विहायस्तलचारिणाम् । अक्षौहिणीप्रमाणानां कैलासोल्लासकारिणः ॥३९॥

अर्थ: इस प्रकार कैलासको कम्पित करनेवाले रावणके कुछ अधिक एक हजार अक्षौहिणी प्रमाण विद्याधरोंकी सेना इकट्ठी हो गयी थी ॥३९॥


अमराणां सहस्रेण प्रत्येकं कृतपालनैः । रत्नैरनुगतो नानागुणसंघातधारिभिः ॥४०॥

अर्थ: प्रत्येकके हजार-हजार देव जिनकी रक्षा करते थे और जो नाना गुणोंके समूहको धारण करनेवाले थे ऐसे रत्न उसके साथ चलते थे ॥४०॥


चन्द्ररश्मिचयाकारैश्चामरैरुपवीजितः । समुच्छ्रितसितच्छत्रश्चारुरूपमहाभुजः ॥४१॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समूहके समान जिनका आकार था ऐसे चमर उसपर ढोले जा रहे थे। उसके सिरपर सफेद छत्र लग रहा था और उसकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ सुन्दर रूपको धारण करनेवाली थीं ॥४१॥


पुष्पकाग्रं समारूढो मन्दरस्थरविद्युतिः । तिग्मांशुमालिनो मार्गं छादयन् यानसंपदा ॥४२॥

अर्थ: वह पुष्पक विमानके अग्रभागपर आरूढ़ था जिससे मेरुपर्वतपर स्थित सूर्यके समान कान्तिको धारण कर रहा था । वह अपनी यानरूपी सम्पत्तिके द्वारा सूर्यका मार्ग अर्थात् आकाशको आच्छादित कर रहा था ॥४२॥


इन्द्रध्वंसनमाधाय मानसे पुरुविक्रमः । प्रयाणकैरभिप्रेतैः प्रयाति स्म दशाननः ॥४३॥

अर्थ: प्रबल पराक्रमका धारी रावण मनमें इन्द्रके विनाशका संकल्प कर इच्छानुकूल प्रयाणकोंसे निरन्तर आगे बढ़ता जाता था ॥४३॥


नानारत्नकृतच्छायं चामरोर्मिसमाकुलम् । तद्दण्डमीनसंघातं छत्रावर्तशताचितम् ॥४४॥

वाजिमातङ्गपादातग्रहसंघातभीषणम् । उल्लसच्छस्त्रकल्लोलमकरोत् स खमर्णवम् ॥४५॥

अर्थ: उस समय वह आकाशको ठीक समुद्रके समान बना रहा था क्योंकि जिस प्रकार समुद्रमें नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्ति व्याप्त होती है उसी प्रकार आकाशमें नाना प्रकारके रत्नोंकी कान्ति फैल रही थी। जिस प्रकार समुद्र तरंगोंसे युक्त होता है उसी प्रकार आकाश चामररूपी तरंगोंसे युक्त होता था। जिस प्रकार समुद्रमें मीन अर्थात् मछलियोंका समूह होता है उसी प्रकार आकाशमें दण्डरूपी मछलियोंका समूह था। जिस प्रकार समुद्र सैकड़ों आवर्तों अर्थात् भ्रमरोंसे सहित होता है उसी प्रकार आकाश भी छत्ररूपी सैकड़ों भ्रमरोंसे युक्त था। जिस प्रकार समुद्र मगरमच्छोंके समूहसे भयंकर होता है उसी प्रकार आकाश भी घोड़े, हाथी और पैदल योद्धारूपी मगरमच्छोंसे भयंकर था तथा जिस प्रकार समुद्रमें अनेक कल्लोल अर्थात् तरंग उठते रहते हैं उसी प्रकार आकाशमें भी अनेक शस्त्ररूपी तरंग उठ रहे थे ॥४४-४५॥


तुङ्गैर्बर्हिणपिच्छौघशिरोभिर्मासुरैर्ध्वजैः । वज्रैरिव क्वचिद् व्याप्तं सुत्रामोपायनैर्नभः ॥४६॥

अर्थ: जिनके अग्रभागपर मयूरपिच्छोंका समूह विद्यमान था ऐसी चमकीली ऊँची ध्वजाओंसे कहीं आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो इन्द्रनीलमणियोंसे युक्त हीरोंसे ही व्याप्त हो ॥४६॥


नानारत्नकृतोद्योतैस्तुङ्गशृङ्गविराजितैः । संचरत्सुरलोकाभं विमाननिवहैः क्वचित् ॥४७॥

अर्थ: जिनमें नाना प्रकारके रत्नोंका प्रकाश फैल रहा था और जो ऊँचे-ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित थे ऐसे विमानोंके समूहसे आकाश कहीं चलते-फिरते स्वर्गलोकके समान जान पड़ता था ॥४७॥


पृथ्व्या किं मगधाधीश गिरात्र परिकीर्णया । मन्ये तत्सैन्यमालोक्य बिभ्युस्त्रिदशा अपि ॥४८॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि मगधेश्वर ! इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? मुझे तो ऐसा लगता है कि रावणकी सेना देखकर देव भी भयभीत हो रहे थे ॥४८॥


इन्द्रजिन्मेघवाहश्च कुम्भकर्णो विभीषणः । खरदूषणनामा च निकुम्भः कुम्भसंज्ञकः ॥४९॥

एते चान्ये च बहवः स्वजना रणकोविदाः । सिद्धविद्यामहाभासः शस्त्रशास्त्रकृतश्रयाः ॥५०॥

महासाधनसंपन्ना ह्रेपयन्तः सुरश्रियम् । अनुजग्मुरतिप्रीता रावणं पृथुकीर्तयः ॥५१॥

अर्थ: जिन्हें विद्यारूपी महाप्रकाश प्राप्त था और शस्त्र तथा शास्त्रमें जिन्होंने परिश्रम किया था ऐसे इन्द्रजित्, मेघवाहन, कुम्भकर्ण, विभीषण, खरदूषण, निकुम्भ और कुम्भ, ये तथा इनके सिवाय युद्धमें कुशल अन्य अनेक आत्मीयजन रावणके पीछे- पीछे चल रहे थे । ये सभी लोग बड़ी-बड़ी सेनाओंसे सहित थे, इन्द्रकी लक्ष्मीको लजाते थे, अत्यन्त प्रीतिसे युक्त थे और विशाल कीर्तिके धारक थे ॥४९-५१॥


ततो विन्ध्यान्तिके तस्य जगामास्तं दिवाकरः । बैलक्ष्यादिव निच्छायो जितो रावणतेजसा ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर जब रावण विन्ध्याचलके समीप पहुँचा तब सूर्य अस्त हो गया सो रावणके तेजसे पराजित होनेके कारण लज्जासे ही मानो प्रभाहीन हो गया था ॥५२॥


उत्तमाङ्गे च विन्ध्यस्य तेन सैन्यं निवेशितम् । विद्याबलसमुद्भूतैर्नानाकृतसमाश्रयम् ॥५३॥

अर्थ: सूर्यास्त होते ही उसने विन्ध्याचलके शिखरपर सेना ठहरा दी । वहाँ विद्याके बलसे सेनाको नाना प्रकारके आश्रय प्राप्त हुए थे ॥५३॥


प्रदीप इव चानीतः क्षपया तस्य भीतया । करदूरीकृतध्वान्तपटलो रोहिणीपतिः ॥५४॥

अर्थ: किरणोंके द्वारा अन्धकारके समूहको दूर करनेवाला चन्द्रमा उदित हुआ सो मानो रावणसे डरी हुई रात्रिने उत्तम दीपक ही लाकर उपस्थित किया था ॥५४॥


तारागणशिरःपुष्पा शशाङ्कवदना निशा । प्राप्ता वराङ्गनेवैतं विमलाम्बरधारिणी ॥५५॥

अर्थ: तारागण ही जिसके सिरके पुष्प थे, चन्द्रमा ही जिसका मुख था, और जो निर्मल अम्बर (आकाश) रूपी अम्बर (वस्त्र) धारण कर रही थी ऐसी उत्तम नायिकाके समान रात्रि रावणके समीप आयी ॥५५॥


संकथाभिर्विचित्राभिर्व्यापारैश्च तथोचितैः । सुखेन रजनी नीता निद्रया च नभश्चरैः ॥५६॥

अर्थ: विद्याधरोंने नाना प्रकारकी कथाओंसे, योग्य व्यापारोंसे तथा अनुकूल निद्रासे वह रात्रि व्यतीत की ॥५६॥


ततः प्रभाततूर्येण मङ्गलैश्च प्रबोधितः । चकार रावणः कर्म सकलं तनुगोचरम् ॥५७॥

अर्थ: तदनन्तर प्रातःकालकी तुरही और वन्दीजनोंके मांगलिक शब्दोंसे जागकर रावणने शरीर सम्बन्धी समस्त कार्य किये ॥५७॥


भ्रान्त्वेव भुवनं सर्वमदृष्ट्वान्यं समाश्रयम् । पुनः शरणमायातो रावणं पद्मबान्धवः ॥५८॥

अर्थ: सूर्योदय हुआ सो मानो सूर्य समस्त जगह भ्रमण कर अन्य आश्रय न देख पुनः रावणकी शरणमें आया ॥५८॥


ततो नानाशकुन्तौघैः कुर्वद्भिर्मधुरस्वरम् । संभाषणमिव भ्रष्टमर्यादं कुर्वतीमयम् ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने नर्मदा नदी देखी । नर्मदा मधुर शब्द करनेवाले नाना पक्षियोंके समूहके साथ मानो अत्यधिक वार्तालाप ही कर रही थी ॥५९॥


ददर्श नर्मदां फेनपटलैः सस्मितामिव । शुद्धस्फटिकसंकाशसलिलां द्विपभूषिताम् ॥६०॥

अर्थ: फेनके समूहसे ऐसी जान पड़ती थी मानो हँस ही रही हो । उसका जल शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल था और वह हाथियोंसे सुशोभित थी ॥६०॥


तरङ्गभ्रूविलासाढ्यामावर्तोत्तमनाभिकाम् । विस्फुरच्छफरीनेत्रां पुलिनोरुकलत्रिकाम् ॥६१॥

नानापुष्पसमाकीर्णां विमलोदकवाससम् । वराङ्गनामिवालोक्य महाप्रीतिमुपागतः ॥६२॥

अर्थ: वह नर्मदा तरंगरूपी भ्रुकुटीके विलाससे युक्त थी, आवर्तरूपी नाभिसे सहित थी, तैरती हुई मछलियाँ ही उसके नेत्र थे, दोनों विशाल तट हो स्थूल नितम्ब थे, नाना फूलोंसे वह व्याप्त थी और निर्मल जल ही उसका वस्त्र था । इस प्रकार किसी उत्तम नायिकाके समान नर्मदाको देख रावण महाप्रीतिको प्राप्त हुआ ॥६१-६२॥


उग्रनक्रकुलाक्रान्तां गम्भीरां वेगिनीं क्वचित् । क्वचिच्च प्रस्थितां मन्दं क्वचित्कुण्डलगामिनीम् ॥६३॥

अर्थ: वह नर्मदा कहीं तो उग्र मगरमच्छोंके समूहसे व्याप्त होनेके कारण गम्भीर थी, कहीं वेगसे बहती थी, कहीं मन्द गतिसे बहती थी और कहीं कुण्डलकी तरह टेढ़ी-मेढ़ी चालसे बहती थी ॥६३॥


नानाचेष्टितसंपूर्णां कौतुकव्याप्तमानसः । अवतीर्णः स तां भीमां रमणीयां च सादरः ॥६४॥

अर्थ: नाना चेष्टाओंसे भरी हुई थी, तथा भयंकर होनेपर भी रमणीय थी । जिसका चित्त कौतुकसे व्याप्त था ऐसे रावणने बड़े आदरके साथ उस नर्मदा नदीमें प्रवेश किया ॥६४॥


माहिष्मतीपुरेशोऽथ बलेन प्रथितो भुवि । सहस्ररश्मिरप्येतामवतीर्णोऽन्यया दिशा ॥६५॥

अर्थ: अथानन्तर जो अपने बलसे पृथिवीपर प्रसिद्ध था ऐसा माहिष्मतीका राजा सहस्ररश्मि भी उसी समय अन्य दिशासे नर्मदामें प्रविष्ट हुआ ॥६५॥


सहस्ररश्मिरेवैष सत्यं परमसुन्दरः । सहस्रं तस्य दाराणां यदत्यन्तसुतेजसाम् ॥६६॥

अर्थ: यह सहस्ररश्मि यथार्थमें परम सुन्दर था क्योंकि उत्कृष्ट कान्तिको धारण करनेवाली हजारों स्त्रियाँ उसके साथ थीं ॥६६॥


जलयन्त्राणि चित्राणि कृतानि वरशिल्पिभिः । समाश्रित्य स रेमेऽस्यामद्भुतानां विधायकः ॥६७॥

अर्थ: उसने उत्कृष्ट कलाकारोंके द्वारा नाना प्रकारके जलयन्त्र बनवाये थे सो उन सबका आश्रय कर आश्चर्यको उत्पन्न करनेवाला सहस्ररश्मि नर्मदामें उतरकर नाना प्रकारकी क्रीड़ा कर रहा था ॥६७॥


सागरस्यापि संरोद्धुमम्भः शक्तैर्नरैर्वृतः । यन्त्रसंवाहनाभिज्ञैः स्वेच्छयास्यां चचार सः ॥६८॥

अर्थ: उसके साथ यन्त्र निर्माणको जाननेवाले ऐसे अनेक मनुष्य थे जो समुद्रका भी जल रोकनेमें समर्थ थे फिर नदीकी तो बात ही क्या थी । इस प्रकार अपनी इच्छानुसार वह नर्मदामें भ्रमण कर रहा था ॥६८॥


जले यन्त्रप्रयोगेण क्षणेन विघृते सति । भ्रमन्ति पुलिने नार्यो नानाक्रीडनकोविदाः ॥६९॥

अर्थ: यन्त्रोंके प्रयोगसे नर्मदाका जल क्षण-भरमें रुक गया था इसलिए नाना प्रकारकी क्रीड़ामें निपुण स्त्रियाँ उसके तटपर भ्रमण कर रही थीं ॥६९॥


कलत्रनिविडाश्लिष्टसुसूक्ष्मविमलांशुकाः । बभूवुः सत्रपा दृष्टा रमणेन वराङ्गनाः ॥७०॥

अर्थ: उन स्त्रियोंके अत्यन्त पतले और उज्ज्वल वस्त्र जलका सम्बन्ध पाकर उनके नितम्ब स्थलोंसे एकदम श्लिष्ट हो गये थे इसलिए जब पति उनकी ओर आँख उठाकर देखता था तब वे लज्जासे गड़ जाती थीं ॥७०॥


विगतालेपना काचित् कुचौ नखपदाङ्कितौ । दर्शयन्ती चकारेर्ष्यां प्रतिपक्षस्य कामिनी ॥७१॥

अर्थ: शरीरका लेप धुल जानेके कारण जो नखक्षतोंसे चिह्नित स्तन दिखला रही थी ऐसी कोई एक स्त्री अपनी सौतके लिए ईर्ष्या उत्पन्न कर रही थी ॥७१॥


काचिद्दृश्यसमस्ताङ्गा वरयोषित् त्रपावती । अभिप्रियं निचिक्षेप कराभ्यां जलमाकुला ॥७२॥

अर्थ: जिसके समस्त अंग दिख रहे थे ऐसी कोई उत्तम स्त्री लजाती हुई दोनों हाथोंसे बड़ी आकुलताके साथ पतिकी ओर पानी उछाल रही थी ॥७२॥


प्रतिपक्षस्य दृष्ट्वान्या जघने करजक्षतीः । लीलाकमलनालेन जघान प्रमदा प्रियम् ॥७३॥

अर्थ: कोई अन्य स्त्री सौतके नितम्ब स्थलपर नखक्षत देखकर क्रीड़ाकमलकी नालसे पतिपर प्रहार कर रही थी ॥७३॥


काचित् कोपवती मौनं गृहीत्वा निश्चला स्थिता । पत्या पादप्रणामेन दयिता तोषमाहृता ॥७४॥

अर्थ: कोई एक स्वभावकी क्रोधिनी स्त्री मौन लेकर निश्चल खड़ी रह गयी थी तब पतिने चरणोंमें प्रणाम कर उसे किसी तरह सन्तुष्ट किया ॥७४॥


यावत्प्रसादयत्येकां तावदेत्यपरा रुषम् । यथाकथंचिदानिन्ये तोषं सर्वाः पुनर्नृपः ॥७५॥

अर्थ: राजा सहस्ररश्मि जबतक एक स्त्रीको प्रसन्न करता था तबतक दूसरी स्त्री रोषको प्राप्त हो जाती थी। इस कारण वह समस्त स्त्रियोंको बड़ी कठिनाईसे सन्तुष्ट कर सका था ॥७५॥


दर्शनात् स्पर्शनात् कोपात् प्रसादाद्विविधोदितात् । प्रणामाद्वारिनिक्षेपादवतंसकताडनात् ॥७६॥

वञ्चनादंशुकाक्षेपान्मेखलादामबन्धनात् । पलायनान्महारावात् संपर्कात् कुचकम्पनात् ॥७७॥

हासाद्भूषणनिक्षेपात् प्रेरणाद् भ्रूविलासतः । अन्तर्धानात् समुद्भूतेरन्यस्माच्च सुविभ्रमात् ॥७८॥

रेमे बहुरसं तस्यां स मनोहरदर्शनः । आवृतो वरनारीभिर्देवीभिरिव वासवः ॥७९॥

अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियोंसे घिरा, मनोहर रूपका धारक वह राजा, किसी स्त्रीकी ओर देखकर, किसीका स्पर्श कर, किसीके प्रति कोप प्रकट कर, किसीके प्रति अनेक प्रकारकी प्रसन्नता प्रकट कर, किसीको प्रणाम कर, किसीके ऊपर पानी उछालकर, किसीको कर्णा- भरणसे ताड़ित कर, किसीका धोखेसे वस्त्र खींचकर, किसीको मेखलासे बाँधकर, किसीके पाससे दूर हटकर, किसीको भारी डाँट दिखाकर, किसीके साथ सम्पर्क कर, किसीके स्तनोंमें कम्पन उत्पन्न कर, किसीके साथ हँसकर, किसीके आभूषण गिराकर, किसीको गुदगुदाकर, किसीके प्रति भौंह चलाकर, किसीसे छिपकर, किसीके समक्ष प्रकट होकर तथा किसीके साथ अन्य प्रकारके विभ्रम दिखाकर नर्मदा नदीमें बड़े आनन्दसे उस तरह क्रीड़ा कर रहा था जिस प्रकार कि देवियों-के साथ इन्द्र क्रीड़ा किया करता है ॥७६-७९॥


पतितान् सिकतापृष्ठे नालंकारान् पुनः स्त्रियः । आचकाङ्क्षुर्महाचित्ता निर्माल्यस्रग्गुणानिव ॥८०॥

अर्थ: उदार हृदयको धारण करनेवाली उन स्त्रियोंके जो आभूषण बालूके ऊपर गिर गये थे उन्होंने निर्माल्यकी मालाके समान फिर उन्हें उठानेकी इच्छा नहीं की थी ॥८०॥


काचिच्चन्दनलेपेन चकार धवलं जलम् । अन्या कुङ्कुमपङ्केन द्रुतचामीकरप्रभम् ॥८१॥

अर्थ: किसी स्त्रीने चन्दनके लेपसे पानीको सफेद कर दिया था तो किसीने केशरके द्रवसे उसे सुवर्णके समान पीला बना दिया था ॥८१॥


धौतताम्बूलरागाणामधराणां सुयोषिताम् । चक्षुषां व्यञ्जनानां च लक्ष्मीरभवदुत्तमा ॥८२॥

अर्थ: जिनकी पानकी लालिमा धुल गयी थी ऐसे स्त्रियोंके ओंठ तथा जिनका काजल छूट गया था ऐसे नेत्रोंकी कोई अद्भुत ही शोभा दृष्टि गोचर हो रही थी ॥८२॥


पुनश्च यन्त्रनिर्मुक्तैर्वारिमध्ये यथेप्सितम् । रेमे समं वरस्त्रीभिर्नरेशः स्मरहेतुभिः ॥८३॥

अर्थ: तदनन्तर यन्त्रके द्वारा छोड़े हुए जलके बीचमें वह राजा, काम उत्पन्न करनेवाली अनेक उत्कृष्ट स्त्रियोंके साथ इच्छानुसार क्रीड़ा करने लगा ॥८३॥


क्रीडन्तीभिर्जले स्त्रीभिर्भूषणानां वरो रवः । शकुन्तेष्विव विन्यस्तः कूलकीलालचारिषु ॥८४॥

अर्थ: उस समय तटके समीपवर्ती जलमें विचरण करनेवाले पक्षी मनोहर शब्द कर रहे थे सो ऐसा जान पड़ता था मानो जलके भीतर क्रीड़ा करनेवाली स्त्रियोंने अपने आभूषणोंका शब्द उनके पास धरोहर ही रख दिया हो ॥८४॥


रावणोऽपि सुखं स्नात्वा वसानो धौतवाससी । विधाय प्रयतो मौलिं शुक्लकर्पटसंयुतम् ॥८५॥

अर्थ: उधर यह सब चल रहा था इधर रावणने भी सुखपूर्वक स्नान कर धुले हुए उत्तम वस्त्र पहने और अपने मस्तकको बड़ी सावधानीसे सफेद वस्त्रसे युक्त किया ॥८५॥


नियुक्तैः सर्वदा पुम्भिरुह्यमानां प्रयत्नतः । प्रतिमामर्हतो रत्नहेमनिर्मितविग्रहाम् ॥८६॥

तरङ्गिणीनवे रम्ये पुलिने शुभ्रभासुरे । सिकतारचितोत्तुङ्गपीठबन्धविराजिते ॥८७॥

वैडूर्यदण्डिकासक्तमुक्ताफलवितानके । सर्वोपकरणव्यग्रपरिवर्गसमावृते ॥८८॥

अर्थ: जिसे नियुक्त मनुष्य सदा बड़ी सावधानीसे साथ लिये रहते थे ऐसी स्वर्ण तथा रत्ननिर्मित अर्हन्त भगवान्की प्रतिमा-को रावणने नदीके उस तीरपर स्थापित कराया जो कि नदीके बीच नया निकला था, मनोहर था, सफेद तथा देदीप्यमान था, बालूके द्वारा निर्मित ऊँचे चबूतरेसे सुशोभित था, जहाँ वैडूर्यमणि-की छड़ियोंपर चन्दोवा तानकर उसपर मोतियोंकी झालर लटकायी गयी थी, और जो सब प्रकार-के उपकरण इकट्ठे करनेमें व्यग्र परिजनोंसे भरा था ॥८६-८८॥


स्थापयित्वा घनामोदसमाकृष्टमधुव्रतैः । धूपैरालेपनैः पुष्पैर्मनोज्ञैर्बहुभक्तिभिः ॥८९॥

विधाय महतीं पूजां संनिविष्टः पुरोऽवनौ । सगर्भं वदनं चक्रे पूतैः स्तुत्यक्षरैश्चिरम् ॥९०॥

अर्थ: प्रतिमा स्थापित कर उसने भारी सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकर्षित करनेवाले धूप, चन्दन, पुष्प तथा मनोहर नैवेद्यके द्वारा बड़ी पूजा की और सामने बैठकर चिरकाल तक स्तुतिके पवित्र अक्षरोंसे अपने मुखको सहित किया ॥८९-९०॥


अकस्मादथ पूरेण हता पूजा समन्ततः । फेनबुद्बुदयुक्तेन कलुषेण तरस्विना ॥९१॥

अर्थ: अथानन्तर रावण पूजामें निमग्न था कि अचानक ही उसकी पूजा सब ओरसे फेन तथा बबूलोंसे युक्त, मलिन एवं वेगशाली जलके पूरसे नष्ट हो गयी ॥९१॥


ततो दशाननः क्षिप्रं गृहीत्वा प्रतियातनाम् । क्रुद्धो जगाद किन्त्वेतदिति विज्ञायतामरम् ॥९२॥

अर्थ: तब रावणने शीघ्र ही प्रतिमा ऊपर उठाकर कुपित हो लोगोंसे कहा कि मालूम करो क्या बात है ? ॥९२॥


ततोऽनुसृत्य वेगेन नरैः प्रतिनिवृत्य च । निवेदितमिदं नाथ कोऽप्ययं पुरुषो महान् ॥९३॥

मध्येललामनारीणां ललामपरमोदयः । दूरस्थेन नृलोकेन वेष्टितः खड्गधारिणा ॥९४॥

नानाकाराणि यन्त्राणि बृहन्ति सुबहूनि च । विद्यन्ते तस्य नूनं तैः कृतमेतद्विचेष्टितम् ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर लोगोंने वेगसे जाकर और वापस लौटकर निवेदन किया कि हे नाथ ! आभूषणोंसे परम अभ्युदयको प्रकट करनेवाला कोई मनुष्य सुन्दर स्त्रियोंके बीच बैठा है । तलवारको धारण करनेवाले मनुष्य दूर खड़े रहकर उसे घेरे हुए हैं । नाना प्रकारके बड़े-बड़े यन्त्र उसके पास विद्यमान हैं । निश्चय ही यह कार्य उन सब यन्त्रोंका किया है ॥९३-९५॥


व्यवस्थामात्रकं तस्य पुरुषा इति नो मतिः । अवष्टम्भस्तु यस्तस्य स एवान्यस्य दुःसहः ॥९६॥

अर्थ: हमारा ध्यान है कि उसके पास जो पुरुष हैं वे तो व्यवस्था मात्रके लिए हैं यथार्थमें उसका जो बल है वही दूसरोंके लिए दुःखसे सहन करने योग्य है ॥९६॥


वार्तया श्रूयते कोऽपि शक्रः स्वर्गे तथा गिरौ । अयं तु वीक्षितोऽस्माभिः शुनासीरः समक्षतः ॥९७॥

अर्थ: लोक-कथासे सुना जाता है कि स्वर्गमें अथवा सुमेरु पर्वतपर इन्द्र नामका कोई व्यक्ति रहता है पर हमने तो यह साक्षात् ही इन्द्र देखा है ॥९७॥


श्रुत्वा संकुचितभ्रूश्च रवं मुरजसंभवम् । वीणावंशादिभिर्युक्तं जयशब्दविमिश्रितम् ॥९८॥

गजवाजिनराणां च ध्वानमाज्ञपयन्नृपान् । त्वरितं गृह्यतामेष दुरात्मेति दशाननः ॥९९॥

अर्थ: उसी समय रावणने वीणा, बाँसुरी आदिसे युक्त तथा जय-जय शब्दसे निश्चित मृदंगका शब्द सुना । साथ ही हाथी, घोड़े और मनुष्योंका शब्द भी उसने सुना । सुनते ही उसकी भौंह चढ़ गयी । उसी समय उसने राजाओंको आज्ञा दी कि इस दुष्टको शीघ्र ही पकड़ा जाये ॥९८-९९॥


दत्त्वा चाज्ञां पुनश्चक्रे पूजां रोधसि सत्तमाम् । रत्नकाञ्चननिर्माणैः पुष्पैर्जिनवराकृतौ ॥१००॥

अर्थ: आज्ञा देकर रावण फिर नदीके किनारे रत्न तथा सुवर्ण निर्मित पुष्पोंसे जिनप्रतिमाकी उत्तम पूजा करने लगा ॥१००॥


शेषामिव दशास्याज्ञां कृत्वा शिरसि संभ्रमात् । अभ्यमित्रं ससन्नद्धाः प्रसस्रुर्व्योमगाधिपाः ॥१०१॥

अर्थ: विद्याधर राजाओं-ने रावणकी आज्ञा शेषाक्षतके समान मस्तकपर धारण की और तैयार हो वे शीघ्र ही शत्रुके सम्मुख दौड़ पड़े ॥१०१॥


दृष्ट्वा परबलं प्राप्तं सहस्रकिरणः क्षणात् । क्षुब्धो दत्वाभयं स्त्रीणां निर्जगाम जलाशयात् ॥१०२॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुदलको आया देख सहस्ररश्मि क्षण-भरमें क्षुभित हो गया और स्त्रियोंको अभय देकर शीघ्र ही जलाशयसे बाहर निकला ॥१०२॥


ततः कलकलं श्रुत्वा विदित्वा च नरौघतः । संनह्य निर्ययुर्वीरा माहिष्मत्याः ससंभ्रमम् ॥१०३॥

अर्थ: तत्पश्चात् कल-कल सुनकर और जनसमूहसे सब समाचार जानकर माहिष्मतीके वीर शीघ्र ही तैयार हो बाहर निकल पड़े ॥१०३॥


गजवाजिसमारूढाः पादातेन समावृताः । रथारूढाश्च सामन्ता विविधायुधधारिणः ॥१०४॥

सहस्रकिरणं प्राप्ता नितान्तमनुरागिणः । ऋतवः क्रमनिर्मुक्ताः संमेदमिव पर्वतम् ॥१०५॥

अर्थ: जिस प्रकार वसन्त आदि ऋतुएँ सम्मेदाचलके पास एक साथ आ पहुँचती हैं उसी प्रकार नाना तरहके शस्त्रोंको धारण करनेवाले बहुत भारी अनुरागसे भरे सामन्त सहस्र-रश्मिके पास एक साथ आ पहुँचे । वे सामन्त हाथियों, घोड़ों और रथोंपर सवार थे तथा पैदल चलनेवाले सैनिकोंसे युक्त थे ॥१०४-१०५॥


आपतन्तीं ततो दृष्ट्वा विद्याधरवरूथिनीम् । सहस्ररश्मिसामन्तास्त्यक्त्वा जीवितलोभिताम् ॥१०६॥

विरचय्य घनव्यूहमन्योऽन्यं पालनोद्यताः । विनापि भर्तृवाक्येन सोत्साहा योद्धुमुत्थिताः ॥१०७॥

अर्थ: परस्पर एक दूसरेकी रक्षा करनेमें तत्पर तथा उत्साहसे भरे सहस्ररश्मिके सामन्तोंने जब विद्याधरोंकी सेना आती देखी तो वे जीवनका लोभ छोड़ मेघव्यूहकी रचना कर स्वामीकी आज्ञाके बिना ही युद्ध करनेके लिए उठ खड़े हुए ॥१०६-१०७॥


बले च राक्षसेशस्य रणं कर्तुं समुद्यते । विचेरुरम्बरे वाचः सुराणामिति सत्वराः ॥१०८॥

अर्थ: इधर जब रावणकी सेना युद्ध करनेके लिए उद्यत हुई तब आकाशमें सहसा देवताओंके निम्नांकित वचन विचरण करने लगे ॥१०८॥


अहो महानयं वीरैरन्यायः कर्तुमीप्सितः । भूगोचरैः समं योद्धुमुद्यता यन्नभश्चराः ॥१०९॥

अर्थ: देवताओंने कहा कि अहो ! वीर लोग यह बड़ा अन्याय करना चाहते हैं कि भूमिगोचरियोंके साथ विद्याधर युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए हैं ॥१०९॥


अमी भूगोचराः स्वल्पा वराका ऋजुचेतसः । विद्यामायाकृतोऽत्यन्तं बहवश्च नभश्चराः ॥११०॥

अर्थ: ये बेचारे भूमिगोचरी थोड़े तथा सरल चित्त हैं और विद्याधर इनके विपरीत विद्या तथा मायाको करनेवाले एवं संख्यामें बहुत हैं ॥११०॥


इति श्रुत्वाथ खे शब्दं पुनरुक्तं समाकुलम् । त्रपायुक्ता भुवं याताः खेचराः साधुवृत्तयः ॥१११॥

अर्थ: इस प्रकार आकाशमें बार-बार कहे हुए इस आकुलतापूर्ण शब्दको सुनकर अच्छी प्रवृत्तिवाले विद्याधर लज्जासे युक्त होते हुए पृथिवीपर आ गये ॥१११॥


असिबाणगदाप्रासैरथ जघ्नुः परस्परम् । तुल्यप्रतिभटारब्धे रणे रावणमानवाः ॥११२॥

अर्थ: तदनन्तर समान योद्धाओंके द्वारा प्रारम्भ किये हुए युद्धमें रावणके पुरुष परस्पर तलवार, बाण, गदा और भाले आदिसे प्रहार करने लगे ॥११२॥


रथिनो रथिभिः सार्धं तुरङ्गास्तुरगैरमा । साकं गजैर्गजाः सत्रा पादातं च पदातिभिः ॥११३॥

अर्थ: रथोंके सवार रथोंके सवारोंके साथ, घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ, हाथियोंके सवार हाथियोंके सवारोंके साथ, और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने लगे ॥११३॥


न्यायेन योद्धुमारब्धाः क्रमानीतपराजयाः । शस्त्रसंपातनिष्पेषसमुत्थापितवह्नयः ॥११४॥

अर्थ: जिन्हें क्रम-क्रमसे पराजय प्राप्त हो रहा था और जिनके शस्त्र-समूहकी टक्करसे अग्नि उत्पन्न हो रही थी ऐसे योद्धाओंने न्यायपूर्वक युद्ध करना शुरू किया ॥११४॥


भङ्गासन्नं ततः सैन्यं निजं वीक्ष्य परैर्द्रुतम् । सहस्ररश्मिरारुह्य रथमुद्धं समागतः ॥११५॥

अर्थ: जब सहस्ररश्मिने अपनी सेनाको शीघ्र ही नष्ट होनेके निकट देखा तब उत्तम रथपर सवार हो तत्काल आ पहुँचा ॥११५॥


किरीटी कवची चापि तेजो बिभ्रदनुत्तमम् । विद्याधरबलं दृष्ट्वा स न बिभ्ये मनागपि ॥११६॥

अर्थ: उत्तम किरीट और कवचको धारण करनेवाला सहस्ररश्मि उत्कृष्ट तेजको धारण करता था इसलिए विद्याधरोंकी सेना देख वह जरा भी भयभीत नहीं हुआ ॥११६॥


स्वामिनाधिष्ठिताः सन्तस्ततः प्रत्यागतौजसः । उद्गूर्णविस्फुरच्छत्रा विस्मृतक्षतवेदनाः ॥११७॥

प्रविष्टा रक्षसां सैन्यं रणशौण्डा महीचराः । स्तम्बेरमा इवोद्भूतमदा गम्भीरमर्णवम् ॥११८॥

अर्थ: तदनन्तर स्वामीसे सहित होनेके कारण जिनका तेज पुनः वापस आ गया था, जिनके ऊपर खुले हुए छत्र लग रहे थे और जिन्होंने घावोंका कष्ट भुला दिया था ऐसे रणनिपुण भूमिगोचरी राक्षसोंकी सेनामें इस प्रकार घुस गये जिस प्रकार कि मदोन्मत्त हाथी गहरे समुद्रमें घुस जाते हैं ॥११७-११८॥


ततः सहस्रकिरणो बिभ्राणः कोषमुन्नतम् । परांश्चिक्षेप बाणौघैर्घनानिव सदागतिः ॥११९॥

अर्थ: जिस प्रकार वायु मेघोंको उड़ा देता है उसी प्रकार अत्यधिक क्रोधको धारण करनेवाला सहस्ररश्मि बाणोंके समूहसे शत्रुओंको उड़ाने लगा ॥११९॥


प्रतीहारेण चाख्यातमिति कैलासकम्पिने । देव पश्य नरेन्द्रेण केनाप्येतेन ते बलम् ॥१२०॥

धानुष्केण रथस्थेन पश्यता तृणवज्जगत् । योजनं यावदध्वानं शरौघैरपसारितम् ॥१२१॥

अर्थ: यह देख द्वारपालने रावणसे निवेदन किया कि हे देव ! देखो जगत्को तृणके समान तुच्छ देखनेवाले, रथपर बैठे धनुषधारी इस किसी राजाने बाणोंके समूहसे तुम्हारी सेनाको एक योजन पीछे खदेड़ दिया है ॥१२०-१२१॥


ततोऽभिमुखमायातं तमालोक्य यमार्दनः । आरुह्य त्रिजगद्भूषनामानं मत्तवारणम् ॥१२२॥

परैरालोकितो भीतैर्विमुक्तशरसंहतिः । सहस्रकिरणं चक्रे विरथं दुःसहद्युतिः ॥१२३॥

अर्थ: तदनन्तर सहस्ररश्मिको सम्मुख आता देख दशानन त्रिलोकमण्डन नामक हाथीपर सवार हो चला । शत्रु जिसे भयभीत होकर देख रहे थे तथा जिसका तेज अत्यन्त दुःसह था ऐसे रावणने बाणोंका समूह छोड़कर सहस्ररश्मिको रथरहित कर दिया ॥१२२-१२३॥


ततः सहस्रकिरणः समारुह्य द्विपोत्तमम् । अभीयाय पुनः क्रुद्धस्तरसा राक्षसाधिपम् ॥१२४॥

अर्थ: तब सहस्ररश्मि उत्तम हाथीपर सवार हो क्रुद्ध होता हुआ वेगसे पुनः रावणके सम्मुख आया ॥१२४॥


सहस्ररश्मिना मुक्ता बाणा निर्भिद्य कङ्कटम् । अङ्गानि दशवक्त्रस्य बिभिदुर्निशिताननाः ॥१२५॥

अर्थ: इधर सहस्ररश्मिके द्वारा छोड़े हुए पैने बाण कवचको भेदकर रावणके अंगोंको विदीर्ण करने लगे ॥१२५॥


रत्नश्रवःसुतेनास्तान्बाणानाकृष्य देहतः । सहस्रकिरणो हासं कृत्वेत्यवददुन्नतम् ॥१२६॥

अर्थ: उधर रावणने सहस्ररश्मिके प्रति जो बाण छोड़े थे उन्हें वह शरीरसे खींचकर हँसता हुआ जोरसे बोला ॥१२६॥


अहो रावण धानुष्को महानसि कुतस्तव । उपदेशोऽयमायातो गुरोः परमकौशलात् ॥१२७॥

अर्थ: कि अहो रावण ! तुम तो बड़े धनुर्धारी मालूम होते हो । यह उपदेश तुम्हें किस कुशल गुरुसे प्राप्त हुआ है ? ॥१२७॥


वत्स तावद्धनुर्वेदमधीष्व कुरु च श्रमम् । ततो मया समं युद्धं करिष्यसि नयोज्झितः ॥१२८॥

अर्थ: अरे छोकड़े ! पहले धनुर्वेद पढ़ और अभ्यास कर, फिर मेरे साथ युद्ध करना । तू नीतिसे रहित जान पड़ता है ॥१२८॥


ततः परुषवाक्येन प्राप्तः संरम्भमुत्तमम् । बिभेद यक्षमर्दस्तं कुन्तेनालिकपट्टके ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर उक्त कठोर वचनोंसे बहुत भारी क्रोधको प्राप्त हुए रावणने एक भाला सहस्ररश्मिके ललाटपर मारा ॥१२९॥


गलद्रुधिरधारोऽसौ घूर्णमाननिरीक्षणः । मोहं गत्वा समाश्वस्तो यावद् गृह्णाति सायकम् ॥१३०॥

तावदुत्प्लुत्य वेगेन तमष्टापदकम्पनः । अनुज्झितमहाधैर्यं जीवग्राहं गृहीतवान् ॥१३१॥

अर्थ: जिससे रुधिरकी धारा बहने लगी तथा आँखें घूमने लगीं । मूर्छित हो पुनः सावधान होकर जबतक वह बाण ग्रहण करता है तबतक रावणने वेगसे उछलकर उस धैर्यशालीको जीवित ही पकड़ लिया ॥१३०-१३१॥


नीतः स्वनिलयं बद्ध्वा खगैर्दृष्टः सविस्मयैः । यदि नामोत्पतेत् सोऽपि केन गृह्येत जन्तुना ॥१३२॥

अर्थ: रावण उसे बाँधकर अपने डेरेपर ले गया । विद्याधर उसे बड़े आश्चर्यसे देख रहे थे । वे सोच रहे थे कि यदि यह किसी तरह उछलकर छूटता है तो फिर इसे कौन पकड़ सकेगा ? ॥१३२॥


सहस्ररश्मिवृत्तान्तादिव नीतिमुपागतः । सहस्ररश्मिरैदस्तं संध्याप्राकारवेष्टितः ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर सन्ध्यारूपी प्राकारसे वेष्टित होता हुआ सूर्य अस्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो सहस्ररश्मिके इस वृत्तान्तसे उसने कुछ नीतिको प्राप्त किया था अर्थात् शिक्षा ग्रहण की थी ॥१३३॥


दशवक्त्रविमुक्तेन कोपेनेव च भूरिणा । तमसा पिहितो लोकः सदसत्समताकृता ॥१३४॥

अर्थ: अच्छे और बुरेको समान करनेवाले अन्धकारसे लोक आच्छादित हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो रावणके द्वारा छोड़े हुए बहुत भारी क्रोधसे ही आच्छादित हुआ हो ॥१३४॥


ततो रणादिव प्राप्तमत्यन्तविमलं यशः । शशाङ्कबिम्बमुद्यातं तमोहरणपण्डितम् ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर अन्धकारके हरनेमें निपुण चन्द्रमाका बिम्ब उदित हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो युद्धसे उत्पन्न हुआ रावणका अत्यन्त निर्मल यश ही हो ॥१३५॥


व्रणभङ्गविधानेन भटानां वीर्यवर्णनैः । गवेषणैश्च भिन्नानां निद्रया चाक्षतात्मनाम् ॥१३६॥

गता राक्षससैन्यस्य रजनी सा यथायथम् । विबुद्धश्च दशग्रीवः प्रभातहततूर्यतः ॥१३७॥

अर्थ: उस समय कोई तो घायल सैनिकोंके घावोंपर मरहमपट्टी लगा रहे थे, कोई योद्धाओंके पराक्रमका वर्णन कर रहे थे, कोई गुमे हुए सैनिकोंकी तलाश कर रहे थे और कोई, जिन्हें घाव नहीं लगे थे सो रहे थे। इस प्रकार यथायोग्य कार्योंसे रावणकी सेनाकी रात्रि व्यतीत हुई। प्रभात हुआ तो प्रभात सम्बन्धी तुरहीके शब्दसे रावण जागृत हुआ ॥१३६-१३७॥


ततो वार्तामिव ज्ञातुं दशवक्त्रस्य भास्करः । बिभ्राणः परमं रागं कम्पमानः समागतः ॥१३८॥

अर्थ: तदनन्तर परम रागको धारण करता हुआ सूर्य काँपता-काँपता उदित हुआ सो ऐसा जान पड़ता था मानो रावणका समाचार जाननेके लिए उदित हुआ हो ॥१३८॥


शतबाहुरथ श्रुत्वा सुतं बद्धं निरम्बरः । जङ्घाचारणलब्धीशो महाबाहुर्महातपाः ॥१३९॥

रजनीपतिवत्कान्तो दीप्तस्तिग्ममरीचिवत् । मेरुवत् स्थैर्यसंपन्नो धीरो रत्नालयो यथा ॥१४०॥

कृतप्रत्यङ्गकर्माणं सभामध्यसुखस्थितम् । प्रशान्तमानसः प्राप रावणं लोकवत्सलः ॥१४१॥

अर्थ: अथानन्तर सहस्ररश्मिके पिता शतबाहु, जो दिगम्बर थे, जिन्हें जंघाचारण ऋद्धि प्राप्त थी, जो महाबाहु, महातपस्वी, चन्द्रमाके समान सुन्दर, सूर्यके समान तेजस्वी, मेरुके समान स्थिर और समुद्रके समान गम्भीर थे, पुत्रको बँधा सुनकर रावणके समीप आये। उस समय रावण अपने शरीरसम्बन्धी कार्योंसे निपटकर सभाके बीचमें सुखसे बैठा था और मुनिराज शतबाहु प्रशान्त-चित्त एवं लोगोंसे स्नेह करनेवाले थे ॥१३९-१४१॥


दूरादेव ततो दृष्ट्वा मुनिं कैलासकम्पनः । अभ्युत्तस्थौ प्रणामं च चक्रे भूमिस्थमस्तकः ॥१४२॥

अर्थ: रावण, मुनिराजको दूरसे ही देखकर खड़ा हो गया। उसने सामने जाकर तथा पृथ्वीपर मस्तक टेककर नमस्कार किया ॥१४२॥


वरासनोपविष्टे च यतौ भूमावुपाविशत् । करद्वयं समासाद्य विनयानतविग्रहः ॥१४३॥

अर्थ: जब मुनिराज उत्कृष्ट प्रासुक आसनपर विराजमान हो गये तब रावण पृथ्वीपर दोनों हाथ जोड़कर बैठ गया। उस समय उसका सारा शरीर विनयसे नम्रीभूत था ॥१४३॥


जगाद चेति भगवन् कृतकृत्यस्य विद्यते । न तवागमने हेतुर्विहाय मम पावनम् ॥१४४॥

अर्थ: रावणने कहा कि हे भगवन् ! आप कृतकृत्य हैं अतः मुझे पवित्र करनेके सिवाय आपके यहाँ आनेमें दूसरा कारण नहीं है ॥१४४॥


ततः प्रशंसनं कृत्वा कुलवीर्यविभूतिभिः । क्षरन्निवामृतं वाचा जगादेति दिगम्बरः ॥१४५॥

अर्थ: तब कुल, वीर्य और विभूतिके द्वारा रावणकी प्रशंसा कर वचनोंसे अमृत झराते हुए की तरह मुनिराज कहने लगे कि ॥१४५॥


आयुष्मन्निदमस्त्येव शुभसंकल्पतस्तव । नान्तरीयकमेतत्तु वदामि यदिदं शृणु ॥१४६॥

अर्थ: हे आयुष्मन् ! तुम्हारे शुभ संकल्पसे यही बात है फिर भी मैं एक बात कहता हूँ सो सुन ॥१४६॥


पराभिभवमात्रेण क्षत्रियाणां कृतार्थता । यतः सहस्रकिरणं ततो मुञ्च ममाङ्गजम् ॥१४७॥

अर्थ: यतश्च शत्रुओंका पराभव करने मात्रसे क्षत्रियोंके कृतकृत्यपना हो जाता है अतः तुम मेरे पुत्र सहस्ररश्मिको छोड़ दो ॥१४७॥


संप्रधार्य ततः सार्धमिङ्गितैरेषै मन्त्रिभिः । उवाच कैकसीपुत्रः प्रणतो मुनिपुङ्गवम् ॥१४८॥

विज्ञापयामि नाथाहं प्रस्थितः खेचराधिपम् । वशीकर्तुं श्रिया मत्तं कृतास्मत्पूर्वजागसम् ॥१४९॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने मन्त्रियोंके साथ इशारोंसे सलाह कर नम्र हो मुनिराजसे कहा कि हे नाथ ! मेरा निम्न प्रकार निवेदन है। मैं इस समय राजलक्ष्मीसे उन्मत्त एवं हमारे पूर्वजोंका अपराध करनेवाले विद्याधराधिपति इन्द्रको वश करनेके लिए प्रयाण कर रहा हूँ ॥१४८-१४९॥


तत्र याते हि रेवायां रम्यायां जिनपूजनम् । मया तटस्थचक्रेण कृतं विमलसैकते ॥१५०॥

सहोपकरणैश्चासौ नीता पूजा सुरंहसा । सहसा पयसा यन्त्ररचितेनास्य मोगिनः ॥१५१॥

अर्थ: सो इस प्रयाणकालमें मनोहर रेवा नदीके किनारे चक्ररत्न रखकर मैं बालूके निर्मल चबूतरेपर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए बैठा था सो इस भोगी - विलासी सहस्ररश्मिके यन्त्ररचित वेगशाली जलसे उपकरणोंके साथ-साथ मेरी वह सब पूजा अचानक बह गयी ॥१५०-१५१॥


ततो मया जिनेन्द्रार्चाध्वंसोद्भूतमहारुषा । कृतं कर्मेदमर्थेन न विना द्वेष्मि मानवान् ॥१५२॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्‌की पूजाके नष्ट हो जानेसे मुझे बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ सो इस क्रोधके कारण ही मैंने यह कार्य किया है। प्रयोजनके बिना मैं किसी मनुष्यसे द्वेष नहीं करता ॥१५२॥


न चानेनोदितं मह्यं संप्राप्ताय प्रमादिना । यथा ज्ञातं मया नेदं क्षम्यतामिति मानिना ॥१५३॥

अर्थ: जब मैं पहुँचा तब इस मानी एवं प्रमादीने यह भी नहीं कहा कि मुझे ज्ञान नहीं था अतः क्षमा कीजिए ॥१५३॥


भूचरान्मानुषाञ्जेतुं यो न शक्तः स खेचरान् । कथं जेष्यामि विद्याभिः कृतनानाविचेष्टितान् ॥१५४॥

अर्थ: जो भूमिगोचरी मनुष्योंको जीतनेके लिए समर्थ नहीं है वह विद्याओंके द्वारा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करनेवाले विद्याधरोंको कैसे जीत सकेगा ? ॥१५४॥


वशीकरोम्यतस्तावद्भूचरान्मानशालिनः । ततो विद्याधराधीशं सोपानक्रमयोगतः ॥१५५॥

अर्थ: यही सोचकर मैं पहले अहंकारी भूमिगोचरियोंको वश कर रहा हूँ। उसके बाद श्रेणीके क्रमसे विद्याधराधिपति इन्द्रको वश करूँगा ॥१५५॥


ततो वशीकृतस्यास्य मुक्तिर्न्याय्यैव किं पुनः । भवत्स्वाज्ञां प्रयच्छत्सु पुण्यवद्दृश्यमूर्तिषु ॥१५६॥

अर्थ: इसे मैं वश कर चुका हूँ अतः इसको छोड़ना न्यायोचित ही है फिर जिनके दर्शन केवल पुण्यवान् मनुष्योंको ही हो सकते हैं ऐसे आप आज्ञा प्रदान कर रहे हैं अतः कहना ही क्या है ? ॥१५६॥


अथेन्द्रजिदुवाचेदं साधु देवेन भाषितम् । को वा नयविदं नाथं मुक्त्वा जानाति भाषितुम् ॥१५७॥

अर्थ: तदनन्तर रावणके पुत्र इन्द्रजित्ने कहा कि आपने बिलकुल ठीक कहा है सो उचित ही है क्योंकि आप जैसे नीतिज्ञ राजाको छोड़कर दूसरा ऐसा कौन कह सकता है ? ॥१५७॥


ततो दशमुखादिष्टो मारीचोऽधिकृतैर्नरैः । आनाययत्सहस्रांशुं नग्नसायकपाणिभिः ॥१५८॥

अर्थ: तदनन्तर रावणका आदेश पाकर मारीच नामा मन्त्रीने हाथमें नंगी तलवार लिये हुए अधिकारी मनुष्योंके द्वारा सहस्ररश्मिको सभामें बुलवाया ॥१५८॥


तातस्य चरणौ नत्वा भूमौ चासावुपाविशत् । संमान्य च दशास्येन विरोषेणेति भाषितः ॥१५९॥

अर्थ: सहस्ररश्मि पिताके चरणोंमें नमस्कार कर भूमिपर बैठ गया। रावणने क्रोधरहित होकर बड़े सम्मानके साथ उससे कहा ॥१५९॥


अद्य प्रभृति मे भ्राता तुरीयस्त्वं महाबलः । जेष्यामि भवता साकं कृताखण्डलविभ्रमम् ॥१६०॥

अर्थ: कि आजसे तुम मेरे चौथे भाई हो । चूँकि तुम महाबलवान् हो अतः तुम्हारे साथ मैं इन्द्रकी विडम्बना करनेवाले राजा इन्द्रको जीतूँगा ॥१६०॥


स्वयंप्रभां च ते दास्ये मन्दोदर्याः कनीयसीम् । कृतं यद्भवता तच्च प्रमाणं मे वराकृते ॥१६१॥

अर्थ: मैं तुम्हारे लिए मन्दोदरीकी छोटी बहन स्वयंप्रभा दूँगा । हे सुन्दर आकृतिके धारक ! तुमने जो किया है वह मुझे प्रमाण है ॥१६१॥


सहस्ररश्मिरूचे च धिङ् मे राज्यमशाश्वतम् । आपातमात्ररम्याँश्च विषयान् दुःखभूयसः ॥१६२॥

अर्थ: सहस्ररश्मि बोला कि मेरे इस क्षणभंगुर राज्यको धिक्कार है। जो प्रारम्भमें रमणीय दिखते हैं और अन्तमें जो दुःखोंसे बहुल होते हैं उन विषयोंको धिक्कार है ॥१६२॥


स्वर्गं धिक्च्युतियोगेन धिग्देहं दुःखभाजनम् । धिङ् मां वञ्चितमत्यन्तं चिरकालं कुकर्मभिः ॥१६३॥

अर्थ: उस स्वर्गके लिए धिक्कार है जिससे कि च्युति अवश्यम्भावी है। दुःखके पात्रस्वरूप इस शरीरको धिक्कार है और जो चिरकाल तक दुष्ट कर्मोंसे ठगा गया ऐसे मुझे भी धिक्कार है ॥१६३॥


तत्करोमि पुनर्येन न पतामि भवार्णवे । गतिष्वत्यन्तदुःखासु निर्विण्णः पर्यटन्नहम् ॥१६४॥

अर्थ: अब तो मैं वह काम करूँगा जिससे कि फिर संसारमें नहीं पड़ूँ । अत्यन्त दुःखदायी गतियोंमें घूमता-घूमता मैं बहुत खिन्न हो चुका हूँ ॥१६४॥


उवाचेति दशास्यश्च ननु प्रवयसां नृणाम् । प्रव्रज्या शोभते भद्र त्वं च प्रत्यग्रयौवनः ॥१६५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें रावणने कहा कि हे भद्र ! दीक्षा तो वृद्ध मनुष्योंके लिए शोभा देती है अभी तो तुम नवयौवनसे सम्पन्न हो ॥१६५॥


सहस्रांशुरुवाचेति नैव मृत्युर्विवेकवान् । शरद्घन इवाकस्माद्देहो नाशं प्रपद्यते ॥१६६॥

अर्थ: सहस्ररश्मिने रावणकी बात काटते हुए बीचमें ही कहा कि मृत्युको ऐसा विवेक थोड़ा ही है कि वह वृद्ध जनको ही ग्रहण करे यौवनवालेको नहीं । अरे ! यह शरीर शरदृतुके बादलके समान अकस्मात् ही नष्ट हो जाता है ॥१६६॥


यदि नाम भवेत् सारः कश्चिद्भोगेषु रावण । तातेनैव न मे त्यक्तास्ते स्युरुत्तमबुद्धिना ॥१६७॥

अर्थ: हे रावण ! यदि भोगोंमें कुछ सार होता तो उत्तम बुद्धिके धारक पिताजीने ही उनका त्याग नहीं किया होता ॥१६७॥


इत्युक्त्वा तनये न्यस्य राज्यं परमनिश्चयः । क्षमितो दशवक्त्रेण प्राव्रजत्पितुरन्तिके ॥१६८॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने दृढ़ निश्चयके साथ पुत्रके लिए राज्य सौंपा और दशाननसे क्षमा याचना कर पिता शतबाहुके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥१६८॥


तेन चाभिहितः पूर्वमयोध्यायाः पतिः सुहृत् । अनरण्योऽनगारत्वं प्रपत्स्येऽहं यदा तदा ॥१६९॥

तुभ्यं वेदयितास्मीति तथायं तेन भाषितः । ज्ञापनार्थमतोऽनेन तस्मै संप्रेषिता नराः ॥१७०॥

अर्थ: सहस्ररश्मिने अपने मित्र अयोध्याके राजा अनरण्यसे पहले कह रखा था कि जब मैं दिगम्बर दीक्षा धारण करूँगा तब तुम्हारे लिए खबर दूँगा और अनरण्यने भी सहस्ररश्मिसे ऐसा ही कह रखा था सो इस कथनके अनुसार सहस्ररश्मिने खबर देनेके लिए अनरण्यके पास आदमी भेजे ॥१६९-१७०॥


ततोऽसौ कथिते पुम्भिः श्रुत्वा वाष्पाकुलेक्षणः । विललाप चिरं स्मृत्वा गुणांस्तस्य महात्मनः ॥१७१॥

अर्थ: गये हुए पुरुषोंने जब अनरण्यसे सहस्ररश्मिके वैराग्यकी वार्ता कही तो उसे सुनकर उसके नेत्र आँसुओंसे भर गये । उस महापुरुषके गुणोंका स्मरणकर वह चिरकाल तक विलाप करता रहा ॥१७१॥


विषादे च गते मान्यमित्युवाच महाबुधः । बन्धुस्तस्य समायातो रिपुवेषेण रावणः ॥१७२॥

अर्थ: जब विषाद कम हुआ तो महाबुद्धिमान् अनरण्यने कहा कि उसके पास रावण क्या आया मानो शत्रुके वेषमें भाई ही उसके पास आया ॥१७२॥


ऐश्वर्यपञ्जरान्तस्थो विषयैर्मोहितश्चिरम् । येनात्यन्तानुकूलेन नरपक्षी विमोचितः ॥१७३॥

अर्थ: वह रावण कि जिसने अत्यन्त अनुकूल होकर विषयोंसे मोहित हो चिरकाल तक ऐश्वर्यरूपी पिंजड़ेके अन्दर स्थित रहनेवाले इस मनुष्यरूपी पक्षीको मुक्त किया है ॥१७३॥


माहिष्मतीपतिर्धन्यः सांप्रतं यो भवार्णवम् । तितीर्षति यमध्वंसबोधपोतसमाश्रितः ॥१७४॥

अर्थ: माहिष्मतीके राजा सहस्ररश्मिको धन्य है जो रावणके सम्यग्ज्ञानरूपी जहाजका आश्रय ले संसाररूपी सागरको तैरना चाहता है ॥१७४॥


कृतार्थः सांप्रतं जातो यदन्तेऽत्यन्तदुःखदम् । पापं राज्याख्यमुज्झित्वा व्रतं जैनेश्वरं श्रितः ॥१७५॥

अर्थ: जो अन्तमें अत्यन्त दुःख देनेवाले राज्य नामक पापको छोड़कर जिनेन्द्रप्रणीत व्रतको प्राप्त हुआ है अब उसकी कृतकृत्यताका क्या पूछना ॥१७५॥


अभिनन्द्येति संविग्नः क्षिप्त्वा लक्ष्मीं शरीरजे । सुतेन ज्यायसा साकमनरण्योऽभवन्मुनिः ॥१७६॥

अर्थ: इस प्रकार सहस्ररश्मिकी प्रशंसाकर अनरण्य भी संसारसे भयभीत हो पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी सौंप बड़े पुत्रके साथ मुनि हो गया ॥१७६॥


येन केनचिदुदात्तकर्मणा कारणेन रिपुणेतरेण वा । निर्मितेन समवाप्यते मतिः श्रेयसी न तु निकृष्टकर्मणा ॥१७७॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जब उत्कृष्ट कर्मका निमित्त मिलता है तब शत्रु अथवा मित्र किसीके भी द्वारा इस जीवको कल्याणकारी बुद्धि प्राप्त हो जाती है पर जबतक निकृष्ट कर्मका उदय रहता है तबतक प्राप्त नहीं होती ॥१७७॥


यः प्रयोजयति मानसं शुभे यस्य तस्य परमः स बान्धवः । भोगवस्तुनि तु यस्य मानसं यः करोति परमारिरस्य सः ॥१७८॥

अर्थ: जो जिसके मनको अच्छे कार्यमें लगा देता है यथार्थमें वही उसका बान्धव है और जो जिसके मनको भोगोपभोगकी वस्तुओंमें लगाता है वही उसका वास्तविक शत्रु है ॥१७८॥


भावयन्निति सहस्रदीधितिं योऽनरण्यनृपतिं शृणोति च । संयुतं श्रमणशीलसंपदा स व्रजत्यमलतां यथा रविः ॥१७९॥

अर्थ: इस प्रकार सहस्ररश्मिका ध्यान करता हुआ जो मनुष्य मुनियोंके समान शीलरूपी सम्पदासे युक्त राजा अनरण्यका चरित्र सुनता है वह सूर्यके समान निर्मलताको प्राप्त होता है ॥१७९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशग्रीवप्रस्थाने सहस्ररश्म्यनरण्य-श्रामण्याभिधानं नाम दशमं पर्व ॥१०॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें दशाननके प्रयाणके समय राजा सहस्ररश्मि और अनरण्यकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला दशम पर्व पूर्ण हुआ ॥१०॥

११. एकादश पर्व (मरुत्वयज्ञध्वंसनपदानुगाभिधानं)

अथ कैलाससंक्षोभो यान् यान् मानवतो नृपान् । शृणोति धरणीयातांस्तांस्तान्सर्वाननीनमत् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रावणने पृथ्वीपर जिन-जिन राजाओंको मानी सुना उन सबको नम्रीभूत किया ॥१॥


वशीकृतैश्च संमानं प्रापितैर्वेष्टितो नृपैः । पश्यन् स्फीतपुरामुर्वी सुभूमश्चक्रभृद्यथा ॥२॥

अर्थ: जिन राजाओंको इसने वश किया था उनका सम्मान भी किया और ऐसे उन समस्त राजाओंसे वेष्टित होकर उसने बड़े-बड़े ग्रामोंसे सहित पृथ्वीको देखते हुए सुभूमचक्रवर्तीके समान भ्रमण किया ॥२॥


नानादेशसमुत्पन्नैर्नानाकारैर्नरैर्वृतः । नानाभूषाधरैर्नानामाषैर्विविधवाहनैः ॥३॥

अर्थ: इसके साथ नाना देशोंमें उत्पन्न हुए नाना आकारके मनुष्य थे। वे मनुष्य नाना प्रकारके आभूषण पहने हुए थे, नाना प्रकारकी उनकी चेष्टाएँ थीं और नाना प्रकारके वाहनोंपर वे आरूढ़ थे ॥३॥


कारयन् जीर्णचैत्यानां संस्कारान् परमां तथा । पूजां देवाधिदेवानां जिनेन्द्राणां सुभावितः ॥४॥

अर्थ: वह जीर्ण मन्दिरोंका जीर्णोद्धार कराता जाता था और देवाधिदेव जिनेन्द्रदेवकी बड़े भावसे पूजा करता था ॥४॥


ध्वंसयन् जिनविद्वेषकारिणः खलमानवान् । दुर्विधान् करुणायुक्तो धनेन परिपूरयन् ॥५॥

अर्थ: जैनधर्मके साथ द्वेष रखनेवाले दुष्ट मनुष्योंको नष्ट करता था और दरिद्र मनुष्योंको दयासे युक्त हो धनसे परिपूर्ण करता था ॥५॥


सम्यग्दर्शनसंशुद्धान् वत्सलः पूजयञ्जनान् । प्रणमन् श्रमणान् भक्त्या रूपमात्रश्रितानपि ॥६॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनसे शुद्ध जनोंकी बड़े स्नेहसे पूजा करता था और जो मात्र जैनमुद्राको धारण करनेवाले थे ऐसे मुनियोंको भी भक्तिपूर्वक प्रणाम करता था ॥६॥


उदीचीं प्रस्थितः काष्ठां प्रतापं दुस्सहं किरन् । यथोत्तरायणे भानुः पुण्यकर्मानुभावतः ॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार उत्तरायणके समय सूर्य दुःसह प्रताप बिखेरता हुआ उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान करता है उसी प्रकार रावणने भी पुण्य कर्मके उदयसे दुःसह प्रताप बिखेरते हुए उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥७॥


बलवांश्च श्रुतस्तेन राजा राजपुराधिपः । अभिमानं परं बिभ्रत्परप्रणतिवर्जितः ॥८॥

अर्थ: अथानन्तर रावणने सुना कि राजपुरका राजा बहुत बलवान् है। वह बहुत भारी अहंकारको धारण करता हुआ कभी किसीको प्रणाम नहीं करता है ॥८॥


जन्मप्रभृति दुश्चेता लौकिकोन्मार्गमोहितः । प्रविष्टः प्राणिविध्वंसं यज्ञदीक्षाख्यपातकम् ॥९॥

अर्थ: जन्मसे ही लेकर दुष्ट-चित्त है, लौकिक मिथ्या मार्गसे मोहित है, और प्राणियोंका विध्वंस करानेवाले यज्ञ दीक्षा नामक महापापको प्राप्त है अर्थात् यज्ञक्रियामें प्रवृत्त है ॥९॥


अथ यज्ञध्वनिं श्रुत्वा श्रेणिको गणपालिनम् । इत्यपृच्छद् विभो तावदास्तां रावणकीर्तनम् ॥१०॥

उत्पत्तिं भगवन्नस्य यज्ञस्येच्छामि वेदितुम् । प्रवृत्तो दारुणो यस्मिन् जैनो जन्तुविनाशने ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर यज्ञका कथन सुन राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे पूछा कि हे विभो ! अभी रावणकी कथा रहने दीजिए । पहले मैं इस यज्ञकी उत्पत्ति जानना चाहता हूँ कि जीवोंका विघात करनेवाले जिस यज्ञमें दुष्टजन प्रवृत्त हुए हैं ॥१०-११॥


उवाच च गणाधीशः शृणु श्रेणिक शोभनम् । भवता पृष्टमेतेन बहवो मोहिता जनाः ॥१२॥

अर्थ: तब गणधर बोले कि हे श्रेणिक ! सुन, तूने बहुत अच्छा प्रश्न किया है । इस यज्ञके द्वारा बहुत-से जन मोहित हो रहे हैं ॥१२॥


विनीतायां महानासीदिक्ष्वाकुकुलभूषणः । ययातिर्नाम राजास्य सुरकान्तेति भामिनी ॥१३॥

अर्थ: अयोध्यानगरीमें इक्ष्वाकुकुलका आभूषणस्वरूप एक ययाति नामका राजा था और सुरकान्ता नामकी उसकी रानी थी ॥१३॥


वसुर्नामाभवत्तस्य गुरोर्योग्यः स चार्पितः । नाम्ना क्षीरकदम्बस्य यस्य स्वस्तिमती प्रिया ॥१४॥

अर्थ: उन दोनोंके वसु नामका पुत्र हुआ । जब वह पढ़नेके योग्य हुआ तब क्षीरकदम्बक नामक गुरुके लिए सौंपा गया । क्षीरकदम्बककी स्त्रीका नाम स्वस्तिमती था ॥१४॥


अन्यदारण्यकं शास्त्रं सर्वशास्त्रविशारदः । अध्यापयत्यसौ शिष्यान्नारदादीन् वनान्तरे ॥१५॥

अर्थ: किसी एक दिन सर्वशास्त्रोंमें निपुण क्षीरकदम्बक, वनके मध्यमें नारद आदि शिष्योंको आरण्यकशास्त्र पढ़ा रहा था ॥१५॥


अथ चारणसाधूनां प्रस्थितानां विहायसा । एकेन यतिना प्रोक्तमेवं कारुण्यकारिणा ॥१६॥

चतुर्णां प्राणिनामेषामेको नरकभागिति । श्रुत्वा क्षीरकदम्बस्तद्वचो भीतोऽभवद् भृशम् ॥१७॥

अर्थ: वहीं आकाशमार्गसे विहार करनेवाले चारण मुनियोंका संघ विराजमान था । उनमें-से एक दयालु मुनिने इस प्रकार कहा कि इन चार प्राणियोंमें से एक नरकको प्राप्त होगा । मुनिके वचन सुन क्षीरकदम्बक अत्यन्त भयभीत हो गया ॥१६-१७॥


ततोऽन्तेवासिनस्तेन प्रेषिताः स्वस्वमालयम् । ययुस्तुष्टा यथा वत्सा मुक्ता दामकबन्धनात् ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर उसने नारद, पर्वत और वसु इन तीनों शिष्योंको अपने-अपने घर भेज दिया और वे शिष्य भी बन्धनसे छोड़े गये बछड़ोंके समान सन्तुष्ट होते हुए अपने-अपने घर गये ॥१८॥


स्वस्तिमत्यथ पप्रच्छ पुत्रं पर्वतसंज्ञकम् । क्व तवासौ पिता पुत्र येनैकाकी त्वमागतः ॥१९॥

अर्थ: जब पर्वत अकेला ही घर पहुँचा तब उसकी माता स्वस्तिमतीने पूछा कि हे पुत्र ! तुम्हारे पिता कहाँ हैं ? जिससे कि तुम अकेले ही आये हो ॥१९॥


पश्चादेमीति तेनोक्तमिति तस्यै जगाद सः । तदागमं च काङ्क्षन्त्यास्तस्या यातमहःक्षयम् ॥२०॥

अर्थ: पर्वतने माताको उत्तर दिया कि उन्होंने कहा था कि पीछे आते हैं । पतिके आगमनकी प्रतीक्षा करते हुए स्वस्तिमतीका दिन समाप्त हो गया ॥२०॥


नायातः स दिनान्तेऽपि यदा तिमिरगह्वरे । तदा शोकभराक्रान्ता पतितासौ महीतले ॥२१॥

अर्थ: जब दिनका बिलकुल अन्त हो गया और सघन अन्धकार फैल चुका फिर भी वह नहीं आया तब स्वस्तिमती शोकके भारसे आक्रान्त हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥२१॥


चक्रवाकीव दुःखार्ता विलापं चाकरोदिति । हा हता मन्दभाग्यास्मि प्राणानां स्वामिनोज्झिता ॥२२॥

अर्थ: वह दुःखसे पीड़ित हो चकवीके समान इस प्रकार विलाप करने लगी कि हाय-हाय मैं बड़ी मन्दभाग्य हूँ जो पतिके द्वारा छोड़ी गयी ॥२२॥


पापेन केनचिन्मृत्युं किमसौ प्रापितो भवेत् । किं वा देशान्तरं यातः कान्तः केनापि हेतुना ॥२३॥

अर्थ: क्या मेरा पति किसी पापी मनुष्यके द्वारा मृत्युको प्राप्त हुआ है अथवा किसी कारण परदेशको चला गया है ? ॥२३॥


सर्वशास्त्रार्थकुशलः किं वा वैराग्यमाश्रितः । सर्वसंगान् परित्यज्य प्रव्रज्यां समशिश्रियत् ॥२४॥

अर्थ: अथवा समस्त शास्त्रोंमें कुशल होनेसे वैराग्यको प्राप्त हो सर्व परिग्रहका त्याग कर मुनिदीक्षाको प्राप्त हुआ है ? ॥२४॥


विलापमिति कुर्वन्त्यास्तस्याः सा रजनी गता । अन्वेष्टुं पितरं चादावह्नः पर्वतको गतः ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार विलाप करते-करते स्वस्तिमतीकी रात्रि भी व्यतीत हो गयी । जब प्रातःकाल हुआ तब पर्वत पिताको खोजनेके लिए गया ॥२५॥


दृष्ट्वा सरित्तटोद्याने दिनैः कैश्चिद् गुरुं मुनिम् । गुरोः सङ्घसमेतस्य समीपे विनयस्थितम् ॥२६॥

अर्थ: लगातार कुछ दिनों तक खोज करनेके बाद पर्वतने देखा कि हमारे पिता नदीके तटवर्ती उद्यानमें मुनि होकर विद्यमान हैं । संघसहित गुरुके समीप विनयसे बैठे हैं ॥२६॥


आरादेव निवृत्याख्यन्मातरं च पिता मम । विप्रलब्धोऽभवन्नग्नः श्रमणैस्तत्परायणैः ॥२७॥

अर्थ: उसने दूरसे ही लौटकर मातासे कहा कि मेरा पिता नग्नमुनियों और उनके भक्तों द्वारा प्रतारित हो नग्न हो गया है ॥२७॥


ततो निश्चयविज्ञाततदसङ्गमदुःखिता । कराभ्यां भृशमाघ्नाना स्तनावरुरुदत् स्वनम् ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर स्वस्तिमतीने जब निश्चयसे यह जान लिया कि अब पतिका समागम मुझे प्राप्त नहीं होनेवाला है तब वह अत्यन्त दुःखी हुई । वह दोनों हाथोंसे स्तनोंको पीटती एवं जोरसे चिल्लाती हुई रुदन करने लगी ॥२८॥


नारदस्तमथ श्रुत्वा वृत्तान्तं धर्मवत्सलः । द्रष्टुमागादुपाध्यायीं क्षणं शोकसमाकुलः ॥२९॥

अर्थ: यह वृत्तान्त सुन धर्मस्नेही नारद शोकसे व्याकुल होता हुआ अपनी गुरानीको देखनेके लिए आया ॥२९॥


तं दृष्ट्वा सुतरां चक्रे स्तनताडनरोदनम् । निसर्गोऽयं यदाप्तस्य पुरः शोको विवर्धते ॥३०॥

अर्थ: उसे देख वह और भी अधिक स्तन पीटकर रोने लगी सो ठीक ही है क्योंकि यह स्वाभाविक बात है कि आप्तजनोंके समक्ष शोक बढ़ने लगता है ॥३०॥


जगाद नारदो मातः किं शोकं कुरुषे वृथा । कृते शोकेऽधुना नासावागच्छति विशुद्धधीः ॥३१॥

अर्थ: नारदने कहा कि हे माताजी ! व्यर्थ ही शोक क्यों करती हो ? क्योंकि इस समय शोक करनेसे निर्मल बुद्धिके धारक गुरुजी वापस नहीं आवेंगे ॥३१॥


कर्मणानुगृहीतोऽसौ चारुणा चारुचेष्टितः । जीवितं चञ्चलं ज्ञात्वा यस्तपः कर्तुमुद्यतः ॥३२॥

अर्थ: सुन्दर चेष्टाओंके धारक गुरुजीपर पुण्यकर्मने बड़ा अनुग्रह किया है कि जिससे वे जीवनको चंचल जानकर तप करनेके लिए उद्यत हुए हैं ॥३२॥


तनुतां बोध्यमानायाः शोकस्तस्या गतः क्रमात् । द्विषती च स्तुवाना च भर्तारं सा स्थिता गृहे ॥३३॥

अर्थ: इस प्रकार नारदके समझानेपर उसका शोक क्रम-क्रमसे हलका हो गया। स्वस्तिमती कभी तो पतिकी निन्दा करती थी कि वे एक अबलाको असहाय छोड़कर चल दिये और कभी उनके गुणोंका चिन्तवन कर स्तुति करती थी कि इनकी निर्लेपता कितनी उच्चकोटिकी थी। इस प्रकार निन्दा और स्तुति करती हुई वह घरमें रहने लगी ॥३३॥


एतस्मादेव चोदन्ताद् ययातिस्तत्त्वकोविदः । राज्यभारं वसोर्न्यस्य बभूव श्रमणो महान् ॥३४॥

अर्थ: इसी घटनासे तत्त्वोंका जानकार ययाति राजा भी वसुके लिए राज्यभार सौंपकर महामुनि हो गया ॥३४॥


सुप्रतिष्ठोऽभवद् राजा पृथिव्यां प्रथितो वसुः । नमःस्फटिकविस्तीर्णशिलास्थहरिविष्टरः ॥३५॥

