१४. चतुर्दशं पर्व (अनन्तबलधर्माभिधानं)
अथ नाकाधिपप्रख्यो भोगसंमूढमानसः । यथाभिमतनिर्वृत्तः पददुर्ललितक्रियः ॥१॥
असौ देवाधिपग्राहो यातो मन्दरमन्यदा । जिनेन्द्रवन्दनां कृत्वा प्रत्यागच्छन्निजेच्छया ॥२॥
अर्थ: अथानन्तर जो इन्द्रके समान शोभाका धारक था, जिसका मन भोगोंमें मूढ़ रहता था, जिसे इच्छानुसार कार्योंकी प्राप्ति होती थी तथा जिसकी क्रियाएँ शत्रुओंको प्राप्त होना कठिन था ऐसा रावण एक समय मेरुपर्वतपर गया था। वहाँ जिनेन्द्रदेवकी वन्दना कर वह अपनी इच्छानुसार वापस आ रहा था ॥१-२॥
विभक्तपर्वतान् पश्यन् वास्यानां विविधांघ्रिपान् । सरितश्चातिचक्षुष्याः स्फटिकादपि निर्मलाः ॥३॥
अर्थ: मार्गमें वह भरतादि क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले एवं अनेक प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित हिमवत् आदि पर्वतोंको तथा स्फटिकसे भी अधिक निर्मल एवं अत्यन्त सुन्दर नदियोंको देखता हुआ चला आ रहा था ॥३॥
आदित्यभवनाकारविमानस्य विभूषणः । संगतः परया लक्ष्म्या लङ्कासंगमनोत्सुकः ॥४॥
अर्थ: सूर्यबिम्बके आकार विमानको अलंकृत कर रहा था, उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त था तथा लंकाकी प्राप्तिमें अत्यन्त उत्सुक था ॥४॥
सहसा निनदं तुङ्गं शुश्राव पुरुषेतरम् । पप्रच्छ च महाक्षुब्धो मारीचमतिसत्वरः ॥५॥
अर्थ: अचानक ही उसने जोरदार कोमल शब्द सुना जिसे सुनकर वह अत्यन्त क्षुभित हो गया। उसने शीघ्र ही मारीचसे पूछा भी ॥५॥
अयि मारीच मारीच कुतोऽयं निनदो महान् । एताश्च ककुभः कस्मान्महारजतलोहिताः ॥६॥
अर्थ: अरे मारीच ! मारीच !! यह महाशब्द कहाँसे आ रहा है ? और दिशाएँ सुवर्णके समान लाल-पीली क्यों हो रही हैं ॥६॥
ततो जगाद मारीचो देव ! देवगमो मुनेः । महाकल्याणसंप्राप्तावेष कस्यापि वर्तते ॥७॥
अर्थ: तब मारीचने कहा कि हे देव ! किसी महामुनिके महाकल्याणकमें सम्मिलित होनेके लिए यह देवोंका आगमन हो रहा है ॥७॥
देवानामेष तुष्टानां नानासंपातकारिणाम् । आकुलो भुवनव्यापी प्रशस्तः श्रूयते ध्वनिः ॥८॥
अर्थ: सन्तोषसे भरे एवं नाना प्रकारसे गमन करनेवाले देवोंका यह संसारव्यापी प्रशस्त शब्द सुनाई दे रहा है ॥८॥
एताश्च ककुभस्तेषां मुकुटादिमरीचिभिः । निचिता दधते भासं कौसुम्भीमिव भास्वराम् ॥९॥
अर्थ: ये दिशाएँ उन्हींके मुकुट आदिकी किरणोंसे व्याप्त होकर कुसुम्भ रंगकी देदीप्यमान कान्तिको धारण कर रही हैं ॥९॥
सुवर्णपर्वतेऽमुष्मिन्ननन्तबलसंज्ञया । कथितो मुनिरुत्पन्नं नूनं तस्याद्य केवलम् ॥१०॥
अर्थ: इस सुवर्णगिरिपर अनन्तबल नामक मनिराज रहते थे जान पड़ता है उन्हें ही आज केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ॥१०॥
ततस्तद् वचनं श्रुत्वा सम्यग्दर्शनभावितः । परं पुरंदरग्राहः प्रमोदं प्रतिपन्नवान् ॥११॥
अर्थ: तदनन्तर मारीचके वचन सुनकर सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त रावण परम हर्षको प्राप्त हुआ ॥११॥
अवतीर्णश्च खाद्देशाद्विप्रकृष्टान्महाद्युतिः । द्वितीय इव देवेन्द्रो वन्दनाय महामुनेः ॥१२॥
अर्थ: महाकान्तिको धारण करनेवाला रावण उन महामुनिकी वन्दना करनेके लिए दूरवर्ती आकाश प्रदेशसे इस प्रकार नीचे उतरा मानो दूसरा इन्द्र ही उतर रहा हो ॥१२॥
वन्दित्वा तुष्टुवुः साधुमिन्द्रप्राग्रहरास्ततः । आसीनाश्च यथास्थानं बद्धाञ्जलिपुटाः सुराः ॥१३॥
अर्थ: तत्पश्चात् इन्द्र आदि देवोंने हाथ जोड़कर मुनिराजको नमस्कार किया। स्तुति की और फिर सब यथास्थान बैठ गये ॥१३॥
रावणोऽपि नमस्कृत्य स्तुत्वा चोदात्तभक्तितः । विद्याधरजनाकीर्णः स्थितः समुचितावनौ ॥१४॥
अर्थ: विद्याधरोंसे युक्त रावण भी बड़ी भक्तिसे नमस्कार एवं स्तुति कर योग्य भूमिमें बैठ गया ॥१४॥
ततश्चतुर्विधैर्देवैस्तिर्यग्भिर्मनुजैस्तथा । कृतशंसं मुनिश्रेष्ठः शिष्येणैवमपृच्छयत ॥१५॥
भगवन् ज्ञातुमिच्छन्ति धर्माधर्मफलं जनाः । समस्ता मुक्तिहेतुं च तत्सर्वं वक्तुमर्हथ ॥१६॥
अर्थ: तदनन्तर विनीत शिष्यके समान रावणने मुनिराजसे इस प्रकार पूछा कि हे भगवन् ! समस्त प्राणी धर्म-अधर्मका फल और मोक्षका कारण जानना चाहते हैं सो आप यह सब कहनेके योग्य हैं। रावणके इस प्रश्नकी चारों प्रकारके देवों, मनुष्यों और तिर्यंचोंने भारी प्रशंसा की ॥१५-१६॥
ततः सुनिपुणं शुद्धं विपुलार्थं मिताक्षरम् । अप्रधृष्यं जगौ वाक्यं यतिः सर्वहितप्रियम् ॥१७॥
अर्थ: तदनन्तर मुनिराज निम्न प्रकार वचन कहने लगे। उनके वे वचन निपुणतासे युक्त थे, शुद्ध थे, महाअर्थसे भरे थे, परिमित अक्षरोंसे सहित थे, अखण्डनीय थे और सर्वहितकारी तथा प्रिय थे ॥१७॥
कर्मणाष्टप्रकारेण संततेन निरादिना । बद्धेनान्तर्हितात्मीयशक्तिर्भ्राम्यति चेतनः ॥१८॥
अर्थ: उन्होंने कहा कि अनादिकालसे बँधे हुए ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंसे जिसकी आत्मीय शक्ति छिप गयी है ऐसा यह प्राणी निरन्तर भ्रमण कर रहा है ॥१८॥
सुभूरिलक्षसंख्यासु योनिष्वनुभवन्सदा । वेदनोयं यथोपात्तं नानाकरणसंभवम् ॥१९॥
अर्थ: अनेक लक्ष योनियोंमें नाना इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखका सदा अनुभव करता रहता है ॥१९॥
रक्तो द्विष्टोऽथवा मूढो मन्दमध्यविपाकतः । कुलालचक्रवत्प्राप्तचतुर्गतिविवर्तनः ॥२०॥
अर्थ: कर्मोंका जब जैसा तीव्र, मन्द या मध्यम उदय आता है वैसा रागी, द्वेषी अथवा मोही होता हुआ कुम्हारके चक्रके समान चतुर्गतिमें घूमता रहता है ॥२०॥
बुध्यते स्वहितं नासौ ज्ञानावरणकर्मणा । मनुष्यतामपि प्राप्तोऽत्यन्तदुर्लभसंगमाम् ॥२१॥
अर्थ: यह जीव अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य पर्यायको भी प्राप्त कर लेता है फिर भी ज्ञानावरण कर्मके कारण आत्महितको नहीं समझ पाता है ॥२१॥
रसस्पर्शपरिग्राहिहृषीकवशतां गताः । कृत्वातिनिन्दितं कर्म पापभारगुरूकृताः ॥२२॥
अनेकोपायसंभूतमहादुःखविधायिनि । पतन्ति नरके जीवा ग्रावाण इव वारिणि ॥२३॥
अर्थ: रसना और स्पर्शन इन्द्रियके वशीभूत हुए प्राणी अत्यन्त निन्दित कार्य करके पापके भारसे इतने वजनदार हो जाते हैं कि वे अनेक साधनोंसे उत्पन्न महादुःख देनेवाले नरकोंमें उस प्रकार जा पड़ते हैं जिस प्रकार कि पानीमें पत्थर पड़ जाते हैं - डूब जाते हैं ॥२२-२३॥
मातरं पितरं भ्रातृन् सुतां पत्नीं सुहृज्जनान् । धनादिचोदिताः केचिद् विश्वनिन्दितमानसाः ॥२४॥
गर्भस्थानर्भकान् वृद्धांस्तरुणान् योषितो नराः । घ्नन्ति केचिन्महाक्रूरा मानुषान् पक्षिणो मृगान् ॥२५॥
अर्थ: जिनके मनकी सभी निन्दा करते हैं ऐसे कितने ही मनुष्य धनादिसे प्रेरित होकर माता, पिता, भाई, पुत्री, पत्नी, मित्रजन, गर्भस्थ बालक, वृद्ध, तरुण एवं स्त्रियोंको मार डालते हैं तथा कितने ही महादुष्ट मनुष्य मनुष्यों, पक्षियों और हरिणोंकी हत्या करते हैं ॥२४-२५॥
स्थलजान् जलजान् धर्मच्युतचित्ताः कुमेधसः । मीत्वा पतन्ति ते सर्वे नरके पुरुवेदने ॥२६॥
अर्थ: जिनका चित्त धर्मसे च्युत है ऐसे कितने ही दुर्बुद्धि मनुष्य स्थलचारी एवं जलचारी जीवोंको मारकर भयंकर वेदनावाले नरकमें पड़ते हैं ॥२६॥
मधुघातकृतश्चण्डाश्चाण्डाला वनदाहिनः । हिंसापरायणाः पापाः कैवर्ताधमलुब्धकाः ॥२७॥
वितथव्याहृतासक्ताः परस्वहरणोद्यताः । पतन्ति नरके घोरे प्राणिनः शरणोज्झिताः ॥२८॥
अर्थ: मधु- मक्खियोंका घात करनेवाले तथा वनमें आग लगानेवाले दुष्ट चाण्डाल निरन्तर हिंसामें तत्पर रहनेवाले पापी कहार और नीच शिकारी, झूठ वचन बोलनेमें आसक्त एवं पराया धन हरण करनेमें उद्यत प्राणी शरणरहित हो भयंकर नरकमें पड़ते हैं ॥२७-२८॥
येन येन प्रकारेण कुर्वते मांसभक्षणम् । तेनैव ते विधानेन भक्ष्यन्ते नरके परैः ॥२९॥
अर्थ: जो मनुष्य जिस-जिस प्रकारसे मांस भक्षण करते हैं नरकमें दूसरे प्राणी उसी-उसी प्रकारसे उनका भक्षण करते हैं ॥२९॥
महापरिग्रहोपेता महारम्भाश्च ये जनाः । प्रचण्डाध्यवसायास्ते वसन्ति नरके चिरम् ॥३०॥
अर्थ: जो मनुष्य बहुत भारी परिग्रहसे सहित हैं, बहुत बड़े आरम्भ करते हैं और तीव्र संकल्प-विकल्प करते हैं वे चिरकाल तक नरकमें वास करते हैं ॥३०॥
साधूनां द्वेषकाः पापा मिथ्यादर्शनसंगताः । रौद्रध्यानमृता जीवा गच्छन्ति नरकं ध्रुवम् ॥३१॥
अर्थ: जो साधुओंसे द्वेष रखते हैं, पापी हैं, मिथ्यादर्शनसे सहित हैं एवं रौद्रध्यानसे जिनका मरण होता है वे निश्चय ही नरकमें जाते हैं ॥३१॥
कुठारैरसिभिश्चक्रैः करपत्रैर्विदारिताः । अन्यैश्च विविधैः शस्त्रैस्तीक्ष्णतुण्डैश्च पक्षिभिः ॥३२॥
अर्थ: ऐसे जीव नरकोंमें कुल्हाड़ियों, तलवारों, चक्रों, करोंतों तथा अन्य अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे चीरे जाते हैं । तीक्ष्ण चोंचोंवाले पक्षी उन्हें चूँथते हैं ॥३२॥
सिंहैर्व्याघ्रैः श्वभिः सर्पैः शरभैर्वृश्चिकैर्वृकैः । अन्यैश्च प्राणिभिश्चित्रैः प्राप्यन्ते दुःखमुत्तमम् ॥३३॥
अर्थ: सिंह, व्याघ्र, कुत्ते, सर्प, अष्टापद, बिच्छू, भेड़िया तथा विक्रियासे बने हुए विविध प्रकारके प्राणी उन्हें बहुत भारी दुःख पहुँचाते हैं ॥३३॥
नितान्तं ये तु कुर्वन्ति संगं शब्दादिवस्तुनि । मायिनस्ते प्रपद्यन्ते तिर्यक्त्वं प्राणधारिणः ॥३४॥
अर्थ: जो शब्द आदि विषयोंमें अत्यन्त आसक्ति करते हैं ऐसे मायावी जीव तिर्यंच गतिको प्राप्त होते हैं ॥३४॥
परस्परवधास्तत्र शस्त्रैश्च विविधैः क्षताः । प्रपद्यन्ते महादुःखं वाहदोहादिभिस्तथा ॥३५॥
अर्थ: उस तिर्यंच गतिमें जीव एक दूसरेको मार डालते हैं। मनुष्य विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उनका घात करते हैं तथा स्वयं भार ढोना एवं दोहा जाना आदि कार्योंसे महादुःख पाते हैं ॥३५॥
सुप्तमेतेन जीवेन स्थलेऽम्भसि गिरौ तरौ । गहनेषु च देशेषु भ्राम्यता भवसंकटे ॥३६॥
अर्थ: संसारके संकटमें भ्रमण करता हुआ यह जीव स्थलमें, जलमें, पहाड़पर, वृक्षपर और अन्यान्य सघन स्थानोंमें सोया है ॥३६॥
एकद्वित्रिचतुःपञ्चहृषीककृतसंगतिः । अनादिनिधनो जन्तुः सेवते मृत्युजन्मनी ॥३७॥
अर्थ: यह जीव अनादि कालसे एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रियोंमें उत्पन्न होता हुआ जन्म-मरण कर रहा है ॥३७॥
तिलमात्रोऽपि देशोऽसौ नास्ति यत्र न जन्तुना । प्राप्तं जन्म विनाशो वा संसारावर्तपातिना ॥३८॥
अर्थ: ऐसा तिलमात्र भी स्थान बाकी नहीं है जहाँ संसाररूपी भँवरमें पड़े हुए इस जीवने जन्म और मरण प्राप्त न किया हो ॥३८॥
मार्दवेनान्विताः केचिदार्जवेन च जन्तवः । स्वभावलब्धसंतोषाः प्रपद्यन्ते मनुष्यताम् ॥३९॥
अर्थ: यदि कोई प्राणी मृदुता और सरलतासे सहित होते हैं तथा स्वभावसे ही सन्तोष प्राप्त करते हैं तो वे मनुष्य गतिको प्राप्त होते हैं ॥३९॥
क्षणमात्रसुखस्यार्थे हित्वा पापं प्रकुर्वते । श्रेयः परमसौख्यस्य कारणं मोहसंगताः ॥४०॥
अर्थ: मनुष्य गतिमें भी मोही जीव परम सुखके कारणभूत कल्याण मार्गको छोड़कर क्षणिक सुखके लिए पाप करते हैं ॥४०॥
आर्या म्लेच्छाश्च तत्रापि जायन्ते पूर्वकर्मतः । तथा केचिद्घनेनाढ्याः केचिदत्यन्तदुर्विधाः ॥४१॥
अर्थ: अपने पूर्वोपार्जित कर्मोंके अनुसार कोई आर्य होते हैं और कोई म्लेच्छ होते हैं। कोई धनाढ्य होते हैं और कोई अत्यन्त दरिद्र होते हैं ॥४१॥
मनोरथशतान्यन्ये कुर्वते कर्मवेष्टिताः । कालं नयन्ति कृच्छ्रेण प्राणिनः परवेश्मसु ॥४२॥
अर्थ: कर्मोंसे घिरे कितने ही प्राणी सैकड़ों मनोरथ करते हुए दूसरेके घरोंमें बड़ी कठिनाईसे समय बिताते हैं ॥४२॥
निरूपा धनिनः केचिन्निर्धनाः रूपिणोऽपरे । केचिद्दीर्घायुषः केचिदत्यन्तस्तोकजीविनः ॥४३॥
अर्थ: कोई धनाढ्य होकर भी कुरूप होते हैं, कोई रूपवान् होकर भी निर्धन रहते हैं, कोई दीर्घायु होते हैं और कोई अल्पायु होते हैं ॥४३॥
इष्टा यशस्विनः केचित्केचिदत्यन्तदुर्भगाः । केचिदाज्ञां प्रयच्छन्ति तामन्ये कुर्वते जनाः ॥४४॥
अर्थ: कोई सबको प्रिय तथा यशके धारक होते हैं, कोई अत्यन्त अप्रिय होते हैं, कोई आज्ञा देते हैं और कोई उस आज्ञाका पालन करते हैं ॥४४॥
प्रविशन्ति रणं केचित्केचिद्गच्छन्ति वारिणि । यान्ति देशान्तरं केचित्केचित्कृष्यादि कुर्वते ॥४५॥
अर्थ: कोई रणमें प्रवेश करते हैं, कोई पानीमें गोता लगाते हैं, कोई विदेशमें जाते हैं और कोई खेती आदि करते हैं ॥४५॥
एवं तत्रापि वैचित्र्यं जायते सुखदुःखयोः । सर्वं तु दुःखमेवात्र सुखं तत्रापि कल्पितम् ॥४६॥
अर्थ: इस प्रकार मनुष्य गतिमें भी सुख और दुःखकी विचित्रता देखी जाती है। वास्तवमें तो सब दुःख ही है सुख तो कल्पना मात्र है ॥४६॥
सरागसंयमाः केचित्संयमासंयमास्तथा । अकामनिर्जरातश्च तपसश्च समोहतः ॥४७॥
देवत्वं च प्रपद्यन्ते चतुर्भेदसमन्वितम् । केचिन्महर्द्धयोऽत्रापि केचिदल्पपरिच्छदाः ॥४८॥
अर्थ: कोई जीव सरागसंयम तथा संयमासंयमके धारक होते हैं, कोई अकाम निर्जरा करते हैं और कोई बालतप करते हैं ऐसे जीव भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और वैमानिक इन चार भेदोंसे युक्त देव गतिमें उत्पन्न होते हैं सो वहाँ भी कितने ही महर्द्धियोंके धारक होते हैं और कितने ही अल्प ऋद्धियोंके धारक ॥४७-४८॥
