पद्मपुराण श्लोक एवं अर्थ (आचार्य रविषेण) | Padma Puran Shlok evam Arth (Acharya Ravishena)

१४. चतुर्दशं पर्व (अनन्तबलधर्माभिधानं) (जारी)

का वा नरान्तराश्लेषदूषितप्रमदातनौ । ओष्ठचर्मदधानायां परदन्तकृतव्रणम् ॥३६८॥

दुर्गन्धायां स्वभावेन वर्चोराशौ भवेद्धृतिः । नरस्य दधतश्चित्तं मानसंस्कारभाजनम् ॥३६९॥

अर्थ: अथवा जो मनुष्य मान और संस्कारके पात्र स्वरूप मनको धारण करता है उसे अन्य मनुष्यके संसर्गसे दूषित स्त्रीके उस शरीरमें धैर्य - सन्तोष हो ही कैसे सकता है कि जो अन्य पुरुषके दाँतों द्वारा किये हुए घावसे युक्त ओठको धारण करता है, स्वभावसे ही दुर्गन्धित है और मलकी राशि स्वरूप है ॥३६८-३६९॥


अवधार्येतिभावेन प्रणम्यानन्तविक्रमम् । देवासुरसमक्षं स प्रकाशमिदमभ्यधात् ॥३७०॥

अर्थ: ऐसा विचारकर रावणने पहले तो अनन्तबल केवलीको भाव पूर्वक नमस्कार किया । फिर देवों और असुरोंके समक्ष स्पष्ट रूपसे यह कहा कि ॥३७०॥


भगवन्न मया नारी परस्येच्छाविवर्जिता । गृहीतव्येति नियमो ममायं कृतनिश्चयः ॥३७१॥

अर्थ: हे भगवन् ! ‘जो परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे ग्रहण नहीं करूँगा’ मैंने यह दृढ़ नियम लिया है ॥३७१॥


चतुःशरणमाश्रित्य भानुकर्णोऽपि कर्णवान् । इमं नियममातस्थे मन्दरस्थिरमानसः ॥३७२॥

करोमि प्रातरुत्थाय सांप्रतं प्रतिवासरम् । स्तुत्वा पूजां जिनेन्द्राणामभिषेकसमन्विताम् ॥३७३॥

वरिवस्यामवस्त्राणामकृत्वा विधिनान्वितम् । अद्य प्रभृति नाहारं करोमीति ससंमदः ॥३७४॥

अर्थ: जो समस्त बातोंको सुन रहा था तथा जिसका मन सुमेरुके समान स्थिर था ऐसे भानुकर्ण ( कुम्भकर्ण ) ने भी अरहन्त सिद्ध साधु और जिन धर्म इन चारकी शरणमें जाकर यह नियम लिया कि ‘मैं प्रतिदिन प्रातः काल उठकर तथा स्तुति कर अभिषेक-पूर्वक जिनेन्द्र देवकी पूजा करूँगा । साथ ही जबतक मैं निर्ग्रन्थ साधुओंकी पूजा नहीं कर लूँगा तबतक आजसे लेकर आहार नहीं करूँगा’ । भानुकर्णने यह प्रतिज्ञा बड़े हर्षसे की ॥३७२-३७४॥


जानुभ्यां भुवमाक्रम्य प्रणम्य मुनिमादरात् । अन्यानपि महाशक्तिनियमान् स समार्जयत् ॥३७५॥

अर्थ: इसके सिवाय उसने पृथिवीपर घुटने टेक मुनिराजको आदरपूर्वक नमस्कार कर और भी बड़े-बड़े नियम लिये ॥३७५॥


ततो देवा सुरा भक्ताः प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । यथास्वं निलयं जग्मुर्हर्षविस्तारितेक्षणाः ॥३७६॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे भक्त और असुर मुनिराजको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥३७६॥


अभि लङ्कां दशास्योऽपि प्रतस्थे पृथुविक्रमः । खमुत्पत्य दधल्लीलां सुरनाथसमुद्भवाम् ॥३७७॥

अर्थ: विशाल पराक्रमका धारी रावण भी आकाश-में उड़कर इन्द्रकी लीला धारण करता हुआ लंकाकी ओर चला ॥३७७॥


वरस्त्रीजनसंघातैः कृतप्रणतिपूजनः । नगरीं स्वां विवेशासौ वस्त्रादिकृतभूषणाम् ॥३७८॥

अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियोंके समूहने प्रणामपूर्वक जिसकी पूजा की थी ऐसे रावणने वस्त्रादिसे सुसज्जित अपनी नगरीमें प्रवेश किया ॥३७८॥


प्रविश्य वसतिं स्वां च समस्तविभवार्चिताम् । अनावृत इवातिष्ठद्गंभीरां मान्दरीं गुहाम् ॥३७९॥

अर्थ: जिस प्रकार अनावृत देव मेरुपर्वतकी गम्भीर गुहामें रहता है उसी प्रकार रावण भी समस्त वैभवसे युक्त अपने निवासगृहमें प्रवेश कर रहने लगा ॥३७९॥


भवन्ति कर्माणि यदा शरीरिणां प्रशान्तियुक्तानि विमुक्तिभाविनाम् । ततोपदेशं परमं गुरोर्मुखादवाप्नुवन्ति प्रभवं शुभस्य ते ॥३८०॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जब भव्य जीवोंके कर्म उपशम भावको प्राप्त होते हैं तब वे सुगुरुके मुखसे कल्याणकारी उत्तम उपदेश प्राप्त करते हैं ॥३८०॥


इति प्रबुद्धोद्यतमानसा जना जिनश्रुतौ सज्जत भो पुनः पुनः । परेण धर्मं विनयेन शृण्वतां भवत्यमन्दोऽवगमो यथा रविः ॥३८१॥

अर्थ: ऐसा जानकर हे प्रबुद्ध एवं उद्यमशील हृदयके धारक भव्य जनो ! तुम लोग बार-बार जिनधर्मके सुननेमें तत्पर होओ क्योंकि जो उत्तम विनयपूर्वक धर्म श्रवण करते हैं उन्हें सूर्यके समान विपुल ज्ञान प्राप्त होता है ॥३८१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते अनन्तबलधर्माभिधानं नाम चतुर्दशं पर्व ॥१८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें अनन्तबल केवलीके द्वारा धर्मोपदेशका निरूपण करनेवाला चौदहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१४॥


१५. पञ्चदशं पर्व (अञ्जनासुन्दरीविवाहाभिधानं)

तस्यैव च मुनेः पार्श्वे हनूमान् गृहिणां व्रतम् । विभीषणश्च जग्राह कृत्वा भावं सुनिश्चितम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर उन्हीं मुनिराजके पास हनुमान् और विभीषणने भी अभिप्रायको सुदृढ़ कर गृहस्थोंके व्रत ग्रहण किये ॥१॥


न तया गिरिराजस्य स्थिरत्वं शस्यते बुधैः । हनूमच्छीलसम्यक्त्वं यथा परमनिश्चलम् ॥२॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि विद्वान् लोग सुमेरुपर्वतकी स्थिरताकी उस प्रकार प्रशंसा नहीं करते जिस प्रकार कि परमनिश्चलताको प्राप्त हुए हनुमान्‌के शील और सम्यग्दर्शनकी करते हैं ॥२॥


सौभाग्यादिमिरत्यन्तं हनूमति ततः स्तुते । इत्यूचे मगधाधीशो रोमाञ्चं बिभ्रदुत्कटम् ॥३॥

अर्थ: इस प्रकार जब गौतमस्वामीने सौभाग्य आदिके द्वारा हनुमान्‌की अत्यधिक प्रशंसा की तब उत्कट रोमांचको धारण करता हुआ श्रेणिक बोला कि ॥३॥


हनूमान् को गणाधीश किंविशिष्टः कुतः क्व वा । भगवन्नस्य तत्त्वेन ज्ञातुमिच्छामि चेष्टितम् ॥४॥

अर्थ: हे गणनाथ ! हनुमान् कौन ? इसकी क्या विशेषता है ? कहाँ किससे इसकी उत्पत्ति हुई है ? हे भगवन् ! मैं इसका चरित्र यथार्थमें जानना चाहता हूँ ॥४॥


ततः सत्पुरुषाभिख्यासंजातपुरुसंमदः । वाचाह्लादनकारिण्या गणप्राग्रहरोऽवदत् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर सत्पुरुषका नाम सुननेसे जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हो रहा था ऐसे गणधर भगवान् आह्लाद उत्पन्न करनेवाली वाणीमें कहने लगे ॥५॥


दक्षिणस्यां नृप श्रेण्यां विजयार्धस्य भूभृतः । दशयोजनमध्वानमतिक्रम्य व्यवस्थितम् ॥६॥

आदित्यनगराभिख्यं पुरमस्ति मनोहरम् । प्रह्लादस्तत्र राजास्य नाम्ना केतुमती प्रिया ॥७॥

अर्थ: हे राजन् ! विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें दश योजनका मार्ग लांघकर आदित्यपुर नामक एक मनोहर नगर है । वहाँके राजा प्रह्लाद और उनकी रानीका नाम केतुमती था ॥६-७॥


शुभो वायुगतिर्नाम बभूव तनयोऽनयोः । लक्ष्म्या वक्षस्थलं यस्य विपुलं निलयीकृतम् ॥८॥

अर्थ: इन दोनोंके पवनगति नामका उत्तम पुत्र हुआ । पवनगतिके विशाल वक्षःस्थलको लक्ष्मीने अपना निवासस्थल बनाया था ॥८॥


संपूर्णयौवनं दृष्ट्वा तं तद्दारक्रियां प्रति । चकार जनकश्चिन्तां संतानच्छेदकातरः ॥९॥

अर्थ: उसे पूर्णयौवन देख, सन्तान-विच्छेदका भय रखनेवाले पिताने उसके विवाहकी चिन्ता की ॥९॥


आस्तां तावदिदं राजन्निदमन्यन्मतौ कुरु । वचनं येन तद्दारसंभवः परिकीर्त्यते ॥१०॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! यह कथा तो अब रहने दो । दूसरी कथा हृदयमें धारण करो जिससे कि पवनगतिके विवाहकी चर्चा सम्भव हो सके ॥१०॥


वासस्य भरतस्यान्ते संनिकृष्टे महोदधेः । पूर्वदक्षिणदिग्भागे दन्तीत्यस्ति महीधरः ॥११॥

अर्थ: इसी भरत क्षेत्रके अन्तमें महासागरके निकट आग्नेय दिशामें एक दन्ती नामका पर्वत है ॥११॥


विपुलाभ्रंलिहोदारतेजःशिखरसंकटः । नानाद्रुमौषधिव्याप्तः सुनिर्झरमहातटः ॥१२॥

अर्थ: जो बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी चमकीले शिखरोंसे युक्त है, नाना प्रकारके वृक्ष और औषधियोंसे व्याप्त है तथा जिसके लम्बे-चौड़े किनारे उत्तमोत्तम झरनोंसे युक्त हैं ॥१२॥


यतः प्रभृति तत्रास्थात्संनिवेश्य वरं पुरम् । विद्याधरो महेन्द्राख्यो महेन्द्रोपमविक्रमः ॥१३॥

तत आरभ्य संप्राप महेन्द्राख्यां रसाधरः । महेन्द्रनगरं तच्च पुरं तत्र प्रकीर्तितम् ॥१४॥

अर्थ: महेन्द्रके समान पराक्रमको धारण करनेवाला महेन्द्र विद्याधर उत्तम नगर बसाकर जबसे उस पर्वतपर रहने लगा था तभीसे उस पर्वतका ‘महेन्द्रगिरि’ नाम पड़ गया था और उस नगरका महेन्द्रनगर नाम प्रसिद्ध हो गया था ॥१३-१४॥


नार्यां हृदयवेगायामजायन्त महेन्द्रतः । गुणवन्तः शतं पुत्रा नामतोऽरिंदमादयः ॥१५॥

अर्थ: राजा महेन्द्रकी हृदयवेगा रानीमें अरिंदम आदि सौ गुणवान् पुत्र उत्पन्न हुए ॥१५॥


उदपाद्यनुजा तेषां कीर्तिताञ्जनसुन्दरी । त्रैलोक्यसुन्दरीरूपसंदोहेनैव निर्मिता ॥१६॥

अर्थ: उनके अंजनासुन्दरी नामसे प्रसिद्ध छोटी बहन उत्पन्न हुई । वह ऐसी जान पड़ती थी मानो तीन लोककी सुन्दर स्त्रियोंका रूप इकट्ठा कर उसके समूहसे ही उसकी रचना हुई थी ॥१६॥


नीलनीरजनिर्मासा प्रशस्तकरपल्लवा । पद्मगर्भाभचरणा कुम्भिकुम्भनिभस्तनी ॥१७॥

अर्थ: उसकी प्रभा नील कमलके समान सुन्दर थी, हस्तरूप पल्लव अत्यन्त प्रशस्त थे, चरण कमलके भीतरी भागके समान थे, स्तन हाथीके गण्डस्थलके तुल्य थे ॥१७॥


तनुमध्या पृथुश्रोणी सुजानूरूः सुलक्षणा । प्रफुल्लमालतीमालामृदुबाहुलतायुगा ॥१८॥

अर्थ: उसकी कमर पतली थी, नितम्ब स्थूल थे, जंघाएँ उत्तम घुटनोंसे युक्त थीं, उसके शरीरमें अनेक शुभ लक्षण थे, उसकी दोनों भुजलताएँ प्रफुल्ल मालतीकी मालाके समान कोमल थीं ॥१८॥


कर्णान्तसंगते कान्तिकृतपुङ्खे सुदूरगे । इषू ते कामदेवस्य ननु तस्या विलोचने ॥१९॥

अर्थ: कानों तक लम्बे एवं कान्तिरूपी मूठसे युक्त उसके दोनों नेत्र ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेवके सुदूरगामी बाण ही हों ॥१९॥


गन्धर्वादिकलाभिज्ञा साक्षादिव सरस्वती । लक्ष्मीरिव च रूपेण सा बभूव गुणान्विता ॥२०॥

अर्थ: वह गन्धर्व आदि कलाओंको जाननेवाली थी इसलिए साक्षात् सरस्वतीके समान जान पड़ती थी और रूपसे लक्ष्मीके तुल्य लगती थी ॥२०॥


अन्यदा कन्दुकेनासौ रममाणा सरेचकम् । जनकेनेक्षिताभ्यग्रयौवनाञ्चितविग्रहा ॥२१॥

सुलोचनासुताभर्तृवरचिन्तातिदुःखिनः । अकम्पननृपस्येव सद्गुणार्पितचेतसः ॥२२॥

तद्वरान्वेषणे तस्य ततः सक्तामवन्मतिः । अत्यन्तव्याकुलप्रायः कन्यादुःखं मनस्विनाम् ॥२३॥

अर्थ: इस प्रकार अनेक गुणोंसे सहित वह कन्या किसी समय गोलाकार भ्रमण करती हुई गेंद खेल रही थी कि पिताकी उसपर दृष्टि पड़ी । पिताने देखा कि कन्याका शरीर नव-यौवनसे सुशोभित हो रहा है । उसे देख जिस प्रकार उत्तम गुणोंमें चित्त लगानेवाले राजा अकम्पनको अपनी पुत्री सुलोचनाके योग्य वर ढूँढ़नेकी चिन्ता हुई थी और उससे वह अत्यन्त दुःखी हुआ था उसी प्रकार राजा महेन्द्रको भी पुत्रीके योग्य वर ढूँढ़नेकी चिन्ता हुई सो ठीक ही है क्योंकि स्वाभिमानी मनुष्योंको कन्याका दुःख अत्यन्त व्याकुलता उत्पन्न करनेवाला होता है ॥२१-२३॥


गमिष्यति पतिं श्लाघ्यं रमयिष्यति तं चिरम् । भविष्यत्युज्झिता दोषैरतिचिन्ता नृणां सुता ॥२४॥

अर्थ: कन्याके पिताको सदा यह चिन्ता लगी रहती है कि कन्या उत्तम पतिको प्राप्त होगी या नहीं, यह उसे चिरकाल तक रमण करा सकेगी या नहीं और निर्दोष रह सकेगी या नहीं । यथार्थमें पुत्री मनुष्यके लिए बड़ी चिन्ता है ॥२४॥


आहूय सुहृदः सर्वांस्ततो विज्ञानभूषणान् । राजा वरविनिश्चित्यै रहोगेहमशिश्रियत् ॥२५॥

अर्थ: अथानन्तर राजा महेन्द्र ज्ञानरूपी अलंकारसे अलंकृत समस्त मित्रजनोंको बुलाकर वरका निश्चय करनेके लिए एकान्त घरमें गये ॥२५॥


जगाद मन्त्रिणश्चैव महो निखिलवेदिनः । सूरयो मम कन्याया वदत प्रवरं वरम् ॥२६॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने मन्त्रियोंसे कहा कि अहो मन्त्रिजनो ! आप लोग सब कुछ जानते हैं तथा विद्वान् हैं अतः मेरी कन्याके योग्य उत्तम वर बतलाइए ॥२६॥


तत्र मन्त्री जगादैकः कन्येयं भरताधिपे । योज्यतां रक्षसामीश इति मे निश्चितं मतम् ॥२७॥

अर्थ: तब एक मन्त्रीने कहा कि यह कन्या भरत क्षेत्रके स्वामी राक्षसोंके अधिपति रावणके लिए दी जानी चाहिए ऐसा मेरा निश्चित मत है ॥२७॥


रावणं स्वजनं प्राप्य सर्वविद्याधराधिपम् । जगत्यां सागरान्तायां प्रभावस्ते भ्रमिष्यति ॥२८॥

अर्थ: समस्त विद्याधरोंके स्वामी रावण जैसे स्वजनको पाकर आपका प्रभाव समुद्रान्त पृथिवीमें फैल जायेगा ॥२८॥


अथवेन्द्रजिते यूने मेघनादाय वा नृप । दीयतामेवमप्येष रावणस्तत्र बान्धवः ॥२९॥

अर्थ: अथवा हे राजन् ! रावणके पुत्र इन्द्रजित् और मेघनाद तरुण हैं सो इन्हें यह कन्या दीजिए क्योंकि उन्हें देनेपर भी रावण स्वजन होगा ॥२९॥


अथैतन्न तवाभीष्टं ततः कन्या स्वयंवरा । विमुच्यतां न वैरी ते तथा सत्युपजायते ॥३०॥

अर्थ: अथवा यह बात भी आपको इष्ट नहीं है तो फिर कन्याको स्वयं पति चुननेके लिए छोड़ दीजिए अर्थात् इसका स्वयंवर कीजिए । ऐसा करनेसे आपका कोई वैरी नहीं बन सकेगा ॥३०॥


इत्युक्त्वा विरतिं याते मन्त्रिण्यमरसागरे । विद्वान्सुमतिसंज्ञाको जगाद वचनं स्फुटम् ॥३१॥

अर्थ: इतना कहकर जब अमरसागर मन्त्री चुप हो गया तब सुमति नामका दूसरा विद्वान् मन्त्री स्पष्ट वचन बोला ॥३१॥


दशास्योऽनेकपत्नीको महाहङ्कारगोचरः । इमां प्राप्यापि नो तस्य प्रीतिरस्मासु जायते ॥३२॥

अर्थ: उसने कहा कि रावणके अनेक पत्नियाँ हैं, साथ ही वह महाअहंकारी है इसलिए इसे पाकर भी उसकी हम लोगोंमें प्रीति उत्पन्न नहीं होगी ॥३२॥


षोडशाब्दसमानेऽपि सत्याकारेऽस्य भोगिनः । उत्कृष्टमेव विज्ञेयं नयः परमतेजसः ॥३३॥

अर्थ: यद्यपि इस परम प्रतापी भोगी रावणका आकार सोलह वर्षके पुरुषके समान है तो भी उसकी आयु अधिक तो है ही ॥३३॥


इन्द्रजिन्मेघवाहाय सति दाने प्रकुप्यति । मेघवाहस्तथा तस्मै तस्मात्तावपि नो वरौ ॥३४॥

अर्थ: अतः इसके लिए कन्या देना मैं उचित नहीं समझता । दूसरा पक्ष इन्द्रजित् और मेघनादका रखा सो यदि मेघनादके लिए कन्या दी जाती है तो इन्द्रजित् कुपित होता है और इन्द्रजित्के लिए देते हैं जो मेघनाद कुपित होता है इसलिए ये दोनों वर भी ठीक नहीं हैं ॥३४॥


श्रीषेणसुतयोरासीद् गणिकार्थं तदा महत् । पितृदुःखकरं युद्धं स्त्रीहेतोः किं न वेष्यते ॥३५॥

अर्थ: पहले राजा श्रीषेणके पुत्रोंमें एक गणिकाके निमित्त पिताको दुःखी करनेवाला बड़ा युद्ध हुआ था यह सुननेमें आता है सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रीका निमित्त पाकर क्या नहीं होता है ? ॥३५॥


वाक्यं ततोऽनुमन्येदं नाम्ना ताराधरायणः । जगाद वचनं चैनं भावेन धृतमानसः ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका हृदय सदभिप्रायसे युक्त था ऐसा ताराधरायण नामका मन्त्री, पूर्व मन्त्रीके वचनोंकी अनुमोदना कर इस प्रकारके वचन बोला ॥३६॥


नगाद्रिदक्षिणं स्थानं कनकं नाम विद्यते । राजा तत्र हिरण्याभः सुमनास्तस्य भामिनी ॥३७॥

अर्थ: उसने कहा कि विजयार्ध-पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक कनकपुर नामका नगर है । वहाँ राजा हिरण्याभ रहते हैं उनकी रानीका नाम सुमना है ॥३७॥


अभवत्तनयस्तस्य नाम्ना सौदामिनीप्रभः । महता यशसा कान्त्या वयसा चातिशोभनः ॥३८॥

अर्थ: उन दोनोंके विद्युत्प्रभ नामका पुत्र उत्पन्न हुआ है जो बहुत भारी यश, कान्ति और अवस्थासे अत्यन्त सुन्दर है ॥३८॥


सर्वविद्याकलापारो लोकनेत्रमहोत्सवः । गुणैरनुपमश्चेष्टारञ्जिताखिलविष्टपः ॥३९॥

अर्थ: वह समस्त विद्याओं और कलाओंका पारगामी है, लोगोंके नेत्रोंका मानो महोत्सव ही है, गुणोंसे अनुपम है, और अपनी चेष्टाओंसे उसने समस्त लोकको अनुरंजित कर रखा है ॥३९॥


सुरविद्याधरैः सर्वैरेकीभूयापि यत्नतः । अजय्यस्त्रिजगच्छक्तिसंग्रहेणेवे निर्मितः ॥४०॥

अर्थ: समस्त देव-विद्याधर एक होकर भी उसे प्रयत्नपूर्वक नहीं जीत सकते हैं । ऐसा जान पड़ता है कि मानो वह तीनों लोकोंकी शक्ति इकट्ठी कर ही बनाया गया है ॥४०॥


कन्येयं दीयतां तस्मै भवतां यदि संमतम् । चिरादुत्पद्यतां योगो दम्पत्योरनुरूपयोः ॥४१॥

अर्थ: यदि आपकी सम्मति हो तो यह कन्या उसे दी जावे जिससे योग्य दम्पतियोंका चिरकालके लिए संयोग उत्पन्न हो सके ॥४१॥


उत्तमाङ्गं ततो धूत्वा संमील्य नयने चिरम् । जगाद वचनं मन्त्री नाम्ना संदेहपारगः ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर सन्देहपारग नामका मन्त्री सिर हिलाकर तथा चिरकाल तक नेत्र बन्द कर निम्नांकित वचन बोला ॥४२॥


भव्योऽयं पूर्वजा याता मम क्वेति विचिन्तयत् । संसारप्रकृतिं बुद्ध्वा निर्वेदं परमेष्यति ॥४३॥

अर्थ: उसने कहा कि यह निकट भव्य है तथा निरन्तर ऐसा विचार करता रहता है कि मेरे पूर्वज कहाँ गये ? सो इससे जान पड़ता है कि यह संसारका स्वभाव जानकर परम वैराग्यको प्राप्त हो जायेगा ॥४३॥


विषयेष्वप्रसक्तात्मा वर्षेऽष्टादशसंख्यके । मङ्क्त्वा भोगमहालानं गृहितां परिहास्यति ॥४४॥

अर्थ: जिसकी आत्मा विषयोंमें अनासक्त रहती है ऐसा यह कुमार अठारह वर्षकी अवस्थामें भोगरूपी महाआलानका भंग कर गृहस्थ अवस्था छोड़ देगा ॥४४॥


बहिरन्तश्च स सङ्गं परित्यज्य महामनाः । केवलज्ञानमुत्पाद्य किल निर्वाणमेष्यति ॥४५॥

अर्थ: वह महामना बहिरंग और अन्तरंग परिग्रहका त्याग कर तथा केवलज्ञान उत्पन्न कर निर्वाणको प्राप्त होगा ॥४५॥


वियुक्तानेन बालेयं भ्रष्टशोभा भविष्यति । शर्वरीव शशाङ्केन जगदालोककारिणा ॥४६॥

अर्थ: सो जिस प्रकार जगत्को प्रकाशित करनेवाले चन्द्रमासे रहित होनेपर रात्रि शोभाहीन हो जाती है उसी प्रकार इससे वियुक्त होनेपर यह बाला शोभाहीन हो जावेगी ॥४६॥


श्रृणुतातोऽस्ति नगरमादित्यपुरसंज्ञकम् । पुरन्दरपुराकारं रत्नैरादित्यभासुरम् ॥४७॥

नभश्चरशशाङ्कोऽत्र प्रह्लादो नाम भोगवान् । तस्य केतुमती पत्नी केतुर्मानसवासिनः ॥४८॥

अर्थ: इसलिए मेरी बात सुनो, इन्द्रके नगरके समान सुन्दर तथा रत्नोंसे सूर्यके समान देदीप्यमान एक आदित्यपुर नामका नगर है इसमें प्रह्लाद नामका राजा रहता है जो भोगोंसे युक्त है तथा विद्याधरोंके बीच चन्द्रमाके समान जान पड़ता है । प्रह्लादकी रानी केतुमती है जो कि सौन्दर्यके कारण कामदेवकी पताकाके समान सुशोभित है ॥४७-४८॥


तयोर्विक्रमसंमारो रूपशीलो गुणाम्बुधिः । पवनञ्जयनामास्ति तनयो नयमण्डनः ॥४९॥

अर्थ: उन दोनोंके एक पवनंजय नामका पुत्र है जो अत्यन्त पराक्रमी, रूपवान्, गुणोंका सागर तथा नयरूपी आभूषणोंसे विभूषित है ॥४९॥


शुभलक्षणसंच्छन्नविशालोत्तुङ्गविग्रहः । कलानां निलयो वीरो दूरीभूतदुरीहितः ॥५०॥

अर्थ: उसका अतिशय ऊँचा शरीर अनेक शुभ लक्षणोंसे व्याप्त है, वह कलाओंका घर, शूरवीर तथा खोटी चेष्टाओंसे दूर रहनेवाला है ॥५०॥


संवत्सरशतेनापि यस्य वक्तुं न शक्यते । गुणग्रामोऽखिलः प्राप्तसमस्तजनचेतसः ॥५१॥

अर्थ: वह सब लोगोंके चित्तमें बसा हुआ है तथा सौ वर्षमें भी उसके समस्त गुणोंका समूह कहा नहीं जा सकता है ॥५१॥


अथवा वचनज्ञानमस्पष्टमुपजायते । अतो गत्वैव वीक्षध्वमिमं देवसमद्युतिम् ॥५२॥

अर्थ: अथवा वचनोंके द्वारा जो किसीका ज्ञान कराया जाता है वह अस्पष्ट ही रहता है इसलिए देवतुल्य कान्तिको धारण करनेवाले इस युवाको स्वयं जाकर ही देख लीजिए ॥५२॥


ततः कैतुमतस्योच्चैर्गुणैः श्रोत्रपथं गतैः । सर्वे ते परमं प्राप्ताः प्रमोदं कृतसंमदाः ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर कर्ण मार्गको प्राप्त हुए पवनंजयके उत्कृष्ट गुणोंसे सब लोग परम हर्षको प्राप्त हो आन्तरिक प्रसन्नता प्रकट करने लगे ॥५३॥


श्रुत्वा कन्यापि तां वार्तां विचकास प्रमोदतः । निशाकरकरालोकमात्रादिव कुमुद्वती ॥५४॥

अर्थ: तथा कन्या भी उस वार्ताको सुनकर हर्षसे इस तरह खिल उठी जिस तरह कि चन्द्रमाकी किरणोंको देखने मात्रसे कुमुदिनी खिल उठती है ॥५४॥


अत्रान्तरेऽत्ययं प्राप्तः कालो हिमकणान्वितः । कामिनीवदनाम्भोजलावण्यहरणोद्यतः ॥५५॥

अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें वसन्त ऋतु आयी और स्त्रियोंके मुख कमलकी सुन्दरताके अपहरणमें उद्यत शीतकाल समाप्त हुआ ॥५५॥


नवं पटलमब्जानां नलिनीनामजायत । चिरोत्कण्ठितमध्वाशसमूहकृतसङ्गमम् ॥५६॥

अर्थ: कमलिनी प्रफुल्लित हुई और नये कमलोंके समूह चिरकालसे उत्कण्ठित भ्रमर-समूहके साथ समागम करने लगे अर्थात् उनपर भ्रमरोंके समूह गूँजने लगे ॥५६॥


घनः शाखाभृतां जज्ञे पत्रपुष्पाङ्कुरोद्भवः । मधुलक्ष्मीपरिष्वङ्गसंजातपुलकाकृतिः ॥५७॥

अर्थ: वृक्षोंके पत्र, पुष्प, अंकुर आदि घनी मात्रामें उत्पन्न हुए जो ऐसे जान पड़ते थे मानो वसन्त लक्ष्मीके आलिंगनसे उनमें रोमांच ही उत्पन्न हुए हों ॥५७॥


चूतस्य मञ्जरीजालं मधुव्रतकृतस्वनम् । मनोलोकस्य विव्याध पटलं मारसायकम् ॥५८॥

अर्थ: जिनपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे ऐसे आमके मौरोंके समूह कामदेवके बाणोंके पटलके समान लोगोंका मन बेधने लगे ॥५८॥


कोकिलानां स्वनश्चक्रे मानिनीमानमञ्जनः । जनस्य व्याकुलीभावं वसन्तालापतां गतः ॥५९॥

अर्थ: मानवती स्त्रियोंके मानको भंग करनेवाला कोकिलाओंका मधुर शब्द लोगोंको व्याकुलता उत्पन्न करने लगा । वह कोकिलाओंका शब्द ऐसा जान पड़ता था मानो उसके बहाने वसन्त ऋतु ही वार्तालाप कर रही हो ॥५९॥


रमणद्विजदष्टानामोष्ठानां वेदनाभृताम् । उदपद्यत वैशद्यं चिरेण वरयोषिताम् ॥६०॥

अर्थ: स्त्रियोंके जो ओठ पतिके दाँतोंसे डँसे जानेके कारण पहले वेदनासे युक्त रहते थे अब चिरकाल बाद उनमें विशदता उत्पन्न हुई ॥६०॥


स्नेहो बभूव चात्यन्तमन्योन्यं जगतः परम् । उपकारसमाधानपरेहाप्रकटीकृतः ॥६१॥

अर्थ: जगत्के जीवोंमें परस्पर बहुत भारी स्नेह प्रकट होने लगा । उनका यह स्नेह उपकारपरक चेष्टाओंसे स्पष्ट ही प्रकट हो रहा था ॥६१॥


भ्रमरीं भ्रमणश्रान्तां रमणः पक्षवायुना । परितो भ्रमणं कुर्वंश्चकार विगतश्रमाम् ॥६२॥

अर्थ: चारों ओर भ्रमण करता हुआ भ्रमर अपने पंखोंकी वायुसे, थकी हुई भ्रमरीको श्रमरहित करने लगा ॥६२॥


दूर्वाप्रवालमुद्धृत्य सारङ्गयै पृषतो ददौ । तस्यास्तेनामृतेनेव कापि प्रीतिरजायत ॥६३॥

अर्थ: उस समय हरिण दूर्वाके प्रवाल उखाड़-उखाड़कर हरिणीके लिए दे रहा था और उससे हरिणीको ऐसा प्रेम उत्पन्न हो रहा था मानो अमृत ही उसे मिल रहा हो ॥६३॥


कैरिकण्डूयनं रेजे वदनभ्रंशिपल्लवम् । करिण्याः सुखसंभारनिमीलितविलोचनम् ॥६४॥

अर्थ: हाथी हथिनीके लिए खुजला रहा था । इस कार्यमें उसके मुखका पल्लव छूटकर नीचे गिर गया था और हथिनीके नेत्र सुखके भारसे निमीलित हो गये थे ॥६४॥


स्तबकस्तननम्राभिश्चलत्पल्लवपाणिभिः । समालिङ्गयन्त वल्लीभिर्भ्रमराक्षीभिरङ्घ्रिपाः ॥६५॥

अर्थ: जो गुच्छेरूपी स्तनोंसे झुक रही थीं, जिनके पल्लवरूपी हाथ हिल रहे थे और ऊपर बैठे हुए भ्रमर ही जिनके नेत्र थे ऐसी लतारूपी स्त्रियाँ वृक्षरूप पुरुषोंका आलिंगन कर रही थीं ॥६५॥


दक्षिणाशामुखोद्गीर्णः प्रावर्तत समीरणः । प्रेर्यमाण इवानेन रविरासीदुदग्गतिः ॥६६॥

अर्थ: दक्षिण दिशाके मुखसे प्रकट हुआ मलय- समीर बहने लगा और सूर्य उत्तरायण हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो इस मलयसमीरसे प्रेरित होकर ही सूर्य उत्तरायण हो गया था ॥६६॥


समीरणकृताकम्पः केसरप्रकरः पतन् । मधुसिंहस्य पान्थेन ददृशे केसरोत्करः ॥६७॥

अर्थ: वायुसे हिलते हुए मौलश्रीके फूलोंका समूह नीचे गिर रहा था जिसे पथिक लोग ऐसा समझ रहे थे मानो वसन्तरूपी सिंहकी जटाओंका समूह ही हो ॥६७॥


दंष्ट्रा वसन्तसिंहस्य मानस्तम्बेरमाङ्कुशः । अङ्कोलकेशरं रेजे प्रोषितस्त्रीभयङ्करम् ॥६८॥

अर्थ: विरहिणी स्त्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाली अंकोल वृक्षके पुष्पोंकी केशर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो वसन्तरूपी सिंहकी दंष्ट्रा अर्थात् जबड़े ही हों अथवा मानरूपी हाथीका अंकुश ही हो ॥६८॥


घनं कैरवजं जालं क्वणद्भृङ्गकदम्बकम् । वियोगिनीमनांसीव मधुनाक्रष्टुमुज्झितम् ॥६९॥

अर्थ: जिसपर भ्रमर गूँज रहे थे ऐसा कुमुदोंका सघन जाल ऐसा जान पड़ता था मानो वियोगिनी स्त्रियोंके मनको खींचनेके लिए वसन्तने जाल ही छोड़ रखा था ॥६९॥


कुड्मलोद्दीपितोऽशोकः प्रचलन्नवपल्लवः । प्राचुर्याद्वनितोदीर्णरागराशिरिवाबभौ ॥७०॥

अर्थ: जिसके नये-नये पत्ते हिल रहे थे ऐसा बोंडियोंसे सुशोभित अशोकका वृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अधिकताके कारण स्त्रियोंके द्वारा उगला हुआ रागका समूह ही हो ॥७०॥


किंशुकं घनमत्यन्तं दिदीपे वनराजिषु । वियोगिनीमनःस्थातिरिक्तदुःखानिलोपमम् ॥७१॥

अर्थ: वनश्रेणियोंमें पलाशके सघन वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो विरहिणी स्त्रियोंके मनमें ठहरनेसे बाकी बचे हुए दुःखरूपी अग्निके समूह ही हों ॥७१॥


व्याप्तदिक्चक्रवालेन रजसा पुष्पजन्मना । वसन्तः पटवासेन चकारेव महोत्सवम् ॥७२॥

अर्थ: समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाला फूलोंका पराग सब ओर फैल रहा था उससे ऐसा जान पड़ता था मानो वसन्त सुगन्धित चूर्णके द्वारा महोत्सव हो मना रहा था ॥७२॥


निमेषमपि सेहाते न स्त्रीपुंसावदर्शनम् । कुत एवान्यदेशेन संगमं प्रेमबन्धनौ ॥७३॥

अर्थ: जब प्रेमरूपी बन्धनसे बँधे स्त्री-पुरुष पल-भरके लिए भी एक दूसरेका अदर्शन नहीं सहन कर पाते थे तब अन्य देशमें गमन किस प्रकार सहन करते ? ॥७३॥


गन्तुमारेभिरे देवा जिनभक्तिप्रचोदिताः । नन्दीश्वरं महामोदाः फाल्गुनाष्टदिनोत्सवे ॥७४॥

अर्थ: फाल्गुन मासके अन्तिम आठ दिनमें आष्टाह्निक महोत्सव आया सो जिनभक्तिसे प्रेरित तथा महाहर्षसे भरे देव नन्दीश्वर द्वीपको जाने लगे ॥७४॥


जग्मुरष्टापदे तत्र काले विद्याधराधिपाः । पूजोपकरणव्यग्रकरभृत्यगणान्विताः ॥७५॥

अर्थ: उसी समय पूजाके उपकरणोंसे व्यग्र हाथोंवाले सेवकोंसे सहित विद्याधर राजा कैलास पर्वतपर गये ॥७५॥


पूज्यं नाभेयनिर्वृत्या तमद्रिं भक्तिनिर्भरः । समेतो बन्धुवर्गेण महेन्द्रोऽपि समीयिवान् ॥७६॥

अर्थ: वह पर्वत भगवान् ऋषभदेवके मोक्ष जानेसे अत्यन्त पूजनीय था इसलिए भक्तिसे भरा राजा महेन्द्र भी बन्धुवर्गके साथ वहाँ गया था ॥७६॥


स तत्र जिनमर्चित्वा स्तुत्वा नत्वा च भावतः । रौक्मे शिलातले श्रीमानासाञ्चक्रे यथासुखम् ॥७७॥

अर्थ: श्रीमान् वह राजा महेन्द्र वहाँपर जिन भगवान्की भावपूर्वक अर्चना, स्तुति एवं नमस्कार करके स्वर्णमय शिलातलपर सुखपूर्वक बैठ गया ॥७७॥


प्रह्लादोऽपि तदायासीत्तं गिरिं वन्दितुं जिनम् । कृताभीष्टं भ्रमन्नासीन्महेन्द्रेक्षणगोचरः ॥७८॥

अर्थ: उसी समय राजा प्रह्लाद भी जिनेन्द्र देवकी वन्दना करनेके लिए कैलास पर्वतपर गया था सो पूजाके अनन्तर भ्रमण करता हुआ राजा महेन्द्रको दिखाई दिया ॥७८॥


महेन्द्रस्य ततोऽभ्याशं सुतप्रीत्या महादरः । ससर्प विकसन्नेत्रः प्रह्लादः प्रीतिमानसः ॥७९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र विकसित हो रहे थे और मन प्रीतिसे भर रहा था ऐसा प्रह्लाद पुत्रकी प्रीतिसे बड़े आदरके साथ राजा महेन्द्रके पास गया ॥७९॥


अभ्युत्थाय महेन्द्रोऽपि मुदितः पुरुसंभ्रमः । आलिङ्गन्तं समालिङ्गत् प्रह्लादं ह्लादकारणम् ॥८०॥

अर्थ: सो हर्षसे भरे महेन्द्रने भी सहसा उठकर उसकी अगवानी की और आनन्दके कारण आलिंगन करते हुए प्रह्लादका आलिंगन किया ॥८०॥


उपविष्टौ च विश्रब्धौ तौ मनोज्ञशिलातले । परस्परं शरीरादिकुशलं पर्यपृच्छताम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर दोनों ही राजा निश्चित होकर मनोहर शिलातलपर बैठे और परस्पर शरीरादिकी कुशलता पूछने लगे ॥८१॥


उवाचेति महेन्द्रोऽथ सखे किं कुशलं मम । कन्यानुरूपसंबन्धचिन्ताव्याकुलितात्मनः ॥८२॥

अर्थ: अथानन्तर राजा महेन्द्रने कहा कि हे मित्र ! मेरा मन तो निरन्तर कन्याके अनुरूप सम्बन्ध ढूँढ़नेकी चिन्तासे व्याकुल रहता है अतः कुशलता कैसे हो सकती है ? ॥८२॥


अस्ति मे दुहिता योग्या वरं प्राप्तुं मनोहरा । कस्मै तां प्रददामीति मम भ्राम्यति मानसम् ॥८३॥

अर्थ: मेरी एक कन्या है जो वर प्राप्त करने योग्य अवस्थामें है, किसके लिए उसे दूँ इसी चिन्तामें मन घूमता रहता है ॥८३॥


रावणो बहुपत्नीकस्तत्सुतौ व्रजतो रुषम् । दानेनान्यतरस्यातो न तेषु रुचिरस्ति मे ॥८४॥

अर्थ: रावण बहुपत्नीक है अर्थात् अनेक पत्नियोंका स्वामी है और इसके पुत्र इन्द्रजित् तथा मेघनाद किसी एकके लिए देनेसे शेष रोषको प्राप्त होते हैं अतः उन तीनोंमें मेरी रुचि नहीं है ॥८४॥


पुरे हेमपुराभिख्ये तनयः कनकद्युतेः । विद्युत्प्रभो दिनैरल्पैर्निर्वाणं प्रतिपत्स्यते ॥८५॥

अर्थ: हेमपुर नगरमें राजा कनकद्युतिके विद्युत्प्रभ नामका पुत्र है सो वह थोड़े ही दिनोंमें निर्वाण प्राप्त करेगा ॥८५॥


मयेयं विदिता वार्ता प्रकटा सर्वविष्टपे । केनापि कथितं नूनं संज्ञानेनेति योगिना ॥८६॥

अर्थ: यह बात किसी सम्यग्ज्ञानी मुनिने कही है सो समस्त लोकमें प्रसिद्ध है और परम्परावश मुझे भी विदित हुई है ॥८६॥


मन्त्रिमण्डलयुक्तस्य ततो मम विनिश्चितः । पुत्रस्तव वरत्वेन निर्वाच्यः पवनञ्जयः ॥८७॥

अर्थ: अतः मन्त्रिमण्डलके साथ बैठकर मैंने निश्चय किया है कि आपके पुत्र पवनंजयको ही कन्याका वर चुनना चाहिए ॥८७॥


मनोरथोऽयमायाता त्वया प्रह्लाद पूरितः । समयेनास्मि संजातः क्षणेन परिनिर्वृतः ॥८८॥

अर्थ: सो हे प्रह्लाद ! यहाँ पधारकर तुमने मेरे इस मनोरथको पूर्ण किया है । मैं तुम्हें देखकर क्षण-भरमें ही सन्तुष्ट हो गया हूँ ॥८८॥


ततोऽवोचदलं प्रीतः प्रह्लादो लब्धवाञ्छितः । चिन्ता ममापि पुत्रस्य द्वितीयान्वेषणं प्रति ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति हो रही है ऐसे प्रह्लादने बड़ी प्रसन्नतासे कहा कि पुत्रके अनुरूप वधू ढूँढ़नेकी मुझे भी चिन्ता है ॥८९॥


ततोऽहमपि वाक्येन त्वदीयेनामुना सुहृत् । शब्दगोचरतायुक्तां परिप्राप्तः सुखासिकाम् ॥९०॥

अर्थ: सो हे मित्र ! आपके इस वचनसे मैं जो शब्दोंसे न कही जाये ऐसी निश्चिन्तताको प्राप्त हुआ हूँ ॥९०॥


सरसो मानसाख्यस्य तटेऽथात्यन्तचारुणि । गुरुभ्यां वाञ्छितं कर्तुं तयोर्वैवाहमङ्गलम् ॥९१॥

अर्थ: अथानन्तर अंजना और पवनंजयके पिताने वहीं मानुषोत्तर पर्वतके अत्यन्त सुन्दर तटपर उनका विवाह-मंगल करनेकी इच्छा की ॥९१॥


स्थिते तत्रोभयोः सेने क्षणकल्पितसंश्रये । गजवाजिपदातीनामनुकूलरवाकुले ॥९२॥

अर्थ: इसलिए क्षण-भरमें ही जिनके डेरे-तम्बू तैयार हो गये थे तथा जो हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके अनुकूल शब्दोंसे व्याप्त था ऐसी उन दोनोंकी सेनाएँ वहीं ठहर गयीं ॥९२॥


दिनेषु त्रिषु यातेषु तयोः सांवत्सरा जगुः । कल्याणदिवसं ज्ञातनिखिलज्योतिरीहिताः ॥९३॥

अर्थ: समस्त ज्योतिषियोंकी गतिविधिको जाननेवाले ज्योतिषियोंने तीन दिन बीतनेके बाद विवाहके योग्य दिन बतलाया था ॥९३॥


श्रुत्वा परिजनादेतां सर्वावयवसुन्दरीम् । दिवसानां त्रयं सेहे न प्राह्लादिः प्रतीक्षितुम् ॥९४॥

अर्थ: पवनंजयने परिजनोंके मुखसे सुन रखा था कि अंजनासुन्दरी सर्वांगसुन्दरी है इसलिए उसे देखनेके लिए वह तीन दिनका व्यवधान सहन नहीं कर सका ॥९४॥


संगमोत्कण्ठितः सोऽयमेभिर्मन्मथसंभवैः । पूरितो दशभिर्वेगैर्भटो बाणैरिवाहवे ॥९५॥

अर्थ: निरन्तर समागमकी उत्कण्ठा रखनेवाला यह पवनंजय कामके दस वेगोंसे इस प्रकार पूर्ण हो गया जिस प्रकार कि युद्धमें कोई योद्धा शत्रुके बाणोंसे पूर्ण हो जाता है - भर जाता है ॥९५॥


आद्ये तद्विषया चिन्ता वेगे समुपजायते । द्वितीये द्रष्टुमाकारो बहिः समभिलष्यते ॥९६॥

अर्थ: प्रथम वेगमें उसे अंजनाविषयक चिन्ता होने लगी अर्थात् मनमें अंजनाकी इच्छा उत्पन्न हुई । दूसरे वेगके समय बाह्यमें उसकी आकृति देखनेकी इच्छा हुई ॥९६॥


तृतीये मन्ददीर्घोष्णनिःश्वासानां विनिर्गमः । चतुर्थे संज्वरो दृष्टज्वलनोपमचन्दनः ॥९७॥

अर्थ: तीसरे वेगमें मन्द-लम्बी और गरम साँसें निकलने लगीं । चौथे वेगमें ऐसा ज्वर उत्पन्न हो गया कि जिसमें चन्दन अग्निके समान सन्तापकारी जान पड़ने लगा ॥९७॥


विवर्तः पञ्चमेऽङ्गस्य कुसुमप्रस्तरादिषु । मन्यते विविधं स्वादु षष्ठे भक्तं विषोपमम् ॥९८॥

अर्थ: पंचम वेगमें उसका शरीर फूलोंकी शय्यापर करवटें बदलने लगा । छठें वेगमें अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनको वह विषके समान मानने लगा ॥९८॥


सप्तमे तत्कथासक्त्या विप्रलापसमुद्भवः । उन्मत्तताष्टमे गीतनृत्यविभ्रमकारिणी ॥९९॥

अर्थ: सातवें वेगमें उसीकी चर्चामें आसक्त रहकर विप्रलाप - बकवाद करने लगा । आठवें वेगमें उन्मत्तता प्रकट हो गयी जिससे कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता था ॥९९॥


मदनोरगदष्टस्य नवमे मूर्च्छनोद्भवः । दशमे दुःखसंभारः स्वसंवेद्यः प्रवर्तते ॥१००॥

अर्थ: कामरूपी सर्पके द्वारा डसे हुए उस पवनंजयको नौवें वेगमें मूर्च्छा आने लगी और दसवें वेगमें जिसका स्वयं ही अनुभव होता था ऐसा दुःखका भार प्राप्त होने लगा ॥१००॥


विवेकिनोऽपि तस्येदं तदा जातमनङ्कुशम् । चरितं वायुवेगस्य हताशं धिगनङ्गकम् ॥१०१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि वह पवनंजय विवेकसे युक्त था तो भी उस समय उसका चरित्र स्वच्छन्द हो गया था सो ऐसे दुष्ट कामके लिए धिक्कार हो ॥१०१॥


अथ चेतोभुवो वेगैरसौ धैर्यात्परिच्युतः । उद्वर्तितकरच्छन्ननिश्वासप्रचलाननः ॥१०२॥

अर्थ: अथानन्तर कामके उपर्युक्त वेगोंके कारण पवनंजयका धैर्य छूट गया । उसका मुख निरन्तर निकलनेवाले श्वासोच्छ्वासोंसे चंचल हो गया और वह उसे अपनी हथेलियोंसे ढँकने लगा ॥१०२॥


करसङ्गारुणीभूतस्वेदवद्गण्डमण्डलः । उष्णातिदीर्घनिश्वासग्लपितासनपल्लवः ॥१०३॥

अर्थ: वह स्वेदसे भरे अपने कपोलमण्डलको सदा हथेलीपर रखे रहता था जिससे उसमें लालिमा उत्पन्न हो गयी थी । वह शीतलता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे पल्लवोंके आसनपर बैठता था तथा उसे गरम-गरम लम्बी श्वासोंसे म्लान करता रहता था ॥१०३॥


जृम्भणं कम्पनं जम्भां मन्दं कुर्वन् पुनः पुनः । निःसहं धारयन्कायं गाढाकल्पकशल्यतः ॥१०४॥

अर्थ: बाणोंके गहरे प्रहारसे असहनीय कामको धारण करनेवाला वह पवनंजय बार-बार जमुहाई लेता था, बार-बार सिहर उठता था और बार-बार अँगड़ाई लेता था ॥१०४॥


रामामिध्यानतो मोघं हृषीकपटलं दधत् । मनोज्ञेष्वपि देशेषु महतीमधृतिं व्रजन् ॥१०५॥

अर्थ: निरन्तर स्त्रीका ध्यान रखनेसे उसकी इन्द्रियोंका समूह व्यर्थ हो गया था अर्थात् उसकी कोई भी इन्द्रिय अपना कार्य नहीं करती थी और अच्छे-से-अच्छे स्थानोंमें भी उसे धैर्य प्राप्त नहीं होता था - वह सदा अधीर ही बना रहता था ॥१०५॥


दधानः शून्यमात्मानं परित्यक्ताखिलक्रियः । क्षणमात्रधृतां भूयः परिमुञ्चन्नपत्रपाम् ॥१०६॥

अर्थ: उसने शून्य हृदय होकर सब काम छोड़ दिये थे । क्षण भरके लिए वह लज्जाको धारण करता भी था तो पुनः उसे छोड़ देता था ॥१०६॥


तनुभूतसमस्ताङ्गः परिभ्रष्टविभूषणः । दध्याविति सचिन्तेन परिवारेण वीक्षितः ॥१०७॥

अर्थ: जिसके समस्त अंग दुर्बल हो गये थे और जिसने सब आभूषण उतारकर अलग कर दिये थे ऐसा पवनंजय निरन्तर स्त्रीका ही ध्यान करता रहता था। परिवार-के लोग बड़ी चिन्तासे उसकी इस दशाको देखते थे ॥१०७॥


कदा नु तामहं कान्तां वीक्षे स्वाङ्कनिवेशिताम् । स्पृशन् कमलतुल्यानि गात्राणि कृतसंकथः ॥१०८॥

अर्थ: वह सोचा करता था कि मैं उस कान्ताको अपनी गोदमें बैठी कब देखूँगा और उसके कमलतुल्य शरीरका स्पर्श करता हुआ उसके साथ कब वार्तालाप करूँगा ॥१०८॥


श्रुत्वा तावदियं जाता ममावस्थातिदुःखदा । आलोक्य तां तु नो पश्यन् भवेयं पञ्चतां गतः ॥१०९॥

अर्थ: उसकी चर्चा सुनकर तो हमारी यह अत्यन्त दुःख देनेवाली अवस्था हो गयी है फिर साक्षात् देखकर तो न जाने क्या होगा ? उसे देखकर तो अवश्य ही मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगा ॥१०९॥


अहो महदिदं चित्रं मनोज्ञापि सखी मम । यदसौ दुःखभारस्य कारणत्वमुपागता ॥११०॥

अर्थ: अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है कि वह मेरी सखी मनोहर होकर भी मेरे लिए दुःखका कारण बन रही है ॥११०॥


अयि भद्रे कथं यस्मिन्नुष्यते हृदये त्वया । दग्धुं तदेव सक्तासि पण्डिते दुःखवह्निना ॥१११॥

अर्थ: अरी भली आदमिन ? तू तो बड़ी पण्डिता है फिर जिस हृदयमें निवास कर रही है उसे ही दुःखरूपी अग्निसे जलानेके लिए तैयार क्यों बैठी है ॥१११॥


मृदुचित्ताः स्वभावेन भवन्ति किल योषितः । मद्दुःखदानतो जातं विपरीतमिदं तव ॥११२॥

अर्थ: स्त्रियाँ स्वभावसे ही कोमलचित्त होती हैं पर मेरे लिए दुःख देनेके कारण तुम्हारे विषयमें यह बात विपरीत मालूम होती है ॥११२॥


अनङ्गः सन् व्यथामेतामनङ्ग त्वं करोषि मे । यदि नाम भवेत्साङ्गस्ततः कष्टतमं भवेत् ॥११३॥

अर्थ: हे अनंग ! जब तुम शरीररहित होकर भी इतनी पीड़ा उत्पन्न कर सकते हो तब फिर यदि शरीरसहित होते तो बड़ा ही कष्ट होता ॥११३॥


क्षतं न चास्ति मे देहे वेदना च गरीयसी । तिष्ठन्नेकत्र चोद्देशे भ्रमामि क्वापि संततम् ॥११४॥

अर्थ: मेरे शरीरमें यद्यपि घाव नहीं है तो भी पीड़ा अत्यधिक हो रही है और यद्यपि एक स्थानपर बैठा हूँ तो भी निरन्तर कहीं घूमता रहता हूँ ॥११४॥


दिवसानां त्रयं नैतन्मम क्षेमेण गच्छति । यदि तां विषयीभावमानयामि न चक्षुषः ॥११५॥

अर्थ: यदि मैं उसे नेत्रोंका विषय नहीं बनाता हूँ - उसे देखता नहीं हूँ तो मेरे ये तीन दिन कुशलतापूर्वक नहीं बीत सकेंगे ॥११५॥


अतस्तद्दर्शनोपायः कतरो मे भविष्यति । यस्याधिगमतश्चित्तं प्रशान्तिमधियास्यति ॥११६॥

अर्थ: इसलिए उसके दर्शनका उपाय क्या हो सकता है जिसे प्राप्त कर चित्त शान्ति प्राप्त करेगा ॥११६॥


अथवा सर्वकार्येषु साधनीयेषु विष्टपे । मित्रं परममुज्झित्वा कारणं नान्यदीक्ष्यते ॥११७॥

अर्थ: अथवा इस संसारमें करने योग्य समस्त कार्योंमें परममित्रको छोड़कर और दूसरा कारण नहीं दिखाई देता ॥११७॥


इति ध्यात्वा स्थितं पार्श्वे छायाबिम्बमिवानुगम् । विक्रियातः समुत्पन्नं शरीरं स्वमिवापरम् ॥११८॥

नाम्ना प्रहसितं मित्रं सर्वविश्रम्भभाजनम् । मन्दगद्गदया वाचा जगाद पवनञ्जयः ॥११९॥

अर्थ: ऐसा विचारकर पवनंजयने पास ही बैठे हुए प्रहसित नामक मित्रसे धीमी एवं गद्गद वाणीमें कहा। वह मित्र छायाके समान सदा पवनंजयके साथ रहता था। विक्रियासे उत्पन्न हुए उन्हींके दूसरे शरीरके समान जान पड़ता था और सर्व विश्वासका पात्र था ॥११८-११९॥


जानास्येव ममाकूतमतः किं ते निवेद्यते । केवलं मुखरत्वं मे करोत्यत्यन्तदुःखिताम् ॥१२०॥

अर्थ: उसने कहा कि मित्र ! तुम मेरा अभिप्राय जानते ही हो अतः तुमसे क्या कहा जाये ? मेरी मुखरता केवल तुम्हें दुःखी ही करेगी ॥१२०॥


सखे कस्य वदान्यस्य दुःखमेतन्निवेद्यते । मुक्त्वा त्वां विदिताशेषजगत्त्रयविचेष्टितम् ॥१२१॥

अर्थ: हे सखे ! तीनों लोकोंकी समस्त चेष्टाओंको जाननेवाले एक आपको छोड़कर दूसरा ऐसा कौन उदारचेता है जिसके लिए यह दुःख बताया जाये ? ॥१२१॥


कुटुम्बी क्षितिपालाय गुरवेऽन्तेवसन् प्रिया । पत्यै वैद्याय रोगार्तो मात्रे शैशवसंगतः ॥१२२॥

निवेद्य मुच्यते दुःखाद्यथात्यन्तपुरोरपि । मित्रायैवं नरः प्राज्ञस्ततस्ते कथयाम्यहम् ॥१२३॥

अर्थ: जिस प्रकार गृहस्थ राजाके लिए, विद्यार्थी गुरुके लिए, स्त्री पतिके लिए, रोगी वैद्यके लिए और बालक माताके लिए प्रकटकर बड़े भारी दुःखसे छूट जाता है उसी प्रकार मनुष्य मित्रके लिए प्रकटकर दुःखसे छूट जाता है इसी कारण मैं आपसे कुछ कह रहा हूँ ॥१२२-१२३॥


श्रुत्वैव तामहं हृद्यां महेन्द्रतनुसंभवाम् । मन्मथस्य शरैर्दूरं विकलत्वमुपागतः ॥१२४॥

अर्थ: जबसे मैंने अनवद्य सुन्दरी राजा महेन्द्रकी पुत्रीकी चर्चा सुनी है तभीसे मैं कामके बाणोंसे अत्यधिक विकलता प्राप्त कर रहा हूँ ॥१२४॥


तामदृष्ट्वातिचक्षुष्यां प्रियां मानसहारिणीम् । अतिवाहयितुं नाहं प्रभवामि दिनत्रयम् ॥१२५॥

अर्थ: मनको हरनेवाली उस सुन्दरी प्रियाको देखे बिना मैं तीन दिन बितानेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥१२५॥


अतो विधत्स्व तं यत्नं येन पश्यामि तामहम् । तद्दर्शनादहं स्वस्थो मयि स्वस्थे भवानपि ॥१२६॥

अर्थ: इसलिए ऐसा प्रयत्न करो कि जिससे मैं उसे देख सकूँ। क्योंकि उसके देखनेसे मैं स्वस्थ हो सकूँगा और मेरे स्वस्थ रहनेसे आप भी स्वस्थ रह सकेंगे ॥१२६॥


जीवितं ननु सर्वस्यादिष्टं सर्वशरीरिणाम् । सति तत्रान्यकार्याणामात्मलामस्य संभवः ॥१२७॥

अर्थ: निश्चयसे सब प्राणियोंके लिए अन्य समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा अपना जीवन ही इष्ट होता है क्योंकि उसके रहते हुए ही अन्य कार्योंका होना सम्भव है ॥१२७॥


एवमुक्तस्ततोऽवोचदाशु प्रहसितो हसन् । लब्धार्थमिव कुर्वाणः सद्यो मित्रस्य मानसम् ॥१२८॥

अर्थ: तदनन्तर मित्रके मनको मानो कृतकृत्य करता हुआ प्रहसित हँसकर शीघ्र ही बोला ॥१२८॥


सखे किं बहुनोक्तेन कृत्यकालातिपातिना । वद किं करवाणीति ननु नान्यत्वमावयोः ॥१२९॥

अर्थ: कि हे मित्र ! करने योग्य कार्यका उल्लंघन करनेवाले बहुत कहनेसे क्या मतलब है कहो, मैं क्या करूँ ? यथार्थमें हम दोनोंमें पृथक्पना नहीं हैं ॥१२९॥


यावत्तयोः समालापो वर्ततेऽयं सुचित्तयोः । तावत्तदुपकारीव गतोऽस्तं घर्मदीधितिः ॥१३०॥

अर्थ: उत्तम चित्तके धारक उन मित्रोंके बीच जबतक यह वार्तालाप चलता है तबतक सूर्य अस्त हो गया सो मानो उनका उपकार करनेके लिए ही अस्त हो गया था ॥१३०॥


प्राह्लादेरिव रागेण संध्यालोकेन भानुमान् । प्रेरितो ध्वान्तसंभूतिमिच्छता प्रियकारिणा ॥१३१॥

अर्थ: जो पवनंजयके रागके समान लाल-लाल था, अन्धकारके प्रसारको चाहता था और प्रिय करनेवाला था ऐसे सन्ध्याके आलोकसे प्रेरित होकर ही मानो सूर्य अस्त हुआ था ॥१३१॥


कान्तया रहितस्यास्य दुःखं दृष्ट्वैव संध्यया । करुणायुक्तया भर्त्ता तेजसामनुवर्तितः ॥१३२॥

अर्थ: कान्तासे रहित पवनंजयका दुःख देखकर ही मानो जिसे करुणा उत्पन्न हो गयी थी ऐसी सन्ध्या अपना पति जो सूर्य सो उसके पीछे चलने लगी थी - उसके अनुकूल हो गयी थी ॥१३२॥


ततो भास्करनाथस्य वियोगादिव कृष्णताम् । आशा पौरन्दरी प्राप तमसात्यन्तभूरिणा ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर पूर्व दिशा अत्यधिक अन्धकारसे कृष्णताको प्राप्त हो गयी सो मानो सूर्यरूप पतिके वियोगसे ही मलिन अवस्थाको प्राप्त हुई थी ॥१३३॥


नीलेनेव च वस्त्रेण क्षणाल्लोकस्तिरस्कृतः । रजो नीलाञ्जनस्येव प्रवृत्तं पतितुं घनम् ॥१३४॥

अर्थ: क्षण-भरमें लोक ऐसा दिखने लगा मानो नील वस्त्रसे ही आच्छादित हो गया हो अथवा नीलांजनकी सघन पराग ही सब ओर उड़-उड़कर गिरने लगी हो ॥१३४॥


ततः समुचिते काले तस्मिन् प्रस्तुतकर्मणः । इत्यवोचत सोत्साहः सुहृदं पवनंजयः ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर जब प्रकृत कार्यके योग्य समय आ गया तब उत्साहसे भरे पवनंजयने मित्रसे इस प्रकार कहा ॥१३५॥


उत्तिष्ठाग्रे सखे तिष्ठ कुरु मार्गोपदेशनम् । व्रजावस्तत्र सा यत्र तिष्ठति स्वान्तहारिणी ॥१३६॥

अर्थ: हे मित्र ! उठो, मार्ग दिखलाओ, हम दोनों वहाँ चलें जहाँ कि वह हृदयको हरनेवाली विद्यमान है ॥१३६॥


इत्युक्ते प्रस्थितौ गन्तुं पूर्वप्रस्थितमानसौ । मीनाविव महानीलनीलव्योमतलार्णवे ॥१३७॥

अर्थ: इतना कहनेपर दोनों मित्र वहाँके लिए चल पड़े । उनके मन उनके जानेके पूर्व ही प्रस्थान कर चुके थे और वे महानील मणिके समान नील आकाशतलरूपी समुद्रमें मछलियोंकी तरह जा रहे थे ॥१३७॥


क्षणेन च परिप्राप्तौ गृहमाञ्जनसुन्दरम् । सुन्दरं तत्समासत्त्या रत्नौघसममन्दरम् ॥१३८॥

अर्थ: दोनों मित्र क्षण-भरमें ही अंजनासुन्दरीके घर जा पहुँचे । उसका वह घर अंजनासुन्दरीके सन्निधानसे ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि रत्नोंके समूहसे सुमेरु पर्वत सुशोभित होता है ॥१३८॥


सप्तमं स्कन्धमारुह्य तस्य वातायनस्थितौ । मुक्ताजालतिरोधानावङ्गनां तामपश्यताम् ॥१३९॥

अर्थ: उस भवनके सातवें खण्डमें चढ़कर दोनों मित्र मोतियोंकी जालीसे छिपकर झरोखेमें बैठ गये और वहींसे अंजनासुन्दरीको देखने लगे ॥१३९॥


संपूर्णवक्त्रचन्द्रांशुविफलीकृतदीपिकाम् । सितासितारुणच्छायचक्षुःशारितदिङ्मुखाम् ॥१४०॥

अर्थ: वह अंजनासुन्दरी अपने मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमाकी किरणोंसे भवनके भीतर जलनेवाले दीपकोंको निष्फल कर रही थी तथा उसके सफेद, काले और लाल-लाल नेत्रोंकी कान्तिसे दिशाएँ रंग-बिरंगी हो रही थीं ॥१४०॥


आभोगिनौ समुत्तुङ्गौ प्रियार्थं हारिणौ कुचौ । कलशाविव बिभ्राणां शृङ्गाररसपूरितौ ॥१४१॥

अर्थ: वह स्थूल, उन्नत एवं सुन्दर स्तनोंको धारण कर रही थी उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो पतिके स्वागतके लिए श्रृंगार रससे भरे हुए दो कलश ही धारण कर रही थी ॥१४१॥


नवपल्लवसच्छायं पाणिपादं सुलक्षणम् । समुद्गिरदिवाभाति लावण्यं नखरश्मिभिः ॥१४२॥

अर्थ: नवीन पल्लवोंके समान लाल-लाल कान्तिको धारण करनेवाले तथा अनेक शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण उसके हाथ और पैर ऐसे जान पड़ते थे मानो नखरूपी किरणोंसे सौन्दर्यको ही उगल रहे हों ॥१४२॥


स्तनभारादिवोदारान्मध्यं भङ्गाभिशङ्कया । त्रिवलीदामभिर्बद्धं दधतीं तनुताभृतम् ॥१४३॥

अर्थ: उसकी कमर पतली तो थी ही ऊपरसे उसपर स्तनोंका भारी बोझ पड़ रहा है इसलिए वह कहीं टूट न जाये इस भयसे ही मानो उसे त्रिवलिरूपी रस्सियोंसे उसने कसकर बाँध रखा था ॥१४३॥


तूणौ मनोभुवः स्तम्भौ बन्धनं मदकामयोः । सुवृत्तौ बिभ्रतीमूरू नदौ लावण्यवाहिनौ ॥१४४॥

अर्थ: वह अंजना जिन गोल-गोल जाँघोंको धारण कर रही थी वे कामदेवके तरकसके समान, अथवा मद और कामके बाँधनेके स्तम्भके समान अथवा सौन्दर्यरूपी जलको बहानेवाली नदियोंके समान जान पड़ती थीं ॥१४४॥


इन्दीवरावलीछायां युक्तां मुक्ताफलोडुभिः । आसक्तां प्रियचन्द्रेण मूर्तामिव विभावरीम् ॥१४५॥

अर्थ: उसकी कान्ति इन्दीवर अर्थात् नील कमलोंके समूहके समान थी, वह मुक्ताफल-रूपी नक्षत्रोंसे सहित थी तथा पतिरूपी चन्द्रमा उसके पास ही विद्यमान था इसलिए वह मूर्तिधारिणी रात्रिके समान जान पड़ती थी ॥१४५॥


आसेचनकवीक्ष्यां तामेकतानस्थितेक्षणः । संप्राप्तः सुखितामुर्वीमैक्षिष्ट पवनंजयः ॥१४६॥

अर्थ: इस प्रकार जिसके देखनेसे तृप्ति ही नहीं होती थी ऐसी अंजनाको पवनंजय एकटक नेत्रोंसे देखता हुआ परम सुखको प्राप्त हुआ ॥१४६॥


अत्रान्तरे प्रियात्यन्तं वसन्ततिलकाभिधा । अभाषत सखी वाक्यमिदमञ्जनसुन्दरीम् ॥१४७॥

अहो परमधन्या त्वं सुरूपे भर्तृदारिके । पिता वायुकुमाराय यद्दत्तासि महौजसे ॥१४८॥

अर्थ: इसी बीचमें उसकी वसन्ततिलका नामकी अत्यन्त प्यारी सखीने अंजना सुन्दरीसे यह वचन कहे कि हे सुन्दरी ! राजकुमारी ! तुम बड़ी भाग्यशालिनी हो जो पिताने तुझे महाप्रतापी पवनंजयके लिए समर्पित किया है ॥१४७-१४८॥


गुणैस्तस्य जगत्सर्वं शशाङ्ककिरणामलैः । व्याप्तमन्यगुणख्यातितिरस्करणकारणैः ॥१४९॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल एवं अन्य मनुष्योंके गुणोंकी ख्यातिको तिरस्कृत करनेवाले उसके गुणोंसे यह समस्त संसार व्याप्त हो रहा है ॥१४९॥


कलशब्दा महारत्नप्रभापटलरञ्जिता । अङ्के स्थास्यति वीरस्य तस्य वेलेव वारिधेः ॥१५०॥

अर्थ: बड़ी प्रसन्नताकी बात है कि तुम समुद्रकी बेलाके समान महारत्नोंकी कान्तिके समूहसे प्रभासित हो, मनोहर शब्द करती हुई उसकी गोदमें बैठोगी ॥१५०॥


पतिता वसुधारा त्वं तटे रत्नमहीभृतः । श्लाघ्यसंबन्धजस्तोषो वधूनाममवत्परः ॥१५१॥

अर्थ: तुम्हारा उसके साथ सम्बन्ध होनेवाला है सो मानो रत्नाचलके तटपर रत्नोंकी धारा ही बरसनेवाली है । यथार्थमें स्त्रियोंके प्रशंसनीय सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाला सन्तोष ही सबसे बड़ा सन्तोष होता है ॥१५१॥


कीर्तयन्त्यां गुणानेवं तस्य सख्या सुमानसा । लिलेख लज्जयाङ्गुल्या कन्याङ्घ्रिनखमानता ॥१५२॥

अर्थ: इस प्रकार जब सखी वसन्तमाला पवनंजयके गुणोंका वर्णन कर रही थी तब अंजना मन ही मन प्रसन्न हो रही थी और लज्जाके कारण मुख नीचा कर अँगुलीसे पैरका नख कुरेद रही थी ॥१५२॥


नितान्तं च हतो दूरं पूरेणानन्दवारिणः । विकसन्नयनाम्भोजच्छन्नास्यः पवनंजयः ॥१५३॥

अर्थ: और खिले हुए नेत्रकमलोंसे जिसका मुख व्याप्त था ऐसे पवनंजयको आनन्दरूपी जलका प्रवाह बहुत दूर तक बहा ले गया था ॥१५३॥


नाम्नाथ मिश्रकेशीति वाक्यं सख्यपरावदत् । संकुचत्पृष्ठबिम्बोष्ठं धूतधम्मिलपल्लवम् ॥१५४॥

अर्थ: अथानन्तर मिश्रकेशी नामक दूसरी सखीने निम्नांकित वचन कहे । कहते समय वह अपने लाल-लाल ओठोंको भीतरकी ओर संकुचित कर रही थी तथा सिर हिलानेके कारण उसकी चोटीमें लगा पल्लव नीचे गिर गया था ॥१५४॥


अहो परममज्ञानं त्वया कथितमात्मनः । विद्युत्प्रभं परित्यज्य वायोर्गृह्णासि यद्गुणान् ॥१५५॥

अर्थ: उसने कहा कि चूँकि तू विद्युत्प्रभको छोड़कर पवनंजयके गुण ग्रहण कर रही है इससे तूने अपना बड़ा अज्ञान प्रकट किया है ॥१५५॥


कथा विद्युत्प्रभस्यास्मिन्मया स्वामिगृहे श्रुता । तस्मै देया न देयेयं कन्येति मुहुरुद्गता ॥१५६॥

अर्थ: मैंने राजमहलोंमें विद्युत्प्रभकी चर्चा कई बार सुनी है कि उसके लिए यह कन्या दी जाये अथवा नहीं दी जाये ॥१५६॥


उदन्वदम्भसो बिन्दुसंख्यानं योऽवगच्छति । तद्गुणानां मतिः पारं व्रजेत्तस्यामलत्विषाम् ॥१५७॥

अर्थ: जो समुद्रके जलकी बूँदोंकी संख्या जानता है उसीकी बुद्धि उसके निर्मल गुणोंका पार पा सकती है ॥१५७॥


युवा सौम्यो विनीतात्मा दीप्तो धीरः प्रतापवान् । पारेविद्यं स्थितः सर्वजगद्वाञ्छितदर्शनः ॥१५८॥

अर्थ: वह युवा है, सौम्य है, नम्र है, कान्तिमान् है, धीर-वीर है, प्रतापी है, विद्याओंका पारगामी है और समस्त संसार उसके दर्शनकी इच्छा करता है ॥१५८॥


विद्युत्प्रभो भवेदस्याः कन्याया यदि पुण्यतः । भर्ता ततोऽनया लब्धं जन्मनोऽस्य फलं भवेत् ॥१५९॥

अर्थ: यदि पुण्ययोगसे विद्युत्प्रभ इस कन्याका पति होता तो इसे इस जन्मका फल प्राप्त हो जाता ॥१५९॥


वसन्तमालिके भेदो वायोर्विद्युत्प्रभस्य च । स गतो जगति ख्यातिं गोष्पदस्याम्बुधेश्च यः ॥१६०॥

अर्थ: हे वसन्तमालिके ! पवनंजय और विद्युत्प्रभके बीच संसारमें वही भेद प्रसिद्ध है जो कि गोष्पद और समुद्रके बीच होता है ॥१६०॥


असौ संवत्सरैरल्पैर्मुनितां यास्यतीति सः । अस्याः पित्रा परित्यक्तस्तन्मे नाभाति शोभनम् ॥१६१॥

अर्थ: वह थोड़े ही वर्षोंमें मुनिपद धारण कर लेगा इस कारण इसके पिताने उसकी उपेक्षा की है पर यह बात मुझे अच्छी नहीं मालूम होती ॥१६१॥


वरं विद्युत्प्रभेणामा क्षणोऽपि सुखकारणम् । सत्रानन्तोऽपि नान्येन कालः क्षुद्रासुधारिणा ॥१६२॥

अर्थ: विद्युत्प्रभके साथ इसका एक क्षण भी बीतता तो वह सुखका कारण होता और अन्य क्षुद्र प्राणीके साथ अनन्त भी काल बीतेगा तो भी वह सुखका कारण नहीं होगा ॥१६२॥


ततः प्राह्लादिरित्युक्ते क्रोधानलविदीपितः । क्षणाच्छायापरोवर्तं संप्राप्तः पुरुवेपथुः ॥१६३॥

अर्थ: तदनन्तर मिश्रकेशीके ऐसा कहते ही पवनंजय क्रोधाग्निसे देदीप्यमान हो गया, उसका शरीर काँपने लगा और क्षण-भरमें ही उसकी कान्ति बदल गयी ॥१६३॥


दष्टाधरः संमाकर्षन् सायकं परिवारतः । निरीक्षणस्फुरच्छोणच्छायाच्छन्नदिगाननः ॥१६४॥

अर्थ: ओठ चाबते हुए उसने म्यानसे तलवार बाहर खींच ली और नेत्रोंसे निकलती हुई लाल-लाल कान्तिसे दिशाओंका अग्र भाग व्याप्त कर दिया ॥१६४॥


ऊचे प्रहसितावश्यमस्या एवेदमीप्सितम् । कन्याया यद्वदत्येवमियं नारी जुगुप्सितम् ॥१६५॥

अर्थ: उसने मित्रसे कहा कि हे प्रहसित ! यह बात अवश्य ही इस कन्याके लिए इष्ट होगी तभी तो यह स्त्री इसके समक्ष इस घृणित बातको कहे जा रही है ॥१६५॥


लुनाम्यतोऽनयोः पश्य मूर्धानमुभयोरपि । विद्युत्प्रभोऽधुना रक्षां करोतु हृदयप्रियः ॥१६६॥

अर्थ: इसलिए देखो, मैं अभी इन दोनोंका मस्तक काटता हूँ। हृदयका प्यारा विद्युत्प्रभ इस समय इनकी रक्षा करे ॥१६६॥


समाकर्ण्य ततो वाक्यं मैत्रं प्रहसितो रुषा । जगाद भ्रकुटीबन्धभीषणालिकपट्टिकः ॥१६७॥

सखे सखेऽलमेतेन यत्नेनागोचरे तव । ननु ते सायकस्यारिनिरनाशः प्रयोजनम् ॥१६८॥

अर्थ: तदनन्तर मित्रके वचन सुनकर क्रोधसे जिसका ललाटतट भौंहोंसे भयंकर हो रहा था ऐसा प्रहसित बोला कि मित्र ! मित्र ! अस्थानमें यह प्रयत्न रहने दो। तुम्हारी तलवारका प्रयोजन तो शत्रुजनोंका नाश करना है न कि स्त्रीजनोंका नाश करना ॥१६७-१६८॥


अतः पश्यत वाक्रोशप्रसक्तां दुष्टयोषितम् । इमामेतेन दण्डेन करोमि गतजीविताम् ॥१६९॥

अर्थ: अतः देखो, निन्दामें तत्पर इस दुष्ट स्त्रीको मैं इन डण्डेसे ही निर्जीव किये देता हूँ ॥१६९॥


ततो दृष्ट्वास्य संरम्भं महान्तं पवनंजयः । विस्मृतात्मीयसंरम्भः खड्गं कोशं प्रतिक्षिपन् ॥१७०॥

अर्थ: तदनन्तर पवनंजय, प्रहसितके महाक्रोधको देखकर अपना क्रोध भूल गया, उसने तलवार म्यानमें वापस डाल ली ॥१७०॥


निजप्रकृतिसंप्राप्तिप्रवणाशेषविग्रहः । जगाद सुहृदं क्रूरकर्मनिश्चितमानसम् ॥१७१॥

अर्थ: और उसका समस्त शरीर अपने स्वभावकी प्राप्तिमें निपुण हो गया अर्थात् उसका क्रोध शान्त हो गया। तदनन्तर उसने क्रूर कार्यमें दृढ़ मित्रसे कहा ॥१७१॥


अयि मित्र शमं गच्छ तवाप्येष न गोचरः । कोपस्यानेकसंग्रामजयोपार्जनशालिनः ॥१७२॥

अर्थ: कि हे मित्र ! शान्तिको प्राप्त होओ। अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त करनेसे सुशोभित रहनेवाले तुम्हारे क्रोधका भी ये स्त्रियाँ विषय नहीं हैं ॥१७२॥


इतरस्यापि नो युक्तं कर्तुं नारीविपादनम् । किं पुनस्तव मत्तेभकुम्भदारणकारिणः ॥१७३॥

अर्थ: अन्य मनुष्यके लिए भी स्त्रीजनका घात करना योग्य नहीं है फिर तुम तो मदोन्मत्त हाथियोंके गण्डस्थल चीरनेवाले हो अतः तुम्हें युक्त कैसे हो सकता है ? ॥१७३॥


पुंसां कुलप्रसूतानां गुणख्यातिमुपेयुषाम् । यशो मलिनताहेतुं कर्तुमेवमसांप्रतम् ॥१७४॥

अर्थ: उच्च कुलमें उत्पन्न तथा गुणोंकी ख्यातिको प्राप्त पुरुषोंके लिए इस प्रकार यशकी मलिनता करनेवाला कार्य करना योग्य नहीं है ॥१७४॥


तस्मादुत्तिष्ठ गच्छावस्तेनैव पुनरध्वना । विचित्रा चेतसो वृत्तिर्जनस्यात्र न कुप्यते ॥१७५॥

अर्थ: इसलिए उठो उसी मार्गसे पुनः वापस चलें। मनुष्यकी मनोवृत्ति भिन्न प्रकारकी होती है अतः उसपर क्रोध करना उचित नहीं है ॥१७५॥


नूनमस्याः प्रियोऽसौ ना कन्याया येन पार्श्वगाम् । मज्जुगुप्सनसंसक्तां न मनागप्यवीवदत् ॥१७६॥

अर्थ: निश्चित ही वह विद्युत्प्रभ इस कन्याके लिए प्यारा होगा तभी तो पास बैठकर मेरी निन्दा करनेवाली इस स्त्रीसे उसने कुछ नहीं कहा ॥१७६॥


ततः समागतौ ज्ञातौ न केनचिदिमौ भृशम् । स्वैरं निःसृत्य निर्य्यूहाद् गतौ वसतिमात्मनः ॥१७७॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके आनेका किसीको कुछ भी पता नहीं था ऐसे दोनों मित्र झरोखेसे बाहर निकलकर अपने डेरेमें चले गये ॥१७७॥


ततः परममापन्नो विरागं पवनंजयः । इति चिन्तनमारेभे प्रशान्तहृदयो भृशम् ॥१७८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका हृदय अत्यन्त शान्त था ऐसा पवनंजय परम वैराग्यको प्राप्त होकर इस प्रकार विचार करने लगा कि ॥१७८॥


संदेहविषमावर्ता दुर्भावग्रहसंकुला । दूरतः परिहर्तव्या पररक्ताङ्गनापगा ॥१७९॥

अर्थ: जिसमें सन्देहरूपी विषम भँवरें उठ रही हैं और जो दुष्टभावरूपी मगरमच्छोंसे भरी हुई हैं ऐसी पर-पुरुषासक्त स्त्रीरूपी नदीका दूरसे ही परित्याग करना चाहिए ॥१७९॥


कुभावगहनात्यन्तं हृषीकव्यालजालिनी । बुधेन नार्यरण्यानी सेवनीया न जातुचित् ॥१८०॥

अर्थ: जो खोटे भावोंसे अत्यन्त सघन है तथा जिसमें इन्द्रियरूपी दुष्ट जीवोंका समूह व्याप्त है ऐसी यह स्त्री एक बड़ी अटवीके समान है, विद्वज्जनोंको कभी इसकी सेवा नहीं करनी चाहिए ॥१८०॥


किं राजसेवनं शत्रुसमाश्रयसमागमम् । श्लथं मित्रं स्त्रियं चान्यसक्तां प्राप्य कुतः सुखम् ॥१८१॥

अर्थ: जिसका अपने शत्रुके साथ सम्पर्क है ऐसे राजाकी सेवा करनेसे क्या लाभ है ? इसी प्रकार शिथिल मित्र और परपुरुषासक्त स्त्रीको पाकर सुख कहाँसे हो सकता है ? ॥१८१॥


इष्टान् बन्धून् सुतान् दारान् बुधा मुञ्चन्त्यसत्कृताः । पराभवजलाध्माताः क्षुद्राः नश्यन्ति तत्र तु ॥१८२॥

अर्थ: जो विज्ञ पुरुष हैं वे अनादृत होनेपर इष्ट-मित्रों, बन्धुजनों, पुत्रों और स्त्रियोंको छोड़ देते हैं पर जो क्षुद्र मनुष्य हैं वे पराभवरूपी जलमें डूबकर वहीं नष्ट हो जाते हैं ॥१८२॥


मदिरारागिणं वैद्यं द्विपं शिक्षाविवर्जितम् । अहेतुवैरिणं क्रूरं धर्मं हिंसनसंगतम् ॥१८३॥

मूर्खगोष्ठी कुमर्यादं देशं चण्डं शिशुं नृपम् । वनितां च परासक्तां सूरिर्दूरेण वर्जयेत् ॥१८४॥

अर्थ: मदिरापानमें राग रखनेवाला वैद्य, शिक्षा रहित हाथी, अहेतुक वैरी, हिंसापूर्ण दुष्ट धर्म, मूर्खोंकी गोष्ठी, मर्यादाहीन देश, क्रोधी तथा बालक राजा और परपुरुषासक्त स्त्री - बुद्धिमान् मनुष्य इन सबको दूरसे ही छोड़ देवे ॥१८३-१८४॥


एवं चिन्तयतस्तस्य कन्याप्रीतिरिवागता । क्षयं विभावरी तूर्यमाहतं च प्रबोधकम् ॥१८५॥

अर्थ: ऐसा विचार करते हुए पवनंजयकी रात्रि कन्याकी प्रीतिके समान क्षयको प्राप्त हो गयी और जगानेवाले बाजे बज उठे ॥१८५॥


ततः संध्याप्रकाशेन कौशिकीर्या दिगावृता । पवनंजयनिर्मुक्तरागेणेव निरन्तरम् ॥१८६॥

अर्थ: तदनन्तर सन्ध्याकी लालीसे पूर्व दिशा आच्छादित हो गयी सो ऐसी जान पड़ती थी मानो पवनंजयके द्वारा छोड़े हुए रागसे ही निरन्तर आच्छादित हो गयी थी ॥१८६॥


उदियाय च तिग्मांशुः स्त्रीकोपादिव लोहितम् । दधानस्तरलं बिम्बं जगच्चेष्टितकारणम् ॥१८७॥

अर्थ: और जो स्त्रीके क्रोधके कारण ही मानो लाल-लाल दिख रहा था तथा जो जगत्की चेष्टाओंका कारण था ऐसे चंचल बिम्बको धारण करता हुआ सूर्य उदित हुआ ॥१८७॥


ततो वहन्विरागेण नितान्तमलसां तनुम् । ऊचे प्रहसितं जायाविमुखः पवनंजयः ॥१८८॥

अर्थ: तदनन्तर विरागके कारण अत्यन्त अलस शरीरको धारण करता स्त्रीविमुख पवनंजय प्रहसित मित्रसे बोला कि ॥१८८॥


सखेऽत्र न समीपेऽपि युज्यतेऽवस्थितिर्मम । तत्सक्तपवनासंगो माभूदिति ततः शृणु ॥१८९॥

उत्तिष्ठ स्वपुरं यामो न युक्तमवलम्बनम् । सेना प्रयाणशङ्खेन कार्यतामवबोधिनी ॥१९०॥

अर्थ: हे मित्र ! उससे सम्पर्क रखनेवाली वायुका स्पर्श न हो जाये इसलिए यहाँ समीपमें भी मेरा रहना उचित नहीं है अतः सुनो और उठो-अपने नगरकी ओर चलें, यहाँ विलम्ब करना उचित नहीं है। प्रस्थान कालमें बजनेवाले शंखसे सेनाको सावधान कर दो ॥१८९-१९०॥


तथेति कारिते तेन क्षुब्धसागरसंनिभा । चचाल सा चमूः क्षिप्रं कृतयानोचितक्रिया ॥१९१॥

अर्थ: तदनन्तर शंखध्वनि होनेपर जो क्षुभित सागरके समान जान पड़ती थी तथा जिसने प्रस्थान कालके योग्य सर्व कार्य कर लिये थे ऐसी सेना शीघ्र ही चल पड़ी ॥१९१॥


ततो रथाश्वमातङ्गपादातप्रभवो महान् । शब्दो भेर्यादिजन्मा च कन्यायाः श्रवणेऽविशत् ॥१९२॥

अर्थ: तत्पश्चात् रथ, घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही और भेरी आदिसे उत्पन्न हुआ शब्द कन्याके कानमें प्रविष्ट हुआ ॥१९२॥


प्रयाणसूचिना तेन नितान्तं दुःखिताभवत् । विशता मुद्गराघातवेगतः शङ्कुनेव सा ॥१९३॥

अर्थ: प्रस्थानको सूचित करनेवाले उस शब्दसे कन्या अत्यन्त दुःखी हुई मानो मुद्गर प्रहार सम्बन्धी वेगसे प्रवेश करनेवाली कीलसे पीड़ित ही हुई थी ॥१९३॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं दत्त्वा मे विधिना हृतम् । निधानं किं करोम्यत्र कथमेतद्भविष्यति ॥१९४॥

अर्थ: वह विचार करने लगी कि हाय-हाय, बड़े खेदकी बात है कि विधाताने मेरे लिए खजाना देकर छीन लिया। मैं क्या करूँ ? अब कैसा क्या होगा ? ॥१९४॥


अङ्केऽस्य पुरुषेन्द्रस्य क्रीडिष्यामीति ये कृताः । तेऽन्यथैव परावृत्ता मन्दाया मे मनोरथाः ॥१९५॥

अर्थ: इस श्रेष्ठ पुरुषकी गोदमें क्रीड़ा करूँगी इस प्रकारके जो मनोरथ मैंने किये थे मुझ अभागिनीके वे सब मनोरथ अन्यथा ही परिणत हो गये और रूप ही बदल गये ॥१९५॥


क्रियमाणमिमं ज्ञात्वा कथंचिन्निन्दमेतया । वैरिणीभूतया सख्या मयि स्याद् द्वेषमागतः ॥१९६॥

अर्थ: इस वैरिन सखीने जो उनकी निन्दा की थी जान पड़ता है.कि किसी तरह उन्हें इसका ज्ञान हो गया है इसीलिए वे मुझपर द्वेष करने लगे हैं ॥१९६॥


विवेकरहितामेतां धिक्पापां क्रूरभाषिणीम् । यथा मे दयितोऽवस्थामीदृशीमेष लम्भितः ॥१९७॥

अर्थ: विवेकरहित, पापिनी तथा क्रूर वचन बोलनेवाली इस सखीको धिक्कार है जिसने कि मेरे प्रियतमको यह अवस्था प्राप्त करा दी ॥१९७॥


कुर्यान्मह्यं हितं तातो जीवितेशं निवर्तयेत् । अपि नाम भवेदस्य बुद्धिर्व्यावर्तनं प्रति ॥१९८॥

अर्थ: पिताजी यदि हृदयवल्लभको लौटा सकें तो मेरा बड़ा हित करेंगे और क्या इनकी भी लौटनेकी बुद्धि होगी ॥१९८॥


तत्त्वतो यदि नाथो मे परित्यागं करिष्यति । आहारवर्जनं कृत्वा ततो यास्यामि पञ्चताम् ॥१९९॥

अर्थ: यदि सचमुच ही हृदयवल्लभ मेरा परित्याग करेंगे तो मैं आहार त्याग कर मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी ॥१९९॥


इति संचिन्तयन्ती सा प्राप्ता मूर्च्छां महीतले । पपाताश्चर्यनिर्मुक्ता लूनमूललता यथा ॥२००॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करती हुई अंजना मूर्छित हो छिन्नमूल लताके समान पृथिवीपर गिर पड़ी ॥२००॥


ततः किमिदमित्युक्त्वा संभ्रमं परमागते । शीतलक्रियया सख्यौ चक्रतुस्तां विमूर्च्छिताम् ॥२०१॥

अर्थ: तदनन्तर ‘यह क्या है ?’ ऐसा कहकर परम उद्वेगको प्राप्त हुई दोनों सखियोंने शीतलोपचारसे उसे मूर्छारहित किया ॥२०१॥


पृच्छयमाना च यत्नेन मूर्च्छाहेतुं श्लथाङ्गिका । शशाक त्रपया वक्तुं न सा स्तिमितलोचना ॥२०२॥

अर्थ: उस समय उसका समस्त शरीर ढीला हो रहा था और नेत्र निश्चल थे। सखियोंने प्रयत्नपूर्वक उससे मूर्छाका कारण पूछा पर वह लज्जाके कारण कुछ कह न सकी ॥२०२॥


अथ वायुकुमारस्य सेनायामिति मानवाः । आकुला मानसे चक्रुरहेतुगतिविस्मिताः ॥२०३॥

अविधायेप्सितं कस्मादयं गन्तुं समुद्यतः । कोपोऽस्य जनितः केन केन वा चोदितोऽन्यथा ॥२०४॥

अर्थ: अथानन्तर वायुकुमार ( पवनंजय ) की सेनाके लोग इस अकारण गमनसे चकित हो बड़ी आकुलताके साथ-मनमें विचार करने लगे कि यह कुमार इच्छित कार्यको पूरा किये बिना ही जानेके लिए उद्यत क्यों हो गया है ? इसे किसने क्रोध उत्पन्न कर दिया ? अथवा किसने इसे विपरीत प्रेरणा दी है ? ॥२०३-२०४॥


विद्यते सर्वमेवास्य कन्योपादानकारणम् । अतः किमित्ययं कस्मादभूदपगताशयः ॥२०५॥

अर्थ: इसके कन्या ग्रहण करनेकी समस्त तैयारी है ही फिर यह किस कारण उदासीन हो गया है ? ॥२०५॥


हसित्वा केचिदित्यूचुर्नामास्येदं सहार्थकम् । पवनंजय इत्येष यस्माज्जेतास्य वेगतः ॥२०६॥

अर्थ: कितने ही लोग हँसकर कहने लगे कि चूँकि इसने वेगसे पवनको जीत लिया है इसलिए इसका ‘पवनंजय’ यह नाम सार्थक है ॥२०६॥


ऊचुरन्येऽयमद्यापि न जानात्यङ्गनारसम् । नूनं येन विहायेमां कन्यां गंतुं समुद्यतः ॥२०७॥

अर्थ: कुछ लोग कहने लगे कि यह अभी तक स्त्रीका रस जानता नहीं है इसीलिए तो यह इस कन्याको छोड़कर जानेके लिए उद्यत हुआ है ॥२०७॥


यदि स्यादस्य विज्ञाता रतिः परमुदारजा । बद्धः स्यात्प्रेमबन्धेन ततो वनगजो यथा ॥२०८॥

अर्थ: यदि इसे उत्तम रतिका ज्ञान होता तो यह जंगली हाथीके समान उसके प्रेमपाशमें सदा बँधा रहता ॥२०८॥


इत्युपांशुकृतालापसामन्तशतमध्यगः । वेगवद्वाहनो गन्तुं प्रवृत्तः पवनंजयः ॥२०९॥

अर्थ: इस प्रकार एकान्तमें वार्तालाप करनेवाले सैकड़ों सामन्तोंके बीच खड़ा हुआ पवनंजय वेगशाली वाहनपर आरूढ हो चलनेके लिए प्रवृत्त हुआ ॥२०९॥


ततः कन्यापिता ज्ञात्वा प्रयाणं तस्य संभ्रमात् । समस्तैर्बन्धुभिः सार्धमाजगाम समाकुलैः ॥२१०॥

अर्थ: तदनन्तर जब कन्याके पिताको इसके प्रस्थानका पता चला तब वह हड़बड़ाकर घबड़ाये हुए समस्त बन्धुजनोंके साथ वहाँ आया ॥२१०॥


प्रह्लादेन समं तेन ततोऽसावित्यभाष्यत । भद्रेदं गमनं कस्मात्क्रियते शोककारणम् ॥२११॥

ननु केन किमुक्तोऽसि कस्य नेष्टोऽसि शोभन । चिन्तयत्यपि नो कश्चिद्यत्ते बुध न रोचते ॥२१२॥

अर्थ: उसने प्रह्लादके साथ मिलकर कुमारसे इस प्रकार कहा कि हे भद्र ! शोकका कारण जो यह गमन है सो किसलिए किया जा रहा है ? आपसे किसने क्या कह दिया ? हे भद्र पुरुष ! आप किसे प्रिय नहीं हैं ? हे विद्वन् ! जो बात आपके लिए नहीं रुचती हो उसका तो यहां कोई विचार ही नहीं करता ॥२११-२१२॥


पितुर्मम च ते वाक्यं दोषे सत्यपि युज्यते । कर्तुं किमुत निःशेषदोषसङ्गविवर्जितम् ॥२१३॥

अर्थ: दोष रहते हुए भी आपको मेरे तथा पिताके वचन मानना उचित है फिर यह कार्य तो समस्त दोषोंसे रहित है अतः इसका करना अनुचित कैसे हो सकता है ? ॥२१३॥


ततः सूरे निवर्तस्व क्रियतां नौवमीप्सितम् । भवादृशां गुरोराज्ञा नन्वानन्दस्य कारणम् ॥२१४॥

अर्थ: इसलिए हे विद्वन् ! लौटो और हम दोनोंका मनोरथ पूर्ण करो । आप जैसे पुरुषोंके लिए पिताकी आज्ञा तो आनन्दका कारण होना चाहिए ॥२१४॥


इत्युक्त्वापत्यरागेण वीरो विनतमस्तकः । श्वसुरेण धृतः पाणौ जनकेन च सादरम् ॥२१५॥

अर्थ: इतना कहकर श्वसुर तथा पिताने सन्तानके राग वश नतमस्तक वीर पवनंजयका बड़े आदरसे हाथ पकड़ा ॥२१५॥


ततस्तद्गौरवं भङ्क्तुमसमर्थो न्यवर्तत । दध्याविति च कन्यायाः कोपाद्दुःखस्य कारणम् ॥२१६॥

अर्थ: तत्पश्चात् 'श्वसुर और पिताके गौरवका भंग करनेके लिए असमर्थ होता हुआ पवनंजय वापिस लौट आया और क्रोधवश कन्याको दुःख पहुँचानेवाले कारणका इस प्रकार विचार करने लगा ॥२१६॥


समुह्य शातयाम्येनां दुःखेनासङ्गजन्मना । येनान्यतोऽपि नैवेषा प्राप्नोति पुरुषात्सुखम् ॥२१७॥

अर्थ: अब मैं इस कन्याको विवाह कर असमागमसे उत्पन्न दुःखके द्वारा सदा दुःखी करूँगा । क्योंकि विवाहके बाद यह अन्य पुरुषसे भी सुख प्राप्त नहीं कर सकेगी ॥२१७॥


चकार विदितार्थं च मित्रं तेने च भाषितः । साधु ते विदितं बुद्ध्या मयाप्येतन्निरूपितम् ॥२१८॥

अर्थ: पवनंजयने अपना यह विचार मित्रके लिए बतलाया और उसने भी उत्तर दिया कि ठीक है यही बात मैं कह रहा था जिसे तुमने अपनी बुद्धिसे स्वयं समझ लिया ॥२१८॥


निवृत्तं दयितं श्रुत्वा कन्यायाः संमदोऽभवत् । निरन्तरसमुद्भिन्नरोमाञ्चाशेषविग्रहः ॥२१९॥

अर्थ: प्रियतमको लौटा सुनकर कन्याको बहुत हर्ष हुआ । उसके समस्त शरीरमें रोमांच निकल आये ॥२१९॥


ततः समयमासाद्य तयोर्वैवाहमङ्गलम् । प्रस्तुतं बन्धुभिः कर्तुं प्राप्तसर्वसमीहितम् ॥२२०॥

अर्थ: तदनन्तर समय पाकर बन्धुजनोंने दोनोंका विवाहरूप मंगल किया जिससे सबके मनोरथ पूर्ण हुए ॥२२०॥


अशोकपल्लवस्पर्शः कन्यायाः स करोऽभवत् । विरक्तचेतसस्तस्य कृशानुरशनोपमः ॥२२१॥

अर्थ: यद्यपि कन्याका हाथ अशोकपल्लवके समान शीत स्पर्शवाला था पर उस विरक्त चित्तके लिए वह अग्निकी मेखलाके समान अत्यन्त उष्ण जान पड़ा ॥२२१॥


अनिच्छतो गता दृष्टिः कथंचित्तस्य तत्तनौ । क्षणमात्रमपि स्थातुं न सेहे तुल्यविद्युति ॥२२२॥

अर्थ: बिजली-की तुलना करनेवाले अंजनाके शरीरपर किसी तरह इच्छाके बिना ही पवनंजयकी दृष्टि गयी तो सही पर वह उसपर क्षण भरके लिए भी नहीं ठहर सकी ॥२२२॥


एष भावं न वेत्तास्या इति विज्ञाय पावकः । स्फुटल्लाजसमूहेन जहासैव कृतस्वनम् ॥२२३॥

अर्थ: यह पवनंजय इस कन्याके भावको नहीं समझ रहा है यह जानकर ही मानो चटकती हुई लाईके बहाने अग्नि शब्द करती हुई हँस रही थी ॥२२३॥


ततो विधानयोगेन कृत्वोपयमनं तयोः । परमं प्रमुदं प्राप्ताः सशब्दाः सर्वबान्धवाः ॥२२४॥

अर्थ: इस तरह विधिपूर्वक दोनोंका विवाह कर शब्द करते हुए समस्त बन्धुजन परम हर्षको प्राप्त हुए ॥२२४॥


नानाद्रुमलताकीर्णे फलपुष्पविराजिते । मासं तत्र वने कृत्वा विभूत्या परमोत्सवम् ॥२२५॥

अर्थ: नाना वृक्ष और लताओंसे व्याप्त तथा फल-फूलोंसे सुशोभित उस वनमें सब लोग बड़े वैभवसे महोत्सव करते रहे ॥२२५॥


यथोचितं कृतालापाः कृतपूजाः परस्परम् । यथास्वं ते ययुः सर्वे वियोगाद् दुःखिताः क्षणम् ॥२२६॥

अर्थ: तदनन्तर परस्पर वार्तालाप और यथा योग्य सत्कार कर सब लोग यथा स्थान गये । जाते समय सब लोग वियोगके कारण क्षण भरके लिए दुःखी हो उठे थे ॥२२६॥


अविदिततत्त्वस्थितयो विदधति यज्जन्तवः परेऽशर्म । तत्तत्र मूलहेतौ कर्मरवौ तापके दृष्टम् ॥२२७॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! तत्त्वकी स्थितिको नहीं समझनेवाले प्राणी दूसरेके लिए जो दुःख अथवा सुख पहुँचाते हैं उसमें मूल कारण सन्ताप पहुँचानेवाला कर्म रूपी सूर्य ही है अर्थात् कर्मके अनुकूल या प्रतिकूल रहनेपर ही दूसरे लोग किसीको सुख या दुःख पहुँचा सकते हैं ॥२२७॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरितेऽञ्जनासुन्दरीविवाहाभिधानं नाम पञ्चदशं पर्व ॥१५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें अञ्जनासुन्दरीके विवाहका कथन करनेवाला पन्द्रहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१५॥

१६. षोडशं पर्व (पवनाञ्जनासंभोगाभिधानं)

ततोऽसंभाषणादस्याश्चक्षुषश्चानिपातनात् । चकार परमं दुःखं वायुरज्ञाततन्मनाः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर पवनंजयने अंजनाको विवाह कर ऐसा छोड़ा कि उससे कभी बात भी नहीं करते थे, बात करना तो दूर रहा आँख उठाकर भी उस ओर नहीं देखते थे। इस तरह वे उसे बहुत दुःख पहुँचा रहे थे। इस घटनासे अंजनाके मनमें कितना दुःख हो रहा था इसका उन्हें बोध नहीं था ॥१॥


रात्रावपि न सा लेभे निन्द्रां विद्राणलोचना । अनारतगलद्बाष्पमलिनौ दधती स्तनौ ॥२॥

अर्थ: उसे रात्रिमें भी नींद नहीं आती थी, सदा उसके नेत्र खुले रहते थे। उसके स्तन निरन्तर अश्रुओंसे मलिन हो गये थे ॥२॥


वायुमप्यभिनन्दन्ती दयितेनैकनामकम् । तन्नामश्रवणोत्कण्ठावष्टब्धश्रवणा भृशम् ॥३॥

अर्थ: पतिके समान नामवाले पवन अर्थात् वायुको भी वह अच्छा समझती थी - सदा उसका अभिनन्दन करती थी और पतिका नाम सुननेके लिए सदा अपने कान खड़े रखती थी ॥३॥


कुर्वती मानसे रूपं तस्य वेद्यां निरूपितम् । अस्पष्टं क्षणनिश्चेष्टस्थिता स्तिमितलोचना ॥४॥

अर्थ: उसने विवाहके समय वेदीपर जो पतिका अस्पष्टरूप देखा था उसीका मनमें ध्यान करती रहती थी। वह क्षण-क्षणमें निश्चेष्ट हो जाती थी और उसके नेत्र निश्चल रह जाते थे ॥४॥


अन्तर्निरूप्य वाञ्छन्ती बहिरप्यस्य दर्शनम् । कुर्वती लोचने स्पष्टे यात्यदृष्टे पुनः शुचम् ॥५॥

अर्थ: वह हृदयमें पतिको देखकर बाहर भी उनका दर्शन करना चाहती थी इसलिए नेत्रोंको पोंछकर ठीक करती थी पर जब बाह्यमें उनका दर्शन नहीं होता था तो पुनः शोकको प्राप्त हो जाती थी ॥५॥


सकृदस्पष्टदृष्टत्वाच्चित्रकर्माणि कृच्छ्रतः । लिखन्ती वेपथुग्रस्तहस्तप्रच्युतवर्तिका ॥६॥

अर्थ: उसने एक ही बार तो पतिका रूप देखा था इसलिए बड़ी कठिनाईसे वह उनका चित्र खींच पाती थी उतने पर भी हाथ बीच-बीचमें काँपने लगता था जिससे तूलिका छूटकर नीचे गिर जाती था ॥६॥


संचारयन्ती कृच्छ्रेण वदनं करतः करम् । कृशीभूतसमस्ताङ्गश्लथसस्वनभूषणा ॥७॥

अर्थ: वह इतनी निर्बल हो चुकी थी कि मुखको एक हाथसे दूसरे हाथ पर बड़ी कठिनाईसे ले जा पाती थी। उसके समस्त अंग इतने कृश हो गये थे कि उनसे आभूषण ढीले हो होकर शब्द करते हुए नीचे गिरने लगे थे ॥७॥


दीर्घोष्णतरनिश्वासदग्धपाणिकपोलिका । अंशुकस्यापि भारेण खेदमङ्गेषु बिभ्रती ॥८॥

अर्थ: उसकी लम्बी और अतिशय गरम साँससे हाथ तथा कपोल दोनों ही जल गये थे । उसके शरीर पर जो महीन वस्त्र था उसीके भारसे वह खेदका अनुभव करने लगी थी ॥८॥


निन्दन्ती भृशमात्मानं स्मरन्ती पितरौ मुहुः । दधाना हृदयं शून्यं क्षणं निष्पन्दविग्रहा ॥९॥

अर्थ: वह अपने आपकी अत्यधिक निन्दा करती हुई बार-बार माता-पिताका स्मरण करती थी तथा शून्य हृदयको धारण करती हुई क्षण-क्षणमें निश्चेष्ट अर्थात् मूर्च्छित हो जाती थी ॥९॥


दुःखनिःसृतया वाचा वाष्पसंरुद्धकण्ठतः । उपालम्भं प्रयच्छन्ती दैवायात्यन्तविक्लवा ॥१०॥

अर्थ: कण्ठके वाष्पावरुद्ध होनेके कारण दुःखसे निकले हुए वचनोंसे वह सदा अपने भाग्यको उलाहना देती रहती थी। अत्यन्त दुःखी जो वह थी ॥१०॥


करैः शीलकरस्यापि बिभ्रती दाहमुत्तमम् । प्रासादेऽपि विनिर्यान्ती याति मूर्च्छां पुनः पुनः ॥११॥

अर्थ: वह चन्द्रमाकी किरणोंसे भी अधिक दाहका अनुभव करती थी और महलमें भी चलती थी तो बार-बार मूर्च्छित हो जाती थी ॥११॥


अयि नाथ तवाङ्गानि मनोज्ञानि कथं मम । अङ्गानां हृदयस्थानि कुर्वते तापमुत्तमम् ॥१२॥

अर्थ: हे नाथ ! तुम्हारे मनोहर अंग मेरे हृदयमें विद्यमान हैं फिर वे अत्यधिक सन्ताप क्यों उत्पन्न कर रहे हैं ? ॥१२॥


ननु ते जनितः कश्चिन्नापराधो मया प्रभो । कारणेन विना कस्मात्कोपं यातोऽसि मे परम् ॥१३॥

अर्थ: हे प्रभो ! मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया है फिर अकारण अत्यधिक क्रोधको क्यों प्राप्त हुए हो ? ॥१३॥


प्रसीद तव भक्तास्मि कुरु मे चित्तनिर्वृतिम् । बहिर्दर्शनदानेन रचितोऽञ्जलिरेष ते ॥१४॥

अर्थ: हे नाथ ! मैं आपकी भक्त हूँ अतः प्रसन्न होओ और बाह्यमें दर्शन देकर मेरा चित्त सन्तुष्ट करो । लो, मैं आपके लिए यह हाथ जोड़ती हूँ ॥१४॥


द्यौरिवादित्यनिर्मुक्ता चन्द्रहीनेव शर्वरी । त्वया विना न शोभेऽहं विद्येव च गुणोज्झिता ॥१५॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्यसे .रहित आकाश, चन्द्रमासे रहित रात्रि और गुणोंसे रहित विद्या शोभा नहीं देती उसी प्रकार आपके बिना मैं भी शोभा नहीं देती ॥१५॥


प्रयच्छन्तीत्युपालम्भं पत्ये मानसवासिने । बिन्दून् मुक्ताफलस्थूलान् मुञ्चन्ती लोचनाम्भसः ॥१६॥

अर्थ: इस प्रकार वह मनमें निवास करने वाले पतिके लिए उलाहना देती हुई मुक्ताफलके समान स्थूल आसुओंकी बूँदें छोड़ती रहती थी ॥१६॥


विद्यमाना म्रदिष्ठेषु कुसुमस्रस्तरेष्वपि । गुरुवाक्यानुरोधेन कुर्वती वपुषः स्थितिम् ॥१७॥

अर्थ: वह अत्यन्त कोमल पुष्पशय्या पर भी खेदका अनुभव करती थी और गुरुजनोंका आग्रह देख बड़ी कठिनाईसे भोजन करती थी ॥१७॥


चक्रारूढमिवाजस्रं स्वं दधाना कृतभ्रमम् । संस्कारविरहाद् रूक्षं भ्रमन्ती केशसंचयम् ॥१८॥

अर्थ: वह चक्रपर चढ़े हुएके समान निरन्तर घूमती रहती थी और तेल कंघी आदि संस्कारके अभावमें जो अत्यन्त रूक्ष हो गये थे ऐसे केशोंके समूहको धारण करती थी ॥१८॥


तेजोमयीव संतापाज्जलात्मेवाश्रुसंततेः । शून्यत्वाद्गगनात्मेव पार्थिवीवाक्रियात्मतः ॥१९॥

अर्थ: उसके शरीरमें निरन्तर सन्ताप विद्यमान रहता था इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो तेजःस्वरूप ही है । निरन्तर अश्रु निकलते रहनेसे ऐसी जान पड़ती थी मानो जलरूप ही हो । निरन्तर शून्य मनस्क रहनेसे ऐसी जान पड़ती थी मानो आकाश रूप ही हो और अक्रिय अर्थात् निश्चल होनेके कारण ऐसी जान पड़ती थी मानो पृथिवी रूप ही हो ॥१९॥


संततोत्कलिकायोगाद्वायुनेव विनिर्मिता । तिरोऽवस्थितचैतन्याद्भूतमात्रोपमात्मिका ॥२०॥

अर्थ: उसके हृदयमें निरन्तर उत्कलिकाएँ अर्थात् उत्कण्ठाएँ ( पक्षमें तरंगें ) उठती रहती थीं इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो वायुके द्वारा रची गयी हो और चेतना शक्तिके तिरोभूत होनेसे ऐसी जान पड़ती थी मानो पृथिवी आदि भूतचतुष्टय रूप ही हो ॥२०॥


भूमौ निक्षिप्तसर्वाङ्गा नोपवेष्टुमपि क्षमा । उपविष्टा च नोत्थातुं देहं नोद्धर्तुमुत्थिता ॥२१॥

अर्थ: वह पृथिवीपर समस्त अवयव फैलाये पड़ी रहती थी, बैठनेके लिए भी समर्थ नहीं थी । यदि बैठ जाती थी तो उठनेके लिए असमर्थ थी और जिस किसी तरह उठती भी तो शरीर सम्भालने की उसमें क्षमता नहीं रह गयी थी ॥२१॥


सखीजनांसविन्यस्तविगलत्पाणिपल्लवा । भ्राम्यन्ती कुट्टिमाङ्केऽपि प्रस्खलच्चरणा मुहुः ॥२२॥

अर्थ: यदि कभी चलती थी तो सखी जनोंके कन्धों पर हाथ रख कर चलती थी । चलते समय उसके हाथ सखियोंके कन्धोंसे बार बार नीचे गिर जाते थे और मणिमय फर्श पर भी बार बार उसके पैर लड़खड़ा जाते थे ॥२२॥


स्पृहयन्त्यनुयाताभ्यः प्रियैश्चाटुविधायिभिः । वराकी छेककान्ताभ्यस्तद्गतास्पन्दवीक्षणा ॥२३॥

अर्थ: चापलूसी करनेवाले पति सदा जिनके साथ रहते थे ऐसी चतुर स्त्रियोंको वह बड़ी स्पृहाके साथ देखती थी और उन्हींकी ओर उसके निश्चल नेत्र लगे रहते थे ॥२३॥


प्रियात्परिमवं प्राप्ता कारणेन विवर्जिता । निन्ये सा दिवसान् कृच्छ्राद्दीना संवत्सरोपमान् ॥२४॥

अर्थ: जो पतिसे तिरस्कारको प्राप्त थी तथा अकारण ही जिसका त्याग किया गया था ऐसी दीनहीन अंजना दिनोंको वर्षोंके समान बड़ी कठिनाईसे बिताती थी ॥२४॥


तस्यामेतदवस्थायां समोऽस्या दुःखितोऽथवा । अधिकः परिवारोऽभूत्किंकर्तव्याकुलात्मकः ॥२५॥

अर्थ: उसकी ऐसी अवस्था होनेपर उसका समस्त परिवार उसके समान अथवा उससे भी अधिक दुःखी था तथा ‘क्या करना चाहिए’ इस विषयमें निरन्तर व्याकुल रहता था ॥२५॥


अचिन्तयच्च किंत्वेतत्कारणेन विनामवत् । किं वा जन्मान्तरोपात्तं कर्म स्यात्पक्वमीदृशम् ॥२६॥

अर्थ: परिवारके लोग सोचा करते थे कि क्या यह सब कारणके बिना ही हुआ है अथवा जन्मान्तरमें संचित कर्म ऐसा फल दे रहा है ॥२६॥


किं वान्तरायकर्म स्याज्जनितं जन्मान्तरे । जातं वायुकुमारस्य फलदानपरायणम् ॥२७॥

अर्थ: अथवा वायुकुमारने जन्मान्तरमें जिस अन्तराय कर्मका उपार्जन किया था अब वह फल देनेमें तत्पर हुआ है ॥२७॥


येनायमनया साकं मुग्धया वीतदोषया । न भुङ्क्ते परमान्भोगान्सर्वेन्द्रियसुखावहान् ॥२८॥

अर्थ: जिससे कि वह इस निर्दोष सुन्दरीके साथ समस्त इन्द्रियोंको सुख देनेवाले उत्कृष्ट भोग नहीं भोग रहा है ॥२८॥


शृणु दुःखं यथा पूर्वं न प्राप्तं भवने पितुः । सेयं कर्मानुभावेन दुःखभारमिमं श्रिता ॥२९॥

अर्थ: सुनो, जिस अंजनाने पहले पिताके घर कभी रंचमात्र भी दुःख नहीं पाया वही अब कर्मके प्रभावसे इस दुःखके भारको प्राप्त हुई है ॥२९॥


उपायमत्र कं कुर्मो वयं भाग्यविवर्जिताः । अस्मत्प्रयतनासाध्यो गोचरो ह्येष कर्मणाम् ॥३०॥

अर्थ: इस विषयमें हम भाग्यहीन क्या उपाय करें सो जान नहीं पड़ता। वास्तवमें यह कर्मोंका विषय हमारे प्रयत्न द्वारा साध्य नहीं है ॥३०॥


राजपुत्री भवत्वेषा प्रेमसंभारभाजनम् । भर्तुरस्मत्कृतेनापि पुण्यजातेन सर्वथा ॥३१॥

अर्थ: हम लोगोंने जो पुण्य किया है उसीके प्रभावसे यह राजपुत्री अपने पतिकी प्रेमभाजन हो जाये तो अच्छा हो ॥३१॥


अथवा विद्यते नैव पुण्यं नोऽत्यन्तमण्वपि । निमग्ना येन तिष्ठामो बालादुःखमहार्णवे ॥३२॥

अर्थ: अथवा हम लोगोंके पास अणुमात्र भी तो पुण्य नहीं है क्योंकि हम स्वयं इस बालाके दुःखरूपी महासागरमें डूबे हुए हैं ॥३२॥


भविष्यति कदा श्लाघ्यः स मुहूर्तोऽङ्कवर्तिनीम् । बालामिमां प्रियो नर्मगिरा यत्र लपिष्यति ॥३३॥

अर्थ: वह प्रशंसनीय मुहूर्त कब आवेगा जब इसका पति इसे गोदमें बैठाकर इसके साथ हास्य-भरी वाणीमें वार्तालाप करेगा ॥३३॥


अत्रान्तरे विरोधोऽभूद्रक्षसां विभुना सह । वरुणस्य परं गर्वं केवलं बिभ्रतो बलम् ॥३४॥

अर्थ: इसी बीचमें बहुत भारी अहंकारको धारण करनेवाले वरुणका रावणके साथ विरोध हो गया ॥३४॥


कैकसीसूनुना दूतः प्रेषितोऽथेत्यभाषत । वरुणं स्वामिनः शक्त्या दधानः परमां द्युतिम् ॥३५॥

अर्थ: सो रावणने वरुणके पास दूत भेजा। स्वामीके सामर्थ्यसे परम तेजको धारण करने-वाला दूत वरुणसे कहता है कि ॥३५॥


श्रीमान् विद्याधराधीशो वरुण त्वाह रावणः । यथा कुरु प्रणामं मे सज्जीभव रणाय वा ॥३६॥

अर्थ: हे वरुण ! विद्याधरोंके अधिपति श्रीमान् रावणने तुमसे कहा है कि या तो तुम मेरे लिए प्रणाम करो या युद्धके लिए तैयार हो जाओ ॥३६॥


प्रकृतिस्थिरचित्तोऽथ विहस्य वरुणोऽवदत् । दूत को रावणो नाम क्रियते तेन का क्रिया ॥३७॥

अर्थ: तब स्वभावसे ही स्थिर चित्तके धारक वरुणने हँसकर कहा कि हे दूत ! रावण कौन है ? और क्या काम करता है ? ॥३७॥


नाहमिन्द्रो जगन्निन्द्यवीर्यो वैश्रवणोऽथवा । सहस्ररश्मिसंज्ञो वा मरुतो वाथवा यमः ॥३८॥

अर्थ: लोकनिन्द्य वीर्यको धारण करनेवाला मैं इन्द्र नहीं हूँ, अथवा वैश्रवण नहीं हूँ, अथवा सहस्ररश्मि नहीं हूँ, अथवा राजा मरुत्व या यम नहीं हूँ ॥३८॥


देवताधिष्ठितैः रत्नैर्दर्पोऽस्यामवदुत्तमः । आयातु सममेभिस्तं नयाम्यद्य विसंज्ञताम् ॥३९॥

अर्थ: देवताधिष्ठित रत्नोंसे इसका गर्व बहुत बढ़ गया है इसलिए वह इन रत्नोंके साथ आवे मैं आज उसे बिना नामका कर दूँ अर्थात् लोकसे उसका नाम ही मिटा दूँ ॥३९॥


नूनमासन्नमृत्युस्त्वं येनैवं भाषसे स्फुटम् । अभिधायेति तं दूतो गत्वा भर्त्रे न्यवेदयत् ॥४०॥

अर्थ: ‘निश्चय ही तुम्हारी मृत्यु निकट आ गयी है इसलिए ऐसा स्पष्ट कह रहे हो’ इतना कहकर दूत चला गया और जाकर उसने रावणसे सब समाचार कह सुनाया ॥४०॥


ततः परमकोपेन परितो वारुणं पुरम् । अरुणद्रावणो युक्तः सेनयोदधिकल्पया ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर समुद्रके समान भारी सेनासे युक्त रावणने तीव्र क्रोधवश जाकर वरुणके नगरको चारों ओरसे घेर लिया ॥४१॥


प्रतिज्ञां च चकारेमां रत्नैरेष मया विना । नेतव्यश्चपलो भङ्गं मृत्युं वेति ससंभ्रमः ॥४२॥

अर्थ: और सहसा उसने यह प्रतिज्ञा कर ली कि मैं देवोपनीत रत्नोंके बिना ही इस चपलको पराजित करूँगा अथवा मृत्युको प्राप्त कराऊँगा ॥४२॥


राजीवपौण्डरीकाद्याः क्षुब्धा वरुणनन्दनाः । विनिर्ययुः सुसन्नद्धाः श्रुत्वा प्राप्तं बलं द्विषः ॥४३॥

अर्थ: राजीव पौण्डरीक आदि वरुणके लड़के बहुत क्षोभको प्राप्त हुए और शत्रुकी सेना आयी सुन तैयार हो-होकर युद्धके लिए बाहर निकले ॥४३॥


रावणस्य बलेनामा तेषां युद्धमभूत्परम् । अन्योन्यापातसंच्छिन्नविविधायुधसंहतिः ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर रावणकी सेनाके साथ उनका घोर युद्ध हुआ । युद्धके समय नाना शस्त्रोंके समूह परस्परकी टक्करसे टूट-टूटकर नीचे गिर रहे थे ॥४४॥


गजा गजैः समं सक्ता वाजिनोऽश्वै रथा रथैः । भटा भटैः कृतारावा दष्टोष्ठा रक्तलोचनाः ॥४५॥

अर्थ: हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे, रथ रथोंसे और योद्धा योद्धाओंके साथ भिड़ गये । उस समय योद्धा बहुत अधिक हल्ला कर रहे थे, ओठ डँस रहे थे तथा क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल-लाल हो रहे थे ॥४५॥


पराचीनं ततः सैन्यं त्रैकूटैर्वारुणं कृतम् । चिराय कृतसंग्रामं दत्तसोढायुधोत्करम् ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने चिरकाल तक युद्ध किया था और शस्त्रसमूहका प्रहार कर स्वयं भी उसकी चोट खायी थी ऐसी वरुणकी सेना, रावणकी सेनासे पराङ्मुख हो गयी ॥४६॥


जलकान्तस्ततः क्रुद्धः कालाग्निरिव दारुणः । अधावद्रक्षसां सैन्यं हेतिपञ्जरमध्यगः ॥४७॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो क्रुद्ध होकर प्रलयकालकी अग्निके समान भयंकर था और शस्त्ररूपी पंजरके बीचमें चल रहा था ऐसा वरुण राक्षसोंकी सेनाकी ओर दौड़ा ॥४७॥


ततो दुर्वारवेगं तं दृष्ट्वायान्तं रणाङ्गणे । गोपायितः स्ववाहिन्या रावणो दीप्तशस्त्रया ॥४८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका वेग बड़ी कठिनाईसे रोका जाता था ऐसे वरुणको रणांगणमें आता देख देदीप्यमान शस्त्रोंकी धारक सेनाने रावणकी रक्षा की ॥४८॥


वरुणेन कृताश्वासास्ततस्तस्य सुताः पुनः । परमं योद्धुमारब्धा विध्वस्तभटकुञ्जराः ॥४९॥

अर्थ: तत्पश्चात् वरुणका आश्वासन पाकर उसके पुत्र पुनः तेजीके साथ युद्ध करने लगे और उन्होंने अनेक योद्धारूपी हस्तियोंको मार गिराया ॥४९॥


ततो यावद्दशग्रीवः क्रोधदीपितमानसः । गृह्णाति कार्मुकं क्रूरः भ्रकुटीकुटिलालिकः ॥५०॥

दत्तयुद्धश्चिरं तावत्खेदवर्जितमानसः । वारुणीनां शतेनाशु गृहीतः खरदूषणः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त खेदसे देदीप्यमान हो रहा था और ललाट भौंहोंसे कुटिल था ऐसे क्रूर रावणने जबतक धनुष उठाया तबतक वरुणके सौ पुत्रोंने शीघ्र ही खरदूषणको पकड़ लिया । खरदूषण चिरकालसे युद्ध कर रहा था फिर भी उसका चित्त खेदरहित था ॥५०-५१॥


ततश्चित्ते दशग्रीवश्चकारात्यन्तमाकुलः । यथा न शोभतेऽस्माकमधुना रणधीरिति ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने अत्यन्त व्याकुल होकर मनमें विचार किया कि इस समय युद्धकी भावना रखना मेरे लिए शोभा नहीं देती ॥५२॥


खरदूषणभद्रस्य प्रवृत्ते परमाहवे । माभून्मरणसंप्राप्तिस्तस्माच्छान्तिरिहोचिता ॥५३॥

अर्थ: यदि परम युद्ध जारी रहता है तो खरदूषके मरणकी आशंका है इसलिए इस समय शान्ति धारण करना ही उचित है ॥५३॥


इति निश्चित्य संग्रामशिरसोऽपससार सः । नोदाराणां यतः कृत्ये मुच्यते चेतसा रसः ॥५४॥

अर्थ: ऐसा निश्चय कर रावण युद्धके अग्रभागसे दूर हट गया सो ठीक ही है क्योंकि उदार मनुष्योंका चित्त करने योग्य कार्यमें रसको नहीं छोड़ता अर्थात् करने न करने योग्य कार्यका विचार अवश्य रखता है ॥५४॥


ततः स मन्त्रिभिः साकं प्रवीणैर्मन्त्रवस्तुनि । संमन्त्र्य निजसामन्तान्स्वदेशसमवस्थितान् ॥५५॥

समग्रबलसंयुक्तान्सर्वान् दीर्घाध्वगामिभिः । आह्वाययच्छिरोबद्धलेखमालैरिति द्रुतम् ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्र कार्यमें निपुण मन्त्रियोंके साथ सलाह कर उसने अपने देशमें रहनेवाले समस्त सामन्तोंको सर्व प्रकारकी सेनाके साथ शीघ्र ही बुलवाया। बुलवानेके लिए उसने लम्बा मार्ग तय करनेवाले तथा सिरपर लेख बाँधकर रखनेवाले दूत भेजे ॥५५-५६॥


प्रह्लादमपि तत्रायाद्रावणप्रेषितो नरः । स्वामिभक्त्या कृतं चास्य करणीयं यथोचितम् ॥५७॥

अर्थ: रावणके द्वारा भेजा हुआ एक आदमी प्रह्लादके पास भी आया सो उसने स्वामीकी भक्तिसे उसका यथायोग्य सत्कार किया ॥५७॥


विद्यावतां प्रभोर्भद्र ! भद्रमित्यथ चोदितः । सादरं भद्रमित्युक्त्वा स लेखं न्यक्षिपत्पुरः ॥५८॥

अर्थ: तथा पूछा कि हे भद्र ! विद्याधरोंके अधिपति रावणकी कुशलता तो है ? तदनन्तर उस आदमीने ‘कुशलता है’ इस प्रकार कहकर आदरपूर्वक रावणका पत्र प्रह्लादके सामने रख दिया ॥५८॥


ततः स्वयं समादाय कृत्वा शिरसि संभ्रमात् । प्रह्लादोऽवाचयल्लेखमस्यार्थस्याभिधायकम् ॥५९॥

अर्थ: तत्पश्चात् प्रह्लादने सहसा स्वयं ही उस पत्रको उठाकर मस्तकसे लगाया और फिर प्रकृत अर्थको कहनेवाला वह पत्र पढ़वाया ॥५९॥


स्वस्ति स्थाने पुरस्यारादलंकारस्य नामतः । निविष्टपृतनः क्षेमी विद्याभृत्स्वामिनां पतिः ॥६०॥

सौमालिनन्दनो रक्षःसन्तानाम्बरचन्द्रमाः । आदित्यनगरे भद्रं प्रह्लादं न्यायवेदिनम् ॥६१॥

कालदेशविधानज्ञमस्मत्प्रीतिपरायणम् । आज्ञापयति देहादिकुशलप्रश्नपूर्वकम् ॥६२॥

यथा मे प्रणताः सर्वे क्षिप्रं विद्याधराधिपाः । कराङ्गुलिनखच्छायाकपिलीकृतमूर्धजाः ॥६३॥

पातालनगरेऽयं तु सुसंनद्धः स्वशक्तितः । वरुणः प्रत्यवस्थानमकरोदिति दुर्मतिः ॥६४॥

हृदयव्यथविद्याभृच्चक्रेण परिवारितः । समुद्रमध्यमासाद्य दुरात्मायं सुखी किल ॥६५॥

ततोऽतिगहने युद्धे प्रवृद्धे खरदूषणः । शतेनैतस्य पुत्राणां कथंचिदपवर्तितः ॥६६॥

अर्थ: पत्रमें लिखा था कि अलंकारपुर नगरके समीप जिसकी सेना ठहरी है, जो कुशलतासे युक्त है, सौमालीका पुत्र है तथा राक्षस वंशरूपी आकाशका चन्द्रमा है ऐसा विद्याधर राजाओंका स्वामी रावण, आदित्य नगरमें रहनेवाले न्याय-नीतिज्ञ, देश-कालकी विधिके ज्ञाता एवं हमारे साथ प्रेम करनेमें निपुण भद्र प्रकृतिके धारी राजा प्रह्लादको शरीरादिकी कुशल कामनाके अनन्तर आज्ञा देता है कि हाथकी अंगुलियोंके नखोंकी कान्तिसे जिनके केश पीले हो रहे हैं ऐसे समस्त विद्याधर राजा तो शीघ्र ही आकर मेरे लिए नमस्कार कर चुके हैं पर पाताल नगरमें जो दुर्बुद्धि वरुण रहता है वह अपनी शक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण प्रतिकूलता कर रहा है - विरोधमें खड़ा है । वह हृदयमें चोट पहुँचानेवाले विद्याधरोंके समूहसे घिरकर समुद्रके मध्यमें सुखसे रहता है । इसी विद्वेषके कारण इसके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ था सो इसके सौ पुत्रोंने खरदूषणको किसी तरह पकड़ लिया है ॥६०-६६॥


संग्रामे संशयो माभूत्प्रमादोऽस्येति निश्चयः । परित्यक्ता महायुद्धधिषणा कालवेदिना ॥६७॥

अर्थ: ‘युद्धमें इसका मरण न हो जाये’ इस विचारसे समयकी विधिको जानते हुए मैंने महायुद्धकी भावना छोड़ दी है ॥६७॥


अतस्तत्प्रतिकाराय त्वयावश्यमिहागमः । कर्तव्यो नैव कर्तव्ये प्रस्खलन्ति मवादृशाः ॥६८॥

अर्थ: इसलिए उसका प्रतिकार करनेके लिए तुम्हें अवश्य ही यहाँ आना चाहिए क्योंकि आप-जैसे पुरुष करने योग्य कार्यमें कभी भूल नहीं करते ॥६८॥


अवधार्य त्वया सार्धं विधास्यामोऽत्र सांप्रतम् । भर्तापि तेजसां कृत्यं कुरुतेऽरुणसङ्गतः ॥६९॥

अर्थ: अब मैं तुम्हारे साथ सलाह कर ही आगेका कार्य करूँगा और यह उचित भी है क्योंकि सूर्य भी तो अरुणके साथ मिलकर ही कार्य करता है ॥६९॥


ततो लेखार्थमावेद्य वायवे निर्विलम्बितम् । गमने संमतिं चक्रे कृतमन्त्रः सुमन्त्रिभिः ॥७०॥

अर्थ: अथानन्तर प्रह्लादने पवनंजयके लिए पत्रका सब सार बतलाकर तथा उत्तम मन्त्रियोंके साथ सलाहकर शीघ्र ही जानेका विचार किया ॥७०॥


अथ तं गमने सक्तं जानुस्पृष्टमहीतलः । वायुर्व्यज्ञापयत्कृत्वा प्रणामं रचिताञ्जलिः ॥७१॥

अर्थ: पिताको गमनमें उद्यत देख पवनंजयने पृथिवीपर घुटने टेककर तथा हाथ जोड़ प्रणाम कर निवेदन किया कि ॥७१॥


नाथ ते गमनं युक्तं विद्यमाने कथं मयि । आलिङ्गनफलं कृत्यं जनकस्य सुतैर्ननु ॥७२॥

अर्थ: हे नाथ ! मेरे रहते हुए आपका जाना उचित नहीं है। पिता पुत्रोंका आलिंगन करते हैं सो पुत्रोंको उसका फल अवश्य ही चुकाना चाहिए ॥७२॥


ततो न जात एवास्मि यदि ते न करोमि तत् । गमनाज्ञाप्रदानेन प्रसादं कुरु मे ततः ॥७३॥

अर्थ: यदि मैं वह फल नहीं चुकाता हूँ तो पुत्र ही नहीं कहला सकता अतः आप जानेकी आज्ञा देकर मुझपर प्रसन्नता कीजिए ॥७३॥


ततः पिता जगादैनं कुमारोऽसि रणे भवान् । आगतो न क्वचित्खेदं तस्मादास्स्व व्रजाम्यहम् ॥७४॥

अर्थ: इसके उ[?]रमें पिताने कहा कि अभी तुम बालक ही हो, युद्धमें जो खेद होता है उसे तुमने कहीं प्राप्त नहीं किया है इसलिए सुखसे यहीं बैठो मैं जाता हूँ ॥७४॥


उन्नमय्य ततो वक्षः कनकाद्रितटोपमम् । पुनरोजोधरं वाक्यं जगाद पवनंजयः ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर सुमेरुके तटके समान चौड़ा सीना तानकर पवनंजयने निम्नांकित ओजस्वी वचन कहे ॥७५॥


तात मे लक्षणं शक्तेस्त्वयैव जननं ननु । जगद्दाहे स्फुलिङ्गस्य किं वा वीर्यं परीक्ष्यते ॥७६॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! मेरी शक्तिका सबसे प्रथम लक्षण यही है कि मेरा जन्म आपसे हुआ है । अथवा संसारको भस्म करनेके लिए क्या कभी अग्निके तिलगेकी परीक्षा की जाती है ? ॥७६॥


भवच्छासनशेषातिपवित्रीकृतमस्तकः । भङ्क्ते पुरन्दरस्यापि समर्थोऽस्मि न संशयः ॥७७॥

अर्थ: आपकी आज्ञारूपी शेषाक्षतसे जिसका मस्तक पवित्र हो रहा है ऐसा मैं इन्द्रको भी पराजित करनेमें समर्थ हूँ इसमें संशयकी बात नहीं है ॥७७॥


अभिधायेति कृत्वा च प्रणामं प्रमदी पुनः । उत्थायानुष्ठितस्नानभोजनादिवपुःक्रियः ॥७८॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने पिताको प्रणाम किया और फिर बड़ी प्रसन्नतासे उठकर उसने स्नान-भोजन आदि शारीरिक क्रियाएँ कीं ॥७८॥


सादरं कुलवृद्धाभिर्दत्ताशीः कृतमङ्गलः । प्रणम्य भावतः सिद्धान् दधानः परमां द्युतिम् ॥७९॥

वाष्पाकुलितनेत्राभ्यां मङ्गलध्वंसभीतितः । आशीर्दानप्रवृत्ताभ्यां पितृभ्यां मूर्ध्नि चुम्बितः ॥८०॥

आपृच्छ्य बान्धवान् सर्वानभिवाद्य च सस्मितः । संभाष्य प्रणतं भक्तं परिवर्गमशेषतः ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर कुलकी वृद्धा स्त्रियोंने बड़े आदरसे आशीर्वाद देकर जिसका मंगलाचार किया था, जो उत्कृष्ट कान्तिको धारण कर रहा था और ‘मंगलाचारमें बाधा न आ जाये’ इस भयसे जिनके नेत्र आँसुओंसे आकुलित थे ऐसे आशीर्वाद देनेमें तत्पर माता-पिताने जिसका मस्तक चूमा था ऐसा पवनंजय भावपूर्वक सिद्ध परमेष्ठीको नमस्कार कर, समस्त बन्धुजनोंसे पूछकर, गुरुजनोंका अभिवादन कर तथा भक्तिसे नम्रीभूत समस्त परिजनसे वार्तालाप कर मन्द-मन्द हँसता हुआ घरसे निकला ॥७९-८१॥


दक्षिणेनाङ्घ्रिणा पूर्वं कृतोच्चालः स्वभावतः । दक्षिणेन कृतानन्दः स्फुरता बाहुना मुहुः ॥८२॥

अर्थ: उसने स्वभावसे ही सर्वप्रथम दाहिना पैर ऊपर उठाया था । बार-बार फड़कती हुई दाहिनी भुजासे उसका हर्ष बढ़ रहा था ॥८२॥


सपल्लवमुखे पूर्णकुम्भे निहितलोचनः । क्रामन् ( वै ) भवनाद्देष सहसैक्षत गेहिनीम् ॥८३॥

अर्थ: और जिसके मुखपर पल्लव रखे हुए थे ऐसे पूर्णकलशपर उसके नेत्र पड़ रहे थे । महलसे निकलते ही उसने सहसा अंजनाको देखा ॥८३॥


द्वारस्तम्भनिषण्णाङ्गीं वाष्पस्थगितलोचनाम् । नितम्बनिहितभ्रंसिनिरादरचलद्भुजाम् ॥८४॥

अर्थ: अंजना द्वारके खम्भेसे टिककर खड़ी थी, उसके नेत्र आँसुओंसे आच्छादित थे, कमरको सहारा देनेके लिए वह अपनी भुजा नितम्बपर रखती भली थी पर दुर्बलताके कारण वह भुजा नितम्बसे नीचे हट जाती थी ॥८४॥


ताम्बूलरागनिर्मुक्तधूसरद्विजवाससम् । तस्मिन्नेव समुत्कीर्णां मलिनां सालभञ्जिकाम् ॥८५॥

अर्थ: पानकी लालीसे रहित होनेके कारण उसके ओठ अत्यन्त धूसर-वर्ण थे और वह ऐसी जान पड़ती थी मानो उसी खम्भेमें उकेरी हुई एक मैली पुतली ही हो ॥८५॥


विद्युतीव ततो दृष्टिं तस्यामापतितां क्षणात् । संहृत्य कुपितोऽवादीदिति प्रह्लादनन्दनः ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर मनुष्य जिस प्रकार बिजलीपर पड़ी दृष्टिको सहसा संकुचित कर लेता है - उससे दूर हटा लेता है उसी प्रकार पवनंजयने अंजनापर पड़ी अपनी दृष्टिको शीघ्र ही संकुचित कर लिया तथा कुपित होकर कहा कि ॥८६॥


अमुष्मादपसर्पाशु देशादपि दुरीक्षणे । उल्कामिव समर्थोऽहं भवतीं न निरीक्षितुम् ॥८७॥

अर्थ: हे दुरवलोकने ! तू इस स्थानसे शीघ्र ही हट जा । उल्काकी तरह तुझे देखनेके लिए मैं समर्थ नहीं हूँ ॥८७॥


अहो कुलाङ्गनायास्ते प्रगल्भत्वमिदं परम् । यत्पुरोऽनिष्यमाणापि तिष्ठसि त्रपयोज्झिते ॥८८॥

अर्थ: अहो, कुलांगना होकर भी तेरी यह परम धृष्टता है जो मेरे न चाहनेपर भी सामने खड़ी है । बड़ी निर्लज्ज है ॥८८॥


ततोऽत्यन्तमपि क्रूरं तद्वाक्यं भर्तृभक्तितः । तृषितेव चिराल्लब्धममृतं मनसा पपौ ॥८९॥

अर्थ: पवनंजयके उक्त वचन यद्यपि अत्यन्त क्रूर थे तो भी जिस प्रकार चिरकालका प्यासा मनुष्य प्राप्त हुए जलको बड़े मनोयोगसे पीता है उसी प्रकार अंजना स्वामीमें भक्ति होनेके कारण उसके उन क्रूर वचनोंको बड़े मनोयोगसे सुनती रही ॥८९॥


जगाद चाञ्जलिं कृत्वा तत्पादगतलोचना । संस्खलन्ती मुहुर्वाचमुद्गिरन्ती प्रयत्नतः ॥९०॥

अर्थ: उसने स्वामीके चरणोंमें नेत्र गड़ाकर तथा हाथ जोड़कर कहा । कहते समय वह यद्यपि प्रयत्नपूर्वक वचनोंका उच्चारण करती थी तो भी बार-बार चूक जाती थी, चुप रह जाती थी, अथवा कुछका कुछ कह जाती थी ॥९०॥


तिष्ठतापि त्वया नाथ भवनेऽत्र विवर्जिता । त्वत्सामीप्यकृताश्वासा जीवितास्म्यतिकृच्छ्रतः ॥९१॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! इस महलमें रहते हुए भी मैं आपके द्वारा त्यक्त हूँ फिर भी ‘मैं आपके समीप ही रह रही हूँ’ इतने मात्रसे ही सन्तोष धारणकर अब तक बड़े कष्टसे जीवित रही हूँ ॥९१॥


जीविष्याम्यधुना स्वामिन्कथं दूरं गते त्वयि । त्वत्सद्वचोऽमृतास्वादस्मरणेन विनातुरा ॥९२॥

अर्थ: पर हे स्वामिन् ! अब जब कि आप दूर जा रहे हैं निरन्तर दुःखी रहनेवाली मैं आपके सद्वचनरूपी अमृतके स्वादके बिना किस प्रकार जीवित रहूँगी ? ॥९२॥


कृतं छेकगणस्यापि त्वया संभाषणं प्रभो । यियासुना परं देशमतिस्नेहार्द्रचेतसा ॥९३॥

अनन्यगतचित्ताहं त्वदसंगमदुःखिता । कथं नान्यमुखेनापि त्वया संभाषिता विभो ॥९४॥

अर्थ: हे प्रभो ! परदेश जाते समय आपने स्नेहसे आर्द्र चित्त होकर सेवक जनोंसे भी सम्भाषण किया है फिर मेरा चित्त तो एक आपमें ही लग रहा है और आपके ही वियोगसे निरन्तर दुःखी रहती हूँ फिर स्वयं न सही दूसरेके मुखसे भी आपने मुझसे सम्भाषण क्यों नहीं किया ? ॥९३-९४॥


त्यक्ताया मे त्वया नाथ समस्तेऽप्यत्र विष्टपे । विद्यते शरणं नान्यदथवा मरणं भवेत् ॥९५॥

अर्थ: हे नाथ ! आपने मेरा त्याग किया है इसलिए इस समस्त संसारमें दूसरा कोई भी मेरा शरण नहीं है अथवा मरण ही शरण है ॥९५॥


ततस्तेन म्रियस्वेति संकोचितमुखेन सा । सती निगदितापप्तद्विषण्णा धरणीतले ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर पवनंजयने मुख सिकोड़कर कहा कि ‘मरो’ । उनके इतना कहते ही वह खेद-खिन्न हो मूर्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़ी ॥९६॥


वायुरप्युत्तमामृद्धिं दधानः कृपयोज्झितः । परमं नागमारुह्य सामन्तैः प्रस्थितः समम् ॥९७॥

अर्थ: इधर उत्तम ऋद्धिको धारण करता हुआ निर्दय पवनंजय उत्तम हाथीपर सवार हो सामन्तोंके साथ आगे बढ़ गया ॥९७॥


वासरे प्रथमे वासौ संप्राप्तो मानसं सरः । आवासयत्तटे तस्य सेनामश्रान्तवाहनः ॥९८॥

अर्थ: प्रथम दिन वह मानसरोवरको प्राप्त हुआ सो यद्यपि उसके वाहन थके नहीं थे तो भी उसने मानसरोवरके तटपर सेना ठहरा दी ॥९८॥


तस्यावतरतः सेना शुशुभे हि नभस्तलात् । सुरसंततिवन्नानायानशस्त्रविभूषणा ॥९९॥

अर्थ: आकाशसे उतरते हुए पवनंजयकी नाना प्रकारके वाहन और शस्त्रोंसे सुशोभित सेना ऐसी जान पड़ती थी मानो देवोंका समूह ही नीचे उतर रहा हो ॥९९॥


आत्मनो वाहनानां च चक्रे कार्यं यथोचितम् । स्नानप्रत्यवसानादिविद्याभृद्भिः सुमानसैः ॥१००॥

अर्थ: प्रसन्नतासे भरे विद्याधरोंने अपने तथा वाहनोंके स्नान-भोजनादि समस्त कार्य यथायोग्य रीतिसे किये ॥१००॥


अथ विद्याबलादाशु रचिते बहुभूमिके । युक्तविस्तारतुङ्गत्वे प्रासादे चित्तहारिणि ॥१०१॥

सहोपरितले कुर्वन् स्वैरं मित्रेण संकथाम् । वरासनगतो भाति संग्रामकृतसंमदः ॥१०२॥

अर्थ: अथानन्तर विद्याके बलसे शीघ्र ही एक ऐसा मनोहर महल बनाया गया कि जिसमें अनेक खण्ड थे तथा जिसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई अनुरूप थी, उस महलके ऊपरके खण्डपर मित्रके साथ स्वच्छन्द वार्तालाप करता हुआ पवनंजय उत्कृष्ट आसनपर विराजमान था । युद्धकी वार्तासे उसका हर्ष बढ़ रहा था ॥१०१-१०२॥


गवाक्षजालमार्गेण छिद्रेण तटभूरुहान् । ईक्षाञ्चक्रे सरो वायुर्मन्दवायुविघट्टितम् ॥१०३॥

अर्थ: पवनंजय झरोखोंके मार्गसे किनारेके वृक्षोंको तथा मन्द-मन्द वायुसे हिलते हुए मानसरोवरको देख रहा था ॥१०३॥


भीमैः कूर्मैर्झषैर्नक्रैर्मकरैर्दर्पधारिभिः । भिन्नवीचिकमन्यैश्च यादोभिरिति भूरिभिः ॥१०४॥

अर्थ: भयंकर कछुए, मीन, नक्र, गर्वको धारण करनेवाले मगर तथा अन्य अनेक जल-जन्तु उस सरोवरमें लहरें उत्पन्न कर रहे थे ॥१०४॥


धौतस्फटिकस्तुल्याम्भः कमलोत्पलभूषितम् । हंसैः कारण्डवैः क्रौञ्चैः सारसैश्चोपशोभितम् ॥१०५॥

अर्थ: धुले हुए स्फटिकके समान स्वच्छ तथा कमलों और नील कमलोंसे सुशोभित उस सरोवरका जल हंस, कारण्डव, क्रौंच और सारस पक्षियोंसे अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१०५॥


अर्थ: तदनन्तर सन्ध्याके प्रकाशको नष्ट करनेका कारण जो अन्धकार उससे युक्त होकर समस्त संसार श्याम वर्ण हो गया और समस्त पदार्थ मात्र स्पर्शन इन्द्रियके द्वारा ही जानने योग्य रह गये ॥१०५॥


मन्द्रकोलाहलादेषा मनःश्रोत्रमलिम्लुचम् । तदन्तरश्रुतोदात्तभ्रमरीकुलझङ्कृतम् ॥१०६॥

अर्थ: इन सब पक्षियोंके गम्भीर कोलाहलसे वह सरोवर मन और कर्ण - दोनोंको चुरा रहा था । तथा उसके मध्यमें भ्रमरियोंका उत्कृष्ट झंकार सुनाई देता था ॥१०६॥


तत्र चैकाकिनीमेकामाकुलां चक्रवाकिकाम् । वियोगानलसंतप्तां नानाचेष्टितकारिणीम् ॥१०७॥

अस्ताचलसमासन्नभानुबिम्बगतेक्षणाम् । पद्मिनीदलरन्ध्रेषु मुहुर्न्यस्तनिरीक्षणाम् ॥१०८॥

धुन्वानां पक्षती वेगात्पातोत्पातकृतश्रमाम् । मृणालशकलस्वादु पश्यन्तीं दुःखितां विषम् ॥१०९॥

प्रतिबिम्बं निजं दृष्ट्वा जले दयितशङ्किनीम् । आह्वयन्तीं तदप्राप्त्या व्रजतीं परमां शुचम् ॥११०॥

नानादेशोद्भवं श्रुत्वा प्रतिशब्दं प्रियाशया । भ्रमं चक्रमिवारूढां कुर्वन्तीं साधुलोचनाम् ॥१११॥

तटपादपमारुह्य न्यस्यन्तीं दिक्षु लोचने । तत्रादृष्ट्वा पुनः पातमाचरन्तीं महाजवम् ॥११२॥

उन्नयन्तीं रजो दूरं पद्मानां पक्षधूतिभिः । चिरं तद्गतया दृष्ट्या ददर्शासौ कृपाहतः ॥११३॥

अर्थ: उसी सरोवरके किनारे पवनंजयने एक चकवी देखी । वह चकवी अकेली होनेसे अत्यन्त व्याकुल थी, वियोगरूपी अग्निसे सन्तप्त थी, नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर रही थी, अस्ताचलके निकटवर्ती सूर्यबिम्बपर उसके नेत्र पड़ रहे थे, वह बार-बार कमलिनीके पत्तोंके विवरोंमें नेत्र डालती थी, वेगसे पंखोंको फड़फड़ाती थी, बार-बार ऊपर उड़कर तथा नीचे उतरकर खेदखिन्न हो रही थी, मृणालके टुकड़ोंसे स्वादिष्ट जलकी ओर देखकर दुःखी हो रही थी, पानीके भीतर अपना प्रतिबिम्ब देखकर पतिकी आशंकासे उसे बुलाती थी और अन्तमें उसके न आनेसे अत्यधिक शोक करती थी, नाना स्थानोंसे जो प्रतिध्वनि आती थी उसे सुनकर ‘कहीं पति तो नहीं बोल रहा है’ इस आशासे वह चक्रारूढ़की तरह गोल चक्कर लगाती थी, उसके नेत्र सुन्दर थे, वह किनारेके वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें नेत्र डालती थी और वहाँ जब पतिको नहीं देखती थी तब बड़े वेगसे पुनः नीचे आ जाती थी, तथा पंखोंकी फड़फड़ाहटसे कमलोंकी परागको दूर तक उड़ा रही थी । पवनंजय दयाके वशीभूत हो उसकी ओर दृष्टि लगाकर देर तक देखता रहा ॥१०७-११३॥


इति चाचिन्तयत्कष्टं प्राप्तमस्या इदं परम् । यत्प्रियेण विमुक्तेयं दह्यते शोकवह्निना ॥११४॥

अर्थ: चकवीको जो अत्यधिक दुःख प्राप्त हो रहा था उसीका वह इस प्रकार चिन्तवन करने लगा । वह विचारने लगा कि पतिसे वियुक्त हुई यह चकवी शोकरूपी अग्निसे जल रही है ॥११४॥


तदेवेदं सरो रम्यं चन्द्रचन्दनशीतलम् । दावकल्पमभूदस्याः प्राप्य नाथवियुक्तताम् ॥११५॥

अर्थ: यह वही चन्द्रमा और चन्दनके समान शीतल, मनोहर सरोवर है पर पतिका वियोग पाकर इसे दावानलके समान हो रहा है ॥११५॥


रमणेन वियुक्तायाः पल्लवोऽप्येति खड्गताम् । चन्द्रांशुरपि वज्रत्वं स्वर्गोऽपि नरकायते ॥११६॥

अर्थ: पतिसे रहित स्त्रियोंके लिए पल्लव भी तलवारका काम करता है, चन्द्रमाकी किरण भी वज्र बन जाती है और स्वर्ग भी नरक-जैसा हो जाता है ॥११६॥


इति चिन्तयतस्तस्य प्रियायां मानसं गतम् । तत्प्रीत्या चैक्षतोद्देशांस्तद्विवाहे निषेवितान् ॥११७॥

अर्थ: ऐसा विचार करते हुए उसका मन अपनी प्रिया अंजनासुन्दरीपर गया और उसीमें प्रेम होनेके कारण उसने विवाहके समय सेवित स्थानोंको बड़े गौरसे देखा ॥११७॥


चक्षुषो गोचरीभूतास्तस्य ते शोकहेतवः । बभूवुर्मर्मभेदानां कर्तार इव दुःसहाः ॥११८॥

अर्थ: वे सब स्थान उसके नेत्रोंके सामने आनेपर शोकके कारण हो गये और मर्म भेद करनेवालोंके समान दुःसह हो उठे ॥११८॥


अध्यासीच्चेति हा कष्टं मया सा क्रूरचेतसा । मुक्तेयमिव चक्राह्वा वैक्लव्यं दयितागमत् ॥११९॥

अर्थ: वह मन ही मन सोचने लगा कि हाय-हाय बड़े कष्टकी बात है - मुझ दुष्ट चित्तके द्वारा छोड़ी हुई वह प्रिया भी इस चकवीके समान दुःखको प्राप्त हो रही होगी ॥११९॥


यदि नाम तदा तस्याः सख्याभाष्यत निष्ठुरम् । ततोऽन्यदीयदोषेण कस्मात्सा वर्जिता मया ॥१२०॥

अर्थ: यदि उस समय उसकी सखीने कठोर शब्द कहे थे तो दूसरेके दोषसे मैंने उसे क्यों छोड़ दिया ? ॥१२०॥


धिगस्मत्सदृशान्मूर्खानप्रेक्षापूर्वकारिणः । जनस्य ये विना हेतुं यत्कुर्वन्त्यसुखासनम् ॥१२१॥

अर्थ: बिना विचारे काम करनेवाले मुझ-जैसे मूर्खोंके लिए धिक्कार है। जो बिना कारण ही लोगोंको दुःखी करते हैं ॥१२१॥


मम वज्रमयं नूनं हृदयं पापचेतसः । प्रत्यवस्थित यत्कालमियन्तं तां प्रियां प्रति ॥१२२॥

अर्थ: निश्चय ही मुझ पापीका चित्त वज्रका बना है इसीलिए तो वह इतने समय तक प्रियाके विरुद्ध रह सका है ॥१२२॥


किं करोम्यधुना तातमापृच्छ्य निरितो गृहात् । कथं नु विनिवर्तेऽहमहो प्राप्तोऽस्मि संकटम् ॥१२३॥

अर्थ: अब क्या करूँ ? मैं पितासे पूछकर घरसे बाहर निकला हूँ इसलिए अब लौटकर वापस कैसे जाऊँ ? अहो ! मैं बड़े संकटमें आ पड़ा हूँ ॥१२३॥


व्रजेयं यदि संग्रामं जीवेन्नासौ ततः स्फुटम् । तदभावे ममाभावः स्वतश्च गुरु नापरम् ॥१२४॥

अर्थ: यदि मैं युद्धके लिए जाता हूँ तो निश्चित है कि वह जीवित नहीं बचेगी और उसके अभावमें मेरा भी अभाव स्वयमेव हो जायेगा। इसलिए इससे बढ़कर और दूसरा कष्ट नहीं है ॥१२४॥


अथवा सर्वसंदेहग्रन्थिभेदनकारणम् । विद्यते मे परं मित्रं तन्नेदं तिष्ठते शुभे ॥१२५॥

अर्थ: अथवा समस्त सन्देहकी गाँठको खोलनेवाला मेरा परम मित्र विद्यमान है सो यही इस शुभ कार्यका निर्णायक है ॥१२५॥


तस्मात्पृच्छाम्यमुं तावत्सर्वाचारविशारदम् । निश्चित्ये विहिते कार्ये लभन्ते प्राणिनः सुखम् ॥१२६॥

अर्थ: इसलिए सब प्रकारके व्यवहारमें निपुण इस मित्रसे पूछता हूँ क्योंकि जो कार्य विचारकर किया जाता है उसीमें प्राणी सुख पाते हैं सर्वत्र नहीं ॥१२६॥


इति च ध्यातमेतेन दृष्ट्वा चैवं विचेतसम् । मन्दं प्रहसितोऽपृच्छद्देवं तद्दुःखदुःखितः ॥१२७॥

अर्थ: इधर पवनंजय इस प्रकार विचार कर रहा था उधर प्रहसित मित्रने उसे अन्यमनस्क देखा। तब उसके दुःखसे दुःखी होकर उसने स्वयं ही धीरेसे पूछा ॥१२७॥


सखे ! प्रतिनरोच्छेदकृतये प्रस्थितस्य ते । कस्माद्वदनमद्यैवं विषण्णमिव दृश्यते ॥१२८॥

अर्थ: कि हे सखे ! तुम तो शत्रुका उच्छेद करनेके लिए निकले हो फिर आज इस तरह तुम्हारा मुख खिन्न-सा क्यों दिखाई दे रहा है ? ॥१२८॥


अपत्रपां विमुच्याशु मह्यं सुजन वेदय । नितान्तमाकुलीभावो जातो मे भवतीदृशि ॥१२९॥

अर्थ: हे सत्पुरुष ! लज्जा छोड़कर शीघ्र ही मेरे लिए इसका कारण बताओ। आपके इस तरह खिन्न रहते हुए मुझे बहुत आकुलता उत्पन्न हो रही है ॥१२९॥


ततोऽसावेवमुक्तः सन् कृच्छ्रनिःसृतया गिरा । जगादेति परिभ्रंशं दूरं धैर्यादुपागतः ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर जो धैर्यसे भ्रष्ट होकर बहुत दूर जा पड़ा ऐसा पवनंजय मित्रके इस प्रकार कहनेपर कठिनाईसे निकलती हुई वाणीसे कहने लगा कि ॥१३०॥


शृणु सुन्दर कस्यान्यत्कथनीयमिदं मया । ननु सर्वरहस्यानां त्वमेव मम भाजनम् ॥१३१॥

अर्थ: हे सुन्दर ! सुनो, तुम्हें छोड़कर और किससे कहूँगा ? यथार्थमें मेरे समस्त रहस्योंके तुम्हीं एक पात्र हो ॥१३१॥


स त्वं कथयितुं नैतदन्यस्मै सुहृदर्हसि । त्रपा हि वस्तुनानेन जायते परमा मम ॥१३२॥

अर्थ: हे मित्र ! यह बात तुम किसी दूसरेसे कहनेके योग्य नहीं हो क्योंकि इससे मुझे अधिक लज्जा उत्पन्न होती है ॥१३२॥


ततः प्रहसितोऽवोचद् विश्रब्धस्त्वं निवेदय । त्वया हि वेदितो मेऽर्थस्तप्तायोगतवारिवत् ॥१३३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें प्रहसितने कहा कि तुम निःशंक होकर कहो क्योंकि तुम्हारे द्वारा कहा हुआ पदार्थ मेरे लिए सन्तप्त लोहेपर पड़े पानीके समान है ॥१३३॥


ततो वायुरुवाचेदं शृणु मित्राञ्जना मया । न कदाचित्कृतप्रीतिरिति मे दुःखितं मनः ॥१३४॥

अर्थ: तदनन्तर पवनंजयने कहा कि हे मित्र ! सुनो, मैंने आज तक कभी अंजनासे प्रेम नहीं किया इसलिए मेरा मन दुखी हो रहा है ॥१३४॥


क्रूरेऽपि मयि सामीप्यादियन्तं समयं तया । आत्मा संधारितो नित्यं प्रवृत्तनयनाम्भसा ॥१३५॥

अर्थ: यद्यपि मैं क्रूर हूँ और क्रूरतावश उससे बोलता-चालता नहीं था तो भी मात्र समीपमें रहनेके कारण उसने निरन्तर आँसू डाल-डालकर अपने आपको जीवित रखा है ॥१३५॥


आगच्छता मया दृष्टा तस्याश्चेष्टाधुना तु या । तया जानामि सा नूनं न प्राणिति वियोगिनी ॥१३६॥

अर्थ: परन्तु उस दिन आते समय मैंने उसकी जो चेष्टा देखी थी उससे जानता हूँ कि वह वियोगिनी अब जीवित नहीं रहेगी ॥१३६॥


तस्या विनापराधेन मया परिभवः कृतः । द्वयग्रं विंशतिमब्दानां पाषाणसमचेतसा ॥१३७॥

अर्थ: मुझ पाषाणचित्तने अपराधके बिना ही उसका बाईस वर्ष तक अनादर किया है ॥१३७॥


आगच्छता मया दृष्टं तस्यास्तन्मुखपङ्कजम् । शोकप्रालेयसंपर्कान्मुक्तं लावण्यसंपदा ॥१३८॥

अर्थ: आते समय मैंने उसका वह मुख देखा था जो कि शोकरूपी तुषारसे सम्पर्क होनेके कारण सौन्दर्यरूपी सम्पदासे रहित था ॥१३८॥


तस्यास्ते नयने दीर्घे नीलोत्पलसमप्रभे । इषुवत्स्मृतिमारूढे हृदयं विध्यतेऽधुना ॥१३९॥

अर्थ: उसके जब नीलोत्पलके समान नीले एवं दीर्घ नेत्र स्मृतिमें आते हैं तो बाणकी तरह हृदय बिंध जाता है ॥१३९॥


तदुपायं कुरु त्वं तमावयोर्येन संगमः । जायेत मरणं माभूदुभयोरपि सज्जन ॥१४०॥

अर्थ: इसलिए हे सज्जन ! ऐसा उपाय करो कि जिससे हम दोनोंका समागम हो जाये और मरण न हो सके ॥१४०॥


ऊचे प्रहसितोऽथैवं क्षणं निश्चलविग्रहः । उपायचिन्तनात्यन्तचलदोलास्थमानसः ॥१४१॥

अर्थ: अथानन्तर क्षण-भरके लिए जिसका शरीर तो निश्चल था और मन उपायकी चिन्तनामें मानो अत्यन्त चंचल झूलापर ही स्थित था ऐसा प्रहसित बोला कि ॥१४१॥


कृत्वा गुरुजनापृच्छां निर्गतस्य तवाधुना । शत्रुं निर्जेतुकामस्य सांप्रतं न निवर्तनम् ॥१४२॥

अर्थ: चूँकि तुम गुरुजनोंसे पूछकर निकले हो और शत्रुको जीतना चाहते हो इसलिए इस समय तुम्हारा लौटना उचित नहीं है ॥१४२॥


समक्षं गुरुलोकस्य नानीता प्रथमं च या । लज्यते तामिहानेतुमधुनाञ्जनसुन्दरीम् ॥१४३॥

अर्थ: इसके सिवाय गुरुजनोंके समक्ष तुम कभी अंजनाको अपने पास नहीं लाये हो इसलिए इस समय उसका यहाँ लाना भी लज्जाकी बात है ॥१४३॥


तस्मादविदितो गत्वा तत्रैवेतां त्वमानय । नेत्रयोर्गोचरीभावं संभाषणसुखस्य च ॥१४४॥

अर्थ: अतः अच्छा उपाय यही है कि तुम गुप्त रूपसे वहीं जाकर उसे अपने दर्शन तथा सम्भाषणजन्य सुखका पात्र बनाओ ॥१४४॥


जीवितालम्बनं कृत्वा चिरात्तस्याः समागमम् । ततः क्षिप्रं निवर्तस्व शीतलीभूतमानसः ॥१४५॥

अर्थ: तुम्हारा समागम उसके जीवनका आलम्बन है सो उसे चिरकाल तक प्राप्त कराकर तथा अपने मनको ठण्डा कर शीघ्र ही वहाँसे वापस लौट आना ॥१४५॥


निरपेक्षस्ततो भूत्वा वहन्नुत्साहमुत्तमम् । गमिष्यसि रिपुं जेतुमुपायोऽयं सुनिश्चितः ॥१४६॥

अर्थ: और इस तरह तुम उस ओरसे निश्चिन्त हो उत्तम उत्साहको धारण करते हुए शत्रुको जीतनेके लिए जा सकोगे ॥१४६॥


ततः परममित्युक्त्वा सेनान्यं मुद्गराभिधम् । नियुज्य बलरक्षायां व्याजतो मेरुवन्दनात् ॥१४७॥

माल्यानुलेपनादीनि गृहीत्वा त्वरयान्वितः । पुरः प्रहसितं कृत्वा वायुर्गगनमुद्ययौ ॥१४८॥

अर्थ: तदनन्तर ‘बहुत ठीक है’ ऐसा कहकर शीघ्रतासे भरा पवनंजय, मुद्गर नामक सेनापतिको सेनाकी रक्षामें नियुक्त कर माला, अनुलेपन आदि अन्य सुगन्धित पदार्थ लेकर और प्रहसित मित्रको आगे कर मेरुवन्दनाके बहाने आकाशमें जा उड़ा ॥१४७-१४८॥


तावच्च भानुरैदस्तं कृपयेव प्रचोदितः । विश्रब्धमेतयोर्योगो निशीथे जायतामिति ॥१४९॥

अर्थ: इतने में ही सूर्य अस्त हो गया सो रात्रिके समय इन दोनोंका निश्चिन्ततासे समागम हो सके इस करुणासे प्रेरित होकर ही मानो अस्त हो गया था ॥१४९॥


संध्यालोकपरिध्वंसहेतुना तमसान्वितम् । जगत् स्पर्शनविज्ञेयपदार्थममवत्ततः ॥१५०॥


प्राप्तश्चाञ्जनसुन्दर्या गृहे प्रग्रीवकोदरे । वायुरस्थात्प्रविष्टस्तु तस्याः प्रहसितोऽन्तिकम् ॥१५१॥

अर्थ: अंजनासुन्दरीके घर पहुँचकर पवनंजय तो बाह्य बरण्डामें रह गया और प्रहसित उसके पास गया ॥१५१॥


ततस्तं सहसा दृष्ट्वा मन्दद्वीपप्रकाशतः । अञ्जना विव्यथेऽत्यर्थं कः कोऽयमिति वादिनी ॥१५२॥

अर्थ: तदनन्तर दीपकके मन्द प्रकाशमें उसे सहसा देखकर ‘यह कौन है कौन है’ ऐसा कहती हुई अंजना अत्यधिक भयभीत हुई ॥१५२॥


सखीं वसन्तमालां च सुप्तां पार्श्वे व्यनिद्रयत् । कुशलोत्थाय सा तस्याश्चकार भयनाशनम् ॥१५३॥

अर्थ: उसने पासमें सोयी वसन्तमाला सखीको जगाया सो उस चतुरने उठकर उसका भय नष्ट किया ॥१५३॥


ततः प्रहसितोऽस्मीति गदित्वाऽसौ नमस्कृतिम् । प्रयुज्याकथयत्तस्मै पवनंजयमागतम् ॥१५४॥

अर्थ: तत्पश्चात् ‘मैं प्रहसित हूँ’ ऐसा कहकर उसने नमस्कार किया और पवनंजयके आनेकी सूचना दी ॥१५४॥


ततः स्वप्नसमं श्रुत्वा प्राणनाथस्य सागमम् । ऊचे प्रहसितं दीनमिदं गद्गदया गिरा ॥१५५॥

अर्थ: तब वह स्वप्नके समान प्राणनाथके समागमका समाचार सुन गद्गद वाणीमें दीनताके साथ प्रहसितसे कहने लगी कि ॥१५५॥


किं मां प्रहसितापुण्यां हससि प्रियवर्जिताम् । ननु कर्मभिरेवाहं हसितातिमलीमसैः ॥१५६॥

अर्थ: हे प्रहसित ! मुझ पुण्यहीना तथा पतित्यक्ताकी हँसी क्यों करते हो ? मैं तो अपने मलिन कर्मोंसे स्वयं ही हास्यका पात्र हो रही हूँ ॥१५६॥


प्रियेण परिभूतेति विदित्वा वद केन नो । परिभूतास्मि निर्भाग्या दुःखावस्थानविग्रहा ॥१५७॥

अर्थ: यह हृदयवल्लभके द्वारा तिरस्कृत है - पतिके द्वारा ठुकरायी गयी है ऐसा जानकर मुझ अभागिनी एवं दुःखिनीका किसने नहीं तिरस्कार किया है ? ॥१५७॥


विशेषतस्त्वया कान्तः प्रोत्साह्य क्रूरचेतसा । एतामारोपितोऽवस्थां मम कृच्छ्रविधायिनीम् ॥१५८॥

अर्थ: खासकर दुष्ट चित्तको धारण करनेवाले तुम्हींने प्राणनाथको प्रोत्साहित कर मुझे अत्यन्त दुःख देनेवाली इस अवस्था तक पहुँचाया है ॥१५८॥


अथवा भद्र ते कोऽत्र दोषः कर्मवशीकृतम् । जगत्सर्वमवाप्नोति दुःखं वा यदि वा सुखम् ॥१५९॥

अर्थ: अथवा हे भद्र ! इसमें तुम्हारा क्या दोष है ? क्योंकि कर्मके वशीभूत हुआ समस्त संसार दुःख अथवा सुख प्राप्त कर रहा है ॥१५९॥


इति साश्रु वदन्तीं तामात्मनिन्दनतत्पराम् । नत्वा प्रहसितोऽवोचद् दुःखार्द्रीकृतमानसः ॥१६०॥

अर्थ: इस प्रकार जो अश्रु ढालती हुई कह रही थी तथा अपने आपकी निन्दा करनेमें तत्पर थी ऐसी अंजना सुन्दरीको नमस्कार कर प्रहसित बोला । उस समय प्रहसितका मन दुःखसे द्रवीभूत हो रहा था ॥१६०॥


कल्याणि मा भणीरेवं क्षमस्व जनितं मया । आगो विचारशून्येन पापावष्टब्धचेतसा ॥१६१॥

अर्थ: उसने कहा कि हे कल्याणि ! ऐसा मत कहो, मुझ निर्विचार तथा पापयुक्त चित्तके धारकने जो अपराध किया है उसे क्षमा करो ॥१६१॥


प्राप्तानि विलयं नूनं दुष्कर्माणि तवाधुना । येन प्रेमगुणाकृष्टो जीवितेशः समागतः ॥१६२॥

अर्थ: इस समय तुम्हारे दुष्कर्म निश्चय ही नष्ट हो गये हैं क्योंकि प्रेमरूपी गुणसे खिचा हुआ तुम्हारा हृदयवल्लभ स्वयं आया है ॥१६२॥


अधुनास्मिन् प्रसन्ने ते किं न जातं सुखावहम् । ननु चन्द्रेण शर्वर्याः संगमे का न चारुता ॥१६३॥

अर्थ: अब इसके प्रसन्न रहनेपर तुम्हें कौन-सी वस्तु सुखदायक नहीं होगी ? वास्तवमें चन्द्रमाके साथ समागम होनेपर रात्रिमें कौन-सी सुन्दरता नहीं आ जाती ? ॥१६३॥


ततः क्षणं स्थिता चेदं जगादाञ्जनसुन्दरी । प्रतिनिस्वनवत्येवं सख्यनूदितया गिरा ॥१६४॥

अर्थ: तदनन्तर अंजनासुन्दरी क्षण-भरके लिए चुप हो रही । उसके बाद उसने सखीके द्वारा अनूदित वचनोंके द्वारा उत्तर दिया । सखी जो वचन कह रही थी वे अंजनाकी प्रतिध्वनिके समान जान पड़ते थे ॥१६४॥


असंभाव्यमिदं भद्र यथा वर्षं जलोज्झितम् । भवत्यप्यथवा काले कल्याणं कर्मचोदितम् ॥१६५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे भद्र ! जिस प्रकार जलसे रहित वर्षाका होना असम्भव है उसी प्रकार उनका आना भी असम्भव है । अथवा इस समय मेरे किसी शुभ-कार्यका उदय हुआ हो जिससे तुम्हारा कहना सम्भव भी हो सकता है ॥१६५॥


तथास्तु स्वागतं तस्य जीवितस्येशितुर्मम । अद्य मे फलितः पूर्वशुभानुष्ठानपादपः ॥१६६॥

अर्थ: अस्तु, यदि प्राणनाथ आये हैं तो मैं उनका स्वागत करती हूँ । मेरा पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मरूपी वृक्ष आज फलीभूत हुआ है ॥१६६॥


वदन्त्यामेवमेतस्यामानन्दास्राक्तचक्षुषि । तत्सख्येवान्तिकं नीतस्तस्याः करुणया प्रियः ॥१६७॥

अर्थ: इस प्रकार नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे हुई अंजनासुन्दरी यह कह ही रही थी कि सखीके समान करुणा प्राणनाथको उसके समीप ले आयी ॥१६७॥


त्रस्तसारङ्गकान्ताक्षी दृष्ट्वा तं परमोत्सवम् । जानुद्वयासकृन्न्यस्तस्रस्तपाणिसरोरुहा ॥१६८॥

स्तम्भवत्प्रसृताकाण्डा वेपथुश्रितविग्रहा । शनैरुत्थातुमारब्धा शयनस्था प्रयासिनी ॥१६९॥

अर्थ: उस समय अंजना शय्यापर बैठी थी । ज्यों ही उसने परम आनन्दके देनेवाले प्राणनाथको समीप आते देखा त्यों ही वह उठनेका प्रयास करने लगी । उसके नेत्र भयभीत हरिणके समान सुन्दर थे, वह खड़ी होनेके लिए अपने घुटनोंपर बार-बार हस्त-कमल रखती थी पर वे दुर्बलताके कारण नीचे खिसक जाते थे । उसकी जाँघें खम्भेके समान अकड़ गयी थीं और सारा शरीर कांपने लगा था ॥१६८-१६९॥


अथालमलमेतेन देवि क्लेशविधायिना । संभ्रमेणेति वचनं विमुञ्चन्नमृतोपमम् ॥१७०॥

अर्थ: यह देख पवनंजयने अमृततुल्य निम्न वचन कहे कि हे देवि ! रहने दो, क्लेश उत्पन्न करनेवाले इस सम्भ्रमसे क्या प्रयोजन है ? ॥१७०॥


समुत्थितां प्रियां कृच्छ्रादञ्जलिं बद्धुमुद्यताम् । गृहीत्वा दयितः पाणौ शयने समुपाविशत् ॥१७१॥

अर्थ: इतना कहनेपर भी अंजना बड़े कष्टसे खड़ी होकर हाथ जोड़नेका उद्यम करने लगी कि पवनंजयने उसका हाथ पकड़कर उसे शय्यापर बैठा दिया ॥१७१॥


स्वेदी पाणिरसौ तस्याः परमं पुलकं वहन् । प्रियस्पर्शामृतेनेव सिक्तो व्यामुञ्चदङ्कुरान् ॥१७२॥

अर्थ: अंजनाका वह हाथ पसीनासे युक्त हो गया और रोमांच धारण करने लगा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पतिके स्पर्शरूपी अमृतसे सींचा जाकर अंकुर ही धारण कर रहा था ॥१७२॥


नत्वा वसन्तमाला तं कृत्वा भाषणमादरात् । साकं प्रहसितेनास्थाद्रम्ये कक्षान्तरे सुखम् ॥१७३॥

अर्थ: वसन्तमालाने पवनंजयको नमस्कार कर आदरपूर्वक उसके साथ वार्तालाप किया । तदनन्तर वह प्रहसितके साथ एक दूसरे सुन्दर कमरेमें सुखसे बैठ गयी ॥१७३॥


अथानादरतः पूर्वं त्रपमाणः स्वयंकृतात् । पवनः कुशलं प्रष्टुं न प्रावर्तत चेतसा ॥१७४॥

अर्थ: अथानन्तर चूँकि पवनंजय अपने द्वारा किये हुए अनादरसे लज्जित हो रहा था अतः सर्वप्रथम कुशल समाचार पूछनेके लिए वह हृदयसे प्रवृत्त नहीं हो सका ॥१७४॥


विलक्षस्तु प्रिये मृष्य मया कर्मानुभावतः । निकारं कृतमित्यूचे तत्क्षणाकुलमानसः ॥१७५॥

अर्थ: तदनन्तर लज्जित होते हुए उसने कहा कि हे प्रिये ! मैंने कर्मोदयके प्रभावसे तुम्हारा जो तिरस्कार किया है उसे क्षमा करो । यह कहते समय पवनंजयका मन अत्यन्त आकुल हो रहा था ॥१७५॥


आद्यसंभाषणात्सापि वहन्ती नतमाननम् । जगाद मन्दया वाचा निश्चलाखिलविग्रहा ॥१७६॥

अर्थ: अंजनाका पतिके साथ वार्तालाप करनेका प्रथम अवसर था इसलिए वह भी लज्जाके कारण मुख नीचा किये थी। उसका सारा शरीर निश्चल था। इसी दशामें उसने धीरे-धीरे उत्तर दिया ॥१७६॥


न कश्चिज्जनितो नाथ त्वया परिभवो मम । अधुना कुर्वता स्नेहं मनोरथसुदुर्लभम् ॥१७७॥

अर्थ: कि हे नाथ ! चूँकि इस समय आप जिसकी मुझे आशा ही नहीं थी ऐसा दुर्लभ स्नेह कर रहे हैं इसलिए यही समझना चाहिए कि आपने मेरा कुछ भी तिरस्कार नहीं किया है ॥१७७॥


त्वत्स्मृतिप्रतिबद्धं मे वहन्त्या ननु जीवितम् । त्वदायत्तो निकारोऽपि महानन्दसमोऽभवत् ॥१७८॥

अर्थ: मैंने अब तक जो जीवन धारण किया है वह एक आपकी स्मृतिके आश्रय ही धारण किया है। इसलिए आपके द्वारा किया हुआ तिरस्कार भी मेरे लिए महान् आनन्दस्वरूप ही रहा है ॥१७८॥


अथैवं भाषमाणाया विधाय चिबुकेऽङ्गुलिम् । उन्नमय्य मुखं पश्यन् जगाद पवनंजयः ॥१७९॥

अर्थ: अथानन्तर ऐसा कहती हुई अंजनाकी चिबुकपर अँगुली रख उसके मुखको कुछ ऊँचा उठाकर उसीकी ओर देखते हुए पवनंजयने कहा कि ॥१७९॥


देवि सर्वापराधानां विस्मृत्यै तव पादयोः । प्रणाममेष यातोऽस्मि प्रसादं परमं व्रज ॥१८०॥

अर्थ: हे देवि ! समस्त अपराध भूल जाओ इसलिए मैं तुम्हारे चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, परम प्रसन्नताको प्राप्त होओ ॥१८०॥


इत्युक्त्वा स्थापितं तेन मूर्द्धानं पादयोः प्रिया । त्वरया करपद्माभ्यामुन्नेतुं व्यापृताभवत् ॥१८१॥

अर्थ: इतना कहकर पवनंजयने अपना मस्तक अंजनाके चरणोंमें रख दिया और अंजना उसे अपने करकमलोंसे शीघ्र ही उठानेका प्रयत्न करने लगी ॥१८१॥


तथावस्थित एवासौ ततोऽवोचत्प्रियं वचः । प्रसन्नास्मीति येनाहमुद्यच्छामि शिरः प्रिये ॥१८२॥

अर्थ: परन्तु पवनंजय उसी दशामें पड़े रहे। उन्होंने कहा कि हे प्रिये ! जब तुम यह कहोगी कि ‘मैं प्रसन्न हूँ’ तभी सिर ऊपर उठाऊँगा ॥१८२॥


क्षान्तमित्युदितोऽथासावुन्नमय्याङ्गमुत्तमम् । चक्रे प्रियासमाश्लेषं सुखामीलितलोचनः ॥१८३॥

अर्थ: तदनन्तर ‘क्षमा किया’ अंजनाके ऐसा कहते ही पवनंजयने सिर ऊपर उठाकर उसका आलिंगन किया। उस समय उसके दोनों नेत्र सुखसे निमीलित हो रहे थे ॥१८३॥


आश्लिष्टा दयितस्यासौ तथा गात्रेष्वलीयत । पुनर्वियोगभीतेव गतान्तर्विग्रहं यथा ॥१८४॥

अर्थ: आलिंगित अंजना पतिके शरीरमें इस प्रकार लीन हो गयी मानो फिरसे वियोग न हो जावे इस भयसे शरीरके भीतर ही प्रविष्ट होना चाहती थी ॥१८४॥


आलिङ्गनविमुक्तायास्तस्याः स्तिमितलोचनम् । मुखं मुक्तनिमेषाभ्यां लोचनाभ्यां पपौ प्रियः ॥१८५॥

अर्थ: पवनंजयने अंजनाको आलिंगनसे छोड़ा तो निश्चल नेत्रोंसे युक्त उसके मुखको अपने टिमकाररहित नेत्रोंसे देखने लगे ॥१८५॥


पादयोः करयोर्नाभ्यां स्तनयोश्चिबुकेऽलिके । गण्डयोर्नेत्रयोश्चास्याश्चुम्बनं मदनातुरः ॥१८६॥

अर्थ: तदनन्तर कामसे व्याकुल हो उन्होंने अंजनाके पैरों, हाथों, नाभि, स्तन, दाढ़ी, ललाट, कपोलों और नेत्रोंका चुम्बन किया ॥१८६॥


पुनः पुनश्चकारासौ स्वेदिना पाणिना स्पृशन् । आप्तसेवा हि सा नूनं क्रियते वक्त्रचुम्बने ॥१८७॥

अर्थ: एक ही बार नहीं, किन्तु पसीनासे युक्त हाथसे स्पर्श करते हुए उन्होंने पुनः-पुनः उन स्थानोंका चुम्बन किया जो ठीक ही है क्योंकि मुखका चुम्बन करनेके लिए वह आप्त सेवा है सो प्रेमीजनोंको करना ही पड़ता है ॥१८७॥


ततः प्रबुद्धराजीवगर्भच्छदसमप्रभम् । स पपावधरं तस्या विमुञ्चन्तमिवामृतम् ॥१८८॥

अर्थ: तदनन्तर खिले हुए कमलके भीतरी दलके समान जिसकी कान्ति थी और मानो जो अमृत ही छोड़ रहा था ऐसे उसके अधरोष्ठका पान किया ॥१८८॥


नीवीविमोचनव्यग्रपाणिमस्य त्रपावती । रोद्धुमैच्छन्न सा शक्ता पाणिना वेपथुश्रिता ॥१८९॥

अर्थ: नीवीकी गाँठ खोलने- के लिए उतावली करनेवाले पवनंजयके हाथको लज्जासे भरी अंजना रोकना तो चाहती थी पर उसका हाथ इतना अधिक काँप रहा था कि उससे वह रोकनेमें समर्थ नहीं हो सकी ॥१८९॥


ततो नितम्बफलकं दृष्ट्वास्या वसनोज्झितम् । उवाह हृदयं वायुर्मनोभूवेगरङ्गितम् ॥१९०॥

अर्थ: तदनन्तर वस्त्ररहित अंजनाका नितम्बफलक देखकर पवनंजयका हृदय कामके वेगसे चंचल हो गया ॥१९०॥


अथ केनापि वेगेन परायत्तीकृतात्मना । गृहीता दयिता गाढं पवनेनाब्जकोमला ॥१९१॥

अर्थ: तत्पश्चात् किसी अद्भुत वेगसे जिसकी आत्मा विवश हो रही थी ऐसे पवनंजयने कमलके समान कोमल अंजनाको कसकर पकड़ लिया ॥१९१॥


यथा ब्रवीति वैदग्ध्यं यथाज्ञापयति स्मरः । अनुरागो यथा शिक्षां प्रयच्छति महोदयः ॥१९२॥

तथा तयो रतिः प्राप्ता दम्पत्योर्वृद्धिमुत्तमाम् । काले तत्र हि यो भावो नैवाख्यातुं स पार्यते ॥१९३॥

अर्थ: तदनन्तर चतुराई जो बात कहती थी, काम जैसी आज्ञा देता था, और बढ़ा हुआ अनुराग जैसी शिक्षा देता था ‘वैसी ही उन दोनों’ दम्पतियोंकी रति-क्रिया उत्तम वृद्धिको प्राप्त हुई । उस समय उन दोनोंके मनका जो भाव था वह शब्दों द्वारा नहीं कहा जा सकता ॥१९२-१९३॥


स्तनयोः कुम्भयोरेष जघने चाङ्गनोत्तमाम् । आस्फालयन् समारूढो मनोभवमहागजम् ॥१९४॥

अर्थ: परम सुन्दरी अंजनाके स्तन-रूपी कलश तथा नितम्ब-स्थलका आस्फालन करते हुए पवनंजय कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथीपर आरूढ़ थे ॥१९४॥


तिष्ठ मुञ्च गृहाणेति नानाशब्दसमाकुलम् । तयोर्युद्धमिवोदारं रतमासीत्सविभ्रमम् ॥१९५॥

अर्थ: ‘ठहरो’, 'छोड़ो, ‘पकड़ो’ आदि नाना शब्दोंसे युक्त तथा हाव-भाव विभ्रमसे भरा उनका रत किसी महायुद्धके समान जान पड़ता था ॥१९५॥


अधरग्रहणे तस्याः पुरुसीत्कारपूर्वकम् । प्रविधूतः करो रेजे लताया इव पल्लवः ॥१९६॥

अर्थ: अधरोष्ठको ग्रहण करते समय जोरसे सी-सी करती हुई अंजना जो हाथ हिलाती थी वह ऐसा जान पड़ता था मानो किसी लताका पल्लव ही हिल रहा हो ॥१९६॥


प्रियदत्ता नवास्तस्य नखाङ्का जघने बभुः । वैडूर्यजगतीभागे पद्मरागोद्गमा इव ॥१९७॥

अर्थ: अंजनाके नितम्ब-स्थलपर पवनंजयने जो नये-नये नख-क्षत दिये थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो नीलमणिकी भूमिमें पद्मरागमणि ही निकल रहे हों ॥१९७॥


तस्याः सेचनकत्वं तु जगाम जघनस्थलम् । निमेषमुक्ततन्निष्ठमुकुलीभूतचक्षुषः ॥१९८॥

अर्थ: अंजनाका जघन-स्थल देखते-देखते पवनंजयको तृप्ति ही नहीं होती थी । वह अपने टिमकाररहित नेत्र उसीपर गड़ाये बैठे थे ॥१९८॥


वलयानां रणत्कारः कलालापसमन्वितः । तदा मनोहरो जज्ञे भ्रमरौघरवोपमः ॥१९९॥

अर्थ: मधुर आलापसे सहित उसकी चूड़ियोंकी मनोहर रुनझुन ऐसी जान पड़ती थी मानो भ्रमरोंके समूह ही गुंजार कर रहे हों ॥१९९॥


तस्यास्ते काम्यमानाया नेत्रकेकरतारके । मुकुले दधतुः शोभां चलालीन्दीवरस्थिताम् ॥२००॥

अर्थ: अंजनाके नेत्रोंके कटाक्ष और पुतलियाँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो चंचल भ्रमरोंसे युक्त नील कमलोंकी शोभा ही धारण कर रही हो ॥२००॥


प्रस्वेदबिन्दुनिकरस्तस्या मुखकुचोद्गतः । स्वच्छमुक्ताफलाकारो रतस्यान्तेऽभ्यराजत ॥२०१॥

अर्थ: सम्भोगके अनन्तर अंजनाके मुख तथा स्तनोंके ऊपर जो पसीनोंकी बूँदोंका समूह प्रकट हुआ था वह ऐसा जान पड़ता था मानो स्वच्छ मोतियोंका समूह ही हो ॥२०१॥


रदग्रहारुणीभूतं साधरं बिभ्रती बभौ । पलाशवनराजीव समुद्भूतैककिंशुका ॥२०२॥

अर्थ: दन्ताघातके कारण उसका अधरोष्ठ लाल-लाल हो गया था । उसे धारण करती हुई वह ऐसी जान पड़ती थी मानो जिसमें एक फूल आया है ऐसे टेसूके वनकी पंक्ति ही हो ॥२०२॥


प्रियभुक्ता तनुस्तस्या ऊहे कान्तिमनुत्तमाम् । कनकाद्रितटाश्लिष्टघनपङ्क्तिकृतोपमाम् ॥२०३॥

अर्थ: पतिके द्वारा उपभुक्त अंजनाका शरीर सुमेरु पर्वतके द्वारा आलिंगित मेघपंक्तिके समान उत्तम कान्तिको धारण कर रहा था ॥२०३॥


ततः संप्राप्तकृत्ये तौ समाप्ते सुरतोत्सवे । दम्पती सेवितुं निद्रां खिन्नदेहाववाञ्छताम् ॥२०४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके समस्त कार्य पूर्ण हो चुके थे ऐसे सुरतोत्सवके समाप्त होनेपर खिन्न शरीरसे युक्त दोनों दम्पति निद्रा-सेवनकी इच्छा करने लगे ॥२०४॥


परस्परगुणध्यानवशमानसयोस्तु सा । ईर्ष्ययेव तयोर्दूरं कोपात् क्वापि पलायिता ॥२०५॥

अर्थ: परन्तु उन दोनोंके मन एक दूसरेके गुणोंका ध्यान करनेमें निमग्न थे इसलिए निद्रा ईर्ष्याके कारण ही मानो क्रोधवश कहीं भाग गयी थी ॥२०५॥


ततः प्रियांसदेशस्थदयितामूर्धदेशकम् । कृतान्योन्यभुजाश्लेषं परमप्रेमकीलितम् ॥२०६॥

महासौरभनिश्वासवासितास्यसरोरुहम् । विकटोरःपरिष्वङ्गचक्रितस्तनमण्डलम् ॥२०७॥

नरोर्वन्तरनिक्षिप्तवनितैकोरुभारकम् । यथेष्टदेशविन्यस्तनानाकारोपधानकम् ॥२०८॥

नागीयमिव तत्कान्तं मिथुनं कथमप्यगात् । निद्रां स्पर्शसुखाम्भोधिनिमग्नालीनविग्रहम् ॥२०९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें पतिके कन्धेपर वल्लभाका सिर रखा था, जिसमें भुजाओंका परस्पर आलिंगन हो रहा था, जो पारस्परिक प्रेमसे मानो कीलित था, महा-सुगन्धित श्वासोच्छ्वासके कारण जिसमें मुख-कमल सुवासित थे, विशाल वक्ष-स्थलकी चपेटसे जिसमें स्तन-मण्डल चक्रके आकार चपटे हो रहे थे, जिसमें पुरुषकी जाँघोंके बीचमें स्त्रीकी एक जाँघका भार अवस्थित था और इच्छित स्थानोंमें जहाँ नाना प्रकारके तकिया लगाये गये थे, ऐसी अवस्थामें नागकुमार देव-देवियोंके युगलके समान वह अंजना और पवनंजयका युगल किसी तरह निद्राको प्राप्त हुआ । उस समय उन दोनोंके शरीर स्पर्श-जन्य सुखरूपी सागरमें निमग्न होनेसे अत्यन्त निश्चल थे ॥२०६-२०९॥


जाते मन्दप्रभातेऽथ शयनीयात्समुत्थिता । पार्श्वासन्नस्थिता कान्तमञ्जना पर्यसेवत ॥२१०॥

अर्थ: अथानन्तर जब कुछ-कुछ प्रभात हुआ तब अंजना शय्यासे उठकर तथा बगलमें निकट बैठकर पतिकी सेवा करने लगी ॥२१०॥


दृष्ट्वा परिमलं देहे स्वस्मिन् साभूत् त्रपावती । प्रमदं च परिप्राप्ता चिराल्लब्धमनोरथा ॥२११॥

अर्थ: अपने शरीरमें सम्भोगजन्य सुगन्धि देखकर वह लज्जित हो गयी और साथ ही चूँकि उसके मनोरथ चिरकाल बाद पूर्ण हुए थे इसलिए हर्षको भी प्राप्त हुई ॥२११॥


तयोरज्ञातयोरेवं यथोचितविधायिनोः । अतीयाय निशानेका क्षणाद्दर्शनभीतयोः ॥२१२॥

अर्थ: इस प्रकार जो पहले एक दूसरेके दर्शन-मात्रसे भयभीत रहते थे ऐसे उन दम्पतियोंकी अज्ञातरूपसे यथेच्छ उपभोग करते हुए अनेक रात्रियाँ व्यतीत हो गयीं ॥२१२॥


दोदुन्दुकसुरौपम्यं प्राप्तयोरुभयोस्तदा । इन्द्रियाण्यन्यकार्येभ्यः प्राप्तानि विनिवर्तनम् ॥२१३॥

अर्थ: दोदुन्दुक नामक देवकी उपमाको धारण करनेवाले उन दोनों दम्पतियोंकी इन्द्रियाँ उस समय अन्य कार्योंसे व्यावृत्त होकर परस्पर एक दूसरेकी ओर ही लगी हुई थीं ॥२१३॥


अन्यदा सौख्यसंभारविस्मृतस्वामिशासनम् । मित्रं प्रमादवद्बुद्ध्वा तद्धितध्यानतत्परः ॥२१४॥

सुधीर्वसन्तमालायां प्रविष्टायां कृतध्वनिः । प्रविश्य वासभवनं मन्दं प्रहसितोऽवदत् ॥२१५॥

अर्थ: अथानन्तर सुखके सम्भारसे जिसने स्वामीका आदेश भुला दिया था ऐसे मित्रको प्रमादी जान उसके हितका चिन्तन करनेमें तत्पर रहनेवाला बुद्धिमान् प्रहसित मित्र वसन्तमालाके प्रवेश करनेपर आवाज देता हुआ महलके भीतर प्रवेश कर धीरे-धीरे बोला ॥२१४-२१५॥


सुन्दरोत्तिष्ठ किं शेषे नन्वेष रजनीपतिः । जितस्त्वन्मुखकान्त्येव गतो विच्छायतां पराम् ॥२१६॥

अर्थ: कि हे सुन्दर ! उठो, क्यों शयन कर रहे हो ? जान पड़ता है कि मानो तुम्हारे मुखकी कान्तिसे पराजित होकर ही यह चन्द्रमा अत्यन्त निष्प्रभताको प्राप्त हुआ है ॥२१६॥


इति वाचास्य जातोऽसौ प्रबोधं श्लथविग्रहः । कृत्वा विजृम्भणं निद्राशेषारुणनिरीक्षणः ॥२१७॥

अर्थ: मित्रके यह वचन सुनते ही पवनंजय जाग उठा । उस समय उसका शरीर शिथिल था, निद्राके शेष रहनेसे उसके नेत्र लाल थे तथा जमुहाई आ रही थी ॥२१७॥


श्रवणं वामतर्जन्या कण्डूयन्मुकुलेक्षणः । संकोच्य दक्षिणं बाहुं निक्षिपञ्जनितस्वरम् ॥२१८॥

अर्थ: उसने नेत्र बन्द किये ही वाम हस्तकी तर्जनी नामा अंगुलीसे कान खुजाया तथा दाहिनी भुजाको पहले संकोचकर फिर जोरसे फैलाया जिससे चटाकका शब्द हुआ ॥२१८॥


कान्तायां निदधन्नेत्रे त्रपाविनतचक्षुषि । एहीति निगदन्मित्रमुत्तस्थौ पवनंजयः ॥२१९॥

अर्थ: तदनन्तर लज्जासे जिसके नेत्र नीचे हो रहे थे ऐसे कान्ताके मुख-पर दृष्टि डालता हुआ पवनंजय ‘आओ मित्र’ ऐसा कहता हुआ शय्यासे उठ खड़ा हुआ ॥२१९॥


कृत्वा स्मितमथापृच्छच्च सुखरात्रिं कृतस्मितम् । पृच्छन्तं रात्रिकुशलं तद्वेदी तन्निवेदनम् ॥२२०॥

निवेश्य तत्प्रियोद्दिष्टे समासन्ने सुखासने । सुहृदेनं जगादैवं नयशास्त्रविशारदः ॥२२१॥

उत्तिष्ठ मित्र गच्छावः सांप्रतं बहवो गताः । दिवसास्ते प्रसक्तस्य प्रियासंमानकर्मणि ॥२२२॥

अर्थ: तदनन्तर प्रहसितने हँसकर पूछा कि रात्रि सुखसे व्यतीत हुई ? इसके उत्तरमें पवनंजयने भी हँसते हुए प्रहसितसे पूछा कि तुम्हारी भी रात्रि कुशलतासे बीती ? इस प्रकार वार्तालापके अनन्तर समस्त वृत्तान्तको जाननेवाला एवं नीतिशास्त्रका पण्डित प्रहसित अंजनाके द्वारा बतलाये हुए निकटवर्ती सुखासनपर बैठकर पवनंजयसे इस प्रकार बोला कि हे मित्र ! उठो, अब चलें, प्रियाके सम्मान-कार्यमें लगे हुए आपके बहुत दिन निकल गये ॥२२०-२२२॥


यावत्कश्चिन्न जानाति प्रत्यागमनमावयोः । गमनं युज्यते तावदन्यथा लज्जनं भवेत् ॥२२३॥

अर्थ: जबतक हम लोगोंका वापस आना कोई जान नहीं पाता है तबतक चला जाना ठीक है अन्यथा लज्जाकी बात हो जायेगी ॥२२३॥


तिष्ठत्युदीक्षमाणश्च रथनूपुरकस्तव । नृपः कैन्नरगीतश्च यियासुः स्वामिनोऽन्तिकम् ॥२२४॥

अर्थ: तुम्हारा सेनापति रथनूपुरक तथा स्वामीके समीप जानेका इच्छुक राजा कैन्नरगीत तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए ठहरे हैं ॥२२४॥


मन्त्रिणश्च किलाजस्रं पृच्छत्यादरसंगतः । पवनो वर्तते क्वेति मरुत्वमखसूदनः ॥२२५॥

अर्थ: आदरसे भरा रावण निरन्तर मन्त्रियोंसे पूछता रहता है कि पवनंजय कहाँ है ? ॥२२५॥


उपायो गमनस्यायं मया विरचितस्तव । दयितासंगमस्तस्मादिदानीं तत्र त्यज्यताम् ॥२२६॥

अर्थ: मैंने तुम्हारे जानेका यह उपाय रचा था सो इस समय वल्लभाका समागम छोड़ दिया जाये ॥२२६॥


आज्ञेयं करणीया ते स्वामिनो जनकस्य च । क्षेमादागत्य सततं दयितां मानयिष्यति ॥२२७॥

अर्थ: तुम्हें स्वामी रावण और पिता प्रह्लादकी यह आज्ञा माननी चाहिए । तदनन्तर कुशलतापूर्वक वापस आकर निरन्तर वल्लभाका सम्मान करते रहना ॥२२७॥


एवं करोमि साधूक्तं सुहृदेत्यभिधाय सः । कृत्वा तनुगतं कर्म संनिधापितमङ्गलम् ॥२२८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें पवनंजयने कहा कि हे मित्र ! ऐसा ही करता हूँ। तुमने बहुत ठीक कहा है । ऐसा कहकर उसने मंगलाचारपूर्वक शरीरसम्बन्धी क्रियाएँ कीं ॥२२८॥


रहस्यालिङ्ग्य दयितां चुम्बित्वा स्फुरिताधरम् । जगाद देवि माकार्षीरुद्वेगं त्वं व्रजाम्यहम् ॥२२९॥

अचिरेणैव कालेन विधाय स्वामिशासनम् । आगमिष्यामि निर्वृत्या तिष्ठेति मधुरस्वरः ॥२३०॥

अर्थ: एकान्तमें वल्लभाका आलिंगन किया, उसके फड़कते हुए अधरोष्ठका चुम्बन किया और कहा कि हे देवि ! तुम उद्वेग नहीं करना, मैं जाता हूँ और शीघ्र ही स्वामीकी आज्ञाका पालन कर वापस आ जाऊँगा। तुम सुखसे रहो। पवनंजयने यह शब्द बड़ी मधुर आवाजसे कहे थे ॥२२९-२३०॥


ततो विरहतो भीता तद्वक्त्रगतलोचना । कृत्वा करयुगाम्भोजां जगादाञ्जनसुन्दरी ॥२३१॥

आर्यपुत्रर्तुमत्यस्मि भवता कृतसंगमा । ततस्त्वद्विरहे गर्भो ममावाच्यो भविष्यति ॥२३२॥

अर्थ: तदनन्तर जो विरहसे भयभीत थी तथा जिसके नेत्र पवनंजयके मुखपर लग रहे थे ऐसी अंजनासुन्दरी दोनों हस्तकमल जोड़कर बोली कि हे आर्य पुत्र ! ऋतु कालके बाद ही मैंने आपके साथ समागम किया है इसलिए यदि मेरे गर्भ रह गया तो वह आपके विरह-कालमें निन्दाका पात्र होगा ॥२३१-२३२॥


तस्मान्निवेद्य गच्छ त्वं गुरुभ्यो गर्भसंभवम् । क्षेमाय दीर्घदर्शित्वं कल्पते प्राणधारिणाम् ॥२३३॥

अर्थ: अतः आप गुरुजनोंको गर्भ सम्भवताकी सूचना देकर जाइए । दीर्घदर्शिता मनुष्योंके कल्याणका कारण है ॥२३३॥


एवमुक्तो जगादासौ देवि पूर्वं त्वया विना । निष्क्रान्तो निश्चितो गेहाद् गुरूणां संनिधावहम् ॥२३४॥

अधुना गमनं तेभ्यस्तदर्थं गदितुं त्रपे । चित्रचेष्टं च विज्ञाय मां जनः स्मेरतां व्रजेत् ॥२३५॥

अर्थ: अंजनाके ऐसा कहनेपर पवनंजयने कहा कि हे देवि ! मैं पहले गुरुजनोंके समीप तुम्हारे बिना घरसे निकला था और ऐसा ही सबको निश्चय है। इसलिए इस समय उनके पास जाने और यह सब समाचार कहनेमें मुझे लज्जा आती है। इसकी चेष्टाएँ विचित्र हैं ऐसा जानकर लोग मेरी हँसी करेंगे ॥२३४-२३५॥


तस्माद्यावदयं गर्भस्तव नैति प्रकाशताम् । तावदेवाव्रजिष्यामि मा व्राजीर्विमनस्कताम् ॥२३६॥

अर्थ: अतः जबतक तुम्हारा यह गर्भ प्रकट नहीं हो पाता है तबतक मैं वापस आ जाऊँगा। विषाद मत करो ॥२३६॥


इमं प्रमादनोदार्थं मन्नामकृतलक्षणम् । गृहाण वलयं भद्रे शान्तिस्तेऽतो भविष्यति ॥२३७॥

अर्थ: हे भद्रे ! प्रमाद दूर करनेके लिए मेरे नामसे चिह्नित यह कड़ा ले लो इसमें तुम्हें शान्ति रहेगी ॥२३७॥


इत्युक्त्वा वलयं दत्वा सान्त्वयित्वा मुहुः प्रियाम् । उक्त्वा वसन्तमालां च तदर्थं समुपासनम् ॥२३८॥

रतव्यतिकरच्छिन्नहारमुक्ताफलाचितात् । पुष्पगन्धपरागोरुसौरभाकृष्टषट्पदात् ॥२३९॥

तरङ्गिप्रच्छदपटाद् दुग्धाब्धिद्वीपसंनिमात् । शयनीयात् समुत्तस्थौ प्रियावस्थितमानसः ॥२४०॥

अर्थ: ऐसा कहकर, कड़ा देकर, बार-बार सान्त्वना देकर और वसन्तमालाको ठीक-ठीक सेवा करनेका आदेश देकर पवनंजय शय्यासे उठा। उस समय उसकी वह शय्या सुरतकालीन सम्मर्दनसे टूटे हुए हारके मोतियोंसे व्याप्त थी, फूलोंकी सुगन्धित पराग सम्बन्धी भारी सुगन्धिसे भौंरे खिंचकर उसपर इकट्ठे हो रहे थे, उसके ऊपर बिछा हुआ चद्दर लहरा रहा था, और वह क्षीरसमुद्रके मध्यमें स्थित क्षीर द्वीपके समान जान पड़ती थी। पवनंजय उठा तो सही पर उसका मन अपनी प्रियामें ही लग रहा था ॥२३८-२४०॥


मङ्गलध्वंसभीत्या च प्रियया साश्रुनेत्रया । अदृष्टिगोचरं दृष्टः समित्रो वियदुद्ययौ ॥२४१॥

अर्थ: पृथ्वीपर अश्रु गिरनेसे कहीं मंगलाचारमें बाधा न आ जाये इस भयसे अंजनाने अपने अश्रु नेत्रोंमें ही समेटकर रखे थे और इसलिए जाते समय वह पवनंजयको आँख खोलकर नहीं देख सकती थी फिर भी मित्रके साथ वह आकाशकी ओर उड़ गया ॥२४१॥


कदाचिदिह जायते स्वकृतकर्मपाकोदयात् सुखं जगति संगमादभिमतस्य सद्वस्तुनः । कदाचिदपि संभवत्यसुभृतामसौख्यं परं भवे भवति न स्थितिः समगुणा यतः सर्वदा ॥२४२॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि इस संसारमें प्राणियोंको कभी तो अपने पूर्वो- पार्जित पुण्य-कर्मके उदयसे इष्ट वस्तुका समागम होनेसे सुख होता है और कभी पाप-कर्मके उदयसे परम दुःख प्राप्त होता है क्योंकि इस संसारमें सदा किसीकी स्थिति एक-सी नहीं रहती ॥२४२॥


अथापि जननात्प्रभृत्यविरतं सुखं प्राणिनां मृतेरविरतो भवेन्ननु तथाप्यमुत्रासुखम् । ततो भजत भो जनाः सततभूरिसौख्यावहं भवासुखतमश्छिदं जिनवरोक्तधर्मं रविम् ॥२४३॥

अर्थ: फिर भी धर्मके प्रसादसे कितने ही जीवोंको जन्मसे लेकर मरण-पर्यन्त निरन्तर सुख प्राप्त होता रहता है और मरनेके बाद परलोकमें भी उन्हें सुख मिलता रहता है । इसलिए हे भव्य जीवो ! निरन्तर अत्यधिक सुख देनेवाले एवं संसारके दुःखरूपी अन्धकारको छेदनेवाले जिनेन्द्रोक्त धर्मरूपी सूर्यकी सेवा करो ॥२४३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते पवनाञ्जनासंभोगाभिधानं नाम षोडशं पर्व ॥१६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें पवनंजय और अंजनाके सम्भोगका वर्णन करनेवाला सोलहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१६॥

१७. सप्तदशं पर्व (हनूमत्संभवाभिधानं)

कियत्यपि प्रयातेऽथ काले गर्भस्य सूचकाः । विशेषाः प्रादुरभवन्महेन्द्रतनयातनौ ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर कितना ही समय बीतनेपर राजा महेन्द्रकी पुत्री अंजनाके शरीरमें गर्भको सूचित करनेवाले विशेष चिह्न प्रकट हुए ॥१॥


इयाय पाण्डुतां छाया यशसेव हनूमतः । गतिर्मन्दतरत्वं च मत्तदिग्नागविभ्रमा ॥२॥

अर्थ: उसकी कान्ति सफेदीको प्राप्त हो गयी सो मानो गर्भमें स्थित हनुमान्‌के यशसे ही प्राप्त हुई थी । मदोन्मत्त दिग्गजके समान विभ्रमसे भरी उसकी मन्द चाल और भी अधिक मन्द हो गयी ॥२॥


स्तनावत्युन्नतिं प्राप्तौ श्यामलीभूतचूचुकौ । आलस्याद् भ्रूसमुत्क्षेपं चकार विषये गिरः ॥३॥

अर्थ: जिनका अग्रभाग श्यामल पड़ गया था ऐसे स्तन अत्यन्त उन्नत हो गये और आलस्यके कारण वह जहाँ बात करना आवश्यक था वहाँ केवल भौंह ऊपर उठा कर संकेत करने लगी ॥३॥


ततस्तां लक्षणैरेभिः श्वश्रूर्विज्ञाय गर्भिणीम् । पप्रच्छ तव केनेदं कृतं कर्मेत्यसूयिका ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर इन लक्षणोंसे उसे गर्भवती जान ईर्ष्यासे भरी सासने उससे पूछा कि तेरे साथ यह कार्य किसने किया है ? ॥४॥


साञ्जलिः सा प्रणम्योचे निखिलं पूर्वचेष्टितम् । प्रतिषिद्धापि कान्तेन गतिमन्यामविन्दती ॥५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें अंजनाने हाथ जोड़ प्रणाम कर पहलेका समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। यद्यपि पवनंजयने यह वृत्तान्त प्रकट करनेके लिए उसे मना कर दिया था तथापि जब उसने कोई दूसरा उपाय नहीं देखा तब विवश हो संकोच छोड़ सब समाचार प्रकट कर दिया ॥५॥


ततः केतुमती क्रुद्धा जगादेति सुनिष्ठुरम् । वाणीभिर्ग्रावदेहाभिस्ताडयन्तीव यष्टिभिः ॥६॥

अर्थ: तदनन्तर केतुमतीने कुपित होकर बड़ी निष्ठुरताके साथ पत्थर-जैसी कठोर वाणीमें उससे कहा। जब केतुमती अंजनासे कठोर शब्द बोल रही थी तब ऐसा जान पड़ता था मानो वह लाठियोंसे उसे ताड़ित कर रही थी ॥६॥


यो न त्वत्सदृशं पापे द्रष्टुमाकारमिच्छति । शब्दं वा श्रवणे कर्तुमतिद्वेषपरायणः ॥७॥

स कथं स्वजनापृच्छां कृत्वा गेहाद्विनिर्गतः । भवत्या संगमं धीरः कुर्वीत विगतत्रपे ॥८॥

अर्थ: उसने कहा कि अरी पापिन ! अत्यन्त द्वेषसे भरा होनेके कारण जो तुझ-जैसा आकार भी नहीं देखना चाहता और तेरा शब्द भी कानमें नहीं पड़ने देना चाहता वह धीर-वीर पवनंजय तो आत्मीय जनोंसे पूछकर घरसे बाहर गया हुआ है। हे निर्लज्जे ! वह तेरे साथ समागम कैसे कर सकता है ? ॥७-८॥


धिक् त्वां पापां शशाङ्कांशुशुभ्रसंतानदूषिणीम् । आचरन्तीं क्रियामेतां लोकद्वितयनिन्दिताम् ॥९॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल सन्तानको दूषित करनेवाली तथा दोनों लोकोंमें निन्दनीय इस क्रियाको करनेवाली तुझ पापिनको धिक्कार है ॥९॥


सखी वसन्तमाला ते साध्वीमेतां मतिं ददौ । वेश्यायाः कुलटानां किं कुर्वन्ति परिचारिकाः ॥१०॥

अर्थ: जान पड़ता है कि सखी वसन्तमालाने ही तेरे लिए यह उत्तम बुद्धि दी है सो ठीक ही है क्योंकि वेश्या और कुलटा स्त्रियोंकी सेविकाएँ इसके सिवाय करती ही क्या हैं ॥१०॥


दर्शितेऽपि तदा तस्मिन्कटके क्रूरमानसा । प्रतीयाय न सा श्वश्रूश्चुकोपात्यन्तमुग्रवाक् ॥११॥

अर्थ: उस समय अंजनाने यद्यपि पवनंजयका दिया कड़ा भी दिखाया पर उस दुष्ट हृदयाने उसका विश्वास नहीं किया। विश्वास तो दूर रहा तीक्ष्ण शब्द कहती हुई अत्यन्त कुपित हो उठी ॥११॥


इत्युक्त्वा क्रूरनामानं क्रूरमाहूय किंकरम् । कृतप्रणाममित्यूचे कोपारुणनिरीक्षणा ॥१२॥

अयि क्रूराशु नीत्वेमां महेन्द्रपुरगोचरम् । यानेन सहितां सख्या निक्षिप्यैहि निरन्तरम् ॥१३॥

अर्थ: उसने उस समय क्रूर नामधारी दुष्ट सेवकको बुलाया । सेवकने आकर उसे प्रणाम किया । तदनन्तर क्रोधसे जिसके नेत्र लाल हो रहे थे ऐसी केतुमतीने सेवकसे कहा कि हे क्रूर ! तू सखीके साथ इस अंजनाको शीघ्र ही ले जाकर राजा महेन्द्रके नगरके समीप छोड़कर बिना किसी विलम्बके वापस आ जा ॥१२-१३॥


ततस्तद्वचनादेतां पृथुवेपथुविग्रहाम् । महापवननिर्धूतां लतामिव निराश्रयाम् ॥१४॥

ध्यायन्तीमाकुलं भूरिदुःखमागामि निष्प्रभाम् । विलीनमिव बिभ्राणां हृदयं दुःखवह्निना ॥१५॥

भीत्या निरुत्तरीभूतां सखीनिहितलोचनाम् । निन्दन्तीमशुभं कर्म मनसा पुनरुद्गतम् ॥१६॥

अश्रुधारां विमुञ्चन्तीं शलाकां स्फटिकीमिव । स्तनमध्ये क्षणं न्यस्तपर्यन्तामनवस्थिताम् ॥१७॥

सख्या समं समारोप्य यानं तत्कर्मदक्षिणः । क्रूरः प्रववृते गन्तुं महेन्द्रनगरं प्रति ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर आज्ञा पालनमें तत्पर रहनेवाला क्रूर केतुमतीके वचन सुन अंजनाको वसन्तमालाके साथ गाड़ीपर सवार कर राजा महेन्द्रके नगरकी ओर चला । उस समय अंजनाका शरीर भयसे अत्यन्त कम्पित हो रहा था, वह प्रचण्ड वायुके द्वारा झकझोरकर नीचे गिरायी हुई निराश्रय लताके समान जान पड़ती थी, आगामी कालमें प्राप्त होनेवाले भारी दुःखका वह बड़ी व्याकुलतासे चिन्तन कर रही थी, उसका हृदय दुःखरूपी अग्निसे मानो पिघल गया था, भयके कारण वह निरुत्तर थी, सखी वसन्तमालापर उसके नेत्र लग रहे थे, वह पुनः उदयमें आये अशुभ कर्मकी मन-ही-मन निन्दा कर रही थी, और जिसका एक छोर स्तनोंके बीचमें रखा हुआ था ऐसी स्फटिककी चंचल शलाकाके समान आँसुओंकी धारा छोड़ रही थी ॥१४-१८॥


दिनान्ते तत्पुरस्यान्तं संप्राप्योवाच सुन्दरीम् । एवं मधुरया वाचा क्रूरः कृतनमस्कृतिः ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर जब दिन समाप्त होनेको आया तब क्रूर राजा महेन्द्रके नगरके समीप पहुँचा । वहाँ पहुँचकर उसने अंजना सुन्दरीको नमस्कार कर निम्नांकित मधुर वचन कहे ॥१९॥


स्वामिनीशासनाद्देवि कृतमेतन्मया तव । दुःखस्य कारणं कर्म ततो न क्रोद्धुमर्हसि ॥२०॥

अर्थ: उसने कहा कि हे देवि ! मैंने तुम्हारे लिए दुःख देनेवाला यह कार्य स्वामिनीकी आज्ञासे किया है अतः मुझपर क्रोध करना योग्य नहीं है ॥२०॥


एवमुक्त्वावतार्यैतां यानात्सख्या समन्विताम् । स्वामिन्यै द्रुतमागत्य कृतामाज्ञां न्यवेदयत् ॥२१॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने सखीसहित अंजनाको गाड़ीसे उतारकर तथा शीघ्र ही वापस आकर स्वामिनीके लिए सूचित कर किया कि मैं आपकी आज्ञाका पालन कर चुका ॥२१॥


ततोऽञ्जनां समालोक्य दुःखभारादिवोत्तमाम् । मन्दीभूतप्रभाचक्रो रविरस्तमुपागमत् ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम नारी अंजनाको देखकर ही मानो दुःखके भारसे जिसका प्रभामण्डल फीका पड़ गया था ऐसा सूर्य अस्त हो गया ॥२२॥


लोचनच्छाययेवास्या रोदनात्यन्तशोणया । रविं त्राणाय पश्यन्त्याः पश्चिमाशारुणाऽभवत् ॥२३॥

अर्थ: पश्चिम दिशा लाल हो गयी सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजना सुन्दरी, निरन्तर रोती रहनेके कारण अत्यन्त लाल दिखनेवाले नेत्रोंसे रक्षा करनेके उद्देश्यसे सूर्यकी ओर देख रही थी सो उन्हींकी लालीसे लाल हो गयो थी ॥२३॥


ततस्तद्दुःखतो मुक्तैर्वाष्पैरिव घनैरलम् । दिग्भिर्निरन्तरं चक्रे श्यामलं नभसस्तलम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर दिशाओंने आकाशको श्यामल कर दिया सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजनाके दुःखसे दुःखी होकर उन्होंने अत्यधिक वाष्प ही छोड़े थे, उन्हींसे आकाश श्यामल हो गया था ॥२४॥


तद्दुःखादिव संप्राप्ता दुःखं संघातकारिणः । कुलायेष्वाकुलाश्चक्रुर्वयः कोलाहलं परम् ॥२५॥

अर्थ: घोंसलोंमें इकट्ठे होनेवाले पक्षी बड़ी आकुलतासे अत्यधिक कोलाहल करने लगे सो ऐसा मालूम होता था मानो अंजनाके दुःखसे दुःखी होकर ही वे चिल्ला रहे हों ॥२५॥


ततो दुःखमविज्ञाय सा क्षुदादिसमुद्भवम् । अभ्याख्यानमहादुःखसागरप्लवकारिणी ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर वह अंजना भूख-प्यास आदिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख तो भूल गयी और अपवादजन्य महादुःखरूपी सागरमें उतराने लगी ॥२६॥


भीतान्तर्वदनं साश्रु कुर्वती परिदेवनम् । सख्या विरचिते तस्थौ पल्लवैः संस्तरेऽञ्जना ॥२७॥

अर्थ: वह भयभीत होनेके कारण जोरसे तो नहीं चिल्लाती थी पर मुखके भीतर-ही-भीतर अश्रु ढालती हुई विलाप कर रही थी । तत्पश्चात् सखीने वृक्षोंके पल्लवोंसे एक आसन बनाया सो वह उसीपर बैठ गयी ॥२७॥


न तस्या नयने निद्रा तस्यां रात्रावढौकत । दाहादिव भयं प्राप्ता संततोष्णाश्रुसंभवात् ॥२८॥

अर्थ: उस रात्रिमें अंजनाके नेत्रोंमें निद्रा नहीं आयी सो ऐसा जान पड़ता था मानो निरन्तर निकलनेवाले उष्ण आँसुओंसे समुत्पन्न दाहसे डरकर ही नहीं आयी थी ॥२८॥


पाणिसंवाहनात् सख्या विनिर्धूतपरिश्रमा । सान्त्व्यमाना निशां निन्ये कृच्छ्रेणासौ समंसमम् ॥२९॥

अर्थ: सखीने हाथसे दाबकर जिसकी थकावट दूर कर दी थी तथा जिसे निरन्तर सान्त्वना दी थी ऐसी अंजनाने बड़े कष्टके साथ पूर्ण रात्रि बितायी अथवा ‘समा समां निशां कृच्छ्रेण निन्ये’ एक वर्षके समान रात्रि बड़े कष्टसे व्यतीत की ॥२९॥


ततो दीर्घोष्णनिश्वासनितान्तम्लानपल्लवम् । प्रभाते शयनं त्यक्त्वा नानाशङ्कातिविक्लवा ॥३०॥

कृतानुगमना सख्या छाययेवानुकूलया । ऐत्पितुर्मन्दिरद्वारं सकृपं वीक्षिता जनैः ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर प्रभात हुआ सो लम्बी और गरम-गरम साँसोंसे जिसके पल्लव अत्यन्त मुरझा गये थे ऐसी शय्या छोड़कर अंजना पिताके महलके द्वारपर पहुँची । छायाकी तरह अनुकूल चलनेवाली सखी उसके पीछे-पीछे चल रही थी और लोग उसे दयाभरी दृष्टिसे देख रहे थे ॥३०-३१॥


ततस्तत्प्रविशन्ती सा निरुद्धा द्वाररक्षिणा । प्राप्ता रूपान्तरं दुःखादविज्ञाता व्यवस्थिता ॥३२॥

अर्थ: दुःखके कारण अंजनाका रूप बदल गया था सो द्वारपालकी पहचानमें नहीं आयी । अतः द्वारमें प्रवेश करते समय उसने उसे रोक दिया । जिससे वह वहीं खड़ी हो गयी ॥३२॥


ततो निखिलमेतस्याः सख्या कृतनिवेदितम् । विज्ञाय स्थापयित्वाऽन्यं नरं द्वारे ससंभ्रमः ॥३३॥

गत्वा शिलाकवाटाख्यो द्वारपालः कृतानतिः । सुतागमं महीपाणिरुपांश्वीशं व्यजिज्ञपत् ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर सखीने सब समाचार सुनाया सो उसे जानकर शिलाकपाट नामका द्वारपाल द्वारपर किसी दूसरे मनुष्यको खड़ा कर भीतर गया और राजाको नमस्कार कर हाथसे पृथिवीको छूता हुआ एकान्तमें पुत्रीके आनेका समाचार कहने लगा ॥३३-३४॥


ततः प्रसन्नकीर्त्याख्यं महेन्द्रः पार्श्वगं सुतम् । आज्ञापयन् महाभूत्या तस्याः शीघ्रं प्रवेशनम् ॥३५॥

अर्थ: तत्पश्चात् राजा महेन्द्रने समीपमें बैठे हुए प्रसन्नकीर्ति नामक पुत्रको आज्ञा दी कि पुत्रीका बड़े वैभवके साथ शीघ्र ही प्रवेश कराओ ॥३५॥


पुरस्य क्रियतां शोभा साधनं परिसज्ज्यताम् । स्वयं प्रवेशयामीति पुनरूचे नराधिपः ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने फिर कहा कि नगरकी शोभा करायी जाये तथा सेना सजायी जाये मैं स्वयं ही पुत्रीका प्रवेश कराऊँगा ॥३६॥


जगादासौ ततस्तस्मै द्वारपालो यथास्थितम् । सुतायाश्चरितं कृत्वा वदने पाणिपल्लवम् ॥३७॥

अर्थ: तत्पश्चात् द्वारपालने पुत्रका जैसा चरित्र सुन रखा था वैसा मुँहपर हाथ लगाकर राजाके लिए कह सुनाया ॥३७॥


ततः श्रुत्वा त्रपाहेतुं पिता तस्या विचेष्टितम् । प्रसन्नकीर्तिमित्यूचे परमं कोपमागतः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर पिता पुत्रीकी लज्जाजनक चेष्टा सुनकर परम क्रोधको प्राप्त हुआ और प्रसन्नकीर्ति नामक पुत्रसे बोला ॥३८॥


निर्वास्यतां पुरादस्मादरं सा पापकारिणी । यस्या मे चरितं श्रुत्वा वज्रेणेवाहते श्रुती ॥३९॥

अर्थ: कि उस पापकारिणीको इस नगरसे शीघ्र ही निकाल दो । उसका चरित्र सुनकर मेरे कान मानो वज्रसे ही ताड़ित हुए हैं ॥३९॥


ततो नाम्ना महोत्साहः सामन्तोऽस्यातिवल्लभः । जगाद नाथ नो कर्तुमेवं कर्तुमिमां प्रति ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर महोत्साह नामका सामन्त जो राजा महेन्द्रको अत्यन्त प्यारा था बोला, हे नाथ ! इसके प्रति ऐसा करना योग्य नहीं है ॥४०॥


वसन्तमालया ख्यातं यथास्मै द्वाररक्षिणे । एवमेव न युक्ता तु विचिकित्सा विकारणा ॥४१॥

अर्थ: वसन्तमालाने द्वारपालके लिए जैसी बात कही है कदाचित् वह वैसी ही हो तो अकारण घृणा करना उचित नहीं है ॥४१॥


श्वश्रूः केतुमती क्रूरा लौकिकश्रुतिभाविता । अत्यन्तमविचारास्या विना दोषात्कृतोज्झिता ॥४२॥

अर्थ: इसकी सास केतुमती अत्यन्त क्रूर है, लौकिक श्रुतियोंसे प्रभावित होनेवाली है और बिलकुल ही विचाररहित है । उसने बिना दोषके ही इसका परित्याग किया है ॥४२॥


क्रूरयेयं यथा त्यक्ता कल्याणाचारतत्परा । भवतापि विनिर्धूता शरणं कं प्रपद्यताम् ॥४३॥

अर्थ: कल्याणरूप आचारका पालन करनेमें तत्पर रहनेवाली इस पुत्रीका जिस प्रकार उस दुष्ट सासने परित्याग किया है उसी प्रकार यदि आप भी तिरस्कार कर त्याग करते हैं तो फिर यह किसकी शरणमें जायेगी ? ॥४३॥


व्याघ्रदृष्टमृगीवेयं मुग्धास्या त्रासमागता । श्वश्रूतस्त्वां महाकक्षसमं शरणमागता ॥४४॥

अर्थ: जिस प्रकार व्याघ्रके द्वारा देखी हुई हरिणी भयभीत होकर किसी महावनकी शरणमें पहुँचती है उसी प्रकार यह मुग्ध-वदना साससे भयभीत होकर महावनके समान जो तुम हो सो तुम्हारी शरणमें आयी है ॥४४॥


सेयं निदाघसूर्यांशुसंतापादिव दुःखिता । महातरूपमं बाला विंदित्वा त्वां समागता ॥४५॥

अर्थ: यह बाला मानो ग्रीष्मऋतुके सूर्यकी किरणोंके सन्तापसे ही दुःखी हो रही है और तुम्हें महावृक्षके समान जानकर तुम्हारे पास आयी है ॥४५॥


श्रीवत् स्वर्गात् परिभ्रष्टा वराकी विह्वलात्मिका । अभ्याख्यानातयालीढा कल्पवल्लीत्र कम्पिनी ॥४६॥

अर्थ: यह बेचारी स्वर्गसे परिभ्रष्ट लक्ष्मीके समान अत्यन्त विह्वल हो रही है और अपवादरूपी घामसे युक्त हो कल्पलताके समान काँप रही है ॥४६॥


द्वारपालनिरोधेन सुतरामागता त्रपाम् । वैलक्ष्यादंशुकेनाङ्गमवगुण्ठ्य समूर्द्धकम् ॥४७॥

अर्थ: द्वारपालके रोकनेसे यह अत्यन्त लज्जाको प्राप्त हुई है । इसीलिए इसने लज्जावश मस्तकके साथ-साथ अपना सारा शरीर वस्त्रसे ढँक लिया है ॥४७॥


पितृस्नेहान्वितं द्वारे सदा दुर्लडितात्मिका । तिष्ठतीत्यमुनाख्यातं द्वारपालेन पार्थिव ॥४८॥

अर्थ: पिताके स्नेहसे युक्त होकर जो सदा लाड़-प्यारसे भरी रहती थी वह अंजना आज दरवाजेपर रुकी खड़ी है । हे राजन् ! इस द्वारपालने यह समाचार आपसे कहा है ॥४८॥


स त्वं कुरु दयामस्यां निर्दोषेयं प्रवेश्यताम् । ननु केतुमती ज्ञाता क्रूरा कस्य न विष्टपे ॥४९॥

अर्थ: सो तुम इसपर दया करो, यह निर्दोष है, इसलिए इसका भीतर प्रवेश कराओ । यथार्थमें केतुमती दुष्ट है यह लोकमें कौन नहीं जानता ? ॥४९॥


तस्य तद्वचनं श्रोत्रे राज्ञश्चक्रे न संश्रयम् । नलिनीदलविन्यस्तं बिन्दुजालमिवाम्भसः ॥५०॥

अर्थ: जिस प्रकार कमलिनीके पत्रपर स्थित पानीके बूँदोंका समूह उसपर स्थान नहीं पाता है उसी प्रकार महोत्साह नामक सामन्तके वचन राजाके कानोंमें स्थान नहीं पा सके ॥५०॥


जगाद च सखी स्नेहात् कदाचित् सत्यमप्यदः । अन्यथाकथयत्केन निश्चयोऽत्रावधार्यते ॥५१॥

अर्थ: राजाने कहा कि कदाचित् सखीने स्नेहके कारण इस सत्य बातको भी अन्यथा कह दिया हो तो इसका निश्चय कैसे किया जाये ? ॥५१॥


तस्मात् संदिग्धशीलेयमाशु निर्वास्यतामतः । नगराद्यावदमले कुले नो जायते मलम् ॥५२॥

अर्थ: इसलिए यह सन्दिग्धशीला है अर्थात् इसके शीलमें सन्देश है अतः जबतक हमारे निर्मल कुलमें कलंक नहीं लगता है उसके पहले ही इसे नगरसे शीघ्र निकाल दिया जाये ॥५२॥


विशुद्धविनया चार्वी चारुचेष्टाविधायिनी । भवेदभ्यर्हितात्यन्तं कस्य नो कुलबालिका ॥५३॥

अर्थ: निर्दोष, विनयको धारण करनेवाली, सुन्दर और उत्तम चेष्टाओंसे युक्त घरकी लड़की किसे अत्यन्त प्रिय नहीं होती ? पर ये सब गुण इसमें कहाँ रहे ? ॥५३॥


पुण्यवन्तो महासत्त्वा पुरुषास्तेऽतिनिर्मलाः । यैः कृतो दोषमूलानां दाराणां न परिग्रहः ॥५४॥

अर्थ: वे महान् धैर्यको धारण करनेवाले अत्यन्त निर्मल पुरुष बड़े पुण्यात्मा हैं जिन्होंने दोषोंके मूल कारणभूत स्त्रियोंका परिग्रह ही नहीं किया अर्थात् उन्हें स्वीकृत ही नहीं किया ॥५४॥


परिग्रहे तु दाराणां भवत्येवंविधं फलम् । यस्मिन् गते सति ख्यातिं भूप्रवेशोऽभिवाञ्छ्यते ॥५५॥

अर्थ: स्त्रियोंके स्वीकार करनेमें ऐसा ही फल होता है । यदि कदाचित् स्त्री अपवादको प्राप्त होती है तो पृथिवीमें प्रवेश करनेकी इच्छा होने लगती है ॥५५॥


दुःखप्रत्यायनस्वान्तस्तावल्लोकोऽवतिष्ठताम् । जातमेव ममाप्यत्र मनोऽद्य कृतशङ्कनम् ॥५६॥

अर्थ: जिनके हृदयमें बड़े दुःखसे विश्वास उत्पन्न कराया जाता है ऐसे अन्य मनुष्य तो दूर रहें आज मेरा हृदय ही इस विषयमें शंकाशील हो गया है ॥५६॥


एषा भर्तुरचक्षुष्या श्रुता पूर्वं मयाऽसकृत् । ततस्तेन न संभूतिरस्या गर्भस्य निश्चिता ॥५७॥

अर्थ: यह अपने पतिकी द्वेषपात्र है अर्थात् इसका पति इसे आँखसे भी नहीं देखना चाहता यह मैंने कई बार सुना है । इसलिए यह तो निश्चित है कि इसके गर्भकी उत्पत्ति पतिसे नहीं है ॥५७॥


तस्मादन्योऽपि यस्तस्मै प्रयच्छति समाश्रयम् । वियोज्यः स मया प्राणैरित्येष मम संगरः ॥५८॥

अर्थ: इस दशामें यदि और कोई भी इसके लिए आश्रय देगा तो मैं उसे प्राणरहित कर दूँगा ऐसी मेरी प्रतिज्ञा है ॥५८॥


कुपितेनेति सा तेन द्वारादविदिता परैः । निर्वाटिता समं सख्या दुःखपूरितविग्रहा ॥५९॥

अर्थ: इस प्रकार कुपित हुए राजाने जब तक दूसरोंको पता नहीं चल पाया उसके पहले ही अंजनाको सखीके साथ द्वारसे बाहर निकलवा दिया । उस समय अंजनाका शरीर दुःखसे भरा हुआ था ॥५९॥


यद्यत्स्वजनगेहं सा जगामाश्रयकाङ्क्षया । तत्र तत्राप्यधीयन्त द्वाराणि नृपशासनात् ॥६०॥

अर्थ: आश्रय पानेकी इच्छासे वह जिस-जिस आत्मीयजनके घर जाती थी राजाकी आज्ञासे वह वहीं-वहींके द्वार बन्द पाती थी ॥६०॥


यत्रैव जनकः क्रुद्धो विदधाति निराकृतिम् । तत्र शेषजने काऽऽस्था तच्छन्दकृतचेष्टिते ॥६१॥

अर्थ: जो ठीक ही है क्योंकि जहाँ पिता ही क्रुद्ध होकर तिरस्कार करता है वहाँ उसीके अभिप्रायके अनुसार कार्य करनेवाले दूसरे लोगोंका क्या विश्वास किया जा सकता है ? - उनमें क्या आशा रखी जा सकती है ? ॥६१॥


एवं निर्घाट्यमाना सा सर्वत्रात्यन्तविक्लवा । सखीं जगाद बाष्पौघसमार्द्रीकृतदेहिका ॥६२॥

अम्बे इहात्र किं भ्रान्तिं कुर्वन्त्यावास्वहे सखि । पाषाणहृदयो लोको जातोऽयं नः कुकर्मभिः ॥६३॥

अर्थ: इस तरह सब जगहसे निकाली गयी अंजना अत्यन्त अधीर हो गयी । अश्रुओंके समूहसे उसका शरीर गीला हो गया । उसने सखीसे कहा कि हे माता ! हम दोनों यहाँ भटकती हुई क्यों पड़ी हैं ? हे सखि ! हमारे पापोदयके कारण यह समस्त संसार पाषाणहृदय हो गया है अर्थात् सबका हृदय पत्थरके समान कड़ा हो गया है ॥६२-६३॥


वनं तदेव गच्छावस्तत्रैवास्तु यथोचितम् । अपमानात्ततो दुःखान्मरणं परमं सुखम् ॥६४॥

अर्थ: इसलिए हम लोग उसी वनमें चलें । जो कुछ होना होगा सो वहीं हो लेगा । इस अपमानसे तथा तज्जन्य दुःखसे तो मर जाना ही परम सुख है ॥६४॥


इत्युक्त्वासौ समं सख्या तदेव प्राविशद्वनम् । मृगीव मोहसंप्राप्ता मृगराजविभीषिता ॥६५॥

अर्थ: इतना कहकर अंजना सखीके साथ उसी वनमें प्रविष्ट हो गयी जिसमें केतुमतीका सेवक उसे छोड़ गया था । जिस प्रकार कोई मृगी सिंहसे भयभीत हो वनसे भागे और कुछ समय बाद भ्रान्तिवश उसी वनमें फिर जा पहुँचे उसी प्रकार फिरसे अंजनाका वनमें जाना हुआ ॥६५॥


वातातपपरिश्रान्ता दुःखसंभारपीडिता । उपविश्य वनस्यान्तं सा चक्रे परिदेवनम् ॥६६॥

अर्थ: दुःखके भारसे पीड़ित अंजना जब वायु और घामसे थक गयी तब वनके समीप बैठकर विलाप करने लगी ॥६६॥


हा हता मन्दभाग्यास्मि विधिना दुःखदायिना । अहेतुवैरिणा कष्टं कं परित्राणमाश्रये ॥६७॥

अर्थ: हाय-हाय ! मैं बड़ी अभागिनी हूँ, अकारण वैर रखनेवाले दुःखदायी विधाताने मुझे यों ही नष्ट कर डाला । बड़े दुःखकी बात है, मैं किसकी शरण गहूँ ॥६७॥


दौर्भाग्यसागरस्यान्ते प्रसादं कथमप्यगात् । नाथो मे स गतस्त्यक्त्वा दुष्कर्मपरिचोदितः ॥६८॥

अर्थ: दौर्भाग्य-रूपी सागरको पार करनेके बाद मेरा नाथ किसी तरह प्रसन्नताको प्राप्त हुआ सो दुष्कर्मसे प्रेरित हो अन्यत्र चला गया ॥६८॥


श्वश्र्वादिकृतदुःखानां नारीणां पितुरालये । अवस्थानं ममापुण्यैरिदमप्यवसारितम् ॥६९॥

अर्थ: जिन्हें सास आदि दुःख पहुँचाती हैं ऐसी स्त्रियाँ जाकर पिताके घर रहने लगती हैं पर मेरे दुर्भाग्यने पिताके घर रहना भी छुड़ा दिया ॥६९॥


मात्रापि न कृतं किंचित्परित्राणं कथं मम । भर्तृच्छन्दानुवर्तिन्यो जायन्ते च कुलाङ्गनाः ॥७०॥

अर्थ: माताने भी मेरी कुछ भी रक्षा नहीं की सो ठीक ही है क्योंकि कुलवती स्त्रियाँ अपने भर्तारके अभिप्रायानुसार ही चलती हैं ॥७०॥


त्वय्यविज्ञातगर्भायामेष्यामीति त्वयोदितम् । हा नाथ वचनं कस्मात्स्मर्यते न कृपावता ॥७१॥

अर्थ: हे नाथ ! तुमने कहा था कि तुम्हारा गर्भ प्रकट नहीं हो पायेगा और मैं आ जाऊँगा सो वह वचन याद क्यों नहीं रखा ? तुम तो बड़े दयालु थे ॥७१॥


अपरीक्ष्य कथं श्वश्रु त्यक्तुं मामुचितं तव । ननु संदिग्धशीलानां सन्त्युपायाः परीक्षणे ॥७२॥

अर्थ: हे सास ! बिना परीक्षा किये ही क्या मेरा त्याग करना तुम्हें उचित था ? जिनके शीलमें संशय होता है उनकी परीक्षा करनेके भी तो बहुत उपाय हैं ॥७२॥


उत्सङ्गलालितां बाल्ये सदा दुर्लडितास्मिकाम् । निष्परीक्ष्य पितस्त्यक्तुं मां कथं तेऽभवन्मतिः ॥७३॥

अर्थ: हे पिता ! आपने मुझे बाल्यकालमें गोदमें खिलाया है और सदा बड़े लाड़-प्यारसे रखा है फिर परीक्षा किये बिना ही मेरा परित्याग करनेकी बुद्धि आपकी कैसे हो गयी ? ॥७३॥


हा मातः साधु वाक्यं ते न कथं निर्गतं मुखात् । सकृदप्युत्तमा प्रीतिरधुना सा किमुज्झिता ॥७४॥

अर्थ: हाय माता ! इस समय तेरे मुखसे एक बार भी उत्तम वचन क्यों नहीं निकला ? तूने वह अनुपम प्रीति इस समय क्यों छोड़ दी ? ॥७४॥


एकोदरोषितां भ्रातस्त्रातुं ते मां सुदुःखिताम् । कथं न काचिदुद्भूता चेष्टा निष्ठुरचेतसः ॥७५॥

अर्थ: हे भाई ! मैं तेरी एक ही माताके उदरमें वास करनेवाली अत्यन्त दुःखिनी बहन हूँ सो मेरी रक्षा करनेके लिए तेरी कुछ भी चेष्टा क्यों नहीं हुई ? तू बड़ा निष्ठुर हृदय है ॥७५॥


यत्र यूयमिदंचेष्टाः प्रधाना बन्धुसंहतेः । तत्र कुर्वन्तु किं शेषा वराका दूरबान्धवाः ॥७६॥

अर्थ: जब बन्धुजनोंमें प्रधानता रखनेवाले तुम लोगोंकी यह दशा है तब जो बेचारे दूरके बन्धु हैं वे तो कर ही क्या सकते हैं ? ॥७६॥


अथवा कोऽत्र वो दोषः पुण्यर्तौ मम निष्ठिते । फलितोऽपुण्यवृक्षोऽयं निषेव्योऽवशया मया ॥७७॥

अर्थ: अथवा इसमें तुम सबका क्या दोष है ? पुण्यरूपी ऋतुके समाप्त होनेपर अब मेरा यह पापरूपी वृक्ष फलीभूत हुआ है सो विवश होकर मुझे इसकी सेवा करनी ही है ॥७७॥


प्रतिशब्दसमं तस्या विलापमकरोत् सखी । तदाक्रन्दविनिर्धूतधैर्यदूरितमानसा ॥७८॥

अर्थ: अंजनाका विलाप सुनकर जिसके हृदयका धैर्य दूर हो गया था ऐसी सखी वसन्तमाला भी प्रतिध्वनिके समान विलाप कर रही थी ॥७८॥


अत्यन्तदीनमेतस्यां रुदन्त्यां तारनिस्वनम् । मृगीभिरपि निर्मुक्ताः सुस्थूला वाष्पबिन्दवः ॥७९॥

अर्थ: यह अंजना बड़ी दीनताके साथ इतने जोर-जोरसे विलाप कर रही थी कि उसे सुनकर वनकी हरिणियोंने भी आँसुओंकी बड़ी-बड़ी बूँदें छोड़ी थीं ॥७९॥


ततश्चिरं रुदित्वैनामरुणीभूतलोचनाम् । सखी दोर्भ्यां समालिङ्ग्य जगादैवं विचक्षणा ॥८०॥

स्वामिन्यलं रुदित्वा ते नन्ववश्यं पुराकृतम् । नेत्रे निमील्य सोढव्यं कर्म पाकमुपागतम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर चिरकाल तक रोनेसे जिसके नेत्र लाल हो गये थे ऐसी अंजनाका दोनों भुजाओं-से आलिंगन कर बुद्धिमती सखीने कहा कि हे स्वामिनि ! रोना व्यर्थ है । पूर्वोपार्जित कर्म उदयमें आया है सो उसे आँख बन्द कर सहन करना ही योग्य है ॥८०-८१॥


सर्वेषामेव जन्तूनां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः । कर्म तिष्ठति यद्देवि तत्र कोऽवसरः शुचः ॥८२॥

अर्थ: हे देवि ! समस्त प्राणियोंके पीछे, आगे तथा बगलमें कर्म विद्यमान हैं इसलिए यहाँ शोकका अवसर ही क्या है ? ॥८२॥


अप्सरःशतनेत्रालीनिलयीभूतविग्रहाः । प्राप्नुवन्ति परं दुःखं सुकृतान्ते सुरा अपि ॥८३॥

अर्थ: जिनके शरीरपर सैकड़ों अप्सराओंके नेत्र विलीन रहते हैं ऐसे देव भी पुण्यका अन्त होनेपर परम दुःख प्राप्त करते हैं ॥८३॥


चिन्तयत्यन्यथा लोकः प्राप्नोति फलमन्यथा । लोकव्यापारसक्तात्मा परमो हि गुरुर्विधिः ॥८४॥

अर्थ: लोक अन्यथा सोचते हैं और अन्यथा ही फल प्राप्त करते हैं। यथार्थमें लोगोंके कार्यपर दृष्टि रखनेवाला विधाता ही परम गुरु है ॥८४॥


हितंकरमपि प्राप्तं विधिर्नाशयति क्षणात् । कदाचिदन्यदा धत्ते मानसस्याप्यगोचरम् ॥८५॥

अर्थ: कभी तो यह विधाता प्राप्त हुई हितकारी वस्तुको क्षण-भरमें नष्ट कर देता है और कभी ऐसी वस्तु लाकर सामने रख देता है जिसकी मनमें कल्पना ही नहीं थी ॥८५॥


गतयः कर्मणां कस्य विचित्रा परिनिश्चिताः । तस्मात्त्वमस्य मा कार्षीर्व्यथां गर्भस्य दुःखिता २ ॥८६॥

अर्थ: कर्मोंकी दशाएँ बड़ी विचित्र हैं। उनका पूर्ण निश्चय कौन कर पाया है ? इसलिए तुम दुःखी होकर गर्भको पीड़ा मत पहुँचाओ ॥८६॥


आक्रम्य दशनैर्दन्तान्कृत्वा ग्रावसमं मनः । कर्म स्वयं कृतं देवि सहस्वाशक्यवर्जनम् ॥८७॥

अर्थ: हे देवि ! दाँतोंसे दाँतोंको दबाकर और मनको पत्थरके समान बनाकर जिसका छूटना अशक्य है ऐसा स्वोपार्जित कर्मका फल सहन करो ॥८७॥


ननु स्वयं विबुद्धाया मया ते शिक्षणं कृतम् । अधिक्षेप इवाभाति वद ज्ञातं न किं तव ॥८८॥

अर्थ: वास्तवमें आप स्वयं विशुद्ध हैं अतः आपके लिए मेरा शिक्षा देना निन्दाके समान जान पड़ता है । तुम्हीं कहो कि आप क्या नहीं जानती हैं ? ॥८८॥


अभिधायेति सा तस्या नयने शोणरोचिषी । न्यमार्ष्ट वेपथुयुतपाणिना सान्त्वतत्परा ॥८९॥

अर्थ: इतना कहकर सान्त्वना देनेमें तत्पर रहनेवाली सखीने अपने काँपते हुए हाथोंसे उसके लाल-लाल नेत्र पोंछ दिये ॥८९॥


भूयश्चोचे प्रदेशोऽयं देवि संश्रयवर्जितः । तस्मादुत्तिष्ठ गच्छावः पार्श्वमस्य महीभृतः ॥९०॥

अर्थ: फिर कहा कि हे देवि ! यह प्रदेश आश्रयसे रहित है अर्थात् यहाँ ठहरने योग्य स्थान नहीं है इसलिए उठो इस पर्वतके पास चलें ॥९०॥


गुहायामत्र कस्यांचिदगम्यायां कुजन्तुभिः । सूतिकल्याणसंप्राप्त्यै समयं कंचिदास्वहे ॥९१॥

अर्थ: यहाँ किसी ऐसी गुफामें जिसमें दुष्ट जीव नहीं पहुँच सकेंगे, गर्भके कल्याणके लिए कुछ समय तक निवास करेंगी ॥९१॥


ततस्तयोपदिष्टा सा पदवीं पादचारिणी । गर्भभाराद् वियच्चारमसमर्था निषेवितुम् ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर सखीका उपदेश पाकर वह पैदल ही मार्ग चलने लगी। क्योंकि गर्भके भारके कारण वह आकाशमें चलनेके लिए समर्थ नहीं थी ॥९२॥


अनुयान्ती महारण्यधरणीं समयागिरिम् । व्यालजालसमाकीर्णां तन्नादात्यन्तभीषणाम् ॥९३॥

महानोकहसंरुद्धदिवाकरकरोत्कराम् । महीभृत्पादसंकीर्णां दर्भसूचीसुदुश्चराम् ॥९४॥

युक्तां मातङ्गमालाभिर्न्यस्यन्तीं कृच्छ्रतः पदम् । मातङ्गमालिनीं नाम प्राप मानसदुर्गमाम् ॥९५॥

अर्थ: वह पर्वतकी समीपवर्तिनी महावनकी भूमिमें चलती-चलती मातंगमालिनी नामकी उस भूमिमें पहुँची जो हिंसक जन्तुओंसे व्याप्त थी और उनके शब्दोंसे भय उत्पन्न कर रही थी । बड़े-बड़े वृक्षोंने जहाँ सूर्यकी किरणोंका समूह रोक लिया था, जो छोटी-छोटी पहाड़ियोंसे व्याप्त थी, डाभकी अनियोंके कारण जहाँ चलना कठिन था, जो हाथियोंकी श्रेणियोंसे युक्त थी तथा शरीरकी बात तो दूर रही मनसे भी जहाँ पहुँचना कठिन था । अंजना बड़े कष्टसे एक-एक डग रखकर चल रही थी ॥९३-९५॥


शक्तापि गगने गन्तुं पद्भ्यां तस्याः सखी ययौ । प्रेमबन्धनसंबद्धा छायावृत्तिमुपाश्रिता ॥९६॥

अर्थ: यद्यपि उसकी सखी आकाशमें चलनेमें समर्थ थी तो भी वह प्रेमरूपी बन्धनमें बँधी होनेसे छायाके समान पैदल ही उसके साथ-साथ चल रही थी ॥९६॥


भयानकां ततः प्राप्य तामसौ संकटाटवीम् । वेपमानसमस्ताङ्गा कांदिशीकत्वमागमत् ॥९७॥

अर्थ: उस भयानक सघन अटवीको देखकर अंजनाका समस्त शरीर काँप उठा । वह अत्यन्त भयभीत हो गयी ॥९७॥


ततस्तामाकुलां ज्ञात्वा गृहीत्वा करपल्लवे । आली जगाद मा भैषीः स्वामिन्येहीति सादरात् ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर उसे व्यग्र देख सखीने हाथ पकड़कर बड़े आदरसे कहा कि स्वामिनि ! डरो मत, इधर आओ ॥९८॥


ततः सख्यंसविन्यस्तविस्रंसिकरपल्लवा । दर्भसूचीमुखस्पर्शकूणितेक्षणकोणिका ॥९९॥

अर्थ: अंजना सहारा पानेकी इच्छासे सखीके कन्धेपर हाथ रखकर चल रही थी पर उसका हाथ सखीके कन्धेसे बार-बार खिसककर नीचे आ जाता था । चलते-चलते जब कभी डाभकी अनी पैरमें चुभ जाती थी तब बेचारी आँख मींचकर खड़ी रह जाती थी ॥९९॥


तत्र तत्रैव भूदेशे न्यस्यन्ती चरणौ पुनः । स्तनन्ती दुःखसंभाराद्देहं कृच्छ्रेण बिभ्रती ॥१००॥

अर्थ: वह जहाँसे पैर उठाती थी दुःखके भारसे चीखती हुई वहीं फिर पैर रख देती थी । वह अपना शरीर बड़ी कठिनतासे धारण कर रही थी ॥१००॥


उत्तरन्ती प्रयासेन निर्झरान् वेगवाहिनः । स्मरन्ती स्वजनं सर्वं निष्ठुराचारकारिणम् ॥१०१॥

अर्थ: वेगसे बहते हुए झरनोंको वह बड़ी कठिनाईसे पार कर पाती थी । उसे निष्ठुर व्यवहार करनेवाले अपने समस्त आत्मीयजनोंका बार-बार स्मरण हो आता था ॥१०१॥


निन्दन्ती स्वमुपालम्भं प्रयच्छन्ती मुहुर्विधेः । कारुण्यादिव वल्लीभिः श्लिष्यमाणाखिलाङ्गिका ॥१०२॥

अर्थ: वह कभी अपनी निन्दा करती थी तो कभी भाग्यको बार-बार दोष देती थी । लताएँ उसके शरीरमें लिपट जाती थीं सो ऐसा जान पड़ता था कि दयासे वशीभूत होकर मानो उसका आलिंगन ही करने लगती थीं ॥१०२॥


त्रस्तसारङ्गजायाक्षी श्रमजस्वेदवाहिनी । सक्तं कण्टकिगुच्छेषु मोचयन्त्यंशुकं चिरात् ॥१०३॥

अर्थ: उसके नेत्र भयभीत हरिणीके समान चंचल थे, थकावटके कारण उसके शरीरमें पसीना निकल आया था, काँटेदार वृक्षोंमें वस्त्र उलझ जाता था तो देर तक उसे ही सुलझाती खड़ी रहती थी ॥१०३॥


क्षतजेनाचितौ पादौ लाक्षिताविव बिभ्रती । शोकाग्निदाहसंभूतां श्यामतां दधती पराम् ॥१०४॥

अर्थ: उसके पैर रुधिरसे लाल-लाल हो गये थे, सो ऐसे जान पड़ते थे मानो लाखका महावर ही उनमें लगाया गया हो। शोकरूपी अग्निकी दाहसे उसका शरीर अत्यन्त साँवला हो गया था ॥१०४॥


तलेऽपि चलिते त्रासं व्रजन्ती चलविग्रहा । संत्रासस्तम्भितावूरू वहन्ती खेददुर्वहौ ॥१०५॥

अर्थ: पत्ता भी हिलता था तो वह भयभीत हो जाती थी, उसका शरीर काँपने लगता था, भयके कारण उसकी दोनों जाँघें अकड़ जाती थीं और खेदके कारण उनका उठाना कठिन हो जाता था ॥१०५॥


मुहुर्विश्रम्यमानाल्या नितान्तप्रियवाक्यया । गिरेः प्रापाञ्जना मूलं शनकैरिति दुःखिता ॥१०६॥

अर्थ: अत्यन्त प्रिय वचन बोलनेवाली सखी उसे बार-बार बैठाकर विश्राम कराती थी। इस प्रकार दुःखसे भरी अंजना धीरे-धीरे पहाड़के समीप पहुँची ॥१०६॥


तत्र धारयितुं देहमसक्ता साश्रुलोचना । अपकर्ण्य सखीवाक्यं महाखेदादुपाविशत् ॥१०७॥

अर्थ: वहाँ तक पहुँचनेमें वह इतनी अधिक थक गयी कि शरीर सम्भालना भी दूभर हो गया। उसके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे और वह बहुत भारी खेदके कारण सखीकी बात अनसुनी कर बैठ गयी ॥१०७॥


जगाद च न शक्नोमि प्रयातुं पदमप्यतः । तिष्ठाम्यत्रैव देशेऽहं प्राप्नोमि मरणं वरम् ॥१०८॥

अर्थ: कहने लगी कि अब तो मैं एक डग भी चलनेके लिए समर्थ नहीं हूँ अतः यहीं ठहरी जाती हूँ। यदि यहाँ मरण भी हो जाय तो अच्छा है ॥१०८॥


सान्त्वयित्वा ततो वाक्यैः कुशला हृदयंगमैः । विश्रमय्य प्रणम्योचे सख्येवं प्रेमतत्परा ॥१०९॥

अर्थ: तदनन्तर प्रेमसे भरी चतुर सखी हृदयको प्रिय लगनेवाले वचनोंसे उसे सान्त्वना देकर तथा कुछ देर विश्राम कराकर प्रणामपूर्वक इस प्रकार बोली ॥१०९॥


पश्य पश्य गुहामेतां देवि नेदीयसीं पराम् । कुरु प्रसादमुत्तिष्ठ स्थास्यावोऽत्र यथासुखम् ॥११०॥

अर्थ: हे देवि ! देखो-देखो यह पास ही उत्तम गुफा दिखाई दे रही है। प्रसन्न होओ, उठो, हम दोनों उस गुफामें सुखसे ठहरेंगी ॥११०॥


प्रदेशे संचरन्तीह प्राणिनः क्रूरचेष्टिताः । ननु ते रक्षणीयोऽयं गर्भः स्वामिनि मा मुह ॥१११॥

अर्थ: यहाँ क्रूर चेष्टाओंको धारण करनेवाले अनेक जीव बिचर रहे हैं और तुम्हें गर्भकी भी रक्षा करनी है। इसलिए हे स्वामिनि ! गलती न करो ॥१११॥


इत्युक्ता सानुरोधेन सख्या वनभयेन च । गमनाय समुत्तस्थौ भूयोऽपि परितापिनी ॥११२॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर सन्तापसे भरी अंजना सखीके अनुरोधसे तथा वनके भयसे पुनः चलनेके लिए उठी ॥११२॥


महानुभावतायोगादनुज्ञातेरभावतः । ह्रीतश्च नान्तिकं वायोरयासिष्टामिमे तदा ॥११३॥

अर्थ: उस समय ये दोनों स्त्रियाँ वनमें कष्ट तो उठाती रहीं पर पवनंजयके पास नहीं गयीं सो इसमें उनकी महानुभावता, आज्ञाका अभाव अथवा लज्जा ही कारण समझना चाहिए ॥११३॥


हस्तावलम्बदानेन ततस्तां विषमां भुवम् । लङ्घयित्वा सखी कृच्छ्राद् गुहाद्वारमुपाहरत् ॥११४॥

अर्थ: तदनन्तर सखी वसन्तमाला हाथका सहारा देकर जिस किसी तरह उस ऊँची-नीची भूमिको पार कराकर बड़े कष्टसे अंजनाको गुफाके द्वार तक ले गयी ॥११४॥


प्रवेष्टुं सहसा भीते तत्र ते तस्थतुः क्षणम् । विषमग्रावसंक्रान्तिसंजातविपुलश्रमे ॥११५॥

अर्थ: ऊँचे-नीचे पत्थरोंमें चलनेके कारण वे दोनों ही बहुत थक गयी थीं और साथ ही उस गुफामें सहसा प्रवेश करनेके लिए डर भी रही थीं इसलिए क्षणभरके लिए बाहर ही बैठ गयीं ॥११५॥


विश्रान्ताभ्यां चिराद् दृष्टिस्तत्राभ्यां न्यासि मन्दगा । म्लानरक्तशितिश्वेतनीरजस्रक्समप्रभा ॥११६॥

अर्थ: बहुत देर तक विश्राम करनेके बाद उन्होंने अपनी मन्दगामिनी दृष्टि गुफापर डाली। उनकी वह दृष्टि मुरझाये हुए लाल, नीले और सफेद कमलों की मालाके समान जान पड़ती थी ॥११६॥


अपश्यतां ततः शुद्धसमामलशिलातले । पर्यङ्कसुस्थितं साधुं चारणातिशयान्वितम् ॥११७॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने शुद्ध सम और निर्मल शिला-तलपर पर्यंकासनसे विराजमान चारण-ऋद्धिके धारक मुनिराजको देखा ॥११७॥


निभृतोच्छ्वासनिश्वासं नासिकाग्राहितेक्षणम् । ऋजुश्लथवपुर्यष्टिं स्थाणुवच्चलनोज्झितम् ॥११८॥

अर्थ: उन मुनिराजका श्वासोच्छ्वास निश्चल अथवा नियमित था। उन्होंने अपने नेत्र नासिकाके अग्रभागपर लगा रखे थे, उनकी शरीरयष्टि शिथिल होनेपर भी सीधी थी, और वे स्वयं स्थाणु अर्थात् ठूँठके समान हलन-चलनसे रहित थे ॥११८॥


अङ्कस्थवामपाण्यङ्कन्यस्तान्योत्तानपाणिकम् । निष्प्रकम्पं नदीनाथगाम्भीर्यस्थितमानसम् ॥११९॥

अर्थ: उन्होंने अपनी गोदमें स्थित वाम हाथकी हथेलीपर दाहिना हाथ उत्तान रूपसे रख छोड़ा था, वे स्वयं निश्चल थे और उनका मन समुद्रके समान गम्भीर था ॥११९॥


ध्यायन्तं वस्तुयाथात्म्यं यथाशासनभावनम् । निःशेषसंगनिर्मुक्तं वायुवद्गगनामलम् ॥१२०॥

अर्थ: वे जिनागमके अनुसार वस्तुके यथार्थ स्वरूपका ध्यान कर रहे थे, वायुके समान सर्व-परिग्रहसे रहित थे और आकाशके समान निर्मल थे ॥१२०॥


शैलकूटगताशङ्कं वीक्ष्य ताभ्यां चिरादसौ । निरचायि महासत्त्वः सौम्यभासुरविग्रहः ॥१२१॥

अर्थ: उन्हें देखकर किसी पर्वतके शिखरकी आशंका उत्पन्न होती थी। वे महान् धैर्यके धारक थे तथा उनका शरीर सौम्य होनेपर भी देदीप्यमान था। बहुत देर तक देखनेके बाद उन्होंने निश्चय कर लिया कि यह उत्तम मुनिराज हैं ॥१२१॥


ततः पूर्वकृतानेकश्रवणासेवने मुदा । समीपं जग्मतुस्तस्या क्षणात्ते विस्मृतासुखे ॥१२२॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने पहले अनेक बार मुनियोंकी सेवा की थी ऐसी वे दोनों स्त्रियाँ हर्षसे मुनिराजके समीप गयीं और क्षण-भरमें अपना सब दुःख भूल गयीं ॥१२२॥


त्रिःपरीत्य च भावेन नेमतुर्विहिताञ्जली । मुनिं परमिव प्राप्ते बान्धवं विकचेक्षणे ॥१२३॥

अर्थ: उन्होंने भावपूर्वक तीन प्रदक्षिणाएँ दीं, हाथ जोड़कर नमस्कार किया और परम बन्धुके समान मुनिराजको पाकर उनके नेत्र खिल उठे ॥१२३॥


काले यदृच्छया तत्र तेन योगः समाप्यते । भवत्येव हि भव्यानां क्रिया प्रस्तावसंगता ॥१२४॥

अर्थ: जिस समय ये पहुँचीं उसी समय मुनिराजने स्वेच्छासे ध्यान समाप्त किया सो ठीक ही है क्योंकि भव्य जीवोंकी क्रिया अवसरके अनुसार ही होती है ॥१२४॥


ते ततोऽवदतामेवमविभक्तकरद्वये । अनगाराङ्घ्रिविन्यस्तनिरश्रुस्थिरलोचने ॥१२५॥

भगवन्नपि ते देहे कुशलं कुशलाशय । मूलमेष हि सर्वेषां साधनानां सुचेष्टित ॥१२६॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और जिन्होंने अपने अश्रुरहित निश्चल नेत्र मुनिराजके चरणोंमें लगा रखे थे ऐसी दोनों सखियोंने कहा कि हे भगवन् ! हे कुशल अभिप्रायके धारक ! हे उत्तम चेष्टाओंसे सम्पन्न ! आपके शरीरमें कुशलता तो है ? क्योंकि समस्त साधनोंका मूल कारण यह शरीर ही है ॥१२५-१२६॥


उपर्युपरिसंवृद्धं तपः कँचिद् गुणाम्बुधे । विहारोऽपि दमोद्वाहव्युपसर्गो महाक्षमः ॥१२७॥

अर्थ: हे गुणोंके सागर ! आपका तप उत्तरोत्तर बढ़ तो रहा है। इसी प्रकार हे इन्द्रियविजयके धारक ! आपका विहार उपसर्गरहित तथा महाक्षमासे युक्त तो है ? ॥१२७॥


आचार इति पृच्छावो भवन्तमिदमीदृशम् । अन्यथा कस्य नो योग्याः कुशलस्य भवद्विधाः ॥१२८॥

अर्थ: हे प्रभो ! हम आपसे जो इस तरह कुशल पूछ रही हैं सो ऐसी पद्धति है यही ध्यान रखकर पूछ रही हैं अन्यथा आप-जैसे मनुष्य किस कुशलके योग्य नहीं हैं ? अर्थात् आप समस्त कुशलताके भण्डार हैं ॥१२८॥


भवन्ति क्षेमताभाजो भवद्विधसमाश्रिताः । स्वस्मिंस्तु कैव भावानां कथा साध्वितरात्मनाम् ॥१२९॥

अर्थ: आप-जैसे पुरुषोंकी शरणमें पहुँचे हुए लोग कुशलतासे युक्त हो जाते हैं; किन्तु स्वयं अपने-आपके विषयमें अच्छे और बुरे पदार्थोंकी चर्चा ही क्या है ? ॥१२९॥


इत्युक्त्वा ते व्यरंसिष्टां विनयानतविग्रहे । निःशेषभयनिर्मुक्ते तद् दृष्टे च बभूवतुः ॥१३०॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर वे दोनों चुप हो रहीं। उस समय उनके शरीर विनयसे नम्रीभूत थे। मुनिराजने जब उनकी ओर देखा तो वे सर्व प्रकारके भयसे रहित हो गयीं ॥१३०॥


अथ प्रशान्तया वाचा श्रमणोऽमृतकल्पया । गम्भीरया जगादैवं पाणिमुत्क्षिप्य दक्षिणम् ॥१३१॥

कल्याणि कुशलं सर्वं मम कर्मानुभावतः । ननु सर्वमिदं बाले नैजकर्मविचेष्टितम् ॥१३२॥

अर्थ: अथानन्तर मुनिराज दाहिना हाथ ऊपर उठाकर अमृतके समान प्रशान्त एवं गम्भीर वाणीमें इस प्रकार कहने लगे कि हे कल्याणि ! कर्मोंके प्रभावसे मेरा सर्वप्रकार कुशल है। हे बाले ! निश्चयसे यह सब अपने-अपने कर्मोंकी चेष्टा है ॥१३१-१३२॥


पश्यतां कर्मणां लीलां यदिहागोविवर्जिता । बन्धुनिर्वास्यतां याता महेन्द्रस्येयमात्मजा ॥१३३॥

अर्थ: कर्मोंकी लीला देखो जो राजा महेन्द्रकी यह निरपराधिनी पुत्री भाइयों द्वारा निर्वासितपनाको प्राप्त हुई अर्थात् घरसे निकाली जाकर अत्यन्त अनादरको प्राप्त हुई ॥१३३॥


ततोऽकथितविज्ञाततद्वृत्तान्तं महामुनिम् । कुतूहलसमाक्रान्तमानसा सुमहादरा ॥१३४॥

नत्वा वसन्तमालोचे स्वामिनीप्रियतत्परा । पादयोर्नेत्रकान्त्यास्य कुर्वतीवाभिषेचनम् ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर बिना कहे ही जिन्होंने सब वृत्तान्त जान लिया था ऐसे महामुनिराजको नमस्कार कर बड़े आदरसे वसन्तमाला बोली। उस समय वसन्तमालाका मन कुतूहलसे भर रहा था, वह स्वामिनीका भला करनेमें तत्पर थी। और अपने नेत्रोंकी कान्तिसे मानो मुनिराजके चरणोंका अभिषेक कर रही थी ॥१३४-१३५॥


विज्ञापयामि नाथ त्वां कृपया वक्तुमर्हसि । परोपकारभूयस्यो ननु युष्मादृशां क्रियाः ॥१३६॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! मैं कुछ प्रार्थना कर रही हूँ सो कृपा कर उसका उत्तर कहिए। क्योंकि आप-जैसे पुरुषोंकी क्रियाएँ परोपकार-बहुल ही होती हैं ॥१३६॥


हेतुना केन भर्तास्याश्चिरं कालं व्यरज्यत । अरज्यत पुनर्दुःखं प्राप्ता चैषा महावने ॥१३७॥

को वातिमन्दभाग्योऽयं जीवोऽस्याः कुक्षिमाश्रयत् । सुखोचितेयमानीता येन जीवितसंशयम् ॥१३८॥

अर्थ: इस अंजनाका भर्ता किस कारणसे चिरकाल तक विरक्त रहा और अब किस कारणसे अनुरक्त हुआ है ? यह अंजना महावनमें किस कारणसे दुःखको प्राप्त हुई है ? और मन्द भाग्यका धारक कौन-सा जीव इसकी कुक्षिमें आया है जिसने कि सुख भोगनेवाली इस बेचारीको प्राणोंके संशयमें डाल दिया है ॥१३७-१३८॥


ततः सोऽमितगत्याख्यो ज्ञानत्रयविशारदः । यथावृत्तं जगादास्या वृत्तिरेषा हि धीमताम् ॥१३९॥

अर्थ: तदनन्तर मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानोंमें निपुण अमितगति नामक मुनिराज अंजनाका यथावत् वृत्तान्त कहने लगे। सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमानोंकी यह वृत्ति है ॥१३९॥


वत्से शृणु यतः प्राप्ता भव्येयं दुःखमीदृशम् । पूर्वमाचरितात् पापात् संप्राप्तपरिपाकतः ॥१४०॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे बेटी ! सुन, इस अंजनाने अपने पूर्वोपार्जित पापकर्मके उदयसे जिस कारण यह ऐसा दुःख पाया है उसे मैं कहता हूँ ॥१४०॥


इह जम्बूमति द्वीपे वास्ये भरतनामनि । नगरे मन्दरामिख्ये प्रियनन्दीति सद्गृही ॥१४१॥

अर्थ: इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके मन्दर नामक नगरमें एक प्रियनन्दी नामका सद्-गृहस्थ रहता था ॥१४१॥


जाया जायास्य तत्राभूद्दमयन्ताभिधः सुतः । महासौभाग्यसंपन्नः कल्याणगुणभूषणः ॥१४२॥

अर्थ: उसकी स्त्रीका नाम जाया था। उस स्त्रीसे प्रियनन्दीके दमयन्त नामका ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ था जो महासौभाग्यसे सम्पन्न तथा कल्याणकारी गुणरूपी आभूषणोंसे विभू-षित था ॥१४२॥


अथान्यदा मधौ क्रीडा परमा तत्पुरेऽभवत् । नन्दनप्रतिमोद्याने पौरलोकसमाकुले ॥१४३॥

चिक्रीड दमयन्तोऽपि तत्र मित्रैः समं सुखम् । पटवासवलक्षाङ्गः कुण्डलादिविभूषितः ॥१४४॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्त ऋतु आनेपर नगरमें बड़ा भारी उत्सव हुआ सो नगरवासी लोगोंसे व्याप्त नन्दनवनके समान सुन्दर उद्यानमें दमयन्त भी अपने मित्रोंके साथ सुखपूर्वक क्रीड़ा कर रहा था । उस समय उसका शरीर सुगन्धित चूर्णसे सफेद था तथा कुण्डलादि आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥१४३-१४४॥


अथ तेन स्थितेनारात्क्रीडता गगनाम्बराः । दृष्टास्तपोधना ध्यानस्वाध्यायादिक्रियोदिताः ॥१४५॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ ठहरकर क्रीड़ा करते हुए दमयन्तने समीपमें ही विद्यमान ध्यान, स्वाध्याय आदि क्रियाओंमें तत्पर दिगम्बर मुनिराज देखे ॥१४५॥


निस्सृत्य मण्डलान्मित्राद् रश्मिवत् सोऽतिभासुरः । जगाम मुनिसंघातं मेरुशृङ्गौघसंनिभम् ॥१४६॥

अर्थ: उन्हें देखते ही जिस प्रकार सूर्यसे देदीप्यमान किरण निकलती है उसी प्रकार अपनी गोष्ठीसे निकलकर अतिशय देदीप्यमान दमयन्त मुनिसमूहके पास पहुँचा । वह मुनियोंका समूह मेरुके शिखरोंके समूहके समान निश्चल था ॥१४६॥


ततः साधुं स वन्दित्वा श्रुत्वा धर्मं यथाविधि । सम्यग्दर्शनसंपन्नो बभूव नियमस्थितः ॥१४७॥

अर्थ: तदनन्तर दमयन्तने मुनिराजकी वन्दना कर उनसे विधि-पूर्वक धर्मका उपदेश सुना और सम्यग्दर्शनसे सम्पन्न होकर नियम आदि धारण किये ॥१४७॥


दत्वा सप्तगुणोपेतामन्यदा पारणामसौ । साधुभ्यः पञ्चतां प्राप्य कल्पवासमशिश्रियत् ॥१४८॥

अर्थ: किसी एक समय उसने साधुओंके लिए सप्तगुणोंसे युक्त पारणा करायी और अन्तमें मरकर स्वर्गमें देवपर्याय पाया ॥१४८॥


नियमाद्दानतश्चात्र मोगमन्वभवत् परम् । देवीशतेक्षणच्छायानीलाब्जस्रग्विभूषितः ॥१४९॥

अर्थ: वहाँ वह पूर्वाचरित नियम और दानके प्रभावसे उत्तम भोग भोगने लगा । सैकड़ों देवियोंके नेत्रोंके समान कान्तिवाले नील कमलोंकी मालासे वह वहाँ सदा अलंकृत रहता था ॥१४९॥


च्युतस्तस्मादिह द्वीपे मृगाङ्कनगरेऽभवत् । प्रियङ्गुलक्ष्मीसंभूतो हरिचन्द्रनृपात्मजः ॥१५०॥

सिंहचन्द्र इति ख्यातः कलागुणविशारदः । स्थितः प्रत्येकमेकोऽपि चेतःसु प्राणधारिणाम् ॥१५१॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर वह इसी जम्बूद्वीपके मृगांकनामा नगरमें राजा हरिचन्द्र और प्रियंगुलक्ष्मी नामक रानीसे सिंहचन्द्र नामका कला और गुणोंमें निपुण पुत्र हुआ । सिंहचन्द्र यद्यपि एक था तो भी समस्त प्राणियोंके हृदयोंमें विद्यमान था ॥१५०-१५१॥


तत्रापि मुक्तसद्भोगः साधुभ्योऽवाप्य सन्मतिम् । कालधर्मेण संयुक्तो जगाम त्रिदशालयम् ॥१५२॥

अर्थ: उस पर्यायमें भी उसने साधुओंसे सद्बोध पाकर भोगोंका त्याग कर दिया था जिससे आयुके अन्तमें मरकर स्वर्ग गया ॥१५२॥


तत्रोदारं सुखं प्राप संकल्पकृतकल्पनम् । देवीवदनराजीवमहाखण्डदिवाकरः ॥१५३॥

अर्थ: वहाँ वह देवियोंके मुखरूपी कमल-वनको विकसित करनेके लिए सूर्यके समान था और संकल्प मात्रसे प्राप्त होनेवाले उत्तम सुखका उपभोग करता था ॥१५३॥


च्युत्वात्रैव ततो वास्ये विजयार्धमहीधरे । नगरेऽरुणसंज्ञाके सुकण्ठस्य नरप्रभोः ॥१५४॥

जायायां कनकोदर्यां सिंहवाहनशब्दितः । उदपादि गुणाकृष्टसमस्तजनमानसः ॥१५५॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर इसी भरतक्षेत्रके विजयार्ध पर्वतपर अरुण नामक नगरमें राजा सुकण्ठकी कनकोदरी नामा रानीसे सिंहवाहन नामका पुत्र हुआ । इस सिंहवाहनने गुणोंके द्वारा समस्त लोगोंका मन अपनी ओर आकर्षित कर लिया था ॥१५४-१५५॥


तत्र देव इवोदारसभोगमनुभूतवान् । अप्सरोविभ्रमस्तेने कान्तालिङ्गनलालितः ॥१५६॥

अर्थ: अप्सराओंके विभ्रमको चुरानेवाली स्त्रियोंके आलिंगनसे परमाह्लादको प्राप्त हुआ सिंहवाहन वहाँ देवोंके समान उदार भोगोंका अनुभव करने लगा ॥१५६॥


तीर्थे विमलनाथस्य सोऽन्यदा जातसंमतिः । निक्षिप्य तनये लक्ष्मीं घनवाहननामनि ॥१५७॥

पुरुसंवेगसंपन्नो विदितासारसंसृतिः । लक्ष्मीतिलकसंज्ञस्य मुनेरानर्च्छ शिष्यताम् ॥१५८॥

अर्थ: किसी एक समय श्रीविमलनाथ भगवान्के तीर्थमें उसे सद्बोध प्राप्त हुआ सो मेघवाहन नामक पुत्रके लिए राज्य-लक्ष्मी सौंप संसारसे विरक्त हो गया । तदनन्तर जो बहुत भारी संवेगसे युक्त था और संसारकी असारताको जिसने अच्छी तरह समझ लिया था ऐसा सिंहवाहन लक्ष्मीतिलक नामक मुनिका शिष्य हो गया अर्थात् उनके पास उसने दीक्षा धारण कर ली ॥१५७-१५८॥


अनुपाल्य समीचीनं व्रतं जिनवरोदितम् । अनित्यत्वादिभिः कृत्वा चेतनां भावनामयीम् ॥१५९॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्‌के द्वारा कहे हुए उत्तम व्रतका अच्छी तरह पालन कर उसने अनित्य आदि भावनाओंके चिन्तवनसे अपनी आत्माको प्रभावित किया ॥१५९॥


तपः कापुरुषाचिन्त्यं तप्त्वा तन्वादरोज्झितम् । रत्नत्रितयतो जातां दधानः परमार्थताम् ॥१६०॥

अर्थ: शरीरका आदर छोड़कर उसने ऐसा कठिन तपश्चरण किया कि कायर मनुष्य जिसका विचार भी नहीं कर सकते थे । वह सदा रत्नत्रयके प्रभावसे उत्पन्न होनेवाली परमार्थताको धारण करता था ॥१६०॥


नानालब्धिसमुत्पत्तेः शक्तोऽप्यहितवारणे । परीषहरिपून् घोरानधिसह्य सुमानसः ॥१६१॥

अर्थ: नाना प्रकारकी ऋद्धियाँ उत्पन्न होनेसे यद्यपि वह अनिष्ट पदार्थोंका निवारण करनेमें समर्थ था तो भी शान्त हृदयसे उसने परीषहरूपी घोर शत्रुओंका कष्ट सहन किया था ॥१६१॥


आयुर्विराममासाद्य ध्यानमास्थाय निर्मलम् । ज्योतिषां पटलं भित्त्वा लान्तवेऽभूत् सुरो महान् ॥१६२॥

अर्थ: आयुका अन्त आनेपर वह निर्मल ध्यानमें लीन हो गया और ज्योतिषी देवोंका पटल भेदन कर अर्थात् उससे ऊपर जाकर लान्तव स्वर्गमें उत्कृष्ट देव हुआ ॥१६२॥


इच्छानुरूपमासाद्य तत्र भोगं परस्थितिः । छद्मस्थजनधीवाचां स्थितं संचक्ष्य [संत्यज्य] गोचरम् ॥१६३॥

अर्थ: वहाँ वह उत्कृष्ट स्थितिका धारी हुआ और छद्मस्थ जीवोंके ज्ञान तथा वचन दोनोंसे परे रहनेवाले इच्छानुकूल भोगोंका उपभोग करने लगा ॥१६३॥


च्युत्वा पुण्यावशेषेण प्रेरितः परमोदयः । कुक्षिमस्या विवेशायं जीवः सौख्यस्य भाजनम् ॥१६४॥

अर्थ: परम अभ्युदयसे सहित तथा सुखका पात्रभूत, इसी देवका जीव लान्तव स्वर्गसे च्युत होकर बाकी बचे पुण्यसे प्रेरित होता हुआ इस अंजनाके गर्भमें प्रविष्ट हुआ है ॥१६४॥


एवं तावदयं गर्भः स्वामिन्यास्ते तनुं श्रितः । हेतुं विरहदुःखस्य शृणु कल्याणचेष्टिते ॥१६५॥

अर्थ: इस प्रकार जो गर्भ तेरी स्वामिनीके शरीरमें प्रविष्ट हुआ है उसका वर्णन किया । अब हे शुभ चेष्टाकी धारक वसन्तमाले ! इसके विरह-जन्य दुःखका कारण कहता हूँ सो सुन ॥१६५॥


भवेऽस्याः कनकोदर्या लक्ष्मीर्नाम सपत्न्यभूत् । सम्यग्दर्शनपूतात्मा साधुपूजनतत्परा ॥१६६॥