अर्थ: नवीन राजा वसुकी पृथिवीपर बड़ी प्रतिष्ठा बढ़ी। आकाशस्फटिककी लम्बी-चौड़ी शिलापर उसका सिंहासन स्थित था सो लोकमें ऐसी प्रसिद्धि हुई कि सत्यके बलपर वसु आकाशमें निराधार स्थित है ॥३५॥


समं पर्वतकेनाथ नारदस्यान्यदाभवत् । कथेयं शास्त्रतत्त्वार्थनिरूपणपरायणा ॥३६॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन नारदकी पर्वतके साथ शास्त्रका वास्तविक अर्थ प्रकट करनेपर तत्पर निम्नलिखित चर्चा हुई ॥३६॥


जगाद नारदोऽर्हद्भिः सर्वज्ञैः सर्वदर्शिभिः । द्विविधो विहितो धर्मः सूक्ष्मोदारविशेषतः ॥३७॥

अर्थ: नारदने कहा कि सबको जानने-देखनेवाले अर्हन्त भगवान्ने अणुव्रत और महाव्रतके भेदसे धर्म दो प्रकारका कहा है ॥३७॥


हिंसाया अनृतात् स्तेयात् स्मरसंगात् परिग्रहात् । विरतेर्व्रतमुद्दिष्टं भावनाभिः समन्वितम् ॥३८॥

अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पाँच पापोंसे विरक्त होनेको व्रत कहते हैं। यह व्रत प्रत्येक व्रतकी पाँच-पाँच भावनाओंसे सहित होता है ॥३८॥


विरतिं सर्वतः कर्तुं ये शक्तास्ते महाव्रतम् । सेवन्तेऽणुव्रतं शेषा जन्तवो गृहमाश्रिताः ॥३९॥

अर्थ: जो उक्त पापोंका सर्वदेश त्याग करनेमें समर्थ हैं वे महाव्रत ग्रहण करते हैं और जो घरमें रहते हैं ऐसे शेषजन अणुव्रत धारग करते हैं ॥३९॥


संविभागोऽतिथीनां च तेषामुक्तो जिनाधिपैः । यज्ञाख्यावस्थितास्तस्मिन् भेदैः पात्रादिभिर्युतैः ॥४०॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्ने गृहस्थोंका एक व्रत अतिथिसंविभाग बतलाया है जो पात्रादिके भेदसे अनेक प्रकारका है । यज्ञका अन्तर्भाव इसी अतिथिसंविभाग व्रतमें होता है ॥४०॥


अजैर्यष्टव्यमित्यस्य वाक्यस्यार्थो दयापरः । अयं मुनिभिराख्यातो ग्रन्थार्थग्रन्थिभेदिभिः ॥४१॥

अर्थ: ग्रन्थोंके अर्थकी गाँठ खोलनेवाले दयालु मुनियोंने ‘अजैर्यष्टव्यम्’ इस वाक्यका यह अर्थ बतलाया है ॥४१॥


अजास्ते जायते येषां नाङ्कुरः सति कारणे । सस्यानां यजनं कार्यमेतैरिति विनिश्चयः ॥४२॥

अर्थ: कि अज उस पुराने धानको कहते हैं जिसमें कि कारण मिलनेपर भी अंकुर उत्पन्न नहीं होते । ऐसे धानसे ही यज्ञ करना चाहिए ॥४२॥


अजाः पशव उद्दिष्टा इति पर्वतकोऽवदत् । तेषामालम्भनं कार्यं तच्च यागोऽभिधीयते ॥४३॥

अर्थ: नारदकी इस व्याख्याको सुनकर तमककर पर्वत बोला कि नहीं अज नाम पशुका है अतः उनकी हिंसा करनी चाहिए यही यज्ञ कहलाता है ॥४३॥


नारदः कुपितोऽवोचत्ततः पर्वतकं खलम् । मैवं वोचः पतस्येवं नरके घोरवेदने ॥४४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें नारदने कुपित होकर दुष्ट पर्वतसे कहा कि ऐसा मत कहो क्योंकि ऐसा कहनेसे भयंकर वेदनावाले नरकमें पड़ोगे ॥४४॥


प्रतिज्ञां चाकरोदेवमावयोर्योऽवसीदति । वसुं प्राश्निकमासाद्य तस्य जिह्वा निकृत्यते ॥४५॥

अर्थ: अपने पक्षकी प्रबलता सिद्ध करते हुए नारदने यह प्रतिज्ञा भी की कि हम दोनों राजा वसुके पास चलें, वहाँ जो पराजित होगा उसकी जिह्वा काट ली जावे ॥४५॥


अतिक्रान्ता वसुं द्रष्टुं वेलाद्य श्वो विनिश्चयः । भवितेत्यभिधायागात् पर्वतो मातुरन्तिकम् ॥४६॥

अर्थ: ‘आज राजा वसुके मिलनेका समय निकल चुका है इसलिए कल इस बातका निश्चय होगा’ इतना कहकर पर्वत अपनी माताके पास गया ॥४६॥


तस्यै चाकथयन्मूलं कलहस्याभिमानवान् । ततो जगाद सा पुत्र त्वया निगदितं मृषा ॥४७॥

अर्थ: अभिमानी पर्वतने कलहका मूल कारण माताके लिए कह सुनाया । इसके उत्तरमें माताने कहा कि हे पुत्र ! तूने मिथ्या बात कही है ॥४७॥


कुर्वतोऽनेकशो व्याख्यां मया तव पितुः श्रुतम् । अजाः किलाभिधीयन्ते व्रीहयो येऽप्ररोहकाः ॥४८॥

अर्थ: अनेकों बार व्याख्या करते हुए तेरे पितासे मैंने सुना है कि अज उस धानको कहते हैं कि जिसमें अंकुर उत्पन्न नहीं होते ॥४८॥


देशान्तरं प्रयातेन मांसभक्षणकारिणा । मानाच्च वितथं प्रोक्तं तवेदं दुःखकारणम् ॥४९॥

अर्थ: तू देशान्तरमें जाकर मांस भक्षण करने लगा इसलिए अभिमानसे तूने यह मिथ्या बात कही है । यह बात तुझे दुःखका कारण होगी ॥४९॥


रसनाच्छेदनं पुत्र नियतं ते भविष्यति । अपुण्या किं करिष्यामि पतिपुत्रविवर्जिता ॥५०॥

अर्थ: हे पुत्र ! निश्चित ही तेरी जिह्वाका छेद होगा । मैं अभागिनी पति और पुत्रसे रहित होकर क्या करूँगी ? ॥५०॥


सस्मारँ सा पुरा प्रोक्तां वसुना गुरुदक्षिणाम् । न्यासभूतां गता चाशु वसोरन्तकमाकुला ॥५१॥

अर्थ: उसी क्षण उसे स्मरण आया कि एक बार राजा वसुने मुझे गुरु दक्षिणा देना कहा था और मैंने उसे धरोहरके रूपमें उन्हींके पास रख दिया था । स्मरण आते ही वह तत्काल घबड़ायी हुई राजा वसुके पास पहुँची ॥५१॥


उपाध्यायीति चोदारमादरं विदधे वसुः । प्रणम्य च सुखासीनां पप्रच्छ रचिताञ्जलिः ॥५२॥

अर्थ: ‘यह हमारी गुरानी है’ यह विचारकर राजा वसुने उसका बहुत सत्कार किया, उसे प्रणाम किया और जब वह आसनपर सुखसे बैठ गयी तब हाथ जोड़कर विनयसे पूछा ॥५२॥


उपाध्यायि नियच्छाज्ञामायाता येन हेतुना । सर्वं संपादयाम्याशु दुःखितेव च दृश्यते ॥५३॥

अर्थ: कि हे गुरानी ! मुझे आज्ञा दीजिए । जिस कारण आप आयी हैं मैं उसे अभी सिद्ध करता हूँ । आप दुःखी-सी क्यों दिखाई देती हैं ? ॥५३॥


उवाच स्वस्तिमत्येवं नित्यं पुत्रास्मि दुःखिता । प्राणनाथपरित्यक्ता का वा स्त्री सुखमृच्छति ॥५४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें स्वस्तिमतीने कहा कि हे पुत्र ! मैं तो निरन्तर दुःखी रहती हूँ क्योंकि पतिके द्वारा छोड़ी हुई कौन-सी स्त्री सुख पाती है ? ॥५४॥


संबन्धो द्विविधो यौनः शास्त्रीयश्च तयोः परम् । शास्त्रीयमेव मन्येऽहमयं मलविवर्जितः ॥५५॥

अर्थ: सम्बन्ध दो प्रकार-का है एक योनिसम्बन्धी और दूसरा शास्त्रसम्बन्धी । इन दोनोंमें मैं शास्त्रीय सम्बन्धको ही उत्तम मानती हूँ क्योंकि यह निर्दोष सम्बन्ध है ॥५५॥


अतो नाथस्य मे शिष्यः पुत्र एव भवानपि । पश्यन्ती भवतो लक्ष्मीं करोमि धृतिमात्मनः ॥५६॥

अर्थ: चूँकि तुम मेरे पतिके शिष्य हो अतः तुम भी मेरे पुत्र हो । तुम्हारी लक्ष्मीको देखते हुए मुझे सन्तोष होता है ॥५६॥


दक्षिणां च गृहाणेति पुत्र प्रोक्तं त्वया सुत । मया चोक्तं गृहीष्यामि कालेऽन्यस्मिन्निति स्मर ॥५७॥

अर्थ: हे पुत्र ! एक बार तुमने कहा था कि दक्षिणा ले लो तब मैंने कहा था कि फिर किसी समय ले लूँगी । स्मरण करो ॥५७॥


सत्यं वदन्ति राजानः पृथिवीपालनोद्यताः । ऋषयस्ते हि भाष्यन्ते ये स्थिता जन्तुपालने ॥५८॥

अर्थ: पृथिवीकी रक्षा करनेमें तत्पर राजा लोग सदा सत्य बोलते हैं । यथार्थमें जो जीवोंकी रक्षा करनेमें तत्पर हैं वे ही ऋषि कहलाते हैं ॥५८॥


सत्येन श्रावितः स त्वं मह्यं तां यच्छ दक्षिणाम् । इत्युक्तश्चावदद्राजा विनयानतमस्तकः ॥५९॥

अर्थ: तुम सत्यके कारण जगत्में प्रसिद्ध हो अतः मेरे लिए वह दक्षिणा दो । गुरानीके ऐसा कहनेपर राजा वसुने विनयसे मस्तक झुकाते हुए कहा ॥५९॥


अम्ब ते वचनादद्य करोम्यथ जुगुप्सितम् । वद यत्ते स्थितं चित्ते मा कृथा मतिमन्यथा ॥६०॥

अर्थ: कि हे माता ! तुम्हारे कहनेसे मैं आज घृणित कार्य भी कर सकता हूँ । जो बात तुम्हारे मनमें हो सो कहो अन्यथा विचार मत करो ॥६०॥


तमुदन्तं ततोऽशेषं निवेद्यास्मै जगाद सा । पुत्रस्यानृतमप्येतदनुमान्यं त्वया मम ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर स्वस्तिमतीने उसके लिए नारद और पर्वतके विवादका सब वृत्तान्त कह सुनाया और साथ ही इस बातकी प्रेरणा की कि यद्यपि मेरे पुत्रका पक्ष मिथ्या ही है तो भी तुम इसका समर्थन करो ॥६१॥


जानतापि ततो राज्ञा नीतेन स्थिरतां पुनः । मूढसत्यगृहीतेन प्रतिपन्नं तयोदितम् ॥६२॥

अर्थ: राजा वसु यद्यपि शास्त्रके यथार्थ अर्थको जानता था पर स्वस्तिमतीने उसे बार-बार प्रेरणा देकर अपने पक्षमें स्थिर रखा । इस तरह मूर्ख सत्यके वश हो राजाने उसकी बात स्वीकृत कर ली ॥६२॥


पुनरुक्तं प्रियं भूरि भाषित्वाशीःपुरस्सरम् । आनर्च्छ निलयं तुष्टा भृशं स्वस्तिमती ततः ॥६३॥

अर्थ: तदनन्तर स्वस्तिमती राजा वसुके लिए बार-बार अनेकों प्रिय आशीर्वाद देकर अत्यन्त सन्तुष्ट होती हुई अपने घर गयी ॥६३॥


अथान्यस्य दिनस्यादौ गतौ नारदपर्वतौ । समीपं क्षितिपालस्य कुतूहलिजनावृतौ ॥६४॥

अर्थ: अथानन्तर दूसरे दिन प्रातःकाल ही नारद और पर्वत राजा वसुके पास गये । कुतूहलसे भरे अनेकों लोग उनके साथ थे ॥६४॥


चतुर्विधो जनपदो नाना प्रकृतयस्तथा । सामन्ता मन्त्रिणश्चाशु विविशुर्जल्पमण्डलम् ॥६५॥

अर्थ: चार प्रकारके जनपद, नाना प्रजाजन, सामन्त और मन्त्री लोग शीघ्र ही उस वादस्थलमें आ पहुँचे ॥६५॥


ततस्तयोः सतां मध्ये विवादः सुमहानभूत् । व्रीहयोऽजा विबीजा ये पशवश्चेति वस्तुनि ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर सज्जनोंके बीच नारद और पर्वतका बड़ा भारी विवाद हुआ । उनमें-से नारद कहता था कि अजका अर्थ बीजरहित धान है और पर्वत कहता था कि अजका अर्थ पशु है ॥६६॥


ततस्ताभ्यां वसुः पृष्टो यदुपाध्याय उक्तवान् । तत्त्वं वद महाराज सत्येन श्रावितो भवान् ॥६७॥

अर्थ: जब विवाद शान्त नहीं हुआ तब उन्होंने राजा वसुसे पूछा कि हे महाराज ! इस विषयमें गुरु क्षीरकदम्बकने जो कहा था सो आप कहो । आप अपनी सत्यवादितासे प्रसिद्ध हैं ॥६७॥


यदेतत्पर्वतेनोक्तं तदुपाध्याय उक्तवान् । इत्युक्ते स्फटिकं यातं वसोः क्षिप्रं महीतले ॥६८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा वसुने कहा कि पर्वतने जो कहा है वही गुरुजी ने कहा था। इतना कहते ही राजा वसुका स्फटिक पृथिवीपर गिर पड़ा ॥६८॥


नाज्ञासीत् किल तल्लोकः स्फटिकं गगने ततः । स्थितं सिंहासनं तस्य विवेदेति ततोऽवदत् ॥६९॥

अर्थ: लोग उस स्फटिकको नहीं जानते थे इसलिए यही समझते थे कि राजा वसुका सिंहासन आकाशमें निराधार स्थित है ॥६९॥


वसो वितथसामर्थ्यात्तव सिंहासनं गतम् । भूमिमद्यापि ते युक्तं परमार्थनिवेदनम् ॥७०॥

अर्थ: नारदने राजाको सम्बोधते हुए कहा कि वसो ! मिथ्या पक्षका समर्थन करनेसे तुम्हारा सिंहासन पृथिवीपर आ पड़ा है। अतः अब भी सत्य पक्षका समर्थन करना तुम्हें उचित है ॥७०॥


ततो मोहमदाविष्टस्तदैव पुनरभ्यधात् । प्रविष्टो धरणीं सद्यः सिंहासनसमन्वितः ॥७१॥

अर्थ: परन्तु राजा वसु तो मोहरूपी मदिराके नशामें इतना निमग्न था कि उसने फिर भी वही बात कही। इस पापके फलस्वरूप राजा वसु शीघ्र ही सिंहासनके साथ ही साथ पृथिवीमें धँस गया ॥७१॥


महापापभराक्रान्तो हिंसाधर्मप्रवर्तनात् । गतस्तमस्तमोऽभिख्यां पृथिवीं घोरवेदनाम् ॥७२॥

अर्थ: हिंसाधर्मकी प्रवृत्ति चलानेसे वह बहुत भारी पापके भारसे आक्रान्त हो बहुत भारी वेदनावाली तमस्तमःप्रभा नामक सातवीं पृथिवीमें गया ॥७२॥


ततो धिग् धिग् ध्वनिः प्रायो जातः कलकलो महान् । जनानां पापभीतानामुद्दिश्य वसुपर्वतौ ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर पापसे भयभीत मनुष्य राजा वसु और पर्वतको लक्ष्य कर धिक्-धिक् कहने लगे जिससे बड़ा भारी कोलाहल उत्पन्न हुआ ॥७३॥


अर्थ: यदि तू कहता है कि शब्दसर्वज्ञ और बुद्धिसर्वज्ञ तो है पर अर्थसर्वज्ञ कोई नहीं है तो यह कहना नहीं बनता क्योंकि गो आदि समस्त पदार्थोंमें शब्द, अर्थ और बुद्धि तीनों साथ ही साथ देखे जाते हैं ॥७३॥


संप्राप्तो नारदः पूजामहिंसाचारदेशनात् । एवमेव हि सर्वेषां यतो धर्मस्ततो जयः ॥७४॥

अर्थ: अहिंसापूर्ण आचारका उपदेश देनेके कारण नारद सम्मानको प्राप्त हुआ। सब लोगोंके मुखसे यही शब्द निकल रहे थे कि ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ जहाँ धर्म वहाँ विजय ॥७४॥


पापः पर्वतको लोके धिग्धिग्दण्डसमाहतः । दुःखितः शोषयन् देहमकरोत् कुत्सितं तपः ॥७५॥

अर्थ: पापी पर्वत, लोकमें धिक्काररूपी दण्डकी चोट खाकर दुःखी हो शरीरको सुखाता हुआ कुतप करने लगा ॥७५॥


कालं कृत्वाभवत् क्रूरो राक्षसः पुरुविक्रमः । अपमानं च सस्मार धिग्दण्डाधिकमात्मनः ॥७६॥

अर्थ: अन्तमें मरण कर प्रबल पराक्रमका धारक दुष्ट राक्षस हुआ। उसे पूर्व पर्यायमें जो अपमान और धिक्काररूपी दण्ड प्राप्त हुआ था उसका स्मरण हो आया ॥७६॥


अचिन्तयच्च लोकेन ममानेन पराभवः । कृतस्ततः करिष्यामि प्रतिकर्मास्य दुःखदम् ॥७७॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि लोगोंने मेरा पराभव किया था इसलिए मैं इसका दुःखदायी बदला लूँगा ॥७७॥


वितानं दम्भरचितं कृत्वा कर्म करोमि तत् । यत्रासक्तो जनो याति तिर्यङ्नरकदुर्गतीः ॥७८॥

अर्थ: मैं कपटपूर्ण शास्त्र रचकर ऐसा कार्य करूँगा कि जिसमें आसक्त हुए मनुष्य तिर्यंच अथवा नरक-जैसी दुर्गतियोंमें जावेंगे ॥७८॥


ततो मानुषवेषस्थो वामस्कन्धस्थसूत्रकः । कमण्डल्वक्षमालादिनानोपकरणावृतः ॥७९॥

अर्थ: तदनन्तर उस राक्षसने मनुष्यका वेष रखा, बायें कन्धेपर यज्ञोपवीत पहना और हाथसे कमण्डलु तथा अक्षमाला आदि उपकरण लिये ॥७९॥


हिंसाकर्मपरं शास्त्रं घोरं क्रूरजनप्रियम् । अधीयानः सुदुष्टात्मा नितान्तामङ्गलस्वरम् ॥८०॥

अर्थ: इस प्रकार हिंसा कार्योंकी प्रवृत्ति करानेमें तत्पर तथा क्रूर मनुष्योंको प्रिय भयावह शास्त्रका अत्यन्त अमांगलिक स्वरमें उच्चारण करता हुआ वह दुष्ट राक्षस पृथिवीपर भ्रमण करने लगा ॥८०॥


तापसान् दुर्विधान् बुद्ध्या सूत्रकण्ठादिकांस्तथा । व्यामोहयितुमुद्युक्तो हिंसाधर्मेण निर्दयः ॥८१॥

अर्थ: वह स्वभावसे निर्दय था तथा बुद्धिहीन तपस्वियों और ब्राह्मणोंको मोहित करनेमें सदा तत्पर रहता था ॥८१॥


तस्य पक्षे ततः पेतुः प्राणिनो मूढमानसाः । भविष्यद्दुःखसंभाराः शलभा इव पावके ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्हें भविष्यमें दुःख प्राप्त होनेवाला था ऐसे मूर्ख प्राणी उसके पक्षमें इस प्रकार पड़ने लगे जिस प्रकार कि अग्निपर पतंगे पड़ते हैं ॥८२॥


तेभ्यो जगाद यज्ञस्य विधानार्थमहं स्वयम् । ब्रह्मा लोकमिमं प्राप्तो येन सृष्टं चराचरम् ॥८३॥

अर्थ: वह उन लोगोंसे कहता था कि मैं वह ब्रह्मा हूँ जिसने इस चराचर विश्वकी रचना की है । यज्ञकी प्रवृत्ति चलानेके लिए मैं स्वयं इस लोकमें आया हूँ ॥८३॥


यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः स्वयमेव मयादरात् । यज्ञो हि भूत्यै स्वर्गस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः ॥८४॥

अर्थ: मैंने बड़े आदरसे स्वयं ही यज्ञके लिए पशुओंकी रचना की हैं । यथार्थमें यज्ञ स्वर्गकी विभूति प्राप्त करानेवाला है इसलिए यज्ञमें जो हिंसा होती है वह हिंसा नहीं है ॥८४॥


सौत्रामणिविधानेन सुरापानं न दुष्यति । अगम्यागमनं कार्यं यज्ञे गोसवनामनि ॥८५॥

अर्थ: सौत्रामणि नामक यज्ञमें मदिरा पीना दोषपूर्ण नहीं है और गोसव नामक यज्ञमें अगम्या अर्थात् परस्त्रीका भी सेवन किया जा सकता है ॥८५॥


मातृमेधे वधो मातुः पितृमेधे वधः पितुः । अन्तर्वेदि विधातव्यं दोषस्तत्र न विद्यते ॥८६॥

अर्थ: मातृमेध यज्ञमें माताका और पितृमेध यज्ञमें पिताका वध वेदीके मध्यमें करना चाहिए इसमें दोष नहीं है ॥८६॥


आशुशुक्षणिमाधाय पृष्ठे कूर्मस्य तर्पयेत् । हविषा जुह्वकाख्याय स्वाहेत्युक्त्वा प्रयत्नतः ॥८७॥

अर्थ: कछुएकी पीठपर अग्नि रखकर जुह्वक नामक देवको बड़े प्रयत्नसे स्वाहा शब्दका उच्चारण करते हुए साकल्यसे सन्तृप्त करना चाहिए ॥८७॥


यदा न प्राप्नुयात् कूर्मं तदा शुद्धद्विजन्मनः । खलतेः पिङ्गलाभस्य विक्लवस्य शुचौ जले ॥८८॥

आस्यदघ्नेऽवतीर्णस्य मस्तके कूर्मसंनिभे । प्रज्वाल्य ज्वलनं दीप्तमाहुतिं निक्षिपेद् द्विजः ॥८९॥

अर्थ: यदि इस कार्यके लिए कछुआ न मिले तो एक गंजे सिरवाले पीले रंगके शुद्ध ब्राह्मणको पवित्र जलमें मुख प्रमाण नीचे उतारे अर्थात् उसका शरीर मुख तक पानीमें डूबा रहे ऊपर केवल कछुआके आकार-का मस्तक निकला रहे उस मस्तकपर प्रचण्ड अग्नि जलाकर आहुति देना चाहिए ॥८८-८९॥


सर्वं पुरुष एवेदं यद्भूतं यद्भविष्यति । ईशानो योऽमृतत्वस्य यदन्नेनातिरोहति ॥९०॥

अर्थ: जो कुछ हो चुका है अथवा जो आगे होगा, जो अमृतत्वका स्वामी है अर्थात् देवपक्षीय है और जो अन्नजीवी हैं अर्थात् भूचारी है वह सब पुरुष ही है ॥९०॥


एवमेकत्र पुरुषे किं केनात्र विपाद्यते । कुरुतातो यथाभीष्टं यज्ञे प्राणिनिपातनम् ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार जब सर्वत्र एक ही पुरुष है तब किसके द्वारा कौन मारा जाता है ? अर्थात् कोई किसीको नहीं मारता इसलिए यज्ञमें इच्छा-नुसार प्राणियोंकी हिंसा करो ॥९१॥


मांसस्य भक्षणं तेषां कर्तव्यं यज्ञकर्मणि । यायजूकेन पूतं हि देवोद्देश्येन तत्कृतम् ॥९२॥

अर्थ: यज्ञमें यज्ञ करनेवालेको उन जीवोंका मांस खाना चाहिए क्योंकि देवताके उद्देश्यसे निर्मित होनेके कारण वह मांस पवित्र माना जाता है ॥९२॥


एवंप्रकारमत्यन्तपापकर्म प्रदर्शयन् । प्राणिनः प्रवणांश्चक्रे राक्षसो धरणीतले ॥९३॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त पापपूर्ण कार्य दिखाता हुआ वह राक्षस पृथिवी तलपर प्राणियोंको यज्ञादि कार्योंमें निपुण करने लगा ॥९३॥


श्रद्दधानास्ततो भूत्वा जन्तवः सुखवाञ्छया । हिंसायज्ञस्थलीं भूमिं दीक्षिता प्रविशन्ति ये ॥९४॥

काष्ठभारं यथा सर्वं प्राध्वंकृत्य स तान् दृढम् । भयोद्भूतमहाकम्पान् चलत्तारकलोचनान् ॥९५॥

पृष्ठस्कन्धशिरोजङ्घा - पादाग्रस्थान्विधाय खम् । उत्पपात पतद्रक्तधारानिकरदुःखितान् ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर उसकी बातोंका विश्वास कर जो लोग सुखकी इच्छासे दीक्षित हो हिंसामयी यज्ञकी भूमिमें प्रवेश करते थे उन सबको वह लकड़ियोंके भारके समान मजबूत बाँधकर आकाशमें उड़ जाता था । उस समय उनके शरीर भयसे काँप उठते थे, उनकी आँखोंकी पुतलियाँ घूमने लगती थीं । उन्हें वह उलटा कर ऐसा झुकाता था कि उनकी जंघाएँ पीठ तथा ग्रीवापर और पैरके पंजे सिरपर आ लगते थे तथा पड़ती हुई खूनकी धाराओंसे वे बहुत दुःखी हो जाते थे ॥९४-९६॥


ततस्ते विस्वरोदारं क्रोशन्तोऽभिदधुः स्वरम् । किमर्थं देव रुष्टोऽसि येनास्मान् हन्तुमुद्यतः ॥९७॥

अर्थ: इस कार्यसे वे सब बहुत भयंकर शब्द करते हुए चिल्लाते थे और कहते थे कि हे देव ! तुम किस लिए रुष्ट हो गये हो जिससे हम सबको मारनेके लिए उद्यत हुए हो ॥९७॥


प्रसीद मुञ्च निर्दोषानस्मान् देव महाबल । भवदाज्ञां वयं सर्वां कुर्मः प्रणतमूर्तयः ॥९८॥

अर्थ: हे देव ! तुम महाबलवान् हो, प्रसन्न होओ, हम सब निर्दोष हैं अतः हम लोगोंको छोड़ो । हम सब आपके समक्ष नतशरीर हैं और आप जो आज्ञा देंगे उस सबका पालन करेंगे ॥९८॥


ततो बभाण तान् रक्षः यथैव पशवो हताः । भवद्भिरियृति स्वर्गं तथा यूयं मया हताः ॥९९॥

अर्थ: तदनन्तर राक्षस उनसे कहता था कि जिस प्रकार तुम्हारे द्वारा मारे हुए पशु स्वर्ग जाते हैं उसी प्रकार मेरे द्वारा मारे गये आप लोग भी स्वर्ग जावेंगे ॥९९॥


इत्युक्त्वा विजने कांश्चिद् द्वीपेऽन्यस्मिन्निरक्षिपत् । महार्णवे परानन्यान्क्रूरप्राणिगणान्तरे ॥१००॥

एकानास्फालयन् क्षोणीधरमूर्ध्नि शिलातले । कुर्वन् बहुविधं शब्दं वासांसि रजको यथा ॥१०१॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने कितने ही लोगोंको जहाँ मनुष्यों-का सद्भाव नहीं था ऐसे दूसरे द्वीपोंमें डाल दिया । कितने ही लोगोंको समुद्रमें फेंक दिया, कितने ही लोगोंको सिंहादिक दुष्ट जीवोंके मध्य डाल दिया और जिस प्रकार धोबी अनेक प्रकारके शब्द करता हुआ शिलातलपर वस्त्र पछाड़ता है उसी तरह कितने ही लोगोंको घुमा-घुमाकर पर्वतकी चोटीपर पछाड़ दिया ॥१००-१०१॥


दुःखेन मरणावस्थां प्राप्तास्ते त्रस्तचेतसः । पितरौ तनयान् भ्रातॄन् स्मरन्तो मृत्युमापिर्ताः ॥१०२॥

अर्थ: दुःखसे वे मरणासन्न अवस्थाको प्राप्त हो गये थे, उन सबके चित्त भयभीत थे, और अन्तमें माता पिता, पुत्र और भाई आदिका स्मरण करते हुए मृत्युको प्राप्त हो गये ॥१०२॥


तद्व्यापादितशेषा ये मूढाः कुग्रन्थकन्थया । रक्षसा दर्शितो हिंसायज्ञस्तैर्वृद्धिमाहृतः ॥१०३॥

अर्थ: जो मरनेसे बाकी बचे थे वे मिथ्या शास्त्ररूपी कन्यासे मोहित थे अतः उन्होंने राक्षसके द्वारा दिखलाये हुए हिंसायज्ञकी वृद्धि की ॥१०३॥


हिंसायज्ञमिमं घोरमाचरन्ति न ये जनाः । दुर्गतिं ते न गच्छन्ति महादुःखविधायिनीम् ॥१०४॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जो मनुष्य इस भयंकर हिंसायज्ञको नहीं करते वे महादुःख देनेवाली दुर्गतिमें नहीं जाते हैं ॥१०४॥


उदाहृतो मया यस्ते हिंसायज्ञसमुद्भवः । श्रेणिकैनं पुराज्ञासीत् प्राज्ञो रत्नश्रवासुतः ॥१०५॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! मैंने यह तेरे लिए हिंसायज्ञकी उत्पत्ति कही । रावण इसे पहलेसे ही जानता था ॥१०५॥


अथ राजपुरं प्राप्तो रावणः स्वर्गसंनिभम् । बहिर्यस्य मरुत्वाख्यो यज्ञवाटे स्थितो नृपः ॥१०६॥

अर्थ: अथानन्तर रावण, स्वर्गकी तुलना करनेवाले उस राजपुर नगरमें पहुँचा जहाँ मरुत्वान् नामका राजा नगरके बाहर यज्ञशालामें बैठा था ॥१०६॥


हिंसाधर्मप्रवीणश्च संवर्तो नाम विश्रुतः । ऋत्विक् तस्मै ददौ कृत्स्नमुपदेशं यथाविधि ॥१०७॥

अर्थ: हिंसाधर्ममें प्रवीण संवर्त नामका प्रसिद्ध ब्राह्मण उस यज्ञका प्रधान याजक था जो राजाके लिए विधिपूर्वक सब उपदेश दे रहा था ॥१०७॥


सूत्रकण्ठाः पृथिव्यां ये सर्वे तेऽत्र निमन्त्रिताः । पुत्रदारादिभिः सार्धमागता लोभवाहिताः ॥१०८॥

अर्थ: पृथ्वीमें जो ब्राह्मण थे वे सब इस यज्ञमें निमन्त्रित किये गये थे इसलिए लोभके वशीभूत हो स्त्री-पुत्रादिके साथ वहाँ आये थे ॥१०८॥


सा तैर्यज्ञमही सर्वा देवमङ्गलनिःस्वनैः । लामाकाङ्क्षा प्रसन्नास्यैर्वृता क्षुभ्यत्सुभूरिभिः ॥१०९॥

अर्थ: लाभकी आशासे जिनके मुख प्रसन्न थे तथा जो वेदका मंगलपाठ कर रहे थे ऐसे बहुत सारे ब्राह्मणोंसे यज्ञकी समस्त भूमि आवृत होकर क्षोभको प्राप्त हो रही थी ॥१०९॥


उपनीताश्च तत्रैव पशवो दीनमानसाः । वराकाः शतशो बद्धाः श्वसत्कुक्षिपुटा भयात् ॥११०॥

अर्थ: सैकड़ों दीनहीन पशु भी वहाँ लाकर बाँधे गये गये थे । भयसे उन पशुओंके पेट दुःखकी साँसें भर रहे थे ॥११०॥


नारदोऽथान्तरे तस्मिन्निच्छया नभसा व्रजन् । अपश्यद् घनपृष्ठस्थो जनं तं तत्र संगतम् ॥१११॥

अर्थ: उसी समय अपनी इच्छासे आकाशमें भ्रमण करते हुए नारदने वहाँ एकत्रित लोगोंका समूह देखा ॥१११॥


अचिन्तयच्च दृष्ट्वैवं विस्मयाकुलमानसः । कुर्वन् विभ्रममङ्गस्य कुतूहलसमुद्भवम् ॥११२॥

अर्थ: उसे देख नारद आश्चर्यसे चकित हो, कुतूहलजनित शरीरकी चेष्टाओंको धारण करता हुआ इस प्रकार विचार करने लगा ॥११२॥


एतत्सुनगरं कस्य कस्य चेयमनीकिनी । इयं च सागराकारा प्रजा कस्मादिह स्थिता ॥११३॥

अर्थ: यह उत्तम नगर कौन है ? यह किसकी सेना है ? और यह सागरके आकार किसकी प्रजा यहाँ किस प्रयोजनसे ठहरी हुई है ? ॥११३॥


नगराणि जनौघाश्च वरूथिन्यश्च भूरिशः । मयेक्षाञ्चक्रिरे जातु नेदृग्दृष्टो जनोत्करः ॥११४॥

अर्थ: मैंने बहुतसे नगर, बहुतसे लोगोंके समूह और बहुत सारी सेनाएँ देखीं पर कभी ऐसा जनसमूह नहीं देखा ॥११४॥


कुतूहलादिति ध्यात्वाऽवतीर्णोऽसौ विहायसः । कर्मैतदेव तस्यासीद्यत्कुतूहलदर्शनम् ॥११५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर नारद कुतूहलवश आकाशसे नीचे उतरा सो ठीक ही है क्योंकि कुतूहल देखना ही उसका खास काम है ॥११५॥


पप्रच्छ मागधेशोऽथ भगवन् कः स नारदः । उत्पत्तिर्वा कुतस्तस्य गुणा वा तस्य कीदृशाः ॥११६॥

अर्थ: यह सुनकर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे पूछा कि भगवन् ! वह नारद कौन है ? उसकी उत्पत्ति किससे हुई है और उसके कैसे गुण हैं ? ॥११६॥


जगाद च गणाधीशः श्रेणिक ब्राह्मणोऽभवत् । नाम्ना ब्रह्मरुचिस्तस्य कूर्मी नाम कुटुम्बिनी ॥११७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गणधर कहने लगे कि श्रेणिक ! ब्रह्मरुचि नामका एक ब्राह्मण था और उसकी कूर्मी नामक स्त्री थी ॥११७॥


तापसेन सता तेन श्रितेन वनवासिताम् । एतस्यामाहितो गर्भः फलमूलादिवृत्तिना ॥११८॥

अर्थ: ब्राह्मण तापस होकर वनमें रहने लगा और फल तथा कन्दमूल आदि भक्षण करने लगा । ब्राह्मणी भी इसके साथ रहती थी सो ब्राह्मणने इसमें गर्भ धारण किया ॥११८॥


वीतसङ्गास्तमुद्देशमथाजग्मुर्महर्षयः । यान्तो मार्गवशात् क्वापि संयमासक्तमानसाः ॥११९॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन संयमके धारक निर्ग्रन्थमुनि कहीं जा रहे थे सो मार्गवश उस स्थानपर आये ॥११९॥


विशश्रमुः क्षणं तस्मिन्नाश्रमे श्रमनोदिनि । अपश्यन् दम्पती तौ च स्वाकारौ कर्मगर्हितौ ॥१२०॥

अर्थ: और श्रमको दूर करनेवाले उस आश्रममें थोड़ी देरके लिए विश्राम करने लगे । उसी आश्रममें उन मुनियोंने उस ब्राह्मण दम्पतीको देखा जिनका कि आकार तो उत्तम था पर कार्य निन्दनीय था ॥१२०॥


आपाण्डुरशरीरां च दृष्ट्वा योषां पृथुस्तनीम् । कृशां गर्भभरम्लानां श्वसन्तीं पन्नगीमिव ॥१२१॥

संसारप्रकृतिज्ञानां श्रमणानां महात्मनाम् । कृपया संबभूवैतौ धर्मं बोधयितुं मतिः ॥१२२॥

अर्थ: जिसका शरीर पीला था, स्तन स्थूल थे, जो दुर्बल थी, गर्भके भारसे म्लान थी और साँसें भरती हुई सर्पिणीके समान जान पड़ती थी ऐसी स्त्रीको देखकर संसारके स्वभावको जाननेवाले उदार हृदय मुनियोंके मनमें दयावश उक्त दम्पतीको धर्मोपदेश देनेका विचार उत्पन्न हुआ ॥१२१-१२२॥


तेषां मध्ये ततो ज्येष्ठो जगाद मधुरं यतिः । कष्टं पश्यत नर्त्यन्ते कर्मभिर्जन्तवः कथम् ॥१२३॥

अर्थ: उन मुनियोंके बीचमें जो बड़े मुनि थे वे मधुर शब्दोंमें उपदेश देने लगे । उन्होंने कहा कि बड़े खेदकी बात है देखो, ये प्राणी कर्मोंके द्वारा कैसे नचाये जाते हैं ? ॥१२३॥


त्यक्त्वा धर्मधिया बन्धून् संसारोत्तरणाशया । स्वयं खलीकृतोऽरण्ये किमात्मा तापस त्वया ॥१२४॥

अर्थ: हे तापस ! तूने संसार-सागरसे पार होनेकी आशासे धर्म समझ भाई- बन्धुओंका त्याग कर स्वयं अपने आपको इस वनके मध्य क्यों कष्टमें डाला है ? ॥१२४॥


भद्र प्रव्रजितो जातः कस्ते भेदो गृहस्थतः । चारित्रं प्रतियातस्य केवलं वेषमन्यथा ॥१२५॥

अर्थ: अरे भले-मानुष ! तूने प्रव्रज्या धारण की है पर तुझमें गृहस्थसे भेद ही क्या है ? तूने जो चारित्र धारण किया था उसके तू प्रतिकूल चल रहा है । केवल वेष ही तेरा दूसरा है पर चारित्र तो गृहस्थ-जैसा ही है ॥१२५॥


यथा हि छर्दितं नान्नं भुज्यते मानुषैः पुनः । तथा त्यक्तेषु कामेषु न कुर्वन्ति मतिं बुधाः ॥१२६॥

अर्थ: जिस प्रकार मनुष्य वमन किये हुए अन्नको फिर नहीं खाते हैं उसी प्रकार विज्ञजन जिन विषयोंका परित्याग कर चुकते हैं फिर उनकी इच्छा नहीं करते ॥१२६॥


त्यक्त्वा लिङ्गी पुनः पापो योषितं यो निषेवते । सुभीमायामरण्यान्यां वृकतां स समश्नुते ॥१२७॥

अर्थ: जो लिंगधारी साधु एक बार स्त्रीका त्याग कर पुनः उसका सेवन करता है वह पापी है और मरकर भयंकर अटवीमें भेड़िया होता है ॥१२७॥


सर्वारम्भस्थितः कुर्वन्नब्रह्म मदनिर्भरः । दीक्षितोऽस्मीति यो वेत्ति स्वं नितान्तं स मोहवान् ॥१२८॥

अर्थ: जो सब प्रकारके आरम्भमें स्थित रहता हुआ, अब्रह्म सेवन करता हुआ और नशामें निमग्न रहता हुआ भी ‘मैं दीक्षित हूँ’ ऐसा अपने आपको जानता है वह अत्यन्त मोही है ॥१२८॥


ईर्ष्यामन्मथदग्धस्य दुष्टदृष्टेर्दुरात्मनः । आरम्भे वर्तमानस्य प्रव्रज्या वद कीदृशी ॥१२९॥

अर्थ: जो ईर्ष्या और कामसे जल रहा है, जिसकी दृष्टि दुष्ट है, जिसकी आत्मा दूषित है, और जो आरम्भमें वर्तमान है अर्थात् जो सब प्रकारके आरम्भ करता है उसकी प्रव्रज्या कैसी ? तुम्हीं कहो ॥१२९॥


कुदृष्ट्या गर्वितो लिङ्गी विषयास्त्रवमानसः । ब्रुवन्नहं तपस्वीति मिथ्यावादी कथं व्रती ॥१३०॥

अर्थ: जो कुदृष्टिसे गर्वित है, मिथ्यावेशधारी है, और जिसका मन विषयोंके अधीन है फिर भी अपने आपको तपस्वी कहता है वह झूठ बोलनेवाला है वह व्रती कैसे हो सकता है ? ॥१३०॥


सुखासनविहारः सन् सदाकशिपुसक्तधीः । सिद्धंमन्यो विमूढात्मा जनोऽयं स्वस्य वञ्चकः ॥१३१॥

अर्थ: जो सुखपूर्वक उठता-बैठता और विहार करता है तथा जो सदा भोजन एवं वस्त्रोंमें बुद्धि लगाये रखता है फिर भी अपने आपको सिद्ध मानता है वह मूर्ख अपने आपको धोखा देता है ॥१३१॥


दह्यमाने यथागारे कथञ्चिदपि निःसृतः । तत्रैव पुनरात्मानं प्रक्षिपेन्मूढमानसः ॥१३२॥

अर्थ: जिस प्रकार जलते हुए मकानसे कोई किसी तरह बाहर निकले और फिरसे अपने आपको उसी मकानमें फेंक दे तो वह मूर्ख ही समझा जाता है ॥१३२॥


यथा च विवरं प्राप्य निष्क्रान्तः पञ्जरात् खगः । निवृत्य प्रविशेद् भूयस्तत्रैवाज्ञानचोदितः ॥१३३॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार कोई पक्षी छिद्र पाकर पिंजड़ेसे बाहर निकल आवे और अज्ञानसे प्रेरित हो पुनः उसीमें लौट आवे तो यह उसकी मूर्खता ही है ॥१३३॥


तथा प्रव्रजितो भूत्वा यो यातीन्द्रियवश्यताम् । निन्दितः स भवेल्लोके न च स्वार्थं समश्नुते ॥१३४॥

अर्थ: उसी प्रकार कोई मनुष्य दीक्षित होकर पुनः इन्द्रियोंकी अधीनताको प्राप्त हो जावे तो वह लोकमें निन्दित होता है और आत्मकल्याणको प्राप्त नहीं होता ॥१३४॥


ध्येयमेकाग्रचित्तेन सर्वग्रन्थविवर्जिना । मुनिना ध्यायते तत्त्वं सारम्भैर्न भवद्विधैः ॥१३५॥

अर्थ: जिनका चित्त एकाग्र है ऐसे सर्वपरिग्रहका त्याग करनेवाले मुनि ही ध्यान करने योग्य तत्त्वका ध्यान कर सकते हैं तुम्हारे जैसे आरम्भी मनुष्य नहीं ॥१३५॥


प्राणिनो ग्रन्थसङ्गेन रागद्वेषसमुद्भवः । रागात् संजायते कामो द्वेषाज्जन्तुविनाशनम् ॥१३६॥

अर्थ: परिग्रहकी संगतिसे प्राणीके रागद्वेषकी उत्पत्ति होती है । रागसे काम उत्पन्न होता है और द्वेषसे जीवोंका विघात होता है ॥१३६॥


कामक्रोधाभिभूतस्य मोहेनाक्रम्यते मनः । कृत्याकृत्येषु मूढस्य मतिर्न स्याद्विवेकिनी ॥१३७॥

अर्थ: जो काम और क्रोधसे अभिभूत ही रहा है उसका मन मोहसे आक्रान्त हो जाता है .और जो करने योग्य तथा न करने योग्य कर्मोंके विषयमें मूढ़ है उसकी बुद्धि विवेकयुक्त नहीं हो सकती ॥१३७॥


यत्किंचित्कुर्वतस्तस्य कर्मोपार्जयतोऽशुभम् । संसारसागरे घोरे भ्रमणं न निवर्तते ॥१३८॥

अर्थ: जो मनुष्य इच्छानुसार चाहे जो कार्य करता हुआ अशुभ कर्मका उपार्जन करता है इस भयंकर संसार-सागरमें उसका भ्रमण कभी भी बन्द नहीं होता ॥१३८॥


एतान् संसर्गजान् दोषान्विदित्वाशु विपश्चितः । वैराग्यमधिगच्छन्ति नियम्यात्मानमात्मना ॥१३९॥

अर्थ: ये सब दोष संसर्गसे ही उत्पन्न होते हैं ऐसा जानकर विद्वान् लोग अपने आपके द्वारा अपने आपका नियन्त्रण कर वैराग्यको धारण करते हैं ॥१३९॥


एवं संबोधितो वाक्यैः परमार्थोपदेशनैः । उपेतः श्रामणीं दीक्षां मोहाद् ब्रह्मरुचिश्च्युतः ॥१४०॥

निरक्षेपमतिः कूर्म्यां महावैराग्यसंमतः । विजहार सुखं सार्धं गुरुणा गुरुवत्सलः ॥१४१॥

अर्थ: इस प्रकार परमार्थका उपदेश देनेवाले वचनोंसे सम्बोधा गया ब्रह्मरुचि ब्राह्मण मिथ्यात्वसे च्युत हो दैगम्बरी दीक्षाको प्राप्त हुआ और अपनी कूर्मी नामक स्त्रीसे निःस्पृह हो महावैराग्यसे युक्त होता हुआ गुरुके साथ सुखपूर्वक विहार करने लगा । उसका गुरुस्नेह ऐसा ही था ॥१४०-१४१॥


सापि शुद्धमतिः कूर्मी कर्मणः कृष्णतश्च्युता । ज्ञात्वा रागवशं जन्तोः संसारपरिवर्तनम् ॥१४२॥

अर्थ: कूर्मीने भी जान लिया कि जीवका संसारमें जो परिभ्रमण होता है वह रागके वश ही होता है । ऐसा जानकर वह पापकार्यसे विरत हो शुद्धाचारमें निमग्न हो गयी ॥१४२॥


कुमार्गसङ्गमुत्सृज्य जिनभक्तिपरायणा । सिंहीव शोभतेऽरण्ये भर्त्रा विरहिता सती ॥१४३॥

अर्थ: वह मिथ्यामार्गियोंका संसर्ग छोड़कर सदा जिन-भक्तिमें ही तत्पर रहने लगी और पतिसे रहित होनेपर भी निर्जन वनमें सिंहनीके समान सुशोभित होने लगी ॥१४३॥


मासे च दशमे धीरा प्रसूता दारकं शुभम् । अचिन्तयच्च वीक्ष्यैनं ज्ञातकर्म विचेष्टिता ॥१४४॥

अर्थ: उस धैर्यशालिनीने दसवें मासमें शुभ पुत्र उत्पन्न किया । पुत्रको देखकर कर्मोंकी चेष्टाको जाननेवाली कूर्मीने विचार किया ॥१४४॥


संपर्कोऽयमनर्थोऽसौ कथितो यन्महर्षिभिः । तस्मान्मुक्त्वाधुना सङ्गं करोमि हितमात्मने ॥१४५॥

अर्थ: कि चूँकि महर्षियोंने इस सम्पर्कको अनर्थका कारण कहा था इसलिए मैं इस सम्पर्क अर्थात् पुत्रकी संगतिको छोड़कर आत्माका हित करती हूँ ॥१४५॥


अनेनापि भवे स्वस्मिन्यः कर्मविधिरर्जितः । फलं तस्य शिशुर्भोक्ता मनोज्ञमथवेतरत् ॥१४६॥

अर्थ: इस शिशुने भी अपने भवान्तरमें जो कर्मोंकी विधि अर्जित की है उसका यह अच्छा या बुरा फल भोगेगा ॥१४६॥


अरण्यान्यां समुद्रे वा स्थितं वारातिपञ्जरे । स्वयंकृतानि कर्माणि रक्षन्ति न परो जनः ॥१४७॥

अर्थ: घनघोर अटवी, समुद्र अथवा शत्रुओंके पिंजड़ेमें स्थित जन्तुकी अपने आपके द्वारा किये हुए कर्म ही रक्षा करते हैं अन्य लोग नहीं ॥१४७॥


यः पुनः प्राप्तकालः स्याज्जनन्यङ्कगतोऽपि सः । ह्रियते मृत्युना जीवः स्वकर्मवशतां गतः ॥१४८॥

अर्थ: जिसका काल आ जाता है ऐसा स्वकृत कर्मोंकी अधीनताको प्राप्त हुआ जीव माताकी गोदमें स्थित होता हुआ भी मृत्युके द्वारा हर लिया जाता है ॥१४८॥


एवं विदिततत्त्वा सा बुद्धयातिनिरपेक्षया । बालकं विपिने त्यक्त्वा तापसी वीतमत्सरा ॥१४९॥

आनर्च्छालोकनगरे क्षान्त्यार्यामिन्दुमालिनीम् । शरणं भूरिसंवेगाद् भूतार्या चारुचेष्टिता ॥१५०॥

अर्थ: इस प्रकार तत्त्वको जाननेवाली तापसीने निरपेक्ष बुद्धिसे उस बालकको वनमें छोड़ दिया । तदनन्तर मत्सर भावसे रहित होकर वह बड़ी शान्तिसे आलोक नगरमें इन्द्रमालिनी नामक आर्यिकाकी शरणमें गयी और उनके पास बहुत भारी संवेगसे उत्तम चेष्टाकी धारक आर्यिका हो गयी ॥१४९-१५०॥


सत्कर्मा बालकश्चासौ रोदनादिविवर्जितः । व्रजद्भिर्नभसा दृष्टः सुरैर्जृम्भकसंज्ञकैः ॥१५१॥

अर्थ: अथानन्तर - आकाशमें जृम्भक नामक देव जाते थे सो उन्होंने रोदनादि क्रियासे रहित उस पुण्यात्मा बालकको देखा ॥१५१॥


गृहीत्वा च कृपायुक्तैरादरात् परिपालितः । अध्यापितश्च शास्त्राणि सरहस्यान्यशेषतः ॥१५२॥

अर्थ: उन दयालु देवोंने आदरसे ले जाकर उसका पालन किया और उसे रहस्यसहित समस्त शास्त्र पढ़ाये ॥१५२॥


लेभे च लब्धवर्णः सन् विद्यामाकाशगामिनीम् । यौवनं च परं प्राप्तः स्थितिं चाणुव्रतीं दृढाम् ॥१५३॥

अर्थ: विद्वान् होनेपर उसने आकाशगामिनी विद्या प्राप्त की और परम यौवन प्राप्त कर अत्यन्त दृढ़ अणुव्रत धारण किये ॥१५३॥


दृष्ट्वा च मातरं चिह्नैः प्रत्यभिज्ञानकारिणीम् । तत्प्रीत्योपेत्य निर्ग्रन्थं सम्यग्दर्शनतत्परः ॥१५४॥

अर्थ: उसने चिह्नोंसे पहचाननेवाली माताके दर्शन किये और उसकी प्रीतिसे अपने पिता निर्ग्रन्थ गुरुके भी दर्शन कर सम्यग्दर्शन धारण किया ॥१५४॥


प्राप्य क्षुल्लकचारित्रं जटामुकुटमुद्वहन् । अवद्वारसमो जातो न गृहस्थो न संयतः ॥१५५॥

अर्थ: क्षुल्लकका चारित्र प्राप्त कर वह जटारूपी मुकुटको धारण करता हुआ अवद्वारके समान हो गया अर्थात् न गृहस्थ ही रहा और न मुनि ही किन्तु उन दोनोंके मध्यका हो गया ॥१५५॥


यश्च कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्य्यात्यन्तवत्सलः । कलहप्रेक्षणाकाङ्क्षी गीतचुञ्चुः प्रभाववान् ॥१५६॥

अर्थ: वह कन्दर्प कौत्कुच्य और मौखर्य्यसे अधिक स्नेह रखता था, कलह देखनेकी सदा उसे इच्छा बनी रहती थी, वह संगीतका प्रेमी और प्रभावशाली था ॥१५६॥


पूजितो राजलोकस्य परैरव्याहतायतिः । चचार रोदसीं नित्यं कुतूहलगतेक्षणः ॥१५७॥

अर्थ: राजाओंके समूह उसका सम्मान करते थे, उसके आगमनमें कभी कोई रुकावट नहीं करते थे अर्थात् वह राजाओंके अन्तःपुर आदि सुरक्षित स्थानोंमें भी बिना किसी रुकावटके आ-जा सकता था। और निरन्तर कुतूहलोंपर दृष्टि डालता हुआ आकाश तथा पृथिवीमें भ्रमण करता रहता था ॥१५७॥


देवैः संवर्धितत्वाच्च देवसंनिभविभ्रमः । देवर्षिः प्रथितः सोऽभूद् विद्याविद्योतिताद्भुतः ॥१५८॥

अर्थ: देवोंने उसका पालन-पोषण किया था इसलिए उसकी सब चेष्टाएँ देवोंके समान थीं। वह देवर्षि नामसे प्रसिद्ध था और विद्याओंसे प्रकाशमान् तथा आश्चर्यकारी था ॥१५८॥


कथंचित्संचरंश्चासाविच्छया तां मखावनीम् । समीपगगनोद्देशस्थितोऽपश्यज्जनाकुलाम् ॥१५९॥

अर्थ: अपनी इच्छासे संचार करता हुआ वह नारद किसी तरह राजपुर नगरकी यज्ञशालाके समीप पहुँचा और वहाँ पास ही आकाशमें खड़ा होकर मनुष्योंसे भरी हुई यज्ञभूमिको देखने लगा ॥१५९॥


दृष्ट्वा च तान् पशून् बद्धान् समाश्लिष्टोऽनुकम्पया । अवतीर्णो मखक्षोणीं जल्पाकपथपण्डितः ॥१६०॥

अर्थ: वहाँ बँधे हुए पशुओंको देखकर वह दयासे युक्त हो यज्ञभूमिमें उतरा। वाद-विवाद करनेमें वह पण्डित था ही ॥१६०॥


उवाचेति मरुत्वञ्च किं प्रारब्धमिदं नृप । हिंसनं प्राणिवर्गस्य द्वारं दुर्गतिगामिनाम् ॥१६१॥

अर्थ: उसने राजा मरुत्वान्से कहा कि हे राजन् ! तुमने यह क्या प्रारम्भ कर रखा है ? तुम्हारा यह प्राणिसमूहकी हिंसाका कार्य दुर्गतिमें जानेवालोंके लिए द्वारके समान है ॥१६१॥


उवाचासावयं वेत्ति सर्वशास्त्रार्थकोविदः । ऋत्विग् मम यदेतेन कर्मणा प्राप्यते फलम् ॥१६२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजाने कहा कि इस कार्यसे मुझे जो फल प्राप्त होगा वह समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेमें निपुण यह याजक (पुरोहित) जानता है ॥१६२॥


आर्त्विजीनं ततोऽवादीदहो माणवक त्वया । किमिदं प्रस्तुतं दृष्टं सर्वज्ञैर्दुःखकारणम् ॥१६३॥

अर्थ: नारदने याजकसे कहा कि अरे बालक ! तूने यह क्या प्रारम्भ कर रखा है ? सर्वज्ञ भगवान्ने तेरे इस कार्यको दुःखका कारण देखा है ॥१६३॥


संवर्तः कुपितोऽवोचदहोऽत्यन्तविमूढता । यदत्यन्तमसंबद्धं भाषसे हेतुवर्जितम् ॥१६४॥

अर्थ: नारदकी बात सुन संवर्त नामक याजकने कुपित होकर कहा कि अहो, तेरी बड़ी मूर्खता है जो इस तरह बिना किसी हेतुके अत्यन्त असम्बद्ध बात बोलता है ॥१६४॥


भवतो यो मतः कोऽपि सर्वज्ञो रागवर्जितः । वक्तृत्वाद्युपपत्तिभ्यो नासावेवं तथेतरः ॥१६५॥

अर्थ: तुम्हारा जो यह मत है कि कोई पुरुष सर्वज्ञ वीतराग है सो वह सर्वज्ञ वक्ता आदि होनेसे दूसरे पुरुषके समान सर्वज्ञ वीतराग सिद्ध नहीं होता । क्योंकि जो सर्वज्ञ वीतराग है वह वक्ता नहीं हो सकता और जो वक्ता है वह सर्वज्ञ वीतराग नहीं हो सकता ॥१६५॥


अशुद्धैः कर्तृभिः प्रोक्तं वचनं स्यान्मलीमसम् । अनीदृशं च नो कश्चिदुपपत्तेरभावतः ॥१६६॥

तस्मादकर्तृको वेदः प्रमाणं स्यादतीन्द्रिये । वर्णत्रयस्य यज्ञे च कर्म तेन प्रकीर्तितम् ॥१६७॥

अपूर्वाख्यो ध्रुवो धर्मो यागेन प्रकटीकृतः । प्रयच्छति फलं स्वर्गे मनोज्ञविषयोत्थितम् ॥१६८॥

अर्थ: अशुद्ध अर्थात् रागी-द्वेषी मनुष्योंके द्वारा कहे हुए वचन मलिन होते हैं और इनसे विलक्षण कोई सर्वज्ञ है नहीं, क्योंकि उसका साधक कोई प्रमाण नहीं पाया जाता । इसलिए अकर्तृक वेद ही तीन वर्णोंके लिए अतीन्द्रिय पदार्थके विषयमें प्रमाण है । उसीमें यज्ञ कर्मका कथन किया है । यज्ञके द्वारा अपूर्व नामक ध्रुवधर्म प्रकट होता है जो जीवको स्वर्गमें इष्ट विषयोंसे उत्पन्न फल प्रदान करता है ॥१६६-१६८॥


अन्तर्वेदि पशूनां च प्रत्यवायाय नो वधः । शास्त्रेण चोदितो यस्माद्यायाद्यागादिसेवनम् ॥१६९॥

अर्थ: वेदीके मध्य पशुओंका जो वध होता है वह पापका कारण नहीं है क्योंकि उसका निरूपण शास्त्रमें किया गया है इसलिए निश्चिन्त होकर यज्ञ आदि करना चाहिए ॥१६९॥


पशूनां च वितानार्थं कृता सृष्टिः स्वयंभुवा । तस्मात्तदर्थसर्गाणां को दोषो विनिपातने ॥१७०॥

अर्थ: ब्रह्माने पशुओंकी सृष्टि यज्ञके लिए ही की है इसलिए जो जिस कार्यके लिए रचे गये हैं उस कार्यके लिए उनका विघात करनेमें दोष नहीं है ॥१७०॥


इत्युक्ते नारदोऽवोचदवद्यं निखिलं त्वया । भाषितं शृणु दुर्ग्रन्थभावनादूषितात्मना ॥१७१॥

अर्थ: संवर्तके इतना कह चुकनेपर नारदने कहा कि तूने सब मिथ्या कहा है । तेरी आत्मा मिथ्या शास्त्रोंकी भावनासे दूषित हो रही है इसीलिए तूने ऐसा कहा है सुन ॥१७१॥


यदि सर्वप्रकारोऽपि सर्वज्ञो नास्ति स त्रिधा । शब्दार्थबुद्धिभेदेन स्ववाचा स्थितितो हताः ॥१७२॥

अर्थ: तू कहता है कि सर्वज्ञ नहीं है सो यदि सर्व प्रकारके सर्वज्ञका अभाव है तो शब्दसर्वज्ञ, अर्थसर्वज्ञ और बुद्धिसर्वज्ञ इस प्रकार सर्वज्ञके तीन भेद तूने स्वयं अपने शब्दों द्वारा क्यों कहे ? स्ववचनसे ही तू बाधित होता है ॥१७२॥


अथ शब्दश्च बुद्धिश्च विद्यतेऽर्थस्तु नेष्यते । नैवमेतत्त्रयं दृष्टं यस्मात् सर्वगवादिषु ॥१७३॥


असत्यर्थे नितान्तं च कुरुते क्व पदं मतिः । शब्दो वा स तथाभूतो व्रजेद्धीवाग्व्यतिक्रमम् ॥१७४॥

अर्थ: यदि पदार्थका बिलकुल अभाव है तो उसके बिना बुद्धि और शब्द कहाँ टिकेंगे अर्थात् किसके आश्रयसे उस प्रकारकी बुद्धि होगी और उस प्रकार शब्द बोला जावेगा । और उस प्रकारका अर्थ बुद्धि और वचनके व्यतिक्रमको प्राप्त हो जायेगा ॥१७४॥


बुद्धेः सर्वज्ञ इत्येष व्यवहारो गुणागतः । मुख्यापेक्षो यथा चैत्रे सिंहशब्दप्रवर्तनम् ॥१७५॥

अर्थ: बुद्धिमें जो सर्वज्ञका व्यवहार होता है वह गौण है और गौण व्यवहार सदा मुख्यकी अपेक्षा करके प्रवृत्त होता है। जिस प्रकार चैत्रके लिए सिंह कहना मुख्य सिंहकी अपेक्षा रखता है उसी प्रकार बुद्धिसर्वज्ञ वास्तविक सर्वज्ञकी अपेक्षा रखता है ॥१७५॥


एतेन चानुमानेन प्रतिज्ञेयं विरोधिनी । अभावश्च ममात्यन्तं प्रसिद्धिं न क्वचिद् गतः ॥१७६॥

अर्थ: इस प्रकार इस अनुमानसे तुम्हारी ‘सर्वज्ञ नहीं है’ इस प्रतिज्ञामें विरोध आता है तथा हमारे मतमें सर्वथा अभाव माना नहीं गया है ॥१७६॥


सर्वज्ञः सर्वदृक् क्वासौ यस्यैष महिमा भुवि । 'दिवि ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्नात्मा सुप्रतिष्ठितः ॥१७७॥

अर्थ: ‘पृथिवीमें जिसकी महिमा व्याप्त है ऐसा यह सर्वदर्शी सर्वज्ञ कहाँ रहता है’ इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है कि दिव्य ब्रह्मपुरमें आकाशके समान निर्मल आत्मा सुप्रतिष्ठित है ॥१७७॥


आगमेन तवानेन विरोधं याति संगरः । अनेकान्ते च साध्येऽर्थे भवेत्सिद्धप्रसाधकम् ॥१७८॥

अर्थ: तुम्हारे इस आगमसे भी प्रतिज्ञावाक्य विरोधको प्राप्त होता है। यदि सर्वथा सर्वज्ञका अभाव होता तो तुम्हारे आगममें उसके स्थान आदिकी चर्चा क्यों की जाती ? और इस प्रकार साध्य अर्थके अनेकान्त हो जानेपर अर्थात् कथंचित् सिद्ध हो जानेपर वह हमारे लिए सिद्धसाधन है क्योंकि यही तो हम कहते हैं ॥१७८॥


वक्तृत्वं सर्वथाऽयुक्तं न परं प्रतिषिध्यति । असिद्धं च भवेत् स्वस्य स्याद्वादेन समागतम् ॥१७९॥

नासावभिमतोऽस्माकं वक्तृत्वाद्देवदत्तवत् । इत्याद्यपि भवेत्सिद्धं विरुद्धं साधनं यतः ॥१८०॥

अर्थ: सर्वज्ञके अभावमें तुमने जो वक्तृत्व हेतु दिया है सो वक्तृत्व तीन प्रकारका होता है - सर्वथाअयुक्तवक्तृत्व, युक्त वक्तृत्व और सामान्य वक्तृत्व । उनमें-से सर्वथाअयुक्तवक्तृत्व तो बनता नहीं, क्योंकि प्रतिवादीके प्रति वह सिद्ध नहीं है । यदि स्याद्वादसम्मत वक्तृत्व लेते हो तो तुम्हारा हेतु असिद्ध हो जाता है, क्योंकि इससे निर्दोष वक्ताकी सिद्धि हो जाती है । दूसरे आपके जैमिनि आदिक वेदार्थ वक्ता हम लोगोंको भी इष्ट नहीं हैं । वक्तृत्व हेतुसे देवदत्तके समान वे भी सदोष वक्ता सिद्ध होते हैं, इसलिए आपका यह वक्तृत्व हेतु विरुद्ध अर्थको सिद्ध करनेवाला होनेसे विरुद्ध हो जाता है ॥१७९-१८०॥


प्रजापत्यादिमिश्रायमुपदेशो न निश्चयः । 'तेऽप्येवमिति चैतेभ्यो दोषवानागमो भवेत् ॥१८१॥

अर्थ: तथा प्रजापति आदिके द्वारा दिया गया यह उपदेश प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि वे भी देवदत्तादिके समान रागी-द्वेषी ही हैं और ऐसे रागी-द्वेषी पुरुषोंसे जो आगम कहा जावेगा वह भी सदोष ही होगा अतः निर्दोष आगमका तुम्हारे यहाँ अभाव सिद्ध होता है ॥१८१॥


एकं यो वेद तेन स्याज्ज्ञातं सत्तात्मनाखिलम् । अतः साध्यविहीनोऽयं दृष्टान्तो गदितस्त्वया ॥१८२॥

अर्थ: एकको जिसने जान लिया उसने सद्रूपसे अखिल पदार्थ जान लिये, अतः सर्वज्ञके अभावकी सिद्धिमें जो तुमने दूसरे पुरुषका दृष्टान्त दिया है उसे तुमने ही साध्यविकल कह दिया है, क्योंकि वह चूँकि एकको जानता है इसलिए वह सबको जानता है इसकी सिद्धि हो जाती है ॥१८२॥


अथ चैकान्तयुक्तोक्तिदृष्टान्तो वो यतस्ततः । साध्यसाधनवैकल्यमुदाहार्यं सधर्मणि ॥१८३॥

अर्थ: दूसरे तुम्हारे मतसे सर्वथा युक्त वचन बोलनेवाला पुरुष दृष्टान्त रूपसे है नहीं, अतः आपको दृष्टान्तमें साध्यके अभावमें साधनका अभाव दिखलाना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार आप अन्वय दृष्टान्तमें अन्वयव्याप्ति करके घटित बतलाते हैं उसी प्रकार व्यतिरेक दृष्टान्तमें व्यतिरेकव्याप्ति भी घटित करके बतलानी चाहिए। तभी साध्यकी सिद्धि हो सकती है, अन्यथा नहीं ॥१८३॥


श्रुत्वा वस्तुन्यदृष्टे च प्रमाणं वेदमागतम् । न समाश्रयणं युक्तं हेतोः सर्वज्ञदूषणे ॥१८४॥

अर्थ: तथा आपके यहाँ सुनकर अदृष्ट वस्तुके विषयमें वेदमें प्रमाणता आती है, अतः वक्तृत्व हेतुके बलसे सर्वज्ञके विषयमें दूषण उपस्थित करनेमें इसका आश्रय करना उचित नहीं है अर्थात् वेदार्थका प्रत्यक्ष ज्ञान न होनेसे उसके बलसे सर्वज्ञके अभावकी सिद्धि नहीं की जा सकती ॥१८४॥


वक्तृत्वस्य विरोधो वा सर्वज्ञत्वेन कः समम् । सति सर्वज्ञतायोगे वक्ता हि सुतरां भवेत् ॥१८५॥

अर्थ: फिर थोड़ा विचार तो करो कि सर्वज्ञताके साथ वक्तृत्वका क्या विरोध है ? मैं तो कहता हूँ कि सर्वज्ञताका सुयोग मिलनेपर यह पुरुष अधिक वक्ता अपने आप हो जाता है ॥१८५॥


यो न वेत्ति स किं वक्ति वराको मतिदुर्विधः । व्यतिरेकाविनाभावो भावाच्च स्यान्न साधनम् ॥१८६॥

अर्थ: जो बेचारा स्वयं नहीं जानता है वह बुद्धिका दरिद्र दूसरोंके लिए क्या कह सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं । इस प्रकार व्यतिरेक और अविनाभावका अभाव होनेसे वह साधक नहीं हो सकता ॥१८६॥


स्वपक्षोऽयमविद्येयं तथा रागादिकं मलम् । क्षीयतेऽलं क्वचिद्धेतोर्धातुहेममलं यथा ॥१८७॥

अर्थ: हमारा पक्ष तो यह है कि जिस प्रकार कि सुवर्णादिक धातुओंका मल किसीमें बिलकुल ही क्षीण हो जाता है उसी प्रकार यह अविद्या अर्थात् अज्ञान और रागादिक मल कारण पाकर किसी पुरुषमें अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं। जिसमें क्षीण हो जाते हैं वही सर्वज्ञ कहलाने लगता है ॥१८७॥


अस्मदादिमते धर्मा अपेक्षितविपर्ययाः । धर्मत्वादुत्पलद्रव्ये यथा नीलविशेषणम् ॥१८८॥

अर्थ: हमारे सिद्धान्तसे पदार्थोंके जो धर्म अर्थात् विशेषण हैं वे अपनेसे विरुद्ध धर्मकी अपेक्षा अवश्य रखते हैं जिस प्रकार कि उत्पल आदिके लिए जो नील विशेषण दिया जाता है उससे यह सिद्ध होता है कि कोई उत्पल ऐसा भी होता है जो कि नील नहीं है । इसी प्रकार पुरुषके लिए जो आपके यहाँ असर्वज्ञ विशेषण है वह सिद्ध करता है कि कोई पुरुष ऐसा भी है जो असर्वज्ञ नहीं है अर्थात् सर्वज्ञ है । यथार्थमें विशेषणकी सार्थकता सम्भव और व्यभिचार रहते ही होती है जैसा कि अन्यत्र कहा है - ‘सम्भवव्यभिचाराभ्यां स्याद्विशेषणमर्थवत् । न शैत्येन न चौष्ण्येन वह्निः क्वापि विशिष्यते ॥’ अर्थात् सम्भव और व्यभिचारके कारण ही विशेषण सार्थक होता है । अग्निके लिए कहीं भी शीत विशेषण नहीं दिया जाता क्योंकि वह सम्भव नहीं है इसी प्रकार कहीं भी उष्ण विशेषण नहीं दिया जाता क्योंकि अग्नि सर्वत्र उष्ण ही होती है । इसी प्रकार तुम्हारे सिद्धान्तानुसार यदि पुरुष असर्वज्ञ ही होता तो उसके लिए असर्वज्ञ विशेषण देना निरर्थक था । उसकी सार्थकता तभी है जब किसी पुरुषको सर्वज्ञ माना जावे ॥१८८॥


कर्त्रभावश्च, वेदस्य युक्त्यभावान्न युज्यते । कर्तृमत्त्वे तु संसाध्ये दृश्यवद्धेतुसंभवः ॥१८९॥

अर्थ: ‘वेदका कोई कर्ता नहीं है’ यह बात युक्तिके अभावमें सिद्ध नहीं होती अर्थात् अकर्तृत्वकी संगति नहीं बैठती जब कि ‘वेदका कर्ता है’ इस विषयमें अनेक हेतु सम्भव हैं । जिस प्रकार दृश्यमान घट-पटादि पदार्थ सहेतुक होते हैं उसी प्रकार ‘वेद सकर्ता है’ इस विषयमें भी अनेक हेतु सम्भव हैं ॥१८९॥


युक्तिश्च, कर्तृमान् वेदः पदवाक्यादिरूपतः । विधेयप्रतिषेध्यार्थयुक्तत्वान्मैत्रकाव्यवत् ॥१९०॥

अर्थ: चूँकि वेद पद और वाक्यादि रूप है तथा विधेय और प्रतिषेध्य अर्थसे युक्त है अतः कर्तृमान् है, किसीके द्वारा बनाया गया है । जिस प्रकार मैत्रका काव्य पदवाक्य रूप होनेसे सकर्तृक है उसी प्रकार वेद भी पदवाक्य रूप होनेसे सकर्तृक है ॥१९०॥


ब्रह्मप्रजापतिप्रायः पुरुषेभ्यश्च संभवः । श्रूयते वेदशास्त्रस्य नापनेतुं स शक्यते ॥१९१॥

अर्थ: इसके साथ लोकमें यह सुना जाता है कि वेदकी उत्पत्ति ब्रह्मा तथा प्रजापति आदि पुरुषोंसे हुई है सो इस प्रसिद्धिका दूर किया जाना शक्य नहीं है ॥१९१॥


स्यात्ते मतिर्न कर्तारः प्रवक्तारः श्रुतेः स्मृताः । तथा नाम प्रवक्तारो रागद्वेषादिभिर्युताः ॥१९२॥

अर्थ: सम्भवतः तुम्हारा यह विचार हो कि ब्रह्मा आदि वेदके कर्ता नहीं हैं किन्तु प्रवक्ता अर्थात् प्रवचन करनेवाले हैं तो वे प्रवचनकर्ता आपके मतसे राग-द्वेषादिसे युक्त ही ठहरेंगे ॥१९२॥


सुसर्वज्ञाश्च किं कुर्युरन्यथा ग्रन्थदेशनम् । अर्थस्य वान्यथाख्यानं प्रमाणं तन्मतं यतः ॥१९३॥

अर्थ: और यदि सर्वज्ञ हैं तो वे ग्रन्थका अन्यथा उपदेश कैसे देंगे और अन्यथा व्याख्यान कैसे करेंगे, क्योंकि सर्वज्ञ होनेसे उनका मत प्रमाण है। इस प्रकार विचार करनेपर सर्वज्ञकी ही सिद्धि होती है ॥१९३॥


चातुर्विध्यं च यज्जात्या तन्न युक्तमहेतुकम् । ज्ञानं देहविशेषस्य न च श्लोकाग्निसंभवात् ॥१९४॥

अर्थ: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके भेदसे जो जातिके चार भेद हैं वे बिना हेतुके युक्तिसंगत नहीं हैं। यदि कहो कि वेदवाक्य और अग्निके संस्कारसे दूसरा जन्म होनेके कारण उनके देहविशेषका ज्ञान होता है सो यह कहना भी युक्त नहीं है ॥१९४॥


दृश्यते जातिभेदस्तु यत्र तत्रास्य संभवः । मनुष्यहस्तिवालेयगोवाजिप्रभृतौ यथा ॥१९५॥

अर्थ: हाँ, जहाँ-जहाँ जाति-भेद देखा जाता है वहाँ-वहाँ शरीरमें विशेषता अवश्य पायी जाती है जिस प्रकार कि मनुष्य, हाथी, गधा, गाय, घोड़ा आदिमें पायी जाती है ॥१९५॥


न च जात्यन्तरस्थेन पुरुषेण स्त्रियां क्वचित् । क्रियते गर्भसंभूतिर्विप्रादीनां तु जायते ॥१९६॥