स्थित्या द्युत्या प्रभावेण धिया सौख्येन लेश्यया । अभिमानेन मानेन ते पुनः कर्मसंग्रहम् ॥४९॥
कृत्वा चतुर्गतौ नित्यं भवे भ्राम्यन्ति जन्तवः । अरघट्टघटीयन्त्रसमानत्वमुपागताः ॥५०॥
अर्थ: स्थिति, कान्ति, प्रभाव, बुद्धि, सुख, लेश्या, अभिमान और मानके अनुसार वे पुनः कर्मोंका बन्ध कर चतुर्गति रूप संसारमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं। जिस प्रकार अरघटकी घड़ी निरन्तर घूमती रहती है इसी प्रकार ये प्राणी भी निरन्तर घूमते रहते हैं ॥४९-५०॥
संकल्पादशुभाद् दुःखं प्राप्नोति शुभतः सुखम् । कर्मणोऽष्टप्रकारस्य जीवो मोक्षमुपक्षयात् ॥५१॥
अर्थ: यह जीव अशुभ संकल्पसे दुःख पाता है, शुभ संकल्पसे सुख पाता है और अष्टकर्मोंके क्षयसे मोक्ष प्राप्त करता है ॥५१॥
दानेनापि प्रपद्यन्ते जन्तवो भोगभूमिषु । भोगान् पात्रविशेषेण वैश्वरूप्यमुपागताः ॥५२॥
अर्थ: पात्रकी विशेषतासे अनेक रूपताको प्राप्त हुए जीव दानके प्रभावसे भोग-भूमियोंमें भोगोंको प्राप्त होते हैं ॥५२॥
प्राणातिपातविरतं परिग्रहविवर्जितम् । उद्धमाचक्षते पात्रं रागद्वेषोज्झितं जिनाः ॥५३॥
अर्थ: जो प्राणिहिंसासे विरत, परिग्रहसे रहित और राग-द्वेषसे शून्य हैं उन्हें जिनेन्द्र भगवान्ने उत्तम पात्र कहा है ॥५३॥
सम्यग्दर्शनसंशुद्धं तपसापि विवर्जितम् । पात्रं प्रशस्यते मिथ्यादृष्टेः कायस्य शोधनात् ॥५४॥
अर्थ: जो तपसे रहित होकर भी सम्यग्दर्शनसे शुद्ध है ऐसा पात्र भी प्रशंसनीय है क्योंकि उससे मिथ्यादृष्टि दाताके शरीरकी शुद्धि होती है ॥५४॥
आपद्भ्यः पाति यस्तस्मात्पात्रमित्यभिधीयते । सम्यग्दर्शनशक्त्या च त्रायन्ते मुनयो जनान् ॥५५॥
अर्थ: जो आपत्तियोंसे रक्षा करे वह पात्र कहलाता है ( पातीति पात्रम् ) इस प्रकार पात्र शब्दका निरुक्त्यर्थ है। चूँकि मुनि, सम्यग्दर्शनकी सामर्थ्यसे लोगोंकी रक्षा करते अतः पात्र हैं ॥५५॥
दर्शनेन विशुद्धेन ज्ञानेन च यदन्वितम् । चारित्रेण च तत्पात्रं परमं परिकीर्तितम् ॥५६॥
अर्थ: जो निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे सहित होता है वह उत्तम कहलाता है ॥५६॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तथा यः सुखदुःखयोः । तृणकाञ्चनयोश्चैव साधुः पात्रं प्रशस्यते ॥५७॥
अर्थ: जो मान, अपमानं, सुख-दुःख और तृण-कांचनमें समान दृष्टि रखता है ऐसा साधु पात्र कहलाता है ॥५७॥
सर्वग्रन्थविनिर्मुक्ता महातपसि ये रताः । श्रमणास्ते परं पात्रं तत्त्वध्यानपरायणाः ॥५८॥
अर्थ: जो सब प्रकारके परिग्रहसे रहित हैं, महातपश्चरणमें लीन हैं और तत्त्वोंके ध्यानमें सदा तत्पर रहते हैं ऐसे श्रमण अर्थात् मुनि उत्तम पात्र कहलाते हैं ॥५८॥
तेभ्यो भावेन यद्दत्तं शक्त्या पानान्नभेषजम् । यथोपयोगमन्यच्च तद्यच्छति महाफलम् ॥५९॥
अर्थ: उन मुनियोंके लिए अपनी सामर्थ्यके अनुसार भावपूर्वक जो भी अन्न, पान, औषधि अथवा उपयोगमें आनेवाले पीछी, कमण्डलु आदि अन्य पदार्थ दिये जाते हैं वे महाफल प्रदान करते हैं ॥५९॥
क्षिप्तं यथैव सत्क्षेत्रे बीजं तत्संपदं पराम् । प्रयच्छति तथा दत्तं सत्पात्रे शुद्धचेतसा ॥६०॥
अर्थ: जिस प्रकार उत्तम क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अत्यधिक सम्पदा प्रदान करता है उसी प्रकार उत्तम पात्रके लिए शुद्ध हृदयसे दिया हुआ दान अत्यधिक सम्पदा प्रदान करता है ॥६०॥
रागद्वेषादिभिर्युक्तं यत्तु पात्रं न तन्मतम् । प्रयच्छति फलं दूरं तत्र लाभविचिन्तितम् ॥६१॥
अर्थ: जो राग-द्वेष आदि दोषोंसे युक्त है वह पात्र नहीं है और न वह इच्छित फल ही देता है अतः उसके फलका विचार करना दूरकी बात है ॥६१॥
क्षिप्तं यथोषरे बीजं न किंचिर्त्तत्र जायते । मिथ्यादर्शनसंयुक्तपापपात्रोद्यतं तथा ॥६२॥
अर्थ: जिस प्रकार ऊषर जमीनमें बीज बोया जाय तो उससे कुछ भी उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार मिथ्यादर्शनसे सहित पापी पात्रके लिए दान दिया जाय तो उससे कुछ भो फल प्राप्त नहीं होता ॥६२॥
कूपादुद्धृतमेकस्मात्सलिलं प्रतिपद्यते । माधुर्यमिक्षुभिः पीतं निम्बपीतं तु तिक्तताम् ॥६३॥
अर्थ: एक कुएँसे निकाले हुए पानीको यदि ईखके पौधे पीते हैं तो वह माधुर्यको प्राप्त होता है और यदि नीमके पौधे पीते हैं तो कड़ुआ हो जाता है ॥६३॥
सरस्यां जलमेकस्यां गवात्तं पन्नगेन च । क्षीरभावमवाप्नोति विषतां च यथा तथा ॥६४॥
अर्थ: अथवा जिस प्रकार एक ही तालाबमें गायने पानी पिया और साँपने भी । गायके द्वारा पिया पानी दूध हो जाता है और साँपके द्वारा पिया पानी विष हो जाता है, उसी प्रकार एक ही गृहस्थसे उत्तम पात्रने दान लिया और नीच पात्रने भी । जो दान उत्तम पात्रको प्राप्त होता है उसका फल उत्तम होता है और जो नीच पात्रको प्राप्त होता है उसका फल नीचा होता है ॥६४॥
विन्यस्तं भावतो दानं सम्यग्दर्शनभाविते । मिथ्यादर्शनयुक्ते तु शुभाशुभफलं भवेत् ॥६५॥
अर्थ: कोई-कोई पात्र मिथ्यादर्शनसे युक्त होने पर भी सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त होते हैं ऐसे पात्रोंके लिए भावसे जो दान दिया जाता है उसका फल शुभ-अशुभ अर्थात् मिश्रित प्रकारका होता है ॥६५॥
दीनान्धादिजनेभ्यस्तु करुणापरिचोदितम् । दानमुक्तं फलं तस्माद् यद्यपि स्यान्न सत्तमम् ॥६६॥
अर्थ: दीन तथा अन्धे आदि मनुष्योंके लिए करुणा दान कहा गया है और उससे यद्यपि फलकी भी प्राप्ति होती है पर वह फल उत्तम फल नहीं कहा जाता ॥६६॥
वदन्ति लिङ्गिनः सर्वे स्वानुकूलं प्रयत्नतः । धर्मं स तु विशेषेण परीक्ष्यः शुभमानसैः ॥६७॥
अर्थ: सभी वेषधारी प्रयत्नपूर्वक अपने अनुकूल धर्मका उपदेश देते हैं पर उत्तम हृदयके धारक मनुष्योंको विशेषकर उसकी परीक्षा करनी चाहिए ॥६७॥
द्रव्यं यदात्मतुल्येषु गृहस्थेषु विसृज्यते । कामक्रोधादियुक्तेषु तत्र का फलभोगिता ॥६८॥
अर्थ: काम-क्रोधादिसे युक्त तथा अपनी समानता रखनेवाले गृहस्थोंके लिए जो द्रव्य दिया जाता है उसका क्या फल भोगनेको मिलता है ? सो कहा नहीं जा सकता ॥६८॥
अहो महानयं मोहः सर्वावस्थेषु यज्जनाः । स्वोपतेयं विमुञ्चन्ति विप्रलब्धाः कुशासनैः ॥६९॥
अर्थ: अहो ! यह कितना प्रबल मोह है कि मिथ्यामतोंसे ठगाये गये लोग सभी अवस्थाओंवाले लोगोंको अपना धन दे देते हैं ॥६९॥
धिगस्तु तान् खलानेष जनो यैर्विप्रतारितः । लोभात् कुग्रन्थकन्थाभिर्वराको नेयमानसः ॥७०॥
अर्थ: उन दुष्टजनोंको धिक्कार है जिन्होंने कि इस भोले प्राणीको ठग रखा है तथा लोभ दिखाकर मिथ्या शास्त्रोंकी चर्चासे उसके मनको विचलित कर दिया है ॥७०॥
मृष्टत्वाद् बलकारित्वान्मांसं भक्ष्यमुदाहृतम् । पापैर्दम्भप्रसिद्धयर्थं परिसंख्या च कीर्तिता ॥७१॥
अर्थ: मीठा तथा बलकारी होनेसे पापी मनुष्योंने मांसको भक्ष्य बताया है और अपना कपट बतानेके लिए जिनका मांस खाना चाहिए उनकी संख्या भी निर्धारित की है ॥७१॥
क्रूरास्ते दापयित्वा तद्भक्षयित्वा च लोभिनः । गच्छन्ति नरकं सार्धं दातृभिर्घोरवेदनम् ॥७२॥
अर्थ: सो ऐसे दुष्ट लोभी जीव दूसरोंको मांस दिलाकर तथा स्वयं खाकर दाताओंके साथ-साथ भयंकर वेदनासे युक्त नरकमें जाते हैं ॥७२॥
जीवदानं च यत्प्रोक्तं गर्द्धाविद्धैर्दुरात्मभिः । ऋषिंमन्यैस्तदत्यन्तं निन्दितं तत्त्ववेदिभिः ॥७३॥
अर्थ: लोभके वशीभूत, दुष्ट अभिप्रायसे युक्त तथा झूठ-मूठ ही अपने-आपको ऋषि माननेवाले कितने ही लोगोंने हाथी, घोड़ा, गाय आदि जीवोंका दान भी बतलाया है पर तत्त्वके जानकार मनुष्योंने उसकी अत्यन्त निन्दा की है ॥७३॥
तस्मिन् हि दीयमानस्य वहनाङ्कनताडनैः । संपद्यते महादुःखं तेनान्येषां च भूयसाम् ॥७४॥
अर्थ: उसका कारण भी यह है कि जीवदानमें जो जीव दिया जाता है उसे बोझा ढोना पड़ता है, नुकीली अरी आदिसे उसके शरीरको आँका जाता है तथा लाठी आदिसे उसे पीटा जाता है इन कारणोंसे उसे महादुःख होता है और उसके निमित्तसे बहुत-से अन्य जीवोंको भी बहुत दुःख उठाना पड़ता है ॥७४॥
भूमिदानमपि क्षिप्तं तद्गतप्राणिपीडनात् । प्राणिघातनिमित्तेन पुण्यं पाषाणतः पयः ॥७५॥
अर्थ: इसी प्रकार भूमिदान भी निन्दनीय है क्योंकि उससे भूमिमें रहनेवाले जीवोंको पीड़ा होती है। और प्राणिपीड़ाके निमित्त जुटाकर पुण्यकी इच्छा करना मानो पत्थरसे पानी निकालना है ॥७५॥
सर्वेषामभयं तस्माद्देयं प्राणभृतां सदा । ज्ञानं भेषजमन्नं च वस्त्रादि च गतासुकम् ॥७६॥
अर्थ: इसलिए समस्त प्राणियोंको सदा अभयदान देना चाहिए साथ ही ज्ञान, प्रासुक, औषधि, अन्न और वस्त्रादि भी देना चाहिए ॥७६॥
दानं निन्दितमप्येति प्रशंसां पात्रभेदतः । शुक्तिपीतं यथा वारि मुक्तीभवति निश्चयम् ॥७७॥
अर्थ: जो दान निन्दित बताया है वह भी पात्रके भेदसे प्रशंसनीय हो जाता है, जिस प्रकार कि शुक्ति ( सीप ) के द्वारा पिया हुआ पानी निश्चयसे मोती हो जाता है ॥७७॥
पशुभूम्यादिकं दत्तं जिनानुद्दिश्य भावतः । ददाति परमान् भोगानत्यन्तचिरकालगान् ॥७८॥
अर्थ: पशु तथा भूमिका दान यद्यपि निन्दित दान है फिर भी यदि वह जिन-प्रतिमा आदिको उद्देश्य कर दिया जाता है तो वह दीर्घ काल तक स्थिर रहनेवाले उत्कृष्ट भोग प्रदान करता है ॥७८॥
अन्तरङ्गं हि संकल्पः कारणं पुण्यपापयोः । विना तेन बहिर्दानं वर्षः पर्वतमूर्धनि ॥७९॥
अर्थ: भीतरका संकल्प ही पुण्य-पापका कारण है उसके बिना बाह्यमें दान देना पर्वतके शिखरपर वर्षा करनेके समान है ॥७९॥
वीतरागान् समस्तज्ञानतो ध्यात्वा जिनेश्वरान् । दानं यद्दीयते तस्य कः शक्तो भाषितुं फलम् ॥८०॥
अर्थ: इसलिए वीतराग सर्वज्ञ जिनेन्द्र देवका ध्यान कर जो दान दिया जाता है उसका फल कहनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥८०॥
आयुधग्रहणादन्ये देवा द्वेषसमन्विताः । रागिणः कामिनीसंगाद् भूषणानां च धारणात् ॥८१॥
रागद्वेषानुमेयश्च तेषां मोहोऽपि विद्यते । तयोर्हि कारणं मोहो दोषाः शेषास्तु तन्मयाः ॥८२॥
अर्थ: जिनेन्द्रके सिवाय जो अन्य देव हैं वे द्वेषी, रागी तथा मोही हैं क्योंकि वे शस्त्र लिये रहते हैं इससे द्वेषी सिद्ध होते हैं और स्त्री साथमें रखते हैं तथा आभूषण धारण करते हैं इससे रागी सिद्ध होते हैं। राग-द्वेषके द्वारा उनके मोहका भी अनुमान हो जाता है क्योंकि मोह राग-द्वेषका कारण है। इस प्रकार राग-द्वेष और मोह ये तीन दोष उनमें सिद्ध हो गये बाकी अन्य दोष इन्हींके रूपान्तर हैं ॥८१-८२॥
मनुष्या एव ये केचिद्देवा भोजनमाजनम् । कषायतनवः काले देशकामादिसेविनः ॥८३॥
एवंविधाः कथं देवा दानगोचरतां गताः । अधमा यदि वा तुल्याः फलं कुर्युर्मनोहरम् ॥८४॥
अर्थ: लोकमें जो कुछ मनुष्य देवके रूपमें प्रसिद्ध हैं वे साधारण जनके समान ही भोजनके पात्र हैं अर्थात् भोजन करते हैं, कषायसे युक्त हैं और अवसरपर आंशिक कामादिका सेवन करते हैं सो ऐसे देव दानके पात्र कैसे हो सकते हैं ? वे कितनी ही बातोंमें जब कि अपने भक्त जनोंसे गये-गुजरे अथवा उनके समान ही हैं तब उन्हें उत्तम फल कैसे दे सकते हैं ? ॥८३-८४॥
दृष्टोऽपि तावदेतेषां विपाकः शुभकर्मणः । कुत एव शिवस्थानैसंप्राप्तिर्दुःखितात्मनाम् ॥८५॥
अर्थ: यद्यपि वर्तमानमें उनके शुभ कर्मोंका उदय देखा जाता है तो भी उनसे अन्य दुःखो मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? ॥८५॥
तदेतत्सिकतामुष्टिपीडनात्तैलवाञ्छितम् । विनाशनं च तृष्णाया सेवनादाशुशुक्षणेः ॥८६॥
अर्थ: ऐसे कुदेवोंसे मोक्षकी इच्छा करना बालूकी मुट्ठी पेरकर तेल प्राप्त करनेकी इच्छाके समान है अथवा अग्निकी सेवासे प्यास नष्ट करनेकी इच्छाके तुल्य है ॥८६॥
पङ्गुना नीयते पङ्गुर्यदि देशान्तरं ततः । एतेभ्यः क्लिश्यतो जन्तोर्देवेभ्यः जायते फलम् ॥८७॥
अर्थ: यदि एक लँगड़ा मनुष्य दूसरे लँगड़े मनुष्यको देशान्तरमें ले जा सकता हो तो इन देवोंसे दूसरे दुःखी जीवोंको भी फलकी प्राप्ति हो सकती है ॥८७॥
एषां तावदियं वार्ता देवानां पापकर्मणाम् । तद्भक्तानां तु दूरेण सत्पात्रत्वं न युज्यते ॥८८॥
अर्थ: जब इन देवोंकी यह बात है तब पाप कार्य करनेवाले उनके भक्तोंकी बात तो दूर ही रही। उनमें सत्पात्रता किसी तरह सिद्ध नहीं हो सकती ॥८८॥
लोभेन चोदितः पापो जनो यज्ञे प्रवर्तते । कुर्वतो हि तथा लोको धनं तर्हि प्रयच्छति ॥८९॥
अर्थ: लोभसे प्रेरित हुए पापी जन यज्ञमें प्रवृत्त होते हैं और लोग ऐसा करने वालोंको दक्षिणा आदिके रूपमें धन देते हैं सो यह निर्दोष कैसे हो सकता है ? ॥८९॥
तस्मादुद्दिश्य यद्दानं दीयते जिनपुङ्गवम् । सर्वदोषविनिर्मुक्तं तद्ददाति फलं महत् ॥९०॥
अर्थ: इसलिए जिनेन्द्र देवको उद्देश्य कर जो दान दिया जाता है वही सर्वदोष रहित है और वही महाफल प्रदान करता है ॥९०॥
वाणिज्यसदृशो धर्मस्तत्रान्वेष्याल्पभूरिता । बहुना हि परामूतिः क्रियतेऽल्पस्य वस्तुनः ॥९१॥
अर्थ: धर्म तो व्यापारके समान है, जिस प्रकार व्यापारमें सदा हीनाधिकताका विचार किया जाता है उसी प्रकार धर्ममें भी सदा हीनाधिकताका विचार रखना चाहिए अर्थात् हानि-लाभपर दृष्टि रखना चाहिए। जिस धर्ममें पुण्यकी अधिकता हो और पापकी न्यूनता हो गृहस्थ उसे स्वीकृत कर सकता है क्योंकि अधिक वस्तुके द्वारा हीन वस्तुका पराभव हो जाता है ॥९१॥