अर्थ: जब यह अंजना कनकोदरीके भवमें थी तब इसकी लक्ष्मी नामक सौत थी । उसकी आत्मा सम्यग्दर्शनसे पवित्र थी और वह सदा मुनियोंकी पूजा करनेमें तत्पर रहती थी ॥१६६॥


प्रतिमा देवदेवानां प्रतीके सद्मनस्तया । स्थापयित्वार्चिता भक्त्या स्तुतिमङ्गलवक्त्रया ॥१६७॥

अर्थ: उसने घरके एक भागमें देवाधिदेव जिनेन्द्र देवकी प्रतिमा स्थापित कराकर भक्तिपूर्वक मुखसे स्तुतियाँ पढ़ती हुई उसकी पूजा की थी ॥१६७॥


महादेव्यभिमानेन सपत्न्यै क्रुद्धया तया । चक्रे बाह्यावकाशेऽसौ जिनेन्द्रप्रतियातना ॥१६८॥

अर्थ: कनकोदरी महादेवी थी इसलिए उसने अभिमानवश सौतके प्रति बहुत ही क्रोध प्रकट किया । इतना ही नहीं जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाको घरके बाहरी भागमें फिंकवा दिया ॥१६८॥


अत्रान्तरेऽविशद् गेहमस्या भिक्षार्थमार्यिका । संयमश्रीरिति ख्याता तपसा विष्टपेऽखिले ॥१६९॥

अर्थ: इसी बीचमे संयमश्री नामक आर्यिकाने भिक्षाके लिए इसके घरमें प्रवेश किया । संयमश्री अपने तपके कारण समस्त संसारमें प्रसिद्ध थीं ॥१६९॥


ततः परिभवं दृष्ट्वा साप्यर्हत्प्रतियातनम् । ययावतिपरं दुःखं पारणापेतमानसा ॥१७०॥

अर्थ: तदनन्तर जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाका अनादर देख उन्हें बहुत दुःख हुआ । पारणा करनेसे उनका मन हटा गया ॥१७०॥


इमां च मोहिनीं दृष्ट्वा परं कारुण्यमागता । साधुवर्गो हि सर्वेभ्यः प्राणिभ्यः शुभमिच्छति ॥१७१॥

अर्थ: तथा इस अंजनाका जीव जो कनकोदरी था उसे मिथ्यात्वग्रस्त देख उन्हें परम करुणा उत्पन्न हुई सो ठीक ही है क्योंकि साधुवर्ग सभी प्राणियोंका कल्याण चाहता है ॥१७१॥


अपृष्टोऽपि जनः साधुर्गुरुभक्तिप्रचोदितः । अज्ञप्राणिहितार्थं च धर्मवाक्ये प्रवर्तते ॥१७२॥

अर्थ: गुरु-भक्तिसे प्रेरित हुए साधुजन बिना पूछे भी अज्ञानी प्राणियोंका हित करनेके लिए धर्मोपदेश देने लगते हैं ॥१७२॥


अवोचत ततः सैवं शीलभूषणधारिणी । तदेमामितया वाचा माधुर्यमुपमोज्झितम् ॥१७३॥

भद्रे शृणु मनः कृत्वा परमं परमद्युते । नरेन्द्रकृतसंमाने भोगायतनविग्रहे ॥१७४॥

अर्थ: तदनन्तर शीलरूप आभूषणको धारण करनेवाली संयमश्री आर्यिका अत्यन्त मधुर वाणीमें कनकोदरीसे बोलीं कि हे भद्रे ! मनको उदार कर सुन । तू परम कान्तिको धारण करनेवाली है, राजा तेरा सम्मान करता है, तथा तेरा शरीर भोगोंका आयतन है ॥१७३-१७४॥


भवे चतुर्गतौ भ्राम्यन् जीवो दुःखैश्चितः सदा । सुमानुषत्वमायाति शमे कटुककर्मणः ॥१७५॥

अर्थ: चतुर्गति रूप संसारमें भ्रमण करता हुआ यह जीव सदा दुःखी रहता है । जब अशुभ कर्मका उदय शान्त होता है तभी यह उत्तम मनुष्यपर्यायको प्राप्त होता है ॥१७५॥


मनुष्यजातिमापन्ना सा त्वं पुण्येन शोभने । माभूज्जुगुप्सिताचारा कर्तुं योग्यासि सत्क्रियाम् ॥१७६॥

अर्थ: हे शोभने ! तू पुण्योदयसे मनुष्य योनिको प्राप्त हुई है अतः घृणित आचार करनेवाली न हो । तू उत्तम क्रिया करने योग्य है अर्थात् अच्छे कार्य करना ही तुझे उचित है ॥१७६॥


लब्ध्वा मनुष्यतां कर्म यो नादत्ते जनः शुभम् । रत्नं करगतं तस्य भ्रंशमायाति मोहिनः ॥१७७॥

अर्थ: जो प्राणी मनुष्यपर्याय पाकर भी शुभ कार्य नहीं करता है उस मोहीके हाथमें आया हुआ रत्न यों ही नष्ट हो जाता है ॥१७७॥


कायवाक्चेतसां वृत्तिः शुभा हितविधायिनी । सैवेतरेतराधानकारिणी प्राणधारिणाम् ॥१७८॥

अर्थ: मन, बचन, कायकी शुभ प्रवृत्ति ही प्राणियोंका हित करती है और अशुभ प्रवृत्ति अहित करती है ॥१७८॥


स्वस्य ये हितमुद्दिश्य प्रवर्तन्ते सुकर्मणि । उत्तमास्ते जना लोके निन्दिताचारभूयसि ॥१७९॥

अर्थ: इस संसारमें निन्दित आचारके धारक मनुष्योंकी ही बहुलता है पर जो आत्महितका लक्ष्य कर शुभ कार्यमें प्रवृत्त होते हैं वे उत्तम कहलाते हैं ॥१७९॥


कृतार्था अपि ये सन्तो भवदुःखमहार्णवात् । तारयन्ति जनान् भव्यानुपदेशविधानतः ॥१८०॥

उत्तमोत्तमतां तेषां बिभ्रतां धर्मचक्रिणाम् । अर्हतां ये तिरस्कारं प्रतिबिम्बस्य कुर्वते ॥१८१॥

जन्तूनां मोहिनां तेषां यदनेकभवानुगम् । दुःखं संजायते कस्तद्वक्तुं शक्नोति कात्स्न्र्यतः ॥१८२॥

अर्थ: जो स्वयं कृतकृत्य होकर भी उपदेश देकर भव्य प्राणियोंको संसाररूपी महासागरसे तारते हैं, जो सर्वोत्कृष्ट हैं तथा धर्मचक्रके प्रवर्तक हैं ऐसे अरहन्त भगवान्की प्रतिमाका जो तिरस्कार करते हैं उन मोही जीवोंको अनेक भवों तक साथ जानेवाला जो दुःख प्राप्त होता है उसे पूर्ण रूपसे कहनेके लिए कौन समर्थ हो सकता है ? ॥१८०-१८२॥


यद्यप्येषां प्रपन्नेषु प्रासादो नोपजायते । न चापकारनिष्ठेषु द्वेषो माध्यस्थ्यमीयुषाम् ॥१८३॥

अर्थ: अरहन्त भगवान् तो माध्यस्थ्य भावको प्राप्त हैं इसलिए यद्यपि इन्हें शरणागत जीवोंमें न प्रसन्नता होती है और न अपकार करनेवालोंपर द्वेष ही होता है ॥१८३॥


स्वस्मात्तथापि जन्तूनां परिणामाच्छुभाशुभात् । तदुद्देशेन संजातात् सुखदुःखसमुद्भवः ॥१८४॥

अर्थ: तो भी जीवोंको उपकार और अपकारके निमित्तसे होनेवाले अपने शुभ-अशुभ परिणामसे सुख-दुःखकी उत्पत्ति होती है ॥१८४॥


यथाग्नेः सेवनाच्छीतदुःखं जन्तुरपोहते । क्षुत्तृष्णापरिपीडां च भक्तशीताम्बुसेवनात् ॥१८५॥

निसर्गोऽयं तथा येन जिनानामर्चनात्सुखम् । जायते प्राणिनां दुःखं परमं च तिरस्कृतेः ॥१८६॥

अर्थ: जिस प्रकार यह जीव अग्निकी सेवासे अपना शीत-जन्य दुःख दूर कर लेता है और भोजन तथा जलका सेवनकर भूख-प्यासकी पीड़ासे छुट्टी पा जाता है यह स्वाभाविक बात है उसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेसे प्राणियोंको सुख उत्पन्न होता है और उनका तिरस्कार करनेसे परम दुःख प्राप्त होता है यह भी स्वाभाविक बात है ॥१८५-१८६॥


यन्नाम दृश्यते लोके दुःखं तत्पापसंभवम् । सुखं च चरितात्पूर्वंसुकृतादिति विद्यताम् ॥१८७॥

अर्थ: यह निश्चित जानो कि संसारमें जो भी दुःख दिखाई देता है वह पापसे उत्पन्न हुआ है और जो भी सुख दृष्टिगोचर है वह पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मसे उपलब्ध है ॥१८७॥


सा त्वं पुण्यैरिमां वृद्धिं भर्तारं पुरुषाधिपम् । पुत्रं चाद्भुतकर्माणं प्राप्ता श्लाघ्यासुधारिणाम् ॥१८८॥

अर्थ: तूने जो यह वैभव, राजा पति और आश्चर्यजनक कार्य करनेवाला पुत्र पाया है सो पुण्यके द्वारा ही पाया है । तू प्राणियोंमें प्रशंसनीय है ॥१८८॥


तथा कुरु यथा भूयो लप्स्यसे सुखमात्मनः । मद्वाक्यादवटे भव्ये ! मा पप्तः सति भास्करे ॥१८९॥

अर्थ: इसलिए ऐसा कार्य कर जिससे फिर भी तुझे सुख प्राप्त हो । हे भव्ये ! तू मेरे कहनेसे सूर्यके रहते हुए गड्ढेमें मत गिर ॥१८९॥


अभविष्यत्तवावासो नरके घोरवेदने । अहं नाबोधयिष्यं चेत्प्रमादोऽयमहो महान् ॥१९०॥

अर्थ: इस पापके कारण घोर वेदनासे युक्त नरकमें तेरा निवास हो और मैं तुझे सम्बोधित न करूँ यह मेरा बड़ा प्रमाद कहलायेगा ॥१९०॥


इत्युक्ता सा परित्रस्ता दुःखतो नरकोद्भवात् । प्रत्ययादिति शुद्धात्मा सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥१९१॥

अर्थ: आर्यिकाके ऐसा कहनेपर कनकोदरी नरकोंमें उत्पन्न होनेवाले दुःखसे भयभीत हो गयी । उसने उसी समय शुद्ध हृदयसे उत्तम सम्यग्दर्शन धारण किया ॥१९१॥


अगृहीद् गृहिधर्मं च शक्तेश्च सदृशं तपः । जन्मान्यदिव मेने च सांप्रतं धर्मसंगमात् ॥१९२॥

अर्थ: गृहस्थका धर्म और शक्ति अनुसार तप भी उसने स्वीकृत किया । उसे ऐसा लगने लगा मानो धर्मका समागम होनेसे मैंने दूसरा ही जन्म पाया हो ॥१९२॥


प्रतिमां च प्रवेश्यैनां पूर्वदेशे व्यतिष्ठपत् । आनर्च च विचित्राभिः सुमनोभिः सुगन्धिभिः ॥१९३॥

अर्थ: अर्हन्त भगवान्की प्रतिमाको उसने पूर्व स्थानपर विराजमान कराया और नाना प्रकारके सुगन्धित फूलोंसे उसकी पूजा की ॥१९३॥


कृतार्थं मन्यमाना स्वं तस्या धर्मनियोजनात् । जगाम स्वोचितं स्थानं संयमश्रीः प्रमोदिनी ॥१९४॥

अर्थ: कनकोदरीको धर्ममें लगाकर अपने आपको कृतकृत्य मानती हुई संयमश्री आर्यिका हर्षित हो अपने योग्य स्थानपर चली गयीं ॥१९४॥


कनकोदर्यपि श्रेयः समुपार्ज्य गृहे रता । कृत्वा कालं दिवं गत्वा भुक्त्वा भोगं महागुणम् ॥१९५॥

च्युत्वा महेन्द्रराजस्य महेन्द्रपुटभेदने । मनोवेगासमाख्यायामञ्जनेति सुताभवत् ॥१९६॥

अर्थ: घरमें अनुराग रखनेवाली कनकोदरी भी पुण्योपार्जन कर आयुके अन्तमें स्वर्ग गयी और वहाँ उत्तमोत्तम भोग भोगकर वहाँसे च्युत हो महेन्द्र नगरमें राजा महेन्द्रकी मनोवेगा नामा रानीसे यह अंजना नामक पुत्री हुई है ॥१९५-१९६॥


सेयं पुण्यावशेषेण कृतेन जननान्तरे । जातेहाढ्यकुले शुद्धे प्राप्ता च वरमुत्तमम् ॥१९७॥

अर्थ: इसने जन्मान्तरमें जो पुण्य किया था उसके अवशिष्ट अंशसे यह यहाँ सम्पन्न एवं विशुद्ध कुलमें उत्पन्न हुई है तथा उत्तम वरको प्राप्त हुई है ॥१९७॥


प्रतिमां च जिनेन्द्रस्य त्रिकालार्च्यस्य यद्बहिः । अकार्षीत्समयं कंचित्तेनातो दुःखमागतम् ॥१९८॥

अर्थ: इसने त्रिकालमें पूजनीय जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाको कुछ समय तक घरसे बाहर किया था उसीसे इसे यह दुःख प्राप्त हुआ है ॥१९८॥


विद्युत्प्रभगुणस्तोत्रं क्रियमाणं पुरस्तव । मिश्रकेश्याः स्वनिन्दां च समित्रः पवनंजयः ॥१९९॥

श्रुत्वा गवाक्षजालेन त्रियामायां तिरोहितः । द्वेषमस्यै परिप्राप्तो वैधुर्यमकरोत् पुरः ॥२००॥

अर्थ: विवाहके पूर्व जब इसके आगे मिश्रकेशी विद्युत्प्रभके गुणोंकी प्रशंसा और पवनंजयकी निन्दा कर रही थी तब पवनंजय अपने मित्रके साथ रात्रिके समय झरोखेसे छिपा खड़ा था सो यह सब सुनकर इससे रोषको प्राप्त हो गया और उस रोषके कारण ही उसने पहले इसे दुःख उपजाया है ॥१९९-२००॥


युद्धाय प्रस्थितो दृष्ट्वा सोऽन्यदा चक्रवाकिकाम् । विरहाद्दीपितां रम्ये मानसे सरसि द्रुतम् ॥२०१॥

अर्थ: जब वह युद्धके लिए गया तो अत्यन्त मनोहर मानसरोवरपर ठहरा । वहाँ विरहसे छटपटाती हुई चकवी- को देखकर अंजनापर दयालु हो गया ॥२०१॥


सख्येव कृपया नीतः समये तां मनोहराम् । गतश्च गर्भमादाय कर्तुं जनकशासनम् ॥२०२॥

अर्थ: उसके हृदयमें जो दया उत्पन्न हुई थी वह सखीके समान उसे शीघ्र ही समयपर इस सुन्दरीके पास ले आयी और वह गर्भाधान कराकर पिताकी आज्ञा पूर्ण करनेके लिए चला गया ॥२०२॥


इत्युक्त्वा पुनरूचेऽसावञ्जनां मुनिपुङ्गवः । महाकारुण्यसंपन्नः क्षरन्निव गिरामृतम् ॥२०३॥

सा त्वं कर्मानुभावेन बाले दुःखमिदं श्रिता । ततो भूयोऽपि मा कार्षीरीदृशं कर्म निन्दितम् ॥२०४॥

अर्थ: महादयालु मुनिराज इतना कहकर वाणीसे अमृत झराते हुएके समान अंजनासे फिर कहने लगे कि हे बेटी ! कर्मके प्रभावसे ही तूने यह दुःख पाया है इसलिए फिर कभी ऐसा निन्द्य कार्य नहीं करना ॥२०३-२०४॥


यानि यानि च सौख्यानि जायन्ते चात्र भूतले । तानि तानि हि सर्वाणि जिनभक्ते विशेषतः ॥२०५॥

अर्थ: इस पृथ्वीतलपर जो-जो सुख उत्पन्न होते हैं वे सब विशेषकर जिनेन्द्र देवकी भक्तिसे ही उत्पन्न होते हैं ॥२०५॥


भक्ता भव जिनेन्द्राणां संसारोत्तारकारिणाम् । गृहाण नियमं शक्त्या कुरु श्रमणपूजनम् ॥२०६॥

अर्थ: इसलिए तू संसारसे पार करनेवाले जिनेन्द्र देवकी भक्त हो, शक्तिके अनुसार नियम ग्रहण कर और मुनियोंकी पूजा कर ॥२०६॥


दिष्ट्या बोधिं प्रपन्नासि तदा दत्तां तदार्थया । उदहार्षीत् करालम्बात् सा त्वां यान्तीमधोगतिम् ॥२०७॥

अर्थ: भाग्यसे तू उस समय संयमश्री आर्याके द्वारा प्रदत्त बोधिको प्राप्त हुई थी । आर्याने तुझे बोधि क्या दी थी मानो अधोगतिमें जाती हुई तुझे हाथका सहारा देकर ऊपर खींच लिया था ॥२०७॥


अयं च ते महाभाग्यः कुक्षिं गर्भः समाश्रितः । पुरा निर्लोठते सम्यग्बहुकल्याणभाजनम् ॥२०८॥

अर्थ: यह महाभाग्यशाली गर्भ तेरे उदरमें आया है सो आगे चल कर अनेक उत्त- मोत्तम कल्याणोंका पात्र होगा ॥२०८॥


परमां भूतिमेतस्मात् सुतात् प्राप्स्यसि शोभने । अखण्डनीयवीर्योऽयं गीर्वाणैः सकलैरपि ॥२०९॥

अर्थ: हे शोभने ! तू इस पुत्रसे परम विश्रुतिको प्राप्त होगी । सब देव मिलकर भी इसका पराक्रम खण्डित नहीं कर सकेंगे ॥२०९॥


अल्पैरेव च तेऽहोभिः प्रियसंगो भविष्यति । ततो भव सुखस्वान्ता प्रमादरहिता शुभे ॥२१०॥

अर्थ: थोड़े ही दिनोंमें तुम्हारा पतिके साथ समागम होगा । इसलिए हे शुभे ! चित्तको सुखी रखो और प्रमादरहित होओ ॥२१०॥


इत्युक्ताभ्यां ततस्ताभ्यां तुष्टाभ्यां मुनिसत्तमः । प्रणतो विकसन्नेत्रराजीवाभ्यां पुनः पुनः ॥२११॥

अर्थ: मुनिराजके ऐसा कहनेपर जो अत्यन्त हर्षित हो रही थीं तथा जिनके नेत्रकमल खिल रहे थे ऐसी दोनों सखियोंने मुनिराजको बार-बार प्रणाम किया ॥२११॥


सोऽपि दत्त्वाशिषं ताभ्यां समुत्पत्य नभस्तलम् । संयमस्योचितं देशं जगामामलमानसः ॥२१२॥

अर्थ: तदनन्तर निर्मल हृदय- के धारक मुनिराज उन दोनोंके लिए आशीर्वाद देकर आकाश-मार्गसे संयमके योग्य स्थानपर चले गये ॥२१२॥


पर्यङ्कासनयोगेन यस्मात्तस्यां स सन्मुनिः । तस्थौ जगाम पर्यङ्कगुहाख्यां सा ततो भुवि ॥२१३॥

अर्थ: वे उत्तम मुनिराज उस गुहामें पर्यंकासनसे विराजमान थे । इसलिए आगे चल- कर वह गुहा पृथिवीमें ‘पर्यंक गुहा’ इस नामको प्राप्त हो गयी ॥२१३॥


इत्थं निजभवान् श्रुत्वाभवद् विस्मितमानसा । निन्दन्ती दुष्कृतं कर्म पूर्वं यदधमं कृतम् ॥२१४॥

अर्थ: इस प्रकार राजा महेन्द्रकी पुत्री अंजना अपने भवान्तर सुन आश्चर्यसे चकित हो गयी । उसने पूर्वभवमें जो निन्द्य कार्य किया था उसकी वह बार-बार निन्दा करती रहती थी ॥२१४॥


महेन्द्रदुहिता तस्यां सूतिकालव्यपेक्षया । तस्थौ मगधराजेन्द्रपूतायां मुनिसंगमात् ॥२१५॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मुनिराजके संगमसे जो अत्यन्त पवित्र हो चुकी थी ऐसी उस गुफामें अंजना प्रसव-कालकी प्रतीक्षा करती हुई रहने लगी ॥२१५॥


वसन्तमालया तस्या विद्याबलसमृद्धया । पानाशनविधिश्चक्रे मनसा विषयीकृतः ॥२१६॥

अर्थ: विद्या-बलसे समृद्ध वसन्तमाला उसकी इच्छानुसार आहार-पानकी विधि मिलाती रहती थी ॥२१६॥


अथ प्रियविमुक्तां तां कारुण्येनेव भूयसा । असमर्थो रविर्द्रष्टुमस्तमैच्छन्निषेवितुम् ॥२१७॥

अर्थ: अथानन्तर सूर्य अस्ताचलके सेवनकी इच्छा करने लगा अर्थात् अस्त होनेके सम्मुख हुआ । सो ऐसा जान पड़ता था मानो अत्यधिक करुणाके कारण भर्तारसे वियुक्त अंजनाको देखनेके लिए असमर्थ हो गया हो ॥२१७॥


तद्दुःखादिव मन्दत्वं भास्करस्य करा ययुः । चित्रकर्मार्पितादित्यकरोत्करकृतोपमाः ॥२१८॥

अर्थ: सूर्यकी किरणें भी चित्रलिखित सूर्यकी किरणोंके समान मन्दपनेको प्राप्त हो गयी थीं सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजनाका दुःख देखकर ही मन्द पड़ गयी हों ॥२१८॥


शोकादिव रवेर्बिम्बं सहसा पातमागतम् । गिरिवृक्षाग्रसंसक्तं करजालं समाहरन् ॥२१९॥

अर्थ: पर्वत और वृक्षोंके अग्रभागपर स्थित किरणोंके समूहको समेटता हुआ सूर्यका बिम्ब सहसा पतनको प्राप्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो अंजनाके शोकके कारण ही पतनको प्राप्त हुआ हो ॥२१९॥


अथागन्तुकसिंहस्य दृष्ट्यैव क्रोधताम्रया । संध्यया पिहितं सर्वं क्षणेन नभसस्तलम् ॥२२०॥

अर्थ: तदनन्तर आगे आनेवाले सिंहकी कुपित दृष्टिके समान लालवर्णकी सन्ध्यासे समस्त आकाश क्षण-भरमें व्याप्त हो गया ॥२२०॥


ततो भाव्युपसर्गेण प्रेरितेव त्वरावती । उदियाय तमोलेखा वेतालीव रसातलात् ॥२२१॥

अर्थ: तत्पश्चात् भावी उपसर्गसे प्रेरित होकर ही मानो शीघ्रता करनेवाली अन्धकारकी रेखा उत्पन्न हो गयी । वह अन्धकारकी रेखा ऐसी जान पड़ती थी मानो पातालसे वेताली ही निकल रही हो ॥२२१॥


कृतकोलाहलाः पूर्वं दृष्ट्वा तामिव भीतितः । निःशब्दा गहने तस्थुर्वृक्षाग्रेषु पतत्रिणः ॥२२२॥

अर्थ: उस वनमें पक्षी पहले तो कोलाहल कर रहे थे पर उन्होंने जब अन्धकारकी रेखा देखी तो मानो उसके भयसे ही निःशब्द होकर वृक्षोंके अग्रभागपर बैठ रहे ॥२२२॥


प्रावर्तन्त शिवारावा महानिर्घातभीषणाः । वादिता उपसर्गेण प्रकटाः पटहा इव ॥२२३॥

अर्थ: महावज्रपातके समान भयंकर शृगालोंके शब्द होने लगे सो ऐसा जान पड़ता था मानो आनेवाले उपसर्गने अपने नगाड़े ही बजाना शुरू कर दिया हो ॥२२३॥


अथ धूतेभकीलालशोणकेसरसंचयः । मृत्युपत्राङ्गुलिच्छायां भृकुटिं कुटिलां दधत् ॥२२४॥

विमुञ्चन्विषमच्छेदान्नादान् सप्रतिशब्दकान् । वेगिनः सकलं व्योम कुर्वाण इव खण्डशः ॥२२५॥

प्रलयज्वलनज्वालाविलासाञ्चलयन्मुहुः । महास्यगह्वरे जिह्वां प्रह्वां भूरिजनक्षये ॥२२६॥

जीवाकर्षां कुशाकारां दंष्ट्रां तीक्ष्णाग्रसंकटाम् । कुटिलां धारयन् रौद्रां मृत्योरपि भयंकराम् ॥२२७॥

उद्यत्प्रलयतीव्रांशुमण्डलप्रतिमे वहन् । छुरयन्ती दिशां चक्रं नेत्रे वित्रासकारिणी ॥२२८॥

मस्तकन्यस्तपुच्छाग्रो नखकोटिक्षतक्षितिः । अष्टापदतटोरस्को जघनं घनमुद्वहन् ॥२२९॥

मृत्युर्दैत्यः कृतान्तो नु प्रेतेशो नु कलिः क्षयः । अन्तकस्यान्तको नु स्याद्भास्करो नु तनूनपात् ॥२३०॥

इति संजनिताशङ्कं जन्तुभिर्वीक्षितोऽखिलैः । आविर्बभूव तद्देशे केसरी विकटः क्षणात् ॥२३१॥

अर्थ: अथानन्तर वहाँ क्षण-भरमें एक ऐसा विकराल सिंह प्रकट हुआ जो हाथियोंके रुधिरसे लाल-लाल दिखनेवाले जटाओंके समूहको बार-बार हिला रहा था, मृत्युके द्वारा भेजे हुए पत्रपर पड़ी अंगुलीकी रेखाके समान कुटिल भौंहको धारण कर रहा था । बीच-बीचमें प्रतिध्वनिसे युक्त वेगशाली भयंकर शब्द छोड़ रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त आकाशके खण्ड-खण्ड ही कर रहा हो । जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान चंचल एवं अनेक प्राणियोंका क्षय करनेमें निपुण जिह्वाको मुखरूपी महागर्तमें बार-बार चला रहा था । जो जीवको खींचनेवाली कुशाके समान तीक्ष्ण, नुकीली, सघन, कुटिल, रौद्र और मृत्युको भी भय उत्पन्न करनेवाली डाढ़को धारण कर रहा था । जो उदित होते हुए प्रलयकालीन सूर्य-बिम्बके समान लाल वर्ण एवं दिशाओंको व्याप्त करनेवाले भयंकर नेत्रोंसे युक्त था । जिसकी पूँछका अग्रभाग मस्तकपर रखा हुआ था, जो अपने नखाग्रसे पृथ्वीको खोद रहा था, जिसका वक्षःस्थल कैलासके तटके समान चौड़ा था, जो स्थूल नितम्ब-मण्डलको धारण कर रहा था । और जिसे सब प्राणी ऐसी आशंका करते हुए देखते थे कि क्या यह साक्षात् मृत्यु है ? अथवा दैत्य है अथवा कृतान्त है, अथवा प्रेतराज है, अथवा कलिकाल है अथवा प्रलय है ? अथवा अन्तक ( यमराज ) का भी अन्त करनेवाला है ? अथवा सूर्य है ? अथवा अग्नि है ? ॥२२४-२३१॥


तस्य प्रतिनिनादेन पूरतोदारकन्दराः । भीता इवातिगम्भीरं रुरुदुर्धरणीधराः ॥२३२॥

अर्थ: उसकी गर्जनाकी प्रतिध्वनिसे जिनकी बड़ी-बड़ी गुफाएँ भर गयी थीं ऐसे पर्वत, ऐसे जान पड़ते थे मानो भयभीत हो अत्यन्त गम्भीर रुदन ही कर रहे हों ॥२३२॥


मुद्गरेणेव घोरेण शब्देनास्य तरस्विना । श्रोत्रयोस्ताडिताश्चक्रुरिति चेष्टाः शरीरिणः ॥२३३॥

अर्थ: उसके मुद्गरके समान भयंकर वेगशाली शब्दसे कानोंमें ताड़ित हुए प्राणी नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करने लगते थे ॥२३३॥


लोचने मुकुलीकुर्वन्नभिदुर्गे महीभृति । शार्दूलो दर्पनिर्मुक्तः संचुकोप सवेपथुः ॥२३४॥

अर्थ: जो सामने जुड़े हुए दुर्गम पहाड़पर अपने दोनों नेत्र लगाये हुए था तथा अत्यन्त अहंकारसे युक्त था ऐसे उस सिंहने अँगड़ाई लेते हुए बहुत ही कोप प्रकट किया ॥२३४॥


शैरपुष्पसमाकारहृष्टरोमाञ्चसंभ्रमः । बभ्रूतरलगुञ्जाक्षो विवेश विवरं गिरेः ॥२३५॥

अर्थ: जिसके शरीरमें तृण-पुष्पके समान रोमांच निकल रहे थे तथा जिसके नेत्र गुमचीके समान लाल-पीले एवं चंचल थे ऐसे सिंहने पर्वतकी गुफामें प्रवेश किया ॥२३५॥


सारङ्गामुखविभ्रंसिदूर्वाकोमलपल्लवाः । यथापूर्वक्षयास्तस्थुर्भयस्तम्भितविग्रहाः ॥२३६॥

अर्थ: उसे देख जिनके मुखसे दूर्वा और कोमल पल्लवोंके ग्रास नीचे गिर गये थे तथा भयसे जिनका शरीर अकड़ गया था ऐसे हरिण ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये ॥२३६॥


संभ्रान्तबभ्रुनेत्राणामुत्कर्णानां विचेतसाम् । दानौघा निश्चलाङ्गानां मातङ्गानां विचिच्छिदुः ॥२३७॥

अर्थ: जिनके पीले-पीले नेत्र घूम रहे थे, कान खड़े हो गये थे, मनकी गति बन्द हो गयी थी और शरीर निश्चल हो गया था ऐसे हाथियोंके मदके प्रवाह रुक गये ॥२३७॥


मण्डलस्यान्तरे कृत्वा शावकान् भयवेपितान् । तस्थुः पश्वङ्गना सङ्घा यूथपन्यस्तलोचनाः ॥२३८॥

अर्थ: हरिणी आदि पशु-स्त्रियोंके जो समूह थे वे भयसे काँपते हुए बच्चोंको घेरेके भीतर कर खड़े हो गये । उन सबके नेत्र अपने झुण्डके मुखियापर लगे हुए थे ॥२३८॥


केसरिध्वनिवित्रस्ता कम्पमानशरीरिका । वपुराहारयोस्त्यागं चक्रे सालम्बमञ्जना ॥२३९॥

अर्थ: जो सिंहकी गर्जनासे भयभीत हो रही थी तथा जिसका शरीर काँप रहा था ऐसी अंजनाने ‘यदि उपसर्गसे जीती बचूँगी तो शरीर और आहार ग्रहण करूँगी अन्यथा नहीं’ इस आलम्बनके साथ शरीर और आहारका त्याग कर दिया ॥२३९॥


उत्पत्य त्वरिता व्योम्नि सख्यस्यास्तद्ग्रहाक्षमा । बभ्राम पक्षिणीवालं मण्डलेनाकुलात्मिका ॥२४०॥

अर्थ: इसकी सखी वसन्तमाला इसे उठानेमें समर्थ नहीं थी इसलिए शीघ्रतासे आकाशमें उड़कर पक्षिणीकी तरह व्याकुल होती हुई मण्डलाकार भ्रमण कर रही थी - चक्कर लगा रही थी ॥२४०॥


भूयः समीपमाकाशमेति प्रेमगुणाहृता । पुनश्च तीव्रवित्रासात् प्रयाति नभसः शिरः ॥२४१॥

अर्थ: वह अंजनाके प्रेम और गुणोंसे आकर्षित होकर बार-बार उसके पास आती थी पर तीव्र भयके कारण पुनः आकाशमें ऊपर चली जाती थी ॥२४१॥


अथ ते सभये दृष्ट्वा विशीर्णहृदये शुभे । गन्धर्वस्तद्गुहावासी कारुण्याश्लेषमीयिवान् ॥२४२॥

अर्थ: अथानन्तर जिनके हृदय विशीर्ण हो रहे थे ऐसी उन दोनों स्त्रियोंको भयभीत देख उस गुफामें रहनेवाला गन्धर्व दयाके आलिंगनको प्राप्त हुआ अर्थात् उसे दया उत्पन्न हुई ॥२४२॥


तमूचे मणिचूलाख्यं रत्नचूला निजाङ्गना । कारुण्येनोरुणा साध्वी चोदिता द्रुतभाषिणी ॥२४३॥

अर्थ: उस गन्धर्वकी स्त्रीका नाम रत्नचूला था। सो बहुत भारी दयासे प्रेरित एवं शीघ्रतासे भाषण करनेवाली उस साध्वी रत्नचूलाने अपने पति मणिचूल नामा गन्धर्वसे कहा ॥२४३॥


पश्य पश्य प्रिय ! त्रस्तां तां मृगेन्द्रादिह स्त्रियम् । एतत्प्रति समादिष्टां द्वितीयां च नभोऽङ्गणे ॥२४४॥

अर्थ: कि हे प्रिय ! देखो देखो, सिंहसे भयभीत हुई एक स्त्री यहीं स्थित है और उससे सम्बन्ध रखनेवाली दूसरी स्त्री आकाशांगणमें चक्कर काट रही है ॥२४४॥


कुरु नाथ प्रसादं मे रक्षैतामतिविह्वलाम् । अभिजातां वरां नारीं कुतोऽपि विषमश्रिताम् ॥२४५॥

अर्थ: हे नाथ ! मेरे ऊपर प्रसाद करो और इस अत्यन्त विह्वल स्त्रीकी रक्षा करो। यह कुलवती उत्तम नारी किसी कारण इस विषम स्थानमें आ पड़ी है ॥२४५॥


एवमुक्तोऽथ गन्धर्वो विकृत्यं शरभाकृतिम् । त्रैलोक्यभीषणद्रव्यसंभारेणेव निर्मिताम् ॥२४६॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर गन्धर्व देवने विक्रियासे अष्टापदका रूप बनाया। उसका वह रूप ऐसा जान पड़ता था मानो तीनों लोकोंमें जितने भयंकर पदार्थ हैं उन सबको इकट्ठा कर ही उसकी रचना की गयी हो ॥२४६॥


हस्तत्रितयमात्रस्थामञ्जनामसमागतम् । सिंहं पुरोऽकरोद्देहच्छन्नसानुकदम्बकः ॥२४७॥

अर्थ: अंजना और सिंहके बीचमें सिर्फ तीन हाथका अन्तर रह गया था कि इतनेमें ही अपने शरीरसे शिखरोंके समूहको आच्छादित करनेवाला अष्टापद सिंहके सामने आकर खड़ा हो गया ॥२४७॥


तयोस्तत्राभवद्भीमः संघट्टो रवसंकुलः । विद्युद्योतितप्रावृड्घनसङ्घं हसन्निव ॥२४८॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ सिंह और अष्टापदके बीच भयंकर युद्ध हुआ। उनका वह युद्ध भयंकर गर्जनासे युक्त था और बिजलीसे प्रकाशित वर्षाकालिक मेघोंके समूहकी मानो हँसी ही उड़ा रहा था ॥२४८॥


एवंविधेऽपि संप्राप्ते काले वीरभयावहे । अञ्जनासुन्दरी चक्रे हृदये जिनपुङ्गवान् ॥२४९॥

अर्थ: इस प्रकार वहाँ शूरवीर मनुष्योंको भी भय उत्पन्न करनेवाला समय यद्यपि आया था तो भी अंजना निर्भय रहकर हृदयमें जिनेन्द्र देवका ध्यान करती रही ॥२४९॥


इत्थं वसन्तमाला च मण्डलेन कृतभ्रमा । विललाप महादुःखा कुररीव नभस्तले ॥२५०॥

अर्थ: आकाशमें मण्डलाकार भ्रमण करती तथा महादुःखसे भरी वसन्तमाला कुररीकी तरह इस प्रकार विलाप कर रही थी ॥२५०॥


हा भर्तृदारिके पूर्वं दौर्भाग्यमसि संगता । तस्मिन्नपि गते कृच्छ्राद् वर्जिता सर्वबन्धुभिः ॥२५१॥

अर्थ: हाय राजपुत्रि ! तुम पहले दौर्भाग्यको प्राप्त रही फिर जिस किसी तरह कष्टसे दौर्भाग्य समाप्त हुआ तो समस्त बन्धुजनोंने तुम्हारा त्याग कर दिया ॥२५१॥


संप्राप्तासि वनं भीमं कथमप्यागतां गुहाम् । मुनिनाश्वासितासन्नप्रियावाप्तिनिवेदनात् ॥२५२॥

सा त्वं केसरिणो वक्त्रमधुना देवि यास्यसि । दंष्ट्राकरालमुद्वृत्तद्विरदक्षयकारणम् ॥२५३॥

अर्थ: भयंकर वनमें आकर किसी तरह इस गुफामें आयी और ‘निकट कालमें ही पतिका समागम प्राप्त होगा’ यह कहकर मुनिराजने आश्वासन दिया पर अब हे देवि ! तुम सिंहके उस मुखमें जा रही हो जो डाढ़ोंसे भयंकर है तथा उद्दण्ड हाथियोंके क्षयका कारण है ॥२५२-२५३॥


हा देवि ते गतः कालो दुर्जनस्य विधेर्वशात् । उपर्युपरिदुःखेन मम दुर्मतिकारणात् ॥२५४॥

अर्थ: हाय देवि ! दुष्ट विधाता- के वश और मेरी दुर्बुद्धिके कारण तुम्हारा समय उत्तरोत्तर दुःखसे ही व्यतीत हुआ ॥२५४॥


परित्रायस्व हा नाथ ! पवनञ्जय ! गेहिनीम् । हा महेन्द्र ! कथं नेमां तनयां परिरक्षसि ॥२५५॥

अर्थ: हा नाथ पवनंजय ! अपनी गृहिणीकी रक्षा करो । हा महेन्द्र ! तुम इस पुत्रीकी रक्षा क्यों नहीं करते हो ? ॥२५५॥


हा किं केतुमति क्रूरे मुधास्यां त्वयका कृतम् । हा करुणे मनोवेगे तनयां किं न रक्षसि ॥२५६॥

अर्थ: हा दुष्टा केतुमति ! तूने व्यर्थ ही इसके विषयमें क्या अनर्थ किया ? हा दयावती मनोवेगे ! अपनी पुत्रीकी रक्षा क्यों नहीं कर रही हो ? ॥२५६॥


मरणं राजपुत्रीयं प्राप्नोति विजने वने । कुरुत त्राणमेतस्याः कृपया वनदेवताः ॥२५७॥

अर्थ: यह राजपुत्री निर्जन वनमें मरणको प्राप्त हो रही है । हे वनदेवताओ ! कृपा कर इसकी रक्षा करो ॥२५७॥


मुनेरपि तथा तस्य लोकतत्त्वावबोधिनः । शुभार्थसूचनं वाक्यं संभवेदन्यथा किमु ॥२५८॥

अर्थ: लोकके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले उन मुनिके शुभसूचक वचन भी क्या अन्यथा हो जावेंगे ? ॥२५८॥


आक्रन्दमिति कुर्वाणा दोलारूढेव विह्वला । चक्रे वसन्तमालाशु स्वामिन्यन्तं गतागतम् ॥२५९॥

अर्थ: इस प्रकार रुदन करती तथा झूलापर चढ़ी हुई के समान विह्वल वसन्तमाला जल्दी-जल्दी स्वामिनीके समीप गमन तथा आगमन कर रही थी अर्थात् साहस कर समीप आती थी फिर भयकी तीव्रतासे दूर हट जाती थी ॥२५९॥


अथ भङ्गं गतः सिंहः शरभेण तलाहतः । अन्तर्दधे कृतार्थश्च शरभो निलये निजे ॥२६०॥

अर्थ: अथानन्तर अष्टापदकी चपेटसे आहत होकर सिंह नष्ट हो गया और कृतकृत्य होकर अष्टापद अपने स्थानमें अन्तर्हित हो गया ॥२६०॥


ततः स्वप्नोपमं दृष्ट्वा विरतं युद्धमेतयोः । द्रुतं वसन्तमालागात् स्वेदिगात्रा पुनर्गुहाम् ॥२६१॥

अर्थ: तदनन्तर स्वप्नके समान दोनोंका युद्ध समाप्त हुआ देख पसीनासे लथ-पथ वसन्तमाला शीघ्र ही गुहामें आयी ॥२६१॥


अन्तःपल्लवकान्ताभ्यां हस्ताभ्यां कृतमार्गणा । क्वासि क्वासीति भीशेषात्कृतगद्गदनिस्वना ॥२६२॥

अर्थ: गुहाके भीतर पल्लवके समान कोमल हाथोंसे अंजनाको खोजती हुई वसन्तमाला कह रही थी कि कहाँ हो ? कहाँ हो ? उस समय भी उसका पूरा भय नष्ट नहीं हुआ था इसलिए आवाज गद्गद निकल रही थी ॥२६२॥


ज्ञात्वा वसन्तमाला तां स्पर्शेनात्यन्तनिश्चलाम् । तां प्रतिप्राणनाशङ्कासमाकुलितमानसा ॥२६३॥

अर्थ: वसन्तमालाने हाथके स्पर्शसे जाना कि यह बिलकुल निश्चल पड़ी हुई है । इसलिए उसका मन ‘यह जीवित है या नहीं’ इस आशंकासे व्याकुल हो उठा ॥२६३॥


ध्रियसे देवि देवीति चालयन्ती पुनः पुनः । जगाद स्वामिनीवक्षोविन्यस्तकरपल्लवा ॥२६४॥

अर्थ: वह उसके वक्षःस्थलपर हाथ रखकर बार-बार उकसाती हुई कह रही थी कि हे देवि ! देवि ! जिन्दा हो ? ॥२६४॥


ततोऽसौ तत्करस्पर्शादागतस्पष्टचेतना । चिरात्सखीयमस्मीति जगादास्पष्टया गिरा ॥२६५॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्तमालाके हाथके स्पर्शसे जब अंजनाको चेतना आयी और कुछ देर बाद उसने समझ लिया कि यह सखी है तब अस्पष्ट वाणीमें उसने कहा कि ‘मैं हूँ’ ॥२६५॥


ततस्ते संगमात्प्राप्य कियतीमपि निर्वृतिम् । पुनर्जन्मेव मेनाते लब्धसंभाषणोद्यते ॥२६६॥

अर्थ: तत्पश्चात् वे दोनों सखियाँ परस्पर मिलकर अनिर्वचनीय सुखको प्राप्त हुईं और अवसरके अनुसार वार्तालाप करनेमें उद्यत हो ऐसा समझने लगीं मानो हम लोगोंका दूसरा ही जन्म हुआ है ॥२६६॥


भयशेषेण चाभीलां मुग्धे तां जग्मतुर्निशाम् । समासमां कृताशेषबन्धुनैष्ठुर्यसंकथे ॥२६७॥

अर्थ: भय शेष रहनेसे उन भोलीभाली स्त्रियोंने उस भयावनी रात्रिको वर्षके बराबर भारी समझा । वे सारी रात जागकर समस्त बन्धुजनोंकी निष्ठुरताकी चर्चा करती रहीं ॥२६७॥


ततो विध्वस्य नागारिं नागारिरिव पन्नगम् । प्रमोदवानसौ मद्यं पीतवान् सुमहागुणम् ॥२६८॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार गरुड़ साँपको नष्ट कर देता है उसी प्रकार गन्धर्व सिंहको नष्ट कर बड़ा हर्षित हुआ और हर्षित होकर उसने महागुणकारी मद्यका पान किया ॥२६८॥


गन्धर्वकान्तयावाचि गन्धर्वो लब्धवर्णया । तदूरौ बाहुमाधाय तरत्तारकनेत्रया ॥२६९॥

अर्थ: जिसके नेत्र चंचल हो रहे थे ऐसी गन्धर्वकी विदुषी स्त्रीने उसकी जाँघपर अपनी भुजा रख गन्धर्वसे कहा कि ॥२६९॥


स्थानकं यच्छ मे नाथ जिगासाम्यधुनोचितम् । उपदेशो हि गन्तव्यं कादम्बर्यामनुत्तमम् ॥२७०॥

अर्थ: हे नाथ ! मुझे अवसर दीजिए मैं इस समय कुछ गाना चाहती हूँ क्योंकि मद्यपानके अनन्तर उत्तम गाना गाना चाहिए ऐसा उपदेश है ॥२७०॥


शेषं साध्वसमेते च वनिते परिमुञ्चतः । श्रुत्वा नौ मधुरं गीतं दैवीयं हृदयंगमम् ॥२७१॥

अर्थ: साथ ही हम दोनोंका मधुर दिव्य एवं हृदयहारी संगीत सुनकर ये दोनों स्त्रियाँ अवशिष्ट भयको भी छोड़ देंगी ॥२७१॥


अर्धरात्रे ततस्तस्मिन्नन्यशब्दविवर्जिते । संस्कृत्यावीवदद्वीणां गन्धर्वः श्रोत्रहारिणीम् ॥२७२॥

अर्थ: तदनन्तर जब अर्धरात्रि हो गयी और किसी दूसरेका शब्द भी सुनाई नहीं पड़ने लगा तब गन्धर्वने कानोंको हरनेवाली वीणा ठीक कर बजाना शुरू किया ॥२७२॥


कांसिके वादयन्ती च प्रियवक्त्राहितेक्षणा । रत्नचूला जगौ मन्दं मुनिक्षोभणकारणम् ॥२७३॥

अर्थ: और उसकी स्त्री रत्नचूला पतिके मुखपर नेत्र धारण कर मंजीरा बजाती हुई धीरे-धीरे गाने लगी । उसका वह गाना मुनियोंको भी क्षोभ उत्पन्न करनेका कारण था ॥२७३॥


तयोर्घनं कृतं वाद्यं सुषिरं च कृतं ततम् । परिवर्गेण गम्भीरकरतलक्रमोचितम् ॥२७४॥

अर्थ: उस समय उन दोनोंके बीच घन, वाद्य, सुषिर और तत इन चारों प्रकारके बाजोंका प्रयोग चल रहा था और परिजनके अन्य लोग गम्भीर हाथोंसे क्रमानुसार योग्य ताल दे रहे थे ॥२७४॥


पाणिधैरेकतानेन मन्दध्वनिसमन्वितम् । तथा वैणविकैर्वाद्यं प्रवीणैर्भ्रूविलासिभिः ॥२७५॥

अर्थ: तबला बजानेमें निपुण देव एकचित्त होकर गम्भीर ध्वनिके साथ तबला बजा रहे थे तो बाँसुरी बजानेमें चतुर देव भौंह चलाते हुए अच्छी तरह बाँसुरी बजा रहे थे ॥२७५॥


प्रवीणाभः प्रवालाभां वीणां चारूपमानिकाम् । कोणेनाताडयद्यक्षो गन्धर्वः काकलीबुधः ॥२७६॥

मध्यमर्षभगान्धारषड्जपञ्चमधैवतान् । निषादसप्तमांश्चक्रे स स्वरान्क्रममत्यजन् ॥२७७॥

अर्थ: उत्तम आभाको धारण करनेवाला यक्ष प्रवालके समान कान्तिवाली तथा सुन्दर उपमासे युक्त वीणाको तमूरेसे बजा रहा था । तो स्वरोंकी सूक्ष्मताको जाननेवाला गन्धर्व, क्रमको नहीं छोड़ता हुआ, मध्यम, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, पंचम, धैवत और निषाद इन सात स्वरोंको निकाल रहा था ॥२७६-२७७॥


भेजे वृत्तीर्यथास्थानं द्रुतमध्यविलम्बिताः । एकविंशतिसंख्याश्च मूर्च्छना नर्तितेक्षणाः ॥२७८॥

अर्थ: गाते समय वह गन्धर्व द्रुता, मध्या और विलम्बिता इन तीन वृत्तियोंका यथास्थान प्रयोग करता था और जिनसे नेत्र नाच उठते हैं, ऐसी इक्कीस मूर्च्छनाओं का भी यथावसर उपयोग करता था ॥२७८॥


हाहाहूहूसमानं स गानं चक्रेऽथवाधिकम् । प्रायो गन्धर्वदेवानां प्रसिद्धिमिदमागतम् ॥२७९॥

अर्थ: वह देवोंके गवैया जो हाहा-हूहू हैं उनके समान अथवा उनसे भी अधिक उत्तम गान गा रहा था और प्रायःकर गन्धर्व देवोंमें यही गान प्रसिद्धको प्राप्त है ॥२७९॥


स्वनान्येकोनपञ्चाशत्संजगौ परिनिष्ठितम् । जिनेन्द्रगुणसंबद्धैर्वचनैर्ललिताक्षरैः ॥२८०॥

अर्थ: वह उनचास ध्वनियोंमें गा रहा था तथा उसका वह समस्त गान जिनेन्द्र भगवान्के गुणोंसे सम्बन्ध रखनेवाले मनोहर अक्षरोंसे युक्त वचनावलीसे निर्मित था ॥२८०॥


देवादेवैर्भक्तिप्रह्वैः पुष्पैरर्घैर्नानागन्धैः । अर्चामुच्चैर्नीतं वन्द्यं देवं भक्त्या त्वामर्हन्तम् ॥२८१॥

अर्थ: वह गा रहा था कि भक्तिसे नम्रीभूत सुर-असुर पुष्प, अर्घ तथा नाना प्रकारकी गन्धसे जिनकी उत्तम पूजा करते हैं ऐसे देवाधिदेव वन्दनीय अरहन्त भगवान्को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ॥२८१॥


त्रिभुवनकुशलमतिशय-पूतं [ नित्यं ] नमामि भक्त्या परया । मुनिसुव्रतचरणयुगं सुरपतिमुकुटप्रवृत्तनखमणिकिरणम् ॥२८२॥

अर्थ: उसने यह भी गाया कि मैं श्री मुनिसुव्रत भगवान्के उस चरण युगलको उत्कट भक्तिसे नमस्कार करता हूँ जो त्रिभुवनकी कुशल करनेवाला है, अत्यन्त पवित्र है और इन्द्रके मुकुटका सम्बन्ध पाकर जिसके नखरूपी मणियोंसे किरणें फूट पड़ती हैं ॥२८२॥


ततो वसन्तमाला तद्गेयमत्यन्तशोभनम् । प्रशशंसाश्रुतपूर्वं विस्मयव्याप्तमानसा ॥२८३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मन आश्चर्यसे व्याप्त था ऐसी वसन्तमालाने उस अश्रुतपूर्व तथा अत्यन्त सुन्दर संगीतकी बहुत प्रशंसा की ॥२८३॥


अहो गीतमहो गीतं केनाप्येतन्मनोहरम् । आर्द्रीकृतमिवानेन हृदयं मे सुधामुचा ॥२८४॥

अर्थ: वह कहने लगी कि वाह ! वाह ! यह मनोहर गान किसने गाया है । इस अमृतवर्षी गवैयाने तो मेरा हृदय मानो गीला ही कर दिया है ॥२८४॥


स्वामिनीं च जगादैवं देवि कोऽप्यनुकम्पकः । देवोऽयं येन नौ रक्षा कृता केसरिनोदनात् ॥२८५॥

अर्थ: उसने स्वामिनीसे कहा कि हे देवि ! यह कोई देव है जिसने सिंह भगाकर हम लोगोंकी रक्षा की है ॥२८५॥


मन्येऽस्मद्वृत्तयेऽनेन गीतमेतच्छ्रुतिप्रियम् । श्रुताबलाकलध्वानमन्तरे सकलाङ्गकम् ॥२८६॥

अर्थ: जिसके बीचमें स्त्रीका मधुर शब्द सुनाई देता था तथा जो संगीतके समस्त अंगोंसे सहित था ऐसा यह कर्णप्रिय गाना, जान पड़ता है इसने हम लोगोंके लिए ही गाया है ॥२८६॥


देवि शीलवती कस्य नानुकम्प्यासि शोभने । महारण्येऽपि भव्यानां भवन्ति सुहृदो जनाः ॥२८७॥

अर्थ: हे देवि ! हे शोभने ! उत्तम शीलको धारण करनेवाली ! तू किसकी दया-पात्र नहीं है ? भव्य जीवोंको महा-अटवीमें भी मित्र मिल जाते हैं ॥२८७॥


उपसर्गस्य विध्वंसादेतस्मात्ते सुनिश्चितः । भविता प्रियसंपर्कः किं वा वक्ष्यन्यथा मुनिः ॥२८८॥

अर्थ: इस उपसर्गके दूर होनेसे यह सुनिश्चित है कि तुम्हारा पतिके साथ समागम होगा । अथवा क्या मुनि भी अन्यथा कहते हैं ? ॥२८८॥


तस्मात्साधुमिमं देवं समाश्रित्य कृतोचितम् । मुनिपर्यङ्कपूतायां गुहायामत्र संश्रयात् ॥२८९॥

मुनिसुव्रतनाथस्य विन्यस्य प्रतियातनाम् । अर्चयन्त्यौ सुखप्राप्त्यै स्वामोदैः कुसुमैरलम् ॥२९०॥

सुखप्रसूतिमेतस्य गर्भस्याध्यायचेतसि । विस्मृत्य वैरहं दुःखं समयं किंचिदास्वहे ॥२९१॥

अर्थ: इसलिए इस उत्तम देवका यथोचित आश्रय लेकर मुनिराजकी पद्मासनसे पवित्र इस गुफामें श्री मुनिसुव्रत भगवान्की प्रतिमा विराजमान कर सुख-प्राप्तिके लिए अत्यन्त सुगन्धित फूलोंसे उसकी पूजा करती हुई हम दोनों कुछ समय तक यहीं रहें । इस गर्भकी सुखसे प्रसूति हो जाये चित्तमें इसी बातका ध्यान रखें और विरह-सम्बन्धी सब दुःख भूल जावें ॥२८९-२९१॥


त्वत्संगमं समासाद्य प्रमोदं परमागतः । नैर्झरैः शीकरैरेष हसतीव महीधरः ॥२९२॥

अर्थ: तुम्हारा समागम पाकर परम हर्षको प्राप्त हुआ । यह पर्वत झरनोंके जल-कणोंके बहाने मानो हँस ही रहा है ॥२९२॥


फलभारविनम्राग्रा लसत्कोमलपल्लवाः । पुष्पहासकृतो वृक्षा इमे तोषमुपागताः ॥२९३॥

अर्थ: जिनके अग्रभाग फलोंके भारसे झुक रहे हैं, जिनके कोमल पल्लव लहलहा रहे हैं और जो पुष्पोंके बहाने हँसी प्रकट कर रहे हैं ऐसे ये वृक्ष तुम्हारे समागमसे ही मानो परम सन्तोषको प्राप्त हो रहे हैं ॥२९३॥


मयूरसारिकाकीरकोकिलादिकलस्वनैः । कृतजल्पा इवैतस्य वनाभोगा महीभृतः ॥२९४॥

अर्थ: इस पर्वतके जंगली मैदान मोर, मैना, तोता तथा कोयल आदिको मधुर ध्वनिसे ऐसे जान पड़ते हैं मानो वार्तालाप ही कर रहे हों ॥२९४॥


नानाधातुकृतच्छायास्तरुसंघातवाससः । अस्मिन् गुहा विराजन्ते कुसुमामोदवासिताः ॥२९५॥

अर्थ: जिनमें गेरू आदि नाना धातुओंकी कान्ति छायी हुई है, जिनपर वृक्षोंके समूह वस्त्रके समान आवरण किये हुए हैं और जो फूलोंकी सुगन्धिसे सुवासित हैं ऐसी इस पर्वतकी गुफाएँ स्त्रियोंके समान सुशोभित हो रही हैं ॥२९५॥


जिनपूजनयोग्यानि पङ्कजानि सरस्सु हि । विद्यन्ते तव वक्त्रस्य धारयन्ति समानताम् ॥२९६॥

अर्थ: तालाबोंमें जिनेन्द्र देवकी पूजा करनेके योग्य जो कमल फूल रहे हैं वे तुम्हारे मुखकी समानता धारण करते हैं ॥२९६॥


विधत्स्व धृतिमत्रेशे माभूश्चिन्तावशात्मिका । कल्याणमत्र ते सर्वं जनयिष्यन्ति देवताः ॥२९७॥

अर्थ: हे स्वामिनि ! यहाँ धैर्य धारण करो, चिन्ताकी वशीभूत मत होओ । यहाँ देवता तुम्हारा सब प्रकारका कल्याण करेंगे ॥२९७॥


अधुना दिनवक्त्रे ते विज्ञायेवानघं वपुः । कोलाहलकृतो जाताः प्रमोदेन पतत्त्रिणः ॥२९८॥

अर्थ: अब दिनके प्रारम्भमें पक्षी चहक रहे हैं सो ऐसा जान पड़ता है कि तुम्हारे शरीरकी स्वस्थता जानकर हर्षसे मानो कोलाहल ही कर रहे हैं ॥२९८॥


पलाशाग्रस्थितानेते वृक्षा मन्दानिलेरितान् । मुञ्चन्त्यानन्दवाष्पाभानवश्यायकणान् जडान् ॥२९९॥

अर्थ: ये वृक्ष पत्तोंके अग्रभागमें स्थित तथा मन्द-मन्द वायुसे प्रेरित शीतल ओसके कणोंको छोड़ रहे हैं सो ऐसे जान पड़ते हैं मानो हर्षके आँसू ही छोड़ रहे हों ॥२९९॥


संप्रेष्य प्रथमं संध्यां दूतीमिव सरागिकाम् । उदन्तं ते परिज्ञातुमेष भानुः समुद्गतः ॥३००॥

अर्थ: तुम्हारा वृत्तान्त जाननेके लिए सर्वप्रथम दूतीके समान रागवती ( लालिमासे युक्त ) सन्ध्याको भेजकर अब पीछेसे यह सूर्य स्वयं उदित हो रहा है ॥३००॥


एवमुक्ताञ्जनावोचत्सखि मे सर्वबान्धवाः । त्वमेव त्वयि सत्यां च ममेदं विपिनं पुरम् ॥३०१॥

अर्थ: वसन्तमालाके ऐसा कहनेपर अंजनाने उत्तर दिया कि हे सखि ! मेरे समस्त बान्धव तुम्हीं हो । तेरे रहते हुए मुझे यह वन नगरके समान है ॥३०१॥


आपन्मध्योत्सवावस्थाः सेवते यस्य यो जनः । स तस्य बान्धवो बन्धुरपि शत्रुरसौख्यदः ॥३०२॥

अर्थ: जो मनुष्य जिसके आपत्तिकाल, मध्यकाल और उत्सवकाल अर्थात् सभी अवस्थाओंमें सेवा करता है वही उसका बन्धु है तथा जो दुःख देता है वह बन्धु होकर भी शत्रु है ॥३०२॥


इत्युक्त्वा देवदेवस्य विन्यस्य प्रतियातनाम् । पूजयन्त्यौ स्थिते तत्र ते विद्याकृतवर्तने ॥३०३॥

अर्थ: इतना कहकर वे दोनों गुफामें देवाधिदेव मुनि सुव्रतनाथकी प्रतिमा विराजमान कर उसकी पूजा करती हुई रहने लगीं । विद्याके बलसे उनके भोजनकी व्यवस्था होती थी ॥३०३॥


गन्धर्वोऽप्यनयोश्चक्रे सर्वतः परिरक्षणम् । आतोद्यं प्रत्यहं कुर्वन् कारुण्याज्जिनभक्तितः ॥३०४॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्की भक्तिसे प्रतिदिन संगीत करता हुआ गन्धर्वदेव भी करुणा भावसे इन दोनों स्त्रियोंकी सबसे रक्षा करता था ॥३०४॥


अथान्यदाञ्जनावोचत् कुक्षिर्मे चलितः सखि । आकुलेव च जातास्मि किमिदं नु भविष्यति ॥३०५॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन अंजना बोली कि हे सखि ! मेरी कूख चंचल हो रही है और मैं व्याकुल-सी हुई जा रही हूँ, यह क्या होगा ? ॥३०५॥


ततो वसन्तमालोचे समयः शोभने तव । अवश्यं प्रसवस्यैष प्राप्तो भव सुखस्थिता ॥३०६॥

अर्थ: तब वसन्तमालाने कहा कि हे शोभने ! अवश्य ही तेरे प्रसवका समय आ पहुँचा है इसलिए सुखसे बैठ जाओ ॥३०६॥


ततो विरचिते तल्पे तया कोमलपल्लवैः । असूत सा सुतं चार्वी प्राचीवाशा विरोचनम् ॥३०७॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्तमालाने कोमल पल्लवोंसे शय्या बनायी सो उसपर, जिस प्रकार पूर्व दिशा सूर्यको उत्पन्न करती है उसी प्रकार अंजना सुन्दरीने पुत्र उत्पन्न किया ॥३०७॥


जातेन सा गुहा तेन तेजसा गात्रजन्मना । हिरण्मयीव संजाता निर्धूतध्वान्तसंचया ॥३०८॥

अर्थ: पुत्र उत्पन्न होते ही उसके शरीर सम्बन्धी तेजसे गुफाका समस्त अन्धकार नष्ट हो गया और गुफा ऐसी हो गयी मानो सुवर्णकी ही बनी हो ॥३०८॥


ततस्तमङ्कमारोप्य प्रमोदस्यापि गोचरे । स्मृतोभयकुला दैन्यं प्राप्ता प्ररुदितामवत् ॥३०९॥

अर्थ: यद्यपि वह हर्षका समय था तो भी अंजना दोनों कुलोंका स्मरण कर दीनताको प्राप्त हो रही थी और इसीलिए वह पुत्रको गोदमें ले रोने लगी ॥३०९॥


विललाप महावत्स ! कथं ते जननोत्सवः । क्रियतां मयकैतस्मिञ्जनस्य गहने वने ॥३१०॥

अर्थ: वह विलाप करने लगी कि हे वत्स ! मनुष्यके लिए भय उत्पन्न करनेवाले इस सघन वनमें मैं तेरा जन्मोत्सव कैसे करूँ ? ॥३१०॥


स्थानेऽजनिष्यथाश्चेत्त्वं पितुर्मातामहस्य वा । अभविष्यन्महानन्दो जननोन्मत्तकारकः ॥३११॥

अर्थ: यदि तू पिता अथवा नानाके घर उत्पन्न हुआ होता तो मनुष्योंको उन्मत्त बना देनेवाला महा-आनन्द मनाया जाता ॥३११॥


मुखचन्द्रमिमं दृष्ट्वा तव चारुविलोचनम् । न भवेद्विस्मयं कस्य भुवने शुभचेतसः ॥३१२॥

अर्थ: सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित तेरे इस मुखचन्द्रको देखकर संसारमें किस सहृदय मनुष्यको आश्चर्य उत्पन्न नहीं होगा ॥३१२॥


करोमि मन्दभाग्या किं सर्ववस्तुविवर्जिता । विधिनाहं दशामेतां प्रापिता दुःखदायिनीम् ॥३१३॥

अर्थ: क्या करूँ ? मैं मन्दभागिनी सब वस्तुओंसे रहित हूँ। विधाताने मुझे यह सर्वदुःख-दायिनी अवस्था प्राप्त करायी है ॥३१३॥


जन्तुना सर्ववस्तुभ्यो वाञ्छयते दीर्घजीविता । यस्मात्त्वं जीवितात्तस्मान्मम वत्स परां स्थितिम् ॥३१४॥

अर्थ: चूँकि संसारके प्राणी सब वस्तुओंसे पहले दीर्घायुष्यकी ही इच्छा रखते हैं इसलिए हे वत्स ! मेरा आशीर्वाद है कि तू उत्कृष्ट स्थिति पर्यन्त जीवित रहे ॥३१४॥


ईदृशे पतितारण्ये सद्यः प्राणापनोदिनि । यज्जीवामि तवैवायमनुभावः सुकर्मणः ॥३१५॥

अर्थ: तत्काल प्राण हरण करनेवाले ऐसे जंगलमें पड़ी रहकर भी जो मैं जीवित हूँ यह तुम्हारे पुण्य कर्मका ही प्रभाव है ॥३१५॥


मुञ्चन्तीमिति तां वाचं जगादैवं हिता सखी । देवि कल्याणपूर्णा त्वं या प्राप्तासीदृशं सुतम् ॥३१६॥

अर्थ: इस प्रकार वचन बोलती हुई अंजनासे हितकारिणी सखीने कहा कि हे देवि ! चूँकि तुमने ऐसा पुत्र प्राप्त किया है इसलिए तुम कल्याणोंसे परिपूर्ण हो ॥३१६॥


चारुलक्षणपूर्णोऽयं दृश्यतेऽस्य शुभा तनुः । अत्यन्तमहतीमृद्धिं वहत्येषा मनोहरा ॥३१७॥

अर्थ: यह पुत्र उत्तम लक्षणोंसे युक्त दिखाई देता है। इसका यह शुभ सुन्दर शरीर अत्यधिक सम्पदाको धारण कर रहा है ॥३१७॥


षट्पदैः कृतसंगीताश्चलत्कोमलपल्लवाः । तव पुत्रोत्सवादेता नृत्यन्तीव लताङ्गनाः ॥३१८॥

अर्थ: जिनपर भ्रमर संगीत कर रहे हैं और जिनके कोमल पल्लव हिल रहे हैं ऐसी ये लताएँ तुम्हारे पुत्रके जन्मोत्सवसे मानो नृत्य ही कर रही हैं ॥३१८॥


तवास्य चानुभावेन बालस्याबालतेजसः । भविष्यत्यखिलं भद्रं मोन्मनीभूरनर्थकम् ॥३१९॥

अर्थ: उत्कट तेजको धारण करनेवाले इस बालकके प्रभावसे सब कुछ ठीक होगा। तुम व्यर्थ ही खेद-खिन्न न हो ॥३१९॥


एवं तयोः समालापे वर्तमाने नभस्तले । क्षणेनाविरभूत्तुङ्गं विमानं भास्करप्रभम् ॥३२०॥

अर्थ: इस प्रकार उन दोनों सखियोंमें वार्तालाप चल ही रहा था कि उसी क्षण आकाशमें सूर्यके समान प्रभावाला एक ऊँचा विमान प्रकट हुआ ॥३२०॥


ततो वसन्तमाला तं दृष्ट्वा देव्यै न्यवेदयद् । विप्रलापं ततो भूयः सैवमाशङ्कयाकरोत् ॥३२१॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्तमालाने वह विमान देखकर अंजनाको दिखलाया सो अंजना आशंकासे पुनः ऐसा विप्रलाप करने लगी कि ॥३२१॥


कोऽप्यकारणवैरी मे किमेषोऽपनयेत् सुतम् । उताहो बान्धवः कश्चिद्भवेदेष समागतः ॥३२२॥

अर्थ: क्या यह मेरा कोई अकारण वैरी है जो पुत्रको छीन ले जायेगा ? अथवा कोई मेरा भाई ही आया है ॥३२२॥


विप्रलापं ततः श्रुत्वा तद्विमानं चिरं स्थितम् । अवातरत्कृपायुक्तो विद्याभृद्वियदङ्गणात् ॥३२३॥

अर्थ: तदनन्तर अंजनाका उक्त विप्रलाप सुनकर वह विमान देर तक खड़ा रहा फिर कुछ देर बाद एक दयालु विद्याधर आकाशांगणसे नीचे उतरा ॥३२३॥


स्थापयित्वा गुहाद्वारि विमानं स ततोऽविशत् । पत्नीभिः सहितः शङ्कां वहमानो महानयम् ॥३२४॥

अर्थ: गुफाके द्वारपर विमान खड़ा कर वह विद्याधर भीतर घुसा । उसकी पत्नियाँ उसके साथ थीं और वह मन-ही-मन शंकित हो रहा था ॥३२४॥


वसन्तमालया दत्ते स्वागतेऽसौ सुमानसः । उपाविशत्स्वभृत्येन प्रापिते च समासने ॥३२५॥

अर्थ: वसन्तमालाने उसका स्वागत किया । तदनन्तर अपने सेवकके द्वारा दिये हुए सम आसनपर वह सहृदय विद्याधर बैठ गया ॥३२५॥


ततः क्षणमिव स्थित्वा स भारत्या गभीरया । सारङ्गानुत्सुकीकुर्वन् घनगर्जितशङ्किनः ॥३२६॥

ऊचे तां विनयं बिभ्रत्परं स्वागतदायिनीम् । दशनज्योत्स्नया कुर्वन् बालभासं विमिश्रिताम् ॥३२७॥

अर्थ: तत्पश्चात् क्षणभर ठहरकर अपनो गम्भीर वाणी-से मेघगर्जनाकी शंका करनेवाले चातकोंको उत्सुक करता हुआ बड़ी विनयसे स्वागत करनेवाली वसन्तमालासे बोला । बोलते समय वह अपने दाँतोंकी कान्तिसे बालककी कान्तिको मिश्रित कर रहा था ॥३२६-३२७॥


सुमर्यादे वदेयं का दुहिता कस्य वा शुभा । पत्नी वा कस्य कस्माद्वा महारण्यमिदं श्रिता ॥३२८॥

अर्थ: उसने कहा कि हे सुमर्यादे ! बता यह किसकी लड़की है ? किसकी शुभ-पत्नी है और किस कारण इस महावनमें आ पड़ी है ? ॥३२८॥


घटते नाकृतेरस्याः समाचारो विनिन्दितः । ततः कथमिमं प्राप्ता विरहं सर्वबन्धुभिः ॥३२९॥

अर्थ: इसकी आकृतिसे निन्दित आचार-का मेल नहीं घटित होता । फिर यह समस्त बन्धुजनोंके साथ इस विरहको कैसे प्राप्त हो गयी ? ॥३२९॥


भवन्त्येवाथवा लोके प्रायोऽकारणवैरिणः । माध्यस्थ्येऽपि निषण्णानां प्रेरिताः पूर्वकर्मभिः ॥३३०॥

अर्थ: अथवा यह संसार है इसमें माध्यस्थ्यभावसे रहनेवाले लोगोंके पूर्व कर्मोंसे प्रेरित अकारण वैरी हुआ ही करते हैं ॥३३०॥


ततो दुःखभरोद्वेलवाष्पसंरुद्धकण्ठिका । कृच्छ्रेणोवाच सा मन्दं भूतलन्यस्तवीक्षणा ॥३३१॥

अर्थ: तदनन्तर दुःखके भारसे अत्यधिक निकलते हुए वाष्पोंसे जिसका कण्ठ रुक गया था ऐसी वसन्तमाला पृथ्वीपर दृष्टि डालकर धीरे-धीरे बोली ॥३३१॥


महानुभाव वाचैव ते विशिष्टं मनः शुभम् । रोगमूलस्य हिच्छाया न स्निग्धा जायते तरोः ॥३३२॥

अर्थ: कि हे महानुभाव ! आपके वचनसे ही आपके विशिष्ट शुभ हृदयका पता चलता है क्योंकि जो वृक्ष रोगका कारण होता है उसकी छाया स्निग्ध अथवा आनन्ददायिनी नहीं होती है ॥३३२॥


भावप्रवेदनस्थानं गुणिनस्त्वादृशा यतः । निवेदयामि ते तेन शृणु जिज्ञासितं पदम् ॥३३३॥

अर्थ: चूँकि आप-जैसे गुणी मनुष्य अभिप्राय प्रकट करनेके पात्र हैं अतः आपके लिए जिसे आप जानना चाहते हैं वह कहती हूँ, सुनिए ॥३३३॥


दुःखं हि नाशमायाति सज्जनाय निवेदितम् । महतां ननु शैलीयं यदापद्गततारणम् ॥३३४॥

अर्थ: यह नीति है कि सज्जनके लिए बताया हुआ दुःख नष्ट हो जाता है क्योंकि आपत्तिमें पड़े हुएका उद्धार करना यह महापुरुषोंकी शैली है ॥३३४॥


शृण्वेषा विष्टपव्यापियशसो विमलात्मनः । सुता महेन्द्रराजस्य नामतः प्रथिताञ्जना ॥३३५॥

प्रह्लादराजपुत्रस्य गुणाकूपारचेतसः । पत्नी पवनवेगस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥३३६॥

अर्थ: सुनिए, यह लोकव्यापी यशसे युक्त, निर्मल हृदयके धारक राजा महेन्द्रकी पुत्री है, अंजना नामसे प्रसिद्ध है और जिसका चित्त गुणोंका सागर है ऐसे राजा प्रह्लादके पुत्र पवनवेगकी प्राणोंसे अधिक प्यारी पत्नी है ॥३३५-३३६॥


सोऽन्यदा स्वैरविज्ञातः कृत्वास्यां गर्भसंभवम् । शासनाज्जनकस्यागाद्रावणस्य सुहृद्युधे ॥३३७॥

अर्थ: किसी एक समय वह आत्मीयजनोंकी अनजानमें इसके गर्भ धारण कर पिताकी आज्ञासे युद्धके लिए चला गया। वह रावणका मित्र जो था ॥३३७॥


दुःस्वभावतया श्वश्र्वा ततः कारुण्यमुक्तया । मूढया जानकं गेहं प्रेषितेयं मलोज्झिता ॥३३८॥

अर्थ: यद्यपि यह अंजना निर्दोष थी तो भी स्वभावकी दुष्टताके कारण दयाशून्य मूर्ख सासने इसे पिताके घर भेज दिया ॥३३८॥


ततो नादात्पिताप्यस्याः स्थानं भीतेरकीर्तितः । अलीकादपि हि प्रायो दोषाद्बिभ्यति सज्जनाः ॥३३९॥

अर्थ: परन्तु अपकीर्तिके भयसे पिताने भी इसके लिए स्थान नहीं दिया सो ठीक ही है क्योंकि प्रायःकर सज्जन पुरुष मिथ्यादोषसे भी डरते रहते हैं ॥३३९॥


सेयमालम्बनैर्मुक्ता सकलैः कुलबालिका । मृगीसामान्यमध्यस्थान्महारण्यं समं मया ॥३४०॥

अर्थ: अन्तमें इस कुलवती बालाको जब सब सहारोंने छोड़ दिया तब यह निराश्रय हो मेरे साथ हरिणीके समान इस महावनमें रहने लगी ॥३४०॥


एतत्कुलक्रमायाता भृत्यास्म्यस्याः सुचेतसः । विश्रम्भपदतां नीता प्रसादपरयानया ॥३४१॥

अर्थ: इस सुहृदयाकी मैं कुल-परम्परासे चली आयी सेविका हूँ सो सदा प्रसन्न रहनेवाली इसने मुझे अपना विश्वासपात्र बनाया है ॥३४१॥


सेयमद्य प्रसूता नु वने नानोपसर्गके । न जानामि कथं साध्वी भविष्यति सुखाश्रया ॥३४२॥

अर्थ: इसी अंजनाने आज नाना उपसर्गोंसे भरे वनमें पुत्र उत्पन्न किया है। मैं नहीं जानती कि यह साध्वी पतिव्रता सुखका आश्रय कैसे होगी ॥३४२॥


निवेदितमिदं साधोर्वृत्तमस्याः पुलाकतः । सकलं तु न शक्नोमि कर्तुं दुःखनिवेदनम् ॥३४३॥

अर्थ: आप सत्पुरुष हैं इसलिए संक्षेपसे मैंने इसका यह वृत्तान्त कहा है। इसने जो दुःख भोगा है उसे सम्पूर्ण रूपमें कहनेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥३४३॥


अथैतदीयसंतापविलीनस्नेहपूरितात् । अमान्तीव निरैद्स्य हृदयात्साधु भारती ॥३४४॥

अर्थ: अथानन्तर उस विद्याधरके हृदयसे वाणी निकली सो ऐसी जान पड़ती थी मानो अंजनाके सन्तापसे पिघले हुए स्नेहसे उसका हृदय पूर्णरूपसे भर गया था अतः वाणीको भीतर ठहरनेके लिए स्थान ही नहीं बचा हो ॥३४४॥


स्वस्त्रीया मम साध्वि त्वं चिरकालवियोगतः । प्रायेण नाभिजानामि रूपान्तरपरिग्रहात् ॥३४५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे पतिव्रते ! तू मेरी भानजी है। चिरकालके वियोगसे प्रायः तेरा रूप बदल गया है इसलिए मैं पहचान नहीं सका हूँ ॥३४५॥


पिता विचित्रभानुर्मे माता सुन्दरमालिनी । नामतः प्रतिसूर्योऽहं द्वीपे हनूरुहाभिधे ॥३४६॥

अर्थ: मेरे पिता विचित्रभानु और माता सुन्दरमालिनी हैं। मेरा नाम प्रतिसूर्य है और हनूरुह नामक द्वीपका रहनेवाला हूँ ॥३४६॥


इत्युक्त्वा वस्तु यद्वृत्तं कौमारे सकलं स तत् । अञ्जनायै पतद्बाष्पनयनस्तमवादयत् ॥३४७॥

अर्थ: इतना कहकर जो-जो घटनाएँ कुमारकालमें हुई थीं वे सब उसने रोते-रोते अंजनासे कहलायीं ॥३४७॥


निर्ज्ञातमातुलाथासौ पूर्ववृत्तनिवेदनात् । तस्य कण्ठं समासज्य रुरोद चिरमध्वनि ॥३४८॥

अर्थ: तदनन्तर जब पूर्ववृत्तान्त कहनेसे अंजनाने मामाको पहचान लिया तब वह उसके गलेमें लगकर चिरकाल तक सिसक-सिसककर रोती रही ॥३४८॥


तस्यास्तत्सकलं दुःखं वाष्पेण सह निर्गतम् । स्वजनस्य हि संप्राप्तावेषैव जगतः स्थितिः ॥३४९॥

अर्थ: अंजनाका वह समस्त दुःख आँसुओंके साथ निकल गया सो ठीक ही है क्योंकि आत्मीयजनोंके मिलनेपर संसारकी ऐसी ही स्थिति होती है ॥३४९॥


तयोः स्नेहभरेणैवं कुर्वतोरथ रोदनम् । वसन्तमालयाप्युच्चैरुदितं पार्श्वयातया ॥३५०॥

अर्थ: इस तरह स्नेहके भारसे जब दोनों रो रहे थे तब पासमें बैठी वसन्तमाला भी जोरसे रो पड़ी ॥३५०॥


रुदत्सु तेषु कारुण्यादरुदंस्तद्योषितः । कृतरोदास्वथैतासु रुरुदू रुरुयोषितः ॥३५१॥

अर्थ: उन सबके रोनेपर विद्याधरकी स्त्रियाँ भी करुणावश रोने लगीं और इन सबको रोते देख हरिणियाँ भी रोने लगीं ॥३५१॥


गुहावदनमुक्तेन प्रतिनादेन भूयसा । पर्वतोऽपि रुरोदैवं संततैर्निर्झराश्रुभिः ॥३५२॥

अर्थ: उस समय गुफारूपी मुखसे जोरकी प्रतिध्वनि निकल रही थी इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो पर्वत भी झरनोंके बहाने बड़े-बड़े आँसू ढालता हुआ रो रहा था ॥३५२॥


ततः शब्दमयं सर्वं तद्बभूव तदा वनम् । शकुन्तैरपि कारुण्यादाकुलैः कृतनिस्वनम् ॥३५३॥

अर्थ: और पक्षी भी दयावश आकुल होकर शब्द कर रहे थे इसलिए वह सम्पूर्ण वन उस समय शब्दमय हो गया था ॥३५३॥


सान्त्वयित्वा ततस्तस्या दत्तेनोदकवाहिना । वारिणाक्षालयद्वक्त्रं स्वस्य च प्रतिमास्करः ॥३५४॥

अर्थ: तदनन्तर प्रतिसूर्य विद्याधरने सान्त्वना देनेके बाद जल लानेवाले नौकरके द्वारा दिये हुए जलसे अंजनाका और अपना मुँह धोया ॥३५४॥


पारम्पर्येण तेनैव ततस्तत्पुनरप्यभूत् । वनं मुक्तमहाशब्दं श्रोतुं वार्तामिवानयोः ॥३५५॥

अर्थ: पहले जिस क्रमसे वन शब्दायमान हो गया था उसी क्रमसे अब पुनः शब्दरहित हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो इन दोनोंकी वार्ता सुननेके लिए ही चुप हो रहा हो ॥३५५॥


ततः क्षणमिव स्थित्वा निष्क्रान्तौ दुःखगह्वरात् । अपृच्छतां मिथो वार्तां कुलेऽकथयतां च तौ ॥३५६॥

अर्थ: तदनन्तर क्षण-भर ठहरकर जब दोनों दुःखरूपी गर्तसे बाहर निकले तब उन्होंने परस्पर कुशल-वार्ता पूछी और अपने-अपने कुलका हाल एक दूसरेको बताया ॥३५६॥


संभाषणं ततश्चक्रे तत्स्त्रीणामञ्जना क्रमात् । स्खलन्ति न विधातव्ये वनेऽपि गुणिनो जनाः ॥३५७॥

अर्थ: इसके बाद अंजनाने प्रतिसूर्यकी स्त्रियोंके साथ क्रमसे सम्भाषण किया सो ठीक हो है क्योंकि गुणीजन करने योग्य कार्यमें कभी नहीं चूकते हैं ॥३५७॥


जगाद मातुलं चैवं पूज्य जातस्य मेऽखिलम् । निवेदय यथावस्थं दिनद्योतिःकदम्बकम् ॥३५८॥

अर्थ: अंजनाने मामासे कहा कि पूज्य ! मेरे पुत्रके समस्त ग्रह कैसी दशामें हैं सो बताइए ॥३५८॥


इत्युक्ते पार्श्वगं नाम्ना द्योतिर्गर्भविशारदम् । सांवत्सरमपृच्छत्स जातकर्म यथास्थितम् ॥३५९॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर मामाने ज्योतिष विद्यामें निपुण पार्श्वंग नामक ज्योतिषीसे पुत्रके यथावस्थित जातकर्मको पूछा अर्थात् पुत्रकी ग्रह-स्थिति पूछी ॥३५९॥


ततः सांवत्सरोऽवोचत्कल्याणस्य निवेदय । जन्मसंबन्धिनी वेलामित्युक्ते चाख्यदञ्जना ॥३६०॥

अर्थ: तब ज्योतिषीने कहा कि इस कल्याणस्वरूप पुत्रका जन्म-समय बताओ । ज्योतिषीके ऐसा पूछनेपर अंजनाने समय बताया ॥३६०॥


अर्धयामावशेषायां रजन्यामद्य बालकः । प्रजात इति सख्या च कथितं निष्प्रमादया ॥३६१॥

अर्थ: साथ ही प्रमादको दूर करनेवाली सखी वसन्तमालाने भी कहा कि आज रात्रिमें जब अर्धप्रहर बाकी था तब बालक उत्पन्न हुआ था ॥३६१॥


मौहूर्तेन ततोऽवाचि यथास्य वपुराचितम् । सुलक्षणैस्तथा मन्ये दारकं सिद्धिभाजनम् ॥३६२॥

अर्थ: तदनन्तर मुहूर्तके जाननेवाले ज्योतिषीने कहा कि इसका शरीर जैसा शुभलक्षणोंसे युक्त है उससे जान पड़ता है कि बालक सब प्रकारकी सिद्धियोंका भाजन होगा ॥३६२॥


तथापि यद्यसंतोषः क्रियेयं लौकिकीति वा । ततः शृणु पुलाकेन कथयाम्यस्य जीवनम् ॥३६३॥

अर्थ: फिर भी यदि सन्तोष नहीं है अथवा ऐसा ख्याल है कि यह क्रिया लौकिकी है तो सुनो मैं संक्षेपसे इसका जीवन कहता हूँ ॥३६३॥


वर्तते तिथिरद्येयं चैत्रस्य बहुलाष्टमी । नक्षत्रं श्रवणः स्वामी वासरस्य विभावसुः ॥३६४॥

अर्थ: आज यह चैत्रके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथि है, श्रवण नक्षत्र है, सूर्य दिनका स्वामी है ॥३६४॥


आदित्यो वर्तते मेषे भवनं तुङ्गमाश्रितः । चन्दमा मकरे मध्ये भवने समवस्थितः ॥३६५॥

अर्थ: सूर्य मेषका है सो उच्च स्थानमें बैठा है और चन्द्रमा मकरका है सो मध्यगृहमें स्थित है ॥३६५॥


लोहिताङ्गो वृषमध्ये मध्ये मीने विधोः सुतः । कुलीरे धिषणोऽप्युच्चैरध्यास्य भवनं स्थितः ॥३६६॥

अर्थ: मंगल वृषका है सो मध्य स्थानमें बैठा है। बुध मीनका है सो भी मध्य स्थानमें स्थित है और बृहस्पति कर्कका है सो भी अत्यन्त उच्च स्थानमें बैठा है ॥३६६॥


मीने दैत्यगुरुस्तुङ्गस्तस्मिन्नेव शनैश्चरः । मीनस्यैवोदयोऽप्यासीत्तदा नृपतिपुङ्गवे ॥३६७॥

अर्थ: शुक्र और शनि दोनों ही मीनके हैं तथा उच्च स्थानमें आरूढ़ हैं। हे राजाधिराज ! उस समय मीनका ही उदय था ॥३६७॥


शनैश्चरं समग्राक्षस्तिग्मभानुर्निरीक्षते । अर्धदृष्ट्या महीपुत्रो दिवसस्य पतिं तथा ॥३६८॥

अर्थ: सूर्य पूर्ण दृष्टिसे शनिको देखता है और मंगल सूर्यको अर्धदृष्टिसे देखता है ॥३६८॥


गुरुः पादोनया दृष्ट्या पतिमह्नोऽवलोकते । अर्धदृष्ट्या गिरामीशं वासरस्येक्षते विभुः ॥३६९॥

अर्थ: बृहस्पति पौन दृष्टिसे सूर्यको देखता है और सूर्य बृहस्पतिको अर्धदृष्टिसे देखता है ॥३६९॥

१७. सप्तदशं पर्व (हनूमत्संभवाभिधानं) (जारी)

चन्द्रं समस्तया दृष्ट्या वचसां पतिरीक्षते । असावप्येवमेवास्य विदधात्यवलोकनम् ॥३७०॥

अर्थ: बृहस्पति चन्द्रमाको पूर्ण दृष्टिसे देखता है और चन्द्रमा भी अर्धदृष्टिसे बृहस्पतिको देखता है ॥३७०॥


गुरुः शनैश्चरं पादन्यूनया वीक्षते दृशा । अर्धावलोकनेनासौ भजते बृहतां पतिम् ॥३७१॥

अर्थ: बृहस्पति शनिको पौन दृष्टिसे देखता है और शनि बृहस्पतिको अर्धदृष्टिसे देखता है ॥३७१॥


गुरुर्दैत्यगुरुं दृष्ट्वा वीक्षते पादहीनया । दृष्टिं तथाविधामेव पातयत्येष तत्र च ॥३७२॥

अर्थ: बृहस्पति शुक्रको पौन दृष्टिसे देखता है और शुक्र भी बृहस्पतिपर पौन दृष्टि डालता है ॥३७२॥


ग्रहाणां परिशिष्टानां नास्त्यपेक्षा परस्परम् । उदयक्षेत्रकालानां बलं चास्ति परं तदा ॥३७३॥

अर्थ: अवशिष्ट ग्रहोंकी पारस्परिक अपेक्षा नहीं है। उस समय इसके ग्रहोंके उदय-क्षेत्र और कालका अत्यधिक बल है ॥३७३॥


राज्यं निवेदयत्यस्य रविर्भौमो गुरुस्तथा । शनैश्चरः सुयोगित्वं निवेदयति सिद्धिदम् ॥३७४॥

अर्थ: सूर्य, मंगल और बृहस्पति इसके राज्ययोगको सूचित कर रहे हैं और शनि मुक्तिदायी योगको प्रकट कर रहा है ॥३७४॥


एकोऽपि भारतीनाथे स्तुङ्गस्थानस्थितो भवन् । सर्वकल्याणसंप्राप्तौ कारणत्वं प्रपद्यते ॥३७५॥

अर्थ: यदि एक बृहस्पति ही उच्च स्थानमें स्थित हो तो समस्त कल्याणकी प्राप्तिका कारण होता है फिर इसके तो समस्त शुभग्रह उच्च स्थानमें स्थित हैं ॥३७५॥


ब्राह्मो नाम तदा योगो मुहूर्तश्च शुभश्रुतिः । एतौ कथयतो ब्राह्मस्थानसौख्यसमागमम् ॥३७६॥

अर्थ: उस समय ब्राह्मनामक योग और शुभ नामका मुहूर्त था सो ये दोनों ही बाह्यस्थान अर्थात् मोक्ष सम्बन्धी सुखके समागमको सूचित करते हैं ॥३७६॥


एवमेतस्य जातस्य ज्योतिश्चक्रमिदं स्थितम् । सूचयत्यखिलं वस्तु सर्वदोषविवर्जितम् ॥३७७॥

अर्थ: इस प्रकार इस पुत्रका यह ज्योतिश्चक्र सर्व वस्तुको सर्व दोषोंसे रहित सूचित करता है ॥३७७॥


रैशतानां सहस्रेण कालज्ञं पूजितं ततः । प्रतिसूर्यो विधायोचे भागिनेयीं ससंमदः ॥३७८॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने हजार मुद्रा द्वारा ज्योतिषी- का सम्मान कर हर्षित हो अंजनासे कहा कि ॥३७८॥


एहीदानीं पुरं यामो वत्से हनूरुहं मम । जातकर्मास्य बालस्य तत्र सर्वं भविष्यति ॥३७९॥

अर्थ: आओ बेटी ! अब हम लोग हनूरुह नगर चलें। वहीं इस बालकका सब जन्मोत्सव होगा ॥३७९॥


एवमुक्ता विधायाङ्के पृथुकं जिनवन्दनाम् । कृत्वा स्थानपतिं देवं क्षमयित्वा पुनः पुनः ॥३८०॥

निष्क्रान्ता सा गुहावासात् स्वजनौघसमन्विता । वनश्रीरिव जाता च विमानस्यान्तिकं स्थिता ॥३८१॥

अर्थ: मामाके ऐसा कहनेपर अंजना पुत्रको गोदमें लेकर जिनेन्द्र देवकी वन्दना कर और गुहाके स्वामी गन्धर्वदेवसे बार-बार क्षमा कराकर आत्मीयजनोंके साथ गुहासे बाहर निकली । विमानके पास खड़ी अंजना वनलक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ॥३८०-३८१॥


ततस्तत्किङ्किणीजालैः प्रक्वणत्पवनेरितैः । सनिर्झरमिवोदारैर्मुक्ताहारैः सुनिर्मलैः ॥३८२॥

ललल्लम्बूषकं काचकदलीवनराजितम् । दिवाकरकरस्पर्शस्फुरत्कनकबुद्बुदम् ॥३८३॥

नानारत्नकरासङ्गजातानेकसुरायुधम् । वैजयन्तीशतैर्नानावर्णैः कल्पतरूपमम् ॥३८४॥

चित्ररत्नविनिर्माणं नानारत्नसमाचितम् । दिव्यं परिवृतं स्वर्गलोकेनेव समन्ततः ॥३८५॥

दृष्ट्वासौ पृथुको मातुरङ्कात् कौतुकसस्मितः । उत्पत्य प्रविविक्षुः सन्नपप्तद्गिरिगह्वरे ॥३८६॥

अर्थ: तदनन्तर जो वायुसे प्रेरित क्षुद्रघण्टिकाओंके समूहसे शब्दायमान था, जो लटकते हुए अतिशय निर्मल मोतियोंके उत्तम हारोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो झरनोंसे सहित ही हो, जिसमें गोले फानूस लटक रहे थे, जो काचनिर्मित केलोंके वनोंसे सुशोभित था, जिसमें लगे हुए सुवर्णके गोले सूर्यकी किरणोंका सम्पर्क पाकर चमक रहे थे, नाना रत्नोंकी किरणोंके संगमसे जिसमें इन्द्रधनुष उठ रहा था, रंग-बिरंगी सैकड़ों पताकाओंसे जो कल्पवृक्षके समान जान पड़ता था, चित्र-विचित्र रत्नोंसे जिसकी रचना हुई थी, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे खचित था, दिव्य था और ऐसा जान पड़ता था मानो सब ओरसे स्वर्गलोकसे घिरा हुआ ही हो ऐसे विमानको देखकर कौतुकसे मुसकराता हुआ बालक उछलकर स्वयं प्रवेश करनेकी इच्छा करता मानो माताकी गोदसे छूटकर पर्वतकी गुफामें जा पड़ा ॥३८२-३८६


हाहाकारं ततः कृत्वा लोकस्तस्य समातृकः । स गतोऽनुपदं ज्ञातुमुदन्तमिति विह्वलः ॥३८७॥

अर्थ: तदनन्तर माता अंजनाके साथ-साथ सब लोग हाहाकार कर उस बालकका समाचार जाननेके लिए शीघ्र ही विह्वल होते हुए वहाँ गये ॥३८७॥


चकार विप्रलापं च सुदीनमिममञ्जना । तिरश्चामपि कुर्वाणा करुणाकोमलं मनः ॥३८८॥

अर्थ: अंजनाने दीनतासे ऐसा विलाप किया कि जिसे सुनकर तिर्यंचोंके भी मन करुणासे कोमल हो गये ॥३८८॥


हा पुत्र किमिदं वृत्तं दैवेन किमनुष्ठितम् । प्रदर्श्य रत्नसंपूर्णं निधानं हरता पुनः ॥३८९॥

अर्थ: वह कह रही थी कि हाय पुत्र ! यह क्या हुआ ? रत्नोंसे परिपूर्ण खजाना दिखाकर फिर उसे हरते हुए विधाताने यह क्या किया ? ॥३८९॥


पत्यसङ्गमदुःखेन ग्रस्ताया मे भवानभूत् । जीवितालम्बनं छिन्नं कथं तदपि कर्मणा ॥३९०॥

अर्थ: पतिके वियोग दुःखसे ग्रसित जो मैं हूँ सो मेरे जीवनका अवलम्बन एक तू ही था पर दैवने उसे भी छीन लिया ॥३९०॥


ततः सहस्रशः खण्डैर्नीतायां सुमहास्वनम् । शिलायां पातवेगेन ददृशैवं सुखस्थितम् ॥३९१॥

अर्थ: तदनन्तर सब लोगोंने देखा कि पतन सम्बन्धी वेगसे हजार टुकड़े हो जानेके कारण जो महाशब्द कर रही थी ऐसी शिलापर बालक सुखसे पड़ा है ॥३९१॥


अन्तरास्यकृताङ्गुष्ठं क्रीडन्तं स्मितशोभितम् । उत्तानं प्रचलत्पाणिचरणं शुभविग्रहम् ॥३९२॥

मन्दमारुतसंपृक्तरक्तोत्पलवनप्रभम् । कुर्वाणं सकलं पिङ्गं तेजसा गिरिगह्वरम् ॥३९३॥

अर्थ: वह मुखके भीतर अँगूठा देकर खेल रहा है, मन्द मुसकानसे सुशोभित है, चित्त पड़ा है, हाथ पैर हिला रहा है, शुभ शरीरका धारक है, मन्द-मन्द वायुसे हिलते हुए लाल तथा नीले कमलवनके समान उसकी कान्ति है, और अपने तेजसे पर्वतकी समस्त गुफाको पीत वर्ण कर रहा है ॥३९२-३९३॥


ततोऽनघशरीरं तं जननी पृथुविस्मया । गृहीत्वा शिरसि घ्रात्वा चक्रे वक्षःस्थलस्थितम् ॥३९४॥

अर्थ: तदनन्तर निर्दोष शरीरके धारक बालकको आश्चर्यसे भरी माताने उठाकर तथा शिरपर सूँघकर छातीसे लगा लिया ॥३९४॥


प्रतिसूर्यस्ततोऽवोचदहो चित्रमिदं परम् । वज्रेणेव यदेतेन शिलाजातं विचूर्णितम् ॥३९५॥

अर्थ: राजा प्रतिसूर्यने कहा कि अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है कि बालकने वज्रकी तरह शिलाओंका समूह चूर्ण कर दिया ॥३९५॥


अर्भकस्य सतोऽप्येषा शक्तिः सुरवरातिगा । यौवनस्थस्य किं वाच्यं चरमेयं ध्रुवं तनुः ॥३९६॥

अर्थ: जब बालक होनेपर भी इसकी यह देवातिशायिनी शक्ति है तब तरुण होनेपर तो कहना ही क्या है ? निश्चित ही इसका यह शरीर अन्तिम शरीर है ॥३९६॥


इति ज्ञात्वा परीत्य त्रिः शिरःपाणिसरोरुहः । सहाङ्गनासमूहेन चकारास्या नमस्कृतिम् ॥३९७॥

अर्थ: ऐसा जानकर उसने, हस्त-कमल शिरसे लगा, तथा तीन प्रदक्षिणाएँ देकर अपनी स्त्रियोंके साथ बालकके उस चरम शरीरको नमस्कार किया ॥३९७॥


असौ तस्य वरस्त्रीभिर्नेत्रभामिः कृतस्मितम् । सितासितारुणाम्भोजमालाभिरिव पूजितम् ॥३९८॥

अर्थ: प्रतिसूर्यकी स्त्रियोंने अपने सफेद, काले तथा लाल नेत्रोंकी कान्तिसे उसे हँसते हुए देखा सो ऐसा जान पड़ता था मानो उन्होंने सफेद, नीले और लाल कमलोंकी मालाओंसे उसकी पूजा ही की हो ॥३९८॥


सपुत्रां यानमारोप्य भागिनेयीं ततोऽगमत् । प्रतिसूर्यो निजं स्थानं ध्वजतोरणभूषितम् ॥३९९॥

अर्थ: तदनन्तर प्रतिसूर्य पुत्रसहित अंजनाको विमानमें बैठाकर ध्वजाओं और तोरणोंसे सुशोभित अपने नगरकी ओर चला ॥३९९॥


ततः प्रत्युद्गतः पौरैर्नानामङ्गलधारिभिः । स विवेश पुरं तूर्यनादव्याप्तनमस्तलम् ॥४००॥

अर्थ: तत्पश्चात् नाना मंगलद्रव्योंको धारण करनेवाले नगरवासी लोगोंने जिसकी अगवानी की थी ऐसे राजा प्रतिसूर्यने नगरमें प्रवेश किया । उस समय नगरका आकाश तुरही आदि वादित्रोंके शब्दसे व्याप्त हो रहा था ॥४००॥


तत्र जन्मोत्सवस्तस्य महान् विद्याधरैः कृतः । आखण्डलसमुत्पत्तौ गीर्वाणैस्त्रिदशैर्यथा ॥४०१॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्रका जन्म होनेपर स्वर्गमें देव लोग महान् उत्सव करते हैं उसी प्रकार हनूरुह नगरमें विद्याधरोंने उस बालकका बहुत भारी जन्मोत्सव किया ॥४०१॥


जन्म लेभे यतः शैले शैलं चाचूर्णयत्ततः । श्रीशैल इति नामास्य चक्रे मात्रा ससूर्यया ॥४०२॥

अर्थ: चूँकि बालकने शैल अर्थात् पर्वतमें जन्म प्राप्त किया था और उसके बाद शैल अर्थात् शिलाओंके समूहको चूर्ण किया था इसलिए माताने मामाके साथ मिलकर उसका ‘श्रीशैल’ नाम रखा था ॥४०२॥


पुरे हनूरुहे यस्माज्जातः संस्कारमाप्तवान् । हनूमानिति तेनागात्प्रसिद्धिं स महीतले ॥४०३॥

अर्थ: चूँकि उस बालकने हनूरुह नगरमें जन्म संस्कार प्राप्त किये थे इसलिए वह पृथिवीतलपर ‘हनूमान्’ इस नामसे भी प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥४०३॥


सर्वलोकमनोनेत्रमहोत्सववपुःक्रियः । तस्मिन् सुरकुमाराभः पुरे रेमे सुकान्तिमान् ॥४०४॥

अर्थ: जिसके शरीरकी क्रियाएँ समस्त मनुष्योंके मन और नेत्रोंको महोत्सव उत्पन्न करनेवाली थीं, तथा जिसकी आभा देवकुमारके समान थी ऐसा वह उत्तम कान्तिका धारी बालक उस नगरमें क्रीड़ा करता था ॥४०४॥


संभवतीह भूधररिपुः पविरपि कुसुमं वह्निरपीन्दुवादशिशिरं पृथु कमलवनम् । खड्गलतापि चारुवनितासुमृदुभुजलता प्राणिषु पूर्वजन्मजनितात्सुचरितबलतः ॥४०५॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! पूर्व जन्ममें संचित पुण्य कर्मके बलसे प्राणियोंके लिए पर्वतोंको चूर्ण करनेवाला वज्र भी फूलके समान कोमल हो जाता है । अग्नि भी चन्द्रमाकी किरणोंके समान शीतल विशाल कमलवन हो जाती है, और खड्गरूपी लता भी सुन्दर स्त्रियोंकी सुकोमल भुजलता बन जाती है ॥४०५॥


इत्यवगम्य दुःखकुशलाद्विरमत दुरितात् सजत सारशर्मचतुरे जिनवरचरिते ।
एष तपत्यहो परिदृढं जगदनवरतं व्याधिसहस्ररश्मिनिकरो ननु जननरविः ॥४०६॥

अर्थ: ऐसा जानकर दुःख देनेमें निपुण जो पापकर्म है उससे विरत होओ और श्रेष्ठ सुख देनेमें चतुर जो जिनेन्द्रदेवका चरित है उसमें लीन होओ । अहो! हजारों रोगरूपी किरणोंसे युक्त यह जन्मरूपी सूर्य समस्त संसारको निरन्तर बड़ी दृढ़ताके साथ सन्तप्त कर रहा है ॥४०६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते हनूमत्संभवाभिधानं नाम सप्तदशं पर्व ॥१७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें हनूमान्‌के जन्मका वर्णन करनेवाला सत्रहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१७॥


१८. अष्टादशं पर्व (पवनाञ्जनासमागमाभिधानं)

इदं ते कथितं जन्म श्रीशैलस्य महात्मनः । शृणु संप्रति वृत्तान्तं वायोर्मगधमण्डन ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगध देशके मण्डनस्वरूप श्रेणिक ! यह तो मैंने तुम्हारे लिए महात्मा श्रीशैलके जन्मका वृत्तान्त कहा। अब पवनंजयका वृत्तान्त सुनो ॥१॥


वायुना वायुनेवाशु गत्वाभ्याशं खगेशिनः । लब्धादेशेन संयुध्य नानाशस्त्राकुले रणे ॥२॥

अर्थ: पवनंजय वायुके समान शीघ्र ही रावणके पास गया और उसकी आज्ञा पाकर नाना-शस्त्रोंसे व्याप्त युद्ध-क्षेत्रमें वरुणके साथ युद्ध करने लगा ॥२॥


कृतयुद्धश्चिरं खिन्नो जलकान्तोऽपवर्तितः । जातस्तस्य निमानोऽसौ पुष्कलः खरदूषणः ॥३॥

मूयश्च जलकान्तेन निनाय खरदूषणः । कृत्वा सन्धिमहं प्राप्य परमं राक्षसाधिपात् ॥४॥

अर्थ: चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद वरुण खेद-खिन्न हो गया सो पवनंजयने उसे पकड़ लिया। खर-दूषणको वरुणने पहले पकड़ रखा था सो उसे छुड़ाया और वरुणको रावणके समीप ले जाकर तथा सन्धि कराकर उसका आज्ञाकारी किया। रावणने पवनंजयका बड़ा सम्मान किया ॥३-४॥


अनुज्ञातोऽवहत् कान्तां हृदयेन त्वरान्वितः । जगामाभिजनं स्थानं महासामन्तमध्यगः ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर रावणकी आज्ञा लेकर हृदयमें कान्ताको धारण करता हुआ पवनंजय महासामन्तोंके साथ शीघ्र ही अपने नगरमें वापस आ गया ॥५॥


प्रविष्टश्च पुरं पौरैरमियातः सुमङ्गलैः । ध्वजतोरणमालाभिर्मासुराभिर्विभूषितम् ॥६॥

अर्थ: उत्तमोत्तम मंगल द्रव्योंको धारण करनेवाले नगरवासी जनोंने जिसकी अगवानी की थी ऐसा पवनंजय देदीप्यमान ध्वजाओं, तोरणों तथा मालाओंसे अलंकृत नगरमें प्रविष्ट हुआ ॥६॥


जगाम च निजं वेश्म दृष्टो वातायनस्थितैः । मुक्तप्रस्तुतकर्तव्यैः पौरनारीकदम्बकैः ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर अपना प्रारम्भ किया हुआ कर्म छोड़ झरोखोंमें आकर खड़ी हुई नगरवासिनी स्त्रियोंके समूह जिसे बड़े हर्षसे देख रहे थे ऐसा पवनंजय अपने महलकी ओर चला ॥७॥


विवेश च कृतार्घादिसंमानो मानिनां वरः । वाग्भिर्मङ्गलसाराभिः स्वजनैरभिनन्दितः ॥८॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसका अर्घ आदिके द्वारा सम्मान किया गया था और आत्मीयजनोंने मंगलमय वचनोंसे जिसका अभिनन्दन किया था ऐसे पवनंजयने महलमें प्रवेश किया ॥८॥


विधाय प्रणतिं तत्र गुरूणामितरैर्जनैः । नमस्कृतः क्षणं तस्थौ वार्ताभिर्वरमण्डपे ॥९॥

अर्थ: वहाँ जाकर इसने गुरुजनोंको नमस्कार किया और अन्य जनोंने इसे नमस्कार किया। फिर कुशलवार्ता करता हुआ क्षणभरके लिए सभामण्डपमें बैठा ॥९॥


ततः प्रासादमारुक्षदञ्जनायाः समुन्मनाः । युक्तः प्रहसितेनैव पूर्वभावनयान्वितः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर उत्कण्ठित होता हुआ अंजनाके महलमें चढ़ा। उस समय वह पहलेकी भावनासे युक्त था और अकेला प्रहसित मित्र ही उसके साथ था ॥१०॥


रिक्तकं तस्य तं दृष्ट्वा प्रासादं प्राणतुल्यया । चेतनामुक्तदेहामं पपातेव मनः क्षणात् ॥११॥

अर्थ: वहाँ जाकर जब उसने महलको प्राण-वल्लभासे रहित देखा तो उसका मन् क्षण एकमें ही निर्जीव शरीरकी तरह नीचे गिर गया ॥११॥


ऊचे प्रहसितं चैव वयस्य किमिदं भवेत् । अञ्जनासुन्दरी नात्र दृश्यते पुष्करेक्षणा ॥१२॥

अर्थ: उसने प्रहसितसे कहा कि मित्र ! यह क्या है ? यहाँ कमल-नयना अंजना सुन्दरी नहीं दिख रही है ॥१२॥


गृहमेतत्तया शून्यं वनं मे प्रतिभासते । आकाशमेव वा क्षिप्रं तस्या वार्ताधिगम्यताम् ॥१३॥

अर्थ: उसके बिना यह घर मुझे वन अथवा आकाशके समान जान पड़ता है । अतः शीघ्र ही उसका समाचार मालूम किया जाये ॥१३॥


आप्तवर्गात् परिज्ञाय वार्तां प्रहसितोऽवदत् । यथावत् सकलां तस्मै हृदये क्षोदकारिणीम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर आप्तवर्गसे सब समाचार जानकर प्रहसित-ने हृदयको क्षुभित करनेवाला सब समाचार ज्योंका त्यों पवनंजयको सुना दिया ॥१४॥


वञ्चित्वा स्वजनं सोऽथ समं मित्रेण तत्क्षणम् । महेन्द्रनगरं तेन प्रवृत्तो गन्तुमुन्मनाः ॥१५॥

अर्थ: उसे सुन, पवनंजय आत्मीयजनोंको छोड़ उसी क्षण मित्रके साथ उत्कण्ठित होता हुआ महेन्द्रनगर जानेके लिए उद्यत हुआ ॥१५॥


तस्यासन्नभुवं प्राप्य मित्रमेवमभाषत । मन्यमानोऽङ्कसंप्राप्तां दयितां प्रमदान्वितः ॥१६॥

पश्य पश्य पुरस्यास्य वयस्य रमणीयताम् । अञ्जनासुन्दरी यत्र वर्तते चारुविभ्रमा ॥१७॥

अर्थ: महेन्द्रनगरके निकट पहुँचकर पवनंजय, प्रियाको गोदमें आयी समझ हर्षित होता हुआ मित्रसे बोला कि हे मित्र ! देखो, इस नगरकी सुन्दरता देखो जहाँ सुन्दर विभ्रमोंको धारण करनेवाली प्रिया विद्यमान है ॥१६-१७॥


कैलासकूटसंकाशा यत्र प्रासादपङ्क्तयः । उद्यानपादपैर्गुप्ताः प्रावृषेण्यघनप्रभैः ॥१८॥

अर्थ: और जहाँ वर्षाऋतुके मेघोंके समान कान्तिके धारक उद्यानके वृक्षोंसे घिरी महलोंकी पंक्तियाँ कैलास पर्वतके शिखरोंके समान जान पड़ती हैं ॥१८॥


ब्रुवन्नेवं स संप्राप्तः पुरं पुरुषसत्तमः । सुहृदाद्वैतचित्तेन विहितप्रतिभाषणः ॥१९॥

अर्थ: इस प्रकार कहता और अभिन्न चित्तके धारक मित्रके साथ वार्तालाप करता हुआ वह महेन्द्रनगरमें पहुँचा ॥१९॥


ततो जनौघतः श्रुत्वा संप्राप्तं पवनजयम् । । अर्घादिनोपचारेण श्वसुरोऽस्य समागमत् ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर लोगोंके समूहसे पवनंजयको आया सुन इसका श्वसुर अर्घादिकी भेंट लेकर आया ॥२०॥


पुरस्सरेण तेनासौ प्रीतियुक्तेन चेतसा । निजं प्रवेशितः स्थानं पौरैः सादरमीक्षितः ॥२१॥

अर्थ: आगे चलते हुए श्वसुरने प्रेमपूर्ण मनसे उसे अपने स्थानमें प्रविष्ट किया और नगर-वासी लोगोंनें उसे बड़े आदरसे देखा ॥२१॥


विवेश भवनं चास्य कान्तादर्शनलालसः । संकथामिर्मुहूर्तं च तस्थौ संवर्गणं भजन् ॥२२॥

अर्थ: प्रियाके दर्शनकी लालसासे इसने श्वसुरके घरमें प्रवेश किया । वहाँ यह परस्पर वार्तालाप करता हुआ मुहूर्त-भर बैठा ॥२२॥


ततस्तत्राप्यसौ कान्तामपश्यद्विरहातुरः । अपृच्छद् बालिकां कांचिदन्तर्भवनगोचराम् ॥२३॥

अपि बालेऽत्र जानासि मत्प्रिया वर्ततेऽञ्जना । सावोचदेव नास्त्यत्र त्वत्प्रियेत्यसुखावहम् ॥२४॥

अर्थ: परन्तु वहाँ भी जब इसने कान्ताको नहीं देखा तब विरहसे आतुर होकर इसने महलके भीतर रहनेवाली किसी बालिकासे पूछा कि हे बाले ! क्या तू जानती है कि यहाँ मेरी प्रिया अंजना है ? बालिकाने यही दुःखदायी उत्तर दिया कि यहाँ तुम्हारी प्रिया नहीं है ॥२३-२४॥


वज्रेणेव ततस्तस्य तेन वाक्येन चूर्णितम् । हृदयं पूरितौ कर्णौ तप्तक्षाराम्बुनेव च ॥२५॥

वियुक्त इव जीवेन क्षणं चाभूत् स निश्चलः । शोकप्रालेयसंपर्कविच्छायमुखपङ्कजः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर इस उत्तरसे पवनंजयका हृदय मानो वज्रसे ही चूर्ण हो गया, कान तपाये हुए खारे पानीसे मानो भर गये और वह स्वयं निर्जीव-की भाँति निश्चल रह गया । शोकरूपी तुषारके सम्पर्कसे उसका मुखकमल कान्तिरहित हो गया ॥२५-२६॥


निर्गत्यासौ ततस्तस्माच्छद्मना श्वासुरात् पुरात् । बभ्राम धरणीं वार्तामधिगन्तुं स्वयोषितः ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर वह किसी छलसे श्वसुरके नगरसे निकलकर अपनी प्रियाका समाचार जाननेके लिए पृथिवीमें भ्रमण करने लगा ॥२७॥


ज्ञात्वा वायुकुमारं च वायुनेवातुरीकृतम् । ऊचे प्रहसितः सान्त्वं तद्दुःखादमिदुःखितः ॥२८॥

किं वयस्य विषण्णोऽसि कुरु चित्तमनाकुलम् । द्रक्ष्यते दयिता द्राक्ते कियद्वेदं महीतलम् ॥२९॥

अर्थ: इधर जब प्रहसित मित्रको मालूम हुआ कि पवनंजय मानो वायुकी बीमारीसे ही दुःखी हो रहा है तब उसके दुःखसे अत्यन्त दुःखी होते हुए उसने सान्त्वनाके साथ कहा कि हे मित्र ! खिन्न क्यों होते हो ? चित्तको निराकुल करो । तुम्हें शीघ्र ही प्रिया दिखलाई देगी, अथवा यह पृथिवी है ही कितनी-सी ? ॥२८-२९॥


सोऽवोचद् गच्छ गच्छ त्वं सखे रविपुरं द्रुतम् । इदं ज्ञापय वृत्तान्तं गुरूणां मदनुष्ठितम् ॥३०॥

अर्थ: पवनंजयने कहा कि हे मित्र ! तुम शीघ्र ही सूर्यपुर जाओ और वहाँ गुरुजनोंको मेरा यह समाचार बतला दो ॥३०॥


अहं पुनरसंप्राप्य दयितां क्षितिसुन्दरीम् । न मन्ये जीवितं तस्मात्पर्यटाम्यखिलां भुवम् ॥३१॥

अर्थ: मैं पृथिवीकी अनन्य सुन्दरी प्रियाको प्राप्त किये बिना अपना जीवन नहीं मानता इसलिए उसे खोजनेके लिए समस्त पृथिवीमें भ्रमण करूँगा ॥३१॥


इत्युक्तस्तेन दुःखेन विमुच्य कथमप्यमुम् । आदित्यनगरीं दीनः क्षिप्रं प्रहसितो ययौ ॥३२॥

अर्थ: यह कहनेपर प्रहसित बड़े दुःखसे किसी तरह पवनंजयको छोड़कर दीन होता हुआ सूर्यपुरकी ओर गया ॥३२॥


पवनोऽपि समारुह्य नागमम्बरगोचरम् । विचरन् धरणीं सर्वामेवं चिन्तामुपागतः ॥३३॥

शोकातपपरिम्लानपद्मकोमलविग्रहा । क्व गता मे भवेत् कान्ता वहन्ती हृदयेन माम् ॥३४॥

अर्थ: इधर पवनंजय भी अम्बरगोचर हाथीपर सवार होकर समस्त पृथिवीमें विचरण करता हुआ ऐसा विचार करने लगा कि जिसका कमलके समान कोमल शरीर शोकरूपी आतापसे मुरझा गया होगा ऐसी मेरी प्रिया हृदयसे मुझे धारण करती हुई कहाँ गयी होगी ? ॥३३-३४॥


वैधुर्यारण्यमध्यस्था विरहानलदीपिता । वराकी कांदिशीकासौ दिशं स्यात् कामुपाश्रिता ॥३५॥

अर्थ: जो विधुरतारूपी अटवीके मध्यमें स्थित थी, विरहाग्निसे जल रही थी और निरन्तर भयभीत रहती थी ऐसी वह बेचारी किस दिशामें गयी होगी ? ॥३५॥


सत्यार्जवसमेतासौ गर्भगौरवधारिणी । वसन्तमालया त्यक्ता भवेत् किन्नु महावने ॥३६॥

अर्थ: वह सती थी, सरलतासे सहित थी तथा गर्भका भार धारण करनेवाली थी । ऐसा न हुआ हो कि वसन्तमालाने उसे महावनमें अकेली छोड़ दी हो ॥३६॥


शोकान्धनयना किं नु व्रजन्ती विषमे पथि । पतिता स्याजरत्कूपे क्षुधिताजगरान्विते ॥३७॥

अर्थ: जिसके नेत्र शोकसे अन्धे हो रहे होंगे ऐसी वह प्रिया विषम मार्गमें जाती हुई कदाचित् किसी पुराने कुएँमें गिर गयी हो अथवा किसी भूखे अजगरके मुँहमें जा पड़ी हो ॥३७॥


किं नु गर्भपरिक्लिष्टा श्वापदानां च भीषणम् । श्रुत्वा शब्दं परित्रस्ता प्राणान्मुक्तवती भवेत् ॥३८॥

अर्थ: अथवा गर्भके भारसे क्लेशित तो थी ही जंगली जानवरोंका भयंकर शब्द सुन भयभीत हो उसने प्राण छोड़ दिये हों ॥३८॥


अहो तृष्णार्दिता शुष्कतालुकण्ठा जलोज्झिते । विन्ध्यारण्ये विमुक्ता स्यात् प्राणैः प्राणसमा मम ॥३९॥

अर्थ: अथवा विन्ध्याचलके निर्जल वनमें प्याससे पीड़ित होनेके कारण जिसके तालु और कण्ठ सूख रहे होंगे ऐसी मेरी प्राणतुल्य प्रिया प्राणरहित हो गयी होगी ॥३९॥


किं वा मन्दाकिनीं मुग्धा विविधग्राहसंकुलाम् । अवतीर्णा भवेद् व्यूढा वारिणा तीव्ररंहसा ॥४०॥

अर्थ: अथवा वह बड़ी भोली थी कदाचित् अनेक मगरमच्छोंसे भरी गंगामें उतरी हो और तीव्र वेगवाला पानी उसे बहा ले गया हो ॥४०॥


दर्भसूचीविनिर्भिन्नचरणस्रुतशोणिता । अशक्ता पदमप्येकं गन्तुं किं नु मृता भवेत् ॥४१॥

अर्थ: अथवा डाभकी अनियोंसे विदीर्ण हुए जिसके पैरोंसे रुधिर बह रहा होगा ऐसी प्रिया एक डग भी चलनेके लिए असमर्थ हो मर गयी होगी ॥४१॥


किं वा दुष्टेन केनापि नीता स्यात् खविचारिणा । कष्टं वार्तापि नो तस्याः केनचिन्मे निवेद्यते ॥४२॥

अर्थ: अथवा कोई आकाशगामी दुष्ट विद्याधर हर ले गया हो । बड़े खेदकी बात है कि कोई मेरे लिए उसका समाचार भी नहीं बतलाता ॥४२॥


किं वा दुःखाच्च्युते गर्भे निर्वेदं परमागता । आर्यिकाणां पदं प्राप्ता भवेद्धर्मानुसेविनी ॥४३॥

अर्थ: अथवा दुःखके कारण गर्भ-भ्रष्ट हो आर्यिकाओंके स्थानमें चली गयी हो ? धर्मानुगामिनी तो वह थी ही ॥४३॥


चिन्तयन्निति पर्यट्य धरणीं मतिविह्वलः । ददर्श न यदा कान्तां सर्वेन्द्रियमनोहराम् ॥४४॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते हुए बुद्धि-विह्वल पवनंजयने पृथिवीमें विहारकर जब समस्त इन्द्रियों और मनको हरनेवाली प्रियाको नहीं देखा ॥४४॥


तदापश्यज्जगत्कृत्स्नं शून्यं विरहदीपितः । विनिश्चितमसौ चेतश्चकार मरणं प्रति ॥४५॥

अर्थ: तब विरहसे जलते हुए उसने समस्त संसारको सूना देख चित्तमें मरनेका दृढ़ निश्चय किया ॥४५॥


न शैलेषु न वृक्षेषु न रम्यासु नदीष्वभूत् । धृतिरस्य वियुक्तस्य तया सर्वस्वभूतया ॥४६॥

अर्थ: अंजना ही पवनंजयकी सर्वस्वभूत थी अतः उसके बिना उसे न पर्वतोंमें आनन्द आता था, न वृक्षोंमें और न मनोहर नदियोंमें ही ॥४६॥


तस्या वार्तासु मुग्धेन तेन पृष्टा नगा अपि । विवेकेन हि निर्मुक्ता जायन्ते दुःखिनो जनाः ॥४७॥

अर्थ: योंही पवनंजयने उसका समाचार जानने-के लिए वृक्षोंसे भी पूछा सो ठीक ही है क्योंकि दुःखीजन विवेकसे रहित हो ही जाते हैं ॥४७॥


अथ भूतरवाभिख्यं वनं प्राप्य गजादसौ । अवतीर्य क्षणं स्थित्वा ध्यायन्मुनिरिव प्रियाम् ॥४८॥

अर्थ: अथानन्तर भूतरव नामक वनमें जाकर वह हाथीसे उतरा और प्रियाका ध्यान करता हुआ क्षण-भरके लिए मुनिके समान स्थिर बैठ गया ॥४८॥


अनादरेण निक्षिप्य धरण्यामस्त्रकङ्कटम् । घनपादपशाखाग्रतिरोहितमहातपः ॥४९॥

अर्थ: सघन वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभाग उसपर पड़ते हुए घामको रोके हुए थे । वहाँ उसने शस्त्र तथा कवच उतारकर अनादरसे पृथिवीपर फेंक दिये ॥४९॥


जगाद गजनाथं तं विनयेन पुरःस्थितम् । गिरा मधुरयात्यर्थं श्रमेण गुरुणान्वितः ॥५०॥

अर्थ: अम्बरगोचर नामका हाथी बड़ी विनयसे उसके सामने बैठा था और पवनंजय अत्यधिक थकावटसे युक्त थे । उन्होंने अत्यन्त मधुर वाणीमें हाथीसे कहा कि ॥५०॥


व्रजेदानीं गजेन्द्र त्वं भव स्वच्छन्दविभ्रमः । तस्या वार्तासु मुग्धेन क्षमस्व च पराभवम् ॥५१॥

अर्थ: हे गजराज ! अब तुम जाओ, जहाँ तुम्हारी इच्छा चाहे भ्रमण करो, अंजनाका समाचार जाननेके लिए मोहसे युक्त होकर मैंने तुम्हारा जो पराभव किया है उसे क्षमा करो ॥५१॥


तीरेऽस्याः सरितः शष्पं शल्लकीनां च पल्लवान् । चरन् विहर यूथेन करिणीनां समन्वितः ॥५२॥

अर्थ: इस नदीके किनारे हरी-हरी घास और शल्लके वृक्षके पल्लवोंको खाते हुए तुम हस्तिनियोंके झुण्डके साथ यथेच्छ भ्रमण करो ॥५२॥


इत्युक्तः सुकृतज्ञोऽसौ स्वामिवात्सल्यदक्षिणः । न मुमोचान्तिकं तस्य शोकार्तस्य सुबन्धुवत् ॥५३॥

अर्थ: पवनंजयने हाथीसे यह सब कहा अवश्य पर वह किये हुए उपकारको जाननेवाला था और स्वामीके साथ स्नेह करनेमें उदार था इसलिए उसने उत्तम बन्धुकी तरह शोकपीड़ित स्वामी-का समीप्य नहीं छोड़ा ॥५३॥


लप्स्ये यदि न तां रामामभिराममहं ततः । यास्याम्यत्र वने मृत्युमिति वायुर्विनिश्चितः ॥५४॥

अर्थ: पवनंजयने यह निश्चय कर लिया था कि यदि मैं उस मनोहारिणी प्रियाको नहीं पाऊँगा तो इस वनमें मर जाऊँगा ॥५४॥


प्रियागतमनस्कस्य तस्य रात्रिरभूद्वने । शरच्चतुष्टयोदारा नानासंकल्पसंकुला ॥५५॥

अर्थ: जिसका मन प्रियामें लग रहा था ऐसे पवनंजयकी नाना संकल्पोंसे युक्त एक रात्रि वनमें चार वर्षसे भी अधिक बड़ी मालूम हुई थी ॥५५॥


एवं तावदिदं वृत्तं शृणु श्रेणिक ते परम् । कथयामि गते तस्मिन् यत् पितृभ्यां विचेष्टितम् ॥५६॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! यह वृत्तान्त तो मैंने तुझसे कहा। अब पवनंजयके घरसे चले जानेपर माता-पिताकी क्या चेष्टा हुई यह कहता हूँ सो सुन ॥५६॥


पवनंजयवृत्तान्ते तन्मित्रेण निवेदिते । समस्ता बान्धवा वायोः परमं शोकमागताः ॥५७॥

अर्थ: मित्रने जाकर जब पवनंजयका वृत्तान्त कहा तब उसके समस्त भाई-बन्धु परम शोकको प्राप्त हुए ॥५७॥


अथ केतुमती पुत्रशोकेनाभ्यावृता भृशम् । ऊचे प्रहसितं वाष्पधाराजनितदुर्दिना ॥५८॥

युक्तं प्रहसितेदं ते कर्तुमीदृग्विचेष्टितम् । मम पुत्रं परित्यज्य यदेकाकी समागतः ॥५९॥

अर्थ: अथानन्तर पुत्रके शोकसे पीड़ित केतुमती अश्रुओंकी धारासे दुर्दिन उपजाती हुई प्रहसितसे बोली कि हे प्रहसित ! क्या तुझे ऐसा करना उचित था जो तू मेरे पुत्रको छोड़कर अकेला आ गया ॥५८-५९॥


सोऽवोचदम्ब तेनैव प्रेषितोऽहं प्रयत्नतः । न मे केनापि भावेन दत्तं स्थातुमुपान्तिके ॥६०॥

अर्थ: इसके उत्तरमें प्रहसितने कहा कि हे अम्ब ! उसीने प्रयत्न कर मुझे भेजा है। उसने मुझे किसी भी भावसे वहाँ नहीं ठहरने दिया ॥६०॥


उवाच सा गतः क्वासौ सोऽवोचद्यत्र साञ्जना । क्वाञ्जनेति च पृष्टेन को वेत्तीति निवेदितम् ॥६१॥

अपरीक्षणशीलानां सहसा कार्यकारिणाम् । पश्चात्तापो भवत्येव जनानां प्राणधारिणाम् ॥६२॥

अर्थ: केतुमतीने कहा कि वह कहाँ गया है ? प्रहसितने कहा कि जहाँ अंजना है। अंजना कहाँ है ? ऐसा केतुमतीने पुनः पूछा तो प्रहसितने उत्तर दिया कि मैं नहीं जानता हूँ। जो मनुष्य बिना परीक्षा किये सहसा कार्य कर बैठते हैं उन्हें पश्चात्ताप होता ही है ॥६१-६२॥


कान्तां यदि न पश्यामि मृत्युमेमि ततो ध्रुवम् । प्रतिज्ञैवं कृतानेन त्वत्पुत्रेण सुनिश्चिता ॥६३॥

अर्थ: प्रहसितने केतुमतीसे यह भी कहा कि तुम्हारे पुत्रने यह निश्चित प्रतिज्ञा की है कि यदि मैं प्रियाको नहीं देखूँगा तो अवश्य ही मृत्युको प्राप्त होऊँगा ॥६३॥


इति श्रुत्वा विलापं सा चकारेति सुदुःखिता । वेष्टिता स्त्रीसमूहेन स्रवल्लोचनवारिणा ॥६४॥

अर्थ: यह सुनकर केतुमती अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगी। उस समय जिनके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे ऐसी स्त्रियोंका समूह उसे घेरकर बैठा था ॥६४॥


अज्ञातसत्यया कष्टं पापया किं मया कृतम् । येन पुत्रः परिप्राप्तो जीवनस्य तु संशयम् ॥६५॥

अर्थ: वह कहने लगी कि सत्यको जाने बिना मुझ पापिनीने क्या कर डाला जिससे पुत्र जीवनके संशयको प्राप्त हो गया ॥६५॥


क्रूरसंधानधारिण्या वक्रमानसया मया । असमीक्षितकारिण्या मन्दया किमनुष्ठितम् ॥६६॥

अर्थ: क्रूर अभिप्रायको धारण करनेवाली कुटिलचित्त तथा बिना विचारे कार्य करनेवाली मुझ मूर्खाने क्या कर डाला ? ॥६६॥


मुक्तं वायुकुमारेण पुरमेतन्न शोभते । विजयार्धगिरीशो वा सेवा वा रक्षसां विभोः ॥६७॥

अर्थ: वायुकुमारके द्वारा छोड़ा हुआ यह नगर शोभा नहीं देता। यही नगर क्यों ? विजयार्द्ध पर्वत ही शोभा नहीं देता और न रावणकी सेना ही उसके बिना सुशोभित है ॥६७॥


दुष्करो रावणस्यापि सन्धिर्यैन रणे कृतः । कस्तस्य मम पुत्रस्य सदृशोऽत्र नरो भुवि ॥६८॥

अर्थ: जो रावणके लिए भी कठिन थी ऐसी सन्धि युद्धमें जिसने करा दी मेरे उस पुत्रके समान पृथ्वीपर दूसरा मनुष्य है ही कौन ? ॥६८॥


हा वत्स ! विनयाधार ! गुरुपूजनतत्पर ! जगत्सुन्दर ! विख्यातगुण ! क्वासि गतो मम ॥६९॥

अर्थ: हाय बेटा ! तू तो विनयका आधार था, गुरुजनोंकी पूजा करनेमें सदा तत्पर रहता था, जगत्-भरमें अद्वितीय सुन्दर था, और तेरे गुण सर्वत्र प्रसिद्ध थे फिर भी तू कहाँ चला गया ॥६९॥


भवद्दुःखाग्निसंतप्तां मातरं मातृवत्सल ! प्रतिवाक्यप्रदानेन कुरु शोकविवर्जिताम् ॥७०॥

अर्थ: हे मातृवत्सल ! जो तेरे दुःखरूपी अग्निसे सन्तप्त हो रही है ऐसी अपनी माताको प्रत्युत्तर देकर शोकरहित कर ॥७०॥


विलापमपि कुर्वाणां ताडयन्तीमुरो भृशम् । सान्त्वयन्वनितां कृच्छ्रात्प्रह्लादः साश्रुलोचनः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार विलाप करती और अत्यधिक छाती कूटती हुई केतुमतीको राजा प्रह्लाद सान्त्वना दे रहे थे पर शोकके कारण उनके नेत्रोंसे भी टप-टप आँसू गिरते जाते थे ॥७१॥


सर्वबन्धुजनाकीर्णः कृत्वा प्रहसितं पुरः । निर्यातः स्वपुरात् पुत्रमुपलब्धुं समुत्सुकः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर पुत्रको पानेके लिए उत्सुक राजा प्रह्लाद समस्त बन्धुजनोंके साथ प्रहसितको आगे कर अपने नगरसे निकले ॥७२॥


सर्वे चाह्वायिता तेन खगा द्विश्रेणिवासिनः । प्रीत्या ते तु समायाताः परिवारसमन्विताः ॥७३॥

अर्थ: उन्होंने दोनों श्रेणियोंमें रहनेवाले समस्त विद्याधरोंको बुलवाया सो अपने-अपने परिवार सहित समस्त विद्याधर प्रेमपूर्वक आ गये ॥७३॥


रवेः पन्थानमाश्रित्य भास्वद्विविधवाहनाः । अन्वेष्यंस्ते महीं यत्नाद् गह्वरन्यस्तलोचनाः ॥७४॥

अर्थ: जिनके नाना प्रकारके वाहन आकाशमें देदीप्यमान हो रहे थे और जिनके नेत्र नीचे गुफाओंमें पड़ रहे थे ऐसे वे समस्त विद्याधर बड़े यत्नसे पृथ्वीकी खोज करने लगे ॥७४॥


प्रतिभानुरुदन्तं तं ज्ञात्वा प्रह्लाददूततः । उद्वहन्मनसा शोकमञ्जनायै न्यवेदयत् ॥७५॥

अर्थ: इधर प्रह्लादके दूतसे राजा प्रतिसूर्यको जब यह समाचार मालूम हुआ तो हृदयसे शोक धारण करते हुए उसने यह समाचार अंजनासे कहा ॥७५॥


प्रथमादपि सा दुःखात्ततो दुःखेन भूयसा । अश्रुधौतमुखा चक्रे करुणं परिदेवनम् ॥७६॥

अर्थ: अंजना पहलेसे ही दुःखी थी अब इस भारी दुःखसे और भी अधिक दुःखी होकर वह करुण विलाप करने लगी । विलाप करते समय उसका मुख अश्रुओंसे धुल रहा था ॥७६॥


हा नाथ प्राणसर्वस्व मम मानसबन्धन । क्व मां त्यक्त्वा प्रयातोऽसि क्लेशसंततिभागिनीम् ॥७७॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हाय नाथ ! आप ही तो मेरे हृदयके बन्धन थे फिर निरन्तर क्लेश भोगनेवाली अबलाको छोड़कर आप कहाँ चले गये ? ॥७७॥


किं वाद्यापि न तं कोपं विमुञ्चसि पुरातनम् । अदृश्यस्त्वं यदेतोऽसि सर्वविद्याभृतामपि ॥७८॥

अर्थ: क्या आज भी आप उस पुरातन क्रोधको नहीं छोड़ रहे हैं जिससे समस्त विद्याधरोंके लिए अदृश्य हो गये हैं ॥७८॥


अप्येकं प्रतिवाक्यं मे नाथ यच्छामृतोपमम् । सत्वापन्नहितोन्मुक्ता महात्मानो भवन्ति हि ॥७९॥

अर्थ: हे नाथ ! मेरे लिए अमृततुल्य एक भी प्रत्युत्तर दीजिए क्योंकि महापुरुष आपत्तिमें पड़े हुए प्राणियोंका हित करना कभी नहीं छोड़ते ॥७९॥


इयन्तं धारिताः कालं भवद्दर्शनकाङ्क्षया । प्राणा मयाधुना कार्यं किमेतैः पापकर्मभिः ॥८०॥

अर्थ: मैंने अब तक आपके दर्शनकी आकांक्षासे ही प्राण धारण किये हैं । अब मुझे इन पापी प्राणोंसे क्या प्रयोजन है ? ॥८०॥


समागममवाप्स्यामि प्रियेणेति समं कृताः । कथं मनोरथा भग्ना दैवेनाफलिता मम ॥८१॥

अर्थ: मैं पतिके साथ समागमको प्राप्त होऊँगी, ऐसे जो मनोरथ मैंने किये थे वे आज दैवके द्वारा निष्फल कर दिये गये ॥८१॥


कृते मे मन्दभाग्यायाः प्रियोऽवस्थां गतो भवेत् । तामिदं हृदयं क्रूरं यां समाशङ्कते मुहुः ॥८२॥

अर्थ: मुझ मन्दभागिनीके लिए प्रिय उस अवस्थाको प्राप्त हुए होंगे जिसकी कि यह क्रूर हृदय बार-बार आशंका करता रहा है ॥८२॥


वसन्तमालिके पश्य किमिदं वर्तते मम । असह्यविरहाङ्गारपल्यङ्कपरिवर्तनम् ॥८३॥

अर्थ: वसन्तमाले ! देख तो यह क्या हो रहा है ? मुझे असह्य विरहके अंगाररूपी शय्यापर कैसे लोटना पड़ रहा है ? ॥८३॥


वसन्तमालया चोक्ता देवि मैवममङ्गलम् । व्यरटीः सर्वथासौ ते भर्ता गोचरमेष्यति ॥८४॥

अर्थ: वसन्तमालाने कहा कि हे देवि ! ऐसी अमांगलिक रट मत लगाओ । मैं निश्चित कहती हूँ कि भर्ता तुम्हारे समीप आयेगा ॥८४॥


एष कल्याणि ते नाथमानयाम्यचिरादिति । प्रतिसूर्यः समाश्वास्य कृच्छ्रेणाञ्जनसुन्दरीम् ॥८५॥

मनोहरं समारुह्य खगयानं मनोजवम् । नभोमूर्धानमुत्पत्य वीक्षमाणः क्षितिं ययौ ॥८६॥

अर्थ: ‘हे कल्याणि ! मैं तेरे भर्ताको अभी हाल ले आता हूँ’ इस प्रकार अंजनाको बड़े दुःखसे आश्वासन देकर राजा प्रतिसूर्य मनके समान तीव्र वेगवाले सुन्दर विमानमें चढ़कर आकाशमें उड़ गया। वह पृथिवीको अच्छी तरह देखता हुआ जा रहा था ॥८५-८६॥


प्रतिमानुसमेतास्ते वैजयार्द्धा नभश्चराः । त्रैकूटाश्च प्रयत्नेन निरैक्षन्त महीतलम् ॥८७॥

अर्थ: इस प्रकार विजयार्धवासी विद्याधर और त्रिकूटाचलवासी राक्षस राजा प्रतिसूर्यके साथ मिलकर बड़े प्रयत्नसे पृथिवीका अवलोकन करने लगे ॥८७॥


अथ भूतरवाटव्यां ददृशुस्ते महाद्विपम् । प्रावृषेण्यघनोदारसंघाताकारधारिणम् ॥८८॥

अर्थ: अथानन्तर उन्होंने भूतरव नामक अटवीमें वर्षा ऋतुके मेघके समान विशाल आकारको धारण करनेवाला एक बड़ा हाथी देखा ॥८८॥


अयं स कालमेघाख्यः पवनद्विप इत्यमी । अभ्यङ्गासिषुरेनं च पूर्वदृष्टेरनेकशः ॥८९॥

अर्थ: उस हाथीको उन्होंने पहले अनेक बार देखा था इसलिए ‘यह पवनकुमारका कालमेघ नामक हाथी है’ इस प्रकार पहचान लिया ॥८९॥


अयमेष स हस्तीति जगदुश्च परस्परम् । सर्वे विद्याधराः हृष्टाः समं कृतमहारवाः ॥९०॥

अर्थ: ‘यह वही हाथी है’ इस प्रकार सब विद्याधर हर्षित हो जोरसे हल्ला करते हुए परस्पर एक दूसरेसे कहने लगे ॥९०॥


नीलाञ्जनगिरिच्छायः कुन्दराशिसितद्विजः । युक्तप्रमाणहस्तोऽयं हस्ती यत्रावतिष्ठते ॥९१॥

पवनंजयवीरेण देशेऽत्र गतसंशयम् । भवितव्यमयं तस्य मित्रवत्पार्श्वगोचरः ॥९२॥

अर्थ: जो नीलगिरि अथवा अंजनगिरिके समान सफेद है तथा जिसकी सूँड़ योग्य प्रमाणसे सहित है ऐसा यह हाथी जिस स्थानमें है निःसन्देह उसी स्थानमें पवनंजयको होना चाहिए क्योंकि यह हाथी मित्रके समान सदा उसके समीप ही रहता है ॥९१-९२॥


वदन्त इति ते याताः समीपं तस्य दन्तिनः । निरङ्कुशतया तस्य मनाग्वित्रस्तमानसाः ॥९३॥

अर्थ: इस प्रकार कहते हुए सब विद्याधर उस हाथीके पास गये। चूँकि वह हाथी निरंकुश था इसलिए विद्याधरोंका मन कुछ-कुछ भयभीत हो रहा था ॥९३॥


रवेण महता तेषां चुक्षोभ स महागजः । दुर्निवारश्चलद्भीमसमस्ताङ्गो महाजवः ॥९४॥

अर्थ: उन विद्याधरोंके महाशब्दसे वह महान् हाथी सचमुच ही क्षुभित हो गया। उस समय उसका रोकना कठिन था, उसका समस्त भयंकर शरीर चंचल हो रहा था और वेग अत्यन्त तीव्र था ॥९४॥


मदक्लिन्नकपोलोऽसौ स्तब्धकर्णः सुगर्जितः । दिशं पश्यति यामेव तत्र क्षुभ्यन्ति खेचराः ॥९५॥

अर्थ: उसके दोनों कपोल मदसे भींगे हुए थे, कान खड़े थे और वह जोर-जोरसे गर्जना कर रहा था । वह जिस दिशामें देखता था उसी दिशाके विद्याधर क्षुभित हो जाते थे - भयसे भागने लगते थे ॥९५॥


दृष्ट्वा जनसमूहं तं स्वामिरक्षणतत्परः । पवनंजयसामीप्यं न जहाति स वारणः ॥९६॥

अर्थ: उस जनसमूहको देखकर स्वामीकी रक्षा करनेमें तत्पर हाथी पवनंजयकी समीपताको नहीं छोड़ रहा था ॥९६॥


मण्डलेन भ्रमत्यस्य सलीलं भ्रमयन् करम् । दशनेनैव चण्डेन त्रासयन् सर्वखेचरान् ॥९७॥

अर्थ: वह लीलासहित सूँड़को घुमाता और अपने तीक्ष्ण दशनसे ही समस्त विद्याधरोंको भयभीत करता हुआ पवनंजयके चारों ओर मण्डलाकार भ्रमण कर रहा था ॥९७॥


करिणीभिरथावृत्य द्विपं यत्नेन खेचराः । वशीकृत्य तमुद्देशमवतीर्णाः समुत्सुकाः ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याधर यत्नपूर्वक हस्तिनियोंसे उस हाथीको घेरकर तथा वशमें कर उत्सुक होते हुए उस स्थानपर उतरे ॥९८॥


उपायेभ्यो हि सर्वेभ्यो वशीकरणवस्तुनि । कामिनीसंगमुज्झित्वा नापरं विद्यते परम् ॥९९॥

अर्थ: वशीकरणके समस्त उपायोंमें स्त्रीसमागमको छोड़कर और दूसरा उत्तम उपाय नहीं है ॥९९॥


अथेक्षांचक्रिरे वायुं विस्रस्ताङ्गं नभश्चराः । पुस्तकर्मसमाकारं वाचंयमतया स्थितम् ॥१००॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका समस्त शरीर ढीला हो रहा था, चित्र-लिखितके समान जिसका आकार था और जो मौनसे बैठा था ऐसे पवनंजयको विद्याधरोंने देखा ॥१००॥


यथार्हमुपचारं ते चक्रुरस्य तथाप्यसौ । न प्रयच्छति चिन्तास्थः प्रतिवाक्यं मुनिर्यथा ॥१०१॥

अर्थ: यद्यपि सब विद्याधरोंने उसका यथायोग्य उपचार किया तो भी वह मुनिके समान चिन्तामें निमग्न बैठा रहा - किसीसे कुछ नहीं कहा ॥१०१॥


पुत्रप्रीत्या तमाघ्राय पितरौ मस्तके मुहुः । आलिङ्ग्य च प्रमोदेन बाष्पस्थगितलोचनौ ॥१०२॥

अर्थ: माता-पिताने पुत्रकी प्रीतिसे उसका मस्तक सूंघा, बार-बार आलिंगन किया और इस हर्षसे उनके नेत्र आँसुओंसे आच्छादित हो गये ॥१०२॥


ऊचतुर्वत्स संत्यज्य पितरौ कथमीदृशम् । चेष्टितं क्रियते त्वं हि विनीतानां धुरिस्थितः ॥१०३॥

अर्थ: उन्होंने कहा भी कि हे बेटा ! तुम माता-पिताको छोड़कर ऐसी चेष्टा क्यों करते हो ? तुम तो विनीत मनुष्योंमें सबसे आगे थे ॥१०३॥


वरशय्योचितः कायस्त्वयाद्य विजने वने । संवाहितः कथं भीमे रात्रौ पादपगह्वरे ॥१०४॥

अर्थ: तुम्हारा शरीर उत्कृष्ट शय्यापर पड़नेके योग्य है पर तुमने आज इसे भयंकर एवं निर्जन वनके बीच वृक्षकी कोटरमें क्यों डाल रखा है ? ॥१०४॥


इति संभाष्यमाणोऽपि नासौ वाचमुदाहरत् । मरणे निश्चितोऽस्मीति संज्ञयैव न्यवेदयत् ॥१०५॥

अर्थ: माता-पिताके इस प्रकार कहने पर भी उसने एक शब्द नहीं कहा। केवल इशारेसे यह बता दिया कि मैं मरनेका निश्चय कर चुका हूँ ॥१०५॥


व्रतमेतन्मयोपात्तं यदप्राप्य महेन्द्रजाम् । न भुञ्जे न वदामीति तत्कथं भज्यतेऽधुना ॥१०६॥

अर्थ: मैंने यह व्रत कर रखा है कि अंजनाको पाये बिना मैं न भोजन करूँगा और न बोलूँगा। फिर इस समय वह व्रत कैसे तोड़ दूँ ? ॥१०६॥


आस्तां तावत्प्रिया सत्यव्रतं संरक्षता मया । गुरू प्रश्वासितावेतौ कथमित्याकुलोऽभवत् ॥१०७॥

अर्थ: अथवा प्रियाकी बात जाने दो, सत्य-व्रतकी रक्षा करता हुआ मैं इन माता-पिताको किस प्रकार सन्तुष्ट करूँ यह सोचता हुआ वह कुछ व्याकुल हुआ ॥१०७॥


ततस्तं नतमूर्धानं मौनव्रतसमाश्रितम् । मरणे निश्चितं ज्ञात्वा जग्मुर्विद्याधराः शुचम् ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मस्तक नीचेकी ओर झुक रहा था और जो मौनसे चुपचाप बैठा था ऐसे पवनंजयको मरनेके लिए कृतनिश्चय जानकर विद्याधर शोकको प्राप्त हुए ॥१०८॥


समेतास्तत्पितृभ्यां ते विलेपुर्दीनमानसाः । संस्पृशन्तः करैरस्य शरीरं स्वेदधारिभिः ॥१०९॥

अर्थ: जिनके हृदय अत्यन्त दीन थे और जो स्वेदको धारण करनेवाले हाथोंसे पवनंजयके शरीरका स्पर्श कर रहे थे ऐसे सब विद्याधर उसके माता-पिताके साथ विलाप करने लगे ॥१०९॥


ततः स्मितमुखोऽवोचत् प्रतिसूर्यो नभश्चरान् । मा भूत विक्लवा वायुमेष वो भाषयाम्यहम् ॥११०॥

अर्थ: तदनन्तर हँसते हुए प्रतिसूर्यने सब विद्याधरोंसे कहा कि आप लोग दुःखी न हों। मैं आप लोगोंसे पवन कुमारको बुलवाता हूँ ॥११०॥


पवनं च परिष्वज्य जगादानुक्रमान्वितम् । कुमार शृणु यद्वृत्तं कथयामि तवाखिलम् ॥१११॥

अर्थ: तथा पवनंजयका आलिंगन कर क्रमा-नुसार उससे कहा कि हे कुमार ! सुनो, जो कुछ भी वृत्तान्त हुआ है वह सब मैं कहता हूँ ॥१११॥


संध्याभ्रपर्वते रम्ये मुनेः कैवल्यमुद्गतम् । अनङ्गवीचिसंज्ञस्य देवेन्द्रक्षोभकारणम् ॥११२॥

अर्थ: सन्ध्याभ्र नामक मनोहर पर्वतपर अनंगवीचि नामक मुनिराजको इन्द्रोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला केवल-ज्ञान उत्पन्न हुआ था ॥११२॥


वन्दित्वा तं प्रदीपेन रात्रावागच्छता मया । रुदितध्वनिरश्रावि स्त्रैणस्तन्त्रीस्वनोपमः ॥११३॥

अर्थ: मैं उनकी वन्दना कर दीपकके सहारे रात्रिको चला आ रहा था कि मैंने वीणाके शब्दके समान किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुना ॥११३॥


अढौकिषि तमुद्देशं गिरेः प्रस्थं समुन्नतम् । पर्यङ्कनाम्नि दृष्टा च गुहायामञ्जना मया ॥११४॥

अर्थ: मैं उस शब्दको लक्ष्य कर पर्वतकी ऊँची चोटीपर गया । वहाँ मुझे पर्यंक नामकी गुफामें अंजना दिखी ॥११४॥


निर्वासकारणं चास्या विज्ञाय विनिवेदितम् । मया प्राश्वासिता बाला रुदती शोकविह्वला ॥११५॥

अर्थ: इसके निर्वासका कारण जो बताया गया था उसे जानकर शोकसे विह्वल होकर रोती हुई उस बालाको मैंने सान्त्वना दी ॥११५॥


तस्यामसूत सा पुत्रमन्वितं लक्षणैः शुभैः । यस्य भासा गुहा सासीत् सुवर्णेनेव निर्मिता ॥११६॥

अर्थ: उसी गुफामें उसने शुभ लक्षणोंसे युक्त ऐसा पुत्र उत्पन्न किया कि जिसकी प्रभासे वह गुफा सुवर्णसे बनी हुईके समान हो गयी ॥११६॥


स तोषं परमं प्राप्तः श्रुत्वा तां जातपुत्रिकाम् । ततस्तत इति क्षिप्रमपृच्छच्च समीरणः ॥११७॥

अर्थ: अंजनाके पुत्र हो चुका है यह जानकर पवनंजय परम सन्तोषको प्राप्त हुआ और ‘फिर क्या हुआ ? फिर क्या हुआ ?’ यह शीघ्रतासे पूछने लगा ॥११७॥


अवोचत् स ततस्तस्याः सुतोऽसौ चारुचेष्टितः । विमाने स्थाप्यमानः सन् पतितः शैलगह्वरे ॥११८॥

अर्थ: प्रतिसूर्यने कहा कि उसके बाद अंजनाके उस सुन्दर चेष्टाओंके धारक पुत्रको विमानमें बैठाया जा रहा था कि वह पर्वतकी गुफामें गिर गया ॥११८॥


अत्रान्तरे पुनः प्राप्तो विषादं पवनंजयः । हाकारमुखरः सार्द्धं तया खेचरसेनया ॥११९॥

अर्थ: यह सुनकर हाहाकार करता हुआ पवनंजय विद्याधरोंकी सेनाके साथ पुनः विषादको प्राप्त हुआ ॥११९॥


प्रतिभानुः पुनश्चोचे मा गाः शोकं ततः शृणु । यद्वृत्तं तत्समस्तं ते वायो दुःखं हरिष्यति ॥१२०॥

अर्थ: तब प्रतिसूर्यने कहा कि शोकको प्राप्त मत होओ । जो कुछ वृत्तान्त हुआ वह सब सुनो । हे पवन ! पूरा वृत्तान्त तुम्हारे दुःखको दूर कर देगा ॥१२०॥


ततो हाकारशब्देन मुखरीकृतदिङ्मुखाः । अवतीर्यानघं बालमैक्षिष्महि नगान्तरे ॥१२१॥

अर्थ: प्रतिसूर्य कहता जाता है कि तदनन्तर हाहाकारसे दिशाओंको शब्दायमान करते हुए हम लोगोंने नीचे उतरकर पर्वतके बीच उस निर्दोष बालकको देखा ॥१२१॥


चूर्णितश्च ततः शैलस्तेनासौ पतनात्तदा । श्रीशैल इति तेनासावस्माभिर्विस्मितैः स्तुतः ॥१२२॥

अर्थ: चूँकि उस बालकने गिरकर पर्वतको चूर-चूर कर डाला था इसलिए हम लोगोंने विस्मित होकर उसकी ‘श्रीशैल’ इस नामसे स्तुति की ॥१२२॥


वसन्तमालया साकं ततः पुत्रेण संयुता । विमानमञ्जनारोप्य मया नीता निजं पुरम् ॥१२३॥

अर्थ: तदनन्तर पुत्रसहित अंजनाको वसन्तमालाके साथ विमानमें बैठाकर मैं अपने नगर ले गया ॥१२३॥


ततो हनूरुहाभिख्ये पुरे संवर्द्धितः शिशुः । हनूमानिति तेनास्य द्वितीयं नाम निर्मितम् ॥१२४॥

अर्थ: आगे चलकर चूँकि उसका हनूरुह द्वीपमें संवर्धन हुआ है इसलिए हनूमान् यह दूसरा नाम भी रखा गया है ॥१२४॥


एषा ते कथिता साकं पुत्रेणाद्भुतकर्मणा । मत्पुरे शीलसंपन्ना तिष्ठतीति विबुध्यताम् ॥१२५॥

अर्थ: इस तरह आपने जिसका कथन किया है वह शीलवती अंजना आश्चर्यजनक कार्य करनेवाले पुत्रके साथ मेरे नगरमें रह रही है सो ज्ञात कीजिए ॥१२५॥


पुरस्कृत्य ततो वायुं हृष्टा गगनचारिणः । क्षिप्रं हनूरुहं जग्मुरञ्जनादर्शनोत्सुकाः ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे भरे विद्याधर अंजनाके देखनेके लिए उत्सुक हो पवनंजयको आगे कर शीघ्र ही हनूरुह नगर गये ॥१२६॥


तेषां महोत्सवस्तत्र समागमकृतोऽभवत् । सुसंवेद्यस्तु दम्पत्योर्दुराख्यानो विशेषतः ॥१२७॥

अर्थ: वहाँ अंजना और पवनंजयका समागम हो जानेसे विद्याधरोंको महान् उत्सव हुआ । दोनों दम्पतियोंको जो उत्सव हुआ वह स्वसंवेदनसे ही जाना जा सकता था विशेषकर उसका कहना अशक्य था ॥१२७॥


तत्र मासद्वयं नीत्वा खेचराः प्रीतमानसाः । आमन्त्र्य लब्धसंमाना ययुः स्थानं यथायथम् ॥१२८॥

अर्थ: वहाँ विद्याधरोंने प्रसन्न- चित्तसे दो महीने व्यतीत किये । तदनन्तर पूछकर सम्मान प्राप्त करते हुए सब यथास्थान चले गये ॥१२८॥


चिरात्संप्राप्तपत्नीकः पवनोऽपि सुचेष्टितः । तत्र गीर्वाणवद्रेमे सुतचेष्टाभिनन्दितः ॥१२९॥

अर्थ: चिरकालके बाद पत्नीको पाकर पवनंजयकी चेष्टाएँ भी ठीक.हो गयीं और वह पुत्रकी चेष्टाओंसे आनन्दित होता हुआ वहाँ देवकी तरह रमण करने लगा ॥१२९॥


हनूमांस्तत्र संप्राप्य यौवनश्रियमुत्तमाम् । मेरुकूटसमानाङ्गः स्तेनकः सर्वचेतसाम् ॥१३०॥

अर्थ: हनूमान् भी वहाँ उत्तम यौवन-लक्ष्मीको पाकर सबके चित्तको चुराने लगा तथा उसका शरीर मेरु पर्वतके शिखरके समान देदीप्यमान हो गया ॥१३०॥


सिद्धविद्यः प्रभावाढ्यो विनयज्ञो महाबलः । सर्वशास्त्रार्थकुशलः परोपकृतिदक्षिणः ॥१३१॥

नाकोपभुक्तपाकस्य पुण्यशेषस्य मोजकः । रमते स्म पुरे तत्र गुरुपूजनतत्परः ॥१३२॥

अर्थ: उसे समस्त विद्याएँ सिद्ध हो गयी थीं, प्रभाव उसका निराला ही था, विनयका वह जानकार था, महाबलवान् था, समस्त शास्त्रोंका अर्थ करनेमें कुशल था, परोपकार करनेमें उदार था, स्वर्गमें भोगनेसे बाकी बचे पुण्यका भोगनेवाला था और गुरुजनोंकी पूजा करनेमें तत्पर था । इस तरह वह उस नगरमें बड़े आनन्दसे क्रीड़ा करता था ॥१३१-१३२॥


श्रीशैलस्य समुद्भवेन सहितं वायोः समं कान्तया यो भावेन श्रृणोति सङ्गममिमं नानारसैरद्भुतम् । जन्तोस्तस्य समस्तसंसृतिविधिज्ञानेन लब्धात्मनो बुद्धिर्नाशुभकर्मणि प्रभवति प्रारब्धसत्कर्मणः ॥१३३॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जो हनूमान्के साथ-साथ नाना रसोंसे आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले इस अंजना और पवनंजयके संगमको भावसे सुनता है उसे संसारकी समस्त विधिका ज्ञान हो जाता है तथा उस ज्ञानके प्रभावसे उसे आत्म-ज्ञान उत्पन्न हो जाता है जिससे वह उत्तम कार्य ही प्रारम्भ करता है और अशुभ कार्यमें उसकी बुद्धि प्रवृत्त नहीं होती ॥१३३॥


आयुर्दीर्घमुदारविभ्रमयुतं कान्तं वपुर्नीरुजं मेधां सर्वकृतान्तपारविषयां कीर्तिं च चन्द्रामलाम् । पुण्यं स्वर्गसुखोपभोगचतुरं लोके च यद्दुर्लभं तत्सर्वं सकृदश्नुते रविरिव स्फीतप्रभामण्डलम् ॥१३४॥

अर्थ: वह दीर्घ आयु, उदार विभ्रमोंसे युक्त, सुन्दर नीरोग शरीर, समस्त शास्त्रोंके पारको विषय करनेवाली बुद्धि, चन्द्रमाके समान निर्मल कीर्ति, स्वर्ग-सुखका उपभोग करनेमें चतुर, पुण्य तथा लोकमें जो कुछ भी दुर्लभ पदार्थ हैं उन सबको एक बार उस तरह प्राप्त कर लेता है जिस प्रकार कि सूर्य देदीप्यमान कान्तिके मण्डलको ॥१३४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते पवनाञ्जनासमागमाभिधानं नामाष्टादशं पर्व ॥१८॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें पवनंजय और अंजनाके समागमका वर्णन करनेवाला अठारहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१८॥


१९. एकोनविंशतितमं पर्व (रावणसाम्राज्याभिधानं)

रावणोऽथ वहन् दीर्घं क्रोधमप्राप्तनिर्वृतिः । आडुढौकत् पुनः सर्वान् खेचरान् लेखहारिभिः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रावणको सन्तोष नहीं हुआ सो उसने बहुत भारी क्रोध धारण कर पत्रवाहकोंके द्वारा समस्त विद्याधरोंको फिरसे बुलाया ॥१॥


किष्किन्धेन्द्रस्तमभ्यागात्तथा दुन्दुभिसंज्ञकः । अलंकाराधिपो यश्च रथनूपुरपस्तथा ॥२॥

विजयार्द्धनगे ये च श्रेणिद्वयनिवासिनः । सर्वोद्योगेन ते सर्वे प्राप्ता रत्नश्रवःसुतम् ॥३॥

अर्थ: किष्किन्धाका राजा, दुन्दुभि, अलंकारपुरका अधिपति, रथनूपुरका स्वामी तथा विजयार्द्ध पर्वतकी दोनों श्रेणियोंमें निवास करनेवाले अन्य समस्त विद्याधर सब प्रकारकी तैयारीके साथ रावणके समीप जा पहुँचे ॥२-३॥


अथो हनूरुहद्वीपं नरो मस्तकलेखकः । प्राप्तः पवनवेगस्य प्रतिसूर्यस्य चान्तिकम् ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर मस्तकपर लेखको धारण करनेवाला एक मनुष्य हनूरुह द्वीपमें पवनंजय और प्रतिसूर्यके पास भी आया ॥४॥


लेखार्थमभिगम्यैतौ प्रयाणन्यस्तमानसौ । श्रीशैलस्योद्यतौ कर्तुमभिषेकं नृपास्पदे ॥५॥

अर्थ: लेखका अर्थ समझकर दोनोंने रावणके पास जानेका विचार किया सो वहाँ जानेके पूर्व वे राज्यपर हनूमान्‌का अभिषेक करनेके लिए उद्यत हुए ॥५॥


कृतस्तदर्थमाटोपस्तूर्यशब्दादिको महान् । नराः कलशहस्ताश्च श्रीशैलस्य पुरः स्थिताः ॥६॥

अर्थ: राज्याभिषेककी बड़ी तैयारी की गयी । तुरही आदि वादित्रोंका बड़ा शब्द होने लगा और मनुष्य हाथमें कलश लेकर हनूमान्‌के सामने खड़े हो गये ॥६॥


किमेतदिति तौ तेन पृष्टाविदमवोचताम् । राज्यं हनूरुहद्वीपे वत्स त्वं पालयाधुना ॥७॥

अर्थ: हनूमान्‌ने पवनंजय और प्रतिसूर्यसे पूछा कि यह क्या है ? तब उन्होंने कहा कि हे वत्स ! अब तुम हनूरुह द्वीपके राज्यका पालन करो ॥७॥


युद्धे सहायतां कर्तुमावामीशेन रक्षसाम् । आहूतौ तस्य कर्तव्यं प्रीत्यावाभ्यां यथोचितम् ॥८॥

अर्थ: हम दोनोंको रावणने युद्धमें सहायता करनेके लिए बुलाया है सो हमें प्रेमपूर्वक यथोचित रूपसे आज्ञा-पालन करना चाहिए ॥८॥


रसातलपुरे तस्य वरुणः प्रत्यवस्थितः । दुर्जयोऽसौ महासैन्यः पुत्रदुर्गबलोत्कटः ॥९॥

अर्थ: रसातलपुरमें जो वरुण रहता है वही उसके विरुद्ध खड़ा हुआ है । उसकी बहुत बड़ी सेना है तथा वह पुत्र और दुर्गके बलसे उत्कट होनेके कारण दुर्जय है ॥९॥


हनूमानेवमुक्तः सन् विनयेनेदमब्रवीत् । मयि स्थिते न युक्तं वां गन्तुमायोधनं गुरू ॥१०॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर हनूमान्‌ने विनयसे उत्तर दिया कि मेरे रहते हुए आप गुरुजनोंको युद्धके लिए जाना उचित नहीं है ॥१०॥


अविज्ञातरणास्वादो वत्स त्वमिति भाषिते । जगाद किं शिवस्थानं कदाचिल्लब्धमाप्यते ॥११॥

यदा निवार्यमाणोऽपि न स्थातुं कुरुते मनः । तदा ताभ्यामनुज्ञातः स युवा गमनं प्रति ॥१२॥

अर्थ: ‘हे बेटा ! अभी तुमने रणका स्वाद नहीं जाना है’ ऐसा जब उससे कहा गया तब उसने उत्तर दिया कि जो मोक्ष प्राप्त होता वह क्या कभी पहले प्राप्त किया हुआ होता है ? जब रोकनेपर भी उसने रुकनेका मन नहीं किया तब उन दोनोंने उस युवाको जानेकी स्वीकृति दे दी ॥११-१२॥


स्नात्वा भुक्त्वा च पूर्वाह्णे मङ्गलार्चितविग्रहः । कृतप्रणामः सिद्धानामर्हतां च प्रयत्नतः ॥१३॥

पितरं मातरं मातुर्मातुलं च महाद्युतिः । प्रणम्याशेषवर्गं च संभाष्य विधिकोविदः ॥१४॥

विमानं सूर्यसंकाशं समारुह्य दिशो दश । व्याप्य शस्त्रसमूहेन ययौ लङ्कापुरीं प्रति ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर प्रातःकाल स्नान कर जिसने अरहन्त और सिद्ध भगवान्‌को प्रयत्नपूर्वक प्रणाम किया था, भोजन कर शरीरपर मंगलद्रव्य धारण किये थे, जो महातेजसे सहित था तथा सब विधि-विधानके जाननेमें निपुण था ऐसा हनूमान् माता-पिता तथा माताके मामाको प्रणाम कर और समस्त लोगोंसे सम्भाषण कर सूर्यके समान चमकते हुए विमानपर बैठकर शस्त्रोंके समूहसे दसों दिशाओंको व्याप्त करता हुआ लंकापुरीकी ओर चला ॥१३-१५॥


त्रिकूटाभिमुखो गच्छन्विमानेऽसावराजत । मन्दराभिमुखो यद्वदैशानस्त्रिदशाधिपः ॥१६॥

अर्थ: विमानमें बैठकर त्रिकूटाचलके सम्मुख जाता हुआ हनूमान् ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि मेरुके सम्मुख जाता हुआ ऐशानेन्द्र सुशोभित होता है ॥१६॥


जलवीचिगिरौ तस्य रविरस्तमुपागमत् । समुद्रवीचिसंतानचुम्बितोरुनितम्बके ॥१७॥

अर्थ: समुद्रकी लहरोंकी सन्तति जिसके विशाल नितम्बको चूम रही थी ऐसे जल-वीचि गिरिपर जब वह पहुँचा तब सूर्य अस्त हो गया ॥१७॥


तत्र रात्रिं सुखं नीत्वा कृतसद्भटसंकथः । महोत्साहेन संनह्य ययौ लङ्काहितेक्षणः ॥१८॥

अर्थ: सो वहाँ उत्तम योद्धाओंके साथ वार्तालाप करते हुए उसने सुखसे रात्रि बितायी और प्रातःकाल होनेपर बड़े उत्साहसे लंकाकी ओर दृष्टि रखकर आगे चला ॥१८॥


नानाजनपदान् द्वीपान्नगानूर्मिसमाहतान् । ग्रहांश्च जलधौ पश्यन् रक्षःसैन्यमवाप सः ॥१९॥

अर्थ: इस तरह नाना देशों, द्वीपों, तरंगोंसे आहत, पर्वतों और समुद्रमें किलोलें करते मगर-मच्छोंको देखता हुआ राक्षसोंकी सेनामें जा पहुँचा ॥१९॥


दृष्ट्वा हनूमतः सैन्यं पुरुराक्षसपुङ्गवाः । विस्मयं परमं जग्मुः श्रीशैलाहितलोचनाः ॥२०॥

अर्थ: हनूमान्की सेना देखकर बड़े-बड़े राक्षसोंके शिरोमणि हनूमान्की ओर दृष्टि लगाकर परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥२०॥


चूर्णितोऽनेन शैलोऽसौ सोऽयं भव्यजनोत्तमः । इति शब्दमसौ श्रृण्वन् रावणस्य गतोऽन्तिकम् ॥२१॥

अर्थ: जिसने पर्वतको चूर्ण किया था यह वही भव्य जनोत्तम है इस शब्दको सुनता हुआ हनूमान् रावणके समीप गया ॥२१॥


मारुतिं रावणो वीक्ष्य कुसुमैरभिपूरितात् । सौरभाकृष्टसंभ्रान्तगुञ्जन्मत्तमधुव्रतात् ॥२२॥

उपरिन्यस्तरत्नांशुच्छुरिताम्बरमण्डपात् । पर्यन्तस्थितसामन्तादभ्युत्तस्थौ शिलातलात् ॥२३॥

अर्थ: उस समय रावण उस शिलातलपर बैठा था जो कि फूलोंसे व्याप्त था, सुगन्धिके कारण खिंचे हुए मदोन्मत्त भ्रमर जिसपर गुंजार कर रहे थे, जिसके ऊपर रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त कपड़ेका उत्तम मण्डप लगा हुआ था और जिसके चारों ओर सामन्त लोग बैठे थे। रावण हनूमान्को देखकर उस शिलातलसे उठकर खड़ा हो गया ॥२२-२३॥


परिष्वज्य हनूमन्तं विनयानतविग्रहम् । उपविष्टः समं तेन तत्र प्रीतिस्मिताननः ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर विनयसे जिसका शरीर झुक रहा था ऐसे हनूमान्का आलिंगन कर वह प्रीतिसे हँसता हुआ उसके साथ उसी शिलातलपर बैठ गया ॥२४॥


अन्योन्यं कुशलं पृष्ट्वा दृष्ट्वान्योन्यस्य संपदम् । रेमाते तौ महाभाग्यौ देवेन्द्राविव संगतौ ॥२५॥

अर्थ: परस्परकी कुशल पूछकर तथा एक दूसरेकी सम्पदा देखकर दोनों महाभाग्यशाली इस तरह रमण करने लगे मानो दो इन्द्र ही परस्पर मिले हों ॥२५॥


अथात्रोचद्दशग्रीवः प्रमदान्वितमानसः । हनूमन्तं मुहुः पश्यन्नत्यन्तस्निग्धया दृशा ॥२६॥

अर्थ: अथानन्तर जो प्रसन्न चित्तका धारक था और अत्यन्त स्नेहभरी दृष्टिसे बार-बार उसीकी ओर देख रहा था ऐसा रावण हनूमान्से बोला कि ॥२६॥


अहो संवर्द्धितं प्रेम वायुना मम साधुना । यदयं प्रेषितः पुत्रः प्रख्यातगुणसागरः ॥२७॥

अर्थ: अहो, सज्जनोत्तम पवनकुमारने मेरे साथ खूब प्रेम बढ़ाया है जो प्रसिद्ध गुणोंके सागरस्वरूप इस पुत्रको भेजा है ॥२७॥


एनं प्राप्य महासत्त्वं तेजोमण्डलभूषितम् । नैव मे दुस्तरं किंचिद्भविष्यत्यत्र विष्टपे ॥२८॥

अर्थ: इस महा- बलवान् तथा तेजोमण्डलके धारक वीरको पाकर मुझे इस संसारमें कोई भी कार्य कठिन नहीं रह जायेगा ॥२८॥


गुणेषु भाष्यमाणेषु श्रीशैलो नतविग्रहः । सव्रीड इव संवृत्तः प्रायो वृत्तिरियं सताम् ॥२९॥

अर्थ: जब रावण हनूमान्के गुणोंका वर्णन कर रहा था तब वह लज्जितके समान नम्र शरीरका धारक हो गया था सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंकी यही वृत्ति है ॥२९॥


भविष्यतोऽथ संग्रामाद्भयेनेव दिवाकरः । अस्तं सेवितुमारेभे मन्दारुणकरोत्करः ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी किरणोंका समूह लाल पड़ गया था ऐसा सूर्य मानो होनेवाले संग्रामके भयसे ही अस्त हो गया था ॥३०॥


संध्यास्य पृष्ठतो यान्ती वहन्ती रागमुत्कटम् । शुशुभे प्राणनाथस्य विनीता रमणी यथा ॥३१॥

अर्थ: उसके पीछे-पीछे जाती और उत्कट राग अर्थात् लालिमा ( पक्षमें प्रेम ) को धारण करती हुई सन्ध्या ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो अपने प्राणनाथके पीछे-पीछे जाती हुई विनीत स्त्री - कुलवधू ही हो ॥३१॥


ततो निशावधू रेजे कृतचन्द्रविशेषका । कुर्वाणानुगतिं भर्तुर्वासरस्य निरन्तरम् ॥३२॥

अर्थ: जो निरन्तर सूर्यके पीछे-पीछे चला करती थी ऐसी रात्रि-रूपी वधू चन्द्रमारूपी तिलक धारण कर अतिशय सुशोभित होने लगी ॥३२॥


अन्येद्युर्भानुभिर्भानोरुज्ज्वले भुवने कृते । दशग्रीवः सुसन्नद्धः समस्तबलमध्यगः ॥३३॥

आसन्नस्थहनूमत्कः कृतमङ्गलविग्रहः । विद्यया जलधिं भित्त्वा प्रयातो वारुणं पुरम् ॥३४॥

अर्थ: दूसरे दिन जब सूर्यकी किरणोंसे संसार प्रकाशमान हो गया तब रावण तैयार होकर वरुणके नगरकी ओर चला । उस समय रावण अपनी समस्त सेनाके मध्यमें चल रहा था । हनूमान् उसके पास ही स्थित था और मंगलद्रव्य उसने शरीरपर धारण कर रखे थे । वह विद्याके द्वारा समुद्रको भेदन कर वरुणके नगरकी ओर चला ॥३३-३४॥


प्रत्यरिं व्रजतोऽमुष्य दीप्तिरासीदनुत्तमा । कुठारराममुद्दिश्य सुभूमस्येव चक्रिणः ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार परशुरामको लक्ष्य कर चलनेवाले सुभौम चक्रवर्तीकी अनुपम दीप्ति थी उसी प्रकार शत्रुके सम्मुख जानेवाले रावणकी दीप्ति भी अनुपम थी ॥३५॥


ज्ञात्वा दशाननं प्राप्तं सैन्यनिस्वनसूचितम् । संचुक्षोभ पुरं सर्वं वरुणस्य महारवम् ॥३६॥

अर्थ: सेनाकी कल-कलसे दशाननको आया जान वरुणका समस्त नगर क्षुभित हो गया उसमें बड़ा कुहराम मच गया ॥३६॥


पातालपुण्डरीकाख्यं तत्पुरं प्रबलध्वजम् । सुरत्नतोरणं जातं सन्नाहरवसंकुलम् ॥३७॥

अर्थ: वरुणका वह नगर पातालपुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध था । उसमें मजबूत ध्वजाएँ लगी हुई थीं और रत्नमयी तोरण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे, पर रावणके पहुँचनेपर सारा नगर युद्धकी तैयारी सम्बन्धी कल-कलसे व्याप्त हो गया ॥३७॥


तत्रासुरपुराकारे पुरे सर्वमनोहरे । आसीच्चकितनेत्राणां स्त्रीणामाकुलता परा ॥३८॥

अर्थ: असुरोंके नगरके समान सबके मनको हरनेवाले उस नगरमें खासकर स्त्रियोंमें बड़ी आकुलता उत्पन्न हो रही थी । भयसे उनके नेत्र चकित हो गये थे ॥३८॥


योधास्तत्र निराक्रामन् समा भवनवासिनाम् । चमरासुरतुल्यश्च वरुणः शौर्यगर्वितः ॥३९॥

अर्थ: वहाँ भवनवासी देवोंके समान जो योद्धा थे वे बाहर निकल आये तथा चमरेन्द्रके समान पराक्रमसे गर्वीला वरुण भी निकलकर बाहर आया ॥३९॥


तस्य पुत्रशतं तावदुत्थितं योद्धुमुद्धतम् । नाना प्रहरणव्रातरुद्धभास्करदर्शनम् ॥४०॥

अर्थ: जिन्होंने नाना प्रकारके शस्त्रोंके समूहसे सूर्यका दिखना रोक दिया था ऐसे वरुणके सौ पराक्रमी पुत्र भी युद्ध करनेके लिए उठ खड़े हुए ॥४०॥


आपातमात्रकेणैव भग्नं तै राक्षसं बलम् । असुराणामिवोदारैः कुमारैः क्षौद्रदैवतम् ॥४१॥

अर्थ: सो जिस प्रकार असुरकुमार अन्य क्षुद्र देवताओंको क्षण एकमें पराजित कर देते हैं उसी प्रकार वरुणके सौ पुत्रोंने क्षण एकमें ही राक्षसोंकी सेनाको परा- जित कर दिया ॥४१॥


अन्तर्भ्रातृशतेनैतद्राक्षसानां बलं क्षतम् । गोयूथवदरं चक्रे भ्रमणं भयसंकुलम् ॥४२॥

अर्थ: जिसके अन्दर सौ भाई अपनी कला दिखा रहे थे ऐसी वरुणकी सेनासे खण्डित हुई रावणकी सेना गायोंके झुण्डके समान भयभीत हो तितर-बितर हो गयी ॥४२॥


चक्रचापघनप्रासशतघ्नीप्रभृतीनि च । शस्त्राणि रक्षसां पेतुः करात्प्रस्वेदपिच्छलात् ॥४३॥

अर्थ: राक्षसोंके हाथ पसीनेसे गीले हो गये जिससे चक्र, धनुष, घन, प्रास, शतघ्नी आदि शस्त्र उनसे छूट-छूटकर नीचे गिरने लगे ॥४३॥


ततस्तं शरजालेन समालोक्याकुलीकृतम् । स्वसैन्यं वेगवद्वर्षहतोऽरुणकरोपमम् ॥४४॥

विंशत्यर्द्धमुखः क्रुद्धो भित्त्वा रिपुबलं क्षणात् । प्रविष्टः पातयन्वीरान् गजेन्द्र इव पादपान् ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने देखा कि हमारी सेना बाणोंके समूहसे व्याकुल होकर प्रातः-कालीन सूर्यकी किरणोंके समान लाल-लाल हो रही है तब वह बाणोंकी वेगशाली वर्षासे स्वयं ताडित होता हुआ भी क्रुद्ध हो क्षण एकमें शत्रुदलको भेदकर भीतर घुस गया और जिस प्रकार गजराज वृक्षोंको नीचे गिराता है उसी प्रकार वरुणकी सेनाके वीरोंको मार-मारकर नीचे गिराने लगा ॥४४-४५॥


ततोऽसौ युगपत्पुत्रैः वरुणस्य समावृतः । आदित्य इव गर्जद्भिः प्रावृषेण्यबलाहकैः ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर वरुणके सौ पुत्रोंने रावणको इस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार कि वर्षाऋतुके गरजते हुए बादल सूर्यको घेर लेते हैं ॥४६॥


तस्येषुभिर्वपुर्भिन्नं सर्वदिग्भ्यः समागतैः । तथापि मानिसिंहोऽसौ न मुञ्चति रणाजिरम् ॥४७॥

अर्थ: यद्यपि सब दिशाओंसे आनेवाले बाणोंसे रावणका शरीर खण्डित हो गया तो भी वह अभिमानी युद्धके मैदानको नहीं छोड़ रहा था ॥४७॥


भास्करश्रवणः श्रेष्ठो नृणामिन्द्रजितस्तथा । अन्ये च रक्षसां नाथा वरुणेनाग्रतः कृताः ॥४८॥

अर्थ: उधर वरुणने भी देदीप्यमान कानोंको धारण करनेवाले नरश्रेष्ठ इन्द्रजित् तथा राक्षसोंके अन्य अनेक राजाओंको अपने सामने किया अर्थात् उनसे युद्ध करने लगा ॥४८॥


ततो लक्षीकृतं दृष्ट्वा शराणां वरुणात्मजैः । रावणं शोणितस्रुत्या किंशुकोत्करसंनिभम् ॥४९॥

रथमाशु समारुह्य महापुरुषमध्यगम् । बन्धुवत्प्रीतिचेतस्कः स रराज तमोरविः ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर वरुणके पुत्रने जिसे अपने बाणोंका निशाना बनाया था और जो रुधिरके बहनेसे पलाशके फूलोंके समूहके समान जान पड़ता था ऐसे रावणको देखकर हनूमान् शीघ्र ही महापुरुषों-के बीचमें चलनेपर रथपर सवार हुआ । उस समय उसका चित्त रावणके भाईके समान प्रीतिसे युक्त था तथा वह सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥४९-५०॥


मारुतिर्मारुतं वेगाज्जयन् जयकृतादरः । उद्यतः कालवद्योद्धुं रविमण्डलभासुरः ॥५१॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो अपने वेगसे पवन-को जीत रहा था, विजय प्राप्त करनेमें जिसका आदर था और जो सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान हो रहा था ऐसा हनूमान् यमराजके समान युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ ॥५१॥


तेन वारुणयः सर्वे प्रेरिताः प्रपलायिताः । महारयसमीरेण घनसंघा इवोन्नताः ॥५२॥

अर्थ: सो जिस प्रकार महावेगशाली वायुसे प्रेरित उन्नत मेघोंका समूह इधर-उधर उड़ जाता है उसी प्रकार हनूमान्के द्वारा प्रेरित हुए वरुणके सब पुत्र इधर-उधर भाग खड़े हुए ॥५२॥


प्रविष्टः परसैन्यं स दृष्टोऽन्यत्र मुहुर्मुहुः । कदलीकाननच्छेदक्रीडां चक्रेऽरिमूर्तिषु ॥५३॥

अर्थ: वह बार-बार शत्रुओंके शरीरोंके साथ कदली वनको छेदनेकी क्रीड़ा करता था अर्थात् शत्रुओंके शरीरको कदली वनके समान अनायास ही काट रहा था ॥५३॥


कंचिल्लाङ्गूलपाशेन विद्यारचितमूर्तिना । आकर्षत्परमं वीरं स्नेहेन सुहृदं यथा ॥५४॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई पुरुष स्नेहके द्वारा अपने मित्रको खींच लेता है उसी प्रकार उसने किसी वीरको विद्यानिर्मित लांगूलरूपी पाशसे खींच लिया था ॥५४॥


कंचिदुल्काभिघातेन मस्तकोपर्यताडयत् । हेतुमुद्गरघातेन मिथ्यादृष्टिमिवार्हतः ॥५५॥

अर्थ: और जिस प्रकार कोई जिनभक्त हेतुरूपी मुद्गरके प्रहारसे मिथ्यादृष्टिके मस्तकपर प्रहार करता है उसी प्रकार वह किसीके शिरपर उल्काके प्रहारसे चोट पहुँचा रहा था ॥५५॥


क्रीडन्तमिति तं दृष्ट्वा श्रीशैलं वानरध्वजम् । अभ्याजगाम वरुणो कोपारुणनिरीक्षणः ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार वानरकी ध्वजासे सुशोभित हनूमान्को क्रीड़ा करते देख क्रोधसे लाल-लाल नेत्र करता हुआ वरुण उसके सामने आया ॥५६॥


श्रीशैलाभिमुखं दृष्ट्वा वारुणं राक्षसाधिपः । धावमानं रुरोधारिं गिरिवन्निम्नगाजलम् ॥५७॥

अर्थ: ज्योंही रावणने वरुणको हनूमान्के सामने दौड़ता आता देखा त्यों ही उसने शत्रुको बीचमें उस प्रकार रोक लिया जिस प्रकार कि पहाड़ नदीके जलको रोक लेता है ॥५७॥


वरुणस्याभवद् युद्धं यावन्नाथेन रक्षसाम् । वाजिवारणपादातशस्त्रसंघातसंकुलम् ॥५८॥

अर्थ: इधर जबतक वरुणका रावणके साथ घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही तथा शस्त्रोंके समूहसे व्याप्त युद्ध हुआ ॥५८॥


तावत्पुत्रशतं तस्य बद्धं पवनसूनुना । चिरं युद्धसमुद्भूतखेदं विहतसैनिकम् ॥५९॥

अर्थ: तबतक हनूमान्ने वरुणके सौके सौ ही पुत्र बाँध लिये । वे चिरकाल तक युद्ध करते-करते थक गये थे तथा उनके सैनिक मारे गये थे ॥५९॥


श्रुत्वा पुत्रशतं बद्धं वरुणः शोकविह्वलः । विद्यास्मरणनिर्मुक्तो बभूव श्लथविक्रमः ॥६०॥

अर्थ: सौके सौ ही पुत्रोंको बँधा सुनकर वरुण शोकसे विह्वल हो गया । वह विद्याका स्मरण भूल गया और उसका पराक्रम ढीला पड़ गया ॥६०॥


प्राप्यास्य रावणश्छिद्रं विद्यामुच्छिद्य योधिनीम् । जीवग्राहमिमं क्षिप्रं जग्राह रणकोविदः ॥६१॥

अर्थ: रण-निपुण रावणने छिद्र पाकर वरुणकी योधिनी नामा विद्या छेद डाली तथा उसे जीवित पकड़ लिया ॥६१॥


तदा वरुणचन्द्रस्य भ्रष्टपुत्रकरश्रियः । उदयेन विमुक्तस्य रावणो राहुतामगात् ॥६२॥

अर्थ: उस समय जिसके पुत्ररूपी किरणोंकी शोभा नष्ट हो गयी थी तथा जो उदयसे रहित था ऐसे वरुणरूपी चन्द्रमाके लिए रावणने राहुका काम किया था ॥६२॥


शस्त्रपञ्जरमध्यस्थो भग्नमानश्च सोऽर्पितः । सादरं कुम्भकर्णस्य रक्षितुं विस्मयेक्षितः ॥६३॥

अर्थ: जो शत्रुरूपी पिंजड़ेके मध्यमें स्थित था, जिसका मान नष्ट हो गया था और जिसे लोग बड़े आश्चर्यसे देखते थे ऐसा वरुण रक्षा करनेके लिए आदरके साथ कुम्भकर्णको सौंपा गया ॥६३॥


ततो विश्रमयन् सैन्यं रावणश्चिरनिर्वृतः । उद्याने प्रवरे तस्थौ भवनोन्मादनामनि ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत दिन बाद निश्चिन्तताको प्राप्त हुआ रावण सेनाको विश्राम देता हुआ भवनोन्माद नामक उत्कृष्ट उद्यानमें ठहरा रहा ॥६४॥


समुद्रासंगशीतेन वायुनास्य व्यनीयत । सैन्यस्य रणजः खेदो वृक्षच्छायानुवर्तिनः ॥६५॥

अर्थ: वृक्षोंकी छायाके नीचे ठहरी हुई इसकी सेनाका युद्धजनित खेद समुद्रके सम्बन्धसे शीतल वायुने दूर कर दिया था ॥६५॥


गृहीतं नायकं ज्ञात्वा वरुणस्याखिलं बलम् । प्रविवेश पुरं भीतं पौण्डरीकं सभाकुलम् ॥६६॥

अर्थ: स्वामीको पकड़ा जानकर वरुणकी समस्त सेना भयभीत हो व्याकुलतासे भरे पुण्डरीक नगरमें घुस गयी ॥६६॥


तदेव साधनं तावन्त एव च महाभटाः । प्रधानस्य वियोगेन प्रापुर्व्यर्थशरीरताम् ॥६७॥

अर्थ: यद्यपि वही सेना थी, और वे ही महायोद्धा थे तो भी प्रधान पुरुषके बिना सब व्यर्थ हो गये ॥६७॥


पुण्यस्य पश्यतौदार्यं यदुद्भवति तद्वति । बहूनामुद्भवः पुंसां पतिते पतनं तथा ॥६८॥

अर्थ: अहो ! पुण्यका माहात्म्य देखो कि पुण्यवान्के उत्पन्न होते ही अनेक पुरुषोंका उद्भव हो जाता है और उसके नष्ट होनेपर अनेक पुरुषोंका पतन हो जाता है ॥६८॥


अथ भास्करकर्णस्तन्मथ्नाति स्म पुरं रिपोः । विह्वलीभूतनिश्शेषजनसंघातसंकुलम् ॥६९॥

अर्थ: अथानन्तर कुम्भकर्ण घबड़ाये हुए समस्त मनुष्योंके समूहसे व्याप्त शत्रुके उस नगरको नष्ट-भ्रष्ट करने लगा ॥६९॥


लुण्टितं चात्र सकलं धनरत्नादिकं भटैः । अरातिपुरकोपेन न तु लोभवशस्थितैः ॥७०॥

अर्थ: योद्धाओंने उस नगरकी धन-रत्न आदिक समस्त कीमती वस्तुएँ लूट लीं । यह लूट शत्रुके नगरपर क्रोध होनेके कारण ही की गयी थी न कि लोभके वशीभूत होकर ॥७०॥


रतिविभ्रमधारिण्यः स्रवदस्राकुलेक्षणाः । विलपन्त्यो वराकाश्च गृह्यन्ते स्म वराङ्गनाः ॥७१॥

अर्थ: जो रतिके समान विभ्रमको धारण करनेवाली थीं, जिनके नेत्र झरते हुए आँसुओंसे व्याप्त थे तथा जो विलाप कर रही थीं ऐसी बेचारी उत्तमोत्तम स्त्रियाँ पकड़कर लायी गयीं ॥७१॥


स्तनावनम्रदेहास्ताश्चलत्पल्लवपाणयः । कूजन्त्यो बान्धवान् सर्वान् गृहीता निष्ठुरैर्नरैः ॥७२॥

अर्थ: जिनके शरीर स्तनोंके भारसे नम्र थे, जिनके पल्लवोंके समान कोमल हाथ हिल रहे थे और जो समस्त बन्धुजनोंको चिल्ला-चिल्लाकर पुकार रही थीं ऐसी उन स्त्रियोंको निष्ठुर मनुष्य पकड़कर ला रहे थे ॥७२॥


विमानाभ्यन्तरन्यस्ता काचिदेवमभाषत । सखीं शोकग्रहग्रस्तसमस्तास्यनिशाकरा ॥७३॥

सखि ! शीलविनाशो मे यदि नाम भवेदिह । उल्लम्ब्यांशुकपट्टेन मरिष्यामि न संशयः ॥७४॥

अर्थ: जिसका मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमा शोकरूपी राहुके द्वारा ग्रसा गया था ऐसी विमानके भीतर डाली गयी कोई स्त्री सखीसे कह रही थी कि हे सखि ! यदि कदाचित् मेरे शीलका भंग होगा तो मैं वस्त्रकी पट्टीसे लटककर मर जाऊँगी इसमें संशय नहीं है ॥७३-७४॥


संदिग्धमरणं काचिद् व्याहरन्ती मुहुः प्रियम् । संस्मृत्य तद्गुणान् मूर्च्छामानर्च्छ म्लानलोचना ॥७५॥

अर्थ: जिसके मरनेमें सन्देह था ऐसे पतिको बार-बार पुकारती हुई म्लान लोचनोंवाली कोई स्त्री उसके गुणोंका स्मरण कर मूर्च्छाको प्राप्त हो रही थी ॥७५॥


मातरं पितरं कान्तं भ्रातरं मातुलं सुतम् । आह्वयन्त्यः क्षरन्नेत्रास्ता मुनेरपि दुःखदाः ॥७६॥

अर्थ: जो माता, पिता, भाई, मामा और पुत्रको बुला रही थीं तथा जिनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे ऐसी वे स्त्रियाँ मुनिके लिए भी दुःख-दायिनी हो रही थीं अर्थात् उनकी दशा देख मुनिके हृदयमें भी दुःख उत्पन्न हो जाता था ॥७६॥


काचिद्भास्करकर्णस्य शोभया हृतलोचना । जगादोपांशुविस्रम्भात् सखीं कमललोचना ॥७७॥

सखि कापि ममोत्पन्ना दृष्ट्वैतं नरपुङ्गवम् । धृतिर्यया कृतेवाहं परायत्तशरीरिका ॥७८॥

अर्थ: कुम्भकर्णकी शोभासे जिसके नेत्र हरे गये थे ऐसी कोई एक कमल-लोचना स्त्री एकान्त पाकर विश्वासपूर्वक सखीसे कह रही थी कि हे सखि ! इस श्रेष्ठ नरको देखकर मुझे कोई अद्भुत ही आनन्द उत्पन्न हुआ है और जिस आनन्दसे मानो मेरा समस्त शरीर पराधीन ही हो गया है ॥७७-७८॥


इति शुद्धा विरुद्धाश्च विकल्पास्तत्र योषिताम् । बभूवुः कर्मवैचिञ्याल्लोकोऽयं चित्रचेष्टितः ॥७९॥

अर्थ: इस प्रकार कर्मोंकी विचित्रतासे उन स्त्रियोंमें शुद्ध तथा विरुद्ध दोनों प्रकारके विकल्प उत्पन्न हो रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि लोगोंकी चेष्टाएँ विचित्र हुआ करती हैं ॥७९॥


कुबेर इव सद्भूतिः प्रवीरभटसेवितः । जयनिस्वानमुखरः कान्तलीलासमन्वितः ॥८०॥

अवतीर्य विमानान्ताद् भास्करश्रवणो मुदा । पुरो राक्षसनाथस्य धूसरोष्ठीरतिष्ठपत् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर जो कुबेरके समान समीचीन विभूतिका धारक था, अत्यन्त बलवान् योद्धा जिसकी सेवा कर रहे थे, जो जय-जयकी ध्वनिसे मुखर था और सुन्दर लीलासे सहित था ऐसे कुम्भकर्णने विमानसे उतरकर बड़े हर्षके साथ उन धूसर ओठोंवाली अपहृत स्त्रियोंको रावणके सामने खड़ा कर दिया ॥८०-८१॥


ता विषादवतीर्दृष्ट्वा बाष्पपूरितलोचनाः । बन्धुभी रहिता नम्राः सवेपथुशरीरिकाः ॥८२॥

वदन्तीः करुणं स्वैरं किमपि त्रपयान्विताः । रावणः करुणाविष्टो जगादेति सहोदरम् ॥८३॥

अर्थ: वे स्त्रियाँ विषादसे युक्त थीं, उनके नेत्र आँसुओंसे भरे हुए थे, बन्धुजनोंसे रहित थीं, नम्र थीं, उनके शरीर कांप रहे थे, वे इच्छानुसार कुछ दयनीय शब्दोंका उच्चारण कर रही थीं तथा लज्जासे युक्त थीं । उन स्त्रियोंको देखकर रावण करुणायुक्त हो कुम्भकर्णसे इस प्रकार कहने लगा ॥८२-८३॥


अहोऽत्यन्तमिदं बाल त्वया दुश्चरितं कृतम् । कुलनार्यो यदानीता वन्दीग्रहणपञ्जरम् ॥८४॥

अर्थ: कि अहो बालक ! जो तू कुलवती स्त्रियोंको बन्दीके समान पकड़कर लाया है यह तूने अत्यन्त दुश्चरितका कार्य किया है ॥८४॥


दोषः कोऽत्र वराकीणां नारीणां मुग्धचेतसाम् । खलीकारमिमा येन त्वंयका प्रापिता मुधा ॥८५॥

अर्थ: इन बेचारी भोली-भाली स्त्रियोंका इसमें क्या दोष था जो तूने व्यर्थ ही इन्हें कष्ट पहुँचाया है ? ॥८५॥


पालिका मुग्धलोकस्य शत्रुलोकस्य नाशिका । गुरुशुश्रूषिणी चेष्टा ननु चेष्टा महात्मनाम् ॥८६॥

अर्थ: जो चेष्टा मुग्धजनोंका पालन करनेवाली है, शत्रुओंका नाश करनेवाली है और गुरुजनोंकी शुश्रूषा करनेवाली है यथार्थमें वही महापुरुषोंकी चेष्टा कहलाती है ॥८६॥


इत्युक्त्वा मोचितास्तेन क्षिप्रं ता ययुरालयम् । आश्वासिता गिरा साध्व्यः सद्यः शिथिलसाध्वसाः ॥८७॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने उन्हें शीघ्र ही छुड़वा दिया जिससे वे अपने-अपने घर चली गयीं। यही नहीं उसने साध्वी स्त्रियोंको अपनी वाणीसे आश्वासन भी दिया जिससे उन सबका भय शीघ्र ही कम हो गया ॥८७॥


आनाय्य वरुणोऽवाचि रावणेनाथ सत्रपः । भटदर्शनमात्रेण कृतरक्षोनताननः ॥८८॥

प्रवीण मा कृथाः शोकं युद्धग्रहणसंभवम् । ग्रहणं ननु वीराणां रणे सत्कीर्तिकारणम् ॥८९॥

अर्थ: अथानन्तर जो लज्जासे सहित था तथा जिसने सुभटोंके देखने मात्रसे राक्षसोंका मुख नीचा कर दिया था ऐसे वरुणको बुलाकर रावणने कहा कि हे प्रवीण ! युद्धमें पकड़े जानेका शोक मत करो क्योंकि युद्धमें वीरोंका पकड़ा जाना तो उनकी उत्तम कीर्तिका कारण है ॥८८-८९॥


द्वयमेव रणे वीरैः प्राप्यते मानशालिभिः । ग्रहणं मरणं वापि कातरैश्च पलायितुम् ॥९०॥

अर्थ: मानशाली वीर युद्धमें दो ही वस्तुएँ प्राप्त करते हैं एक तो पकड़ा जाना और दूसरा मारा जाना। इनके सिवाय जो कायर लोग हैं वे भाग जाना प्राप्त करते हैं ॥९०॥


पुरावदखिलं स त्वं राज्यं रक्ष निजे पदे । मित्रबान्धवसंपन्नः सकलोपद्रवोज्झितम् ॥९१॥

अर्थ: तुम पहलेके समान ही समस्त मित्र और बन्धुजनोंसे सम्पन्न हो सकल उपद्रवोंसे रहित अपने सम्पूर्ण राज्यका अपने ही स्थानमें रहकर पालन करो ॥९१॥


अथैवमुक्तो वरुणः स वीरं कृत्वाञ्जलिं प्रावददेतमेव । विशालपुण्यस्य तवात्र लोके मूढो जनो तिष्ठति वैरभावे ॥९२॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर वरुणने हाथ जोड़कर वीर रावणसे कहा कि इस संसारमें आपका पुण्य विशाल है जो आपके साथ वैर रखता है वह मूर्ख है ॥९२॥


अहो महद्धैर्यमिदं त्वदीयं मुनेरिव स्तोत्रसहस्रयोग्यम् । विहाय रत्नानि पराजितोऽहं त्वया यदभ्युन्नतशासनेन ॥९३॥

अर्थ: अहो ! यह तुम्हारा बड़ा धैर्य है, यह मुनिके धैर्यके समान हजारों स्तवन करनेके योग्य है, कि जो तुमने दिव्य रत्नोंका प्रयोग किये बिना ही मुझे जीत लिया। यथार्थमें तुम्हारा शासन उन्नत है ॥९३॥


वायोः सुतस्यैव कथं प्रभावो निगद्यतामद्भुतकर्मणोऽपि । यतस्त्वदीयेन शुभेन साधो समादृतः सोऽपि महानुभावः ॥९४॥

अर्थ: अथवा आश्चर्यकारी कार्य करनेवाले हनूमान्का ही प्रभाव कैसे कहा जाये ? क्योंकि हे सत्पुरुष ! वह महानुभाव भी आपके ही शुभोदयसे यहाँ आया था ॥९४॥


न कस्यचिन्नाम महीयमेतां गोत्रक्रमाद्विक्रमकोशधारिता । वीरस्य भोग्येयमसौ भवांश्च तेषां स्थितो मूर्धनि शाधि लोकम् ॥९५॥

अर्थ: पराक्रमरूपी कोशसे जिसकी रक्षा की गयी ऐसी यह पृथिवी गोत्रकी परिपाटीके अनुसार किसीको प्राप्त नहीं हुई । यह तो वोर मनुष्यके भोगने योग्य है और आप वीर मनुष्योंमें अग्रसर हो अतः आप लोकका पालन करो ॥९५॥


स्वामी त्वमस्माकमुदारकीर्ते क्षमस्व दुर्वाक्यकृतं निकारम् । वक्तव्यमित्येव वदामि नाथ क्षमा तु दृष्टैव तवात्युदारा ॥९६॥

अर्थ: हे उदार यशके धारक ! आप हमारे स्वामी हो । मेरे दुर्वचनोंसे आपको जो दुःख हुआ हो उसे क्षमा करो । हे नाथ ! ऐसा कहना चाहिए, इसीलिए कह रहा हूँ । वैसे आपकी अत्यन्त उदार क्षमा तो देख ही ली है ॥९६॥


तेन त्वया सार्धमहं विधाय संबन्धमत्युन्नतचेष्टितेन । कृतार्थतामेमि ततो गृहाण तन्मे सुतां योग्यतमस्त्वमस्याः ॥९७॥

अर्थ: आप अत्यन्त चेष्टाके धारक हो इसलिए आपके साथ सम्बन्ध कर मैं कृतकृत्य होना चाहता हूँ । आप मेरी पुत्री स्वीकृत कीजिए क्योंकि इसके योग्य आप ही हैं ॥९७॥


एवं गदित्वा तनुजां विनीतां प्रकीर्तितां सत्यवतीति नाम्ना । ललाम रूपां जनितां सुदेव्यां समर्पयत्तामरसाभवक्त्राम् ॥९८॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने सुन्दर रूपकी धारक, सुदेवी रानीसे उत्पन्न, कमलके समान मुखवाली, सत्यवती नामसे प्रसिद्ध अपनी विनीत कन्या रावणके लिए समर्पित कर दी ॥९८॥


तयोर्महान् संववृते विवाहे समुत्सवः पूजितसर्वलोकः । तयोर्हि निःशेषसमृद्धिभाजोरन्वेषणीयं न समस्ति किंचित् ॥९९॥

अर्थ: उन दोनोंके विवाहमें ऐसा बड़ा भारी उत्सव हुआ था कि जिसमें सब लोगोंका सम्मान किया गया तो ठीक ही है क्योंकि दोनों ही समस्त समृद्धिको प्राप्त थे, अतः उन्हें कोई भी वस्तु खोजनी नहीं पड़ी थी ॥९९॥


संमानितस्तेन च मानितेन कृतानुयानः कतिचिद्दिनानि । सुतावियोगव्यथितान्तरात्मा स्वराजधानीं वरुणो विवेश ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार सम्मानको प्राप्त हुए रावणने जिसका सम्मान किया था तथा रावण स्वयं जिसे भेजनेके लिए पीछे-पीछे गया था ऐसा वरुण अपनी राजधानीमें प्रविष्ट हुआ । वहाँ पुत्रीके वियोगसे कुछ दिन तक उसकी अन्तरात्मा दुःखी रही ॥१००॥


कैलासकम्पोऽपि समेत्य लङ्का विधाय संमानमतिप्रधानम् । महाप्रभां चन्द्रनखातनूजां ददौ समीरप्रभवाय कन्याम् ॥१०१॥

अनङ्गपुष्पेति समस्तलोके गतां प्रसिद्धिं गुणराजधानीम् । अनङ्गपुष्पायुधभूतनेत्रां लब्ध्वा स तां तोषमुदारमार ॥१०२॥

अर्थ: कैलासको कम्पित करनेवाले रावणने भी लंकामें आकर तथा बहुत भारी सम्मान कर हनूमान्के लिए चन्द्रनखाकी कान्तिमती पुत्री समर्पित की । उस कन्याका नाम लोकमें ‘अनंगपुष्पा’ प्रसिद्ध था । वह गुणोंकी राजधानी थी और उसके नेत्र कामदेवके पुष्परूपी शस्त्र अर्थात् कमलके समान थे । उसे पाकर हनूमान् अत्यधिक सन्तोषको प्राप्त हुआ ॥१०१-१०२॥


श्रियां च संगादिनि कर्णकुण्डले पुरेऽस्य चक्रे क्षितिपाभिषेचनम् । स्थितः स तत्रोत्तमभोगसंगतो यथोर्द्ध्वलोके भुवनस्य पालकः ॥१०३॥

अर्थ: कन्या ही नहीं दी किन्तु लक्ष्मीसे भरपूर कर्णकुण्डलनामा नगरमें उसका राज्याभिषेक भी किया सो जिस प्रकार स्वर्गलोकमें इन्द्र रहता है उसी प्रकार वह उस नगरमें उत्तम भोग भोगता हुआ रहने लगा ॥१०३॥


तथा नलः किष्कुपुरे शरीरजां प्रसिद्धिमेवां हरिमालिनीं श्रुतिम् । श्रियं जयन्तीमपि रूपसंपदा ददौ विभूत्या परया हनूमते ॥१०४॥

अर्थ: किष्कुपुरके राजा नलने भी रूपसम्पदाके द्वारा लक्ष्मीको जीतनेवाली अपनी हरिमालिनी नामकी प्रसिद्ध पुत्री बड़े वैभवके साथ हनूमान्‌को दी ॥१०४॥


पुरे तथा किन्नरगीतसंज्ञके स लब्धवान् किन्नरकन्यकाशतम् ।
इति क्रमेणास्य बभूव योषितां परं सहस्राद्गणनं महात्मनः ॥१०५॥

अर्थ: इसी प्रकार किन्नरगीत नामा नगरमें भी उसने किन्नरजातिके विद्याधरोंकी सौ कन्याएँ प्राप्त कीं। इस तरह उस महात्माके यथाक्रमसे एक हजारसे भी अधिक स्त्रियाँ हो गयीं ॥१०५॥


भ्रमन्नसौ येन महीधरेऽस्थाच्छ्रीशैलसंज्ञोऽत्र समीरसूनुः । श्रीशैल इत्यागतवानसौ तत् ख्यातिं पृथिव्यामिति रम्यसानुः ॥१०६॥

अर्थ: चूँकि श्रीशैल नामको धारण करनेवाले हनूमान् भ्रमण करते हुए उस पर्वतपर आकर ठहर गये थे इसलिए सुन्दर शिखरोंवाला वह पर्वत पृथिवीमें ‘श्रीशैल’ इस नामसे ही प्रसिद्ध हो गया ॥१०६॥


तदास्ति किष्किन्धपुरे महात्मा सुग्रीवसंज्ञः पुरखेचरेशः । तारेति तारापति कान्तवक्त्रा बभूव रामास्य रते समाना ॥१०७॥

अर्थ: अथानन्तर उस समय किष्किन्धपुर नामा नगरमें विद्याधरोंके राजा उदारचेता सुग्रीव रहते थे। उनकी चन्द्रमाके समान मुखवाली तथा सुन्दरतामें रतिकी समानता करनेवाली तारा नामकी स्त्री थी ॥१०७॥


तयोस्तनूजा नवपद्मरागा गुणैः प्रतीता भुवि पद्मरागा । पद्मेव रूपेण विशालनेत्रा मामण्डलप्रावृतवक्त्रपद्मा ॥१०८॥

महेभकुम्भोन्नतपीवरस्तनी सुरेन्द्रशस्त्रग्रहणोपमोदरी ।
विशाललावण्यतडागमध्यगा मलिम्लुचा सर्वजनान्तरात्मनाम् ॥१०९॥

अर्थ: उन दोनोंके एक पद्मरागा नामकी पुत्री थी । उस पुत्रीका रंग नूतन कमलके समान था, गुणोंके द्वारा वह पृथिवीमें अत्यन्त प्रसिद्ध थी, रूपसे लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, उसके नेत्र विशाल थे, उसका मुखकमल कान्तिके समूहसे आवृत था, उसके स्तन किसी बड़े हाथीके गण्डस्थलके समान उन्नत और स्थूल थे, उसका उदर इन्द्रायुध अर्थात् वज्रके पकड़नेकी जगहके समान कृश था, वह अत्यधिक सौन्दर्यरूपी सरोवरके मध्यमें संचार करनेवाली थी तथा सर्व मनुष्योंकी अन्तरात्माको चुरानेवाली थी ॥१०८-१०९॥


विचिन्तयन्तौ पितरौ च तस्या योग्यं वरं शोभनविभ्रमायाः ।
नक्तं न निद्रां सुखतो लभेतां दिवा तु नैव प्रविकीर्णचित्तौ ॥११०॥

अर्थ: सुन्दर विभ्रमोंसे युक्त उस कन्याके योग्य वरकी खोज करते हुए माता-पिता न रातमें सुखसे नींद लेते थे और न दिनमें चैन । उनका चित्त सदा इसी उलझनमें उलझा रहता था ॥११०॥


ततः पटेष्विन्द्रजितप्रधाना विद्याधराः सूचितशीलवंशाः । चित्रीकृताश्चित्रगुणा दुहित्रे प्रदर्शिताश्चारुरुचः पितृभ्याम् ॥१११॥

अर्थ: तदनन्तर जो नाना गुणोंके धारक थे, जिनकी कान्ति अत्यन्त मनोहर थी, और साथ ही जिनके शील तथा वंशका परिचय दिया गया था ऐसे इन्द्रजित् आदि प्रधान विद्याधरोंके चित्रपट लिखाकर माता-पिताने पुत्रीको दिखलाये ॥१११॥


अनुक्रमात्साथ निरीक्षमाणा मुहुर्मुहुः संहृतनेत्रकान्तिः ।
सद्यः समाकृष्टविचेष्टदृष्टिर्बाला हनूमत्प्रतिमां ददर्श ॥११२॥

अर्थ: अनुक्रमसे उन चित्रपटोंको देखकर कन्याने बार-बार अपनी दृष्टि संकुचित कर ली । अन्तमें हनूमान्का चित्रपट उसे दिखाया गया तो उस ओर उसकी दृष्टि शीघ्र ही आकर्षित होकर निश्चल हो गयी । उसे वह अनुरागसे देखती रही ॥११२॥


दृष्ट्वा च तं वायुसुतं पटस्थं सादृश्यनिर्मुक्तसमस्तदेहम् । अताडयतासौ मदनस्य बाणैः सुदुस्सहैः पञ्चभिरेककालम् ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका समस्त शरीर सदृशतासे रहित था ऐसे चित्रपटमें स्थित हनूमान्को देखकर वह कन्या एक ही साथ कामदेवके पाँचों दुःसह बाणोंसे ताड़ित हो गयी ॥११३॥


तत्रानुरक्तामधिगम्य बाढमेतामुवाचेति सखी गुणज्ञा ।
अयं स बाले पवनंजयस्य श्रीशैलनामा तनयः प्रतीतः ॥११४॥

अर्थ: उसे हनूमान्में अनुरक्त देख गुणोंको जाननेवाली सखीने कहा कि हे बाले ! यह पवनंजयका श्रीशैल नामसे प्रसिद्ध पुत्र है ॥११४॥


गुणास्तवास्य प्रथिता पुरैव शोभा तु दृग्गोचरतां प्रयाता ।
एतेन सार्धं भज कामभोगान् पित्रोः प्रयच्छातिचिरेण निद्राम् ॥११५॥

अर्थ: इसके गुण तो तुम्हें पहलेसे ही विदित थे और सुन्दरता तुम्हारे नेत्रोंके सामने है इसलिए इसके साथ कामभोगको प्राप्त करो तथा माता-पिताको चिरकाल बाद निद्रा प्रदान करो अर्थात् निश्चिन्त होकर सोने दो ॥११५॥


अहो पुनश्चित्रगतेन ते सता मनोविकारो जनितो हनूमता ।
सखीं वदन्तीमिति लज्जया नता जघान लीलाकमलेन कन्यका ॥११६॥

अर्थ: आश्चर्यकी बात है कि हनूमान्ने चित्र-गत होकर भी तेरे मनमें विकार उत्पन्न कर दिया ऐसा कहती हुई सखीको कन्याने लज्जावनत हो लीलाकमलसे ताड़ित किया ॥११६॥


ततो विदित्वा जनकेन तस्या हृतं मनो मारुतनन्दनेन ।
पटः समारूढसुताशरीरः संप्रेषितो वायुसुताय शीघ्रम् ॥११७॥

अर्थ: तदनन्तर जब पिताको पता चला कि कन्याका मन पवनपुत्र हनूमान्के द्वारा हरा गया है तब उसने शीघ्र ही हनूमान्के पास कन्याका चित्रपट भेजा ॥११७॥


दूतो युवा श्रीनगरं समेत्य ज्ञातः प्रविष्टो विहितप्रणामः ।
हनूमते दर्शयति स्म बिम्बं तारात्मजायाः पटमध्ययातम् ॥११८॥

अर्थ: सो सुग्रीवका भेजा हुआ दूत श्रीनगर पहुँचा । वहाँ जाकर उसने अपना परिचय दिया, प्रणाम किया और उसके बाद हनूमान्के लिए ताराकी पुत्री पद्मरागाका चित्रपट दिखलाया ॥११८॥


सत्यं शराः पञ्च मनोभवस्य स्युर्यद्यमुष्मिन् जगति प्रसिद्धाः । कन्या नियुक्तैः कथमेककालं ततः शतैर्वायुसुतं जघान ॥११९॥

अर्थ: जैसा कि इस संसारमें प्रसिद्ध है कि कामदेवके पाँच बाण हैं यदि यह बात सत्य हे तो कन्याने एक ही समय सौ बाणोंके द्वारा हनूमान्को कैसे घायल किया ॥११९॥


अजात एवास्मि न यावदेनां प्राप्नोमि कन्यामिति जातचित्तः । समीरसूनुर्विभवेन युक्तः क्षणेन सुग्रीवपुरं जगाम ॥१२०॥

अर्थ: यदि मैं इस कन्याको नहीं प्राप्त करता हूँ तो मेरा जन्म लेना व्यर्थ है ऐसा मनमें विचारकर हनूमान् बड़े वैभवके साथ क्षण एकमें सुग्रीवके नगरकी ओर चल पड़ा ॥१२०॥


श्रुत्वा तमासन्नतरं प्रवृष्टः सुग्रीवराजोऽभ्युदियाय सद्यः । प्रयुज्यमानोऽर्घशतैर्हनूमान् पुरं प्रविष्टः श्वसुरेण सार्धम् ॥१२१॥

अर्थ: उसे अत्यन्त निकटमें आया सुन सुग्रीव राजा हर्षित होता हुआ शीघ्र ही उसकी अगवानीके लिए गया। तत्पश्चात् जिसे सैकड़ों अर्घ दिये गये थे ऐसे हनूमान्ने श्वसुरके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥१२१॥


तस्मिंस्तदा राजगृहं प्रयाति प्रासादमालामणिजालकस्थाः । तद्दर्शनव्याकुलनेत्रपद्मा मुक्तान्यचेष्टा ललना बभूवुः ॥१२२॥

अर्थ: उस समय जब हनूमान् राजमहलकी ओर जा रहा था तब नगरकी स्त्रियाँ अन्य सब काम छोड़कर महलोंके मणिमय झरोखोंमें जा खड़ी हुई थीं और उस समय उनके नेत्रकमल हनूमान्को देखनेके लिए व्याकुल हो रहे थे ॥१२२॥


गवाक्षजालेन निरीक्षमाणा सुग्रीवजा वायुसुतस्य रूपम् । कामप्यवस्थां मनसा प्रपन्ना स्ववेदनीयां सुकुमारदेही ॥१२३॥

अर्थ: सुकुमार शरीरकी धारक सुग्रीवकी पुत्री पद्मरागा झरोखेसे हनूमान्का रूप देखकर मन-ही-मन अपने आपके द्वारा अनुभव करने योग्य किसी अद्भुत अवस्थाको प्राप्त हुई ॥१२३॥


अयं स नायं पुरुषोऽपरोऽयं कोऽप्येष सोऽसौ सखि सोऽयमेव । इत्यङ्गनाभिः परितर्क्यमाणो विवेश सुग्रीवपुरं हनूमान् ॥१२४॥

अर्थ: सखि ! यह वह पुरुष नहीं है, यह तो कोई दूसरा है, अथवा नहीं सखि ! यह वही है, इस प्रकार स्त्रियाँ जिसके विषयमें तर्कणा कर रहीं थी ऐसे हनूमान्ने नगरमें प्रवेश किया ॥१२४॥


तयोर्विवाहः परया विभूत्या विनिर्मितः सङ्गतसर्वबन्धुः । तौ दम्पती योग्यसमागमेन प्राप्तौ प्रमोदं परमं सुरूपौ ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर बड़े वैभवके साथ उन दोनोंका विवाह हुआ। विवाहमें समस्त बन्धुजन सम्मिलित हुए और अत्यन्त सुन्दर रूपके धारक दोनों दम्पति परम-प्रमोदको प्राप्त हुए ॥१२५॥


जगाम बध्वा सहितो हनूमान् स्थानं निजं निर्वृतचित्तवृत्तिः । कृत्वा सशोकौ श्वसुरौ सवर्गौ सुतावियोगात्स्ववियोजनाच्च ॥१२६॥

अर्थ: जिसका चित्त सन्तुष्ट हो रहा था ऐसे हनूमान् पुत्री तथा अपने आपके वियोगसे परिवार सहित सास-श्वसुरको शोकयुक्त करता हुआ नववधूके साथ अपने स्थानपर चला गया ॥१२६॥


तस्मिंस्तथा श्रीमति वर्तमाने सुते समस्तक्षितियातकीर्तौ । महासुखास्वादसमुद्रमध्ये ममज्ज वायुः क्षितिपोऽञ्जना च ॥१२७॥

अर्थ: इस प्रकार जिसकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही थी ऐसे शोभा अथवा लक्ष्मी सम्पन्न पुत्रके रहते हुए राजा पवनंजय और अंजना महासुखानुभव रूपी सागरके मध्यमें गोता लगा रहे थे ॥१२७॥


श्रीशैलतुल्यैरथ खेचरेशैः सम्मान्यमानो बहुमानधारी । अभूद्दशास्य क्षतसर्वशत्रुः त्रिखण्डनाथो हरिकण्ठतुल्यः ॥१२८॥

अर्थ: अथानन्तर हनूमान् जैसे उत्तमोत्तम विद्याधर राजा जिसका सम्मान करते थे, जो अत्यधिक मानको धारण करनेवाला था, तीन खण्डका स्वामी था और हरिकण्ठके समान था ऐसा रावण समस्त शत्रुओंसे रहित हो गया ॥१२८॥


लङ्कानगर्यां स विशालकान्तिः सुखेन रेमे पृथुभोगजेन ।
समस्तलोकस्य धृतिं प्रयच्छन् यथा सुरेन्द्रः सुरलोकपुर्याम् ॥१२९॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गलोकमें क्रीड़ा करता है उसी प्रकार समस्त लोकोंको आनन्द प्रदान करता हुआ विशाल कान्तिका धारक रावण विशाल भोगोंसे समुत्पन्न सुखसे लंका नगरीमें क्रीड़ा करने लगा ॥१२९॥


महानुभावः प्रमदाजनस्य स्तनेष्वसौ लालितरक्तपाणिः । विवेद नो दीर्घमपि व्यतीतं कालं प्रियावक्त्रतिगिञ्छभृङ्गः ॥१३०॥

अर्थ: स्त्रियोंके मुखरूपी कमलका भ्रमर रावण स्त्रीजनोंके स्तनोंपर हाथ चलाता हुआ बीते हुए बहुत भारी कालको भी नहीं जान पाया अर्थात् कितना अधिक काल बीत गया इसका उसे पता ही नहीं चला ॥१३०॥


एकापि यस्येह भवेद्विरूपा नरस्य जाया प्रतिकूलचेष्टा ।
रतेः पतित्वं स नरः करोति स्थितः सुखे संसृतिधर्मजाते ॥१३१॥

अर्थ: जिस मनुष्यके पास एक ही विरूप तथा निरन्तर झगड़नेवाली स्त्री होती है वह भी सांसारिक सुखमें निमग्न हो अपने आपको रतिपति अर्थात् कामदेव समझता है ॥१३१॥


युक्तः प्रियाणां दशभिः सहस्रैस्तथाष्टभिः श्रीजनितोपमानाम् । महाप्रभावः किमुतैष राजा खण्डत्रयस्यानुपमानकान्तिः ॥१३२॥

अर्थ: फिर रावण तो लक्ष्मीकी उपमा धारण करनेवाली अठारह हजार स्त्रियोंसे युक्त था, महाप्रभावशाली था, तीन खण्डका स्वामी था, अनुपम कान्तिका धारी था अतः उसके विषयमें क्या कहना है ? ॥१३२॥


एवं समस्तखगपैरभिनूयमानः संभ्रान्तसंनतपराङ्गधृतानुशिष्टिः । खण्डत्रयाधिपतिता विहिताभिषेकः साम्राज्यमाप जनताभिनुतं दशास्यः ॥१३३॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त विद्याधर जिसकी स्तुति करते थे, सब लोग घबड़ाकर नम्रीभूत मस्तकपर जिसकी आज्ञा धारण करते थे और तीन खण्डके राज्यपर जिसका अभिषेक किया गया था ऐसा रावण जनसमूहके द्वारा स्तुत साम्राज्यको प्राप्त हुआ ॥१३३॥


विद्याधराधिपतिपूजितपादपद्मः श्रीकीर्तिकान्तिपरिवारमनोज्ञदेहः ।
सर्वग्रहैः परिवृतो दशवक्त्रराजो जातः शशाङ्क इव कस्य न चित्तहारी ॥१३४॥

अर्थ: समस्त विद्याधर राजा जिसके चरणकमलोंकी पूजा करते थे और जिसका शरीर श्री, कीर्ति और कान्तिसे मनोज्ञ था ऐसा रावण सर्वग्रहोंसे परिवृत चन्द्रमाके समान किसका मन हरण नहीं करता था ॥१३४॥


चक्रं सुदर्शनममोघममुष्य दिव्यं मध्याह्नभास्करकरोपममध्यजालम् ।
उद्वृत्तशत्रुनृपवर्गविनाशदक्षं रेजेऽरदृष्टमतिभासुररत्नचित्रम् ॥१३५॥

अर्थ: जिसकी मध्यजाली मध्याह्नके सूर्यकी किरणोंके समान थी, जो उद्दण्ड शत्रु राजाओंके नष्ट करनेमें समर्थ था, जिसके अर स्पष्ट दिखाई देते थे, तथा जो अत्यन्त देदीप्यमान रत्नोंसे चित्र-विचित्र जान पड़ता था ऐसा इसका सुदर्शन नामका अमोघ देवोपनीत चक्र अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१३५॥


दण्डश्च मृत्युरिव जातशरीरबन्धो दुष्टात्मनां भयकरः स्फुरितोग्रतेजाः । उल्कासमूह इव संगतवान् प्रचण्डो जज्वाल शस्त्रभवने प्रतिपन्नपूजः ॥१३६॥

अर्थ: जिसका उग्रतेज सब ओर फैल रहा था ऐसा रावण, दुष्टजनोंको तो ऐसा भय उत्पन्न कर रहा था मानो शरीरधारी दण्ड अथवा मृत्यु ही हो। जब वह शस्त्रशालामें शस्त्रोंकी पूजा करता था तब ऐसा जान पड़ता था मानो इकट्ठा हुआ प्रचण्ड उल्काओंका समूह ही हो ॥१३६॥


सोऽयं स्वकर्मवशतः कुलसंक्रमेण संप्राप्य राक्षसपुरीं पुरुचारुकीर्तिः ।
ऐश्वर्यमद्भुततरं च समन्तभद्रं रक्षःपतिः परमसंसृतिसौख्यमेतः ॥१३७॥

अर्थ: इस प्रकार विशाल तथा सुन्दर कीर्तिको धारण करनेवाला रावण स्वकीय कर्मोदयसे वंशपरम्परागत लंकापुरीको पाकर सर्वकल्याणयुक्त आश्चर्यकारक ऐश्वर्यको तथा संसार सम्बन्धी श्रेष्ठ सुखको प्राप्त हुआ था ॥१३७॥


सद्दृष्टिबोधचरणप्रतिपत्तिहेतौ दूरं गतेऽथ मुनिसुव्रतनाथतीर्थे । अत्यन्तमूढकविभिः परमार्थदूरैर्लोकेऽन्यथैव कथितः पुरुषः प्रधानः ॥१३८॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी प्राप्तिका कारण जो मुनिसुव्रत भगवान्‌का तीर्थ था उसे व्यतीत हुए जब बहुत दिन हो गये तब परमार्थसे दूर रहनेवाले अत्यन्त मूढ़ कवियोंने इस प्रधान पुरुषका लोकमें अन्यथा ही कथन कर डाला ॥१३८॥


विषयवशमुपेतैर्नष्टतत्त्वार्थबोधैः कविभिरतिकुशीलैर्नित्यपापानुरक्तैः । कुरचितगरहेतुग्रन्थवाग्वागुराभिः प्रगुणजनमृगौघो वध्यते मन्दभाग्यः ॥१३९॥

इति विदितयथावद्वृत्तवस्तुप्रपञ्च क्षतकुमतजनोक्तग्रन्थपङ्कप्रसङ्ग । भज सुरपतिवन्द्यं शास्त्ररत्नं जिनानां रविसमधिकतेजः श्रेणिक श्रीविशाले ॥१४०॥

अर्थ: जो विषयोंके अधीन हैं, जिनका तत्त्वज्ञान नष्ट हो गया है, जो अत्यन्त कुशील हैं और निरन्तर पापमें अनुरक्त रहते हैं ऐसे कवि लोग स्वरचित पापवर्धक ग्रन्थरूपी जालसे मन्दभाग्य तथा अत्यन्त सरल मनुष्यरूपी मृगोंके समूहको नष्ट करते रहते हैं। इसलिए जिसने वस्तुका यथार्थस्वरूप समझ लिया है, जिसने मिथ्यादृष्टि जनोंके द्वारा रचित कुशास्त्ररूपी कीचड़का प्रसंग नष्ट कर दिया है, जिसका सूर्यके समान विशाल तेज है और जो लक्ष्मीसे विशाल है ऐसे हे श्रेणिक ! तू इन्द्रद्वारा वन्दनीय जिनशास्त्ररूपी रत्नकी उपासना कर - उसीका अध्ययन-मनन कर ॥१३९-१४०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते रावणसाम्राज्याभिधानं नामैकोनविंशतितमं पर्व ॥१९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें रावणके साम्राज्यका कथन करनेवाला उन्नीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१९॥

२०. विंशतितमं पर्व (तीर्थंकरभवानुकीर्तनं)

अथैवं श्रेणिकः श्रुत्वा विनीतात्मा प्रसन्नधीः । प्रणम्य गणिनः पादौ पुनरूचे सविस्मयः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जिसकी आत्मा अत्यन्त नम्र थी और बुद्धि अत्यन्त स्वच्छ थी ऐसा श्रेणिक विद्याधरोंका वर्णन सुन आश्चर्यचकित होता हुआ गणधर भगवान्‌के चरणोंको नमस्कार कर फिर बोला कि ॥१॥


प्रसादात्तव विज्ञातः प्रतिशत्रोः समुद्भवः । अष्टमस्य तथा भेदः कुलयोः कपिरक्षसाम् ॥२॥

साम्प्रतं श्रोतुमिच्छामि चरितं जिनचक्रिणाम् । नाथ पूर्वभवैर्युक्तं बुद्धिशोधनकारणम् ॥३॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपके प्रसादसे मैंने अष्टम प्रतिनारायणका जन्म तथा वानर बंश और राक्षस वंशका भेद जाना । अब इस समय हे नाथ ! चौबीस तीर्थंकरों तथा बारह चक्रवर्तियोंका चरित्र उनके पूर्वभवोंके साथ सुनना चाहता हूँ क्योंकि वह बुद्धिको शुद्ध करनेका कारण है ॥२-३॥


अष्टमो यश्च विख्यातो हली सकलविष्टपे । वंशे कस्य समुद्भूतः किं वा तस्य विचेष्टितम् ॥४॥

अर्थ: इनके सिवाय जो आठवाँ बलभद्र समस्त संसारमें प्रसिद्ध है वह किस वंशमें उत्पन्न हुआ तथा उसकी क्या-क्या चेष्टाएँ हुईं ! ॥४॥


अमीषां जनकादीनां तथा नामानि सन्मुने । जिज्ञासितानि मे नाथ तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥५॥

अर्थ: हे उत्तम मुनिराज ! इन सबके पिता आदिके नाम भी मैं जानना चाहता हूँ सो हे नाथ ! यह सब कहनेके योग्य हो ॥५॥


इत्युक्तः स महासत्त्वः परमार्थविशारदः । जगाद गणभृद्वाक्यं चारुप्रश्नाभिनन्दितः ॥६॥

शृणु श्रेणिक वक्ष्यामि जिनानां भवकीर्तनम् । पापविध्वंसकरणं त्रिदशेन्द्रनमस्कृतम् ॥७॥

अर्थ: श्रेणिकके इस प्रकार कहनेपर महाधैर्यशाली, परमार्थके विद्वान् गणधर भगवान् उत्तम प्रश्नसे प्रसन्न होते हुए इस प्रकारके वचन बोले कि हे श्रेणिक ! सुन, मैं तीर्थंकरोंका वह भवोपाख्यान कहूँगा जो कि पापको नष्ट करनेवाला है और इन्द्रोंके द्वारा नमस्कृत है ॥६-७॥


ऋषभोऽजितनाथश्च संभवश्चाभिनन्दनः । सुमतिः पद्मभासश्च सुपार्श्वः शशभृत्प्रभः ॥८॥

सुविधिः शीतलः श्रेयान् वासुपूज्योऽमलप्रभुः । अनन्तो धर्मशान्ती च कुन्थुदेवो महानरः ॥९॥

मल्लिः सुव्रतनाथश्च नमिर्नेमिश्च तीर्थकृत् । पार्श्वोऽयं पश्चिमो वीरो शासनं यस्य वर्तते ॥१०॥

अर्थ: ऋषभ, अजित, सम्भव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चन्द्रप्रभ, सुविधि ( पुष्पदन्त ), शीतल, श्रेयान्स, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म, शान्ति, कुन्थु, अर, मल्लि, ( मुनि ) सुव्रतनाथ, नमि, नेमि, पार्श्व और महावीर ये चौबीस तीर्थंकरोंके नाम हैं । इनमें महावीर अन्तिम तीर्थंकर हैं तथा इस समय इन्हींका शासन चल रहा है ॥८-१०॥


नगरी परमोदारा नामतः पुण्डरीकिणी । सुसीमेत्यपरा ख्याता क्षेमेत्यन्यातिशोभना ॥११॥

तथा रत्नवरैर्दीप्ता रत्नसंचयनामिका । चतस्रः परमोदाराः सुव्यवस्था इमाः पुरः ॥१२॥

वासुपूज्यजिनान्तानां जिनानामृषभादितः । आसन् पूर्वभवे रम्या राजधान्यः सदोत्सवाः ॥१३॥

अर्थ: अब इनकी पूर्व भवकी नगरियोंका वर्णन करते हैं - अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्डरीकिणी, सुसीमा, अत्यन्त मनोहर क्षेमा, और उत्तमोत्तम रत्नोंसे प्रकाशमान रत्नसंचयपुरी ये चार नगरियाँ अत्यन्त उत्कृष्ट तथा उत्तम व्यवस्थासे युक्त थीं । ऋषभदेवको आदि लेकर वासुपूज्य भगवान् तक क्रमसे तीन-तीन तीर्थंकरोंकी ये पूर्व भवकी राजधानियाँ थीं । इन नगरियोंमें सदा उत्सव होते रहते थे ॥११-१३॥


सुमहानगरं चारु तथारिष्टपुरं वरम् । सुमाद्रिका च विख्याता तथासौ पुण्डरीकिणी ॥१४॥

सुसीमा सीमसंपन्ना क्षेमा च क्षेमकारिणी । व्यतीतशोकनामा च चम्पा च विदिता भुवि ॥१५॥

कौशाम्बी च महाभोगा तथा नागपुरं पृथु । साकेता कान्तभवना छत्राकारपुरं तथा ॥१६॥

अनुक्रमेण शेषाणां जिनानां पूर्वजन्मनि । राजधान्य इमा ज्ञेयाः पुर्यः स्वर्गपुरीसमाः ॥१७॥

अर्थ: अवशिष्ट बारह तीर्थंकरोंकी पूर्वभवकी राजधानियाँ निम्न प्रकार थीं - सुमहानगर, अरिष्टपुर, सुमाद्रिका, पुण्डरीकिणी, सुसीमा, क्षेमा, वीतशोका, चम्पा, कौशाम्बी, नागपुर, साकेता और छत्राकारपुर । ये सभी राजधानियाँ स्वर्गपुरीके समान सुन्दर, महाविस्तृत तथा उत्तमोत्तम भवनोंसे सुशोभित थीं ॥१४-१७॥


वज्रनाभिरिति ख्यातस्तथा विमलवाहनः । अन्यश्च विपुलख्यातिः श्रीमान् विपुलवाहनः ॥१८॥

महाबलोऽपरः कान्तस्तथातिबलकीर्तनः । अपराजितसंज्ञश्च नन्दिषेणाभिधोऽपरः ॥१९॥

पद्मश्चान्यो महापद्मस्तथा पद्मोत्तरो भुवि । नाथः पङ्कजगुल्माख्यः पङ्कजप्रतिमाननः ॥२०॥

विभुर्नलिनगुल्मश्च तथा पद्मासनः सुखी । स्मृतः पद्मरथो नाथः श्रीमान् दृढरथोऽपरः ॥२१॥

महामेघरथो नाम शूरः सिंहरथाभिधः । स्वामी वैश्रवणो धीमान् श्रीधर्मोऽन्यो महाधनः ॥२२॥

अप्रतिष्ठः सुरश्रेष्ठः सिद्धार्थः सिद्धशासनः । आनन्दो नन्दनीयोऽन्यः सुनन्दश्चेति विश्रुतः ॥२३॥

पूर्वजन्मनि नामानि जिनानामिति विष्टपे । प्रख्यातानि मयोक्तानि क्रमेण मगधाधिप ॥२४॥

अर्थ: अब इनके पूर्वभवके नाम कहता हूँ - १ वज्रनाभि, २ विमलवाहन, ३ विपुलख्याति, ४ विपुलवाहन, ५ महाबल, ६ अतिबल, ७ अपराजित, ८ नन्दिषेण, ९ पद्म, १० महापद्म, ११ पद्मोत्तर, १२ कमलके समान मुखवाला पंकजगुल्म, १३ नलिनगुल्म, १४ पद्मासन, १५ पद्मरथ, १६ दृढ़रथ, १७ महामेघरथ, १८ सिंहरथ, १९ वैश्रवण, २० श्रीधर्म, २१ उपमारहित सुरश्रेष्ठ, २२ सिद्धार्थ, २३ आनन्द और २४ सुनन्द । हे मगधराज ! ये बुद्धिमान् चौबीस तीर्थंकरोंके पूर्वभवके नाम तुझसे कहे हैं । ये सब नाम संसारमें अत्यन्त प्रसिद्ध थे ॥१८-२४॥


वज्रसेनो महातेजास्तथा वीरो रिपुंदमः । अन्यः स्वयंप्रभाभिख्यः श्रीमान् विमलवाहनः ॥२५॥

गुरुः सीमन्धरो ज्ञेयो नाथश्च पिहितास्रवः । महातपस्विनावन्यावरिन्दमयुगन्धरौ ॥२६॥

तथा सर्वजनानन्दः सार्थकाभिख्ययान्वितः । अभयानन्दसंज्ञश्च वज्रदन्तोऽपरः प्रभुः ॥२७॥

वज्रनाभिश्च विज्ञेयः सर्वगुप्तिश्च गुप्तिमान् । चिन्तारक्षप्रसिद्धिश्च पुनर्विपुलवाहनः ॥२८॥

मुनिर्घनरवो धीरः संवरः साधुसंवरः । वरधर्मस्त्रिलोकीयः सुनन्दो नन्दनामभृत् ॥२९॥

व्यतीतशोकसंज्ञश्च डामरः प्रोष्ठिलस्तथा । क्रमेण गुरवो ज्ञेया जिनानां पूर्वजन्मनि ॥३०॥

अर्थ: अब इनके पूर्वभवके पिताओंके नाम सुन - १ वज्रसेन, २ महातेज, ३ रिपुंदम, ४ स्वयंप्रभ, ५ विमलवाहन, ६ सीमन्धर, ७ पिहितास्रव, ८ अरिन्दम, ९ युगन्धर, १० सार्थक नामके धारक सर्वजनानन्द, ११ अभयानन्द, १२ वज्रदन्त, १३ वज्रनाभि, १४ सर्वगुप्ति, १५ गुप्तिमान्, १६ चिन्तारक्ष, १७ विपुलवाहन, १८ घनरव, १९ धीर, २० उत्तम संवरको धारण करनेवाले संवर, २१ उत्तम धर्मको धारण करनेवाले त्रिलोकीय, २२ सुनन्द, २३ वीतशोक डामर और २४ प्रोष्ठिल । इस प्रकार ये चौबीस तीर्थंकरोंके पूर्वभव सम्बन्धी चौबीस पिताओंके नाम जानना चाहिए ॥२५-३०॥


सर्वार्थसिद्धिसंशब्दो वैजयन्तः सुखावहः । ग्रैवेयको महामासः वैजयन्तः स एव च ॥३१॥

ऊर्ध्वग्रैवेयको ज्ञेयो मध्यमश्च प्रकीर्तितः । वैजयन्तो महातेजा अपराजितसंज्ञकः ॥३२॥

आरणश्च समाख्यातस्तथा पुष्पोत्तराभिधः । कापिष्टः पुरुशुक्रश्च सहस्रारो मनोहरः ॥३३॥

त्रिपुष्पोत्तरसंज्ञोऽतो मुक्तिस्थानधरस्थितः । विजयाख्यस्तथा श्रीमानपराजितसंज्ञकः ॥३४॥

प्राणतोऽनन्तरःतीतो वैजयन्तो महाद्युतिः । पुष्पोत्तर इति ज्ञेयो जिनानाममरालयाः ॥३५॥

अर्थ: अब चौबीस तीर्थंकर जिस-जिस स्वर्गलोकसे आये उनके नाम सुन - १ सर्वार्थसिद्धि, २ वैजयन्त, ३ ग्रैवेयक, ४ वैजयन्त, ५ वैजयन्त, ६ ऊर्ध्व ग्रैवेयक, ७ मध्यम ग्रैवेयक, ८ वैजयन्त, ९ अपराजित, १० आरण, ११ पुष्पोत्तर, १२ कापिष्ट, १३ महाशुक्र, १४ सहस्रार, १५ पुष्पोत्तर, १६ पुष्पोत्तर, १७ पुष्पोत्तर, १८ सर्वार्थसिद्धि, १९ विजय, २० अपरा- जित, २१ प्राणत, २२ आनत, २३ वैजयन्त और २४ पुष्पोत्तर। ये चौबीस तीर्थंकरोंके आनेके स्वर्गोंके नाम कहे ॥३१-३५॥


जिनानां जन्मनक्षत्रं मातरं पितरं पुरम् । चैत्यवृक्षं तथा मोक्षस्थानं ते कथयाम्यतः ॥३६॥

विनीता नगरी नाभिर्मरुदेव्युत्तरा तथा । आषाढा वटवृक्षश्च कैलाशः प्रथमो जिनः ॥३७॥

अर्थ: अब आगे चौबीस तीर्थंकरोंकी जन्मनगरी, जन्मनक्षत्र, माता, पिता, वैराग्यका वृक्ष और मोक्षका स्थान कहता हूँ - विनीता(अयोध्या)नगरी, नाभिराजा पिता, मरुदेवी रानी, उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, वट वृक्ष, कैलासपर्वत और प्रथम जिनेन्द्र हे श्रेणिक ! तेरे लिए ये मंगलस्वरूप हों ॥३६-३७॥


साकेता विजयानाथो जितशत्रुर्जिनोत्तमः । रोहिणी सप्तपर्णश्च मङ्गलं श्रेणिकास्तु ते ॥३८॥

अर्थ: साकेता ( अयोध्या ) नगरी, जितशत्रु पिता, विजया माता, रोहिणी नक्षत्र, सप्तपर्ण वृक्ष और अजितनाथ जिनेन्द्र, हे श्रेणिक ! ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥३८॥


सेना जितारिराजश्च श्रावस्तीसंभवो जिनः । ऐन्द्रमृक्षं ततः शालः परमं तेऽस्तु मङ्गलम् ॥३९॥

अर्थ: श्रावस्ती नगरी, जितारि पिता, सेना माता, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, शाल वृक्ष और सम्भवनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥३९॥


सिद्धार्था संवरोऽयोध्या सरलश्च पुनर्वसुः । अभिनन्दननाथश्च भवन्तु तव मङ्गलम् ॥४०॥

अर्थ: अयोध्या नगरी, संवर पिता, सिद्धार्था माता, पुनर्वसु नक्षत्र, सरल अर्थात् देवदारु वृक्ष और अभिनन्दन जिनेन्द्र, ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥४०॥


सुमङ्गला प्रियङ्गुश्च मघा मेघप्रभः पुरी । साकेता सुमतिर्नाथो जगदुत्तममङ्गलम् ॥४१॥

अर्थ: साकेता (अयोध्या) नगरी, मेघप्रभ राजा पिता, सुमंगला माता, मघा नक्षत्र, प्रियंगु वृक्ष और सुमतिनाथ जिनेन्द्र, ये जगत्के लिए उत्तम मंगलस्वरूप हों ॥४१॥


सुसीमा वत्सनगरी च चित्रा धरणशब्दितः । पद्मप्रभः प्रियङ्गुश्च भवन्तु तव मङ्गलम् ॥४२॥

अर्थ: वत्सनगरी ( कौशाम्बीपुरी ), धरणराजा पिता, सुसीमा माता, चित्रा नक्षत्र, प्रियंगु वृक्ष और पद्मप्रभ जिनेन्द्र, ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥४२॥


सुप्रतिष्ठः पुरी काशी विशाखा पृथिवी तथा । शिरीषश्च सुपार्श्वश्च राजन् परममङ्गलम् ॥४३॥

अर्थ: काशी नगरी, सुप्रतिष्ठ पिता, पृथ्वी माता, विशाखा नक्षत्र, शिरीष वृक्ष और सुपार्श्व जिनेन्द्र, हे राजन् ! ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥४३॥


नागवृक्षोऽनुराधर्क्षं महासेनाश्च लक्ष्मणा । ख्याता चन्द्रपुरी चन्द्रप्रभश्च तव मङ्गलम् ॥४४॥

अर्थ: चन्द्रपुरी नगरी, महासेन पिता, लक्ष्मणा माता, अनुराधा नक्षत्र, नाग वृक्ष और चन्द्रप्रभ भगवान्, ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥४४॥


काकन्दी सुविधिर्मूलं रामा सुग्रीवपार्थिवः । सालस्तरुश्च ते सन्तु चित्तपावनकारणम् ॥४५॥

अर्थ: काकन्दी नगरी, सुग्रीव राजा पिता, रामा माता, मूल नक्षत्र, साल वृक्ष और पुष्पदन्त अथवा सुविधिनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे चित्तको पवित्र करनेवाले हों ॥४५॥


प्लक्षो दृढरथो राजा भद्रिका शीतलो जिनः । सुनन्दा प्रथमाषाढा सन्तु ते मङ्गलं परम् ॥४६॥

अर्थ: भद्रिकापुरी, दृढ़रथ पिता, सुनन्दा माता, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, प्लक्ष वृक्ष और शीतलनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे लिए परम मंगलस्वरूप हों ॥४६॥


विष्णुश्रीः श्रवणो विष्णुः सिंहनादं च तिन्दुकः । सततं नु जिनः श्रेयान् श्रेयः कुर्वन्तु ते नृप ॥४७॥

अर्थ: सिंहपुरी नगरी, विष्णुराज पिता, विष्णुश्री माता, श्रवण नक्षत्र, तेंदूका वृक्ष और श्रेयान्सनाथ जिनेन्द्र हे राजन् ! ये तेरे लिए कल्याण करें ॥४७॥


पाटला वसुपूज्यश्च जया शतभिषं तथा । चम्पा च वासुपूज्यश्च लोकपूजां दिशन्तु ते ॥४८॥

अर्थ: चम्पापुरी, वसुपूज्य राजा पिता, जया माता, शतभिषा नक्षत्र, पाटला वृक्ष, चम्पापुरी सिद्धक्षेत्र और वासुपूज्य जिनेन्द्र, ये तेरे लिए लोकप्रतिष्ठा प्राप्त करावें ॥४८॥


काम्पिल्यं कृतवर्मा च शर्मा प्रौष्ठपदोत्तरा । जम्बूर्विमलनाथश्च कुर्वन्तु त्वां मलोज्झितम् ॥४९॥

अर्थ: काम्पिल्य नगरी, कृतवर्मा पिता, शर्मा माता, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, जम्बू वृक्ष, विमलनाथ जिनेन्द्र ये तुझे निर्मल करें ॥४९॥


अश्वत्थः सिंहसेनश्च विनीता रेवती तथा । श्लाघ्या सर्वयशा नाथोऽनन्तश्च तव मङ्गलम् ॥५०॥

अर्थ: विनीता नगरी, सिंहसेन पिता, सर्वयशा माता, रेवती नक्षत्र, पीपलका वृक्ष और अनन्तनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे लिए मंगलस्वरूप हों ॥५०॥


धर्मो रत्नपुरी भानुर्दधिपर्णश्च सुव्रता । पुष्यश्च तव पुष्णातु श्रियं श्रेणिक धर्मिणीम् ॥५१॥

अर्थ: रत्नपुरी नगरी, भानुराजा पिता, सुव्रता माता, पुष्य नक्षत्र, दधिपर्ण वृक्ष और धर्मनाथ जिनेन्द्र, हे श्रेणिक ! ये तेरी धर्मयुक्त लक्ष्मीको पुष्ट करें ॥५१॥


भरणी हास्तिनस्थानमैराणी नन्दपादपः । विश्वसेननृपः शान्तिः शान्तिं कुर्वन्तु ते सदा ॥५२॥

अर्थ: हस्तिनागपुर नगर, विश्वसेन राजा पिता, ऐराणी माता, भरणी नक्षत्र, नन्द वृक्ष और शान्तिनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे लिए सदा शान्ति प्रदान करें ॥५२॥


सूर्यो गजपुरं कुन्थुस्तिलकः श्रीश्च कृत्तिका । भवन्तु तव राजेन्द्र पापद्रवणहेतवः ॥५३॥

अर्थ: हस्तिनागपुर नगर, सूर्य राजा पिता, श्रीदेवी माता, कृत्तिका नक्षत्र, तिलक वृक्ष और कुन्थुनाथ जिनेन्द्र, हे राजन् ! ये तेरे पाप दूर करनेमें कारण हो ॥५३॥


मित्रा सुदर्शनश्चूतो नगरं पूर्वकीर्तितम् । रोहिण्यरजिनेन्द्रश्च नाशयन्तु रजस्तव ॥५४॥

अर्थ: हस्तिनागपुर नगर, सुदर्शन पिता, मित्रा माता, रोहिणी नक्षत्र, आम्र वृक्ष और अर जिनेन्द्र, ये तेरे पापको नष्ट करें ॥५४॥


रक्षिता मिथिला कुम्भो जिनेशो मल्लिरश्विनी । अशोकश्च तवाशोकं मनः कुर्वन्तु पार्थिव ॥५५॥

अर्थ: मिथिला नगरी, कुम्भ पिता, रक्षिता माता, अश्विनी नक्षत्र, अशोक वृक्ष और मल्लिनाथ जिनेन्द्र, हे राजन् ! ये तेरे मनको शोकरहित करें ॥५५॥


पद्मावती कुशाग्रं च सुमित्रः श्रवणस्तथा । चम्पकः सुव्रतेशश्च व्रजन्तु तव मानसम् ॥५६॥

अर्थ: कुशाग्र नगर ( राजगृह ), सुमित्र पिता, पद्मावती माता, श्रवण नक्षत्र, चम्पक वृक्ष और सुव्रतनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे मनको प्राप्त हों अर्थात् तू हृदयसे इनका ध्यान कर ॥५६॥


विजयो मिथिला वप्रा वकुलो नमितीर्थकृत् । अश्विनी च प्रयच्छन्तु तव धर्मसमागमम् ॥५७॥

अर्थ: मिथिला नगरी, विजय पिता, वप्रा माता, अश्विनी नक्षत्र, वकुल वृक्ष और नेमिनाथ तीर्थंकर, ये तेरे लिए धर्मका समागम प्रदान करें ॥५७॥


समुद्रविजयश्चित्रा नेमिः शौरिपुरं शिवा । ऊर्जयन्तश्च ते मेषशृङ्गश्चास्तु सुखप्रदः ॥५८॥

अर्थ: शौरिपुरनगर, समुद्रविजय पिता, शिवा माता, चित्रा नक्षत्र, मेषशृंग वृक्ष, ऊर्जयन्त ( गिरनार ) पर्वत और नेमि जिनेन्द्र, ये तेरे लिए सुखदायक हों ॥५८॥


वाराणसी विशाखा च पार्श्वो वर्मा धवोऽङ्घ्रिपः । अश्वसेनश्च ते राजन् दिशन्तु मनसो धृतिम् ॥५९॥

अर्थ: वाराणसी ( बनारस ) नगरी, अश्वसेन पिता, वर्मादेवी माता, विशाखा नक्षत्र, धव ( धौ ) वृक्ष और पार्श्वनाथ जिनेन्द्र, ये तेरे मनमें धैर्य उत्पन्न करें ॥५९॥


सालः कुण्डपुरं पावा सिद्धार्थः प्रियकारिणी । हस्तोत्तरं महावीरं परमं तव मङ्गलम् ॥६०॥

अर्थ: कुण्डपुर नगर, सिद्धार्थ पिता, प्रियकारिणी माता, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र, साल वृक्ष, पावा नगर और महावीर जिनेन्द्र, ये तेरे लिए परम मंगलस्वरूप हों ॥६०॥


चम्पैव वासुपूज्यस्य मोक्षस्थानमुदाहृतम् । पूर्वमुक्तं त्रयाणां तु शेषाः संमेदनिर्वृताः ॥६१॥

अर्थ: इनमें-से वासुपूज्य भगवान्का मोक्ष-स्थान चम्पापुरी ही है। ऋषभदेव, नेमिनाथ तथा महावीर इनके मोक्षस्थान क्रमसे कैलास, ऊर्जयन्त गिरि तथा पावापुर ये तीन पहले कहे जा चुके हैं और शेष बीस तीर्थंकर सम्मेदाचलसे निर्वाण धामको प्राप्त हुए हैं ॥६१॥


शान्तिः कुन्थुररश्चेति राजानश्चक्रवर्तिनः । संतस्तीर्थंकरा जाताः शेषाः सामान्यपार्थिवाः ॥६२॥

अर्थ: शान्ति, कुन्थु और अर ये तीन राजा चक्रवर्ती होते हुए तीर्थंकर हुए। शेष तीर्थंकर सामान्य राजा हुए ॥६२॥


चन्द्राभश्चन्द्रसंकाशः पुष्पदन्तश्च कीर्तितः । प्रियङ्गुमञ्जरीवर्णः सुपार्श्वो जिनसत्तमः ॥६३॥

अपक्कशालिसंकाशः पार्श्वो नागाधिपस्तुतः । पद्मगर्भसमच्छायः पद्मप्रभजिनोत्तमः ॥६४॥

अर्थ: चन्द्रप्रभ और पुष्पदन्त ये चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णके धारक थे । सुपार्श्व जिनेन्द्र प्रियंगुके फूलके समान हरित वर्णके थे । पार्श्वनाथ भी कच्ची धान्यके समान हरित वर्णके थे । धरणेन्द्रने पार्श्वनाथ भगवान्‌की स्तुति भी की थी । पद्मप्रभ जिनेन्द्र कमलके भीतरी दलके समान लाल कान्तिके धारक थे ॥६३-६४॥


किंशुकोत्करसंकाशो वासुपूज्यः प्रकीर्तितः । नीलाञ्जनगिरिच्छायो मुनिसुव्रततीर्थकृत् ॥६५॥

अर्थ: वासुपूज्य भगवान् पलाश पुष्प-के समूहके समान लालवर्णके थे । मुनिसुव्रत तीर्थंकर नीलगिरि अथवा अंजनगिरिके समान श्याम-वर्णके थे ॥६५॥


मयूरकण्ठसंकाशो जिनो यादवपुङ्गवः । सुतप्तकाञ्चनच्छायाः शेषा जिनवराः स्मृताः ॥६६॥

अर्थ: यदुवंश शिरोमणि नेमिनाथ भगवान् मयूरके कण्ठके समान नील वर्णके थे और बाकीके समस्त तीर्थंकर तपाये हुए स्वर्णके समान लाल-पीत वर्णके धारक थे ॥६६॥


वासुपूज्यो महावीरो मल्लिः पार्श्वो यदूत्तमः । कुमारा निर्गता गेहात्पृथिवीपतयोऽपरे ॥६७॥

अर्थ: वासुपूज्य, मल्लि, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर ये पाँच तीर्थंकर कुमार अवस्थामें ही घरसे निकल गये थे, बाकी तीर्थंकरोंने राज्यपाट स्वीकार कर दीक्षा धारण की थी ॥६७॥


एते सुरासुराधीशैः प्रणताः पूजिताः स्तुताः । अभिषेकं परं प्राप्ता नगपार्थिवमूर्धनि ॥६८॥

अर्थ: इन सभी तीर्थंकरोंको देवेन्द्र तथा धरणेन्द्र नमस्कार करते थे, इनकी पूजा करते थे, इनकी स्तुति करते थे और सुमेरु पर्वतके शिखरपर सभी परम अभिषेकको प्राप्त हुए थे ॥६८॥


सर्वकल्याणसंप्राप्तिकारणीभूतसेवनाः । जिनेन्द्राः पान्तु वो नित्यं त्रैलोक्यपरमाद्भुताः ॥६९॥

अर्थ: जिनकी सेवा समस्त कल्याणोंकी प्राप्तिका कारण है तथा जो तीनों लोकोंके परम आश्चर्यस्वरूप थे, ऐसे ये चौबीसों जिनेन्द्र निरन्तर तुम सबकी रक्षा करें ॥६९॥


आयुःप्रमाणबोधार्थं गणेश मम सांप्रतम् । निवेदय परं तत्त्वं मनःपावनकारणम् ॥७०॥

अर्थ: अथानन्तर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे कहा कि हे गणनाथ ! अब मुझे इन चौबीस तीर्थंकरोंकी आयुका प्रमाण जाननेके लिए मनकी पवित्रताका कारण जो परम तत्त्व है वह कहिए ॥७०॥


यश्च रामोऽन्तरे यस्य जिनेन्द्रस्योदपद्यत । तत्सर्वं ज्ञातुमिच्छामि प्रतीक्ष्य त्वत्प्रसादतः ॥७१॥

अर्थ: साथ ही जिस तीर्थंकरके अन्तरालमें रामचन्द्रजी हुए हैं हे पूज्य ! वह सब आपके प्रसादसे जानना चाहता हूँ ॥७१॥


इत्युक्तो गणभृत्सौम्यः श्रेणिकेन महादरात् । निवेदयांबभूवासौ क्षीरोदामलमानसः ॥७२॥

अर्थ: राजा श्रेणिकने जब बड़े आदरसे इस प्रकार पूछा तब क्षीर-सागरके समान निर्मल चित्तके धारक परम शान्त गणधर स्वामी इस प्रकार कहने लगे ॥७२॥


संख्याया गोचरं योऽर्थो व्यतिक्रम्य व्यवस्थितः । बुद्धौ कल्पितदृष्टान्तः कथितोऽसौ महात्मभिः ॥७३॥

अर्थ: कि हे श्रेणिक ! काल नामा जो पदार्थ है वह संख्याके विषयको उल्लंघन कर स्थित है अर्थात् अनन्त है, इन्द्रियोंके द्वारा उसका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता फिर भी महात्माओंने बुद्धिमें दृष्टान्तकी कल्पना कर उसका निरूपण किया है ॥७३॥


योजनप्रतिमं व्योम सर्वतो भित्तिवेष्टितम् । अवेः प्रजातमात्रस्य रोमाग्रैः परिपूरितम् ॥७४॥

अर्थ: कल्पना करो कि एक योजन प्रमाण आकाश सब ओर-से दीवालोंसे वेष्टित अर्थात् घिरा हुआ है तथा तत्काल उत्पन्न हुए भेड़के बालोंके अग्रभागसे भरा हुआ है ॥७४॥


द्रव्यपल्यमिदं गाढमाहत्य कठिनीकृतम् । कथ्यते कल्पितं कस्य व्यापारोऽयं सुधा भवेत् ॥७५॥

अर्थ: इसे ठोक-ठोककर बहुत ही कड़ा बना दिया गया है, इस एक योजन लम्बे-चौड़े तथा गहरे गर्तको द्रव्यपल्य कहते हैं । जब यह कह दिया गया है कि यह कल्पित दृष्टान्त है तब यह गर्त किसने खोदा, किसने भरा आदि प्रश्न निरर्थक हैं ॥७५॥


तत्र वर्षशतेऽतीते ह्येकैकस्मिन्समुद्धृते । क्षीयते येन कालेन कालपल्यं तदुच्यते ॥७६॥

कोटीकोट्यो दशैतेषां कालो रत्नाकरोपमः । सागरोपमकोटीनां दशकोट्योऽवसर्पिणी ॥७७॥

अर्थ: उस भरे हुए रोमगर्तमें-से सौ-सौ वर्षके बाद एक-एक रोमखण्ड निकाला जाय जितने समयमें खाली हो जाय उतना समय एक पल्य कहलाता है। दश कोड़ाकोड़ी पल्योंका एक सागर होता है और दश कोड़ा-कोड़ी सागरोंकी एक अवसर्पिणी होती है ॥७६-७७॥


उत्सर्पिणी च तावन्त्यस्ते सितासितपक्षवत् । सततं परिवर्तेते राजन् कालस्वभावतः ॥७८॥

अर्थ: उतने ही समयकी एक उत्सर्पिणी भी होती है। हे राजन् ! जिस प्रकार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष निरन्तर बदलते रहते हैं उसी प्रकार काल-द्रव्यके स्वभावसे अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल निरन्तर बदलते रहते हैं ॥७८॥


प्रत्येकमेतयोर्भेदाः षडुद्दिष्टा महात्मभिः । संसर्गिवस्तुवीर्यादिभेदसंभववृत्तयः ॥७९॥

अर्थ: महात्माओंने इन दोनोंमें-से प्रत्येकके छह-छह भेद बतलाये हैं। संसर्गमें आनेवाली वस्तुओंके वीर्य आदिमें भेद होनेसे इन छह-छह भेदोंकी विशेषता सिद्ध होती है ॥७९॥


अत्यन्तः सुषमः कालः प्रथमः परिकीर्तितः । कोटी कोट्यश्चतस्रोऽस्य सामुद्रोन्मानमुच्यते ॥८०॥

अर्थ: अवसर्पिणीका पहला भेद सुषमा-सुषमा काल कहलाता है। इसका चार कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण काल कहा जाता है ॥८०॥


कीर्तितः सुषमस्तिस्रो द्वयं सुषमदुःषमः । वक्ष्यमाणद्विकालोऽब्दैरूना दुःषमसत्समः ॥८१॥

उक्तो वर्षसहस्राणामेकविंशतिमानतः । प्रत्येकं दुःषमोऽत्यन्तदुःषमश्च जिनाधिपैः ॥८२॥

अर्थ: दूसरा भेद सुषमा कहलाता है। इसका प्रमाण तीन कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण है। तीसरा भेद सुषमा-दुःषमा कहा जाता है। इसका प्रमाण दो कोड़ा-कोड़ी सागर प्रमाण है। चौथा भेद दुःषमा-सुषमा कहलाता है। इसका प्रमाण बयालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ी-कोड़ी सागर प्रमाण है। पांचवां भेद दुःषमा और छठा भेद दुःषमा-दुःषमा काल कहलाता है इनका प्रत्येकका प्रमाण इक्कीस-इक्कीस हजार वर्षका जिनेन्द्र देवने कहा है ॥८१-८२॥


पञ्चाशदब्धिकोटीनां लक्षाः प्रथममुच्यते । त्रिंशद्दशनवैतासां परिपाट्या जिनान्तरम् ॥८३॥

अर्थ: अब तीर्थंकरोंका अन्तर काल कहते हैं।
भगवान् ऋषभदेवके बाद पचास लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर द्वितीय अजितनाथ तीर्थंकर हुए। उसके बाद तीस लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर तृतीय सम्भवनाथ उत्पन्न हुए। उनके बाद दश लाख करोड़ सागरका अन्तर बीतनेपर चतुर्थ अभिनन्दननाथ उत्पन्न हुए ॥८३॥


नवतिश्च सहस्राणि नव चासां व्यवस्थितः । शतानि च नवैतासां नवतिस्तास्तथा नव ॥८४॥

शतवार्द्धिखखद्योषड्द्विषट्षड्वर्षविच्युता । एका कोटी समुद्राणां ज्ञेयं दशममन्तरम् ॥८५॥

चतुर्भिः सहिता ज्ञेयाः पञ्चाशत्सागरास्ततः । त्रिंशन्नवाथ चत्वारः सागराः कीर्तितास्ततः ॥८६॥

पल्यभागत्रयन्यूनं तयो रत्नाकरत्रयम् । पल्यार्धं षोडश प्रोक्तं चतुर्भागोऽस्य तत्परम् ॥८७॥

न्यूनः कोटिसहस्रेण वर्षाणां परिकीर्तितः । समाकोटिसहस्रं च तत्परं गदितं बुधैः ॥८८॥

चतुःपञ्चाशदाख्यातं समा लक्षास्तु तत्परम् । षड्लक्षा उत्तरं तस्मात्ततः पञ्च प्रकाशितम् ॥८९॥

सहस्राणि त्र्यशीतिस्तु सार्धाष्टमशतं परम् । शतान्यर्द्धतृतीयानि समानां कीर्तितं ततः ॥९०॥

वर्द्धमानजिनेन्द्रस्य धर्मः संस्पृष्टदुःषमः । निवृत्ते तु महावीरे धर्मचक्रे महेश्वरे । सुरेन्द्रमुकुटच्छायापयोधौतक्रमद्वये ॥९१॥

देवागमननिर्मुक्ते कालेऽतिशयवर्जिते । प्रनष्टकेवलोत्पादे हलचक्रधरोज्झिते ॥९२॥

भवद्विधमहाराजगुणसंघातरिक्तके । भविष्यन्ति प्रजा दुष्टा वञ्चनोद्यतमानसाः ॥९३॥

निश्शीला निर्व्रताः प्रायः क्लेशव्याधिसमन्विताः । मिथ्यादृशो महाघोरा भविष्यन्त्यसुधारिणः ॥९४॥

अर्थ: उनके बाद नौ लाख करोड़ सागरके बीतनेपर पंचम सुमतिनाथ हुए, उनके बाद नब्बे हजार करोड़ सागर बीतनेपर छठे पद्मप्रभ हुए, उनके बाद नौ हजार करोड़ सागर बीतनेपर सातवें सुपार्श्वनाथ हुए, उनके बाद नौ सौ करोड़ सागर बीतनेपर आठवें चन्द्रप्रभ हुए, उनके बाद नब्बे करोड़ सागर बीतनेपर नवें पुष्पदन्त हुए, उनके बाद नौ करोड़ सागर बीतनेपर दशवें शीतलनाथ हुए, उनके बाद सौ सागर कम एक करोड़ सागर बीतनेपर ग्यारहवें श्रेयांसनाथ हुए, उनके बाद चौवन सागर बीतनेपर बारहवें वासुपूज्य स्वामी हुए, उनके बाद तीस सागर बीतने- पर तेरहवें विमलनाथ हुए, उनके बाद नौ सागर बीतने पर चौदहवें अनन्तनाथ हुए, उनके बाद चार सागर बीतनेपर पन्द्रहवें श्रीधर्मनाथ हुए, उनके बाद पौन पल्य कम तीन सागर बीतनेपर सोलहवें शान्तिनाथ हुए, उनके बाद आधा पल्य बीतनेपर सत्रहवें कुन्थुनाथ हुए, उनके बाद हजार वर्ष कम पावपल्य बीतनेपर अठारहवें अरनाथ हुए, उनके बाद पैंसठ लाख चौरासी हजार वर्ष कम हजार करोड़ सागर बीतनेपर उन्नीसवें मल्लिनाथ हुए, उनके बाद चौवन लाख वर्ष बीतनेपर बीसवें मुनिसुव्रतनाथ हुए, उनके बाद छह लाख वर्ष बीतनेपर इक्कीसवें नमिनाथ हुए, उनके बाद पाँच लाख वर्ष बीतनेपर बाईसवें नेमिनाथ हुए, उनके बाद पौने चौरासी हजार वर्ष बीतनेपर तेईसवें श्रीपार्श्वनाथ हुए और उनके बाद ढाई सौ वर्ष बीतनेपर चौबीसवें श्री वर्धमान-स्वामी हुए हैं । भगवान् वर्धमान स्वामीका धर्म ही इस समय पंचम कालमें व्याप्त हो रहा है । इन्द्रोंके मुकुटोंकी कान्तिरूपी जलसे जिनके दोनों चरण धुल रहे हैं, जो धर्म-चक्रका प्रवर्तन करते हैं तथा महान् ऐश्वर्यके धारक थे, ऐसे महावीर स्वामीके मोक्ष चले जानेके बाद जो पंचम काल आवेगा, उसमें देवोंका आगमन बन्द हो जायेगा, सब अतिशय नष्ट हो जावेंगे, केवलज्ञानकी उत्पत्ति समाप्त हो जावेगी । बलभद्र, नारायण तथा चक्रवर्तियोंका उत्पन्न होना भी बन्द हो जायेगा । और आप जैसे महाराजाओंके योग्य गुणोंसे समय शून्य हो जायेगा । तब प्रजा अत्यन्त दुष्ट हो जावेगी, एक दूसरेको धोखा देनेमें ही उसका मन निरन्तर उद्यत रहेगा । उस समयके लोग निःशील तथा निर्व्रत होंगे, नाना प्रकारके क्लेश और व्याधियोंसे सहित होंगे, मिथ्यादृष्टि तथा अत्यन्त भयंकर होंगे ॥८४-९४॥


अतिवृष्टिरवृष्टिश्च विषमावृष्टिरीतयः । विविधाश्च भविष्यन्ति दुस्सहाः प्राणधारिणाम् ॥९५॥

अर्थ: कहीं अतिवृष्टि होगी, कहीं अवृष्टि होगी और कहीं विषम वृष्टि होगी। साथ ही नाना प्रकारकी दुःसह रीतियाँ प्राणियोंको दुःसह दुःख पहुँचावेंगी ॥९५॥


मोहकादम्बरीमत्ता रागद्वेषात्ममूर्तयः । नर्तितभ्रूकराः पापा मुहुर्गर्वस्मिता नराः ॥९६॥

कुवाक्यमुखराः क्रूरा धनलाभपरायणाः । विचरिष्यन्ति खद्योता रात्राविव महीतले ॥९७॥

अर्थ: उस समयके लोग मोहरूपी मदिराके नशामें चूर रहेंगे, उनके शरीर राग-द्वेषके पिण्डके समान जान पड़ेंगे, उनकी भौंहें तथा हाथ सदा चलते रहेंगे, वे अत्यन्त पापी होंगे, बार-बार अहंकारसे मुसकराते रहेंगे, खोटे वचन बोलनेमें तत्पर होंगे, निर्दय होंगे, धनसंचय करनेमें ही निरन्तर लगे रहेंगे और पृथ्वीपर ऐसे विचरेंगे जैसे कि रात्रिमें जुगुनू अथवा पटवीजना विचरते हैं अर्थात् अल्प प्रभावके धारक होंगे ॥९६-९७॥


गोदण्डपथतुल्येषु मूढास्ते पतिताः स्वयम् । कुधर्मेषु जनानन्यान्पातयिष्यन्ति दुर्जनाः ॥९८॥

अपकारे समासक्ताः परस्य स्वस्य चानिशम् । ज्ञास्यन्ति सिद्धमात्मानं नरा दुर्गतिगामिनः ॥९९॥

अर्थ: वे स्वयं मूर्ख होंगे और गोदण्ड पथके समान जो नाना कुधर्म हैं उनमें स्वयं पड़कर दूसरे लोगोंको भी ले जायेंगे। दुर्जय प्रकृतिके होंगे, दूसरेके तथा अपने अपकारमें रात-दिन लगे रहेंगे । उस समयके लोग होंगे तो दुर्गतिमें जानेवाले पर अपने आपको ऐसा समझेंगे जैसे सिद्ध हुए जा रहे हों अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेवाले हों ॥९८-९९॥


कुशास्त्रमुक्तहुंकारैः कर्मम्लेच्छैर्मदोद्धतैः । अनर्थजनितोत्साहैर्मोहसंतमसावृतैः ॥१००॥

छेत्स्यन्ते सततोद्युक्तैर्मन्दैकालानुभावतः । हिंसाशास्त्रकुठारेण भव्येतरजनाङ्घ्रिपाः ॥१०१॥

अर्थ: जो मिथ्या शास्त्रोंका अध्ययन कर अहंकारवश हुंकार छोड़ रहे हैं, जो कार्य करनेमें म्लेच्छोंके समान हैं, सदा मदसे उद्धत रहते हैं, निरर्थक कार्योंमें जिनका उत्साह उत्पन्न होता है, जो मोहरूपी अन्धकारसे सदा आवृत रहते हैं और सदा दावँ-पेंच लगानेमें ही तत्पर रहते हैं, ऐसे ब्राह्मणादिकके द्वारा उस समयके अभव्य जीवरूपी वृक्ष, हिंसाशास्त्र रूपी कुठारसे सदा छेदे जावेंगे । यह सब हीन कालका प्रभाव ही समझना चाहिए ॥१००-१०१॥


आदावरत्नयः सप्त जनानां दुःषमे स्मृताः । प्रमाणं क्रमतो हानिस्ततस्तेषां भविष्यति ॥१०२॥

द्विहस्तसंमिता मर्त्या विंशत्यब्दायुषस्ततः । भविष्यन्ति परे हस्तमात्रोत्सेधाः सुदुःषमे ॥१०३॥

आयुः षोडशवर्षाणि तेषां गदितमुत्तमम् । वृत्त्या सरीसृपाणां ते जीविष्यन्त्यन्तदुःखिताः ॥१०४॥

अर्थ: दुःषम नाम पंचम कालके आदिमें मनुष्योंकी ऊँचाई सात हाथ प्रमाण होगी फिर क्रमसे हानि होती जावेगी । इस प्रकार क्रमसे हानि होतेहोते अन्तमें दो हाथ ऊँचे रह जावेंगे । बीस वर्षकी उनकी आयु रह जावेगी । उसके बाद जब छठा काल आवेगा तब एक हाथ ऊँचा शरीर और सोलह वर्षकी आयु रह जावेगी । उस समयके मनुष्य सरीसृपोंके समान एक दूसरेको मारकर बड़े कष्टसे जीवन बितावेंगे ॥१०२-१०४॥


ते विरूपसमस्ताङ्गा नित्यं पापक्रियारताः । तिर्यञ्च इव मोहार्ता भविष्यन्ति रुजार्दिताः ॥१०५॥

अर्थ: उनके समस्त अंग विरूप होंगे, वे निरन्तर पाप-क्रियामें लीन रहेंगे, तिर्यंचोंके समान मोहसे दुःखी तथा रोगसे पीड़ित होंगे ॥१०५॥


न व्यवस्था न संबन्धा नेश्वरा न च सेवकाः । न धनं न गृहं नैव सुखमेकान्तदुःषमे ॥१०६॥

अर्थ: छठे कालमें न कोई व्यवस्था रहेगी, न कोई सम्बन्ध रहेंगे, न राजा रहेंगे, न सेवक रहेंगे । लोगोंके पास न धन रहेगा, न घर रहेगा, और न सुख ही रहेगा ॥१०६॥


कामार्थधर्मसंभारहेतुभिः परिचेष्टितैः । शून्याः प्रजा भविष्यन्ति पापपिण्डचिता इव ॥१०७॥

अर्थ: उस समयकी प्रजा धर्म, अर्थ, काम सम्बन्धी चेष्टाओंसे सदा शून्य रहेगी और ऐसी दिखेगी मानो पापके समूहसे व्याप्त ही हो ॥१०७॥


कृष्णपक्षे क्षयं याति यथा शुक्ले च वर्धते । इन्दुस्तथैतयोरायुरादीनां हानिवर्धने ॥१०८॥

अर्थ: जिस प्रकार कृष्ण पक्षमें चन्द्रमा ह्रासको प्राप्त होता है और शुक्ल पक्षमें वृद्धिको प्राप्त होता है उसी प्रकार अवसर्पिणी कालमें लोगोंकी आयु आदिमें ह्रास होने लगता है तथा उत्सर्पिणीकालमें वृद्धि होने लगती है ॥१०८॥


उत्सवादिप्रवृत्तीनां रात्रिवासरयोर्यथा । हानिवृद्धी च विज्ञेये कालयोस्तद्वदेतयोः ॥१०९॥

अर्थ: अथवा जिस प्रकार रात्रिमें उत्सवादि अच्छे-अच्छे कार्योंकी प्रवृत्तिका ह्रास होने लगता है और दिनमें वृद्धि होने लगती है उसी प्रकार अवसर्पिणी और उत्सर्पिणीकालका हाल जानना चाहिए ॥१०९॥


येनावसर्पिणीकाले क्रमेणोदाहृतः क्षयः । उत्सर्पिण्यामनेनैव परिवृद्धिः प्रकीर्तिता ॥११०॥

अर्थ: अवसर्पिणी कालमें जिस क्रमसे क्षयका उल्लेख किया है उत्सर्पिणीकालमें उसी क्रमसे वृद्धिका उल्लेख जानना चाहिए ॥११०॥


जिनानामन्तरं प्रोक्तमुत्सेधं शृण्वतः परम् । क्रमतः कीर्तयिष्यामि राजन्नवहितो भव ॥१११॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मैंने चौबीस तीर्थंकरोंका अन्तर तो कहा । अब क्रमसे उनकी ऊँचाई कहूँगा सो सावधान होकर सुन ॥१११॥


शतानि पञ्च चापानां प्रथमस्य महात्मनः । उत्सेधो जिननाथस्य वपुषः परिकीर्तितः ॥११२॥

अर्थ: पहले ऋषभदेव भगवान्के शरीरकी ऊँचाई पाँच सौ धनुष कही गयी है ॥११२॥


पञ्चाशच्चापहान्यातः प्रत्येकं परिकीर्तितम् । शीतलात् प्राग्जिनेन्द्राणां नवतिः शीतलस्य च ॥११३॥

ततो धर्मजिनात् पूर्वं दशचापपरिक्षयः । प्रत्येकं धर्मनाथस्य चत्वारिंशत्सपञ्चिकाः ॥११४॥

ततः पार्श्वजिनात् पूर्वं प्रत्येकं पञ्चभिः क्षयः । नवारत्निमितः पार्श्वो महावीरो द्विवर्जितः ॥११५॥

अर्थ: उसके बाद शीतलनाथके पहले-पहले तक अर्थात् पुष्पदन्त भगवान् तक प्रत्येककी पचास-पचास धनुष कम होती गयी है । शीतलनाथ भगवान्की ऊँचाई नब्बे धनुष है । उसके आगे धर्मनाथके पहले-पहले तक प्रत्येककी दश-दश धनुष कम होती गयी है । धर्मनाथकी पैंतालीस धनुष प्रमाण है । उनके आगे पार्श्वनाथके पहले-पहले तक प्रत्येककी पाँच-पाँच धनुष कम होती गयी है । पार्श्वनाथकी नौ हाथ और वर्धमान स्वामीके उनसे दो हाथ कम अर्थात् सात हाथकी ऊँचाई है । भावार्थ - १ ऋषभनाथकी ५०० धनुष, २ अजितनाथकी ४५० धनुष, ३ सम्भवनाथकी ४०० धनुष, ४ अभिनन्दननाथकी ३५० धनुष, ५ सुमतिनाथकी ३०० धनुष, ६ पद्मप्रभकी २५० धनुष, ७ सुपार्श्वनाथकी २०० धनुष, ८ चन्द्रप्रभकी १५० धनुष, ९ पुष्पदन्तकी १०० धनुष, १० शीतलनाथकी ९० धनुष, ११ श्रेयान्सनाथकी ८० धनुष, १२ वासुपूज्यकी ७० धनुष, १३ विमलनाथकी ६० धनुष, १४ अनन्तनाथकी ५० धनुष, १५ धर्मनाथकी ४५ धनुष, १६ शान्तिनाथकी ४० धनुष, १७ कुन्थुनाथकी ३५ धनुष, १८ अरनाथकी ३० धनुष, १९ मल्लिनाथकी २५ धनुष, २० मुनिसुव्रतनाथकी २० धनुष, २१ नमिनाथकी १५ धनुष, २२ नेमिनाथकी १० धनुष, २३ पार्श्वनाथकी ९ हाथ और २४ वर्धमान स्वामीकी ७ हाथकी ऊँचाई है ॥११३-११५॥


पल्योपमस्य दशमो भाग आद्यस्य कीर्तितम् । मिस्या कुलकरस्यायुर्लोकालोकावलोकिभिः ॥११६॥

दशमो दशमो भागः पौरस्त्यस्य ततः स्मृतः । प्रमाणमायुषो राजन् शेषाणां कुलकारिणाम् ॥११७॥

अर्थ: अब कुलकर तथा तीर्थंकरोंकी आयुका वर्णन करता हूँ - हे राजन् ! लोक तथा अलोकके देखनेवाले सर्वज्ञदेवने प्रथम कुलकरकी आयु पल्यके दशवें भाग बतलायी है । उसके आगे प्रत्येक कुलकरकी आयु दशवें-दशवें भाग बतलायी गयी हैं अर्थात् प्रथम कुलकरकी आयुमें दशका भाग देनेपर जो लब्ध आये वह द्वितीय कुलकरकी आयु है और उसमें दशका भाग देनेपर जो लब्ध आवे वह तृतीय कुलकरकी आयु है । इस तरह चौदह कुलकरोंकी आयु जानना चाहिए ॥११६-११७॥


चतुर्भिरधिकाशीतिः पूर्वलक्षाः प्रकीर्तिताः । प्रथमस्य जिनेन्द्रस्य द्वितीयस्य द्विसप्ततिः ॥११८॥

षष्टिश्च पञ्चसु ज्ञेयः क्रमेण दशभिः क्षयः । विज्ञेये पूर्वलक्षे द्वे तथैकं परिकीर्तितम् ॥११९॥

चतुर्भिरधिकाशीतिरब्दा लक्षा द्विसप्ततिः । षष्टिस्त्रिंशद्दशैका च समा लक्षाः प्रकीर्तिताः ॥१२०॥

नवतिः पञ्चभिः सार्धमशीतिश्चतुरुत्तराः । पञ्चाशत्पञ्चभिर्युक्तास्त्रिंशद्दश च कीर्तितः ॥१२१॥

एकं चाब्दं सहस्राणां संख्येयं परिकीर्तिताः । वर्षाणां च शतं द्वाभ्यामधिका सप्ततिस्तथा ॥१२२॥