अर्थ: इसके सिवाय दूसरी बात यह है कि अन्य जातीय पुरुषके द्वारा अन्य जातीय स्त्रीमें गर्भोत्पत्ति नहीं देखी जाती परन्तु ब्राह्मणादिकमें देखी जाती है। इससे सिद्ध है कि ब्राह्मणादिकमें जातिवैचित्र्य नहीं है ॥१९६॥


अश्वायां रासभेनास्ति संभवोऽस्येति चेन्न सः । नितान्तमन्यजातिस्थः शफादितनुसाम्यतः ॥१९७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें यदि तुम कहो कि गधेके द्वारा घोड़ीमें गर्भोत्पत्ति देखी जाती है, इसलिए उक्त युक्ति ठीक नहीं है ? तो ऐसा कहना उचित नहीं है क्योंकि गधा और घोड़ा दोनों अत्यन्त भिन्न जातीय नहीं है क्योंकि एक खुर आदिकी अपेक्षा उनके शरीरमें समानता पायी जाती है ॥१९७॥


यदि वा तद्वदेव स्याद् द्वयोर्विसदृशः सुतः । नात्र दृष्टं तथा तस्माद् गुणैर्वर्णव्यवस्थितिः ॥१९८॥

अर्थ: अथवा दोनोंमें भिन्नजातीयता ही है यदि ऐसा पक्ष है तो दोनोंकी जो सन्तान होगी वह विसदृश ही होगी जैसे कि गधा और घोड़ीके समागमसे जो सन्तान होगी वह न घोड़ा ही कहलावेगी और न गधा ही। किन्तु खच्चर नामकी धारक होगी किन्तु इस प्रकार सन्तानकी विसदृशता ब्राह्मणादिमें नहीं देखी जाती इससे सिद्ध होता है कि वर्णव्यवस्था गुणोंके अधीन है जातिके अधीन नहीं है ॥१९८॥


मुखादिसंभवश्चापि ब्रह्मणो योऽभिधीयते । निर्हेतुः स्वगेहेऽसौ शोभते भाषमाणकः ॥१९९॥

अर्थ: इसके अतिरिक्त जो यह कहा जाता है कि ब्राह्मणकी उत्पत्ति ब्रह्माके मुखसे हुई है, क्षत्रियकी उत्पत्ति भुजासे हुई है, वैश्यकी उत्पत्ति जंघासे हुई है और शूद्रकी उत्पत्ति पैरसे हुई है सो ऐसा हेतुहीन कथन करनेवाला अपने घरमें ही शोभा देता है सर्वत्र नहीं ॥१९९॥


ऋषिश्टङ्गादिकानां च मानवानां प्रकीर्त्यते । ब्राह्मण्यं गुणयोगेन न तु तद्योनिसंभवात् ॥२००॥

अर्थ: तथा ऋषिश्रृंग आदि मानवोंमें जो ब्राह्मणता कही जाती है वह गुणोंके संयोगसे कही जाती है ब्राह्मण योनिमें उत्पन्न होनेसे नहीं कही जाती ॥२००॥


बृहत्त्वाद् भगवान् ब्रह्मा नाभेयस्तस्य ये जनाः । भक्ताः सन्तस्तु पश्यन्ति ब्राह्मणास्ते प्रकीर्तिताः ॥२०१॥

अर्थ: वास्तवमें समस्त गुणोंके वृद्धिंगत होनेके कारण भगवान् ऋषभदेव ब्रह्मा कहलाते हैं और जो सत्पुरुष उनके भक्त हैं वे ब्राह्मण कहे जाते हैं ॥२०१॥


क्षत्रियास्तु क्षतत्राणाद् वैश्याः शिल्पप्रवेशनात् । श्रुतात् सदागमाद् ये तु द्रुतास्ते शूद्रसंज्ञिताः ॥२०२॥

अर्थ: क्षत अर्थात् विनाशसे त्राण अर्थात् रक्षा करनेके कारण क्षत्रिय कहलाते हैं, शिल्प अर्थात् वस्तुनिर्माण या व्यापारमें प्रवेश करनेसे लोग वैश्य कहे जाते हैं और श्रुत अर्थात् प्रशस्त आगमसे जो दूर रहते हैं वे शूद्र कहलाते हैं ॥२०२॥


न जातिर्गर्हिता काचिद्गुणाः कल्याणकारणम् । व्रतस्थमपि चाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥२०३॥

अर्थ: कोई भी जाति निन्दनीय नहीं है, गुण ही कल्याण करनेवाले हैं। यही कारण है कि व्रत धारण करनेवाले चाण्डालको भी गणधरादि देव ब्राह्मण कहते हैं ॥२०३॥


विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥२०४॥

अर्थ: विद्या और विनयसे सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल आदिके विषयमें जो समदर्शी हैं वे पण्डित कहलाते हैं अथवा जो पण्डितजन हैं वे इन सबमें समदर्शी होते हैं ॥२०४॥


चातुर्वर्ण्यं यथान्यच्च चाण्डालादिविशेषणम् । सर्वमाचारभेदेन प्रसिद्धिं भुवने गतम् ॥२०५॥

अर्थ: इस प्रकार ब्राह्मणादिक चार वर्ण और चाण्डाल आदि विशेषणोंका जितना अन्य वर्णन है वह सब आचारके भेदसे ही संसारमें प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है ॥२०५॥


अपूर्वाख्यश्च धर्मो न व्यज्यते यागकर्मणा । नित्यत्वाद् व्योमवद् व्यक्तेरनित्यो वा घटादिवत् ॥२०६॥

अर्थ: इसके पूर्व तुमने कहा था कि यज्ञसे अपूर्व अथवा अदृष्ट नामका धर्म व्यक्त होता है सो यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि अपूर्व धर्म तो आकाशके समान नित्य है वह कैसे व्यक्त होगा ? और यदि व्यक्त होता ही है तो फिर वह नित्य न रहकर घटादिके समान अनित्य होगा ॥२०६॥


फलं रूपपरिच्छेदः प्रदीपव्यक्त्यनन्तरम् । दृष्टं यथेह चापूर्वव्यक्तिकालं फलं भवेत् ॥२०७॥

अर्थ: जिस प्रकार दीपकके व्यक्त होनेके बाद रूपका ज्ञान उसका फल होता है उसी प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिरूपी फल भी अपूर्वधर्मके व्यक्त होनेके बाद ही होना चाहिए पर ऐसा नहीं है ॥२०७॥


शास्त्रेण चोदितत्वाच्च वेदीमध्ये पशोर्वधः । प्रत्यवायाय नेत्येतदयुक्तं येन तच्छृणु ॥२०८॥

अर्थ: तुमने कहा है कि वेदीके मध्यमें पशुओंका जो वध होता है वह शास्त्र निरूपित होनेसे पापका कारण नहीं है सो ऐसा कहना अयुक्त है उसका कारण सुनो ॥२०८॥


वेदागमस्य शास्त्रत्वमसिद्धं शास्त्रमुच्यते । तद्धि यन्मातृवच्छास्ति सर्वस्मै जगते हितम् ॥२०९॥

अर्थ: सर्वप्रथम तो वेद शास्त्र हैं यही बात असिद्ध है क्योंकि शास्त्र वह कहलाता है जो माताके समान समस्त संसारके लिए हितका उपदेश दे ॥२०९॥


प्रायश्चित्तं च निर्दोषे वक्तुं कर्मणि नोचितम् । अत्र तूक्तं ततो दुष्टं तच्चेदमभिधीयते ॥२१०॥

अर्थ: जो कार्य निर्दोष होता है उसमें प्रायश्चित्तका निरूपण करना उचित नहीं है परन्तु इस याज्ञिक हिंसामें प्रायश्चित्त कहा गया है इसलिए वह सदोष है । उस प्रायश्चित्तका कुछ वर्णन यहाँ किया जाता है ॥२१०॥


राजानं हन्त्यसौ सोमं वीरं वा नाकवासिनाम् । सोमेन यो यजेत्तस्य दक्षिणा द्वादशं शतम् ॥२११॥

अर्थ: जो सोमयज्ञमें सोम अर्थात् चन्द्रमाके प्रतीक रूप सोम लतासे यज्ञ करता है जिसका तात्पर्य होता है कि वह देवोंके वीर सोम राजाका हनन करता है उसके इस यज्ञकी दक्षिणा एक सौ बारह गौ है ॥२११॥


शोधयत्यत्र देवानां शतं वीरं प्रतर्पणम् । प्राणानां दश कुर्वन्ति यैकादश्यात्मनस्तु सा ॥२१२॥

द्वादशी दक्षिणा या तु दक्षिणा सैव केवलम् । इतरासां च दोषाणां व्यापारो विनिवर्तने ॥२१३॥

अर्थ: इन एक सौ बारह दक्षिणाओंमें-से सौ दक्षिणाएँ देवोंके वीर सोमका शोधन करती हैं, दस दक्षिणाएँ प्राणोंका तर्पण करती हैं, ग्यारहवीं दक्षिणा आत्माके लिए है और जो बारहवीं दक्षिणा है वह केवल दक्षिणा ही है । अन्य दक्षिणाओंका व्यापार तो दोषोंके निवारण करनेमें होता है ॥२१२-२१३॥


तया च यत्पशुर्मायुमकृतोरोदवाहना (?) । पादाभ्यामेनसस्तस्माद्विश्वस्मान्मुञ्च त्वनलः ॥२१४॥

अर्थ: तथा पशु-यज्ञमें यदि पशु यज्ञके समय शब्द करे या अपने अगले दोनों पैरोंसे छाती पीटे तो हे अनल ! तुम मुझे इससे होनेवाले समस्त दोषसे मुक्त करो ॥२१४॥


एवमादि च बह्वेव गदितं दोषनोदनम् । आगमेन ततोऽन्येन व्यभिचारोऽत्र विद्यते ॥२१५॥

अर्थ: इत्यादि रूपसे जो दोषोंके बहुत-से प्रायश्चित्त कहे गये हैं उनके विषयमें अन्य आगमसे प्रकृतमें विरोध दिखाई देता है ॥२१५॥


पशोर्मध्ये वधो वेद्याः प्रत्यवायाय कल्प्यते । तस्य दुःखनिमित्तत्वाद् यथा व्याधकृतो वधः ॥२१६॥

अर्थ: जिस प्रकार व्याधके द्वारा किया हुआ वध दुःखका कारण होनेसे पापबन्धका निमित्त है उसी प्रकार वेदीके बीचमें पशुका जो वध होता है वह भी उसे दुःखका कारण होनेसे पापबन्धका ही निमित्त है ॥२१६॥


स्वयंभुवा च लोकस्य सर्गो नेयर्ति सत्यताम् । विचार्यमाणमेतद्धि पुराणतृणदुर्बलम् ॥२१७॥

अर्थ: ‘ब्रह्माके द्वारा लोककी सृष्टि हुई है’ यह कहना भी सत्य नहीं है क्योंकि विचार करनेपर ऐसा कथन जीर्णतृणके समान निस्सार जान पड़ता है ॥२१७॥


कृतार्थो यद्यसौ सृष्टौ तस्यां किं स्यात्प्रयोजनम् । क्रीडेति चेत्कृतार्थोऽसौ न मवत्यर्भको यथा ॥२१८॥

अर्थ: हम पूछते हैं कि जब ब्रह्मा कृतकृत्य है तो उसे सृष्टिकी रचना करनेसे क्या प्रयोजन है ? कहो कि क्रीड़ावश वह सृष्टिकी रचना करता है तो फिर कृतकृत्य कहाँ रहा ? जिस प्रकार क्रीड़ाका अभिलाषी बालक अकृत-कृत्य है उसी प्रकार क्रीड़ाका अभिलाषी ब्रह्मा भी अकृतकृत्य कहलायेगा ॥२१८॥


साक्षादेव रतिं कस्मान्न सृजेत् स विनेतरैः । सृजतो वास्य के भावा व्रजेयुः करणादिताम् ॥२१९॥

अर्थ: फिर ब्रह्मा अन्य पदार्थोंके बिना स्वयं ही रतिको क्यों नहीं प्राप्त हो जाता ? जिससे सृष्टि निर्माणकी कल्पना करनी पड़ी । इसके सिवाय एक प्रश्न यह भी उठता है कि जब ब्रह्मा सृष्टिकी रचना करता है तो इसके सहायक करण, अधिकरण आदि कौन-से पदार्थ हैं ? ॥२१९॥


किंचोपकारिणः केचित् केचिद्वास्यापकारिणः । सुखिनः कुरुते कांश्चिद् येन कांश्चिच्च दुःखिनः ॥२२०॥

अर्थ: फिर संसारमें सब लोग एक सदृश नहीं हैं, कोई सुखी देखे जाते हैं और कोई दुःखी देखे जाते हैं । इससे यह मानना पड़ेगा कि कोई लोग तो ब्रह्माके उपकारी हैं और कोई अपकारी हैं । जो उपकारी हैं उन्हें यह सुखी करता है और कोई अपकारी हैं उन्हें यह दुःखी करता है ॥२२०॥


अथ नैव कृतार्थोऽसावेवं तर्हि स नेश्वरः । कर्मणां परतन्त्रत्वाद् यथा कश्चिद् भवद्विधः ॥२२१॥

अर्थ: इस सब विसंवादसे बचनेके लिए यदि यह माना जाये कि ईश्वर कृतकृत्य नहीं है तो वह कर्मोंके परतन्त्र होनेके कारण ईश्वर नहीं कहलावेगा जिस प्रकार कि आप कर्मोंके परतन्त्र होनेके कारण ईश्वर नहीं हैं ॥२२१॥


सुबुद्धिनरयत्नोत्थसंस्थानाः कमलादयः । विशिष्टाकारयुक्तत्वाद् रथवेश्मादयो यथा ॥२२२॥

यद्बुद्धिपूर्वका एते भविष्यन्ति स ईश्वरः । इत्येतच्च न सम्यक्त्वं व्रजत्येकान्तवादिनः ॥२२३॥

अर्थ: जिस प्रकार रथ, मकान आदि पदार्थ विशिष्ट आकारसे सहित होनेके कारण किसी बुद्धिमान् मनुष्यके प्रयत्नसे निर्मित माने जाते हैं उसी प्रकार कमल आदि पदार्थ भी विशिष्ट आकारसे युक्त होनेके कारण किसी बुद्धिमान् मनुष्यके प्रयत्नसे रचित होना चाहिए । “जिसकी बुद्धिसे इन सबकी रचना होती है वही ईश्वर है” इस अनुमानसे सृष्टिकर्ता ईश्वरकी सिद्धि होती है सो यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि एकान्तवादीका उक्त अनुमान समीचीनताको प्राप्त नहीं है ॥२२२-२२३॥


सुबुद्धिनरयत्नोत्थाः सर्वथा न रथादयः । व्यवस्थितं यतस्तत्र द्रव्यं चैवोपजन्यते ॥२२४॥

अर्थ: विचार करनेपर जान पड़ता है कि रथ आदि जितने पदार्थ हैं वे सब एकान्तसे बुद्धिमान् मनुष्यके प्रयत्नसे ही उत्पन्न होते हैं ऐसी बात नहीं है । क्योंकि रथ आदि वस्तुओंमें जो लकड़ी आदि पदार्थ अवस्थित है वही रथादिरूप उत्पन्न होता है ॥२२४॥


क्लेशादियुक्तता चास्य व्यश्नुते तक्षकादिवत् । नामकर्म च मैवं स्यादीश्वरो यस्त्वयेष्यते ॥२२५॥

अर्थ: जिस प्रकार रथ आदिके बनानेमें बढ़ई आदिको क्लेश उठाना पड़ता है उसी प्रकार ईश्वरको भी सृष्टिके बनानेमें क्लेश उठाना पड़ता होगा । इस तरह उसके सुखी होनेमें बाधा प्रतीत होती है । यथार्थमें तुम जिसे ईश्वर कहते हो वह नाम कर्म है ॥२२५॥


विशिष्टाकारसंबद्धमीश्वरस्य पुनर्वपुः । ईश्वरान्तरयत्नोत्थमिष्यतेऽतो न निश्चयः ॥२२६॥

अपरेश्वरयत्नोत्थमथैतदपि कल्प्यते । सत्येवमनवस्था स्यान्न च स्वस्याभिसर्जनम् ॥२२७॥

शरीरमथ नैवास्य विद्यते नैष सर्जकः । अमूर्तत्वाद् यथाकाशं तक्षवद् वा सविग्रहः ॥२२८॥

अर्थ: एक प्रश्न यह भी उठता है कि ईश्वर सशरीर है या अशरीर ? यदि अशरीर है तो उससे मूर्तिक पदार्थोंका निर्माण सम्भव नहीं है । यदि सशरीर है तो उसका वह विशिष्टाकारवाला शरीर किसके द्वारा रचा गया है ? यदि स्वयं रचा गया है तो फिर दूसरे पदार्थ स्वयं क्यों नहीं रचे जाते ? यदि यह माना जाय कि वह दूसरे ईश्वरके यत्नसे रचा गया है तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होगा कि उस दूसरे ईश्वरका शरीर किसने रचा ? इस तरह अनवस्था दोष उत्पन्न होगा । इस विसंवादसे बचनेके लिए यदि यह माना जाये कि ईश्वरके शरीर है ही नहीं तो फिर अमूर्तिक होनेसे वह सृष्टिका रचयिता कैसे होगा ? जिस प्रकार अमूर्तिक होनेसे आकाश सृष्टिका कर्ता नहीं है उसी प्रकार अमूर्तिक होनेसे ईश्वर भी सृष्टिका कर्ता नहीं हो सकता । यदि बढ़ईके समान ईश्वरको कर्ता माना जाये तो वह सशरीर होगा न कि अशरीर ॥२२६-२२८॥


यजनार्थं च सृष्टानां पशूनां वाहनादिकम् । क्रियमाणं विरुद्धचेत तद्धि स्तेयं प्रकल्प्यते ॥२२९॥

अर्थ: और तुमने जो कहा कि ब्रह्माने पशुओंकी सृष्टि यज्ञके लिए ही की है सो यदि यह सत्य है तो फिर पशुओंसे बोझा ढोना आदि काम क्यों लिया जाता ? इसमें विरोध आता है विरोध ही नहीं यह तो चोरी कहलावेगी ॥२२९॥


सतः कर्मभिरेवेदं रागादिभिरुपार्जितैः । वैचित्र्यं व्यश्नुते विश्वमनादौ भवसागरे ॥२३०॥

अर्थ: इससे यह सिद्ध होता है कि रागादि भावोंसे उपार्जित कर्मोंके कारण ही समस्त लोग अनादि संसारसागरमें विचित्र दशाका अनुभव करते हैं ॥२३०॥


कर्म किं पूर्वमाहोस्विच्छरीरमिति नेदृशः । युक्तः प्रश्नो भवेऽनादौ बीजपादपयोर्यथा ॥२३१॥

अर्थ: कर्म पहले होता है कि शरीर पहले होता है ? ऐसा प्रश्न करना ठीक नहीं है क्योंकि इन दोनोंका सम्बन्ध बीज और वृक्षके समान अनादि कालसे चला आ रहा है ॥२३१॥


अन्तोऽपि तर्हि न स्याच्चेत्तन्न बीजविनाशतः । दृष्टा हि पादपोद्भूतेरसंभूतिरिदं तथा ॥२३२॥

अर्थ: कर्म और शरीरका सम्बन्ध अनादि है इसलिए इसका कभी अन्त नहीं होगा ऐसा कहना भी उचित नहीं है क्योंकि जिस प्रकार बीजके नष्ट हो जानेसे वृक्षकी उत्पत्तिका अभाव देखा जाता है उसी प्रकार कर्मके नष्ट होनेसे शरीरका अभाव भी देखा जाता है ॥२३२॥


तस्माद् द्विष्टेन केनापि प्राणिना पापकर्मणा । कुग्रन्थरचनां कृत्वा यज्ञकर्म प्रवर्तितम् ॥२३३॥

अर्थ: इसलिए पाप कार्य करनेवाले किसी द्वेषी पुरुषने खोटे शास्त्रकी रचना कर इस यज्ञ कार्यको प्रचलित किया है ॥२३३॥


संप्राप्तोऽसि कुले जन्म बुद्धिमानसि मानवः । निवर्तस्व ततः पापादेतस्माद् व्याधकर्मणः ॥२३४॥

अर्थ: तुम उच्च कुलमें उत्पन्न हुए हो और बुद्धिमान् मनुष्य हो इसलिए शिकारियोंके कार्यके समान इस पाप कार्यसे विरत होओ ॥२३४॥


यदि प्राणिवधः स्वर्गसंप्राप्तौ कारणं भवेत् । ततः शून्यो भवेदेष लोकोऽल्पैरेव वासरैः ॥२३५॥

अर्थ: यदि प्राणियोंका वध स्वर्गप्राप्तिका कारण होता तो थोड़े ही दिनोंमें यह संसार शून्य हो जाता ॥२३५॥


प्राप्तेन वापि किं तेन च्युतिर्यस्मात् पुनर्भवेत् । दुःखेन च समासक्तं सुखं स्वल्पं च बाह्यजम् ॥२३६॥

अर्थ: और फिर उस स्वर्गके प्राप्त होनेसे भी क्या लाभ है ? जिससे फिर च्युत होना पड़ता है । यथार्थमें बाह्य पदार्थोंसे जो सुख उत्पन्न होता है वह दुःखसे मिला हुआ तथा परिमाणमें थोड़ा होता है ॥२३६॥


यदि प्राणिवधाद् ब्रह्मलोकं गच्छन्ति मानवाः । तस्यानुमननात् कस्मात् पतितो नरके वसुः ॥२३७॥

अर्थ: यदि प्राणियोंका वध करनेसे मनुष्य स्वर्ग जाते हैं तो फिर प्राणिवधकी अनुमति मात्रसे वसु नरकमें क्यों पड़ा ? ॥२३७॥


उत्तिष्ठ भो वसो स्वर्गं व्रजेति कृतनिस्वनैः । सूत्रकण्ठैर्दुराचारैः स्वपराशुभकारिभिः ॥२३८॥

स्वपक्षानुमतिप्रीतेरुद्घुष्याद्यापि यद्द्विजैः । आहुतिः क्षिप्यते वह्नौ नितान्तं क्रूरमानसैः ॥२३९॥

अर्थ: वसु नरक गया है इसमें प्रमाण यह है कि दुराचारी, निज और परका अकल्याण करनेवाले दुष्टचेता ब्राह्मण, अपने पक्षके समर्थनसे प्रसन्न हो आज भी ‘हे वसो ! उठो, स्वर्ग जाओ’ इस प्रकार जोर-जोरसे चिल्लाते हुए अग्निमें आहुति डालते हैं । यदि वसु नरक नहीं गया होता तो उक्त मन्त्र द्वारा आहुति देनेकी क्या आवश्यकता थी ? ॥२३८-२३९॥


पिष्टेनापि पशुं कृत्वा निघ्नन्तो नरकं गताः । संकल्पादशुभात् कैव कथेतरपशोर्वधे ॥२४०॥

अर्थ: चूर्णके द्वारा पशु बनाकर उसका घात करनेवाले लोग भी नरक गये हैं फिर अशुभ संकल्पसे साक्षात् अन्य पशुके वध करनेवाले लोगोंकी तो कथा ही क्या है ? ॥२४०॥


यज्ञकल्पनया नैव किंचिदस्ति प्रयोजनम् । अथापि स्यात्तथाप्येवं न कर्तव्या बुधोत्तमैः ॥२४१॥

अर्थ: प्रथम तो यज्ञकी कल्पनासे कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात् यज्ञकी कल्पना करना ही व्यर्थ है दूसरे यदि कल्पना करना ही है तो विद्वानोंको इस प्रकारके हिंसायज्ञकी कल्पना नहीं करनी चाहिए ॥२४१॥


यजमानो भवेदात्मा शरीरं तु वितर्दिका । पुरोडाशस्तु संतोषः परित्यागस्तथा हविः ॥२४२॥

मूर्धजा एव दर्भाणि दक्षिणा प्राणिरक्षणम् । प्राणायामः सितं ध्यानं यस्य सिद्धपदं फलम् ॥२४३॥

सत्यं यूपस्तपो वह्निर्मानसं चपलं पशुः । समिधश्च हृषीकाणि धर्मयज्ञोऽयमुच्यते ॥२४४॥

अर्थ: उन्हें धर्मयज्ञ ही करना चाहिए । आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, सन्तोष साकल्य है, त्याग होम है, मस्तकके बाल कुशा हैं, प्राणियोंकी रक्षा दक्षिणा है, शुक्लध्यान प्राणायाम है, सिद्धपदकी प्राप्ति होना फल है, सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि है, चंचल मन पशु है और इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं । इन सबसे यज्ञ करना चाहिए यही धर्मयज्ञ कहलाता है ॥२४२-२४४॥


यज्ञेन क्रियते तृप्तिर्देवानामिति चेन्मतिः । तन्न तेषां यतोऽस्त्येव दिव्यमन्नं यथेप्सितम् ॥२४५॥

अर्थ: यज्ञसे देवोंकी तृप्ति होती है यदि ऐसा तुम्हारा ख्याल है तो यह ठीक नहीं है क्योंकि देवोंको तो मनचाहा दिव्य अन्न उपलब्ध है ॥२४५॥


स्पर्शतो रसतो रूपाद्गन्धाद्येषां मनोहरम् । अन्नमस्ति किमेतेन तेषां मांसादिवस्तुना ॥२४६॥

अर्थ: जिन्हें स्पर्श, रस, गन्ध और रूपकी अपेक्षा मनोहर-आहार प्राप्त होता है उन्हें इस मांसादि घृणित वस्तुसे क्या प्रयोजन है ? ॥२४६॥


शुक्रशोणितसंभूतममेध्यं कृमिसंभवम् । दुर्गन्धदर्शनं मांसं भक्षयन्ति कथं सुराः ॥२४७॥

अर्थ: जो रज और वीर्यसे उत्पन्न है, अपवित्र है, कीड़ोंका उत्पत्तिस्थान है तथा जिसकी गन्ध और रूप दोनों ही अत्यन्त कुत्सित हैं ऐसे मांसको देव लोग किस प्रकार खाते हैं अर्थात् किसी प्रकार नहीं खाते ॥२४७॥


त्रयोऽग्नयो वपुष्येव ज्ञानदर्शनजाठराः । दक्षिणाग्न्यादिविज्ञानं कार्यं तेष्वेव सूरिभिः ॥२४८॥

अर्थ: ज्ञानाग्नि, दर्शनाग्नि और जठराग्नि इस तरह तीन अग्नियाँ शरीरमें सदा विद्यमान रहती हैं; विद्वानोंको उन्हींमें दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्नि इन तीन अग्नियोंकी स्थापना करना चाहिए ॥२४८॥


सुरा यदि हुतेनाग्नौ तृप्तिं यान्ति बुभुक्षिताः । स्वतो नाम ततो देवास्तृप्तिं किमिति नागताः ॥२४९॥

अर्थ: यदि भूखे देव होम किये गये पदार्थसे तृप्तिको प्राप्त होते हैं तो वे स्वयं ही क्यों नहीं तृप्तिको प्राप्त हो जाते, मनुष्योंकें होमको माध्यम क्यों बनाते हैं ? ॥२४९॥


ब्रह्मलोकात्किलागत्य दुर्गन्धं योनिजं वपुः । चखाद ध्वाङ्क्षगोमायुसारमेयसमो भवेत् ॥२५०॥

अर्थ: जो देव ब्रह्मलोकसे आकर योनिसे उत्पन्न होनेवाले दुर्गन्धयुक्त शरीरको खाता है वह कौए, शृगाल और कुत्तेके समान है ॥२५०॥


लालाक्लिन्ने मुखे क्षिप्तं कथं वान्नं द्विजातिभिः । विट्पूर्णकुक्षिसंप्राप्तं तर्पयेत् स्वर्गवासिनः ॥२५१॥

अर्थ: इसके सिवाय तुम श्राद्धतर्पण आदिके द्वारा मृत व्यक्तियोंकी तृप्ति मानते हो सो जरा विचार तो करो । ब्राह्मण लोग लारसे भीगे हुए अपने मुखमें जो अन्न रखते हैं वह मलसे भरे पेटमें जाकर पहुँचता है । ऐसा अन्न स्वर्गवासी देवताओंको तृप्त कैसे करता होगा ? ॥२५१॥


एवं ततो गदन्तं तमनेकान्तदिवाकरम् । देवर्षितेजसा दीप्तं शास्त्रार्थज्ञानजन्मना ॥२५२॥

अर्थ: इस प्रकार शास्त्रोंके अर्थज्ञानसे उत्पन्न, देवर्षिके तेजसे देदीप्यमान, उक्त कथन करते हुए नारदजी अनेकान्तके सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥२५२॥


ऋत्विक्पराजयोद्भूतक्रोधसंभारकम्पिताः । वेदार्थाभ्यसनात्यन्तदयानिर्मुक्तमानसाः ॥२५३॥

अर्थ: ब्राह्मणोंने उन्हें सब ओरसे घेर लिया। उस समय वे ब्राह्मण याजककी पराजयसे उत्पन्न क्रोधके भारसे कम्पित थे, वेदार्थका अभ्यास करनेके कारण उनके हृदय दयासे रहित थे ॥२५३॥


आशीविषसमाशेषदृष्टतारकलोचनाः । आवृत्य सर्वतः क्षुब्धाः कृत्वा कलकलं महत् ॥२५४॥

अर्थ: सर्पके समान उनकी आँखोंकी पुतलियाँ सबको दिख रही थीं और क्षुभित हो सब ओरसे बड़ा भारी कल-कल कर रहे थे ॥२५४॥


बद्ध्वा परिकरं पापाः सूत्रकण्ठाः समुद्धताः । हस्तपादादिभिर्हन्तुं वायसा इव कौशिकम् ॥२५५॥

अर्थ: वे सब ब्राह्मण कमर कसकर हस्तपादादिकसे नारदको मारनेके लिए ठीक उसी तरह तैयार हो गये जिस प्रकार कि कौए उल्लूको मारनेके लिए तैयार हो जाते हैं ॥२५५॥


नारदोऽपि ततः कांश्चिन्मुष्टिमुद्गरताडनैः । पार्ष्णिनिर्घातपातैश्च कांश्चिदन्यान् यथागतान् ॥२५६॥

अर्थ: तदनन्तर नारद भी उनमें-से कितने ही लोगोंको मुट्ठियोंरूपी मुद्गरोंकी मारसे और कितने ही लोगोंको एड़ीरूपी वज्रपातसे मारने लगा ॥२५६॥


शस्त्रायमाणैर्निःशेषैर्गात्रैरेव सुदुःसहैः । द्विजान् जघान कुर्वाणो रेचकं भ्रमणं बहून् ॥२५७॥

अर्थ: उस समय नारदके समस्त अवयव अत्यन्त दुःसह शस्त्रोंके समान जान पड़ते थे । उन सबसे उसने घूम-घूमकर बहुत-से ब्राह्मणोंको मारा ॥२५७॥


अथ घ्नन् स चिरात्खिन्नः क्रूरैर्बहुभिरावृतः । गृहीतः सर्वगात्रेषु भजन्नाकुलतां पराम् ॥२५८॥

अर्थ: अथानन्तर चिरकाल तक ब्राह्मणों-को मारता हुआ खेदखिन्न हो गया। उसे बहुत-से दुष्ट ब्राह्मणोंने घेर लिया, वे उसे समस्त शरीरमें मारने लगे जिससे वह परम आकुलताको प्राप्त हुआ ॥२५८॥


पक्षीव निबिडं बद्धः पाशकैरतिदुःखितः । वियदुत्पतनाशक्तः संप्राप्तः प्राणसंशयम् ॥२५९॥

अर्थ: जिस प्रकार जालसे कसकर बँधा पक्षी अत्यन्त दुखी हो जाता है और आकाशमें उड़नेमें असमर्थ होता हुआ प्राणोंके संशयको प्राप्त होता है ठीक वही दशा उस समय नारदकी थी ॥२५९॥


एतस्मिन्नन्तरे दूतो दाशवक्त्रः समागतः । हन्यमानमिमं दृष्ट्वा प्रत्यभिज्ञाय नारदम् ॥२६०॥

अर्थ: इसी बीचमें रावणका दूत आ रहा था सो उसने पिटते हुए नारदको देखकर पहचान लिया ॥२६०॥


निवृत्य त्वरयात्यन्तमेवं रावणमब्रवीत् । यस्यान्तिकं महाराज दूतोऽहं प्रेषितस्त्वया ॥२६१॥

राज्ञः पश्यत एवास्य नारदो बहुभिर्द्विजैः । एकाकी हन्यते क्रूरैः शलभैरिव पन्नगः ॥२६२॥

अर्थ: उसने शीघ्र ही लौटकर रावणसे इस प्रकार कहा कि हे महाराज ! मुझ दूतको आपने जिसके पास भेजा था वह अकेला ही राजाके देखते हुए बहुत-से दुष्ट ब्राह्मणोंके द्वारा उस तरह मारा जा रहा है जिस प्रकार कि बहुत-से दुष्ट पतंगे किसी साँपको मारते हैं ॥२६१-२६२॥


अशक्तस्तत्र राजानमहं दृष्ट्वा भयार्दितः । निवेदयितुमायातो वृत्तान्तमिति दारुणम् ॥२६३॥

अर्थ: मैं शक्तिहीन था और राजाको वहाँ देख भयसे पीड़ित हो गया इसलिए यह दारुण वृत्तान्त आपसे कहनेके लिए दौड़ा आया हूँ ॥२६३॥


तमुदन्तं ततः श्रुत्वा रावणः कोपमागतः । वितानधरणीं गन्तुं प्रवृत्तो जविवाहनः ॥२६४॥

अर्थ: यह समाचार सुनते ही रावण क्रोधको प्राप्त हुआ और वेग-शाली वाहनपर सवार हो यज्ञभूमिमें जानेके लिए तत्पर हुआ ॥२६४॥


समीररंहसश्चास्य पुरः संप्रस्थिता नराः । परिवारविनिर्मुक्तखड्गाः सूत्कारभासिताः ॥२६५॥

अर्थ: वायुके समान जिनका वेग था, जो म्यानोंसे निकली हुई नंगी तलवारें हाथमें लिये थे और सू-सू शब्दसे सुशोभित थे ऐसे रावणके सिपाही पहले ही चल दिये थे ॥२६५॥


निमेषेण मखक्षोणीं प्राप्ता दर्शनमात्रतः । व्यमोचयन् दयायुक्ता नारदं शत्रुपञ्जरात् ॥२६६॥

अर्थ: वे पल-भरमें यज्ञभूमिमें जा पहुँचे। वहाँ जाकर उन दयालु पुरुषोंने दृष्टिमात्रसे नारदको शत्रुरूपी पिंजड़ेसे मुक्त करा दिया ॥२६६॥


निस्त्रिंशनरवृन्दैश्च रक्षिता पशुसंहतिः । मोचिता तैः सहुंकारं चक्षुर्निक्षेपमात्रतः ॥२६७॥

अर्थ: क्रूर मनुष्य जिस पशुओंके झुण्डकी रक्षा कर रहे थे उसे उन्होंने आँखके इशारे मात्रसे छुड़वा दिया ॥२६७॥


भज्यमानैस्ततो यूपैस्ताड्यमानैर्द्विजातिभिः । पशुभिर्मुच्यमानैश्च जातं सांराविणं महत् ॥२६८॥

अर्थ: यज्ञके खम्भे तोड़ डाले, ब्राह्मणोंको पिटाई लगायी और पशुओंको बन्धनसे छोड़ दिया। इन सब कारणोंसे वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥२६८॥


अब्रह्मण्यकृतारावास्ताड्यन्ते तावदेकशः । यावन्निपतिता भूमौ विश्वे निस्पन्दविग्रहाः ॥२६९॥

अर्थ: ‘अब्रह्मण्यं’ ‘अब्रह्मण्यं’ की रट लगानेवाले एक-एक ब्राह्मणको इतना पीटा कि जबतक वे निश्चेष्ट शरीर होकर भूमिपर गिर न पड़े तबतक पीटते ही गये ॥२६९॥


भटैश्च पर्यचोद्यन्त यथा वो दुःखमप्रियम् । सुखं च दयितं तद्वत्पशूनामपि दृश्यताम् ॥२७०॥

अर्थ: रावणके योद्धाओंने उन ब्राह्मणोंसे पूछा कि जिस प्रकार आप लोगोंको दुःख अप्रिय लगता है और सुख प्रिय जान पड़ता है उसी तरह इन पशुओंको भी लगता होगा ॥२७०॥


यथा हि जीवितं कान्तं त्रैलोक्यस्यापि भावतः । भवतात् सर्वजन्तूनामियमेव व्यवस्थितिः ॥२७१॥

अर्थ: जिस प्रकार तीन लोकके समस्त जीवोंको हृदयसे अपना जीवन अच्छा लगता है उसी प्रकार इन समस्त जन्तुओंकी भी व्यवस्था जाननी चाहिए ॥२७१॥


भवतां ताड्यमानानां कष्टा तावदियं व्यथा । शस्त्रैर्विशस्यमानानां पशूनां तु किमुच्यताम् ॥२७२॥

अर्थ: आप लोगोंको जो पिटाई लगी है उससे आप लोगोंकी यह कष्टकारी अवस्था हुई है फिर शस्त्रोंसे मारे गये पशुओंकी क्या दशा होती होगी सो आप ही कहो ॥२७२॥


दुष्कृतस्याधुना पापाः सहध्वं फलमागतम् । येन नो पुनरप्येवं कुरुध्वं पुरुषाधमाः ॥२७३॥

अर्थ: अरे पापी नीच पुरुषो ! इस समय तुम्हारे पापका जो फल प्राप्त हुआ है उसे सहन करो जिससे फिर ऐसा न करोगे ॥२७३॥


सुत्रामापि समं देवैर्यद्यायाति तथापि न । अस्मत्स्वामिनि वः क्रुद्धे जायते परिरक्षणम् ॥२७४॥

अर्थ: देवोंके साथ इन्द्र भी यहाँ आ जाये तो भी हमारे स्वामीके कुपित रहते तुम लोगोंकी रक्षा नहीं हो सकती ॥२७४॥


अश्वैर्मतङ्गजैस्तत्स्थै रथस्थैर्गगनस्थितैः । भूमिस्थैः पुरुषैरस्त्रैराहन्यन्ते द्विजातयः ॥२७५॥

अर्थ: हाथी, घोड़े, रथ, आकाश और पृथिवीपर जो भी जहाँ स्थित था वह वहींसे शस्त्रों द्वारा ब्राह्मणोंको मार रहा था ॥२७५॥


अब्रह्मण्यमहो राजन् हा मातर्यज्ञपालये । जीवामि मुञ्च मां नैवं करिष्यामि पुनर्भटाः ॥२७६॥

अर्थ: और ब्राह्मण चिल्ला रहे थे कि ‘अब्रह्मण्यम्’ बड़ा अनर्थ हुआ । हे राजन् ! हे माता यज्ञपालि ! हमारी रक्षा करो । हे योद्धाओ! हम जीवित रह सकें इसलिए छोड़ दो, अब ऐसा नहीं करेंगे’ ॥२७६॥


एवंविधमलं दीनं विलपन्तो विचेष्टितम् । गण्डूपदा इव प्राप्ताः समताड्यन्त ते भटैः ॥२७७॥

अर्थ: इस प्रकार दीनताके साथ अत्यन्त विलाप करते हुए वे ब्राह्मण केंचुए-जैसी दशाको प्राप्त थे फिर भी रावणके योद्धा उन्हें पीटते जाते थे ॥२७७॥


हन्यमानं ततो दृष्ट्वा सूत्रकण्ठकदम्बकम् । सहस्रकिरणग्राहमित्यवोचत नारदः ॥२७८॥

अर्थ: तदनन्तर ब्राह्मणोंके समूहको पिटता देख नारदने रावणसे इस प्रकार कहा ॥२७८॥


कल्याणमस्तु ते राजन् येनाहं मोचितस्त्वया । हन्यमान इमैर्व्याधैः सूत्रकण्ठैर्दुरात्मभिः ॥२७९॥

अर्थ: कि हे राजन् ! तुम्हारा कल्याण हो । मैं इन दुष्ट शिकारी ब्राह्मणोंके द्वारा मारा जा रहा था जो आपने मुझे इनसे छुड़ाया ॥२७९॥


अवश्यमेवमेतेन भवितव्यं यतस्ततः । कुर्वेतेषां दयां क्षुद्रा जीवन्तु प्रियजीविताः ॥२८०॥

अर्थ: यह कार्य चूँकि ऐसा ही होना था सो हुआ अब इनपर दया करो । ये क्षुद्र जीव जीवित रह सकें ऐसा करो, अपना जीवन इन्हें प्रिय है ॥२८०॥


ज्ञातं किं न तथोत्पन्नाः कुपाखण्डा यथा नृप । शृण्वस्यामवसर्पिण्यां तुरीयसमयागमे ॥२८१॥

ऋषभो नाम विख्यातो बभूव त्रिजगन्नतः । कृत्वा कृतयुगं येन कलानां कल्पितं शतम् ॥२८२॥

अर्थ: हे राजन्! इन कुपाखण्डियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है ? यह क्या आप नहीं जानते हैं । अच्छा सुनो मैं कहता हूँ । इस अवसर्पिणी युगका जब चौथा काल आनेवाला था तब भगवान् ऋषभदेव तीर्थंकर हुए । तीनों लोकोंके जीव उन्हें नमस्कार करते थे । उन्होंने कृत- युगकी व्यवस्था कर सैकड़ों कलाओंका प्रचार किया ॥२८१-२८२॥


जातमात्रश्च यो देवैर्नीत्वा मन्दरमस्तकम् । क्षीरोदवारिणा तुष्टैरभिषिक्तो महाद्युतिः ॥२८३॥

अर्थ: जिस समय ऋषभदेव उत्पन्न हुए थे उसी समय देवोंने सुमेरु पर्वतके मस्तकपर ले जाकर सन्तुष्ट हो क्षीरसागरके जलसे उनका अभिषेक किया था। वे महाकान्तिके धारक थे ॥२८३॥


ऋषभस्य विभोर्दिव्यं चरितं पापनोदनम् । स्थितं लोकत्रयं व्याप्य पुराणं न श्रुतं त्वया ॥२८४॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवका पापापहारी चरित्र तीनों लोकोंमें व्याप्त होकर स्थित है क्या तुमने उनका पुराण नहीं सुना ? ॥२८४॥


भर्ता बभूव कौमारः स भुवो भूतवत्सलः । गुणांस्तस्य क्षमो वक्तुं न सुरेन्द्रोऽपि विस्तरात् ॥२८५॥

अर्थ: प्राणियोंके साथ स्नेह करनेवाले भगवान् ऋषभदेव कुमार-कालके बाद इस पृथ्वीके स्वामी हुए थे। उनके गुण इतने अधिक थे कि इन्द्र भी उनका विस्तारके साथ वर्णन करनेमें समर्थ नहीं था ॥२८५॥


उद्वहन्तीं स्तनौ तुङ्गौ विन्ध्यप्रालेयपर्वतौ । आर्यदेशमुखीं रम्यां नगरीवलयैर्युताम् ॥२८६॥

अब्धिकाञ्चीगुणां नीलसत्काननशिरोरुहाम् । नानारत्नकृतच्छायामत्यन्तप्रवणां सतीम् ॥२८७॥

यः परित्यज्य भूभार्यां मुमुक्षुर्भवसंकटम् । प्रतिपेदे विशुद्धात्मा श्रामण्यं जगते हितम् ॥२८८॥

अर्थ: जब उन्हें वैराग्य आया और वे संसाररूपी संकटको छोड़नेकी इच्छा करने लगे तब जो विन्ध्याचल और हिमाचलरूपी उन्नत स्तनोंको धारण कर रही थी, आर्य देश ही जिसका मुख था, जो नगरीरूपी चूड़ियोंसे युक्त होकर बहुत मनोहर जान पड़ती थी, समुद्र ही जिसकी करधनी थी, हरे-भरे वन जिसके सिरके बाल थे, नाना रत्नोंसे जिसकी कान्ति बढ़ रही थी और जो अत्यन्त निपुण थी ऐसी पृथिवीरूपी स्त्रीको छोड़कर उन्होंने विशुद्धात्मा हो जगत्के लिए हितकारी मुनिपद धारण किया था ॥२८६-२८८॥


स्थितो वर्षसहस्रं च वज्राङ्गो स्थिरयोगभृत् । प्रलम्बितमहाबाहुः प्राप्तभूमिजटाचयः ॥२८९॥

अर्थ: उनका शरीर वज्रमय था, वे स्थिर योगको धारण कर एक हजार वर्ष तक खड़े रहे । उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं और जटाओंका समूह पृथिवीको छू रहा था ॥२८९॥


स्वामिनश्चानुरागेण गृहीतोग्रपरीषहैः । कच्छाद्यैर्नग्नता मुक्ता वल्कलादिसमाश्रितम् ॥२९०॥

अर्थ: स्वामीके अनुरागसे कच्छ आदि चार हजार राजाओंने भी उनके साथ नग्न व्रत धारण किया था परन्तु कठिन परीषहोंसे पीड़ित होकर अन्तमें उन्होंने वह व्रत छोड़ दिया और वल्कल आदि धारण कर लिये ॥२९०॥


अज्ञातपरमार्थैस्तैः क्षुधादिपरिपीडितैः । फलाद्याहारसंतुष्टैः प्रणीतास्तापसादयः ॥२९१॥

अर्थ: परमार्थको नहीं जाननेवाले उन राजाओंने क्षुधा आदिसे पीड़ित होनेपर फल आदिके आहारसे सन्तोष प्राप्त किया । उन्हीं भ्रष्ट लोगोंने तापस आदि लोगोंकी रचना की ॥२९१॥


ऋषभस्य तु संजातं केवलं सर्वभासनम् । महान्यग्रोधवृक्षस्य स्थितस्यासन्नगोचरे ॥२९२॥

अर्थ: जब भगवान् ऋषभदेव महा वटवृक्षके समीप विद्यमान थे तब उन्हें समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्रकट हुआ ॥२९२॥


तत्प्रदेशे कृता देवैस्तस्मिन् काले विभोर्यतः । पूजा तेनैव मार्गेण लोकोऽद्यापि प्रवर्तते ॥२९३॥

अर्थ: उस समय उस स्थान-पर चूँकि देवोंके द्वारा भगवान्‌की पूजा की गयी थी इसलिए उसी पद्धतिसे आज भी लोग पूजा करनेमें प्रवृत्त हैं अर्थात् आज जो वटवृक्षकी पूजा होती है उसका मूल स्रोत भगवान् ऋषभदेवके केवलज्ञानकल्याणकसे है ॥२९३॥


प्रतिमाश्च सुरैस्तस्य तस्मिन्देशे सुमानसैः । स्थापिता रम्यचैत्येषु मनुजैश्च महोत्सवैः ॥२९४॥

अर्थ: उत्तम हृदयके धारक देवोंने उस स्थानपर उनकी प्रतिमा स्थापित की तथा महान् उत्सवोंसे युक्त मनुष्योंने मनोहर चैत्यालयोंमें उनकी प्रतिमाएँ विराजमान कीं ॥२९४॥


भरतेनास्य पुत्रेण सृष्टा ये चक्रवर्तिना । पुरा मरीचिना ये च प्रमादस्मययोगतः ॥२९५॥

विसर्पणमिमे सूत्रकण्ठास्तु भुवने गताः । प्राणिनां दुःखदा यद्वत्सलिले विषबिन्दवः ॥२९६॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवके पुत्र भरत चक्रवर्तीने तथा इनके पुत्र मरीचिने पहले प्रमाद और अहंकारके योगसे जिन ब्राह्मणोंकी रचना की थी वे पानीमें विषकी बूँदोंके समान प्राणियोंको दुःख देते हुए संसारमें सर्वत्र फैल गये ॥२९५-२९६॥


उद्वृत्तकुहुकाचारैर्बहुदम्भैः कुलिङ्गकैः । प्रचण्डदण्डैरत्यन्तं तैरिदं मोहितं जगत् ॥२९७॥

अर्थ: जिन्होंने कुत्सित आचारकी परम्परा चलायी है, जो अनेक प्रकारके कपटोंसे युक्त हैं, जो नाना प्रकारके खोटे-खोटे वेष धारण करते हैं और प्रचण्ड - अत्यन्त तीक्ष्ण दण्डके धारक हैं ऐसे इन ब्राह्मणोंने इस संसारको मोहित कर रखा है - भ्रममें डाल रखा है ॥२९७॥


जातं शश्वत्प्रवृत्तातिक्रूरकर्मतमश्रितम् । प्रनष्टसुकृतालोकं साध्वसत्कारतत्परम् ॥२९८॥

अर्थ: यह समस्त संसार निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले अत्यन्त क्रूर कार्यरूपी अन्धकार-से व्याप्त है, इसका पुण्यरूपी प्रकाश नष्ट हो चुका है और साधुजनोंका अनादर करनेमें तत्पर है ॥२९८॥


एकविंशतिवारान् ये निधनं प्रापिताः क्षितौ । सुभूमचक्रिणा प्राप्ता न नितान्तमभावताम् ॥२९९॥

अर्थ: इस पृथिवीपर सुभूम चक्रवर्तीने इक्कीस बार इन ब्राह्मणोंका सर्वनाश किया फिर भी ये अत्यन्ताभावको प्राप्त नहीं हुए ॥२९९॥


ते कथं वद शाम्यन्ते त्वया विप्रा दशानन । उपशाम्यानया किंचिन्न कृत्यं प्राणिहिंसया ॥३००॥

अर्थ: इसलिए हे दशानन ! तुम्हारे द्वारा ये किस तरह शान्त किये जा सकेंगे - सो तुम्हीं कहो । तुम स्वयं उपशान्त होओ । इस प्राणिहिंसासे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥३००॥


जिनैरपि कृतं नैतत्सर्वज्ञैर्निःकुमार्गकम् । जगत् किमुत शक्येत कर्तुमस्मद्विधैर्जनैः ॥३०१॥

अर्थ: जब सर्वज्ञ जिनेन्द्र भी इस संसारको कुमार्गसे रहित नहीं कर सके तब फिर हमारे जैसे लोग कैसे कर सकते हैं ? ॥३०१॥


इति देवयतेः श्रुत्वा कैकसीकुक्षिसंभवः । पुराणकथया प्रीतो नमश्चक्रे जिनाधिपम् ॥३०२॥

अर्थ: इस प्रकार नारदके मुखसे पुराणकी कथा सुनकर रावण बहुत प्रसन्न हुआ और उसने जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार किया ॥३०२॥


संकथाभिश्च रम्याभिर्महापुरुषजन्मभिः । स्थितः क्षणं विचित्राभिर्नारदेन समं सुखी ॥३०३॥

अर्थ: इस प्रकार वह नारदके साथ महापुरुषोंसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक प्रकारकी मनोहर और विचित्र कथाएँ करता हुआ क्षण-भर सुख से बैठा ॥३०३॥


मरुत्वोऽथाञ्जलिं बद्ध्वा क्षितिसक्तशिरोरुहः । प्रणनाम यमोत्सादं नयविच्चैवमब्रवीत् ॥३०४॥

अर्थ: अथानन्तर नीतिके जानकार राजा मरुत्वने हाथ जोड़कर तथा सिरके बाल जमीनपर लगाकर रावणको प्रणाम किया और निम्नांकित वचन कहे ॥३०४॥


भृत्योऽहं तव लङ्केश ! भज नाथ ! प्रसन्नताम् । अज्ञानेन हि जन्तूनां भवत्येव दुरीहितम् ॥३०५॥

अर्थ: हे लंकेश ! मैं आपका दास हूँ । आप मुझपर प्रसन्न होइए । अज्ञानवश जीवोंसे खोटे काम बन ही जाते हैं ॥३०५॥


गृह्यतां कन्यका चेयं नाम्ना मे कनकप्रभा । वस्तूनां दर्शनीयानां भवानेव हि भोजनम् ॥३०६॥

अर्थ: मेरी कनकप्रभा नामकी कन्या है सो इसे आप स्वीकृत कीजिए क्योंकि सुन्दर वस्तुओंके पात्र आप ही हैं ॥३०६॥


प्रणतेषु दयाशीलस्तां प्रतीयेष रावणः । उपयेमे च सातत्यप्रवृत्तपरमोदयः ॥३०७॥

अर्थ: नम्र मनुष्योंपर दया करना जिसका स्वभाव था और निरन्तर जिसका अभ्युदय बढ़ रहा था ऐसे रावणने कनकप्रभाको विवाहना स्वीकृत कर विधिपूर्वक उसके साथ विवाह कर लिया ॥३०७॥


तत्सामन्ताश्च तुष्टेन मरुत्वेन यथोचितम् । भटाश्च पूजिता यानवासोऽलंकरणादिभिः ॥३०८॥

अर्थ: राजा मरुत्वने सन्तुष्ट होकर रावणके सामन्तों और योद्धाओंका वाहन, वस्त्र तथा अलंकार आदिसे यथायोग्य सत्कार किया ॥३०८॥


कनकप्रभया सार्धं रममाणस्य चाजनि । सुता संवत्सरस्यान्ते कृतचित्रेति नामतः ॥३०९॥

अर्थ: कनकप्रभाके साथ रमण करते हुए रावणके एक वर्ष बाद कृतचित्रा नामकी पुत्री हुई ॥३०९॥


रूपेण हि कृतं चित्रं तया लोकस्य पश्यतः । मूर्तियुक्तेव सा शोभा चक्रे चित्तस्य चोरणम् ॥३१०॥

अर्थ: चूँकि उसने देखनेवाले मनुष्योंको अपने रूपसे चित्र अर्थात् आश्चर्य उत्पन्न किया था इसलिए उसका कृतचित्रा नाम सार्थक था । वह मूर्तिमती शोभाके समान सबका चित्त चुराती थी ॥३१०॥


जयार्जितसमुत्साहाः शूरास्तेजस्विविग्रहाः । सामन्ता दशवक्त्रस्य रेमिरे धरणीतले ॥३११॥

अर्थ: विजयसे जिनका उत्साह बढ़ रहा था तथा जिनका शरीर अत्यन्त तेजःपूर्ण था ऐसे दशाननके शूरवीर सामन्त पृथ्वीतल-पर जहाँ-तहाँ क्रीड़ा करते थे ॥३११॥


धत्ते यो नृपतिख्यातिं तान् दृष्ट्वा स बलीयसः । जगामात्यन्तदीनत्वं स्वभोगभ्रंशकातरः ॥३१२॥

अर्थ: जो मनुष्य ‘राजा’ इस ख्यातिको धारण करता था वह दशाननके उन बलवान् सामन्तोंको देखकर अपने भोगोंके नाशसे कातर होता हुआ अत्यन्त दीनताको प्राप्त हो जाता था ॥३१२॥


मध्यभागं समालोक्य वर्षस्याम्बरगोचराः । कनकाद्रिनदीरम्यं विस्मयं प्रापुरुत्तमम् ॥३१३॥

अर्थ: विद्याधर लोग सुवर्णमय पर्वत तथा नदियोंसे मनोहर भारतवर्षका मध्यभाग देखकर परम आश्चर्यको प्राप्त हुए थे ॥३१३॥


ऊचुः केचिद्वरं भद्रा अत्रैवावस्थिता वयम् । नूनं स्वर्गोऽपि नैतस्माद्व्रजते रामणीयकम् ॥३१४॥

अर्थ: कितने ही विद्याधर कहने लगे कि यदि हम लोग यहीं रहने लगें तो अच्छा हो । निश्चय ही स्वर्ग भी इस स्थानसे बढ़कर अधिक सौन्दर्यको प्राप्त नहीं है ॥३१४॥


अन्येऽवदन्निमं देशं दृष्ट्वा लङ्कानिवर्तने । कुटुम्बदर्शनं शुद्धं कारणं नो भविष्यति ॥३१५॥

अर्थ: कितने ही लोग कहते थे कि हम लोग इस देशको देखकर लंका लौटेंगे इसमें अपने कुटुम्बका दर्शन ही मुख्य कारण होगा ॥३१५॥


एकेऽवोचन् गृहे वासो न मनागपि शोभते । दृश्यतामस्य देशस्य पार्थवं चित्तहारिणः ॥३१६॥

अर्थ: कुछ लोग कहते थे कि घरमें रहना तो कुछ भी शोभा नहीं देता । जरा इस मनोहर देशका विस्तार तो देखो ॥३१६॥


समुद्रविपुलं सैन्यं पश्यतात्र कथं स्थितम् । मरुत्त्वमखभङ्गस्य यथाऽन्योऽन्यं न दृश्यते ॥३१७॥

अर्थ: देखो, रावणकी समुद्रके समान विशाल सेना यहाँ किस प्रकार ठहर गयी कि परस्परमें दिखाई ही नहीं देती ॥३१७॥


अहो धैर्यमहोदारं लोकस्येक्षणहारिणः । एतस्य खेचराणां च प्रशस्तोऽयं निरूप्यते ॥३१८॥

अर्थ: नेत्रोंको हरण करनेवाले इस लोकके धैर्यकी महानता आश्चर्यकारी है । इस लोक तथा विद्याधरोंके लोकका जब विचार करते हैं तो यह लोक ही उत्तम मालूम होता है ॥३१८॥


मरुत्वमखविध्वंसो यं यं देशमुपागतः । रम्यं तस्याकरोल्लोकः पन्थानं तोरणादिभिः ॥३१९॥

अर्थ: राजा मरुत्वके यज्ञको नष्ट करनेवाला रावण जिस-जिस देशमें जाता था वहींके निवासीजन तोरण आदिके द्वारा उसके मार्गको मनोहर बना देते थे ॥३१९॥


शशाङ्कसौम्यवक्त्राभिर्नेत्रे सरसिजोपमे । बिभ्रतीभिः सुलावण्यपूर्णदेहाभिरादरात् ॥३२०॥

महीगोचरनारीभिर्विद्याधरकुतूहलात् । वीक्ष्यमाणा ययुर्भूम्यां खेचरास्तद्दिदृक्षया ॥३२१॥

अर्थ: जिनके मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर थे, जो कमलतुल्य नेत्र धारण कर रही थीं और जिनका शरीर सौन्दर्यसे परिपूर्ण था ऐसी भूमिगोचरी स्त्रियाँ विद्याधरोंके कुतूहलसे जिन्हें बड़े आदरसे देख रही थीं ऐसा विद्याधर भी रावणको देखनेकी इच्छासे पृथ्वीपर चल रहे थे ॥३२०-३२१॥


नगरस्य समीपेन व्रजन्तं कैकसीसुतम् । निर्द्धौतसायकश्यामं पक्वबिम्बफलाधरम् ॥३२२॥

मुकुटन्यस्तमुक्तांशुसलिलक्षालितालिकम् । इन्द्रनीलप्रमोदारस्फुरत्कुन्तलभारकम् ॥३२३॥

सहस्रपत्रनयनं शर्वरीतिलकाननम् । सज्यचापानतस्निग्धनीलभ्रूयुगराजितम् ॥३२४॥

कम्बुग्रीवं हरिस्कन्धं पीनविस्तीर्णवक्षसम् । दिग्नागनासिकाबाहुं वज्रवन्मध्यदुर्विधम् ॥३२५॥

नागभोगसमाकारप्रसृतं मग्नजानुकम् । सरोजचरणं न्याय्यप्रमाणस्थितविग्रहम् ॥३२६॥

श्रीवत्सप्रभृतिस्तुत्यद्वात्रिंशल्लक्षणाञ्चितम् । रत्नरश्मिज्वलन्मौलिं विचित्रमणिकुण्डलम् ॥३२७॥

केयूरकर दीप्तांसं हारराजितवक्षसम् । प्रत्यर्धचक्रभृद्भोगं द्रष्टुमुत्सुकमानसाः ॥३२८॥

आपूरयन् परित्यक्तसमस्तप्रस्तुतक्रियाः । वातायनानि सद्वेषाः स्त्रियोऽन्योऽन्यविपीडिता ॥३२९॥

अर्थ: जो अत्यन्त धुले हुए बाणके अग्रभाग अथवा तलवारके समान श्यामवर्ण था, जिसके ओठ पके हुए बिम्ब फलके समान थे, मुकुटमें लगे हुए मोतियोंकी किरणोंरूपी जलसे जिसका ललाट धुला हुआ था, जिसके घुँघराले बालोंका समूह इन्द्रनीलमणिकी प्रभासे भी अधिक चमकीला था, जिसके नेत्र कमलके समान थे, मुख चन्द्रमाके समान था, जो प्रत्यंचा सहित धनुषके समान टेढ़ी, चिकनी एवं नीली-नीली भौंहोंके युगलसे सुशोभित था, जिसकी ग्रीवा शंखके समान थी, कन्धे सिंहके समान थे, जिसका वक्षःस्थल मोटा और चौड़ा था, जिसकी भुजाएँ दिग्गजकी सूँड़के समान मोटी थीं, जिसकी कमर वज्रके समान मजबूत एवं पतली थी, जिसकी जंघाएँ साँपके फणके समान थीं, जिसके घुटने अपनी मांसपेशियोंमें निमग्न थे, पैर कमलके समान थे, जिसका शरीर योग्य ऊँचाईसे सहित था, जो श्रीवत्स आदि उत्तमोत्तम बत्तीस लक्षणोंसे युक्त था, जिसका मुकुट रत्नोंकी किरणोंसे जगमगा रहा था, जिसके कुण्डल चित्रविचित्र मणियोंसे निर्मित थे, जिसके कन्धे बाजूबन्दोंकी किरणोंसे देदीप्यमान थे, जिसका वक्षःस्थल हारसे सुशोभित था और जिसे अर्धचक्रीके भोग प्राप्त थे ऐसा रावण जब नगरके समीपमें गमन करता हुआ आगे जाता था तब उसे देखने के लिए स्त्रियाँ अत्यन्त उत्कण्ठित- चित्त हो जाती थीं । उत्तम वेषको धारण करनेवाली स्त्रियाँ परस्पर एक दूसरेको पीड़ा पहुँचाती हुई प्रारब्ध समस्त कार्योंको छोड़कर झरोखोंमें आ डटी थीं ॥३२२-३२९॥


निश्चिक्षिपुश्च पुष्पाणि समेतानि मधुव्रतः । तुष्टाश्च विविधालापांश्चक्रुस्तद्वर्णनामिति ॥३३०॥

अर्थ: वे सन्तुष्ट होकर भौंरोंसे सहित फूल रावणपर फेंक रही थीं और विविध प्रकारके शब्दोंसे उसका इस प्रकार वर्णन कर रही थीं ॥३३०॥


अयं स रावणो येन जितो मातृष्वसुः सुतः । यमश्च यश्च कैलासं समुत्क्षेप्तुं समुद्यतः ॥३३१॥

नीतः सहस्ररश्मिश्च राज्यभारविमुक्तताम् । मरुत्वस्य च विध्वस्तो वितानः शौर्यशालिना ॥३३२॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि देखो यह वही रावण है जिसने मौसीके लड़के वैश्रवण और यमको जीता था । जो कैलास पर्वतको उठानेके लिए उद्यत हुआ था । जिसने सहस्ररश्मिको राज्यभारसे विमुक्त किया था यह बड़ा पराक्रमी है ॥३३१-३३२॥


अहो समागमः साधुः कृतोऽयं कर्मभिश्चिरात् । रूपस्य केकसीसूनौ गुणानां च जनोत्सवः ॥३३३॥

अर्थ: अहो, बड़े आश्चर्यकी बात है कि कर्मोंने चिरकाल बाद रावणमें रूप तथा अनेक गुणोंका लोकानन्दकारी समागम किया है। अर्थात् जैसा इसका सुन्दर रूप है वैसे ही इसमें गुण विद्यमान हैं ॥३३३॥


योषित्पुण्यवती सोऽयं धृतो गर्भे ययोत्तमः । पिताप्यसौ कृतार्थत्वं प्राप्तः कृत्वास्य संभवम् ॥३३४॥

अर्थ: वह स्त्री पुण्यवती है जिसने इस उत्तम पुत्रको गर्भमें धारण किया है और वह पिता भी कृतकृत्यपनाको प्राप्त है जिसने इसे जन्म दिया है ॥३३४॥


श्लाघ्यः स बन्धुलोकोऽपि यस्यायं प्रेमगोचरः । अनेनोपयता यास्तु तासां स्त्रीणां किमुच्यते ॥३३५॥

अर्थ: वे बन्धुजन प्रशंसनीय हैं जिनका कि यह प्रेमपात्र है, जो स्त्रियाँ इसके साथ विवाहित हैं उनका तो कहना ही क्या है ? ॥३३५॥


आलापमिति कुर्वन्त्यस्तावदैक्षन्त ताः स्त्रियः । गोचरत्वमवापायं यावद्विततचक्षुषाम् ॥३३६॥

अर्थ: वार्तालाप करती हुई स्त्रियाँ उसे तब-तक देखती रहीं जबतक कि वह उनके विस्तृत नेत्रोंका विषय रहा अर्थात् नेत्रोंके ओझल नहीं हो गया ॥३३६॥


गते तस्मिन्मनश्चौरे चक्षुर्गोचरतात्ययम् । मुहूर्तमभवन्नार्यः पुस्तकर्मगता इव ॥३३७॥

अर्थ: मनको चुरानेवाला रावण जब नेत्रोंसे अदृश्य हो गया तब मुहूर्त-भरके लिए स्त्रियाँ चित्रलिखितको तरह निश्चेष्ट हो गयीं ॥३३७॥


तेनापहतचित्तानां वाञ्छन्तीनां मनोगतम् । कर्तुमन्यदभूत्कर्म कियताचिदनेहसा ॥३३८॥

अर्थ: रावणके द्वारा उन स्त्रियोंका चित्त हरा गया था इसलिए कुछ दिन तक तो उनका यह हाल रहा कि उनके मनमें कुछ कार्य था और वे कर बैठती थीं कोई दूसरा ही कार्य ॥३३८॥


बभूवेति दशग्रीवे देशे तत्संगमोज्झिते । नारीणां पुरुषाणां च त्यक्तान्याशेषसंकथा ॥३३९॥

अर्थ: रावण जिस देशका समागम छोड़ आगे बढ़ जाता था उस देशके स्त्री-पुरुषोंमें एक रावणकी ही कथा शेष रह जाती थी अन्य सबकी कथा छूट जाती थी ॥३३९॥


विषये नगरे ग्रामे घोषे वा ये प्रधानताम् । भजन्ते पुरुषास्ते तमुपायनभृतोऽगमन् ॥३४०॥

अर्थ: देश, नगर, ग्राम अथवा अहीरोंकी बस्तीमें जो पुरुष प्रधानताको प्राप्त थे वे उपहार ले-लेकर रावणके समीप गये ॥३४०॥


गत्वा जनपदाश्चैवमुपनीय यथोचितम् । रचिताञ्जलयो नत्वा परितुष्टा व्यजिज्ञपन् ॥३४१॥

अर्थ: जनपदोंमें रहनेवाले लोग यथायोग्य भेंट लेकर रावणके पास गये और हाथ जोड़ नमस्कार कर सन्तुष्ट होते हुए निम्न प्रकार निवेदन करने लगे ॥३४१॥


नन्दनादिषु रम्याणि यानि द्रव्याणि पार्थिव । सुलभत्वं प्रपन्नानि तव तान्यपि चिन्तनात् ॥३४२॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! नन्दन आदि वनोंमें जो भी मनोहर द्रव्य हैं वे इच्छा करने मात्रसे ही आपको सुलभ हैं अर्थात् अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं ॥३४२॥


महाविभवपात्रस्य किमपूर्वं भवेत्तव । उपनीय प्रमोदं ते यत्कुर्मो द्रविणं वयम् ॥३४३॥

अर्थ: चूँकि आप महावैभवके पात्र हैं इसलिए ऐसा कौन-सा अपूर्व धन है जिसे भेंट देकर हम आपको प्रसन्न कर सकते हैं ॥३४३॥

११. एकादश पर्व (मरुत्वयज्ञध्वंसनपदानुगाभिधानं) (जारी)

तथापि शून्यहस्तानामस्माकं तव दर्शनम् । न युक्तमिति यत्किंचिदुपादाय समागताः ॥३४४॥

अर्थ: फिर भी हम लोगोंको खाली हाथ आपका दर्शन करना उचित नहीं है इसलिए कुछ तो भी लेकर समीप आये हैं ॥३४४॥


जिनेन्द्रः प्रापितः पूजाममरैः कनकाम्बुजैः । द्रुमपुष्पादिभिः किन्न पूज्यतेऽस्मद्विधैर्जनैः ॥३४५॥

अर्थ: देवोंने जिनेन्द्र भगवान्की सुवर्ण कमलोंसे पूजा की थी तो क्या हमारे जैसे लोग उनकी साधारण वृक्षोंके फूलोंसे पूजा नहीं करते ? अर्थात् अवश्य करते हैं ॥३४५॥


नानाजनपदैरेवं सामन्तैश्च महर्द्धिभिः । पूजितः प्रतिसंमानं तेषां चक्रे प्रियोदितैः ॥३४६॥

अर्थ: इस प्रकार नाना जनपदवासी और बड़ी-बड़ी सम्पदाओंको धारण करनेवाले सामन्तोंने रावणकी पूजा की तथा रावणने भी प्रिय वचन कहकर बदलेमें उनका सम्मान किया ॥३४६॥


परां प्रीतिमवापासौ पश्यन् रम्यां वसुन्धराम् । कान्तामिव निजां नानारत्नलङ्कारशालिनीम् ॥३४७॥

अर्थ: नाना रत्नमयी, अलंकारोंसे सुशोभित अपनी स्त्रीके समान सुन्दर पृथिवीको देखता हुआ रावण परम प्रीतिको प्राप्त हुआ ॥३४७॥


संगं देशेन येनासौ ययौ मार्गवशाद्विभुः । अकृष्टपच्यसस्याढ्यं तत्रासीद् वसुधातलम् ॥३४८॥

अर्थ: रावण मार्गके कारण जिस-जिस देशके साथ समागमको प्राप्त हुआ था वहाँकी पृथिवी अकृष्टपच्य धान्यसे युक्त हो गयी थी ॥३४८॥


प्रमोदं परमं बिभ्रज्जनोऽस्य धरणीतलम् । अनुरागाम्भसा कीर्तिमभ्यसिञ्चत् सुनिर्मलाम् ॥३४९॥

अर्थ: परम हर्षको धारण करनेवाले लोग रावणके द्वारा छोड़े हुए पृथिवीतलको तथा उसकी अत्यन्त निर्मल कीर्तिको अनुरागरूपी जलसे सींचते थे ॥३४९॥


कृषीबलजनाश्चैवमूचुः पुण्यजुषो वयम् । येन देशमिमं प्राप्तो देवो रत्नश्रवःसुतः ॥३५०॥

अर्थ: किसान लोग इस प्रकार कह रहे थे कि हम लोग बड़े पुण्यात्मा हैं जिससे कि रावण इस देशमें आया ॥३५०॥


अन्यदा कृषिसक्तानां रूक्षाङ्गानां कुवाससाम् । वहतां कर्कशस्पर्शं पाणिपादं सवेदनम् ॥३५१॥

क्लेशात् कालो गतोऽस्माकं सुखस्वादविवर्जितः । प्रभावादस्य भव्यस्य सांप्रतं वयमीश्वराः ॥३५२॥

अर्थ: हम लोग अब तक खेतीमें लगे रहे, हम लोगोंका सारा शरीर रूखा हो गया। हमें फटे-पुराने वस्त्र पहननेको मिले, हम कठोर स्पर्श और तीव्र वेदनासे युक्त हाथ-पैरोंको धारण करते रहे और आज तक कभी सुखसे अच्छा भोजन हमें प्राप्त नहीं हुआ। इस तरह हम लोगोंका काल बड़े क्लेशसे व्यतीत हुआ परन्तु इस भव्य जीवके प्रभावसे हम लोग इस समय सर्व प्रकारसे सम्पन्न हो गये हैं ॥३५१-३५२॥


पुण्येनानुगृहीतास्ते देशाः संपत्समाश्रिताः । येषु कल्याणसंभारो विचरत्येष रावणः ॥३५३॥

अर्थ: जिन देशोंमें यह कल्याणकारी रावण विचरण करता है वे देश पुण्यसे अनुगृहीत तथा सम्पत्तिसे सुशोभित हैं ॥३५३॥


कृत्यं किं बान्धवैर्ये न समर्था दुःखनोदने । अयमेव महाबन्धुः सर्वेषां प्राणिनामभूत् ॥३५४॥

अर्थ: मुझे उन भाइयोंसे क्या प्रयोजन जो कि दुःख दूर करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह रावण ही हम सब प्राणियोंका बड़ा भाई है ॥३५४॥


अनुरागं गुणैरेवं स लोकस्य प्रवर्धयन् । चकार तस्य हेमन्तं निदाघं च सुखप्रदम् ॥३५५॥

अर्थ: इस प्रकार गुणोंके द्वारा लोगोंके अनुरागको बढ़ाते हुए रावणने हेमन्त और ग्रीष्म ऋतुको भी लोगोंके लिए सुखदायी बना दिया था ॥३५५॥


आसतां चेतनास्तावच्चेऽपि भावा विचेतनाः । तेऽपि भीता इवामुष्माद् बभूवुर्लोकसौख्यदाः ॥३५६॥

अर्थ: चेतन पदार्थ तो दूर रहे जो अचेतन पदार्थ थे वे भी मानो रावणसे भयभीत होकर ही लोगोंके लिए सुखदायी हो गये थे ॥३५६॥


तावच्च व्रजतस्तस्य प्रादुरासीद्घनागमः । अभ्युत्थानं दशास्यस्य कुर्वन्निव ससंभ्रमः ॥३५७॥

अर्थ: रावणका प्रयाण जारी था कि इतनेमें वर्षा ऋतु आ गयी जो ऐसी जान पड़ती थी मानो हर्षके साथ रावणकी अगवानी करनेके लिए ही आयी थी ॥३५७॥


बलाकाविद्युदिन्द्रास्त्रकृतभूषा घनाघनाः । महानीलगिरिच्छायाः कुर्वन्तः पटुनिस्वनम् ॥३५८॥

हेमकक्षाभृतः कम्बुध्वजभूषितविग्रहाः । प्रहिताभा वै शक्रेण रावणस्य गजा इव ॥३५९॥

अर्थ: बलाका बिजली और इन्द्रधनुषसे शोभित, महानीलगिरिके समान काले-काले मेघ जोरदार गर्जना करते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो सुवर्णमालाओंको धारण करनेवाले शंख और पताकाओंसे सुशोभित हाथी ही इन्द्रने रावणके लिए उपहारमें भेजे हों ॥३५८-३५९॥


दिशोऽन्धकारिताः सर्वा जीमूतपटलैस्तथा । रात्रिन्दिवस्य न ज्ञातो भेद एव यथा जनैः ॥३६०॥