यथा विषकणः प्राप्तः सरसीं नैव दुष्यति । जिनधर्मोद्यतस्यैवं हिंसालेशो वृथोद्भवः ॥९२॥
अर्थ: जिस प्रकार विषका एक कण तालाबमें पहुँचकर पूरे तालाबको दूषित नहीं कर सकता उसी प्रकार जिनधर्मानुकूल आचरण करनेवाले पुरुषसे जो थोड़ी हिंसा होती है वह उसे दूषित नहीं कर सकती। उसकी वह अल्प हिंसा व्यर्थ रहती है ॥९२॥
प्रासादादि ततः कार्यं जिनानां भक्तितत्परैः । माल्यधूपप्रदीपादि सर्वं च कुशलैर्जनैः ॥९३॥
अर्थ: इसलिए भक्तिमें तत्पर रहनेवाले कुशल मनुष्योंको जिन-मन्दिर आदि बनवाना चाहिए और माला, धूप, दीप आदि सबकी व्यवस्था करनी चाहिए ॥९३॥
स्वर्गे मनुष्यलोके च भोगानत्यन्तमुन्नतान् । जन्तवः प्रतिपद्यन्ते जिनानुद्दिश्य दानतः ॥९४॥
अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्को उद्देश्य कर जो दान दिया जाता है उसके फलस्वरूप जीव स्वर्ग तथा मनुष्यलोक सम्बन्धी उत्तमोत्तम भोग प्राप्त करते हैं ॥९४॥
तन्मार्गप्रस्थितानां च दत्तं दानं यथोचितम् । करोति विपुलान् भोगान् गुणानामिति भाजनम् ॥९५॥
अर्थ: सन्मार्गमें प्रयाण करनेवाले मुनि आदिके लिए जो यथायोग्य दान दिया जाता है वह उत्कृष्ट भोग प्रदान करता है। इस प्रकार यही दान गुणोंका पात्र है ॥९५॥
यथाशक्ति ततो भक्त्या सम्यग्दृष्टिषु यच्छतः । दानं तदेकमात्रास्ति शेषं चोरैर्विलुण्ठितम् ॥९६॥
अर्थ: इसलिए सामर्थ्यके अनुसार भक्तिपूर्वक सम्यग्दृष्टि पुरुषोंके लिए जो दान देता है उसीका दान एक दान है बाकी तो चोरोंको धन लुटाना है ॥९६॥
स्थितं ज्ञानस्य साम्राज्ये केवलं परिकीर्त्यते । निर्वाणं तस्य संप्राप्तावुपैति ध्यानयोगतः ॥९७॥
अर्थ: केवलज्ञान ज्ञानके साम्राज्य पदपर स्थित है। ध्यानके प्रभावसे जब केवलज्ञानकी प्राप्ति हो चुकती है तभी यह जीव निर्वाणको प्राप्त होता है ॥९७॥
विमुक्ताशेषकर्माणः सर्वबाधाविवर्जिताः । अनन्तसुखसंपन्ना अनन्तज्ञानदर्शनाः ॥९८॥
अशरीराः स्वभावस्था लोकमूर्ध्नि प्रतिष्ठिताः । प्रत्यापत्तिविनिर्मुक्ताः सिद्धा वक्तव्यवर्जिताः ॥९९॥
अर्थ: जिनके समस्त कर्म नष्ट हो चुकते हैं, जो सर्व प्रकारकी बाधाओंसे परे हो जाते हैं, जो अनन्त सुखसे सम्पन्न रहते हैं, अनन्त ज्ञान और अनन्त दर्शन जिनकी आत्मामें प्रकाशमान रहते हैं जिनके तीनों प्रकारके शरीर नष्ट हो जाते हैं, निश्चयसे जो अपने स्वभावमें ही स्थित रहते हैं और व्यवहारसे लोक-शिखरपर विराजमान हैं, जो पुनरागमनसे रहित हैं और जिनका स्वरूप शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता वे सिद्ध भगवान् हैं ॥९८-९९॥
गर्द्धापवनसंवृद्धदुःखपावकमध्यगाः । क्लिश्यन्ते पापिनो नित्यं विना सुकृतवारिणा ॥१००॥
अर्थ: लोभरूपी पवनसे बढ़े दुःख रूपी अग्निके बीचमें पड़े पापी जीव पुण्य रूपी जलके बिना निरन्तर क्लेश भोगते रहते हैं ॥१००॥
पापान्धकारमध्यस्थाः कुदर्शनवशीकृताः । बोधं केचित्प्रपद्यन्ते धर्मादित्यमरीचिभिः ॥१०१॥
अर्थ: पापरूपी अन्धकारके बीचमें रहनेवाले तथा मिथ्यादर्शनके वशीभूत कितने ही जीव धर्मरूपी सूर्यकी किरणोंसे प्रबोधको प्राप्त होते हैं ॥१०१॥
अशुभायोमयात्यन्तदृढपञ्जरमध्यगाः । आशापाशवशा जीवा मुच्यन्ते धर्मबन्धुना ॥१०२॥
अर्थ: जो अशुभभावरूपी लोहेके मजबूत पिंजरेके मध्यमें रह रहे हैं तथा आशारूपी पाशके अधीन हैं ऐसे जीव धर्मरूपी बन्धुके द्वारा ही मुक्त किये जाते हैं - बन्धनसे छुड़ाये जाते हैं ॥१०२॥
सिद्धो व्याकरणाल्लोकबिन्दुसारैकदेशतः । धारणार्थो धृतो धर्मशब्दो वाचि परिस्थितः ॥१०३॥
अर्थ: जो लोकबिन्दुसार नामक पूर्वका एक देश है ऐसे व्याकरणसे सिद्ध है कि जो धारण करे सो धर्म है । ‘धरतीति धर्मः’ इस प्रकार उसका निरुक्त्यर्थ है ॥१०३॥
पतन्तं दुर्गतौ यस्मात्सम्यगाचरितो भवन् । प्राणिनं धारयत्यस्माद्धर्म इत्यभिधीयते ॥१०४॥
अर्थ: और यह ठीक भी है क्योंकि अच्छी तरहसे आचरण किया हुआ धर्म दुर्गतिमें पड़ते हुए जीवको धारण कर लेता है - बचा लेता है इसलिए वह धर्म कहलाता है ॥१०४॥
लभिर्धातुः स्मृतः प्राप्तौ प्राप्तिः संपर्क उच्यते । तस्य धर्मस्य यो लाभो धर्मलाभः स उच्यते ॥१०५॥
अर्थ: लभ धातुका अर्थ प्राप्ति है और प्राप्ति सम्पर्कको कहते हैं, अतः धर्मको प्राप्तिको धर्मलाभ कहते हैं ॥१०५॥
जिनैरभिहितं धर्मं कथयामि समासतः । कांश्चित्तत्फलभेदांश्च श्रृणुतैकाग्रमानसाः ॥१०६॥
अर्थ: अब हम जिन-भगवान्के द्वारा कहे हुए धर्मका संक्षेपसे निरूपण करते हैं। साथ ही उसके कुछ भेदों और उनके फलोंका भी निर्देश करेंगे सो तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥१०६॥
हिंसातोऽलीकतः स्तेयान्मैथुनाद् द्रव्यसंगमात् । विरतिर्व्रतमुद्दिष्टं विधेयं तस्य धारणम् ॥१०७॥
अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहसे विरक्त होना सो व्रत कहलाता है। ऐसा व्रत अवश्य ही धारण करना चाहिए ॥१०७॥
ईर्यावाक्यैषणादाननिक्षेपोत्सर्गरूपिका । समितिः पालनं तस्याः कार्यं यत्नेन साधुना ॥१०८॥
अर्थ: ईर्या, भाषा, एषणा, आदान-निक्षेपण और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं। साधुको इनका प्रयत्नपूर्वक पालन करना चाहिए ॥१०८॥
वाङ्मनःकायवृत्तीनामभावो म्रदिमाथवा । गुप्तिराचरणं तस्यां विधेयं परमादरात् ॥१०९॥
अर्थ: वचन, मन और कायकी प्रवृत्तिका सर्वथा अभाव हो जाना अथवा उसमें कोमलता आ जाना गुप्ति है। इसका आचरण बड़े आदरसे करना चाहिए ॥१०९॥
क्रोधो मानस्तथा माया लोभश्चेति महाद्विषः । कषाया यैरयं लोकः संसारे परिवर्त्यते ॥११०॥
अर्थ: क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार कषाय महाशत्रु हैं, इन्हींके द्वारा जीव संसारमें परिभ्रमण करता है ॥११०॥
क्षमातो मृदुतासंगादृजुत्वाद्धृतियोगतः । विधेयो निग्रहस्तेषां सूत्रनिर्दिष्टकारिणा ॥१११॥
अर्थ: आगमके अनुसार कार्य करनेवाले मनुष्यको क्षमासे क्रोधका, मृदुतासे मानका, सरलतासे मायाका और सन्तोषसे लोभका निग्रह करना चाहिए ॥१११॥
धर्मसंज्ञमिदं सर्वं व्रतादि परिकीर्तितम् । त्यागश्चोदितो धर्मो विशेषोऽस्य निवेदितः ॥११२॥
अर्थ: अभी ऊपर जिन व्रत समिति आदिका वर्णन किया है वह सब धर्म कहलाता है। इसके सिवाय त्याग भी विशेषधर्म कहा गया है ॥११२॥
रसनस्पर्शनघ्राणचक्षुःश्रोत्राभिधानतः । प्रसिद्धानीन्द्रियाण्येषां निर्जयो धर्म उच्यते ॥११३॥
अर्थ: स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण ये पाँच इन्द्रियाँ प्रसिद्ध हैं। इनका जीतना धर्म कहलाता है ॥११३॥
उपवासोऽवमौदर्यं परिसंख्यानवृत्तिता । रसानां च परित्यागो विविक्तं शयनासनम् ॥११४॥
कायक्लेश इति प्रोक्तं बाह्यं षोढा तपः स्थितम् । तपसोऽभ्यन्तरस्यैतद्वृत्तिस्थानीयमिष्यते ॥११५॥
अर्थ: उपवास, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश ये छह बाह्यतप हैं। बाह्यतप अन्तरंग तपकी रक्षाके लिए वृति अर्थात् बाड़ीके समान हैं ॥११४-११५॥
प्रायश्चित्तं विनीतिश्च वैयावृत्यकृतिस्तथा । स्वाध्यायेन च संबन्धो व्युत्सर्गो ध्यानमुत्तमम् ॥११६॥
एतदाभ्यन्तरं षोढा तपश्चरणमिष्यते । तपः समस्तमप्येतद्धर्म इत्यभिधीयते ॥११७॥
अर्थ: प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह आभ्यन्तर तप हैं। यह समस्त तप धर्म कहलाता है ॥११६-११७॥
धर्मेणानेन कुर्वन्ति भव्याः कर्मवियोजनम् । कर्म चाद्भुतमत्यन्तव्यवस्थापरिवर्तनम् ॥११८॥
अर्थ: भव्य जीव इस धर्मके द्वारा कर्मोंका वियोजन अर्थात् विनाश तथा अनन्त व्यवसायोंको परिवर्तित करनेवाले अनेक आश्चर्यजनक कार्य करते हैं ॥११८॥
शक्नोति बाधितुं सर्वान्मानुषानमरांस्तथा । लोकाकाशं च संरोद्धुं वपुषा विक्रियात्मना ॥११९॥
अर्थ: यह जीव धर्मके प्रभावसे ऐसा विक्रियात्मक शरीर प्राप्त करता है कि जिसके द्वारा समस्त मनुष्य और देवोंको बाधा देने तथा लोकाकाशको व्याप्त करनेमें समर्थ होता है ॥११९॥
एकग्रासत्वमानेतुं त्रैलोक्यं च महाबलः । अष्टभेदमहैश्वर्यं योगं चाप्नोति दुर्लभम् ॥१२०॥
अर्थ: धर्मके प्रभावसे यह जीव इतना महाबलवान् हो जाता है कि तीनों लोकोंको एक ग्रास बना सकता है । अणिमा, महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्य तथा अनेक दुर्लभ योग भी यह धर्मके प्रभावसे प्राप्त करता है ॥१२०॥
हन्ति तापं सहस्रांशोस्तुषारत्वमुडुप्रभोः । करोति पूरणं वृष्ट्या सर्वस्य जगतः क्षणात् ॥१२१॥
अर्थ: यह जीव धर्मके प्रभावसे सूर्यके सन्तापको और चन्द्रमाकी शीतलताको नष्ट कर सकता है तथा वृष्टिके द्वारा समस्त संसारको क्षणभरमें भर सकता है ॥१२१॥
भस्मतां नयते लोकमाशीविषवदीक्षणात् । कुरुते मन्दरोत्क्षेपं विक्षेपणमुदन्वताम् ॥१२२॥
अर्थ: यह धर्मके प्रभावसे आशीविष साँपके समान दृष्टिमात्रसे लोकको भस्म कर सकता है, मेरु पर्वतको उठा सकता है और समुद्रको बिखेर सकता है ॥१२२॥
ज्योतिश्चक्रं समुद्धर्तुमिन्द्ररुद्रादिसाध्वसम् । रत्नकाञ्चनवर्षं च ग्रावसंघातसर्जनम् ॥१२३॥
अर्थ: धर्मके ही प्रभावसे ज्योतिश्चक्रको उठा सकता है, इन्द्र, रुद्र आदि देवोंको भयभीत कर सकता है, रत्न और सुवर्णकी वर्षा कर सकता है तथा पर्वतोंके समूहकी सृष्टि कर सकता है ॥१२३॥
व्याधीनामतितीव्राणां शमनं पादपांसुना । नृणामद्भुतहेतूनां विभवानां समुद्भवम् ॥१२४॥
अर्थ: धर्मके ही प्रभावसे अत्यन्त भयंकर बीमारियोंकी शान्ति अपने पैरकी धूलिसे कर सकता है तथा मनुष्योंको अन्य अनेक आश्चर्यकारक वैभवकी प्राप्ति करा सकता है ॥१२४॥
जीवः करोति धर्मेण तथान्यदपि दुष्करम् । नैव किंचिदसाध्यत्वं धर्मस्य प्रतिपद्यते ॥१२५॥
अर्थ: जीव धर्मके प्रभावसे और भी कितने ही कठिन कार्य कर सकता है। यथार्थमें धर्मके लिए कोई भी कार्य असाध्य नहीं है ॥१२५॥
धर्मेण मरणं प्राप्ता ज्योतिश्चक्रतिरस्कृतिम् । कृत्वा कल्पान्प्रपद्यन्ते सौधर्मादीन् गुणालयान् ॥१२६॥
अर्थ: जो जीव धर्मपूर्वक मरण करते हैं वे ज्योतिश्चक्रको उल्लंघन कर गुणोंके निवासभूत सौधर्मादि स्वर्गोंमें उत्पन्न होते हैं ॥१२६॥
सामानिकाः सुराः केचिद्भवन्त्यन्ये सुराधिपाः । अहमिन्द्रास्तथान्ये च कृत्वा धर्मस्य संग्रहम् ॥१२७॥
अर्थ: धर्मका उपार्जन कर कितने ही सामानिक देव होते हैं, कितने ही इन्द्र होते हैं और कितने ही अहमिन्द्र बनते हैं ॥१२७॥
हेमस्फटिकवैडूर्यस्तम्भसंभारनिर्मितान् । तद्भित्तिभासुराँस्तुङ्गान् प्रासादान्बहुभूमिकान् ॥१२८॥
अर्थ: धर्मके प्रभावसे जीव उन महलोंमें उत्पन्न होते हैं जो कि स्वर्ण, स्फटिक और वैडूर्य मणिमय खम्भोंके समूहसे निर्मित होते हैं जिनकी स्वर्णादिनिर्मित दीवालें सदा देदीप्यमान रहती हैं, जो अत्यन्त ऊँचे और अनेक भूमियों (खण्डों) से युक्त होते हैं । ॥१२८॥
अम्भोजदधिमध्वादिविचित्रमणिकुट्टिमान् । मुक्ताकलापसंयुक्तान् वातायनविराजितान् ॥१२९॥
अर्थ: जिनके फर्श पद्मराग, दधिराग तथा मधुराग आदि विचित्र-विचित्र मणियोंसे बने होते हैं, जिनमें मोतियोंकी मालाएँ लटकती रहती हैं, जो झरोखोंसे सुशोभित होते हैं ॥१२९॥
रुरुमिश्रमरैः सिंहैर्गजैरन्यैश्च चारुभिः । रूपैर्निचितपार्श्वाभिर्वेदिकाभिरलंकृतान् ॥१३०॥
अर्थ: जिनके किनारोंपर हरिण, चमरी गाय, सिंह, हाथी तथा अन्यान्य जीवोंके सुन्दर-सुन्दर चित्र चित्रित रहते हैं ऐसी वेदिकाओंसे जो अलंकृत होते हैं ॥१३०॥
चन्द्रशालादिभिर्युक्तान् ध्वजमालाविभूषितान् । सोपाश्रयमनोहारिशयनासनसंगतान् ॥१३१॥
अर्थ: जो चन्द्रशाला आदिसे सहित होते हैं, ध्वजाओं और मालाओंसे अलंकृत रहते हैं तथा जिनकी कक्षाओंमें मनोहारी शय्याएँ और आसन बिछे रहते हैं ॥१३१॥
आतोद्यवरसंपूर्णानिच्छासंचारकारिणः । युक्तान्सत्परिवर्गेण पुण्डरीकादिलक्षितान् ॥१३२॥
विमानप्रभृतीन् जीवा निलयान् धर्मकारिणः । प्रपद्यन्तेऽर्कशीतांशुदीप्तिकान्त्यभिभाविनः ॥१३३॥
अर्थ: धर्म धारण करनेवाले लोग ऐसे विमान आदि स्थानोंमें उत्पन्न होते हैं जो वादित्र आदि संगीतके साधनोंसे युक्त रहते हैं, इच्छानुसार जिनमें गमन होता है, जो उत्तम परिकरसे सहित होते हैं, कमल आदि प्रसाधन सामग्रीसे युक्त रहते हैं और अपनी प्रभासे सूर्यकी दीप्ति और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत करते रहते हैं ॥१३२-१३३॥
सुखनिद्राक्षये यद्वद्विबुद्धं विमलेन्द्रियम् । अचिरोदिततिग्मांशुदीप्तं कान्त्या समं विधोः ॥१३४॥
रजःस्वेदरुजामुक्तं स्वामोदममलं मृदु । श्रिया परमया युक्तं चक्षुष्यमुपपादजम् ॥१३५॥
शरीरं लभ्यते धर्मात् प्राणिभिः सुरसद्मसु । अलंकाराश्च भ्राचक्रतिरोहितदिगन्तरैः ॥१३६॥
अर्थ: धर्मके प्रभावसे प्राणियोंको देव-भवनोंमें ऐसा वैक्रियिक शरीर प्राप्त होता है जो कि सुखमय निद्राके दूर होनेपर जागृत हुएके समान जान पड़ता है, जिसकी इन्द्रियाँ अत्यन्त निर्मल होती हैं । जो तत्काल उदित सूर्यके समान देदीप्यमान होता है, जो कान्तिसे चन्द्रमाकी तुलना प्राप्त करता है, रज, पसीना तथा बीमारीसे रहित होता है, अत्यन्त सुगन्धित, निर्मल और कोमल होता है, उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त, नयनाभिराम और उपपाद जन्मसे उत्पन्न होता है । इसके सिवाय अपनी कान्तिके समूहसे दिगन्तरालको आच्छादित करनेवाले आभूषण भी प्राप्त होते हैं ॥१३४-१३६॥