अर्थ: प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान्की चौरासी लाख पूर्व, द्वितीय तीर्थंकर श्री अजितनाथ भगवान्की बहत्तर लाख पूर्व, तृतीय तीर्थंकर श्री सम्भवनाथकी साठ लाख पूर्व, उनके बाद पाँच तीर्थंकरोंमें प्रत्येककी दश-दश लाख पूर्व, कम अर्थात् चतुर्थ अभिनन्दननाथकी पचास लाख पूर्व, पंचम सुमतिनाथकी चालीस लाख पूर्व, षष्ठ पद्मप्रभकी तीस लाख पूर्व, सप्तम सुपार्श्वनाथकी बीस लाख पूर्व, अष्टम चन्द्रप्रभकी दश लाख पूर्व, नवम पुष्पदन्तकी दो लाख पूर्व, दशम शीतलनाथकी एक लाख पूर्व, ग्यारहवें श्रेयान्सनाथकी चौरासी लाख वर्ष, बारहवें वासुपूज्यकी बहत्तर लाख वर्ष, तेरहवें विमलनाथकी साठ लाख वर्ष, चौदहवें अनन्तनाथकी तीस लाख वर्ष, पन्द्रहवें धर्मनाथकी दश लाख वर्ष, सोलहवें शान्तिनाथकी एक लाख वर्ष, सत्रहवें कुन्थुनाथकी पंचानबे हजार वर्ष, अठारहवें अरनाथकी चौरासी हजार वर्ष, उन्नीसवें मल्लिनाथकी पचपन हजार वर्ष, बीसवें मुनिसुव्रतनाथ- की तीस हजार वर्ष, इक्कीसवें नमिनाथकी दश हजार वर्ष, बाईसवें नेमिनाथकी एक हजार वर्ष, तेईसवें पार्श्वनाथकी सौ वर्ष और चौबीसवें महावीरकी बहत्तर वर्षको आयु थी ॥११८-१२२॥


क्रमेणेति जिनेन्द्राणामायुः श्रेणिक कीर्तितम् । शृणु संप्रति यो यत्र जातश्चक्रधरोऽन्तरे ॥१२३॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! मैंने इस प्रकार क्रमसे तीर्थंकरोंकी आयुका वर्णन किया । अब जिस अन्तरालमें चक्रवर्ती हुए हैं उनका वर्णन सुन ॥१२३॥


ऋषभेण यशोवत्यां जातो भरतकीर्तितः । यस्य नाम्ना गते ख्यातिमेतद्वास्यं जगत्त्रये ॥१२४॥

अर्थ: भगवान् ऋषभदेवकी यशस्वती रानीसे भरत नामा प्रथम चक्रवर्ती हुआ । इस चक्रवर्तीके नामसे ही यह क्षेत्र तीनों जगत्में भरत नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥१२४॥


अभूद् यः पुण्डरीकिण्यां पीठः पूर्वत्र जन्मनि । सर्वार्थसिद्धिमैत्कृत्वा कुशसेनस्य शिष्यताम् ॥१२५॥

लोचैानन्तरमुत्पाद्य महासंवेगयोगतः । सर्वावभासनं ज्ञानं निर्वाणं स समीयिवान् ॥१२६॥

अर्थ: यह भरत पूर्व जन्ममें पुण्डरीकिणी नगरीमें पीठ नामका राजकुमार था । तदनन्तर कुशसेन मुनिका शिष्य होकर सर्वार्थसिद्धि गया । वहाँसे आकर भरत चक्रवर्ती हुआ । इसके परिणाम निरन्तर वैराग्यमय रहते थे जिससे केशलोंचके अनन्तर ही लोकालोकावभासी केवलज्ञान उत्पन्न कर निर्वाण धामको प्राप्त हुआ ॥१२५-१२६॥


बभूव नगरे राजा पृथिवीपुरनामनि । विजयो नाम शिष्योऽभूद् यशोधरगुरोरसौ ॥१२७॥

स मृतो विजयं गत्वा भुक्त्वा भोगमनुत्तमम् । विनीतायामिह च्युत्वा विजयस्याप्य पुत्रताम् ॥१२८॥

सौमङ्गलो बभूवासौ चक्री सगरसंज्ञितः । भुक्त्वा भोगं महासारं सुरपूजितशासनः ॥१२९॥

प्रबुद्धः पुत्रशोकेन प्रव्रज्य जिनशासने । उत्पाद्य केवलं नाथः सिद्धानामालयं गतः ॥१३०॥

अर्थ: फिर पृथ्वीपुर नगरमें राजा विजय था जो यशोधर गुरुका शिष्य होकर मुनि हो गया । अन्तमें सल्लेखनासे मरकर विजय नामका अनुत्तम विमानमें गया । वहाँ उत्तम भोग भोगकर अयोध्या नगरीमें राजा विजय और रानी सुमंगलाके सगर नामका द्वितीय चक्रवर्ती हुआ । वह इतना प्रभावशाली था कि देव भी उसकी आज्ञाका सम्मान करते थे । उसने उत्तमोत्तम भोग भोगकर अन्तमें पुत्रोंके शोकसे प्रवृत्ति हो जिन दीक्षा धारण कर ली और केवलज्ञान उत्पन्न कर सिद्धालय प्राप्त किया ॥१२७-१३०॥


शशिभः पुण्डरीकिण्यां शिष्योऽभूद् विमले गुरौ । गत्वा ग्रैवेयकं भुक्त्वा संसारसुखमुत्तमम् ॥१३१॥

च्युत्वा सुमित्रराजस्य भद्रवत्यामभूत् सुतः । श्रावस्त्यां मघवा नाम चक्रलक्ष्मीलतातरुः ॥१३२॥

श्रामण्यव्रतमास्थाय धर्मशान्तिजिनान्तरे । समाधानानुरूपेण गतः सौधर्मवासिताम् ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर पुण्डरीकिणी नगरीमें शशिप्रभ नामका राजा था । वह विमल गुरुका शिष्य होकर ग्रैवेयक गया । वहाँ संसारका उत्तम सुख भोगकर वहाँसे च्युत हो श्रावस्ती नगरीमें राजा सुमित्र और रानी भद्रवतीके मघवा नामका तृतीय चक्रवर्ती हुआ । यह चक्रवर्तीकी लक्ष्मीरूपी लताके लिपटनेके लिए मानो वृक्ष ही था । यह धर्मनाथ और शान्तिनाथ तीर्थंकरके बीचमें हुआ था तथा मुनिव्रत धारण कर समाधिके अनुरूप सौधर्म स्वर्गमें उत्पन्न हुआ था ॥१३१-१३३॥


सनत्कुमारचक्रेशे स्तुते मगधपुंगवः । ब्रवीति केन पुण्येन जातोऽसाविति रूपवान् ॥१३४॥

अर्थ: इसके बाद गौतमस्वामी चतुर्थ चक्रवर्ती सनत्कुमारकी बहुत प्रशंसा करने लगे तब राजा श्रेणिकने पूछा कि हे भगवन् ! वह किस पुण्यके कारण इस तरह अत्यन्त रूपवान् हुआ था ॥१३४॥


तस्मै समासतोऽवोचत् पुराणार्थं महामुनिः । यन्न वर्षशतेनापि सर्वं कथयितुं क्षमम् ॥१३५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गणधर भगवान्ने संक्षेपसे ही पुराणका सार वर्णन किया क्योंकि उसका पूरा वर्णन तो सौ वर्षमें भी नहीं कहा जा सकता था ॥१३५॥


तिर्यग्नरकदुःखानि कुमानुषभवांस्तथा । जीवः प्रपद्यते तावद्यावन्नायाति जैनताम् ॥१३६॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि जबतक यह जीव जैनधर्मको प्राप्त नहीं होता है तबतक तिर्यंच नरक तथा कुमानुष सम्बन्धी दुःख भोगता रहता है ॥१३६॥


अस्ति गोवर्धनामिख्यो ग्रामो जनसमाकुलः । जिनदत्ताभिधानोऽत्र बभूव गृहिणां वरः ॥१३७॥

अर्थ: पूर्वभवका वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्योंसे भरा एक गोवर्धन नामका ग्राम था उसमें जिनदत्त नामका उत्तम गृहस्थ रहता था ॥१३७॥


यथा सर्वाम्बुधानानां सागरो मूर्द्धनि स्थितः । भूधराणां च सर्वेषां मन्दरश्चारुकन्दरः ॥१३८॥

ग्रहाणां हरिदश्वश्च तृणानामिक्षुरर्चितः । ताम्बूलाख्या च वल्लीनां तरूणां हरिचन्दनः ॥१३९॥

कुलानामिति सर्वेषां श्रावकाणां कुलं स्तुतम् । आचारेण हि तत्पूतं सुगत्यर्जनतत्परम् ॥१४०॥

अर्थ: जिस प्रकार समस्त जलाशयोंमें सागर, समस्त पर्वतोंमें सुन्दर गुफाओंसे युक्त सुमेरु पर्वत, समस्त ग्रहोंमें सूर्य, समस्त तृणोंमें इक्षु, समस्त लताओंमें नागवल्ली और समस्त वृक्षोंमें हरिचन्दन वृक्ष प्रधान है, उसी प्रकार समस्त कुलोंमें श्रावकोंका कुल सर्वप्रधान है क्योंकि वह आचारकी अपेक्षा पवित्र है तथा उत्तम गति प्राप्त करानेमें तत्पर है ॥१३८-१४०॥


स गृही तत्र जातः सन् कृत्वा श्रावकचेष्टितम् । गुणभूषणसंपन्नः प्रशस्तामाश्रितो गतिम् ॥१४१॥

अर्थ: वह गृहस्थ श्रावक कुलमें उत्पन्न हो तथा श्रावकाचारका पालनकर गुणरूपी आभूषणोंसे युक्त होता हुआ उत्तम गतिको प्राप्त हुआ ॥१४१॥


भार्या विनयवत्यस्य तद्वियोगेन दुःखिता । शीलशेखरसद्गन्धा गृहिधर्मपरायणा ॥१४२॥

अर्थ: उसकी विनयवती नामकी पतिव्रता तथा गृहस्थका धर्म पालन करनेमें तत्पर रहनेवाली स्त्री थी सो पतिके वियोगसे बहुत दुःखी हुई ॥१४२॥


स्वनिवेशे जिनेन्द्राणां कारयित्वा वरालयम् । प्रव्रज्य सुतपः कृत्वा जगाम गतिमर्चिताम् ॥१४३॥

अर्थ: उसने अपने घरमें जिनेन्द्र भगवान्का उत्तम मन्दिर बनवाया तथा अन्तमें आर्यिकाकी दीक्षा ले उत्तम तपश्चरण कर देवगति प्राप्त की ॥१४३॥


तत्रैवान्योऽभवद् ग्रामे हेमबाहुर्महागृही । आस्तिकः परमोत्साहो दुराचारपराङ्मुखः ॥१४४॥

अर्थ: उसी नगरमें हेमबाहु नामका एक महागृहस्थ रहता था जो आस्तिक, परमोत्साही और दुराचारसे विमुख था ॥१४४॥


तया विनयवत्यासौ कारितं जैनमालयम् । अनुमोद्य महापूजां यक्षोऽभूदायुषः क्षये ॥१४५॥

अर्थ: विनयवतीने जो जिनालय बनवाया था तथा उसमें जो भगवान्की महापूजा होती थी उसकी अनुमोदना कर वह आयुके अन्तमें यक्ष जातिका देव हुआ ॥१४५॥


चतुर्विधस्य संघस्य निरतः पर्युपासने । सम्यग्दर्शनसंपन्नो जिनवन्दनतत्परः ॥१४६॥

अर्थ: वह यक्ष चतुर्विध संघकी सेवामें सदा तत्पर रहता था। सम्यग्दर्शनसे सहित था और जिनेन्द्रदेवकी वन्दना करनेमें सदा तत्पर रहता था ॥१४६॥


ततः सुमानुषो देव इति त्रिः परिवर्तनम् । कुर्वन्नसौ महापुर्यामासीद्धर्मरुचिर्नृपः ॥१४७॥

अस्य सानत्कुमारस्य पितासीत् सुप्रभाह्वयः । वरस्त्रीगुणमञ्जूषा माता तिलकसुन्दरी ॥१४८॥

अर्थ: वहाँसे आकर वह उत्तम मनुष्य हुआ, फिर देव हुआ। इस प्रकार तीन बार मनुष्य-देवगतिमें आवागमन कर महापुरी नगरीमें धर्मरुचि नामका राजा हुआ। यह धर्मरुचि सनत्कुमार स्वर्गसे आकर उत्पन्न हुआ था। इसके पिताका नाम सुप्रभ और माताका नाम तिलकसुन्दरी था। तिलकसुन्दरी उत्तम स्त्रियोंके गुणोंकी मानो मंजूषा ही थी ॥१४७-१४८॥


कृत्वा सुप्रभशिष्यत्वं महाव्रतधरस्ततः । महासमितिसंपन्नश्चारुगुप्तिसमावृतः ॥१४९॥

अर्थ: राजा धर्मरुचि सुप्रभ मुनिका शिष्य होकर पाँच महाव्रतों, पाँच समितियों और तीन गुप्तियोंका धारक हो गया ॥१४९॥


आत्मनिन्दापरो धीरः स्वदेहेऽत्यन्तनिःस्पृहः । दयादमपरो धीमान् शीलवैवधिकः परः ॥१५०॥

शङ्कादिदृष्टिदोषाणामतिदूरव्यवस्थितः । साधूनां सततं सक्तो वैयावृत्त्ये यथोचिते ॥१५१॥

अर्थ: वह सदा आत्मनिन्दामें तत्पर रहता था, आगत उपसर्गादिके सहनेमें धीर था, अपने शरीरसे अत्यन्त निःस्पृह रहता था, दया और दमको धारण करनेवाला था, बुद्धिमान् था, शीलरूपी काँवरका धारक था, शंका आदि सम्यग्दर्शनके आठ दोषोंसे बहुत दूर रहता था, और साधुओंकी यथायोग्य वैयावृत्यमें सदा लगा रहता था ॥१५०-१५१॥


संयुक्तः कालधर्मेण माहेन्द्रं कल्पमाश्रितः । अवाप परमान् भोगान् देवीनिवहमध्यगः ॥१५२॥

अर्थ: अन्तमें आयु समाप्त कर वह माहेन्द्र स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहाँ देवियोंके समूहके मध्यमें स्थित हो परम भोगोंको प्राप्त हुआ ॥१५२॥


च्युतो नागपुरे जातः साहदेवः स वैजयिः । सनत्कुमारशब्देन ख्यातश्चक्राङ्कशासनः ॥१५३॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँते च्युत होकर हस्तिनापुरमें राजा विजय और रानी सहदेवीके सनत्कुमार नामका चतुर्थ चक्रवर्ती हुआ ॥१५३॥


संकथानुक्रमाद् यस्य सौधर्मेण कीर्तितम् । रूपं द्रष्टुं समाजग्मुः सुरा विस्मयकारणम् ॥१५४॥

अर्थ: एक बार सौधर्मेन्द्रने अपनी सभामें कथाके अनुक्रमसे सनत्कुमार चक्रवर्तीके रूपकी प्रशंसा की। सो आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले उसके रूपको देखनेके लिए कुछ देव आये ॥१५४॥


कृतश्रमः स तैर्दृष्टो भूरजोधूसरद्युतिः । गन्धामलकपङ्केन दिग्धमौलिर्महातनुः ॥१५५॥

स्नानैकशाटकः श्रीमान् स्थितः स्नानोचितासने । नानावर्णपयःपूर्णकुम्भमण्डलमध्यगः ॥१५६॥

अर्थ: जिस समय उन देवोंने छिपकर उसे देखा उस समय वह व्यायाम कर निवृत्त हुआ था, उसके शरीरकी कान्ति अखाड़ेकी धूलिसे धूसरित हो रही थी, शिरमें सुगन्धित आँवलेका पंक लगा हुआ था, शरीर अत्यन्त ऊँचा था, स्नानके समय धारण करने योग्य एक वस्त्र पहने था, स्नानके योग्य आसनपर बैठा था, और नाना वर्णके सुगन्धित जलसे भरे हुए कलशोंके बीचमें स्थित था ॥१५५-१५६॥


उक्तः स तैरहो रूपं साधु शुक्रेण वर्तितम् । मानुषस्य सतो देवचित्ताकर्षणकारणम् ॥१५७॥

अर्थ: उसे देखकर देवोंने कहा कि अहो ! इन्द्रने जो इसके रूपकी प्रशंसा की है सो ठीक ही की है। मनुष्य होनेपर भी इसका रूप देवोंके चित्तको आकर्षित करनेका कारण बना हुआ है ॥१५७॥


तेनोक्तास्ते कृतस्नानं भुक्तवन्तं सभूषणम् । सुरा द्रक्ष्यथ मां स्तोकां वेलामत्रैव तिष्ठत ॥१५८॥

अर्थ: जब सनत्कुमारको पता चला कि देव लोग हमारा रूप देखना चाहते हैं तब उसने उनसे कहा कि आप लोग थोड़ी देर यहीं ठहरिए । मुझे स्नान और भोजन करनेके बाद आभूषण धारण कर लेने दीजिए फिर आप लोग मुझे देखें ॥१५८॥


एवमित्युदिते कृत्वा यः समस्तं यथोचितम् । स्थितः सिंहासने रत्नशैलकूटसमद्युतिः ॥१५९॥

अर्थ: ‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार कहनेपर चक्रवर्ती सनत्कुमार सब कार्य यथायोग्य कर सिंहासन पर आ बैठा । उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो रत्नमय पर्वतका शिखर ही हो ॥१५९॥


दृष्ट्वा तस्य पुनारूपं निनिन्दुर्नाकवासिनः । असारां धिगिमां शोभां मर्त्यानां क्षणिकामिति ॥१६०॥

अर्थ: तदनन्तर पुनः उसका रूप देखकर देव लोग आपसमें निन्दा करने लगे कि मनुष्योंकी शोभा असार तथा क्षणिक है, अतः इसे धिक्कार है ॥१६०॥


प्रथमे दर्शने याऽस्य यौवनेन समन्विता । सेयं क्षणात् कथं ह्रासं प्राप्ता सौदामिनीत्वरी ॥१६१॥

अर्थ: प्रथम दर्शनके समय जो इसकी शोभा यौवनसे सम्पन्न देखी थी वह बिजलीके समान नश्वर होकर क्षण-भरमें ही ह्रासको कैसे प्राप्त हो गयी ? ॥१६१॥


विज्ञाय क्षणिकां लक्ष्मीं सुरेभ्यो रागवर्जितः । श्रमणत्वं परिप्राप्य महाघोरतपोऽन्वितः ॥१६२॥

अर्थ: लक्ष्मी क्षणिक है ऐसा देवोंसे जानकर चक्रवर्ती सनत्कुमारका राग छूट गया । फलस्वरूप वह मुनि-दीक्षा लेकर अत्यन्त कठिन तप करने लगा ॥१६२॥


अधिसह्य महारोगान् महालब्धियुतोऽपि सन् । सनत्कुमारमारूढः स्वध्यानस्थितियोगतः ॥१६३॥

अर्थ: यद्यपि उसके शरीरमें अनेक रोग उत्पन्न हो गये थे तो भी वह उन्हें बड़ी शान्तिसे सहन करता रहा । तपके प्रभावसे अनेक ऋद्धियाँ भी उसे प्राप्त हुई थीं । अन्तमें आत्मध्यानके प्रभावसे वह सनत्कुमार स्वर्गमें देव हुआ ॥१६३॥


बभूव पुण्डरीकिण्यां नाम्ना मेघरथो नृपः । सर्वार्थसिद्धिमेतोऽसौ शिष्यो घनरथस्य सन् ॥१६४॥

च्युत्वा नागपुरे विश्वसेनस्यैराशरीरजः । तनयः प्रथितो जातः शान्तिः शान्तिकरो नृणाम् ॥१६५॥

अर्थ: अब पंचम चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं - पुण्डरीकिणी नगरमें राजा मेघरथ रहते थे । वे अपने पिता घनरथ तीर्थंकरके शिष्य होकर सर्वार्थसिद्धि गये । वहाँसे च्युत होकर हस्तिनागपुरमें राजा विश्वसेन और रानी ऐरादेवीके मनुष्योंको शान्ति उत्पन्न करनेवाले शान्तिनाथ नामक प्रसिद्ध पुत्र हुए ॥१६४-१६५॥


जातमात्रोऽभिषेकं यः सुरेभ्यः प्राप्य मन्दिरे । अभूच्चक्राङ्कभोगस्य नाथोऽसाविन्द्रसंस्तुतः ॥१६६॥

अर्थ: उत्पन्न होते ही देवोंने सुमेरु पर्वतपर इनका अभिषेक किया था । इन्द्रने स्तुति की थी और इस तरह वे चक्रवर्तीके भोगोंके स्वामी हुए ॥१६६॥


विहाय तृणवद्राज्यं प्राव्राज्यं समशिश्रियत । चक्रिणां पञ्चमो भूत्वा जिनानां षोडशोऽभवत् ॥१६७॥

अर्थ: ये पंचम चक्रवर्ती तथा सोलहवें तीर्थंकर थे । अन्तमें तृणके समान राज्य छोड़कर इन्होंने दीक्षा धारण की थी ॥१६७॥


कुन्थ्वरौ परतस्तस्य संजातौ चक्रवर्तिनौ । जिनेन्द्रत्वं च संप्राप्तौ पूर्वसंचितकारणौ ॥१६८॥

अर्थ: इनके बाद क्रमसे कुन्थुनाथ और अरनाथ नामके छठे तथा सातवें चक्रवर्ती हुए । ये पूर्वभवमें सोलह कारण भावनाओंका संचय करनेके कारण तीर्थंकर पदको भी प्राप्त हुए थे ॥१६८॥


सनत्कुमारराजोऽभूद्धर्मशान्तिजिनान्तरे । निजमेवान्तरं ज्ञेयं त्रयाणां जिनचक्रिणाम् ॥१६९॥

अर्थ: सनत्कुमार नामका चौथा चक्रवर्ती धर्मनाथ और शान्तिनाथ तीर्थंकरके बीचमें हुआ था और शान्ति, कुन्थु तथा अर इन तीन तीर्थंकर तथा चक्रवर्तियोंका अन्तर अपना-अपना ही काल जानना चाहिए ॥१६९॥


कनकाम इति ख्यातो नाम्ना धान्यपुरे नृपः । विचित्रगुप्तशिष्यः सन् स जयन्तं समाश्रयत् ॥१७०॥

अर्थ: अब आठवें चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं - धान्यपुर नगरमें राजा कनकाभ रहता था । वह विचित्रगुप्त मुनिका शिष्य होकर जयन्त नामका अनुत्तर विमानमें उत्पन्न हुआ ॥१७०॥


ईशावत्यां नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भामिनी । तारेति तनयस्तस्यामभून्नाकादुपागतः ॥१७१॥

सुभूम इति चाख्यातश्चक्राङ्कायाः श्रियः पतिः । येनेयं शोभना भूमिः कृता परमचेष्टिना ॥१७२॥

अर्थ: वहाँसे आकर वह ईशावती नगरीमें राजा कार्तवीर्य और रानी ताराके सुभूम नामका आठवाँ चक्रवर्ती हुआ । यह उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला था तथा इसने भूमिको उत्तम किया था इसलिए इसका सुभूम नाम सार्थक था ॥१७१-१७२॥


पितुर्यो वधकं युद्धे जामदग्न्यममीमरत् । भुञ्जानः पायसं पात्र्या चक्रत्वपरिवृत्तया ॥१७३॥

जामदग्न्याहतक्षात्रदन्ता एवास्य पायसम् । सत्रे किलाश्नतो जाता नैमित्तोक्तं समन्ततः ॥१७४॥

सप्तवारान् कृताक्षत्रारिपूर्णा किल भूरिति । चक्रे त्रिसप्तवारान् यः क्षितिं निष्कण्ठसूत्रिकाम् ॥१७५॥

अर्थ: परशुरामने युद्धमें इसके पिताको मारा था सो इसने उसे मारा । परशुरामने क्षत्रियोंको मारकर उनके दन्त इकट्ठे किये थे । किसी निमित्तज्ञानीने उसे बताया था कि जिसके देखनेसे ये दन्त खीर रूपमें परिवर्तित हो जायेंगे उसीके द्वारा तेरी मृत्यु होगी । सुभूम एक यज्ञमें परशुरामके यहाँ गया था । जब वह भोजन करनेको उद्यत हुआ तब परशुरामने वे सब दन्त एक पात्रमें रखकर उसे दिखाये । उसके पुण्य प्रभावसे वे दन्त खीर बन गये और पात्र चक्रके रूपमें बदल गया । सुभूमने उसी चक्रके द्वारा परशुरामको मारा था । परशुरामने पृथ्वीको सात बार क्षत्रियोंसे रहित किया था इसलिए उसके बदले इसने इक्कीस बार पृथ्वीको ब्राह्मणरहित किया था ॥१७३-१७५॥


अत्युग्रशासनात्तस्माद् विभा प्राप्य महाभयम् । कुलेषु रजकादीनां क्षत्रिया इव लिल्यिरे ॥१७६॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले परशुरामके भयसे क्षत्रिय धोबी आदिके कुलोंमें छिपते फिरते थे उसी प्रकार अत्यन्त कठिन शासनके धारक सुभूम चक्रवर्तीसे ब्राह्मण लोग भयभीत होकर धोबी आदिके कुलोंमें छिपते फिरते थे ॥१७६॥


अरमल्ल्यन्तरे चक्री भोगादविरतात्मकः । कालधर्मेण संयुक्तः सप्तमीं क्षितिमाश्रितः ॥१७७॥

अर्थ: यह सुभूम चक्रवर्ती अरनाथ और मल्लिनाथके बीचमें हुआ था तथा भोगोंसे विरक्त न होनेके कारण मरकर सातवें नरक गया था ॥१७७॥


नगर्यां वीतशोकायां चिन्ताह्वः पार्थिवोऽभवत् । भूत्वा सुप्रभशिष्योऽसौ ब्रह्माह्वं कल्पमाश्रितः ॥१७८॥

अर्थ: अब नौवें चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं -
वीतशोका नगरीमें चिन्त नामका राजा था। वह सुप्रभमुनिका शिष्य होकर ब्रह्मस्वर्ग गया ॥१७८॥


च्युतो नागपुरे पद्मरथस्य धरणीपतेः । मयूर्यां तनयो जातो महापद्मः प्रकीर्तितः ॥१७९॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर हस्तिनागपुरमें राजा पद्मरथ और रानी मयूरीके महापद्म नामका नवाँ चक्रवर्ती हुआ ॥१७९॥


अष्टौ दुहितरस्तस्य रूपातिशयगर्विताः । नेच्छन्ति भुवि भर्तारं हृता विद्याधरैरिमाः ॥१८०॥

उपलभ्य समानीता निर्वेदिन्यः प्रवव्रजुः । समाराधितकल्याणा देवलोकं समाश्रिताः ॥१८१॥

अर्थ: इसकी आठ पुत्रियाँ थीं जो सौन्दर्यके अतिशयसे गर्वित थीं तथा पृथ्वीपर किसी भर्ताकी इच्छा नहीं करती थीं । एक समय विद्याधर इन्हें हरकर ले गये । पता चलाकर चक्रवर्तीने उन्हें वापस बुलाया परन्तु विरक्त होकर उन्होंने दीक्षा धारण कर ली तथा आत्म-कल्याण कर स्वर्गलोक प्राप्त किया ॥१८०-१८१॥


तेऽप्यष्टौ तद्वियोगेन प्रव्रज्यां व्योमचारिणः । चक्रुर्विचित्रसंसारदर्शनत्रासमागताः ॥१८२॥

अर्थ: जो आठ विद्याधर उन्हें हरकर ले गये थे वे भी उनके वियोगसे तथा संसारकी विचित्र दशाके देखनेसे भयभीत हो दीक्षित हो गये ॥१८२॥


हेतुना तेन चक्रेशः प्रतिबुद्धो महागुणः । सुते न्यस्य श्रियं पद्मे निष्क्रान्तो विष्णुना समम् ॥१८३॥

अर्थ: इस घटनासे महागुणोंका धारक चक्रवर्ती प्रतिबोधको प्राप्त हो गया तथा पद्म नामक पुत्रके लिए राज्य दे विष्णु नामक पुत्रके साथ घरसे निकल गया अर्थात् दीक्षित हो गया ॥१८३॥


महापद्मस्तपः कृत्वा परं संप्राप्तकेवलः । लोकप्राग्भारमारुक्षदरमल्लिजिनान्तरे ॥१८४॥

अर्थ: इस प्रकार महापद्म मुनिने परम तप कर केवलज्ञान प्राप्त किया तथा अन्तमें लोकके शिखरमें जा पहुँचा। यह चक्रवर्ती अरनाथ और मल्लिनाथके बीचमें हुआ था ॥१८४॥


महेन्द्रदत्तनामासीत् पुरे विजयनामनि । कृत्वा नन्दनशिष्यत्वं माहेन्द्रं कल्पमुद्ययौ ॥१८५॥

अर्थ: अब दशवें चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं - विजय नामक नगरमें महेन्द्रदत्त नामका राजा रहता था । वह नन्दन मुनिका शिष्य बन- कर महेन्द्र स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥१८५॥


काम्पिल्यनगरे च्युत्वा वप्रायां हरिकेतुतः । हरिषेण इति ख्यातो जज्ञे चक्राङ्कितेशतः ॥१८६॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर काम्पिल्यनगरमें राजा हरिकेतु और रानी वप्राके हरिषेण नामका दशवाँ प्रसिद्ध चक्रवर्ती हुआ ॥१८६॥


स कृत्वा धरणीं सर्वां निजां चैत्यविभूषणाम् । तीर्थे सुव्रतनाथस्य सिद्धानां पदमाश्रितः ॥१८७॥

अर्थ: उसने अपने राज्यकी समस्त पृथिवीको जिन-प्रतिमाओंसे अलंकृत किया था तथा मुनिसुव्रतनाथ भगवान्के तीर्थमें सिद्धपद प्राप्त किया था ॥१८७॥


अमिताङ्कोऽभवद् राजा पुरे राजपुराभिधे । सुधर्ममित्रशिष्यत्वं कृत्वा ब्रह्मालयं ययौ ॥१८८॥

अर्थ: अब ग्यारहवें चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं - राजपुर नामक नगरमें एक अमितांक नामका राजा रहता था । वह सुधर्म मित्र नामक मुनिराजका शिष्य होकर ब्रह्म स्वर्ग गया ॥१८८॥


ततश्च्युतो यशोवत्यां जातस्तत्रैव वैजयिः । जयसेन इति ख्यातश्चक्रचुम्बितशासनः ॥१८९॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर उसी काम्पिल्यनगरमें राजा विजयकी यशोवती रानीसे जयसेन नामका ग्यारहवाँ चक्रवर्ती हुआ ॥१८९॥


परित्यज्य महाराज्यं दीक्षां दैगम्बरीमितः । रत्नत्रितयमाराध्य सैद्धं पदमशिश्रियत् ॥१९०॥

अर्थ: वह अन्तमें महाराज्य- का परित्याग कर दैगम्बरी दीक्षाको धारण कर रत्नत्रयकी आराधना करता हुआ सिद्धपदको प्राप्त हुआ ॥१९०॥


स्वतन्त्रलिङ्गसंज्ञस्य संभूतः प्राप्य शिष्यताम् । काश्यां कमलगुल्माख्यं विमानं समुपाश्रितः ॥१९१॥

अर्थ: यह मुनिसुव्रतनाथ और नमिनाथके अन्तरालमें हुआ था । अब बारहवें चक्रवर्तीका वर्णन करते हैं - काशी नगरीमें सम्भूत नामका राजा रहता था । वह स्वतन्त्रलिंग नामक मुनिराजका शिष्य हो कमलगुल्म नामक विमानमें उत्पन्न हुआ ॥१९१॥


च्युतो ब्रह्मरथस्याभूत् पुरे काम्पिल्यनामनि । चूलाह्वासंभवः पुत्रो ब्रह्मदत्तः प्रकीर्तितः ॥१९२॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर काम्पिल्यनगरमें राजा ब्रह्मरथ और रानी चूलाके ब्रह्मदत्त नामका बारहवाँ चक्रवर्ती हुआ ॥१९२॥


चक्रचिह्नामसौ भुक्त्वा श्रियं विरतिवर्जितः । सप्तमीं क्षितिमश्लिक्षन्नेमिपार्श्वजिनान्तरे ॥१९३॥

अर्थ: यह चक्रवर्ती लक्ष्मी- का उपभोगकर उससे विरत नहीं हुआ और उसी अविरत अवस्थामें मरकर सातवें नरक गया । यह नेमिनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरके बीचमें हुआ था ॥१९३॥


एते षट्खण्डभूनाथाः कीर्तिता मगधाधिप । .गतिर्न शक्यते येषां रोद्धुं देवासुरैरपि ॥१९४॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधराज ! इस प्रकार मैंने छह खण्डके अधिपति-चक्रवर्तियोंका वर्णन किया । ये इतने प्रतापी थे कि इनकी गतिको देव तथा असुर भी नहीं रोक सकते थे ॥१९४॥


प्रत्यक्षमक्षमुक्तं च फलमेतच्छुभाशुभम् । श्रुत्वानुभूय दृष्ट्वा च युक्तं न क्रियते कथम् ॥१९५॥

अर्थ: यह मैंने पुण्य- पापका फल प्रत्यक्ष कहा है, उसे सुनकर, अनुभव कर तथा देखकर लोग योग्य कार्य क्यों नहीं करते हैं ? ॥१९५॥


न पाथेयमपूपादि गृहीत्वा कश्चिदृच्छति । लोकान्तरं न चायाति किन्तु तत्सुकृतेतरम् ॥१९६॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई पथिक अपूप आदि पाथेय ( मार्ग हितकारी भोजन ) लिये बिना ग्रामान्तरको नहीं जाता है उसी प्रकार यह जीव भी पुण्य-पापरूपी पाथेयके बिना लोकान्तर- को नहीं जाता है ॥१९६॥


कैलासकूटकल्पेषु वरस्त्रीपूर्णकुक्षिषु । यद्वसन्ति स्वगारेषु तत्फलं पुण्यवृक्षजम् ॥१९७॥

अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियोंसे भरे तथा कैलासके समान ऊँचे उत्तम महलोंमें जो मनुष्य निवास करते हैं वह पुण्यरूपी वृक्षका ही फल है ॥१९७॥


शीतोष्णवातयुक्तेषु कुगृहेषु वसन्ति यत् । दारिद्र्यपङ्कनिर्मग्नास्तदधर्मतरोः फलम् ॥१९८॥

अर्थ: और जो दरिद्रतारूपी कीचड़में निमग्न हो सरदी, गरमी तथा हवाकी बाधासे युक्त खोटे घरोंमें रहते हैं वह पापरूपी वृक्षका फल है ॥१९८॥


विन्ध्यकूटसमाकारैर्वारणेन्द्रैर्व्रजन्ति यत् । नरेन्द्राश्चामरोद्धूताः पुण्यशालेरिदं फलम् ॥१९९॥

अर्थ: जिनपर चमर ढुल रहे हैं ऐसे राजा महाराजा जो विन्ध्याचलके शिखरके समान ऊँचे-ऊँचे हाथियोंपर बैठकर गमन करते हैं वह पुण्यरूपी शालि ( धान ) का फल है ॥१९९॥


तुरङ्गैर्यदलं स्वङ्गैर्गम्यते चलचामरैः । पादातमध्यगैः पुण्यनृपतेस्तद्विचेष्टितम् ॥२००॥

अर्थ: जिनके दोनों ओर चमर हिल रहे हैं ऐसे सुन्दर शरीरके धारक घोड़ोंपर बैठकर जो पैदल सेनाओंके बीचमें चलते हैं वह पुण्यरूपी राजाकी मनोहर चेष्टा है ॥२००॥


कल्पप्रासादसंकाशं रथमारुह्य यज्जनाः । व्रजन्ति पुण्यशैलेन्द्रात् स्रुतोऽसौ स्वादुनिर्झरः ॥२०१॥

अर्थ: जो मनुष्य स्वर्गके भवनके समान सुन्दर रथपर सवार हो गमन करते हैं वह उनके पुण्यरूपी हिमालयसे भरा हुआ स्वादिष्ट झरना है ॥२०१॥


स्फुटिताभ्यां पदाङ्घ्रिभ्यां मलग्रस्तपटच्चरैः । भ्रम्यते पुरुषैः पापविषवृक्षस्य तत्फलम् ॥२०२॥

अर्थ: जो पुरुष मलिन वस्त्र पहनकर फटे हुए पैरोंसे पैदल ही भ्रमण करते हैं वह पापरूपी विषवृक्षका फल है ॥२०२॥


अन्नं यदमृतप्रायं हेमपात्रेषु भुज्यते । स प्रभावो मुनिश्रेष्ठैरुक्तो धार्मरसायनः ॥२०३॥

अर्थ: जो मनुष्य सुवर्णमया पात्रोंमें अमृतके समान मधुर भोजन करते हैं उसे श्रेष्ठ मुनियोंने धर्मरूपी रसायनका प्रभाव बतलाया है ॥२०३॥


देवाधिपतिता चक्रत्वमिवा यच्च राजता । लभ्यते भव्यशार्दूलैस्तदहिंसालताफलम् ॥२०४॥

अर्थ: जो उत्तम भव्य जीव इन्द्रपद, चक्रवर्तीका पद तथा सामान्य राजाका पद प्राप्त करते हैं वह अहिंसारूपी लताका फल है ॥२०४॥


रामकेशवयोर्लक्ष्मीर्लभ्यते यच्च पुङ्गवैः । तद्धर्मफलमुक्ष्ये तत्कीर्तनमथाधुना ॥२०५॥

अर्थ: तथा उत्तम मनुष्य जो बलभद्र और नारायणकी लक्ष्मी प्राप्त करते हैं वह भी धर्मका ही फल है । हे श्रेणिक ! अब मैं उन्हीं बलभद्र और नारायणोंका कथन करूँगा ॥२०५॥


हास्तिनं नगरं रम्यं साकेता केतुभूषिता । श्रावस्ती वरविस्तीर्णा कौशाम्बी भासिताम्बरा ॥२०६॥

पोदनं शैलनगरं तथा सिंहपुरं पुरम् । कौशाम्बी हास्तिनं चेति क्रमेण परिकीर्तिता ॥२०७॥

सर्वद्रविणसंपन्ना भयसंपर्कवर्जिता । नगर्यो वासुदेवानामिमाः पूर्वत्र जन्मनि ॥२०८॥

अर्थ: प्रथम ही भरत क्षेत्रके नौ नारायणकी पूर्वभव सम्बन्धी नगरियोंके नाम सुनो - १ मनोहर हस्तिनापुर, २ पताकाओंसे सुशोभित अयोध्या, ३ अत्यन्त विस्तृत श्रावस्ती, ४ निर्मल आकाशसे सुशोभित कौशाम्बी, ५ पोदनपुर, ६ शैलनगर, ७ सिंहपुर, ८ कौशाम्बी और, ९ हस्तिनापुर ये क्रमसे नौ नगरियाँ कही गयी हैं । ये सभी नगरियाँ सर्वप्रकारके धन-धान्यसे परिपूर्ण थीं, भयके सम्पर्कसे रहित थीं, तथा वासुदेव अर्थात् नारायणोंके पूर्वजन्म सम्बन्धी निवाससे सुशोभित थीं ॥२०६-२०८॥


विश्वनन्दी महातेजास्ततः पर्वतकाभिधः । धनमित्रस्ततो ज्ञेयस्तृतीयश्चक्रधारिणाम् ॥२०९॥

ततः सागरदत्ताख्यः क्षुब्धसागरनिस्वनः । विकटः प्रियमित्रश्च तथा मानसचेष्टितः ॥२१०॥

पुनर्वसुश्च विज्ञातो गङ्गदेवश्च कीर्तितः । उक्तान्यमूनि नामानि कृष्णानां पूर्वजन्मनि ॥२११॥

अर्थ: अब इन वासुदेवोंके पूर्वभवके नाम सुनो - १ महाप्रतापी विश्वनन्दी, २ पर्वत, ३ धनमित्र, ४ क्षोभको प्राप्त हुए सागरके समान शब्द करनेवाला सागरदत्त, ५ विकट, ६ प्रियमित्र, ७ मानसचेष्टित, ८ पुनर्वसु और, ९ गंगदेव ये नारायणोंके पूर्व जन्मके नाम कहे ॥२०९-२११॥


नैविकीयातनं युद्धविजयाप्रमदाहृतिः । उद्यानारण्यरमणं वनक्रीडाभिकाङ्क्षणम् ॥२१२॥

अत्यन्तविषयासङ्गो विप्रयोगस्तनूनपात् । दौर्भाग्यं प्रेत्य हेतुश्च एतेभ्यो हरयोऽभवन् ॥२१३॥

विरूपा दुर्भगाः सन्तः सनिदानतपोधनाः । तत्त्वविज्ञाननिर्मुक्ताः संभवन्ति बलानुजाः ॥२१४॥

अर्थ: ये सभी पूर्वभवमें अत्यन्त विरूप तथा दुर्भाग्यसे युक्त थे । मूलधनका अपहरण १, युद्धमें हार २, स्त्रीका अपहरण ३, उद्यान तथा वनमें क्रीड़ा करना ४, वन क्रीड़ाकी आकाङ्क्षा ५, विषयोंमें अत्यन्त आसक्ति ६, इष्टजनवियोग ७, अग्निबाधा ८ और दौर्भाग्य ९ क्रमशः इन निमित्तोंको पाकर ये मुनि हो गये थे । निदान अर्थात् आगामी भोगोंकी लालसा रखकर तपश्चरण करते थे तथा तत्त्वज्ञानसे रहित थे । इसी अवस्थामें मरकर ये नारायण हुए थे । ये सभी नारायण बलभद्रके छोटे भाई होते हैं ॥२१२-२१४॥


सनिदानं तपस्तस्माद्वर्जनीयं प्रयत्नतः । तद्धि पश्चान्महाघोरदुःखदानसुशिक्षितम् ॥२१५॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! निदान- सहित तप प्रयत्नपूर्वक छोड़ना चाहिए क्योंकि वह पीछे चलकर महाभयंकर दुःख देनेमें निपुण होता है ॥२१५॥


संभूतस्तपसो मूर्तिः सुभद्रो वसुदर्शनः । श्रेयान् सुभूतिसंज्ञश्च वसुभूतिश्च कीर्तितः ॥२१६॥

घोषसेनपराम्भोधिनामानौ च महामुनी । द्रुमसेनश्च कृष्णानां गुरवः पूर्वजन्मनि ॥२१७॥

अर्थ: अब नारायणोंके पूर्वभवके गुरुओंके नाम सुनो - तपकी मूर्तिस्वरूप सम्भूत १, सुभद्र २, वसुदर्शन ३, श्रेयान्स ४, सुभूति ५, वसुभूति ६, घोषसेन ७, पराम्भोधि ८, और द्रुमसेन ९ ये नौ इनके पूर्वभवके गुरु थे अर्थात् इनके पास इन्होंने दीक्षा धारण की थी ॥२१६-२१७॥


महाशुक्राभिधः कल्पः प्राणतो लान्तवस्तथा । सहस्रारोऽपरो ब्रह्मनामा माहेन्द्रसंज्ञितः ॥२१८॥

सौधर्मश्च समाख्यातः कल्पः सच्चेष्टितालयः । सनत्कुमारनामा च महाशुक्राभिधोऽपरः ॥२१९॥

एतेभ्यः प्रच्युताः सन्तः प्राप्तपुण्यफलोदयाः । पुण्यावशेषतो जाता वासुदेवा नराधिपाः ॥२२०॥

अर्थ: अब जिस-जिस स्वर्गसे आकर नारायण हुए,उनके नाम सुनो - महाशुक्र १, प्राणत २, लान्तव ३, सहस्रार ४, ब्रह्म ५, माहेन्द्र ६, सौधर्म ७, सनत्कुमार ८, और महाशुक्र ९। पुण्यके फलस्वरूप नाना अभ्युदयोंको प्राप्त करनेवाले ये देव इन स्वर्गोंसे च्युत होकर अवशिष्ट पुण्यके प्रभावसे नारायण हुए हैं ॥२१८-२२०॥


पोदनं द्वापुरी हस्तिनगरं तत्पुनः स्मृतम् । तथा चक्रपुरं रम्यं कुशाग्रं मिथिलापुरी ॥२२१॥

विनीता मथुरा चेति माधवोत्पत्तिभूमयः । समस्तधनसंपूर्णाः सदोत्सवसमाकुलाः ॥२२२॥

अर्थ: अब इन नारायणोंकी जन्म-नगरियोंके नाम सुनो - पोदनपुर १, द्वापुरी २, हस्तिनापुर ३, हस्तिनापुर ४, चक्रपुर ५, कुशाग्रपुर ६, मिथिलापुरी ७, अयोध्या ८ और मथुरा ९ ये नगरियाँ क्रमसे नौ नारायणोंकी जन्म नगरियाँ थीं। ये सभी समस्त धनसे परिपूर्ण थीं तथा सदा उत्सवोंसे आकुल रहतीं थीं ॥२२१-२२२॥


आद्यः प्रजापतिर्ज्ञेयो ब्रह्मभूतिरतोऽपरः । रौद्रनादस्तथा सोमः प्रख्यातश्च शिवाकरः ॥२२३॥

सममूर्द्धाग्निनादश्च ख्यातो दशरथस्तथा । वसुदेवश्च कृष्णानां पितरः परिकीर्तिताः ॥२२४॥

अर्थ: अब इन नारायणोंके पिताके नाम सुनो - प्रजापति १, ब्रह्मभूति २, रौद्रनाद ३, सोम ४, प्रख्यात ५, शिवाकर ६, सममूर्धाग्निनाद ७, दशरथ ८ और वसुदेव ९ ये नौ क्रमसे नारायणोंके पिता कहे गये हैं ॥२२३-२२४॥


आद्या मृगावती ज्ञेया माधवी पृथिवी तथा । सीताम्बिका च लक्ष्मीश्च केशिनी कैकयी शुभा ॥२२५॥

देवकी चरमा ज्ञेया महासौभाग्यसंयुता । उदाररूपसंपन्नाः कृष्णानां मातरः स्मृताः ॥२२६॥

अर्थ: अब इनकी माताओंके नाम सुनो - मृगावती १, माधवी २, पृथ्वी ३, सीता ४, अम्बिका ५, लक्ष्मी ६, केशिनी ७, कैकयी ८ और देवकी ९ ये क्रमसे नौ नारायणोंकी मातायें थीं। ये सभी महासौभाग्यसे सम्पन्न तथा उत्कृष्ट रूपसे युक्त थीं ॥२२५-२२६॥


सुप्रभा प्रथमा देवी रूपिणी प्रभवा परा । मनोहरा सुनेत्रा च तथा विमलसुन्दरी ॥२२७॥

तथानन्दवती ज्ञेया कीर्तिता च प्रभावती । रुक्मिणी चेति कृष्णानां महादेव्यः प्रकीर्तिताः ॥२२८॥

अर्थ: [अब इन नारायणोंके नाम सुनो - त्रिपृष्ठ १, द्विपृष्ठ २. स्वयम्भू ३, पुरुषोत्तम ४, पुरुषसिंह ५, पुण्डरीक ६, दत्त ७, लक्ष्मण ८ और कृष्ण ९ ये नौ नारायण हैं] अब इनकी पट्टरानियोंका नाम सुनो - सुप्रभा १, रूपिणी २, प्रभवा ३, मनोहरा ४, सुनेत्रा ५, विमलसुन्दरी ६, आनन्दवती ७, प्रभावती ८ और रुक्मिणी ९ ये नौ नारायणोंकी क्रमशः नौ पट्टरानियाँ कहीं गयी है ॥२२७-२२८॥


प्रकाण्डपाण्डुरागारा नगरी पुण्डरीकिणी । पृथिवीवसुविस्तीर्णा द्वितीया पृथिवीपुरी ॥२२९॥

अन्यानन्दपुरी ज्ञेया तथानन्दपुरी स्मृता । पुरी व्यतीतशोकाख्या पुरं विजयसंज्ञितम् ॥२३०॥

सुसीमा च तथा क्षेमा हास्तिनं च प्रकीर्तितम् । एतानि बलदेवानां पुराणि गतजन्मनि ॥२३१॥

अर्थ: अथानन्तर अब नौ बलभद्रोंका वर्णन करते हैं। सो सर्वप्रथम इनकी पूर्वजन्म-सम्बन्धी नगरियोंके नाम सुनो - उत्तमोत्तम धवल महलोंसे सहित पुण्डरीकिणी १ पृथ्वीके समान अत्यन्त विस्तृत पृथिवीपुरी २ आनन्दपुरी ३ नन्दपुरी ४ वीतशोका ५ विजयपुर ६ सुसीमा ७ क्षेमा ८ और हस्तिनापुर ९ ये नौ बलभद्रोंके पूर्व जन्मसम्बन्धी नगरोंके नाम हैं ॥२२९-२३१॥


बलो मारुतवेगश्च नन्दिमित्रो महाबलः । पुरुषर्षभसंज्ञश्च तथा षष्ठः सुदर्शनः ॥२३२॥

वसुन्धरश्च विज्ञेयः श्रीचन्द्रः सखिसंज्ञकः । ज्ञेयान्यमूनि नामानि रामाणां पूर्वजन्मनि ॥२३३॥

अर्थ: अब बलभद्रोंके पूर्वजन्मके नाम सुनो - बल १ मारुतवेग २ नन्दिमित्र ३ महाबल ४ पुरुषर्षभ ५ सुदर्शन ६ वसुन्धर ७ श्रीचन्द्र ८ और सखिसंज्ञ ९ ये नौ बलभद्रोंके पूर्वनाम जानना चाहिए ॥२३२-२३३॥


अमृतारो मुनिः श्रेष्ठः महासुव्रतसुव्रतौ । वृषभोऽथ प्रजापालस्तथा दमवराभिधः ॥२३४॥

सुधर्मोऽर्णवसंज्ञश्च तथा विद्रुमसंज्ञितः । अमी पूर्वभवे ज्ञेया गुरवः सीरधारिणाम् ॥२३५॥

अर्थ: अब इनके पूर्वभव सम्बन्धी गुरुओंके नाम सुनो - अमृतार १ महासुव्रत २ सुव्रत ३ वृषभ ४ प्रजापाल ५ दमवर ६ सुधर्म ७ अर्णव ८ और विद्रुम ९ ये नौ बलभद्रोंके पूर्वभवके गुरु हैं अर्थात् इनके पास इन्होंने दीक्षा धारण की थी ॥२३४-२३५॥


निर्वासोऽनुत्तरा ज्ञेयास्त्रयाणां हलधारिणाम् । सहस्रारस्त्रयाणां च द्वयोर्ब्रह्मनिवासिता ॥२३६॥

महाशुक्राभिधानश्च कल्पः परमशोभनः । एभ्यश्च्युत्वा समुत्पन्ना रामाः साधुसुचेष्टिताः ॥२३७॥

अर्थ: अब ये जिस स्वर्गसे आये उसका वर्णन करते हैं - तीन बलभद्रका अनुत्तर विमान, तीनका सहस्रार स्वर्ग, दोका ब्रह्म स्वर्ग और एकका अत्यन्त सुशोभित महाशुक्र स्वर्ग पूर्वभवका निवास था। ये सब यहाँसे च्युत होकर उत्तम चेष्टाओंके धारक बलभद्र हुए थे ॥२३६-२३७॥


भद्राम्भोजा सुभद्रा च सुवेषा च सुदर्शना । सुप्रभा विजया चान्या वैजयन्ती प्रकीर्तिता ॥२३८॥

महाभागा च विज्ञेया महाशीलाऽपराजिता । रोहिणी चेति विज्ञेया जनन्यः सीरधारिणाम् ॥२३९॥

अर्थ: अब इनकी माताओंके नाम सुनो - भद्राम्भोजा १ सुभद्रा २ सुवेषा ३ सुदर्शना ४ सुप्रभा ५ विजया ६ वैजयन्ती ७ उदार अभिप्रायको धारण करनेवाली तथा महाशीलवती अपराजिता ( कौशिल्या ) ८ और रोहिणी ९ ये नौ बलभद्रोंकी क्रमशः माताओंके नाम हैं ॥२३८-२३९॥


श्रेये आदीन् जिनान्पञ्च त्रिपृष्ठाद्याबलानुजाः । क्रमेण पञ्च विचन्ते तत्परावरतः परौ ॥२४०॥

नमिसुव्रतयोर्मध्ये लक्ष्मणः परिकीर्तितः । वन्दको नेमिनाथस्य कृष्णोऽभूदद्भुतक्रियः ॥२४१॥

अर्थ: इनमें-से त्रिपृष्ठ आदि पाँच नारायण और पाँच बलभद्र श्रेयान्सनाथको आदि लेकर धर्मनाथ स्वामीके समय पर्यन्त हुए। छठे और सातवें नारायण तथा बलभद्र अरनाथ स्वामीके बाद हुए। लक्ष्मण नामके आठवें नारायण और राम नामक आठवें बलभद्र मुनिसुव्रतनाथ और नमिनाथके बीचमें हुए तथा अद्भुत क्रियाओंको करनेवाले श्री कृष्ण नामक नौवें नारायण तथा बल नामक नौवें बलभद्र भगवान् नेमिनाथकी वन्दना करनेवाले हुए ॥२४०-२४१॥


अलकं विजयं ज्ञेयं नन्दनं पृथिवीपुरम् । तथा हरिपुरं सूर्यसिंहशब्दपरे पुरे ॥२४२॥

लङ्काराजगृहं चान्यक्रमेण प्रतिचक्रिणाम् । स्थानान्यमूनि वेद्योनि दीप्तानि मणिरश्मिभिः ॥२४३॥

अर्थ: ★ [ अब बलभद्रोंके नाम सुनो - अचल १ विजय २ भद्र ३ सुप्रभ ४ सुदर्शन ५ नन्दिमित्र ६ नन्दिषेण ७ रामचन्द्र ( पद्म ) और बल ] नारायणोंके प्रतिद्वन्द्वी नौ प्रतिनारायण होते हैं । उनके नगरोंके नाम इस प्रकार जानना चाहिए । अलकपुर १ विजयपुर २ नन्दनपुर ३ पृथ्वीपुर ४ हरिपुर ५ सूर्यपुर ६ सिंहपुर ७ लंका ८ और राजगृह ९ । ये सभी नगर मणियोंकी किरणोंसे देदीप्यमान थे ॥२४२-२४३॥


अश्वग्रीव इति ख्यातस्तारको मेरकस्तथा । मधुकैटभसंज्ञश्च निशुम्भश्च तथा बलिः ॥२४४॥

प्रह्लादो दशवक्त्रश्च जरासन्धश्च कीर्तितः । क्रमेण वासुदेवानां विज्ञेया प्रतिचक्रिणः ॥२४५॥

अर्थ: अब प्रतिनारायणोंके नाम सुनो - अश्वग्रीव १ तारक २ मेरक ३ मधुकैटभ ४ निशुम्भ ५ बलि ६ प्रह्लाद ७ दशानन ८ और जरासन्ध ९ ये नौ प्रतिनारायणोंके नाम जानना चाहिए ॥२४४-२४५॥


सुवर्णकुम्भः सत्कीर्तिः सुधर्मोऽथ महामुनिः । मृगाङ्कः श्रुतिकीर्तिश्च सुमित्रो भवनश्रुतः ॥२४६॥

सुव्रतश्च सुसिद्धार्थो रामाणां गुरवः स्मृताः । तपःसंभारसंजातकीर्तिवेष्टितविष्टपाः ॥२४७॥

अर्थ: सुवर्णकुम्भ १ सत्कीर्ति २ सुधर्म ३ मृगांक ४ श्रुतिकीर्ति ५ सुमित्र ६ भवनश्रुत ७ सुव्रत ८ और सुसिद्धार्थ ९ बलभद्रोंके गुरुओंके नाम हैं। इन सभीने तपके भारसे उत्पन्न कीर्तिके द्वारा समस्त संसारको व्याप्त कर रखा था ॥२४६-२४७॥


दग्ध्वा कर्मोरुकक्षं क्षुमितबहुविधव्याधिसंभ्रान्तसत्त्वं मृत्युव्याघ्राति भीमं भवविपुलसमुत्तुङ्गवृक्षोरुखण्डम् । याता निर्वाणमष्टौ हलधरविभवं प्राप्य संविग्नभावाः संप्राप ब्रह्मलोकं चरमहलधरः कर्मबन्धावशेषात् ॥२४८॥

अर्थ: नौ बलभद्रोंमें-से आठ बलभद्र तो बलभद्रका वैभव प्राप्त कर तथा संसारसे उदासीन हो उस कर्मरूपी महावनको भस्म कर निर्वाणको पधारे जिसमें कि क्षोभको प्राप्त हुए नाना प्रकारके रोगरूपी जन्तु भ्रमण कर रहे थे, जो मृत्युरूपी व्याघ्रसे अत्यन्त भयंकर था तथा जिसमें जन्मरूपी बड़े-बड़े ऊँचे वृक्षोंके खण्ड लग रहे थे। अन्तिम बलभद्र कर्म-बन्धन शेष रहनेके कारण ब्रह्म स्वर्गको प्राप्त हुआ था ॥२४८॥


आदौ कृत्वा जिनेन्द्रान् भरतजयकृतां केशवानां बलाना- मेतत्ते पूर्वजन्मप्रभृति निगदितं वृत्तमत्यन्तचित्रम् । केचिद् गच्छन्ति मोक्षं कृतपुरुतपसः स्तोकपङ्काश्च केचित् केचिद् भ्राम्यन्ति भूयो बहुभवगहनां संसृतिं निर्विरामाः ॥२४९॥

अर्थ: गौतम गणधर राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मैंने तीर्थंकरोंको आदि लेकर भरत क्षेत्रको जीतनेवाले चक्रवर्तियों, नारायणों तथा बलभद्रोंका अत्यन्त आश्चर्यसे भरा हुआ पूर्व-जन्म आदिका वृत्तान्त तुझसे कहा। इनमें-से कितने ही तो विशाल तपश्चरण कर उसी भवसे मोक्ष जाते हैं, किन्हींके कुछ पाप कर्म अवशिष्ट रहते हैं तो वे कुछ समय तक संसारमें भ्रमण कर मोक्ष जाते हैं और कुछ कर्मोंकी सत्ता अधिक प्रबल होनेसे दीर्घ काल तक अनेक जन्म-मरणोंसे सघन इस संसार-अटवीमें निरन्तर घूमते रहते हैं ॥२४९॥


एतज्ज्ञात्वा विचित्रं कलिकलुषमहासागरावर्तमग्नं संसारप्राणिजातं विरसगतिमहादुःखवह्निप्रतप्तम् । कष्टं नेच्छन्ति केचित्सुकृतपरिचयं कर्तुमन्यस्तु कश्चित् कृत्वा मोहावसानं रविरिव विमलं केवलज्ञानमेति ॥२५०॥

अर्थ: ये संसारके विविध प्राणी कलिकालरूपी अत्यन्त मलिन महासागरकी भ्रमरमें मग्न हैं तथा नरकादि नीच गतियोंके महादुःखरूपी अग्निमें सन्तप्त हो रहे हैं। ऐसा जानकर कितने ही निकट भव्य तो इस संसारकी इच्छा ही नहीं करते हैं। कुछ लोग पुण्यका परिचय करना चाहते हैं और कुछ लोग सूर्यके समान मोहका अवसान कर निर्मल केवलज्ञानको प्राप्त होते हैं ॥२५०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते तीर्थंकरभवानुकीर्तनं नाम विंशतितमं पर्व ॥२०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें तीर्थंकरादिके भवोंका वर्णन करनेवाला बीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२०॥

२१. एकविंशतितमं पर्व (सुव्रत-वज्रबाहु-कीर्तिमाहात्म्यवर्णनं)

शृण्वतोऽष्टमरामस्य संबन्धार्थं वदामि ते । वंशानुकीर्तनं किंचिन्महापुरुषसंभवम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! अब आठवें बलभद्र श्रीरामका सम्बन्ध बतलानेके लिए कुछ महापुरुषोंसे उत्पन्न वंशोंका कथन करता हूँ सो सुन ॥१॥


जिनेन्द्रे दशमेऽतीते राजासीत् सुमुखश्रुतिः । कौशाम्ब्यामपरोऽत्रैव वाणिजो वीरकश्रुतिः ॥२॥

हृत्वा तद्दयितां राजा श्रित्वा कामं यथेप्सितम् । दत्त्वा दानं विरागाणां मृत्वा रुक्मगिरिं ययौ ॥३॥

तत्रापि दक्षिणश्रेण्यां पुरे हरिपुरसंज्ञके । उत्पन्नौ दम्पती, क्रीडन् भोगभूमिमशिश्रियत् ॥४॥

दयिताविरहाङ्गारदग्धदेहस्तु वीरकः । तपसा देवतां प्राप देवीनिवहसंकुलाम् ॥५॥

अर्थ: दशवें तीर्थंकर श्री शीतलनाथ भगवान्के मोक्ष चले जानेके बाद कौशाम्बी नगरीमें एक सुमुख नामका राजा हुआ । उसी समय उस नगरीमें एक वीरक नामका श्रेष्ठी रहता था । उसकी स्त्रीका नाम वनमाला था । राजा सुमुखने वनमालाका हरणकर उसके साथ इच्छानुसार कामोपभोग किया और अन्तमें वह मुनियोंके लिए दान देकर विजयार्ध पर्वतपर गया । वहाँ विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक हरिपुर नामका नगर था । उसमें वे दोनों दम्पती उत्पन्न हुए अर्थात् विद्याधर-विद्याधरी हुए । वहाँ क्रीड़ा करता हुआ राजा सुमुखका जीव विद्याधर भोगभूमि गया । उसके साथ उसकी स्त्री विद्याधरी भी थी । इधर स्त्रीके विरहरूपी अंगारसे जिसका शरीर जल रहा था ऐसा वीरक श्रेष्ठी तपके प्रभावसे अनेक देवियोंके समूहसे युक्त देवपदको प्राप्त हुआ ॥२-५॥


विदित्वावधिना देवो वैरिणं हरिसंभवम् । भरतेऽतिष्ठपद्यातं दुर्गतिं पापधीरतिः ॥६॥

अर्थ: उसने अवधि ज्ञानसे जब यह जाना कि हमारा वैरी राजा सुमुख हरिक्षेत्रमें उत्पन्न हुआ है तो पाप बुद्धिमें प्रेम करनेवाला वह देव उसे वहाँसे भरतक्षेत्रमें रख गया तथा उसकी दुर्दशा की ॥६॥


यतोऽसौ हरितः क्षेत्रादानीतो भार्यया समम् । ततो हरिरिति ख्यातिं गतः सर्वत्र विष्टपे ॥७॥

अर्थ: चूँकि वह अपनी भार्याके साथ हरिक्षेत्रसे हरकर लाया गया था इसलिए समस्त संसारमें वह हरि इस नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥७॥


नाम्ना महागिरिस्तस्य सुतो हिमगिरिस्ततः । ततो वसुगिरिर्जातो बभूवेन्द्रगिरिस्ततः ॥८॥

रत्नमालोऽथ संभूतो भूतदेवो महीधरः । इत्याद्याः शतशोऽतीता राजानो हरिवंशजाः ॥९॥

अर्थ: उसके महागिरि नामका पुत्र हुआ, उसके हिमगिरि, हिमगिरिके वसुगिरि, वसुगिरिके इन्द्रगिरि, इन्द्रगिरिके रत्नमाला, रत्नमालाके सम्भूत और सम्भूतके भूतदेव आदि सैकड़ों राजा क्रमशः उत्पन्न हुए । ये सब हरिवंशज कहलाये ॥८-९॥


वंशे तत्र महासत्त्वः सुमित्र इति विश्रुतः । बभूव परमो राजा कुशाग्राख्ये महापुरे ॥१०॥

अर्थ: आगे चलकर उसी हरिवंशमें कुशाग्र नामक महानगरमें सुमित्र नामक प्रसिद्ध उत्कृष्ट राजा हुआ ॥१०॥


त्रिदशेन्द्रसमो भोगैः कान्त्या जितनिशाकरः । जितप्रभाकरो दीप्त्या प्रतापानतशात्रवः ॥११॥

अर्थ: यह राजा भोगोंसे इन्द्रके समान था, कान्तिसे चन्द्रमाको जीतनेवाला था, दीप्तिसे सूर्यको पराजित कर रहा था और प्रतापसे समस्त शत्रुओंको नम्र करनेवाला था ॥११॥


पद्मावतीति जायास्य पद्मनेत्रा महाद्युतिः । शुभलक्षणसंपूर्णा पूर्णसर्वमनोरथा ॥१२॥

अर्थ: उसकी पद्मावती नामकी स्त्री थी। पद्मावती बहुत ही सुन्दरी थी। उसके नेत्र कमलके समान थे, वह विशाल कान्तिकी धारक थी, शुभ लक्षणोंसे सम्पूर्ण थी तथा उसके सर्व मनोरथ पूर्ण हुए थे ॥१२॥


सुप्तासौ भवने रम्ये रात्रौ तल्पे सुखावहे । अद्राक्षीत् पश्चिमे यामे स्वप्नान् षोडश पूजितान् ॥१३॥

अर्थ: एक दिन वह रात्रिके समय सुन्दर महलमें सुखकारी शय्यापर सो रही थी कि उसने पिछले पहरमें निम्नलिखित सोलह उत्तम स्वप्न देखे ॥१३॥


द्विरदं शाक्वरं सिंहमभिषेकं श्रियस्तथा । दामनी शीतगुं भानुं झषौ कुम्भं सरोऽब्जवत् ॥१४॥

सागरं सिंहसंयुक्तमासनं रत्नचित्रितम् । विमानं भवनं शुभ्रं रत्नराशिं हुताशनम् ॥१५॥

अर्थ: गज १ वृषभ २ सिंह ३ लक्ष्मीका अभिषेक ४ दो मालाएँ ५ चन्द्रमा ६ सूर्य ७ दो मीन ८ कलश ९ कमलकलित सरोवर १० समुद्र ११ रत्नोंसे चित्र-विचित्र सिंहासन १२ विमान १३ उज्ज्वल भवन १४ रत्नराशि १५ और अग्नि १६ ॥१४-१५॥


ततो विस्मितचित्ता सा विबुद्धा बुद्धिशालिनी । कृत्वा यथोचितं याता विनीता भर्तुरन्तिकम् ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त आश्चर्यसे चकित हो रहा था ऐसी बुद्धिमती रानी पद्मावती जागकर तथा प्रातःकाल सम्बन्धी यथायोग्य कार्य कर बड़ी नम्रतासे पतिके समीप गयी ॥१६॥


कृताञ्जलि पप्रच्छ स्वस्वप्नार्थं न्यायवेदिनी । भद्रासने सुखासीना स्फुरद्वदनपङ्कजा ॥१७॥

अर्थ: वहाँ जाकर जिसका मुखकमल फूल रहा था ऐसी न्याय की जाननेवाली रानी भद्रासनपर सुखसे बैठी। तदनन्तर उसने हाथ जोड़कर पतिसे अपने स्वप्नोंका फल पूछा ॥१७॥


दयितोऽकथयद्यावत्तस्यै स्वप्नफलं शुभम् । अपप्तद् गगनात्तावद्वृष्टी रत्नप्रसूतिनी ॥१८॥

अर्थ: इधर पतिने जबतक उससे स्वप्नोंका फल कहा तबतक उधर आकाशसे रत्नोंकी वृष्टि पड़ने लगी ॥१८॥


तिस्रः कोट्योऽर्धकोटी च वसुनोऽस्य दिने दिने । भवने मुदितो यक्षो ववर्ष सुरपाज्ञया ॥१९॥

अर्थ: इन्द्रकी आज्ञासे प्रसन्न यक्ष प्रतिदिन इसके घरमें साढ़े तीन करोड़ रत्नोंकी वर्षा करता था ॥१९॥


मासान् पञ्चदशा खण्डं पतन्त्या वसुधारया । तया रत्नसुवर्णादिमयं तन्नगरं कृतम् ॥२०॥

अर्थ: पन्द्रह मास तक लगातार पड़ती हुई धनवृष्टिसे वह समस्त नगर रत्न तथा सुवर्णादिमय हो गया ॥२०॥


तस्याः कमलवासिन्यो जिनमातुः प्रतिक्रियाम् । समस्तामादृता देव्यश्चक्रुः सपरिवारिकाः ॥२१॥

अर्थ: पद्म, महापद्म आदि सरोवरोंके कमलोंमें रहनेवाली श्री-ह्री आदि देवियाँ अपने परिवारके साथ मिलकर जिनमाताकी सब प्रकारकी सेवा बड़े आदरभावसे करती थीं ॥२१॥


जातमात्रमथो सन्तं जिनेन्द्रं क्षीरवारिणा । लोकपालैः समं शक्रो मेरावस्नपयच्छ्रिया ॥२२॥

अर्थ: अथानन्तर भगवान्का जन्म हुआ। सो जन्म होते ही इन्द्रने लोकपालोंके साथ बड़े वैभवसे सुमेरु पर्वतपर भगवान्का क्षीरसागरके जलसे अभिषेक किया ॥२२॥


संपूज्य भक्तितः स्तुत्वा प्रणम्य च सुराधिपः । मातुरङ्के पुनः प्रीत्या जिननाथमतिष्ठिपत् ॥२३॥

अर्थ: अभिषेकके बाद इन्द्रने भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेवकी पूजा की, स्तुति की, प्रणाम किया और तदनन्तर प्रेमपूर्वक माताकी गोदमें लाकर विराजमान कर दिया ॥२३॥


आसीद् गर्भस्थिते यस्मिन् सुव्रता जननी यतः । विशेषेण ततः कीर्तिं गतोऽसौ सुव्रताख्यया ॥२४॥

अर्थ: जब भगवान् गर्भमें स्थित थे तभीसे उनकी माता विशेषकर सुव्रता अर्थात् उत्तम व्रतोंको धारण करनेवाली हो गयी थीं इसलिए वे मुनिसुव्रत नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए ॥२४॥


अञ्जनाद्रिप्रकाशोऽपि स जिनो देहतेजसा । जिगाय तिग्मगुं पूर्णनिशाकरनिभाननः ॥२५॥

अर्थ: जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था ऐसे सुव्रतनाथ भगवान् यद्यपि अंजनागिरिके समान श्यामवर्ण थे तथापि उन्होंने अपने तेजसे सूर्यको जीत लिया था ॥२५॥


दधता परमं तेन भोगमिन्द्रेण कल्पितम् । अहमिन्द्रसुखं दूरमधरीकृतमूर्जितम् ॥२६॥

अर्थ: इन्द्रके द्वारा कल्पित ( रचित ) उत्तम भोगोंको धारण करते हुए उन्होंने अहमिन्द्रका भारी सुख दूरसे ही तिरस्कृत कर दिया था ॥२६॥


हाहाहूहूश्रुती तस्य तुम्बुरू नारदस्तथा । विश्वावसुश्च गायन्ति किन्नर्योऽप्सरसो वराः ॥२७॥

वीणावेण्वादिवाद्येन तत्कृतेन सुचारुणा । स्नानादिविधिमाप्नोति देवीजनितवर्तनम् ॥२८॥

अर्थ: हा-हा, हू-हू, तुम्बुरू, नारद और विश्वावसु आदि गन्धर्व-देव सदा उनके समीप गाते रहते थे तथा किन्नर देवियाँ और अनेक अप्सराएँ वीणा, बाँसुरी आदि बाजोंके साथ नृत्य करती रहती थीं । अनेक देवियाँ उबटन आदि लगाकर उन्हें स्नान कराती थीं ॥२७-२८॥


स्मितलज्जितदम्भेर्ष्याप्रसादादिसुविभ्रमाः । यौवनेऽरमयद्रामाः सोऽभिरामो यथेप्सितम् ॥२९॥

अर्थ: सुन्दर शरीरको धारण करनेवाले भगवान्ने यौवन अवस्थामें मन्द मुसकान, लज्जा, दम्भ, ईर्ष्या, प्रसाद आदि सुन्दर विभ्रमोंसे युक्त स्त्रियोंको इच्छानुसार रमण कराया था ॥२९॥


शरदम्भोदविलयं स दृष्ट्वा प्रतिबुद्धवान् । स्तुतो लौकान्तिकैर्देवैः प्रविव्रजिषयान्वितः ॥३०॥

अर्थ: अथानन्तर एक बार शरद्ऋतुके मेघको विलीन होता देख वे प्रतिबोधको प्राप्त हो गये जिससे दीक्षा लेनेकी इच्छा उनके मनमें जाग उठी । उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति की ॥३०॥


दत्त्वा सुव्रतसंज्ञाय राज्यं पुत्राय निस्पृहः । प्रणताशेषसामन्तमण्डलं सुखपालनम् ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें समस्त सामन्तोंके समूह नम्रीभूत थे तथा सुखसे जिसका पालन होता था ऐसा राज्य उन्होंने अपने सुव्रत नामक पुत्रके लिए देकर सब प्रकारकी इच्छा छोड़ दी ॥३१॥


निर्गतः सौरभव्याप्तदशदिक्चक्रवालतः । दिव्यानुलेपनोदारसुकान्तमकरन्दतः ॥३२॥

सौरभाकृष्टसंभ्रान्तभ्रमरीपृथुवृन्दतः । हरिन्मणिविमाचक्रपालाशचयसंकुलात् ॥३३॥

दन्तपङ्क्तिसितच्छायाविसजालसमाकुलात् । नानाविभूषणध्वानविहगारावपूरितात् ॥३४॥

वलीतरङ्गसंपृक्तात् स्तनचक्राह्वशोभितात् । राजहंसः सितः कीर्त्या दिव्यस्त्रीपद्मखण्डतः ॥३५॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसने अपनी सुगन्धिसे दशों दिशाओंको व्याप्त कर रखा था, जिसमें शरीरपर लगा हुआ दिव्य विलेपन ही सुन्दर मकरन्द था, जिसने अपनी सुगन्धिसे आतुर भ्रमरियोंके भारी समूहको अपनी ओर खींच रखा था, जो हरे मणियोंकी कान्तिरूपी पत्तोंके समूहसे व्याप्त था, जो दाँतोंकी पंक्तिकी सफेद कान्तिरूपी मृणालके समूहसे युक्त था, जो नाना प्रकारके आभूषणोंकी ध्वनिरूपी पक्षियोंकी कलकूजनसे परिपूर्ण था, बलिरूपी तरंगोंसे युक्त था और जो स्तनरूपी चक्रवाक पक्षियोंसे सुशोभित था ऐसी उत्तम स्त्रियोंरूपी कमल-वनसे वे कीर्ति-धवल राजहंस ( श्रेष्ठ राजा भगवान् मुनिसुव्रतनाथ ) इस प्रकार बाहर निकले जिस प्रकार कि किसी कमल-वनसे राजहंस ( हंस विशेष ) निकलता है ॥३२-३५॥


देवमानवराजोढां शिविकामपराजिताम् । आरुह्य विपुलोद्यानं ययौ चूडामणिर्नृणाम् ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर मनुष्योंके चूड़ा-मणि भगवान् मुनिसुव्रतनाथ, देवों तथा राजाओंके द्वारा उठायी हुई अपराजिता नामकी पालकीमें सवार होकर विपुल नामक उद्यानमें गये ॥३६॥


अवतीर्य ततो राज्ञां सहस्रैर्बहुभिः समम् । दधौ जैनेश्वरीं दीक्षां हरिवंशविभूषणः ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर पालकीसे उतरकर हरिवंशके आभूषण-स्वरूप भगवान् मुनिसुव्रतनाथने कई हजार राजाओंके साथ जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली ॥३७॥


षष्ठोपवासयुक्ताय तस्मै राजगृहे ददौ । भक्त्या वृषभदत्ताख्यः परमान्नेन पारणम् ॥३८॥

अर्थ: भगवान्ने दीक्षा लेते समय दो दिनका उपवास किया था । उपवास समाप्त होनेपर राजगृह नगरमें वृषभदत्तने उन्हें परमान्न अर्थात् खीरसे भक्तिपूर्वक पारणा करायी ॥३८॥


शासनाचारवृत्त्यर्थं भुक्तिश्च विभुना कृता । प्राप्तो वृषभदत्तश्च पञ्चातिशयपूजनम् ॥३९॥

अर्थ: जिनशासनमें आचारकी वृत्ति किस तरह है यह बतलानेके लिए ही भगवान्ने आहार ग्रहण किया था । आहारदानके प्रभावसे वृषभदत्त पंचातिशयको प्राप्त हुआ ॥३९॥


अधश्चम्पकवृक्षस्य शुक्लध्यानमुपेयुषः । उत्पन्नं घातिकर्मान्ते केवलं परमेष्ठिनः ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर चम्पक वृक्षके नीचे शुक्ल-ध्यानसे विराजमान भगवान्को घातिया कर्मोंका क्षय होनेके उपरान्त केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ॥४०॥


ततो देवाः समागत्य सेन्द्राः स्तुत्वा प्रणम्य च । संजातगणिनस्तस्माच्छुश्रुवुर्धर्ममुत्तमम् ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रों सहित देवोंने आकर स्तुति की, प्रणाम किया तथा उत्तम गणधरोंसे युक्त उन मुनिसुव्रतनाथ भगवान्से उत्तम धर्मका उपदेश सुना ॥४१॥


सागारं च निरागारं बहुभेदं यथाविधि । श्रुत्वा ते विमलं धर्मं नत्वा जग्मुर्यथायथम् ॥४२॥

अर्थ: भगवान्ने सागार और अनगारके भेदसे अनेक प्रकारके धर्मका निरूपण किया सो उस निर्मल धर्मको विधिपूर्वक सुनकर वे सब यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर गये ॥४२॥


मुनिसुव्रतनाथोऽपि धर्मतीर्थप्रवर्तनम् । कृत्वा सुरासुरैर्नम्रैः स्तूयमानः प्रमोदिभिः ॥४३॥

गणनाथैर्महासत्त्वैर्गणपालनकारिभिः । अन्यैश्च साधुभिर्युक्तो विहृत्य वसुधातलम् ॥४४॥

अर्थ: हर्षसे भरे नम्रीभूत सुरासुर जिनकी स्तुति करते थे ऐसे भगवान् मुनिसुव्रतनाथने भी धर्मतीर्थकी प्रवृत्ति कर महाधैर्यके धारक तथा गणकी रक्षा करनेवाले गणधरों एवं अन्यान्य साधुओंके साथ पृथिवीतलपर विहार किया ॥४३-४४॥


सम्मेदगिरिमूर्धानं समारुह्य चतुर्विधम् । विधूय कर्म संप्राप लोकचूडामणिस्थितम् ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर सम्मेदाचलके शिखरपर आरूढ़ होकर तथा चार अघातिया कर्मोंका क्षय कर वे लोकके चूड़ामणि हो गये अर्थात् सिद्धालयमें जाकर विराजमान हो गये ॥४५॥


मुनिसुव्रतमाहात्म्यमिदं येऽधीयते जनाः । शृण्वन्ति वा सुभावेन तेषां नश्यति दुष्कृतिः ॥४६॥

अर्थ: जो मनुष्य उत्तम भावसे मुनिसुव्रत भगवान्के इस माहात्म्यको पढ़ते अथवा सुनते हैं उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥४६॥


भूयश्च बोधिमागत्य ततः कृत्वा सुनिर्मलम् । गच्छन्ति परमं स्थानं यतो नागमनं पुनः ॥४७॥

अर्थ: वे पुनः आकर रत्नत्रयको निर्मल कर उस परम स्थानको प्राप्त होते हैं जहाँसे कि फिर आना नहीं होता ॥४७॥


अथासौ सुव्रतः कृत्वा चिरं राज्यं सुनिश्चलम् । दक्षं तत्र विनिक्षिप्य प्रव्रज्यावाप निर्वृतिम् ॥४८॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिसुव्रतनाथके पुत्र सुव्रतने भी चिरकाल तक निश्चल राज्य कर अन्तमें अपने पुत्र दक्षके लिए राज्य सौंप दिया और स्वयं दीक्षा लेकर निर्वाण प्राप्त किया ॥४८॥


दक्षात् समभवत् सूनुरिलावर्द्धनसंज्ञितः । ततः श्रीवर्द्धनो जज्ञे श्रीवृक्षाख्यस्ततोऽभवत् ॥४९॥

सञ्जयन्तो बभूवास्मादुदभूत्कुणिमस्ततः । महारथः पुलोमा चेत्येवमाद्या नरेश्वराः ॥५०॥

सहस्रशः समुत्पन्ना हरीणामन्वये शुभे । संप्रापुर्निर्वृतिं केचित् केचिन्नाकनिवासिताम् ॥५१॥

अर्थ: राजा दक्षके इलावर्धन, इलावर्धनके श्रीवर्धन, श्रीवर्धनके श्रीवृक्ष, श्रीवृक्षके संजयन्त, संजयन्तके कुणिम, कुणिमके महारथ और महारथके पुलोमा इत्यादि हजारों राजा हरिवंशमें उत्पन्न हुए । इनमेंसे कितने ही राजा निर्वाणको प्राप्त हुए और कितने ही स्वर्ग गये ॥४९-५१॥


एवं क्रमात् प्रयातेषु पार्थिवेषु च भूरिषु । नृपो वासवकेत्वाख्यः कुलेऽस्मिन्मैथिलोऽभवत् ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार क्रमसे अनेक राजाओंके हो चुकनेपर इसी वंशमें मिथिलाका राजा वासवकेतु हुआ ॥५२॥


विपुलेति महादेवी तस्यासीत् विपुलेक्षणा । परमश्रीरपि प्राप्ता या मध्येन दरिद्रताम् ॥५३॥

अर्थ: उसकी विपुला नामकी पट्टरानी थी। वह विपुला, विपुल अर्थात् दीर्घ नेत्रोंको धारण करनेवाली थी और उत्कृष्ट लक्ष्मीकी धारक होकर भी मध्यभागसे दरिद्रताको प्राप्त थी अर्थात् उसकी कमर अत्यन्त कृश थी ॥५३॥


तस्य जनकनामाभूत्तनयो नयकोविदः । हितं यः सततं चक्रे प्रजानां जनको यथा ॥५४॥

अर्थ: उन दोनोंके नीतिनिपुण जनक नामका पुत्र हुआ। वह जनक, जनक अर्थात् पिताके समान ही निरन्तर प्रजाका हित करता था ॥५४॥


एवं जनकसंभूतिः कथिता ते नराधिप । श्रृणु संप्रति यद्वंशे नृपो दशरथोऽभवत् ॥५५॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह मैंने तेरे लिए राजा जनककी उत्पत्ति कही। अब जिस वंशमें राजा दशरथ हुए उसका कथन करता हूँ सो सुन ॥५५॥


इक्ष्वाकूणां कुले रम्ये निर्वृते नामिजे जिने । भरते भास्करे सोमे व्यतीते वंशभूषणे ॥५६॥

संख्यातीतेन कालेन कुले तत्र नराधिपाः । अतिक्रामन्ति कुर्वन्तस्तपः परमदुश्चरम् ॥५७॥

क्रीडन्ति भोगनिर्मग्नाः शुष्यन्त्यकृतपुण्यकाः । लभन्ते कर्मणः स्वस्य विपाकमश्रुधारिणः ॥५८॥

अर्थ: अथानन्तर इक्ष्वाकुओंके रमणीय कुलमें जब भगवान् ऋषभदेव निर्वाणको प्राप्त हो गये और उनके बाद चक्रवर्ती भरत, अर्ककीर्ति तथा वंशके अलंकारभूत सोम आदि राजा व्यतीत हो चुके तब असंख्यात कालके भीतर उस वंशमें अनेक राजा हुए। उनमें कितने ही राजा अत्यन्त कठिन तपश्चरण कर निर्वाणको प्राप्त हुए, कितने ही स्वर्गमें जाकर भोगोंमें निमग्न हो क्रीड़ा करने लगे, और कितने ही पुण्यका संचय नहीं करनेसे शुष्क हो गये अर्थात् नरकादि गतियोंमें जाकर रोते हुए अपने कर्मोंका फल भोगने लगे ॥५६-५८॥


चक्रवत्परिवर्तन्ते व्यसनानि महोत्सवैः । शनैर्मायादयो दोषाः प्रयान्ति परिवर्द्धनम् ॥५९॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! इस संसारमें जो व्यसन-कष्ट हैं वे चक्रकी नाईं बदलते रहते हैं अर्थात् कभी व्यसन महोत्सवरूप हो जाते हैं और कभी महोत्सव व्यसनरूप हो जाते हैं, कभी इस जीवमें धीरे-धीरे माया आदि दोष वृद्धिको प्राप्त हो जाते हैं ॥५९॥


क्लिश्यन्ते द्रव्यनिर्मुक्ता म्रियन्ते बालतासु च । पूर्वोपात्तायुषि क्षीणे हेतुना चोपसंहृते ॥६०॥

अर्थ: कभी ये जीव निर्धन होकर क्लेश उठाते हैं और कभी पूर्वबद्ध आयुके क्षीण हो जाने अथवा किसी कारणवश कम हो जानेसे बाल्य अवस्थामें ही मर जाते हैं ॥६०॥


नाना भवन्ति तिष्ठन्ति निघ्नते शोचयन्ति च । रुदन्त्यदन्ति बाधन्ते विवदन्ति पठन्ति च ॥६१॥

ध्यायन्ति यान्ति वल्गन्ति प्रभवन्ति वहन्ति च । गायन्त्युपासतेऽश्नन्ति दरिद्रति नदन्ति च ॥६२॥

अर्थ: कभी ये जीव नाना रूपताको धारण करते हैं, कभी ज्यों-के-त्यों स्थिर रह जाते हैं, कभी एक दूसरेको मारते हैं, कभी शोक करते हैं, कभी रोते हैं, कभी खाते हैं, कभी बाधा पहुँचाते हैं, कभी विवाद करते हैं, कभी गमन करते हैं, कभी चलते हैं, कभी प्रभावशील होते हैं, अर्थात् स्वामी बनते हैं, कभी भार ढोते हैं, कभी गाते हैं, कभी उपासना करते हैं, कभी भोजन करते हैं, कभी दरिद्रताको प्राप्त करते हैं, कभी शब्द करते हैं ॥६१-६२॥


जयन्ति रान्ति मुञ्चन्ति राजन्ते विलसन्ति च । तुष्यन्ति शासति क्षान्तिं स्पृहयन्ति हरन्ति च ॥६३॥

अर्थ: कभी जीतते हैं, कभी देते हैं, कभी कुछ छोड़ते हैं, कभी विराजमान होते हैं, कभी अनेक विलास धारण करते हैं, कभी सन्तोष धारण करते हैं, कभी शासन करते हैं, कभी क्षान्ति अर्थात् क्षमाकी अभिलाषा करते हैं, कभी शान्तिका हरण करते हैं ॥६३॥


त्रपन्ते द्रान्ति सज्जन्ति दूयन्ते कूटयन्ति च । मार्गयन्तेऽभिधावन्ते कुहयन्ते सृजन्ति च ॥६४॥

अर्थ: कभी लज्जित होते हैं, कभी कुत्सित चाल चलते हैं, कभी किसीको सताते हैं, कभी सन्तप्त होते हैं, कभी कपट धारण करते हैं, कभी याचना करते हैं, कभी सम्मुख दौड़ते हैं, कभी मायाचार दिखाते हैं, कभी किसीके द्रव्यादिका हरण करते हैं ॥६४॥


क्रीडन्ति स्यन्ति यच्छन्ति शीलयन्ति वसन्ति च । लुच्यन्ति मान्ति सीदन्ति क्रुध्यन्ति विचलन्ति च ॥

अर्थ: कभी क्रीड़ा करते हैं, कभी किसी वस्तुको नष्ट करते हैं, कभी किसीको कुछ देते हैं, कभी कहीं वास करते हैं, कभी किसीको लोंचते हैं, कभी किसीको नापते हैं, कभी दुःखी होते हैं, कभी क्रोध करते हैं, कभी विचलित होते हैं, ॥६५॥


तुष्यन्त्यर्चन्ति वञ्चन्ति सान्त्वयन्ति विदन्ति च । मुह्यन्त्यर्वन्ति नृत्यन्ति स्निह्यन्ति विनयन्ति च ॥६६॥

अर्थ: कभी सन्तुष्ट होते हैं, कभी किसीकी पूजा करते हैं, कभी किसीको छलते हैं, कभी किसीको सान्त्वना देते हैं, कभी कुछ समझते हैं, कभी मोहित होते हैं, कभी रक्षा करते हैं, कभी नृत्य करते हैं, कभी स्नेह करते हैं, कभी विनय करते हैं, ॥६६॥


नुदन्त्युच्छन्ति कर्षन्ति भृज्जन्ति विनमन्ति च । दीव्यन्ति दान्ति शृण्वन्ति जुह्वत्यङ्गन्ति जाग्रति ॥६७॥

अर्थ: कभी किसीको प्रेरणा देते हैं, कभी दाने-दाने बीनकर पेट भरते हैं, कभी खेत जोतते हैं, कभी भाड़ भूँजते हैं, कभी नमस्कार करते हैं, कभी क्रीड़ा करते हैं, कभी लुनते हैं, कभी सुनते हैं, कभी होम करते हैं, कभी चलते हैं, कभी जागते हैं ॥६७॥


स्वपन्ति बिभ्यतीङ्गन्ति श्यन्ति घ्नन्ति तुदन्ति च । प्रान्ति सुन्वन्ति सिन्वन्ति रुन्धन्ति विरुवन्ति च ॥६८॥

अर्थ: कभी सोते हैं, कभी डरते हैं, कभी नाना चेष्टा करते हैं, कभी नष्ट करते हैं, कभी किसीको खण्डित करते हैं, कभी किसीको पीड़ा पहुँचाते हैं, कभी पूर्ण करते हैं, कभी स्नान करते हैं, कभी बांधते हैं, कभी रोकते हैं, कभी चिल्लाते हैं, ॥६८॥


सीव्यन्त्यटन्ति जीर्यन्ति पिबन्ति रचयन्ति च । वृणते परिमृद्नन्ति विस्तृणन्ति पृणन्ति च ॥६९॥

अर्थ: कभी सोते हैं, कभी घूमते हैं, कभी जीर्ण होते हैं, कभी पीते हैं, कभी रचते हैं, कभी वरण करते हैं, कभी मसलते हैं, कभी फैलाते हैं, कभी तर्पण करते हैं ॥६९॥


मीमांसन्ते जुगुप्सन्ते कामयन्ते तरन्ति च । चिकित्सन्त्यनुमन्यन्ते वारयन्ति गृणन्ति च ॥७०॥

अर्थ: कभी मीमांसा करते हैं, कभी घृणा करते हैं, कभी इच्छा करते हैं, कभी तरते हैं, कभी चिकित्सा करते हैं, कभी अनुमोदना करते हैं, कभी रोकते हैं और कभी निगलते हैं ॥७०॥


एवमादिक्रियाजालसंततव्याप्तमानसाः । शुभाशुभसमासक्ता व्यतिक्रामन्ति मानवाः ॥७१॥

अर्थ: हे राजन् ! इत्यादि क्रियाओंके जालसे जिनके मन व्याप्त हो रहे थे तथा शुभ-अशुभ कार्योंमें लीन थे ऐसे अनेक मानव उस इक्ष्वाकुवंशमें क्रमसे हुए थे ॥७१॥


इति चित्रपटाकारचेष्टिताखिलमानवे । कालेऽवसर्पिणीनाम्नि प्रयाति विलयं शनैः ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार जिसमें समस्त मानवोंकी चेष्टाएँ चित्रपटके समान नाना प्रकारकी हैं ऐसा यह अवसर्पिणी नामका काल धीरे-धीरे समाप्त होता गया ॥७२॥


जाते विंशतिसंख्याने वर्तमानजिनान्तरे । देवागमनसंयुक्ते विनीतायामुरौ पुरि ॥७३॥

विजयो नाम राजेन्द्रो विजिताखिलशात्रवः । सौर्यप्रतापसंयुक्तः प्रजापालनपण्डितः ॥७४॥

अर्थ: अथानन्तर जिसमें देवोंका आगमन जारी रहता था ऐसे बोसवें वर्तमान तीर्थंकरका अन्तराल शुरू होनेपर अयोध्यानामक विशाल नगरीमें विजय नामका बड़ा राजा हुआ । उसने समस्त शत्रुओंको जीत लिया था । वह सूर्यके समान प्रतापसे संयुक्त था तथा प्रजाका पालन करने- में निपुण था ॥७३-७४॥


संभूतो हेमचूलिन्यां महादेव्यां सुतेजसि । सुरेन्द्रमन्युनामाभूत्सूनुस्तस्य महागुणः ॥७५॥

अर्थ: उसकी हेमचूला नामकी महातेजस्विनी पट्टरानी थी सो उसके सुरेन्द्रमन्यु नामका महागुणवान् पुत्र उत्पन्न हुआ ॥७५॥


तस्य कीर्तिसमाख्यायां जायायां तनयद्वयम् । चन्द्रसूर्यसमच्छायं तातं गुणसमर्चितम् ॥७६॥

वज्रबाहुस्तयोराद्यो द्वितीयश्च पुरंदरः । अन्वर्थनामयुक्तौ तौ रेमाते भुवने सुखम् ॥७७॥

अर्थ: सुरेन्द्रमन्युकी कीर्तिसमा स्त्री हुई सो उसके चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिको धारण करनेवाले दो पुत्र हुए। ये दोनों ही पुत्र गुणोंसे सुशोभित थे । उनमेंसे बड़े पुत्रका नाम वज्रबाहु और छोटे पुत्रका नाम पुरन्दर था । दोनों ही सार्थक नामको धारण करनेवाले थे और संसारमें सुखसे क्रीड़ा करते थे ॥७६-७७॥


इभवाहननामासीत्तस्मिन् काले नराधिपः । रम्ये नागपुरे तस्य नाम्ना चूडामणिः प्रिया ॥७८॥

तयोर्दुहितरं चार्वीं ख्यातां नाम्ना मनोदयाम् । वज्रबाहुकुमारोऽसौ लेभे श्लाघ्यतमो नृणाम् ॥७९॥

अर्थ: उसी समय अत्यन्त मनोहर हस्तिनापुर नगरमें इभवाहन नामका राजा रहता था । उसकी स्त्रीका नाम चूड़ामणि था । उन दोनोंके मनोदया नामकी अत्यन्त सुन्दरी पुत्री थी सो उसे मनुष्योंमें अत्यन्त प्रशंसनीय वज्रबाहु कुमारने प्राप्त किया ॥७८-७९॥


तां कन्यां सोदरो नेतुमागादुदयसुन्दरः । सार्धं तेनोच्छ्रितः श्रीमत्सितातपनिवारणः ॥८०॥

अर्थ: कदाचित् कन्याका भाई उदयसुन्दर उस कन्याको लेनेके लिए वज्रबाहुके घर गया सो जिसपर अत्यन्त सुशोभित सफ़ेद छत्र लग रहा था ऐसा वज्रबाहु स्वयं भी उसके साथ चलनेके लिए उद्यत हुआ ॥८०॥


कन्यां तां रूपतः ख्यातां सकले वसुधातले । मानसेन वहन् भूत्या प्रतस्थे श्वाशुरं पुरम् ॥८१॥

अर्थ: वह कन्या अपने सौन्दर्यसे समस्त पृथ्वीमें प्रसिद्ध थी, उसे मनमें धारण करता हुआ वज्रबाहु बड़े वैभवके साथ श्वसुरके नगरकी ओर चला ॥८१॥


अथास्य व्रजतो दृष्टिर्वसन्तकुसुमाकुले । गिरौ वसन्तसंज्ञाङ्के निपपात मनोहरे ॥८२॥

अर्थ: अथानन्तर चलते-चलते उसकी दृष्टि वसन्त ऋतुके फूलोंसे व्याप्त वसन्त नामक मनोहर पर्वतपर पड़ी ॥८२॥


यथा यथा समीपत्वं यस्य याति गिरेरसौ । तथा तथा परां लक्ष्मीं पश्यन् हर्षमुपागमत् ॥८३॥

अर्थ: वह जैसे-जैसे उस पर्वतके समीप आता जाता वैसे-वैसे ही उसकी परम शोभाको देखता हुआ हर्षको प्राप्त हो रहा था ॥८३॥


पुष्पधूलीविमिश्रेण वायुना स सुगन्धिना । समालिङ्ग्यन्त मित्रेण संप्राप्तेन चिरादिव ॥८४॥

अर्थ: फूलोंकी धूलिसे मिली सुगन्धित वायु उसका आलिगन कर रही थी सो ऐसा जान पड़ता था मानो चिरकालके बाद प्राप्त हुआ मित्र ही आलिंगन कर रहा हो ॥८४॥


पुंस्कोकिलकलालापैर्जयशब्दमिवाकरोत् । वातकम्पितवृक्षाग्रो वज्रबाहोर्धराधरः ॥८५॥

अर्थ: जहाँ वृक्षोंके अग्रभाग वायुसे कम्पित हो रहे थे ऐसा वह पर्वत पुंस्कोकिलाओंके शब्दोंके बहाने मानो वज्रबाहुका जय-जयकार ही कर रहा था ॥८५॥


वीणाझङ्काररम्याणां भृङ्गाणां मदशालिनाम् । नादेन श्रवणौ तस्य मानसेन समं हृतौ ॥८६॥

अर्थ: वीणाकी झंकारके समान मनोहर मदशाली भ्रमरोंके शब्दसे उसके श्रवण तथा मन साथ-ही-साथ हरे गये ॥८६॥


चूतोऽयं कर्णिकारोऽयं लोध्रोऽयं कुसुमान्वितः । प्रियालोऽयं पलाशोऽयं ज्वलत्पावकभासुरः ॥८७॥

व्रजन्तीति क्रमेणास्य दृष्टिर्निश्चलपक्ष्मिका । संदिग्धमानुषाकारे पपात मुनिपुङ्गवे ॥८८॥

अर्थ: ‘यह आम है, यह कनेर है, यह फूलोंसे सहित लोध्र है, यह प्रियाल है और यह जलती हुई अग्निके समान सुशोभित पलाश है’ इस प्रकार क्रमसे चलती हुई उसकी निश्चल दृष्टि दूरीके कारण जिसमें मनुष्यके आकारका संशय हो रहा था ऐसे मुनिराजपर पड़ी ॥८७-८८॥


स्थाणुः स्याच्छ्रमणोऽयं नु शैलकूटमिदं भवेत् । इति राज्ञो वितर्कोऽभूत् कायोत्सर्गस्थिते मुनौ ॥८९॥

अर्थ: कायोत्सर्गसे स्थित मुनिराजके विषयमें वज्रबाहुको वितर्क उत्पन्न हुआ कि क्या यह ठूठ है ? या साधु हैं, अथवा पर्वतका शिखर है ? ॥८९॥


नेदीयान्सं ततो मार्गं प्रयातस्यास्य निश्चयः । उदपादि महायोगिदेहविन्दनतत्परः ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर जब अत्यन्त समीपवर्ती मार्गमें पहुँचा तब उसे निश्चय हुआ कि ये महायोगी-मुनिराज हैं ॥९०॥


उच्चावचशिलाजालविषमेऽवस्थितं स्थिरम् । दिवाकरकराश्लिष्टाम्लानवक्त्रसरोरुहम् ॥९१॥

प्रलम्बितमहाभोगिमोगमासुरसद्भुजम् । शैलेन्द्रतटसंकाशपीवरोदारवक्षसम् ॥९२॥

दिग्नागबन्धनस्तम्भस्थिरभास्वद्वरोरुकम् । तपसापि कृशं कान्त्या दृश्यमानं सुपीवरम् ॥९३॥

नासिकाग्रनिविष्टातिसौम्यनिश्चलचक्षुषम् । मुनिं ध्यायन्तमैकाग्र्यं दृष्ट्वा राजेत्यचिन्तयत् ॥९४॥

अर्थ: वे मुनिराज ऊँची-नीची शिलाओंसे विषम धरातलमें स्थिर विराजमान थे, सूर्यकी किरणोंसे आलिंगित होनेके कारण उनका मुखकमल म्लान हो रहा था, किसी बड़े सर्पके समान सुशोभित उनकी दोनों उत्तम भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं, उनका वक्षःस्थल सुमेरुके तटके समान स्थूल तथा चौड़ा था, उनकी देदीप्यमान दोनों उत्कृष्ट जाँघें दिग्गजोंके बाँधनेके खम्भोंके समान स्थिर थीं, यद्यपि वे तपके कारण कृश थे तथापि कान्तिसे अत्यन्त स्थूल जान पड़ते थे, उन्होंने अपने अत्यन्त सौम्य निश्चल नेत्र नासिकाके अग्रभाग पर स्थापित कर रखे थे, इस प्रकार एकाग्र रूपसे ध्यान करते हुए मुनिराजको देखकर राजा वज्रबाहु इस प्रकार विचार करने लगा कि ॥९१-९४॥


अहो धन्योऽयमत्यन्तं प्रशान्तो मानवोत्तमः । यद्विहायाखिलं संगं तपस्यति मुमुक्षया ॥९५॥

अर्थ: अहो ! इन अत्यन्त प्रशान्त उत्तम मानवको धन्य है जो समस्त परिग्रहका त्याग कर मोक्षकी इच्छासे तपस्या कर रहे हैं ॥९५॥


विमुक्त्यानुगृहीतोऽयं कल्याणाभिनिविष्टधीः । परपीडानिवृत्तात्मा मुनिर्लक्ष्मीपरिष्कृतः ॥९६॥

समः सुहृदि शत्रौ च रत्नराशौ तृणे तथा । मानमत्सरनिर्मुक्तः सिद्ध्यालिङ्गनलालसः ॥९७॥

वशीकृतहृषीकात्मा निष्प्रकम्पो गिरीन्द्रवत् । श्रेयो ध्यायति नीरागः कुशलस्थितमानसः ॥९८॥

अर्थ: इन मुनिराजपर मुक्ति-लक्ष्मीने अनुग्रह किया है, इनकी बुद्धि आत्मकल्याणमें लीन है, इनकी आत्मा परपीड़ासे निवृत्त हो चुकी है, ये अलौकिक लक्ष्मीसे अलंकृत हैं, शत्रु और मित्र, तथा रत्नोंकी राशि और तृणमें समान बुद्धि रखते हैं, मान एवं मत्सरसे रहित हैं, सिद्धिरूपी वधूका आलिंगन करनेमें इनकी लालसा बढ़ रही है, इन्होंने इन्द्रियों और मनको वशमें कर लिया है, ये सुमेरुके समान स्थिर हैं, वीतराग हैं तथा कुशल कार्यमें मन स्थिर कर ध्यान कर रहे हैं ॥९६-९८॥


फलं पुष्कलमेतेन लब्धं मानुषजन्मनः । अयं न वञ्चितः क्रूरैः कषायाख्यैर्मलिम्लुचैः ॥९९॥

अर्थ: मनुष्यमें जन्मका पूर्ण-फल इन्होंने प्राप्त किया है, इन्द्रियरूपी दुष्ट चोर इन्हें नहीं ठग सके हैं ॥९९॥


अहं नु वेष्टितः पापः कर्मपाशैरनन्तरम् । आशीविषैर्महानागैर्यथा चन्दनपादपः ॥१००॥

अर्थ: और मैं ? मैं तो कर्मरूपी पाशोंसे उस तरह निरन्तर वेष्टित हूँ जिस तरह कि आशीविष जातिके बड़े-बड़े सर्पोंसे चन्दनका वृक्ष वेष्टित होता है ॥१००॥


प्रमत्तचेतसं पापं धिग्मां निश्चेतनोपमम् । योऽहं निद्रामिभोगाद्रिमहाभृगुशिरस्थितः ॥१०१॥

अर्थ: जिसका चित्त प्रमादसे भरा हुआ है ऐसे जड़तुल्य मुझ पापीके लिए धिक्कार है। मैं भोगरूपी पर्वतकी बड़ी गोल चट्टानके अग्रभाग पर बैठकर सो रहा हूँ ॥१०१॥


यदि नाम मजेयेमामवस्थामस्य योगिनः । भवेयं लब्धलब्धव्यस्ततो मानुषजन्मनि ॥१०२॥

अर्थ: यदि मैं इन मुनिराजकी इस अवस्थाको धारण कर सकूँ तो मनुष्य-जन्मका फल मुझे प्राप्त हो जावे ॥१०२॥


इति चिन्तयतस्तस्य राज्ञो निर्ग्रन्थपुङ्गवे । दृष्टिः स्तम्भनिबद्धेव बभूवात्यन्तनिश्चला ॥१०३॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते हुए राजा वज्रबाहुकी दृष्टि उन निर्ग्रन्थ मुनिराजपर खम्भेमें बँधी हुईके समान अत्यन्त निश्चल हो गयी ॥१०३॥


एवं निश्चलपक्ष्माणं निरीक्ष्योदयसुन्दरः । कुर्वन्नर्म जगादैवं वज्रबाहुं कृतस्मितः ॥१०४॥

चिरं निरीक्षितो देवस्त्वयैष मुनिपुङ्गवः । वृणीषे किमिमां दीक्षां रागवानत्र दृश्यसे ॥१०५॥

अर्थ: इस तरह वज्रबाहुको निश्चल दृष्टि देख उदयसुन्दरने मुसकराकर हँसी करते हुए कहा कि आप इन मुनिराजको बड़ी देरसे देख रहे हैं सो क्या इस दीक्षाको ग्रहण कर रहे हो ? इसमें आप अनुरक्त दिखाई पड़ते हैं ॥१०४-१०५॥


वज्रबाहुरथोवोचत् कृतभावनिगूहनः । वर्तते कः पुनर्भावस्तवोदय निवेदय ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर अपने भावको छिपाकर वज्रबाहुने कहा कि हे उदय ! तुम्हारा क्या भाव है सो तो कहो ॥१०६॥


अन्तर्विरक्तमज्ञात्वा तमाहोदयसुन्दरः । परिहासानुरागेण दन्तांशुच्छुरिताधरः ॥१०७॥

अर्थ: उसे अन्तरसे विरक्त न जानकर उदयसुन्दरने परिहासके अनुरागवश दाँतोंकी किरणोंसे ओठोंको व्याप्त करते हुए कहा कि ॥१०७॥


दीक्षामिमां वृणीषे चेत्ततोऽहमपि ते सखा । अहो विराजसेऽत्यर्थं कुमार श्रमणश्रिया ॥१०८॥

अर्थ: यदि आप इस दीक्षाको स्वीकृत करते हैं तो मैं भी आपका सखा अर्थात् साथी होऊँगा । अहो कुमार ! आप इस मुनि दीक्षासे अत्यधिक सुशोभित होओगे ॥१०८॥


अस्त्वेवमिति भाषित्वा युक्तो वीवाहभूषणैः । अवारोहदसौ नागादारोहद्धरणीधरम् ॥१०९॥

अर्थ: ‘ऐसा हो’ इस प्रकार कहकर विवाहके आभूषणोंसे युक्त वज्रबाहु हाथीसे उतरा और पर्वतपर चढ़ गया ॥१०९॥


ततो वराङ्गनास्तारं रुरुदुरुरुलोचनाः । छिन्नमुक्तकलापाभस्थूलनेत्रास्रुविन्दवः ॥११०॥

अर्थ: तब विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ जोर-जोरसे रोने लगीं । उनके नेत्रोंसे टूटे हुए मोतियोंके हारके समान आँसुओंकी बड़ी-बड़ी बूँदें गिरने लगीं ॥११०॥


व्यज्ञापयत् सवाष्पाक्षस्तमथोदयसुन्दरः । प्रसीद देव नर्मेदं कृतं किमनुतिष्ठसि ॥१११॥

अर्थ: उदयसुन्दरने भी आँखोंमें आँसू भरकर कहा कि हे देव ! प्रसन्न होओ, यह क्या कर रहे हो ? मैंने तो हँसी की थी ॥१११॥


उवाच वज्रबाहुस्तं मधुरं परिसान्त्वयन् । कल्याणाशयकूपेऽहं पतन्नुत्तारितस्त्वया ॥११२॥

अर्थ: तदनन्तर मधुर शब्दोंमें सान्त्वना देते हुए वज्रबाहुने उदयसुन्दरसे कहा कि हे उत्तम अभिप्रायके धारक ! मैं कुएँमें गिर रहा था सो तुमने निकाला है ॥११२॥


भवता सदृशं मित्रं नास्ति मे भुवनत्रये । जातस्य सुन्दरावश्यं मृत्युः प्रेतस्य संभवः ॥११३॥

अर्थ: तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान मेरा दूसरा मित्र नहीं है । हे सुन्दर ! संसारमें जो उत्पन्न होता है उसका मरण अवश्य होता है और जो मरता है उसका जन्म अवश्यंभावी है ॥११३॥


मृत्युजन्मघटीयन्त्रमेतद्भ्राम्यत्यनारतम् । विद्युत्तरङ्गदुष्टाहिरसनेभ्योऽपि चञ्चलम् ॥११४॥

अर्थ: यह जन्म-मरणरूपी घटीयन्त्र बिजली, लहर तथा दुष्ट सर्पकी जिह्वासे भी अधिक चंचल है तथा निरन्तर घूमता रहता है ॥११४॥


जगतो दुःखमग्नस्य किं न पश्यसि जीवितम् । स्वप्नभोगोपमा भोगा जीवितं बुद्बुदोपमम् ॥११५॥

सन्ध्यारागोपमः स्नेहस्तारुण्यं कुसुमोपमम् । परिहासोऽपि ते भद्र मम जातोऽमृतोपमः ॥११६॥

अर्थ: दुःखमें फंसे हुए संसारके जीवनकी ओर तुम क्यों नहीं देख रहे हो ? ये भोग स्वप्नोंके भोगोंके समान हैं, जीवन बुद्बुदके तुल्य है, स्नेह सन्ध्याकी लालिमाके समान है और यौवन फूलके समान है । हे भद्र ! तेरी हँसी भी मेरे लिए अमृतके समान हो गयी ॥११५-११६॥


परिहासेन किं पीतं नौषधं हरते रुजम् । स त्वमेकोऽद्य मे बन्धुर्यः सुश्रेयःप्रवृत्तये ॥११७॥

अर्थ: क्या हँसीमें पी गयी औषधि रोगको नहीं हरती ? चूँकि तुमने मेरी कल्याण- की ओर प्रवृत्ति करायी है इसलिए आज तुम्हीं एक मेरे बन्धु हो ॥११७॥


संसाराचारसक्तस्य प्रतिपन्नोऽसि हेतुताम् । एषोऽहं प्रव्रजाम्यद्य कुरु त्वं स्वमनीषितम् ॥११८॥

अर्थ: मैं संसारके आचारमें लीन था सो आज तुम उससे विरक्तिके कारण हो गये । लो, अब मैं दीक्षा लेता हूँ । तुम अपने अभिप्रायके अनुसार कार्य करो ॥११८॥


गुणसागरनामानं तमुपेत्य तपोधनम् । प्रणम्य चरणावूचे विनीतो रचिताञ्जलिः ॥११९॥

स्वामिन् भवत्प्रसादेन पवित्रीकृतमानसः । अद्य निष्क्रमितुं भीमादिच्छामि भवचारकात् ॥१२०॥

अर्थ: इतना कहकर वह गुणसागर नामक मुनिराजके पास गया और उनके चरणोंमें प्रणाम कर बड़ी विनयसे हाथ जोड़ता हुआ बोला कि हे स्वामिन् ! आपके प्रसादसे मेरा मन पवित्र हो गया है सो आज मैं इस भयंकर संसाररूपी कारागृहसे निकलना चाहता हूँ ॥११९-१२०॥


ततः समाप्तयोगेन गुरुणेत्यनुमोदितः । महासंवेगसंपन्नस्त्यक्तवस्त्रविभूषणः ॥१२१॥

पर्यङ्कासनमास्थाय रभसान्वितमानसः । केशापनयनं कृत्वा पल्लवारुणपाणिना ॥१२२॥

जानानः प्रलघुं देहमुल्लाघमिव तत्क्षणम् । दीक्षां संचक्ष्य वैवाहीं मोक्षदीक्षामशिश्रियत् ॥१२३॥

अर्थ: तदनन्तर ध्यान समाप्त होनेपर मुनिराजने उसके इस कार्यकी अनुमोदना की । सो महा-संवेगसे भरा वज्रबाहु वस्त्राभूषण त्याग कर उनके समक्ष शीघ्र ही पद्मासनसे बैठ गया । उसने पल्लवके समान लाल-लाल हाथोंसे केश उखाड़कर फेंक दिये । उसे उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो उसका शरीर रोगरहित होनेसे हलका हो गया हो । इस तरह उसने विवाह-सम्बन्धी दीक्षाका परित्याग कर मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा धारण कर ली ॥१२१-१२३॥


त्यक्तरागमदद्वेषा जातसंवेगरंहसः । सुन्दरप्रमुखा वीराः कुमारा मारविभ्रमाः ॥१२४॥

परमोत्साहसंपन्नाः प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । षड्विंशतिरमा तेन राजपुत्रा प्रवव्रजुः ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने राग, द्वेष और मदका परित्याग कर दिया था, संवेगकी ओर जिनका वेग बढ़ रहा था, तथा जो कामके समान सुन्दर विभ्रमको धारण करनेवाले थे, ऐसे उदयसुन्दर आदि छब्बीस राजकुमारोंने भी परमोत्साहसे सम्पन्न हो मुनिराजको प्रणाम कर दीक्षा धारण कर ली ॥१२४-१२५॥


तमुदन्तं परिज्ञाय सोदरस्नेहकातरा । वहन्ती पुरुसंवेगमदीक्षिष्ट मनोदया ॥१२६॥

अर्थ: यह समाचार जानकर भाईके स्नेहसे भीरु मनोदयाने भी बहुत भारी संवेगसे युक्त हो दीक्षा ले ली ॥१२६॥


सितांशुकपरिच्छन्नविशालस्तनमण्डला । अल्पोदरी मलच्छन्ना जाता सातितपस्विनी ॥१२७॥

अर्थ: सफेद वस्त्रसे जिसका विशाल स्तनमण्डल आच्छादित था, जिसका उदर अत्यन्त कृश था और जिसके शरीरपर मैल लग रहा था ऐसी मनोदया बड़ी तपस्विनी हो गयी ॥१२७॥


विजयस्यन्दनो वार्तां विदित्वा वज्रबाहवीम् । शोकार्दितो जगादैवं समामध्यव्यवस्थितः ॥१२८॥

चित्रं पश्यत मे नप्ता वयसि प्रथमे स्थितः । विषयेभ्यो विरक्तात्मा दीक्षां दैगम्बरीमितः ॥१२९॥

अर्थ: वज्रबाहुके बाबा विजयस्यन्दनको जब उसके इस समाचारका पता चला तब शोकसे पीड़ित होता हुआ वह सभाके बीचमें इस प्रकार बोला कि अहो ! आश्चर्यकी बात देखो, प्रथम अवस्थामें स्थित मेरा नाती विषयोंसे विरक्त हो दैगम्बरी दीक्षाको प्राप्त हुआ है ॥१२८-१२९॥


मादृशोऽपि सुदुर्मोचैर्वर्षीयान् प्रवणीकृतः । भोगैर्यैस्ते कथं तेन कुमारेण विवर्जिताः ॥१३०॥

अर्थ: मेरे समान वृद्ध पुरुष भी दुःखसे छोड़ने योग्य जिन विषयोंके अधीन हो रहा है वे विषय उस कुमारने कैसे छोड़ दिये ॥१३०॥


अथवानुगृहीतोऽसौ भाग्यवान्मुक्तिसंपदा । भोगान् यस्तृणवत्यक्त्वा शीतीभावे व्यवस्थितः ॥१३१॥

अर्थ: अथवा उस भाग्यशालीपर मुक्तिरूपी लक्ष्मीने बड़ा अनुग्रह किया है जिससे वह भोगोंको तृणके समान छोड़कर निराकुल भावको प्राप्त हुआ है ॥१३१॥


मन्दभाग्योऽधुना चेष्टां कां व्रजामि जरार्दितः । सुचिरं वञ्चितः पापैर्विषयैर्मुखसुन्दरैः ॥१३२॥

अर्थ: प्रारम्भमें सुन्दर दिखनेवाले पापी विषयोंने जिसे चिरकालसे ठगा है तथा जो वृद्धावस्थासे पीड़ित है ऐसा मैं अभागा इस समय कौन-सी चेष्टाको धारण करूँ ? ॥१३२॥


इन्द्रनीलांशुसंघातसंकाशो योऽभवत् कथम् । केशभारः स मे जातः काशराशिसमद्युतिः ॥१३३॥

अर्थ: मेरे जो केश इन्द्रनील मणि-की किरणोंके समान श्याम वर्ण थे वे ही आज कासके फूलोंकी राशिके समान सफ़ेद हो गये हैं ॥१३३॥


सितासितारुणच्छाये नेत्रे ये जनहारिणी । जाते संप्रति ते सुभ्रूवलीच्छन्नस्ववर्त्मनी ॥१३४॥

अर्थ: सफ़ेद काली और लाल कान्तिको धारण करनेवाले मेरे जो नेत्र मनुष्योंके मनको हरण करनेवाले थे, अब उनका मार्ग भृकुटी रूपी लताओंसे आच्छादित हो गया है अर्थात् अब वे लताओंसे आच्छादित गर्तके समान जान पड़ते हैं ॥१३४॥


प्रभासमुज्ज्वलः कायो योऽयमासीन्महाबलः । जातः संप्रत्यसौ वर्षाहतचित्रसमच्छविः ॥१३५॥

अर्थ: मेरा जो यह शरीर कान्तिसे उज्ज्वल तथा महाबलसे युक्त था वह अब वर्षासे ताड़ित चित्रके समान निष्प्रभ हो गया ॥१३५॥


अर्थो धर्मश्च कामश्च त्रयस्ते तरुणोचिताः । जरापरीतकायस्य दुष्कराः प्राणधारिणः ॥१३६॥

अर्थ: अर्थ, धर्म और काम ये तीन पुरुषार्थ तरुण मनुष्यके योग्य हैं। वृद्ध मनुष्यके लिए इनका करना कठिन है ॥१३६॥


धिङ्मामचेतनं पापं दुराचारं प्रमादिनम् । अलीकबान्धवस्नेहसागरावर्तवर्तिनम् ॥१३७॥

अर्थ: चेतनाशून्य, दुराचारी, प्रमादी तथा भाई-बन्धुओंके मिथ्या स्नेहरूपी सागरकी भँवरमें पड़े हुए मुझ पापीको धिक्कार हो ॥१३७॥


इत्युक्त्वा बान्धवान् सर्वानापृच्छ्य विगतस्पृहः । दत्वा पुरंदरे राज्यं राजा जर्जरविग्रहः ॥१३८॥

पार्श्वे निर्वाणघोषस्य निर्ग्रन्थस्य महात्मनः । सुरेन्द्रमन्युना सार्धं प्रवव्राज महामनाः ॥१३९॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा समस्त बन्धुजनोंसे पूछकर उदारहृदय वृद्ध राजा विजयस्यन्दनने निःस्पृह हो छोटे पोते पुरन्दरके लिए राज्य सौंप दिया और स्वयं निर्वाणघोष नामक निर्ग्रन्थ महात्माके समीप अपने पुत्र सुरेन्द्रमन्युके साथ दीक्षा ले ली ॥१३८-१३९॥


पुरंदरस्य तनयमसूत पृथिवीमती । भार्या कीर्तिधराभिख्यं विख्यातगुणसागरम् ॥१४०॥

अर्थ: तदनन्तर पुरन्दरकी भार्या पृथिवीमतीने कीर्तिधर नामक पुत्रको उत्पन्न किया। वह पुत्र समस्त प्रसिद्ध गुणोंका मानो सागर ही था ॥१४०॥


क्रमेण स परिप्राप्तो यौवनं विनयाधिकः । एधयन् सर्वबन्धूनां प्रसादं चारुचेष्टया ॥१४१॥

अर्थ: अपनी सुन्दर चेष्टासे समस्त बन्धुओंकी प्रसन्नताको बढ़ाता हुआ विनयी कीर्तिधर क्रम-क्रमसे यौवनको प्राप्त हुआ ॥१४१॥


कौसलस्थनरेन्द्रस्य वृता तस्मै शरीरजा । सुतमुद्वाह्य तां गेहान्निश्चक्राम पुरंदरः ॥१४२॥

अर्थ: तब राजा पुरन्दरने उसके लिए कौशल देशके राजाकी पुत्री स्वीकृत की । इस तरह पुत्रका विवाहकर राजा पुरन्दर विरक्त हो घरसे निकल पड़ा ॥१४२॥


क्षेमंकरमुनेः पार्श्वे प्रव्रज्य गुणभूषणः । तपः कर्तुं समारेभे कर्मनिर्जरकारणम् ॥१४३॥

अर्थ: गुणरूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले राजा पुरन्दरने क्षेमंकर मुनिराजके समीप दीक्षा लेकर कर्मोंकी निर्जराका कारण कठिन तप करना प्रारम्भ किया ॥१४३॥


कुलक्रमागतं राज्यं पालयन् जितशात्रवः । रेमे देवोत्तमैर्भोगैः सुखं कीर्तिधरो नृपः ॥१४४॥

अर्थ: इधर शत्रुओंको जीतनेवाला राजा कीर्तिधर कुल-क्रमागत राज्यका पालन करता हुआ देवोंके समान उत्तम भोगोंके साथ सुखपूर्वक क्रीड़ा करने लगा ॥१४४॥


अथान्यदा कीर्तिधरः क्षितीश्वरः प्रजासुबन्धुः कृतभीररातिषु । सुखासनस्थो भवने मनोरमे विराजमानो नलकूबरो यथा ॥१४५॥

निरीक्ष्य राहुक्षयनीलतेजसा तिरोहितं भास्करभासमण्डलम् । अचिन्तयत् कष्टमहो न शक्यते विधिर्विनेतुं प्रकटीकृतोदयः ॥१४६॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन शत्रुओंको भयभीत करनेवाला प्रजा-वत्सल राजा कीर्तिधर, अपने सुन्दर भवनके ऊपर नलकूबर विद्याधरके समान सुखसे बैठा हुआ सुशोभित हो रहा था कि उसकी दृष्टि राहु विमानकी नील कान्तिसे आच्छादित सूर्यमण्डल (सूर्यग्रहण) पर पड़ी । उसे देखकर वह विचार करने लगा कि अहो ! उदयमें आया कर्म दूर नहीं किया जा सकता ॥१४५-१४६॥


उत्सार्य यो भीषणमन्धकारं करोति निष्कान्तिकमिन्दुबिम्बम् । असौ रविः पद्मवनप्रबोधः स्वर्मानुमुत्सारयितुं न शक्तः ॥१४७॥

अर्थ: सूर्य भीषण अन्धकारको नष्ट कर चन्द्रमण्डलको कान्तिहीन कर देता है तथा कमलोंके वनको विकसित करता है वह सूर्य राहुको दूर करनेमें समर्थ नहीं है ॥१४७॥


तारुण्यसूर्योऽप्ययमेवमेव प्रणश्यति प्राप्तजरोपरागः ।
जन्तुर्वराको वरपाशबद्धो मृत्योरवश्यं मुखमभ्युपैति ॥१४८॥

अर्थ: जिस प्रकार यह सूर्य नष्ट हो रहा है उसी प्रकार यह यौवनरूपी सूर्य भी जरारूपी ग्रहणको प्राप्त कर नष्ट हो जावेगा। मजबूत पाशसे बँधा हुआ यह बेचारा प्राणी अवश्य ही मृत्युके मुखमें जाता है ॥१४८॥


अनित्यमेतज्जगदेष मत्वा समासमेतानगदीदमात्यान् ।
ससागरां रक्षत भो धरित्रीमहं प्रयाम्येष विमुक्तिमार्गम् ॥१४९॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त संसारको अनित्य मानकर राजा कीर्तिधरने सभामें बैठे हुए मन्त्रियोंसे कहा कि अहो मन्त्री जनो ! इस सागरान्त पृथिवीकी आप लोग रक्षा करो। मैं तो मुक्तिके मार्गमें प्रयाण करता हूँ ॥१४९॥


इत्युक्तमात्रे बुधबन्धुपूर्णा सभा विषादं प्रगता तमूचे ।
राजंस्त्वमस्याः पतिरद्वितीयो विराजसे सर्ववसुंधरायाः ॥१५०॥

अर्थ: राजाके ऐसा कहनेपर विद्वानों तथा बन्धुजनोंसे परिपूर्ण सभा विषादको प्राप्त हो उससे इस प्रकार बोली कि हे राजन् ! इस समस्त पृथिवीके तुम्हीं एक अद्वितीय पति हो ॥१५०॥


त्यक्ता वशस्था धरणी त्वयेयं न राजते निर्जितशत्रुपक्षा ।
नवे वयस्युन्नतवीर्यराज्यं कुरुष्व तावत् सुरनाथतुल्यम् ॥१५१॥

अर्थ: यह पृथिवी आपके अधीन है तथा आपने समस्त शत्रुओंको जीता है, इसलिए आपके छोड़नेपर सुशोभित नहीं होगी। उन्नत पराक्रमके धारक ! अभी आपकी नयी अवस्था है इसलिए इन्द्रके समान राज्य करो ॥१५१॥


जगाद राजा भववृक्षसंकटां जरावियोगारतिवह्निदीपिताम् ।
निरीक्ष्य दीर्घां व्यसनाटवीमिमां भयं ममात्यन्तमुरु प्रजायते ॥१५२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजाने कहा कि जो जन्मरूपी वृक्षोंसे संकुल है, व्याप्त है, बुढ़ापा, वियोग तथा अरतिरूपी अग्निसे प्रज्वलित है, तथा अत्यन्त दीर्घ है ऐसी इस व्यसनरूपी अटवीको देखकर मुझे भारी भय उत्पन्न हो रहा है ॥१५२॥


तन्निश्चितं मन्त्रिजनोऽवगत्य विध्यातमङ्गारचयं महान्तम् । आनाय्य मध्येऽस्य मरीचिरम्यं वैदूर्यमस्थापयदत्युदारम् ॥१५३॥

अर्थ: जब मन्त्रीजनोंको राजाके दृढ़ निश्चयका बोध हो गया तब उन्होंने बहुतसे बुझे हुए अंगारोंका समूह बुझाकर उसमें किरणोंसे सुशोभित उत्तम वैडूर्य-मणि रखा सो उसके प्रभावसे वह बुझे हुए अंगारोंका समूह प्रकाशमान हो गया ॥१५३॥


पुनस्तदुद्वृत्य जगाद राजन् यथामुना रत्नवरेण हीनः । न शोभतेऽङ्गारकलाप एष त्वया विनेदं भुवनं तथैव ॥१५४॥

अर्थ: तदनन्तर वह रत्न उठाकर बोले कि हे राजन् ! जिस प्रकार इस उत्तम रत्नसे रहित अंगारोंका समूह शोभित नहीं होता है उसी प्रकार आपके बिना यह संसार शोभित नहीं होगा ॥१५४॥


नाथ त्वयेमा विकला विनाथा प्रजा विनश्यन्त्यखिला वराक्यः । प्रजासु नष्टासु तथैव धर्मो धर्मे विनष्टे वद किं न नष्टम् ॥१५५॥

अर्थ: हे नाथ ! तुम्हारे बिना यह बेचारी समस्त प्रजा अनाथ तथा विकल होकर नष्ट हो जायेगी । प्रजाके नष्ट होनेपर धर्म नष्ट हो जायेगा और धर्मके नष्ट होनेपर क्या नहीं नष्ट होगा सो तुम्हीं कहो ॥१५५॥


तस्माद्यथा ते जनकः प्रजाभ्यो दत्वा भवन्तं परिपालनाय । तपोऽकरोन्निर्वृतिदानदक्षं तथा भवान् रक्षतु गोत्रधर्मम् ॥१५६॥

अर्थ: इसलिए जिस प्रकार आपके पिताने प्रजाकी रक्षाके लिए आपको देकर मोक्ष प्रदान करनेमें दक्ष तपश्चरण किया था उसी प्रकार आप भी अपने इस कुलधर्मकी रक्षा कीजिए ॥१५६॥


अथैवमुक्तः कुशलैरमात्यैरवग्रहं कीर्तिधरश्चकार । श्रुत्वा प्रजातं तनयं प्रपत्स्ये ध्रुवं मुनीनां पदमत्युदारम् ॥१५७॥

अर्थ: अथानन्तर कुशल मन्त्रियोंके इस प्रकार कहनेपर राजा कीर्तिधरने नियम किया कि जिस समय मैं पुत्रको उत्पन्न हुआ सुनूँगा उस समय मुनियोंका उत्कृष्ट पद अवश्य धारण कर लूँगा ॥१५७॥


ततः स शक्रोपमभोगवीर्यः स्फीतां व्यवस्थामहतीं धरित्रीम् । सुखं शशासाखिलभीतिमुक्तां स भूरिकालं सुसमाहितात्मा ॥१५८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके भोग और पराक्रम इन्द्रके समान थे तथा जिसकी आत्मा सदा सावधान रहती थी ऐसे राजा कीर्तिधरने सब प्रकारके भयसे रहित तथा व्यवस्थासे युक्त दीर्घ पृथ्वीका चिरकाल तक पालन किया ॥१५८॥


चिरं ततः कीर्तिधरेण साकं सुखं भजन्ती सहदेवदेवी । क्रमेण संपूर्णगुणं प्रसूता सुतं धरित्रीधरणे समर्थम् ॥१५९॥

अर्थ: तदनन्तर राजा कीर्तिधरके साथ चिरकाल तक सुखका उपभोग करती हुई रानी सहदेवीने सर्वगुणोंसे परिपूर्ण एवं पृथ्वीके धारण करनेमें समर्थ पुत्रको उत्पन्न किया ॥१५९॥


समुत्सवस्तत्र कृतो न जाते मागाद्धरित्रीपतिकर्णजाहम् । वार्तेति कांश्चिद्दिवसान्निगूढः कालः कथंचित्प्रसवस्य जातः ॥१६०॥

अर्थ: पुत्र-जन्मका समाचार राजाके कानों तक न पहुँच जावे इस भयसे पुत्र जन्मका उत्सव नहीं किया गया तथा इसी कारण कितने ही दिन तक प्रसवका समय गुप्त रक्खा गया ॥१६०॥


ततः समुद्यद्दिवसप्रभूपमश्चिरं स शक्यः कथमेव गोपितुम् ।
निवेदितो दुर्विधिनातिदुःखिना नृपाय केनापि नरेण निश्चितः ॥१६१॥

अर्थ: तदनन्तर उगते हुए सूर्यके समान वह बालक चिरकाल तक छिपाकर कैसे रक्खा जा सकता था ? फलस्वरूप किसी दरिद्र मनुष्यने पुरस्कार पानेके लोभसे राजाको उसकी खबर दे दी ॥१६१॥


तस्मै नरेन्द्रो मुकुटादि हृष्टो विभूषणं सर्वमदान्महात्मा ।
घोषाख्यशाखानगरं च रम्यं महाधनग्रामशतेन युक्तम् ॥१६२॥

अर्थ: राजाने हर्षित होकर उसके लिए मुकुट आदि दिये तथा विपुल धनसे युक्त सौ गाँवोंके साथ घोष नामका मनोहर शाखानगर दिया ॥१६२॥


पुत्रं समानाय्य च पक्षजातं स्थितं महातेजसि मातुरङ्के ।
अतिष्ठिपत्तुङ्गविभूतियुक्तं निजे पदे पूजितसर्वलोकः ॥१६३॥

अर्थ: और माताकी महा तेजपूर्ण गोदमें स्थित उस एक पक्षके बालकको बुलवाकर उसे बड़े वैभवके साथ अपने पदपर बैठाया तथा सब लोगोंका सन्मान किया ॥१६३॥


जाते यतस्तत्र बभूव रम्या पुरी विभूत्या किल कोशलाख्या ।
सुकोशलाख्यां स जगाम तस्माद् बालः समस्ते भुवने सुचेष्टः ॥१६४॥

अर्थ: चूँकि उसके उत्पन्न होनेपर वह कोसला नगरी वैभवसे अत्यन्त मनोहर हो गयी थी इसलिए उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला वह बालक ‘सुकोसल’ इस नामको प्राप्त हुआ ॥१६४॥


ततो विनिष्क्रम्य निवासचारकादशिश्रियत् कीर्तिधरस्तपोवनम् ।
तपोभवेनैष रराज तेजसा घनागमोन्मुक्ततनुर्यथा रविः ॥१६५॥

अर्थ: तदनन्तर राजा कीर्तिधर भवनरूपी कारागारसे निकलकर तपोवनमें पहुँचा और तप सम्बन्धी तेजसे वर्षाकालसे रहित सूर्यके समान अत्यन्त सुशोभित होने लगा ॥१६५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते सुव्रत-वज्रबाहु-कीर्तिमाहात्म्यवर्णनं नामैकविंशतितमं पर्व ॥२१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें भगवान् मुनिसुव्रतनाथ वज्रबाहु तथा राजा कीर्तिधरके माहात्म्यको कथन करनेवाला इक्कीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२१॥


२२. द्वाविंशतितमं पर्व (सुकोशलमाहात्म्ययुक्त-दशरथोत्पत्त्यभिधानं)

अथ घोरतपोधारी धरातुल्यक्षमः प्रभुः । मलकञ्चुकसंवीतो वीतमानो महामनाः ॥१॥

तपःशोषितसर्वाङ्गो धीरो लुञ्चविभूषणः । प्रलम्बितमहाबाहुर्युगाध्वन्यस्तलोचनः ॥२॥

स्वभावान्मत्तनागेन्द्रमन्थरायणविभ्रमः । निर्विकारः समाधानी विनीतो लोभवर्जितः ॥३॥

अनुसूत्रसमाचारो दयाविमलमानसः । स्नेहपङ्कविनिर्मुक्तः श्रमणश्रीसमन्वितः ॥४॥

गृहपङ्क्तिक्रमप्राप्तं भ्राम्यन्नात्मन्चरं गृहम् । मुनिर्विवेश भिक्षार्थं चिरकालोपवासवान् ॥५॥

अर्थ: अथानन्तर जो घोर तपस्वी थे, पृथ्वीके समान क्षमाके धारक थे, प्रभु थे, जिनका शरीर मैलरूपी कंचुकसे व्याप्त था, जिन्होंने मानको नष्ट कर दिया था, जो उदार हृदय थे, जिनका समस्त शरीर तपसे सूख गया था, जो अत्यन्त धीर थे, केश लोंच करनेको जो आभूषणके समान समझते थे, जिनकी लम्बी भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं, जो युगप्रमाण अर्थात् चार हाथ प्रमाण मार्गमें दृष्टि डालते हुए चलते थे, जो स्वभावसे ही मत्त हाथीके समान मन्दगतिसे चलते थे, विकार-शून्य थे, समाधान अर्थात् चित्तकी एकाग्रतासे सहित थे, विनीत थे, लोभरहित थे, आगमानुकूल आचारका पालन करते थे, जिनका मन दयासे निर्मल था, जो स्नेहरूपी पंकसे रहित थे, मुनिपदरूपी लक्ष्मीसे सहित थे और जिन्होंने चिरकालका उपवास धारण कर रखा था, ऐसे कीर्तिधर मुनिराज भ्रमण करते हुए गृहपंक्तिकें क्रमसे प्राप्त अपने पूर्व घरमें भिक्षाके लिए प्रवेश करने लगे ॥१-५॥


निरीक्ष्य सहदेवी तं गवाक्षनिहितेक्षणा । परमं क्रोधमायाता विस्फुरल्लोहितानना ॥६॥

प्रतीहारगणानूचे कुञ्चितोष्ठी दुराशया । श्रमणो गृहभञ्जोऽयमाशु निर्वास्यतामिति ॥७॥

अर्थ: उस समय उनकी गृहस्थावस्थाकी स्त्री सहदेवी झरोखेमें दृष्टि लगाये खड़ी थी सो उन्हें आते देख परमक्रोधको प्राप्त हुई। क्रोधसे उसका मुँह लाल हो गया। ओंठ चाबती हुई उस दुष्टाने द्वारपालोंसे कहा कि यह मुनि घरको फोड़नेवाला है इसलिए यहाँसे शीघ्र ही निकाल दिया जाय ॥६-७॥


मुग्धः सर्वजनप्रीतः स्वभावमृदुमानसः । यावन्निरीक्षते नैनं कुमारः सुकुमारकः ॥८॥

अन्यानपि यदीक्षे तु भवने नग्नमानवान् । निग्रहं वः करिष्यामि प्रतीहारा न संशयः ॥९॥

परित्यज्य दयामुक्तो गतोऽसौ शिशुपुत्रकम् । यतः प्रभृति नामीषु तदारभ्य धृतिर्मम ॥१०॥

अर्थ: मुग्ध, सर्वजन प्रिय और स्वभावसे ही कोमल चित्तका धारक, सुकुमार कुमार जबतक इसे नहीं देखता है तबतक शीघ्र ही दूर कर दो। यही नहीं यदि मैं और भी नग्न मनुष्योंको महलके अन्दर देखूँगी तो हे द्वारपालो! याद रखो मैं अवश्य ही तुम्हें दण्डित करूँगी। यह निर्दय जबसे शिशुपुत्रको छोड़कर गया है तभीसे इन लोगोंमें मेरा सन्तोष नहीं रहा ॥८-१०॥


राज्यश्रियं द्विषन्त्येते महाशूरनिषेविताम् । नयन्त्यत्यन्तनिर्वेदं महोद्योगपरान्नरान् ॥११॥

अर्थ: ये लोग महाशूर वीरोंसे सेवित राज्यलक्ष्मीसे द्वेष करते हैं तथा महान् उद्योग करनेमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको अत्यन्त निर्वेद प्राप्त करा देते हैं ॥११॥


क्रूरैरित्युदितैः क्षिप्रं दुर्वाक्यजनिताननैः । दूरं निर्धारितो योगी वेत्रग्राहितपाणिभिः ॥१२॥

अर्थ: सहदेवीके इस प्रकार कहनेपर जिनके मुखसे दुर्वचन निकल रहे थे तथा जो हाथमें वेत्र धारण कर रहे थे ऐसे दुष्ट द्वारपालोंने उन मुनिराजको दूरसे ही शीघ्र निकाल दिया ॥१२॥


अन्येऽपि लिङ्गिनः सर्वे पुरान्निर्वासितास्तदा । कुमारो धर्मशब्दं मा श्रौषीदिति नृपास्पदे ॥१३॥

अर्थ: इन्हें ही नहीं, ‘राज-भवनमें विद्यमान राजकुमार धर्मका शब्द न सुन ले’ इस भयसे नगरमें जो और भी मुनि विद्यमान थे उन सबको नगरसे बाहर निकाल दिया ॥१३॥


इति संतक्ष्यमाणं तं वाग्वास्या मुनिपुङ्गवम् । श्रुत्वा दृष्ट्वा च संजातप्रत्यग्रौदारशोकिका ॥१४॥

स्वामिनं प्रत्यभिज्ञाय भक्ता कीर्तिधरं चिरात् । धात्री सौकोशली दीर्घमरोदीन्मुक्तकण्ठिका ॥१५॥

अर्थ: इस प्रकार वचनरूपी वसूलीके द्वारा छीले हुए मुनिराजको सुनकर तथा देखकर जिसका भारी शोक फिरसे नवीन हो गया था, तथा जो भक्तिसे युक्त थी ऐसी सुकोसल धाय चिरकाल बाद अपने स्वामी कीर्तिधरको पहचानकर गला फाड़-फाड़कर रोने लगी ॥१४-१५॥


श्रुत्वा तां रुदतीमाशु समागत्य सुकोशलः । जगाद सान्त्वयन्मातः केन तेऽपकृतं वद ॥१६॥

अर्थ: उसे रोती सुनकर सुकोशल शीघ्र ही उसके पास आया और सान्त्वना देता हुआ बोला कि हे माता ! कह तेरा अपकार किसने किया है ? ॥१६॥


गर्भधारणमात्रेण जनन्या समनुष्ठितम् । त्वत्पयोमयमेतत्तु शरीरं जातमीदृशम् ॥१७॥

अर्थ: माताने तो इस शरीरको गर्भमात्रमें ही धारण किया है पर आज यह शरीर तेरे दुग्ध-पानसे ही इस अवस्थाको प्राप्त हुआ है ॥१७॥


सा मे त्वं जननीतोऽपि परं गौरवमाश्रिता । वदापमानिता केन मृत्युवक्त्रं विविक्षुणा ॥१८॥

अर्थ: तू मेरे लिए मातासे भी अधिक गौरवको धारण करती है। बता, यमराजके मुखमें प्रवेश करनेकी इच्छा करनेवाले किस मनुष्यने तेरा अपमान किया है ? ॥१८॥


अद्य मे त्वं जनन्यापि परिभूता भवेद्यदि । करोम्यविनयं तस्या जन्तोरन्यस्य किं पुनः ॥१९॥

अर्थ: यदि आज माताने भी तेरा पराभव किया होगा तो मैं उसकी अविनय करनेको तैयार हूँ फिर दूसरे प्राणीकी तो बात ही क्या है ? ॥१९॥


ततस्तस्मै समाख्यातं वसन्तलतया तया । कृच्छ्रेण विरलीकृत्य नेत्राम्बुप्लवसंततिम् ॥२०॥

अभिषिच्य शिशुं राज्ये भवन्तं यस्तपोवनम् । प्रविष्टस्ते पिता भीतो भवव्यसनपञ्जरात् ॥२१॥

भिक्षार्थमागतः सोऽद्य प्रविष्टो भवतो गृहम् । जनन्यास्ते नियोगेन प्रतिहारैर्निराकृतः ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्तलता नामक धायने बड़े दुःखसे आँसुओंकी धाराको कमकर सुकोशलसे कहा कि तुम्हारा जो पिता शिशु अवस्थामें ही तुम्हारा राज्याभिषेक कर संसाररूपी दुःखदायी पंजरसे भयभीत हो तपोवनमें चला गया था आज वह भिक्षाके लिए आपके घरमें प्रविष्ट हुआ सो तुम्हारी माताने अपने अधिकारसे उसे द्वारपालोंके द्वारा अपमानित कर बाहर निकलवा दिया ॥२०-२२॥


दृष्ट्वा निर्धार्यमाणं तं जातशोकोरुवेलया । रुदितं मयका वत्स शोकं धर्तुमशक्तया ॥२३॥

अर्थ: उसे अपमानित होते देख मुझे बहुत शोक हुआ और उस शोकको मैं रोक नहीं सकी। इसलिए हे वत्स ! मैं रो रही हूँ ॥२३॥


भवद्गौरवदृष्टायाः कुरुते कः पराभवम् । मम कारणमेतत्तु कथितं रुदितस्य ते ॥२४॥

अर्थ: जिसे आप सदा गौरवसे देखते हैं उसका पराभव कौन कर सकता है ? मेरे रोनेका कारण यही है जो मैंने आपसे कहा है ॥२४॥


प्रसादस्तेन नाथेन तदास्माकमकारि यः । स्मर्यमाणः शरीरं स दहत्येष निरङ्कुशः ॥२५॥

अर्थ: उस समय स्वामी कीर्तिधरने हमारा जो उपकार किया था वह स्मरणमें आते ही शरीरको स्वतन्त्रतासे जलाने लगता है ॥२५॥


धृतमेतदपुण्यैर्मे शरीरं दुःखभाजनम् । वियोगे तस्य नाथस्य भ्रियते यदयोमयम् ॥२६॥

अर्थ: पापके उदयसे दुःखका पात्र बननेके लिए ही मेरा यह शरीर रुका हुआ है । जान पड़ता है कि यह लोहेसे बना है इसलिए तो स्वामीका वियोग होनेपर भी स्थिर है ॥२६॥


निर्ग्रन्थं भवतो दृष्ट्वा माभून्निर्वेदधीरिति । तपस्विनां प्रवेशोऽस्मिन्नगरेऽपि निवारितः ॥२७॥

अर्थ: निर्ग्रन्थ मुनिको देखकर तुम्हारी बुद्धि वैराग्यमय न हो जावे इस भयसे नगरमें मुनियोंका प्रवेश रोक दिया गया है ॥२७॥


गोत्रे परम्परायातो धर्मोऽयं भवतां किल । राज्ये यत्तनयं न्यस्य तपोवननिषेवणम् ॥२८॥

अर्थ: परन्तु तुम्हारे कुलमें परम्परासे यह धर्म चला आया है कि पुत्रको राज्य देकर तपोवनकी सेवा करना ॥२८॥


किं नास्मादपि जानासि मन्त्रिणां संप्रधारणम् । न कदाचिदतो गेहाल्लभसे यद्विनिर्गमम् ॥२९॥

अर्थ: तुम कभी घरसे बाहर नहीं निकल सकते हो इतनेसे ही क्या मन्त्रियोंके इस निश्चयको नहीं जान पाये हो ॥२९॥


एतस्मात् कारणात् सर्वं बाह्यालीभ्रमणादिकम् । अमात्यैः कृतमत्रैव भवने नयशालिभिः ॥३०॥

अर्थ: इसी कारण नीतिके जाननेवाले मन्त्रियोंने तुम्हारे भ्रमण आदिकी व्यवस्था इसी भवनमें कर रखी है ॥३०॥


ततो निशम्य वृत्तान्तं सकलं तन्निवेदितम् । अवतीर्य त्वरायुक्तः प्रासादाग्रात् सुकोशलः ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर वसन्तलता धायके द्वारा निरूपित समस्त वृत्तान्त सुनकर सुकोशल शीघ्रतासे महलके अग्रभागसे नीचे उतरा ॥३१॥


परिशिष्टातपत्रादिपृथिवीपतिलाञ्छनः । पद्मकोमलकान्तिभ्यां चरणाभ्यां श्रियान्वितः ॥३२॥

इतो वरमुनिर्दृष्टो भवद्भिरिति नादवान् । परमोत्कण्ठया युक्तः संप्राप पितुरन्तिकम् ॥३३॥

अर्थ: और छत्र चमर आदि राज-चिह्नोंको छोड़कर कमलके समान कोमल कान्तिको धारण करनेवाले पैरोंसे पैदल ही चल पड़ा । वह लक्ष्मीसे सुशोभित था तथा मार्गमें लोगोंसे पूछता जाता था कि यहाँ कहीं आप लोगोंने उत्तम मुनिराजको देखा है ? इस तरह परम उत्कण्ठासे युक्त सुकोशल राजकुमार पिताके समीप पहुँचा ॥३२-३३॥


अस्य । नुपदवीभूता महासंभ्रमसंगताः । छत्रधारादयः सर्वे व्याकुलीभूतचेतसः ॥३४॥

अर्थ: इसके जो छत्र धारण करनेवाले आदि सेवक थे वे सब व्याकुल चित्त होते हुए हड़बड़ाकर उसके पीछे दौड़ते आये ॥३४॥


निविष्टं प्रासुकोदारे प्रवरेऽमुं शिलातले । बाष्पाकुलविशालाक्षिः परीत्य सुमावनः ॥३५॥

अर्थ: जाते ही उसने प्रासुक विशाल तथा उत्तम शिलातल पर विराजमान अपने पिता कीर्तिधर मुनिराजकी तीन प्रदक्षिणाएँ दीं । उस समय उसके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे, और उसकी भावनाएँ अत्यन्त उत्तम थीं ॥३५॥


करयुग्मान्तिकं कृत्वा मूर्द्धानं स्नेहनिर्भरः । ननाम पादयोर्जानुमस्तकस्पृष्टभूतलः ॥३६॥

अर्थ: उसने दोनों हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये तथा घुटनों और मस्तकसे पृथिवीका स्पर्श कर बड़े स्नेहके साथ उनके चरणोंमें नमस्कार किया ॥३६॥


कृताञ्जलिरथोवाच विनयेन पुरस्थितः । व्रीडामिव परिप्राप्तो मुनेर्गेहादपाकृतेः ॥३७॥

अर्थ: वह हाथ जोड़कर विनयसे मुनिराजके आगे बैठ गया । अपने घरसे मुनिराजका तिरस्कार होनेके कारण मानो वह लज्जाको प्राप्त हो रहा था ॥३७॥


अग्निज्वालाकुलागारे सुप्तः कश्चिन्नरो यथा । बोध्यते पटुनादेन समूहेन पयोमुचाम् ॥३८॥

तद्वत्संसारगेहेऽहं मृत्युजन्माग्निदीपिते । मोहनिद्रापरिष्वक्तो बोधितो भवता प्रभो ॥३९॥

अर्थ: उसने मुनिराजसे कहा कि जिस प्रकार अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त घरमें सोते हुए मनुष्योंको तीव्र गर्जनासे युक्त मेघोंका समूह जगा देता है उसी प्रकार जन्म-मरणरूपी अग्निसे प्रज्वलित•इस संसाररूपी घरमें मैं मोहरूपी निद्रासे आलिंगित होकर सो रहा था सो हे प्रभो ! आपने मुझे जगाया है ॥३८-३९॥


प्रसादं कुरु मे दीक्षां प्रयच्छ स्वयमाश्रिताम् । मामप्युत्तारयामुष्माद् भवव्यसनसंकटात् ॥४०॥

अर्थ: आप प्रसन्न होइए तथा आपने स्वयं जिस दीक्षाको धारण किया है वह मेरे लिए भी दीजिये । हे भगवन् ! मुझे भी इस संसारके व्यसनरूपी संकटसे बाहर निकालिए ॥४०॥


ब्रवीति यावदेतावन्नतवक्त्रः सुकोशलः । तावत्सामन्तलोकोऽस्य समस्तः समुपागतः ॥४१॥

अर्थ: नीचेकी ओर मुख किये सुकोशल जबतक मुनिराजसे यह कह रहा था तब तक उसके समस्त सामन्त वहाँ आ पहुँचे ॥४१॥


कृच्छ्रेण दधती गर्भमन्तःपुरसमन्विता । प्राप्ता विचित्रमालाख्या देवी चास्य विषादिनी ॥४२॥

अर्थ: सुकोशलकी स्त्री विचित्र-माला भी गर्भके भारको धारण करती, विषादभरी, अन्तःपुरके साथ वहाँ आ पहुँची ॥४२॥


तं दीक्षाभिमुखं ज्ञात्वा भृङ्गझाङ्कारकोमलः । अन्तःपुरात् समुत्तस्थौ समं रुदितनिःस्वनः ॥४३॥

अर्थ: सुकोशलको दीक्षाके सम्मुख जानकर अन्तःपुरसे एक साथ भ्रमरकी झंकारके समान कोमल रोनेकी आवाज उठ पड़ी ॥४३॥


स्याच्चेद्विचित्रमालाया गर्भोऽयं तनयस्ततः । राज्यमस्मै मया दत्तमिति संभाष्य निःस्पृहः ॥४४॥

आशापाशं समुच्छिद्य निर्दह्य स्नेहपञ्जरम् । कलत्रनिगडं भित्त्वा त्यक्त्वा राज्यं तृणं यथा ॥४५॥

अलंकारान् समुत्सृज्य ग्रन्थमन्तर्बहिःस्थितम् । पर्यङ्कासनमास्थाय लुञ्चित्वा केशसंचयम् ॥४६॥

महाव्रतान्युपादाय गुरोर्गुरुविनिश्चयः । पित्रा साकं प्रशान्तात्मा विजहार सुकोशलः ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर सुकोशलने कहा कि ‘यदि विचित्रमालाके गर्भमें पुत्र है तो उसके लिए मैंने राज्य दिया’ इस प्रकार कहकर उसने निःस्पृह हो, आशारूपी पाशको छेदकर, स्नेहरूपी पंजरको जलाकर, स्त्रीरूपी बेड़ीको तोड़कर, राज्यको तृणके समान छोड़कर, अलंकारोंका त्याग कर अन्तरंग-बहिरंग दोनों प्रकारके परिग्रहका उत्सर्ग कर, पर्यंकासनसे बैठकर, केशोंका लोंचकर पितासे महाव्रत धारण कर लिये । और दृढ़ निश्चय हो शान्त चित्तसे पिताके साथ विहार करने लगा ॥४४-४७॥


कुर्वन्निव बलिं पद्मैः पादारुणमरीचिभिः । संभ्राम्यन् धरणीं योग्यां विस्मितैरीक्षितो जनैः ॥४८॥

अर्थ: जब वह विहारके योग्य पृथिवीपर भ्रमण करता था तब पैरोंकी लाल-लाल किरणोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो कमलोंका उपहार ही पृथिवीपर चढ़ा रहा हो । लोग उसे आश्चर्यभरे नेत्रोंसे देखते थे ॥४८॥


आर्तध्यायेन सम्पूर्णा सहदेवी मृता सती । तिर्यग्योनौ समुत्पन्ना दुर्दृष्टिः पापतत्परा ॥४९॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि तथा पाप करनेमें तत्पर रहनेवाली सहदेवी आर्तध्यानसे मरकर तिर्यंच योनिमें उत्पन्न हुई ॥४९॥


तयोर्विहरतोर्युक्तं यत्रास्तमितशायिनोः । कृष्णीकुर्वन् दिशां चक्रमुपतस्थौ घनागमः ॥५०॥

अर्थ: इस प्रकार पिता-पुत्र आगमानुकूल विहार करते थे । विहार करते-करते जहाँ सूर्य अस्त हो जाता था वे वहीं सो जाते थे । तदनन्तर दिशाओंको मलिन करता हुआ वर्षा काल आ पहुँचा ॥५०॥


नभः पयोमुचां व्रातैरनुलिप्तमिवासितैः । वलाकाभिः क्वचिच्चक्रे कुमुदौघैरिवार्चनम् ॥५१॥

अर्थ: काले-काले मेघोंके समूहसे आकाश ऐसा जान पड़ने लगा मानो गोबरसे लीपा गया हो और कहीं-कहीं उड़ती हुई वलाकाओंसे ऐसा जान पड़ता था मानो उसपर कुमुदोंके समूहसे अर्चा ही की गयी हो ॥५१॥


कदम्बस्थूलमुकुलः क्वणद्भृङ्गकदम्बकः । पयोदकालराजस्य यशोगानमिवाकरोत् ॥५२॥

अर्थ: जिनपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे ऐसी कदम्बकी बड़ी-बड़ी बोंडियाँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो वर्षाकालरूपी राजाका यशोगान ही कर रहे हों ॥५२॥


नीलाञ्जनचयैर्व्याप्तं जगत्तुङ्गनगैरिव । चन्द्रसूर्यौ गतौ क्वापि तर्जिताविव गर्जितैः ॥५३॥

अर्थ: जगत् ऐसा जान पड़ता था मानो ऊँचे-ऊँचे पर्वतोंके समान नीलांजनके समूहसे ही व्याप्त हो गया हो और चन्द्रमा तथा सूर्य कहीं चले गये थे मानो मेघोंकी गर्जनासे तर्जित होकर ही चले गये थे ॥५३॥


अच्छिन्नजलधाराभिर्द्रवतीव नमस्तलम् । तोषादिवोत्तमान् मह्यां शष्पकञ्चुकमावृतम् ॥५४॥

अर्थ: आकाशतलसे अखण्ड जलधारा बरस रही थी सो उससे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशतल पिघल-पिघलकर बह रहा हो और पृथिवीमें हरी-हरी घास उग रही थी उससे ऐसा जान पड़ता था मानो उसने सन्तोषसे घासरूपी कंचुक ( चोली ) ही पहन रखी हो ॥५४॥


जमितं जलपूरेण समं सर्वं नतोन्नतम् । अतिवेगप्रवृत्तेन प्रखलस्येव चेतसा ॥५५॥

अर्थ: जिस प्रकार अतिशय दुष्ट मनुष्यका चित्त ऊँच-नीच सबको समान कर देता है उसी प्रकार वेगसे बहनेवाले जलके पूरने ऊँची-नीची समस्त भूमिको समान कर दिया था ॥५५॥


भूमौ गर्जन्ति तोयौघा विहायसि घनाघनाः । अन्विष्यन्त इवारातिं निदाघसमयं द्रुतम् ॥५६॥

अर्थ: पृथिवीपर जलके समूह गरज रहे थे और आकाशमें मेघोंके समूह गर्जना कर रहे थे उससे ऐसा जान पड़ता था मानो वे भागे हुए ग्रीष्मकालरूपी शत्रुको खोज ही रहे थे ॥५६॥


कन्दलैर्निविडैश्छन्ना धरा निर्झरशोभिनः । अत्यन्तजलभारेण पतिता जलदा इव ॥५७॥

अर्थ: झरनोंसे सुशोभित पर्वत अत्यन्त सघन कन्दलोंसे आच्छादित हो गये थे । उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो जलके बहुत भारी भारसे मेघ ही नीचे गिर पड़े हों ॥५७॥


स्थलीदेशेषु दृश्यन्ते स्फुरन्तः शक्रगोपकाः । घनचूर्णितसूर्यस्य खण्डा इव महीं गताः ॥५८॥

अर्थ: वनकी स्वाभाविक भूमिमें जहाँ-तहाँ चलते-फिरते इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़े दिखाई देते थे । जो ऐसे जान पड़ते थे मानो मेघोंके द्वारा चूर्णीभूत सूर्यके टुकड़े ही पृथिवीपर आ पड़े हों ॥५८॥


चचार वैद्युतं तेजो दिक्षु सर्वासु सत्वरम् । पूरितापूरितं देशं पश्यच्चक्षुरिवाम्बरम् ॥५९॥

अर्थ: बिजलीका तेज जल्दी-जल्दी समस्त दिशाओंमें घूम रहा था उससे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशका नेत्र ‘कौन देश जलसे भरा गया और कौन देश नहीं भरा गया’ इस बातको देख रहा था ॥५९॥


मण्डितं शुक्रचापेन गगनं चित्रतेजसा । अत्यन्तोन्नतियुक्तेन तोरणेनेव चारुणा ॥६०॥

अर्थ: अनेक प्रकारके तेजको धारण करनेवाले इन्द्रधनुषसे आकाश ऐसा सुशोभित हो गया मानो अत्यन्त ऊँचे सुन्दर तोरणसे ही सुशोभित हो गया हो ॥६०॥


कूलद्वयनिपातिन्यो भीमावर्ता महाजवाः । वहन्ति कलुषा नद्यः स्वच्छन्दप्रमदा इव ॥६१॥

अर्थ: जो दोनों तटोंको गिरा रही थीं, जिनमें भयंकर आवर्त उठ रहे थे, और जो बड़े वेगसे बह रही थीं ऐसी कलुषित नदियाँ व्यभिचारिणी स्त्रियोंके समान जान पड़ती थीं ॥६१॥


घनाघनरवत्रस्ता हरिणीचकितेक्षणा । आलिलिङ्गुर्द्रुतं स्तम्भान्नार्यः प्रोषितभर्तृकाः ॥६२॥

अर्थ: जो मेघोंकी गर्जनासे भयभीत हो रहीं थीं, तथा जिनके नेत्र हरिणीके समान चंचल थे ऐसी प्रोषितभर्तृका स्त्रियाँ शीघ्र ही खम्भोंका आलिंगन कर रही थीं ॥६२॥


गर्जितेनातिरौद्रेण जर्जरीकृतचेतनाः । प्रोषिता विह्वलीभूताः प्रमदाशाहितेक्षणाः ॥६३॥

अर्थ: अत्यन्त भयंकर गर्जनासे जिनकी चेतना जर्जर हो रही थी ऐसे प्रवासी-परदेशी मनुष्य जिस दिशामें स्त्री थी उसी दिशामें नेत्र लगाये हुए विह्वल हो रहे थे ॥६३॥


अनुकम्पापराः शान्ता निर्ग्रन्थमुनिपुङ्गवाः । प्रासुकस्थानमासाद्य चातुर्मासीव्रतं श्रिताः ॥६४॥

अर्थ: सदा अनुकम्पा ( दया ) के पालन करनेमें तत्पर रहनेवाले दिगम्बर मुनिराज प्रासुक स्थान पाकर चातुर्मास व्रतका नियम लिये हुए थे ॥६४॥


गृहीतां श्रावकैः शक्त्या नानानियमकारिभिः । दिग्विरामव्रतं साधुसेवातत्परमानसैः ॥६५॥

अर्थ: जो शक्तिके अनुसार नाना प्रकारके व्रत-नियम आखड़ी आदि धारण करते थे तथा सदा साधुओंकी सेवामें तत्पर रहते थे ऐसे श्रावकोंने दिग्व्रत धारण कर रखा था ॥६५॥


एवं महति संप्राप्ते समये जलदाकुले । निर्ग्रन्थौ तौ पितापुत्रौ यथोक्ताचारकारिणौ ॥६६॥

वृक्षान्धकारगम्भीरं बहुव्यालसमाकुलम् । गिरिपादमहादुर्गं रौद्राणामपि भीतिदम् ॥६७॥

कङ्कगृद्ध्रक्षगोमायुरवपूरितगह्वरम् । अर्धदग्धशवस्थानं भीषणं विषमावनि ॥६८॥

शिरःकपालसंघातैः क्वचित्पाण्डुरितक्षिति । वसातिविस्रगन्धोग्रवेगवाहिसमीरणम् ॥६९॥

साट्टहासभ्रमद्भीमरक्षोवेतालसंकुलम् । तृणगुच्छलताजालपरिणद्धोरुपादपम् ॥७०॥

पृथु प्रेतवनं धीरावाषाढ्यां शुचिमानसौ । यदृच्छया परिप्राप्तौ विहरन्तौ तपोधनौ ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार मेघोंसे युक्त वर्षाकालके उपस्थित होनेपर आगमानुकूल आचारको धारण करनेवाले दोनों पिता-पुत्र निर्ग्रन्थ साधु कीर्तिधर मुनिराज और सुकोशलस्वामी इच्छानुसार विहार करते हुए उस श्मशानभूमिमें आये जो वृक्षोंके अन्धकारसे गम्भीर था, अनेक प्रकारके सर्प आदि हिंसक जन्तुओंसे व्याप्त था, पहाड़की छोटी-छोटी शाखाओं-से दुर्गम था, भयंकर जीवोंको भी भय उत्पन्न करनेवाला था, काक, गीध, रीछ तथा शृगाल आदिके शब्दोंसे जिसके गर्त भर रहे थे, जहाँ अधजले मुरदे पड़े हुए थे, जो भयंकर था, जहाँकी भूमि ऊँची-नीची थी, जो शिरकी हड्डियोंके समूहसे कहीं-कहीं सफेद हो रहा था, जहाँ चर्बीकी अत्यन्त सड़ी बाससे तीक्ष्ण वायु बड़े वेगसे बह रही थी, जो अट्टहाससे युक्त घूमते हुए भयंकर राक्षस और वेतालोंसे युक्त था तथा जहाँ तृणोंके समूह और लताओंके जालसे बड़े-बड़े वृक्ष परिणद्ध - व्याप्त थे । ऐसे विशाल श्मशानमें एक साथ विहार करते हुए, तपरूपी धनके धारक तथा उज्ज्वल मनसे युक्त धीरवीर पिता-पुत्र - दोनों मुनिराज आषाढ सुदी पूर्णिमाको अनायास ही आ पहुँचे ॥६६-७१॥


चातुर्मासोपवासं तौ गृहीत्वा तत्र निःस्पृहौ । वृक्षमूले स्थितौ पत्रसंगप्रासुकिताम्भसि ॥७२॥

अर्थ: सब प्रकारकी स्पृहासे रहित दोनों मुनिराज, जहाँ पत्तोंके पड़नेसे पानी प्रासुक हो गया था ऐसे उस श्मशानमें एक वृक्षके नीचे चार मासका उपवास लेकर विराजमान हो गये ॥७२॥


पर्यङ्कासनयोगेन कायोत्सर्गेण जातुचित् । वीरासनादियोगेन निन्ये ताभ्यां घनागमः ॥७३॥

अर्थ: वे दोनों मुनिराज कभी पर्यंकासनसे विराजमान रहते थे, कभी कायोत्सर्ग धारण करते थे, और कभी वीरासन आदि विविध आसनोंसे अवस्थित रहते थे। इस तरह उन्होंने वर्षा-काल व्यतीत किया ॥७३॥


ततः शरदृतुः प्राप सोद्योगाखिलमानवः । प्रत्यूष इव निःशेषजगदालोकपण्डितः ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें समस्त मानव उद्योग-धन्धोंसे लग गये थे तथा जो प्रातःकालके समान समस्त संसारको प्रकाशित करनेमें निपुण थी ऐसी शरद् ऋतु आयी ॥७४॥


सितच्छाया घनाः क्वापि दृश्यन्ते गगनाङ्गणे । विकासिकाशसंघातसंकाशा मन्दकम्पिताः ॥७५॥

अर्थ: उस समय आकाशां-गणमें कहीं-कहीं ऐसे सफेद मेघ दिखाई देते थे जो फूले हुए काशके फूलोंके समान थे तथा मन्द-मन्द हिल रहे थे ॥७५॥


घनागमविनिर्मुक्ते भाति खे पद्मबान्धवः । गते सुदुःषमाकाले भव्यबन्धुर्जिनो यथा ॥७६॥

अर्थ: जिस प्रकार उत्सर्पिणी कालके दुःषमा-काल बीतनेपर भव्य जीवोंके बन्धु श्रीजिनेन्द्रदेव सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार मेघोंके आगमनसे रहित आकाशमें सूर्य सुशोभित होने लगा ॥७६॥


तारानिकरमध्यस्थो राजते रजनीपतिः । कुमुदाकरमध्यस्थो राजहंसयुवा यथा ॥७७॥

अर्थ: जिस प्रकार कुमुदोंके बीचमें तरुण राजहंस सुशोभित होता है उसी प्रकार ताराओंके समूहके बीचमें चन्द्रमा सुशोभित होने लगा ॥७७॥


ज्योत्स्नया प्लावितो लोकः क्षीराकूपारकल्पया । रजनीषु निशानाथ प्रणालमुखमुक्तया ॥७८॥

अर्थ: रात्रिके समय चन्द्रमारूपी प्रणालीके मुखसे निकली हुई क्षीरसागरके समान सफेद चाँदनीसे समस्त संसार व्याप्त हो गया ॥७८॥


नद्यः प्रसन्नतां प्राप्तास्तरङ्गाङ्कितसैकताः । क्रौञ्चसारसचक्राह्वनादसंभाषणोद्यताः ॥७९॥

अर्थ: जिनके रेतीले किनारे तरंगोंसे चिह्नित थे, तथा जो क्रौंच सारस चकवा आदि पक्षियोंके शब्दके बहाने मानो परस्परमें वार्तालाप कर रही थीं ऐसी नदियाँ प्रसन्नताको प्राप्त हो गयी थीं ॥७९॥


उन्मज्जन्ति चलद्भृङ्गाः सरःसु कमलाकराः । भव्यसंघा इवोन्मुक्तमिथ्यात्वमलसंचयाः ॥८०॥

अर्थ: जिनपर भ्रमर चल रहे थे ऐसे कमलोंके समूह तालाबोंमें इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो मिथ्यात्व- रूपी मैलके समूहको छोड़ते हुए भव्य जीवोंके समूह ही हों ॥८०॥


तलेषु तुङ्गहर्म्याणां पुष्पप्रकरचारुषु । रमन्ते भोगसंपन्ना नरा नक्तं प्रियान्विताः ॥८१॥

अर्थ: भोगी मनुष्य, फूलोंके समूहसे सुन्दर ऊँचे-ऊँचे महलोंके तल्लोंसे रात्रिके समय अपनी वल्लभाओंके साथ रमण करने लगे ॥८१॥


सन्मानितसुहृद्बन्धुजनसंघा महोत्सवाः । दम्पतीनां वियुक्तानां संजायन्ते समागमाः ॥८२॥

अर्थ: जिनमें मित्र तथा बन्धुजनोंके समूह सम्मानित किये गये थे तथा जिनमें महान् उत्सवकी वृद्धि हो रही थी ऐसे वियुक्त स्त्री-पुरुषोंके समागम होने लगे ॥८२॥


कार्तिक्यामुपजातायां विहरन्ति तपोधनाः । जिनातिशयदेशेषु महिमोद्यतजन्तुषु ॥८३॥

अर्थ: कार्तिक मासकी पूर्णिमा व्यतीत होनेपर तपस्वीजन उन स्थानोंमें विहार करने लगे जिनमें भगवान्‌के गर्भ जन्म आदि कल्याणक हुए थे तथा जहाँ लोग अनेक प्रकारकी प्रभावना करनेमें उद्यत थे ॥८३॥


अथ तौ पारणाहेतोः समाप्तनियमौ मुनी । निवेशं गन्तुमारब्धौ गत्या समयदृष्टया ॥८४॥

अर्थ: अथानन्तर जिनका चातुर्मासोपवासका नियम पूर्ण हो गया था ऐसे वे दोनों मुनिराज आगमानुकूल गतिसे गमन करते हुए पारणाके निमित्त नगरमें जानेके लिए उद्यत हुए ॥८४॥


सहदेवीचरी व्याघ्री दृष्ट्वा तौ क्रोधपूरिता । शोणितारुणसंकीर्णधुतकेसरसंचया ॥८५॥

दंष्ट्राकरालवदना स्फुरत्पिङ्गनिरीक्षणा । मस्तकोर्ध्ववलत्पुच्छा नखक्षतवसुंधरा ॥८६॥

कृतगम्भीरहुंकारा मारीवोपात्तविग्रहा । लसल्लोहितजिह्वाग्रा विस्फुरद्देहधारिणी ॥८७॥

मध्याह्नरविसंकाशा कृत्वा क्रीडां विलम्बिताम् । उत्पपात महावेगाल्लक्ष्यीकृत्य सुकोशलम् ॥८८॥

अर्थ: उसी समय एक व्याघ्री जो पूर्वभवमें सुकोशलमुनिकी माता सहदेवी थी उन्हें देखकर क्रोधसे भर गयी, उसकी खूनसे लाल-लाल दिखनेवाली बिखरी जटाएँ काँप रही थीं, उसका मुख दाढ़ोंसे भयंकर था, पीले-पीले नेत्र चमक रहे थे, उसकी गोल पूँछ मस्तकके ऊपर आकर लग रही थी, नखोंके द्वारा वह पृथिवीको खोद रही थी, गम्भीर हुंकार कर रही थी, ऐसी जान पड़ती थी मानो शरीरको धारण करनेवाली मारी ही हो, उसकी लाल-लाल जिह्वाका अग्रभाग लपलपा रहा था, वह देदीप्यमान शरीरको धारण कर रही थी और मध्याह्नके सूर्यके समान जान पड़ती थी। बहुत देर तक क्रीड़ा करनेके बाद उसने सुकोशलस्वामीको लक्ष्य कर ऊँची छलांग भरी ॥८५-८८॥


उत्पतन्तीं तु तां दृष्ट्वा तौ मुनी चारुविभ्रमौ । सालम्बं भयनिर्मुक्तौ कायोत्सर्गेण तस्थतुः ॥८९॥

अर्थ: सुन्दर शोभाको धारण करनेवाले दोनों मुनिराज, उसे छलांग भरती देख ‘यदि इस उपसर्गसे बचे तो आहार पानी ग्रहण करेंगे अन्यथा नहीं’ इस प्रकारकी सालम्ब प्रतिज्ञा लेकर निर्भय हो कायोत्सर्गसे खड़े हो गये ॥८९॥


सुकोशलमुनेरूर्ध्वं मूर्ध्नः प्रभृति निर्दया । दारयन्ती नखैर्देहं पतिता सा महीतले ॥९०॥

अर्थ: वह दयाहीन व्याघ्री सुकोशल मुनिके ऊपर पड़ी और नखोंके द्वारा उनके मस्तक आदि अंगोंको विदारती हुई पृथिवीपर आयी ॥९०॥


तयासौ दारितो देहे विमुञ्चन्नस्रसंहतीः । बभूव विगलद्धातुवारिनिर्झरशैलवत् ॥९१॥

अर्थ: उसने उनके समस्त शरीरको चीर डाला जिससे खूनकी धाराओंको छोड़ते हुए वे उस पहाड़के समान जान पड़ते थे जिससे गेरू आदि धातुओंसे मिश्रित पानीके निर्झर झर रहे हों ॥९१॥


ततस्तस्य पुरः स्थित्वा कृत्वा नानाविचेष्टितम् । पापा खादितुमारब्धा मुनिमारभ्य पादतः ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर वह पापिन उनके सामने खड़ी होकर तथा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर उन्हें पैरकी ओरसे खाने लगी ॥९२॥


पश्य श्रेणिक संसारे संमोहस्य विचेष्टितम् । यत्राभीष्टस्य पुत्रस्य माता गात्राणि खादति ॥९३॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मोहकी चेष्टा तो देखो जहाँ माता ही प्रिय पुत्रके शरीरको खाती है ॥९३॥


किमतोऽन्यत्परं कष्टं यज्जन्मान्तरमोहिताः । बान्धवा एव गच्छन्ति वैरितां पापकारिणः ॥९४॥

अर्थ: इससे बढ़कर और क्या कष्टकी बात होगी कि दूसरे जन्मसे मोहित हो बान्धवजन ही अनर्थकारी शत्रुताको प्राप्त हो जाते हैं ॥९४॥


ततो मेरुस्थिरस्यास्य शुक्लध्यानावगाहिनः । उत्पन्नं केवलज्ञानं देहमुक्तेरनन्तरम् ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर मेरुके समान स्थिर और शुक्ल ध्यानको धारण करनेवाले सुकोशल मुनिको शरीर छूटनेके पहले ही केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥९५॥


आगत्य च सहेन्द्रेण प्रमोदेन सुरासुराः । चक्रुर्देहार्चनं तस्य दिव्यपुष्पादिसंपदा ॥९६॥

अर्थ: सुर और असुरोंने इन्द्रके साथ आकर बड़े हर्षसे दिव्य पुष्पादि सम्पदाके द्वारा उनके शरीरकी पूजा की ॥९६॥


व्याघ्री कीर्तिधरेणापि सुवाक्यैर्बोधिता सती । संन्यासेन शुभं कालं कृत्वा स्वर्गमुपागता ॥९७॥

अर्थ: सुकोशलके पिता कीर्तिधर मुनिराजने भी उस व्याघ्रीको मधुर शब्दोंसे सम्बोधा जिससे संन्यास ग्रहण कर वह स्वर्ग गयी ॥९७॥


ततः कीर्तिधरस्यापि केवलज्ञानमुद्गतम् । यात्रा सैकैव देवानां जाता महिमकारिणाम् ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर उसी समय कीर्तिधर मुनिराजको भी केवलज्ञान उत्पन्न हुआ सो महिमा को करनेवाले देवोंकी वही एक यात्रा पिता और पुत्र दोनोंका केवलज्ञान महोत्सव करनेवाली हुई ॥९८॥


महिमानं परं कृत्वा केवलस्य सुरासुराः । पादौ केवलिनोर्नत्वा ययुः स्थानं यथायथम् ॥९९॥

अर्थ: सुर और असुर केवलज्ञानकी परम महिमा फैलाकर तथा दोनों केवलियोंके चरणों- को नमस्कार कर यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर गये ॥९९॥


सुकोशलस्य माहात्म्यमधीते यः पुमानिति । उपसर्गविनिर्मुक्तः सुखं जीवत्यसौ चिरम् ॥१००॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि जो पुरुष सुकोशलस्वामीके माहात्म्यको पढ़ता है वह उपसर्गसे रहित हो चिरकाल तक सुखसे जीवित रहता है ॥१००॥


देवी विचित्रमालाथ संपूर्णे समये सुखम् । प्रसूता तनयं चारुलक्षणाङ्कितविग्रहम् ॥१०१॥

अर्थ: अथानन्तर सुकोशलकी स्त्री विचित्रमालाने गर्भका समय पूर्ण होनेपर सुन्दर लक्षणोंसे चिह्नित शरीरको धारण करनेवाला पुत्र उत्पन्न किया ॥१०१॥


हिरण्यरुचिरा माता तस्मिन् गर्भस्थितेऽभवत् । यतो हिरण्यगर्भाख्यामतोऽसौ सुन्दरोऽगमत् ॥१०२॥

अर्थ: चूँकि उस बालकके गर्भमें स्थित रहनेपर माता सुवर्णके समान सुन्दर हो गयी थी इसलिए वह बालक हिरण्यगर्भ नामको प्राप्त हुआ ॥१०२॥


नाभेयसमयस्तेन गुणैः पुनरिवाहृतः । हरेः स तनयां लेभे नाम्नामृतवतीं शुभाम् ॥१०३॥

अर्थ: आगे चलकर हिरण्यगर्भ ऐसा राजा हुआ कि उसने अपने गुणोंके द्वारा भगवान् ऋषभदेवका समय ही मानो पुनः वापस लाया था। उसने राजा हरिकी अमृतवती नामकी शुभ पुत्रीके साथ विवाह किया ॥१०३॥


सुहृद्बान्धवसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अक्षीणद्रविणः श्रीमान् हेमपर्वतसंनिभः ॥१०४॥

परानुभवन् भोगानन्यदासौ महामनाः । मध्ये भृङ्गाभकेशानां पलिताङ्कुरमैक्षत ॥१०५॥

अर्थ: राजा हिरण्यगर्भ समस्त मित्र तथा बान्धवजनोंसे सहित था, सर्व शास्त्रोंका पारगामी था, अखण्ड धनका स्वामी था, श्रीमान् था, सुमेरु पर्वतके समान सुन्दर था, और उदार हृदय था । वह उत्कृष्ट भोगोंको भोगता हुआ समय बिताता था कि एक दिन उसने अपने भ्रमरके समान काले केशोंके बीच एक सफ़ेद बाल देखा ॥१०४-१०५॥


दर्पणस्य स्थितं मध्ये दृष्ट्वा तं पलिताङ्कुरम् । मृत्योर्दूतसमाहूतमात्मानं शोकमाप्तवान् ॥१०६॥

अर्थ: दर्पणके मध्यमें स्थित उस सफेद बालको देखकर वह ऐसा शोकको प्राप्त हुआ मानो अपने आपको बुलानेके लिए यमका दूत ही आ पहुँचा हो ॥१०६॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं बलादङ्गानि मेऽनया । शक्तिकान्तिविनाशिन्या व्याप्यन्ते जरसाधुना ॥१०७॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि हाय बड़े कष्टकी बात है कि इस समय शक्ति और कान्तिको नष्ट करनेवाली इस वृद्धावस्थाके द्वारा मेरे अंग बलपूर्वक हरे जा रहे हैं ॥१०७॥


चन्दनद्रुमसंकाशः कायोऽयमधुना मम । जराज्वलननिर्दग्धोऽङ्गारकल्पो भविष्यति ॥१०८॥

अर्थ: मेरा यह शरीर चन्दनके वृक्षके समान सुन्दर है सो अब वृद्धावस्था-रूपी अग्निसे जलकर अंगारके समान हो जावेगा ॥१०८॥


तर्कयन्ती रुजा छिद्रं या स्थिता समयं चिरम् । पिशाचीवाधुना सा मे शरीरं वाधयिष्यति ॥१०९॥

अर्थ: जो वृद्धावस्था रोगरूपी छिद्रकी प्रतीक्षा करती हुई चिरकालसे स्थित थी अब वह पिशाचीकी नाईं प्रवेश कर मेरे शरीरको बाधा पहुँचावेगी ॥१०९॥


चिरं बद्धक्रमो योऽस्थाद् व्याघ्रवद्ग्रहणोत्सुकः । मृत्युः स मेऽधुना देहं प्रसभं भक्षयिष्यति ॥११०॥

अर्थ: ग्रहण करनेमें उत्सुक जो मृत्यु व्याघ्रकी तरह चिरकालसे बद्धक्रम होकर स्थित था अब वह हठात् मेरे शरीरका भक्षण करेगा ॥११०॥


कर्मभूमिमिमां प्राप्य धन्यास्ते युवपुङ्गवाः । व्रतपोतं समारुह्य तेरुर्ये भवसागरम् ॥१११॥

अर्थ: वे श्रेष्ठ तरुण धन्य हैं जो इस कर्मभूमिको पाकर तथा व्रतरूपी नावपर सवार हो संसाररूपी सागरसे पार हो चुके हैं ॥१११॥


इति संचिन्त्य विन्यस्य राज्येऽमृतवतोसुतम् । नघुषाख्यं प्रवव्राज पार्श्वे विमलयोगिनः ॥११२॥

अर्थ: ऐसा विचारकर उसने अमृतवतीके पुत्र नघुषको राज्य-सिंहासनपर बैठाकर विमल योगीके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥११२॥


न घोषितं यतस्तस्मिन् गर्भस्थेऽप्यशुभं भुवि । नघुषोऽसौ ततः ख्यातो गुणनामितविष्टपः ॥११३॥

अर्थ: चूँकि उस पुत्रके गर्भमें स्थित रहते समय पृथिवीपर अशुभ-की घोषणा नहीं हुई थी अर्थात् जबसे वह गर्भमें आया था तभीसे अशुभ शब्द नहीं सुनाई पड़ा था इसलिए वह ‘नघुष’ इस नामसे प्रसिद्ध हुआ था । उसने अपने गुणोंसे समस्त संसारको नम्रीभूत कर दिया था ॥११३॥


स जायां सिंहिकामिख्यां स्थापयित्वा पुरे ययौ । उत्तरां ककुभं जेतुं सामन्तान् प्रत्यवस्थितान् ॥११४॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय राजा नघुष अपनी सिंहिका नामक रानीको नगरमें रखकर प्रतिकूल शत्रुओंको वश करनेके लिए उत्तर दिशाकी ओर गया ॥११४॥


दूरीभूतं नृपं ज्ञात्वा दाक्षिणात्या नराधिपाः । पुरीं गृहीतुमाजग्मुर्विनीतां भूरिसाधनाः ॥११५॥

अर्थ: इधर दक्षिण दिशाके राजा नघुषको दूरवर्ती जानकर उसकी अयोध्या नगरीको हथियानेके लिए आ पहुँचे । वे राजा बहुत भारी सेनासे सहित थे ॥११५॥


रणे विजित्य तान् सर्वान् सिंहिकातिप्रतापिनी । स्थापयित्वा दृढं स्थाने रक्षमाप्ततरं नृपम् ॥११६॥

सामन्तैर्निर्जितैः सार्द्धं जेतुं शेषान्नराधिपान् । जगाम दक्षिणामाशां शस्त्रशास्त्रकृतश्रमा ॥११७॥

अर्थ: परन्तु अत्यन्त प्रतापिनी सिंहिका रानीने उन सबको युद्धमें जीत लिया । इतना ही नहीं वह एक विश्वासपात्र राजाको नगरकी रक्षाके लिए नियुक्त कर युद्धमें जीते हुए सामन्तोंके साथ शेष राजाओंको जीतनेके लिए दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़ी । शस्त्र और शास्त्र दोनोंमें ही उसने अच्छा परिश्रम किया था ॥११६-११७॥


प्रतापेनैव निर्जित्य सामन्तान् प्रत्यवस्थितान् । आजगाम पुरीं राज्ञी जयनिस्वनपूरिता ॥११८॥

अर्थ: वह प्रतिकूल सामन्तोंको अपने प्रतापसे ही जीतकर विजयनादसे दिशाओंको पूर्ण करती हुई नगरीमें वापस आ गयी ॥११८॥


नघुषोऽप्युत्तरामाशां वशीकृत्य समागतः । कोपं परममापन्नः श्रुतदारपराक्रमः ॥११९॥

अर्थ: उधर जब राजा नघुष उत्तर दिशाको वश कर वापस आया तब स्त्रीके पराक्रम- की बात सुनकर वह परम क्रोधको प्राप्त हुआ ॥११९॥


अविखण्डितशीलाया नेदृग्धाष्टर्यं कुलस्त्रियाः । भवतीति विनिश्चित्य सिंहिकायां व्यरज्यत ॥१२०॥

अर्थ: अखण्डशीलको धारण करनेवाली कुलांगनाकी ऐसी धृष्टता नहीं हो सकती ऐसा निश्चय कर वह सिंहिकासे विरक्त हो गया ॥१२०॥


महादेवीपदात् साथ च्याविता साधुचेष्टिता । महादरिद्रतां प्राप्ता कालं कंचिदवस्थिता ॥१२१॥

अर्थ: वह उत्तम चेष्टाओंसे सहित थी फिर भी राजाने उसे महादेवीके पदसे च्युत कर दिया। इस तरह महादरिद्रताको प्राप्त हो वह कुछ समय तक बड़े कष्टसे रही ॥१२१॥


अन्यदाथ महादाहज्वरोऽभूत् पृथिवीपतेः । सर्ववैद्यप्रयुक्तानामौषधानामगोचरः ॥१२२॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय राजाको ऐसा महान् दाहज्वर हुआ कि जो समस्त वैद्योंके द्वारा प्रयुक्त ओषधियोंसे भी अच्छा नहीं हो सका ॥१२२॥


सिंहिका तं तथाभूतं ज्ञात्वा शोकसमाकुला । स्वं च शोधयितुं साध्वी क्रियामेतां समाश्रिता ॥१२३॥

अर्थ: जब सिंहिकाको इस बातका पता चला तब वह शोकसे बहुत ही आकुल हुई। उसी समय उसने अपने आपको निर्दोष सिद्ध करनेके लिए यह काम किया ॥१२३॥


समाहूयाखिलान् बन्धून् सामन्तान् प्रकृतीस्तथा । करकोशे समादाय वारि दत्तं पुरोधसा ॥१२४॥

जगाद यदि मे भर्ता नान्यश्चेतस्यपि स्थितः । ततः सिक्तोऽम्बुनानेन राजास्तु विगतज्वरः ॥१२५॥

अर्थ: कि उसने समस्त बन्धुजनों, सामन्तों और प्रजाको बुलाकर अपने करपुटमें पुरोहितके द्वारा दिया हुआ जल धारण किया और कहा कि यदि मैंने अपने चित्तमें किसी दूसरे भर्ताको स्थान नहीं दिया हो तो इस जलसे सींचा हुआ भर्ता दाहज्वरसे रहित हो जावे ॥१२४-१२५॥


ततोऽसौ सिक्तमात्रेऽस्मिन् तत्करोदकशीकरे । दन्तवीणाकृतस्वानो हिममग्न इवाभवत् ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर सिंहिका रानीके हाथमें स्थित जलका एक छींटा ही राजापर सींचा गया था कि वह इतना शीतल हो गया मानो बर्फमें ही डुबा दिया गया हो। शीतके कारण उसकी दन्तावली वीणाके समान शब्द करने लगी ॥१२६॥


साधु साध्विति शब्देन गगनं परिपूरितम् । अदृष्टजननिर्मुक्तैर्वृष्टं सुमनसां चयैः ॥१२७॥

अर्थ: उसी समय ‘साधु’-‘साधु’ शब्दसे आकाश भर गया औ अदृष्टजनोंके द्वारा छोड़े हुए फूलोंके समूह बरसने लगे ॥१२७॥


इति तां शीलसंपन्नां विज्ञाय नरपुङ्गवः । महादेवीपदे भूयः कृतपूजामतिष्ठिपत् ॥१२८॥

अर्थ: इस प्रकार राजा नघुषने सिंहिका रानीको शीलसम्पन्न जानकर फिरसे उसे महादेवी पदपर अधिष्ठित किया तथा उसकी बहुत भारी पूजा की ॥१२८॥


अनुभूय चिरं भोगान् तया सार्धमकण्टकः । निःशेषपूर्वजाचारं कृत्वा मनसि निःस्पृहः ॥१२९॥

अर्थ: शत्रुरहित होकर उसने चिरकाल तक उसके साथ भोगोंका अनुभव किया और अपने पूर्वपुरुषोंके द्वारा आचारित समस्त कार्य किये । उसकी यह विशेषता थी कि भोगरत रहनेपर भी वह मनमें सदा भोगोंसे निःस्पृह रहता था ॥१२९॥


संभूतं सिंहिकादेव्यां सुतं राज्ये निनाय सः । जगाम पदवीं धीरो जनकेन निषेविताम् ॥१३०॥

अर्थ: अन्तमें वह धीरवीर सिंहिकादेवीसे उत्पन्न पुत्रको राज्य देकर अपने पिताके द्वारा सेवित मार्गका अनुसरण करने लगा अर्थात् पिताके समान उसने जिनदीक्षा धारण कर ली ॥१३०॥


नघुषस्य सुतो यस्मात् सुदासीकृतविद्विषः । सौदास इति तेनासौ भुवने परिकीर्तितः ॥१३१॥

अर्थ: राजा नघुष समस्त शत्रुओंको वश कर लेनेके कारण सुदास कहलाता था। इसलिए उसका पुत्र संसारमें सौदास ( सुदासस्यापत्यं पुमान् सौदासः ) नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥१३१॥


तस्य गोत्रे दिनान्यष्टौ चंतुर्मासीसमाप्तिषु । भुक्तं न केनचिन्मांसमपि मांसैधितात्मना ॥१३२॥

अर्थ: प्रत्येक चार मास समाप्त होनेपर जब अष्टाह्निकाके आठ दिन आते थे तब उसके गोत्रमें कोई भी मांस नहीं खाता था भले ही उसका शरीर मांससे ही क्यों न वृद्धिगत हुआ हो ॥१३२॥


कर्मणस्त्वशुभस्यास्य कस्यापि समुदीरणात् । बभूव खादितुं मांसं तेष्वेव दिवसेषु धीः ॥१३३॥

अर्थ: किन्तु इस राजा सौदासको किसी अशुभ कर्मके उदयसे इन्हीं दिनोंमें मांस खानेकी इच्छा उत्पन्न हुई ॥१३३॥


ततोऽनेन समाह्वाय सूदः स्वैरमभाष्यत । मांसमत्तुं समुत्पन्ना मम भद्राद्य धीरिति ॥१३४॥

अर्थ: तब उसने रसोइयाको बुलाकर एकान्तमें कहा कि हे भद्र ! आज मेरे मांस खानेकी इच्छा उत्पन्न हुई है ॥१३४॥


तेनोक्तं देव जानासि दिनेष्वेतेष्वमारणम् । जिनपूजासमृद्धेषु समस्तायामपि क्षितौ ॥१३५॥

अर्थ: रसोइयाने उत्तर दिया कि देव ! आप यह जानते हैं कि इन दिनोंमें समस्त पृथ्वीमें बड़ी समृद्धिके साथ जिनपूजा होती है तथा जीवोंके मारनेकी मनाही है ॥१३५॥


नृपेणोचे पुनः सूदो म्रियेऽद्य यदि नाद्मि तत् । इति निश्चित्य यद्युक्तं तदाचर किमुक्तिभिः ॥१३६॥

अर्थ: यह सुन राजाने रसोइयासे कहा कि यदि आज मैं मांस नहीं खाता हूँ तो मर जाऊँगा । ऐसा निश्चय कर जो उचित हो सो करो । बात करनेसे क्या लाभ है ? ॥१३६॥


तदवस्थं नृपं ज्ञात्वा पुरात् सूदो बहिर्गतः । ददर्श मृतकं बालं तद्दिने परिखोज्झितम् ॥१३७॥

अर्थ: राजाकी ऐसी दशा जानकर रसोइया नगरके बाहर गया । वहाँ उसने उसी दिन परिखामें छोड़ा हुआ एक मृतक बालक देखा ॥१३७॥


तं वस्त्रावृतमानीय संस्कृत्य स्वादुवस्तुभिः । नरेन्द्राय ददावत्तुं मन्यसेऽमुंष्य गोचरम् (?) ॥१३८॥

अर्थ: उसे वस्त्रसे लपेटकर वह ले आया और स्वादिष्ट वस्तुओंसे पकाकर खानेके लिए राजाको दिया ॥१३८॥


महामांसरसास्वादनितान्तप्रीतमानसः । भुक्त्वोत्थितो मिथः सूदं स जगाद सविस्मयः ॥१३९॥

वद भद्र कुतः प्राप्तं मांसमेतत्त्वयेदृशम् । अनास्वादितपूर्वोऽयं रसो यस्यातिपेशलः ॥१४०॥

अर्थ: महामांस ( नरमांस ) के रसास्वादसे जिसका मन अत्यन्त प्रसन्न हो रहा था ऐसा राजा उसे खाकर जब उठा तब उसने आश्चर्यचकित हो रसोइयासे कहा कि भद्र ! जिसके इस अत्यन्त मधुर रसका मैंने पहले कभी स्वाद नहीं लिया ऐसा यह मांस तुमने कहाँसे प्राप्त किया है ? ॥१३९-१४०॥


सोऽभयं मार्गयित्वास्मै यथावद् विन्यवेदयत् । ततो राजा जगादेदं सर्वदा क्रियतामिति ॥१४१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें रसोइयाने अभयदानकी याचना कर सब बात ज्योंकी-त्यों बतला दी । तब राजाने कहा कि सदा ऐसा ही किया जाये ॥१४१॥


सूदोऽथ दातुमारब्धः शिशुवर्गाय मोदकान् । शिशवस्तत्प्रसङ्गेन प्रत्यहं तं समाययुः ॥१४२॥

अर्थ: अथानन्तर रसोइयाने छोटे-छोटे बालकोंके लिए लड्डू देना शुरू किया, उसके लोभसे बालक प्रतिदिन उसके पास आने लगे ॥१४२॥


गृहीत्वा मोदकान् यातां शिशूनां पश्चिमं ततः । मारयित्वा ददौ सूदो राज्ञे संस्कृत्य संततम् ॥१४३॥

अर्थ: लड्डू लेकर जब बालक जाने लगते तब उनमें जो पीछे रह जाता था उसे मारकर तथा पकाकर वह निरन्तर राजाको देने लगा ॥१४३॥


प्रत्यहं क्षीयमाणेषु पौरबालेषु निश्चितः । सूदेन सहितो राजा देशात् पौरैर्निराकृतः ॥१४४॥

अर्थ: जब प्रतिदिन नगरके बालक कम होने लगे तब लोगोंने इसका निश्चय किया और रसोइयाके साथ-साथ राजाको नगरसे निकाल दिया ॥१४४॥


कनकामासमुत्पन्नस्तस्य सिंहरथः सुतः । राज्येऽवस्थापितः पौरैः प्रणतः सर्वपार्थिवैः ॥१४५॥

अर्थ: सौदासकी कनकाभा स्त्रीसे एक सिंहरथ नामका पुत्र हुआ था । नगरवासियोंने उसे ही राज्यपदपर आरूढ़ किया तथा सब राजाओंने उसे प्रणाम किया ॥१४५॥


महामांसरसासक्तः सौदासो जग्धसूदकः । बभ्राम धरणीं दुःखी भक्षयन्नुज्झितान् शवान् ॥१४६॥

अर्थ: राजा सौदास नरमांसमें इतना आसक्त हो गया कि उसने अपने रसोइयाको ही खा लिया । अन्तमें वह छोड़े हुए मुर्दोंको खाता हुआ दुःखी हो पृथ्वीपर भ्रमण करने लगा ॥१४६॥


सिंहस्येव यतो मांसमाहारोऽस्यामवत्ततः । सिंहसौदासशब्देन भुवने ख्यातिमागतः ॥१४७॥

अर्थ: जिस प्रकार सिंहका आहार मांस है उसी प्रकार इसका भी आहार मांस हो गया था । इसलिए यह संसारमें सिंहसौदासके नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ ॥१४७॥


दक्षिणापथमासाद्य प्राप्यानम्बरसंश्रयम् । श्रुत्वा धर्मं बभूवासावणुव्रतधरो महान् ॥१४८॥

अर्थ: अथानन्तर वह दक्षिण देशमें जाकर एक दिगम्बर मुनिके पास पहुँचा और उनसे धर्म श्रवण कर बड़ा भारी अणुव्रतोंका धारी हो गया ॥१४८॥


ततो महापुरे राज्ञि मृते पुत्रविवर्जिते । स्कन्धमारोपितः प्राप राज्यं राजद्विपेन सः ॥१४९॥

अर्थ: तदनन्तर उसी समय महापुर नगरका राजा मर गया था । उसके कोई सन्तान नहीं थी । सो लोगोंने निश्चय किया कि पट्टबन्ध हाथी छोड़ा जावे । वह जिसे कन्धेपर बैठाकर लावे उसे ही राजा बना दिया जाये । निश्चयानुसार पट्टबन्ध हाथी छोड़ा गया और वह सिंहसौदासको कन्धेपर बैठाकर नगरमें ले गया । फलस्वरूप उसे राज्य प्राप्त हो गया ॥१४९॥


व्यसर्जयच्च पुत्रस्य नतये दूतमूर्जितः । सोऽलिखत्तव गर्ह्यस्य न नमामीति निर्भयः ॥१५०॥

अर्थ: कुछ समय बाद जब सौदास बलिष्ठ हो गया तब उसने नमस्कार करनेके लिए पुत्रके पास दूत भेजा । इसके उत्तरमें पुत्रने निर्भय होकर लिख दिया कि चूँकि तुम निन्दित आचरण करनेवाले हो अतः तुम्हें नमस्कार नहीं करूँगा ॥१५०॥


तस्योपरि ततो याति सौदासे विषयोऽखिलः । प्रपलायितुमारेभे भक्षणत्रासकम्पितः ॥१५१॥

अर्थ: तदनन्तर सौदास पुत्रके ऊपर चढ़ाई करनेके लिए चला सो ‘कहीं यह खा न ले’ इस भयसे समस्त देशवासी लोगोंने भागना शुरू कर दिया ॥१५१॥


स जित्वा तनयं युद्धे राज्ये न्यस्य पुनः कृती । महासंवेगसंपन्नः प्रविवेश तपोवनम् ॥१५२॥

अर्थ: अन्तमें सौदासने युद्धमें पुत्रको जीतकर उसे ही राजा बना दिया और स्वयं कृतकृत्य हो वह महावैराग्यसे युक्त होता हुआ तपोवनमें चला गया ॥१५२॥


ततो ब्रह्मरथो जातश्चतुर्वक्त्रस्ततोऽभवत् । तस्माद्धेमरथो जज्ञे जातः शतरथस्ततः ॥१५३॥

उदपादि पृथुस्तस्मादजस्तस्मात् पयोरथः । बभूवेन्द्ररथोऽमुष्माद्दिननाथरथस्ततः ॥१५४॥

मान्धाता वीरसेनश्च प्रतिमन्युस्ततः क्रमात् । नाम्ना कमलबन्धुश्च दीप्त्या कमलबान्धवः ॥१५५॥

प्रतापेन रवेस्तुल्यः समस्तस्थितिकोविदः । रविमन्युश्च विज्ञेयो वसन्ततिलकस्तथा ॥१५६॥

कुबेरदत्तनामा च कुन्थुभक्तिश्च कीर्तिमान् । शरमद्विरदौ प्रोक्तौ रथशब्दोत्तरश्रुती ॥१५७॥

मृगेशदमनामिख्यो हिरण्यकशिपुस्तथा । पुञ्जस्थलः ककुत्थश्च रघुः परमविक्रमः ॥१५८॥

अर्थ: तदनन्तर सिंहरथके ब्रह्मरथ, ब्रह्मरथके चतुर्मुख, चतुर्मुखके हेमरथ, हेमरथके शतरथ, शतरथके मान्धाता, मान्धाताके वीरसेन, वीरसेनके प्रतिमन्यु, प्रतिमन्युके दीप्तिसे सूर्यकी तुलना करनेवाला कमलबन्धु, कमलबन्धुके प्रतापसे सूर्यके समान तथा समस्त मर्यादाको जाननेवाला रविमन्यु, रविमन्युके वसन्ततिलक, वसन्ततिलकके कुबेरदत्त, कुबेरदत्तके कीर्तिमान् कुन्थुभक्ति, कुन्थुभक्तिके शरभरथ, शरभरथके द्विरदरथ, द्विरदरथके सिंहदमन, सिंहदमनके हिरण्यकशिपु, हिरण्यकशिपुके पुंजस्थल, पुंजस्थलके ककुत्थ और ककुत्थके अतिशय पराक्रमी रघु पुत्र हुआ ॥१५३-१५८॥


इतीक्ष्वाकुकुलोद्भूताः कीर्तिता भुवनाधिपाः । भूरिशोऽत्र गता मोक्षं कृत्वा दैगम्बरं व्रतम् ॥१५९॥

अर्थ: इस प्रकार इक्ष्वाकु वंशमें उत्पन्न हुए राजाओंका वर्णन किया। इनमें-से अनेक राजा दिगम्बर व्रत धारण कर मोक्षको प्राप्त हुए ॥१५९॥


आसीत्ततो विनीतायामनरण्यो महानृपः । अनरण्यः कृतो येन देशो वासयता जनम् ॥१६०॥

अर्थ: तदनन्तर राजा रघुके अयोध्यामें अनरण्य नामका ऐसा पुत्र हुआ कि जिसने लोगोंको बसाकर देशको अनरण्य अर्थात् वनोंसे रहित कर दिया ॥१६०॥


पृथिवीमत्यभिख्यास्य महादेवी महागुणा । कान्तिमण्डलमध्यस्था सर्वेन्द्रियसुखावहा ॥१६१॥

अर्थ: राजा अनरण्यकी पृथिवीमती नामकी महादेवी थी जो महागुणोंसे युक्त थी, कान्तिके समूहके मध्यमें स्थित थी और समस्त इन्द्रियोंके सुख धारण करनेवाली थी ॥१६१॥


द्वौ सुतावुदपत्स्यातां तस्यामुत्तमलक्षणौ । ज्येष्ठोऽनन्तरथो ज्ञेयः ख्यातो दशरथोऽनुजः ॥१६२॥

अर्थ: उसके उत्तम लक्षणोंके धारक दो पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्रका नाम अनन्तरथ और छोटे पुत्रका नाम दशरथ था ॥१६२॥


सहस्ररश्मिसंज्ञस्य राज्ञो माहिष्मतीपतेः । अजर्यमनरण्येन साकमासीदनुत्तमम् ॥१६३॥

अर्थ: माहिष्मतीके राजा सहस्ररश्मिकी अनरण्यके साथ उत्तम मित्रता थी ॥१६३॥


अन्योऽन्यगतिसंवृद्धप्रेमाणौ तौ नरोत्तमौ । सौधर्मैशानदेवेन्द्राविवास्थातां स्वधामनि ॥१६४॥

अर्थ: परस्परके आने-जानेसे जिनका प्रेम वृद्धिको प्राप्त हुआ था ऐसे दोनों राजा अपने-अपने घर सौधर्म और ऐशानेन्द्रके समान रहते थे ॥१६४॥


रावणेन जितो युद्धे सहस्रांशुर्विबुद्धवान् । दीक्षां जैनेश्वरीमाप बिभ्रत्संवेगमुन्नतम् ॥१६५॥

अर्थ: अथानन्तर रावणसे पराजित होकर राजा सहस्ररश्मि प्रतिबोधको प्राप्त हो गया जिससे उत्तम संवेगको धारण करते हुए उसने जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली ॥१६५॥


दूतात्तत्प्रेषिताज् ज्ञात्वा तद्वृत्तान्तमशेषतः । मासजाते श्रियं न्यस्य नार्पीं दशरथे भृशम् ॥१६६॥

सकाशेऽभयसेनस्य निर्ग्रन्थस्य महात्मनः । राजानन्तरथेनामा प्रवव्राजातिनिःस्पृहः ॥१६७॥

अर्थ: दीक्षा धारण करनेके पहले उसने राजा अनरण्यके पास दूत भेजा था सो उससे सब समाचार जानकर राजा अनरण्य, जिसे उत्पन्न हुए एक माह ही हुआ था ऐसे दशरथके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर अभयसेन नामक निर्ग्रन्थ महात्माके समीप ज्येष्ठ पुत्र अनन्तरथके साथ अत्यन्त निःस्पृह हो दीक्षित हो गया ॥१६६-१६७॥


अनरण्योऽगमन्मोक्षमनन्तस्यन्दनो महीम् । सर्वसङ्गविनिर्मुक्तो विजहार यथोचितम् ॥१६८॥

अर्थ: अनरण्य मुनि तो मोक्ष चले गये और अनन्तरथ मुनि सर्व प्रकारके परिग्रहसे रहित हो यथायोग्य पृथिवीपर विहार करने लगे ॥१६८॥


अत्यन्तदुस्सहैर्योगी द्वाविंशतिपरीषहैः । न क्षोभितस्ततोऽनन्तवीर्याख्यां स क्षितौ गतः ॥१६९॥

अर्थ: अनन्तरथ मुनि अत्यन्त दुःसह बाईस परीषहोंसे क्षोभको प्राप्त नहीं हुए थे इसलिए पृथिवीपर ‘अनन्तवीर्य’ इस नामको प्राप्त हुए ॥१६९॥


वपुर्दशरथो लेभे नवयौवनभूषितम् । शैलकूटमिवोत्तुङ्गं नानाकुसुमभूषितम् ॥१७०॥

अर्थ: अथानन्तर राजा दशरथने नवयौवनसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके फूलोंसे सुभूषित पहाड़के शिखरके समान ऊँचा शरीर प्राप्त किया ॥१७०॥


अथामृतप्रभावायामुत्पन्नां वरयोषिति । दर्भस्थलपुरेशस्य चारुविभ्रमधारिणः ॥१७१॥

राज्ञः सुकोशलाख्यस्य तनयामपराजिताम् । उपयेमे स रत्यापि स्त्रीगुणैरपराजिताम् ॥१७२॥

अर्थ: तदनन्तर उसने दर्भस्थल नगरके स्वामी तथा सुन्दर विभ्रमोंको धारण करनेवाले राजा सुकोशलकी अमृतप्रभावा नामकी उत्तम स्त्रीसे उत्पन्न अपराजिता नामकी पुत्रीके साथ विवाह किया। अपराजिता इतनी उत्तम स्त्री थी कि स्त्रियोंके योग्य गुणोंके द्वारा रति भी उसे पराजित नहीं कर सकी थी ॥१७१-१७२॥


पुरमस्ति महारम्यं नाम्ना कमलसंकुलम् । सुबन्धुतिलकस्तस्य राजा मित्रास्य भामिनी ॥१७३॥

दुहिता कैकयी नाम तयोः कन्या गुणान्विता । मुण्डमाला कृता यस्या नेत्रेन्दीवरमालया ॥१७४॥

अर्थ: तदनन्तर कमलसंकुल नामका एक महासुन्दर नगर था। उसमें सुबन्धुतिलक नामका राजा राज्य करता था। उसकी मित्रा नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके कैकयी नामकी गुणवती पुत्री थी। वह इतनी सुन्दरी थी कि उसके नेत्ररूपी नील कमलोंकी मालासे मस्तक मालारूप हो गया था ॥१७३-१७४॥


मित्राया जनिता यस्मात् सुचेष्टा रूपशालिनी । सुमित्रेति ततः ख्यातिं भुवने समुपागता ॥१७५॥

अर्थ: चूँकि यह मित्रा नामक मातासे उत्पन्न हुई थी, उत्तम चेष्टाओंसे युक्त थी, तथा रूपवती थी इसलिए लोकमें सुमित्रा इस नामसे भी प्रसिद्धिको प्राप्त हुई थी । राजा दशरथने उसके साथ भी विवाह किया था ॥१७५॥


महाराजसुतामन्यां प्रापासौ सुप्रभाश्रुतिम् । लावण्यसंपदा बालां जनयन्तीं श्रियस्त्रपाम् ॥१७६॥

अर्थ: इनके सिवाय लावण्यरूपी सम्पदाके द्वारा लक्ष्मीको भी लज्जा उत्पन्न करनेवाली सुप्रभा नामकी एक अन्य राजपुत्रीके साथ भी उन्होंने विवाह किया था ॥१७६॥


स सम्यग्दर्शनं लेभे राज्यं च परमोदयम् । आद्ये रत्नमतिस्तस्य चरमे तृणशेमुषी ॥१७७॥

अर्थ: राजा दशरथने सम्यग्दर्शन तथा परम वैभवसे युक्त राज्य इन दोनों वस्तुओंको प्राप्त किया था। सो प्रथम जो सम्यग्दर्शन है उसे वह रत्न समझता था और अन्तिम जो राज्य था उसे तृण मानता था ॥१७७॥


अधोगतिर्यतो राज्यादस्यक्तादुपजायते । सम्यग्दर्शनयोगात्तु गतिरूर्ध्वमसंशया ॥१७८॥

अर्थ: इस प्रकार माननेका कारण यह है कि यदि राज्यका त्याग नहीं किया जाये तो उससे अधोगति होती है और सम्यग्दर्शनके सुयोगसे निःसन्देह ऊर्ध्वगति होती है ॥१७८॥


ये भरताद्यैर्नृपतिभिरूद्धाः कारितपूर्वा जिनवरवासाः । भङ्गमुपेतान् क्वचिदपि रम्यान् सोऽनयदेतानभिनवभावान् ॥१७९॥

अर्थ: भरतादि राजाओंने जो पहले जिनेन्द्र भगवान्के उत्तम मन्दिर बनवाये थे वे यदि कहीं भग्नावस्थाको प्राप्त हुए थे तो उन रमणीय मन्दिरोंको राजा दशरथने मरम्मत कराकर पुनः नवीनता प्राप्त करायी थी ॥१७९॥


इन्द्रनुतानां स्वयमपि रम्यान् तीर्थकराणां परमनिवासान् । रत्नसमूहैः स्फुरदुरुभासः संततपूजामघटयदेषः ॥१८०॥

अर्थ: यही नहीं, उसने स्वयं भी ऐसे जिनमन्दिर बनवाये थे जिनकी कि इन्द्र स्वयं स्तुति करता था तथा रत्नोंके समूहसे जिनकी विशाल कान्ति स्फुरायमान हो रही थी ॥१८०॥


अन्यभवेषु प्रथितसुधर्माः प्राप्य सुराणां श्रियमतिरम्याम् । ईदृशजीवा पुनरिह लोके यान्ति समृद्धिं रविरुचिभासः ॥१८१॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! अन्य भवोंमें जो धर्मका संचय करते हैं वे देवोंकी अत्यन्त रमणीय लक्ष्मी प्राप्त कर संसारमें पुनः राजा दशरथके समान भाग्यशाली जीव होते हैं और सूर्यके समान कान्तिको धारण करते हुए समृद्धिको प्राप्त होते हैं ॥१८१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते सुकोशलमाहात्म्ययुक्त-दशरथोत्पत्त्यभिधानं नाम द्वाविंशतितमं पर्व ॥२२॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित, पद्मचरितमें सुकोशल स्वामीके माहात्म्यसे युक्त राजा दशरथकी उत्पत्तिका कथन करनेवाला बाईसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२२॥

२३. त्रयोविंशतितमं पर्व (विभीषणव्यसनवर्णनं)

अन्यदाथ सुखासीनं सभायां पुरुतेजसम् । जिनराजकथासक्तं सुरेन्द्रसमविभ्रमम् ॥१॥

सहसा जनितालोको गगने देहतेजसा । समाययावबद्दारः शिष्टो दशरथं सुधीः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय विशाल तेजके धारक तथा इन्द्रके समान शोभासे सम्पन्न राजा दशरथ जिनराजकी कथा करते हुए सभामें सुखसे बैठे थे कि सहसा शरीरके तेजसे प्रकाश उत्पन्न करते हुए शिष्ट पुरुष तथा उत्तम बुद्धिके धारक नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥१-२॥


कृत्वाभ्युत्थानमासीनमासने तं सुखावहे । दत्ताशीर्वचनं राजा पप्रच्छ कुशलं कृती ॥३॥

अर्थ: राजाने उठकर उनका सम्मान किया तथा सुखदायक आसनपर बैठाया। नारदने राजाको आशीर्वाद दिया। तदनन्तर बुद्धिमान् राजाने कुशल-समाचार पूछा ॥३॥


निवेद्य कुशलं तेन क्षेमं पृष्टो महीपतिः । सकलं क्षेममित्युक्त्वा पुनरेवमभाषत ॥४॥

अर्थ: जब नारद कुशल-समाचार कह चुके तब राजाने क्षेम अर्थात् कल्याणरूप हो ? यह पूछा । इसके उत्तरमें ‘राजन् ! सब कल्याण रूप है’ यह उत्तर दिया ॥४॥


आगम्यते कुतः स्थानाद्भगवन् विहृतं क्व च । किमु दृष्टं श्रुतं किंवा न ते देशोऽस्त्यगोचरः ॥५॥

अर्थ: इतनी वार्ता हो चुकनेके बाद राजा दशरथने फिर पूछा कि हे भगवन् ! आप किस स्थानसे आ रहे हैं ? और कहाँ आपका विहार हो रहा है ? आपने क्या देखा क्या सुना सो कहिए ? ऐसा कोई देश नहीं जहाँ आप न गये हों ॥५॥


ततो मनःस्थजैनेन्द्रवर्णनोद्भूतसंमदः । उन्नतं पुलकं बिभ्रदित्यभाषत नारदः ॥६॥

विदेहं नृप यातोऽहमासं चारुजनेहितम् । जिनेन्द्रभवनाधारभूरिशैलविभूषितम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर मनमें स्थित जिनेन्द्रदेव सम्बन्धी वर्णनसे जिन्हें आनन्द उत्पन्न हो रहा था तथा इसी कारण जो उन्नत रोमांच धारण कर रहे थे ऐसे नारदजी कहने लगे कि हे राजन् ! उत्तम जन जिसकी सदा इच्छा करते हैं तथा जो जिनमन्दिरोंके आधारभूत मेरु, गजदन्त, विजयार्द्ध आदि पर्वतोंसे सुशोभित है ऐसे विदेह क्षेत्रमें गया था ॥६-७॥


तत्र निष्क्रमणं दृष्टं मया सीमन्धरार्हतः । नगर्यां पुण्डरीकिण्यां नानारत्नोरुतेजसि ॥८॥

अर्थ: वहाँ नाना रत्नोंके विशाल तेजसे युक्त पुण्डरीकिणी नगरीमें मैंने सीमन्धर स्वामीका दीक्षा कल्याणक देखा ॥८॥


विमानैर्विविधच्छायैः केतुच्छत्रविभूषितैः । यानैश्च विविधैर्दृष्टं देवागमनमाकुलम् ॥९॥

अर्थ: पताकाओं और छत्रोंसे सुशोभित रंग-बिरंगे विमानों, तथा विविध प्रकारके वाहनोंसे व्याप्त देवोंका आगमन देखा ॥९॥


मुनिसुव्रतनाथस्य यथेह सुरपैः कृतम् । तथाभिषेचनं मेरौ मया तस्य मुनेः श्रुतम् ॥१०॥

अर्थ: मैंने वहाँ सुना था कि जिस प्रकार अपने इस भरत क्षेत्रमें इन्होंने मुनिसुव्रतनाथ भगवान्का सुमेरु पर्वतपर अभिषेक किया था वैसा ही वहाँ उन भगवान्का इन्होंने सुमेरु पर्वतपर अभिषेक किया था ॥१०॥


सुव्रतस्य जिनेन्द्रस्य वाच्यमानं श्रुतं यथा । तथा मे चरितं तस्य तत्र गोचरितं दृशा ॥११॥

अर्थ: मुनिसुव्रत भगवान्का जैसा बाँचा गया चरित्र यहाँ सुना है वैसा ही वहाँ उनका चरित्र अपनी आँखोंसे देखा है ॥११॥


नानारत्नप्रभाढ्यानि तुङ्गानि विपुलानि च । दृष्टानि तत्र चैत्यानि कृतपूजान्यनारतम् ॥१२॥

अर्थ: जो नाना प्रकारके रत्नोंकी प्रभासे व्याप्त हैं, ऊँचे हैं, विशाल हैं तथा जिनमें निरन्तर पूजा होती रहती है ऐसे वहाँके जिन-मन्दिर देखे हैं ॥१२॥


विचित्रमणिभक्तीनि हेमपीठानि पार्थिव । दृष्टान्यत्यन्तरम्याणि वनचैत्यानि नन्दने ॥१३॥

अर्थ: हे राजन् ! वहाँ नन्दनवनमें जो अत्यन्त मनोहर चैत्यालय हैं वे भी देखे हैं । उन मन्दिरोंमें अनेक प्रकारके मणियोंके बेलबूटे निकाले गये हैं तथा उनकी कुर्सियाँ सुवर्णनिर्मित हैं ॥१३॥


चामीकरमहास्तम्भयुक्तेषु स्फुरितांशुषु । भास्करालयतुल्येषु हारितोरणचारुषु ॥१४॥

रत्नदामसमृद्धेषु महावैदिकभूमिषु । द्विपसिंहादिरूपाढ्यवैडूर्योदारभित्तिषु ॥१५॥

कृतसंगीतदिव्यस्त्रीजनपूरितकुक्षिषु । अमरारण्यचैत्येषु जिनार्चाः प्रणता मया ॥१६॥

अर्थ: सो सुवर्णमय खम्भोंसे युक्त हैं, जिनमें नाना प्रकारकी किरणें देदीप्यमान हो रही हैं, जो सूर्य-विमानके समान जान पड़ते हैं, जो हार तथा तोरणोंसे मनोहर हैं, जो रत्नमयी मालाओंसे समृद्ध हैं, जिनकी भूमियोंमें बड़ी विस्तृत वेदिकाएँ बनी हुई हैं, जिनकी वैदूर्य-मणि निर्मित उत्तम दीवालें हाथी, सिंह आदिके चित्रोंसे अलंकृत हैं और जिनके भीतरी भाग संगीत करनेवाली दिव्य स्त्रियोंसे भरे हुए हैं, ऐसे देवारण्यके चैत्यालयोंमें जो जिनप्रतिमाएँ हैं उन सबके लिए मैंने नमस्कार किया ॥१४-१६॥


चैत्यप्रभाविकासाढ्यं कृत्वा मेरुं प्रदक्षिणम् । पयोदपटलं भित्त्वा समुल्लङ्घ्योन्नतं नभः ॥१७॥

अर्थ: आकृत्रिम प्रतिमाओंकी प्रभाके विकाससे युक्त जो मेरु पर्वत है उसकी प्रदक्षिणा देकर तथा मेघ-पटलको भेदन कर बहुत ऊँचे आकाशमें गया ॥१७॥


वास्यान्तरगिरीन्द्राणां शिखरेषु महाप्रभाः । चैत्यालया जिनेन्द्राणां प्रणता बहवो मया ॥१८॥

अर्थ: तथा कुलाचलोंके शिखरोंपर जो महादेदीप्यमान अनेक जिनचैत्यालय हैं उनकी वन्दना की है ॥१८॥


सर्वेषु तेषु चैत्येषु जिनानां प्रतियातनाः । अकृत्रिमा महाभासो मया पार्थिव वन्द्यते ॥१९॥

अर्थ: हे राजन् ! उन समस्त चैत्यालयोंमें जिनेन्द्र भगवान्की महादेदीप्यमान अकृत्रिम प्रतिमाएँ हैं मैं उन सबको वन्दना करता हूँ ॥१९॥


इत्युक्ते देवदेवेभ्यो नम इत्युद्गतध्वनिः । प्रणतं करयुग्मं च चक्रे दशरथः शिरः ॥२०॥

अर्थ: नारदके इस प्रकार कहनेपर ‘देवाधिदेवोंको नमस्कार हो’ शब्दोंका उच्चारण करते हुए राजा दशरथने दोनों हाथ जोड़े तथा शिर नम्रीभूत किया ॥२०॥


संज्ञया नारदेनाथ चोदिते जगतीपतिः । जनस्योत्सारणं चक्रे प्रतीहारेण सादरम् ॥२१॥

अर्थ: अथानन्तर संकेत द्वारा नारदकी प्रेरणा पाकर राजा दशरथने प्रतिहारीके द्वारा आदरके साथ सब लोगोंको वहाँसे अलग कर दिया ॥२१॥


उपांशु नारदेनाथ जगदे कोशलाधिपः । शृणु स्वावहितो राजन् सद्भावं कथयामि ते ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर जब एकान्त हो गया तब नारदने कोसलाधिपति राजा दशरथसे कहा कि हे राजन् ! एकाग्रचित्त होकर सुनो मैं तुम्हारे लिए एक उत्तम बात कहता हूँ ॥२२॥


गतस्त्रिकूटशिखरं वन्दारुरहमुत्सुकः । वन्दितं शान्तिभवनं मया तत्र मनोरमम् ॥२३॥

अर्थ: मैं बड़ी उत्सुकताके साथ वन्दना करनेके लिए त्रिकूटाचलके शिखर-पर गया था सो मैंने वहाँ अत्यन्त मनोहर शान्तिनाथ भगवान्के जिनालयकी वन्दना की ॥२३॥


भवत्पुण्यानुभावेन मया तत्र प्रधारणम् । श्रुतं विभीषणादीनां लङ्कानाथस्य मन्त्रिणाम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर आपके पुण्यके प्रभावसे मैंने लंकापति रावणके विभीषणादि मन्त्रियोंका एक निश्चय सुना है ॥२४॥


नैमित्तेन समादिष्टं तेन सागरबुद्धिना । भविता दशवक्त्रस्य मृत्युर्दाशरथिः किल ॥२५॥

अर्थ: वहाँ सागरबुद्धि नामक निमित्तज्ञानीने रावणको बताया है कि राजा दशरथका पुत्र तुम्हारी मृत्युका कारण होगा ॥२५॥


दुहिता जनकस्यापि हेतुत्वमुपयास्यति । इति श्रुत्वा विषण्णात्मा निश्चिचार्य विभीषणः ॥२६॥

जायते यावदेवास्य प्रजा दशरथस्य न । जनकस्य च तावत्तौ मारयामीति सादरः ॥२७॥

अर्थ: इसी प्रकार राजा जनककी पुत्री भी इसमें कारणपनेको प्राप्त होगी । यह सुनकर जिसकी आत्मा विषादसे भर रही थी ऐसे विभीषणने निश्चय किया कि जबतक राजा दशरथ और जनकके सन्तान होती है उसके पहले ही मैं इन्हें मारे डालता हूँ ॥२६-२७॥


पर्यटच्च चिरं क्षोणीं तच्चरेण निवेदितौ । भवन्तौ कामरूपेण स्थानरूपादिलक्षणैः ॥२८॥

अर्थ: यह निश्चय कर वह तुम लोगोंकी खोजके लिए चिरकाल तक पृथ्वीमें घूमता रहा पर पता नहीं चला सका । तदनन्तर इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाले उसके गुप्तचरने स्थान, रूप आदि लक्षणोंसे तुम दोनोंका उसे परिचय कराया है ॥२८॥


मुनिविस्रम्भतस्तेन पृष्टोऽहमपि मो यते । क्वचिद्दशरथं वेत्सि जनकं च क्षिताविति ॥२९॥

अर्थ: मुनि होनेके कारण मेरा विश्वास कर उसने मुझसे पूछा कि हे मुने ! पृथ्वीपर कोई दशरथ तथा जनक नामके राजा हैं सो उन्हें तुम जानते हो ॥२९॥


अन्विष्य कथयामीति मया चोपात्तमुत्तरम् । आकूतं दारुणं तस्य पश्यामि नरपुङ्गव ॥३०॥

अर्थ: इस प्रश्नके बदले मैंने उत्तर दिया कि खोजकर बतलाता हूँ । हे नरपुंगव ! मैं उसके अभिप्रायको अत्यन्त कठोर देखता हूँ ॥३०॥


तत्ते यावदयं किंचिन्न करोति विभीषणः । निगूह्य तावदात्मानं क्वचित्तिष्ठ महीपते ॥३१॥

अर्थ: इसलिए हे राजन् ! यह विभीषण जबतक तुम्हारे विषयमें कुछ नहीं कर लेता है तबतक तुम अपने आपको छिपाकर कहीं गुप्तरूपसे रहने लगो ॥३१॥


सम्यग्दर्शनयुक्तेषु गुरुपूजनकारिषु । सामान्येनैव मे प्रीतिस्त्वद्विधेषु विशेषतः ॥३२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनसे युक्त तथा गुरुओंकी पूजा करनेवाले पुरुषोंपर मेरी समान प्रीति रहती है और तुम्हारे जैसे पुरुषोंपर विशेषरूपसे विद्यमान है ॥३२॥


स त्वं युक्तं कुरु स्वस्ति भूयात्तेऽहं गतोऽधुना । इमां वेदयितुं वार्तां क्षिप्रं जनकमूभृतः ॥३३॥

अर्थ: तुम जैसा उचित समझो सो करो। तुम्हारा भला हो । अब मैं यह वार्ता कहनेके लिए शीघ्र ही राजा जनकके पास जाता हूँ ॥३३॥


कृतानतिर्नृपेणैवमुक्त्वोत्पत्य नभस्तलम् । अबद्धारयतिर्वेगान्मिथिलाभिमुखं ययौ ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे राजा दशरथने नमस्कार किया था ऐसे नारद मुनि इस प्रकार कहकर तथा आकाशमें उड़कर बड़े वेगसे मिथिलाकी ओर चले गये ॥३४॥


जनकायापि तेनेदमशेषं विनिवेदितम् । भव्यजीवा हि तस्यासन् प्राणेभ्योऽप्यतिवल्लभाः ॥३५॥

अर्थ: वहाँ जाकर राजा जनकके लिए भी उन्होंने यह सब समाचार बतलाया सो ठीक ही है क्योंकि भव्य जीव उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारे थे ॥३५॥


अबद्धारयतौ याते मरणाशङ्किमानसः । समुद्रहृदयामात्यमाकारयदिलापतिः ॥३६॥

अर्थ: नारद मुनिके चले जानेपर जिसके मनमें मरणकी आशंका उत्पन्न हो गयी थी ऐसे राजा दशरथने समुद्रहृदय नामक मन्त्रीको बुलवाया ॥३६॥


श्रुत्वा राजमुखान्मन्त्री समभ्यर्णं महाभयम् । जगाद गदतां श्रेष्ठः स्वामिभक्तिपरायणः ॥३७॥

अर्थ: वक्ताओंमें श्रेष्ठ तथा स्वामिभक्तिमें तत्पर मन्त्रीने राजाके मुखसे महाभयको निकटस्थल सुन कहा ॥३७॥


जीवितायाखिलं कृत्यं क्रियते नाथ जन्तुभिः । त्रैलोक्येशत्वलाभोऽपि वद तेनोज्झितस्य कः ॥३८॥

अर्थ: कि हे नाथ ! प्राणी जितना कुछ कार्य करते हैं वह जीवनके लिए ही करते हैं। आप ही कहिए, जीवनसे रहित प्राणीके लिए यदि तीन लोकका राज्य भी मिल जाये तो किस कामका है ॥३८॥


तस्माद्यावदरातीनां व्यसनं रचयाम्यहम् । तावदज्ञातरूपस्त्वं विकृतो विहरावनिम् ॥३९॥

अर्थ: इसलिए जबतक मैं शत्रुओंके नाशका प्रयत्न करता हूँ तबतक तुम किसीकी पहचानमें रूप न आ सके इस प्रकार वेष बदलकर पृथ्वीमें विहार करो ॥३९॥


इत्युक्ते तत्र निक्षिप्य कोशं देशं पुरं जनम् । निरक्रामत् पुराद् राजा सह्यस्य सुपरीक्षितः ॥४०॥

अर्थ: मन्त्रीके ऐसा कहनेपर राजा दशरथ उसी समुद्रहृदय मन्त्रीके लिए खजाना, देश, नगर तथा प्रजाको सौंपकर नगरसे बाहर निकल गया सो ठीक ही है क्योंकि वह मन्त्री राजाका अच्छी तरह परीक्षा किया हुआ था ॥४०॥


गते राजन्यमात्येन लेप्यं दाशरथं वपुः । कारितं मुख्यवपुषो भिन्नं चेतनयैकया ॥४१॥

अर्थ: राजाके चले जानेपर मन्त्रीने राजा दशरथके शरीरका एक पुतला बनवाया । वह पुतला मूल शरीरसे इतना मिलता-जुलता था कि केवल एक चेतनाकी अपेक्षा ही भिन्न जान पड़ता था ॥४१॥


लाक्षादिरसयोगेन रुधिरं तत्र निर्मितम् । मार्दवं च कृतं तादृग्यादृक्सत्यासुधारिणः ॥४२॥

अर्थ: उसके भीतर लाख आदिका रस भराकर रुधिरकी रचना की गयी थी तथा सचमुचके प्राणीके शरीरमें जैसी कोमलता होती है वैसी ही कोमलता उस पुतलेमें रची गयी थी ॥४२॥


वरासननिविष्टं तं वेश्मनः सप्तमे तले । युक्तं पुरैव सर्वेण परिवर्गेण बिम्बकम् ॥४३॥

अर्थ: राजाका वह पुतला पहलेके समान ही समस्त परिकरके साथ महलके सातवें खण्डमें उत्तम आसनपर विराजमान किया गया था ॥४३॥


स मन्त्री लेप्यकारश्च कृत्रिमं जज्ञतुर्नृपम् । भ्रान्तिर्हि जायते तत्र पश्यतोरुभयोरपि ॥४४॥

अर्थ: वह मन्त्री तथा पुतलाको बनानेवाला चित्रकार ये दोनों ही राजाको कृत्रिम राजा समझते थे और बाकी सब लोग उसे सचमुचका ही राजा समझते थे । यही नहीं उन दोनोंको भी देखते हुए जब कभी भ्रान्ति उत्पन्न हो जाती थी ॥४४॥


अयमेव च वृत्तान्तो जनकस्यापि कल्पितः । उपर्युपरि हि प्रायश्चलन्ति विदुषां धियः ॥४५॥

अर्थ: उधर यही हाल राजा जनकका भी किया गया सो ठीक ही है क्योंकि विद्वानोंकी बुद्धियां प्रायः ऊपर-ऊपर ही चलती हैं अर्थात् एक-से-एक बढ़कर होती हैं ॥४५॥


मह्यां तौ क्षितिपौ नष्टौ भुवनस्थितिकोविदौ । आपत्काले यथेन्द्वर्कौ समये जलदायिनाम् ॥४६॥

अर्थ: जिस प्रकार वर्षाऋतुके समय चन्द्रमा और सूर्य छिपे-छिपे रहते हैं उसी प्रकार संसारकी स्थितिके जानकार दोनों राजा भी आपत्तिके समय पृथिवीपर छिपे-छिपे रहने लगे ॥४६॥


यौ पुरा वरनारीभिर्महाप्रासादवर्तिनौ । उदारभोगसंपन्नौ सेवितौ मगधाधिप ॥४७॥

इतराविव तौ कौचिदसहायौ नरोत्तमौ । चरणाभ्यां महीं कष्टं भ्रमन्तौ धिग्भवस्थितिम् ॥४८॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधाधिपते ! जो राजा पहले बड़े-बड़े महलोंमें रहते थे, उदार भोगसे सम्पन्न थे । उत्तमोत्तम स्त्रियाँ जिनकी सेवा करती थीं वे ही राजा अन्य मनुष्योंके समान असहाय हो पृथिवी-पर पैरोंसे पैदल भटकते फिरते थे, सो इस संसारकी दशाको धिक्कार हो ॥४७-४८॥


इति निश्चित्य जन्तुभ्यो यो ददात्यभयं नरः । किं न तेन भवेद्दत्तं साधूनां धुरि तिष्ठता ॥४९॥

अर्थ: ऐसा निश्चय कर जो प्राणियोंके लिए अभयदान देता है, सत्पुरुषोंके अग्रभागमें स्थित रहनेवाले उस पुरुषने क्या नहीं दिया ? अर्थात् सब कुछ दिया ॥४९॥


इष्टौ तौ तत्र तत्रेति चरवर्गेण वेदितौ । अनुजेन दशास्यस्य प्रेषिता वधका भृशम् ॥५०॥

अर्थ: गुप्तचरोंके समूहने जहां-जहां उनका सद्भाव जाना वहाँ-वहाँ विभीषणने उन्हें स्वयं देखा तथा बहुत-से वधक भेजे ॥५०॥


ते शस्त्रपाणयः क्रूरा दृष्ट्यगोचरविग्रहाः । दिवा नक्तं च नगरीं भ्रमन्ति चलचक्षुषः ॥५१॥

अर्थ: जिनके हाथोंमें शस्त्र विद्यमान थे, जो स्वभावसे क्रूर थे, जिनके शरीर नेत्रोंसे दिखाई नहीं देते थे तथा जिनके नेत्र अत्यन्त चंचल थे, ऐसे वधक रात-दिन नगरीमें घूमने लगे ॥५१॥


प्रासादं हीनसत्त्वास्ते प्रवेष्टुं न सहा यदा । चिरायन्ते तदायासीत् स्वयमेव विभीषणः ॥५२॥

अर्थ: हीन शक्तिके धारक वे वधक राजमहल-में प्रवेश करनेके लिए समर्थ नहीं हो सके इसलिए जब उन्हें अपने कार्यमें विलम्ब हुआ तब विभीषण स्वयं ही आया ॥५२॥


अन्विष्य गीतशब्देन प्रविश्य गतविभ्रमः । ददर्शान्तःपुरान्तस्थं व्यक्तं दशरथं विभीः ॥५३॥

अर्थ: संगीतके शब्दसे उसने दशरथका पता लगा लिया, जिससे निःसन्देह तथा निर्भय हो राजमहलमें प्रवेश किया। वहाँ जाकर उसने अन्तःपुरके बीचमें स्थित राजा दशरथको स्पष्ट रूपसे देखा ॥५३॥


विद्युद्विलसितो नाम चोदितस्तेन खेचरः । निकृत्य तस्य मूर्धानं स्वामिनेऽदर्शयन्मुदा ॥५४॥

अर्थ: उसी समय उसके द्वारा प्रेरित विद्युद्विलसित नामक विद्याधरने दशरथका शिर काटकर बड़े हर्षसे अपने स्वामी - विभीषणको दिखाया ॥५४॥


श्रुतान्तःपुरजाक्रन्दो निक्षिप्यैतच्छिरोऽम्बुधौ । जनकेऽपि तथा चक्रे निर्दयं स विचेष्टितम् ॥५५॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने अन्तःपुरके रुदनका शब्द सुना था ऐसे विभीषणने उस कटे हुए शिरको समुद्रमें गिरा दिया और राजा जनकके विषयमें भी ऐसी ही निर्दय चेष्टा की ॥५५॥


ततः कृतिनमात्मानं कृत्वा सोदरवत्सलः । ययौ विभीषणो लङ्कां प्रमोदपरिपूरितः ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर भाईके स्नेहसे भरा विभीषण अपने आपको कृतकृत्य मानकर हर्षित होता हुआ लंका चला गया ॥५६॥


विप्रलापं परं कृत्वा विदित्वा पुस्तकर्म च । धृतिं दाशरथः प्राप परिवर्गः सविस्मयः ॥५७॥

अर्थ: दशरथका जो परिजन था उसने पहले बहुत ही विलाप किया पर अन्तमें जब उसे यह विदित हुआ कि वह पुतला था तब आश्चर्य करता हुआ धैर्यको प्राप्त हुआ ॥५७॥


विभीषणोऽपि संप्राप्य पुरीमशुभशान्तये । दानपूजादिकं चक्रे कर्म सञ्जनितोत्सवम् ॥५८॥

अर्थ: विभीषणने भी नगरीमें जाकर अशुभ कर्मकी शान्तिके लिए बड़े उत्सवके साथ दान-पूजा आदि शुभ कर्म किये ॥५८॥


बभूव च मतिस्तस्य कदाचिच्छान्तचेतसः । कर्मणामिति वैचित्र्यात् पश्चात्तापमुपेयुषः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर किसी समय जब उसका चित्त शान्त हुआ तब कर्मोंकी इस विचित्रतासे पश्चात्ताप करता हुआ इस प्रकार विचार करने लगा कि ॥५९॥


असत्यभीत्या क्षितिगोचरौ तौ निरर्थकं प्रेतगतिं प्रणीतौ । आशीविषाङ्गप्रभवोऽपि सर्पस्तार्क्ष्यस्य शक्नोति किमु प्रहर्तुम् ॥६०॥

अर्थ: मिथ्या भयसे मैंने उन बेचारे भूमिगोचरियोंको व्यर्थ ही मारा क्योंकि सर्प आशीविषके शरीरसे उत्पन्न होनेपर भी क्या गरुड़के ऊपर प्रहार करनेके लिए समर्थ हो सकता है? अर्थात् नहीं ॥६०॥


सुलेशशौर्यः क्षितिगोचरः क्व क्व रावणः शक्रसमानशौर्यः । केभः सशङ्को मदमन्दगामी क्व केसरी वायुसमानवेगः ॥६१॥

अर्थ: अत्यन्त तुच्छ पराक्रमको धारण करनेवाला भूमिगोचरी कहाँ और इन्द्रके समान पराक्रमको धारण करनेवाला रावण कहाँ ? शंकासे सहित तथा मदसे धीरे-धीरे गमन करनेवाला हाथी कहाँ और वायुके समान वेगशाली सिंह कहाँ ? ॥६१॥


यद्यत्र यावच्च यतश्च येन दुःखं सुखं वा पुरुषेण लभ्यम् । तत्तत्र तावच्च ततश्च तेन संप्राप्यते कर्मवशानुगेन ॥६२॥

अर्थ: जिस पुरुषको जहाँ जिससे जिस प्रकार जितना और जो सुख अथवा दुःख मिलना है कर्मोंके वशीभूत हुए उस पुरुषको उससे उस प्रकार उतना और वह सुख अथवा दुःख अवश्य ही प्राप्त होता है ॥६२॥


सम्यग्निमित्तं यदि वेत्ति कश्चिच्छ्रेयो न कस्मात् कुरुते निजस्य । येनेह लोके लभतेऽतिसौख्यं मोक्षे च देहस्यजनात् पुरस्तात् ॥६३॥

अर्थ: यदि कोई अच्छी तरह निमित्तको जानता है तो वह अपनी आत्माका कल्याण क्यों नहीं करता ? जिससे कि इस लोकमें तथा आगे चलकर शरीरका त्याग हो जानेसे मोक्षमें भी उत्तम सुखको प्राप्त होता ॥६३॥


राज्ञोस्तयोः प्राणवियोजनेन नैमित्तमूढत्वमितं विवेकम् । दुःशिक्षितार्थैर्मनुजैरकार्ये प्रवर्तते जन्तुरसारबुद्धिः ॥६४॥

अर्थ: मैंने जो उन दो राजाओंका प्राणघात किया है उससे जान पड़ता है कि मेरा विवेक निमित्तज्ञानीके द्वारा अत्यन्त मूढ़ताको प्राप्त हो गया था। सो ठीक ही है क्योंकि हीन बुद्धि मनुष्य दुःशिक्षित मनुष्योंकी प्रेरणासे अकार्यमें प्रवृत्ति करने ही लगते हैं ॥६४॥


अस्याम्बुनाथस्य पुरी स्थितेयं प्रभिन्नपातालतलस्य मध्ये । कथं सुराणामपि भीतिदक्षा गम्यत्वमायात् क्षितिगोचराणाम् ॥६५॥

अर्थ: यह लंकानगरी पातालतलको भेदन करनेवाले इस समुद्रके मध्यमें स्थित है तथा देवोंको भी भय उत्पन्न करनेमें समर्थ है फिर भूमिगोचरियोंके गम्य कैसे हो सकती है ? ॥६५॥


कृतं मयात्यन्तमिदं न योग्यं करोमि नैवं पुनरप्रधार्यम् ।
इति प्रधार्योत्तमदीप्तियुक्तो रविर्यथा स्वे निलये स रेमे ॥६६॥

अर्थ: ‘मैंने जो यह कार्य किया है वह सर्वथा मेरे योग्य नहीं है अब आगे कभी भी ऐसा अविचारपूर्ण कार्य नहीं करूँगा’ ऐसा विचारकर सूर्यके समान उत्तम कान्तिसे युक्त विभीषण अपने महलमें क्रीड़ा करने लगा ॥६६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते विभीषणव्यसनवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमं पर्व ॥२३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें विभीषणके व्यसनका वर्णन करनेवाला तेईसवाँ पर्व समाप्त हुआ।


२४. चतुर्विंशतितमं पर्व (केकयावरप्रदानं)

यदथ भ्राम्यतो वृत्तमनरण्यतनूभुवः । तत्ते श्रेणिक वक्ष्यामि श्रृणु विस्मयकारणम् ॥१॥

इतोऽस्त्युत्तरकाष्ठायां नाम्ना कौतुकमङ्गलम् । नगरं चास्य शैलाभप्राकारपरिशोभितम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! प्राण-रक्षाके लिए भ्रमण करते समय राजा दशरथका जो आश्चर्यकारी वृत्तान्त हुआ वह मैं तेरे लिए कहता हूँ सो सुन। यहाँसे उत्तर दिशामें पर्वतके समान ऊँचे कोटसे सुशोभित कौतुकमंगल नामका नगर है ॥१-२॥


राजा शुभमतिर्नाम तत्रासीत् सार्थकश्रुतिः । पृथुश्रीर्वनिता तस्य योषिद्गुणविभूषणा ॥३॥

अर्थ: वहाँ सार्थक नामको धारण करनेवाला शुभमति नामका राजा राज्य करता था। उसकी पृथुश्री नामकी स्त्री थी जो कि स्त्रियोंके योग्य गुणरूपी आभूषणसे विभूषित थी ॥३॥


केकया द्रोणमेघश्च पुत्रावभवतां तयोः । गुणैरत्यन्तविमलैः स्थितौ यौ व्याप्य रोदसी ॥४॥

अर्थ: उन दोनोंके केकया नामकी पुत्री और द्रोणमेघका नामका पुत्र ये दो सन्तानें हुईं। ये दोनों ही अपने अत्यन्त निर्मल गुणोंके द्वारा आकाश तथा पृथिवीके अन्तरालको व्याप्त कर स्थित थे ॥४॥


तत्र सुन्दरसर्वाङ्गा चारुलक्षणधारिणी । नितरां केकया रेजे कलानां पारमागता ॥५॥

अर्थ: उनमें जिसके सर्व अंग सुन्दर थे, जो उत्तम लक्षणोंको धारण करनेवाली तथा समस्त कलाओंकी पारगामिनी थी, ऐसी केकया नामकी पुत्री अत्यन्त सुशोभित हो रही थी ॥५॥


अङ्गहाराश्रयं नृत्तं तथाभिनयसंश्रयम् । व्यायामिकं च साज्ञासीत्तत्प्रभेदैः समन्वितम् ॥६॥

अर्थ: अंगहाराश्रय, अभिनयाश्रय और व्यायामिकके भेदसे नृत्यके तीन भेद हैं तथा इनके अन्य अनेक अवान्तर भेद हैं सो वह इन सबको जानती थी ॥६॥


अभिव्यक्तं त्रिभिः स्थानैः कण्ठेन शिरसोरसा । स्वरेषु समवेतं च सप्तस्थानेषु तद्यथा ॥७॥

अर्थ: वह उस संगीतको अच्छी तरह जानती थी जो कण्ठ, शिर और उरस्थल इन तीन स्थानोंसे अभिव्यक्त होता था, तथा नीचे लिखे सात स्वरोंमें समवेत रहता था ॥७॥


षड्जर्षभौ तृतीयश्च गान्धारो मध्यमस्तथा । पञ्चमो धैवतश्चापि निषादश्चेत्यमी स्वराः ॥८॥

अर्थ: षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद ये सात स्वर कहलाते हैं ॥८॥


स्थितं लयैस्त्रिसंख्यानैर्द्रुतमध्यविलम्बितैः । अस्रं च चतुरस्रं च तालयोनिद्वयं दधत् ॥९॥

अर्थ: जो द्रुत, मध्य और विलम्बित इन तीन लयोंसे सहित था, तथा अस्र और चतुरस्र इन तालकी दो योनियोंको धारण करता था ॥९॥


स्थायिसंचारिभिर्युक्तं तथारोह्यवरोहिभिः । वर्णैरेभिश्चतुर्भेदैश्चतुःसंख्यपदैस्थितम् ॥१०॥

अर्थ: स्थायी, संचारी, आरोही और अवरोही इन चार प्रकारके वर्णोंसे सहित होनेके कारण जो चार प्रकारके पदोंसे स्थित था ॥१०॥


नामाख्यातोपसर्गेषु निपातेषु च संस्कृता । प्राकृती शौरसेनी च भाषा यत्र त्रयी स्मृता ॥११॥

अर्थ: प्रातिपदिक, तिङन्त, उपसर्ग और निपातोंमें संस्कारको प्राप्त संस्कृत, प्राकृत और शौरसेनी यह तीन प्रकारकी भाषा जिसमें स्थित थी ॥११॥


धैवत्यथार्षभीषड्जषड्जोदीच्या निषादिनी । गान्धारी चापरा षड्जकैकशी षड्जमध्यमा ॥१२॥

गान्धारोदीच्यसंज्ञाभ्यां तथा मध्यमपञ्चमी । गान्धारपञ्चमी रक्तगान्धारी मध्यमा तथा ॥१३॥

आन्ध्री च मध्यमोदीच्या स्मृता कर्मारवीति च । प्रोक्ताथ नन्दनी चान्या कैशिकी चेति जातयः ॥१४॥

इमाभिर्जातिभिर्युक्तमष्टामिर्दशभिस्तथा । अलंकारैरमीमिश्र त्रयोदशभिरन्वितम् ॥१५॥

अर्थ: धैवती, आर्षभी, षड्ज-षड्जा, उदीच्या, निषादिनी, गान्धारी, षड्जकैकशी और षड्जमध्यमा ये आठ जातियां हैं अथवा गान्धारोदीच्या, मध्यमपंचमी, गान्धारपंचमी, रक्तगान्धारी, मध्यमा, आन्ध्री, मध्यमोदीच्या, कर्मारवी, नन्दिनी ओर कैशिकी ये दश जातियाँ हैं । सो जो संगीत इन आठ अथवा दश जातियोंसे युक्त था तथा इन्हीं और आगे कहे जानेवाले तेरह अलंकारोंसे सहित था ॥१२-१५॥


प्रसन्नादिः प्रसन्नान्तस्तथा मध्यप्रसादवान् । प्रसन्नाद्यवसानश्च चतुर्धा स्थायिभूषणम् ॥१६॥

अर्थ: प्रसन्नादि, प्रसन्नान्त, मध्यप्रसाद और प्रसन्नाद्यवसान ये चार स्थायी पदके अलंकार हैं ॥१६॥


निर्वृत्तः प्रस्थितो बिन्दुस्तथा प्रेङ्खोलितः स्मृतः । तारो मन्द्रः प्रसन्नश्च षोढा संचारिभूषणम् ॥१७॥

अर्थ: निर्वृत्त, प्रस्थित, बिन्दु, प्रेंखोलित, तार-मन्द्र और प्रसन्न ये छह संचारी पदके अलंकार हैं ॥१७॥


आरोहिणः प्रसन्नादिरेकमेव विभूषणम् । प्रसन्नान्तस्तथा तुल्यः कुहरश्चावरोहिणः ॥१८॥

गदितौ द्वावलङ्काराविथ्यलङ्कारयोजनम् । अवागात् साधुगीतं च लक्षणैरेमिरन्वितम् ॥१९॥

अर्थ: आरोही पदका प्रसन्नादि नामका एक ही अलंकार है और अवरोही पदके प्रसन्नान्त तथा कुहर ये दो अलंकार हैं। इस प्रकार तेरह अलंकार हैं सो इन सब लक्षणोंसे सहित उत्तम संगीतको वह अच्छी तरह जानती थी ॥१८-१९॥


ततं तन्त्रीसमुत्थानमवनद्धं मृदङ्गजम् । शुषिरं वंशसंभूतं घनं तालसमुत्थितम् ॥२०॥

चतुर्विधमिदं वाद्यं नानाभेदैः समन्वितम् । जानाति स्म नितान्तं सा यथैवं विरलोऽपरः ॥२१॥

अर्थ: तन्त्री अर्थात् वीणासे उत्पन्न होनेवाला तत, मृदंगसे उत्पन्न होनेवाला अवनद्ध, बाँसुरीसे उत्पन्न होनेवाला शुषिर और तालसे उत्पन्न होनेवाला घन ये चार प्रकारके वाद्य हैं, ये सभी वाद्य नाना भेदोंसे सहित हैं । वह केकया इन सबको इस तरह जानती थी कि उसकी समानता करनेवाला दूसरा व्यक्ति विरला ही था ॥२०-२१॥


कलानां तिसृणामासां नाट्यमेकीक्रियोच्यते । शृङ्गारहास्यकरुणवीराद्भुतभयानकाः ॥२२॥

रौद्रबीभत्सशान्ताश्च रसास्तत्र नवोदिताः । वेत्ति स्म तदसौ बाला सैप्रभेदमनुत्तमम् ॥२३॥

अर्थ: गीत, नृत्य और वादित्र इन तीनोंका एक साथ होना नाट्य कहलाता है । शृंगार, हास्य, करुणा, वीर, अद्भुत, भयानक, रौद्र, बीभत्स और शान्त ये नौ रस कहे गये हैं । वह बाला केकया उन्हें अनेक अवान्तर भेदोंके साथ उत्कृष्टतासे जानती थी ॥२२-२३॥


अनुवृत्तं लिपिज्ञानं यत्स्वदेशे प्रवर्तते । द्वितीयं विकृतं ज्ञेयं कल्पितं यत्स्वसंज्ञया ॥२४॥

प्रत्यङ्गादिषु वर्णेषु तत्त्वं सामयिकं स्मृतम् । नैमित्तिकं च पुष्पादिद्रव्यविन्यासतोऽपरम् ॥२५॥

प्राच्यमध्यमयौधेयसमाद्रादिभिरन्वितम् । लिपिज्ञानमसौ बाला किल ज्ञातवती परम् ॥२६॥

अर्थ: जो लिपि अपने देशमें आमतौरसे चलती है उसे अनुवृत्त कहते हैं। लोग अपने-अपने संकेतानुसार जिसकी कल्पना कर लेते हैं उसे विकृत कहते हैं। प्रत्यंग आदि वर्णोंमें जिसका प्रयोग होता है उसे सामयिक कहते हैं और वर्णोंके बदले पुष्पादि पदार्थ रखकर जो लिपिका ज्ञान किया जाता है उसे नैमित्तिक कहते हैं। इस लिपिके प्राच्य, मध्यम, यौधेय, समाद्र आदि देशोंकी अपेक्षा अनेक अवान्तर भेद होते हैं सो केकया उन सबको अच्छी तरह जानती थी ॥२४-२६॥


अस्त्युक्तिकौशलं नाम भिन्नस्थानादिभिः कला । स्थानं स्वरोऽथ संस्कारो विन्यासः काकुना सह ॥२७॥

समुदायो विरामश्च सामान्याभिहितस्तथा । समानार्थत्वभाषा च जातयश्च प्रकीर्तिताः ॥२८॥

अर्थ: जिसके स्थान आदिके अपेक्षा अनेक भेद हैं ऐसी उक्तिकौशल नामकी कला है। स्थान, स्वर, संस्कार, विन्यास, काकु, समुदाय, विराम, सामान्याभिहित, समानार्थत्व, और भाषा ये जातियाँ कही गयी हैं ॥२७-२८॥


उरः कण्ठः शिरश्चेति स्थानं तत्र त्रिधा स्मृतम् । उक्त एव स्वरः पूर्वं षड्जादिः सप्तभेदकः ॥२९॥

अर्थ: इनमें-से उरस्थल, कण्ठ और मूर्धाके भेदसे स्थान तीन प्रकारका माना गया है। स्वरके षड्ज आदि सात भेद पहले कह ही आये हैं ॥२९॥


संस्कारो द्विविधः प्रोक्तो लक्षणोद्देशतस्तथा । विन्यासस्तु सखण्डाः स्युः पदवाक्यास्तदुत्तराः ॥३०॥

अर्थ: लक्षण और उद्देश अथवा लक्षणा और अभिधाकी अपेक्षा संस्कार दो प्रकारका कहा गया है। पदवाक्य, महावाक्य आदिके विभागसहित जो कथन है वह विन्यास कहलाता है ॥३०॥


सापेक्षा निरपेक्षा च काकुर्भेदद्वयान्विता । गद्यः पद्यश्च मिश्रश्च समुदायस्त्रिधोदितः ॥३१॥

अर्थ: सापेक्षा और निरपेक्षाकी अपेक्षा काकु दो भेदोंसे सहित है। गद्य, पद्य और मिश्र अर्थात् चम्पूकी अपेक्षा समुदाय तीन प्रकारका कहा गया है ॥३१॥


संक्षिप्तता विरामस्तु सामान्याभिहितः पुनः । शब्दानामेकवाच्यानां प्रयोगः परिकीर्तितः ॥३२॥

अर्थ: किसी विषयका संक्षेपसे उल्लेख करना विराम कहलाता है। एकार्थक अर्थात् पर्यायवाची शब्दोंका प्रयोग करना सामान्याभिहित कहा गया है ॥३२॥


तुल्यार्थतैकशब्देन बह्वर्थप्रतिपादनम् । भाषार्यलक्षणम्लेच्छनियमात्त्रिविधा स्मृता ॥३३॥

अर्थ: एक शब्दके द्वारा बहुत अर्थका प्रतिपादन करना समानार्थता है। आर्य, लक्षण और म्लेच्छके नियमसे भाषा तीन प्रकारकी कही गयी है ॥३३॥


पद्यव्यवहृतिर्लेख एवमाद्यास्तु जातयः । व्यक्तवाग्लोकवाग्मार्गव्यवहारश्च मातरः ॥३४॥

एतेषामपि भेदानां ये भेदा बुधगोचराः । सर्वैरेभिः समायुक्तं सात्यवैदुक्तिकौशलम् ॥३५॥

अर्थ: इनके सिवाय जिसका पद्यरूप व्यवहार होता है उसे लेख कहते हैं। ये सब जातियाँ कहलाती हैं। व्यक्तवाक्, लोकवाक् और मार्गव्यवहार ये मातृकाएँ कहलाती हैं। इन सब भेदोंके भी अनेक भेद हैं जिन्हें विद्वज्जन जानते हैं। इन सबसे सहित जो भाषण-चातुर्य है उसे उक्ति-कौशल कहते हैं। केकया इस उक्ति-कौशलको अच्छी तरह जानती थी ॥३४-३५॥


शुष्कचित्रं द्विधा प्रोक्तं नानाशुष्कं च वर्जितम् । आर्द्रचित्रं पुनर्नाना चन्दनादिद्रवोद्भवम् ॥३६॥

अर्थ: नानाशुष्क और वर्जितके भेदसे शुष्कचित्र दो प्रकारका कहा गया है तथा चन्दनादिके द्रवसे उत्पन्न होनेवाला आर्द्रचित्र अनेक प्रकारका है ॥३६॥


कृत्रिमाकृत्रिमैरङ्गैर्भूजलाम्बरगोचरम् । वर्णकश्लेषसंयुक्तं सा त्रिवेदाखिलं शुभा ॥३७॥

अर्थ: कृत्रिम और अकृत्रिम रंगोंके द्वारा पृथ्वी, जल तथा वस्त्र आदिके ऊपर इसकी रचना होती है। यह अनेक रंगोंके सम्बन्धसे संयुक्त होता है। शुभ लक्षणोंवाली केकया इस समस्त चित्रकलाको जानती थी ॥३७॥


पुस्तकर्म त्रिधा प्रोक्तं क्षयोपचयसंक्रमैः । तक्षणादिकमोद्भूतं काष्ठादौ क्षयजं स्मृतम् ॥३८॥

उपचित्या मृदादीनामुपचेयं तु कथ्यते । संक्रान्तं तु यदाहस्य प्रतिबिम्बं विभाव्यते ॥३९॥

अर्थ: क्षय, उपचय और संक्रमके भेदसे पुस्तकर्म तीन प्रकारका कहा गया है। लकड़ी आदिको छील-छालकर जो खिलौना आदि बनाये जाते हैं उसे क्षयजन्य पुस्तकर्म कहते हैं। ऊपरसे मिट्टी आदि लगाकर जो खिलौना आदि बनाये जाते हैं उसे उपचयजन्य पुस्तकर्म कहते हैं तथा जो प्रतिबिम्ब अर्थात् साँचे आदि गढ़ाकर बनाये जाते हैं उसे संक्रमजन्य पुस्तकर्म कहते हैं ॥३८-३९॥


यन्त्रनिर्यन्त्रसच्छिद्रनिश्छिद्रादिभिरन्वितम् । सा जज्ञे तद्यथा मद्रा लोकेभ्यो दुर्लभस्तथा ॥४०॥

अर्थ: यह पुस्तकर्म, यन्त्र, निर्यन्त्र, सच्छिद्र तथा निश्छिद्र आदिके भेदोंसे सहित है, अर्थात् कोई खिलौना यन्त्रचालित होते हैं, और कोई बिना यन्त्रके होते हैं, कोई छिद्रसहित होते हैं, कोई छिद्ररहित। वह केकया पुस्तकर्मको ऐसा जानती थी जैसा दूसरोंके लिए दुर्लभ था ॥४०॥


वुष्किमं छिन्नमछिन्नं पत्रच्छेद्यं त्रिधोदितम् । सूचीदन्तादिभिस्तत्र निर्मितं वुष्किमं स्मृतम् ॥४१॥

कर्तरीच्छेदनोद्भूतं छिन्नं संबन्धसंयुतम् । विच्छिन्नं तु तदुद्भूतं संबन्धपरिवर्जितम् ॥४२॥

अर्थ: पत्रच्छेदके तीन भेद हैं - बुष्किम, छिन्न और अच्छिन्न । सुई अथवा दन्त आदिके द्वारा जो बनाया जाता है उसे बुष्किम कहते हैं । जो कैंचीसे काटकर बनाया जाता है तथा जो अन्य अवयवोंके सम्बन्धसे युक्त होता है उसे छिन्न कहते हैं । जो कैंची आदिसे काटकर बनाया जाता है तथा अन्य अवयवोंके सम्बन्धसे रहित होता है उसे अच्छिन्न कहते हैं ॥४१-४२॥


पत्रवस्त्रसुवर्णादिसंभवं स्थिरचञ्चलम् । निर्णिन्ये सा परं चार्वी संवृतासंवृतादिजम् ॥४३॥

अर्थ: यह पत्रच्छेद्यक्रिया पत्र, वस्त्र तथा सुवर्णादिके ऊपर की जाती है तथा स्थिर और चंचल दोनों प्रकारकी होती है । सुन्दरी केकयाने इस कलाका अच्छी तरह निर्णय किया था ॥४३॥


आर्द्रं शुष्कं तदुन्मुक्तं मिश्रं चेति चतुर्विधम् । माल्यं तत्रार्द्रपुष्पादिसंभवं प्रथमं मतम् ॥४४॥

शुष्कपत्रादिसंभूतं शुष्कमुक्तं तदुज्झितम् । सिक्थकादिसमुद्भूतं संकीर्णं तु त्रिसंकरात् ॥४५॥

अर्थ: आर्द्र, शुष्क, तदुन्मुक्त और मिश्रके भेदसे मालानिर्माणकी कला चार प्रकारकी है । इनमेंसे गीले अर्थात् ताजे पुष्पादिसे जो माला बनायी जाती है उसे आर्द्र कहते हैं, सूखे पत्र आदिसे जो बनायी जाती है शुष्क कहते हैं । चावलोंके सीथ अथवा जवा आदिसे जो बनायी जाती है उसे तदुज्झित कहते हैं और जो उक्त तीनों चीजोंके मेलसे बनायी जाती है उसे मिश्र कहते हैं ॥४४-४५॥


रणप्रबोधनव्यूहसंयोगादिभिरन्वितम् । तद्विधातुमलं प्राज्ञा साज्ञासीत् पूरणादिजम् ॥४६॥

अर्थ: यह माल्यकर्म रणप्रबोधन, व्यूहसंयोग आदि भेदोंसे सहित होता है वह बुद्धिमती केकया इस समस्त कार्यको करना अच्छी तरह जानती थी ॥४६॥


योनिद्रव्यमधिष्ठानं रसो वीर्यं च कल्पना । परिकर्म गुणा दोषा युक्तिरेषा तु कौशलम् ॥४७॥

योनिर्विशिष्टमूलादिद्रव्यं तु तगरादिकम् । यद्वर्णवर्तिकाद्येतदधिष्ठानं प्रकीर्तितम् ॥४८॥

कषायो मधुरस्तिक्तः कटुकाम्लश्च कीर्तितः । रसः पञ्चविधो यस्य निर्हारेण विनिश्चयः ॥४९॥

अर्थ: योनिद्रव्य, अधिष्ठान, रस, वीर्य, कल्पना, परिकर्म, गुण-दोष विज्ञान तथा कौशल ये गन्धयोजना अर्थात् सुगन्धित पदार्थ निर्माणरूप कलाके अंग हैं । जिनसे सुगन्धित पदार्थोंका निर्माण होता है ऐसे तगर आदि योनिद्रव्य हैं, जो धूपबत्ती आदिका आश्रय है उसे अधिष्ठान कहते हैं, कषायला, मधुर, चिरपरा, कड़ुआ और खट्टा यह पांच प्रकारका रस कहा गया है जिसका सुगन्धित द्रव्यमें खासकर निश्चय करना पड़ता है ॥४७-४९॥


द्रव्याणां शीतमुष्णं च वीर्यं तत्र द्विधा स्मृतम् । कल्पनात्र विवादानुवादसंवादयोजनम् ॥५०॥

अर्थ: पदार्थोंकी जो शीतता अथवा उष्णता है वह दो प्रकारका वीर्य है । अनुकूल-प्रतिकूल पदार्थोंका मिलाना कल्पना है ॥५०॥


परिकर्म पुनः स्नेहशोधनक्षालनादिकम् । ज्ञानं च गुणदोषाणां पाटवादीतरात्मनाम् ॥५१॥

अर्थ: तेल आदि पदार्थोंका शोधना तथा धोना आदि परिकर्म कहलाता है, गुण अथवा दोषका जानना सो गुण-दोष विज्ञान है और परकीय तथा स्वकीय वस्तुकी विशिष्टता जानना कौशल है ॥५१॥


स्वतन्त्रानुगताख्येन तां भेदेन समन्विताम् । गन्धयुक्तिमसौ सर्वामजानाद्युक्तविभ्रमा ॥५२॥

अर्थ: यह गन्धयोजनाकी कला स्वतन्त्र और अनुगतके भेदसे सहित है । केकया इस सबको अच्छी तरह जानती थी ॥५२॥


भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चूष्यं च पञ्चधा । आसाद्यं तत्र भक्ष्यं तु कृत्रिमाकृत्रिमं स्मृतम् ॥५३॥

अर्थ: भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य और चूष्यके भेदसे भोजन सम्बन्धी पदार्थोंके पाँच भेद हैं । इनमेंसे जो स्वादके लिए खाया जाता है उसे भक्ष्य कहते हैं । यह कृत्रिम तथा अकृत्रिमके भेदसे दो प्रकारका है ॥५३॥


भोज्यं द्विधा यवाग्वादिविशेषाश्चौदनादयः । शीतयोगो जलं मद्यमिति पेयं त्रिधोदितम् ॥५४॥

अर्थ: जो क्षुधा-निवृत्तिके लिए खाया जाता है उसे भोज्य कहते हैं, इसके भी मुख्य और साधककी अपेक्षा दो भेद हैं ? ओदन, रोटी आदि मुख्य भोज्य हैं और लप्सी, दाल, शाक आदि साधक भोज्य हैं ॥५४॥


रागखाण्डवलेह्याख्यं लेह्यं त्रिविधमुच्यते । कृत्रिमाकृत्रिमं चूष्यं द्विविधं परिकीर्तितम् ॥५५॥

अर्थ: शीतयोग ( शर्बत ), जल और मद्यके भेदसे पेय तीन प्रकारका कहा गया है ॥५५॥


पाचनच्छेदनोष्णत्वशीतत्वकरणादिभिः । युक्तमास्वाद्यविज्ञानमासीत्तस्या मनोहरम् ॥५६॥

अर्थ: इन सबका ज्ञान होना आस्वाद्यविज्ञान है। यह आस्वाद्यविज्ञान पाचन, छेदन, उष्णत्वकरण तथा शीतत्वकरण आदिसे सहित है, केकयाको इस सबका सुन्दर ज्ञान था ॥५६॥


वज्रमौक्तिकवैडूर्यसुवर्णं रजतायुधम् । वस्त्रसंखादि चावेदीत् सा रत्नं लक्षणादिभिः ॥५७॥

अर्थ: वह वज्र अर्थात् हीरा, मोती, वैडूर्य ( नीलम ), सुवर्ण, रजतायुध तथा वस्त्र-शंखादि रत्नोंको उनके लक्षण आदिसे अच्छी तरह जानती थी ॥५७॥


तन्तुसंतानयोगं च वस्त्रस्य बहुवर्णकम् । रागाधानं च सा चारु विवेदातिशयान्वितम् ॥५८॥

अर्थ: वस्त्रपर धागेसे कढ़ाईका काम करना तथा वस्त्रको अनेक रंगोंमें रँगना इन कार्योंको वह बड़ी सुन्दरता और उत्कृष्टताके साथ जानती थी ॥५८॥


लोहदन्तजतुक्षारशिलासूत्रादिसंभवम् । तथोपकरणं कर्तुं ज्ञातमत्यन्तमुद्धया ॥५९॥

अर्थ: वह लोहा, दन्त, लाख, क्षार, पत्थर तथा सूत आदिसे बननेवाले नाना उपकरणोंको बनाना बहुत अच्छी तरह जानती थी ॥५९॥


मेयदेशतुलाकालभेदान्मानं चतुर्विधम् । तत्र प्रस्थादिभिर्भिन्नं मेयमानं प्रकीर्तितम् ॥६०॥

अर्थ: मेय, देश, तुला और कालके भेदसे मान चार प्रकारका है। इसमेंसे प्रस्थ आदिके भेदसे जिसके अनेक भेद हैं उसे मेय कहते हैं ॥६०॥


देशमानं वितस्त्यादि तुलामानं पलादिकम् । समयादि तु यन्मानं तत्कालस्य प्रकीर्तितम् ॥६१॥

अर्थ: वितस्ति हाथ देशमान कहलाता है, पल, छटाक, सेर आदि तुलामान कहलाता है और समय, घड़ी, घण्टा आदि कालमान कहा गया है ॥६१॥


तच्चारोहपरीणाहतिर्यग्गौरवभेदतः । क्रियातश्च समुत्पन्नं साध्यगान्मानमुत्तमम् ॥६२॥

अर्थ: यह मान आरोह, परीणाह, तिर्यग्गौरव और क्रियासे उत्पन्न होता है। इस सबको वह अच्छी तरह जानती थी ॥६२॥


भूतिकर्म निधिज्ञानं रूपज्ञानं वणिग्विधिः । अन्यथा जीवविज्ञानमासीत्तस्या विशेषवत् ॥६३॥

अर्थ: भूतिकर्म अर्थात् बेलबूटा खींचनेका ज्ञान, निधिज्ञान अर्थात् गड़े हुए धनका ज्ञान, रूपज्ञान, वणिग्विधि अर्थात् व्यापार कला तथा जीवविज्ञान अर्थात् जन्तुविज्ञान इन सबको वह विशेष रूपसे जानती थी ॥६३॥


मानुषद्विपगोवाजिप्रभृतीनां चिकित्सितम् । सा निदानादिभिर्भेदयुक्तं ज्ञातवती परम् ॥६४॥

अर्थ: वह मनुष्य, हाथी, गौ तथा घोड़ा आदिकी चिकित्साको निदान आदिके साथ अच्छी तरह जानती थी ॥६४॥


मायाकृतं त्रिधा पीडाशक्रजालं विमोहनम् । मन्त्रौषधादिभिर्जातं तच्च सर्वं विवेद सा ॥६५॥

अर्थ: विमोहन अर्थात् मूर्च्छाके तीन भेद हैं - मायाकृत, पीडा अथवा इन्द्रजाल कृत और मन्त्र तथा ओषधि आदि द्वारा कृत । सो इस सबको वह अच्छी तरह जानती थी ॥६५॥


समयं च समीक्ष्यादि पाखण्डपरिकल्पितम् । चारित्रेण पदार्थैश्च विवेद विविधैर्युतम् ॥६६॥

अर्थ: पाखण्डीजनोंके द्वारा कल्पित सांख्य आदि मतोंको वह उनमें वर्णित चारित्र तथा नाना प्रकारके पदार्थोंके साथ अच्छी तरह जानती थी ॥६६॥


चेष्टोपकरणं वाणी कलाव्यत्यसनं तथा । क्रीडा चतुर्विधा प्रोक्ता तत्र चेष्टा शरीरजा ॥६७॥

अर्थ: चेष्टा, उपकरण, वाणी और कला व्यासंगके भेदसे क्रीड़ा चार प्रकारकी कही गयी है। उसमें शरीरसे उत्पन्न होनेवाली क्रीड़ाको चेष्टा कहा है ॥६७॥


कन्दुकादि तु विज्ञेयं तत्रोपकरणं बहु । वाक्क्रीडनं पुनर्नाना सुभाषितसमुद्भवम् ॥६८॥

नानादुरोदरन्यासः कलाव्यत्यसनं स्मृतम् । क्रीडायां बहुभेदायामस्यां सात्यन्तकोविदा ॥६९॥

अर्थ: गेंद आदि खेलना उपकरण है, नाना प्रकारके सुभाषित आदि कहना वाणी-क्रीड़ा है और जुआ आदि खेलना कलाव्यासंग नामक क्रीड़ा है इस प्रकार वह अनेक भेदवाली क्रीड़ामें अत्यन्त निपुण थी ॥६८-६९॥


आश्रिताश्रयतो भिन्नो लोको द्विविध उच्यते । आश्रिता जीवनिर्जीवा पृथिव्यादिस्तदाश्रयाः ॥७०॥

अर्थ: आश्रित और आश्रयके भेदसे लोक दो प्रकारका कहा गया है। इनमेंसे जीव और अजीव तो आश्रित हैं तथा पृथ्वी आदि उनके आश्रय हैं ॥७०॥


तत्र नानाभवोत्पत्तिः स्थितिर्नश्वरता तथा । ज्ञायते यदिदं प्रोक्तं लोकज्ञत्वं सुदुर्गमम् ॥७१॥

अर्थ: इसी लोकमें जीवकी नाना पर्यायोंमें उत्पत्ति हुई है, उसीमें यह स्थिर रहा है तथा उसीमें इसका नाश होता है यह सब जानना लोकज्ञता है। यह लोकज्ञता प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है ॥७१॥


पौर्वापर्योधरोभूर्यद्वीपदेशादिभेदतः । स्वभावावस्थिते लोके बभूवास्यास्तदुत्तमम् ॥७२॥

अर्थ: पूर्वापर पर्वत, पृथ्वी, द्वीप, देश आदि भेदोंमें यह लोक स्वभावसे ही अवस्थित है। केकयाको इसका उत्तम ज्ञान था ॥७२॥


संवाहनकला द्वेधा तत्रैका कर्मसंश्रया । शय्यौपचारिका चान्या प्रथमा तु चतुर्विधा ॥७३॥

त्वङ्मांसास्थिमनःसौख्यादेते त्वासामुपक्रमाः । संस्पृष्टं च गृहीतं च भुक्तितं चलितं तथा ॥७४॥

आहतं भङ्गितं विद्धं पीडितं भिन्नपाटितम् । मृदुमध्यप्रकृष्टत्वात्तत्पुनर्भिद्यते त्रिधा ॥७५॥

अर्थ: संवाहन कला दो प्रकारकी है - उनमेंसे एक कर्मसंश्रया है और दूसरी शय्योपचारिका । त्वचा, मांस, अस्थि और मन इन चारको सुख पहुँचानेके कारण कर्मसंश्रयाके चार भेद हैं अर्थात् किसी संवाहनसे केवल त्वचाको सुख मिलता है, किसीसे त्वचा और मांसको सुख मिलता है, किसीसे त्वचा, मांस और हड्डीको सुख मिलता है और किसीसे त्वचा, मांस, हड्डी एवं मन इन चारोंको सुख प्राप्त होता है । इसके सिवाय इसके संपृष्ट, गृहीत, भुक्तित, चलित, आहत, भंगित, विद्ध, पीडित और भिन्नपीडित ये भेद भी हैं । ये ही नहीं मृदु, मध्य और प्रकृष्टके भेदसे तीन भेद और भी होते हैं ॥७३-७५॥


त्वक्सुखं सुकुमारं तु मध्यमं मांससौख्यकृत् । उत्कृष्टमस्थिसौख्याय मृदुगीति मनःसुखम् ॥७६॥

अर्थ: जिस संवाहनसे केवल त्वचाको सुख होता है वह मृदु अथवा सुकुमार कहलाता है। जो त्वचा और मांसको सुख पहुँचाता है वह मध्यम कहा जाता है और जो त्वचा, मांस तथा हड्डीको सुख देता है वह प्रकृष्ट कहलाता है। इसके साथ जब कोमल संगीत और होता है तब वह मनःसुखसंवाहन कहलाने लगता है ॥७६॥


दोषास्तस्याः प्रतीपं यल्लोम्नामुद्वर्तनं तथा । निर्मांसपीडितं वाढं केशाकर्षणमद्भुतम् ॥७७॥

भ्रष्टप्राप्तममार्गेण प्रयातमतिभुग्नकम् । आदेशाहतमत्यर्थमवसुप्तप्रतीपकम् ॥७८॥

एभिर्दोषैर्विनिर्मुक्तं सुकुमारमतीव च । योग्यदेशप्रयुक्तं च ज्ञाताकूतं च शोभनम् ॥७९॥

अर्थ: इस संवाहन कलाके निम्नलिखित दोष भी हैं–शरीरके रोमोंको उलटा उद्वर्तन करना, जिस स्थानमें मांस नहीं है वहाँ अधिक दबाना, केशाकर्षण, अद्भुत, भ्रष्टप्राप्त, अमार्गप्रयात, अतिभुग्नक, अदेशाहत, अत्यर्थ और अवसुप्तप्रतीपक, जो इन दोषोंसे रहित है, योग्यदेशमें प्रयुक्त है तथा अभिप्रायको जानकर किया गया है ऐसा सुकुमारसंवाहन अत्यन्त शोभास्पद होता है ॥७७-७९॥


करणैर्विविधैर्या तु जन्यते चित्तसौख्यदा । संवाहनावगम्या सा शय्योपचरणात्मिका ॥८०॥

अर्थ: जो संवाहन क्रिया अनेक कारण अर्थात् आसनोंसे की जाती है वह चित्तको सुख देनेवाली शय्योपचारिका नामकी क्रिया जाननी चाहिए ॥८०॥


संवाहनकलामेतामङ्गप्रत्यङ्गगोचराम् । अवेदसौ यथा कन्या नान्या नारी तथा घनम् ॥८१॥

अर्थ: अंग-प्रत्यंगसे सम्बन्ध रखनेवाली इस संवाहनकलाको जिस प्रकार वह कन्या जानती थी उस प्रकार अन्य स्त्री नहीं जानती थी ॥८१॥


शरीरवेषसंस्कारकौशलं च कला परा । स्नानमूर्धजवासादि निरचैषीदिमां च सा ॥८२॥

अर्थ: स्नान करना, शिरके बाल गूँथना तथा उन्हें सुगन्धित आदि करना यह शरीर संस्कार वेषकौशल नामकी कला है सो वह कन्या इसे भी अच्छी तरह जानती थी ॥८२॥


एवमाद्याः कलाश्चारुशीला लोकमनोहराः । अदीधरत्समस्तः सा विनयोत्तमभूषणा ॥८३॥

अर्थ: इस तरह सुन्दर शीलकी धारक तथा विनयरूपी उत्तम आभूषणसे सुशोभित वह कन्या इन्हें आदि लेकर लोगोंके मनको हरण करनेवाली समस्त कलाओंको धारण कर रही थी ॥८३॥


कलागुणाभिरूपं च समुद्भूता त्रिविष्टपे । अद्वितीया बभौ तस्याः कीर्तिराकृष्टमानसा ॥८४॥

अर्थ: कलागुणके अनुरूप उत्पन्न तथा लोगोंके मनको आकृष्ट करनेवाली उसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें अद्वितीय अर्थात् अनुपम सुशोभित हो रही थी ॥८४॥


बहुनात्र किमुक्तेन शृणु राजन् समासतः । तस्या वर्षशतेनापि दुःशक्यं रूपवर्णनम् ॥८५॥

अर्थ: हे राजन् ! अधिक कहनेसे क्या ? संक्षेपमें इतना ही सुनो कि उसके रूपका वर्णन सौ वर्षोंमें भी होना संभव है ॥८५॥


पित्रा प्रधारितं तस्या योग्यः कोऽस्या भवेद् वरः । स्वयं रुचितमेवेयं गृह्णात्विति विसंशयम् ॥८६॥

अर्थ: पिताने विचार किया कि इसके योग्य वर कौन हो सकता है ? अच्छा हो कि यह स्वयं ही अपनी इच्छानुसार वरको ग्रहण करे ॥८६॥


तदर्थं पार्थिवाः सर्वे वसुमत्यामुपाहृताः । हरिवाहननामाद्याः पुरोविभ्रमभूषिताः ॥८७॥

अर्थ: ऐसा निश्चय कर उसने स्वयंवरके लिए पृथिवीपरके हरिवाहन आदि समस्त राजा एकत्रित किये । वे राजा स्वयंवरके पूर्व ही नाना प्रकारके विभ्रमों अर्थात् हाव-भावोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥८७॥