अर्थ: मेघोंके समूहसे समस्त दिशाएँ इस प्रकार अन्धकारयुक्त हो गयी थीं कि लोगोंको रात-दिनका भेद ही नहीं मालूम होता था ॥३६०॥


अथवा युक्तमेवेदं कर्तुं मलिनताभृताम् । यत्प्रकाशतमोयुक्तान् कुर्वन्ति भुवने समान् ॥३६१॥

अर्थ: अथवा जो मलिनताको धारण करनेवाले हैं उन्हें ऐसा ही करना उचित है कि वे संसारमें प्रकाश और अन्धकारसे युक्त सभी पदार्थोंको एक समान कर देते हैं ॥३६१॥


भूमिजीमूतसंसक्ताः स्थूला विच्छेदवर्जिताः । नाज्ञायन्त घना धारा उत्पतन्ति पतन्ति नु ॥३६२॥

अर्थ: पानीकी बड़ी मोटी धाराएँ रुकावटरहित पृथिवी और आकाशके बीचमें इस तरह संलग्न हो रही थीं कि पता ही नहीं चलता था कि ये मोटी धाराएँ ऊपरको जा रही हैं या ऊपरसे नीचे फिर रही हैं ॥३६२॥


मानसे मानसंभारो मानिनीभिश्चिरं धृतः । पटुनो मेघरटितात् क्षणेन ध्वंसमागतः ॥३६३॥

अर्थ: मानवती स्त्रियोंने जो मानका समूह चिरकालसे अपने मनमें धारण कर रखा था वह मेघोंकी जोरदार गर्जनासे क्षण-भरमें नष्ट हो गया था ॥३६३॥


घनध्वनितवित्रस्ता मानिन्यो रमणं भृशम् । आलिलिङ्गू रणत्कारि वलयाकुलबाहवः ॥३६४॥

अर्थ: जिनकी भुजाएँ रुनझुन करनेवाली चूड़ियोंसे युक्त थीं ऐसी मानवती स्त्रियाँ मेघगर्जनासे डरकर पतिका गाढ़ आलिंगन कर रही थीं ॥३६४॥


शीतला मृदवो धाराः पथिकानां घनोज्झिताः । द्रष्टॄणां समतां जग्मुः कुर्वन्त्यो मर्मदारणम् ॥३६५॥

अर्थ: मेघोंके द्वारा छोड़ी हुई जलकी धाराएँ यद्यपि शीतल और कोमल थीं तथापि वे पथिक जनोंका मर्म विदारण करती हुई दर्शकोंकी समानताको प्राप्त हो रही थीं ॥३६५॥


भिन्नं धाराकदम्बेन हृदयं दूरवर्तिनः । चक्रेणेव सुतीक्ष्णेन पथिकस्याकुलात्मनः ॥३६६॥

अर्थ: जिसकी आत्मा अत्यन्त व्याकुल थी ऐसे दूरवर्ती पथिकका हृदय धाराओंके समूहसे इस प्रकार खण्डित हो गया था मानो अत्यन्त पैने चक्रसे ही खण्डित हुआ हो ॥३६६॥


नीतो नवेन नीपेन मूढतां पथिको यथा । पुस्तकर्मसमो जातो वराकः क्षणमात्रकम् ॥३६७॥

अर्थ: कदम्बके नये फूलसे बेचारा पथिक इतना अधिक मोहित हो गया कि वह क्षण-भरके लिए मिट्टीके पुतलेके समान निश्चेष्ट हो गया ॥३६७॥


क्षीरोदपायिनो मेघा प्रविष्टा इव धेनुषु । अन्यथा क्षीरधारास्ताश्चक्षरुः सततं कथम् ॥३६८॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता था कि क्षीरसमुद्रसे जल ग्रहण करनेवाले मेघ मानो गायोंके भीतर जा घुसे थे । यदि ऐसा न होता तो वे निरन्तर दूधकी धाराएँ कैसे झराते रहते ? ॥३६८॥


वर्षाणां समये तस्मिन्न बभूवुः कृषीवलाः । समाकुलाः प्रभावेण रावणस्य महाधनाः ॥३६९॥

अर्थ: उस समयके किसान रावणके प्रभावसे महाधनवान् हो गये थे इसलिए उस वर्षाके समय भी वे व्याकुल नहीं हुए थे ॥३६९॥


अन्नमेकस्य हेतोर्यत्कुटुम्बिन्या प्रसाधितम् । भुज्यमानं कुटुम्बेन न तन्निष्ठामुपागमत् ॥३७०॥

अर्थ: घरकी मालकिन एक व्यक्तिके लिए जो भोजन तैयार करती थी उसे सारा कुटुम्ब खाता था फिर भी वह समाप्त नहीं होता था ॥३७०॥


महोत्सवो दशग्रीवो बभूव प्राणधारिणाम् । पुण्यसंपूर्णदेहानां सौभाग्यं केन कथ्यते ॥३७१॥

अर्थ: इस प्रकार रावण समस्त प्राणियोंके लिए महोत्सवस्वरूप थां सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यात्मा जीवोंका सौभाग्य कौन कह सकता है ? ॥३७१॥


इन्दीवरचयश्यामः स्त्रीणामौत्सुक्यमाहरन् । साक्षादिव बभूवासौ वर्षाकालो महाध्वनिः ॥३७२॥

अर्थ: रावण नील कमलोंके समूहके समान श्याम वर्ण था और जोरदार शब्द करता था इससे ऐसा जान पड़ता था मानो स्त्रियोंको उत्सुक करता हुआ साक्षात् वर्षाकाल ही हो ॥३७२॥


गर्जितेन पयोदानां रावणस्येव शासनात् । घोषणेन कृता सर्वैः प्रणतिः पतिभिर्नृणाम् ॥३७३॥

अर्थ: मेघोंकी गर्जनाके बहाने मानो रावणका आदेश पाकर ही समस्त राजाओंने रावणको नमस्कार किया था ॥३७३॥


कन्या दृष्टिहराः प्रापुर्दशवक्त्रं स्वयंवराः । भूगोचराः परित्यक्तगगना इव विद्युतः ॥३७४॥

अर्थ: नेत्रोंको हरण करनेवाली भूमिगोचरियोंकी अनेक कन्याएँ रावणको प्राप्त हुईं सो ऐसी जान पड़ती थीं मानो आकाशको छोड़कर बिजलियाँ ही उसके पास आयी हों ॥३७४॥


रेमिरे तास्तमासाद्य महीधरणतत्परम् । पयोधरभराक्रान्ता सद्वर्षा इव भूभृतम् ॥३७५॥

अर्थ: जिस प्रकार पयोधरभराक्रान्ता अर्थात् मेघोंके समूहसे युक्त उत्तम वर्षाएँ किसी पर्वतको पाकर क्रीड़ा करती हैं उसी प्रकार पयोधरभराक्रान्ता अर्थात् स्तनोंके भारसे आक्रान्त कन्याएँ पृथिवीका भार धारण करनेमें समर्थ रावणको पाकर क्रीड़ा करती थीं ॥३७५॥


जिगीषोर्यक्षमर्दस्य दृष्ट्वैव परमां द्युतिम् । भास्वान् पलायितः क्वापि त्रपात्राससमाकुलः ॥३७६॥

अर्थ: वर्षा ऋतुमें सूर्य छिप गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो विजयाभिलाषी रावणकी उत्कृष्ट कान्ति देख लज्जा और भयसे व्याकुल होता हुआ कहीं भाग गया था ॥३७६॥


दशाननस्य यद्वक्त्रं तदेव कुरुते क्रियाम् । मदीयामिति मत्वेव जगाम क्वापि चन्द्रमाः ॥३७७॥

अर्थ: चन्द्रमाने देखा कि जो काम मैं करता हूँ वही रावण का मुख करता है ऐसा मानकर ही मानो वह कहीं चला गया था ॥३७७॥


दशवक्त्रस्य वक्त्रेण जितं ज्ञात्वा निजं पतिम् । भयेनेव समाक्रान्तास्ताराः क्वापि पलायिताः ॥३७८॥

अर्थ: तारा भी अन्तर्हित हो गये थे सो ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंने देखा कि रावणके मुखसे हमारा स्वामी - चन्द्रमा जीत लिया गया है इस भयसे युक्त होकर ही वे कहीं भाग गयी थीं ॥३७८॥


सुरक्तं पाणिचरणं कैकसेयस्य योषिताम् । विदित्वेव त्रपायुक्ता तिरोऽभूदब्जसंहतिः ॥३७९॥

अर्थ: रावणकी स्त्रियोंके हाथ और पैर हमसे कहीं अधिक लाल हैं ऐसा जानकर ही मानो कमलोंका समूह लजाता हुआ कहीं छिप गया था ॥३७९॥


रशनाविद्युता युक्ता रक्तांशुकसुरायुधाः । नार्यः पयोधराक्रान्ताँस्तस्य वर्षा इवाभवन् ॥३८०॥

अर्थ: जो मेखलारूपी बिजलीसे युक्त थीं तथा रंग-बिरंगे वस्त्ररूपी इन्द्रधनुषको धारण कर रही थीं और पयोधर अर्थात् स्तनों ( पक्षमें मेघों ) से आक्रान्त थीं ऐसी रावणकी स्त्रियाँ ठीक वर्षा ऋतुके समान जान पड़ती थीं ॥३८०॥


आमोदं रावणो जज्ञे केतकीनां न योषिताम् । निःश्वासमरुताकृष्टगुञ्जद्भ्रमरपङ्क्तिना ॥३८१॥

अर्थ: जिसने गूँजती हुई भ्रमरपंक्तिको आकृष्ट किया था ऐसे श्वासोच्छ्वासकी वायुसे रावण केतकीके फूल और स्त्रियोंकी गन्धको अलग-अलग नहीं पहचान सका था ॥३८१॥


भागीरथ्यास्तटमतितरां रम्यमासाद्य दूरं प्रान्तोद्भूतप्रचुरविलसत्कान्तिशष्पं विशालम् । नानापुष्पप्रभवनिविडघ्राणसंरोधिगन्धं क्षोणीबन्धुर्जलदसमयं सर्वसौख्येन निन्ये ॥३८२॥

अर्थ: जिसके दूर-दूर तक प्रचुर मात्रामें सुन्दर घास उत्पन्न हुई थी और जहाँ नाना फूलोंसे समुत्पन्न गन्ध घ्राणको व्याप्त कर रही थी ऐसे गंगा नदीके लम्बे-चौड़े सुन्दर तटको पाकर रावणने सुखपूर्वक वर्षा काल व्यतीत किया ॥३८२॥


नाम श्रुत्वा प्रणमति जनः पुण्यभाजां नराणां चारुस्त्रीणां निखिलविषयप्रापिसङ्घा भवन्ति । उत्पद्यन्ते परमविभवा विस्मयानां निवासाः शैत्यं यायाद् रविरपि ततः पुण्यबन्धे यतध्वम् ॥३८३॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! पुण्यात्मा मनुष्योंका नाम सुनकर ही लोग उन्हें प्रणाम करने लगते हैं, अनेक विषयोंको प्राप्त करानेवाले सुन्दर स्त्रियोंके समूह उन्हें प्राप्त होते रहते हैं, आश्चर्यके निवासभूत अनेक ऐश्वर्य उनके घर उत्पन्न होते हैं और कहाँ तक कहा जाये सूर्य भी उनके प्रभावसे शीतल हो जाता है इसलिए सबको पुण्यबन्धके लिए प्रयत्न करना चाहिए ॥३८३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते मरुत्वयज्ञध्वंसनपदानुगाभिधानं नामैकादशं पर्व ॥११॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें राजा मरुत्वके यज्ञके विध्वंसका वर्णन करनेवाला ग्यारहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११॥

१२. द्वादशं पर्व (इन्द्रपराभवाभिधानं)

तत्राथ मन्त्रिभिः सार्धं चक्रेऽसौ संप्रधारणम् । कस्मै तु दीयतामेषा कन्येति रहसि स्थितः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर - उसी गंगा तटपर रावणने एकान्तमें मन्त्रियोंके साथ सलाह की कि यह कृत-चित्रा कन्या किसके लिए दी जाये ? ॥१॥


इन्द्रेण सह संग्रामे जीविते नास्ति निश्चयः । अतो वरं कृतं बालापाणिग्रहणमङ्गलम् ॥२॥

अर्थ: इन्द्रके साथ संग्राममें जीवित रहनेका निश्चय नहीं है इसलिए कन्याका विवाहरूप मंगल कार्य प्रथम ही कर लेना योग्य है ॥२॥


तं च चिन्तापरं ज्ञात्वा कन्यावरगवेषणे । हरिवाहनराजेन सूनुराह्वानितोऽन्तिकम् ॥३॥

अर्थ: तब रावणको कन्याके योग्य वर खोजनेमें चिन्तातुर जानकर राजा हरिवाहनने अपना पुत्र निकट बुलाया ॥३॥


दृष्ट्वा तं सुन्दराकारं प्रणतं तोषमागतः । दशाननः सुतां चास्मै दातुं चक्रे मनोरथम् ॥४॥

अर्थ: सुन्दर आकारके धारक उस विनयवान् पुत्रको देखकर रावणको बड़ा सन्तोष हुआ और उसने उसके लिए पुत्री देनेका विचार किया ॥४॥


उचिते चासने तस्मिन्नासीने सचिवान्विते । अचिन्तयद्दशग्रीवो नयशास्त्रविशारदः ॥५॥

मथुरानगरीनाथः सुगोत्रो हरिवाहनः । अस्मद्गुणगणोत्कीर्तिसततासक्तमानसः ॥६॥

अस्य च प्राणभूतोऽयं बन्धूनां च मधुः सुतः । श्लाघ्यो विनयसंपन्नो योग्यः प्रीत्यनुवर्तने ॥७॥

अर्थ: जब वह मन्त्रियोंके साथ योग्य आसनपर बैठ गया तब नीतिशास्त्रका विद्वान् रावण इस प्रकार विचार करने लगा कि यह मथुरा नगरीका राजा हरिवाहन उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ है, इसका मन सदा हमारे गुण-कथन करनेमें आसक्त रहता है और यह इसका तथा इसके बन्धुजनोंका प्राणभूत मधु नामका पुत्र है । यह अत्यन्त प्रशंसनीय, विनयसम्पन्न और प्रीतिके निर्वाह करनेमें योग्य है ॥५-७॥


ज्ञात्वा चेतीव वृत्तान्तमयं सुन्दरविभ्रमः । प्रख्यातगुणसंघातः परिप्राप्तो मदन्तिकम् ॥८॥

अर्थ: यह वृत्तान्त जानकर ही मानो इसकी चेष्टाएँ सुन्दर हो रही हैं । इसके गुणोंका समूह अत्यन्त प्रसिद्ध है । यह मेरे समीप आया सो बहुत अच्छा हुआ ॥८॥


ततो मधोरिदं प्राह मन्त्री देव तवाग्रतः । अस्य दुःखेन वर्ण्यन्ते गुणा विक्रमशालिनः ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर राजा मधुका मन्त्री बोला कि हे देव ! आपके आगे इस पराक्रमीके गुण बड़े दुःखसे वर्णन किये जाते हैं अर्थात् उनका वर्णन करना सरल नहीं है ॥९॥


तथापि भवतु ज्ञाता स्वामिनोऽस्य यथात्मना । इत्यावेदयितुं किंचित् क्रियते प्रक्रमो मया ॥१०॥

अर्थ: फिर भी आप कुछ जान सकें इसलिए कुछ तो भी वर्णन करनेका प्रयत्न करता हूँ ॥१०॥


आमोदं परमं बिभ्रत्सर्वलोकमनोहरः । मधुशब्दमयं धत्ते यथार्थं पृथिवीगतम् ॥११॥

अर्थ: सब लोगोंके मनको हरण करनेवाला यह कुमार वास्तविक मधु शब्दको धारण करता है क्योंकि यह सदा मधु-जैसी उत्कृष्ट गन्धको धारण करनेवाला है ॥११॥


गुणा एतावतैवास्य ननु पर्याप्तवर्णनाः । असुरेन्द्रेण यद्दत्तं शूलरत्नं महागुणम् ॥१२॥

अर्थ: इसके गुणोंका वर्णन इतनेसे ही पर्याप्त समझना चाहिए कि असुरेन्द्रने इसके लिए महागुणशाली शूलरत्न प्रदान किया है ॥१२॥


यत्प्रत्यरिबलं क्षिप्तममोघं भासुरं भृशम् । द्विषत्सहस्रं नीत्वान्तं करं प्रतिनिवर्तते ॥१३॥

अर्थ: ऐसा शूलरत्न कि जो कभी व्यर्थ नहीं जाता, अत्यन्त देदीप्यमान है और शत्रुसेनाकी ओर फेंका जाये जो हजारों शत्रुओंको नष्ट कर हाथमें वापस लौट आता है ॥१३॥


क्रिययैव च देवोऽस्य गुणान् ज्ञास्यति वाचिरात् । वाचा हि प्रकटीकारस्तेषां हास्यस्य कारणम् ॥१४॥

अर्थ: अथवा आप कार्यके द्वारा ही शीघ्र इसके गुण जानने लगेंगे। वचनोंके द्वारा उनका प्रकट करना हास्यका कारण है ॥१४॥


तदस्य युक्तये बुद्धिं करोतु परमेश्वरः । संबन्धं भवतो लब्ध्वा कृतार्थोऽयं भविष्यति ॥१५॥

अर्थ: इसलिए आप इसके साथ पुत्रीका सम्बन्ध करनेका विचार कीजिए। आपका सम्बन्ध पाकर यह कृतकृत्य हो जायेगा ॥१५॥


इत्युक्ते निश्चितो बुद्ध्या जामातासौ निरूपितः । समस्तं च यथायोग्यं कृत्यं तस्य प्रकल्पितम् ॥१६॥

अर्थ: मन्त्रीके ऐसा कहनेपर रावणने उसे बुद्धिपूर्वक अपना जामाता निश्चित कर लिया और जामाताके यथायोग्य सब कार्य कर दिये ॥१६॥


चिन्तितप्राप्तनिःशेषकारणश्च तयोरभूत् । विवाहविधिरत्यन्तप्रीतलोकसमाकुलः ॥१७॥

अर्थ: इच्छा करते ही जिसके समस्त कारण अनायास मिल गये थे ऐसा उन दोनोंका विवाह अत्यन्त प्रसन्न लोगोंसे व्याप्त था अर्थात् उनके विवाहोत्सवमें प्रीतिसे भरे अनेक लोक आये थे ॥१७॥


पुष्पलक्ष्मीमिव प्राप्य दुराख्यानां समागतः । आमोदं जगतो हृद्यं मधुस्तां नेत्रहारिणीम् ॥१८॥

अर्थ: मधु नाम उस राजकुमारका था और वसन्तऋतुका भी । इसी प्रकार आमोदका अर्थ सुगन्धि है और हर्ष भी । सो जिस प्रकार वसन्तऋतु नेत्रोंको हरण करने वाली अकथनीय पुष्पसम्पदाको पाकर जगत्प्रिय सुगन्धिको प्राप्त होती है उसी प्रकार राजकुमार मधु भी नेत्रोंको हरण करनेवाली कृतचित्राको पाकर परम हर्षको प्राप्त हुआ था ॥१८॥


इन्द्रभूतिमिहोद्देशे प्रत्युत्पन्नकुतूहलः । अपृच्छन्मगधाधीशः कृत्वाभिनवमादरम् ॥१९॥

अर्थ: इसी अवसरपर जिसे कुतूहल उत्पन्न हुआ था ऐसे राजा श्रेणिकने फिरसे नमस्कार कर गौतम स्वामीसे पूछा ॥१९॥


असुराणामधीशेन मधवे केन हेतुना । शूलरत्नं मुनिश्रेष्ठ ! दत्तं दुर्लभसंगमम् ॥२०॥

अर्थ: कि हे मुनिश्रेष्ठ ! असुरेन्द्रने मधुके लिए दुर्लभ शूलरत्न किस कारण दिया था ? ॥२०॥


इत्युक्तः पुरुणा युक्तस्तेजसा धर्मवत्सलः । शूलरत्नस्य संप्राप्तेः कारणं गौतमोऽवदत् ॥२१॥

अर्थ: श्रेणिकके ऐसा कहनेपर विशाल तेजसे युक्त तथा धर्मसे स्नेह रखनेवाले गौतम स्वामी शूलरत्नकी प्राप्तिका कारण कहने लगे ॥२१॥


धातकीलक्ष्मणि द्वीपे क्षेत्रे चैरावतश्रुतौ । शतद्वारपुरेऽभूतां मित्रे सुप्रेमबन्धने ॥२२॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि धातकीखण्ड द्वीपके ऐरावतक्षेत्र सम्बन्धी शतद्वार नामक नगरमें प्रीतिरूपी बन्धनसे बँधे दो मित्र रहते थे ॥२२॥


एकः सुमित्रनामासीदपरः प्रभवश्रुतिः । उपाध्यायकुले चैतौ जातावतिविचक्षणौ ॥२३॥

अर्थ: उनमेंसे एकका नाम सुमित्र था और दूसरेका नाम प्रभव । सो ये दोनों एक गुरुकी चटशालामें पढ़कर बड़े विद्वान् हुए ॥२३॥


सुमित्रस्याभवद् राज्यं सर्वसामन्तसेवितम् । पुण्योपार्जितसत्कर्मप्रभावात् परमोदयम् ॥२४॥

अर्थ: कई एक दिनमें पुण्योपार्जित सत्कर्मके प्रभावसे सुमित्रको सर्व सामन्तोंसे सेवित तथा परम अभ्युदयसे युक्त राज्य प्राप्त हुआ ॥२४॥


दरिद्रकुलसंभूतः कर्मभिर्दुष्कृतैः पुरा । सुमित्रेण महास्नेहात्प्रभवोऽपि कृतः प्रभुः ॥२५॥

अर्थ: यद्यपि प्रभव पूर्वोपार्जित पापकर्मके उदयसे दरिद्र कुलमें उत्पन्न हुआ था तथापि महास्नेहके कारण सुमित्रने उसे भी राजा बना दिया ॥२५॥


सुमित्रोऽथान्यदारण्ये हृतो दुष्टेन वाजिना । दृष्टो द्विरददंष्ट्रेण म्लेच्छेन स्वैरचारिणा ॥२६॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन एक दुष्ट घोड़ा राजा सुमित्रको हरकर जंगलमें ले गया सो वहाँ अपनी इच्छासे भ्रमण करनेवाले द्विरददंष्ट्र नाम म्लेच्छोंके राजाने उसे देखा ॥२६॥


आनीयासौ ततः पल्लीं संप्राप्य समयं दृढम् । पत्या म्लेच्छवरूथिन्यास्तनयां परिणायितः ॥२७॥

अर्थ: द्विरद- दंष्ट्र उसे अपनी पल्ली (भीलोंकी बस्ती) में ले गया और एक पक्की शर्त कर उसने अपनी पुत्री राजा सुमित्रको विवाह दी ॥२७॥


तां च कन्यां समासाद्य साक्षादिव वनश्रियम् । वनमालाश्रुतिं तत्र स्थितोऽसौ मासमात्रकम् ॥२८॥

अर्थ: जो साक्षात् वनलक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ऐसी वनमाला नामा कन्याको पाकर राजा सुमित्र वहाँ एक माह तक रहा ॥२८॥


अनुज्ञातस्ततस्तेन शतद्वारपुरोत्तमम् । प्रस्थितः कान्तया साकं वृतः शबरसेनया ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर द्विरददंष्ट्रकी आज्ञा लेकर वह अपनी कान्ताके साथ शतद्वार नगरकी ओर वापस आ रहा था। भीलोंकी सेना उसके साथ थी ॥२९॥


गवेषणे विनिष्क्रान्तः प्रभवोऽथ तदैक्षत । कान्तया सहितं मित्रं स्मरस्येव पताकया ॥३०॥

अर्थ: इधर प्रभव अपने मित्रकी खोजके लिए निकला था सो उसने कामदेवकी पताका-के समान सुशोभित कान्तासे सहित मित्रको देखा ॥३०॥


चक्रे च मित्रभार्यायां मानसं पापकर्मणः । उदयान्नष्टनिःशेषकृत्याकृत्यविचेतनः ॥३१॥

अर्थ: पापकर्मके उदयसे जिसके समस्त करने और न करने योग्य कार्योंका विचार नष्ट हो गया था ऐसे प्रभवने मित्रकी स्त्रीमें अपना मन किया ॥३१॥


मनोभवशरैरुग्रैस्ताड्यमानः समन्ततः । अवाप न क्वचित्सौख्यं मनसा भृशमाकुलः ॥३२॥

अर्थ: सब ओरसे कामके तीक्ष्ण बाणोंसे ताड़ित होनेके कारण उसका मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा था इसलिए वह कहीं भी सुख नहीं पा रहा था ॥३२॥


ज्येष्ठो व्याधिसहस्राणां मदनो मतिसूदनः । येन संप्राप्यते दुःखं नरैरक्षतविग्रहैः ॥३३॥

अर्थ: बुद्धिको नष्ट करनेवाला काम हजारों बीमारियोंमें सबसे बड़ी बीमारी है क्योंकि उससे मनुष्योंका शरीर तो नष्ट होता नहीं है पर वे दुःख पाते रहते हैं ॥३३॥


प्रधानं दिवसाधीशः सर्वेषां ज्योतिषां यथा । तथा समस्तरोगाणां मदनो मूर्ध्नि वर्तते ॥३४॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य समस्त ज्योतिषियोंमें प्रधान है उसी प्रकार काम समस्त रोगोंमें प्रधान है ॥३४॥


विचित्तोऽसि किमित्येवमित्युक्तः सुहृदा च सः । जगाद सुन्दरीं दृष्ट्वा विक्लवत्वस्य कारणम् ॥३५॥

अर्थ: 'बेचैन क्यों हो रहे हो 'इस तरह जब मित्रने बेचैनीका कारण पूछा तब उसने सुन्दरीको देखना ही अपनी बेचैनीका कारण कहा ॥३५॥


श्रुत्वा प्राणसमस्यास्य दुःखं स्वस्त्रीनिमित्तकम् । तामाशुप्राहिणोत् प्राज्ञः सुमित्रो मित्रवत्सलः ॥३६॥

प्रेक्ष्य च प्रभवागारं गवाक्षे गूढविग्रहः । स तामैक्षत किं कुर्यादियमस्येति तत्परः ॥३७॥

अर्थ: मित्रवत्सल सुमित्रने जब सुना कि मेरे प्राणतुल्य मित्रको जो दुःख हो रहा है उसमें मेरी स्त्री ही निमित्त है तब उस बुद्धिमान्ने उसे प्रभवके घर भेज दिया और आप झरोखेमें छिपकर देखने लगा कि देखें यह वनमाला इसका क्या करती है ॥३६-३७॥


अचिन्तयच्च यद्येषा भवेन्नास्यानुकूलिका । ततो निग्रहमेतस्याः कर्तास्मि सुविनिश्चितम् ॥३८॥

अर्थ: साथ ही वह यह भी सोचता जाता था कि यदि यह वनमाला इसके अनुकूल नहीं हुई तो मैं निश्चित ही इसका निग्रह करूँगा अर्थात् इसे दण्ड दूँगा ॥३८॥


अथैतस्याश्रवा भूत्वा कामं संपादयिष्यति । ततो ग्रामसहस्रेण पूजयिष्यामि सुन्दरीम् ॥३९॥

अर्थ: और यदि अनुकूल होकर इसका मनोरथ पूर्ण करेगी तो हजार ग्राम देकर इस सुन्दरी-की पूजा करूँगा ॥३९॥


समीपं प्रभवस्यापि वनमाला च सोत्सुका । प्रदोषसमये स्पष्टे ताराप्रकरमण्डिते ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर जब रात्रिका प्रारम्भ हो गया और आकाशमें ताराओंके समूह छिटक गये तब वनमाला बड़ी उत्कण्ठाके साथ प्रभवके समीप पहुँची ॥४०॥


आसीनां चासने रम्ये पुरोदोषविवर्जितः । तामपृच्छदहो भद्रे का त्वमित्युत्कटादरः ॥४१॥

अर्थ: वनमालाको उसने सुन्दर आसनपर बैठाया और स्वयं निर्दोष भावसे उसके सामने बैठ गया। तदनन्तर उसने बड़े आदरके साथ उससे पूछा कि हे भद्रे ! तू कौन है ? ॥४१॥


ततो विवाहपर्यन्तं तस्याः श्रुत्वा विचेष्टितम् । प्रभवो निष्प्रभो जातो निर्वेदं च गतः परम् ॥४२॥

अर्थ: वनमालाने विवाह तकका सब समाचार कह सुनाया । उसे सुनकर प्रभव प्रभाहीन हो गया और परम निर्वेदको प्राप्त हुआ ॥४२॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं मया मित्रस्य कामिनी । किमपि प्रार्थिता कर्तुं धिङ्मामुच्छिन्नचेतनम् ॥४३॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि हाय-हाय बड़े कष्टकी बात है कि मैंने मित्रकी स्त्रीसे कुछ तो भी करनेकी इच्छा की । मुझ अविवेकीके लिए धिक्कार है ॥४३॥


पापादस्मान्न मुच्येऽहमृते स्वस्य विपादनात् । किं वा कलङ्कयुक्तेन जीवितेन ममाधुना ॥४४॥

अर्थ: आत्मघातके सिवाय अन्य तरह मैं इस पापसे मुक्त नहीं हो सकता । अथवा मुझे अब इस कलंकी जीवनसे प्रयोजन ही क्या है ? ॥४४॥


इति संचिन्त्य मूर्धानं स्वं लुलूष्यं चकर्ष सः । कोशतः सायकं सान्द्रच्छायादिग्धदिगन्तरम् ॥४५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर उसने अपना मस्तक काटनेके लिए म्यानसे तलवार खींची । उसकी वह तलवार अपनी सघन कान्तिसे दिशाओंके अन्तरालको व्याप्त कर रही थी ॥४५॥


उपकण्ठं च कण्ठस्य यावदेनं चकार सः । निपत्य सहसा तावत्सुमित्रेण न्यरुध्यत ॥४६॥

अर्थ: वह इस तलवारको कण्ठके पास ले ही गया था कि सुमित्रने सहसा लपककर उसे रोक दिया ॥४६॥


जगाद च त्वरायुक्तं परिष्वज्य स तं सुहृद् । आत्मघातितया दोषं प्राज्ञः किं नाम बुध्यसे ॥४७॥

अर्थ: सुमित्रने शीघ्रतासे मित्रका आलिंगन कर कहा कि तुम तो पण्डित हो, आत्मघातसे जो दोष होता है उसे क्या नहीं जानते हो ? ॥४७॥


आमगर्भेषु दुःखानि प्राप्नुवन्ति चिरं जनाः । ये शरीरस्य कुर्वन्ति स्वस्याविधिनिपातनम् ॥४८॥

अर्थ: जो मनुष्य अपने शरीरका अविधिसे घात करते हैं वे चिरकाल तक कच्चे गर्भमें दुख प्राप्त करते हैं अर्थात् गर्भ पूर्ण हुए बिना ही असमय में मर जाते हैं ॥४८॥


इत्युक्त्वा सुहृदः खड्गं करान्नाश्य सुचेतसा । सान्त्वितश्च चिरं वाक्यैर्मनोहरणकारिभिः ॥४९॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने मित्रके हाथसे तलवार छीनकर नष्ट कर दी और चिरकाल तक उसे मनोहारी वचनोंसे समझाया ॥४९॥


ईदृशी च तयोः प्रीतिरन्योऽन्यगुणयोजिता । प्राप्स्यत्यन्तमहो कष्टः संसारः सारवर्जितः ॥५०॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि परस्परके गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उन दोनों मित्रोंकी प्रीति इस तरह अन्तको प्राप्त होगी इससे जान पड़ता है कि यह संसार असार है ॥५०॥


पृथक्-पृथक् प्रपद्यन्ते सुखदुःखकरीं गतिम् । जीवाः स्वकर्मसंपन्नाः कोऽत्र कस्य सुहृज्जनः ॥५१॥

अर्थ: अपने-अपने कर्मोंसे युक्त जीव सुख-दुःख उत्पन्न करनेवाली पृथक्-पृथक् गतिको प्राप्त होते हैं इसलिए इस संसारमें कौन किसका मित्र है ? ॥५१॥


अन्यदाथ विबुद्धात्मा श्रमणत्वं समाश्रितः । ईशानकल्प ईशत्वं सुमित्रः प्राप्तवान् सुखी ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी आत्मा प्रबुद्ध थी ऐसा राजा सुमित्र मुनि दीक्षा धारण कर अन्तमें ऐशान स्वर्गका अधिपति हो गया ॥५२॥


ततश्च्युत्वेह संभूतो द्वीपे जम्बूपदान्तिके । हरिवाहनराजस्य मथुरायां सुरः पुरि ॥५३॥

माधव्यास्तनयो नाम्ना मधुः स मधुमोहितः । नभसो हरिवंशस्य यश्चन्द्रत्वमुपागतः ॥५४॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर जम्बूद्वीपकी मथुरा नगरीमें राजा हरिवाहनकी माधवी रानीसे मधु नामका पुत्र हुआ । यह पुत्र मधुके समान मोह उत्पन्न करनेवाला था और हरिवंशरूपी आकाशमें चन्द्रमाके समान सुशोभित था ॥५३-५४॥


मिथ्यादृक् प्रभवो मृत्वा दुःखमासाद्य दुर्गतौ । विश्वावसारभूत् पुत्रो ज्योतिष्मत्यां शिखिश्रुतिः ॥५५॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि प्रभव मरकर दुर्गतिमें दुःख भोगता रहा और अन्तमें विश्वावसुकी ज्योतिष्मती स्त्रीके शिखी नामा पुत्र हुआ ॥५५॥


श्रमणत्वधरः कृत्वा तपः कष्टं निदानतः । दैत्यानामधिपो जातश्चमराख्योऽभमामरः ॥५६॥

अर्थ: सो द्रव्यलिंगी मुनि हो महातप कर निदानके प्रभावसे असुरोंका अधिपति चमरेन्द्र हुआ ॥५६॥


ततोऽवधिकृतालोकः स्मृत्वा पूर्वभवान् निजान् । गुणान् सुमित्रमित्रस्य चक्रे मनसि निर्मलान् ॥५७॥

अर्थ: तदनन्तर अवधिज्ञानके द्वारा अपने पूर्व भवोंका स्मरण कर सुमित्र नामक मित्रके निर्मल गुणोंका हृदयमें चिन्तवन करने लगा ॥५७॥


सुमित्रराजचरितं स्मर्यमाणं सुपेशलम् । असुरेन्द्रस्य हृदयं चकर्त्त करपत्रवत् ॥५८॥

अर्थ: ज्यों ही उसे सुमित्र राजाके मनोहर चरित्रका स्मरण आया त्योंही वह करोंतके समान उसके हृदयको विदीर्ण करने लगा ॥५८॥


दध्यौ चेति पुनर्भद्रः सुमित्रोऽसौ महागुणः । आसीन्मम महामित्रः सहायः सर्ववस्तुषु ॥५९॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि सुमित्र बड़ा ही भला और महागुणवान् था । वह समस्त कार्योंमें सहा- यता करनेवाला मेरा परम मित्र था ॥५९॥


तेन सार्धं मया विद्या गृहीता गुरुवेश्मनि । दरिद्रकुलसंभूतस्तेनाहं स्वसमः कृतः ॥६०॥

अर्थ: उसने मेरे साथ गुरुके घर विद्या पढ़ी थी । मैं दरिद्रकुल में उत्पन्न हुआ था सो उसने मुझे अपने समान धनवान् बना लिया था ॥६०॥


आत्मीया तेन मे पत्नी द्वेषवर्जितचेतसा । प्रेषिता पापचित्तस्य वितृष्णेन दयावता ॥६१॥

अर्थ: मेरे चित्तमें पाप समाया सो द्वेषरहित चित्तके धारक उस दयालुने तृष्णारहित होकर मेरे पास अपनी स्त्री भेजी ॥६१॥


ज्ञात्वा वयस्यपत्नीति परमुद्वेगमागतः । शिरः स्वमसिना छिन्दंस्तेनाहं परिरक्षितः ॥६२॥

अर्थ: ‘यह मित्रकी स्त्री है’ ऐसा जानकर जब मैं परम उद्वेगको प्राप्त होता हुआ तलवारसे अपना शिर काटनेके लिए उद्यत हुआ तो उसीने मेरी रक्षा की थी ॥६२॥


अश्रद्दधज्जिनेन्द्राणां शासनं पञ्चतां गतः । प्राप्तोऽस्मि दुर्गतौ दुःखं स्मरणेनापि दुःसहम् ॥६३॥

अर्थ: मैंने जिनशासनकी श्रद्धा बिना मरकर दुर्गतिमें ऐसे दुःख भोगे कि जिनका स्मरण करना भी दुःसह है ॥६३॥


निन्दनं साधुवर्गस्य सिद्धिमार्गानुवर्तिनः । यत्कृतं तस्य तत्प्राप्तं फलं दुःखासु योनिषु ॥६४॥

अर्थ: मैंने मोक्षमार्गका अनुवर्तन करनेवाले साधुओंके समूहकी जो निन्दा की थी उसका फल अनेक दुःखदायी योनियोंमें प्राप्त किया ॥६४॥


स चापि चरितं कृत्वा निर्मलं सुखमुत्तमम् । ऐशाननिलये भुक्त्वा च्युतोऽयं वर्तते मधुः ॥६५॥

अर्थ: और वह सुमित्र निर्मल चारित्रका पालन कर ऐशान स्वर्गमें उत्तम सुखका उपभोग करनेवाला इन्द्र हुआ तथा अब वहाँसे च्युत होकर मधु हुआ है ॥६५॥


उपकारसमाकृष्टस्ततोऽसौ भवनान्निजात् । निर्जगाम क्षणोद्भूतपरप्रेमार्द्रमानसः ॥६६॥

अर्थ: इस प्रकार क्षणभरमें उत्पन्न हुए परम प्रेमसे जिसका मन आर्द्र हो रहा था ऐसा चमरेन्द्र सुमित्र मित्रके उपकारोंसे आकृष्ट हो अपने भवनसे बाहर निकला ॥६६॥


दृष्ट्वादरेण कृत्वा च महारत्नादिपूजनम् । शूलरत्नं ददावस्मै सहस्रान्तकसंज्ञितम् ॥६७॥

अर्थ: उसने बड़े आदरके साथ मिलकर महारत्नोंसे मित्रका पूजन किया और उसके लिए सहस्रान्तक नामक शूलरत्न भेंटमें दिया ॥६७॥


शूलरत्नं स तत्प्राप्य परां प्रीतिं गतः क्षितौ । अस्त्रविद्याधिराजश्च सिंहवाहनजोऽभवत् ॥६८॥

अर्थ: हरिवाहनका पुत्र मधु चमरेन्द्रसे शूलरत्न पाकर पृथिवीपर परम प्रीतिको प्राप्त हुआ और अस्त्र- विद्याका स्वामी कहलाने लगा ॥६८॥


एतन्मधोरुपाख्यानमधीते यः शृणोति वा । दीप्तिमर्थं परं चायुः सोऽधिगच्छति मानवः ॥६९॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिक से कहते हैं कि हे राजन् ! जो मनुष्य मधुके इस चरित्रको पढ़ता अथवा सुनता है वह विशाल दीप्ति, श्रेष्ठ धन और उत्कृष्ट आयुको प्राप्त होता है ॥६९॥


सामन्तानुगतोऽथासौ मरुत्वमखनाशकृत् । प्रभावं प्रथयँल्लोके प्रवणीकृतविद्विषम् ॥७०॥

संवत्सरान् दशाष्टौ च विहरञ्जनिताद्भुतम् । भुवने जनितप्रेम्णि देवेन्द्रस्त्रिदिवे यथा ॥७१॥

अर्थ: अथानन्तर अनेक सामन्त जिसके पीछे-पीछे चल रहे थे ऐसा रावण लोकमें शत्रुओंको वशीभूत करनेवाला अपना प्रभाव फैलाता और अनेक आश्चर्य उत्पन्न करता हुआ प्रेमसे भरे संसारमें अठारह वर्ष तक इस प्रकार भ्रमण करता रहा जिस प्रकार कि इन्द्र स्वर्गमें भ्रमण करता है ॥७०-७१॥


मुञ्चन्नारात्समुद्रस्य धरणीं धरणीधृतिः । चिरेण जिनचैत्याढ्यं प्रापाष्टापदभूधरम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर रावण क्रम-क्रमसे समुद्रकी निकटवर्तिनी भूमिको छोड़ता हुआ चिरकाल के बाद जिनमन्दिरोंसे युक्त कैलास पर्वतपर पहुँचा ॥७२॥


प्रसन्नसलिला तत्र भाति मन्दाकिनी भृशम् । महिषी सिन्धुनाथस्य कनकाब्जरजस्तता ॥७३॥

अर्थ: वहाँ स्वच्छ जलसे भरी समुद्रकी पत्नी एवं सुवर्ण कमलोंकी परागसे व्याप्त गंगानदी अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ॥७३॥


सन्निवेश्य समीपेऽस्या वाहिनीं परमाप ताम् । मनोज्ञं रमणं चक्रे कैलासस्य स कुक्षिषु ॥७४॥

अर्थ: सो उसके समीप ही अपनी विशाल सेना ठहराकर कैलासकी कन्दराओंमें मनोहर क्रीड़ा करने लगा ॥७४॥


नुनुदुः खेचराः खेदं भूचराश्च यथाक्रमम् । मन्दाकिन्याः सुखस्पर्शसलिले स्फटिकामले ॥७५॥

अर्थ: पहले विद्याधर और फिर भूमिगोचरी मनुष्योंने यथाक्रमसे गंगा नदीके स्फटिकके समान स्वच्छ सुखकर स्पर्शवाले जलमें अपना खेद दूर किया था अर्थात् स्नानकर अपनी थकावट दूर की थी ॥७५॥


न मेरुपल्लवापास्तलोठनोपात्तपांशवः । स्नपिताः सप्तयः पीतपयसो विनयस्थिताः ॥७६॥

अर्थ: पृथ्वीपर लोटनेके कारण लगी हुई जिनकी धूलि नमेरुवृक्षके नये-नये पत्तोंसे झाड़कर दूर कर दी गयी थी और पानी पिलानेके बाद जिन्हें खूब नहलाया गया था ऐसे घोड़े विनयसे खड़े थे ॥७६॥


शीकरार्द्रितदेहत्वाद् ग्राहिताः सुघनं रजः । तटिन्यस्तमहाखेदाः स्नपिताः कुञ्जराश्चिरम् ॥७७॥

अर्थ: जलके छींटोंसे गीला शरीर होनेके कारण जिनपर बहुत गाढ़ी धूलि जमी हुई थी तथा नदीके द्वारा जिनका बड़ा भारी खेद दूर कर दिया गया था ऐसे हाथियोंको महावतोंने चिरकाल तक नहलाया था ॥७७॥


स्मृत्वा तु बालिवृत्तान्तं नमस्कृतजिनालयः । यमध्वंसः स्थितः कुर्वंश्चेष्टां धर्मानुगामिनीम् ॥७८॥

अर्थ: कैलासपर आते ही रावणको बालिका वृत्तान्त स्मृत हो उठा इसलिए उसने समस्त चैत्यालयोंको बड़ी सावधानीसे नमस्कार किया और धर्मानुकूल क्रियाओंका आचरण किया ॥७८॥


अथ योऽसौ सुरेन्द्रेण नियुक्तो नलकूबरः । लोकपालतया ख्यातः पुरे दुर्लङ्घसंज्ञके ॥७९॥

उपशल्यं स विज्ञाय रावणं चरवर्गतः । जिगीषया समायातं सैन्यसागरवर्तिनम् ॥८०॥

लेखारोपितवृत्तान्तं प्राहिणोदाशुगामिनम् । खेचरं सुरनाथाय त्रासाध्यासितमानसः ॥८१॥

अर्थ: अथानन्तर इन्द्रने दुर्लंघ्यपुर नामा नगरमें नलकूबरको लोकपाल बनाकर स्थापित किया था सो गुप्तचरोंसे जब उसे यह मालूम हुआ कि सेना रूपी सागरके मध्य वर्तमान रहनेवाला रावण जीतनेकी इच्छासे निकट ही आ पहुँचा है तब उसने भयभीतचित्त होकर पत्रमें सब समाचार लिख एक शीघ्रगामी विद्याधर इन्द्रके पास पहुँचाया ॥७९-८१॥


मन्दरं प्रस्थितायास्मै वन्दितुं जिनपुङ्गवान् । प्रणम्य लेखवाहेन लेखोऽवस्थापितः पुरः ॥८२॥

अर्थ: सो इन्द्र जिस समय जिन-प्रतिमाओंकी वन्दना करनेके लिए सुमेरु पर्वतपर जा रहा था उसी समय पत्रवाहक विद्याधर-ने प्रणामकर नलकूबरका पत्र उसके सामने रख दिया ॥८२॥


वाचयित्वा च तं कृत्वा हृदयेऽर्थमशेषतः । आज्ञापयत् सुराधीशो वस्त्विदं लेखदानतः ॥८३॥

यत्नात्तावद्विहास्स्व त्वममोघास्त्रस्य पालकः । जिनानां पाण्डुके कृत्वा वन्दनां यावदेम्यहम् ॥८४॥

अर्थ: इन्द्रने पत्र बाँचकर तथा समस्त अर्थ हृदयमें धारणकर प्रतिलेख द्वारा आज्ञा दी कि मैं जबतक पाण्डुकवनमें स्थित जिन-प्रति-माओंकी वन्दना कर वापस आता हूँ तबतक तुम बड़े यत्नसे रहना । तुम अमोघ अस्त्रके धारक हो ॥८३-८४॥


इति संदिश्य गर्वेण सेनामगणयद् द्विषः । गतोऽसौ पाण्डुकोद्यानं वन्दनासक्तमानसः ॥८५॥

अर्थ: ऐसा सन्देश देकर जिसका मन वन्दनामें आसक्त था ऐसा इन्द्र गर्ववश शत्रुकी सेनाको कुछ नहीं गिनता हुआ पाण्डुकवन चला गया ॥८५॥


समस्ताप्तसमेतश्च प्रयत्नान्नलकूबरः । पुरस्याचिन्तयद् रक्षामिति कर्तव्यतत्परः ॥८६॥

अर्थ: इधर समयानुसार कार्य करनेमें तत्पर रहनेवाले नलकूबरने समस्त आप्तजनोंके साथ मिलकर बड़े प्रयत्नसे नगरकी रक्षाका उपाय सोचा ॥८६॥


योजनानां शतं तुङ्गः प्राकारो विद्यया कृतः । वज्रशाल इति ख्यातः परिधिस्त्रिगुणान्वितः ॥८७॥

अर्थ: उसने सौ योजन ऊँचा और तिगुनी परिधिसे युक्त वज्रशाल नामा कोट, विद्याके प्रभावसे नगरके चारों ओर खड़ा कर दिया ॥८७॥


रावणेन च विज्ञाय नगरं शत्रुगोचरम् । गृहीतुं प्रेषितो दण्डे प्रहस्तोऽनीकिनीपतिः ॥८८॥

अर्थ: यह नगर शत्रुके अधीन है ऐसा जानकर रावणने दण्ड वसूल करनेके लिए प्रहस्त नामा सेनापति भेजा ॥८८॥


निवृत्य रावणायासावाख्यद्देव न शक्यते । गृहीतुं तत्पुरं तुङ्गप्राकारकृतवेष्टनम् ॥८९॥

अर्थ: सो उसने लौटकर रावणसे कहा कि हे देव ! शत्रुका नगर बहुत ऊँचे प्रकारसे घिरा हुआ है इसलिए वह नहीं लिया जा सकता है ॥८९॥


पश्य दृश्यत एवायं दिक्षु सर्वासु दारुणः । शिखरी विवरी दंष्ट्राकरालास्यशयूपमः ॥९०॥

अर्थ: देखो वह भयंकर प्राकार यहाँ से ही समस्त दिशाओंमें दिखाई दे रहा है । वह बड़ी ऊँची शिखरों और गम्भीर विलोसे युक्त है तथा जिसका मुख दाँढ़ोंसे भयंकर है ऐसे अजगरके समान जान पड़ता है ॥९०॥


दह्यमानमिवोदारं कीचकानां घनं वनम् । स्फुलिङ्गराशिदुष्प्रेक्ष्यज्वालाजालसमाकुलम् ॥९१॥

अर्थ: उड़ते हुए तिलगोंसे जिनकी ओर देखना भी कठिन है ऐसी ज्वालाओंके समूहसे वह प्राकार भरा हुआ है तथा बाँसोंके जलते हुए किसी सघन बड़े वनके समान दिखाई देता है ॥९१॥


दंष्ट्राकरालवेतालरूपाण्यस्य नरान् बहून् । हरन्त्युदारयन्त्राणि योजनाभ्यन्तरस्थितान् ॥९२॥

अर्थ: इस प्राकारमें भयंकर दाँढ़ोंको धारण करनेवाले वेतालोंके समान ऐसे-ऐसे विशाल यन्त्र लगे हुए हैं जो एक योजनके भीतर रहनेवाले बहुतसे मनुष्योंको एक साथ पकड़ लेते हैं ॥९२॥


तेषां वक्त्राणि ये प्राप्ता यन्त्राणां प्राणिनां गणाः । तेषां जन्मान्तरे भूयः शरीरेण समागमः ॥९३॥

अर्थ: प्राणियोंके जो समूह उन यन्त्रोंके मुखमें पहुँच जाते हैं फिर उसके शरीरका समागम दूसरे जन्ममें ही होता है ॥९३॥


इति विज्ञाय कर्तव्यस्त्वया कुशलसंगमः । उपायो विजिगीषुत्वं क्रियते दीर्घदर्शिना ॥९४॥

अर्थ: ऐसा जानकर आप नगर लेनेके लिए कोई कुशल उपाय सोचिए। यथार्थमें दीर्घदर्शी मनुष्यके द्वारा ही विजिगीषुपना किया जाता है अर्थात् जो दीर्घदर्शी होता है वही विजिगीषु हो सकता है ॥९४॥


निःसर्पणमरं तावदस्माद्देशाद् विराजते । संशयः परमोऽप्यत्र दृश्यते दुर्निराकृतः ॥९५॥

अर्थ: इस स्थानसे तो शीघ्र ही निकल भागना शोभा देता है क्योंकि यहाँ पर जिसका निरावरण नहीं किया जा सकता ऐसा बहुत भारी संशय विद्यमान है ॥९५॥


ततः कैलासकुक्षिस्था दशवक्त्रस्य मन्त्रिणः । उपायं चिन्तयाञ्चक्रुर्नयशास्त्रविशारदाः ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर कैलासकी गुफाओंमें बैठे रावणके नीतिनिपुण मन्त्री उपायका विचार करने लगे ॥९६॥


अथ रम्भागुणाकारा नलकूबरकामिनी । उपरम्भेति विख्याता शुश्रावान्ते दशाननम् ॥९७॥

अर्थ: अथानन्तर जिसके गुण और आकार रम्भा नामक अप्सराके समान थे ऐसी नलकूबरकी उपरम्भा नामक प्रसिद्ध स्त्री ने सुना कि रावण समीप ही आकर ठहरा हुआ है ॥९७॥


पूर्वमेव गुणै रक्ता तत्रोत्कण्ठां परामसौ । जगाम रजनीनाथे यथा कुमुदसंहतिः ॥९८॥

अर्थ: वह रावणके गुणोंसे पहले ही अनुरक्त थी इसलिए जिस प्रकार कुमुदोंकी पंक्ति चन्द्रमाके विषयमें उत्कण्ठाको प्राप्त रहती है उसी प्रकार वह भी रावणके विषयमें परम उत्कण्ठाको प्राप्त हुई ॥९८॥


सखीं विचित्रमालाख्यामेकान्ते चेत्यभाषत । शृणु सुन्दरि काऽस्त्यन्या सखी प्राणसमा मम ॥९९॥

अर्थ: उसने एकान्तमें विचित्रमाला नामक सखीसे कहा कि हे सुन्दरि, सुन। तुझे छोड़कर मेरी प्राण तुल्य दूसरी सखी कौन है ? ॥९९॥


समानं ख्याति येनातः सखिशब्दः प्रवर्तते । अतो न मे मतेर्भेदं कर्तुमर्हसि शोभने ॥१००॥

अर्थ: जो समान बात कहे वहीं सखी शब्द प्रवृत्त होता है अर्थात् समान बात कहनेवाली ही सखी कहलाती है इसलिए हे शोभने ! तू मेरी मनसाका भेद करनेके योग्य नहीं है ॥१००॥


नियमात् कुरुषे यस्माद्दक्षे मत्कार्यसाधनम् । ततो ब्रवीमि सख्यो हि जीवितालम्बनं परम् ॥१०१॥

अर्थ: हे चतुरे ! तू अवश्य ही मेरा कार्य सिद्ध करती है इसलिए तुझसे कहती हूँ । यथार्थमें सखियाँ ही जीवनका बड़ा आलम्बन हैं - सबसे बड़ा सहारा हैं ॥१०१॥


एवमुक्ता जगादासौ किमेवं देवि भाषसे । भृत्याहं विनियोक्तव्या त्वया वाञ्छितकर्मणि ॥१०२॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर विचित्रमालाने कहा कि हे देवि ! आप ऐसा क्यों कहती हैं। मैं तो आपकी दासी हूँ, मुझे आप इच्छित कार्यमें लगाइए ॥१०२॥


न करोमि स्तुतिं स्वस्य सा हि लोकेऽतिनिन्दिता । एतावन्नु ब्रवीम्येषा सिद्धिरेवास्मि रूपिणी ॥१०३॥

अर्थ: मैं अपनी प्रशंसा नहीं करती क्योंकि लोकमें उसे निन्दनीय बताया है पर इतना अवश्य कहती हूँ कि मैं साक्षात् रूपधारिणी सिद्धि ही हूँ ॥१०३॥


वद विश्रब्धिका भूत्वा यत्ते मनसि वर्तते । मयि सत्यां वृथा खेदः स्वामिन्या धार्यते त्वया ॥१०४॥

अर्थ: जो कुछ तुम्हारे मनमें हो उसे निःशंक होकर कहो मेरे रहते आप खेद व्यर्थ ही उठा रही हैं ॥१०४॥


उपरम्भा ततोऽवादीन्निश्वस्यायतमन्थरम् । पद्माभे चन्द्रमःकान्तं करे न्यस्य कपोलकम् ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर उपरम्भा लम्बी और धीमी साँस लेकर तथा कमल तुल्य हथेलीपर चन्द्रमाके समान सुन्दर कपोल रखकर कहने लगी ॥१०५॥


निष्क्रान्तस्तम्भितान् वर्णान् प्रेरयन्ती पुनः पुनः । आरूढपतितं धाष्टर्ये कृच्छ्रान्निदधती मनः ॥१०६॥

अर्थ: जो अक्षर उपरम्भाके मुखसे निकलते थे वे लज्जाके कारण बीच-बीचमें रुक जाते थे अतः वह उन्हें बार-बार प्रेरित कर रही थी - तथा उसका मन धृष्टताके ऊपर बार-बार चढ़ता और बार-बार गिरता था सो उसे वह बड़े कष्टसे धृष्टताके ऊपर स्थित कर रही थी ॥१०६॥


सखि बाल्यत आरभ्य रावणे मन्मनो गतम् । लोकावतायिनस्तस्य गुणाः कान्ता मया श्रुताः ॥१०७॥

अप्रगल्भतया प्राप्ता साहमप्रियसंगमम् । वहामि परमप्रीतेः पश्चात्तापमनारतम् ॥१०८॥

अर्थ: उसने कहा कि हे सखि ! बाल्य अवस्थासे ही मेरा मन रावणमें लगा हुआ है। यद्यपि मैंने उसके समस्त लोकमें फैलनेवाले मनोहर गुण सुने हैं तो भी मैं उसका समागम प्राप्त नहीं कर सकी। किन्तु उसके विपरीत भाग्यकी मन्दतासे मैं नलकूबरके साथ अप्रिय संगमको प्राप्त हुई हूँ सो अप्रीतिके कारण निरन्तर भारी पश्चात्तापको धारण करती रहती हूँ ॥१०७-१०८॥


जानामि च तथा नैतत्प्रशस्यमिति रूपिणि । तथापि मरणं सोढुं नास्मि शक्ता सुभाषिते ॥१०९॥

अर्थ: हे रूपिणि ! यद्यपि मैं जानती हूँ कि यह कार्य प्रशंसनीय नहीं है तथापि हे सुभाषिते ! मैं मरण सहन करनेके लिए भी समर्थ नहीं हूँ ॥१०९॥


सोऽयमासन्नदेशस्थो वर्तते मे मनोहरः । कथंचिदमुना योगं प्रसीद कुरु मे सखि ॥११०॥

अर्थ: मेरे मनको हरण करनेवाला वह रावण इस समय निकट ही स्थित है इसलिए हे सखि ! मुझपर प्रसन्न हो और इसके साथ किसी तरह मेरा समागम करा ॥११०॥


एषा नमामि ते पादावित्युक्ता तावदुद्यता । शिरो नमयितुं तावत्सख्या तत्संभ्रमाद्धृतम् ॥१११॥

अर्थ: ‘यह मैं तेरे चरणोंमें नमस्कार करती हूँ’ इतना कहकर ज्योंही वह शिर झुकानेके लिए उद्यत हुई त्योंही सखीने बड़ी शीघ्रतासे उसका शिर बीचमें पकड़ लिया ॥१११॥


वरं स्वामिनि कामं ते साधयामि क्षणादिति । गदित्वा निर्गता गेहाद् दूती ज्ञाताखिलस्थितिः ॥११२॥

अर्थ: ‘हे स्वामिनी ! मैं आपका मनोरथ शीघ्र ही सिद्ध करती हूँ’ यह कहकर सब स्थितिको जाननेवाली दूती घरसे बाहर निकली ॥११२॥


साम्भोजीमूतसंकाशसूक्ष्मवस्त्रावगुण्ठिता । खमुत्पत्य क्षणात्प्राप वसतिं रक्षसां प्रभोः ॥११३॥

अर्थ: सजल मेघके समान सूक्ष्म वस्त्रका घूँघट धारण करनेवाली दूती आकाशमें उड़कर क्षण-भरमें रावणके डेरेमें जा पहुँची ॥११३॥


अन्तःपुरं प्रविष्टा च प्रतीहार्या निवेदिता । कृत्वा प्रणतिमासीना दत्ते सविनयासने ॥११४॥

अर्थ: द्वारपालिनीके द्वारा सूचना देकर वह अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुई। वहाँ प्रणाम कर, रावणके द्वारा दिये आसनपर विनयसे बैठी ॥११४॥


ततो जगाद देवस्य भुवनं सकलं गुणैः । दोषसंगोज्झितैर्व्याप्तं यत्तद्युक्तं तवेदृशः ॥११५॥

अर्थ: तदनन्तर कहने लगी कि हे देव ! आपके निर्दोष गुणोंसे जो समस्त संसार व्याप्त हो रहा है वह आपके समान प्रभावक पुरुषके अनुरूप ही है ॥११५॥


उदारो विभवो यस्ते याचकांस्तर्पयन् भुवि । कारणेनामुना वेद्मि सर्वेषां त्वां हिते स्थितम् ॥११६॥

अर्थ: चूँकि आपका उदार वैभव पृथिवीपर याचकोंको सन्तुष्ट कर रहा है इस कारण मैं जानती हूँ कि आप सबका हित करनेमें तत्पर हैं ॥११६॥


आकारस्यास्य जानामि न ते प्रार्थनभञ्जनम् । भूतिर्भवद्विधानां हि परोपकृतिकारणम् ॥११७॥

अर्थ: मैं खूब समझती हूँ कि इस आकारको धारण करनेवाले आप मेरी प्रार्थनाको भंग नहीं करेंगे। यथार्थमें आप-जैसे लोगोंकी सम्पदा परोपकारका ही कारण है ॥११७॥


स त्वमुत्सारिताशेषपरिवर्गो विभो क्षणम् । अवधानस्य दानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥११८॥

अर्थ: हे विभो ! आप क्षण-भरके लिए समस्त परिजनको दूर कर दीजिए और ध्यान देकर मुझपर प्रसन्नता कीजिए ॥११८॥


तथा कृते ततः कर्णे दशवक्त्रस्य सा जगौ । सकलं पूर्ववृत्तान्तं सर्ववृत्तान्तवेदिनी ॥११९॥

अर्थ: तदनन्तर जब सर्व परिजन दूर कर दिये गये और बिलकुल एकान्त हो गया तब सब वृत्तान्त जाननेवाली दूतीने रावणके कानमें पहलेका सब समाचार कहा ॥११९॥


ततः पिधाय पाणिभ्यां श्रवणौ पुरुषोत्तमः । धुन्वन् शिरश्चिरं चक्षुःसंकोचं परमानयन् ॥१२०॥

अर्थ: तदनन्तर दूतीकी बात सुन रावणने दोनों हाथोंसे दोनों कान ढक लिये। वह चिर काल तक सिर हिलाता रहा और नेत्र सिकोड़ता रहा ॥१२०॥


विचित्रवनितावाञ्छाचिन्ताखिन्नमतिः क्षणम् । बभूव केकसीसूनुः सदाचारपरायणः ॥१२१॥

अर्थ: सदाचारमें तत्पर रहनेवाला रावण परस्त्रीकी वांछा सुन चिन्तासे क्षण-भरमें खिन्न चित्त हो गया ॥१२१॥


जगाद च स्मितं कृत्वा भद्रे चेतसि ते कथम् । स्थितमीदृगिदं वस्तु पापसंगमकारणम् ॥१२२॥

अर्थ: उसने हँसते हुए कहा कि हे भद्रे ! पापका संगम करानेवाली यह ऐसी बात तुम्हारे मन आयी ही कैसे ? ॥१२२॥


ईदृशे याचितेऽत्यन्तं दरिद्रः किं करोम्यहम् । अभिमानं परित्यज्य तथेदमुदितं त्वया ॥१२३॥

अर्थ: तूने यह बात अभिमान छोड़कर कही है। ऐसी याचनाके पूर्ण करनेमें मैं अत्यन्त दरिद्र हूँ, क्या करूँ ? ॥१२३॥


विधवा भर्तृसंयुक्ता प्रमदा कुलबालिका । वेश्या च रूपयुक्तापि परिहार्या प्रयत्नतः ॥१२४॥

अर्थ: चाहे विधवा हो, चाहे पतिसे सहित हो, चाहे कुलवती हो और चाहे रूपसे युक्त वेश्या हो परस्त्री मात्रका प्रयत्न पूवक त्याग करना चाहिए ॥१२४॥


विरोधवदिदं कर्म परत्रेह च जन्मनि । लोकद्वयपरिभ्रष्टः कीदृशो वद मानवः ॥१२५॥

अर्थ: यह कार्य इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह विरुद्ध है। तथा जो मनुष्य दोनों लोकोंसे भ्रष्ट हो गया वह मनुष्य ही क्या सो तू ही कह ॥१२५॥


नरान्तरमुखक्लेदपूर्णेऽन्याङ्गविमर्दिते । उच्छिष्टभोजने भोक्तुं भद्रे वाञ्छति को नरः ॥१२६॥

अर्थ: हे भद्रे ! दूसरे मनुष्यके मुखकी लारसे पूर्ण तथा अन्य मनुष्यके अंगसे मर्दित जूठा भोजन खानेकी कौन मनुष्य इच्छा करता है ? ॥१२६॥


मिथो विभीषणायेदं प्रीत्यानेनाथ वेदितम् । नयज्ञः स जगादैवं सततं मन्त्रिगणाग्रणीः ॥१२७॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने यह बात प्रीतिपूर्वक विभीषणसे भी एकान्तमें कही सो नीतिको जाननेवाले एवं निरन्तर मन्त्रिगणोंमें प्रमुखता धारण करनेवाले विभीषणने इस प्रकार उत्तर दिया ॥१२७॥


देव प्रक्रम एवायमीदृशो वर्तते यतः । अलीकमपि वक्तव्यं राज्ञा नयवता सदा ॥१२८॥

अर्थ: कि हे देव ! चूँकि यह कार्य ही ऐसा है अतः सदा नीतिके जाननेवाले राजाको कभी झूठ भी बोलना पड़ता है ॥१२८॥


तुष्टाभ्युपगमात् किंचिदुपायं कथयिष्यति । उपरम्भा परिप्राप्तौ विश्रम्भं परमागता ॥१२९॥

अर्थ: सम्भव है स्वीकार कर लेनेसे सन्तोषको प्राप्त हुई उपरम्भा उत्कट विश्वास करती हुई, किसी तरह नगर लेनेका कोई उपाय बता दे ॥१२९॥


ततस्तद्वचनात्तेन दूती छद्मानुगामिना । इत्यभाष्यत तन्नाम भद्रे यदुचितं त्वया ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणके कहनेसे कपटका अनुसरण करनेवाले रावणने दूतीसे कहा कि हे भद्रे ! तूने जो कहा है वह ठीक है ॥१३०॥


वराकी मद्गतप्राणा वर्तते सा सुदुःखिता । रक्षणीया ममोदारा भवन्ति हि दयापराः ॥१३१॥

अर्थ: चूँकि उस बेचारीके प्राण मुझमें अटक रहे हैं और वह अत्यन्त दुःखसे युक्त है अतः मेरे द्वारा रक्षा करनेके योग्य है । यथार्थमें उदार मनुष्य दयालु होते हैं ॥१३१॥


ततश्चानय तां गत्वा प्राणैर्यावन्न मुच्यते । प्राणिनां रक्षणे धर्मः श्रूयते प्रकटो भुवि ॥१३२॥

अर्थ: इसलिए जबतक प्राण उसे नहीं छोड़ देते हैं तब तक जाकर उसे ले आ । ‘प्राणियोंकी रक्षा करनेमें धर्म है’ यह बात पृथिवीपर खूब सुनी जाती है ॥१३२॥


इत्युक्त्वा परिसृष्टा सा गत्वा तामानयत् क्षणात् । आदरश्च महानस्याः कृतो यमविमर्दिना ॥१३३॥

अर्थ: इतना कहकर रावणके द्वारा विदा की हुई दूती क्षणभरमें जाकर उपरम्भाको ले आयी । आनेपर रावणने उसका बहुत आदर किया ॥१३३॥


ततो मदनसंप्राप्ता सा तेनैवमभाष्यत । दुर्लङ्घ्यनगरे देवि रन्तुं मम परा स्पृहा ॥१३४॥

अर्थ: तदनन्तर कामके वशीभूत हो जब उपरम्भा रावणके समीप पहुँची तब रावणने कहा कि हे देवि ! मेरी उत्कट इच्छा दुर्लंघ्यनगरमें ही रमण करनेकी है ॥१३४॥


अटव्यामिह किं सौख्यं किं वा मदनकारणम् । तथा कुरु यथैतस्मिंस्त्वया सह पुरे रमे ॥१३५॥

अर्थ: तुम्हीं कहो इस जंगलमें क्या सुख है ? और क्या कामवर्धक कारण है ? हे देवि ! ऐसा करो कि जिससे मैं तुम्हारे साथ नगरमें ही रमण करूँ ॥१३५॥


ततस्तत्तस्य कौटिल्यमविज्ञाय स्मरातुरा । स्त्रीणां स्वभावमुग्धत्वात्पुरस्यागमनाय सा ॥१३६॥

ददावाशालिकां विद्यां प्राकारत्वेन कल्पिताम् । व्यन्तरैः कृतरक्षाणि नानास्त्राणि च सादरा ॥१३७॥

अर्थ: स्त्रियाँ स्वभावसे ही मुग्ध होती हैं इसलिए उपरम्भा रावणकी कुटिलताको नहीं समझ सकी । निदान, उसने कामसे पीड़ित हो उसे नगरमें आनेके लिए आशालिका नामकी वह विद्या जो कि प्राकार बनकर खड़ी हुई थी तथा व्यन्तर देव जिनकी रक्षा किया करते थे ऐसे नाना शस्त्र बड़े आदरके साथ दे दिये ॥१३६-१३७॥


अपयातश्च शालोऽसौ विद्यालाभादनन्तरम् । स्थितं प्रकृतिशालेन केवलेनावृतं पुरम् ॥१३८॥

अर्थ: विद्या मिलते ही वह मायामय प्राकार दूर हो गया और उसके अभावमें वह नगर केवल स्वाभाविक प्राकारसे ही आवृत रह गया ॥१३८॥


बभूव रावणः साकं सैन्येन महतान्तिकः । पुरस्य निनदं श्रुत्वा क्षुब्धश्च नलकूबरः ॥१३९॥

अर्थ: रावण बड़ी भारी सेना लेकर नगरके निकट पहुँचा सो उसका कलकल सुनकर नलकूबर क्षोभको प्राप्त हुआ ॥१३९॥


तमदृष्ट्वा ततः शालं लोकपालो विषादवान् । गृहीतमेव नगरं मेने यक्षविमर्दिना ॥१४०॥

तथापि पौरुषं बिभ्रद् योद्धुं श्रमभरेण सः । निष्क्रान्तोऽत्यन्तविक्रान्तसर्वसामन्तवेष्टितः ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर उस मायामय प्राकारको न देखकर लोकपाल नलकूबर बड़ा दुःखी हुआ। यद्यपि उसने समझ लिया था कि अब तो हमारा नगर रावणने ले ही लिया तो भी उसने उद्यम नहीं छोड़ा। वह पुरुषार्थको धारण करता हुआ बड़े श्रमसे युद्ध करनेके लिए बाहर निकला। अत्यन्त पराक्रमी सब सामन्त उसके साथ थे ॥१४०-१४१॥


ततो महति संग्रामे प्रवृत्ते शस्त्रसङ्कुले । अदृष्टपद्मिनीनाथकिरणे क्रूरनिःस्वने ॥१४२॥

विभीषणेन वेगेन निपत्य नलकूबरः । गृहीतः कूबरं भंक्त्वा स्यन्दनस्याङ्घ्रिताडनात् ॥१४३॥

अर्थ: तदनन्तर जो शस्त्रोंसे व्याप्त था, जिसमें सूर्यकी किरणें नहीं दिख रही थीं और भयंकर कठोर शब्द हो रहा था ऐसे महायुद्धके होनेपर विभीषणने वेगसे उछलकर पैरके आघातसे रथका धुरा तोड़ दिया और नलकूबरको जीवित पकड़ लिया ॥१४२-१४३॥


सहस्रकिरणे कर्म दशवक्त्रेण यत्कृतम् । विभीषणेन क्रुद्धेन तत्कृतं नलकूबरे ॥१४४॥

अर्थ: रावणने राजा सहस्ररश्मिके साथ जो काम किया था वही काम क्रोधसे भरे विभीषणने नलकूबरके साथ किया ॥१४४॥


देवासुरभयोत्पादे दक्षं चक्रं न रावणः । त्रिदशाधिपसंबन्धि प्राप नाम्ना सुदर्शनम् ॥१४५॥

अर्थ: उसी समय रावणने देव और असुरोंको भय उत्पन्न करनेमें समर्थ इन्द्र सम्बन्धी सुदर्शन नामका चक्ररत्न प्राप्त किया ॥१४५॥


उपरम्भा दशास्येन रहसीदमथोदिता । विद्यादानाद् गुरुत्वं मे वर्तते प्रवराङ्गने ! ॥१४६॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने एकान्तमें उपरम्भासे कहा कि हे प्रवरांगने ! विद्या देनेसे तुम मेरी गुरु हो ॥१४६॥


जीवति प्राणनाथे ते न युक्तं कर्तुमीदृशम् । ममापि सुतरामेव न्यायमार्गोपदेशिनः ॥१४७॥

अर्थ: पतिके जीवित रहते तुम्हें ऐसा करना योग्य नहीं है और नीतिमार्गका उपदेश देनेवाले मुझे तो बिलकुल ही योग्य नहीं है ॥१४७॥


समाश्वास्य ततो नीतो भार्यान्तं नलकूबरः । शस्त्रदारितसंनाहदृष्टविक्षतविग्रहः ॥१४८॥

अर्थ: तत्पश्चात् शस्त्रोंसे विदारित कवचके भीतर जिसका अक्षत शरीर दिख रहा था ऐसे नलकूबरको वह समझाकर स्त्रीके पास ले गया ॥१४८॥


अनेनैव समं भर्त्रा भुङ्क्ष्व भोगान् यथेप्सितान् । कामवस्तुनि को भेदो मम वास्य च भोजने ॥१४९॥

अर्थ: और कहा कि इस भर्ताके साथ मनचाहे भोग भोगो। काम-सेवनके विषयमें मेरे और इसके साथ उपभोगमें विशेषता ही क्या है ? ॥१४९॥


मलीमसा च मे कीर्तिः कर्मेदं कुर्वतो भवेत् । अपरोऽपि जनः कर्म कुर्वीतेदं मया कृतम् ॥१५०॥

अर्थ: इस कार्यके करनेसे मेरी कीर्ति मलिन हो जायेगी और मैंने यह कार्य किया है इसलिए दूसरे लोग भी यह कार्य करने लग जावेंगे ॥१५०॥


सुताकाशध्वजस्यासि संभूता विमले कुले । संजाता मृदुकान्तायां शीलं रक्षितुमर्हसि ॥१५१॥

अर्थ: तुम राजा आकाशध्वज और मृदुकान्ताकी पुत्री हो, निर्मल कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है अतः शीलकी रक्षा करना ही योग्य है ॥१५१॥


उच्यमानेति सा तेन नितान्तं त्रपयान्विता । स्वभर्तरि भृशं चक्रे मानसं प्रतिबोधिनी ॥१५२॥

अर्थ: रावणके ऐसा कहनेपर वह अत्यधिक लज्जित हुई और प्रतिबोधको प्राप्त हो अपने पतिमें ही सन्तुष्ट हो गयी ॥१५२॥


व्यभिचारमविज्ञाय कान्ताया नलकूबरः । रेमे तया समं प्राप्तः संमानं दशवक्त्रतः ॥१५३॥

अर्थ: इधर नलकूबरको अपनी स्त्रीके व्यभिचारका पता नहीं चला इसलिए रावणसे सम्मान प्राप्त कर वह पूर्ववत् उसके साथ रमण करने लगा ॥१५३॥


रावणः संयुगे लब्ध्वा परध्वंसात्परं यशः । वर्धमानश्रिया प्राप विजयार्धगिरेर्महीम् ॥१५४॥

अर्थ: तदनन्तर रावण युद्धमें शत्रुके संहारसे परम यशको प्राप्त करता हुआ बढ़ती हुई लक्ष्मीके साथ विजयार्ध गिरिकी भूमिमें पहुँचा ॥१५४॥


अभ्यर्णं रावणं श्रुत्वा शक्रः प्रचलितुं ततः । देवानास्थानसंप्राप्तान् समस्तानिदमभ्यधात् ॥१५५॥