सरोरुहदलस्पर्शचरणाः कान्तिवन्नखाः । तुलाकोटिकसंदष्टैरक्तांशुकदशाननाः ॥१३७॥
अर्थ: धर्मके प्रभावसे स्वर्गमें ऐसी अप्सराएँ प्राप्त होती हैं जिनके कि चरणोंका स्पर्शन कमलदलके समान कोमल होता है, जिनके नख अत्यन्त कान्तिमान् होते हैं, जिनके लाल-लाल वस्त्रोंके अंचल नूपुरोंमें उलझते रहते हैं ॥१३७॥
रम्भास्तम्भसमस्पर्शजङ्घान्तर्गतजानुकाः । काञ्चीगुणाञ्चितोदारनितम्बा द्विरदक्रमाः ॥१३८॥
अर्थ: जिनकी जंघाएँ केलेके स्तम्भके समान स्निग्ध स्पर्शसे युक्त होती हैं, जिनके घुटने मांस-पेशियोंमें अन्तर्निहित रहते हैं, जिनके स्थूल नितम्ब मेखलाओंसे सुशोभित होते हैं, जिनकी चाल हाथीकी चालके समान मस्तीसे भरी रहती है ॥१३८॥
अनुदारवलीभङ्गतनुमध्यविराजिताः । नवोदितक्षपानाथप्रतिमस्तनमण्डलाः ॥१३९॥
अर्थ: जो सूक्ष्म त्रिवलिसे युक्त मध्यभागसे सुशोभित होती हैं, जिनके स्तनोंके मण्डल नवीन उदित चन्द्रमाके समान होते हैं ॥१३९॥
रत्नावलीप्रभाजालनिर्मुक्तघनचन्द्रिकाः । मालतीमार्दवोपेततनुबाहुलताभृतः ॥१४०॥
अर्थ: जिनको रत्नावलीकी कान्तिसे सदा चाँदनी छिटकती रहती है, जो मालतीके समान कोमल और पतली भुजारूपी लताओंको धारण करती हैं ॥१४०॥
महार्घमणिवाचालवलयाकुलपाणयः । अशोकपल्लवस्पर्शकराङ्गुलिगलत्प्रभाः ॥१४१॥
अर्थ: जिनके हाथ महामूल्य मणियोंकी खनकती हुई चूड़ियोंसे सदा युक्त रहते हैं, अशोक पल्लवके समान कोमलता धारण करनेवाली जिनकी अँगुलियोंसे मानो कान्ति चूती रहती है ॥१४१॥
कम्बुकण्ठा रदच्छायापिहितद्विजवासर्सः । लावण्यलिप्तसर्वांशकपोलामलदर्पणाः ॥१४२॥
अर्थ: जिनके कण्ठ शंखके समान होते हैं, जिनके ओठ दाँतोंकी कान्तिसे आच्छादित रहते हैं, जिनके कपोलरूपी निर्मल दर्पणोंका समस्त भाग लावण्यसे संलिप्त रहता है ॥१४२॥
लोचनान्तघनच्छायाकृतकर्णावतंसकाः । मुक्तापरीतपद्माभिमणिसीमन्तभूषणाः ॥१४३॥
अर्थ: जिनके नयनान्तकी सघन कान्ति सदा कर्णाभरणकी शोभा बढ़ाया करती है, मोतियोंसे व्याप्त पद्मराग मणि जिनकी माँगको अलंकृत करते रहते हैं ॥१४३॥
भ्रमरासितसूक्ष्मातिमृदुकेशकलापिकाः । मृणालकोमलस्पर्शवपुषो मधुरस्वराः ॥१४४॥
अर्थ: जिनके केशोंके समूह भ्रमरके समान काले, सूक्ष्म और अत्यन्त कोमल हैं, जिनके शरीरका स्पर्श मृणालके समान कोमल है, जिनकी आवाज अत्यन्त मधुर है ॥१४४॥
अत्यन्तमुपचारज्ञा नितान्तसुभगक्रियाः । नन्दनप्रभवामोदसमनिश्वाससौरभाः ॥१४५॥
अर्थ: जो सब प्रकारका उपचार जानती हैं, जिनकी समस्त क्रियाएँ अत्यन्त मनोहर हैं, जिनके श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धि नन्दनवनकी सुगन्धिके समान है ॥१४५॥
इङ्गितज्ञानकुशलाः पञ्चेन्द्रियसुखावहाः । कामरूपधरा धर्मात्प्राप्यन्तेऽप्सरसो दिवि ॥१४६॥
अर्थ: जो अभिप्रायके समझनेमें कुशल, पंचेन्द्रियोंको सुख पहुँचानेवाली और इच्छानुसार रूपको धारण करनेवाली हैं ॥१४६॥
संकल्पमात्रसंभूतसर्वोपकरणं पुरु । विषयोत्थं सुखं ताभिः प्राप्नुवन्ति समं सुराः ॥१४७॥
अर्थ: देव लोग, उन अप्सराओंके साथ जहाँ संकल्पमात्रसे ही समस्त उपकरण उपस्थित हो जाते हैं ऐसा विषयजन्य विशाल सुख भोगते हैं ॥१४७॥
सुखं यन्त्रिदशावासे यच्च मानुषविष्टपे । फलं तद्गदितं सर्वं धर्मस्य जिनपुङ्गवैः ॥१४८॥
अर्थ: अथवा मनुष्य लोकमें जो सुख प्राप्त होता है जिनेन्द्रदेवने उस सबको धर्मका फल कहा है ॥१४८॥
ऊर्ध्वाधोमध्यलोकेषु यो नाम सुखसंज्ञितः । भोक्तॄणां जायते भावः स सर्वो धर्मसंभवः ॥१४९॥
अर्थ: ऊर्ध्व, मध्य और अधोलोकमें उपभोक्ताओंको जो भी सुख नामका पदार्थ प्राप्त होता है वह सब धर्मसे ही उत्पन्न होता है ॥१४९॥
दाता भोक्ता स्थितेः कर्ता यो नरः प्रतिवासरम् । रक्ष्यते नृसहस्रौघैः सर्वं तद्धर्मजं फलम् ॥१५०॥
अर्थ: दान देनेवाले, उपभोग करनेवाले एवं मर्यादा स्थापित करनेवाले मनुष्यकी जो हजारों मनुष्योंके झुण्ड रक्षा करते हैं वह सब धर्मसे उत्पन्न हुआ फल समझना चाहिए ॥१५०॥
यत्तत्सुरसहस्राणां हरिभूषणधारिणाम् । प्रभुत्वं कुरुते शक्रस्तत्फलं धर्मसंभवम् ॥१५१॥
अर्थ: मनोहर आभूषण धारण करनेवाले हजारों देवोंपर इन्द्र जो शासन करता है वह धर्मसे उत्पन्न हुआ फल है ॥१५१॥
यन्मोहरिपुमुद्रास्य रत्नत्रयसमन्विताः । सिद्धस्थानं प्रपद्यन्ते शुद्धधर्मस्य तत्फलम् ॥१५२॥
अर्थ: सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयसे युक्त जो पुरुष मोहरूपी शत्रुको नष्ट कर मोक्षस्थान प्राप्त करते हैं वह शुद्ध धर्मका फल है ॥१५२॥
अप्राप्य मानुषं जन्म स च धर्मो न लभ्यते । तस्मान्मनुष्यसंप्राप्तिः परमा सर्वजन्मसु ॥१५३॥
अर्थ: मनुष्य-जन्मके बिना अन्यत्र वह धर्म प्राप्त नहीं हो सकता इसलिए मनुष्यभवकी प्राप्ति सब भवोंमें श्रेष्ठ है ॥१५३॥
राजा श्रेष्ठो मनुष्याणां मृगाणां केसरी यथा । पक्षिणां विनतापुत्रः भवानां मानुषो भवः ॥१५४॥
अर्थ: जिस प्रकार मनुष्योंमें राजा, मृगोंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड़ श्रेष्ठ है उसी प्रकार सब भवोंमें मनुष्यभव श्रेष्ठ है ॥१५४॥
सारस्त्रिभुवने धर्मः सर्वेन्द्रियसुखप्रदः । क्रियते मानुषे देहे ततो मनुजता परा ॥१५५॥
अर्थ: तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ एवं समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाला धर्म मनुष्यशरीरमें ही किया जाता है इसलिए मनुष्यदेह ही सर्वश्रेष्ठ है ॥१५५॥
तृणानां शालयः श्रेष्ठाः पादपानां च चन्दनाः । उपलानां च रत्नानि भवानां मानुषो भवः ॥१५६॥
अर्थ: जिस प्रकार तृणोंमें धान, वृक्षोंमें चन्दन और पत्थरोंमें रत्न श्रेष्ठ है उसी प्रकार सब भवोंमें मनुष्यभव श्रेष्ठ है ॥१५६॥
उत्सर्पिणीसहस्राणि परिभ्रम्य कथंचन । लभ्यते वा न वा जन्म मनुष्याणां शरीरिणा ॥१५७॥
अर्थ: हजारों उत्सर्पिणियोंमें भ्रमण करनेके बाद यह जीव किसी तरह मनुष्य-जन्म प्राप्त करता है और नहीं भी प्राप्त करता है ॥१५७॥
अवाप्य दुर्लभं तद्यः क्लेशनिर्मोक्षकारणम् । जनो न कुरुते धर्मं यात्यसौ दुर्गतीः पुनः ॥१५८॥
अर्थ: क्लेशोंसे छुटकारा देनेवाले उस मनुष्य-जन्मको पाकर जो मनुष्य धर्म नहीं करता है वह पुनः दुर्गतियोंको प्राप्त होता है ॥१५८॥
पतितं तन्मनुष्यत्वं पुनर्दुर्लभसंगमम् । समुद्रसलिले नष्टं यथा रत्नं महागुणम् ॥१५९॥
अर्थ: जिस प्रकार समुद्रके पानीमें गिरा महामूल्य रत्न दुर्लभ हो जाता है उसी प्रकार नष्ट हुए मनुष्य-जन्मका पुनः पाना भी दुर्लभ है ॥१५९॥
इहैव मानुषे लोके कृत्वा धर्मं यथोचितम् । स्वर्गादिषु प्रपद्यन्ते सर्वं प्राणभृतः फलम् ॥१६०॥
अर्थ: इसी मनुष्य पर्यायमें यथायोग्य धर्म कर प्राणी स्वर्गादिकमें समस्त फल प्राप्त करते हैं ॥१६०॥
सर्वज्ञोक्तमिदं श्रुत्वा भानुकर्णः ससंमदः । भक्त्या प्रणम्य पद्माक्षः पर्यपृच्छत्कृताञ्जलिः ॥१६१॥
अर्थ: सर्वज्ञ देवके द्वारा कहे हुए इस उपदेशको सुनकर भानुकर्ण बहुत ही हर्षित हुआ । उसके नेत्र कमलके समान विकसित हो गये । उसने भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तथा हाथ जोड़कर पूछा कि ॥१६१॥
भगवन्न ममाद्यापि जायते प्राप्ततृप्तिता । अतो विधानतो धर्मं निवेदयितुमर्हसि ॥१६२॥
अर्थ: हे भगवान् ! अभी जो उपदेश प्राप्त हुआ है उससे मुझे तृप्ति नहीं हुई है अतः भेद-प्रभेदके द्वारा धर्मका निरूपण कीजिए ॥१६२॥
ततोऽनन्तबलोऽवोचद्विशेषं सौकृतं शृणु । संसाराद्येन मुच्यन्ते प्राणिनो भव्यताभृतः ॥१६३॥
अर्थ: तब अनन्तबल केवली कहने लगे कि अच्छा धर्मका विशेष वर्णन सुनो जिसके प्रभावसे भव्य प्राणी संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥१६३॥
द्विविधो गदितो धर्मो महत्त्वादाणवात्तथा । आद्योऽगारविमुक्तानामन्यश्च भववर्तिनाम् ॥१६४॥
अर्थ: महाव्रत और अणुव्रतके भेदसे धर्म दो प्रकारका कहा गया है। उनमें-से पहला अर्थात् महाव्रत गृहत्यागी मुनियोंके होता है और दूसरा अर्थात् अणुव्रत संसारवर्ती गृहस्थोंके होता है ॥१६४॥
विसृष्टसर्वसंगानां श्रमणानां महात्मनाम् । कीर्तयामि समाचारं दुरितक्षोदनक्षमम् ॥१६५॥
अर्थ: अब मैं समस्त परिग्रहोंसे रहित महान् आत्माके धारी मुनियोंका वह चरित्र कहता हूँ जो कि पापोंको नष्ट करनेमें समर्थ है ॥१६५॥
मते सुव्रतनाथस्य लीना निखिलवेदिनः । मृत्युजन्मसमुद्भूतमहात्राससमन्विताः ॥१६६॥
अर्थ: समस्त पदार्थोंको जाननेवाले मुनि सुव्रतनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें ऐसे कितने ही महापुरुष हैं जो जन्म-मरण सम्बन्धो महाभयसे युक्त हैं ॥१६६॥
एरण्डसदृशं ज्ञात्वा मनुष्यत्वमसारकम् । संगेन रहिता धन्या श्रमणत्वमुपाश्रिताः ॥१६७॥
अर्थ: ये मनुष्य पर्यायको एरण्ड वृक्षके समान निःसार जानकर परिग्रहसे रहित हो मुनिपदको प्राप्त हुए हैं ॥१६७॥
रता महत्त्वयुक्तेषु पञ्चसंख्येषु साधवः । व्रतेष्वाविग्रहत्यागात्तत्त्वावगमतत्पराः ॥१६८॥
अर्थ: वे साधु सदा पंच महाव्रतोंमें लीन रहते हैं और शरीरत्यागपर्यन्त तत्त्वज्ञानके प्राप्त करनेमें तत्पर होते हैं ॥१६८॥
समितिष्वपि तत्संख्यासंगतासु सुचेतसः । अभियुक्ता महासत्त्वास्त्रिसंख्यासु च गुप्तिषु ॥१६९॥
अर्थ: शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले ये धैर्यशाली मुनि पाँच समितियों और तीन गुप्तियोंमें सदा लीन रहते हैं ॥१६९॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं यथोदितम् । येषामस्ति न तेषां स्यात्परिग्रहसमाश्रयः ॥१७०॥
अर्थ: अहिंसा, सत्य, अचौर्य और आगमानुमोदित ब्रह्मचर्य उन्हींके होता है जिनके कि परिग्रह-का आलम्बन नहीं होता ॥१७०॥
देहेऽपि ये न कुर्वन्ति निजे रागं मनीषिणः । कः स्यात्परिग्रहस्तेषां यत्नास्तमितशायिनाम् ॥१७१॥
अर्थ: जो बुद्धिमान् जन अपने शरीरमें भी राग नहीं करते हैं और सूर्यास्त हो जानेपर यत्नपूर्वक विश्राम करते हैं उनके परिग्रह क्या हो सकता है ? अर्थात् कुछ नहीं ॥१७१॥
अपि बालाग्रमात्रेण पापोपार्जनकारिणा । ग्रन्थेन रहिता धीरा मुनयः सिंहविक्रमाः ॥१७२॥
अर्थ: मुनि पाप उपार्जन करनेवाले बालाग्रमात्र परिग्रहसे रहित होते हैं तथा अत्यन्त धीर-वीर और सिंहके समान पराक्रमी होते हैं ॥१७२॥
समस्तप्रतिबन्धेन समीरणवदुज्झिताः । खगानामपि संगः स्यान्न तु तेषां मनागपि ॥१७३॥
अर्थ: ये वायुके समान सब प्रकारके प्रतिबन्धसे रहित होते हैं। पक्षियोंके तो परिग्रह हो सकता है पर मुनियोंके रंचमात्र भी परिग्रह नहीं होता ॥१७३॥
व्योमवन्मलसंबन्धरहिताः श्लाघ्यचेष्टिताः । रजनीनाथवत्सौम्या दीप्ता दिवसनाथवत् ॥१७४॥
अर्थ: ये आकाशके समान मलके संसर्गसे रहित होते हैं, इनकी चेष्टाएँ अत्यन्त प्रशंसनीय होती हैं, ये चन्द्रमाके समान सौम्य और दिवाकरके समान देदीप्यमान होते हैं ॥१७४॥
निम्नगानाथगम्भीरा धीरा भूधरनाथवत् । भीतकूर्मवदत्यन्तगुप्तेन्द्रियकदम्बकाः ॥१७५॥
अर्थ: ये समुद्रके समान गम्भीर, सुमेरुके समान धीर-वीर और भयभीत कछुएके समान समस्त इन्द्रियोंके समूहको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले होते हैं ॥१७५॥
क्षमया क्षमया तुल्याः कषायोद्रेकवर्जिताः । अशीत्या गुणलक्षाणां चतुःसहितयान्विताः ॥१७६॥
अर्थ: ये क्षमाधर्मके कारण क्षमा अर्थात् पृथ्वीके तुल्य हैं, कषायोंके उद्रेकसे रहित हैं और चौरासी लाख गुणोंसे सहित हैं ॥१७६॥
अष्टादशजिनोद्दिष्टशीललक्षसमन्विताः । अत्यन्ताढ्यास्तपोभूत्या सिद्धयाकाङ्क्षणतत्पराः ॥१७७॥
अर्थ: जिनेन्द्र प्रतिपादित शीलके अठारह लाख भेदोंसे सहित हैं, तपरूपी विभूतिसे अत्यन्त सम्पन्न हैं तथा मुक्तिकी इच्छा करनेमें सदा तत्पर रहते हैं ॥१७७॥
जिनोदितार्थसंसक्ता विदितापरशासनाः । श्रुतसागरपारस्था मुनयो यमधारिणः ॥१७८॥
अर्थ: ये मुनि जिनेन्द्रनिरूपित पदार्थोंमें लीन रहते हैं, अन्य धर्मोंके भी अच्छे जानकार होते हैं, श्रुतरूपी सागरके पारगामी और यमके धारी होते हैं ॥१७८॥
नियमानां विधातारः समुन्नद्धतयोज्झिताः । नानालब्धिकृतासंगा महामङ्गलमूर्तयः ॥१७९॥
अर्थ: ये मुनि अनेक नियमोंके करनेवाले, उद्दण्डतासे रहित, नाना ऋद्धियोंसे सम्पन्न और महामंगलमय शरीरके धारक होते हैं ॥१७९॥
एवंगुणाः समस्तस्य जगतः कृतमण्डनाः । श्रमणास्तनुकर्माणः प्रयान्त्युत्तमदेवताम् ॥१८०॥
अर्थ: इस तरह जो पूर्वोक्त गुणोंको धारण करनेवाले हैं, समस्त जगत्के आभरण हैं और जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं ऐसे मुनि उत्तम देव पदको प्राप्त होते हैं ॥१८०॥
द्वित्रैर्भवैश्च निःशेषं कलुषं ध्यानवह्निना । निर्दह्य प्रतिपद्यन्ते सुखं सिद्धसमाश्रितम् ॥१८१॥
अर्थ: तदनन्तर दो-तीन भवोंमें ध्यानाग्निके द्वारा समस्त कलुषताको जलाकर निर्वाण-सुखको प्राप्त कर लेते हैं ॥१८१॥
स्नेहपञ्जररुद्धानां गृहाश्रमनिवासिनाम् । धर्मोपायं प्रवक्ष्यामि शृणु द्वादशधा स्थितम् ॥१८२॥
अर्थ: अब स्नेहरूपी पिंजड़ेमें रुके हुए गृहस्थाश्रमवासी लोगोंका बारह प्रकारका धर्म कहता हूँ सो सुनो ॥१८२॥
व्रतान्यणूनि पञ्चैषां शिक्षा चोक्ता चतुर्विधा । गुणास्त्रयो यथाशक्तिनियमास्तु सहस्रशः ॥१८३॥