गतो दशरथोऽप्यस्य जनकेन सह भ्रमन् । स्थितः स तादृशोऽप्येतान् लक्ष्म्या प्रच्छाद्य भूपतीन् ॥८८॥

अर्थ: राजा जनकके साथ घूमते हुए राजा दशरथ वहाँ जा पहुँचे । राजा दशरथ यद्यपि साधारण वेषभूषामें थे तो भी वे अपनी शोभासे उपस्थित अन्य राजाओंको आच्छादित कर वहाँ विराजमान थे ॥८८॥


मञ्चेषु सुप्रपञ्चेषु निविष्टान् वसुधाधिपान् । प्रत्येकमैक्षतोदारान्प्रतीहार्या निवेदितान् ॥८९॥

भ्राम्यन्ती सा ततः साध्वी नरलक्षणपण्डिता । कण्ठे दाशरथे न्यास दृष्टिनीलोत्पलस्रजम् ॥९०॥

अर्थ: सुसज्जित मंचोंके ऊपर बैठे हुए उदार राजाओंका परिचय प्रतीहारी दे रही थी और मनुष्योंके लक्षण जाननेमें पण्डित वह साध्वी कन्या घूमती हुई प्रत्येक राजाको देखती जाती थी । अन्तमें उसने अपनी दृष्टिरूपी नीलकमलकी माला दशरथके कण्ठमें डाली ॥८९-९०॥


भूपालनिवहस्थं तं सा ययौ चारुविभ्रमा । राजहंसं यथा हंसी बकवृन्दव्यवस्थितम् ॥९१॥

अर्थ: जिस प्रकार बगलोंके बीचमें स्थित राजहंसके पास हंसी पहुँच जाती है उसी प्रकार सुन्दर हाव-भावको धारण करनेवाली वह कन्या राजसमूहके बीचमें स्थित राजा दशरथके पास जा पहुँची ॥९१॥


भावमालागृहीतेऽस्मिन् न्यस्ता या द्रव्यमालिका । पौनरुक्त्यं प्रपेदेऽसौ लोकाचारकृतास्पदा ॥९२॥

अर्थ: उसने दशरथको भावमालासे तो पहले ही ग्रहण कर लिया था फिर लोकाचारके अनुसार जो द्रव्यमाला डाली थी वह पुनरुक्तताको प्राप्त हुई थी ॥९२॥


केचित्तत्र जगुस्तारं प्रसन्नमनसो नृपाः । अहो योग्यो वृतः कोऽपि पुरुषोऽयं सुकन्यया ॥९३॥

अर्थ: उस मण्डपमें प्रसन्नचित्तके धारक कितने ही राजा जोर-जोरसे कह रहे थे कि अहो ! इस उत्तम कन्याने योग्य तथा अनुपम पुरुष वरा है ॥९३॥


केषांचित्त्वतिवैलक्ष्यात् स्वदेशगमनं प्रति । विररामातिदूरेण मनो वैवर्ण्यमीयुषाम् ॥९४॥

अर्थ: और कितने ही राजा अत्यन्त धृष्टताके कारण कुपित हो अत्यधिक कोलाहल करने लगे ॥९४॥


केचिदत्यन्तधृष्टत्वात् परमं कोपमागताः । युद्धं प्रति मनश्चक्रुः कृतकोलाहला भृशम् ॥९५॥

जगुश्च ख्यातसद्वंशान् महाभोगसमन्वितान् । त्यक्त्वा नो गृह्णतीमेतमज्ञातकुलशीलिनम् ॥९६॥

अमुं कमपि वैदेशं दुरभिप्रायकारिणीम् । गृह्णीत मूर्धजाकृष्टां प्रसभं दुष्टकन्यकाम् ॥९७॥

अर्थ: वे कहने लगे कि अरे ! प्रसिद्ध वंशमें उत्पन्न तथा महाभोगोंसे सम्पन्न हम लोगोंको छोड़कर इस दुष्ट कन्याने जिसके कुल और शीलका पता नहीं ऐसे परदेशी किसी मनुष्यको वरा है सो इसका अभिप्राय दुष्ट है। इसके केश पकड़कर खींचो और इसे जबरदस्ती पकड़ लो ॥९५-९७॥


इत्युक्त्वा ते सुसन्नद्धाः समुद्यतमहायुधाः । नृपा दशरथान्तेन चलिताः क्रुद्धचेतसः ॥९८॥

अर्थ: ऐसा कहकर वे राजा बड़े-बड़े शस्त्र उठाते हुए युद्धके लिए तैयार हो गये तथा क्रुद्धचित्त होकर राजा दशरथकी ओर चल पड़े ॥९८॥


ततः समाकुलीभूतो वरं शुभमतिर्जगौ । भद्र यावन्नृपानेतान् सुक्षुब्धान् वारयाम्यहम् ॥९९॥

रथमारोप्य तावत्त्वं कन्यामन्तर्हितो भव । कालज्ञानं हि सर्वेषां नयानां मूर्धनि स्थितम् ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर कन्याके पिता शुभमतिने घबड़ाकर दशरथसे कहा कि हे भद्र ! जबतक मैं इन क्षुभित राजाओंको रोकता हूँ तबतक तुम कन्याको रथपर चढ़ाकर कहीं अन्तर्हित हो जाओ - छिप जाओ क्योंकि समयका ज्ञान होना सब नयोंके शिरपर स्थित है अर्थात् सब नीतियोंमें श्रेष्ठ नीति है ॥९९-१००॥


एवमुक्तो जगादासौ स्मितं कृत्वातिधीरधीः । विश्रब्धो भव माम त्वं पश्यैतान्कांदिशीकृतान् ॥१०१॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर अत्यन्त धीर-वीर बुद्धिके धारक राजा दशरथने मुसकराकर कहा कि हे माम ! निश्चिन्त रहो और अभी इन सबको भयसे भागता हुआ देखो ॥१०१॥


इत्युक्त्वा रथमारुह्य संयुक्तं प्रौढवाजिभिः । भृशं संववृते भीमः शरन्मध्याह्नभानुभाः ॥१०२॥

अर्थ: इतना कहकर वे प्रौढ़ घोड़ोंसे जुते रथपर सवार हो शरद्ऋतुके मध्याह्न काल सम्बन्धी सूर्यके समान अत्यन्त भयंकर हो गये ॥१०२॥


उत्तार्य केकया चाशु रथवाहं रणाङ्गणे । तस्थौ पौरुषमालम्ब्य तोत्रप्रग्रहधारिणी ॥१०३॥

अर्थ: केकयाने रथके चालक सारथिको तो उतार दिया और स्वयं शीघ्र ही साहसके साथ चाबुक तथा घोड़ोंकी रास सँभालकर युद्धके मैदानमें जा खड़ी हुई ॥१०३॥


उवाच च प्रयच्छाज्ञां नाथ कस्योपरि द्रुतम् । चोदयामि रथं तस्य मृत्युरद्यातिवत्सलः ॥१०४॥

अर्थ: और बोली कि हे नाथ ! आज्ञा दीजिए, किसके ऊपर रथ चलाऊँ ? आज मृत्यु किसके साथ अधिक स्नेह कर रही है ? ॥१०४॥


जगादासौ किमत्रान्यैर्वराकैर्निहतैर्नरैः । मूर्द्धानमस्य सैन्यस्य पुरुषं पातयाम्यहम् ॥१०५॥

यस्यैतत्पाण्डुरं छत्रं विभाति शशिविभ्रमम् । एतस्याभिमुखं कान्ते रथं चोदय पण्डिते ॥१०६॥

अर्थ: दशरथने कहा कि यहाँ अन्य क्षुद्र राजाओंके मारनेसे क्या लाभ है ? अतः इस सेनाके मस्तकस्वरूप प्रधान पुरुषको ही गिराता हूँ । हे चतुर वल्लभे ! जिसके ऊपर यह चन्द्रमाके समान सफेद छत्र सुशोभित हो रहा है इसीके सन्मुख रथ ले चलो ॥१०५-१०६॥


एवमुक्ते तयात्यन्तं धीरया वाहितो रथः । समुच्छ्रितसितच्छत्रस्तरङ्गितमहाध्वजः ॥१०७॥

अर्थ: ऐसा कहते ही उस धीर वीराने जिसपर सफेद छत्र लग रहा था तथा बड़ी भारी ध्वजा फहरा रही थी ऐसा रथ आगे बढ़ा दिया ॥१०७॥


केतुच्छायामहाज्वाले तत्र दम्पतिदेवते । रथाग्नौ योधशलभाः दृष्ट्वा नष्टाः सहस्रशः ॥१०८॥

अर्थ: जिसमें पताकाकी कान्तिरूपी बड़ी-बड़ी ज्वालाएँ उठ रही थीं तथा दम्पती ही जिसमें देवता थे ऐसे रथरूपी अग्निमें हजारों योधारूपी पतंगे नष्ट होते हुए दिखने लगे ॥१०८॥


दशस्यन्दननिर्मुक्तैर्नाराचैरर्दिता नृपाः । क्षणात्पराङ्मुखीभूताः परस्परविलङ्घिनः ॥१०९॥

अर्थ: दशरथके द्वारा छोड़े बाणोंसे पीड़ित राजा एक दूसरेको लांघते हुए क्षण-भरमें पराङ्मुख हो गये ॥१०९॥


ततो हेमप्रभेणैते चोदिता लज्जिता जिताः । निवृत्य पुनरारब्धा हन्तुं दाशरथं रथम् ॥११०॥

अर्थ: तदनन्तर पराजित होनेसे लज्जित हुए राजाओंको हेमप्रभने ललकारा, जिससे वे लौटकर पुनः दशरथके रथको नष्ट करनेका प्रयत्न करने लगे ॥११०॥


वाजिभिः स्यन्दनैर्नागैः पादातैश्च नृपा वृताः । कृतशूरमहानादा घनसंघातवर्तिनः ॥१११॥

तोमराणि शरान्याशांश्चक्राणि कनकानि च । तमेकं नृपमुद्दिश्य चिक्षिपुश्च समुद्यताः ॥११२॥

अर्थ: जो घोड़ों, रथों, हाथियों तथा पैदल सैनिकोंसे घिरे थे, सिंहनाद कर रहे थे तथा बहुत बड़े समूहके साथ वर्तमान थे ऐसे अनेक राजा अकेले राजा दशरथको लक्ष्य कर तोमर, बाण, पाश, चक्र और कनक आदि शस्त्र बड़ी तत्परतासे चला रहे थे ॥१११-११२॥


चित्रमेकरथो भूत्वा तदा दशरथो नृपः । जातः शतरथः शक्त्या निःसंख्यानरथोऽथवा ॥११३॥

अर्थ: बड़े आश्चर्यकी बात थी कि राजा दशरथ एकरथ होकर भी दशरथ थे तो और उस समय तो अपने पराक्रमसे शतरथ अथवा असंख्यरथ हो रहे थे ॥११३॥


विचिच्छेद स नाराचैः समं शस्त्राणि विद्विषाम् । अदृष्टाकर्षसंधानैश्चक्रीकृतशरासनः ॥११४॥

अर्थ: चक्राकार धनुषके धारक राजा दशरथने जिनके खींचने और रखनेका पता नहीं चलता था ऐसे बाणोंसे एक साथ शत्रुओंके शस्त्र छेद डाले ॥११४॥


छिन्नध्वजातपत्रः सन् विह्वलीकृतवाहनः । शरैर्हेमप्रभस्तेन क्षणेन विरथीकृतः ॥११५॥

अर्थ: जिसकी ध्वजा और छत्र कटकर नीचे गिर गये थे तथा जिसका वाहन थककर अत्यन्त व्याकुल हो गया था ऐसे राजा हेमप्रभको दशरथने क्षणभरमें रथरहित कर दिया ॥११५॥


स रथान्तरमारुह्य भयावततमानसः । द्रुतं पलायनं चक्रे कृष्णीकुर्वन्निजं यशः ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मन भयसे व्याप्त था ऐसा हेमप्रभ दूसरे रथपर सवार हो अपने यशको मलिन करता हुआ शीघ्र ही भाग गया ॥११६॥


ररक्ष स्वं च जायां च शत्रूनस्त्राणि चाच्छिनत् । एको दशरथः कर्म चक्रेऽनन्तरथोचितम् ॥११७॥

अर्थ: राजा दशरथने शत्रुओं तथा शस्त्रोंको छेद डाला और अपनी तथा स्त्रीकी रक्षा की। उस समय एक दशरथने जो काम किया था वह अनन्तरथके योग्य था ॥११७॥


दृष्ट्वा दशरथं सिंहं विधूतशरकेसरम् । दुद्रुवुर्योधसारङ्गाः परिगृह्य दिगष्टकम् ॥११८॥

अर्थ: जो बाणरूपी जटाओंको हिला रहा था ऐसे दशरथ-रूपी सिंहको देखकर योद्धारूपी हरिण आठो दिशाएँ पकड़कर भाग गये ॥११८॥


अहो शक्तिर्नरस्यास्य ही चित्रं कन्यया कृतम् । इति नादः समुत्तस्थौ महान् स्वपरसेनयोः ॥११९॥

अर्थ: उस समय अपनी तथा शत्रुकी सेनामें यही जोरदार शब्द उठ रहा था कि अहो ! इस मनुष्यकी कैसी अद्भुत शक्ति है ? और इस कन्याने कैसा कमाल किया ? ॥११९॥


वन्दिघोषितशब्देन शक्त्या वानन्यतुल्यया । जनैर्दशरथो जज्ञे प्रतापं बिभ्रदुन्नतम् ॥१२०॥

अर्थ: उन्नत प्रतापको धारण करनेवाले राजा दशरथको लोग पहचान सके थे तो वन्दीजनोंके द्वारा घोषित जयनाद अथवा उनकी अनुपम शक्तिसे ही पहचान सके थे ॥१२०॥


ततः पाणिग्रहस्तेन कृतः कौतुकमङ्गले । कन्यायाः परलोकेन कृतकौतुकमङ्गले ॥१२१॥

अर्थ: तदनन्तर अन्य लोगोंने जहाँ कौतुक एवं मंगलाचार किये थे ऐसे कौतुकमंगल नामा नगरमें राजा दशरथने कन्याका पाणिग्रहण किया ॥१२१॥


महता भूतिभारेण वृत्तोपयमनोत्सवः । ययौ दशरथोऽयोध्यां मिथिलां जनको यथा ॥१२२॥

अर्थ: तत्पश्चात् बड़े भारी वैभवसे जिनका विवाहोत्सव सम्पन्न हुआ था ऐसे राजा दशरथ अयोध्या गये और राजा जनक मिथिलापुरी गये ॥१२२॥


पुनर्जन्मोत्सवं तस्य तस्यां चक्रेऽतिसंमदः । पुनर्नृपाभिषेकं च परिवर्गो महर्द्धिभिः ॥१२३॥

अर्थ: वहाँ हर्षसे भरे परिजनोंने बड़े वैभवसे साथ राजा दशरथका पुनर्जन्मोत्सव और पुनर्राज्याभिषेक किया ॥१२३॥


अशेषभयनिर्मुक्तो रेमे तत्र स पुण्यवान् । आखण्डल इव स्वर्गे प्रतिमानितशासनः ॥१२४॥

अर्थ: जो सब प्रकारके भयसे रहित थे तथा जिनकी आज्ञाको सब शिरोधार्य करते थे ऐसे पुण्यवान् राजा दशरथ स्वर्गमें इन्द्रकी तरह अयोध्यामें क्रीड़ा करते थे ॥१२४॥


तत्र प्रत्यक्षमन्यासां पत्नीनां भूभृतां तथा । अभ्यधायि नरेन्द्रेण केकयासन्नवर्तिनी ॥१२५॥

पूर्णेन्दुवदने ब्रूहि यत्ते वस्तु मनीषितम् । इह संपादयाम्यद्य प्रसन्नोऽस्मि तव प्रिये ॥१२६॥

अर्थ: वहाँ राजा दशरथने अन्य सपत्नियों तथा राजाओंके समक्ष पास बैठी हुई केकयासे कहा कि हे पूर्णचन्द्रमुखि ! प्रिये ! जो वस्तु तुम्हें इष्ट हो वह कहो, मैं उसे पूर्ण कर दूँ । आज मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥१२५-१२६॥


चोदयेन्नातिविज्ञानाद्यदि नाम तथा रथम् । कथं क्रुद्धारिसंघातं विजयेयं सहोत्थितम् ॥१२७॥

अर्थ: यदि तुम उस समय बड़ी चतुराईसे उस प्रकार रथ नहीं चलातीं तो मैं एक साथ उठे हुए कुपित शत्रुओंके समूहको किस प्रकार जीतता ? ॥१२७॥


अवस्थितं जगद्व्याप्य नुदेदर्कः कथं तमः । सव्येष्टा चेद्भवेदस्य न मूर्तिररुणात्मिका ॥१२८॥

गुणग्रहणसंजातव्रीडाभारनतानना । मुहुः प्रचोदितोवाच कथंचिदिति केकया ॥१२९॥

नाथ न्यासोऽयमास्तां मे त्वयि वाञ्छितयाचनम् । प्रार्थयिष्ये यदा तस्मिन् काले दास्यसि निर्वचाः ॥

अर्थ: यदि अरुण सारथि नहीं होता तो समस्त जगत्में व्याप्त होकर स्थित अन्धकारको सूर्य किस प्रकार नष्ट कर सकता ? तदनन्तर गुणग्रहणसे उत्पन्न लज्जाके भारसे जिसका मुख नीचा हो रहा था ऐसी केकयाने बार-बार प्रेरित होनेपर भी किसी प्रकार यह उत्तर दिया कि हे नाथ ! मेरी इच्छित वस्तुकी याचना आपके पास धरोहरके रूपमें रहे । जब मैं मागूँगी तब आप बिना कुछ कहे दे देंगे ॥१२८-१३०॥


इति प्रोक्तमात्रे जगौ भूमिनाथः समग्रेन्दुनाथप्रतिस्पर्द्धिवक्त्रः । भवत्येव युद्धे पृथुश्रोणिसौम्ये त्रिवर्णातिकान्तप्रसन्नोरुनेत्रे ॥१३१॥

अर्थ: केकयाके इतना कहते ही पूर्णचन्द्रमाके समान मुखको धारण करनेवाले राजा दशरथने कहा कि हे प्रिये ! हे स्थूलनितम्बे ! हे सौम्यवर्णे ! तीन रंगके अत्यन्त सुन्दर, स्वच्छ एवं विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाली ! ऐसा ही हो ॥१३१॥


अहो बुद्धिरस्या महागोत्रजाया नयाढ्या नितान्तं कलापारगायाः । समस्तोपभोगैरलं संगतायाः कृतं न्यासभूतं मतप्रार्थनं यत् ॥१३२॥

अर्थ: राजा दशरथने अन्य लोगोंसे कहा कि अहो ! महाकुलमें उत्पन्न, कलाओंकी पारगामिनी तथा महाभोगोंसे सहित इस केकयाकी बुद्धि अत्यधिक नीतिसे सम्पन्न है कि जो इसने अपने वरकी याचना धरोहररूप कर दी ॥१३२॥


समस्तोऽपि तस्यास्तदाभीष्टवर्गः प्रयातः प्रमोदं प्रकृष्टं नितान्तम् । विचिन्त्य प्रधानं शुभा कंचिदर्थं शनैर्मार्गयिष्यत्यहो केकयेति ॥१३३॥

अर्थ: यह पुण्यशालिनी धीरे-धीरे विचारकर किसी अभिलषित उत्तम अर्थको माँग लेगी ऐसा विचारकर उसके सभी इष्ट परिजन उस समय अत्यधिक परम आनन्दको प्राप्त हुए थे ॥१३३॥


मतेर्गोचरस्वं मया तावदेतत्प्रणीतं सुवृत्तं धरित्रीपते ते । समुत्पत्तिमस्मान्महामानवानां शृणु द्योतकानामुदारान्वयस्य ॥१३४॥

अर्थ: गौतमस्वामी श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! मैंने बुद्धिके अनुसार तेरे लिए यह राजा दशरथका सुवृत्तान्त कहा है । अब इससे अपने उदार वंशको प्रकाशित करनेवाले महामानवोंकी उत्पत्तिका वर्णन सुन ॥१३४॥


समासेन सर्वं वदाम्येष तेऽहं त्रिलोकस्य वृत्तं किमत्र प्रपञ्चैः ।
दुराचारयुक्ताः परं यान्ति दुःखं सुखं साधुवृत्ता रविप्रख्यभासः ॥१३५॥

अर्थ: तीन लोकका वृत्तान्त जाननेके लिए विस्तारकी आवश्यकता नहीं । अतः मैं संक्षेपसे ही तेरे लिए यह कहता हूँ कि दुराचारी मनुष्य अत्यन्त दुःख प्राप्त करते हैं और सूर्यके समान दीप्तिको धारण करनेवाले सदाचारी मनुष्य सुख प्राप्त करते हैं ॥१३५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते केकयावरप्रदानं नाम चतुर्विंशतितमं पर्व ॥२४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें केकयाके वरदानका वर्णन करनेवाला चौबीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२४॥


२५. पञ्चविंशतितमं पर्व (चतुर्भ्रातृसंभवाभिधानं)

अथापराजिता देवी सुखं सुप्ता वरालये । शयनीये महाकान्ते रत्नोद्योतसरःस्थिते ॥१॥

रजन्याः पश्चिमे यामे महापुरुषवेदिनः । नितान्तं परमान् स्वप्नानैक्षताशयिता यथा ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर उत्तम महलमें रत्नोंके प्रकाशरूपी सरोवरके मध्यमें स्थित अत्यन्त सुन्दर शय्यापर सुखसे सोती हुई अपराजिता रानीने रात्रिके पिछले पहरमें महापुरुषके जन्मको सूचित करनेवाले अत्यन्त आश्चर्यकारक स्वप्न देखे। वे स्वप्न उसने इतनी स्पष्टतासे देखे थे जैसे मानो जाग ही रही थी ॥१-२॥


शुभ्रं स्तम्बेरमं सिंहं पद्मिनीबान्धवं विधुम् । दृष्ट्वा विबोधमायाता तूर्यमङ्गलनिस्वनैः ॥३॥

अर्थ: पहले स्वप्नमें उसने सफेद हाथी, दूसरेमें सिंह, तीसरेमें सूर्य और चौथेमें चन्द्रमा देखा था। इन सबको देखकर वह तुरहीके मांगलिक शब्दसे जाग उठी ॥३॥


ततः प्रत्यङ्गकार्याणि कृत्वा विस्मितमानसा । दिवाकरकरालोकमण्डिते भुवने सति ॥४॥

सा विनीतान्तिकं भर्तुर्गत्वात्यन्तसमाकुला । सखीभिरावृता भद्रपीठभूषणकारिणी ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मन आश्चर्यसे भर रहा था ऐसी अपराजिता प्रातःकाल सम्बन्धी शारीरिक क्रियाएँ कर, जब सूर्यके प्रकाशसे समस्त संसार सुशोभित हो गया तब बड़ी विनयसे पतिके पास गयी । स्वप्नोंका फल जाननेके लिए उसका हृदय अत्यन्त आकुल हो रहा था तथा अनेक सखियाँ उसके साथ गयी थीं । जाकर वह उत्तम सिंहासनको अलंकृत करने लगी ॥४-५॥


कृताञ्जलिर्जगौ स्वप्नान् किंचिद्विनतविग्रहा । स्वामिने सावधानाय यथादृष्टान्मनोहरान् ॥६॥

अर्थ: जिसका शरीर संकोचवश कुछ नीचेकी ओर झुक रहा था ऐसी अपराजिताने हाथ जोड़कर स्वामीके लिए सब मनोहर स्वप्न जिस क्रमसे देखे थे उसी क्रमसे सुना दिये और स्वामीने भी बड़ी सावधानीसे सुने ॥६॥


ततो निखिलविज्ञानपारदृश्वा नराधिपः । बुधमण्डलमध्यस्थः स्वप्नानामभ्यधात् फलम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त ज्ञानोंके पारदर्शी एवं विद्वत्समूहके बीचमें स्थित राजा दशरथने स्वप्नोंका फल कहा ॥७॥


परमाश्चर्यहेतुस्ते कान्ते पुत्रो भविष्यति । अन्तर्बहिश्च शत्रूणां यः करिष्यति शातनम् ॥८॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे कान्ते ! तुम्हारे परम आश्चर्यका कारण ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा जो अन्तरंग और बहिरंग दोनों प्रकारके शत्रुओंका नाश करेगा ॥८॥


एवमुक्ते परं तोषं हस्तस्पृष्टोदरी ययौ । स्मितकेसरसंरुद्धमुखपद्मापराजिता ॥९॥

अर्थ: पतिके ऐसा कहनेपर अपराजिता परम सन्तोषको प्राप्त हुई। उसने हाथसे उदरका स्पर्श किया तथा उसका मुखरूपी कमल मन्द मुसकानरूपी केशरसे व्याप्त हो गया ॥९॥


चकार च समं भर्त्रा परं प्रमदमीयुषा । जिनेन्द्रवेश्मसुस्फीतां पूजां पूजितभावना ॥१०॥

अर्थ: प्रशस्त भावनासे युक्त अपराजिताने परम प्रसन्नताको प्राप्त पतिके साथ जिन-मन्दिरोंमें भगवान्‌की महापूजा की ॥१०॥


ततः प्रभृतिकान्त्यासौ सुतरां स्मावगाह्यते । बभूव चेतसश्चास्याः शान्तिः कापि महौजसः ॥११॥

अर्थ: उस समयसे दिन-प्रति-दिन उसकी कान्ति बढ़ने लगी तथा उसका चित्त यद्यपि महाप्रतापसे युक्त था तो भी उसमें अद्भुत शान्ति उत्पन्न हो गयी थी ॥११॥


सुमित्रानन्तरं तस्या ईक्षांचक्रेऽतिसुन्दरी । विस्मिता पुलकोपेता स्वप्नान् साधुमनोरथा ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर अतिशय सुन्दरी सुमित्रा रानीने स्वप्न देखे। स्वप्न देखते समय वह आश्चर्यसे चकित हो गयी थी, उसके समस्त शरीरमें रोमांच निकल आये थे और उसका अभिप्राय अत्यन्त निर्मल हो गया था ॥१२॥


सिच्यमानं मृगाधीशं लक्ष्म्या कीर्त्या च सादरम् । कलशैश्चावमानास्यकमलैश्चारुवारिभिः ॥१३॥

अर्थ: उसने देखा कि लक्ष्मी और कीर्ति आदरपूर्वक, जिनके मुखपर कमल रखे हुए थे तथा जिनमें सुन्दर जल भरा हुआ था ऐसे कलशोंसे सिंहका अभिषेक कर रही हैं ॥१३॥


आत्मानं चातितुङ्गस्य भूभृतो मूर्धनि स्थितम् । पश्यन्तं मेदिनीं स्फीतां निम्नगापतिमेखलाम् ॥१४॥

अर्थ: फिर देखा कि मैं स्वयं किसी ऊँचे पर्वतके शिखरपर चढ़कर समुद्ररूपी मेखलासे सुशोभित विस्तृत पृथिवीको देख रही हूँ ॥१४॥


स्फुरत्किरणजालं च दिवसाधिपविभ्रमम् । नानारत्नोचितं चक्रं सौम्यं कृतविवर्तनम् ॥१५॥

अर्थ: इसके बाद उसने देदीप्यमान किरणोंसे युक्त, सूर्यके समान सुशोभित, नाना रत्नोंसे खचित तथा घूमता हुआ सुन्दर चक्र देखा ॥१५॥


वीक्ष्य मङ्गलनादेन तथैव कृतबोधना । विनीताकथयत् पत्ये नितान्तं मधुरस्वना ॥१६॥

अर्थ: इन सब स्वप्नोंको देखकर वह मंगलमय वादित्रोंके शब्दसे जाग उठी। तदनन्तर उसने बड़ी विनयसे जाकर अत्यन्त मधुर शब्दों द्वारा पतिके लिए स्वप्न-दर्शनका समाचार सुनाया ॥१६॥


सूनुर्युगप्रधानस्ते शत्रुचक्रक्षयावहः । भविष्यति महातेजाश्चित्रचेष्टो वरानने ॥१७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा दशरथने बताया कि हे उत्तम मुखको धारण करनेवाली प्रिये ! तुम्हारे ऐसा पुत्र होगा कि जो युगका प्रधान होगा, शत्रुओंके समूहका क्षय करनेवाला होगा, महातेजस्वी तथा अद्भुत चेष्टाओंका धारक होगा ॥१७॥


इत्युक्ता सा सती पत्या संमदाक्रान्तमानसा । ययौ निजास्पदं लोकं पश्यन्तीवाधरस्थितम् ॥१८॥

अर्थ: पतिके इस प्रकार कहनेपर जिसका चित्त आनन्दसे व्याप्त हो रहा था ऐसी सुमित्रा रानी अपने स्थान पर चली गयी। उस समय वह समस्त लोकको ऐसा देख रही थी मानो नीचे ही स्थित हो ॥१८॥


अथानेहसि संपूर्णे पूर्णेन्दुमिवं पूर्वदिक् । असूत तनयं कान्त्या विशालमपराजिता ॥१९॥

अर्थ: अथानन्तर समय पूर्ण होनेपर, जिस प्रकार पूर्व दिशा पूर्ण चन्द्रमाको उत्पन्न करती है उसी प्रकार अपराजिता रानीने कान्तिमान् पुत्र उत्पन्न किया ॥१९॥


दिष्ट्यावर्धनकारिभ्यः प्रयच्छन् वसु पार्थिवः । बभूव चामरच्छत्रपरिधानपरिच्छदः ॥२०॥

अर्थ: इस भाग्य-वृद्धिकी सूचना करनेवाले लोगोंको जब राजा दशरथ धन देने बैठे तो उनके पास छत्र, चमर तथा वस्त्र ही शेष रह गये बाकी सब वस्तुएँ उन्होंने दानमें दे दीं ॥२०॥


जन्मोत्सवो महानस्य चक्रे निःशेषबान्धवैः । महाविभवसंपन्नैरुन्मत्तीभूतविष्टपः ॥२१॥

अर्थ: महा विभवसे सम्पन्न समस्त भाई-बान्धवोंने इसका बड़ा भारी जन्मोत्सव किया। ऐसा जन्मोत्सव कि जिसमें सारा संसार उन्मत्त-सा हो गया था ॥२१॥


तरुणादित्यवर्णस्य पद्मालिङ्गितवक्षसः । पद्मनेत्रस्य पद्माख्या पितृभ्यां तस्य निर्मिता ॥२२॥

अर्थ: मध्याह्नके सूर्यके समान जिसका वर्ण था, जिसका वक्षःस्थल लक्ष्मीके द्वारा आलिंगित था तथा जिसके नेत्र कमलोंके समान थे ऐसे उस पुत्रका माता-पिताने पद्म नाम रखा ॥२२॥


सुमित्रापि ततः पुत्रमसूत परमद्युतिम् । छायादिगुणयोगेन सद्रत्नं रत्नभूरिव ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार रत्नोंकी भूमि अर्थात् खान छाया आदि गुणोंसे सम्पन्न उत्तम रत्नको उत्पन्न करती है उसी प्रकार सुमित्राने श्रेष्ठ कान्तिके धारक पुत्रको उत्पन्न किया ॥२३॥


पद्मजन्मोत्सवस्यानुसंधानमिव कुर्वता । जनितो बन्धुवर्गेण तस्य जन्मोत्सवः परः ॥२४॥

अर्थ: पद्मके जन्मोत्सवका मानो अनुसन्धान ही करते हुए बन्धु-वर्गने उसका भी बहुत भारी जन्मोत्सव किया था ॥२४॥


उत्पाता जज्ञिरेऽरातिनगरेषु सहस्रशः । आपदां सूचका बन्धुनगरेषु च संपदाम् ॥२५॥

अर्थ: शत्रुओंके नगरोंमें आपत्तियोंकी सूचना देनेवाले हजारों उत्पात होने लगे और बन्धुओंके नगरोंमें सम्पत्तियोंकी सूचना देनेवाले हजारों शुभ चिह्न प्रकट होने लगे ॥२५॥


प्रौढेन्दीवरगर्भाभः कान्तिवारिकृतप्लवः । सुलक्ष्मा लक्ष्मणाख्यायां पितृभ्यामेव योजितः ॥२६॥

अर्थ: प्रौढ नील कमलके भीतरी भागके समान जिसकी आभा थी, जो कान्तिरूपी जलमें तैर रहा था और अनेक अच्छे-अच्छे लक्षणोंसे सहित था ऐसे उस पुत्रका माता-पिताने लक्ष्मण नाम रखा ॥२६॥


बालौ मनोज्ञरूपौ तौ विद्रुमाभरदच्छदौ । रक्तोत्पलसमच्छायपाणिपादौ सुविभ्रमौ ॥२७॥

नवनीतसुखस्पर्शौ जातिसौरभधारिणौ । कुर्वाणौ शैशवीं क्रीडां चेतः कस्य न जह्रतुः ॥२८॥

अर्थ: उन दोनों बालकोंका रूप अत्यन्त मनोहर था, उनके ओंठ मूँगाके समान लाल थे, हाथ और पैर लाल कमलके समान कान्तिवाले थे, उनके विभ्रम अर्थात् हाव-भाव देखते ही बनते थे, उनका स्पर्श मक्खनके समान कोमल था, तथा जन्मसे ही वे उत्तम सुगन्धिको धारण करनेवाले थे । बाल-क्रीड़ा करते हुए वे किसका मन हरण नहीं करते थे ॥२७-२८॥


चन्दनद्रवदिग्धाङ्गौ कुङ्कुमस्थासकाञ्चितौ । सुवर्णरससंपृक्तरजताचलकोपमौ ॥२९॥

अर्थ: चन्दनके लेपसे शरीरको लिप्त करनेके बाद जब वे ललाटपर कुंकुमका तिलक लगाते थे तब सुवर्ण रससे संयुक्त रजताचलकी उपमा धारण करते थे ॥२९॥


अनेकजन्मसंवृद्धस्नेहान्योन्यवशानुगौ । अन्तःपुरगतौ सर्वबन्धुभिः कृतपालनौ ॥३०॥

अर्थ: अनेक जन्मोंके संस्कारसे बढ़े हुए स्नेहसे वे दोनों ही बालक परस्पर एक दूसरेके वंशानुगामी थे, तथा अन्तःपुरमें समस्त बन्धु उनका लालन-पालन करते थे ॥३०॥


विच्छर्दमिव कुर्वाणावमृतेन कृतस्वनौ । मुखपङ्केन लिम्पन्ताविव लोकं विलोकनात् ॥३१॥

अर्थ: जब वे शब्द करते थे तब ऐसे जान पड़ते थे मानो अमृतका वमन ही कर रहे हों और जब किसीकी ओर देखते थे तब ऐसा जान पड़ते थे मानो उस लोकको सुखदायक पंकसे लिप्त ही कर रहे हों ॥३१॥


छिन्दन्ताविव दारिद्र्यमाहूतागमकारिणौ । तर्पयन्ताविव स्वान्तं सर्वेषामनुकूलतः ॥३२॥

अर्थ: जब किसीके बुलानेपर वे उसके पास पहुँचते थे तब ऐसे जान पड़ते थे मानो दरिद्रताका छेद ही कर रहे हों । वे अपनी अनुकूलतासे सबके हृदयको मानो तृप्त ही कर रहे थे ॥३२॥


प्रसादसंमदौ साक्षादिव देहमुपागतौ । रेमाते तौ सुखं पुर्यां कुमारौ कृतरक्षणौ ॥३३॥

अर्थ: उन्हें देखनेसे ऐसा जान पड़ता था मानो प्रसाद और सम्पद् नामक गुण ही देह रखकर आये हों । जिनकी रक्षक लोग रक्षा कर रहे थे ऐसे दोनों बालक नगरीमें सुखपूर्वक जहाँ-तहाँ क्रीड़ा करते थे ॥३३॥


विजयश्च त्रिपृष्ठश्च यथापूर्वं बभूवतुः । तत्तुल्यचेष्टितावेवं कुमारौ तावशेषतः ॥३४॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले विजय और त्रिपृष्ठ नामक बलभद्र तथा नारायण हुए थे उसी प्रकार ये दोनों बालक भी उन्हींके समान समस्त चेष्टाओंके धारक हुए थे ॥३४॥


तनयं केकयासूत दिव्यरूपसमन्वितम् । यो जगाम महाभाग्यो भुवने भरतश्रुतिम् ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर केकया रानीने सुन्दर रूपसे सहित पुत्र उत्पन्न किया जो महाभाग्यवान् था तथा संसारमें ‘भरत’ इस नामको प्राप्त हुआ था ॥३५॥


सुषुवे सुप्रभा पुत्रं सुन्दरं यस्य विष्टपे । ख्यातिः शत्रुघ्नशब्देन सकलेऽद्यापि वर्तते ॥३६॥

अर्थ: तत्पश्चात् सुप्रभा रानीने सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया जिसकी समस्त संसारमें आज भी ‘शत्रुघ्न’ नामसे प्रसिद्धि है ॥३६॥


बलनामापरं मात्रा पद्मस्येति विनिर्मितम् । सुमित्रया हरिर्नाम तनयस्य महेच्छया ॥३७॥

अर्थ: अपराजिताने पद्मका दूसरा नाम बल रखा था तथा सुमित्राने अपने पुत्रका दूसरा नाम बड़ी इच्छासे हरि घोषित किया था ॥३७॥


कृतोऽर्धचक्रिनामायं मात्रेति भरताभिधाम् । दृष्ट्वा चक्रिणि संपूर्णे केकया प्रापयत् सुतम् ॥३८॥

अर्थ: केकयाने देखा कि ‘भरत’ यह नाम सम्पूर्ण चक्रवर्ती भरतमें आया है इसलिए उसने अपने पुत्रका अर्ध-चक्रवर्ती नाम प्रकट किया ॥३८॥


चक्रवर्तिध्वनिं नीतो मात्रायमिति सुप्रभा । तनयस्यार्हतो नाम शत्रुघ्नमिति निर्ममे ॥३९॥

अर्थ: सुप्रभाने विचार किया कि जब केकयाने अपने पुत्रका नाम चक्रवर्तीके नामपर रखा है तब मैं अपने पुत्रका नाम इससे भी बढ़कर क्यों नहीं रखूँ यह विचारकर उसने अर्हन्त भगवान्के नामपर अपने पुत्रका नाम शत्रुघ्न रखा ॥३९॥


समुद्रा इव चत्वारः कुमारास्ते नया इव । दिग्विभागा इवोदारा बभूवुर्जगतः प्रियाः ॥४०॥

अर्थ: जगत्के जीवोंको प्रिय लगनेवाले वे चारों कुमार समुद्रके समान गम्भीर थे, सम्यग् नयोंके समान परस्पर अनुकूल थे तथा दिग्विभागोंके समान उदार थे ॥४०॥


ततः कुमारकान् दृष्ट्वा विद्यासंग्रहणोचितान् । दध्यौ योग्यमुपाध्यायं पितैषां मनसाकुलः ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर इन कुमारोंको विद्या ग्रहणके योग्य देखकर इनके पिता राजा दशरथने बड़ी व्यग्रतासे योग्य अध्यापकका विचार किया ॥४१॥


अथास्ति नगरं नाम्ना काम्पिल्यमिति सुन्दरम् । भार्गवोऽत्र शिखी ख्यातस्तस्येषुरिति भामिनी ॥४२॥

अर्थ: अथानन्तर एक काम्पिल्य नामका सुन्दर नगर था उसमें शिखी नामका ब्राह्मण रहता था। उसकी इषु नामकी स्त्री थी ॥४२॥


ऐररूढिस्तयोः पुत्रो दुर्विनीतोऽतिलालितः । उपालम्भसहस्राणां कारणीभूतचेष्टितः ॥४३॥

अर्थ: उन दोनोंके एक ऐर नामका पुत्र था जो अत्यधिक लाड़-प्यारके कारण महाअविनयी हो गया था। उसकी चेष्टाएँ हजारों उलाहनोंका कारण हो रही थीं ॥४३॥


द्रविणोपार्जनं विद्याग्रहणं धर्मसंग्रहः । स्वाधीनमपि तत्प्रायो विदेशे सिद्धिमश्नुते ॥४४॥

अर्थ: धनका उपार्जन करना, विद्या ग्रहण करना और धर्मसंचय करना ये तीनों कार्य यद्यपि मनुष्यके अपने अधीन हैं फिर भी प्रायःकर विदेशमें ही इनकी सिद्धि होती है ॥४४॥


पितृभ्यां भवनादेष निर्विण्णाभ्यां निराकृतः । ययौ राजगृहं दुःखी वसानः कर्पटद्वयम् ॥४५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर माता-पिताने दुःखी होकर उसे घरसे निकाल दिया जिससे केवल दो कपड़ोंको धारण करता हुआ वह दुःखी अवस्थामें राजगृह नगर पहुँचा ॥४५॥


तत्र वैवस्वतो नाम धनुर्वेदातिपण्डितः । युक्ता सहस्रमात्रेण शिष्याणामभियोगिनाम् ॥४६॥

अर्थ: वहाँ एक वैवस्वत नामका विद्वान् था जो धनुर्विद्यामें अत्यन्त निपुण था और विद्याध्ययनमें श्रम करनेवाले एक हजार शिष्योंसे सहित था ॥४६॥


यथावत्तस्य पार्श्वेऽसौ धनुर्विद्यामुपागमत् । जातः शिष्यसहस्राच्च दूरेणाधिककौशलः ॥४७॥

अर्थ: ऐर उसीके पास विधिपूर्वक धनुर्विद्या सीखने लगा और कुछ ही समयमें उसके हजार शिष्योंसे भी अधिक निपुण हो गया ॥४७॥


श्रुतं कुशाग्रराजेन मत्सुतेभ्योऽपि कौशलम् । वैदेशे क्वापि विन्यस्तमिति ज्ञात्वा रुषं गतः ॥४८॥

अर्थ: राजगृहके राजाने जब यह सुना कि वैवस्वतने किसी विदेशी बालकको हमारे पुत्रोंसे भी अधिक कुशल बनाया है तब वह यह जानकर क्रोधको प्राप्त हुआ ॥४८॥


श्रुत्वा च स्वामिनं क्रुद्धमस्त्राचार्येण शिक्षितः । एवमेरो यथा राज्ञः पुरः कुण्ठो भविष्यति ॥४९॥

अर्थ: राजाको कुपित सुनकर अस्त्रविद्याके गुरु वैवस्वतने ऐरको ऐसी शिक्षा दी कि तू राजाके सामने मूर्ख बन जाना ॥४९॥


स समाह्वयितः शिष्यैः सुतोऽसौ विभुना नृणाम् । शिक्षां पश्यामि सर्वेषां क्षात्राणमिति चोदितः ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने, मैं तुम्हारे सब शिष्योंकी शिक्षा देखूँगा, यह कहकर शिष्योंके साथ वैवस्वत गुरुको बुलाया ॥५०॥


ततोऽन्तेवासिनस्तेन क्रमेण शरमोचनम् । कारिता लक्ष्यपातं च सर्वे चक्रुर्यथायथम् ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने सब शिष्योंसे क्रमसे बाण छुड़वाये और सबने यथायोग्य निशाने बींध दिये ॥५१॥


तथैरोऽपि स निर्युक्तः शरान् चिक्षेप तादृशान् । दुःशिक्षित इति ज्ञातो विभुना तेन यादृशैः ॥५२॥

अर्थ: इसके बाद ऐरसे भी बाण छुड़वाये तो उसने इस रीतिसे बाण छोड़े कि राजाने उसे मूर्ख समझा ॥५२॥


विदित्वा वितथां सर्वां राज्ञा संप्रेषितो गतः । अस्त्राचार्यः स्वकं धाम शिष्यमण्डलमध्यगः ॥५३॥

अर्थ: जब राजाने यह समझ लिया कि लोगोंने इसके विषयमें जो कहा था वह सब झूठ है तब उसने अस्त्राचार्यको सम्मानके साथ विदा किया और वह शिष्य-मण्डलके साथ अपने घर चला गया ॥५३॥


वैवस्वतसुतामैरः स्वीकृत्य गुरुसंमताम् । रात्रौ पलायनं कृत्वा प्राप दाशरथीं पुरीम् ॥५४॥

अर्थ: ऐर गुरुकी सम्मतिसे उसकी पुत्रीको विवाह कर रात्रिमें वहाँसे भाग आया और राजा दशरथकी राजधानी अयोध्यापुरीमें आया ॥५४॥


ढौकितश्चानरण्ये स्वं कौशलं च न्यवेदयत् । राज्ञा समर्पिता तस्मै तुष्टेन तनुसंभवाः ॥५५॥

अर्थ: वहाँ उसने राजा दशरथके पास जाकर उन्हें अपना कौशल दिखाया और राजाने सन्तुष्ट होकर उसे अपने सब पुत्र सौंप दिये ॥५५॥


तेष्वस्त्रकौशलं तस्य संक्रान्तं स्फीततां गतम् । सरःसु सुप्रसन्नेषु चन्द्रबिम्बमिवागतम् ॥५६॥

अर्थ: सो जिस प्रकार निर्मल सरोवरोंमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाका बिम्ब विस्तारको प्राप्त होता है उसी प्रकार उन शिष्योंमें ऐरका अस्त्रकौशल प्रतिबिम्बित होकर विस्तारको प्राप्त हो गया ॥५६॥


अन्यानि च गुरुप्राप्त्या विज्ञानानि प्रकाशताम् । यातानि तेषु रत्नानि पिधानापगमादिव ॥५७॥

अर्थ: इसके सिवाय अन्य-अन्य विषयोंके गुरु प्राप्त होनेसे उनके अन्य-अन्य ज्ञान भी उस तरह प्रकाशताको प्राप्त हो गये जिस तरह कि ढक्कनके दूर हो जानेसे छिपे रत्न प्रकाशताको प्राप्त हो जाते हैं ॥५७॥


दृष्ट्वा विज्ञानमेषामतिशयसहितं सर्वशास्त्रेषु राजा संप्राप्तस्तोषमग्र्यं सुतनयविनयोदारचेष्टाहृतात्मा । चक्रे पूजासमेतं गुरुषु गुणगणज्ञानपाण्डित्ययुक्तो यातं व्युत्क्रम्य वाञ्छाविभवमतितरां दानविख्यातकीर्तिः ॥५८॥

अर्थ: पुत्रोंके नय, विनय और उदार चेष्टाओंसे जिनका हृदय हरा गया था ऐसे राजा दशरथ उन पुत्रोंका सर्वशास्त्रविषयक अतिशय पूर्णज्ञान देखकर अत्यन्त सन्तोषको प्राप्त हुए । वे गुणसमूहविषयक ज्ञान और पाण्डित्यसे युक्त थे तथा दानमें उनकी कीर्ति अत्यन्त प्रसिद्ध थी, इसलिए उन्होंने समस्त गुरुओंका सम्मान कर उन्हें इच्छासे भी अधिक वैभव प्रदान किया था ॥५८॥


ज्ञानं संप्राप्य किंचिद् व्रजति परमतां तुल्यमन्यत्र यातं तावत्त्वेनापि नैति क्वचिदपि पुरुषे कर्मवैषम्ययोगात् । अत्यन्तं स्फीतिमेति स्फटिकगिरितटे तुल्यमन्यत्र देशे यात्येकान्तेन नाशं तिमिरवति रवेरंशुवृन्दं खगौघैः ॥५९॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! किसी पुरुषको प्राप्तकर थोड़ा ज्ञान भी उत्कृष्टताको प्राप्त हो जाता है, किसीको पाकर उतनाका उतना ही रह जाता है और कर्मोंकी विषमतासे किसीको पाकर उतना भी नहीं रहता । सो ठीक ही है क्योंकि सूर्यकी किरणोंका समूह स्फटिक-गिरिके तटको पाकर अत्यन्त विस्तारको प्राप्त हो जाता है, किसी स्थानमें तुल्यताको प्राप्त होता है अर्थात् उतनाका उतना ही रह जाता है और अन्धकारयुक्त स्थानमें बिलकुल ही नष्ट हो जाता है ॥५९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते चतुर्भ्रातृसंभवाभिधानं नाम पञ्चविंशतितमं पर्व ॥२५॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें राम आदि चार भाइयोंकी उत्पत्तिका कथन करनेवाला पचीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२५॥

२६. षड्विंशतितमं पर्व (सीताभामण्डलोत्पत्त्यभिधानं)

अतो जनकसम्बन्धं शृणु श्रेणिक ते परम् । निवेदयामि यद्वृत्तं भवावहितमानसः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अब राजा जनकका वृत्तान्त कहता हूँ सो तुम सावधान चित्त होकर सुनो ॥१॥


भामिनी जनकस्यासीद् विदेहा नाम सुन्दरी । गर्भनिर्वेदनं तस्याः प्रत्यैक्षत चिरं सुरः ॥२॥

अर्थ: राजा जनककी विदेहा नामकी सुन्दरी स्त्री थी । उसके गर्भ रहा, सो एक देव चिरकालसे उसके गर्भकी प्रतीक्षा करने लगा ॥२॥


जगाद श्रेणिको नाथ तं गर्भं केन हेतुना । देवो ररक्ष विज्ञातुमेतदिच्छामि शिष्यताम् ॥३॥

अर्थ: यह सुन राजा श्रेणिकने कहा कि नाथ ! वह देव किस कारणसे विदेहाके गर्भकी रक्षा करता था ? यह मैं जानना चाहता हूँ सो कहिए ॥३॥


उवाच गौतमो राजा नाम्ना चक्रध्वजोऽभवत् । स्थाने चक्रपुराभिख्ये भार्या तस्य मनस्विनी ॥४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गौतमस्वामीने कहा कि चक्रपुरनामा नगरमें एक चक्रध्वज नामका राजा था । उसकी स्त्रीका नाम मनस्विनी था ॥४॥


तयोश्चित्तोत्सवापत्यं कन्या गुरुगृहे च सा । रराज सितमृल्लेशैर्लेखनी वर्णपूरिका ॥५॥

अर्थ: उन दोनोंके चित्तोत्सवा नामकी कन्या उत्पन्न हुई । वह कन्या गुरुके घर अर्थात् चाटशालामें खड़िया मिट्टीके टुकड़ोंसे वर्णमाला लिखती हुई सुशोभित होती थी ॥५॥


राज्ञः पुरोहितस्यास्य धूमकेशस्य पिङ्गलः । स्वाहाकुक्षिभवोऽधीते सुतस्तत्रैव पाठके ॥६॥

अर्थ: उसी गुरुके घर राजाके पुरोहित धूमकेशकी स्वाहा नामकी स्त्रीसे उत्पन्न पिङ्गल नामका पुत्र भी अध्ययन करता था ॥६॥


विद्यालाभस्तयोर्नासीदन्योन्यहृतचेतसोः । विद्याधर्मावगाहश्च जायतेऽवहितात्मनाम् ॥७॥

अर्थ: चित्तोत्सवा और पिङ्गल इन दोनोंका चित्त परस्परमें हरा गया इसलिए उन्हें विद्याकी प्राप्ति नहीं हो पाई । सो ठीक ही है क्योंकि विद्या और धर्मकी प्राप्ति स्थिर-चित्तवालोंको ही होती है ॥७॥


पुरा संसर्गतः प्रीतिः प्राणिनामुपजायते । प्रीतितोऽभिरतिप्राप्ती रतेर्विश्रम्भसंभवः ॥८॥

सद्भावात् प्रणयोत्पत्तिः प्रेमैवं पञ्चहेतुकम् । दुर्मोचं बध्यते कर्म पातकैरिव पञ्चभिः ॥९॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि पहले स्त्री पुरुषका संसर्ग अर्थात् मेल होता है फिर प्रीति उत्पन्न होती है, प्रीतिसे रति उत्पन्न होती है, रतिसे विश्वास उत्पन्न होता है और तदनन्तर विश्वाससे प्रणय उत्पन्न होता है । इस तरह प्रेम पूर्वोक्त पाँच कारणोंसे उत्पन्न होता है । जिस प्रकार हिंसादि पाँच पापोंसे जो छूट न सके ऐसे कर्मका बन्ध होता है उसी प्रकार पूर्वोक्त पाँच कारणोंसे प्राणियोंके गाढ़ प्रेम उत्पन्न होता है ॥८-९॥


अथासौ ज्ञातसद्भावा तेन चित्तोत्सवा रहः । ह्रियतेस्म महारूपा कीर्तिर्दुर्यशसा यथा ॥१०॥

अर्थ: अथानन्तर जब पिंगलको चित्तोत्सवाके अभिप्रायका पूर्ण ज्ञान हो गया तब वह उस रूपवतीको एकान्त पाकर हर ले गया । जिस प्रकार अपयशके द्वारा कीर्तिका अपहरण होता है उसी प्रकार पिंगलके द्वारा चित्तोत्सवका हरण हुआ ॥१०॥


दूरं देशं यदानायि तदाज्ञायि सुबन्धुभिः । हृता प्रमाददोषेण मोहेन सुगतिर्यथा ॥११॥

अर्थ: जब वह उसे बहुत दूर देशमें ले गया तब बन्धुजनोंको उसका पता चला । जिस प्रकार मोहके द्वारा उत्तम गतिका हरण होता है उसी प्रकार प्रमादके द्वारा उस कन्याका हरण हुआ था ॥११॥


कन्यया मुदितश्चौरः पिङ्गलो धनवर्जितः । न विभाति यथा लोभी तृष्णया धर्मवर्जितः ॥१२॥

अर्थ: इधर कन्याको चुरानेवाला पिंगल कन्या पाकर प्रसन्न था, पर निर्धन होनेके कारण वह उससे उस प्रकार सुशोभित नहीं हो रहा था जिस प्रकार कि धर्महीन लोभी मनुष्य तृष्णासे सुशोभित नहीं होता है ॥१२॥


विदग्धनगरं चाप दुर्गमं परराष्ट्रिणाम् । बहिः कृत्वा कुटीं तत्र तस्थौ निःस्वकपाटके ॥१३॥

अर्थ: पिंगल कन्याको लेकर जहाँ दूसरे देशके लोगोंका प्रवेश नहीं हो सकता था ऐसे विदग्ध नगरमें पहुँचा और वहाँ नगरके बाहर जहाँ अन्य दरिद्र मनुष्य रहते थे वहीं कुटी बनाकर रहने लगा ॥१३॥


ज्ञानविज्ञानरहितस्तृणकाष्ठादिविक्रियात् । अनुरक्षति तां पत्नीं मग्नो दारिद्र्यसागरे ॥१४॥

अर्थ: वह ज्ञान-विज्ञानसे रहित था साथ ही दरिद्रतारूपी सागरमें भी निमग्न था इसलिए तृण, काष्ठ आदि बेंचकर अपनी उस पत्नीकी रक्षा करता था ॥१४॥


पुत्रः प्रकाशसिंहस्य परराष्ट्रभयंकरः । जातोऽत्र प्रवरावल्यां राजा कुण्डलमण्डितः ॥१५॥

अर्थ: उसी नगरमें राजा प्रकाशसिंह और प्रवरावली रानीका पुत्र राजा कुण्डलमण्डित रहता था जो कि शत्रुओंके देशको भय उत्पन्न करनेवाला था ॥१५॥


तेन दृष्टान्यदा बाला निर्यातेन कथंचन । हतश्च पञ्चभिर्बाणैर्मारस्याभूत् सुदुःखितः ॥१६॥

अर्थ: एक दिन वह नगरके बाहर गया था सो वहाँ चित्तोत्सवा उसकी दृष्टिमें आयी । देखते ही वह कामके पाँचों बाणोंसे ताड़ित होकर अत्यन्त दुःखी हो गया ॥१६॥


प्रच्छन्नं प्रेषिता दूती तया रात्रौ नृपालयम् । यथासीत् कमलामेला सुमुखस्य प्रवेशिता ॥१७॥

अर्थ: उसने गुप्तरूपसे चित्तोत्सवाके पास दूती भेजी सो उस दूतीने उसे रात्रिके समय राजमहलमें उस तरह प्रविष्ट करा दिया जिस प्रकार कि पहले राजा सुमुखकी दूतीने कमलामेलाको उसके महलमें प्रविष्ट कराया था ॥१७॥


तया सह सुखं रेमे प्रीतः कुण्डलमण्डितः । उर्वश्या सह संरक्तो यथासीन्नलकूबरः ॥१८॥

अर्थ: जिस प्रकार अनुरागसे भरा नलकूबर उर्वशीके साथ रमण करता था उसी प्रकार प्रीतिसे भरा कुण्डलमण्डित उस चित्तोत्सवाके साथ रमण करने लगा ॥१८॥


ततः स पिङ्गलाख्योऽपि श्रान्तः स्वगृहमागमत् । तामपश्यन् विशालाक्षीं मग्नो वैधुर्यसागरे ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर जब वह पिंगल थका-माँदा अपने घर आया तो उस विशाललोचनाको न देखकर दुःखरूपी सागरमें निमग्न हो गया ॥१९॥


विस्तीर्णेन किमुक्तेन सोऽयं विरहदुःखितः । न क्वचिल्लभते सौख्यं चक्रारूढ इवाकुलः ॥२०॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि अधिक कहनेसे क्या ? उसके विरहसे दुःखी हुआ वह चक्रारूढ़की तरह आकुल होता हुआ किसी भी जगह सुख प्राप्त नहीं करता था ॥२०॥


हृतभार्यो द्विजो दीनस्तं राजानमुपागमत् । ऊचे चान्विष्य मे राजन् पत्नी केनापि चोरिता ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी भार्या हरी गयी थी ऐसा वह दीनहीन ब्राह्मण राजाके पास गया और जिस किसी तरह राजाका पता चलाकर बोला कि हे राजन् ! किसीने मेरी स्त्री चुरा ली है ॥२१॥


भीषितानां दरिद्राणामार्तानां च विशेषतः । नारीणां पुरुषाणां च सर्वेषां शरणं नृपः ॥२२॥

अर्थ: राजा ही सबका शरण है और खासकर जो स्त्री-पुरुष भयभीत, दरिद्र तथा दुःखी होते हैं उनका राजा ही शरण होता है ॥२२॥


अमात्यं धूर्तमाहूय समायं पार्थिवोऽब्रवीत् । चिराय मा कृथा माम जायास्यान्विष्यतामिति ॥२३॥

अर्थ: यह सुन राजाने एक धूर्त मन्त्रीको बुलाकर मायासहित कहा कि विलम्ब मत करो, शीघ्र ही इसकी स्त्रीका पता चलाओ ॥२३॥


जगादेति च तत्रैकः सविकारेण चक्षुषा । सा दृष्टा पथिकैर्देव पौदनस्थानवर्त्मनि ॥२४॥

अर्थ: तब एक मन्त्रीने विकारसहित नेत्र चलाकर कहा कि हे राजन् ! उस स्त्रीको तो पथिकोंने पोदनपुरके मार्गमें देखा था ॥२४॥


क्षान्त्यार्यावृन्दमध्यस्था तपः कर्तुं समुद्यता । विनिवर्तय तां क्षिप्रं किं विरौषि व्रज द्विज ॥२५॥

अर्थ: वह आर्यिकाओंके समूहके बीचमें स्थित थी तथा शान्तिपूर्वक तप करनेके लिए तत्पर जान पड़ती थी । अरे ब्राह्मण ! जल्दी जाकर उसे लौटा ला । इधर क्यों रो रहा है ? ॥२५॥


को वा प्राव्रज्यकालोऽस्या दधत्यास्तरुणीं तनुम् । वरस्त्रीगुणपूर्णाया हरन्त्यास्तरुणं जनम् ॥२६॥

अर्थ: जब कि वह यौवनपूर्ण शरीरको धारण कर रही है, उत्तम स्त्रियोंके गुणोंसे परिपूर्ण है तथा तरुण जनोंको हरनेवाली है तब उसका यह तप करनेका समय ही कौन-सा है ? ॥२६॥


इत्युक्ते द्विज उत्थाय बद्ध्वा परिकरं दृढम् । दधाव रंहसा विद्धो भ्रष्टाश्वतरको यथा ॥२७॥

अर्थ: मन्त्रीके ऐसा कहते ही वह ब्राह्मण उठा और अच्छी तरह कमर कसकर वेगसे इस प्रकार दौड़ा जिस प्रकार कि बन्धनसे छूटा घोड़ा दौड़ता है ॥२७॥


पौदने नगरेऽन्विष्य चैत्येषूपवनेषु च । अदृष्ट्वा पुनरागच्छद् विदग्धनगरं द्रुतम् ॥२८॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने पोदनपुरके मन्दिरों तथा उपवनोंमें अपनी स्त्रीकी बहुत खोज की । जब नहीं दिखी तब वह पुनः शीघ्र ही विदग्धनगरमें वापस आ गया ॥२८॥


नृपाज्ञया नरैः क्रूरैर्गलघातैः स तर्जनैः । यष्टिलोष्टप्रहारैश्च दूरं निर्वासितो भृशम् ॥२९॥

अर्थ: राजाकी आज्ञासे दुष्ट मनुष्योंने उसे गलेमें घिच्चा देकर नाना प्रकारकी डाँट दिखाकर तथा लाठी और पत्थरोंसे मारकर बहुत दूर भगा दिया ॥२९॥


स्थानभ्रंशं परिक्लेशमवमानं वधं तथा । अनुभूय परं दीर्घमध्वानं स प्रपन्नवान् ॥३०॥

अर्थ: स्थानभ्रंश, अत्यन्त क्लेश, अपमान और मारका अनुभव कर उसने लम्बा रास्ता पकड़ लिया अर्थात् वह बहुत दूर चला गया ॥३०॥


रतिं न लभते क्वापि रहितः प्रियया तया । शुष्यत्यहनि रात्रौ च पतितोऽग्नाविवोरगः ॥३१॥

अर्थ: स्त्रीके बिना वह कहीं भी रतिको प्राप्त नहीं होता था । वह अग्निमें पड़े हुए साँपके समान रात-दिन सूखता जाता था ॥३१॥


विशालपङ्कजवनं दावाग्निमिव पश्यति । सरोऽपि गाहमानोऽसौ दह्यते विरहाग्निना ॥३२॥

अर्थ: वह कमलोंके विशाल वनको दावानलके समान देखता था और सरोवरमें प्रविष्ट होता हुआ भी विरहाग्निसे जलने लगता था ॥३२॥


एवं सुदुःखितमतिः पर्यटन् पृथिवीतले । नगरस्य स्थितं द्वारे ददर्श गगनाम्बरम् ॥३३॥

आचार्यमार्यगुप्तं च समेत्य रचिताञ्जलिः । प्रणम्य शिरसा हृष्टो धर्मं शुश्राव तत्त्वतः ॥३४॥

अर्थ: इस प्रकार दुःखितहृदय होकर वह पृथिवीपर घूमता रहा । एक दिन उसने नगरके द्वारपर स्थित आर्यगुप्त नामक दिगम्बर आचार्यको देखा । उनके पास जाकर उसने हाथ जोड़कर शिरसे प्रणाम किया तथा हर्षित हो धर्मका यथार्थ स्वरूप सुना ॥३३-३४॥


श्रुत्वा धर्मं मुनेः प्राप्तः स वैराग्यमनुत्तमम् । प्रशशंस जिनेन्द्राणां शासनं शान्तमानसः ॥३५॥

अर्थ: मुनिराजसे धर्म श्रवणकर वह परम वैराग्यको प्राप्त हुआ तथा शान्त-चित्त होकर इस प्रकार जिनशासनकी प्रशंसा करने लगा ॥३५॥


अहो परममाहात्म्यो मार्गोऽयं जिनदेशितः । ममान्धकारयातस्य यो भास्कर इवोदितः ॥३६॥

अर्थ: कि अहो ! जिन-भगवान्के द्वारा प्रदर्शित यह मार्ग उत्कृष्ट प्रभावसे सहित है । मैं अन्धकारमें पड़ा था सो यह मार्ग मेरे लिए मानो सूर्यके समान ही उदित हुआ है ॥३६॥


प्रपद्येऽहं जिनेन्द्राणां शासनं पापनाशनम् । देहं निर्वापयाम्यद्य दग्धं विरहवह्निना ॥३७॥

अर्थ: मैं पापको नष्ट करनेवाले जिनशासनको प्राप्त होता हूँ और विरहरूपी अग्निसे जले हुए [?]स शरीरको आज शान्त करता हूँ ॥३७॥


ततः संवेगमापद्य गुरुणाभ्यनुमोदितः । कृत्वा परिग्रहत्यागं दीक्षां दैगम्बरीमितः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर संवेगको प्राप्त हो तथा गुरुकी आज्ञा लेकर उसने परिग्रहका त्याग कर दिया और दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली ॥३८॥


तथापि विहरन् क्षोणीं सर्वसंगविवर्जितः । चित्तोत्सवासमुत्कण्ठां जातुचित्प्रत्यपद्यत ॥३९॥

अर्थ: यद्यपि वह समस्त परिग्रहसे रहित हो पृथिवी पर विहार करता था तथापि जब कभी भी चित्तोत्सवाके विषयमें उत्कण्ठित हो जाता था ॥३९॥


सरित्पर्वतदुर्गेषु श्मशानेष्वटवीषु च । वसन् स परमं चक्रे तपो विग्रहशोषणम् ॥४०॥

अर्थ: नदी, पर्वत, दुर्ग, श्मशान और अटवियोंमें निवास करता हुआ वह शरीरको सुखानेवाला परम तपश्चरण करता था ॥४०॥


न यस्य जलदध्वान्ते काले खेदं गतं मनः । हेमन्ते हिमपङ्केन वपुर्यस्य न कम्पितम् ॥४१॥

अर्थ: मेघोंसे अन्धकारपूर्ण वर्षाकालमें उसका मन खेदको प्राप्त नहीं होता था और न हेमन्त ऋतुमें हिमके पंकसे उसका शरीर कम्पित होता था ॥४१॥


पूष्णो यस्य करैरुग्रैस्तापोऽणुरपि नो कृतः । स्मृत्वासीदत् सतां जातु स्नेहस्य किमु दुष्करम् ॥४२॥

अर्थ: सूर्यकी तीक्ष्ण किरणोंसे उसे थोड़ा भी सन्ताप नहीं होता था । वह सदा सत्पुरुषोंका स्मरण करता रहता था सो ठीक ही है क्योंकि स्नेहके लिए कौन-सा कार्य दुष्कर अर्थात् कठिन है ? ॥४२॥


दह्यमानं तथाप्येष शरीरं विरहाग्निना । पुनर्विध्यापयञ्जैनवचनोदकसीकरैः ॥४३॥

अर्थ: यह सब था तो भी उसका शरीर विरहाग्नि से जलता रहता था जिसे वह जिनेन्द्र भगवान्के वचनरूपी जलके छींटोंसे पुनः-पुनः शान्त करता था ॥४३॥


अर्धदग्धतरुच्छायं तत्तस्य वपुरागतम् । रमणीस्मरणेनोग्रतपसा च निरन्तरम् ॥४४॥

अर्थ: इस प्रकार निरन्तर होनेवाले स्त्रीके स्मरण तथा उग्र तपश्चरणसे उसका वह शरीर अधजले वृक्षके समान काला हो गया था ॥४४॥


आस्तां तावदिदं वक्ष्ये मण्डितस्याधुनेहितम् । कथा ह्यन्तरयोगेन स्थिता रत्नावली यथा ॥४५॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी कहते हैं कि अब यह कथा रहने दो। इसके बाद कुण्डलमण्डितकी कथा कहता हूँ सो सुनो ! यथार्थमें जिस प्रकार रत्नावली बीच-बीचमें दूसरे रत्नोंके अन्तरसे निर्मित होती है उसी प्रकार कथा भी बीच-बीचमें दूसरी-दूसरी कथाओंके अन्तरसे निर्मित होती है ॥४५॥


अनरण्ये च राज्यस्थे वृत्तमेतन्निबुध्यताम् । कथानुक्रमयोगेन कथ्यमानमतः शृणु ॥४६॥

अर्थ: जिस समय राजा अनरण्य राज्यमें स्थित थे अर्थात् राज्य करते थे उस समयकी यह कथा है सो कथाके अनुक्रमसे कही जानेवाली इस अवान्तर कथाको सुनो ॥४६॥


स्थानं दुर्गं समाश्रित्य मण्डितेन वसुन्धरा । विराधितानरण्यस्य कुशीलेन यथा स्थितिः ॥४७॥

अर्थ: कुण्डलमण्डित दुर्गम गढ़का अवलम्बन कर सदा अनरण्यकी भूमिको उस तरह विराधित करता रहता था जिस प्रकार कि कुशील मनुष्य कुलकी मर्यादाको विराधित करता रहता है ॥४७॥


देशा उद्वासिता तेन दुर्जनेन गुणा यथा । विरोधिताश्च सामन्ताः कषाया इव योगिना ॥४८॥

अर्थ: जिस प्रकार दुर्जन गुणोंको उजाड़ देता है उसी प्रकार उसने अनरण्यके बहुत-से देश उजाड़ दिये और जिस प्रकार योगी कषायोंका अवरोध करते हैं उसी प्रकार उसने बहुत-से सामन्तोंका अवरोध कर दिया ॥४८॥


नाशकनोदनरण्यस्तं ग्रहीतुं क्षुद्रमप्यलम् । आखोर्गिरिविलस्थस्य किं करोतु मृगाधिपः ॥४९॥

अर्थ: यद्यपि वह क्षुद्र था तो भी अनरण्य उसे पकड़नेके लिए समर्थ नहीं हो सका । सो ठीक ही है क्योंकि पहाड़के बिलमें स्थित चूहेका सिंह क्या कर सकता है ? ॥४९॥


नक्तंदिवमशुष्यत् स तत्पराजयचिन्तया । अनादरेण शारीरमपि कर्म प्रपन्नवान् ॥५०॥

अर्थ: वह रात-दिन उसीके पराजयकी चिन्तासे सूखता जाता था । भोजन, पान आदि शरीर-सम्बन्धी कार्य भी वह अनादरसे करता था ॥५०॥


ततोऽसौ बालचन्द्रेण सेनान्या जात्वभाष्यत । उद्विग्न इव कस्मात्त्वं सततं नाथ लक्ष्यसे ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर किसी दिन उसके बालचन्द्र नामा सेनापतिने उससे कहा कि हे नाथ ! आप सदा उद्विग्न-से क्यों दिखाई देते हैं ? ॥५१॥


उद्वेगकारणं भद्र मम मण्डितकः परम् । इत्युक्ते बालचन्द्रेण प्रतिज्ञेयं समाश्रिता ॥५२॥

राजन्नसाधयित्वा तं पापं मण्डितकं तव । सकाशं नागमिष्यामि व्रतमेतन्मया कृतम् ॥५३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा अनरण्यने कहा कि हे भद्र ! मेरे उद्वेगका परम कारण कुण्डलमण्डित है। राजाके यह कहनेपर बालचन्द्र सेनापतिने यह प्रतिज्ञा की कि हे राजन् ! ‘पापी कुण्डलमण्डितको वश किये बिना मैं आपके समीप नहीं आऊँगा’ मैंने यह व्रत लिया है ॥५२-५३॥


इति राज्ञः पुरः कृत्वा संगरं रोषमुद्वहन् । बलेन चतुरङ्गेण सेनानीर्गन्तुमुद्यतः ॥५४॥

अर्थ: इस प्रकार राजाके सामने प्रतिज्ञा कर क्रोध धारण करता हुआ सेनापति चतुरंग सेनाके साथ जानेके लिए उद्यत हुआ ॥५४॥


चित्तोत्सवासमायुक्तचित्तो मुक्तान्यचेष्टितः । प्रमादबहुलो भिन्नमूलभृत्पक्षतायतिः ॥५५॥

अज्ञातलोकवृत्तान्तो मण्डितः खण्डितोद्यमः । हेलया बालचन्द्रेण गत्वा बद्धो मृगो यथा ॥५६॥

अर्थ: उधर चित्तोत्सवामें जिसका चित्त लग रहा था ऐसा कुण्डलमण्डित अन्य सब चेष्टाएँ छोड़कर प्रमादसे परिपूर्ण था। उसके मन्त्री आदि मूल पक्षके सभी लोग उससे भिन्न हो चुके थे। लोकमें कहाँ क्या हो रहा है ? इसका उसे कुछ भी पता नहीं था। सब प्रकारका उद्यम छोड़कर वह एक स्त्रीमें ही आसक्त हो रहा था। सो अनरण्यके सेनापति बालचन्द्रने जाकर उसे मृगकी भाँति अनायास ही बाँध लिया ॥५५-५६॥


गृहीतबलराज्यं तं निर्वास्य विषयात् कृती । बालचन्द्रोऽनरण्यस्य समीपं पुनरागमत् ॥५७॥

अर्थ: चतुर बालचन्द्र उसकी सेना और राज्यपर अपना अधिकार कर तथा उसे देशसे निकालकर अनरण्यके समीप वापस आ गया ॥५७॥


ततस्तेन सुभृत्येन कृतसुस्थवसुन्धरः । परं प्रमोदमापन्नोऽनरण्यः सुखमन्वभूत् ॥५८॥

अर्थ: इस प्रकार उस उत्तम सेवकके द्वारा जिसकी वसुधामें पुनः सुख-शान्ति स्थापित की गयी थी ऐसा अनरण्य परम हर्षको प्राप्त होता हुआ सुखका अनुभव करने लगा ॥५८॥


शरीरमात्रधारी तु मण्डितः पादचारकः । पर्यटन् धरणीं दुःखी पश्चात्ताप-समाहतः ॥५९॥

अर्थ: कुण्डलमण्डितका सब राज्य छिन गया था, शरीर मात्र ही उसके पास बचा था। ऐसी दशामें वह पैदल ही पृथिवीपर भ्रमण करता था, सदा दुःखी रहता था और पश्चात्ताप करता रहता था ॥५९॥


परिप्राप्याश्रमपदं श्रमणानां महात्मनाम् । नत्वा च शिरसाचार्यं धर्मं पप्रच्छ भावतः ॥६०॥

अर्थ: एक दिन वह भ्रमण करता हुआ दिगम्बर मुनियोंके तपोवनमें पहुँचा। वहाँ आचार्य महाराजको शिरसे नमस्कार कर उसने भावपूर्वक धर्मका स्वरूप पूछा ॥६०॥


दुःखितानां दरिद्राणां वर्जितानां च बान्धवैः । व्याधिसंपीडितानां च प्रायो भवति धर्मधीः ॥६१॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि दुःखी, दरिद्री, भाई-बन्धुओंसे रहित ओर रोगसे पीड़ित मनुष्योंकी बुद्धि प्रायः धर्ममें लगती ही है ॥६१॥


प्राव्रज्ये यस्य भगवन् शक्तिर्जन्तोर्न विद्यते । परिग्रहपरस्यास्य धर्मः कश्चिन्न विद्यते ॥६२॥

अर्थ: उसने पूछा कि हे भगवन् ! जिसकी मुनिदीक्षा लेनेकी शक्ति नहीं है उस परिग्रही मनुष्यके लिए क्या कोई धर्म नहीं है ? ॥६२॥


कथं वा मुच्यते पापैश्चतुःसंज्ञापरायणः । एतदिच्छामि विज्ञातुं प्रसीद व्याकुरुष्व मे ॥६३॥

अर्थ: अथवा चारों संज्ञाओंमें तत्पर रहनेवाला गृहस्थ पापोंसे किस प्रकार छूट सकता है ? मैं यह जानना चाहता हूँ सो आप प्रसन्न होकर मेरे लिए यह सब बताइए ॥६३॥


गुरुः प्रोवाच वचनं धर्मः प्राणिदया स्मृता । मुच्यन्ते देहिनः पापैरात्मनिन्दाविगर्हणैः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजने निम्नांकित वचन कहे कि जीवदया धर्म है तथा अपनी निन्दा गर्हा आदि करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाते हैं ॥६४॥


हिंसायाः कारणं घोरं शुक्रशोणितसंभवम् । पिशितं मा भक्षय त्वं शुद्धं चेद्धर्ममिच्छसि ॥६५॥

अर्थ: यदि तू शुद्ध अर्थात् निर्दोष धर्म धारण करना चाहता है तो हिंसाका भयंकर कारण तथा शुक्र और शोणितसे उत्पन्न मांसका कभी भक्षण नहीं कर ॥६५॥


प्राणिनां मृत्युभीरूणां मांसैश्चर्मप्रसेविकाम् । पूरयित्वा ध्रुवं याति नरकं पापमानवः ॥६६॥

अर्थ: जो पापी पुरुष मृत्युसे डरनेवाले प्राणियोंके मांससे अपना पेट भरता है वह अवश्य ही नरक जाता है ॥६६॥


शिरसो मुण्डनैः स्नानैर्विलिङ्गग्रहणादिभिः । नास्ति संधारणं जन्तोर्मांसभक्षणकारिणः ॥६७॥

अर्थ: शिर मुँड़ाना, स्नान करना तथा नाना प्रकारके वेष धारण करना आदि कार्योंसे मांसभक्षी मनुष्यकी रक्षा नहीं हो सकती ॥६७॥


तीर्थस्नानानि दानानि सोपवासानि देहिनः । नरकान्न परित्राणं कुर्वन्ति पिशिताशिनः ॥६८॥

अर्थ: तीर्थक्षेत्रोंमें स्नान करना, दान देना तथा उपवास करना आदि कार्य मांसभोजी मनुष्यको नरकसे बचानेमें समर्थ नहीं हैं ॥६८॥


सर्वजातिगता जीवा बान्धवाः पूर्वजन्मसु । स्युरमी भक्षितास्तेन मांसभक्षणकारिणा ॥६९॥

अर्थ: समस्त जातियोंके जीव इस प्राणीके पूर्वभवोंमें बन्धु रह चुके हैं। अतः मांसभक्षण करनेवाला मनुष्य अपने इन्हीं भाई-बन्धुओंको खाता है यह समझना चाहिए ॥६९॥


पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति परिपन्थं च तिष्ठति । यो नरोऽस्मादपि क्रूरां मधुमांसाद् गतिं व्रजेत् ॥७०॥

अर्थ: जो मनुष्य पक्षी, मत्स्य और मृगोंको मारता है तथा इनके विरुद्ध आचरण करता है वह मधु-मांसभक्षी मनुष्य इन पक्षी आदिसे भी अधिक क्रूर गतिको प्राप्त होता है ॥७०॥


न वृक्षाज्जायते मांसं नोद्भिद्य धरणीतलम् । नाम्भसः पद्मवन्नापि सद्द्रव्येभ्यो यथौषधम् ॥७१॥

पक्षिमत्स्यमृगान् हत्वा वराकान् प्रियजीवितान् । क्रूरैरुत्पाद्यते मांसं तन्नाश्नन्ति दयापराः ॥७२॥

अर्थ: मांस न वृक्षसे उत्पन्न होता है, न पृथिवीतलको भेदन कर निकलता है, न कमलकी तरह पानीसे उत्पन्न होता है और न औषधिके समान किन्हीं उत्तम द्रव्योंसे उत्पन्न होता है । किन्तु जिन्हें अपना जीवन प्यारा है ऐसे पक्षी, मत्स्य, मृग आदि दीन-हीन प्राणियोंको मारकर दुष्ट मनुष्य मांस उत्पन्न करते हैं । इसलिए दयालु मनुष्य उसे कभी नहीं खाते ॥७१-७२॥


स्तन्येन वर्धितं यस्या शरीरं तां मृतां सतीम् । महिषीं मातरं कष्टं भक्षयन्ति नराधमाः ॥७३॥

अर्थ: जिसके दूधसे शरीर पुष्ट होता है तथा जो माताके समान है ऐसी भैंसके मरनेपर नीच मनुष्य उसे खा जाता है यह कितने कष्टकी बात है ? ॥७३॥


माता पिता च पुत्रश्च मित्राणि च सहोदराः । भक्षितास्तेन यो मांसं भक्षयत्यधमो नरः ॥७४॥

अर्थ: जो नीच मनुष्य मांस खाता है उसने माता, पिता, पुत्र, मित्र और भाइयोंका ही भक्षण किया है ॥७४॥


इतः क्ष्मापटलं मेरोरधस्तात् सप्तकं स्मृतम् । तत्र रत्नप्रभाभिख्ये देवा भवनवासिनः ॥७५॥

सकषायं तपः कृत्वा जायन्ते तत्र देहिनः । देवानामधमास्ते तु दुष्टकर्मसमन्विताः ॥७६॥

अर्थ: यहाँसे मेरु पर्वतके नीचे सात पृथिवियाँ हैं उनमें-से रत्नप्रभानामक पृथिवीमें भवनवासी देव रहते हैं। जो मनुष्य कषायसहित तप करते हैं वे उनमें उत्पन्न होते हैं। भवनवासो देव सब देवोंमें नीच देव कहलाते हैं तथा ये दुष्ट कार्य करनेवाले होते हैं ॥७५-७६॥


अधस्तस्याः क्षितेरन्या दारुणः षट् च भूमयः । नारका यासु पापस्य भुञ्जन्ते कर्मणः फलम् ॥७७॥

अर्थ: रत्नप्रभा पृथिवीके नीचे छह भयंकर पृथिवियाँ और हैं जिनमें नारकी जीव पाप कर्मका फल भोगते हैं ॥७७॥


कुरूपा दारुणारावा दुःस्पर्शा ध्वान्तपूरिताः । उपमोज्झितदुःखानां कारणीभूतविग्रहाः ॥७८॥

अर्थ: वे नारकी कुरूप होते हैं, उनके शब्द अत्यन्त दारुण होते हैं, वे अन्धकारसे परिपूर्ण रहते हैं तथा उनके शरीर उपमातीत दुःखोंके कारण हैं ॥७८॥


कुम्भीपाकाख्यमाख्यातं नरकं भीमदर्शनम् । नदी वैतरणी घोरा शाल्मली क्रूरकण्टका ॥७९॥

अर्थ: उन पृथिवियोंमें कुम्भीपाक नामका भयंकर नरक है, भय उत्पन्न करनेवाली वैतरणी नदी है, तथा तीक्ष्ण काँटोंसे युक्त शाल्मली वृक्ष है ॥७९॥


असिपत्रवनच्छन्नाः क्षुरधाराश्च पर्वताः । ज्वलदग्निनिभास्तीक्ष्णलोहकीला निरन्तराः ॥८०॥

अर्थ: असिपत्र वनसे आच्छादित तथा क्षुरोंकी धारके समान तीक्ष्ण पर्वत हैं और जलती हुई अग्निके समान निरन्तर लोहेकी तीक्ष्ण कीलें वहाँ व्याप्त हैं ॥८०॥


तेषु ते तीव्रदुःखानि प्राप्नुवन्ति निरन्तरम् । प्राणिनो मधुमांसादा घातकाश्चासुधारिणाम् ॥८१॥

अर्थ: मधु मांस खानेवाले तथा प्राणियोंका घात करनेवाले जीव उन नरकोंमें निरन्तर तीव्र दुःख पाते रहते हैं ॥८१॥


नास्त्यर्धाङ्गुलमात्रोऽपि प्रदेशस्तत्र दुःखितैः । क्रियते नारकैर्यत्र निमेषमपि विश्रमः ॥८२॥

अर्थ: वहाँ अर्ध-अंगुल प्रमाण भी ऐसा प्रदेश नहीं है जहाँ दुःखी नारकी निमेषमात्रके लिए भी विश्राम कर सकें ॥८२॥


प्रच्छन्नमिह तिष्ठाम इति ध्यात्वा पलायिताः । हन्यन्ते निर्दयैरन्यैर्नारकैरमरैश्च ते ॥८३॥

अर्थ: ‘हम यहाँ छिपकर रहेंगे’ ऐसा सोचकर नारकी भागकर जाते हैं पर वहींपर दयाहीन अन्य नारकी और दुष्ट देव उनका घात करने लगते हैं ॥८३॥


ज्वलदङ्गारकुटिले दग्धा मत्स्या इवानिले । विरसं विहिताक्रन्दा विनिःसृत्य कथंचन ॥८४॥

नारकाग्निभयग्रस्ताः प्राप्ता वैतरणीजलम् । चण्डक्षारोर्मिभिर्भूयो दह्यन्ते वह्नितोऽधिकम् ॥८५॥

अर्थ: जिस प्रकार जलते हुए अंगारोंसे कुटिल अग्निमें जलते हुए मच्छ विरस शब्द करते हैं उसी प्रकार नारकी भी अग्निमें पड़कर विरस शब्द करते हैं। यदि अग्निके भयसे भयभीत हो किसी तरह निकलकर वैतरणी नदीके जलमें पहुँचते हैं तो अत्यन्त खारी तरंगोंके द्वारा अग्निसे भी अधिक जलने लगते हैं ॥८४-८५॥


असिपत्रवनं याताश्छायाप्रत्याशया द्रुतम् । पतद्भिस्तत्र दार्यन्ते चक्रखड्गगदादिभिः ॥८६॥

अर्थ: यदि छायाकी इच्छासे शीघ्र ही भागकर असिपत्र वनमें पहुँचते हैं तो वहाँ पड़ते हुए चक्र, खड्ग, गदा आदि शस्त्रोंसे उनके खण्ड-खण्ड हो जाते हैं ॥८६॥


विच्छिन्ननासिकाकर्णस्कन्धजङ्घादिविग्रहाः । कुम्भीपाके नियुज्यन्ते वान्तशोणितवर्षिणः ॥८७॥

अर्थ: जिनके नाक, कान, स्कन्ध तथा जंघा आदि अवयव काट लिये गये हैं तथा जो निकलते हुए खूनकी मानो वर्षा करते हैं ऐसे उन नारकियोंको कुम्भी-पाकमें डाला जाता है अर्थात् किसी घड़े आदिमें भरकर उन्हें पकाया जाता है ॥८७॥


प्रपीड्यन्ते च यन्त्रेषु क्रूरारावेषु विह्वलाः । पुनः शैलेषु भिद्यन्ते तीक्ष्णेषु विरसस्वराः ॥८८॥

अर्थ: जिनसे क्रूर शब्द निकल रहा है ऐसे कोल्हुओंमें उन विह्वल नारकियोंको पेल दिया जाता है फिर तीक्ष्ण नुकीले पर्वतों पर गिराकर उनके टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं जिससे वे विरस शब्द करते हैं ॥८८॥


उल्लङ्घ्यन्तेऽतितुङ्गेषु पादपेष्वन्धकारिषु । ताड्यन्ते मुद्गराघातैर्महद्भिर्मस्तके तथा ॥८९॥

अर्थ: अन्धा कर देनेवाले बहुत ऊँचे वृक्षोंपर उन्हें चढ़ाया जाता है तथा बड़े-बड़े मुद्गरों की चोटसे उनका मस्तक पीटा जाता है ॥८९॥


जलं प्रार्थयमानानां तृष्णार्तानां प्रदीयते । ताम्रादिकललं तेन दग्धदेहाः सुदुःखिताः ॥९०॥

अर्थ: जो नारकी प्याससे पीड़ित होकर पानी माँगते हैं उनके लिए तामा आदि धातुओंका कलल ( पिघलाया हुआ रस ) दिया जाता है जिससे उनका शरीर जल जाता है तथा अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं ॥९०॥


ब्रुवते नास्ति तृष्णा न इत्यतोऽपि बलादमी । पाय्यन्ते तदतिक्रूरैः संदंशव्यावृताननाः ॥९१॥

अर्थ: यद्यपि वे कहते हैं कि हमें प्यास नहीं लगी है तो भी जबर्दस्ती संडासीसे मुँह फाड़कर उन्हें वह कलल पिलाया जाता है ॥९१॥


प्रपात्य भूतले भूयो वक्षस्याक्रम्य दीयते । पादः क्रूरवचोभिस्तैस्तेषां कल्मषकर्मणाम् ॥९२॥

अर्थ: पाप करनेवाले उन नारकियोंको जमीनपर गिराकर तथा उनकी छातीपर चढ़कर दुष्ट वचन बोलते हुए बलवान् नारकी उन्हें पैरोंसे रूँदते हैं ॥९२॥


तेषां निर्दग्धकण्ठानां दह्यते हृदयं पुनः । निष्क्रामन्ति पुरीतन्ति निर्भिद्य जठरं सह ॥९३॥

अर्थ: पूर्वोक्त कललपानसे उन नारकियोंके कण्ठ जल जाते हैं तथा हृदय जलने लगते हैं । यही नहीं पेट फोड़कर उनकी आँते भी बाहर निकल आती हैं ॥९३॥


परस्परकृतं दुःखं तथा भवनवासिभिः । नरका यत्प्रपद्यन्ते कस्तद्वर्णयितुं क्षमः ॥९४॥

अर्थ: इसके सिवाय भवनवासी देव उन्हें परस्पर लड़ाकर जो दुःख प्राप्त कराते हैं उसका वर्णन करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥९४॥


इति ज्ञात्वा महादुःखं नरके मांससंभवम् । वर्जनीयं प्रयत्नेन विदुषा मांसभक्षणम् ॥९५॥

अर्थ: इस तरह मांस खानेसे नरकमें महादुःख भोगना पड़ता है ऐसा जानकर समझदार पुरुषको प्रयत्नपूर्वक मांसभक्षणका त्याग करना चाहिए ॥९५॥


अत्रान्तरे जगादैवं कुण्डलस्त्रस्तमानसः । नाथाणुव्रतयुक्तानां का गतिर्दृश्यते वद ॥९६॥

अर्थ: इसी बीचमें जिसका मन अत्यन्त भयभीत हो रहा था ऐसे कुण्डलमण्डितने कहा कि हे नाथ ! अणुव्रतसे युक्त मनुष्योंकी क्या गति होती है सो कहिए ॥९६॥


गुरुरूचे न यो मांसं खादत्यतिदृढव्रतः । तस्य वक्ष्यामि यत्पुण्यं सम्यग्दृष्टेर्विशेषतः ॥९७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गुरु महाराजने कहा कि जो मांस नहीं खाता है तथा अत्यन्त दृढ़तासे व्रत पालन करता है उसे तथा खासकर सम्यग्दृष्टि मनुष्यको जो पुण्य होता है उसे कहता हूँ ॥९७॥


उपवासादिहीनस्य दरिद्रस्यापि धीमतः । मांसभुक्तेर्निवृत्तस्य सुगतिर्हस्तवर्तिनी ॥९८॥

अर्थ: जो बुद्धिमान् मनुष्य मांस-भक्षणसे दूर रहता है भले ही वह उपवासादिसे रहित हो तथा दरिद्र हो तो भी उत्तम गति उसके हाथमें रहती है ॥९८॥


यः पुनः शीलसंपन्नो जिनशासनभावितः । सोऽणुव्रतधरः प्राणी सौधर्मादिषु जायते ॥९९॥

अर्थ: और जो शीलसे सम्पन्न तथा जिनशासनकी भावनासे युक्त होता हुआ अणुव्रत धारण करता है वह सौधर्मादि स्वर्गोंमें उत्पन्न होता है ॥९९॥


अहिंसा प्रवरं मूलं धर्मस्य परिकीर्तितम् । सा च मांसान्निवृत्तस्य जायतेऽत्यन्तनिर्मला ॥१००॥

अर्थ: धर्मका उत्तम मूल कारण अहिंसा कही गयी है। जो मनुष्य मांस-भक्षणसे निवृत्त रहता है उसीके अत्यन्त निर्मल अहिंसा-धर्म पलता है ॥१००॥


दयावान् सङ्गवान् योऽपि म्लेच्छश्चाण्डाल एव वा । मधुमांसान्निवृत्तः सन् सोऽपि पापेन मुच्यते ॥१०१॥

अर्थ: जो परिग्रही म्लेच्छ अथवा चाण्डाल भी क्यों न हो यदि दयालु है और मधु-मांस-भक्षणसे दूर रहता है तो वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ॥१०१॥


मुक्तमात्रः स पापेन पुण्यं गृह्णाति मानवः । जायते पुण्यबन्धेन सुरः सन्मनुजोऽथवा ॥१०२॥

अर्थ: ऐसा जीव पापसे मुक्त होते ही पुण्य-बन्ध करने लगता है और पुण्य-बन्धके प्रभावसे वह देव अथवा उत्तम मनुष्य होता है ॥१०२॥


सम्यग्दृष्टिः पुनर्जन्तुः कृत्वाणुव्रतधारणम् । लभते परमान्भोगान् ध्रुवं स्वर्गनिवासिनाम् ॥१०३॥

अर्थ: यदि सम्यग्दृष्टि मनुष्य अणुव्रत धारण करता है तो वह निश्चित ही देवोंके उत्कृष्ट भोग प्राप्त करता है ॥१०३॥


इत्याचार्यस्य वचनं श्रुत्वा कुण्डलमण्डितः । मन्दभाग्यतया शक्त्या रहितोऽणुव्रतेष्वपि ॥१०४॥

अर्थ: इस प्रकार आचार्यके वचन सुनकर कुण्डलमण्डित मन्द भाग्य होनेसे अणुव्रत धारण करनेके लिए भी समर्थ नहीं हो सका ॥१०४॥


प्रणिपत्य गुरुं मूर्ध्ना मधुमांसविवर्जनम् । जग्राह शरणोपेतं समीचीनं च दर्शनम् ॥१०५॥

अर्थ: अतः उसने शिरसे गुरुको नमस्कार कर मधुमांसका परित्याग किया और शरणभूत सम्यग्दर्शन धारण किया ॥१०५॥


कृत्वा चैत्ये नमस्कारं गुरोर्दिग्वाससां तथा । निष्क्रान्तः स ततो देशादिति चिन्तामुपागतः ॥१०६॥

मातुः सहोदरो भ्राता कृतान्तसमविक्रमः । ध्रुवं मे सीदतः सोऽयं भविष्यत्यवलम्बनम् ॥१०७॥

राजा भूत्वा पुनः शत्रुं जेष्यामीति सुनिश्चितः । आशां वहन् प्रवृत्तोऽसावातुरो दक्षिणापथम् ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर जिन-प्रतिमा और दिगम्बराचार्यको नमस्कार कर वह ऐसा, विचार करता हुआ उस देशसे बाहर निकला कि मेरी माताका सगा भाई यमराजके समान पराक्रमका धारी है सो वह विपत्तिमें पड़े हुए मेरी अवश्य ही सहायता करेगा । मैं फिरसे राजा होकर निश्चित ही शत्रुको जीतूँगा । ऐसी आशा रखता हुआ वह कुण्डलमण्डित दुःखी हो दक्षिण दिशाकी ओर चला ॥१०६-१०८॥


श्रमादिदुःखपूर्णस्य व्रजतोऽस्य शनैः शनैः । उदीयुर्व्याधयो देहे पापैरन्यभवार्जितैः ॥१०९॥

अर्थ: वह थकावट आदि दुःखोंसे परिपूर्ण होनेके कारण धीरे-धीरे चलता था। बीचमें पूर्वभवमें संचित पाप कर्मके उदयसे उसके शरीरमें अनेक रोग प्रकट हो गये ॥१०९॥


सन्धिषु च्छिद्यमानेषु भिद्यमानेषु मर्मसु । सर्वस्य जगतोऽत्राणं मरणं तस्य ढौकितम् ॥११०॥

अर्थ: उसकी सन्धियाँ छिन्न होने लगीं और मर्म स्थानोंमें भयंकर पीड़ा होने लगी । अन्तमें समस्त संसार जिससे नहीं बचा सकता ऐसा उसका मरण आ पहुँचा ॥११०॥


मुञ्चते समये यस्मिन् जीवं कुण्डलमण्डितः । तत्रैव च्यवते देवः शेषपुण्याद्दिवश्च्युतः ॥१११॥

अर्थ: जिस समय कुण्डल-मण्डितने प्राण छोड़े उसी समय चित्तोत्सवाका जीव जो स्वर्गमें देव हुआ था शेष पुण्यके प्रभावसे स्वर्गसे च्युत हुआ ॥१११॥


गर्भं च तौ विदेहाया विधिना परियोजितौ । पश्य कर्मानुभावस्य विचित्रमिति चेष्टितम् ॥११२॥

अर्थ: भाग्यवश वे दोनों ही जीव राजा जनककी रानी विदेहाके गर्भमें उत्पन्न हुए। गौतमस्वामी कहते हैं कि अहो श्रेणिक ! कर्मोदयकी यह विचित्र चेष्टा देखो ॥११२॥


एतस्मिन्नन्तरे साधु कालं कृत्वा स पिङ्गलः । तपोबलान्महातेजा महाकालोऽसुरोऽभवत् ॥११३॥

अर्थ: इसी बीचमें वह पिंगल ब्राह्मण अच्छी तरह मरण कर तपके प्रभावसे महातेजस्वी महाकाल नामका असुर हुआ ॥११३॥


भवनेऽवधिना स्मृत्वा धर्मस्य च फलोदयम् । दध्यौ चित्तोत्सवा क्वेति तावज्जज्ञे यथाविधि ॥११४॥

अर्थ: उसने उत्पन्न होते ही अवधिज्ञानसे धर्मके फलका विचार किया और साथ ही इस बातका ध्यान किया कि चित्तोत्सवा कहाँ उत्पन्न हुई है ? वह अपने अवधिज्ञानसे इन सब बातोंको अच्छी तरहसे जान गया ॥११४॥


दुष्टया किं तया कृत्यं क्वासौ कुण्डलमण्डितः । येनाहं प्रापितोऽवस्थां विधुरां विरहार्णवे ॥११५॥

अर्थ: फिर कुछ देर बाद उसने विचार किया कि मुझे उस दुष्टासे क्या प्रयोजन है ? वह कुण्डलमण्डित कहाँ है जिसने मुझे विरहरूपी सागरमें गिराकर दुःखपूर्ण अवस्था प्राप्त करायी थी ॥११५॥


पत्न्यां जनकराजस्य गर्भमाश्रित्य मण्डितः । साकमन्येन जीवेन विवेद स्थित इत्यसौ ॥११६॥

अर्थ: उसने अवधिज्ञानसे यह जान लिया कि कुण्डलमण्डित राजा जनककी पत्नीके गर्भमें चित्तोत्सवाके जीवके साथ विद्यमान है ॥११६॥


सूतां तावदियं देवी युगलं किं ममानया । गर्भद्वितययोगिन्या मृतयास्ति प्रयोजनम् ॥११७॥

ततो निर्लुठितं सन्तं पापं मण्डितकं भ्रुवम् । नेष्यामि यदहं दुःखं तत्तमेव दुरीहितम् ॥११८॥

अर्थ: उसने विचार किया कि यदि गर्भमें ही इसे मारता हूँ तो रानी विदेहा मरणको प्राप्त होगी इसलिए यह युगल सन्तानको उत्पन्न करे पीछे देखा जायेगा । दो गर्भको धारण करनेवाली इस रानीके मारनेसे मुझे क्या प्रयोजन है ? गर्भसे निकलते ही इस पापी कुण्डलमण्डितको अवश्य ही भारी दुःख प्राप्त कराऊँगा ॥११७-११८॥


इति संचिन्तयन् क्रुद्धः पूर्वकर्मानुबन्धतः । देवो रक्षति तं गर्भं संमृदन्पाणिना करम् ॥११९॥

अर्थ: ऐसा विचार करता हुआ वह असुर पूर्वकर्मके प्रभावसे अत्यन्त क्रुद्ध रहने लगा तथा हाथसे हाथको मसलता हुआ उस गर्भकी रक्षा करने लगा ॥११९॥


इति ज्ञात्वा क्षमं कर्तुं दुःखं जन्तोर्न कस्यचित् । कालव्यवहितं तद्धि कृतमात्मन एव हि ॥१२०॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि राजन् ! ऐसा जानकर कभी किसीको दुःख पहुँचाना उचित नहीं है क्योंकि कालान्तरमें वह दुःख अपने आपको भी प्राप्त होता है ॥१२०॥


कालेनाथ सुतं देवी प्रसूता युगलं शुभम् । सुतं दुहितरं चान्ते जहार पृथुकं सुरः ॥१२१॥

अर्थ: अथानन्तर समय आनेपर रानी विदेहाने एक पुत्र और एक पुत्री इस प्रकार युगल सन्तान उत्पन्न की। सो उत्पन्न होते ही असुरने पुत्रका अपहरण कर लिया ॥१२१॥


आस्फाल्य मारयाम्येनं शिलायां पूर्वमण्डितम् । इति ध्यातं पुरा तेन पुनरेवमचिन्तयत् ॥१२२॥

अर्थ: उसने पहले तो विचार किया कि इस कुण्डलमण्डितके जीवको मैं शिलापर पछाड़कर मार डालूँ। फिर कुछ देर बाद वह विचार करने लगा ॥१२२॥


धिङ्मया चिन्तितं सर्वं संसारपरिवर्धनम् । जायते कर्मणा येन तत्कुर्वीत कथं बुधः ॥१२३॥

अर्थ: कि मैंने जो विचार किया है उसे धिक्कार है । जिस कार्यके करनेसे संसार ( जन्म-मरण ) की वृद्धि होती है उस कार्यको बुद्धिमान् मनुष्य कैसे कर सकता है ? ॥१२३॥


तृणस्यापि पुरा दुःखं श्रामण्ये न कृतं मया । सर्वारम्भनिवृत्तेन तपोवीवधवाहिना ॥१२४॥

अर्थ: पूर्वभवमें मुनि अवस्थामें जब मैं सब प्रकारके आरम्भसे रहित था तथा तपरूपी काँवरको धारण करता था तब मैंने तृणको भी दुःख नहीं पहुँचाया था ॥१२४॥


गुरोस्तस्य प्रसादेन कृत्वा धर्मं सुनिर्मलम् । ईदृशीं द्युतिमाप्तोऽस्मि करोमि दुरितं कथम् ॥१२५॥

अर्थ: उन गुरुके प्रसादसे अत्यन्त निर्मल धर्म धारण कर मैं ऐसी कान्तिको प्राप्त हुआ हूँ। अतः अब ऐसा पाप कैसे कर सकता हूँ ॥१२५॥


स्वल्पमप्यर्जितं पापं व्रजत्युपचयं परम् । निमग्नो येन संसारे चिरं दुःखेन दह्यते ॥१२६॥

अर्थ: संचित किया हुआ थोड़ा पाप भी परम वृद्धिको प्राप्त हो जाता है जिससे संसार-सागरमें निमग्न हुआ यह जीव चिरकाल तक दुःखसे जलता रहता है ॥१२६॥


निर्दोषभावनो यस्तु दयावान् सुसमाहितः । स्थितं करतले तस्य रत्नं सुगतिसंज्ञकम् ॥१२७॥

अर्थ: परन्तु जिसकी भावना निर्दोष है, जो दयालु है और जो अपने परिणामोंको ठीक रखता है सुगतिरूपी रत्न उसके करतलमें स्थित रहता है ॥१२७॥


घृणावान् संप्रधार्येदं तमलंकृत्य बालकम् । कुण्डले कर्णयोरस्य चक्रे दीप्तांशुमण्डले ॥१२८॥

अर्थ: ऐसा विचार करके हृदयमें दया उत्पन्न हो गयी जिससे उसने उस बालकको मारनेका विचार छोड़ दिया तथा उसके कानोंमें देदीप्यमान किरणोंके धारक कुण्डल पहनाकर उसे अलंकृत कर दिया ॥१२८॥


पर्णलघ्वीं ततो विद्यां संक्रमय्य शिशौ सुरः । सुखदेशे विमुच्यैनं गतो धाम मनीषितम् ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर वह देव उस बालकमें पर्णलघ्वी विद्याका प्रवेश कराकर तथा उसे सुखकर स्थानमें छोड़कर इच्छित स्थानपर चला गया ॥१२९॥


नक्तं शक्त्या स्थितेनासावुद्याने नभसः पतन् । विद्याभृतेन्दुगतिना ददृशे सुखभाजनम् ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रगति विद्याधर रात्रिके समय अपने उद्यानमें स्थित था सो उसने आकाशसे पड़ते हुए सुखके पात्रस्वरूप उस बालकको देखा ॥१३०॥


उडुपातः किमेष स्याद् विद्युत्खण्डोऽथवा च्युतः । वितर्क्येति समुत्पत्य ददृशे पृथुकं शुभम् ॥१३१॥

अर्थ: क्या यह नक्षत्रपात हो रहा है ? अथवा कोई बिजलीका टुकड़ा नीचे गिर रहा है ऐसा संशय कर वह चन्द्रगति विद्याधर ज्योंही आकाशमें उड़ा त्योंही उसने उस शुभ बालकको देखा ॥१३१॥


गृहीत्वा च प्रमोदेन देव्याः पुष्पवतीश्रुतेः । वरशय्याप्रसुप्ताया जङ्घादेशे चकार सः ॥१३२॥

अर्थ: देखते ही उसने बड़े हर्षसे उस बालकको बीचमें ही ले लिया और उत्तम शय्यापर शयन करनेवाली पुष्पवती रानीकी जाँघोंके बीचमें रख दिया ॥१३२॥


ऊचे चैतां द्रुतस्वान उत्तिष्ठोत्तिष्ठ सुन्दरि । किं शेषे बालकं पश्य संप्रसूतासि शोभनम् ॥१३३॥

अर्थ: यही नहीं, ऊँची आवाजसे वह रानीसे बोला भी कि हे सुन्दरि ! उठो, क्यों सो रही हो ? देखो तुमने सुन्दर बालक उत्पन्न किया है ॥१३३॥


ततः कान्तकरस्पर्शसौख्यसंपत्प्रबोधिता । शय्यातः सहसोत्तस्थौ सा विघूर्णितलोचना ॥१३४॥

अर्थ: तदनन्तर पतिके हस्त-स्पर्शसे उत्पन्न सुखरूपी सम्पत्तिसे जागृत हो रानी शय्यासे सहसा उठ खड़ी हुई और इधर-उधर नेत्र चलाने लगी ॥१३४॥


अर्भकं च ददर्शातिसुन्दरं सुन्दरानना । तस्यास्तदंशुजालेन निद्राशेषो निराकृतः ॥१३५॥

अर्थ: ज्योंही उस सुन्दरमुखीने अत्यन्त सुन्दर बालक देखा, त्योंही उसकी किरणोंके समूहसे उसकी अवशिष्ट निद्रा दूर हो गयी ॥१३५॥


परं च विस्मयं प्राप्ता पप्रच्छ प्रियदर्शना । कयायं जनितो नाथ पुण्यवत्या स्त्रिया शिशुः ॥१३६॥

अर्थ: उस सुन्दरीने परम आश्चर्यको प्राप्त होकर पूछा कि यह बालक किस पुण्यवती स्त्रीने उत्पन्न किया है ? ॥१३६॥


सोऽवोचद्दयिते जातस्तवायं प्रवरः सुतः । प्रतीहि संशयं मा गास्त्वत्तो धन्या परा तु का ॥१३७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें चन्द्रगतिने कहा कि हे प्रिये ! यह तुम्हारे ही पुत्र उत्पन्न हुआ है । विश्वास रखो, संशय मत करो, तुमसे बढ़कर और दूसरी धन्य स्त्री कौन हो सकती है ? ॥१३७॥


सावोचत्प्रिय वन्ध्यास्मि कुतो मे सुतसंभवः । प्रतारितास्मि दैवेन किं मे भूयः प्रतार्यते ॥१३८॥

अर्थ: उसने कहा कि हे प्रिय ! मैं तो वन्ध्या हूँ, मेरे पुत्र कैसे हो सकता है ? मैं दैवके द्वारा ही प्रतारित हूँ - ठगी गयी हूँ अब आप और क्यों प्रतारित कर रहे हैं ? ॥१३८॥


सोऽवोचद्देवि मा शङ्कां कार्षीः कर्मनियोगतः । प्रच्छन्नोऽपि हि नारीणां जायते गर्भसंभवः ॥१३९॥

अर्थ: उसने कहा कि हे देवि ! शंका मत करो, क्योंकि कदाचित् कर्मयोगसे स्त्रियोंके प्रच्छन्न गर्भ भी तो होता है ॥१३९॥


सावोचदस्तु नामैवं कुण्डले त्वतिचारुणी । ईदृशी मर्त्यलोकेऽस्मिन् सुरत्ने भवतः कुतः ॥१४०॥

अर्थ: रानीने कहा कि अच्छा ऐसा ही सही पर यह बताओ कि इसके कुण्डल लोकोत्तर क्यों है ? मनुष्य लोकमें ऐसे उत्तम रत्न कहाँसे आये ? ॥१४०॥


सोऽवोचद्देवि नानेन विचारेण प्रयोजनम् । शृणु तथ्यं पतन्नेष गगनादाहृतो मया ॥१४१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें चन्द्रगतिने कहा कि हे देवि ! इस विचारसे क्या प्रयोजन है ? जो सत्य बात है सो सुनो । यह बालक आकाशसे नीचे गिर रहा था सो बीचमें ही मैंने प्राप्त किया है ॥१४१॥


मयानुमोदितस्तेऽयं सुतः सुकुलसंभवः । लक्षणानि वदन्त्यस्य महापुरुषभूमिकम् ॥१४२॥

अर्थ: मैं जिसकी अनुमोदना कर रहा हूँ ऐसा यह तुम्हारा पुत्र उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ है क्योंकि इसके लक्षण इसे महापुरुषसे उत्पन्न सूचित करते हैं ॥१४२॥


श्रमं कृत्वापि भूयांसं भारमूढ्वा च गर्भजम् । फलं तनयलाभोऽत्र तत्ते जातं सुखं प्रिये ॥१४३॥

अर्थ: बहुत भारी श्रम कर तथा गर्भका भार धारण कर जो फल प्राप्त होता है वह पुत्रलाभ रूप ही होता है । सो हे प्रिये ! तुम्हें यह फल अनायास ही प्राप्त हो गया है ॥१४३॥


कुक्षिजातोऽपि पुत्रस्य यः कृत्यं कुरुते न ना । अपुत्र एव कान्तेऽसौ जायते रिपुरेव वा ॥१४४॥

अर्थ: जो मनुष्य कुक्षिसे उत्पन्न होकर भी पुत्रका कार्य नहीं करता है हे प्रिये ! वह अपुत्र ही है अथवा शत्रु ही है ॥१४४॥


तव सोऽयमपुत्रायाः सति पुत्रो भविष्यति । अन्तर्यानेन किं कृत्यमत्र वस्तुनि शोभने ॥१४५॥

अर्थ: हे पतिव्रते ! तुम्हारे पुत्र नहीं है अतः यह तुम्हारा पुत्र हो जायेगा । इस उत्तम वस्तुके भीतर जानेसे क्या प्रयोजन है ? ॥१४५॥


एवमस्त्विति संभाष्य देवी सूतिगृहं गता । प्रभाते सुतजन्मास्यास्तुष्ट्या लोके प्रकाशितम् ॥१४६॥

अर्थ: तदनन्तर ऐसा ही हो इस प्रकार रानी प्रसूतिकागृहमें चली गयी और प्रातःकाल होते ही इसके पुत्र-जन्मका समाचार लोकमें बड़े हर्षसे प्रकाशित कर दिया गया ॥१४६॥


ततो जन्मोत्सवस्तस्य पुरेऽस्मिन् रथनूपुरे । संप्रवृत्तः समागच्छद् विस्मिताशेषबान्धवः ॥१४७॥

अर्थ: तदनन्तर रथनूपुर नगरमें पुत्रका जन्मोत्सव किया गया । इस उत्सवमें आश्चर्यचकित होते हुए समस्त भाई-बन्धु-रिश्तेदार सम्मिलित हुए ॥१४७॥


रत्नकुण्डलभानूनां मण्डलेन यतो वृतः । प्रभामण्डलनामास्य पितृभ्यां निर्मितं ततः ॥१४८॥

अर्थ: चूँकि वह बालक रत्नमय कुण्डलोंकी किरणोंके समूहसे घिरा हुआ था इसलिए माता-पिताने उसका भामण्डल नाम रक्खा ॥१४८॥


अर्पितः पोषणायासौ धात्र्या लीलामनोहरः । सर्वान्तःपुरलोकस्य करपद्ममधुव्रतः ॥१४९॥

अर्थ: अपनी लीलाओंसे मनको हरनेवाला तथा समस्त अन्तःपुरके करकमलोंमें भ्रमरके समान संचार करनेवाला वह बालक पोषण करनेके लिए धायको सौंपा गया ॥१४९॥


विदेहा तु हृते पुत्रे कुररीवत् कृतस्वना । बन्धूनपातयत् सर्वान् गम्भीरे शोकसागरे ॥१५०॥

अर्थ: इधर पुत्रके हरे जानेपर कुररीके समान विलाप करती हुई रानी विदेहाने समस्त बन्धुओं-को शोकरूपी सागरमें गिरा दिया ॥१५०॥


परिदेवनमेवं च चक्रे चक्राहतेव सा । हा वत्स केन नीतोऽसि मम दुष्करकारिणा ॥१५१॥

अर्थ: चक्रसे ताड़ित हुईके समान वह इस प्रकार विलाप कर रही थी कि हाय वत्स ! कठोर कार्य करनेवाला कौन पुरुष तुझे हर ले गया है ? ॥१५१॥


विघृणस्य कथं तस्य पापस्य प्रसृतौ करौ । अज्ञानं जातमात्रं त्वां ग्रहीतुं ग्रावचेतसः ॥१५२॥

अर्थ: जिसे उत्पन्न होते देर नहीं थी ऐसे तुझ अबोध बालकको उठानेके लिए उस निर्दय पापीके हाथ कैसे पसरे होंगे ? जान पड़ता है कि उसका हृदय पत्थरका बना होगा ॥१५२॥


पश्चिमाया इवाशायाः संध्येवेयं सुता मम । स्थिता स तु परिप्राप्तो मन्दायाः पूर्ववत्सुतः ॥१५३॥

अर्थ: जिस प्रकार पश्चिम दिशामें आकर सूर्य तो अस्त हो जाता है और सन्ध्या रह जाती है उसी प्रकार मुझ अभागिनीका पुत्र तो अस्त हो गया और सन्ध्याकी भाँति यह पुत्री स्थित रह गयी ॥१५३॥


ध्रुवं भवान्तरे कोऽपि मया बालो वियोजितः । तदेव फलितं कर्म न कार्यं बीजवर्जितम् ॥१५४॥

अर्थ: निश्चित ही भवा-न्तरमें मैंने किसी बालकका वियोग किया होगा सो उसी कर्मने अपना फल दिखाया है क्योंकि बिना बीजके कोई कार्य नहीं होता ॥१५४॥


मारितास्मि न किं तेन पुत्रचोरणकारिणा । पुरु प्राप्तास्मि यद्दुःखं समागत्यार्द्धवैशसम् ॥१५५॥

अर्थ: पुत्रकी चोरी करनेवाले उस दुष्टने मुझे मार ही क्यों नहीं डाला । जब कि अधमरी करके उसने मुझे बहुत भारी दुःख प्राप्त कराया है ॥१५५॥


इति तां कुर्वतीमुच्चैर्विह्वलां परिदेवनम् । समाश्वासयदागत्य जनको निगदन्निदम् ॥१५६॥

प्रिये मा गाः परं शोकं जीवत्येव शरीरजः । हृतः केनाप्यसौ जीवन् द्रक्ष्यसे ध्रुवमेव हि ॥१५७॥

अर्थ: इस प्रकार विह्वल होकर जोर-जोरसे विलाप करती हुई रानीके पास जाकर राजा जनक यह कहते हुए उसे समझाने लगे कि हे प्रिये ! अत्यधिक शोक मत करो, तुम्हारा पुत्र जीवित ही है, कोई उसे हरकर ले गया है और निश्चित ही तुम उसे जीवित देखोगी ॥१५६-१५७॥


दृश्यते नेक्ष्यते भूयः पुनर्जात्ववलोक्यते । पूर्वकर्मानुभावेन जाये रोदिषि किं वृथा ॥१५८॥

अर्थ: इष्ट वस्तु पूर्व कर्मके प्रभावसे अभी दिखती है फिर नहीं दिखती, तदनन्तर फिर कभी दिखाई देने लगती है । इसलिए हे प्रिये ! व्यर्थ ही क्यों रोती हो ? ॥१५८॥


व्रज स्वास्थ्यमिमं लेखं सुहृदो नाययाम्यहम् । वार्तां दशरथस्येमां परिवेदयितुं प्रिये ॥१५९॥

अर्थ: तुम स्वस्थताको प्राप्त होओ । हे प्रिये ! मैं यह समाचार बतलानेके लिए मित्र राजा दशरथके पास पत्र भेजता हूँ ॥१५९॥


स चाहं च सुतस्याशु करिष्यामि गवेषणम् । प्रच्छाद्य धरणीं सर्वां चरैः कुशलचेष्टितैः ॥१६०॥

अर्थ: वह और मैं दोनों ही चतुर गुप्तचरोंसे समस्त पृथिवीको आच्छादित कर शीघ्र ही तेरे पुत्रकी खोज करेंगे ॥१६०॥


दयितां सान्त्वयित्वैवं लेखं मित्राय दत्तवान् । तं प्रवाच्य सशोकेन पूरितोऽतिगरीयसा ॥१६१॥

अर्थ: इस प्रकार स्त्रीको सान्त्वना देकर उसने मित्रके लिए पत्र दिया । उस पत्रको बाँचकर राजा दशरथ अत्यधिक शोकसे व्याप्त हो गये ॥१६१॥


मह्यामन्वेषितस्ताभ्यां नासौ दृष्टो यदार्भकः । मन्दीकृत्य तदा शोकमस्थुः कृच्छ्रेण बान्धवाः ॥१६२॥

अर्थ: उन दोनोंने पृथिवीपर पुत्रकी खोज की । पर जब कहीं पुत्र नहीं दिखा तब सब बन्धुजन शोकको मन्द कर बड़े कष्टसे चुप बैठ रहे ॥१६२॥


नासावासीज्जनस्तत्र पुरुषः प्रमदाथवा । यो न बाष्पपरीताक्षस्तच्छोकेन वशीकृतः ॥१६३॥

अर्थ: उस समय न कोई ऐसा पुरुष था और न कोई ऐसी स्त्री ही थी जिसके नेत्र पुत्रसम्बन्धी शोकके कारण अश्रुओंसे व्याप्त नहीं हुए हों ॥१६३॥


शोकविस्मरणे हेतुर्बभूव सुमनोहरा । जानकी बन्धुलोकस्य शुभशैशवचेष्टिता ॥१६४॥

अर्थ: उस समय बन्धुजनोंका शोक भुलानेका कारण यदि कुछ था तो अत्यन्त मनोहर और शुभ बालचेष्टाओंको धारण करनेवाली जानकी ही थी ॥१६४॥


प्रमदमुपगतानां योषितामङ्कदेशे पृथुतनुभवकान्त्या लिम्पती दिक्समूहम् । विपुलकमलयाता श्रीरिवासौ सुकण्ठा शुचिहसितसितास्या वर्धताम्भोजनेत्रा ॥१६५॥

अर्थ: वह जानकी हर्षको प्राप्त होनेवाली स्त्रियोंकी गोदमें निरन्तर वृद्धिगत हो रही थी । वह अपने शरीरकी विशाल कान्तिसे दिशाओंके समूहको लिप्त करती थी । वह विपुल कमलोंको प्राप्त लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, उसका कण्ठ सुन्दर था, पवित्र हास्यसे उसका मुख शुक्ल हो रहा था और कमलके समान उसके नेत्र थे ॥१६५॥


प्रभवति गुणसस्यं येन तस्यां समृद्धं भजदखिलजनानां सौख्यसंभारदानम् । तदतिशयमनोज्ञा चारुलक्ष्मान्विताङ्गा जगति निगदितासौ भूमिसाम्येन सीता ॥१६६॥

अर्थ: समस्त भक्तजनोंके लिए सुखका समूह प्रदान करनेवाला गुणरूपी धान्य, चूँकि उस जानकीमें अत्यन्त समृद्धिके साथ उत्पन्न होता था, अतः अत्यन्त मनोहर और उत्तम लक्षणोंसे युक्त उस जानकीको लोग भूमिकी समानता रखनेके कारण सीता भी कहते थे ॥१६६॥


वदनजितशशाङ्का पल्लवच्छायपाणिः शितिमणिसमतेजः केशसंघातरम्या । जितसमदनहंसस्त्रीगतिः सुन्दरभ्रू- र्बकुलसुरभिवक्त्रामोदबद्धालिवृन्दा ॥१६७॥

अर्थ: उसने अपने मुखसे चन्द्रमाको जीत लिया था, उसके हाथ पल्लवके समान लाल कान्तिके धारक थे, वह नील मणिके समान कान्तिके धारक केशोंके समूहसे मनोहर थी, उसने कामोन्मत्त हंसिनीकी चालको जीत लिया था, उसकी भौंहें सुन्दर थीं तथा मौलिश्रीके समान सुगन्धित उसके मुखके सुवाससे उसके पास भौंरोंके समूह मँडराते रहते थे ॥१६७॥


अतिमृदुभुजमाला शक्रशस्त्राणुमध्या प्रवरसरसरम्भास्तम्भसाम्यस्थितोरुः । स्थलकमलसमानोत्तुङ्गपृष्ठोज्ज्वलाङ्घ्रिः प्रमवदतिविशालच्छायवक्षोजयुग्मा ॥१६८॥

अर्थ: उसकी भुजाएँ अत्यन्त सुकुमार थीं, उसकी कमर वज्रके समान पतली थी, उसकी जांघें उत्तम सरस केलेके स्तम्भके समान सुन्दर थीं, उसके पैर स्थल-कमलके समान उन्नत पृष्ठभागसे सुशोभित थे और उसके उठते हुए स्तनयुगल अत्यधिक कान्तिसे युक्त थे ॥१६८॥


प्रवरभवनकुक्षिष्वत्युदारेषु कान्त्या विविधविहितमार्गा लब्धवर्णा परं सा । सततमुपगतान्तःसप्तकन्याशताना- मतिशयरमणीयं शास्त्रमार्गेण रेमे ॥१६९॥

अर्थ: वह विदुषी जानकी उत्तमोत्तम राजमहलोंके विशाल कोष्ठोंमें अपनी कान्तिसे विविध मार्ग बनाती हुई सात सौ कन्याओंके मध्यमें स्थित हो बड़ी सुन्दरताके साथ शास्त्रानुसार क्रीड़ा करती थी ॥१६९॥


अपि दिनकरदीप्तिः कौमुदी चन्द्रकान्तिः
सुरपतिमहिषी वा कापि वा सा सुभद्रा ।
यदि भजति तदीयासङ्गशोभां कथंचि-
न्नियतमतिमनोज्ञास्तास्ततो वेदनीयाः ॥१७०॥

अर्थ: यदि सूर्यकी प्रभा, चन्द्रमाकी चाँदनी, इन्द्रकी इन्द्राणी, और चक्रवर्तीकी पट्टरानी सुभद्रा किसी तरह जानकीके शरीरकी शोभा प्राप्त कर सकतीं तो वे निश्चित ही अपने पूर्वरूपकी अपेक्षा अधिक सुन्दर होतीं ॥१७०॥


विधिरिव रतिदेवीं कामदेवस्य बुद्ध्या दशरथतनयस्याकल्पयत्पूर्वजस्य । जनकनरपतिस्तां सर्वविज्ञानयुक्तां ननु रविकरसङ्गस्योचिता पद्मलक्ष्मीः ॥१७१॥

अर्थ: जिस प्रकार विधाताने रतिको कामदेवकी पत्नी निश्चित किया था, उसी प्रकार राजा जनकने सर्व प्रकारके विज्ञानसे युक्त सीताको राजा दशरथके प्रथम पुत्र रामकी पत्नी निश्चित किया था सो ठीक ही है क्योंकि कमलोंकी लक्ष्मी सूर्यकी किरणों-के साथ सम्पर्क करने योग्य ही है ॥१७१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते सीताभामण्डलोत्पत्त्यभिधानं नाम षड्विंशतितमं पर्व ॥२६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा प्रोक्त पद्मचरितमें सीता और भामण्डलकी उत्पत्तिका कथन करनेवाला छब्बीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२६॥


२७. सप्तविंशतितमं पर्व (म्लेच्छपराजयसंकीर्तनं)

ततो मगधराजेन्द्रश्चारुवृत्तान्तविस्मितः । पप्रच्छ गणिनामग्र्यं नूतनप्रश्रयान्वितः ॥१॥

किं पुनस्तस्य माहात्म्यं दृष्टं जनकभूभृता । रामस्य येन सा तस्मै तेन बुद्धचा निरूपिता ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर भामण्डलके सुन्दर वृत्तान्तसे आश्चर्यचकित हुए राजा श्रेणिकने नूतन विनयसे युक्त हो अर्थात् पुनः नमस्कार कर गौतम गणधरसे पूछा कि हे भगवन् ! राजा जनकने रामका ऐसा कौन-सा माहात्म्य देखा कि जिससे उसने रामके लिए बुद्धिपूर्वक अपनी कन्या देनेका निश्चय किया ? ॥१-२॥


ततः करतलासङ्गद्विगुणीभूतदन्तभाः । जगौ गणधरो वाक्यं चित्तप्रह्लादनावहम् ॥३॥

अर्थ: तदनन्तर करतलके आसंगसे जिनके दाँतोंकी कान्ति दूनी हो गयी थी ऐसे गौतम गणधर चित्तको आह्लादित करनेवाले वचन बोले ॥३॥


शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि रामस्याक्लिष्टकर्मणः । यतः प्रकल्पिता कन्या जनकेन सुबुद्धिना ॥४॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! सुनो, संक्लेशहीन कार्यंको करनेवाले रामचन्द्रके लिए अत्यन्त बुद्धिमान् जनकने जिस कारण अपनी कन्या देना निश्चित किया था वह मैं कहता हूँ ॥४॥


दक्षिणे विजयार्द्धस्य कैलासाद्रेस्तथोत्तरे । अन्तरेऽस्यन्तबहवः सन्ति देशाः सहान्तराः ॥५॥

अर्थ: विजयार्द्ध पर्वतके दक्षिण और कैलास पर्वतके उत्तरकी ओर बीच-बीचमें अन्तर देकर बहुत-से देश स्थित हैं ॥५॥


तत्रार्धवर्वरो देशो निःसंयमनमस्कृतिः । निर्विदग्धजनो घोरम्लेच्छलोकसमाकुलः ॥६॥

अर्थ: उन देशोंमें एक अर्धवर्वर नामका देश है जो असंयमी जनोंके द्वारा मान्य है, धूर्तजनोंका जिसमें निवास है तथा जो अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ लोगोंसे व्याप्त है ॥६॥


मयूरमालनगरे कृतान्तनगरोपमे । आन्तरङ्गतमो नामेत्यर्द्धवर्वरचारिणाम् ॥७॥

अर्थ: उस देशमें यमराजके नगरके समान एक मयूरमाल नामका नगर है। उसमें आन्तरंगतम नामका राजा राज्य करता था ॥७॥


पूर्वापरायतक्षोण्यां यावन्तो म्लेच्छसंभवाः । कपोतशुककाम्बोजमङ्कनाद्याः सहस्रशः ॥८॥

गुप्ता बहुविधैः सैन्यैर्भीषणैर्विविधायुधैः । आन्तरङ्गतमं प्रीत्या परिवार्य ससाधनाः ॥९॥

अर्थ: पूर्वसे लेकर पश्चिम तककी लम्बी भूमिमें कपोत, शुक, काम्बोज, मंकन आदि जितने हजारों म्लेच्छ रहते थे वे अनेक प्रकार- के शस्त्र तथा नाना प्रकारके भीषण अस्त्रोंसे युक्त हो अपने सब साधनोंके साथ प्रीतिपूर्वक आन्त-रंगतम राजाकी उपासना करते थे ॥८-९॥


आर्यानेताञ्जनपदान् प्रचण्डान्तररंहसः । उद्वासयन्त आजग्मुरिति कारुण्यवर्जिताः ॥१०॥

अर्थ: जिनका गमन बीच-बीचमें अत्यन्त वेगसे होता था तथा जो दयासे रहित थे ऐसे वे म्लेच्छ इन आर्य देशोंको उजाड़ते हुए यहाँ आये ॥१०॥


देशं जनकराजस्य ततो व्याप्तुं समुद्यताः । शलभा इव निःशेषमुपप्लवविधायिनः ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर टिड्डियोंके समान उपद्रव करनेवाले वे म्लेच्छ राजा जनकके देशको व्याप्त करनेके लिए उद्यत हुए ॥११॥


जनकेन च साकेतां युवानः प्रेषिता द्रुतम् । आन्तरङ्गतमं प्राप्तमूचुर्दशरथस्य ते ॥१२॥

अर्थ: राजा जनकने शीघ्र ही अपने योद्धा अयोध्या भेजे। उन्होंने जाकर राजा दशरथसे आन्तरंगतमके आनेकी खबर दी ॥१२॥


विज्ञापयति देव स्वां जनको जनवत्सलः । पौलिन्द परचक्रेण समाक्रान्तं महीतलम् ॥१३॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! प्रजावत्सल राजा जनक आपसे निवेदन करते हैं कि समस्त पृथिवीतल म्लेच्छ राजाकी सेनासे आक्रान्त हो चुका है ॥१३॥


आर्यदेशाः परिध्वस्ता म्लेच्छैरुद्वासितं जगत् । एकवर्णां प्रजां सर्वां पापाः कर्तुं समुद्यताः ॥१४॥

अर्थ: उन म्लेच्छोंने आर्य देश नष्ट-भ्रष्ट कर दिये हैं तथा समस्त जगत्‌को उजाड़ दिया है । वे पापी समस्त प्रजाको एक वर्णकी करनेके लिए उद्यत हुए हैं ॥१४॥


प्रजासु विप्रनष्टासु जीवामः किं प्रयोजनाः । चिन्त्यतामिति किं कुर्मो व्रजामो वा कमाश्रयम् ॥१५॥

अर्थ: जब प्रजा नष्ट हो रही है तब हम किसलिए जीवित रह रहे हैं ? विचार कीजिए कि इस दशामें हम क्या करें ? अथवा किसकी शरणमें जावें ? ॥१५॥


किं वा दुर्गं समाश्रित्य तिष्ठामः ससुहृज्जनाः । नन्दीकालिन्दभागान् वा गिरिं वा विपुलाह्वयम् ॥१६॥

अर्थ: हम मित्रजनोंके साथ किस दुर्गका आश्रय लेकर रहें अथवा नन्दी, कलिन्द या विपुलगिरि इन पर्वतोंका आश्रय लें ? ॥१६॥


अथवा सर्वसैन्येन निकुञ्जगिरिमाश्रिताः । संनिरुध्मः समागच्छत् परसैन्यं भयानकम् ॥१७॥

अर्थ: अथवा सब सेनाके साथ निकुंजगिरिमें जाकर शत्रुकी आती हुई भयंकर सेनाको रोकें ॥१७॥


साधुगोश्रावकाकीर्णां प्रजामेतां सुविह्वलाम् । सम्यक् संधारयिष्यामस्त्यक्त्वा जीवं सुदुस्सहम् ॥१८॥

अर्थ: अथवा यह कठिन दिखता है कि हम अपना जीवन देकर भी साधु, गौ तथा श्रावकोंसे व्याप्त इस विह्वल प्रजाकी रक्षा कर सकेंगे ॥१८॥


अतो ब्रवीमि राजंस्त्वां यत्त्वया पाल्यते मही । तव राज्यं महाभाग त्वमेव हि जगत्पतिः ॥१९॥

अर्थ: इसलिए हे राजन् ! मैं आपसे कहता हूँ कि चूँकि आप ही पृथिवीकी रक्षा करते रहे, अतः यह राज्य आपका ही है और हे महाभाग ! आप ही जगत्‌के स्वामी हैं ॥१९॥


यजन्ते भावतः सन्तो यावन्तः श्रावकादयः । पञ्चयज्ञान् विधानेन व्रीह्याद्यैर्यदबीजकैः ॥२०॥

अर्थ: जितने श्रावक आदि सत्पुरुष हैं वे भाव-पूर्वक पूजा करते हैं । अंकुर उत्पन्न होनेकी शक्तिसे रहित पुराने धान आदिके द्वारा विधिपूर्वक पाँच प्रकारके यज्ञ करते हैं ॥२०॥


मुक्तिक्षान्तिगुणैर्युक्ता यच्च ध्यानपरायणाः । तप्यन्ते सुतपो मोक्षसाधनं गगनाम्बराः ॥२१॥

अर्थ: निर्ग्रन्थ मुनि मुक्ति क्षान्ति आदि गुणोंसे युक्त होकर ध्यानमें तत्पर रहते हैं तथा मोक्षका साधनभूत उत्तम तप तपते हैं ॥२१॥


महान्तश्च पुरस्कारा यच्चैत्यभवनादिषु । विधीयन्तेऽभिषेकाश्च जिनानां क्षीणकर्मणाम् ॥२२॥

अर्थ: जिनमन्दिर आदि स्थलोंमें कर्मोंको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्‌की बड़ी-बड़ी पूजाएँ तथा अभिषेक होते हैं ॥२२॥


प्रजासु रक्षितास्वेतत्सर्वं भवति रक्षितम् । ततश्च धर्मकामार्थाः प्रेत्य चेह च भूभृताम् ॥२३॥

अर्थ: प्रजाकी रक्षा रहनेपर ही इन सबकी रक्षा हो सकती है और इन सबकी रक्षा होनेपर ही इस लोक तथा परलोकमें राजाओंके धर्म, अर्थ, कामरूप त्रिवर्ग सिद्ध हो सकते हैं ॥२३॥


बहुकोषो नरेशो यः प्रीतः पालयति क्षितिम् । परचक्राभिभूतश्च नावसादं समश्नुते ॥२४॥

हिंसाधर्मविहीनानां यच्छतां यागदक्षिणाम् । कुरुते पालनं यश्च तस्य भोगाः पुनर्भुवः ॥२५॥

अर्थ: बहुत बड़े खजानेका स्वामी होकर जो राजा प्रसन्नतासे पृथिवीकी रक्षा करता है और परचक्रके द्वारा अभिभूत होनेपर भी जो विनाशको प्राप्त नहीं होता तथा हिंसाधर्मसे रहित एवं यज्ञ आदिमें दक्षिणा देनेवाले लोगोंकी जो रक्षा करता है उस राजाको भोग पुनः प्राप्त होते हैं ॥२४-२५॥


धर्मार्थकाममोक्षाणामधिकारा महीतले । जनानां राजगुप्तानां जायन्ते तेऽन्यथा कुतः ॥२६॥

अर्थ: पृथिवीतलपर मनुष्योंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अधिकार है सो राजाओंके द्वारा सुरक्षित मनुष्योंको ही ये अधिकार प्राप्त होते हैं अन्यथा किस प्रकार प्राप्त हो सकते हैं ? ॥२६॥


नृपबाहुबलच्छायां समाश्रित्य सुखं प्रजाः । ध्यायन्त्यात्मानमव्यग्रास्तथैवाश्रमिणो बुधाः ॥२७॥

अर्थ: राजाके बाहुबलकी छायाका आश्रय लेकर प्रजा सुखसे आत्माका ध्यान करती है तथा आश्रमवासी विद्वान् निराकुल रहते हैं ॥२७॥


यस्य देशं समाश्रित्य साधवः कुर्वते तपः । षष्ठमंशं नृपस्तस्य लभते परिपालनात् ॥२८॥

अर्थ: जिस देशका आश्रय पाकर साधुजन तपश्चरण करते हैं उन सबकी रक्षाके कारण राजा तपका छठवाँ भाग प्राप्त करता है ॥२८॥


अथैवमिति तत्सर्वमुपश्रुत्य नराधिपः । द्रुतं रामं समाहूय राज्यं दातुं समुद्यतः ॥२९॥

अर्थ: अथानन्तर यह सब सुनकर राजा दशरथ शीघ्र ही रामको बुलाकर राज्य देनेके लिए उद्यत हो गये ॥२९॥


मुदितैः किङ्करैर्भेरीघनानन्दा समाहता । आजग्मुः सचिवाः सर्वे गजवाजिसमाकुलाः ॥३०॥

अर्थ: किंकरोंने प्रसन्न होकर बहुत भारी आनन्द देनेवाली भेरी बजायी। हाथी और घोड़ोंसे व्याकुल समस्त मन्त्री लोग आ पहुँचे ॥३०॥


जाम्बूनदमयान् कुम्भान् गृहीत्वा वारिपूरितान् । बद्ध्वा परिकरं शूरा भासमानाः समागताः ॥३१॥

अर्थ: देदीप्यमान शूरवीर जलसे भरे हुए सुवर्ण कलश लेकर तथा कमर कसकर आ गये ॥३१॥


चारुनूपुरनिस्वाना दधाना वेषमर्चितम् । वस्त्रालङ्कारमादाय पटलेष्वागताः स्त्रियः ॥३२॥

अर्थ: जिनके नूपुरोंसे सुन्दर शब्द हो रहा था तथा जो उत्तमोत्तम वेष धारण कर रही थीं ऐसी स्त्रियाँ पिटारोंमें वस्त्रालंकार ले-लेकर आ गयीं ॥३२॥


आटोपमीदृशं दृष्ट्वा किमेतदिति शब्दितम् । रामं दशरथोऽवोचत् पालयेमां सुत क्षितिम् ॥३३॥

अर्थ: यह सब तैयारी देखकर रामने पूछा कि यह क्या है ? तब राजा दशरथने कहा कि हे पुत्र ! तुम इस पृथिवीका पालन करो ॥३३॥


रिपुचक्रमिहायातं यद्देवैरपि दुर्जयम् । विजेष्ये तदहं गत्वा प्रजानां हितकाम्यया ॥३४॥

अर्थ: यहाँ ऐसा शत्रुदल आ पहुँचा है जो देवोंके द्वारा भी दुर्जेय है । मैं प्रजाके हितकी वांछासे जाकर उसे जीतूँगा ॥३४॥


ततो राजीवनयनो राघवो नृपमब्रवीत् । किमर्थं तात संरम्भमस्थाने प्रतिपद्यसे ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर कमललोचन रामने राजा दशरथसे कहा कि हे तात ! अस्थानमें क्रोध क्यों करते हो ? ॥३५॥


किं कार्यं पशुसंज्ञैस्तैरसंभाषैर्दुरात्मभिः । येषामभिमुखीभावं प्रयासि रणकाङ्क्षया ॥३६॥

अर्थ: आप रणकी इच्छासे जिनके सम्मुख जा रहे हैं, उन पशुस्वरूप भाषाहीन दुष्ट मनुष्योंसे क्या कार्य हो सकता है ? ॥३६॥


न ह्याखूनां विरोधेन क्षुभ्यन्ति वरवारणाः । न चापि तूलदाहार्थं सन्नह्यति विभावसुः ॥३७॥

अर्थ: चूहोंके विरोध करनेसे उत्तम गजराज क्षोभको प्राप्त नहीं होते और न सूर्य रुईको जलानेके लिए तत्पर होता है ॥३७॥


तत्र प्रयातुमस्माकं युज्यते यच्छ शासनम् । इत्युक्ते हर्षिताङ्गस्तं परिष्वज्य पिताब्रवीत् ॥३८॥

अर्थ: वहाँ जानेके लिए तो मुझे आज्ञा देना उचित है सो दीजिए। ऐसा कहनेपर हर्षित शरीरके धारी पिताने रामका आलिंगन कर कहा ॥३८॥


त्वं बालः सुकुमाराङ्गः पद्म पद्मनिभेक्षणः । कथं तान् सहसे जेतुं न प्रत्येम्यहमर्भकं ॥३९॥

अर्थ: कि हे पद्म ! अभी तुम बालक हो, तुम्हारा शरीर सुकुमार है तथा नेत्र कमलके समान हैं, इसलिए हे बालक ! तुम उन्हें किस तरह जीत सकोगे इसका मुझे प्रत्यय नहीं है ॥३९॥


सोऽवोचत् सद्य उत्पन्नो भृशमल्पोऽपि पावकः । कथं दहति विस्तीर्णं महद्भिः किं प्रयोजनम् ॥४०॥

अर्थ: रामने उत्तर दिया कि तत्काल उत्पन्न हुई थोड़ी-सी अग्नि बड़े विस्तृत वनको जला देती है इसलिए बड़ोंसे क्या प्रयोजन है ? ॥४०॥


बालः सूर्यस्तमो घोरं द्युतीरृक्षगणस्य च । एको नाशयति क्षिप्रं भूतिभिः किं प्रयोजनम् ॥४१॥

अर्थ: बालसूर्य अकेला ही घोर अन्धकारको तथा नक्षत्र-समूहकी कान्तिको नष्ट कर देता है इसलिए विभूतिसे क्या प्रयोजन है ? ॥४१॥


ततः सहृष्टरोमाङ्गो नृपो दशरथः पुनः । प्रमोदं परमं प्राप्तो विषादं च सवाष्पदृक् ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका शरीर रोमांचित हो रहा था ऐसे राजा दशरथ पुनः परम प्रमोद और विषादको प्राप्त हुए । उनके नेत्रोंसे आँसू निकल पड़े ॥४२॥


सत्त्वत्यागादिवृत्तीनां क्षत्रियाणामियं स्थितिः । उत्सहन्ते प्रयातुं यद्विहातुमपि जीवितम् ॥४३॥

अर्थ: सत्त्व त्याग आदि करना जिनकी वृत्ति है ऐसे क्षत्रियोंका यही स्वभाव है कि वे युद्धमें प्रस्थान करनेके लिए अथवा जीवनका भी त्याग करनेके लिए सदा उत्साहित रहते हैं ॥४३॥


अथवा क्षयमप्राप्ते जन्तुरायुषि नाश्नुते । मरणं गहनं प्राप्तः परं यद्यपि जायते ॥४४॥

अर्थ: उन्होंने विचार किया कि जबतक आयु क्षीण नहीं होती है तबतक यह जीव परम कष्टको पाकर भी मरणको प्राप्त नहीं होता ॥४४॥


इति चिन्तयतस्तस्य कुमारौ रामलक्ष्मणौ । पितुः पादाब्जयुगलं प्रणम्योपगतौ बहिः ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार राजा दशरथ विचार ही करते रहे और राम-लक्ष्मण दोनों कुमार उनके चरण-कमलको नमस्कार कर बाहर चले गये ॥४५॥


ततः सर्वास्त्रकुशलौ सर्वशास्त्रविशारदौ । सर्वलक्षणसंपूर्णौ सर्वस्य प्रियदर्शनौ ॥४६॥

चतुरङ्गबलोपेतौ पूर्यमाणौ विभूतिभिः । संप्रयातौ रथारूढौ दीप्यमानौ स्वतेजसा ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर जो सर्व शस्त्र चलानेमें कुशल थे, सर्व शास्त्रोंमें निपुण थे, सर्व लक्षणोंसे परिपूर्ण थे, जिनका दर्शन सबके लिए प्रिय था, जो चतुरंग सेनासे सहित थे, विभूतियोंसे परिपूर्ण थे तथा आत्मतेजसे देदीप्यमान हो रहे थे ऐसे दोनों कुमार रथपर आरूढ़ होकर चले ॥४६-४७॥


पूर्वमेव तु निर्यातो जनकः सोदरान्वितः । अन्तरं योजने द्वे च परसैन्यस्य तस्य च ॥४८॥

अर्थ: राजा जनक अपने भाईके साथ पहले ही निकल पड़ा था । जनक और शत्रुसेनाके बीचमें दो योजनका ही अन्तर रह गया था ॥४८॥


शत्रुशब्दममृष्यन्तो जनकस्य महारथाः । विविशुर्म्लेच्छसंघातं मेघवृन्दमिव ग्रहाः ॥४९॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य-चन्द्रमा आदि ग्रह मेघसमूहके बीच में प्रवेश करते हैं उसी प्रकार राजा जनकके महारथी योद्धा शत्रुके शब्दको सहन नहीं करते हुए म्लेच्छसमूहके भीतर प्रविष्ट हो गये ॥४९॥


प्रवृत्तश्च महाभीमः संग्रामो रोमहर्षणः । बृहत्प्रहरणाटोप आर्यम्लेच्छमटाकुलः ॥५०॥

अर्थ: दोनों ही सेनाओंके बीच जिसमें बड़े-बड़े शस्त्रों का विस्तार फैला हुआ था, और जो आर्य तथा म्लेच्छ योद्धाओंसे व्याप्त था, ऐसा रोमहर्षित करनेवाला महा-भयंकर युद्ध हुआ ॥५०॥


जनकः कनकं दृष्ट्वा परं गहनमागतम् । अचोदयदतिक्रुद्धो दुर्वारकरिणां घटाम् ॥५१॥

अर्थ: राजा जनकने देखा कि भाई कनक संकटमें पड़ गया है तब उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर दुर्वार हाथियोंकी घटाको प्रेरित कर आगे बढ़ाया ॥५१॥


बर्बरैस्तु महासैन्यैर्भग्नैर्भग्नैः पुनः पुनः । भीमैर्जनकराजोऽपि दिक्षु सर्वासु वेष्टितः ॥५२॥

अर्थ: म्लेच्छोंकी सेना बहुत बड़ी तथा भयंकर थी इसलिए उसने बार-बार भग्न होनेपर भी राजा जनकको सब दिशाओंमें घेर लिया ॥५२॥


एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः पद्मः सौमित्रिणा सह । अपारं गहनं सैन्यमपश्यच्चारुलोचनः ॥५३॥

अर्थ: इसी बीचमें सुन्दर नेत्रोंको धारण करनेवाले राम लक्ष्मणके साथ वहाँ जा पहुँचे । पहुँचते ही उन्होंने शत्रुकी अपार तथा भयंकर सेना देखी ॥५३॥


दृष्ट्वा तस्य सितच्छत्रं विशीर्णा शत्रुवाहिनी । तमसां सन्ततिः स्फीता पौर्णमासीविधुं यथा ॥५४॥

अर्थ: रामके सफेद छत्रको देखकर शत्रुकी सेना इस प्रकार नष्ट-भ्रष्ट हो गयी जिस प्रकार कि अन्धकारकी सन्तति पूर्णिमाके चन्द्रमाको देखकर नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है ॥५४॥


आश्वासितश्च बाणौघैर्जनको ध्वस्तकङ्कटः । तेन जन्तुर्यथा दुःखी धर्मेण जगदायुषा ॥५५॥

अर्थ: बाणोंके समूहसे जिसका कवच टूट गया था ऐसे जनकको रामने उसी तरह आश्वासन दिया - धैर्य बँधाया जिस प्रकार कि जगत्के प्राणस्वरूप धर्मके द्वारा दुःखी प्राणीको आश्वासन दिया जाता है ॥५५॥


राघवो रथमारूढो युक्तं चपलवाजिभिः । कवचोद्योतितवपुः हारकुण्डलमण्डितः ॥५६॥

अर्थ: रामचन्द्र चंचल घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार थे, उनका शरीर कवचसे प्रकाशमान हो रहा था, हार और कुण्डल उनकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥५६॥


धनुरायतमास्थाय शरपाणिर्हरिध्वजः । प्रकीर्णकोल्वणच्छत्रो धरणीधीरमानसः ॥५७॥

अर्थ: वे एक हाथमें लम्बा धनुष और दूसरे हाथमें बाण लिये हुए थे। उनकी ध्वजामें सिंहका चिह्न था, शिरपर विशाल छत्र फिर रहा था तथा उनका मन पृथिवीके समान धीर था ॥५७॥


प्रविशन् विपुलं सैन्यं लीलया लोकवत्सलः । सुभटैः पूर्यमाणः सन् भात्यर्क इव रश्मिभिः ॥५८॥

अर्थ: जिनके साथ अनेक सुभट थे ऐसे लोकवत्सल राम, लीलापूर्वक विशाल सेनाके बीच प्रवेश करते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो किरणोंसे सहित सूर्य ही हो ॥५८॥


संरक्ष्य जनकं प्रीतः कनकं च यथाविधि । बलं व्यध्वंसयच्छत्रोरिभवत् कदलीवनम् ॥५९॥

अर्थ: प्रसन्नतासे भरे रामने जनक और कनक दोनों भाइयोंकी विधिपूर्वक रक्षा कर शत्रुसेनाको उस तरह नष्ट कर दिया जिस प्रकार कि हाथी केलाके वनको नष्ट कर देता है ॥५९॥


तथैव लक्ष्मणस्तत्र बाणानाकर्णसंहतान् । ववर्ष वायुना नुन्नः सागरे जलदो यथा ॥६०॥

अर्थ: जिस प्रकार वायुसे प्रेरित मेघ समुद्रपर जल-वर्षा करता है उसी प्रकार लक्ष्मणने शत्रुदलपर कान तक खिंचे हुए बाण बरसाये ॥६०॥


निशितानि च चक्राणि शक्तींश्च कनकानि च । शूलक्रकचनिर्घातान्येवमाद्यान्यचिक्षिपत् ॥६१॥

अर्थ: वह अत्यन्त तीक्ष्ण चक्र, शक्ति, कनक, शूल, क्रकच और वज्रदण्ड आदि शस्त्रोंकी खूब वर्षा कर रहा था ॥६१॥


सौमित्रिभुजनिर्मुक्तैस्तैः पतद्भिरितस्ततः । म्लेच्छदेहा न्यकृत्यन्त द्रुमाः परशुभिर्यथा ॥६२॥

अर्थ: जिस प्रकार पड़ते हुए कुल्हाड़ोंसे वृक्ष कट जाते हैं उसी प्रकार लक्ष्मणकी भुजासे छूटकर जहाँ-तहाँ पड़ते हुए पूर्वोक्त शस्त्रोंसे म्लेच्छोंके शरीर कट रहे थे ॥६२॥


भटाः शबरसैन्येऽस्मिन् बाणैर्निर्भिन्नवक्षसः । केचिच्छिन्नभुजग्रीवा निपतन्ति सहस्रशः ॥६३॥

अर्थ: म्लेच्छोंकी इस सेनामें बाणोंसे कितने ही योद्धाओंका वक्षःस्थल छिन्न-भिन्न हो गया था, और हजारों योद्धा भुजा तथा गरदन कट जानेसे नीचे गिर गये थे ॥६३॥


ततः पराङ्मुखीभूता लोककण्टकवाहिनी । तथापि लक्ष्मणस्तेषामनुधावति पृष्ठतः ॥६४॥

अर्थ: यद्यपि लोकके शत्रुओंकी वह सेना लक्ष्मणसे पराङ्मुख हो गयी थी तो भी वह उनके पीछे दौड़ता ही गया ॥६४॥


अनिवार्यं समालोक्य तं सौमित्रिं मृगाधिपम् । अपरे म्लेच्छशार्दूलाः समन्तात् क्षोममागताः ॥६५॥

अर्थ: जिसे कोई रोक नहीं सकता था ऐसे लक्ष्मणरूपी मृगराजको देखकर म्लेच्छरूपी तेन्दुए सब ओरसे क्षोभको प्राप्त हो गये ॥६५॥


बृहद्वादित्रनिर्घोषैः कुर्वाणा भैरवं रवम् । चापासिचक्रबहुलाः कृतसंघातपङ्क्तयः ॥६६॥

अर्थ: उस समय वे म्लेच्छ बड़े भारी बाजोंके शब्दसे भयंकर शब्द कर रहे थे, धनुष, कृपाण तथा चक्र आदि शस्त्र बहुलतासे लिये थे और झुण्डके-झुण्ड बनाकर पंक्तिरूपमें खड़े थे ॥६६॥


रक्तवस्त्रशिरस्त्राणाः केचिद्वर्बरधारिणः । असिधेनुकराः क्रूरा नानावर्णाङ्गधारिणः ॥६७॥

अर्थ: कितने ही म्लेच्छ लाल वस्त्रका साफा बाँधे हुए थे, कोई छुरी हाथमें लिये थे और नाना रंगके शरीर धारण कर रहे थे ॥६७॥


केचिद्भिन्नाञ्जनच्छायाः शुकपत्रत्विषोऽपरे । केचित्कर्दमसंकाशाः केचित्ताम्रसमत्विषः ॥६८॥

अर्थ: कोई मसले हुए अंजनके समान काले थे, कोई सूखे पत्तोंके समान कान्तिवाले थे, कोई कीचड़के समान थे और कोई लाल रंगके थे ॥६८॥


कटिसूत्रमणिप्रायाः पत्रचीवरधारिणः । नानाधातुविलिप्ताङ्गा मञ्जरीकृतशेखराः ॥६९॥

अर्थ: अधिकतर वे कटिसूत्रमें मणि बाँधे हुए थे, पत्तोंके वस्त्र पहने हुए थे, नाना धातुओंसे उनके शरीर लिप्त थे, फूलकी मंजरियोंसे उन्होंने सेहरा बना रखा था ॥६९॥


वराटकाभदशना विशालपिठरोदराः । विरेजुः सैन्यमध्ये तु कुटजा इव पुष्पिताः ॥७०॥

अर्थ: कौड़ियोंके समान उनके दाँत थे, बड़े मटकाके समान उनके पेट थे और सेनाके बीच वे फूले हुए कुटज वृक्षके समान सुशोभित हो रहे थे ॥७०॥


अपरे शबरा रेजुर्भीषणायुधपाणयः । पीनजङ्घाभुजस्कन्धा असुरा इव दर्पिताः ॥७१॥

अर्थ: जिनके हाथोंमें भयंकर शस्त्र थे, और जिनकी जाँघें, भुजाएँ और स्कन्ध अत्यन्त स्थूल थे ऐसे कितने ही म्लेच्छ गर्वीले असुरोंके समान जान पड़ते थे ॥७१॥


निर्दयाः पशुमांसादो मूढाः प्राणिवधोद्यताः । आरभ्य जन्मनः पापा सहसारम्भकारिणः ॥७२॥

अर्थ: वे अत्यन्त निर्दय थे, पशुओंका मांस खानेवाले थे, मूढ़ थे, पापी थे और सहसा अर्थात् बिना विचार किये काम करनेवाले थे ॥७२॥


वराहमहिषव्याघ्रवृककङ्कादिकेतवः । नानायानच्छदच्छत्रास्तत्सामन्ताः सुभीषणाः ॥७३॥

अर्थ: वराह, महिष, व्याघ्र, वृक और कंक आदिके चिह्न उनकी पताकाओंमें थे, उनके सामन्त भी अत्यन्त भयंकर थे तथा नाना प्रकारके वाहन, चद्दर और छत्र आदिसे सहित थे ॥७३॥


नानायुद्धकृतध्वान्ता महावेगपदातयः । सागरोर्मिनिमाश्चण्डा नानाभीषणनिस्वनाः ॥७४॥

अर्थ: नाना युद्धोंमें जिन्होंने अन्धकार उत्पन्न किया था, जो समुद्रकी लहरोंके समान प्रचण्ड थे, और नाना प्रकारका भयंकर शब्द कर रहे थे ऐसे महावेगशाली पैदल योद्धा उनके साथ थे ॥७४॥


लक्ष्मणक्ष्माधरं वव्रुः क्षुब्धाः शबरनीरदाः । निजसामन्तवातेन प्रेरिताः पुरुरंहसः ॥७५॥

अर्थ: अपने सामन्तरूपी वायुसे प्रेरित होनेके कारण जिनका वेग बढ़ रहा था ऐसे उन क्षोभको प्राप्त हुए म्लेच्छरूपी मेघोंने लक्ष्मणरूपी पर्वतको घेर लिया ॥७५॥


अधावल्लक्ष्मणस्तेषां निपाताय समुद्यतः । यथानडुत्समूहानां महावेगो गजाधिपः ॥७६॥

अर्थ: जिस प्रकार बैलोंके समूहको नष्ट करनेके लिए महावेगशाली हाथी दौड़ता है उसी प्रकार उन सबको नष्ट करनेके लिए उद्यत लक्ष्मण दौड़ा ॥७६॥


मृद्यमाना निपेतुस्ते स्वैरेव वसुधातले । विदुद्रुवुरसंख्याश्च भीत्या विक्षतमूर्तयः ॥७७॥

अर्थ: लक्ष्मणके दौड़ते ही उनमें भगदड़ मच गयी जिससे वे अपने ही लोगोंसे कुचले जाकर पृथिवीपर गिर पड़े। तथा भयसे जिनके शरीर खण्डित हो रहे थे ऐसे अनेक योद्धा इधर-उधर भाग गये ॥७७॥


ततः संधारयन् सैन्यमान्तरङ्गतमो नृपः । समं सकलसैन्येन लक्ष्मणाभिमुखं स्थितः ॥७८॥

अर्थ: तदनन्तर आन्तरंगतम राजा सेनाको रोकता हुआ सब सेनाके साथ लक्ष्मणके सम्मुख खड़ा हुआ ॥७८॥


तेनाभ्यागतमात्रेण प्रवृत्ते भैरवे मृधे । लक्ष्मणस्य धनुश्छिन्नं बाणैः संततवर्षिभिः ॥७९॥

अर्थ: उसने आते ही भयंकर युद्ध किया और निरन्तर बरसते हुए बाणोंसे लक्ष्मणका धनुष तोड़ डाला ॥७९॥


कृपाणं यावदादत्ते लक्ष्मणो विरथीकृतः । समीरणजवं तावत्पद्मो रथमचोदयत् ॥८०॥

अर्थ: लक्ष्मण जबतक तलवार उठाता है तबतक उसने उसे रथरहित कर दिया अर्थात् उसका रथ तोड़ डाला। यह देख रामने वायुके समान वेगवाला अपना रथ आगे बढ़ाया ॥८०॥


लक्ष्मणस्योपनीतश्च रथोऽन्यः क्षेपवर्जितः । अपारमदहत् सैन्यं रामः कक्षमिवानलः ॥८१॥

अर्थ: लक्ष्मणके लिए शीघ्र ही दूसरा रथ लाया गया और जिस प्रकार अग्नि वनको जलाती है, उसी प्रकार रामने शत्रुकी सेनाको जला दिया ॥८१॥


कांश्चिच्चिच्छेद बाणौघैः कांश्चित्कनकतोमरैः । चक्रैः शिरांसि केषांचित्कुञ्चितौष्ठान्यपातयत् ॥८२॥

अर्थ: उन्होंने कितने ही लोगोंको बाणोंके समूहसे छेद डाला, कितने ही लोगोंको कनक और तोमर नामक शस्त्रोंसे काट डाला तथा जिनके ओठ टेढ़े हो रहे थे ऐसे कितने ही लोगोंके शिर चक्ररत्नसे नीचे गिरा दिये ॥८२॥


ननाश भयपूर्णा च यथाशं म्लेच्छवाहिनी । विध्वस्तचामरच्छत्रध्वजचापसमाकुला ॥८३॥

अर्थ: टूटे-फूटे चमर, छत्र, ध्वजा और धनुषोंसे व्याप्त म्लेच्छोंकी वह सेना भयभीत होकर इच्छानुसार नष्ट हो गयी - इधर-उधर भाग गयी ॥८३॥


निमिषान्तरमात्रेण रामेणाक्लिष्टकर्मणा । म्लेच्छा निराकृताः सर्वे कषाया इव साधुना ॥८४॥

अर्थ: जिस प्रकार साधु कषायोंको क्षण-भरमें नष्ट कर देते हैं उसी प्रकार क्लेशरहित कार्य करनेवाले रामने निमेष मात्रमें ही समस्त म्लेच्छोंको नष्ट कर दिया ॥८४॥


आगतो यश्च सैन्येन निष्पारेणोदधिर्यथा । भीतोऽश्वैर्दशभिः सोऽयं म्लेच्छराजो विनिःसृतः ॥८५॥

अर्थ: जो म्लेच्छ राजा समुद्रके समान अपार सेनाके साथ आया था वह भयभीत होकर केवल दस घोड़ोंके साथ बाहर निकला था ॥८५॥


पराङ्मुखीकृतैः क्लीबैः किमेभिर्निहतैरिति । सौमित्रिणा समं रामः कृती निववृते सुखम् ॥८६॥

अर्थ: इन विमुख नपुंसकोंको मारनेसे क्या प्रयोजन है ऐसा विचारकर कृतकृत्य राम लक्ष्मणके साथ सुखपूर्वक युद्धसे लौट गये ॥८६॥


अमी भयाकुला म्लेच्छा विहाय विजिगीषुताम् । आश्रित्य सह्यविन्ध्याद्रीन् समयेनावतस्थिरे ॥८७॥

अर्थ: भयसे घबड़ाये हुए म्लेच्छ विजयकी इच्छा छोड़ सन्धि कर सह्य और विन्ध्य पर्वतोंपर रहने लगे ॥८७॥


कन्दमूलफलाहारास्तत्यजू रौद्रकर्मताम् । राघवाद् भयमापन्ना वैनतेयादिवोरगाः ॥८८॥

अर्थ: जिस प्रकार साँप गरुड़से भयभीत रहते हैं उसी प्रकार म्लेच्छ भी रामसे भयभीत रहने लगे । वे कन्द-मूल, फल आदि खाकर अपना निर्वाह करने लगे तथा उन्होंने सब दुष्टता छोड़ दी ॥८८॥


सानुजः सानुजं पद्मो विग्रहे शान्तविग्रहः । विसर्ज्य जनकं हृष्टं जनकाभिमुखोऽगमत् ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धमें जिनका शरीर शान्त रहा था ऐसे सानुज अर्थात् छोटे भाई लक्ष्मणसहित राम, सानुज अर्थात् छोटे भाई कनकसहित हर्षित जनकको छोड़कर जनक अर्थात् पिताके सम्मुख चले गये ॥८९॥


प्रजातपरमानन्दा रेमे विस्मितमानसा । रराज पृथिवी सर्वा भूत्या कृतयुगे यथा ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे परम आनन्द उत्पन्न हुआ था और जिसका मन आश्चर्यसे विस्मित हो रहा था ऐसी समस्त प्रजा आनन्दसे क्रीड़ा करने लगी और समस्त पृथिवी कृतयुगके समान वैभवसे सुशोभित होने लगी ॥९०॥


धर्मार्थकामसंसक्तैः पुरुषैर्भूषितं जगत् । व्यतीतहिमसंरोधैर्नक्षत्रैरम्बरं यथा ॥९१॥

अर्थ: जिस प्रकार हिमके आवरणसे रहित नक्षत्रोंसे आकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार धर्म-अर्थ-काममें आसक्त पुरुषोंसे संसार सुशोभित होता है ॥९१॥


माहात्म्यादमुतो राजन् दुहिता लोकसुन्दरी । जनकेन प्रसन्नेन राघवस्य प्रकल्पिता ॥९२॥

अर्थ: गौतमस्वामी श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! राजा जनकने इसी माहात्म्य से प्रसन्न होकर अपनी लोक-सुन्दरी पुत्री जानकी रामके लिए देना निश्चित की थी ॥९२॥


किं वात्र कृत्यं बहुभाषितेन श्रीश्रेणिक स्वं ननु कर्म पुंसाम् । समागमे गच्छति हेतुभावं वियोजने वा सुजनेन साकम् ॥९३॥

अर्थ: इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? हे श्रेणिक ! यह निश्चित बात है कि मनुष्योंका अपना किया कर्म ही उत्तम पुरुषोंके साथ संयोग अथवा वियोग होनेमें कारणभावको प्राप्त होता है ॥९३॥


सोऽहं महात्मा भुवने समस्ते गतः प्रतापं परमं सुभाग्यः । गुणैरनन्यप्रमितैरुपेतो रविर्यथोद्भाति परो मयूखैः ॥९४॥

अर्थ: परम प्रतापको प्राप्त भाग्यशाली एवं असाधारण गुणोंसे युक्त महात्मा रामचन्द्र समस्त संसारमें इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि किरणोंसे युक्त सूर्य सुशोभित होता है ॥९४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते म्लेच्छपराजयसंकीर्तनं नाम सप्तविंशतितमं पर्व ॥२७॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें म्लेच्छोंके पराजयका वर्णन करनेवाला सत्ताईसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२७॥

२८. अष्टाविंशतितमं पर्व (रामलक्ष्मणरत्नमालाभिधानं)

ईदृक्पराक्रमादृष्टो नारदः पुरुविस्मयः । धृतिं न लभते क्वापि रामसंकथया विना ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जो इस प्रकारके पराक्रमसे आकर्षित था तथा बहुत भारी आश्चर्यसे युक्त था ऐसा नारद युद्धकी चर्चाके बिना कहीं भी सन्तोषको प्राप्त नहीं होता था ॥१॥


श्रुतश्च तेन वृत्तान्तो रामस्य किल मैथिली । पिता दातुमभीष्टेति प्रकटा सर्वविष्टपे ॥२॥

अर्थ: उसने समाचार सुना कि समस्त संसारमें प्रसिद्ध अपनी सीता नामकी पुत्री उसके पिता राजा जनकने रामचन्द्रके लिए देनेकी इच्छा की है ॥२॥


अचिन्तयच्च पश्यामि कन्यां तामद्य कीदृशीम् । शोभनैर्लक्षणैर्येन रामस्य परिकल्पिता ॥३॥

अर्थ: समाचार सुनते ही उसने विचार किया कि उस कन्याको देखूँ तो सही कि वह शुभ लक्षणोंसे कैसी है जिससे रामचन्द्रके लिए उसका देना निश्चित किया गया है ॥३॥


पद्मगर्भदलं यस्मिन् कृत्वा स्तनतटे रहः । मत्कान्त्या सदृशं नेदमिति बुद्ध्यावलोकते ॥४॥

अर्थ: ऐसा विचारकर नारद उस समय सीताके महलमें पहुँचा जब कि वह एकान्त स्थानमें कमलकी भीतरी कलिकाको अपने स्तनतटके समीप करके इस बुद्धिसे उसे देख रही थी कि यह मेरी कान्तिके समान है या नहीं ॥४॥


समये नारदस्तस्मिन् सीतालोकनलालसः । विशुद्धहृदयः प्रापदारुरोह च तद्गृहम् ॥५॥

अर्थ: जिसे सीताके देखनेकी लालसा थी तथा जिसका हृदय अत्यन्त शुद्ध अर्थात् निर्विकार था ऐसा नारद उस समय सीताके महलमें ऊपर जा चढ़ा ॥५॥


ततो दर्पणसंक्रान्तं जटामुकुटभीषणम् । नारदीयं वपुर्वीक्ष्य कन्या त्राससमाकुला ॥६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका दर्पणमें प्रतिबिम्ब पड़ रहा था और जो जटारूपी मुकुटसे भीषण था ऐसा नारदका शरीर देखकर सीता भयसे व्याकुल हो गयी ॥६॥


हा मातः कोऽयमत्रेति कृत्वा प्रस्खलितं स्वनम् । विवेश गर्भभवनं वेपमानशरीरिका ॥७॥

अर्थ: हा मातः ! यह यहाँ कौन आ रहा है ? इस प्रकार अर्धोच्चारित शब्द कर वह महलके भीतर घुस गयी । उस समय उसका शरीर कम्पित हो रहा था ॥७॥


नारदोऽनुपदं तस्या विशन्नतिकुतूहलः । नारीभिर्द्वारपालीभिः सावष्टम्भमरुध्यत ॥८॥

अर्थ: अत्यन्त कुतूहलसे भरा नारद भी उसीके पीछे महलमें भीतर प्रवेश करने लगा तो द्वारकी रक्षा करनेवाली स्त्रियोंने उसे बलपूर्वक रोक लिया ॥८॥


यावत्तस्य च तासां च कलहो वर्तते महान् । तावच्छब्देन संप्रापुर्नरा खड्गधनुर्धराः ॥९॥

अर्थ: जबतक नारद तथा उन स्त्रियोंके बीच बड़ा कलह होता है तबतक उनका शब्द सुनकर तलवार और धनुषको धारण करनेवाले पुरुष वहाँ आ पहुँचे ॥९॥


गृह्यतां गृह्यतां कोऽयं कोऽयमित्युद्धतस्वनाः । कुञ्चितौष्ठाधरान् दृष्ट्वा सशस्त्रान् हन्तुमुद्यतान् ॥१०॥

नारदः परमं बिभ्रद्भयमुत्कटवेपथुः । ऊर्ध्वरोमा खमुत्पत्य विश्रान्तोऽष्टापदाचले ॥११॥

अर्थ: वे पुरुष पकड़ो-पकड़ो कौन है ? कौन है ? इस प्रकार- का जोरदार शब्द कर रहे थे । जो ओठ चाब रहे थे, शस्त्रोंसे युक्त थे तथा मारनेके लिए उद्यत थे ऐसे उन पुरुषोंको देखकर नारद अत्यन्त भयभीत हो उठा । उसके शरीरसे अत्यधिक कँपकँपी छूट रही थी, और रोमांच खड़े हो गये थे । खैर, जिस किसी तरह वह आकाशमें उड़कर कैलास पर्वतपर पहुँचा और वहीं विश्राम करने लगा ॥१०-११॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं प्राप्तोऽस्मि जननं पुनः । निष्क्रान्तोऽस्मि महादावात् पक्षी ज्वालाहतो यथा ॥१२॥

अर्थ: वह विचारने लगा कि हाय! मैं बड़े कष्टमें पड़ गया था। बचकर क्या आया मानो दूसरा जन्म ही मैंने प्राप्त किया है। जिस प्रकार ज्वालाओंसे झुलसा पक्षी किसी बड़े दावानलसे बाहर निकलता है उसी प्रकार मैं भी उस कष्टसे बाहर निकला हूँ ॥१२॥


शनैः शनैस्ततः कम्पं तद्दिग्न्यस्तेक्षणोऽमुचत् । ममार्ज च ललाटस्थान् स्वेदबिन्दून् स्थवीयसः ॥१३॥

अर्थ: उस समय भी उसके नेत्र उसी दिशामें लग रहे थे । तदनन्तर धीरे-धीरे उसने शरीरकी कँपकँपी छोड़ी और ललाटपर स्थित पसीनेकी बड़ी-बड़ी बूँदें पोंछीं ॥१३॥


समादधे स्खलत्पाणिर्जटाभारं समाकुलम् । मुहुः स्मृता च निःश्वासान्मुमुचे दीर्घवेगिनः ॥१४॥

अर्थ: उसने काँपते हुए हाथसे अपनी बिखरी हुई जटाएँ ठीक कीं । यह करते हुए जब उसे बार-बार पिछली घटनाका स्मरण हो आता था तब वह लम्बी-लम्बी साँसें छोड़ने लगता था ॥१४॥


ततः स्वैरं भयाद् भ्रष्टो दध्यावेवं प्रकोपवान् । निश्चलस्थितशेषाङ्गो मूर्धानं कम्पयन् मनाक् ॥१५॥

अर्थ: तत्पश्चात् जब भय दूर हुआ तो क्रोधमें आकर वह इस प्रकार विचार करने लगा । विचार करते समय उसके समस्त अंग निश्चित रूपसे स्थिर थे केवल वह मस्तकको कुछ-कुछ हिला रहा था ॥१५॥


अदुष्टमानसः पश्यन् यातो रूपदिदृक्षया । रामानुरागतः प्रापमवस्थां मृत्युगोचराम् ॥१६॥

अर्थ: वह विचारने लगा कि देखो मेरे मनमें कोई दोष नहीं था मैं केवल रामचन्द्रके अनुरागसे सीताका रूप देखनेकी इच्छासे ही वहाँ गया था परन्तु ऐसी दशाको प्राप्त हो गया जिसमें मृत्यु तककी आशंका हो गयी ॥१६॥


अहो प्रौढकुमार्यास्तच्चेष्टितं दुष्टविभ्रमम् । गृहीतोऽस्मि नयेनैष कृतान्तसदृशैर्न रैः ॥१७॥

अर्थ: आश्चर्य है कि उस प्रौढ़ कुमारीकी वह चेष्टा कितनी दुष्टतासे भरी थी कि जिसके कारण मैं यमराजकी समानता करनेवाले मनुष्योंके द्वारा पकड़ लिया गया ॥१७॥


क्व मे पापाधुना याति व्यसने पातयामि ताम् । नृत्याम्यातोद्यमुक्तोऽपि किमुतातोद्यसंयुतः ॥१८॥

अर्थ: वह पापिनी अब जायेगी कहाँ ? मैं उसे अवश्य ही संकटमें डालूँगा । मैं तो बाजेके बिना ही नाचता हूँ फिर यदि बाजे मिल जायें तो कहना ही क्या है ? ॥१८॥


विचिन्त्यैवं द्रुतं गत्वा नगरं रथनूपुरम् । सीतारूपं पटे न्यस्य प्रत्यक्षमिव सुन्दरम् ॥१९॥

अर्थ: ऐसा विचारकर उसने एक पटपर प्रत्यक्षके समान सीताका सुन्दर चित्र बनाया और उसे लेकर वह शीघ्र ही रथनूपुर नगर गया ॥१९॥


चकारोपवने चन्द्रगतेः क्रीडनसद्मनि । उत्सृज्य च बहिस्तस्थौ पुरस्याप्रकटात्मकः ॥२०॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने उपवनमें जो अत्यन्त उत्तुंग क्रीड़ाभवन था उसमें वह चित्रपट रख दिया और स्वयं अप्रकट रहकर नगरके बाहर रहने लगा ॥२०॥


अन्यदाथ समुद्देशं कुमारैर्बहुभिः समम् । भामण्डलकुमारोऽसौ रममाणः समाययौ ॥२१॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन अनेक कुमारोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ भामण्डल कुमार वहाँ आया ॥२१॥


तत्राज्ञानात् समालोक्य स्वसारं चित्रगोचराम् । ह्रीश्रुतिस्मृतिमुक्तात्मा द्राक् प्रभामण्डलोऽभवत् ॥२२॥

अर्थ: सो चित्रमें अंकित बहन सीताको देखकर वह अज्ञानवश शीघ्र ही लज्जा, शास्त्र, ज्ञान तथा स्मृतिसे रहित हो गया अर्थात् सीताके चित्रको देखकर इतना कामाकुलित हुआ कि लज्जा, शास्त्र तथा स्मृति आदि सबको भूल गया ॥२२॥


ततः शोचति निश्वासान्मुञ्चतेऽत्यन्तमायतान् । शुष्यति क्षिपति स्रस्तं गात्रं यत्र क्वचिद् द्रुतम् ॥२३॥

अर्थ: वह निरन्तर शोक करने लगा, अत्यन्त लम्बे श्वासोच्छ्वास छोड़ने लगा, उसका शरीर सूख गया तथा शिथिल शरीरको वह चाहे जहाँ उपेक्षासे डालने लगा अर्थात् चाहे जहाँ उठने-बैठने लगा ॥२३॥


न रात्रौ न दिवा निद्रां लभते ध्यानतत्परः । उपचारेण कान्तेन न जातु सुखमश्नुते ॥२४॥

अर्थ: उसे न रात्रिमें नींद आती थी न दिनमें चैन पड़ता था । वह रात-दिन उसीके ध्यानमें निमग्न रहता था । सुन्दर उपचारोंसे उसे कभी भी सुख नहीं मिलता था ॥२४॥


पुष्पाणि गन्धमाहारं द्वेष्टि क्ष्वेडं यथा भृशम् । करोति लोठनं भूयः संतापी जलकुट्टिमे ॥२५॥

अर्थ: वह पुष्प, सुगन्धित पदार्थ तथा आहारसे ऐसा द्वेष करता था मानो उन्हें विषमय ही समझता हो । वह सन्तापसे युक्त होकर बार-बार जलसे सींचे हुए फर्शपर लोटता था ॥२५॥


मौनमाचरति स्मित्वा करोति च कथां मुहुः । सहसोत्तिष्ठति व्यर्थं याति भूयो निवर्तते ॥२६॥

अर्थ: वह मौन बैठा रहता था, कभी हँसकर बार-बार चर्चा करने लगता था, कभी सहसा उठकर व्यर्थ ही चलने लगता था और फिर लौट आता था ॥२६॥


ततो ग्रहगृहीतस्य सदृशैस्तैर्विचेष्टितैः । ज्ञातं तदातुरत्वस्य कारणं मतिशालिभिः ॥२७॥

अर्थ: उसकी समस्त चेष्टाएँ ऐसी हो गयीं मानो उसे भूत लग गया हो । तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुषोंने उसकी आतुरताके कारणोंका पता लगाया ॥२७॥


जगदुश्चैवमन्योन्यं कन्येयं केन चित्रिता । पटोऽत्र निहितो गेहे स्याद् वा नारदचेष्टितम् ॥२८॥

अर्थ: वे परस्परमें इस प्रकार कहने लगे कि यह कन्या किसने चित्रित की है ? इस महलमें यह चित्रपट किसने रखा है ? जान पड़ता है कि यह सब नारदकी चेष्टा है ॥२८॥


ततः श्रुत्वा कुमारं तमाकुलं स्वेन कर्मणा । नारदस्तस्य बन्धूनां विस्रब्धो दर्शनं ददौ ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर जब नारदने सुना कि हमारे कार्यसे भामण्डल कुमार अत्यन्त आकुल हो रहा है तब उसने निःशंक होकर उसके बन्धुओंके लिए दर्शन दिया ॥२९॥


आदरेण च तैः पृष्टः कृतपूजानमस्कृतिः । मुने कथय कन्येयं दृष्टा क्व भवतेदृशी ॥३०॥

अर्थ: उन सबने बड़े आदरसे नारदकी पूजा कर नमस्कार किया तथा पूछा कि हे मुने ! कहो आपने यह ऐसी कन्या कहाँ देखी है ? ॥३०॥


महोरगाङ्गना किं स्याद् भवेत् किं वा विमानजा । मर्त्यलोकं समायाता त्वया दृष्टा कथंचन ॥३१॥

अर्थ: यह कोई नागकुमार देवकी अंगना है या पृथिवीपर आयी हुई किसी कल्पवासी देवकी स्त्री आपने किसी तरह देखी है ? ॥३१॥


अवद्वारस्ततोऽवोचद् विनयं परमं वहन् । भूयो भूयः स्वयं गच्छन् विस्मयं कम्पयन् शिरः ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर परम विनयको धारण करता तथा स्वयं ही आश्चर्यको प्राप्त हो बार-बार शिर हिलाता हुआ नारद कहने लगा ॥३२॥


अस्त्यत्र मिथिला नाम पुरो परमसुन्दरी । इन्द्रकेतोः सुतस्तत्र जनको नाम पार्थिवः ॥३३॥

अर्थ: कि इसी मध्यमलोकमें अत्यन्त मनोहर मिथिला नामकी नगरी है । उसमें इन्द्रकेतुका पुत्र जनक नामका राजा रहता है ॥३३॥


विदेहेति प्रिया तस्य मनोबन्धनकारिणी । गोत्रसर्वस्वभूतेयं सीतेति दुहिता तयोः ॥३४॥

अर्थ: उसके मनको बाँधनेवाली विदेहा नामकी प्रिया है । उन दोनोंकी ही यह सीता नामकी कन्या है । यह कन्या उन दोनोंके गोत्रका मानो सर्वस्व ही है ॥३४॥


निवेद्यैवमसौ तेभ्यः कुमारं पुनरुक्तवान् । बाल मा याः विषादं त्वं तवेयं सुलभैव हि ॥३५॥

अर्थ: भामण्डलके भाई-बन्धुओंसे ऐसा कहकर उसने भामण्डलसे कहा कि हे बालक ! तू विषादको प्राप्त मत हो । यह कन्या तुझे सुलभ ही है ॥३५॥


रूपमात्रेण यातोऽसि किमस्या भावमीदृशम् । ये तस्या विभ्रमा भद्र कस्तान् वर्णयितुं क्षमः ॥३६॥

अर्थ: तू इसके रूपमात्रसे ही ऐसी अवस्थाको प्राप्त हो रहा है फिर इसके जो हाव-भाव विभ्रम हैं उनका वर्णन करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥३६॥


तया चित्तं समाकृष्टं तवेति किमिहाद्भुतम् । धर्मध्याने दृढं बद्धं मुनीनामपि सा हरेत् ॥३७॥

अर्थ: उसने तुम्हारा चित्त आकृष्ट कर लिया इसमें आश्चर्य ही क्या है ? वह तो धर्मध्यानमें सुदृढ़ रूपसे निबद्ध मुनियोंके चित्तको भी आकृष्ट कर सकती है ॥३७॥


आकारमात्रमत्रैतत्तस्या न्यस्तं मया पटे । लावण्यं यत्तु तत्तस्यास्तस्यामेवैतदीदृशम् ॥३८॥

अर्थ: मैंने चित्रपटमें उसका यह केवल आकारमात्र ही अंकित किया है । उसका जो लावण्य है वह तो उसीमें है अन्यत्र सुलभ नहीं है ॥३८॥


नवयौवनसंभूतकान्तिसागरवीचिषु । सा तिष्ठति तरन्तीव संसक्ता स्तनकुम्भयोः ॥३९॥

अर्थ: वह नवयौवनसे उत्पन्न कान्तिरूपी समुद्रकी तरंगोंमें ऐसी जान पड़ती है मानो स्तनरूपी कलशोंके सहारे तैर ही रही हो ॥३९॥


तस्याः श्रोणी वरारोहा कान्तिसंप्लावितांशुका । वीक्षितोन्मूलयेत् स्वान्तं समूलमपि योगिनाम् ॥४०॥

अर्थ: कान्तिसे वस्त्रको तिरोहित करनेवाले उसके नितम्ब यदि देखनेमें आ जावें तो निश्चित ही वह योगियोंके मनको भी समूल उखाड़कर फेंक दें ॥४०॥


मुक्त्वा भवन्तमन्यस्य सेयं कस्योचिता भवेत् । यत्नं वस्तुनि कुर्वन्ना जायतां योग्यसंगमः ॥४१॥

अर्थ: आपको छोड़कर और यह किसके योग्य हो सकती है ? इस कार्यमें यत्न करो जिससे योग्य समागम प्राप्त हो सके ॥४१॥


इत्युक्त्वा चरितार्थः सन्नारदोऽगान्मनीषितम् । दध्यौ भामण्डलोऽप्येवं स्मरसायकताडितः ॥४२॥

अर्थ: इतना कहकर नारद तो कृतकृत्य हो इच्छित स्थानपर चला गया पर इधर भामण्डल कामके बाणोंसे ताड़ित हो इस प्रकार विचार करने लगा कि ॥४२॥


क्षेपिष्ठं प्रमदारत्नं न लभेयं यदीदृशम् । न जीवेयं तदावश्यं स्मराकुलितमानसः ॥४३॥

अर्थ: चूँकि मेरा मन कामसे इतना आकुल हो रहा है कि यदि मैं शीघ्र ही इस स्त्रीरत्नको नहीं पाता हूँ तो अवश्य ही जीवित नहीं रह सकूँगा ॥४३॥


धारयन्ती परां कान्तिमियं मे हृदयस्थिता । कथं न कुरुते तापमग्निज्वालेव सुन्दरी ॥४४॥

अर्थ: परम कान्तिको धारण करनेवाली यह सुन्दरी प्रमदा मेरे हृदयमें स्थित है फिर अग्निकी ज्वालाके समान सन्ताप क्यों कर रही है ॥४४॥


दहति त्वचमेवार्को बहिरन्तश्च मन्मथः । अन्तर्द्धिरस्ति सूर्यस्य मन्मथस्य न विद्यते ॥४५॥

अर्थ: सूर्य सिर्फ बाहरी चमड़ेको जलाता है पर काम भीतरी भागको जलाता है। इतनेपर भी सूर्य अस्त हो जाता है पर काम कभी अस्त नहीं होता ॥४५॥


द्वयमेव ध्रुवं मन्ये प्राप्तव्यमधुना मया । तया वा संगमः साकं मरणं वा स्मरेषुभिः ॥४६॥

अर्थ: इस समय तो ऐसा जान पड़ता है कि मेरे द्वारा दो ही वस्तुएँ प्राप्त करने योग्य हैं - एक तो उस स्त्रीरत्नके साथ समागम और दूसरा कामके बाणोंसे मारा जाना ॥४६॥


अनारतमिति ध्यायन्नशने शयने न च । न प्रासादे न चोद्याने धृतिं भामण्डलोऽगमत् ॥४७॥

अर्थ: इस प्रकार निरन्तर उसीका ध्यान करता हुआ भामण्डल न भोजनमें, न शयनमें, न महलमें और न उद्यानमें - कहीं भी धैर्यको प्राप्त हो रहा था ॥४७॥


स्त्रियोऽथ नारदं मत्वा कुमारासुखकारणम् । ससंभ्रमं समुद्विग्नाः पितुरस्य न्यवेदयन् ॥४८॥

अर्थ: अथानन्तर जब स्त्रियोंको पता चला कि कुमारके दुःखका कारण नारद है तब उन्होंने उद्विग्न होकर शीघ्र ही कुमारके पितासे यह समाचार कहा ॥४८॥


नाथानर्थसमुद्गेन नारदेनाहृता पटे । चित्रीकृत्याङ्गना कापि रूपातिशययोगिनी ॥४९॥

अर्थ: कि इस समस्त अनर्थका पिटारा नारद ही है। वही कहींकी एक अत्यन्त सुन्दरी स्त्रीको चित्रपटपर अंकित करके लाया था ॥४९॥


समालोक्य कुमारस्तां विह्वलीभूतमानसः । धृतिं न लभते क्वापि त्रपया दूरमुज्झितः ॥५०॥

अर्थ: उसे देखकर जिसका मन अत्यन्त विह्वल हो गया है ऐसा कुमार किसी भी वस्तुमें धैर्यको प्राप्त नहीं हो रहा है। लज्जाने उसे दूरसे ही छोड़ दिया है ॥५०॥


मुहुस्तामीक्षते कन्यां सीताशब्दं समुच्चरन् । करोति विविधां चेष्टां वायुनेव वशीकृतः ॥५१॥

अर्थ: वह सीता शब्दका उच्चारण करता हुआ बार-बार उसी कन्याको देखता रहता है तथा वायुके वशीभूत हुएके समान नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करता रहता है ॥५१॥


उपायश्चिन्त्यतामाशु तस्योत्पादयितुं धृतिम् । यावन्न मुच्यते प्राणैर्भोजनादिपराङ्मुखः ॥५२॥

अर्थ: वह भोजनादि समस्त कार्योंसे विमुख हो गया है अर्थात् उसने खाना-पीना सब छोड़ दिया है। इसलिए जबतक प्राण इसे नहीं छोड़ते हैं तबतक उसके पहले ही इसे धैर्य उत्पन्न करानेके लिए कोई उपाय सोचा जाये ॥५२॥


ततश्चन्द्रगतिः श्रुत्वा वार्तामेतां समाकुलः । आगत्य कान्तया साकं सुतमेवमभाषत ॥५३॥

भज सर्वाः क्रियाः पुत्र सुचेता भोजनादिकाः । अयं वृणोमि तां कन्यां भवतो मनसि स्थिताम् ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रगति विद्याधर इस समाचारको सुनकर घबड़ाया हुआ स्त्रीके साथ आकर पुत्रसे इस प्रकार बोला कि हे पुत्र ! स्वस्थचित्त होकर भोजनादि समस्त क्रियाएँ करो । मैं तुम्हारे मनमें स्थित उस कन्याको वरता हूँ अर्थात् तेरे लिए स्वीकार करता हूँ ॥५३-५४॥


परिसान्त्व्य सुतं कान्तां रहश्चन्द्रायणोऽवदत् । प्रमोदं च विषादं च विस्मयं च वहन्निदम् ॥५५॥

अर्थ: इस प्रकार पुत्रको सान्त्वना देकर चन्द्रगति विद्याधर हर्ष, विषाद और विस्मयको धारण करता हुआ एकान्तमें अपनी स्त्रीसे बोला कि ॥५५॥


आर्ये विद्याभृतां कन्याः संत्यज्य प्रतिमोज्झिताः । भूगोचरामिसंबन्धः कथमस्मासु युज्यते ॥५६॥

अर्थ: हे आर्ये ! विद्याधरोंकी अनुपम कन्याएँ छोड़कर हम लोगोंका भूमिगोचरियोंसे साथ सम्बन्ध करना कैसे ठीक हो सकता है ? ॥५६॥


क्ष्मागोचरस्य निलयं गन्तुं वा युज्यते कथम् । यदा वा तेन नो दत्ता मुखच्छाया तदा तु का ॥५७॥

अर्थ: इसके सिवाय एक बात यह है कि भूमिगोचरीके घर जाना कैसे ठीक हो सकता है ? याचना करनेपर भी यदि उसने कन्या नहीं दी तो उस समय मुखकी क्या कान्ति होगी ? ॥५७॥


तस्मात् केनाप्युपायेन कन्यायाः पितरं प्रियम् । इहैव नाययाम्याशु नान्यः पन्था विराजते ॥५८॥

अर्थ: इसलिए कन्याके प्रिय पिताको किसी उपायसे शीघ्र ही यहीं बुलाता हूँ । इस विषयमें कोई दूसरा मार्ग शोभा नहीं देता ॥५८॥


नाथ युक्तमयुक्तं वा त्वमेव ननु मन्यसे । तथापि तावकं वाक्यं ममापि हृदयंगमम् ॥५९॥

अर्थ: स्त्रीने उत्तर दिया कि हे नाथ ! उचित और अनुचित तो आप ही जानते हैं पर इतना अवश्य कहती हूँ कि आपकी बात मुझे भी अच्छी लगती है ॥५९॥


ततश्चपलवेगाख्यं भृत्यमाहूय सादरम् । कर्णजापेन विज्ञातवृत्तान्तमकरोन्नृपः ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने चपलवेग नामक भृत्यको आदरपूर्वक बुलाकर उसके कानमें सब वृत्तान्त सूचित कर दिया ॥६०॥


आज्ञादानेन तुष्टोऽसौ मिथिलां त्वरितो ययौ । हृष्टहंसयुवामोदसूचितामिव पद्मिनीम् ॥६१॥

अर्थ: तत्पश्चात् स्वामीकी आज्ञासे सन्तुष्ट हुआ चपलवेग शीघ्र ही उस प्रकार मिथिलाकी ओर चला जिस प्रकार कि हर्षसे भरा तरुण हंस सुगन्धिसे सूचित कमलिनीकी ओर चलता है ॥६१॥


अवतीर्याम्बराच्चारु सप्तिवेषमुपाश्रितः । वित्रासयितुमुद्युक्तो गोमहिष्यश्ववारणान् ॥६२॥

अर्थ: उसने आकाशसे उतरकर सुन्दर घोड़ेका रूप बनाया और वह गाय, भैंसा, अश्व तथा हाथी आदि पशुओंको भयभीत करनेके लिए उद्यत हुआ ॥६२॥


देशघाते यथा जातः समाक्रन्दस्तदापरः । शुश्राव च जनौघेभ्यो जनकस्तद्विचेष्टितम् ॥६३॥

अर्थ: वह जिस देशके घात करनेमें प्रवृत्त होता था उसी ओरसे रोनेका प्रबल शब्द उठ खड़ा होता था । राजा जनकने भी जनसमूहसे उस घोड़ेकी चेष्टाएँ सुनीं ॥६३॥


निर्ययौ च पुराद्युक्तः प्रमोदोद्वेगकौतुकैः । ईक्षांचक्रे च तं सप्तिं नवयौवनसंगतम् ॥६४॥

अर्थ: सुनीं ही नहीं, वह हर्ष, उद्वेग और कौतुकसे युक्त हो उस घोड़ेकी चेष्टाएँ देखनेके लिए नगरसे बाहर भी आया और उसने नवयौवनसे युक्त उस घोड़ेको देखा ॥६४॥


उद्दामानं मनोवेगं भास्वत्प्रवरलक्षणम् । प्रदक्षिणमहावर्तं तनुवक्त्रोदरं चलम् ॥६५॥

सुशफाग्रैर्मृदङ्गानां कुर्वाणमिव ताडनम् । पृथग्जनैर्दुरारोहं दधतं प्रोथवेपथुम् ॥६६॥

अर्थ: वह घोड़ा अत्यन्त ऊँचा था, मनको अपनी ओर खींचनेवाला था, उसके शरीरमें अच्छे-अच्छे लक्षण देदीप्यमान हो रहे थे, दक्षिण अंगमें महान् आवर्त थी, उसका मुख तथा उदर कृश था, वह अत्यन्त बलवान् था, टापोंके अग्रभागसे वह पृथिवीको ताड़ित कर रहा था । उससे ऐसा जान पड़ता था मानो मृदंग ही बजा रहा हो। साधारण व्यक्ति उसपर चढ़नेमें असमर्थ थे तथा उसका नथना कम्पित हो रहा था ॥६५-६६॥


ततः शुद्धप्रमोदः सन् जगाद जनको मुहुः । ज्ञायतामेष कस्याश्वः प्राप्तो निर्दामतामिति ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर विशुद्ध हर्षको धारण करनेवाले राजा जनकने बार-बार उपस्थित लोगोंसे कहा कि मालूम किया जाये कि यह किसका घोड़ा बन्धनमुक्त हो गया है ? ॥६७॥


ततो द्विजगणा ऊचुः प्रियोद्योद्यतचेतसः । राजन्नस्य न नाकेऽपि तुरङ्गो विद्यते समः ॥६८॥

अर्थ: तत्पश्चात् प्रिय वचन कहनेमें जिनका चित्त उत्कण्ठित हो रहा था ऐसे ब्राह्मणोंने कहा कि हे राजन् ! इस घोड़ेके समान कोई दूसरा घोड़ा नहीं है ॥६८॥


कैव वार्ता पृथिव्यां नु राज्ञामीदृग् भवेदिति । अथवा किं न कालेन नृप दृष्टस्त्वयेयता ॥६९॥

अर्थ: यहाँ की बात जाने दीजिए समस्त पृथिवीमें जितने राजा हैं उनमें किसीके ऐसा घोड़ा नहीं होगा। अथवा हे राजन् ! आपने भी इतने समय तक क्या कभी ऐसा घोड़ा देखा ? ॥६९॥


रथे दिवाकरस्यापि श्रुतिविभ्रमगोचरः । विद्यते नेति जानीमः स्थूरीपृष्ठोऽमुना समः ॥७०॥

अर्थ: हम तो समझते हैं कि सूर्यके रथमें भी इस घोड़ेकी समानता करनेवाला घोड़ा नहीं होगा ॥७०॥


नूनं भवन्तमुद्दिश्य कृतवन्तं परं तपः । सृष्टोऽयं विधिना सन्निरतः स्वीक्रियतां प्रभो ॥७१॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता है कि परम तपस्या करनेवाले आपको लक्ष्य कर ही विधाताने यह घोड़ा बनाया है सो हे प्रभो ! इसे आप स्वीकार करो ॥७१॥


ततोऽसौ विनयी निन्ये प्रग्रहद्वयसंयुतः । मन्दुरां कुङ्कुमार्द्राङ्गः प्रवलच्चारुचामरः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर उस विनयवान् घोड़ेको दुहरी रस्सीसे बाँधकर घुड़शालमें ले जाया गया । उस समय उसका शरीर केशरके विलेपनसे गीला हो रहा था और उसपर सुन्दर चमर हिल रहे थे ॥७२॥


संवृत्तो मासमात्रोऽस्य ययौ कालो गृहीतितः । उपचारैरलंयोग्यैः सेव्यमानस्य संततम् ॥७३॥

अर्थ: घुड़शालमें निरन्तर योग्य उपचारोंसे इसकी सेवा होती थी। इस तरह जिस दिनसे घोड़ा पकड़कर लाया गया था उस दिनसे एक मासका समय व्यतीत हो गया ॥७३॥


पाशकोऽत्रान्तरे नत्वा जनकाय न्यवेदयत् । नाथ नागस्य सद्देशे ग्रहणं दृश्यतामिति ॥७४॥

अर्थ: इस बीचमें वनके एक कर्मचारीने नमस्कार कर राजा जनकसे निवेदन किया कि हे नाथ ! अपने देशमें हाथी कैसे पकड़ा जाता है यह देखिए ? ॥७४॥


ततोऽसौ मुदितस्तुङ्गमारुह्य वरवारणम् । उद्दिष्टपादविस्तेन विवेश सुमहद्वनम् ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर प्रसन्नतासे भरे राजा जनक उत्तुंग गजराज-पर सवार होकर चले । वनका कर्मचारी उन्हें मार्ग बताता जाता था । इस तरह राजा जनक किसी बड़े वनमें प्रविष्ट हुए ॥७५॥


दूरे च सरसो दुर्गे स्थितं दृष्ट्वा वरं द्विपम् । जगादानय तत्क्षिप्रं कंचिदश्वं महाजवम् ॥७६॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने सरोवरके दूसरी ओर दुर्गम स्थानमें खड़े हुए उत्तम हाथीको देखकर सारथीसे कहा कि शीघ्र ही किसी वेगशाली घोड़ेको लाओ ॥७६॥


ढौकितश्च स मायाश्वः सद्यः स्फुरितविग्रहः । आरुरोह स तं यातश्चोत्पत्य तुरगो नभः ॥७७॥

अर्थ: कहनेकी देर थी कि जिसका शरीर फड़क रहा था ऐसा वह मायामय घोड़ा लाकर राजा जनकके समीप खड़ा कर दिया गया। राजा जनक उसपर सवार हुए नहीं कि वह घोड़ा उन्हें लेकर आकाशमें उड़ गया ॥७७॥


हाहाकारं नृपाः कृत्वा वहन्तः शोकमुद्गतम् । निवृत्ताः सहसा भीता विस्मयव्याप्तमानसाः ॥७८॥

अर्थ: यह देख जो सहसा भयभीत हो गये थे तथा जिनमें चित्त आश्चर्यसे व्याप्त हो रहे थे ऐसे अन्य राजा लोग हाहाकार करके बहुत भारी शोकको धारण करते हुए वापस लौट आये ॥७८॥


ततो नदीर्गिरीन् देशानरण्यानि च भूरिशः । प्रयाति लङ्घयन् सप्तिः मनोवदनिवारणः ॥७९॥

अर्थ: अथानन्तर मनके समान जिसका कोई निवारण नहीं कर सकता था ऐसा वह घोड़ा अनेक नदी, पहाड़, देश और पर्वतोंको लाँघता हुआ आगे बढ़ता गया ॥७९॥


नातिदूरे ततो दृष्ट्वा प्रासादं तुङ्गमुज्ज्वलम् । ह्रियमाणः स शाखायां दृढं लग्नो महातरोः ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर पास ही में एक ऊँचा उज्ज्वल भवन देखकर राजा जनक एक महावृक्षकी शाखामें मजबूतीसे झूम गये ॥८०॥


अवतीर्य ततो वृक्षाद् विश्रम्य च सविस्मयः । चरणाभ्यां परिक्रामन् प्रययौ स्तोकमन्तरम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर वृक्षसे नीचे उतरकर उन्होंने आश्चर्यचकित हो कुछ देर तक विश्राम किया फिर पैरोंसे पैदल चलते हुए कुछ दूर गये ॥८१॥


ददर्श च महातुङ्गं शालं चामीकरात्मकम् । गोपुरं च सुरत्नेन तोरणेनातिशोभिनम् ॥८२॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने अत्यन्त ऊँचा सुवर्णमय कोट और उत्तमोत्तम रत्नोंसे युक्त तोरणसे समुद्भासित गोपुर देखा ॥८२॥


नानाजातींश्च वृक्षाणां लताजालकयोगिनाम् । फलपुष्पसमृद्धानां नानाविहगशोभिनाम् ॥८३॥

अर्थ: लताओंके समूहसे युक्त, फल और फूलोंसे समृद्ध तथा नाना प्रकारके पक्षियोंसे सुशोभित वृक्षोंकी नाना जातियां देखीं ॥८३॥


संध्याभ्रकूटसंकाशान् प्रासादान् मण्डलस्थितान् । सेवां प्रासादराजस्य कुर्वाणानिव तत्पराम् ॥८४॥

अर्थ: जिनके शिखर सन्ध्याके बादलोंके समान सुशोभित थे, जो गोलाकारमें स्थित थे तथा जो भवनोंके राजा अर्थात् राजभवनकी बड़ी तत्परतासे सेवा करते हुए के समान जान पड़ते थे ऐसे महलोंको भी उन्होंने देखा ॥८४॥


ततोऽसौ खड्गमालम्ब्य दक्षिणो दक्षिणे करे । केसरीवातिनिःशङ्कः प्रविवेश स गोपुरम् ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर अतिशय चतुर राजा जनकने दाहिने हाथमें तलवार लेकर सिंहके समान निःशंक हो गोपुरमें प्रवेश किया ॥८५॥


अपश्यच्च परिस्फीताः पुष्पजातीर्बहुत्विषः । मणिकाञ्चनसोपाना वापीश्च स्फटिकाम्भसः ॥८६॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने जहाँ-तहाँ फैले हुए रंग-बिरंगे अनेक प्रकारके फूल देखे । जिनकी सीढ़ियाँ मणि और स्वर्णकी बनी हुई थीं तथा जिनमें स्फटिकके समान स्वच्छ जल भरा था ऐसी बावड़ियाँ देखीं ॥८६॥


रमणांश्च महामोदान् विशालान् कुन्दमण्डपान् । चलत्पल्लवसंघातान् कृतसंगीतषट्पदान् ॥८७॥

अर्थ: जिन्हें देखकर आनन्द उत्पन्न होता था, जिनकी बहुत भारी सुगन्धि दूर-दूर तक फैल रही थी, जिनके पल्लवोंके समूह हिल रहे थे, और जहाँ भ्रमर संगीत कर रहे थे ऐसे कुन्द पुष्पोंके विशाल मण्डप भी उन्होंने देखे ॥८७॥


ततश्च माधवीतुङ्गजालकान्तरयोगिना । विस्फारितप्रसन्नेन चक्षुषा चारुकान्तिना ॥८८॥

रत्नवातायनैर्युक्तं मुक्ताजालकशोभितैः । शातकौम्भमहास्तम्भसहस्रकृतधारणम् ॥८९॥

नानारूपसमाकीर्णं मेरुशृङ्गसमप्रभम् । वज्रबद्धमहापीठमद्राक्षीद् भवनं नृपः ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर राजा जनकने खुले हुए अत्यन्त सुन्दर स्वच्छ नेत्रसे माधवी लताओंकी ऊँची जालीके बीच झाँककर एक ऐसा सुन्दर मन्दिर देखा जो मोतियोंकी जालीसे सुशोभित रत्नमय झरोखोंसे युक्त था, जो सुवर्णनिर्मित हजारों बड़े-बड़े खम्भे धारण कर रहा था, नाना प्रकारके रूपसे व्याप्त था, मेरुकी शिखरके समान जिसकी प्रभा थी, और जिसकी महापीठ ( भूमिका ) वज्रनिबद्धके समान अत्यन्त मजबूत थी ॥८८-९०॥


अचिन्तयच्च किं न्वेतद्विमानं पतितं खतः । वासवस्य हृतं किं वा दैत्यैः क्रीडागृहं भवेत् ॥९१॥

अर्थ: उसे देखकर वे विचार करने लगे कि क्या यह आकाशसे गिरा हुआ विमान है अथवा दैत्योंके द्वारा हरण किया हुआ इन्द्रका क्रीड़ागृह है ? ॥९१॥


पातालादुत्थितः किं वा नागेन्द्रस्यायमालयः । कुतोऽपि कारणात् सूर्यमरीचिकृतखण्डनः ॥९२॥

अर्थ: अथवा किसी कारणवश सूर्यकी किरणोंसे जिसके खण्ड हो गये थे ऐसा पातालसे निकला हुआ नागेन्द्रका भवन है ? ॥९२॥


अहो मे ययुना तेन भद्रेणोपकृतं परम् । अदृष्टपूर्वमेतद् यत् साधु वेश्मावलोकितम् ॥९३॥

अर्थ: अहो ! उस भले घोड़ेने मेरा बड़ा उपकार किया जिससे मैं इस अदृष्टपूर्व सुन्दर मन्दिरको देख सका ॥९३॥


विवेश चिन्तयन्नेवं भवनं तन्मनोहरम् । संफुल्लवदनाम्भोजो ददर्श च जिनाधिपम् ॥९४॥

अर्थ: ऐसा विचार करते हुए राजा जनकने उस मनोहर मन्दिरमें प्रवेश किया और वहाँ जाकर जिनेन्द्र भगवान्के दर्शन किये । जिन-दर्शनके प्रभावसे उनका मुखकमल खिल उठा था ॥९४॥


हुताशनशिखागौरं पूर्णचन्द्रनिभाननम् । पद्मासनस्थितं तुङ्गं जटामुकुटधारिणम् ॥९५॥

प्रातिहार्यसमायुक्तं हेमतामरसार्चितम् । चित्ररत्नकृतच्छायं तुङ्गसिंहासनस्थितम् ॥९६॥

अर्थ: मन्दिरमें विराजमान जिनेन्द्रदेव अग्निकी शिखाके समान गौर वर्ण थे, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था, वे पद्मासनसे विराजमान थे, बहुत ऊँचे थे, जटारूपी मुकुटको धारण किये हुए थे, आठ प्रातिहार्योंसे युक्त थे, स्वर्ण कमलोंसे उनकी पूजा की गयी थी, नाना प्रकारके रत्नोंसे उनकी कान्ति बढ़ रही थी, और वे ऊँचे सिंहासन-पर विराजमान थे ॥९५-९६॥


ततोऽञ्जलिपुटं मूर्ध्नि कृत्वा हृष्टतनूरुहः । प्रणामं प्रयतः कुर्वन् भक्त्या मूर्च्छामुपागतः ॥९७॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके शरीरमें रोमांच उठ रहे थे ऐसे राजा जनकने हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये और बड़ी सावधानीसे जिनेन्द्रदेवको नमस्कार किया । नमस्कार करते-करते उसकी भक्ति इतनी अधिक बढ़ी कि वह उसके अतिरेकसे मूर्च्छित हो गया ॥९७॥


क्षणेन प्राप्य संज्ञां च स्तुतिं कृत्वा सुसंस्कृताम् । विस्रब्धं जनकस्तस्थौ विस्मयं परमुद्वहन् ॥९८॥

अर्थ: क्षण-भरके बाद पुनः चेतना प्राप्त कर उसने सुन्दर सुसंस्कृत स्तुति की । तदनन्तर वह परम आश्चर्यको धारण करता हुआ निःशंक हो वहीं बैठ गया ॥९८॥


कृती चपलवेगश्च मायां संहृत्य सत्वरः । खड्गविद्याधरो भूत्वा संप्राप रथनूपुरम् ॥९९॥

अर्थ: इधर चपलवेग नामका विद्याधर जो घोड़ेका रूप धरकर जनकको हर ले गया था अपने कार्यमें सफल हो बड़ा प्रसन्न हुआ तथा शीघ्रतासे सब माया समेटकर तथा खड्गधारी विद्याधर बनकर रथनूपुर नगर पहुँचा ॥९९॥


स्वामिने चावदन्नत्वा तुष्टो जनकमाहृतम् । रम्यकाननसंवीते स्थापितं जिनवेश्मनि ॥१००॥

अर्थ: उसने सन्तुष्ट होकर अपने स्वामीके लिए नमस्कार कर कहा कि राजा जनक यहाँ लाये जा चुके हैं तथा सुन्दर वनसे वेष्टित जिनमन्दिरमें उन्हें ठहरा दिया गया है ॥१००॥


आगतं जनकं ज्ञात्वा परं हर्षमुपागमत् । आप्तवर्गेण संयुक्तश्चन्द्रयानो महामनाः ॥१०१॥

गृहीत्वा च परां पूजां नानावाहनसंकुलः । मनोरथरथारूढो ययौ जिनवरालयम् ॥१०२॥

अर्थ: राजा जनकको आया जानकर चन्द्रगति परम हर्षको प्राप्त हुआ । तदनन्तर उदार चित्तको धारण करनेवाला एवं नाना वाहनोंसे युक्त चन्द्रगति आप्तवर्गके साथ पूजाकी उत्तमोत्तम सामग्री लेकर मनोरथरूपी रथपर सवार हो जिनमन्दिर गया ॥१०१-१०२॥


दृष्ट्वा तत्सुमहत्सैन्यमागच्छत्परमोज्ज्वलम् । तूर्यशङ्खमहानादमाविग्नो जनकोऽभवत् ॥१०३॥

अर्थ: जिसमें तुरही और शंखोंका विशाल शब्द हो रहा था ऐसी उस देदीप्यमान बड़ी भारी सेनाको आती देख जनक कुछ भयभीत हुआ ॥१०३॥


ततो हरिगजद्वीपिनागहंसादिवाहिनाम् । पुरुषाणामिदं मध्ये विमानं स व्यलोकयत् ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर उसमें सिंह, हाथी, शार्दूल, नाग तथा हंस आदि नाना वाहनोंपर स्थित पुरुषोंके मध्यमें एक विमान देखा ॥१०४॥


अचिन्तयच्च ते नूनमेते विद्याभृतो जनाः । विजयार्द्धगिरेरूर्ध्वं ये वसन्तीति मे श्रुतम् ॥१०५॥

अर्थ: उसे देखकर वह विचार करने लगा कि निश्चय ही वे विद्याधर हैं जो कि विजयार्द्ध पर्वतपर वास करते हैं ॥१०५॥


मध्येऽयमस्य सैन्यस्य स्वविमानकृतस्थितिः । शोभते परमो दीप्त्या कोऽपि विद्याधराधिपः ॥१०६॥

अर्थ: इस सेनाके बीचमें अपने विमानमें बैठा हुआ जो कान्तिमान् पुरुष शोभित हो रहा है वह विद्याधरोंका राजा है ॥१०६॥


एवं चिन्तापरे तस्मिन्नृपतौ दैत्यपुङ्गवः । संप्रापच्चैत्यभवनं सम्मदी नतविग्रहः ॥१०७॥

अर्थ: राजा जनक इस प्रकारकी चिन्तामें तत्पर थे ही कि हर्षसे भरा तथा नम्रीभूत शरीर-को धारण करनेवाला वह चन्द्रगति जिनमन्दिरमें आ पहुँचा ॥१०७॥


दृष्ट्वा दैत्याधिपं प्राप्तं भीमसौम्यपरिग्रहम् । जनकः किमपि ध्यायंस्तस्थौ सिंहासनान्तरे ॥१०८॥

अर्थ: जिसका परिग्रह कुछ तो भीम अर्थात् भय उत्पन्न करनेवाला था और कुछ सौम्य अर्थात् शान्ति उत्पन्न करनेवाला ऐसे दैत्यराजको आया देख कुछ ध्यान करता हुआ राजा जनक जिनराजके सिंहासनके नीचे बैठ गया ॥१०८॥


भक्त्या शशाङ्कयानोऽपि कृत्वा पूजामनुत्तमाम् । प्रणम्य विधिना चक्रे जिनानां परमस्तुतिम् ॥१०९॥

अर्थ: राजा चन्द्रगतिने भी भक्तिवश उत्तम पूजा कर तथा विधिपूर्वक प्रणाम कर जिनेन्द्र-देवकी उत्तम स्तुति की ॥१०९॥


विपञ्चीं च विधायाङ्के सुखरूपां प्रियामिव । महाभावनया युक्तो जगौ जिनगुणात्मकम् ॥११०॥

अर्थ: और प्रियाके समान जिसका स्वर अत्यन्त सुखकारी था ऐसी वीणाको गोदमें रख बड़ी भावनासे युक्त हो जिनराजका गुणगान करने लगा ॥११०॥


त्रिभुवनवरदमभिष्टुतमतिशयपूजाविधानविनिहितचित्तैः । प्रणतं सुरवृषभगणैः प्रणमत नाथं जिनेन्द्रमक्षयसौख्यम् ॥१११॥

अर्थ: गुणगान करते समय उसने कहा कि जो तीनों लोकोंके लिए वर देनेवाले हैं, अतिशय-पूर्ण पूजाके करनेमें चित्त धारण करनेवाले मनुष्य जिनकी सदा स्तुति करते हैं, इन्द्रादि श्रेष्ठ देव जिन्हें नमस्कार करते हैं, तथा जो अक्षय - अविनाशी सुखके धारक हैं, ऐसे जिनेन्द्रदेवको हे भव्यजन ! सदा प्रणाम करो ॥१११॥


ऋषभं सततं परमं वरदं मनसा वचसा शिरसा सुजनाः । भजत प्रवरं विलयं प्रगतं विहितं सकलं दुरितं भवति ॥११२॥

अर्थ: हे सत्पुरुषो ! तुम उन ऋषभदेव भगवान्को मनसे, वचनसे शिर झुकाकर सदा नमस्कार करो जो कि उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त हैं, वर देनेवाले हैं, श्रेष्ठ हैं, अविनाशी हैं और उत्तम ज्ञानसे युक्त हैं तथा जिन्हें नमस्कार करनेसे समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥११२॥


अतिशयपरमं विनिहतदुरितं परमगतिगतं नमत जिनवरम् । सर्वसुरासुरपूजितपादं क्रोधमहारिपुनिर्मितमङ्गम् ॥११३॥

अर्थ: तुम उन जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करो जो कि अतिशयोंसे उत्कृष्ट हैं, जिन्होंने पापको नष्ट कर दिया है, जो परमगति - सिद्ध गतिको प्राप्त हो चुके हैं, समस्त सुर और असुर जिनके चरणोंकी पूजा करते हैं, तथा जिन्होंने क्रोधरूपी महाशत्रुको पराजित कर दिया है ॥११३॥


उत्तमलक्षणलक्षितदेहं नौमि जिनेन्द्रमहं प्रयतात्मा । भक्त्या विनमितसर्वजनौघं नतिमात्रविनाशितभक्तमयम् ॥११४॥

अर्थ: मैं भक्तिपूर्वक बड़ी सावधानीसे उन जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति करता हूँ कि जिनका शरीर उत्तम लक्षणोंसे युक्त है, जिन्होंने समस्त मनुष्योंके समूहको नम्रीभूत कर दिया है और जिन्हें नमस्कार करने मात्रसे भक्तोंका भय नष्ट हो जाता है ॥११४॥


अनुपमगुणधरमनुपमकायं विनिहतभवभयसकलकुचेष्टम् । कलिमलघनपटविनयनदक्षं प्रणमत जिनवरमतिशयपूतम् ॥११५॥

अर्थ: हे भव्यजन ! तुम उन जिनेन्द्रदेवको प्रणाम करो कि जो अनुपम गुणोंको धारण करनेवाले हैं, जिनका शरीर उपमारहित है, जिन्होंने संसार-रूपी समस्त कुचेष्टाओंको नष्ट कर दिया है, जो कलिकालके पापरूपी सघन पटको दूर करनेमें समर्थ हैं तथा जो अतिशयोंसे पवित्र हैं अथवा अत्यन्त पवित्र हैं ॥११५॥


इति गायति दैत्येन्द्रे जिनसिंहासनान्तरात् । निर्ययौ भयमुत्सृज्य जनको नाम शोभनः ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर दैत्यराजके इस प्रकार गानेपर सुन्दर शरीरको धारण करनेवाला राजा जनक भय छोड़ जिनेन्द्रदेवके सिंहासनके नीचेसे बाहर निकल आया ॥११६॥


ततश्चन्द्रायणोऽवोचदीषच्चलितमानसः । को भवान् विजने देशे वसत्यत्र जिनालये ॥११७॥

अर्थ: उसे देख जिसका मन कुछ विचलित हो गया था ऐसा चन्द्रगति बोला कि आप कौन हैं ? जो इस निर्जन स्थानमें जिनालयके बीच रहते हैं ॥११७॥


उरगाणां पतिः किं स्यात् किं वा विद्याधराधिपः । सखे वद कुतः प्राप्तो भवान् किंसंज्ञकोऽपि वा ॥११८॥

अर्थ: आप नागकुमार देवोंके स्वामी हैं ? या विद्याधरोंके अधिपति हैं ? अथवा किस नामको धारण करनेवाले हैं ? और यहाँ कहाँसे आये हैं ? हे मित्र ! यह सब मुझसे कहो ॥११८॥


मिथिलानगरीतोऽहं प्राप्तो जनकसंज्ञकः । हृतो मायातुरङ्गेण नभश्चरमहीपते ॥११९॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजाने कहा कि विद्याधरराज ! मैं मिथिला नगरीसे आया हूँ। जनक मेरा नाम है और एक मायामयी घोड़ा मुझे हरकर लाया है ॥११९॥


इत्युक्ते जनकेनैतावन्योन्यं प्रीतमानसौ । इच्छाकाराञ्जलिं कृत्वा सुखासीनौ बभूवतुः ॥१२०॥

अर्थ: जनकके इतना कहनेपर दोनोंके हृदय परस्पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और दोनों ही एक दूसरेके लिए हाथ जोड़कर सुखसे बैठ गये ॥१२०॥


क्षणं स्थित्वा च वृत्तान्तैरन्योन्यविनिवेदितैः । जनितान्योन्यसंमानौ तौ विश्रम्भं समीयतुः ॥१२१॥

अर्थ: क्षण-भर ठहरकर दोनोंने एक दूसरेके लिए अपना वृत्तान्त सुनाया और परस्पर एक दूसरेका सम्मान किया। इस तरह वे परस्पर विश्वासको प्राप्त हुए ॥१२१॥


ततश्चन्द्रायणोऽवोचद्धीमान् कृत्वा कथान्तरम् । पुण्यवानस्मि येन त्वं मिथिलापतिरीक्षितः ॥१२२॥

अर्थ: तदनन्तर बीचमें ही बात काटकर चन्द्रगतिने कहा कि अहो ! मैं बड़ा पुण्यवान् हूँ कि जिसने आप मिथिलाके राजाका दर्शन किया ॥१२२॥


अस्ति ते दुहिता राजन् लक्षणैरन्विता शुभैः । कर्णगोचरमायाता मम भूरिजनाननात् ॥१२३॥

अर्थ: हे राजन् ! मैंने अनेक लोगोंके मुखसे सुना है कि आपके शुभ लक्षणोंसे युक्त कन्या है ॥१२३॥


सा भामण्डलसंज्ञाय मत्पुत्राय प्रदीयताम् । त्वया विहितसंबन्धं मन्ये स्वं परमोदयम् ॥१२४॥

अर्थ: सो वह कन्या मेरे भामण्डल नामक पुत्रके लिए दीजिए। आपके साथ सम्बन्ध स्थापित कर मैं अपने-आपको परम भाग्यशाली समझूँगा ॥१२४॥


सोऽवोचत् सर्वमेतत्स्यात् कृतं विद्याधराधिप । किंतु दाशरथेर्बाला ज्येष्ठस्य परिकल्पिता ॥१२५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा जनकने कहा कि हे विद्याधरराज ! यह सब हो सकता था परन्तु वह कन्या राजा दशरथके ज्येष्ठ पुत्र रामके लिए निश्चित की जा चुकी है, अतः विवशता है ॥१२५॥


सुहृच्चन्द्रगतिरूचे सा कस्मात्तस्य कल्पिता । सोऽवोचच्छ्रूयतामस्ति भवतां चेत् कुतूहलम् ॥१२६॥

अर्थ: मित्र चन्द्रगतिने कहा कि वह कन्या रामके लिए किस कारण निश्चित की गयी है ? इसके उत्तरमें जनकने कहा कि यदि आपको कौतूहल है तो सुनिए ॥१२६॥


धनगोरत्नसंपूर्णा मदीया मिथिलापुरी । अर्द्धबर्बरकैर्म्लेच्छैरबाध्यत सुदारुणैः ॥१२७॥

अर्थ: अर्ध-राक्षसोंके समान अत्यन्त दुष्ट म्लेच्छोंने मेरी धन, धान्य, गाय, भैंस तथा अनेक रत्न-से परिपूर्ण मिथिला नगरीको बाधा पहुँचाना शुरू किया ॥१२७॥


अपीडयन्त प्रजाः सर्वाः स्वह्रियन्त धनोत्कराः । धर्मयज्ञा न्यवर्तन्त श्रावकाणां महात्मनाम् ॥१२८॥

अर्थ: समस्त प्रजा पीड़ित होने लगी, धन-धान्यके समूह चुराये जाने लगे, और महानुभाव श्रावकोंके धार्मिक पूजा-विधान आदि अनु-ष्ठान नष्ट किये जाने लगे ॥१२८॥


ततो महाहवे जाते रक्षित्वा मां सहानुजम् । पद्मेन विजिता म्लेच्छा ये सुरैरपि दुर्जयाः ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर उनके साथ मेरा महायुद्ध हुआ । सो उस महायुद्धमें रामने मेरी तथा मेरे छोटे भाईकी रक्षा कर देवोंसे भी दुर्जेय उन समस्त म्लेच्छोंको पराजित किया ॥१२९॥


लक्ष्मणश्चानुजस्तस्य शक्रोपमपराक्रमः । कुरुते शासनं नित्यं महाविनयसंयुतः ॥१३०॥

अर्थ: रामका छोटा भाई लक्ष्मण भी इन्द्रके समान महापराक्रमी तथा महा विनयसे सहित है। वह सदा रामकी आज्ञाका पालन करता है ॥१३०॥


यदि नाम न तत्सैन्यं ताभ्यां स्याद् विजितं द्विषा । म्लेच्छलोकेन संपूर्णा ततः स्यादखिला मही ॥१३१॥

अर्थ: यदि उन दोनों भाइयोंके द्वारा म्लेच्छोंकी वह सेना नहीं जीती जाती तो निश्चित था कि यह समस्त पृथिवी म्लेच्छोंसे भर जाती ॥१३१॥


विवेकरहितास्ते हि लोकपीडामया इव । महोत्पाता इवात्यन्तभीषणा विषदारुणाः ॥१३२॥

अर्थ: वे म्लेच्छ विवेकसे रहित तथा लोगोंको पीड़ा पहुँचानेके लिए रोगोंके समान थे अथवा महा उत्पातके समान अत्यन्त भयंकर और विषके समान दारुण थे ॥१३२॥


प्राप्य तौ गुणसंपूर्णौ सुपुत्रौ लोकवत्सलौ । इन्द्रवद्भवने राज्यं सुखं दशरथोऽभजत् ॥१३३॥

अर्थ: गुणोंसे सम्पूर्ण तथा लोगोंसे स्नेह करनेवाले उन दोनों पुत्रोंको पाकर राजा दशरथ अपने भवनमें इन्द्रके समान राज्यसुखका उपभोग करते हैं ॥१३३॥


तस्य राज्येऽधुना जाते नयशौर्यविलासिनः । वातोऽपि नाहरत् किंचित् प्रजानां पुरुसंपदाम् ॥१३४॥

अर्थ: नय और शूरवीरतासे सुशोभित राजा दशरथके राज्यमें इस समय हवा भी सम्पत्तिशाली प्रजाका कुछ हरण नहीं कर पाती है फिर अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? ॥१३४॥


ततः प्रत्युपकारं कं करोमीति समाकुलः । न रात्रौ न दिवा निद्रां संप्राप्तोऽस्मि विचिन्तयन् ॥१३५॥

अर्थ: इस उपकारके बदले मैं उनका क्या उपकार करूँ इसी बातकी आकुलतासे चिन्ता करते हुए मुझे न रातमें नींद है न दिनमें ही ॥१३५॥


रक्षिता येन मे प्राणास्तस्य रामस्य नो समः । कश्चित् प्रत्युपकारोऽस्ति किमुताधिक्यगोचरः ॥१३६॥

अर्थ: रामने मेरे प्राणोंकी जो रक्षा की है उस समान भी कोई प्रत्युपकार नहीं है फिर अधिककी तो चर्चा ही क्या है ? ॥१३६॥


हतं महोपकारेण प्रतीकारविवर्जितम् । मन्ये तृणमिवात्मानं भोगप्रीतिपराङ्मुखः ॥१३७॥

अर्थ: जो महान् उपकारसे दबा हुआ है तथा स्वयं कुछ भी प्रत्युपकार करनेमें असमर्थ है, ऐसे अपने आपको मैं तृणके समान तुच्छ समझता हूँ। मैं केवल भोगोंके भयसे पराङ्मुख हो रहा हूँ ॥१३७॥


नवयौवनसंपूर्णां दृष्ट्वा दुहितरं शुभाम् । गतो विरलतां शोकः शोकस्थानेऽपि मे ततः ॥१३८॥

अर्थ: तदनन्तर जब मेरी दृष्टि नवयौवनसे सम्पूर्ण अपनी शुभ पुत्री पर पड़ी तब शोकके स्थानमें भी मेरा शोक विरलताको प्राप्त हो गया ॥१३८॥


तया कल्पितया तस्य रामस्य पुरुतेजसः । नावेव शोकजलधेस्तारितोऽहं सुजातया ॥१३९॥

अर्थ: मैंने अतिशय प्रतापी रामचन्द्रजीके लिए उसको देना संकल्पित कर लिया और नावकी भाँति इस पुत्रीने मुझे शोकरूपी सागरसे पार कर दिया ॥१३९॥


ततो नभश्चरा ऊचुरन्धकारीकृताननाः । अहो मानुषमात्रस्य बुद्धिस्तव न शोभना ॥१४०॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके मुखोंपर अन्धकार छा रहा था ऐसे विद्याधर बोले कि अहो ! तुम एक साधारण मनुष्य हो, तुम्हारी बुद्धि ठीक नहीं है ॥१४०॥


म्लेच्छैः किं ग्रहणं क्षुद्रैर्यदि तेषां पराजये । प्रशंससि परां शक्तिं भूमिगोचरिणो बुध ॥१४१॥

अर्थ: रामने म्लेच्छोंको पकड़ा है इससे क्या हुआ ? उनको परास्त तो क्षुद्र मनुष्य भी कर सकते हैं फिर क्यों तुम बुद्धिमान् होकर भूमिगोचरियोंकी परम शक्तिकी प्रशंसा कर रहे हो ॥१४१॥


म्लेच्छनिर्घाटनात् स्तोत्रं त्वया पद्मस्य कुर्वता । कृता प्रत्युत निन्देयमहो हास्यमिदं परम् ॥१४२॥

अर्थ: म्लेच्छोंको निकालने मात्रसे ही तुम रामकी स्तुति कर रहे हो सो यह उनकी स्तुति नहीं किन्तु निन्दा है । अहो ! यह बड़ी हँसीकी बात है ॥१४२॥


शिशोर्विषफले प्रीतिर्निःस्वस्य बदरादिषु । ध्वाङ्क्षस्य पादपे शुष्के स्वभावः खलु दुस्त्यजः ॥१४३॥

अर्थ: बालकी विषफलमें, दरिद्रकी बैर आदि तुच्छ फलोंमें और कौएकी सूखे वृक्षमें प्रीति होती है । सो कहना पड़ता है कि प्राणीका स्वभाव कठिनाईसे छूटता है ॥१४३॥


कुसंबन्धं परित्यज्य क्षितिगोचरिणां मतम् । कुरु विद्याधरेन्द्रेण संबन्धमधुना सह ॥१४४॥

अर्थ: इसलिए तुम भूमिगोचरियोंका खोटा सम्बन्ध छोड़कर इस समय विद्याधरोंके राजाके साथ सम्बन्ध करो ॥१४४॥


क्व महासंपदो देवैः सदृशो व्योमचारिणः । क्व भूमिगोचराः क्षुद्राः सर्वथैवातिदुःखिताः ॥१४५॥

अर्थ: महासम्पत्तिमान् तथा देवोंके समान आकाशमें चलनेवाले विद्याधर कहाँ ? और सर्वप्रकारसे अत्यन्त दुःखी क्षुद्र भूमिगोचरी कहाँ ? ॥१४५॥


जनकोऽवोचदत्यन्तविपुलः क्षारसागरः । न तत्करोति यद्वाप्यः स्तोकस्वादुपयोभृतः ॥१४६॥

अर्थ: तदनन्तर जनकने उत्तर दिया कि अत्यन्त विस्तृत लवणसमुद्र वह काम नहीं करता जो कि थोड़ेसे मधुर जलको धारण करनेवाली वापिकाएँ कर लेती हैं ॥१४६॥


अत्यन्तघनबन्धेन तमसा भूयसापि किम् । अल्पेन तु प्रदीपेन जन्यते लोकचेष्टितम् ॥१४७॥

अर्थ: अत्यन्त सघन अन्धकार बहुत भारी होता है तो भी उससे क्या प्रयोजन सिद्ध होता है जब कि छोटेसे दीपकके द्वारा लोककी चेष्टा उत्पन्न होती है अर्थात् सब काम सिद्ध होते हैं ॥१४७॥


असंख्या अपि मातङ्गा मदिनः कुर्वते न तत् । केशरी यत्किशोरः संश्चन्द्रनिर्मलकेसरः ॥१४८॥

अर्थ: मदको झरानेवाले असंख्य हाथी भी वह काम नहीं कर पाते जो कि चन्द्रबिम्बके समान उज्ज्वल जटाओंको धारण करनेवाला सिंहका एक बच्चा कर लेता है ॥१४८॥


इत्युक्ते कोऽपि नोऽत्यर्थं समं कृतमहारवाः । भूमिचेष्टां समारब्धा निन्दितुं गगनायनाः ॥१४९॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर कितने ही विद्याधर ‘ऐसा नहीं है’ इस प्रकार जोरसे एक साथ बड़ा शब्द करते हुए भूमिगोचरियोंकी निन्दा करने लगे ॥१४९॥


विद्यामाहात्म्यनिर्मुक्ता नित्यं स्वेदसमन्विताः । शौर्यसंपत्परित्यक्ताः शोचनीया धराचराः ॥१५०॥

अर्थ: वे कहने लगे कि भूमिगोचरी विद्याके माहात्म्यसे रहित हैं, निरन्तर पसीनासे युक्त रहते हैं, शूर-वीरता और सम्पत्तिसे रहित हैं तथा अतिशय शोचनीय हैं ॥१५०॥


वद तेषां पशूनां च को भेदो जनक त्वया । दृष्टो येन त्रपां त्यक्त्वा दुर्बुद्धिस्तान् विकत्थसे ॥१५१॥

अर्थ: अरे जनक ! बता तूने उनमें और पशुओंमें क्या भेद देखा है ? जिससे दुर्बुद्धि हो तथा लज्जा छोड़कर उनकी इस तरह प्रशंसा किये जा रहा है ? ॥१५१॥


उवाच जनको धीरः हा कष्टं किं श्रुतं मया । वसुधाराजरत्नानां निन्दितं पापकर्मणा ॥१५२॥

अर्थ: तदनन्तर धीरवीर जनकने कहा कि हाय ! बड़े कष्टकी बात है कि मुझ पापीको भूमिगोचरी उत्तमोत्तम राजाओंकी निन्दा सुननी पड़ी ॥१५२॥


कथं त्रिभुवनख्यातो वंशो नाभेयसंभवः । कर्णगोचरमेतेषां न प्राप्तो लोकपावनः ॥१५३॥

अर्थ: क्या त्रिजगत्में प्रसिद्ध तथा लोकको पवित्र करनेवाला भगवान् ऋषभदेवका वंश इनके कर्णगोचर नहीं हुआ ॥१५३॥


अर्हन्तस्त्रिजगत्पूज्याश्चक्रिणो हरयो बलाः । उत्पद्यन्ते नरा यस्यां सा कथं निन्दिता मही ॥१५४॥

अर्थ: त्रिजगत्के द्वारा पूजनीय तीर्थंकर चक्रवर्ती, नारायण और बलभद्र-जैसे महापुरुष जिसमें उत्पन्न होते हैं वह भूमि निन्दनीय कैसे हो सकती है ? ॥१५४॥


पञ्चकल्याणसंप्राप्तिः पुंसां वदत खेचराः । स्वप्नेऽपि जातु किं दृष्टा भवद्भिः खेचरावनौ ॥१५५॥

अर्थ: हे विद्याधरो ! कहो, विद्याधरोंकी भूमिमें पुरुषोंको पंच कल्याणकोंकी प्राप्ति होना क्या कभी आप लोगोंने स्वप्नमें भी देखी है ? ॥१५५॥


इक्ष्वाकुवंशसंभूता गोष्पदीकृतविष्टपाः । अनीक्षितपरच्छत्रा महारत्नसमृद्धयः ॥१५६॥

सुरेन्द्रकीर्त्तितोदारकीर्तयो गुणसागराः । व्यतीता बहवो भूमौ कृतकृत्या नरोत्तमाः ॥१५७॥

अर्थ: जिनकी उत्पत्ति इक्ष्वाकु वंशमें हुई थी, जिन्होंने संसारको गोष्पदके समान तुच्छ कर दिखाया, जिन्होंने कभी दूसरे-का छत्र नहीं देखा, महारत्नोंकी समृद्धि जिनके पास थी, इन्द्र जिनकी उदार कीर्तिका वर्णन करता था, और जो गुणोंके सागर थे ऐसे अनेक कृतकृत्य राजा पृथिवीपर हो चुके हैं ॥१५६-१५७॥


पुत्रोऽनरण्यराजस्य तत्र वंशे महात्मनः । जातः सुमङ्गलाकुक्षौ नृपो दशरथोऽभवत् ॥१५८॥

अर्थ: उसी इक्ष्वाकु वंशमें महानुभाव राजा अनरण्यकी सुमंगला रानीकी कुक्षिसे राजा दशरथ उत्पन्न हुए हैं ॥१५८॥


यो लोकहितमुद्दिश्य विरहेदपि जीवितम् । मूर्ध्ना वहति यस्याज्ञां शेषामिव जनोऽखिलः ॥१५९॥

अर्थ: जो लोकहितके लिए अपना जीवन भी छोड़ सकते हैं, समस्त लोग जिनकी आज्ञाको शेषाक्षतके समान शिरसे धारण करते हैं ॥१५९॥


चतस्रो यस्य संपन्नाः सर्वशोभागुणोज्ज्वलाः । आशा इव महादेव्यः सुभावाः सुप्रसाधिताः ॥१६०॥

अर्थ: जिसके सर्व प्रकारकी शोभा और गुणोंसे उज्ज्वल, उत्तम अभिप्रायकी धारक तथा उत्तम अलंकारोंसे युक्त चार दिशाओंके समान चार महादेवियाँ हैं ॥१६०॥


शतानि वरनारीणां पञ्च यस्य सुचेतसः । वक्त्रनिर्जितचन्द्राणां हरन्ति चरितैर्मनः ॥१६१॥

अर्थ: यही नहीं, अपने मुखसे चन्द्रमाको जीतनेवाली पाँच सौ स्त्रियाँ और भी अपनी चेष्टाओंसे जिसके मनको हरती रहती हैं ॥१६१॥


पद्मो नाम सुतो यस्य पद्मालिङ्गितविग्रहः । दीप्तिनिर्जिततिग्मांशुः कीर्त्तिनिर्जितशीतगुः ॥१६२॥

स्थैर्यनिर्जितशैलेन्द्रः शोभाजितपुरन्दरः । शौर्येण यो महापद्मं जयेदपि सुविभ्रमः ॥१६३॥

अर्थ: जिसके पद्म ( राम ) नामका ऐसा पुत्र है कि लक्ष्मी जिसके शरीरका आलिंगन करती है, जिसने अपनी दीप्तिसे सूर्यको, कीर्तिसे चन्द्रमाको, धीरतासे सुमेरुको और शोभासे इन्द्रको जीत लिया है, जो शूरवीरतासे महापद्म नामक चक्रवर्तीको भी जीत सकता है तथा उत्तम विभ्रमको धारण करनेवाला है ॥१६२-१६३॥


अनुजो लक्ष्मणो यस्य लक्ष्मीनिलयविग्रहः । द्रवन्ति शत्रवो भीता दृष्ट्वा यस्य शरासनम् ॥१६४॥

अर्थ: जिसका शरीर लक्ष्मीका निवासस्थल है और जिसके धनुषको देखकर शत्रु भयभीत होकर भाग जाते हैं ऐसा लक्ष्मण उस रामका छोटा भाई है ॥१६४॥


वायसा अपि गच्छन्ति नभसा तेन किं भवेत् । गुणेष्वत्र मनः कृत्यमिन्द्रजालेन को गुणः ॥१६५॥

अर्थ: विद्याधर आकाशमें चलते हैं यह कहा सो आकाशमें तो कौए भी चलते हैं । इससे उनमें क्या विशेषता हो जाती है ? यहाँ गुणोंमें मन लगाना चाहिए अर्थात् गुणोंका विचार करना चाहिए । इन्द्रजालमें क्या सार है ? ॥१६५॥


ग्रहणं वा भवद्भिः किं यत्र देवाधिपा अपि । क्रियन्ते भूमिसंभूतैर्नमन्तः क्षितिमस्तकाः ॥१६६॥

अर्थ: अथवा आप लोगोंकी तो बात ही क्या है ? जबकि भूमिमें उत्पन्न हुए मनुष्य इन्द्रोंको भी नम्रीभूत कर देते हैं और नमस्कार करते समय उन्हें अपने मस्तक पृथिवीपर रगड़ने पड़ते हैं ॥१६६॥


इत्युक्ते रहसि स्थित्वा संमन्त्र्य गगनायनाः । ऊचुर्न वेत्सि कार्याणि जनकैकाग्रमानसाः ॥१६७॥

अर्थ: अथानन्तर जनकके ऐसा कहनेपर विद्याधरोंने एकान्तमें बैठकर पहले सलाह की फिर कहा कि हे जनक ! तुम कार्य करना नहीं जानते, तुम्हारा मन सिर्फ एक ही ओर लग रहा है ॥१६७॥


पद्मो लक्ष्मण इत्युच्चैर्गर्जितं वहसे वृथा । अथ विप्रत्ययः कश्चित्ततोऽस्माद्व्रज निश्चयम् ॥१६८॥

अर्थ: ‘राम और लक्ष्मण उत्कृष्ट हैं’ इस गर्जनाको तुम व्यर्थ ही धारण कर रहे हो । यदि मेरे इस कहनेमें कुछ संशय हो तो इससे उसका निश्चय कर लो ॥१६८॥


समयं शृणु भूनाथ वज्रावर्तमिदं धनुः । इदं च सागरावर्तममरैः कृतरक्षणम् ॥१६९॥

अर्थ: हे राजन् ! हमारी शर्त सुनो । यह वज्रावर्त्त नामका धनुष है, और यह सागरावर्त्त नामका धनुष है । देव लोग इन दोनोंकी रक्षा करते हैं ॥१६९॥


इमे बाणासने कर्तुमधिज्ये यदि तौ क्षमौ । अनेनैव तयोः शक्तिं ज्ञास्यामः किं बहूदितैः ॥१७०॥

अर्थ: यदि राम और लक्ष्मण इन धनुषोंको डोरीसहित करनेमें समर्थ हो जावेंगे तो इसीसे हम उनकी शक्ति जान लेंगे । अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? ॥१७०॥


वज्रावर्तं समारोप्य पद्मो गृह्णातु कन्यकाम् । अस्माभिः प्रसभं पश्य तामानीतामिहान्यथा ॥१७१॥

अर्थ: राम वज्रावर्त्त धनुष- को चढ़ाकर कन्या ग्रहण कर सकते हैं । यदि वे उक्त धनुष नहीं चढ़ा सकेंगे तो आप देखना कि हम लोग उसे यहाँ जबरदस्ती ले आवेंगे ॥१७१॥


ततः परममित्युक्त्वा धनुषी वीक्ष्य दुर्ग्रहे । मनकाद् व्याकुलीभावं जनको मनसागमत् ॥१७२॥

अर्थ: तदनन्तर ‘ठीक है’ ऐसा कहकर जनकने विद्याधरोंकी शर्त स्वीकार तो कर ली परन्तु उन दुर्ग्राह्य धनुषोंको देखकर चित्तमें वह कुछ आकुलताको प्राप्त हुआ ॥१७२॥


ततः कृत्वा जिनेन्द्राणां पूजां स्तोत्रं तु भावतः । गदासीरादिसंयुक्ते पूजां नीते शरासने ॥१७३॥

अर्थ: तदनन्तर भावपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्की पूजा और स्तुति कर चुकनेके बाद गदा, हल आदि शस्त्रोंसे युक्त उन दोनों धनुषोंकी भी पूजा की गयी ॥१७३॥


उपादाय च ते शूरा जनकं च नभश्चराः । मिथिलाभिमुखं जग्मुश्चन्द्रोऽपि रथनूपुरम् ॥१७४॥

अर्थ: वे शूरवीर विद्याधर उन धनुषों तथा राजा जनकको लेकर मिथिलाकी ओर चल पड़े और चन्द्रगति विद्याधर भी रथनूपुरकी ओर चल दिया ॥१७४॥


ततः कृतमहाशोभं सशङ्खलमहाजनम् । विवेश जनको वेश्म पौरलोकावलोकितः ॥१७५॥

अर्थ: तद- नन्तर जिसकी बहुत बड़ी सजावट की गयी थी, और जिसमें महाजन लोग मंगलाचारसे सहित थे, ऐसे अपने भवनमें राजा जनकने प्रवेश किया । प्रवेश करते समय नागरिकजनोंने जनकके अच्छी तरह दर्शन किये थे ॥१७५॥


विधायायुधशालां च समावृत्य नभश्चराः । वहन्तः परमं गर्वं नगरस्य बहिःस्थिताः ॥१७६॥

अर्थ: बहुत भारी गर्वको धारण करनेवाले विद्याधर नगरके बाहर आयुधशाला बनाकर तथा उसीको घेरकर ठहर गये ॥१७६॥


जनकस्तु सखेदाङ्गः कृत्वा किंचित्स भोजनम् । चिन्तयाकुलितो भेजे तल्पमुत्साहवर्जितः ॥१७७॥

अर्थ: जिसका शरीर खेद-खिन्न था ऐसे जनकने कुछ थोड़ा-सा भोजन किया और इसके बाद वह चिन्तासे व्याकुल हो शय्यापर पड़ रहा । उत्साह तो उसे था ही नहीं ॥१७७॥


तत्र चोत्तमनारीभिर्विनीताभिः सुविभ्रमम् । चन्द्रांशुचयसंकाशैश्चामरैरभिवीजितः ॥१७८॥

उष्णदीर्घातिनिःश्वासान् विमुञ्चन् विषमानलम् । दधत्या विविधं भावमभाष्यत विदेहया ॥१७९॥

अर्थ: यद्यपि वहाँ विनयसे भरी उत्तम स्त्रियाँ, हाव-भाव दिखाती हुई, चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमरोंसे उसे हवा कर रही थीं तथापि वह अत्यन्त विषम, उष्ण और लम्बे-लम्बे अत्यधिक श्वास छोड़ रहा था । उसकी यह दशा देख विविध प्रकारके भावको धारण करती हुई रानी विदेहाने कहा ॥१७८-१७९॥


का क कामिंस्त्वया दृष्टा नारी यातेन लक्षिता । तद्वियोगकथामेतामवस्थामसि संश्रितः ॥१८०॥

अर्थ: कि हे कामिन् ! आप कहाँ गये थे और वहाँ ऐसी कौन-सी कामिनी आपने देखी है जिसके वियोगसे इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो ॥१८०॥


प्राकृता कापि सा नारी कामिनीगुणरिक्तिका । इति या स्मरसंतप्तं भवन्तं नानुकम्पते ॥१८१॥

अर्थ: जान पड़ता है कि वह कोई पामरी स्त्री है अथवा स्त्रीके योग्य गुणोंसे रिक्त है जो इस तरह कामसे सन्तप्त हुए आपपर दया नहीं करती है ॥१८१॥


नाथ वेदय मे स्थानं येन तामानयामि ते । भवद्दुःखेन मे दुःखं जनस्य सकलस्य वा ॥१८२॥

अर्थ: हे नाथ ! आप वह स्थान बतलाइए जिससे मैं उसे ले आऊँ क्योंकि आपके दुःखसे मुझे तथा समस्त लोगोंको दुःख हो रहा है ॥१८२॥


उदारे सति सौभाग्ये कथमिष्टोऽसि नो तया । ग्रावमानसया येन धृतिं न लभसे भृशम् ॥१८३॥

अर्थ: उत्कृष्ट सौभाग्यके रहते हुए भी उस पाषाणहृदयाने आपको क्यों नहीं चाहा है जिससे कि आप अत्यन्त अधीर हो रहे हैं ॥१८३॥


उत्तिष्ठ भज निःशेषाः क्रिया राजजनोचिताः । शरीरे सति कामिन्यो भविष्यन्ति मनीषिताः ॥१८४॥

अर्थ: उठिए और राजाओंके योग्य समस्त क्रियाओंका सेवन कीजिए। यदि शरीर है तो अनेक इच्छित स्त्रियाँ हो जावेंगी ॥१८४॥


इत्युक्ते पार्थिवोऽवोचत् कान्तां प्राणगरीयसीम् । अन्यथा खेदितस्यास्य किं मे चित्तस्य खेद्यते ॥१८५॥

अर्थ: विदेहाके ऐसा कहनेपर राजाने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय वल्लभासे कहा कि मेरा चित्त दूसरे ही कारणसे खिन्न हो रहा है। उसे इस तरह खेद क्यों पहुँचा रही हो ? ॥१८५॥


शृणु देवि यतोऽवस्थामीदृशीमहमागतः । अपरिज्ञातवृत्तान्ता किमर्थमिति भाषसे ॥१८६॥

अर्थ: हे देवि ! सुनो, मैं जिस कारणसे ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुआ हूँ। तुम वृत्तान्तको जाने बिना इस प्रकार क्यों बोल रही हो ? ॥१८६॥


तेन मायातुरङ्गेण नीतोऽहं विजयाचलम् । समयेनामुना तत्र मुक्तः पत्या खगामिनाम् ॥१८७॥

वज्रावर्तमधिज्यं चेद्धनुः पद्मः करिष्यति । ततः स्यात्तस्य कन्येयं तनयस्य ममान्यथा ॥१८८॥

अर्थ: मैं उस मायामय अश्वके द्वारा विजयार्ध पर्वतपर ले जाया गया था। वहाँ विद्याधरोंके राजाने मुझे इस शर्तपर छोड़ा है कि यदि राम वज्रावर्त धनुषको डोरी-सहित कर देंगे तो यह कन्या उनकी होगी अन्यथा मेरे पुत्रकी होगी ॥१८७-१८८॥


कर्मानुभावतस्तच्च मया साध्वसतोऽपि वा । प्रतिपन्नमभाग्येन बन्धावस्थामुपेयुषा ॥१८९॥

अर्थ: कर्मके प्रभावसे समझो अथवा भयसे समझो बन्धन अवस्थाको प्राप्त हुए मुझ मन्दभाग्यने उसकी वह शर्त स्वीकार कर ली ॥१८९॥


समुद्रावर्तसंज्ञेन तच्चापेन समन्वितम् । आनीतं खेचरैरुग्रैर्बहिःस्थानस्य तिष्ठति ॥१९०॥

अर्थ: समुद्रावर्त नामक दूसरे धनुषके साथ उस धनुषको उग्र विद्याधर ले आये हैं और वह नगरके बाहर स्थित है ॥१९०॥


मन्ये तस्य सुरेशोऽपि न शक्तोऽधिज्यताकृतौ । वज्रज्वलनतुल्यस्य दुर्निरीक्ष्यस्य तेजसा ॥१९१॥

अर्थ: वह धनुष वज्राग्निके समान है तथा तेजके कारण उसकी ओर देखना भी कठिन है। इसलिए मैं तो समझता हूँ कि उसे डोरी-सहित करनेमें इन्द्र भी समर्थ नहीं हो सकेगा ॥१९१॥


कृतान्तमेव निक्रुद्धमनाकृष्टमपि स्वनत् । अनधिज्यमपि स्वैरं भीष्मं तिष्ठत्यनारतम् ॥१९२॥

अर्थ: वह ऐसा जान पड़ता है मानो अत्यन्त क्रुद्ध यमराज ही हो। बिना खींचे भी वह शब्द करता है और बिना डोरीके भी वह अत्यन्त भयंकर है ॥१९२॥


अधिज्ये न कृते तस्मिन् पद्मेन मदियं ध्रुवम् । हरिष्यते खगैः कन्या मांसपेशीव जम्बुकात् ॥१९३॥

अर्थ: यदि राम उस धनुषको डोरीसहित नहीं कर सके तो मेरी इस कन्याको विद्याधर लोग अवश्य ही उसी तरह हरकर ले जावेंगे जिस तरह कि पक्षी किसी शृगालके मुखसे मांसकी डलीको हर ले जाते हैं ॥१९३॥


विंशतिर्वासराणां च वस्तुन्यत्र कृतोऽवधिः । बलान्नीता वराकीयं भूयोऽस्माभिः क्व वीक्षिता ॥१९४॥

अर्थ: इस कार्यके लिए बीस दिनकी अवधि निश्चित को गयी है । इसके बाद यह कन्या जबरदस्ती ले जायी जावेगी । फिर इस बेचारीको हम कहाँ देख सकेंगे ? ॥१९४॥


एवमुक्तेऽस्रसंपूर्णलोचना सहसामवत् । विदेहापहृतं बालमस्मरच्च प्रसङ्गतः ॥१९५॥

अर्थ: जनकके ऐसा कहते ही विदेहाके नेत्र सहसा आँसुओंसे भर गये और इस प्रसंगसे उसे अपने अपहृत बालकका स्मरण हो आया ॥१९५॥


अतीतागामिशोकाभ्यामभितः पीडितेव सा । चकार वारिनेत्राभ्यां कुररीव कृतस्वना ॥१९६॥

अर्थ: वह अतीत और आगामी शोकके द्वारा दोनों ओरसे पीड़ित हो रही थी। इसलिए कुररीकी तरह शब्द करती हुई नेत्रोंसे जल बरसाने लगी ॥१९६॥


परिदेवनमेवं च चक्रे विह्वलमानसा । कुर्वती परिवर्गस्य द्रवणं चेतसामलम् ॥१९७॥

कीदृग्वामं मया नाथ दैवस्यापकृतं भवेत् । पुत्रेण यन्न संतुष्टं हर्तुं कन्यां समुद्यतम् ॥१९८॥

अर्थ: विह्वल चित्तकी धारक विदेहा परिजनोंके चित्तको अत्यन्त द्रवीभूत करती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी कि हे नाथ ! मैंने दैवका कैसा उलटा अपकार किया होगा कि जिससे वह पुत्रके द्वारा सन्तुष्ट नहीं हुआ अब कन्याको हरनेके लिए उद्यत हुआ है ॥१९७-१९८॥


स्नेहालम्बनमेकैव बालिकेयं सुचेष्टिता । मम ते बान्धवानां च प्रेमभावो जनस्य च ॥१९९॥

अर्थ: उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली यही एक बालिका मेरे और आपके स्नेहका आलम्बन है तथा भाई-बान्धव एवं परिवारके लोगोंका प्रेमभाजन है ॥१९९॥


दुःखस्य यावदेकस्य नान्तं गच्छामि पापिनी । द्वितीयं तावदेतन्मे कृतसन्निधि वर्तते ॥२००॥

अर्थ: मैं पापिनी जबतक एक दुःखका अन्त नहीं प्राप्त कर पाती हूँ तबतक दूसरा दुःख आकर उपस्थित हो जाता है ॥२००॥


शोकावर्तनिमग्नां तां करुणं रुदतीमिति । नियम्यास्रं प्रियोऽवोचदतः शोकसमाकुलः ॥२०१॥

अलं कान्ते रुदित्वा ते ननु कर्मार्जितं पुरा । नर्तयत्यखिलं लोकं नृत्ताचार्यो ह्यसौ परः ॥२०२॥

अर्थ: राजा जनक स्वयं शोकसे आकुल था पर जब उसने देखा कि विदेहा शोकरूपी आवर्तमें फँसकर करुण रोदन कर रही है तब उसने जिस किसी तरह अपने आँसू रोककर कहा कि हे प्रिये ! तुम्हारा रोना व्यर्थ है। निश्चयसे पूर्व जन्ममें अर्जित कर्म ही समस्त लोकको नचा रहा है। यही सबसे बड़ा नर्तकाचार्य है ॥२०१-२०२॥


अथवा मयि विश्वस्ते हतो दुष्टेन बालकः । अप्रमत्तस्य बालां तु हर्तुं शक्तोऽस्ति को मम ॥२०३॥

अर्थ: अथवा मेरे निश्चित असावधान रहनेपर किसी दुष्टके द्वारा बालक हरा गया था पर अब तो मैं सावधान हूँ। देखूँ मेरी कन्याको हरनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२०३॥


आप्तप्रधारणन्यायमपरित्यजता मया । पृष्टासि दयिते वस्तु जानाम्येतत् सुखावहम् ॥२०४॥

अर्थ: हे प्रिये ! ‘आप्तजनोंके साथ कार्यका विचार करना चाहिए’ इस न्यायको न छोड़ते हुए ही मैंने तुमसे पूछा था। मैं तो जानता हूँ कि यह वस्तु सुखको धारण करनेवाली ही होगी ॥२०४॥


सारैरेवंविधैर्वाक्यैः कान्तेन कृतसान्त्वना । विदेहा विरलीकृत्य शोकं कृच्छ्रादवस्थिता ॥२०५॥

अर्थ: पतिके इस प्रकार सारपूर्ण वचनोंसे जिसे सान्त्वना दी गयी थी ऐसी विदेहा बड़े कष्टसे शोकको हलका कर चुप हो रही ॥२०५॥


ततो धनुर्गृहप्रान्ते विशाला रचितावनिः । स्वयंवरार्थमाहूताः पार्थिवाः सकलाः क्षितौ ॥२०६॥

अर्थ: तदनन्तर जहाँ धनुष रखा था उसके समीप ही विशाल भूमि बनायी गयी और उसमें स्वयंवरके लिए समस्त राजा बुलाये गये ॥२०६॥


प्रेषितः कोशलां दूतः पद्माद्याः समुपागताः । मातापित्रादिसंयुक्ता जनकेनाभिपूजिताः ॥२०७॥

अर्थ: अयोध्याको भी दूत भेजा गया जिससे राम आदि चारों भाई माता-पिता आदिके साथ आये और राजा जनकने उन सबका सन्मान किया ॥२०७॥


ततो हर्म्यतले कान्ते स्थिता परमसुन्दरी । कन्यासप्तशतान्तस्था सीता शूरभटावृता ॥२०८॥

अर्थ: तदनन्तर परम सुन्दरी सीता सात सौ अन्य कन्याओंके साथ महलकी सुन्दर छतपर बैठी । शूरवीर योद्धा उसे घेरे हुए थे ॥२०८॥


प्रान्तेषु सर्वसामन्ता वेश्मनोऽस्यावतस्थिरे । कुर्वाणा विविधां लीलां महाविभववर्तिनः ॥२०९॥

अर्थ: उस महलके चारों ओर नाना प्रकारकी लीलाको करते हुए समस्त सामन्त बड़े ठाट-बाटसे अवस्थित थे ॥२०९॥


ततः स्थित्वा पुरस्तस्य कञ्चुकी सुबहुश्रुतः । जगाद तारशब्देन हेमवेत्रलताकरः ॥२१०॥

राजपुत्रि परीक्षस्व पद्मोऽसौ पद्मलोचनः । अयोध्याधिपतेराद्यः पुत्रो दशरथश्रुतेः ॥२११॥

अर्थ: तदनन्तर अनेक शास्त्रोंको जाननेवाला तथा हाथमें सुवर्णकी छड़ी धारण करनेवाला कंचुकी सीताके सामने खड़ा होकर उच्च स्वरसे बोला कि हे राजपुत्रि ! देखो यह कमल-लोचन, अयोध्याके अधिपति राजा दशरथका आद्य पुत्र पद्म ( राम ) है ॥२१०-२११॥


लक्ष्मीमान् लक्ष्मणश्चायमनुजोऽस्य महाद्युतिः । भरतोऽयं महाबाहुः शत्रुघ्नोऽयं सुचेष्टितः ॥२१२॥

अर्थ: यह लक्ष्मीवान् तथा विशाल कान्तिको धारण करनेवाला इसका छोटा भाई लक्ष्मण है । यह बड़ी-बड़ी भुजाओं-को धारण करनेवाला भरत है और यह सुन्दर चेष्टाओंको धारण करनेवाला शत्रुघ्न है ॥२१२॥


सुतैर्दशरथोऽमीभिर्गुणसागरमानसैः । वसुधां शास्ति निर्दग्धभयाङ्कुरसमुद्भवाम् ॥२१३॥

अर्थ: जिनके हृदय गुणोंके सागर हैं ऐसे इन पुत्रोंके द्वारा राजा दशरथ पृथिवीका पालन करते हैं । इनकी पृथिवीमें भयके समस्त अंकुरोंकी उत्पत्ति भस्म कर दी गयी है ॥२१३॥


हरिवाहननामायं धीमानेष घनप्रभः । अयं चित्ररथः कान्तो दुर्मुखोऽयं प्रभाववान् ॥२१४॥

अर्थ: यह अत्यधिक कान्तिको धारण करनेवाला बुद्धिमान् हरिवाहन है, यह सुन्दर चित्ररथ है, यह प्रभावशाली दुर्मुख है ॥२१४॥


श्रीसंजयो जयो भानुः सुप्रभो मन्दरो बुधः । विशालः श्रीधरो वीरो बन्धुर्भद्रबलः शिखी ॥२१५॥

अर्थ: यह श्रीसंजय है, यह जय है, यह भानु है, यह सुप्रभ है, यह मन्दर है, यह बुध है, यह विशाल है, यह श्रीधर है, यह वीर है, यह बन्धु है, यह भद्रबल है और यह शिखी अर्थात् मयूरकुमार है ॥२१५॥


एतेऽन्ये च महासत्त्वा महाशोभासमन्विताः । विशुद्धवंशसंभूताश्चन्द्रनिर्मलकान्तयः ॥२१६॥

कुमाराः परमोत्साहा गुणभूषणधारिणः । महाविभवसंपन्ना भूरिविज्ञानकोविदाः ॥२१७॥

अर्थ: ये तथा इनके सिवाय और भी राजकुमार यहाँ उपस्थित हैं । ये सभी महापराक्रमी, महा शोभासे युक्त, विशुद्ध कुलमें उत्पन्न, चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिके धारक, परमोत्साही, गुणरूपी आभूषणोंके धारक, महा विभवसे सम्पन्न तथा अत्यधिक विज्ञानमें निपुण हैं ॥२१६-२१७॥


गजोऽयमस्य शैलाभस्तुरङ्गोऽस्यायमुन्नतः । रथोऽस्यायं महाभोगो भटोऽस्यायं कृताद्भुतः ॥२१८॥

अर्थ: यह पर्वतके समान आभावाला इसका हाथी है, यह इसका ऊँचा घोड़ा है, यह इसका विस्तृत रथ है और आश्चर्यजनक कार्य करनेवाला इसका सुभट - योद्धा है ॥२१८॥


सांकाश्यपुरनाथोऽयमयं रन्ध्रपुराधिपः । गवीधुमदधीशोऽयमयं नन्दनिकाधिपः ॥२१९॥

अर्थ: यह सांकाश्यपुरका स्वामी है, यह रन्ध्रपुरका अधिपति है, यह गवीधुमद् देशका अधीश है, यह नन्दनिकाका नाथ है ॥२१९॥


विभुः सूरपुरस्यायमेष कुण्डपुराधिपः । अयं मगधराजेन्द्रः काम्पिल्यविभुरेष च ॥२२०॥

अर्थ: यह सूरपुरका विभु है । यह कुण्डपुरका अधिप है, यह मगध देशका राजा है, और यह काम्पिल्यपुरका स्वामी है ॥२२०॥


अयमिक्ष्वाकुसंभूतो नृपोऽयं हरिवंशजः । अयं कुरुकुलानन्दो भोजोऽयं वसुधापतिः ॥२२१॥

अर्थ: यह राजा इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न हुआ है, यह हरिवंशमें उद्भूत हुआ है, यह कुरुकुलका आनन्ददायक है और यह राजा भोज है ॥२२१॥


इत्यादिवर्णनायुक्ता श्रूयन्तेऽमी महागुणाः । इदं त्वदर्थमेतेषां समारब्धं परीक्षणम् ॥२२२॥

अर्थ: ये सभी राजा इत्यादि वर्णनासे युक्त तथा महागुणवान् सुने जाते हैं। तुम्हारे लिए इन सबका यह परीक्षण प्रारम्भ किया गया है ॥२२२॥


वज्रावर्तमिदं चापमारोपयति यो नरः । कुमारि वरणीयोऽसौ भवत्या पुरुषोत्तमः ॥२२३॥

अर्थ: हे कुमारि ! जो पुरुष इस वज्रावर्त धनुषको चढ़ा देगा वही पुरुषोतम तुम्हारे द्वारा वरा जाना है ॥२२३॥


क्रमेण मानिनस्ते च कुर्वाणाः स्वविकत्थनम् । वज्रावर्तधनुस्तेन ढौकिताश्चारुविभ्रमाः ॥२२४॥

अर्थ: तदनन्तर जो मानसे सहित थे, अपनी प्रशंसा अपनेआप कर रहे थे, और सुन्दर विलाससे सहित थे ऐसे उन सब राजाओंको वह कंचुकी वज्रावर्त धनुषके पास ले गया ॥२२४॥


आसीदस्तु कुमारेषु धनुर्मुञ्चति पावकम् । विद्युत्सटासमाकारं निश्वसद्भीषणोरगम् ॥२२५॥

अर्थ: जिसका आकार बिजलीकी छटाके समान था तथा जिसमें भयंकर साँप फुँकार रहे थे ऐसा वह धनुष राजकुमारोंके पास आते ही अग्नि छोड़ने लगा ॥२२५॥


चक्षुस्तत्र द्रुतं केचिद्घनुर्ज्वालासमाहतम् । त्रस्ताः पिधाय पाणिभ्यां पराचीनत्वमाश्रिताः ॥२२६॥

अर्थ: कितने ही राजकुमार भयभीत हो धनुषकी ज्वालाओंसे ताड़ित चक्षुको दोनों हाथोंसे ढँककर शीघ्र ही वापिस लौट गये ॥२२६॥


तस्थुर्दूरत एवान्ये दृष्ट्वा स्फुरितपन्नगान् । कम्पमानसमस्ताङ्गा निमीलितविलोचनाः ॥२२७॥

अर्थ: जिनके समस्त अंग कम्पित हो रहे थे तथा नेत्र बन्द हो गये थे ऐसे कितने ही लोग चलते हुए साँपोंको देखकर दूर ही खड़े रह गये थे ॥२२७॥


केचिज्ज्वराकुलाः पेतुः क्षितावन्ये गिरोज्झिताः । द्रुतं पलायिताः केचित्केचे मूर्छामुपागताः ॥२२८॥

अर्थ: कितने ही लोग ज्वरसे आकुल हो पृथ्वीपर गिर पड़े, कितने ही लोगोंकी बोलती बन्द हो गयी, कितने ही शीघ्र भाग गये और कितने ही मूर्छाको प्राप्त हो गये ॥२२८॥


केचित्पन्नगवातेन क्षिप्ता मर्मरपत्रवत् । अपरे स्तम्भमायाताः स्थिताः शान्तर्द्धयोऽपरे ॥२२९॥

अर्थ: कितने ही लोग साँपोंकी वायुसे सूखे पत्रके समान उड़ गये, कितने ही अकड़ गये और कितने ही लोगोंकी ऋद्धि शान्त हो गयी अर्थात् वे शोभारहित हो गये ॥२२९॥


केचिद्गुर्यदि स्थानं गमिष्यामो निजं ततः । जीवदानानि दास्यामश्चरणौ देहि देवते ॥२३०॥

अर्थ: कितने ही लोग कहने लगे कि यदि हम अपने स्थानपर वापिस जा सकेंगे तो जीवोंको दान देवेंगे। हे देवते ! मुझे दो चरण दो अर्थात् वापिस भागनेकी पैरोंमें शक्ति प्रदान करो ॥२३०॥


ऊचुरन्येऽन्यनारीभिः सेवां मानससवासिनः । म्रियमाणाः करिष्यामो रूपिण्यापि किमेतया ॥२३१॥

अर्थ: कितने ही लोग बोले कि यदि हम जीवित रहेंगे तो अन्य स्त्रियोंसे कामकी सेवा कर लेंगे। भले ही यह रूपवती हो पर इससे क्या प्रयोजन है ? ॥२३१॥


अन्ये जगुरियं नूनं केनापि क्रूरचेतसा । प्रयुक्ता परमा माया वधार्थं पृथिवीक्षिताम् ॥२३२॥

अर्थ: कुछ लोग कहने लगे कि निश्चित ही किसी दुष्ट चित्तने राजाओंके वधके लिए इस मायाका प्रयोग किया है ॥२३२॥


अन्ये जगुः किमस्माकं कामेनास्ति प्रयोजनम् । ब्रह्मचर्येण नेष्यामः समयं साधवो यथा ॥२३३॥

अर्थ: और कुछ लोग कहने लगे कि हमें कामसे क्या प्रयोजन ? हम तो साधुओंके समान ब्रह्मचर्यसे समय बिता देवेंगे ॥२३३॥


तत पद्मः समुत्तस्थौ वरकार्मुकलालसः । ढुढौके च महानागमन्थरां गतिमुद्वहन् ॥२३४॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्हें उस उत्कृष्ट धनुषकी लालसा उत्पन्न हो रही थी ऐसे राम मदोन्मत्त गजराजके समान मन्थर गतिको धारण करते हुए उसके पास पहुँचे ॥२३४॥


आसीद्दतिशुभे तस्मिन् रूपं भेजे धनुर्निजम् । सुचारुपरमं सौम्यमन्तेवासी गुराविव ॥२३५॥

अर्थ: पुण्यशाली रामके समीप आते ही धनुष अपने असली स्वरूपको उसी तरह प्राप्त हो गया जिस तरह कि गुरुके समीप आते ही विद्यार्थी अत्यन्त सुन्दर सौभाग्यरूपको प्राप्त हो जाता है ॥२३५॥


ततो विस्रब्धमादाय धनुरुद्वेष्ट्य चांशुकम् । समारोपयदभ्युच्चैर्ध्वनितं विपुलप्रभम् ॥२३६॥

अर्थ: तदनन्तर रामने वस्त्र ऊपर चढ़ाकर निःशंक हो धनुष उठा लिया और उसे चढ़ाकर विपुल गर्जना की ॥२३६॥


महाजलधरध्वानशङ्किभिः शिखिभिः कृतम् । मुक्तकेकारवैर्नृत्यं बद्धविस्तीर्णमण्डलैः ॥२३७॥

अर्थ: मयूर उस गर्जनाको मेघोंकी महागर्जना समझ हर्षसे केकाध्वनि छोड़ने लगे और अपनी पिच्छोंका मण्डल फैलाकर नृत्य करने लगे ॥२३७॥


अलातचक्रसंकाशः संजातो दिवसाधिपः । सुवर्णरजसाच्छन्ना इवासन् व्योमबाहवः ॥२३८॥

अर्थ: सूर्य अलातचक्रके समान हो गया और दिशाएँ सुवर्णकी परागसे ही मानो व्याप्त हो गयीं ॥२३८॥


साधु साध्विति देवानां बभूव नभसि स्वनः । ननृतुर्व्यन्तराः केचिन्मुञ्चन्तः पुष्पसंहतीः ॥२३९॥

अर्थ: आकाशमें ‘साधु’ ‘साधु’ - ‘ठीक-ठीक’ इस प्रकार देवोंका शब्द होने लगा और फूलोंके समूहकी वर्षा करते हुए कितने ही व्यन्तर नृत्य करने लगे ॥२३९॥


ततोऽटनिजटङ्कारबधिरीकृतविष्टपम् । आचकर्ष धनुः पद्मः संप्राप्तं चक्रताविव ॥२४०॥

अर्थ: तदनन्तर अटनीकी टंकारसे जिसने समस्त विश्वको बहिरा कर दिया था तथा जो चक्राकारताको मानो व्याप्त हो रहा था ऐसे धनुषको रामने खींचा ॥२४०॥


विकलीभूतनिश्शेषहृषीकः सकलो जनः । तदावर्तमिव प्राप्तो भ्राम्यति त्रस्तमानसः ॥२४१॥

अर्थ: जिनकी समस्त इन्द्रियाँ विकल हो गयी थीं तथा मन भयभीत हो रहा था ऐसे सब लोग भँवरमें पड़े हुएके समान घूमने लगे ॥२४१॥


प्रवातघूर्णिताम्भोजपलाशाधिककान्तिना । चक्षुषा स्मरचापेन सीता रामं निरैक्षत ॥२४२॥

अर्थ: वायुसे हिलते हुए कमलदलसे भी अधिक जिसकी कान्ति थी, तथा जो कामदेवके धनुषके समान जान पड़ता था, ऐसे नेत्रसे सीताने रामको देखा ॥२४२॥


रोमाञ्चार्चितसर्वांगा दधती परमस्रजम् । प्रीता रामं ढुढौके सा व्रीडाविनमितानना ॥२४३॥

अर्थ: जिसका समस्त शरीर रोमांचोंसे सुशोभित हो रहा था, जो उत्कृष्ट मा[?]ा धारण कर रही थी, तथा लज्जासे जिसका मुख नीचेकी ओर झुक रहा था ऐसी सीता प्रसन्न हो रामके समीप पहुँची ॥२४३॥


पार्श्वस्थया तया रेजे स तथा सुन्दरो यथा । यथायमिति दृष्टान्तं यो गदेत् स गतत्रपः ॥२४४॥

अर्थ: पासमें खड़ी सीतासे सुन्दर राम इस तरह सुशोभित हो रहे थे कि उनकी उपमामें ‘वे इस तरह सुशोभित थे’ ऐसा जो कहता था वह निर्लज्ज जान पड़ता था अर्थात् वे अनुपम थे ॥२४४॥


अवतारितमौर्वीकं स कृत्वा सायकासनम् । तस्थौ विनयसंपन्नः स्वासने सीतया सह ॥२४५॥

अर्थ: तदनन्तर धनुषकी डोरी उतार कर वे विनयवान् राम सीताके साथ अपने आसनपर बैठ गये ॥२४५॥


सकम्पहृदया सीता रामाननदिदृक्षया । भावं कमपि संप्राप्ता नवसंगमसाध्वसा ॥२४६॥

अर्थ: जो नव समागमके कारण भयभीत हो रही थी तथा जिसके हृदयमें कम्पन उत्पन्न हो रहा था ऐसी सीता रामका मुख देखनेकी इच्छासे किसी अद्भुत भावको प्राप्त हो रही थी ॥२४६॥


क्षुब्धाकूपारनिस्वानं सागरावर्तकार्मुकम् । तावच्च लक्ष्मणोऽधिज्यं कृत्वास्फालयदुन्नतम् ॥२४७॥

अर्थ: इतनेमें ही क्षुभित समुद्रके समान जिसका शब्द हो रहा था ऐसे सागरावर्त नामक धनुषको लक्ष्मणने प्रत्यंचासहित कर जोरसे उसकी टंकार छोड़ी ॥२४७॥


शरे निहितदृष्टिं तं समालोक्य नभश्चराः । वदन्तो देव मा मेति मुमुचुः कुसुमोत्करान् ॥२४८॥

अर्थ: तदनन्तर बाणपर दृष्टि लगाये हुए लक्ष्मणको देख ‘हे देव नहीं, नहीं’ ऐसा कहते हुए विद्याधरोंने फूलोंके समूह छोड़े अर्थात् पुष्प वर्षा की ॥२४८॥


आकृष्य कार्मुकं क्रूरं मौर्वीसंरावमूर्जितः । अवतार्य च पद्मस्य पार्श्वे सुविनयस्थितः ॥२४९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी डोरीसे विशाल शब्द हो रहा था ऐसे धनुषको खींचकर और फिर उतारकर बलवान् लक्ष्मण रामके समीप ही बड़ी विनयसे आ बैठा ॥२४९॥


विक्रान्ताय तथा तस्मै विद्याभृच्चन्द्रवर्धनः । अष्टादश ददौ कन्या धियैवाप्रौढिका इति ॥२५०॥

अर्थ: इस प्रकार शूरवीरता दिखानेवाले लक्ष्मणके लिए चन्द्रवर्धन विद्याधरने अत्यन्त बुद्धिमती अठारह कन्याएँ दीं ॥२५०॥


विद्याधरैः समागत्य परमं भयपूरितैः । वृत्तान्ते कथिते तस्मिंश्चन्द्रश्चिन्तापरः स्थितः ॥२५१॥

अर्थ: भयसे अतिशय भरे हुए विद्याधरोंने वापस आकर जब यह समाचार कहा तब चन्द्रगति विद्याधर चिन्तामें निमग्न हो गया ॥२५१॥


वृत्तान्तमिममालोक्य भरतः पुरुविस्मयः । अशोचदेवमात्मानं मनसा संप्रबुद्धवान् ॥२५२॥

अर्थ: अथानन्तर यह वृत्तान्त देखकर जिसे बड़ा आश्चर्य प्राप्त हो रहा था, जिसे मनमें प्रबोध उत्पन्न हुआ था ऐसा भरत अपने आपके विषयमें इस प्रकार शोक करने लगा ॥२५२॥


कुलमेकं पिताप्येक एतयोर्मम चेदृशम् । प्राप्तमद्भुतमेताभ्यां न मया मन्दकर्मणा ॥२५३॥

अर्थ: कि देखो हम दोनोंका एक कुल है, एक पिता हैं। पर इन दोनों अर्थात् राम-लक्ष्मणने ऐसा आश्चर्य प्राप्त किया और पुण्यकी मन्दतासे मैं ऐसा आश्चर्य प्राप्त नहीं कर सका ॥२५३॥


अथवा किं मनो व्यर्थं परलक्ष्म्याभितप्यसे । पुरा चारूणि कर्माणि न कृतानि ध्रुवं त्वया ॥२५४॥

अर्थ: अथवा दूसरेकी लक्ष्मीसे मनको व्यर्थ ही क्यों सन्तप्त किया जाये ? निश्चित ही तूने पूर्वभवमें अच्छे कार्य नहीं किये ॥२५४॥


पद्मगर्भदलच्छाया साक्षाल्लक्ष्मीरिवोज्ज्वला । ईदृशी पुरुपुण्यस्य पुंसो भवति भामिनी ॥२५५॥

अर्थ: कमलके भीतरी दलके समान जिसकी कान्ति है ऐसी साक्षात् लक्ष्मीके समान उज्ज्वल स्त्री अत्य- धिक पुण्यके धारक पुरुषको ही प्राप्त हो सकती है ॥२५५॥


कलाकलापनिष्णाता विज्ञाना केकया ततः । विज्ञाय तनयाकूतं कर्णे प्रियमभाषत ॥२५६॥

भरतस्य मया नाथ शोकवल्लक्षितं मनः । तथा कुरु यथा नायं निर्वेदं परमृच्छति ॥२५७॥

अर्थ: तदनन्तर कलाओंके समूहमें निष्णात एवं विशिष्ट ज्ञानको धारण करनेवाली केकयाने पुत्रकी चेष्टा जानकर कानमें हृदयवल्लभ राजा दशरथसे कहा कि हे नाथ ! मुझे भरतका मन शोकयुक्त दिखाई देता है। इसलिए ऐसा करो कि जिससे यह वैराग्यको प्राप्त न हो जाये ॥२५६-२५७॥


अस्त्यत्र कनको नाम जनकस्यानुजो नृपः । सुप्रभायां ततो जाता सुकन्या लोकसुन्दरी ॥२५८॥

अर्थ: यहाँ जनकका छोटा भाई कनक है। उसकी सुप्रभा रानीसे उत्पन्न हुई लोक-सुन्दरी नामा कन्या है ॥२५८॥


स्वयंवरामिधं भूयः समुद्घोष्य नियोज्यताम् । तथायं यावदायाति नान्यं तं भावनान्तरम् ॥२५९॥

अर्थ: सो स्वयंवर विधिकी पुनः घोषणा कर उसे भरतके लिए उसी तरह स्वीकृत कराओ जिस तरह कि वह किसी दूसरी भावनाको प्राप्त नहीं हो सके ॥२५९॥


ततः परममित्युक्त्वा वार्ता दशरथेन सा । कर्णगोचरमानीता कनकस्य सुचेतसः ॥२६०॥

अर्थ: तदनन्तर ‘बहुत ठीक है’ ऐसा कहकर राजा दशरथने यह बात विचारवान् राजा कनकके कान तक पहुँचायी ॥२६०॥


यदाज्ञापयतीत्युक्त्वा कनकेनान्यवासरे । समाहूता नृपाः क्षिप्रं गता ये निलयं निजम् ॥२६१॥

अर्थ: राजा कनकने भी ‘जो आज्ञा’ कहकर दूसरे दिन जो राजा अपने घर चले गये थे उन्हें शीघ्र ही बुलाया ॥२६१॥


ततो यथोचितस्थानस्थितभूनाथमध्यगम् । नक्षत्रगणमध्यस्थशर्वरीवरविभ्रमम् ॥२६२॥

उपात्तसुमनोदामा कानकी कनकप्रभा । सुप्रभा भरतं वव्रे सुभद्रा भरतं यथा ॥२६३॥

अर्थ: तदनन्तर जो यथायोग्य स्थानोंपर बैठे हुए राजाओंके मध्यमें स्थित था और नक्षत्रोंके समूहके मध्यमें स्थित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ऐसे भरतको पुष्पमाला धारण करनेवाली एवं सुवर्णके समान कान्तिसे संयुक्त, राजा कनककी पुत्री लोकसुन्दरीने उस तरह वरा जिस तरह कि उत्तम कान्तिको धारण करनेवाली सुभद्राने पहले भरत चक्रवर्तीको वरा था ॥२६२-२६३॥