अर्थ: अथानन्तर इन्द्रने रावणको निकट आया सुन सभामण्डपमें स्थित समस्त देवोंसे कहा ॥१५५॥


वस्वश्विप्रमुखा देवाः संनह्यत किमासताम् । विश्रब्धं कुरुत प्राप्तः प्रभुरेष स रक्षसाम् ॥१५६॥

अर्थ: कि हे वस्वश्वि आदि देव जनो ! युद्धकी तैयारी करो, आप लोग निश्चिन्त क्यों बैठो हो ? यह राक्षसोंका स्वामी रावण यहाँ आ पहुँचा है ॥१५६॥


इत्युक्त्वा जैनकोद्देशं संप्रधारयितुं ययौ । उपविष्टो नमस्कृत्य धरण्यां विनयान्वितः ॥१५७॥

अर्थ: इतना कहकर इन्द्र पितासे सलाह करनेके लिए उसके स्थानपर गया और नमस्कार कर विनय-पूर्वक पृथिवीपर बैठ गया ॥१५७॥


उवाच च विधातव्यं किमस्मिन्नन्तरे मया । प्रबलोऽयमरिः प्राप्तो बहुशो विजिताहितः ॥१५८॥

अर्थ: उसने कहा कि इस अवसरपर मुझे क्या करना चाहिए । जिसे मैंने अनेक बार पराजित किया पुनः स्थापित किया ऐसा यह शत्रु अब प्रबल होकर यहाँ आया है ॥१५८॥


आत्मकार्यविरुद्धोऽयं तातात्यन्तं मया कृतः । अनयः स्वल्प एवासौ प्रलयं यन्न लम्भितः ॥१५९॥

अर्थ: हे तात ! मैंने आत्म कार्यके विरुद्ध यह बड़ी अनीति की है कि जब यह शत्रु छोटा था तभी इसे नष्ट नहीं कर दिया ॥१५९॥


उत्तिष्ठतो मुखं भङ्क्तुमधरेणापि शक्यते । कण्टकस्यापि यत्नेन परिणाममुपेयुषः ॥१६०॥

अर्थ: उठते हुए कण्टकका मुख एक साधारण व्यक्ति भी तोड़ सकता है पर जब वही कण्टक परिपक्व हो जाता है तब बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है ॥१६०॥


उत्पत्तावेव रोगस्य क्रियते ध्वंसनं सुखम् । व्यापी तु बद्धमूलः स्यादूर्ध्वं स क्षेत्रियोऽथवा ॥१६१॥

अर्थ: जब रोग उत्पन्न होता है तब उसका सुखसे विनाश किया जाता है पर जब वह रोग जड़ बाँधकर व्याप्त हो जाता है तब मरनेके बाद ही उसका प्रतिकार हो सकता है ॥१६१॥


अनेकशः कृतोद्योगस्तस्यास्मि विनिपातने । निवारितस्त्वया व्यर्थं येन क्षान्तिर्मया कृता ॥१६२॥

अर्थ: मैंने अनेक बार उसके नष्ट करनेका उद्योग किया पर आपके द्वारा रोक दिया गया। आपने व्यर्थ ही मुझे क्षमा धारण करायी ॥१६२॥


नयमार्गं प्रपन्नेन मयेदं तात भाष्यते । मर्यादैषेति पृष्टोऽसि न त्वशक्तोऽस्मि तद्वधे ॥१६३॥

अर्थ: हे तात ! नीतिमार्गका अनुसरण कर ही मैं यह कह रहा हूँ । बड़ोंसे पूछकर कार्य करना यह कुलकी मर्यादा है और इसलिए ही मैंने आपसे पूछा है । मैं उसके मारनेमें असमर्थ नहीं हूँ ॥१६३॥


स्मयरोषविमिश्रं तच्छ्रुत्वा वाक्यं सुतेरितम् । सहस्रारोऽगदत् पुत्र त्वरावानिति मा स्म भूः ॥१६४॥

अर्थ: अहंकार और क्रोधसे मिश्रित पुत्रके वचन सुनकर सहस्रारने कहा कि हे पुत्र ! इस तरह उतावला मत हो ॥१६४॥


तावद्विमृश्य कार्याणि प्रवरैर्मन्त्रिभिः सह । जायते विफलं कर्मप्रेक्षापूर्वकारिणाम् ॥१६५॥

अर्थ: पहले उत्तम मन्त्रियोंके साथ सलाह कर क्योंकि बिना विचारे कार्य करनेवालोंका कार्य निष्फल हो जाता है ॥१६५॥


भवत्यर्थस्य संसिद्धयै केवलं च न पौरुषम् । कर्षकस्य विना वृष्ट्या का सिद्धिः कर्मयोगिनः ॥१६६॥

अर्थ: केवल पुरुषार्थ ही कार्यसिद्धिका कारण नहीं है क्योंकि निरन्तर कार्य करनेवाले - पुरुषार्थी किसानके वर्षाके बिना क्या सिद्ध हो सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं ॥१६६॥


समानमहिमानानां पठतां च समादरम् । अर्थभाजो भवन्त्येके नापरे कर्मणां वशात् ॥१६७॥

अर्थ: एक ही समान पुरुषार्थ करनेवाले और एक ही समान आदरसे पढ़नेवाले छात्रोंमें-से कुछ तो सफल हो जाते हैं और कुछ कर्मोंकी विवशतासे सफल नहीं हो पाते ॥१६७॥


एवं गतेऽपि संधानं रावणेन समं कुरु । तस्मिन् सति जगत्सर्वं विधत्स्वोद्धृतकण्टकम् ॥१६८॥

अर्थ: ऐसी स्थिति आनेपर भी तुम रावणके साथ सन्धि कर लो क्योंकि सन्धिके होनेपर तुम समस्त संसारको निष्कण्टक बना सकते हो ॥१६८॥


रूपिणीं च सुतां तस्मै यच्छ रूपवतीं सुताम् । एवं सति न दोषोऽस्ति तथावस्था च राजताम् ॥१६९॥

अर्थ: साथ ही तू रूपवती नामकी अपनी सुन्दरी पुत्री रावणके लिए दे दे। ऐसा करनेमें कुछ भी दोष नहीं है। बल्कि ऐसा करनेसे तेरी यही दशा बनी रहेगी ॥१६९॥


विविक्तधिषणेनासाविति पित्रा प्रचोदितः । रोषराशिवशोदारशोणचक्षुः क्षणादभूत् ॥१७०॥

अर्थ: पवित्र बुद्धिके धारक पिताने इस प्रकार इन्द्रको समझाया अवश्य परन्तु क्रोधके समूहके कारण उसके नेत्र क्षण-भरमें लाल-लाल हो गये ॥१७०॥


रोषज्वलनसंतापसंजातस्वेदसंततिः । बभाण भासुरः शक्रः स्फोटयन्निव खं गिरा ॥१७१॥

वध्यस्य दीयते कन्येत्येतत्तात क्व युज्यते । प्रकृष्टवयसां पुंसां धीर्यात्येवाथवा क्षयम् ॥१७२॥

अर्थ: क्रोधाग्निके सन्तापसे जिसके शरीरमें पसीनेकी परम्परा उत्पन्न हो गयी थी ऐसा देदीप्यमान इन्द्र अपनी वाणीसे मानो आकाशको फोड़ता हुआ बोला कि हे तात ! जो वध करने योग्य है उसीके लिए कन्या दी जावे यह कहाँ तक उचित है ? अथवा वृद्ध पुरुषोंकी बुद्धि क्षीण हो ही जाती है ॥१७१-१७२॥


वद केनाधरस्तस्मादहं जनक वस्तुना । अत्यन्तकातरं वाक्यं येनेदं भाषितं त्वया ॥१७३॥

अर्थ: हे तात ! कहो तो सही मैं किस वस्तुमें उससे हीन हूँ ? जिससे आपने यह अत्यन्त दीन वचन कहे हैं ॥१७३॥


रवेरपि कृतस्पर्शः पादैर्मूर्ध्नाति खिद्यते । योगे स कथमन्यस्य तुङ्गः प्रणतिमाचरेत् ॥१७४॥

अर्थ: जो मस्तकपर सूर्यकी किरणोंका स्पर्श होनेपर भी अत्यन्त खेदखिन्न हो जाता है वह उदार मानव मिलनेपर अन्य पुरुषके लिए प्रणाम किस प्रकार करेगा ? ॥१७४॥


पौरुषेणाधिकस्तावदेतस्मान्नितरामहम् । दैवं तस्यानुकूलं ते कथं बुद्धाववस्थितम् ॥१७५॥

अर्थ: मैं पुरुषार्थकी अपेक्षा रावणसे हर एक बातमें अधिक हूँ फिर आपकी बुद्धिमें यह बात कैसे बैठ गयी कि भाग्य उसके अनुकूल है ? ॥१७५॥


विजिता बहवोऽनेन विपक्षा इति चेन्मतिः । हतानेककुरङ्गं किं शबरो हन्ति नो हरिम् ॥१७६॥

अर्थ: यदि आपका यह ख्याल है कि इसने अनेक शत्रुओंको जीता है तो अनेक हरिणोंको मारनेवाले सिंहको क्या एक भील नहीं मार देता ? ॥१७६॥


संग्रामे शस्त्रसंपातजातज्वलनजालके । वरं प्राणपरित्यागो न तु प्रतिनरानतिः ॥१७७॥

अर्थ: शस्त्रोंके प्रहारसे जहाँ ज्वालाओंके समूह उत्पन्न हो रहे हैं ऐसे युद्धमें प्राणत्याग करना भी अच्छा है पर शत्रुके लिए नमस्कार करना अच्छा नहीं है ॥१७७॥


सोऽयमिन्द्रो दशास्यस्य राक्षसस्यानतिं गतः । इति लोके च हास्यत्वं न दृष्टं मे कथं त्वया ॥१७८॥

अर्थ: ‘वह इन्द्र रावण राक्षसके सामने नम्र हो गया’ इस तरह लोकमें जो मेरी हँसी होगी उस ओर भी आपने दृष्टि क्यों नहीं दी ? ॥१७८॥ ’


नभश्चरत्वसामान्यं न च संधानकारणम् । वनगोचरसामान्यं यथा सिंहशृगालयोः ॥१७९॥

अर्थ: ’ वह विद्याधर है और मैं भी विद्याधर हूँ’ इस प्रकार विद्याधरपनाकी समानता सन्धिका कारण नहीं हो सकती । जिस प्रकार सिंह और शृगालमें वनचारित्वकी समानता होनेपर भी एकता नहीं होती है उसी प्रकार विद्याधरपनाकी समानता होनेपर भी हम दोनोंमें एकता नहीं हो सकती ॥१७९॥


इति ब्रुवत एवास्य शब्दः पूरितविष्टपः । प्रविष्टः श्रोत्रयोः शत्रुबलजो वासरानने ॥१८०॥

अर्थ: इस प्रकार प्रातःकालके समय इन्द्र पिताके समक्ष कह रहा था कि उसी समय समस्त संसारको व्याप्त करनेवाला शत्रुसेनाका जोरदार शब्द उसके कानोंमें प्रविष्ट हुआ ॥१८०॥


ततोऽपकर्णनं कृत्वा पितुः संनाहमण्डपम् । गत्वा संनाहसंज्ञार्थं तूर्यं तारमवीवदत् ॥१८१॥

अर्थ: तदनन्तर पिताकी बात अनसुनी कर वह आयुधशालामें गया और वहाँ युद्धकी तैयारीका संकेत करनेके लिए उसने जोरसे तुरही बजवायी ॥१८१॥


उपाहर गजं शीघ्रं सप्तिं पर्याणय द्रुतम् । मण्डलाग्रमितो देहि पटु चाहर कङ्कटम् ॥१८२॥

धनुराहर धावस्व शिरस्त्राणमितः कुरु । यच्छार्धबाहुकां क्षिप्रं देहि सायकपुत्रिकाम् ॥१८३॥

चेट यच्छ सैमायोगं सज्जमाशु रथं कुरु । एवमादि कृतारावैः सुरलोकश्चलोऽभवत् ॥१८४॥

अर्थ: ‘हाथी शीघ्र लाओ, घोड़ापर शीघ्र ही पलान बाँधो, तलवार यहाँ देओ, अच्छा-सा कवच लाओ, दौड़कर धनुष लाओ, सिरकी रक्षा करनेवाला टोप इधर बढ़ाओ, हाथपर बाँधनेकी पट्टी शीघ्र देओ, छुरी भी जल्दी देओ, अरे चेट, घोड़े जोत और रथको तैयार करो’ इत्यादि शब्द करते हुए देव नामधारी विद्याधर इधर-उधर चलने लगे ॥१८२-१८४॥


अथ क्षुब्धेषु वीरेषु रटत्सु पटहेषु च । तुङ्गं रणत्सु शङ्खेषु सान्द्रं गर्जत्सु दन्तिषु ॥१८५॥

मुञ्चत्सु दीर्घहुङ्कारं स्पृष्टवेत्रेषु सप्तिषु । संक्रीडत्सु रथौघेषु ज्याजाले पटु गुञ्जति ॥१८६॥

भटानामट्टहासेन जयशब्देन वादिनाम् । अभूत्तदा जगत्सर्वं शब्देनेव विनिर्मितम् ॥१८७॥

अर्थ: अथानन्तर - जब वीर सैनिक क्षुभित हो रहे थे, बाजे बज रहे थे, शंख जोरदार शब्द कर रहे थे, हाथी बार-बार चिंघाड़ रहे थे, बेंतके छूते ही घोड़े दीर्घ हुंकार छोड़ रहे थे, रथोंके समूह चल रहे थे और प्रत्यंचाओंके समूह जोरदार गुंजन कर रहे थे, तब योद्धाओंके अट्टहास और चारणोंके जयजयकारसे समस्त संसार ऐसा हो गया था मानो शब्दसे निर्मित हो ॥१८५-१८७॥


असिभिस्तोमरैः पाशैर्ध्वजैश्छत्रैः शरासनैः । ककुभश्छादिताः सर्वाः प्रभावोऽपहृतो रवेः ॥१८८॥

अर्थ: तलवारों, तोमरों, पाशों, ध्वजाओं, छत्रों और धनुषोंसे समस्त दिशाएँ आच्छादित हो गयीं और सूर्यका प्रभाव जाता रहा ॥१८८॥


निष्क्रान्ताश्च सुसंनद्धाः सुरा रभसरागिणः । गोपुरे कृतसंघट्टा घण्टाभिर्वरदन्तिनाम् ॥१८९॥

अर्थ: शीघ्रताके प्रेमी देव तैयार हो-हो कर बाहर निकल पड़े और हाथियोंके घण्टाओंके शब्द सुन-सुनकर गोपुरके समीप धक्कम-धक्का करने लगे ॥१८९॥


स्यन्दनं परतो धेहि प्राप्तोऽयं मत्तवारणः । आधोरण गजं देशादस्मात्सारय सत्वरम् ॥१९०॥

स्तम्भितोऽसीह किं सादिन्नयाश्वं द्रुतमग्रतः । मुञ्च मुग्धे निवर्तस्व कुरु मां मा समाकुलम् ॥१९१॥

एवमादिसमालापाः सत्वरा मन्दिरात् सुराः । निष्क्रान्ता गर्वनिर्मुक्तशुभारभटगर्जिताः ॥१९२॥

अर्थ: ‘रथको उधर खड़ा करो, इधर यह मदोन्मत्त हाथी आ रहा है । अरे महावत ! हाथीको यहाँसे शीघ्र ही हटा । अरे सवार ! यहीं क्यों रुक गया ? शीघ्र ही घोड़ा आगे ले जा । अरी मुग्धे ! मुझे छोड़ तू लौट जा, व्यर्थ ही मुझे व्याकुल मत कर’ इत्यादि वार्तालाप करते हुए शीघ्रतासे भरे देव, अपने-अपने मकानोंसे बाहर निकल पड़े । उस समय वे अहंकारके कारण शुभ गर्जना कर रहे थे ॥१९०-१९२॥


आलीने च यथा जातप्रतिपक्षं चमूमुखे । विषमाहततूर्येण परमुत्साहमाहृते ॥१९३॥

ततो राक्षससैन्यस्य मुखभङ्गः कृतः सुरैः । मुञ्चद्भिः शस्त्रसंघातमन्तर्हितनभस्तलम् ॥१९४॥

अर्थ: कभी धीमी और कभी जोरसे बजायी हुई तुरहीसे जिसका उत्साह बढ़ रहा था ऐसी सेना जब शत्रुके सम्मुख जाकर यथास्थान खड़ी हो गयी तब आकाशको आच्छादित करनेवाले शस्त्रसमूहको छोड़ते हुए देवोंने राक्षसोंकी सेनाका मुख भंग कर दिया अर्थात् उसके अग्र भागपर जोरदार प्रहार किया ॥१९३-१९४॥


सेनामुखावसादेन कुपिता राक्षसास्ततः । अध्यूषुः पृतनावक्त्रं निजमूर्जितविक्रमाः ॥१९५॥

अर्थ: सेनाके अग्रभागका विनाश देख प्रबल पराक्रमके धारक राक्षस कुपित हो अपनी सेनाके आगे आ डटे ॥१९५॥


वज्रवेगः प्रहस्तोऽथ हस्तो मारीच उद्भवः । वज्रवक्त्रः शुको घोरः सारणो गगनोज्ज्वलः ॥१९६॥

महाजठरसंध्याभ्रक्रूरप्रभृतयस्तथा । सुसंनद्धाः सुयानाश्च सुशस्त्राश्च पुरःस्थिताः ॥१९७॥

अर्थ: वज्रवेग, प्रहस्त, हस्त, मारीच, उद्भव, वज्रमुख, शुक, घोर, सारण, गगनोज्ज्वल, महाजठर, सन्ध्याभ्र और क्रूर आदि राक्षस आ-आकर सेनाके सामने खड़े हो गये । ये सभी राक्षस कवच आदिसे युक्त थे, उत्तमोत्तम सवारियोंपर आरूढ़ थे और अच्छे-अच्छे शस्त्रोंसे युक्त थे ॥१९६-१९७॥


ततस्तैरुत्थितैः सैन्यं सुराणां क्षणमात्रतः । कृतं विहतवित्रस्तशस्त्रसंगतशत्रुकम् ॥१९८॥

अर्थ: तदनन्तर इन उद्यमी राक्षसोंने देवोंकी सेनाको क्षणमात्रमें मारकर भयभीत कर दिया । उसके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्र शत्रुओंके हाथ लगे ॥१९८॥


भज्यमानं ततः सैन्यवक्त्रं दृष्ट्वा महासुराः । उत्थिता योद्धुमत्युग्रकोपापूरितविग्रहाः ॥१९९॥

अर्थ: तब अपनी सेनाके अग्रभागको नष्ट होता देख बड़े-बड़े देव युद्ध करनेके लिए उठे । उस समय उन सबके शरीर अत्यन्त तीव्र क्रोधसे भर रहे थे ॥१९९॥


मेघमाली तडित्पिङ्गो ज्वलिताक्षोऽरिसंज्वरः । पावकस्यन्दनाद्याश्च सुराः प्रकटतां ययुः ॥२००॥

अर्थ: मेघमाली, तडित्पिंग, ज्वलिताक्ष, अरिसंज्वर और अग्निरथ आदि देव सामने आये ॥२००॥


उत्थाय राक्षसास्तैस्ते मुञ्चद्भिः शस्त्रसंहतिम् । अवष्टब्धाः समुद्भूततीव्रकोपातिमासुरैः ॥२०१॥

अर्थ: जो शस्त्रोंके समूहकी वर्षा कर रहे थे और उत्पन्न हुए तीव्र क्रोधसे अतिशय देदीप्यमान थे ऐसे देवोंने उठकर राक्षसोंको रोका ॥२०१॥


ततो भङ्गं परिप्राप्ताश्चिरं कृतमहाहवाः । प्रत्येकं राक्षसा देवैर्बहुभिः कृतवेष्टनाः ॥२०२॥

अर्थ: तदनन्तर चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद राक्षस भंगको प्राप्त हुए । एक-एक राक्षसको बहुत-से देवोंने घेर लिया ॥२०२॥


आवर्तेष्विव निक्षिप्ता राक्षसा वेगशालिषु । बभ्रमुर्विगलच्छस्त्रशिथिलस्थितपाणयः ॥२०३॥

अर्थ: वेगशाली भँवरोंमें पड़े हुएके समान राक्षस इधर-उधर घूम रहे थे तथा उनके ढीले हाथोंसे शस्त्र छूट-छूटकर नीचे गिर रहे थे ॥२०३॥


परावृत्तास्तथाप्यन्ये राक्षसा मानशालिनः । प्राणानभिमुखीभूता मुञ्चन्ति न तु सायकान् ॥२०४॥

अर्थ: कितने ही राक्षस युद्धसे पराङ्मुख हो गये पर जो अभिमानी राक्षस थे वे सामने आकर प्राण तो छोड़ रहे थे पर उन्होंने शस्त्र नहीं छोड़े ॥२०४॥


ततोऽवसादनाद् भग्नं दृष्ट्वा तद्रक्षसां बलम् । सूनुर्महेन्द्रसेनस्य कपिकेतोर्महाबलः ॥२०५॥

दक्षः प्रसन्नकीर्त्याख्यां धारयन्नर्थसंगताम् । त्रासयन् द्विषतां सैन्यं जन्यस्य शिरसि स्थितम् ॥२०६॥

अर्थ: तदनन्तर देवोंकी विकट मारसे राक्षसोंकी सेनाको नष्ट होता देख वानरवंशी राजा महेन्द्रका महाबलवान् पुत्र, जो कि अत्यन्त चतुर था और प्रसन्नकीर्ति इस सार्थक नामको धारण करता था, युद्धके अग्रभागमें स्थित शत्रुओंकी सेनाको भयभीत करता हुआ सामने आया ॥२०५-२०६॥


रक्षता बलमात्मीयं तेन तत्रेदृशं बलम् । शूरैः पराङ्मुखं चक्रे निष्क्रामद्भिरनन्तरम् ॥२०७॥

अर्थ: अपनी सेनाकी रक्षा करते हुए उसने निरन्तर निकलनेवाले बाणोंसे शत्रुकी सेनाको पराङ्मुख कर दिया ॥२०७॥


अतिमात्रं ततो भूरि विजयार्धनिवासिनाम् । सैन्यं प्राप्तं महोत्साहं नानाशस्त्रसमुज्ज्वलम् ॥२०८॥

अर्थ: विजयार्ध पर्वतपर रहनेवाले देवोंकी जो सेना नाना प्रकारके शस्त्रोंसे देदीप्यमान थी वह प्रथम तो प्रसन्नकीर्तिसे अत्यधिक महान् उत्साहको प्राप्त हुई ॥२०८॥


दृष्ट्वैव कपिलक्ष्मास्य ध्वजे छत्रे च भीषणम् । अवाप मानसे भेदं विजयार्धाद्रिजं बलम् ॥२०९॥

अर्थ: पर उसके बाद ही जब उसने उसकी ध्वजा और छत्रमें वानरका चिह्न देखा तो उसका मन टूक-टूक हो गया ॥२०९॥


तत्तेन विशिखैः पश्चात्स्फुरत्तेजःशिखैः क्षणात् । भिन्नं कुतीर्थहृदयं यथा मन्मथविभ्रमैः ॥२१०॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार कामके बाणोंसे कुगुरुका हृदय खण्डित हो जाता है उसी प्रकार जिनसे अग्निकी देदीप्यमान शिखा निकल रही थी ऐसे प्रसन्नकीर्तिके बाणोंसे देवोंकी सेना खण्डित हो गयी ॥२१०॥


ततोऽन्यदपि संप्राप्तं सैन्यं त्रिदशगोचरम् । कनकासिगदाशक्तिचापमुद्गरसंकुलम् ॥२११॥

अर्थ: तदनन्तर देवोंकी और दूसरी सेना सामने आयी। वह सेना कनक, तलवार, गदा, शक्ति, धनुष और मुद्गर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त थी ॥२११॥


ततोऽन्तराल एवातिवीरो माल्यवतः सुतः । श्रीमालीति प्रतीतात्मा पुरोऽस्य समवस्थितः ॥२१२॥

अर्थ: तत्पश्चात् माल्यवान्‌का पुत्र श्रीमाली जो अत्यन्त वीर और निःशंक हृदयवाला था देवोंकी सेनाके आगे खड़ा हो गया ॥२१२॥


तेन ते क्षणमात्रेण सुराः सूर्यसमत्विषा । क्व नीता इति न ज्ञाता मुञ्चता शरसंहतीः ॥२१३॥

अर्थ: जिसकी सूर्यके समान कान्ति थी तथा जो निरन्तर बाणोंका समूह छोड़ रहा था ऐसे श्रीमालीने देवोंको क्षणमात्रमें कहाँ भेज दिया इसका पता नहीं चला ॥२१३॥


दृष्ट्वा तमभ्यमित्रीणमनिवार्यरयं ततः । क्षोभयन्तं द्विषां सैन्यं महाग्राहमिवार्णवम् ॥२१४॥

मत्तद्विपेन्द्रसंघट्टघटितारातिमण्डलम् । करवालकरोदारमटमण्डलमध्यगम् ॥२१५॥

अमी समुत्थिता देवा निजं पालयितुं बलम् । महाक्रोधपरीताङ्गाः समुल्लासितहेतयः ॥२१६॥

अर्थ: तदनन्तर जो शत्रुपक्षकी ओरसे सामने खड़ा था, जिसका वेग अनिवार्य था, जो शत्रुओंकी सेनाको इस तरह क्षोभयुक्त कर रहा था जिस प्रकार कि महाग्राह किसी समुद्रको क्षोभयुक्त करता है, जो अपना मदोन्मत्त हाथी शत्रुओंकी सेनापर हूल रहा था और जो तलवार हाथमें लिये उद्दण्ड योद्धाओंके बीचमें घूम रहा था ऐसे श्रीमालीको देखकर देव लोग अपनी सेनाकी रक्षा करनेके लिए उठे। उस समय उन सबके शरीर बहुत भारी क्रोधसे व्याप्त थे तथा उनके हाथोंमें अनेक शस्त्र चमक रहे थे ॥२१४-२१६॥


शिखिकेशरिदण्डोग्रकनकप्रवरादयः । छादयन्तो नभो दूरं प्रावृषेण्या इवाम्बुदाः ॥२१७॥

अर्थ: शिखी, केशरी, दण्ड, उग्र, कनक, प्रवर आदि इन्द्रके योद्धाओंने आकाशको दूर तक ऐसा आच्छादित कर लिया जैसा कि वर्षाऋतुके मेघ आच्छादित कर लेते हैं ॥२१७॥


स्वस्त्रीयाश्च सुरेन्द्रस्य मृगचिह्नादयोऽधिकम् । दीप्यमाना रणोद्भूततेजसा सुमहाबलाः ॥२१८॥

अर्थ: इनके सिवाय मृगचिह्न आदि इन्द्रके भानेज भी जो कि रणसे समुत्पन्न तेजके द्वारा अत्यधिक देदीप्यमान और महाबलवान् थे, आकाशको दूर-दूर तक आच्छादित कर रहे थे ॥२१८॥


ततः श्रीमालिना तेषां शिरोभिः कमलैरिव । सशैवलैर्मही छन्ना छिन्नैश्चन्द्रार्धसायकैः ॥२१९॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीमालीने अपने अर्द्धचन्द्राकार बाणोंसे काटे हुए उनके सिरोंसे पृथिवीको इस प्रकार ढक दिया मानो शेवाल-सहित कमलोंसे ही ढक दिया हो ॥२१९॥


अचिन्तयत्ततः शक्रो येनैते नरपुङ्गवाः । कुमाराः क्षयमानीताः सममेभिर्वरैः सुरैः ॥२२०॥

तस्यास्य को रणे स्थातुं पुरो वाञ्छेद्दिवौकसाम् । राक्षसस्य [ महातेजो दुरीक्ष्यस्यातिवीर्यवान् ॥२२१॥

तस्मादस्य स्वयं युद्धश्रद्धाध्वंसं करोम्यहम् । अपरानमरान् यावन्नयते नैष पञ्चताम् ॥२२२॥

अर्थ: अथानन्तर इन्द्रने विचार किया कि जिसने इन श्रेष्ठ देवोंके साथ-साथ इन नरश्रेष्ठ राजकुमारोंका क्षय कर दिया है तथा अपने विशाल तेजसे जिसकी ओर आँख उठाना भी कठिन है ऐसे इस राक्षसके आगे युद्धमें देवोंके बीच ऐसा कौन है जो सामने खड़ा होनेकी भी इच्छा कर सके ? इसलिए जब तक यह दूसरे देवोंको नहीं मारता है उसके पहले ही मैं स्वयं इसके युद्धकी श्रद्धाका नाश कर देता हूँ ॥२२०-२२२॥


इति ध्यात्वा समाश्वास्य] बलं स त्रासकम्पितम् । योद्धुं समुद्यतो यावत्त्रिदशानामधीश्वरः ॥२२३॥

निपत्य पादयोस्तावज्जानुस्पृष्टमहीतलः । तमुवाच महावीरो जयन्त इति विश्रुतः ॥२२४॥

सत्येव मयि देवेन्द्र करोषि यदि संयुगम् । ततो भवत्कृतं जन्म त्वया मम निरर्थकम् ॥२२५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर देवोंका स्वामी इन्द्र भयसे काँपती हुई सेवाको सान्त्वना देकर ज्योंही युद्धके लिए उठा त्योंही उसका महाबलवान् जयन्त नामका पुत्र चरणोंमें गिरकर तथा पृथिवीपर घुटने टेककर कहने लगा कि हे देवेन्द्र ! यदि मेरे रहते हुए आप युद्ध करते हैं तो आपसे जो मेरा जन्म हुआ है वह निरर्थक है ॥२२३-२२५॥


बालकोऽङ्के भजन्क्रीडां पुत्रप्रीत्या यदीक्षितः । स्नेहस्यानृण्यमेतस्य जनयामि तवाधुना ॥२२६॥

अर्थ: जब मैं बाल्य अवस्थामें आपकी गोदमें क्रीड़ा करता था और आप पुत्रके स्नेहसे बार-बार मेरी ओर देखते थे आज मैं उस स्नेहका बदला चुकाना चाहता हूँ, उस ऋणसे मुक्त होना चाहता हूँ ॥२२६॥


स त्वं निराकुलो भूत्वा तिष्ठ तात यथेप्सितम् । शत्रून् क्षणेन निःशेषानयं व्यापादयाम्यहम् ॥२२७॥

अर्थ: इसलिए हे तात ! आप निराकुल होकर घरपर रहिए । मैं क्षण-भरमें समस्त शत्रुओंका नाश कर डालता हूँ ॥२२७॥


नखेन प्राप्यते छेदं वस्तु यत्स्वल्पयत्नतः । व्यापारः परशोस्तत्र ननु तात निरर्थकः ॥२२८॥

अर्थ: हे तात ! जो वस्तु थोड़े ही प्रयत्नसे नखके द्वारा छेदी जा सकती है वहाँ परशुका चलाना व्यर्थ ही है ॥२२८॥


वारयित्वेत्यसौ तातं संयुगाय समुद्यतः । कोपावेशाच्छरीरेण ग्रसमान इवाम्बरम् ॥२२९॥

अर्थ: इस प्रकार पिताको मनाकर जयन्त युद्धके लिए उद्यत हुआ । उस समय वह क्रोधावेशसे ऐसा जान पड़ता था मानो शरीरके द्वारा आकाशको ही ग्रस रहा हो ॥२२९॥


प्रतिश्रीमालि चायासीदायासपरिवर्जितः । गुप्तः पवनवेगेन सैन्येनोज्ज्वलहेतिना ॥२३०॥

अर्थ: पवनके समान वेगशाली एवं देदीप्यमान शस्त्रोंको धारण करनेवाली सेना जिसकी रक्षा कर रही थी ऐसा जयन्त बिना किसी खेदके सहज ही श्रीमालीके सम्मुख आया ॥२३०॥


श्रीमाली चापि संप्राप्तं चिराद्योग्यं प्रतिद्विषम् । दृष्ट्वा तुष्टो दधावास्य संमुखं सैन्यमध्यगः ॥२३१॥

अर्थ: श्रीमाली चिर काल बाद रणके योग्य शत्रुको आया देख बहुत सन्तुष्ट हुआ और सेनाके बीच गमन करता हुआ उसकी ओर दौड़ा ॥२३१॥


अमुञ्चतां ततः क्रुद्धौ शरासारं परस्परम् । कुमारौ सतताकृष्टदृष्टकोदण्डमण्डलौ ॥२३२॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके धनुर्मण्डल निरन्तर खिंचते हुए दिखाई देते थे ऐसे क्रोधसे भरे दोनों कुमारोंने एक दूसरेपर बाणोंकी वर्षा छोड़ी ॥२३२॥


तयोः कुमारयोर्युद्धं निश्चलं पृतनाद्वयम् । ददर्श विस्मयप्राप्तमानसं रेखया स्थितम् ॥२३३॥

अर्थ: जिनका चित्त आश्चर्यसे भर रहा था और जो अपनी-अपनी रेखाओंपर खड़ी थीं ऐसी दोनों ओरकी सेनाएँ निश्चल होकर उन दोनों कुमारोंका युद्ध देख रही थीं ॥२३३॥


कनकेन ततो भित्त्वा जयन्तो विरथीकृतः । श्रीमालिना स्वसैन्यस्य कुर्वता संमदं परम् ॥२३४॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी सेनाको हर्षित करते हुए श्रीमालीने कनक नामक हथियारसे जयन्तका रथ तोड़कर रथरहित कर दिया ॥२३४॥


मूर्च्छया पतिते तस्मिन् स्ववर्गस्यापतन्मनः । मूर्च्छायाश्च परित्यागादुत्थिते पुनरुत्थितम् ॥२३५॥

अर्थ: जयन्त मूर्च्छासे नीचे गिर पड़ा सो उसे गिरा देख उसकी सेनाका मन भी गिर गया और मूर्च्छा दूर होनेपर जब वह उठा तो सेनाका मन भी उठ गया ॥२३५॥


आहत्य भिण्डिमालेन जयन्तेन ततः कृतः । श्रीमाली विरथो रोषात्प्रहारेणातिवर्द्धितात् ॥२३६॥

अर्थ: तदनन्तर जयन्तने भिण्डिमाल नामक शस्त्र चलाकर श्रीमालीको रथरहित कर दिया और अत्यन्त बढ़े हुए क्रोधसे ऐसा प्रहार किया कि वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥२३६॥


ततः परबले तोषनिर्घोषो निर्गतो महान् । निजे च यातुधानस्य समाक्रन्दध्वनिर्बले ॥२३७॥

अर्थ: तब शत्रुसेनामें बड़ा भारी हर्षनाद हुआ और इधर राक्षसोंकी सेनामें रुदन शब्द सुनाई पड़ने लगा ॥२३७॥


गतमूर्च्छस्तु संक्रुद्धः श्रीमाली भृशभीषणः । किरन् प्रहरणव्रातं जयन्ताभिमुखो ययौ ॥२३८॥

अर्थ: जब मूर्च्छा दूर हुई तब श्रीमाली अत्यन्त कुपित हो शस्त्रसमूहकी वर्षा करता हुआ जयन्तके सम्मुख गया । उस समय वह अत्यन्त भयंकर दिखाई देता था ॥२३८॥


मुञ्चन्तौ हेतिजालं तौ कुमारौ रेजतुस्तराम् । सिंहार्भकाविवोद्धूतदीप्तकेसरसंचयौ ॥२३९॥

अर्थ: शस्त्रसमूहको छोड़ते हुए दोनों कुमार ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनकी चमकीली सटाओंका समूह उड़ रहा था ऐसे सिंहके दो बालक ही हों ॥२३९॥


ततो माल्यवतः पुत्रः सुरराजस्य सूनुना । स्तनान्तरे हतो गाढं गदया पतितो भुवि ॥२४०॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रके पुत्र जयन्तने माल्यवान्के पुत्र श्रीमालीके वक्षःस्थलपर गदाका ऐसा प्रहार किया कि वह पृथिवीपर गिर पड़ा ॥२४०॥


वदनेन ततो रक्तं विमुञ्चन् धरणीं गतः । अस्तंगत इवाभाति कमलाकरबान्धवः ॥२४१॥

अर्थ: मुखसे खूनको छोड़ता पृथिवीपर पड़ा श्रीमाली ऐसा जान पड़ता था मानो अस्त होता हुआ सूर्य ही हो ॥२४१॥


हतश्रीमालिकः प्राप्य रथं वासवनन्दनः । दध्मौ शङ्खं मुदा भीता राक्षसाश्च विदुद्रुवुः ॥२४२॥

अर्थ: श्रीमालीको मारनेके बाद जयन्तने रथपर सवार हो हर्षसे शंख फूँका जिससे राक्षस भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे ॥२४२॥


माल्यवत्तनयं दृष्ट्वा ततो निर्गतजीवितम् । जयन्तं च सुसन्नद्धं तोषमुक्तभटस्वनम् ॥२४३॥

आश्वासयन्निजं सैन्यं पलायनपरायणम् । इन्द्रजित्संमुखीभूतो जयन्तस्योत्कटो रुषा ॥२४४॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीमालीको निष्प्राण और जिसके योद्धा हर्षनाद कर रहे थे ऐसे जयन्तको आगामी युद्धके लिए तत्पर देख रावणका पुत्र इन्द्रजित् अपनी भागती हुई सेनाको आश्वासन देता हुआ जयन्तके सम्मुख आया । उस समय वह क्रोधसे बड़ा विकट जान पड़ता था ॥२४३-२४४॥


ततोऽभिभवने सक्तं जनानां तं कलिं यथा । जयन्तमिन्द्रजिच्चक्रे जर्जरं वर्मवच्छरैः ॥२४५॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रजित्ने कलिकालकी तरह लोगोंके अनादर करनेमें संलग्न जयन्तको अपने बाणोंसे कवचकी तरह जर्जर कर दिया अर्थात् जिस प्रकार बाणोंसे उसका कवच जर्जर किया था उसी प्रकार उसका शरीर भी जर्जर कर दिया ॥२४५॥


दृष्ट्वा च छिन्नवर्माणं रुधिरारुणविग्रहम् । जयन्तं शरसंघातैः प्राप्तं शैललितुल्यताम् ॥२४६॥

अमरेन्द्रः स्वयं योद्धुमुत्थितश्छादयन्नभः । नीरन्ध्रं वाहनैरुग्रैरायुधैश्च चलत्करैः ॥२४७॥

अर्थ: जिसका कवच टूट गया था, जिसका शरीर खूनसे लाल-लाल हो रहा था और जो गड़े हुए बाणोंसे सेहीकी तुलना प्राप्त कर रहा था ऐसे जयन्तको देखकर इन्द्र स्वयं युद्ध करनेके लिए उठा । उस समय इन्द्र अपने वाहनों और चमकते हुए तीक्ष्ण शस्त्रोंसे नीरन्ध्र आकाशको आच्छादित कर रहा था ॥२४६-२४७॥


अवादीत् सारथिश्चैवं रावणं संमतिश्रुतिः । अयं स देव संप्राप्तः स्वयं नाथो दिवौकसाम् ॥२४८॥

अर्थ: इन्द्रको युद्धके लिए उद्यत देख सन्मति नामक सारथिने रावणसे कहा कि हे देव ! यह देवोंका अधिपति इन्द्र स्वयं ही आया है ॥२४८॥


चक्रेण लोकपालानां परितः कृतपालनः । मत्तैरावतपृष्ठस्थो मौलिरत्नप्रभावृतः ॥२४९॥

पाण्डुरेणोपरिस्थेन छत्रेणावृतभास्करः । क्षुब्धेन सागरेणेव सैन्येन कृतवेष्टनः ॥२५०॥

अर्थ: लोकपालोंका समूह चारों ओरसे इसकी रक्षा कर रहा है, यह मदोन्मत्त ऐरावत हाथीपर सवार है, मुकुटके रत्नोंकी प्रभासे आवृत है, ऊपर लगे हुए सफेद छत्रसे सूर्यको ढक रहा है, तथा क्षोभको प्राप्त हुए महासागरके समान सेनासे घिरा हुआ है ॥२४९-२५०॥


महाबलोऽयमेतस्य कुमारो नोचितो रणे । उद्यच्छ स्वयमेव त्वं जहि शत्रोरहंयुताम् ॥२५१॥

अर्थ: यह चूँकि महाबलवान् है इसलिए कुमार इन्द्रजित् युद्ध करनेके लिए इसके योग्य नहीं है अतः आप स्वयं ही उठिए और शत्रुका अहंकार नष्ट कीजिए ॥२५१॥


ततोऽभिमुखमायान्तं दृष्ट्वाखण्डलमूर्जितम् । संस्मृत्य मालिमरणं श्रीमालिवधदीपितः ॥२५२॥

दृष्ट्वा च शत्रुभिः पुत्रं वेष्ट्यमानं समन्ततः । दधाव रावणः क्रोधाद् रथेनानिलरंहसा ॥२५३॥

मटानाममवद्युद्धमेतयो रोमहर्षणम् । तुमुलं शस्त्रसंघातघनध्वान्तसमावृतम् ॥२५४॥

अर्थ: तदनन्तर बलवान् इन्द्रको सामने आता देख रावण वायुके समान वेगशाली रथसे सामने दौड़ा। उस समय रावण मालीके मरणका स्मरण कर रहा था और अभी हालमें जो श्रीमालीका वध हुआ था उससे देदीप्यमान हो रहा था। उस समय इन दोनों योद्धाओंका रोमांचकारी भयंकर युद्ध हो रहा था। वह युद्ध शस्त्र समुदायसे उत्पन्न सघन अन्धकारसे व्याप्त था। रावणने देखा कि उसका पुत्र इन्द्रजित् सब ओरसे शत्रुओं द्वारा घेर लिया गया है अतः वह कुपित हो आगे दौड़ा ॥२५२-२५४॥


ततः शस्त्रकृतध्वान्ते रक्तनीहारवर्तिनि । अज्ञायन्त भटाः शूरास्तारारावेण केवलम् ॥२५५॥

अर्थ: तदनन्तर जहाँ शस्त्रोंके द्वारा अन्धकार फैल रहा था और रुधिरका कुहरा छाया हुआ था ऐसे युद्धमें यदि शूरवीर योद्धा पहचाने जाते थे तो केवल अपनी जोरदार आवाज से ही पहचाने जाते थे ॥२५५॥


प्रेरिता स्वामिनो भक्त्या पूर्वानादरचोदिताः । प्रहारोत्थेन कोपेन भटा युयुधिरे भृशम् ॥२५६॥

अर्थ: जिन योद्धाओंने पहले अपेक्षा भावसे युद्ध करना बन्द कर दिया था उनपर भी जब चोटें पड़ने लगीं तब वे स्वामीकी भक्तिसे प्रेरित हो प्रहारजन्य क्रोधसे अत्यधिक युद्ध करने लगे ॥२५६॥


गदाभिः शक्तिभिः कुन्तैर्मुसलैरसिभिः शरैः । परिघैः कनकैश्चक्रैः करवालीभिरंघ्रिपैः ॥२५७॥

शूलैः पाशैर्भुशुण्डीभिः कुठारैर्मुद्गरैर्घनैः । ग्रावभिर्लाङ्गलैर्दण्डैः कौणैः सायकवेणुभिः ॥२५८॥

अन्यैश्च विविधैः शस्त्रैरन्योन्यच्छेदकारिभिः । करालमभवद् व्योम तदाघातोत्थितानलम् ॥२५९॥

अर्थ: गदा, शक्ति, कुन्त, मुसल, कृपाण, बाण, परिघ, कनक, चक्र, छुरी, अंह्रिप, शूल, पाश, भुशुण्डी, कुठार, मुद्गर, घन, पत्थर, लांगल, दण्ड, कौण, बाँसके बाण तथा एक दूसरेको काटनेवाले अन्य अनेक शस्त्रोंसे उस समय आकाश भयंकर हो गया था और शस्त्रोंके पारस्परिक आघातसे उसमें अग्नि उत्पन्न हो रही थी ॥२५७-२५९॥


क्वचिद्ग्रसदिति ध्वानो भवत्यन्यत्र शूदिति । क्वचिद्रणरणारावः क्वचित्किणिकिणिस्वनः ॥२६०॥

त्रपत्रपायतेऽन्यत्र तथा दमदमायते । छमाछमायतेऽन्यत्र तथा पटपटायते ॥२६१॥

छलछलायतेऽन्यत्र टट्टट्टायते तथा । तटत्तटायतेऽन्यत्र तथा चटचटायते ॥२६२॥

घग्घग्घग्घायतेऽन्यत्र रणं शस्त्रोत्थितैः स्वरैः । शब्दात्मकमिवोद्भूतं तदा त्वजिरमण्डलम् ॥२६३॥

अर्थ: उस समय कहीं तो ग्रसद्-ग्रसद्, कहीं शूद्-शूद्, कहीं रण-रण, कहीं किण-किण, कहीं त्रप-त्रप, कहीं दम-दम, कहीं छम-छम, कहीं पट-पट, कहीं छल-छल, कहीं टद्द-टद्द, कहीं तड़-तड़, कहीं चट-चट और कहीं घग्घ-घग्घकी आवाज आ रही थी । यथार्थ बात यह थी कि शस्त्रोंसे उत्पन्न स्वरोंसे उस समय रणांगण शब्दमय हो रहा था ॥२६०-२६३॥


हन्यते वाजिना वाजी वारणेन मतङ्गजः । तत्रस्थेन च तत्रस्थो रथेन ध्वस्यते रथः ॥२६४॥

अर्थ: घोड़ा घोड़ाको मार रहा था, हाथी हाथीको मार रहा था, घुड़सवार घुड़सवारको, हाथीका सवार हाथीके सवारको और रथ रथको नष्ट कर रहा था ॥२६४॥


पदातिभिः समं युद्धं कर्तुं पादातमुद्यतम् । यथा पुरोगतैकैकभटपाटनतत्परम् ॥२६५॥

अर्थ: जो जिसके सामने आया उसीको चीरनेमें तत्पर रहनेवाला पैदल सिपाहियोंका झुण्ड पैदल सिपाहियोंके साथ युद्ध करनेके लिए उद्यत था ॥२६५॥


गजशूत्कृतनिस्सर्पच्छीकरासारसंहतिः । शस्त्रपातसमुद्भूतधूमकेतुमशीशमत् ॥२६६॥

अर्थ: हाथियोंकी शूत्कारके साथ जो जलके छींटोंका समूह निकल रहा था वह शस्त्रपातसे उत्पन्न अग्निको शान्त कर रहा था ॥२६६॥


प्रतिमागुरवो दन्ता भ्रष्टा अपि गजाननात् । पतन्तः कुर्वते भेदं भटपङ्क्तेरधोमुखाः ॥२६७॥

अर्थ: प्रतिमाके समान भारी-भारी जो दाँत हाथियोंके मुखसे नीचे गिरते थे वे गिरते-गिरते ही अनेक योद्धाओंकी पंक्तिका कचूमर निकाल देते थे ॥२६७॥


प्रहारं मुञ्च भो शूर मा भूः पुरुष कातरः । प्रहारं भटसिंहासेः सहस्व मम सांप्रतम् ॥२६८॥

अर्थ: अरे शूर पुरुष ! प्रहार छोड़, कायर क्यों हो रहा है ? हे सैनिकशिरोमणे ! इस समय जरा मेरी तलवारका भी तो वार सहन कर ॥२६८॥


अयं मृतोऽसि मां प्राप्य गतिस्तव कुतोऽधुना । दुःशिक्षित न जानासि गृहीतुमपि सायकम् ॥२६९॥

अर्थ: ले अब तू मरता ही है, मेरे पास आकर अब तो जा ही कहाँ सकता है ? अरे दुःशिक्षित ! तलवार पकड़ना भी तो तुझे आता नहीं है, युद्ध करनेके लिए चला है ॥२६९॥


रक्षात्मानं व्रजामुष्माद् रणकण्डूर्मुधा तव । कण्डूरेव न मे भ्रष्टा क्षतं स्वल्पं त्वया कृतम् ॥२७०॥

अर्थ: जा यहांसे भाग जा और अपने आपकी रक्षा कर । तेरी रणकी खाज व्यर्थ है, तूने इतना थोड़ा घाव किया कि उससे मेरी खाज ही नहीं गयी ॥२७०॥


मुधैव जीवनं भुक्तं पण्डकेन प्रभोस्त्वया । किं गर्जसि फले व्यक्तिर्भटतायाः करोम्यहम् ॥२७१॥

अर्थ: तुझ नपुंसकने स्वामीका वेतन व्यर्थ ही खाया है, चुप रह, क्यों गरज रहा है ? अवसर आनेपर शूरवीरता अपने आप प्रकट हो जायेगी ॥२७१॥


किं कम्पसे भज स्थैर्यं गृहाण त्वरितं शरम् । दृढमुष्टिं कुरु स्रंसत्खड्गोऽयं तव यास्यति ॥२७२॥

अर्थ: काँप क्यों रहा है ? जरा स्थिरताको प्राप्त हो, शीघ्र ही बाण हाथमें ले, मुट्ठीको मजबूत रख, देख यह तलवार खिसककर नीचे चली जायेगी ॥२७२॥


एवमादिसमालापाः परमोत्साहवर्तिनाम् । भटानामाहवे जाताः स्वामिनामग्रतो मुहुः ॥२७३॥

अर्थ: उस समय युद्धमें अपने-अपने स्वामियोंके आगे परमोत्साहसे युक्त योद्धाओंके बार-बार उल्लिखित वार्तालाप हो रहे थे ॥२७३॥


अलसः कस्यचिद्बाहुराहतो गदया द्विषा । बभूव विशदोऽत्यन्तं क्षणनर्तनकारिणः ॥२७४॥

अर्थ: किसीकी भुजा आलस्यसे भरी थी - उठती ही नहीं थी पर जब शत्रुने उसमें गदाकी चोट जमायी तब वह क्षण-भरमें नाच उठा और उसकी भुजा ठीक हो गयी ॥२७४॥


प्रयच्छत्प्रतिपक्षस्य साधुकारं मुहुः शिरः । पपात कस्यचिद्वेगनिष्क्रामद्भूरिशोणितम् ॥२७५॥

अर्थ: जिससे बड़े वेगसे अत्यधिक खून निकल रहा था ऐसा किसीका सिर शत्रुके लिए बार-बार धन्यवाद देता हुआ नीचे गिर पड़ा ॥२७५॥


अभिद्यत शरैर्वक्षो भटानां न तु मानसम् । शिरः पपात नो मानः कान्तो मृत्युर्न जीवितम् ॥२७६॥

अर्थ: बाणोंसे योद्धाओं- का वक्षःस्थल तो खण्डित हो गया पर मन खण्डित नहीं हुआ । इसी प्रकार योद्धाओंका सिर तो गिर गया पर मान नहीं गिरा । उन्हें मृत्यु प्रिय थी पर जीवन प्रिय नहीं था ॥२७६॥


कुर्वाणा यशसो रक्षां दक्षा वीरा महौजसः । भटाः संकटमायाताः प्राणान् शस्त्रभृतोऽमुचन् ॥२७७॥

अर्थ: जो महा- तेजस्वी कुशल वीर थे उन्होंने संकट आनेपर शस्त्र लिये यशकी रक्षा करते-करते अपने प्राण छोड़ दिये थे ॥२७७॥


म्रियमाणो भटः कश्चिच्छत्रुमारणकाङ्क्षया । पपात देहमाक्रम्य रिपोः कोपेन पूरितः ॥२७८॥

अर्थ: कोई एक योद्धा मर तो रहा था पर शत्रुको मारनेकी इच्छासे क्रोधयुक्त हो जब गिरने लगा तो शत्रुके शरीरपर आक्रमण कर गिरा ॥२७८॥


च्युते शस्त्रान्तराघाताच्छस्त्रे कश्चिद्भटोत्तमः । मुष्टिमुद्गरघातेन चक्रे शत्रुं गतासुकम् ॥२७९॥

अर्थ: शत्रुके शस्त्रकी चोटसे जब किसी योद्धाका शस्त्र छूटकर नीचे गिर गया तब उसने मुट्ठीरूपी मुद्गरकी मारसे ही शत्रुको प्राणरहित कर दिया ॥२७९॥


आलिङ्ग्य मित्रवत्कश्चिद्दोर्भ्यां गाढं महाभटः । चकार विगलद्रक्तधारं शत्रुं विजीवितम् ॥२८०॥

अर्थ: किसी महायोद्धाने मित्रकी तरह भुजाओंसे शत्रुका गाढ़ आलिंगन कर उसे निर्जीव कर दिया - आलिंगन करते समय शत्रुके शरीरसे खूनकी धारा बह निकली थी ॥२८०॥


कश्चिच्चकार पन्थानमृजुं निघ्नन् भटावलीम् । समरे पुरुषैरन्यैर्भयादकृतसंगमम् ॥२८१॥

अर्थ: किसी योद्धाने योद्धाओंके समूहको मारकर युद्धमें अपना सीधा मार्ग बना लिया था। भयके कारण अन्य पुरुष उसके उस मार्गमें आड़े नहीं आये थे ॥२८१॥


पतन्तोऽपि न पृष्ठस्य दर्शनं भटसत्तमाः । वितेरुः प्रतिपक्षस्य गर्वोत्तानितवक्षसः ॥२८२॥

अर्थ: गर्वसे जिनका वक्षःस्थल तना हुआ था ऐसे उत्तम योद्धाओंने गिरते-गिरते भी शत्रुके लिए अपनी पीठ नहीं दिखलायी थी ॥२८२॥


अश्वै रथैर्भटैर्नागैः पतद्भिरतिरंहसा । अश्वा रथा भटा नागा न्यपात्यन्त सहस्रशः ॥२८३॥

अर्थ: बड़े वेगसे नीचे गिरनेवाले घोड़ों, रथों, योद्धाओं और हाथियोंने हजारों घोड़ों, .रथों, योद्धाओं और हाथियोंको नीचे गिरा दिया था ॥२८३॥


रजोभिः शस्त्रनिक्षेपसमुद्भूतैः सशोणितैः । दानाम्भसा च संच्छन्नं शक्रचापैरभून्नभः ॥२८४॥

अर्थ: शस्त्रोंके निक्षेपसे उठी हुई रुधिराक्त धूलि और हाथियोंके मदजलसे आकाश ऐसा व्याप्त हो गया था मानो इन्द्रधनुषोंसे ही आच्छादित हो रहा हो ॥२८४॥


कश्चित्करेण संरुध्य वामेनान्त्राणि सद्भटः । तरसा खड्गमुद्यम्य ययौ प्रत्यरि भीषणः ॥२८५॥

अर्थ: कोई एक भयंकर योद्धा अपनी निकलती हुई आँतोंको बायें हाथसे पकड़कर तथा दाहिने हाथसे तलवार उठा बड़े वेगसे शत्रुके सामने जा रहा था ॥२८५॥


कश्चिन्निजैः पुरीतद्भिर्बद्ध्वा परिकरं दृढम् । दष्टोष्ठोऽभिययौ शत्रुं दृष्टाशेषकनीनिकः ॥२८६॥

अर्थ: जो ओठ चाब रहा था तथा जिसके नेत्रोंकी पूर्ण पुतलियाँ दिख रही थीं ऐसा कोई योद्धा अपनी ही आँतोंसे कमरको मजबूत कसकर शत्रुकी ओर जा रहा था ॥२८६॥


कश्चित्कीलालमादाय निजं रोषपरायणः । कराभ्यां द्विषतो मूर्ध्नि चिक्षेप गलितायुधः ॥२८७॥

अर्थ: जिसके हथियार गिर गये थे ऐसे किसी योद्धाने क्रोधनिमग्न हो अपना खून दोनों हाथोंमें भरकर शत्रुके सिरपर डाल दिया था ॥२८७॥


गृहीत्वा कीकसं कश्चिन्निजं छिन्नमरातिना । ढुढौके तं गलद्रक्तधारांशुकविराजितः ॥२८८॥

अर्थ: जो निकलते हुए खूनकी धारासे लथपथ वस्त्रोंसे सुशोभित था ऐसा कोई योद्धा शत्रुके द्वारा काटी हुई अपनी हड्डी लेकर शत्रुके सामने जा रहा था ॥२८८॥


पाशेन कश्चिदानीय रिपुं युद्धसमुत्सुकः । मुमोच दूरनिर्मुक्तं रणसंभवसंभ्रमः ॥२८९॥

अर्थ: जो युद्धमें उत्सुक तथा युद्धकालमें उत्पन्न होनेवाली अनेक चेष्टाओंओंसे युक्त था ऐसे किसी योद्धाने शत्रुको पाशमें बाँधकर दूर ले जाकर छोड़ दिया ॥२८९॥


कश्चिच्च्युतायुधं दृष्ट्वा प्रतिपक्षमनिच्छया । ढुढौके शस्त्रमुज्झित्वा न्याय्यसंग्रामतत्परः ॥२९०॥

अर्थ: जो न्यायपूर्ण युद्ध करनेमें तत्पर था ऐसे किसी योद्धाने जब देखा कि हमारे शत्रुके शस्त्र नीचे गिर गये हैं और वह निरस्त्र हो गया है तब वह स्वयं भी अपना शस्त्र छोड़कर अनिच्छासे शत्रुके सामने गया था ॥२९०॥


पिनाकाननलग्नेन रिपून् कश्चित्प्रतिद्विषा । जघान घनकीलालधारानिकरवर्षिणा ॥२९१॥

अर्थ: कोई योद्धा धनुषके अग्रभागमें लगे एवं खूनकी बड़ी मोटी धाराओंकी वर्षा करनेवाले शत्रुके द्वारा ही दूसरे शत्रुओंको मार रहा था ॥२९१॥


कश्चित्कबन्धतां प्राप्तः शिरसा स्फुटरंहसा । मुञ्चंस्तद्दिशि कीलालं प्रतिपक्षमताडयत् ॥२९२॥

अर्थ: कोई एक योद्धा सिर कट जानेसे यद्यपि कबन्ध दशाको प्राप्त हुआ था तथापि उसने शत्रुकी दिशामें वेगसे उछलते हुए सिरके द्वारा ही रुधिरकी वर्षा कर शत्रुको मार डाला था ॥२९२॥


कृत्तोऽपि कस्यचिन्मूर्धा गर्वनिर्भरचेतसः । दष्टदन्तच्छदोऽपप्तद्धुङ्कारमुखरश्चिरम् ॥२९३॥

अर्थ: जिसका चित्त गर्वसे भर रहा था ऐसे किसी योद्धाका सिर यद्यपि कट गया था तो भी वह ओठोंको डसता रहा और हुंकारसे मुखर होता हुआ चिरकाल बाद नीचे गिरा था ॥२९३॥


अन्येनाशीविषेणेव पतताऽत्यन्तभीषणा । दृष्टिरुल्कानिभाक्षेपि प्रतिपक्षस्य विग्रहे ॥२९४॥

अर्थ: जो साँपके समान जान पड़ता था ऐसे किसी योद्धाने गिरते समय उल्काके समान अत्यन्त भयंकर अपनी दृष्टि शत्रुके शरीरपर डाली थी ॥२९४॥


अर्धकृत्तं शिरोऽन्येन धृत्वा वामेन पाणिना । पातितं प्रतिपक्षस्य शिरो विक्रमशालिना ॥२९५॥

अर्थ: किसी पराक्रमी योद्धाने शत्रुके द्वारा आधे काटे हुए अपने सिरको बायें हाथसे थाम लिया और दाहिने हाथसे शत्रुका सिर काटकर नीचे गिरा दिया ॥२९५॥


कश्चिद्विक्षिप्य कोपेन शस्त्रमप्राप्तशत्रुकम् । हन्तुं परिघतुल्येन बाहुनैव समुद्यतः ॥२९६॥

अर्थ: किसी योद्धाका शस्त्र शत्रु तक नहीं पहुँच रहा था इसलिए क्रोधमें आकर उसने उसे फेंक दिया और अर्गलके समान लम्बी भुजासे ही शत्रुको मारनेके लिए उद्यत हो गया ॥२९६॥


अरातिं मूर्च्छितं कश्चित्सिषेच स्वासृजा भृशम् । शीतीकृतेन वस्त्रान्तवायुना संभ्रमान्वितः ॥२९७॥

अर्थ: किसी एक दयालु योद्धाने देखा कि हमारा शत्रु सामने मूर्च्छित पड़ा है जब उसे सचेत करनेके लिए जल आदि अन्य साधन न मिले तब उसने सम्भ्रमसे युक्त हो वस्त्रके छोरकी वायुसे शीतल किये गये अपने ही रुधिरसे उसे बार-बार सींचना शुरू कर दिया ॥२९७॥


विश्रान्तं मूर्च्छया शूरैः शस्त्रघातैः सुखायितम् । मरणेन कृतार्थत्वं मेने कोपेन कम्पितैः ॥२९८॥

अर्थ: क्रोधसे काँपते हुए शूर-वीर मनुष्योंको जब मूर्च्छा आती थी तब वे समझते थे कि विश्राम प्राप्त हुआ है, जब शस्त्रोंकी चोट लगती थी तब समझते थे कि सुख प्राप्त हुआ और जब मरण प्राप्त होता था तब समझते थे कि कृतकृत्यता प्राप्त हुई है ॥२९८॥


एवं महति संग्रामे प्रवृत्ते भीतिभीषणे । भटानामुत्तमानन्दसंपादनपरायणे ॥२९९॥

अर्थ: इस प्रकार जब योद्धाओंके बीच महायुद्ध हो रहा था, ऐसा महायुद्ध कि जो भयको भी भय उत्पन्न करनेवाला था तथा उत्तम मनुष्योंको आनन्द उत्पन्न करनेमें तत्पर था ॥२९९॥


गजनासासमाकृष्टवीरकल्पिततत्करे । जवनाश्वखुराघातपतत्तत्कर्तनोद्यते ॥३००॥

अर्थ: जहाँ हाथी अपनी सूँड़ोंमें कसकर वीर पुरुषोंको अपनी ओर खींचते थे पर वे वीर पुरुष उनकी सूँड़ें स्वयं काट डालते थे। जहाँ लोग घोड़ोंको काटनेके लिए उद्यत होते अवश्य थे पर वे वेगशाली घोड़े अपने खुरोंके आघातसे उन्हें वहीं गिरा देते थे ॥३००॥


सारथिप्रेरणाकृष्टरथविक्षतवाजिनि । जङ्घावष्टम्भसंक्रान्तक्षतकुम्भमहागजे ॥३०१॥

अर्थ: जहाँ घोड़े सारथियोंकी प्रेरणा पाकर रथ खींचते थे पर उनसे उनका शरीर घायल हो जाता था। जहाँ मस्तकरहित बड़े-बड़े हाथी पड़े हुए थे और लोग उनपर पैर रखते हुए चलते थे ॥३०१॥


परस्परजवाघातदलत्पादातविग्रहे । भटोत्तमकराकृष्टपुच्छनिष्पन्दवाजिनि ॥३०२॥

अर्थ: जहाँ पैदल सिपाहियोंके शरीर एक दूसरेके वेगपूर्ण आघातसे खण्डित हो रहे थे। जहाँ उत्तम योद्धा अपने हाथोंसे घोड़ोंकी पूँछ पकड़कर इतने जोरसे खींचते थे कि वे निश्चल खड़े रह जाते थे ॥३०२॥


कराघातदलत्कुम्भिकुम्भनिष्ठ्यूतमौक्तिके । पतन्मातङ्गनिर्भग्नरथाहतपतद्भटे ॥३०३॥

अर्थ: जहाँ हाथोंकी चोटसे हाथियोंके गण्डस्थल फट जाते थे तथा उनसे मोती निकलने लगते थे। जहाँ गिरते हुए हाथियोंसे रथ टूट जाते थे और उनकी चपेटमें आकर अनेक योद्धा घायल होकर नीचे गिर जाते थे ॥३०३॥


कीलालपटलच्छन्नगलन्नासाकदम्बके । गजकर्णसमुद्भूततीव्राकुलसमीरणे ॥३०४॥

अर्थ: जहाँ लोगोंकी नासिकाओंके समूह पड़ते हुए खूनके समूहसे आच्छादित हो रहे थे अथवा जहाँ आकाश और दिशाओंके समूह खूनके समूहसे आच्छादित थे और जहाँ हाथियोंके कानोंकी फटकारसे प्रचण्ड वायु उत्पन्न हो रही थी ॥३०४॥


उवाच सारथिं वीरः सुमतिं कैकसीसुतः । न किंचिदिव मन्वानो रणं रणकुतूहली ॥३०५॥

तस्यैव शक्रसंज्ञस्य संमुखो वाह्यतां रथः । असमानैः किमत्रान्यैः सामन्तैस्तस्य मारितैः ॥३०६॥

अर्थ: इस प्रकार योद्धाओंके बीच भयंकर युद्ध हो रहा था पर युद्धके कुतूहलसे भरा वीर रावण उस युद्धको ऐसा मान रहा था जैसा कि मानो कुछ हो ही न रहा हो। उसने अपने सुमति नामक सारथिसे कहा कि उस इन्द्रके सामने ही रथ ले जाया जाये क्योंकि जो हमारी समानता नहीं रखते ऐसे उसके अन्य सामन्तोंके मारनेसे क्या लाभ है ? ॥३०५-३०६॥


तृणतुल्येषु नामीषु मम शस्त्रं प्रवर्तते । मनश्च सुमहावीरग्रासग्रहणघस्मरम् ॥३०७॥

अर्थ: तृणके समान तुच्छ इन सामन्तोंपर न तो मेरा शस्त्र उठता है और न महाभटरूपी ग्रासके ग्रहण करनेमें तत्पर मेरा मन ही इनकी ओर प्रवृत्त होता है ॥३०७॥


आखण्डलत्वमस्याद्य कृतं क्षुद्राभिमानतः । करोमि मृत्युना दूरं स्वविडम्बनकारिणः ॥३०८॥

अर्थ: अपने आपकी विडम्बना करानेवाले इस विद्याधरने क्षुद्र अभिमानके वशीभूत हो अपने आपको जो इन्द्र मान रखा है सो इसके उस इन्द्रपनाको आज मृत्युके द्वारा दूर करता हूँ ॥३०८॥


अयं शक्रो महानेते लोकपालाः प्रकल्पिताः । अन्ये च मानुषा देवा नाकश्च धरणीधरः ॥३०९॥

अर्थ: यह बड़ा इन्द्र बना है, ये लोकपाल इसीने बनाये हैं। यह अन्य मनुष्योंको देव मानता है और विजयार्ध पर्वतको स्वर्ग समझता है ॥३०९॥


अहो लोकावहासस्य मत्तस्य क्षुद्रया श्रिया । आत्मा विस्मृत एवास्य भ्रुकुंसस्येव दुर्मतेः ॥३१०॥

अर्थ: बड़े आश्चर्यकी बात है कि जिस प्रकार कोई दुर्बुद्धि नट उत्तम पुरुषका वेष धर अपने आपको भुला देता है उसी प्रकार यह दुर्बुद्धि क्षुद्र लक्ष्मीसे मत्त होकर अपने आपको भुला रहा है, तथा लोगोंकी हँसीका पात्र हो रहा है ॥३१०॥


शुक्रशोणितमांसास्थिमज्जादिघटिते चिरम् । उषित्वा जठरे पापश्चिद्दर्शमन्यतां गतः ॥३११॥

अर्थ: शुक्र, शोणित, मांस, हड्डी और मज्जा आदिसे भरे हुए माताके उदरमें चिरकाल तक निवास कर यह अपने आपको देव मानने लगा है ॥३११॥


विद्याबलेन यत्किंचित्कुर्वाणो धैर्यदुर्विधः । एष देवायतो ध्वाङ्क्षो वैनतेयायते यथा ॥३१२॥

अर्थ: विद्याके बलसे कुछ तो भी करता हुआ यह अधीर व्यक्ति अपने आपको देव समझ रहा है जो इसका यह कार्य ऐसा है कि जिस प्रकार कौआ अपने आपको गरुड़ समझने लगता है ॥३१२॥


एवमुक्तेन शक्रस्य बलं सम्मतिना रथः । प्रवेशितो महाशूरसामन्तपरिपालितः ॥३१३॥

अर्थ: ऐसा कहते ही सुमति नामक सारथिने महाबलवान् सामन्तोंके द्वारा सुरक्षित रावणके रथको इन्द्रकी सेनामें प्रविष्ट कर दिया ॥३१३॥


पश्यन्निन्द्रस्य सामन्तान्युद्धाशक्तपलायितान् । ऋजुना चक्षुषा राजा कीटकोपमचेष्टितान् ॥३१४॥

अर्थ: वहाँ जाकर रावणने इन्द्रके उन सामन्तों को सरल दृष्टिसे देखा कि जो युद्धमें असमर्थ होकर भाग रहे थे, तथा कीड़ोंके समान जिनकी दयनीय चेष्टाएँ थीं ॥३१४॥


अशक्यः शत्रुभिर्धर्तुं कूलैः पूरो यथाम्भसः । चेतोवेगश्च सक्रोधो मिथ्यादृष्टिव्रताश्रितैः ॥३१५॥

अर्थ: जिस प्रकार किनारे नीरके प्रवाहको नहीं रोक सकते हैं और जिस प्रकार मिथ्यादर्शनके साथ व्रताचरण करनेवाले मनुष्य क्रोधसहित मनके वेगको नहीं रोक पाते हैं उसी प्रकार शत्रु भी रावणको आगे बढ़नेसे नहीं रोक सके थे ॥३१५॥


दृष्ट्वातपत्रमेतस्य क्षीरोदावर्तपाण्डुरम् । नष्टं सुरबलं क्वापि तमश्चन्द्रोदये यथा ॥३१६॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमाका उदय होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है उसी प्रकार क्षीरसमुद्रकी आवर्तके समान धवल रावणका छत्र देखकर देवोंकी सेना न जाने कहाँ नष्ट हो गयी ॥३१६॥


इन्द्रोऽपि गजमारूढः कैलासगिरिसंनिभम् । शरं समुद्धरँस्तूणादभीयाय दशाननम् ॥३१७॥

अर्थ: कैलास पर्वतके समान ऊँचे हाथीपर सवार हुआ इन्द्र भी तरकससे बाण निकालता हुआ रावणके सम्मुख आया ॥३१७॥


शरानाकर्णमाकृष्टान् चिक्षेप च यमद्विषि । महीधर इवाम्भोदः स्थूलधारामहाचयम् ॥३१८॥

अर्थ: जिस प्रकार मेघ बड़ी मोटी धाराओंके समूहको किसी पर्वतपर छोड़ता है उसी प्रकार इन्द्र भी कान तक खींचे हुए बाण रावणके ऊपर छोड़ने लगा ॥३१८॥


दशवक्त्रोऽपि तान्बाणैराच्छित्तान्तरवर्तिनः । ततस्तैर्गगनं चक्रे निखिलं मण्डपाकृतिम् ॥३१९॥

अर्थ: इधर रावणने भी इन्द्रके उन बाणोंको बीचमें ही अपने बाणोंसे छेद डाला और अपने बाणोंसे समस्त आकाशमें मण्डप-सा बना दिया ॥३१९॥


आच्छिद्यन्त शरा बाणैरभिद्यन्त च भूरिशः । भीता इव रवेः पादाः क्वापि नष्टा निरन्वयाः ॥३२०॥

अर्थ: इस प्रकार बाणोंके द्वारा बाण छेदे-भेदे जाने लगे और सूर्यकी किरणें इस तरह निर्मूल नष्ट हो गयीं मानो भयसे कहीं जा छिपी हों ॥३२०॥


अन्तरेऽस्मिन्नवेद्वारगतिर्निःशरगोचरम् । ननर्त कलहप्रेक्षासंभूतपुरुसंमदः ॥३२१॥

अर्थ: इसी समय युद्धके देखनेसे जिसे बहुत भारी हर्ष उत्पन्न हो रहा था ऐसा नारद जहाँ बाण नहीं पहुँच पाते थे वहाँ आनन्दविभोर हो नृत्य कर रहा था ॥३२१॥


असाध्यं प्रकृतास्त्राणां ततो ज्ञात्वा दशाननम् । निक्षिप्तमस्त्रमाग्नेयं नाथेन स्वर्गवासिनाम् ॥३२२॥

अर्थ: अथानन्तर जब इन्द्रने देखा कि रावण सामान्य शस्त्रोंसे साध्य नहीं है तब उसने आग्नेय बाण चलाया ॥३२२॥


इन्धनत्वं गतं तस्य खमेव विततात्मनः । धनुरादौ तु किं शक्यं वक्तुं पुद्गलवस्तुनि ॥३२३॥

अर्थ: वह आग्नेय बाण इतना विशाल था कि स्वयं आकाश ही उसका ईंधन बन गया, धनुष आदि पौद्गलिक वस्तुओंके विषयमें तो कहा ही क्या जा सकता है ? ॥३२३॥


कीचकानामिवोदारो दह्यमाने वने ध्वनिः । ज्वालावलीकरालस्य संबभूवाशुशुक्षणेः ॥३२४॥

अर्थ: जिस प्रकार बाँसोंके वनके जलनेपर विशाल शब्द होता है उसी प्रकार ज्वालाओंके समूहसे भयंकर दिखनेवाली आग्नेय बाणकी अग्निसे विशाल शब्द हो रहा था ॥३२४॥


ततस्तेनाकुलं दृष्ट्वा स्वबलं कैकसीसुतः । चिक्षेप क्षेपनिर्मुक्तमस्त्रं वरुणलक्षितम् ॥३२५॥

अर्थ: तदनन्तर जब रावणने अपनी सेनाको आग्नेय बाणसे आकुल देखा तब उसने शीघ्र ही वरुण अस्त्र चलाया ॥३२५॥


तेन क्षणसमुद्भूतमहाजीमूतराशिना । पर्वतस्थूलधारौघवर्षिणा रावशालिना ॥३२६॥

रावणस्येव कोपेन विलीनेन विहायसा । क्षणात्तद्धूमलक्ष्मास्त्रं विध्यापितमशेषतः ॥३२७॥

अर्थ: उस बाणके प्रभावसे तत्क्षण ही महामेघोंका समूह उत्पन्न हो गया। वह मेघसमूह पर्वतके समान बड़ी मोटी धाराओंके समूहकी वर्षा कर रहा था, गर्जनासे सुशोभित था और ऐसा जान पड़ता था मानो रावणके क्रोधसे आकाश ही पिघल गया हो। ऐसे मेघसमूहने इन्द्रके उस आग्नेय बाणको उसी क्षण सम्पूर्ण रूपसे बुझा दिया ॥३२६-३२७॥


सुरेन्द्रेण ततोऽसर्जि तामसास्त्रं समन्ततः । तेनान्धकारिता चक्रे ककुभां नभसा समम् ॥३२८॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रने तामस बाण छोड़ा जिससे समस्त दिशाओं और आकाशमें अन्धकार ही अन्धकार छा गया ॥३२८॥