अर्थ: गृहस्थोंको पाँच अणुव्रत, चार शिक्षाव्रत, तीन गुणव्रत और यथाशक्ति हजारों नियम धारण करने पड़ते हैं ॥१८३॥
प्राणातिपाततः स्थूलाद्विरतिर्वितथात्तथा । ग्रहणात्परवित्तस्य परदारसमागमात् ॥१८४॥
अनन्तायाश्च गर्द्धायाः पञ्चसंख्यमिदं व्रतम् । भावना चेयमेतेषां कथिता जिनपुङ्गवैः ॥१८५॥
अर्थ: स्थूल हिंसा, स्थूल झूठ, स्थूल परद्रव्यग्रहण, परस्त्री समागम और अनन्ततृष्णासे विरत होना ये गृहस्थोंके पाँच अणुव्रत कहलाते हैं। इन व्रतोंकी रक्षाके लिए जिनेन्द्रदेवने निम्नांकित भावनाका निरूपण किया है ॥१८४-१८५॥
इष्टो यथात्मनो देहः सर्वेषां प्राणिनां तथा । एवं ज्ञात्वा सदा कार्या देया सर्वासुधारिणाम् ॥१८६॥
अर्थ: जिस प्रकार मुझे अपना शरीर इष्ट है उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको भी अपना-अपना शरीर इष्ट होता है ऐसा जानकर गृहस्थको सब प्राणियोंपर दया करनी चाहिए ॥१८६॥
एषैव हि पराकाष्ठा धर्मस्योक्ता जिनाधिपैः । दयारहितचित्तानां धर्मः स्वल्पोऽपि नेष्यते ॥१८७॥
अर्थ: जिनेन्द्रदेवने दयाको ही धर्मकी परम सीमा बतलायी है। यथार्थमें जिनके चित्त दयारहित हैं उनके थोड़ा भी धर्म नहीं होता है ॥१८७॥
वचनं परपीडायां हेतुत्वं यत्प्रपद्यते । अलीकमेव तत्प्रोक्तं सत्यमस्माद्विपर्यये ॥१८८॥
अर्थ: जो वचन दूसरोंको पीड़ा पहुँचानेमें निमित्त है वह असत्य ही कहा गया है, क्योंकि सत्य इससे विपरीत होता है ॥१८८॥
वधादि कुरुते जन्मन्यस्मिंस्तेयमनुष्ठितम् । कर्तुः परत्र दुःखानि विविधानि कुयोनिषु ॥१८९॥
अर्थ: की गयी चोरी इस जन्ममें वध, बन्धन आदि कराती है और मरनेके बाद कुयोनियोंमें नाना प्रकारके दुःख देती है ॥१८९॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मतिमान् वर्जयेन्नरः । लोकद्वयविरोधस्य निमित्तं क्रियते कथम् ॥१९०॥
अर्थ: इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिए कि वह चोरीका सर्व प्रकारसे त्याग करे । जो कार्य दोनों लोकोंमें विरोधका कारण है वह किया ही कैसे जा सकता है ? ॥१९०॥
परिवर्ज्या भुजङ्गीव वनिता न्यस्य दूरतः । सा हि लोभवशा पापा पुरुषस्य विनाशिका ॥१९१॥
अर्थ: परस्त्रीका सर्पिणीके समान दूरसे ही त्याग करना चाहिए क्योंकि वह पापिनी लोभके वशीभूत हो पुरुषका नाश कर देती है ॥१९१॥
यथा च जायते दुःखं रुद्धायामात्मयोषिति । नरान्तरेण सर्वेषामियमेव व्यवस्थितिः ॥१९२॥
अर्थ: जिस प्रकार अपनी स्त्रीको कोई दूसरा मनुष्य छेड़ता है और उससे अपने आपको दुःख होता है उसी प्रकार सभीकी यह व्यवस्था जाननी चाहिए ॥१९२॥
उदारश्च तिरस्कारः प्राप्यतेऽत्रैव जन्मनि । तिर्यङ्नरकयोर्दुःखं प्राप्यमेवातिदुस्सहम् ॥१९३॥
अर्थ: परस्त्री सेवन करनेवाले मनुष्यको इसी जन्ममें बहुत भारी तिरस्कार प्राप्त होता है और मरनेपर तिर्यंच तथा नरकगतिके अत्यन्त दुःसह दुःख प्राप्त करने ही पड़ते हैं ॥१९३॥
प्रमाणं कार्यमिच्छायाः सा हि दद्यान्निरङ्कुशा । महादुःखमिहाख्येयौ भद्रकाञ्चनसंज्ञकौ ॥१९४॥
अर्थ: अपनी इच्छाका सदा परिमाण करना चाहिए क्योंकि इच्छापर यदि अंकुश नहीं लगाया गया तो वह महादुःख देती है । इस विषयमें भद्र और कांचनका उदाहरण प्रसिद्ध है ॥१९४॥
विक्रेता वदरादीनां भद्रो दीनारमात्रकम् । द्रविणं प्रत्यजानीत दृष्ट्वातो वर्त्मनि च्युतम् ॥१९५॥
प्रसेवकमितोऽगृह्लाद्दीनारं तु कुतूहली । तत्र काञ्चननामा तु सर्वमेव प्रसेवकम् ॥१९६॥
दीनारस्वामिना राजा काञ्चनो वीक्ष्य नाशितः । स्वयमर्पितदीनारो भद्रस्तु परिपूजितः ॥१९७॥
अर्थ: वैर आदिको बेचनेवाला एक भद्र नामक पुरुष था । उसने प्रतिज्ञा की थी कि मैं एक दीनारका ही परिग्रह रखूँगा । एक बार उसे मार्गमें पड़ा हुआ बटुआ मिला । उस बटुएमें यद्यपि बहुत दीनारें रखी थीं पर भद्रने अपनी प्रतिज्ञाका ध्यान कर कुतूहलवश उनमें-से एक दीनार निकाल ली । शेष बटुआ वहीं छोड़ दिया । वह बटुआ कांचन नामक दूसरे पुरुषने देखा तो वह सबका सब उठा लिया । दीनारोंका स्वामी राजा था । जब उसने जाँच-पड़ताल की तो कांचनको मृत्युकी सजा दी गयी और भद्रने जो एक दीनार ली थी वह स्वयं ही जाकर राजाको वापस कर दी जिससे राजाने उसका सम्मान किया ॥१९५-१९७॥
विगमोऽनर्थदण्डेभ्यो दिग्विदिक्परिवर्जनम् । भोगोपभोगसंख्यानं त्रयमेतद्गुणव्रतम् ॥१९८॥
अर्थ: अनर्थदण्डोंका त्याग करना, दिशाओं और विदिशाओंमें आवागमनकी सीमा निर्धारित करना और भोगोपभोगका परिमाण करना ये तीन गुणव्रत हैं ॥१९८॥
सामायिकं प्रयत्नेन प्रोषधानशनं तथा । संविभागोऽतिथीनां च सल्लेखश्चायुषः क्षये ॥१९९॥
अर्थ: प्रयत्नपूर्वक सामायिक करना, प्रोषधोपवास धारण करना, अतिथिसंविभाग और आयुका क्षय उपस्थित होनेपर सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षाव्रत हैं ॥१९९॥
संकेतो न तिथौ यस्य कृतो यश्चापरिग्रहः । गृहमेति गुणैर्युक्तैः श्रमणः सोऽतिथिः स्मृतः ॥२००॥
अर्थ: जिसने अपने आगमनके विषयमें किसी तिथिका संकेत नहीं किया है, जो परिग्रहसे रहित है और सम्यग्दर्शनादि गुणोंसे युक्त होकर घर आता है ऐसा मुनि अतिथि कहलाता है ॥२००॥
संविभागोऽस्य कर्तव्यो यथाविभवमादरात् । विधिना लोभमुक्तेन भिक्षोपकरणादिभिः ॥२०१॥
अर्थ: ऐसे अतिथिके लिए अपने वैभवके अनुसार आदरपूर्वक लोभरहित हो भिक्षा तथा उपकरण आदि देना चाहिए यही अतिथिसंविभाग है ॥२०१॥
मधुनो मद्यतो मांसाद् द्यूततो रात्रिभोजनात् । वेश्यासंगमनाच्चास्य विरतिर्नियमः स्मृतः ॥२०२॥
अर्थ: इनके सिवाय गृहस्थ मधु, मद्य, मांस, जुआ, रात्रिभोजन और वेश्यासमागमसे जो विरक्त होता है उसे नियम कहा है ॥२०२॥
गृहधर्ममिमं कृत्वा समाधिप्राप्तपञ्चतः । प्रपद्यते सुदेवत्वं च्युत्वा च सुमनुष्यताम् ॥२०३॥
अर्थ: इस गृहस्थ धर्मका पालन कर जो समाधिपूर्वक मरण करता है, वह उत्तमदेव पर्यायको प्राप्त होता है और वहाँसे च्युत होकर उत्तम मनुष्यत्व प्राप्त करता है ॥२०३॥
भवानामेवमष्टानामन्तः कृत्वानुवर्तनम् । रत्नत्रयस्य निर्ग्रन्थो भूत्वा सिद्धिं समश्नुते ॥२०४॥
अर्थ: ऐसा जीव अधिकसे अधिक आठ भवोंमें रत्नत्रयका पालन कर अन्तमें निर्ग्रन्थ हो सिद्धिपदको प्राप्त होता है ॥२०४॥
नरत्वं दुर्लभं प्राप्य यथोक्ताचरणाक्षमः । श्रद्दधाति जिनोक्तं यः सोऽप्यासन्नशिवालयः ॥२०५॥
अर्थ: जो दुर्लभ मनुष्यपर्याय पाकर यथोक्त आचरण करनेमें असमर्थ है, केवल जिनेन्द्रदेवके द्वारा कथित आचरणकी श्रद्धा करता है वह भी निकट कालमें मोक्ष प्राप्त करता है ॥२०५॥
सम्यग्दर्शनलाभेन केवलेनापि मानवः । सर्वलाभवरिष्ठेन दुर्गतित्रासमुज्झति ॥२०६॥
अर्थ: जिसका लाभ सब लाभोंमें श्रेष्ठ है ऐसे केवल सम्यग्दर्शनके द्वारा भी मनुष्य दुर्गतिके भयसे छूट जाता है ॥२०६॥
कुरुते यो जिनेन्द्राणां नमस्कारं स्वभावतः । पुण्याधारः स पापस्य लवेनापि न युज्यते ॥२०७॥
अर्थ: जो स्वभावसे ही जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करता है वह पुण्यका आधार होता है तथा पापके अंशमात्रका भी उससे सम्बन्ध नहीं होता ॥२०७॥
यः स्मरत्यपि भावेन जिनांस्तस्याशुभं क्षयम् । सद्यः समस्तमायाति भवकोटिभिरर्जितम् ॥२०८॥
अर्थ: नमस्कार तो दूर रहा जो जिनेन्द्र देवका भावपूर्वक स्मरण भी करता है उसके करोड़ों भवोंके द्वारा संचित पाप कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥२०८॥
प्रशस्ताः सततं तस्य ग्रहाः स्वप्नाः शकुन्तयः । त्रैलोक्यसाररत्नं यो दधाति हृदये जिनम् ॥२०९॥
अर्थ: जो मनुष्य तीन लोकमें श्रेष्ठ रत्नस्वरूप जिनेन्द्र देवको हृदयमें धारण करता है उसके सब ग्रह, स्वप्न और शकुनकी सूचना देनेवाले पक्षी सदा शुभ ही रहते हैं ॥२०९॥
अर्हते नम इत्येतत्प्रयुङ्क्ते यो वचो जनः । भावात्तस्याचिरात् कृत्स्नकर्ममुक्तिरसंशया ॥२१०॥
अर्थ: जो मनुष्य ‘अर्हते नमः’ अर्हन्तके लिए नमस्कार हो, इस वचनका भावपूर्वक उच्चारण करता है उसके समस्त कर्म शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२१०॥
जिनचन्द्रकथारश्मिसंगमादेति फुल्लताम् । सिद्धियोग्यासुमत्स्वान्तःकुमुदं परमामलम् ॥२११॥
अर्थ: जिनेन्द्र चन्द्रकी कथारूपी किरणोंके समागमसे भव्य जीवका निर्मल हृदयरूपी कुमुद शीघ्र ही प्रफुल्ल अवस्थाको प्राप्त होता है ॥२११॥
अर्हत्सिद्धमुनिभ्यो यो नमस्यां कुरुते जनः । स परीतभवो ज्ञेयः सुशासनजनप्रियः ॥२१२॥
अर्थ: जो मनुष्य अर्हन्त सिद्ध और मुनियोंके लिए नमस्कार करता है वह जिनशासनके भक्त जनोंसे स्नेह रखनेवाला अतीतसंसार है अर्थात् शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करनेवाला है ऐसा जानना चाहिए ॥२१२॥
जिनबिम्बं जिनाकारं जिनपूजां जिनस्तुतिम् । यः करोति जनस्तस्य न किंचिद् दुर्लभं भवेत् ॥२१३॥
अर्थ: जो पुरुष जिनेन्द्र देवकी प्रतिमा बनवाता है, जिनेन्द्र देवका आकार लिखवाता है, जिनेन्द्र देवकी पूजा करता है अथवा जिनेन्द्रदेवकी स्तुति करता है उसके लिए संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं होता ॥२१३॥
नरनाथः कुटुम्बी वा धनाढ्यो दुर्विधोऽथवा । जनो धर्मेण यो युक्तः स पूज्यः सर्वविष्टपे ॥२१४॥
अर्थ: यह मनुष्य चाहे राजा हो चाहे साधारण कुटुम्बी, धनाढ्य हो चाहे दरिद्र, जो भी धर्मसे युक्त होता है वह समस्त संसारमें पूज्य होता है ॥२१४॥
महाविनयसंपन्नाः कृत्याकृत्यविचक्षणाः । जनाः गृहाश्रमस्थानां प्रधाना धर्मसंगमात् ॥२१५॥
अर्थ: जो महाविनयसे सम्पन्न तथा कार्य और अकार्यके विचारमें निपुण हैं वे धर्मके समागमसे गृहस्थोंमें प्रधान होते हैं ॥२१५॥
मधुमांससुरादीनामुपयोगं न कुर्वते । ये जनास्ते गृहस्थानां ललामत्वे प्रतिष्ठिताः ॥२१६॥
अर्थ: जो मनुष्य मधु, मांस और मदिरा आदिका उपयोग नहीं करते हैं वे गृहस्थोंके आभूषण पद पदपर स्थित हैं अर्थात् गृहस्थोंके आभूषण हैं ॥२१६॥
शङ्कया काङ्क्षया युक्ता तथा ये विचिकित्सया । सुदूररहितात्मानः परदृष्टिप्रशंसया ॥२१७॥
अन्यशासनसंबद्धसंस्तवेन विवर्जिताः । जन्तवस्ते गृहस्थानां प्रधानपदमाश्रिताः ॥२१८॥
अर्थ: जो शंका, कांक्षा और विचिकित्सासे रहित हैं, जिनकी आत्मा अन्यदृष्टियोंकी प्रशंसासे दूर है और जो अन्य शासन सम्बन्धी स्तवनसे वर्जित हैं वे गृहस्थोंमें प्रधान पदको प्राप्त हैं ॥२१७-२१८॥
सुचारुवसनोऽत्यन्तसुरभिः प्रियदर्शनः । शस्यमानः पुरस्त्रीभिर्याति यो वन्दितुं जिनम् ॥२१९॥
ईक्षमाणो महीं मुक्तविकारश्चारुभावनः । साधुकृत्यसमुद्युक्तः पुण्यं तस्यान्तवर्जितम् ॥२२०॥
अर्थ: जो उत्तम वस्त्रका धारक है, जिसके शरीरसे सुगन्धि निकल रही है, जिसका दर्शन सबको प्रिय लगता है, नगरकी स्त्रियाँ जिसकी प्रशंसा कर रही हैं, जो पृथिवीको देखता हुआ चलता है, जिसने सब विकार छोड़ दिये हैं, जो उत्तम भावनासे युक्त है और अच्छे कार्योंके करनेमें तत्पर है ऐसा होता हुआ जो जिनेन्द्रदेवकी वन्दनाके लिए जाता है उसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है ॥२१९-२२०॥
तृणोपमं परद्रव्यं पश्यन्ति स्वसमं परम् । परयोषां समां मातुर्ये ते धन्यतमा जनाः ॥२२१॥
अर्थ: जो परद्रव्यको तृणके समान, परपुरुषको अपने समान और परस्त्रीको माताके समान देखते हैं वे धन्य हैं ॥२२१॥
प्रतिपद्य कदा दीक्षां विहरिष्यामि मेदिनीम् । क्षपयित्वा कदा कर्म प्रपत्स्ये सिद्धसंश्रयम् ॥२२२॥
एवं प्रतिदिनं यस्य ध्यानं विमलचेतसः । भीतानीव न कुर्वन्ति तेन कर्माणि संगतिम् ॥२२३॥
अर्थ: ‘मैं दीक्षा लेकर पृथिवीपर कब विहार करूँगा ? और कब कर्मोंको नष्ट कर सिद्धालयमें पहुँचूँगा’ जो निर्मल चित्तका धारी मनुष्य प्रतिदिन ऐसा विचार करता है कर्म भयभीत होकर ही मानो उसकी संगति नहीं करते ॥२२२-२२३॥
सप्ताष्टजन्मभिः केचित्सिद्धिं गच्छन्ति जन्तवः । केचिदुग्रतपः कृत्वा द्वित्रैरेव सुचेतसः ॥२२४॥
अर्थ: कोई-कोई गृहस्थ प्राणी, सात-आठ भवोंमें मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं और उत्तम हृदयको धारण करनेवाले कितने ही मनुष्य तीक्ष्ण तप कर दो-तीन भवमें ही मुक्त हो जाते हैं ॥२२४॥
क्षिप्रं यान्ति महानन्दं मध्यमा भव्यजन्तवः । असमर्थास्तु विश्रम्य मार्गस्य यदि वेदकाः ॥२२५॥
अर्थ: मध्यम भव्य प्राणी शीघ्र ही महान् आनन्द अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं पर जो असमर्थ हैं किन्तु मार्गको जानते हैं वे कुछ विश्राम करनेके बाद महाआनन्द प्राप्त कर पाते हैं ॥२२५॥
अह्नोऽपि योजनशतमविद्वान् वर्त्म यो जनः । भ्राम्यतीष्टमवाप्नोति स पदं न चिरादपि ॥२२६॥
अर्थ: जो मनुष्य मार्गको न जानकर दिनमें सौ-सौ योजन तक गमन करता है वह भटकता ही रहता है तथा चिरकाल तक भी इष्ट स्थानको नहीं प्राप्त कर सकता है ॥२२६॥
तथोग्रमपि कुर्वाणास्तपो वितथदर्शनाः । प्राप्नुवन्ति पदं नैव जन्ममृत्युविवर्जितम् ॥२२७॥
अर्थ: जिनका श्रद्धान मिथ्या है ऐसे लोग उग्र तपश्चरण करते हुए भी जन्म-मरणसे रहित पद नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥२२७॥
मोहान्धकारसंछन्ने कषायोरगसंकुले । ते भ्रमन्ति भवारण्ये नष्टमुक्तिपथा जनाः ॥२२८॥
अर्थ: जो मोक्षमार्ग अर्थात् रत्नत्रयसे भ्रष्ट हैं वे मोहरूपी अन्धकारसे आच्छादित तथा कषायरूपी सर्पोंसे व्याप्त संसाररूपी अटवीमें भटकते रहते हैं ॥२२८॥