अत्यन्तविषमीभावं पश्य श्रेणिक कर्मणाम् । यतोऽसौ संप्रबुद्धः सन् कन्यया मोहितः पुनः ॥२६४॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! कर्मोंकी अत्यन्त विषमता देखो कि प्रबोधको प्राप्त हुआ भरत कन्याके द्वारा पुनः मोहित हो गया ॥२६४॥


विलक्षाः पार्थिवाः सर्वे जग्मुः स्थानं यथाग्रथम् । अस्थुश्च विकथाशक्त्या बन्धुवर्गसमागमे ॥२६५॥

अर्थ: सब राजा लोग लज्जित होते हुए यथायोग्य स्थानोंपर चले गये और अपने बन्धुवर्गके बीचमें विकथा करते हुए रहने लगे ॥२६५॥


यादृक् येन कृतं कर्म भुङ्क्ते तादृक् स तत्फलम् । नह्युप्तान् कोद्रवान् कश्चिदश्नुते शालिसंपदम् ॥२६६॥

अर्थ: कितने ही कहने लगे कि जिस जीवने जैसा कार्य किया है वह वैसा ही फल भोगता है। क्योंकि जिसने कोदों बोये हैं वह धान्य प्राप्त नहीं कर सकता ॥२६६॥


केतुतोरणमालाभिमण्डितायां महाद्युतौ । आगुल्फकुसुमापूर्णविशालापणवर्त्मनि ॥२६७॥

सशंखतूर्यनिस्वानपूरिताखिलवेश्मनि । मिथिलायां तयोश्चक्रे विवाहः परमोत्सवः ॥२६८॥

अर्थ: तदनन्तर जो पताका तोरण और मालाओंसे सजायी गयी थी, जो महाकान्तिको धारण कर रही थी, जिसके बाजारके लम्बे-चौड़े मार्ग घुटनों तक फूलोंसे व्याप्त किये गये थे और जिसके समस्त घर शंख एवं तुरहीके मधुर शब्दोंसे भर रहे थे ऐसी मिथिला नगरीमें दोनोंका बड़े उत्सवके साथ विवाह किया गया ॥२६७-२६८॥


द्रविणेन तथा लोकः सकलो परिपूरितः । महाप्रलयमायातं देहीति ध्वनितं यथा ॥२६९॥

अर्थ: उस समय धनसे सब लोक इस तरह भर दिया गया था कि जिससे ‘देहि अर्थात् देओ’ यह शब्द महाप्रलयको प्राप्त हो गया था अर्थात् बिलकुल ही नष्ट हो गया था ॥२६९॥


ये विवाहोत्सवं द्रष्टुं स्थिता भूपाः सुचेतसः । परमं प्राप्य सन्मानं ययुस्ते स्वं स्वमालयम् ॥२७०॥

अर्थ: उत्तम चित्तको धारण करनेवाले जो राजा विवाहोत्सव देखनेके लिए रह गये थे वे परम सम्मानको प्राप्त हो अपने-अपने घर गये ॥२७०॥


सकलविष्टपनिर्गतकीर्तयः परमरूपपयोनिधिवर्तिनः । पितृजनार्पितसंमदसंपदः परमरत्नविभूषितविग्रहाः ॥२७१॥

विविधयानसमाकुलसैनिका जलनिधिस्वनतूर्यनिनादिताः । विविशुरभ्युदयेन सुकोशलां दशरथस्य सुता वधुके तथा ॥२७२॥

अर्थ: अथानन्तर जिनकी कीर्ति समस्त संसारमें फैल रही थी, जो परम सौन्दर्यरूपी सागरमें निमग्न थे, जिन्होंने माता-पिताके लिए हर्षरूप सम्पदा समर्पित की थी, जिनके शरीर उत्कृष्ट रत्नोंसे अलंकृत थे, जिनके सैनिक नाना प्रकारकी सवारियोंसे व्यग्र थे, और जिनके आगे समुद्रके समान विशाल शब्द करनेवाली तुरही बज रही थी ऐसे दशरथके पुत्रों तथा बहुओंने बड़े वैभवके साथ अयोध्यामें प्रवेश किया ॥२७१-२७२॥


समवलोकितुमुत्तमविग्रहे पुरि तदा वधुके सकलो जनः । रहितसामिकृतस्वमनःक्रियः श्रयति राजपथं भृशमाकुलः ॥२७३॥

अर्थ: उस समय उत्तम शरीरको धारण करनेवाली बहुओंको देखनेके लिए समस्त नगरवासी लोग अपना आधा किया कार्य छोड़ बड़ी व्यग्रतासे राजमार्गमें आ गये ॥२७३॥


कृतसमस्तजनप्रतिमाननाः पुरुगुणस्तवसन्नतमूर्तयः ।
स्वनिलयेषु महासुखभोगिनो दशरथस्य सुताः सुधियः स्थिताः ॥२७४॥

अर्थ: जिन्होंने सब लोगोंका सत्कार किया था तथा अपने विशाल गुणोंके स्तवनसे जिनका शरीर विनम्र हो रहा था अर्थात् लज्जाके भारसे झुक रहा था ऐसे दशरथके बुद्धिमान् पुत्र महासुख भोगते हुए अपने महलोंमें रहने लगे ॥२७४॥


समवगम्य जनाः शुभकर्मणः फलमुदारमशोभनतोऽन्यथा ।
कुरुत कर्म बुधैरभिनन्दितं भवत येन रवेरधिकप्रभाः ॥२७५॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे भव्यजनो ! ‘शुभ कर्मका फल अच्छा होता है और अशुभ कर्मका फल अशुभ होता है’ ऐसा जानकर विद्वज्जनोंके द्वारा प्रशंसनीय वह कार्य करो जिससे कि सूर्यसे भी अधिक कान्तिके धारक होओ ॥२७५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते रामलक्ष्मणरत्नमालाभिधानं नामाष्टाविंशतितमं पर्व ॥२८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें राम-लक्ष्मणको स्वयंवरमें रत्नमालाकी प्राप्ति होनेका वर्णन करनेवाला अट्ठाईसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२८॥

२९. एकोनत्रिंशत्तमं पर्व (दशरथवैराग्यसर्वभूतहितागमाभिधानं)

आषाढधवलाष्टम्याः प्रभृत्यथ नराधिपः । महिमानं जिनेन्द्राणां प्रयतः कर्तुमुद्यतः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर आषाढ़ शुक्ल अष्टमीसे आष्टाह्निक महापर्व आया । सो राजा दशरथ जिनेन्द्र भगवान्की महिमा करनेके लिए उद्यत हुआ ॥१॥


सर्वाः प्रियास्तदा तस्य तनया बान्धवास्तथा । विधातुं जिनबिम्बानामिति कर्तव्यमुद्यताः ॥२॥

अर्थ: उस समय उसकी समस्त स्त्रियां, पुत्र तथा बान्धवजन जिन-प्रतिमाओंके विषयमें निम्नांकित कार्य करनेके लिए तत्पर हुए ॥२॥


पिनष्टि पञ्चवर्णानि कश्चिच्चूर्णानि सादरः । कश्चिद् ग्रथ्नाति माल्यानि लब्धवर्णः सुमक्तिषु ॥३॥

अर्थ: कोई मण्डल बनानेके लिए बड़े आदरसे पाँच रंगके चूर्ण पीसने लगा, तो नाना प्रकारकी रचना करनेमें निपुण कोई मालाएँ गूँथने लगा ॥३॥


वासयत्युदकं कश्चिद्द्रवयत्यपरः क्षितिम् । पिनष्टि परमान् गन्धान् कश्चिद्बहुविधच्छवीन् ॥४॥

अर्थ: कोई जलको सुगन्धित करने लगा, कोई पृथिवीको सींचने लगा, कोई नाना प्रकारके उत्कृष्ट सुगन्धित पदार्थ पीसने लगा ॥४॥


द्वारशोभां करोत्यन्यो वासोभिरतिभासुरैः । नानाधातुरसैः कश्चित्कुरुते भित्तिमण्डनम् ॥५॥

अर्थ: कोई अत्यन्त सुन्दर वस्त्रोंसे जिनमन्दिरके द्वारकी शोभा करने लगा और कोई नाना धातुओंके रससे दीवालोंको अलंकृत करने लगा ॥५॥


एवं जनः परां भक्तिं वहन् प्रमदपूरितः । जिनपूजासमाधानात् पुण्यमार्जयदुत्तमम् ॥६॥

अर्थ: इस प्रकार उत्कृष्ट भक्तिको धारण करनेवाले एवं आनन्दसे परिपूर्ण भक्तजनोंने जिनेन्द्र-देवकी पूजा कर उत्तम पुण्यका संचय किया ॥६॥


ततः सर्वसमृद्धीनां कृतसंभारसंनिधिः । चकार स्नपनं राजा जिनानां तूर्यनादितम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर सब प्रकारकी उत्तमोत्तम सामग्रियोंको एकत्र कर राजा दशरथने जिसमें तुरही-का विशाल शब्द हो रहा था ऐसा जिनेन्द्र भगवान्का अभिषेक किया ॥७॥


अष्टाहोपोषितं कृत्वाभिषेकं परमं नृपः । चकार महतीं पूजां पुष्पैः सहजकृत्रिमैः ॥८॥

अर्थ: आठ दिनका उपवास कर उत्कृष्ट अभिषेक किया तथा सहज अर्थात् स्वाभाविक और कृत्रिम अर्थात् स्वर्ण, रजत आदिसे बनाये हुए पुष्पोंसे महापूजा की ॥८॥


यथा नन्दीश्वरे द्वीपे शक्रः सुरसमन्वितः । जिनेन्द्रमहिमानन्दं कुरुते तद्वदेव सः ॥९॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्र देवोंके साथ नन्दीश्वर द्वीपमें जिनेन्द्रपूजा करता है उसी प्रकार राजा दशरथने भी सब परिवारके साथ जिनेन्द्रपूजा की ॥९॥


ततः सदनयातानां महिषीणां नराधिपः । प्रजिघाय महापूतं शान्तिगन्धोदकं कृती ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर जब रानियाँ घर पहुँच गयीं तब बुद्धिमान् राजा दशरथने सबके लिए महापवित्र, शान्तिकारक गन्धोदक पहुँचाया ॥१०॥


तिसृणां तरुणीस्त्रीभिर्नीतं शान्त्युदकं द्रुतम् । प्रतीता मस्तके चक्रुस्ततो दुरितनोदनम् ॥११॥

अर्थ: सो तीन रानियोंके लिए तो वह गन्धोदक तरुण स्त्रियां ले गयीं इसलिए जल्दी पहुँच गया और उन्होंने पापको नष्ट करनेवाला वह गन्धोदक शीघ्र ही बड़ी श्रद्धासे मस्तक-पर धारण कर लिया ॥११॥


वृद्धकञ्चुकिनो हस्ते दत्तं जिनवरोदकम् । अप्राप्य सुप्रभा कोपं शोकं च परमं गता ॥१२॥

अर्थ: परन्तु सुप्रभाके लिए वृद्ध कंचुकीके हाथ भेजा था इसलिए उसे शीघ्र नहीं मिला अतः वह अत्यधिक क्रोध और शोकको प्राप्त हुई ॥१२॥


अचिन्तयच्च नो साध्वी बुद्धिरेषा महीभृतः । यदेता मानिता नाहं शान्तिवारिविसर्जनात् ॥१३॥

अर्थ: वह विचार करने लगी कि राजाकी यह बुद्धि ठीक नहीं है जिससे उन्होंने मुझे गन्धोदक भेजकर सम्मानित नहीं किया ॥१३॥


को वात्र नृपतेर्दोषः प्रायः पुण्यं पुरा मया । नार्जितं येन संप्राप्ता निकारमिदमीदृशम् ॥१४॥

अर्थ: अथवा इसमें राजाका क्या दोष है? प्रायःकर मैंने पूर्व भवमें पुण्यका संचय नहीं किया होगा जिससे मैं ऐसे तिरस्कारको प्राप्त हुई हूँ ॥१४॥


पुण्यवत्य इमाः श्लाघ्या महासौभाग्यसंयुताः । पूतं यासां जिनेन्द्राम्बु प्रीत्या प्रहितमुत्तमम् ॥१५॥

अर्थ: ये तीनों पुण्यवती तथा महासौभाग्यसे सम्पन्न हैं जिनके लिए राजाने प्रेमपूर्वक पवित्र एवं उत्तम गन्धोदक भेजा है ॥१५॥


अपमानेन दग्धस्य हृदयस्यास्य मेऽधुना । शरणं मरणं मन्ये तापः शाम्यति नान्यथा ॥१६॥

अर्थ: अपमानसे जले हुए मेरे इस हृदयके लिए इस समय मरण ही शरण हो सकता है ऐसा मैं मानती हूँ। अन्य प्रकारसे मेरा सन्ताप शान्त नहीं हो सकता ॥१६॥


विशाखसंज्ञमाहूय भाण्डागरिकमेककम् । जगाद भद्र नाख्येयं त्वयेदं वस्तु कस्यचित् ॥१७॥

अर्थ: यह विचारकर उसने विशाख नामक एक भाण्डारीसे कहा कि हे भद्र ! तुम यह बात किसीसे कहना नहीं ॥१७॥


विषेणात्यन्तपरमं मम जातं प्रयोजनम् । तदानय द्रुतं भक्तिर्मयि चेत्तत्र विद्यते ॥१८॥

अर्थ: मुझे विषकी अत्यन्त आवश्यकता आ पड़ी है। इसलिए यदि तेरी मुझमें भक्ति है तो शीघ्र हो ला दे ॥१८॥


गत्वा स यावदन्विष्यंश्चिरयत्यतिशङ्कितः । तावत्तल्पगृहं गत्वा सातिष्ठत् स्रस्तगात्रिका ॥१९॥

अर्थ: विषके नामसे अत्यन्त शंकित होता हुआ भाण्डारी उसे खोजता हुआ जबतक कुछ विलम्ब करता है तबतक वह शयनगृहमें जाकर तथा शरीरको शिथिल कर पड़ रही ॥१९॥


नृपतिश्चागतो वीक्ष्य प्रियास्तिस्रस्तया विना । समन्विष्यागमत्तस्याः समीपं त्वरितक्रमः ॥२०॥

अर्थ: इतनेमें ही राजा आ गये और उसके बिना तीन प्रियाओंको देखकर खोज करते हुए शीघ्र ही उसके समीप जा पहुँचे ॥२०॥


अपश्यच्च मनश्चौरीमंशुकच्छन्नविग्रहाम् । अनादरेण सत्तल्पे शक्रयष्टिमिव स्थिताम् ॥२१॥

अर्थ: उन्होंने देखा कि मनको चुरानेवाली सुप्रभा वस्त्रसे शरीर ढँककर शय्यापर अनादरसे इन्द्रधनुषके समान पड़ी है ॥२१॥


गृहाण तदिदं देवि क्ष्वेडमित्यवदच्च सः । प्रेष्यो दशरथश्चैतं देशं प्राप्याशृणोद् ध्वनिम् ॥२२॥

अर्थ: इसी समय उस भाण्डारीने आकर कहा कि हे देवि ! यह विष लो। भाण्डारीके इस शब्दको वहाँ जाकर राजाने सुन लिया ॥२२॥


हा देवि किमिदं मुग्धे प्रारब्धमिति च ब्रुवन् । स निराकरोद् भुजिष्यं तं तत्तल्पे चोपविष्टवान् ॥२३॥

अर्थ: सुनते ही राजाने कहा कि हे देवि ! यह क्या है ? मूर्खे ! यह क्या प्रारम्भ कर रखा है ? ऐसा कहते हुए राजाने उस भाण्डारीको वहाँसे दूर हटाया और स्वयं सुप्रभाकी शय्यापर बैठ गये ॥२३॥


राजानमागतं ज्ञात्वा सहसा सत्रपोत्थिता । क्षितावुपविविक्षन्ती कान्तेनाङ्के निवेशिता ॥२४॥

अर्थ: राजाको आया जान वह लजाती हुई सहसा उठी और पृथिवीपर बैठना चाहती थी कि उन्होंने उसे गोदमें बैठा लिया ॥२४॥


अवाचि च प्रिये कस्मात् कोपं प्राप्ता त्वमीदृशम् । सर्वतो दयिते येन जीवितेऽप्यसि निस्पृहा ॥२५॥

अर्थ: राजाने कहा कि प्रिये ! तुम इस प्रकारके क्रोधको क्यों प्राप्त हुई हो जिससे कि सबसे अधिक प्रिय अपने जीवनसे भी निःस्पृह हो रही हो ॥२५॥


सर्वतो मरणं दुःखमन्यस्माद्दुखतः परम् । प्रतिकारस्तु यद्यस्य तद्दुःखं वद कीदृशम् ॥२६॥

अर्थ: मरणका दुःख सब दुःखोंसे अधिक दुःख है। सो जिस अन्य दुःखसे दुःखी होकर तुमने मरणको उसका प्रतिकार बनाया है वह दुःख कैसा है यह तो बताओ ॥२६॥


त्वं मे हृदयसर्वस्वं दयिते वद कारणम् । क्षणेनापनयं यस्य करिष्यामि वरानने ॥२७॥

अर्थ: हे दयिते ! तुम मेरे हृदयकी सर्वस्व हो, अतः हे सुमुखि ! शीघ्र ही वह कारण बताओ जिससे मैं उसका प्रतिकार कर सकूँ ॥२७॥


श्रुतं वेत्सि जिनेन्द्राणां सदसद्गतिकारणम् । तथापि मतमीदृक् ते धिक्कोपं ध्वान्तमुत्तमम् ॥२८॥

अर्थ: सुगति और दुर्गतिके कारणोंका निरूपण करनेवाले जिनशास्त्रको तुम जानती हो फिर भी तुम्हारी ऐसी बुद्धि क्यों हो गयी ? इस प्रगाढ़ अन्धकारस्वरूप क्रोधको धिक्कार हो ॥२८॥


प्रसीद देवि कोऽद्यापि कोपस्यावसरस्तव । प्रसादध्वनिपर्यन्तप्रकोपा हि महास्त्रियः ॥२९॥

अर्थ: हे देवि ! प्रसन्न होओ । इस समय भी क्या तुम्हारे क्रोधका कोई अवसर है क्योंकि जो महास्त्रियाँ होती हैं उनका क्रोध प्रसाद शब्द सुनने तक ही रहता है ॥२९॥


तयोक्तं नाथ कः कोपस्त्वयि मे दुःखमीदृशम् । समुत्पन्नं न यद्याति शान्तिं पञ्चतया विना ॥३०॥

अर्थ: सुप्रभाने कहा कि हे नाथ ! आपपर मेरा क्या क्रोध हो सकता है ? पर मुझे ऐसा दुःख उत्पन्न हुआ है कि जो मरणके बिना शान्त नहीं हो सकता ॥३०॥


देवि तत्कतरद्दुःखमित्युक्तैवमभाषत । शान्त्यम्बुदानमन्यासां मम नेति कुतो वद ॥३१॥

अर्थ: राजाने पूछा कि हे देवि ! वह कौन-सा दुःख है ? इसके उत्तरमें सुप्रभाने कहा कि आपने अन्य रानियोंके लिए तो गन्धोदक भेजा पर मुझे क्यों नहीं भेजा सो कहिए ? ॥३१॥


दृष्टेन केन कार्येण हीनाहं विदिता त्वया । यदवञ्चितपूर्वास्मि वञ्चिता पण्डिताधुना ॥३२॥

अर्थ: आपने ऐसा कौन-सा कार्य देखा है जिससे मुझे हीन समझ लिया है । हे सुविज्ञ ! जिसे पहले कभी धोखा नहीं दिया उसे आज क्यों धोखा दिया गया ? ॥३२॥


यावदेवं वदत्येषा तावदायाति कञ्चुकी । देवि जैनाम्बु नाथेन तुभ्यं दत्तमिति ब्रुवन् ॥३३॥

अर्थ: सुप्रभा जबतक यह सब कह रही थी कि तबतक वृद्ध कंचुकी आकर यह कहने लगा कि हे देवि ! राजाने तुम्हें यह गन्धोदक दिया है ॥३३॥


अत्रान्तरे प्रियाः प्राप्ता इतरास्तामिदं जगुः । अयि मुग्धे प्रसादस्य स्थाने प्राप्तासि किं रुषा ॥३४॥

अर्थ: इसी बीचमें दूसरी रानियाँ आकर उससे कहने लगीं कि अरी भोली ! तू प्रसन्नताके स्थानको प्राप्त है फिर क्या कह रही है ? ॥३४॥


पश्यास्माकं जुगुप्साभिर्दासीभिर्जलमाहृतम् । वरिष्ठेन पवित्रेण तव कञ्चुकिनामुना ॥३५॥

अर्थ: देख, हम लोगोंके लिए तो निन्दनीय दासियाँ गन्धोदक लायी हैं पर तेरे लिए यह श्रेष्ठ एवं पवित्र कंचुकी लाया है ॥३५॥


ईदृशी नाम नाथस्य संप्रीतिर्भवतीं प्रति । यतोऽयं जनितो भेदः किमकाण्डे प्रकुप्यसि ॥३६॥

अर्थ: तेरे प्रति स्वामीकी ऐसी उत्तम प्रीति है इसीसे यह भेद हुआ है फिर असमयमें क्यों कुपित हो रही है ? ॥३६॥


प्रसीद दयितस्यास्य लग्नस्यैव प्रयत्नतः । प्रणयादपराधेऽपि ननु तुष्यन्ति योषितः ॥३७॥

अर्थ: फिर स्वामी तेरे पीछे बड़े प्रयत्नसे लग रहे हैं । अतः इनपर प्रसन्न हो क्योंकि स्नेहके कारण स्त्रियाँ अपराध होनेपर भी सन्तुष्ट ही रहती हैं ॥३७॥


दयिते क्रियते यावत्कोपो दारुणमानसे । तावत्संसारसौख्यस्य विघ्नं जानीहि शोभने ॥३८॥

अर्थ: हे कठोरहृदये ! जबतक पतिपर क्रोध किया जाता है तबतक हे शोभने ! सांसारिक सुखमें विघ्न ही जानना चाहिए ॥३८॥


विपादयितुमस्माकमात्मानमुचितं ननु । किंत्वत्र जिनचन्द्राणां वारिणा नः प्रयोजनम् ॥३९॥

अर्थ: वास्तवमें तो हम लोगोंका मरना उचित था पर हमें तो गन्धोदकसे प्रयोजन था । इसलिए सब अपमान सहन कर लिया ॥३९॥


सपत्नीभिरपि प्रीतमिति सान्त्वितया तया । चक्रे शान्त्युदकं मूर्ध्नि रोमाञ्चाञ्चितगात्रया ॥४०॥

अर्थ: इस प्रकार सपत्नियोंने भी जब उसे सान्त्वना दी तब उसका शरीर रोमांचसे सुशोभित हो गया और उसने गन्धोदक मस्तकपर धारण किया ॥४०॥


ततः प्रकुपितोऽवोचद् राजा कञ्चुकिनं तकम् । व्याक्षेपः क्व नु ते जातो वदापसद कञ्चुकिन् ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने कुपित होकर उस कंचुकीसे कहा कि हे नीच कंचुकी ! बता तुझे यह विलम्ब कहाँ हुआ ? ॥४१॥


ततो भयाद्विशेषेण कम्पिताखिलविग्रहः । कञ्चुकी कथमप्यूचे क्षितिजानुशिरोऽञ्जलिः ॥४२॥

अर्थ: भयसे जिसका समस्त शरीर विशेषकर काँपने लगा था ऐसा कंचुकी• पृथिवीपर घुटने और शिरपर अंजलि रखकर किसी तरह बोला ॥४२॥


हृदये स्थापिताः कृच्छ्रादानीता वक्त्रगोचरम् । ओष्ठे प्रणिहिता वर्णा व्यलीयन्तेऽस्य भूरिशः ॥४३॥

अर्थ: उसके हृदयमें जो अक्षर थे वे मुख तक बड़ी कठिनाईसे आये और जो ओठोंपर रखे गये थे वे बार-बार वहींके वहीं विलीन हो गये ॥४३॥


सखत्कारं मुहुः कुर्वन् स्फुरयन्नधरौ मुहुः । हृदयं संस्पृशन् कृच्छ्रादुपनीतेन पाणिना ॥४४॥

अर्थ: वह बार-बार खकारता था, बार-बार ओठ चलाता था, और बड़ी कठिनाईसे उठाकर पास ले जाये गये हाथसे हृदयका स्पर्श करता था ॥४४॥


पश्चान्मस्तकभागस्थश्चन्द्रांशुसितमूर्द्धजः । मन्दवाताहतश्वेतचामरोपमकूर्चकः ॥४५॥

अर्थ: उसके मस्तकके पिछले भागमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान सफेद बाल स्थित थे तथा सफेद चमरके समान उसकी दाढ़ीके बाल मन्द-मन्द वायुसे हिल रहे थे ॥४५॥


मक्षिकाच्छदनच्छातत्वक्तिरोहितकीकसः । धवलभ्रूवलिच्छन्नशोणप्रभनिरीक्षणः ॥४६॥

अर्थ: मक्खीके पंखके समान पतली त्वचासे उसकी हड्डियाँ ढँकी हुई थीं, उसके लाल-लाल नेत्र सफेद-सफेद भ्रकुटियोंकी वलिसे आच्छादित थे ॥४६॥


अभिलक्ष्यशिराजालसंवेष्टितचलत्तनुः । असंपूरितपुस्ताभः कृच्छ्राद्वासोऽपि धारयन् ॥४७॥

हिमाहत इवात्यर्थं कपोलौ कम्पयन् श्लथौ । विवक्षया मुहुर्जिह्वां स्थानानि स्खलितां नयन् ॥४८॥

अप्येकाक्षरनिष्पत्तिं मन्यमानो महोत्सवम् । वर्णान्तराभिसंधानाद् वर्णमन्यं समुच्चरन् ॥४९॥

संधानवर्जितान् वर्णान् परमश्रमकारिणः । कण्टकानिव कृच्छ्रेण मुमोच परिजर्जरान् ॥५०॥

अर्थ: उसका चंचल शरीर स्पष्ट दिखाई देनेवाली नसोंके समूहसे वेष्टित था, मिट्टीके अधबने खिलौनेके समान उसकी आभा थी। वह वस्त्र भी बड़ी कठिनाईसे धारण कर रहा था, हिमसे ताड़ित हुएके समान दोनो शिथिल कपोलोंको कम्पित कर रहा था, बोलनेकी इच्छासे लड़खड़ाती जिह्वाको तालु आदि स्थानोंपर बड़ी कठिनाईसे ले जा रहा था, यदि एक अक्षरका भी उच्चारण कर लेता था तो उसे महान् उत्सव मानता था। कुछ वर्ण बोलना चाहता था पर उसके बदले कुछ दूसरे ही वर्ण बोल जाता था, जिनके बोलनेका विचार ही नहीं था ऐसे बहुत भारी श्रमको करनेवाले टूटे-फूटे वर्णोंको वह जीर्ण-शीर्ण काँटेके समान बड़ी कठिनाईसे छोड़ता था अर्थात् उसका उच्चारण करता था ॥४७-५०॥


जराधीनस्य मे नाथ किमागो भृत्यवत्सल । संप्राप्तोऽसि यतः कोपं देव विज्ञातभूषण ॥५१॥

अर्थ: हे भृत्यवत्सल, स्वामिन्! मुझ बुड्ढेका क्या अपराध है? जिससे कि विज्ञानरूपी आभूषणको धारण करनेवाले हे देव! आप क्रोधको प्राप्त हुए हो ॥५१॥


पुरा करिकराकारभुजं कर्कशमुन्नतम् । पीनोत्तुङ्गं महोरस्कमालानसदृशोरुकम् ॥५२॥

आसीन् मम वपुः शैलराजकूटसमाकृति । कर्मणामिति चित्राणां कारणं परमोदयम् ॥५३॥

अर्थ: पहले मेरे शरीरकी भुजाएँ हाथीकी सूँड़के समान थीं, शरीर अत्यन्त कठोर और ऊँचा था। सीना विशाल था, जंघाएँ आलान अर्थात् हाथी बाँधनेके खम्भेके समान थीं, मेरा यह शरीर सुमेरुके शिखरके समान आकृतिवाला था, तथा अनेक अद्भुत कार्योंका सशक्त कारण था ॥५२-५३॥


अभूतां चूर्णने देव शक्तौ हस्तिकपाटयोः । करौ पार्ष्णिप्रहारश्च पर्वतस्यापि भेदकः ॥५४॥

उच्चावचां क्षितिं वेगात् पुराहं परिलङ्घयन् । राजहंस इवावातं नाथ स्थानमभीप्सितम् ॥५५॥

अर्थ: हे देव! हमारे ये हाथ पहले सुदृढ़ किवाड़ोंके चूर्ण करनेमें समर्थ थे, हमारे पैरकी ठोकर पर्वतके भी टुकड़े कर डालती थी, ऊँची-नीची भूमिको मैं वेगसे लाँघ जाता था, हे स्वामिन्! मैं राजहंस पक्षीके समान मनचाहे स्थानको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता था ॥५४-५५॥


आसीद् दृष्टेरवष्टम्भस्तादृशो मम पार्थिव । आमन्येऽपि क्षितेरीशं यादृशेन तृणोपमम् ॥५६॥

अर्थ: हे राजन् ! मेरी दृष्टिमें इतना बल था कि जिससे मैं राजाको भी तृणके समान तुच्छ समझता था ॥५६॥


अङ्गनाजनदृष्टीनां मनसां स महास्थिरम् । आलानमेतदासीन्मे शरीरं चारुविभ्रमम् ॥५७॥

अर्थ: अत्यन्त स्थविर और सुन्दर विलाससे युक्त मेरा यह शरीर स्त्रीजनोंकी दृष्टि और मनको बाँधनेके लिए आलानके समान था ॥५७॥


लालितं परमैर्भोगैः प्रसादेन पितुस्तव । विसंघटितमेतन्मे कुमित्रमिव सांप्रतम् ॥५८॥

अर्थ: आपके पिताके प्रसादसे मैंने इस शरीरका उत्तमोत्तम भोगोंसे लाड़-प्यार किया था पर इस समय कुमित्रके समान यह विघट गया है ॥५८॥


अधत्त यः पुरा शक्तिं रिपुदारणकारिणीम् । करेण यष्टिमालम्ब्य तेन भ्राम्यामि साम्प्रतम् ॥५९॥

अर्थ: मेरा जो हाथ पहले शत्रुओंको विदारण करनेकी शक्ति रखता था अब उसी हाथसे लाठी पकड़कर चलता हूँ ॥५९॥


विक्रान्तपुरुषाकृष्टशरासनसमं मम । पृष्ठास्थिस्थितमाक्रान्ते मूर्ध्नि मृत्योरिवाङ्घ्रिणा ॥६०॥

अर्थ: मेरी पीठकी हड्डी शूरवीर मनुष्यके द्वारा खींचे हुए धनुषके समान झुक गयी है और मेरा शिर यमराजके पैरसे आक्रान्त हुएके समान नम्र हो गया है ॥६०॥


दन्तस्थानभवा वर्णाश्चिरं क्वापि गता मम । ऊष्मवर्णोष्मणा तापमशक्ता इव सेवितुम् ॥६१॥

अर्थ: दाँतोंके स्थानसे उच्चरित होनेवाले मेरे वर्ण ( लृ तवर्ग ल और स ) कहीं चले गये हैं सो ऐसा जान पड़ता है मानो ऊष्मवर्णों ( श ष स ह ) की ऊष्मा अर्थात् गरमीसे उत्पन्न सन्तापको सहनेमें असमर्थ होकर ही कहीं चले गये हैं ॥६१॥


आलम्बे यदि नो यष्टिमेतां प्राणगरीयसीम् । क्षितौ पतेत्ततः पक्वमिदं हतशरीरकम् ॥६२॥

अर्थ: यदि मैं प्राणोंसे भी अधिक प्यारी इस लाठीका सहारा न लेऊँ तो यह पका हुआ अधम शरीर पृथ्वीपर गिर जावे ॥६२॥


वलीनां वर्तते वृद्धिरुत्साहस्य परिक्षयः । राजन् श्वसिमि देहेन यदेतेन तदद्भुतम् ॥६३॥

अर्थ: शरीरमें बलि अर्थात् सिकुड़नोंकी वृद्धि हो रही है और उत्साहका ह्रास हो रहा है। हे राजन् ! इस शरीरसे मैं साँस ले रहा हूँ यही आश्चर्यकी बात है ॥६३॥


अद्यश्वीनममुं कायं जरया जर्जरीकृतम् । नाथ धर्तुं न शक्नोमि बाह्ये वस्तुनि का कथा ॥६४॥

अर्थ: हे नाथ ! आजकलमें नष्ट हो जानेवाले इस जराजर्जरित शरीरको ही धारण करनेके लिए मैं समर्थ नहीं हूँ फिर दूसरी बाह्य वस्तुकी तो कथा ही क्या है ? ॥६४॥


नितान्तपटुताभाञ्जि हृषीकाणि पुरा मम । संप्रत्युद्देशमात्रेण स्थितानि जडचेतसः ॥६५॥

अर्थ: पहले मेरी इन्द्रियाँ अत्यन्त सामर्थ्यको प्राप्त थीं पर इस समय नाममात्रको ही स्थित हैं । मेरा मन भी जड़रूप हो गया है ॥६५॥


पदमन्यत्र यच्छामि पतत्यन्यत्र दुर्घटम् । श्याममेवाखिलं दृष्ट्या पश्यामि धरणीतलम् ॥६६॥

अर्थ: पैर अन्य स्थानपर रखता हूँ पर सँभल नहीं सकनेके कारण अन्य स्थानपर जा पड़ता है । मैं समस्त पृथ्वीतलको अपनी दृष्टिसे काला ही काला देखता हूँ ॥६६॥


गोत्रक्रमसमायातमिदं राजकुलं मम । यतः शक्नोमि न त्यक्तुमपि प्राप्येदृशीं दशाम् ॥६७॥

अर्थ: चूँकि यह राजकुल मेरी वंश-परम्परासे चला आ रहा है इसलिए ऐसी दशाको प्राप्त होकर भी इसे छोड़नेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥६७॥


पक्कं फलमिवैतन्मे शरीरं क्वापि वासरे । नेष्यत्याहारतां मृत्युर्मर्मरच्छदनोपमाम् ॥६८॥

अर्थ: मेरा यह शरीर पके हुए फलके समान है सो यमराज सूखे पत्रके समान इसे अपना आहार बना लेगा ॥६८॥


न तथासन्नमृत्योर्मे स्वामिन् संजायते भयम् । भवच्चरणसंसेवाविरहाद् भाविनो यथा ॥६९॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! मुझे निकटवर्ती मृत्युसे वैसा भय नहीं उत्पन्न होता है जैसा कि भविष्यमें होनेवाली आपके चरणोंकी सेवाके अभावसे हो रहा है ॥६९॥


व्याक्षेपो मे कुतः कश्चिद्दधतस्तनुमीदृशीम् । भवदाज्ञा प्रतीक्ष्यैव यस्य जीवितकारणम् ॥७०॥

अर्थ: आपकी सम्माननीय आज्ञा ही जिसके जीवित रहनेका कारण है ऐसे इस शरीरको धारण करते हुए मुझे विलम्ब अथवा कार्या- न्तरमें आसंग कैसे हो सकता है ? ॥७०॥


स त्वं नाथ जराधीनं मम ज्ञात्वा शरीरकम् । कोपमर्हसि नो कर्तुं धीर धत्स्व प्रसन्नताम् ॥७१॥

अर्थ: इसलिए हे नाथ ! मेरे शरीरको जराके अधीन जानकर आप क्रोध करनेके योग्य नहीं हैं । हे धीर ! प्रसन्नताको धारण करो ॥७१॥


निशम्य तद्वचो राजा गण्डं कुण्डलमण्डितम् । वामे करतले न्यस्य चिन्तामेवमुपागमत् ॥७२॥

अर्थ: कंचुकीके वचन सुनकर राजा कुण्डलसे सुशोभित कपोलको वाम करतलपर रखकर इस प्रकार विचार करने लगे ॥७२॥


जलबुद्बुदनिस्सारं कष्टमेतच्छरीरकम् । संध्याप्रकाशसंकाशं यौवनं बहुविभ्रमम् ॥७३॥

अर्थ: कि अहो, बड़े कष्टकी बात है कि यह अधम शरीर पानीके बबूलेके समान निःसार है और अनेक विभ्रमों - विलासोंसे भरा यह यौवन सन्ध्याके प्रकाशके समान भंगुर है ॥७३॥


सौदामिनीत्वरस्यास्य कृते देहस्य मानवाः । आरम्भन्ते न किं कृत्यं नितान्तं दुःखसाधनम् ॥७४॥

अर्थ: बिजलीके समान नष्ट हो जानेवाले इस शरीरके पीछे मनुष्य न जाने अत्यन्त दुःखके कारणभूत क्या-क्या कार्य प्रारम्भ नहीं करते हैं ? ॥७४॥


अतिमत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गतुल्याः प्रतारकाः । भोगिभोगसमाभोगास्तापोपचयकारिणः ॥७५॥

अर्थ: ये भोग अत्यन्त मत्त स्त्रीके कटाक्षोंके समान ठगनेवाले हैं, साँपके फनके समान भयंकर हैं और सन्तापकी वृद्धि करनेवाले हैं ॥७५॥


विषयेषु यदायत्तं दुष्प्रापेषु विनाशिषु । दुःखमेतद्विमूढानां सुखत्वेनावभासते ॥७६॥

अर्थ: कठिनाईसे प्राप्त होने योग्य विनाशी विषयोंमें जो दुःख प्राप्त होता है वह मूर्ख प्राणियोंके लिए सुख जान पड़ता है ॥७६॥


आपातरमणीयानि सुखानि विषयादयः । किंपाकफलतुल्यानि चित्रं प्रार्थयते जनः ॥७७॥

अर्थ: ये जो विषयादिक हैं वे प्रारम्भमें ही मनोहर सुखरूप जान पड़ते हैं फिर भी आश्चर्य है कि लोग किम्पाक फलके समान इन सुखोंकी चाह रखते हैं ॥७७॥


पुण्यवन्तो महोत्साहाः प्रबोधं परमं गताः । विषवद् विषयान् दृष्ट्वा ये तपस्यन्ति सज्जनाः ॥७८॥

अर्थ: जो सज्जन इन विषयोंको विषके समान देखकर तपस्या करते हैं वे पुण्यात्मा महोत्साहवान् तथा परम प्रबोधको प्राप्त हैं ऐसा समझना चाहिए ॥७८॥


कदा नु विषयांस्त्यक्त्वा निर्गतः स्नेहचारकात् । आचरिष्यामि जैनेन्द्रं तपो निर्वृतिकारणम् ॥७९॥

अर्थ: मैं कब इन विषयोंको छोड़कर तथा स्नेह-रूपी कारागृहसे छूटकर मोक्षके कारणभूत जिनेन्द्र-प्रोक्त तपका आचरण करूँगा ॥७९॥


सुखेन पालिता क्षोणी भुक्ता भोगा यथोचिताः । विक्रान्ता जनिता पुत्राः किमद्यापि प्रतीक्ष्यते ॥८०॥

अर्थ: सुखसे पृथिवीका पालन किया, यथायोग्य भोग भोगे, और शूरवीर पुत्र उत्पन्न किये फिर अब किस बात-की प्रतीक्षा की जा रही है ॥८०॥


अन्वयव्रतमस्माकमिदं यत्सूनवे श्रियम् । दत्त्वा संवेगिनो धीराः प्रविशन्ति तपोवनम् ॥८१॥

अर्थ: यह हमारा वंशपरम्परागत व्रत है कि हमारे धीर-वीर वंशज विरक्त हो पुत्रके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर तपोवनमें प्रवेश कर जाते हैं ॥८१॥


चिन्तयित्वाप्यसावेवं राजा कर्मानुभावतः । भोगेषु शिथिलासक्तिर्गृह एव रतिं ययौ ॥८२॥

अर्थ: राजा दशरथने इस प्रकार विचार भी किया और भोगोंमें आसक्ति कुछ शिथिल भी हुई तो भी कर्मोंके प्रभावसे वे घरमें ही प्रीतिको प्राप्त होते रहे अर्थात् गृहत्याग करनेके लिए समर्थ नहीं हो सके ॥८२॥


यत्प्राप्तव्यं यदा येन यत्र यावद्यतोऽपि वा । तत्प्राप्यते तदा तेन तत्र तावत्ततो ध्रुवम् ॥८३॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि जिस समय जहाँ जिससे जो और जितना कार्य होना होता है उस समय वहाँ उससे वह और उतना ही कार्य प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है ॥८३॥


कियत्यपि ततोऽतीते काले मगधसुन्दर । पर्यटन् विधिना क्षोणीं सङ्घेन महता वृतः ॥८४॥

सर्वभूतहितो नाम सर्वभूतहितो मुनिः । नगरीं तां समायासीन्मनःपर्ययवेदकः ॥८५॥

अर्थ: अथानन्तर गौतमस्वामी कहते हैं कि हे मगध देशके आभूषण ! कितना ही काल व्यतीत होनेपर बड़े भारी संघसे आवृत, सर्व प्राणियोंका हित करनेवाले, तथा मनःपर्यय ज्ञानके धारक सर्वभूतहित नामा मुनि, विधिपूर्वक पृथिवीमें विहार करते हुए अयोध्या नगरीमें आये ॥८४-८५॥


सरय्वाश्च तटे कालं श्रान्तं सङ्घमतिष्ठिपत् । पितेव पालयन् न्यस्तकायवाङ्मानसक्रियः ॥८६॥

अर्थ: जिनके मन-वचन-कायकी चेष्टा समीचीन थी और जो पिताकी तरह संघका पालन करते थे ऐसे उन मुनिराजने अपने थके हुए संघको सरयू नदीके किनारे ठहराया ॥८६॥


प्राग्भागेषु स्थिताः केचिद् गुहास्वन्ये तपस्विनः । केचिद् विविक्तगेहेषु केचिज्जैनेन्द्रवेश्मसु ॥८७॥

नगानां कोटरेष्वन्ये यथाशक्तिसमुद्यताः । तपांसि चक्रुराचार्यादधिगम्यानुमोदनाम् ॥८८॥

अर्थ: संघके कितने ही मुनि, आचार्य महाराजकी आज्ञा प्राप्त कर वनके सघन प्रदेशोंमें, कितने ही गुफाओंमें, कितने ही शून्य गृहोंमें, कितने ही जिनमन्दिरोंमें और कितने ही वृक्षोंकी कोटरोंमें ठहरकर यथाशक्ति तपश्चरण करने लगे ॥८७-८८॥


आचार्यस्तु विविक्तैषी पुर्या उत्तरपश्चिमाम् । तपःसमुचितक्षेत्रं विशालमतिसुन्दरम् ॥८९॥

उद्यानं सुमहावृक्षं सयूथ इव वारणः । प्रविवेशात्मदशमो महेन्द्रोदयकीर्तनम् ॥९०॥

तस्मिन् शिलातले रम्ये विपुले निर्मले समे । पशूनामङ्गनानां च पण्डुकानां च दुर्गमे ॥९१॥

द्वेषिलोकविमुक्तेऽसौ सूक्ष्मप्राणिविवर्जिते । दूरावष्टम्भिशाखस्य स्थितो नागतरोरधः ॥९२॥

अर्थ: तथा आचार्य एकान्त स्थानके अभिलाषी थे इसलिए उन्होंने नगरीकी उत्तर पश्चिम दिशा अर्थात् वायव्य कोणमें जो महेन्द्रोदय नामका उद्यान था उसमें यूथसहित गजराजके समान प्रवेश किया । उस महेन्द्रोदय नामा उद्यानमें तपके योग्य अनेक स्थान थे, तथा वह विशाल, अत्यन्त सुन्दर और अनेक बड़े-बड़े वृक्षोंसे सहित था । आचार्यके साथ अधिक भीड़ नहीं थी । अपने आपको मिलाकर कुल दस ही मुनिराज थे । वह उद्यान पशुओं, स्त्रियों और नपुंसकों- के लिए दुर्गम था, द्वेषी मनुष्योंसे रहित था तथा सूक्ष्म जन्तुओंसे शून्य था । ऐसे उस उद्यानमें जिसकी शाखाएँ दूर-दूर तक फैल रही थीं ऐसे एक नाग वृक्षके नीचे सुन्दर, विशाल, निर्मल एवं समान शिलातलपर विराजमान हुए ॥८९-९२॥


मार्तण्डमण्डलोच्छायो गभीरः प्रियदर्शनः । वर्षाः क्षपयितुं तस्थौ कर्माणि च महामनाः ॥९३॥

अर्थ: आचार्य महाराज सूर्यबिम्बके समान देदीप्यमान, गम्भीर, प्रिय-दर्शन और उदारहृदय थे तथा कर्मोंका क्षय करनेके लिए वर्षायोग लेकर वहाँ विराजमान हुए थे ॥९३॥


संप्राप्तश्च महाकालः प्रवासिजनभैरवः । प्रस्फुरद्विद्युदुग्रोऽष्ट क्रूरधाराधरध्वनिः ॥९४॥

तर्जयन्निव लोकस्य कृततापं दिवाकरम् । भयात् पलायितं क्वापि स्थूलधारान्धकारतः ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर जो विदेशमें जानेवाले मनुष्योंको भय उत्पन्न करनेवाला था, चमकती हुई बिजलीसे उग्र था तथा जिसमें आठों दिशाओंके मेघोंकी कठोर गर्जना हो रही थी ऐसा वर्षाकाल आ पहुँचा। वह वर्षाकाल ऐसा जान पड़ता था मानो लोगोंको सन्ताप पहुँचानेवाले सूर्यको डाँट हो रहा हो और बड़ी मोटी धाराओंके अन्धकारसे भयभीत हो कहीं भाग गया हो ॥९४-९५॥


जातमुर्वीतलं सम्यक् कञ्चुकेन कृतावृति । वर्द्धन्ते सुमहानद्यो वीचिपातितरोधसः ॥९६॥

अर्थ: पृथिवीतल ऐसा दिखाई देने लगा मानो उसने अच्छी तरह कंचुक ही धारण कर रखी हो । तरंगों- से तटोंको गिरानेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ बढ़ने लगीं ॥९६॥


जायते प्राप्तकम्पानां चित्तोद्भ्रान्तिः प्रवासिनाम् । असिधाराव्रतं जैनो जनोऽसक्तं निषेवते ॥९७॥

अर्थ: और जिन्हें कँपकँपी छूट रही थी ऐसे प्रवासी मनुष्योंके चित्तमें भ्रान्ति उत्पन्न होने लगी। ऐसे वर्षाकालमें जैनी लोग निरन्तर खड्गधाराके समान कठोर व्रत धारण करते हैं ॥९७॥


भूरिशोऽवग्रहांश्चक्रुर्मुनयः क्षितिगोचराः । खदानलब्धयश्चैते पान्तु त्वा मगधाधिप ॥९८॥

अर्थ: जो पृथिवीपर विहार करते थे तथा जिन्हें आकाशमें चलनेकी ऋद्धि प्राप्त हुई थी ऐसे मुनिराज उस समय अनेक प्रकारके नियम धारण करते थे । गौतमस्वामी कहते हैं कि हे मगधेश्वर ! ये सब मुनिराज तुम्हारी रक्षा करें ॥९८॥


अथ भेरीनिनादेन शङ्खनिस्वनशोभिना । दोषान्ते कोशलानाथो विबुद्धो भास्करो यथा ॥९९॥

अर्थ: अथानन्तर प्रातःकाल होनेपर शंखके शब्दसे सुशोभित भेरीके नादसे राजा दशरथ सूर्यके समान जागृत हुए ॥९९॥


ताम्रचूडाः खरं रेणुर्दम्पतीनां वियोजकाः । सारसाश्चक्रवाकाश्च सरसीषु नदीषु च ॥१००॥

अर्थ: स्त्री-पुरुषोंका वियोग करनेवाले मुर्गे तथा सरोवर और नदियोंमें विद्यमान सारस और चक्रवाक पक्षी जोर-जोरसे शब्द करने लगे ॥१००॥


भेरीपणववीणाद्यैर्गीतैश्च सुमनोहरैः । व्यावृतश्चैत्यगेहेषु जायते विपुलो जनः ॥१०१॥

अर्थ: भेरी, पणव तथा वीणा आदिके मनोहर गीतोंसे आकर्षित हो बहुत-से मनुष्य जिनमन्दिरोंमें उपस्थित होने लगे ॥१०१॥


विघूर्णमाननयनः सकलारुणलोचनः । विमुञ्चते जनो निद्रां प्रियामिव हियान्वितः ॥१०२॥

अर्थ: जिस प्रकार लज्जासे युक्त मनुष्य प्रियाको छोड़ता है इसी प्रकार जिसके नेत्र घूम रहे थे तथा समस्त नेत्र लाल-लाल हो रहे थे ऐसा मनुष्य निद्राको छोड़ रहा था ॥१०२॥


प्रदीपाः पाण्डुरा जाता शशाङ्कश्च गतप्रभः । विकासं यान्ति पद्मानि कुमुदानि निमीलनम् ॥१०३॥

अर्थ: दीपक पाण्डुवर्ण हो गये थे और चन्द्रमा फीका पड़ गया । कमल विकासको प्राप्त हुए और कुमुद निमीलित हो गये ॥१०३॥


ध्वस्ता ग्रहादयः सर्वे दिवाकरमरीचिभिः । जिनप्रवचनज्ञस्य वचनैर्वादिनो यथा ॥१०४॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनशास्त्रके ज्ञाता मनुष्यसे वादी परास्त हो जाते हैं उसी प्रकार सूर्यकी किरणोंसे समस्त ग्रह परास्त हो गये अर्थात् छिप गये ॥१०४॥


एवं प्रभातसमये संपन्नेऽत्यन्तनिर्मले । कृत्वा प्रत्यङ्गकर्माणि नमस्कृत्यार्चितं जिनम् ॥१०५॥

आरुह्य वासितां भद्रां कुथापटविराजिताम् । शतैरवनिनाथानां सेव्यमानोऽमरत्विषाम् ॥१०६॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त निर्मल प्रभातकाल होनेपर राजा दशरथने शरीर-सम्बन्धी कार्य कर पूजनीय जिनेन्द्रभगवान्‌को नमस्कार किया । तदनन्तर मनोहर झूलसे सुशोभित हस्तिनीपर सवार हो वह मुनिराजकी वन्दनाके लिए चला । देवोंके समान कान्तिको धारण करनेवाले हजार राजा उसकी सेवा कर रहे थे ॥१०५-१०६॥


देशे देशे नमस्कुर्वन् मुनींश्चैत्यालयांस्तथा । महेन्द्रोदयमुर्वीशो ययौ छत्रोपशोभितः ॥१०७॥

अर्थ: इस प्रकार छत्रसे सुशोभित राजा दशरथ जगह-जगह मुनियों और जिनचैत्यालयोंको नमस्कार करता हुआ महेन्द्रोदय नामा उद्यानमें पहुँचा ॥१०७॥


विष्टपानन्दजननीविभूतिस्तस्य भूभृतः । राजन् संवत्सरेणापि शक्यं कथयितुं न सा ॥१०८॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उस समय राजा दशरथकी लोकको आनन्दित करनेवाली जो विभूति थी वह एक वर्षमें भी नहीं कही जा सकती है ॥१०८॥


मुनिरायातमात्रः सन् गुणरत्नपयोनिधिः । श्रोत्रयोर्गोचरं तस्य संप्राप्तस्तत्र मण्डले ॥१०९॥

अर्थ: गुणरूपी रत्नोंके सागर मुनिराज जब देशमें पधारे थे तभी उसके कानोंमें यह समाचार आ पहुँचा था ॥१०९॥


करेणोरवतीर्यासौ राजामितपरिच्छदः । महाप्रमोदसंपूर्णो विवेशोद्यानमेदिनीम् ॥११०॥

अर्थ: तदनन्तर हस्तिनीसे उतरकर अपरिमित वैभवके धारक एवं महान् हर्षसे परिपूर्ण राजाने उद्यानकी भूमिमें प्रवेश किया ॥११०॥


विन्यस्य भक्तिसंपन्नः पादयोः कुसुमाञ्जलिम् । सर्वभूतहिताचार्यं शिरसा स नमोऽकरोत् ॥१११॥

अर्थ: तत्पश्चात् भक्तिसे युक्त हो चरणोंमें पुष्पांजलि बिखेरकर उसने सर्वभूत आचार्यको शिरसे नमस्कार किया ॥१११॥


ततः सिद्धान्तसंबद्धामश्रृणोद् गुरुतः कथाम् । अनुयोगान्यतीतानां भाविनां च महात्मनाम् ॥११२॥

लोकं द्रव्यानुभावांश्च युगानि च यथाविधि । स्थितिं कुलकराणां च वंशांश्च बहुधागतान् ॥११३॥

पदार्थान् सर्वजीवादीन् पुराणानि च सादरम् । श्रुत्वा प्रणम्य संघेशं नगरं पार्थिवोऽविशत् ॥११४॥

अर्थ: सिद्धान्तसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा सुनी, अतीत अनागत महापुरुषोंके चरित सुने, लोक, द्रव्य, युग, कुलकरोंकी स्थिति, अनेक वंश, जीवादिक समस्त पदार्थ और पुराणोंको बड़े आदरसे सुना। तदनन्तर संघके स्वामी सर्वभूतहित आचार्यको नमस्कार कर राजाने नगरमें वापस प्रवेश किया ॥११२-११४॥


दत्त्वा स्थानं क्षणमवनिभृन्मन्त्रिणां स क्षितीशां कृत्वा जैनीं गुणगणकथां विस्मयेनातिपूर्णः । अन्तर्गेहं प्रविशति तदा मज्जनादिक्रियाश्च प्रीतश्चक्रे विपुलविभवः स प्रजापत्यभिख्यः ॥११५॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्रियों और राजाओंको क्षण भरके लिए स्थान देकर अर्थात् उनके साथ वार्तालाप कर जिनराज सम्बन्धी गुणोंकी कथा कर आश्चर्यसे भरे हुए राजाने अन्तःपुरमें प्रवेश किया। वहाँ विपुल वैभव तथा प्रजापतिकी शोभा धारण करनेवाले राजाने बड़ी प्रसन्नतासे स्नानादि क्रियाएँ कीं ॥११५॥


संपूर्णानां परममहसा चन्द्रकान्ताननानां चक्षुश्चेतोहरणनिपुणैर्विभ्रमैर्मण्डितानाम् । श्रीतुल्यानां परमविनयं बिभ्रतीनां प्रियाणां पद्मालीनां रविरिव रतिं तत्र कुर्वन् स तस्थौ ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर जो उत्कृष्ट कान्तिसे युक्त थीं, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंको धारण कर रही थीं, नेत्र और हृदयको हरनेमें निपुण विभ्रमोंसे सुशोभित थीं, लक्ष्मीके तुल्य थीं और परम विनयको धारण कर रही थीं ऐसी स्त्रियोंको, कमलिनियोंको सूर्यकी भाँति आनन्द उपजाता हुआ वह उसी अन्तःपुरमें ठहर गया ॥११६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशरथवैराग्यसर्वभूतहितागमाभिधानं नाम एकोनत्रिंशत्तमं पर्व ॥२९॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें राजा दशरथके वैराग्य और सर्वभूत आचार्यके आगमनका वर्णन करनेवाला उन्तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥२९॥


३०. त्रिंशत्तमं पर्व (भामण्डलसमागमाभिधानं)

ततः कालो गत क्वापि घनौघडमरो नृप । प्रोद्ययौ पुष्करं धौतमण्डलाग्रसमप्रभम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर मेघोंके आडम्बरसे युक्त वर्षाकाल कहीं चला गया और आकाश मांजे हुए कृपाणके समान निर्मल प्रभाका धारक हो गया ॥१॥


पद्मोत्पलादिजलजपुष्पमुन्मादकृद् बभौ । साधूनां हृदयं यद्वद् बभूव विमलं जलम् ॥२॥

अर्थ: कमल उत्पल आदि जलमें उत्पन्न होनेवाले पुष्प कामीजनोंको उन्माद करते हुए सुशोभित होने लगे तथा जल साधुओंके हृदयके समान निर्मल हो गया ॥२॥


शरत्कालः परिप्राप्तः प्रकटं कुमुदैर्हसन् । नष्टमिन्द्रधनुर्जाता धरणी पङ्कवर्जिता ॥३॥

अर्थ: कुमुदोंके सफेद पुष्पोंसे प्रकट रूपसे हँसता हुआ शरद्काल आ पहुँचा, इन्द्रधनुष नष्ट हो गया और पृथ्वी कीचड़से रहित हो गयी ॥३॥


विद्युत्संभावनायोग्यास्तूलराशिसमत्विषः । क्षणमात्रमदृश्यन्त घनलेशा क्वचित्क्वचित् ॥४॥

अर्थ: जिनमें बिजली चमकनेकी सम्भावना नहीं थी और जो रूईके समूहके समान सफेद कान्तिके धारक थे ऐसे मेघोंके खण्ड कहीं-कहीं दिखाई देने लगे ॥४॥


सन्ध्यालोकललामोष्ठी ज्योत्स्नातिविमलाम्बरा । निशानववधूर्भाति चन्द्रचूडामणिस्तदा ॥५॥

अर्थ: सन्ध्याका लाल-लाल प्रकाश जिसका सुन्दर ओंठ था, चाँदनी ही जिसका अत्यन्त उज्ज्वल वस्त्र था और चन्द्रमा ही जिसका चूडामणि था, ऐसी रात्रिरूपी नववधू उस समय अत्य- धिक सुशोभित हो रही थी ॥५॥


चक्रवाककृतच्छाया मत्तसारसनादिताः । वाप्यः पद्मवनभ्राम्यद्राजहंसैर्विराजिरे ॥६॥

अर्थ: चक्रवाक पक्षी जिनकी शोभा बढ़ा रहे थे, और मदोन्मत्त सारस जहाँ शब्द कर रहे थे ऐसी वापिकाएँ कमलवनमें घूमते हुए राजहंसोंसे सुशोभित हो रही थीं ॥६॥


भामण्डलकुमारस्य सीतां चिन्तयतस्तु तत् । ऋतुनार्चितमप्येवं जातमग्निसमं जगत् ॥७॥

अर्थ: इस तरह यह जगत् यद्यपि शरदृतुसे सुशोभित था तो भी सीताकी चिन्ता करनेवाले भामण्डलके लिए अग्निके समान जान पड़ता था ॥७॥


अरत्याकर्षिताङ्गोऽसौ परित्यज्यान्यदा त्रपा । पितुः पुरः परं मित्रं वसन्तध्वजमब्रवीत् ॥८॥

अर्थ: अथानन्तर अरतिसे जिसका शरीर आकर्षित हो रहा था ऐसा भामण्डल एक दिन लज्जा छोड़ पिताके आगे अपने परममित्र वसन्तध्वजसे इस प्रकार बोला कि ॥८॥


दीर्घसूत्रो भवानेवं परकार्येषु शीतलः । गणरात्रमिदं दुःखं तस्यां मे गतचेतसः ॥९॥

अर्थ: आप बड़े दीर्घसूत्री हैं - देरसे काम करनेवाले हैं और दूसरेके कार्य करनेमें अत्यन्त मन्द हैं । उस सीतामें जिसका चित्त लग रहा है ऐसे मुझे दुःख उठाते हुए अनेक रात्रियाँ व्यतीत हो गयीं । फिर भी तुझे चिन्ता नहीं है ॥९॥


उद्वेगविपुलावर्ते प्रत्याशाजलधौ मम । निमज्जनः सखे कस्माद्दीयते नावलम्बनम् ॥१०॥

अर्थ: जिसमें उद्वेगरूपी बड़ी-बड़ी भँवरें उठ रही हैं ऐसे आशारूपी समुद्रमें मैं डूब रहा हूँ। सो हे मित्र ! मुझे सहारा क्यों नहीं दिया जा रहा है ॥१०॥


इत्यार्तध्यानयुक्तस्य निशम्य गदितं बुधाः । सर्वे गतप्रभीभूता विषादं परमं ययुः ॥११॥

अर्थ: इस प्रकार आर्तध्यानसे युक्त भामण्डलके वचन सुनकर सभी विद्वान् हतप्रभ होते हुए परम विषादको प्राप्त हुए ॥११॥


तान् वीक्ष्य शोकसंतप्तान् वारणानिव शुष्यतः । आवर्जितशिराव्रीडां क्षणं भामण्डलोऽगमत् ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर उन सबको शोकसे सन्तप्त तथा हाथियोंके समान सूखते हुए देख भामण्डल शिर नीचा कर क्षणभरके लिए लज्जाको प्राप्त हुआ ॥१२॥


बृहत्केतुस्ततोऽवोचत् किमद्याप्युपगुह्यते । निवेद्यतां कुमारस्य निराशो येन जायते ॥१३॥

अर्थ: तब बृहत्केतु नामा विद्याधर बोला कि अबतक इस बातको क्यों छिपाया जाता है प्रकट कर देना चाहिए जिससे कि कुमार इस विषयमें निराश हो जावे ॥१३॥


ततस्ते कथायाञ्चकुस्तस्मै सर्वं यथाविधि । चन्द्रयानं पुरस्कृत्य कथमप्युज्झिताक्षराः ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर उन सबने चन्द्रयानको आगे कर लड़खड़ाते अक्षरोंमें सब समाचार भामण्डलसे कह दिया ॥१४॥


जनको बाल कन्यायां इहैवास्माभिराहृतः । याचितश्चातियत्नेन पद्मस्योचे प्रकल्पिताम् ॥१५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे कुमार ! हम लोग कन्याके पिताको यहाँ ही ले आये थे और उससे यत्नपूर्वक कन्याकी याचना भी की थी पर उसने कहा था कि मैं उस कन्याको रामके लिए देना संकल्पित कर चुका हूँ ॥१५॥


उक्तप्रत्युक्तमालाभिरस्माभिस्तेन निर्जितैः । धनूरत्नावधिश्चक्रे कृतसंमन्त्रणैः किल ॥१६॥

अर्थ: उत्तर-प्रत्युत्तरसे जब उसने हम सबको पराजित कर दिया तब हमने मन्त्रणा कर धनुषरत्नकी अवधि निश्चित की अर्थात् राम और भामण्डलमें-से जो भी धनुष-रत्नको चढ़ा देगा वही कन्याका स्वामी होगा ॥१६॥


धनूरत्नलता तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । शार्दूलस्य क्षुधार्तस्य मांसपेशी यथार्पिता ॥१७॥

कन्या स्वयंवरा साध्वी कथा हृदयहारिणी । नवयौवनलावण्यपरिपूरितविग्रहा ॥१८॥

अबालेन्दुमुखा बाला मदनेन समन्विता । वैदेही रामदेवस्य श्रीसमा वनिताभवत् ॥१९॥

अर्थ: हम लोगोंने धनुषकी शर्त इसलिए रखी थी कि राम उसे चढ़ा नहीं सकेगा अतः अगत्या तुम्हें ही कन्याकी प्राप्ति होगी परन्तु वह धनुषरत्नरूपी लता पुण्याधिकारी रामके लिए ऐसी हुई जैसे भूखसे पीड़ित सिंहके लिए मांसकी डली अर्पित की गयी हो अर्थात् रामने धनुष चढ़ा दिया जिससे वह साध्वी कन्या स्वयंवरमें रामकी स्त्री हो गयी । वह कन्या अपने वचनोंसे हृदयको हरनेवाली थी, नवयौवनसे उत्पन्न लावण्यसे उसका शरीर भर रहा था, तरुण चन्द्रके समान उसका मुख था, लक्ष्मीकी तुलना करनेवाली थी और कामसे सहित थी ॥१७-१९॥


न चापे सांप्रतं जाते गदासीरादिसंयुते । अमराधिष्ठिते नापि कन्या त्रैलोक्यसुन्दरी ॥२०॥

अपि द्रष्टुं न ये शक्ये सुपर्णोरगदानवैः । रामलक्ष्मणवीराभ्यामाकृष्टे ते शरासने ॥२१॥

अर्थ: वे सागरावर्त और वज्रावर्त नामा धनुष आजकलके धनुष नहीं थे किन्तु बहुत प्राचीन थे, गदा, हल आदि शस्त्रोंसे सहित थे, देवोंसे अधिष्ठित थे तथा सुपर्ण और उरग जातिके दैत्योंके कारण उनकी ओर देखना भी सम्भव नहीं था । फिर भी राम-लक्ष्मणने उन्हें चढ़ा दिया और रामने वह त्रिलोकसुन्दरी कन्या प्राप्त कर ली ॥२०-२१॥


प्रसह्य साधुना हर्तुमशक्या त्रिदशैरपि । किमुतात्यन्तमस्माभिर्निस्सारैर्धनुषी विना ॥२२॥

अर्थ: इस समय वह कन्या देवोंके द्वारा भी जबरदस्ती नहीं हरी जा सकती है फिर जो उन धनुषोंके निकल जानेसे अत्यन्त सारहीन हो गये हैं ऐसे हम लोगोंकी तो बात ही क्या है ॥२२॥


पूर्वमेव हृता कस्मान्नेति चेन्मन्यते शिशो । यज्जामाता दशास्यस्य जनकस्य सुहृन्मधुः ॥२३॥

अर्थ: हे कुमार ! यदि यह कहो कि रामके स्वयंवरके पहले ही उसे क्यों नहीं हर लिया तो उसका उत्तर यह है कि रावणका जमाई राजा मधु जनकका मित्र है सो उसके रहते हम कैसे हर सकते थे ? ॥२३॥


अवगम्य कुमारैवं विनीतः स्वस्थतां भज । शक्नोति न सुरेन्द्रोऽपि विधातुं विधिमन्यथा ॥२४॥

अर्थ: इसलिए यह सब जानकर हे कुमार ! स्वस्थताको प्राप्त होओ, तुम तो अत्यन्त विनीत हो, जो कार्य जैसा होना होता है उसे इन्द्र भी अन्यथा नहीं कर सकता ॥२४॥


ततः स्वयंवरोदन्तं श्रुत्वा भामण्डलो ह्रिया । विषादेन च संपूर्णः कृच्छ्रं चिन्तान्तरं गतः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर स्वयंवरका वृत्तान्त सुनकर भामण्डल लज्जा और विषादसे युक्त होता हुआ दुःख-के साथ यह विचार करने लगा कि ॥२५॥


निरर्थकमिदं जन्म विद्याधरतया समम् । यतः प्राकृतवत् कश्चिन्न संप्राप्तोऽस्मि तां प्रियाम् ॥२६॥

अर्थ: अहो ! मेरा यह विद्याधर जन्म निरर्थक है कि जिससे मैं साधारण मनुष्यकी तरह उस प्रियाको प्राप्त नहीं कर सका ॥२६॥


ईर्ष्याक्रोधपरीतश्च सभामाह हसन्नसौ । का वः खेचरता भीतिं भजतां भूमिगोचरात् ॥२७॥

अर्थ: ईर्ष्या और क्रोधसे युक्त होकर उसने हँसते हुए सभासे कहा कि जब आप लोग भूमिगोचरीसे भी भय रखते हो तब आपका विद्याधर होना किस कामका ? ॥२७॥


आनयाम्येष सत्कन्यां स्वयं निर्जित्य भूचरान् । न्यासापहारिणां कुर्वे यक्षाणां च विनिग्रहम् ॥२८॥

अर्थ: मैं भूमिगोचरियोंको जीतकर स्वयं ही उस उत्तम कन्याको ले आता हूँ तथा धनुषरूपी धरोहरका अपहरण करनेवाले यक्षोंका निग्रह करता हूँ ॥२८॥


इत्युक्त्वासौ सुसन्नह्य विमानी वियदुद्गतः । पुरकाननसंपूर्णं पृथिवीतलमैक्षत ॥२९॥

अर्थ: ऐसा कहकर वह तैयार हो विमानमें बैठकर आकाशमें जा उड़ा । वहाँसे उसने पुर और वनसे भरा पृथ्वीतल देखा ॥२९॥


ततो दृष्टिर्गता तस्य विदग्धविषये क्रमात् । महीध्रसंकटे रम्ये नगरे चात्मसेविते ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर उसकी दृष्टि अनेक पर्वतोंसे युक्त विदग्ध नामक देशमें अपने पूर्वभवके मनोहर नगरपर पड़ी ॥३०॥


दृष्टं मया कदाप्येतदिति चिन्तामुपागतः । जातिस्मरत्वमासाद्य समवाप्य स मूर्छनम् ॥३१॥

अर्थ: यह नगर मैंने कभी देखा है - इस प्रकार चिन्ता करता हुआ वह जातिस्मरणको प्राप्त होकर मूर्च्छित हो गया ॥३१॥


पितुरन्ते ततो नीतः सचिवैराकुलात्मकैः । चन्दनद्रवसिक्ताङ्गः प्रमदाभिः प्रबोधितः ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर घबड़ाये हुए मन्त्री उसे पिताके समीप ले आये । वहाँ स्त्रियोंने चन्दनके द्रवसे उसका शरीर सींचकर उसे सचेत किया ॥३२॥


अन्योन्यं दत्तनेत्रं च हसित्वा तामिरौच्यत । कुमार युक्तमेतत्ते कातरत्वमनुत्तमम् ॥३३॥

अर्थ: स्त्रियोंने परस्पर नेत्रका इशारा कर तथा हँसकर उससे कहा कि हे कुमार ! तुम्हारी यह कातरता अच्छी नहीं ॥३३॥


अदृष्ट्वावनिचर्यार्थं निश्शेषरहितत्रपः । गुरूणामग्रतो मोहं यत्प्राप्तोऽसि विचक्षण ॥३४॥

अर्थ: जो तुम बुद्धिमान् होकर भी भूचर्याका समस्त प्रयोजन बिना देखे ही गुरुजनोंके आगे इस तरह मोहको प्राप्त हुए हो ॥३४॥


भज खेचरनाथानां कन्या देव्यधिकप्रभाः । जनजल्पनकं व्यर्थं वृत्तं सुन्दर मा कृथाः ॥३५॥

अर्थ: देवियोंसे भी अधिक कान्तिको धारण करनेवाली विद्याधर राजाओंकी अनेक कन्याएँ हैं सो उन्हें तुम प्राप्त होओ । हे सुन्दर ! इस तरह व्यर्थ ही लोकापवाद मत करो ॥३५॥


ततोऽसावब्रवीदेवं व्रीडाशोकनताननः । धिग्मया घनमोहेन विरुद्धं चिन्तितं महत् ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर लज्जा और शोकसे जिसका मुख नीचा हो रहा था ऐसे भामण्डलने इस प्रकार कहा कि मुझे धिक्कार हो, जो मैंने तीव्र मोहमें पड़कर इस प्रकार विरुद्ध चिन्तवन किया ॥३६॥


नीचानामपि नात्यन्तमीदृशं कर्म युज्यते । अहो कर्मभिरत्यर्थमशुभैरभिचेष्टितः ॥३७॥

अर्थ: ऐसा कार्य तो अत्यन्त नीच कुलवालोंको भी करना उचित नहीं है । अहो, मेरे अत्यन्त अशुभ कर्मोंने कैसी चेष्टा दिखायी ? ॥३७॥


एकस्मिन्नुषितः कुक्षौ क्वापि सार्धमहं तया । दुष्कर्मविगमाज्ज्ञाता कथंचित् साधुना मया ॥३८॥

अर्थ: मैंने उसके साथ एक ही उदरमें शयन किया है । आज पाप-कर्मका उदय मन्द हुआ इसलिए किसी तरह उसे जान सका हूँ ॥३८॥


ततस्तं शोकभारेण पीडितं चन्द्रविक्रमः । अङ्कमारोप्य चुम्बित्वा पप्रच्छ पुरुविस्मयः ॥३९॥


वद पुत्रक किं न्वेतदीदृशं भाषितं त्वया । सोऽवोचत्तात वक्तव्यं चरितं शृणु मामकम् ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर शोकके भारसे पीड़ित भामण्डलको गोदमें रखकर बहुत भारी आश्चर्यसे भरा चन्द्रगति चुम्बन कर पूछने लगा कि हे पुत्र ! कह, तूने ऐसा कथन किसलिए किया ? इसके उत्तरमें उसने कहा कि हे तात ! मेरा कहने योग्य चरित सुनिए ॥४०॥


पूर्वजन्मनि वास्येऽस्मिन् विदग्धे नगरे नृपः । अभूवं परराष्ट्राणां ध्वंसको मण्डितध्वनिः ॥४१॥

सर्वस्यामवनौ ख्यातः सततं विग्रहप्रियः । पालको निजलोकस्य महाविभवसंयुतः ॥४२॥

अर्थ: पूर्वजन्ममें मैं इसी देशके विदग्ध नगरमें दूसरे देशोंको लूटनेवाला, समस्त पृथिवीमें प्रसिद्ध, युद्धका प्रेमी, अपनी प्रजाकी रक्षा करनेवाला तथा महाविभवसे संयुक्त कुण्डलमण्डित नामका राजा था ॥४१-४२॥


हृता तत्र मया जाया विप्रस्याशुभकर्मणा । माययाऽपाकृतश्चासौ गतः क्वाप्यतिदुःखितः ॥४३॥

अर्थ: वहाँ मैंने अशुभ कर्मके उदयसे एक ब्राह्मणकी स्त्री हरी और ब्राह्मणको मायापूर्वक तिरस्कृत किया जिससे वह अत्यन्त दुःखी होकर कहीं चला गया ॥४३॥


ततोऽनरण्यसेनान्या गमितस्तनुशेषताम् । पर्यटन् धरणीं क्वापि प्राप्तोऽस्मि मुनिसंश्रयम् ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर राजा अनरण्यके सेनापतिने मेरी सब सम्पत्ति हरकर मेरे पास केवल मेरा शरीर ही रहने दिया। अन्तमें अन्यन्त दरिद्र हो पृथिवीपर भटकता हुआ मैं कहीं मुनियोंके आश्रममें पहुँचा ॥४४॥


यत्र त्रिलोकपूज्यानां सर्वज्ञानां महात्मनाम् । मतं भगवतां प्राप्तमर्हतां पावनं मया ॥४५॥

अर्थ: वहाँ मैंने तीनों लोकोंसे पूज्य, सब पदार्थोंको जाननेवाले तथा महान् आत्माके धारक अरहन्त भगवान्का पवित्र धर्म प्राप्त किया ॥४५॥


तत्र बान्धवभूतस्य गुरोः शासनतो मया । अनामिषं व्रतं शुद्धं गृहीतं क्षुद्रशक्तिना ॥४६॥

अर्थ: और समस्त जीवोंके बान्धवभूत श्री गुरुके उपदेशसे निरतिचार मांसत्याग व्रत धारण किया। मैं अत्यन्त क्षुद्र शक्तिका धारक था इसलिए अधिक व्रत धारण नहीं कर सका ॥४६॥


शासनस्य जिनेन्द्राणामहो माहात्म्यमुत्तमम् । तथापि यन्महापापो नावतीर्णोऽस्मि दुर्गतिम् ॥४७॥

अर्थ: अहो ! जिन शासनका बड़ा माहात्म्य है जो मैं महापापी होकर भी दुर्गतिको प्राप्त नहीं हुआ ॥४७॥


अनन्यशरणत्वेन व्रतेन नियमेन च । सममन्येन जीवेन विदेहाकुक्षिमागमत् ॥४८॥

अर्थ: श्री जिनधर्मकी शरण होनेसे तथा व्रत और नियमके प्रभावसे मेरा जीव किसी अन्य जीवके साथ राजा जनककी विदेहा रानीके उदरमें पहुँचा ॥४८॥


सुखेन च प्रसूता सा कन्यया सहितं तुकम् । केनाप्यपहृतश्चायं गृध्रेण पिशितं यथा ॥४९॥

अर्थ: रानी विदेहाने सुखपूर्वक कन्याके साथ एक पुत्र उत्पन्न किया सो जिस प्रकार गीध मांसके टुकड़ेको हर लेता है उसी प्रकार किसीने उस पुत्रको हर लिया ॥४९॥


नक्षत्रगोचरातीतं तेन नीतोऽस्मि पुष्करम् । असौ नूनं स यस्यासौ हृता जाया मया पुरा ॥५०॥

अर्थ: वह व्यक्ति उस बालकको नक्षत्रोंसे भी अधिक ऊँचे आकाशमें ले गया। यथार्थमें व्यक्ति वही था जिसकी स्त्री पहले मैंने हरी थी ॥५०॥


मारयामीति तेनोक्त्वा भूयः कृत्वानुकम्पनम् । शनैरस्मि विमुक्तः खात् कुण्डलाभ्यामलङ्कृतम् ॥५१॥

अर्थ: पहले तो उसने कहा कि मैं इसे मारता हूँ परन्तु फिर दया कर उसने कुण्डलोंसे अलंकृत कर धीरेसे आकाशसे छोड़ दिया ॥५१॥


पतन् वीक्ष्य तदा रात्रावुद्याने परमे तया । गृहीत्वा तात दत्तोऽस्मि जायायै करुणावता ॥५२॥

अर्थ: उस समय तुम परम उपवनमें विद्यमान थे सो रात्रिमें पड़ता देख तुमने मुझे ऊपरसे ही पकड़ लिया और दयालु होकर अपनी रानीके लिए सौंपा ॥५२॥


सोऽहं भवत्प्रसादेन तदङ्के वृद्धिमागतः । परं विद्याधरत्वं च कृतदुर्लडितक्रियः ॥५३॥

अर्थ: आपके प्रसादसे रानीकी गोदमें वृद्धि प्राप्त हुआ, उत्कृष्ट विद्याओंका धारक हुआ और बहुत ही लाड़प्यारसे मेरा पालन हुआ ॥५३॥


इत्युत्वा विररामासौ विस्मयं च जनो गतः । हाकारबहुलं शब्दं कुर्वन् कम्पितमस्तकः ॥५४॥

अर्थ: यह कहकर भामण्डल चुप हो रहा तथा उपस्थित समस्त लोग हाहाकार करते तथा मस्तक हिलाते हुए आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥५४॥


इमं चन्द्रगतिः श्रुत्वा वृत्तान्तमतिचित्रितम् । लोकधर्मतरुं वन्ध्यं विदित्वा भवबन्धनम् ॥५५॥

भूतमात्रमतिं त्यक्त्वा सुनिश्चित्यात्मकर्मणाम् । परं प्रबोधमायातः संवेगं च सुदुर्लभम् ॥५६॥

आत्मीयं राज्यमाधाय तत्र पुत्रे यथाविधि । सर्वभूतहितस्यागात् पादमूलं त्वरान्वितः ॥५७॥

अर्थ: राजा चन्द्रगति यह अत्यन्त आश्चर्यकारी वृत्तान्त सुनकर परम प्रबोध तथा अत्यन्त दुर्लभ संवेगको प्राप्त हुआ । उसने लोक-धर्म अर्थात् स्त्री-सेवनरूपी वृक्षको सुखरूपी फलसे रहित तथा संसारका बन्धन जाना; इन्द्रियोंके विषयोंमें जो बुद्धि लग रही थी उसका परित्याग किया, आत्म-कर्तव्यका ठीक-ठीक निश्चय किया, पुत्रके लिए विधिपूर्वक अपना राज्य दिया और बड़ी शीघ्रतासे सर्वभूतहित नामक मुनिराजके चरणमूलमें प्रस्थान किया ॥५५-५७॥


भगवान् स हि सर्वत्र विष्टपे प्रथितात्मकः । गुणरश्मिसमूहेन भव्यानन्दविधायिना ॥५८॥

अर्थ: भगवान् सर्वभूतहित भव्य जीवोंको आनन्द देनेवाले गुणरूपी किरणोंके समूहसे समस्त संसारमें प्रसिद्ध थे ॥५८॥


महेन्द्रोदययातं तमभ्यर्च्य प्रणिपत्य च । स्तुत्वा च भावतोऽवादीदेवं मूर्धाहिताञ्जलिः ॥५९॥

भगवंस्त्वत्प्रसादेन संप्राप्य जिनदीक्षणम् । तपोविधातुमिच्छामि निर्विण्णो गृहवासतः ॥६०॥

अर्थ: महेन्द्रोदय नामा उद्यानमें स्थित उन सर्वभूतहित मुनिराजकी पूजा कर नमस्कार कर तथा भावपूर्वक स्तुति कर हाथ जोड़ मस्तकसे लगाकर राजा चन्द्रगतिने इस प्रकार कहा कि हे भगवन् ! मैं गृहवाससे विरक्त हो चुका हूँ इसलिए आपके प्रसादसे जिनदीक्षा प्राप्त कर तपश्चरण करना चाहता हूँ ॥५९-६०॥


एवमस्त्विति तेनोक्ते तारं भेर्यः समाहिताः । भामण्डलः परं चक्रे महिमानं च भावतः ॥६१॥

कलं प्रवरनारीभिर्गीतं वंशस्वनानुगम् । जगर्जे तूर्यसङ्घातः करतालसमन्वितः ॥६२॥

श्रीमान् जनकराजस्य तनयो जयतीति च । इत्युच्चैर्वन्दिनां नादः संजज्ञे प्रतिनादवान् ॥६३॥

अर्थ: ‘एवमस्तु’ ऐसा कहनेपर भामण्डलने भावपूर्वक परम प्रभावना की । जोर-जोरसे भेरियाँ बजने लगीं, उत्तम स्त्रियोंने बाँसुरीकी ध्वनिके साथ मनोहर गीत गाया, करतालके साथ-साथ अनेक वादित्रोंके समूह गर्जना करने लगे । ‘राजा जनकका लक्ष्मीशाली पुत्र जयवन्त हो रहा है’ बन्दीजनोंका यह जोरदार शब्द प्रतिध्वनि करता हुआ गूँजने लगा ॥६१-६३॥


तेनोद्यानसमुत्थेन नादेन श्रोत्रहारिणा । नक्तं कृतो विनीतायां कृत्तनिद्रोऽखिलो जनः ॥६४॥

अर्थ: उद्यानसे उठे हुए इस श्रोत्रहारी शब्दने रात्रिके समय अयोध्यावासी समस्त लोगोंको निद्रारहित कर दिया ॥६४॥


ऋषिसंबन्धमुद्ध्वानं श्रुत्वा जैनाः प्रमोदिनः । जाता जना विषण्णाश्च मिथ्यादर्शनपूरिताः ॥६५॥

अर्थ: ऋषियोंसे सम्बन्ध रखनेवाली इस हर्षध्वनिको सुनकर जैन लोग परम हर्षको प्राप्त हुए और मिथ्यादृष्टि लोग विषादसे युक्त हो गये ॥६५॥


रोमाञ्चार्चितसर्वाङ्गा विस्फुरद्वामलोचना । सीता सिक्तामृतेनेव बुबुधे ध्वनिनामुना ॥६६॥

अर्थ: उस शब्दको सुनकर सीता भी इस प्रकार जाग उठी मानो अमृतसे ही सींची गयी हो, उसके समस्त अंग रोमांचसे व्याप्त हो गये तथा उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा ॥६६॥


अचिन्तयच्च को न्वेष जनको यस्य नन्दनः । जयतीति मुहुर्नादः श्रूयतेऽत्यन्तमुन्नतः ॥६७॥

अर्थ: वह विचारने लगी कि यह जनक कौन है जिसका कि पुत्र जयवन्त हो रहा है । यह अत्यन्त उन्नत शब्द बार-बार सुनाई दे रहा है ॥६७॥


कनकस्याग्रजो राजा ममापि जनकः पिता । जातमात्रश्च मे भ्राता हृतो यः किं न्वसौ भवेत् ॥६८॥

अर्थ: राजा जनक कनकका बड़ा भाई और मेरा पिता है । मेरा भाई उत्पन्न होते ही हरा गया था सो यह वही तो नहीं है ? ॥६८॥


ध्यात्वेति सोदरस्नेहसुसंप्लावितमानसा । मुक्तकण्ठं रुरोदासौ परिदेवनकारिणी ॥६९॥

अर्थ: ऐसा विचार कर भाईके स्नेहसे जिसका मन व्याप्त हो रहा था ऐसी सीता विलाप करती हुई गला फाड़कर रोने लगी ॥६९॥


ततो रामोऽभिरामाङ्गः प्रोवाच मधुराक्षरम् । कस्माद् रोदिषि वैदेहि भ्रातृशोकेन कर्दिता ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर सुन्दर शरीरके धारी रामने मधुर अक्षरोंमें कहा कि वैदेहि ! भाईके शोकसे विवश हो क्यों रही हो ॥७०॥


भवत्या यद्यसौ भ्राता श्वो ज्ञातास्मो न संशयः । अथवान्यः कचित् कोऽपि पण्डिते शोचितेन किम् ॥७१॥

अर्थ: यदि यह तुम्हारा भाई है तो कल मालूम करेंगे इसमें संशय नहीं है और यदि कहीं कोई दूसरा है तो हे पण्डिते ! शोक करनेसे क्या लाभ है ? ॥७१॥


कारणं यदतिक्रान्तं मृतमिष्टं च बान्धवम् । हृतं विनिर्गतं नष्टं न शोचन्ति विचक्षणाः ॥७२॥

अर्थ: क्योंकि जो चतुर जन हैं वे बीते हुए, मरे हुए, हरे हुए, गये हुए अथवा गुमे हुए इष्टजनका शोक नहीं करते हैं ॥७२॥


कातरस्य विषादोऽस्ति दयिते प्राकृतस्य च । न कदाचिद्विषादोऽस्ति विक्रान्तस्य बुधस्य च ॥७३॥

अर्थ: हे वल्लभे ! विषाद उसका किया जाता है जो कातर होता है अथवा बुद्धिहीन होता है। इसके विपरीत जो शूरवीर बुद्धिमान् होता है उसका विषाद नहीं किया जाता ॥७३॥


एवं तयोः समालापं दम्पत्योः कुर्वतोः क्षपा । कृपयैव गता शीघ्रं जातमङ्गलनिस्वना ॥७४॥

अर्थ: इस प्रकार दम्पतीके वार्तालाप करते-करते रात्रि बीत गयी सो मानो दयासे ही शीघ्र चली गयी और प्रातःकाल सम्बन्धी मंगलमय शब्द होने लगे ॥७४॥


ततो दशरथः कृत्वा प्रत्यङ्गं वस्तु सादरः । नगरीतो विनिष्क्रान्तः ससुतः साङ्गनाजनः ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर राजा दशरथ अंगसम्बन्धी कार्य कर आदरसहित पुत्रों और स्त्रीजनोंके साथ नगरीसे बाहर निकले ॥७५॥


इतश्चेतश्च विस्तीर्णां पश्यन् खेचरवाहिनीम् । ययौ स विस्मयापन्नः सामन्तशतपूरितः ॥७६॥

अर्थ: सैकड़ों सामन्त उनके साथ थे। वे जहाँ-तहाँ फैली हुई विद्याधरोंकी सेनाको देखते हुए आश्चर्यचकित होते जा रहे थे ॥७६॥


ईक्षांचक्रे च देवेन्द्रपुरतुल्यं विनिर्मितम् । क्षणाद्विद्याधरैः स्थानं तुङ्गप्राकारगोपुरम् ॥७७॥

अर्थ: उन्होंने क्षण-भरमें ही विद्याधरोंके द्वारा निर्मित ऊँचे कोट और गोपुरोंसे सहित इन्द्रपुरीके समान स्थान देखा ॥७७॥


पताकातोरणैश्चित्रं रत्नैश्च कृतमण्डनम् । प्रविवेश तदुद्यानं साधुलोकसमाकुलम् ॥७८॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने पताकाओं और तोरणोंसे चित्रित, रत्नोंसे अलंकृत एवं मुनिजनोंसे व्याप्त उस महेन्द्रोदय नामा उद्यानमें प्रवेश किया ॥७८॥


नत्वा स्तुत्वा च तत्रासौ गुरुं गुणगुरुं नृपः । ददर्शोदयने मानोश्चन्द्रयानस्य दीक्षणम् ॥७९॥

अर्थ: वहाँ जाकर राजा दशरथने गुणोंसे श्रेष्ठ सर्वभूतहित नामा गुरुको नमस्कार कर तथा उनकी स्तुति कर सूर्योदयके समय राजा चन्द्रगतिका दीक्षामहोत्सव देखा ॥७९॥


नभश्चरैः समं पूजां कृत्वा सुमहतीं गुरोः । एकपार्श्वे निविष्टोऽसौ सर्वबान्धवसङ्गतः ॥८०॥

अर्थ: उन्होंने विद्याधरोंके साथ गुरुकी बहुत बड़ी पूजा की और उसके बाद वे समस्त भाई-बन्धुओंके साथ एक ओर बैठ गये ॥८०॥


श्रीप्रभामण्डलोऽप्येकं पार्श्वमाश्रित्य खेचरैः । समस्तैः सहितस्तस्थौ किंचिच्छोकमिवोद्वहन् ॥८१॥

अर्थ: कुछ शोकको धारण करता हुआ भामण्डल भी समस्त विद्याधरोंके साथ एक ओर आकर बैठ गया ॥८१॥


खेचरा भूचराश्चैते मुनयश्चान्तिकं स्थिताः । शुश्रुवुर्गुरुतो धर्ममनगारं तथेतरम् ॥८२॥

अर्थ: विद्याधर और भूमिगोचरी गृहस्थ तथा मुनिराज सभी लोग पास-पास बैठकर गुरुदेवसे मुनि तथा गृहस्थ धर्मका व्याख्यान सुन रहे थे ॥८२॥


चरितं निरगाराणां शूराणां शान्तमीहितम् । शिवं सुदुर्लभं सिद्धं सारं क्षुद्रभयावहम् ॥८३॥

अर्थ: गुरुदेव कह रहे थे कि मुनियोंका धर्म शूरवीरोंका धर्म है, अत्यन्त शान्त दशारूप है, मंगलरूप है, अत्यन्त दुर्लभ है, सिद्ध है, साररूप है और क्षुद्रजनोंको भय उत्पन्न करनेवाला है ॥८३॥


भव्यजीवा यमासाद्य लभन्ते संशयोज्झितम् । सम्यग्दर्शनसंपन्ना गीर्वाणेन्द्रसुखं महत् ॥८४॥

अर्थ: इस मुनिधर्मको पाकर सम्यग्दृष्टि भव्यजीव निःसन्देह स्वर्गका महासुख प्राप्त करते हैं ॥८४॥


केचित् केवलमासाद्य लोकालोकप्रकाशनम् । लोकप्राग्भारमारुह्य भजन्ते नैर्वृतं सुखम् ॥८५॥

अर्थ: और कितने ही लोक-अलोकको प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञानको प्राप्त कर लोकके अग्रभागपर आरूढ़ हो मोक्षका सुख प्राप्त करते हैं ॥८५॥


तिर्यग्नरकदुःखाग्निज्वालाभिः परिपूरितः । संसारो मुच्यते येन तं पन्थानं महोत्तमम् ॥८६॥

अर्थ: तिर्यंच और नरक गतिके दुःखरूपी अग्निकी ज्वालाओंसे भरा हुआ यह संसार जिससे छूटता है वही मार्ग सर्वोत्तम है ॥८६॥


सर्वप्राणिहितोऽवोचन्मन्द्रगर्जितनिस्वनः । प्रह्लादं सर्वचित्तानां जनयन्विदिताखिलः ॥८७॥

अर्थ: ऐसे मार्गका कथन उन मुनिराजने किया था। वे मुनिराज समस्त प्राणियोंका हित करनेवाले थे, गम्भीर गर्जनाके समान स्वरको धारण करनेवाले थे, समस्त जीवोंके चित्तमें आह्लाद उत्पन्न करनेवाले थे तथा समस्त पदार्थोंको जाननेवाले थे ॥८७॥


संदेहतापविच्छेदि तद्वचोम्बु मुनीन्द्रजम् । कर्णाञ्जलिपुटैः पीतं प्राणिभिः प्रीतमानसैः ॥८८॥

अर्थ: जिनके चित्त प्रसन्नतासे भर रहे थे ऐसे समस्त लोगोंने सन्देहरूपी सन्तापको नष्ट करनेवाले मुनिराजके वचनरूपी जलका अपने-अपने कर्णरूपी अंजलिपुटसे खूब पान किया ॥८८॥


ततो दशरथोऽपृच्छत् संजाते वचनान्तरे । चन्द्रकीर्तेः खगेन्द्रस्य वैराग्यं नाथ किंकृतम् ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर जब वचनोंमें अन्तराल पड़ा तब राजा दशरथने पूछा कि हे नाथ ! विद्याधरोंके राजा चन्द्रगतिका वैराग्य किस कारण हुआ है ? ॥८९॥


सीता तत्र विशुद्धाक्षी ज्ञातुमिच्छुः सहोदरम् । शुश्रूषया मनश्चक्रे विनीतात्यन्तनिश्चलम् ॥९०॥

अर्थ: वहीं पासमें बैठी निर्मल दृष्टिकी धारक सीता अपने भाईको जानना चाहती थी इसलिए श्रवण करनेकी इच्छासे नम्र हो उसने मनको अत्यन्त निश्चल कर लिया ॥९०॥


शुद्धात्मा भगवानूचे श्रृणु राजन् विचित्रताम् । जीवानां निर्मितामेतां कर्मभिः स्वयमर्जितैः ॥९१॥

अर्थ: तब विशुद्ध आत्माके धारक भगवान् सर्वभूतहित मुनिराज बोले कि हे राजन् ! अपने द्वारा अर्जित कर्मोंके द्वारा निर्मित जीवोंकी इस विचित्रताको सुनो ॥९१॥


संसारे सुचिरं भ्रान्त्वा जीवोऽयमतिदुःखितः । कर्मानिलेरितः प्राप्तश्चन्द्रेण द्युतिमण्डलः ॥९२॥

अर्पितः पुष्पवत्यै च स्त्रीचिन्ताकुलतारकः । स्वसारं च समालोक्य गाढाकल्पकमागतः ॥९३॥

अर्थ: कर्मरूपी वायुसे प्रेरित हुआ यह भामण्डलका जीव दीर्घकाल तक संसारमें भ्रमण कर अत्यन्त दुःखी हुआ है। अन्तमें जब भामण्डल पैदा हुआ तब वह राजा चन्द्रगतिको प्राप्त हुआ। चन्द्रगतिने पालन-पोषण करनेके लिए अपनी पुष्पवती भार्याको सौंपा। जब यह तरुण होकर स्त्रीविषयक चिन्ताको प्राप्त हुआ तब अपनी बहन सीताका चित्रपट देख अत्यन्त व्यथाको प्राप्त हुआ ॥९२-९३॥


जनकः कृत्रिमाश्वेन हृतश्चापस्वयंवरा । जाता विदेहजा चिन्तां परां भामण्डलोऽगमत् ॥९४॥

अर्थ: सीताकी मँगनी करनेके लिए मायामयी अश्वके द्वारा राजा जनकका हरण हुआ अन्तमें सीताका धनुष-स्वयंवर हुआ और उसने स्वयंवरमें राजा दशरथके पुत्र रामको वर लिया । इस घटनासे भामण्डल परम चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥९४॥


अस्मरच्च भवं पूर्वं मूर्च्छितः पुनरश्वसीत् । पृष्टश्चन्द्रेण चावोचदिति पूर्वभवक्रियाम् ॥९५॥

अर्थ: अकस्मात् इसे पूर्व भवका स्मरण हुआ, जिससे यह मूच्छित हो गया । सचेत होनेपर राजा चन्द्रगतिने इसका कारण पूछा तब वह अपने पूर्व भवकी वार्ता इस प्रकार कहने लगा ॥९५॥


भरतस्थे विदग्धाख्ये पुरे कुण्डलमण्डितः । अधार्मिकोऽहरत् कान्तां पिङ्गलस्य मनःप्रियाम् ॥९६॥

अर्थ: कि मैं भरत क्षेत्रके विदग्धनामा नगरमें कुण्डल- मण्डित नामका राजा था, मैं बड़ा अधर्मी था इसलिए मैंने उसी नगरमें रहनेवाले पिंगल नामक ब्राह्मणकी मनोहर स्त्रीका हरण किया था ॥९६॥


बालेन्दुहृतसर्वस्वो विषयात् स निराकृतः । श्रमणाश्रममासाद्य प्राप व्रतमनामिषम् ॥९७॥

अर्थ: मैं राजा अनरण्यके राज्यमें उपद्रव किया करता था इसलिए उसके सेनापति बालचन्द्रने मेरी सर्व सम्पदा छीनकर मुझे देशसे निकाल दिया । अन्तमें मैं भटकता हुआ मुनियोंके आश्रममें पहुँचा और वहाँ मैंने अनामिष अर्थात् मांसत्यागका व्रत धारण किया ॥९७॥


धर्म्यध्यानगतः कृत्वा कालं कलुषवर्जितः । जनकस्य विदेहायाः ससहायस्तनुं श्रितः ॥९८॥

अर्थ: उसके फलस्वरूप धर्मध्यानसे सहित हो तथा कलुषतासे रहित होकर मैंने मरण किया और मरकर राजा जनककी रानी विदेहाके गर्भमें जन्म धारण किया । जिस स्त्रीका मैंने हरण किया था भाग्यकी बात कि वह भी उसी विदेहाके गर्भमें उसी समय आकर उत्पन्न हुई ॥९८॥


अरण्यात् पिङ्गलः प्राप्तो दृष्ट्वा शून्यकुटीरकम् । कोटरानलजीर्णाङ्गदाहदुःखं समाप्तवान् ॥९९॥

अर्थ: पिंगलने जब जंगलसे लौटकर कुटिया सूनी देखी तो उसे इतना तीव्र दुःख हुआ कि मानो उसका शरीर कोटरकी अग्निसे झुलस ही गया हो ॥९९॥


यद्दर्शं दुःखितोऽप्राक्षीन्नेत्राम्बुकृतदुर्दिनः । दृष्टा स्यात् पुण्डरीकाक्षी ममेत्युन्मत्तविभ्रमः ॥१००॥

अर्थ: वह उसके बिना पागल-जैसा हो गया, उसके नेत्रोंसे लगातार दुर्दिनकी भाँति आँसुओंकी वर्षा होने लगी तथा दुःखी होकर वह जो भी दिखता था उसीसे पूछता था क्या तुमने मेरी कमललोचना प्रिया देखी है ? ॥१००॥


हा कान्त इति कूजंश्च विलापमकरोदिति । प्रभावती सवित्रीं तां तातं चक्रध्वजं च तम् ॥१०१॥

विभूतिमतितुङ्गां च बान्धवांश्च सुमानसान् । परित्यज्य मयि प्रीत्या विदेशमसि सङ्गता ॥१०२॥

अर्थ: वह हा कान्ते ! इस प्रकार चिल्लाता हुआ विलाप करने लगा तथा कहने लगा कि तुम मुझमें प्रीति होनेके कारण प्रभावती माता, चक्रध्वज पिता, विशाल विभूति और प्रेमसे भरे भाइयोंको छोड़कर विदेशमें आयी थीं ॥१०१-१०२॥


रूक्षाहारकुवस्त्रत्वं मदर्थं सेवितं त्वया । मामुत्सृज्य क्व यातासि सर्वावयवसुन्दरि ॥१०३॥

अर्थ: तुमने मेरे पीछे रूखा-सूखा भोजन और अशोभनीय वस्त्र ग्रहण किये हैं फिर भी हे सर्वावयवसुन्दरि ! मुझे छोड़कर तुम कहाँ चली गयी हो ? ॥१०३॥


खिन्नोऽसौ धरणीं दुःखं भ्रान्त्वा सगिरिकाननाम् । वियोगवह्निना दग्धः सोत्कण्ठस्तपसि स्थितः ॥१०४॥

अर्थ: खेदखिन्न तथा वियोगरूपी अग्निसे जला हुआ पिंगल पहाड़ों और वनोंसे सहित पृथिवीमें दुःखी होकर चिरकाल तक भटकता रहा । अन्तमें तप करने लगा परन्तु उस समय भी उसे स्त्रीकी उत्कण्ठा सताती रहती थी ॥१०४॥


ततो देवत्वमासाद्य चिन्तामेवमुपागमत् । तिर्यग्योनिं किमेता सा कान्ता सम्यक्त्ववर्जिता ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर देवपर्यायको पाकर वह इस प्रकार चिन्ता करने लगा कि क्या मेरी वह प्रिया सम्यक्त्वसे रहित होकर तिर्यंचयोनिको प्राप्त हुई है ॥१०५॥


स्वभावार्जवसंपन्ना भूयो वा मानुषी भवेत् । जीवितान्ते जिनं स्मृत्वा किं वा देवत्वमागता ॥१०६॥

अर्थ: अथवा स्वभावसे सरल होनेके कारण पुनः मानुषी हुई या आयुके अन्त समयमें जिनेन्द्रदेवका स्मरण कर देव पर्यायको प्राप्त हुई है ? ॥१०६॥


इति ध्यायन् विनिश्चित्य स्तब्धदृष्टिः प्रकोपवान् । क्वासौ शत्रुर्दुरात्मेति ज्ञात्वा कुक्षिसमाश्रितम् ॥१०७॥

अर्थ: ऐसा विचार कर तथा सब निश्चय कर उसने अपनी दृष्टि स्थिर की तथा कुपित होकर यह विचार किया कि इसे अपहरण करनेवाला दुष्ट शत्रु कहाँ है ? कुछ समयके विचारके बाद उसे मालूम हो गया कि वह शत्रु भी इसीके साथ विदेहा रानीकी कुक्षिमें ही विद्यमान है ॥१०७॥


प्रसूतमेककं कृत्वा शान्तः कर्मनियोगतः । बालं मुमोच जीवेहि वदन् विद्यालघूकृतम् ॥१०८॥

अर्थ: रानी विदेहाने बालक और बालिकाको जन्म दिया सो वैरका बदला लेनेके लिए वह देव बालकको उठा ले गया परन्तु कर्मोदयसे उसके परिणाम शान्त हो गये जिससे उसने उस बालकको लघुपर्णी विद्यासे लघु कर ‘जीते रहो’ इन शब्दोंका उच्चारण कर आकाशसे छोड़ा ॥१०८॥


ज्योत्स्नाकृताट्टहासायां रात्रौ प्राप्तः पतंस्त्वया । तदा स्मरसि किं नेदं पुष्पवत्यै समर्पितः ॥१०९॥

अर्थ: जिसमें चाँदनी अट्टहास कर रही थी ऐसी रात्रिमें आकाशसे पड़ते हुए उस बालक- को आपने पकड़ा था और अपनी रानी पुष्पवतीके लिए सौंपा था । क्या यह आपको स्मरण नहीं है ? ॥१०९॥


प्राप्तो भवत्प्रसादेन विद्याधरविधिर्मया । नूनं माता विदेहा मे सा च सीता सहोदरी ॥११०॥

अर्थ: मैंने आपके प्रसादसे विद्याधरपना प्राप्त किया। यथार्थमें विदेहा मेरी माता है वह सीता मेरी बहन है ॥११०॥


इत्युक्ते विस्मयं प्राप्ता सर्वा वैद्याधरी सभा । चन्द्रायणश्च संविग्नो न्यस्य भामण्डले श्रियम् ॥१११॥

माता पिता च ते वत्स दुःखं शोकेन तिष्ठति । तयोर्नेत्रोत्सवं यच्छेत्येवमुक्त्वा समागतः ॥११२॥

अर्थ: भामण्डलके ऐसा कहनेपर विद्याधरोंकी समस्त सभा आश्चर्यको प्राप्त हुई तथा चन्द्रगति संसारसे भयभीत हो भामण्डलके लिए राज्यलक्ष्मी सौंपकर तथा यह कह- कर यहाँ चला आया कि हे वत्स ! तेरे माता-पिता शोकके कारण दुःखसे रह रहे हैं सो उनके नेत्रोंको आनन्द प्रदान कर ॥१११-११२॥


जातस्य नियतो मृत्युस्ततो गर्भस्थितिः पुनः । इति भीतो भवादेष चन्द्रः प्राव्रज्यमाप्तवान् ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर जो उत्पन्न होता है उसका मरण अवश्य होता है और जिसका मरण होता है वह गर्भमें स्थित होता है, ऐसा विचारकर चन्द्रगति संसारसे भयभीत हो वैराग्यको प्राप्त हुआ ॥११३॥


अत्रान्तरे विदेहाजः संशयं परिपृच्छति । स्नेहश्चन्द्रायणादीनां मयि कस्मात् परः प्रभो ॥११४॥

अर्थ: इसी बीचमें भामण्डलने सर्वभूतहित मुनिराजसे पूछा कि हे प्रभो ! चन्द्रगति आदिका मुझपर बहुत भारी स्नेह किस कारण था ॥११४॥


ततः सर्वहितोऽवोचन्निबोध द्युतिमण्डल । यथा पिता च माता च तव पूर्वभवे स्थितौ ॥११५॥

अर्थ: इनके उत्तरमें मुनिराजने कहा कि हे भामण्डल ! तेरे माता-पिता पूर्व भवमें जिस प्रकार थे सो कहता हूँ सुन ॥११५॥


दारुग्रामे तु विप्रोऽभूद् विमुचिस्तस्य भामिनी । अनुकोशातिभूतिश्च तनयः सरसा स्नुषा ॥११६॥

अर्थ: दारुग्राममें एक विमुचि नामका ब्राह्मण था । उसकी स्त्रीका नाम अनुकोशा था और पुत्रका नाम अतिभूति था । अतिभूतिकी स्त्रीका नाम सरसा था ॥११६॥


ऊर्या मात्रा सहप्राप्तः कयानाख्योऽन्यदा द्विजः । अहरत् सरसां सारं धनमन्तर्गतं च यत् ॥११७॥

अर्थ: किसी समय उसके घर अपनी ऊरी नामक माताके साथ कयान नामका एक ब्राह्मण आया सो उसने अतिभूतिकी स्त्री सरसा तथा घरके भीतरका सारभूत धन दोनोंका हरण किया अर्थात् सरसा और धनको लेकर कहीं भाग गया ॥११७॥


अतिभूतिश्च तद्धेतोः शोकी बभ्राम मेदिनीम् । ततो निष्पुरुषे गेहे शेषं स्वमपि लुण्ठितम् ॥११८॥

अर्थ: इस निमित्तसे अतिभूति बहुत दुःखी हुआ और स्त्रीकी खोजमें पृथिवीपर भ्रमण करने लगा। इधर उसके चले जानेसे घर पुरुषरहित हो गया सो बाकी बचा धन भी चोर ले गये ॥११८॥


विमुचिर्दक्षिणाकाङ्क्षी देशान्तरगतः पुरा । श्रुत्वा कुलकुटं भग्नं निवृत्तस्त्वरयान्वितः ॥११९॥

अर्थ: विमुचि ब्राह्मण दक्षिणाकी इच्छा करता हुआ पहले ही देशान्तर चला गया था। वहाँ जब उसने सुना कि हमारा कुल-परम्परासे चला आया घर नष्ट हो गया है तब वह शीघ्र ही लौटकर वापस आया ॥११९॥


जीर्णवस्त्रावशेषाङ्गामनुकोशां सुविह्वलाम् । सान्त्वयित्वा तया सार्धमुर्या चान्वेष्टुमुद्यतः ॥१२०॥

अर्थ: आकर उसने देखा कि उसकी स्त्री अनुकोशा अत्यन्त विह्वल हो रही है और उसके शरीरपर जीर्ण-शीर्ण फटे चिथड़े ही शेष रह गये हैं । तब उसने उसे सान्त्वना दी और कयानकी माता ऊरीके साथ पुत्रको ढूँढ़नेके लिए गया ॥१२०॥


प्रजामिः पृथिवीपृष्ठे कथ्यमानं समन्ततः । अवधिज्ञानकरणैर्जगद् येनावभासितम् ॥१२१॥

तमाचार्यं परिप्राप्तः पुरे सर्वारिनामनि । प्रष्टुं किल महाशोको नष्टचित्तस्तुषात्मजः ॥१२२॥

अर्थ: उसने पृथिवीतलपर भ्रमण करते हुए लोगोंसे सुना कि सर्वारिपुर नामा नगरमें एक आचार्य है जिन्होंने अपने अवधिज्ञानसे इस जगत्को प्रकाशित कर रखा है सो वह उनसे पुत्रकी वार्ता पूछनेके उद्देश्यसे उनके पास गया । विमुचि महाशोकसे भरा था और पुत्र तथा पुत्रवधूका पता न लगनेसे अत्यन्त दुःखी था ॥१२१-१२२॥


दृष्ट्वा गणेश्वरोमृद्धिं श्रुत्वा च विविधां स्थितिम् । तीव्रं संवेगमासाद्य विमुचिर्मुनितां गतः ॥१२३॥

अर्थ: वह आचार्य महाराजकी तपऋद्धि देखकर तथा संसारकी नाना प्रकारकी स्थिति सुनकर तीव्र वैराग्यको प्राप्त हुआ और उन्हींके पास दीक्षा लेकर मुनि हो गया ॥१२३॥


पार्श्वे कमलकान्ताया आर्याया सुसमाहिता । सममूर्यानुकोशापि प्रव्रज्य तपसि स्थिता ॥१२४॥

अर्थ: विमुचिकी स्त्री अनुकोशा और कयानकी माता ऊरी इन दोनों ब्राह्मणियोंने भी कमलकान्ता नामक आर्यिकाके पास दीक्षा लेकर तप धारण कर लिया ॥१२४॥


त्रयोऽपि ते शुभध्यानाः कृत्वा कालमलोलुपाः । लौकान्तिकं गता लोकं नित्यालोकमनाकुलम् ॥१२५॥

अर्थ: विमुचि, अनुकोशा और ऊरी ये तीनों प्राणी महानिस्पृह, धर्मध्यानसे मरकर निरन्तर प्रकाशसे युक्त तथा आकुलतारहित ब्रह्मलोक नामक स्वर्गमें उत्पन्न हुए ॥१२५॥


अतिभूतिप्रभृतयो हिंसावादस्य शंसकाः । द्वेषकाः संयतानां च कुध्याना दुर्गतिं गताः ॥१२६॥

अर्थ: अतिभूत तथा कयान दोनों ही हिंसा धर्मके समर्थक तथा मुनियोंसे द्वेष रखनेवाले थे । इसलिए खोटे ध्यानसे मरकर दुर्गतिमें गये ॥१२६॥


मृगीत्वं सरसा प्राप्ता वलाहकनगोरसि । व्याघ्रभीता च्युता यूथान्मृता दावानलाहता ॥१२७॥

अर्थ: अतिभूतिकी स्त्री सरसा बलाहक नामक पर्वतकी तलहटीमें मृगी हुई सो व्याघ्रसे भयभीत हो मृगोंके झुण्डसे बिछुड़कर दावानलमें जल मरी ॥१२७॥


जाता मनस्विनीदेव्याः सुता चित्तोत्सवाह्वया । दुःखदानप्रवीणस्य प्रशमात् पापकर्मणः ॥१२८॥

अर्थ: तदनन्तर दुःख देनेमें प्रवीण पापकर्मके शान्त होनेसे मनस्विनी देवीके चित्तोत्सवा हुई ॥१२८॥


कयानः क्रमशो भूत्वा पारसीकः क्रमेलकः । मृत्वा पिङ्गलनामाभूद्धूमकेशस्य नन्दनः ॥१२९॥

अर्थ: और कयान मरकर क्रमसे घोड़ा तथा ऊँट हुआ । फिर मरकर धूम्रकेशका पुत्र पिंगल हुआ ॥१२९॥


हंसस्ताराक्षसरसि सोऽतिभूतिः क्रमादभूत् । श्येनैर्विलुप्तसर्वाङ्गश्चैत्यस्य पतितोऽन्तके ॥१३०॥

अर्थ: अतिभूति भवभ्रमण कर क्रमसे ताराक्ष नामक सरोवरके तीरपर हंस हुआ सो किसी समय श्येन अर्थात् बाज पक्षियोंने इसका समस्त शरीर नोंच डाला जिससे घायल होकर जिनमन्दिरके समीप पड़ा ॥१३०॥


अध्याप्यमानं गुरुणा यशोमित्रं पुनः पुनः । अश्रौषीदर्हतां स्तोत्रं मुक्तवानथ जीवितम् ॥१३१॥

अर्थ: वहाँ गुरु यशोमित्र नामक शिष्यको बार-बार अर्हन्त भगवान्का स्तोत्र पढ़ा रहे थे उसे सुनकर हंसने प्राण छोड़े ॥१३१॥


दशवर्षसहस्रायुः किन्नरोऽभून्नगोत्तरे । विदग्धनगरे च्युत्वा जातः कुण्डलमण्डितः ॥१३२॥

अर्थ: उसके फलस्वरूप वह नगोत्तर नामक पर्वतपर दश हजार वर्षकी आयुवाला किन्नर देव हुआ और वहाँसे च्युत होकर विदग्धनगरमें राजा कुण्डलमण्डित हुआ ॥१३२॥


अहरत् पिङ्गलः कन्यां तथा कुण्डलमण्डितः । यदत्रायं पुरावृत्तः संबन्धः परिकीर्तितः ॥१३३॥

अर्थ: पूर्वभवके संस्कारसे चित्तोत्सवा कन्याका पिंगलने अपहरण किया और उसके पाससे कुण्डलमण्डित राजाने अपहरण किया । इन सबका जो पूर्वभवका सम्बन्ध था वह पहले कहा जा चुका है ॥१३३॥


योऽसौ विमुचिरित्यासीत् सोऽयं चन्द्रगतिर्नृपः । अनुकोशा तु जायास्य जाता पुष्पवती पुनः ॥१३४॥

अर्थ: इनमें जो विमुचि ब्राह्मण था वह चन्द्रगति राजा हुआ, उसकी अनुकोशा नामकी जो स्त्री थी वही पुष्पवती नामकी फिरसे स्त्री हुई ॥१३४॥


कयानोऽयं सुरो हर्ता सरसा हृदयोत्सवा । ऊरी जाता विदेहा तु सोऽतिभूतिः प्रभाह्वयः ॥१३५॥

अर्थ: कयान अपहरण करनेवाला देव हुआ, सरसा चित्तोत्सवा हुई, ऊरी विदेहा और अतिभूति भामण्डल हुआ ॥१३५॥


ततो दशरथः श्रुत्वा तं वृत्तान्तमशेषतः । भामण्डलं समाश्लिष्य वाष्पपूर्णनिरीक्षणः ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर इस समस्त वृत्तान्तको सुनकर जिनके नेत्र आँसुओंसे भर गये थे ऐसे राजा दशरथने भामण्डलका आलिंगन किया ॥१३६॥


अद्भुतैर्जितमूर्धानो जातरोमोद्गमा भृशम् । आनन्दवाष्पलोलाक्षा सभायामभवञ्जनाः ॥१३७॥

अर्थ: उस समय सभामें जितने लोग बैठे थे सभीके मस्तक आश्चर्यसे चकित रह गये, सभीके शरीरमें बहुत भारी रोमांच निकल आये और सभीके नेत्र आनन्दके आँसुओंसे चंचल हो उठे ॥१३७॥


उद्गीर्णमाननेनैव प्रीत्या तं वीक्ष्य सोदरम् । मृगीव रुदती स्नेहाद्धावोद्धृतबाहुका ॥१३८॥

हा भ्रातः प्रथमं दृष्टो मयाद्यासीतिशब्दिनी । तमाश्लिष्य चिरं सीता रुदित्वा धृतिमागता ॥१३९॥

अर्थ: मुखकी आकृति ही जिसे प्रकट कर रही थी ऐसे भाईको बड़े प्रेमसे देखकर सीता स्नेहवश मृगीकी तरह रोती हुई, भुजाएँ ऊपर उठा दौड़ी और हे भाई ! मैं तुझे आज पहले ही पहल देख रही हूँ, यह कहकर उससे लिपट गयी और चिरकाल तक रुदन कर धैर्यको प्राप्त हुई ॥१३८-१३९॥


संभाषितः स रामेण संभ्रमालिङ्गितश्चिरम् । लक्ष्मणेन तथान्येन बन्धुलोकेन सादरम् ॥१४०॥

अर्थ: राम, लक्ष्मण तथा अन्य बन्धुओंने भी सहसा उठकर भामण्डलका आलिंगन किया तथा आदरसहित उससे वार्तालाप किया ॥१४०॥


नमस्कृत्य मुनिं श्रेष्ठं ततः खेचरभूचराः । उद्यानात् प्रमदापूर्णा निरीयुः सुविराजिताः ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर उन श्रेष्ठ मुनिराजको नमस्कार कर सब विद्याधर और भूमिगोचरी मनुष्य उपवनसे बाहर निकले । उस समय वे हर्षसे परिपूर्ण थे तथा अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ॥१४१॥


भामण्डलेन संमन्त्र्य द्रुतं दशरथो ददौ । लेखं जनकराजस्य नीतं गगनयायिना ॥१४२॥

अर्थ: भामण्डलके साथ सलाह कर राजा दशरथने शीघ्र ही आकाशगामी विद्याधरके हाथ राजा जनकके पास पत्र भेजा ॥१४२॥


प्रेषितं भानुमार्गेण तस्य हंसधृतं वरम् । यानं विद्याधरैर्वीरैर्भूरिभिः परिवारितम् ॥१४३॥

अर्थ: भामण्डलका उत्तम विमान आकाश-मार्गसे आ रहा था, हंसोंके द्वारा धारण किया गया था तथा बहुत-से विद्याधर वीर उसे घेरे हुए थे ॥१४३॥


प्रभामण्डलमादाय ततो भूत्यातिकान्तया । तुष्टो दशरथोऽयोध्यां सुत्रामसदृशोऽविशत् ॥१४४॥

अर्थ: तदनन्तर भामण्डलको लेकर राजा दशरथने इन्द्रके समान बड़ी विभूतिसे अयोध्यामें प्रवेश किया ॥१४४॥


अक्षीणसर्वकोशोऽसावुपचारं परं नृपः । प्रीतो भामण्डले चक्रे सर्वलोकसमन्वितः ॥१४५॥

अर्थ: अक्षीण कोशके धनी राजा दशरथने भामण्डलके आनेपर प्रसन्न हो सब लोगोंके साथ मिलकर बड़ा उत्सव किया ॥१४५॥


रम्ये सुविपुले तुङ्गे वाप्युद्यानविभूषिते । गृहे दशरथोद्दिष्टे तस्थौ भामण्डलः सुखम् ॥१४६॥

अर्थ: भामण्डल राजा दशरथके द्वारा बताये हुए रमणीय, विशाल, ऊँचे तथा वापी और बगीचासे सुशोभित महलमें सुखसे ठहरा ॥१४६॥


दारिद्र्यान्मोचितो लोकः परमोत्सवजन्मना । दानेन वाञ्छिताधिक्यं प्राप्तेन धरणीतले ॥१४७॥

अर्थ: उस परमोत्सवके समय राजा दशरथने इतना अधिक दान दिया कि पृथ्वीतलके दरिद्र मनुष्य इच्छासे अधिक धन पाकर दरिद्रतासे मुक्त हो गये ॥१४७॥


गत्वा पवनवेगेन जनको लेखहारिणा । सहसा वर्द्धितो दिष्ट्या पुत्रागमनजन्मना ॥१४८॥

अर्थ: उधर पवनके समान शीघ्रगामी पत्रवाहक विद्याधरने पुत्रके आगमनका समाचार सुनाकर राजा जनकको सहसा हर्षित कर दिया ॥१४८॥


प्रवाच्य चार्पितं लेखं सुदृढप्रत्ययः परम् । प्रमोदं जनकः प्राप रोमाञ्चार्चितविग्रहः ॥१४९॥

अर्थ: राजा जनक दिये हुए पत्रको बाँचकर तथा उसकी सत्यताका दृढ़ विश्वास कर परम प्रमोदको प्राप्त हुए । उनका सारा शरीर हर्षसे रोमांचित हो गया ॥१४९॥


भद्र किं किमयं स्वप्नः स्याज्जाग्रत्प्रत्ययोऽथवा । एहि ढौकस्व ढौकस्व तावत्त्वाद्य परिष्वजे ॥१५०॥

अर्थ: वे उस विद्याधरसे पूछने लगे कि हे भद्र ! क्या यह स्वप्न है ? अथवा जागृत दशामें होनेवाला प्रत्यक्ष ज्ञान है, आओ, आओ मैं तुम्हारा आलिंगन करूँ ॥१५०॥


इत्युक्त्वानन्दवाष्पेण तरत्तारकलोचनः । साक्षात्पुत्रमिव प्राप्तं लेखहारं स सष्वजे ॥१५१॥

अर्थ: इतना कहकर आनन्दके आँसुओंसे जिनके नेत्रोंकी पुतलियाँ चंचल हो रही थीं ऐसे राजा जनकने उस पत्रवाहक विद्याधरका ऐसा आलिंगन किया मानो साक्षात् पुत्र ही आ गया हो ॥१५१॥


नग्नतापरिहारेण देहस्थं वस्त्रभूषणम् । ससंभ्रमं ददौ तस्मै मुदा नृत्तमिवाचरन् ॥१५२॥

अर्थ: उन्होंने इस हर्षसे नृत्य करते हुए की तरह उस विद्याधरके लिए अपने शरीरपर स्थित समस्त वस्त्राभूषण दे दिये। शरीरपर केवल उतने ही वस्त्र शेष रहने दिये जिससे कि वे नग्न न दिखें ॥१५२॥


समेति बन्धुलोकोऽस्य यावद्दिष्ट्याभिवर्द्धकः । तावत्तद्यानमायातं छादयद्गगनं रुचा ॥१५३॥

अर्थ: हर्षकी वृद्धि करनेवाले राजा जनकके बन्धुवर्ग जबतक इकट्ठे होते हैं तबतक अपनी कान्तिसे आकाशको आच्छादित करता हुआ भामण्डलका विमान वहाँ आ पहुँचा ॥१५३॥


अपृच्छत्तस्य वृत्तान्तमतृप्तश्च पुनः पुनः । उक्तं विद्याधरैस्तस्य यथावदतिविस्तरम् ॥१५४॥

अर्थ: राजा जनकने अतृप्त हो बार-बार भामण्डलका वृत्तान्त पूछा और विद्याधरोंने सब वृत्तान्त ज्योंका-त्यों बड़े विस्तारसे कहा ॥१५४॥


ततो यानं समारुह्य समस्तैर्बन्धुभिः समम् । निमेषेण परिप्राप्तो विनीतां तूर्यनादिताम् ॥१५५॥

अर्थ: तदनन्तर राजा जनक समस्त भाई-बन्धुओंके साथ विमानपर आरूढ़ हो निमेष मात्रमें अयोध्या जा पहुँचे। उस समय अयोध्या तुरहीके मधुर शब्दसे शब्दायमान हो रही थी ॥१५५॥


अवतीर्याम्बरादाशु पुत्रमालिङ्ग्य निर्भरम् । सुखमीलितनेत्रोऽसौ क्षणं मूर्छामुपागतः ॥१५६॥

अर्थ: आकाशसे शीघ्र ही उतरकर उन्होंने पुत्रका गाढ़ आलिंगन किया। आलिंगनजन्य सुखसे उनके नेत्र निमीलित हो गये और क्षण भरके लिए वे मूर्च्छाको प्राप्त हो गये ॥१५६॥


प्रबुध्य च विशालेन चक्षुषा वाष्पवारिणा । आसेचनकमैक्षिष्ट तनयं पाणिना स्पृशन् ॥१५७॥

अर्थ: सचेत होनेपर उन्होंने जिनसे अश्रु-जल झर रहा था ऐसे विशाल लोचनोंसे तृप्तिकर पुत्रका अवलोकन किया तथा हाथसे उसका स्पर्श किया ॥१५७॥


माता तं मूर्छिता दृष्ट्वा परिष्वज्य प्रबोधिनी । आचक्रन्द सुकारुण्यं तिरश्चामपि कुर्वती ॥१५८॥

अर्थ: माता विदेहा भी पुत्रको देखकर तथा आलिंगन कर हर्षातिरेकसे मूर्च्छित हो गयी और सचेत होनेपर ऐसा रुदन करने लगी कि जिससे तिर्यंचोंको भी दया उत्पन्न हो रही थी ॥१५८॥


परिदेवनमेवं च चक्रे पुत्रक हा कथम् । हतोऽसि जातमात्रस्त्वं केनाप्युत्तमवैरिणा ॥१५९॥

अर्थ: वह विलाप करने लगी कि हाय पुत्र ! तू उत्पन्न होते ही किसी विकट वैरीके द्वारा क्यों अपहृत हो गया था ? ॥१५९॥


त्वदीक्षाचिन्तया देहो दग्धोऽयं वह्नितुल्यया । भवद्दर्शनतोयेन चिरान्निर्वापितोऽद्य मे ॥१६०॥

अर्थ: मेरा यह शरीर अग्निके समान तेरे देखनेकी चिन्तासे अब तक जलता रहा है। आज चिरकालके बाद तेरे दर्शनरूपी जलसे शान्त हुआ है ॥१६०॥


धन्या पुष्पवती सुस्त्री या तेऽङ्गानि शैशवे । क्रीडता धूसराण्यङ्के निहितानि सुचुम्बितम् ॥१६१॥

चन्दनेन विलिप्तस्य कुङ्कुमस्थासकाञ्चितम् । दधतः शैशवं दृष्टं कौमारं ते तया वपुः ॥१६२॥

अर्थ: पुष्पवती बड़ी ही धन्य और भाग्यशालिनी उत्तम स्त्री है जिसने कि बाल्य अवस्थामें क्रीड़ासे धूल-धूसरित तेरे अंग अपनी गोदमें रखे हैं तथा चन्दनसे लिप्त और केशरके तिलकसे सुशोभित तेरे मुखका चुम्बन किया है एवं शैशव अवस्थाको धारण करनेवाले तेरे कुमारकालीन शरीरको देखा है ॥१६१-१६२॥


नेत्राभ्यामस्रमुत्सृज्य स्तनाभ्यां च पयश्चिरम् । सुपुत्रसङ्गमानन्दं विदेहा परमं गता ॥१६३॥

अर्थ: माता विदेहाके नेत्रोंसे आँसू और स्तनोंसे चिरकाल तक दूध निकलता रहा। वह उत्तम पुत्रका संग पाकर परम आनन्दको प्राप्त हुई ॥१६३॥


अर्हच्छासनदेवीव जृम्भैरावतनामनि । सा तत्र लोचने कृत्वा तस्थौ मग्ना सुखाम्बुधौ ॥१६४॥

अर्थ: जिस प्रकार ऐरावत क्षेत्रमें जृम्भा नामकी जिनशासनकी सेवक देवी रहती है उसी प्रकार वह भामण्डलपर दृष्टि लगाकर अर्थात् उसे देखती हुई सुखरूपी सागरमें निमग्न होकर रहने लगी ॥१६४॥


मासमात्रमुषित्वातो बन्धुसङ्गममोदिना । पद्मो भामण्डलेनोचे विनयं बिभ्रता परम् ॥१६५॥

अर्थ: तदनन्तर एक मास तक अयोध्यामें रहनेके बाद भाई-बन्धुओंके समागमसे प्रसन्न एवं परम विनयको धारण करनेवाले भामण्डलने श्रीरामसे कहा कि ॥१६५॥


वैदेह्याः शरणं देव त्वमेवोत्तमबान्धवः । छन्देऽस्या वर्ततां येन नो यात्युद्वेगमेषका ॥१६६॥

अर्थ: हे देव ! सीताके आप ही शरण हो और आप ही इसके सर्वोत्तम बान्धव हो। आप इसके हृदयमें इस प्रकार विद्यमान रहे कि जिससे यह उद्वेगको प्राप्त न हो ॥१६६॥


स्वसारं च समालिङ्ग्य स्नेहादेनां सुचेष्टिताम् । उपादिशदसौ भूयो भूयः प्रवरमानसः ॥१६७॥

अर्थ: उत्कृष्ट हृदयके धारक भामण्डलने उत्तम चेष्टाओंसे सुशोभित बहनका स्नेहवश आलिंगन कर उसे बार-बार उपदेश दिया ॥१६७॥


मातालिङ्ग्यागदत् सीतां सुते श्वसुरयोः प्रिये । परिवर्गे च तत्कुर्याः श्लाघ्यतां येन गच्छसि ॥१६८॥

अर्थ: माता विदेहाने भी सीताका आलिंगन कर कहा कि हे बेटी ! तू अपने सास-ससुरको प्रिय हो, तथा परिजनके साथ ऐसा व्यवहार कर कि जिससे प्रशंसाको प्राप्त हो ॥१६८॥


सर्वानामन्त्र्य विन्यस्य कनके मिथिलेशिताम् । गृहीत्वा पितरौ यातः स्थानं भामण्डलो निजम् ॥१६९॥

अर्थ: तदनन्तर भामण्डल सब लोगोंसे पूछकर तथा मिथिलाका राज्य कनक- के लिए सौंपकर माता-पिताको साथ ले अपने स्थानपर चला गया ॥१६९॥


वीक्षस्व माहात्म्यमिदं कृतस्य धर्मस्य पूर्वं मगधाधिराज । विद्याधरेन्द्रो यदवापि बन्धुः सीता च पत्नी गुणरूपपूर्णा ॥१७०॥

अधिष्ठिते देवगणैश्च चापे सकंकटे सीरगदादियुक्ते । लब्धे सुरैरप्यतिदुर्लभे ये पद्मेन लक्ष्मीनिलयश्च भृत्यः ॥१७१॥

अर्थ: गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधेश्वर ! पूर्व भवमें किये हुए धर्मका यह माहात्म्य देखो। धर्मके माहात्म्यसे ही रामने विद्याधरोंका राजा भामण्डल-जैसा बन्धु प्राप्त किया, गुण तथा रूपसे परिपूर्ण सीता जैसी पत्नी प्राप्त की तथा देवोंके समूहसे अधिष्ठित कवच, हल, गदा आदिसे युक्त एवं देवोंके द्वारा दुर्लभ धनुष प्राप्त किये। लक्ष्मीका भाण्डार लक्ष्मण जैसा सेवक प्राप्त किया ॥१७०-१७१॥


इदं जनो यः सुविशुद्धचेताः शृणोति भामण्डलबन्धुयोगम् । अभीष्टयोगानरुजश्चिराय रविप्रभोऽसौ लभते शुभात्मा ॥१७२॥

अर्थ: जो मनुष्य अत्यन्त विशुद्ध हृदयसे भामण्डलके इस इष्ट समागमको सुनता है सूर्यके समान प्रभाको धारण करनेवाला वह शुभात्मा मनुष्य चिरकाल तक इष्टजनोंके साथ समागम और आरोग्यको प्राप्त होता है ॥१७२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते भामण्डलसमागमाभिधानं नाम त्रिंशत्तमं पर्व ॥३०॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें भामण्डलके समागमका वर्णन करनेवाला तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३०॥

३१. एकत्रिंशत्तमं पर्व (दशरथप्रव्रज्याभिधानं)

उवाच श्रेणिको भूपः सबन्धुरनरण्यजः । इमां विभूतिं संप्राप्य चक्रे किं गणनायक ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे पूछा कि हे गणनायक ! इष्टजनोंसे सहित, राजा अनरण्यके पुत्र राजा दशरथने इस विभूतिको पाकर क्या किया ? ॥१॥


पुरातनं च वृत्तान्तं रामलक्ष्मणयोस्तयोः । तवैव विदितं सर्वं तन्नो ब्रूहि महायशः ॥२॥

अर्थ: हे महायशके धारक ! राम और लक्ष्मणका पुरातन वृत्तान्त आपको ही विदित है इसलिए वह सब वृत्तान्त मुझसे कहिए ॥२॥


इति पृष्टो महातेजा जगाद मुनिपुङ्गवः । निरवद्यं तथा तत्त्वं यथा सर्वज्ञभाषितम् ॥३॥

अर्थ: इस प्रकार पूछे गये महातेजस्वी मुनिराजने कहा कि हे राजन् ! इनका जैसा वृत्तान्त सर्वज्ञदेवने कहा है वैसा कहता हूँ तू सुन ॥३॥


स्वसंशयमशेषज्ञं राजा दशरथोऽन्यदा । प्रणम्य साधुमप्राक्षीत् सर्वभूतहितं हितम् ॥४॥

अर्थ: वे कहने लगे कि किसी समय राजा दशरथने समस्त पदार्थोंको जाननेवाले सर्वभूतहित नामक हितकारी मुनिराजको प्रणाम कर उनसे अपना संशय पूछा ॥४॥


मया जन्मानि भूरीणि परिप्राप्तानि यानि तु । वेद्म्येकमपि नो तेषां तत्सर्वं विदितं त्वया ॥५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे स्वामिन् ! मैंने बहुत-से जन्म धारण किये हैं पर मैं उनमें-से एक भी भवको नहीं जानता जब कि आपके द्वारा सब विदित हैं ॥५॥


तान्यहं ज्ञातुमिच्छामि भगवन्नुच्यतामिति । भवत्प्रसादतो मोहं निराकर्तुमहं यजे ॥६॥

अर्थ: हे भगवन् ! मैं उन्हें जानना चाहता हूँ सो कहिए । आपके प्रसादसे मोह नष्ट करनेके लिए मैं आपकी पूजा करता हूँ ॥६॥


श्रोतुं समुद्यतस्यैवं भवान् दशरथस्य तु । सर्वभूतहितः साधुरिदं वचनमब्रवीत् ॥७॥

अर्थ: इस प्रकार भवान्तर सुननेके लिए उद्यत राजा दशरथसे सर्वभूतहित मुनि निम्नांकित वचन कहने लगे ॥७॥


शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यन्मां पृच्छसि सन्मते । त्वया पर्यट्य संसारे मतिरासादिता यथा ॥८॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! सुन । हे सद्बुद्धिके धारक ! तुमने जो पूछा है वह सब मैं कहूँगा ! तुमने इस संसारमें समन्तात् भ्रमण कर जिस प्रकार सद्बुद्धि प्राप्त की है वह सब मैं निवेदन करूँगा ॥८॥


न त्वयैकेन संसारो भ्रान्तोऽन्यैरपि संसृतः । चिन्वानैः कर्मभिः कर्म दुःखसंजननो महान् ॥९॥

अर्थ: दुःख देनेवाले इस महान् संसारमें केवल तुमने ही भ्रमण नहीं किया है किन्तु कर्मोंका संचय करनेवाले अन्य लोगोंने भी कर्मोदयसे इसमें भ्रमण किया है ॥९॥


अस्मिन् जगत्त्रये राजन् जन्तूनां स्वहितैषिणाम् । स्थितयस्तिस्र उद्दिष्टा उत्तमाधममध्यमाः ॥१०॥

अर्थ: हे राजन् ! इस जगत्त्रयमें अपना हित चाहनेवाले प्राणियोंकी दशाएँ उत्तम, मध्यम और जघन्यके भेदसे तीन प्रकारकी वर्णित की गयी हैं ॥१०॥


अभाव्यी च तथा भाव्यी सैद्धी च गतिरुत्तमा । पुनरावृत्तिनिर्मुक्ता कल्याणी जिनदेशिता ॥११॥

अर्थ: उनमें-से अभव्य जीवकी दशा जघन्य है, भव्यकी मध्यम है और सिद्धोंकी उत्तम है । जिनेन्द्रभगवान्ने सिद्धगतिको पुनरागमनसे रहित तथा कल्याणकारिणी बतलाया है ॥११॥


सेयं सिद्धगतिः शुद्धा सनातनसुखावहा । इन्द्रियव्रणरोगार्तैर्मोहेनान्धैर्न दृश्यते ॥१२॥

अर्थ: यह सिद्धगति शुद्ध है तथा सनातन सुखको देनेवाली है । इन्द्रियरूपी व्रणरोग- से पीड़ित तथा मोहसे अन्धे मनुष्य इसे नहीं देख सकते हैं ॥१२॥


श्रद्धासंवेगहीनानां हिंसादिष्वनिवर्तिनाम् । चतुर्गतिकसंवर्ता गतिरुग्रतमोरजाः ॥१३॥

अर्थ: जो मनुष्य श्रद्धा और संवेगसे रहित हैं तथा हिंसादि पाँच पापोंसे निवृत्त नहीं हैं उनकी चतुर्गतिमें भ्रमण करानेवाली गति अर्थात् दशा होती है । उनकी यह गति अत्यन्त उग्र तमोगुण और रजोगुणसे युक्त रहती है ॥१३॥


अभव्यानां गतिः क्लिष्टा विनाशपरिवर्जिता । भव्यानां तु परिज्ञेया गतिर्निर्वृतिभाविनी ॥१४॥

अर्थ: अभव्य जीवोंकी गति अतिशय दुःखपूर्ण तथा विनाशसे रहित है और भव्य जीवोंकी गति मोक्ष प्राप्त करनेवाली है अर्थात् अभव्य जीव सदा चतुर्गतिमें ही भ्रमण करते हैं और भव्य जीवोंमें किन्हींका निर्वाण भी हो जाता है ॥१४॥


धर्मादिद्रव्यपर्यन्तं लोकालोकमशेषतः । पृथिवीप्रभृतीन् कायानाश्रिताश्चेतनाभृतः ॥१५॥

अर्थ: जहाँ तक धर्माधर्मादि द्रव्य पाये जाते हैं उसे लोक कहते हैं और बाकी समस्त आकाश अलोक कहलाता है । संसारके समस्त प्राणी पृथिवी आदि षट्कायको धारण करनेवाले हैं ॥१५॥


जीवराशिरनन्तोऽयं विद्यते नास्य संक्षयः । दृष्टान्तः सिकताकाशचन्द्रादित्यकरादिकः ॥१६॥

अर्थ: यह जीवराशि अनन्त है । इसका क्षय नहीं होता है । इसके लिए बालूके कण, आकाश अथवा चन्द्रमा, सूर्य आदिकी किरणें दृष्टान्त हैं अर्थात् जिस प्रकार बालूके कणोंका अन्त नहीं है, आकाशका अन्त नहीं है और चन्द्र तथा सूर्यकी किरणोंका अन्त नहीं है उसी प्रकार जीवराशिका भी अन्त नहीं है ॥१६॥


अनाद्यमन्तनिर्मुक्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् । स्वकर्मनिचयोपेतं नानायोनिकृताटनम् ॥१७॥

अर्थ: चर-अचर पदार्थों अर्थात् त्रस-स्थावर जीवोंसे सहित ये तीनों लोक अनादि, अनन्त हैं, स्वकीय कर्मोंके समूहसे सहित हैं तथा नाना योनियोंके जीव इनमें भ्रमण करते रहते हैं ॥१७॥


सिद्धाः सिद्ध्यन्ति सेत्स्यन्ति कालेऽन्तपरिवर्जिते । जिनदृष्टेन धर्मेण नैवान्येन कथंचन ॥१८॥

अर्थ: आज तक जितने सिद्ध हुए हैं, जो वर्तमानमें सिद्ध हो रहे हैं और जो अनन्त काल तक सिद्ध होंगे वे जिनेन्द्रदेवके द्वारा देखे हुए धर्मके द्वारा ही होंगे अन्य किसी प्रकारसे नहीं ॥१८॥


यः संदेहकलङ्केन निचितः पापकर्मणा । अभावितस्य धर्मेण का तस्य श्रद्दधानता ॥१९॥

अर्थ: जो पापकर्मके कारण संशयरूपी कलंकसे व्याप्त है तथा धर्मकी भावना अर्थात् संस्काररहित है उसके सम्यग्दर्शन कैसे हो सकता है ? ॥१९॥


कुतः श्रद्धाविमुक्तस्य धर्मो धर्मफलानि च । अत्यन्तदुःखमज्ञानं सम्यक्त्वरहितात्मनाम् ॥२०॥

अत्युग्रकर्मनिर्मोकैर्वेष्टितानां समन्ततः । मिथ्याधर्मानुरक्तानां स्वाहिताद्दूरवर्तिनाम् ॥२१॥

अर्थ: जो मनुष्य श्रद्धासे रहित है उसके धर्म और धर्मके फल कहाँसे प्राप्त हो सकते हैं ? जिनकी आत्मा सम्यग्दर्शनसे रहित है, जो अत्यन्त उग्र कर्मरूपी काँचलीसे सब ओरसे वेष्टित हैं, जो मिथ्या धर्ममें अनुरक्त हैं और जो आत्महितसे दूर रहते हैं उन प्राणियोंको अत्यन्त दुःख देनेवाला अज्ञान ही प्राप्त होता है ॥२०-२१॥


सेनापुरेऽथ दीपिन्या उपास्तिर्नाम मावनः । सा च मिथ्याभिमानेन परिपूर्णा निरर्गलम् ॥२२॥

अश्रद्दधाना संरंभमत्सरक्ष्वेडधारिणी । दुर्भावा सततं साधुनिन्दनासक्तशब्दिका ॥२३॥

प्रयच्छति स्वयं नान्नं यच्छन्तं नानुमन्यते । निवारयति यत्नेन विद्यमानं सुमूर्यपि ॥२४॥

एवमादिमहादोषा कुतीर्थपरिभाविता । कालमेत्याभ्रमद्भीमे निष्पारे भवसागरे ॥२५॥

अर्थ: अथानन्तर हस्तिनापुर नगरमें एक उपास्ति नामका गृहस्थ था । उसकी दीपिनी नामकी स्त्री थी । वह दीपिनी मिथ्या अभिमानसे पूर्ण थी, श्रद्धासे रहित थी, क्रोध तथा मात्सर्यरूपी विषको धारण करनेवाली थी, दुष्ट भावोंसे युक्त थी, उसके शब्द सदा साधुओंकी निन्दा करनेमें तत्पर रहते थे । वह न कभी स्वयं किसीको आहार देती थी और न देते हुए किसी दूसरेकी अनुमोदना करती थी । यदि कोई दानादि सत्कार्योंमें प्रवृत्त होता था तो उसे वह प्रयत्नपूर्वक मना करती थी । इत्यादि अनेक महादोषोंसे युक्त थी और कुतीर्थकी भावनासे युक्त थी । इस प्रकार समय व्यतीत कर वह भयंकर तथा पाररहित संसार सागरमें भ्रमण करने लगो ॥२२-२५॥


उपास्तिर्देहि देहीति समभ्यस्याक्षरद्वयम् । पुण्यकर्मानुभावेन पुरेऽन्द्रकपुराह्वये ॥२६॥

सुतोऽभूद् भद्रधारिण्योर्भाग्यवान् बहुबान्धवः । धारणो नामतस्तस्य पत्नी नयनसुन्दरी ॥२७॥

अर्थ: इसके विपरीत उपास्ति ‘देहि’ ‘देहि’ अर्थात् ‘देओ’ ‘देओ’ इन दो अक्षरोंका अच्छी तरह अभ्यास कर - अत्यधिक दान देकर पुण्य कर्मके प्रभावसे अन्द्रकपुरनामा नगरमें मद्रनामा गृहस्थ और उसकी धारिणीनामा स्त्रीके धारण नामका भाग्यशाली एवं अनेक बन्धुजनोंसे युक्त पुत्र हुआ । उसकी नयनसुन्दरी नामकी स्त्री थी ॥२६-२७॥


देशकालप्रपन्नेभ्य साधुभ्यः शुद्धभावतः । दत्त्वासौ पारणां सम्यक्काले संत्यज्य विग्रहम् ॥२८॥

विदेहे धातकीखण्डे मेरोरुत्तरतः कुरौ । भुक्त्वा पल्यत्रयं भोगं समारूढस्त्रिविष्टपम् ॥२९॥

अर्थ: वह योग्य देश तथा कालमें प्राप्त हुए साधुओंके लिए शुद्धभावसे आहार देता था । जिसके फलस्वरूप अन्तमें समाधिपूर्वक शरीरका त्याग कर धातकीखण्डद्वीप सम्बन्धी विदेह क्षेत्रमें मेरु पर्वतकी उत्तर दिशामें विद्यमान कुरुक्षेत्रमें आर्य हुआ । वहाँ तीन पल्य तक भोग भोगकर स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥२८-२९॥


च्युतोऽतः पुष्कलावत्यां नगर्यां नन्दिघोषतः । वसुधायां समुत्पन्नो नामतो नन्दिवर्धनः ॥३०॥

अर्थ: वहाँसे च्युत होकर पुष्कलावती नगरीमें राजा नन्दिघोष और वसुधा रानीके नन्दिवर्धन नामका पुत्र हुआ ॥३०॥


नन्दिघोषोऽन्यदा धर्मं श्रुत्वोद्यानं प्रबुद्धवान् । नन्दिवर्धनमाधाय पृथिवीपरिपालने ॥३१॥

यशोधरमुनेः पार्श्वे प्रव्रज्य सुमहत्तपः । कृत्वा स्वर्गं समारूढस्तनुं त्यक्त्वा यथाविधि ॥३२॥

अर्थ: एक दिन राजा नन्दिघोष उत्कृष्ट धर्म श्रवण कर प्रबोधको प्राप्त हुआ और नन्दिवर्धनको पृथिवी-पालनका भार सौंप यशोधर मुनिराजके समीप दीक्षा लेकर महातप करने लगा । तथा अन्तमें विधिपूर्वक शरीर त्याग कर स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥३१-३२॥


गृहिधर्मसमासक्तो नमस्कारपरायणः । पूर्वकोटीं महाभोगान् भुक्त्वा श्रीनन्दिवर्धनः ॥३३॥

संन्यासेन तनुं त्यक्त्वा प्रयातः पञ्चमं दिवम् । ततश्च्युतो विदेहेऽस्मिन् गिरिराजस्य पश्चिमे ॥३४॥

ख्याते शशिपुरे स्थाने विजयार्द्धनगोत्तमे । सूर्यंजयोऽभवद् विद्युल्लतायां रत्नमालिनः ॥३५॥

अर्थ: इधर नन्दिवर्धन गृहस्थका धर्म धारण करनेमें लीन एवं पंच-नमस्कार मन्त्रकी आराधना करनेमें तत्पर था । वह एक करोड़ पूर्व तक महाभोगोंको भोग कर तथा संन्याससे शरीर छोड़कर पंचम स्वर्गमें गया । वहाँसे च्युत होकर इसी विदेह क्षेत्रमें सुमेरु पर्वतके पश्चिमकी ओर विजयार्ध पर्वतपर स्थित शशिपुरनामा नगरमें राजा रत्नमाली और रानी विद्युल्लताके सूर्यंजय नामका पुत्र हुआ ॥३३-३५॥


अन्यदा सिंहनगरं रत्नमाली महाबलः । प्रस्थितो विग्रहं कर्तुं यत्रासौ वज्रलोचनः ॥३६॥

अर्थ: अथानन्तर एक समय महाबलवान् राजा रत्नमाली युद्ध करनेके लिए उस सिंहपुर नगर- की ओर चला जहाँ कि राजा वज्रलोचन रहता था ॥३६॥


रथैः प्रभास्वरैर्दिव्यैः पदातिगजवाजिभिः । नानाशस्त्रकृतध्वान्तैः सामन्तैः सुमहाबलैः ॥३७॥

अर्थ: वह देदीप्यमान सुन्दर रथ, पैदल सेना, हाथी, घोड़े तथा नाना प्रकारके शस्त्रोंसे अन्धकार उत्पन्न करनेवाले अत्यन्त बलवान् सामन्तोंसे सहित था ॥३७॥


तं दष्टोष्ठं धनुःपाणिं कवचावृतविग्रहम् । दग्धुकाममरिस्थानं क्रोधादाग्नेयविद्यया ॥३८॥

रथाग्रारूढमायान्तं वेगिनं भीषणाकृतिम् । नभस्थं सहसा कश्चिदमरोऽभिदधाविति ॥३९॥

अर्थ: जो क्रोधके कारण ओंठ डँस रहा था, जिसके हाथमें धनुष था, जिसका शरीर कवचसे आच्छादित था, जो आग्नेयविद्यासे शत्रुका स्थान जलाना चाहता था, जो रथके अग्रभागपर आरूढ़ था, जो वेगशाली था एवं भयंकर आकारका धारक था । ऐसे उस रत्नमालीको आकाशमें स्थित देख सहसा किसी देवने इस प्रकार कहा ॥३८-३९॥


रत्नमालिन् किमारब्धमिदं संरंभमुत्सृज । विबुध्यस्व वदाम्येष वृत्तान्तं तव पूर्वकम् ॥४०॥

अर्थ: कि हे रत्नमालिन् ! तूने यह क्या आरम्भ कर रखा है ? क्रोधको छोड़ और स्मरण कर, मैं तेरा पूर्व वृत्तान्त कहता हूँ ॥४०॥


इहासीद् भारते वास्ये मांसादोऽधमकर्मकृत् । गान्धार्यां भूतिरुर्वीभृदुपमन्युः पुरोहितः ॥४१॥

अर्थ: 'इसी भरत क्षेत्रकी गान्धारीनामा नगरीमें एक भूति नामका राजा था । उपमन्यु उसके पुरोहितका नाम था । राजा और पुरोहित दोनों हीं मांसभोजी तथा नीचकार्य करनेवाले थे ॥४१॥


साधोः कमलगर्भस्य श्रुत्वा व्याकरणं च सः । नाचरामि पुनः पापमिति व्रतमुपाददे ॥४२॥

अर्थ: एक बार कमलगर्भनामा मुनिका व्याख्यान सुनकर राजा भूतिने व्रत लिया कि अब मैं ऐसे पापका आचरण फिर कभी नहीं करूँगा ॥४२॥


पञ्चपल्योपमं स्वर्गे तेनायुः समुपार्जितम् । उपमन्यूपदेशेन भस्मसाद्भावमाहृतम् ॥४३॥

मुञ्चते सुकृतं चासाववस्कन्देन चारिभिः । प्रपत्य हिंसितः साकमुपमन्युपुरोधसा ॥४४॥

अर्थ: इस व्रतके प्रभावसे उसने इतने पुण्यका संचय किया कि उससे स्वर्गकी पाँच पल्य प्रमाण आयुका बन्ध हो सकता था, परन्तु उपमन्यु पुरोहितके उपदेशसे उसका यह सब पुण्य भस्म-भावको प्राप्त हो गया अर्थात् नष्ट हो गया। उसने उस पुण्यभावको छोड़ दिया। उसी समय शत्रुओंने आक्रमण कर पुरोहितके साथ-साथ उसे मार डाला ॥४३-४४॥


पुरोहितो गजो जातो युद्धेऽसौ जर्जरीकृतः । संप्राप्य जाप्यमप्राप्तमितरैर्दुःखमाजनैः ॥४५॥

पुनस्तत्रैव गान्धार्यां भूतिपुत्रस्य धीमतः । देव्यां योजनगन्धायां पुत्रोऽभूदरिसूदनः ॥४६॥

अर्थ: पुरोहितका जीव मरकर हाथी हुआ सो युद्धमें घायल हो अन्य दुःखी जीवोंको जिसका मिलना दुर्लभ था ऐसे पंच नमस्कार मन्त्रको पाकर उसी गान्धारीके राजा भूतिके बुद्धिमान् पुत्रकी योजनगन्धा नामा स्त्रीके अरिसूदन नामका पुत्र हुआ ॥४५-४६॥


दृष्ट्वा कमलगर्भं च पूर्वं जन्म समस्मरत् । प्रव्रज्यासौ ततो मृत्वा शतारेऽहं सुरोऽभवम् ॥४७॥

स त्वं भूतिमृगो जातो मन्दारण्ये दुराकृतिः । अकामनिर्जरा तस्य दावदग्धस्य भूकुना ॥४८॥

कम्बोजेन सताकारि यत्त्वया कर्म दारुणम् । क्लिञाख्येन मृतस्त्वासीच्छर्करानरकं गतः ॥४९॥

अर्थ: कमलगर्भ मुनिराजके दर्शन कर अरिसूदनको पूर्व जन्मका स्मरण हो आया जिससे विरक्त होकर उसने दीक्षा ले ली और मरकर शतार नामक ग्यारहवें स्वर्गमें देव हुआ । इस तरह मैं वही पुरोहितका जीव देव हूँ और तू राजा भूतिका जीव मरकर मन्दारण्यनामा वनमें मृग हुआ सो वहाँ दावानलमें जलकर उसने अकाम-निर्जरा की उसके फलस्वरूप वह क्लिज नामका नीच पुरुष हुआ । उस पर्यायमें तूने जो दारुण कार्य किये - तीव्र पाप किये उनके फलस्वरूप तू शर्कराप्रभा नामक दूसरे नरक गया ॥४७-४९॥


मया स्नेहानुबन्धेन ततस्त्वं संप्रबोधितः । अयमुद्वृत्य जातोऽसि रत्नमाली खगेश्वरः ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर स्नेहके संस्कारसे मैंने वहाँ जाकर तुझे सम्बोधा जिसके प्रभावसे निकलकर तू यह रत्नमाली विद्याधर हुआ है ॥५०॥


पर्याप्तानि न किं तानि दुःखानीत्युदितश्च सः । सूर्यंजयसुतं राज्ये निधाय कुलनन्दनम् ॥५१॥

वृत्तान्तश्रवणात्तस्मात्परं निर्वेदमीयुषा । सूर्यंजयेन सहितं सत्कर्मोदयचेतसा ॥५२॥

रत्नमाली पुनर्नानादुर्गतित्रस्तमानसः । ययौ शरणमाचार्यं सौम्यं तिलकसुन्दरम् ॥५३॥

अर्थ: तूने क्या वे दुःख नहीं पाये हैं ?’ इस प्रकार देवके कहते ही रत्नमालीका मन नाना दुर्गतियोंसे भयभीत हो गया । इस वृत्तान्तके सुननेसे रत्नमालीका पुत्र सूर्यंजय भी परम वैराग्यको प्राप्त हो गया इसलिए उस पुण्यात्माके साथ ही साथ राजा रत्नमाली, सूर्यंजयके पुत्र कुलनन्दको राज्य देकर तिलकसुन्दरनामा प्रशान्त आचार्यकी शरणमें पहुँचा ॥५१-५३॥


सूर्यंजयस्तपः कृत्वा महाशुक्रमुपागमत् । च्युतोऽनरण्यराजर्षेः सुतो दशरथोऽभवत् ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर सूर्यंजय तपकर महाशुक्र स्वर्गमें गया और वहाँसे च्युत होकर राजर्षि अनरण्यके दशरथ नामका पुत्र हुआ ॥५४॥


स्वल्पेन सुकृतेन त्वमुपास्तिप्रमुखैर्भवैः । न्यग्रोधबीजवद्वृद्धिं संप्राप्तोऽसि शुभोदयात् ॥५५॥

अर्थ: सर्वभूतहित मुनि कहते हैं कि तू थोड़े ही पुण्यके द्वारा उपास्ति आदि भवोंमें वटबीजकी तरह शुभोदयसे वृद्धिको प्राप्त हुआ है ॥५५॥


नन्दिवर्धनकाले ते नन्दिघोषपिता च यः । सोऽहं ग्रैवेयकाद् भ्रष्टः सर्वभूतहितोऽभवम् ॥५६॥

अर्थ: तू राजा दशरथ उपास्तिका जीव है और नन्दिवर्धनकी पर्यायमें जो तेरा पिता नन्दिघोष था वह तप कर ग्रैवेयक गया और वहाँसे च्युत होकर मैं सर्वभूतहित हुआ हूँ ॥५६॥


यो भूतिरुपमन्युश्च तावेतौ तद्वशानुगौ । जनको कनकश्चेति जातौ सुकृतचेतसा ॥५७॥

अर्थ: तथा उसके अनुकूल रहनेवाले जो भूति और उपमन्युके जीव थे वे पुण्यके प्रभावसे क्रमशः राजा जनक एवं कनक हुए हैं ॥५७॥


संसारे न परः कश्चिन्नात्मीयः कश्चिदञ्जसा । सैषा शुभाशुभैर्जन्तोरुद्वर्तपरिवर्तना ॥५८॥

अर्थ: वास्तवमें इस संसारमें न तो कोई पर है और न अपना है । शुभाशुभ कर्मोंके कारण जीवका यह जन्म-मरणरूप परिवर्तन होता रहता है ॥५८॥


उदाहृतमिदं श्रुत्वा विनीतो वीतसंशयः । अनरण्यसुतो जातः प्रबुद्धः संयमोन्मुखः ॥५९॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वभवका वृत्तान्त सुन अनरण्यका पुत्र राजा दशरथ प्रतिबोधको प्राप्त हुआ तथा सब प्रकारका संशय छोड़ विनीत हो संयम धारण करनेके सम्मुख हुआ ॥५९॥


सर्वादरसमेतश्च संपूज्य चरणौ गुरोः । प्रणम्य च विशुद्धात्मा प्रविवेश सुकोशलम् ॥६०॥

अर्थ: सम्पूर्ण आदरके साथ उसने गुरुके चरणोंकी पूजा की, उन्हें प्रणाम किया और तदनन्तर निर्मल हृदय हो नगरमें प्रवेश किया ॥६०॥


एवं च मानसे चक्रे सार्वभूमीश्वरं पदम् । पद्माय सुधिये दत्वा साधवीयां श्रये गतिम् ॥६१॥

अर्थ: उसने मनमें विचार किया कि यह महामण्डलेश्वरका पद बुद्धिमान् रामके लिए देकर मैं मुनिव्रत धारण करूँ ॥६१॥


धर्मात्मा सुस्थिरो रामस्त्रिसमुद्रां वसुन्धराम् । अनुपालयितुं शक्तो भ्रातृभिः परिवारितः ॥६२॥

अर्थ: धर्मात्मा तथा स्थिर चित्तका धारक राम अपने भाइयोंके साथ जिसके पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिणमें तीन समुद्र हैं ऐसी इस भरत क्षेत्रकी पृथ्वीका पालन करनेमें समर्थ है ॥६२॥


चिन्तयत्येवमेवास्मिन् राज्यमोहपराङ्मुखे । मुक्त्यर्थाहितचेतस्के श्रीमद्दशरथे नृपे ॥६३॥

तिरोधानं गता क्वापि स्वच्छज्योत्स्नापटा शरत् । चन्द्रास्याहिमभीतेव सरीरुहनिरीक्षणा ॥६४॥

अर्थ: इस प्रकार राज्यके मोहसे विमुख और मुक्तिके लिए चित्त धारण करनेवाले राजा दशरथ ऐसा विचार कर रहे थे कि उसी समय निर्मल चाँदनी ही जिसका वस्त्र थी, चन्द्रमा ही जिसका मुख था और कमल ही जिसके नेत्र थे ऐसी शरद्ऋतुरूपी स्त्री हिमसे डरकर ही मानो कहीं जा छिपी ॥६३-६४॥


प्राप्तः प्रालेयसंपातैर्विच्छायीकृतनीरजः । हेमन्तो जडवातेन व्याकुलीकृतविष्टपः ॥६५॥

अर्थ: और लगातार हिमके पड़नेसे जिसने कमलोंको कान्तिरहित कर दिया था तथा शीतल वायुसे जिसने समस्त संसारको व्याकुल बना दिया था ऐसा हेमन्त काल आ पहुँचा ॥६५॥


स्फुटिताधरपादान्ताः पृष्ठन्यस्तपटच्चराः । दन्तवीणाकृतस्वाना रूक्षव्याकुलमूर्धजाः ॥६६॥

तित्तिरच्छदनच्छायक्रोडजङ्घा विभावसोः । सततासेवनात् कुक्षिपूरणाद्यूनचेतसः ॥६७॥

शरीरच्छायया तुल्याः प्रपक्वत्रपुषत्वचः । दुर्गेहिनीवचःशस्त्रैरत्यन्तं तष्टमानसाः ॥६८॥

काष्ठाद्यानयनासक्ता दिवाभास्करतापिताः । कुठारादिधराः स्कन्धौ दधानाः किणकर्कशौ ॥६९॥

शाकाम्लखलकाद्यन्तपरिपूरितकुक्षयः । दुःखं नयन्ति तत्कालं दुष्कुटीषु धनोज्झिताः ॥७०॥

अर्थ: जिनके ओठ तथा पैरोंके किनारे फट गये थे, जो पीठपर पुराने चिथड़े धारण किये हुए थे, जिनके दन्त वीणाके समान शब्द कर रहे थे, जिनके मस्तकके बाल रूखे तथा बिखरे हुए थे, निरन्तर अग्निके तापनेसे जिनकी गोद तथा जाँघें तीतरके पंखके समान मटमैली हो गयी थीं, जिनका चित्त पेट भरनेकी चिन्तासे दुःखी रहता था, जो शरीरकी कान्तिसे पके हुए त्रपुषफलके वल्कलके समान श्यामवर्ण थे, दुष्ट भार्याके वचनरूपी शस्त्रों-से जिनका हृदय छिल गया था, जो लकड़ी आदिके लानेमें लगे रहते थे, जो दिनभर सूर्यके द्वारा तपाये जाते थे, जो कुल्हाड़ी आदि हथियारोंको धारण करते थे तथा जो भट्ट पड़ जानेसे कठोर कन्धोंको धारण करते थे तथा जो शाकभाजी आदिसे पेट भरते थे, ऐसे निर्धन मनुष्य जीर्ण-शीर्ण कुटियोंमें उस हेमन्त कालको बड़े कष्टसे व्यतीत करते थे ॥६६-७०॥


वरप्रासादयातास्तु शीतसङ्गमहारिभिः । संवीताङ्गा वरैर्वस्त्रैर्धूपामोदानुबन्धिभिः ॥७१॥

षड्रसं स्वादुसंपन्नं हेमरुक्मादिपात्रगम् । भुञ्जानाः सुरभिस्निग्धमाहारं निजलीलया ॥७२॥

कुङ्कुमप्रविलिप्ताङ्गा असितागुरुधूपिताः । अक्षीणधननिश्चिन्ता गवाक्षकृतवीक्षणाः ॥७३॥

गीतनृत्यादिसंप्राप्ता विनोदं परमं सदा । माल्यभूषणसंपन्नाः सुभाषितकथोद्यताः ॥७४॥

विनीताभिः कलाज्ञाभिः सुरूपाभिः समं नराः । क्रीडन्ति वरनारीभिः तदा पुण्यानुभावतः ॥७५॥

अर्थ: और इनसे विपरीत जो अक्षीण धनके कारण निश्चिन्त थे वे उत्तमोत्तम महलोंमें रहते थे, शीतके समागमको हरनेवाले तथा धूपकी सुगन्धिसे सुवासित उत्कृष्ट वस्त्रोंसे उनके शरीर ढके रहते थे, स्वर्ण तथा चाँदी आदि-के पात्रमें रखे हुए, छह रसके स्वादिष्ट, सुगन्धित तथा स्निग्ध आहारको लीलापूर्वक ग्रहण करते थे, उनके शरीर केशरसे लिप्त तथा कालागुरुकी धूपसे सुवासित रहते थे, उनके नेत्र झरोखोंकी ओर झाँका करते थे, वे गीत, नृत्य आदि परम विनोदको प्राप्त होते रहते थे, माला तथा आभूषणों-से युक्त रहते थे, सुभाषितोंके कहनेमें तत्पर रहते थे और विनीत, कलानिपुण तथा सुन्दर रूपकी धारक उत्तम स्त्रियोंके साथ पुण्योदयसे क्रीड़ा करते थे ॥७१-७५॥


पुण्येन लभ्यते सौख्यमपुण्येन च दुःखिताः । कर्मणामुचितं लोकः सर्वं फलमुपाश्नुते ॥७६॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि इस संसार-में पुण्यसे सुख प्राप्त होता है और पापसे दुःख मिलता है । प्राणी अपने कर्मोंके अनुरूप ही सब प्रकारका फल प्राप्त करते हैं ॥७६॥


तदा दशरथो भीतो भृशं संसारवासतः । निर्वृत्यालिङ्गनाकाङ्क्षी विरक्तो भोगवस्तुतः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर उस समय संसारवाससे अत्यन्त भयभीत राजा दशरथ, मुक्तिरूपी स्त्रीके आलिंगनकी आकांक्षा करते हुए भोगवस्तुओंसे विरक्त हो गये ॥७७॥


द्वाःस्थमाज्ञापयद्भूमिन्यस्तजानुकरं द्रुतम् । भद्राह्वय स्वसामन्तान् मन्त्रिभिः सहितानिति ॥७८॥

अर्थ: जिसने पृथिवीपर घुटने और हस्त टेककर नमस्कार किया था ऐसे द्वारपालको उन्होंने तत्काल आज्ञा दी कि हे भद्र ! मन्त्रियोंसे सहित अपने सामन्तोंको बुला लाओ ॥७८॥


नियुज्यात्मसमं द्वारे शासनं तेन तत्कृतम् । आगतास्ते नमस्कृत्य यथास्थानमवस्थिताः ॥७९॥

अर्थ: द्वारपालने द्वारपर अपने ही समान दूसरे पुरुषको नियुक्त कर राजाज्ञाका पालन किया । सामन्त और मन्त्रीगण आकर तथा नमस्कार कर यथा-स्थान बैठ गये ॥७९॥


नाथाज्ञापय किं कृत्यमिति चोक्तेन भूभृता । विनीता जगदे संसत् प्रव्रजामीति निश्चितम् ॥८०॥

अर्थ: उन्होंने राजासे कहा कि हे नाथ ! आज्ञा दीजिए, क्या कार्य है ? तब राजाने विनयसे भरी सभासे कहा कि मैंने निश्चय किया है कि ‘दीक्षा धारण करूँ’ ॥८०॥


ततस्तन्मन्त्रिणोऽवोचन् गण्यमानाश्च पार्थिवाः । नाथ किं कारणं जातं मतावस्यां तवाधुना ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्रियों तथा गण्यमान-प्रमुख राजाओंने कहा कि हे नाथ ! इस समय आपकी ऐसी बुद्धिके उत्पन्न होनेमें क्या कारण है ? ॥८१॥


जगादासौ समक्षं मो नन्वेतत्सकलं जगत् । शुष्कं तृणमिवाजस्रं दह्यते मृत्युवह्निना ॥८२॥

अर्थ: तब राजाने कहा कि अये ! यह समस्त संसार सूखे तृणके समान निरन्तर मृत्युरूपी अग्निसे जल रहा है इस बातको आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं ॥८२॥


अग्राह्यं यदभव्यानां भव्यानां ग्रहणोचितम् । सुरासुरनमस्कार्यं प्रशस्यं शिवसौख्यदम् ॥८३॥

त्रिलोके प्रकटं सूक्ष्मं विशुद्धमुपमोज्झितम् । श्रुतं तन्मुनितो जैनं श्रुतमद्य मयाचिरात् ॥८४॥

अर्थ: आज मैंने अभी-अभी मुनिराजके मुखसे जिनेन्द्रप्रणीत उस शास्त्रका श्रवण किया है कि जिसे अभव्य जीव ग्रहण नहीं कर सकते, जो भव्य जीवोंके ग्रहण करनेके योग्य है, सुर और असुर जिसे नमस्कार करते हैं, जो प्रशस्त है, मोक्षसुखको देनेवाला है, तीन लोकमें प्रकट है, सूक्ष्म है। विशुद्ध है तथा उपमासे रहित है ॥८३-८४॥


परमं सर्वभावानां सम्यक्त्वमतिनिर्मलम् । गुरुपादप्रसादेन प्राप्तोऽहं वर्त्म निर्वृतेः ॥८५॥

अर्थ: समस्त भावोंमें सम्यक्त्व भाव ही उत्कृष्ट तथा निर्मल भाव है, यही मुक्तिका मार्ग है। गुरु चरणोंके प्रसादसे आज मैंने उसे प्राप्त किया है ॥८५॥


नानाजन्ममहावर्तां मोहपङ्कसमाकुलाम् । कुतर्कग्राहसंपूर्णां महादुःखोर्मिसंतताम् ॥८६॥

मृत्युकल्लोलसंयुक्तां कुदृष्टिजलनिर्भराम् । समाक्रन्दमहारावां विधर्मजववाहिनीम् ॥८७॥

भवापगां मम स्मृत्वा नरकाम्भोधिगामिनीम् । पश्यताङ्गानि कम्पन्ते वित्रासेन समन्ततः ॥८८॥

अर्थ: जिसमें नाना जन्मरूपी बड़े-बड़े भँवर उठ रहे हैं, जो मोहरूपी कीचड़से भरी है, कुतर्करूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त है, महादुःखरूपी तरंगोंसे युक्त है, मृत्युरूपी कल्लोलोंसे सहित है, मिथ्यात्वरूपी जलसे भरी है, जिसमें रुदनरूपी भयंकर शब्द हो रहा है, जो विधर्म अर्थात् मिथ्याधर्मरूपी वेगसे बह रही है तथा नरकरूपी समुद्रके पास जा रही है, ऐसी संसाररूपी नदीका स्मरण कर देखो। भयसे मेरे अंग सब ओरसे कम्पित हो रहे हैं ॥८६-८८॥


वृथावोचत मा किंचिदात्मानं मोहिता भृशम् । तमसः प्रकटे देशे कुतः स्थानं रवौ सति ॥८९॥

अर्थ: आप लोग मोहके वशीभूत हो व्यर्थ ही कुछ मत कहिए अर्थात् मुझे रोकिए नहीं क्योंकि प्रकट स्थानमें सूर्यके विद्यमान रहते अन्धकारका निवास कैसे हो सकता है ? ॥८९॥


अभिषिञ्चत मे पुत्रं प्रथमं राज्यपालने । त्वरितं येन निर्विघ्नं प्रविशामि तपोवनम् ॥९०॥

अर्थ: आप लोग मेरे प्रथम पुत्रका शीघ्र ही राज्याभिषेक कीजिए जिससे मैं निर्विघ्न हो तपोवनमें प्रवेश कर सकूँ ॥९०॥


इत्युक्ते निश्चितं ज्ञात्वा महाराजस्य मन्त्रिणः । सामन्ताश्च परं शोकं प्राप्ता विनतमस्तकाः ॥९१॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर महाराजका दृढ़ निश्चय जानकर मन्त्री तथा सामन्तवर्ग परम शोकको प्राप्त हुए। सभीके मस्तक नीचे हो रहे ॥९१॥


लिखन्तो भूमिमङ्गुल्या बाष्पाकुलनिरीक्षणाः । क्षणेन निष्प्रभीभूतास्तस्थुर्मौनं समाश्रिताः ॥९२॥

अर्थ: वे अँगुलीसे भूमिको खोदने लगे, उनके नेत्र आसुओंसे व्याप्त हो गये और सभी क्षणभरमें प्रभाहीन हो चुपचाप बैठ रहे ॥९२॥


प्राणेशं निश्चितं श्रुत्वा निर्ग्रन्थव्रतसंश्रयम् । एकीभूतं शुचं प्राप्तं सर्वमन्तःपुरं परम् ॥९३॥

अर्थ: ‘प्राणनाथ निश्चितरूपसे निर्ग्रन्थ व्रतको धारण करनेवाले हैं’ यह सुनकर समस्त अन्तःपुर एकत्रित हो परम शोकको प्राप्त हुआ ॥९३॥


विनोदान् प्रस्तुतान्मुक्त्वा वाष्पपूरितलोचनाः । भूषणस्वनभूयिष्ठं रुरुदुः प्रमदाङ्गनाः ॥९४॥

अर्थ: स्त्रियोंने जो विनोद प्रारम्भ कर रखे थे उन्हें छोड़कर आँसुओंसे नेत्र भर लिये तथा आभूषणोंका अत्यधिक शब्द करती हुई वे रुदन करने लगीं ॥९४॥


पितरं तादृशं दृष्ट्वा भरतः प्रतिबुद्धवान् । अचिन्तयदहो कष्टं दुश्छेद्यं स्नेहबन्धनम् ॥९५॥

अर्थ: पिताको विरक्त देख भरत भी प्रतिबोधको प्राप्त हुआ। वह विचार करने लगा कि अहो ! यह स्नेहका बन्धन बड़ा कष्टकारी तथा दुःखसे छेदने योग्य है ॥९५॥


अव्यापारेण तातस्य किमेतेन प्रबोधिनः । चिन्ता राज्यगता कास्य प्रव्रज्यां कर्तुमिच्छतः ॥९६॥

अर्थ: वह सोचने लगा कि सम्यक्-ज्ञानको प्राप्त हुए पिताको इस अव्यापार अर्थात् नहीं करने योग्य चिन्तासे क्या प्रयोजन है ? जब ये दीक्षा ही लेना चाहते हैं तब इन्हें राज्यकी चिन्ता क्यों होनी चाहिए ? ॥९६॥


आपृच्छया न मे किंचित्कार्यमाशु विशाम्यहम् । तपोवनं महादुःखसंसारक्षयकारणम् ॥९७॥

अर्थ: मुझे किसीसे पूछनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, मैं तो तीव्र दुःखसे भरे संसारके क्षयका कारण जो तपोवन है उसमें शीघ्र ही प्रवेश करता हूँ ॥९७॥


देहेनापि किमेतेन व्याधिगेहेन नाशिना । बान्धवेषु तु कावस्था स्वकर्मफलभोगिषु ॥९८॥

अर्थ: रोगोंके घरस्वरूप इस नश्वर शरीरसे भी मुझे क्या प्रयोजन है ? फिर भाई-बन्धु जो अपने-अपने कर्मका फल भोग रहे हैं उनसे क्या प्रयोजन हो सकता है ? ॥९८॥


जन्तुरेकक एवायं भवपादपसंकुले । मोहान्धो दुःखविपिने कुरुते परिवर्तनम् ॥९९॥

अर्थ: मोहसे अन्धा हुआ यह प्राणी अकेला ही जन्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त इस दुःखदायी अटवीमें भ्रमण करता रहता है ॥९९॥


ततः कलाकलापज्ञा भरतस्येङ्गितादिभिः । केकया चिन्तितं ज्ञात्वा दधाना शोकमुत्तमम् ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर कलाओंके कलापको जाननेवालो केकयी चेष्टाओंसे भरतका अभिप्राय जानकर अत्यधिक शोक करने लगी ॥१००॥


कथं मे न भवेद् भर्त्ता न च पुत्रो गुणालयः । एतयोर्वारणे कुर्वे कमुपायं सुनिश्चितम् ॥१०१॥

अर्थ: वह सोचने लगी कि भर्ता और गुणी पुत्र दोनों ही मेरे नहीं हो रहे हैं अर्थात् दोनों ही दीक्षा धारण करनेके लिए उद्यत हैं। इन दोनोंको रोकनेके लिए मैं किस निश्चित उपायका अवलम्बन करूँ ? ॥१०१॥


एवं चिन्तामुपेतायाः परमं व्याकुलात्मनः । तस्या वरोऽभवच्चित्ते गत्वा च त्वरितं ततः ॥१०२॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ताको प्राप्त तथा अत्यन्त व्याकुल हृदयको धारण करनेवाली केकयाके मनमें शीघ्र ही स्वीकृत वर माँगनेकी बात याद आ गयी ॥१०२॥


प्रीत्या परमया दृष्ट्वा सावष्टम्भं नराधिपम् । जगादार्धासने स्थित्वा तेजसा पुरुणान्विता ॥१०३॥

सर्वेषां भूभृतां नाथ पत्नीनां च पुरस्त्वया । मनीषितं ददामीति यदुक्ताहं प्रसादिना ॥१०४॥

वरं संप्रति तं यच्छ मह्यं सत्यसमुज्ज्वला । दानेन तेऽखिलं लोकं कीर्तिर्भ्रमति निर्मला ॥१०५॥

अर्थ: वह अपने विचारोंमें दृढ़ राजा दशरथके पास बड़ी प्रसन्नतासे गयी और बहुत भारी तेजके साथ अर्द्धासनपर बैठकर बोली कि हे नाथ ! आपने उस समय प्रसन्न होकर समस्त राजाओं और पत्नियोंके सामने कहा था कि ‘जो तू चाहेगी दूँगा’। सो हे नाथ ! इस समय वह वर मुझे दीजिए। सत्यधर्मके कारण उज्ज्वल तथा निर्मल जो आपकी कीर्ति है, वह दानके प्रभावसे समस्त संसारमें फैल रही है ॥१०३-१०५॥


ततो दशरथोऽवोचद् ब्रूहि त्वं दक्षिणां प्रिये । प्रार्थयस्व यदिष्टं ते यच्छाम्येष वराशये ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर राजा दशरथने कहा कि हे प्रिये ! तू अपना अभिप्राय बता। हे उत्कृष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाली प्रिये ! जो तुझे इष्ट हो सो माँग। अभी देता हूँ ॥१०६॥


इत्युक्ते मुञ्चती वाष्पमवोचज्ज्ञातनिश्चया । कथं नाथ त्वया चेतः कृतं निष्ठुरमीदृशम् ॥१०७॥

वद किं कृतमस्माभिर्येनासि त्यक्तुमुद्यतः । ननु जीवितमायत्त१मस्माकं त्वयि पार्थिव ॥१०८॥

अर्थ: राजाके इस प्रकार कहनेपर जिसने उसका निश्चय जान लिया था ऐसी केकयी आँसू डालती हुई बोली कि हे नाथ ! आपने ऐसा कठोर चित्त किस कारण किया है ? बताइए, हम लोगोंने ऐसा कौन-सा अपराध किया है कि जिससे आप हम लोगोंको छोड़नेके लिए उद्यत हुए हैं। हे राजन् ! आप तो यह जानते ही हैं कि हमारा जीवन आपके अधीन है ॥१०७-१०८॥


अत्यन्तं दुर्धरोद्दिष्टा प्रव्रज्या जिनसत्तमैः । कथमाश्रयितुं बुद्धिस्तामद्य भवता कृता ॥१०९॥

अर्थ: जिनेन्द्र-भगवान्के द्वारा कही हुई दीक्षा अत्यन्त कठिन है उसे धारण करनेकी आज आपने बुद्धि क्यों की ? ॥१०९॥


देवेन्द्रसदृशैर्भोगैरिदं ते लालितं वपुः । कथं वक्ष्यति२ जीवेश श्रामण्यं विविधं परम् ॥११०॥

अर्थ: हे प्राणवल्लभ ! आपका यह शरीर इन्द्रके समान भोगोंसे पालित हुआ है सो अत्यन्त कठिन नाना प्रकारका मुनिपना कैसे धारण करेगा ? ॥११०॥


एवमुक्तो जगादासौ कान्ते सत्त्वस्य को भरः । वाञ्छितं वद कर्तव्यं स्वयं यास्यामि सांप्रतम् ॥१११॥

अर्थ: केकयीके इस प्रकार कहनेपर राजा दशरथने कहा कि प्रिये ! समर्थके लिए क्या भार है ? तू तो केवल अपना मनोरथ बता ! जो मुझे करना है उसे मैं अब अवश्य ही प्राप्त होऊँगा ॥१११॥


इत्युक्ता लि३खती क्षोणीं प्रदेशिन्या नतानना । जगाद नाथ पुत्राय मम राज्यं प्रदीयताम् ॥११२॥

अर्थ: पतिके इस प्रकार कहनेपर प्रदेशिनीनामा अंगुलिसे पृथिवीको खोदती हुई केकयीने मुख नीचा कर कहा कि हे नाथ ! मेरे पुत्रके लिए राज्य प्रदान कीजिए ॥११२॥


ततो दशरथोऽवोचत्प्रिये कास्मिन्नपत्रपा । न्यासस्त्वया मयि न्यस्तः सांप्रतं गृह्यतामसौ ॥११३॥

एवमस्तु शुचं मुञ्च निर्ऋणोऽहं त्वया कृतः । किं वा कदाचिदुक्तं ते मया जनितमन्यथा ॥११४॥

अर्थ: तब दशरथने कहा कि हे प्रिये ! इसमें लज्जाकी क्या बात है ? तुमने अपनी धरोहर मेरे पास रख छोड़ी थी सो इस समय जैसा तुम चाहती हो वैसा ही हो । शोक छोड़ो, आज तुमने मुझे ऋणमुक्त कर दिया । क्या कभी मैंने तुम्हारा कहा अन्यथा किया है ? ॥११३-११४॥


पद्मं लक्षणसंयुक्तमाहूय च कृतानतिम् । ऊचे विनयसंपन्नं किंचिद्विगतमानसः ॥११५॥

अर्थ: उसी समय उन्होंने उत्तम लक्षणोंसे युक्त नमस्कार करते हुए विनयी रामको बुलाकर कुछ खिन्न चित्तसे कहा ॥११५॥


वत्स पूर्वं रणे घोरे कलापारगयानया । कृतं केकयया साधु सारथ्यं मम दक्षया ॥११६॥

अर्थ: कि हे वत्स ! कलाकी पार-गामिनी इस चतुर केकयीने पहले भयंकर युद्धमें अच्छी तरह मेरे सारथिका काम किया था ॥११६॥


तदा तुष्टेन पत्नीनां भूभृतां च पुरो मया । मनीषितं प्रतिज्ञातं नीतं न्यासत्वमेतया ॥११७॥

अर्थ: उस समय सन्तुष्ट होकर मैंने पत्नियों तथा राजाओंके सामने प्रतिज्ञा की थी ‘जो यह चाहे सो दूँ’ । परन्तु उस समय इसने वह वर मेरे पास न्यासरूपमें रख छोड़ा था ॥११७॥


देहि पुत्रस्य मे राज्यमिति तं याचतेऽधुना । किमप्याकूतमापन्ना निरपेक्षा मनस्विनी ॥११८॥

अर्थ: अब किसीकी अपेक्षा नहीं रखनेवाली यह तेजस्विनी किसी खास अभिप्रायसे उस वरको इस प्रकार माँग रही है कि ‘मेरे पुत्रके लिए राज्य दीजिए’ ॥११८॥


प्रतिज्ञाय तदेदानीं ददाम्यस्यै न चेन्मतम् । प्रव्रज्यां भरतः कुर्यात् संसारालम्बनोज्झितः ॥११९॥

अर्थ: उस समय प्रतिज्ञा कर इस समय यदि इसके लिए इसकी इच्छानुरूप वर नहीं देता हूँ तो संसारके आलम्बनसे उन्मुक्त होकर भरत दीक्षा ले लेगा ॥११९॥


इयं च पुत्रशोकेन कुर्यात् प्राणविसर्जनम् । भ्रमेच्च मम लोकेऽस्मिन्नकीर्तिर्वितथोद्भवा ॥१२०॥

अर्थ: और यह पुत्रके शोकसे प्राण छोड़ देगी तथा असत्य व्यवहारके कारण उत्पन्न हुई मेरी अपकीर्ति इस संसारमें सर्वत्र फैल जावेगी ॥१२०॥


मर्यादा न च नामेयं यद्विहायाग्रजं क्षमम् । राज्यलक्ष्मीवधूसङ्गं कनीयान् प्राप्यते सुतः ॥१२१॥

अर्थ: साथ ही यह मर्यादा भी नहीं है कि समर्थ बड़े पुत्रको छोड़कर छोटे पुत्रको राज्य-लक्ष्मीरूपी स्त्रीका समागम प्राप्त कराया जाये ॥१२१॥


भरतस्याखिले राज्ये दत्ते स त्वं सलक्ष्मणः । क्व गच्छेत्परमं तेजो दधानः क्षत्रगोचरम् ॥१२२॥

तदहं वत्स नो वेद्मि किं करोमीति पण्डित । अत्यन्तदुःखवेगोरुचिन्तावार्तान्तरस्थितः ॥१२३॥

अर्थ: जब भरतके लिए समस्त राज्य दे दिया जायेगा तब क्षत्रिय-सम्बन्धी परम तेजको धारण करनेवाले तुम लक्ष्मण-के साथ कहाँ जाओगे ? यह मैं नहीं जानता हूँ । तुम पण्डित-निपुण पुरुष हो । अतः बताओ कि इस दुःखपूर्ण बहुत भारी चिन्ताकी बातके मध्यमें स्थित रहनेवाला मैं क्या करूँ ? ॥१२२-१२३॥


ततः पद्मो जगादैवं बिभ्रद्विनयमुत्तमम् । सद्भावप्रीतिचेतस्कः पादन्यस्तनिरीक्षणः ॥१२४॥

तात रक्षात्मनः सत्यं त्यजास्मत्परिचिन्तनम् । शक्रस्यापि श्रिया किं मे त्वय्यकीर्तिमुपागते ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम अभिप्रायके कारण जिनका चित्त अतिशय प्रसन्न था और जो अपनी दृष्टि पैरों पर लगाये हुए थे ऐसे रामने उत्तम विनयको धारण करते हुए इस प्रकार कहा कि हे पिता-जी ! आप अपने सत्य-व्रतकी रक्षा कीजिए और मेरी चिन्ता छोड़िए । यदि आप अपकीर्तिको प्राप्त होते हैं तो मुझे इन्द्रकी लक्ष्मीसे भी क्या प्रयोजन है ? ॥१२४-१२५॥


जातेन ननु पुत्रेण तत्कर्तव्यं गृहैषिणा । येन नो पितरौ शोकं कनिष्ठमपि गच्छतः ॥१२६॥

अर्थ: निश्चयसे उत्पन्न हुए तथा घरकी इच्छा रखनेवाले पुत्रको वही कार्य करना चाहिए कि जिससे माता-पिता किंचित् भी शोक-को प्राप्त न हों ॥१२६॥


पुनाति त्रायते चायं पितरं येन शोकतः । एतत्पुत्रस्य पुत्रत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥१२७॥

अर्थ: जो पिताको पवित्र करे अथवा शोकसे उसकी रक्षा करे यही पुत्रका पुत्रपना है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥१२७॥


समानुरञ्जनी यावत्कथेयं वर्तते तयोः । तावद्भवं निहन्मीति कठोरीकृतमानसः ॥१२८॥

सौधादवतरन्वेगाल्लोकहाकारनादितः । निरुद्धो भरतः पित्रा स्नेहविक्लवचेतसा ॥१२९॥

उपविश्याङ्कमारोप्य परिष्वज्य सचुम्बितम् । इति चाभिदधे भूमौ तिष्ठासुर्वशगः पितुः ॥१३०॥

राज्यं पालय वत्स त्वमहं यामि तपोवनम् । स जगौ न मजे राज्यं प्राव्रज्यं तु करोम्यहम् ॥१३१॥

अर्थ: इधर जबतक पिता-पुत्रके बीच सभाको अनुरक्त करनेवाली यह कथा चल रही थी तबतक ‘मैं संसारको नष्ट करूँ’ ऐसा दृढ़ निश्चय कर भरत महलसे नीचे उतर पड़ा । यह देख लोग हाहाकार करने लगे । पिताने स्नेहसे दुःखी चित्त होकर उसे रोका । वह पिताका आज्ञाकारी था अतः रुककर सामने पृथिवीपर खड़ा होना चाहता था; परन्तु पिताने उसे गोदमें बैठाकर उसका आलिंगन किया, चुम्बन किया और इस प्रकार कहा कि ‘हे पुत्र ! तू राज्यका पालन कर । मैं तपोवनके लिए जा रहा हूँ’ । इसके उत्तरमें भरतने कहा कि मैं राज्यकी सेवा नहीं करूँगा, मैं तो दीक्षा धारण कर रहा हूँ ॥१२८-१३१॥


भज तावत्सुखं पुत्र सारं मनुजजन्मनः । नवेन वयसा कान्तः वृद्धः संप्रव्रजिष्यसि ॥१३२॥

अर्थ: यह सुनकर पिताने कहा कि हे पुत्र ! अभी तू नवीन वयसे सुन्दर है अतः मनुष्य-जन्मका सारभूत जो सुख है उसकी उपासना कर । पीछे वृद्ध होनेपर दीक्षा धारण करना ॥१३२॥


इत्युक्तेऽभिदधे तात किं मोहयसि मां वृथा । मृत्युः प्रतीक्षते नैव बालं तरुणमेव वा ॥१३३॥

अर्थ: पिताके इस प्रकार कहनेपर भरतने कहा कि हे पिताजी ! मुझे व्यर्थ ही क्यों मोहित कर रहे हो । मृत्यु बालक अथवा तरुणकी प्रतीक्षा नहीं करती ॥१३३॥


गृहाश्रमे महावत्स श्रूयते धर्मसंचयः । अशक्यः कुनरैः कर्तुं कुरुते राज्यसंगतः ॥१३४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें पिताने कहा कि हे पुत्र ! गृहस्थाश्रममें भी तो धर्मका संचय सुना जाता है। यद्यपि क्षुद्र मनुष्य इसे नहीं कर सकते हैं पर जो उत्तम पुरुष हैं वे तो राज्य पाकर भी करते ही हैं ॥१३४॥


इत्युक्तेऽभिदधे तात हृषीकवशवर्तिनः । कामक्रोधादिपूर्णस्य का मुक्तिर्गृहसेविनः ॥१३५॥

अर्थ: पिताके इस प्रकार कहनेपर भरतने कहा कि हे पिताजी ! जो इन्द्रियोंके वशीभूत है तथा काम-क्रोधादिसे परिपूर्ण है ऐसे गृहसेवी मनुष्यकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? ॥१३५॥


मुनीनां वत्स केषांचिद्भवेनैकेन जायते । नैव मुक्तिस्ततो धर्मं कुरु सद्मन्यवस्थितः ॥१३६॥

अर्थ: इसके उत्तरमें पिताने कहा कि हे वत्स ! एक भवमें मुक्ति किन्हीं विरले ही मुनियोंको प्राप्त होती है । अधिकांश मुनियोंको मुक्ति नहीं मिलती । इसलिए घरमें रहकर ही धर्म धारण करो ॥१३६॥


इत्युक्तोऽभिदधे तात यद्यप्येवं तथापि किम् । गृहधर्मेण तस्मिन् हि मुक्त्यभावः सुनिश्चितः ॥१३७॥

अर्थ: पिताके इस प्रकार कहनेपर भरतने कहा कि हे पिताजी ! यद्यपि ऐसा है तथापि गृहस्थाश्रमसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि उससे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती यह बिलकुल निश्चित है ॥१३७॥


अपि चानुक्रमान्मुक्तिर्न ममान्यस्य सोचिता । गरुडः किं पतङ्गानां वेगेन सदृशो भवेत् ॥१३८॥

अर्थ: और दूसरी बात यह है कि मेरी मुक्ति अनुक्रमसे नहीं होगी। मैं तो इसी भवसे प्राप्त करूँगा । अनुक्रमसे होनेवाली मुक्ति दूसरे हीके योग्य है । क्या गरुड़ वेगसे अन्य पक्षियोंके समान होता है ? ॥१३८॥


कामार्चिषा परं दाहं व्रजन्तः कुत्सिता नराः । जिह्वाधमाङ्गकार्याणि कुर्वते न च निर्वृतिः ॥१३९॥

अर्थ: क्षुद्र मनुष्य कामरूपी ज्वालासे परम दाहको प्राप्त होते हुए जिह्वा और स्पर्शन इन्द्रियसम्बन्धी कार्य करते हैं पर उनसे उन्हें सन्तोष प्राप्त नहीं होता ॥१३९॥


निक्षिप्यते हि कामाग्नौ भोगसर्पिर्यथा यथा । नितरां वृद्धिमायाति तापकृत्स तथा तथा ॥१४०॥

अर्थ: कामरूपी अग्निमें ज्योंज्यों भोगरूपी घी डाला जाता है त्यों-त्यों वह अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होती है और सन्तापको उत्पन्न करती है ॥१४०॥


भुक्त्वा भोगान् दुरुत्पादान् दूरक्षान् क्षणभङ्गिनः । नियतं दुर्गतिं याति पापात् परमदुःखदम् ॥१४१॥

अर्थ: प्रथम तो ये भोग बड़ी कठिनाईसे प्राप्त होते हैं फिर इनकी रक्षा करना कठिन है । ये देखते-देखते क्षण-भरमें नष्ट हो जाते हैं और इनको भोगनेवाला व्यक्ति पापके कारण नियमसे परम दुःख देनेवाली दुर्गतिको प्राप्त होता है ॥१४१॥


अनुमन्यस्व मां तात नितान्तं जन्मभीरुकम् । करोमि विधिनारण्ये तपोनिर्वृत्तिकारणम् ॥१४२॥

अर्थ: हे पिताजी ! मैं संसारसे अत्यन्त भयभीत हो चुका हूँ इसलिए मुझे अनुमति दीजिए । जिससे मैं वनमें जाकर विधिपूर्वक मोक्षका कारण जो तप है उसे कर सकूँ ॥१४२॥


अथ गेहेऽपि लभ्येत श्रेयो जनक नैर्वृतम् । त्वमेव कुरुषे कस्मादस्य त्यागं महामते ॥१४३॥

अर्थ: हे पिताजी ! यदि मोक्ष-सम्बन्धी सुख घरमें भी मिल सकता है तो फिर आप ही इसका त्याग क्यों कर रहे हैं? आप तो महाबुद्धिमान् हैं ॥१४३॥


तार्यते दुःखतो यस्मात्तपश्वाभ्यनुमोदते । एतत्तातस्य तातत्त्वं प्रवदन्ति विचक्षणाः ॥१४४॥

अर्थ: जो पुत्रको दुःखसे तारे और तपकी अनुमोदना करे यही तातका तातपना है ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं ॥१४४॥


जीवितं वनितामिष्टं पितरं मातरं धनम् । भ्रातरं च परित्यज्य याति जीवोऽयमेककः ॥१४५॥

अर्थ: यह जीव आयु, स्त्री, मित्रादि इष्टजन, पिता, माता, धन और भाई आदिको छोड़कर अकेला ही जाता है ॥१४५॥


सुचिरं देवभोगेऽपि यो न तृप्तो हताशकः । स कथं तृप्तिमागच्छेन्मनुष्यभवभोगकैः ॥१४६॥

अर्थ: जो अभागा चिरकाल तक देवोंके भोग भोगनेपर भी सन्तुष्ट नहीं हो सका वह मनुष्य भवके तुच्छ भोगोंसे किस प्रकार सन्तोष प्राप्त करेगा ? ॥१४६॥


पिता तद्वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमा प्रमोदतः । जगाद वत्स धन्योऽसि विबुद्धो भव्यकेसरी ॥१४७॥

अर्थ: पिता दशरथ भरतके उक्त वचन सुनकर गद्गद हो गये । हर्षसे उनके शरीरमें रोमांच निकल आये । वे बोले कि हे वत्स ! तू धन्य है, सचमुच ही तू प्रतिबोधको प्राप्त हुआ है और तू उत्तम भव्य है ॥१४७॥


तथापि धीर नो भङ्गः कदाचित्प्रणयस्य मे । त्वया कृतो विनीतानां भवान् हि शिरसि स्थितः ॥१४८॥

अर्थ: फिर भी हे धीर ! तूने कभी भी मेरे स्नेहका भंग नहीं किया । तू विनयी मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ है ॥१४८॥


शृणु सारथ्यतुष्टेन मयाजौ जीवसंशये । प्रतिज्ञातं जनन्यास्ते वाञ्छितं नृपसाक्षिकम् ॥१४९॥

अर्थ: सुन, एक बार युद्धमें मेरे प्राणोंका संशय उपस्थित हुआ था । उस समय तेरी माताने सारथिका कार्य कर मेरी रक्षा की थी । उससे सन्तुष्ट होकर मैंने अनेक राजाओं-के समक्ष प्रतिज्ञा की थी कि ‘यह जो कुछ चाहेगी वह दूँगा’ ॥१४९॥


ऋणतां तच्चिरं नीतमद्याहं याचितोऽनया । राज्यं प्रयच्छ पुत्रस्य ममेति बहुमानतः ॥१५०॥

अर्थ: मेरे ऊपर इसका यह बहुत पुराना ऋण था सो इसने आज मुझसे माँगा है । इसने बड़े सम्मानके साथ कहा है कि मेरे पुत्रके लिए राज्य दीजिए ॥१५०॥


स त्वं निष्कण्टकं तात राज्यं शक्रोपमं कुरु । असत्यसंधाकीर्तिर्मे माभ्रमीन्निखिलं जगत् ॥१५१॥

अर्थ: इसलिए हे पुत्र ! तू इन्द्रके समान यह निष्कण्टक राज्य कर जिससे असत्य प्रतिज्ञाके कारण मेरी अकीर्ति समस्त संसारमें भ्रमण नहीं करे ॥१५१॥


इयं च तव शोकेन परमेणाभितापिता । माता म्रियेत सौख्येन सततं लालिताङ्गिका ॥१५२॥

अर्थ: और जिसका शरीर सुखसे निरन्तर पालित हुआ है ऐसी यह तेरी माता इस महाशोकसे दुःखी होकर प्राण छोड़ देगी ॥१५२॥


न करोति यतः पातं पित्रोः शोकमहोदधौ । अपत्यत्वमपत्यस्य तद्वदन्ति सुमेधसः ॥१५३॥

अर्थ: अपत्य अर्थात् पुत्रका अपत्यपना यही है कि जो माता-पिताको शोकरूपी महासागरमें नहीं गिरने देता है ऐसा विद्वज्जन कहते हैं ॥१५३॥


ततः पद्मोऽपि तत्पाणौ गृहीत्वैवमभाषत । प्रेमनिर्भरया पश्यन् दृष्ट्या मधुरनिस्वनः ॥१५४॥

तातेन भ्रातरुक्तं यत्कोऽन्यस्तद्गदितुं क्षमः । नहि सागररत्नानामुपपत्तिः सरसो भवेत् ॥१५५॥

अर्थ: तदनन्तर प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखते हुए रामने भी उसका हाथ पकड़कर मधुर शब्दोंमें इस प्रकार कहा कि हे भाई ! पिताजीने जो कहा है वह दूसरा कौन कह सकता है ? सो ठीक ही है क्योंकि समुद्रके रत्नोंकी उत्पत्ति सरोवरसे नहीं हो सकती ॥१५४-१५५॥


वयस्तपोऽधिकारे ते जायतेऽद्यापि नोचितम् । कुरु राज्यं पितुः कीर्तिरुद्यातु शशिनिर्मला ॥१५६॥

अर्थ: अभी तेरी अवस्था तप करनेके योग्य नहीं है । इसलिए राज्य कर जिससे पिताकी चन्द्रमाके समान निर्मल कीर्ति फैले ॥१५६॥


इयं च शोकतप्ताङ्गा माता यद्याति पञ्चताम् । न तद्युक्तं महाभागे नन्दने त्वादृशे सति ॥१५७॥

अर्थ: जिसका शरीर शोकसे सन्तप्त हो रहा है ऐसी यह तेरी माता तेरे समान भाग्यशाली पुत्रके रहते हुए यदि मरणको प्राप्त होती है तो यह ठीक नहीं होगा ॥१५७॥


पितुः पालयितुं सत्यं त्यजामोऽपि वयं तनुम् । कथं त्वं तु कृतं प्राज्ञः श्रियं न प्रतिपद्यसे ॥१५८॥

अर्थ: पिताके सत्यकी रक्षा करनेके लिए हम शरीरको भी छोड़ सकते हैं । फिर तू बुद्धिमान् होकर भी लक्ष्मीको क्यों नहीं प्राप्त हो रहा है ? ॥१५८॥


नद्यां गिरावरण्ये वा तत्र वासं करोम्यहम् । तत्र कश्चिन्न जानाति कुरु राज्यं यथेप्सितम् ॥१५९॥

अर्थ: मैं किसी नदीके किनारे, पर्वत अथवा वनमें वहाँ निवास करूँगा जहाँ कोई जान नहीं सकेगा इसलिए तू इच्छानुसार राज्य कर ॥१५९॥


भागं सर्वं परित्यज्य पन्थानमपि संश्रितः । न करोमि पृथिव्यां ते कांचित्पीडां गुणालयः ॥१६०॥

अर्थ: हे गुणोंके आलय ! मैं अपना सब भाग छोड़ मार्गका ही आश्रय ले रहा हूँ । मैं पृथ्वीपर तुझे कुछ भी पीड़ा नहीं पहुँचाऊँगा ॥१६०॥


माश्वसीद्दीर्घमुष्णं च मुञ्च तावद्भवाद्भयम् । कुरु वाक्यं पितुः क्षोणीं रक्ष न्यायपरायणः ॥१६१॥

अर्थ: इसलिए लम्बी और गरम साँस मत ले, संसारका भय छोड़, पिताकी बात मान और न्यायमें तत्पर रहकर पृथ्वीकी रक्षा कर ॥१६१॥


इक्ष्वाकूणां कुलं श्रीमद्भूषयामलविभ्रमम् । अत्यन्तविपुलं भ्रातः शशी ग्रहकुलं यथा ॥१६२॥

अर्थ: हे भाई ! जिस प्रकार चन्द्रमा ग्रहोंके समूहको अलंकृत करता है उसी प्रकार तु इक्ष्वाकुओंके इस लक्ष्मीसम्पन्न, निर्मल एवं अत्यन्त विशाल कुलको अलंकृत कर ॥१६२॥


भ्राजते त्रायमाणः सन् वाक्यं तत्पितृकस्य यत् । लब्धवर्णैरिदं भ्रातुर्भ्रातृत्वं परिकीर्तितम् ॥१६३॥

अर्थ: जो पिताके वचनकी रक्षा करता हुआ देदीप्यमान होता है वही भाईका भाईपन है ऐसा विद्वानोंने कहा है ॥१६३॥


इत्युक्त्वा भावतः पादौ शिरसा भूतलस्पृशा । पितुः प्रणम्य तत्पार्श्वान्निर्गतो लक्ष्मणान्वितः ॥१६४॥

अर्थ: इतना कहकर राम पृथ्वीतलका स्पर्श करनेवाले शिरसे भावपूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम कर लक्ष्मणके साथ उनके पाससे चले गये ॥१६४॥


अत्रान्तरे नृपो मूर्छां संप्राप्तोऽपि न केनचित् । ज्ञातः स्तम्भसमायुक्तवपुः पुस्तसमाकृतिः ॥१६५॥

अर्थ: इसी बीचमें यद्यपि राजा दशरथ मूर्च्छाको प्राप्त हो गये तो भी किसीको इसका पता नहीं चला क्योंकि वे जिस खम्भासे टिककर बैठे हुए थे मूर्च्छाके समय भी पुतलेके समान उसी खम्भासे टिके बैठे रहे ॥१६५॥


स तूर्णं धनुरादाय गत्वा नत्वा च मातरम् । आपृच्छय तां च गच्छामि तावदन्यमहीमिति ॥१६६॥

अर्थ: राम शीघ्र ही धनुष उठाकर माताके पास गये और प्रणाम कर पूछने लगे कि मैं अन्य पृथ्वी अर्थात् देशान्तरको जाता हूँ ॥१६६॥


सखीत्वं मूर्छया तस्या दुःखज्ञाननिवारणात् । क्षणं कृतं परिप्राप्तसंज्ञा चास्राकुलेक्षणा ॥१६७॥

ऊचेऽपराजिता हा त्वं वत्स क्व प्रस्थितोऽसि माम् । कस्मात्त्यजसि सच्चेष्ट क्षिप्त्वा शोकमहोदधौ ॥१६८॥

अर्थ: रामकी बात सुनकर माताको मूर्च्छा आ गयी सो मानो दुःखका ज्ञान रोककर उसने सखीका कार्य किया । तदनन्तर क्षणभरके बाद जब मूर्च्छा दूर हुई तथा चैतन्य प्राप्त हुआ तब आँखोंमें आँसू भरकर माता अपराजिता ( कौसल्या ) बोली कि हाय वत्स ! तू कहाँ जा रहा है ? हे उत्तम चेष्टाके धारक पुत्र ! तू मुझे शोकरूपी महासागरमें डालकर क्यों छोड़ रहा है ? ॥१६७-१६८॥


मनोरथशतैः पुत्र त्वं प्राप्तो दुर्लभो मया । प्रारोह इव शाखाया मातुरालम्बनं सुतः ॥१६९॥

अर्थ: हे पुत्र ! तू बड़ा दुर्लभ है, सैकड़ों मनोरथोंके बाद मैंने तुझे पाया है । जिस प्रकार शाखाका आलम्बन प्रारोह अर्थात् पाया होता है उसी प्रकार माताका आलम्बन पुत्र होता है ॥१६९॥


परिदेवनमेवं तां कुर्वन्तीं हृदयङ्गमम् । जगाद प्रणतः पद्मो मातृभक्तिपरायणः ॥१७०॥

अम्ब मा गाद् विषादं त्वं दक्षिणस्यामहं दिशि । निरूप्य संश्रयं योग्यं नेष्यामि त्वां विसंशयम् ॥१७१॥

अर्थ: इस प्रकार हृदयमें चुभनेवाला विलाप करती हुई माताको प्रणाम कर मातृभक्तिमें तत्पर रहनेवाले रामने कहा कि माता ! तुम विषादको प्राप्त मत होओ । मैं दक्षिण दिशामें योग्य स्थान देखकर तुम्हें ले जाऊँगा । इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥१७०-१७१॥


तातेन पृथिवी दत्ता जननीवरदानतः । भरतायेति ते कर्णजाहं नूनमुपागतम् ॥१७२॥

अर्थ: ‘पिताने, केकयी माताको वरदान देनेके कारण पृथ्वी भरतके लिए दे दी है’ यह समाचार निश्चित ही आपके कर्णमूल तक आ गया होगा ॥१७२॥


अन्ते तस्या महारण्ये विन्ध्याद्रौ मलयेऽथवा । अन्यस्मिन् चार्णवस्यान्ते पश्य मातः कृतं पदम् ॥१७३॥

अर्थ: अब यह पृथिवी जहाँ समाप्त होती है उसके अन्तमें किसी महाअटवीमें, विन्ध्याचलमें, मलयपर्वतपर अथवा समुद्रके निकट किसी अन्य देशमें हे माता ! अपना स्थान बनाऊँगा ॥१७३॥


मयि स्थिते समीपेऽस्मिन् लोके भास्करसंमते । आज्ञैश्वर्यमयी कान्तिर्भरतेन्दोर्न जायते ॥१७४॥

अर्थ: सूर्यके समान जब-तक मैं इस देशके समीप ही रहूँगा तबतक भरतरूपी चन्द्रमाकी आज्ञा ऐश्वर्यसे सम्पन्न नहीं हो सकेगी ॥१७४॥


ततः प्ररुदती माता जगादात्यन्तदुःखिता । पुत्रं विनतमाश्लिष्य स्नेहकातरलोचना ॥१७५॥

तनयाद्यैव मे गन्तुमुचितं भवता समम् । कथं त्वाहमपश्यन्ती प्राणान् धारयितुं क्षमा ॥१७६॥

अर्थ: तदनन्तर जो अत्यन्त दुःखी थी और जिसके नेत्र स्नेहसे कातर हो उठे थे ऐसी माता रोतो हुई, नम्रीभूत पुत्रका आलिंगन कर बोली कि हे पुत्र ! मेरा आज ही तेरे साथ चला जाना उचित है क्योंकि तुझे बिना देखे मैं प्राण धारण करनेके लिए कैसे समर्थ हो सकूँगी ? ॥१७५-१७६॥


पिता नाथोऽथवा पुत्रः कुलस्त्रीणां त्रयी गतिः । पितातिक्रान्तकालो मे नाथो दीक्षासमुत्सुकः ॥१७७॥

जीवितस्य त्वमेवैकः सांप्रतं मेऽवलम्बनम् । त्वयापि रहिता साहं वद गच्छामि कां गतिम् ॥१७८॥

अर्थ: पिता, पति अथवा पुत्र ये तीन ही कुलवती स्त्रियोंके आधार हैं। इनमें मेरे पिता तो अपना समय पूरा कर चुके हैं और पति दीक्षा लेनेके लिए उत्सुक हैं इस प्रकार इस समय मेरे जीवनका आधार एक तू ही है सो यदि तू भी मुझे छोड़ रहा है तो बता मैं किस दशाको प्राप्त होऊँ ॥१७७-१७८॥


सोऽवोचदुपलैरम्ब क्षितिरत्यन्तकर्कशा । भवत्या विषमा पद्भ्यां गन्तुं सा शक्यते कथम् ॥१७९॥

अर्थ: यह सुन रामने कहा कि हे माता ! पृथ्वी पत्थरोंसे अत्यन्त कठोर है आप इस ऊँची-नीची पृथ्वीपर पैरोंसे किस प्रकार चल सकोगी ? ॥१७९॥


तस्मादेकक एवाहं विधाय सुखमाश्रयम् । यानेन केनचिन्नेष्ये भवन्तीं त्यजनं कुतः ॥१८०॥

अर्थ: इसलिए मैं अभी अकेला ही जाता हूँ फिर सुखकारी कोई स्थान ठीक कर किसी यानके द्वारा आपको वहाँ ले जाऊँगा अतः आपका छोड़ना कैसे हुआ ? ॥१८०॥


यथा स्पृशामि ते मातः पादावेष तथा ध्रुवम् । आगमिष्यामि नेतुं त्वां मुञ्च कार्यविचक्षणे ॥१८१॥

अर्थ: हे माता ! मैं आपके चरणोंका स्पर्श कर कहता हूँ कि मैं आपको ले जानेके लिए अवश्य ही आऊँगा । हे कार्यके समझनेमें निपुण माता ! इस समय मुझे छोड़ दे ॥१८१॥


एवमुक्ते विमुक्तः सन् परिसान्त्व्य सुभाषितैः । पुनश्च पितरं प्राप्तप्रबोधं प्रणिपत्य सः ॥१८२॥

अर्थ: रामके ऐसा कहनेपर माताने उन्हें छोड़ दिया और अनेक हितकारी वचन कहकर उन्हें सान्त्वना दी । अब तक पिता दशरथ प्रबोधको प्राप्त हो चुके थे इसलिए रामने पुनः पास जाकर उन्हें प्रणाम किया ॥१८२॥


शेषं मातृजनं नत्वा परिसान्त्व्य सुभाषितैः । अविषण्णमहाचेताः सर्वन्यायविचक्षणः ॥१८३॥

भ्रातृबन्धुपरिष्वङ्गं कृत्वा संभाषणं तथा । सीतायाः सदनं प्राप्तः प्रेमनिर्भरमानसः ॥१८४॥

अर्थ: अपराजिताके सिवाय अन्य माताओंको नमस्कार कर अनेक मधुर वचनोंसे उन्हें सान्त्वना दी, भाई-बन्धुओंका आलिंगन कर उनके साथ मधुर सम्भाषण किया और तदनन्तर जिनका उदार हृदय विषादसे रहित था, तथा जो सर्व प्रकारके न्यायमें निपुण थे ऐसे राम हृदयको प्रेमसे भरकर सीताके महलमें पहुँचे ॥१८३-१८४॥


प्रिये त्वं तिष्ठ चात्रैव गच्छाम्यहं पुरान्तरम् । ततो जगाद साध्वी सा यत्र त्वं तत्र चाप्यहम् ॥१८५॥

अर्थ: राम बोले कि - ‘हे प्रिये ! तुम यहीं पर रहो मैं दूसरे नगरको जाता हूँ’ । तदनन्तर उस पतिव्रताने एक ही उत्तर दिया कि ‘जहाँ आप रहेंगे वहीं मैं भी रहूँगी’ ॥१८५॥


मन्त्रिणो नृपतीन् सर्वान् परिवर्गं च सादरम् । आपृच्छच्छेकवर्गेऽपि भाषणाल्लापताकुलः ॥१८६॥

अर्थ: इसके पश्चात् रामने समस्त मन्त्रियोंसे, राजाओंसे तथा परिवारके अन्य लोगोंसे बड़े आदरके साथ पूछा । नगरमें जो बुद्धिमान् मनुष्य थे उनके साथ बड़ी तत्परतासे वार्तालाप किया ॥१८६॥


प्रीत्या संवर्धितं भूयः कृतालिङ्गनमादृतम् । मित्रवर्गं सवाष्पाक्षं पुनरुक्तं न्यवर्तयत् ॥१८७॥

अर्थ: इस समय प्रीतिवश बहुत-से मित्र इकट्ठे हो गये थे जो बार-बार आलिंगन कर रहे थे, आदरसे भरे हुए थे तथा जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे । रामने अनेक बार कहकर उन्हें वापस लौटाया ॥१८७॥


स्निग्धेन चक्षुषा पश्यन् प्रधानान्राजिवारणान् । निरगच्छत्पितुर्गेहान्मन्दरस्थिरमानसः ॥१८८॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका मन मेरु पर्वतके समान स्थिर था ऐसे राम, मुख्य-मुख्य घोड़ों तथा हाथियोंको स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखते हुए पिताके घरसे बाहर निकल पड़े ॥१८८॥


आडुढौकन् द्रुतं चारु सामन्ता वाजिवारणम् । पद्मेन न गृहीतास्ते परमन्यायवेदिना ॥१८९॥

अर्थ: यद्यपि सामन्त लोग शीघ्र ही सुन्दर घोड़े और हाथी ले आये परन्तु परम न्यायके जाननेवाले रामने उन्हें ग्रहण नहीं किया ॥१८९॥


विदेशगमनोद्युक्तं दृष्ट्वा तं जानकी भृशम् । श्रीमदंशुकसंवीता विकसत्पद्मलोचना ॥१९०॥

प्रणम्य श्वसुरं श्वश्रूरापृच्छ्य च सुहृज्जनम् । विनीतानुययौ नाथं पौलोमीव सुराधिपम् ॥१९१॥

अर्थ: पतिको विदेश-गमनके लिए उद्यत देख, जिसके शरीरपर सुन्दर वस्त्रका आवरण था, जिसके नेत्र फूले हुए कमलके समान थे ऐसी सीता भी, सास-श्वसुरको प्रणाम कर तथा मित्रजनोंसे पूछकर, जिस प्रकार इन्द्राणी इन्द्रके पीछे चलती है उसी प्रकार रामके पीछे चलने लगी ॥१९०-१९१॥


दृष्ट्वा तमुद्यतं गन्तुं स्नेहनिर्भरमानसः । लक्ष्मणोऽचिन्तयत् क्रोधं वहन्नयनलक्षकम् ॥१९२॥

अन्यायमीदृशं कर्तुं कथं तातेन वाञ्छितम् । स्वार्थसंसक्तनित्याशं धिक् स्त्रैणमनपेक्षितम् ॥१९३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त स्नेहसे भरा हुआ था ऐसे लक्ष्मणने जब रामको जाते हुए देखा तो नेत्रोंमें छलकते हुए क्रोधको धारण करता हुआ वह चिन्ता करने लगा कि अहो! पिताजी ऐसा अन्याय क्यों करना चाहते हैं ? जिसमें निरन्तर स्वार्थ साधनकी ही आशा लगी रहती है तथा जिसमें दूसरेकी कुछ भी अपेक्षा नहीं की जाती ऐसे स्त्री स्वभावको धिक्कार हो ॥१९२-१९३॥


अहो महानुभावोऽयं ज्यायान् पुरुषसत्तमः । मुनेरपीदृशं स्वान्तं दुष्करं जातु जायते ॥१९४॥

अर्थ: अहो ! बड़े भाई राम महानुभाव हैं तथा पुरुषोंमें अत्यन्त श्रेष्ठ हैं । इनके समान दुर्लभ हृदय तो मुनिके भी जब कभी ही होता है ॥१९४॥


किमद्यैव करोम्यन्यां सृष्टिमुत्सृज्य दुर्जनान् । भरतस्य बलादाहो करोमि विमुखां श्रियम् ॥१९५॥

अर्थ: क्या दुर्जनोंको छोड़कर आज ही दूसरी सृष्टि रच डालूँ या बलपूर्वक लक्ष्मीको भरतसे विमुख कर दूँ ? ॥१९५॥


विधातुरद्य सामर्थ्यं भनज्मि चिरमूर्जितम् । निरुद्ध्य पादयोर्ज्येष्ठं करोमि श्रीसमुत्सुकम् ॥१९६॥

अर्थ: मैं आज विधाताकी बलवती सामर्थ्यको नष्ट करता हूँ और चरणोंमें पड़कर बड़े भाईको लक्ष्मीमें उत्सुक करता हूँ ॥१९६॥


न युक्तमथवा चित्तं जातक्रोधानुगस्य मे । क्रोधः करोति मोहान्धमपि दीक्षामुपाश्रितम् ॥१९७॥

अर्थ: अथवा क्रोधके वशीभूत हो मुझे ऐसा विचार करना उचित नहीं है क्योंकि क्रोध दीक्षा धारण करनेवाले मुनिको भी मोहसे अन्धा बना देता है ॥१९७॥


किमनेन विचारेण कृतेनानुचितेन मे । ज्येष्ठस्तातश्च जानाति सांप्रतासांप्रतं बहु ॥१९८॥

अर्थ: मुझे इस अनुचित विचार करनेसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि बड़े भाई राम तथा पिता ही ‘यह कार्य उचित है अथवा अनुचित’ यह अच्छी तरह जानते हैं ॥१९८॥


सितकीर्तिसमुत्पत्तिर्विधातव्या हि नः पितुः । तूष्णीमेवानुगच्छामि ज्यायान्सं साधुकारिणम् ॥१९९॥

अर्थ: हमें पिताकी उज्ज्वल कीर्ति ही उत्पन्न करनी चाहिए अतः मैं चुपचाप उत्तम कार्य करनेवाले बड़े भाईके ही साथ जाता हूँ ॥१९९॥


प्रशमय्य स्वयं कोपमित्यादाय शरासनम् । प्रणम्यापृच्छ्य चाशेषं जनं गुरुपुरस्सरम् ॥२००॥

महाविनयसंपन्नो मार्गयोग्यकृताकृतिः । लक्ष्मीनिलयवक्षस्कः पद्मस्यानुपदं ययौ ॥२०१॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मण स्वयं ही क्रोध शान्त कर, धनुष लेकर तथा पिता आदि समस्त जनोंसे पूछकर भी रामके पीछे चलने लगा। उस समय लक्ष्मण महाविनयसे सम्पन्न था, मार्गके योग्य उसकी वेषभूषा थी, तथा उसका वक्षःस्थल लक्ष्मीका घर था ॥२००-२०१॥


पितरौ परिवर्गेण सहितौ तनयान्वितौ । वर्षा इव कुर्वाणौ तौ धाराभिर्नयनाम्भसा ॥२०२॥

अर्थ: उस समयका दृश्य बड़ा ही करुण था। सीताके साथ राम-लक्ष्मण आगे बढ़े जाते थे और माता-पिता परिवार तथा शेष दो पुत्रोंके साथ धारा-प्रवाह आँसुओंसे मानो वर्षा कर रहे थे ॥२०२॥


परिसान्त्वनसूरिभ्यां प्राप्ताभ्यां निश्चयं परम् । कृच्छ्रान्निवर्तितौ ताभ्यां प्रणिपत्य पुनः पुनः ॥२०३॥

अर्थ: परन्तु दोनों भाई दृढ़ निश्चयको प्राप्त थे और सान्त्वना देनेमें अत्यन्त निपुण थे इसलिए उन्होंने बार-बार चरणोंमें गिरकर माता-पिताको बड़ी कठिनाईसे वापस किया ॥२०३॥


निवर्त्यमानबन्धूनां समूहेनान्विताविमौ । राजगेहाद्विनिष्क्रान्तौ देवाविव सुरालयात् ॥२०४॥

अर्थ: उन्होंने भाई-बन्धुओंको बहुत लौटाया फिर भी वे लौटे नहीं । अन्तमें जिस प्रकार स्वर्गसे देव बाहर निकलते हैं उसी प्रकार दोनों भाई राजमहलसे बाहर निकले ॥२०४॥


वर्तते किमिदं मातः कस्येदं मतमीदृशम् । अभाग्येयं पुरी कष्टमथवा सकला मही ॥२०५॥

अर्थ: 'हे माता ! यह क्या हो रहा है ? यह ऐसा किसका मत था ? अर्थात् किसके कहनेसे यह सब हुआ है ? यह नगरी बड़ी अभागिन है अथवा नगरी ही क्यों समस्त पृथिवी अभागिन है ॥२०५॥


यामोऽनेन समं दुःखमेताभ्यां सह गम्यते । महाशक्ताविमौ कृच्छ्राद्धरणीधरगह्वरात् ॥२०६॥

अर्थ: अब हम इनके साथ ही चलेंगे, इनके साथ रहनेसे सब दुःख दूर हो जायेगा । ये दोनों ही दुःखरूपी पर्वतकी गुहासे उद्धार करनेमें अत्यन्त समर्थ हैं ॥२०६॥


पश्य सीता कथं याति नाथेनैषानुमोदिता । अस्याः सुविहितं सर्वं पतिभ्राता करिष्यति ॥२०७॥

अर्थ: देखो, यह सीता कैसी जा रही है ? पतिने इसे साथ चलनेकी अनुमति दे दी है । देवर इसका सब काम ठीक कर देगा ॥२०७॥


अहो परमधन्येयं जानकी रूपशालिनी । विनयांशुकसंवीता भर्तारं यानुगच्छति ॥२०८॥

अर्थ: अहो ! जो विनयरूपी वस्त्रसे आवृत होकर पतिके पीछे-पीछे जा रही है ऐसी यह रूपवती जानकी अत्यन्त धन्य है - बड़ी भाग्यवती है ॥२०८॥


अस्माकमपि नारीणामेषैव भवताद् गतिः । उदाहरणभूतेयं भर्तृदैवतयोषिताम् ॥२०९॥

अर्थ: हमारी स्त्रियोंकी भी ऐसी ही गति हो । यह पतिव्रता स्त्रियोंके लिए उदाहरणस्वरूप है ॥२०९॥


पश्य मातरमुज्झित्वा नेत्राम्बुप्लाविताननाम् । एष लक्ष्मीधरो गन्तुमुद्युक्तो ज्यायसा समम् ॥२१०॥

अर्थ: अहो ! देखो, जिसका मुख आँसुओंसे भीग रहा है ऐसी माताको छोड़कर यह लक्ष्मण बड़े भाईके साथ जानेके लिए उद्यत हुआ है ॥२१०॥


अहो प्रीतिरहो भक्तिरहो शक्तिरहो क्षमा । अहो विनयसंभारः श्रीमतोऽस्य विराजते ॥२११॥

अर्थ: अहो ! इस लक्ष्मणकी प्रीति धन्य है, भक्ति धन्य है, शक्ति धन्य है, क्षमा धन्य है और विनयका समूह धन्य है ॥२११॥


भरतस्य किमाकूतं कृतं दशरथेन किम् । रामलक्ष्मणयोरेषा का मनीषा व्यवस्थिता ॥२१२॥

अर्थ: भरतका क्या अभिप्राय था ? और राजा दशरथने यह क्या कर दिया ? राम-लक्ष्मणके भी यह कौन-सी बुद्धि उत्पन्न हुई है ? ॥२१२॥


कालः कर्मेश्वरो दैवं स्वभावः पुरुषः क्रिया । नियतिर्वा करोत्येवं विचित्रं कः समीहितम् ॥२१३॥

अर्थ: यह सब काल, कर्म, ईश्वर, दैव, स्वभाव, पुरुष, क्रिया अथवा नियति ही कर सकती है । ऐसी विचित्र चेष्टाको और दूसरा कौन कर सकता है ? ॥२१३॥


वर्ततेऽनुचितं बाढं क्व गता स्थानदेवता । एवमादिस्तदा जज्ञे ध्वनिर्जनसमूहतः ॥२१४॥

अर्थ: यह सब बड़ा अनुचित हो रहा है । इस स्थानके देवता कहाँ गये’ ? उस समय लोगोंकी भीड़से इस प्रकारके शब्द निकल रहे थे ॥२१४॥


कुमाराभ्यां समं गन्तुमुत्सुके सकले जने । पुरी शून्यगृहा जाता नष्टाशेषसमुत्सवा ॥२१५॥

अर्थ: उस समय समस्त लोग राम-लक्ष्मणके साथ जानेके लिए उत्सुक हो रहे थे इसलिए नगरीके समस्त घर सूने हो गये थे तथा नगरीका समस्त उत्सव नष्ट हो गया था ॥२१५॥


पुष्पप्रकरसंपूर्णाः समस्ता द्वारभूमयः । पिच्छलत्वं समानीताः शोकपूर्णजनाश्रुभिः ॥२१६॥

अर्थ: समस्त घरोंके दरवाजोंकी जो भूमियाँ पहले फूलोंके समूहसे व्याप्त रहती थीं वे उस समय शोकसे भरे मनुष्योंके आंसुओंसे पंकिल अर्थात् कर्दमयुक्त हो गयी थीं ॥२१६॥


जनस्योत्सार्यमाणस्य वरूथिन्यो नरोत्तमैः । वीचयः सागरस्येव विक्षोभ्यन्ते महानिलैः ॥२१७॥

अर्थ: जिस प्रकार महापवनसे समुद्रकी लहरें क्षोभको प्राप्त होती हैं उसी प्रकार उत्तम मनुष्योंके द्वारा दूर हटाये गये लोगोंकी पंक्तियां क्षोभको प्राप्त हो रही थीं ॥२१७॥


भक्तिभिः पूज्यमानोऽपि संभाषणसमुद्यतः । दाक्षिण्यपरमः पद्मो मेने विघ्नं पदे पदे ॥२१८॥

अर्थ: लोग पद-पदपर भक्तिवश रामकी पूजा करते थे और भक्तिवश उनके साथ वार्तालाप करनेके लिए उद्यत होते थे सो अत्यन्त सरल प्रकृतिके धारक राम उसे विघ्न मानते थे ॥२१८॥


असक्त इव तं द्रष्टुमसमञ्जसमीदृशम् । मन्दं मन्दांशुसङ्घातो रविरस्तमुपागमत् ॥२१९॥

अर्थ: तदनन्तर धीरे-धीरे जिसकी किरणें मन्द पड़ गयी थीं ऐसा सूर्य अस्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो वह इस अनुचित कार्यको देखनेके लिए असमर्थ होनेसे ही अस्त हो गया था ॥२१९॥


रविणा दिवसस्यान्ते त्यक्ताः सर्वमरीचयः । ज्येष्ठचक्रधरेणेव संपदो मुक्तिमिच्छता ॥२२०॥

अर्थ: जिस प्रकार मुक्तिकी इच्छा करनेवाले प्रथम चक्रवर्ती भरतने सब सम्पत्तियां छोड़ दी थीं उसी प्रकार दिनके अन्तमें सूर्यने सब किरणें छोड़ दीं ॥२२०॥


दधाना परमं रागमुचिताम्बरयोगिनी । अन्वियाय रविं संध्या सीता दाशरथिं यथा ॥२२१॥

अर्थ: जिस प्रकार परम राग अर्थात् उत्कृष्ट प्रेमको धारण करनेवाली तथा उचित-अम्बर अर्थात् योग्य वस्त्रसे सुशोभित सीता रामके पीछे जा रही थी उसी प्रकार परम राग अर्थात् उत्कृष्ट लालिमा और उचित-अम्बर अर्थात् अभ्यस्त आकाशके समागमको प्राप्त सन्ध्या सूर्यके पीछे जा रही थी ॥२२१॥


ततो विशेषविज्ञानविध्वंसनविधायिना । रामव्रज्योद्भवेनेव तमसा व्याततं जगत् ॥२२२॥

अर्थ: तदनन्तर वस्तुओंके विशेष ज्ञानको नष्ट करनेवाले अन्धकारसे समस्त जगत् व्याप्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो रामके जानेसे उत्पन्न शोकसे ही व्याप्त हो गया हो ॥२२२॥


अनुप्रयातुकामस्य कर्तुं लोकस्य वञ्चनम् । ससीतौ तावरेशस्य स्थानं प्राप्तौ क्षपामुखे ॥२२३॥

अर्थ: तत्पश्चात् पीछे चलनेके लिए उत्सुक मनुष्योंको धोखा देनेके लिए सीता सहित वे दोनों कुमार सायंकालके समय अरहनाथ भगवान्के मन्दिरमें पहुँचे ॥२२३॥


भवान्तकस्य भवनं नित्यालंकृतपूजितम् । चन्दनाम्भोऽनुलिप्तक्ष्मं त्रिद्वारं तुङ्गतोरणम् ॥२२४॥

दर्पणादिविभूषं तत्ससीतौ सप्रदक्षिणम् । प्रविष्टावनपेक्षौ तौ यथाविधि विशारदौ ॥२२५॥

अर्थ: संसारको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्का वह मन्दिर सदा अलंकृत रहता था, लोग उसकी निरन्तर पूजा करते थे, चन्दनके जलसे वहांकी भूमि लिप्त रहती थी, उसमें तीन दरवाजे थे, ऊँचा तोरण था और दर्पणादि मंगल द्रव्योंसे वह विभूषित रहता था। सो अतिशय बुद्धिमान् तथा अन्यकी अपेक्षासे रहित राम-लक्ष्मणने सीताके साथ प्रदक्षिणा देकर उस मन्दिरमें विधिपूर्वक प्रवेश किया ॥२२४-२२५॥


तृतीये तु जनो द्वारे प्रतिहारेण रुध्यते । कर्मणा मोहनीयेन शिवमिच्छन् कुदृष्टिवत् ॥२२६॥

अर्थ: दो दरवाजे तक तो सब मनुष्य चले गये परन्तु तीसरे दरवाजेपर द्वारपालने उन्हें उस प्रकार रोक दिया जिस प्रकारकी मोक्षकी इच्छा करनेवाले मिथ्यादृष्टिको मोहनीय कर्म रोक देता है ॥२२६॥


स्थापयित्वा धनुर्वर्म पुण्डरीकनिभेक्षणौ । जिनेन्द्रवदनं दृष्ट्वा तौ वरां धृतिमागतौ ॥२२७॥

अर्थ: कमलके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मण, अपने धनुष तथा कवच एक ओर रख भगवान्के दर्शन कर परम सन्तोषको प्राप्त हुए ॥२२७॥


मणिपीठस्थितं सौम्यं प्रलम्बितभुजद्वयम् । श्रीवत्सभासुरोरस्कं व्यक्तनिश्शेषलक्षणम् ॥२२८॥

संपूर्णचन्द्रवदनं विबुद्धकमलेक्षणम् । अस्मर्यमाणनिर्माणविम्बमष्टादशं जिनम् ॥२२९॥

प्रणम्य सर्वभावेन समभ्यर्च्य च सादरौ । स्थितौ तत्र विभावर्यां चिन्तयन्तौ सुहृज्जनम् ॥२३०॥

अर्थ: तदनन्तर जो मणिमयी चौकीपर विराजमान थे, सौम्य थे, जिनकी दोनों भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं, जिनका वक्षःस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे सुशोभित था, जिनके समस्त लक्षण स्पष्ट दिखाई देते थे, जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था, जिनके नेत्र विकसित कमलके समान थे, और जिनके प्रतिबिम्बकी रचना भुलायी नहीं जा सकती थी । ऐसे अठारहवें अरनाथ जिनेन्द्रको सर्व भाव अर्थात् मन-वचन-कायसे प्रणाम कर तथा उनकी पूजा कर आदरसे भरे हुए राम-लक्ष्मण मित्रजनोंकी चिन्ता करते हुए रात्रिके समय उसी मन्दिरमें स्थित रहे ॥२२८-२३०॥


तत्र तावुषितौ ज्ञात्वा मातरः पुत्रवत्सलाः । एत्य बाष्पाकुलाः स्नेहात् परिष्वज्य पुनः पुनः ॥२३१॥

पुत्राभ्यां सह संमन्त्र्य दर्शने तृप्तिवर्जिताः । दोलारूढसमात्मानो जग्मुर्दशरथं पुनः ॥२३२॥

अर्थ: पुत्रवत्सल माताओंको जब पता चला कि राम-लक्ष्मण अर-जिनेन्द्रके मन्दिरमें ठहरे हैं तब वे तत्काल दौड़ी आयीं । उस समय उनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे । उन्होंने बार-बार पुत्रोंका आलिंगन किया और बार-बार उनके साथ मन्त्रणा - सलाह की । उन्हें पुत्रोंको देखते-देखते तृप्ति ही नहीं होती थी और संकल्प-विकल्पके कारण उनकी आत्मा हिंडोले पर चढ़ी हुईके समान चंचल हो रही थी । अन्तमें वे पुनः राजा दशरथके पास चली गयीं ॥२३१-२३२॥


सर्वासामेव शुद्धीनां मनःशुद्धिः प्रशस्यते । अन्यथालिङ्ग्यतेऽपत्यमन्यथालिङ्ग्यते पतिः ॥२३३॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि सब शुद्धियोंमें मनकी शुद्धि ही सबसे प्रशस्त है। स्त्री पुत्र और पति दोनोंका आलिंगन करती है परन्तु परिणाम पृथक्-पृथक् रहते हैं ॥२३३॥


ततस्ता गुणलावण्यरूपवेषमहोदयाः । जग्मुर्मधुरवादिन्यः प्रियं मन्दरनिश्चलम् ॥२३४॥

कुलपोतं निमज्जन्तं प्रिय शोकमहार्णवे । संधारय ससौमित्रिं विनिवर्तय राघवम् ॥२३५॥

अर्थ: तदनन्तर गुण-लावण्यरूप वेष आदि महाअभ्युदयको धारण करनेवाली चारों मिष्टवादिनी रानियां मेरुके समान निश्चल पतिके पास गयीं और बोलीं कि हे वल्लभ ! शोकरूपी समुद्रमें डूबते हुए इस कुलरूपी जहाजको रोको और लक्ष्मण सहित रामको वापस बुलाओ ॥२३४-२३५॥


सोऽवोचन्न ममायत्तं जगद्यात्र विकारिकम् । प्रमाणं चेन्मदीयेच्छा सुखमेवास्तु जन्तुषु ॥२३६॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राजा दशरथने कहा कि यह विकाररूप जगत् मेरे अधीन नहीं। मेरी इच्छानुसार यदि काम हो तो मैं तो चाहता हूँ कि समस्त प्राणियोंमें सदा सुख ही रहे ॥२३६॥


जन्ममृत्युजराव्याधैर्मास्म कश्चिद्विबाध्यताम् । नाना कर्मस्थितौ त्वस्यां को नु शोचति कोविदः ॥२३७॥

अर्थ: जन्म, जरा और मरणरूपी व्याधोंके द्वारा किसीका घात नहीं हो परन्तु कर्मोंकी स्थिति नाना प्रकारकी है अतः कौन विवेकी शोक करे ॥२३७॥


पर्याप्तिर्नास्ति मृष्टानामिष्टानां दर्शनेषु वा । बान्धवानां सुखानां च जीवितस्य धनस्य च ॥२३८॥

अर्थ: बान्धवादिक इष्ट पदार्थोंके देखनेमें किसीको तृप्ति नहीं है सांसारिक सुख, धन और जीवनके विषयमें भी किसीको सन्तोष नहीं है ॥२३८॥


असमाप्तेन्द्रियसुखं कदाचित्स्थितिसंक्षये । पक्षी वृक्षमिव त्यक्त्वा देहं जन्तुर्गमिष्यति ॥२३९॥

अर्थ: कदाचित् इन्द्रिय-सुखकी पूर्णता न हो और आयु समाप्त हो जावे तो यह प्राणी जिस प्रकार पक्षी एक वृक्षको छोड़कर दूसरे वृक्षपर चला जाता है उसी प्रकार एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है ॥२३९॥


पुत्रवत्यो भवत्योऽत्र निवर्तयत सत्सुतौ । उपभुङ्ध्वं सुविश्रब्धाः पुत्रभोगोदयद्युतिम् ॥२४०॥

अर्थ: आप लोग पुत्रवाली हैं अर्थात् आपके पुत्र हैं इसलिए गुणी पुत्रोंको लौटा लो और निश्चिन्त होकर पुत्रभोगका अभ्युदय भोगो ॥२४०॥


त्यक्तराज्याधिकारोऽहं निवृत्तः पापचेष्टितात् । मवादुग्रं भयं प्राप्तः करोमि चरितं मुनेः ॥२४१॥

अर्थ: मैं तो राज्यका अधिकार छोड़ चुका हूँ, इस पापपूर्ण चेष्टासे निवृत्त हो गया हूँ और संसारसे तीव्र भय प्राप्त कर चुका हूँ इसलिए मुनिव्रत धारण करूँगा ॥२४१॥


एवं निश्चितचित्तो दशरथनृपतिस्समग्रमौदासीन्यम् ।
भेजे रविसमतेजाः सकलकुभावाभिलाषदोषविमुक्तः ॥२४२॥

अर्थ: इस प्रकार जिन्होंने अपने चित्तमें दृढ़ निश्चय कर लिया था, जो सूर्यके समान तेजस्वी थे और जो समस्त मिथ्याभावोंकी अभिलाषारूपी दोषसे रहित थे ऐसे राजा दशरथने सब प्रकारकी उदासीनता धारण कर ली ॥२४२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशरथप्रव्रज्याभिधानं नामैकत्रिंशत्तमं पर्व ॥३१॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें राजा दशरथके वैराग्यका वर्णन करनेवाला इकतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३१॥

३२. द्वात्रिंशत्तमं पर्व (दशरथरामभरतानां प्रव्रज्यावनप्रस्थानराज्याभिधानं)

अथ तत्र क्षणं नीत्वा निद्रान्तौ धृतकङ्कटौ । अर्धरात्रे महाध्वान्ते निश्शब्दे शान्तमानवे ॥१॥

विधाय जानकीं मध्ये जिनं नत्वा सकार्मुकौ । सुवेषौ प्रस्थितौ दीपैः पश्यन्ताविव कामिनः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर राम-लक्ष्मण उस मन्दिरमें कहीं क्षण एक निद्रा लेकर अर्धरात्रिके समय जब घोर अन्धकार फैल रहा था, लोगोंका शब्द मिट गया था, और मनुष्य शान्त थे तब जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर कवच धारण कर तथा धनुष उठाकर चले। वे सीताको बीचमें करके चल रहे थे। दोनों ही उत्तम वेषके धारक थे तथा दीपक हाथमें लिये थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो मण्डपादि स्थानोंमें कामी जनोंको देख ही रहे थे ॥१-२॥


कश्चित् सुरतखिन्नाङ्गो बाहुपञ्जरवर्तिनीम् । कृत्वा प्राणसमां निद्रामतिगाढां निषेवते ॥३॥

अर्थ: उन्होंने देखा कि जिसका शरीर सम्भोगसे खिन्न हो रहा है ऐसा कोई पुरुष अपनी प्राणवल्लभाको भुजारूप पंजरके मध्य रखकर अत्यन्त गाढ़ निद्राका सेवन कर रहा है ॥३॥


कृत्वापराधकः पूर्वं कोपिनीं कश्चिदङ्गनाम् । प्रत्याययत्यलीकेन शपथेन पुनः पुनः ॥४॥

अर्थ: अपराध करनेवाले किसी पुरुषने पहले तो अपनी स्त्रीको कुपित कर दिया और पीछे बार-बार झूठी शपथके द्वारा उसे विश्वास दिला रहा है ॥४॥


अपरो मानमुत्सृज्य कान्तया स्मरतप्तया । कृतकं कोपमायातः सुवाग्भिः परिसान्त्व्यते ॥५॥

अर्थ: कोई एक पुरुष कृत्रिम कोपकर पृथक् बैठा है और उसकी स्त्री कामसे उत्तप्त हो उसे मधुर वचनोंसे शान्त कर रही है ॥५॥


सुरतायासखिन्नाङ्गा देहे कस्यचिदङ्गना । लीना तत्त्वमिव प्राप्ता गाढां निद्रां निषेवते ॥६॥

अर्थ: सुरतके श्रमसे जिसका शरीर खिन्न हो रहा था ऐसी कोई स्त्री पतिके शरीरमें इस तरह लीन होकर गाढ़ निद्रा ले रही है जिस तरह कि मानो वह पतिके साथ अभेदको ही प्राप्त हो चुकी हो ॥६॥


नवसङ्गमनां कश्चिज्जायां विमुखवर्तिनीम् । कृच्छ्रात् प्रस्तावमानीय सम्भाषयति संमदी ॥७॥

अर्थ: कोई एक पुरुष लज्जाके कारण विमुख बैठी नवोढ़ा पत्नीको बड़ी कठिनाईसे अनुकूल कर हर्षपूर्वक उसके साथ वार्तालाप कर रहा है ॥७॥


कस्मैचित्पूर्ववैगुण्यं कथयत्यङ्गनाखिलम् । अपरो वेदयत्यस्मै विस्रब्धः कृतमाननः ॥८॥

अर्थ: कोई एक स्त्री अपने पतिके लिए उसके द्वारा पहले किये हुए सब अपराध बता रही है और वह उसे मनाकर निश्चिन्ततासे उसका समाधान कर रहा है ॥८॥


कश्चित् परगृहं प्राप्तो धूर्तः सङ्कुचिताङ्गकः । उद्वासयति मार्जारं वातायनकृतस्थितिम् ॥९॥

अर्थ: कोई एक धूर्त पुरुष अपने शरीरको संकुचित कर दूसरेके घर पहुँचा है और वहाँ झरोखेमें बैठे बिलावको वहाँसे हटा रहा है ॥९॥


अपरः कृतसंकेतां शून्यदेवकुलान्तरे । कुलटामाकुलीभूतो मुहुरुत्थाय वीक्षते ॥१०॥

अर्थ: किसी पुरुषने अपनी कुलटा प्रेमिकाको सूने मठमें आनेका संकेत दिया था पर उसने आनेमें विलम्ब किया इसलिए वह व्याकुल हो बार-बार उठकर उसे देख रहा है ॥१०॥


चिरादुपगतं कश्चिद् घनरोषाभिसारिका । ताडयत्युत्तरीयेण बध्वा मेखलया खलम् ॥११॥

अर्थ: किसी अभिसारिकाका प्रेमी देरसे आया था इसलिए वह अत्यन्त कुपित हो उसे मेखलासे बांधकर उत्तरीय वस्त्रसे पीट रही है ॥११॥


अभिसारिकया साकमन्यः प्राप्य समागमम् । शुनोऽपि पदशब्देन याति त्रासमनुत्तमम् ॥१२॥

अर्थ: और कोई एक मनुष्य अभिसारिकाके साथ समागम प्राप्त कर कुत्तेके भी पैरकी आहट सुनकर अत्यधिक भयको प्राप्त हो रहा है ॥१२॥


इति निर्यूहदेशेषु मण्डपेषु च कामिनाम् । शृण्वन्तौ वीक्षमाणौ च वृत्तान्तं जग्मतुः शनैः ॥१३॥

अर्थ: इस प्रकार बाह्य झरोखों और मण्डपोंमें कामीजनोंको देखते तथा उनके वृत्तान्तको सुनते हुए राम और लक्ष्मण धीरे-धीरे जा रहे थे ॥१३॥


अवद्वारेण निर्गत्य पुरीतः पश्चिमेन तौ । आश्रितौ मार्गयोगेन दक्षिणौ दक्षिणां दिशम् ॥१४॥

अर्थ: वे अतिशय सरल थे और वे नगरीके पश्चिम द्वारसे बाहर निकलकर आगे मिलनेवाले मार्गसे दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥१४॥


त्रियामान्ते ततोऽस्पष्टे सामन्ता वेगवाहिनः । राघवेण समं गन्तुमुत्सुका भक्तिनिर्भराः ॥१५॥

यथाश्रुति परिज्ञाय बन्धुवञ्चनकारिणः । समीपं रामदेवस्य प्रापुर्मन्थरगामिनः ॥१६॥

अर्थ: इधर जब भक्तिसे भरे तथा रामके साथ जानेके लिए उत्सुक सामन्तोंको कानोंकान यह पता चला कि राम तो बन्धुजनोंको धोखा देकर चले गये हैं तब वे प्रातःकाल होनेके पूर्व जब कुछ-कुछ अँधेरा था वेगसे घोड़े दौड़ाकर मन्थर गतिसे चलनेवाले रामके पास जा पहुँचे ॥१५-१६॥


ते चक्षुर्गोचरीकृत्य समेतौ रामलक्ष्मणौ । महाविनयसंपन्नाः पद्भ्यामेव ढुढौकिरे ॥१७॥

अर्थ: जब उन्हें साथ-साथ चलनेवाले राम-लक्ष्मण नेत्रोंसे दिखने लगे तब वे महाविनयसे युक्त हो पैदल ही चलने लगे ॥१७॥


प्रणिपत्य च भावेन सक्रमं संबभाषिरे । यावत्तावन्महासैन्यं तद्गवेषार्थमाययौ ॥१८॥

अर्थ: सामन्त लोग भावपूर्वक प्रणाम कर जबतक उनके साथ यथाक्रमसे वार्तालाप करते हैं तबतक उन्हें खोजनेके लिए बड़ी भारी सेना वहाँ आ पहुँची ॥१८॥


प्रशशंसुश्च ते सीतामिति निर्मलचेतसः । वयमस्याः प्रसादेन राजपुत्रौ समागताः ॥१९॥

अर्थ: अत्यन्त निर्मल चित्तके धारक सामन्त लोग सीताकी इस प्रकार स्तुति करने लगे कि हम लोग इसके प्रसादसे ही राजपुत्रोंको प्राप्त कर सके हैं ॥१९॥


अयास्यद्यदि नैताभ्यां सममेषा सुमन्थरा । ततः कथमिव प्राप्स्यामैतौ पवनरंहसौ ॥२०॥

अर्थ: यदि यह इनके साथ धीरे-धीरे नहीं चलती तो हम पवनके समान वेगशाली राजपुत्रोंको किस तरह प्राप्त कर सकते ? ॥२०॥


इयं नः सुसती माता परमप्रियकारिणी । एतस्याः सदृशी नान्या प्रशस्तास्ति क्षिताविह ॥२१॥

अर्थ: यह माता अत्यन्त सती तथा हम सबका बहुत भारी भला करनेवाली है । इस पृथिवीपर इसके समान दूसरी पवित्र स्त्री नहीं है ॥२१॥


तौ सीतागतिचिन्तत्वान्मन्द्मन्दं नरोत्तमौ । गव्यूतिमात्रमध्वानं सुखयोगेन जग्मतुः ॥२२॥

अर्थ: मनुष्योंमें उत्तम राम लक्ष्मण सीताकी गतिका ध्यान कर गव्यूति प्रमाण मार्गको ही सुखसे तय कर पाते थे ॥२२॥


सस्यानि बहुरूपाणि पश्यन्तौ क्षितिमण्डले । सरांसि कञ्जरम्याणि तरूंश्च गगनस्पृशः ॥२३॥

अर्थ: वे पृथिवीमण्डलपर नाना प्रकारके धान, कमलोंसे सुशोभित तालाब और गगनचुम्बी वृक्षोंको देखते हुए जा रहे थे ॥२३॥


आपूर्यमाणपर्यन्तौ वेगवद्भिर्नराधिपैः । घनागमे नदैर्गङ्गाकालिन्दीप्रवहाविव ॥२४॥

अर्थ: जिस प्रकार वर्षाऋतुमें गंगा और यमुनाके प्रवाह अनेक नदियोंसे मिलते रहते हैं उसी प्रकार राम-लक्ष्मणके पर्यन्त भाग भी अनेक वेगशाली राजाओंसे मिलते रहते थे ॥२४॥


ग्रामखेटमटम्बेषु घोषेषु नगरेषु च । लोकेन पूजितौ वीरौ भोजनादिभिरुत्तमौ ॥२५॥

अर्थ: ग्राम, खेट, मटम्ब, घोष तथा नगरोंमें लोग उन उत्तम वीरोंका भोजनादि सामग्रीके द्वारा सत्कार करते थे ॥२५॥


केचिद्ध्वजखेदेन सामन्ता व्रजतोस्तयोः । पश्चादज्ञापयित्वैव निवृत्ता ज्ञातनिश्चयाः ॥२६॥

अर्थ: दोनों ही भाई आगे बढ़ रहे थे, और सामन्त लोग मार्गके खेदसे दुःखी हो रहे थे। जब उन्हें इस बातका दृढ़ ज्ञान हो गया कि राम-लक्ष्मण लौटनेवाले नहीं हैं तब वे उनसे कहे बिना ही लौट गये ॥२६॥


अपरे त्रपया केचिद्भीत्यान्ये भक्तितत्पराः । अव्रजन् विनयात् पद्भ्यां दत्त्वा दुःखस्य मानसम् ॥२७॥

अर्थ: भक्तिमें तत्पर रहनेवाले कितने ही सामन्त लज्जासे और कितने ही भयसे अपने मनको दुःखी कर विनयपूर्वक उनके साथ पैदल चल रहे थे ॥२७॥


ततो हरिगजव्रातसङ्कुलारावभैरवाम् । परियात्राटवीं प्राप्तौ लीलया रामलक्ष्मणौ ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर राम-लक्ष्मण लीलापूर्वक परियात्रा नामकी उस अटवीमें पहुँचे जो कि सिंह और हस्तिसमूहके उच्च शब्दोंसे भयंकर हो रही थी ॥२८॥


तस्यां बहुलशर्वर्या तुल्यध्वान्तां महानगैः । निम्नगां शर्वरीमेतौ शबराश्रितरोधसाम् ॥२९॥

अर्थ: उस अटवीमें बड़े-बड़े वृक्षोंसे कृष्णपक्षकी निशाके समान घोर अन्धकार व्याप्त था। वहीं, जिसके किनारे अनेक शबर अर्थात् भील रहते थे ऐसी एक शर्वरी नामकी नदी थी। राम-लक्ष्मण वहाँ पहुँचे ॥२९॥


तस्या रोधसि विश्रम्य नानास्वादुफलोचिते । कांश्चिन्न्यवर्तयद्भूपान् पद्मः सुप्रतिबोधनः ॥३०॥

अर्थ: नाना प्रकारके मधुर फलोंसे युक्त उस नदीके तटपर विश्राम कर रामने समझा-बुझाकर कितने ही राजाओंको तो वापस लौटा दिया ॥३०॥


महतापि प्रयत्नेन निवृत्ता नापरे नृपाः । पद्मेन सहितं गन्तुं किल सञ्जातनिश्चयाः ॥३१॥

अर्थ: पर जिन्होंने रामके साथ जानेका निश्चय ही कर लिया था ऐसे अन्य अनेक राजा बहुत भारी प्रयत्न करनेपर भी नहीं लौटे ॥३१॥


गतस्ते निम्नगां दृष्ट्वा महानीलावभासिनीम् । चण्डवेगोर्मिसंघातनिर्मितोदरनिश्चिताम् ॥३२॥

उन्मज्जत्प्रबलग्राहकृतकल्लोलसङ्कुलाम् । वीचीमालासमाघातनिपतन्मृदुरोधसम् ॥३३॥

महाद्रिकन्दरास्फालप्रतिसूत्कारनादिनीम् । उद्वर्तमानमीनाङ्गस्फुरद्भास्कररोचिषम् ॥३४॥

उद्वृत्तनक्रसूत्कारजातदूरगशीकराम् । उड्डीयमाननिश्शेषभयपूर्णपतत्रगाम् ॥३५॥

संत्रासकम्पमानाङ्गा जगू रामं सलक्ष्मणम् । समुत्तारय नाथास्मानपि पद्मप्रसादवान् ॥३६॥

भृत्यानां भक्तिपूर्णानां प्रसादं कुरु लक्ष्मण । देवि ते कुरुते वाक्यं जानकि ब्रूहि लक्ष्मणम् ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर जो नदी महानील मणिके समान सुशोभित हो रही थी, अत्यन्त वेगशाली लहरोंके समूहसे जिसका मध्य भाग व्याप्त था, जो उखरते हुए बलवान् मगरमच्छोंकी टक्करसे उत्पन्न होनेवाली तरंगोंसे व्याप्त थीं, लहरोंके समूहके आघातपर जिसके कोमल किनारे उसीमें टूट-टूटकर गिर रहे थे, बड़े-बड़े पर्वतोंकी गुफाओंमें टकरानेसे जिसमें ‘सू-सू’ शब्द हो रहा था, जिसमें ऊपर तैरनेवाली मछलियोंके शरीरमें सूर्यकी किरणें प्रतिबिम्बित हो रही थीं, जिसमें उत्पात करनेवाले नाकोंकी सूत्कारसे जलके छींटे दूर-दूर तक उड़ रहे थे, और जिसके पाससे समस्त पक्षी भयभीत होकर उड़ गये थे ऐसी उस नदीको देखकर सब सामन्तोंके शरीर भयसे काँपने लगे । वे लक्ष्मण सहित रामसे बोले कि ‘हे नाथ ! हम लोगोंको भी नदीसे पार उतारो । हे पद्म ! प्रसन्न होओ, हे लक्ष्मण ! भक्तिसे भरे हुए हम सेवकोंपर प्रसन्नता करो । हे देवि ! लक्ष्मण तुम्हारी बात मानते हैं इसलिए इनसे कह दो’ ॥३२-३७॥


एवमादि गदन्तस्ते कृपणा बहु तां नदीम् । डुढौकिरे प्रसस्रुश्च नानाचेष्टाविधायिनः ॥३८॥

अर्थ: इत्यादि अनेक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वे दीन सामन्त उस नदीमें कूद पड़े तथा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए बहने लगे ॥३८॥


ततस्तान् राघवोऽवोचद्विश्रब्धो रोधसि स्थितः । अधुना विनिवर्तध्वं भद्रा भीममिदं वनम् ॥३९॥

अर्थ: तब किनारेपर निश्चिन्ततासे खड़े हुए रामने उन सबसे कहा कि हे भले पुरुषो ! अब तुम लौट जाओ । यह वन बहुत भयंकर है ॥३९॥


अस्माभिः सह युष्माकमियानेवैष सङ्गमः । एषा नद्यवधिर्जाता भवतौत्सुक्यवर्जिता ॥४०॥

अर्थ: हम लोगोंके साथ तुम्हारा इतना ही समागम था । अब हमारे और तुम्हारे बीचमें यह नदी सीमा बन गयी है इसलिए उत्सुकतासे रहित होओ ॥४०॥


तातेन भरतः स्वामी सर्वेषां वो निवेदितः । विसाध्वसास्तमावृत्य तिष्ठत क्षितिपालिनः ॥४१॥

अर्थ: पिताने तुम सबके लिए भरतको राजा बनाया है सो तुम सब निर्भय होकर उसीकी शरणमें रहो ॥४१॥


ततस्ते पुनरित्यूचुर्नाथास्माकं भवान् गतिः । प्रसादं कुरु मा त्याक्षीरस्मान् कारुण्यकोविद ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने फिर कहा कि हे नाथ ! हमारी गति तो आप ही हैं इसलिए हे दया-निपुण ! प्रसाद करो और हम लोगोंको नहीं छोड़ो ॥४२॥


निराश्रयाकुलीभूता त्वयेयं रहिता प्रजा । वद कं शरणं यातु सदृशः कस्तवापरः ॥४३॥

अर्थ: तुम्हारे बिना यह प्रजा निराधार होकर व्याकुल हो रही है । आप ही कहो किसकी शरणमें जावे ? आपके समान दूसरा है ही कौन? ॥४३॥


व्याघ्रसिंहगजेन्द्रादिव्यालजालसमाकुले । वसामो भवता सार्धमरण्ये न विना दिवि ॥४४॥

अर्थ: हम आपके साथ व्याघ्र, सिंह, गजेन्द्र आदि दुष्ट जीवोंके समूहसे भरे हुए वनमें रह सकते हैं पर आपके बिना स्वर्गमें भी नहीं रहना चाहते ॥४४॥


न नो निवर्तते चित्तं प्रतियामः कथं वयम् । महत्तरत्वमेतेन हृषीकेष्वर्जितं ननु ॥४५॥

अर्थ: हमारा चित्त ही नहीं लौटता है फिर हम कैसे लौटें ? यह चित्त ही तो इन्द्रियोंमें प्रधान है ॥४५॥


किं नो गृहेण किं भोगैः किं दारैः किं नु बन्धुभिः । भवता नररत्नेन मुक्तानां पापकर्मणाम् ॥४६॥

अर्थ: जब आप-जैसे नर-रत्न हमें छोड़ रहे हैं तब हम पापो जीवोंको घरसे क्या प्रयोजन है ? भोगोंसे क्या मतलब है ? स्त्रियोंसे क्या अर्थ है? और बन्धुओंकी क्या आवश्यकता है ? ॥४६॥


क्रीडास्वपि त्वया देव वञ्चिता स्मो न जातुचित् । संमानेनाधुना कस्माज्जातोऽस्यत्यन्तनिष्ठुरः ॥४७॥

अर्थ: हे देव ! क्रीड़ाओंमें भी कभी आपने हम लोगोंको सम्मानसे वंचित नहीं किया फिर इस समय अत्यन्त निष्ठुर क्यों हो रहे हो ? ॥४७॥


कोऽपराधो वदास्माकं भवच्चरणरेणुना । परमां वृद्धिमेतानां भक्तानां भृत्यवत्सल ॥४८॥

अर्थ: हे भृत्य-वत्सल ! हम लोग आपके चरणोंकी धूलिसे ही परम वृद्धिको प्राप्त हुए हैं । बताइए, हमारा क्या अपराध है ? ॥४८॥


अहो जानकि लक्ष्मीश रचितोऽयं शिरोञ्जलिः । प्रसादयतमीशं नः प्रसादी भवतोरयम् ॥४९॥

अर्थ: रामसे इतना कहकर उन्होंने सीता और लक्ष्मणको भी सम्बोधित करते हुए कहा कि हे जानकि ! हे लक्ष्मण ! मैं आप दोनोंके लिए हाथ जोड़कर मस्तकपर लगाता हूँ, आप हमारे विषयमें स्वामीको प्रसन्न कीजिए क्योंकि ये आप दोनोंपर प्रसन्न हैं - आपकी बात मानते हैं ॥४९॥


सीता लक्ष्मीधरश्चैवमुच्यमानौ सुदक्षिणौ । तस्थतुः पद्मपादाग्रन्यस्तनेत्रौ निरुत्तरौ ॥५०॥

अर्थ: लोग सीता तथा लक्ष्मणसे इस प्रकार कह रहे थे और अत्यन्त सरल प्रकृतिके धारक वे दोनों रामके चरणकमलोंके आगे दृष्टि लगाये चुपचाप खड़े थे - ‘क्या उत्तर दिया जाये’ यह उन्हें सूझ नहीं पड़ता था ॥५०॥


ततः पद्मो जगादेदं भवतामुत्तरं स्फुटम् । निवर्तध्वमयं भद्रा यातोऽस्मि सुखमास्यताम् ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि हे भद्रपुरुषो ! आप लोगोंके लिए यही एक स्पष्ट उत्तर है कि अब आप यहाँसे लौट जाइए, मैं जाता हूँ, आप लोग अपने घर सुखसे रहें ॥५१॥


इत्युक्त्वा निरपेक्षौ तौ परमोत्साहसङ्गतौ । अवतेरतुरत्यन्तगम्भीरां तां महापगाम् ॥५२॥

अर्थ: इतना कहकर किसीकी अपेक्षा नहीं करनेवाले दोनों भाई बड़े भारी उत्साहसे उस अतिशय गहरी महानदीमें उतर पड़े ॥५२॥


उत्तीर्णः सरितं पद्मो जानकीं विकचेक्षणाम् । करेण सुखमादाय पद्मिनीमिव दिग्गजः ॥५३॥

अर्थ: जिस प्रकार दिग्गज अपने कर ( सूँड़ ) में कमलिनीको लेकर तैरता है उसी प्रकार राम विकसित नेत्रोंवाली सीताको हाथमें लेकर नदीको पार कर रहे थे ॥५३॥


अम्भोविहारविज्ञानबुधयोः सा तयोर्धुनी । नामिदघ्नी बभूवोद्वां क्रीडामाचरतोश्चिरम् ॥५४॥

अर्थ: दोनों ही जल-क्रीड़ाके ज्ञानमें निपुण थे अतः चिरकाल तक उत्तम क्रीड़ा करते हुए जा रहे थे। उनके लिए वह नदी नाभि प्रमाण गहरी हो गयी थी ॥५४॥


तदातिशोभते सीता पद्महस्ततलस्थिता । सुधीरा श्रीरिवोत्तुङ्गशतपत्रगृहस्थिता ॥५५॥

अर्थ: उस समय रामकी हथेलीपर स्थित धैर्यशालिनी सीता ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो ऊँचे उठे हुए कमलरूपी घरमें स्थित लक्ष्मी ही हो ॥५५॥


पारगः सीतया सार्धं लक्ष्मणेन च स क्षणात् । वृक्षैरन्तर्धिमायातश्चेतस्तम्भनविग्रहः ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार जिनका शरीर चित्तको रोकनेवाला था ऐसे राम सीता और लक्ष्मणके साथ नदीको पार कर क्षण-भरमें वृक्षोंसे अन्तर्हित हो गये ॥५६॥


विप्रलापं ततः कृत्वा महान्तं साश्रुलोचनाः । भवनाभिमुखीभूताः केचित्कृच्छ्रेण भूभृतः ॥५७॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे ऐसे कितने ही राजा बहुत भारी विलाप कर अपने भवनकी ओर उन्मुख हुए ॥५७॥


तदाशान्यस्तनेत्रास्तु केचित्पुस्तमया इव । तस्थुः प्राप्यापरे मूर्छां निपेतुर्धरणीतले ॥५८॥

अर्थ: कितने ही लोग उसी दिशामें नेत्र लगाये हुए मिट्टी आदिके पुतलोंके समान खड़े रहे । कितने ही मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े ॥५८॥


विबोध्य केचिदत्रोचुर्धिक् संसारमसारकम् । धिग्भोगान्भोगिभोगाभान् भङ्गुरान्मीतिभाविनः ॥५९॥

अर्थ: और कितने ही प्रबोधको प्राप्त होकर कहने लगे कि इस असार संसारको धिक्कार है तथा साँपके शरीरके समान भय उत्पन्न करनेवाले नश्वर भोगोंको धिक्कार है ॥५९॥


ईदृशामपि शूराणां यत्रावस्थेयमीदृशी । तत्र ग्रहणमस्मासु किमेरण्डप्रफल्गुषु ॥६०॥

अर्थ: जहाँ इन-जैसे शूर वीरोंकी भी यह अवस्था है वहाँ एरण्डके समान निःसार हम लोगोंकी तो गिनती ही क्या है ? ॥६०॥


वियोगमरणव्याधिजराव्यसनभाजनम् । जनुदुद्बुदनिस्सारं कृतघ्नं धिक् शरीरकम् ॥६१॥

अर्थ: वियोग, मरण, व्याधि और जरा आदि अनेक कष्टोंके पात्र तथा जलके बबूलेके समान निःसार इस कृतघ्न शरीरको धिक्कार है ॥६१॥


भाग्यवन्तो महासत्त्वास्ते नराः श्लाघ्यचेष्टिताः । कपिभ्रूभङ्गुरां लक्ष्मीं ये तिरस्कृत्य दीक्षिताः ॥६२॥

अर्थ: उत्तम चेष्टाके धारक जो मनुष्य वानरकी भौंहके समान चंचल लक्ष्मीको छोड़कर दीक्षित हो गये हैं वे महाशक्तिके धारक भाग्यवान् हैं ॥६२॥


इति निर्वेदमापन्ना बहवो नरसत्तमाः । प्रव्रज्याभिमुखीभूता बभ्रमुस्तत्र रोधसि ॥६३॥

अर्थ: इस प्रकार वैराग्यको प्राप्त हुए अनेक उत्तम मनुष्य दीक्षा लेनेके सम्मुख हो नदीके उसी तटपर घूमने लगे ॥६३॥


अथेक्षांचक्रिरे तुङ्गं विशालं शुभमालयम् । परिवीतमतिश्याममहानोकहमालया ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने हरे-भरे वृक्षोंकी पंक्तिसे घिरा हुआ एक ऊँचा, विशाल तथा शुभ मन्दिर देखा ॥६४॥


अनुसस्रुश्च तं नानापुष्पजातिसमाकुलम् । मकरन्दरसास्वादगुञ्जत्संभ्रान्तषट्पदम् ॥६५॥

अर्थ: मन्दिरका वह स्थान नाना प्रकारके पुष्पोंकी जातियोंसे व्याप्त था तथा मकरन्द रसके आस्वादसे गूँजते हुए भ्रमर वहाँ भ्रमण कर रहे थे ॥६५॥


ददृशुश्च विविक्तेषु देशेषु समवस्थितान् । साधून् स्वाध्यायसंसक्तमानसान् पृथुतेजसः ॥६६॥

अर्थ: उन लोगोंने वहाँ एकान्त स्थानोंमें बैठे हुए, स्वाध्यायमें लीन तथा विशाल तेजके धारक मुनियोंको देखा ॥६६॥


क्रमेण तान्नमस्यन्तः शनैर्मस्तकपाणयः । विविशुर्जिननाथस्य भवनं भृशमुज्ज्वलम् ॥६७॥

अर्थ: मस्तकपर अंजलि बाँधकर सब लोगोंने उन्हें धीरे-धीरे यथाक्रमसे नमस्कार किया। तदनन्तर अत्यन्त उज्ज्वल जिनमन्दिरमें प्रवेश किया ॥६७॥


रम्येष्वद्रिनितम्बेषु काननेषु सरित्सु च । तत्र काले मही प्रायो भूषितासीज्जिनालयैः ॥६८॥

अर्थ: उस समय भूमि प्रायःकर पर्वतोंके सुन्दर नितम्बोंपर, वनोंमें तथा नदियोंके तटोंपर बने हुए जिनमन्दिरोंसे विभूषित थी ॥६८॥


तत्र कृत्वा नमस्कारं जिनानां शुभ्रभावनाः । रत्नसंभवगम्भीरं संयतेन्द्रं ढुढौकिरे ॥६९॥

अर्थ: वहाँ उज्ज्वल भावनाको धारण करनेवाले सब जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार कर समुद्रके समान गम्भीर मुनिराजके पास गये ॥६९॥


प्रणम्य शिरसा तस्य संवेगभरवाहिनः । नाथोत्तारय संसारादस्मादिति बभाषिरे ॥७०॥

अर्थ: वहाँ जाकर वैराग्यको धारण करनेवाले सब लोगोंने शिर झुकाकर मुनिराजको नमस्कार किया और तदनन्तर यह कहा कि हे नाथ ! हम लोगोंको इस संसार-सागरसे पार कीजिए ॥७०॥


सत्यकेतुगणीशेन तथास्त्विति कृतध्वनौ । जम्मुस्ते परमं तोषं निर्गताः स्मो भवादिति ॥७१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें मुनियोंके अधिपति सत्यकेतु आचार्यने ज्योंही ‘तथास्तु’ यह शब्द कहा त्योंही ‘अब तो हम संसारसे पार हो गये’ यह कहते हुए सब लोग परम सन्तोषको प्राप्त हुए ॥७१॥


विदग्धो विजयो मेरुः क्रूरः संग्रामलोलुपः । श्रीनागदमनो धीरः शठः शत्रुदमो धरः ॥७२॥

विनोदः कण्टकः सत्यः कठोरः प्रियवर्धनः । एवमाद्या नृपा धर्मं नैर्ग्रन्थ्यं समशिश्रियन् ॥७३॥

अर्थ: विदग्ध, विजय, मेरु, क्रूर, संग्रामलोलुप, श्रीनागदमन, धीर, शठ, शत्रुदम, धर, विनोद, कण्टक, सत्य, कठोर और प्रियवर्धन आदि अनेक राजाओंने दिगम्बर दीक्षा धारण की ॥७२-७३॥


साधनानि महास्तेषां गृहीत्वा नगरीं गताः । द्रुतमर्पयितुं दीनाः पुत्रादीनां त्रपान्विताः ॥७४॥

अर्थ: इनके जो सेवक थे वे हाथी, घोड़ा आदि सेनाको लेकर उनके पुत्रोंको सौंपनेके लिए शीघ्र ही नगरकी ओर गये । उस समय वे सेवक अत्यन्त दीन तथा लज्जासे युक्त हो रहे थे ॥७४॥


अणुव्रतानि संगृह्य केचिन्नियमधारिणः । आराधयितुमुद्युक्ता बोधिशुद्धिविभूषणाः ॥७५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानरूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले कितने ही लोग अणुव्रत ग्रहण कर निर्ग्रन्थमुद्राके धारकोंकी सेवा करनेके लिए उद्यत हुए ॥७५॥


सम्यग्दर्शनमात्रेण संतोषमपरे गताः । श्रुत्वातिविमलं धर्मं जिनानां जितजन्मनाम् ॥७६॥

अर्थ: तथा कितने ही लोग संसारको जीतनेवाले जिनेन्द्र भगवान्का अत्यन्त निर्मल धर्म श्रवण कर मात्र सम्यग्दर्शनसे ही सन्तोषको प्राप्त हुए ॥७६॥


सामन्तैर्बहुभिर्गत्वा भरताय निवेदितः । वृत्तान्तो सुस्थितश्चायं ध्यायन् किमपि दुःखितः ॥७७॥

अर्थ: अनेक सामन्तोंने जाकर यह समाचार भरतके लिए सुनाया सो भरत कुछ ध्यान करता हुआ सुखसे बैठा था परंतु यह समाचार सुन दुःखी हुआ ॥७७॥


अथानरण्यराजस्य तनयः सुप्रबोधनः । राज्याभिषिञ्चनं कृत्वा भरतस्य सुचेतसः ॥७८॥

किंचित्पद्मवियोगेन संतप्तं चित्तमुद्वहन् । शोकाम्भोधिनिमग्नेन परिवर्गेण वीक्षितः ॥७९॥

कृतसान्त्वनमप्युच्चैर्विलपत्स समाकुलम् । अन्तःपुरं परित्यज्य नगरीतो विनिर्गतः ॥८०॥

अर्थ: अथानन्तर सम्यक् प्रबोधको प्राप्त हुए राजा दशरथ स्वस्थ चित्तको धारण करनेवाले भरतका राज्याभिषेक कर रामके वियोगसे कुछ सन्तप्त चित्तको धारण करते हुए, सान्त्वना देनेपर भी जो अत्यन्त विलाप कर रहा था ऐसे व्याकुल अन्तःपुरको छोड़ नगरीसे बाहर निकले । उस समय शोकरूपी सागरमें डूबे हुए परिजन उनकी ओर निहार रहे थे ॥७८-८०॥


गुरुपूजां परां कृत्वा द्वासप्ततिनृपान्वितः । सर्वभूतहितस्यान्ते शिश्रिये श्रमणश्रिया ॥८१॥

अर्थ: नगरीसे निकलकर वे सर्वभूतहित नामक गुरुके समीप गये और वहाँ बहुत भारी गुरुपूजा कर बहत्तर राजाओंके साथ दीक्षित हो गये ॥८१॥


अथाप्येकविहारस्य शुभं ध्यानमभीप्सतः । मानसं पुत्रशोकेन कलुषं तस्य जन्यते ॥८२॥

अर्थ: यद्यपि मुनिराज दशरथ एकाकी विहार करते हुए सदा शुभ ध्यानकी इच्छा रखते थे तथापि पुत्रशोकके कारण उनका मन कलुषित हो जाता था ॥८२॥


अन्यदा योगमाश्रित्य दध्यावेवं विचक्षणः । धिक् स्नेहं भवदुःखानां मूलं बन्धमिमं मम ॥८३॥

अर्थ: एक दिन योगारूढ़ होकर बुद्धिमान् दशरथ विचार करने लगे कि संसार सम्बन्धी दुःखोंका मूल कारण तथा मुझे बन्धनमें डालनेवाले स्नेहको धिक्कार है ॥८३॥


अन्यजन्मसु ये दारा पितृभ्रातृसुतादयः । क्व गतास्ते ममानादौ संसारे गणनोज्झिताः ॥८४॥

अर्थ: अन्य जन्मोंमें जो मेरे स्त्री, पिता, भाई तथा पुत्र आदि सम्बन्धी थे वे सब कहाँ गये ? यथार्थमें इस अनादि संसारमें सभी सम्बन्धी इतने हो चुके हैं कि उनकी गणना नहीं की जा सकती ॥८४॥


अनेकशो मया प्राप्ता विविधा विषया दिवि । नरकानलदाहाश्च संप्राप्ता भोगहेतवः ॥८५॥

अर्थ: मैंने अनेकों बार स्वर्गमें नाना प्रकारके विषय प्राप्त किये हैं और भोगोंके निमित्त नरकाग्निके सन्ताप भी सहन किये हैं ॥८५॥


अन्योन्यभक्षणादीनि तिर्यक्त्वे च चिरं मया । प्राप्तानि दुःखशल्यानि बहुरूपासु योनिषु ॥८६॥

अर्थ: तिर्यंच पर्यायमें मैंने चिरकाल तक परस्पर एक दूसरेका खाया जाना आदि दुःख उठाये हैं । इस प्रकार नाना योनियोंमें मैंने दुःखरूपी अनेक शल्य प्राप्त किये ॥८६॥


श्रुताः सङ्गीतनिस्वाना वंशवीणानुगामिनः । भूयश्च परमाक्रन्दाश्चित्तदारणकारिणः ॥८७॥

अर्थ: मैंने बाँसुरी, वीणा आदि मधुर बाजोंका अनुगमन करनेवाले संगीतके शब्द सुने हैं और हृदयको विदारण करनेवाले तीव्र रुदनके शब्द भी अनेक बार श्रवण किये हैं ॥८७॥


स्तनेष्वप्सरसां पाणिर्लालितो नेत्रहारिषु । पुनः कुठारघातेन दुर्वृत्तेन पृथक्कृतिः ॥८८॥

अर्थ: मैंने अपना हाथ अप्सराओंके सुन्दर स्तनोंपर लड़ाया है और कभी कुठारकी तीक्ष्ण धारासे उसके टुकड़े-टुकड़े भी किये हैं ॥८८॥


आस्वादितं महावीर्यमन्नं सुरभि षड्रसम् । त्रपुसीसादिकललं पुनश्च नरकावनौ ॥८९॥

अर्थ: मैंने महाशक्ति वर्धक, सुगन्धित छह रसोंसे युक्त आहार ग्रहण किया है और नरककी भूमिमें राँगा, सीसा आदिका कलल भी बार-बार पिया है ॥८९॥


वीक्षितं परमं रूपं मनोद्रवणकारणम् । पुनश्चात्यन्तवित्रासकारणं दत्तवेपथु ॥९०॥

अर्थ: मनको द्रवीभूत करनेवाला अत्यन्त सुन्दर रूप देखा है और अत्यन्त भयका कारण तथा कम्पन उत्पन्न करनेवाला घृणित रूप भी अनेक बार देखा है ॥९०॥


आघ्रातः स चिरामोदो गन्धो मुदितषट्पदः । पुनश्च पूतिरत्यन्तमुद्वासितमहाजनः ॥९१॥

अर्थ: जिसकी सुवास चिरकाल तक स्थित रहती है ऐसा भ्रमरोंको आनन्दित करनेवाला मनोहर गन्ध सूँघा है और जिसे देखते ही महाजन दूर हट जाते हैं ऐसा तीव्र दुर्गन्ध उत्पन्न करनेवाला सड़ा कलेवर भी बार-बार सूँघा है ॥९१॥


आलिङ्गिता मनश्चौर्यो नार्यो लीलाविभूषणाः । पुनश्च कूटशाल्मल्यः तीक्ष्णकण्टकसङ्कटाः ॥९२॥

अर्थ: मनको चुरानेवाली तथा लीलारूपी आभूषणोंसे सुशोभित स्त्रियोंका आलिंगन किया है और तीक्ष्ण काँटोंसे व्याप्त सेमरके मायामयी वृक्षोंका भी बार-बार आलिंगन किया है ॥९२॥


किं न स्पृष्टं न किं दृष्टं किं न घ्रातं न किं श्रुतम् । मुहुरास्वादितं किं न भवे दासेन कर्मणाम् ॥९३॥

अर्थ: कर्मोंका दास बनकर मैंने इस संसारमें क्या नहीं किया है ? क्या नहीं देखा है ? क्या नहीं सूँघा है ? क्या नहीं सुना है ? और बार-बार क्या नहीं खाया है ? ॥९३॥


न सा क्षितिर्न तत्तोयं नासौ वह्निर्न सोऽनिलः । देहतां तो न मे प्राप्तो भवे संक्रामतश्चिरम् ॥९४॥

अर्थ: न वह पृथिवी है, न वह जल है, न वह अग्नि है और न वह वायु है जो चिरकालसे संसारमें भ्रमण करते हुए मेरी शरीर-दशाको प्राप्त नहीं हुआ है ॥९४॥


त्रैलोक्ये स न जीवोऽस्ति यो न प्राप्तः सहस्रशः । पित्रादितां मम स्थानं न तद्यत्रोषितोऽस्मि न ॥९५॥

अर्थ: तीनों लोकोंमें वह जीव नहीं है जो हजारों बार मेरा पिता आदि नहीं हुआ हो और वह स्थान भी नहीं है जहाँ मैंने निवास नहीं किया हो ॥९५॥


अध्रुवं देहभोगादिशरणं नास्ति विद्यते । संसारोऽयं चतुःस्थान एकोऽहं दुःखभुक्तिषु ॥९६॥

अशुचेः कायतोऽन्योऽहं द्वारमक्षाणि कर्मणाम् । संवरो वारणं तेषां निर्जरा जायते ततः ॥९७॥

लोको विचित्ररूपोऽयं दुर्लभा बोधिरुत्तमा । स्वाख्यातोऽयं जिनैर्धर्मः कृच्छ्रेणाधिगतो मया ॥९८॥