ततस्तेन दशास्यस्य विततं सकलं बलम् । स्वदेहमपि नापश्यत्कुतः शत्रोरनीकिनीम् ॥३२९॥

अर्थ: उस बाणने रावणकी सेनाको इस प्रकार व्याप्त कर लिया कि वह अपना शरीर भी देखनेमें असमर्थ हो गयी फिर शत्रुकी सेनाको देखनेकी तो बात ही क्या थी ? ॥३२९॥


ततो निजबलं मूढं दृष्ट्वा रत्नश्रवःसुतः । प्रभास्त्रममुचत्कालवस्तुयोजनकोविदः ॥३३०॥

अर्थ: तब अवसरके योग्य वस्तुकी योजना करनेमें निपुण रावणने अपनी सेनाको मोहग्रस्त देख प्रभास्त्र अर्थात् प्रकाशबाण छोड़ा ॥३३०॥


तेन तन्निखिलं ध्वान्तं विध्वस्तं क्षणमात्रतः । जिनशासनतत्त्वेन मतं मिथ्यादृशामिव ॥३३१॥

अर्थ: सो जिस प्रकार जिन-शासनके तत्त्वसे मिथ्यादृष्टियोंका मत नष्ट हो जाता है उसी प्रकार उस प्रभास्त्रसे क्षण-भरमें ही वह समस्त अन्धकार नष्ट हो गया ॥३३१॥


ततो यमविमर्देन कोपान्नागास्त्रमुज्झितम् । वितेने गगनं तेन मोगिभी रत्नभासुरैः ॥३३२॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने क्रोधवश नागास्त्र छोड़ा जिससे समस्त आकाश रत्नोंसे देदीप्यमान सर्पोंसे व्याप्त हो गया ॥३३२॥


कामरूपभृतो बाणास्ते गत्वा वृत्रविद्विषः । चेष्टया रहितं चक्रुः शरीरं कृतवेष्टनाः ॥३३३॥

अर्थ: इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन बाणोंने जाकर इन्द्रके शरीरको निश्चेष्ट कर दिया तथा सब उससे लिपट गये ॥३३३॥


महानीलनिभैरेभिर्वलयाकारधारिभिः । जगामाकुलतां शक्रश्चलद्रसनभीषणैः ॥३३४॥

अर्थ: जो महानीलमणिके समान श्याम थे, वलयका आकार धारण करनेवाले थे और चंचल जिह्वाओंसे भयंकर दिखते थे ऐसे सर्पोंसे इन्द्र बड़ी आकुलताको प्राप्त हुआ ॥३३४॥


प्रययावस्वतन्त्रत्वं कुलिशी व्यालवेष्टितैः । वेष्टितः कर्मजालेन यथा जन्तुर्भवोदधौ ॥३३५॥

अर्थ: जिस प्रकार कर्मजालसे घिरा प्राणी संसाररूपी सागरमें विवश हो जाता है उसी प्रकार व्याल अर्थात् सर्पोंसे घिरा इन्द्र विवशताको प्राप्त हो गया ॥३३५॥


गरुडास्त्रं ततो दध्यौ सुरेन्द्रस्तदनन्तरम् । हेमपक्षप्रभाजालैः पिङ्गतां गगनं गतम् ॥३३६॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रने गरुडास्त्रका ध्यान किया जिसके प्रभावसे उसी क्षण आकाश सुवर्णमय पंखोंकी कान्तिके समूहसे पीला हो गया ॥३३६॥


पक्षवातेन तस्याभून्नितान्तोदाररंहसा । दोलारूढमिवाशेषं प्रेङ्खर्णप्रवणं बलम् ॥३३७॥

अर्थ: जिसका वेग अत्यन्त तीव्र था ऐसी गरुडके पंखोंकी वायुसे रावणकी समस्त सेना ऐसी चंचल हो गयी मानो हिंडोला ही झूल रही हो ॥३३७॥


स्पृष्टा गरुडवातेन न ज्ञाता नागसायकाः । क्व गता इति विस्पष्टबन्धस्थानोपलक्षिताः ॥३३८॥

अर्थ: गरुडकी वायुका स्पर्श होते ही पता नहीं चला कि नागबाण कहाँ चले गये। वे शरीरमें कहाँ-कहाँ बँधे थे उन स्थानोंका पता भी नहीं रहा ॥३३८॥


गरुत्मता कृताश्लेषो बन्धलक्षणवर्जितः । बभूव दारुणः शक्रो निदाघरविसंनिमः ॥३३९॥

अर्थ: गरुडका आलिंगन होनेसे जिसके समस्त बन्धन दूर हो गये थे ऐसा इन्द्र ग्रीष्मऋतुके सूर्यके समान भयंकर हो गया ॥३३९॥


विमुक्तं सर्पजालेन दृष्ट्वा शक्रं दशाननः । आरूढस्त्रिजगद्भूषं क्षरद्दानं जयद्विपम् ॥३४०॥

अर्थ: जब रावणने देखा कि इन्द्र नागपाशसे छूट गया है तब वह जिससे मद झर रहा था ऐसे त्रिलोकमण्डन नामक विजयी हाथीपर सवार हुआ ॥३४०॥


शक्रोऽऽप्यैरावतं रोषादस्यात्यासन्नमानयत् । ततो महदभूद्युद्धं दन्तिनोः पुरुदर्पयोः ॥३४१॥

अर्थ: उधरसे इन्द्र भी क्रोधवश अपना ऐरावत हाथी रावणके निकट ले आया। तदनन्तर बहुत भारी गर्वको धारण करनेवाले दोनों हाथियोंमें महायुद्ध हुआ ॥३४१॥


क्षरद्दानौ स्फुरद्धेमकक्षाविद्युद्गुणान्वितौ । दधतुस्तौ घनाकारं सान्द्रगर्जितकारिणौ ॥३४२॥

अर्थ: जिनसे मद झर रहा था, जो चमकती हुई स्वर्णकी मालारूपी बिजलीके सहित थे, तथा जो लगातार विशाल गर्जना कर रहे थे ऐसे दोनों हाथी मेघका आकार धारण कर रहे थे ॥३४२॥


परस्पररदाघातनिर्घातैरिव दारुणैः । पतद्भिर्भुवनं कम्पं प्रययौ शब्दपूरितम् ॥३४३॥

अर्थ: परस्परके दाँतोंके आघातसे ऐसा लगता था मानो भयंकर वज्र गिर रहे हों और उनसे शब्दायमान हो समस्त संसार कम्पित हो रहा हो ॥३४३॥


पिण्डयित्वा स्थवीयान्सौ करौ चपलविग्रहौ । पुनः प्रसारयन्तौ च ताडयन्तौ महारथौ ॥३४४॥

अर्थ: जिनका शरीर अत्यन्त चंचल था तथा वेग भारी था ऐसे दोनों हाथी अपनी मोटी सूँड़ोंको फैलाते, सिकोड़ते और ताड़ित कर रहे थे ॥३४४॥


दन्तिनौ दृष्टविस्पष्टतारकाक्रूरवीक्षणौ । चक्रतुः सुमहद्युद्धं स्तब्धकर्णौ महाबलौ ॥३४५॥

अर्थ: साफ-साफ दिखनेवाली पुतलियोंसे जिनके नेत्र अत्यन्त क्रूर जान पड़ते थे, जिनके कान खड़े थे और जो महाबलसे युक्त थे ऐसे दोनों हाथियोंने बहुत भारी युद्ध किया ॥३४५॥


तत उत्पत्य विन्यस्य पादमिन्द्रेभमूर्धनि । नितान्तं लाघवोपेतपादनिर्धूतसारथिः ॥३४६॥

बद्ध्वांशुकेन देवेन्द्रं मुहुराश्वासयन्विभुः । आरोपयद्यमध्वंसो निजं वाहनमूर्जितः ॥३४७॥

अर्थ: तदनन्तर शक्तिशाली रावणने उछलकर अपना पैर इन्द्रके हाथीके मस्तकपर रखा और बड़ी शीघ्रतासे पैरकी ठोकर देकर सारथिको नीचे गिरा दिया । बार-बार आश्वासन देते हुए रावणने इन्द्रको वस्त्रसे कसकर बाँध अपने हाथीपर चढ़ा लिया ॥३४६-३४७॥


राक्षसाधिपपुत्रोऽपि गृहीत्वा वासवात्मजम् । समर्प्य किङ्करौघस्य सुरसैन्यस्य संमुखः ॥३४८॥

धावमानो जयोद्भूतमहोत्साहः परंतपः । उक्तो द्विषंतपेनैवं मरुत्वमखविद्विषा ॥३४९॥

अलं वत्स ! प्रयत्नेन निवर्तस्व रणादरात् । शिरो गृहीतमेतस्याः सेनाया गिरिवासिनाम् ॥३५०॥

अर्थ: उधर इन्द्रजित्ने भी जयन्तको बाँधकर किंकरोंके लिए सौंप दिया । तदनन्तर विजयसे जिसका उत्साह बढ़ रहा था तथा जो शत्रुओंको सन्तप्त कर रहा था ऐसा इन्द्रजित् देवोंकी सेनाके सम्मुख दौड़ा । उसे दौड़ता देख शत्रुओंको सन्ताप पहुँचानेवाले रावणने कहा कि हे वत्स ! अब प्रयत्न करना व्यर्थ है, युद्धके आदरसे निवृत्त होओ, विजयार्धवासी लोगोंकी इस सेनाका सिर अपने हाथ लग चुका है ॥३४८-३५०॥


गृहीतेऽस्मिन् परिष्यन्दमत्र कः कुरुते परः । क्षुद्रा जीवन्तु सामन्ता गच्छन्तु स्थानमीप्सितम् ॥३५१॥

अर्थ: इसके हाथ लग चुकनेपर दूसरा कौन हलचल कर सकता है ? ये क्षुद्र सामन्त जीवित रहें और अपने इच्छित स्थानपर जावें ॥३५१॥


तन्दुलेषु गृहीतेषु ननु शालिकलापतः । त्यागस्तुषपलालस्य क्रियते कारणाद् विना ॥३५२॥

अर्थ: जब धानके समूहसे चावल निकाल लिये जाते हैं तब छिलकोंके समूहको अकारण ही छोड़ देते हैं ॥३५२॥


इत्युक्तः समरोत्साहादिन्द्रजिद्विनिवर्तनम् । चक्रे चक्रेण महता नृपाणां बद्धमण्डलः ॥३५३॥

अर्थ: रावणके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रजित् युद्धके उत्साहसे निवृत्त हुआ। उस समय राजाओंका बड़ा भारी समूह इन्द्रजित्को घेरे हुए था ॥३५३॥


ततः सुरबलं सर्वं विशीर्णं क्षणमात्रतः । शारदानामिवाब्दानां वृन्दमत्यन्तमायतम् ॥३५४॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार शरद्ऋतुके बादलोंका बड़ा लम्बा समूह क्षण-भरमें विशीर्ण हो जाता है उसी प्रकार इन्द्रकी सेना क्षण-भरमें विशीर्ण हो गयी - इधर-उधर बिखर गयी ॥३५४॥


सैन्येन दशवक्त्रस्य जयशब्दो महान् कृतः । पटुभिः पटलैः शङ्खैर्झर्झरैर्वन्दिनां गणैः ॥३५५॥

अर्थ: रावणकी सेनामें उत्तमोत्तम पटल, शंख, झर्झर बाजे तथा बन्दीजनोंके समूहके द्वारा बड़ा भारी जयनाद किया गया ॥३५५॥


शब्देन तेन विज्ञाय गृहीतममराधिपम् । सैन्यं राक्षसनाथस्य बभूवाकुलितोज्झितम् ॥३५६॥

अर्थ: उस जयनादसे इन्द्रको पकड़ा जानकर रावणकी सेना निराकुल हो गयी ॥३५६॥


ततः परमया युक्तो विभूत्या कैकसीसुतः । प्रतस्थे निर्वृतो लङ्कां साधनाच्छादिताम्बरः ॥३५७॥

अर्थ: तदनन्तर परम विभूतिसे युक्त रावण, सेनासे आकाशको आच्छादित करता हुआ लंकाकी ओर चला। उस समय वह बड़ा सन्तुष्ट था ॥३५७॥


आदित्यरथसंकाशैरथैर्ध्वजविराजितैः । नानारत्नकरोद्भूतसुनासीरशरासनैः ॥३५८॥

अर्थ: जो सूर्यके रथके समान थे, ध्वजाओंसे सुशोभित थे और नाना रत्नोंकी किरणोंसे जिनपर इन्द्रधनुष उत्पन्न हो रहे थे ऐसे रथ उसके साथ थे ॥३५८॥


तुरङ्गैश्चञ्चलच्चारुचामरालीविभूषितैः । नृत्यद्भिरिव विस्रब्धकृतविभ्रमहारिभिः ॥३५९॥

अर्थ: जो हिलते हुए सुन्दर चमरोंके समूहसे सुशोभित थे, निश्चिन्ततासे किये हुए अनेक विलासोंसे मनोहर थे तथा नृत्य करते हुए-से जान पड़ते थे ऐसे घोड़े उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥३५९॥


महानिनदसंघट्टैः प्रवृत्तमदनिर्झरैः । गर्जद्भिर्मधुरं नागैः षट्पदालीनिषेवितैः ॥३६०॥

अर्थ: जिनके गलेमें विशाल शब्द करनेवाले घण्टा बँधे हुए थे, जिनसे मदके निर्झरने झर रहे थे, जो मधुर गर्जना कर रहे थे तथा भ्रमरोंकी पंक्ति जिनकी उपासना कर रही थी ऐसे हाथी उसके साथ थे ॥३६०॥


अनुयानसमारूढैर्महासाधनखेचरैः । उपकण्ठं क्षणात्प्राप लङ्काया राक्षसाधिपः ॥३६१॥

अर्थ: इनके सिवाय अपनी-अपनी सवारियोंपर बैठे हुए बड़ी-बड़ी सेनाओंके अधिपति विद्याधर उसके साथ चल रहे थे । इन सबके साथ रावण क्षण-भरमें ही लंकाके समीप जा पहुँचा ॥३६१॥


ततो दृष्ट्वा समासन्नं गृहीतार्घा विनिर्ययुः । पुरस्य पालकाः पौरा बान्धवाश्च समुत्सुकाः ॥३६२॥

अर्थ: तब रावणको निकट आया जान नगरकी रक्षा करनेवाले लोग पुरवासी और भाई-बान्धव उत्सुक हो अर्घ ले-लेकर बाहर निकले ॥३६२॥


कृतपूजस्ततः कैश्चित्केषांचित्कृतपूजनः । नम्यमानोऽपरैः कांश्चित्प्रणमन्मदवर्जितः ॥३६३॥

अर्थ: तदनन्तर कितने ही लोगोंने रावणकी पूजा की तथा रावणने भी कितने ही वृद्धजनोंकी पूजा की । कितने ही लोगोंने रावणको नमस्कार किया और रावणने भी कितने ही वृद्धजनोंको मदरहित हो नमस्कार किया ॥३६३॥


दृष्ट्या संमानयन् कांश्चित्स्निग्धया नतवत्सलः । स्मितेन कांश्चिद्वाचान्यान्परिज्ञातजनान्तरः ॥३६४॥

अर्थ: लोगोंकी विशेषता-को जाननेवाला तथा नम्र मनुष्योंसे स्नेह रखनेवाला रावण कितने ही मनुष्योंको स्नेहपूर्ण दृष्टिसे सम्मानित करता था । कितने ही लोगोंको मन्द मुसकानसे और कितने ही लोगोंको मनोहर वचनोंसे समादृत कर रहा था ॥३६४॥


मनोहरां निसर्गेण विशेषेण विभूषिताम् । समुच्छ्रितसमुत्तुङ्गरत्ननिर्मिततोरणाम् ॥३६५॥

अर्थ: तदनन्तर जो स्वभावसे ही सुन्दर थी तथा उस समय विशेषकर सजायी गयी थी, जिसमें रत्ननिर्मित बड़े ऊँचे-ऊँचे तोरण खड़े किये गये थे ॥३६५॥


मन्दानिलविधूतान्तबहुवर्णध्वजाकुलाम् । कुङ्कुमादिमनोज्ञाम्बुसिक्तनिःशेषभूतलाम् ॥३६६॥

अर्थ: जो मन्द-मन्द वायुसे हिलती हुई रंग-बिरंगी ध्वजाओंसे युक्त थी, केशर आदि मनोज्ञ वस्तुओंसे मिश्रित जलसे जहाँकी समस्त पृथिवी सींची गयी थी ॥३६६॥


सर्वर्तुकुसुमव्याप्तराजमार्गविराजिताम् । अनेकभक्तिभिः पञ्चवर्णैश्चूर्णैरलंकृताम् ॥३६७॥

अर्थ: जो सब ऋतुओंके फूलोंसे व्याप्त राजमार्गोंसे सुशोभित थी, काले, पीले, नीले, लाल, हरे आदि पंचवर्णीय चूर्णसे निर्मित अनेक वेल-बूटोंसे जो अलंकृत थी ॥३६७॥


द्वारदेशसुविन्यस्तपूर्णकुम्भां महाद्युतिम् । सरसैः पल्लवैर्बद्धमालां वस्त्रविभूषिताम् ॥३६८॥

अर्थ: जिसके दरवाजोंपर पूर्ण कलश रखे गये थे, जो महाकान्तिसे युक्त थी, सरस पल्लवोंकी जिसमें वन्दन-मालाएँ बाँधी गयी थीं, जो उत्तमोत्तम वस्त्रोंसे विभूषित थी तथा जहाँ बहुत भारी उत्सव हो रहा था ऐसी लंकानगरीमें रावणने प्रवेश किया ॥३६८॥


वृत्तौ विद्याधरैर्देवैर्यथेन्द्रोऽत्यन्तभूरिभिः । सुखमासादयन् प्राज्यं पूर्वोपार्जितकर्मणा ॥३६९॥

अर्थ: जिस प्रकार अनेक देवोंसे इन्द्र घिरा होता है उसी प्रकार रावण भी अनेक विद्याधरोंसे घिरा था । उस समय वह अपने पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके प्रभावसे उत्तम सुखको प्राप्त हो रहा था ॥३६९॥


आरूढः परमेकान्ते पुष्पके कामगामिनि । स्फुरन्मौलिमहारत्नकेयूरधरसद्भुजः ॥३७०॥

अर्थ: अत्यन्त सुन्दर तथा इच्छानुकूल गमन करने- वाले पुष्पक विमानपर सवार था। उसके मुकुटमें बड़े-बड़े रत्न देदीप्यमान हो रहे थे तथा उसकी भुजाएँ बाजूबन्दोंसे सुशोभित थीं ॥३७०॥


दधानो वक्षसा हारं प्रस्फुरद्विमलप्रभम् । वसन्त इव संजातकुसुमौघविराजितः ॥३७१॥

अर्थ: जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैल रही थी ऐसे हारको वह वक्षःस्थलपर धारण कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो उत्पन्न हुए फूलोंके समूहसे सुशोभित वसन्त ऋतु ही हो ॥३७१॥


वितृप्तिहर्षपूर्णाभिर्वधूभिः कृतवीक्षणः । स्वयं मृदुसमुद्धूतचामराभिः ससंभ्रमम् ॥३७२॥

अर्थ: जो अतृप्तिकर हर्षसे पूर्ण थीं तथा धीरे-धीरे चमर ऊपर उठा रही थीं ऐसी स्त्रियाँ हाव-भावपूर्वक उसे देख रही थीं ॥३७२॥


नानावादित्रशब्देन जयशब्देन चारुणा । आनन्दितः सुवेश्याभिर्नृत्यन्तीभिः समन्वितः ॥३७३॥

अर्थ: वह नाना प्रकारके बाजोंके शब्द तथा मनोहर जय-जयकारसे आनन्दित हो रहा था और नृत्य करती हुई उत्तमोत्तम वेश्याओंसे सहित था ॥३७३॥


प्रविष्टो मुदितो लङ्कां समुद्भूतमहोत्सवाम् । भवनं च निजं बन्धुभृत्यवर्गाभिनन्दितः ॥३७४॥

अर्थ: इस प्रकार उसने बड़ी प्रसन्नतासे, अनेक महोत्सवोंसे भरी लंकामें प्रवेश किया और बन्धुजन तथा भृत्यसमूहसे अभिनन्दित हो अपने भवनमें भी पदार्पण किया ॥३७४॥


सुसन्नद्धान् जित्वा तृणमिव समस्तानरिगणान् पुरोपात्तात् पुण्यात् समधिगतसुप्राज्यविभवः । क्षयं प्राप्ते तस्मिन् विगलितरुचिर्भ्रष्टविभवो बभूवासौ शक्रो धिगतिचपलं मानुषसुखम् ॥३७५॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि जिसने पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके प्रभावसे, सब प्रकारकी तैयारीसे युक्त समस्त शत्रुओंको तृणके समान जीतकर उत्तम वैभव प्राप्त किया था ऐसा इन्द्र विद्याधर पुण्यकर्मके क्षीण होनेपर कान्तिहीन तथा विभवसे रहित हो गया सो इस अत्यन्त चंचल मनुष्यके सुखको धिक्कार है ॥३७५॥


१२. द्वादशं पर्व (इन्द्रपराभवाभिधानं) (जारी)

असौ प्राप्तौ वृद्धिं दशमुखखगः पूर्वचरिता- च्छुभान्निर्धूयालं प्रबलमहितव्रातमखिलम् । इति ज्ञात्वा भव्या जगति निखिलं कर्मजनितं विमुक्तान्यासङ्गा रविरुचिकरं यातु सुकृतम् ॥३७६॥

अर्थ: तथा विद्याधर रावण अपने पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके प्रभावसे समस्त बलवान् शत्रुओंको निर्मूल नष्ट कर वृद्धिको प्राप्त हुआ । इस प्रकार संसारके समस्त कार्य कर्मजनित हैं ऐसा जानकर हे भव्यजनो ! अन्य पदार्थोंमें आसक्ति छोड़कर सूर्यके समान कान्तिको उत्पन्न करनेवाले एक पुण्य कर्मका ही संचय करो ॥३७६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते इन्द्रपराभवाभिधानं नाम द्वादशं पर्व ॥१२॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें इन्द्र विद्याधरके पराभवका वर्णन करनेवाला बारहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१२॥

१३. त्रयोदशं पर्व (इन्द्रनिर्वाणाभिधानं)

ततः शक्रस्य सामन्ताः स्वामिदुःखसमाकुलाः । पुरस्कृतसहस्राराः प्राप्ता रावणमन्दिरम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर स्वामीके दुःखसे आकुल इन्द्रके सामन्त, सहस्रारको आगे कर रावणके महलमें पहुँचे ॥१॥


प्रविष्टाश्च प्रतीहारज्ञापिता विनयान्विताः । प्रणम्य च स्थिता दत्तेष्वासनेषु यथोचितम् ॥२॥

अर्थ: द्वारपालके द्वारा समाचार देकर बड़ी विनयसे सबने भीतर प्रवेश किया और सब प्रणाम कर दिये हुए आसनोंपर यथायोग्य रीतिसे बैठ गये ॥२॥


दृष्टोऽथ गौरवेणोचे सहस्रारो दशाननम् । जितस्तातस्त्वया शक्रो मुञ्चेदानीं गिरा मम ॥३॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने सहस्रारकी ओर बड़े गौरवसे देखा । तब सहस्रार रावणसे बोला कि तूने मेरे पुत्र इन्द्रको जीत लिया है अब मेरे कहनेसे छोड़ दे ॥३॥


बाह्वोः पुण्यस्य चोदात्तं सामर्थ्यं दर्शितं त्वया । परगर्वापसादं हि समीहन्ते नराधिपाः ॥४॥

अर्थ: तूने अपनी भुजाओं और पुण्यकी उदार महिमा दिखलायी सो ठीक ही है क्योंकि राजा दूसरेके अहंकारको नष्ट करनेकी ही चेष्टा करते हैं ॥४॥


इत्युक्ते लोकपालानां वदनेभ्यः समुत्थितः । शब्दोऽयमेव विस्पष्टः प्रतिनिःस्वनसंनिमः ॥५॥

अर्थ: सहस्रारके ऐसा कहनेपर लोकपालोंके मुखसे भी यही शब्द निकला सो मानो उसके शब्द की प्रतिध्वनि ही निकली थी ॥५॥


लोकपालानथोवाच विहस्योद्वासितान्तकः । समयोऽस्ति विमुञ्चामि येन नाथं दिवौकसाम् ॥६॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने हँसकर लोकपालोंसे कहा कि एक शर्त है उस शर्तसे ही मैं इन्द्रको छोड़ सकता हूँ ॥६॥


अद्य प्रभृति मे सर्वे यूयं कर्म यथोचितम् । संमार्जनादि सेवध्वं सर्वमन्तर्बहिःपुरः ॥७॥

अर्थ: वह शर्त यह है कि आजसे लेकर तुम सब, मेरे नगरके भीतर और बाहर बुहारी देना आदि जो भी कार्य हैं उन्हें करो ॥७॥


पुरीयं सांप्रतं कृत्या भवद्भिः प्रतिवासरम् । परागाशुचिपाषाणतृणकण्टकवर्जिता ॥८॥

अर्थ: अब आप सबको प्रतिदिन ही यह नगरी धूलि, अशुचिपदार्थ, पत्थर, तृण तथा कण्टक आदिसे रहित करनी होगी ॥८॥


गृहीत्वा कुम्भमिन्द्रोऽपि वारिणा मोदचारुणा । महीं सिञ्चतु कर्मेदमस्य लोके प्रकीर्त्यते ॥९॥

अर्थ: तथा इन्द्र भी घड़ा लेकर सुगन्धित जलसे पृथिवी सींचें । लोकमें इसका यही कार्य प्रसिद्ध है ॥९॥


पञ्चवर्णैश्च कुर्वन्तु पुष्पैर्गन्धमनोहरैः । संभ्रान्ताः प्रकरं देव्यः सर्वालंकारभूषिताः ॥१०॥

अर्थ: और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित इनकी सम्भ्रान्त देवियाँ पंचवर्णके सुगन्धित फूलोंसे नगरी को सजावें ॥१०॥


समयेनामुना युक्ता यदि तिष्ठन्ति सादराः । विमुञ्चामि ततः शक्रं कुतो निर्मुक्तिरन्यथा ॥११॥

अर्थ: यदि आप लोग आदरके साथ इस शर्तसे युक्त होकर रहना चाहते हैं तो इन्द्रको अभी छोड़ देता हूँ । अन्यथा इसका छूटना कैसे हो सकता है ? ॥११॥


इत्युक्त्वा वीक्षमाणोऽसौ लोकपालांस्त्रपानतान् । जहास मुहुराप्तानां ताडयन् पाणिना करम् ॥१२॥

अर्थ: इतना कह रावण लज्जासे झुके हुए लोकपालोंकी ओर देखता तथा आप्तजनोंके हाथको अपने हाथमें ताड़ित करता हुआ बार-बार हँसने लगा ॥१२॥


ततो विनयनम्रः सन् सहस्रारमवोचत । समाहृदयहारिण्या क्षरन्निव गिरामृतम् ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर उसने विनयावनत होकर सहस्रारसे कहा । उस समय रावण सभाके हृदयको हरनेवाली अपनी मधुर वाणीसे मानो अमृत ही झरा रहा था ॥१३॥


यथा तात प्रतीक्ष्यस्त्वं वासवस्य तथा मम । अधिकं वा ततः कुर्यां कथमाज्ञाविलङ्घनम् ॥१४॥

अर्थ: उसने कहा कि हे तात ! जिस प्रकार आप इन्द्रके पूज्य हैं उसी प्रकार मेरे भी पूज्य हैं, बल्कि उससे भी अधिक । इसलिए मैं आपकी आज्ञाका उल्लंघन कैसे कर सकता हूँ ? ॥१४॥


गुरवः परमार्थेन यदि न स्युर्भवादृशाः । अधस्ततो धरित्रीयं व्रजेन्मुक्ता धरैरिव ॥१५॥

अर्थ: यदि यथार्थमें आप-जैसे गुरुजन न होते तो यह पृथिवी पर्वतोंसे छोड़ी गयी के समान रसातलको चली जाती ॥१५॥


पुण्यवानस्मि यत्पूज्यो ददाति मम शासनम् । भवद्विधनियोगानां न पदं पुण्यवर्जिताः ॥१६॥

अर्थ: चूँकि आप-जैसे पूज्यपुरुष मुझे आज्ञा दे रहे हैं अतः मैं पुण्यवान् हूँ। यथार्थमें आप-जैसे पुरुषोंकी आज्ञाके पात्र पुण्यहीन मनुष्य नहीं हो सकते ॥१६॥


तदद्यारभ्य संचिन्त्य मनोज्ञं क्रियतां तथा । यथा शक्रस्य सौस्थित्यं जायते मम च प्रमो ॥१७॥

अर्थ: इसलिए हे प्रभो ! आज आप विचारकर ऐसा उत्तम कार्य कीजिए जिससे इन्द्र और मुझमें सौहार्द्र उत्पन्न हो जाये। इन्द्र सुखसे रहे और मैं भी सुखसे रह सकूँ ॥१७॥


अयं शक्रो मम भ्राता तुरीयः सांप्रतं बली । एनं प्राप्य करिष्यामि पृथिवीं वीतकण्टकाम् ॥१८॥

अर्थ: यह बलवान् इन्द्र मेरा चौथा भाई है, इसे पाकर मैं पृथ्वीको निष्कण्टक कर दूँगा ॥१८॥


लोकपालास्तथैवास्य तच्च राज्यं यथा पुरा । ततोऽधिकं वा गृह्णातु विवेकेन किमावयोः ॥१९॥

अर्थ: इसके लोकपाल पहलेकी तरह ही रहें तथा इसका राज्य भी पहलेकी तरह ही रहे अथवा उससे भी अधिक ले ले। हम दोनोंमें भेदकी आवश्यकता ही क्या है ? ॥१९॥


आज्ञा च मम शक्रे वा दातव्या कृत्यवस्तुनि । गुरुभिः सा हि शेषेव रक्षालंकारकारणम् ॥२०॥

अर्थ: आप जिस प्रकार इन्द्रको आज्ञा देते हैं उसी प्रकार मुझमें करने योग्य कार्यकी आज्ञा देते रहें क्योंकि गुरुजनोंकी आज्ञा ही शेषाक्षतकी तरह रक्षा एवं शोभाको करनेवाली है ॥२०॥


आस्यतामिह वा छन्दादथवा रथनूपुरे । यत्र वेच्छत का भूमिर्भृत्ययोरावयोर्मता ॥२१॥

अर्थ: आप अपने अभिप्रायके अनुसार यहाँ रहें अथवा रथनूपुर नगरमें रहें अथवा जहाँ इच्छा हो वहाँ रहें। हम दोनों आपके सेवक हैं हमारी भूमि ही कौन है ? ॥२१॥


इति प्रियवचोवारिसमार्द्रीकृतमानसः । अवोचत सहस्रारस्ततोऽपि मधुरं वचः ॥२२॥

अर्थ: इस प्रकारके प्रियवचनरूपी जलसे जिसका मन भीग रहा था ऐसा सहस्रार रावणसे भी अधिक मधुर वचन बोला ॥२२॥


नूनं भद्र समुत्पत्तिः सज्जनानां भवादृशाम् । सममेव गुणैः सर्वलोकाह्लादनकारिभिः ॥२३॥

अर्थ: उसने कहा कि हे भद्र ! आप-जैसे सज्जनोंकी उत्पत्ति समस्त लोगोंको आनन्दित करनेवाले गुणोंके साथ ही होती है ॥२३॥


आयुष्मन्नस्य शौर्यस्य विनयोऽयं तवोत्तमः । अलंकारसमस्तेऽस्मिन् भुवने श्लाघ्यतां गतः ॥२४॥

अर्थ: हे आयुष्मन् ! तुम्हारी यह उत्तम विनय इस संसारमें प्रशंसाको प्राप्त है तथा तुम्हारी इस शूरवीरताके आभूषणके समान है ॥२४॥


भवतो दर्शनेनेदं जन्म मे सार्थकं कृतम् । पितरौ पुण्यवन्तौ तौ त्वया यौ कारणीकृतौ ॥२५॥

अर्थ: आपके दर्शनने मेरे इस जन्मको सार्थक कर दिया। वे माता-पिता धन्य हैं जिन्हें तूने अपनी उत्पत्तिमें कारण बनाया है ॥२५॥


क्षमावता समर्थेन कुन्दनिर्मलकीर्तिना । दोषाणां संभवाशङ्का त्वया दूरमपाकृता ॥२६॥

अर्थ: जो समर्थ होकर भी क्षमावान् है, तथा जिसकी कीर्ति कुन्दके फूलके समान निर्मल है ऐसे तूने दोषोंके उत्पन्न होनेकी आशंका दूर हटा दी है ॥२६॥


एवमेतद्यथा वक्षि सर्वं संपद्यते त्वयि । ककुष्करिकराकारौ कुरुतः किं न ते भुजौ ॥२७॥

अर्थ: तू जैसा कह रहा है वह ऐसा ही है । तुझमें सर्व कार्य सम्भव हैं । दिग्गजोंकी सूँड़के समान स्थूल तेरी भुजाएँ क्या नहीं कर सकती हैं ॥२७॥


किंतु मातेव नो शक्या त्यक्तुं जन्मवसुंधरा । सा हि क्षणाद्वियोगेन कुरुते चित्तमाकुलम् ॥२८॥

अर्थ: किन्तु जिस प्रकार माता नहीं छोड़ी जा सकती उसी प्रकार जन्मभूमि भी नहीं छोड़ी जा सकती क्योंकि वह क्षण-भरके वियोगसे चित्तको आकुल करने लगती है ॥२८॥


अशक्ताः स्वभुवं त्यक्तुं तत्र नो मित्रबान्धवाः । चातका इव सोत्कण्ठास्तिष्ठन्त्यध्वावलोकिनः ॥२९॥

अर्थ: हम अपनी भूमिको छोड़नेके लिए असमर्थ हैं क्योंकि वहाँ हमारे मित्र तथा भाई-बान्धव चातककी तरह उत्कण्ठासे युक्त हो मार्ग देखते हुए स्थित होंगे ॥२९॥


कुलक्रमसमायातां सेवमानो गुणालय । लङ्कां यासि परां प्रीतिं जन्मभूमेः किमुच्यताम् ॥३०॥

अर्थ: हे गुणालय ! आप भी तो अपनी कुल-परम्परासे चली आयी लंकाकी सेवा करते हुए परम प्रीतिको प्राप्त हो रहे हैं सो बात ही ऐसी है जन्मभूमिके विषयमें क्या कहा जाये ? ॥३०॥


तस्मात्तामेव गच्छामो महाभोगोद्भवावनिम् । देवानांप्रिय निर्विघ्नं रक्षताद्भुवनं चिरम् ॥३१॥

अर्थ: इसलिए हम जहाँ महाभोगोंकी उत्पत्ति होती है अपनी उसी भूमिको जाते हैं । हे देवोंके प्रिय ! तुम चिरकाल तक संसारकी रक्षा करो ॥३१॥


इत्युक्त्वानुगतो दूरं कैलासक्षोभकारिणा । सहस्रारो गतः सेन्द्रो लोपपालैः समं गिरिम् ॥३२॥

अर्थ: इतना कहकर सहस्रार इन्द्र नामा पुत्र तथा लोकपालोंके साथ विजयार्ध पर्वतपर चला गया । रावण भेजनेके लिए कुछ दूर तक उसके साथ गया ॥३२॥


यथास्वं च स्थिताः सर्वे पूर्ववल्लोकपालिनः । भङ्गादसारतां प्राप्ताश्चलयन्त्रमया इव ॥३३॥

अर्थ: सब लोकपाल पहलेकी तरह ही अपने-अपने स्थानोंपर रहने लगे परन्तु पराजयके कारण निःसार हो गये और चलते-फिरते यन्त्रके समान जान पड़ने लगे ॥३३॥


विजयार्धजलोकेन दृश्यमाना महात्रपाः । नाज्ञासिषुः क्व गच्छाम इति मोगद्विषः सुराः ॥३४॥

अर्थ: बहुत भारी लज्जासे भरे देव लोगोंकी ओर जब विजयार्धवासी लोग देखते थे तब वे यह नहीं जान पाते थे कि हम कहाँ जा रहे हैं ? इस तरह देव लोग सदा भोगोंसे उदास रहते थे ॥३४॥


इन्द्रोऽपि न पुरे प्रीतिं लेभे नोद्यानभूमिषु । न दीर्घिकासु राजीवरजःपिञ्जरवारिषु ॥३५॥

अर्थ: इन्द्र भी न नगरमें, न बाग-बगीचोंमें और न कमलोंकी परागसे पीले जलवाली वापिकाओंमें ही प्रीतिको प्राप्त होता था अर्थात् पराजयके कारण उसे कहीं अच्छा नहीं लगता था ॥३५॥


न दृष्टिमपि कान्तासु चक्रे प्रगुणवर्तिनीम् । तनौ तु सकला कैव त्रपानिर्भरचेतसः ॥३६॥

अर्थ: अब वह स्त्रियोंपर भी अपनी सरल दृष्टि नहीं डालता था फिर शरीरकी तो गिनती ही क्या थी ? उसका चित्त सदा लज्जासे भरा रहता था ॥३६॥


अथाप्युद्विजमानस्य तस्य लोकोऽनुवर्तनम् । चकारान्यकथासङ्गैः कुर्वन् भङ्गस्य विस्मृतिम् ॥३७॥

अर्थ: यद्यपि लोग अन्यान्य कथाओंके प्रसंग छेड़कर उसके पराजय सम्बन्धी दुःखको भुला देनेके लिए सदा अनुकूल चेष्टा करते थे तो भी उसका चित्त स्वस्थ नहीं होता था ॥३७॥


अथैकस्तम्भमूर्धस्थे स्वसद्मान्तरवर्तिनि । गन्धमादनशृङ्गाभे स्थितो जिनवरालये ॥३८॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन इन्द्र, अपने महलकी भीतर विद्यमान, एक खम्भेके अग्रभागपर स्थित, गन्धमादन पर्वतके शिखरके समान सुशोभित जिनालयमें बैठा था ॥३८॥


बुधैः परिवृतो दध्याविति शक्रो निरादरम् । वहन्नङ्गं गतच्छायं स्मरन् मङ्गमनारतम् ॥३९॥

अर्थ: विद्वान् लोग उसे घेरकर बैठे थे । वह निरन्तर पराजयका स्मरण करता हुआ शरीरको निरादर भावसे धारण कर रहा था । बैठे-बैठे ही उसने इस प्रकार विचार किया कि ॥३९॥


धिग्विद्यागोचरैश्वर्यं विलीनं यदिति क्षणात् । शारदानामिवाब्दानां वृन्दमस्यन्तमुन्नतम् ॥४०॥

अर्थ: विद्याओंसे सम्बन्ध रखनेवाले इस ऐश्वर्यंको धिक्कार है जो कि शरद् ऋतुके बादलोंके अत्यन्त उन्नत समूहके समान क्षण-भरमें विलीन हो गया ॥४०॥


तानि शस्त्राणि ते नागास्ते भटास्ते तुरङ्गमाः । सर्वं तृणसमं जातं मम पूर्वं कृताद्भुतम् ॥४१॥

अर्थ: वे शस्त्र, वे हाथी, वे योद्धा और वे घोड़े जो कि पहले मुझे आश्चर्य उत्पन्न करते थे आज सबके सब तृणके समान तुच्छ जान पड़ते हैं ॥४१॥


अथवा कर्मणामेतद्वैचित्र्यं कोऽन्यथा नरः । कर्तुं शक्नोति तेषां हि सर्वमन्यद्बलाधरम् ॥४२॥

अर्थ: अथवा कर्मोंकी इस विचित्रताको अन्यथा करनेके लिए कौन मनुष्य समर्थ है ? यथार्थमें अन्य सब पदार्थ कर्मोंके बलसे ही बल धारण करते हैं ॥४२॥


नूनं पुराकृतं कर्म भोगसंपादनक्षमम् । परिक्षयं मम प्राप्तं येनैषा वर्तते दशा ॥४३॥

अर्थ: निश्चय ही मेरा पूर्वसंचित पुण्यकर्म जो कि नाना भोगोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ है परिक्षीण हो चुका है इसीलिए तो यह अवस्था हो रही है ॥४३॥


वरं समर एवास्मिन्मृतः स्याच्छत्रुसंकटे । नाकीर्तिर्यत्र जायेत सर्वविष्टपगामिनी ॥४४॥

अर्थ: शत्रुके संकटसे भरे युद्धमें यदि मर ही जाता तो अच्छा होता क्योंकि उससे समस्त लोकमें फैलनेवाली अपकीर्ति तो उत्पन्न नहीं होती ॥४४॥


चरणं शिरसि न्यस्य शत्रूणां येन जीवितम् । शत्रुणानुमतां सोऽहं सेवे लक्ष्मीं कथं हरिः ॥४५॥

अर्थ: जिसने शत्रुओंके सिरपर पैर रखकर जीवन बिताया वह मैं अब शत्रु द्वारा अनुमत लक्ष्मीका कैसे उपभोग करूँ ? ॥४५॥


परित्यज्य सुखे तस्मादभिलाषं भवोद्भवे । निश्रेयसंपदप्राप्तिकारणानि भजाम्यहम् ॥४६॥

अर्थ: इसलिए अब मैं संसार सम्बन्धी सुखकी अभिलाषा छोड़ मोक्षपदकी प्राप्तिके जो कारण हैं उन्हींकी उपासना करता हूँ ॥४६॥


रावणो मे महाबन्धुरागतः शत्रुवेषभृत् । येनासारसुखास्वादसक्तोऽस्मि परिबोधितः ॥४७॥

अर्थ: शत्रुके वेशको धारण करनेवाला रावण मेरा महाबन्धु बनकर आया था जिसने कि इस असार सुखके स्वादमें लीन मुझको जागृत कर दिया ॥४७॥


अत्रान्तरे मुनिः प्राप्तो नाम्ना निर्वाणसंगमः । विहरन् क्वापि योग्यानि स्थानानि गुणवाससाम् ॥४८॥

अर्थ: इसी बीचमें गुणी मनुष्योंके योग्य स्थानोंमें विहार करते हुए निर्वाणसंगम नामा चारण-ऋद्धिधारी मुनि वहाँ आकाशमार्गसे जा रहे थे ॥४८॥


सहसा व्रजतस्तस्य गतिः स्तम्भमुपागता । प्रणिधाय ततश्चक्षुरधोऽसौ चैत्यमैक्षत ॥४९॥

अर्थ: सो चलते-चलते उनकी गति सहसा रुक गयी । तदनन्तर उन्होंने जब नीचे दृष्टि डाली तो मन्दिरके दर्शन हुए ॥४९॥


प्रत्यक्षज्ञानसंपन्नस्तस्मिंश्च जिनपुङ्गवम् । वन्दितुं नमसः शीघ्रमवतीर्णो महायतिः ॥५०॥

अर्थ: प्रत्यक्ष ज्ञानके धारी महामुनि मन्दिरमें विराजमान जिन-प्रतिमा की वन्दना करनेके लिए शीघ्र ही आकाशसे नीचे उतरे ॥५०॥


संतोषेण च शक्रेण कृताभ्युत्थानपूजनः । चक्रे जिननमस्कारं विधिना यतिसत्तमः ॥५१॥

अर्थ: राजा इन्द्रने बड़े सन्तोषसे उठकर जिनकी पूजा की थी ऐसे उन मुनिराजने विधि-पूर्वक जिनप्रतिमाको नमस्कार किया ॥५१॥


आसीनस्य ततो जोषं वन्दित्वा चरणौ मुनेः । पुरः स्थित्वा हरिश्चक्रे चिरमात्मनिगर्हणम् ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर जब मुनिराज जिनेन्द्रदेवकी वन्दना कर चुप बैठ गये तब इन्द्र उनके चरणोंको नमस्कार कर सामने बैठ गया और अपनी निन्दा करने लगा ॥५२॥


सर्वसंसारवृत्तान्तवेदनात्यन्तकोविदैः । मुनिना परमैर्वाक्यैः परिसान्त्वनमाहृतः ॥५३॥

अर्थ: मुनिराजने समस्त संसारके वृत्तान्तका अनुभव करानेमें अतिशय निपुण उत्कृष्ट वचनोंसे उसे सन्तोष प्राप्त कराया ॥५३॥


अपृच्छत् स भवं पूर्वमात्मनो मुनिपुङ्गवम् । स चेत्यकथयत्तस्मै गुणग्रामविभूषितः ॥५४॥

अर्थ: अथानन्तर इन्द्रने मुनिराजसे अपना पूर्वभव पूछा सो गुणोंके समूहसे विभूषित मुनिराज उसके लिए इस प्रकार पूर्वभव कहने लगे ॥५४॥


चतुर्गतिगतानेकयोनिदुःखमहावने । भ्राम्यन् शिखापदामिख्ये नगरे मानुषीं गतिम् ॥५५॥

प्राप्तो जीवः कुले जातो दरिद्रे स्त्रैणसंगतः । कुलवान्तेति बिभ्राणा नामार्थेन समागतम् ॥५६॥

अर्थ: हे राजन् ! चतुर्गति सम्बन्धी अनेक योनियोंके दुःखरूपी महावनमें भ्रमण करता हुआ एक जीव शिखापदनामा नगरमें मनुष्य गतिको प्राप्त हो दरिद्र कुलमें उत्पन्न हुआ । वहाँ स्त्री पर्यायसे युक्त हो वह जीव ‘कुलवान्ता’ इस सार्थक नामको धारण करनेवाला हुआ ॥५५-५६॥


सा चिल्ला चिपिटा व्याधिशतसंकुलविग्रहा । कथंचित्कर्मसंयोगाल्लोकोच्छिष्टेन जीविता ॥५७॥

अर्थ: कुलवान्ताके नेत्र सदा कींचरसे युक्त रहते थे, उसकी नाक चपटी थी और उसका शरीर सैकड़ों बीमारियोंसे युक्त था । इतना होनेपर भी उसके भोजनका ठिकाना नहीं था । वह कर्मोदयके कारण जिस किसी तरह लोगोंका जूठन खाकर जीवित रहती थी ॥५७॥


दुश्चेला दुर्भगा रूक्षा स्फुटिताङ्गा कुमूर्धजा । उत्त्रास्यमाना लोकेन लेभे सा शर्म न क्वचित् ॥५८॥

अर्थ: उसके वस्त्र अत्यन्त मलिन थे, दौर्भाग्य उसका पीछा कर रहा था, सारा शरीर अत्यन्त रूक्ष था, हाथ-पैर आदि अंग फटे हुए थे और खोटे केश बिखरे हुए थे । वह जहाँ जाती थी वहीं लोग उसे तंग करते थे । इस तरह वह कहीं भी सुख नहीं प्राप्त कर सकती थी ॥५८॥


मुहूर्तं परिवर्ज्यान्नं शरीरं च सुमानसा । जाता किंपुरुषस्य स्त्री क्षीरधारेति नामतः ॥५९॥

अर्थ: अन्त समय शुभमति हो उसने एक मुहूर्तके लिए अन्नका त्याग कर अनशन धारण किया जिससे शरीर त्याग कर किंपुरुषनामा देवकी क्षीरधारा नामकी स्त्री हुई ॥५९॥


च्युता च रत्ननगरे धरणीगोमुखाख्ययोः । बिभ्रत्सहस्रभागाख्यां तनयोऽभूत्कुटुम्बिनोः ॥६०॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर रत्नपुर नगरमें धरणी और गोमुख नामा दम्पतीके सहस्रभाग नामक पुत्र हुआ ॥६०॥


लब्ध्वा परमसम्यक्त्वमणुव्रतसमन्वितः । पञ्चतां प्राप्य शुक्राह्वे जातो विबुधसत्तमः ॥६१॥

अर्थ: वहाँ उत्कृष्ट सम्यग्दर्शन प्राप्त कर अणुव्रतोंका धारी हुआ और अन्तमें मरकर शुक्र नामा स्वर्गमें उत्तम देव हुआ ॥६१॥


च्युतो महाविदेहेऽथ नगरे रत्नसंचये । गुणावल्यां मणेर्जातोऽमात्यात् सामन्तवर्द्धनः ॥६२॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर महाविदेह क्षेत्रके रत्नसंचयनामा नगरमें मणिनामक मन्त्रीकी गुणावली नामक स्त्रीसे सामन्तवर्धन नामक पुत्र हुआ ॥६२॥


निष्क्रान्तो विभुना सार्धं महाव्रतधरोऽभवत् । अतितीव्रतया नित्यं तत्त्वार्थगतमानसः ॥६३॥

परीषहगणस्यालं षोढा निर्मलदर्शनः । कषायरहितः प्रेत्य परं ग्रैवेयकं गतः ॥६४॥

अहमिन्द्रैः परं सौख्यं तत्र भुक्त्वा चिरं च्युतः । जातो हृदयसुन्दर्यां सहस्राराख्यखेचरात् ॥६५॥

पूर्वाभ्यासेन शक्रस्य सुखे संसक्तमानसः । इन्द्रस्त्वं खेचराधीशो नगरे रथनूपुरे ॥६६॥

अर्थ: सामन्तवर्धन अपने राजाके साथ विरक्त हो महाव्रतका धारक हुआ । वहाँ उसने अत्यन्त कठिन तपश्चरण किया, तत्त्वार्थके चिन्तनमें निरन्तर मन लगाया, अच्छी तरह परीषह सहन किये, निर्मल सम्यग्दर्शन प्राप्त किया और कषायोंपर विजय प्राप्त की । अन्त समय मरकर वह ग्रैवेयक गया सो अहमिन्द्र होकर चिरकाल तक वहाँके सुख भोगता रहा । अन्त समयमें वहाँसे च्युत हो रथनूपुर नगरमें सहस्रार नामक विद्याधरकी हृदयसुन्दरी रानीसे इन्द्र नामको धारण करनेवाला तू विद्याधरोंका राजा हुआ है । पूर्व अभ्यासके कारण ही तेरा मन इन्द्रके सुखमें लीन रहा है ॥६३-६६॥


स त्वमिन्द्र विषण्णः किं वृथैव परितप्यसे । विद्याधिको जितोऽस्मीति वहन्नात्मन्यनादरम् ॥६७॥

अर्थ: सो हे इन्द्र ! मैं विद्याओंसे युक्त होता हुआ भी शत्रुसे हार गया हूँ, इस प्रकार अपने आपके विषयमें अनादरको धारण करता हुआ तू विषादयुक्त हो व्यर्थ ही क्यों सन्ताप कर रहा है ॥६७॥


निर्बुद्धे ! कोद्रवानुप्त्वा शालीन् प्रार्थयसे वृथा । कर्मणामुचितं तेषां जायते प्राणिनां फलम् ॥६८॥

अर्थ: अरे निर्बुद्धि ! तू कोदों बोकर धानकी व्यर्थ ही इच्छा करता है । प्राणियोंको सदा कर्मोंके अनुकूल ही फल प्राप्त होता है ॥६८॥


क्षीणं पुराकृतं कर्म तव भोगस्य साधनम् । हेतुना न बिना कार्यं भवतीति किमद्भुतम् ॥६९॥

अर्थ: तुम्हारे भोगोपभोगका साधन जो पूर्वोपार्जित कर्म था वह अब क्षीण हो गया है सो कारणके बिना कार्य नहीं होता है इसमें आश्चर्य ही क्या है ? ॥६९॥


निमित्तमात्रमेतस्मिन् रावणस्ते पराभवे । जन्मन्यत्रैव यत्कर्म कृतं तेनैव लम्भितम् ॥७०॥

अर्थ: तेरे इस पराभवमें रावण तो निमित्तमात्र है । तूने इसी जन्ममें कर्म किये हैं उन्हींसे यह पराभव प्राप्त हुआ है ॥७०॥


किं न स्मरसि यत्पूर्वं क्रीडता दुर्नयं कृतम् । ऐश्वर्यजनितो भ्रष्टो मदस्ते स्मर सांप्रतम् ॥७१॥

अर्थ: तूने पहले क्रीड़ा करते समय जो अन्याय किया है उसका स्मरण क्यों नहीं करता है ? ऐश्वर्यसे उत्पन्न हुआ तेरा मद चूँकि अब नष्ट हो चुका है इसलिए अब तो पिछली बातका स्मरण कर ॥७१॥


चिरवृत्ततया बुद्धौ वृत्तान्तस्ते स्वयं कृतः । नारोहति यतस्तस्माच्छृण्वेकाग्रचेतसा ॥७२॥

अर्थ: जान पड़ता है कि बहुत समय हो जानेके कारण वह वृत्तान्त स्वयं तेरी बुद्धिमें नहीं आ रहा है इसलिए एकाग्रचित्त होकर सुन, मैं कहता हूँ ॥७२॥


अरिंजयपुरे बह्निवेगाख्यः खेचरोऽभवत् । स्वयंवरार्थमाहल्यां चक्रे वेगवतीसुताम् ॥७३॥

अर्थ: अरिंजयपुर नगरमें वह्निवेग नामा विद्याधर राजा था सो उसने वेगवती रानीसे उत्पन्न आहल्या नामक पुत्रीका स्वयंवर रचा था ॥७३॥


तत्र विद्याधराः सर्वे यथाविभवशोभिताः । समागताः परित्यज्य श्रेण्यावत्यन्तमुत्सुकाः ॥७४॥

अर्थ: उत्सुकतासे भरे तथा यथायोग्य वैभवसे शोभित समस्त विद्याधर दक्षिण श्रेणी छोड़-छोड़कर उस स्वयंवरमें आये थे ॥७४॥


भवानपि गतस्तत्र युक्तः परमसंपदा । अन्यश्चानन्दमालाख्यश्चन्द्रावर्तपुराधिपः ॥७५॥

अर्थ: उत्कृष्ट सम्पदासे युक्त होकर आप भी वहाँ गये थे तथा चन्द्रावर्त नगरका राजा आनन्दमाल भी वहाँ आया था ॥७५॥


संत्यज्य खेचरान् सर्वान् पूर्वकर्मानुभावतः । कन्ययानन्दमालोऽसौ वृतः सर्वाङ्गकान्तया ॥७६॥

अर्थ: सर्वांगसुन्दरी कन्याने पूर्व कर्मके प्रभावसे समस्त विद्याधरोंको छोड़कर आनन्दमालको वरा ॥७६॥


परिणीय स तां भोगान् प्राप चिन्तितसंगतान् । यथामराधिपः स्वर्गे प्रतिवासरवर्द्धिनः ॥७७॥

अर्थ: सो आनन्दमाल उसे विवाहकर इच्छा करते ही प्राप्त होनेवाले भोगोंका उस तरह उपभोग करने लगा जिस तरह कि इन्द्र स्वर्गमें प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होनेवाले भोगोंका उपभोग करता है ॥७७॥


ततः प्रभृति कोपेन स्वमीर्ष्याजेन भूरिणा । गृहीतो बैरितामस्य संप्राप्तोऽतिगरीयसीम् ॥७८॥

अर्थ: ईर्ष्याजन्य बहुत भारी क्रोधके कारण तू उसी समयसे उसके साथ अत्यधिक शत्रुता करने लगा ॥७८॥


ततोऽस्य सहसा बुद्धिरियं जाता स्वकर्मतः । देहोऽयमध्रुवः किंचित्कृत्यमेतेन नो मम ॥७९॥

अर्थ: तदनन्तर कर्मोंकी अनुकूलताके कारण आनन्दमालको सहसा यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि यह शरीर अनित्य है अतः इससे मुझे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥७९॥


तपः करोमि संसारदुःखं येन विनश्यति । का वा मोगेषु प्रत्याशा विप्रलम्भनकारिषु ॥८०॥

अर्थ: मैं तो तप करता हूँ जिससे संसार सम्बन्धी दुःखका नाश होगा । धोखा देनेवाले भोगोंमें क्या आशा रखना है ? ॥८०॥


अवधार्येदमत्यन्तं विबुद्धेनान्तरात्मना । त्यक्त्वा परिग्रहं सर्वं चचार परमं तपः ॥८१॥

अर्थ: प्रबोधको प्राप्त हुई अन्तरात्मासे ऐसा विचारकर उसने सर्व परिग्रहका त्यागकर उत्कृष्ट तप धारण कर लिया ॥८१॥


हंसावलीनदीतीरे स्थितः प्रतिमयान्यदा । स त्वया प्रत्यभिज्ञातो रथावर्तमहीधरे ॥८२॥

अर्थ: एक दिन हंसावली नदीके किनारे रथावर्त नामा पर्वतपर वह प्रतिमा योगसे विराजमान था सो तूने पहचान लिया ॥८२॥


दर्शनेन्धनसंवृद्धपूर्वकोपाग्निना ततः । त्वयासौ कुर्वता नर्म गर्वेण हसितो मुहुः ॥८३॥

अर्थ: दर्शनरूपी ईन्धनसे जिसकी पिछली क्रोधाग्नि भड़क उठी थी ऐसे तूने क्रीड़ा करते हुए अहंकारवश उसकी बार-बार हँसी की थी ॥८३॥


आहल्यारमणः स त्वं कामभोगातिवत्सलः । अधुना किं स्थितोऽस्येवमिति भाषणकारिणा ॥८४॥

अर्थ: तू कह रहा था कि अरे ! तू तो कामभोगका अतिशय प्रेमी आहल्याका पति है, इस समय यहाँ इस तरह क्यों बैठा है ? ॥८४॥


वष्टितो रज्जुभिः क्षोणीधरनिष्कम्पविग्रहः । तत्त्वार्थचिन्तनासंगनितान्तस्थिरमानसः ॥८५॥

अर्थ: ऐसा कहकर तूने उन्हें रस्सियोंसे कसकर लपेट लिया फिर भी उनका शरीर पर्वतके समान निष्कम्प बना रहा और उनका मन तत्त्वार्थकी चिन्तनामें लीन होनेसे स्थिर रहा आया ॥८५॥


दृष्ट्वाभिभूयमानं तं त्वयास्य निकटस्थितः । कल्याणसंज्ञको भ्राता साधुः क्रोधेन दुःखितः ॥८६॥

अर्थ: इस प्रकार आनन्दमाल मुनि तो निर्विकार रहे पर उन्हींके समीप कल्याण नामक दूसरे मुनि बैठे थे जो कि उनके भाई थे तेरे द्वारा उन्हें अनादृत होता देख क्रोधसे दुःखी हो गये ॥८६॥


संहृत्य प्रतिमायोगमृद्धिप्राप्तः स ते ददौ । शापमेवमलं दीर्घं निश्वस्योष्णं च दुःखितः ॥८७॥

अर्थ: वे मुनि ऋद्धिधारी थे तथा प्रतिमायोगसे विराजमान थे सो तेरे कुकृत्यसे दुःखी होकर उन्होंने प्रतिमायोगका संकोचकर तथा लम्बी और गरम श्वास भरकर तेरे लिए इस प्रकार शाप दी ॥८७॥


अयं निरपराधः संस्त्वया यन्मुनिपुङ्गवः । तिरस्कृतस्तदत्यन्तं तिरस्कारमवाप्स्यसि ॥८८॥

अर्थ: कि चूँकि तूने इन निरपराध मुनिराजका तिरस्कार किया है इसलिए तू भी बहुत भारी तिरस्कारको प्राप्त होगा ॥८८॥


निश्वासेनामितेनासीद्दग्धुमेव निरूपितः । सर्वश्रीसंज्ञया किंतु शामितस्तव कान्तया ॥८९॥

अर्थ: वे मुनि अपनी अपरिमित श्वाससे तुझे भस्म ही कर देना चाहते थे पर तेरी सर्वश्रीनामक स्त्रीने उन्हें शान्त कर लिया ॥८९॥


सम्यग्दृष्टिरलं सा हि साधुपूजनकारिणी । मुनयोऽपि वचस्तस्याः कुर्वते साधुचेतसः ॥९०॥

अर्थ: वह सर्वश्री सम्यग्दर्शनसे युक्त तथा मुनिजनोंकी पूजा करनेवाली थी इसलिए उत्तम हृदयके धारक मुनि भी उसकी बात मानते थे ॥९०॥


यदि नाम तया साध्व्या नासौ नीतः शमं भवेत् । ततस्तस्य स कोपाग्निः केन शक्येत वारितुम् ॥९१॥

अर्थ: यदि वह साध्वी उन मुनिराजको शान्त नहीं करती तो उनकी क्रोधाग्निको कौन रोक सकता था ? ॥९१॥


लोकत्रयेऽपि तन्नास्ति तपसा यन्न साध्यते । बलानां हि समस्तानां स्थितं मूर्ध्नि तपोबलम् ॥९२॥

अर्थ: तीनों लोकोंमें वह कार्य नहीं है जो तपसे सिद्ध नहीं होता हो । यथार्थमें तपका बल सब बलोंके शिरपर स्थित है अर्थात् सबसे श्रेष्ठ है ॥९२॥


न सा त्रिदशनाथस्य शक्तिः कान्तिर्द्युतिर्धृतिः । तपोधनस्य या साधोर्यथाभिमतकारिणः ॥९३॥

अर्थ: इच्छानुकूल कार्य करनेवाले तपस्वी साधुकी जैसी शक्ति, कान्ति, द्युति, अथवा धृति होती है वैसी इन्द्रकी भी सम्भव नहीं है ॥९३॥


विधाय साधुलोकस्य तिरस्कारं जना महत् । दुःखमत्र प्रपद्यन्ते तिर्यक्षु नरकेषु च ॥९४॥

अर्थ: जो मनुष्य साधुजनोंका तिरस्कार करते हैं वे तिर्यंच गति और नरक गतिमें महान् दुःख पाते हैं ॥९४॥


मनसापि हि साधूनां पराभूतिं करोति यः । तस्य सा परमं दुःखं परत्रेह च यच्छति ॥९५॥

अर्थ: जो मनुष्य मनसे भी साधुजनोंका पराभव करता है वह पराभव उसे परलोक तथा इस लोकमें परम दुःख देता है ॥९५॥


यस्त्वाक्रोशति निर्ग्रन्थं हन्ति वा क्रूरमानसः । तत्र किं शक्यते वक्तुं जन्तौ दुष्कृतकर्मणि ॥९६॥

अर्थ: जो दुष्ट चित्तका धारी मनुष्य निर्ग्रन्थ मुनिको गाली देता है अथवा मारता है उस पापी मनुष्यके विषयमें क्या कहा जाय ? ॥९६॥


कायेन मनसा वाचा यानि कर्माणि मानवाः । कुर्वते तानि यच्छन्ति निकचानि फलं ध्रुवम् ॥९७॥

अर्थ: मनुष्य मन वचन कायसे जो कर्म करते हैं वे छूटते नहीं हैं और प्राणियोंको अवश्य ही फल देते हैं ॥९७॥


कर्मणामिति विज्ञाय पुण्यापुण्यात्मिकां गतिम् । दृढां कृत्वा मतिं धर्मे स्वमुत्तारय दुःखतः ॥९८॥

अर्थ: इस प्रकार कर्मोंके पुण्य पापरूप फलका विचारकर अपनी बुद्धि धर्ममें धारण करो और अपने आपको दुःखोंसे बचाओ ॥९८॥


इत्युक्ते पूर्वजन्मानि स्मरन् विस्मयसंगतः । शक्रः प्रणम्य निर्ग्रन्थमिदमाह महादरः ॥९९॥

अर्थ: इस प्रकार मुनिराजके कहनेपर इन्द्रको अपने पूर्व जन्मोंका स्मरण हो आया। उन्हें स्मरण करता हुआ वह आश्चर्यको प्राप्त हुआ। तदनन्तर बहुत भारी आदरसे भरे इन्द्रने निर्ग्रन्थ मुनिराजको नमस्कार कर कहा कि ॥९९॥


भगवंस्त्वत्प्रसादेन लब्ध्वा बोधिमनुत्तमाम् । सांप्रतं दुरितं सर्वं मन्ये त्यक्तमिव क्षणात् ॥१००॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपके प्रसादसे मुझे उत्कृष्ट रत्नत्रय-की प्राप्ति हुई है इसलिए मैं मानता हूँ कि अब मेरे समस्त पाप मानो क्षण भरमें ही छूट जानेवाले हैं ॥१००॥


साधोः संगमनाल्लोके न किंचिद् दुर्लभं भवेत् । बहुजन्मसु न प्राप्ता बोधिर्येनाधिगम्यते ॥१०१॥

अर्थ: जो बोधि अनेक जन्मोंमें भी प्राप्त नहीं हुई वह साधु समागमसे प्राप्त हो जाती है इसलिए कहना पड़ता है कि साधुसमागमसे संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती ॥१०१॥


इत्युक्त्वा वन्दितस्तेन मुनिर्यातो यथेप्सितम् । शक्रोऽपि परमं प्राप्तो निर्वेदं गृहवासतः ॥१०२॥

अर्थ: इतना कहकर निर्वाणसंगम मुनिराज तो उधर इन्द्रके द्वारा वन्दित हो यथेच्छ स्थानपर चले गये इधर इन्द्र भी गृहवाससे अत्यन्त निर्वेदको प्राप्त हो गया ॥१०२॥


पुण्यकर्मोदयाज्ज्ञात्वा रावणं परमोदयम् । स्तुत्वा च वीर्यदंष्ट्राय महाभूभृत्तटक्षितौ ॥१०३॥

अर्थ: उसने जान लिया कि रावण पुण्यकर्मके उदयसे परम अभ्युदयको प्राप्त हुआ है। उसने महापर्वतके तटपर विद्यमान वीर्यदंष्ट्रकी बार-बार स्तुति की ॥१०३॥


जलबुद्‌बुदनिस्सारामवबुध्य मनुष्यताम् । कृत्वा सुनिश्चलां धर्मे मतिं निन्दन् दुरीहितम् ॥१०४॥

अर्थ: मनुष्य पर्यायको जलके बबूलाके समान निःसार जानकर उसने धर्ममें अपनी बुद्धि निश्चल की। अपने पाप कार्योंकी बार-बार निन्दा की ॥१०४॥


श्रियमिन्द्रः सुते न्यस्य महात्मा रथनूपुरे । ससुतो लोकपालानां समूहेन समन्वितः ॥१०५॥

दीक्षां जैनेश्वरीं प्राप सर्वकर्मविनाशिनीम् । विशुद्धमानसोऽत्यन्तं त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥१०६॥

अर्थ: इस प्रकार महापुरुष इन्द्रने रथनू पुर नगरमें पुत्रके लिए राज्य-सम्पदा सौंपकर अन्य अनेक पुत्रों तथा लोकपालोंके समूहके साथ समस्त कर्मोंको करनेवाली जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली । उस समय उसका मन अत्यन्त विशुद्ध था तथा समस्त परिग्रहका उसने त्याग कर दिया था ॥१०५-१०६॥


ततस्तत्तादृशेनापि भोगेनाप्युपलालितम् । वपुस्तस्य तपोभारमुवाहेतरदुर्वहम् ॥१०७॥

अर्थ: यद्यपि उसका शरीर इन्द्रके समान लोकोत्तर भोगोंसे लालित हुआ था तो भी उसने अन्यजन जिसे धारण करनेमें असमर्थ थे ऐसा तपका भार धारण किया था ॥१०७॥


प्रायेण महतां शक्तिर्यादृशी रौद्रकर्मणि । कर्मण्येवं विशुद्धेऽपि परमा चोपजायते ॥१०८॥

अर्थ: प्रायः करके महापुरुषोंकी रुद्र कार्योंमें जैसी अद्‌भुत शक्ति होती है वैसी ही शक्ति विशुद्ध कार्योंमें भी उत्पन्न हो जाती है ॥१०८॥


दीर्घकालं तपस्तप्त्वा विशुद्धध्यानसंगतः । कर्मणां प्रक्षयं कृत्वा निर्वाणं वासवोऽगमत् ॥१०९॥

अर्थ: तदनन्तर दीर्घ काल तक तपकर शुक्ल ध्यानके प्रभावसे कर्मोंका क्षय कर इन्द्र निर्वाण धामको प्राप्त हुआ ॥१०९॥


पश्यत चित्रमिदं पुरुषाणां चेष्टितमूर्जितवीर्यसमृद्धम् । यच्चिरकालमुपार्जितभोगा यान्ति पुनः पदमुत्तमसौख्यम् ॥११०॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि राजन् ! देखो, बड़े पुरुषोंके चरित्र अतिशय शक्तिसे सम्पन्न तथा आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले हैं। ये चिर काल तक भोगोंका उपार्जन करते हैं और अन्तमें उत्तम सुखसे युक्त निर्वाण पदको प्राप्त हो जाते हैं ॥११०॥


स्तोकमपीह न चाद्भुतमस्ति न्यस्य समस्तपरिग्रहसङ्गम् । यत्क्षणतो दुरितस्य विनाशं ध्यानबलाज्जनयन्ति बृहन्तः ॥१११॥

अर्थ: इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है कि बड़े पुरुष समस्त परिग्रहका संग छोड़कर ध्यानके बलसे क्षण-भरमें पापोंका नाश कर देते हैं ॥१११॥


अर्जितमत्युरुकालविधानादिन्धनराशिमुदारमशेषम् । प्राप्य परं क्षणतो महिमानं किं न दहत्यनिलः कणमात्रः ॥११२॥

अर्थ: क्या बहुत कालसे इकट्ठी की हुई ईन्धनकी बड़ी राशिको कणमात्र अग्नि क्षणभरमें विशाल महिमाको प्राप्त हो भस्म नहीं कर देती ? ॥११२॥


इत्यवगम्य जनाः सुविशुद्धं यत्नपराः करणं वहतान्तः ।
मृत्युदिनस्य न केचिदपेता ज्ञानरवेः कुरुत प्रतिपत्तिम् ॥११३॥

अर्थ: ऐसा जानकर हे भव्य जनो ! यत्नमें तत्पर हो अन्तःकरणको अत्यन्त निर्मल करो । मृत्युका दिन आनेपर कोई भी पीछे नहीं हट सकते अर्थात् मृत्युका अवसर आनेपर सबको मरना पड़ता है । इसलिए सम्यग्ज्ञानरूपी सूर्यकी प्राप्ति करो ॥११३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते इन्द्रनिर्वाणाभिधानं नाम त्रयोदशं पर्व ॥१३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें इन्द्रके निर्वाणका कथन करनेवाला तेरहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१३॥

१४. चतुर्दशं पर्व (अनन्तबलधर्माभिधानं)

अथ नाकाधिपप्रख्यो भोगसंमूढमानसः । यथाभिमतनिर्वृत्तः पददुर्ललितक्रियः ॥१॥

असौ देवाधिपग्राहो यातो मन्दरमन्यदा । जिनेन्द्रवन्दनां कृत्वा प्रत्यागच्छन्निजेच्छया ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो इन्द्रके समान शोभाका धारक था, जिसका मन भोगोंमें मूढ़ रहता था, जिसे इच्छानुसार कार्योंकी प्राप्ति होती थी तथा जिसकी क्रियाएँ शत्रुओंको प्राप्त होना कठिन था ऐसा रावण एक समय मेरुपर्वतपर गया था। वहाँ जिनेन्द्रदेवकी वन्दना कर वह अपनी इच्छानुसार वापस आ रहा था ॥१-२॥


विभक्तपर्वतान् पश्यन् वास्यानां विविधांघ्रिपान् । सरितश्चातिचक्षुष्याः स्फटिकादपि निर्मलाः ॥३॥

अर्थ: मार्गमें वह भरतादि क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले एवं अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित हिमवत् आदि पर्वतोंको तथा स्फटिकसे भी अधिक निर्मल एवं अत्यन्त सुन्दर नदियोंको देखता हुआ चला आ रहा था ॥३॥


आदित्यभवनाकारविमानस्य विभूषणः । संगतः परया लक्ष्म्या लङ्कासंगमनोत्सुकः ॥४॥

अर्थ: सूर्यबिम्बके आकार विमानको अलंकृत कर रहा था, उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त था तथा लंकाकी प्राप्तिमें अत्यन्त उत्सुक था ॥४॥


सहसा निनदं तुङ्गं शुश्राव पुरुषेतरम् । पप्रच्छ च महाक्षुब्धो मारीचमतिसत्वरः ॥५॥

अर्थ: अचानक ही उसने जोरदार कोमल शब्द सुना जिसे सुनकर वह अत्यन्त क्षुभित हो गया। उसने शीघ्र ही मारीचसे पूछा भी ॥५॥


अयि मारीच मारीच कुतोऽयं निनदो महान् । एताश्च ककुभः कस्मान्महारजतलोहिताः ॥६॥

अर्थ: अरे मारीच ! मारीच !! यह महाशब्द कहाँसे आ रहा है ? और दिशाएँ सुवर्णके समान लाल-पीली क्यों हो रही हैं ॥६॥


ततो जगाद मारीचो देव ! देवगमो मुनेः । महाकल्याणसंप्राप्तावेष कस्यापि वर्तते ॥७॥

अर्थ: तब मारीचने कहा कि हे देव ! किसी महामुनिके महाकल्याणकमें सम्मिलित होनेके लिए यह देवोंका आगमन हो रहा है ॥७॥


देवानामेष तुष्टानां नानासंपातकारिणाम् । आकुलो भुवनव्यापी प्रशस्तः श्रूयते ध्वनिः ॥८॥

अर्थ: सन्तोषसे भरे एवं नाना प्रकारसे गमन करनेवाले देवोंका यह संसारव्यापी प्रशस्त शब्द सुनाई दे रहा है ॥८॥


एताश्च ककुभस्तेषां मुकुटादिमरीचिभिः । निचिता दधते भासं कौसुम्भीमिव भास्वराम् ॥९॥

अर्थ: ये दिशाएँ उन्हींके मुकुट आदिकी किरणोंसे व्याप्त होकर कुसुम्भ रंगकी देदीप्यमान कान्तिको धारण कर रही हैं ॥९॥


सुवर्णपर्वतेऽमुष्मिन्ननन्तबलसंज्ञया । कथितो मुनिरुत्पन्नं नूनं तस्याद्य केवलम् ॥१०॥

अर्थ: इस सुवर्णगिरिपर अनन्तबल नामक मनिराज रहते थे जान पड़ता है उन्हें ही आज केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ॥१०॥


ततस्तद् वचनं श्रुत्वा सम्यग्दर्शनभावितः । परं पुरंदरग्राहः प्रमोदं प्रतिपन्नवान् ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर मारीचके वचन सुनकर सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त रावण परम हर्षको प्राप्त हुआ ॥११॥


अवतीर्णश्च खाद्देशाद्विप्रकृष्टान्महाद्युतिः । द्वितीय इव देवेन्द्रो वन्दनाय महामुनेः ॥१२॥

अर्थ: महाकान्तिको धारण करनेवाला रावण उन महामुनिकी वन्दना करनेके लिए दूरवर्ती आकाश प्रदेशसे इस प्रकार नीचे उतरा मानो दूसरा इन्द्र ही उतर रहा हो ॥१२॥


वन्दित्वा तुष्टुवुः साधुमिन्द्रप्राग्रहरास्ततः । आसीनाश्च यथास्थानं बद्धाञ्जलिपुटाः सुराः ॥१३॥