न शीलं न च सम्यक्त्वं न त्यागः साधुगोचरः । यस्य तस्य भवाम्भोधितरणं जायते कथम् ॥२२९॥
अर्थ: जिसके न शील है, न सम्यक्त्व है और न उत्तम त्याग ही है उसका संसार-सागरसे सन्तरण किस प्रकार हो सकता है ? ॥२२९॥
विन्ध्यस्य स्रोतसा नागा यत्रोह्यन्ते नगोन्नताः । वराकाः शशकास्तत्र चिरं नीता विसंशयम् ॥२३०॥
अर्थ: विन्ध्याचलके जिस प्रवाहमें पहाड़के समान ऊँचे-ऊँचे हाथी बह जाते हैं उसमें बेचारे खरगोश तो निःसन्देह ही बह जाते हैं ॥२३०॥
मृत्युजन्मजरावर्तभवस्रोतो विवर्तिनः । कुतीर्थ्या यत्र नीयन्ते तद्भक्तेष्वत्र का कथा ॥२३१॥
अर्थ: जहाँ कुतीर्थका उपदेश देनेवाले कुगुरु भी जन्म-जरा-मृत्युरूपी आवर्तोंसे युक्त संसाररूपी प्रवाहमें चक्कर काटते हैं, वहाँ उनके भक्तोंकी कथा ही क्या है ? ॥२३१॥
यथा तारयितुं शक्ता न शिला सलिले शिलाम् । तथा परिग्रहासक्ताः कुतीर्थ्याः शरणागतान् ॥२३२॥
अर्थ: जिस प्रकार पानीमें पड़ी शिलाको शिला ही तारनेमें समर्थ नहीं है उसी प्रकार परिग्रही साधु शरणागत परिग्रही भक्तोंको तारनेमें समर्थ नहीं हैं ॥२३२॥
तपोनिर्दग्धपापा ये लघवस्तत्त्ववेदिनः । त एव तारणे शक्ता जनानामुपदेशतः ॥२३३॥
अर्थ: जो तपके द्वारा पापोंको जलाकर हलके हो गये हैं ऐसे तत्त्वज्ञ मनुष्य ही अपने उपदेशसे दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ॥२३३॥
संसारसागरे भीमे रत्नद्वीपोऽयमुत्तमः । यदेतन्मानुषं क्षेत्रं तद्धि दुःखेन लभ्यते ॥२३४॥
अर्थ: जो यह मनुष्य क्षेत्र है सो भयंकर संसार-सागरमें मानो उत्तम रत्नद्वीप है । इसकी प्राप्ति बड़े दुःखसे होती है ॥२३४॥
तस्मिन्नियमरत्नानि गृहीतव्यानि धीमता । अवश्यं देहमुत्सृज्य कर्तव्यो भवसंक्रमः ॥२३५॥
अर्थ: इस रत्नद्वीपमें आकर बुद्धिमान् मनुष्यको अवश्य ही नियमरूपी रत्न ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान शरीर छोड़कर पर्यायान्तरमें अवश्य ही जाना होगा ॥२३५॥
अतो यथात्र सूत्रार्थं कश्चित् संचूर्णयेन्मणीन् । विषयार्थं तथा धर्मरत्नानां चूर्णको जनः ॥२३६॥
अर्थ: इस संसारमें जो विषयोंके लिए धर्मरूपी रत्नोंका चूर्ण करता है वह वैसा ही है जैसा कि कोई सूत प्राप्त करनेके लिए मणियोंका चूर्ण करता है ॥२३६॥
अनित्यत्वं शरीरादेरभावं शरणस्य च । अशुचित्वं तथान्यत्वमात्मनो देहपञ्जरात् ॥२३७॥
एकत्वमथ संसारो लोकस्य च विचित्रता । आस्रवः संवरः पूर्वकर्मणां निर्जरा तथा ॥२३८॥
बोधिदुर्लभताधर्मस्वाख्यातत्वं जिनेश्वरैः । द्वादशैवमनुप्रेक्षाः कर्तव्या हृदये सदा ॥२३९॥
अर्थ: शरीरादि अनित्य है, कोई किसीका शरण नहीं है, शरीर अशुचि है, शरीररूपी पिंजड़ेसे आत्मा पृथक् है, यह अकेला ही सुख-दुःख भोगता है, संसारके स्वरूपका चिन्तवन करना, लोक की विचित्रताका विचार करना, आस्रवके दुर्गुणोंका ध्यान करना, संवरकी महिमाका चिन्तवन करना, पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जराका उपाय सोचना, बोधि अर्थात् रत्नत्रयकी दुर्लभताका विचार करना और धर्मका माहात्म्य सोचना - जिनेन्द्र भगवान्ने ये बारह भावनाएँ कही हैं सो इन्हें सदा हृदयमें धारण करना चाहिए ॥२३७-२३९॥
आत्मनः शक्तियोगेन धर्मं यो यादृशं भजेत् । स तस्य तादृशं भुङ्क्ते फलं देवादिभूमिषु ॥२४०॥
अर्थ: जो अपनी शक्तिके अनुसार जैसे धर्मका सेवन करता है वह देवादि गतियोंमें उसका वैसा ही फल भोगता है ॥२४०॥
एवं वदन्नसौ पृष्टो भानुकर्णेन केवली । सभेदं नियमं नाथ ज्ञातुमिच्छामि सांप्रतम् ॥२४१॥
अर्थ: इस प्रकार उपदेश देते हुए अनन्तबल केवलीसे भानुकर्णने पूछा कि हे नाथ ! मैं अब नियम तथा उसके भेदोंको जानना चाहता हूँ ॥२४१॥
ततो जगाद भगवान्भानुकर्णावधारय । नियमश्च तपश्चेति द्वयमेतन्न भिद्यते ॥२४२॥
अर्थ: इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा कि हे भानुकर्ण ! ध्यान देकर अवधारण करो । नियम और तप ये दो पदार्थ पृथक्-पृथक् नहीं हैं ॥२४२॥
तेन युक्तो जनः शक्त्या तपस्वीति निगद्यते । तत्र सर्वप्रयत्नेन मतिः कार्या सुमेधसा ॥२४३॥
अर्थ: जो मनुष्य नियमसे युक्त है वह शक्तिके अनुसार तपस्वी कहलाता है इसलिए बुद्धिमान् मनुष्यको सब प्रकारसे नियम अथवा तपमें प्रवृत्त रहना चाहिए ॥२४३॥
स्वल्पं स्वल्पमपि प्राज्ञैः कर्तव्यं सुकृतार्जनम् । पतद्भिर्बिन्दुभिर्जाता महानद्यः समुद्रगाः ॥२४४॥
अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्योंको थोड़ा-थोड़ा भी पुण्यका संचय करना चाहिए क्योंकि एक-एक बूँदके पड़नेसे समुद्र तक बहनेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ बन जाती हैं ॥२४४॥
अह्नो मुहूर्तमात्रं यः कुरुते भुक्तिवर्जनम् । फलं तस्योपवासेन समं मासेन जायते ॥२४५॥
अर्थ: जो दिनमें एक मुहूर्तके लिए भी भोजनका त्याग करता है उसे एक महीनेमें उपवासके समान फल प्राप्त होता है ॥२४५॥
तत्र स्वर्गे सहस्राणि समानां दश कीर्तितम् । भुञ्जानस्य जनस्योद्यद्भोगं चित्तोपपादितम् ॥२४६॥
अर्थ: संकल्प मात्रसे प्राप्त होनेवाले उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करते हुए इस जीवको कमसे कम दसहजार वर्ष तो लगते ही हैं ॥२४६॥
श्रद्दधानो मतं जैनं यः करोति पुरोदितम् । पल्यैस्तस्योपमानो यः कालः स्वर्गे महात्मनः ॥२४७॥
अर्थ: और जो जैनधर्मकी श्रद्धा करता हुआ पूर्वप्रतिपादित व्रतादि धारण करता है उस महात्माका स्वर्गमें कमसे कम एक पल्य प्रमाण काल बीतता है ॥२४७॥
च्युत्वा तत्र मनुष्यत्वे लभते भोगमुत्तमम् । यथोपवनया लब्धं तापसान्वयजातया ॥२४८॥
अर्थ: वहाँसे च्युत होकर वह मनुष्य गतिमें उस प्रकार उत्तम भोग प्राप्त करता है जिस प्रकार तापसवंशमें उत्पन्न हुई उपवनाने प्राप्त किये थे ॥२४८॥
दुःखिन्युपवनाऽबन्धुर्बदराद्युपजीविनी । आदरादीक्षिता राज्ञा मुहूर्तव्रतसंभवात् ॥२४९॥
कुमारी व्रतकस्यान्ते परया द्रव्यसंपदा । योजिता सुतरां जाता धर्मसंविग्नमानसा ॥२५०॥
अर्थ: एक उपवना नामकी दुःखिनी कन्या थी जो भाई-बन्धुओंसे रहित थी और बेर आदि खाकर अपनी जीविका करती थी । एक बार उसने मुहूर्त-भरके लिए आहारका त्याग किया । उस व्रतके प्रभावसे राजाने उसका बड़ा आदर किया तथा व्रतके अनन्तर उसे उत्कृष्ट धनसम्पदासे युक्त किया । इस घटनासे उसका मन धर्ममें अत्यन्त उत्साहित हो गया ॥२४९-२५०॥
जिनेन्द्रवचनं यस्तु कुरुतेऽन्तरवर्जितम् । अनन्तरमसौ सौख्यं परलोके गतोऽश्नुते ॥२५१॥
अर्थ: जो मनुष्य निरन्तर जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंका पालन करता है वह परलोकमें निर्बाध सुखका उपभोग करता है ॥२५१॥
मुहूर्तद्वितयं यस्तु न भुङ्क्ते प्रतिवासरम् । षष्ठोपवासिता तस्य जन्तोर्मासेन जायते ॥२५२॥
अर्थ: जो प्रतिदिन दो मुहूर्तके लिए आहारका त्याग करता है उसे महीनेमें दो उपवासका फल प्राप्त होता है ॥२५२॥
मुहूर्तत्रिंशतं कृत्वा काले यावति तावति । आहारवर्जनं जन्तुरुपवासफलं भजेत् ॥२५३॥
अर्थ: इस प्रकार जो एक-एक मुहूर्त बढ़ाता हुआ तीस मुहूर्त तकके लिए आहारका त्याग करता है उसे तीन-चार आदि उपवासोंका फल प्राप्त होता है ॥२५३॥
मुहूर्तयोजनं कार्यमेवमेवाष्टमादिषु । अधिकं तु फलं वाच्यं हेतुवृद्ध्यनुरूपतः ॥२५४॥
अर्थ: तेला आदि उपवासोंमें भी इसी तरह मुहूर्तकी योजना कर लेनी चाहिए । जो अधिक कालके लिए त्याग होता है उसका कारणके अनुसार अधिक फल कहना चाहिए ॥२५४॥
अवाप्यास्य फलं नाके नियमस्य शरीरिणः । मनुष्यतां समासाद्य जायन्तेऽद्भुतचेष्टिताः ॥२५५॥
अर्थ: प्राणी स्वर्गमें इस नियमका फल प्राप्त कर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ अद्भुत चेष्टाओंके धारक होते हैं ॥२५५॥
लावण्यपङ्कलिप्तानां हारिविभ्रमकारिणाम् । भवन्ति कुलदाराणां पतयो धर्मशेषतः ॥२५६॥
अर्थ: स्वर्गमें फल भोगनेसे जो पुण्य शेष बचता है उसके फलस्वरूप वे कुलवती स्त्रियोंके पति होते हैं । जिनका कि शरीर लावण्यरूपी पंकसे लिप्त रहता है तथा जो मनको हरण करनेवाले हाव-भाव विभ्रम किया करती हैं ॥२५६॥
स्त्रियोऽपि स्वर्गतश्च्युत्वा मनुष्यभवमागताः । महापुरुषसंसेव्या यान्ति लक्ष्मीसमानताम् ॥२५७॥
अर्थ: नियमवाली स्त्रियाँ भी स्वर्गसे चयकर मनुष्य भवमें आती हैं और महापुरुषोंके द्वारा सेवनीय होती हुई लक्ष्मीकी समानता प्राप्त करती हैं ॥२५७॥
आदित्येऽस्तमनुप्राप्ते कुरुते योऽन्नवर्जनम् । भवेदभ्युदयोऽस्यापि सम्यग्दृष्टेर्विशेषतः ॥२५८॥
अर्थ: जो सूर्यास्त होनेपर अन्नका त्याग करता है उस सम्यग्दृष्टिको भी विशेष अभ्युदयकी प्राप्ति होती है ॥२५८॥
अप्सरोमण्डलान्तःस्थो विमाने रत्नभासुरे । बहुपल्योपमं कालं धर्मेणानेन तिष्ठति ॥२५९॥
अर्थ: यह जीव इस धर्मके कारण रत्नोंसे जगमगाते विमानोंमें अप्सराओंके मध्यमें बैठकर अनेक पल्योपमकाल व्यतीत करता है ॥२५९॥
मनुष्यत्वं समासाद्य दुर्लभं तत्परायणैः । महेशानस्य कर्तव्यं जिनस्य समुपासनम् ॥२६०॥
अर्थ: इसलिए दुर्लभ मनुष्य पर्याय पाकर धर्ममें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको महाप्रभु श्रीजिनेन्द्र देवकी उपासना करनी चाहिए ॥२६०॥
यस्य काञ्चननिर्माणा योजनं जायते मही । आसने जायते देवतिर्यग्मानुषसेविता ॥२६१॥
अर्थ: जिनके आसनस्थ होनेपर देव, तिर्यंच और मनुष्योंसे सेवित एक योजनकी पृथ्वी स्वर्णमयी हो जाती है ॥२६१॥
प्रातिहार्याणि यस्याष्टौ चतुस्त्रिंशन्महाद्भुताः । सहस्रभास्कराकारं रूपं लोचनसौख्यदम् ॥२६२॥
अर्थ: जिनके आठ प्रातिहार्य और चौंतीस महाअतिशय प्रकट होते हैं। तथा जिनका रूप हजार सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं नेत्रोंको सुख देनेवाला होता है ॥२६२॥
भव्यः प्रणाममेतस्य यः करोति विचक्षणः । समुत्तरति कालेन स स्तोकेन भवार्णवम् ॥२६३॥
अर्थ: ऐसे महाप्रभु जिनेन्द्र भगवान्को जो बुद्धिमान् भव्य प्रणाम करता है वह थोड़े ही समयमें संसार-सागरसे पार हो जाता है ॥२६३॥
उपायमेतमुज्झित्वा शान्तिप्राप्तौ शरीरिणाम् । नान्यः कश्चिदुपायोऽस्ति तस्मात्सेव्यः स यत्नतः ॥२६४॥
अर्थ: जीवोंको शान्ति प्राप्त करनेके लिए यह उपाय छोड़कर और दूसरा कोई उपाय नहीं है इसलिए यत्नपूर्वक इसकी सेवा करनी चाहिए ॥२६४॥
मार्गा गोदण्डकाकाराः सन्त्यन्येऽपि सहस्रशः । कुतीर्थसंश्रिता येषु विमुह्यन्ति प्रमादिनः ॥२६५॥
अर्थ: इनके सिवाय कुतीर्थियोंसे सेवित गोदण्डकके समान जो अन्य हजारों मार्ग हैं उनमें प्रमादी जीव मोहित हो रहे हैं - यथार्थ मार्ग भूल रहे हैं ॥२६५॥
न सम्यक्करुणा तेषु मधुमांसादिसेवनात् । जैने तु कणिकाप्यस्ति न दोषस्य प्ररूपणे ॥२६६॥
अर्थ: उन मार्गाभासोंमें समीचीन दया तो नाममात्रको नहीं है क्योंकि मधु-मांसादिका सेवन खुलेआम होता है पर जिनेन्द्रदेवकी प्ररूपणामें दोष की कणिका भी दृष्टिगत नहीं होती ॥२६६॥
त्याज्यमेतत्परं लोके यत्प्रपीड्य दिवा क्षुधा । आत्मानं रजनीभुक्त्या गमयत्यर्जितं शुभम् ॥२६७॥
अर्थ: लोकमें यह कार्य तो बिलकुल ही त्यागने योग्य है कि दिनभर तो भूखसे अपनी आत्माको पीड़ा पहुँचाते हैं और रात्रिको भोजन कर संचित पुण्यको तत्काल नष्ट कर देते हैं ॥२६७॥
निशिभुक्तिरधर्मो यैर्धर्मत्वेन प्रकल्पितः । पापकर्मकठोराणां तेषां दुःखं प्रबोधनम् ॥२६८॥
अर्थ: रात्रिमें भोजन करना अधर्म है फिर भी इसे जिन लोगोंने धर्म मान रखा है, उनके हृदय पापकर्मसे अत्यन्त कठोर हैं उनका समझना कठिन है ॥२६८॥
दर्शनागोचरीभूते सूर्ये परमलालसः । भुङ्क्ते पापमना जन्तुर्दुर्गतिं नावबुध्यते ॥२६९॥
अर्थ: सूर्यके अदृश हो जानेपर जो लम्पटी-पापी मनुष्य भोजन करता है वह दुर्गतिको नहीं समझता ॥२६९॥
मक्षिकाकीटकेशादि भक्ष्यते पापजन्तुना । तमःपटलसंछन्नचक्षुषा पापबुद्धिना ॥२७०॥
अर्थ: जिसके नेत्र अन्धकारके पटलसे आच्छादित हैं और बुद्धि पापसे लिप्त है ऐसे पापी प्राणी रातके समय मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि हानिकारक पदार्थ खा जाते हैं ॥२७०॥
डाकिनीप्रेतभूतादिकुत्सितप्राणिभिः समम् । भुक्तं तेन भवेद्येन क्रियते रात्रिभोजनम् ॥२७१॥
अर्थ: जो रात्रिमें भोजन करता है वह डाकिनी, प्रेत, भूत आदि नीच प्राणियोंके साथ भोजन करता है ॥२७१॥
सारमेयाखुमार्जारप्रभृतिप्राणिभिः समम् । मांसाहारैर्भवेद्भुक्तं तेन यो निशि वल्भते ॥२७२॥
अर्थ: जो रात्रिमें भोजन करता है वह कुत्ते, चूहे, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवोंके साथ भोजन करता है ॥२७२॥
अथवा किं प्रपञ्चेन पुलाकेनेह भाष्यते । क्षपायामश्नता सर्वं भवेदशुचि भक्षितम् ॥२७३॥
अर्थ: अथवा अधिक कहनेसे क्या ? संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि जो रातमें भोजन करता है वह सब अपवित्र पदार्थ खाता है ॥२७३॥
विरोचनेऽस्तसंसर्गं गते ये भुञ्जते जनाः । ते मानुषतया बद्धाः पशवो गदिता बुधैः ॥२७४॥
अर्थ: सूर्यके अस्त हो जानेपर जो भोजन करते हैं उन्हें विद्वानोंने मनुष्यतासे बँधे हुए पशु कहा है ॥२७४॥
नक्तं दिवा च भुञ्जानो विमुखो जिनशासने । कथं सुखी परत्र स्यान्निर्व्रतो नियमोज्झितः ॥२७५॥