अर्थ: शरीर भोग आदि अनित्य है, कोई किसीका शरण नहीं है, यह संसार चतुर्गति रूप है, मैं अकेला ही दुःख भोगता हूँ, यह शरीर अशुचि है तथा उससे मैं पृथक् हूँ, इन्द्रियाँ कर्मोंके आनेका द्वार हैं, कर्मोंको रोक देना संवर है, संवरके बाद कर्मोंकी निर्जरा होती है, यह लोक विचित्र रूप है, उत्तम रत्नत्रयकी प्राप्ति होना दुर्लभ है, और जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहा हुआ यह धर्म मैंने बड़े कष्टसे पाया है ॥९६-९८॥


ध्यानेन मुनिदृष्टेन विशुद्धेनैवमादिना । आर्तध्यानमसौ धीरः क्रमेण निरनीनशत् ॥९९॥

अर्थ: इस प्रकार मुनियोंके द्वारा अनुभूत विशुद्ध ध्यानसे धीरवीर दशरथ मुनिने क्रमसे पूर्वोक्त आर्तध्यानको नष्ट कर दिया ॥९९॥


येषूच्छ्रितसितच्छत्रो वरस्तम्बेरमाश्रितः । महाजिषु पराजिग्ये शत्रूनत्यन्तमुद्धतान् ॥१००॥

विषमानधिकुर्वाणः परीषहगणान् भृशम् । शान्तस्तेष्वेव देशेषु निर्ग्रन्थो विजहार सः ॥१०१॥

अर्थ: जिनके ऊपर सफेद छत्र फिर रहा था तथा जो उत्तम हाथीपर सवार थे ऐसे राजा दशरथने पहले जिन देशोंमें महायुद्धोंके बीच अत्यन्त उद्धत शत्रुओंको जीता था अब उन्हीं देशोंमें वे अत्यन्त शान्त निर्ग्रन्थ मुनि होकर विषम परिषहोंको सहते हुए विहार कर रहे थे ॥१००-१०१॥


नाथे तथा स्थिते तस्मिन् विदेशे च गतेऽङ्गजे । परं सुमित्रया सत्रा शोकं भेजेऽपराजिता ॥१०२॥

अर्थ: तदनन्तर पतिके मुनि हो जाने और पुत्रके विदेश चले जानेपर अपराजिता ( कौशल्या ) सुमित्राके साथ परम शोकको प्राप्त हुई ॥१०२॥


ते दृष्ट्वा दुःखिते बाढमजस्रास्रुतलोचने । भरतामां श्रियं मेने भरतो विषदारुणाम् ॥१०३॥

अर्थ: जिनके नेत्रोंसे निरन्तर अश्रु झरते थे ऐसी दोनों विमाताओंको दुःखी देखकर भरत, भरत चक्रवर्तीकी लक्ष्मीके समान विशाल राज्यलक्ष्मीको विषके समान दारुण मानता था ॥१०३॥


अथैवं दुःखमापन्ने भृशं ते वीक्ष्य केकया । पश्चादुत्पन्नकारुण्यात् पुत्रमेवमभाषत ॥१०४॥

पुत्र राज्यं त्वया लब्धं प्रणताखिलराजकम् । पद्मलक्ष्मणनिर्मुक्तमलमेतन्न शोभते ॥१०५॥

अर्थ: अथानन्तर इस तरह उन्हें अत्यन्त दुखी देख केकयीके मनमें दया उत्पन्न हुई जिससे प्रेरित होकर उसने अपने पुत्र भरतसे इस प्रकार कहा कि हे पुत्र ! यद्यपि तूने जिसमें समस्त राजा नम्रीभूत हैं ऐसा राज्य प्राप्त किया है तथापि वह राम और लक्ष्मणके बिना शोभा नहीं देता है ॥१०४-१०५॥


विना ताभ्यां विनीताभ्यां किं राज्यं का सुखासिका । का वा जनपदे शोभा तव का वा सुवृत्तता ॥१०६॥

अर्थ: नियमसे भरे हुए उन दोनों भाइयोंके बिना राज्य क्या है ? देशकी शोभा क्या है ? और तेरी धर्मज्ञता क्या है ? ॥१०६॥


राजपुत्र्या समं बालौ क्व तौ यातां सुखैधितौ । विमुक्तवाहनौ मार्गे पाषाणादिमिराकुले ॥१०७॥

अर्थ: सुखपूर्वक वृद्धिको प्राप्त हुए दोनों बालक, बिना किसी वाहनके पाषाण आदि विषम मार्गमें राजकुमारी सीताके साथ कहाँ भटकते होंगे ? ॥१०७॥


मातरौ दुःखिते एते तयोर्गुणसमुद्रयोः । विरहे मापतां मृत्युमजस्रपरिदेवते ॥१०८॥

अर्थ: गुणोंके सागरस्वरूप उन दोनोंकी ये माताएँ अत्यन्त दुःखी हैं, निरन्तर विलाप करती रहती हैं सो उनके विरहमें मृत्युको प्राप्त न हो जावें ॥१०८॥


तस्मादानय तौ क्षिप्रं समं ताभ्यां महासुखः । सुचिरं पालय क्षोणीमेवं सर्वं विराजते ॥१०९॥

अर्थ: इसलिए तू शीघ्र ही उन दोनोंको वापस ले आ। उन्हींके साथ सुखपूर्वक चिरकाल तक पृथिवीका पालन कर। ऐसा करनेसे ही सबकी शोभा होगी ॥१०९॥


व्रज तावत्त्वमारुह्य तुरङ्गं जातरंहसम् । आव्रजाम्यहमप्येषा सुपुत्रानुपदं तव ॥११०॥

अर्थ: हे सुपुत्र ! तू वेगशाली घोड़ेपर सवार होकर जा और मैं भी तेरे पीछे ही आती हूँ ॥११०॥


इत्युक्तो धृतिमासाद्य साध्वेवमिति सस्वनः । संभ्रान्तोऽश्वसहस्रेण भरतस्तत्पथं श्रितः ॥१११॥

अर्थ: माताके इस प्रकार कहनेपर भरत बहुत प्रसन्न हुआ । वह ‘साधु-साधु ठीक-ठीक’ इस प्रकारके शब्द कहने लगा तथा शीघ्र ही एक हजार घोड़ोंसे युक्त हो रामके मार्गमें चल पड़ा ॥१११॥


कृत्वा पुरस्सरान् पद्मपार्श्वात् प्रत्यागतान्नरान् । पवनाश्वसमारूढः स ययौ भृशमुत्सुकः ॥११२॥

अर्थ: वह रामके पाससे लौटकर आये हुए लोगोंको आगे कर बड़ी उत्कण्ठासे पवनके समान शीघ्रगामी घोड़ेपर सवार होकर चला ॥११२॥


प्राप्तश्च तामरण्यानीमनेकपकुलाकुलाम् । नानावृक्षावृतादित्यां गिरिगह्वरभीषणाम् ॥११३॥

अर्थ: तथा कुछ ही समयमें उस महाअटवीमें जा पहुँचा जो हाथियोंके समूहसे व्याप्त थी, नाना वृक्षोंसे जहाँ सूर्यका प्रवेश रुक गया था तथा जो पर्वत और गर्तोंसे अत्यन्त भयंकर थी ॥११३॥


बन्धयित्वा महावृक्षैरुडुपानां सुसंहतीः । तां धुनीमुत्ततारासौ क्षणेन सहवाहनः ॥११४॥

अर्थ: सामने भयंकर नदी थी सो वृक्षोंके बड़े-बड़े लट्ठोंसे नावोंके समूहको बाँधकर उनका पुल बना वाहनोंके साथ-साथ क्षण-भरमें पार कर गया ॥११४॥


इतो दृष्टावितो दृष्टौ पुरुषौ सह योषिता । इति पृच्छन्स शृण्वंश्च जगामानन्यमानसः ॥११५॥

अर्थ: वह मार्गमें मिलनेवाले लोगोंसे पूछता जाता था कि क्या यहाँ आप लोगोंने एक स्त्रीके साथ दो पुरुष देखे हैं और उत्तरको एकाग्र मनसे सुनता हुआ आगे बढ़ता जाता था ॥११५॥


अथ तौ परमारण्ये विश्रान्तौ सरसस्तटे । ससीतौ भरतोऽपश्यत् पार्श्वन्यस्तशरासनौ ॥११६॥

अर्थ: अथानन्तर जो सघन वनमें एक सरोवरके तीरपर विश्राम कर रहे थे तथा जिनके पास ही धनुष रखे हुए थे ऐसे सीता सहित राम-लक्ष्मणको भरतने देखा ॥११६॥


प्रभूतदिवसप्राप्तं ताभ्यां सीताव्यपेक्षया । षड्भिर्दिनैस्तमुद्देशं भरतः प्रतिपन्नवान् ॥११७॥

अर्थ: राम-लक्ष्मण, सीताके कारण जिस स्थानपर बहुत दिनमें पहुँच पाये थे भरत उस स्थानपर छह दिनमें ही पहुँच गया ॥११७॥


अवतीर्य तुरङ्गाच्च मार्गं लोचनगोचरम् । गत्वा पद्भ्यां समाश्लिष्य पादौ पद्मस्य मूर्छितः ॥११८॥

अर्थ: वह घोड़ेसे उतर पड़ा और जहाँसे राम दिख रहे थे उतने मार्गमें पैदल ही चलकर उनके समीप पहुँचा तथा उनके चरणोंका आलिंगन कर मूर्च्छित हो गया ॥११८॥


ततो विबोधितस्तेन कृत्वा संभाषणं क्रमात् । मूर्द्धाञ्जलिर्जगादैवं पद्मं विनतविग्रहः ॥११९॥

विडम्बनमिदं कस्मान्नाथ मे भवता कृतम् । परं राज्यापदेशेन न्यायसर्वस्व कोविद ॥१२०॥

अर्थ: तदनन्तर रामने सचेत किया सो क्रमसे वार्तालाप कर नम्रीभूत हो हाथ जोड़ शिरसे लगाकर इस प्रकार कहने लगा कि हे नाथ ! राज्य देकर आपने मेरी यह क्या विडम्बना की है ? आप ही न्यायके जाननेवाले अतिशय निपुण हो ॥११९-१२०॥


आस्तां तावदिदं राज्यं जीवितेनापि किं मम । भवता विप्रयुक्तस्य गुरुचेष्टितकारिणा ॥१२१॥

अर्थ: उत्तम चेष्टाओंके धारण करनेवाले आपसे पृथक् रहकर मुझे यह राज्य तो दूर रहे जीवनसे भी क्या प्रयोजन है ? ॥१२१॥


उत्तिष्ठ स्वपुरीं यामः प्रसादं कुरु मे प्रभो । राज्यं पालय निश्शेषं यच्छ मेऽतिसुखासिकाम् ॥१२२॥

अर्थ: हे प्रभो ! उठो, अपनी नगरीको चलें, मुझपर प्रसन्नता करो, समस्त राज्यका पालन करो, और मुझे सुखकी अवस्था देओ ॥१२२॥


भवामि छत्रधारस्ते शत्रुघ्नश्चमराश्रितः । लक्ष्मणः परमो मन्त्री सर्वं सुविहितं ननु ॥१२३॥

अर्थ: मैं आपका छत्रधारक होऊँगा, शत्रुघ्न चमर डोलेगा और लक्ष्मण उत्कृष्ट मन्त्री होगा, ऐसा करनेसे ही सब ठीक होगा ॥१२३॥


पश्चात्तापानलेनालं संतप्ता जननी मम । तव लक्ष्मीधरस्यापि वर्तते शोककारिणी ॥१२४॥

अर्थ: मेरी माता पश्चात्तापरूपी अग्निसे अत्यन्त सन्तप्त हो रही है तथा आपकी और लक्ष्मणकी माता भी निरन्तर शोक कर रही हैं ॥१२४॥


ब्रवीत्येवमसौ यावत्केकया तावदागता । वेगिनं रथमारुह्य सामन्तशतमध्यगा ॥१२५॥

अर्थ: जबतक भरत इस प्रकार कह रहा था तबतक सैकड़ों सामन्तोंके मध्य गमन करनेवाली केकयी वेगशाली रथपर सवार हो वहाँ आ पहुँची ॥१२५॥


दृष्ट्वा परमशोकेन निर्भरीकृतमानसा । हाकारमुखरा चेतावालिङ्ग्य रुदिता चिरम् ॥१२६॥

अर्थ: राम लक्ष्मणको देखकर इसका हृदय बहुत भारी शोकसे भर गया । हा हा कार करती हुई वह दोनोंका आलिंगन कर चिरकाल तक रोती रही ॥१२६॥


ततोऽस्रसरितश्छेदे विप्रलापेऽतिखेदिता । क्रमात्संभाषणं कृत्वा केकयैवमभाषत ॥१२७॥

पुत्रोत्तिष्ठ पुरीं यामः कुरु राज्यं सहानुजः । ननु त्वया विहीनं मे सकलं विपिनायते ॥१२८॥

अर्थ: तदनन्तर जो विलाप करती-करती अत्यन्त खिन्न हो गयी थी ऐसी केकयी अश्रुरूपी नदीकी धारा टूटनेपर क्रमसे वार्तालाप कर इस प्रकार बोली कि हे पुत्र ! उठो, नगरीको चलें, छोटे भाइयोंके साथ राज्य करो, तुम्हारे बिना मुझे यह सब राज्य वनके समान जान पड़ता है ॥१२७-१२८॥


भरतः शिक्षणीयोऽयं तवात्यन्तमनीषिणः । स्त्रैणेन नष्टबुद्धेर्मे क्षमस्व दुरनुष्ठितम् ॥१२९॥

अर्थ: तुम अतिशय बुद्धिमान् हो, यह भरत तुम्हारी शिक्षाके योग्य है अर्थात् इसे शिक्षा देकर ठीक करो, स्त्रीपनाके कारण मेरी बुद्धि नष्ट हो गयी थी अतः मेरे इस कुकृत्यको क्षमा करो ॥१२९॥


ततः पद्मो जगादैवं किं न वेत्सि त्वमम्बिके । क्षत्रिया ननु कुर्वन्ति सकृत्कार्यमनन्यथा ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि हे माता ! क्या तुम यह नहीं जानती हो कि क्षत्रिय स्वीकृत कार्यको कभी अन्यथा नहीं करते हैं–एक बार कार्यको जिस प्रकार स्वीकृत कर लेते हैं उसी प्रकार उसे पूर्ण करते हैं ॥१३०॥


उक्तं तातेन यत्सत्यं तत्कर्तव्यं मया त्वया । भरतेन च दुष्कीर्तिर्माभूदस्य जगत्त्रये ॥१३१॥

अर्थ: ‘पिताकी अपकीर्ति जगत्त्रयमें न फैले’ इस बातका ध्यान रखना आवश्यक है ॥१३१॥


पुनश्चोवाच भरतं भ्रातर्मा गा विचित्तताम् । शङ्कसे यद्यनाचाराम्नायं सदनुमोदनात् ॥१३२॥

अर्थ: केकयीसे इतना कहकर उन्होंने भरतसे कहा कि हे भाई ! तू वैचित्य अर्थात् द्विविधाको प्राप्त मत हो । यदि तू अनाचारसे डरता है तो यह अनाचार नहीं है क्योंकि मैं स्वयं इस कार्यकी तुझे अनुमति दे रहा हूँ ॥१३२॥


इत्युक्त्वा पुनरप्यस्य पद्मो राज्याभिषेचनम् । चकार कानने रम्ये समक्षं सर्वभूभृताम् ॥१३३॥

अर्थ: इतना कहकर रामने मनोहर वनमें सब राजाओंके समक्ष भरतका पुनः राज्याभिषेक किया ॥१३३॥


प्रणम्य केकयां सान्त्वं संभाष्य च पुनः पुनः । भ्रातरं च परिष्वज्य प्राहिणोत् सोऽतिकृच्छ्रतः ॥१३४॥

अर्थ: तदनन्तर केकयीको प्रणाम कर सान्त्वना देते हुए बार-बार सम्भाषण कर और भाईका आलिंगन कर बड़े कष्टसे सबको वापस विदा किया ॥१३४॥


तौ विधाय यथायोग्यमुपचारं ससीतयोः । रामलक्ष्मणयोर्यातौ मातापुत्रौ यथागतम् ॥१३५॥

अर्थ: इस प्रकार माता और पुत्र अर्थात् केकयी और भरत, सीता सहित राम-लक्ष्मणका यथायोग्य उपचार कर जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥१३५॥


परिध्वस्ताखिलद्वेषं सर्वप्रकृतिसौख्यदम् । चकार भरतो राज्यं प्रजासु जनकोपमः ॥१३६॥

अर्थ: अथानन्तर भरत, पिताके समान, प्रजापर राज्य करने लगा । उसका राज्य समस्त शत्रुओंसे रहित तथा समस्त प्रजाको सुख देनेवाला था ॥१३६॥


राज्ये तथाविधेऽप्यस्य धृतिर्नाभूदपि क्षणम् । दुस्सहं दधमानस्य शोकशल्यं मनस्विनः ॥१३७॥

अर्थ: तेजस्वी भरतने अपने मनमें असहनीय शोकरूपी शल्यको धारण कर रहा था इसलिए ऐसे व्यवस्थित राज्यमें भी उसे क्षणभरके लिए सन्तोष नहीं होता था ॥१३७॥


त्रिकालमरनाथस्य वन्दारुर्भोगमन्दधीः । ययौ श्रोतुं च सद्धर्मं चैत्यमस्येयती धृतिः ॥१३८॥

अर्थ: वह तीनों काल अरनाथ भगवान्की वन्दना करता था, भोगोंसे सदा उदास रहता था और समीचीन धर्मका श्रवण करनेके लिए मन्दिर जाता था यही इसका नियम था ॥१३८॥


तत्राचार्यो द्युतिर्नाम स्वपरागमपारगः । महता साधुसंघेन सततं कृतसेवनः ॥१३९॥

अर्थ: वहाँ स्व और परशास्त्रोंके पारगामी तथा अनेक मुनियोंका संघ जिनकी निरन्तर सेवा करता था ऐसे द्युति नामके आचार्य रहते थे ॥१३९॥


अग्रतोऽवग्रहं तस्य चकार भरतः सुधीः । पद्मदर्शनमात्रेण करिष्ये मुनितामिति ॥१४०॥

अर्थ: उनके आगे बुद्धिमान् भरतने प्रतिज्ञा की कि मैं रामके दर्शन मात्रसे मुनिव्रत धारण करूँगा ॥१४०॥


कृतावग्रहमेवं तमुवाच भगवान् द्युतिः । कुर्वन् मयूरवृन्दानां नृत्तं धीरया गिरा ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी गम्भीर वाणीसे मयूरसमूहको नृत्य कराते हुए भगवान् द्युति भट्टारक इस प्रकारकी प्रतिज्ञा करनेवाले भरतसे बोले ॥१४१॥


भव्य भो यावदायाति पद्मः पद्मनिरीक्षणः । तावद्गृहस्थधर्मेण भवाप्तपरिकर्मकः ॥१४२॥

अर्थ: कि हे भव्य ! कमलके समान नेत्रोंके धारक राम जबतक आते तबतक तू गृहस्थ धर्मके द्वारा अभ्यास कर ले ॥१४२॥


अत्यन्तदुस्सहा चेष्टा निर्ग्रन्थानां महात्मनाम् । परिकर्म विशुद्धस्य जायते सुखसाधना ॥१४३॥

अर्थ: महात्मा निर्ग्रन्थ मुनियोंकी चेष्टा अत्यन्त कठिन है पर जो अभ्यासके द्वारा परिपक्व होते हैं उन्हें उसका साधन करना सरल हो जाता है ॥१४३॥


उपरिष्टात् करिष्यामि काले तप इति ब्रुवन् । अनेको मृत्युमायाति नरोऽतिजडमानसः ॥१४४॥

अर्थ: ‘मैं आगे तप करूँगा’ ऐसा कहनेवाले अनेक जड़बुद्धि मनुष्य मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं पर तप नहीं कर पाते हैं ॥१४४॥


अनर्घ्यरत्नसदृशं तपो दिग्वाससामिति । एवमप्यक्षमं वक्तुं परस्तस्योपमा कुतः ॥१४५॥

अर्थ: ‘निर्ग्रन्थ मुनियोंका तप अमूल्य रत्नके समान है’ ऐसा कहना भी अशक्य है फिर उसकी अन्य उपमा तो हो ही क्या सकती है ? ॥१४५॥


कनीयांस्तस्य धर्मोऽयमुक्तोऽयं गृहिणां जिनैः । अप्रमादी भवेत्तस्मिंश्चिरतो बोधदायिनि ॥१४६॥

अर्थ: गृहस्थोंके धर्मको जिनेन्द्र भगवान्ने मुनिधर्मका छोटा भाई कहा है सो बोधिको प्रदान करनेवाले इस धर्ममें भी प्रमाद-रहित होकर लीन रहना चाहिए ॥१४६॥


यथा रत्नाकरद्वीपं मानवः कश्चिदागतः । रत्नं यत्किंचिदादत्ते यात्यस्य तदनर्घताम् ॥१४७॥

तथास्मिन्नियमद्वीपे शासने धर्मचक्रिणाम् । य एव नियमः कश्चिद् ग्रहीतो यात्यनर्घताम् ॥१४८॥

अर्थ: जैसे कोई मनुष्य रत्नद्वीपमें गया वहाँ वह जिस किसी भी रत्नको उठाता है वही उसके लिए अमूल्यताको प्राप्त हो जाता है इसी प्रकार धर्मचक्रकी प्रवृत्ति करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्के शासनमें जो कोई इस नियमरूपी द्वीपमें आकर जिस किसी नियमको ग्रहण करता है वही उसके लिए अमूल्य हो जाता है ॥१४७-१४८॥


अहिंसारत्नमादाय विपुलं यो जिनाधिपम् । भक्त्यार्चयत्यसौ नाके परमां वृद्धिमश्नुते ॥१४९॥

अर्थ: जो अत्यन्त श्रेष्ठ अहिंसारूपी रत्नको लेकर भक्तिपूर्वक जिनेन्द्रदेवकी पूजा करता है वह स्वर्गमें परम वृद्धिको प्राप्त होता है ॥१४९॥


सत्यव्रतधरः स्रग्भिर्यः करोति जिनार्चनम् । भवत्यादेयवाक्योऽसौ सत्कीर्तिव्याप्तविष्टपः ॥१५०॥

अर्थ: जो सत्य व्रतका धारी होकर मालाओंसे भगवान्की अर्चा करता है उसके वचनोंको सब ग्रहण करते हैं तथा उज्ज्वल कीर्तिसे वह समस्त संसारको व्याप्त करता है ॥१५०॥


अदत्तादाननिर्मुक्तो जिनेन्द्रान् यो नमस्यति । जायते रत्नपूर्णानां निधीनां स विभुर्नरः ॥१५१॥

अर्थ: जो अदत्तादान अर्थात् चोरीसे दूर रहकर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करता है वह रत्नोंसे परिपूर्ण निधियोंका स्वामी होता है ॥१५१॥


यो रतिं परनारीषु न करोति जिनाश्रितः । सोऽथ गच्छति सौभाग्यं सर्वनेत्रमलिम्लुचः ॥१५२॥

अर्थ: जो जिनेन्द्र भगवान्की सेवा करता हुआ परस्त्रियोंमें प्रेम नहीं करता है वह सबके नेत्रोंको हरण करनेवाला परम सौभाग्यको प्राप्त होता है ॥१५२॥


जिनानर्चति यो भक्त्या कृतावधिपरिग्रहः । लभतेऽसावतिस्फीतान् लाभान् लोकस्य पूजितः ॥१५३॥

अर्थ: जो परि- ग्रहकी सीमा नियत कर भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्‌की अर्चा करता है वह अतिशय विस्तृत लाभोंको प्राप्त होता है तथा लोग उसकी पूजा करते हैं ॥१५३॥


आहारदानपुण्येन जायते भोगनिर्भरः । विदेशमपि यातस्य सुखिता तस्य सर्वदा ॥१५४॥

अर्थ: आहार-दानके पुण्यसे यह जीव भोग-निर्भर होता है अर्थात् सब प्रकारके भोग इसे प्राप्त होते हैं। यदि यह परदेश भी जाता है तो वहाँ भी उसे सदा सुख ही प्राप्त होता है ॥१५४॥


अभीतिदानपुण्येन जायते भयवर्जितः । महासंकटयातोऽपि निरुपद्रवविग्रहः ॥१५५॥

अर्थ: अभयदानके पुण्यसे यह जीव निर्भय होता है और बहुत भारी संकटमें पड़कर भी उसका शरीर उपद्रवसे शून्य रहता है ॥१५५॥


जायते ज्ञानदानेन विशालसुखभाजनम् । कलार्णवामृतं चासौ गण्डूषं कुरुते नरः ॥१५६॥

अर्थ: ज्ञानदानसे यह जीव विशाल सुखोंका पात्र होता है और कलारूपी सागरसे निकले हुए अमृतके कुल्ले करता है ॥१५६॥


यः करोति विभावर्यामाहारपरिवर्जनम् । सर्वारम्भप्रवृत्तोऽपि यात्यसौ सुखदां गतिम् ॥१५७॥

अर्थ: जो मनुष्य रात्रिमें आहारका त्याग करता हैं वह सब प्रकारके आरम्भमें प्रवृत्त रहनेपर भी सुखदायी गतिको प्राप्त होता है ॥१५७॥


वर्दनं यो जिनेन्द्राणां त्रिकालं कुरुते नरः । तस्य भावविशुद्धस्य सर्वं नश्यति दुष्कृतम् ॥१५८॥

अर्थ: जो मनुष्य तीनों कालमें जिनेन्द्र-भगवान्की वन्दना करता है उसके भाव सदा शुद्ध रहते हैं तथा उसका सब पाप नष्ट हो जाता है ॥१५८॥


सामोदैर्भूजलोद्भूतैः पुष्पैर्यो जिनमर्चति । विमानं पुष्पकं प्राप्य स क्रीडति यथेप्सितम् ॥१५९॥

अर्थ: जो पृथिवी तथा जलमें उत्पन्न होनेवाले सुगन्धित फूलोंसे जिनेन्द्रभगवान्‌की अर्चा करता है वह पुष्पक विमानको पाकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है ॥१५९॥


भावपुष्पैर्जिनं यस्तु पूजयत्यतिनिर्मलैः । लोकस्य पूजनीयोऽसौ जायतेऽत्यन्तसुन्दरः ॥१६०॥

अर्थ: जो अतिशय निर्मल भावरूपी फूलोंसे जिनेन्द्रदेवकी पूजा करता है वह लोगोंके द्वारा पूजनीय तथा अत्यन्त सुन्दर होता है ॥१६०॥


धूपं यश्चन्दनाशुभ्रागुर्वादिप्रभवं सुधीः । जिनानां ढौकयत्येष जायते सुरभिः सुरः ॥१६१॥

अर्थ: जो बुद्धिमान् चन्दन तथा कालागुरु आदिसे उत्पन्न धूप जिनेन्द्रभगवान्‌के लिए चढ़ाता है वह मनोज्ञ देव होता है ॥१६१॥


यो जिनेन्द्रालये दीपं ददाति शुभभावतः । स्वयंप्रभशरीरोऽसौ जायते सुरसद्मनि ॥१६२॥

अर्थ: जो जिनमन्दिरमें शुभ भावसे दीपदान करता है वह स्वर्गमें देदीप्यमान शरीरका धारक होता है ॥१६२॥


छत्रचामरलम्बूषपताकादर्पणादिभिः । भूषयित्वा जिनस्थानं याति विस्मयिनीं श्रियम् ॥१६३॥

अर्थ: जो मनुष्य छत्र, चमर, फन्नूस, पताका तथा दर्पण आदिके द्वारा जिनमन्दिरको विभूषित करता है वह आश्चर्यकारक लक्ष्मीको प्राप्त होता है ॥१६३॥


समालभ्य जिनान् गन्धैः सौरभ्यव्याप्तदिङ्मुखैः । सुरभिः प्रमदानन्दो जायते दयितः पुमान् ॥१६४॥

अर्थ: जो मनुष्य सुगन्धिसे दिशाओंको व्याप्त करनेवाली गन्धसे जिनेन्द्रभगवान्‌का लेपन करता है वह सुगन्धिसे युक्त, स्त्रियोंको आनन्द देनेवाला प्रिय पुरुष होता है ॥१६४॥


अभिषेकं जिनेन्द्राणां कृत्वा सुरभिवारिणा । अभिषेकमवाप्नोति यत्र यत्रोपजायते ॥१६५॥

अर्थ: जो मनुष्य सुगन्धित जलसे जिनेन्द्रभगवान्‌का अभिषेक करता है वह जहाँ-जहाँ उत्पन्न होता है वहाँ अभिषेकको प्राप्त होता है ॥१६५॥


अभिषेकं जिनेन्द्राणां विधाय क्षीरधारया । विमाने क्षीरधवले जायते परमद्युतिः ॥१६६॥

अर्थ: जो दूधकी धारासे जिनेन्द्रभगवान्‌का अभिषेक करता है वह दूधके समान धवल विमानमें उत्तमकान्तिका धारक होता है ॥१६६॥


दधिकुम्भैर्जिनेन्द्राणां यः करोत्यभिषेचनम् । दध्याभकुट्टमे स्वर्गे जायते स सुरोत्तमः ॥१६७॥

अर्थ: जो दहीके कलशोंसे जिनेन्द्र-भगवान्‌का अभिषेक करता है वह दहीके समान फर्शवाले स्वर्गमें उत्तम देव होता है ॥१६७॥


सर्पिषा जिननाथानां कुरुते योऽभिषेचनम् । कान्तिद्युतिप्रभावाढ्यो विमानेशः स जायते ॥१६८॥

अर्थ: जो घीसे जिनदेवका अभिषेक करता है वह कान्ति, द्युति और प्रभावसे युक्त विमानका स्वामी देव होता है ॥१६८॥


अभिषेकप्रभावेण श्रूयन्ते बहवो बुधाः । पुराणेऽनन्तवीर्याद्या द्युभूलब्धाभिषेचनाः ॥१६९॥

अर्थ: पुराणमें सुना जाता है कि अभिषेकके प्रभावसे अनन्तवीर्य आदि अनेक विद्वज्जन, स्वर्गकी भूमिमें अभिषेकको प्राप्त हुए हैं ॥१६९॥


भक्त्या वल्युपहारं यः कुरुते जिनसद्मनि । संप्राप्नोति परां भूतिमारोग्यं स सुमानसः ॥१७०॥

अर्थ: जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जिनमन्दिरमें रंगावलि आदिका उपहार चढ़ाता है वह उत्तम हृदयका धारक होकर परम विभूति और आरोग्य-को प्राप्त होता है ॥१७०॥


गीतनर्तनवादित्रैर्यः करोति महोत्सवम् । जिनसद्मन्यसौ स्वर्गे लभते परमोत्सवम् ॥१७१॥

अर्थ: जो जिनमन्दिरमें गीत, नृत्य तथा वादित्रोंसे महोत्सव करता है वह स्वर्गमें परम उत्सवको प्राप्त होता है ॥१७१॥


भवनं यस्तु जैनेन्द्रं निर्मापयति मानवः । तस्य भोगोत्सवः शक्यः केन वक्तुं सुचेतसः ॥१७२॥

अर्थ: जो मनुष्य जिनमन्दिर बनवाता है उस सुचेताके भोगोत्सवका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥१७२॥


प्रतिमां यो जिनेन्द्राणां कारयत्यचिरादसौ । सुरासुरोत्तमसुखं प्राप्य याति परं पदम् ॥१७३॥

अर्थ: जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान्‌की प्रतिमा बनवाता है वह शीघ्र ही सुर तथा असुरोंके उत्तम सुख प्राप्त कर परम पदको प्राप्त होता है ॥१७३॥


व्रतज्ञानतपोदानैर्यान्युपात्तानि देहिनः । सर्वैस्त्रिष्वपि कालेषु पुण्यानि भुवनत्रये ॥१७४॥

एकस्मादपि जैनेन्द्रबिम्बाद् भावेन कारितात् । यत्पुण्यं जायते तस्य न संमान्त्यतिमात्रतः ॥१७५॥

अर्थ: तीनों कालों और तीनों लोकोंमें व्रत, ज्ञान, तप और दानके द्वारा मनुष्यके जो पुण्य-कर्म संचित होते हैं वे भावपूर्वक एक प्रतिमाके बनवानेसे उत्पन्न हुए पुण्यकी बराबरी नहीं कर सकते ॥१७४-१७५॥


फलं यदेतदुद्दिष्टं स्वर्गे संप्राप्य जन्तवः । चक्रवर्त्यादितां लब्ध्वा यन्मर्त्यत्वेऽपि भुञ्जते ॥१७६॥

अर्थ: इस कहे हुए फलको जीव स्वर्गमें प्राप्त कर जब मनुष्य पर्यायमें उत्पन्न होते हैं तब चक्रवर्ती आदि-का पद पाकर वहाँ भी उसका उपभोग करते हैं ॥१७६॥


धर्ममेवं विधानेन यः कश्चित्प्राप्य मानवः । संसारार्णवमुत्तीर्य त्रिलोकाग्रेऽवतिष्ठते ॥१७७॥

अर्थ: जो कोई मनुष्य इस विधिसे धर्मका सेवन करता है वह संसार-सागरसे पार होकर तीन लोकके शिखरपर विराजमान होता है ॥१७७॥


फलं ध्यानाच्चतुर्थस्य षष्ठस्योद्यानमात्रतः । अष्टमस्य तदारम्भे गमने दशमस्य तु ॥१७८॥

द्वादशस्य ततः किंचिन्मध्ये पक्षोपवासजम् । फलं मासोपवासस्य लभते चैत्यदर्शनात् ॥१७९॥

चैत्याङ्गणं समासाद्य याति षाण्मासिकं फलम् । फलं वर्षोपवासस्य प्रविश्य द्वारमश्नुते ॥१८०॥

फलं प्रदक्षिणीकृत्य भुङ्क्ते वर्षशतस्य तु । दृष्ट्वा जिनास्यमाप्नोति फलं वर्षसहस्रजम् ॥१८१॥

अनन्तफलमाप्नोति स्तुतिं कुर्वन् स्वभावतः । नहि भक्तेर्जिनेन्द्राणां विद्यते परमुत्तमम् ॥१८२॥

अर्थ: जो मनुष्य जिनप्रतिमाके दर्शनका चिन्तवन करता है वह बेलाका, जो उद्यमका अभिलाषी होता है वह तेलाका, जो जानेका आरम्भ करता है वह चौलाका, जो जाने लगता है वह पाँच उपवासका, जो कुछ दूर पहुँच जाता है वह बारह उपवासका, जो बीचमें पहुँच जाता है वह पन्द्रह उपवासका, जो मन्दिरके दर्शन करता है वह मासोपवासका, जो मन्दिरके आँगनमें प्रवेश करता है वह छह मासके उपवासका, जो द्वारमें प्रवेश करता है वह वर्षोपवासका, जो प्रदक्षिणा देता है वह सौ वर्षके उपवासका, जो जिनेन्द्रदेवके मुखका दर्शन करता है वह हजार वर्षके उपवासका और जो स्वभावसे स्तुति करता है वह अनन्त उपवासके फलको प्राप्त करता है। यथार्थमें जिनभक्तिसे बढ़कर उत्तम पुण्य नहीं है ॥१७८-१८२॥


कर्म भक्त्या जिनेन्द्राणां क्षयं भरत गच्छति । क्षीणकर्मा पदं याति यस्मिन्ननुपमं सुखम् ॥१८३॥

अर्थ: आचार्य द्युति कहते हैं कि हे भरत ! जिनेन्द्रदेवकी भक्तिसे कर्म क्षयको प्राप्त हो जाते हैं और जिसके कर्म क्षीण हो जाते वह अनुपम सुखसे सम्पन्न परम पदको प्राप्त होता है ॥१८३॥


इत्युक्तेऽत्यन्तसद्भक्तिः प्रणम्य चरणौ गुरोः । जग्राह भरतो धर्मं सागारं सुविधानतः ॥१८४॥

अर्थ: ऐसा कहनेपर अत्यन्त समीचीन भक्तिसे युक्त भरतने गुरुके चरणोंको नमस्कार कर विधिपूर्वक गृहस्थ धर्म ग्रहण किया ॥१८४॥


बहुश्रुतोऽतिधर्मज्ञो विनीतः श्रद्धयान्वितः । विशेषतो ददौ दानं स साधुषु यथोचितम् ॥१८५॥

अर्थ: अनेक शास्त्रोंका ज्ञाता, धर्मके मर्मको जाननेवाला, विनयवान् और श्रद्धा गुणसे युक्त भरत अब साधुओंके लिए विशेष रूपसे यथायोग्य दान देने लगा ॥१८५॥


सम्यग्दर्शनरत्नं स हृदयेन सदा वहन् । चकार विपुलं राज्यं साधुचेष्टापरायणः ॥१८६॥

अर्थ: उत्तम आचरणके गालनमें तत्पर रहनेवाला भरत हृदयमें सम्यग्दर्शनरूपी रत्नको धारण करता हुआ विशाल राज्य- का पालन करता था ॥१८६॥


प्रतापश्चानुरागश्च समस्तां तस्य मेदिनीम् । बभ्राम प्रतिघातेन रहितां गुणवारिधेः ॥१८७॥

अर्थ: गुणोंके सागरस्वरूप भरतका प्रताप और अनुराग दोनों ही बिना किसी रुकावटके समस्त पृथिवीमें भ्रमण करते थे ॥१८७॥


अध्यर्द्धं तस्य पत्नीनां शतं देवीसमत्विषाम् । न तत्रासक्तिमायाति शतपत्रं यथाम्भसि ॥१८८॥

अर्थ: उसके देवियोंके समान कान्तिको धारण करनेवाली डेढ़ सौ स्त्रियाँ थीं फिर भी वह उनमें आसक्तिको प्राप्त नहीं होता था । जिस प्रकार कमल जलमें रहकर भी उसमें आसक्त नहीं होता है उसी प्रकार वह उन स्त्रियोंके बीच रहता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं था ॥१८८॥


चिन्तास्य नित्यं मगधाधिपासीत् कदा नु लप्स्ये निरगारदीक्षाम् ।
तपः करिष्यामि कदा नु घोरं संगैर्विमुक्तो विहरन् पृथिव्याम् ॥१८९॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! भरतके मनमें सदा यही चिन्ता विद्यमान रहती थी कि मैं निर्ग्रन्थ दीक्षा कब धारण करूँगा और परिग्रहसे रहित हो पृथिवीपर विहार करता हुआ घोर तप कब करूँगा ? ॥१८९॥


धन्या मनुष्या धरणीतले ते ये सर्वसङ्गान् परिवर्ज्य धीराः ।
दग्ध्वाखिलं कर्म तपोबलेन प्राप्ताः पदं निर्वृतिसौख्यसारम् ॥१९०॥

अर्थ: पृथिवीतलपर वे धीर-वीर मनुष्य धन्य हैं जो सर्व परिग्रहका त्यागकर तथा तपोबलसे समस्त कर्मोंको भस्म कर सन्तोषरूपी सुखसे श्रेष्ठ मोक्ष पदको प्राप्त हो चुके हैं ॥१९०॥


तिष्ठामि पापो भवदुःखमग्नः पश्यन्नपीदं क्षणिकं समस्तम् । पूर्वाह्लदृष्टोऽत्र जनोऽपराह्ले न दृश्यते कश्चिदहोऽस्मि मूढः ॥१९१॥

अर्थ: एक मैं पापी हूँ जो समस्त जगत्को क्षणभंगुर देखता हुआ भी संसारके दुःखमें मग्न हूँ । इस संसारमें जो मनुष्य पूर्वाह्ल कालमें देखा गया है वही अपराह्ल कालमें नहीं दिखाई देता फिर भी आश्चर्य है कि मैं मूढ़ बना हूँ ॥१९१॥


व्यालाज्जलाद् वा विषतोऽनलाद् वा वज्राद् विमुक्तादहितेन शस्त्रात् ।
शूलाद् वराद् वा मरणं जनोऽयं प्राप्नोति दीनाननबन्धुमध्ये ॥१९२॥

अर्थ: दीन हीन मुखको धारण करनेवाले बन्धुजनोंके बीचमें बैठा हुआ यह प्राणी सर्पसे, जलसे, विषसे, अग्निसे, वज्रसे, शत्रुके द्वारा छोड़े हुए शस्त्रसे, अथवा तीक्ष्ण शूलसे मरणको प्राप्त हो जाता है ॥१९२॥


बहुप्रकारैर्मरणैर्जनोऽयं प्रतर्क्यते दुःखसहस्रभागी ।
क्षारार्णवस्येव तटे प्रसुप्तो मत्तोऽतिवेगप्रसृतोर्मिजालैः ॥१९३॥

अर्थ: यह प्राणी अनेक प्रकारके मरणोंसे हजारों प्रकारके दुःख भोगता हुआ भी निश्चिन्त बैठा है सो ऐसा जान पड़ता है मानो कोई मत्त मनुष्य वेगसे फैलनेवाली लहरोंके समूहसे निर्भय हो लवणसमुद्रके तटपर सोया है ॥१९३॥


विधाय राज्यं घनपापदिग्धो हा कं प्रपत्स्ये नरकं तु घोरम् । शरासिचक्राङ्गनगान्धकारं किं वा नु तिर्यक्त्वमनेकयोनिम् ॥१९४॥

अर्थ: हाय हाय, मैं राज्यकर तीव्र पापसे लिप्त होता हुआ जहाँ बाण, खड्ग, चक्र आदि शस्त्र, तथा शाल्मली आदि वृक्षों और पहाड़ोंके कारण घोर अन्धकार व्याप्त है ऐसे किस भयंकर नरकमें पड़ूँगा अथवा अनेक योनियोंसे युक्त तिर्यंच पर्यायको प्राप्त होऊँगा ? ॥१९४॥


लब्ध्वापि जैनं समयं यदेतन्मनो मदीयं दुरितानुबद्धम् ।
करोति नो निस्पृहतामुपेत्य विमुक्तिदक्षं निरगारधर्मम् ॥१९५॥

अर्थ: मेरा यह मन जैनधर्मको पाकर भी पापोंसे लिप्त हो रहा है तथा निःस्पृहताको प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करानेमें समर्थ मुनिधर्मको धारण नहीं कर रहा है ॥१९५॥


एवं च चिन्तां सततं प्रपन्नो दुष्कर्मविध्वंसनहेतुभूताम् ।
पुराणनिर्ग्रन्थकथाप्रसक्तो ददर्श राजा न रविं न चन्द्रम् ॥१९६॥

अर्थ: इस प्रकार जो पापकर्मके नाशमें कारणभूत चिन्ताको निरन्तर प्राप्त था तथा जो प्राचीन मुनियोंकी कथामें सदा लीन रहता था ऐसा राजा भरत न सूर्यकी ओर देखता था न चन्द्रमाकी ओर ॥१९६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दशरथरामभरतानां प्रव्रज्यावनप्रस्थानराज्याभिधानं नाम द्वात्रिंशत्तमं पर्व ॥३२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें राजा दशरथकी दीक्षा, रामका वनगमन और भरतके राज्याभिषेकका वर्णन करनेवाला बत्तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३२॥

३३. त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व (वज्रकर्णोपाख्यानं)

ततो जनोपभोग्यानां प्रदेशानां समीपतः । रमणीयान् परिप्राप पद्मस्तापससंश्रयान् ॥१॥

तापसा जटिलास्तत्र नानावल्कलधारिणः । सुस्वादुफलसंपूर्णाः पादपा इव भूरयः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर राम मनुष्योंके उपभोगके योग्य स्थानोंसे हटकर तपस्वियोंके सुन्दर आश्रममें पहुँचे । वहाँ वृक्षोंके समान जटिल अर्थात् जटाधारी ( पक्षमें जड़ोंसे युक्त ), नाना प्रकारके वल्कलोंको धारण करनेवाले और स्वादिष्ट फलोंसे युक्त बहुत-से तापस रहते थे ॥१-२॥


विशालपत्रसञ्छन्ना मठकाः सवितर्दिकाः । पलाशोदुम्बरैधानां पूलिकाभिर्युताः क्वचित् ॥३॥

अर्थ: उस आश्रममें अनेक मठ बने हुए थे जो विशाल पत्तोंसे छाये थे । सबके आगे बैठनेके लिए चबूतरे थे, जो एक ओर कहीं रखी हुई पलाश तथा ऊमरकी लकड़ियोंकी गड्डियोंसे सहित थे ॥३॥


अकृष्टपच्यबीजेन शुष्यता पूरिताङ्गणाः । वर्तयद्भिः सुविश्रब्धैः रोमन्थं राजिता मृगैः ॥४॥

अर्थ: बिना जोते बोये अपने-आप उत्पन्न होनेवाले धान उनके आँगनोंमें सूख रहे थे तथा निश्चिन्ततासे रोमन्थ करते हुए हरिणोंसे वे सुशोभित थे ॥४॥


सजटैर्वटुमिर्युक्ता रटद्भिः सततं पटु । ललितोच्छ्रितपुच्छेण तार्णकेन कृताजिराः ॥५॥

अर्थ: निरन्तर जोर-जोरसे रटनेवाले जटाधारी बालकोंसे युक्त गायोंके बछड़े अपनी सुन्दर पूँछ ऊपर उठाकर उन मठोंके आँगनोंमें चौकड़ियाँ भर रहे थे ॥५॥


पठद्भिर्विशदं युक्ताः शारिकाशुककौशिकैः । वीरुधां पुष्परम्याणां छायासु समवस्थितैः ॥६॥

अर्थ: फूलोंसे सुन्दर लताओंकी छायामें बैठकर स्पष्ट उच्चारण करनेवाले तोता, मैना तथा उलूक आदि पक्षियोंसे वे मठ सहित थे ॥६॥


कन्याभिर्घटकैः स्वादु वारिणा भ्रातृतेक्षितैः । पूर्णालवालकैर्बालैस्तरुभिः कृतराजनाः ॥७॥

अर्थ: कन्याओंने भाई समझकर घड़ों द्वारा मधुर जलसे जिनकी क्यारियाँ भर दी थीं ऐसे छोटे-छोटे वृक्ष उन मठोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥७॥


फलैर्बहुविधैः पुष्पैर्वासितैः स्वादुवारिभिः । सादरैः स्वागतस्वानैः सार्घदानैस्तथाशनैः ॥८॥

संभाषणैः कुटीदानैः शयनैर्मृदुपल्लवैः । तापसैरुपचारैस्ते पूजिता श्रमहारिभिः ॥९॥

अर्थ: उन तपस्वियोंने नाना प्रकारके मधुर फल, सुगन्धित पुष्प, मीठा जल, आदरसे भरे स्वागतके शब्द, अर्घके साथ दिये गये भोजन, मधुर सम्भाषण, कुटीका दान और कोमल पत्तोंकी शय्या आदि थकावटको दूर करनेवाले उपचारसे उनका बहुत सम्मान किया ॥८-९॥


आतिथेयाः स्वभावेन ते हि सर्वत्र तापसाः । रूपेष्वेवं प्रकारेषु विशेषेण सुवृत्तयः ॥१०॥

अर्थ: तापस लोग स्वभावसे ही सर्वत्र अतिथि-सत्कार करनेमें निपुण थे फिर इस प्रकारके सुन्दर पुरुषोंके मिलनेपर तो उनका वह गुण और भी अधिक प्रकट हो गया था ॥१०॥


उषित्वा गच्छतां तेषां ययुर्मार्गेण तापसाः । पाषाणानपि तद्रूपं द्रवीकुर्यात् किमन्यकैः ॥११॥

अर्थ: राम-लक्ष्मण वहाँ बसकर जब आगे जाने लगे तब वे तापस उनके मार्गमें आ गये सो ठीक ही है क्योंकि उनका रूप पाषाणोंको भी द्रवीभूत कर देता था फिर औरोंकी तो बात ही क्या थी ? ॥११॥


शुष्कपत्राशिनस्तत्र तापसा वायुपायिनः । सीतारूपहृतस्वान्ता धृतिं दूरेण तत्यजुः ॥१२॥

अर्थ: उस आश्रममें जो तापस रहते थे उन्होंने सुन्दर रूप कहाँ देखा था ? वे सूखे पत्ते खाकर तथा वायुका पान कर जीवन बिताते थे इसलिए सीताका रूप देखते ही उनका चित्त हरा गया जिससे उन्होंने धीरजको दूर छोड़ दिया ॥१२॥


तानूचुस्तापसा वृद्धाः सान्त्ववाचा पुनः पुनः । तिष्ठतं यदि नास्माकमाश्रमे श्रृणुतं ततः ॥१३॥

अर्थ: वृद्ध तपस्वियोंने शान्त वचनोंसे उनसे बार-बार कहा कि यदि आप लोग हमारे आश्रममें नहीं ठहरते हैं तो भी हमारे वचन सुनिए ॥१३॥


सर्वातिथ्यसमेतास्वप्यटवीषु विचक्षणौ । विश्रम्भं जातु मा गातां नारीष्विव नदीष्विव ॥१४॥

अर्थ: यद्यपि ये अटवियाँ सर्व प्रकारके आतिथ्य-सत्कारसे सहित हैं तो भी नारियों और नदियोंके समान इनका विश्वास नहीं कीजिए । आप स्वयं बुद्धिमान् हैं ॥१४॥


तापसप्रमदा दृष्ट्वा पद्मं पद्मनिरीक्षणम् । लक्ष्मणं च जहुः सर्वं कर्तव्यं शून्यविग्रहाः ॥१५॥

अर्थ: तपस्वियोंकी स्त्रियोंने कमलके समान नेत्रोंवाले राम और लक्ष्मणको देखकर अपने सब काम छोड़ दिये । उनका सर्व शरीर शून्य पड़ गया ॥१५॥


काश्चिदुत्कण्ठया युक्तास्तन्मार्गाहितलोचनाः । व्रजन्त्यन्यापदेशेन सुदूरं विह्वलात्मिकाः ॥१६॥

अर्थ: उत्कण्ठासे भरी कितनी ही विह्वल स्त्रियाँ उनके मार्गमें नेत्र लगाकर किसी अन्य कार्यके बहाने बहुत दूर तक चली गयीं ॥१६॥


मधुरं ब्रुवते काश्चिद्भवन्तोऽस्माकमाश्रमे । किं न तिष्ठन्तु सर्वं नः करिष्यामो यथोचितम् ॥१७॥

अर्थ: कोई स्त्रियाँ मधुर शब्दोंमें कह रही थीं कि आप लोग हमारे आश्रममें क्यों नहीं रहते हैं ? हम आपका सब कार्य यथायोग्य रीतिसे कर देंगी ॥१७॥


अतीत्य त्रीनितः कोशानरण्यानी जनोज्झिता । महानोकहसञ्छन्ना हरिशार्दूलसंकुला ॥१८॥

अर्थ: यहाँसे तीन कोश आगे चलकर मनुष्योंके संचारसे रहित, बड़े-बड़े वृक्षोंसे भरी तथा सिंह, व्याघ्र आदि जन्तुओंसे व्याप्त एक महाअटवी है ॥१८॥


समित्फलप्रसूनार्थं तापसा अपि तां भुवम् । न व्रजन्ति महाभीमां दर्भसूचीभिराचिताम् ॥१९॥

अर्थ: वह अत्यन्त भयंकर है तथा डाभकी सूचियोंसे व्याप्त है । ईंधन तथा फल-फूल लानेके लिए तपस्वी लोग भी वहाँ नहीं जाते हैं ॥१९॥


चित्रकूटः सुदुर्लङ्घ्यः प्रविशालो महीधरः । भवद्भिः किं न विज्ञातः प्रकोपं येन गच्छत ॥२०॥

अर्थ: आगे अत्यन्त दुर्लंघ्य तथा बहुत भारी चित्रकूट नामका पर्वत है सो क्या आप जानते नहीं हैं जिससे क्रोधको प्राप्त हो रहे हैं ॥२०॥


तापस्योऽवश्यमस्माभिर्गन्तव्यमिति चोदिताः । कृच्छ्रेण ता न्यवर्तन्त कुर्वाणास्तत्कथां चिरम् ॥२१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें राम-लक्ष्मणने कहा कि हे तपस्वियो ! हम लोगोंको अवश्य ही जाना है । इस प्रकार कहनेपर वे बड़ी कठिनाईसे लौटीं और लौटती हुईं भी चिरकाल तक उन्हींकी कथा करती रहीं ॥२१॥


ततस्ते भूमहीध्राग्रग्राववातसुकर्कशम् । महातरुढमारूढवल्लीजालसमाकुलम् ॥२२॥

अर्थ: अथानन्तर उन्होंने ऐसे महावनमें प्रवेश किया कि जो पृथिवी और पर्वतोंके अग्रभागके चट्टानोंके समूहसे अत्यन्त कर्कश था तथा बड़े-बड़े वृक्षोंपर चढ़ी हुई लताओंके समूहसे जो व्याप्त था ॥२२॥


क्षुदतिक्रुद्धशादू लनखविक्षतपादपम् । सिंहाहतद्विपोद्गीर्णरक्तवमौक्तिकपिच्छलम् ॥२३॥

अर्थ: जहाँ भूखसे अत्यन्त क्रुद्ध हुए व्याघ्र नखोंसे वृक्षोंको क्षत-विक्षत कर रहे थे । जो सिंहोंके द्वारा मारे गये हाथियोंके गण्डस्थलसे निकले रुधिर तथा मोतियोंकी कीचसे युक्त था ॥२३॥


उन्मत्तवारणस्कन्धतष्टस्कन्धमहातरुम् । केसरिध्वनिवित्रस्तसमुत्कीर्णकुरङ्गकम् ॥२४॥

अर्थ: जहाँ उन्नत हाथियोंने अपने स्कन्धोंसे बड़े-बड़े वृक्षोंके स्कन्ध छील दिये थे । जहाँ सिंहोंकी गर्जनासे भयभीत हुए मृग इधर-उधर दौड़ रहे थे ॥२४॥


सुप्ताजगरनिश्वासवायुपूरितगह्वरम् । वराहयूथप्रोथाग्रविषमीकृतपल्वलम् ॥२५॥

अर्थ: जहाँ सोये हुए अजगरोंकी श्वासोच्छ्वास वायुसे गुफाएँ भरी हुई थीं । तथा सूकर समूहके मुखके अग्रभागके आघातसे छोटे-छोटे जलाशय ऊँचे-नीचे हो रहे थे ॥२५॥


महामहिषश्रृङ्गाग्रभग्नवल्मीकसानुकम् । ऊर्ध्वीकृतमहाभोगसंचरद्भोगिभीषणम् ॥२६॥

अर्थ: बड़े-बड़े भैंसाओंके सींगोंके अग्रभागसे जहाँ वामियोंके शिखर खुद गये थे तथा जो बड़े-बड़े फण ऊँचे उठाकर चलनेवाले साँपोंसे भयंकर था ॥२६॥


तरक्षुक्षतसारङ्गरुधिरभ्रान्तमक्षिकम् । कण्टकासक्तपुच्छाग्रप्रताम्यच्चमरीगणम् ॥२७॥

अर्थ: जहाँ भेड़ियोंके द्वारा मारे गये मृगोंके रुधिरपर मक्खियां भिन-भिना रही थीं और कटीली झाड़ियोंमें पूँछके बाल उलझ जानेसे जहाँ चमरी मृगोंके झुण्ड बेचैन हो रहे थे ॥२७॥


दर्पसंपूरितश्वाविन्मुक्तसूचीविचित्रितम् । विषपुष्परजोघ्राणघूर्णितानेकजन्तुकम् ॥२८॥

अर्थ: जो अहंकारसे भरी सेहियोंके द्वारा छोड़ी हुई सूचियोंसे चित्रविचित्र था तथा विषपुष्पोंकी परागके सूँघनेसे जहाँ अनेक जन्तु इधर-उधर घूम रहे थे ॥२८॥


खड्गि खड्गसमुल्लीढतरुस्कन्धच्युतद्रवम् । उद्भ्रान्तगवयव्रातभग्नपल्लवजालकम् ॥२९॥

अर्थ: जहाँ गेंड़ा, हाथियोंके गण्डस्थलोंके आघातसे खण्डित हुए वृक्षोंके तनोंसे पानी झर रहा था तथा इधर-उधर दौड़ते हुए गवय-समूहने जहाँ वृक्षोंके पल्लव तोड़ डाले थे ॥२९॥


नानापक्षिकुलक्रूरकूजितप्रतिनादितम् । शाखामृगकुलाक्रान्तचलत्प्राग्भारपादपम् ॥३०॥

अर्थ: जहाँ नाना पक्षियोंके समूहकी क्रूरध्वनि गूँज रही थी तथा वानर समूहके आक्रमणसे जहाँ वृक्षोंके ऊर्ध्वभाग हिल रहे थे ॥३०॥


तीव्रवेगगिरिस्रोतःशतनिर्दारितक्ष्मम् । वृक्षाग्रविस्फुरत्स्फीतदिवाकरकरोत्करम् ॥३१॥

अर्थ: तीव्र वेगसे बहनेवाले सैकड़ों पहाड़ी झरनोंसे जहाँ पृथिवी विदीर्ण हो गयी थी तथा वृक्षोंके अग्रभागपर जहाँ सूर्यकी किरणोंका समूह देदीप्यमान होता था ॥३१॥


नानापुष्पफलाकीर्णं विचित्रामोदवासितम् । विविधौषधिसंपूर्णं वनसस्यसमाकुलम् ॥३२॥

अर्थ: जो नाना प्रकारके फूलों और फलोंसे व्याप्त था, विचित्र प्रकारकी सुगन्धिसे सुवासित था, नाना ओषधियोंसे परिपूर्ण था, और जंगली धान्योंसे युक्त था ॥३२॥


क्वचिन्नीलं क्वचित्पीतं क्वचिद्रक्तं हरित्क्वचित् । पिञ्जरच्छायमन्यत्र विविशुर्विपिनं महत् ॥३३॥

अर्थ: जो कहीं नीला था, कहीं पीला था, कहीं लाल था, कहीं हरा था, और कहीं पिंगल वर्ण था ॥३३॥


तत्र ते चित्रकूटस्य निर्झरेष्वतिचारुषु । क्रीडन्तो दर्शयन्तश्च सद्वस्तूनि परस्परम् ॥३४॥ कुलकं(द्वादशभिः)

फलानि स्वादुहारीणि स्वदमानाः पदे पदे । गायन्तो मधुरं हारि किन्नरीणां त्रपाकरम् ॥३५॥

पुष्पैर्जलस्थलोद्भूतैर्भूषयन्तः परस्परम् । सुगन्धिभिर्द्रवैरङ्गं लिम्पन्तस्तरुसंभवैः ॥३६॥

उद्यानमिव निर्याता विकसत्कान्तिलोचनाः । स्वच्छन्दकृतसंस्काराः सत्त्वलोचनतस्कराः ॥३७॥

अर्थ: वे तीनों महानुभाव वहाँ चित्रकूटके सुन्दर निर्झरोंमें क्रीड़ा करते, सुन्दर वस्तुएँ परस्पर एक दूसरेको दिखाते, स्वादिष्ट मनोहर फल खाते, पद-पदपर किन्नरियोंको लज्जित करनेवाला हृदयहारी मधुर गान गाते, जल तथा स्थलमें उत्पन्न हुए पुष्पोंसे परस्पर एक दूसरेको भूषित करते और वृक्षोंसे निकले हुए सुगन्धित द्रवसे शरीरको लिप्त करते हुए इस प्रकार भ्रमण कर रहे थे मानो उद्यानकी सैर करनेके लिए ही निकले हों। उनके सुन्दर नेत्र विकसित हो रहे थे, वे इच्छानुसार शरीरकी सजावट करते थे तथा प्राणियोंके नेत्रोंका अपहरण करते थे ॥३४-३७॥


लतागृहेषु विश्रान्ता मुहुर्नयनहारिषु । कृतनानाकथासङ्गाः किंचिन्नर्मविधायिनः ॥३८॥

अर्थ: वे बार-बार नेत्रोंको हरण करनेवाले निकुंजोंमें विश्राम करते थे, नाना प्रकारकी कथावार्ता करते थे और तरह-तरहकी क्रीड़ाएँ करते थे ॥३८॥


व्रजन्तो लीलया युक्ता निसर्गादतिरम्यया । पर्यटन्तो वनं चारु त्रिदशा इव नन्दनम् ॥३९॥

अर्थ: स्वभावसे ही अत्यन्त सुन्दर लीलाके साथ गमन करते हुए वे उस सुन्दर वनमें इस प्रकार भ्रमण कर रहे थे जिस प्रकार कि नन्दन वनमें देव ॥३९॥


पक्षोनैः पञ्चभिर्मासैस्तमुद्देशमतीत्य ते । जनैः समाकुलं प्रापुर्देशमत्यन्तसुन्दरम् ॥४०॥

गोघण्टारवसंपूर्णं नानासस्योपशोभितम् । अवन्तीविषयं स्फीतं ग्रामपत्तनसंकुलम् ॥४१॥

अर्थ: इस प्रकार एक पक्ष कम पाँच मासमें वे उस स्थानको पार कर मनुष्योंसे भरे हुए अत्यन्त सुन्दर अवन्ती देशमें पहुँचे। वह देश गायोंकी गरदनोंमें बँधे घण्टाओंके शब्दसे परिपूर्ण था, नाना प्रकारके धान्यसे सुशोभित था, विस्तृत था और ग्राम तथा नगरोंसे व्याप्त था ॥४०-४१॥


मार्गं तत्र कियन्तं चिदतिक्रम्य जनोज्झितम् । विषयैकान्तमापुस्ते पृथुं स्वाकारधारिणः ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर सुन्दर आकारको धारण करनेवाले वे तीनों, कितना हो मार्ग उल्लंघकर एक अतिशय विस्तृत ऐसे स्थानमें पहुँचे जिसे मनुष्य छोड़कर भाग गये थे ॥४२॥


छायां न्यग्रोधजां श्रित्वा विश्रान्तास्ते परस्परम् । जगुः कस्मादयं देशो दृश्यते जनवर्जितः ॥४३॥

अर्थ: एक वट वृक्षकी छायामें बैठकर विश्राम करते हुए वे परस्पर कहने लगे कि यह मनुष्योंसे रहित क्यों दिखाई देता है ? ॥४३॥


सस्यानि कृष्टपच्यानि दृश्यन्तेऽत्रातिभूरिशः । उद्यानपादपाश्चैत्ये फलैः पुष्पैश्च शोभिताः ॥४४॥

अर्थ: यहाँ अनेकों धानके पके खेत दिखाई दे रहे हैं, बगीचोंके ये वृक्ष फलों और फूलोंसे सुशोभित हैं ॥४४॥


पुण्ड्रैक्षुवाटसंपन्ना ग्रामास्तुङ्गावनिस्थिताः । सरांस्यच्छिन्नपद्मानि युक्तानि विविधैः खगैः ॥४५॥

अर्थ: ऊँची भूमिपर बसे गाँव पौंडों और ईखोंके बागोंसे युक्त हैं, जिनके कमलोंको किसीने तोड़ा नहीं है ऐसे सरोवर नाना प्रकारके पक्षियोंसे युक्त हैं ॥४५॥


अध्वायं घटकैर्भग्नैः शकटैश्च विशङ्कटः । करण्डैः कुण्डकैर्दण्डैः कुण्डिकाभिः कटासनैः ॥४६॥

अर्थ: यह मार्ग फूटे घड़ों, गाड़ियों, पिटारों, कूँड़ों, कुण्डिकाओं और चटाई आदि आसनोंसे व्याप्त है ॥४६॥


विकीर्णास्तण्डुला माषा मुद्गाः सूर्पादयस्तथा । वृद्धोक्षोयं मृतो जीर्णगोण्यस्योपरि तिष्ठति ॥४७॥

अर्थ: यहाँ चावल, उड़द, मूँग तथा सूप आदि बिखरे हुए हैं और इधर यह बूढ़ा बैल मरा पड़ा है तथा इसके ऊपर फटी पुरानी गोन लदी हुई है ॥४७॥


देशोऽयमतिविस्तीर्णः शोभते न जनोज्झितः । अत्यन्तविषयासङ्गो यथा दीक्षासमाश्रितः ॥४८॥

अर्थ: यह इतना बड़ा देश मनुष्योंसे रहित हुआ ठीक उस तरह शोभित नहीं होता जिस प्रकार कि कोई दीक्षा लेनेवाला साधु विषयोंकी आसक्तिमें पड़कर शोभित नहीं होता ॥४८॥


ततोऽत्यन्तमृदुस्पर्शे निषण्णं रत्नकम्बले । देशोद्वासकृतालापं राम पार्श्वस्थकार्मुकम् ॥४९॥

अर्थ: तदनन्तर देशके ऊजड़ होनेकी चर्चा करते हुए राम अत्यन्त कोमल स्पर्शवाले रत्नकम्बल-पर बैठ गये और पास ही उन्होंने अपना धनुष रख लिया ॥४९॥


पद्मगर्भदलाभाभ्यां पाणिभ्यां पूजितेहिता । द्राग्विश्रमयितुं सक्ता सीता प्रेमाम्बुदीर्घिका ॥५०॥

अर्थ: जो प्रशस्त चेष्टाकी धारक और प्रेमरूपी जलकी मानो वापिका ही थी ऐसी सीता कमलके भीतरी दलके समान कोमल हाथोंसे शीघ्र ही रामको विश्राम दिलाने अर्थात् उनके पादमर्दन करनेके लिए तैयार हुई ॥५०॥


उत्सार्य चोरुलग्नां तां सादरक्रमकोविदः । संवाहयितुमासक्तो लक्ष्मणो ज्यायसोदितः ॥५१॥

अर्थ: तब आदरपूर्ण क्रमको जाननेवाला लक्ष्मण, बड़े भाईकी आज्ञा प्राप्त कर जाँघोंसे लगी सीताको अलग कर स्वयं पादमर्दन करने लगा ॥५१॥


निरूपय क्वचित्तावद् ग्रामं नगरमेव वा । घोषं वा लक्ष्मण क्षिप्रं श्रान्तेयं हि प्रजावती ॥५२॥

अर्थ: रामने लक्ष्मणसे कहा कि हे भाई ! तेरी यह भावज बहुत थक गयी है इसलिए शीघ्र ही किसी गाँव, नगर अथवा अहीरोंकी बस्तीको देखो ॥५२॥


ततोऽन्यस्यातितुङ्गस्य वृक्षस्योर्ध्वसमाश्रितः । दृश्यते किंचिदत्रेति पद्मेनोच्यत लक्ष्मणः ॥५३॥

अर्थ: तब लक्ष्मण एक बड़े वृक्षकी शिखरपर चढ़ा । रामने उससे पूछा कि क्या यहाँ कुछ दिखाई देता है ? ॥५३॥


सोऽवोचद्देव पश्यामि रूपपर्वतसंनिभान् । शारदाभ्रसमुत्तुङ्गैः श्रृङ्गजालैर्विराजितान् ॥५४॥

प्राग्भारसिंहकर्णस्थजिनबिम्बोपलक्षितान् । प्रासादान् परमोद्यानान् प्रचलद्धवलध्वजान् ॥५५॥

अर्थ: लक्ष्मणने कहा कि हे देव ! जो चाँदीके पर्वतके समान हैं, शरद् ऋतुके बादलोंके समान ऊँचे शिखरोंसे सुशोभित हैं, जो उपरितन अग्र भागपर जिन-प्रतिमाओंसे सहित हैं, उत्तमोत्तम बगीचों-से युक्त हैं तथा जिनपर सफेद ध्वजाएँ फहरा रही हैं ऐसे जिनमन्दिरोंको देख रहा हूँ ॥५४-५५॥


ग्रामांश्चायतवापीभिः सस्यैश्च कृतवेष्टनान् । नगराणि च गन्धर्वपुरैर्बिभ्रन्ति तुल्यताम् ॥५६॥

दृष्टिगोचरमात्रे तु संनिवेशाः सुभूरयः । दृश्यन्ते न पुनः कश्चिदेकोऽप्यालोक्यते जनः ॥५७॥

अर्थ: लम्बी-चौड़ी वापिकाओं तथा धानके हरे-भरे खेतोंसे घिरे गाँव और गन्धर्वनगरोंकी तुलना धारण करनेवाले नगर भी दिखाई दे रहे हैं । इस प्रकार बहुत भारी वसतिकाएँ दिखाई दे रही हैं परन्तु उनमें आदमी एक भी नहीं दिखाई देता ॥५६-५७॥


समं किं परिवर्गेण विनष्टाः स्युरिह प्रजाः । उपानीताः किमु म्लेच्छैर्वन्दित्वं क्रूरकर्मभिः ॥५८॥

अर्थ: क्या यहाँकी प्रजा अपने समस्त परिवारके साथ नष्ट हो गयी है अथवा क्रूर कर्म करनेवाले म्लेच्छोंने उसे बन्दी बना लिया है ? ॥५८॥


एकस्तु पुरुषाकारो दृश्यते चातिदूरतः । स्थाणुर्न पुरुषोऽयं तु ननु चैष चलाकृतिः ॥५९॥

अर्थ: बहुत दूर, एक पुरुष-जैसा आकार दिखाई देता है जो ठूँठ नहीं है पुरुष ही मालूम होता है क्योंकि उसकी प्रकृति चंचल है ॥५९॥


यात्येष किमुतायाति पश्याम्यागच्छतीत्यम् । तावदायातु मार्गेण जानाम्येनं विशेषतः ॥६०॥

अर्थ: परन्तु यह जा रहा हैं या आ रहा है इसका पता नहीं चलता । कुछ देर तक गौरसे देखनेके बाद लक्ष्मणने कहा कि ‘यह आ रहा है’ यही जान पड़ता है, अच्छा, मार्गपर आने दो तभी इसे विशेषतासे जान सकूँगा ॥६०॥


अयं मृग इवोद्विग्नो द्रुतमायाति मानवः । रूक्षोर्द्धमूर्धजो दीनो मलोपहतविग्रहः ॥६१॥

कूर्चाच्छादितवक्षस्को वसानश्चीरखण्डकम् । स्फुटिताङ्घ्रि स्रवत्स्वेदो दर्शयन् पूर्वदुष्कृतम् ॥६२॥

अर्थ: लक्ष्मणने फिर देखकर कहा कि यह पुरुष मृगके समान भयभीत होकर शीघ्र ही आ रहा है, इसके शिरके बाल रूखे तथा खड़े हैं, दीन है, इसका शरीर मैलसे दूषित है, पसीना झर रहा है और पूर्वोपार्जित पाप कर्मको दिखा रहा है ॥६१-६२॥


आनयेममितः क्षिप्रमिति पद्मेन भाषितः । अवतीर्य गतस्तस्य सविस्मय इवान्तिकम् ॥६३॥

अर्थ: रामने लक्ष्मणसे कहा कि इसे शीघ्र ही यहाँ बुलाओ । तब लक्ष्मण नीचे उतरकर आश्चर्यके साथ उसके पास गया ॥६३॥


दृष्ट्वा तं पुरुषो हृष्टरोमा विस्मयपूरितः । विलम्बितगतिः किंचिदकरोदिति मानसे ॥६४॥

अर्थ: लक्ष्मणको देखकर उस पुरुषको रोमांच उठ आये। वह आश्चर्यसे भर गया और अपनी गति कुछ धीमी कर मनमें इस प्रकार विचार करने लगा ॥६४॥


समाकम्पितवृक्षोऽयमवतीर्य समागतः । किमिन्द्रो वरुणो दैत्यः किं नागः किन्नरो नरः ॥६५॥

वैवस्वतः शशाङ्को नु वह्निर्वैश्रवणो नु किम् । भास्करो नु भुवं प्राप्तः कोऽयमुत्तमविग्रहः ॥६६॥

अर्थ: कि यह जो वृक्षको कम्पित करनेवाला नीचे उतरकर आया है सो क्या इन्द्र है ? या वरुण है ? या दैत्य है ? या नाग है ? या किन्नर है ? या मनुष्य है ? या यम है ? या चन्द्रमा है ? या अग्नि है ? या कुबेर है ? या पृथिवीपर आया सूर्य है ? अथवा उत्तम शरीरका धारी कौन है ? ॥६५-६६॥


इति ध्यायन् महाभीत्या मुकुलीकृत्य लोचने । निश्चेष्टावयवो भूमौ पपाताव्यक्तचेतनः ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते-करते उसके नेत्र महाभयसे बन्द हो गये, शरीर निश्चेष्ट पड़ गया और वह मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥६७॥


उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्र त्वं मा भैषीरिति भाषितः । प्रत्यागतधृतिर्नीतो लक्ष्मणेनान्तिकं गुरोः ॥६८॥

अर्थ: यह देख लक्ष्मणने कहा कि भद्र ! उठ-उठ, डर मत। कुछ देर बाद जब चैतन्य हुआ तब लक्ष्मण उसे रामके पास ले गया ॥६८॥


ततः सौम्याननं राममभिरामं समन्ततः । दृष्ट्वा कान्तिसमुद्रस्थं चक्षुरुत्सवकारिणम् ॥६९॥

सीतया शोभितं पार्श्ववर्तिन्यातिविनीतया । मुमोच पुरुषः सद्यः क्षुधादिजपरिश्रमम् ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका मुख सौम्य था, जो सर्व प्रकारसे सुन्दर थे, मानो कान्तिके समुद्रमें ही स्थित थे, नेत्रोंको उत्सव प्रदान करनेवाले थे, और पासमें बैठी हुई अतिशय नम्र सीतासे सुशोभित थे ऐसे रामको देखकर उस पुरुषने क्षुधा आदिसे उत्पन्न हुए श्रमको शीघ्र ही छोड़ दिया ॥६९-७०॥


ननाम चाञ्जलिं कृत्वा शिरसा स्पृष्टभूतलः । छायायां भव विश्वस्त इति चोक्त उपाविशत् ॥७१॥

अर्थ: उसने हाथ जोड़ मस्तकसे भूमिका स्पर्श करते हुए नमस्कार किया तथा ‘छायामें विश्राम कर’ इस प्रकार कहे जानेपर वह बैठ गया ॥७१॥


अपृच्छत्तं ततः पद्मः क्षरन्निव गिरामृतम् । आगतोऽसि कुतो भद्र को वा किंसंज्ञकोऽपि वा ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर रामने वाणीसे मानो अमृत झराते हुए उससे पूछा कि हे भद्र ! तू कहाँसे आ रहा है और तेरा क्या नाम है ? ॥७२॥


सोऽवोचद् दूरतः स्थानाच्छीरगुप्तिः कुटुम्बिकः । देशोऽयं विजनः कस्मादिति पृष्टोऽवदत् पुनः ॥७३॥

अर्थ: उसने कहा कि मैं बहुत दूरसे आ रहा हूँ और सीरगुप्ति मेरा नाम है। ‘यह देश मनुष्योंसे रहित क्यों है ?’ इस प्रकार रामके पूछनेपर वह पुनः कहने लगा ॥७३॥


सिंहोदर इति ख्यातो देवोऽस्त्युज्जयिनीपतिः । प्रतापप्रणतोदारसामन्तः सुरसंनिभः ॥७४॥

अर्थ: कि जिसने अपने प्रतापसे बड़े-बड़े सामन्तोंको नम्रीभूत कर दिया है तथा जो देवोंके समान जान पड़ता है ऐसा सिंहोदर नामसे प्रसिद्ध उज्जयिनी नगरीका राजा है ॥७४॥


दशाङ्गपुरनाथोऽस्य वज्रकर्णश्रुतिर्महान् । अत्यन्तदयितो भृत्यः कृतानेकाद्भुतक्रियः ॥७५॥

अर्थ: दशांगपुरका राजा वज्रकर्ण जिसने कि अनेक आश्चर्यजनक कार्य किये हैं इसका अत्यन्त प्रिय सेवक है ॥७५॥


मुक्त्वा त्रिभुवनाधीशं भगवन्तं जिनाधिपम् । निर्ग्रन्थांश्च नमस्कारं न करोत्यपरस्य सः ॥७६॥

अर्थ: वह तीन लोकके अधिपति जिनेन्द्रभगवान् और निर्ग्रन्थ मुनियोंको छोड़कर किसी अन्यको नमस्कार नहीं करता है ॥७६॥


साधुप्रसादतस्तस्य सम्यग्दर्शनमुत्तमम् । पृथिव्यां ख्यातिमायातं देवेन किमु न श्रुतम् ॥७७॥

अर्थ: ‘साधुके प्रसादसे उसका उत्तम सम्यग्दर्शन पृथिवीमें प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ है’ यह क्या आपने नहीं सुना ? ॥७७॥


प्रसादः साधुना तस्य कृतः कथमितीरतः । लक्ष्मीधरकुमारेण पद्माभिप्रायसूरिणा ॥७८॥

अर्थ: इसी बीचमें रामका अभिप्राय जाननेवाले लक्ष्मणने उससे पूछा कि हे भाई ! साधुने इसपर किस तरह प्रसाद किया है ? सो तो बता ॥७८॥


उवाच पथिको देव समासात् कथयाम्यहम् । प्रसादः साधुना तस्य यथायमुपपादितः ॥७९॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उस पथिकने कहा कि हे देव ! साधुने जिस तरह इसपर प्रसाद किया यह मैं संक्षेपसे कहता हूँ ॥७९॥


अन्यदा वज्रकर्णोऽयं दशारण्यसमाश्रिताम् । प्राविशत् सत्त्वसंपूर्णामटवीं मृगयोद्यतः ॥८०॥

अर्थ: एक समय शिकार खेलनेके लिए उद्यत हुआ वज्रकर्ण दशारण्यपुरके समीपमें स्थित जीवोंसे भरी अटवीमें प्रविष्ट हुआ ॥८०॥


जन्मनः प्रभृति क्रूरः ख्यातोऽयं विष्टपेऽखिले । हृषीकवशगो मूढः सदाचारपराङ्मुखः ॥८१॥

लोभसंज्ञासमासक्तः सूक्ष्मतत्त्वान्धचेतनः । भोगोद्भवमहागर्वपिशाचग्रहदूषितः ॥८२॥

अर्थ: यह वज्रकर्ण जन्मसे ही लेकर समस्त संसारमें अत्यन्त क्रूर प्रसिद्ध था, इन्द्रियोंका वशगामी था, मूर्ख था, सदाचारसे विमुख था, लोभ अर्थात् परिग्रह संज्ञामें आसक्त था, सूक्ष्म तत्त्वके विचारसे शून्य था, और भोगोंसे उत्पन्न महागर्वरूपी पिशाच ग्रहसे दूषित था ॥८१-८२॥


तेन च भ्रमता तत्र कर्णिकारवनान्तरे । दृष्टः शिलातले साधुर्दधानः शममुत्तमम् ॥८३॥

अर्थ: उस अटवीमें घूमते हुए उसने कनेर वनके बीचमें शिलापर विद्यमान उत्तम शान्तिके धारक एक साधु देखे ॥८३॥


परित्यक्तावृतिर्ग्रीष्मे समाप्तनियमस्थितिः । विहंग इव निश्शङ्कः केसरीव भयोज्झितः ॥८४॥

अर्थ: उन साधुके ऊपर किसी प्रकारका आवरण नहीं था, वे घाममें बैठकर अपना नियम पूर्ण कर रहे थे, पक्षीके समान निःशंक और सिंहके समान निर्भय थे ॥८४॥


स ग्रावभिः करैर्भानोरतितप्तः समन्ततः । अभ्याख्यानशतैस्तीव्रैर्दुर्जनस्येव सज्जनः ॥८५॥

अर्थ: जिस प्रकार दुर्जनके अत्यन्त तीखे सैकड़ों कुवचनोंसे सज्जन सन्तप्त होता है उसी प्रकार वे साधु भी नीचे पत्थरों और ऊपरसे सूर्यकी किरणोंके द्वारा सब ओरसे सन्तप्त हो रहे थे ॥८५॥


अश्वारूढः स तं दृष्ट्वा कृतान्तसमदर्शनः । रत्नप्रभवगम्भीरं परमार्थनिवेशनम् ॥८६॥

पापघातकरं सर्वभूतकारुण्यसङ्गतम् । कुन्तपाणिरुवाचैवं भूषितं श्रमणश्रिया ॥८७॥

अर्थ: जो यमराजके समान दिखाई देता था ऐसे वज्रकर्णने घोड़ेपर चढ़े-चढ़े, समुद्रके समान गम्भीर, परमार्थके ज्ञाता, पापोंका विनाश करनेवाले, समस्त प्राणियोंकी दयासे युक्त एवं श्रमण लक्ष्मीसे विभूषित साधुसे भाला हाथमें लेकर कहा ॥८६-८७॥


अत्र किं क्रियते साधो सोऽवोचद्धितमात्मनः । अनाचरितपूर्वं यज्जन्मान्तरशतेष्वपि ॥८८॥

अर्थ: कि हे साधो ! यह क्या कर रहे हो ? साधुने उत्तर दिया कि जो पिछले सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं किया जा सका ऐसा आत्माका हित करता हूँ ॥८८॥


जगाद विहसन् भूभृदनया खल्ववस्थया । न किंचिदपि ते सौख्यं कीदृशं हितमात्मनः ॥८९॥

अर्थ: राजा वज्रकर्णने हँसते हुए कहा कि इस अवस्थामें तो तुम्हें कुछ भी सुख नहीं है फिर आत्माका हित कैसा ? ॥८९॥


मुक्तलावण्यरूपस्य कामार्थरहितस्य च । अचेलस्यासहायस्य कीदृशं हितमात्मनः ॥९०॥

अर्थ: जिसका लावण्य और रूप नष्ट हो गया है, जो काम और अर्थसे रहित है, जिसके शरीरपर एक भी वस्त्र नहीं है तथा जिसका कोई भी सहायक नहीं उसका आत्महित कैसा ? ॥९०॥


स्नानालंकाररहितैः परपिण्डोपजीविभिः । भवादृशैर्न रैः कीदृक् क्रियते हितमात्मनः ॥९१॥

अर्थ: स्नान तथा अलंकारसे रहित एवं परके द्वारा प्रदत्त भोजनपर निर्भर रहनेवाले आप-जैसे लोगोंके द्वारा आत्महित किस प्रकार किया जाता है ? ॥९१॥


दृष्ट्वा तं कामभोगार्तं दयावान् संयतोऽवदत् । हितं पृच्छसि किं त्वं मां छिन्नाशापाशबन्धनम् ॥९२॥

इन्द्रियैर्वञ्चितान् पृच्छ हितोपायबहिष्कृतान् । मोहेनात्यन्तवृद्धेन भ्राम्यन्ते ये भवाम्बुधौ ॥९३॥

अर्थ: कामभोगसे पीड़ित राजा वज्रकर्णको देखकर दयालु मुनिराज बोले कि तू आशापाशरूपी बन्धनको तोड़नेवाले मुझसे हित क्या पूछ रहा है ? उनसे पूछ कि जो इन्द्रियोंके द्वारा ठगे गये हैं, हितके उपायोंसे दूर हैं और अत्यन्त बढ़े हुए मोहसे जो संसार-सागरमें भ्रमण कर रहे हैं ॥९२-९३॥


हन्ता सत्त्वसहस्राणामात्मानर्थपरायणः । यात्येष नरकं घोरमवश्यं नष्टचेतनः ॥९४॥

अर्थ: यह जो तू हजारों प्राणियोंका घात करनेवाले, आत्माके अनर्थ करनेमें तत्पर एवं सद्-असद्के विचारसे रहित है सो अवश्य ही भयंकर नरकमें पड़ेगा ॥९४॥


नूनं त्वया न विज्ञाता घोरा नरकभूमयः । उत्थायोत्थाय पापेषु यत्परां कुरुषे रतिम् ॥९५॥

अर्थ: जो तू उठ-उठकर पापोंमें परम प्रीति कर रहा है सो जान पड़ता है कि तूने भयंकर नरककी पृथिवियोंको अब तक जाना नहीं है ॥९५॥


पृथिव्यः सन्ति सप्ताधो नरकाणां सुदारुणाः । सुदुर्गन्धाः सुदुष्प्रेक्षाः सुदुस्पर्शाः सुदुस्तराः ॥९६॥

अर्थ: इस पृथिवीके नीचे नरकोंकी सात पृथिवियाँ हैं जो अत्यन्त भयंकर हैं, अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त हैं, जिनका देखना अत्यन्त कठिन है, जिनका स्पर्श करना अत्यन्त दुःखदायी है, जिनका पार करना अत्यन्त दुःखकारक है ॥९६॥


तीक्ष्णायस्कीलसंकीर्णा नानायन्त्रसमाकुलाः । क्षुरधाराद्रिसंयुक्तास्तप्तलोहतलाधिकाः ॥९७॥

अर्थ: लोहेके तीक्ष्ण काँटोंसे व्याप्त हैं, नाना प्रकारके यन्त्रोंसे युक्त हैं, क्षुराकी धाराके समान पैने पर्वतोंसे युक्त हैं, जिनका तल भाग तपे हुए लोहेसे भी अधिक दुःख-दायी है ॥९७॥


रौरवाद्यवटाक्रान्ता महाध्वान्ता महाभयाः । असिपत्रवनच्छन्ना महाक्षारनदीयुताः ॥९८॥

अर्थ: जो रौरव आदि विलोंसे युक्त हैं, महाअन्धकारसे भरी हैं, महाभय उत्पन्न करनेवाली हैं, असिपत्र वनसे आच्छादित हैं और अत्यन्त खारे जलसे भरी नदियोंसे युक्त हैं ॥९८॥


पापकर्मपरिक्लिष्टैर्गजैरिव निरङ्कुशैः । तत्र दुःखसहस्राणि प्राप्यन्ते पुरुषाधमैः ॥९९॥

अर्थ: जो पाप कार्योंसे संक्लेशको प्राप्त होते रहते हैं तथा जो हाथियोंके समान निरंकुश अर्थात् स्वच्छन्द रहते हैं ऐसे नीच पुरुष उन पृथिवियोंमें हजारों दुःख प्राप्त करते हैं ॥९९॥


भवन्तमेव पृच्छामि त्वादृशैर्विषयातुरैः । क्रियते पापसंसक्तैः कीदृशं हितमात्मनः ॥१००॥

अर्थ: मैं आपसे ही पूछता हूँ कि तुम्हारे समान विषयोंसे पीड़ित तथा पापोंमें लीन मनुष्य आत्माका कैसा हित करते हैं ? ॥१००॥


इन्द्रियप्रभवं सौख्यं किंपाकसदृशं कथम् । अहन्यहन्युपादाय मन्यसे हितमात्मनः ॥१०१॥

अर्थ: किंपाक फलके समान जो इन्द्रियजन्य सुख है उसे प्रतिदिन प्राप्त कर तू आत्माका हित मान रहा है ॥१०१॥


हितं करोत्यसौ स्वस्य भूतानां यो दयापरः । दीक्षितो गृहयातो वा बुधो निर्मलमानसः ॥१०२॥

अर्थ: अरे ! आत्माका हित तो वह करता है जो प्राणियोंपर दया करनेमें तत्पर रहता हो, विवेकी हो, निर्मल अभिप्रायका धारक हो, मुनि हो अथवा गृहस्थ हो ॥१०२॥


कृतं तैरात्मनः श्रेयो ये महाव्रततत्पराः । अथवाणुव्रतैर्युक्ताः शेषा दुःखस्य भाजनम् ॥१०३॥

अर्थ: आत्माका कल्याण तो उन्होंने किया है जो महाव्रत धारण करनेमें तत्पर रहते हैं अथवा जो अणुव्रतोंसे युक्त होते हैं, शेष मनुष्य तो दुःखके ही पात्र हैं ॥१०३॥


परलोकादिहैतस्त्वं कृत्वा सुकृतमुत्तमम् । इहलोकेऽधुना पापं कृत्वा यास्यसि दुर्गतिम् ॥१०४॥

अर्थ: तू परलोकमें उत्तम पुण्य कर यहाँ आया है और अब इस लोकमें पाप कर दुर्गतिको जायेगा ॥१०४॥


अमी निरागसः क्षुद्रा वराकाः क्षितिशायिनः । अनाथा लोलनयना नित्योद्विग्ना वने मृगाः ॥१०५॥

आरण्यतृणपानीयकृतविग्रहधारिणः । अनेकदुःखसंछन्नाः पूर्वदुष्कृतभोगिनः ॥१०६॥

रात्रावपि न विन्दन्ति निद्रां चकितचेतसः । साध्वाचारैर्न युक्तं ते कुलजैर्हिंसितुं नरैः ॥१०७॥

अर्थ: ये वनके निरपराधी, क्षुद्र, दयनीय मृग; जो अनाथ हैं, चंचल नेत्रोंके धारक हैं, निरन्तर उद्विग्न रहते हैं, जंगलके तृण और पानीसे बने शरीरको धारण करते हैं, अनेक दुःखोंसे व्याप्त हैं, पूर्व भवमें किये पापको भोग रहे हैं और भय-भीत होनेके कारण जो रात्रिमें भी निद्राको नहीं प्राप्त होते हैं; उत्तम आचारके धारक कुलीन मनुष्योंके द्वारा मारे जानेके योग्य नहीं हैं ॥१०५-१०७॥


अतो ब्रवीमि राजंस्त्वां यदीच्छस्यात्मनो हितम् । त्रिधा हिंसां परित्यज्य कुर्वहिंसां प्रयत्नतः ॥१०८॥

अर्थ: इसलिए हे राजन् ! मैं तुझसे कहता हूँ कि यदि तू अपना हित चाहता है तो मन-वचन-कायसे हिंसा छोड़कर प्रयत्नपूर्वक अहिंसाका पालन कर ॥१०८॥


उद्धैरित्युपदेशोघैर्यदासौ प्रतिबोधितः । तदा प्रणतिमायातः फलैरिव महीरुहः ॥१०९॥

अर्थ: इस प्रकार हितकारी उपदेशात्मक वचनोंसे जब राजा सम्बोधा गया तब वह फलोंसे वृक्षके समान नम्रताको प्राप्त हो गया ॥१०९॥


उत्तीर्य प्रसृतः सप्तेर्जानुपीडितभूतलः । प्रणनामोत्तमाङ्गेन सुसाधुं रचिताञ्जलिः ॥११०॥

अर्थ: वह घोड़ेसे उतरकर पैदल चलने लगा तथा पृथिवीपर घुटने टेक, हाथ जोड़, शिर झुकाकर उसने उन उत्तम मुनिराजको नमस्कार किया ॥११०॥


निरीक्ष्य सौम्यया दृष्ट्या तमेवं चाभ्यनन्दयत् । श्लाघ्योऽयं वीक्षितः सिद्धो मुनिस्त्यक्तपरिग्रहः ॥१११॥

अर्थ: सौम्य दृष्टिसे दर्शन कर उनका इस प्रकार अभिनन्दन किया कि अहो ! आज मैंने परिग्रह रहित प्रशंसनीय तपस्वी मुनिराजके दर्शन किये ॥१११॥


शकुन्तयो मृगाश्चामी धन्या वननिवासिनः । शिलातलनिषण्णं ये पश्यन्तीमं समाहितम् ॥११२॥

अर्थ: वनमें निवास करनेवाले ये पक्षी तथा हरिण धन्य हैं जो शिलातलपर विराजमान इन ध्यानस्थ मुनिका दर्शन करते हैं ॥११२॥


अतिधन्योऽहमप्यद्य मुक्तः पापेन कर्मणा । यदेतं त्रिजगद्वन्द्यं प्राप्तः साधुसमागमम् ॥११३॥

अर्थ: आज जो मैं त्रिभुवनके द्वारा वन्दनीय इस साधु समागमको प्राप्त हुआ हूँ सो धन्य हो गया हूँ, पाप कर्मसे छूट गया हूँ ॥११३॥


बन्धुस्नेहमयं बन्धं छित्वा ज्ञाननखैरयम् । केसरीव विनिष्क्रान्तः प्रभुः संसारपञ्जरात् ॥११४॥

अर्थ: ये प्रभु सिंहके समान ज्ञानरूपी नखोंके द्वारा बन्धुओंके स्नेहरूपी बन्धनको छोड़कर संसाररूपी पिंजड़ेसे बाहर निकले हैं ॥११४॥


अनेन साधुना पश्य वशीकृतमनोरिपुम् । नाग्न्योपकारयोगेन शीलस्थानं प्रपाल्यते ॥११५॥

अर्थ: देखो, इन साधुके द्वारा मनरूपी शत्रुको वश कर नग्नताके उपकारसे शील स्थानकी किस प्रकार रक्षा की जा रही है ? ॥११५॥


अहं पुनरतृप्तात्मा तावदस्मिन् गृहाश्रमे । अणुव्रतविधौ रम्ये करोमि परमां धृतिम् ॥११६॥

अर्थ: किन्तु मेरी आत्मा अभी तृप्त नहीं हुई है। अतः मैं इस गृहस्थाश्रममें रहकर रमणीय अणुव्रतके पालनमें ही सन्तोष धारण करता हूँ ॥११६॥


इति संचिन्त्य जग्राह तस्मात्साधोर्गृहस्थितिम् । चकारावग्रहं चैवं भावप्लावितमानसः ॥११७॥

देवदेवं जिनं मुक्त्वा परमात्मानमच्युतम् । निर्ग्रन्थांश्च महाभागान्न नमाम्यपरानिति ॥११८॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर उसने उन मुनिराजसे गृहस्थ धर्म अंगीकार किया और भावसे प्लावित मन होकर इस प्रकार प्रतिज्ञा की कि मैं देवाधिदेव तथा गुणोंसे अच्युत परमात्मा जिनेन्द्रदेव और उदार अभिप्रायके धारक निर्ग्रन्थ मुनियोंको छोड़कर अन्य किसीको नमस्कार नहीं करूँगा ॥११७-११८॥


प्रीतिवर्धनसंज्ञस्य मुनेस्तस्य महादरः । चकार महतीं पूजामुपवासं समाहितः ॥११९॥

अर्थ: इस प्रकार उसने बड़े आदरसे उन प्रीतिवर्धन मुनिराजकी बड़ी भारी पूजा की और स्थिरचित्त होकर उस दिनका उपवास किया ॥११९॥


उपासीनस्य चाख्यातं परमं साधुना हितम् । यत्समाराध्य मुच्यन्ते संसाराद् भव्यदेहिनः ॥१२०॥

अर्थ: समीपमें बैठे हुए राजा वज्रकर्णको मुनिराजने उस परम हितका उपदेश दिया कि जिसकी आराधना कर भव्य प्राणी संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥१२०॥


सागारं निरगारं च द्विधा चारित्रमुत्तमम् । सावलम्बं गृहस्थानां निरपेक्षं खवाससाम् ॥१२१॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि उत्तम चरित्रके दो भेद हैं - एक सागार और दूसरा अनगार । इनमें-से पहला चारित्र बाह्य वस्तुओंके आलम्बनसे सहित है तथा गृहस्थोंके होता है और दूसरा चारित्र बाह्य वस्तुओंकी अपेक्षासे रहित है तथा आकाशरूपी वस्त्रके धारक मुनियोंके ही होता है ॥१२१॥


दर्शनस्य विशुद्धिश्च तपोज्ञानसमन्विता । प्रथमाद्यनुयोगाश्च प्रसिद्धा जिनशासने ॥१२२॥

अर्थ: उन्होंने यह भी बताया कि तप तथा ज्ञानके संयोगसे दर्शनमें विशुद्धता उत्पन्न होती है। साथ ही साथ उन्होंने जिनशासनमें प्रसिद्ध प्रथमानुयोग आदिका वर्णन भी किया ॥१२२॥


सुदुष्करं विगेहानां चारित्रमवधार्य सः । पुनः पुनर्मतिं चक्रेऽणुव्रतेष्वेव पार्थिवः ॥१२३॥

अर्थ: यह सब सुननेके बाद भी राजाने निर्ग्रन्थ मुनियोंका चरित्र अत्यन्त कठिन समझकर अणुव्रत धारण करनेका ही बार-बार विचार किया ॥१२३॥


निधानमधनेनेव प्राप्तं विभ्रदनुत्तमम् । धर्म्यध्यानमसौ बुद्ध्वा परमां धृतिमागतः ॥१२४॥

अर्थ: यह जानकर राजा परम सन्तोषको प्राप्त हुआ कि मुझे उत्कृष्ट धर्म ध्यान क्या प्राप्त हुआ मानो किसी निर्धनको उत्तम खजाना ही मिल गया ॥१२४॥


नितान्तक्रूरकर्मायमुपशान्तो महीपतिः । इति प्रमोदमायातः संयतोऽपि विशेषतः ॥१२५॥

अर्थ: अत्यन्त क्रूर कार्य करनेवाला यह राजा शान्त हो गया है यह देख मुनिराज भी बहुत हर्षको प्राप्त हुए ॥१२५॥


गते साधौ तपोयोग्यं स्थानं सुकृतसत्रिणि । विभूत्या परया युक्तः सुलाभः सुखतर्पितः ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर पुण्यरूपी यज्ञके धारक मुनिराज तपके योग्य दूसरे स्थानपर चले गये और राजा परम विभूतिसे युक्त हो वहीं रहा आया । उसे उत्तम लाभकी प्राप्ति हुई थी इसलिए सुखसे सन्तृप्त था ॥१२६॥


विहितातिथिसंमानोऽपरेद्युः कृतपारणः । प्रणम्य चरणौ साधोः स्वस्थानमविशन्नृपः ॥१२७॥

अर्थ: दूसरे दिन अतिथिका सत्कार कर उसने पारणा की और फिर मुनिराजके चरणोंको प्रणाम कर अपने नगरमें प्रवेश किया ॥१२७॥


वहन् परमभावेन वज्रकर्णः सदा गुरुम् । बभूव वीतसंदेहश्चिन्तामेवमुपागतः ॥१२८॥

अर्थ: अथानन्तर जो परम भक्ति-भावसे गुरुको सदा हृदयमें धारण करता था तथा जिसे किसी प्रकारका सन्देह नहीं था ऐसा राजा वज्रकर्ण इस प्रकार चिन्ता करने लगा ॥१२८॥


भृत्यो भूत्वा विपुण्योऽहं सिंहोदरमहीभृतः । अकृत्वा विनयं भोगान् कथं सेवे निकारिणः ॥१२९॥

अर्थ: कि मैं पुण्यहीन, राजा सिंहोदरका सेवक होकर यदि उसकी विनय नहीं करता हूँ तो वह दमन करेगा - दण्ड देवेगा तब इस दशामें भोगोंका सेवन किस प्रकार करूँगा ॥१२९॥


इति चिन्तयतस्तस्य प्रसन्नेनान्तरात्मना । विधिना प्रेर्यमाणस्य मतिरेवं समुद्गता ॥१३०॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ता करते-करते भाग्यसे प्रेरित राजा वज्रकर्णको अपनी स्वच्छ अन्तरात्मासे यह बुद्धि उत्पन्न हुई ॥१३०॥


कारयाम्यूर्मिकां स्वार्णीं सुव्रतस्वामिबिम्बिनीम् । दधामि दक्षिणाङ्गुष्ठे तां नमस्कारभागिनीम् ॥१३१॥

अर्थ: कि मैं मुनिसुव्रत भगवान्‌की प्रतिमासे युक्त एक स्वर्णकी अँगूठी बनवाकर दाहिने हाथके अँगूठामें धारण करूँ तो मेरा नमस्कार उसीको कहलावेगा ॥१३१॥


घटिता सा ततस्तेन पाणिभासुरपीठिका । पिनद्धा चातिहृष्टेन नयप्रवणचेतसा ॥१३२॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उस नीति-निपुण राजाने, जिसकी पीठिका हाथमें सुशोभित थी ऐसी अँगूठी बनवायी और अत्यन्त हर्षित होकर धारण की ॥१३२॥


स्थित्वा सिंहोदरस्याग्रे कृत्वाङ्गुष्ठं पुरः कृती । प्रतिमां तां महाभागो नमस्यति स संततम् ॥१३३॥

अर्थ: अब वह बुद्धिमान्, राजा सिंहोदरके आगे खड़ा होकर तथा अँगूठेको आगे कर सदा उस प्रतिमाको नमस्कार करने लगा ॥१३३॥


रन्ध्रविन्यस्तचित्तेन वैरिणा कथितेऽन्यदा । वृत्तान्तेऽत्र परं कोपं पापः सिंहोदरोऽगमत् ॥१३४॥

अर्थ: किसी एक दिन छिद्रान्वेषी वैरीने यह समाचार सिंहोदरसे कह दिया जिससे वह पापी परम कोपको प्राप्त हुआ ॥१३४॥


माययाह्वययच्चैनं दशाङ्गनगरस्थितम् । वधार्थमुद्यतो मानी मत्तो विक्रमसंपदा ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर पराक्रमरूपी सम्पदासे मत्त मानी सिंहोदर उसका वध करनेके लिए उद्यत हो गया और उसने दशांगपुरमें रहनेवाले वज्रकर्णको छलसे अपने यहाँ बुलाया ॥१३५॥


बृहद्गतितनूजस्तु प्रगुणेनैव चेतसा । प्रवृत्तोऽश्वशतेनास्य विनीतो गन्तुमन्तिकम् ॥१३६॥

दण्डपाणिरुवाचैकः पीवरोदारविग्रहः । कुङ्कुमस्थासकोद्भासी तमागत्यैवमुक्तवान् ॥१३७॥

अर्थ: बृहद्गतिका पुत्र वज्रकर्ण सरल चित्त था इसलिए वह सौ घुड़सवार साथ ले उसके पास जानेके लिए तैयार हो गया। उसी समय जिसके हाथमें लाठी थी, जिसका मोटा तथा ऊँचा शरीर था और जो केशरके तिलकसे सुशोभित हो रहा था ऐसा एक पुरुष आकर उससे इस प्रकार बोला ॥१३६-१३७॥


यदि भोगशरीराभ्यां सुनिर्विण्णोऽसि पार्थिव । तत उज्जयिनीं गच्छ नोचेन्नो गन्तुमर्हसि ॥१३८॥

अर्थ: कि हे राजन् ! यदि तुम भोग और शरीरसे उदासीन हो चुके हो तो तुम उज्जयिनी जाओ अन्यथा जाना योग्य नहीं है ॥१३८॥


क्रुद्धः सिंहोदरो यत्ते वधं कर्तुं समुद्यतः । अनमस्कारदोषेण कुरु राजन्नभीप्सितम् ॥१३९॥

अर्थ: हे राजन् ! तुम सिंहोदरको नमस्कार नहीं करते हो इस अपराधसे वह क्रुद्ध होकर तुम्हारा वध करनेके लिए तैयार हुआ है । अतः जैसी आपकी इच्छा हो वैसा करो ॥१३९॥


एवं स गदितो दध्यौ केनाप्येष दुरात्मना । मात्सर्यहतचित्तेन भेदः कर्तुममीप्सितः ॥१४०॥

तं विसर्पन्मदामोदं किंचित्खेदमुपागतम् । सोऽपृच्छत्कोऽसि किंनामा कुतो वासि समागतः ॥१४१॥

अर्थ: उस पुरुषके ऐसा कहनेपर वज्रकर्णने विचार किया कि किसी ईर्ष्यालु दुष्ट मनुष्यने भेद करना चाहा है अर्थात् मुझमें और सिंहोदरमें फूट डालनेका उद्योग किया है। इस प्रकार विचारकर उसने जिसे अत्यधिक हर्ष हो रहा था तथा जो किंचित् खेदको प्राप्त था ऐसे उस दूतसे पूछा कि तू कौन है ? कहाँसे आया है ? ॥१४०-१४१॥


कथं वा तव मन्त्रोऽयं विदितोऽस्यन्तदुर्गमः । एतद्भद्र समाचक्ष्व ज्ञातुमिच्छाम्यशेषतः ॥१४२॥

अर्थ: और इस दुर्गम मन्त्रका तुझे कैसे पता चला है ? हे भद्र ! यह कह । मैं सब जानना चाहता हूँ ॥१४२॥


सोऽवोचत् कुन्दनगरे वणिग्धनपरायणः । समुद्रसङ्गमो नामा यमुना तस्य भासिनी ॥१४३॥

विद्युज्ज्वालाकुले काले प्रसूता जननी च माम् । बन्धुभिर्विद्युदङ्गाख्या मयि तेन नियोजिता ॥१४४॥

अर्थ: वह बोला कि कुन्दनगरमें धनसंचय करनेमें तत्पर एक समुद्रसंगम नामक वैश्य रहता था । उसकी स्त्रीका नाम यमुना था । मैं उन्हींका पुत्र हूँ । चूँकि मेरी माताने मुझे उस समय जन्म दिया जो बिजलीकी ज्वालाओंसे व्याप्त रहता है इसलिए बन्धुजनोंने मेरा विद्युदंग नाम रखा ॥१४३-१४४॥


क्रमाच्च यौवनं बिभ्रदवन्तीनगरीमिमाम् । आगतोऽस्म्यर्थलाभाय युक्तो वाणिज्यविद्यया ॥१४५॥

अर्थ: क्रमसे यौवनको धारण करता हुआ मैं व्यापारकी विद्यासे युक्त हो धनोपार्जन करनेके लिए इस उज्जयिनी नगरीमें आया था ॥१४५॥


वेश्यां कामलतां दृष्ट्वा कामबाणेन ताडितः । न रात्रौ न दिवा यामि निर्वृतिं परमाकुलः ॥१४६॥

अर्थ: सो यहाँ कामलता नामक वेश्याको देखकर कामबाणसे ताड़ित हुआ जिससे व्याकुल होकर न दिनमें चैनको पाता हूँ और न रात्रिमें ॥१४६॥


एकां रात्रिं वसामीति तथा कृतसमागमः । प्रीत्या दृढतरं बद्धो यथा वागुरया मृगः ॥१४७॥

अर्थ: ‘मैं एक रात उसके साथ समागम कर रह लूँ’ इस प्रीतिने मुझे इस प्रकार अत्यन्त मजबूत बाँध रखा जिस प्रकार कि जाल किसी हरिणको बाँध रखता है ॥१४७॥


जनकेन ममासंख्यैर्यदब्दैरर्जितं धनम् । तन्मयास्य सुपुत्रेण षड्भिर्मासैर्विनाशितम् ॥१४८॥

अर्थ: मेरे पिताने अनेक वर्षोंमें जो धन संचित किया था मुझ सुपूतने उसे केवल छह माहमें नष्ट कर दिया ॥१४८॥


पद्मे द्विरेफवत् सक्तः कामतद्गतमानसः । साहसं कुरुते किं न मानवो योषितां कृते ॥१४९॥

अर्थ: जिस प्रकार भ्रमर कमलमें आसक्त रहता है उसी प्रकार मेरा मन कामसे दुःखी हो उस वेश्यामें आसक्त रहता था सो ठीक ही है क्योंकि यह पुरुष स्त्रियोंके लिए कौन-सा साहस नहीं करता है ? ॥१४९॥


अन्यदा सा पुरः सख्या निन्दन्ती कुण्डलं निजम् । श्रुता मयेति भारेण किं कर्णस्यामुना मम ॥१५०॥

धन्या सा श्रीधरा देवी महासौभाग्यभाविनी । यस्यास्तद्भ्राजते कर्णे मनोज्ञं रत्नकुण्डलम् ॥१५१॥

अर्थ: एक दिन मैंने सुना कि वह वेश्या सखीके सामने अपने कुण्डलकी निन्दा करती हुई कह रही है कि कानोंके भारस्वरूप इस कुण्डलसे मुझे क्या प्रयोजन है ? वह महासौभाग्यका उपभोग करनेवाली श्रीधरा रानी धन्य है जिसके कानमें वह रत्नमयी मनोहर कुण्डल शोभित होता है ॥१५०-१५१॥


चिन्तितं च मया तच्चेदपहृत्य सकुण्डलम् । आशां न पूरयाम्यस्यास्तदा किं जीवितेन मे ॥१५२॥

अर्थ: मैंने सुनकर विचार किया कि यदि मैं उस उत्तम कुण्डलको चुराकर इसकी आशा पूर्ण नहीं करता हूँ तो मेरा जीवन किस काम का ? ॥१५२॥


ततो जिहीर्षया तस्य दयितं प्रोह्य जीवितम् । गतोऽहं भवनं राज्ञो रजन्या तमसावृतः ॥१५३॥

अर्थ: तदनन्तर उस कुण्डलको अपहरण करनेकी इच्छासे मैं अपने प्रिय जीवनकी उपेक्षा कर रात्रिके समय अन्धकारसे आवृत होकर राजाके घर गया ॥१५३॥


पृच्छन्ती श्रीधरा तस्य मया सिंहोदरं श्रुता । निद्रां न लभसे कस्मान्नाथोद्विग्न इवाधुना ॥१५४॥

अर्थ: वहाँ मैंने रानी श्रीधराको सिंहोदरसे यह पूछती हुई सुना कि हे नाथ ! आज नींदको क्यों नहीं प्राप्त हो रहे हो तथा उद्विग्न-से क्यों मालूम होते हो ? ॥१५४॥


सोऽवोचद्देवि निद्रा मे कुतो व्याकुलचेतसः । न मारितो रिपुर्यावन्नमस्कारपराङ्मुखः ॥१५५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे देवि ! जबतक मैं नमस्कारसे विमुख रहनेवाले शत्रु वज्रकर्णको नहीं मारता हूँ तबतक मेरा चित्त व्याकुल है अतः निद्रा कैसे आ सकती है ? ॥१५५॥


अपमानेन दग्धस्य व्याकुलस्यार्णचिन्तया । अजितप्रत्यनीकस्य विटाक्रान्ताबलस्य च ॥१५६॥

सशल्यस्य दरिद्रस्य भीरोश्च भवदुःखतः । निद्रा कृपापरीतेव सुदूरेण पलायते ॥१५७॥

अर्थ: जो अपमानसे जल रहा हो, ऋणकी चिन्तासे व्याकुल हो, जो शत्रुको नहीं जीत सका हो, जिसकी स्त्री विटपुरुषके चक्रमें पड़ गयी हो, जो शल्यसे सहित दरिद्र हो तथा जो संसारके दुःखसे भयभीत हो ऐसे मनुष्यसे दयायुक्त होकर ही मानो निद्रा दूर भाग जाती है ॥१५६-१५७॥


निहन्तास्मि न चेदेनं नमस्कारपराङ्मुखम् । वज्रकर्णं ततः किं मे जीवितेन हतौजसः ॥१५८॥

अर्थ: यदि मैं नमस्कारसे विमुख रहनेवाले इस वज्रकर्णको नहीं मारता हूँ तो मुझ निस्तेजको जीवनसे क्या प्रयोजन है ? ॥१५८॥


ततोऽहं कुलिशेनेव हृदये कृतताडनः । रहस्यरत्नमादाय त्यक्त्वा कुण्डलशेमुषीम् ॥१५९॥

धर्मोद्यतमनस्कस्य सततं साधुसेविनः । भवतोऽन्तिकमायातो ज्ञात्वा कुरु निवर्तनम् ॥१६०॥

अर्थ: तदनन्तर यह सुनकर जिसके हृदयमें मानो वज्रकी ही चोट लगी थी ऐसा मैं इस रहस्य-रूपी रत्नको लेकर और कुण्डलकी भावना छोड़कर आपके पास आया हूँ क्योंकि आपका मन सदा धर्ममें तत्पर रहता है तथा आप सदा साधुओंकी सेवा करते हैं । हे नाथ ! यह जानकर आप लौट जाइए, उज्जैन मत जाइए ॥१५९-१६०॥


नागैरञ्जनशैलाभैः प्रक्षरद्गण्डभित्तिभिः । सप्तिभिश्च महावेगैर्भटैश्च कवचावृतैः ॥१६१॥

तदाज्ञानयता मार्गो निरुद्धोऽयं पुरोऽखिलः । सामन्तैः परमं क्रूरैर्भवन्तं हन्तुमुद्यतैः ॥१६२॥

अर्थ: उसकी आज्ञा पाकर नगरका यह समस्त मार्ग, जिनके गण्डस्थलसे मद झर रहा है ऐसे अंजनगिरिके समान आभावाले हाथियों, महावेगशाली घोड़ों, कवचोंसे आवृत योद्धाओं तथा आपको मारनेके लिए उद्यत क्रूर सामन्तोंसे घिरा हुआ है ॥१६१-१६२॥


प्रसादं कुरु गच्छाशु प्रतीपं धर्मवत्सल । पतामि पादयोरेष तव मद्वचनं कुरु ॥१६३॥

अर्थ: अतः हे धर्मवत्सल ! प्रसन्न होओ, शीघ्र ही उलटा वापस जाओ, मैं आपके चरणोंमें पड़ता हूँ । आप मेरा वचन मानो ॥१६३॥


अथ प्रत्येषि नो राजन् ततः पश्यैतदागतम् । धूलीपटलसंच्छन्नं परचक्रं महारवम् ॥१६४॥

अर्थ: हे राजन् ! यदि आपको विश्वास नहीं हो तो देखो, धूलिके समूहसे व्याप्त तथा महा-कल-कल शब्द करता हुआ यह शत्रुका दल आ पहुँचा है ॥१६४॥


तावत्परागतं दृष्ट्वा साधनं कुलिशश्रवाः । समेतो विद्युदङ्गेन निवृत्तो वेगिवाहनः ॥१६५॥

अर्थ: इतनेमें शत्रुदलको आया देख वज्रकर्ण विद्युदंगके साथ वेगशाली घोड़ेसे वापस लौटा ॥१६५॥


प्रविश्य च पुरं दुर्गं सुधीरः प्रत्यवस्थितः । विधाय वञ्चितैरोधं सामन्ताश्चावतस्थिरे ॥१६६॥

अर्थ: और अपने दुर्गम नगरमें प्रवेश कर धीरताके साथ युद्धकी तैयारी करता हुआ स्थित हो गया । बड़े-बड़े सामन्त गोपुरोंको रोककर खड़े हो गये ॥१६६॥


प्रविष्टं नगरं श्रुत्वा वज्रकर्णं रुषा ज्वलन् । सिंहोदरः समायातः सर्वसाधनसंयुतः ॥१६७॥

अर्थ: तदनन्तर वज्रकर्णको नगरमें प्रविष्ट सुन, क्रोधसे जलता हुआ सिंहोदर अपनी सर्व सेनाके साथ वहाँ आया ॥१६७॥


पुरस्यात्यन्तदुर्गत्वात् साधनक्षयकातरः । न स तद्ग्रहणे बुद्धिं चकार सहसा नृपः ॥१६८॥

अर्थ: वज्रकर्णका नगर अत्यन्त दुर्गम था । इसलिए सेनाके क्षयसे भयभीत हो राजा सिंहोदरने उसपर तत्काल ही आक्रमण करनेकी इच्छा नहीं की ॥१६८॥


समावास्य समीपे च त्वरितं प्राहिणोन्नरम् । वज्रकर्णं स गत्वेति बभाणात्यन्तनिष्ठुरम् ॥१६९॥

अर्थ: किन्तु सेनाको समीप ही ठहराकर शीघ्र ही एक दूत भेजा । वह दूत वज्रकर्णके पास जाकर बड़ी निष्ठुरतासे बोला ॥१६९॥


जिनशासनवर्गेण सदावष्टब्धमानसः । ऐश्वर्यकण्टकस्त्वं मे जातः सद्भाववर्जितः ॥१७०॥

अर्थ: कि जिन शासनके वर्गसे जिसका मन सदा अहंकारपूर्ण रहता है तथा जो समीचीन भावोंसे रहित है ऐसा तू मेरे ऐश्वर्यका कण्टक बन रहा है ॥१७०॥


कुटुम्बभेदने दक्षैः श्रमणैर्दुर्विचेष्टितैः । प्रोत्साहितो गतोऽस्येतामवस्थां नयवर्जितः ॥१७१॥

अर्थ: कुटुम्बोंके भेदन करनेमें चतुर, तथा खोटी चेष्टाओंसे युक्त मुनियोंके द्वारा प्रोत्साहित होकर तू इस अवस्थाको प्राप्त हुआ है, स्वयं नीतिसे रहित है ॥१७१॥


भुङ्क्षे देशं मया दत्तमर्हन्तं च नमस्यति । अहो ते परमा माया जातेयं दुष्टचेतसः ॥१७२॥

अर्थ: मेरे द्वारा प्रदत्त देशका उपभोग करता है और अरहन्तको नमस्कार करता है। अहो, तुझ दुष्ट हृदयकी यह बड़ी माया ॥१७२॥


आगच्छाशु ममाभ्याशं प्रणामं कुरु संमतिः । अन्यथा पश्य यातोऽसि मृत्युना सह संगतम् ॥१७३॥

अर्थ: तू सुबुद्धि है अतः शीघ्र ही मेरे पास आकर प्रणाम कर अन्यथा देख, अभी मृत्युके साथ समागमको प्राप्त होता है ॥१७३॥


ततस्तद्वचनाद्गत्वा दूतोऽवददिदं पुनः । एवं वज्रश्रुतिर्नाथ ब्रवीति कृतनिश्चयः ॥१७४॥

नगरं साधनं कोषं गृहाण विषयं विभो । धर्मद्वारं समार्यस्य यच्छ मे केवलस्य वा ॥१७५॥

अर्थ: तदनन्तर वज्रकर्णका उत्तर ले दूतने वापस जाकर सिंहोदरसे कहा कि हे नाथ ! निश्चयको धारण करनेवाला वज्रकर्ण इस प्रकार कहता है कि हे विभो ! नगर, सेना, खजाना और देश सब कुछ ले लो पर भार्या सहित केवल मुझे धर्मका द्वार प्रदान कीजिए अर्थात् मेरी धर्माराधनामें बाधा नहीं डालिए ॥१७४-१७५॥


कृता मया प्रतिज्ञेयं मुञ्चाम्येनां मृतोऽपि न । द्रविणस्य भगवान् स्वामी शरीरस्य तु नो मम ॥१७६॥

अर्थ: मैंने जो यह प्रतिज्ञा की है कि मैं अरहन्त देव और निर्ग्रन्थ गुरुको छोड़ अन्य किसीको नमस्कार नहीं करूँगा सो मरते-मरते इस प्रतिज्ञाको नहीं छोड़ूँगा। आप मेरे धनके स्वामी हैं शरीरके नहीं ॥१७६॥


इत्युक्तोऽप्यपरित्यक्तक्रोधः सिंहोदरः पुरः । कृत्वा रोधमिमं देशमुदवासयदुज्ज्वलम् ॥१७७॥

अर्थ: इतना कहनेपर भी सिंहोदरने क्रोध नहीं छोड़ा और नगरपर घेरा डालकर तथा आग लगाकर इस देशको उजाड़ दिया ॥१७७॥


इदं ते कथितं देव देशोद्वासनकारणम् । गच्छामि सांप्रतं शून्यग्रामधानमितोऽन्तिकम् ॥१७८॥

अर्थ: इस प्रकार हे देव ! मैंने आपसे इस देशके उजड़ होनेका कारण कहा है अब यहाँ पास ही अपने उजड़े गाँवको जाता हूँ ॥१७८॥


तस्मिन् विमानतुल्येषु दह्यमानेषु सद्मसु । मदीया दुष्कुटी दग्धा तृणकाष्ठविनिर्मिता ॥१७९॥

अर्थ: उस गाँवमें विमानके तुल्य जो अच्छे-अच्छे महल थे वे जल गये और उनके साथ तृण तथा काष्ठसे निर्मित मेरी टूटी-फूटी कुटिया भी जल गयी ॥१७९॥


तत्र गोपायितं सूर्पं घटं पिठरमेव च । आनयामि कुगेहिन्या प्रेरितः क्रूरवाक्यया ॥१८०॥

अर्थ: उस कुटियामें एक जगह सूपा घट तथा मटका छिपाकर रखे थे सो दुष्ट वचन बोलनेवाली स्त्रीसे प्रेरित हो उन्हें लेने जा रहा हूँ ॥१८०॥


गृहोपकरणं भूरि शून्यग्रामेषु लभ्यते । आनयस्व त्वमेवेति सा तु मां भाषते मुहुः ॥१८१॥

अर्थ: ‘सूने गाँवोंमें घर-गृहस्थीके बहुत-से उपकरण मिल जाते हैं इसलिए तू भी उन्हें ले आ’ इस प्रकार वह बार-बार मुझसे कहती रहती है ॥१८१॥


अथवात्यन्तसेवेदं तया मे जनितं हितम् । देव कोऽपि भवान् दृष्टो मया येन सुकर्मणा ॥१८२॥

अर्थ: अथवा उसने मेरा यह बहुत भारी हित किया है कि हे देव ! पुण्योदयसे मैं आपके दर्शन कर सका हूँ ॥१८२॥


इत्युक्ते करुणाक्लिष्टः पथिकं वीक्ष्य दुःखितम् । पद्मोऽस्मै रत्नसंयुक्तं ददौ काञ्चनसूत्रकम् ॥१८३॥

अर्थ: इस प्रकार उस पथिकको दुःखी देख दयासे स्वयं दुःखी होते हुए रामने उसके लिए अपना रत्नजटित स्वर्णसूत्र दे दिया ॥१८३॥


प्रतीतः प्रणिपत्यासौ तदादाय त्वरान्वितम् । प्रतियातो निजं धाम बभूव च नृपोपमः ॥१८४॥

अर्थ: वह पथिक उसे लेकर तथा विश्वासपूर्वक उन्हें प्रणाम कर अपने घर वापस लौट गया और राजाके समान सम्पन्न हो गया ॥१८४॥


अथावोचत्ततः पद्मो लक्ष्मणाय दिवाकरः । नैदाघो यावदत्यन्तं दुस्सहत्वं न गच्छति ॥१८५॥

तावदुत्तिष्ठ गच्छावः पुरस्यास्यान्तिकं भुवम् । जानकीयं तृषाश्रान्ता कुर्वाहारविधिं द्रुतम् ॥१८६॥

अर्थ: अथानन्तर रामने कहा कि हे लक्ष्मण ! यह ग्रीष्मकालका सूर्य जबतक अत्यन्त दुःसह अवस्थाको प्राप्त नहीं हो जाता है तबतक उठो इस नगरके समीपवर्ती प्रदेशमें चलें । यह जानकी प्याससे पीड़ित है इसलिए शीघ्र ही आहारकी विधि मिलाओ ॥१८५-१८६॥


एवमित्युदिते याता दशाङ्गनगरस्य ते । समीपे चन्द्रभासस्य चैत्यालयमनुत्तमम् ॥१८७॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर वे तीनों दशांगनगरके समीप चन्द्रप्रभ भगवान्के उत्तम चैत्यालयमें पहुँचे ॥१८७॥


तस्मिन् सजानकीरामः प्रणम्यावस्थितः सुखम् । तदाहारोपलम्भाय लक्ष्मणः सधनुर्गतः ॥१८८॥

अर्थ: वहाँ जिनेन्द्र-देवको नमस्कार कर सीता सहित राम तो उसी चैत्यालयमें सुखसे ठहर गये और लक्ष्मण धनुष लेकर आहार प्राप्तिके लिए निकला ॥१८८॥


विशन् सिंहोदरस्यासौ शिबिरं रक्षिमानवैः । निरुद्धः कृतनिस्वानैः समीरण इवाद्रिभिः ॥१८९॥

अर्थ: जब वह राजा सिंहोदरकी छावनीमें प्रवेश करने लगा तब रक्षक पुरुषोंने जोरसे ललकारकर उसे उस तरह रोका जिस तरह कि पर्वत वायुको रोक लेते हैं ॥१८९॥


इमकैर्दुष्कुलोत्पन्नैः किं विरोधेन मे समम् । इति सञ्चिन्त्य यातोऽसौ नगरं तेन पण्डितः ॥१९०॥

अर्थ: ‘इन नीच कुली लोगोंके साथ विरोध करनेसे मुझे क्या प्रयोजन है’ ऐसा विचारकर वह बुद्धिमान् लक्ष्मण नगरकी ओर गया ॥१९०॥


गोपुरं च समासीददनेकभटरक्षितम् । यस्योपरि स्थितः साक्षाद्वज्रकर्णः प्रयत्नवान् ॥१९१॥

अर्थ: जब वह अनेक योद्धाओंके द्वारा सुरक्षित उस गोपुर द्वारपर पहुँचा जिसपर कि साक्षात् वज्रकर्ण बड़े प्रयत्नसे बैठा था ॥१९१॥


ऊचिरे तस्य भृत्यास्तं कस्त्वमेतः कुतोऽपि वा । किमर्थं वेति सोऽवोचद्दूरात्प्राप्तोऽन्नलिप्सया ॥१९२॥

अर्थ: तब उसके भृत्योंने कहा कि तुम कौन हो ? कहाँसे आये हो ? और किसलिए आये हो ? इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं बहुत दूरसे अन्न प्राप्त करनेकी इच्छासे आया हूँ ॥१९२॥


ततस्तं बालकं कान्तं दृष्ट्वा विस्मयसंगतः । आगच्छ प्रविश क्षिप्रमिति वज्रश्रवा जगौ ॥१९३॥

अर्थ: तदनन्तर उस बालकको सुन्दर देख आश्चर्यचकित हो वज्रकर्णने कहा कि आओ, शीघ्र प्रवेश करो ॥१९३॥


ततस्तुष्टः प्रयातोऽसौ समीपं कुलिशश्रुतेः । विनीतवेषसंपन्नो वीक्षितं सादरं नरैः ॥१९४॥

अर्थ: तत्पश्चात् सन्तुष्ट होकर लक्ष्मण विनीत वेषमें वज्रकर्णके पास गया । वहाँ सब लोगोंने उसे बड़े आदरसे देखा ॥१९४॥


जगाद वज्रकर्णश्च नरमाप्तमयं द्रुतम् । अन्नं प्रसाधितं मह्यं मोज्यतां रचितादरः ॥१९५॥

अर्थ: वज्रकर्णने एक आप्त पुरुषसे कहा कि जो अन्न मेरे लिए तैयार किया गया है यह इसे शीघ्र ही आदरके साथ खिलाओ ॥१९५॥


सोऽवोचन्नात्र भुञ्जेऽहमिति मे गुरुरन्तिके । तमादौ भोजयाम्यन्नं नयाम्यस्याहमन्तिकम् ॥१९६॥

अर्थ: यह सुन लक्ष्मणने कहा कि मैं यहाँ भोजन नहीं करूँगा । पास ही में मेरे गुरु अग्रज ठहरे हुए हैं पहले उन्हें भोजन कराऊँगा इसलिए मैं यह अन्न उनके पास ले जाता हूँ ॥१९६॥


एवमस्त्विति संभाष्य नृपोऽन्नमतिपुष्कलम् । अदीदपद् वरं तस्मै चारुव्यञ्जनपानकम् ॥१९७॥

अर्थ: ‘एवमस्तु - ऐसा ही हो’ कहकर राजाने उसे उत्तमोत्तम व्यजन और पेय पदार्थोंसे युक्त बहुत भारी अन्न दिला दिया ॥१९७॥


लक्ष्मीधरस्तदादाय गतो द्विगुणरंहसा । भुक्तं च तैः क्रमेणैतत्तृप्तिं च परमां गताः ॥१९८॥

अर्थ: लक्ष्मण उसे लेकर दूने वेगसे रामके पास गया । सबने उसे यथाक्रमसे खाया और खाकर परम तृप्तिको प्राप्त हुए ॥१९८॥


ततस्तुष्टोऽवदत् पद्मः पश्य लक्ष्मण मद्रताम् । वज्रकर्णस्य येनेदं कृतं परिचयाद् विना ॥१९९॥

अर्थ: तदनन्तर रामने सन्तुष्ट होकर कहा कि हे लक्ष्मण ! वज्रकर्णकी भद्रता देखो जो इसने परिचयके बिना ही यह किया है ॥१९९॥


जामात्रेऽपि सुसंपन्नमीदृगन्नं न दीयते । पानकानामहो शैत्यं व्यञ्जनानां च मृष्टता ॥२००॥

अर्थ: ऐसा सुन्दर भोजन तो जमाईके लिए भी नहीं दिया जाता है । अहो ! पेय पदार्थोंकी शीतलता और व्यंजनोंकी मधुरता तो सर्वथा आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली है ॥२००॥


अनेनामृतकल्पेन भुक्तेनान्नेन मार्गजः । नैदाघोऽपहृतः सद्यः श्रमोऽस्माकं समन्ततः ॥२०१॥

अर्थ: इस अमृत तुल्य अन्नके खानेसे हमारा मार्गसे उत्पन्न हुआ गर्मीका समस्त श्रम एक साथ नष्ट हो गया है ॥२०१॥


चन्द्रबिम्बमिवाचूर्ण्य शालयोऽमी विनिर्मिताः । धवलत्वेन विभ्राणा मार्दवं भिन्नसिक्थकाः ॥२०२॥

अर्थ: जो कोमलताको धारण कर रहे हैं, जिनका एक-एक सीत अलग-अलग है, और जो सफेदीके कारण ऐसे जान पड़ते हैं मानो चन्द्रमाके बिम्बको चूर्ण कर ही बनाये गये हैं ऐसे ये धानके चावल हैं ॥२०२॥


दुग्ध्वेव दीधितीरिन्दोः कृतमेतच्च पानकम् । नितान्तमच्छतायुक्तं सौरभाकृष्टषट्पदम् ॥२०३॥

अर्थ: जो अत्यन्त स्वच्छतासे युक्त है तथा जो अपनी सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकृष्ट कर रहा है ऐसा यह पानक, जान पड़ता है चन्द्रमाकी किरणोंको दुहकर ही बनाया गया है ॥२०३॥


घृतक्षीरमिदं जातं कल्पधेनुस्तनादिव । रसानामीदृशी व्यक्तिर्व्यञ्जनेषु सुदुस्तरा ॥२०४॥

अर्थ: यह घी और दूध तो मानो कामधेनुके स्तनसे ही उत्पन्न हुआ है अन्यथा व्यंजनोंमें रसोंकी ऐसी व्यक्तता कठिन ही है ॥२०४॥


अणुव्रतधरः साधुर्वर्णितः पथिकेन सः । अतिथीनां करोत्यन्यः संविभागं क ईदृशम् ॥२०५॥

अर्थ: पथिकने यह ठीक ही कहा था कि वह सत्पुरुष अणुव्रतोंका धारी है अन्यथा अतिथियोंका ऐसा सत्कार दूसरा कौन करता है ? ॥२०५॥


शुद्धात्मा श्रूयते सोऽयमनन्यप्रणतिः सुधीः । भवार्तिमथनं नाथं जिनेन्द्रं यो नमस्यति ॥२०६॥

अर्थ: जो संसारकी पीड़ाको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करता है उनके सिवाय किसी दूसरेको नमस्कार नहीं करता ऐसा वह बुद्धिमान् शुद्ध आत्माका धारक सुना जाता है ॥२०६॥


ईदृक्शीलगुणोपेतो यद्येषोऽस्माकमग्रतः । तिष्ठत्यरातिना रुद्धस्ततो नो जीवितं वृथा ॥२०७॥

अर्थ: ऐसे शील और गुणोंसे सहित होनेपर भी यदि यह हम लोगोंके आगे शत्रुसे घिरा रहता है तो हमारा जीवन व्यर्थ है ॥२०७॥


अपराधविमुक्तस्य साधुसेवार्पितात्मनः । समस्ताश्चास्य सामन्ता एकनाथाविरोधिनः ॥२०८॥

अर्थ: यह अपराधसे रहित है, अपने आपको सदा साधुओंकी सेवामें तत्पर रखता है तथा इसके समस्त सामन्त अपने इस अद्वितीय स्वामीके अनुकूल हैं ॥२०८॥


तोद्यमानमिमं नूनं सिंहोदरकुभूभृता । भरतोऽपि न शक्नोति रक्षितुं नूतनेशतः ॥२०९॥

अर्थ: दुष्ट राजा सिंहोदरके द्वारा पीड़ित हुए इस वज्रकर्णकी रक्षा करनेके लिए भरत भी समर्थ नहीं है क्योंकि वह अभी नवीन राजा है ॥२०९॥


तस्मादन्यपरित्राणरहितस्यास्य संमतेः । क्षिप्रं कुरु परित्राणं व्रज सिंहोदरं वद ॥२१०॥

अर्थ: इसलिए अन्य रक्षकोंसे रहित बुद्धिमान्की रक्षा शीघ्र ही करो, जाओ और सिंहोदरसे कहो ॥२१०॥


इदं वाच्यमिदं वाच्यमिति किं शिक्ष्यते भवान् । उत्पन्नः प्रज्ञया साकं प्रभयेव महामणिः ॥२११॥

अर्थ: ‘यह कहना, यह कहना’ यह तुम्हें क्या शिक्षा दी जाये क्योंकि जिस प्रकार महामणि प्रभाके साथ उत्पन्न होता है उसी प्रकार तुम भी प्रज्ञाके साथ ही उत्पन्न हुए हो ॥२११॥


गुणोच्चारणसव्रीडः कृत्वा शिरसि शासनम् । यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा प्रणम्य प्रेमदान्वितः ॥२१२॥

विनीतं धारयन् वेषमनुपादाय कार्मुकम् । प्रयातो रयसंपन्नो लक्ष्मणः कम्पितक्षितिः ॥२१३॥

अर्थ: अथानन्तर अपने गुणोंकी प्रशंसा सुन जिसे लज्जा उत्पन्न हो रही थी ऐसा लक्ष्मण रामकी आज्ञा शिरोधार्य कर ‘जैसी आपकी आज्ञा’ यह कहकर तथा प्रणाम कर हर्षित होता हुआ चला। वह उस समय विनीत वेषको धारण कर रहा था, धनुष साथमें नहीं ले गया था, वेगसे सम्पन्न था और पृथ्वीको कँपाता हुआ जा रहा था ॥२१२-२१३॥


दृष्ट्वा संरक्षकैः पृष्टः कतरस्य पुमान् भवान् । सोऽवोचद् भरतस्याहमेतो दूतस्य कर्मणा ॥२१४॥

अर्थ: रक्षक पुरुषोंने देखकर उससे पूछा कि आप किसके आदमी हैं ? इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं राजा भरतका आदमी हूँ और दूतके कार्यसे आया हूँ ॥२१४॥


क्रमेणातीत्य शिविरं भूरि प्राप्तो नृपास्पदम् । अविशद्वेदितो द्वाःस्थैः सदः सिंहोदरस्य सः ॥२१५॥

अर्थ: क्रम-क्रमसे बहुत बड़ी छावनीको उलंघ कर वह राजाके निवास-स्थानमें पहुँचा और द्वारपालोंके द्वारा खबर देकर राजा सिंहोदरकी सभामें प्रविष्ट हुआ ॥२१५॥


प्रस्पष्टमिति चोवाच मन्यमानस्तृणं नृपम् । ज्येष्ठभ्रातृवचोवाहं सिंहोदर निबोध माम् ॥२१६॥

अर्थ: वहाँ जाकर राजाको तृणके समान तुच्छ समझते हुए उसने स्पष्ट शब्दोंमें इस प्रकार कहा कि हे सिंहोदर ! तू मुझे बड़े भाईका सन्देशवाहक समझ ॥२१६॥


आज्ञापयत्यसौ देवो भवन्तमिति सद्गुणः । यथा किल किमेतेन विरोधेन विहेतुना ॥२१७॥

अर्थ: उत्तम गुणोंको धारण करनेवाले राजा भरत आपको इस प्रकार आज्ञा देते हैं कि इस निष्कारण वैरसे क्या लाभ है ? ॥२१७॥


ततः सिंहोदरोऽवादीन्मनः कर्कशमुद्वहन् । दूत भर्ता विनीतेशमिति मद्वचनाद् भवान् ॥२१८॥

यथा किलाविनीतानां भृत्यानां विनयाहृतौ । कुर्वन्ति स्वामिनो यत्नं विरोधः कोऽत्र दृश्यते ॥२१९॥

अर्थ: तदनन्तर कठोर मनको धारण करनेवाला सिंहोदर बोला कि हे दूत ! तू मेरी ओरसे अयोध्याके राजा भरतसे इस प्रकार कहो कि अविनीत सेवकोंको विनयमें लानेके लिए स्वामी प्रयत्न करते हैं इसमें क्या विरोध दिखाई देता है ? ॥२१८-२१९॥


वज्रकर्णो दुरात्मायं मानी नैकृतिकः परः । पिशुनः क्रोधनः क्षुद्रः सुहृन्निन्दापरायणः ॥२२०॥

आलस्योपहतो मूढो वायुग्रहगृहीतधीः । विनयाचारनिर्मुक्तो दुर्विदग्धो दुरीहितः ॥२२१॥

एतं मुञ्चन्त्यमी दोषा दमेन मरणेन वा । तमुपायं करोम्यस्य स्वैरमत्रास्यतां त्वया ॥२२२॥

अर्थ: यह वज्रकर्ण दुष्ट है, मानी है, मायावी है, अत्यन्त नीच है, क्रोधी है, क्षुद्र है, मित्रकी निन्दा करनेमें तत्पर है, आलस्यसे युक्त है, मूढ़ है, वायु अथवा किसी पिशाचने इसकी बुद्धि हर ली है, यह विनयाचारसे रहित है, पण्डितम्मन्य है, और दुष्ट चेष्टाओंसे युक्त है। ये दोष इसे या तो दमनसे छोड़ सकते हैं या मरणसे; इसलिए इसका उपाय करता हूँ इस विषयमें आप चुप बैठिए ॥२२०-२२२॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत् किमत्र प्रत्युक्तरैः । कुरुतेऽयं हितं यस्मात् क्षम्यतां सर्वमस्य तत् ॥२२३॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने कहा कि इस विषयमें अधिक उत्तरोंसे क्या प्रयोजन है ? चूँकि यह सबका हित करता है अतः इसका यह सब अपराध क्षमा कर दिया जाये ॥२२३॥


इत्युक्तः प्रकटक्रोधः संधिदूरपराङ्मुखः । सिंहोदरोऽवदत्तारं वीक्ष्य सामन्तसंहतिम् ॥२२४॥

न केवलमसौ मानी हतात्मा वज्रकर्णकः । तत्कार्यवाञ्छया प्राप्तो भवानपि तथाविधः ॥२२५॥

अर्थ: लक्ष्मणके इस प्रकार कहते ही जिसका क्रोध उबल पड़ा था, और जो सन्धिसे विमुख था ऐसा सिंहोदर अपने सामन्तोंकी ओर देख गरजकर बोला कि न केवल यह दुष्ट वज्रकर्ण ही मानी है किन्तु उसके कार्यकी इच्छासे आया हुआ यह दूत भी वैसा ही मानी है ॥२२४-२२५॥


पाषाणेनैव ते गात्रमिदं दूत विनिर्मितम् । न नाममीषदप्येति दुर्भृत्यः कोशलापतेः ॥२२६॥

अर्थ: अरे दूत ! जान पड़ता है तेरा यह शरीर पाषाणसे ही बना है अयोध्यापतिका यह दुष्ट भृत्य, रंचमात्र भी नम्रताको प्राप्त नहीं है - अर्थात् इसने बिलकुल भी नमस्कार नहीं किया ॥२२६॥


तत्र देशे नरा नूनं सर्व एव भवद्विधाः । स्थालीपुलाकधर्मेण परोक्षं ज्ञायते ननु ॥२२७॥

अर्थ: सचमुच ही उस देशके सब लोग तेरे ही जैसे हैं जिस प्रकार बटलोई-के दो-चार सीथ जाननेसे सब सीथोंका ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार तेरे द्वारा वहाँके सब लोगोंका परोक्ष ज्ञान हो रहा है ॥२२७॥


इत्युक्ते कोपमायातः किंचिल्लक्ष्मीधरोऽवदत् । साम्यहेतोरहं प्राप्तो न ते कर्तुं नमस्कृतिम् ॥२२८॥

अर्थ: सिंहोदरके इस प्रकार कहनेपर कुछ क्रोधको प्राप्त हुआ लक्ष्मण बोला कि मैं साम्यभाव स्थापित करनेके लिए यहाँ आया हूँ तुझे नमस्कार करनेके लिए नहीं ॥२२८॥


बहुनात्र किमुक्तेन हरे संक्षेपतः शृणु । प्रतीच्छ सन्धिमद्यैव मरणं वा समाश्रय ॥२२९॥

अर्थ: सिंहोदर ! इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? संक्षेपसे सुन, या तो तू सन्धि कर या आज ही मरणका आश्रय ले ॥२२९॥


इत्युक्ते परिषत्सर्वा परं क्षोभमुपागता । नानाप्रकारदुर्वाक्या नानाचेष्टाविधायिनी ॥२३०॥

अर्थ: यह कहते ही समस्त सभा परम क्षोभको प्राप्त हो गयी, नाना प्रकारके दुर्वचन बोलने लगी तथा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करने लगी ॥२३०॥


आकृष्य छुरिकां केचिन्निस्त्रिंशानपरे भटाः । वधार्थमुद्यतास्तस्य कोपकम्पितमूर्तयः ॥२३१॥

अर्थ: जिनके शरीर क्रोधसे काँप रहे थे ऐसे कितने ही योधा छुरी खींचकर और कितने ही योधा तलवारें निकालकर उसका वध करनेके लिए उद्यत हो गये ॥२३१॥


वेगनिर्मुक्तहुङ्काराः परस्परसमाकुलाः । ते तं समन्ततो बव्रुर्मशका इव पर्वतम् ॥२३२॥

अर्थ: जो वेगसे हुंकार छोड़ रहे थे तथा जो परस्पर अत्यन्त व्याकुल थे ऐसे उन योद्धाओंने लक्ष्मणको चारों ओरसे उस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार कि मच्छर किसी पर्वतको घेर लेते हैं ॥२३२॥


अप्राप्तानेव धीरोऽसौ क्रियालाघवपण्डितः । चिक्षेप चरणाघातैर्दूरं तान् विह्वलान् समम् ॥२३३॥

अर्थ: शीघ्रतासे कार्य करनेमें निपुण धीर-वीर लक्ष्मणने जो पासमें नहीं आ पाये थे ऐसे उन योद्धाओंको चरणोंकी चपेटसे विह्वल कर एक साथ दूर फेंक दिया ॥२३३॥


जघान जानुना कांश्चित्कूर्परेणापरान् भ्रमन् । कांश्चिन्मुष्टिप्रहारेण चकार शतशर्करान् ॥२३४॥

अर्थ: शीघ्रतासे घूमते हुए लक्ष्मणने कितने ही लोगोंको घुटनोंसे, कितने ही लोगोंको कोहनीसे, और कितने ही लोगोंको मुट्ठियोंके प्रहारसे शतखण्ड कर दिया अर्थात् एक-एकके सौ-सौ टुकड़े कर दिये ॥२३४॥


कचेषु कांश्चिदाकृष्य निपात्य धरणीतले । पादेनाचूर्णयत् कांश्चिदंसघातैरपातयत् ॥२३५॥

अर्थ: कितने ही लोगोंके बाल खींचकर तथा पृथिवीपर पटककर उन्हें पैरोंसे चूर्ण कर डाला और कितने हो लोगोंको कन्धेके प्रहारसे गिरा दिया ॥२३५॥


कांश्चिदन्योन्यघातेन परिचूर्णितमस्तकान् । चकार जङ्घया कांश्चिदरं प्राप्तविमूर्छनान् ॥२३६॥

अर्थ: कितने ही लोगोंको परस्पर भिड़ाकर उनके शिर एक दूसरेके शिरकी चोटसे चूर्ण कर डाले और कितने ही लोगोंको जंघाके प्रहारसे मूर्च्छित कर दिया ॥२३६॥


एवमेकाकिना तेन परिषत्सा तथाविधा । महाबलेन विध्वंसं नीता भयसमाकुला ॥२३७॥

अर्थ: इस प्रकार महाबलवान् एक लक्ष्मणने सिंहोदरकी उस सभाको भयभीत कर विध्वस्त कर दिया ॥२३७॥


एवं विध्वंसयन् यावन्निष्क्रान्तो भवनाजिरम् । तावद्योधशतैरन्यैः लक्ष्मणः परिवेष्टितः ॥२३८॥

अर्थ: इस प्रकार सभाको विध्वस्त करता हुआ लक्ष्मण जब भवनसे बाहर आंगणमें निकला तब सैकड़ों अन्य योद्धाओंने उसे घेर लिया ॥२३८॥


सामन्तैरथ सन्नद्धैर्वारणैः सप्तिभी रथैः । परस्परविमर्देन बभूवाकुलता परा ॥२३९॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धके लिए तैयार खड़े हुए सामन्तों, हाथियों, घोड़ों और रथोंके द्वारा उत्पन्न परस्परकी धक्काधूमीसे बहुत भारी आकुलता उत्पन्न हो गयी ॥२३९॥


नानाशस्त्रकरेष्वेषु लक्ष्म्यालिङ्गितविग्रहः । चकार चेष्टितं वीरः शृगालेष्विव केसरी ॥२४०॥

अर्थ: हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले उन सामन्तोंके साथ वीर लक्ष्मण ऐसी चेष्टा करने लगा जैसी कि शृगालोंके साथ सिंह करता है ॥२४०॥


ततोऽनेकपमारुह्य प्रावृषेण्यघनाकृतिम् । स्वयं सिंहोदरो रोद्धुं लक्ष्मीनिलयमुद्यतः ॥२४१॥

अर्थ: तदनन्तर वर्षा ऋतुके मेघके समान आकारको धारण करनेवाले हाथीपर सवार होकर सिंहोदर स्वयं लक्ष्मणको रोकनेके लिए उद्यत हुआ ॥२४१॥


तस्मिन् रणशिरोयाते किंचिद्धैर्यमुपागताः । दूरगाः पुनराजग्मुः सामन्ता लक्ष्मणं प्रति ॥२४२॥

अर्थ: जो सामन्त पहले दूर भाग गये थे वे सिंहोदरके रणाग्रमें आते ही कुछ-कुछ धैर्य धारण कर फिरसे वापस आ गये ॥२४२॥


घनानामिव सङ्घास्ते बव्रुस्तं शशिनं यथा । वातूल इव तानेष तूलराशीनिवाकिरत् ॥२४३॥

अर्थ: जिस प्रकार मेघोंके झुण्ड चन्द्रमाको घेरते हैं उसी प्रकार उन सामन्तोंने लक्ष्मणको घेरा परन्तु जिस प्रकार तीव्र वायु रुईके ढेरको उड़ा देती है उसी प्रकार उसने उन सामन्तोंको उड़ा दिया - दूर भगा दिया ॥२४३॥


उदारभटकामिन्यो गण्डविन्यस्तपाणयः । जगुराकुलताभाजः प्रविलोलविलोचनाः ॥२४४॥

पश्यतैनं महाभीमं सख्यः पुरुषमेककम् । वेष्टितं बहुभिः क्रूरैरसांप्रतमिदं परम् ॥२४५॥

अर्थ: जिन्होंने गालोंपर हाथ लगा रखे थे, जो अत्यन्त आकुलताको प्राप्त थीं, तथा जिनके नेत्र भयसे चंचल हो रहे थे ऐसी उत्तम योद्धाओंकी स्त्रियाँ परस्परमें कह रही थीं कि हे सखियो ! इस महा-भयंकर पुरुषको देखो । इस एकको बहुतसे क्रूर सामन्तोंने घेर रखा है यह अत्यन्त अनुचित बात है ॥२४४-२४५॥


अन्यास्तत्रोचिरे कोऽपि केनायं परिभूयते । पश्यतानेन विक्रान्ता बहवो विह्वलीकृताः ॥२४६॥

अर्थ: उन्हींमें कुछ स्त्रियां इस प्रकार कह रहीं थीं कि यद्यपि यह अकेला है फिर भी इसे कौन परिभूत कर सकता है ? देखो, इसने अनेक योद्धाओंको चपेटकर विह्वल कर दिया है ॥२४६॥


आस्तृणानमथो दृष्ट्वा लक्ष्मणोऽभिमुखं बलम् । विहस्य वारणस्तम्भं महान्तमुदमूलयत् ॥२४७॥

अर्थ: अथानन्तर सामने सेनाको इकट्ठी होती देख लक्ष्मणने हँसकर हाथी बाँधनेका एक बड़ा खम्भा उखाड़ा ॥२४७॥


ततः सरभसस्तत्र सान्द्रहुङ्कारभीषणः । जजृम्भे लक्ष्मणः कक्षे यथोच्चैराशुशुक्षणिः ॥२४८॥

अर्थ: और जिस प्रकार वनमें जोरदार अग्नि वृद्धिगत होती है उसी प्रकार सघन हुंकारोंसे भयंकरताको प्राप्त करता हुआ लक्ष्मण उस सेनापर वेगसे टूट पड़ा ॥२४८॥


विस्मितो गोपुराग्रस्थो दशाङ्गनगराधिपः । पार्श्ववर्तिभिरित्यूचे सामन्तैर्विकचेक्षणैः ॥२४९॥

कोऽप्येष पुरुषो नाथ पश्य सैंहोदरं बलम् । भग्नध्वजरथच्छत्रं करोति परमद्युतिः ॥२५०॥

अर्थ: दशांग-पुरका राजा वज्रकर्ण गोपुरके अग्रभाग पर बैठा-बैठा इस दृश्यको देख आश्चर्यसे चकित हो गया। जिनके नेत्र हर्षसे विकसित हो रहे थे ऐसे समीपवर्ती सामन्तोंने उससे कहा कि हे नाथ ! देखो, परम तेजको धारण करनेवाला यह कोई पुरुष सिंहोदरकी सेनाको नष्ट कर रहा है । उसने उसकी सेनाके ध्वज, रथ तथा छत्र आदि सभी तोड़ डाले हैं ॥२४९-२५०॥


एष खड्गधनुच्छायमध्यवर्ती सुविह्वलः । आवर्त इव निक्षिप्तो भ्राम्यतीमाहितोदरः ॥२५१॥

अर्थ: तलवारों और धनुषोंकी छायाके बीच खड़ा हुआ यह सिंहोदर, अत्यन्त विह्वल हो भँवरमें पड़े हुए के समान इधर-उधर घूम रहा है ॥२५१॥


इतश्चेतश्च विस्तीर्णमेतत्सैन्यं पलायते । एतस्मात्त्रासमागत्य सिंहान् मृगकुलं यथा ॥२५२॥

अर्थ: जिस प्रकार सिंहसे भयभीत होकर मृग समूह इधर-उधर भागता फिरता है उसी प्रकार सिंहोदरकी सेना इससे भयभीत होकर इधर-उधर भागती फिरती है ॥२५२॥


वदन्त्यन्योन्यमत्रैते सामन्ता दूरवर्तिनः । अवतारय सन्नाहं मण्डलाग्रो विमुच्यताम् ॥२५३॥

कार्मुकं क्षिप मुञ्चाश्वं वारणादवतीर्यताम् । गदां निरस्य गर्तायां माकार्षीरवमुन्नतम् ॥२५४॥

आलोक्य शस्त्रसङ्घातं श्रुत्वा वा रभसान्वितः । कोऽप्येष पुरुषोऽस्माकमापप्तदतिदारुणः ॥२५५॥

अपसर्पामुतो देशाद्देहि मार्गमहो भट । वारणं सारयैतस्मात्किमत्र स्तम्भितोऽसि ते ॥२५६॥

अयं प्राप्तोऽयमायातो दुःसूत स्यन्दनं त्यज । तुरङ्गाश्चोदय क्षिप्रं घातिता स्मो न संशयम् ॥२५७॥

एवमादिकृतालापाः केचित्सङ्कटमागताः । परित्यज्य भटाकल्पमेते पण्डकवत् स्थिताः ॥२५८॥

अर्थ: ये दूर खड़े हुए सामन्त परस्पर कह रहे हैं कि कवच उतार दो, तलवार छोड़ दो, धनुष फेंक दो, घोड़ा छोड़ दो, हाथीसे नीचे उतर जाओ, गदा गड्ढेमें गिरा दो, ऊँचा शब्द मत करो, शस्त्रोंका समूह देखकर यह अतिशय भयंकर पुरुष वेगसे कहीं हमारे ऊपर न आ पड़े; इस स्थानसे हट जाओ, अरे भट ! रास्ता दे, हाथीको यहाँसे दूर हटा, चुपचाप क्यों खड़ा है ? अरे दुष्ट सारथि ! देख, यह आया, यह आया, रथ छोड़, घोड़े जल्दी बढ़ा, मारे गये इसमें संशय नहीं, इत्यादि वार्तालाप करते हुए, संकटमें पड़े कितने ही योद्धा, योद्धाओंका वेष छोड़कर नपुंसकोंके समान एक ओर स्थित हैं ॥२५३-२५८॥


किमेष रमते युद्धे कोऽपि त्रिदशसंभवः । विद्याधरो तु वान्यस्य कस्येयं शक्तिरीदृशी ॥२५९॥

कालो नाम यमो वायुः कोऽपि लोके प्रकीर्त्यते । सोऽयं किमु भवेच्चण्डो विद्युद्दण्डचलाचलः ॥२६०॥

अर्थ: क्या युद्धमें यह कोई देव क्रीड़ा कर रहा है अथवा विद्याधर, वायु नामका कोई व्यक्ति संसारमें प्रसिद्ध है सो क्या यह वही है ? यह अत्यन्त तीक्ष्ण और बिजली-के समान चंचल है ॥२५९-२६०॥


कृत्वेदमीदृशं सैन्यं पुनरेष करिष्यति । किमित्येवं मनोऽस्माकं नाथ शङ्कामुपागतम् ॥२६१॥

अर्थ: सेनाको इस प्रकार नष्ट-भ्रष्ट करके अब यह आगे क्या करेगा ? हे नाथ ! इस प्रकार हमारा मन शंकाको प्राप्त हो रहा है ॥२६१॥


निरीक्षस्वैनमुत्पत्य संग्रामे रोमहर्षणे । सिंहोदरं समाकृष्य विह्वलं वरवारणात् ॥२६२॥

गले तदंशुकेनैव प्राध्वंकृत्य सुविस्मितः । एष याति पुरःकृत्वा बलीवर्दं यथा वशम् ॥२६३॥

अर्थ: देखो, रोमांचकारी युद्धमें उछलकर भयभीत सिंहोदरको हाथीसे खींचकर उसीके वस्त्रसे गलेमें बाँध लिया है और यह बैलकी तरह वश कर उसे आगे कर आश्चर्यसे चकित होता हुआ आ रहा है ॥२६२-२६३॥


एवमुक्तः स तैरूचे स्वस्था भवत मानवाः । देवाः शान्तिं करिष्यन्ति किमत्र बहुचिन्तया ॥२६४॥

अर्थ: इस प्रकार सामन्तोंके कहनेपर वज्रकर्णने कहा कि हे मानवो ! स्वस्थ होओ, देव शान्ति करेंगे, इस विषयमें बहुत चिन्ता करनेसे क्या लाभ है ? ॥२६४॥


स्थिता मूर्द्धसु हर्म्याणां दशाङ्गनगराङ्गनाः । परं विस्मयमापन्ना जगुरेवं परस्परम् ॥२६५॥

अर्थ: महलोंके शिखरोंपर बैठी दशांगनगरकी स्त्रियाँ परम आश्चर्यको प्राप्त हो परस्पर इस प्रकार कह रही थीं ॥२६५॥


सखि पश्यास्य वीरस्य चेष्टितं परमाद्भुतम् । येनैकेन नरेन्द्रोऽयमानीतोंऽशुकबन्धनम् ॥२६६॥

अर्थ: कि हे साथी ! इस वीरकी परम अद्भुत चेष्टा देखो जिसने अकेले ही इस राजाको वस्त्रसे बाँध लिया ॥२६६॥


अहो कान्तिरमुष्येयं द्युतिश्चातिशतान्विता । अहो शक्तिरियं कोऽयं भवेत् पुरुषसत्तमः ॥२६७॥

अर्थ: धन्य इसकी कान्ति, धन्य इसका अतिशय पूर्ण तेज, और धन्य इसकी शक्ति। अहो ! यह उत्तम पुरुष कौन होगा ? ॥२६७॥


भूतोऽयं भविता वापि पुण्यवत्याः सुयोषितः । पतिः कस्याः प्रशस्तायाः समस्तजगतीश्वरः ॥२६८॥

अर्थ: यह किस भाग्यशालिनी गुणवती स्त्रीका पति है ? अथवा आगे होगा ? यह समस्त पृथिवीका स्वामी है ॥२६८॥


सिंहोदरमहिष्योऽथ वृद्धबालसमन्विताः । रुदत्यः पादयोः पेतुर्लक्ष्मणस्यातिविक्लवाः ॥२६९॥

अर्थ: अथानन्तर वृद्ध और बालकोंसे सहित सिंहोदरकी रानियाँ भयसे अत्यन्त विह्वल हो रोती हुई लक्ष्मणके चरणोंमें आ पड़ीं ॥२६९॥


ऊचुश्च देव मुञ्चैनं भर्तृभिक्षां प्रयच्छ नः । अद्य प्रभृतिभृत्योऽयं तवाज्ञाकरणोद्यतः ॥२७०॥

अर्थ: वे बोलीं कि हे देव ! इसे छोड़ो, हमारे लिए पतिकी भिक्षा देओ, आजसे यह आपका आज्ञाकारी भृत्य है ॥२७०॥


सोऽवोचत् पश्यतोदारं द्रुमखण्डमिमं पुरः । अत्र नीत्वा दुराचारमेतमुल्लम्बयाम्यहम् ॥२७१॥

अर्थ: लक्ष्मणने कहा कि देखो यह सामने ऊँचा वृक्षखण्ड है वहाँ ले जाकर इस दुराचारीको उसपर लटकाऊँगा ॥२७१॥


करुणं बहु कुर्वन्त्यः पुनः साञ्जलयोऽवदन् । रुष्टोऽसि यदि देवास्मान् जहि निर्धार्यतामयम् ॥२७२॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत करुण रुदन करती तथा बार-बार हाथ जोड़ती हुई बोलीं कि हे देव ! यदि रुष्ट हो तो हम लोगोंको मारो और इसे छोड़ दो ॥२७२॥


प्रसादं कुरु मा दुःखं दर्शय प्रियसंभवम् । ननु योषित्सु कारुण्यं कुर्वन्ति पुरुषोत्तमाः ॥२७३॥

अर्थ: प्रसन्नता करो, हम लोगोंको पतिका दुःख न दिखाओ । उत्तम पुरुष स्त्रियोंपर दया करते ही हैं ॥२७३॥


पुरो मोक्ष्यामि सेवध्वं स्वस्थतामित्यसौ वदन् । ययौ चैत्यालयं यत्र ससीतो राघवः स्थितः ॥२७४॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने कहा कि अच्छा आगे चलकर छोड़ देंगे आप लोग स्वस्थताको प्राप्त होओ । इस प्रकार कहता हुआ लक्ष्मण उस चैत्यालयमें गया जहाँ कि सीता सहित राम ठहरे हुए थे ॥२७४॥


अवोचल्लक्ष्मणः पद्मं सोऽयं वज्रश्रुतेररिः । आनीतोऽस्याधुना देव कृत्यं वदतु यन्मया ॥२७५॥

अर्थ: वहाँ जाकर लक्ष्मणने रामसे कहा कि यह वज्रकर्णका शत्रु है इसे मैं ले आया हूँ । अब हे देव ! जो करना हो सो आज्ञा करो ॥२७५॥


ततः सिंहोदरो मूर्ध्ना करकुड्मलयोगिना । पपात वेपमानाङ्गः पद्मस्य क्रमपद्मयोः ॥२७६॥

अर्थ: तब जिसका शरीर काँप रहा था ऐसा सिंहोदर हाथ जोड़ मस्तकसे लगा रामके चरणकमलोंमें गिरा ॥२७६॥


जगाद च न देव त्वां वेद्मिकोऽसीति कान्तिमान् । परेण तेजसा युक्तो महीध्रपतिसन्निभः ॥२७७॥

अर्थ: और बोला कि हे देव ! आप कौन हैं ? यह मैं नहीं जानता । आप कान्तिमान् हैं, उत्कृष्ट तेजसे युक्त हैं और सुमेरुके समान स्थिर हैं ॥२७७॥


मानवो भव देवो वा गम्भीरपुरुषोत्तम । अत्र किं बहुभिः प्रोक्तैरहमाज्ञाकरस्तव ॥२७८॥

अर्थ: हे गम्भीर पुरुषोत्तम ! आप मनुष्य रहो चाहे देव ! इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ ॥२७८॥


गृह्णातु रुचितस्तुभ्यं राज्यमिन्द्रायुधश्रुतिः । अहं तु पादशुश्रूषां करोमि सततं तव ॥२७९॥

अर्थ: वज्रकर्ण आपको रुचता है सो वह यह राज्य ग्रहण करे मैं तो सदा आपके चरणोंकी शुश्रूषा ही करता रहूँगा ॥२७९॥


धवभिक्षां प्रयच्छेति योषितोऽप्यस्य पादयोः । रुदत्यः प्रणिपत्योचुः कुर्वन्त्यः करुणं बहु ॥२८०॥

अर्थ: सिंहोदरकी स्त्रियाँ भी अत्यन्त करुण विलाप करती हुईं, रामके चरणोंमें प्रणाम कर बोलीं कि हमारे लिए पतिकी भिक्षा दीजिए ॥२८०॥


देवि स्त्रैणात्त्वमस्माकं कारुण्यं कुरु शोभने । इत्युदित्वा च सीतायाः पतितास्ताः क्रमाब्जयोः ॥२८१॥

अर्थ: ‘हे देवि ! तुम तो स्त्री हो अतः हे शोभने ! हमपर दया करो’ इस प्रकार कहकर वे सीताके चरणकमलोंमें भी पड़ीं ॥२८१॥


ततः सिंहोदरं पद्मो जगाद विनताननम् । कुर्वन् वापीषु हंसानां मेघनादोद्भवं भयम् ॥२८२॥

अर्थ: तदनन्तर वापिकाओंमें स्थित हंसोंको मेघध्वनिसे होनेवाला भय उत्पन्न करते हुए रामने नीचा मुख कर बैठे हुए सिंहोदर-से कहा ॥२८२॥


शक्रायुधश्रुतिर्यत्ते ब्रवीति कुरु तत्सुधीः । एवं ते जीवितं मन्ये प्रकारोऽन्यो न विद्यते ॥२८३॥

अर्थ: कि हे सुधी ! तुझे वज्रकर्ण जो कहे सो कर ! इसी तरह तेरा जीवन रह सकता है और दूसरा उपाय नहीं है ॥२८३॥


आहूतोऽथ हितैः पुम्भिः कृतदृष्ट्यादिवर्धनः । वज्रकर्णः परीवारसहितश्चैत्यमागमत् ॥२८४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी भाग्य-वृद्धि हो रही थी ऐसा वज्रकर्ण हित-कारी पुरुषोंके द्वारा बुलाया गया जो परिवार सहित उस चैत्यालयमें आया ॥२८४॥


स त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य मूर्धपाणिर्जिनालयम् । स्तुत्वा ननाम चन्द्राभं भक्तिहृष्टस्तनूरुहः ॥२८५॥

अर्थ: उसने हाथ जोड़ मस्तकसे लगा जिनालयकी तीन प्रदक्षिणाएँ दीं फिर भक्तिसे रोमांचित हो चन्द्रप्रभ भगवान्‌को नमस्कार किया ॥२८५॥


ततश्च विनयी गत्वा स्तुत्वा तौ भ्रातरौ क्रमात् । अपृच्छद् वपुरारोग्यं सीतां च विधिकोविदः ॥२८६॥

अर्थ: तत्पश्चात् विधि-विधानके जानकार वज्रकर्णने विनयपूर्वक जाकर राम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंकी क्रमसे स्तुति की और सीतासे शरीर-सम्बन्धी आरोग्य पूछा ॥२८६॥


भद्र ते कुशलेनाद्य कुशलं नः समन्ततः । इति तं राघवोऽवोचन्नितान्तं मधुरध्वनिः ॥२८७॥

अर्थ: तदनन्तर रामने अत्यन्त मधुर ध्वनिमें उससे कहा कि हे भद्र ! आज तो तेरी कुशलसे ही हम सबकी कुशल है ॥२८७॥


सङ्कथेयं तयोर्यावद् वर्तते शुभलीलयोः । चारुवेषोऽथ सैन्येन विद्युदङ्गः समागतः ॥२८८॥

अर्थ: इस प्रकार शुभलीलाके धारक राम और वज्रकर्णके बीच जबतक यह वार्तालाप चलता है तबतक सुन्दर वेषका धारक विद्युदंग सेनाके साथ वहाँ आ पहुँचा ॥२८८॥


स तयोः प्रणतिं कृत्वा स्तुत्वा च क्रमपण्डितः । समीपे वज्रकर्णस्य संनिविष्टः प्रतापवान् ॥२८९॥

अर्थ: क्रमके जाननेमें पण्डित प्रतापी विद्युदंग राम-लक्ष्मणको प्रणाम कर वज्रकर्णके पास आ बैठा ॥२८९॥


विद्युदङ्गः सुधी सोऽयं वज्रकर्णसुहृत्परः । इति शब्दः समुत्तस्थौ तदा सदसि मांसलः ॥२९०॥

अर्थ: उसी समय सभामें यह जोरदार शब्द गूँजने लगा कि यह बुद्धिमान् विद्युदंग वज्रकर्णका परम मित्र है ॥२९०॥


पुनश्च राघवोऽवोचत् कृत्वा स्मितसितं मुखम् । वज्रकर्ण ! समीचीना तव दृष्टिरियं परा ॥२९१॥

अर्थ: तदनन्तर रामने मन्द हास्यसे मुखको धवल कर वज्रकर्णसे कहा कि हे वज्रकर्ण ! तेरी यह दृष्टि अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥२९१॥


कुमतैस्तव धीरेषा मनागपि न कम्पिता । उत्पातवातसंघातैः मन्दरस्येव चूलिका ॥२९२॥

अर्थ: जिस प्रकार मेरुपर्वतकी चूलिका, प्रलयकालकी वायुके आघातसे कम्पित नहीं होती, उसी प्रकार तेरी यह बुद्धि मिथ्या मतोंसे रंचमात्र भी कम्पित नहीं हुई ॥२९२॥


ममापि सहसा दृष्ट्वा न ते मूर्धायमानतः । अहो परमिदं चारु तव शान्तं विचेष्टितम् ॥२९३॥

अर्थ: मुझे देखकर भी तेरा यह मस्तक नम्रीभूत नहीं हुआ सो तेरी यह चेष्टा अत्यन्त मनोहर तथा शान्त है ॥२९३॥


अथवा शुद्धतत्त्वस्य किमु पुंसोऽस्ति दुस्तरम् । धर्मानुरागचित्तस्य सम्यग्दृष्टेर्विशेषतः ॥२९४॥

अर्थ: अथवा शुद्ध तत्त्वके जानकार पुरुषको क्या कठिन है ? खासकर धर्मानुरागी सम्यग्दृष्टिके मनुष्यको ॥२९४॥


प्रणम्य त्रिजगद्वन्द्यं जिनेन्द्रं परमं शिवम् । तुङ्गेन शिरसा तेन कथमन्यः प्रणम्यते ॥२९५॥

अर्थ: जिस उन्नत शिरसे तीन लोकके द्वारा वन्दनीय परम कल्याणस्वरूप जिनेन्द्रभगवान्‌को नमस्कार किया जाता है उसी शिरसे दूसरे लोगोंको कैसे प्रणाम किया जाये ? ॥२९५॥


मकरन्दरसास्वादलब्धवर्णो मधुव्रतः । रासभस्य पदं पुच्छे प्रमत्तोऽपि करोति किम् ॥२९६॥

अर्थ: मकरन्द रसके आस्वादनमें निपुण भौंरा उन्मत्त होनेपर भी क्या गधेकी पूँछपर अपना स्थान जमाता है ? ॥२९६॥


बुद्धिमानसि धन्योऽसि दधास्यासन्नभव्यताम् । चन्द्रादपि सिता कीर्तिस्तव भ्राम्यति विष्टपे ॥२९७॥

अर्थ: तुम बुद्धिमान् हो, धन्य हो, निकट भव्यपना धारण कर रहे हो और चन्द्रमासे भी अधिक धवल तुम्हारी कीर्ति संसारमें भ्रमण कर रही है ॥२९७॥


विद्युदङ्गोऽप्ययं मित्रं परं ते विदितं मया । भव्योऽयमपि यः सेवां तव कर्तुं समुद्यतः ॥२९८॥

अर्थ: मुझे मालूम है कि यह विद्युदंग भी तुम्हारा मित्र है। सो यह भी भव्य है जो कि तुम्हारी सेवा करनेके लिए उद्यत रहता है ॥२९८॥


सद्भूतगुणसत्कीर्तेरथ लज्जामुपागतः । किंचिन्नताननोऽवोचच्छुनाशीरायुधश्रवाः ॥२९९॥

अत्रावसीदतो देव प्राप्तस्य व्यसनं महत् । सञ्जातोऽसि महाभाग त्वं मे परमबान्धवः ॥३००॥

अर्थ: अथानन्तर यथार्थ गुणोंके कथनसे जो लज्जाको प्राप्त था तथा जिसका मुख कुछ नीचेकी ओर झुक रहा था ऐसा वज्रकर्ण बोला कि हे देव ! यद्यपि आपको यहाँ रहते बहुत कष्ट हुआ है तो भी हे महाभाग ! आप मेरे परम बान्धव हुए हैं ॥२९९-३००॥


नियमस्त्वत्प्रसादेन ममायं जीवतोऽधुना । पालितो मम भाग्येन त्वमानीतो नरोत्तमः ॥३०१॥

अर्थ: इस समय मेरे जीवित रहते हुए मेरे इस नियमका पालन आपके ही प्रसादसे हुआ है और मेरे भाग्यसे ही आप पुरुषोत्तम यहाँ पधारे हैं ॥३०१॥


वदन्नेवमसा ऊचे लक्ष्मणेन विचक्षणः । वदाभिरुचितं यत्ते क्षिप्रं संपादयाम्यहम् ॥३०२॥

अर्थ: इस प्रकार कहते हुए बुद्धिमान् वज्रकर्णसे लक्ष्मणने कहा कि जो तेरी अभिलाषा हो वह कह मैं शीघ्र ही पूर्ण कर दूँ ॥३०२॥


सोऽवोचत् सुहृदं प्राप्य भवन्तमतिदुर्लभम् । न किंचिदस्ति लोकेऽस्मिन्निदं तु प्रवदाम्यहम् ॥३०३॥

तृणस्यापि न वाञ्छामि पीडां जिनमताश्रितः । अतो विमुच्यतामेष मम सिंहोदरप्रभुः ॥३०४॥

अर्थ: यह सुनकर वज्रकर्णने कहा कि आप-जैसे अत्यन्त दुर्लभ मित्रको पाकर इस संसारमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है । अतः मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि मैं जिनमतका धारक होनेसे यह नहीं चाहता हूँ कि तृणको भी पीड़ा हो । इसलिए यह मेरा स्वामी राजा सिंहोदर छोड़ दिया जाये ॥३०३-३०४॥


इत्युक्ते लोकवक्त्रेभ्यः साधुकारः समुद्ययौ । प्राप्तद्वेषेऽपि पश्यायं मतिं धत्ते शुभामिति ॥३०५॥

अर्थ: वज्रकर्णके इतना कहते ही लोगोंके मुखसे ‘धन्य-धन्य’ शब्द निकल पड़ा । देखो यह भद्र पुरुष शत्रुके ऊपर भी शुभ बुद्धि धारण कर रहा है ॥३०५॥


अपकारिणि कारुण्यं यः करोति स सज्जनः । मध्यो कृतोपकारे वा प्रीतिः कस्य न जायते ॥३०६॥

अर्थ: अपकारीके ऊपर जो दया करता है वही सज्जन है । वैसे मध्यस्थ अथवा उपकार करनेवालेपर किसे प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥३०६॥


एवमस्त्विति भाषित्वा लक्ष्मणेन तयोः कृता । हस्तग्रहणसंपन्ना प्रीतिः समयपूर्विका ॥३०७॥

अर्थ: तदनन्तर ‘एवमस्तु’ कह लक्ष्मणने हाथ मिलाकर तथा कभी शत्रुता नहीं करेंगे, इस प्रकार शपथ दिलवाकर दोनोंकी मित्रता करा दी ॥३०७॥


उज्जयिन्या ददावर्धं वज्रकर्णाय शुद्धधीः । सिंहोदरो हृतं पूर्वं विषयोद्वासने च यत् ॥३०८॥

अर्थ: निर्मल बुद्धिके धारक सिंहोदरने उज्जयिनीका आधा भाग तथा देशको उजाड़ करते समय जो कुछ पहले हरा था वह सब वज्रकर्णके लिए दे दिया ॥३०८॥


चतुरङ्गस्य देशस्य गणिकानां धनस्य च । विभागं समभागेन निजस्याप्यकरोदसौ ॥३०९॥

अर्थ: अपनी चतुरंग सेना, देश, गणिका तथा धनका भी उसने बराबर-बराबर आधा भाग कर दिया ॥३०९॥


वार्हद्गतप्रसादेन तां वेश्यां तच्च कुण्डलम् । लेभे सेनाधिपत्यं च विद्युदङ्गः सुविश्रुतः ॥३१०॥

अर्थ: जिनभक्तिके प्रसादसे अतिशय प्रसिद्ध विद्युदंगने भी वह वेश्या, वह रत्नमयी कुण्डल और सेनापतिका पद प्राप्त किया ॥३१०॥


वज्रकर्णस्ततः कृत्वा रामलक्ष्मणयोः पराम् । पूजामानाययत्क्षिप्रमष्टौ दुहितरो वराः ॥३११॥

अर्थ: तदनन्तर वज्रकर्णने राम-लक्ष्मणकी परम पूजा कर शीघ्र ही अपनी आठ पुत्रियाँ बुलवायीं ॥३११॥


सजायो दृश्यते ज्यायानिति तास्तेन ढौकिताः । लक्ष्मीधरं कृतोदारविभूषाविनयान्विताः ॥३१२॥

अर्थ: चूँकि बड़े भाई राम स्त्रीसे सहित दिखाई देते थे इसलिए उसने उत्तम आभूषणोंको धारण करनेवालीं तथा विनयसे युक्त अपनी पुत्रियाँ लक्ष्मणको व्याह दीं ॥३१२॥


नृपाः सिंहोदराद्याश्च ददुः परमकन्यकाः । एवं सन्निहितं तस्य कुमारीणां शतत्रयम् ॥३१३॥

अर्थ: इनके सिवाय सिंहोदर आदि राजाओंने भी उत्तमोत्तम कन्याएँ दीं । इस तरह सब मिलाकर लक्ष्मणको तीन सौ कन्याएँ प्राप्त हुईं ॥३१३॥


ढौकित्वा वज्रकर्णस्ताः समं सिंहोदरादिभिः । जगाद लक्ष्मणं देव तवैता वनिता इति ॥३१४॥

अर्थ: उन सबको खड़ी कर वज्रकर्णने सिंहोदर आदि राजाओंके साथ लक्ष्मणसे कहा कि हे देव ! ये आपकी स्त्रियाँ हैं ॥३१४॥


लक्ष्मीधरस्ततोऽवोचद् दारसङ्गं करोम्यहम् । न तावन्न कृतं यावत् पदं भुजबलार्जितम् ॥३१५॥

अर्थ: तदनन्तर उसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि मैं जबतक अपने बाहुबलसे अर्जित स्थान प्राप्त नहीं कर लेता हूँ तबतक स्त्री समागम नहीं करूँगा ॥३१५॥


पद्मश्च तानुवाचैवं नास्माकं वसतिः क्वचित् । भरतस्याधिराज्येऽस्मिन् देशे स्वर्गतलोपमे ॥३१६॥

देशान् सर्वान् समुल्लङ्घ्य करिष्याम्यालयं ततः । आश्रित्य चन्दनगिरिं दक्षिणार्णवमेव वा ॥३१७॥

एकां वेलामिह ततो जनन्यौ नेतुमुत्सुके । आगन्तव्यं मयावश्यं द्रागयोध्यामनेन वा ॥३१८॥

काले तत्रैव नेष्यन्ते कन्यका अपि भो नृपाः । अज्ञातनिलयस्यास्य कीदृशो दारसंग्रहः ॥३१९॥

अर्थ: रामने भी उनसे इसी प्रकार कहा कि अभी हमारा कहीं निश्चित निवास नहीं है । स्वर्गके समान भरतके राज्यमें जो देश हैं उन सबको पार कर हम मलयगिरि अथवा दक्षिण समुद्रके पास अपना घर बनवावेंगे । वहाँ उत्कण्ठासे भरी अपनी माताओंको ले जानेसे लिए एक बार हम अथवा लक्ष्मण अवश्य ही अयोध्या आवेंगे । हे राजाओ ! उसी समय आपकी इन कन्याओंको ले आवेंगे । तुम्हीं कहो जिसके रहनेका ठिकाना नहीं उसका स्त्री-संग्रह कैसा ? ॥३१६-३१९॥


एकमुक्ते कुमारीणां तद्वृन्दं शुशुभे न च । आकुलं पङ्कजवनं हिमवाताहतं यथा ॥३२०॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर वह कन्याओंका समूह तुषार वायुसे आहत कमलवनके समान आकुल होता हुआ शोभित हुआ ॥३२०॥


प्रियस्य विरहे प्राणान् त्यक्ष्यामो यदि तत्पुनः । अवाप्स्यामः कुतोऽनेन समागमरसायनम् ॥३२१॥

अर्थ: कन्याएँ विचार करने लगीं कि यदि हम पतिके विरहमें प्राण छोड़ देवेंगी तो फिर इसके साथ समागमरूपी रसायनको कैसे प्राप्त कर सकेंगी ? ॥३२१॥


प्राणांश्च धारयन्तीनां कैतवं मन्यते जनः । दह्यते च समिद्धेन मनो विरहवह्निना ॥३२२॥

अर्थ: और यदि प्राण धारण करती हैं तो लोग कपट मानते हैं तथा देदीप्यमान विरहानलसे मन जलता है ॥३२२॥


सुमहान् भृगुरेकत्र व्याघ्रोऽन्यत्रातिदारुणः । अहो कष्टं कमाधारं व्रजामोऽत्यन्तदुस्सहाः ॥३२३॥

अर्थ: अहो ! एक ओर तो बड़ी भारी ढालू चट्टान है और दूसरी ओर अत्यन्त निर्दय व्याघ्र है। अतः अत्यन्त दुखसे भरी हुई हम किस आधारको प्राप्त हों ? ॥३२३॥


अथवा विरहव्याघ्रं संगमाशयविद्यया । संस्तम्भ्य धारयिष्यामः शरीरमिति सांप्रतम् ॥३२४॥

अर्थ: अथवा इस समय हम समागमकी अभिलाषारूपी विद्यासे विरहरूपी व्याघ्रको कीलकर शरीर धारण करेंगी ॥३२४॥


एवं विचिन्तयन्तीभिः सार्धं तामिर्महीभृतः । गता यथागतं कृत्वा रामादीनां यथोचितम् ॥३२५॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करती हुई उन कन्याओंके साथ राजा लोग राम आदिका यथोचित सत्कार कर जैसे आये थे वैसे चले गये ॥३२५॥


सच्चेष्टाः पूज्यमानास्तां पितृवर्गेण कन्यकाः । नानाविनोदनासक्तास्तस्थुस्तद्गतमानसाः ॥३२६॥

अर्थ: जिनकी उत्तम चेष्टा थी, पितृवर्ग जिनका निरन्तर सत्कार करता था और जो नाना प्रकारके विनोदमें आसक्त थीं ऐसी कन्याएँ लक्ष्मणमें मन लगाकर रह गयीं ॥३२६॥


आनायितः पिता भूत्या सबन्धुर्देशमात्मनः । विद्युदङ्गेन चक्रे च परमः सङ्गमोत्सवः ॥३२७॥

अर्थ: तदनन्तर विद्युदंगने भाई-बान्धवोंसे सहित पिताको बड़े ठाट-बाटसे अपने देशमें बुलाया और पहुँचनेपर उनके समागमका बहुत भारी उत्सव किया ॥३२७॥


परमेऽथ निशीथे 'ते नत्वा चैत्यालयात्ततः । शनैर्निर्गत्य पादाभ्यां स्वेच्छया सुधियो ययुः ॥३२८॥

अर्थ: अथानन्तर बुद्धिमान् राम-लक्ष्मण सीताके साथ-साथ घनघोर आधी रातके समय भगवान्‌को नमस्कार कर चुपके-चुपके चैत्यालयसे निकलकर इच्छानुसार पैदल चले गये ॥३२८॥


चैत्यालयं प्रभाते तं दृष्ट्वा शून्यं जनोऽखिलः । रहिताशेषकर्तव्यो वितानहृदयस्थितः ॥३२९॥

अर्थ: प्रभात होनेपर चैत्यालयको शून्य देख सब लोग अपना-अपना कर्तव्य भूलकर शून्य हृदय हो गये ॥३२९॥


समं कुलिशकर्णेन जाता प्रीतिरनुत्तरा । सिंहोदरस्य सन्मानगत्यागमनवर्धिता ॥३३०॥

अर्थ: सिंहोदरकी वज्रकर्णके साथ जो उत्तम प्रीति उत्पन्न हुई थी वह पारस्परिक सम्मान तथा आने-जानेसे वृद्धिको प्राप्त हुई ॥३३०॥


स्वैरं स्वैरं जनकतनयां तौ च संचारयन्तौ स्थायं स्थायं विकटसरसां काननानां तलेषु । पायं पायं रसमभिमतं स्वादुभाजां फलानां क्रीडं क्रीडं सुरसवचनं चारुचेष्टासमेतम् ॥३३१॥

प्राप्तौ नानारचनभवनोत्तुङ्गशृङ्गाभिरामं रम्योद्यानावततवसुधं चैत्यसंवातपूतम् । नाकच्छायं सततजनितात्युत्सवोदारपौरं श्रीमत्स्वानं रविसमरुचिख्यातिमत्कूवराख्यम् ॥३३२॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि राम-लक्ष्मण-सीताको धीरे-धीरे उसकी इच्छानुसार चलाते हुए, विशाल सरोवरोंसे युक्त वनोंके मध्यमें ठहरते हुए, स्वादिष्ट फलोंका इच्छित रस पीते हुए, तथा उत्तम वचन और सुन्दर चेष्टाओंके साथ क्रीड़ा करते हुए, कूवरनामक उस देशमें पहुँचे जो नाना प्रकारके भवनोंके ऊँचे-ऊँचे शिखरोंसे सुन्दर था, जिसकी वसुधा मनोहर उद्यानोंसे व्याप्त थी, जो मन्दिरोंके समूहसे पवित्र था, स्वर्गके समान कान्तिवाला था, जहांके नगरवासी लोग निरन्तर होनेवाले उत्सवोंसे उत्कृष्ट थे, जो श्रीमानोंके शब्दसे युक्त था तथा सूर्यके समान कान्ति और प्रसिद्धिसे युक्त था ॥३३१-३३२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते वज्रकर्णोपाख्यानं नाम त्रयस्त्रिंशत्तमं पर्व ॥३३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य रचित पद्मचरितमें वज्रकर्णका वर्णन करनेवाला तैंतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३३॥

३४. चतुस्त्रिंशत्तमं पर्व (वालिखिल्योपाख्यानं)

परम सुन्दरे तत्र फलपुष्पभरानते । गुञ्जद्भ्रमरसंघाते मत्तकोकिलनादिते ॥१॥

कानने सीतया साकमग्रजन्मा स्थितः सुखम् । अन्तिकां सलिलार्थी तु लक्ष्मणः सरसीं गतः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो फल और फूलोंके भारसे नत हो रहा था, जहाँ भ्रमरोंके समूह गूँज रहे थे और जहाँ मत्त कोकिलाएँ शब्द कर रही थीं ऐसे अत्यन्त सुन्दर वनमें राम तो सुखसे विराजमान थे और लक्ष्मण पानी लेनेके लिए समीपवर्ती सरोवरमें गये ॥१-२॥


अत्रान्तरे सुरूपाढ्यो नेत्रतस्करविभ्रमः । एकोऽपि सर्वलोकस्य हृदयेषु समं वसन् ॥३॥

महाविनयसंपन्नः कान्तिनिर्झरपर्वतः । वरवारणमारूढश्चारुपादातमध्यगः ॥४॥

तामेव सरसीं रम्यां क्रीडनाहितमानसः । प्राप्तः कल्याणमालाख्यो जनस्तन्नगराधिपः ॥५॥

अर्थ: इसी अवसरमें जो अत्यन्त सुन्दर रूपसे सहित था, जिसके विभ्रम नेत्रोंको चुरानेवाले थे, जो एक होनेपर भी सर्व लोगोंके हृदयमें एक साथ निवास करता था, महाविनय सम्पन्न था। कान्तिरूपी निर्झरके उत्पन्न होनेके लिए पर्वतस्वरूप था, उत्तम हाथीपर सवार था। मनोहर पैदल सैनिकोंके बीच चल रहा था, जिसका मन क्रीड़ा करनेमें लीन था। जिसका कल्याणमाला नाम था तथा जो उस नगरका स्वामी था, ऐसा एक पुरुष उसी सरोवरमें क्रीड़ा करनेके लिए आया ॥३-५॥


महतः सरसस्तस्य दृष्ट्वा तं तीरवर्तिनम् । नीलोत्पलचयश्यामं लक्ष्मणं चारुलक्षणम् ॥६॥

ताडितः कामबाणेन स जनोऽत्यन्तमाकुलः । मनुष्यमब्रवीदेकमयमानीयतामिति ॥७॥

अर्थ: सो उस महासरोवरके तटपर विद्यमान, नील कमलोंके समूहके समान श्याम और सुन्दर लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणको देख वह मनुष्य कामबाणसे ताड़ित होकर अत्यन्त आकुल हो गया। फलस्वरूप उसने अपने एक आदमीसे कहा कि इस पुरुषको ले आओ ॥६-७॥


गत्वा कृत्वाञ्जलीर्दक्षः स तमेवमभाषत । एह्ययं राजपुत्रस्ते प्रसादात् संगमिच्छति ॥८॥

अर्थ: वह चतुर मनुष्य जाकर तथा हाथ जोड़कर लक्ष्मणसे इस प्रकार बोला कि ‘आइए, यह राजकुमार प्रसन्नतासे आपके साथ मिलना चाहता है’ ॥८॥


को दोष इति संचिन्त्य दधानः कौतुकं परम् । जगाम लीलया चार्व्या समीपं तस्य लक्ष्मणः ॥९॥

अर्थ: ‘क्या दोष है’ इस प्रकार विचारकर परम कौतुकको धारण करते हुए लक्ष्मण सुन्दर लीलासे उसके पास गये ॥९॥


उत्तीर्य स जनो नागात् पद्मतुल्येन पाणिना । करे लक्ष्मणमालम्ब्य प्राविशद् गृहमाम्बरम् ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर वह राजकुमार हाथीसे उतरकर तथा कमलके समान कोमल हाथसे लक्ष्मणको पकड़ अपने वस्त्र निर्मित तम्बूमें भीतर चला गया ॥१०॥


एकासने च तेनातिप्रतीतः सहितः स्थितः । अपृच्छच्च सखे कस्त्वं कुतो वा समुपागतः ॥११॥

अर्थ: वहाँ अत्यन्त विश्वस्त हो एक ही आसनपर लक्ष्मणके साथ सुखसे बैठा। कुछ समय बाद उसने लक्ष्मणसे पूछा कि हे सखे ! तुम कौन हो ? और कहाँसे आये हो ? ॥११॥


सोऽवोचद् विप्रयोगान्मे ज्येष्ठो दुःखेन तिष्ठति । तावन्नयामि तस्यान्नं कथयिष्यामि ते ततः ॥१२॥

अर्थ: लक्ष्मणने कहा कि मेरे वियोगसे मेरे बड़े भाई दुःखी होंगे इसलिए मैं पहले उनके पास भोजन ले जाता हूँ पश्चात् तुम्हारे लिए सब समाचार कहूँगा ॥१२॥


ततः शाल्योदनः सूप उपदंशनवं घृतम् । अपूपा घैनबन्धानि व्यञ्जनानि पयो दधि ॥१३॥

पानकानि विचित्राणि शर्कराखण्डमोदकाः । शष्कुल्यो घृतपूर्णानि पूरिका गुडपूर्णिकाः ॥१४॥

वस्त्रालंकारमाल्यानि लेपनप्रभृतीनि च । अमत्राणि च चित्राणि हस्तमार्जनकानि च ॥१५॥

सर्वमेतत् समासन्नपुरुषैः सुर्महाजवैः । माचिनानायितं तेन जनेनान्तिकमात्मनः ॥१६॥

अर्थ: अथानन्तर शालिके चावलोंका भात, दाल, ताजा घृत, पुए, घेवर, नानाप्रकारके व्यंजन, दूध, दही, अनेक प्रकारके पानक, शक्कर और खांडके लड्डू, पूड़ियाँ, कचौड़ियाँ, साधारण पूड़ियाँ, गुड़मिश्रित पूड़ियाँ, वस्त्र, अलंकार, मालाएँ, लेपन आदिकी सामग्री, नानाप्रकारके बर्तन और हाथ धोनेका सामान, यह सब सामग्री निकटवर्ती शीघ्रगामी पुरुष भेजकर उसने अपने पास मँगवा ली ॥१३-१६॥


अन्तरङ्गः प्रतीहारो जनस्य वचनात् ततः । गत्वा सीतान्वितं पद्मं प्रणम्यैवमभाषत ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर उसकी आज्ञा पाकर अन्तरंग द्वारपाल वहाँ गया जहाँ सीता सहित राम विराजमान थे, सो उन्हें प्रणाम कर वह इस प्रकार बोला ॥१७॥


अमुष्मिन् वस्त्रभवने भ्राता ते देव तिष्ठति । एतन्नगरनाथश्च विज्ञापयति सादरः ॥१८॥

प्रसादं कुरु तच्छाया शीतलेयं मनोहरा । तस्मादियन्तमध्वानं स्वेच्छया गन्तुमर्हथ ॥१९॥

अर्थ: कि हे देव ! उस तम्बूमें आपके भाई विराजमान हैं वहीं इस नगरका राजा भी विद्यमान है सो वह आदरके साथ प्रार्थना करता है कि चूँकि इस तम्बूकी छाया शीतल तथा मनको हरण करनेवाली है इसलिए प्रसन्न होइए और इतना मार्ग स्वेच्छासे चलकर आप यहाँ पधारिए ॥१८-१९॥


इत्युक्ते सीतया सार्धं ज्योत्स्नयेव निशाकरः । पद्मः समाययौ बिभ्रन् मत्तद्विरदविभ्रमम् ॥२०॥

अर्थ: प्रतिहारीके इतना कहने पर मत्त हाथीकी शोभाको धारण करते हुए रामचन्द्र सीताके साथ चल पड़े उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चाँदनीके सहित चन्द्रमा ही हों ॥२०॥


दूरादेव समालोक्य लक्ष्मणेन समं ततः । अभ्युत्थानं चकारास्य जनः प्रत्युद्गतिं तथा ॥२१॥

अर्थ: रामको दूरसे ही आते देख राजकुमारने लक्ष्मणके साथ खड़े होकर तथा कुछ आगे जाकर उनका स्वागत किया ॥२१॥


सीतया सहितस्तस्थौ पद्मोऽत्यन्तवरासने । अर्घदानादिसन्मानं प्राप्तश्च जनकल्पितम् ॥२२॥

अर्थ: राम सीताके साथ अत्यन्त उत्कृष्ट आसन पर विराजमान हुए तथा राजकुमारके द्वारा प्रदत्त अर्घदान आदि सम्मानको प्राप्त हुए ॥२२॥


ततः कर्मणि निर्वृत्ते स्वैरं स्नानाशनादिके । समुत्सार्याखिलं लोकमात्मा नीतस्तुरीयताम् ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर इच्छानुसार स्नान, भोजन आदि समस्त कार्य समाप्त होनेपर राजकुमारने अन्य सब लोगोंको दूर कर दिया। वहाँ राम, लक्ष्मण, सीता तीन और चौथा राजकुमार ये ही चार व्यक्ति रह गये ॥२३॥


दूतः पितुः सकाशान्मे प्राप्त इत्युपदेशनः । प्रयत्नपरमं कक्ष्यां प्रविश्यानन्यगोचराम् ॥२४॥

नानाप्रहरणान् वीरान् नियुज्य द्वारि भूयसः । प्रविष्टो योऽत्र बध्योऽसौ ममेति कृतभाषणः ॥२५॥

अर्थ: ‘मेरे पिताके पाससे दूत आया है’ ऐसा कहता हुआ वह राजकुमार प्रयत्नपूर्वक सजाये हुए एक दूसरे कमरेमें गया। वहाँ उसने नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले अनेक योद्धाओंको द्वारपर नियुक्त कर यह आदेश दिया कि यहाँ जो कोई प्रवेश करेगा वह मेरे द्वारा वध्य होगा ॥२४-२५॥


सद्भावज्ञापने लज्जां दूरीकृत्य सुमानसः । व्यपाटयदसौ तेषां समक्षं कञ्चुकं जनः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर यथार्थ भावके प्रकट करनेमें जो लज्जा थी उसे दूर कर उस सुचेताने राम, लक्ष्मण और सीताके सामने बीचका आवरण फाड़ डाला ॥२६॥


स्वर्गादिव तपोऽपप्तत् काऽप्यसौ वरकन्यका । उपयातेव पातालात् किंचिल्लज्जानतानना ॥२७॥

अर्थ: तत्पश्चात् आवरणके दूर होते ही ऐसा लगने लगा मानो स्वर्गसे ही कोई उत्तम कन्या नीचे आकर पड़ी है। अथवा पातालसे ही निकली है। उस कन्याका मुख लज्जाके कारण कुछ नम्रीभूत हो रहा था ॥२७॥


तत्कान्त्या भवनं लिप्तं लग्नानलमिवाभवत् । उद्योतमिव चन्द्रेण लज्जास्मितसितांशुभिः ॥२८॥

अर्थ: उसकी कान्तिसे लिप्त हुआ कपड़ेका तम्बू ऐसा दीखने लगा मानो उसमें आग ही लग गयी हो तथा लज्जा-से युक्त मन्द मुसकानकी किरणोंसे लिप्त होनेपर ऐसा जान पड़ने लगा मानो उसमें चन्द्रमाका ही प्रकाश फैल गया हो ॥२८॥


छेकहंसाश्चिरं त्रस्ताश्चक्षुषी समचूकुचन् । लक्ष्मीरिव स्थिता साक्षात् श्रीरिवोज्झितपङ्कजा ॥२९॥

अर्थ: उसे देख, चतुर हंसोंने चिरकाल तक भयभीत हो अपने नेत्र संकुचित कर लिये । वह कन्या ऐसी जान पड़ती थी मानो कमंलको छोड़कर साक्षात् लक्ष्मी ही वहाँ आ बैठी हो ॥२९॥


गृहं प्लावितुमारब्धामिव लावण्यवारिधौ । उत्कीर्णामिव रत्नानां रजसा काञ्चनस्य वा ॥३०॥

अर्थ: उसकी कान्तिसे वह घर ऐसा मालूम होता थां मानो सौन्दर्यके सागरमें उसने तैरना ही शुरू किया हो अथवा रत्नों और स्वर्णकी परागसे मानो आच्छादित ही किया गया हो ॥३०॥


कल्लोला इव निर्जग्मुः स्तनाभ्यां कान्तिवारिणः । तरङ्गा इव संजाता मध्ये त्रिवलिराजिते ॥३१॥

अर्थ: उसके स्तनोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो कान्तिरूपी जलके कल्लोल ही निकल रहे हों और त्रिबलिसे शोभित मध्यभागमें ऐसा लगता था मानो तरंगें ही उठ रही हों ॥३१॥


चण्डातकं समुद्भिद्य जघनस्य घनं महः । निर्जगामापरं छातं जीमूतं शशिनो यथा ॥३२॥

अर्थ: जिस प्रकार मेघके पतले आवरणको लाँघकर चन्द्रमाका प्रकाश बाहर फूट पड़ता है उसी प्रकार लँहगाको भेदकर उसके नितम्बस्थलका सघन तेज बाहर फूट पड़ा था ॥३२॥


सुचिरं प्रथितं लोके चञ्चलत्वायशोमलम् । गृहजीमूतवर्तिन्या निर्धौतमिव विद्युता ॥३३॥

अर्थ: वह घर, एक मेघ-के समान जान पड़ता था और उसमें बैठी हुई वह कन्या बिजलीके समान प्रतिभासित होती थी । ऐसा लगता था कि लोकमें चंचलताके कारण बिजलीके यशमें जो मल चिरकालसे लगा हुआ था उसने उसे बिलकुल ही धो डाला था ॥३३॥


अत्यन्तस्निग्धया तन्व्या रोमराज्या विराजिता । नितम्बाज्जातया हैमान् महानीलत्विषा यथा ॥३४॥

अर्थ: वह स्वर्णनिर्मितकी तरह देदीप्यमान नितम्ब-स्थलसे उत्पन्न महानीलमणिके समान श्याम, अत्यन्त चिकनी एवं पतली रोमराजिसे सुशोभित थी ॥३४॥


ततोऽसौ सहसामुक्तनररूपा सुलोचना । ढौकिता जानकी तेन रतिश्रीरिव लज्जया ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने सहसा पुरुषका वेष छोड़ दिया था तथा जिसके नेत्र अत्यन्त सुन्दर थे, ऐसी वह कन्या सीताके पास आ बैठी जिससे वह उस प्रकार सुशोभित होने लगी जिस प्रकारकी लज्जासे रतिकी श्री सुशोभित होती है ॥३५॥


अन्ते लक्ष्मणस्तत्र परिष्वक्तो मनोभुवा । अवस्थां कामपि प्रापच्चलमन्थरलोचनः ॥३६॥

अर्थ: लक्ष्मण उसके पास ही बैठे थे, सो कामसे युक्त हो किसी अनिर्वचनीय अवस्थाको प्राप्त हुए । उस समय उनके चंचल नेत्र धीरे-धीरे चल रहे थे ॥३६॥


ततो विशुद्धया बुद्धया पद्मस्तामित्यभाषत । दधाना विविधं वेषं का त्वं क्रीडसि कन्यके ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर निर्मल बुद्धिसे युक्त रामने उससे इस प्रकार कहा कि हे कन्ये ! विविध वेषको धारण करनेवाली तू कौन है ? जो इस तरह क्रीड़ा करती है ? ॥३७॥


ततोऽशुंकेन संवीय गात्रं प्रवरभाषिणी । जगाद देव ! वृत्तान्तं शृणु सद्भाववेदिनम् ॥३८॥

अर्थ: उसके उत्तरमें मधुर भाषण करनेवाली कन्याने वस्त्रसे शरीर ढँककर कहा कि हे देव ! सद्भावको सूचित करनेवाला मेरा वृत्तान्त सुनिए ॥३८॥


बालिखिल्य इति ख्यातः पुरस्यास्य पतिः सुधीः । सदाचारपरो नित्यं मुनिवल्लोकवत्सलः ॥३९॥

अर्थ: इस नगरका स्वामी ‘बालिखिल्य’ इस नामसे प्रसिद्ध है जो अतिशय बुद्धिमान्, मुनियोंके समान निरन्तर सदाचारका पालन करनेवाला और लोगोंके साथ स्नेह करनेवाला है ॥३९॥


पृथिवीति प्रिया तस्य गर्भाधानमुपागता । म्लेच्छाधिपतिना चासौ गृहीतः संयुगे नृपः ॥४०॥

अर्थ: उसकी प्रियाका नाम पृथिवी है । जिस समय पृथिवी गर्भाधानको प्राप्त हुई उसी समय राजा बालखिल्यका म्लेच्छ राजाके साथ युद्ध हुआ, सो युद्धमें म्लेच्छ राजाने उसे पकड़ लिया ॥४०॥


उक्तं च स्वामिना तस्य सिंहोदरमहीभृता । पुत्रश्चेद् भविता गर्भे कर्ता राज्यमसाविति ॥४१॥

अर्थ: राजा सिंहोदर बालखिल्यके स्वामी हैं सो उन्होंने कहा कि बालखिल्यकी रानी गर्भवती है यदि उसके गर्भमें पुत्र होगा तो राज्य करेगा ॥४१॥


ततोऽहं पापिनी जाता मन्त्रिणा वसुबुद्धिना । सिंहोदराय पौंस्नेन कथिता राज्यकाङ्क्षया ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर दुर्भाग्यसे पुत्र न होकर मैं पापिनी पुत्री उत्पन्न हुई परन्तु वसुबुद्धि मन्त्रीने राज्यकी आकांक्षासे सिंहोदरके लिए पुत्र उत्पन्न होनेकी खबर दी ॥४२॥


नीता कल्याणमालाख्यां जनन्या रहितार्थिकाम् । प्रायो माङ्गलिके लोको व्यवहारे प्रवर्तते ॥४३॥

अर्थ: माताने मेरा कल्याणमाला यह अर्थहीन नाम रखा, सो ठीक ही है क्योंकि लोग प्रायः मंगलमय व्यवहारमें ही प्रवृत्त होते हैं ॥४३॥


मन्त्री माता च मे वेत्ति कन्येयमिति नापरः । इयन्तं कालमधुना भवन्तः पुण्यवीक्षिताः ॥४४॥

अर्थ: अबतक मन्त्री और मेरी माता ही जानती है कि यह कन्या है दूसरा नहीं । आज पुण्योदयसे आप लोगोंके दर्शन हुए ॥४४॥


दुःखं तिष्ठति मे तातः प्राप्तश्चारकवासिताम् । सिंहोदरोऽपि नो सक्तस्तस्य कर्तुं विमोचनम् ॥४५॥

अर्थ: बन्दीगृहके निवासको प्राप्त हुए हमारे पिता बहुत कष्टमें हैं। सिंहोदर भी उन्हें छुड़ानेके लिए समर्थ नहीं है ॥४५॥


यदत्र द्रविणं किंचिद्देशे समुपजायते । तन्म्लेच्छस्वामिने सर्वं प्रेर्ष्यते दुर्गमीयुषे ॥४६॥

अर्थ: इस देशमें जो कुछ धन उत्पन्न होता है वह सब दुर्गकी रक्षा करनेवाले म्लेच्छ राजाके लिए भेज दिया जाता है ॥४६॥


वियोगवह्निनात्यन्तं तप्यमाना ममाम्बिका । जाता कलावशेषेव चन्द्रमूर्तिर्गतप्रभा ॥४७॥

अर्थ: वियोगरूपी अग्निसे अत्यन्त सन्तापको प्राप्त हुई मेरी माता सूखकर कला मात्रसे अवशिष्ट चन्द्रमाके समान कान्तिहीन हो गयी है ॥४७॥


इत्युक्त्वा दुःखभारेण पीडिताशेषगात्रिका । सद्यो विच्छायतां प्राप्ता मुक्तकण्ठं रुरोद सा ॥४८॥

अर्थ: इतना कहकर दुःखके समान भारसे जिसका समस्त शरीर पीड़ित हो रहा था ऐसी वह कल्याणमाला शीघ्र ही कान्तिरहित हो गयी तथा गला फाड़कर रोने लगी ॥४८॥


अत्यन्तमधुरैर्वाक्यैः पद्मेनाश्वासिता ततः । सीतया च निधायाङ्के कुर्वन्त्या मुखधावनम् ॥४९॥

सुमित्रासूनुना चोक्ता शुचं विसृज सुन्दरि । कुरु राज्यमनेनैव वेषेणोचितकारिणी ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर रामने अत्यन्त मधुर शब्दोंमें उसे सान्त्वना दी; सीताने गोदमें बैठाकर उसका मुँह धोया और लक्ष्मणने कहा कि हे सुन्दरि ! शोक छोड़ो, इसी वेषसे राज्य करो, तुम उचित कार्य कर रही हो ॥४९-५०॥


शुभे कांश्चित्प्रतीक्षस्व दिवसान् धैर्यसङ्गतान् । म्लेच्छेन ग्रहणं किं मे पितरं पश्य मोचितम् ॥५१॥

अर्थ: हे शुभे ! हे कल्याणरूपिणी ! धैर्यके साथ कुछ दिन तक प्रतीक्षा करो । मेरे लिए म्लेच्छराजका पकड़ना कौनसी बात है ? तुम शीघ्र ही अपने पिताको छूटा देखोगी ॥५१॥


इत्युक्ते परमं तोषं ताते मुक्त इवागता । समुल्लसितसर्वाङ्गा कन्यका द्युतिपूरिता ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर उसे इतना सन्तोष हुआ मानो पिता छूट ही गया हो। उस कन्याके समस्त अंग हर्षसे उल्लसित हो उठे और वह कान्तिसे भर गयी ॥५२॥


तत्र ते कानने रम्ये विचित्रालापविभ्रमाः । देवा इव सुखं तस्थुः स्वच्छन्दा दिवसत्रयम् ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर उस मनोहर वनमें नाना प्रकारका वार्तालाप करते हुए वे सब तीन दिन तक देवोंके समान स्वतन्त्र हो सुखसे रहे ॥५३॥


ततः सुप्तजने काले रजन्यां रामलक्ष्मणौ । ससीतौ रन्ध्रमाश्रित्य निष्क्रान्तौ काननालयात् ॥५४॥

अर्थ: तत्पश्चात् रात्रिके समय जब सब लोग सो गये तब सीता सहित राम-लक्ष्मण छिद्र पाकर वनके उस तम्बूसे बाहर निकल गये ॥५४॥


विबुद्धा तानपश्यन्ती कन्या व्याकुलमानसा । हाकारमुखरा शोकं परमं समुपागता ॥५५॥

अर्थ: जागनेपर जब कन्याने उन्हें नहीं देखा तब उसका मन बहुत ही व्याकुल हुआ । वह हाहाकार करती हुई परम शोकको प्राप्त हुई ॥५५॥


महापुरुषयुक्तं ते स्तेनयित्वा मनो मम । गन्तुं निद्रासमेताया निर्घृणेति मनस्विनी ॥५६॥

अर्थ: वह मनस्विनी मन ही मन यह कह रही थी कि हे महापुरुष ! मेरा मन चुराकर तथा मुझे सोती छोड़ क्या तुम्हें जाना उचित था ? तुम बड़े निर्दय हो ॥५६॥


कृच्छ्रान्नियम्य शोकं च वरवारणवर्तिनी । प्रविश्य कूवरं तस्थौ पूर्ववद्दीनमानसा ॥५७॥

अर्थ: अन्तमें बड़े दुःखसे शोकको रोककर तथा उत्तम हाथीपर सवार हो उसने कूबर नगरमें प्रवेश किया और वहाँ पहलेके समान दीन हृदयसे वह निवास करने लगी ॥५७॥


ततः कल्याणमालाया रूपेण विनयेन च । हृतचित्ताः क्रमेणैते प्रापुर्मेकलनिम्नगाम् ॥५८॥

अर्थ: अथानन्तर कल्याणमालाके रूप और विनयसे जिनके चित्त हरे हो गये थे ऐसे राम, सीता तथा लक्ष्मण क्रम-क्रमसे नर्मदा नदीको प्राप्त हुए ॥५८॥


उत्तीर्य विहितक्रीडास्तां सुखेन मनोहरान् । बहून् देशानतिक्रम्य प्राप्ता विन्ध्यमहाटवीम् ॥५९॥

अर्थ: क्रीड़ा करते हुए उस नदीको पार कर तथा अनेक सुन्दर देशोंको उल्लंघन कर वे विन्ध्याचलकी महाअटवीमें पहुँचे ॥५९॥


स्कन्धावारमहासार्थपरिक्षुण्णेन वर्त्मना । प्रयान्तः पथिकैर्गोपैः कीनाशैश्च निवारिताः ॥६०॥

अर्थ: वे बड़ी भारी सेनाके संचारसे खुदे हुए मार्गसे जा रहे थे, इसलिए मार्गमें चलनेवाले ग्वालों तथा हलवाहकोंने उन्हें रोका कि इस मार्गसे आगे न जाओ पर वे रुके नहीं ॥६०॥


क्वचित्सालादिभिर्वृक्षैर्लतालिङ्गितमूर्तिभिः । तद्वनं शोभतेऽत्यन्तं स्वामोदं नन्दनं यथा ॥६१॥

क्वचिद्दावेन निर्दग्धप्रान्तस्थितमहीरुहम् । न शोभते यथा गोत्रं दुष्पुत्रेण कलङ्कितम् ॥६२॥

अर्थ: बहुत भारी सुगन्धिसे भरा हुआ यह वन कहीं तो लताओंसे आलिंगित सागौन आदिके वृक्षोंसे नन्दनवनके समान अत्यन्त सुशोभित है और कहीं दावानलके कारण समीप स्थित वृक्षोंके जल जानेसे कुपुत्रके द्वारा कलंकित गोत्रके समान सुशोभित नहीं है, इस प्रकार कहते हुए वे आगे बढ़ रहे थे ॥६१-६२॥


अथानोचत् ततः सीता कर्णिकारवनान्तरे । वामतोऽयं स्थितो ध्वाङ्क्षो मूर्ध्नि कण्टकिनस्तरोः ॥६३॥

वाश्यमानो मुहुः क्रूरं कलहं कथयत्यरम् । अन्योऽपि क्षीरवृक्षस्थो जयं शंसति वायसः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर कुछ आगे बढ़नेपर सीताने कहा कि देखो, कनेर वनके बीचमें बायीं ओर कँटीले वृक्षकी चोटीपर बैठा कौआ बार-बार क्रूर शब्द कर रहा है सो ‘शीघ्र ही कलह होनेवाली है’ यह कह रहा है और इधर क्षीर वृक्षपर बैठा दूसरा कौआ ‘हम लोगोंकी विजय होगी’ यह सूचित कर रहा है ॥६३-६४॥


तस्मात् तावत् प्रतीक्षेतां मुहूर्तं कलहात् परम् । जयोऽपि नैव मे चित्ते प्रतिभात्यतिसुन्दरः ॥६५॥

अर्थ: इसलिए आप लोग मुहूर्तमात्र प्रतीक्षा कर लें क्योंकि कलहान्तर जय प्राप्त करना भी मेरे मनमें बहुत अच्छा नहीं जँचता ॥६५॥


ततः क्षणं विलम्ब्यैतौ प्रयातौ पुनरुद्यतौ । तदेव च पुनर्जातं निमित्तं निकटेऽन्तरे ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर क्षण-भर विलम्ब कर वे पुनः आगे गये तो कुछ ही अन्तर पर वही निमित्त फिर हुआ ॥६६॥


ब्रुवत्या अपि सीताया अवकर्ण्य वचस्ततः । प्रवृत्तौ गन्तुमग्रे च म्लेच्छानां सैन्यमुद्गतम् ॥६७॥

तौ निरीक्ष्यैव निर्भीतावायान्तौ वरकार्मुकौ । क्षणेनैकेन तत्सैन्यं कान्दिशीकं पलायितम् ॥६८॥

अर्थ: यद्यपि सीता कह रही थी फिर भी उसका कहा अनसुना कर राम-लक्ष्मण आगे बढ़ते गये । कुछ दूरी पर उन्हें म्लेच्छोंकी सेना मिली, सो उत्तम धनुषके धारक तथा निर्भय राम-लक्ष्मणको आते देख वह सेना भयभीत हो क्षण-भरमें भाग गयी ॥६७-६८॥


अवगत्य ततस्तस्मात् सन्नह्यान्ये समागताः । प्रावृड्मेघसमानेन तेऽपि हासेन निर्जिताः ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर भागती सेनासे समाचार जानकर दूसरे म्लेच्छ तैयार हो सामने आये परन्तु वर्षाकालीन मेघके समान श्याम लक्ष्मणने उन्हें हँसते-हँसते पराजित कर दिया ॥६९॥


ततस्तेऽत्यन्तवित्रस्ता म्लेच्छाः पतितकार्मुकाः । कुर्वन्तः परमं रावं गत्वा पत्ये न्यवेदयन् ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर जो अत्यन्त भयभीत थे, जिन्होंने धनुष छोड़ दिये थे और जो जोरसे चिल्ला रहे थे ऐसे उन म्लेच्छोंने जाकर अपने स्वामीसे निवेदन किया ॥७०॥


ततोऽसौ परमं क्रोधं वहंश्चापं च दारुणम् । निर्जगाम महासैन्यः शस्त्रसन्तमसावृतः ॥७१॥

अर्थ: तब परम क्रोध और भयंकर धनुषको धारण करता हुआ म्लेच्छोंका स्वामी निकला। बड़ी भारी सेना उसके साथ थी और वह शस्त्ररूपी अन्धकारसे आच्छादित था ॥७१॥


काकोनदा इति ख्याता म्लेच्छास्ते धरणीतले । दारुणाः सर्वमांसादो दुर्जयाः पार्थिवैरपि ॥७२॥

अर्थ: वे म्लेच्छ पृथिवीपर ‘काकोनद’ इस नामसे प्रसिद्ध थे, अत्यन्त भयंकर थे, सब जन्तुओंका मांस खानेवाले थे और राजाओंके द्वारा भी दुर्जेय थे ॥७२॥


तैरावृतां दिशं प्रेक्ष्य पुरो घनकुलासितैः । धनुरारोपयत् कोपं किंचिल्लक्ष्मीधरो भजन् ॥७३॥

अर्थ: जब लक्ष्मणने देखा कि आगेकी दिशा मेघसमूहके समान श्यामवर्ण म्लेच्छोंसे आच्छादित हो रही है तब उन्होंने कुछ कुपित हो धनुषकी डोरी चढ़ा ली ॥७३॥


तथा चास्फालितं सर्वंवनमाकम्पितं यथा । ज्वरश्च वनसत्त्वानां जज्ञे प्रकटवेपथुः ॥७४॥

अर्थ: और उस प्रकारसे उसका आस्फालन किया कि समस्त वन काँप उठा तथा जंगली जानवरोंको कँपकँपी उत्पन्न करनेवाला ज्वर उत्पन्न हो गया ॥७४॥


संदधानं शरं वीक्ष्य लक्ष्मणं त्रस्तचेतसः । बभ्रमुश्चक्रतां प्राप्ता म्लेच्छा निश्चक्षुषो यथा ॥७५॥

अर्थ: लक्ष्मणको डोरीपर बाण चढ़ाते देख जिनका चित्त भयभीत हो गया था ऐसे वे म्लेच्छ नेत्रहीनके समान चक्राकार घूमने लगे ॥७५॥


ततः साध्वससंपूर्णो म्लेच्छानामधिपो भृशम् । अवतीर्य रथादेतौ प्रणम्य रचिताञ्जलिः ॥७६॥

अब्रवीदस्ति कौशाम्बी नगरी प्रथिता प्रभुः । आहिताग्निर्द्विजस्तत्र नाम्ना विश्वानलः शुचिः ॥७७॥

प्रतिसंध्येति तज्जाया जातोऽहं तनयस्तयोः । रौद्रभूतिरिति ख्यातः शस्त्रद्यूतकलान्वितः ॥७८॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त भयसे भरा म्लेच्छोंका स्वामी रथसे उतरकर हाथ जोड़ता हुआ इनके पास आया और प्रणाम कर बोला कि एक कौशाम्बी नामकी प्रसिद्ध नगरी है, निरन्तर अग्निमें होम करनेवाला विश्वानल नामका पवित्र ब्राह्मण उसका स्वामी है । विश्वानलकी स्त्रीका नाम प्रतिसन्ध्या है । मैं उन्हीं दोनोंका पुत्र हूँ, रौद्रभूति नामसे प्रसिद्ध हूँ, शस्त्र तथा जुएके कलाका पारगामी हूँ ॥७६-७८॥


बाल्यात् प्रभृति दुष्कर्मनित्यानुष्ठानकोविदः । प्राप्तश्चौर्ये कदाचिच्च शूले भेत्तुमभीप्सितः ॥७९॥

अर्थ: मैं बाल्य अवस्थासे ही निरन्तर खोटे कार्य करनेमें निपुण था। किसी समय चोरीके अपराधमें पकड़ा गया और मुझे शूलीपर चढ़ानेका निश्चय किया गया ॥७९॥


धनिनैकेन तत्राहं श्रद्दधानेन साधुना । मोचितो वेपमानाङ्गः त्यक्त्वा देशमिहागतः ॥८०॥

अर्थ: शूलीका नाम सुनते ही मेरा शरीर काँप उठा तब विश्वास रखनेवाले एक भले धनिकने जमानत देकर मुझे छुड़वा दिया। तदनन्तर देश छोड़कर मैं यहाँ आ गया ॥८०॥


प्राप्तः कर्मानुभावेन काकोनदजनेशताम् । भ्रष्टस्तिष्ठामि सद्वृत्तात् पशुभिः समतां गतः ॥८१॥

अर्थ: कर्मोंके प्रभावसे इन काकोनद म्लेच्छोंकी स्वामिताको प्राप्त हो गया हूँ तथा सदाचारसे भ्रष्ट हो पशुओंके समान यहाँ रहता हूँ ॥८१॥


इयन्तं यस्य मे कालं सैन्याढ्या अपि पार्थिवाः । चक्षुषो गोचरीभावमासन् शक्ता न सेवितुम् ॥८२॥

सोऽहं दर्शनमात्रेण कृतो देवेन विक्लवः । धन्योऽस्मि वीक्षितौ येन भवन्तौ पुरुषोत्तमौ ॥८३॥

अर्थ: इतने समय तक बड़ी-बड़ी सेनाओंसे युक्त राजा भी जिसके दृष्टिगोचर होनेके लिए समर्थ नहीं हो सके उस मुझको आपने दृष्टिमात्रसे ही दीन कर दिया । मैं धन्य हूँ जिससे पुरुषोंमें उत्तम आप महानुभावोंके दर्शन किये ॥८२-८३॥


शासनं यच्छतां नाथौ किं करोमि यथोचितम् । शिरसा पादुके किं वा वहे पावनपण्डिते ॥८४॥

अर्थ: हे नाथ ! आज्ञा दीजिए मैं क्या योग्य सेवा करूँ ? क्या पवित्र करनेमें निपुण आपकी पादुकाएँ शिरपर धारण करूँ ? ॥८४॥


विन्ध्योऽयं निधिभिः पूर्णो वरयोषिच्छतैस्तथा । भुजिष्यमिच्छतां देवौ मामतो निभृतं परम् ॥८५॥

अर्थ: यह विन्ध्याचल निधियों तथा उत्तमोत्तम सैकड़ों स्त्रियोंसे परिपूर्ण है इसलिए हे देव ! मुझसे किसी अच्छे भारी राजस्वकी इच्छा प्रकट करो ॥८५॥


इत्युक्त्वा प्रणतिं कुर्वन् पुनरार्तिं परां गतः । पपात विह्वलो भूमौ छिन्नमूलस्तरुर्यथा ॥८६॥

अर्थ: इतना कहकर प्रणाम करता हुआ वह पुनः परम पीड़ाको प्राप्त हुआ और विह्वल हो कटे वृक्षके समान भूमिपर गिर पड़ा ॥८६॥


कष्टावस्थां ततः प्राप्तं तमेवं राघवोऽवदत् । कृपालतापरिष्वक्तवीरकल्पमहातरुः ॥८७॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा भैषीर्वालिखिल्यं दिवन्धनम् । कृत्वाऽऽनय द्रुतं प्राप्य संमानं परमं सुधीः ॥८८॥

अर्थ: तदनन्तर जो वीरजनोंके लिए दयारूपी लतासे आलिंगित कल्पवृक्षके समान थे ऐसे राम दुःखमय अवस्थाको प्राप्त हुए म्लेच्छ राजासे इस प्रकार बोले कि हे सुबुद्धि ! उठ-उठ, डर मत, बालिखिल्यको बन्धनरहित कर तथा उत्तम सम्मानको प्राप्त कराकर शीघ्र ही यहाँ ला ॥८७-८८॥


तस्यैवाभिमतो भूत्वा सचिवः सज्जनान्वितः । विहाय संगतिं म्लेच्छैर्विषयस्य हितोऽभवत् ॥८९॥

अर्थ: उसीका इष्ट मन्त्री हो सज्जनोंकी संगति कर और म्लेच्छोंकी संगति छोड़, देशका हितकारी हो ॥८९॥


एतत् चेत् कुरुषे सर्वमन्यथात्वविवर्जितम् । ततस्ते विद्यते शान्तिरद्यैव म्रियसेऽन्यथा ॥९०॥

अर्थ: यदि तू यह सब काम ठीक-ठीक करता है तो उससे तुझे शान्ति प्राप्त होगी अन्यथा आज ही मारा जायेगा ॥९०॥


एवं प्रभो करोमीति कृत्वा प्रणतिमादृतः । महारथसुतं गत्वा मुमोच विनयान्वितः ॥९१॥

अर्थ: ‘हे प्रभो ! ऐसा ही करता हूँ’ इस प्रकार कहकर उसने बड़े आदरसे रामको प्रणाम किया और विनयके साथ जाकर महारथके पुत्र बालिखिल्यको छोड़ दिया ॥९१॥


अभ्यङ्गोद्वर्त्य सुस्नातं भोजयित्वा स्वलंकृतम् । आरोप्य स्यन्दने नेतुमारेभे तं तदन्तिकम् ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे तेल-उबटन लगाकर अच्छी तरह स्नान कराया गया था और भोजन कराकर जिसे अलंकारोंसे अलंकृत किया गया था ऐसे बालिखिल्यको रथपर बैठाकर वह रामके पास ले जानेके लिए उद्यत हुआ ॥९२॥


स दध्यौ नीयमानः सन् विस्मयं परमं गतः । इतोऽपि गहनावस्था प्रायो मेऽद्य भविष्यति ॥९३॥

अर्थ: जो इस तरह आदरके साथ लाया जा रहा था ऐसा बालिखिल्य परम आश्चर्यको प्राप्त हुआ और मन ही मन सोचता जाता था कि प्रायः अब मेरी अवस्था इससे भी गहन होगी ॥९३॥


कायं म्लेच्छो महाशत्रुः कुकर्मात्यन्तनिर्दयः । क्व चायमतिसंमानो न मन्येऽद्यासुधारणम् ॥९४॥

अर्थ: कहाँ तो यह कुकर्म करनेवाला अत्यन्त निर्दय महावैरी म्लेच्छ ? और कहाँ यह भारी सम्मान ? जान पड़ता है कि आज प्राण नहीं बचेंगे ॥९४॥


इति दीनभना गच्छन् सहसा पद्मलक्ष्मणौ । दृष्ट्वा परां धृतिं प्राप्तोऽवतीर्य सनमस्कृतिः ॥९५॥

अब्रवीत् तौ युवां नाथावागतावतिसुन्दरौ । मम पुण्यानुभावेन मुक्तो येनास्मि बन्धनात् ॥९६॥

अर्थ: इस प्रकार बालिखिल्य दीन चित्त होकर जा रहा था कि सहसा राम-लक्ष्मणको देखकर वह परम सन्तोषको प्राप्त हुआ । उसने रथसे उतरकर नमस्कार करते हुए कहा कि हे नाथ ! मेरे पुण्योदयसे अतिशय सुन्दर रूपको धारण करनेवाले आप दोनों महानुभाव पधारे हैं इसीलिए मैं बन्धनसे मुक्त हुआ हूँ ॥९५-९६॥


गच्छ क्षिप्रं निजं धाम लभस्वामीष्टसंगमम् । तत्र नौ ज्ञास्यसीत्युक्ते बालिखिल्यः सुधीर्गतः ॥९७॥

अर्थ: राम-लक्ष्मणने उससे कहा कि शीघ्र ही अपने घर जाओ और इष्टजनोंके साथ समागम प्राप्त करो । वहां पहुँचनेपर तुम हम लोगोंको जान सकोगे । इस प्रकार कहनेपर बुद्धिमान् बालिखिल्य अपने घर चला गया ॥९७॥


कृत्वा सुनिभृतं भृत्यं तस्य विश्वानलाङ्गजम् । यातौ सीतान्वितौ स्वेष्टं कृतिनौ रामलक्ष्मणौ ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर विश्वानलके पुत्र रौद्रभूतिको बालिखिल्यका निश्चल मित्र बनाकर अतिशय कुशल राम-लक्ष्मण सीताके साथ अपने इष्ट स्थानको चले गये ॥९८॥


वालिखिल्यस्तु संप्राप्तः समं रौद्रविभूतिना । स्वपुरस्यान्तिकां क्षोणीं स्मरन् बान्धवचेष्टितम् ॥९९॥

प्रत्यासन्नं ततः कृत्वा विभूत्या परयान्वितम् । पितरं निरगात्तुष्टा पुरात् कल्याणमालिनी ॥१००॥

अर्थ: बान्धवजनोंकी चेष्टाका स्मरण करता हुआ बालिखिल्य, रौद्रभूतिके साथ जब अपने नगरकी समीपवर्ती भूमिमें पहुँचा तब निकट-वर्ती पिताको परम विभूतिसे युक्तकर पुत्री कल्याणमालिनी सन्तुष्ट हो उसका सत्कार करनेके लिए नगरसे बाहर निकली ॥९९-१००॥


प्रतीतां सनमस्कारां तां समाघ्राय मस्तके । निजयाने पुनः कृत्वा प्रविष्टः कूबरं नृपः ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर नमस्कार करती हुई पुत्रीको पहचानकर राजा बालिखिल्यने उसका मस्तक सूँघा फिर अपने रथपर बैठाकर कूबर नगरमें प्रवेश किया ॥१०१॥


पृथिवी महिषी तोषसञ्जातपुलका क्षणात् । पुरातनीं तनुं भेजे कान्तिसागरवर्तिनीम् ॥१०२॥

अर्थ: बालिखिल्यकी रानी पृथिवीके शरीरमें हर्षातिरेकसे रोमांच निकल आये और वह कान्तिरूपी सागरमें वर्तमान अपने पुराने शरीरको क्षण-भरमें पुनः प्राप्त हो गयी ॥१०२॥


सिंहोदरप्रभृतयो नृपा प्रभृतयोऽखिलाः । गुणैः कल्याणमालायाः परमं विस्मयं गताः ॥१०३॥

अर्थ: सिंहोदर आदि समस्त राजा कल्याणमालाके गुणोंसे परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥१०३॥


यद्रौद्रभूतिः सुचिरं विचित्रं समार्जयच्चौर्यपरायणः स्वम् । अनेकदेशप्रभवं विशालं तद्बालिखिल्यस्य गृहं विवेश ॥१०४॥

अर्थ: रौद्रभूतिने चिरकाल तक चोरीमें तत्पर रहकर नाना देशोंमें उत्पन्न जो विविध प्रकारका विशाल धन इकट्ठा किया था वह सब बालिखिल्यके घरमें प्रविष्ट हुआ ॥१०४॥


जातेऽस्य वाग्वर्तिनि रौद्रभूतौ वशीकृतम्लेच्छसुदुर्गभूमौ । सिंहोदरोऽपि प्रतिपन्नशङ्कः स्नेहं ससंमानमलंचकार ॥१०५॥

अर्थ: जब म्लेच्छोंकी सुदुर्गम भूमिको वश करनेवाला रौद्रभूति बालिखिल्यका आज्ञाकारी हो गया तब शंकाको प्राप्त हुआ सिंहोदर भी सम्मानसहित उसके साथ बहुत स्नेह करने लगा ॥१०५॥


सोऽयं समासाद्य परां विभूतिं प्रसादतो राघवसत्तमस्य । महारथी प्राणसमासमेतो रविर्यथैवं शरदा रराज ॥१०६॥

अर्थ: इस प्रकार महारथी बालिखिल्य राम-लक्ष्मणके प्रसादसे परम विभूतिको पांकर अपनी प्राणप्रियासे इस तरह सुशोभित होने लगा जिस तरह कि शरद्-ऋतुसे सूर्य सुशोभित होता है ॥१०६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते वालिखिल्योपाख्यानं नाम चतुस्त्रिंशत्तमं पर्व ॥३४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें बालिखिल्यका वर्णन करनेवाला चौंतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३४॥


३५. पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व (कपिलोपाख्यानं)

अथ ते त्रिदशाभिख्याः काननं नन्दनोपमम् । विहरन्तः सुखं प्राप्ता देशमत्यन्तमुज्ज्वलम् ॥१॥

मध्ये यस्य नदी भाति प्रसिद्धजलवाहिनी । तापीति विश्रुता नानापक्षिवर्गानुनादिता ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर देवोंके समान शोभाको धारण करनेवाले वे तीनों, नन्दन वनके समान सुन्दर वनमें सुखसे विहार करते हुए एक ऐसे अत्यन्त उज्ज्वल देशमें पहुँचे, जिसके मध्यमें प्रसिद्ध जलको बहानेवाली, पक्षी समूहसे शब्दायमान तापी नामकी प्रसिद्ध नदी सुशोभित है ॥१-२॥


अरण्ये तत्र निस्तोये सीताऽत्यन्तश्रमान्विता । जगाद राघवं नाथ कण्ठशोषो ममोत्तमः ॥३॥

अर्थ: वहांके निर्जल वनमें जब सीता अत्यन्त थक गयी तब रामसे बोली कि नाथ ! मेरा कण्ठ बिलकुल सूख गया है ॥३॥


यथा भवशतैः खिन्नो भव्यो दर्शनमर्हतः । वाञ्छत्येवमहं तीव्रतृष्णयाऽऽकुलिता जलम् ॥४॥

अर्थ: जिस प्रकार सैकड़ों जन्म धारण करनेसे खेदको प्राप्त हुआ भव्य, अरहन्त भगवान्‌के दर्शन चाहता है उसी प्रकार तीव्र पिपासासे आकुलित हुई मैं जल चाहती हूँ ॥४॥


इत्युक्त्वा वार्यमाणापि निषण्णा सुतरोरधः । रामेण जगदे देवि विषादं मागमः शुभे ॥५॥

अर्थ: इतना कहकर वह रोकनेपर भी एक उत्तम वृक्षके नीचे बैठ गयी । रामने कहा कि हे देवि ! हे शुभे ! विषादको प्राप्त मत होओ ॥५॥


आसन्नोऽयं महाग्रामो दृश्यते विकटालयः । उत्तिष्ठाशु प्रयामोऽत्र शिशिरं वारि पास्यति ॥६॥

अर्थ: यह पास ही बड़े-बड़े महलोंसे युक्त बड़ा भारी ग्राम दिखाई दे रहा है, उठो, शीघ्र ही चलें, वहीं शीतल पानी पीना ॥६॥


एवमुक्ते तया स्वैरं स्वैरं प्रस्थितया समम् । प्राप्तौ तावरुणग्रामं महाधनकुटुम्बिकम् ॥७॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर धीरे-धीरे चलती हुई सीताके साथ चलकर वे दोनों, जहाँ अनेक धनिक कुटुम्ब रहते थे, ऐसे अरुण ग्राममें पहुँचे ॥७॥


आहिताग्निर्द्विजस्तत्र कपिलो नाम विश्रुतः । गेहे तस्यावतीर्णौ तौ यथाक्रममुपागते ॥८॥

अर्थ: वहाँ प्रतिदिन होम करनेवाला एक कपिल नामका ब्राह्मण रहता था सो वे दोनों यथा क्रमसे प्राप्त हुए, उसीके घर उतरे ॥८॥


अत्राग्निहोत्रशालायामपनीय श्रमं क्षणम् । तद्ब्राह्मण्या जलं दत्तं पपौ सीता सुशीतलम् ॥९॥

अर्थ: यहाँ यज्ञ-शालामें क्षण-भर विश्राम कर सीताने उसकी ब्राह्मणीके द्वारा दिया शीतल जल पिया ॥९॥


यावत् तिष्ठन्ति ते तत्र द्विजस्तावदरण्यतः । बिल्वाश्वत्थपलाशैधोभारवाही समागतः ॥१०॥

अर्थ: वे सब वहाँ ठहर ही रहे थे कि इतनेमें बेल, पीपल और पलाशकी लकड़ियोंका भार लिये ब्राह्मण जंगलसे वापस आ पहुँचा ॥१०॥


दावानलसमं यस्य मानसं नित्यकोपिनः । कालकूटविषं वाक्यमुलूकसदृशं मुखम् ॥११॥

अर्थ: निरन्तर क्रोध करनेवाले उस ब्राह्मणका मन दावानलके समान था, वचन कालकूटके समान थे, और मुख उल्लूके सदृश था ॥११॥


कमण्डलुशिखाकूर्चवालसूत्रादिभिः परम् । बिभ्राणः कुटिलं वेषमुञ्छवृत्तिं भजन् किल ॥१२॥

अर्थ: वह हाथमें कमण्डलु लिये था, उसने शिरपर बड़ी चोटी रख छोड़ी थी, मुखपर लम्बी-चौड़ी दाढ़ी बढ़ा ली थी और कन्धेपर यज्ञोपवीतका सूत्र धारण किया था, इन सब चीजोंसे वह अत्यन्त कुटिल वेषको धारण कर रहा था तथा उञ्छ वृत्तिसे अपनी जीविका चलाता था ॥१२॥


दृष्ट्वा तान् कुपितोऽत्यन्तभ्रुकुटीकुटिलाननः । उवाच ब्राह्मणीं वाचा तक्षन्निव सुतीक्ष्णया ॥१३॥

अर्थ: उन्हें देखते ही उसका क्रोध उमड़ पड़ा, उसका मुख भौंहोंसे अत्यन्त कुटिल हो गया और वह ब्राह्मणीसे इस प्रकार बोला, मानो तीक्ष्ण वचनोंसे उसे छील ही रहा हो ॥१३॥


अयि पापे किमित्येषामिह दत्तं प्रवेशनम् । प्रयच्छाम्यद्य ते दुष्टे बन्धं गोरपि दुस्सहम् ॥१४॥

अर्थ: उसने कहा कि हे पापिनि ! तूने इन्हें यहाँ प्रवेश क्यों दिया है ? अरी दुष्टे ! मैं आज तुझे पशुसे भी अधिक दुःसह बन्धनमें डालता हूँ ॥१४॥


पश्येमे निस्त्रपा धृष्टाः केऽपि पांशुलपाण्डुकाः । अग्निहोत्रकुटीं पापा कुर्वन्त्युपहतां मम ॥१५॥

अर्थ: देख, जिनका शरीर धूलिसे धूसर हो रहा है, ऐसे ये निर्लज्ज, पापी, ढीठ व्यक्ति मेरी यज्ञशालाको दूषित कर रहे हैं ॥१५॥


ततः सीताऽब्रवीत् पद्ममार्यपुत्र कुकर्मणः । अस्येदमास्पदं दग्धं परमाक्रोशकारिणः ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर सीताने रामसे कहा कि हे आर्यपुत्र ! इस कुकर्मा तथा अतिशय अपशब्द कहनेवाले इस ब्राह्मणका यह अधम स्थान छोड़ो ॥१६॥


वरं पुष्पफलच्छन्नैः पादपैरुपशोभिते । सरोभिश्चातिविमलैः पद्मादिपिहितैर्वने ॥१७॥

सारङ्गैरुषितं सार्धं क्रीडद्भिर्निजयेच्छया । श्रूयते नेदृशं तत्र नितान्तं परुषं वचः ॥१८॥

अर्थ: फूलों और फलोंसे आच्छादित वृक्षों तथा कमल आदिसे युक्त अत्यन्त निर्मल सरोवरोंसे सुशोभित वनमें स्वेच्छासे साथ-साथ क्रीड़ा करनेवाले हरिणोंके साथ निवास करना अच्छा, जहाँ इस प्रकारके अत्यन्त कठोर शब्द सुनाई नहीं पड़ते ॥१७-१८॥


अस्मिन् राघव नाकाभे देशे धनसमुज्ज्वले । समस्तो निष्ठुरो लोको ग्रामवासी विशेषतः ॥१९॥

अर्थ: हे राघव ! स्वर्गके समान आभावाले इस अतिशय सुन्दर देशमें समस्त लोग निष्ठुर हैं और खासकर ग्रामवासी तो अत्यन्त निष्ठुर हैं ही ॥१९॥


विप्रस्य रूक्षया वाचा क्षोभितोऽसौ ततोऽखिलः । ग्रामः समागतो दृष्ट्वा तेषां रूपं सुरोपमम् ॥२०॥

अर्थ: ब्राह्मणके रूक्ष वचनोंसे क्षोभको प्राप्त हुआ समस्त गाँव उनका देवतुल्य रूप देखकर वहाँ आ गया ॥२०॥


अब्रवीद् ब्राह्मणैकान्ते पथिकाः क्षणमेककम् । तिष्ठन्तु किमिमे दोषं कुर्वन्ति विनयान्विताः ॥२१॥

अर्थ: गाँवके लोगोंने कहा कि हे ब्राह्मण ! यदि ये पथिक तेरे मकानमें एक ओर क्षण-भरके लिए ठहर जाते हैं तो क्या दोष उत्पन्न कर देंगे ? ये सब बड़े विनयी जान पड़ते हैं ॥२१॥


ततो निर्भर्त्स्य सकलं तं लोकं कोपलोहितः । बभाषे तौ द्विजः प्राप सारमेयो गजाविव ॥२२॥

निष्क्रामत परं गेहान्मदीयादपवित्रकौ । एवमादिवचोघातैर्लक्ष्मीमान् कुपितस्ततः ॥२३॥

ऊर्ध्वपादमधोग्रीवं कृत्वा तं ब्राह्मणाधमम् । अब्रह्मण्यं प्रकूजन्तं शोणितारुणलोचनम् ॥२४॥

भ्रमयित्वा क्षितौ यावदास्फालयितुमुद्यतः । रामेण वारितस्तावदिति कारुण्यधारिणा ॥२५॥

अर्थ: उसने क्रोधसे लाल होकर सब लोगोंको डाँटते हुए, राम-लक्ष्मणसे कहा कि तुम लोग अपवित्र हो, अतः मेरे घरसे निकलो । ब्राह्मणका राम-लक्ष्मणके प्रति रोष दिखाना ऐसा ही था जैसा कि कोई एक कुत्ता दो हाथियोंके प्रति रोष दिखाता है - उन्हें देखकर भोंकता है । तदनन्तर उसके इस प्रकारके वचन सम्बन्धी आघातसे लक्ष्मणको क्रोध आ गया । वे रुधिरके समान लाल-लाल नेत्रोंके धारक तथा अमांगलिक अपशब्द बकनेवाले उस नीच ब्राह्मणको ऊर्ध्वपाद और अधोग्रीव कर घुमाकर ज्यों ही पृथिवीपर पछाड़नेके लिए उद्यत हुए त्यों ही करुणाके धारी रामने उन्हें यह कहते हुए रोका ॥२२-२५॥


सौमित्रे किमिदं क्लीबे प्रारब्धं भवतेदृशम् । मारितेन किमेतेन जीवत्प्रेतेन ते ननु ॥२६॥

अर्थ: कि हे लक्ष्मण ! तुम इस बेचारे दीन प्राणीपर यह क्या करने जा रहे हो ? यह तो जीवित रहते हुए भी मृतकके समान है, इसके मारनेसे क्या लाभ है ? ॥२६॥


मुञ्चैनं त्वरितं क्षुद्रं यावत्प्राणैर्न मुच्यते । अयशः परमेतस्मिंल्लभ्यते केवलं मृते ॥२७॥

अर्थ: जबतक यह निष्प्राण नहीं होता है तबतक इस क्षुद्रको शीघ्र ही छोड़ दो । इसके मरनेपर केवल अपयश ही प्राप्त होगा ॥२७॥


श्रमणा ब्राह्मणा गावः पशुस्त्रीबालवृद्धकाः । सदोषा अपि शूराणां नैते वध्याः किलोदिताः ॥२८॥

अर्थ: मुनि, ब्राह्मण, गाय, पशु, स्त्री, बालक और वृद्ध ये सदोष होनेपर भी शूरवीरोंके द्वारा वध्य नहीं हैं, ऐसा कहा गया है ॥२८॥


इत्युक्त्वा मोचयित्वा तं कृत्वा लक्ष्मणमग्रतः । सीतयाऽनुगतो रामः कुटीराद्विरगात्ततः ॥२९॥

अर्थ: इतना कहकर रामने उसे छुड़ाया और लक्ष्मणको आगे कर वे सीता सहित उस ब्राह्मणकी कुटियासे बाहर निकल आये ॥२९॥


धिग्-धिग् नीचसमासङ्गं दुर्वचःश्रुतिकारणम् । मनोविकारकरणं महापुरुषवर्जितम् ॥३०॥

अर्थ: 'जो दुर्वचन सुननेका कारण है, मनमें विकार उत्पन्न करनेवाला है और महापुरुष जिसे दूरसे ही छोड़ देते हैं ऐसी नीच मनुष्योंकी संगतिको धिक्कार है ॥३०॥


वरं तरुतले शीते दुर्गमे विपिने स्थितम् । परित्यज्याखिलं ग्रन्थं विहृतं भुवने वरम् ॥३१॥

वरमाहारमुत्सृज्य मरणं सेवितुं सुखम् । अवज्ञातेन नान्यस्य गृहे क्षणमपि स्थितम् ॥३२॥

अर्थ: शीत ऋतुके समय दुर्गम वनमें वृक्षके नीचे बैठा रहना अच्छा है, समस्त परिग्रह छोड़कर संसारमें भ्रमण करते रहना अच्छा है और आहार छोड़कर सुखपूर्वक मर जाना अच्छा है परन्तु तिरस्कारके साथ दूसरेके घरमें एक क्षण भी रहना अच्छा नहीं है ॥३१-३२॥


कूलेषु सरितामद्रेः कुक्षिष्वत्यन्तहारिषु । स्थास्यामो न पुनर्भूयः प्रवेक्ष्यामः खलालयम् ॥३३॥

निन्दन्नेवं खलासङ्गमभिमानं परं वहन् । निर्गत्य ग्रामतः पद्मो वनस्य पदवीं श्रितः ॥३४॥

अर्थ: ‘हम नदियोंके तटों और पर्वतोंकी अतिशय मनोहर गुफाओंमें रहेंगे परन्तु अब फिर दुर्जनोंके घरमें प्रवेश नहीं करेंगे’ इस प्रकार दुर्जन संसर्गकी निन्दा करते तथा परम अभिमानको धारण करते हुए रामने गाँवसे निकलकर वनका मार्ग लिया ॥३३-३४॥


घनकालस्ततः प्राप्तो नीलयन्नखिलं नमः । पटुगर्जितसंतानप्रतिनादितगह्वरः ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त आकाशको नीला करता और तीव्र गर्जनाके समूहसे गुफाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ वर्षा काल आया ॥३५॥


ग्रहनक्षत्रपटलमुपगुह्य समन्ततः । सरावविद्युदुद्योतं जहासेव नमःस्फुटम् ॥३६॥

अर्थ: उस समय ग्रह और नक्षत्रोंके पटलको सब ओरसे छिपाकर कड़कती हुई बिजलीके प्रकाशके बहाने आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ॥३६॥


ग्रीष्मडामरकं घोरं समुत्सार्य घनाघनः । जगर्ज विद्युदङ्गुल्या प्रोषितानिव तर्जयन् ॥३७॥

अर्थ: ग्रीष्म कालके भयंकर विस्तारको दूर हटाकर मेघ गरज रहा था और बिजलीरूपी अंगुलीके द्वारा ऐसा जान पड़ता था मानो प्रवासी मनुष्योंको डांट ही दिखा रहा हो ॥३७॥


नभोऽन्धकारितं कुर्वन् धारामिर्नीलतोयदः । अभिषेक्तुं समारेभे सीतां गज इव श्रियम् ॥३८॥

अर्थ: धाराओंके द्वारा आकाशको अन्धकारयुक्त करता हुआ श्यामल मेघ, सीताका अभिषेक करनेके लिए उस तरह तैयार हुआ जिस तरह हाथी लक्ष्मीका अभिषेक करनेके लिए तैयार होता है ॥३८॥


तिम्यन्तस्ते ततोऽभ्यर्णं पृथुन्यग्रोधपादपम् । उपसस्नुः पुरो गेहसमानस्कन्धमुन्नतम् ॥३९॥

अर्थ: तदनन्तर वे भीगते हुए एक निकटवर्ती ऐसे विशाल वटवृक्षके नीचे पहुँचे कि जिसका स्कन्ध घरके समान सुरक्षित था तथा जो अत्यन्त ऊँचा था ॥३९॥


इभकर्णो गणस्तेषामभिभूतोऽथ तेजसा । गत्वा स्वामिनमित्यूचे नत्वा विन्ध्यवनाश्रितम् ॥४०॥

आगत्य नाकतः केऽपि मदीये नाथ सद्मनि । स्थिता यैस्तेजसैवाहं तस्मादुद्वासितो द्रुतम् ॥४१॥

अर्थ: अथानन्तर उनके तेजसे अभिभूत हुआ इभकर्ण नामका यक्ष, विन्ध्याचलके वनमें रहनेवाले अपने स्वामीके पास जाकर तथा नमस्कार कर इस प्रकार बोला कि हे नाथ! स्वर्गसे आकर कोई ऐसे तीन महानुभाव मेरे घरमें ठहरे हैं जिन्होंने अपने तेजसे अभिभूत कर मुझे शीघ्र ही घरके बाहर कर दिया है ॥४०-४१॥


श्रुत्वा तद्वचनं स्मित्वा विनायकपतिः समम् । वधूभिः प्रस्थितो गन्तुं न्यग्रोधं वरलीलया ॥४२॥

अर्थ: इभकर्णके वचन सुनकर मन्द हास्य करता हुआ यक्षराज, अपनी स्त्रियोंके साथ लीलापूर्वक उस वटवृक्षके पास जानेके लिए चला ॥४२॥


अधीश्वरः स यक्षाणां महाविभवसंगतः । रम्यकाननसंसक्तः क्रीडन्पूतनसंज्ञकः ॥४३॥

अर्थ: यक्षोंका वह अधिपति महावैभवसे युक्त था, रम्य वनोंमें क्रीड़ा करता आ रहा था और ‘पूतन’ नामसे सहित था ॥४३॥


दूरादेव च तौ दृष्ट्वा महारूपौ गणाधिपः । प्रयुज्यावधिमज्ञासीद् बलनारायणाविति ॥४४॥

अर्थ: यक्षराजने अत्यन्त सुन्दर रूपके धारक राम-लक्ष्मणको दूरसे ही देख अवधिज्ञान जोड़कर जान लिया कि ये बलभद्र और नारायण हैं ॥४४॥


ततस्तदनुभावेन वात्सल्येन च भूयसा । क्षणेन नगरी तेषां तेन रम्या विनिर्मिता ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर उनके प्रभाव एवं बहुत भारी वात्सल्यसे उसने उनके लिए क्षण-भरमें एक सुन्दर नगरीकी रचना कर दी ॥४५॥


ततस्ते सुखसंपन्नं सुप्ताः किल सुचारुणा । प्रभाते गीतशब्देन प्रबोधं समुपागताः ॥४६॥

अर्थ: तत्पश्चात् वे वहाँ सुखसे सोये और प्रातःकाल अतिशय मनोहर संगीतके शब्दसे प्रबोधको प्राप्त हुए ॥४६॥


तल्पेऽवस्थितमात्मानमपश्यन् रत्नराजिते । प्रासादं च महारम्यं बहुभूमिकमुज्ज्वलम् ॥४७॥

देहोपकारणव्यग्रं परिवर्गं च सादरम् । नगरं च महाशब्दशालगोपुरशोभितम् ॥४८॥

अर्थ: उन्होंने अपने आपको रत्नोंसे सुशोभित शय्यापर अवस्थित देखा, अनेक खण्डका अत्यन्त मणीय उज्ज्वल महल देखा, आदरके साथ शरीरकी सेवा करनेमें व्यग्र सेवकोंका समूह देखा और महाशब्द, प्राकार तथा गोपुरोंसे शोभित नगर देखा ॥४७-४८॥


तेषां महानुभावानां दृष्टेऽस्मिन् सहसा पुरे । न मनो विस्मयं प्राप तद्धि क्षुद्रविचेष्टितम् ॥४९॥

अर्थ: सहसा इस नगरको दीखनेपर उन महानुभावोंका मन आश्चर्यको प्राप्त नहीं हुआ सो ठीक ही है क्योंकि यह सब चमत्कार क्षुद्र चेष्टा थी ॥४९॥


अशेषवस्तुसंपन्नास्तत्र ते चारुचेष्टिताः । अवस्थानं सुखं चक्रुरमरा इव भोगिनः ॥५०॥

अर्थ: सुन्दर चेष्टाओंको धारण करनेवाले राम, सीता और लक्ष्मण समस्त वस्तुओंसे युक्त हो देवोंके समान भोग भोगते हुए उस नगरीमें सुखसे रहने लगे ॥५०॥


यथाधिपेन रामस्य पुरी यस्मात् प्रकल्पिता । ततो महीतले ख्यातिं गता रामपुरीति सा ॥५१॥

अर्थ: चूँकि वह नगरी यक्षराजने रामके लिए बनायी थी इसलिए महीतलपर रामपुरी इसी नामसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुई ॥५१॥


प्रतीहारा भटाः शूरा अमात्याः सप्तयो गजाः । पौराश्च विविधास्तस्यामयोध्यायामिवाभवन् ॥५२॥

अर्थ: द्वारपाल, भट, शूरवीर, मन्त्री, घोड़े, हाथी तथा नाना प्रकारके नगरवासी जिस प्रकार अयोध्यामें थे उसी प्रकार इस रामपुरीमें भी थे ॥५२॥


कुशाग्रनगरेशोऽयं गणिनं पृष्टवानिति । तयोर्नाथ तथाभूतो स द्विजः किमु चेष्टितः ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर राजा श्रेणिकने गौतम स्वामीसे पूछा कि हे नाथ ! राम-लक्ष्मणके साथ उस प्रकार व्यवहार करनेवाले उस कपिल ब्राह्मणका क्या हाल हुआ ? सो कहिए ॥५३॥


उवाच च गणस्वामी शृणु श्रेणिक स द्विजः । प्रयातः प्रातरुत्थाय दात्रहस्तो वनस्थलीम् ॥५४॥

अर्थ: तब गौतम स्वामी बोले कि हे श्रेणिक ! सुन, वह ब्राह्मण प्रभात काल उठकर तथा हँसिया हाथमें लेकर वनकी ओर चला ॥५४॥


भ्रमंश्च समिदाद्यर्थमकस्मादूर्ध्वलोचनः । नातिदूरे पुरीं पृथ्वीमपश्यद् विस्मिताननः ॥५५॥

अर्थ: वह इन्धन आदिकी प्राप्तिके लिए इधर-उधर घूम रहा था कि अकस्मात् ही दृष्टि ऊपर उठानेपर उसने एक विशाल नगरी देखी। देखकर उसका मुख आश्चर्यसे चकित हो गया ॥५५॥


असिताभिः सिताभिश्च पताकाभिर्विराजिताम् । शरन्मेघसमानैश्च भवनैरतिभासुरैः ॥५६॥

अर्थ: वह नगरी सफेद तथा अन्य रंगोंकी अनेक पताकाओं और शरद् ऋतुके मेघोंके समान अतिशय देदीप्यमान भवनोंसे सुशोभित थी ॥५६॥


पुण्डरीकातपत्रेण मध्ये समुपलक्षितम् । महाप्रासादमेकं च कैलासस्येव शावकम् ॥५७॥

अर्थ: नगरीके मध्यमें सफेद कमलरूपी छत्रसे सहित एक बड़ा भवन था जो ऐसा जान पड़ता था मानो कैलासका बच्चा ही हो ॥५७॥


अचिन्तयच्च द्यौरेषा अटव्यासीन्मृगाश्रिता । यस्यां समित्कुशाद्यर्थं दुःखं पर्यटितं सदा ॥५८॥

अर्थ: यह सब देख, वह ब्राह्मण विचार करने लगा कि क्या यह स्वर्ग है ? अथवा मृगोंसे सेवित वही अटवी है ? जिसमें मैं इन्धन तथा कुशा आदिके लिए निरन्तर दुःखपूर्वक भटकता रहता था ॥५८॥


अकस्मात् सेयमुत्तुङ्गशृङ्गमालोपशोभितैः । रत्नपर्वतसंकाशैर्विराजति पुरी गृहैः ॥५९॥

अर्थ: यह नगरी ऊँचे-ऊँचे शिखरोंकी मालासे शोभायमान, तथा रत्नमयी पर्वतोंके समान दीखनेवाले भवनोंसे अकस्मात् ही सुशोभित हो रही है ॥५९॥


सरांस्यमूनि रम्याणि पद्मादिपिहितानि च । दृश्यन्ते यानि नो पूर्वं मया दृष्टानि जातुचित् ॥६०॥

अर्थ: यहाँ कमल आदिसे आच्छादित जो ये मनोहर सरोवर दिखाई दे रहे हैं वे मैंने पहले कभी नहीं देखे ॥६०॥


उद्यानानि सुरम्याणि सेवितानि जनैर्भृशम् । दृश्यन्ते देवधामानि लक्षितानि महाध्वजैः ॥६१॥

अर्थ: यहाँ मनुष्योंके द्वारा सेवित सुरम्य उद्यान और बड़ी-बड़ी ध्वजाओंसे युक्त मन्दिर दिखाई पड़ते हैं ॥६१॥


वारणैः सप्तिभिर्गोभिर्महिषीभिश्च सङ्कटा । अस्योपकण्ठधरणी घण्टादिस्वनपूरिता ॥६२॥

अर्थ: इस नगरकी निकटवर्ती भूमि, हाथियों, घोड़ों, गायों और भैंसोंसे संकीर्ण तथा घण्टा आदिके शब्दोंसे पूर्ण है ॥६२॥


किमेषा नगरी नाकादवतीर्णा भवेदिह । पातालादुद्गताहोस्वित् कस्यापि शुभकर्मणः ॥६३॥

अर्थ: क्या यह नगरी यहाँ स्वर्गसे अवतीर्ण हुई है ? अथवा किसी पुण्यात्माके प्रभावसे पातालसे निकली है ॥६३॥


स्वप्नमेवं नु पश्यामि मायेयं बत कस्यचित् । किमु गन्धर्वनगरं पित्तव्याकुलितोऽस्मि किम् ॥६४॥

अर्थ: क्या मैं ऐसा स्वप्न देख रहा हूँ ? अथवा यह किसीकी माया है ? या गन्धर्वका नगर है ? अथवा मैं स्वयं पित्तसे व्याकुलित हो गया हूँ ? ॥६४॥


उपालिङ्गमिदं किं स्यात् प्रायेणास्यान्तिकस्य मे । इति संचिन्तयन् प्राप्तो विवादं परमं द्विजः ॥६५॥

अर्थ: अथवा क्या मेरा निकट कालमें मरण होनेवाला है सो उसका चिह्न प्रकट हुआ है ? इस प्रकार विचार करता हुआ वह ब्राह्मण अत्यधिक विवादको प्राप्त हुआ ॥६५॥


दृष्ट्वा च प्रमदामेकां नानालंकारधारिणीम् । अपृच्छदुपसृत्येयं भद्रे कस्य पुरीत्यसौ ॥६६॥

अर्थ: उसी समय उसे नाना अलंकार धारण करनेवाली एक स्त्री दिखी सो उसके पास जाकर उसने पूछा कि हे भद्रे ! यह किसकी नगरी है ? ॥६६॥


सा जगौ जातु पद्मस्य पुरीयं किं न ते श्रुता । यस्य लक्ष्मीधरो भ्राता सीता च प्राणवल्लभा ॥६७॥

अर्थ: उसने कहा कि यह रामकी नगरी है, क्या तुमने कभी सुना नहीं ? उन रामकी कि लक्ष्मण जिनके भाई हैं और सीता जिनकी प्राणप्रिया है ॥६७॥


एतत् पश्यसि यद् विप्र पुर्या मध्ये महागृहम् । शरदभ्रसमच्छायमत्रासौ पुरुषोत्तमः ॥६८॥

अर्थ: हे ब्राह्मण ! नगरीके बीचमें जो यह शरद् ऋतुके मेघके समान कान्तिवाला बड़ा भवन देख रहे हो इसीमें वे पुरुषोत्तम रहते हैं ॥६८॥


लोको दुर्लभदर्शनेन सर्वोनेनातिदुर्विधः । यच्छता वाञ्छितं द्रव्यं जनितः पार्थिवोपमः ॥६९॥

अर्थ: जिनका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है, ऐसे इन पुरुषोत्तमने मन वाञ्छित द्रव्य देकर सभी दरिद्र मनुष्योंको राजाके समान बना दिया है ॥६९॥


विप्रोऽवोचदुपायेन केन पश्यामि सुन्दरि । पद्मं सद्भावतः पृष्टा निवेदयितुमर्हसि ॥७०॥

अर्थ: ब्राह्मणने कहा कि हे सुन्दरि ! मैं किस उपायसे रामके दर्शन कर सकता हूँ ? मैं तुमसे सद्भावसे पूछ रहा हूँ अतः बतलानेके योग्य हो ॥७०॥


इत्युक्त्वा समिधाभारं निक्षिप्य भुवि साञ्जलिः । पपात पादयोस्तस्याः सा कस्य न मनोहरा ॥७१॥

अर्थ: इतना कहकर उस ब्राह्मणने ईन्धनका भार पृथिवी पर रख दिया और स्वयं हाथ जोड़कर उस स्त्रीके चरणोंमें गिर पड़ा, सो ठीक ही है क्योंकि वह स्त्री किसका मन नहीं हरती थी ? ॥७१॥


ततोऽसौ कृपयाऽऽकृष्टा सुमाया नाम यक्षिणी । जगाद विप्रं परमं त्वयेदं साहसं कृतम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर दयासे आकृष्ट हुई उस सुमाया नामकी यक्षीने ब्राह्मणसे कहा कि तूने यह बड़ा साहस किया है ॥७२॥


अस्याः पुरः समासन्नां कथं त्वं भुवमागतः । आरक्षकैरलं घोरैर्नूनं नश्यति वीक्षितः ॥७३॥

अर्थ: तू इस नगरीकी समीपवर्ती भूमिमें कैसे आ गया ? यदि भयंकर पहरेदार तुझे देख लेते तो तू अवश्य ही नष्ट हो जाता ॥७३॥


अस्या द्वारत्रयं पुर्याः दुष्प्रवेशं सुरैरपि । अशून्यं सर्वदा वीरै रक्षकैः सुनियामकैः ॥७४॥

सिंहवारणशार्दूलतुल्यवक्त्रैर्महोज्ज्वलैः । एभिर्विभीषिता मृत्युं मानुषा यान्त्यसंशयम् ॥७५॥

अर्थ: इस नगरीके तीन द्वारोंमें तो देवोंको भी प्रवेश करना कठिन है क्योंकि वे सदा सिंह, हाथी और शार्दूलके समान मुखवाले तेजस्वी, वीर तथा कठोर नियन्त्रण रखनेवाले रक्षकोंसे अशून्य रहते हैं । इन रक्षकोंके द्वारा डरवाये हुए मनुष्य निःसन्देह मरणको प्राप्त हो जाते हैं ॥७४-७५॥


पूर्वद्वारमदो यत्तु तस्य पश्यसि यान् बहिः । प्रासादानन्तिकानेतान् बलाकाच्छादनच्छवीन् ॥७६॥

मणितोरणरम्येषु विविधध्वजराजिषु । अर्हतामिन्द्रवन्द्यानाममीषु १प्रतियातनाः ॥७७॥

सामायिकं पुरस्कृत्य तासां यः स्तवनं नरः । नमोऽर्हत्सिद्धनिस्वानपूर्वं पठति भावतः ॥७८॥

गुरूपदेशयुक्तोऽसौ सम्यग्दर्शनरक्षितः । विशतीन्द्रककुब्द्वारं हन्यते त्वनमस्कृतिः ॥७९॥

अर्थ: इनके सिवाय जो वह पूर्व द्वार तथा उसके बाहर समीप ही बने हुए बगलाके पंखके समान कान्तिवाले सफेद-सफेद भवन तू देख रहा है वे मणिमय तोरणोंसे रमणीय तथा नाना ध्वजाओंकी पंक्तिसे सुशोभित जिन-मन्दिर हैं । उनमें इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय अरहन्त भगवान्की प्रतिमाएँ हैं जो मनुष्य सामायिक कर तथा ‘अर्हत् सिद्धेभ्यो नमः’ अर्थात् ‘अरहन्त तथा सिद्धोंको नमस्कार हो’ इस प्रकार कहता हुआ भाव पूर्वक उन प्रतिमाओं-का स्तवन पढ़ता है तथा निर्ग्रन्थ गुरुका उपदेश पाकर सम्यग्दर्शन धारण करता है वही उस पूर्व-द्वारमें प्रवेश करता है । इसके विपरीत जो मनुष्य प्रतिमाओंको नमस्कार नहीं करता है वह मारा जाता है ॥७६-७९॥


अणुव्रतधरो यो ना गुणशीलविभूषितः । तं रामः परया प्रीत्या वाञ्छितेन समर्चति ॥८०॥

अर्थ: जो मनुष्य अणुव्रतका धारी तथा गुण और शीलसे अलंकृत होता है, राम उसे बड़ी प्रसन्नतासे इच्छित वस्तु देकर सन्तुष्ट करते हैं ॥८०॥


ततस्तस्या वचः श्रुत्वा द्विजोऽसावमृतोपमम् । जगाम परमं हर्षं लब्ध्वोपायं धनागमे ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर उसके अमृत तुल्य वचन सुनकर तथा धन प्राप्तिका उपाय प्राप्तकर वह ब्राह्मण परम हर्षको प्राप्त हुआ ॥८१॥


नमस्कारं च कृत्वाऽस्या भूयो भूयस्तुतिं तथा । रोमाञ्चार्चितसर्वाङ्गः परमाद्भुतभावितः ॥८२॥

मुनेश्चारित्रशूरस्य गत्वासन्नं कृताञ्जलिः । प्रणम्य शिरसाऽपृच्छदणुव्रतधरक्रियाम् ॥८३॥

अर्थ: उसका समस्त शरीर रोमांचोंसे सुशोभित हो गया तथा उसका हृदय अत्यन्त अद्भुत भावोंसे युक्त हो गया । वह उस स्त्रीको नमस्कार कर तथा बार-बार उसकी स्तुति कर चारित्र पालन करनेमें शूर-वीर मुनिराजके पास गया और अंजलि बाँध शिरसे प्रणाम कर उसने उनसे अणुव्रत धारण करनेवालोंकी क्रिया पूछी ॥ ८२ - ८३


ततस्तेन समुद्दिष्टं धर्मं सद्मनिवासिनाम् । स जग्राहानुयोगांश्च शुश्राव चतुरः सुधीः ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर उस चेतुर बुद्धिमान् ब्राह्मणने मुनिराजके द्वारा उपदिष्ट गृहस्थ धर्म अंगीकृत किया तथा अनुयोगोंका स्वरूप सुना ॥८४॥


धनलोभाभिभूतस्य धर्मं शुश्रूषतोऽस्य सः । ग्रहणे परमार्थस्य परिणाममुपागतः ॥८५॥

अर्थ: पहले तो वह ब्राह्मण धनके लोभसे अभिभूत होकर धर्म श्रवण करना चाहता था पर अब वास्तविक धर्म ग्रहण करनेके भावको प्राप्त हो गया ॥८५॥


अवगम्य ततो धर्मं द्विजोऽवोचत् सुमानसः । नाथ तेऽद्योपदेशेन चक्षुरुन्मीलितं मम ॥८६॥

अर्थ: मुनिराजसे धर्मका स्वरूप जानकर जिसका हृदय अत्यन्त शुद्ध हो गया था, ऐसा वह ब्राह्मण बोला कि हे नाथ ! आज आपके उपदेशसे तो मेरे नेत्र खुल गये हैं ॥८६॥


तृषार्तेनेव सत्तोयं छायेवाश्रयकाङ्क्षिणा । क्षुधार्तेनेव मिष्टान्नं रोगिणेव सुभेषजम् ॥८७॥

दुष्पथप्रतिपन्नेन वर्त्मेवेप्सितदेशगम् । यानपात्रमिवाम्भोधौ व्याकुलेन निमज्जता ॥८८॥

मयेदं शासनं जैनं सर्वदुःखविनाशनम् । लब्धं भवत्प्रसादेन दुर्लभं पुरुषाधमैः ॥८९॥

अर्थ: जिस प्रकार प्याससे पीड़ित मनुष्यको उत्तम जल मिल जाय, आश्रयकी इच्छा करनेवाले पुरुषको छाया मिल जाय, भूखसे पीड़ित मनुष्यको मिष्टान्न मिल जाय, रोगीके लिए उत्तम औषधि मिल जाय, कुमार्गमें भटके हुएको इच्छित स्थान पर भेजनेवाला मार्ग मिल जाय, और बड़ी व्याकुलतासे समुद्रमें डूबनेवालोंको जहाज मिल जाय, उसी प्रकार आपके प्रसादसे सर्व दुःखोंको नष्ट करनेवाला यह जैन शासन मुझे प्राप्त हुआ है । यह जैन शासन नीच मनुष्योंके लिए सर्वथा दुर्लभ है ॥८७-८९॥


त्रैलोक्येऽपि न मे कश्चिद्भवता विद्यते समः । येनायमीदृशो मार्गो दर्शितो जिनदेशितः ॥९०॥

अर्थ: चूँकि आपने यह ऐसा जिन प्रदर्शित मार्ग मुझे दिखलाया है इसलिए तीन लोकमें भी आपके समान मेरा हितकारी नहीं है ॥९०॥


इत्युक्त्वा शिरसा पादौ वन्दित्वाञ्जलियोगिना । गुरुं प्रदक्षिणीकृत्य द्विजः स भवनं गतः ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा अंजलिबद्ध शिरसे मुनिराजके चरणोंमें नमस्कार कर प्रदक्षिणा देता हुआ वह ब्राह्मण अपने घर चला गया ॥९१॥


जगाद वातिहृष्टस्तां प्रसन्नविकचेक्षणः । दयिते परमाश्चर्यं गुरोरद्य मया श्रुतम् । ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र कमलके समान विकसित हो रहे थे तथा जो अत्यन्त हर्षसे युक्त था ऐसा वह ब्राह्मण घर जाकर अपनी स्त्रीसे बोला कि हे प्रिये ! आज मैंने गुरुसे परम आश्चर्य सुना है ॥९२॥


श्रुतं तव न तत्पित्रा जनकेनाथ वा पितुः । किं वाऽत्र बहुभिः प्रोक्तैर्गोत्रेणापि न ते श्रुतम् ॥९३॥

अर्थ: ऐसा परम आश्चर्य कि जिसे तेरे पिताने, पिताके पिताने अथवा बहुत कहनेसे क्या तेरे गोत्र भरने नहीं सुना होगा ॥९३॥


दृष्टं ब्राह्मणि यातेन यदरण्यं मयाद्भुतम् । तद्गुरोरुपदेशेन नेदानीं विस्मयाय मे ॥९४॥

अर्थ: हे ब्राह्मणि ! वनमें जाकर जो अद्भुत बात मैंने देखी थी अब वह गुरुके उपदेशसे आश्चर्य करनेवालो नहीं रही ॥९४॥


किं किं मो ब्राह्मण ब्रूहि दृष्टं किंवा त्वया श्रुतम् । उक्तोऽवोचन्न शक्नोमि हर्षात्कथयितुं प्रिये ॥९५॥

अर्थ: ब्राह्मणीने कहा कि हे ब्राह्मण ! तुमने क्या-क्या देखा है और क्या-क्या सुना है ? सो कहो। ब्राह्मणीके इस प्रकार कहने पर ब्राह्मण बोला कि हे प्रिये ! मैं हर्षके कारण कहनेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥९५॥


आदरेणानुयुक्तश्च कौतुकिन्या पुनः पुनः । विप्रोऽवोचत श्रृण्वार्ये यन्मया श्रुतमद्भुतम् ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर कौतुकसे भरी ब्राह्मणीने जब आदरके साथ बार-बार पूछा तब वह विप्र बोला कि हे आर्ये ! जो आश्चर्य मैंने सुना है वह सुन ॥९६॥


समिदर्थं प्रयातेन वनं तस्य समीपतः । दृष्टा पुरी मया रम्या यत्रासीद् गहनं वनम् ॥९७॥

अर्थ: मैं लकड़ियां लानेके लिए जंगल गया था सो उसके समीप ही जहाँ सघन वन था वहाँ एक मनोहर नगरी दिखी ॥९७॥


तदासन्ने मया चैका दृष्टा नारी विभूषिता । नूनं सा देवता कापि मनोहरणभाषिता ॥९८॥

अर्थ: मैंने उस नगरीके पास एक आभूषणोंसे विभूषित स्त्री देखी। जान पड़ता है कि मनोहर भाषण करनेवाली वह कोई देवी होगी ॥९८॥


पृष्टा च सा मयाख्यातं तया रामपुरीति च । ददाति श्रावकेभ्योऽत्र किल रामो महद्धनम् ॥९९॥

अर्थ: मैंने उससे पूछा तो उसने कहा कि यह रामपुरी नामकी नगरी है, यहाँ राजा रामचन्द्र श्रावकोंके लिए बहुत भारी धन देते हैं ॥९९॥


ततो गत्वा मया साधोर्जिनेन्द्रवचनं श्रुतम् । आत्मा मे तर्पितस्तेन कुदृष्टिपरितापितः ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर मैंने मुनिराजके पास जाकर जिनेन्द्र भगवान्‌के वचन सुने उससे मेरी आत्मा जो कि मिथ्या दर्शनसे संतप्त थी अत्यन्त सन्तुष्ट हो गयी ॥१००॥


मुनयो यं समाश्रित्य तप्यन्ते सुधियस्तपः । त्यक्त्वा परिग्रहं सर्वं मुक्त्यालिङ्गनलालसाः ॥१०१॥

सोऽर्हद्धर्मो मया लब्धस्त्रैलोक्यैकमहानिधिः । अमी यतो बहिर्भूताः क्लिश्यन्ते त्वन्यवादिनः ॥१०२॥

अर्थ: मुक्तिके आलिंगनकी लालसा रखनेवाले बुद्धिमान् मुनि जिस धर्मका आश्रय ले समस्त परिग्रहका त्यागकर तप करते हैं वह अरहन्तका धर्म मैंने प्राप्त कर लिया। वह धर्म तीनों लोकोंकी महानिधि है, इससे बहिर्भूत जो अन्यवादी हैं वे व्यर्थ ही क्लेश उठाते हैं ॥१०१-१०२॥


यथाभूतो मुनेर्धर्मः श्रुतो धर्मेण तादृशः । ब्राह्मण्यै कथितः सर्वो मलवर्जितचेतसा ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर उस धर्मात्माने मुनिराजसे जैसा वास्तविक धर्म सुना था वह सब शुद्ध हृदयसे उसने ब्राह्मणीके लिए कह दिया ॥१०३॥


ब्राह्मणी विनिशम्यैतं सुशर्मा वाक्यमब्रवीत् । मयापि त्वत्प्रसादेन लब्धो धर्मो जिनोदितः ॥१०४॥

अर्थ: उसे सुन सुशर्मा ब्राह्मणी ब्राह्मणसे बोली कि मैंने भी तुम्हारे प्रसादसे जिनेन्द्र प्रतिपादित धर्म प्राप्त कर लिया है ॥१०४॥


विधेः पश्य मया योगं मोहाद् विषफलार्थिना । वीच्छेनापि त्वया लब्धमर्हन्नामरसायनम् ॥१०५॥

अर्थ: 'मेरा यह भाग्यका योग तो देखो कि जो मोहवश विषफलकी इच्छा कर रहे थे तथा जिसे तद्विषयक रंचमात्र भी इच्छा नहीं थी ऐसे तुमने अर्हन्तका नामरूपी रसायन प्राप्त कर लिया ॥१०५॥


मयासीन्मन्दधीभाजा मणिर्हस्तगतो यथा । निजाङ्गणगतः साधुरपमानमुपाहृतः ॥१०६॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी मूर्खके हाथमें मणि आ जाय और वह तिरस्कार कर उसे दूर कर दे उसी प्रकार मुझ मूर्खके गृहांगणमें साधु आये और मैंने उनका अपमानकर उन्हें दूर कर दिया ॥१०६॥


उपवासपरिश्रान्तश्रमणं तं निरम्बरम् । निराकृत्यान्नवेलायां मार्गोऽन्यस्यैव वीक्षितः ॥१०७॥

अर्थ: उस दिन आहारके समय उपवाससे खिन्न दिगम्बर मुनि घर आये सो उन्हें हटाकर मैंने दूसरे साधुका मार्ग देखा ॥१०७॥


अर्हन्तं समतिक्रम्य पाकशासनवन्दितम् । ज्योतिष्कव्यन्तरादीनां शिरसा प्रणतिः कृता ॥१०८॥

अर्थ: जिन्हें इन्द्र भी नमस्कार करता है ऐसे अर्हन्तको छोड़कर मैंने ज्योतिषी तथा व्यन्तरादिक देवोंको शिर झुका-झुकाकर नमस्कार किया ॥१०८॥


अहिंसानिर्मलं सारमर्हद्धर्मरसायनम् । अज्ञानात् समतिक्रम्य विषमं भक्षितं विषम् ॥१०९॥

अर्थ: अर्हन्त भगवान्‌का धर्मरूपी रसायन अहिंसासे निर्मल तथा सारभूत है सो उसे छोड़कर मैंने अज्ञान वश विषम विषका भक्षण किया है ॥१०९॥


मानुषद्वीपमासाद्य त्यक्त्वा साधुपरीक्षितम् । धर्मरत्नं कुतः कष्टं बिभीतकपरिग्रहः ॥११०॥

अर्थ: बड़े खेदकी बात है कि मैंने मनुष्य द्वीपको पाकर साधुओं द्वारा परीक्षित धर्मरूपी रत्न तो छोड़ दिया और उसके बदले बहेड़ा अंगीकार किया ॥११०॥


सर्वमक्षप्रवर्तेषु दिवारात्रौ च मोजिषु । अव्रतेषु विशीलेषु दत्तं फलविवर्जितम् ॥१११॥

अर्थ: जो इन्द्रियोंके विषयोंमें प्रवृत्त हैं, रात दिन इच्छानुसार खाते हैं, व्रत रहित हैं तथा शीलसे शून्य हैं, ऐसे साधुओंके लिए मैंने जो कुछ दिया वह सब निष्फल गया ॥१११॥


यं किलातिथिवेलायामागतं विभयोचितम् । यो नार्चयति दुर्बुद्धिस्तस्य धर्मो न विद्यते ॥११२॥

अर्थ: जो दुर्बुद्धि मनुष्य आहारके समय आये हुए अतिथिका अपनी सामर्थ्यके अनुसार सन्मान नहीं करता है - उसे आहार आदि नहीं देता है उसके धर्म नहीं है ॥११२॥


परित्यक्तोत्सवतिथिः सर्वस्यैकान्तनिस्पृहः । निकेतरहितः सोऽयमतिथिः श्रमणः स्मृतः ॥११३॥

अर्थ: जिसने उत्सवकी तिथिका परित्याग कर दिया है, जो सर्व प्रकारके परिग्रहसे बिलकुल निःस्पृह है तथा घरसे रहित है ऐसा साधु ही अतिथि कहलाता है ॥११३॥


येषां न मोजनं हस्ते नाप्यासन्नपरिग्रहः । ते तारयन्ति निर्ग्रन्थाः पाणिपात्रपुटाशिनः ॥११४॥

अर्थ: जिनके हाथमें न भोजन है न जो अपक्व फल परिग्रह रखते हैं तथा जो हस्तरूपी पात्रमें भोजन करते हैं ऐसे निर्ग्रन्थ साधु ही संसार-समुद्रसे पार करते हैं ॥११४॥


स्वशरीरेऽपि निस्संगा ये लुभ्यन्ति न जातुचित् । ते निष्परिग्रहा ज्ञेया मुक्तिलक्षणभूषिताः ॥११५॥

अर्थ: जो अपने शरीरमें भी निःस्पृह हैं तथा जो कभी बाह्य विषयोंमें नहीं लुभाते और मुक्तिके लक्षण अर्थात् चिह्न स्वरूप दिगम्बर मुद्रासे विभूषित रहते हैं उन्हें निर्ग्रन्थ जानना चाहिए’ ॥११५॥


एवमुद्गतसद्दृष्टिः कुदृष्टिमलवर्जिता । सुशर्मा शुशुभे पत्यौ भरणीव बुधे परम् ॥११६॥

अर्थ: इस प्रकार जिसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न हुआ था तथा जो मिथ्या दर्शनरूपी मलसे रहित थी ऐसी सुशर्मा नामकी ब्राह्मणी पतिके साथ बुध ग्रहके साथ भरणी नक्षत्रके समान सुशोभित हो रही थी ॥११६॥


पादमूले ततो नीत्वा गुरोस्तस्यैव सादरम् । अणुव्रतानि सामोदा ब्राह्मणी तेन लम्भिता ॥११७॥

अर्थ: तदनन्तर उस ब्राह्मणने हर्षसे ब्राह्मणीको उन्हीं गुरुके पादमूलमें ले जाकर तथा आदर सहित नमस्कार कर अणुव्रत ग्रहण कराये ॥११७॥


विज्ञाय कपिलं रक्तं परमं जिनशासने । कुलान्याशीविषोग्राणि विप्राणां भेजिरे शमम् ॥११८॥