अर्थ: तत्पश्चात् इन्द्र आदि देवोंने हाथ जोड़कर मुनिराजको नमस्कार किया। स्तुति की और फिर सब यथास्थान बैठ गये ॥१३॥


रावणोऽपि नमस्कृत्य स्तुत्वा चोदात्तभक्तितः । विद्याधरजनाकीर्णः स्थितः समुचितावनौ ॥१४॥

अर्थ: विद्याधरोंसे युक्त रावण भी बड़ी भक्तिसे नमस्कार एवं स्तुति कर योग्य भूमिमें बैठ गया ॥१४॥


ततश्चतुर्विधैर्देवैस्तिर्यग्भिर्मनुजैस्तथा । कृतशंसं मुनिश्रेष्ठः शिष्येणैवमपृच्छयत ॥१५॥

भगवन् ज्ञातुमिच्छन्ति धर्माधर्मफलं जनाः । समस्ता मुक्तिहेतुं च तत्सर्वं वक्तुमर्हथ ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर विनीत शिष्यके समान रावणने मुनिराजसे इस प्रकार पूछा कि हे भगवन् ! समस्त प्राणी धर्म-अधर्मका फल और मोक्षका कारण जानना चाहते हैं सो आप यह सब कहनेके योग्य हैं। रावणके इस प्रश्नकी चारों प्रकारके देवों, मनुष्यों और तिर्यंचोंने भारी प्रशंसा की ॥१५-१६॥


ततः सुनिपुणं शुद्धं विपुलार्थं मिताक्षरम् । अप्रधृष्यं जगौ वाक्यं यतिः सर्वहितप्रियम् ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराज निम्न प्रकार वचन कहने लगे। उनके वे वचन निपुणतासे युक्त थे, शुद्ध थे, महाअर्थसे भरे थे, परिमित अक्षरोंसे सहित थे, अखण्डनीय थे और सर्वहितकारी तथा प्रिय थे ॥१७॥


कर्मणाष्टप्रकारेण संततेन निरादिना । बद्धेनान्तर्हितात्मीयशक्तिर्भ्राम्यति चेतनः ॥१८॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि अनादिकालसे बँधे हुए ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंसे जिसकी आत्मीय शक्ति छिप गयी है ऐसा यह प्राणी निरन्तर भ्रमण कर रहा है ॥१८॥


सुभूरिलक्षसंख्यासु योनिष्वनुभवन्सदा । वेदनोयं यथोपात्तं नानाकरणसंभवम् ॥१९॥

अर्थ: अनेक लक्ष योनियोंमें नाना इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखका सदा अनुभव करता रहता है ॥१९॥


रक्तो द्विष्टोऽथवा मूढो मन्दमध्यविपाकतः । कुलालचक्रवत्प्राप्तचतुर्गतिविवर्तनः ॥२०॥

अर्थ: कर्मोंका जब जैसा तीव्र, मन्द या मध्यम उदय आता है वैसा रागी, द्वेषी अथवा मोही होता हुआ कुम्हारके चक्रके समान चतुर्गतिमें घूमता रहता है ॥२०॥


बुध्यते स्वहितं नासौ ज्ञानावरणकर्मणा । मनुष्यतामपि प्राप्तोऽत्यन्तदुर्लभसंगमाम् ॥२१॥

अर्थ: यह जीव अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य पर्यायको भी प्राप्त कर लेता है फिर भी ज्ञानावरण कर्मके कारण आत्महितको नहीं समझ पाता है ॥२१॥


रसस्पर्शपरिग्राहिहृषीकवशतां गताः । कृत्वातिनिन्दितं कर्म पापभारगुरूकृताः ॥२२॥

अनेकोपायसंभूतमहादुःखविधायिनि । पतन्ति नरके जीवा ग्रावाण इव वारिणि ॥२३॥

अर्थ: रसना और स्पर्शन इन्द्रियके वशीभूत हुए प्राणी अत्यन्त निन्दित कार्य करके पापके भारसे इतने वजनदार हो जाते हैं कि वे अनेक साधनोंसे उत्पन्न महादुःख देनेवाले नरकोंमें उस प्रकार जा पड़ते हैं जिस प्रकार कि पानीमें पत्थर पड़ जाते हैं - डूब जाते हैं ॥२२-२३॥


मातरं पितरं भ्रातृन् सुतां पत्नीं सुहृज्जनान् । धनादिचोदिताः केचिद् विश्वनिन्दितमानसाः ॥२४॥

गर्भस्थानर्भकान् वृद्धांस्तरुणान् योषितो नराः । घ्नन्ति केचिन्महाक्रूरा मानुषान् पक्षिणो मृगान् ॥२५॥

अर्थ: जिनके मनकी सभी निन्दा करते हैं ऐसे कितने ही मनुष्य धनादिसे प्रेरित होकर माता, पिता, भाई, पुत्री, पत्नी, मित्रजन, गर्भस्थ बालक, वृद्ध, तरुण एवं स्त्रियोंको मार डालते हैं तथा कितने ही महादुष्ट मनुष्य मनुष्यों, पक्षियों और हरिणोंकी हत्या करते हैं ॥२४-२५॥


स्थलजान् जलजान् धर्मच्युतचित्ताः कुमेधसः । मीत्वा पतन्ति ते सर्वे नरके पुरुवेदने ॥२६॥

अर्थ: जिनका चित्त धर्मसे च्युत है ऐसे कितने ही दुर्बुद्धि मनुष्य स्थलचारी एवं जलचारी जीवोंको मारकर भयंकर वेदनावाले नरकमें पड़ते हैं ॥२६॥


मधुघातकृतश्चण्डाश्चाण्डाला वनदाहिनः । हिंसापरायणाः पापाः कैवर्ताधमलुब्धकाः ॥२७॥

वितथव्याहृतासक्ताः परस्वहरणोद्यताः । पतन्ति नरके घोरे प्राणिनः शरणोज्झिताः ॥२८॥

अर्थ: मधु- मक्खियोंका घात करनेवाले तथा वनमें आग लगानेवाले दुष्ट चाण्डाल निरन्तर हिंसामें तत्पर रहनेवाले पापी कहार और नीच शिकारी, झूठ वचन बोलनेमें आसक्त एवं पराया धन हरण करनेमें उद्यत प्राणी शरणरहित हो भयंकर नरकमें पड़ते हैं ॥२७-२८॥


येन येन प्रकारेण कुर्वते मांसभक्षणम् । तेनैव ते विधानेन भक्ष्यन्ते नरके परैः ॥२९॥

अर्थ: जो मनुष्य जिस-जिस प्रकारसे मांस भक्षण करते हैं नरकमें दूसरे प्राणी उसी-उसी प्रकारसे उनका भक्षण करते हैं ॥२९॥


महापरिग्रहोपेता महारम्भाश्च ये जनाः । प्रचण्डाध्यवसायास्ते वसन्ति नरके चिरम् ॥३०॥

अर्थ: जो मनुष्य बहुत भारी परिग्रहसे सहित हैं, बहुत बड़े आरम्भ करते हैं और तीव्र संकल्प-विकल्प करते हैं वे चिरकाल तक नरकमें वास करते हैं ॥३०॥


साधूनां द्वेषकाः पापा मिथ्यादर्शनसंगताः । रौद्रध्यानमृता जीवा गच्छन्ति नरकं ध्रुवम् ॥३१॥

अर्थ: जो साधुओंसे द्वेष रखते हैं, पापी हैं, मिथ्यादर्शनसे सहित हैं एवं रौद्रध्यानसे जिनका मरण होता है वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं ॥३१॥


कुठारैरसिभिश्चक्रैः करपत्रैर्विदारिताः । अन्यैश्च विविधैः शस्त्रैस्तीक्ष्णतुण्डैश्च पक्षिभिः ॥३२॥

अर्थ: ऐसे जीव नरकोंमें कुल्हाड़ियों, तलवारों, चक्रों, करोंतों तथा अन्य अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे चीरे जाते हैं । तीक्ष्ण चोंचोंवाले पक्षी उन्हें चूँथते हैं ॥३२॥


सिंहैर्व्याघ्रैः श्वभिः सर्पैः शरभैर्वृश्चिकैर्वृकैः । अन्यैश्च प्राणिभिश्चित्रैः प्राप्यन्ते दुःखमुत्तमम् ॥३३॥

अर्थ: सिंह, व्याघ्र, कुत्ते, सर्प, अष्टापद, बिच्छू, भेड़िया तथा विक्रियासे बने हुए विविध प्रकारके प्राणी उन्हें बहुत भारी दुःख पहुँचाते हैं ॥३३॥


नितान्तं ये तु कुर्वन्ति संगं शब्दादिवस्तुनि । मायिनस्ते प्रपद्यन्ते तिर्यक्त्वं प्राणधारिणः ॥३४॥

अर्थ: जो शब्द आदि विषयोंमें अत्यन्त आसक्ति करते हैं ऐसे मायावी जीव तिर्यंच गतिको प्राप्त होते हैं ॥३४॥


परस्परवधास्तत्र शस्त्रैश्च विविधैः क्षताः । प्रपद्यन्ते महादुःखं वाहदोहादिभिस्तथा ॥३५॥

अर्थ: उस तिर्यंच गतिमें जीव एक दूसरेको मार डालते हैं। मनुष्य विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उनका घात करते हैं तथा स्वयं भार ढोना एवं दोहा जाना आदि कार्योंसे महादुःख पाते हैं ॥३५॥


सुप्तमेतेन जीवेन स्थलेऽम्भसि गिरौ तरौ । गहनेषु च देशेषु भ्राम्यता भवसंकटे ॥३६॥

अर्थ: संसारके संकटमें भ्रमण करता हुआ यह जीव स्थलमें, जलमें, पहाड़पर, वृक्षपर और अन्यान्य सघन स्थानोंमें सोया है ॥३६॥


एकद्वित्रिचतुःपञ्चहृषीककृतसंगतिः । अनादिनिधनो जन्तुः सेवते मृत्युजन्मनी ॥३७॥

अर्थ: यह जीव अनादि कालसे एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियोंमें उत्पन्न होता हुआ जन्म-मरण कर रहा है ॥३७॥


तिलमात्रोऽपि देशोऽसौ नास्ति यत्र न जन्तुना । प्राप्तं जन्म विनाशो वा संसारावर्तपातिना ॥३८॥

अर्थ: ऐसा तिलमात्र भी स्थान बाकी नहीं है जहाँ संसाररूपी भँवरमें पड़े हुए इस जीवने जन्म और मरण प्राप्त न किया हो ॥३८॥


मार्दवेनान्विताः केचिदार्जवेन च जन्तवः । स्वभावलब्धसंतोषाः प्रपद्यन्ते मनुष्यताम् ॥३९॥

अर्थ: यदि कोई प्राणी मृदुता और सरलतासे सहित होते हैं तथा स्वभावसे ही सन्तोष प्राप्त करते हैं तो वे मनुष्य गतिको प्राप्त होते हैं ॥३९॥


क्षणमात्रसुखस्यार्थे हित्वा पापं प्रकुर्वते । श्रेयः परमसौख्यस्य कारणं मोहसंगताः ॥४०॥

अर्थ: मनुष्य गतिमें भी मोही जीव परम सुखके कारणभूत कल्याण मार्गको छोड़कर क्षणिक सुखके लिए पाप करते हैं ॥४०॥


आर्या म्लेच्छाश्च तत्रापि जायन्ते पूर्वकर्मतः । तथा केचिद्घनेनाढ्याः केचिदत्यन्तदुर्विधाः ॥४१॥

अर्थ: अपने पूर्वोपार्जित कर्मोंके अनुसार कोई आर्य होते हैं और कोई म्लेच्छ होते हैं। कोई धनाढ्य होते हैं और कोई अत्यन्त दरिद्र होते हैं ॥४१॥


मनोरथशतान्यन्ये कुर्वते कर्मवेष्टिताः । कालं नयन्ति कृच्छ्रेण प्राणिनः परवेश्मसु ॥४२॥

अर्थ: कर्मोंसे घिरे कितने ही प्राणी सैकड़ों मनोरथ करते हुए दूसरेके घरोंमें बड़ी कठिनाईसे समय बिताते हैं ॥४२॥


निरूपा धनिनः केचिन्निर्धनाः रूपिणोऽपरे । केचिद्दीर्घायुषः केचिदत्यन्तस्तोकजीविनः ॥४३॥

अर्थ: कोई धनाढ्य होकर भी कुरूप होते हैं, कोई रूपवान् होकर भी निर्धन रहते हैं, कोई दीर्घायु होते हैं और कोई अल्पायु होते हैं ॥४३॥


इष्टा यशस्विनः केचित्केचिदत्यन्तदुर्भगाः । केचिदाज्ञां प्रयच्छन्ति तामन्ये कुर्वते जनाः ॥४४॥

अर्थ: कोई सबको प्रिय तथा यशके धारक होते हैं, कोई अत्यन्त अप्रिय होते हैं, कोई आज्ञा देते हैं और कोई उस आज्ञाका पालन करते हैं ॥४४॥


प्रविशन्ति रणं केचित्केचिद्गच्छन्ति वारिणि । यान्ति देशान्तरं केचित्केचित्कृष्यादि कुर्वते ॥४५॥

अर्थ: कोई रणमें प्रवेश करते हैं, कोई पानीमें गोता लगाते हैं, कोई विदेशमें जाते हैं और कोई खेती आदि करते हैं ॥४५॥


एवं तत्रापि वैचित्र्यं जायते सुखदुःखयोः । सर्वं तु दुःखमेवात्र सुखं तत्रापि कल्पितम् ॥४६॥

अर्थ: इस प्रकार मनुष्य गतिमें भी सुख और दुःखकी विचित्रता देखी जाती है। वास्तवमें तो सब दुःख ही है सुख तो कल्पना मात्र है ॥४६॥


सरागसंयमाः केचित्संयमासंयमास्तथा । अकामनिर्जरातश्च तपसश्च समोहतः ॥४७॥

देवत्वं च प्रपद्यन्ते चतुर्भेदसमन्वितम् । केचिन्महर्द्धयोऽत्रापि केचिदल्पपरिच्छदाः ॥४८॥

अर्थ: कोई जीव सरागसंयम तथा संयमासंयमके धारक होते हैं, कोई अकाम निर्जरा करते हैं और कोई बालतप करते हैं ऐसे जीव भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और वैमानिक इन चार भेदोंसे युक्त देव गतिमें उत्पन्न होते हैं सो वहाँ भी कितने ही महर्द्धियोंके धारक होते हैं और कितने ही अल्प ऋद्धियोंके धारक ॥४७-४८॥


स्थित्या द्युत्या प्रभावेण धिया सौख्येन लेश्यया । अभिमानेन मानेन ते पुनः कर्मसंग्रहम् ॥४९॥

कृत्वा चतुर्गतौ नित्यं भवे भ्राम्यन्ति जन्तवः । अरघट्टघटीयन्त्रसमानत्वमुपागताः ॥५०॥

अर्थ: स्थिति, कान्ति, प्रभाव, बुद्धि, सुख, लेश्या, अभिमान और मानके अनुसार वे पुनः कर्मोंका बन्ध कर चतुर्गति रूप संसारमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं। जिस प्रकार अरघटकी घड़ी निरन्तर घूमती रहती है इसी प्रकार ये प्राणी भी निरन्तर घूमते रहते हैं ॥४९-५०॥


संकल्पादशुभाद् दुःखं प्राप्नोति शुभतः सुखम् । कर्मणोऽष्टप्रकारस्य जीवो मोक्षमुपक्षयात् ॥५१॥

अर्थ: यह जीव अशुभ संकल्पसे दुःख पाता है, शुभ संकल्पसे सुख पाता है और अष्टकर्मोंके क्षयसे मोक्ष प्राप्त करता है ॥५१॥


दानेनापि प्रपद्यन्ते जन्तवो भोगभूमिषु । भोगान् पात्रविशेषेण वैश्वरूप्यमुपागताः ॥५२॥

अर्थ: पात्रकी विशेषतासे अनेक रूपताको प्राप्त हुए जीव दानके प्रभावसे भोग-भूमियोंमें भोगोंको प्राप्त होते हैं ॥५२॥


प्राणातिपातविरतं परिग्रहविवर्जितम् । उद्धमाचक्षते पात्रं रागद्वेषोज्झितं जिनाः ॥५३॥

अर्थ: जो प्राणिहिंसासे विरत, परिग्रहसे रहित और राग-द्वेषसे शून्य हैं उन्हें जिनेन्द्र भगवान्ने उत्तम पात्र कहा है ॥५३॥


सम्यग्दर्शनसंशुद्धं तपसापि विवर्जितम् । पात्रं प्रशस्यते मिथ्यादृष्टेः कायस्य शोधनात् ॥५४॥

अर्थ: जो तपसे रहित होकर भी सम्यग्दर्शनसे शुद्ध है ऐसा पात्र भी प्रशंसनीय है क्योंकि उससे मिथ्यादृष्टि दाताके शरीरकी शुद्धि होती है ॥५४॥


आपद्भ्यः पाति यस्तस्मात्पात्रमित्यभिधीयते । सम्यग्दर्शनशक्त्या च त्रायन्ते मुनयो जनान् ॥५५॥

अर्थ: जो आपत्तियोंसे रक्षा करे वह पात्र कहलाता है ( पातीति पात्रम् ) इस प्रकार पात्र शब्दका निरुक्त्यर्थ है। चूँकि मुनि, सम्यग्दर्शनकी सामर्थ्यसे लोगोंकी रक्षा करते अतः पात्र हैं ॥५५॥


दर्शनेन विशुद्धेन ज्ञानेन च यदन्वितम् । चारित्रेण च तत्पात्रं परमं परिकीर्तितम् ॥५६॥

अर्थ: जो निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे सहित होता है वह उत्तम कहलाता है ॥५६॥


मानापमानयोस्तुल्यस्तथा यः सुखदुःखयोः । तृणकाञ्चनयोश्चैव साधुः पात्रं प्रशस्यते ॥५७॥

अर्थ: जो मान, अपमानं, सुख-दुःख और तृण-कांचनमें समान दृष्टि रखता है ऐसा साधु पात्र कहलाता है ॥५७॥


सर्वग्रन्थविनिर्मुक्ता महातपसि ये रताः । श्रमणास्ते परं पात्रं तत्त्वध्यानपरायणाः ॥५८॥

अर्थ: जो सब प्रकारके परिग्रहसे रहित हैं, महातपश्चरणमें लीन हैं और तत्त्वोंके ध्यानमें सदा तत्पर रहते हैं ऐसे श्रमण अर्थात् मुनि उत्तम पात्र कहलाते हैं ॥५८॥


तेभ्यो भावेन यद्दत्तं शक्त्या पानान्नभेषजम् । यथोपयोगमन्यच्च तद्यच्छति महाफलम् ॥५९॥

अर्थ: उन मुनियोंके लिए अपनी सामर्थ्यके अनुसार भावपूर्वक जो भी अन्न, पान, औषधि अथवा उपयोगमें आनेवाले पीछी, कमण्डलु आदि अन्य पदार्थ दिये जाते हैं वे महाफल प्रदान करते हैं ॥५९॥


क्षिप्तं यथैव सत्क्षेत्रे बीजं तत्संपदं पराम् । प्रयच्छति तथा दत्तं सत्पात्रे शुद्धचेतसा ॥६०॥

अर्थ: जिस प्रकार उत्तम क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अत्यधिक सम्पदा प्रदान करता है उसी प्रकार उत्तम पात्रके लिए शुद्ध हृदयसे दिया हुआ दान अत्यधिक सम्पदा प्रदान करता है ॥६०॥


रागद्वेषादिभिर्युक्तं यत्तु पात्रं न तन्मतम् । प्रयच्छति फलं दूरं तत्र लाभविचिन्तितम् ॥६१॥

अर्थ: जो राग-द्वेष आदि दोषोंसे युक्त है वह पात्र नहीं है और न वह इच्छित फल ही देता है अतः उसके फलका विचार करना दूरकी बात है ॥६१॥


क्षिप्तं यथोषरे बीजं न किंचिर्त्तत्र जायते । मिथ्यादर्शनसंयुक्तपापपात्रोद्यतं तथा ॥६२॥

अर्थ: जिस प्रकार ऊषर जमीनमें बीज बोया जाय तो उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार मिथ्यादर्शनसे सहित पापी पात्रके लिए दान दिया जाय तो उससे कुछ भो फल प्राप्त नहीं होता ॥६२॥


कूपादुद्धृतमेकस्मात्सलिलं प्रतिपद्यते । माधुर्यमिक्षुभिः पीतं निम्बपीतं तु तिक्तताम् ॥६३॥

अर्थ: एक कुएँसे निकाले हुए पानीको यदि ईखके पौधे पीते हैं तो वह माधुर्यको प्राप्त होता है और यदि नीमके पौधे पीते हैं तो कड़ुआ हो जाता है ॥६३॥


सरस्यां जलमेकस्यां गवात्तं पन्नगेन च । क्षीरभावमवाप्नोति विषतां च यथा तथा ॥६४॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार एक ही तालाबमें गायने पानी पिया और साँपने भी । गायके द्वारा पिया पानी दूध हो जाता है और साँपके द्वारा पिया पानी विष हो जाता है, उसी प्रकार एक ही गृहस्थसे उत्तम पात्रने दान लिया और नीच पात्रने भी । जो दान उत्तम पात्रको प्राप्त होता है उसका फल उत्तम होता है और जो नीच पात्रको प्राप्त होता है उसका फल नीचा होता है ॥६४॥


विन्यस्तं भावतो दानं सम्यग्दर्शनभाविते । मिथ्यादर्शनयुक्ते तु शुभाशुभफलं भवेत् ॥६५॥

अर्थ: कोई-कोई पात्र मिथ्यादर्शनसे युक्त होने पर भी सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त होते हैं ऐसे पात्रोंके लिए भावसे जो दान दिया जाता है उसका फल शुभ-अशुभ अर्थात् मिश्रित प्रकारका होता है ॥६५॥


दीनान्धादिजनेभ्यस्तु करुणापरिचोदितम् । दानमुक्तं फलं तस्माद् यद्यपि स्यान्न सत्तमम् ॥६६॥

अर्थ: दीन तथा अन्धे आदि मनुष्योंके लिए करुणा दान कहा गया है और उससे यद्यपि फलकी भी प्राप्ति होती है पर वह फल उत्तम फल नहीं कहा जाता ॥६६॥


वदन्ति लिङ्गिनः सर्वे स्वानुकूलं प्रयत्नतः । धर्मं स तु विशेषेण परीक्ष्यः शुभमानसैः ॥६७॥

अर्थ: सभी वेषधारी प्रयत्नपूर्वक अपने अनुकूल धर्मका उपदेश देते हैं पर उत्तम हृदयके धारक मनुष्योंको विशेषकर उसकी परीक्षा करनी चाहिए ॥६७॥


द्रव्यं यदात्मतुल्येषु गृहस्थेषु विसृज्यते । कामक्रोधादियुक्तेषु तत्र का फलभोगिता ॥६८॥

अर्थ: काम-क्रोधादिसे युक्त तथा अपनी समानता रखनेवाले गृहस्थोंके लिए जो द्रव्य दिया जाता है उसका क्या फल भोगनेको मिलता है ? सो कहा नहीं जा सकता ॥६८॥


अहो महानयं मोहः सर्वावस्थेषु यज्जनाः । स्वोपतेयं विमुञ्चन्ति विप्रलब्धाः कुशासनैः ॥६९॥

अर्थ: अहो ! यह कितना प्रबल मोह है कि मिथ्यामतोंसे ठगाये गये लोग सभी अवस्थाओंवाले लोगोंको अपना धन दे देते हैं ॥६९॥


धिगस्तु तान् खलानेष जनो यैर्विप्रतारितः । लोभात् कुग्रन्थकन्थाभिर्वराको नेयमानसः ॥७०॥

अर्थ: उन दुष्टजनोंको धिक्कार है जिन्होंने कि इस भोले प्राणीको ठग रखा है तथा लोभ दिखाकर मिथ्या शास्त्रोंकी चर्चासे उसके मनको विचलित कर दिया है ॥७०॥


मृष्टत्वाद् बलकारित्वान्मांसं भक्ष्यमुदाहृतम् । पापैर्दम्भप्रसिद्धयर्थं परिसंख्या च कीर्तिता ॥७१॥

अर्थ: मीठा तथा बलकारी होनेसे पापी मनुष्योंने मांसको भक्ष्य बताया है और अपना कपट बतानेके लिए जिनका मांस खाना चाहिए उनकी संख्या भी निर्धारित की है ॥७१॥


क्रूरास्ते दापयित्वा तद्भक्षयित्वा च लोभिनः । गच्छन्ति नरकं सार्धं दातृभिर्घोरवेदनम् ॥७२॥

अर्थ: सो ऐसे दुष्ट लोभी जीव दूसरोंको मांस दिलाकर तथा स्वयं खाकर दाताओंके साथ-साथ भयंकर वेदनासे युक्त नरकमें जाते हैं ॥७२॥


जीवदानं च यत्प्रोक्तं गर्द्धाविद्धैर्दुरात्मभिः । ऋषिंमन्यैस्तदत्यन्तं निन्दितं तत्त्ववेदिभिः ॥७३॥

अर्थ: लोभके वशीभूत, दुष्ट अभिप्रायसे युक्त तथा झूठ-मूठ ही अपने-आपको ऋषि माननेवाले कितने ही लोगोंने हाथी, घोड़ा, गाय आदि जीवोंका दान भी बतलाया है पर तत्त्वके जानकार मनुष्योंने उसकी अत्यन्त निन्दा की है ॥७३॥


तस्मिन् हि दीयमानस्य वहनाङ्कनताडनैः । संपद्यते महादुःखं तेनान्येषां च भूयसाम् ॥७४॥

अर्थ: उसका कारण भी यह है कि जीवदानमें जो जीव दिया जाता है उसे बोझा ढोना पड़ता है, नुकीली अरी आदिसे उसके शरीरको आँका जाता है तथा लाठी आदिसे उसे पीटा जाता है इन कारणोंसे उसे महादुःख होता है और उसके निमित्तसे बहुत-से अन्य जीवोंको भी बहुत दुःख उठाना पड़ता है ॥७४॥


भूमिदानमपि क्षिप्तं तद्गतप्राणिपीडनात् । प्राणिघातनिमित्तेन पुण्यं पाषाणतः पयः ॥७५॥

अर्थ: इसी प्रकार भूमिदान भी निन्दनीय है क्योंकि उससे भूमिमें रहनेवाले जीवोंको पीड़ा होती है। और प्राणिपीड़ाके निमित्त जुटाकर पुण्यकी इच्छा करना मानो पत्थरसे पानी निकालना है ॥७५॥


सर्वेषामभयं तस्माद्देयं प्राणभृतां सदा । ज्ञानं भेषजमन्नं च वस्त्रादि च गतासुकम् ॥७६॥

अर्थ: इसलिए समस्त प्राणियोंको सदा अभयदान देना चाहिए साथ ही ज्ञान, प्रासुक, औषधि, अन्न और वस्त्रादि भी देना चाहिए ॥७६॥


दानं निन्दितमप्येति प्रशंसां पात्रभेदतः । शुक्तिपीतं यथा वारि मुक्तीभवति निश्चयम् ॥७७॥

अर्थ: जो दान निन्दित बताया है वह भी पात्रके भेदसे प्रशंसनीय हो जाता है, जिस प्रकार कि शुक्ति ( सीप ) के द्वारा पिया हुआ पानी निश्चयसे मोती हो जाता है ॥७७॥


पशुभूम्यादिकं दत्तं जिनानुद्दिश्य भावतः । ददाति परमान् भोगानत्यन्तचिरकालगान् ॥७८॥

अर्थ: पशु तथा भूमिका दान यद्यपि निन्दित दान है फिर भी यदि वह जिन-प्रतिमा आदिको उद्देश्य कर दिया जाता है तो वह दीर्घ काल तक स्थिर रहनेवाले उत्कृष्ट भोग प्रदान करता है ॥७८॥


अन्तरङ्गं हि संकल्पः कारणं पुण्यपापयोः । विना तेन बहिर्दानं वर्षः पर्वतमूर्धनि ॥७९॥

अर्थ: भीतरका संकल्प ही पुण्य-पापका कारण है उसके बिना बाह्यमें दान देना पर्वतके शिखरपर वर्षा करनेके समान है ॥७९॥


वीतरागान् समस्तज्ञानतो ध्यात्वा जिनेश्वरान् । दानं यद्दीयते तस्य कः शक्तो भाषितुं फलम् ॥८०॥

अर्थ: इसलिए वीतराग सर्वज्ञ जिनेन्द्र देवका ध्यान कर जो दान दिया जाता है उसका फल कहनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥८०॥


आयुधग्रहणादन्ये देवा द्वेषसमन्विताः । रागिणः कामिनीसंगाद् भूषणानां च धारणात् ॥८१॥

रागद्वेषानुमेयश्च तेषां मोहोऽपि विद्यते । तयोर्हि कारणं मोहो दोषाः शेषास्तु तन्मयाः ॥८२॥

अर्थ: जिनेन्द्रके सिवाय जो अन्य देव हैं वे द्वेषी, रागी तथा मोही हैं क्योंकि वे शस्त्र लिये रहते हैं इससे द्वेषी सिद्ध होते हैं और स्त्री साथमें रखते हैं तथा आभूषण धारण करते हैं इससे रागी सिद्ध होते हैं। राग-द्वेषके द्वारा उनके मोहका भी अनुमान हो जाता है क्योंकि मोह राग-द्वेषका कारण है। इस प्रकार राग-द्वेष और मोह ये तीन दोष उनमें सिद्ध हो गये बाकी अन्य दोष इन्हींके रूपान्तर हैं ॥८१-८२॥


मनुष्या एव ये केचिद्देवा भोजनमाजनम् । कषायतनवः काले देशकामादिसेविनः ॥८३॥

एवंविधाः कथं देवा दानगोचरतां गताः । अधमा यदि वा तुल्याः फलं कुर्युर्मनोहरम् ॥८४॥

अर्थ: लोकमें जो कुछ मनुष्य देवके रूपमें प्रसिद्ध हैं वे साधारण जनके समान ही भोजनके पात्र हैं अर्थात् भोजन करते हैं, कषायसे युक्त हैं और अवसरपर आंशिक कामादिका सेवन करते हैं सो ऐसे देव दानके पात्र कैसे हो सकते हैं ? वे कितनी ही बातोंमें जब कि अपने भक्त जनोंसे गये-गुजरे अथवा उनके समान ही हैं तब उन्हें उत्तम फल कैसे दे सकते हैं ? ॥८३-८४॥


दृष्टोऽपि तावदेतेषां विपाकः शुभकर्मणः । कुत एव शिवस्थानैसंप्राप्तिर्दुःखितात्मनाम् ॥८५॥

अर्थ: यद्यपि वर्तमानमें उनके शुभ कर्मोंका उदय देखा जाता है तो भी उनसे अन्य दुःखो मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥८५॥


तदेतत्सिकतामुष्टिपीडनात्तैलवाञ्छितम् । विनाशनं च तृष्णाया सेवनादाशुशुक्षणेः ॥८६॥

अर्थ: ऐसे कुदेवोंसे मोक्षकी इच्छा करना बालूकी मुट्ठी पेरकर तेल प्राप्त करनेकी इच्छाके समान है अथवा अग्निकी सेवासे प्यास नष्ट करनेकी इच्छाके तुल्य है ॥८६॥


पङ्गुना नीयते पङ्गुर्यदि देशान्तरं ततः । एतेभ्यः क्लिश्यतो जन्तोर्देवेभ्यः जायते फलम् ॥८७॥

अर्थ: यदि एक लँगड़ा मनुष्य दूसरे लँगड़े मनुष्यको देशान्तरमें ले जा सकता हो तो इन देवोंसे दूसरे दुःखी जीवोंको भी फलकी प्राप्ति हो सकती है ॥८७॥


एषां तावदियं वार्ता देवानां पापकर्मणाम् । तद्भक्तानां तु दूरेण सत्पात्रत्वं न युज्यते ॥८८॥

अर्थ: जब इन देवोंकी यह बात है तब पाप कार्य करनेवाले उनके भक्तोंकी बात तो दूर ही रही। उनमें सत्पात्रता किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती ॥८८॥


लोभेन चोदितः पापो जनो यज्ञे प्रवर्तते । कुर्वतो हि तथा लोको धनं तर्हि प्रयच्छति ॥८९॥

अर्थ: लोभसे प्रेरित हुए पापी जन यज्ञमें प्रवृत्त होते हैं और लोग ऐसा करने वालोंको दक्षिणा आदिके रूपमें धन देते हैं सो यह निर्दोष कैसे हो सकता है ? ॥८९॥


तस्मादुद्दिश्य यद्दानं दीयते जिनपुङ्गवम् । सर्वदोषविनिर्मुक्तं तद्ददाति फलं महत् ॥९०॥

अर्थ: इसलिए जिनेन्द्र देवको उद्देश्य कर जो दान दिया जाता है वही सर्वदोष रहित है और वही महाफल प्रदान करता है ॥९०॥


वाणिज्यसदृशो धर्मस्तत्रान्वेष्याल्पभूरिता । बहुना हि परामूतिः क्रियतेऽल्पस्य वस्तुनः ॥९१॥

अर्थ: धर्म तो व्यापारके समान है, जिस प्रकार व्यापारमें सदा हीनाधिकताका विचार किया जाता है उसी प्रकार धर्ममें भी सदा हीनाधिकताका विचार रखना चाहिए अर्थात् हानि-लाभपर दृष्टि रखना चाहिए। जिस धर्ममें पुण्यकी अधिकता हो और पापकी न्यूनता हो गृहस्थ उसे स्वीकृत कर सकता है क्योंकि अधिक वस्तुके द्वारा हीन वस्तुका पराभव हो जाता है ॥९१॥


यथा विषकणः प्राप्तः सरसीं नैव दुष्यति । जिनधर्मोद्यतस्यैवं हिंसालेशो वृथोद्भवः ॥९२॥

अर्थ: जिस प्रकार विषका एक कण तालाबमें पहुँचकर पूरे तालाबको दूषित नहीं कर सकता उसी प्रकार जिनधर्मानुकूल आचरण करनेवाले पुरुषसे जो थोड़ी हिंसा होती है वह उसे दूषित नहीं कर सकती। उसकी वह अल्प हिंसा व्यर्थ रहती है ॥९२॥


प्रासादादि ततः कार्यं जिनानां भक्तितत्परैः । माल्यधूपप्रदीपादि सर्वं च कुशलैर्जनैः ॥९३॥

अर्थ: इसलिए भक्तिमें तत्पर रहनेवाले कुशल मनुष्योंको जिन-मन्दिर आदि बनवाना चाहिए और माला, धूप, दीप आदि सबकी व्यवस्था करनी चाहिए ॥९३॥


स्वर्गे मनुष्यलोके च भोगानत्यन्तमुन्नतान् । जन्तवः प्रतिपद्यन्ते जिनानुद्दिश्य दानतः ॥९४॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्को उद्देश्य कर जो दान दिया जाता है उसके फलस्वरूप जीव स्वर्ग तथा मनुष्यलोक सम्बन्धी उत्तमोत्तम भोग प्राप्त करते हैं ॥९४॥


तन्मार्गप्रस्थितानां च दत्तं दानं यथोचितम् । करोति विपुलान् भोगान् गुणानामिति भाजनम् ॥९५॥

अर्थ: सन्मार्गमें प्रयाण करनेवाले मुनि आदिके लिए जो यथायोग्य दान दिया जाता है वह उत्कृष्ट भोग प्रदान करता है। इस प्रकार यही दान गुणोंका पात्र है ॥९५॥


यथाशक्ति ततो भक्त्या सम्यग्दृष्टिषु यच्छतः । दानं तदेकमात्रास्ति शेषं चोरैर्विलुण्ठितम् ॥९६॥

अर्थ: इसलिए सामर्थ्यके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्यग्दृष्टि पुरुषोंके लिए जो दान देता है उसीका दान एक दान है बाकी तो चोरोंको धन लुटाना है ॥९६॥


स्थितं ज्ञानस्य साम्राज्ये केवलं परिकीर्त्यते । निर्वाणं तस्य संप्राप्तावुपैति ध्यानयोगतः ॥९७॥

अर्थ: केवलज्ञान ज्ञानके साम्राज्य पदपर स्थित है। ध्यानके प्रभावसे जब केवलज्ञानकी प्राप्ति हो चुकती है तभी यह जीव निर्वाणको प्राप्त होता है ॥९७॥


विमुक्ताशेषकर्माणः सर्वबाधाविवर्जिताः । अनन्तसुखसंपन्ना अनन्तज्ञानदर्शनाः ॥९८॥

अशरीराः स्वभावस्था लोकमूर्ध्नि प्रतिष्ठिताः । प्रत्यापत्तिविनिर्मुक्ताः सिद्धा वक्तव्यवर्जिताः ॥९९॥

अर्थ: जिनके समस्त कर्म नष्ट हो चुकते हैं, जो सर्व प्रकारकी बाधाओंसे परे हो जाते हैं, जो अनन्त सुखसे सम्पन्न रहते हैं, अनन्त ज्ञान और अनन्त दर्शन जिनकी आत्मामें प्रकाशमान रहते हैं जिनके तीनों प्रकारके शरीर नष्ट हो जाते हैं, निश्चयसे जो अपने स्वभावमें ही स्थित रहते हैं और व्यवहारसे लोक-शिखरपर विराजमान हैं, जो पुनरागमनसे रहित हैं और जिनका स्वरूप शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता वे सिद्ध भगवान् हैं ॥९८-९९॥


गर्द्धापवनसंवृद्धदुःखपावकमध्यगाः । क्लिश्यन्ते पापिनो नित्यं विना सुकृतवारिणा ॥१००॥

अर्थ: लोभरूपी पवनसे बढ़े दुःख रूपी अग्निके बीचमें पड़े पापी जीव पुण्य रूपी जलके बिना निरन्तर क्लेश भोगते रहते हैं ॥१००॥


पापान्धकारमध्यस्थाः कुदर्शनवशीकृताः । बोधं केचित्प्रपद्यन्ते धर्मादित्यमरीचिभिः ॥१०१॥

अर्थ: पापरूपी अन्धकारके बीचमें रहनेवाले तथा मिथ्यादर्शनके वशीभूत कितने ही जीव धर्मरूपी सूर्यकी किरणोंसे प्रबोधको प्राप्त होते हैं ॥१०१॥


अशुभायोमयात्यन्तदृढपञ्जरमध्यगाः । आशापाशवशा जीवा मुच्यन्ते धर्मबन्धुना ॥१०२॥

अर्थ: जो अशुभभावरूपी लोहेके मजबूत पिंजरेके मध्यमें रह रहे हैं तथा आशारूपी पाशके अधीन हैं ऐसे जीव धर्मरूपी बन्धुके द्वारा ही मुक्त किये जाते हैं - बन्धनसे छुड़ाये जाते हैं ॥१०२॥


सिद्धो व्याकरणाल्लोकबिन्दुसारैकदेशतः । धारणार्थो धृतो धर्मशब्दो वाचि परिस्थितः ॥१०३॥

अर्थ: जो लोकबिन्दुसार नामक पूर्वका एक देश है ऐसे व्याकरणसे सिद्ध है कि जो धारण करे सो धर्म है । ‘धरतीति धर्मः’ इस प्रकार उसका निरुक्त्यर्थ है ॥१०३॥


पतन्तं दुर्गतौ यस्मात्सम्यगाचरितो भवन् । प्राणिनं धारयत्यस्माद्धर्म इत्यभिधीयते ॥१०४॥

अर्थ: और यह ठीक भी है क्योंकि अच्छी तरहसे आचरण किया हुआ धर्म दुर्गतिमें पड़ते हुए जीवको धारण कर लेता है - बचा लेता है इसलिए वह धर्म कहलाता है ॥१०४॥


लभिर्धातुः स्मृतः प्राप्तौ प्राप्तिः संपर्क उच्यते । तस्य धर्मस्य यो लाभो धर्मलाभः स उच्यते ॥१०५॥

अर्थ: लभ धातुका अर्थ प्राप्ति है और प्राप्ति सम्पर्कको कहते हैं, अतः धर्मको प्राप्तिको धर्मलाभ कहते हैं ॥१०५॥


जिनैरभिहितं धर्मं कथयामि समासतः । कांश्चित्तत्फलभेदांश्च श्रृणुतैकाग्रमानसाः ॥१०६॥

अर्थ: अब हम जिन-भगवान्‌के द्वारा कहे हुए धर्मका संक्षेपसे निरूपण करते हैं। साथ ही उसके कुछ भेदों और उनके फलोंका भी निर्देश करेंगे सो तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥१०६॥


हिंसातोऽलीकतः स्तेयान्मैथुनाद् द्रव्यसंगमात् । विरतिर्व्रतमुद्दिष्टं विधेयं तस्य धारणम् ॥१०७॥

अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहसे विरक्त होना सो व्रत कहलाता है। ऐसा व्रत अवश्य ही धारण करना चाहिए ॥१०७॥


ईर्यावाक्यैषणादाननिक्षेपोत्सर्गरूपिका । समितिः पालनं तस्याः कार्यं यत्नेन साधुना ॥१०८॥

अर्थ: ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं। साधुको इनका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए ॥१०८॥


वाङ्मनःकायवृत्तीनामभावो म्रदिमाथवा । गुप्तिराचरणं तस्यां विधेयं परमादरात् ॥१०९॥

अर्थ: वचन, मन और कायकी प्रवृत्तिका सर्वथा अभाव हो जाना अथवा उसमें कोमलता आ जाना गुप्ति है। इसका आचरण बड़े आदरसे करना चाहिए ॥१०९॥


क्रोधो मानस्तथा माया लोभश्चेति महाद्विषः । कषाया यैरयं लोकः संसारे परिवर्त्यते ॥११०॥

अर्थ: क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय महाशत्रु हैं, इन्हींके द्वारा जीव संसारमें परिभ्रमण करता है ॥११०॥


क्षमातो मृदुतासंगादृजुत्वाद्धृतियोगतः । विधेयो निग्रहस्तेषां सूत्रनिर्दिष्टकारिणा ॥१११॥

अर्थ: आगमके अनुसार कार्य करनेवाले मनुष्यको क्षमासे क्रोधका, मृदुतासे मानका, सरलतासे मायाका और सन्तोषसे लोभका निग्रह करना चाहिए ॥१११॥


धर्मसंज्ञमिदं सर्वं व्रतादि परिकीर्तितम् । त्यागश्चोदितो धर्मो विशेषोऽस्य निवेदितः ॥११२॥

अर्थ: अभी ऊपर जिन व्रत समिति आदिका वर्णन किया है वह सब धर्म कहलाता है। इसके सिवाय त्याग भी विशेषधर्म कहा गया है ॥११२॥


रसनस्पर्शनघ्राणचक्षुःश्रोत्राभिधानतः । प्रसिद्धानीन्द्रियाण्येषां निर्जयो धर्म उच्यते ॥११३॥

अर्थ: स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण ये पाँच इन्द्रियाँ प्रसिद्ध हैं। इनका जीतना धर्म कहलाता है ॥११३॥


उपवासोऽवमौदर्यं परिसंख्यानवृत्तिता । रसानां च परित्यागो विविक्तं शयनासनम् ॥११४॥

कायक्लेश इति प्रोक्तं बाह्यं षोढा तपः स्थितम् । तपसोऽभ्यन्तरस्यैतद्वृत्तिस्थानीयमिष्यते ॥११५॥

अर्थ: उपवास, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह बाह्यतप हैं। बाह्यतप अन्तरंग तपकी रक्षाके लिए वृति अर्थात् बाड़ीके समान हैं ॥११४-११५॥


प्रायश्चित्तं विनीतिश्च वैयावृत्यकृतिस्तथा । स्वाध्यायेन च संबन्धो व्युत्सर्गो ध्यानमुत्तमम् ॥११६॥

एतदाभ्यन्तरं षोढा तपश्चरणमिष्यते । तपः समस्तमप्येतद्धर्म इत्यभिधीयते ॥११७॥

अर्थ: प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह आभ्यन्तर तप हैं। यह समस्त तप धर्म कहलाता है ॥११६-११७॥


धर्मेणानेन कुर्वन्ति भव्याः कर्मवियोजनम् । कर्म चाद्भुतमत्यन्तव्यवस्थापरिवर्तनम् ॥११८॥

अर्थ: भव्य जीव इस धर्मके द्वारा कर्मोंका वियोजन अर्थात् विनाश तथा अनन्त व्यवसायोंको परिवर्तित करनेवाले अनेक आश्चर्यजनक कार्य करते हैं ॥११८॥


शक्नोति बाधितुं सर्वान्मानुषानमरांस्तथा । लोकाकाशं च संरोद्धुं वपुषा विक्रियात्मना ॥११९॥

अर्थ: यह जीव धर्मके प्रभावसे ऐसा विक्रियात्मक शरीर प्राप्त करता है कि जिसके द्वारा समस्त मनुष्य और देवोंको बाधा देने तथा लोकाकाशको व्याप्त करनेमें समर्थ होता है ॥११९॥


एकग्रासत्वमानेतुं त्रैलोक्यं च महाबलः । अष्टभेदमहैश्वर्यं योगं चाप्नोति दुर्लभम् ॥१२०॥

अर्थ: धर्मके प्रभावसे यह जीव इतना महाबलवान् हो जाता है कि तीनों लोकोंको एक ग्रास बना सकता है । अणिमा, महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्य तथा अनेक दुर्लभ योग भी यह धर्मके प्रभावसे प्राप्त करता है ॥१२०॥


हन्ति तापं सहस्रांशोस्तुषारत्वमुडुप्रभोः । करोति पूरणं वृष्ट्या सर्वस्य जगतः क्षणात् ॥१२१॥

अर्थ: यह जीव धर्मके प्रभावसे सूर्यके सन्तापको और चन्द्रमाकी शीतलताको नष्ट कर सकता है तथा वृष्टिके द्वारा समस्त संसारको क्षणभरमें भर सकता है ॥१२१॥


भस्मतां नयते लोकमाशीविषवदीक्षणात् । कुरुते मन्दरोत्क्षेपं विक्षेपणमुदन्वताम् ॥१२२॥

अर्थ: यह धर्मके प्रभावसे आशीविष साँपके समान दृष्टिमात्रसे लोकको भस्म कर सकता है, मेरु पर्वतको उठा सकता है और समुद्रको बिखेर सकता है ॥१२२॥


ज्योतिश्चक्रं समुद्धर्तुमिन्द्ररुद्रादिसाध्वसम् । रत्नकाञ्चनवर्षं च ग्रावसंघातसर्जनम् ॥१२३॥

अर्थ: धर्मके ही प्रभावसे ज्योतिश्चक्रको उठा सकता है, इन्द्र, रुद्र आदि देवोंको भयभीत कर सकता है, रत्न और सुवर्णकी वर्षा कर सकता है तथा पर्वतोंके समूहकी सृष्टि कर सकता है ॥१२३॥


व्याधीनामतितीव्राणां शमनं पादपांसुना । नृणामद्भुतहेतूनां विभवानां समुद्भवम् ॥१२४॥

अर्थ: धर्मके ही प्रभावसे अत्यन्त भयंकर बीमारियोंकी शान्ति अपने पैरकी धूलिसे कर सकता है तथा मनुष्योंको अन्य अनेक आश्चर्यकारक वैभवकी प्राप्ति करा सकता है ॥१२४॥


जीवः करोति धर्मेण तथान्यदपि दुष्करम् । नैव किंचिदसाध्यत्वं धर्मस्य प्रतिपद्यते ॥१२५॥

अर्थ: जीव धर्मके प्रभावसे और भी कितने ही कठिन कार्य कर सकता है। यथार्थमें धर्मके लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं है ॥१२५॥


धर्मेण मरणं प्राप्ता ज्योतिश्चक्रतिरस्कृतिम् । कृत्वा कल्पान्प्रपद्यन्ते सौधर्मादीन् गुणालयान् ॥१२६॥

अर्थ: जो जीव धर्मपूर्वक मरण करते हैं वे ज्योतिश्चक्रको उल्लंघन कर गुणोंके निवासभूत सौधर्मादि स्वर्गोंमें उत्पन्न होते हैं ॥१२६॥


सामानिकाः सुराः केचिद्भवन्त्यन्ये सुराधिपाः । अहमिन्द्रास्तथान्ये च कृत्वा धर्मस्य संग्रहम् ॥१२७॥

अर्थ: धर्मका उपार्जन कर कितने ही सामानिक देव होते हैं, कितने ही इन्द्र होते हैं और कितने ही अहमिन्द्र बनते हैं ॥१२७॥


हेमस्फटिकवैडूर्यस्तम्भसंभारनिर्मितान् । तद्भित्तिभासुराँस्तुङ्गान् प्रासादान्बहुभूमिकान् ॥१२८॥

अर्थ: धर्मके प्रभावसे जीव उन महलोंमें उत्पन्न होते हैं जो कि स्वर्ण, स्फटिक और वैडूर्य मणिमय खम्भोंके समूहसे निर्मित होते हैं जिनकी स्वर्णादिनिर्मित दीवालें सदा देदीप्यमान रहती हैं, जो अत्यन्त ऊँचे और अनेक भूमियों (खण्डों) से युक्त होते हैं । ॥१२८॥


अम्भोजदधिमध्वादिविचित्रमणिकुट्टिमान् । मुक्ताकलापसंयुक्तान् वातायनविराजितान् ॥१२९॥

अर्थ: जिनके फर्श पद्मराग, दधिराग तथा मधुराग आदि विचित्र-विचित्र मणियोंसे बने होते हैं, जिनमें मोतियोंकी मालाएँ लटकती रहती हैं, जो झरोखोंसे सुशोभित होते हैं ॥१२९॥


रुरुमिश्रमरैः सिंहैर्गजैरन्यैश्च चारुभिः । रूपैर्निचितपार्श्वाभिर्वेदिकाभिरलंकृतान् ॥१३०॥

अर्थ: जिनके किनारोंपर हरिण, चमरी गाय, सिंह, हाथी तथा अन्यान्य जीवोंके सुन्दर-सुन्दर चित्र चित्रित रहते हैं ऐसी वेदिकाओंसे जो अलंकृत होते हैं ॥१३०॥


चन्द्रशालादिभिर्युक्तान् ध्वजमालाविभूषितान् । सोपाश्रयमनोहारिशयनासनसंगतान् ॥१३१॥

अर्थ: जो चन्द्रशाला आदिसे सहित होते हैं, ध्वजाओं और मालाओंसे अलंकृत रहते हैं तथा जिनकी कक्षाओंमें मनोहारी शय्याएँ और आसन बिछे रहते हैं ॥१३१॥


आतोद्यवरसंपूर्णानिच्छासंचारकारिणः । युक्तान्सत्परिवर्गेण पुण्डरीकादिलक्षितान् ॥१३२॥

विमानप्रभृतीन् जीवा निलयान् धर्मकारिणः । प्रपद्यन्तेऽर्कशीतांशुदीप्तिकान्त्यभिभाविनः ॥१३३॥

अर्थ: धर्म धारण करनेवाले लोग ऐसे विमान आदि स्थानोंमें उत्पन्न होते हैं जो वादित्र आदि संगीतके साधनोंसे युक्त रहते हैं, इच्छानुसार जिनमें गमन होता है, जो उत्तम परिकरसे सहित होते हैं, कमल आदि प्रसाधन सामग्रीसे युक्त रहते हैं और अपनी प्रभासे सूर्यकी दीप्ति और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत करते रहते हैं ॥१३२-१३३॥


सुखनिद्राक्षये यद्वद्विबुद्धं विमलेन्द्रियम् । अचिरोदिततिग्मांशुदीप्तं कान्त्या समं विधोः ॥१३४॥

रजःस्वेदरुजामुक्तं स्वामोदममलं मृदु । श्रिया परमया युक्तं चक्षुष्यमुपपादजम् ॥१३५॥

शरीरं लभ्यते धर्मात् प्राणिभिः सुरसद्मसु । अलंकाराश्च भ्राचक्रतिरोहितदिगन्तरैः ॥१३६॥

अर्थ: धर्मके प्रभावसे प्राणियोंको देव-भवनोंमें ऐसा वैक्रियिक शरीर प्राप्त होता है जो कि सुखमय निद्राके दूर होनेपर जागृत हुएके समान जान पड़ता है, जिसकी इन्द्रियाँ अत्यन्त निर्मल होती हैं । जो तत्काल उदित सूर्यके समान देदीप्यमान होता है, जो कान्तिसे चन्द्रमाकी तुलना प्राप्त करता है, रज, पसीना तथा बीमारीसे रहित होता है, अत्यन्त सुगन्धित, निर्मल और कोमल होता है, उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त, नयनाभिराम और उपपाद जन्मसे उत्पन्न होता है । इसके सिवाय अपनी कान्तिके समूहसे दिगन्तरालको आच्छादित करनेवाले आभूषण भी प्राप्त होते हैं ॥१३४-१३६॥


सरोरुहदलस्पर्शचरणाः कान्तिवन्नखाः । तुलाकोटिकसंदष्टैरक्तांशुकदशाननाः ॥१३७॥

अर्थ: धर्मके प्रभावसे स्वर्गमें ऐसी अप्सराएँ प्राप्त होती हैं जिनके कि चरणोंका स्पर्शन कमलदलके समान कोमल होता है, जिनके नख अत्यन्त कान्तिमान् होते हैं, जिनके लाल-लाल वस्त्रोंके अंचल नूपुरोंमें उलझते रहते हैं ॥१३७॥


रम्भास्तम्भसमस्पर्शजङ्घान्तर्गतजानुकाः । काञ्चीगुणाञ्चितोदारनितम्बा द्विरदक्रमाः ॥१३८॥

अर्थ: जिनकी जंघाएँ केलेके स्तम्भके समान स्निग्ध स्पर्शसे युक्त होती हैं, जिनके घुटने मांस-पेशियोंमें अन्तर्निहित रहते हैं, जिनके स्थूल नितम्ब मेखलाओंसे सुशोभित होते हैं, जिनकी चाल हाथीकी चालके समान मस्तीसे भरी रहती है ॥१३८॥


अनुदारवलीभङ्गतनुमध्यविराजिताः । नवोदितक्षपानाथप्रतिमस्तनमण्डलाः ॥१३९॥

अर्थ: जो सूक्ष्म त्रिवलिसे युक्त मध्यभागसे सुशोभित होती हैं, जिनके स्तनोंके मण्डल नवीन उदित चन्द्रमाके समान होते हैं ॥१३९॥


रत्नावलीप्रभाजालनिर्मुक्तघनचन्द्रिकाः । मालतीमार्दवोपेततनुबाहुलताभृतः ॥१४०॥

अर्थ: जिनको रत्नावलीकी कान्तिसे सदा चाँदनी छिटकती रहती है, जो मालतीके समान कोमल और पतली भुजारूपी लताओंको धारण करती हैं ॥१४०॥


महार्घमणिवाचालवलयाकुलपाणयः । अशोकपल्लवस्पर्शकराङ्गुलिगलत्प्रभाः ॥१४१॥

अर्थ: जिनके हाथ महामूल्य मणियोंकी खनकती हुई चूड़ियोंसे सदा युक्त रहते हैं, अशोक पल्लवके समान कोमलता धारण करनेवाली जिनकी अँगुलियोंसे मानो कान्ति चूती रहती है ॥१४१॥


कम्बुकण्ठा रदच्छायापिहितद्विजवासर्सः । लावण्यलिप्तसर्वांशकपोलामलदर्पणाः ॥१४२॥

अर्थ: जिनके कण्ठ शंखके समान होते हैं, जिनके ओठ दाँतोंकी कान्तिसे आच्छादित रहते हैं, जिनके कपोलरूपी निर्मल दर्पणोंका समस्त भाग लावण्यसे संलिप्त रहता है ॥१४२॥


लोचनान्तघनच्छायाकृतकर्णावतंसकाः । मुक्तापरीतपद्माभिमणिसीमन्तभूषणाः ॥१४३॥

अर्थ: जिनके नयनान्तकी सघन कान्ति सदा कर्णाभरणकी शोभा बढ़ाया करती है, मोतियोंसे व्याप्त पद्मराग मणि जिनकी माँगको अलंकृत करते रहते हैं ॥१४३॥


भ्रमरासितसूक्ष्मातिमृदुकेशकलापिकाः । मृणालकोमलस्पर्शवपुषो मधुरस्वराः ॥१४४॥

अर्थ: जिनके केशोंके समूह भ्रमरके समान काले, सूक्ष्म और अत्यन्त कोमल हैं, जिनके शरीरका स्पर्श मृणालके समान कोमल है, जिनकी आवाज अत्यन्त मधुर है ॥१४४॥


अत्यन्तमुपचारज्ञा नितान्तसुभगक्रियाः । नन्दनप्रभवामोदसमनिश्वाससौरभाः ॥१४५॥

अर्थ: जो सब प्रकारका उपचार जानती हैं, जिनकी समस्त क्रियाएँ अत्यन्त मनोहर हैं, जिनके श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धि नन्दनवनकी सुगन्धिके समान है ॥१४५॥


इङ्गितज्ञानकुशलाः पञ्चेन्द्रियसुखावहाः । कामरूपधरा धर्मात्प्राप्यन्तेऽप्सरसो दिवि ॥१४६॥

अर्थ: जो अभिप्रायके समझनेमें कुशल, पंचेन्द्रियोंको सुख पहुँचानेवाली और इच्छानुसार रूपको धारण करनेवाली हैं ॥१४६॥


संकल्पमात्रसंभूतसर्वोपकरणं पुरु । विषयोत्थं सुखं ताभिः प्राप्नुवन्ति समं सुराः ॥१४७॥

अर्थ: देव लोग, उन अप्सराओंके साथ जहाँ संकल्पमात्रसे ही समस्त उपकरण उपस्थित हो जाते हैं ऐसा विषयजन्य विशाल सुख भोगते हैं ॥१४७॥


सुखं यन्त्रिदशावासे यच्च मानुषविष्टपे । फलं तद्गदितं सर्वं धर्मस्य जिनपुङ्गवैः ॥१४८॥

अर्थ: अथवा मनुष्य लोकमें जो सुख प्राप्त होता है जिनेन्द्रदेवने उस सबको धर्मका फल कहा है ॥१४८॥


ऊर्ध्वाधोमध्यलोकेषु यो नाम सुखसंज्ञितः । भोक्तॄणां जायते भावः स सर्वो धर्मसंभवः ॥१४९॥

अर्थ: ऊर्ध्व, मध्य और अधोलोकमें उपभोक्ताओंको जो भी सुख नामका पदार्थ प्राप्त होता है वह सब धर्मसे ही उत्पन्न होता है ॥१४९॥


दाता भोक्ता स्थितेः कर्ता यो नरः प्रतिवासरम् । रक्ष्यते नृसहस्रौघैः सर्वं तद्धर्मजं फलम् ॥१५०॥

अर्थ: दान देनेवाले, उपभोग करनेवाले एवं मर्यादा स्थापित करनेवाले मनुष्यकी जो हजारों मनुष्योंके झुण्ड रक्षा करते हैं वह सब धर्मसे उत्पन्न हुआ फल समझना चाहिए ॥१५०॥


यत्तत्सुरसहस्राणां हरिभूषणधारिणाम् । प्रभुत्वं कुरुते शक्रस्तत्फलं धर्मसंभवम् ॥१५१॥

अर्थ: मनोहर आभूषण धारण करनेवाले हजारों देवोंपर इन्द्र जो शासन करता है वह धर्मसे उत्पन्न हुआ फल है ॥१५१॥


यन्मोहरिपुमुद्रास्य रत्नत्रयसमन्विताः । सिद्धस्थानं प्रपद्यन्ते शुद्धधर्मस्य तत्फलम् ॥१५२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयसे युक्त जो पुरुष मोहरूपी शत्रुको नष्ट कर मोक्षस्थान प्राप्त करते हैं वह शुद्ध धर्मका फल है ॥१५२॥


अप्राप्य मानुषं जन्म स च धर्मो न लभ्यते । तस्मान्मनुष्यसंप्राप्तिः परमा सर्वजन्मसु ॥१५३॥

अर्थ: मनुष्य-जन्मके बिना अन्यत्र वह धर्म प्राप्त नहीं हो सकता इसलिए मनुष्यभवकी प्राप्ति सब भवोंमें श्रेष्ठ है ॥१५३॥


राजा श्रेष्ठो मनुष्याणां मृगाणां केसरी यथा । पक्षिणां विनतापुत्रः भवानां मानुषो भवः ॥१५४॥

अर्थ: जिस प्रकार मनुष्योंमें राजा, मृगोंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड़ श्रेष्ठ है उसी प्रकार सब भवोंमें मनुष्यभव श्रेष्ठ है ॥१५४॥


सारस्त्रिभुवने धर्मः सर्वेन्द्रियसुखप्रदः । क्रियते मानुषे देहे ततो मनुजता परा ॥१५५॥

अर्थ: तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ एवं समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला धर्म मनुष्यशरीरमें ही किया जाता है इसलिए मनुष्यदेह ही सर्वश्रेष्ठ है ॥१५५॥


तृणानां शालयः श्रेष्ठाः पादपानां च चन्दनाः । उपलानां च रत्नानि भवानां मानुषो भवः ॥१५६॥

अर्थ: जिस प्रकार तृणोंमें धान, वृक्षोंमें चन्दन और पत्थरोंमें रत्न श्रेष्ठ है उसी प्रकार सब भवोंमें मनुष्यभव श्रेष्ठ है ॥१५६॥


उत्सर्पिणीसहस्राणि परिभ्रम्य कथंचन । लभ्यते वा न वा जन्म मनुष्याणां शरीरिणा ॥१५७॥

अर्थ: हजारों उत्सर्पिणियोंमें भ्रमण करनेके बाद यह जीव किसी तरह मनुष्य-जन्म प्राप्त करता है और नहीं भी प्राप्त करता है ॥१५७॥


अवाप्य दुर्लभं तद्यः क्लेशनिर्मोक्षकारणम् । जनो न कुरुते धर्मं यात्यसौ दुर्गतीः पुनः ॥१५८॥

अर्थ: क्लेशोंसे छुटकारा देनेवाले उस मनुष्य-जन्मको पाकर जो मनुष्य धर्म नहीं करता है वह पुनः दुर्गतियोंको प्राप्त होता है ॥१५८॥


पतितं तन्मनुष्यत्वं पुनर्दुर्लभसंगमम् । समुद्रसलिले नष्टं यथा रत्नं महागुणम् ॥१५९॥

अर्थ: जिस प्रकार समुद्रके पानीमें गिरा महामूल्य रत्न दुर्लभ हो जाता है उसी प्रकार नष्ट हुए मनुष्य-जन्मका पुनः पाना भी दुर्लभ है ॥१५९॥


इहैव मानुषे लोके कृत्वा धर्मं यथोचितम् । स्वर्गादिषु प्रपद्यन्ते सर्वं प्राणभृतः फलम् ॥१६०॥

अर्थ: इसी मनुष्य पर्यायमें यथायोग्य धर्म कर प्राणी स्वर्गादिकमें समस्त फल प्राप्त करते हैं ॥१६०॥


सर्वज्ञोक्तमिदं श्रुत्वा भानुकर्णः ससंमदः । भक्त्या प्रणम्य पद्माक्षः पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ॥१६१॥

अर्थ: सर्वज्ञ देवके द्वारा कहे हुए इस उपदेशको सुनकर भानुकर्ण बहुत ही हर्षित हुआ । उसके नेत्र कमलके समान विकसित हो गये । उसने भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तथा हाथ जोड़कर पूछा कि ॥१६१॥


भगवन्न ममाद्यापि जायते प्राप्ततृप्तिता । अतो विधानतो धर्मं निवेदयितुमर्हसि ॥१६२॥

अर्थ: हे भगवान् ! अभी जो उपदेश प्राप्त हुआ है उससे मुझे तृप्ति नहीं हुई है अतः भेद-प्रभेदके द्वारा धर्मका निरूपण कीजिए ॥१६२॥


ततोऽनन्तबलोऽवोचद्विशेषं सौकृतं शृणु । संसाराद्येन मुच्यन्ते प्राणिनो भव्यताभृतः ॥१६३॥

अर्थ: तब अनन्तबल केवली कहने लगे कि अच्छा धर्मका विशेष वर्णन सुनो जिसके प्रभावसे भव्य प्राणी संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥१६३॥


द्विविधो गदितो धर्मो महत्त्वादाणवात्तथा । आद्योऽगारविमुक्तानामन्यश्च भववर्तिनाम् ॥१६४॥

अर्थ: महाव्रत और अणुव्रतके भेदसे धर्म दो प्रकारका कहा गया है। उनमें-से पहला अर्थात् महाव्रत गृहत्यागी मुनियोंके होता है और दूसरा अर्थात् अणुव्रत संसारवर्ती गृहस्थोंके होता है ॥१६४॥


विसृष्टसर्वसंगानां श्रमणानां महात्मनाम् । कीर्तयामि समाचारं दुरितक्षोदनक्षमम् ॥१६५॥

अर्थ: अब मैं समस्त परिग्रहोंसे रहित महान् आत्माके धारी मुनियोंका वह चरित्र कहता हूँ जो कि पापोंको नष्ट करनेमें समर्थ है ॥१६५॥


मते सुव्रतनाथस्य लीना निखिलवेदिनः । मृत्युजन्मसमुद्भूतमहात्राससमन्विताः ॥१६६॥

अर्थ: समस्त पदार्थोंको जाननेवाले मुनि सुव्रतनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें ऐसे कितने ही महापुरुष हैं जो जन्म-मरण सम्बन्धो महाभयसे युक्त हैं ॥१६६॥


एरण्डसदृशं ज्ञात्वा मनुष्यत्वमसारकम् । संगेन रहिता धन्या श्रमणत्वमुपाश्रिताः ॥१६७॥

अर्थ: ये मनुष्य पर्यायको एरण्ड वृक्षके समान निःसार जानकर परिग्रहसे रहित हो मुनिपदको प्राप्त हुए हैं ॥१६७॥


रता महत्त्वयुक्तेषु पञ्चसंख्येषु साधवः । व्रतेष्वाविग्रहत्यागात्तत्त्वावगमतत्पराः ॥१६८॥

अर्थ: वे साधु सदा पंच महाव्रतोंमें लीन रहते हैं और शरीरत्यागपर्यन्त तत्त्वज्ञानके प्राप्त करनेमें तत्पर होते हैं ॥१६८॥


समितिष्वपि तत्संख्यासंगतासु सुचेतसः । अभियुक्ता महासत्त्वास्त्रिसंख्यासु च गुप्तिषु ॥१६९॥

अर्थ: शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले ये धैर्यशाली मुनि पाँच समितियों और तीन गुप्तियोंमें सदा लीन रहते हैं ॥१६९॥


अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं यथोदितम् । येषामस्ति न तेषां स्यात्परिग्रहसमाश्रयः ॥१७०॥

अर्थ: अहिंसा, सत्य, अचौर्य और आगमानुमोदित ब्रह्मचर्य उन्हींके होता है जिनके कि परिग्रह-का आलम्बन नहीं होता ॥१७०॥


देहेऽपि ये न कुर्वन्ति निजे रागं मनीषिणः । कः स्यात्परिग्रहस्तेषां यत्नास्तमितशायिनाम् ॥१७१॥

अर्थ: जो बुद्धिमान् जन अपने शरीरमें भी राग नहीं करते हैं और सूर्यास्त हो जानेपर यत्नपूर्वक विश्राम करते हैं उनके परिग्रह क्या हो सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं ॥१७१॥


अपि बालाग्रमात्रेण पापोपार्जनकारिणा । ग्रन्थेन रहिता धीरा मुनयः सिंहविक्रमाः ॥१७२॥

अर्थ: मुनि पाप उपार्जन करनेवाले बालाग्रमात्र परिग्रहसे रहित होते हैं तथा अत्यन्त धीर-वीर और सिंहके समान पराक्रमी होते हैं ॥१७२॥


समस्तप्रतिबन्धेन समीरणवदुज्झिताः । खगानामपि संगः स्यान्न तु तेषां मनागपि ॥१७३॥

अर्थ: ये वायुके समान सब प्रकारके प्रतिबन्धसे रहित होते हैं। पक्षियोंके तो परिग्रह हो सकता है पर मुनियोंके रंचमात्र भी परिग्रह नहीं होता ॥१७३॥


व्योमवन्मलसंबन्धरहिताः श्लाघ्यचेष्टिताः । रजनीनाथवत्सौम्या दीप्ता दिवसनाथवत् ॥१७४॥

अर्थ: ये आकाशके समान मलके संसर्गसे रहित होते हैं, इनकी चेष्टाएँ अत्यन्त प्रशंसनीय होती हैं, ये चन्द्रमाके समान सौम्य और दिवाकरके समान देदीप्यमान होते हैं ॥१७४॥


निम्नगानाथगम्भीरा धीरा भूधरनाथवत् । भीतकूर्मवदत्यन्तगुप्तेन्द्रियकदम्बकाः ॥१७५॥

अर्थ: ये समुद्रके समान गम्भीर, सुमेरुके समान धीर-वीर और भयभीत कछुएके समान समस्त इन्द्रियोंके समूहको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले होते हैं ॥१७५॥


क्षमया क्षमया तुल्याः कषायोद्रेकवर्जिताः । अशीत्या गुणलक्षाणां चतुःसहितयान्विताः ॥१७६॥

अर्थ: ये क्षमाधर्मके कारण क्षमा अर्थात् पृथ्वीके तुल्य हैं, कषायोंके उद्रेकसे रहित हैं और चौरासी लाख गुणोंसे सहित हैं ॥१७६॥


अष्टादशजिनोद्दिष्टशीललक्षसमन्विताः । अत्यन्ताढ्यास्तपोभूत्या सिद्धयाकाङ्क्षणतत्पराः ॥१७७॥

अर्थ: जिनेन्द्र प्रतिपादित शीलके अठारह लाख भेदोंसे सहित हैं, तपरूपी विभूतिसे अत्यन्त सम्पन्न हैं तथा मुक्तिकी इच्छा करनेमें सदा तत्पर रहते हैं ॥१७७॥


जिनोदितार्थसंसक्ता विदितापरशासनाः । श्रुतसागरपारस्था मुनयो यमधारिणः ॥१७८॥

अर्थ: ये मुनि जिनेन्द्रनिरूपित पदार्थोंमें लीन रहते हैं, अन्य धर्मोंके भी अच्छे जानकार होते हैं, श्रुतरूपी सागरके पारगामी और यमके धारी होते हैं ॥१७८॥


नियमानां विधातारः समुन्नद्धतयोज्झिताः । नानालब्धिकृतासंगा महामङ्गलमूर्तयः ॥१७९॥

अर्थ: ये मुनि अनेक नियमोंके करनेवाले, उद्दण्डतासे रहित, नाना ऋद्धियोंसे सम्पन्न और महामंगलमय शरीरके धारक होते हैं ॥१७९॥


एवंगुणाः समस्तस्य जगतः कृतमण्डनाः । श्रमणास्तनुकर्माणः प्रयान्त्युत्तमदेवताम् ॥१८०॥

अर्थ: इस तरह जो पूर्वोक्त गुणोंको धारण करनेवाले हैं, समस्त जगत्के आभरण हैं और जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं ऐसे मुनि उत्तम देव पदको प्राप्त होते हैं ॥१८०॥


द्वित्रैर्भवैश्च निःशेषं कलुषं ध्यानवह्निना । निर्दह्य प्रतिपद्यन्ते सुखं सिद्धसमाश्रितम् ॥१८१॥

अर्थ: तदनन्तर दो-तीन भवोंमें ध्यानाग्निके द्वारा समस्त कलुषताको जलाकर निर्वाण-सुखको प्राप्त कर लेते हैं ॥१८१॥


स्नेहपञ्जररुद्धानां गृहाश्रमनिवासिनाम् । धर्मोपायं प्रवक्ष्यामि शृणु द्वादशधा स्थितम् ॥१८२॥

अर्थ: अब स्नेहरूपी पिंजड़ेमें रुके हुए गृहस्थाश्रमवासी लोगोंका बारह प्रकारका धर्म कहता हूँ सो सुनो ॥१८२॥


व्रतान्यणूनि पञ्चैषां शिक्षा चोक्ता चतुर्विधा । गुणास्त्रयो यथाशक्तिनियमास्तु सहस्रशः ॥१८३॥

अर्थ: गृहस्थोंको पाँच अणुव्रत, चार शिक्षाव्रत, तीन गुणव्रत और यथाशक्ति हजारों नियम धारण करने पड़ते हैं ॥१८३॥


प्राणातिपाततः स्थूलाद्विरतिर्वितथात्तथा । ग्रहणात्परवित्तस्य परदारसमागमात् ॥१८४॥

अनन्तायाश्च गर्द्धायाः पञ्चसंख्यमिदं व्रतम् । भावना चेयमेतेषां कथिता जिनपुङ्गवैः ॥१८५॥

अर्थ: स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल परद्रव्यग्रहण, परस्त्री समागम और अनन्ततृष्णासे विरत होना ये गृहस्थोंके पाँच अणुव्रत कहलाते हैं। इन व्रतोंकी रक्षाके लिए जिनेन्द्रदेवने निम्नांकित भावनाका निरूपण किया है ॥१८४-१८५॥


इष्टो यथात्मनो देहः सर्वेषां प्राणिनां तथा । एवं ज्ञात्वा सदा कार्या देया सर्वासुधारिणाम् ॥१८६॥

अर्थ: जिस प्रकार मुझे अपना शरीर इष्ट है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको भी अपना-अपना शरीर इष्ट होता है ऐसा जानकर गृहस्थको सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिए ॥१८६॥


एषैव हि पराकाष्ठा धर्मस्योक्ता जिनाधिपैः । दयारहितचित्तानां धर्मः स्वल्पोऽपि नेष्यते ॥१८७॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने दयाको ही धर्मकी परम सीमा बतलायी है। यथार्थमें जिनके चित्त दयारहित हैं उनके थोड़ा भी धर्म नहीं होता है ॥१८७॥


वचनं परपीडायां हेतुत्वं यत्प्रपद्यते । अलीकमेव तत्प्रोक्तं सत्यमस्माद्विपर्यये ॥१८८॥

अर्थ: जो वचन दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेमें निमित्त है वह असत्य ही कहा गया है, क्योंकि सत्य इससे विपरीत होता है ॥१८८॥


वधादि कुरुते जन्मन्यस्मिंस्तेयमनुष्ठितम् । कर्तुः परत्र दुःखानि विविधानि कुयोनिषु ॥१८९॥

अर्थ: की गयी चोरी इस जन्ममें वध, बन्धन आदि कराती है और मरनेके बाद कुयोनियोंमें नाना प्रकारके दुःख देती है ॥१८९॥


तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मतिमान् वर्जयेन्नरः । लोकद्वयविरोधस्य निमित्तं क्रियते कथम् ॥१९०॥

अर्थ: इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिए कि वह चोरीका सर्व प्रकारसे त्याग करे । जो कार्य दोनों लोकोंमें विरोधका कारण है वह किया ही कैसे जा सकता है ? ॥१९०॥


परिवर्ज्या भुजङ्गीव वनिता न्यस्य दूरतः । सा हि लोभवशा पापा पुरुषस्य विनाशिका ॥१९१॥

अर्थ: परस्त्रीका सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग करना चाहिए क्योंकि वह पापिनी लोभके वशीभूत हो पुरुषका नाश कर देती है ॥१९१॥


यथा च जायते दुःखं रुद्धायामात्मयोषिति । नरान्तरेण सर्वेषामियमेव व्यवस्थितिः ॥१९२॥

अर्थ: जिस प्रकार अपनी स्त्रीको कोई दूसरा मनुष्य छेड़ता है और उससे अपने आपको दुःख होता है उसी प्रकार सभीकी यह व्यवस्था जाननी चाहिए ॥१९२॥


उदारश्च तिरस्कारः प्राप्यतेऽत्रैव जन्मनि । तिर्यङ्नरकयोर्दुःखं प्राप्यमेवातिदुस्सहम् ॥१९३॥

अर्थ: परस्त्री सेवन करनेवाले मनुष्यको इसी जन्ममें बहुत भारी तिरस्कार प्राप्त होता है और मरनेपर तिर्यंच तथा नरकगतिके अत्यन्त दुःसह दुःख प्राप्त करने ही पड़ते हैं ॥१९३॥


प्रमाणं कार्यमिच्छायाः सा हि दद्यान्निरङ्कुशा । महादुःखमिहाख्येयौ भद्रकाञ्चनसंज्ञकौ ॥१९४॥

अर्थ: अपनी इच्छाका सदा परिमाण करना चाहिए क्योंकि इच्छापर यदि अंकुश नहीं लगाया गया तो वह महादुःख देती है । इस विषयमें भद्र और कांचनका उदाहरण प्रसिद्ध है ॥१९४॥


विक्रेता वदरादीनां भद्रो दीनारमात्रकम् । द्रविणं प्रत्यजानीत दृष्ट्वातो वर्त्मनि च्युतम् ॥१९५॥

प्रसेवकमितोऽगृह्लाद्दीनारं तु कुतूहली । तत्र काञ्चननामा तु सर्वमेव प्रसेवकम् ॥१९६॥

दीनारस्वामिना राजा काञ्चनो वीक्ष्य नाशितः । स्वयमर्पितदीनारो भद्रस्तु परिपूजितः ॥१९७॥

अर्थ: वैर आदिको बेचनेवाला एक भद्र नामक पुरुष था । उसने प्रतिज्ञा की थी कि मैं एक दीनारका ही परिग्रह रखूँगा । एक बार उसे मार्गमें पड़ा हुआ बटुआ मिला । उस बटुएमें यद्यपि बहुत दीनारें रखी थीं पर भद्रने अपनी प्रतिज्ञाका ध्यान कर कुतूहलवश उनमें-से एक दीनार निकाल ली । शेष बटुआ वहीं छोड़ दिया । वह बटुआ कांचन नामक दूसरे पुरुषने देखा तो वह सबका सब उठा लिया । दीनारोंका स्वामी राजा था । जब उसने जाँच-पड़ताल की तो कांचनको मृत्युकी सजा दी गयी और भद्रने जो एक दीनार ली थी वह स्वयं ही जाकर राजाको वापस कर दी जिससे राजाने उसका सम्मान किया ॥१९५-१९७॥


विगमोऽनर्थदण्डेभ्यो दिग्विदिक्परिवर्जनम् । भोगोपभोगसंख्यानं त्रयमेतद्गुणव्रतम् ॥१९८॥

अर्थ: अनर्थदण्डोंका त्याग करना, दिशाओं और विदिशाओंमें आवागमनकी सीमा निर्धारित करना और भोगोपभोगका परिमाण करना ये तीन गुणव्रत हैं ॥१९८॥


सामायिकं प्रयत्नेन प्रोषधानशनं तथा । संविभागोऽतिथीनां च सल्लेखश्चायुषः क्षये ॥१९९॥

अर्थ: प्रयत्नपूर्वक सामायिक करना, प्रोषधोपवास धारण करना, अतिथिसंविभाग और आयुका क्षय उपस्थित होनेपर सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षाव्रत हैं ॥१९९॥


संकेतो न तिथौ यस्य कृतो यश्चापरिग्रहः । गृहमेति गुणैर्युक्तैः श्रमणः सोऽतिथिः स्मृतः ॥२००॥

अर्थ: जिसने अपने आगमनके विषयमें किसी तिथिका संकेत नहीं किया है, जो परिग्रहसे रहित है और सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे युक्त होकर घर आता है ऐसा मुनि अतिथि कहलाता है ॥२००॥


संविभागोऽस्य कर्तव्यो यथाविभवमादरात् । विधिना लोभमुक्तेन भिक्षोपकरणादिभिः ॥२०१॥

अर्थ: ऐसे अतिथिके लिए अपने वैभवके अनुसार आदरपूर्वक लोभरहित हो भिक्षा तथा उपकरण आदि देना चाहिए यही अतिथिसंविभाग है ॥२०१॥


मधुनो मद्यतो मांसाद् द्यूततो रात्रिभोजनात् । वेश्यासंगमनाच्चास्य विरतिर्नियमः स्मृतः ॥२०२॥

अर्थ: इनके सिवाय गृहस्थ मधु, मद्य, मांस, जुआ, रात्रिभोजन और वेश्यासमागमसे जो विरक्त होता है उसे नियम कहा है ॥२०२॥


गृहधर्ममिमं कृत्वा समाधिप्राप्तपञ्चतः । प्रपद्यते सुदेवत्वं च्युत्वा च सुमनुष्यताम् ॥२०३॥

अर्थ: इस गृहस्थ धर्मका पालन कर जो समाधिपूर्वक मरण करता है, वह उत्तमदेव पर्यायको प्राप्त होता है और वहाँसे च्युत होकर उत्तम मनुष्यत्व प्राप्त करता है ॥२०३॥


भवानामेवमष्टानामन्तः कृत्वानुवर्तनम् । रत्नत्रयस्य निर्ग्रन्थो भूत्वा सिद्धिं समश्नुते ॥२०४॥

अर्थ: ऐसा जीव अधिकसे अधिक आठ भवोंमें रत्नत्रयका पालन कर अन्तमें निर्ग्रन्थ हो सिद्धिपदको प्राप्त होता है ॥२०४॥


नरत्वं दुर्लभं प्राप्य यथोक्ताचरणाक्षमः । श्रद्दधाति जिनोक्तं यः सोऽप्यासन्नशिवालयः ॥२०५॥

अर्थ: जो दुर्लभ मनुष्यपर्याय पाकर यथोक्त आचरण करनेमें असमर्थ है, केवल जिनेन्द्रदेवके द्वारा कथित आचरणकी श्रद्धा करता है वह भी निकट कालमें मोक्ष प्राप्त करता है ॥२०५॥


सम्यग्दर्शनलाभेन केवलेनापि मानवः । सर्वलाभवरिष्ठेन दुर्गतित्रासमुज्झति ॥२०६॥

अर्थ: जिसका लाभ सब लाभोंमें श्रेष्ठ है ऐसे केवल सम्यग्दर्शनके द्वारा भी मनुष्य दुर्गतिके भयसे छूट जाता है ॥२०६॥


कुरुते यो जिनेन्द्राणां नमस्कारं स्वभावतः । पुण्याधारः स पापस्य लवेनापि न युज्यते ॥२०७॥

अर्थ: जो स्वभावसे ही जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करता है वह पुण्यका आधार होता है तथा पापके अंशमात्रका भी उससे सम्बन्ध नहीं होता ॥२०७॥


यः स्मरत्यपि भावेन जिनांस्तस्याशुभं क्षयम् । सद्यः समस्तमायाति भवकोटिभिरर्जितम् ॥२०८॥

अर्थ: नमस्कार तो दूर रहा जो जिनेन्द्र देवका भावपूर्वक स्मरण भी करता है उसके करोड़ों भवोंके द्वारा संचित पाप कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥२०८॥


प्रशस्ताः सततं तस्य ग्रहाः स्वप्नाः शकुन्तयः । त्रैलोक्यसाररत्नं यो दधाति हृदये जिनम् ॥२०९॥

अर्थ: जो मनुष्य तीन लोकमें श्रेष्ठ रत्नस्वरूप जिनेन्द्र देवको हृदयमें धारण करता है उसके सब ग्रह, स्वप्न और शकुनकी सूचना देनेवाले पक्षी सदा शुभ ही रहते हैं ॥२०९॥


अर्हते नम इत्येतत्प्रयुङ्क्ते यो वचो जनः । भावात्तस्याचिरात् कृत्स्नकर्ममुक्तिरसंशया ॥२१०॥

अर्थ: जो मनुष्य ‘अर्हते नमः’ अर्हन्तके लिए नमस्कार हो, इस वचनका भावपूर्वक उच्चारण करता है उसके समस्त कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२१०॥


जिनचन्द्रकथारश्मिसंगमादेति फुल्लताम् । सिद्धियोग्यासुमत्स्वान्तःकुमुदं परमामलम् ॥२११॥

अर्थ: जिनेन्द्र चन्द्रकी कथारूपी किरणोंके समागमसे भव्य जीवका निर्मल हृदयरूपी कुमुद शीघ्र ही प्रफुल्ल अवस्थाको प्राप्त होता है ॥२११॥


अर्हत्सिद्धमुनिभ्यो यो नमस्यां कुरुते जनः । स परीतभवो ज्ञेयः सुशासनजनप्रियः ॥२१२॥

अर्थ: जो मनुष्य अर्हन्त सिद्ध और मुनियोंके लिए नमस्कार करता है वह जिनशासनके भक्त जनोंसे स्नेह रखनेवाला अतीतसंसार है अर्थात् शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करनेवाला है ऐसा जानना चाहिए ॥२१२॥


जिनबिम्बं जिनाकारं जिनपूजां जिनस्तुतिम् । यः करोति जनस्तस्य न किंचिद् दुर्लभं भवेत् ॥२१३॥

अर्थ: जो पुरुष जिनेन्द्र देवकी प्रतिमा बनवाता है, जिनेन्द्र देवका आकार लिखवाता है, जिनेन्द्र देवकी पूजा करता है अथवा जिनेन्द्रदेवकी स्तुति करता है उसके लिए संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होता ॥२१३॥


नरनाथः कुटुम्बी वा धनाढ्यो दुर्विधोऽथवा । जनो धर्मेण यो युक्तः स पूज्यः सर्वविष्टपे ॥२१४॥

अर्थ: यह मनुष्य चाहे राजा हो चाहे साधारण कुटुम्बी, धनाढ्य हो चाहे दरिद्र, जो भी धर्मसे युक्त होता है वह समस्त संसारमें पूज्य होता है ॥२१४॥


महाविनयसंपन्नाः कृत्याकृत्यविचक्षणाः । जनाः गृहाश्रमस्थानां प्रधाना धर्मसंगमात् ॥२१५॥

अर्थ: जो महाविनयसे सम्पन्न तथा कार्य और अकार्यके विचारमें निपुण हैं वे धर्मके समागमसे गृहस्थोंमें प्रधान होते हैं ॥२१५॥


मधुमांससुरादीनामुपयोगं न कुर्वते । ये जनास्ते गृहस्थानां ललामत्वे प्रतिष्ठिताः ॥२१६॥

अर्थ: जो मनुष्य मधु, मांस और मदिरा आदिका उपयोग नहीं करते हैं वे गृहस्थोंके आभूषण पद पदपर स्थित हैं अर्थात् गृहस्थोंके आभूषण हैं ॥२१६॥


शङ्कया काङ्क्षया युक्ता तथा ये विचिकित्सया । सुदूररहितात्मानः परदृष्टिप्रशंसया ॥२१७॥

अन्यशासनसंबद्धसंस्तवेन विवर्जिताः । जन्तवस्ते गृहस्थानां प्रधानपदमाश्रिताः ॥२१८॥

अर्थ: जो शंका, कांक्षा और विचिकित्सासे रहित हैं, जिनकी आत्मा अन्यदृष्टियोंकी प्रशंसासे दूर है और जो अन्य शासन सम्बन्धी स्तवनसे वर्जित हैं वे गृहस्थोंमें प्रधान पदको प्राप्त हैं ॥२१७-२१८॥


सुचारुवसनोऽत्यन्तसुरभिः प्रियदर्शनः । शस्यमानः पुरस्त्रीभिर्याति यो वन्दितुं जिनम् ॥२१९॥

ईक्षमाणो महीं मुक्तविकारश्चारुभावनः । साधुकृत्यसमुद्युक्तः पुण्यं तस्यान्तवर्जितम् ॥२२०॥

अर्थ: जो उत्तम वस्त्रका धारक है, जिसके शरीरसे सुगन्धि निकल रही है, जिसका दर्शन सबको प्रिय लगता है, नगरकी स्त्रियाँ जिसकी प्रशंसा कर रही हैं, जो पृथिवीको देखता हुआ चलता है, जिसने सब विकार छोड़ दिये हैं, जो उत्तम भावनासे युक्त है और अच्छे कार्योंके करनेमें तत्पर है ऐसा होता हुआ जो जिनेन्द्रदेवकी वन्दनाके लिए जाता है उसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है ॥२१९-२२०॥


तृणोपमं परद्रव्यं पश्यन्ति स्वसमं परम् । परयोषां समां मातुर्ये ते धन्यतमा जनाः ॥२२१॥

अर्थ: जो परद्रव्यको तृणके समान, परपुरुषको अपने समान और परस्त्रीको माताके समान देखते हैं वे धन्य हैं ॥२२१॥


प्रतिपद्य कदा दीक्षां विहरिष्यामि मेदिनीम् । क्षपयित्वा कदा कर्म प्रपत्स्ये सिद्धसंश्रयम् ॥२२२॥

एवं प्रतिदिनं यस्य ध्यानं विमलचेतसः । भीतानीव न कुर्वन्ति तेन कर्माणि संगतिम् ॥२२३॥

अर्थ: ‘मैं दीक्षा लेकर पृथिवीपर कब विहार करूँगा ? और कब कर्मोंको नष्ट कर सिद्धालयमें पहुँचूँगा’ जो निर्मल चित्तका धारी मनुष्य प्रतिदिन ऐसा विचार करता है कर्म भयभीत होकर ही मानो उसकी संगति नहीं करते ॥२२२-२२३॥


सप्ताष्टजन्मभिः केचित्सिद्धिं गच्छन्ति जन्तवः । केचिदुग्रतपः कृत्वा द्वित्रैरेव सुचेतसः ॥२२४॥

अर्थ: कोई-कोई गृहस्थ प्राणी, सात-आठ भवोंमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं और उत्तम हृदयको धारण करनेवाले कितने ही मनुष्य तीक्ष्ण तप कर दो-तीन भवमें ही मुक्त हो जाते हैं ॥२२४॥


क्षिप्रं यान्ति महानन्दं मध्यमा भव्यजन्तवः । असमर्थास्तु विश्रम्य मार्गस्य यदि वेदकाः ॥२२५॥

अर्थ: मध्यम भव्य प्राणी शीघ्र ही महान् आनन्द अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं पर जो असमर्थ हैं किन्तु मार्गको जानते हैं वे कुछ विश्राम करनेके बाद महाआनन्द प्राप्त कर पाते हैं ॥२२५॥


अह्नोऽपि योजनशतमविद्वान् वर्त्म यो जनः । भ्राम्यतीष्टमवाप्नोति स पदं न चिरादपि ॥२२६॥

अर्थ: जो मनुष्य मार्गको न जानकर दिनमें सौ-सौ योजन तक गमन करता है वह भटकता ही रहता है तथा चिरकाल तक भी इष्ट स्थानको नहीं प्राप्त कर सकता है ॥२२६॥


तथोग्रमपि कुर्वाणास्तपो वितथदर्शनाः । प्राप्नुवन्ति पदं नैव जन्ममृत्युविवर्जितम् ॥२२७॥

अर्थ: जिनका श्रद्धान मिथ्या है ऐसे लोग उग्र तपश्चरण करते हुए भी जन्म-मरणसे रहित पद नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥२२७॥


मोहान्धकारसंछन्ने कषायोरगसंकुले । ते भ्रमन्ति भवारण्ये नष्टमुक्तिपथा जनाः ॥२२८॥

अर्थ: जो मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रयसे भ्रष्ट हैं वे मोहरूपी अन्धकारसे आच्छादित तथा कषायरूपी सर्पोंसे व्याप्त संसाररूपी अटवीमें भटकते रहते हैं ॥२२८॥


न शीलं न च सम्यक्त्वं न त्यागः साधुगोचरः । यस्य तस्य भवाम्भोधितरणं जायते कथम् ॥२२९॥

अर्थ: जिसके न शील है, न सम्यक्त्व है और न उत्तम त्याग ही है उसका संसार-सागरसे सन्तरण किस प्रकार हो सकता है ? ॥२२९॥


विन्ध्यस्य स्रोतसा नागा यत्रोह्यन्ते नगोन्नताः । वराकाः शशकास्तत्र चिरं नीता विसंशयम् ॥२३०॥

अर्थ: विन्ध्याचलके जिस प्रवाहमें पहाड़के समान ऊँचे-ऊँचे हाथी बह जाते हैं उसमें बेचारे खरगोश तो निःसन्देह ही बह जाते हैं ॥२३०॥


मृत्युजन्मजरावर्तभवस्रोतो विवर्तिनः । कुतीर्थ्या यत्र नीयन्ते तद्भक्तेष्वत्र का कथा ॥२३१॥

अर्थ: जहाँ कुतीर्थका उपदेश देनेवाले कुगुरु भी जन्म-जरा-मृत्युरूपी आवर्तोंसे युक्त संसाररूपी प्रवाहमें चक्कर काटते हैं, वहाँ उनके भक्तोंकी कथा ही क्या है ? ॥२३१॥


यथा तारयितुं शक्ता न शिला सलिले शिलाम् । तथा परिग्रहासक्ताः कुतीर्थ्याः शरणागतान् ॥२३२॥

अर्थ: जिस प्रकार पानीमें पड़ी शिलाको शिला ही तारनेमें समर्थ नहीं है उसी प्रकार परिग्रही साधु शरणागत परिग्रही भक्तोंको तारनेमें समर्थ नहीं हैं ॥२३२॥


तपोनिर्दग्धपापा ये लघवस्तत्त्ववेदिनः । त एव तारणे शक्ता जनानामुपदेशतः ॥२३३॥

अर्थ: जो तपके द्वारा पापोंको जलाकर हलके हो गये हैं ऐसे तत्त्वज्ञ मनुष्य ही अपने उपदेशसे दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ॥२३३॥


संसारसागरे भीमे रत्नद्वीपोऽयमुत्तमः । यदेतन्मानुषं क्षेत्रं तद्धि दुःखेन लभ्यते ॥२३४॥

अर्थ: जो यह मनुष्य क्षेत्र है सो भयंकर संसार-सागरमें मानो उत्तम रत्नद्वीप है । इसकी प्राप्ति बड़े दुःखसे होती है ॥२३४॥


तस्मिन्नियमरत्नानि गृहीतव्यानि धीमता । अवश्यं देहमुत्सृज्य कर्तव्यो भवसंक्रमः ॥२३५॥

अर्थ: इस रत्नद्वीपमें आकर बुद्धिमान् मनुष्यको अवश्य ही नियमरूपी रत्न ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान शरीर छोड़कर पर्यायान्तरमें अवश्य ही जाना होगा ॥२३५॥


अतो यथात्र सूत्रार्थं कश्चित् संचूर्णयेन्मणीन् । विषयार्थं तथा धर्मरत्नानां चूर्णको जनः ॥२३६॥

अर्थ: इस संसारमें जो विषयोंके लिए धर्मरूपी रत्नोंका चूर्ण करता है वह वैसा ही है जैसा कि कोई सूत प्राप्त करनेके लिए मणियोंका चूर्ण करता है ॥२३६॥


अनित्यत्वं शरीरादेरभावं शरणस्य च । अशुचित्वं तथान्यत्वमात्मनो देहपञ्जरात् ॥२३७॥

एकत्वमथ संसारो लोकस्य च विचित्रता । आस्रवः संवरः पूर्वकर्मणां निर्जरा तथा ॥२३८॥

बोधिदुर्लभताधर्मस्वाख्यातत्वं जिनेश्वरैः । द्वादशैवमनुप्रेक्षाः कर्तव्या हृदये सदा ॥२३९॥

अर्थ: शरीरादि अनित्य है, कोई किसीका शरण नहीं है, शरीर अशुचि है, शरीररूपी पिंजड़ेसे आत्मा पृथक् है, यह अकेला ही सुख-दुःख भोगता है, संसारके स्वरूपका चिन्तवन करना, लोक की विचित्रताका विचार करना, आस्रवके दुर्गुणोंका ध्यान करना, संवरकी महिमाका चिन्तवन करना, पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जराका उपाय सोचना, बोधि अर्थात् रत्नत्रयकी दुर्लभताका विचार करना और धर्मका माहात्म्य सोचना - जिनेन्द्र भगवान्ने ये बारह भावनाएँ कही हैं सो इन्हें सदा हृदयमें धारण करना चाहिए ॥२३७-२३९॥


आत्मनः शक्तियोगेन धर्मं यो यादृशं भजेत् । स तस्य तादृशं भुङ्क्ते फलं देवादिभूमिषु ॥२४०॥

अर्थ: जो अपनी शक्तिके अनुसार जैसे धर्मका सेवन करता है वह देवादि गतियोंमें उसका वैसा ही फल भोगता है ॥२४०॥


एवं वदन्नसौ पृष्टो भानुकर्णेन केवली । सभेदं नियमं नाथ ज्ञातुमिच्छामि सांप्रतम् ॥२४१॥

अर्थ: इस प्रकार उपदेश देते हुए अनन्तबल केवलीसे भानुकर्णने पूछा कि हे नाथ ! मैं अब नियम तथा उसके भेदोंको जानना चाहता हूँ ॥२४१॥


ततो जगाद भगवान्भानुकर्णावधारय । नियमश्च तपश्चेति द्वयमेतन्न भिद्यते ॥२४२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि हे भानुकर्ण ! ध्यान देकर अवधारण करो । नियम और तप ये दो पदार्थ पृथक्-पृथक् नहीं हैं ॥२४२॥


तेन युक्तो जनः शक्त्या तपस्वीति निगद्यते । तत्र सर्वप्रयत्नेन मतिः कार्या सुमेधसा ॥२४३॥

अर्थ: जो मनुष्य नियमसे युक्त है वह शक्तिके अनुसार तपस्वी कहलाता है इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको सब प्रकारसे नियम अथवा तपमें प्रवृत्त रहना चाहिए ॥२४३॥


स्वल्पं स्वल्पमपि प्राज्ञैः कर्तव्यं सुकृतार्जनम् । पतद्भिर्बिन्दुभिर्जाता महानद्यः समुद्रगाः ॥२४४॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्योंको थोड़ा-थोड़ा भी पुण्यका संचय करना चाहिए क्योंकि एक-एक बूँदके पड़नेसे समुद्र तक बहनेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ बन जाती हैं ॥२४४॥


अह्नो मुहूर्तमात्रं यः कुरुते भुक्तिवर्जनम् । फलं तस्योपवासेन समं मासेन जायते ॥२४५॥

अर्थ: जो दिनमें एक मुहूर्तके लिए भी भोजनका त्याग करता है उसे एक महीनेमें उपवासके समान फल प्राप्त होता है ॥२४५॥


तत्र स्वर्गे सहस्राणि समानां दश कीर्तितम् । भुञ्जानस्य जनस्योद्यद्भोगं चित्तोपपादितम् ॥२४६॥

अर्थ: संकल्प मात्रसे प्राप्त होनेवाले उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करते हुए इस जीवको कमसे कम दसहजार वर्ष तो लगते ही हैं ॥२४६॥


श्रद्दधानो मतं जैनं यः करोति पुरोदितम् । पल्यैस्तस्योपमानो यः कालः स्वर्गे महात्मनः ॥२४७॥

अर्थ: और जो जैनधर्मकी श्रद्धा करता हुआ पूर्वप्रतिपादित व्रतादि धारण करता है उस महात्माका स्वर्गमें कमसे कम एक पल्य प्रमाण काल बीतता है ॥२४७॥


च्युत्वा तत्र मनुष्यत्वे लभते भोगमुत्तमम् । यथोपवनया लब्धं तापसान्वयजातया ॥२४८॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर वह मनुष्य गतिमें उस प्रकार उत्तम भोग प्राप्त करता है जिस प्रकार तापसवंशमें उत्पन्न हुई उपवनाने प्राप्त किये थे ॥२४८॥


दुःखिन्युपवनाऽबन्धुर्बदराद्युपजीविनी । आदरादीक्षिता राज्ञा मुहूर्तव्रतसंभवात् ॥२४९॥

कुमारी व्रतकस्यान्ते परया द्रव्यसंपदा । योजिता सुतरां जाता धर्मसंविग्नमानसा ॥२५०॥

अर्थ: एक उपवना नामकी दुःखिनी कन्या थी जो भाई-बन्धुओंसे रहित थी और बेर आदि खाकर अपनी जीविका करती थी । एक बार उसने मुहूर्त-भरके लिए आहारका त्याग किया । उस व्रतके प्रभावसे राजाने उसका बड़ा आदर किया तथा व्रतके अनन्तर उसे उत्कृष्ट धनसम्पदासे युक्त किया । इस घटनासे उसका मन धर्ममें अत्यन्त उत्साहित हो गया ॥२४९-२५०॥


जिनेन्द्रवचनं यस्तु कुरुतेऽन्तरवर्जितम् । अनन्तरमसौ सौख्यं परलोके गतोऽश्नुते ॥२५१॥

अर्थ: जो मनुष्य निरन्तर जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंका पालन करता है वह परलोकमें निर्बाध सुखका उपभोग करता है ॥२५१॥


मुहूर्तद्वितयं यस्तु न भुङ्क्ते प्रतिवासरम् । षष्ठोपवासिता तस्य जन्तोर्मासेन जायते ॥२५२॥

अर्थ: जो प्रतिदिन दो मुहूर्तके लिए आहारका त्याग करता है उसे महीनेमें दो उपवासका फल प्राप्त होता है ॥२५२॥


मुहूर्तत्रिंशतं कृत्वा काले यावति तावति । आहारवर्जनं जन्तुरुपवासफलं भजेत् ॥२५३॥

अर्थ: इस प्रकार जो एक-एक मुहूर्त बढ़ाता हुआ तीस मुहूर्त तकके लिए आहारका त्याग करता है उसे तीन-चार आदि उपवासोंका फल प्राप्त होता है ॥२५३॥


मुहूर्तयोजनं कार्यमेवमेवाष्टमादिषु । अधिकं तु फलं वाच्यं हेतुवृद्ध्यनुरूपतः ॥२५४॥

अर्थ: तेला आदि उपवासोंमें भी इसी तरह मुहूर्तकी योजना कर लेनी चाहिए । जो अधिक कालके लिए त्याग होता है उसका कारणके अनुसार अधिक फल कहना चाहिए ॥२५४॥


अवाप्यास्य फलं नाके नियमस्य शरीरिणः । मनुष्यतां समासाद्य जायन्तेऽद्भुतचेष्टिताः ॥२५५॥

अर्थ: प्राणी स्वर्गमें इस नियमका फल प्राप्त कर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ अद्भुत चेष्टाओंके धारक होते हैं ॥२५५॥


लावण्यपङ्कलिप्तानां हारिविभ्रमकारिणाम् । भवन्ति कुलदाराणां पतयो धर्मशेषतः ॥२५६॥

अर्थ: स्वर्गमें फल भोगनेसे जो पुण्य शेष बचता है उसके फलस्वरूप वे कुलवती स्त्रियोंके पति होते हैं । जिनका कि शरीर लावण्यरूपी पंकसे लिप्त रहता है तथा जो मनको हरण करनेवाले हाव-भाव विभ्रम किया करती हैं ॥२५६॥


स्त्रियोऽपि स्वर्गतश्च्युत्वा मनुष्यभवमागताः । महापुरुषसंसेव्या यान्ति लक्ष्मीसमानताम् ॥२५७॥

अर्थ: नियमवाली स्त्रियाँ भी स्वर्गसे चयकर मनुष्य भवमें आती हैं और महापुरुषोंके द्वारा सेवनीय होती हुई लक्ष्मीकी समानता प्राप्त करती हैं ॥२५७॥


आदित्येऽस्तमनुप्राप्ते कुरुते योऽन्नवर्जनम् । भवेदभ्युदयोऽस्यापि सम्यग्दृष्टेर्विशेषतः ॥२५८॥

अर्थ: जो सूर्यास्त होनेपर अन्नका त्याग करता है उस सम्यग्दृष्टिको भी विशेष अभ्युदयकी प्राप्ति होती है ॥२५८॥


अप्सरोमण्डलान्तःस्थो विमाने रत्नभासुरे । बहुपल्योपमं कालं धर्मेणानेन तिष्ठति ॥२५९॥

अर्थ: यह जीव इस धर्मके कारण रत्नोंसे जगमगाते विमानोंमें अप्सराओंके मध्यमें बैठकर अनेक पल्योपमकाल व्यतीत करता है ॥२५९॥


मनुष्यत्वं समासाद्य दुर्लभं तत्परायणैः । महेशानस्य कर्तव्यं जिनस्य समुपासनम् ॥२६०॥

अर्थ: इसलिए दुर्लभ मनुष्य पर्याय पाकर धर्ममें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको महाप्रभु श्रीजिनेन्द्र देवकी उपासना करनी चाहिए ॥२६०॥


यस्य काञ्चननिर्माणा योजनं जायते मही । आसने जायते देवतिर्यग्मानुषसेविता ॥२६१॥

अर्थ: जिनके आसनस्थ होनेपर देव, तिर्यंच और मनुष्योंसे सेवित एक योजनकी पृथ्वी स्वर्णमयी हो जाती है ॥२६१॥


प्रातिहार्याणि यस्याष्टौ चतुस्त्रिंशन्महाद्भुताः । सहस्रभास्कराकारं रूपं लोचनसौख्यदम् ॥२६२॥

अर्थ: जिनके आठ प्रातिहार्य और चौंतीस महाअतिशय प्रकट होते हैं। तथा जिनका रूप हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं नेत्रोंको सुख देनेवाला होता है ॥२६२॥


भव्यः प्रणाममेतस्य यः करोति विचक्षणः । समुत्तरति कालेन स स्तोकेन भवार्णवम् ॥२६३॥

अर्थ: ऐसे महाप्रभु जिनेन्द्र भगवान्‌को जो बुद्धिमान् भव्य प्रणाम करता है वह थोड़े ही समयमें संसार-सागरसे पार हो जाता है ॥२६३॥


उपायमेतमुज्झित्वा शान्तिप्राप्तौ शरीरिणाम् । नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति तस्मात्सेव्यः स यत्नतः ॥२६४॥

अर्थ: जीवोंको शान्ति प्राप्त करनेके लिए यह उपाय छोड़कर और दूसरा कोई उपाय नहीं है इसलिए यत्नपूर्वक इसकी सेवा करनी चाहिए ॥२६४॥


मार्गा गोदण्डकाकाराः सन्त्यन्येऽपि सहस्रशः । कुतीर्थसंश्रिता येषु विमुह्यन्ति प्रमादिनः ॥२६५॥

अर्थ: इनके सिवाय कुतीर्थियोंसे सेवित गोदण्डकके समान जो अन्य हजारों मार्ग हैं उनमें प्रमादी जीव मोहित हो रहे हैं - यथार्थ मार्ग भूल रहे हैं ॥२६५॥


न सम्यक्करुणा तेषु मधुमांसादिसेवनात् । जैने तु कणिकाप्यस्ति न दोषस्य प्ररूपणे ॥२६६॥

अर्थ: उन मार्गाभासोंमें समीचीन दया तो नाममात्रको नहीं है क्योंकि मधु-मांसादिका सेवन खुलेआम होता है पर जिनेन्द्रदेवकी प्ररूपणामें दोष की कणिका भी दृष्टिगत नहीं होती ॥२६६॥


त्याज्यमेतत्परं लोके यत्प्रपीड्य दिवा क्षुधा । आत्मानं रजनीभुक्त्या गमयत्यर्जितं शुभम् ॥२६७॥

अर्थ: लोकमें यह कार्य तो बिलकुल ही त्यागने योग्य है कि दिनभर तो भूखसे अपनी आत्माको पीड़ा पहुँचाते हैं और रात्रिको भोजन कर संचित पुण्यको तत्काल नष्ट कर देते हैं ॥२६७॥


निशिभुक्तिरधर्मो यैर्धर्मत्वेन प्रकल्पितः । पापकर्मकठोराणां तेषां दुःखं प्रबोधनम् ॥२६८॥

अर्थ: रात्रिमें भोजन करना अधर्म है फिर भी इसे जिन लोगोंने धर्म मान रखा है, उनके हृदय पापकर्मसे अत्यन्त कठोर हैं उनका समझना कठिन है ॥२६८॥


दर्शनागोचरीभूते सूर्ये परमलालसः । भुङ्क्ते पापमना जन्तुर्दुर्गतिं नावबुध्यते ॥२६९॥

अर्थ: सूर्यके अदृश हो जानेपर जो लम्पटी-पापी मनुष्य भोजन करता है वह दुर्गतिको नहीं समझता ॥२६९॥


मक्षिकाकीटकेशादि भक्ष्यते पापजन्तुना । तमःपटलसंछन्नचक्षुषा पापबुद्धिना ॥२७०॥

अर्थ: जिसके नेत्र अन्धकारके पटलसे आच्छादित हैं और बुद्धि पापसे लिप्त है ऐसे पापी प्राणी रातके समय मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि हानिकारक पदार्थ खा जाते हैं ॥२७०॥


डाकिनीप्रेतभूतादिकुत्सितप्राणिभिः समम् । भुक्तं तेन भवेद्येन क्रियते रात्रिभोजनम् ॥२७१॥

अर्थ: जो रात्रिमें भोजन करता है वह डाकिनी, प्रेत, भूत आदि नीच प्राणियोंके साथ भोजन करता है ॥२७१॥


सारमेयाखुमार्जारप्रभृतिप्राणिभिः समम् । मांसाहारैर्भवेद्भुक्तं तेन यो निशि वल्भते ॥२७२॥

अर्थ: जो रात्रिमें भोजन करता है वह कुत्ते, चूहे, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवोंके साथ भोजन करता है ॥२७२॥


अथवा किं प्रपञ्चेन पुलाकेनेह भाष्यते । क्षपायामश्नता सर्वं भवेदशुचि भक्षितम् ॥२७३॥

अर्थ: अथवा अधिक कहनेसे क्या ? संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि जो रातमें भोजन करता है वह सब अपवित्र पदार्थ खाता है ॥२७३॥


विरोचनेऽस्तसंसर्गं गते ये भुञ्जते जनाः । ते मानुषतया बद्धाः पशवो गदिता बुधैः ॥२७४॥

अर्थ: सूर्यके अस्त हो जानेपर जो भोजन करते हैं उन्हें विद्वानोंने मनुष्यतासे बँधे हुए पशु कहा है ॥२७४॥


नक्तं दिवा च भुञ्जानो विमुखो जिनशासने । कथं सुखी परत्र स्यान्निर्व्रतो नियमोज्झितः ॥२७५॥

अर्थ: जो जिनशासनसे विमुख होकर रात-दिन चाहे जब खाता रहता है वह नियमरहित अव्रती मनुष्य परलोकमें सुखी कैसे हो सकता है ? ॥२७५॥


दयामुक्तो जिनेन्द्राणां पापः कुत्सामुदाहरन् । अन्यदेहं गतो जन्तुः पूतिगन्धमुखो भवेत् ॥२७६॥

अर्थ: जो पापी मनुष्य दयारहित होकर जिनेन्द्र देवको निन्दा करता है वह अन्य शरीरमें जाकर दुर्गन्धित मुखवाला होता है अर्थात् परभवमें उसके मुखसे दुर्गन्ध आती है ॥२७६॥


मांसं मद्यं निशाभुक्तिं स्तेयमन्यस्य योषितम् । सेवते यो जनस्तेन भवे जन्मद्वयं हतम् ॥२७७॥

अर्थ: जो मनुष्य मांस, मद्य, रात्रिभोजन, चोरी और परस्त्रीका सेवन करता है वह अपने दोनों भवोंको नष्ट करता है ॥२७७॥


ह्रस्वायुर्वित्तमुक्तश्च व्याधिपीडितविग्रहः । परत्र सुखहीनः स्यान्नक्तं यः प्रत्यवश्यति ॥२७८॥

अर्थ: जो मनुष्य रात्रिमें भोजन करता है वह पर-भवमें अल्पायु, निर्धन, रोगी और सुखरहित अर्थात् दुःखी होता है ॥२७८॥


प्राप्नोति जन्ममृत्युं च दीर्घकालमनन्तरम् । पच्यते गर्भवासेषु दुःखेन निशि भोजनात् ॥२७९॥

अर्थ: रात्रिमें भोजन करनेसे यह जीव दीर्घ काल तक निरन्तर जन्म-मरण प्राप्त करता रहता है और गर्भवासमें दुःखसे पकता रहता है ॥२७९॥


वराहवृकमार्जारहंसकाकादियोनिषु । जायते सुचिरं कालं रात्रिभोजी कुदर्शनः ॥२८०॥

अर्थ: रात्रिमें भोजन करनेवाला मिथ्यादृष्टि पुरुष शूकर, भेड़िया, बिलाव, हंस तथा कौआ आदि योनियोंमें दीर्घ काल तक उत्पन्न होता रहता है ॥२८०॥


उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योः सहस्राणि कुयोनिषु । आपनीपद्यते दुःखं कुधीर्यो निशि वल्भते ॥२८१॥

अर्थ: जो दुर्बुद्धि रात्रिमें भोजन करता है वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक कुयोनियोंमें दुःख उठाता रहता है ॥२८१॥


अवाप्य यो मतं जैनं नियमेष्ववतिष्ठते । अशेषं किल्बिषं दग्ध्वा सुस्थानं सोऽधिगच्छति ॥२८२॥

अर्थ: जो जैन धर्म पाकर उसके नियमोंमें अटल रहता है वह समस्त पापोंको जलाकर उत्तम स्थानको प्राप्त होता है ॥२८२॥


रत्नत्रितयसंपूर्णा अणुव्रतपरायणाः । तरणावुदिते भव्या भुञ्जते दोषवर्जितम् ॥२८३॥

अर्थ: रत्नत्रयके धारक तथा अणुव्रतोंका पालन करनेमें तत्पर भव्य जीव सूर्योदय होनेपर ही निर्दोष आहार ग्रहण करते हैं ॥२८३॥


अपापास्तेऽधिगच्छन्ति विमानेशास्त्रिविष्टपाः । परं भोगं न ये रात्रौ भुञ्जते करुणा पराः ॥२८४॥

अर्थ: जो दयालु मनुष्य रात्रिमें भोजन नहीं करते वे पापहीन मनुष्य स्वर्गमें विमानोंके अधिपति होकर उत्कृष्ट भोग प्राप्त करते हैं ॥२८४॥


ततश्च्युत्वा मनुष्यत्वं प्राप्य निन्दाविवर्जितम् । भुञ्जते चक्रवर्त्यादिविभवोपहृतं सुखम् ॥२८५॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर तथा उत्तम मनुष्य पर्याय पाकर चक्रवर्ती आदिके विभवसे प्राप्त होनेवाले सुखका उपभोग करते हैं ॥२८५॥


सौधर्मादिषु कल्पेषु मानसानीतकारणम् । प्राप्नुवन्ति परं भोगं सिद्धिं च शुभचेष्टिताः ॥२८६॥

अर्थ: शुभ चेष्टाओंके धारक पुरुष सौधर्मादि स्वर्गोंमें मनमें विचार आते ही उपस्थित होनेवाले उत्कृष्ट भोगों तथा अणिमा-महिमा आदि आठ सिद्धियों-को प्राप्त होते हैं ॥२८६॥


जगद्धिता महामात्या राजानः पीठमर्दिनः । संमताः सर्वलोकस्य भवन्ति दिनभोजनात् ॥२८७॥

अर्थ: दिनमें भोजन करनेसे मनुष्य जगत्का हित करनेवाले महामन्त्री, राजा, पीठमर्द तथा सर्व लोकप्रिय व्यक्ति होते हैं ॥२८७॥


धनवन्तो गुणोदाराः सुरूपा दीर्घजीविताः । जिनबोधिसमायुक्ताः प्रधानपदसंस्थिताः ॥२८८॥

अर्थ: धनवान्, गुणवान्, रूपवान्, दीर्घायुष्क, रत्नत्रयसे युक्त तथा प्रधान पदपर आसीन व्यक्ति भी दिनमें भोजन करने से ही होते हैं ॥२८८॥


असह्यतेजसः संख्ये पुरादीनामधीश्वराः । विचित्रवाहनोपेताः सामन्तकृतपूजनाः ॥२८९॥

अर्थ: जिनका तेज युद्धमें असह्य है, जो नगर आदिके अधिपति हैं, विचित्र वाहनोंसे सहित हैं तथा सामन्तगण जिनका सत्कार करते हैं ऐसे पुरुष भी दिनमें भोजन करनेसे ही होते हैं ॥२८९॥


भवनेशाः सुरेशाश्च चक्राङ्कविभवाश्रिताः । महालक्षणसंपन्ना भवन्ति दिनभोजनात् ॥२९०॥

अर्थ: इतना ही नहीं, भवनेन्द्र, देवेन्द्र, चक्रवर्ती और महालक्षणोंसे सम्पन्न व्यक्ति भी दिनमें भोजन करने से ही होते हैं ॥२९०॥


आदित्यवत्प्रभावन्तश्चन्द्रवत्सौम्यदर्शनाः । अनस्तमितभोगाढ्यास्ते येऽनस्तमितोद्यताः ॥२९१॥

अर्थ: जो रात्रिभोजनत्यागव्रतमें उद्यत रहते हैं वे सूर्यके समान प्रभावान्, चन्द्रमाके समान सौम्य और स्थायी भोगोंसे युक्त होते हैं ॥२९१॥


अनाथा दुर्भगा मातृपितृभ्रातृविवर्जिताः । शोकदारिद्र्यसंपूर्णाः स्त्रियः स्युर्निशि भोजनात् ॥२९२॥

अर्थ: रात्रिमें भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ, दुर्भाग्यशाली, मातापिता भाईसे रहित तथा शोक और दारिद्र्यसे युक्त होती हैं ॥२९२॥


रूक्षस्फुटितहस्तादिस्वाङ्गाश्चिपिटनासिकाः । बीभत्सदर्शनाः क्लिन्नचक्षुषो दुष्टलक्षणाः ॥२९३॥

दुर्गन्धविग्रहा मग्नसुमहादशनच्छदाः । उत्वणश्रुतयः पिङ्गस्फुटिताग्रशिरोरुहाः ॥२९४॥

अलाबूबीजसंस्थानदशनाः शुक्लविग्रहाः । काणकुण्ठगतच्छाया विवर्णाः परुषत्वचः ॥२९५॥

अनेकरोगसंपूर्णमलिनाश्छिद्रवाससः । .कुत्सिताशनजीविन्यः परकर्मसमाश्रिताः ॥२९६॥

अर्थ: जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़से युक्त हैं, जो अनेक दुष्टलक्षणोंसे सहित हैं, । जिनके शरीरसे दुर्गन्ध आती रहती है, जिनके ओठ फटे और मोटे हैं, कान खड़े हैं, शिरके बाल पीले तथा चटके हैं, दाँत तूँबड़ीके बीजके समान हैं और शरीर सफेद है, जो कानी, शिथिल तथा कान्तिहीन हैं, रूपरहित हैं, जिनका चर्म कठोर है । जो अनेक रोगोंसे युक्त तथा मलिन हैं, जिनके वस्त्र फटे हैं, जो गन्दा भोजन खाकर जीवित रहती हैं, और जिन्हें दूसरेकी नौकरी करनी पड़ती है, ऐसी स्त्रियाँ रात्रि भोजनके ही पापसे होती हैं ॥२९३-२९६॥


उत्कृत्तश्रवणं विग्रं धनबन्धुविवर्जितम् । प्राप्नुवन्ति पतिं नार्यो रात्रिभोजनतत्पराः ॥२९७॥

अर्थ: रात्रिभोजनमें तत्पर रहनेवाली स्त्रियाँ बूचे नकटे और धन तथा भाई-बन्धुओंसे रहित पतिको प्राप्त होती हैं ॥२९७॥


दुःखभारसमाक्रान्ता बालवैधव्यसंगताः । अम्बुकाष्ठादिवाहिन्यो दुःपूरोदरतत्पराः ॥२९८॥

सर्वलोकपराभूता वाग्वासीनष्टचेतसः । अङ्कव्रणशताधारा भवन्ति निशि भोजनात् ॥२९९॥

अर्थ: जो दुःखके भारसे निरन्तर आक्रान्त रहती हैं, बाल अवस्थामें ही विधवा हो जाती हैं, पानी, लकड़ी आदि ढो-ढो कर पेट भरती हैं, अपना पेट बड़ी कठिनाईसे भर पाती हैं, सब लोग जिनका तिरस्कार करते हैं, जिनका चित्त वचन रूपी बसूलासे नष्ट होता रहता है और जिनके शरीरमें सैकड़ों घाव लगे रहते हैं, ऐसी स्त्रियाँ रात्रि भोजनके कारण ही होती हैं ॥२९८-२९९॥


उपशान्ताशया यास्तु नार्यः शीलसमन्विताः । साधुवर्गहिता रात्रिभोजनाद्विरतात्मिकाः ॥३००॥

लभन्ते ता यथाभीष्टं भोगं स्वर्गे समावृताः । परिवारेण मूर्धस्थपाणिना शासनैषिणा ॥३०१॥

अर्थ: जो स्त्रियाँ शान्त चित्त, शील सहित, मुनिजनोंका हित करनेवाली और रात्रि भोजनसे विरत रहती हैं वे स्वर्गमें यथेच्छ भोग प्राप्त करती हैं । शिरपर हाथ रखकर आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेवाले परिवारके लोग उन्हें सदा घेरे रहते हैं ॥३००-३०१॥


ततश्च्युताः स्फुरन्त्युच्चैः कुले विभवधारिणि । शुभलक्षणसंपूर्णा गुणैः सर्वैः समन्विताः ॥३०२॥

अर्थ: स्वर्गसे च्युत होकर वे वैभवशाली उच्च कुलमें उत्पन्न होती हैं, शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा समस्त गुणोंसे सहित होती हैं ॥३०२॥


कलाविशारदा नेत्रमानसस्नेहविग्रहाः । विमुञ्चन्त्योऽमृतं वाचा ह्लादयन्त्योऽखिलं जनम् ॥३०३॥

अर्थ: अनेक कलाओंमें निपुण रहती हैं, उनके शरीर नेत्र और मनमें स्नेह उत्पन्न करनेवाले होते हैं, अपने वचनोंसे मानो वे अमृत छोड़ती हैं, समस्त लोगोंको आनन्दित करती हैं ॥३०३॥


भवन्त्युत्कण्ठया युक्तास्तासु विद्याधराधिपाः । हरयो बलदेवाश्च तथा चक्राङ्कितश्रियः ॥३०४॥

अर्थ: विद्याधरोंके अधिपति, नारायण, बलदेव और चक्रवर्ती भी उनमें उत्कण्ठित रहते हैं - उन्हें प्राप्त करनेके लिए उत्सुक रहते हैं ॥३०४॥


विद्युद्रक्तोत्पलच्छायाः स्फुरल्ललितकुण्डलाः । नरेन्द्रकृतसंबन्धा भवन्ति दिनभोजनात् ॥३०५॥

अर्थ: जिनके शरीरकी कान्ति बिजली तथा लाल कमलके समान मनोहारी है, जिनके सुन्दर कुण्डल सदा हिलते रहते हैं, तथा राजाओंके साथ जिनके विवाह सम्बन्ध होते हैं ऐसी स्त्रियाँ दिनमें भोजन करनेसे ही होती हैं ॥३०५॥


अन्नं यथेप्सितं तासां जायते भृत्यकल्पितम् । निशासु या न कुर्वन्ति भोजनं करुणापराः ॥३०६॥

अर्थ: जो दयावती स्त्रियाँ रात्रिमें भोजन नहीं करती हैं उन्हें सदा भृत्यजनोंके द्वारा तैयार किया हुआ मनचाहा भोजन प्राप्त होता है ॥३०६॥


श्रीकान्तासुप्रभातुल्याः सुभद्रासदृशस्तथा । लक्ष्मीसमत्विषो योषा भवन्ति दिनभोजनात् ॥३०७॥

अर्थ: दिनमें भोजन करनेसे स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा, सुभद्रा और लक्ष्मीके समान कान्ति-युक्त होती हैं ॥३०७॥


तस्मान्नरेण नार्या वा नियमस्थेन चेतसा । वर्जनीया निशाभुक्तिरनेकापायसंगता ॥३०८॥

अर्थ: इसलिए नर हो चाहे नारी, दोनोंको अपना चित्त नियममें स्थिरकर अनेक दुःखोंसे सहित जो रात्रि भोजन है उसका त्याग करना चाहिए ॥३०८॥


अत्यल्पेन प्रयासेन शर्मैवमुपलभ्यते । ततो भजत तं नित्यं स्वसुखं को न वाञ्छति ॥३०९॥

अर्थ: इस प्रकार थोड़े ही प्रयाससे जब सुख मिलता है तो उस प्रयासका निरन्तर सेवन करो । ऐसा कौन है जो अपने लिए सुखकी इच्छा न करता हो ॥३०९॥


धर्मो मूलं सुखोत्पत्तेरधर्मो दुःखकारणम् । इति ज्ञात्वा भजेद्धर्ममधर्मं च विवर्जयेत् ॥३१०॥

अर्थ: ‘धर्म सुखोत्पत्तिका कारण है और अधर्म दुःखोत्पत्तिका’ ऐसा जानकर धर्मकी सेवा करनी चाहिए और अधर्मका परित्याग ॥३१०॥


आगोपालाङ्गनं लोके प्रसिद्धिमिदमागतम् । यथा धर्मेण शर्मेति विपरीतेन दुःखितम् ॥३११॥

अर्थ: यह बात गोपालकों तकमें प्रसिद्ध है कि धर्मसे सुख होता है और अधर्मसे दुःख ॥३११॥


धर्मस्य पश्य माहात्म्यं येन नाकच्युता नराः । उत्पद्यन्ते महाभोगा मनुष्यत्वे मनोहराः ॥३१२॥

अर्थ: धर्मका माहात्म्य देखो कि जिसके प्रभावसे प्राणी स्वर्गसे च्युत होकर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ महाभोगोंसे युक्त तथा मनोहर शरीरके धारक होते हैं ॥३१२॥


जलस्थलसमुद्भूतरत्नानां ते समाश्रयाः । औदासीन्यमपि प्राप्ता भवन्ति सुखिनः सदा ॥३१३॥

अर्थ: वे जल तथा स्थलमें उत्पन्न हुए रत्नोंके आधार होते हैं और उदासीन होनेपर भी सदा सुखी रहते हैं ॥३१३॥


सुवर्णवस्त्रसस्यादिभाण्डागाराणि मानवैः । रक्ष्यन्ते सततं तेषां विचित्रायुधपाणिभिः ॥३१४॥

अर्थ: ऐसे मनुष्योंके स्वर्ण, वस्त्र तथा धान आदिके भाण्डारोंकी रक्षा हाथोंमें विविध प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले लोग किया करते हैं ॥३१४॥


प्रभूतं गोमहिष्यादिवारणास्तुरगा रथाः । भृत्या जनपदा ग्रामाः प्रासादा नगराणि च ॥३१५॥

दासवर्गो विशाला श्रीर्विष्टरं हरिभिर्धृतम् । मानसस्येन्द्रियाणां च विषयाहरणक्षमाः ॥३१६॥

हंसीविभ्रमगामिन्यो घनलावण्यविग्रहाः । माधुर्ययुक्तनिस्वानाः पीनस्तन्यः सुलक्षणाः ॥३१७॥

चक्षुषां वागुरातुल्यास्तरुण्यो हारिचेष्टिताः । नानालंकारधारिण्यो दास्यः पुण्यफलात्मिकाः ॥३१८॥

अर्थ: उन्हें अत्यधिक गाय, भैंस आदि पशु, हाथी, घोड़े, रथ, पयादे, देश, ग्राम, महल, नौकरोंके समूह, विशाल लक्ष्मी और सिंहासन प्राप्त होते हैं । साथ ही जो मन और इन्द्रियोंके विषय उत्पन्न करनेमें समर्थ हैं, जिनकी चाल हंसीके समान विलास पूर्ण है, जिनका शरीर अत्यधिक सौन्दर्यसे युक्त है, जिनकी आवाज मीठी है, जिनके स्तन स्थूल हैं, जो अनेक शुभ लक्षणोंसे युक्त हैं, जो नेत्रोंको पराधीन करनेके लिए जालके समान हैं, तथा जिनकी चेष्टाएँ मनोहर हैं ऐसी अनेक तरुण स्त्रियाँ और नाना अलंकार धारण करनेवाली दासियाँ पुण्यके फलस्वरूप प्राप्त होती हैं ॥३१५-३१८॥


उपायं केचिदज्ञात्वा धर्माख्यं सुखसंततेः । मूढा तस्य समारम्भे न यतन्तेऽसुधारिणः ॥३१९॥

अर्थ: कितने ही मूर्ख प्राणी ऐसे हैं कि जो सुख-समूहकी प्राप्तिका कारण धर्म है उसे जानते ही नहीं हैं अतः वे उसके साधनके लिए प्रयत्न ही नहीं करते ॥३१९॥


पापकर्मवशात्मानः केचिच्छ्रुत्वापि मानवाः । शर्मोपायं न सेवन्ते धर्मं दुष्कृततत्पराः ॥३२०॥

अर्थ: और जिनकी आत्मा पाप कर्मके वशीभूत है तथा जो पाप कर्मोंमें निरन्तर तत्पर रहते हैं ऐसे भी कितने ही लोग हैं कि जो धर्मको सुख प्राप्तिका साधन सुनकर भी उसका सेवन नहीं करते ॥३२०॥


उपशान्तिं गते केचित्सच्चेष्टारोधिकर्मणि । अभिगम्य गुरुं धर्मं पृच्छन्त्युद्यतचेतसः ॥३२१॥

अर्थ: उत्तम कार्योंके बाधक पापकर्मके उपशान्त हो जानेपर कुछ ही जीव ऐसे होते हैं कि जो उत्सुक चित्त हो गुरुके समीप जाकर धर्मका स्वरूप पूछते हैं ॥३२१॥


उपशान्तेरशुद्धस्य कर्मणस्तद्गुरोर्वचः । अर्थवज्जायते तेषु श्रेष्ठानुष्ठानकारिषु ॥३२२॥

अर्थ: तथा पाप कर्मके उपशान्त होनेसे यदि वे जीव उत्तम आचरण करने लगते हैं तो उनमें सद्गुरुके वचन सार्थक हो जाते हैं ॥३२२॥


इमं ये नियमं प्राज्ञाः कुर्वते मुक्तदुष्कृताः । एके भवन्ति ते नाके द्वितीया वा महागुणाः ॥३२३॥

अर्थ: जो बुद्धिमान् मनुष्य पापका परित्याग कर इस नियमका पालन करते हैं वे स्वर्गमें महागुणोंके धारक होते हुए प्रथम अथवा द्वितीय होते हैं ॥३२३॥


समयं येऽनगाराणां भुञ्जतेऽतीत्य भक्तितः । तेषां स्वर्गे सुखप्रेक्षामाकाङ्क्षन्ति सुराः सदा ॥३२४॥

अर्थ: जो मनुष्य भक्ति-पूर्वक मुनियोंके भोजन करनेका समय बिताकर बादमें भोजन करते हैं स्वर्गमें देव लोग सदा उन्हें सुखी देखनेकी इच्छा करते हैं ॥३२४॥


इन्द्रत्वं देवसङ्घानां ते प्रयान्ति सुतेजसः । जनाः सामानिकत्वं वा संपादितयथेप्सिताः ॥३२५॥

अर्थ: उत्तम तेजको धारण करने-वाले वे पुरुष देवोंके समूहके इन्द्र होते हैं अथवा मनचाहे भोग प्राप्त करनेवाले सामानिक पदको प्राप्त करते हैं ॥३२५॥


न्यग्रोधस्य यथा स्वल्पं बीजमुच्चैस्तरुर्भवेत् । तपोऽल्पमपि तद्वत्स्यान्महाभोगफलावहम् ॥३२६॥

अर्थ: जिस प्रकार वट वृक्षका छोटा-सा बीज आगे चलकर ऊँचा वृक्ष हो जाता है उसी प्रकार छोटा-सा तप भी आगे चलकर महाभोग रूपी फलको धारण करता है ॥३२६॥


समः कुबेरकान्तस्य नेत्रबन्धनविग्रहः । धर्मसक्तमतिर्नित्यं जायते पूर्वधर्मतः ॥३२७॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि निरन्तर धर्ममें आसक्त रहती है ऐसा मनुष्य अपने पूर्वाचरित धर्मके प्रभावसे कुबेरकान्तके समान नेत्रोंको आकर्षित करनेवाले सुन्दर शरीरका धारक होता है ॥३२७॥


मुनिवेलाव्रतो दत्त्वा मुनेर्भिक्षां समागतः । रत्नवृष्टिं सहस्राख्यः कुबेरदयितोऽभवत् ॥३२८॥

अर्थ: एक सहस्रभट नामका पुरुष था । उसने मुनिवेलाव्रत धारण किया था अर्थात् मुनियोंके भोजन करनेका समय बीत जानेके बाद ही वह भोजन करता था । एक बार उसने मुनिके लिए आहार दिया । उसके प्रभावसे उसके घर रत्नवृष्टि हुई और वह मरकर परभवमें कुबेरकान्त सेठ हुआ ॥३२८॥


महीमण्डलविख्यातो नामोदारपराक्रमः । धनेन महता युक्तो भृत्यमण्डलमध्यगः ॥३२९॥

अर्थ: जो कि भूमण्डलमें प्रसिद्ध, उत्कृष्ट पराक्रमी, महाधनसे युक्त और सेवक समूहके मध्यमें स्थित रहनेवाला था ॥३२९॥


पौर्णमास्यां यथा चन्द्रः कान्तदर्शनविग्रहः । भुञ्जानः परमं भोगं सर्वशास्त्रार्थकोविदः ॥३३०॥

अर्थ: पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान उसका शरीर अत्यन्त सुन्दर था और वह उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेमें निपुण था ॥३३०॥


पूर्वधर्मानुभावेन परं निर्वेदमागतः । अमीयाय महादीक्षां जिनेन्द्रमुखनिर्गताम् ॥३३१॥

अर्थ: पूर्व धर्मके प्रभावसे ही उसने परम वैराग्यको प्राप्त हो जिनेन्द्र-प्रतिपादित दीक्षाको धारण किया था ॥३३१॥


अनगारमहर्षीणां वेलामर्चन्ति ये जनाः । भोगोत्सवं प्रपद्यन्ते परं ते हरिषेणवत् ॥३३२॥

अर्थ: जो मनुष्य अनगार महर्षियोंके कालकी प्रतीक्षा करते हैं वे हरिषेण चक्रवर्तीके समान उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त होते हैं ॥३३२॥


मुनिवेलाप्रतीक्ष्यत्वादुपार्ज्य सुकृतं महत् । हरिषेणः परिप्राप्तो लक्ष्मीमत्यन्तमुन्नताम् ॥३३३॥

अर्थ: हरिषेणने मुनिवेलामें मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा कर बहुत भारी पुण्यका संचय किया था इसलिए वह अत्यन्त उन्नत लक्ष्मीको प्राप्त हुआ था ॥३३३॥


मुनेरन्तिकमासाद्य समाधानप्रचोदिताः । एकभक्तं जना ये तु कुर्वते शुद्धदर्शनाः ॥३३४॥

एकभक्तेन ते कालं नीत्वा पञ्चत्वमागताः । उत्पद्यन्ते विमानेषु रत्नभाचक्रवर्तिषु ॥३३५॥

अर्थ: शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले जो मनुष्य ध्यानकी भावनासे प्रेरित हो मुनिके समीप जाकर एकभक्त करते हैं अर्थात् एक बार भोजन करनेका नियम लेते हैं और एक भक्तसे ही समय पूरा कर मृत्युको प्राप्त होते हैं वे रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए विमानोंमें उत्पन्न होते हैं ॥३३४-३३५॥


नित्यालोकेषु ते तेषु विमानेषु सुचेतसः । रमन्ते सुचिरं कालमप्सरोमध्यवर्तिनः ॥३३६॥

अर्थ: शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले वे देव, निरन्तर प्रकाशित रहनेवाले उन विमानोंमें अप्सराओंके बीच बैठकर चिरकाल तक क्रीडा करते हैं ॥३३६॥


हारिणः कटकाधारप्रकोष्ठाः कटिसूत्रिणः । मौलिमन्तो भवन्त्येते छत्रचामरिणोऽमराः ॥३३७॥

अर्थ: जो उत्तम हार धारण किये हुए हैं, जिनकी कलाइयोंमें उत्तम कड़े सुशोभित हैं, जो कमरमें कटिसूत्र और शिरपर मुकुट धारण करते हैं, जिनके ऊपर छत्र फिरता है और पार्श्वमें चमर ढोले जाते हैं ऐसे देव, एक भक्त व्रतके प्रभावसे होते हैं ॥३३७॥


उत्तमव्रतसंसक्ता ये चाणुव्रतधारिणः । शरीरमध्रुवं ज्ञात्वा प्रशान्तहृदया जनाः ॥३३८॥

उपवासं चतुर्दश्यामष्टम्यां च सुमानसाः । सेवन्ते ते निबध्नन्ति चिरमायुस्त्रिविष्टपे ॥३३९॥

अर्थ: जो महाव्रत धारण करनेकी भावना रखते हुए वर्तमानमें अणुव्रत धारण करते हैं तथा शरीरको अनित्य समझकर जिनके हृदय अत्यन्त शान्त हो चुके हैं ऐसे जो मनुष्य हृदयपूर्वक अष्टमी और चतुर्दशीके दिन उपवास करते हैं वे स्वर्गकी दीर्घायुका बन्ध करते हैं ॥३३८-३३९॥


सौधर्मादिषु कल्पेषु यान्ति केचित्समुद्भवम् । अपरे त्वहमिन्द्रत्वं मुक्तिमन्ये विशुद्धितः ॥३४०॥

अर्थ: उनमेंसे कोई तो सौधर्मादि स्वर्गोंमें जन्म लेते हैं, कोई अहमिन्द्र पद प्राप्त करते हैं और कोई विशुद्धताके कारण मोक्ष जाते हैं ॥३४०॥


विनयेन परिष्वक्ता गुणशीलसमन्विताः । तपःसंयोजितस्वान्ता यान्ति नाकमसंशयम् ॥३४१॥

तत्र कामेन भुक्त्वासौ भोगान्प्राप्तो मनुष्यताम् । भुङ्क्ते राज्यं महज्जैनं मतं च प्रतिपद्यते ॥३४२॥

अर्थ: जो निरन्तर विनयसे युक्त रहते हैं, गुण और शीलव्रतसे सहित होते हैं तथा जिनका चित्त सदा तपमें लगा रहता है ऐसे मनुष्य निःसन्देह स्वर्ग जाते हैं वहाँ इच्छानुसार भोग भोगकर मनुष्य होते हैं, बड़े भारी राज्यका उपभोग करते हैं और जैनमतको प्राप्त होते हैं ॥३४१-३४२॥


जिनशासनमासाद्य स क्रमात्साधुचेष्टितः । सर्वकर्मविमुक्तानामालयं प्रतिपद्यते ॥३४३॥

अर्थ: जैनमतको पाकर क्रम-क्रमसे मुनियोंका चरित्र धारण करते हैं और उसके प्रभावसे सर्व कर्मरहित सिद्धोंका निकेतन प्राप्त कर लेते हैं ॥३४३॥


स्तुत्वा कालत्रये यस्तु नमस्यति जिनं त्रिधा । शैलराजवदक्षोभ्यः कुतीर्थमतवायुभिः ॥३४४॥

अर्थ: जो प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकाल इन तीनों कालोंमें मन, वचन, कायसे स्तुति कर जिन देवको नमस्कार करता है अर्थात् त्रिकाल वन्दनाका नियम लेता है वह सुमेरुपर्वतके समान मिथ्यामत रूपी वायुसे सदा अक्षोभ्य रहता है ॥३४४॥


गुणालङ्कारसंपन्नः सुशीलसुरभीकृतः । सर्वेन्द्रियहरं भोगं भजते त्रिदशालये ॥३४५॥

अर्थ: जो गुणरूपी अलंकारोंसे सुशोभित है तथा जिसका शरीर शीलव्रत रूपी चन्दनसे सुगन्धित है ऐसा वह पुरुष स्वर्गमें समस्त इन्द्रियोंको हरनेवाले भोग भोगता है ॥३४५॥


ततः कतिचिदावृत्तीः कृत्वा शुभगतिद्वये । प्रयाति परमं स्थानं सर्वकर्मविवर्जितः ॥३४६॥

अर्थ: तदनन्तर मनुष्य और देव इन दो शुभगतियोंमें कुछ आवागमन कर सर्वकर्मरहित हो परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है ॥३४६॥


विषया हि समभ्यस्ताश्चिरं सकलजन्तुभिः । ततस्तैर्मोहिताः कर्तुं विरतिं विभवो न ते ॥३४७॥

अर्थ: चूँकि पंचेन्द्रियोंके विषय सब जीवोंके द्वारा चिरकालसे अभ्यस्त हैं इसलिए इनसे मोहित हुए प्राणी विरति (त्याग - आखड़ी) करनेके लिए समर्थ नहीं हो पाते हैं ॥३४७॥


इदं तत्र परं चित्रं ये तान् दृष्ट्वा विषान्नवत् । निर्वाणकारणं कर्म सेवन्ते पुरुषोत्तमाः ॥३४८॥

अर्थ: यहाँ बड़ा आश्चर्य तो यही है कि फिर भी उत्तम पुरुष उन विषयोंको विषमिश्रित अन्नके समान देखकर मोक्ष प्राप्तिके साधक कार्यका सेवन करते हैं ॥३४८॥


संसारे भ्रमतो जन्तोरेकापि विरतिः कृता । सम्यग्दर्शनयुक्तस्य मुक्तेरायाति बीजताम् ॥३४९॥

अर्थ: संसारमें भ्रमण करनेवाले सम्यग्दृष्टि जीवको यदि एक ही विरति (आखड़ी) प्राप्त हो जाती है तो वह मोक्षका बीज हो जाता है ॥३४९॥


एकोऽपि नास्ति येषां तु नियमः प्राणधारिणाम् । पशवस्तेऽथवा भग्नकुम्भा गुणविवर्जिताः ॥३५०॥

अर्थ: जिन प्राणियोंके एक भी नियम नहीं है वे पशु हैं अथवा रस्सीसे रहित (पक्षमें व्रतशील आदि गुणोंसे रहित) फूटे घड़ेके समान हैं ॥३५०॥


गुणव्रतसमृद्धेन नियमस्थेन जन्तुना । भाव्यं प्रमादयुक्तेन संसारतरणैषिणा ॥३५१॥

अर्थ: गुण और व्रतसे समृद्ध तथा नियमोंका पालन करनेवाला प्राणी यदि वह संसारसे पार होनेकी इच्छा रखता है तो उसे प्रमादरहित होना चाहिए ॥३५१॥


दुष्कर्म ये न मुञ्चन्ति मानवा मतिदुर्विधाः । भ्रमन्ति भवकान्तारं जात्यन्धा इव ते चिरम् ॥३५२॥

अर्थ: जो बुद्धिके दरिद्र मनुष्य दुष्कर्म - खोटे कार्य नहीं छोड़ते हैं वे जन्मान्ध मनुष्योंके समान चिरकाल तक संसाररूपी अटवीमें भटकते रहते हैं ॥३५२॥


ततस्तेऽनन्तवीर्येन्दुवाङ्मरीचिसमागमात् । प्रमोदं परमं प्राप्तास्तिर्यङ्मानवनाकजाः ॥३५३॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ जो भी तिर्यंच, मनुष्य और देव विद्यमान थे वे उन अनन्तबल केवली रूपी चन्द्रमाके वचन रूपी किरणोंके समागमसे परम हर्षको प्राप्त हुए ॥३५३॥


सम्यग्दर्शनमायाताः केचित्केचिदणुव्रतम् । महाव्रतधराः केचिज्जाता विक्रमशालिनः ॥३५४॥

अर्थ: उनमेंसे कोई तो सम्यग्दर्शनको प्राप्त हुए, कोई अणुव्रती हुए और कोई बलशाली महाव्रतोंके धारक हुए ॥३५४॥


अथ धर्मरथाख्येन मुनिनाभाषि रावणः । गृहाण नियमं भव्य कंचिदित्यात्मशक्तितः ॥३५५॥

अर्थ: अथानन्तर धर्मरथ नामक मुनिने रावणसे कहा कि हे भव्य ! अपनी शक्तिके अनुसार कोई नियम ले ॥३५५॥


द्वीपोऽयं धर्मरत्नानामेनगारमहेश्वरः । गृह्यतामेकमप्यस्माद्रत्नं नियमसंज्ञकम् ॥३५६॥

अर्थ: ये मुनिराज धर्मरूपी रत्नोंके द्वीप हैं सो इनसे अधिक नहीं तो कमसे कम एक ही नियम रूपी रत्न ग्रहण कर ॥३५६॥


किमर्थमेव मास्से त्वं चिन्ताभारवशीकृतः । महतां हि ननु त्यागो न मतेः खेदकारणम् ॥३५७॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ताके वशीभूत होकर क्यों बैठा है ? निश्चयसे त्याग महापुरुषोंकी बुद्धिके खेदका कारण नहीं है अर्थात् त्यागसे महापुरुषोंको खिन्नता नहीं होती प्रत्युत प्रसन्नता होती है ॥३५७॥


रत्नद्वीपं प्रविष्टस्य यथा भ्रमति मानसम् । इदं वृत्तं तथैवास्य परमाकुलतां गतम् ॥३५८॥

अर्थ: जिस प्रकार रत्नद्वीपमें प्रविष्ट हुए पुरुषका चित्त ‘यह लूँ या यह लूँ’ इस तरह चंचल होकर घूमता है उसी प्रकार इस चारित्र रूपी द्वीपमें प्रविष्ट हुए पुरुषका भी चित्त ‘यह नियम लूँ या यह नियम लूँ’ इस तरह परम आकुलताको प्राप्त हो घूमता रहता है ॥३५८॥


अथास्य मानसं चिन्ता समारूढेयमुत्कटा । भोगानुरक्तचित्तस्य व्याकुलत्वमुपेयुषः ॥३५९॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका चित्त सदा भोगोंमें अनुरक्त रहता था और इसी कारण जो व्याकुलताको प्राप्त हो रहा था ऐसे रावणके मनमें यह भारी चिन्ता उत्पन्न हुई कि ॥३५९॥


स्वभावेनैव मे शुद्धमन्धो गन्धमनोहरम् । स्वादु वृष्यं परित्यक्तमांसादिमलसंगमम् ॥३६०॥

अर्थ: मेरा भोजन तो स्वभावसे ही शुद्ध है, सुगन्धित है, स्वादिष्ट है, गरिष्ट है और मांसादिके संसर्गसे रहित है ॥३६०॥


स्थूलप्राणिवधादिभ्यो विरतिं गृहवासिनाम् । एकामपि न शक्तोऽहं कर्तुं कान्यत्र संकथा ॥३६१॥

अर्थ: स्थूल हिंसा त्याग आदि जो गृहस्थोंके व्रत हैं उनमेंसे मैं एक भी व्रत धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ फिर अन्य व्रतोंकी चर्चा ही क्या है ? ॥३६१॥


मत्तेमसदृशं चेतस्तद्धावत्सर्ववस्तुषु । हस्तेनेवात्मभावेन धर्त्तुं न प्रभवाम्यहम् ॥३६२॥

अर्थ: मेरा मन मदोन्मत्त हाथीके समान सर्व वस्तुओंमें दौड़ता रहता है सो उसे मैं हाथके समान अपनी भावनासे रोकनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥३६२॥


हुताशनशिखा पेया बद्धव्यो वायुरंशुके । उत्क्षेप्तव्यो धराधीशो निर्ग्रन्थत्वमभीप्सता ॥३६३॥

अर्थ: जो निर्ग्रन्थ व्रत धारण करना चाहता है वह मानो अग्निकी शिखाको पीना चाहता है, वायुको वस्त्रमें बाँधना चाहता है, और सुमेरुको उठाना चाहता है ॥३६३॥


शूरोऽपि न समर्थोऽहं सेवितुं यत्तपोव्रतम् । अहो चित्रमिदं तद्ये धारयन्ति नरोत्तमाः ॥३६४॥

अर्थ: बड़ा आश्चर्य है कि मैं शूर वीर होकर भी जिस तप एवं व्रतको धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ उसी तप एवं व्रतको अन्य पुरुष धारण कर लेते हैं। यथार्थमें वे ही पुरुषोत्तम हैं ॥३६४॥


किमेकमाश्रयाम्येतं नियमं शोभनामपि । अवष्टम्भामि नानिच्छामन्ययोषां बलादिभिः ॥३६५॥

अर्थ: रावण सोचता है कि क्या मैं एक यह नियम ले लूँ कि परस्त्री कितनी ही सुन्दर क्यों न हो यदि वह मुझे नहीं चाहेगी तो मैं उसे बलपूर्वक नहीं छेड़ूँगा ॥३६५॥


अथवा न ननु क्षुद्रे कुतः शक्तिरियं मयि । स्वस्याप्यस्य न शक्नोमि वोढुं चित्तस्य निश्चयम् ॥३६६॥

अर्थ: अथवा मुझ क्षुद्र व्यक्तिमें इतनी शक्ति कहाँसे आई ? मैं अपने ही चित्तका निश्चय वहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥३६६॥


यद्वा लोकत्रये नासौ विद्यते प्रमदोत्तमा । दृष्ट्वा मां विकलत्वं या न व्रजेन्मन्मथार्दिता ॥३६७॥

अर्थ: अथवा तीनों लोकोंमें ऐसी उत्तम स्त्री नहीं है जो मुझे देखकर कामसे पीड़ित होती हुई विकलताको प्राप्त न हो जाय ? ॥३६७॥