अर्थ: जो जिनशासनसे विमुख होकर रात-दिन चाहे जब खाता रहता है वह नियमरहित अव्रती मनुष्य परलोकमें सुखी कैसे हो सकता है ? ॥२७५॥
दयामुक्तो जिनेन्द्राणां पापः कुत्सामुदाहरन् । अन्यदेहं गतो जन्तुः पूतिगन्धमुखो भवेत् ॥२७६॥
अर्थ: जो पापी मनुष्य दयारहित होकर जिनेन्द्र देवको निन्दा करता है वह अन्य शरीरमें जाकर दुर्गन्धित मुखवाला होता है अर्थात् परभवमें उसके मुखसे दुर्गन्ध आती है ॥२७६॥
मांसं मद्यं निशाभुक्तिं स्तेयमन्यस्य योषितम् । सेवते यो जनस्तेन भवे जन्मद्वयं हतम् ॥२७७॥
अर्थ: जो मनुष्य मांस, मद्य, रात्रिभोजन, चोरी और परस्त्रीका सेवन करता है वह अपने दोनों भवोंको नष्ट करता है ॥२७७॥
ह्रस्वायुर्वित्तमुक्तश्च व्याधिपीडितविग्रहः । परत्र सुखहीनः स्यान्नक्तं यः प्रत्यवश्यति ॥२७८॥
अर्थ: जो मनुष्य रात्रिमें भोजन करता है वह पर-भवमें अल्पायु, निर्धन, रोगी और सुखरहित अर्थात् दुःखी होता है ॥२७८॥
प्राप्नोति जन्ममृत्युं च दीर्घकालमनन्तरम् । पच्यते गर्भवासेषु दुःखेन निशि भोजनात् ॥२७९॥
अर्थ: रात्रिमें भोजन करनेसे यह जीव दीर्घ काल तक निरन्तर जन्म-मरण प्राप्त करता रहता है और गर्भवासमें दुःखसे पकता रहता है ॥२७९॥
वराहवृकमार्जारहंसकाकादियोनिषु । जायते सुचिरं कालं रात्रिभोजी कुदर्शनः ॥२८०॥
अर्थ: रात्रिमें भोजन करनेवाला मिथ्यादृष्टि पुरुष शूकर, भेड़िया, बिलाव, हंस तथा कौआ आदि योनियोंमें दीर्घ काल तक उत्पन्न होता रहता है ॥२८०॥
उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योः सहस्राणि कुयोनिषु । आपनीपद्यते दुःखं कुधीर्यो निशि वल्भते ॥२८१॥
अर्थ: जो दुर्बुद्धि रात्रिमें भोजन करता है वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक कुयोनियोंमें दुःख उठाता रहता है ॥२८१॥
अवाप्य यो मतं जैनं नियमेष्ववतिष्ठते । अशेषं किल्बिषं दग्ध्वा सुस्थानं सोऽधिगच्छति ॥२८२॥
अर्थ: जो जैन धर्म पाकर उसके नियमोंमें अटल रहता है वह समस्त पापोंको जलाकर उत्तम स्थानको प्राप्त होता है ॥२८२॥
रत्नत्रितयसंपूर्णा अणुव्रतपरायणाः । तरणावुदिते भव्या भुञ्जते दोषवर्जितम् ॥२८३॥
अर्थ: रत्नत्रयके धारक तथा अणुव्रतोंका पालन करनेमें तत्पर भव्य जीव सूर्योदय होनेपर ही निर्दोष आहार ग्रहण करते हैं ॥२८३॥
अपापास्तेऽधिगच्छन्ति विमानेशास्त्रिविष्टपाः । परं भोगं न ये रात्रौ भुञ्जते करुणा पराः ॥२८४॥
अर्थ: जो दयालु मनुष्य रात्रिमें भोजन नहीं करते वे पापहीन मनुष्य स्वर्गमें विमानोंके अधिपति होकर उत्कृष्ट भोग प्राप्त करते हैं ॥२८४॥
ततश्च्युत्वा मनुष्यत्वं प्राप्य निन्दाविवर्जितम् । भुञ्जते चक्रवर्त्यादिविभवोपहृतं सुखम् ॥२८५॥
अर्थ: वहाँसे च्युत होकर तथा उत्तम मनुष्य पर्याय पाकर चक्रवर्ती आदिके विभवसे प्राप्त होनेवाले सुखका उपभोग करते हैं ॥२८५॥
सौधर्मादिषु कल्पेषु मानसानीतकारणम् । प्राप्नुवन्ति परं भोगं सिद्धिं च शुभचेष्टिताः ॥२८६॥
अर्थ: शुभ चेष्टाओंके धारक पुरुष सौधर्मादि स्वर्गोंमें मनमें विचार आते ही उपस्थित होनेवाले उत्कृष्ट भोगों तथा अणिमा-महिमा आदि आठ सिद्धियों-को प्राप्त होते हैं ॥२८६॥
जगद्धिता महामात्या राजानः पीठमर्दिनः । संमताः सर्वलोकस्य भवन्ति दिनभोजनात् ॥२८७॥
अर्थ: दिनमें भोजन करनेसे मनुष्य जगत्का हित करनेवाले महामन्त्री, राजा, पीठमर्द तथा सर्व लोकप्रिय व्यक्ति होते हैं ॥२८७॥
धनवन्तो गुणोदाराः सुरूपा दीर्घजीविताः । जिनबोधिसमायुक्ताः प्रधानपदसंस्थिताः ॥२८८॥
अर्थ: धनवान्, गुणवान्, रूपवान्, दीर्घायुष्क, रत्नत्रयसे युक्त तथा प्रधान पदपर आसीन व्यक्ति भी दिनमें भोजन करने से ही होते हैं ॥२८८॥
असह्यतेजसः संख्ये पुरादीनामधीश्वराः । विचित्रवाहनोपेताः सामन्तकृतपूजनाः ॥२८९॥
अर्थ: जिनका तेज युद्धमें असह्य है, जो नगर आदिके अधिपति हैं, विचित्र वाहनोंसे सहित हैं तथा सामन्तगण जिनका सत्कार करते हैं ऐसे पुरुष भी दिनमें भोजन करनेसे ही होते हैं ॥२८९॥
भवनेशाः सुरेशाश्च चक्राङ्कविभवाश्रिताः । महालक्षणसंपन्ना भवन्ति दिनभोजनात् ॥२९०॥
अर्थ: इतना ही नहीं, भवनेन्द्र, देवेन्द्र, चक्रवर्ती और महालक्षणोंसे सम्पन्न व्यक्ति भी दिनमें भोजन करने से ही होते हैं ॥२९०॥
आदित्यवत्प्रभावन्तश्चन्द्रवत्सौम्यदर्शनाः । अनस्तमितभोगाढ्यास्ते येऽनस्तमितोद्यताः ॥२९१॥
अर्थ: जो रात्रिभोजनत्यागव्रतमें उद्यत रहते हैं वे सूर्यके समान प्रभावान्, चन्द्रमाके समान सौम्य और स्थायी भोगोंसे युक्त होते हैं ॥२९१॥
अनाथा दुर्भगा मातृपितृभ्रातृविवर्जिताः । शोकदारिद्र्यसंपूर्णाः स्त्रियः स्युर्निशि भोजनात् ॥२९२॥
अर्थ: रात्रिमें भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ, दुर्भाग्यशाली, मातापिता भाईसे रहित तथा शोक और दारिद्र्यसे युक्त होती हैं ॥२९२॥
रूक्षस्फुटितहस्तादिस्वाङ्गाश्चिपिटनासिकाः । बीभत्सदर्शनाः क्लिन्नचक्षुषो दुष्टलक्षणाः ॥२९३॥
दुर्गन्धविग्रहा मग्नसुमहादशनच्छदाः । उत्वणश्रुतयः पिङ्गस्फुटिताग्रशिरोरुहाः ॥२९४॥
अलाबूबीजसंस्थानदशनाः शुक्लविग्रहाः । काणकुण्ठगतच्छाया विवर्णाः परुषत्वचः ॥२९५॥
अनेकरोगसंपूर्णमलिनाश्छिद्रवाससः । .कुत्सिताशनजीविन्यः परकर्मसमाश्रिताः ॥२९६॥
अर्थ: जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़से युक्त हैं, जो अनेक दुष्टलक्षणोंसे सहित हैं, । जिनके शरीरसे दुर्गन्ध आती रहती है, जिनके ओठ फटे और मोटे हैं, कान खड़े हैं, शिरके बाल पीले तथा चटके हैं, दाँत तूँबड़ीके बीजके समान हैं और शरीर सफेद है, जो कानी, शिथिल तथा कान्तिहीन हैं, रूपरहित हैं, जिनका चर्म कठोर है । जो अनेक रोगोंसे युक्त तथा मलिन हैं, जिनके वस्त्र फटे हैं, जो गन्दा भोजन खाकर जीवित रहती हैं, और जिन्हें दूसरेकी नौकरी करनी पड़ती है, ऐसी स्त्रियाँ रात्रि भोजनके ही पापसे होती हैं ॥२९३-२९६॥
उत्कृत्तश्रवणं विग्रं धनबन्धुविवर्जितम् । प्राप्नुवन्ति पतिं नार्यो रात्रिभोजनतत्पराः ॥२९७॥
अर्थ: रात्रिभोजनमें तत्पर रहनेवाली स्त्रियाँ बूचे नकटे और धन तथा भाई-बन्धुओंसे रहित पतिको प्राप्त होती हैं ॥२९७॥
दुःखभारसमाक्रान्ता बालवैधव्यसंगताः । अम्बुकाष्ठादिवाहिन्यो दुःपूरोदरतत्पराः ॥२९८॥
सर्वलोकपराभूता वाग्वासीनष्टचेतसः । अङ्कव्रणशताधारा भवन्ति निशि भोजनात् ॥२९९॥
अर्थ: जो दुःखके भारसे निरन्तर आक्रान्त रहती हैं, बाल अवस्थामें ही विधवा हो जाती हैं, पानी, लकड़ी आदि ढो-ढो कर पेट भरती हैं, अपना पेट बड़ी कठिनाईसे भर पाती हैं, सब लोग जिनका तिरस्कार करते हैं, जिनका चित्त वचन रूपी बसूलासे नष्ट होता रहता है और जिनके शरीरमें सैकड़ों घाव लगे रहते हैं, ऐसी स्त्रियाँ रात्रि भोजनके कारण ही होती हैं ॥२९८-२९९॥
उपशान्ताशया यास्तु नार्यः शीलसमन्विताः । साधुवर्गहिता रात्रिभोजनाद्विरतात्मिकाः ॥३००॥
लभन्ते ता यथाभीष्टं भोगं स्वर्गे समावृताः । परिवारेण मूर्धस्थपाणिना शासनैषिणा ॥३०१॥
अर्थ: जो स्त्रियाँ शान्त चित्त, शील सहित, मुनिजनोंका हित करनेवाली और रात्रि भोजनसे विरत रहती हैं वे स्वर्गमें यथेच्छ भोग प्राप्त करती हैं । शिरपर हाथ रखकर आज्ञाकी प्रतीक्षा करनेवाले परिवारके लोग उन्हें सदा घेरे रहते हैं ॥३००-३०१॥
ततश्च्युताः स्फुरन्त्युच्चैः कुले विभवधारिणि । शुभलक्षणसंपूर्णा गुणैः सर्वैः समन्विताः ॥३०२॥
अर्थ: स्वर्गसे च्युत होकर वे वैभवशाली उच्च कुलमें उत्पन्न होती हैं, शुभ लक्षणोंसे युक्त तथा समस्त गुणोंसे सहित होती हैं ॥३०२॥
कलाविशारदा नेत्रमानसस्नेहविग्रहाः । विमुञ्चन्त्योऽमृतं वाचा ह्लादयन्त्योऽखिलं जनम् ॥३०३॥
अर्थ: अनेक कलाओंमें निपुण रहती हैं, उनके शरीर नेत्र और मनमें स्नेह उत्पन्न करनेवाले होते हैं, अपने वचनोंसे मानो वे अमृत छोड़ती हैं, समस्त लोगोंको आनन्दित करती हैं ॥३०३॥
भवन्त्युत्कण्ठया युक्तास्तासु विद्याधराधिपाः । हरयो बलदेवाश्च तथा चक्राङ्कितश्रियः ॥३०४॥
अर्थ: विद्याधरोंके अधिपति, नारायण, बलदेव और चक्रवर्ती भी उनमें उत्कण्ठित रहते हैं - उन्हें प्राप्त करनेके लिए उत्सुक रहते हैं ॥३०४॥
विद्युद्रक्तोत्पलच्छायाः स्फुरल्ललितकुण्डलाः । नरेन्द्रकृतसंबन्धा भवन्ति दिनभोजनात् ॥३०५॥
अर्थ: जिनके शरीरकी कान्ति बिजली तथा लाल कमलके समान मनोहारी है, जिनके सुन्दर कुण्डल सदा हिलते रहते हैं, तथा राजाओंके साथ जिनके विवाह सम्बन्ध होते हैं ऐसी स्त्रियाँ दिनमें भोजन करनेसे ही होती हैं ॥३०५॥
अन्नं यथेप्सितं तासां जायते भृत्यकल्पितम् । निशासु या न कुर्वन्ति भोजनं करुणापराः ॥३०६॥
अर्थ: जो दयावती स्त्रियाँ रात्रिमें भोजन नहीं करती हैं उन्हें सदा भृत्यजनोंके द्वारा तैयार किया हुआ मनचाहा भोजन प्राप्त होता है ॥३०६॥
श्रीकान्तासुप्रभातुल्याः सुभद्रासदृशस्तथा । लक्ष्मीसमत्विषो योषा भवन्ति दिनभोजनात् ॥३०७॥
अर्थ: दिनमें भोजन करनेसे स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा, सुभद्रा और लक्ष्मीके समान कान्ति-युक्त होती हैं ॥३०७॥
तस्मान्नरेण नार्या वा नियमस्थेन चेतसा । वर्जनीया निशाभुक्तिरनेकापायसंगता ॥३०८॥
अर्थ: इसलिए नर हो चाहे नारी, दोनोंको अपना चित्त नियममें स्थिरकर अनेक दुःखोंसे सहित जो रात्रि भोजन है उसका त्याग करना चाहिए ॥३०८॥
अत्यल्पेन प्रयासेन शर्मैवमुपलभ्यते । ततो भजत तं नित्यं स्वसुखं को न वाञ्छति ॥३०९॥
अर्थ: इस प्रकार थोड़े ही प्रयाससे जब सुख मिलता है तो उस प्रयासका निरन्तर सेवन करो । ऐसा कौन है जो अपने लिए सुखकी इच्छा न करता हो ॥३०९॥
धर्मो मूलं सुखोत्पत्तेरधर्मो दुःखकारणम् । इति ज्ञात्वा भजेद्धर्ममधर्मं च विवर्जयेत् ॥३१०॥
अर्थ: ‘धर्म सुखोत्पत्तिका कारण है और अधर्म दुःखोत्पत्तिका’ ऐसा जानकर धर्मकी सेवा करनी चाहिए और अधर्मका परित्याग ॥३१०॥
आगोपालाङ्गनं लोके प्रसिद्धिमिदमागतम् । यथा धर्मेण शर्मेति विपरीतेन दुःखितम् ॥३११॥
अर्थ: यह बात गोपालकों तकमें प्रसिद्ध है कि धर्मसे सुख होता है और अधर्मसे दुःख ॥३११॥
धर्मस्य पश्य माहात्म्यं येन नाकच्युता नराः । उत्पद्यन्ते महाभोगा मनुष्यत्वे मनोहराः ॥३१२॥
अर्थ: धर्मका माहात्म्य देखो कि जिसके प्रभावसे प्राणी स्वर्गसे च्युत होकर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और वहाँ महाभोगोंसे युक्त तथा मनोहर शरीरके धारक होते हैं ॥३१२॥
जलस्थलसमुद्भूतरत्नानां ते समाश्रयाः । औदासीन्यमपि प्राप्ता भवन्ति सुखिनः सदा ॥३१३॥
अर्थ: वे जल तथा स्थलमें उत्पन्न हुए रत्नोंके आधार होते हैं और उदासीन होनेपर भी सदा सुखी रहते हैं ॥३१३॥
सुवर्णवस्त्रसस्यादिभाण्डागाराणि मानवैः । रक्ष्यन्ते सततं तेषां विचित्रायुधपाणिभिः ॥३१४॥
अर्थ: ऐसे मनुष्योंके स्वर्ण, वस्त्र तथा धान आदिके भाण्डारोंकी रक्षा हाथोंमें विविध प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले लोग किया करते हैं ॥३१४॥
प्रभूतं गोमहिष्यादिवारणास्तुरगा रथाः । भृत्या जनपदा ग्रामाः प्रासादा नगराणि च ॥३१५॥
दासवर्गो विशाला श्रीर्विष्टरं हरिभिर्धृतम् । मानसस्येन्द्रियाणां च विषयाहरणक्षमाः ॥३१६॥
हंसीविभ्रमगामिन्यो घनलावण्यविग्रहाः । माधुर्ययुक्तनिस्वानाः पीनस्तन्यः सुलक्षणाः ॥३१७॥
चक्षुषां वागुरातुल्यास्तरुण्यो हारिचेष्टिताः । नानालंकारधारिण्यो दास्यः पुण्यफलात्मिकाः ॥३१८॥
अर्थ: उन्हें अत्यधिक गाय, भैंस आदि पशु, हाथी, घोड़े, रथ, पयादे, देश, ग्राम, महल, नौकरोंके समूह, विशाल लक्ष्मी और सिंहासन प्राप्त होते हैं । साथ ही जो मन और इन्द्रियोंके विषय उत्पन्न करनेमें समर्थ हैं, जिनकी चाल हंसीके समान विलास पूर्ण है, जिनका शरीर अत्यधिक सौन्दर्यसे युक्त है, जिनकी आवाज मीठी है, जिनके स्तन स्थूल हैं, जो अनेक शुभ लक्षणोंसे युक्त हैं, जो नेत्रोंको पराधीन करनेके लिए जालके समान हैं, तथा जिनकी चेष्टाएँ मनोहर हैं ऐसी अनेक तरुण स्त्रियाँ और नाना अलंकार धारण करनेवाली दासियाँ पुण्यके फलस्वरूप प्राप्त होती हैं ॥३१५-३१८॥
उपायं केचिदज्ञात्वा धर्माख्यं सुखसंततेः । मूढा तस्य समारम्भे न यतन्तेऽसुधारिणः ॥३१९॥
अर्थ: कितने ही मूर्ख प्राणी ऐसे हैं कि जो सुख-समूहकी प्राप्तिका कारण धर्म है उसे जानते ही नहीं हैं अतः वे उसके साधनके लिए प्रयत्न ही नहीं करते ॥३१९॥
पापकर्मवशात्मानः केचिच्छ्रुत्वापि मानवाः । शर्मोपायं न सेवन्ते धर्मं दुष्कृततत्पराः ॥३२०॥
अर्थ: और जिनकी आत्मा पाप कर्मके वशीभूत है तथा जो पाप कर्मोंमें निरन्तर तत्पर रहते हैं ऐसे भी कितने ही लोग हैं कि जो धर्मको सुख प्राप्तिका साधन सुनकर भी उसका सेवन नहीं करते ॥३२०॥
उपशान्तिं गते केचित्सच्चेष्टारोधिकर्मणि । अभिगम्य गुरुं धर्मं पृच्छन्त्युद्यतचेतसः ॥३२१॥
अर्थ: उत्तम कार्योंके बाधक पापकर्मके उपशान्त हो जानेपर कुछ ही जीव ऐसे होते हैं कि जो उत्सुक चित्त हो गुरुके समीप जाकर धर्मका स्वरूप पूछते हैं ॥३२१॥
उपशान्तेरशुद्धस्य कर्मणस्तद्गुरोर्वचः । अर्थवज्जायते तेषु श्रेष्ठानुष्ठानकारिषु ॥३२२॥
अर्थ: तथा पाप कर्मके उपशान्त होनेसे यदि वे जीव उत्तम आचरण करने लगते हैं तो उनमें सद्गुरुके वचन सार्थक हो जाते हैं ॥३२२॥
इमं ये नियमं प्राज्ञाः कुर्वते मुक्तदुष्कृताः । एके भवन्ति ते नाके द्वितीया वा महागुणाः ॥३२३॥