अर्थ: जो पहले आशीविष साँपके समान अत्यन्त उग्र थे ऐसे ब्राह्मणोंके कुल, कपिलको जिनशासनमें अनुरक्त जानकर शान्तिभावको प्राप्त हो गये ॥११८॥


मुनिसुव्रतनाथस्य संप्राप्य सुदृढं मतम् । बभूवुः श्रावकास्तीव्रा ऊचुश्चैव सुबुद्धयः ॥११९॥

कर्मभारगुरूभूता मानोत्तानितमस्तकाः । स्तोकेन नरकं घोरं न याता स्मः प्रमादिनः ॥१२०॥

अर्थ: उनमें जो सुबुद्धि थे वे मुनिसुव्रत भगवान्का अत्यन्त सुदृढ़ मत प्राप्त कर श्रावक हो गये तथा इस प्रकार बोले कि हम लोग कर्मोंके भारसे वजनदार थे, अहंकारसे हमारे मस्तक ऊपर उठ रहे थे और हम निरन्तर प्रमादसे युक्त रहते थे परन्तु अब जिनधर्मके प्रसादसे भयंकर नरकमें नहीं जावेंगे ॥११९-१२०॥


अज्ञातमिदमप्राप्तं जन्मान्तरशतेष्वपि । जिनेन्द्रशासनं ब्रह्म कृच्छ्रात् प्राप्तं सुनिर्मलम् ॥१२१॥

अर्थ: इस जिनशासनको हमने सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं जाना, न प्राप्त किया किन्तु आज अतिशय निर्मल यह जिनशासन रूपी ब्रह्म बड़े कष्टसे प्राप्त किया है ॥१२१॥


ध्यानाशुशुक्षिणाविद्धे मनऋत्विक्समाहिताः । स्वकर्मसमिधो भावसर्पिषा जुहुमोऽधुना ॥१२२॥

अर्थ: अब हम मनरूपी होताके साथ मिलकर भावरूपी घीके साथ अपनी कर्मरूपी समिधाओंको ध्यानरूपी देदीप्यमान अग्निमें होमेंगे ॥१२२॥


इति केचित् समाधाय मनः संवेगनिर्भराः । विरक्ताः सर्वसंगेभ्यो बभूवुः श्रमणोत्तमाः ॥१२३॥

अर्थ: इस प्रकार मनको स्थिर कर संवेगसे भरे हुए कितने ही ब्राह्मण सर्वपरिग्रहसे विरक्त हो उत्तम मुनि हो गये ॥१२३॥


सागारधर्मरक्तस्तु कपिलः परमक्रियः । कदाचिद् ब्राह्मणीमूचे सदभिप्रायवर्तिनीम् ॥१२४॥

अर्थ: परन्तु कपिल श्रावकधर्ममें आसक्त रहकर ही उत्तम आचरण करता था। एक दिन वह उत्तम अभिप्राय रखनेवाली ब्राह्मणीसे बोला ॥१२४॥


कान्ते रामपुरीं किं नो व्रजामोऽद्य तमूर्जितम् । विशुद्धचेष्टितं द्रष्टुं रामं राजीवलोचनम् ॥१२५॥

अर्थ: कि हे प्रिये ! आज हम लोग, अतिशय बलवान्, विशुद्ध चेष्टाके धारक तथा कमलके समान नेत्रोंसे युक्त उन श्रीरामके दर्शन करनेके लिए रामपुरी क्यों नहीं चलें ? ॥१२५॥


आशापरायणं नित्यमुपायगतमानसम् । दारिद्र्यवारिधौ मग्नमाधूनं कुक्षिपूरणे ॥१२६॥

जनमुत्तारयत्येष किल भव्यानुकम्पकः । इति कीर्तिर्भ्रमत्यस्य निर्मलाह्लादकारिणी ॥१२७॥

अर्थ: वे भव्य जीवोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं तथा जो निरन्तर आशामें तत्पर रहता है, जिसका मन निरन्तर धनोपार्जनके उपाय जुटानेमें ही लगा रहता है, जो दरिद्रतारूपी समुद्रमें मग्न है, और पेट भरना भी जिसे कठिन है ऐसे दरिद्र मनुष्यका वे उद्धार करते हैं, इस प्रकार आनन्ददायिनी उनकी निर्मल कीर्ति सर्वत्र फैल रही है । ॥१२६-१२७॥


उत्तिष्ठैवं गृहाणैवं प्रिये पुष्पकरण्डकम् । करोम्यहमपि स्कन्धे सुकुमारमिमं शिशुम् ॥१२८॥

अर्थ: हे प्रिये ! उठो, यह फूलोंका पिटारा तुम ले लो और मैं इस सुकुमार बच्चेको कन्धेपर रख लेता हूँ ॥१२८॥


एवमुक्त्वा तथा कृत्वा दम्पती संपदान्वितौ । स्वशक्त्या गन्तुमुद्युक्तौ शुद्धवेषविभूषितौ ॥१२९॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा वैसा ही कर हर्षसे भरे दोनों दम्पती जानेके लिए तत्पर हुए । अपनी शक्तिके अनुसार वे निर्मल वेषसे विभूषित थे ॥१२९॥


व्रजतोश्च तयोरुग्रा उत्तस्थुः पन्नगाः पथि । दंष्ट्राकरालवक्त्राश्च वेतालास्तारहासिनः ॥१३०॥

अर्थ: जब वे चले तो उनके मार्गमें उग्र सर्प फणा तानकर खड़े हो गये तथा जिनके मुख डाँढ़ोंसे विकराल थे और जो जोर-जोरसे हँस रहे थे ऐसे वेताल मार्गमें आड़े आ गये ॥१३०॥


एवमादीनि वस्तूनि भीषणान्यवलोक्य तौ । निष्कम्पहृदयौ भूत्वा स्तुतिमेतामुपागतौ ॥१३१॥

अर्थ: परन्तु इन सब भयंकर वस्तुओंको देखकर भी उनके हृदय निष्कम्प रहे । वे निश्चल चित्त होकर यही स्तुति पढ़ते जाते थे कि ॥१३१॥


नमस्त्रिलोकवन्द्येभ्यो जिनेभ्यः सततं त्रिधा । उत्तीर्णभवपङ्केभ्यो दातृभ्यः परमं शिवम् ॥१३२॥

अर्थ: ‘जो त्रिलोक द्वारा वन्दनीय हैं, जो भयंकर संसाररूपी कर्दमसे पार हो चुके हैं तथा जो उत्कृष्ट मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं ऐसे जिनेन्द्र भगवान्को मन, वचन, कायसे सदा नमस्कार हो’ ॥१३२॥


एतयोः स्तुवतोरेवं विदित्वा जिनभक्तिताम् । भेजिरे प्रशमं यक्षास्तौ च प्राप्तौ जिनालयम् ॥१३३॥

अर्थ: इस प्रकार स्तुति करते हुए उन दोनोंकी जिन-भक्तिको जानकर यक्ष शान्त हो गये और वे रामपुरीके जिनालयमें पहुँच गये ॥१३३॥


ततो नमो निषद्याया इत्युक्त्वा रचिताञ्जली । कृत्वा प्रदक्षिणं स्तोत्रमुदचीचरतामिदम् ॥१३४॥

अर्थ: तदनन्तर ‘भगवान्की वसतिकाके लिए नमस्कार हो’ यह कहकर दोनोंने हाथ जोड़े और प्रदक्षिणा देकर दोनों ही यह स्तुति पढ़ने लगे ॥१३४॥


विहाय लौकिकं मार्गं महादुर्गतिदुःखदम् । भवन्तं शरणं नाथ चिरेण समुपागतः ॥१३५॥

अर्थ: हे नाथ ! महादुर्गतिके दुःख देनेवाले लौकिक मार्गको छोड़कर हम चिरकालके बाद आपकी शरणमें आये हैं ॥१३५॥


चतुर्भिर्विंशतिं युक्तामक्षराणां महात्मनाम् । उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योर्वन्दे भूतमविष्यताम् ॥१३६॥

पञ्चस्वैरावताख्येषु भरताख्येषु पञ्चसु । जिनान्नमामि वास्येषु तान्नमामि जिनांस्त्रिधा ॥१३७॥

अर्थ: उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके वर्तमान तथा भूत-भविष्यत् सम्बन्धी तीर्थंकरोंकी चौबीसीको हम नमस्कार करते हैं । पांच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्रोंमें जो तीर्थंकर हैं, हो चुके हैं अथवा होंगे उन सबको हम मन, वचन, कायसे नमस्कार करते हैं ॥१३६-१३७॥


यैः संसारसमुद्रस्य कृते तरणतारणे । त्रिकालं सर्ववास्येषु तान्नमामि जिनांस्त्रिधा ॥१३८॥

अर्थ: जो संसार समुद्रसे स्वयं पार हुए हैं तथा जिन्होंने दूसरोंको पार किया है ऐसे समस्त क्षेत्रों सम्बन्धी तीर्थंकरोंको हम त्रिकाल नमस्कार करते हैं ॥१३८॥


मुनिसुव्रतनाथाय तस्मै भगवते नमः । त्रैलोक्ये शासनं यस्य सुविशुद्धं प्रकाशते ॥१३९॥

अर्थ: उन मुनिसुव्रत भगवान्को नमस्कार हो जिनका निर्मल शासन तीनों लोकोंमें प्रकाशमान हो रहा है ॥१३९॥


इति कृत्वा स्तुतिं जानुमस्तकस्पृष्टभूतलौ । नेमतुस्तौ जिनं भक्त्या परिहृष्टतनूरुहौ ॥१४०॥

अर्थ: इस प्रकार स्तुतिकर घुटनों और मस्तकसे पृथिवीतलका स्पर्श करते हुए उन्होंने जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार किया । उस समय भक्तिके कारण उन दोनोंके शरीरमें रोमांच उठ रहे थे ॥१४०॥


ततोऽसौ कृतकर्तव्यो रक्षैः सौम्यैः प्रियंवदैः । अनुज्ञातः समं पत्न्या द्रष्टुं हलिनमुद्ययौ ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर वन्दनाका कार्य पूर्ण कर चुकनेके बाद शान्त तथा मधुरभाषी रक्षकोंने जिसे आज्ञा दे दी थी ऐसा कपिल ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ रामके दर्शन करनेके लिए चला ॥१४१॥


राजमार्गेऽद्रिसंकाशान् प्रासादान् विमलत्विषः । ब्राह्मण्यै दर्शयन् याति दिव्यनारीसमाकुलान् ॥१४२॥

अर्थ: वह, राजमार्गमें पर्वतोंके समान ऊँचे, निर्मल कान्तिके धारक, तथा दिव्य स्त्रियोंसे भरे जो महल मिलते थे उन्हें अपनी स्त्रीके लिए दिखाता जाता था ॥१४२॥


ऊचे च कुन्दसंकाशैः सर्वकामगुणान्वितैः । राजते भवनैर्यस्य पुरीयं स्वर्गसन्निभा ॥१४३॥

तस्यैतद्भवनं भद्रे प्रान्तप्रासादवेष्टितम् । अभिरामस्य रामस्य पुर्या मध्ये विराजते ॥१४४॥

अर्थ: उसने स्त्रीसे कहा कि हे भद्रे ! कुन्दके समान उज्ज्वल तथा सर्व मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले गुणोंसे सहित, भवनोंसे जिनकी यह स्वर्ग तुल्य नगरी सुशोभित हो रही है उन मनोहर रामका यह भवन समीपवर्ती अन्य महलोंसे घिरा कैसा सुन्दर जान पड़ता है ? ॥१४३-१४४॥


ब्रुवन्निति महाहृष्टः स विवेश च तद्गृहम् । दृष्ट्वा च लक्ष्मणं दूराद्भृशमाकुलतां गतः ॥१४५॥

अर्थ: इस प्रकार कहते हुए उस अतिशय हर्षित ब्राह्मणने रामके भवनमें प्रवेश किया। वहाँ वह दूरसे ही लक्ष्मणको देखकर अत्यन्त आकुलताको प्राप्त हुआ ॥१४५॥


दध्यौ संजातकम्पश्च सोऽयमिन्दीवरप्रभः । व्यथितो दुर्विदग्धोऽहं चित्रैर्येन तदावधैः ॥१४६॥

अर्थ: उसके शरीरमें कँपकँपी छूटने लगी। वह विचार करने लगा कि नील कमलसे समान प्रभावाला यह वही पुरुष है जिसने उस समय मुझ मूर्खको नाना प्रकारके वधसे दुखी किया था ॥१४६॥


कर्णयोरतिदुःखानि भाषितानि महाखले । तानि कृत्वा तदा पापे जिह्वे निस्सर साम्प्रतम् ॥१४७॥

अर्थ: उसकी बोलती बन्द हो गयी। वह मन ही मन अपनी जिह्वासे कहने लगा हे महादुष्टे ! हे पापे ! उस समय तो तूने कानोंके लिए अत्यन्त दुःखदायी वचन कहे अब चुप क्यों है ? बाहर निकल ॥१४७॥


किं करोमि क्व गच्छामि विवरं प्रविशामि किम् । अस्मिन् शरणहीनस्य भवेच्छरणमद्य कः ॥१४८॥

अर्थ: वह मन ही मन विचार करने लगा कि क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किस बिलमें घुस जाऊँ ? आज मुझ शरणहीनका यहाँ कौन शरण होगा ? ॥१४८॥


अवस्थितोऽयमत्रेति यदि मे विदितो भवेत् । समुल्लङ्घ्योत्तरामाशां देशत्यागः कृतो भवेत् ॥१४९॥

अर्थ: यदि मुझे मालूम होता कि यह यहाँ ठहरा है तो मैं उत्तर दिशाको लांघकर देश त्याग ही कर देता ॥१४९॥


एवमुद्वेगमापन्नो विहाय ब्राह्मणीं द्विजः । प्रपलायितुमुद्युक्तो लक्ष्मणेन विलोकितः ॥१५०॥

अर्थ: इस प्रकार उद्वेगको प्राप्त हुआ वह ब्राह्मण, ब्राह्मणीको छोड़ भागनेके लिए तैयार हुआ ही था कि लक्ष्मणने उसे देख लिया ॥१५०॥


स्मित्वा च स जगादायं कुतो विप्रः समागतः । वनसंवर्धितात्मेव किमित्याकुलतामितः ॥१५१॥

अर्थ: हँसकर लक्ष्मणने कहा कि यह ब्राह्मण कहाँसे आया है ? जान पड़ता है कि इसका पोषण वनमें हो हुआ है, यह इस तरह आकुलताको क्यों प्राप्त हुआ है ? ॥१५१॥


समाश्वासमिमं नीत्वा द्रुतमानय तं द्विजम् । पश्यामस्तावदेतस्य चेष्टितं किमयं वदेत् ॥१५२॥

अर्थ: सान्त्वना देकर उस ब्राह्मणको शीघ्र ही लाओ हम इसकी चेष्टाको देखेंगे तथा सुनेंगे कि यह क्या कहता है ? ॥१५२॥


न भेत्तव्यं न भेत्तव्यं निवर्तस्वेति चोदितः । अधिगम्य समाश्वासं निवृत्तः स्खलितक्रमः ॥१५३॥

अर्थ: ‘नहीं डरना चाहिए, नहीं डरना चाहिए, लौटो’, इस प्रकार कहनेपर वह सान्त्वनाको प्राप्त कर लड़खड़ाते पैरों वापस लौटा ॥१५३॥


उपसृत्य भयं त्यक्त्वा प्रसृतो धवलाम्बरः । पुष्पाञ्जलिस्तयोरग्रे स्थित्वा स्वस्तीत्यशब्दयत् ॥१५४॥

अर्थ: तदनन्तर श्वेत वस्त्रको धारण करनेवाला वह ब्राह्मण पास जाकर निर्भय हो राम-लक्ष्मणके सम्मुख गया तथा अंजलिमें पुष्प रखकर उनके सामने खड़ा हो ‘स्वस्ति’ शब्दका उच्चारण करने लगा ॥१५४॥


ततो लब्धासनासीनो निकटस्थाङ्गनो द्विजः । ऋग्भिः स्तवनदक्षाभिरस्तौषीद् रामलक्ष्मणौ ॥१५५॥

अर्थ: तदनन्तर जो प्राप्त हुए आसनपर बैठा था और पास ही जिसकी स्त्री बैठी थी ऐसा वह ब्राह्मण स्तवन करनेमें समर्थ ऋचाओंके द्वारा राम-लक्ष्मणकी स्तुति करने लगा ॥१५५॥


ततः पद्मो जगादैवं तां नः कृत्वा विमानताम् । वद साम्प्रतमागत्य कस्मात् पूजयसि द्विजः ॥१५६॥

अर्थ: स्तुतिके बाद रामने कहा कि हे ब्राह्मण ! उस समय हमलोगोंका वैसा तिरस्कार कर अब इस समय आकर पूजा क्यों कर रहे हो सो तो बताओ ॥१५६॥


सोऽब्रवीन्न मया ज्ञातं त्वं प्रच्छन्नमहेश्वरः । मोहाद्विमानितस्तेन भस्मच्छन्न इवानिलः ॥१५७॥

अर्थ: ब्राह्मणने कहा, हे देव ! मैंने नहीं जाना था कि आप प्रच्छन्न महेश्वर हो इसीलिए भस्मसे आच्छादित अग्निके समान मोहवह मुझसे आपका अनादर हो गया ॥१५७॥


स्थितिरेषा जगन्नाथ लोके स्थावरजङ्गमे । धनवान् पूज्यते नित्यं यथादित्यो हिमागमे ॥१५८॥

अर्थ: हे जगन्नाथ ! चराचर विश्वकी यही रीति है कि शीत ऋतुमें सूर्यके समान धनवान्की ही सदा पूजा होती है ॥१५८॥


अधुना त्वं मया ज्ञातः सोऽसि नान्यः कदाचन । द्रविणानीह पूज्यन्ते न भवान् पद्म पूज्यते ॥१५९॥

अर्थ: यद्यपि इस समय मैं जानता हूँ कि आप वही हैं अन्य नहीं फिर भी आपकी पूजा हो रही है सो हे पद्म ! यहाँ यथार्थमें धनकी ही पूजा हो रही है आपकी नहीं ॥१५९॥


नित्यमर्थयुतं देव मानयन्ति जना जनम् । त्यजन्त्यर्थपरित्यक्तं निष्प्रयोजनसौहृदम् ॥१६०॥

अर्थ: हे देव ! लोग निरन्तर धनवान् मनुष्यका ही सन्मान करते हैं और जिसके साथ मित्रताका प्रयोजन जाता रहा है ऐसे धनहीन मनुष्यको छोड़ देते हैं ॥१६०॥


यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥१६१॥

अर्थ: जिसके पास धन है उसके मित्र हैं, जिसके पास धन है उसके बान्धव हैं, जिसके पास धन है लोकमें वह पुरुष है और जिसके पास धन है वह पण्डित है ॥१६१॥


अर्थेन विप्रहीनस्य न मित्रं न सहोदरः । तस्यैवार्थसमेतस्य परोऽपि स्वजनायते ॥१६२॥

अर्थ: जब मनुष्य धन-रहित हो जाता है तब उसका न कोई मित्र रहता है न भाई । पर वही मनुष्य जन-धनसहित हो जाता है तो अन्य लोग भी उसके आत्मीय बन जाते हैं ॥१६२॥


सोऽर्थो धर्मेण यो युक्तः सधर्मो यो दयान्वितः । सा दया निर्मला ज्ञेया मांसं यस्यां न भुज्यते ॥१६३॥

अर्थ: धन वही है जो धर्मसे सहित है, धर्म वही है जो दयासे सहित है और निर्मल दया वही हैं जिसमें मांस नहीं खाया जाता ॥१६३॥


मांसाशनान्निवृत्तानां सर्वेषां प्राणधारिणाम् । अन्या मूलेन संपन्ना प्रशस्यन्ते निवृत्तयः ॥१६४॥

अर्थ: मांस भोजनसे दूर रहनेवाले समस्त प्राणियोंके अन्य त्याग चूँकि मूलसे सहित रहते हैं इसलिए ही उनकी प्रशंसा होती है ॥१६४॥


राजन् विचित्ररूपोऽयं लोको मानुषलक्षितः । मादृशो ज्ञायते नैव यथाभूतोऽत्र यो जनः ॥१६५॥

अर्थ: हे राजन् ! यह मनुष्य लोक विचित्र है इसमें मेरे जैसे लोगोंको तो कोई जानता ही नहीं है ॥१६५॥


आस्तां तावद्भवानत्र वन्द्यते ये मवद्विधैः । पराभवं विमूढेभ्यो लभन्ते तेऽपि साधवः ॥१६६॥

अर्थ: अथवा आपकी बात जाने दीजिए आप जैसे लोग जिनकी वन्दना करते हैं वे साधु भी मूर्ख पुरुषोंसे पराभव प्राप्त करते हैं ॥१६६॥


पूर्वं सनत्कुमाराख्यः किं ते ज्ञातो न चक्रभृत् । महर्द्धयः सुरा यस्य रूपं द्रष्टुमिहागताः ॥१६७॥

सोऽपि श्रामण्यमासाद्य संप्राप्तः परिभूतताम् । पर्यटन्न क्वचिल्लेभे भिक्षामाचारकोविदः ॥१६८॥

अर्थ: क्या आप नहीं जानते कि पहले एक ऐसे सनत्कुमार चक्रवर्ती हो गये हैं जिनका रूप देखनेके लिए बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाले देव आये थे परन्तु वे भी मुनिपद धारणकर पराभवको प्राप्त हुए । आचार-शास्त्रके जाननेमें निपुण वे मुनिराज भ्रमण करते रहे परन्तु उन्हें कहीं भिक्षा नहीं मिली ॥१६७-१६८॥


वनस्पत्युपजीविन्या तर्पितः सोऽन्यदा मुनिः । पञ्चाश्चर्यगुणैश्वर्यमाददे विजये पुरे ॥१६९॥

अर्थ: फिर अन्य समय विजयपुर नगरमें वनस्पतिसे आजीविका करनेवाली एक स्त्रीने आहार देकर उन्हें सन्तुष्ट किया और पंचाश्चर्यरूपी गुणोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया ॥१६९॥


सुभूमश्चक्रभृद् भूत्वा करं कटकभास्वरम् । केयूरभूषितभुजो बदरार्थमढौकयत् ॥१७०॥

वदरं नैकमप्यस्मै निःस्वोऽसावददात्ततः । अनभिज्ञो विशेषस्य विशेषं कमवाप्तवान् ॥१७१॥

अर्थ: जिनकी भुजा बाजूबन्दसे विभूषित थी ऐसे सुभूमने चक्रवर्ती होकर अपना वलयविभूषित हाथ बेरके लिए बढ़ाया परन्तु यह दरिद्र है यह समझकर उनके लिए किसीने एक बेर भी नहीं दिया सो ठीक ही है क्योंकि विशेषको नहीं जाननेवाला मनुष्य किसी विशेषको कब प्राप्त हुआ है ? ॥१७०-१७१॥


अयमन्यश्च विवशो जनैः स्वकृतभोगिभिः । न योऽवगम्यते तत्र न स तत्र जनोऽर्च्यते ॥१७२॥

अर्थ: यह अथवा और कोई सभी लोग, स्वकृत कर्मको भोगनेवाले मनुष्योंसे विवश हैं। जिस मनुष्यका जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ उसकी अर्चा नहीं होती ॥१७२॥


न कृता मन्दभागेन कस्मादभ्यागतक्रिया । तदा मयेति मेऽद्यापि तप्यते मानसं भृशम् ॥१७३॥

अर्थ: मुझ मन्दभाग्यने उस समय आपकी आतिथ्य-क्रिया क्यों नहीं की ? यह विचारकर आज भी मेरा मन अत्यन्त सन्तापको प्राप्त है ॥१७३॥


रूपमेवमलं कान्तं युष्माकमवलोकयन् । भृशं क्रुद्धोऽपि को नाम न ययावतिविस्मयम् ॥१७४॥

अर्थ: आपके अतिशय सुन्दर रूपको देखनेवाला मनुष्य ही अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त नहीं होता किन्तु आपके प्रति अत्यन्त क्रोध प्रकट करनेवाला पुरुष भी ऐसा कौन है जो अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त नहीं हुआ हो ॥१७४॥


एवमुक्त्वा शुचा ग्रस्तं रुदन्तं कपिलं गिरा । शुभयासान्त्वयद् रामः सुशर्माणं च जानकी ॥१७५॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर वह कपिल ब्राह्मण शोकाक्रान्त हो रोने लगा, तब रामने शुभ वचनोंसे उसे सान्त्वना दी और सीताने उसकी स्त्री सुशर्माको समझाया ॥१७५॥


ततो हेमघटाम्भोभिः किङ्करै राघवाज्ञया । कपिलः श्रावकः प्रीत्या स्नापितः सह भार्यया ॥१७६॥

अर्थ: तदनन्तर रामकी आज्ञासे किंकरोंने भार्या सहित कपिल श्रावकको सुवर्ण घटोंमें रखे हुए जलसे प्रीतिपूर्वक स्नान कराया ॥१७६॥


परमं मोजितश्चान्नं वस्त्रै रत्नैश्च भूषितः । सुभूरिधनमादाय जगाम निजमालयम् ॥१७७॥

अर्थ: उत्कृष्ट भोजन कराया और वस्त्र तथा रत्नोंसे उसे अलंकृत किया। तदनन्तर वह बहुत भारी धन लेकर अपने घर वापस गया ॥१७७॥


जनानां विस्मयकरं सर्वोपकरणान्वितम् । भोगं यद्यपि यातोऽयं तथापि सुविचक्षणः ॥१७८॥

सन्मानविशिखैर्विद्धो दष्टो गुणमहोरगैः । उपचारहतात्मासौ धृतिं न लभते द्विजः ॥१७९॥

अर्थ: यद्यपि वह बुद्धिमान् ब्राह्मण, लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाले तथा सर्व प्रकारके उपकरणोंसे युक्त भोगोपभोगके पदार्थोंको प्राप्त हुआ था, तो भी चूँकि वह सम्मानरूपी बाणोंसे विद्ध था, गुणरूपी महासर्पोंसे डसा गया था और सेवा-शुश्रूषाके कारण उसकी आत्मा दब रही थी, इसलिए वह सन्तोषको प्राप्त नहीं होता था। भावार्थ - रामने तिरस्कारके बदले उसका सत्कार किया था, अपने अनेक गुणोंसे उसे वशीभूत किया था और स्नान, भोजन, पान आदि सेवा-शुश्रूषासे उसे सुखी किया था इसलिए वह रात-दिन इसी शोकमें पड़ा रहता था कि देखो कहाँ तो मैं दुष्ट कि जिसने इन्हें एक रात घर भी नहीं ठहरने दिया और कहाँ ये महापुरुष जिन्होंने इस प्रकार हमारा उपकार किया ? ॥१७८-१७९॥


दध्यौ चाहं पुरा यत्र स्कन्धन्यस्तैन्धभारकः । यथा शोषितदेहः स तृषितोऽत्यन्तदुर्विधः ॥१८०॥

ग्रामे तत्रैव जातोऽस्मि पश्य यक्षाधिपोपमः । रामदेवप्रसादेन चिन्तादुःखविवर्जितः ॥१८१॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि मैं पहले जिस गाँवमें इतना अधिक दरिद्र था कि कन्धेपर लकड़ियोंका गट्ठा रखकर भूखा-प्यासा दुर्बल शरीर इधर-उधर भटकता था आज उसी गाँवमें मैं रामके प्रसादसे यक्षराजके समान हो गया हूँ तथा सब चिन्ता और दुःखोंसे छूट गया हूँ ॥१८०-१८१॥


आसीन्मे शीर्णपतितमनेकच्छिद्रजर्जरम् । काकाद्यशुचिसंलिप्तं गृहं गोमयवर्जितम् ॥१८२॥

अधुना धेनुभिर्व्याप्तं बहुप्रासादसंकुलम् । रामदेवप्रसादेन प्राकारपरिमण्डलम् ॥१८३॥

अर्थ: पहले मेरा जो घर जीर्ण-शीर्ण होकर गिर गया था, अनेक छिद्रोंसे जर्जर था, काक आदि पक्षियोंकी अशुचिसे लिप्त था तथा जिसमें कभी गोबर भी नहीं लगता था, वही घर आज श्रीरामके प्रसादसे अनेक गायोंसे व्याप्त है, नाना महलोंसे संकीर्ण तथा प्राकार-कोटसे घिरा हुआ है ॥१८२-१८३॥


हा मया पुण्डरीकाक्षौ भ्रातरौ गृहमागतौ । निर्भर्त्सितौ विना दोषं तौ मृगाङ्कनिमाननौ ॥१८४॥

अर्थ: हाय, बड़े खेदकी बात है कि मैंने कमलके समान नेत्रोंके धारक तथा चन्द्रतुल्य मुखसे सुशोभित, घर आये हुए उन दोनों भाइयोंका अपराधके बिना ही तिरस्कार किया ॥१८४॥


यद्ग्रीष्मातपतप्ताङ्गौ समं देव्या विनिर्गतौ । तन्मे प्रतिष्ठितं शल्यं हृदये प्रचलत् सदा ॥१८५॥

अर्थ: ग्रीष्म ऋतुके आतापसे जिनके शरीर सन्तप्त हो रहे थे ऐसे दोनों भाई देवी अर्थात् सीताके साथ घरसे बाहर निकले, वह मेरे हृदयमें सदा शल्यकी तरह गड़ा हुआ चंचल हो उठता है ॥१८५॥


तावन्मे नास्ति दुःखस्य च्छेदो यावदिदं गृहम् । परित्यज्य निरारम्भः प्रव्रजिष्याम्यसंशयम् ॥१८६॥

अर्थ: निःसन्देह मेरे दुःखका अन्त तबतक नहीं हो सकता है जबतक कि मैं घर छोड़कर निरारम्भ ही दीक्षा नहीं ले लेता हूँ ॥१८६॥


उपलभ्यास्य वैराग्यं बन्धुवर्गः ससंभ्रमः । धाराभिरुत्ससर्जास्रं दीनः साकं सुशर्मणा ॥१८७॥

अर्थ: तदनन्तर कपिलके वैराग्यका समाचार जानकर इसके घबड़ाये हुए दीन-हीन भाई-बन्धु, सुशर्मा ब्राह्मणीके साथ अश्रुधारा बहाने लगे ॥१८७॥


निरीक्ष्य स्वजनं विप्रो निर्मग्नं शोकसागरे । अपेक्षापेतया बुद्ध्या निर्जगाद शिवोत्सुकः ॥१८८॥

विचित्रस्वजनस्नेहैरत्युत्तुङ्गमनोरथैः । मूढोऽयं दह्यते लोकः किं न जानीथ भो जनाः ॥१८९॥

अर्थ: मोक्ष प्राप्त करनेमें उत्सुक कपिल, अपने परिजनको शोकरूपी सागरमें निमग्न देख निरपेक्ष बुद्धिसे बोला कि हे मानवो! बड़े-बड़े मनोरथोंसे युक्त कुटुम्बी जनोंके विचित्र स्नेहसे मोहित हुआ यह प्राणी निरन्तर जलता रहता है, यह क्या तुम नहीं जानते ? ॥१८८-१८९॥


इति संवेगमापन्नः प्रियां दुःखेन मूर्च्छिताम् । विहाय बन्धुलोकं च बहुविक्लवकारिणम् ॥१९०॥

अष्टादश सहस्राणि धेनूनां सिततेजसाम् । रत्नपूर्णं च भवनं दासीयोषित्समाकुलम् ॥१९१॥

सुशर्मायां समारोप्य तनयं द्रविणं तथा । बभूव कपिलः साधुर्निरारम्भो निरम्बरः ॥१९२॥

अर्थ: इस प्रकार संवेगको प्राप्त हुआ कपिल ब्राह्मण दुःखसे मूर्च्छित स्त्री तथा बहुत दुःखका अनुभव करनेवाले बन्धुजनोंको छोड़कर, अठारह हजार सफेद गायें, रत्नोंसे परिपूर्ण तथा दास-दासियोंसे युक्त भवन, पुत्र और समस्त धन सुशर्मा ब्राह्मणीके लिए सौंपकर आरम्भ रहित दिगम्बर साधु हो गया ॥१९०-१९२॥


सह्यानन्दमतेः शिष्यः सुप्रतीतस्तपोधनः । चकार गुरुतां तस्य गुणशीलमहार्णवः ॥१९३॥

अर्थ: सह्यानन्दमतिके शिष्य तथा गुण और शीलके महासागर अतिशय तपस्वी मुनि, उसके गुरु हुए थे अर्थात् उनके पास उसने दीक्षा ली थी ॥१९३॥


विजहार महातपास्ततः कपिलश्चारुचरित्रवीवधः । परमार्थनिविष्टमानसः श्रमणश्रीपरिवीतविग्रहः ॥१९४॥

अर्थ: तदनन्तर जो निर्मल चारित्ररूपी काँवरको धारण करते थे, जिनका मन सदा परमार्थमें लगा रहता था, और जिनका शरीर निर्ग्रन्थ व्रत रूपी लक्ष्मीसे आलिंगित था ऐसे महातपस्वी कपिल मुनिराज पृथिवी पर विहार करने लगे ॥१९४॥


य इदं कपिलानुकीर्तनं पठति प्रह्वमतिः शृणोति वा । उपवाससहस्रसंभवं लभतेऽसौ रविभासुरः फलम् ॥१९५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य अहंकार रहित हो कपिलकी इस कथाको पढ़ता अथवा सुनता है वह सूर्यके समान देदीप्यमान होता हुआ एक हजार उपवासका फल प्राप्त करता है ॥१९५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते कपिलोपाख्यानं नाम पञ्चत्रिंशत्तमं पर्व ॥३५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य रचित पद्मचरितमें कपिलका वर्णन करनेवाला पैंतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३४॥

३६. षट्त्रिंशत्तमं पर्व (वनमालाभिधानं)

ततोऽनुक्रमतः काले विकालप्रतिमे गते । घोरान्धकारसंरुद्धे विद्युच्चकितभीषणे ॥१॥

जातायां सुप्रसन्नायां शरदि प्रीतिनिर्भरः । ऊचे यक्षाधिपः पद्मं प्रस्थातुं कृतमानसम् ॥२॥

क्षन्तव्यं देव यत्किंचिदस्माकमिति दुष्कृतम् । विधातुं शक्यते केन योग्यं सर्वं भवादृशाम् ॥३॥

अर्थ: तदनन्तर घोर अन्धकारसे व्याप्त और बिजलीकी चमकसे भीषण वर्षा काल, दुष्कालके समान जब क्रम-क्रमसे व्यतीत हो गया तथा स्वच्छ शरद् ऋतु आ गयी तब रामने वहाँसे प्रस्थान करनेका विचार किया । उसी समय यक्षोंका अधिपति आकर रामसे कहता है कि हे देव ! हमारी जो कुछ त्रुटि रह गयी हो वह क्षमा कीजिए क्योंकि आप-जैसे महानुभावोंके योग्य समस्त कार्य करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥१-३॥


इत्युक्ते रामदेवोऽपि तमूचे गुह्यकाधिपम् । त्वयापि निखिला स्वस्य क्षन्तव्या परतन्त्रता ॥४॥

अर्थ: यक्षाधिपतिके ऐसा कहनेपर रामने भी उससे कहा कि आप भी अपनी समस्त परतन्त्रताको क्षमा कीजिए अर्थात् आपको इतने समय तक मेरी इच्छानुसार जो प्रवृत्ति करनी पड़ी है उसके लिए क्षमा कीजिए ॥४॥


सुतरां तेन वाक्येन जातः सत्तमभावनः । यक्षाणामधिपो नत्वा संभाष्य विपुलक्रियम् ॥५॥

हारं स्वयंप्रभाभिख्यं ददौ पद्माय सोऽद्भुतम् । उद्यद्दिनकराकारे हरये मणिकुण्डले ॥६॥

चूडामणिं सुकल्याणं सीतायै विलसत्प्रभम् । महाविनोददक्षां च वीणामीप्सितनादिनीम् ॥७॥

अर्थ: रामके इस वचनसे यक्षाधिप अत्यन्त प्रसन्न हुआ । उसने बहुत काल तक वार्तालाप कर नमस्कार किया, रामके लिए स्वयंप्रभ नामका अद्भुत हार दिया । लक्ष्मणके लिए उगते सूर्यके समान देदीप्यमान दो मणिमय कुण्डल दिये, और सीताके लिए महामांगलिक देदीप्यमान चूड़ामणि तथा महाविनोद करनेमें समर्थ एवं इच्छानुसार शब्द करनेवाली वीणा दी ॥५-७॥


स्वेच्छया तेषु यातेषु यक्षराजः पुरीकृताम् । मायां समहरत्किंचिद्दधानः शोकितामिव ॥८॥

अर्थ: तदनन्तर जब वे इच्छानुसार वहाँसे चले गये तब यक्षराजने कुछ शोकयुक्त हो अपनी नगरी सम्बन्धी माया समेट ली ॥८॥


बलदेवोऽपि कर्तव्यकरणाच्च ससंमदः । अमन्यत परिप्राप्तमुदारं शिवमात्मनः ॥९॥

अर्थ: इधर राम भी कर्तव्य कार्य करनेसे हर्षित हो ऐसा मान रहे थे कि मानो मुझे उत्कृष्ट मोक्ष ही प्राप्त हो गया है ॥९॥


पर्यटन्तो महीं स्वैरं नानारसफलाशिनः । विचित्रसंकथासक्ताः रममाणाः सुरा इव ॥१०॥

उल्लङ्घ्य सुमहारण्यं द्विपसिंहसमाकुलम् । जनोपभुक्तमुद्देशं वैजयन्तपुरं गताः ॥११॥

अर्थ: अथानन्तर स्वेच्छानुसार पृथिवीमें विहार करते, नाना रसके स्वादिष्ट फल खाते, विचित्र कथाएँ करते और देवोंके समान रमण करते हुए वे तीनों, हाथी और सिंहोंसे व्याप्त महावनको पार कर मनुष्योंके द्वारा सेवित वैजयन्तपुरके समीपवर्ती मैदानमें पहुँचे ॥१०-११॥


ततोऽस्तमागते सूर्ये दिक्चक्रे तमसावृते । नक्षत्रमण्डलाकीर्णे संजाते गगनाङ्गणे ॥१२॥

अपरोत्तरदिग्भागे क्षुद्रलोकभयावहे । यथाभिरुचिते देशे ते पुरो निकटे स्थिताः ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर जब सूर्य अस्त हो गया, दिशाओंका समूह अन्धकारसे आवृत हो गया और आकाशरूपी आँगन नक्षत्रोंके समूहसे व्याप्त हो गया तब वे क्षुद्र मनुष्योंको भय उत्पन्न करनेवाले पश्चिमोत्तर दिग्भागमें नगरके समीप ही किसी इच्छित स्थानमें ठहर गये ॥१२-१३॥


अथात्र नगरे राजा प्रसिद्धः पृथिवीधरः । इन्द्राणी महिषी तस्य योषिद्गुणसमन्विता ॥१४॥

अर्थ: अथानन्तर इस नगरका राजा पृथिवीधर नामसे प्रसिद्ध था उसकी रानीका नाम इन्द्राणी था जो कि स्त्रियोंके योग्य समस्त गुणोंसे सहित थी ॥१४॥


तनया वनमालेति तयोरत्यन्तसुन्दरी । बाल्यात् प्रभृति सा रक्ता लक्ष्मणस्य गुणश्रुतेः ॥१५॥

अर्थ: उन दोनोंके वनमाला नामकी अत्यन्त सुन्दरी पुत्री थी, वनमाला बाल्य अवस्थासे ही लक्ष्मणके गुण श्रवण कर उनमें अनुरक्त थी ॥१५॥


श्रुत्वानरण्यपुत्रस्य प्रव्रज्यासमये वचः । रक्षितुं क्वापि निर्यातं रामं लक्ष्मणसंयुतम् ॥१६॥

ध्यात्वेन्द्रनगरेशस्य बालमित्राय सूनवे । सुन्दरायातियोग्याय पितृभ्यां सा निरूपिता ॥१७॥

अर्थ: इसके माता-पिताने सुना कि राम अपने पिता दशरथके दीक्षा लेनेके समय कथित वचनोंका पालन करनेके लिए लक्ष्मणके साथ कहीं चले गये हैं तब उन्होंने इन्द्र नगरके राजाके बालमित्र नामक अत्यन्त योग्य सुन्दर पुत्रके लिए वनमाला देनेका निश्चय किया ॥१६-१७॥


तं च विज्ञाय वृत्तान्तं हृदयस्थितलक्ष्मणा । विरहाद्भयमापन्ना चिन्तामेवमुपागता ॥१८॥

अर्थ: जिसके हृदयमें लक्ष्मण विद्यमान थे ऐसी वनमालाने जब यह समाचार सुना तो वह विरहसे भयभीत हों इस प्रकार चिन्ता करने लगी ॥१८॥


अंशुकेन वरं कण्ठं विवेष्ट्यासज्य पादपे । मृत्युं प्राप्तास्मि नान्येन पुरुषेण समागमम् ॥१९॥

अर्थ: कि वस्त्रसे कण्ठ लपेट वृक्षपर लटककर भले ही मर जाऊँगी परन्तु अन्य पुरुषके साथ समागमको प्राप्त नहीं होऊँगी ॥१९॥


विधिच्छलेन केनापि गत्वारण्यं दिनक्षये । ध्रुवमद्यैव यास्यामि मृत्युं विघ्नविवर्जितम् ॥२०॥

अर्थ: मैं किसी कार्यके बहाने सायंकालके समय वनमें जाकर आज ही निर्विघ्न रूपसे मृत्यु प्राप्त करूँगी ॥२०॥


प्रयाहि भगवन् भानो संप्रेषय निशां द्रुतम् । कृताञ्जलिरियं दीना पादयोः प्रपतामि ते ॥२१॥

शर्वरी मण्यतां यात्वा काङ्क्षन्ती दुःखभागिनी । संवत्सरसमं वेत्ति दिनं द्राग्गम्यतामिति ॥२२॥

अर्थ: हे भगवन् सूर्य ! आप जाओ और रात्रिको जल्दी भेजो । मैं अतिशय दीन हो हाथ जोड़कर आपके चरणोंमें पड़ती हूँ । जाकर रात्रिसे कहो कि तुम्हारी आकांक्षा करती हुई यह दुःखिनी दिनको वर्षके समान समझती है इसलिए जल्दी जाओ ॥२१-२२॥


इति संचित्य सा बाला गतेऽस्तं तिग्मतेजसि । सोपवासा समासाद्य पितृभ्यामनुमोदनम् ॥२३॥

प्रवरं रथमारुह्य सखीजनसमावृता । जगाम परया लक्ष्म्या वनदेवीं किलार्चितुम् ॥२४॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उपवास धारण करनेवाली वह बाला, सूर्यास्त होनेपर माता-पिताकी आज्ञा प्राप्त कर उत्तम रथपर सवार हो सखी जनोंके साथ वैभवपूर्वक वनदेवीकी पूजा करनेके लिए गयी ॥२३-२४॥


यस्यां रात्रौ वनोद्देशे यत्र ते प्रथमं स्थिताः । तस्यामेव तमेवैषा गता दैवनियोगतः ॥२५॥

अर्थ: भाग्यकी बात कि जिस रात्रिमें तथा वनके जिस प्रदेशमें राम, सीता और लक्ष्मण पहलेसे जाकर ठहरे थे उसी रात्रिमें उसी स्थानपर वनमाला भी आ पहुँची ॥२५॥


अरण्यदेवतापूजा तस्मिन् किल विनिर्मिता । सुप्तश्च सकलो लोको निराशङ्कः कृतक्रियः ॥२६॥

निश्शब्दपदनिक्षेपात्ततो वनमृगीव सा । निष्क्रम्य शिविरात् तस्मात् प्रतस्थे भयवर्जिता ॥२७॥

अर्थ: वहाँ उसने वन-देवताकी पूजा की । तदनन्तर जब सब लोग अपना-अपना कार्य पूरा कर निःशंक हो सो गये तब जिसके पैर रखनेका भी शब्द नहीं हो रहा था ऐसी वनमाला वनकी मृगीकी नाईं उस शिविरसे निकल निर्भय हो आगे चली ॥२६-२७॥


ततस्तस्याः समाघ्राय गन्धं परमसौरभम् । एवं सूनुः सुमित्राया दध्यौ संमदमुद्वहन् ॥२८॥

अर्थ: तत्पश्चात् वनमालाके शरीरसे निकलनेवाली अत्यन्त मनोहर सुगन्धको सूँघकर हर्षित हो लक्ष्मण इस प्रकार विचार करने लगे ॥२८॥


ज्योतीरेखेव काप्येषा मूर्तिरत्रोपलक्ष्यते । कुमार्या श्रेष्ठया भाव्यमनया कुलजातया ॥२९॥

अर्थ: कि 'यहाँ कोई ज्योतिकी रेखाके समान मूर्ति दिखाई पड़ती है, हो सकता है कि वह कोई उच्च कुलीन श्रेष्ठ कुमारी हो ॥२९॥


महता शोकभारेण परिपीडितमानसा । अपश्यन्ती परं दुःखवारणोपायमुन्मनाः ॥३०॥

अर्थ: बहुत भारी शोकके भारसे इसका मन पीड़ित हो रहा है और दुःख दूर करनेका दूसरा उपाय नहीं देखती हुई यह बेचैन हो रही है ॥३०॥


अजातचिन्तिता नूनमेषात्मानं जिघांसति । पश्यामि तावदेतस्याश्चेष्टामन्तर्हितो भवन् ॥३१॥

अर्थ: निश्चित ही यह मनचाही वस्तुके न मिलनेसे आत्मघात करना चाहती है अतः छिपकर इसकी चेष्टा देखता हूँ’ ॥३१॥


इति संचित्य निश्शब्दो भूत्वा वटतरोरधः । तस्थौ कल्पद्रुमस्येव त्रिदशः कौतुकान्वितः ॥३२॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर कौतुक-भरे लक्ष्मण चुपचाप वटवृक्षके नीचे उस प्रकार खड़े हो गये जिस प्रकार कि कल्पवृक्षके नीचे कोई देव खड़ा होता है ॥३२॥


तमेव पादपं सापि प्राप्ता हंसवधूगतिः । नतेव स्तनभारेण चन्द्रवक्त्रा तनूदरी ॥३३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी चाल हंसोके समान थी, जो स्तनोंके भारसे झुकी हुई-सी जान पड़ती थी, जिसका मुख चन्द्रमाके समान था तथा जिसका उदर अत्यन्त कृश था ऐसी वनमाला भी उसी वृक्षके नीचे पहुँची ॥३३॥


लक्ष्मणस्तां तथाभूतां दृष्ट्वाचिन्तयदुक्तिभिः । वेद्मि तावदिमां सम्यक् कुतः कृत्यं भविष्यति ॥३४॥

अर्थ: उसे उस प्रकारकी देख लक्ष्मणने विचार किया कि इसके शब्दोंसे ठीक-ठीक मालूम तो करूँ कि इसे किससे कार्य है ? ॥३४॥


अंशुकेनाम्बुवर्णेन कृत्वा पाशं तु कन्यका । जगादैवं गिरा योगिमनोहरणयोग्यया ॥३५॥

एतत्तरुनिवासिन्यः श्रृणुताहो सुदेवताः । भवतीभ्यो नमाम्येषां प्रसादः क्रियतां मयि ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर जलके समान स्वच्छ वर्णवाले वस्त्रसे फाँसी बनाकर वह कन्या योगियोंका भी मन हरण करनेमें समर्थ वाणीसे इस प्रकार कहने लगी कि अहो, इस वृक्षके निवासी देवताओ ! सुनिए, मैं आपके लिए नमस्कार करती हूँ, आप मुझपर प्रसन्नता कीजिए ॥३५-३६॥


वाच्यो मद्वचनादेवं भवन्तीभिः प्रयत्नतः । कुमारो लक्ष्मणो दृष्ट्वा वनेऽस्मिन् विचरन् ध्रुवम् ॥३७॥

अर्थ: कुमार लक्ष्मण इस वनमें अवश्य ही विचरण करते होंगे सो उन्हें प्रयत्नपूर्वक देखकर आप लोग मेरी ओरसे उनसे कहें ॥३७॥


यथा त्वद्विरहे बाला वनमाला सुदुःखिता । त्वयि मानसमारोप्य प्रेतलोकमुपागता ॥३८॥

अर्थ: कि तुम्हारे विरहमें कुमारी वनमाला अत्यन्त दुखी होकर तथा तुम्हींमें मन लगाकर मृत्युलोकको प्राप्त हुई है ॥३८॥


अंशुकेन समालम्ब्य स्वं सा न्यग्रोधपादपे । त्वन्निमित्तमसून् तन्वी त्यजन्त्यस्माभिरीक्षिता ॥३९॥

अर्थ: वटवृक्षपर कपड़ेसे अपने आपको टांगकर तुम्हारे मिमित्त प्राण छोड़ती हुई उस कृशांगीको हमने देखा है ॥३९॥


एवमुक्तं त्वया नाथ यदि मे नात्र जन्मनि । समागमः कृतोऽन्यत्र प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥४०॥

अर्थ: और यह कह गयी है कि हे नाथ ! यद्यपि मेरे इस जन्ममें आपने समागम नहीं किया है तो अन्य जन्ममें प्रसन्नता करनेके योग्य हो ॥४०॥


एवं निगद्य शाखायां समर्पयति पाशकम् । संभ्रान्तश्च समालिङ्ग्य सौमित्रिरिदमब्रवीत् ॥४१॥

अयि मुग्धे सुकण्ठेऽस्मिन् मद्भुजालिङ्गनोचिते । कस्मादंशुकपाशोऽयं त्वया सुमुखि सज्ज्यते ॥४२॥

अर्थ: इतना कहकर वह ज्यों ही शाखापर फांसी बांधती है त्योंही घबड़ाये हुए लक्ष्मणने उसका आलिंगन कर यह कहा कि हे मूर्खे ! यह कण्ठ तो मेरी भुजाके आलिंगनके योग्य है, हे सुमुखि ! तू इसमें यह वस्त्र की फाँसी क्यों सजा रही है ? ॥४१-४२॥


अहं स लक्ष्मणो मुञ्च पाशं परमसुन्दरि । यथाश्रुतं निरीक्षस्व न चेत्प्रत्येषि बालिके ॥४३॥

अर्थ: मैं वही लक्ष्मण हूँ, हे परम सुन्दरि ! यह फाँसी छोड़ो, हे बालिके ! यदि तुझे विश्वास न हो तो जैसा सुन रखा हो वैसा देख लो ॥४३॥


इत्युक्त्वा पाशमेतस्याः करात् सान्त्वनकोविदः । जहार लक्ष्मणः फेनपुञ्जं तामरसादिव ॥४४॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर सान्त्वना देनेमें निपुण लक्ष्मणने जिस प्रकार कोई कमलसे फेनको दूर करता है उसी प्रकार उसके हाथसे फाँसी छीन ली ॥४४॥


ततोऽसौ त्रपया युक्ता दृष्ट्वा मन्थरचक्षुषा । लक्ष्मणं नेत्रचौरेण रूपेण परिलक्षितम् ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर नेत्रोंको चुरानेवाले रूपसे सुशोभित लक्ष्मणको मन्थर दृष्टिसे देखकर वह कन्या लज्जासे युक्त हो गयी ॥४५॥


परं विस्मयमापन्ना चिन्तामेवमुपागता । ईषद्वेपथुना युक्ता नवसंगमजन्मना ॥४६॥

अर्थ: नवसमागमके कारण कुछ-कुछ काँपती हुई वनमाला परम आश्चर्यको प्राप्त हो इस प्रकार विचार करने लगी ॥४६॥


किमयं वनदेवीभिः प्रसादो जनितो मम । कारुण्यमुपयाताभिः संदेशवचनैः परम् ॥४७॥

अर्थ: कि क्या मेरे सन्देश वचनोंसे परम दयालुताको प्राप्त हुई वनदेवियोंने ही मुझपर यह प्रसन्नता की है ? ॥४७॥


सोऽयं यथाश्रुतो नाथः संप्राप्तो दैवयोगतः । सवेद्येन मम प्राणाः प्रयान्तो विनिवारिताः ॥४८॥

अर्थ: जिन्होंने मेरे निकलते हुए प्राण रोके हैं ऐसे ये प्राणनाथ दैवयोगसे ही यहाँ आ पहुँचे हैं ॥४८॥


इति संचिन्तयन्ती सा किंचित्प्रस्वेदधारिणी । लक्ष्मीधरसमाश्लेषं लब्ध्वात्यन्तमराजत ॥४९॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करती और कुछ-कुछ पसीनाको धारण करती हुई वनमाला लक्ष्मणका आलिंगन पाकर अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ॥४९॥


ततो मृदुमहामोदकुसुमोदारसंस्तरे । प्रबुद्धो राघवश्चक्षुर्लक्ष्मणार्थमुदीरयन् ॥५०॥

अपश्यंश्च समुत्थाय पप्रच्छ जनकात्मजाम् । प्रदेशे लक्ष्मणो देवि नैतस्मिन् दृश्यते कुतः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर इधर कोमल तथा महासुगन्धित फूलोंकी उत्कृष्ट शय्यापर पड़े रामकी जब निद्रा हटी तो उन्होंने लक्ष्मणकी ओर दृष्टि डाली । लक्ष्मणको न देखकर वे उठे और सीतासे पूछने लगे कि देवि ! यहाँ लक्ष्मण क्यों नहीं दिखाई देता ? ॥५०-५१॥


प्रदोषे संस्तरं कृत्वा सोऽस्माकं पुष्पपल्लवैः । आसीदनतिदूरस्थः कुमारो ह्यत्र नेक्ष्यते ॥५२॥

अर्थ: सायंकालके समय तो वह फूल तथा पत्तोंसे हमारी शय्या कर यहीं पासमें सोया था 'पर अब यहाँ दिखाई नहीं दे रहा है ॥५२॥


नाथ वाह्वायतां तावदिति तस्यां कृतध्वनौ । क्रमादत्युच्चया वाचा वचो व्याहृतवानिति ॥५३॥

एह्यागच्छ क्व यातोऽसि भद्र लक्ष्मण लक्ष्मण । प्रयच्छ वचनं तात त्वरितं बालकानुज ॥५४॥

अर्थ: सीताने उत्तर दिया कि हे नाथ ! आवाज देकर बुलाइए । तब रामने यथाक्रमसे उच्चवाणीमें इस प्रकार शब्द कहे कि हे लक्ष्मण ! तू कहाँ चला गया, आओ-आओ, हे तात ! हे बालक ! हे अनुज ! कहाँ हो, शीघ्र आवाज देओ ॥५३-५४॥


अयमायामि देवेति दत्त्वास्मै संभ्रमी वचः । वनमालासमेतोऽसौ ज्येष्ठस्यान्तिकमागतः ॥५५॥

अर्थ: रामकी आवाज सुन लक्ष्मणने हड़बड़ाकर उत्तर दिया कि देव ! यह आता हूँ । इस प्रकार उत्तर देकर वे वनमालाके साथ अग्रजके समीप आ पहुँचे ॥५५॥


अर्धरात्रे तदा स्पष्टे निशानाथः समुद्ययौ । ववौ कुमुदगर्भाश्रिर्वायुः सामोदशीतलः ॥५६॥

अर्थ: उस समय स्पष्ट ही आधी रात थी, चन्द्रमाका उदय हो चुका था और कुमुदोंके गर्भसे मिलकर सुगन्धित तथा शीतल वायु बह रही थी ॥५६॥


ततः पल्लवकान्ताभ्यां हस्ताभ्यां रचिताञ्जलिः । अंशुकावृतसर्वाङ्गा त्रपाविनमितानना ॥५७॥

ज्ञातनिश्शेषकर्तव्या बिभ्राणा विनयं परम् । बालावन्दत रामस्य सीतायाश्च क्रमद्वयम् ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने कमलके समान सुन्दर हाथोंसे अंजलि बाँध रखी थी, वस्त्रसे जिसका सर्व शरीर आवृत था, लज्जासे जिसका मुख नम्रीभूत हो रहा था, जो समस्त कर्तव्यको जानती थी तथा/परम विनयको धारण कर रही थी ऐसी वनमालाने आकर राम तथा सीताके चरणयुगलको नमस्कार किया ॥५७-५८॥


सद्वितीयं ततो दृष्ट्वा सीता लक्ष्मणमब्रवीत् । कुमार सह चन्द्रेण समवायस्त्वया कृतः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणको स्त्री सहित देख सीताने कहा कि हे कुमार ! तुमने तो चन्द्रमाके साथ मित्रता कर ली ॥५९॥


कथं जानासि देवीति पद्मेनोक्ता जगाद सा । चेष्टया देव जानामि शृणु तुल्यप्रवृत्तया ॥६०॥

अर्थ: रामने सीतासे कहा कि हे देवि ! तुम किस प्रकार जानती हो ? इसके उत्तरमें सीताने कहा कि हे देव ! मैं समान प्रवृत्त चेष्टासे जानतो हूँ सुनिए ॥६०॥


ज्योत्स्नया सहितश्चन्द्रो यस्मिन् काले समागतः । लक्ष्मीधरोऽपि तत्रैव सहितो बालयानया ॥६१॥

अर्थ: जिस समय चन्द्रमा चन्द्रिका अर्थात् चाँदनीके साथ आया उसी समय लक्ष्मण भी इस बालाके साथ आया है इससे स्पष्ट है कि इसकी चन्द्रमाके साथ मित्रता है ॥६१॥


यथा ज्ञापयसि स्पष्टमेवमेतदिति ब्रुवन् । लक्ष्मीधरोऽन्तिके तस्थौ ह्रिया किंचिन्नताननः ॥६२॥

अर्थ: जैसा आप समझ रही हैं बात स्पष्ट ही ऐसी है इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मण लज्जासे कुछ नतानन हो पास ही में बैठ गये ॥६२॥


उत्फुल्लनेत्रराजीवाः प्रमोदार्पितचेतसः । प्रसन्नवक्त्रतारेशाः सुशीला विस्मयान्विताः ॥६३॥

कथाभिः स्मितयुक्ताभिः याताभिः स्थानयुक्तताम् । ते तत्र त्रिदशच्छाया नष्टनिद्राः सुखं स्थिताः ॥६४॥

अर्थ: इस तरह जिनके नेत्रकमल विकसित थे, जो आनन्दसे विभोर थे, जिनके मुखरूपी चन्द्रमा अत्यन्त प्रसन्न थे, जो सुशील थे, आश्चर्यसे सहित थे, देवोंके समान कान्तिके धारक थे तथा जिनकी निद्रा नष्ट हो गयी थी ऐसे वे सब, स्थानकी अनुकूलताको प्राप्त मन्दहास्य युक्त कथाएँ करते हुए वहाँ सुखसे विराजमान थे ॥६३-६४॥


सख्योऽत्र वनमालायाः समये बोधमागताः । शयनीयं तथा शून्यं ददृशुस्त्रस्तमानसाः ॥६५॥

अर्थ: यहाँ समयपर जब वनमालाकी सखियाँ जागीं तो शय्याको सूनी देख भयभीत हो गयीं ॥६५॥


ततोऽश्रुपूर्णनेत्राणां गवेषव्याकुलात्मनाम् । तासां हाकारशब्देन प्रबोधं भेजिरे भटाः ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे तथा जो वनमालाकी खोजके लिए छटपटा रही थीं ऐसी उन सखियोंकी हाहाकारसे योद्धा जाग उठे ॥६६॥


उपलभ्य च वृत्तान्तं सन्नद्धारूढसप्तयः । शूराः पदातयश्चान्ये कुन्तकार्मुकपाणयः ॥६७॥

अर्थ: तथा सब समाचार जानकर तैयार हो कुछ तो घोड़ोंपर आरूढ़ हुए और कुछ भाले तथा धनुष हाथमें ले पैदल ही चलनेके लिए तैयार हुए ॥६७॥


दिशः सर्वाः समास्तीर्य दधावुर्भ्रान्तमानसाः । भीतिप्रीतिसमायुक्ताः समीरस्येव शावकाः ॥६८॥

अर्थ: इस प्रकार जिनके चित्त घबड़ा रहे थे, जो भय और प्रीतिसे युक्त थे तथा जो शीघ्र गतिमें वायुके बच्चोंके समान जान पड़ते थे ऐसे योद्धा समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दौड़े ॥६८॥


ततः कैरपि ते दृष्टाः समेता वनमालया । निवेदिताश्च शेषस्य जनस्य जववाहनैः ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर कितने ही योद्धाओंने वनमालाके साथ बैठे हुए उन सबको देखा और देखकर शीघ्रगामी वाहनोंसे चलकर शेषजनोंके लिए इसकी खबर दी ॥६९॥


ज्ञातनिश्शेषवृत्तान्तैस्तैरलं संमदान्वितैः । पृथिवीधरराजस्य कृतं दिष्ट्याभिवर्धनम् ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त समाचारको ठीक-ठीक जानकर जो अत्यधिक हर्षित हो रहे थे ऐसे कुछ योद्धाओंने पृथिवीधर राजाके लिए भाग्यवृद्धिकी सूचना दी ॥७०॥


उपायारम्भमुक्तस्य तवाद्य नगरे प्रभो । जगाम प्रकटीभावं महारत्ननिधिः स्वयम् ॥७१॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे प्रभो ! उपायारम्भसे रहित होनेपर भी आज आपके नगरमें स्वयं ही महारत्नोंका खजाना प्रकट हुआ है ॥७१॥


पपात नभसो वृष्टिर्विना मेघसमुद्भवात् । परिकर्मविनिर्मुक्तं सस्यं क्षेत्रात् समुद्गतम् ॥७२॥

अर्थ: आज आकाशसे बिना मेघके ही वर्षा पड़ी है तथा जोतना, बखेरना आदि क्रियाओंके बिना ही खेतसे धान्य उत्पन्न हुआ है ॥७२॥


जामाता लक्ष्मणोऽयं ते वर्तते निकटे पुरः । जीवितं हातुमिच्छन्त्या संगतो वनमालया ॥७३॥

अर्थ: आपका जामाता लक्ष्मण नगरके निकट ही वर्तमान है तथा प्राण छोड़नेकी इच्छा करनेवाली वनमालाके साथ उसका मिलाप हो गया है ॥७३॥


पद्मश्च सीतया साकं परमो भवतः प्रियः । शच्येव सहितो देवेन्द्रोऽयमत्र विराजते ॥७४॥

अर्थ: सीता सहित राम भी जो कि आपको अत्यन्त प्रिय हैं इन्द्राणी सहित इन्द्रके समान यहीं सुशोभित हो रहे हैं ॥७४॥


वदतामिति भृत्यानां वचनैः प्रियशंसिभिः । सुखनिर्झरचेतस्को समूर्छ नृपतिः क्षणम् ॥७५॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेवाले भृत्यों-के प्रिय सूचक वचनोंसे जिसके हृदयमें सुखका झरना फूट पड़ा था ऐसा राजा पृथिवीपर हर्षाति- रेकसे क्षण-भरके लिए मूर्च्छित हो गया ॥७५॥


ततः प्रबुद्धचित्तेन परं प्रमदमीयुषा । दत्तं बहुधनं तेभ्यः स्मितशुक्लमुखेन्दुना ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर सचेत होनेपर जो परम हर्षको प्राप्त था तथा जिसका मुखरूपी चन्द्रमा मन्द मुसकानसे धवल हो रहा था ऐसे राजाने उन भृत्योंके लिए बहुत भारी धन दिया ॥७६॥


अचिन्तयच्च ही साधु संजातं दुहितुर्मम । अनिश्चितगतिः प्राप्तो यदयं सुमनोरथः ॥७७॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि अहो, मेरी पुत्रीका बड़ा भाग्य है कि जिससे उसका यह अनिश्चित मनोरथ स्वयं ही पूर्ण हो गया ॥७७॥


सर्वेषामेव जीवानां धनमिष्टसमागमः । जायते पुण्ययोगेन यच्चात्मसुखकारणम् ॥७८॥

अर्थ: समस्त जीवोंको धन, इष्टका समागम तथा जो भी आत्म-सुखका कारण है वह सब पुण्य योगसे प्राप्त होता है ॥७८॥


योजनानां शतेनापि परिच्छिन्ने श्रुतान्तरे । इष्टो मुहूर्तमात्रेण लभ्यते पुण्यमागिभिः ॥७९॥

अर्थ: जिसके बीचमें सौ योजनका भी अन्तर प्रसिद्ध है वह इष्ट वस्तु पुण्यात्मा जीवोंको मुहूर्तमात्रमें प्राप्त हो जाती है ॥७९॥


ये पुण्येन विनिर्मुक्ताः प्राणिनो दुःखभागिनः । तेषां हस्तमपि प्राप्तमिष्टवस्तु पलायते ॥८०॥

अर्थ: इसके विपरीत जो प्राणी पुण्यसे रहित हैं वे निरन्तर दुखी रहते हैं तथा उनके हाथमें आयी हुई भी इष्ट वस्तु दूर हो जाती है ॥८०॥


अरण्यानां गिरेर्मूर्ध्नि विषमे पथि सागरे । जायन्ते पुण्ययुक्तानां प्राणिनामिष्टसंगमाः ॥८१॥

अर्थ: अटवियोंके बीचमें, पहाड़की चोटीपर विषम मार्ग तथा समुद्रके मध्यमें भी पुण्यशाली मनुष्योंको इष्ट समागम प्राप्त होते रहते हैं ॥८१॥


इति संचिन्त्य जायायै तं वृत्तान्तमशेषतः । उत्थाप्याकथयत्तोषादक्षरैः कृच्छ्रनिर्गतैः ॥८२॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उसने स्त्रीको उठाया और उसके लिए हर्षातिरेकके कारण कष्टसे निकलनेवाले वचनोंके द्वारा सब समाचार कहा ॥८२॥


पुनः पुनरपृच्छत् सा सुमुखी स्वप्नशङ्कया । संजातनिश्चयादाप स्वसंवेद्यां सुखासिकाम् ॥८३॥

अर्थ: उस सुमुखीने ‘कहीं स्वप्न तो नहीं देख रही हूँ’ इस आशंकासे बार-बार पूछा और उत्पन्न हुए निश्चयसे वह स्वसंवेद्य सुखको प्राप्त हुई ॥८३॥


ततो रामाधरच्छाये समुद्यति दिवाकरे । प्रेमसंपूरितो राजा सर्वबान्धवसंगतः ॥८४॥

वरवारणमारुह्य धुत्या परमया युतः । प्रतस्थे परमं द्रष्टुमुत्सुकः प्रियसंगमम् ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर जब स्त्रीके ओठके समान लाल-लाल कान्तिको धारण करनेवाला सूर्य उदित हो रहा था तब प्रेमसे भरा, सर्व बन्धुजनोंसे सहित, परम कान्तिसे युक्त और परम प्रिय समागम देखनेके लिए उत्सुक राजा पृथिवीधर उत्तम हाथीपर सवार हो चला ॥८४-८५॥


माता च वनमालायाः पुत्रैरष्टाभिरन्विता । आरुह्य शिविकां रम्यां प्रियस्य पदवीं श्रिता ॥८६॥

अर्थ: आठों पुत्रोंसे सहित वनमालाकी माता भी मनोहर पालकीपर सवार हो पतिके मार्गमें चली ॥८६॥


अनन्तरं नृपादेशात् कशिपुः प्रचुरं हितम् । गन्धमाल्यादिवाशेषमनीयत मनोहरम् ॥८७॥

अर्थ: इसके पीछे राजाकी आज्ञानुसार सेवकोंके द्वारा अत्यधिक हितकारी वस्त्र तथा गन्ध, माला आदि समस्त मनोहर पदार्थ ले जाये जा रहे थे ॥८७॥


ततो दूरात् समालोक्य संफुल्लेक्षणपङ्कजम् । अवतीर्य गजाद् राजा ढुढौके राममादरी ॥८८॥

अर्थ: तदनन्तर दूरसे ही विकसित नेत्रकमलोंके धारी रामको देखकर राजा पृथिवीधर हाथीसे उतरकर आदरके साथ उनके पास पहुँचा ॥८८॥


परिष्वज्य महाप्रीत्या सहितं लक्ष्मणेन तम् । अपृच्छत् कुशलं कृष्टिर्जानकीं च सुमानसः ॥८९॥

अर्थ: तत्पश्चात् विधि-विधानके वेत्ता तथा शुद्ध-हृदयके धारक राजाने बड़े प्रेमसे राम-लक्ष्मणका आलिंगन कर उनसे तथा सीतासे कुशल समा- चार पूछा ॥८९॥


तद्देव्यपि तयोः पृष्ट्वा क्षेमं सुस्निग्धलोचना । निखिलाचारनिष्णाता जानकीं परिषस्वजे ॥९०॥

अर्थ: जिसके नेत्रोंसे स्नेह टपक रहा था तथा जो सब प्रकारका आचार जाननेमें निपुण थी ऐसी रानीने भी राम-लक्ष्मणसे कुशल पूछकर सीताका आलिंगन किया ॥९०॥


उपचारो यथायोग्यं तयोस्तैरपि निर्मितः । आचार्यकं हिते याता वस्तुन्यत्र प्रतिष्ठितम् ॥९१॥

अर्थ: उन सबने भी राजा-रानीका यथायोग्य सत्कार किया सो ठीक ही है क्योंकि वे इस विषयमें अतिशय निपुणताको प्राप्त थे ॥९१॥


वीणावेणुमृदङ्गादिसहितो गीतनिःस्वनः । क्षुब्धार्णवसमो जज्ञे वन्दिवृन्दानुनादितः ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर जो वीणा, बाँसुरी, मृदंग आदिके शब्दसे सहित था, जो क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रकी तुलना धारण कर रहा था और जिसमें वन्दीजनोंके द्वारा उच्चारित विरुदावलीका नाद गूँज रहा था ऐसा संगीतका शब्द होने लगा ॥९२॥


उत्सवः स महाञ्जातः पूजिताखिलसंगतः । नृत्यल्लोकक्रमन्यासादतिकम्पितभूतलः ॥९३॥

अर्थ: जिसमें आये हुए समस्त इष्टजनोंका सत्कार हो रहा था, तथा नृत्य करनेवाले मनुष्योंके चरण निक्षेपसे जिसमें भूतल काँप रहा था ऐसा वह महान् उत्सव सम्पन्न हुआ ॥९३॥


दिशस्तूर्यनिनादेन प्रतिशब्दसमन्विताः । चक्रुः परस्परालापमिव संमदनिर्भराः ॥९४॥

अर्थ: तुरहीके शब्दसे जिनमें प्रतिध्वनि गूँज रही थी ऐसी दिशाएँ हर्षसे ओत-प्रोत हो मानो परस्पर वार्तालाप ही कर रही थीं ॥९४॥


शनैः प्रसन्नतां याते तस्मिन्नथ महोत्सवे । शरीरकर्म तैः सर्वं कृतं स्नानाशनादिकम् ॥९५॥

अर्थ: अथानन्तर धीरे-धीरे जब वह महोत्सव शान्त हुआ तब उन्होंने स्नान, भोजन आदि शरीर सम्बन्धी सब कार्य किये ॥९५॥


ततः ससिद्विपारूढसामन्तशतवेष्टितौ । सारङ्गोपमपादातमहाचक्रपरिच्छदौ ॥९६॥

पुरःप्रवृत्तसोत्साहराजस्थपृथिवीधरौ । विदग्धसूतलोकेन कृतमङ्गलनिस्वनौ ॥९७॥

हारराजितवक्षस्कावनर्घांशुकधारिणौ । हरिचन्दनदिग्धाङ्गावारूढौ रथमुत्तमम् ॥९८॥

नानारत्नांशुसंपर्कसमुद्भूतेन्द्रकार्मुकौ । शशाङ्कभास्कराकारावशक्यगुणवर्णनौ ॥९९॥

सौधर्मैशानदेवाभौ जानकीसहितौ पुरम् । कुर्वाणौ विस्मयं तुङ्गं प्रविष्टौ रामलक्ष्मणौ ॥१००॥

वरमालाधरौ गन्धबद्धषट्पदमण्डलौ । संपूर्णचन्द्रवदनौ विनीताकारधारिणौ ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर जो हाथी-घोड़ोंपर बैठे हुए सैकड़ों सामन्तोंसे घिरे थे, मृगतुल्य पैदल सिपाहियोंका बड़ा दल जिनके साथ था, उत्साहसे भरा राजा पृथिवीधर जिनके आगे-आगे चल रहा था, चतुर वन्दीजन जिनके आगे मंगल ध्वनि कर रहे थे, जिनके वक्षःस्थल हारोंसे सुशोभित थे, जो अमूल्य वस्त्र धारण किये हुए थे, जिनके शरीर हरिचन्दनसे लिप्त थे, जो उत्तम रथपर सवार थे, जिनके नाना रत्नोंकी किरणोंके सम्पर्कसे इन्द्रधनुष उठ रहे थे, चन्द्र और सूर्यके समान जिनके आकार थे, जिनके गुणोंका वर्णन करना अशक्य था, सौधर्म तथा ऐशानेन्द्रके समान जिनकी कान्ति थी, जो अत्यधिक आश्चर्य उत्पन्न कर रहे थे, जिनके गलेमें वरमालाएँ पड़ी थीं, सुगन्धिके कारण जिनके आस-पास भ्रमरोंने मण्डल बाँध रखे थे, जिनके मुख चन्द्रमाके समान थे तथा जो विनीत आकारको धारण कर रहे थे ऐसे राम-लक्ष्मणने नगरमें प्रवेश किया ॥९६-१०१॥


यक्षेणेव कृते तस्मिँल्लङ्कामे पुटभेदने । रेमाते परमं भोगं भुञ्जानौ निजयेच्छया ॥१०२॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले, यक्षके द्वारा निर्मित नगरमें इच्छानुसार भोग भोगते हुए वे रमण करते थे उसी प्रकार राजा पृथिवीधरके नगरमें भी वे इच्छानुसार उत्कृष्ट भोग भोगते हुए रमण करने लगे ॥१०२॥


इति वनगहनान्यपि प्रयाताः सुकृतसुसंस्कृतचेतसो मनुष्याः । अतिपरमगुणानुपाश्रयन्ते रविरुचयः सहसा पदार्थकामान् ॥१०३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जिनके चित्त पुण्यसे सुसंस्कृत हैं तथा जो सूर्यके समान दीप्तिके धारक हैं ऐसे मनुष्य सघन वनोंमें पहुँचकर भी सहसा उत्कृष्ट गुणोंसे युक्त पदार्थोंको प्राप्त कर लेते हैं ॥१०३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे-पद्मायने वनमालाभिधानं नाम षट्त्रिंशत्तमं पर्व ॥३६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें वनमालाका वर्णन करनेवाला छत्तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३६॥


३७. सप्तत्रिंशत्तमं पर्व (अतिवीर्यनिष्क्रमणाभिधानं)

अन्यदाथ सुखासीनं समुदीरिततत्कथम् । राघवालंकृतास्थानं राजानं पृथिवीधरम् ॥१॥

दूराध्वपरिखिन्नाङ्गो लेखवाहः समाययौ । प्रणम्य च समासीनो द्रुतं लेखं समार्पयत् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन राजा पृथ्वीधर सभामण्डपमें सुखसे विराजमान थे, पास ही में राम भी सभाको अलंकृत कर रहे थे तथा उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा चल रही थी कि इतनेमें दूर मार्गसे आनेके कारण जिसका शरीर खिन्न हो रहा था ऐसा एक पत्रवाहक आया और राजाको प्रणाम कर बैठनेके बाद उसने शीघ्र ही एक पत्र समर्पित किया ॥१-२॥


गृहीत्वासौ ततो राज्ञा बाह्यनामकलक्षितः । लेखकायार्पितः साधु सन्धिविग्रहवेदिने ॥३॥

अर्थ: वह पत्र जिसे दिया जाना था उसके नामसे अंकित था । राजाने पत्रवाहकसे पत्र लेकर सन्धिविग्रहको अच्छी तरह जाननेवाले लेखक (मुन्शी) के लिए सौंप दिया ॥३॥


स विमुच्यानुवाच्यैनं चायितो राजचक्षुषा । लिपिज्ञुर्विधौ चारुरित्यवाचयदुच्चगीः ॥४॥

अर्थ: वह लेखक सब लिपियोंके जाननेमें निपुण था, राजाके नेत्र द्वारा सम्मान प्राप्त कर उसने वह पत्र खोला । एक बार स्वयं बाँचा और फिर उच्च स्वरसे इस प्रकार बाँचकर सुनाया ॥४॥


स्वस्तिस्वस्तिलकोदारप्रभावमतिकर्मणे । श्रीमते नतराजानामतिवीर्याय शर्मणे ॥५॥

अर्थ: उसमें लिखा था कि जो इन्द्रके समान उदार प्रभावका धारक तथा बुद्धिमान् है, लक्ष्मीमान् है तथा नम्रीभूत राजाओंके लिए सुख देनेवाला है ऐसा राजा अतिवीर्य स्वस्तिरूप है, मंगलरूप है ॥५॥


श्रीनन्द्यावर्तनगरान्नगराज इवोत्थितः । ख्यातः पञ्चमहाशब्दः शस्त्रशास्त्रविशारदः ॥६॥

राजाधिराजताश्लिष्टः प्रतापवशिताहितः । अनुरञ्जितसर्वक्ष्मः समुद्यद्भास्करद्युतिः ॥७॥

अतिवीर्यः समस्तेषु कर्तव्येषु महानयः । राजमानगुणः श्रीमानतिवीर्यः क्षितीश्वरः ॥८॥

आज्ञापयति नगरे विजये पृथिवीधरम् । अक्षरैर्लेखसंक्रान्तैः कुशलप्रश्नपूर्वकम् ॥९॥

यथा मे केचिदेतस्मिन् सामन्ता धरणीतले । सकोषवाहनास्ते मे वर्तन्ते पार्श्ववर्तिनः ॥१०॥

अर्थ: जो नगराज अर्थात् सुमेरुके समान (उदार) है, महायशका धारी है, शस्त्रमें निपुण है, राजाधिराजपनासे आलिंगित है, जिसने अपने प्रतापसे शत्रुओंको वश कर लिया है, जिसने समस्त पृथिवीको अनुरंजित कर लिया है, उगते हुए सूर्यके समान जिसकी कान्ति है, जो अतिशय पराक्रमी है, समस्त कार्योंमें महानीतिज्ञ है, और जिससे अनेक गुण शोभायमान हो रहे हैं ऐसा श्रीमान् अतिवीर्य राजा नन्द्यावर्तपुरसे विजयनगरमें वर्तमान राजा पृथिवीधरको लेखमें लिखित अक्षरोंसे कुशल समाचार पूछता हुआ आज्ञा देता है कि इस पृथिवीतलपर मेरे जो सामन्त हैं वे खजाना और सेनाके साथ मेरे पास हैं ॥६-१०॥


आयान्बहुविधा म्लेच्छाश्चतुरङ्गसमन्विताः । नानाशास्त्रकरा वाक्यमर्चन्ति समभूतयः ॥११॥

अर्थ: जिनके हाथमें नाना प्रकारके शस्त्र देदीप्यमान है तथा जो एक सदृश विभूतिके धारक हैं ऐसे म्लेच्छ राजा अपनी-अपनी चतुरंग सेनाके साथ यहाँ आ गये हैं ॥११॥


वराञ्जननगाभानां करिणामष्टभिः शतैः । समीरशात्रतुल्यानां सहस्रैर्वाजिनां त्रिभिः ॥१२॥

महाभोगो महातेजा मद्गुणाकृष्टमानसः । राजा विजयशार्दूलः सोऽद्य प्राप्तो ममान्तिकम् ॥१३॥

अर्थ: जो महाभोगी और महाप्रतापी हैं तथा जिसका मन हमारे गुणोंसे आकर्षित है ऐसा राजा विजयशार्दूल भी अंजनगिरिके समान आभावाले आठ सौ सौ हाथियों और वायुके पुत्रके समान चपल तीन हजार घोड़ोंके साथ आज हमारे पास आ गया है ॥१२-१३॥


मृगध्वजो रणोर्मिश्च कलभः केसरी तथा । अङ्गा महीभृतः षड्भिरमी करटिनां शतैः ॥१४॥

प्रत्येकं पञ्चभिः सप्तिसहस्रैश्च समावृताः । प्राप्ताः कृतमहोत्साहा नयपण्डितबुद्धयः ॥१५॥

अर्थ: बहुत भारी उत्साहके देनेवाले तथा नीति-निपुण बुद्धिके धारक जो मृगध्वज, रणोर्मि, कलभ और केसरी नामके अंगदेशके राजा हैं वे भी प्रत्येक छह सौ हाथियों तथा पाँच हजार घोड़ोंसे समावृत हो आ पहुँचे हैं ॥१४-१५॥


उत्साहयन् छलोद्वृत्तं नयशास्त्रविशारदम् । पञ्चालाधिपमात्मार्थकारिणं ज्ञातकारणम् ॥१६॥

द्विरदानां सहस्रेण तैर्यूनां च सप्तभिः । पौण्ड्रक्ष्मापतिरालीनः प्रतापं परमं वहन् ॥१७॥

अर्थ: जो छलपूर्ण युद्ध करनेमें निपुण है, नीतिशास्त्रका पारगामी है, प्रयोजन सिद्ध करनेवाला है तथा युद्धकी सब गतिविधियोंका जानकार है ऐसे पंचाल देशके राजाको उत्साहित करता हुआ पौण्ड्रदेशका परम प्रतापी राजा, दो हजार हाथियों और सात हजार घोड़ोंके साथ आ गया है ॥१६-१७॥


साधनेन तदग्रेण संप्राप्तो मगधाधिपः । पूर्यमाणो नृपैर्वाहो रैवो नदशतैरिव ॥१८॥

अर्थ: जिस प्रकार रेवा नदीके प्रवाहमें सैकड़ों नदियाँ आकर मिलती हैं इसी प्रकार जिसमें अन्य अनेक राजा आ-आकर मिल रहे हैं ऐसा मगध देशका राजा भी पौण्ड्राधिपतिसे भी कहीं अधिक सेना लेकर आया है ॥१८॥


सहस्रैरागतोऽष्टाभिर्दन्तिनां जलदत्विषाम् । अश्वीयेन सुकेशश्च दुर्लभान्तेन वज्रधृक् ॥१९॥

अर्थ: वज्रको धारण करनेवाला राजा सुकेश, मेघके समान कान्तिको धारण करनेवाले आठ हजार हाथियों और जिसका अन्त पाना कठिन है ऐसी घोड़ोंकी सेनाके साथ आ पहुँचा है ॥१९॥


सुभद्रो मुनिभद्रश्च साधुभद्रश्च नन्दनः । तुल्या वज्रधरस्यैते संप्राप्ता यवनाधिपाः ॥२०॥

अर्थ: जो इन्द्रके समान पराक्रमके धारी हैं, ऐसे सुभद्र, मुनिभद्र, साधुभद्र और नन्दन नामक भवनोंके राजा हैं वे भी आ गये हैं ॥२०॥


अवार्यवीर्यसंप्राप्तः सिंहवीर्यो महीपतिः । वाङ्गः सिंहरथश्चेतौ मातुलौ बलशालिनौ ॥२१॥

अर्थ: जो अवार्य वीर्यसे सम्पन्न है, ऐसा राजा सिंहवीर्य, तथा वंग देशका राजा सिंहरथ ये दोनों मेरे मामा हैं सो बहुत भारी सेनासे सुशोभित होते हुए आये हैं ॥२१॥


पदातिमी रथैर्नागैः स्थूरीपृष्ठैः प्रतिष्ठितैः । वत्सस्वामी समायातो मारिदत्तोतिमूरिभिः ॥२२॥

अर्थ: वत्स देशका राजा मारिदत्त बहुत भारी पदाति, रथ, हाथी और उत्तमोत्तम घोड़ोंके साथ आया है ॥२२॥


आम्बष्ठः प्रोष्ठिलो राजा सौवीरो धीरमन्दिरः । प्राप्तौ दुर्वेदसंख्येन साधनेनान्विताविमौ ॥२३॥

अर्थ: अम्बष्ठ देशका राजा प्रोष्ठिल और सुवीर देशका स्वामी धीरमन्दिर ये दोनों असंख्यात सेनाके साथ आ पहुँचे हैं ॥२३॥


एतेऽन्ये च महासत्त्वा राजानः श्रुतशासनाः । अक्षौहिणीभिरायाता दशभिस्त्रिदशोपमाः ॥२४॥

अर्थ: तथा इनके सिवाय जो और भी महापराक्रमी एवं देवोंकी उपमा धारण करनेवाले अन्य राजा हैं वे मेरी आज्ञा श्रवण कर सेनाओंके साथ आ चुके हैं ॥२४॥


अमीभिरनुयातोऽहं प्रस्थितो भरतं प्रति । त्वामुदीक्षे यतो लेखदर्शनानन्तरं ततः ॥२५॥

आगन्तव्यं त्वया प्रीत्या कार्याप्रेक्षितया तथा । पश्यामोऽत्यादरेण त्वां यथा वर्षं कृषीवलाः ॥२६॥

अर्थ: इन सब राजाओंको साथ लेकर मैंने अयोध्याके राजा भरतके प्रति प्रस्थान किया है, सो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है, अतः तुम्हें पत्र देखनेके बाद तुरन्त ही यहाँ आना चाहिए। तुम्हारी मुझमें प्रीति ही ऐसी है कि जिससे आप दूसरे कार्यके प्रति दृष्टि भी नहीं डालेंगे। जिस प्रकार किसान वर्षाको बड़े आदरसे देखते हैं, उसी प्रकार हम भी तुम्हें बड़े आदरसे देखते हैं ॥२५-२६॥


एवं च वाचिते लेखे न यावत्पृथिवीधरः । किंचिदूचे सुमित्रायाः सूनुस्तावदभाषत ॥२७॥

अतिवीर्ये तथाबुद्धौ भरतस्य विचेष्टितम् । तव कीदृगिति ज्ञातं भद्रस्य दूतस्य ते ॥२८॥

अर्थ: इस प्रकार पत्र बाँचे जानेपर राजा पृथिवीधर जबतक कुछ नहीं कह पाये कि तबतक उसके पहले ही लक्ष्मण ने कहा कि हे भद्र ! हे समीचीन बुद्धिके धारक दूत ! तुझे मालूम है कि राजा अतिवीर्यके उस तरह रुष्ट होनेमें भरतकी कैसी चेष्टा कारण है अर्थात् अतिवीर्य और भरतमें विरोध होनेका क्या कारण है ? ॥२७-२८॥


एवं वायुगतिः पृष्टो जगाद निखिलं मम । विदितं राजचरितमन्तरङ्गो ह्ययं परः ॥२९॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मणके पूछनेपर उस वायुगति नामक दूतने कहा कि मैं चूँकि राजाका अत्यन्त अन्तरंग व्यक्ति हूँ अतः मुझे सब मालूम है ॥२९॥


इच्छामि विशदं श्रोतुमित्युक्ते पुनरब्रवीत् । शृणु चित्तं समाधाय भवतश्चेत्कुतूहलम् ॥३०॥

अर्थ: इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि तो मैं सुनना चाहता हूँ । इस प्रकार कहे जानेपर वायुगति दूत बोला कि यदि आपको कुतूहल है तो चित्त स्थिर कर सुनिए मैं कहता हूँ ॥३०॥


श्रुतबुद्धिरिति ख्यातो दूतः श्रुतविशारदः । प्रहितः स्वामिनास्माकं गत्वा भरतमब्रवीत् ॥३१॥

दूतोऽस्मि शक्रतुल्यस्य प्रणताखिलभूभृतः । अतिवीर्यनरेन्द्रस्य नयन्यासमनीषिणः ॥३२॥

अर्थ: उसने कहा कि एक बार हमारे राजा अतिवीर्यने श्रुतबुद्धि नामका निपुण दूत भरतके पास भेजा, सो उसने जाकर भरतसे कहा कि जो इन्द्रके समान पराक्रमी है । जिसे समस्त राजा नमस्कार करते हैं तथा जो नयके प्रयोग करनेमें अत्यन्त निपुण है ऐसे राजा अतिवीर्यका मैं दूत हूँ ॥३१-३२॥


संप्राप्य साध्वसं यस्मान्नरकेसरिणः परम् । मजन्ते रिपुसारङ्गा न निद्रां वसतिष्वपि ॥३३॥

अर्थ: जो मनुष्योंमें सिंहके समान है तथा जिससे भयभीत होकर शत्रुरूप मृग अपनी वसतिकाओंमें निद्राको प्राप्त नहीं होते ॥३३॥


विनीता पृथिवी यस्य चतुरम्भोधिमेखला । आज्ञां पाणिगृहीतेव कुरुते परिपालिता ॥३४॥

आज्ञापयत्यसौ देवो भवन्तमिति सत्क्रियः । वर्णैर्मदास्यविन्यस्तैरूर्जितात्मा समन्ततः ॥३५॥

यथा मज समागत्य भृत्यतां भरत द्रुतम् । अयोध्यां वा परित्यज्य मज पारमुदन्वतः ॥३६॥

अर्थ: चार समुद्र ही जिसकी कटिमेखला है, ऐसी समस्त पृथिवी स्त्रीके समान बड़ी विनयसे जिसकी आज्ञाका पालन करती है, जो उत्तम क्रियाओंका आचरण करनेवाला है तथा सब ओरसे जिसकी आत्मा अत्यन्त बलिष्ठ है, ऐसे राजा पृथिवीपर मेरे मुखमें स्थापित किये हुए अक्षरोंसे आपको आज्ञा देते हैं कि हे भरत ! तू शीघ्र ही आकर मेरी दासता स्वीकृत कर अथवा अयोध्या छोड़कर समुद्रके उस पार भाग जा ॥३४-३६॥


ततः क्रोधपरीताङ्गः शत्रुघ्नश्चण्डया गिरा । जगाद निष्प्रतीकारो दावानल इवोत्थितः ॥३७॥

भजत्येव तथा देवो भरतस्तस्य भृत्यताम् । यथा संजायते युक्तमिदं तावत्प्रभाषितम् ॥३८॥

विनीतां च परित्यज्य सचिवेषु प्रभुर्ध्रुवम् । यात्येवोदन्वतः पारं वशीकुर्वन् कुमानवान् ॥३९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका शरीर क्रोधसे व्याप्त हो रहा था तथा उठी हुई दावानलके समान जिसका प्रतिकार करना कठिन था ऐसा शत्रुघ्न तीक्ष्ण वाणीसे बोला कि अरे दूत ! राजा भरत उसकी भृत्यताको उस तरह अभी हाल स्वीकृत करते हैं कि जिस तरह उसका यह कहना ठीक सिद्ध हो जाय ? अयोध्या छोड़नेकी बात कही सो अभ्युदयको धारण करनेवाले राजा भरत अयोध्याको मन्त्रियोंपर छोड़ क्षुद्र मनुष्योंको वश करनेके लिए अभी हाल समुद्रके पार जाते हैं ॥३७-३९॥


वचस्त्वां ज्ञापयामीति नितरां तस्य नोचितम् । रासभस्य यथा मत्तवारणधिपगर्जितम् ॥४०॥

अर्थ: परन्तु मैं तुझसे कह रहा हूँ कि जिस प्रकार मदोन्मत्त हाथीके प्रति गधेकी गर्जना उचित नहीं जान पड़ती, उसी प्रकार भरतके प्रति तेरे स्वामीकी यह गर्जना बिलकुल ही उचित नहीं है ॥४०॥


सूचयत्यथवा तस्य मृत्युमेतद्वचः स्फुटम् । उत्पातभूतमेतो वा स नूनं वायुवश्यताम् ॥४१॥

अर्थ: अथवा उसके यह वचन स्पष्ट ही उसकी मृत्युको सूचित करते हैं । जान पड़ता है कि वह उत्पातरूपी भूतसे ग्रस्त है अथवा वायुरोगके वशीभूत है ॥४१॥


वैराग्यादथवा ताते तपोवनमुपागते । नरेन्द्रेण समाविष्टो ग्रहेण खलवेष्टितः ॥४२॥

अर्थ: अथवा वैराग्यके योगसे पिता राजा दशरथके तपोवनके लिए चले जानेपर दुष्टोंसे घिरा तुम्हारा राजा ग्रहसे आक्रान्त हो गया है ॥४२॥


यद्यप्युपशमं यातस्ताताग्निर्मुक्तिकाम्यया । तथापि निर्गतस्तस्मात्स्फुलिङ्गस्तं दहाम्यहम् ॥४३॥

अर्थ: यद्यपि मोक्षकी आकांक्षासे पितारूपी अग्नि शान्त हो चुकी है तथापि मैं उस अग्निसे निकला हुआ एक तिलगा हूँ, सो तेरे राजाको अभी भस्म करता हूँ ॥४३॥


सिंहे करीन्द्रकोलालपङ्कलोहितकेसरे । शान्तेऽपि शावकस्तस्य कुरुते करिपातनम् ॥४४॥

अर्थ: बड़े-बड़े हाथियोंके रुधिररूपी पंकसे जिसकी गरदनके बाल लाल हो रहे थे ऐसे सिंहके शान्त हो जानेपर भी उसका बच्चा हाथियोंका विघात करता ही है ॥४४॥


इत्युक्त्वा दह्यमानोरुवेणुकान्तारभीषणम् । जहास तेजसास्थानं ग्रसमानः इवाखिलम् ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार जलते हुए बाँसोंके बड़े वनके समान भयंकर वचन कहकर तेजसे समस्त सभाको ग्रसता हुआ शत्रुघ्न जोरसे हँसा ॥४५॥


जगाद च कुदूतस्य तावदस्य विधीयताम् । खलीकारोऽल्पवीर्यस्य सत्यंकार इव द्रुतम् ॥४६॥

अर्थ: और बोला कि बयानेके समान अल्पवीर्य (अतिवीर्य) के इस कुदूतका तिरस्कार शीघ्र ही किया जाये ॥४६॥


इत्युक्ते पादयोर्दूतो गृहीत्वा कुपितैर्भटैः । सारमेय इवागस्वी हन्यमानः कृतध्वनिः ॥४७॥

अर्थ: शत्रुके इस प्रकार कहते ही क्रोधसे भरे योद्धाओंने उस दूतके दोनों पैर पकड़कर उसे घसीटना शुरू किया जिससे वह पीटे जानेवाले अपराधी कुत्तेके समान काँय-काँय करने लगा ॥४७॥


आकृष्टो नगरीमध्यं यावन्मुक्तश्च दुःखितः । दग्धो दुर्वचनैर्धूलीधूसरो निरगात्ततः ॥४८॥

अर्थ: इस तरह नगरीके मध्य तक घसीटकर उसे छोड़ दिया। तदनन्तर दुःखी दुर्वचनोंसे जला और धूलिसे धूसर हुआ वह दूत वहाँसे चला गया ॥४८॥


ततः सागरगम्भीरः परमार्थविशारदः । अपूर्वं दुर्वचः श्रुत्वा किंचित्कोपमुपागतः ॥४९॥

केकयानन्दनः श्रीमान्सुप्रमानन्दनान्वितः । विनिनीषुररिं पुर्या निर्यातः सचिवान्वितः ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर जो समुद्रके समान गम्भीर थे, परमार्थके जाननेवाले थे तथा जो दूतके पूर्वोक्त अपूर्व वचन सुनकर कुछ क्रोधको प्राप्त हुए थे ऐसे श्रीमान् राजा भरत, शत्रुघ्न भाई और मन्त्रियोंको साथ ले, शत्रुका प्रतिकार करनेके लिए नगरीसे बाहर निकले ॥४९-५०॥


श्रुत्वा तं मिथिलाधीशः कनकः पुरुसाधनः । प्राप सिंहोदराद्याश्च राजानो भक्तितत्पराः ॥५१॥

अर्थ: वह सुनकर मिथिलाका राजा कनक बड़ी भारी सेना लेकर भरतसे आ मिला तथा भक्तिमें तत्पर रहनेवाले सिंहोदर आदि राजा भी आ पहुँचे ॥५१॥


चक्रेण महता युक्तो भरतः प्रस्थितस्ततः । नन्द्यावर्तं प्रजा रक्षन् पितेव न्यायकोविदः ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार जो पिताके समान प्रजाकी रक्षा करते थे, तथा जो न्याय-नीतिमें निपुण थे ऐसे राजा भरत बड़ी भारी सेनासे युक्त हो नन्द्यावर्त नगरकी ओर चले ॥५२॥


अतिवीर्योऽपि दूतेन खलीकारप्रदर्शिना । परमं क्रोधमानीतः क्षुब्धाकूपारभीषणः ॥५३॥

भरतायाग्निरोचिष्णुर्गन्तुं संविदधे मतिम् । सामन्तैर्वेष्टितः सर्वैः कृतानेकमहाद्भुतैः ॥५४॥

अर्थ: उधर अपने अपमानको दिखानेवाले दूतने जिसे अत्यन्त कुपित कर दिया था, जो क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान भयंकर था, जो अग्निके समान दमक रहा था तथा अनेक बड़े-बड़े आश्चर्यपूर्ण कार्य करनेवाले सामन्त जिसे घेरे थे ऐसे राजा अतिवीर्यने भी भरतके प्रति चढ़ाई करनेका निश्चय किया ॥५३-५४॥


ततो ललाटभागेन युवचन्द्राकृतिं श्रितः । वनमालापितुः संज्ञां कृत्वा स्वैरं बलोऽवदत् ॥५५॥

युक्तमेवातिवीर्यस्य भरते कर्तुमीदृशम् । पितुर्येन समो भ्राता ज्येष्ठोऽसावपमानितः ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर ललाटसे तरुण चन्द्रमाकी आकृतिके धारण करने- वाले रामने वनमालाके पिता राजा पृथिवीधरको संकेत कर स्वेच्छानुसार कहा कि जिसने पिताके समान बड़े भाईको अपमानित किया है ऐसे भरतपर अतिवीर्यका ऐसा करना उचित ही है ॥५५-५६॥


आगच्छाम्यहमित्युक्त्वा लेखवाहं महीधरः । प्रतिप्रेष्याकरोन्मन्त्रं रामेण पृथिवीधरः ॥५७॥

अतिवीर्योऽतिदुर्वारश्छद्मना तं व्रजाम्यहम् । एवं महीधरेणोक्ते पद्मो विश्रब्धमब्रवीत् ॥५८॥

अज्ञातैरिदमस्माभिः साधनीयं प्रयोजनम् । ततो न महता कृत्यं संरम्भेण तु पार्थिवः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर ‘मैं अभी आता हूँ’ इस प्रकार कहकर राजा पृथिवीधरने दूतको तो विदा किया और रामके साथ बैठकर इस प्रकार सलाह की कि ‘अतिवीर्यका निराकरण करना सरल नहीं है इसलिए मैं छलसे जाता हूँ’। राजा पृथिवीधरके इस प्रकार कहनेपर रामने विश्वासपूर्वक कहा कि हम लोगोंको यह कार्य अज्ञात रूपसे चुपचाप करना योग्य है अतः हे राजन् ! बड़े आडम्बरकी आवश्यकता नहीं है ॥५७-५९॥


तिष्ठ त्वमिह कुर्वाणः सुप्रयुक्तमहं तव । पुत्रजामातृभिः सार्धमन्तं तस्य व्रजाम्यरेः ॥६०॥

अर्थ: आप सुचारु रूपसे अपना काम करते हुए यहीं रहिए मैं आपके पुत्र तथा जँवाईके साथ शत्रुके सम्मुख जाता हूँ ॥६०॥


इत्युक्त्वा रथमारुह्य परं सारबलान्वितैः । महीधरसुतैः साकं ससीतो लक्ष्मणान्वितः ॥६१॥

नन्द्यावर्तपुरीं रामो गन्तुं प्रववृते जवी । प्राप्तश्चावस्थितस्तस्य पुरस्य निकटेऽन्तरे ॥६२॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर राम, लक्ष्मण और सीताके साथ रथपर सवार हो श्रेष्ठ सेना सहित राजा पृथिवीधरके पुत्रोंको साथ ले नन्द्यावर्तपुरीकी ओर चले तथा वेगसे चलकर नगरीके निकट जाकर ठहर गये ॥६१-६२॥


तनुकृत्ये कृते तत्र संबन्धितनयैः सह । रामलक्ष्मणयोर्मन्त्रः सीतायाश्चेत्यवर्तत ॥६३॥

अर्थ: वहाँ स्नान, भोजन आदि शरीर सम्बन्धी कार्य कर चुकनेके बाद राम, लक्ष्मण तथा सीताकी पृथिवीधरके पुत्रोंके साथ निम्न प्रकार सलाह हुई ॥६३॥


जगाद जानकी नाथ भवतः सन्निधौ मम । वक्तुं नैवाधिकारोऽस्ति किं तारा भान्ति भास्करे ॥६४॥

अर्थ: सलाहके बीच सीताने रामसे कहा कि हे नाथ ! यद्यपि आपके समीप मुझे कहनेका अधिकार नहीं है क्योंकि सूर्यके रहते हुए क्या तारा शोभा देते हैं ? ॥६४॥


तथापि देव भाषेऽहं प्रेरिता हितकाम्यया । जातो वंशलतातोऽपि मणिः संगृह्यते ननु ॥६५॥

अर्थ: तथापि हे देव ! हितकी इच्छासे प्रेरित हो कुछ कह रही हूँ सो ठीक ही है क्योंकि वंशकी लतासे उत्पन्न हुआ मणि भी तो ग्राह्य होता है ॥६५॥


अतिवीर्योऽतिवीर्योऽयं महासाधनसंगतः । क्रूरकर्मा कथं शक्यो जेतुं भरतभूभृता ॥६६॥

अर्थ: सीताने कहा कि यह अतिवीर्य, अत्यन्त बलवान्, बड़ी भारी सेनासे सहित तथा क्रूरतापूर्ण कार्य करनेवाला है सो भरतके द्वारा कैसे जीता जा सकता है ? ॥६६॥


अतस्तन्निर्जये तावदुपायाश्चिन्त्यतां द्रुतम् । सहसारभ्यमाणं हि कार्यं व्रजति संशयम् ॥६७॥

अर्थ: अतः शीघ्र ही उसके जीतनेका उपाय सोचिए क्योंकि सहसा प्रारम्भ किया हुआ कार्य संशयमें पड़ जाता है ॥६७॥


त्रिलोकेऽप्यस्ति नासाध्यं भवतो लक्ष्मणस्य वा । किंतु प्रस्तुतमत्यक्त्वा समारब्धं प्रशस्यते ॥६८॥

अर्थ: यद्यपि तीन लोकमें भी ऐसा कार्य नहीं है जो आप तथा लक्ष्मणके असाध्य हो किन्तु जो कार्य प्रकृत कार्यको न छोड़कर प्रारम्भ किया जाता है वही प्रशंसनीय होता है ॥६८॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत्किमेवं देवि भाषसे । पश्य श्वो निहितं पापमणुवीर्यं मया रणे ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने कहा कि हे देवि ! ऐसा क्यों कहती हो, तुम कल ही अणुवीर्य ( अतिवीर्य ) को रणमें मेरे द्वारा मरा हुआ देख लेना ॥६९॥


रामपादरजःपूतशिरसो मे सुरैरपि । न शक्यते पुरः स्थातुं क्षुद्रवीर्ये तु का कथा ॥७०॥

अर्थ: रामकी चरण-धूलिसे जिसका शिर पवित्र है ऐसे मेरे सामने देव भी खड़े होनेके लिए समर्थ नहीं हैं फिर अणुवीर्यकी तो बात ही क्या है ? ॥७०॥


न यावदथवा याति भानुरस्तं कुतूहली । वीक्ष्यतां तावदद्यैव क्षुद्रवीर्यस्य पञ्चताम् ॥७१॥

अर्थ: अथवा कुतूहलसे भरा सूर्य जबतक अस्त नहीं होता है तबतक आज ही अणुवीर्यकी मृत्यु देख लेना ॥७१॥


युवगर्वसमाध्माता संबन्धितनया अपि । एतदेव वचोऽमुञ्चन्प्रतिशब्दमिवोन्नतम् ॥७२॥

अर्थ: तरुण लक्ष्मणके गर्वसे फूले राजा पृथिवीधरके पुत्रोंने भी प्रतिध्वनिके समान यही जोरदार शब्द कहे ॥७२॥


ततः पद्मो निवार्यैतां भ्रूभङ्गेन महामनाः । अब्रवील्लक्ष्मणं धैर्यादब्धिं गण्डूषयन्निव ॥७३॥

युक्तमुक्तमलं तात जानक्या वस्तु पुष्कलम् । स्फुटीकृतं तु नात्यन्तमत्यासादनभीतया ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर धैर्यसे समुद्रको कुल्लेके समान तुच्छ करनेवाले महामना रामने भ्रकुटिके भंगसे पृथिवीधरके पुत्रोंको रोककर लक्ष्मणसे कहा कि हे तात ! सीताने सब बात बिलकुल ठीक कही है केवल रहस्य खुल न जाये इससे भयभीत हो खुलासा नहीं किया है ॥७३-७४॥


अस्याः शृणु यदाकूतमतिवीर्यो बलोद्धतः । भरतेन स नो शक्यो वशीकर्तुं रणाजिरे ॥७५॥

अर्थ: उसका जो अभिप्राय है वह सुनो। यह कह रही है कि चूँकि अतिवीर्य बलसे उद्धत है अतः भरतके द्वारा रणांगणमें वश करनेके योग्य नहीं है ॥७५॥


भागो न भरतस्तस्य दशमोऽपि भवत्यतः । तस्य दावानलस्यायं किं करोति महागजः ॥७६॥

अर्थ: भरत उसके दशवें भाग भी नहीं है वह दावानलके समान है अतः यह महागज उसका क्या कर सकता है ? ॥७६॥


दन्तिभिश्च समृद्धस्य समृद्धोऽपि तुरङ्गमैः । भरतो नैव शक्तोऽस्य तथा विन्ध्यस्य केसरी ॥७७॥

अर्थ: यद्यपि भरत घोड़ोंसे समृद्ध है पर अतिवीर्य हाथियोंसे समृद्ध है अतः जिस प्रकार सिंह विन्ध्याचलका कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार भरत भी अतिवीर्यका कुछ नहीं कर सकता ॥७७॥


भरतस्य जये नात्र संशयोऽपि समीक्ष्यते । एकान्तस्तु कुतो वापि स्याजन्तुप्रलयस्तथा ॥७८॥

अर्थ: वह भरतको जीत लेगा इसमें कुछ भी संशय नहीं है अथवा दो में से किसीकी जीत होगी पर उससे प्राणियोंका विनाश तो होगा ही ॥७८॥


कष्टमेककयोर्जाते विरोधे कारणं विना । पक्षद्वयं मनुष्याणां जायते विवशक्षयम् ॥७९॥

अर्थ: जब बिना कारण ही दो व्यक्तियोंमें परस्पर विरोध होता है तब दोनों पक्षके मनुष्योंका विवश होकर क्षय होता ही है ॥७९॥


दुरात्मनातिवीर्येण भरते च वशीकृते । जायते रघुगोत्रस्य कलङ्कः पश्य कोदृशः ॥८०॥

अर्थ: और यदि दुष्ट अतिवीर्यने भरतको वश कर लिया तो फिर देखो रघुवंशका कैसा अपयश उत्पन्न होता है ? ॥८०॥


नेक्ष्यते संधिरप्यत्र शत्रुघ्नेन च मानिना । शैशवेन कृतं दोषं शत्रावत्युद्धते शृणु ॥८१॥

विभावर्यां तमिस्रायां किलावस्कन्ददायिना । रौद्रभूतिसमेतेन शत्रुघ्नेन चरिष्णुना ॥८२॥

निद्रावशीकृतान् वीरान् बहून् कृत्वा मृतक्षतान् । हस्तिनश्च दुरारोहान् प्रगलद्दाननिर्झरान् ॥८३॥

चतुःषष्टिसहस्राणि वाजिनां वातरंहसाम् । शतानि सप्त चेमानामञ्जनाद्रिसमत्विषाम् ॥८४॥

बाह्यस्थानि पुरस्यास्य नीतानि दिवसैस्त्रिभिः । भरतस्यान्तिकं किं ते न श्रुतानि जनास्यतः ॥८५॥

अर्थ: इस विषयमें सन्धि भी होती नहीं दिखती क्योंकि मानी शत्रुघ्नने लड़कपनके कारण अत्यन्त उद्धत शत्रुके बहुत दोष - अपराध किये हैं सुनो, रौद्रभूतिके साथ मिलकर शत्रुघ्नने अन्धेरी रातमें छापा मार-मारकर उसके बहुत-से निद्रानिमग्न वीरोंको तथा जिनपर चढ़ना कठिन था और जिनसे मदके निर्झर झर रहे थे ऐसे बहुत-से हाथियोंको मारा । पवनके समान वेगशाली चौंसठ हजार घोड़े और अंजनगिरिके समान आभावाले सात सौ हाथी जो कि इसके नगरके बाहर स्थित थे, तीन दिन तक चुराकर भरतके पास ले गया सो क्या लोगोंके मुँहसे तुमने सुना नहीं है ? ॥८१-८५॥


दृष्ट्वा कलिङ्गराजस्तान् गाढशल्यान् बहून्नृपान् । जीवेन च विनिर्मुक्तान् हृतं ज्ञात्वा च साधनम् ॥८६॥

संप्राप्तः परमं क्रोधमप्रमत्तः समन्ततः । बैरिनिर्यातनं कृत्वा बुद्धौ रणमुदीक्ष्यते ॥८७॥

अर्थ: कलिगाधिपति अतिवीर्यने जब देखा कि बहुत-से राजाओंको गहरी शल्य लगी हुई है तथा कितने ही राजा निष्प्राण हो गये हैं और साथ ही बहुत-सी सेनाका अपहरण हुआ है तब वह परम क्रोधको प्राप्त हुआ । अब वह सब ओरसे सावधान है और बुद्धिमें वैरीसे बदला लेनेका विचार कर रणकी प्रतीक्षा कर रहा है ॥८६-८७॥


दण्डोपायं परित्यज्य भरतो मानिनां वरः । हेतुं तन्निर्जये नान्यं प्रयुङ्क्ते बुद्धिमानपि ॥८८॥

अर्थ: भरत मानियोंमें श्रेष्ठ है तथा बुद्धिमान् भी इसलिए वह उसके जीतनेमें एक युद्धरूपी उपायको छोड़कर अन्य उपाय प्रयोगमें नहीं लाना चाहता ॥८८॥


अथ त्वं साधयस्येयं केनैतन्न प्रतीयते । शक्तिस्ते प्रभवेत्तात तीव्रांशोरपि यातने ॥८९॥

किंत्वयं वर्ततेऽत्रैव प्रदेशे भरतोऽधुना । निर्गत्य च तथायुक्तं प्रकटीकरणं ननु ॥९०॥

अर्थ: यद्यपि तुम इसे ठीक कर सकते हो यह किसे प्रतीत नहीं है ? अथवा हे तात ! इसकी बात जाने दो तुझमें तो सूर्यको भी गिरानेकी शक्ति है किन्तु भरत इसी प्रदेशमें विद्यमान है अर्थात् यहाँसे बहुत ही निकट है सो इस समय उस तरह अयोध्यासे निकलकर प्रकट होना उचित नहीं है ॥८९-९०॥


अज्ञाता एव ये कार्यं कुर्वन्ति पुरुषाद्भुतम् । तेऽतिश्लाघ्या यथात्यन्तं निवृष्य जलदा गताः ॥९१॥

अर्थ: जो लोग अज्ञात रहकर मनुष्योंको आश्चर्यमें डाल देनेवाला भारी उपकार करते हैं वे चुपचाप बरसकर गये हुए रात्रिके मेघोंके समान अत्यन्त प्रशंसनीय हैं ॥९१॥


इति मन्त्रयमाणस्य रामस्य मतिरुद्गता । अतिवीर्यग्रहोपाये ततो मन्त्रः समापितः ॥९२॥

अर्थ: इस प्रकार सलाह करते-करते रामको, अतिवीर्यके वश करनेका उपाय सूझ आया और उसके बाद सलाहका काम समाप्त हो गया ॥९२॥


प्रमादरहितस्तत्र कृतप्रवरसंकथः । सुखेन शर्वरीं नीत्वा रामः स्वजनसंगतः ॥९३॥

अर्थ: अथानन्तर आत्मीयजनोंके साथ मिले हुए रामने, प्रमादरहित हो उत्तमोत्तम कथाएँ कहते हुए सुखसे रात्रि व्यतीत की ॥९३॥


आवासान्निर्गतोऽपश्यदार्यिकाजनलक्षितम् । जिनेन्द्रभवनं भक्त्या प्रविवेश च साञ्जलिः ॥९४॥

अर्थ: दूसरे दिन डेरेसे निकलकर रामने आर्यिकाओंसे सहित जिनमन्दिर देखा सो हाथ जोड़कर बड़ी भक्तिसे उसमें प्रवेश किया ॥९४॥


नमस्कारं जिनेन्द्राणां विधायार्याजनस्य च । सकाशे वरधर्माया गणपाल्याः सशस्त्रिकाम् ॥९५॥

स्थापयित्वा कृती सीतां कृत्वात्मानं च वर्णिनीम् । स्त्रीवेषधारिभिः सार्धं सुरूपैर्लक्ष्मणादिभिः ॥९६॥

अर्थ: भीतर प्रवेश कर जिनेन्द्र भगवान् तथा आर्यिकाओंको नमस्कार किया । वहाँ आर्यिकाओंकी जो वरधर्मा नामकी गणिनी थी उसके पास सीताको रखा तथा सीताके पास ही अपने सब शस्त्र छोड़े । तदनन्तर अतिशय चतुर रामने अपने आपका नृत्यकारिणीका वेश बनाया और साथ ही अत्यन्त सुन्दर रूपको धारण करनेवाले लक्ष्मण आदिने भी स्त्रियोंके वेष धारण किये ॥९५-९६॥


कृत्वा पूजां जिनेन्द्राणां बहुमङ्गलभूषिताम् । नरेन्द्रभवनद्वारं प्रतस्थे लीलयान्वितः ॥९७॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिनेन्द्र भगवान्की मंगलमयी पूजा कर सब लोगोंके साथ रामने लीलापूर्वक राजमहलके द्वारकी ओर प्रस्थान किया ॥९७॥


सुरेन्द्रगणिकातुल्यं वीक्ष्य तं वर्णिनी जनम् । सर्वः पौरजनो लग्नः पश्चाद्गन्तुं सविस्मयः ॥९८॥

अर्थ: इन्द्रनर्तकीकी तुलना करनेवाली उन नर्तकियोंको देखकर आश्चर्यसे भरे समस्त नगरवासी उनके पीछे लग गये ॥९८॥


सर्वलोकस्य नेत्राणि मनांसि च सुचेष्टिताः । हरन्त्यस्ता नृपागारं प्राप्ता द्वारि सुमण्डनाः ॥९९॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम चेष्टाओं और सुन्दर आभूषणोंको धारण करनेवाली वे नृत्यकारिणी सब लोगोंके नेत्र और मनको हरती हुईं राजमहलके द्वारपर पहुँचीं ॥९९॥


ते चतुर्विंशतिर्भक्त्या जिनेन्द्रा भक्तितत्परैः । वन्द्यन्तेऽस्माभिरित्येवं तेवातेवा ध्वनिं पुरः ॥१००॥

कृत्वा पुराणवस्तूनि गातुमुत्फुल्ललोचनाः । गम्भीरभारतीतानासक्ताश्चारणयोषितः ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नेत्रकमल विकसित थे तथा जो भारतीकी गम्भीर तान खींचनेमें आसक्त थीं ऐसी उन नृत्यकारिणी स्त्रियोंने ‘भक्तिमें तत्पर रहनेवाली हम सब चौबीस तीर्थंकरोंको भक्तिपूर्वक नमस्कार करती हैं’, यह कहकर सब प्रथम ‘तेवा-लेवा’ यह अव्यक्त ध्वनि कीं फिर पुराणोंमें प्रतिपादित वस्तुओंका गाना शुरू किया ॥१००-१०१॥


ध्वनिमश्रुतपूर्वं तं श्रुत्वा तासां नराधिपः । आजगाम गुणाकृष्टः काष्ठमार इवोदके ॥१०२॥

अर्थ: उन नृत्यकारिणियोंकी अश्रुतपूर्वं ध्वनि सुनकर गुणोंसे खिंचा राजा अतिवीर्य उनके पास इस तरह आ गया जिस तरह कि पानीमें गुण अर्थात् रस्सीसे खिंचा काष्ठका भार खींचनेवालेके पास आता है ॥१०२॥


ततो रेचकमादाय ललिताङ्गविवर्तनम् । नृपस्याभिमुखीभावं जगाम वरवर्त्तनी ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर फिरकी लेकर सुन्दर अंगोंको मोड़ती हुए श्रेष्ठ नर्तकी राजाके सम्मुख गयी ॥१०३॥


सस्मितालोकितैस्तस्या विगलद्भ्रूसमुद्गमैः । गमकानुगतैः कम्पैस्तनभारस्य हारिणः ॥१०४॥

मन्थरैश्चारुसंचारैर्जघनस्य घनस्य च । तथा बाहुलताहारैः सुलीलकरपल्लवैः ॥१०५॥

पादन्यासैर्लघुस्पृष्टविमुक्तधरणीतलैः । आशु संपादितैः स्थानैः केशपाशविवर्तनैः ॥१०६॥

त्रिकस्य बलनैर्भागगात्रसंदर्शितात्मभिः । कामबाणैरिमैर्लोकः सकलः समताड्यत ॥१०७॥

अर्थ: वहाँ उसका मन्द-मन्द मुसकानके साथ देखना, भौंहोंका चलाना, विज्ञ मनुष्य ही जिसे समझ पाते थे ऐसे सुन्दर स्तनोंका कँपाना, धीमी-धीमी सुन्दर चालसे चलना, स्थूल नितम्बका मटकाना, भुजारूप लताओंका चलाना, उत्तम लीलाके साथ हस्तरूपी पल्लवोंका किराना, जिनमें शीघ्रतासे स्पर्श कर पृथिवीतल छोड़ दिया जाता था ऐसे पैर रखना, शीघ्रतासे नृत्यकी अनेक मुद्राओंका बदलना, केशपाशका चलाना, कटिकी अस्थिका हिलाना, तथा नाभि आदि शरीरके अवयवोंका दिखलाना आदि कामके बाणोंसे समस्त मनुष्य ताड़े गये थे ॥१०४-१०७॥


मूर्छनाभिः स्वरैर्ग्रामैर्यथास्थानं नियोजितैः । नर्तकी सा जगौ वल्गु परिलीनसखीस्वरम् ॥१०८॥

अर्थ: वह नर्तकी, जिनका यथास्थान प्रयोग किया गया था ऐसी मूर्च्छनाओं, स्वरों तथा ग्रामों - स्वरोंके समूहसे सखियोंके स्वरको अपने स्वरमें मिलाकर बहुत सुन्दर गा रही थी ॥१०८॥


यत्र तत्र समुद्देशे नर्तकी कुरुते स्थितिम् । तत्र तत्र समा सर्वा नयनानि प्रयच्छति ॥१०९॥

अर्थ: वह नृत्यकारिणी जिस-जिस स्थानमें ठहरती थी सारी सभा उसी-उसी स्थानमें अपने नेत्र लगा देती थी ॥१०९॥


तस्या रूपेण चक्षूंषि स्वरेण श्रवणेन्द्रियम् । मनांसि तद्द्वयेनापि बद्धानि सदसो दृढम् ॥११०॥

अर्थ: सारी सभाके नेत्र उसके रूपसे, कान मधुर स्वरसे और मन, रूप तथा स्वर दोनोंसे मजबूत बँध गये थे ॥११०॥


उत्फुल्लमुखराजीवा सामन्ता दानतत्परा । बभूवुर्निरलंकारा संव्यानाम्बरधारिणः ॥१११॥

अर्थ: जिनके मुखकमल विकसित थे ऐसे सामन्त लोग उन नर्तकियोंको पुरस्कार देते-देते अलंकाररहित हो गये थे उनके शरीरपर केवल पहननेके वस्त्र ही बाकी रह गये थे ॥१११॥


आतोद्यानुगतं नृत्यं तत्तस्यास्त्रिदशानपि । वशीकुर्वीत कैवास्था सुहरेष्वन्यजन्तुषु ॥११२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! गायन-वादनसे सहित उस नृत्यकारिणीका वह नृत्य देवोंको भी वश कर सकता था फिर जिनका हरा जाना सरल बात थी ऐसे अन्य मनुष्योंकी तों बात ही क्या थी ? ॥११२॥


विधाय वृषभादीनां चरितस्य प्रकीर्तनम् । संक्षेपेण वशीकृत्य समितिं सकलां भृशम् ॥११३॥

संगीतेन समुद्युक्ता राजानमिति नर्तकी । दधाना परमां दीप्तिमुपालब्धुं सुदुस्सहम् ॥११४॥

अर्थ: इस तरह संक्षेपसे ऋषभ आदि तीर्थंकरोंके चरित्रका कीर्तन कर जब उस नर्तकीने समस्त सभाको अत्यन्त वशीभूत कर लिया तब वह संगीतसे परम दीप्तिको धारण करती हुई राजाको इस प्रकारका असह्य उलाहना देनेके लिए तत्पर हुई ॥११३-११४॥


अतिवीर्य किमेतत्ते दुष्टं व्यवसितं महत् । नयहीनमिदं वस्तु तेनात्र त्वं नियोजितः ॥११५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे अतिवीर्य ! यह तेरी अतिशय दुष्ट चेष्टा क्या है ? तेरा यह कार्य नीतिसे रहित है, किसने तुझे इस कार्यमें लगाया है ? ॥११५॥


किमिति स्वविनाशाय केकयानन्दनस्त्वया । शान्तचेताः शृगालेन केसरीव प्रकोपितः ॥११६॥

अर्थ: जिस तरह शृगाल सिंहको कुपित करता है उस तरह तूने शान्त चित्त भरतको अपना नाश करनेके लिए इस तरह क्यों कुपित किया है ? ॥११६॥


एवं गतेऽपि बिभ्राणः परमं विनयं द्रुतम् । संप्रसादय तं गत्वा यदि ते जीवितं प्रियम् ॥११७॥

अर्थ: इतना सब होनेपर भी यदि तुझे अपना जीवन प्यारा है तो शीघ्र ही परम विनयको धारण करता हुआ जाकर भरतको प्रसन्न कर ॥११७॥


जाता विशुद्धवंशेषु वरक्रीडनभूमयः । माभूवन् विधवा मद्र तवैता वरयोषितः ॥११८॥

अर्थ: हे भद्र ! विशुद्ध कुलमें उत्पन्न तथा उत्तम क्रीड़ाकी भूमिस्वरूप तेरी ये स्त्रियाँ विधवा न हों ॥११८॥


एतास्त्वया परित्यक्ता विमुक्ताशेषभूषणाः । ध्रुवं पुरा न शोभन्ते ताराश्चन्द्रमसा यथा ॥११९॥

अर्थ: तुझसे रहित होनेपर जिनने समस्त आभूषण छोड़ दिये हैं ऐसी ये उत्तम स्त्रियाँ चन्द्रमासे रहित ताराओंके समान निश्चित ही शोभत्त नहीं होंगी ॥११९॥


निवर्तय द्रुतं चित्तमशुभध्यानतत्परम् । उत्तिष्ठ व्रज निर्माणो नमस्य भरतं सुधीः ॥१२०॥

अर्थ: इसलिए अशुभ ध्यानमें जानेवाले अपने चित्तको शीघ्र ही लौटा, उठ, जा और मानरहित हो भरतको नमस्कार कर। तू बुद्धिमान् है ॥१२०॥


एवं कुरु न चेदेवं कुरुषे पुरुषाधम । ततोऽद्यैव विनष्टोऽसि संशयोऽत्र न विद्यते ॥१२१॥

अर्थ: अतः ऐसा कर। हे अधम पुरुष ! यदि तू ऐसा नहीं करता है तो आज ही नष्ट हो जायेगा इसमें संशय नहीं है ॥१२१॥


जीवत्येवानरण्यस्य पौत्रे राज्यं समीहसे । चकासति रवौ पापलक्ष्मीर्दोषाकरस्य का ॥१२२॥

अर्थ: अनरण्यके पोता भरतके जीवित रहते हीं तू राज्य चाहता है सो सूर्यके देदीप्यमान रहते चन्द्रमाकी क्या शोभा है ? ॥१२२॥


पतितस्याद्य नो रूपे मरणं ते समुद्गतम् । शलभस्येव मूढस्य दुष्पक्षस्य प्रियद्युतेः ॥१२३॥

अर्थ: जिस प्रकार कान्तिके लोभी तथा कमजोर पंखोंवाले मूर्ख शलभका मरण आ पहुँचता है उसी प्रकार हम लोगोंके रूपपर आसक्त तथा खोटे सहायकोंसे युक्त तुझ मूढ़का आज मरण आ पहुँचा है ॥१२३॥


देवेन भरतेनामा गरुडेन महात्मना । अलगर्दाधमो भूत्वा प्रतिस्पर्धनमिच्छति ॥१२४॥

अर्थ: तू जलके साँपके समान तुच्छ होकर भी गरुड़के समान जो महात्मा राजा भरत हैं उनके साथ ईर्ष्या करना चाहता है ॥१२४॥


ततो निर्भर्त्सनं स्वस्य भरतस्य च शंसनम् । निशम्य संसदा साकमभूत्ताम्रेक्षणो नृपः ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर नृत्यकारिणीके मुखसे अपना तर्जन और भरतकी प्रशंसा सुनकर राजा अतिवीर्य सभाके साथ लाल-लाल नेत्रोंका धारक हो गया अर्थात् क्रोधवश उसके नेत्र लाल हो गये ॥१२५॥


विरक्ता च सभात्यन्तपरं रूक्षितमानसा । जुघूर्णार्णववेलेव भ्रूतरङ्गसमाकुला ॥१२६॥

अर्थ: जिसका मन अत्यन्त रूक्ष हो गया था, जिसका प्रेम समाप्त हो चुका था और जो भ्रकुटिरूपो तरंगोंसे व्याकुल थी ऐसी सारी सभा समुद्रकी वेलाके समान क्षोभको प्राप्त हुई ॥१२६॥


अतिवीर्यो रुषा कम्पो यावज्जग्राह सायकम् । तावदुत्पत्य नर्तक्या सविलासकृतभ्रमम् ॥१२७॥

मण्डलाग्रं समाक्षिप्य वीक्षमाणेषु राजसु । जीवग्राहं विषण्णात्मा केशेषु जगृहे दृढम् ॥१२८॥

अर्थ: क्रोधसे काँपते हुए अतिवीर्यने ज्योंही तलवार उठायी त्योंही नर्तकीने विलासपूर्वक विभ्रम दिखाते हुए उछलकर तलवार छीन ली और सब राजाओंके देखते-देखते अतिवीर्यको जीवित पकड़कर मजबूतीसे उसके केश बाँध लिये ॥१२७-१२८॥


उद्यम्य नर्तकी खड्गं पश्यन्ती नृपसंहतिम् । जगादाविनयी योऽत्र स मे वध्यो विसंशयम् ॥१२९॥

अर्थ: नर्तकीने तलवार उठाकर राजाओंकी ओर देखते हुए कहा कि यहाँ जो भी अविनय करेगा वह निःसन्देह मेरे द्वारा होगा ॥१२९॥


परित्यज्यातिवीर्यस्य पक्षं विनयमण्डनाः । भरतस्य द्रुतं पादौ नमत प्रियजीविताः ॥१३०॥

अर्थ: यदि आप लोगोंको अपना जीवन प्यारा है तो अतिवीर्यका पक्ष छोड़कर विनयरूपी आभूषणसे युक्त हो शीघ्र ही भरतके चरणोंमें नमस्कार करो ॥१३०॥


भरतो जयति श्रीमान् गुणस्फीतांशुमण्डलः । दशस्यन्दनवंशेन्दुर्लोकानन्दकरः परः ॥१३१॥

लक्ष्मीकुमुद्वती यस्य विकासं भजते तराम् । द्विषत्तपननिर्मुक्ता कुर्वतः परमाद्भुतम् ॥१३२॥

अर्थ: जो लक्ष्मीसे युक्त है, गुण ही जिसकी विस्तृत किरणोंका समूह है, जो लोगोंको परम आनन्दका देनेवाला है, जिसकी लक्ष्मीरूपी कुमुदिनी शत्रुरूपी सूर्यसे निर्मुक्त होकर परम विकासको प्राप्त हो रही है तथा जो अत्यन्त आश्चर्यजनक कार्य कर रहा है ऐसा दशरथके वंशका चन्द्रमा भरत जयवन्त है ॥१३१-१३२॥


उज्जगाम ततो लोकवक्त्रेभ्य इति निस्वरः । अहो वृत्तमिदं चित्रमिन्द्रजालोपमं महत् ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर लोगोंके मुखसे इस प्रकारके शब्द निकलने लगे कि अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है, यह तो बहुत भारी इन्द्रजालके समान है ॥१३३॥


यस्य चारणकन्यानामिदमीदृग्विचेष्टितम् । भरतस्य स्वयं तस्य शक्तिः शक्रं जयेदपि ॥१३४॥

अर्थ: जिसकी नृत्यकारिणियोंकी यह ऐसी चेष्टा है उस भरतकी शक्तिका क्या ठिकाना ? वह तो इन्द्रको भी जीत लेगा ॥१३४॥


न विद्मः स किमस्माकं क्रुद्धो नाथः करिष्यति । अथवा सप्रणामेषु देवो यास्यति मार्दवम् ॥१३५॥

अर्थ: न जाने वह राजा भरत कुपित होकर हमारा क्या करेगा ? अथवा प्रणाम करनेवालोंपर वह अवश्य ही मार्दवभावको प्राप्त होगा ॥१३५॥


ततः करिणमारुह्य राघवः सातिवीर्यकः । सहितः परिवर्गेण ययौ जिनवरालयम् ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर राम अतिवीर्यको पकड़ हाथीपर सवार हो अपने परिजनके साथ जिनमन्दिर गये ॥१३६॥


अवतीर्य गजात्तत्र प्रविश्य प्रमदान्वितः । चक्रे सुमहतीं पूजां कृतमङ्गलनिस्वनः ॥१३७॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने हाथीसे उतरकर बड़े हर्षसे मन्दिरके भीतर प्रवेश किया और मंगलमय शब्दोंका उच्चारण कर बड़ी भारी पूजा की ॥१३७॥


वरधर्मापि सर्वेण संघेन सहितापरम् । राघवेण ससीतेन नीता तुष्टेन पूजनम् ॥१३८॥

अर्थ: मन्दिरमें सर्वसंघके साथ जो वरधर्मा नामकी गणिनी ठहरी हुई थीं रामने सीताके साथ सन्तुष्ट होकर उनकी भी उत्तम पूजा की ॥१३८॥


अतिवीर्योऽत्र पद्मेन लक्ष्मणाय समर्पितः । तस्यासौ वधमुद्युक्तः कर्तुमौच्यत सीतया ॥१३९॥

मावीवधोऽस्य लक्ष्मीमन् कन्धरां निष्ठुराशय । केशेषु मागृहीर्गाढं कुमारं भज सौम्यताम् ॥१४०॥

अर्थ: यहाँ रामने अतिवीर्यको लक्ष्मणके लिए सौंप दिया और वे उसका वध करनेके लिए उद्यत हुए तब सीताने कहा कि हे लक्ष्मीधर ! निष्ठुर अभिप्रायके धारी हो इसकी ग्रीवा मत छेदो और न जोरसे इसके केश ही पकड़ो । हे कुमार ! सौम्यताको प्राप्त होओ ॥१३९-१४०॥


को दोषः कर्मसामर्थ्याद्यदायान्त्यापदं नराः । रक्ष्या एव तथाप्येते दधतामतिसाधुताम् ॥१४१॥

अर्थ: इस बेचारेका क्या दोष है ? यद्यपि मनुष्य कर्मोंकी सामर्थ्यसे आपत्तिको प्राप्त होते हैं तथापि सज्जनताको धारण करनेवाले मनुष्य उनकी रक्षा ही करते हैं ॥१४१॥


इतरोऽपि खलीकर्तुं साधूनां नोचितो जनः । किमुतायं नरेशानां सहस्राणां प्रपूजितः ॥१४२॥

अर्थ: जो सज्जन पुरुष हैं उन्हें साधारण मनुष्यको भी दुःखी करना उचित नहीं है फिर यह तो हजारों राजाओंका पूज्य है इसकी बात ही क्या है ? ॥१४२॥


कुर्वेनं मुक्तकं भद्र भवतायं वशीकृतः । जानानः स्वस्य सामर्थ्यं क्वानुगच्छति सांप्रतम् ॥१४३॥

अर्थ: हे भद्र ! इसे आपने वश कर ही लिया है अतः इसे छोड़ दो । अपनी सामर्थ्यको जानता हुआ यह अब कहाँ जायेगा ? ॥१४३॥


गृहीत्वा समयेनास्य सन्मानमुपलम्भिताः । विमुच्यन्ते पुनर्भूयो मर्यादेयं चिरन्तनी ॥१४४॥

अर्थ: प्रबल शत्रुओंको पकड़कर तदनन्तर सन्धिके अनुसार सम्मान कर उन्हें छोड़ दिया जाता है यह चिरकालकी मर्यादा है ॥१४४॥


इत्युक्तो मस्तके कृत्वा करराजीवकुड्मलम् । जगाद लक्ष्मणो देवि यद्ब्रवीषि तथैव तत् ॥१४५॥

अर्थ: सीताके इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मणने हस्तकमल जोड़ मस्तकपर लगाते हुए कहा कि हे देवि ! आप जो कह रही हैं वह वैसा ही है ॥१४५॥


आस्तां स्वामिनि ते वाक्यात्तावदस्य विमोचनम् । सुराणामप्यमुं पूज्यं कुर्वीयं त्वत्प्रसादतः ॥१४६॥

अर्थ: हे स्वामिनि, आपकी आज्ञासे इसका छोड़ना तो दूर रहा इसे आपके प्रसादसे ऐसा कर सकता हूँ कि यह देवताओंका भी पूज्य हो जाये ॥१४६॥


एवं प्रशान्तसंरम्भे सद्यो लक्ष्मीधरे स्थिते । अतिवीर्यो विबुद्धात्मा स्तुत्वा पद्ममभाषत ॥१४७॥

अर्थ: इस प्रकार शीघ्र ही लक्ष्मणके शान्त होनेपर प्रतिबोधको प्राप्त हुआ अतिवीर्य रामकी स्तुति कर कहने लगा ॥१४७॥


साधु साधु त्वया चित्रं कृतमीदृग्विचेष्टितम् । कदाचिदप्यनुत्पन्ना ममाद्य मतिरुद्गता ॥१४८॥

अर्थ: कि आपने जो यह अद्भुत चेष्टा की सो बड़ा भला किया। मेरी जो बुद्धि कभी उत्पन्न नहीं हुई वह आज उत्पन्न हो गयी ॥१४८॥


विमुक्तहारमुकुटं दृष्ट्वा तं करुणान्वितः । विश्रब्धं राघवोऽवोचत् सौम्याकारपरिग्रहः ॥१४९॥

मा व्रजीरङ्ग दैन्यं त्वं धत्स्व धैर्यं पुरातनम् । महतामेव जायन्ते संपदो विपदन्विताः ॥१५०॥

अर्थ: इतना कह उसने हार और मुकुट उतारकर रख दिये । यह देख सौम्य आकारको धारण करनेवाले दयालु रामने विश्वास दिलाते हुए कहा कि हे भद्र ! तू दीनताको प्राप्त मत हो, पहले-जैसा धैर्य धारण कर, विपत्तियोंसे सहित सम्पदाएँ महापुरुषोंको ही प्राप्त होती हैं ॥१४९-१५०॥


न चात्र काचिदापत्ते नंद्यावर्ते क्रमागते । भरतस्य वशो भूत्वा कुरु राज्यं यथेप्सितम् ॥१५१॥

अर्थ: अब मुझे कोई आपत्ति नहीं है ! इस क्रमागत नन्द्यावर्तनगरमें भरतका आज्ञाकारी होकर इच्छानुसार राज्य कर ॥१५१॥


अतिवीर्यस्ततोऽवोचन्न मे राज्येऽधुना स्पृहा । राज्येन मे फलं दत्तमधुनान्यत्र सज्ज्यते ॥१५२॥

अर्थ: तदनन्तर अतिवीर्यने कहा कि अब मुझे राज्यकी इच्छा नहीं है। राज्यने मुझे फल दे दिया है। अब दूसरे ही अवस्थामें लगना चाहता हूँ ॥१५२॥


आसीन्मया कृता वांछा हिमवत्सागरावधि । जेतुं वसुन्धरा येन बिभ्रता मानमुत्तमम् ॥१५३॥

सोऽहं स्वमानमुन्मूल्य भूत्वा सारविवर्जितः । कुर्यां प्रणतिमन्यस्य कथं पुरुषतां दधत् ॥१५४॥

अर्थ: उत्कट मानको धारण करते हुए मैंने हिमवान्से लेकर समुद्र तककी सारी पृथिवी जीतनेकी इच्छा की थी सो मैं अपने मानको उखाड़कर निःसार हो गया हूँ अब मैं पुरुषत्वको धारण करता हुआ अन्यको नमस्कार कैसे कर सकता हूँ ? ॥१५३-१५४॥


षट्खण्डा यैरपि क्षोणी पालितेयं महानरैः । न तृप्तास्तेऽप्यहं ग्रामैः पञ्चभिस्तु किमेतकैः ॥१५५॥

अर्थ: जिन महापुरुषोंने इस छहखण्डकी रक्षा की है वे भी सन्तोषको प्राप्त नहीं हुए फिर मैं इन पांच गांवोंसे कैसे सन्तुष्ट हो सकता हूँ ? ॥१५५॥


जन्मान्तरकृतस्यास्य बलितां पश्य कर्मणः । छायाहानिमहं येन राहुणेन्दुरिवाहृतः ॥१५६॥

अर्थ: जन्मान्तरमें किये हुए इस कर्मकी बलवत्ता तो देखो कि जिस प्रकार राहु चन्द्रमाको कान्तिरहित कर देता है उसी प्रकार इसने मुझे कान्ति-रहित - निस्तेज कर दिया ॥१५६॥


मानुष्यकमिदं जातं सारमुक्तं मयाधुना । सुराणामपि वार्तैषा किमन्यत्राभिधीयताम् ॥१५७॥

अर्थ: जिस मनुष्य पर्यायके लिए देव भी चर्चा करते हैं औरोंकी तो बात ही क्या है उस मनुष्य पर्यायको मैंने अब तक निःसार खोया ॥१५७॥


सोऽहं पुनर्भवाद्भीरुस्त्वया संप्रतिबोधितः । तथाविधां मजे चेष्टां यया मुक्तिरवाप्यते ॥१५८॥

अर्थ: अब मैं दूसरा जन्म धारण करनेसे भयभीत हो चुका हूँ इसलिए आपसे प्रतिबोध पाकर यह चेष्टा करता हूँ कि जिससे मुक्ति प्राप्त होती है ॥१५८॥


इत्युक्त्वा क्षमयित्वा तं परिवर्गसमन्वितम् । गत्वा केसरिविक्रान्तो मुनिं श्रुतिधरश्रुतिम् ॥१५९॥

कराब्जकुड्मलाङ्केन विधाय शिरसा नतिम् । जगाद नाथ वाञ्छामि दीक्षां दैगम्बरीमिति ॥१६०॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर परिजन सहित रामसे क्षमा कराकर सिंहके समान शूरवीरताको धारण करता हुआ अतिवीर्य श्रुतिधर मुनिराजके पास गया और अंजलियुक्त शिरसे नमस्कार कर बोला कि हे नाथ ! मैं दैगम्बरी दीक्षा धारण करना चाहता हूँ ॥१५९-१६०॥


आचार्येणैवमित्युक्ते परित्यज्यांशुकादिकम् । केशलुञ्चं विधायासौ महाव्रतधरोऽभवत् ॥१६१॥

अर्थ: ‘एवमस्तु’ इस प्रकार आचार्यके कहते ही वह वस्त्रादि त्यागकर तथा केश लोंचकर महाव्रतका धारी हो गया ॥१६१॥


आत्मार्थनिरतस्त्यक्तरागद्वेषपरिग्रहः । विजहार क्षितिं धीरो यत्रास्तमितवास्यसौ ॥१६२॥

अर्थ: आत्माके अर्थमें तत्पर, तथा राग-द्वेष आदि परिग्रहसे रहित होकर वह धीर-वीर पृथिवीमें विहार करने लगा । विहार करते-करते जहाँ सूर्य अस्त हो जाता था वहीं वह ठहर जाता था ॥१६२॥


क्रूरश्वापदयुक्तेषु गहनेषु वनेषु सः । चकार वसतिं निर्भीर्गह्वरेषु च भूभृताम् ॥१६३॥

अर्थ: सिंह आदि दुष्ट जानवरोंसे युक्त सघन वनों तथा पर्वतोंकी गुफाओंमें वह निर्भय होकर निवास करता था ॥१६३॥


विमुक्तनिश्शेषपरिग्रहाशं गृहीतचारित्रमरं सुशीलम् । नानातपःशोषितदेहमुद्धं महामुनिं तं नमतातिवीर्यम् ॥१६४॥

अर्थ: जिसने समस्त परिग्रहकी आशा छोड़ दी थी, जिसने चारित्रका भार धारण किया था, जो उत्तम शीलसे युक्त था, नाना प्रकारके तपसे जिसने अपना शरीर सुखा दिया, तथा जो स्वयं शुभ रूप था उन महामुनि अतिवीर्यको नमस्कार करो ॥१६४॥


रत्नत्रयापादितचारुभूषं दिगम्बरं साधुगुणावतंसम् । संप्रस्थितं योग्यवरं विमुक्तेर्महामुनिं तं नमतातिवीर्यम् ॥१६५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूपी मनोहर आभूषणोंसे जो सहित थे, दिशाएँ ही जिनके अम्बर - वस्त्र थे, मुनियोंके अट्ठाईस मूल गुण ही जिनके आभरण थे, जिन्होंने कर्मरूपी शत्रुओंको हरनेके लिए प्रस्थान किया था, और जो मुक्तिके योग्य वर थे उन महामुनि अतिवीर्यको नमस्कार करो ॥१६५॥


इदं परं चेष्टितमातिवीर्यं शृणोति यो यश्च सुधीरधीते । प्राप्नोति वृद्धिं सदसोऽपि मध्ये रविप्रभोऽसौ व्यसनं न लोकः ॥१६६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अतिवीर्य मुनिके इस उत्कृष्ट चरितको जो बुद्धिमान् सुनता है अथवा पढ़ता है वह सभाके बीच बुद्धिको प्राप्त होता है तथा सूर्यके समान प्रभाको धारण करता हुआ कभी कष्ट नहीं पाता ॥१६६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरितेऽतिवीर्यनिष्क्रमणाभिधानं नाम सप्तत्रिंशत्तमं पर्व ॥३७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें राजा अतिवीर्यकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला सैंतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३७॥

३८. अष्टत्रिंशत्तमं पर्व (जितपद्मोपाख्यानं)

अथ पद्मोऽतिवीर्यस्य तनयं नयकोविदः । विजयस्यन्दनामिख्यमभ्यषिञ्चत्पितुः पदे ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर न्यायके वेत्ता श्रीरामने अतिवीर्यके पुत्र विजयरथका उसके पिताके पदपर अभिषेक किया ॥१॥


दर्शिताशेषवित्तोऽसावरविन्दातनूभुवम् । स्वसारं रतिमालाख्यां लक्ष्मणाय न्यवेदयत् ॥२॥

एवमस्त्वित्यमीष्टायां तस्यां पद्मेन लक्ष्मणः । लक्ष्मीमिवाङ्कमायातां ज्ञात्वा सप्रमदोऽभवत् ॥३॥

अर्थ: उसने अपना सब धन दिखाया और माता अरविन्दाकी पुत्री अपनी रत्नमाला नामक बहन लक्ष्मणके लिए देनी कही सो रामने उसे ‘एवमस्तु’ कहकर स्वीकृत किया । रत्नमालाको पा, मानो लक्ष्मी ही गोदमें आयी है, यह जानकर लक्ष्मण अधिक प्रसन्न हुए ॥२-३॥


ततः कृत्वा जिनेन्द्राणां पूजां विस्मयदायिनीम् । इयाय विजयस्थानं लक्ष्मणाद्यन्वितो बलैः ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मण आदिसे सहित राम, जिनेन्द्र भगवान्की आश्चर्यदायिनी पूजा कर राजा पृथ्वीधर-के विजयपुर नगर वापस आये ॥४॥


दीक्षां श्रुत्वातिवीर्यस्य नर्तकीग्रहहेतुकाम् । शत्रुघ्नं हाससध्वानं निषिध्य भरतोऽवदत् ॥५॥

अर्थ: नर्तकीके पकड़नेके कारण राजा अतिवीर्यने दीक्षा धारण की है यह सुनकर शत्रुघ्न हास्य करने लगा सो भरतने मना कर कहा ॥५॥


अतिवीर्यो महाधन्यस्तस्य किं भद्र हास्यते । त्यक्त्वा यो विषयान् कष्टान् परां शान्तिमुपाश्रितः ॥६॥

अर्थ: कि हे भद्र ! जो कष्टकारी विषयोंको छोड़कर परम शान्तिको प्राप्त हुआ है ऐसा अतिवीर्य महाधन्य है । उसकी तू क्या हँसी करता है ? ॥६॥


प्रभावं तपसः पश्य त्रिदशेष्वपि दुर्लभम् । मुनिर्यो रिपुरासीन्नः संप्राप्तोऽसौ प्रणम्यताम् ॥७॥

अर्थ: जो देवोंके लिए भी दुर्लभ है ऐसा तपका प्रभाव देख । जो हमारा शत्रु था अब मुनि होनेपर वह हमारे नमस्कार करने योग्य गुरु हो गया ॥७॥


इलाघामित्यतिवीर्यस्य यावत्कुर्वन् स तिष्ठति । विजयस्यन्दनस्तावत्प्राप्तः सामन्तमध्यगः ॥८॥

अर्थ: इस प्रकार अतिवीर्यकी प्रशंसा करता हुआ भरत जबतक बैठा था तबतक अनेक सामन्तोंके साथ विजयरथ वहाँ आ पहुँचा ॥८॥


प्रणम्य भरतायासौ स्थितः संकथया क्षणम् । ज्यायसीं रतिमालाया नाम्ना विजयसुन्दरीम् ॥९॥

उपनिन्ये शुभां कन्यां नानालंकारधारिणीम् । कोशं च विपुलं सारं साधनं च प्रसन्नदृक् ॥१०॥

अर्थ: वह भरतको प्रणाम कर उत्तम वार्ता करता हुआ क्षण भर बैठा । तदनन्तर उसने रतिमालाकी बड़ी बहन विजयसुन्दरी नामकी शुभ कन्या जो कि नाना अलंकारोंको धारण कर रही थी भरतके लिए समर्पित की । साथ ही बड़ी प्रसन्न दृष्टिसे बहुत भारी खजाना और उत्तम सेना भी प्रदान की ॥९-१०॥


कन्यामेकामुपादाय केकयानन्दनस्ततः । तस्यैवानुमतं सर्वं स्थितिरेषा महात्मनाम् ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर उस अद्वितीय कन्याको पाकर भरत बहुत प्रसन्न हुआ । उसने विजयरथकी इच्छानुकूल सब कार्य स्वीकृत किया सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषोंकी यही रीति है ॥११॥


कौतुकोत्कलिकाकीर्णमानसोऽथ महाजवैः । अश्वैः प्रववृते द्रष्टुमतिवीर्यदिगम्बरम् ॥१२॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका मन कौतुक और उत्कण्ठासे व्याप्त था ऐसा भरत महावेगशाली घोड़ोंसे अतिवीर्य मुनिराजके दर्शन करनेके लिए चला ॥१२॥


क्वासौ महामुनिः क्वासाविति पृच्छन्सुभावनः । एषोऽयमित्यमुं भृत्यैः कथ्यमानमियाय सः ॥१३॥

अर्थ: वह उत्तम भावनासे सहित था तथा पूछता जाता था कि वे महामुनि कहाँ हैं ? और सेवक कहते जाते थे कि ये आगे विराजमान हैं ॥१३॥


ततो विषमपाषाणनिवहात्यन्तदुर्गमम् । नानाद्रुमसमाकीर्णं कुसुमामोदवासितम् ॥१४॥

तज्ज्ञेन कथितं रम्यं पर्वतं श्वापदाकुलम् । आरुरोहावतीर्याश्वाद्विनीताकारमण्डितः ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर जो ऊँचे-नीचे पाषाणोंके समूहसे अत्यन्त दुर्गम था, नाना प्रकारके वृक्षोंसे व्याप्त था, फूलोंकी सुगन्धिसे सुवासित था, और जंगली जानवरोंसे युक्त था ऐसे जानकार सेवकोंके द्वारा बताये हुए पर्वतपर भरत चढ़ा और घोड़ेसे उतरकर विनीत वेषसे शोभित होता हुआ अतिवीर्य मुनिराजके दर्शनके लिए चला । ॥१४-१५॥


रोषतोषविनिर्मुक्तं प्रशान्तकरणं विभुम् । शिलातलनिषण्णं तमेकसिंहमिवाभयम् ॥१६॥

अतिवीर्यमुनिं दृष्ट्वा सुघोरतपसि स्थितम् । शुभध्यानगतात्मानं ज्वलन्तं श्रमणश्रिया ॥१७॥

अर्थ: वे मुनिराज हर्ष-विषादसे रहित थे, शान्त इन्द्रियोंके धारक थे, विभु थे, शिलातलपर विराजमान थे, एक सिंहके समान निर्भय थे, घोर तपमें स्थित थे, शुभ ध्यानमें लीन थे और मुनिपनेकी लक्ष्मीसे देदीप्यमान थे ॥१६-१७॥


उत्फुल्लनयनो लोकः सर्वो हृष्टतनूरुहः । विस्मयं परमं प्राप्तो ननाम रचिताञ्जलिः ॥१८॥

अर्थ: मुनिराजके दर्शन कर सब लोगोंके नेत्र विकसित हो गये और सबके शरीरमें हर्षसे रोमांच निकल आये । सभीने परम आश्चर्यको प्राप्त हो अंजलि जोड़कर उन्हें नमस्कार किया ॥१८॥


कृत्वास्य महतीं पूजां भरतः श्रमणप्रियः । प्रणम्य पादयोरूचे भक्त्या विनतविग्रहः ॥१९॥

नाथ शूरस्त्वमेवैकः परमार्थविशारदः । येनेयं दुर्धरा दीक्षा धृता जिनवरोदिता ॥२०॥

अर्थ: जिसे मुनि बहुत प्रिय थे ऐसे भरतने उन मुनिराजकी बड़ी भारी पूजा की, चरणोंमें प्रणाम किया और फिर भक्तिसे नतशरीर होकर इस प्रकार कहा कि हे नाथ ! जिसने यह जिनेन्द्र-प्रतिपादित कठिन दीक्षा धारण की है ऐसे . एक आप ही शूरवीर हो तथा आप ही परमार्थके जाननेवाले हो ॥१९-२०॥


विशुद्धकुलजातानां पुरुषाणां महात्मनाम् । ज्ञातसंसारसाराणामीदृगेव विचेष्टितम् ॥२१॥

अर्थ: विशुद्ध कुलमें उत्पन्न तथा संसारके सारको जाननेवाले महापुरुषोंकी ऐसी ही चेष्टा होती है ॥२१॥


मनुष्यलोकमासाद्य फलं यदभिवाञ्छयते । तदुपात्तं त्वया साधो वयमत्यन्तदुःखिनः ॥२२॥

अर्थ: मनुष्य लोक पाकर जिस फलकी इच्छा की जाती है हे साधो ! वह फल आपने पा लिया पर हम अत्यन्त दुखी हैं ॥२२॥


क्षन्तव्यं दुरितं किंचिद्यदस्माभिस्त्वयीहितम् । कृतार्थोऽसि नमस्तुभ्यं प्राप्तायातिप्रतीक्ष्यताम् ॥२३॥

अर्थ: हे नाथ ! हम लोगोंसे आपके विषयमें जो कुछ अनिष्ट-पापरूप चेष्टा हुई है उसे क्षमा कीजिए । आप कृतकृत्य हैं, अतिशय पूज्यताको प्राप्त हुए आपके लिए हमारा नमस्कार है ॥२३॥


इत्युक्त्वा साञ्जलिं कृत्वा महासाधोः प्रदक्षिणाम् । अवतीर्णः कथां मौनीं कुर्वाणो धरणीधरात् ॥२४॥

अर्थ: इस प्रकार महामुनिराज अतिवीर्यसे कहकर तथा अंजलि सहित प्रदक्षिणा देकर उन्हींसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा करता हुआ भरत पर्वतसे नीचे उतरा ॥२४॥


स्थूरीपृष्ठं समारुह्य पूर्यमाणः सहस्रशः । सामन्तैः प्रस्थितोऽयोध्यां विभवाम्भोधिमध्यगः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर हजारों सामन्त जिसके साथ थे तथा जो विभवरूपी समुद्रके बीचमें गमन कर रहा था ऐसा भरत हस्तिनीके पृष्ठपर सवार हो अयोध्याके लिए वापस चला ॥२५॥


महासाधनसामन्तमण्डलस्यान्तरे स्थितः । शुशुभेऽसौ यथा जम्बूद्वीपोऽन्यद्वीपमध्यमः ॥२६॥

अर्थ: बड़ी भारी सेना और सामन्तोंके बीचमें स्थित भरत ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अन्य द्वीपोंके मध्यमें स्थित जम्बूद्वीप ही हो ॥२६॥


क्व गतास्ता नु नर्तक्यः कृतलोकानुरञ्जनाः । स्वजीवितेऽपि विलोभा विदधुर्या मयि प्रियम् ॥२७॥

अर्थ: भरत प्रसन्न चित्तसे इस प्रकार विचार करता जाता था कि जिन्होंने अपने जीवनका भी लोभ छोड़कर हमारा इष्ट किया ऐसी लोगोंको अनुरंजित करनेवाली वे नर्तकियाँ कहाँ गयी होंगी ? ॥२७॥


पुरः कृत्वातिवीर्यस्य महीयां परमां स्तुतिम् । नर्तकीभिः कृतं कर्म चित्रमेतदहो परम् ॥२८॥

अर्थ: राजा अतिवीर्यके सामने हमारी परम स्तुति कर उन नर्तकियोंने जो काम किया। अहो ! वह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥२८॥


स्त्रीणां कुतोऽथवा शक्तिरीदृशी विष्टपेऽखिले । जिनशासनदेवीभिर्नूनमेतदनुष्ठितम् ॥२९॥

चिन्तयन्नयमित्यादि सुप्रसन्नेन चेतसा । जगाम धरणीं पश्यन्नानासस्यसमाकुलाम् ॥३०॥

व्याप्ताशेषजगत्कीर्तिः प्रभावं परमं दधत् । सशत्रुघ्नो विवेशासौ विनीतां परमोदयः ॥३१॥

अर्थ: अथवा समस्त संसारमें स्त्रियोंकी ऐसी शक्ति कहाँ है ? निश्चयसे यह कार्य जिनशासनकी देवियोंने किया है ।’ तदनन्तर जो नाना प्रकारके धान्यसे युक्त पृथिवीको देख रहा था, जिसकी कीर्ति समस्त संसारमें व्याप्त थी, जो परम प्रभावको धारण कर रहा था और जो उत्कृष्ट अभ्युदयसे युक्त था ऐसे भरतने शत्रुघ्नके साथ अयोध्यामें प्रवेश किया ॥२९-३१॥


साकं विजयसुन्दर्या तस्थौ तत्र रतिं भजन् । सुलोचनापरिष्वक्तो यथा जलदनिस्वनः ॥३२॥

अर्थ: वहाँ विजयसुन्दरीके साथ प्रीतिको धारण करता हुआ भरत सुलोचना सहित मेघस्वर ( जयकुमार ) के समान सुखसे रहने लगा ॥३२॥


आनन्दं सर्वलोकस्य कुर्वाणौ रामलक्ष्मणौ । कंचित्कालं पुरे स्थित्वा पृथिवीधरभूभृतः ॥३३॥

जानक्या सह संमन्त्र्य कर्तव्याहितमानसौ । भूयः प्रस्थातुमुद्युक्तौ समुद्देशमभीप्सितम् ॥३४॥

अर्थ: अथानन्तर सब लोगोंको आनन्द उत्पन्न करते हुए राम-लक्ष्मण कुछ समय तक तो राजा पृथिवीधरके नगरमें रहे फिर जानकीके साथ सलाह कर आगेका कार्य निश्चित करते हुए इच्छित स्थानपर जानेके लिए उद्यत हुए ॥३३-३४॥


वनमाला ततोऽवोचल्लक्ष्मणं चारुलक्षणा । सवाष्पे बिभ्रती नेत्रे तरत्तरलतारके ॥३५॥

अवश्यं यदि मोक्तव्या मन्दभाग्याहकं त्वया । पुरैव रक्षिता कस्मान्मुमूर्षन्ती वद प्रिय ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर जो सुन्दर लक्षणोंसे युक्त थी और आँसुओंसे भीगे चंचल कनीनिकाओंवाले नेत्र धारण कर रही थी ऐसी वनमाला लक्ष्मणसे बोली कि हे प्रिय ! यदि मुझ मन्दभाग्याको तुम्हें अवश्य ही छोड़ना था तो पहले ही मरनेसे क्यों बचाया था सो कहो ॥३५-३६॥


सौमित्रिरगदद् भद्रे विषादं मा गमः प्रिये । अत्यल्पेनैव कालेन पुनरेमि वरानने ॥३७॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने कहा कि हे भद्रे ! हे प्रिये ! हे वरानने ! विषादको प्राप्त मत होओ। मैं बहुत ही थोड़े समय बाद फिर आ जाऊँगा ॥३७॥


सम्यग्दर्शनहीना यां गतिं यान्ति सुविभ्रमे । व्रजेयं तां पुनः क्षिप्रं न चेदेमि तवान्तिकम् ॥३८॥

अर्थ: हे उत्तम विलासोंको धारण करनेवाली प्रिये ! यदि मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास वापस न आऊँ तो सम्यग्दर्शनसे हीन मनुष्य जिस गतिको प्राप्त होते हैं उसी गतिको प्राप्त होऊँ ॥३८॥


नराणां मानदग्धानां साधुनिन्दनकारिणाम् । प्रिये पापेन लिप्येऽहं यदि नायामि तेऽन्तिकम् ॥३९॥

अर्थ: हे प्रिये ! यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो साधुओंकी निन्दा करनेवाले अहंकारी मनुष्योंके पापसे लिप्त होऊँ ॥३९॥


रक्षितव्यं पितुर्वाक्यमस्माभिः प्राणवल्लभे । दक्षिणोदन्वतः कूलं गन्तव्यं निर्विचारणम् ॥४०॥

अर्थ: हे प्राणवल्लभे ! हमें पिताके वचनकी रक्षा करनी है और बिना कुछ विचार किये दक्षिण समुद्रके तट जाना है ॥४०॥


मलयोपत्यकां प्राप्य कृत्वा परममालयम् । नेष्यामि भवतीमेत्य वरोरु धृतिमाव्रज ॥४१॥

अर्थ: वहाँ मलयाचलकी उपत्यकामें जाकर उत्तम भवन बनाऊँगा और फिर तुम्हें ले जाऊँगा । हे सुन्दर जाँघोंवाली प्रिये ! तब तक धैर्य धारण करो ॥४१॥


समयैः सान्त्वयित्वेति वनमालां सुभाषितैः । भेजे लाङ्गलिनः पार्श्वं सुमित्राकुक्षिसंभवः ॥४२॥

अर्थ: इस प्रकार उत्तम शब्दोंसे युक्त शपथोंके द्वारा वनमालाको शान्त कर लक्ष्मण रामके पास जा पहुँचे ॥४२॥


ततः सुप्तजने काले विदितौ तौ न केनचित् । निर्गत्य नगराद्गन्तुं प्रवृत्तौ सह सीतया ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर जब सब लोग सो गये तब किसीके बिना जाने ही राम लक्ष्मण और सीताके साथ नगरसे निकलकर आगेके लिए चल पड़े ॥४३॥


प्रभाते तद्विनिर्मुक्तं पुरं दृष्ट्वाखिलो जनः । परमं शोकमापन्नः कृच्छ्रेणाधारयत्तनुम् ॥४४॥

अर्थ: जब प्रभात हुआ तब नगरको उनसे रहित देख समस्त जन परम शोकको प्राप्त हुए तथा बड़े कष्टसे शरीरको धारण कर सके ॥४४॥


वनमाला गृहं दृष्ट्वा लक्ष्मणेन विवर्जितम् । समयेषु समालम्ब्य जीवितं शोकिनी स्थिता ॥४५॥

अर्थ: वनमाला भी घरको लक्ष्मणसे रहित देख बहुत शोकको प्राप्त हुई तथा लक्ष्मणके द्वारा की हुई शपथोंका आश्रय ले जीवित रही ॥४५॥


विहरन्तौ ततः क्षोणीं लोकविस्मयकारिणौ । मुमुदाते महासत्त्वौ ससीतौ रामलक्ष्मणौ ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर महान् धैर्यके धारक राम-लक्ष्मण पृथ्वीपर विहार करते हुए परम आनन्दको प्राप्त हुए । उन्हें देख लोगोंको आश्चर्य उत्पन्न होता था ॥४६॥


युवत्युज्ज्वलवल्लीनां मनोनयनपल्लवान् । तावनङ्गतुषारेण दहन्तावाटतुः शनैः ॥४७॥

अर्थ: वे तरुण स्त्री-रूपी उज्ज्वल लताओंके मन और नेत्ररूपी पल्लवोंको कामरूपी तुषारसे जलाते हुए धीरे-धीरे विहार करते थे ॥४७॥


कस्य पुण्यवतो गोत्रमेताभ्यां समलंकृतम् । सुजाता जननी सैका लोके यैतावजीजनत् ॥४८॥

अर्थ: हे सखि ! इन दोनोंने किस पुण्यात्माका कुल अलंकृत किया है ? वह कौन-सी भाग्यशालिनी माता है जिसने इन दोनोंको जन्म दिया है ? ॥४८॥


धन्येयं वनितैताभ्यां समं या चरति क्षितिम् । ईदृशं यदि देवानां रूपं देवास्ततः स्फुटम् ॥४९॥

अर्थ: यह स्त्री धन्य है जो इनके साथ पृथ्वी पर विहार कर रही है। यदि ऐसा रूप देवोंका होता है तो निश्चित ही ये देव हैं ॥४९॥


कुतः समागतावेतौ ब्रजतो वा क्व सुन्दरौ । वाञ्छतः किमिमौ कर्तुं सृष्टिरीदृगियं कथम् ॥५०॥

अर्थ: ये सुन्दर पुरुष कहाँसे आये हैं ? कहाँ जा रहे हैं ? और क्या करना चाहते हैं इनको यह ऐसी रचना कैसे हो गयी ? ॥५०॥


सख्योऽनेन पथा दृष्टौ पुण्डरीकनिरीक्षणौ । व्रजन्तौ सहितौ नार्या क्वचिच्चन्द्रनिभाननौ ॥५१॥

अर्थ: जिनके नेत्र कमलके समान तथा मुख चन्द्रमाके तुल्य है ऐसे दो पुरुष एक स्त्रीके साथ इस मार्गसे जा रहे थे सो हे सखियो ! तुमने देखे ॥५१॥


यदिमौ शोभिनौ मुग्धे मनुष्यावथवा सुरौ । तत्किमर्थं त्वया शोको धार्यते गतलज्जया ॥५२॥

अर्थ: हे मुग्धे ! ये अतिशय सुशोभित व्यक्ति मनुष्य हों अथवा देव, तू निर्लज्ज होकर शोक किस लिए धारण कर रही है ? ॥५२॥


अयि मूढे न पुण्येन नितान्तं भूरिणा विना । लभ्यते सुचिरं द्रष्टुमेवंविधनराकृतिः ॥५३॥

अर्थ: अयि मूर्खे ! ऐसे मनुष्योंका रूप बहुत भारी पुण्यके बिना चिरकाल तक देखनेको प्राप्त नहीं होता ॥५३॥


निवर्तस्व भज स्वास्थ्यं स्रस्तं वसनमुद्धर । मा नैषीर्लोचने खेदमतिमात्रप्रसारिते ॥५४॥

अर्थ: इसलिए लौट जा, स्वस्थ हो, नीचे खिसके हुए वस्त्रको सँभाल और अत्यधिक पसारे हुए नेत्रोंको खेद मत प्राप्त करा ॥५४॥


नेत्रमानसचौराभ्यां दृष्टाभ्यामपि बालिके । निष्ठुराभ्यां किमेताभ्यां काभ्यामपि धृतिं भज ॥५५॥

अर्थ: अरी बाले ! नेत्र और मनको चुरानेवाले इन कठोर पुरुषोंके देखनेसे क्या प्रयोजन है ? धीरज धर ॥५५॥


इत्याद्यालापसंसक्तं कुर्वाणावबलाजनम् । रेमाते शुद्धचित्तौ तौ स्वेच्छाविहृतिकारिणौ ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार स्त्रीजनोंको वार्तालाप करनेमें तत्पर करते हुए शुद्धचित्तके धारक वे दोनों स्वेच्छासे विहार कर रहे थे ॥५६॥


नानाजनपदाकीर्णां पर्यट्य धरिणीमिमौ । क्षेमाञ्जलिसमाख्यानं संप्राप्तौ परमं पुरम् ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार नाना देशोंसे व्याप्त पृथिवीमें विहार करते हुए वे क्षेमांजलि नामके परम सुन्दर नगरमें पहुँचे ॥५७॥


उद्याने निकटे तस्य जलदोत्करसंनिभे । अवस्थिताः सुखेनैते यथा सौमनसे सुराः ॥५८॥

अर्थ: उस नगरके निकट ही वे मेघसमूहके समान सुन्दर एक उद्यानमें सुखपूर्वक इस प्रकार ठहर गये जिस प्रकार कि सौमनस वनमें देव ठहर जाते हैं ॥५८॥


अन्नं वरगुणं भुक्त्वा लक्ष्मणेनोपसाधितम् । माध्वीकं सीतया सार्धमसेवत हलायुधः ॥५९॥

अर्थ: वहाँ लक्ष्मणके द्वारा तैयार किया उत्तम भोजन ग्रहण कर रामने सीताके साथ दाखोंका मधुर पेय दिया ॥५९॥


प्रासादगिरिमालाभिस्ततो हृतनिरीक्षणः । लक्ष्मणः पद्मतोऽनुज्ञां प्राप्य प्रश्रययाचिताम् ॥६०॥

दधानः प्रवरं माल्यं पीताम्बरधरः शुभः । स्वैरं क्षेमाञ्जलिं द्रष्टुं प्रतस्थे चारुविभ्रमः ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर बड़े-बड़े महलरूपी पर्वतोंकी पंक्तियोंसे जिनके नेत्र हरे गये थे ऐसे लक्ष्मण विनयपूर्वक रामसे आज्ञा प्राप्त कर इच्छानुसार क्षेमांजलि नगर देखनेके लिए चले। उस समय वे उत्तम मालाएँ और पीतवस्त्र धारण किये हुए थे तथा सुन्दर विलाससे सहित थे ॥६०-६१॥


नानालतोपगूढानि काननानि वराण्यसौ । सरितः स्वच्छतोयाश्च शुभ्राभ्रसमसैकताः ॥६२॥

विचित्रधातुरङ्गाश्च परिक्रीडनपर्वतान् । देवधामानि तुङ्गानि कूपान् वापीः सभाः प्रपाः ॥६३॥

लोकं च विविधं पश्यन् दृश्यमानः सविस्मयम् । विवेश नगरं धीरो नानाव्यापारसंकुलम् ॥६४॥

अर्थ: नाना लताओंसे आलिंगित उत्तमोत्तम वनों, स्वच्छ जलसे भरीं तथा शुक्लमेघोंके समान उज्ज्वल तटोंसे शोभित नदियों, नाना प्रकारकी धातुओंसे रंग-बिरंगे क्रीड़ा-पर्वतों, ऊँचे-ऊँचे जिनमन्दिर, कुओं, वापिकाओं, सभाओं, पानीयशालाओं और अनेक प्रकारके मनुष्योंको देखते हुए उन्होंने नाना प्रकारके व्यापार-कार्योंसे युक्त नगरीमें बड़ी धीरतासे प्रवेश किया । लोग उन्हें बड़े आश्चर्यसे देख रहे थे ॥६२-६४॥


शृणु शृण्विति तत्रायं प्रधानविशिखागतम् । अशृणोत्पौरतः शब्दमिति विश्रब्धभाषितम् ॥६५॥

अर्थ: जब ये नगरके प्रधान मार्गमें पहुँचे तब उन्होंने किसी नगरवासीसे निश्चिन्ततापूर्वक कहा हुआ यह शब्द सुना ॥६५॥


पुरुषः कोऽन्वसौ लोके यो मुक्तां राजपाणिना । शक्तिं प्रसह्य शूरेन्द्रो जितपद्मां गृहीष्यति ॥६६॥

अर्थ: वह किसीसे कह रहा था कि अरे सुनो-सुनो, संसारमें ऐसा कौन शूरवीर पुरुष है जो राजाके हाथसे छोड़ी हुई शक्तिको सहकर ‘जितपद्मा’ कन्याको ग्रहण करेगा ? ॥६६॥


स्वर्गे राज्यं ददामीति राजा चेत्प्रतिपद्यते । तथापि नानया कृत्यं कथया शक्तियातया ॥६७॥

अर्थ: यदि राजा यह भी कहे कि मैं स्वर्गका राज्य देता हूँ तो भी शक्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस कथासे क्यः प्रयोजन है ? ॥६७॥


जातश्चाभिमुखः शक्तेः प्राणैश्च परिवर्जितः । किं करिष्यति कन्यास्य राज्यं वा त्रिदशालये ॥६८॥

अर्थ: यदि कोई शक्ति झेलनेके लिए सम्मुख हुआ और प्राणोंसे रहित हो गया तो यह कन्या और स्वर्गका राज्य उसका क्या कर लेगा ? ॥६८॥


समस्तेभ्यो हि वस्तुभ्यः प्रियं जगति जीवितम् । तदर्थमितरत् सर्वमिति को नावगच्छति ॥६९॥

अर्थ: संसारमें समस्त वस्तुओंसे जीवन ही प्यारा है और उसीके लिए अन्य सब प्रयत्न है यह कौन नहीं जानता है ? ॥६९॥


श्रुत्वैवं कौतुकी कंचिदथ पप्रच्छ मानवम् । भद्र ! का जितपद्मेयं यदर्थं भाषते जनः ॥७०॥

अर्थ: अथानन्तर इस प्रकारके शब्द सुनकर लक्ष्मणने कौतुकवश किसी मनुष्यसे पूछा कि हे भद्र ! यह जितपद्मा कौन है ! जिसके लिए लोग इस प्रकार वार्ता कर रहे हैं ॥७०॥


सोऽवोचन्मृत्युकन्यासावतिपण्डितमानिनी । किं न ते विदिता सर्वलोकविख्यातकीर्तिका ॥७१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उस मनुष्यने कहा कि जिसकी कीर्ति समस्त संसारमें व्याप्त है तथा जो अपने आपको अति पण्डित मानती है ऐसी इस कालकन्याको क्या तुम नहीं जानते ? ॥७१॥


एतन्नगरनाथस्य राज्ञः शत्रुंदमश्रुतेः । कनकाभासमुत्पन्ना दुहिता गुणशालिनी ॥७२॥

अर्थ: यह इस नगरके राजा शत्रुदमनकी कनकाभा रानीसे उत्पन्न गुणवती पुत्री है ॥७२॥


यतोऽनया जितं पद्मं कान्त्या वदनजातया । पद्मा च सर्वगात्रेण जितपद्मोदिता ततः ॥७३॥

अर्थ: चूँकि इसने मुखकी कान्तिसे कमलको अथवा सर्व शरीरसे लक्ष्मीको जीत लिया है इसलिए यह जितपद्मा कहलाती है ॥७३॥


नवयौवनसंपन्ना कलालंकारधारिणी । पुंसोऽपि त्रिदशान् द्वेष्टि मनुष्येषु कथात्र का ॥७४॥

अर्थ: नवयौवनसे सम्पन्न तथा कलारूपी अलंकारोंको धारण करनेवाली यह कन्या पुंवेदधारी देवोंसे भी द्वेष करती है फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? ॥७४॥


उच्चारयति नो शब्दमपि पुल्लिङ्गवर्तिनम् । व्यवहारः समस्तोऽस्याः पुरुषार्थविवर्जितः ॥७५॥

अर्थ: जो शब्द व्याकरणकी दृष्टिसे पुंलिंग होता है यह उसका भी उच्चारण नहीं करती है । इसका जितना भी व्यवहार है वह सब पुरुषोंके प्रयोजनसे रहित है ॥७५॥


अदः पश्यसि कैलाससदृशं भवनं वरम् । अत्र तिष्ठत्यसौ कन्या शतसेवनलालिता ॥७६॥

अर्थ: सामने जो कैलास पर्वतके समान बड़ा भवन देख रहे हो उसीमें यह सैकड़ों प्रकारकी सेवाओंसे लालित होती हुई रहती है ॥७६॥


शक्तिं यः पाणिना मुक्तां पित्रास्याः सहते नरः । वृणुते तमियं दग्ध-समीहा कृच्छ्रशालिनी ॥७७॥

अर्थ: जो मनुष्य इसके पिताके हाथसे छोड़ी हुई शक्तिको सहन करेगा उसे ही यह वरेगी ऐसी कठिन प्रतिज्ञा इसने ले रखी है ॥७७॥


लक्ष्मीधरः समाकर्ण्य सकोपस्मयविस्मयः । दध्यौ सा कीदृशी नाम कन्या यैवं समीहते ॥७८॥

अर्थ: यह सुनकर लक्ष्मण क्रोध, गर्व और आश्चर्यसे युक्त हो विचार करने लगे कि वह कन्या कैसी होगी जो इस प्रकारकी चेष्टा करती है ॥७८॥


दुष्टचेष्टामिमां तावत्कन्यां पश्यामि गर्विताम् । अहो पुनरभिप्रायः प्रौढोऽयमनया कृतः ॥७९॥

अर्थ: दुष्ट चेष्टासे युक्त तथा गर्वसे भरी इस कन्याको देखूँ तो सही । अहो ! इसने यह बड़ा कठोर अभिप्राय कर रखा है ॥७९॥


ध्यायन्निति महोक्षेती राजमार्गेण चारुणा । विमानाभान् महाशब्दान् प्रासादान्विधुपाण्डुरान् ॥८०॥

दन्तिनो जलदाकारांस्तुरंगांश्चलचामरान् । बलमीर्नृत्यशालांश्च पश्यन् मन्थरचक्षुषा ॥८१॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते हुए लक्ष्मण महावृषभकी नाईं सुन्दर चालसे चलकर मनोहर राजमार्गमें आगे बढ़े । वहाँ वे विमानके समान आभावाले तथा चन्द्रमाके समान धवल उत्तमोत्तम भवनों, मेघोंके समान हाथियों, चंचल चमरोंसे सुशोभित घोड़ों, छपरियों और नृत्यशालाओंको धीमी दृष्टिसे देखते जाते थे ॥८०-८१॥


नानानिर्व्यूहसंपन्नं विचित्रध्वजशोभितम् । शुभ्राभ्रराशिसंकाशं प्राप शत्रुंदमालयम् ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर जो नाना प्रकारके निर्व्यूहोंसे युक्त था, रंग-बिरंगी ध्वजाओंसे सुशोभित था, तथा जो सफ़ेद मेघावलीके समान था ऐसे राजा शत्रुंदमके महलपर पहुँचे ॥८२॥


भास्वद्भक्तिशताकीर्णं तुङ्गप्राकारयोजितम् । द्वारं तस्य ढुढौकेऽसौ शक्रचापाभतोरणम् ॥८३॥

अर्थ: महलका द्वार सैकड़ों देदीप्यमान बेलबूटोंसे सहित था, ऊँचे प्राकारसे युक्त था, और इन्द्रधनुषके समान रंग-बिरंगे तोरणोंसे सुशोभित था ॥८३॥


शस्त्रिवृन्दावृते तस्मिन्नानोपायनसंकुले । निर्गच्छद्भिर्विशद्भिश्च सामन्तैरतिसंकटे ॥८४॥

द्वाःस्थेन प्रविशन्नेष बभाषे सौम्यया गिरा । कस्त्वमज्ञापितो भद्र विशसि क्षितिपालयम् ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर जो शस्त्रधारी पहरेदारोंके समूहसे आवृत था, नाना प्रकारके उपहारोंसे युक्त था और जहाँ बाहर निकलते तथा भीतर प्रवेश करते हुए सामन्तोंकी बड़ी भीड़ लग रही थी ऐसे द्वारमें लक्ष्मण प्रवेश करने लगे तो द्वारपालने सौम्यवाणीसे कहा कि हे भद्र ! तू कौन है जो बिना आज्ञा ही राजमहलमें प्रवेश कर रहा है ॥८४-८५॥


सोऽवोचद्द्रष्टुमिच्छामि राजानं गच्छ वेदय । स्वपदेऽन्यमसौ कृत्वा गत्वा राज्ञे न्यवेदयत् ॥८६॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने कहा कि मैं राजाके दर्शन करना चाहता हूँ सो राजाको खबर दे दो । यह सुन अपने स्थानपर दूसरेको नियुक्त कर द्वारपालने भीतर जाकर राजासे निवेदन किया कि ॥८६॥


दिदृक्षुस्त्वां महाराज पुमानिन्दीवरप्रभः । राजीवलोचनः श्रीमान् सौम्यो द्वारेऽवतिष्ठते ॥८७॥

अर्थ: हे महाराज ! जो आपके दर्शन करना चाहता है, जिसकी प्रभा नील कमलके समान है, जिसके नेत्र कमलोंके समान सुशोभित हैं तथा जो अत्यन्त सौम्य है ऐसा एक शोभासम्पन्न पुरुष द्वार पर खड़ा है ॥८७॥


अमात्यवदनं वीक्ष्य राजावोचद्विशत्विति । ततः सुतः सुमित्रायाः प्रतीहारोदितोऽविशत् ॥८८॥

अर्थ: मन्त्रीके मुखकी ओर देख राजाने कहा कि ‘प्रवेश करे’। तदनन्तर द्वारपालके कहने पर लक्ष्मणने भीतर प्रवेश किया ॥८८॥


तं दृष्ट्वा सुन्दराकारं सुगम्भीरापि सा सभा । समुद्रमूर्तिवत्क्षोभं गता शीतांशुदर्शने ॥८९॥

अर्थ: यद्यपि वह सभा गम्भीर थी तो भी जिस प्रकार चन्द्रमाको देखकर समुद्र क्षोभको प्राप्त होता है उसी प्रकार वह सभा भी सुन्दर आकारके धारक लक्ष्मणको देखकर क्षोभको प्राप्त हो गयी ॥८९॥


प्रणामरहितं दृष्ट्वा विकटांसं सुभासुरम् । किंचिद्विकृतचेतस्कस्तमपृच्छदरिंदमः ॥९०॥

कुतः समागतः कस्त्वं किमर्थं क्व कृतश्रमः । ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत् प्रावृषेण्यघनध्वनिः ॥९१॥

अर्थ: प्रणामरहित, विशाल कन्धोंके धारक तथा अतिशय देदीप्यमान लक्ष्मणको देखकर जिसका हृदय कुछ-कुछ विकृत हो रहा था ऐसे राजा शत्रुंदमने पूछा कि तू कहाँसे आया है ? कौन है ? और किस लिए आया है ? इसके उत्तरमें वर्षा ऋतुके मेघके समान गम्भीर ध्वनिको धारण करनेवाले लक्ष्मणने कहा ॥९०-९१॥


बाह्योऽहं भरतस्यापि महीहिण्डनपण्डितः । विद्वान् सर्वत्र ते भङ्क्तुं दुहितुर्मानमागतः ॥९२॥

अर्थ: कि मैं राजा भरतका सेवक हूँ, पृथ्वीपर घूमनेमें निपुण हूँ, सब विषयोंका पण्डित हूँ और तुम्हारी पुत्रीका मान भङ्ग करनेके लिए आया हूँ ॥९२॥


अभग्नमानशृङ्गेयं दुष्टकन्यागवी त्वया । पोषिता सर्वलोकस्य वर्तते दुःखदायिनी ॥९३॥

अर्थ: जिसके मान-रूपी सींग अभग्न हैं ऐसी जो दुष्ट कन्यारूपी मरकनी गाय तुमने पाल रक्खी है वह सब लोगोंको दुःख देनेवाली है ॥९३॥


सोऽवोचद् यो मया मुक्तां शक्तः शक्तिं प्रतीक्षितुम् । कोऽसौ तु जितपद्माया मानस्य ध्वंसको भवेत् ॥९४॥

अर्थ: राजा शत्रुंदमने कहा कि जो मेरे द्वारा छोड़ी हुई शक्तिको सहन करनेमें समर्थ है ऐसा वह कौन पुरुष है जो जितपद्माका मान खण्डित करनेवाला हो ॥९४॥


उवाच लक्ष्मणः शक्त्या ग्रहणं मे किमेकया । शक्तीः पञ्च विमुञ्च त्वं मयि शक्त्या समस्तया ॥९५॥

अर्थ: लक्ष्मणने कहा कि मैं एक शक्तिको क्या ग्रहण करूँ ? तू पूरी सामर्थ्यके साथ मुझपर पाँच शक्तियाँ छोड़ ॥९५॥


विवादो गर्विणोरेवं प्रवृत्तो यावदेतयोः । गवाक्षा विनिडास्तावत्पिहिता वनिताननैः ॥९६॥

अर्थ: यहाँ जब तक दोनों अहंकारियोंके बीच इस प्रकारका विवाद चल रहा था वहाँ तब तक राजमहलके सघन झरोखे स्त्रियोंके मुखोंसे आच्छादित हो गये ॥९६॥


परित्यक्तनरद्वेषा दृष्ट्वा लक्ष्मणपुङ्गवम् । निर्व्यूहस्था जिताम्भोजा संज्ञादानादवारयत् ॥९७॥

अर्थ: जितपद्मा भी लक्ष्मणको देख मोहित हो गयी और पुरुषोंके साथ द्वेषको छोड़कर छपरी पर आ बैठी तथा इशारा देकर लक्ष्मणको मना करने लगी ॥९७॥


दक्षबद्धाञ्जलिं भीरुं सौमित्रिरिति संज्ञया । चकार जातबोधां तां मा भैषीरिति संमदी ॥९८॥

अर्थ: तब हर्षसे भरे लक्ष्मणने भयभीत तथा हाथ जोड़कर बैठी हुई जितपद्माको इशारा देकर जताया कि भय मत करो ॥९८॥


जगाद च किमद्यापि कातर त्वं प्रतीक्षसे । विमुञ्चारिंदमाभिख्य शक्तिं शक्तिं निवेदय ॥९९॥

अर्थ: और राजासे कहा कि अरे कातर ! अब भी क्या प्रतीक्षा कर रहा है ? शत्रुंदम नाम रखे फिरता है शक्ति छोड़ और पराक्रम दिखा ॥९९॥


इत्युक्तः कुपितो राजा बद्ध्वा परिकरं दृढम् । ज्वलत्पावकसंकाशां शक्तिमेकामुपाददौ ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर राजाने कुपित हो अच्छी तरह कमर कसी और जलती हुई अग्निके समान एक शक्ति उठायी ॥१००॥


प्रतीच्छेच्छसि मर्तुं चेदित्युक्त्वा भृकुटीं दधत् । वैशाखं स्थानकं कृत्वा तां मुमोच विधानवित् ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर ‘यदि मरना ही चाहता है तो ले झेल’ यह कहकर भौंहको धारण करनेवाले विधि-विधानके ज्ञाता राजाने आलीढ़ आसनसे खड़ा होकर वह गदा छोड़ दी ॥१०१॥


अयत्नेनेव सा तेन धृता दक्षिणपाणिना । वर्तिकाग्रहणे को वा बहुमानो गरुत्मतः ॥१०२॥

अर्थ: लक्ष्मणने बिना किसी यत्नके ही दाहिने हाथसे वह शक्ति पकड़ ली सो ठीक ही है क्योंकि बटेरके पकड़नेमें गरुडका कौन-सा बड़ा मान होता है ? ॥१०२॥


द्वितीयेतरहस्तेन कक्षाभ्यां द्वे सुविभ्रमः । शुशुभे सुभृशं तामिश्चतुर्दन्त इव द्विपः ॥१०३॥

अर्थ: दूसरी शक्ति दूसरे हाथसे तथा तीसरी चौथी शक्ति दोनों बगलोंमें धारण कर पुलकते हुए लक्ष्मण उनसे चार दाँतोंको धारण करनेवाले ऐरावत हाथीके समान अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥१०३॥


संक्रुद्धभोगिभोगाभां संप्राप्तामथ पञ्चमीम् । दन्ताग्राभ्यां दधौ शक्तिं पेशीमिव मृगाधिपः ॥१०४॥

अर्थ: अथानन्तर अत्यन्त कुपित साँपकी फणकी नाईं जो पाँचवीं शक्ति आयी उसे लक्ष्मणने दाँतोंके अग्रभागसे उस प्रकार पकड़ लिया जिस प्रकार कि मृगराज मांसकी डलीको पकड़ रखता है ॥१०४॥


ततो देवगणाः स्वस्था ववृषुः पुष्पसंहतिम् । ननृतुस्ताडयांश्चक्रुर्दुन्दुभींश्च कृतस्वनाः ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर आकाशमें खड़े देवोंके समूह पुष्प बरसाने लगे, नृत्य करने लगे तथा हर्षसे शब्द करते हुए दुन्दुभि बाजे बनाने लगे ॥१०५॥


प्रतीच्छारिंदमेदानीं शक्ति त्वमिति लक्ष्मणे । कृतशब्दे परं प्राप साध्वसं सकलो जनः ॥१०६॥

अर्थ: अथानन्तर ‘शत्रुंदम ! अब तू मेरी शक्ति झेल’ इस प्रकार लक्ष्मणके कहनेपर सबलोग अत्यन्त भयको प्राप्त हुए ॥१०६॥


तमक्षततनुं दृष्ट्वा लक्ष्मीनिलयवक्षसम् । विस्मितोऽरिंदमो जातस्त्रपावनमिताननः ॥१०७॥

अर्थ: राजा शत्रुन्दम लक्ष्मणको अक्षत शरीर देख विस्मयमें पड़ गया और लज्जासे उसका मुख नीचा हो गया ॥१०७॥


जितपद्मा ततः प्राप स्मितच्छायानतानना । लक्ष्मीधरं समाकृष्टा रूपेणाचरितेन च ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर मन्द मुसकानकी छायासे जिसका मुख नीचेकी ओर हो रहा था ऐसा जितपद्मा रूप तथा आचरणसे खिंचकर लक्ष्मणके पास आयी ॥१०८॥


धृतशक्तेः समीपेऽस्य सा तन्वी शुशुभेतराम् । कुलिशायुधपार्श्वस्था शचीर्व विनतानना ॥१०९॥

अर्थ: शक्तियोंको धारण करनेवाले लक्ष्मणके पास वह कृशाङ्गी, इस तरह अत्यन्त सुशोभित हो रही थी जिस तरह कि वज्रके धारक इन्द्रके पास खड़ी नतमुखी इन्द्राणी सुशोभित होती है ॥१०९॥


नवेन संगमेनास्या हृदयं तस्य कम्पितम् । यन्नासीत् कम्पितं जातु संग्रामेषु महत्स्वपि ॥११०॥

अर्थ: लक्ष्मणका जो हृदय बड़े-बड़े संग्रामोंमें भी कभी कम्पित नहीं हुआ था वह जितपद्माके नूतन समागमसे कम्पित हो गया ॥११०॥


पुरस्तात्तनरेशानां कन्यया लक्ष्मणा वृतः । विभिद्यापत्रपापालीं तद्वरन्यस्तनेत्रया ॥१११॥

अर्थ: तदनन्तर लज्जाके भारसे जिसके नेत्र नीचे हो रहे थे ऐसी जितपद्माने पिता तथा अन्य अनेक राजाओंके सामने लज्जा छोड़कर लक्ष्मणका वरण किया ॥१११॥


सद्यो विनयनम्राङ्गो राजानं लक्ष्मणोऽब्रवीत् । मामकार्हसि मे क्षन्तुं शैशवाद्दुर्विचेष्टितम् ॥११२॥

अर्थ: तत्काल ही विनयसे जिसका शरीर नम्रीभूत हो रहा था ऐसे लक्ष्मणने राजासे कहा कि हे माम ! लड़कपनके कारण मैंने जो खोटी चेष्टा की है उसे आप क्षमा करनेके योग्य हैं ॥११२॥


बालानां प्रतिकूलेन कर्मणा वचसापि वा । भवद्विधा सुगम्भीरा नैव यान्ति विकारिताम् ॥११३॥

अर्थ: बालकोंके विपरीत कार्य अथवा विरुद्ध वचनोंसे आप जैसे महागम्भीर पुरुष विकार भावको प्राप्त नहीं होते ॥११३॥


ततः शत्रुंदमोऽप्येनं सप्रमोदः ससंभ्रमः । स्तम्बेरमकराभाभ्यां कराभ्यां परिषष्वजे ॥११४॥

अर्थ: तदनन्तर हर्ष और संभ्रमसे सहित राजा शत्रुंदमने भी हाथीकी सूंडके समान लम्बी तथा सुपुष्ट भुजाओंसे लक्ष्मणका आलिंगन किया ॥११४॥


उवाच च परिक्लिन्नगण्डांश्चण्डान् गजान् क्षणात् । योऽजैषं भीमयुद्धेषु भद्र सोऽहं त्वया जितः ॥११५॥

अर्थ: और कहा कि हे भद्र ! जिस मैंने भयंकर युद्धोंमें मदस्रावी कुपित हाथियोंको क्षणभरमें जीता था वह मैं आज तुम्हारे द्वारा जीता गया ॥११५॥


वन्यानपि महानागान् गण्डशैलसमत्विषः । विमदीकृतवानस्मि सोऽयमन्य इवाभवम् ॥११६॥

अर्थ: जिसने गोल काली चट्टानोवाले पर्वतके समान कान्तिके धारक बड़े-बड़े जंगली हाथियोंको मदरहित किया था वह मैं आज मानो अन्य ही हो गया हूँ ॥११६॥


अहो वीर्यमहो रूपं सदृशाः शुभ ते गुणाः । अहोनुद्धततात्यन्तं प्रश्र्यश्च तवाद्भुतः ॥११७॥

अर्थ: धन्य तुम्हारी अनुद्धतता और धन्य तुम्हारी अद्भुत विनय। अहो शोभनीक ! तुम्हारे गुण तुम्हारे अनुरूप ही हैं ॥११७॥


भाषमाणे गुणानेवं राज्ञि संसद्यवस्थिते । लक्ष्मीधरस्त्रपातोऽभूत् क्वापि यात इव क्षणम् ॥११८॥

अर्थ: इस प्रकार सभामें बैठा राजा शत्रुंदम जब लक्ष्मणके गुणोंका वर्णन कर रहा था तब लक्ष्मण लज्जाके कारण ऐसे हो गये मानो क्षणभरके लिए कहीं चले ही गये हों ॥११८॥


अथ लब्धाम्बुदव्रातघोषभेर्यः समाहताः । राजादेशात् समाध्माताः शङ्खाः संशितवारणाः ॥११९॥

अर्थ: अथानन्तर राजाकी आज्ञासे मेघसमूहकी गर्जनाके समान विशाल शब्द करनेवाली भेरियाँ बजायी गयीं और हाथियोंकी चिंघाड़का संशय उत्पन्न करनेवाले शंख फूँके गये ॥११९॥


यथेष्टं दीयमानेषु धनेषु परमस्ततः । आनन्दोऽवर्तताशेषनगरक्षोभदक्षिणः ॥१२०॥

अर्थ: इच्छानुसार धन दिया जाने लगा और समस्त नगरको क्षोभित करनेमें समर्थ बहुत भारी आनन्द प्रवृत्त हुआ ॥१२०॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवाचि राज्ञा पुरुषपुङ्गव । त्वया दुहितुरिच्छामि पाणिग्रहणमीक्षितुम् ॥१२१॥

अर्थ: तदनन्तर राजाने लक्ष्मणसे कहा कि हे श्रेष्ठ पुरुष ! मैं तुम्हारे साथ पुत्रीका पाणिग्रहण देखना चाहता हूँ ॥१२१॥


सोऽवोचन्नगरस्यास्य प्रदेशे निकटे मम । ज्येष्ठस्तिष्ठति तं पृच्छ स जानाति यथोचितम् ॥१२२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि इस नगरके निकटवर्ती प्रदेशमें मेरे बड़े भाई विराजमान हैं सो उनसे पूछो वही ठीक जानते हैं ॥१२२॥


ततः स्यन्दनमारोप्य जितपद्मां सलक्ष्मणाम् । सदारबन्धुरभ्याशं प्रतस्थे तस्य सादरः ॥१२३॥

अर्थ: तब लक्ष्मण सहित जितपद्माको रथ पर बैठाकर स्त्रियों तथा भाई-बन्धुओंसे सहित राजा शत्रुंदम बड़े आदरके साथ रामके समीप चला ॥१२३॥


ततः क्षुब्धापगानाथनिर्घोषप्रतिमध्वनिम् । श्रुत्वा वोक्ष्य विशालं च धूलीपटलमुद्गतम् ॥१२४॥

जानुन्यस्तमुहुःस्रस्तकरा कृच्छात्समुत्थिता । सीता जगाद संभ्राता गिरा प्रस्खलिता मुहुः ॥१२५॥

कृतं सौमित्रिणा नूनं राघवोद्धतचेष्टितम् । आशेयमाकुलात्यन्तं दृश्यते कृत्यमाश्रयः ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रकी गर्जनाके समान जोरदार शब्द सुनकर और उठे हुए विशाल धूलिपटलको देखकर घुटनोंपर बार-बार हाथ रखती हुई सीता बड़े कष्टसे उठी और घबड़ाकर स्खलित वाणीमें रामसे बोली कि हे राघव ! जान पड़ता है लक्ष्मणने कोई उद्धत चेष्टा की है। यह दिशा अत्यन्त आकुल दिखाई देती है इसलिए सावधान होओ और जो कुछ करना हो सो करो ॥१२४-१२६॥


आश्लिष्य जानकीं देवि मा भैषीरिति शब्दयन् । उत्तस्थौ राघवः क्षिप्रं दृष्टिं धनुषि पातयन् ॥१२७॥

अर्थ: तब सीताका आलिंगन कर ‘हे देवि ! भयभीत मत होओ’ यह कहते तथा शीघ्र ही धनुषपर दृष्टि डालते हुए राम उठे ॥१२७॥


तावच्च नरवृन्दस्य महतः स्थितमग्रतः । सुतारगीतनिस्वानमीक्षांचक्रेऽङ्गनाजनम् ॥१२८॥

अर्थ: इतनेमें ही उन्होंने विशाल नर-समूहके आगे उच्चस्वरसे मंगल गीत गानेवाली स्त्रियोंका समूह देखा ॥१२८॥


क्रमेण गच्छतश्चास्य प्रत्यासत्तिं मनोहराः विभ्रमाः समदृश्यन्त सुदारावयवोत्थिताः ॥१२९॥

अर्थ: वह स्त्रियोंका समूह जब क्रम-क्रमसे पास आया तब सुन्दर स्त्रियोंके शरीरसे उत्पन्न होनेवाले मनोहर हाव-भाव दिखाई दिये ॥१२९॥


नृत्यन्तं च समालोक्य तारनूपुरशिञ्जितम् । विश्रब्धः सीतया साकं पद्मः पुनरुपाविशत् ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नूपुरोंकी जोरदार झनकार फैल रही थी ऐसी स्त्रियोंके समूहको नृत्य करता देख राम निश्चिन्त हो सीताके साथ पुनः बैठ गये ॥१३०॥


स्त्रियो मङ्गलहस्तास्तं सर्वालंकारभूषिताः । ढुढौकिरेऽतिहारिण्यः समदस्फीतलोचनाः ॥१३१॥

अर्थ: अथानन्तर जिनके हाथोंमें मंगल द्रव्य थे, जो सब प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत थीं, अतिशय मनोहर थीं और जिनके नेत्र मदसे फूल रहे थे ऐसी स्त्रियाँ रामके पास आयीं ॥१३१॥


रथादुत्तीर्य पद्मास्यः सहितो जितपद्मया । पतिः पपात पद्मायाः पद्मस्य चरणौ द्रुतम् ॥१३२॥

अर्थ: कमलके समान मुखको धारण करनेवाले लक्ष्मण जितपद्माके साथ रथसे उतरकर शीघ्र ही रामके चरणोंमें जा पड़े ॥१३२॥


पद्मस्य प्रणतिं कृत्वा सीताया अपि सत्रपः । निविश्य नातिनिकटे पद्मस्य विनयी स्थितः ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर राम और सीताको प्रणाम कर लजाते हुए लक्ष्मण रामसे कुछ दूर हटकर विनयपूर्वक बैठ गये ॥१३३॥


नृपाः शत्रुंदमाद्याश्च क्रमात्कृत्वा नमस्कृतिम् । पद्मस्य सहसीतस्य यथास्थानमवस्थिताः ॥१३४॥

अर्थ: शत्रुन्दम आदि राजा भी क्रम-क्रमसे राम तथा सीताको नमस्कार कर यथा स्थान बैठ गये ॥१३४॥


तत्र संकथया स्थित्वा कुशलप्रश्नपूर्वया । कृते च पुनरानन्दनर्तने पार्थिवैरपि ॥१३५॥

अर्थ: कुशल समाचार पूछकर सब वार्तालाप करते हुए सुखसे बैठे तथा राजाओंने आनन्द-नृत्य किया ॥१३५॥


ऋद्धया परमया युक्तः ससीतो लक्ष्मणो बलः । प्रविष्टः स्यन्दनारूढो नगरं प्रमदान्वितः ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर परम सम्पदासे युक्त तथा हर्षसे भरे राम लक्ष्मण और सीताने रथपर सवार हो नगरमें प्रवेश किया ॥१३६॥


तत्र लावण्यकिञ्जल्कयोषित्कुवलयाकुले । महाप्रासादसरसि स्वनद्भूषणपक्षिणि ॥१३७॥

अर्थ: वहाँ राजमहलमें पहुँचे । वह राजमहल एक सरोवरके समान जान पड़ता था क्योंकि सौन्दर्य रूपी केशरसे युक्त स्त्रियों रूपी नील कमलोंसे वह व्याप्त था और शब्द करते हुए आभूषण रूपी पक्षियोंसे युक्त था ॥१३७॥


नरेमकलमौ सत्यव्रतसिंहध्वनेरलम् । त्रासात् संकुचितस्वान्तौ कुमारश्रीसमन्वितौ ॥१३८॥

शत्रुंदमकृतच्छन्दौ किंचित्कालं महासुखौ । उषितौ सर्वलोकस्य चित्ताह्लादनदायिनौ ॥१३९॥

अर्थ: सत्यव्रत रूपी सिंहकी गर्जनाके भयसे जिनके चित्त अत्यन्त संकुचित रहते थे, जो कुमार लक्ष्मीसे सहित थे, राजा शत्रुन्दम जिनकी इच्छानुसार सब सेवा करता था, जो महा सुखसे सहित थे तथा जो समस्त लोगोंके चित्तको आनन्द देनेवाले थे ऐसे नर श्रेष्ठ राम लक्ष्मण उस राजमहलमें कुछ समय तक सुखसे रहे ॥१३८-१३९॥


जितपद्मां ततो भीतां विरहादतिदुःखिताम् । परिसान्त्व्य प्रियैर्वाक्यैर्वनमालामिवादरात् ॥१४०॥

पद्मः सीतानुगो भूत्वा निशीथे स्वैरनिर्गतः । यातो लक्ष्मीधरो दत्वा पौराणामधृतिं पराम् ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर राम अर्धरात्रिके समय सीताके साथ इच्छानुसार राजमहलसे बाहर निकल पड़े और लक्ष्मण भी वनमालाके समान विरहसे भयभीत अतिशय दुःखी जितपद्माको प्रिय वचनों द्वारा आदर पूर्वक सान्त्वना दे रामके साथ चले । इन सबके जानेसे नगरवासियोंका धैर्य जाता रहा ॥१४०-१४१॥


ये जन्मान्तरसंचिताखिलसुकृताः सर्वासुभाजां प्रियाः यं यं देशमुपव्रजन्ति विविधं कृत्यं मजन्तः परम् । तस्मिन्सर्वहृषीकसौख्यचतुरस्तेषां विना चिन्तया मृष्टान्नादिविधिर्भवत्यनुपमो यो विष्टपे दुर्लभः ॥१४२॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्होंने जन्मान्तरमें बहुत भारी पुण्यका संचय किया है ऐसे सर्व प्राणियोंको प्रिय पुरुष, नाना प्रकारके उत्तम कार्य करते हुए जिस-जिस देशमें जाते हैं उसी-उसी देशमें उन्हें बिना किसी चिन्ताके समस्त इन्द्रियोंके सुख देनेमें निपुण मधुर आहार आदिकी सब ऐसी अनुपम विधि मिलती है कि लोकमें जो दूसरोंके लिए दुर्लभ रहती है ॥१४२॥


भोगैर्नास्ति मम प्रयोजनमिमे गच्छन्तु नाशं खला इत्येषां यदि सर्वदापि कुरुते निन्दामलं द्वेषकः । एतैः सर्वगुणोपपत्तिपटुभिर्यातोऽपि शृङ्गं गिरेः नित्यं याति तथापि निर्जितरविर्दीप्त्या जनः संगमम् ॥१४३॥

अर्थ: 'मुझे इन लोगोंसे प्रयोजन नहीं है। ये दुष्ट नाशको प्राप्त हों, इस प्रकार भोगोंसे अतिशय द्वेष रखनेवाला पुरुष यद्यपि सर्वदा इन भोगोंकी निन्दा करता है और इन्हें छोड़कर पर्वतके शिखरपर भी चला जाता है तो भी अपनी कान्तिसे सूर्यको जीतनेवाला पुण्यात्मा पुरुष समस्त गुणोंकी प्राप्ति करानेमें समर्थ इन भोगोंके साथ सदा समागमको प्राप्त होता है अर्थात् पुण्यात्मा मनुष्यको इच्छा न रहते हुए भी सब प्रकारकी सुख सामग्री सर्वत्र मिलती है ॥१४३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते जितपद्मोपाख्यानं नामाष्टत्रिंशत्तमं पर्व ॥३८॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें जितपद्माका वर्णन करनेवाला अड़तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३८॥


३९. एकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व (देशकुलभूषणोपाख्यानं)

अथ नानाद्रुमक्ष्मासु बहुपुष्पसुगन्धिषु । लतामण्डपयुक्तासु सेवितासु सुखं मृगैः ॥१॥

देवोपनीतनिश्शेषशरीरस्थितिसाधनौ । आयातां रममाणौ तौ ससीतौ रामलक्ष्मणौ ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जिनकी शरीर-स्थितिके समस्त साधन देवोपनीत थे, ऐसे सीता सहित राम-लक्ष्मण रमण करते हुए वनको उन भूमियोंमें आये जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे सहित थी, जिनमें नाना फूलोंकी सुगन्धि फैल रही थी, जो लतामण्डपोंसे सहित थीं तथा मृगगण जिनमें सुखसे निवास करते थे ॥१-२॥


क्वचिद्विद्रुमसंकाशं रामः किसलयं लघु । गृहीत्वा कुरुते कर्णे जानक्याः साध्विति ब्रुवन् ॥३॥

सुतरौं संगतां वल्लीं क्वचिदारोप्य जानकीम् । स्वैरं दोलयतः पार्श्ववर्तिनौ रामलक्ष्मणौ ॥४॥

अर्थ: कहीं राम, मूंगके समान कान्तिवाले पल्लवको तोड़कर तथा उसका कर्णाभरण बनाकर ‘यह ठीक रहेगा’ इस प्रकार कहते हुए सीताके कानमें पहिनाते थे, तो कहीं किसी वृक्ष पर लटकती लता पर सीताको बैठाकर बगलमें दोनों ओर खड़े हो राम-लक्ष्मण उसे झूला झुलाते थे ॥३-४॥


द्रुमखण्डे क्वचिद् स्थित्वा नितान्तघनपल्लवे । कथाभिः सुविदग्धाभिः कुरुतस्तद्विनोदनम् ॥५॥

अर्थ: कहीं सघन पत्तोंवाले द्रुम-खण्डमें बैठकर मनोहर-मनोहर कथाओंसे उसका मनोविनोद करते थे ॥५॥


इयमेतदयं वल्ली पलाशं तरुरीक्ष्यताम् । हारिणी हारि हारीति सीतोचे राघवं क्वचित् ॥६॥

अर्थ: कहीं सीता रामसे कहती थी कि यह मनोहर लता देखो, कहीं कहती थी कि यह मनोहर पल्लव देखो और कहीं कहती थी कि यह मनोहर वृक्ष देखो ॥६॥


क्वचिद् भ्रमरसंघातैर्मुखसौरभलोलुपैः । कृच्छ्रादरक्षतामेतौ राजपुत्रीं कदर्थिताम् ॥७॥

अर्थ: कहीं मुखकी सुगन्धिके लोभी भ्रमरोंके समूह सीताको पीड़ित करते थे, सो ये दोनों भाई बड़ी कठिनाई-से उसकी रक्षा करते थे ॥७॥


शनैर्विहरमाणौ तौ ससीतौ शुभविभ्रमौ । काननेषु विचित्रेषु स्वर्वनेषु सुराविव ॥८॥

अर्थ: जिस प्रकार देव स्वर्गके वनोंमें विहार करते हैं उसी प्रकार शुभ चेष्टाओंके धारक दोनों भाई सीताको साथ लिये नाना प्रकारके वनोंमें धीरे-धीरे विहार करते थे ॥८॥


नानाजनोपभोग्येषु देशेषु निहितेक्षणौ । धीरौ क्रमेण संप्राप्तौ पुरं वंशस्थलद्युतिम् ॥९॥

अर्थ: नाना मनुष्योंसे उपभोग्य देशोंमें दृष्टि डालते हुए वे धीर-वीर क्रमसे वंशस्थद्युति नामक नगरमें पहुँचे ॥९॥


सुदीर्घोऽपि तयोः कालो गच्छतोः सहसीतयोः । पुण्यानुगतयोर्नासीदपि दुःखलवप्रदः ॥१०॥

अर्थ: सीताके साथ भ्रमण करते हुए उन पुण्यानुगामी महापुरुषोंको यद्यपि बहुत काल हो गया था तो भी उतना बड़ा काल उन्हें अंशमात्र भी दुःख देनेवाला नहीं हुआ था ॥१०॥


अपश्यतां च तस्यान्ते वंशजालातिसंकटम् । नगं वंशधराभिख्यं भित्त्वेव भुवमुद्गतम् ॥११॥

छायया तुङ्गशृङ्गाणां यः सन्ध्यामिव संततम् । दधाति निर्झराणां च हसतीव च शीकरैः ॥१२॥

अर्थ: उस नगरके समीप ही उन्होंने वंशधर नामका पर्वत देखा जो बाँसोंके समूहसे अत्यन्त व्याप्त था, पृथिवीको भेदकर ही मानो ऊपर उठा था, ऊँचे-ऊँचे शिखरोंकी कान्तिसे जो मानो सदा सन्ध्याको धारण कर रहा था और निर्झरनोंके छींटोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो हँस ही रहा हो ॥११-१२॥


निर्गच्छन्तीं प्रजां दृष्ट्वा पुरादथ स एककाम् । रामः पप्रच्छ भोः कस्मात् त्रासोऽयं सुमहानिति ॥१३॥

अर्थ: उन्होंने यह भी देखा कि प्रजाके लोग नगरसे निकल-निकल कर कहीं अन्यत्र जा रहे हैं । तब रामने किसी एक मनुष्यसे पूछा कि हे भद्र ! यह बहुत भारी भय किस कारणसे है ? ॥१३॥


सोऽवोचदद्य दिवसस्तृतीयो वर्तते नरः । नक्तमुत्तिष्ठतोऽमुष्मिन्नगे नादस्य मस्तके ॥१४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उस मनुष्यने कहा कि इस पर्वतके शिखर पर रात्रिके समय शब्द उठते हुए आज तीसरा दिन है ॥१४॥


ध्वनिरश्रुतपूर्वोऽयं प्रतिनादी भयावहः । कस्येति बहुविज्ञानैर्न वृद्धैरपि वेद्यते ॥१५॥

अर्थ: जो शब्द पर्वत पर होता है वह हमने पहले कभी नहीं सुना, उसकी प्रतिध्वनि सर्वत्र गूँज उठती है तथा वह अत्यन्त भयंकर है । किस व्यक्तिका शब्द है ? यह बहुविज्ञानी वृद्ध लोग भी नहीं जानते हैं ॥१५॥


संक्षुभ्यतीव भूः सर्वा नन्दन्तीव दिशो दश । सरांसि संचरन्तीव निर्मूल्यन्त इवाङ्घ्रिपाः ॥१६॥

अर्थ: इस शब्दसे मानो समस्त पृथिवी हिल उठती है, दशों दिशाएँ मानो शब्द करने लगती हैं, सरोवर मानो इधर-उधर फिरने लगते हैं और वृक्ष मानो उखड़ने लगते हैं ॥१६॥


रौरवारावरौद्रेण घनेन ध्वनिनामुना । श्रवणौ सर्वलोकस्य ताड्येतेऽयोघनैरिव ॥१७॥

अर्थ: रौद्रतामें नरकके शब्दकी तुलना करनेवाले इस भारी शब्दसे समस्त लोगोंके कान ऐसे फटे पड़ते हैं मानो लोहेके घनोंसे ही ताडित होते हों ॥१७॥


निशागमे किमस्माकं वधार्थमयमुद्यतः । करोति क्रीडनं तावत् कोऽपि विष्टपकण्टकः ॥१८॥

अर्थ: जान पड़ता है कि रात्रिके समय हम लोगोंका वध करनेके लिए उद्यत हुआ यह कोई लोकका कण्टक क्रीड़ा करता फिरता है ॥१८॥


भयेन स्वनतस्तस्मादयं लोको निशागमे । पलायते प्रभाते तु पुनरेति यथायथम् ॥१९॥

अर्थ: ये लोग उस शब्दके भयसे रात्रि प्रारम्भ होते ही भाग जाते हैं और प्रभात होने पर पुनः वापिस आ जाते हैं ॥१९॥


साग्रं योजनमेतस्मादतीत्यान्योन्यभाषितम् । शृणोत्ययं जनः किंचित् प्राप्नोति च सुखासिकाम् ॥२०॥

अर्थ: यहाँसे कुछ अधिक एक योजन चलकर यह शब्द इतना हलका हो जाता है कि लोग परस्परका वार्तालाप सुन सकते हैं तथा कुछ आराम प्राप्त कर सकते हैं’ ॥२०॥


निशम्योक्तमिदं सीता बभाषे रामलक्ष्मणौ । वयमन्यत्र गच्छामो यत्र याति महाजनः ॥२१॥

अर्थ: यह सुनकर सीताने राम-लक्ष्मणसे कहा कि जहाँ ये सब लोग जा रहे हैं वहाँ हम लोग भी चलें ॥२१॥


कालं देशं च विज्ञाय नातिशास्त्रविशारदैः । क्रियते पौरुषं तेन न जातु विपदाप्यते ॥२२॥

अर्थ: नीतिशास्त्रके ज्ञाता पुरुष देश कालको समझकर पुरुषार्थ करते हैं, इसलिए कभी आपत्ति नहीं आती ॥२२॥


प्रहस्यावोचतामेतामुद्विग्नां जनकात्मजाम् । गच्छ त्वं यत्र लोकोऽयं व्रजत्यलँघुसाध्वसे ॥२३॥

अर्थ: राम-लक्ष्मणने घबड़ायी हुई सीतासे हँसकर कहा कि तुझे बहुत भय लग रहा है इसलिए जहां ये लोग जाते हैं वहाँ तू भी चली जा ॥२३॥


अन्विष्यन्ती प्रभाते नौ लोकेन सहितामुना । अमुष्मिन् गण्डशैलान्ते गतभीरागमिष्यति ॥२४॥

अर्थ: प्रभात होनेपर इन लोगोंके साथ हम दोनोंको खोजती हुई निर्भय हो इस पर्वतके समीप आ जाना ॥२४॥


अस्मिन् महीधरे रम्ये ध्वनिरत्यन्तभीषणः । कस्यायमिति पश्यामो वयमद्येति निश्चयः ॥२५॥

अर्थ: ‘इस मनोहर पर्वत पर यह अत्यन्त भयंकर शब्द किसका होता है ? यह आज हम देखेंगे’ ऐसा निश्चय किया है ॥२५॥


प्रभीष्यते वराकोऽयं लोकः शिशुसमाकुलः । पशुभिः सहितः स्वन्तमस्य को नु करिष्यति ॥२६॥

अर्थ: ये दीन लोग बाल-बच्चोंसे व्याकुल तथा पशुओंसे सहित हैं, इसलिए ये तो भयभीत होंगे ही इनका भला कौन कर सकता है ? ॥२६॥


वैदेही सज्वरेवोचे सततं भवतोरिमम् । हर्तुमेकं ग्रहं शक्तः कः कुलीरग्रहोपमम् ॥२७॥

अर्थ: तब जैसे ज्वर चढ़ रहा हो ऐसी काँपती हुई आवाजमें सीताने कहा कि हमेशा आपलोगोंकी हठ केंकड़ेकी पकड़के समान विलक्षण ही है उसे दूर करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२७॥


वदन्ती पुनरेवं सा पद्मनाभस्य पृष्ठतः । लक्ष्मीधरकुमारस्य जगामावस्थिता पुरः ॥२८॥

अर्थ: ऐसा कहती हुई वह रामके पीछे और लक्ष्मणके आगे खड़ी हो चलने लगी ॥२८॥


आरोहन्ती गिरिं देवी प्रखिन्नक्रमपङ्कजा । रराज शृङ्गमब्दस्य चन्द्ररेखेव निर्मला ॥२९॥

अर्थ: जिसके चरणकमल खेदखिन्न हो गये थे, ऐसी सीता पहाड़ पर चढ़ती हुई इस प्रकार सुशोभित हो रही थी मानो मेघके शिखर पर चन्द्रमाकी निर्मल रेखा ही है ॥२९॥


चन्द्रकान्तेन्द्रनीलान्तःस्थिता पुष्पमणेरसौ । शलाकेवाभवत्तस्य पर्वतस्य विभूषणम् ॥३०॥

अर्थ: राम और लक्ष्मणके बीचमें खड़ी सीता चन्द्रकान्तमणि और नीलमणिके मध्यमें स्थित स्फटिकमणिकी शलाकाके समान पर्वतका आभूषण हो रही थी ॥३०॥


भृगुपातपरित्रस्तां क्वचिदुत्क्षिप्य तामिमौ । नयतोऽन्यत्र विश्रब्धहस्तालम्बनकोविदौ ॥३१॥

अर्थ: जहाँ कहीं सीताको गोल चट्टानोंसे नीचे गिरनेका भय होता था वहाँ वे दोनों, उसे ऊपर उठाकर ले जाते थे और जहाँ गिरनेका भय नहीं होता था वहाँ निश्चिन्ततापूर्वक हाथका सहारा देकर ले जाते थे ॥३१॥


विषमग्रावसंघातं निस्तीर्य त्रासवर्जितौ । विस्तीर्णनगमूर्धानं ससीतौ तावपापतुः ॥३२॥

अर्थ: इस प्रकार ऊँची-नीची चट्टानोंका समूह पारकर भयसे रहित राम-लक्ष्मण सीताके साथ पर्वतके चौड़े शिखर पर जा पहुँचे ॥३२॥


अथ सद्ध्यानमारूढौ प्रलम्बितमहाभुजौ । साधयन्तौ सुदुस्साध्यां प्रतिमां चतुराननाम् ॥३३॥

परेण तेजसा युक्तावब्धिधीरौ नगस्थिरौ । शरीरचेतनान्यत्ववेदिनौ मोहवर्जितौ ॥३४॥

जातरूपधरौ कान्तिसागरौ नवयौवनौ । संयतौ प्रवराकारौ ददृशुस्ते यथोदितौ ॥३५॥

अर्थ: अथानन्तर उन्होंने ऊपर जाकर ऐसे दो मुनि देखे जो उत्तमध्यानमें आरूढ थे, जिनकी लम्बी भुजाएँ नीचेकी ओर लटक रही थीं, जो अत्यन्त दुःसाध्य चतुर्मुखी प्रतिमाको सिद्ध कर रहे थे, परम तेजसे युक्त थे, समुद्रके समान गम्भीर थे. पर्वतके समान स्थिर थे, शरीर और आत्माकी भिन्नताको जाननेवाले थे, मोहसे रहित थे, दिगम्बर-मुद्राको धारण करनेवाले थे, कान्तिके सागर थे, नूतन तारुण्यसे युक्त थे, उत्तम आकारके धारक थे और आगमोक्त आचरण करनेवाले थे ॥३३-३५॥


दध्युश्च विस्मयं प्राप्ता यथा मुक्त्वाशुमार्जनम् । निस्सारमीहितं सर्वं संसारे दुःखकारणम् ॥३६॥

अर्थ: आश्चर्यको प्राप्त हुए वे तीनों अशुभ कर्मोंके आश्रयका परित्याग कर इस प्रकार विचार करने लगे कि संसारमें प्राणियोंकी समस्त चेष्टाएँ निःसार तथा दुःखके कारण हैं ॥३६॥


मित्राणि द्रविणं दाराः पुत्राः सर्वे च बान्धवाः । सुखदुःखमिदं सर्वं धर्म एकः सुखावहः ॥३७॥

अर्थ: मित्र, धन, स्त्री, पुत्र, और भाई-बन्धु आदि सभी सुख-दुःख रूप हैं, एक धर्म ही सुखका कारण है ॥३७॥


डुढौकिरे च भक्त्याढ्या मूर्धविन्यस्तपाणयः । दधानाः परमं तोषं विनयानतविग्रहाः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर जो भक्तिसे युक्त थे, जिन्होंने हाथ जोड़कर मस्तक पर लगा रक्खे थे, जो परम सन्तोषको धारण कर रहे थे, और विनयसे जिनके शरीर नम्रीभूत हो रहे थे, ऐसे वे तीनों उक्त मुनिराजोंके पास गये ॥३८॥


यावद्ददृशुरत्युग्रैर्विस्फुरद्भिर्महास्वनैः । मिन्नाञ्जनसमच्छायैश्चलजिह्वैः पृदाकुभिः ॥३९॥

समुद्यतालकैर्भीमैश्चलद्भिरनिशं घनैः । नानावर्णैरतिस्थूलैर्वेष्टितौ वृश्चिकैश्च तौ ॥४०॥

अर्थ: दर्शन करते ही उन्होंने, जो अत्यन्त भयंकर थे, इधर-उधर चल रहे थे, विकट शब्द कर रहे थे, मसले हुए अंजनके समान कान्तिवाले थे, तथा जिनकी जीभें लपलपा रही थीं ऐसे साँपोंसे और जिन्होंने अपनी पूँछ ऊपर उठा रक्खी थी, जो अत्यन्त भयंकर थे, रात-दिन एक-दूसरेसे सटकर चल रहे थे, नाना रंगके थे, एवं बहुत मोटे थे, ऐसे बिच्छुओंसे उन दोनों मुनियोंको घिरा देखा ॥३९-४०॥


तथाविधौ च तौ दृष्ट्वा रामोऽपि सहलक्ष्मणः । सहसा त्रासमायातौ भेजे स्तम्भमिव क्षणम् ॥४१॥

अर्थ: उक्त प्रकारके मुनियोंको देख, राम भी लक्ष्मणके साथ सहसा भयको प्राप्त हुए तथा क्षण भरके लिए निश्चल रह गये ॥४१॥


वैदेही भयसंपन्ना भर्तारं परिषस्वजे । मा भैषीरिति तामूचे भयं त्यक्त्वा क्षणेन सः ॥४२॥

अर्थ: सीता भयभीत हो पतिसे लिपट गयी, तब रामने क्षण एकमें भय छोड़कर सीतासे कहा कि डरो मत ॥४२॥


उपसृत्य ततः स्वैरं ताभ्यां पन्नगवृश्चिकाः । अत्यस्ता कार्मुकाग्रेण मुहुः कृतविवर्तनाः ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर राम-लक्ष्मणने धीरे-धीरे पास जाकर जो दूर हटानेपर भी बार-बार वहीं लौटकर आते थे ऐसे साँप, बिच्छुओंको धनुषके अग्रभागसे दूर किया ॥४३॥


अथोद्वर्त्य चिरं पादौ तयोर्निर्झरवारिणा । गन्धेन सीतया लिप्तौ चारुणा पुरुभावया ॥४४॥

अर्थ: अथानन्तर भक्तिसे भरी सीताने निर्झरके जलसे देर तक उन मुनियोंके पैर धोकर मनोहर गन्धसे लिप्त किये ॥४४॥


आसन्नानां च वल्लीनां कुसुमैर्वनसौरभैः । लक्ष्मीधरार्पितैः शुक्लैः पूरितान्तरमर्चितौ ॥४५॥

अर्थ: तथा जो वनको सुगन्धित कर रहे थे एवं लक्ष्मणने जो तोड़कर दिये थे, ऐसे निकटवर्ती लताओंके फूलोंसे उनकी खूब पूजा की ॥४५॥


ततस्ते करयुग्माब्जमुकुलभ्राजितालिकाः । चक्रुर्योगीश्वरौ भक्त्या वन्दनां विधिकोविदाः ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर अंजलिरूपी कमलकी बोड़ियोंसे जिनके ललाट शोभायमान थे तथा जो विधि-विधानके जाननेमें निपुण थे ऐसे उन सबने भक्तिपूर्वक मुनिराजकी वन्दना की ॥४६॥


वीणां च संनिधायाङ्के वधूमिव मनोहराम् । पद्मोऽवादयदत्युद्धं गायन् सुमधुराक्षरम् ॥४७॥

अर्थ: अत्यन्त उत्तम तथा मधुर अक्षरोंमें गाते हुए रामने मनोहर स्त्रीके समान वीणाको गोदमें रखकर बजाया ॥४७॥


अन्वगायदिमं लक्ष्मीलतालिङ्गितपादपः । वाक्कोकिलरवः पुत्रः कैकय्यास्तत्त्वमादरम् ॥४८॥

अर्थ: इनके साथ ही लक्ष्मणने भी बड़े आदरसे तत्त्वपूर्ण गान गाया । उस समय लक्ष्मण, लक्ष्मीरूपी लतासे आलिंगित वृक्षके समान जान पड़ते थे और उनका मधुर शब्द कोयलकी मीठी तानके समान मालूम होता था ॥४८॥


महायोगेश्वरा धीरा मनसा शिरसा गिरा । वन्द्यास्ते साधवो नित्यं सुरैरपि सुचेष्टिताः ॥४९॥

उपमानविनिर्मुक्तं यैरव्याहतमुत्तमम् । प्राप्तं त्रिभुवनख्यातं सुभाग्यैरर्हदक्षरम् ॥५०॥

भिन्नं यैर्ध्यानदण्डेन महामोहशिलातलम् । दीनं विदन्ति ये विश्वं धर्मानुष्ठानवर्जितम् ॥५१॥

अर्थ: वे गा रहे थे कि जो महायोगके स्वामी हैं, धीर-वीर हैं तथा उत्तम चेष्टाओंसे सहित हैं, उत्तम भाग्यके धारक जिन मुनियोंने उपमासे रहित, अखण्डित, तथा तीन लोकमें प्रसिद्ध ‘अर्हंत्’ यह उत्तम अक्षर प्राप्त कर लिया हैं । जिन्होंने ध्यानरूपी दण्डके द्वारा महामोहरूपी शिलातलको तोड़ दिया है और जो धर्मानुष्ठान-धर्माचरणसे रहित विश्वको दीन समझते हैं ऐसे साधु देवोंके द्वारा भी मनसे, शिरसे तथा वचनसे वन्दनीय हैं ॥४९-५१॥


गायतोरक्षराण्येवं तयोर्गानविधिज्ञयोः । तिरश्चामपि चेतांसि परिप्राप्तानि मार्दवम् ॥५२॥

अर्थ: मानकी विधिको जाननेवाले राम-लक्ष्मण जब इस प्रकारके अक्षर गा रहे थे तब तिर्यंचोंके भी चित्त कोमलताको प्राप्त हो गये थे ॥५२॥


ततो विदितनिःशेषचारुनर्तनलक्षणा । मनोज्ञाकल्पसंपन्ना हारमाल्यादिभूषिता ॥५३॥

लीलया परया युक्ता दर्शिताभिनया स्फुटम् । चारुबाहुलताभारा हावभावादिकोविदा ॥५४॥

लयान्तरवशोल्कम्पिमनोज्ञस्तनमण्डला । निश्शब्दचरणाम्भोजविन्यासा चलितोरुका ॥५५॥

गीतानुगमसंपन्नसमस्ताङ्गविचेष्टिता । मन्दरे श्रीरिवानृत्यज्जानकी भक्तिचोदिता ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर जो समस्त सुन्दर नृत्योंके लक्षण जानती थी, मनोहर वेषभूषासे युक्त थी, हार माला आदिसे अलंकृत थी, परम लीलासे सहित थी, स्पष्टरूपसे अभिनय दिखला रही थी, जिसकी बाहुरूपी लताओंका भार अत्यन्त सुन्दर था, जो हाव-भाव आदिके दिखलानेमें निपुण थी, लय बदलनेके समय जिसके सुन्दर स्तनोंका मण्डल कुछ ऊपर उठकर कम्पित हो रहा था, जिसके चरण-कमलोंका विन्यास शब्द रहित था; जिसकी एक जांघ चल रही थी । जिसके शरीरकी समस्त चेष्टाएँ संगीत शास्त्रके अनुरूप थीं, तथा जो भक्तिसे प्रेरित थी, ऐसी सीताने उस प्रकार नृत्य किया जिस प्रकार कि जिनेन्द्रके जन्माभिषेकके समय सुमेरु पर श्री देवीने किया था ॥५३-५६॥


उपसर्गादिव त्रस्ते यातेऽस्तं भास्करे ततः । सन्ध्यायां चानुमार्गेण यातायां चलतेजसि ॥५७॥

नक्षत्रमण्डलालोकं निघ्नन् नीलाभ्रसंनिभम् । व्याप्नुवानं दिशः सर्वा गहनं ध्वान्तमुद्गतम् ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर उपसर्गसे त्रस्त होकर ही मानो जब सूर्य अस्त हो गया और उसीके पीछे चंचल तेजको धारण करनेवाली संध्या भी जब चली गयी तब नक्षत्र मण्डलके प्रकाशको नष्ट करनेवाला तथा नील मेघके समान आभावाला सघन अन्धकार समस्त दिशाओंको व्याप्त करता हुआ उदित हुआ ॥५७-५८॥


जनस्याश्रावि कस्यापि दिक्षु संक्षोभणं परम् । सांराविणं तथा चित्रं भिन्दानमिव पुष्करम् ॥५९॥

अर्थ: उसी समय किसीका ऐसा विचित्र शब्द सुनाई दिया जो दिशाओंमें परम क्षोभ उत्पन्न करनेवाला था तथा जो आकाशको भेदन करता हुआ-सा जान पड़ता था ॥५९॥


विद्युज्ज्वालामुखैर्लम्बैरम्बुदैर्व्याप्तमम्बरम् । क्वापि यात इवाशेषो लोकस्त्राससमाकुलः ॥६०॥

अर्थ: जिसके अग्रभागमें बिजलीरूपी ज्वाला प्रकाशमान थी, ऐसी लम्बी घन-घटासे आकाश व्याप्त हो गया और लोक ऐसा जान पड़ने लगा मानो भयसे व्याकुल हो कहीं चला ही गया हो ॥६०॥


अलंप्रतिभयाकारा दंष्ट्रालीकुटिलाननाः । अट्टाहासान् महारौद्रान् भूतानां ससृजुर्गणाः ॥६१॥

अर्थ: जिनके आकार अत्यन्त भय उत्पन्न करनेवाले थे तथा जिनके मुख दाँढ़ोंकी पंक्तिसे कुटिल थे, ऐसे भूतोंके झुण्ड महा भयंकर अट्टहास करने लगे ॥६१॥


क्रव्यादा विरसं रेसुः सानलं चाशिवाः शिवाः । सस्वनुर्ननृतुर्भीमं कलेवरशतानि च ॥६२॥

अर्थ: राक्षस नीरस शब्द करने लगे, अमंगल रूप शृगालियाँ अग्नि उगलती हुई शब्द करने लगीं, सैकड़ों कलेवर भयंकर नृत्य करने लगे, ॥६२॥


मूर्धोरोभुजजङ्घादीन्यङ्गानि ववृषुर्घनाः । दुर्गन्धिभिः समेतानि स्थूलशोणितबिन्दुभिः ॥६३॥

अर्थ: मेघ, दुर्गन्धित खूनकी बड़ी मोटी बूँदोंसे सहित मस्तक, वक्षःस्थल, भुजा तथा जंघा आदि अवयवोंकी वर्षा करने लगे ॥६३॥


करवालीकरा क्रूरविग्रहा दोलितस्तनी । लम्बोष्ठी डाकिनी नग्ना दृश्यमानास्थिसंचया ॥६४॥

मांसखण्डाममग्नाक्षी शिरोघटितशेखरा । ललाटप्रसरोजिह्वा पेशीशोणितवर्षिणी ॥६५॥

अर्थ: जो हाथमें तलवार लिये थी जिसका शरीर अत्यन्त क्रूर था, जिसके स्तन हिल रहे थे, जिसके ओठ अत्यन्त लम्बे थे, जो नग्न थी, जिसकी हड्डियोंका समूह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा था, जिसकी फूटी आँखें मांसखण्डके समान थीं, जिसने नरमुण्डका सेहरा पहिन रखा था, जिसकी जीभ ऊपरकी ओर उठकर ललाटका स्पर्श कर रही थी तथा जो मांस और रुधिरकी वर्षा कर रही थी ऐसी डाकिनी दिखाई देने लगी ॥६४-६५॥


सिंहव्याघ्रमुखैस्तप्तलोहचक्रामलोचनैः । शूलहस्तैर्विदष्टौष्ठैर्भ्रूकुटिकुटिलालकैः ॥६६॥

राक्षसैः परुषारावैर्नृत्यद्भिरतिसंकुलम् । कम्पिताद्रिशिलाजालं चुक्षोम वसुधातलम् ॥६७॥

अर्थ: जिनके मुख सिंह तथा व्याघ्रके समान थे, जिनके नेत्र तपे हुए लोह चक्रके सदृश थे, जिनके हाथमें शूल विद्यमान थे, जो ओंठको डश रहे थे, जिनके ललाट भौंहोंसे कुटिल थे, जिनकी आवाज अत्यन्त कठोर थी, तथा जो नृत्य कर रहे थे ऐसे राक्षसोंसे भरा हुआ वहाँका भूतल क्षोभको प्राप्त हो गया और पर्वतकी चट्टानें हिल उठीं ॥६६-६७॥


विचेष्टितमिदं व्यर्थं नाज्ञासिष्टां महामुनी । तयोर्हि ज्ञानकर्मान्तश्शुक्लध्यानमयं तदा ॥६८॥

अर्थ: यह सब हो रहा था परन्तु उन महामुनियोंको इस व्यर्थकी चेष्टाका कुछ भी भान नहीं था, उस समय उनका ज्ञानोपयोग अन्तरंगमें शुक्लध्यान मय हो रहा था अथवा उन महामुनियोंका ज्ञान कर्मोंका क्षय करनेवाले शुक्लध्यानसे तन्मय हो रहा था ॥६८॥


तथाविधं तमालोक्य वृत्तान्तं वरभीतिदम् । संहृत्य जानकी नृत्यमाश्लिष्यत्कम्पिनी पतिम् ॥६९॥

अर्थ: अच्छे-अच्छे पुरुषोंको भय उत्पन्न करनेवाला ऐसा वृत्तान्त देख सीता नृत्य छोड़ कांपती हुई पतिसे लिपट गयी ॥६९॥


पद्मो जगाद तां देवि मा भैषीः शुभमानसे । उपगुह्य मुनेः पादौ तिष्ठ सर्वभयच्छिदौ ॥७०॥

अर्थ: तब रामने कहा कि हे देवि ! हे शुभ मानसे ! भयभीत मत हो ! सब प्रकारका भय दूर करनेवाले मुनियोंके चरणोंका आश्रय ले बैठ जाओ ॥७०॥


इत्युक्त्वा पादयोः कान्तां मुनेरासाद्य लाङ्गली । लक्ष्मीधरकुमारेण साकं सन्नाहमाश्रितः ॥७१॥

अर्थ: यह कहकर रामने सीताको मुनिराजके चरणोंके समीप बैठाया और स्वयं लक्ष्मण कुमारके साथ, युद्धके लिए तैयार हो गये ॥७१॥


सजलाविव जीमूतौ गर्जितौ तौ महाप्रभौ । निर्घातमिव मुञ्चन्तौ समास्फालयतां धनुः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर सजल मेघके समान गरजनेवाले एवं महा कान्तिके धारक राम लक्ष्मणने अपने-अपने धनुष टंकोरे सो ऐसा जान पड़ा मानो वज्र ही छोड़ रहे हों ॥७२॥


ततस्तौ संभ्रमी ज्ञात्वा रामनारायणाविति । सुरो वह्निप्रभाभिख्यस्तिरोधानमुपेयिवान् ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर ‘ये बलभद्र और नारायण हैं’ ऐसा जानकर वह अग्निप्रभ देव घबड़ाकर तिरोहित हो गया ॥७३॥


ज्योतिर्वरे गते तस्मिन् समस्तं तद्विचेष्टितम् । सपदि प्रलयं यातं जातं च विमलं नभः ॥७४॥

अर्थ: उस ज्योतिषी देवके चले जानेपर उसकी सबकी सब चेष्टाएँ तत्काल विलीन हो गयीं और आकाश निर्मल हो गया ॥७४॥


प्रातिहार्ये कृते ताभ्यामिच्छद्भ्यां परमं हितम् । उत्पन्नं केवलज्ञानं मुनिपुङ्गवयोः क्षणात् ॥७५॥

अर्थ: अथानन्तर परम हितकी इच्छा करनेवाले राम-लक्ष्मणके द्वारा प्रतिहारीका कार्य सम्पन्न होनेपर अर्थात् उपसर्ग दूर किये जानेपर दोनों मुनियोंकी क्षणभरमें केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥७५॥


चतुर्विधास्ततो देवा नानायानसमाश्रिताः । समाजग्मुः प्रशंसन्तो मुदितास्तपसः फलम् ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर नाना प्रकारके वाहनोंपर बैठे, हर्षसे भरे तथा तपके फलकी प्रशंसा करते हुए चारों निकायके देव आ पहुँचे ॥७६॥


प्रणम्य विधिना तत्र कृत्वा केवलपूजनम् । रचिताञ्जलयो देवा यथास्थानमुपाविशन् ॥७७॥

अर्थ: वहाँ विधिपूर्वक प्रणामकर तथा केवलज्ञानकी पूजाकर सब देव लोग हाथ जोड़े हुए यथास्थान बैठ गये ॥७७॥


केवलज्ञानसंभूतिसमाकृष्टसुरागमात् । दोषादिनात्मकौ कालावभूतां भेदवर्जितौ ॥७८॥

अर्थ: उस समय केवलज्ञानकी उत्पत्तिसे खिंचे हुए देवोंका समागम होनेसे रात-दिन रूप काल भेदसे रहित हो गया अर्थात् वहाँ रात दिनका व्यवहार समाप्त हो गया ॥७८॥


भूमिगोचरिणो मर्त्यास्तथा विद्यामहाबलाः । उपविष्टा यथायोग्यं कृत्वा केवलिनो महम् ॥७९॥

अर्थ: भूमिगोचरी मनुष्य तथा विद्यारूपी महाबलको धारण करनेवाले विद्याधर - सभी लोग केवलियोंकी पूजाकर यथायोग्य स्थानपर बैठ गये ॥७९॥


प्रसन्नमानसौ सद्यः कृत्वा केवलिपूजनम् । प्रणम्य सीतया साकं निविष्टौ रामलक्ष्मणौ ॥८०॥

अर्थ: प्रसन्न चित्तके धारक राम-लक्ष्मण भी सीताके साथ शीघ्र ही केवलियोंकी पूजाकर यथास्थान बैठ गये ॥८०॥


अथ तत्क्षणसंभूतपरमार्हासनस्थितौ । प्रणम्य साञ्जलिः पद्मः पप्रच्छैवं महामुनी ॥८१॥

अर्थ: अथानन्तर तत्क्षण उत्पन्न हुए परमोत्तम सिंहासनोंपर विराजमान केवलज्ञानी महा- मुनियोंको नमस्कारकर रामने हाथ जोड़ इस प्रकार पूछा ॥८१॥


भगवन्तौ कृतो नक्तं केनायं वामुपद्रवः । अथवा स्वस्य युवयोरिदं जातं हितं परम् ॥८२॥

अर्थ: कि हे भगवन् ! रात्रिके समय आप दोनों अथवा अपने ही ऊपर यह उपसर्ग किसने किया था और आप दोनोंमें परस्पर अति स्नेह किस कारण हुआ ? ॥८२॥


त्रिकालगोचरं विश्वं विदन्तावपि तौ समम् । गिरं यामूचतुः (गिरायामूचतुः) साम्यपरिणाममितौ क्रमात्

अर्थ: यद्यपि दोनों महामुनि त्रिकालविषयक समस्त पदार्थोंको एक साथ जानते थे, तो भी साम्यपरिणामको प्राप्त हुए दोनों महामुनि दिव्य ध्वनिमें क्रमसे बोले ॥८३॥


नगर्यां पद्मिनीनाम्नि राजा विजयपर्वतः । गुणसस्योत्तमक्षेत्रं भामिनी यस्य धारिणी ॥८४॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि - पद्मिनी नामा नगरीमें राजा विजयपर्वत रहता था । गुणरूपी धान्यकी उत्पत्तिके लिए उत्तम क्षेत्रके समान उसकी धारिणी नामकी स्त्री थी ॥८४॥


अमृतस्वरसंज्ञोऽस्य दूतः शास्त्रविशारदः । राजकर्तव्यकुशलो लोकविद् गुणवत्सलः ॥८५॥

अर्थ: राजा विजयपर्वतके एक अमृतस्वर नामका दूत था जो शास्त्रज्ञानमें निपुण था, राजकर्तव्यमें कुशल था, लोकव्यवहारका ज्ञाता तथा गुणोंमें स्नेह करनेवाला था ॥८५॥


उपयोगेति भार्यास्य द्वौ तस्यां कुक्षिसंभवौ । उदितो मुदिताख्यश्च व्यवहारविशारदौ ॥८६॥

अर्थ: उसकी उपयोगा नामकी स्त्री थी और उसके उदरसे उत्पन्न हुए उदित तथा मुदित नामके दो पुत्र थे । ये दोनों ही पुत्र व्यवहारमें अत्यन्त कुशल थे ॥८६॥


असौ दूतोऽन्यदा राज्ञा प्रहितो दूतकर्मणा । प्रवासं सेवितुं सक्तः स्वामिरक्तमतिर्भृशम् ॥८७॥

अर्थ: किसी समय राजाने अमृतस्वरको दूत सम्बन्धी कार्यसे बाहर भेजा, सो स्वामीके कार्यमें अत्यन्त अनुरक्त बुद्धिको धारण करनेवाला अमृतस्वर प्रवासके लिए गया ॥८७॥


वसुभूतिः समं तेन सखा तद्भक्तजीवितः । निर्गतस्तत्प्रियासक्तिनिष्ठो दुष्टेन चेतसा ॥८८॥

अर्थ: उसके साथ उसीके भोजनसे जीवित रहनेवाला वसुभूति नामका मित्र भी गया । वसुभूति अत्यन्त दुष्ट चित्तका था तथा अमृतस्वरकी स्त्रीमें आसक्त था ॥८८॥


सुप्तं तमसिना हत्वा निवृत्तो नगरीं पुनः । जनायावेदयत्तेन किलाहं विनिवर्तितः ॥८९॥

अर्थ: वह सोते हुए अमृतस्वरको तलवारसे मारकर नगरीमें वापिस लौट आया और आकर उसने लोगोंको बताया कि अमृतस्वरने मुझे लौटा दिया है ॥८९॥


उपयोगा जगादैवं जहि मे तनयावपि । विश्रब्धं येन तिष्ठाव इति वध्वा निवेदितम् ॥९०॥

त्वरितं चोदितायासौ वृत्तान्तो विनिवेदितः । सा हि तेन समं श्वश्र्वाः संगं ज्ञातवती पुरा ॥९१॥

अर्थ: अमृतस्वरकी स्त्री उपयोगाने वसुभूतिसे कहा कि हमारे दोनों पुत्रोंको भी मार डालो जिससे फिर हम दोनों निश्चिन्ततासे रह सकेंगे । सासका यह कहना उसकी बहूने जान लिया इसलिए उसने यह सब समाचार शीघ्र ही उदितके लिए बता दिया, यथार्थमें वह बहू ‘सासका वसुभूतिके साथ संगम है’ यह पहलेसे जानती थी ॥९०-९१॥


ब्राह्मण्या वसुभूतेश्च रतिकार्यसमोर्ष्यया । कथितं तत्तथाभूतं परमाकुलचित्तया ॥९२॥

अर्थ: वसुभूतिकी खास स्त्री उसकी इस रतिक्रियासे सदा ईर्ष्या रखती थी तथा उसका चित्त अत्यन्त व्याकुल रहता था इसलिए उसने यह समाचार उदितकी स्त्रीसे कहा था ॥९२॥


बभूव चोदितस्यापि संदिग्धं विदितं पुरा । मुदितस्य च खड्गस्य दर्शनात् स्फुटतां गतम् ॥९३॥

अर्थ: उदितको भी पहलेसे कुछ-कुछ सन्देह था और मुदित भी इस बातको पहलेसे जानता था फिर वसुभूतिके पास तलवार देखनेसे सब बात स्पष्ट हो गयी ॥९३॥


ततो रोषपरीतेन हतः संमुदितेन सः । कुद्विजो म्लेच्छतां प्राप क्रूरकर्मपरायणः ॥९४॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे युक्त होकर उदितने उसे मार डाला जिससे क्रूरकर्ममें तत्पर रहनेवाला वह कुब्राह्मण म्लेच्छपर्यायको प्राप्त हुआ ॥९४॥


अन्यदा प्रथितः क्षोण्यां गणेशो मतिवर्धनः । विहरन् पद्मिनीं प्राप श्रमणः सुमहातपाः ॥९५॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय मुनिसंघके स्वामी मतिवर्धन नामक महातपस्वी आचार्य पृथिवीपर विहार करते हुए पद्मिनी नगरी आये ॥९५॥


अनुद्धरेति विख्याता धर्म्यध्यानपरायणा । महत्तरा तदा चासीदार्यिका गणपालिनी ॥९६॥

अर्थ: उसी समय धर्मध्यानमें तत्पर रहनेवाली, अतिशय श्रेष्ठ और आर्यिकाओंके संघकी रक्षा करनेवाली अनुद्धरा नामकी गणिनी भी विद्यमान थीं ॥९६॥


वसन्ततिलकाभिख्ये तत्रोद्याने सुसुन्दरे । संघेन सहितस्तस्थौ चतुर्भेदेन सद्भुवि ॥९७॥

अर्थ: चतुर्विध संघसे सहित मतिवर्धन आचार्य वहाँ आकर उत्तम भूमिसे युक्त वसन्ततिलक नामक उद्यानमें ठहर गये ॥९७॥


अथोद्यानस्य संभ्रान्ताः पालकाः किङ्करा भृशम् । नृपं व्यज्ञापयन्नेवं भूमिविन्यस्तपाणयः ॥९८॥

अग्रतो भृगुरत्युग्रः शार्दूलः पृष्ठतो नृप । वद कं शरणं यामो नाशो नः सर्वथोदितः ॥९९॥

अर्थ: तदनन्तर उद्यानकी रक्षा करनेवाले किंकर अत्यन्त व्यग्र हो राजाके पास पहुँचे और पृथ्वीपर हाथ रखकर इस प्रकार प्रार्थना करने लगे कि हे नाथ ! आगे तो बड़ी ऊँची ढालू चट्टान है और पीछे व्याघ्र है बताइए हम किसकी शरणमें जावें । हमारा तो सब प्रकारसे विनाश उपस्थित हुआ है ॥९८-९९॥


मद्रा किं किमिति ब्रूथेत्युक्ता नृपतिनागदन् । नाथोद्यानभुवं प्राप्य श्रमणानां गणः स्थितः ॥१००॥

अर्थ: ‘भले आदमियो ! क्या ? क्या ??, क्या कह रहे हो’ इस प्रकार राजाके कहनेपर किंकरोंने कहा कि हे नाथ ! मुनियोंका एक संघ उद्यानकी भूमिमें आकर ठहर गया है ॥१००॥


यद्येनं वारयामोऽतः शापं ध्रुवमवाप्नुमः । न चेत्ते जायते कोप इति नः संकटो महान् ॥१०१॥

अर्थ: यदि इस संघको हम मना करते हैं तो निश्चित ही शापको प्राप्त होते हैं और यदि नहीं मना करते हैं तो आपको क्रोध उत्पन्न होता है, इस प्रकार हम लोगोंपर बड़ा संकट आ पड़ा है ॥१०१॥


कल्पोद्यानसमच्छायमुद्यानं ते प्रसादतः । नरेन्द्रकृतमस्माभिरप्रवेश्यं पृथग्जनैः ॥१०२॥

अर्थ: हे राजन् ! आपके प्रसादसे हम लोगोंने वह उद्यान कल्पवृक्षोंके उद्यानके समान बना रखा है, उसमें साधारण-पामर मनुष्य प्रवेश नहीं कर सकते ॥१०२॥


नैव वारयितुं शक्यास्तपस्तेजोऽतिदुर्गमाः । त्रिदशैरपि दिग्वस्त्राः किमुतास्मादृशैर्जनैः ॥१०३॥

अर्थ: जो तपके तेजसे अत्यन्त दुर्गम हैं ऐसे निर्ग्रन्थ मुनियोंको देव भी रोकनेमें समर्थ नहीं हैं फिर हमारे-जैसे मनुष्योंकी बात ही क्या है ? ॥१०३॥


मा भैष्ट ततो राजा कृत्वा किङ्करसान्त्वनम् । उद्यानं प्रस्थितो युक्तो विस्मयेनातिभूरिणा ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर ‘भयभीत मत होओ’ इस प्रकार किंकरोंको सान्त्वना देकर बहुत भारी आश्चर्यसे युक्त हुआ राजा उद्यानकी ओर चला ॥१०४॥


ऋद्धया च परया युक्तो वन्दिभिः कृतनिस्वनः । उद्यानभुवमासीदत् प्रतापप्रकटः क्षितीट् ॥१०५॥

अर्थ: जो बहुत भारी सम्पदासे युक्त था, बन्दीजन जिसकी स्तुति करते जाते थे, तथा जो अतिशय प्रतापी था, ऐसा राजा चलकर उद्यानभूमिमें पहुँचा ॥१०५॥


ददर्श च महाभागान् वनरेणुसमुक्षितान् । मुक्तियोग्यक्रियायुक्तान् प्रशान्तहृदयान् मुनीन् ॥१०६॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने महाभाग्यवान् मुनियोंके दर्शन किये । वे मुनि वनकी धूलिसे व्याप्त थे, मुक्तिके योग्य क्रियाओंमें तत्पर थे तथा अत्यन्त प्रशान्त चित्त थे ॥१०६॥


प्रतिमावस्थितान् कांश्चित् प्रलम्बितभुजद्वयान् । षष्ठाष्टमादिमिस्तीव्रैरुपवासैर्विशोषितान् ॥१०७॥

अर्थ: उनमें-से कितने ही मुनि दोनों भुजाओंको नीचेकी ओर लटकाकर प्रतिमाके समान अवस्थित थे, तथा वेला-तेला आदि कठिन उपवासोंसे उनके शरीर शुष्क हो रहे थे ॥१०७॥


स्वाध्यायनिरतानन्यान् षडङ्घ्रिमधुरध्वनीन् । तन्निवेशितचेतस्कान् पाणिपादसमाहितान् ॥१०८॥

अर्थ: कितने ही स्वाध्यायमें तत्पर हो भ्रमरोंके समान मधुरध्वनिसे गुनगुना रहे थे और कितने ही स्वाध्यायमें चित्त लगाकर पद्मासनसे विराजमान थे ॥१०८॥


अवलोक्य मुनीनित्थं भग्नगर्वाङ्कुरोऽभवत् । अवतीर्य गजाद् भावी ननाम जयपर्वतः ॥१०९॥

अर्थ: इस प्रकारके मुनियोंको देखकर राजाका गर्वरूपी अंकुर भग्न हो गया तथा उसने हाथीसे नीचे उतरकर मुनियोंको नमस्कार किया। राजाका नाम विजयपर्वत था ॥१०९॥


क्रमेण प्रणमन् साधूनाचार्यं समुपागतः । प्रणम्य पादयोरूचे भोगे सद्बुद्धिमुद्वहन् ॥११०॥

नरप्रधानदीप्तिस्ते यथेयं शुभलक्षणा । तथा कथं न ते भोगा रताः पादतलस्थिताः ॥१११॥

अर्थ: भोगोंमें समीचीन बुद्धिको धारण करनेवाला राजा क्रम-क्रमसे सब मुनियोंको नमस्कार करता हुआ आचार्यके पास पहुँचा और उनके चरणोंमें प्रणाम कर इस प्रकार बोला कि हे नरश्रेष्ठ ! तुम्हारी शुभ लक्षणोंसे युक्त जैसी दीप्ति है वैसे भोग आपके चरणतलमें स्थित क्यों नहीं हैं ? ॥११०-१११॥


जगाद मुनिमुख्यस्तं का ते मतिरियं तनौ । स्थास्नुतासंगतालीका संसारपरिवर्धिनी ॥११२॥

अर्थ: आचार्यने उत्तर दिया कि तेरे शरीरमें यह क्या बुद्धि है ? तेरी वह बुद्धि शरीरको स्थिर समझनेवाली है सो झूठी है और संसारको बढ़ानेवाली है ॥११२॥


करिबालककर्णान्तचपलं ननु जीवितम् । मानुष्यकं च कदलीसारसाम्यं विभर्त्यदः ॥११३॥

अर्थ: निश्चयसे यह जीवन हस्तिशिशुके कानोंके समान चंचल है तथा मनुष्यका यह जीतव्य केलेके सारकी सदृशता धारण करता है ॥११३॥


स्वप्नप्रतिममैश्वर्यं सक्तं च सह बान्धवैः । इति ज्ञात्वा रतिः कात्र चिन्त्यमानातिदुःखदे ॥११४॥

अर्थ: यह ऐश्वर्य और बन्धुजनोंका समागम स्वप्नके समान है, ऐसा जानकर इसमें क्या रति करना है ? इन ऐश्वर्य आदिका ज्यों-ज्यों विचार करो त्यों-त्यों ये अत्यन्त दुःखदायी ही मालूम होते हैं ॥११४॥


नरकप्रतिमे घोरे दुर्गन्धे कृमिसंकुले । रक्तश्लेष्मादिसरसि प्रभूताशुचिकर्दमे ॥११५॥

उषितोऽनेकशो जीवो गर्भवासेऽतिसंकटे । तथा न शङ्कते मोहमहाध्वान्तसमावृतः ॥११६॥

अर्थ: जो नरकके समान है, अत्यन्त भयंकर है, दुर्गन्धिसे भरा है, कीड़ोंसे युक्त है, रक्त तथा कफ आदिका मानो सरोवर है, जहाँ अत्यन्त अशुचि पदार्थोंकी कीच मच रही है तथा जो अत्यन्त संकीर्ण है ऐसे गर्भमें इस जीवने अनेकों बार निवास किया है, फिर भी महामोहरूपी अन्धकारसे आवृत हुआ यह प्राणी उससे भयभीत नहीं होता ॥११५-११६॥


धिगत्यन्ताशुचिं देहं सर्वाशुभनिधानकम् । क्षणनश्वरमत्राणं कृतघ्नं मोहपूरितम् ॥११७॥

स्नसाजालकसंश्लिष्टमतिच्छातत्त्वगावृतम् । अनेकरोगविहतं जरागमजुगुप्सितम् ॥११८॥

अर्थ: जो सर्व प्रकारके अशुचि पदार्थोंका भाण्डार है, क्षण-भरमें नष्ट हो जानेवाला है, जिसकी कोई रक्षा नहीं कर सकता, जो कृतघ्न है, मोहसे पूरित है, नसोंके समूहसे वेष्टित है, अत्यन्त पतली चर्मसे घिरा है, अनेक रोगोंसे खण्डित है, और बुढ़ापाके आगमनसे निन्दित है, ऐसे इस शरीरको धिक्कार है ॥११७-११८॥


एवंधर्मिणि देहेऽस्मिन् ये कुर्वन्ति जना धृतिम् । तेभ्यश्चैतन्यमुक्तेभ्यः स्वस्ति संजायते कथम् ॥११९॥

अर्थ: जो मनुष्य ऐसे शरीरमें धैर्य धारण करते हैं, चैतन्य अर्थात् विचारा-विचारकी शक्तिसे रहित उन मनुष्योंका कल्याण कैसे हो सकता है ? ॥११९॥


शरीरिसार्थं एतस्मिन् परलोकप्रवासिनि । मुष्णन्तः प्रशभं लोकं तिष्ठन्तीन्द्रियदस्यवः ॥१२०॥

अर्थ: यह आत्मारूपी बनजारा परलोकके लिए प्रस्थान कर रहा है, सो लोगोंको जबरदस्ती लूटनेवाले ये इन्द्रियरूपी चोर उसे रोककर बैठे हैं ॥१२०॥


रमते जीवनृपतिः कुमतिप्रमदावृतः । अवस्कन्देन मृत्युस्तं कदर्थयितुमिच्छति ॥१२१॥

अर्थ: यह जीवरूपी राजा कुबुद्धिरूपी स्त्रीसे घिरकर क्रीड़ा कर रहा है और मृत्यु उसे अचानक ही दुःखी करना चाहती है ॥१२१॥


मनो विषयमार्गेषु मत्तद्विरदविभ्रमम् । वैराग्यबलिना शक्यं रोद्धुं ज्ञानाङ्कुशश्रिता ॥१२२॥

अर्थ: विषयोंके मार्गमें मदोन्मत्त हाथीके समान दौड़ता हुआ यह मन ज्ञानरूपी अंकुशको धारण करनेवाले वैराग्यरूपी बलवान् पुरुषके द्वारा ही रोका जा सकता है ॥१२२॥


परस्त्रीरूपसस्येषु बिभ्राणा लोभमुत्तमम् । अमी हृषीकतुरगा धृतमोहमहाजवाः ॥१२३॥

शरीररथमुन्मुक्ताः पातयन्ति कुवर्त्मसु । चित्तप्रग्रहमत्यन्तं योग्यं कुरुत तद्दृढम् ॥१२४॥

अर्थ: जो शरीररूपी धान्यमें उत्तम लोभको धारण कर रहे हैं तथा जो महामोहरूपी वेगको धारण कर लम्बी चौकड़ी भर रहे हैं ऐसे ये इन्द्रियरूपी घोड़े शरीररूपी रथको कुमार्गमें गिरा देते हैं, इसलिए मनरूपी लगामको अत्यन्त दृढ़ करो ॥१२३-१२४॥


नमस्यत जिनं भक्त्या स्मरतानारतं तथा । संसारसागरं येन समुत्तरत निश्चितम् ॥१२५॥

अर्थ: भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार करो और निरन्तर उन्हींका स्मरण करो जिससे निश्चयपूर्वक संसार-सागरको पार कर सको ॥१२५॥


मोहारिकण्टकं हित्वा तपःसंयमहेतिभिः । लोकाग्रनगरं प्राप्य राज्यं कुरुत निर्भयाः ॥१२६॥

अर्थ: तप और संयमरूपी शस्त्रोंके द्वारा मोहशत्रुरूपी कंटकको नष्ट कर मोक्षरूपी नगरको प्राप्त करो तथा निर्भय होकर वहाँका राज्य करो ॥१२६॥


जैनं व्याकरणं श्रुत्वा सुधीर्विजयपर्वतः । त्यक्त्वा विपुलमैश्वर्यं बभूव मुनिपुंगवः ॥१२७॥

अर्थ: इस प्रकार जैनाचार्यका व्याख्यान सुनकर उत्तम बुद्धिको धारण करनेवाला राजा विजयपर्वत विशाल वैभवका परित्यागकर श्रेष्ठ मुनि हो गया ॥१२७॥


तावपि भ्रातरौ तस्मिन् श्रुत्वा भक्त्या जिनश्रुतिम् । प्रव्रज्य सुतपोमारौ संगतावाटतुर्महीम् ॥१२८॥

अर्थ: दूतके पुत्र दोनों भाई उदित और मुदित भक्तिपूर्वक जिनवाणी सुनकर दीक्षित हो गये और उत्तम तपको धारण करते हुए एक साथ पृथिवीपर विहार करने लगे ॥१२८॥


संमेदं च व्रजन्तौ ताविष्टनिर्वाणवन्दनौ । कथंचिन्मार्गतो भ्रष्टावरण्यानीं समाश्रितौ ॥१२९॥

अर्थ: निर्वाण क्षेत्रकी वन्दनाकी अभिलाषा रखते हुए वे सम्मेदाचलको जा रहे थे, सो किसी तरह मार्ग भूलकर एक महाअटवीमें जा पहुँचे ॥१२९॥


वसुभूतिचरेणाथ रौद्रम्लेच्छेन वीक्षितौ । अतिक्रुद्धेन चाहूतौ गिराक्रोशकठोरया ॥१३०॥

अर्थ: वसुभूतिका जीव मरकर उसी अटवीमें पुष्टम्लेच्छ हुआ था, सो उसने देखते ही अत्यन्त क्रुद्ध होकर कठोर वाणीसे उन्हें बुलाया ॥१३०॥


जिघांसन्तं तमालोक्य ज्यायान्मुदितमब्रवीत् । मा भैषीर्भ्रातरद्य त्वं समाधानं समाश्रय ॥१३१॥

अर्थ: उसे मारनेके लिए उत्सुक देख बड़े भाई उदितने मुदितसे कहा कि हे भाई ! भयभीत मत हो, इस समय समाधि धारण करो, चित्त स्थिर करो ॥१३१॥


म्लेच्छोऽयं हन्तुमुद्युक्तो दृश्यते नौ दुराकृतिः । चिराभ्याससमृद्धाया क्षान्तेरद्य विनिश्चयः ॥१३२॥

अर्थ: दुष्ट आकृतिको धारण करनेवाला या म्लेच्छ हम दोनोंको मारनेके लिए तत्पर दिखाई देता है सो हम लोगोंने चिरकालके अभ्याससे जिस क्षमाको समृद्ध बनाया है आज उसकी परीक्षाका अवसर है ॥१३२॥


प्रत्युवाच स तं भीतिः का नौ जिनवचस्थयोः । नूनं मूढतयास्माभिरप्ययं प्रापितो वधम् ॥१३३॥

अर्थ: मुदितने बड़े भाईको उत्तर दिया कि जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंमें स्थिर रहनेवाले हम लोगोंको भय किस बातका है ? निश्चयसे हम लोगोंने भी इसका वध किया होगा ॥१३३॥


एवं तौ विहितालापौ सविचारं समाश्रितौ । प्रत्याख्यानं शरीरादेः प्रतिमायोगमागतौ ॥१३४॥

अर्थ: इस प्रकार वार्तालाप करते हुए दोनों भाई विचारपूर्वक खड़े हो गये और शरीर आदिसे ममता छोड़ प्रतिमा योगको प्राप्त हुए ॥१३४॥


समीपतां च संप्राप्तो म्लेच्छो हन्तुं समुद्यतः । आलोक्य दैवयोगेन सेनेशेन निवारितः ॥१३५॥

अर्थ: तदनन्तर मारनेकी इच्छा रखता हुआ वह भील उनके पास आया परन्तु दैवयोगसे भीलोंके सेनापतिने उसे देख लिया जिसे मना कर दिया ॥१३५॥


रामः पप्रच्छ तेनैतौ व्यापादयितुमीप्सितौ । सेनाधिपेन निर्मुक्तौ रक्षितौ केन हेतुना ॥१३६॥

अर्थ: यह सुन, रामने केवलीसे पूछा कि भील इन्हें क्यों मारना चाहता था और सेनापतिने किस कारणसे छुड़ाकर इनकी रक्षा की ॥१३६॥


केवल्या१ स्यात् समुद्भूता भारतीति भवान्तरे । सुरपः कर्षकश्चास्तां यक्षस्थाने सहोदरौ ॥१३७॥

अर्थ: तब केवली भगवान्के मुखसे इस प्रकारकी दिव्यध्वनि प्रकट हुई कि भवान्तरमें यक्षस्थान नामक नगरमें सुरप और कर्षक नामके दो भाई रहते थे ॥१३७॥


लुब्धकेनाहतो जीवः शकुन्तिर्ग्राममन्यदा । ताभ्यां कारुण्ययुक्ताभ्यां दत्वा मूल्यं विमोचितः ॥१३८॥

अर्थ: एक दिन एक शिकारी किसी पक्षीको पकड़कर उस गांवमें आया सो दयासे युक्त होकर सुरप और कर्षकने मूल्य देकर उसे छुड़ा दिया ॥१३८॥


ततोऽसौ शकुनो मृत्वा बभूव म्लेच्छभूपतिः । सुरपः कर्षकश्चैतावुदितो मुदितस्तथा ॥१३९॥

अर्थ: तदनन्तर वह पक्षी मरकर म्लेच्छ राजा हुआ और सुरप तथा कर्षक मरकर उदित तथा मुदित हुए ॥१३९॥


पक्षीभवन्नसौ यस्मादेताभ्यां रक्षितं पुरा । तस्मात् सेनापतिर्भूयो ररक्षासाविमौ मुनी ॥१४०॥

अर्थ: चूँकि पक्षी अवस्थामें इन दोनोंने पहले इसकी रक्षा की थी इसलिए पक्षीने भी सेनापति होकर इन दोनों मुनियोंकी रक्षा की ॥१४०॥


२लुब्धको जीवमोक्षेण वसुभूतिर्द्विजोत्तमः । संजातो कर्मयोगेन मनुष्यभवमुत्तमम् ॥१४१॥

अर्थ: शिकारीका जीव मरकर कर्मयोगसे उत्तम मनुष्य पर्याय पाकर वसुभूति नामका ब्राह्मण हुआ ॥१४१॥


यद्यथा निर्मितं पूर्वं तद्योग्यं जायतेऽधुना । संसारवाससक्तानां जीवानां गतिरीदृशी ॥१४२॥

अर्थ: यह जीव पूर्व भवमें जैसा करता है इस भवमें उसके अनुरूप ही उत्पन्न होता है । संसारी प्राणियोंकी ऐसी ही दशा है ॥१४२॥


किमधीतैरिहानर्थं ग्रन्थैरौशनसादिभिः । एकमेव हि कर्तव्यं सुकृतं सुखकारणम् ॥१४३॥

अर्थ: यहाँ निरर्थक शुक्रादि निर्मित शास्त्रोंके पढ़नेसे क्या होता है ? सुखके कारणभूत एक पुण्यका ही संचय करना चाहिए ॥१४३॥


निःसृतावुपसर्गात्तौ मुनी कर्मानुभावतः । निर्वाणसदनं प्राप्तावकार्ष्टां जिनवन्दनाम् ॥१४४॥

अर्थ: पुण्यके प्रभावसे उपसर्गसे निकले हुए दोनों मुनियोंने निर्वाण क्षेत्र - सम्मेदाचल पहुँचकर जिन-वन्दना की ॥१४४॥


एवं तौ चारुधामानि पर्यट्य समयं चिरम् । रत्नत्रयं समाराध्य मृत्वा स्वर्गमुपागतौ ॥१४५॥

अर्थ: इस प्रकार अनेक उत्तमोत्तम स्थानोंमें भ्रमण कर तथा चिरकाल तक रत्नत्रयकी आराधना कर मरकर दोनों मुनि स्वर्ग गये ॥१४५॥


निन्द्ययोनिषु पर्यट्य वसुभूतिः सुकृच्छ्रतः । मनुष्यत्वं समासाद्य तापसव्रतमाश्रितः ॥१४६॥

अर्थ: और वसुभूति अनेक खोटा योनियोंमें भ्रमण कर बड़ी कठिनाईसे मनुष्यभवको प्राप्त हुआ, सो वहाँ उसने तापसके व्रत धारण किये ॥१४६॥


कृत्वा बालतपः कष्टं कालधर्मेण संगतः । अग्निकेतुरिति ख्यातः क्रूरो ज्योतिःसुरोऽभवत् ॥१४७॥

अर्थ: तदनन्तर दुःखदायी बाल तपकर वह मरा और अग्निकेतु नामका दुष्ट ज्योतिषी देव हुआ ॥१४७॥


तथास्ति भरतक्षेत्रे नाम्नारिष्टमहापुरम् । प्रियव्रत इति ख्यातः पुरुभोगोऽत्र पार्थिवः ॥१४८॥

अर्थ: तदनन्तर इसी भरतक्षेत्रमें एक अरिष्टपुर नामा नगर है जहाँ प्रियव्रत नामका महाभोगवान् राजा राज्य करता था ॥१४८॥


महादेव्यावुभे तस्य योषिद्गुणसमन्विते । काञ्चनाभा प्रसिद्धैका पद्मावत्यपरोदिता ॥१४९॥

अर्थ: उसकी स्त्रियोंके गुणोंसे सहित दो महादेवियाँ थीं एक कांचनाभा और दूसरी पद्मावती ॥१४९॥


च्युतौ तौ सुन्दरौ नाकाज्जातौ पद्मावतीसुतौ । नाम्ना रत्नरथोऽन्यश्च विचित्ररथसंज्ञकः ॥१५०॥

अर्थ: उदित और मुदितके जीव स्वर्गसे चयकर रानी पद्मावतीके रत्नरथ और विचित्ररथ नामके सुन्दर पुत्र हुए ॥१५०॥


उत्पन्नः कनकाभायां ज्योतिर्देवः परिच्युतः । अनुन्धर इति ख्यातिं गुणैस्ते चावनिं गताः ॥१५१॥

अर्थ: वसुभूतिका जीव जो ज्योतिषी देव हुआ था वह प्रियव्रत राजाकी दूसरी महादेवी कांचनाभाके अनुन्धर नामका पुत्र हुआ । पृथिवीपर आये हुए तीनों पुत्र अपने गुणोंसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए ॥१५१॥


राज्यं पुत्रेषु निक्षिप्य षड्दिनानि जिनालये । कृतसंलेखनः सम्यक् स्वर्गं यातः प्रियव्रतः ॥१५२॥

अर्थ: राजा प्रियव्रत पुत्रोंके ऊपर राज्य छोड़ जिनालयमें छह दिनकी उत्तम सल्लेखना धारण कर स्वर्ग गया ॥१५२॥


राज्ञोऽन्यस्य सुता नाम्ना श्रीप्रभा श्रीप्रभेव सा । लब्धा रत्नरथेनेष्टा कनकाभाङ्गजेन च ॥१५३॥

लब्धा रत्नरथेनैषा ततो द्वेषमुपागतः । अनुन्धरो महीं तस्य विनाशयितुमुद्यतः ॥१५४॥

अर्थ: अथानन्तर एक राजाकी पुत्री श्रीप्रभा जो कि यथार्थमें श्रीप्रभा अर्थात् लक्ष्मीके समात प्रभाकी धारक थी, रत्नरथने उससे विवाह कर लिया । इसी पुत्रीको कांचनाभाका पुत्र अनुन्धर भी चाहता था । वह द्वेष रखकर उसकी भूमिको उजाड़ करनेके लिए उद्यत हो गया ॥१५३-१५४॥


ततो रत्नरथेनासौ विचित्रस्यन्दनेन च । निर्जित्य समरे पञ्च दण्डान् प्राप्य निराकृतः ॥१५५॥

अर्थ: तब रत्नरथ और विचित्ररथने उसे युद्धमें जीतकर तथा पांच प्रकारके दण्ड देकर देशसे निकाल दिया ॥१५५॥


खलीकारात्ततः पूर्वजन्मवैराच्च कोपतः । जटावल्कलधारी स तापसोऽभूद् विषाङ्घ्रिवत् ॥१५६॥

अर्थ: अनुन्धर इस अपमानसे तथा पूर्वभव सम्बन्धी बैरसे कुपित होकर जटा और बल्कलको धारण करनेवाला विषवृक्षके समान तापसी हो गया ॥१५६॥


भुक्त्वा राज्यं चिरं कालं सोदरौ तु प्रबोधिनौ । प्रव्रज्य सुतपः कृत्वा स्वर्गलोकमुपागतौ ॥१५७॥

अर्थ: इधर रत्नरथ और विचित्ररथ दोनों भाई चिरकाल तक राज्य भोगकर प्रबोधको प्राप्त हुए सो दीक्षा ले उत्तम तप धारण कर स्वर्ग लोकमें उत्पन्न हुए ॥१५७॥


तौ महातेजसौ तत्र सुखं प्राप्य सुरोचितम् । च्युतौ सिद्धार्थनगरे क्षेमङ्करमहीभृतः ॥१५८॥

उत्पन्नौ विमलाख्यायां महादेव्यां सुसुन्दरौ । देशभूषण इत्याद्यो द्वितीयः कुलभूषणः ॥१५९॥

अर्थ: महातेजको धारण करनेवाले दोनों भाई वहाँ देवोंके योग्य उत्तम सुख भोगकर वहाँसे च्युत हुए और सिद्धार्थ नगरके राजा क्षेमंकरकी विमला नामक महादेवीके दो सुन्दर पुत्र हुए । प्रथम पुत्रका नाम देशभूषण और दूसरे पुत्रका नाम कुलभूषण था ॥१५८-१५९॥


विद्यार्जनोचितौ तौ च क्रीडन्तौ तिष्ठतो गृहे । नाम्ना सागरघोषश्च विद्वान् भ्राम्यन्नुपागतः ॥१६०॥

राज्ञा च संगृहीतस्य तस्य पार्श्वेऽखिलाः कलाः । शिक्षितौ तावुदारेण विनयेन समन्वितौ ॥१६१॥

अर्थ: विद्या उपार्जन करनेकी योग्य अवस्थामें वर्तमान दोनों भाई घरपर क्रीड़ा करते रहते थे । एक दिन भ्रमण करता हुआ एक सागरसेन नामका महाविद्वान् वहां आया, सो राजाने उसे रख लिया । उत्कृष्ट विनयसे युक्त दोनों भाइयोंने उस विद्वान्के पास समस्त कलाएँ सीखीं ॥१६०-१६१॥


स्वजनं नैव तौ कंचिज्जानीतस्तद्गतात्मकौ । कर्तव्यं हि तयोः सर्वं विद्याशालागतं तदा ॥१६२॥

अर्थ: दोनों पुत्रोंका विद्यामें इतना चित्त लगा कि वे अपने परिवारके लोगोंको भी नहीं जानते थे । यथार्थमें उनका सम्पूर्ण चित्त विद्या और विद्यालयमें ही लगा रहता था ॥१६२॥


उपाध्यायेन चानीतौ सुचिरात् पितुरन्तिकम् । दृष्ट्वा योग्यौ नरेन्द्रेण यथाकामं स पूजितः ॥१६३॥

अर्थ: उपाध्याय चिरकालके बाद पुत्रोंको निपुण बनाकर पिताके पास ले गया सो पिताने पुत्रोंको योग्य देख उपाध्यायका यथायोग्य सम्मान किया ॥१६३॥


आवयोः किल दारार्थं पित्रा सामन्तकन्यकाः । आनायिता इति श्रोत्रपथं वार्ता तयोर्गता ॥१६४॥

अर्थ: तदनन्तर पिताने हम दोनोंके विवाहके लिए राज-कन्याएँ बुलवायी हैं यह समाचार उनके कर्णमार्ग तक पहुँचा ॥१६४॥


ततस्तौ परया द्युत्या बाह्यालीं गन्तुमुद्यतौ । वातायनस्थितां कन्यां पुरशोमामपश्यताम् ॥१६५॥

अर्थ: तदनन्तर परम कान्तिसे युक्त दोनों भाई एक दिन नगरके बाहर जानेके लिए उद्यत हुए सो उन्होंने झरोखेमें बैठी नगरकी शोभास्वरूप एक कन्या देखी ॥१६५॥


तत्संगमार्थमन्योन्यं मानसेऽकुरुतां वधम् । ततश्च वन्दिनो वक्त्रादिति शब्दः समुत्थितः ॥१६६॥

अर्थ: उस कन्याका समागम प्राप्त करनेके लिए दोनों ही भाइयोंने अपने मनमें परस्पर एक दूसरेके वध करनेका विचार किया । तदनन्तर वन्दीके मुखसे उसी समय यह शब्द निकला ॥१६६॥


साकं विमलया देव्या श्रीमान् क्षेमङ्करो नृपः । चिरं जयति यस्यैतौ तनयौ त्रिदशोपमौ ॥१६७॥

अर्थ: कि विमला देवीके साथ वह राजा क्षेमंकर सदा जयवन्त रहे जिसके कि देवोंके समान ये दो पुत्र हैं ॥१६७॥


वातायनस्थितैषापि कन्यका कमलोत्सवा । जयति भ्रातरावेतौ यस्याश्चारुगुणोत्कटौ ॥१६८॥

अर्थ: तथा झरोखेमें बैठी यह कमलोत्सवा नामकी कन्या भी धन्य है जिसके कि सुन्दर गुणोंसे उत्कट ये दो भाई हैं ॥१६८॥


ततस्तौ तद्गिरो ज्ञात्वा सोदरैषावयोरिति । वैराग्यं परमं प्राप्ताविति चिन्तामुपागतौ ॥१६९॥

अर्थ: तदनन्तर वन्दीके कहनेसे ‘यह हमारी बहन है’ ऐसा जानकर परम वैराग्यको प्राप्त हुए दोनों भाई इस प्रकार विचार करने लगे कि ॥१६९॥


धिग्धिग्धिगिदमत्यन्तं पापमस्माभिरीहितम् । अहो मोहस्य दारुण्यं सोदरा येन काङ्क्षिता ॥१७०॥

अर्थ: अहो ! हम लोगोंके द्वारा इच्छित इस भारी पापको धिक्कार है, धिक्कार है, धिक्कार है । अहो ! मोहकी दारुणता देखो कि जिससे हमने बहन ही की इच्छा की ॥१७०॥


चिन्तयित्वा प्रमादेन दुःखमस्माकमीदृशम् । कुर्वन्ति ये सदा कार्यं तेषां त्वत्यन्तसाहसम् ॥१७१॥

अर्थ: हम लोग तो प्रमादसे ही ऐसा विचार कर दुःखी हो रहे हैं फिर जो जान-बूझकर सदा ऐसा कार्य करते हैं उनका तो बहुत भारी साहस ही कहना चाहिए ॥१७१॥


असारोऽयमहोऽत्यन्तं संसारो दुःखपूरितः । तत्र नामेदृशा भावा जायन्ते पापकर्मणाम् ॥१७२॥

अर्थ: अहो ! दुःखसे भरा यह संसार बिलकुल ही असार है जिसमें पापी मनुष्योंके ऐसे विचार उत्पन्न होते हैं ॥१७२॥


कुतोऽप्यपुण्यतः क्षिप्रं चेतनो नरकं व्रजेत् । संप्राप्य बोधमस्माभि सद्वृत्तं चित्रमुत्तमम् ॥१७३॥

अर्थ: किसी पापके उदयसे सहसा कार्य करनेवाला प्राणी नरक जा सकता है, पर हम लोग तो सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रको पाकर भी नरक जाना चाहते हैं, यह बड़ा आश्चर्य है ॥१७३॥


इति संचिन्त्य सन्त्यज्य मातरं दुःखमूर्च्छिताम् । स्नेहाकुलं च पितरं दीक्षां दैग्वालसीं श्रितौ ॥१७४॥

अर्थ: ऐसा विचारकर दुःखसे मूर्च्छित माता और स्नेहसे आकुल पिताको छोड़कर दोनोंने दैगम्बरी दीक्षा धारण कर ली ॥१७४॥