अर्थ: जो बुद्धिमान् मनुष्य पापका परित्याग कर इस नियमका पालन करते हैं वे स्वर्गमें महागुणोंके धारक होते हुए प्रथम अथवा द्वितीय होते हैं ॥३२३॥
समयं येऽनगाराणां भुञ्जतेऽतीत्य भक्तितः । तेषां स्वर्गे सुखप्रेक्षामाकाङ्क्षन्ति सुराः सदा ॥३२४॥
अर्थ: जो मनुष्य भक्ति-पूर्वक मुनियोंके भोजन करनेका समय बिताकर बादमें भोजन करते हैं स्वर्गमें देव लोग सदा उन्हें सुखी देखनेकी इच्छा करते हैं ॥३२४॥
इन्द्रत्वं देवसङ्घानां ते प्रयान्ति सुतेजसः । जनाः सामानिकत्वं वा संपादितयथेप्सिताः ॥३२५॥
अर्थ: उत्तम तेजको धारण करने-वाले वे पुरुष देवोंके समूहके इन्द्र होते हैं अथवा मनचाहे भोग प्राप्त करनेवाले सामानिक पदको प्राप्त करते हैं ॥३२५॥
न्यग्रोधस्य यथा स्वल्पं बीजमुच्चैस्तरुर्भवेत् । तपोऽल्पमपि तद्वत्स्यान्महाभोगफलावहम् ॥३२६॥
अर्थ: जिस प्रकार वट वृक्षका छोटा-सा बीज आगे चलकर ऊँचा वृक्ष हो जाता है उसी प्रकार छोटा-सा तप भी आगे चलकर महाभोग रूपी फलको धारण करता है ॥३२६॥
समः कुबेरकान्तस्य नेत्रबन्धनविग्रहः । धर्मसक्तमतिर्नित्यं जायते पूर्वधर्मतः ॥३२७॥
अर्थ: जिसकी बुद्धि निरन्तर धर्ममें आसक्त रहती है ऐसा मनुष्य अपने पूर्वाचरित धर्मके प्रभावसे कुबेरकान्तके समान नेत्रोंको आकर्षित करनेवाले सुन्दर शरीरका धारक होता है ॥३२७॥
मुनिवेलाव्रतो दत्त्वा मुनेर्भिक्षां समागतः । रत्नवृष्टिं सहस्राख्यः कुबेरदयितोऽभवत् ॥३२८॥
अर्थ: एक सहस्रभट नामका पुरुष था । उसने मुनिवेलाव्रत धारण किया था अर्थात् मुनियोंके भोजन करनेका समय बीत जानेके बाद ही वह भोजन करता था । एक बार उसने मुनिके लिए आहार दिया । उसके प्रभावसे उसके घर रत्नवृष्टि हुई और वह मरकर परभवमें कुबेरकान्त सेठ हुआ ॥३२८॥
महीमण्डलविख्यातो नामोदारपराक्रमः । धनेन महता युक्तो भृत्यमण्डलमध्यगः ॥३२९॥
अर्थ: जो कि भूमण्डलमें प्रसिद्ध, उत्कृष्ट पराक्रमी, महाधनसे युक्त और सेवक समूहके मध्यमें स्थित रहनेवाला था ॥३२९॥
पौर्णमास्यां यथा चन्द्रः कान्तदर्शनविग्रहः । भुञ्जानः परमं भोगं सर्वशास्त्रार्थकोविदः ॥३३०॥
अर्थ: पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान उसका शरीर अत्यन्त सुन्दर था और वह उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेमें निपुण था ॥३३०॥
पूर्वधर्मानुभावेन परं निर्वेदमागतः । अमीयाय महादीक्षां जिनेन्द्रमुखनिर्गताम् ॥३३१॥
अर्थ: पूर्व धर्मके प्रभावसे ही उसने परम वैराग्यको प्राप्त हो जिनेन्द्र-प्रतिपादित दीक्षाको धारण किया था ॥३३१॥
अनगारमहर्षीणां वेलामर्चन्ति ये जनाः । भोगोत्सवं प्रपद्यन्ते परं ते हरिषेणवत् ॥३३२॥
अर्थ: जो मनुष्य अनगार महर्षियोंके कालकी प्रतीक्षा करते हैं वे हरिषेण चक्रवर्तीके समान उत्कृष्ट भोगोंको प्राप्त होते हैं ॥३३२॥
मुनिवेलाप्रतीक्ष्यत्वादुपार्ज्य सुकृतं महत् । हरिषेणः परिप्राप्तो लक्ष्मीमत्यन्तमुन्नताम् ॥३३३॥
अर्थ: हरिषेणने मुनिवेलामें मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा कर बहुत भारी पुण्यका संचय किया था इसलिए वह अत्यन्त उन्नत लक्ष्मीको प्राप्त हुआ था ॥३३३॥
मुनेरन्तिकमासाद्य समाधानप्रचोदिताः । एकभक्तं जना ये तु कुर्वते शुद्धदर्शनाः ॥३३४॥
एकभक्तेन ते कालं नीत्वा पञ्चत्वमागताः । उत्पद्यन्ते विमानेषु रत्नभाचक्रवर्तिषु ॥३३५॥
अर्थ: शुद्ध सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले जो मनुष्य ध्यानकी भावनासे प्रेरित हो मुनिके समीप जाकर एकभक्त करते हैं अर्थात् एक बार भोजन करनेका नियम लेते हैं और एक भक्तसे ही समय पूरा कर मृत्युको प्राप्त होते हैं वे रत्नोंकी कान्तिसे जगमगाते हुए विमानोंमें उत्पन्न होते हैं ॥३३४-३३५॥
नित्यालोकेषु ते तेषु विमानेषु सुचेतसः । रमन्ते सुचिरं कालमप्सरोमध्यवर्तिनः ॥३३६॥
अर्थ: शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले वे देव, निरन्तर प्रकाशित रहनेवाले उन विमानोंमें अप्सराओंके बीच बैठकर चिरकाल तक क्रीडा करते हैं ॥३३६॥
हारिणः कटकाधारप्रकोष्ठाः कटिसूत्रिणः । मौलिमन्तो भवन्त्येते छत्रचामरिणोऽमराः ॥३३७॥
अर्थ: जो उत्तम हार धारण किये हुए हैं, जिनकी कलाइयोंमें उत्तम कड़े सुशोभित हैं, जो कमरमें कटिसूत्र और शिरपर मुकुट धारण करते हैं, जिनके ऊपर छत्र फिरता है और पार्श्वमें चमर ढोले जाते हैं ऐसे देव, एक भक्त व्रतके प्रभावसे होते हैं ॥३३७॥
उत्तमव्रतसंसक्ता ये चाणुव्रतधारिणः । शरीरमध्रुवं ज्ञात्वा प्रशान्तहृदया जनाः ॥३३८॥
उपवासं चतुर्दश्यामष्टम्यां च सुमानसाः । सेवन्ते ते निबध्नन्ति चिरमायुस्त्रिविष्टपे ॥३३९॥
अर्थ: जो महाव्रत धारण करनेकी भावना रखते हुए वर्तमानमें अणुव्रत धारण करते हैं तथा शरीरको अनित्य समझकर जिनके हृदय अत्यन्त शान्त हो चुके हैं ऐसे जो मनुष्य हृदयपूर्वक अष्टमी और चतुर्दशीके दिन उपवास करते हैं वे स्वर्गकी दीर्घायुका बन्ध करते हैं ॥३३८-३३९॥
सौधर्मादिषु कल्पेषु यान्ति केचित्समुद्भवम् । अपरे त्वहमिन्द्रत्वं मुक्तिमन्ये विशुद्धितः ॥३४०॥
अर्थ: उनमेंसे कोई तो सौधर्मादि स्वर्गोंमें जन्म लेते हैं, कोई अहमिन्द्र पद प्राप्त करते हैं और कोई विशुद्धताके कारण मोक्ष जाते हैं ॥३४०॥
विनयेन परिष्वक्ता गुणशीलसमन्विताः । तपःसंयोजितस्वान्ता यान्ति नाकमसंशयम् ॥३४१॥
तत्र कामेन भुक्त्वासौ भोगान्प्राप्तो मनुष्यताम् । भुङ्क्ते राज्यं महज्जैनं मतं च प्रतिपद्यते ॥३४२॥
अर्थ: जो निरन्तर विनयसे युक्त रहते हैं, गुण और शीलव्रतसे सहित होते हैं तथा जिनका चित्त सदा तपमें लगा रहता है ऐसे मनुष्य निःसन्देह स्वर्ग जाते हैं वहाँ इच्छानुसार भोग भोगकर मनुष्य होते हैं, बड़े भारी राज्यका उपभोग करते हैं और जैनमतको प्राप्त होते हैं ॥३४१-३४२॥
जिनशासनमासाद्य स क्रमात्साधुचेष्टितः । सर्वकर्मविमुक्तानामालयं प्रतिपद्यते ॥३४३॥
अर्थ: जैनमतको पाकर क्रम-क्रमसे मुनियोंका चरित्र धारण करते हैं और उसके प्रभावसे सर्व कर्मरहित सिद्धोंका निकेतन प्राप्त कर लेते हैं ॥३४३॥
स्तुत्वा कालत्रये यस्तु नमस्यति जिनं त्रिधा । शैलराजवदक्षोभ्यः कुतीर्थमतवायुभिः ॥३४४॥
अर्थ: जो प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकाल इन तीनों कालोंमें मन, वचन, कायसे स्तुति कर जिन देवको नमस्कार करता है अर्थात् त्रिकाल वन्दनाका नियम लेता है वह सुमेरुपर्वतके समान मिथ्यामत रूपी वायुसे सदा अक्षोभ्य रहता है ॥३४४॥
गुणालङ्कारसंपन्नः सुशीलसुरभीकृतः । सर्वेन्द्रियहरं भोगं भजते त्रिदशालये ॥३४५॥
अर्थ: जो गुणरूपी अलंकारोंसे सुशोभित है तथा जिसका शरीर शीलव्रत रूपी चन्दनसे सुगन्धित है ऐसा वह पुरुष स्वर्गमें समस्त इन्द्रियोंको हरनेवाले भोग भोगता है ॥३४५॥
ततः कतिचिदावृत्तीः कृत्वा शुभगतिद्वये । प्रयाति परमं स्थानं सर्वकर्मविवर्जितः ॥३४६॥
अर्थ: तदनन्तर मनुष्य और देव इन दो शुभगतियोंमें कुछ आवागमन कर सर्वकर्मरहित हो परम धाम (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है ॥३४६॥
विषया हि समभ्यस्ताश्चिरं सकलजन्तुभिः । ततस्तैर्मोहिताः कर्तुं विरतिं विभवो न ते ॥३४७॥
अर्थ: चूँकि पंचेन्द्रियोंके विषय सब जीवोंके द्वारा चिरकालसे अभ्यस्त हैं इसलिए इनसे मोहित हुए प्राणी विरति (त्याग - आखड़ी) करनेके लिए समर्थ नहीं हो पाते हैं ॥३४७॥
इदं तत्र परं चित्रं ये तान् दृष्ट्वा विषान्नवत् । निर्वाणकारणं कर्म सेवन्ते पुरुषोत्तमाः ॥३४८॥
अर्थ: यहाँ बड़ा आश्चर्य तो यही है कि फिर भी उत्तम पुरुष उन विषयोंको विषमिश्रित अन्नके समान देखकर मोक्ष प्राप्तिके साधक कार्यका सेवन करते हैं ॥३४८॥
संसारे भ्रमतो जन्तोरेकापि विरतिः कृता । सम्यग्दर्शनयुक्तस्य मुक्तेरायाति बीजताम् ॥३४९॥
अर्थ: संसारमें भ्रमण करनेवाले सम्यग्दृष्टि जीवको यदि एक ही विरति (आखड़ी) प्राप्त हो जाती है तो वह मोक्षका बीज हो जाता है ॥३४९॥
एकोऽपि नास्ति येषां तु नियमः प्राणधारिणाम् । पशवस्तेऽथवा भग्नकुम्भा गुणविवर्जिताः ॥३५०॥
अर्थ: जिन प्राणियोंके एक भी नियम नहीं है वे पशु हैं अथवा रस्सीसे रहित (पक्षमें व्रतशील आदि गुणोंसे रहित) फूटे घड़ेके समान हैं ॥३५०॥
गुणव्रतसमृद्धेन नियमस्थेन जन्तुना । भाव्यं प्रमादयुक्तेन संसारतरणैषिणा ॥३५१॥
अर्थ: गुण और व्रतसे समृद्ध तथा नियमोंका पालन करनेवाला प्राणी यदि वह संसारसे पार होनेकी इच्छा रखता है तो उसे प्रमादरहित होना चाहिए ॥३५१॥
दुष्कर्म ये न मुञ्चन्ति मानवा मतिदुर्विधाः । भ्रमन्ति भवकान्तारं जात्यन्धा इव ते चिरम् ॥३५२॥
अर्थ: जो बुद्धिके दरिद्र मनुष्य दुष्कर्म - खोटे कार्य नहीं छोड़ते हैं वे जन्मान्ध मनुष्योंके समान चिरकाल तक संसाररूपी अटवीमें भटकते रहते हैं ॥३५२॥
ततस्तेऽनन्तवीर्येन्दुवाङ्मरीचिसमागमात् । प्रमोदं परमं प्राप्तास्तिर्यङ्मानवनाकजाः ॥३५३॥
अर्थ: तदनन्तर वहाँ जो भी तिर्यंच, मनुष्य और देव विद्यमान थे वे उन अनन्तबल केवली रूपी चन्द्रमाके वचन रूपी किरणोंके समागमसे परम हर्षको प्राप्त हुए ॥३५३॥
सम्यग्दर्शनमायाताः केचित्केचिदणुव्रतम् । महाव्रतधराः केचिज्जाता विक्रमशालिनः ॥३५४॥
अर्थ: उनमेंसे कोई तो सम्यग्दर्शनको प्राप्त हुए, कोई अणुव्रती हुए और कोई बलशाली महाव्रतोंके धारक हुए ॥३५४॥
अथ धर्मरथाख्येन मुनिनाभाषि रावणः । गृहाण नियमं भव्य कंचिदित्यात्मशक्तितः ॥३५५॥
अर्थ: अथानन्तर धर्मरथ नामक मुनिने रावणसे कहा कि हे भव्य ! अपनी शक्तिके अनुसार कोई नियम ले ॥३५५॥
द्वीपोऽयं धर्मरत्नानामेनगारमहेश्वरः । गृह्यतामेकमप्यस्माद्रत्नं नियमसंज्ञकम् ॥३५६॥
अर्थ: ये मुनिराज धर्मरूपी रत्नोंके द्वीप हैं सो इनसे अधिक नहीं तो कमसे कम एक ही नियम रूपी रत्न ग्रहण कर ॥३५६॥
किमर्थमेव मास्से त्वं चिन्ताभारवशीकृतः । महतां हि ननु त्यागो न मतेः खेदकारणम् ॥३५७॥
अर्थ: इस प्रकार चिन्ताके वशीभूत होकर क्यों बैठा है ? निश्चयसे त्याग महापुरुषोंकी बुद्धिके खेदका कारण नहीं है अर्थात् त्यागसे महापुरुषोंको खिन्नता नहीं होती प्रत्युत प्रसन्नता होती है ॥३५७॥
रत्नद्वीपं प्रविष्टस्य यथा भ्रमति मानसम् । इदं वृत्तं तथैवास्य परमाकुलतां गतम् ॥३५८॥
अर्थ: जिस प्रकार रत्नद्वीपमें प्रविष्ट हुए पुरुषका चित्त ‘यह लूँ या यह लूँ’ इस तरह चंचल होकर घूमता है उसी प्रकार इस चारित्र रूपी द्वीपमें प्रविष्ट हुए पुरुषका भी चित्त ‘यह नियम लूँ या यह नियम लूँ’ इस तरह परम आकुलताको प्राप्त हो घूमता रहता है ॥३५८॥
अथास्य मानसं चिन्ता समारूढेयमुत्कटा । भोगानुरक्तचित्तस्य व्याकुलत्वमुपेयुषः ॥३५९॥
अर्थ: अथानन्तर जिसका चित्त सदा भोगोंमें अनुरक्त रहता था और इसी कारण जो व्याकुलताको प्राप्त हो रहा था ऐसे रावणके मनमें यह भारी चिन्ता उत्पन्न हुई कि ॥३५९॥
स्वभावेनैव मे शुद्धमन्धो गन्धमनोहरम् । स्वादु वृष्यं परित्यक्तमांसादिमलसंगमम् ॥३६०॥
अर्थ: मेरा भोजन तो स्वभावसे ही शुद्ध है, सुगन्धित है, स्वादिष्ट है, गरिष्ट है और मांसादिके संसर्गसे रहित है ॥३६०॥
स्थूलप्राणिवधादिभ्यो विरतिं गृहवासिनाम् । एकामपि न शक्तोऽहं कर्तुं कान्यत्र संकथा ॥३६१॥
अर्थ: स्थूल हिंसा त्याग आदि जो गृहस्थोंके व्रत हैं उनमेंसे मैं एक भी व्रत धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ फिर अन्य व्रतोंकी चर्चा ही क्या है ? ॥३६१॥
मत्तेमसदृशं चेतस्तद्धावत्सर्ववस्तुषु । हस्तेनेवात्मभावेन धर्त्तुं न प्रभवाम्यहम् ॥३६२॥
अर्थ: मेरा मन मदोन्मत्त हाथीके समान सर्व वस्तुओंमें दौड़ता रहता है सो उसे मैं हाथके समान अपनी भावनासे रोकनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥३६२॥
हुताशनशिखा पेया बद्धव्यो वायुरंशुके । उत्क्षेप्तव्यो धराधीशो निर्ग्रन्थत्वमभीप्सता ॥३६३॥
अर्थ: जो निर्ग्रन्थ व्रत धारण करना चाहता है वह मानो अग्निकी शिखाको पीना चाहता है, वायुको वस्त्रमें बाँधना चाहता है, और सुमेरुको उठाना चाहता है ॥३६३॥
शूरोऽपि न समर्थोऽहं सेवितुं यत्तपोव्रतम् । अहो चित्रमिदं तद्ये धारयन्ति नरोत्तमाः ॥३६४॥
अर्थ: बड़ा आश्चर्य है कि मैं शूर वीर होकर भी जिस तप एवं व्रतको धारण करनेमें समर्थ नहीं हूँ उसी तप एवं व्रतको अन्य पुरुष धारण कर लेते हैं। यथार्थमें वे ही पुरुषोत्तम हैं ॥३६४॥
किमेकमाश्रयाम्येतं नियमं शोभनामपि । अवष्टम्भामि नानिच्छामन्ययोषां बलादिभिः ॥३६५॥
अर्थ: रावण सोचता है कि क्या मैं एक यह नियम ले लूँ कि परस्त्री कितनी ही सुन्दर क्यों न हो यदि वह मुझे नहीं चाहेगी तो मैं उसे बलपूर्वक नहीं छेड़ूँगा ॥३६५॥
अथवा न ननु क्षुद्रे कुतः शक्तिरियं मयि । स्वस्याप्यस्य न शक्नोमि वोढुं चित्तस्य निश्चयम् ॥३६६॥
अर्थ: अथवा मुझ क्षुद्र व्यक्तिमें इतनी शक्ति कहाँसे आई ? मैं अपने ही चित्तका निश्चय वहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ ॥३६६॥
यद्वा लोकत्रये नासौ विद्यते प्रमदोत्तमा । दृष्ट्वा मां विकलत्वं या न व्रजेन्मन्मथार्दिता ॥३६७॥
अर्थ: अथवा तीनों लोकोंमें ऐसी उत्तम स्त्री नहीं है जो मुझे देखकर कामसे पीड़ित होती हुई विकलताको प्राप्त न हो जाय ? ॥३६७॥