नभोविहरणीं लब्धिं प्राप्य तौ सुतपोधनौ । आंहिषातां जगन्नानाजिनतीर्थाभिपूजितम् ॥१७५॥

अर्थ: उत्तम तपरूपी धनको धारण करनेवाले दोनों मुनियोंने आकाशगामिनी ऋद्धि प्राप्त कर जगत्के नाना तीर्थ क्षेत्रोंमें विहार किया ॥१७५॥


क्षेमङ्करनरेशस्तु तच्छोकानलदीपितः । युगपत्सकलं त्यक्त्वाऽऽहारं पञ्चत्वमागतः ॥१७६॥

अर्थ: राजा क्षेमंकर उस शोकाग्निसे दग्ध होकर एक साथ समस्त आहार छोड़ मृत्युको प्राप्त हुआ ॥१७६॥


भवादारभ्य पूर्वोक्तात् स एव हि पितावयोः । तेन नौ प्रति वात्सल्यं तस्य नित्यमनुत्तमम् ॥१७७॥

अर्थ: राजा क्षेमंकर पहले कहे हुए भवसे ही लेकर हम दोनोंका पिता होता आया है इसलिए हम दोनोंके प्रति उसका निरन्तर भारी स्नेह रहता था ॥१७७॥


गरुडाधिपतिश्चासौ जातः ख्यातो मरुत्त्वतः । सुन्दरोऽद्भुतविक्रान्तो महालोचनसंज्ञकः ॥१७८॥

अर्थ: अब वह मरकर भवनवासी देवोंमें सुपर्ण कुमार जातिके देवोंका अधिपति, प्रसिद्ध, सुन्दर, अद्भुत-पराक्रमका धारी महालोचन नामका देव हुआ है ॥१७८॥


क्षुब्धः स्वासनकम्पेन प्रयुज्यावधिमूर्जितः । आगतोऽयं स्थितो भाति व्यन्तरामरसंसदि ॥१७९॥

अर्थ: वह बली अपने आसनके कम्पित होनेसे क्षुभित हो अवधिज्ञानके द्वारा सब जानकर यहाँ आया है तथा व्यन्तर देवोंकी सभामें बैठा है ॥१७९॥


अनुन्धरस्तु विहरंस्तापसाचारतत्परः । कौमुदीनगरीं यातः शिष्यसंघेन वेष्टितः ॥१८०॥

अर्थ: उधर तपस्वियोंका आचार पालन करनेमें तत्पर अनुन्धर, शिष्य समूहके साथ विहार करता हुआ कौमुदी नगरीमें आया ॥१८०॥


नरेशः सुमुखस्तत्र रतवत्यस्य भामिनी । कान्ता शतप्रधानत्वं प्राप्ता परमसुन्दरी ॥१८१॥

अर्थ: वहाँका राजा सुमुख था और रतवती उसकी स्त्री थी जो सैकड़ो स्त्रियोंमें प्रधान तथा परम सुन्दरी थी ॥१८१॥


अवरुद्धा च सच्चेष्टा मदनेति विलासिनी । पताका मदनेनेव जित्वा लोकमुपार्जिता ॥१८२॥

अर्थ: उसी राजाके उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली एक मदना नामकी विलासिनी ( वेश्या ) स्त्री थी, जो ऐसी जान पड़ती थी मानो संसारको जीतकर कामदेवके द्वारा प्राप्त की हुई पताका ही हो ॥१८२॥


साधुदत्तमुनेः पार्श्वे सम्यग्दर्शनमैदसौ । तत्प्राप्येतरतीर्थानि तृणतुल्यान्यमन्यत ॥१८३॥

अर्थ: उस मदनाने साधुदत्त मुनिके पास सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था जिसे पाकर वह अन्य धर्मोंको तृणके समान तुच्छ मानती थी ॥१८३॥


तस्याः पुरोऽथ रहसि कदाचिद्वदन्नृपः । अहोऽसौ तापसः स्थानं महतां तपसामिति ॥१८४॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन राजाने मदनाके सामने कहा कि अहो ! यह तापस महातपोंका स्थान है ॥१८४॥


ततो मदनयाऽवाचि कीदृग्नाथेदृशां तपः । मिथ्यादृशामविज्ञानलोकदम्भनकारिणाम् ॥१८५॥

अर्थ: यह सुन मदनाने कहा कि हे नाथ ! इन मिथ्यादृष्टि, अज्ञानी तथा लोगोंको ठगनेवाले लोगोंका तप कैसा ? ॥१८५॥


तच्छ्रुत्वा भूपतिस्तस्यै क्रुद्धः सा चागदत् पुनः । मा रुषः पश्य नाथेमं मेऽचिरात्पादवर्तिनम् ॥१८६॥

अर्थ: यह सुन राजा उसके लिए क्रुद्ध हुआ पर उसने फिर कहा कि हे नाथ ! क्रोध मत कीजिए तथा इसे मेरे चरणोंमें वर्तमान देखिए ॥१८६॥


इत्युक्त्वा स्वगृहं गत्वा शिक्षयित्वा मनोहरम् । आत्मजां नागदत्ताख्यां प्रैषयत्तापसाश्रमम् ॥१८७॥

अर्थ: यह कहकर तथा घर जाकर उसने अपनी नागदत्ता नामकी सुन्दरी पुत्रीको सिखाकर उस तापसके आश्रममें भेजा ॥१८७॥


तस्मै सैकान्तयाताय योगस्थाय सुविभ्रमा । आस्थितामरकन्येव परमाकल्पधारिणी ॥१८८॥

अर्थ: सुन्दर हावभाव और उत्तम वेष-भूषाको धारण करनेवाली नागदत्ता देवकन्याके समान जान पड़ती थी । वह एकान्तमें योग लेकर बैठे हुए उस तापसके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥१८८॥


वातेरिताम्बरव्याजादूरूकाण्डमदर्शयत् । मारस्यान्तःपुरस्थानं लावण्यरसनिर्भरम् ॥१८९॥

अर्थ: हवासे हिलते हुए वस्त्रके बहाने उसने कामदेवके अन्तःपुरके समान, सौन्दर्य रससे भरे अपने ऊरू दिखाये ॥१८९॥


समाधानोपदेशेन कुङ्कुमद्रवपिञ्जरम् । मारवारणकुम्भाभं तथा वक्षसिजद्वयम् ॥१९०॥

अर्थ: समाधानके बहाने केशरके द्रवसे पीले तथा कामदेवके गण्डस्थलकी तुलना धारण करनेवाले दोनों स्तन प्रकट किये ॥१९०॥


कुसुमग्रहणव्याजात् स्रस्तनीविरतेर्गृहम् । नाभिमण्डलमुत्तेजः कक्षोद्देशं च सुन्दरी ॥१९१॥

अर्थ: पुष्प ग्रहणके बहाने नीवी ढीली कर जघन स्थान दिखाया, देदीप्यमान नाभिमण्डल और सुन्दर बगलें भी दिखलायी ॥१९१॥


अज्ञानयोगमेतस्य भित्त्वा लोचनमानसे । अपप्ततां प्रदेशेषु तेषु तस्याः सुबन्धने ॥१९२॥

अर्थ: उस तापसके नेत्र और मन अज्ञानपूर्ण योगका भेदनकर उस नागदत्ताके उन-उन प्रदेशोंपर पड़ने लगे तथा वहीं बन्धनसे युक्त हो गये । .१९२ ॥


ताडितः स्मरबाणैश्च समुत्थाय समाकुलः । गत्वा शनैरपृच्छत्तां त्वं बाले कात्र वर्तसे ॥१९३॥

अर्थ: तदनन्तर कामके बाणोंसे ताड़ित तपस्वी अत्यन्त व्याकुल होता हुआ उठकर उसके पास गया और धीरे-से उससे पूछने लगा कि हे बाले ! तू कौन है ? और यहाँ कहाँ आयी है ? ॥१९३॥


संध्याकालेऽत्र ये केचित् प्राणिनः क्षुद्रका अपि । आलयं स्वं निषेवन्ते ननु त्वं सुकुमारिका ॥१९४॥

अर्थ: इस सन्ध्याके समय छोटे-मोटे प्राणी भी अपने घर रहते हैं फिर तू तो अत्यन्त सुकुमार है ॥१९४॥


सावोचन्मधुरैर्वर्णैः भिन्दन्ती हृदयस्थलीम् । लीलया बाहुलतिकामुन्नयन्ती मुखं प्रति ॥१९५॥

चलन्नीलोत्पलच्छाये धारयन्ती विलोचने । किंचिद्दैन्यमिव प्राप्ता बहुविस्फुरिताधरा ॥१९६॥

अर्थ: नागदत्ता मधुरवर्णोंसे उसका हृदयस्थल भेदती, लीलापूर्वक भुजलताको मुखकी ओर ऊपर उठाती, चंचल नील कमलके समान कान्तिके धारक नेत्रोंको धारण करती, कुछ-कुछ दीनताको प्राप्त होती तथा अधरोष्ठको बार-बार हिलाती हुई बोली ॥१९५-१९६॥


श्रृणु नाथ ! दयाधार ! शरणागतवत्सल ! । अम्बयाऽहं विना दोषादद्य निर्वासिता गृहात् ॥१९७॥

अर्थ: कि हे नाथ ! हे दयाके आधार ! हे शरणागत वत्सल ! सुनिए, आज मेरी माताने मुझे अपराधके बिना ही घरसे निकाल दिया है ॥१९७॥


काषायप्रावृता चाहं भवदीयामिमां स्थितिम् । आचरामि प्रसादं मे कुरु नाथानुमोदनात् ॥१९८॥

अर्थ: सो हे नाथ ! अब मैं गेरुआ वस्त्र धारण कर आपकी इस वृत्तिका आचरण करूँगी, आप अनुमति देकर मुझपर प्रसाद कीजिए ॥१९८॥


शुश्रूषां भवतः कृत्वा दिवा नक्तं च सक्तया । इह लोको मया लब्धः परलोकश्च जायते ॥१९९॥

अर्थ: रात-दिन आपकी सेवा करनेसे मेरा यह लोक तथा परलोक दोनों ही सुधर जावेंगे ॥१९९॥


किं तद्धर्मार्थकामेषु न यद्भवति लभ्यते । निधानमसि काम्यानां मया पुण्येन वीक्षितः ॥२००॥

अर्थ: धर्म, अर्थ और काममें ऐसा कौन पदार्थ है जो आपके पास प्राप्त न हो सके, आप समस्त मनोरथोंके भाण्डार हैं । पुण्यसे ही आपके दर्शन हुए हैं ॥२००॥


इति संभाषिते तस्याः विज्ञाय प्रगुणं मनः । स्मरेण दह्यमानोऽसावब्रवीदिति विक्लवः ॥२०१॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर उसका मन वशीभूत जान कामसे जलता हुआ तापस व्याकुल होता हुआ इस प्रकार बोला ॥२०१॥


भद्रे कोऽहं प्रसादस्य प्रसीद त्वं ममोत्तमे । भजस्व भक्तिमेषोऽहं यावज्जीवं करोमि ते ॥२०२॥

अर्थ: कि हे भद्रे ! प्रसाद करनेके लिए मैं कौन होता हूँ ? हे उत्तमे ! तुम्हीं मुझपर प्रसाद करो, स्वीकृत करो, मैं जीवन-पर्यन्त तुम्हारी भक्ति करूँगा ॥२०२॥


इत्युक्त्वालिङ्गितुं क्षिप्रं तं प्रसारितबाहुकम् । अगदीत् पाणिना कन्या वारयन्तीति सादरा ॥२०३॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसने आलिंगन करनेके लिए शीघ्र ही अपनी भुजा पसारी तब आदरके साथ उसे हाथसे रोकती हुई कन्याने कहा ॥२०३॥


न वर्तते इदं कर्तुं कन्याहं विधिवर्जिता । पृच्छ मे मातरं गत्वा गृहेऽस्मिन् दृश्य तोरणे ॥२०४॥

अर्थ: कि यह करना उचित नहीं है, मैं कुमारी कन्या हूँ जिसका तोरण दिखाई दे रहा हे, ऐसे इस घरमें जाकर मेरी मातासे पूछो ॥२०४॥


परा कारुण्ययुक्तेयं भवतः शेमुषी यथा । एतां प्रसादयावश्यं तुभ्यमेषा ददाति माम् ॥२०५॥

अर्थ: आपकी बुद्धिके समान वह परम दयासे युक्त है, उसे प्रसन्न करो, वह अवश्य ही मुझे तुम्हारे लिए दे देगी ॥२०५॥


एवमुक्तस्तया साकं त्वरया व्याकुलक्रमः । वेश्माविशद्विलासिन्याः सवितर्यस्तमागते ॥२०६॥

अर्थ: इस प्रकार नागदत्ताके कहनेपर वह सूर्यास्तके अनन्तर अटपटे पैर रखता हुआ उसके साथ वेश्याके घर गया ॥२०६॥


मन्मथाकृष्टनिःशेषहृषीकविषयो ह्यसौ । किंचिद्वेत्ति स्म नोपायं विशन्वारीमिव द्विपः ॥२०७॥

अर्थ: जिसके समस्त इन्द्रियोंके विषय कामसे आकृष्ट हो चुके थे, ऐसा वह तापस वारी ( बन्धन ) में प्रवेश करनेवाले हाथीके समान कुछ भी उपाय नहीं जानता था ॥२०७॥


न श्रृणोति स्मरग्रस्तो न जिघ्रति न पश्यति । न जानात्यपरस्पर्शं न बिभेति न लज्जते ॥२०८॥

अर्थ: सो ठीक ही है, क्योंकि कामसे ग्रस्त मनुष्य न सुनता है, न सूँघता है, न देखता है, न दूसरेका स्पर्श जानता है, न डरता है और न लज्जित ही होता है ॥२०८॥


आश्चर्यं मोहतः कष्टमनुतापं प्रपद्यते । अन्धो निपतितः कूपे यथा पन्नगसेविते ॥२०९॥

अर्थ: जिस प्रकार अन्धा मनुष्य साँपोंसे भरे कुएँमें गिरकर कष्ट और सन्तापको प्राप्त होता है उसी प्रकार यह कामी मनुष्य मोहवश कष्ट और सन्तापको प्राप्त होता है, यह आश्चर्यकी बात है ॥२०९॥


वेश्याचरणयोश्चासौ कृत्वा विलुठितं शिरः । याचते कन्यकां पूर्वसंज्ञितश्चाविशन्नृपः ॥२१०॥

अर्थ: तदनन्तर वह तापस वेश्याके चरणोंमें शिर झुकाकर कन्याकी याचना करता है और उसी समय पूर्वसंकेतानुसार राजा प्रवेश करता है ॥२१०॥


स्थापितो बन्धयित्वाऽसौ राज्ञा नक्तं समीक्षितः । खलीकारं प्रभाते च प्रकटं प्रापितः परम् ॥२११॥

अर्थ: राजाने उसे बँधवाकर रात्रि-भर रखा और सवेरे छान-बीनकर सबके समक्ष उसका परम तिरस्कार किया ॥२११॥


ततोऽपमाननिर्दग्धः परं दुःखं समुद्वहन् । भ्राम्यन् महीं मृतः क्लेशयोनिषु भ्रमणं स्थितः ॥२१२॥

अर्थ: तदनन्तर अपमानसे जला तापस परम दुःखको धारण करता हुआ पृथ्वी-पर भ्रमण करता रहा और अन्तमें मरकर दुःखदायी योनियोंमें भटकता रहा ॥२१२॥


ततः कर्मानुभावेन मनुष्यभवमागतः । दारिद्र्यपङ्कनिर्मग्नं जनादरविवर्जितम् ॥२१३॥

अर्थ: तदनन्तर कर्मोंके प्रभावसे मनुष्य भवको प्राप्त हुआ सो दरिद्रतारूपी कीचड़में निमग्न तथा लोगोंके आदरसे रहित नीच कुलमें उत्पन्न हुआ ॥२१३॥


गर्भस्थ एव चैतस्मिन् विदेशं जनको गतः । उद्वेजितः कुटुम्बिन्या कलहक्रूरवाक्यया ॥२१४॥

अर्थ: जब वह गर्भमें था तभी कलहके समय क्रूर वचन कहने-वाली स्त्रीसे उद्विग्न होकर इसका पिता परदेश चला गया था ॥२१४॥


कुमारे च हृता माता म्लेच्छेन विषयाहतौ । दुःखं च परमं प्राप्तः सर्वबन्धुविवर्जितः ॥२१५॥

अर्थ: तथा जब वह बालक ही था तभी म्लेच्छोंके द्वारा देशपर आक्रमण होनेसे इसकी माता मर गयी । इस तरह सर्व बन्धुओंसे रहित होकर वह परम दुःखको प्राप्त होता रहा ॥२१५॥


ततस्तापसतां प्राप्य कृत्वा बालतपः परम् । ज्योतिर्लोकं समारुह्य नाम्ना वह्निप्रभोऽभवत् ॥२१६॥

अर्थ: तदनन्तर तापस होकर तथा कठिन बालतप कर ज्योतिष लोकमें अग्निप्रभ नामक देव हुआ ॥२१६॥


अनन्तवीर्यनामाथ केवली सेवितः सुरैः । इत्यन्तेवासिना पृष्टो धर्मचिन्तागतात्मना ॥२१७॥

मुनिसुव्रतनाथस्य तीर्थेऽस्मिन् भवता समः । कोऽन्योऽनुभविता भव्यो लोकस्योत्तरकारणम् ॥२१८॥

अर्थ: अथानन्तर एक समय धर्मकी चिन्तामें जिसका मन लग रहा था ऐसे शिष्यने देवोंके द्वारा सेवित अनन्तवीर्य नामा केवलीसे पूछा कि हे नाथ ! मुनिसुव्रत भगवान्के इस तीर्थमें आपके समान ऐसा दूसरा कौन भव्य होगा जो संसार समुद्रसे पार होनेका कारण होगा ॥२१७-२१८॥


सोऽवोचन्मयि निर्वाणं गतेऽत्र श्रमणक्षितौ । देशभूषण इत्येको द्वितीयः कुलभूषणः ॥२१९॥

भवितारौ जगत्सारौ केवलज्ञानदर्शिनौ । यौ समाश्रित्य लोकोऽयं तरिष्यति भवार्णवम् ॥२२०॥

अर्थ: तब अनन्तवीर्य केवलीने उत्तर दिया कि मेरे मोक्ष चले जानेके बाद मुनियोंकी इस भूमिमें एक देशभूषण और दूसरा कुलभूषण इस प्रकार दो केवली होंगे । ये जगत्के सारभूत तथा केवलज्ञान और दर्शन-के धारक होंगे । इनका आश्रय लेकर भव्यजीव संसार-सागरसे पार होंगे ॥२१९-२२०॥


सोऽपि वह्निप्रभस्तस्माच्छ्रुत्वा केवलिनो मुखात् । अवस्थानं निजं यातो दध्यौ केवलिभाषितम् ॥२२१॥

अर्थ: वह अग्निप्रभदेव केवलीके मुखसे यह सुनकर तथा उन्हींके कथनका ध्यान करता हुआ अपने स्थानपर चला गया ॥२२१॥


अन्यदावधिना ज्ञात्वा योगिनाविह नौ गिरौ । अनन्तवीर्यसर्वज्ञमिथ्यावाक्यं करोम्यहम् ॥२२२॥

एवमुक्त्वाभिमानेन परमेणातिमोहितः । आगतः पूर्ववैरेण कर्तुं परमुपद्रवम् ॥२२३॥

अर्थ: एक दिन अवधिज्ञानसे वह हम दोनों मुनियोंको इस पर्वतपर विद्यमान जानकर ‘मैं अनन्तवीर्य सर्वज्ञके वचन मिथ्या करता हूँ’ इस प्रकार कहकर तीव्र मोहसे मोहित होता हुआ पूर्व वैरके कारण परम उपद्रव करनेके लिए यहाँ आया ॥२२२-२२३॥


चरमाङ्गधरं दृष्ट्वा स भवन्तमतिद्रुतम् । सुरेन्द्रकोपभीत्या च तिरोधानमुपागतः ॥२२४॥

अर्थ: सो चरमशरीरी आपको देखकर तथा इन्द्रके क्रोधसे भयभीत हो शीघ्र ही तिरोधानको प्राप्त हुआ अर्थात् भाग गया ॥२२४॥


नारायणसमेतेन प्रातिहार्ये त्वया कृते । केवलज्ञानमस्माकं जातं घातिपरिक्षये ॥२२५॥

अर्थ: तुम बलभद्र हो और लक्ष्मण नारायण सो इसके साथ तुमने हमारा उपसर्ग दूर किया अतः घातिया कर्मोंका क्षय होनेपर हमें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ॥२२५॥


इति गत्यागतीः श्रुत्वा प्राणिनां वैरकारिणाम् । वैरानुबन्धमुत्सृज्य स्वस्था भवत जन्तवः ॥२२६॥

अर्थ: इस प्रकार वैर करनेवाले प्राणियोंकी गति-आगतिको सुनकर हे प्राणियो ! परस्परका वैर छोड़ स्वस्थ होओ अर्थात् आत्मस्वरूपमें लीन होओ ॥२२६॥


महापूतमिति श्रुत्वा वचनं केवलीरितम् । मुहुः सुरासुरा नेमुस्तं भीता भवदुःखतः ॥२२७॥

अर्थ: इस प्रकार केवली भगवान्के द्वारा उच्चरित महापवित्र वचन सुनकर संसारके दुःखोंसे भयभीत हुए सुर और असुरोंने उन्हें बार-बार नमस्कार किया ॥२२७॥


तावच्च गरुडाधीशः परमं संपदं श्रितः । नत्वा केवलिनः पादौ शयकञ्जार्पितालिकः ॥२२८॥

ऊचे रघुकुलोद्योतं विलसन्मणिकुण्डलम् । स्निग्धां प्रसारयन् दृष्टिं प्रेमतर्पितमानसः ॥२२९॥

अर्थ: इतनेमें ही परम ऐश्वर्यको प्राप्त सुवर्ण कुमारोंके पतिने हाथ जोड़कर मस्तकसे लगा केवली भगवान्के चरणकमलमें नमस्कार कर देदीप्यमान मणिमय कुण्डलोंके धारक रामसे कहा । उस समय वह गरुडेन्द्र रामकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टि डाल रहा था तथा प्रेमसे उसका मन सन्तुष्ट हो रहा था ॥२२८-२२९॥


प्रातिहार्यं कृतं येन त्वया मत्सुतयोः परम् । ततस्तुष्टोऽस्मि याचस्व वस्तु यत्तेऽभिरोचते ॥२३०॥

अर्थ: उसने कहा कि चूँकि तुमने हमारे पुत्रोंकी परम सेवा की है इसलिए मैं तुमपर प्रसन्न हूँ तुम्हें जो वस्तु रुचती हो वह माँग लो ॥२३०॥


क्षणं चिन्तागतः स्थित्वा जगाद रघुनन्दनः । त्वयासुरप्रसन्नेन स्मर्तव्या वयमापदि ॥२३१॥

अर्थ: राम क्षण-भर चिन्ता करते हुए चुपचाप बैठे रहे । तदनन्तर बोले कि हे देव ! यदि प्रसन्न हो तो आपत्तिके समय हम लोगोंका स्मरण रखना ॥२३१॥


साधुसेवाप्रसादेन फलमेतदुपागतम् । अङ्गीकर्तव्यमस्माभिर्भवद्वारविनिर्गतम् ॥२३२॥

अर्थ: साधुसेवाके प्रसादसे ही यह प्राप्त हुआ कि आप-जैसे सत्पुरुषोंके साथ मिलाप हुआ तथा संसारके द्वारसे निकलनेका मार्ग मिला ॥२३२॥


एवमस्त्विति तेनोक्ते दध्मुः शङ्खान् दिवौकसः । भेर्यश्च मेघनिनदाः सातुवाद्याः समाहताः ॥२३३॥

अर्थ: ‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार गरुडेन्द्रके कहनेपर देवोंने शंख फूँके तथा अनेक प्रकारके वादित्रोंके साथ मेघोंके समान शब्द करनेवाली भेरियाँ बजायीं ॥२३३॥


साधुपूर्वभवं श्रुत्वा संवेगं परमं श्रिताः । प्राव्रजन्जनाः केचिदन्येऽणुव्रतमाश्रिताः ॥२३४॥

अर्थ: मुनियोंके पूर्वभव सुनकर परम संवेगको प्राप्त हुए कितने ही लोगोंने दीक्षा धारण कर ली और कितने ही लोग अणुव्रतोंके धारी हुए ॥२३४॥


देशकुलभूषणमुनी नु जगदर्च्यौ सर्वभवदुःखमलसंगमविमुक्तौ । ग्रामपुरपर्वतमटम्बपरिरम्यान् बभ्रमतुरुत्तमगुणैरुपचिन्तागान् ॥२३५॥

अर्थ: जगत्के द्वारा पूजनीय तथा संसारके समस्त दुःखरूपी मलके समागमसे रहित देशभूषण, कुलभूषण केवली उत्तम गुणोंसे युक्त ग्राम, पुर, पर्वत तथा मटम्ब आदि रमणीय स्थानोंमें विहार कर धर्मका उपदेश देने लगे ॥२३५॥


देशकुलभूषणमहामुनिभवं ये वृत्तमतिपूतमिदमुत्कटसुभावाः । श्रोत्रवचसोर्विषयतामुपनयन्ते ते रविनिभा दुरितमाशु विसृजन्ति ॥२३६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जो देशभूषण, कुलभूषण, महामुनियोंके इस अतिशय पवित्र चरित्रको उत्तम भावोंसे युक्त हो सुनते हैं तथा कथन कर दूसरोंको सुनाते हैं वे सूर्यके समान देदीप्यमान होकर शीघ्र ही पापोंका त्याग करते हैं ॥२३६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते देशकुलभूषणोपाख्यानं नामैकोनचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥३९॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें देशभूषण, कुलभूषण केवलीका व्याख्यान करनेवाला उनतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३९॥

४०. चत्वारिंशत्तमं पर्व (रामगिर्युपाख्यानं)

श्रुत्वा केवलिनः पद्ममन्त्यविग्रहधारिणम् । स्तुत्वा सजयनिस्वानं प्रणेमुः सर्वपार्थिवाः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर केवली भगवान्‌के मुखसे रामको चरमशरीरी जानकर समस्त राजाओंने जयध्वनिके साथ स्तुति कर उन्हें नमस्कार किया ॥१॥


वंशस्थलपुरेशश्च महाचित्तः सुरप्रभः । सलक्ष्मणं सपत्नीकं पद्मनाभमपूजयत् ॥२॥

अर्थ: और उदार चित्तके धारक वंशस्थलपुर नगरके राजा सुरप्रभने लक्ष्मण तथा सीता सहित रामकी भक्ति की ॥२॥


प्रासादशिखरच्छायाधवलीकृतपुष्करम् । नावृणोन्नगरं गन्तुं रामो राज्ञापि याचितः ॥३॥

अर्थ: जो महलोंके शिखरोंकी कान्तिसे आकाशको धवल कर रहा था ऐसे नगरमें चलनेके लिए राजाने रामसे बहुत याचना की परन्तु उन्होंने स्वीकृत नहीं किया ॥३॥


वंशाद्रिशिखरे रम्ये हिमवच्छिखरोपमे । समविस्तीर्णसद्वर्णरमणीयशिलातले ॥४॥

नानावृक्षलताकीर्णे नानाशकुनिनादिते । सुगन्धानिलसंपूर्णे नानापुष्पफलाकुले ॥५॥

पद्मोत्पलवनाढ्याभिर्वापीभिरतिशोभिते । सर्वर्तुसहितोद्युक्तवसन्तकृतसेवने ॥६॥

सज्जिता परमा भूमिः शुद्धादर्शतलोपमा । दशार्धवर्णरजसा कल्पितानेकमक्तिका ॥७॥

अर्थ: तब जो अतिशय रमणीय था, हिमगिरिके शिखरके समान था, जहाँ एक समान लम्बे-चौड़े अच्छे रंगके मनोहर शिलातल थे, जो नाना वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था, नाना पक्षी जहाँ शब्द कर रहे थे, जो सुगन्धित वायुसे पूर्ण था, नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त था, कमल और उत्पलके वनोंसे युक्त वापिकाओंसे जो अत्यन्त शोभित था, तथा सब ऋतुओंके साथ आकर वसन्त ऋतु जिसकी सेवा कर रही थी, ऐसे वंशधर पर्वतके शिखरपर शुद्ध दर्पणतलके समान उत्कृष्ट भूमि तैयार की गयी । उस भूमिपर पाँच वर्णकी धूलिसे अनेक चित्राम बनाये गये थे ॥४-७॥


कुन्दातिमुक्तकलता वकुलाः कमलानि च । यूथिका मल्लिका नागा अशोकाश्चारुपल्लवाः ॥८॥

एते चान्ये च भूयांसश्चारुभासः सुगन्धयः । भावारम्यविलासाभिः प्रमदाभिः प्रकल्पिताः ॥९॥

अर्थ: अनेक प्रकारके भावोंसे रमणीय चेष्टाओंको धारण करनेवाली स्त्रियोंने वहाँ उसी पंचवर्णकी परागसे कुन्द, अतिमुक्तकलता, मौलश्री, कमल, जुही, मालती, नागकेशर और सुन्दर पल्लवोंसे युक्त अशोक वृक्ष, तथा इनके सिवाय सुन्दर कान्ति और सुगन्धिको धारण करनेवाले बहुत-से अन्य वृक्ष बनाये ॥८-९॥


बद्ध्वा परिकरं पुम्भिः सुविदग्धैः सुसंभ्रमैः । मङ्गलालापसंपन्नैः स्वामिभक्तिपरायणैः ॥१०॥

मेघकाण्डानि वस्त्राणि नानाचित्रधराणि च । प्रसारितानि रुद्राणि वैजयन्तीशतानि च ॥११॥

अर्थ: चतुर, उत्तम चेष्टाओंके धारक, मंगलमय वार्तालापमें तत्पर और स्वामिभक्तिमें निपुण मनुष्योंने बड़ी तैयारीके साथ नाना चित्रोंको धारण करनेवाले बादली रंगके वस्त्र फैलाये, सैकड़ों सघन पताकाएँ फहरायीं ॥१०-११॥


किङ्किणीजालयुक्तानि मुक्तादामशतानि च । चामराणि विचित्राणि लम्बूषमणिपट्टिका ॥१२॥

दर्पणा बुद्बुदावल्यो विस्फुरद्भास्करांशवः । न्यस्तान्येतानि तुङ्गेषु तोरणेषु ध्वजेषु च ॥१३॥

अर्थ: छोटी-छोटी घण्टियोंसे युक्त सैकड़ों मोतियोंकी मालाएँ, चित्र-विचित्र चमर, मणिमय फानूस, दर्पण, तथा जिनपर सूर्यकी किरणें प्रकाशमान हो रही थीं ऐसे अनेक छोटे-छोटे गोले ये सब ऊँचे-ऊँचे तोरणों तथा ध्वजाओंमें लगाये ॥१२-१३॥


अवनौ पूर्णकलशाः स्थापिता विधिसंयुताः । हंसा इव निविष्टास्ते विरेजुर्नलिनीवने ॥१४॥

अर्थ: पृथिवीपर जहाँ-तहाँ विधिपूर्वक पूर्ण कलश रखे गये थे जो कमलिनीके वनमें बैठे हुए हंसोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१४॥


यत्र यत्र पदन्यासं करोति रघुनन्दनः । तत्र तत्रोरुपद्मानि स्थापितानि महीतले ॥१५॥

अर्थ: श्रीराम जहाँ-जहाँ चरण रखते थे वहाँ-वहाँ पृथिवी तलपर बड़े-बड़े कमल रख दिये गये थे ॥१५॥


शयनान्यासनैः साकं रचितानि यतस्ततः । मणिकांचनचित्राणि सुखस्पर्शधराण्यलम् ॥१६॥

अर्थ: जहाँ-तहाँ मणियों और सुवर्णसे चित्रित तथा अतिशय सुखदायक स्पर्शको धारण करनेवाले आसन और सोनेके स्थान बनाये गये थे ॥१६॥


सलवङ्गादिताम्बूलं प्रवराण्यंशुकानि च । महासुगन्धयो गन्धा भास्वन्त्याभरणानि च ॥१७॥

अर्थ: लवंग आदिसे सहित ताम्बूल, उत्तम वस्त्र, महासुगन्धित गन्ध और देदीप्यमान आभूषण जहाँ-तहाँ रखे गये थे ॥१७॥


सूदगेहसमेतानि कन्दूशालाशतानि च । बहुभेदान्नपूर्णानि कृतयत्नानि सर्वतः ॥१८॥

अर्थ: जो सब ओरसे नाना प्रकारकी भोजन-सामग्रीसे युक्त थीं तथा जिनमें रसोई घर अलगसे बनाया गया था ऐसी सैकड़ों भोजनशालाएँ वहाँ निर्मित की गयी थीं ॥१८॥


गुडेन सर्पिषा दध्ना भूः क्वचिद् भाति पङ्किला । इति कर्तव्यताभाजा जनेनादरिणान्विता ॥१९॥

अर्थ: वहाँकी भूमि कहीं गुड़, घी और दहीसे पंकिल (कीचसे युक्त) होकर सुशोभित हो रही थी तो कहीं कर्तव्य पालन करनेमें तत्पर आदरसे युक्त मनुष्योंसे सहित थी ॥१९॥


स्वाहारेण क्वचित्तृप्ताः पथिकाः स्वेच्छया स्थिताः । प्रसादयन्ति विश्रब्धाः संकथाबद्धगुल्मकाः ॥२०॥

अर्थ: कहीं मधुर आहारसे तृप्त हुए पथिक अपनी इच्छासे बैठे थे तो कहीं निश्चिन्तताके साथ गोष्ठी बनाकर एक दूसरेको प्रसन्न कर रहे थे ॥२०॥


क्वचिन्ना शेखरी भाति मदिरामत्तलोचनः । क्वचित् सीमन्तिनी मत्ता वकुलामोदवाहिनी ॥२१॥

अर्थ: कहीं सेहरेको धारण करनेवाला और मदिराके नशामें झूमते हुए नेत्रोंसे युक्त मनुष्य दिखाई देता था तो कहीं मौलश्रीकी सुगन्धिको धारण करनेवाली नशासे भरी स्त्री दृष्टिगत होती थी ॥२१॥


क्वचिन्नाट्यं क्वचिद् गीतं क्वचित्सुकृतसंकथा । क्वचित् कान्तैः समं नार्यो रमन्ते चारुविभ्रमाः ॥२२॥

अर्थ: कहीं नाट्य हो रहा था, कहीं संगीत हो रहा था, कहीं पुण्य चर्चा हो रही थी, और कहीं सुन्दर विलासोंसे सहित स्त्रियाँ पतियोंके साथ क्रीड़ा कर रही थीं ॥२२॥


दत्तप्रेङ्खाः क्वचित् स्मेरैः सलीलैर्विटपुंगवैः । विलासिन्यो विराजन्ते गीर्वाणगणिकोपमाः ॥२३॥

अर्थ: कहीं मुसकराते तथा लीलासे सहित विट पुरुष जिन्हें धक्का दे रहे थे, ऐसी देव नर्तकियोंके समान वेश्याएं सुशोभित हो रही थीं ॥२३॥


रामलक्ष्मणयोर्यानि रचितानि ससीतयोः । क्रीडाधामानि कस्तानि नरो वर्णयितुं क्षमः ॥२४॥

अर्थ: इस प्रकार सीता सहित राम-लक्ष्मणके जो क्रीड़ास्थल बनाये गये थे उनका वर्णन करनेके लिए कौन मनुष्य समर्थ है ? ॥२४॥


नानाभूषणयुक्ताङ्गौ सुमाल्याम्बरधारिणौ । यथेप्सितकृताहारौ श्रिया परमयान्वितौ ॥२५॥

अर्थ: जिनके शरीर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सहित थे, जो उत्तमोत्तम मालाएँ और वस्त्र धारण करते थे, जो इच्छानुसार क्रीड़ा करते थे ॥२५॥


सीता चाक्लिष्टसौभाग्या दुरितासंगवर्जिता । रमते तत्र चेष्टाभिः शास्त्रदृष्टाभिरुज्ज्वलम् ॥२६॥

अर्थ: और अखण्ड सौभाग्यको धारण करनेवाली तथा पापके समागमसे रहित सीता वहाँ शास्त्र निरूपित चेष्टाओंसे उज्ज्वल क्रीड़ा करती थीं ॥२६॥


तत्र वंशगिरौ राजन् रामेण जगदिन्दुना । निर्मापितानि चैत्यानि जिनेशानां सहस्रशः ॥२७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उस वंशगिरिपर जगत्के चन्द्र स्वरूप रामने जिनेन्द्र भगवान्‌की हजारों प्रतिमाएँ बनवायीं थीं ॥२७॥


महावष्टम्भसुस्तम्भा युक्तविस्तारतुङ्गताः । गवाक्षहर्म्यवलभीप्रभृत्याकारशोभिताः ॥२८॥

सतोरणमहाद्वाराः सशालाः परिखान्विताः । सितचारुपताकाढ्या बृहद्घण्टारवाचिताः ॥२९॥

मृदङ्गवंशमुरजसंगीतोत्तमनिस्वनाः । झर्झरैरानकैः शङ्खभेरीभिश्च महारवाः ॥३०॥

सततारब्धनिःशेषरम्यवस्तुमहोत्सवाः । विरेजुस्तत्र रामीया जिनप्रासादपङ्क्तयः ॥३१॥

अर्थ: तथा जिनमें महामजबूत खम्भे लगवाये गये थे, जिनकी चौड़ाई तथा ऊँचाई योग्य थी, जो झरोखे, महलों तथा छपरी आदिकी रचनासे शोभित थे, जिनके बड़े-बड़े द्वार तोरणोंसे युक्त थे, जिनमें अनेक शालाएँ निर्मित थीं, जो परिखासे सहित थे, सफ़ेद और सुन्दर पताकाओंसे युक्त थे, बड़े-बड़े घण्टाओंके शब्दसे व्याप्त थे, जिनमें मृदंग, बांसुरी और मुरजका संगीतमय उत्तम शब्द फैल रहा था, जो झाँझों, नगाड़ों, शंखों और भेरियोंके शब्दसे अत्यन्त शब्दायमान थे और जिनमें सदा समस्त सुन्दर वस्तुओंके द्वारा महोत्सव होते रहते थे ऐसे रामके बनवाये जिनमन्दिरोंकी पंक्तियाँ उस पर्वतपर जहाँ-तहाँ सुशोभित हो रही थीं ॥२८-३१॥


रेजिरे प्रतिमास्तत्र सर्वलोकनमस्कृताः । पञ्चवर्णा जिनेन्द्राणां सर्वलक्षणभूषिताः ॥३२॥

अर्थ: उन मन्दिरोंमें सब लोगोंके द्वारा नमस्कृत तथा सब प्रकारके लक्षणोंसे युक्त पंचवर्णकी जिनप्रतिमाएँ सुशोभित थीं ॥३२॥


अन्यदाथ महीपालरामो राजीवलोचनः । लक्ष्मीधरमुवाचेदं क्रियते किमतः परम् ॥३३॥

अर्थ: अथानन्तर एक दिन कमललोचन राजा रामचन्द्रने लक्ष्मणसे कहा कि अब आगे क्या करना है ? ॥३३॥


इह संप्रेरितः कालः सुखेन परमे गिरौ । जिनचैत्यसमुत्थाना स्थापिता कीर्तिरुज्ज्वला ॥३४॥

अर्थ: इस उत्तम पर्वतपर समय सुखसे व्यतीत किया तथा जिनमन्दिरोंके निर्माणसे उत्पन्न उज्ज्वल कीर्ति स्थापित की ॥३४॥


अनेन भूभृता श्रेष्ठैरुपचारशतैर्हृताः । अत्रैव यदि तिष्ठामस्तदा कार्यं विनश्यति ॥३५॥

अर्थ: इस राजाकी सैकड़ों प्रकारकी उत्तमोत्तम सेवाओंके वशीभूत होकर यदि यहीं रहते हैं तो संकल्पित कार्य नष्ट होता है ॥३५॥


इह तावदलं भोगैरिति चिन्तयतोऽपि मे । न मुञ्चति क्षणमपि प्रवरा भोगसन्ततिः ॥३६॥

अर्थ: यद्यपि मैं सोचता हूँ कि मुझे इन भोगोंसे प्रयोजन नहीं है तो भी यह उत्तम भोगोंकी सन्तति क्षण भरके लिए भी नहीं छोड़ती है ॥३६॥


इह यत् क्रियते कर्म तत्परत्रोपभुज्यते । पुराकृतानां पुण्यानां इह संपद्यते फलम् ॥३७॥

अर्थ: जो कर्म इस लोकमें किया जाता है उसका उपभोग परलोकमें होता है और पूर्व भवमें किये हुए पुण्य कर्मोंका फल इस भवमें प्राप्त होता है ॥३७॥


अस्माकमत्र वसतां बिभ्रतां सुखसंपदम् । अमी ये दिवसा यान्ति न तेषां पुनरागमः ॥३८॥

अर्थ: यहाँ रहते तथा सुख-सम्पदाको धारण करते हुए हमारे जो ये दिन बीत रहे हैं उनका फिरसे आगमन नहीं हो सकता ॥३८॥


नदीनां चण्डवेगानामायुषो दिवसस्य च । यौवनस्य च सौमित्रे यद्गतं गतमेव तत् ॥३९॥

अर्थ: हे लक्ष्मण ! तीव्र वेगसे बहनेवाली नदियों, आयुके दिन और यौवनका जो अंश चला गया वह चला ही गया फिर लौटकर नहीं आता ॥३९॥


नद्याः कर्णरवायास्तु परतो रोमहर्षणम् । श्रूयते दण्डकारण्यं दुर्गमं क्षितिचारिभिः ॥४०॥

अर्थ: कर्णरवा नदीके उस पार रोमांच उत्पन्न करनेवाला तथा भूमिगोचरियोंका जहाँ पहुँचना कठिन है ऐसा दण्डक वन सुना जाता है ॥४०॥


भारती न विशत्याज्ञा तस्मिन् जनपदोज्झिते । तत्रार्णवतटं श्रित्वा विदध्मः क्वचिदालयम् ॥४१॥

अर्थ: देशोंसे रहित उस वनमें भरतकी आज्ञाका प्रवेश नहीं है इसलिए वहाँ समुद्रका किनारा प्राप्त कर घर बनावेंगे ॥४१॥


यदाज्ञापयसीत्युक्ते कुमारेण ससंभ्रमम् । सुरेन्द्रसदृशं भोगं मुक्त्वा ते निर्गतास्त्रयः ॥४२॥

अर्थ: ‘जो आज्ञा हो’ इस प्रकार लक्ष्मणके कहनेपर राम-लक्ष्मण और सीता तीनों ही इन्द्र सदृश भोग छोड़कर वहाँसे निकल गये ॥४२॥


अनुगत्य सुदूरं तौ बलोपेतः सुरप्रभः । कृच्छ्रान्निवर्तितस्ताभ्यां शोकी पुरमुपागतः ॥४३॥

अर्थ: वंशस्थविलपुरका राजा सुरप्रभ अपनी सेनाके साथ बहुत दूर तक उन्हें पहुँचानेके लिए गया । राम-लक्ष्मण उसे बड़ी कठिनाईसे लौटा सके । तदनन्तर शोकको धारण करता हुआ वह अपने नगरमें वापस आया ॥४३॥


एषोऽपि तुङ्गः परमो महीध्रः श्रीमन्नितम्बो बहुधातुसानुः । विलम्पतीभिः ककुभां समूहं भासाचकाज्जैनगृहावलीभिः ॥४४॥

अर्थ: इधर जिसकी मेखलाएँ शोभासे सम्पन्न थीं, तथा जिसके शिखर अनेक धातुओंसे युक्त थे ऐसा यह ऊँचा उत्तम पर्वत दिशाओंके समूहको लिप्त करनेवाली जिनमन्दिरोंकी पंक्तिसे अतिशय सुशोभित होता था ॥४४॥


रामेण यस्मात्परमाणि तस्मिन् जैनानि वेश्मानि विधापितानि । निर्नष्टवंशाद्रिवचाः स तस्माद्रविप्रभो रामगिरिः प्रसिद्धः ॥४५॥

अर्थ: चूँकि उस पर्वतपर रामचन्द्रने जिनेन्द्र भगवान्के उत्तमोत्तम मन्दिर बनवाये थे इसलिए उसका वंशाद्रि नाम नष्ट हो गया और सूर्यके समान प्रभाको धारण करनेवाला वह पर्वत 'रामगिरि’के नामसे प्रसिद्ध हो गया ॥४५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते रामगिर्युपाख्यानं नाम चत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें रामगिरिका वर्णन करनेवाला चालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४०॥


४१. एकचत्वारिंशत्तमं पर्व (जटायूपाख्यानं)

अथानरण्यनप्तारौ श्रीमन्तौ सीतयान्वितौ । दिदृक्षू दक्षिणाम्भोधिमायातां सुखमागिनौ ॥१॥

पुरग्रामसमाकीर्णानतीत्य विषयान् बहून् । प्रविष्टौ तौ महारण्यं नानामृगसमाकुलम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जिन्हें दक्षिण समुद्र देखनेकी इच्छा थी तथा जो निरन्तर सुख भोगते आते थे ऐसे श्रीमान् राम-लक्ष्मण सीताके साथ नगर और ग्रामोंसे व्याप्त बहुत देशोंको पार कर नाना प्रकारके मृगोंसे व्याप्त महावनमें प्रविष्ट हुए ॥१-२॥


यस्मिन्न विद्यते पन्थाः स्थानं नार्यनिषेवितम् । पुलिन्दानामपि प्रायो दुश्चरं यन्नगाकुलम् ॥३॥

नानावृक्षलताकीर्णं महाविषमगह्वरम् । गुहान्धकारगम्भीरं वहन्निर्झरनिम्नगम् ॥४॥

अर्थ: ऐसे सघन वनमें प्रविष्ट हुए जिसमें मार्ग ही नहीं सूझता था, उत्तम मनुष्योंके द्वारा सेवित एक भी स्थान नहीं था, वनचारी भीलोंके लिए भी जहाँ चलना कठिन था, जो पर्वतोंसे व्याप्त था, नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे सघन था, जिसमें अत्यन्त विषम गर्त थे, जो गुहाओंके अन्धकारसे गम्भीर जान पड़ता था, और जहाँ झरने तथा अनेक नदियाँ बह रही थीं ॥३-४॥


क्रोशं क्रोशं शनैस्तत्र गच्छन्तौ जानकीवशात् । निर्भयौ क्रीडनोद्युक्तो प्राप्तौ कर्णरवां नदीम् ॥५॥

अर्थ: उस वनमें वे जानकीके कारण धीरे-धीरे एक कोश ही चलते थे । इस तरह भयसे रहित तथा क्रीड़ा करनेमें उद्यत दोनों भाई उस कर्णरवा नदीके पास पहुँचे ॥५॥


यस्यास्तटानि रम्याणि तृणैर्युक्तानि भूरिभिः । समान्यायतदेशानि स्पर्शं बिभ्रति सौख्यदम् ॥६॥

अर्थ: जिसके कि किनारे अत्यन्त रमणीय, बहुत भारी तृणोंसे व्याप्त, समान, लम्बे-चौड़े और सुखकारी स्पर्शको धारण करनेवाले थे ॥६॥


अनत्युच्चैर्घनच्छायैः फलपुष्पविभूषितैः । रेजुस्तटद्रुमैस्तस्याः समीपधरणीधराः ॥७॥

अर्थ: उस कर्णरवा नदीके समीपवर्ती पर्वत, किनारेके उन वृक्षोंसे सुभोभित थे जो ज्यादा ऊँचे तो नहीं थे पर जिनकी छाया अत्यन्त घनी थी तथा जो फल और फूलोंसे युक्त थे ॥७॥


वनमेतदलं चारु नदी चेति निरूप्य तौ । रम्ये तत्र तरुच्छायेऽवस्थितौ सीतयान्वितौ ॥८॥

अर्थ: यह वन तथा नदी दोनों ही अत्यन्त सुन्दर हैं ऐसा विचारकर वे एक वृक्षकी मनोहर छायामें सीताके साथ बैठ गये ॥८॥


क्षणं स्थित्वाऽतिरम्याणि सैकतान्यवगाह्य च । जलावगाहनं चक्रुस्ते रम्यक्रीडयोचितम् ॥९॥

अर्थ: क्षण-भर वहाँ बैठकर तथा मनोहर किनारोंपर अवगाहन कर वे सुन्दर क्रीड़ाके योग्य जलावगाहन करने लगे अर्थात् जलके भीतर प्रवेश कर जलक्रीड़ा करने लगे ॥९॥


ततो मृष्टानि पक्कानि फलानि कुसुमानि च । यथेच्छमुपभुक्तानि तैः सुखं कृतसंकथैः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर परस्पर सुखकारी कथा करते हुए उन सबने वनके पके मधुर फल तथा फूलोंका इच्छानुसार उपभोग किया ॥१०॥


तत्र भाण्डोपकरणं सकलं केकयीसुतः । मृदावंशैः पलाशैश्च विविधैराशु निर्ममे ॥११॥

अर्थ: वहाँ लक्ष्मणने नाना प्रकारकी मिट्टी, बाँस तथा पत्तोंसे सब प्रकारके बरतन तथा उपयोगी सामान शीघ्र ही बना लिया ॥११॥


अमीषु स्वादचारूणि फलानि सुरभीनि च । वनजानि च सस्यानि राजपुत्री समस्करोत् ॥१२॥

अर्थ: इन सब बरतनोंमें राजपुत्री सीताने स्वादिष्ट तथा सुन्दर फल और वनकी सुगन्धित धानके भोजन बनाये ॥१२॥


अन्यदातिथिवेलायां गगनाङ्गणचारिणौ । प्रमापटलसंवीतविग्रहौ चारुदर्शनौ ॥१३॥

ज्ञानत्रितयसंपन्नौ महाव्रतपरिग्रहौ । परेण तपसा युक्तौ दुस्पृहामुक्तमानसौ ॥१४॥

मासोपवासिनौ वीरौ गुण्यौ शुभसमीहितौ । यच्छन्तौ नयनानन्दं बुधचन्द्रमसाविव ॥१५॥

मुनी सुगुप्तिगुप्ताख्यावायान्तौ संमुखं भुवः । यथोक्ताचारसंपन्नौ सहसा सीतयेक्षितौ ॥१६॥

अर्थ: किसी एक दिन अतिथि प्रेक्षणके समय सीताने सहसा सामने आते हुए सुगुप्ति और गुप्ति नामके दो मुनि देखे। वे मुनि आकाशांगणमें विहार कर रहे थे, कान्तिके समूहसे उनके शरीर व्याप्त थे, वे बहुत ही सुन्दर थे, मति-श्रुत-अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे, महाव्रतोंके धारक थे, परम तपसे युक्त थे, खोटी इच्छाओंसे उनके मन रहित थे, उन्होंने एक मासका उपवास किया था, वे धीर-वीर थे, गुणोंसे सहित थे, शुभ चेष्टाके धारक थे, बुध और चन्द्रमाके समान नेत्रोंको आनन्द प्रदान करते थे और यथोक्त आचारसे सहित थे ॥१३-१६॥


ततः प्रमदसंभारविकसन्नेत्र शोभया । दयिताय तया ख्यातमिति रोमांचिताङ्गया ॥१७॥

पश्य पश्य नरश्रेष्ठ ! तपसा कृशविग्रहम् । दैगम्बरं परिश्रान्तं भदन्तयुगलं शुभम् ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षके भारसे जिसके नेत्रोंकी शोभा विकसित हो रही थी तथा जिसके शरीरमें रोमांच उठ रहे थे ऐसी सीताने रामसे कहा कि हे नरश्रेष्ठ ! देखो देखो, तपसे जिनका शरीर कृश हो रहा है तथा जो अतिशय थके हुए मालूम होते हैं, ऐसे दिगम्बर मुनियोंका यह युगल देखो । ॥१७-१८॥


क्व तत् क्व तत्प्रिये साध्वि पण्डिते चारुदर्शने । निर्ग्रन्थयुगलं दृष्टं भवत्या गुणमण्डने ॥१९॥

अर्थ: रामने सम्भ्रममें पड़कर कहा कि हे प्रिये ! हे साध्वि ! हे पण्डिते ! हे सुन्दरदर्शने ! हे गुणमण्डने ! तुमने निर्ग्रन्थ मुनियोंका युगल कहाँ देखा ? कहाँ देखा ? ॥१९॥


यन्निरीक्ष्य वरारोहे सुचिरं पापमर्जितम् । क्षणात् प्रणाशमायाति जनानां भक्तचेतसाम् ॥२०॥

अर्थ: वह युगल कि जिसके देखनेसे हे सुन्दरि ! भक्त मनुष्योंका चिरसंचित पाप क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है ॥२०॥


इत्युक्ते रघुचन्द्रेण सीतोवाच ससम्भ्रमा । इमाविमाविति प्रीत्या स तदाभूत् समाकुलः ॥२१॥

अर्थ: रामके इस प्रकार कहनेपर सीताने सम्भ्रम पूर्वक कहा कि ‘ये हैं, ये हैं’। उस समय राम कुछ आकुलताको प्राप्त हुए ॥२१॥


ततो युगमितक्षोणीदेशविन्यस्तलोचनौ । मुनी प्रशान्तगमनौ सुसमाहितविग्रहौ ॥२२॥

अभ्युत्थानाभियानाभिस्तुष्टैः प्रणमनादिभिः । दम्पतीभ्यां कृतावेतौ पुण्यनिर्झरपर्वतौ ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर युग प्रमाण पृथिवीमें जिनकी दृष्टि पड़ रही थी, जिनका गमन अत्यन्त शान्तिपूर्ण था और जिनके शरीर प्रमादसे रहित थे, ऐसे दो मुनियोंको देखकर दम्पती अर्थात् राम और सीताने उठकर खड़े होना, सम्मुख जाना, स्तुति करना, और नमस्कार करना आदि क्रियाओंसे उन दोनों मुनियोंको पुण्यरूपी निर्झरके झरानेके लिए पर्वतके समान किया था ॥२२-२३॥


शुच्यङ्गया च वैदेह्या महाश्रद्धापरीतया । परिविष्टं तयोः श्राद्धं रमणेन समेतया ॥२४॥

अर्थ: जिसका शरीर पवित्र था, तथा जो अतिशय श्रद्धासे युक्त थी ऐसी सीताने पतिके साथ मिलकर दोनों मुनियोंके लिए भोजन परोसा-आहार प्रदान किया ॥२४॥


गवामरण्यजातानां महिषीणां च चारुणा । हैयङ्गवीनमिश्रेण पयसा तत्समुद्भवैः ॥२५॥

अर्थ: वह आहार वनमें उत्पन्न हुई गायों और भैंसोंके ताजे और मनोहर घी, दूध तथा उनसे निर्मित अन्य मावा आदि पदार्थोंसे बना था ॥२५॥


खर्जूरैरिङ्गुदैराम्रैर्नालिकेरै रसान्वितैः । बदराम्लातकाद्यैश्च वैदेह्या सुप्रसाधितैः ॥२६॥

अर्थ: खजूर, इंगुद, आम, नारियल, रसदार बेर तथा भिलामा आदि फलोंसे निर्मित था ॥२६॥


आहार्यैर्विविधैः शास्त्रदृष्टिशुद्धिसमन्वितैः । पारणां चक्रतुर्गृद्धासंबन्धोज्झितचेतसौ ॥२७॥

अर्थ: इस प्रकार शास्त्रोक्त शुद्धिसे सहित नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंसे उन मुनियोंने पारणा की। उन मुनियोंके चित्त भोजन विषयक गृध्रताके सम्बन्धसे रहित थे ॥२७॥


एवं च पर्युपास्यैतौ मुनी रामः प्रियान्वितः । समस्तभावसंभारकृतनिर्ग्रन्थमाननः ॥२८॥

तावद्दुन्दुभयो नेदुर्गगनेऽदृष्टताडिताः । ववौ समीरणः स्वैरं घ्राणरञ्जनकारणम् ॥२९॥

साधु साध्विति देवानां मधुरो निस्वनोऽभवत् । ववर्ष पञ्चवर्णानि कुसुमानि नभस्तलम् ॥३०॥

पात्रदानानुभावेन दिव्या सकलवर्णिका । पूरयन्ती नभोऽपप्तद्वसुधारा महाद्युतिः ॥३१॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त भावोंसे मुनियोंका सन्मान करनेवाले राम इन दोनों मुनियोंकी सेवा कर सीताके साथ बैठे ही थे कि उसी समय आकाशमें अदृष्टजनोंसे ताडित दुन्दुभि बाजे बजने लगे, घ्राण इन्द्रियको प्रसन्न करनेवाली वायु धीरे-धीरे बहने लगी, ‘धन्य, धन्य’ इस प्रकार देवोंका मधुर शब्द होने लगा, आकाश पाँच वर्णके फूल बरसाने लगा और पात्रदानके प्रभावसे आकाशको व्याप्त करनेवाली, महाकान्तिकी धारक, सब रंगोंकी दिव्यरत्न वृष्टि होने लगी ॥२८-३१॥


अथात्रैव वनोद्देशे गहनस्य महातरोः । निषण्णोऽग्रे महागृध्रः स्वेच्छयावस्थितोऽभवत् ॥३२॥

अर्थ: अथानन्तर वनके इसी स्थानमें सघन महावृक्षके अग्रभागपर एक बड़ा भारी गृध्र पक्षी स्वेच्छासे बैठा ॥३२॥


स दृष्ट्वाऽतिशयोपेतौ मुनी कर्मानुभावतः । बहूनात्मभवान् स्मृत्वा तत्तदैवमचिन्तयत् ॥३३॥

अर्थ: सो अतिशय पूर्ण दोनों मुनिराजोंको देखकर कर्मोदयके प्रभावसे उसे अपने अनेक भव स्मृत हो उठे । वह उस समय इस प्रकार विचार करने लगा ॥३३॥


मनुष्यभावसुकरं प्रमत्तेन मया पुरा । विवेकिनापि न कृतं तपो धिग्मामचेतनम् ॥३४॥

अर्थ: कि यद्यपि मैं पूर्व पर्यायमें विवेकी था तो भी मैंने प्रमादी बनकर मनुष्य भवमें करने योग्य तपश्चरण नहीं किया अतः मुझ अविवेकीको धिक्कार हो ॥३४॥


भाव प्रतप्यसे किं त्वमधुना पापचेष्टितः । कमुपायं करोम्येतां कुत्सितां योनिमागतः ॥३५॥

अर्थ: हे हृदय ! अब क्यों सन्ताप कर रहा है ? इस समय तो इस कुयोनिमें आकर पाप चेष्टाओंमें निमग्न हूँ अतः क्या उपाय कर सकता हूँ ? ॥३५॥


अनुकूलारिभिः पापैर्मित्रशब्दनधारिभिः । प्रेरितेन सता त्यक्तं धर्मरत्नं सदा मया ॥३६॥

अर्थ: मित्र संज्ञाको धारण करनेवाले तथा अनुकूलता दिखानेवाले पापी वैरियोंसे प्रेरित हो मैंने सदा धर्मरूपी रत्नका परित्याग किया है ॥३६॥


सुभूरिचरितं पापमपकर्ण्य गुरूदितम् । मोहध्वान्तपरीतेन दह्ये यदधुना स्मरन् ॥३७॥

अर्थ: मोहरूपी अन्धकारसे व्याप्त होकर मैंने गुरुओंका उपदेश न सुन जिस अत्यधिक पापका आचरण किया है उसे आज स्मरण करता हुआ ही जल रहा हूँ ॥३७॥


न किंचिदत्र बहुना चिन्तितेन प्रयोजनम् । गतिरन्या न मे लोके विद्यते दुःखसंक्षये ॥३८॥

एतौ प्रयामि शरणं साधू सर्वसुखावहौ । इतो मे परमार्थस्य प्राप्तिः संजायते ध्रुवम् ॥३९॥

अर्थ: अथवा इस विषयमें बहुत विचार करनेसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है क्योंकि दुःखोंका क्षय करनेके लिए लोकमें मेरी दूसरी गति नहीं है - अन्य उपाय नहीं है । मैं तो सब जीवोंको सुख देनेवाले इन्हीं दोनों मुनियोंकी शरणको प्राप्त होता हूँ । इनसे निश्चित ही मुझे परमार्थकी प्राप्ति होगी ॥३८-३९॥


इति पूर्वभवैध्यानात् परमं शोकमागतः । दर्शनाच्च महासाधोः प्रमोदं त्वरयान्वितः ॥४०॥

विधूय पक्षयुगलमश्रुसंपूर्णलोचनः । पपात शाखिनो मूर्ध्नः प्रश्रयान्वितविभ्रमः ॥४१॥

अर्थ: इस प्रकार पूर्वभवका स्मरण होनेसे जो परम शोकको प्राप्त हुआ था तथा महामुनियोंके दर्शनसे जो अत्यधिक हर्षको प्राप्त था ऐसा शीघ्रतासे सहित, अश्रुपूर्ण नेत्रोंका धारक, एवं विनयपूर्ण चेष्टाओंसे सहित वह गृध्र पक्षी दोनों पंख फड़फड़ाकर वृक्षके शिखरसे नीचे आया ॥४०-४१॥


नागाः सिंहादयोऽप्यत्र नादेन महतामुना । विदुद्रुवुरयं दुष्टः कथं तु न खगाधमः ॥४२॥

हा मातः पश्यतामुष्य धार्ष्ट्यं गृध्रस्य पापिनः । चिन्तयित्वेति वैदेह्या कोपाकुलितचित्तया ॥४३॥

वार्यमाणोऽपि यत्नेन कृतनिष्ठुरशब्दया । मुनिपादोदकं पक्षी सोत्साहः पातुमुद्यतः ॥४४॥

अर्थ: यहाँ इस अत्यधिक कोलाहलसे हाथी तथा सिंहादिक बड़े-बड़े जन्तु तो भाग गये पर यह दुष्ट नीच पक्षी क्यों नहीं भागा । हा मातः ! इस पापी गृध्रकी धृष्टता तो देखो; इस प्रकार विचारकर जिसका चित्त क्रोधसे आकुलित हो रहा था तथा जिसने कठोर शब्दोंका उच्चारण किया था ऐसी सीताने यद्यपि प्रयत्नपूर्वक उस पक्षीको रोका था तथापि वह बड़े उत्साहसे मुनिराजके चरणोदकको पीने लगा ॥४२-४४॥


पादोदकप्रभावेण शरीरं तस्य तत्क्षणम् । रत्नराशिसमं जातं परीतं चित्रतेजसा ॥४५॥

अर्थ: चरणोदकके प्रभावसे उसका शरीर उसी समय रत्नराशिके समान नाना प्रकारके तेजसे व्याप्त हो गया ॥४५॥


जातौ हेमप्रभौ पक्षौ पादौ वैडूर्यसंनिभौ । नानारत्नच्छविर्देहश्चञ्चुर्विद्रुमविभ्रमा ॥४६॥

अर्थ: उसके दोनों पंख सुवर्णके समान हो गये, पैर नील मणिके समान दिखने लगे, शरीर नाना रत्नोंकी कान्तिका धारक हो गया और चोंच मूँगाके समान दिखने लगी ॥४६॥


ततः स्वमन्यथामूतमवलोक्य सुसंमदः । विमुञ्चन्मधुरं नादं नर्तितुं स समुद्यतः ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर अपने आपको अन्य रूप देख वह अत्यन्त हर्षित हुआ और मधुर शब्द छोड़ता हुआ नृत्य करनेके लिए उद्यत हुआ ॥४७॥


देवदुन्दुभिनादोऽसावेव तस्यातिसुन्दरम् । आतोद्यत्वं परिप्राप्तं स्वां च वाणीं सुतेजसः ॥४८॥

अर्थ: उस समय जो देव-दुन्दुभिका नाद हो रहा था वही उस तेजस्वीकी अपनी वाणीसे मिलता-जुलता अत्यन्त सुन्दर साजका काम दे रहा था ॥४८॥


मुञ्चन्नानन्दनेत्राम्भश्चक्रीकृत्य गुरुद्वयम् । शुशुभे कृतनृत्योऽसौ शिखी मेघागमे यथा ॥४९॥

अर्थ: दोनों मुनियोंकी प्रदक्षिणा देकर हर्षाश्रुको छोड़ता हुआ वह नृत्य करनेवाला गृध्र पक्षी वर्षा ऋतुके मयूरके समान सुशोभित हो रहा था ॥४९॥


विधिना पारणां कृत्वा मुनी कृतयथोचितौ । वैडूर्यसदृशे राजन्नुपविष्टौ शिलातले ॥५०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिनका यथोचित सत्कार किया गया था ऐसे दोनों मुनिराज विधिपूर्वक पारणा कर वैडूर्यमणिके समान जो शिलातल था उसपर विराजमान हो गये ॥५०॥


पद्मरागाभनेत्रश्च पक्षी संकुचितच्छदः । प्रणम्य पादयोः साधोः सुखं तस्थौ कृताञ्जलिः ॥५१॥

अर्थ: और पद्मराग मणिके समान नेत्रोंका धारक गृध्र पक्षी भी अपने पंख संकुचित कर तथा मुनिराजके चरणोंमें प्रणाम कर अंजली बाँध सुखसे बैठ गया ॥५१॥


क्षणादग्निमिवालोक्य ज्वलन्तं तेजसा खगम् । पद्मो विकचपद्माक्षो विस्मयं परमं गतः ॥५२॥

अर्थ: विकसित कमलके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले राम, क्षण-भरमें तेजसे जलती हुई अग्निके समान उस गृध्र पक्षीको देखकर परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥५२॥


प्रणम्य पादयोः साधुं गुणशीलविभूषणम् । अपृच्छदिति विन्यस्य मुहुर्नेत्रे पतत्रिणि ॥५३॥

भगवन्नयमत्यन्तं विरूपावयवः पुरा । कथं क्षणेन संजातो हेमरत्नचयच्छविः ॥५४॥

अर्थ: उन्होंने पक्षीपर बार-बार नेत्र डालकर तथा गुण और शीलरूपी आभूषणको धारण करनेवाले मुनिराजके चरणोंमें नमस्कार कर उनसे इस प्रकार पूछा कि हे भगवन् ! यह पक्षी पहले तो अत्यन्त विरूप शरीरका धारक था पर अब क्षण-भरमें सुवर्ण तथा रत्नराशिके समान कान्तिका धारक कैसे हो गया ? ॥५३-५४॥


अशुचिः सर्वमांसादो गृध्रोऽयं दुष्टमानसः । निषद्य पादयोः शान्तस्तव कस्मादवस्थितः ॥५५॥

अर्थ: महाअपवित्र, सब प्रकारका मांस खानेवाला तथा दुष्ट हृदयका धारक यह गृध्र आपके चरणोंमें बैठकर अत्यन्त शान्त कैसे हो गया है ? ॥५५॥


सुगुप्तिश्रमणोऽवोचद् राजन् पूर्वमिहाभवत् । देशो जनपदाकीर्णो विषयः सुन्दरो महान् ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर सुगुप्ति नामक मुनिराज बोले कि हे राजन् । पहले यहाँ नाना जनपदोंसे व्याप्त एक बहुत बड़ा सुन्दर देश था ॥५६॥


पत्तनग्रामसंवाहमटम्बपुटभेदनैः । घोषद्रोणमुखाद्यैश्च संनिवेशैर्विराजितः ॥५७॥

अर्थ: जो पत्तन, ग्राम, संवाह, मटम्ब, पुटभेदन, घोष और द्रोणमुख आदि रचनाओंसे सुशोभित था ॥५७॥


कर्णकुण्डलनामात्र पुरमासीन् मनोहरम् । तस्मिन्नयमभूद्राजा प्रतापपरमोदयः ॥५८॥

चण्डविक्रमसंपन्नो भग्नशात्रवकण्टकः । दण्डो मानमयः ख्यातो दण्डको नाम साधनी ॥५९॥

अर्थ: इसी देशमें एक कर्णकुण्डल नामका मनोहर नगर था जिसमें यह परम प्रतापी राजा था। यह तीव्र पराक्रमसे युक्त, शत्रुरूपी कण्टकोंको भग्न करनेवाला, महामानी एवं साधनसम्पन्न दण्डक नामका धारक था ॥५८-५९॥


घृतार्थिना जलं तेन मथितं रघुनन्दन । धर्मश्रद्धापरीतेन धृतः पापागमो धिया ॥६०॥

अर्थ: हे रघुनन्दन ! धर्मकी श्रद्धासे युक्त इस राजाने पापपोषक शास्त्रको समझकर बुद्धिपूर्वक धारण किया सो मानो इसने घृतकी इच्छासे जलका ही मन्थन किया ॥६०॥


देवी मस्करिणां तस्य वरिवस्या पराभवत् । तेषामसावधीशेन संभोगं समुपागता ॥६१॥

अर्थ: राजा दण्डकको जो रानी थी वह परिव्राजकोंकी बड़ी भक्त थी क्योंकि परिव्राजकोंके स्वामीके द्वारा वह उत्तम भोगको प्राप्त हुई थी ॥६१॥


सोऽपि तस्याः परं वश्यस्तामेव दिशमाश्रयत् । स्त्रीचित्तहरणोद्युक्ताः किं न कुर्वन्ति मानवाः ॥६२॥

अर्थ: राजा दण्डक रानीके वशीभूत था इसलिए यह भी उसी दिशाका आश्रय लेता था, सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रियोंका चित्त हरण करनेमें उद्यत मनुष्य क्या नहीं करते हैं ? ॥६२॥


निष्क्रान्तेनान्यदा तेन नगरात् साधुरीक्षितः । प्रलम्बितभुजः श्रीमान् ध्यानसंरुद्धमानसः ॥६३॥

अर्थ: एक दिन राजा नगरसे बाहर निकला वहाँ उसने एक ऐसे साधुको देखा जो अपनी भुजाएँ नीचे लटकाये हुए थे, वीतराग लक्ष्मीसे सहित थे तथा जिनका मन ध्यानमें रुका हुआ था ॥६३॥


कृष्णसर्पो मृतस्तस्य दिग्धाङ्गो विषलालया । कण्ठे निधापितस्तेन ग्रावदारुणचेतसा ॥६४॥

अर्थ: पाषाणके समान कठोर चित्तके धारक राजाने उन मुनिके गलेमें, विषमिश्रित लारसे जिसका शरीर व्याप्त था ऐसा एक मरा हुआ काला साँप डलवा दिया ॥६४॥


यावदेषोऽपनीतो न प्रदालुर्गम केनचित् । तावन्न संहरेद्योगमिति ध्यात्वा मुनिः स्थितः ॥६५॥

अर्थ: ‘जबतक इस साँपको कोई अलग नहीं करता है तबतक मैं योगको संकुचित नहीं करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा कर वह मुनि उसी स्थानपर खड़े रहे ॥६५॥


अतीते गणरात्रे च पुनस्तेनैव वर्त्मना । निष्क्रामन् पार्थिवोऽपश्यत्तदवस्थं महामुनिम् ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत रात्रियाँ व्यतीत हो जानेके बाद उसी मार्गसे निकले हुए राजाने उन महामुनिको उसी प्रकार ध्यानारूढ़ देखा ॥६६॥


ऋजुनैव च रूपेण गत्वा निकटतां भृशम् । अपृच्छदपनेतारं किमेतदिति सोऽवदत् ॥६७॥

नरेन्द्र पश्य केनापि नरकावासमार्गिणा । योगस्थस्य मुनेरस्य कण्ठे सर्पः समर्पितः ॥६८॥

अर्थ: उसी समय कोई मनुष्य मुनिराजके गलेसे साँप अलग कर रहा था। राजा मुनिराजकी सरलतासे आकृष्ट हो उनके पास गया और साँप निकालनेवाले मनुष्यसे पूछता है कि ‘यह क्या है ?’ इसके उत्तरमें वह मनुष्य कहता है कि राजन् ! देखो, नरकको खोज करनेवाले किसी मनुष्यने इन ध्यानारूढ़ मुनिराजके गलेमें साँप डाल रखा है ॥६७-६८॥


यस्य सर्पस्य संपर्काद् विग्रहस्य समुद्गतम् । प्रतिबिम्बं शितिक्लिन्नं दुर्दर्शमतिभीषणम् ॥६९॥

अर्थ: जिस साँपके सम्पर्कसे इनके शरीरकी आकृति श्याम, खेदखिन्न, दुर्दर्शनीय तथा अत्यन्त भयंकर हो गयी है ॥६९॥


मुनिं निःप्रतिकर्माणं दृष्ट्वा राजा तथाविधम् । प्रणम्याक्षमयद्यातास्ते च स्थानं यथोचितम् ॥७०॥

अर्थ: कुछ भी प्रतिकार नहीं करनेवाले मुनिको उसी प्रकार ध्यानारूढ़ देख राजाने प्रणाम कर उनसे क्षमा माँगी और तदनन्तर वह यथास्थान चला गया ॥७०॥


ततः प्रभृति सक्तोऽसौ कर्तुं भक्तिमनुत्तमाम् । निरम्बरमुनीन्द्राणां वारितोपद्रवक्रियः ॥७१॥

अर्थ: उस समयसे राजा दिगम्बर मुनियोंकी उत्तम भक्ति करनेमें तत्पर हो गया और उसने मुनियोंके सब उपद्रव - कष्ट दूर कर दिये ॥७१॥


देवीविटपरिव्राजा ज्ञात्वान्यविषयं नृपम् । इदं क्रोधपरीतेन विधातुमभिवाञ्छितम् ॥७२॥

अर्थ: रानीके साथ गुप्त समागम करनेवाले परिव्राजकोंके अधिपतिने जब राजाके इस परिवर्तनको जाना तब क्रोधसे युक्त होकर उसने यह करनेकी इच्छा की ॥७२॥


जीवितस्नेहमुत्सृज्य परदुःखाहितात्मकः । निर्ग्रन्थरूपभृद्देव्याः संपर्कमभजत् पुनः ॥७३॥

अर्थ: दूसरे प्राणियोंको दुःख देनेमें जिसका हृदय लग रहा था ऐसे उस परिव्राजकने जीवनका स्नेह छोड़ निर्ग्रन्थ मुनिका रूप धर रानीके साथ सम्पर्क किया ॥७३॥


ज्ञात्वा तदीदृशं कर्म राज्ञातिक्रोधमीयुषा । अमात्याद्युपदेशं च स्मृत्वा निर्ग्रन्थनिन्दनम् ॥७४॥

अर्थ: जब राजाको इस कार्यका पता चला तब वह अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुआ । मन्त्री आदि अपने उपदेशमें निर्ग्रन्थ मुनियोंकी जो निन्दा किया करते थे वह सब इसकी स्मृतिमें झूलने लगा ॥७४॥


क्रूरकर्मभिरन्यैश्च प्रेरितः श्रमणाहितैः । आज्ञापयन् महर्षीणां यन्त्रनिष्पीडने नरान् ॥७५॥

अर्थ: उसी समय मुनियोंसे द्वेष रखनेवाले अन्य दुष्ट लोगोंने भी राजाको प्रेरित किया जिससे उसने अपने सेवकोंके लिए समस्त मुनियोंको घानीमें पेलनेकी आज्ञा दे दी ॥७५॥


गणाधिपसमेतोऽसौ समूहोऽम्बरवाससाम् । यन्त्रनिष्पीडनैर्नीतः पञ्चतां पापकर्मणा ॥७६॥

अर्थ: जिसके फलस्वरूप गणनायकके साथ-साथ जितना मुनियोंका समूह था वह सब, पापी मनुष्योंके द्वारा घानीमें पिलकर मृत्युको प्राप्त हो गया ॥७६॥


बाह्यभूमिगतस्तत्र मुनिरेकः समाव्रजन् । इत्यवार्यत लोकेन केनचित् करुणावता ॥७७॥

भो भो निर्ग्रन्थ मागास्त्वं पूर्वनैर्ग्रन्थ्यमाश्रयन् । यन्त्रेणापीड्यसे तत्र द्रुतं कुरु पलायनम् ॥७८॥

अर्थ: उस समय एक मुनि कहीं बाहर गये थे जो लौटकर उसी नगरीकी ओर आ रहे थे । उन्हें किसी दयालु मनुष्यने यह कहकर रोका कि हे निर्ग्रन्थ ! हे दिगम्बरमुद्राके धारी ! तुम अपने पहलेका निर्ग्रन्थवेष धारण करते हुए नगरीमें मत जाओ, अन्यथा घानीमें पेल दिये जाओगे, शीघ्र ही यहाँसे भाग जाओ ॥७७-७८॥


यन्त्रेषु श्रमणाः सर्वे राज्ञा क्रुद्धेन पीडिताः । मागास्त्वमप्यवस्थां तां रक्ष धर्माश्रयं वपुः ॥७९॥

अर्थ: राजाने क्रुद्ध होकर समस्त निर्ग्रन्थ मुनियोंको घानीमें पिलवा दिया है तुम भी इस अवस्थाको प्राप्त मत होओ, धर्मका आश्रय जो शरीर है उसकी रक्षा करो ॥७९॥


ततः क्षणमसौ संघमृत्युदुःखेन शल्यितः । वज्रस्तम्भ इवाकम्पस्तस्थावव्यक्तचेतनः ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त संघकी मृत्युके दुःखसे जिन्हें शल्य लग रही थी ऐसे वे मुनि क्षण-भरके लिए वज्रके स्तम्भकी नाईं अकम्प - निश्चल हो गये । उस समय उनकी चेतना अव्यक्त हो गयी थी अर्थात् यह नहीं जान पड़ता था कि जीवित है या मृत ? ॥८०॥


अथास्य शतदुःखेन प्रेरितः शमगह्वरात् । निरम्बरमहीध्रस्य निरगात् क्रोधकेसरी ॥८१॥

अर्थ: अथानन्तर उन निर्ग्रन्थ मुनिरूपी पर्वतकी शान्तिरूपी गुफासे सैकड़ों दुःखोंसे प्रेरित हुआ क्रोधरूपी सिंह बाहर निकला ॥८१॥


रक्ताशोकप्रकाशेन निखिलं तस्य चक्षुषः । तेजसा विहितं व्योम संध्यामयमिवाभवत् ॥८२॥

अर्थ: उनके नेत्रके अशोकके समान लाल-लाल तेजसे आकाश ऐसा व्याप्त हो गया मानो उसमें सन्ध्या ही व्याप्त हो गयी हो ॥८२॥


कोपेन तप्यमानस्य मुनेः सर्वत्र विग्रहे । प्रस्वेदबिन्दवो जाताः प्रतिबिम्बितविष्टपाः ॥८३॥

अर्थ: क्रोधसे तपे हुए मुनिराजके समस्त शरीरमें स्वेदकी बूँदें निकल आयीं और उनमें लोकका प्रतिबिम्ब पड़ने लगा ॥८३॥


ततः कालानलाकारो बहुलः कुटिलः पृथुः । हाकारेण मुखात्तस्य निरगात् पावकध्वजः ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर उन मुनिराजने मुखसे ‘हा’ शब्दका उच्चारण किया उसीके साथ मुखसे धुआँ निकला जो कालाग्निके समान अत्यधिक कुटिल और विशाल था ॥८४॥


अनुलग्नश्च तस्याग्निरुज्जगाम निरन्तरम् । कृतं नभस्तलं येन निरिन्धनविदीपितम् ॥८५॥

अर्थ: उस धुआँके साथ ऐसी ही निरन्तर अग्नि निकली कि जिसने ईंधनके बिना ही समस्त आकाशको देदीप्यमान कर दिया ॥८५॥


उल्काभिर्नु जगद्व्याप्तं ज्योतिर्देवाः पतन्ति नु । महाप्रलयकालो नु वह्निदेवा नु रोषिताः ॥८६॥

हा हा मातः किमेतन्नु तापोऽयमतिदुस्सहः । चक्षुरुत्पाट्यते दीर्घसंदंशैरिव वेगिभिः ॥८७॥

मूर्तिनिर्मुक्तमेवैतद्गगनं कुरुते ध्वनिम् । वंशारण्यमिवोद्दीप्तं जीविताकर्षणोचितम् ॥८८॥

यावदेव ध्वनिर्लोके वर्ततेऽत्यन्तमाकुलः । वह्निस्तावदयं देशमनयद् भस्मदोषताम् ॥८९॥

अर्थ: क्या यह लोक उल्काओंसे व्याप्त हो रहा है ? या ज्योतिष्क देव नीचे गिर रहे हैं ? या महा प्रलयकाल आ पहुँचा है ? या अग्निदेव कुपित हो रहे हैं ? हाय माता ! यह क्या है ? यह ताप तो अत्यन्त दुःसह है, ऐसा लगता है जैसे वेगशाली बड़ी-बड़ी संडासियोंसे नेत्र उखाड़े जा रहे हों, यह अमूर्तिक आकाश ही घोर शब्द कर रहा है, मानो प्राणोंके खींचनेमें उद्यत बाँसोंका वन ही जल रहा है, इस प्रकार अत्यन्त व्याकुलतासे भरा यह शब्द जबतक लोकमें गूँजता है तबतक उस अग्निने समस्त देशको भस्म कर दिया ॥८६-८९॥


नान्तःपुरं न देशो न पुराणि न च पर्वताः । न नद्यो नाप्यरण्यानि तदा न प्राणधारिणः ॥९०॥

अर्थ: उस समय न अन्तःपुर, न देश, न नगर, न पर्वत, न नदियाँ, न जंगल और न प्राणी ही शेष रह गये थे ॥९०॥


महासंवेगयुक्तेन मुनिना चिरमर्जितम् । क्रोधाग्निनाखिलं दग्धं तपोऽन्यत् किमु शिष्यताम् ॥९१॥

अर्थ: महान् संवेगसे युक्त मुनिराजने चिरकालसे जो तप संचित कर रखा था यह सबका शब्द क्रोधाग्निमें दग्ध हो गया - जल गया फिर दूसरी वस्तुएँ तो बचतीं ही कैसे ? ॥९१॥


यतोऽयं दण्डको देशः आसीद्दण्डकपार्थिवः । तेनैव ध्वनिनाद्यापि दण्डकः परिकीर्त्यते ॥९२॥

अर्थ: यह दण्डक देश था तथा दण्डक ही यहाँका राजा था इसलिए आज भी यह स्थान दण्डक नामसे ही प्रसिद्ध है ॥९२॥


काले महत्यतिक्रान्ते प्राप्तायां चारुतां भुवि । वृक्षेऽत्र पादपा जाताः पर्वताश्च सनिम्नगाः ॥९३॥

अर्थ: बहुत समय बीत जानेके बाद यहाँकी भूमि कुछ सुन्दरताको प्राप्त हुई है और ये वृक्ष, पर्वत तथा नदियाँ दिखाई देने लगी हैं ॥९३॥


मुनेस्तस्य प्रभावेण सुराणामपि भीतिदम् । वनमेतदभूत् कैव वार्ता विद्याबलाश्रितेाम् ॥९४॥

अर्थ: उन मुनिके प्रभावसे यह वन देवोंके लिए भी भय उत्पन्न करनेवाला है फिर विद्याधरोंकी तो बात ही क्या है ? ॥९४॥


पश्चादिदं समाकीर्णं सिंहेन शरभादिभिः । नानाशकुनिवृन्दैश्च सस्यभेदैश्च भूरिभिः ॥९५॥

अर्थ: आगे चलकर यह वन सिंह-अष्टापद आदि क्रूर जन्तुओं, नाना प्रकारके पक्षि-समूहों तथा अत्यधिक जंगली धान्योंसे युक्त हो गया ॥९५॥


अद्याप्यस्योरुदावस्य श्रुत्वा शब्दं परं भयम् । व्रजन्ति मानवाः कम्पं वृत्तान्तेऽनुनिबोधिनः ॥९६॥

अर्थ: आज भी इस वनकी प्रचण्ड दावानलका शब्द सुनकर मनुष्य पिछली घटनाका स्मरण कर भयभीत होते हुए काँपने लगते हैं ॥९६॥


संसारेऽतिचिरं भ्रान्त्वा दण्डको दुःखपूरितः । अयं गृध्रत्वमायातो वनेऽत्र रतिमागतः ॥९७॥

अर्थ: राजा दण्डक बहुत समय तक संसारमें भ्रमण कर दुःख उठाता रहा अब गृध्रपर्यायको प्राप्त हो इस वनमें प्रीतिको प्राप्त हुआ है ॥९७॥


दृष्ट्वा सातिशयावेव नौ वनेऽत्र समागतौ । पापस्य कर्मणो हान्या प्राप्तः पूर्वभवस्मृतिम् ॥९८॥

अर्थ: इस समय इस वनमें आये हुए अतिशय युक्त हम दोनोंको देखकर पापकर्मकी मन्दता होनेसे यह पूर्वभवके स्मरणको प्राप्त हुआ है ॥९८॥


योऽसौ परमया शक्त्या युक्तोऽभूद्दण्डको नृपः । सोऽयं पश्यत संजातः कीदृशः पापकर्मभिः ॥९९॥

अर्थ: जो दण्डक राजा पहले परम शक्तिसे युक्त था वह देखो, आज पापकर्मोंके कारण कैसा हो गया है ? ॥९९॥


इति विज्ञाय विरसं फलं कटुककर्मणः । कथं न सज्यते धर्मे दुरिताच्च विरज्यते ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार पापकर्मका नीरस फल जानकर धर्ममें क्यों नहीं लगा जाये और पापसे क्यों नहीं विरक्त हुआ जाये ? ॥१००॥


दृष्टान्तः परकीयोऽपि शान्तेर्भवति कारणम् । असमञ्जसमात्मीयं किं पुनः स्मृतिमागतम् ॥१०१॥

अर्थ: दूसरेका उदाहरण भी शान्तिका कारण हो जाता है फिर यदि अपनी ही खोटी बात स्मरण आ जावे तो कहना ही क्या है ? ॥१०१॥


पक्षिणं संयतोऽगादीन्मा भैषीरधुना द्विज । मा रोदीर्यद्यथा भाव्यं कः करोति तदन्यथा ॥१०२॥

अर्थ: रामसे इतना कहकर मुनिराजने गृध्रसे कहा कि हे द्विज ! अब भयभीत मत होओ, रोओ मत, जो बात जैसी होनेवाली है उसे अन्यथा कौन कर सकता है ? ॥१०२॥


आश्वासं गच्छ विश्रब्धः कम्पं मुञ्च सुखी भव । पश्य क्वेयमरण्यानी क्व रामः सीतयान्वितः ॥१०३॥

अर्थ: धैर्य धरो, निश्चिन्त होकर कँपकँपी छोड़ो, सुखी होओ, देखो यह महा अटवी कहाँ ? और सीता सहित राम कहाँ ? ॥१०३॥


अवग्रहोऽस्मदीयः क्व क्व त्वमात्मार्थसंगतः । प्रबुद्धो दुःखसंबोधः कर्मणामिदमीहितम् ॥१०४॥

अर्थ: हमारा पडगाहन कहाँ ? और आत्मकल्याणके लिए दुःखका अनुभव करते हुए तुम्हारा प्रबुद्ध होना कहाँ ? कर्मोंकी ऐसी ही चेष्टा है ॥१०४॥


इदं कर्म विचित्रत्वाद् विचित्रं परमं जगत् । अनुभूतं श्रुतं दृष्टं यथैव प्रवदाम्यहम् ॥१०५॥

अर्थ: कर्मोंकी विचित्रताके कारण यह संसार अत्यन्त विचित्र है । जैसा मैंने अनुभव किया है, सुना है, अथवा देखा है वैसा ही मैं कह रहा हूँ ॥१०५॥


पक्षिणः प्रतिबोधार्थं ज्ञात्वाकूतं च सीरिणः । सुगुप्तिरवदत् स्वस्य सुगुप्तेः शमकारणम् ॥१०६॥

अर्थ: पक्षीको समझानेके लिए रामका अभिप्राय जान सुगुप्ति मुनिराज अपनी दीक्षा तथा शान्तिका कारण कहने लगे ॥१०६॥


अचलो नाम विख्यातो वाराणस्यां महीपतिः । गिरिदेवीति जायास्य गुणरत्नविभूषिता ॥१०७॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि वाराणसी नगरीमें एक अचल नामका प्रसिद्ध राजा था । उसकी गुणरूपी रत्नोंसे विभूषित गिरि देवी नामकी स्त्री थी ॥१०७॥


त्रिगुप्त इति विख्यातो गुणनाम्नान्यदा मुनिः । पारणार्थं गृहं तस्याः प्रविष्टः शुद्धचेष्टितः ॥१०८॥

अर्थ: किसी दिन त्रिगुप्त इस सार्थक नामको धारण करनेवाले तथा शुद्ध चेष्टाओंके धारक मुनिराजने आहारके लिए उसके घर प्रवेश किया ॥१०८॥


स तया परमां श्रद्धां दधत्या विधिपूर्विकाम् । तर्पितः परमान्नेन स्वयं व्यापारमुक्तया ॥१०९॥

अर्थ: सो विधिपूर्वक परम श्रद्धाको धारण करनेवाली गिरिदेवीने अन्य सब कार्य छोड़ स्वयं ही उत्तम आहार देकर उन्हें सन्तुष्ट किया ॥१०९॥


समाप्ताशनकृत्यं च पादन्यस्तोत्तमाङ्गया । पप्रच्छान्यापदेशेन स्वस्य पुत्रसमुद्भवम् ॥११०॥

अर्थ: जब मुनिराज आहार कर चुके तब उसने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर किसी दूसरेके बहाने अपने पुत्र उत्पन्न होनेकी बात पूछी ॥११०॥


नाथ सातिशयोऽयं मे गृहवासो भविष्यति । किं वा नेति प्रसादोऽयं क्रियतां निश्चयार्पणम् ॥१११॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! मेरा यह गृहवास सार्थक होगा या नहीं ? इस बातका निश्चय कराकर प्रसन्नता कीजिए ॥१११॥


वचोगुप्तिं ततो भित्वा राज्ञीभक्त्यनुरोधतः । तस्याश्चारुसमादिष्टं मुनिना तनयद्वयम् ॥११२॥

अर्थ: तदनन्तर मुनि यद्यपि तीन गुप्तियोंके धारक थे तथापि रानीकी भक्तिके अनुरोधसे वचनगुप्तिको तोड़कर उन्होंने कहा कि तुम्हारे दो सुन्दर पुत्र होंगे ॥११२॥


त्रिगुप्तस्य मुनेस्तस्य समादेशेऽनयत् सुतौ । जातौ सुगुप्तिगुप्ताख्यौ पितृभ्यां तौ ततः कृतौ ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर उन त्रिगुप्त मुनिराजके कहे अनुसार दो पुत्र उत्पन्न हुए सो माता-पिताने उनके ‘सुगुप्ति’ और ‘गुप्त’ इस प्रकार नाम रखे ॥११३॥


तौ च सर्वकलाभिज्ञौ कुमारश्रीसमन्वितौ । तिष्ठन्तौ विविधैर्भावै रममाणौ जनप्रियौ ॥११४॥

अर्थ: वे दोनों ही पुत्र सर्व कलाओंके जानकार, कुमार लक्ष्मीसे सुशोभित, अनेक भावोंसे रमण करते तथा लोगोंके अत्यन्त प्रिय थे ॥११४॥


वृत्तान्तोऽयं च संजातो गन्धर्वत्यां महीपतेः । पुरोहितस्य सोमस्य प्रियायास्तनयद्वयम् ॥११५॥

सुकेतुरग्निकेतुश्च तयोः प्रीतिरनुत्तमा । सुकेतुरन्यदा चाभूत् कृतदारपरिग्रहः ॥११६॥

आवयोरधुना भ्रात्रोः पृथक् शयनमेतया । क्रियते जाययावश्यमिति दुःखमुपागतः ॥११७॥

अर्थ: उसी समय यह दूसरा वृत्तान्त हुआ कि गन्धवती नामकी नगरीके राजाके सोम नामक पुरोहित था उसकी स्त्रीके सुकेतु और अग्निकेतु नामके दो पुत्र थे। उन दोनों ही पुत्रोंमें अत्यधिक प्रेम था, उस प्रेमके कारण बड़े होनेपर भी वे एक ही शय्यापर सोते थे। समय पाकर सुकेतुका विवाह हो गया। जब स्त्री घर आयी तब सुकेतु यह विचार कर बहुत दुःखी हुआ कि इस स्त्रीके द्वारा अब हम दोनों भाइयोंकी शय्या पृथक्-पृथक् की जा रही है ॥११५-११७॥


सुकेतुः प्रतिबुद्धः सन् शुभकर्मानुभावतः । अनन्तवीर्यपादान्ते श्रमणत्वं समाश्रितः ॥११८॥

अर्थ: इस प्रकार शुभ कर्मके प्रभावसे प्रतिबोधको प्राप्त हो सुकेतु अनन्तवीर्य मुनिके पास दीक्षित हो गया ॥११८॥


अग्निकेतुर्वियोगेन भ्रातुरत्यन्तदुःखितः । वाराणस्यामभूदुग्रस्तापसो धर्मचिन्तया ॥११९॥

अर्थ: भाईके वियोगसे अग्निकेतु भी बहुत दुःखी हो धर्म संचय करनेकी भावनासे वाराणसीमें उग्र तापस हो गया ॥११९॥


श्रुत्वा चैवंविधं तं च भ्रातरं स्नेहबन्धनः । प्रतिबोधयितुं वाञ्छन् सुकेतुर्गन्तुमुद्यतः ॥१२०॥

अर्थ: स्नेहके बन्धनमें बँधे सुकेतुने जब भाईके तापस होनेका समाचार सुना तब वह उसे समझानेके अर्थ जानेके लिए उद्यत हुआ ॥१२०॥


स व्रजन् गुरुणावाचि सुकेतो कथयिष्यसि । वृत्तान्तं सोदरायेमं येनासावुपशाम्यति ॥१२१॥

अर्थ: जब वह जाने लगा तब गुरुने उससे कहा कि हे सुकेतो! तुम अपने भाईसे यह वृत्तान्त कहना जिससे वह शीघ्र ही उपशान्त हो जायेगा ॥१२१॥


कोऽसौ नाथेति तेनोक्ते गुरुरेवमुदाहरत् । करिष्यति त्वया साकं स जल्पं दुष्टभावनः ॥१२२॥

अर्थ: ‘हे नाथ ! वह कौन सा वृत्तान्त है’? इस प्रकार सुकेतुके कहने पर गुरुने कहा कि दुष्ट भावनाको धारणा करनेवाला तेरा भाई तेरे साथ वाद करेगा ॥१२२॥


युवयोः कुर्वतोर्जल्पं जाह्नवीमागमिष्यति । चारुकन्या समं स्त्रीभिस्तिसृभिर्गौरविग्रहा ॥१२३॥

दिवसस्य गते यामे विचित्रांशुकधारिणी । एभिश्चिह्नैर्विदित्वा तां भाषितव्यमिदं त्वया ॥१२४॥

दृष्ट्वा तां वक्ष्यसीदं त्वं ज्ञानं चेदस्ति ते मते । वदैतस्याः कुमार्याः किं भवितेति शुभाशुभम् ॥१२५॥

अर्थ: सो जिस समय तुम दोनों वाद कर रहे होओगे उस समय गौरवर्ण शरीरको धारणा करनेवाली एक सुन्दर कन्या तीन स्त्रियोंके साथ गंगा आवेगी । वह दिनके पिछले प्रहरमें आवेगी तथा विचित्र वस्त्रको धारण कर रही होगी । इन चिह्नोंसे उसे जानकर तुम अपने भाईसे कहना कि यदि तुम्हारे धर्ममें कुछ ज्ञान है तो बताओ इस कन्याका क्या शुभ-अशुभ होनेवाला है? ॥१२३-१२५॥


अज्ञानोऽसौ विलक्षः संस्तापसस्त्वां भणिष्यति । भवान् जानात्विति त्वं च वक्ष्यस्येवं सुनिश्चितः ॥१२६॥

अस्त्यत्र प्रवरो नाम वणिजः संपदान्वितः । तस्येयं दुहिता नाम्ना रुचिरेति प्रकीर्तिता ॥१२७॥

अर्थ: तब वह अज्ञानी तापसी लज्जित होता हुआ तुमसे कहेगा कि अच्छा तुम जानते हो तो कहो। यह सुन तुम निश्चयसे सुदृढ़ हो कहना कि इसी नगरमें एक सम्पत्तिशाली प्रवर नामका वैश्य रहता है यह उसीकी लड़की है तथा रुचिरा नामसे प्रसिद्ध है ॥१२६-१२७॥


तृतीयेऽहनि पञ्चत्वं वराकीयं प्रपत्स्यते । ततोऽजा कम्बरग्रामे विलासस्य भविष्यति ॥१२८॥

वृकेण मारिता मेषी महिषी च ततः पितुः । मातुलस्य विलासस्य भविष्यति शरीरजा ॥१२९॥

अर्थ: यह बेचारी आजसे तीसरे दिन मर जायेगी और कम्बर नामक ग्राममें विलास नामक वैश्यके यहाँ बकरी होगी । भेड़िया उस बकरीको मार डालेगा जिससे गाडर होगी फिर मरकर उसीके घर भैंस होगी और उसके बाद उसी विलासके पुत्री होगी । वह विलास इस कन्याके पिताका मामा होता है ॥१२८-१२९॥


एवमस्त्विति संभाष्य प्रणम्य प्रमदी गुरुम् । सुकेतुः क्रमतः प्राप्तस्तापसानां निकेतनम् ॥१३०॥

अर्थ: ‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार कहकर तथा गुरुको प्रणाम कर हर्षसे भरा सुकेतु क्रम-क्रमसे तापसोंके आश्रममें पहुँचा ॥१३०॥


गुरुणा च यथादिष्टं तां दृष्ट्वा तमुदाहरत् । तथा वृत्तं च तत्सर्वं यातमग्नेः समक्षताम् ॥१३१॥

अर्थ: गुरुने जिस प्रकार कहा था उसी प्रकार उस कन्याको देखकर सुकेतुने अपने भाई अग्निकेतुसे कहा और वह सबका सब वृत्तान्त उसी प्रकार अग्निकेतुके सामने आ गया अर्थात् सच निकला ॥१३१॥


ततोऽसौ विधुरा नाम्ना विलासस्य शरीरजा । याचिता श्रेष्ठिना लब्धा प्रवरेण मनोहरा ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर वह कन्या जब मरकर चौथे भवमें विलासके विधुरा नामकी पुत्री हुई तब प्रवर नामक सेठने उस सुन्दरीको याचना की और वह उसे प्राप्त भी हो गयी ॥१३२॥


विवाहसमये प्राप्ते प्रवराय न्यवेदयत् । अग्निकेतुर्यथेयं तं दुहितासीद् भवान्तरे ॥१३३॥

अर्थ: जब विवाहका समय आया तब अग्निकेतुने प्रवरसे कहा कि यह कन्या भवान्तरमें तुम्हारी पुत्री थी ॥१३३॥


विलासायापि ते सर्वे भवास्तेन निवेदिताः । श्रुत्वा तत्कन्यका जाता जातिस्मरणकोविदा ॥१३४॥

अर्थ: यह कहकर उसने कन्याके वर्तमान पिता विलासके लिए भी उसके वे सब भव कह सुनाये। उन भवोंको सुनकर कन्याको जातिस्मरण हो गया ॥१३४॥


ततः प्रव्रजितुं वाञ्छां सा संवेगपराकरोत् । प्रवरश्च विलासेन व्यवहारं दुराशयः ॥१३५॥

सभायां पितुरस्माकं प्रवरे भङ्गतां गते । आर्यिकात्वमिता कन्या श्रमणत्वं च तापसः ॥१३६॥

अर्थ: जिससे संसारसे भयभीत हो उसने दीक्षा धारण करनेका विचार कर लिया। इधर प्रवरने समझा कि विलास किसी छलके कारण मेरे साथ अपनी कन्याका विवाह नहीं कर रहा है इसलिए दूषित अभिप्रायको धारण करनेवाले प्रवरने हमारे पिताकी सभामें विलासके विरुद्ध अभियोग चलाया परन्तु अन्तमें प्रवरकी हार हुई, कन्या आर्यिका पदको प्राप्त हुई और अग्निकेतु तापस दिगम्बरमुनि बन गया ॥१३५-१३६॥


वृत्तान्तमीदृशं श्रुत्वा वयं वैराग्यपूरिताः । सकाशेऽनन्तवीर्यस्य जैनेन्द्रव्रतमाश्रिताः ॥१३७॥

अर्थ: वृत्तान्तको सुनकर हमने भी विरक्त हो अनन्तवीर्य नामक मुनिराजके समीप जिनेन्द्र दीक्षा धारण कर ली ॥१३७॥


एवं मोहपरीतानां प्राणिनामतिभूरिशः । जायन्ते कुत्सिताचारा भवसंततिदायिनः ॥१३८॥

अर्थ: इस प्रकार मोही जीवोंसे संसारकी सन्ततिको बढ़ानेवाले अनेक खोटे आचरण हो जाया करते हैं ॥१३८॥


मातापितृसुहृन्मित्रभार्यापत्यादिकं जनः । सुखदुःखादिकं चायं विवर्तं लभते भवे ॥१३९॥

अर्थ: यह जीव अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार ही माता, पिता, स्नेही मित्र, स्त्री, पुत्र तथा सुख-दुःखादिकको भव-भवमें प्राप्त होता है ॥१३९॥


तच्छ्रुत्वा सुतरां पक्षी भीतोऽभूद् भवदुःखतः । चकार च मुहुःशब्दं धर्मग्रहणवाञ्छया ॥१४०॥

अर्थ: यह सुनकर वह गृध्र पक्षी संसार सम्बन्धी दुःखोंसे अत्यन्त भयभीत हो गया और धर्म ग्रहण करनेकी इच्छासे बार-बार शब्द करने लगा ॥१४०॥


उक्तं च गुरुणा भद्र मा भैषीरधुना व्रतम् । गृहाण येन नो भूयः प्राप्यते दुःखसंततिः ॥१४१॥

अर्थ: तब मुनिराजने कहा कि हे भद्र ! भय मत करो। इस समय व्रत धारण करो जिससे फिर यह दुःखोंकी सन्तति प्राप्त न हो ॥१४१॥


प्रशान्तो भव मा पीडां कार्षीः सर्वासुधारिणाम् । अनृतं स्तेयतां भार्यां परकीयां विवर्जय ॥१४२॥

एकान्तब्रह्मचर्यं वा गृहीत्वा सत्क्षमान्वितः । रात्रिभुक्तिं परित्यज्य भव शोभनचेष्टितः ॥१४३॥

प्रयतोऽह्नि क्षपायां च जिनेन्द्रान् वह चेतसा । उपवासादिकं शक्त्या सुधीर्नियममाचर ॥१४४॥

इन्द्रियाण्यप्रमत्तः सन्नुत्सुकान्यात्मगोचरे । कुरु युक्तव्यवस्थानि साधूनां भक्तितत्परः ॥१४५॥

अर्थ: अत्यन्त शान्त हो जाओ, किसी भी प्राणीको पीड़ा मत पहुँचाओ, असत्य वचन, चोरी और परस्त्री-का त्याग करो अथवा पूर्ण ब्रह्मचर्य धारण कर उत्तम क्षमासे युक्त हो रात्रि भोजनका त्याग करो, उत्तम चेष्टाओंसे युक्त होओ, बड़े प्रयत्नसे रात-दिन जिनेन्द्र भगवान्को हृदयमें धारण करो, शक्त्यनुसार विवेकपूर्वक उपवासादि नियमोंका आचरण करो, प्रमादरहित होकर इन्द्रियोंको व्यवस्थित कर आत्मध्यानमें उत्सुक करो और साधुओंकी भक्तिमें तत्पर होओ ॥१४२-१४५॥


इत्युक्तः साञ्जलिः पक्षी शिरो विनमयन्मुहुः । कुर्वाणो मधुरं शब्दं जग्राह मुनिभाषितम् ॥१४६॥

अर्थ: मुनिराजके इस प्रकार कहनेपर गृध्र पक्षीने अंजलि बाँध बार-बार शिर हिलाकर तथा मधुर शब्दका उच्चारण कर मुनिराजका उपदेश ग्रहण किया ॥१४६॥


श्रावकोऽयं विनीतात्मा जातोऽस्माकं विनोदकृत् । इत्युक्त्वा सस्मिता सीता तं कराभ्यां समस्पृशत् ॥१४७॥

अर्थ: ‘विनीत आत्माको धारण करनेवाला यह श्रावक हम लोगोंका विनोद करनेवाला हो गया’ यह कहकर मन्द हास्य करनेवाली सीताने उस पक्षीका दोनों हाथोंसे स्पर्श किया ॥१४७॥


साधुभ्यामुक्तमित्येतं रक्षितुं वोऽधुनोचितम् । तपस्वी शान्तचित्तोऽयं क्व वा गच्छतु पक्षभृत् ॥१४८॥

अर्थ: तदनन्तर दोनों मुनियोंने राम आदिको लक्ष्य कर कहा कि अब आप लोगोंको इसकी रक्षा करना उचित है क्योंकि शान्तचित्तको धारण करनेवाला यह बेचारा पक्षी कहाँ जायेगा ? ॥१४८॥


अस्मिन् सुगहनेऽरण्ये क्रूरप्राणिनिषेविते । सम्यग्दृष्टेः खगस्यास्य रक्षा कार्या त्वया सदा ॥१४९॥

अर्थ: क्रूर प्राणियोंसे भरे हुए इस सघन वनमें तुम्हें इस सम्यग्दृष्टि पक्षीकी सदा रक्षा करनी चाहिए ॥१४९॥


ततो गुरुवचः प्राप्य सुतरां स्नेहपूर्णया । सीतयानुगृहीतोऽसौ परिपालनचिन्तया ॥१५०॥

अर्थ: तदनन्तर गुरुके वचन प्राप्त कर अतिशय स्नेहसे भरी सीताने उसके पालनकी चिन्ता अपने ऊपर ले उसे अनुगृहीत किया अर्थात् अपने पास ही रख लिया ॥१५०॥


पल्लवस्पर्शहस्ताभ्यां तं परामृशती सती । जनकस्याङ्गजा रेजे विनता गरुडं यथा ॥१५१॥

अर्थ: पल्लवके समान कोमल स्पर्शवाले हाथोंसे उसका स्पर्श करती हुई सीता ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो गरुड़का स्पर्श करती हुई उसकी माँ विनता ही हो ॥१५१॥


निर्ग्रन्थपुङ्गवावेभिः स्तुतिपूर्वं नमस्कृतौ । बहूपकारिसंचारौ यातावात्मोचितं पदम् ॥१५२॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका भ्रमण अनेक जीवोंका उपकार करनेवाला था ऐसे दोनों निर्ग्रन्थ साधु, राम आदिके द्वारा स्तुतिपूर्वक नमस्कार किये जानेपर अपने योग्य स्थानपर चले गये ॥१५२॥


नमः समुत्पतन्तौ तौ शुशुभाते महामुनी । दानधर्मसमुद्रस्य कल्लोलाविव पुष्कलौ ॥१५३॥

अर्थ: आकाशमें उड़ते हुए वे दोनों महामुनि ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो दानधर्मरूपी समुद्रकी दो बड़ी लहरें ही हों ॥१५३॥


प्रभिन्नं वारणं तावद् वशीकृत्य वनोत्थितम् । आरुह्य लक्ष्मणः श्रुत्वा ध्वनिमागात् समाकुलः ॥१५४॥

अर्थ: उसी समय एक मदोन्मत्त हाथीको वश कर तथा उसपर सवार हो लक्ष्मण शब्द सुनकर कुछ व्यग्र होते हुए आ पहुँचे ॥१५४॥


रत्नकाञ्चनराशिं च दृष्ट्वा पर्वतसंनिधिम् । नानावर्णप्रभाजालसमुद्गतसुरायुधम् ॥१५५॥

विकसन्नयनाम्भोजमहाकौतुकपूरितः । कृतो विदितवृत्तान्तः पद्मेन मुदितात्मना ॥१५६॥

अर्थ: नाना वर्णकी प्रभाओंके समूहसे जिसमें इन्द्रधनुष निकल रहा था ऐसी पर्वतके समान बहुत बड़ी रत्न तथा सुवर्णकी राशि देखकर जिनके नेत्रकमल विकसित हो रहे थे तथा जो अत्यधिक कौतुकसे युक्त थे ऐसे लक्ष्मणको प्रसन्न हृदय रामने सब समाचार विदित कराया ॥१५५-१५६॥


प्राप्तबोधिरसौ पक्षी नायासीत्तौ विना क्वचित् । निर्ग्रन्थवचनं सर्वं कुर्वन्नुद्यतमानसः ॥१५७॥

अर्थ: जिसे रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई थी तथा जो मुनिराजके समस्त वचनोंका बड़ी तत्परतासे पालन करता था ऐसा वह पक्षी राम और सीताके बिना कहीं नहीं जाता था ॥१५७॥


स्मर्यमाणोपदेशोऽसौ सीतयाणुव्रताश्रमे । पद्मलक्ष्मणमार्गेण रममाणोऽभ्रमन्महीम् ॥१५८॥

अर्थ: अणुव्रताश्रममें स्थित सीता जिसे बार-बार मुनियोंके उपदेशका स्मरण कराती रहती थी ऐसा वह पक्षी राम-लक्ष्मणके मार्गमें रमण करता हुआ पृथ्वीपर भ्रमण करता था ॥१५८॥


धर्मस्य पश्यतौदार्यं यदस्मिन्नेव जन्मनि । शाकपत्रोपमो गृध्रो जातस्तामरसोपमः ॥१५९॥

अर्थ: अहो ! धर्मका माहात्म्य देखो कि जो पक्षी इसी जन्ममें शाकपत्रके समान निष्प्रभ था वही कमलके समान सुन्दर हो गया ॥१५९॥


पुरा योऽनेकमांसादो दुर्गन्धोऽभूज्जुगुप्सितः । सोऽयं काञ्चनकुम्भाभःसुरभिः सुन्दरोऽभवत् ॥१६०॥

अर्थ: पहले जो अनेक प्रकारके मांसको खानेवाला, दुर्गन्धित एवं घृणाका पात्र था वही अब सुवर्णकलशमें स्थित जलके समान मनोज्ञ एवं सुन्दर हो गया ॥१६०॥


क्वचिद् वह्निशिखाकारः क्वचिद् वैडूर्यसंनिभः । क्वचिच्चामीकरच्छायो हरिन्मणिरुचिः क्वचित् ॥१६१॥

अर्थ: उसका आकार कहीं तो अग्निकी शिखाके समान था, कहीं नीलमणिके सदृश था, कहीं स्वर्णके समान कान्तिसे युक्त था और कहीं हरे मणिके तुल्य था ॥१६१॥


रामलक्ष्मणयोरग्रे स्थितोऽसौ बहुचाटुकः । बुभुजे साधु संपन्नमन्नं सीतोपसाधितम् ॥१६२॥

अर्थ: राम-लक्ष्मणके आगे बैठा तथा अनेक प्रकारके मधुर शब्द कहनेवाला वह पक्षी सीताके द्वारा निर्मित उत्तम भोजन ग्रहण करता था ॥१६२॥


चन्दनेन स दिग्धाङ्गो हेमकिङ्किण्यलंकृतः । बिभ्राणः शकुनी रेजे रत्नांशुजटिलं शिरः ॥१६३॥

अर्थ: जिसका शरीर चन्दनसे लिप्त था, जो स्वर्णनिर्मित छोटी-छोटी घण्टियोंसे अलंकृत था तथा जो रत्नोंकी किरणोंसे व्याप्त शिरको धारण कर रहा था ऐसा वह पक्षी अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१६३॥


यस्मादंशुजटास्तस्य विरेजू रत्नहेमजाः । जटायुरिति तेनासावाहूतस्तैरतिप्रियः ॥१६४॥

अर्थ: यतश्च उसके शरीर पर रत्न तथा स्वर्णनिर्मित किरणरूपी जटाएँ सुशोभित हो रही थीं इसलिए राम आदि उसे ‘जटायु’ इस नामसे बुलाते थे । वह उन्हें अत्यन्त प्यारा था ॥१६४॥


जितहंसगतिं कान्तं चारुविभ्रमभूषितम् । तमन्यपक्षिणो दृष्ट्वा भयवन्तो विसिस्मियुः ॥१६५॥

अर्थ: जिसने हंसकी चालको जीत लिया था, जो स्वयं सुन्दर था और सुन्दर विलासोंसे जो युक्त था ऐसे उस जटायुको देखकर अन्य पक्षी भयभीत होते हुए आश्चर्यचकित रह जाते थे ॥१६५॥


त्रिसंध्यं सीतया साकं वन्दनामकरोदसौ । भक्तिप्रह्वो जिनेन्द्राणां सिद्धानां योगिनां तथा ॥१६६॥

अर्थ: वह भक्तिसे नम्रीभूत होकर तीनों सन्ध्याओंमें सीताके साथ अरहन्त, सिद्ध तथा निर्ग्रन्थ साधुओंको नमस्कार करता था ॥१६६॥


तत्र प्रीतिं महाप्राप्ता जानकी करुणापरा । अप्रमत्ता सदा रक्षां कुर्वन्ती धर्मवत्सला ॥१६७॥

अर्थ: धर्मसे स्नेह करनेवाली दयालु सीता बड़ी सावधानीसे उसकी रक्षा करती हुई सदा उसपर बहुत प्रेम रखती थी ॥१६७॥


आस्वादमानो निजयेच्छयासौ फलानि शुद्धान्यमृतोपमानि । जलं प्रशस्तं च पिबन्नरण्ये बभूव नित्यं सुविधिः पतत्री ॥१६८॥

अर्थ: इस प्रकार वह पक्षी अपनी इच्छानुसार शुद्ध तथा अमृतके समान स्वादिष्ट फलोंको खाता और जंगलमें उत्तम जलको पीता हुआ निरन्तर उत्तम आचरण करता था ॥१६८॥


सतालशब्दं जनकात्मजाया धर्माश्रयोच्चारितगीतिकायाम् । कृतानुगीत्यां पतिदेवराभ्यां ननर्त हृष्टो रविरुग्जटायुः ॥१६९॥

अर्थ: जब सीता तालका शब्द देती हुई धर्ममय गीतोंका उच्चारण करती थी और पति तथा देवर उसके स्वरमें स्वर मिलाकर साथ-साथ गाते थे तब सूर्यके समान कान्तिको धारण करनेवाला वह जटायु हर्षित हो नृत्य करता था ॥१६९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते जटायूपाख्यानं नामैकचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४१॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें जटायुका वर्णन करनेवाला इकतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४१॥


४२. द्विचत्वारिंशत्तमं पर्व (दण्डकारण्यनिवासाभिधानं)

पात्रदानप्रभावेण ससीतौ रामलक्ष्मणौ । इहैव रत्नहेमादि संपद्युक्तौ बभूवतुः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर पात्रदानके प्रभावसे सीता सहित राम-लक्ष्मण इसी पर्यायमें रत्न तथा सुवर्णादि सम्पत्तिसे युक्त हो गये ॥१॥


ततश्चामीकरानेकभक्तिविन्याससुन्दरम् । सुस्तम्भवेदिकागर्भगृहसंगतमुन्नतम् ॥२॥

स्थूलमुक्ताफलस्रग्भिर्विराजत्पवनायनम् । बुद्बुदादर्शलम्बूषखण्डचन्द्रादिमण्डितम् ॥३॥

शयनासनवादित्रवस्त्रगन्धादिपूरितम् । चतुर्भिर्वारणैर्युक्तं विमानप्रतिमं रथम् ॥४॥

आरूढा विचरन्त्येते प्रतिघातविवर्जिताः । जटायुसहिता रम्ये वने सत्त्ववतां नृणाम् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर जो स्वर्णमयी अनेक बेल-बूटोंके विन्याससे सुन्दर था, जो उत्तमोत्तम खम्भों, वेदिका तथा गर्भगृहसे सहित था, ऊँचा था, जिसके झरोखे बड़े-बड़े मोतियोंकी मालासे सुशोभित थे, जो छोटे-छोटे गोले, दर्पण, फन्नूस, तथा खण्डचन्द्र आदि सजावटकी सामग्रीसे अलंकृत था, शयन, आसन, वादित्र, वस्त्र तथा गन्ध आदिसे भरा था, जिसमें चार हाथी जुते थे और जो विमानके समान था ऐसे रथपर सवार होकर ये सब बिना किसी बाधाके जटायु पक्षीके साथ-साथ धैर्यशाली मनुष्योंके मनको हरण करनेवाले वनमें विचरण करते थे ॥२-५॥


क्वचिद्दिनं क्वचित् पक्षं क्वचिन्मासं मनोहरे । यथेप्सितकृतक्रीडाः प्रदेशे तेऽवतस्थिरे ॥६॥

अर्थ: वे उस मनोहर वनमें इच्छानुसार क्रीड़ा करते हुए कहीं एक दिन, कहीं एक पक्ष और कहीं एक माह ठहरते थे ॥६॥


निवासमत्र कुर्मोऽत्र कुर्म इत्यभिलाषिणः । महोक्षनवशष्पेच्छा विचेरुस्ते वनं सुखम् ॥७॥

अर्थ: ‘हम यहाँ निवास करेंगे’ ‘यहाँ ठहरेंगे’ इस प्रकार कहते हुए वे किसी बड़े बैलकी नयी घास खानेकी इच्छाके समान वनमें सुखपूर्वक विचरण करते थे ॥७॥


महानिर्झरगम्भीरान् कांश्चिदुच्चावचान् बहून् । उत्तुङ्गपादपान् देशान् जग्मुरुल्लङ्घ्य ते शनैः ॥८॥

अर्थ: जो बड़े-बड़े निर्झरोंसे गम्भीर थे तथा जिनमें ऊँचे-ऊँचे वृक्ष लग रहे थे ऐसे कितने ही ऊँचे-नीचे प्रदेशोंको पार कर वे धीरे-धीरे जा रहे थे ॥८॥


स्वेच्छया पर्यटन्तस्ते सिंहा इव मयोज्झिताः । मध्यं दण्डककक्षस्य प्रविष्टा भीरुदुःखदम् ॥९॥

विचित्रशिखरा यत्र हिमाद्रिगिरिसंनिभाः । रम्या निर्झरनद्यश्च मुक्ताहारोपमाः स्थिताः ॥१०॥

अर्थ: सिंहोंके समान निर्भय हो स्वेच्छासे घूमते हुए वे, भीरु मनुष्योंको भय देनेवाले दण्डक वनके उस मध्य भागमें प्रविष्ट हुए जहाँ हिमगिरिके समान विचित्र पर्वत थे तथा मोतियोंके हारके समान सुन्दर निर्झर और नदियाँ स्थित थीं ॥९-१०॥


अश्वत्थैस्तिन्तिडीकाभिर्बदरीभिर्बिभीतकैः । शिरीषैः कदलैर्लक्षैरक्षोटैः सरलैर्धवैः ॥११॥

कदम्बैस्तिलकैर्लोध्रैरशोकैर्नीललोहितैः । जम्बूभिः पाटलाभिश्च चूतैराम्रातकैः शुभैः ॥१२॥

चम्पकैः कर्णिकारैश्च सालैस्तालैः प्रियङ्गुभिः । सप्तपर्णैस्तमालैश्च नागैर्नन्दिभिरर्जुनैः ॥१३॥

केसरैश्चन्दनैर्नीपैर्भूर्जैर्हिङ्गुलकैर्वटैः । सितासितैरगुरुभिः कुन्दै रम्माभिरिङ्गुदैः ॥१४॥

पद्मकैर्मुचिलिन्दैश्च कुटिलैः पारिजातिकैः । बन्धूकैः केतकीभिश्च मधूकैः खदिरैस्तथा ॥१५॥

मदनैर्खदिरैर्निम्बैः खर्जूरैश्छत्रकैस्तथा । नारिङ्गैर्मातुलिङ्गीभिर्दाडिमीभिस्तथासनैः ॥१६॥

नालिकेरैः कपित्थैश्च रसैरामलकैर्वनैः । शमीहरीतकीभिश्च कोविदारैरगस्तिभिः ॥१७॥

करञ्जकुष्टकालीयैरुत्कचैरजमोदकैः । कङ्कोलस्त्वग्लवङ्गीभिर्मरिचाजातिभिस्तथा ॥१८॥

चविभिर्धातकीभिश्च कुर्षकैरतिमुक्तकैः । पूगैस्ताम्बूलवल्लीभिरेलामी रक्तचन्दनैः ॥१९॥

वेत्रैः श्यामलताभिश्च मेषशृङ्गैर्हरिद्रुभिः । पलाशैः स्पन्दनैर्बिल्वैश्चिरबिल्वैः समेथिकैः ॥२०॥

चन्दनैररडूकैश्च शाल्मलीबीजकैस्तथा । एभिरन्यैश्च भूरुहैस्तदरण्यं विराजितम् ॥२१॥

अर्थ: जहाँ-का वन, पीपल, इमली, बैरी, बहेड़े, शिरीष, केले, राल, अक्षरोट, देवदारु, धौ, कदम्ब, तिलक, लोध, अशोक, नील और लाल रंगको धारण करनेवाले जामुन, गुलाब, आम, अंवाडा, चम्पा, कनेर, सागौन, ताल, प्रियंगु, सप्तपर्ण, तमाल, नागकेशर, नन्दी, कौहा, बकौली, चन्दन, नीप, भोजपत्र, हिंगुलक, बरगद, सफेद तथा काला अगुरु, कुन्द, रम्भा, इंगुआ, पद्मक, मुचकुन्द, कुटिल, पारिजातक, दुपहरिया, केतकी, महुआ, खैर, मैनार, खदिर, नीम, खजूर, छत्रक, नारंगी, बिजौरे, अनार, असन, नारियल, कैंथा, रसोंद, आँवला, शमी, हरड, कचनार, करंज, कुष्ट, कालीय, उत्कच, अजमोद, कंकोल, दालचीनी, लौंग, मिरच, चमेली, चव्य, आँवला, कुर्षक, अतिमुक्तक, सुपारी पान, इलायची, लालचन्दन, बेंत, श्यामलता, मेढासिंगी, हरिद्रु, पलाश, तेंदू, बेल, चिरोल, मेथी चन्दन, अरडूक, सेंम, बीजसार, इनसे तथा इनके सिवाय अन्य वृक्षोंसे सुशोभित था ॥११-२१॥


सस्यैर्बहुप्रकारैश्च स्वयंभूतै रसोत्तमैः । पुण्ड्रेक्षुभिश्च विस्तीर्णाः प्रदेशास्तस्य संकुलाः ॥२२॥

अर्थ: उस वनके लम्बे-चौड़े प्रदेश स्वयं उत्पन्न हुए अनेक प्रकारके धान्यों तथा रसीले पौंडों और ईखोंसे व्याप्त थे ॥२२॥


चित्रपादपसंघातैर्नानावल्लीसमाकुलैः । अशोभत वनं वाढं द्वितीयमिव नन्दनम् ॥२३॥

अर्थ: नाना प्रकारकी लताओंसे युक्त विविध वृक्षोंके समूहसे वह वन ठीक दूसरे नन्दनवनके समान सुशोभित हो रहा था ॥२३॥


मन्दमारुतनिक्षिप्तैः पल्लवैरतिकोमलैः । ननर्तेवाटवी तोषात् पद्माद्यागमजन्मनः ॥२४॥

अर्थ: मन्द-मन्द वायुसे हिलते हुए अत्यन्त कोमल किसलयोंसे वह अटवी ऐसी जान पड़ती थी मानो राम आदिके आगमनसे उत्पन्न हर्षसे नृत्य ही कर रही हो ॥२४॥


वायुतो ह्रियमाणेन रजसाभ्युत्थितेव च । आलिलिङ्गे च सद्गन्धवाहिना नित्ययायिना ॥२५॥

अर्थ: वायुके द्वारा हरण की हुई परागसे वह अटवी ऊपर उठी हुई-सी जान पड़ती थी और उत्तम गन्धको धारण करनेवाली वायु मानो उसका आलिंगन कर रही थी ॥२५॥


अगायदिव भृङ्गाणां झङ्कारेण मनोहरम् । जहासेव सितं रम्यं शैलनिर्झरशीकरैः ॥२६॥

अर्थ: वह भ्रमरोंकी झंकारसे एसी जान पड़ती थी मानो मनोहर गान ही गा रही हो और पहाड़ी निर्झरोंके उड़ते हुए जलकणोंसे ऐसे विदित होती थी मानो शुक्ल एवं सुन्दर हास्य ही कर रही हो ॥२६॥


जीवंजीवकभेरुण्डहंससारसकोकिलाः । मयूरश्येनकुरराः शुककौशिकसारिकाः ॥२७॥

कपोतभृङ्गराजाश्च भारद्वाजादयस्तथा । अरमन्त द्विजास्तस्मिन् प्रयुक्तकलनिस्वनाः ॥२८॥

अर्थ: चकोर, भेरुण्ड, हंस, सारस, कोकिला, मयूर, बाज, कुरर, तोता, उलूक, मैना, कबूतर, भृङ्गराज, तथा भारद्वाज आदि पक्षी मनोहर शब्द करते हुए उस अटवीमें क्रीड़ा करते थे ॥२७-२८॥


कोलाहलेन रम्येण तद्वनं तेन संभ्रमि । जगाद स्वागतमिव प्राप्तकर्तव्यदक्षिणम् ॥२९॥

अर्थ: पक्षियों-के उस मधुर कोलाहलसे वह वन ऐसा जान पड़ता था मानो प्राप्त कार्यमें निपुण होनेसे संभ्रमके साथ सबका स्वागत ही कर रहा हो ॥२९॥


कुतः किं राजपुत्रीति कस्मिन्नागच्छ साध्विति । इतिकोमलभारत्या संजजल्पुरिव द्विजाः ॥३०॥

अर्थ: कलरव करते हुए पक्षी कोमल वाणीसे मानो यही कह रहे थे कि हे साध्वि ! राजपुत्रि ! तुम कहाँसे आ रही हो और कहाँ आयी हो ॥३०॥


सितासितारुणाम्भोजसंछन्नैरतिनिर्मलैः । सरोभिर्वीक्षितुमिव प्रवृत्तं सुकुतूहलात् ॥३१॥

अर्थ: सफ़ेद, नीले तथा लाल कमलोंसे व्याप्त अतिशय निर्मल सरोवरोंसे वह वन ऐसा जान पड़ता था मानो कुतूहल-वश देखनेके लिए उद्यत ही हुआ हो ॥३१॥


फलभारनतैरग्रैर्ननामेव महादरम् । मुमोचानन्दनिश्वासमिव सद्गन्धवायुना ॥३२॥

अर्थ: फलोंके भारसे झुके हुए अग्र भागोंसे वह वन ऐसा जान पड़ता था मानो बड़े आदरसे राम आदिको नमस्कार ही कर रहा हो और सुगन्धित वायुसे ऐसा सुशोभित होता था मानो आनन्दके श्वासोच्छ्वास ही छोड़ रहा हो ॥३२॥


ततः सौमनसाकारं वनं तद्वीक्ष्य राघवः । जगाद विकचाम्भोजलोचनां जनकात्मजाम् ॥३३॥

वल्लीभिर्गुल्मकैः स्तम्बैः समासन्नैरमी नगाः । सकुटुम्बा इवाभान्ति प्रिये यच्छात्र लोचने ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर सौमनस वनके समान सुन्दर वनको देख-देखकर रामने विकसित कमलके समान खिले हुए नेत्रोंको धारण करनेवाली सीतासे कहा कि हे प्रिये ! इधर देखो, ये वृक्ष लताओं तथा निकटवर्ती गुल्मों और झाड़ियोंसे ऐसे जान पड़ते हैं मानो कुटुम्ब सहित ही हों ॥३३-३४॥


प्रियङ्गुलतिकां पश्य संगतां वकुलोरसि । कान्तस्येव वरारोहा शङ्के निर्भरसौहृदम् ॥३५॥

अर्थ: वकुल वृक्षके वक्षस्थलसे लिपटी हुई इस प्रियंगु लताको देखो । यह ऐसी जान पड़ती है मानो पतिके वक्षःस्थलसे लिपटी प्रेम भरी सुन्दरी ही हो ॥३५॥


चलता पल्लवेनेयं संप्रत्यग्रेण माधवी । परामृशति सौहार्दादिव चूतमनुत्तरात् ॥३६॥

अर्थ: यह माधवीलता हिलते हुए पल्लवसे मानो सौहार्दके कारण ही आमका स्पर्श कर रही है ॥३६॥


अयं मदालसेक्षणः करी करेणुचोदितः । मधुकरविघटितदलनिचयः प्रविशति सीते कमलवनम् ॥३७॥

अर्थ: हे सीते ! जिसके नेत्र मदसे आलस हैं, हस्तिनी जिसे प्रेरणा दे रही है और जिसने कलिकाओंके समूहको भ्रमरोंसे रहित कर दिया है ऐसा यह हाथी कमल वनमें प्रवेश कर रहा है ॥३७॥


वहन्नसौ दर्पमुदारमुच्चैर्वल्मीकशृङ्गं गवलीसुनीलः । लीलान्वितो वज्रसमेन घोरं भिन्ते विषाणेन लसत्खुराग्रः ॥३८॥

अर्थ: जो अत्यधिक गर्वको धारण कर रहा है, जो लीलासे सहित है, तथा जिसके खुरोंके अग्रभाग सुशोभित हैं ऐसा यह अत्यन्त नील भैंसा वज्रके समान सींगके द्वारा वामीके उच्च शिखरको भेद रहा है ॥३८॥


अमुमिन्द्रनीलवर्णं विवरान्निर्यातदूरतनुभागम् । पश्य मयूरं दृष्ट्वा प्रविशन्तमहिं भयाकुलितम् ॥३९॥

अर्थ: इधर देखो, इस साँपके शरीरका बहुत कुछ भाग बिलसे बाहर निकल आया था फिर भी यह सामने इन्द्रनील मणिके समान नीलवर्णवाले मयूरको देखकर भयभीत हो फिरसे उसी बिलमें प्रवेश कर रहा है ॥३९॥


पश्यामुष्य महानुभावचरितं सिंहस्य सिंहेक्षणे रम्येऽस्मिन्नचले गुहामुखगतस्याराद्विकासिद्युते । यः श्रुत्वा रथनादमुन्नतमना निद्रां विहाय क्षणं वीक्ष्यापाङ्गदृशा विजृम्भ्य शनकैर्भूयस्तथैव स्थितः ॥४०॥

अर्थ: हे सिंहके समान नेत्रोंको धारण करनेवाली तथा फैलती हुई कान्तिसे युक्त प्रिये ! इस मनोहर पर्वतपर गुहाके अग्रभागमें स्थित सिंहकी उदात्त चेष्टाको देखो जो इतना दृढ चित्त है कि रथका शब्द सुनकर क्षण भरके लिए निद्रा छोड़ता है और कटाक्षसे उसकी ओर देखकर तथा धीरेसे जमुहाई लेकर फिर भी उसी तरह निर्भय बैठा है ॥४०॥


नानामृगक्षतजपानसुरक्तवक्त्रो दर्पोद्धुरः कपिलनेत्रमरीचिवक्त्रः । मूर्धोपनीतलसदुज्ज्वलवालपुच्छो व्याघ्रो नखैः खनति पादपमेष मूले ॥४१॥

अर्थ: इधर नाना मृगोंका रुधिर पान करनेसे जिसका मुख अत्यन्त लाल हो रहा है, जो अहंकारसे फूल रहा है, जिसका मुख नेत्रोंकी पीली-पीली कान्तिसे युक्त है, तथा चमकीले बालोंसे युक्त जिसकी पूँछ पीछेसे घूमकर मस्तकके समीप आ पहुँची है ऐसा यह व्याघ्र नाखूनोंके द्वारा वृक्षके मूलभागको खोद रहा है ॥४१॥


अन्तः कृत्वा शिशुगणमिमे कामिनीभिः समेतं दूरन्यस्तप्रचलनयना भूरिशः सावधानाः । किंचिद्दूर्वाग्रहणचतुराः प्रान्तयाताः कुरङ्गाः पश्यन्ति त्वां विपुलनयनालम्बिनः कौतुकेन ॥४२॥

अर्थ: जिन्होंने स्त्रियोंके साथ-साथ अपने बच्चोंके समूहको बीचमें कर रखा है, जिनके चंचल नेत्र बहुत दूर तक पड़ रहे हैं, जो अत्यधिक सावधान हैं, जो कुछ-कुछ दूर्वाके ग्रहण करनेमें चतुर हैं और कौतुक वश जिनके नेत्र अत्यन्त विशाल हो गये हैं ऐसे ये हरिण समीपमें आकर तुम्हें देख रहे हैं ॥४२॥


सुन्दरि पश्य वराहं दंष्ट्रान्तरलग्नमुस्तमुन्नतसत्त्वम् । अभिनवगृहीतपङ्कं गच्छन्तं मन्थरं सघोणम् ॥४३॥

अर्थ: हे सुन्दरि ! धीरे-धीरे जाते हुए उस वराह को देखो, जिसकी दाँढोंमें मोथा लग रहा है, जिसका बल अत्यन्त उन्नत है, जिसने अभी हाल नयी कीचड़ अपने शरीरमें लगा रखी है, तथा जिसकी नाक बहुत लम्बी है ॥४३॥


अयं प्रयत्नादिव चित्रिताङ्गको विनातिवर्णैर्बहुभिः सुलोचने । प्रजल्पतिक्रीडनमर्भकैः समं वनैकदेशे तृणभाजि चित्रकः ॥४४॥

अर्थ: हे सुलोचने ! प्रयत्नके बिना ही जिसका शरीर नाना प्रकारके वर्णोंसे चित्रित हो रहा है ऐसा यह चीता इस तृणबहुल वनके एकदेशमें अपने बच्चोंके साथ अत्यधिक क्रीड़ा कर रहा है ॥४४॥


श्येनयुवैष लघुभ्रमपक्षो दूरत एव निरूप्य समन्तात् । स्वापमितस्य परं शरभस्य स्तेनयति द्रुतमामिषमास्यात् ॥४५॥

अर्थ: इधर जिसके पंख जल्दी घूम रहे हैं ऐसा यह तरुण बाज-पक्षी दूरसे ही सब ओर देखकर सोते हुए शरभके मुखसे बड़ी शीघ्रताके साथ मांसको छीन रहा है ॥४५॥


कमलजालकराजितमस्तकः ककुदमुन्नतमाचलितं वहन् । अयमुदात्तरवोऽत्र विराजते सुरभिपुत्रपतिर्वरविभ्रमः ॥४६॥

अर्थ: इधर जिसका मस्तक कमल जैसी आवर्तसे सुशोभित है; जो कुछ-कुछ हिलती हुई ऊँची काँदौरको धारण कर रहा है, जो विशाल शब्द कर रहा है तथा जो उत्तम विभ्रमसे सहित है ऐसा यह बैल सुशोभित हो रहा है ॥४६॥


क्वचिदिदमतिघनवरनगकलितं क्वचिदणुबहुविधतृणपरिनिचितम् । क्वचिदपगतभयमृगपुरुपटलं क्वचिदतिमययुतरुरुदितगहनम् ॥४७॥

अर्थ: कहीं तो यह वन उत्तमोत्तम सघन वृक्षोंसे युक्त है, कहीं छोटे-छोटे अनेक प्रकारके तृणोंसे व्याप्त है, कहीं निर्भय मृगोंके बड़े-बड़े झुण्डोंसे सहित है, कहीं अत्यन्त भयभीत कृष्णमृगोंके लिए सघन झाड़ियोंसे युक्त है ॥४७॥


क्वचिदुरुमदगजपातितवृक्षं क्वचिदभिनवतरुजालकयुक्तम् । क्वचिदलिकुलकलझंकृतरम्यं क्वचिदतिखररवसंभृतकक्षम् ॥४८॥

अर्थ: कहीं अतिशय मदोन्मत्त हाथियोंके द्वारा गिराये हुए वृक्षोंसे सहित है, कहीं नवीन वृक्षोंके समूहसे युक्त है, कहीं भ्रमर-समूहकी मनोहारी झंकारसे सुन्दर है, कहीं अत्यन्त तीक्ष्ण शब्दोंसे भरा हुआ है ॥४८॥


क्वचिद्विभ्रान्तसत्त्वकं क्वचिद्विश्रब्धसत्त्वकम् । क्वचिन्निरम्बुगह्वरं क्वचिद्विस्रस्तगह्वरम् ॥४९॥

अर्थ: कहीं प्राणी भयसे इधर-उधर घूम रहे हैं, कहीं निश्चिन्त बैठे हैं, कहीं गुफाएँ जलसे रहित हैं, कहीं गुफाओंसे जल बह रहा है ॥४९॥


अरुणं धवलं कपिलं हरितं बलितं निभृतं सरवं विरवम् । विरलं गहनं सुभगं विरसं, तरुणं पृथुकं विषमं सुसमम् ॥५०॥

अर्थ: कहीं यह वन लाल है, कहीं सफेद है, कहीं पीला है, कहीं हरा है, कहीं मोड़ लिये हुए है, कहीं निश्चल है, कहीं शब्दसहित है, कहीं शब्दरहित है, कहीं विरल है, कहीं सघन है, कहीं नीरस - शुष्क है, कहीं तरुण - हराभरा है, कहीं विशाल है, कहीं विषम है, और कहीं अत्यन्त सम है ॥५०॥


इदं तद्दण्डकारण्यं प्रसिद्धं दयिते वनम् । पश्यानेकविधं कर्मप्रपञ्चमिव जानकि ॥५१॥

अर्थ: हे प्रिये जानकि ! देखो यह प्रसिद्ध दण्डकवन कर्मोंके प्रपंचके समान अनेक प्रकारका हो रहा है ॥५१॥


नगोऽयं दण्डको नाम श्रृङ्गालीढाम्बराङ्गणः । सुवक्त्रे यस्य नाम्नेदं दण्डकारण्यमुच्यते ॥५२॥

अर्थ: हे सुमुखि ! शिखरोंके समूहसे आकाशरूपी आँगनको व्याप्त करनेवाला यह दण्डक नामका पर्वत है जिसके नामसे ही यह वन दण्डक वन कहलाता है ॥५२॥


तुङ्गया शिखरेष्वस्य प्रभया धातुजन्मना । रक्तया पुष्पचयेव प्रावृतं भाति पुष्करम् ॥५३॥

अर्थ: इस पर्वतके शिखरपर गेरू आदि आदि धातुओंसे उत्पन्न हो ऊँची उठनेवाली लाल-लाल कान्तिसे आच्छादित हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता है मानो लाल फूलोंके समूहसे ही व्याप्त हो रहा हो ॥५३॥


अस्य गह्वरदेशेषु पश्यौषधिमहाशिखाः । निर्वातस्थप्रदीपाभा दूरध्वस्ततमश्चयाः ॥५४॥

अर्थ: इधर इस पर्वतकी गुफाओंमें दूरसे ही अन्धकारके समूहको नष्ट करनेवाली देदीप्यमान औषधियोंकी बड़ी-बड़ी शिखाएँ वायुरहित स्थानमें स्थित दीपकोंके समान जान पड़ती हैं ॥५४॥


अस्मिन्नुच्चैर्निर्झराः संपतन्तस्तारारावा ग्रावसङ्घातसक्ताः । मुक्ताकारान् सीकरानुत्सृजन्तो राजन्त्येते स्पष्टभासानुकाराः ॥५५॥

अर्थ: इधर पाषाण-खण्डोंके बीच अत्यधिक शब्दके साथ बहुत ऊँचेसे पड़नेवाले ये झरने मोतियोंके समान जलकणोंको छोड़ते हुए सूर्यकी किरणोंके साथ मिलकर सुशोभित हो रहे हैं ॥५५॥


विद्युन्मालावृत्तम् अस्योद्देशाः शुभ्राः केचित् केचिन्नीला रक्ताः केचित् । दृश्यन्तेऽमी वृक्षैर्व्याप्ता प्रान्ते कान्तेऽत्यन्तं कान्ताः ॥५६॥

अर्थ: हे कान्ते ! इस पर्वतके कितने ही प्रदेश सफ़ेद हैं, कितने ही नील हैं, कितने ही लाल हैं, और कितने ही वृक्षावलीसे व्याप्त होकर अत्यन्त सुन्दर दिखाई देने हैं ॥५६॥


प्रमाणिकाछन्दः अमी समीरणेरिते वरोष्ठि वृक्षमस्तके । विभान्ति गह्वरे लवा रवेः कराः क्वचित् क्वचित् ॥५७॥

अर्थ: हे वरोष्ठि ! सघनवनमें वायुसे हिलते हुए वृक्षोंके अग्रभाग पर कहीं-कहीं सूर्यकी किरणें ऐसी सुशोभित होती हैं मानो उसके खण्ड ही हों ॥५७॥


रुचिरावृत्तम् अयं क्वचित् फलभरनम्रपादपः क्वचित् स्थितैः कुसुमपटैरलंकृतः । क्वचित् खगैः कलरवकारिभिश्चितो विभात्यलं वरमुखि दण्डको गिरिः ॥५८॥

अर्थ: हे सुमुखि ! जो कहीं तो फलोंके भारसे झुके हुए वृक्षोंके समूहसे युक्त है; कहीं पड़े हुए पुष्प रूपी वस्त्रोंसे सुशोभित है, और कहीं कलरव करनेवाले पक्षियोंसे व्याप्त है ऐसा यह दण्डक वन अत्यधिक सुशोभित हो रहा है ॥५८॥


कोकिलकच्छन्दः इह चमरीगणोऽयमतिदुष्टमृगोपगतः प्रियतरवालिधिः प्रियतमैरनुयातपथः । अनतिविसृष्टमन्दगतिरिन्दुरुचिः पुरुषं प्रविशति गह्वरं न पृथुकाहितचञ्चलदृक् ॥५९॥

अर्थ: इधर, जिसे अपनी पूँछ अधिक प्यारी है, जिसके वल्लभ पीछे-पीछे दौड़े चले आ रहे हैं, जो चन्द्रमाके समान सफेद कान्तिका धारक है, और जो अपने बच्चोंपर चंचल दृष्टि डाल रहा है ऐसा यह चमरीमृगोंका समूह दुष्ट जीवोंके द्वारा उपद्रुत होनेपर भी अपनी मन्दगतिको नहीं छोड़ रहा है तथा बाल टूट जानेके भयसे कठोर एवं सघन झाड़ीमें प्रवेश नहीं कर रहा है ॥५९॥


स्रग्धरावृत्तम् एषा नीला शिला स्यात्तिमिरमुपचितं कन्दराणां मुखेषु स्यादेतत् किं विहायःस्फटिकमणिशिला किन्तु वृक्षान्तरस्था । एष स्याद् गण्डशैलः किमुत गजपतिः सेवते गाढनिद्रां कान्ते क्षोणीधरेऽस्मिन्नतिसदृशतया दुर्गमा भूविभागाः ॥६०॥

अर्थ: हे कान्ते ! इधर इस पर्वतकी गुफाओंके आगे यह क्या नील शिला रखी है ? अथवा अन्धकारका समूह व्याप्त है ? इधर यह वृक्षोंके मध्यमें आकाश स्थित है अथवा स्फटिक मणिकी शिला विद्यमान है ? और इधर यह काली चट्टान है या कोई बड़ा हाथी गाढ़ निद्राका सेवन कर रहा है इस तरह अत्यन्त सादृश्य-के कारण इस पर्वतके भूभागों पर चलना कठिन जान पड़ता है ॥६०॥


एषा क्रौञ्चरवा नाम नदी जगति विश्रुता । जलं यस्याः प्रिये वीध्रं त्वदीयमिव चेष्टितम् ॥६१॥

अर्थ: हे प्रिये । यह वह क्रौंचरवा नामकी जगत्-प्रसिद्ध नदी है कि जिसका जल तुम्हारी चेष्टाके समान अत्यन्त उज्ज्वल है ॥६१॥


अश्वललितच्छन्दः मृदुमरुदीरभङ्गुरमलं तटस्थतरुपुष्पसंहितधरम् । मवशयनीयरूपसुभगं सुकेशि जलमत्र राजतितराम् ॥६२॥

अर्थ: हे सुकेशि ! जो मन्द-मन्द वायुसे प्रेरित होकर लहरा रहा है, जो तटपर स्थित वृक्षोंके पुष्प- समूहको धारण कर रहा है और जो कैलासके समान शुक्लरूपसे सुन्दर है ऐसा इस नदीका जल अत्यन्त सुशोभित हो रहा है ॥६२॥


हंसकुलामफेनपटलप्रभिन्नबहुपुष्पपुञ्जकलितम् । भृङ्गनिनादपूरितवना क्वचिद् विकटसंकटोपलचयैः ॥६३॥

अर्थ: यह जल कहीं तो हंस समूहके समान उज्ज्वल फेन समूहसे युक्त है, कहीं टूट-टूटकर गिरे हुए फूलोंके समूहसे सहित है, कहीं भ्रमरोंके समूहसे इसका कमल वन पूरित है और कहीं यह बड़े-बड़े सघन पाषाणोंके समूहसे उपलक्षित है ॥६३॥


ग्राहसहस्रचारविषमा क्वचिच्च पुरुवेदसंगतजला । घोरतपस्विचेष्टिसमा क्वचिच्च वहति प्रशान्तगुरियम् ॥६४॥

अर्थ: यह नदी कहीं तो हजारों मगरमच्छोंके संचारसे विषम है, कहीं इसका जल अत्यन्त वेगसे सहित है और कहीं यह घोर तपस्वी-साधुओंकी चेष्टाके समान अत्यन्त प्रशान्त भावसे बहती है ॥६४॥


परमशितिशिलौघरश्मिभिन्नं क्वचिदनुलग्नसितोपलांशुयुक्तम् । जलमिह सितदन्ति भाति वाढं हरिहरयोरिव संगतं शरीरम् ॥६५॥

अर्थ: हे शुक्ल दाँतों-को धारण करनेवाली सीते ! इस नदीका जल एक ओर तो अत्यन्त नील शिला समूहकी किरणोंसे मिश्रित होकर नीला हो रहा है तो दूसरी ओर समीपमें स्थित सफेद पाषाणखण्डोंकी किरणोंसे मिलकर सफेद हो रहा है। इस तरह यह परस्पर मिले हुए हरिहर-नारायण और महादेवके शरीरके समान अत्यन्त सशोभित हो रहा है ॥६५॥


रक्तशिलौघरश्मिनिचिता क्वचिदियममला भाति समुद्यदर्कसमये दिगिव सुरपतेः । भिन्नजला क्वचिच्च हरितैरुपलकरचयैः शैवलशङ्कयागमकृतो विरसयति खगान् ॥६६॥

अर्थ: लाल-लाल शिलाखण्डोंकी किरणोंसे व्याप्त यह निर्मल नदी, कहीं तो सूर्योदयकालीन पूर्व दिशाके समान सुशोभित हो रही है और कहीं हरे रंगके पाषाण-खण्डकी किरणोंके समूहसे जलके मिश्रित होनेसे शेवालकी शंकासे आनेवाले पक्षियोंको विरस कर रही है ॥६६॥


कमलनिकरेष्वत्र स्वेच्छंकृतातिकलस्वनं निभृतपवनासंगात् कम्पेष्वभीक्ष्णकृतभ्रमम् । परमसुरभेर्गन्धाद् वक्त्रात्तवेव समुद्गतान् मधुकपटलं कान्ते क्षीवं विभाति रजोरुणम् ॥६७॥

अर्थ: हे कान्ते ! इधर निरन्तर चलनेवाली वायुके संगसे हिलते हुए कमल-समूहपर जो इच्छानुसार अत्यन्त मधुर शब्द कर रहा है, निरन्तर भ्रमण कर रहा है और उसकी परागसे जो लाल वर्ण हो रहा है ऐसा भ्रमरोंका समूह तुम्हारे मुखसे निकली सुगन्धिके समान उत्कृष्ट सुगन्धिसे उन्मत्त हुआ अत्यधिक सुशोभित हो रहा है ॥६७॥


विषिक्तं पाताले क्वचिदिह जलं मुक्तवहनं परं गम्भीरत्वं वहति दयिते ते मन इव । क्वचिन्नीलाम्भोजैरनतिचलितैः षट्पदचितैर्विमर्त्यक्षिच्छायां प्रवरवनितालोकनभवाम् ॥६८॥

अर्थ: हे दयिते ! जो अतिशय स्वच्छ है तथा बहाव छोड़कर पाताल तक भरा है ऐसा इस नदीका जल कहीं तो तुम्हारे मनके समान परम गाम्भीर्यको धारण कर रहा है और कहीं भ्रमरोंसे व्याप्त तथा कुछ-कुछ हिलते हुए नील कमलोंसे उत्तम स्त्रीके देखनेसे समुत्पन्न नेत्रोंकी शोभा धारण कर रहा है ॥६८॥


अत्र विभाति व्योमगवृन्दं बहुविधजलभववनकृतचरणम् ।
प्रेमनिबद्धं तारविरावं क्वचिदतिमदवशपरिचितकलहम् ॥६९॥

अर्थ: इधर कहीं जो नाना प्रकारके कमलवनोंमें विचरण कर रहा है, प्रेमसे युक्त है, उच्च शब्द कर रहा है और तीव्र मदसे विवश हो जो परस्पर कलह कर रहा है ऐसा पक्षियोंका समूह सुशोभित हो रहा है ॥६९॥


सैकतमस्या राजति चेदं सवनितखगकुलकृतपदपदवि ।
त्वज्जघनस्य प्राप्तसुसमत्वं गतघनसुरपथशशधरवदने ॥७०॥

अर्थ: मेघरहित आकाशमें विद्यमान चन्द्रमाके समान उज्ज्वल मुखको धारण करनेवाली हे प्रिये ! इधर जिसपर स्त्रियों सहित क्रीड़ा करनेवाले पक्षियोंके समूहने अपने चरण-चिह्न बना रखे हैं ऐसा इस नदीका यह बालुमय तट तुम्हारे नितम्बस्थलकी सदृशता धारण कर रहा है ॥७०॥


एषा यातानेकविलासाकुलिताम्बुस्तोयाधीशं वीचिवरभ्रूरतिकान्ता ।
तद्वच्चारुस्फीतगुणौघं शुभचेष्टं विष्टपसुन्दरमुत्तमशीला भरतेशम् ॥७१॥

अर्थ: जिस प्रकार अनेक उत्तम विलासों - हावभावरूप चेष्टाओंसे सहित तरंगके समान उत्तम भौंहोंसे युक्त एवं उत्तम शीलको धारण करनेवाली सुभद्रा सुन्दर एवं विस्तत गुणसमूहसे युक्त, शुभ चेष्टाओंके धारक तथा संसारमें सर्वसुन्दर भरत चक्रवर्तीको प्राप्त हुई थी उसी प्रकार अनेक विलासों - पक्षियोंके संचारसे युक्त जलको धारण करनेवाली, भौंहोंके समान उत्तम तरंगोंसे युक्त, अतिशय मनोहर यह नदी, अत्यन्त सुन्दर तथा विस्तृत गुणसमूहसे सहित शुभ चेष्टासे युक्त एवं जगत्सुन्दर लवणसमुद्रको प्राप्त हुई है ॥७१॥


इमे प्रिये फलकुसुमैरलंकृतास्तटीरुहो विविधविहङ्गसंकुलाः ।
निरन्तराः सजलघनौघसंनिभाः इमामिता रतिमिव कर्तुमावयोः ॥७२॥

अर्थ: हे प्रिये ! जो फल और फूलोंसे अलंकृत हैं, नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्त हैं, निरन्तर हैं तथा जलसे भरे मेघ-समूहके समान जान पड़ते हैं ऐसे ये किनारेके वृक्ष हम दोनोंको प्रीति उत्पन्न करनेके लिए ही मानो इस नदीकूलमें प्राप्त हुए हैं ॥७२॥


इति निगदति राघवोत्तमे परमविचित्रपदार्थसंगतम् ।
प्रमदभरवशंगता सती जनकसुता निजगाद सादरम् ॥७३॥

अर्थ: इस प्रकार जब रामने अत्यन्त विचित्र शब्द तथा अर्थसे सहित वचन कहे तब हर्षित होती हुई सीताने आदरपूर्वक कहा ॥७३॥


नद्येषा विमलजला तरङ्गरम्या हंसाद्यैः खगनिवहैः कृताभिलापाः ।
एतस्यां प्रियतम ते मनोगतं चेत्तोयेऽस्याः किमिति रतिक्षणं न कुर्मः ॥७४॥

अर्थ: कि हे प्रियतम ! यह नदी विमल जलसे भरी है, लहरोंसे रमणीय है, हंसादि पक्षियोंके समूह इसमें इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे हैं और आपका मन भी इसमें लग रहा है तो इसके जलमें हम लोग भी क्यों नहीं क्षण-भर क्रीड़ा करें ॥७४॥


अथ राजसुतासमीरितं तद्वाक्यं राघवगोत्रचन्द्रमाः ।
अनुजानुगतोऽभिनन्दनात् भेजे रम्यभुवं रथालयात् ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर छोटे भाई लक्ष्मणके साथ-साथ रामने सीताके वचनोंका समर्थन किया और सब रथरूपी घरसे उतरकर मनोहर भूमिपर आये ॥७५॥


पूर्वं चक्रे लक्ष्मीनाथः स्नपनमभिनवधृतगजपतिवनपथपरिचितश्रमप्रतिनोदनम् ।
तस्मादूर्ध्वं नानास्वादप्रवरकिसलयकुसुमसमुच्चयमुचितां च परिक्रियाम् ॥७६॥

अर्थ: सर्वप्रथम लक्ष्मणने नवीन पकड़े हुए हाथी-को जंगली मार्गोंके बीच चलनेसे उत्पन्न हुई थकावटको दूर करनेवाला स्नान कराया। उसके बाद उसे नाना प्रकारके स्वादिष्ट उत्तमोत्तम कोमल पत्ते और फूलोंका समूह इकट्ठा किया तथा उसकी योग्य परिचर्या की ॥७६॥


पश्चात् स्रोतः संसक्ताग्रद्रुमनिवहपरिचलनकरणवरसहितमतुलं विचेष्टितमीप्सितम् ।
रामेणामा स्नातुं सक्तो विविधजलविहितिविषयपरमविधिसमुपचितं गुणाकरमानसः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका मन नाना प्रकारके गुणोंकी खान था ऐसे लक्ष्मणने रामके साथ-साथ नदीमें स्नान करना प्रारम्भ किया। वे कभी जलके प्रवाहमें आगे बढ़े हुए वृक्षोंके समूहपर चढ़कर जलमें कूदते थे, कभी अनुपम चेष्टाएँ करते थे और कभी नाना प्रकारकी जलक्रीड़ा सम्बन्धी उत्तमोत्तम विधियोंका प्रयोग करते थे ॥७७॥


सफेनवलया लसत्प्रकटवीचिमालाकुला विमर्दितसितासितारुणपयोजपत्राचिता ।
समुद्गतकलस्वनातिरहसंगमासेविता समं रघुकुलेन्दुना रतिमिवाकरोदापगा ॥७८॥

अर्थ: जो फेनके वलय अर्थात् समूह अथवा फेनरूपी चूड़ियोंसे सहित थी, जो प्रकट उठती हुई तरंगरूपी मालाओंसे युक्त थी, जो मसले हुए सफेद-नीले और लाल कमलपत्रोंसे व्याप्त थी, जिसमें मधुर शब्द उत्पन्न हो रहा था और जो एकान्त समागमसे सेवित थी ऐसी वह नदीरूपी स्त्री ऐसी जान पड़ती थी मानो रघुकुलके चन्द्र - रामचन्द्रके साथ उपभोग ही कर रही हो ॥७८॥


विनिमज्ज्य सुदूरयायिना बिसिनीखण्डतिरोहितात्मना ।
पुनराशुसमागमाश्रिता रघुपुत्रेण रता नृपात्मजा ॥७९॥

अर्थ: रामचन्द्रजी पानीमें गोता मार बहुत दूर लम्बे जाकर कमल वनमें छिप गये तदनन्तर पता चलनेपर शीघ्र ही सीता उनके पास जाकर क्रीड़ा करने लगी ॥७९॥


मुक्त्वा नानाकृत्यासंगं कुसुमवनचरणजरजोविराजिगरुद्भृतम् ।
गत्वा क्षिप्रं तीरोद्देशं त्वरितकृतविविधरसिताः पुरोगतयोषितः ॥८०॥

तेषां द्रष्टुं सक्ताः श्रेष्ठामपरविषयगमनरहितं विधाय मनो भृशम् ।
तिर्यञ्चोऽपि ह्येते रम्यं परुषकृतिरहितमनसां विदन्ति समीहितम् ॥८१॥

अर्थ: पहले जो हंसादि पक्षी अपनी स्त्रियोंके साथ जलमें क्रीड़ा कर रहे थे और कमलोंके वनमें विचरण करनेसे उत्पन्न परागसे जिनके पंख सुशोभित हो रहे थे वे अब शीघ्र ही किनारोंपर आकर नाना प्रकारके मधुर शब्द करने लगे तथा नाना कार्यों की आसक्ति छोड़कर तथा मनको विषयान्तरसे रहित कर राम-लक्ष्मण-सीताकी श्रेष्ठ जलक्रीड़ा देखने लगे, सो ठीक ही है क्योंकि ये तिर्यंच भी कोमल चित्तके धारक मनुष्योंकी मनोहर चेष्टाको समझते हैं - जानते हैं ॥८०-८१॥


अतिमधुररवं कराभिघातैर्मरुजरवादपि सुन्दरं विचित्रम् । अनुगतदयितो रघुप्रधानः सलिलमवादयदन्वितं सुगीत्या ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर रामने सीताके साथ-साथ उत्तम गीत गाते हुए हथेलियोंके आघातसे जलका बाजा बजाया । उस जलवाद्यका शब्द मृदंगके शब्दसे भी अधिक मधुर, सुन्दर और विचित्र था ॥८२॥


परितोऽकरोद्भ्रमणमस्य जलरमणसक्तचेतसोदारचतुरकरणेऽनुगतक्रियस्य हलहेतेर्लक्ष्मणः । अतिवेगवान् पुनरपेतजवनिपुणचारतत्परो भ्रातृगुणनिरतधीः परमं समुद्ररवचापलक्षितः ॥८३॥

अर्थ: उस समय रामका चित्त जलक्रीड़ामें आसक्त था तथा वे स्वयं नाना प्रकारकी उत्तम चतुर चेष्टाओंके करनेमें तत्पर थे । भाईके स्नेहसे भरे एवं समुद्रघोष धनुषसे सहित लक्ष्मण उनके चारों ओर चक्कर लगा रहे थे । यद्यपि लक्ष्मण अत्यन्त वेगसे युक्त थे तो भी उस समय वेगको दूर कर सुन्दर चालके चलनेमें तत्पर थे ॥८३॥


इति सुविमललीलः स्वेच्छयाम्भोविहारं प्रमदमुपनयन्तं तीरभाजां मृगाणाम् ।
रघुपतिरनुभूय भ्रातृदारानुयातो गजपतिरिव तीरं सेवितुं संप्रवृत्तः ॥८४॥

अर्थ: इस प्रकार उज्ज्वल लीलाको धारण करनेवाले राम भाई और स्त्रीके साथ, तटपर स्थित मृगोंको हर्ष उपजानेवाली जलक्रीड़ा इच्छानुसार कर गजराजके समान किनारेपर आनेके लिए उद्यत हुए ॥८४॥


शरीरयातं च विधाय वर्तनं महाप्रशस्तैर्वनजन्मवस्तुभिः । स्थिता लतामण्डपरुद्धभास्करे सुरा इवामी कृतचित्रसंकथाः ॥८५॥

अर्थ: स्नानके बाद वनमें उत्पन्न हुई अतिशय श्रेष्ठ वस्तुओंके द्वारा शरीरवृत्ति अर्थात् भोजन कर वे अनेक प्रकारकी कथाएँ करते हुए जहाँ लताओंके मण्डपसे सूर्यका संचार रुक गया था ऐसे दण्डक वनमें देवोंके समान आनन्दसे बैठ गये ॥८५॥


सीतापतिस्ततोऽवोचदिति विश्रब्धमानसः । जटायुमूर्धकरया सीतयाऽलंकृतान्तिकः ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर जटायुके मस्तकपर हाथ रखे हुई सीता जिनके पास बैठी थी ऐसे राम निश्चिन्त चित्त हो इस प्रकार बोले ॥८६॥


सन्त्यस्मिन् विविधा भ्रातर्द्रुमाः स्वादुफलान्विताः । सरितः स्वच्छतोयाश्च मण्डपाश्च लतात्मकाः ॥८७॥

अर्थ: कि हे भाई ! यहाँ स्वादिष्ट फलोंसे युक्त नाना प्रकारके वृक्ष हैं, स्वच्छ जलसे भरी नदियाँ हैं और लताओंसे निर्मित नाना मण्डप हैं ॥८७॥


अनेकरत्नसंपूर्णो दण्डकोऽयं महागिरिः । प्रदेशैर्विविधैर्युक्तः परक्रीडनकोचितैः ॥८८॥

अर्थ: यह दण्डक नामका महापर्वत अनेक रत्नोंसे परिपूर्ण तथा उत्तम क्रीड़ाके योग्य नाना प्रदेशोंसे युक्त है ॥८८॥


उपकण्ठेऽस्य नगरं विदध्मः सुमनोहरम् । नैजिकीर्वनसंभूता गृह्णीमो महिषीस्तथा ॥८९॥

अर्थ: हम लोग इस पर्वतके समीप अत्यन्त मनोहर नगर बनायें और वनमें उत्पन्न हुई पोषण करनेवाली अनेक भैंसें रख लें ॥८९॥


अस्मिन्नगोचरेऽन्येषामरण्येऽत्यन्तसुन्दरे । विषयावासनं कुर्मः परमा धृतिरत्र मे ॥९०॥

अर्थ: जहाँ दूसरोंका आना कठिन है ऐसे इस अत्यन्त सुन्दर वनमें हम लोग देश बसायें क्योंकि यहाँ मुझे बड़ा सन्तोष हो रहा है ॥९०॥


स्वस्मिन्निहितचेतस्के नूनं शोकवशीकृते । स्वहितैः स्वजनैः सर्वैः परिवर्गसमन्वितैः ॥९१॥

व्रजानय जनन्यौ नौ त्वरितं न न नाथवा । तिष्ठ सुन्दर नैवं मे मानसं शुद्धिमश्नुते ॥९२॥

अर्थ: जिनका चित्त हम लोगोंमें लग रहा है और जो निरन्तर शोकके वशीभूत रहती हैं ऐसी अपनी माताओंको, अपना हित करनेवाले समस्त परिकर एवं परिवारके साथ, जाओ शीघ्र ही ले आओ अथवा नहीं-नहीं ठहरो, यह ठीक नहीं है इसमें मेरा मन शुद्धताको प्राप्त नहीं हो रहा है ॥९१-९२॥


स्वयमेव गमिष्यामि शरत्समयसंगमे । प्रतिजाग्रद्भवान् सीतामिह स्थास्यति यत्नवान् ॥९३॥

अर्थ: ऋतु आनेपर मैं स्वयं जाऊँगा, तुम सीताके प्रति सावधान रहकर यत्न सहित यहीं ठहरना ॥९३॥


ततो लक्ष्मीधरे नम्रे प्रस्थितेऽवस्थिते तथा । प्रेमार्द्रीकृतचेतस्कः पुनः पद्मो जगाविति ॥९४॥

समयेऽस्मिन्नतिक्रान्ते दीप्तभास्करदारुणे । प्राप्तोऽत्यन्तमयं भीमः कालः संप्रति जालदः ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर रामकी पहली बात सुनकर लक्ष्मण बड़ी नम्रतासे जाने लगे थे पर दूसरी बात सुनकर रुक गये । उसी समय जिनका चित्त प्रेमसे आर्द्र हो रहा था ऐसे रामने पुनः कहा कि देदीप्यमान सूर्यसे दारुण यह ग्रीष्म काल तो व्यतीत हुआ अब यह अत्यन्त भयंकर वर्षा काल उपस्थित हुआ है ॥९४-९५॥


क्षुब्धाकूपारनिर्घोषाश्चलाञ्जनगोपमाः । दिशोऽन्धकारयन्त्येते विद्युद्वन्तो बलाहकाः ॥९६॥

अर्थ: जो क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान गर्जना कर रहे हैं तथा जो चलते-फिरते अंजनगिरिके समान जान पड़ते हैं ऐसे बिजलीसे युक्त ये मेघ दिशाओंको अन्धकारसे युक्त कर रहे हैं ॥९६॥


निरन्तरं तिरोधाय गगनं घनविग्रहाः । मुञ्चन्ति कं यथा देवा रत्नराशिं जिनोद्भवे ॥९७॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनेन्द्र भगवान्के जन्मके समय देव रत्नराशिकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघोंका शरीर धारण करनेवाले देव निरन्तर रूपसे आकाशको आच्छादित कर जल छोड़ रहे हैं - पानी बरसा रहे हैं ॥९७॥


विधाय तुङ्गानचलान् महान्तो धाराभिरुच्चैर्ध्वनयः पयोदाः । नभोङ्गणेऽमी निभृतं चरन्तः क्षणप्रभासंगमिनो विभान्ति ॥९८॥

अर्थ: जो स्वयं महान् हैं, अत्यधिक गर्जना करनेवाले हैं, जो अपनी मोटी धाराओंसे पर्वतोंको और भी अधिक उन्नत कर रहे हैं, जो आकाशांगणमें निरन्तर विचरण कर रहे हैं तथा जिनमें बिजली चमक रही है ऐसे ये मेघ अत्यधिक सुशोभित हो रहे हैं ॥९८॥


पयोमुचः केचिदमी विपाण्डुराः समीरिता वेगवता नमस्वता । भ्रमन्ति निष्णातमसंयतात्मनां मनोविशेषा इव यौवनश्रिताः ॥९९॥

अर्थ: वेगशाली वायुके द्वारा प्रेरित ये कितने ही सफेद मेघ असंयमी मनुष्यों-के तरुण हृदयोंके समान इधर-उधर घूम रहे हैं ॥९९॥


अयं सस्यभुवं मुक्त्वा मेघो भूभृति वर्षति । अनिश्चितविशेषः सन् कुपात्रे द्रविणी यथा ॥१००॥

अर्थ: जिस प्रकार विशेषताका निश्चय नहीं करनेवाला धनाढ्य मनुष्य कुपात्रके लिए धन देता है उस प्रकार यह मेघ धान्यकी भूमि छोड़कर पर्वतपर पानी बरसा रहा है ॥१००॥


अतिजवमिह काले सिन्धवः संप्रवृत्ता विषमतमविहारोदारपङ्का धरित्री । जलपरिमलशीतो वाति चण्डश्च वायुर्न तव गमनयुक्तं तेन मन्ये सुभाव ॥१०१॥

अर्थ: इस समय बड़े वेगसे नदियां बहने लगी हैं, अत्यधिक कीचड़से युक्त हो जानेके कारण पृथिवीपर विहार करना दुर्भर हो गया है और जलके सम्बन्धसे शीतल तीक्ष्ण वायु चलने लगी है इसलिए हे भद्र ! तुम्हारा जाना ठीक नहीं है ॥१०१॥


इति निगदति पद्मे केकयीसूनुरूचे
प्रवदसि यदधीशस्त्वं तथाहं करोमि ।
विविधरसकथाभिः सुन्दरे स्वाश्रये ते
रविपरिचयमुक्तं कालमस्थुः सुखेन ॥१०२॥

अर्थ: इस प्रकार रामके कहनेपर लक्ष्मण बोले कि आप स्वामी हो जैसा कहते हो वैसा ही मैं करता हूँ । इस तरह अपने सुन्दर निवास स्थलमें वे नाना प्रकारकी स्नेहपूर्ण कथाएँ करते हुए सूर्यके परिचयसे रहित वर्षा काल तक सुखसे रहे ॥१०२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते दण्डकारण्यनिवासाभिधानं नाम द्विचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरितमें दण्डक वनमें निवासका वर्णन करनेवाला बयालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४२॥

४३. त्रिचत्वारिंशत्तमं पर्व (शम्बूकवधाभिधानं)

ततः शरदृतुर्जित्वा शशाङ्ककरपत्रिभिः । घनौघं विश्नुवंश्चक्रे राज्यमाक्रान्तविष्टपः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर उज्ज्वल शरद् ऋतु, चन्द्रमाकी किरणरूपी बाणोंके द्वारा मेघसमूहको जीतकर समस्त विश्वमें व्याप्त होती हुई राज्य करने लगी ॥१॥


विकसत्पुष्पसंघातान् पादपान् स्निग्धचेतसः । अलंकारोत्तमांस्तस्य जगृहुः ककुबङ्गनाः ॥२॥

अर्थ: जिनका चित्त स्नेहसे भर रहा था ऐसी दिशारूपी स्त्रियोंने उस शरद् ऋतुके स्वागतके लिए ही मानो खिले हुए पुष्पसमूहसे सुशोभित वृक्षरूपी उत्तमोत्तम अलंकार धारण किये थे ॥२॥


जीमूतमलनिर्मुक्तं भिन्नाञ्जनसमद्युति । अम्बुनेव चिरं धौतं रराज गगनाङ्गणम् ॥३॥

अर्थ: मेघरूपी मलसे रहित आकाशरूपी आंगन, मर्दित अंजनके समान श्यामवर्ण हो ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बहुत देर तक पानीसे धुल जानेके कारण ही स्वच्छ हो गया है ॥३॥


प्रावृट्कालगजो मेघकलशैर्धरिणीश्रियम् । अभिषिच्य गतः क्वापि विद्युत्कक्षाविराजितः ॥४॥

अर्थ: वर्षा कालरूप हाथी, मेघरूपी कलशोंके द्वारा पृथिवी-रूपी लक्ष्मीका अभिषेक कर बिजलीरूपी कक्षाओंमें सुशोभित होता हुआ जान पड़ता है कहीं चला गया था ॥४॥


चिरात् कमलिनीगेहं प्राप्य पक्षभृतां गणाः । उद्भूतमधुरालापाः कामप्यापुः सुखासिकाम् ॥५॥

अर्थ: भ्रमरोंके समूह बहुत समय बाद कमलिनीके घर जाकर मधुरालाप करते हुए सुखसे बैठे थे ॥५॥


सिन्धवः स्वच्छकीलाला उन्मज्जत्पुलिनाः पराम् । कान्तिमीयुः समासाद्य शरत्समयकामुकम् ॥६॥

अर्थ: जिनके पुलिन धीरे-धीरे उन्मग्न हो रहे हैं ऐसी स्वच्छ जलसे भरी नदियाँ शरत्कालरूपी वल्लभको पाकर परम कान्तिको प्राप्त हो रहीं थीं ॥६॥


वर्षावातविमुक्तानि चिरात्प्राप्य सुखासिकाम् । काननानि व्यराजन्त संगतानीव निद्रया ॥७॥

अर्थ: वर्षा कालकी तीक्ष्ण वायुसे रहित वन चिरकाल बाद सुखसे बैठकर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निद्रासे संगत ही थे - नींद ही ले रहे थे ॥७॥


सरांसि पङ्कजाढ्यानि समं रोधस्समुत्थितैः । पादपैः पक्षिनादेन समालापमिवाभजन् ॥८॥

अर्थ: कमलोंसे युक्त सरोवर तटोंपर उत्पन्न हुए वृक्षोंके साथ पक्षियोंके शब्दके बहाने मानो वार्तालाप ही कर रहे थे ॥८॥


नानापुष्पकृतामोदा रजनीविमलाम्बरा । मृगाङ्कतिलकं भेजे सुकालेशमिवोषती ॥९॥

अर्थ: जिसने नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्धि धारण की थी तथा जो आकाशरूपी स्वच्छ वस्त्रसे सुशोभित थी ऐसी रात्रिरूपी स्त्री उत्तमकालरूपी पतिको पाकर मानो चन्द्रमारूपी तिलकको धारण कर रही थी ॥९॥


केतकीसूतिरजसा पाण्डुरीकृतविग्रहः । ववौ समीरणो मन्दं मदयन् कामिनीजनम् ॥१०॥

अर्थ: केतकीके फूलोंसे उत्पन्न परागके द्वारा शरीर शुक्लवर्ण हो रहा था ऐसी वायु कामिनीजनोंको उन्मत्त करती हुई धीरे-धीरे बह रही थी ॥१०॥


इति प्रसन्नतां प्राप्ते काले सोत्साहविष्टपे । मृगेन्द्रगतिराश्लिष्टविक्रमैकमहारसः ॥११॥

लब्ध्वानुमननं ज्येष्ठादाशानिहितवीक्षणः । कदाचिल्लक्ष्मणो भ्राम्यन्नेककस्तद्वनान्तिकम् ॥१२॥

अर्थ: इस प्रकार जिसमें समस्त संसार उत्साहसे युक्त था ऐसे उस शरत्कालके प्रसन्नताको प्राप्त होनेपर सिंहके समान निर्भय विचरनेवाले महापराक्रमी लक्ष्मण बड़े भाई रामसे आज्ञा प्राप्त कर दिशाओंकी ओर दृष्टि डालते हुए किसी समय अकेले ही उस दण्डक वनके समीप घूम रहे थे ॥११-१२॥


अजिघ्रदामरं गन्धं विनीतपवनाहृतम् । अचिन्तयच्च कस्यैष भवेद्गन्धो मनोहरः ॥१३॥

अर्थ: उसी समय उन्होंने विनयी पवनके द्वारा लायी हुई दिव्य सुगन्धि सूँघी । उसे सूँघते ही वे विचार करने लगे कि यह मनोहर गन्ध किसकी होनी चाहिए ? ॥१३॥


पादपानां किमेतेषां स्फुटकुसुमधारिणाम् । अहोस्विन्मम देहस्य कुसुमोत्करशायिनः ॥१४॥

अर्थ: क्या यह गन्ध विकसित फूलोंको धारण करनेवाले इन वृक्षोंकी है अथवा पुष्पसमूहपर शयन करनेवाले मेरे शरीरकी है ? ॥१४॥


वैदेह्या संगतो रामः किमुतोपरि तिष्ठति । किंवा कश्चित्समायातो भवेदत्र त्रिविष्टपी ॥१५॥

अर्थ: अथवा ऊपर सीताके साथ श्रीराम विराजमान हैं ? या कोई देव यहां आया है ? ॥१५॥


ततो मगधराजेन्द्रः पप्रच्छ श्रमणोत्तमम् । भगवन् कस्य गन्धोऽसौ चक्रे विस्मयनं हरेः ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर मगधदेशके सम्राट् राजा श्रेणिकने गौतम स्वामीसे पूछा कि हे भगवन् ! वह किसकी गन्ध थी जिसने लक्ष्मणको आश्चर्य उत्पन्न किया था ॥१६॥


ततो गणधरोऽवोचज्ज्ञातलोकविचेष्टितः । संदेहतिमिरादित्यः पापधूलीसमीरणः ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर लोगोंकी चेष्टाओंको जाननेवाले, सन्देहरूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए सूर्य एवं पापरूपी धूलिको उड़ानेके लिए वायुस्वरूप गणधर भगवान् बोले ॥१७॥


द्वितीयस्य जिनेन्द्रस्य मुनिवाससमागमे । विद्याधराय विग्नाय याताय शरणं विभुम् ॥१८॥

राक्षसानामधीशेन महाभीमेन धीमता । अम्भोदवाहनायासीत्कृपयेत्युदितो वरः ॥१९॥

अर्थ: कि द्वितीय जिनेन्द्र श्री अजितनाथके समवसरणमें मेघवाहन नामका विद्याधर भयभीत होकर प्रभुकी शरणमें आया था। उस समय राक्षसोंके अधिपति बुद्धिमान् महाभीमने करुणावश मेघवाहनके लिए इस प्रकार वर दिया था ॥१८-१९॥


विपुले राक्षसद्वीपे त्रिकूटं नाम पर्वतम् । मेघवाहनविश्रब्धो गच्छ दक्षिणसागरे ॥२०॥

जम्बूद्वीपस्य जगतीमिमामाश्रित्य दक्षिणम् । लङ्केति नगरी तत्र रक्षोभिर्विनिवेशिता ॥२१॥

रहस्यमिदमेकं च विद्याधर परं शृणु । जम्बूभरतवर्षस्य दक्षिणाशां समाश्रयत् ॥२२॥

आश्रयित्वोत्तरं तीरं लवणस्य महोदधेः । वसुन्धरोदरस्थानस्वभावार्पितमायतम् ॥२३॥

योजनस्याष्टमं भागं दण्डकाद्रौ गुहाश्रयम् । अधोगत्वा महाद्वारं प्रविश्य मणितोरणम् ॥२४॥

अलंकारोदयं नाम स्थितं पुरमनुत्तमम् । स्थानीयशतधर्मस्थं दिव्यदेशं निरीक्ष्यते ॥२५॥

अर्थ: कि हे मेघवाहन ! दक्षिण समुद्रमें एक विशाल राक्षस द्वीप है उसी द्वीपमें त्रिकूट नामका पर्वत है सो तू निश्चिन्त होकर उसी त्रिकूट पर्वतपर चला जा। वहाँ जम्बूद्वीपकी जगती (वेदिका) का आश्रय कर दक्षिण दिशामें राक्षसोंने एक लंका नामकी नगरी बसायी है। वहाँ ही तूँ निवास कर। हे विद्याधर ! इसके साथ ही एक रहस्य-गुप्त वार्ता और सुन। जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रकी दक्षिण दिशामें लवण समुद्रके उत्तर तटका आश्रय कर पृथिवीके भीतर एक लम्बा-चौड़ा स्वाभाविक स्थान है जो योजनके आठवें भाग विस्तृत है। दण्डक पर्वतके गुफाद्वारसे नीचे जानेपर मणिमय तोरणोंसे देदीप्यमान एक महाद्वार मिलता है उसमें प्रवेश करनेपर अलंकारोदय नामका एक उत्कृष्ट सुन्दर नगर दिखाई देता है ॥२०-२५॥


नानाप्रकाररत्नांशुसंतानपरिराजितम् । विस्मयोत्पादने शक्तमपि त्रिदिवसद्मनाम् ॥२६॥

अप्रतर्क्यं गगनगैर्दुर्गं विद्याविवर्जितैः । सर्वकामगुणोपेतं विचित्रालयसंकुलम् ॥२७॥

अर्थ: वह नगर नाना प्रकारके रत्नोंकी किरणोंके समूहसे सुशोभित है तथा देवोंको भी आश्चर्य उत्पन्न करनेमें समर्थ है। आकाशमें गमन करनेवाले विद्याधर उसका विचार ही नहीं कर सकते तथा विद्यासे रहित मनुष्योंके लिए वह अत्यन्त दुर्गम है। वह सब प्रकारके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले गुणोंसे सहित है तथा विविध प्रकारके भवनोंसे व्याप्त है ॥२६-२७॥


परचक्रसमाक्रान्तो यद्यापत्सु कदाचन । भवेर्दुर्गं समाश्रित्य तिष्ठेस्त्वं निर्भयस्ततः ॥२८॥

अर्थ: यदि कदाचित् तू आपत्तिके समय परचक्रके द्वारा आक्रान्त हो तो उस दुर्गका आश्रय कर निर्भय निवास करना ॥२८॥


इत्युक्तस्तेन यातोऽसौ यो विद्याधरबालकः । लङ्कापुरीमभूत्तस्मात् संतानोऽनेकपुंगवः ॥२९॥

अर्थ: इस प्रकार महाभीम राक्षसेन्द्रके कहनेपर जो विद्याधर बालक, लंकापुरी गया था उसीसे अनेक उत्तमोत्तम सन्तति उत्पन्न हुई ॥२९॥


यथावस्थितभावानां श्रद्धानं परमं सुखम् । मिथ्याविकल्पितार्थानां ग्रहणं दुःखमुत्तमम् ॥३०॥

अर्थ: जो पदार्थ जिस प्रकार अवस्थित हैं उनका उसी प्रकार श्रद्धान करना सो परम सुख है और मिथ्याकल्पित पदार्थोंका ग्रहण करना सो अत्यधिक दुःख है ॥३०॥


विद्याभृतां सुराणां च ज्ञेयो भेदो विचक्षणैः । तिलपर्वतयोस्तुल्यः शक्तिकान्त्यादिभिर्गुणैः ॥३१॥

अर्थ: विद्याधरों और देवोंके बीच बुद्धिमान् मनुष्योंको शक्ति, कान्ति आदि गुणोंके कारण तिल तथा पर्वतके समान भारी भेद समझना चाहिए ॥३१॥


पङ्कचन्दनयोर्यद्वदथवोपलरत्नयोः । तद्वत् खेचरलोकस्य देवलोकस्य चान्तरम् ॥३२॥

अर्थ: जिस प्रकार कीचड़ और चन्दन तथा पाषाण और रत्नमें भेद है उसी प्रकार विद्याधर और देवोंमें भेद है ॥३२॥


गर्भवासपरिक्लेशमनुभूय विधेर्वशात् । ततः समुपजायन्ते विद्यामात्रोपजीविनः ॥३३॥

क्षेत्रवंशसमुद्भूताः खे चरन्तीति खेचराः । अमराणां स्वभावस्तु मनोज्ञोऽयं विबुध्यताम् ॥३४॥

अर्थ: विद्याधर तो गर्भवासका दुःख भोगकर बादमें कर्मोदयकी अनुकूलतासे विद्यामात्रके धारक होते हैं। ये विद्याधरोंके क्षेत्र-विजयार्ध पर्वतपर तथा उनके योग्य कुलोंमें उत्पन्न होते हैं तथा आकाशमें चलते हैं इसलिए खेचर कहलाते हैं। परन्तु देवोंका स्वभाव ही मनोहर है ॥३३-३४॥


सुरूपशुचिसर्वाङ्गा गर्भवासविवर्जिता । मांसास्थिक्लेदरहिता देवा अनिमिषेक्षणाः ॥३५॥

अर्थ: देव सुन्दर रूप तथा पवित्र शरीरके धारक हैं, गर्भावाससे रहित हैं, मांस-हड्डी तथा स्वेद आदिसे दूर हैं और टिमकार रहित नेत्रोंके धारक हैं ॥३५॥


जरारोगविहीनाश्च सततं यौवनान्विताः । उदारतेजसा युक्ताः सुखसौभाग्यसागराः ॥३६॥

स्वभावविद्यासंपन्ना अवधिज्ञानलोचनाः । कामरूपधरा धीराः स्वच्छन्दगतिधारिणः ॥३७॥

अर्थ: वे वृद्धावस्था तथा रोगोंसे रहित हैं, सदा यौवनसे सहित रहते हैं, उत्कृष्ट तेजसे युक्त, सुख और सौभाग्यके सागर, स्वाभाविक विद्याओंसे सम्पन्न, अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंके धारक, इच्छानुसार रूप रखनेवाले, धीर, वीर और स्वच्छन्द गतिसे विचरण करनेवाले हैं ॥३६-३७॥


अमी लङ्काश्रिता राजन् न देवा न च राक्षसाः । रक्षन्ति रक्षसां क्षेत्रमाहूतास्तेन राक्षसाः ॥३८॥

अर्थ: हे राजन् ! लंकामें रहनेवाले विद्याधर न देव हैं और न राक्षस हैं किन्तु राक्षस द्वीपकी रक्षा करते हैं इसलिए राक्षस कहलाते हैं ॥३८॥


तद्वंशानुक्रमो ज्ञेयो युगानामन्तरैः सह । पारम्पर्याद् व्यतिक्रान्तः कालो नैकार्णवोपमः ॥३९॥

अर्थ: अनेक युगान्तरोंके साथ उनके वंशका अनुक्रम चला आता है और उसी अनुक्रम-परम्पराके अनुसार अनेक सागर प्रमाण काल व्यतीत हो चुका है ॥३९॥


रक्षःप्रभृतिषु श्लाघ्येष्वतीतेषु बहुष्वपि । खण्डत्रयाधिपस्तस्य रावणोऽभवदन्वये ॥४०॥

अर्थ: राक्षस आदि बहुत-से प्रशंसनीय उत्तमोत्तम विद्याधर राजाओंके व्यतीत हो चुकनेपर उसी वंशमें तीन खण्डका स्वामी रावण उत्पन्न हुआ है ॥४०॥


भगिनी दुर्नखा तस्य रूपेणाप्रतिमा भुवि । प्राप्तस्तया महावीर्यो रमणः खरदूषणः ॥४१॥

अर्थ: उसकी एक दुर्नखा नामकी बहन है जो पृथ्वीपर अपने सौन्दर्यकी उपमा नहीं रखती । उसने महाशक्तिशाली खरदूषण नामक पति प्राप्त किया है ॥४१॥


चतुर्दशसहस्राणि नृणां तस्य महात्मनाम् । प्रतीतो दूषणाख्यश्च सेनाधिपतिरूर्जितः ॥४२॥

अर्थ: अतिशय बलवान् खरदूषण चौदह हजार प्रमाण मनुष्योंका विश्वासप्राप्त सेनापति है ॥४२॥


दिक्कुमार इवोदारे धरणीजठरे स्थितम् । अलंकारपुरं तस्य स्थानमासीन्महौजसः ॥४३॥

अर्थ: वह दिक्कुमार-भवनवासी देवके समान उदार है । पृथ्वीके मध्यमें स्थित अलंकारपुर नामका नगर उस महाप्रतापीका निवासस्थान है ॥४३॥


शम्बूको नाम सुन्दश्च सुतौ तस्य बभूवतुः । बन्धुतश्च दशग्रीवाद् भुवि गौरवमाप सः ॥४४॥

अर्थ: उसके शम्बूक और सुन्द नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए थे। साथ ही वह अपने सम्बन्धी रावणसे भी पृथ्वीपर गौरवको प्राप्त हुआ था ॥४४॥


गुरुभिर्वार्यमाणोऽपि मृत्युपाशावलोकितः । शम्बूकः सूर्यहासार्थं प्राविशद्भीषणं वनम् ॥४५॥

अर्थ: जिसे मृत्युका फन्दा देख रहा था ऐसे शम्बूकने गुरुजनोंके द्वारा रोके जानेपर भी सूर्यहास नामा खड्ग प्राप्त करनेके लिए भयंकर वन-में प्रवेश किया ॥४५॥


यथोक्तमाचरन् राजन्नाराधयितुमुद्यतः । एकान्नभुग्विशुद्धात्मा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥४६॥

अर्थ: हे राजन् ! वह यथोक्त आचरण करता हुआ सूर्यहास खड्गको प्राप्त करनेके लिए उद्यत हुआ । वह एक अन्न खाता है, निर्मल आत्माका धारक है, ब्रह्मचारी है और इन्द्रियोंको जीतनेवाला है, ॥४६॥


असमाप्तोपयोगस्य यो मे दृष्टिपथे स्थितः । वध्योऽसाविति भाषित्वा वंशस्थलमुपाविशत् ॥४७॥

अर्थ: ‘उपयोग पूर्ण हुए बिना जो मेरी दृष्टिके सामने आवेगा वह मेरे द्वारा वध्य होगा’ इस प्रकार कहकर वह वंशस्थल पर्वतपर वंशकी एक झाड़ीमें जा बैठा ॥४७॥


दण्डकारण्यभागान्तं तां च क्रौंचरवां नदीम् । सागरस्योत्तरं तीरं संसृत्यासाववस्थितः ॥४८॥

अर्थ: वह दण्डक वनके अन्तमें क्रौंचरवा नदी और समुद्रके उत्तर तटके बीच जो स्थान है वहाँ अवस्थित है ॥४८॥


नीत्वा द्वादशवर्षाणि ततोऽसावसिरुद्गतः । ग्राह्यः सप्तदिनं स्थित्वा हन्यात्साधकमन्यथा ॥४९॥

अर्थ: तदनन्तर बारह वर्ष व्यतीत होनेपर वह सूर्यहास नामा खड्ग प्रकट हुआ जो सात दिन ठहरकर ग्रहण करने योग्य होता है अन्यथा सिद्ध करनेवालेको ही मार डालता ॥४९॥


कैकसेयी सुतस्नेहाद्द्रष्टुमागात् क्षणे क्षणे । अपश्यच्चासिमुद्भूतं काले देवैरधिष्ठितम् ॥५०॥

अर्थ: दुर्नखा (चन्द्रनखा ) पुत्रके स्नेहसे उसे बार-बार देखनेके लिए उस स्थानपर आती रहती थी सो उसने उसी क्षण उत्पन्न उस देवाधिष्ठित सूर्यहास खड्गको देखा ॥५०॥


प्रसन्नवदना भर्तुर्निजगाद यथाविधि । शम्बूकस्य महाराज सिद्धं तद्योगकारणम् ॥५१॥

आगमिष्यति मे पुत्रो मेरुं कृत्वा प्रदक्षिणम् । अहोभिस्त्रिभिरद्यापि नियमो न समाप्यते ॥५२॥

अर्थ: जिसका मुख प्रसन्नतासे भर रहा था ऐसी दुर्नखाने अपने पति खरदूषणसे कहा कि हे महाराज ! मेरा पुत्र मेरुपर्वतकी प्रदक्षिणा देकर तीन दिनमें आ जायेगा क्योंकि उसका नियम आज भो समाप्त नहीं हुआ है ॥५१-५२॥


एवं मनोरथं सिद्धं दध्यौ चन्द्रनखा सदा । लक्ष्मणश्च तमुद्देशं संप्राप्तः पर्यटन् वने ॥५३॥

अर्थ: इस प्रकार इधर शम्बूककी माता चन्द्रनखा, सिद्ध हुए मनोरथका सदा ध्यान कर रही थी उधर लक्ष्मण वनमें घूमते हुए उस स्थानपर जा पहुँचे ॥५३॥


सहस्रामरपूज्यस्य सद्गन्धस्य स्वभावतः । अनन्तस्यादिहीनस्य खड्गरत्नस्य तस्य सः ॥५४॥

दिव्यगन्धानुलिप्तस्य दिव्यस्रग्भूषितस्य च । गन्धो भास्करहासस्य लक्ष्मीधरमुपेयिवान् ॥५५॥

अर्थ: एक हजार देव जिसकी पूजा करते थे, जिसकी स्वाभाविक उत्तम गन्ध थी, जिसका न आदि था न अन्त था, जो दिव्यगन्धसे लिप्त था और दिव्यमालाओंसे जो अलंकृत था ऐसे सूर्यहास नामक खड्गरत्नकी गन्ध लक्ष्मण तक पहुँची ॥५४-५५॥


लक्ष्मणो विस्मयं प्राप्तः परित्यज्य क्रियान्तरम् । अयासीद् गन्धमार्गेण केसरीव भयोज्झितः ॥५६॥

अर्थ: आश्चर्यको प्राप्त हुए लक्ष्मण अन्य कार्य छोड़कर जिस मार्गसे गन्ध आ रही थी उसी मार्गसे सिंहके समान निर्भय हो चल पड़े ॥५६॥


अपश्यच्च तरुच्छन्नं प्रदेशमतिदुर्गमम् । लताजालावलीरुद्धं तुङ्गपाषाणवेष्टितम् ॥५७॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने वृक्षोंसे आच्छादित, लताओंके समूहसे घिरा तथा ऊँचे-ऊँचे पाषाणोंसे वेष्टित एक अत्यन्त दुर्गम स्थान देखा ॥५७॥


मध्ये च गहनस्यास्य सुसमं धरणीतलम् । विचित्ररत्ननिर्माणमर्चितं कनकाम्बुजैः ॥५८॥

अर्थ: इसी वनके बीचमें एक समान पृथ्वीतल था जो चित्र-विचित्र रत्नोंसे बना था तथा सुवर्णमय कमलोंसे अर्चित था ॥५८॥


मध्ये तस्यापि विपुलं वंशस्तम्बं समुत्थितम् । सौधर्ममिव संद्रष्टुमविज्ञातकुतूहलम् ॥५९॥

अर्थ: उसी समान धरातलके मध्यमें एक बाँसोंका विस्तृत स्तम्भ ( भिड़ा ) था जो किसी अज्ञात कुतूहलके कारण सौधर्मस्वर्गको देखनेके लिए ही मानो ऊँचा उठा हुआ था ॥५९॥


अथान्ते तस्य निस्त्रिंशं विस्फुरत्करमण्डलम् । सकीचकवनं येन प्रदीप्तमिव लक्ष्यते ॥६०॥

अर्थ: अथानन्तर उस बाँसोंके स्तम्बमें देदीप्यमान किरणोंके समूहसे सुशोभित एक खड्ग दिखाई दिया जिससे बाँसोंके साथ-साथ समस्त वन प्रज्वलित-सा जान पड़ता था ॥६०॥


नष्टशङ्कस्तमादाय लक्ष्मीभाजातविस्मयः । जिज्ञासंस्तीक्ष्णतामस्य तं वेणुस्तम्बमच्छिनत् ॥६१॥

अर्थ: आश्चर्यचकित लक्ष्मणने निःशंक हो वह खड्ग ले लिया और उसकी तीक्ष्णताकी परख करनेके लिए उसी वंशस्तम्बको उन्होंने काट डाला ॥६१॥


गृहीतसायकं दृष्ट्वा तं सर्वास्तत्र देवताः । अस्माकं स्वाम्यसीत्युक्त्वा सनमस्यमपूजयन् ॥६२॥

अर्थ: खड्गधारी लक्ष्मणको देखकर वहाँ सब देवताओंने ‘आप हमारे स्वामी हो’ यह कहकर नमस्कारके साथ-साथ उनकी पूजा की ॥६२॥


अथावोचत सीतेशः किंचिदस्राकुलेक्षणः । सौमित्रिश्चिरयत्यद्य क्व नु यातो भविष्यति ॥६३॥

अर्थ: अथानन्तर जिनके नेत्र कुछ-कुछ आँसुओंसे भर रहे थे ऐसे रामने यह कहा कि आज लक्ष्मण बड़ी देर कर रहा है कहाँ गया होगा ? ॥६३॥


भद्रोत्तिष्ठ जटायुः खं दूरमत्पत्य सद्रुतम् । लक्ष्मीधरकुमारस्य निपुणान्वेषणं कुरु ॥६४॥

अर्थ: हे भद्र जटायु ! उठो और शीघ्र ही आकाशमें दूर तक उड़कर लक्ष्मणकुमारकी अच्छी तरह खोज करो ॥६४॥


इत्युक्तः करुणं यावत् करोत्युत्पतितुं खगः । अङ्गुलीं तावदायस्य जनकस्याङ्गजावदत् ॥६५॥

अर्थ: इस प्रकार रामके करुणापूर्वक कहनेपर जटायु उड़नेको तैयारी करता है कि इतनेमें सीता अंगुली ऊपर उठाकर कहती है ॥६५॥


अयं कुङ्कुमपङ्केन लिप्ताङ्गो नाथ लक्ष्मणः । चित्रमाल्याम्बरधरः समायाति स्वलंकृतः ॥६६॥

अर्थ: कि जिनका शरीर केशरकी पंकसे लिप्त है, जो नाना प्रकारकी मालाओं और वस्त्रोंको धारण कर रहे हैं तथा जो अलंकारोंसे अलंकृत हैं ऐसे लक्ष्मण यह आ रहे हैं ॥६६॥


गृहीतश्चायमेतेन मण्डलाग्रो महाप्रभः । राजतेऽत्यन्तमेतेन शैलः केसरिणा यथा ॥६७॥

अर्थ: इन्होंने यह महादेदीप्यमान खड्ग ले रखा है और इससे ये सिंहसे पर्वतके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं ॥६७॥


दृष्ट्वा तमीदृशं रामो विस्मयव्याप्तमानसः । असहः प्रमदं रोद्धुमुत्थाय परिषस्वजे ॥६८॥

अर्थ: लक्ष्मणको वैसा देख रामका मन आश्चर्यसे व्याप्त हो गया तथा वे हर्षको रोकनेके लिए असमर्थ हो गये जिससे उन्होंने उठकर उनका आलिंगन किया ॥६८॥


पृष्टश्च लक्ष्मणः कृत्स्नं स्ववृत्तान्तमवेदयत् । स्थिताश्च ते विचित्राभिः संकथाभिर्यथासुखम् ॥६९॥

अर्थ: पूछनेपर लक्ष्मणने अपना सब वृत्तान्त बतलाया । इस तरह राम-लक्ष्मण और सीता - तीनों प्राणी नाना प्रकारकी कथाएँ करते हुए सुखसे वहाँ ठहरे ॥६९॥


दृष्ट्वा प्रतिदिनं खड्गं सुतं च नियमस्थितम् । यायासीत् सा दिने तस्मिन् कैकसेय्यागतैकिका ॥७०॥

अर्थ: अथानन्तर जो चन्द्रनखा प्रतिदिन खड्गको तथा नियममें स्थित पुत्रको देख जाती थी उस दिन वह अकेली ही वहाँ आयी ॥७०॥


अपश्यच्च विसाराणां वनं कृत्तमशेषतः । अचिन्तयच्च यातः क्व पुत्रः स्थित्वाटवीमिमाम् ॥७१॥

अर्थ: आते ही उसने बाँसोंके उस समस्त वनको सब ओरसे कटा देखा । वह विचार करने लगी कि पुत्र इस अटवीमें रहकर अब कहाँ चला गया ? ॥७१॥


स्थितश्च यत्र संसिद्धमसिरत्नमिदं वनम् । छिन्दानेन परीक्षार्थं न युक्तं सुनुना कृतम् ॥७२॥

अर्थ: जिस वनमें यह रहा तथा जहाँ यह खड्ग रत्न सिद्ध हुआ परीक्षाके लिए उसी वनको काटते हुए पुत्रने अच्छा नहीं किया ॥७२॥


तावच्चास्तस्थितादित्यमण्डलप्रतिमं शिरः । सत्कुण्डलं कबन्धं च ददर्श स्थाणुमध्यगम् ॥७३॥

अर्थ: इतनेमें ही उसने अस्ताचलपर स्थित सूर्यमण्डलके समान निष्प्रभ, तथा कुण्डलोंसे युक्त शिर और एक ठूँठके बीच पड़ा हुआ पुत्रका धड़ देखा ॥७३॥


उपकारः कृतस्तस्याः परमो मूर्च्छया क्षणम् । पुत्रमृत्युसमुत्थेन यन्न दुःखेन पीडिता ॥७४॥

ततः संज्ञां समासाद्य हाकारमुखरं मुखम् । उत्क्षिप्य कृच्छ्रतो दृष्टिं तत्र सूर्धन्यपातयत् ॥७५॥

अर्थ: उसी क्षण मूर्च्छाने उसका परम उपकार किया जिससे पुत्रकी मृत्युसे उत्पन्न दुःखसे वह पीड़ित नहीं हुई। सचेत होनेपर हाहाकारसे मुखर शिर ऊपर उठाकर उसने बड़ी कठिनाईसे पुत्रके शिरपर दृष्टि डाली ॥७४-७५॥


विललाप च शोकार्ता गलदस्राकुलेक्षणा । कुररीवैकिकारण्ये हृदयाघातकारिणी ॥७६॥

अर्थ: झरते हुए आँसुओंसे जिसके नेत्र आकुलित थे तथा जो अपनी छाती कूट रही थी ऐसी शोकसे पीड़ित चन्द्रनखा, वनमें अकेली कुररीके समान विलाप करने लगी ॥७६॥


स्थितो द्वादशवर्षाणि दिनानां च चतुष्टयम् । पुत्रो मे हा परं क्षान्तं न विधे दिवसत्रयम् ॥७७॥

अर्थ: मेरा पुत्र बारह वर्ष और चार दिन तक यहाँ रहा। हाय दैव ! इसके आगे तूने तीन दिन सहन नहीं किये ॥७७॥


कृतान्तापकृतं किं ते मया परमनिष्ठुर । येन दृष्टनिधिः पुत्रः सहसा विनिपातितः ॥७८॥

अर्थ: हे अतिशय निष्ठुर दैव ! मैंने तेरा क्या अपकार किया था जिससे पुत्रको निधि दिखाकर सहसा नष्ट कर दिया ॥७८॥


अपुण्यया मया नूनमन्यजन्मनि बालकः । कस्या अपहृतो मृत्युं तत्प्रत्यागतमद्य ते ॥७९॥

अर्थ: निश्चय ही मुझ पापिनीने अन्य जन्ममें किसीका पुत्र हरा होगा इसीलिए तो मेरा पुत्र मृत्युको प्राप्त हुआ है ॥७९॥


मयापि पुत्र जातोऽसि कथमेतां स्थितिं गतः । ईदृशोऽपि प्रयच्छैकां वाचमार्तिविनाशिनीम् ॥८०॥

अर्थ: हे पुत्र ! तू मुझसे उत्पन्न हुआ था फिर ऐसी दशाको कैसे प्राप्त हो गया ? अथवा इसी अवस्थामें तू दुःखको दूर करनेवाला एक वचन तो मुझे दे - एक बार तो मुझसे बोल ॥८०॥


एहि वत्स निजं रूपं परिधाय मनोहरम् । अमङ्गलमिदं मायाक्रीडितं न विराजते ॥८१॥

अर्थ: आओ वत्स ! अपना मनोहर रूप धरकर आओ। यह तेरी अमंगल रूप छलक्रीड़ा अच्छी नहीं लगती ॥८१॥


स्फुटं यातोऽसि हा वत्स परलोकं विधेर्वशात् । अन्यथा चिन्तितं कार्यमिदमुद्भूतमन्यथा ॥८२॥

अर्थ: हाय वत्स ! भाग्यवश तू स्पष्ट ही परलोक चला गया है। यह कार्य अन्य प्रकारसे सोचा था और अन्य प्रकार हो गया ॥८२॥


अनुष्ठितं त्वया मातुः प्रतिकूलं च जातुचित् । अधुना कारणोन्मुक्तं किमिदं विनयोज्झितम् ॥८३॥

अर्थ: तूने कभी भी माताके प्रतिकूल कार्य नहीं किया है अब यह अकारण विनयका त्याग क्यों कर रहा है ? ॥८३॥


संसिद्धसूर्यहासश्चेदजीविष्यस्त्वमत्र ते । अस्थास्यत् कः पुरो लोके चन्द्रहासवृतो यथा ॥८४॥

अर्थ: सूर्यहास खड्ग सिद्ध होनेपर यदि तू जीवित रहेगा तो इस संसारमें चन्द्रहाससे आवृतकी तरह ऐसा कौन पुरुष है जो तेरे सामने खड़ा हो सकेगा ? ॥८४॥


भजता चन्द्रहासेन पदं मम सहोदरे । सूर्यहासस्य न क्षान्तं नूनमात्मविरोधिनः ॥८५॥

अर्थ: चन्द्रहास खड्ग मेरे भाईके पास है सो जान पड़ता है उसने अपने विरोधी सूर्यहास खड्गको सहन नहीं किया है ॥८५॥


एककं भीषणेऽरण्ये निर्दोषं नियमस्थितम् । कुशत्रोः कस्य हन्तुं त्वां गूढस्य प्रसृतः करः ॥८६॥

अर्थ: तू इस भयंकर वनमें अकेला रहकर नियमका पालन करता था किसीका कुछ भी अपराध तूने नहीं किया था फिर भी किस मूर्ख दुष्ट शत्रुका हाथ तुझे मारनेके लिए आगे बढ़ा ? ॥८६॥


अचिरोपेक्षिता तेन भवन्तं निघ्नतोदिता । क गमिष्यति पापोऽसौ सांप्रतं हतचेतनः ॥८७॥

अर्थ: तुम्हें मारते हुए उस शत्रुने शीघ्र ही प्रकट होनेवाली अपनी उपेक्षा प्रकट की है। अब वह अविचारी पापी कहाँ जायेगा ? ॥८७॥


विलापमिति कुर्वाणा कृत्वाङ्के सुतमुत्तमम् । चुचुम्बे विद्रुमच्छायलोचना करसंगतम् ॥८८॥

अर्थ: इस प्रकार उत्तम पुत्रको गोदमें रखकर विलाप करते-करते जिसके नेत्र मूँगाके समान लाल हो गये थे ऐसी चन्द्रनखाने हाथमें लेकर पुत्रका चुम्बन किया ॥८८॥


ततः क्षणात् परित्यज्य शोकं नष्टास्रसंततिः । गृहीत्वा परमं क्रोधमुत्थाय स्फुरितानना ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर क्षण एकमें शोक छोड़कर वह उठी । उसके अश्रुओंकी धारा नष्ट हो गयी और तीव्र क्रोध धारण करनेसे उसका मुख दमकने लगा ॥८९॥


संचरन्ती तमुद्देशं स्वैरं मार्गानुलक्षितम् । निरैक्षत युवानौ तौ चित्तबन्धनकारिणौ ॥९०॥

अर्थ: वह मार्गके समीपमें ही स्थित उस स्थानपर इच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगी । उसी समय उसने चित्तको बाँधनेवाले दोनों तरुण - राम-लक्ष्मणको देखा ॥९०॥


विनाशमगमत्तस्याः क्रोधोऽसौ तादृशोऽपि सन् । आदेश इव तस्याभूत् स्थाने रागरसः परः ॥९१॥

अर्थ: उन्हें देखते ही उसका वैसा तीव्र क्रोध नष्ट हो गया और आदेशके समान उसके स्थानपर परम रागरूपी रस आ जमा ॥९१॥


ततोऽचिन्तयदेताभ्यां नराभ्यामभिलाषिणम् । वृणोमि नरमित्युच्चैरूर्मिकं दधती मनः ॥९२॥

अर्थ: इसके बाद उसने ऐसा विचार किया कि इन दोनों पुरुषोंमें-से मैं अपने इच्छुक पुरुषको वरूँगी इस प्रकार उसके मनमें ऊँची तरंगें उठने लगीं ॥९२॥


इति संचिन्त्य संसाधुकन्याकल्पं समाश्रिता । हृदयेनातुरात्यन्तं भावगह्वरवर्तिना ॥९३॥

अर्थ: ऐसा विचार कर वह कन्याभावको प्राप्त हुई । वह उस समय भावरूपी गुफामें वर्तमान हृदयसे अत्यन्त आतुर हो रही थी ॥९३॥


हंसीव पद्मिनीखण्डे महिषीव महाद्रहे । सस्ये सारङ्गबालेव तत्राभूत् सामिलाषिणी ॥९४॥

अर्थ: जिस प्रकार हंसी कमलिनीके झुण्डमें, महिषी (भैंस) महासरोवरमें और हरिणी धान्यमें अभिलाषासे युक्त होती है उसी प्रकार वह भी राम-लक्ष्मणमें अभिलाषासे युक्त हो गयी ॥९४॥


भञ्जनं करशाखानां कुर्वन्ती स्फुटनिस्वनम् । उपविश्य किलोद्विग्ना पुन्नागस्य तलेऽरुदत् ॥९५॥

अर्थ: वह हाथकी अंगुलियाँ चटखाती हुई भय-भीत मुद्रामें पुन्नाग वृक्षके नीचे बैठकर रोने लगी ॥९५॥


अतिदीनकृतारावां धूसरां वनरेणुना । दृष्ट्वा तां रामरमणी कृपावष्टब्धमानसा ॥९६॥

अर्थ: जो अत्यन्त दीन शब्द कर रही थी, तथा वनकी धूलिसे धूसरित थी ऐसी उस कन्याको देख सीताका हृदय दयासे द्रवीभूत हो गया ॥९६॥


उत्थायान्तिकमागत्य करामर्शनतत्परा । मा भैषीरिति भाषित्वा गृहीत्वा पाणिपल्लवे ॥९७॥

किंचित् किल त्रपाभाजं मलिनांशुकधारिणीम् । सान्त्वयन्ती शुभैर्वाक्यै रमणान्तिकमानयत् ॥९८॥

अर्थ: वह उठकर उसके पास गयी तथा शरीरपर हाथ फेरने लगी । तदनन्तर ‘डरो मत’ यह कहकर उसका हाथ पकड़कर पतिके पास ले आयी । उस समय वह कुछ-कुछ लज्जित हो रही थी, तथा मलिन वस्त्रको धारण किये हुई थी । सीता उसे शुभ वचनोंसे सान्त्वना दे रही थी ॥९७-९८॥


ततः पद्मो जगादैतां का त्वं श्वापदसेविते । एकाकिनी वने कन्ये चरसीहातिदुःखिता ॥९९॥

अर्थ: तदनन्तर रामने उससे कहा कि हे कन्ये ! जंगली जानवरोंसे भरे इस वनमें अतिशय दुःखसे युक्त तू कौन अकेली विचरण कर रही है ? ॥९९॥


ततः संभाषणं प्राप्य स्फुटं तामरसेक्षणा । जगाद भ्रमरौघस्य वाचानुकृतिमेतया ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर सम्भाषण प्राप्त कर जिसके नेत्र कमलके समान खिल रहे थे ऐसी वह कन्या भ्रमरसमूहका अनुकरण करनेवाली वाणीसे बोली ॥१००॥


पुरुषोत्तम मे माता निःसंज्ञायां मृतिं गता । तद्भवेन च शोकेन तातोऽपि विनिपातितः ॥१०१॥

अर्थ: कि हे पुरुषोत्तम ! मूर्च्छा आनेपर मेरी माता मर गयी और उसके उत्पन्न शोकसे पिता भी मर गये ॥१०१॥


साहं पूर्वकृतात् पापाद् बन्धुभिः परिवर्जिता । प्रविष्टा दण्डकारण्यं वैराग्यं दधती परम् ॥१०२॥

अर्थ: इस तरह पूर्वोपार्जित पापके कारण बन्धुजनोंसे रहित हो परम वैराग्यको धारण करती हुई मैं इस दण्डकवनमें प्रविष्ट हुई थी ॥१०२॥


पश्य पापस्य माहात्म्यं यद्वाञ्छन्त्यपि पञ्चताम् । अरण्येऽस्मिन् महाभीमे व्यालैरपि विवर्जिता ॥१०३॥

अर्थ: पापका माहात्म्य तो देखो कि मैं यद्यपि मृत्युकी इच्छा करती हूँ फिर भी इस महाभयंकर वनमें दुष्ट जीव भी मुझे छोड़ देते हैं ॥१०३॥


चिरान्मानुपनिर्मुक्ते भ्रमन्त्यास्मिन् वने मया । भवन्तः साधवो दृष्टाः क्षयात् पापस्य कर्मणः ॥१०४॥

अर्थ: चिरकालसे इस निर्जन वनमें भ्रमण करती हुई मैंने पापकर्मके क्षयसे आज आप सज्जनों-के दर्शन किये हैं ॥१०४॥


जनोऽविदितपूर्वो यो जने बध्नाति सौहृदम् । अनाहूतश्च सामीप्यं व्रजति त्रपयोज्झितः ॥१०५॥

अनादृतः प्रभूतं च भाषते शून्यमानसः । उत्पादयति विद्वेषं कस्य नासौ क्रमोज्झितः ॥१०६॥

अर्थ: जो पहलेका अपरिचित मनुष्य किसी मनुष्यसे मैत्रीभाव प्रकट करता है, विना बुलाया निर्लज्ज हो उसके पास जाता है तथा बिना आदरके शून्यचित्त हो अधिक भाषण करता है वह क्रमहीन मनुष्य किसे द्वेष नहीं उत्पन्न करता ? ॥१०५-१०६॥


एवंभूतापि नो यावत्प्राणान् मुञ्चामि सुन्दर । तावदद्यैव मामिच्छ दुःखितायां दयां कुरु ॥१०७॥

अर्थ: ऐसी होनेपर भी हे सुन्दर ! जबतक मैं प्राण नहीं छोड़ती हूँ तबतक आज ही मुझे चाहो, मेरी इच्छा करो मुझ दुःखिनीपर दया करो ॥१०७॥


न्यायेन संगतां साध्वीं सर्वोपप्लववर्जिताम् । को वा नेच्छति लोकेऽस्मिन् कल्याणप्रकृतिस्थितिम् ॥१०८॥

अर्थ: जो न्यायसे संगत है, साध्वी है, सर्व प्रकारकी बाधाओंसे रहित है, तथा जिसकी कल्याणरूप प्रकृति है ऐसी कन्याको इस संसारमें कौन नहीं चाहता ? ॥१०८॥


श्रुत्वा तद्वचनं तस्यास्त्रपया परिवर्जितम् । परस्परं समालोक्य स्थितौ तूष्णीं नरोत्तमौ ॥१०९॥

अर्थ: राम-लक्ष्मण उसके लज्जाशून्य वचन सुनकर परस्पर एक दूसरेको देखते हुए चुप रह गये ॥१०९॥


सर्वशास्त्रार्थबोधाम्बुक्षालितं हि तयोर्मनः । कृत्याकृत्यविवेकेषु मलमुक्तं प्रकाशते ॥११०॥

अर्थ: समस्त शास्त्रोंके अर्थज्ञानरूपी जलसे धुला हुआ उनका निर्मल मन करने योग्य तथा नहीं करने योग्य कार्योंमें अत्यन्त प्रकाशित हो रहा था ॥११०॥


निर्मुक्तदुःखनिश्वासं गच्छामीति तयोदिते । पद्मनाभादिभिः सोक्ता यथेष्टं क्रियतामिति ॥१११॥

अर्थ: दुःख-भरी श्वास छोड़कर जब उसने कहा कि मैं जाती हूँ तब राम आदिने उत्तर दिया कि ‘जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो’ ॥१११॥


तस्यां प्रयातमात्रायां तदाशालीनताहृतौ । ससीतौ विस्मितौ वीरौ स्मेरवक्त्रौ बभूवतुः ॥११२॥

अर्थ: उसके जाते ही उसकी अकुलीनतासे प्रेरित हुए शूरवीर राम-लक्ष्मण सीताके साथ आश्चर्यसे चकित हो हँसने लगे ॥११२॥


अन्तर्हत्य च संक्रुद्धा समुत्पत्य त्वरावती । याता चन्द्रनखा धाम निजं शोकसमाकुला ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर शोकसे व्याकुल चन्द्रनखा मनमार क्रुद्ध हो उड़कर शीघ्र ही अपने घर चली गयी ॥११३॥


शोभयापहृतस्तस्या लक्ष्मणस्तरलेक्षणः । पुनरालोकनाकाङ्क्षी विरहादाकुलोऽभवत् ॥११४॥

अर्थ: लक्ष्मण उसकी सुन्दरतासे हरे गये थे इसलिए उनके नेत्र चंचल हो रहे थे । वे उसे पुनः देखनेकी इच्छा करते हुए विरहसे आकुल हो गये ॥११४॥


उत्थायान्यापदेशेन रामदेवसकाशतः । अटवीं पादपद्माभ्यां बभ्रामान्वेषणातुरः ॥११५॥

अर्थ: वे किसी अन्य कार्यके बहाने रामके पाससे उठकर चन्द्रनखाकी खोजमें व्यग्र होते हुए पैदल ही वनमें भ्रमण करने लगे ॥११५॥


अचिन्तयच्च खिन्नात्मा वाष्पव्याकुललोचनः । आत्मन्यनादृतप्रीतिरिति तत्प्रेमनिर्भरः ॥११६॥

रूपयौवनलावण्यगुणपूर्णा घनस्तनी । मदनाविष्टनागेन्द्रवनितासमगामिनी ॥११७॥

आयान्त्येव सती कस्माद्दृष्टमात्रा न सा मया । स्तनोपपीडनाश्लेषं परिरब्धा हतात्मना ॥११८॥

अर्थ: जिनका हृदय अत्यन्त खिन्न था, जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे, जिन्होंने अपने आपके विषयमें प्रकट हुए चन्द्रनखाके प्रेमकी उपेक्षा की थी तथा जो उसके प्रेमसे परिपूर्ण थे ऐसे लक्ष्मण इस प्रकार विचार करने लगे कि जो, रूप-यौवन-सौन्दर्य तथा अनेक गुणोंसे परिपूर्ण थी, जिसके स्तन अतिशय सघन थे और जो कामोन्मत्त हस्तिनीके समान चलती थी ऐसी उस सतीका मैंने आने तथा दिखनेके साथ ही स्तनोंको पीड़ित करनेवाला आलिंगन क्यों नहीं किया ॥११६-११८॥


अयोगमोहितं चेतश्च्युतं कर्तव्यवस्तुनः । सांप्रतं शोकशिखिना दह्यते मे निरङ्कुशम् ॥११९॥

अर्थ: उसके वियोगसे मोहित हुआ मेरा चित्त कर्तव्य वस्तु - करने योग्य कार्यसे च्युत होता हुआ इस समय शोकरूपी अग्निके द्वारा निर्वाध रूपसे जल रहा है ॥११९॥


जाता सा विषये कस्मिन् कस्य वा दुहिता भवेत् । यूथभ्रष्टा मृगीवेयं कुतः प्राप्ता सुलोचना ॥१२०॥

अर्थ: वह किस देशमें उत्पन्न हुई है । किसकी पुत्री है ? यह उत्तम नेत्रोंकी धारक झुण्डसे बिछुड़ी हरिणीके समान यहाँ कहाँसे आयी थी ? ॥१२०॥


संचिन्त्येति कृतभ्रान्तिस्तामपश्यन् समाकुलः । मेने तद्वनमाकाशपुष्पतुल्यं समन्ततः ॥१२१॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर जो इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे तथा उसे न देखकर जो अत्यन्त व्याकुल थे ऐसे लक्ष्मणने उस वनको सब ओरसे आकाशपुष्पके समान माना था ॥१२१॥


मालिनीवृत्तम् अविदितपरमार्थैरेवमर्थेन हीनं न खलु विमलचित्तैः कार्यमारम्भणीयम् । अविषयकृतचित्ता तत्समासक्तिमुक्ता दधति परमशोकं बालवद्बुद्धिहीनाः ॥१२२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! निर्मल चित्तके धारक मनुष्योंको इस तरह परमार्थके जाने बिना निरर्थक कार्य प्रारम्भ नहीं करना चाहिए । क्योंकि जो बालकोंके समान निर्बुद्धि मनुष्य अयोग्य विषयमें चित्त लगाते हैं वे उसकी प्राप्तिसे रहित हो परम शोकको धारण करते हैं ॥१२२॥


किमिदमिह मनो मे किं नियोज्यं तदिष्टं कथमनुगतकृत्यैः प्राप्यते शं मनुष्यैः । इति कृतमतिरुच्चैर्यो विवेकस्य कर्ता रविरिव विमलोऽसौ राजते लोकमार्गे ॥१२३॥

अर्थ: ‘यह क्या है ? इसमें मुझे मन क्यों लगाना चाहिए ? वह इष्ट क्यों है ? और करने योग्य कार्योंका अनुसरण करनेवाले मनुष्य ही सुख-शान्ति प्राप्त कर पाते हैं’ इस प्रकार विचारकर जो उत्कृष्ट विवेकका कर्ता होता है वह सूर्यकी तरह निर्मल होता हुआ लोकके मार्गमें सुशोभित होता है ॥१२३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते शम्बूकवधाभिधानं नाम त्रिचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४३॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें शम्बूकके बधका वर्णन करनेवाला तैंतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४३॥


४४. चतुश्चत्वारिंशत्तमं पर्व (सीताहरणरामविलापाभिधानं)

अनिच्छयाथ विध्वस्ते खरवध्वा मनोभवे । दुःखपूरः पुनः प्राप्तो भग्नरोधो यथा नदः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जब अनिच्छासे चन्द्रनखाका काम नष्ट हो गया तब तटको भग्न करनेवाले नदके समान दुःखका पूर उसे पुनः प्राप्त हो गया ॥१॥


चकार व्याकुलीभूता विविधं परिदेवनम् । शोकपावकतप्ताङ्गा विवत्सा बहुला यथा ॥२॥

अर्थ: जिसका शरीर शोकरूपी अग्निसे सन्तप्त हो रहा था ऐसी चन्द्रनखा, मृतवत्सा गायके समान व्याकुल होकर नाना प्रकारका विलाप करने लगी ॥२॥


वहन्ती चापमानं तं क्रोधदैन्यस्थमानसा । विगलद्भूरिनेत्राम्बुर्दूषणेन निरैक्ष्यत ॥३॥

अर्थ: जो पूर्वोक्त अपमानको धारण कर रही थी, जिसका मन क्रोध और दीनतामें स्थित था तथा जिसके नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे ऐसी चन्द्रनखाको खरदूषणने देखा ॥३॥


तां विनष्टधृतिं दृष्ट्वा धरणीधूलिधूसराम् । प्रकीर्णकेशसंभारां शिथिलीभूतमेखलाम् ॥४॥

नखविक्षतकक्षोरुकुचक्षोणीं सशोणिताम् । कर्णाभरणनिर्मुक्तां हारलावण्यवर्जिताम् ॥५॥

विच्छिन्नकञ्चुकां भ्रष्टस्वभावतनुतेजसम् । आलोडितां गजेनेव नलिनीं मदवाहिना ॥६॥

पप्रच्छ परिसान्त्व्यैष कान्ते शीघ्रं निवेदय । अवस्थामिमकां केन प्रापितासि दुरात्मनः ॥७॥

अर्थ: जिसका धैर्य नष्ट हो गया था, जो पृथिवीकी धूलिसे धूसरित थी, जिसके केशोंका समूह बिखरा हुआ था, जिसकी मेखला ढीली हो गयी थी, जिसकी बगलों, जाँघों तथा स्तनोंकी भूमि नखोंसे विक्षत थी, जो रुधिरसे युक्त थी, जिसके कर्णाभरण गिर गये थे, जो हार और लावण्यसे रहित थी, जिसकी चोली फट गयी थी, जिसके शरीरका स्वाभाविक तेज नष्ट हो गया था, और जो मदोन्मत्त हाथीके द्वारा मर्दित कमलिनीके समान जान पड़ती थी ऐसी चन्द्रनखाको सान्त्वना देकर खरदूषणने पूछा कि हे प्रिये ! शीघ्र ही बताओ तुम किस दुष्टके द्वारा इस अवस्थाको प्राप्त करायी गयी हो ? ॥४-७॥


अद्येन्दुरष्टमः कस्य मृत्युना कोऽवलोकितः । गिरेः स्वपिति कः शृङ्गे मूढः क्रीडति कोऽहिना ॥८॥

अर्थ: आज किसका आठवाँ चन्द्रमा है ? मृत्युके द्वारा कौन देखा गया है ? पहाड़की चोटीपर कौन सो रहा है और कौन मूर्ख सर्पके साथ क्रीड़ा कर रहा है ? ॥८॥


कोऽन्धः कूपं समापन्नो दैवं कस्याशुभावहम् । मत्क्रोधाग्नावयं दीप्ते शलभः कः पतिष्यति ॥९॥

अर्थ: कौन अन्धा कुएँमें आकर पड़ा है ? किसका देव अशुभ है ? और मेरी प्रज्वलित क्रोधाग्निमें कौन पतंग बनकर गिरना चाहता है ? ॥९॥


धिक् तं पशुसमं पापं विवेकत्यक्तमानसम् । अपवित्रसमाचारं लोकद्वितयदूषितम् ॥१०॥

अर्थ: जिसका मन विवेकसे रहित है, जो अपवित्र आचरण करनेवाला है और जिसने दोनों लोकोंको दूषित किया है उस पशुतुल्य पापीको धिक्कार है ॥१०॥


अलं रुदित्वा नान्येव काचित्त्वं प्राकृताबला । स्पृष्टा येनासितं शंस वाडवाग्निशिखासमा ॥११॥

अर्थ: रोना व्यर्थ है तुम अन्य साधारण स्त्रीके समान थोड़े ही हो । वडवानलकी शिखाके समान जिसने तुम्हें छुआ है उसका नाम कहो ॥११॥


अद्यैव तं दुराचारं कृत्वा हस्ततलाहतम् । नेष्ये प्रेतगतिं सिंहो यथा नागं निरंकुशम् ॥१२॥

अर्थ: निरंकुश हाथीको सिंहके समान मैं आज ही उसे हस्ततलसे पीसकर यमराजके घर भेज दूँगा ॥१२॥


एवमुक्ता विसृज्यासौ रुदितं कृच्छ्रतः परात् । अस्रक्लिन्नालकाच्छन्नगण्डागादीत् सगद्गदम् ॥१३॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर कड़े कष्टसे रोना छोड़कर वह गद्गद वाणीमें बोली । उस समय उसके कपोल आंसुओंसे भीग रहे थे तथा बिखरे हुए बालोंसे आच्छन्न थे ॥१३॥


वनान्तरस्थितं पुत्रं द्रष्टुं यातास्मि सांप्रतम् । अपश्यन्तं च केनापि प्रत्यग्रच्छिन्नमूर्धकम् ॥१४॥

अर्थ: उसने कहा कि मैं अभी वनके मध्यमें स्थित पुत्रको देखनेके लिए गयी थी सो मैंने देखा कि उसका मस्तक अभी हाल किसीने काट डाला है ॥१४॥


ततः शोणितधाराभिर्निःसृताभिर्निरन्तरम् । प्रदीप्तमिव तन्मूले लक्ष्यते कीचकस्थलम् ॥१५॥

अर्थ: निरन्तर निकली हुई रुधिरकी धाराओंसे वंशस्थलका मूल भाग अग्निसे प्रज्वलितके समान दिखाई देता है ॥१५॥


प्रशान्ताऽवस्थितं हत्वा मे केनापि सुपुत्रकम् । खड्गरत्नं समुत्पन्नं प्राप्तं पूजासमन्वितम् ॥१६॥

अर्थ: शान्तिसे बैठे हुए मेरे सुपुत्रको किसीने मारकर पूजाके साथ-साथ प्राप्त हुआ वह खड्गरत्न ले लिया है ॥१६॥


साहं दुःखसहस्राणां भाजनं भाग्यवर्जिता । तन्मूर्धानं निधायाङ्के विप्रलापं प्रसेविता ॥१७॥

अर्थ: जो हजारों दुःखोंका पात्र तथा भाग्यसे हीन है ऐसी मैं पुत्रके मस्तकको गोदमें रखकर विलाप कर रही थी ॥१७॥


तावच्च तेन दुष्टेन शम्बूकवधकारिणा । उपगूढास्मि बाहुभ्यां कर्तुं किमपि वाञ्छिता ॥१८॥

अर्थ: कि शम्बूकका वध करनेवाले उस दुष्टने दोनों भुजाओंसे मेरा आलिंगन किया तथा कुछ अनर्थ करनेकी इच्छा की ॥१८॥


उक्तोऽपि मुञ्च मुञ्चेति घनस्पर्शवशङ्गतः । न मुञ्चति हतात्मा मां कोऽपि नीचकुलोद्गतः ॥१९॥

अर्थ: यद्यपि मैंने उससे कहा कि मुझे छोड़-छोड़ तो भी वह कोई नीच कुलोत्पन्न पुरुष था इसलिए गाढ़ स्पर्शके वशीभूत हुए उसने मुझे छोड़ा नहीं ॥१९॥


नखैर्विलुप्य दन्तैश्च तेनाहं विजने वने । एतिकां प्रापितावस्थां क्वाबला क्व पुमान् बली ॥२०॥

अर्थ: उसने उस निर्जन वनमें नखों तथा दांतोंसे छिन्न-भिन्न कर मुझे इस दशाको प्राप्त कराया है सो आप ही सोचिए कि अबला कहाँ और बलवान् पुरुष कहाँ ? ॥२०॥


तथापि पुण्यशेषेण केनापि परिरक्षिता । अविखण्डितचारित्रा कृच्छ्राद्य निःसृता ततः ॥२१॥

अर्थ: इतना सब होनेपर भी किसी अवशिष्ट पुण्यने मेरी रक्षा की और मैं चारित्रको अखण्डित रखती हुई बड़े कष्टसे आज उससे बचकर निकल सकी हूँ ॥२१॥


सर्वविद्याधराधीशस्त्रिलोकक्षोभकारणः । भ्राता मे रावणः ख्यातः शक्रेणाप्यपराजितः ॥२२॥

खरदूषणनामा त्वं भर्ता कोऽपि विवर्ण्यसे । संप्राप्तास्मि तथाप्येतामवस्थां दैवयोगतः ॥२३॥

अर्थ: जो समस्त विद्याधरोंका स्वामी है, तीन लोकके क्षोभका कारण है, और इन्द्र भी जिसे पराजित नहीं कर सका ऐसा प्रसिद्ध रावण मेरा भाई है तथा तुम खरदूषण नामधारी अद्भुत पुरुष मेरे भर्ता हो फिर भी दैवयोगसे मैं इस अवस्थाको प्राप्त हुई हूँ ॥२२-२३॥


ततस्तद्वचनं श्रुत्वा शोकक्रोधसमाहतः । स्वयं महाजवो गत्वा दृष्ट्वा व्यापादितं सुतम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रनखाके वचन सुनकर शोक और क्रोधसे ताड़ित हुए महावेगशाली खरदूषणने स्वयं जाकर पुत्रको मरा देखा ॥२४॥


संपूर्णेन्दुसमानोऽपि पूर्वसारङ्गलोचनः । बभूव भीषणाकारो मध्यग्रीष्मार्कसन्निभः ॥२५॥

अर्थ: यद्यपि वह पहले मृगके समान नेत्रोंको धारण करनेवाला और पूर्ण चन्द्रमाके समान उज्ज्वल था तो भी पुत्रको मरा देख ग्रीष्म ऋतुके मध्याह्नकालीन सूर्यके समान भयंकर हो गया ॥२५॥


आगतश्च द्रुतं भूयः प्रविश्य भवनं निजम् । सुहृद्भिः सहितश्चक्रे स्वल्पकालप्रधारणम् ॥२६॥

अर्थ: उसने शीघ्र ही वापस आकर और अपने भवनमें प्रवेश कर मित्रोंके साथ स्वल्पकालीन मन्त्रणा की ॥२६॥


तत्र केचिद्द्रुतं प्रोचुः सचिवाः कर्कशाशयाः । राजकीयमभिप्रायं बुद्ध्वा सेवापरायणाः ॥२७॥

शम्बूकः साधितो येन खड्गरत्नं च हस्तितम् । असावुपेक्षितो राजन् वद किं न करिष्यति ॥२८॥

अर्थ: उनमें-से कठोर अभिप्रायके धारक तथा सेवामें तत्पर रहनेवाले कितने ही मन्त्री राजाका अभिप्राय जानकर शीघ्र ही कहने लगे कि जिसने शम्बुकको मारा है तथा खड्गरत्न हथिया लिया है । हे राजन् ! यदि उसकी उपेक्षा की जायेगी तो वह क्या नहीं करेगा ? ॥२७-२८॥


ऊचुरन्ये विवेकस्था नाथ नेदं लघुक्रियम् । सामन्तान् ढौकयाशेषान् रावणाय च कथ्यताम् ॥२९॥

अर्थ: कुछ विवेकी मन्त्री इस प्रकार बोले कि हे नाथ ! यह कार्य जल्दी करनेका नहीं है इसलिए सब सामन्तोंको बुलाओ और रावणको भी खबर दी जाये ॥२९॥


यस्यासिरत्नमुत्पन्नं सुसाध्यः स कथं भवेत् । तस्मात् संघातकार्येऽस्मिंस्त्वरा कर्तुं न युज्यते ॥३०॥

अर्थ: जिसे खड्गरत्न प्राप्त हुआ है वह सुखपूर्वक वशमें कैसे किया जा सकता है ? इसलिए मिलकर समूहके द्वारा करने योग्य इस कार्यमें उतावली करना ठीक नहीं है ॥३०॥


गुरुवाक्यानुरोधेन राक्षसाधिपसंविदे । दूतः संप्रेषितस्तेन युवा लङ्कां महाजवः ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर उसने गुरुजनोंके वचनोंके अनुरोधसे रावणको खबर देनेके लिए एक तरुण तथा वेगशाली दूत लंकाको भेजा ॥३१॥


राजधैर्यात् कुतोऽप्येष चिरं यावदवस्थितः । रावणस्यान्तिके दूतः कार्यसाधनतत्परः ॥३२॥

अर्थ: उधर कार्य सिद्ध करनेमें तत्पर रहनेवाला वह दूत, किसी राज्यधैर्यके कारण चिर काल तक रावणके पास बैठा रहा ॥३२॥


तीव्रक्रोधपरीतात्मा तावच्च खरदूषणः । अभाषत पुनः पुत्रगुणप्रेषितमानसः ॥३३॥

मायाविनिहतैः क्षुद्रैर्जन्तुभिर्भूमिगोचरैः । दिव्यसेनार्णवः क्षुब्धस्तरितुं नैव शक्यते ॥३४॥

अर्थ: इधर तीव्र क्रोधसे जिसकी आत्मा व्याप्त हो रही थी तथा जिसका मन पुत्रके गुणोंमें बार-बार जा रहा था ऐसा खरदूषण पुनः बोला कि मायासे रहित क्षुद्र भूमिगोचरी प्राणियोंके द्वारा, क्षोभको प्राप्त हुआ दिव्य सेनारूपी सागर नहीं तैरा जा सकता ॥३३-३४॥


धिगिदं शौर्यमस्माकं सहायान् यदि वाञ्छति । द्वितीयोऽपि कथं बाहुरिष्यते मम बाहुना ॥३५॥

अर्थ: हमारी इस शूरवीरताको धिक्कार है जो अन्य सहायकोंकी वांछा करती है । मेरी वह भुजा किस कामकी जो अपनी ही दूसरी भुजाकी इच्छा करती है ॥३५॥


इत्युक्त्वा परमं बिभ्रदभिमानं त्वरान्वितः । उत्पपात सुहृन्मध्यादाकाशं स्फुरिताननः ॥३६॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर जो परम अभिमानको धारण कर रहा था तथा क्रोधके कारण जिसका मुख कम्पित हो रहा था ऐसा शीघ्रतासे भरा खरदूषण मित्रोंके बीचसे उठकर आकाशमें जा उड़ा ॥३६॥


तमेकान्तपरं दृष्ट्वा सन्नद्धानि क्षणान्तरे । चतुर्दशसहस्राणि सुहृदां निर्ययुः पुरात् ॥३७॥

अर्थ: उसे हठमें तत्पर देख उसके चौदह हजार मित्र जो पहलेसे तैयार थे क्षण भरमें नगरसे बाहर निकल पड़े ॥३७॥


तस्य राक्षससैन्यस्य श्रुत्वा वादित्रनिस्वनम् । क्षुब्धसागरनिर्घोषं मैथिली त्रासमागता ॥३८॥

अर्थ: राक्षसोंकी उस सेनाके, क्षोभको प्राप्त हुए सागरके समान शब्दवाले वादित्रोंका शब्द सुनकर सीता भयको प्राप्त हुई ॥३८॥


किं किमेतदहो नाथ प्राहमित्युद्गतस्वनः । आलिङ्गितस्म जीवेशं वल्ली कल्पतरुं यथा ॥३९॥

अर्थ: हे नाथ ! यह क्या है ? क्या है ? इस प्रकार शब्दोंका उच्चारण करती हुई वह भर्तारसे उस प्रकार लिपट गयी जिस प्रकार कि लता कल्प वृक्षसे लिपट जाती है ॥३९॥


न भेत्तव्यं न भेत्तव्यं इति तां परिसान्त्व्य सः । अचिन्तयदयं कस्य भवेच्छब्दः सुदुर्धरः ॥४०॥

अर्थ: ‘नहीं डरना चाहिए, नहीं डरना चाहिए’ इस प्रकार उसे सान्त्वना देकर रामने विचार किया कि यह अत्यन्त दुर्धर शब्द किसका होना चाहिए ? ॥४०॥


रवः किमेष सिंहस्य भवेज्जलधरस्य वा । आहोस्विदम्बुनाथस्य पूरयत्यखिलं नभः ॥४१॥

अर्थ: क्या यह सिंहका शब्द है या मेघकी ध्वनि है अथवा समुद्रकी गर्जना समस्त आकाशको व्याप्त कर रही है ॥४१॥


उवाच च प्रिये नूनममी चतुरगामिनः । नादिनः प्रचलत्पक्षा राजहंसा नभोऽङ्गणे ॥४२॥

अर्थ: उन्होंने सीतासे कहा कि हे प्रिये ! जान पड़ता है ये मनोहर गमन करनेवाले तथा पंखोंको हिलानेवाले राजहंस पक्षी आकाशरूपी आँगनमें शब्द करते हुए जा रहे हैं ॥४२॥


किं वा दुष्टद्विजाः केचिदन्ये त्वद्भयकारिणः । समर्पय प्रिये चापं प्रलयं प्रापयाम्यमून् ॥४३॥

अर्थ: अथवा तुझे भय उत्पन्न करनेवाले कोई दूसरे दुष्ट पक्षी ही जा रहे हैं। हे प्रिये ! धनुष देओ, जिससे मैं इन्हें प्रलयको प्राप्त करा दूँ ॥४३॥


अथासन्नत्वमागच्छद् विविधायुधसंकुलम् । वातेरिताभ्रवृन्दाभं निरीक्ष्य सुमहद्बलम् ॥४४॥

जगाद राघवः किं नु नन्दीश्वरममी सुराः । जिनेन्द्रान् वन्दितुं भक्त्या प्रस्थिताः स्युर्महौजसः ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर नाना प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त, वायुसे प्रेरित मेघसमूहके समान दीखनेवाली बड़ी भारी सेनाकी समीपमें आती देख रामने कहा कि क्या ये महातेजके धारक देव भक्तिपूर्वक जिनेन्द्र देवकी वन्दना करनेके लिए नन्दीश्वर द्वीपको जा रहे हैं ॥४४-४५॥


आहो वंशस्थलं छित्वा हत्वा कमपि मानवम् । असिरत्ने गृहीतेऽस्मिन् प्राप्ता मायाविवैरिणः ॥४६॥

अर्थ: अथवा बाँसके भिड़ेको छेदकर तथा किसी मनुष्यको मारकर यह खड्गरत्न लक्ष्मणने लिया है सो मायावी शत्रु ही आ पहुँचे हैं ॥४६॥


दुश्शीलया तया नूनं स्त्रिया मायाप्रवीणया । निजाः संक्षोभिता एते स्युरस्मद्दुष्कृतिं प्रति ॥४७॥

अर्थ: अथवा जान पड़ता है कि उस दुराचारिणी मायाविनी स्त्रीने हम लोगोंको दुःख देनेके लिए आत्मीय जनोंको क्षोभित किया है ॥४७॥


नात्र युक्तमवज्ञातुं सैन्यमभ्यर्णतामितम् । इत्युक्त्वा कवचे दृष्टिं कार्मुके च न्यपातयत् ॥४८॥

अर्थ: अब निकटमें आयी हुई सेनाकी उपेक्षा करना उचित नहीं है ऐसा कहकर रामने कवच और धनुष पर दृष्टि डाली ॥४८॥


ततस्तमञ्जलिं कृत्वा सुमित्रातनयोऽगदत् । मयि स्थिते न संरम्भस्तव देव विराजते ॥४९॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने हाथ जोड़कर कहा कि हे देव ! मेरे रहते हुए आपका क्रोध करना शोभा नहीं देता ॥४९॥


संरक्ष राजपुत्रीं त्वं प्रत्यरातिं व्रजाम्यहम् । ज्ञेया च सिंहनादेन मम यद्यापदुद्भवेत् ॥५०॥

अर्थ: आप राजपुत्रीकी रक्षा कीजिए और मैं शत्रुकी ओर जाता हूँ । यदि मुझपर आपत्ति आवेगी तो मेरे सिंहनादसे उसे समझ लेना ॥५०॥


इत्युक्त्वा कङ्कटच्छन्नः समुपात्तमहायुधः । योद्धुमभ्युद्यतः श्रीमांल्लक्ष्मणः प्रत्यरिस्थितः ॥५१॥

अर्थ: इतना कहकर जो कवचसे आच्छादित हैं तथा जिसने महाशस्त्र धारण किये हैं ऐसे लक्ष्मण युद्धके लिए तत्पर हो शत्रुकी ओर मुख कर खड़े हो गये ॥५१॥


दृष्ट्वा तमुत्तमाकारं वीरं पुरुषपुंगवम् । पर्यस्तृणन् विहायःस्था जलदा इव पर्वतम् ॥५२॥

अर्थ: उत्तम आकारके धारक, मनुष्योंमें श्रेष्ठ तथा अतिशय शूरवीर उन लक्ष्मणको देखकर आकाशमें स्थित विद्याधरोंने उन्हें इस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार कि मेघ किसी पर्वतको घेर लेते हैं ॥५२॥


शक्तिमुद्गरचक्राणि कुन्तबाणांश्च खेचरैः । परिकीर्णान्यसौ सम्यक् शस्त्रैरेव न्यवारयत् ॥५३॥

अर्थ: विद्याधरोंके द्वारा चलाये हुए शक्ति, मुद्गर, चक्र, भाले और बाणोंका लक्ष्मणने अपने शस्त्रोंसे अच्छी तरह निवारण कर दिया ॥५३॥


निरुध्य सर्वशस्त्राणि खेचरैः प्रहितानि सः । वज्रदण्डान् शरान् मोक्तुं प्रवृत्तो व्योमगाहिनः ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर वे विद्याधरोंके द्वारा चलाये हुए समस्त शस्त्रोंको रोककर उनकी ओर वज्रमय बाण छोड़नेको तत्पर हुए ॥५४॥


एककेनैव सा तेन विद्याधरमहाचमूः । रुद्धा बाणैः कदिच्छेव विज्ञानैः संयतात्मना ॥५५॥

अर्थ: अकेले लक्ष्मणने विद्याधरोंकी वह बड़ी भारी सेना अपने बाणोंसे उस प्रकार रोक ली जिस प्रकार कि मुनि विशिष्ट ज्ञानके द्वारा खोटी इच्छाको रोक लेते हैं ॥५५॥


माणिक्यशकलाङ्कानि राजमानानि कुण्डलैः । पेतुः शिरांसि खाद् भूमौ खसरः कमलानि वा ॥५६॥

अर्थ: मणिखण्डोंसे युक्त तथा कुण्डलोंसे सुशोभित शत्रुओंके शिर आकाशरूपी सरोवरके कमलोंके समान कट-कटकर आकाशसे पृथिवीपर गिरने लगे ॥५६॥


शैलाभा द्विरदाः पेतुरश्वैः सह महाभटाः । कुर्वते निनदं भीमं संदृष्टरदवाससः ॥५७॥

अर्थ: पर्वतोंके समान बड़े-बड़े हाथी-घोड़ोंके साथ-साथ नीचे गिरने लगे तथा ओठोंको डँसनेवाले बड़े-बड़े योद्धा भयंकर शब्द करने लगे ॥५७॥


अयमस्य महान् लाभो निघ्नतस्तस्य तानभूत् । यदूर्ध्वगैः शरैर्योधान् विव्याध सहवाहनान् ॥५८॥

अर्थ: उन सबको मारते हुए लक्ष्मणको यह बड़ा लाभ हुआ कि वे ऊपरकी ओर जानेवाले बाणोंसे योद्धाओंको उनके वाहनोंके साथ ही छेद देते थे अर्थात् एक ही प्रहारमें वाहन और उनके ऊपर स्थित योद्धाओंको नष्ट कर देते थे ॥५८॥


अत्रान्तरे प्रतिप्राप्तः पुष्पकस्थो दशाननः । क्रुद्धः कृताशयो हन्तुं शम्बूकवधकारिणम् ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर इसी बीचमें शम्बूकके वधकर्ताको मारनेके लिए विचार करनेवाला, क्रोधसे भरा रावण पुष्पक विमानमें बैठकर वहाँ आया ॥५९॥


अपश्यच्च महामोहसंप्रवेशनकारिणीम् । रत्यरत्योः समुद्धर्त्रीं साक्षाल्लक्ष्मीमिव स्थिताम् ॥६०॥

अर्थ: आते ही उसने महामोहमें प्रवेश करानेवाली तथा रति और अरतिको धारण करनेवाली साक्षात् लक्ष्मीके समान स्थित सीताको देखा ॥६०॥


चन्द्रमःकान्तवदनां बन्धूकामवराधराम् । तनूदरीं च लक्ष्मीं च जलजच्छदलोचनाम् ॥६१॥

अर्थ: उस सीताका मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था, वह बन्धूक पुष्पके समान उत्तम ओष्ठोंको धारण करनेवाली थी, कृशांगी थी, लक्ष्मीके समान थी, कमलदलके समान उसके नेत्र थे ॥६१॥


महेभकुम्भशिखरप्रोत्तुङ्गविपुलस्तनीम् । यौवनोदयसंपन्नां सर्वस्त्रीगुणसद्गताम् ॥६२॥

अर्थ: किसी बड़े हाथीके गण्डस्थलके अग्रभागके समान उन्नत तथा स्थूल स्तन थे, वह यौवनके उदयसे सम्पन्न तथा समस्त स्त्री गुणोंसे सहित थी ॥६२॥


संहितामिव कामेन कान्तिज्यां दृष्टिसायकाम् । निजां चापलतां हन्तुं सुखेनैव यथेप्सितम् ॥६३॥

अर्थ: वह ऐसी जान पड़ती थी मानो इच्छित पुरुषको अनायास ही मारनेके लिए कामदेवके द्वारा धारण की हुई अपनी धनुषरूपी लता ही हो । कान्ति ही उस धनुष-रूपी लताकी डोरी थी और नेत्र ही उसपर चढ़ाये हुए बाण थे ॥६३॥


सर्वस्मृतिमहाचारीं रूपातिशयवर्तिनीम् । सीतां मनोभवोदारज्वरग्रहणकारिणीम् ॥६४॥

अर्थ: वह सबकी स्मृतिको चुराने-वाली थी, अत्यन्त रूपवती थी और कामरूपी महाज्वरको उत्पन्न करनेवाली थी ॥६४॥


तस्यामीक्षितमात्रायां क्रोधोऽस्य प्रलयं गतः । अजायतापरो भावश्चित्रा हि मनसो गतिः ॥६५॥

अर्थ: उसे देखते ही रावणका क्रोध नष्ट हो गया और दूसरा ही भाव उत्पन्न हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मनकी गति विचित्र है ॥६५॥


अचिन्तयच्च किं नाम जीवितं मेऽनया विना । अयुक्तस्यानया का वा श्रीर्मदीयस्य वेश्मनः ॥६६॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि इसके बिना मेरा जीवन क्या है ? और इसके विना मेरे घरकी शोभा क्या है ? ॥६६॥


इमामप्रतिमाकारां ललितां नवयौवनाम् । हराम्यद्यैव यावन्नो कश्चिज्जानात्युपागतम् ॥६७॥

अर्थ: इसलिए जबतक कोई मेरा आना नहीं जान लेता है तब-तक आज ही मैं इस अनुपम, नवयौवना सुन्दरीका अपहरण करता हूँ ॥६७॥


आरब्धुं प्रसभं कार्यं न मे शक्तिर्न विद्यते । किन्त्विदमीदृशं वस्तु यत्कौपीनत्वमर्हति ॥६८॥

अर्थ: यद्यपि इस कार्यको बलपूर्वक सिद्ध करनेकी शक्ति मुझमें विद्यमान है किन्तु यह कार्य ही ऐसा है कि छिपानेके योग्य है ॥६८॥


निवेदयन् गुणांस्तावल्लोकेऽलं याति लाघवम् । ईदृशान् किं पुनर्दोषान् ख्यापयन्नो प्रियो भवेत् ॥६९॥

अर्थ: लोकमें अपने गुणोंको प्रकट करनेवाला मनुष्य भी अत्यधिक लघुताको प्राप्त होता है फिर जो इस प्रकारके दोषोंको प्रकट करनेवाला है वह प्रिय कैसे हो सकता है ? ॥६९॥


वितत्य सकलं लोकं शशाङ्ककरनिर्मला । कीर्तिर्व्यवस्थिता मामूत् सैवं सति मलीमसा ॥७०॥

अर्थ: मेरी चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कीर्ति समस्त संसारमें व्याप्त होकर स्थित है सो वह ऐसा काम करनेपर मलिन न हो जाये ॥७०॥


तस्मादकीर्तिसंभूतिमकुर्वन् स्वार्थतत्परः । रहःप्रयत्नमारेभे लोको हि परमो गुरुः ॥७१॥

अर्थ: इसलिए अकीर्तिकी उत्पत्तिको बचाता हुआ वह स्वार्थसिद्ध करनेमें तत्पर हो एकान्तमें प्रयत्न करता है सो ठीक ही हे क्योंकि लोक परमगुरु है अर्थात् संसारके प्राणी बड़े चतुर हैं ॥७१॥


इति ध्यात्वावलोकिन्या विद्ययोपायमञ्जसा । विवेद हरणे तस्यास्तेषां नामकुलादि यत् ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उसने अवलोकिनी विद्याके द्वारा सीताके हरण करनेका वास्तविक उपाय जान लिया। राम-लक्ष्मण तथा सीताके नाम-कुल आदि सबका उसे ठीक-ठीक ज्ञान हो गया ॥७२॥


अयं स लक्ष्मणः ख्यातो बहुभिः कृतरोधनः । अयं स रामः सीतेयं सा गुणैः परिकीर्तिता ॥७३॥

अर्थ: जिसे अनेक लोग घेरे हुए हैं ऐसा यह वह लक्ष्मण है, यह राम है, और यह गुणोंसे प्रसद्धि सीता है ॥७३॥


अमुष्य व्यसनं कृत्वा सिंहनादं स धन्विनः । गरुत्मानिव गृध्रस्य सीतां पेशीमिवाददे ॥७४॥

अर्थ: इसके बाद उस रावणने इस धनुर्धारी रामके लिए आपत्तिस्वरूप सिंहनाद करके सीताको ऐसे पकड़ लिया जैसे गरुडपक्षी गीधके मुखकी मांसपेशीको ले लेता है ॥७४॥


जायावैरप्रदीप्तोऽयमजय्यः खरदूषणः । शक्त्यादिभिः क्षणादेतौ भ्रातरौ मारयिष्यति ॥७५॥

अर्थ: स्त्रीके वैरसे अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुआ यह खरदूषण अजेय है तथा शक्ति आदि शस्त्रोंसे इन दोनों भाइयोंको क्षण-भरमें मार डालेगा ॥७५॥


महाप्रकृष्टपूरस्य नदस्योदारंहसः । तटयोः पातने शक्तिः केन न प्रतिपद्यते ॥७६॥

अर्थ: जिसमें बहुत बड़ा पूर चढ़ रहा है तथा जिसका वेग अत्यन्त तीव्र है ऐसे नदमें दोनों तटोंको गिरानेकी शक्ति है यह कौन नहीं मानता है ? ॥७६॥


इति संचिन्त्य कामार्तः शिशुवत्स्वल्पमानसः । विषवन्मरणोपायं हरणं प्रति निश्चितः ॥७७॥

अर्थ: ऐसा विचारकर कामसे पीड़ित तथा बालकके समान विवेकशून्य हृदयको धारण करनेवाले रावणने सीताके हरण करनेका उस प्रकार निश्चय किया कि जिस प्रकार कोई मारनेके लिए विषपानका निश्चय करता है ॥७७॥


शस्त्रान्धकारिते जाते तयोरथ महाहवे । कृत्वा सिंहरवं रामरामेति च मुहुर्जगौ ॥७८॥

अर्थ: अथानन्तर जब लक्ष्मण और खरदूषणके बीच शस्त्रोंके अन्धकारसे युक्त महायुद्ध हो रह था तब रावणने सिंहनाद कर बार-बार राम ! राम !! इस प्रकार उच्चारण किया ॥७८॥


तं च सिंहरवं श्रुत्वा स्फुटं लक्ष्मणभाषितम् । प्रीत्यारतिमयात् पद्मो व्याकुलीभूतमानसः ॥७९॥

अर्थ: उस सिंहनादको सुनकर रामने समझा कि यह लक्ष्मणने ही किया है ऐसा विचारकर वे प्रीतिवश व्याकुलित चित्त हो अरतिको प्राप्त हुए ॥७९॥


निर्माल्यैर्जानकीं सम्यक् प्रच्छाद्यात्यन्तभूरिभिः । क्षणमेकं प्रिये तिष्ठ मा भैषीरिति संगदन् ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने सीताको अत्यधिक मालाओंसे अच्छी तरह ढक दिया और कहा कि हे प्रिये ! तुम क्षण-भर यहाँ ठहरो, भय मत करो ॥८०॥


वयस्यवनितां तावज्जटायू रक्ष यत्नतः । किंचिदस्मत्कृतं भद्र स्मरस्युपकृतं यदि ॥८१॥

अर्थ: सीतासे इतना कहनेके बाद उन्होंने जटायुसे भी कहा कि हे भद्र ! यदि तुम मेरे द्वारा किये हुए उपकारका स्मरण रखते हो तो मित्रकी स्त्रीकी प्रयत्न पूर्वक रक्षा करना ॥८१॥


इत्युक्त्वा वार्यमाणोऽपि शकुनैः क्रन्दनाकुलैः । सतीं मुक्त्वा जनेऽरण्ये वेगवान् प्राविशद् रणम् ॥८२॥

अर्थ: इतना कहकर यद्यपि क्रन्दन करनेवाले पक्षियोंने उन्हें रोका भी था तो भी वे निर्जन वनमें सीताको छोड़कर वेगसे युद्धमें प्रविष्ट हो गये ॥८२॥


अत्रान्तरे समागत्य विद्यालोकेन कोविदः । सीतामुत्क्षिप्य बाहुभ्यां नलिनीमिव वारणः ॥८३॥

कामदाहगृहीतात्मा विस्मृताशेषधर्मधीः । आरोपयितुमारेभे पुष्पकं गगनस्थितम् ॥८४॥

अर्थ: इसी बीचमें विद्याके आलोकसे निपुण रावण, कपालिनीको हाथीके समान दोनों भुजाओं-से सीताको उठाकर आकाशमें स्थित पुष्पक विमानमें चढ़ानेका प्रयत्न करने लगा। उस समय उसकी आत्मा कामकी दाहसे दग्ध ही रही थी तथा उसने समस्त धर्मबुद्धिको भुला दिया था ॥८३-८४॥


ह्रियमाणामथ प्रेक्ष्य स्वामिनो वनितां प्रियाम् । संरम्भवह्निदीप्तात्मा समुत्पत्य महाजवः ॥८५॥

तीक्ष्णकोटिभिरत्यन्तं जटायुर्नखलाङ्गलैः । दाशाननमुरःक्षेत्रं चकर्षासृक्समार्द्रितम् ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर स्वामीकी प्रिय वनिताको हरी जाती देख जिसकी आत्मा क्रोधाग्निसे प्रज्वलित हो रही थी ऐसा जटायु वेगसे आकाशमें उड़कर खूनसे गीले रावणके वक्षःस्थलरूपी खेतको अत्यन्त तीक्ष्ण अग्रभागको धारण करनेवाले नखरूपी हलोंके द्वारा जोतने लगा ॥८५-८६॥


परुषैश्छदनान्तैश्च वातसंपाटितांशुकैः । जघान जवनैर्भूयः सर्वकायमलं बलः ॥८७॥

अर्थ: तत्पश्चात् अतिशय बलवान् जटायुने वायुके द्वारा वस्त्रोंको फाड़नेवाले कठोर तथा वेगशाली पंखोंके आघातसे रावणके समस्त शरीरको छिन्न-भिन्न कर डाला ॥८७॥


इष्टवस्तुविघातेन रावणः कोपवानथ । हत्वा हस्ततलेनैव महीतलमजीगमत् ॥८८॥

अर्थ: तदनन्तर इष्ट वस्तुमें बाधा डालनेसे क्रोधको प्राप्त हुए रावणने हस्ततलके प्रहारसे ही जटायुको मारकर पृथ्वीतलपर भेज दिया अर्थात् नीचे गिरा दिया ॥८८॥


ततोऽसौ परुषाघाताद् विकलीभूतमानसः । कुर्वन् केकायितं दुःखी खगो मूर्च्छामुपागतः ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर कठोर प्रहारसे जिसका मन अत्यन्त विकल हो रहा था ऐसा दुःखसे भरा जटायु पक्षी कें-कें करता हुआ मूर्च्छित हो गया ॥८९॥


ततो निर्विघ्नमारोप्य पुष्पकं जनकात्मजाम् । जानानः संगतं कामं रावणः स्वेच्छया ययौ ॥९०॥

अर्थ: तत्पश्चात् बिना किसी विघ्न-बाधाके सीताको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर कामको ठीक जाननेवाला रावण इच्छानुसार चला गया ॥९०॥


ज्ञात्वापहृतमात्मानं रामरागातिशायनात् । सीता शोकवशीभूता विललापार्तनिस्वनात् ॥९१॥

अर्थ: सीताका राममें अत्यधिक राग था इसलिए अपने आपको अपहृत जान शोकके वशीभूत हो वह आर्तनाद करती हुई विलाप करने लगी ॥९१॥


ततः स्वपुरुषासक्तहृदयां कृतरोदनाम् । दृष्ट्वा सीतामभूत् किंचिद् विरागीव दशाननः ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर अपने भर्तामें जिसका चित्त आसक्त था ऐसी सीताको रोती देख रावण कुछ विरक्त-सा हो गया ॥९२॥


अचिन्तयच्च मे कास्था कृतेऽन्यस्यैव कस्यचित् । यदियं रौति सक्तासुः करुणं विरहाकुला ॥९३॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि इसके हृदयमें मेरे लिए आदर ही क्या है यह तो किसी दूसरेके लिए ही करुण रुदन कर रही है उसमें ही इसके प्राण आसक्त हैं तथा उसीके विरहसे आकुल हो रही है ॥९३॥


कीर्तयन्ती गुणान् भूयः राधूनामभिसंमतान् । पुरुषान्तरसंबन्धानतिशोकपरायणा ॥९४॥

अर्थ: सत्पुरुषोंको इष्ट हैं ऐसे अन्य पुरुष सम्बन्धी गुणोंका बार-बार कथन करती हुई यह अत्यन्त शोकके धारण करनेमें तत्पर है ॥९४॥


तत्किमेतेन खड्गेन मूढां व्यापादयाम्यमूम् । अथवा न स्त्रियं हन्तुं मम चेतः प्रवर्तते ॥९५॥

अर्थ: तो क्या इस खड्गसे इस मूर्खाको मार डालूँ अथवा नहीं, स्त्रीको मारनेके लिए चित्त प्रवृत्त नहीं होता ॥९५॥


न प्रसादयितुं शक्यः क्रुद्धः शीघ्रं नरेश्वरः । अभीष्टं लब्धुमथवा द्युतिर्वा कीर्तिरेव वा ॥९६॥

विद्या वाभिमता लब्धुं परलोकक्रियापि वा । प्रिया वा मनसो भार्या यद्वा किंचित् समीहितम् ॥९७॥

अर्थ: अथवा अधीर होनेकी बात नहीं है क्योंकि जो राजा कुपित होता है उसे शीघ्र ही प्रसन्न नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार इष्ट वस्तुका पाना, कान्ति अथवा कीर्तिका प्राप्त करना अभीष्ट विद्या, पारलौकिकी क्रिया, मनको आनन्द देनेवाली भार्या अथवा ओर भी जो कुछ अभिलषित पदार्थ हैं वे सहसा प्राप्त नहीं हो जाते - उन्हें प्राप्त करने के लिए समय लगता ही है ॥९६-९७॥


साधूनामग्रतः पूर्वं व्रतमेतन्मयार्जितम् । अप्रसन्ना न भोक्तव्या परस्य स्त्री-मयेति च ॥९८॥

अर्थ: मैंने साधुओंके समक्ष पहले यह नियम लिया था कि जो परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी, मुझपर प्रसन्न नहीं रहेगी मैं उसका उपभोग नहीं करूँगा ॥९८॥


रक्षन्निदं व्रतं तस्मात् प्रसादं प्रापयाम्यमुम् । भविष्यत्यनुकूलेयं कालेन मम संपदा ॥९९॥

अर्थ: इसलिए इस व्रतकी रक्षा करता हुआ मैं इसे प्रसन्नताको प्राप्त कराता हूँ, सम्भव है कि यह समय पाकर मेरी सम्पदाके कारण मेरे अनुकूल हो जावेगी ॥९९॥


इति संचिन्त्य तामङ्कात्तले स्वस्मिन्नतिष्ठिपत् । प्रतीक्षते हि तत्कालं मृत्युः कर्मप्रचोदितः ॥१००॥

अर्थ: ऐसा विचार कर रावणने सीताको गोदसे हटाकर अपने समीप ही बैठा दिया सो ठीक ही है क्योंकि कर्मसे प्रेरित मृत्यु उसके योग्य समयकी प्रतीक्षा करती ही है ॥१००॥


अथेषुवारिधाराभिराकुलं रणमण्डलम् । प्रविष्टं राममालोक्य सुमित्रातनयोऽगदत् ॥१०१॥

अर्थ: अथानन्तर बाणरूपी जलकी धाराओंसे आकुल युद्धके मैदानमें रामको प्रविष्ट देख लक्ष्मण ने कहा ॥१०१॥


हा कष्टं देव कस्मात् त्वं भूमिमेतामुपागतः । एकाकीं मैथिलीं मुक्त्वा विपिने विघ्नसंकुले ॥१०२॥

अर्थ: कि हाय देव ! बड़े दुःखकी बात है आप विघ्नोंसे व्याप्त वनमें सीताको अकेली छोड़ इस भूमिमें किस लिए आये ? ॥१०२॥


तेनोक्तस्त्वद्रवं श्रुत्वा प्राप्तोऽस्मि त्वरयान्वितः । सोऽवोचद् गम्यतां शीघ्रं न साधु भवता कृतम् ॥१०३॥

अर्थ: रामने कहा कि मैं तुम्हारा शब्द सुनकर शीघ्रतासे यहाँ आया हूँ । इसके उत्तरमें लक्ष्मणने कहा कि आप शीघ्र ही चल जाइए, आपने अच्छा नहीं किया ॥१०३॥


सर्वथा परमोत्साहो जय त्वं बलिनं रिपुम् । इत्युक्त्वा शङ्कया युक्तो जानकीं प्रति चञ्चलः ॥१०४॥

अर्थ: ‘परम उत्साहसे भरे हुए तुम बलवान् शत्रुको सब प्रकारसे जीतो’ इस प्रकार कहकर शंकासे युक्त तथा चंचलचित्तके धारक राम जानकीकी ओर वापस चले गये ॥१०४॥


क्षणान्निवर्तते यावत् तावत्तत्र न दृश्यते । सीतेति हतवचेतो रामश्च्युतममन्यत ॥१०५॥

अर्थ: जब राम क्षण-भरमें वहाँ वापस लौटे तब उन्हें सीता नहीं दिखाई दी । इस घटनासे रामने अपने चित्तको नष्ट हुआ-सा अथवा च्युत हुआ-सा माना ॥१०५॥


ही सीत इति भाषित्वा मूर्च्छितो धरणीमगात् । भर्त्रा तेन परिष्वक्ता सा बभूव विभूषिता ॥१०६॥

अर्थ: हा सीते ! इस प्रकार कहकर राम मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े और भर्ताके द्वारा आलिंगित भूमि सुशोभित हो उठी ॥१०६॥


संज्ञां प्राप्य ततो दृष्टिं निक्षिपन् वृक्षसंकुले । इति प्रेमपरीतात्मा जगादात्यन्तमाकुलः ॥१०७॥

अर्थ: तदनन्तर जब संज्ञाको प्राप्त हुए तब वृक्षोंसे व्याप्त वनमें इधर-उधर दृष्टि डालते हुए प्रेमपूर्ण आत्माके धारक राम, अत्यन्त व्याकुल होते हुए इस प्रकार कहने लगे ॥१०७॥


अयि देवि क्व यातासि प्रयच्छ वचनं द्रुतम् । चिरं किं प्रतिहास्येन दृष्टासि तरुमध्यगा ॥१०८॥

अर्थ: कि हे देवि ! तुम कहाँ चली गयी हो ? शीघ्र ही वचन देओ। चिरकाल तक हँसी करनेसे क्या लाभ है ? मैंने तुम्हें वृक्षोंके मध्य चलती हुई देखा है ॥१०८॥


एह्यागच्छ-(प्र)-यातोऽस्मि कार्यं कोपेन किं प्रिये । जानास्येव चिरं कोपात्तव देवि न मे सुखम् ॥१०९॥

अर्थ: हे प्रिये ! आओ-आओ, मैं प्रयाण कर रहा हूँ, क्रोध करनेसे क्या प्रयोजन है ? हे देवि ! तुम यह जानती ही हो कि दीर्घकाल तक तुम्हारे क्रोध करनेसे मुझे सुख नहीं होता है ॥१०९॥


एवं कृतध्वनिर्भ्राम्यन् प्रदेशं तं सुगह्वरम् । गृध्रं मुमूर्षुमैक्षिष्ट कृतकेकास्वनं शनैः ॥११०॥

अर्थ: इस प्रकार शब्द करने तथा गुफाओंसे युक्त उस स्थानमें भ्रमण करते हुए रामने धीरे-धीरे कें-कें करते हुए मरणोन्मुख जटायुको देखा ॥११०॥


ततोऽत्यन्तविषण्णात्मा म्रियमाणस्य पक्षिणः । कर्णजापं ददौ प्राप्तस्स तेनामरकायताम् ॥१११॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त दुःखित होकर रामने उस मरणोन्मुख पक्षीके कानमें णमोकार मन्त्रका जाप दिया और उसके प्रभावसे वह पक्षी देवपर्यायको प्राप्त हुआ ॥१११॥


तस्मिन् कालगते पद्मः शोकार्तः केवले वने । वियोगदहनव्यासः पुनर्मूर्छामशिश्रियत् ॥११२॥

अर्थ: वियोगाग्निसे व्याप्त राम उस पक्षी- के मरनेपर शोकसे पीड़ित हो निर्जन वनमें पुनः मूर्च्छाको प्राप्त हो गये ॥११२॥


समाश्वस्य च सर्वत्र न्यस्य दृष्टिं समाकुलः । दीनं ललाप नैराश्याद् भूतेनेवार्तमानसः ॥११३॥

अर्थ: जब सचेत हुए तब सब ओर दृष्टि डालकर निराशताके कारण व्याकुल तथा खिन्न चित्त होकर करुण विलाप करने लगे ॥११३॥


रन्ध्रं प्राप्य वने भीमे हा केनास्मि दुरात्मना । हरता जानकीं कष्टं हतो दुष्कर्मकारिणा ॥११४॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हाय-हाय भयंकर वनमें छिद्र पाकर कठोर कार्य करनेवाले किसी दुष्टने सीताका हरण कर मुझे नष्ट किया है ॥११४॥


दर्शयंस्तामथोत्सृष्टां हरन् शोकमशेषतः । को नाम बान्धवत्वं मे वनेऽस्मिन् परमेष्यति ॥११५॥

अर्थ: अब बिछुड़ी हुई उस सीताको दिखाकर समस्त शोकको दूर करता हुआ कौन व्यक्ति इस वनमें मेरे परम बान्धवपनेको प्राप्त होगा ॥११५॥


भो वृक्षाश्चम्पकच्छाया सरोजदललोचना । सुकुमाराङ्गिका भीरुस्वभावा वरगामिनी ॥११६॥

चित्तोत्सवकरी पद्मरजोगन्धिमुखानिला । अपूर्वा यौषिती सृष्टिर्दृष्टा स्यात् काचिदङ्गना ॥११७॥

अर्थ: हे वृक्षो ! क्या तुमने कोई ऐसी स्त्री देखी है ? जिसकी चम्पाके फूलके समान कान्ति है, कमलदलके समान जिनके नेत्र हैं, जिसका शरीर अत्यन्त सुकुमार है, जो स्वभावसे भीरु है, उत्तम गतिसे युक्त है, हृदयमें आनन्द उत्पन्न करनेवाली है, जिसके मुखकी वायु कमलकी परागके समान सुगन्धित है तथा जो स्त्रीविषयक अपूर्व सृष्टि है ॥११६-११७॥


कथं निरुत्तरा यूयमित्युक्त्वा तद्गुणैर्हृतः । पुनर्मूर्छापरीतात्मा धरणीतलमागमत् ॥११८॥

अर्थ: अरे तुम लोग निरुत्तर क्यों हो ? इस प्रकार कहकर उसके गुणोंसे आकृष्ट हुए राम पुनः मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥११८॥


समाश्वास्य च संक्रुद्धो वज्रावर्तं महाधनुः । आयोप्यास्फालयन्मुक्तं टङ्कारगुरुनिस्वनम् ॥११९॥

सिंहानां भीतिजननं नृसिंहः सिंहनिस्वनम् । मुमोच मुहुरत्युग्रमुत्कर्णद्विरदश्रुतम् ॥१२०॥

अर्थ: जब सचेत हुए तब कुपित हो वज्रावर्त नामक महाधनुषको चढ़ाकर टंकारका विशाल शब्द करते हुए आस्फालन करने लगे । उसी समय नरश्रेष्ठ रामने बार-बार अत्यन्त तीक्ष्ण सिंहनाद किया । उनका वह सिंहनाद सिंहोंको भय उत्पन्न करनेवाला था तथा हाथियोंने कान खड़े कर उसे डरते-डरते सुना था ॥११९-१२०॥


भूयो विषादमागत्य त्यक्तचापोत्तरीयकम् । उपविश्य प्रमादं स्वं शुशोच फलितं क्षणात् ॥१२१॥

अर्थ: पुनः विषादको प्राप्त होकर तथा धनुष और उत्तरच्छदको उतारकर बैठ गये और तत्काल ही फल देनेवाले अपने प्रमादके प्रति शोक करने लगे ॥१२१॥


दुःश्रुत्य दुर्विमर्शेण भजता त्वरितां गतिम् । धर्मधीरिव मूढेन हारिता हा मया प्रिया ॥१२२॥

अर्थ: हाय-हाय जिस प्रकार मोही मनुष्य धर्मबुद्धिको हरा देता है उसी प्रकार लक्ष्मणके सिंहनादको अच्छी तरह नहीं श्रवण कर विचारके बिना ही शीघ्रतासे जाते हुए मैंने प्रियाको हरा दिया है ॥१२२॥


मानुषत्वं परिभ्रष्टं गहने भवसंकटे । प्राप्तुमत्यद्भुतं भूयः प्राणिनाशुभकर्मणा ॥१२३॥

त्रैलोक्यगुणवद्रत्नं पतितं निम्नगापतौ । लभेत कः पुनर्धन्यः कालेन महताप्यलम् ॥१२४॥

अर्थ: जिस प्रकार संसाररूपी वनमें एक बार छूटा हुआ मनुष्य भव, अशुभकार्य करनेवाले प्राणीको पुनः प्राप्त करना कठिन है उसी प्रकार प्रियाका पुनः पाना कठिन है । अथवा समुद्रमें गिरे हुए त्रिलोकी मूल्यरत्नको कौन भाग्यशाली मनुष्य दीर्घकालमें भी पुनः प्राप्त कर सकता है ? ॥१२३-१२४॥


वनितामृतमेतन्मे कराङ्कस्थं महागुणम् । प्रणष्टं संगतिं भूयः केनोपायेन यास्यति ॥१२५॥

अर्थ: यह महागुणोंसे युक्ता वनितारूपी अमृत मेरे हाथमें स्थित होनेपर भी नष्ट हो गया है सो अब पुनः किस उपायसे प्राप्त हो सकेगा ? ॥१२५॥


वनेऽस्मिन् जननिर्मुक्ते कस्य दोषः प्रदीयते । नूनं मत्त्यागकोपेन क्वापि याता तपस्विनी ॥१२६॥

अर्थ: इस निर्जन वनमें किसे दोष दिया जाये ? जान पड़ता है कि मैं उसे छोड़कर गया था इसी क्रोधसे वह बेचारी कहीं चली गयी है ॥१२६॥


अरण्ये निर्मनुष्येऽस्मिन्कमुपेत्य प्रसाद्य च । पृच्छामि दुष्कृताचारो यो मे वार्तां निवेदयेत् ॥१२७॥

अर्थ: मैं पापचारी निर्जन वनमें किसके पास जाकर तथा उसे प्रसन्न कर पूछूँ जो मुझे प्रियाका समाचार बता सके ॥१२७॥


इयं ते प्राणतुल्येति चेतःश्रवणयोः परम् । कुर्यात्प्रह्लादनं को मे वचसामृतदायिना ॥१२८॥

अर्थ: “यह तुम्हारी प्राणतुल्य प्रिया है” इस प्रकार अमृतको प्रदान करनेवाले वचनसे कौन पुरुष मेरे मन और कानोंको परम आनन्द प्रदान कर सकता है ? ॥१२८॥


दयावानीदृशः कोऽस्मिन् लोके पुरुषपुंगवः । यो मे स्मिताननां कान्तां दर्शयेदघवर्जिताम् ॥१२९॥

अर्थ: इस संसारमें ऐसा कौन दयालु श्रेष्ठ पुरुष है जो मेरी मुसकुराती हुई निष्पाप कान्ताको मुझे दिखला सकता है ? ॥१२९॥


हृदयागारमुद्दीप्तं कान्ताविरहवह्निना । उदन्तजलदानेन को मे निर्वापयिष्यति ॥१३०॥

अर्थ: प्रियाके विरहरूपी अग्निसे जलते हुए मेरे हृदयरूपी घरको कौन मनुष्य समाचाररूपी जल देकर शान्त करेगा ? ॥१३०॥


इत्युक्त्वा परमोद्विग्नो महीनिहितलोचनः । असकृत् किमपि ध्यायंस्तस्थौ निश्चलविग्रहः ॥१३१॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर जो परम उद्वेगको प्राप्त थे, पृथ्वीपर जिनके नेत्र लग रहे थे, और जिनका शरीर अत्यन्त निश्चल था ऐसे राम बार-बार कुछ ध्यान करते हुए बैठे थे ॥१३१॥


अथ नात्यन्तदूरस्थचक्रवाकीस्वनं कलम् । समाकर्ण्य दृशं तस्या श्रवणं च न्यधापयत् ॥१३२॥

अर्थ: अथानन्तर कुछ ही दूरीपर उन्होंने चकवीका मनोहर शब्द सुना सो सुनकर उस दिशामें दृष्टि तथा कान दोनों ही लगाये ॥१३२॥


अचिन्तयदमुष्याद्रेस्तत्संगे गन्धसूचितम् । किमिदं पङ्कजवनं भवेद्याता कुतूहलात् ॥१३३॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि इस पर्वतके समीप ही गन्धसे सूचित होनेवाला कमल वन है सो क्या वह कुतूहलवश उस कमल वनमें गयी होगी ? ॥१३३॥


दृष्टपूर्वं मनोहारि नानाकुसुमसंकुलम् । स्थानं हरति चेतोऽस्याः कदाचित्क्षणमात्रकम् ॥१३४॥

अर्थ: नाना प्रकारके फूलोंसे व्याप्त तथा मनको हरण करनेवाला वह स्थान उसका पहलेसे देखा हुआ है सो सम्भव है कि वह कदाचित् क्षण-भरके लिए उसके चित्तको हर रहा हो ॥१३४॥


जगाम च तमुद्देशं यावच्चक्राह्वसुन्दरी । मया विना क्व यातीति पुनरुद्वेगमागमत् ॥१३५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर वे उस स्थानपर गये जहाँ चकवी थी। फिर ‘मेरे बिना वह कहाँ जाती है’ यह विचारकर वे पुनः उद्वेगको प्राप्त हो गये ॥१३५॥


भो भो महीधराधीश ! धातुभिर्विविधैश्चित ! सूनुर्दशरथस्य त्वां पद्माख्यः परिपृच्छते ॥१३६॥

अर्थ: अब वे पर्वतको लक्ष्य कर कहने लगे कि हे नाना प्रकारकी धातुओंसे व्याप्त पर्वतराज ! राजा दशरथका का पुत्र पद्म ( राम ) तुमसे पूछता है ॥१३६॥


विपुलस्तननम्राङ्गा बिम्बोष्ठी हंसगामिनी । सन्नितम्बा भवेद् दृष्टा सीता मे मनसः प्रिया ॥१३७॥

अर्थ: कि जिसका शरीर स्थूल स्तनोंसे नम्रीभूत है, जिसके ओठ बिम्बके समान हैं। जो हंसके समान चलती है तथा जिसके उत्तम नितम्ब हैं ऐसी मनको आनन्द देनेवाली सीता क्या आपने देखी है ? ॥१३७॥


दृष्टादृष्टेति किं वक्षि ब्रूहि ब्रूहि क्व सा क्व सा । केवलं निगदस्येवं प्रतिशब्दोऽयमीदृशः ॥१३८॥

अर्थ: उसी समय पर्वतसे टकराकर रामके शब्दोंकी प्रतिध्वनि निकली जिसे सुनकर उन्होंने कहा कि क्या तुम यह कह रहे हो कि हाँ देखी है देखी है तो बताओ वह कहाँ है ? कहाँ है ? कुछ समय बाद निश्चय होनेपर उन्होंने कहा कि तुम तो केवल ऐसा ही कहते हो जैसा कि मैं कह रहा हूँ जान पड़ता है यह इस प्रकारकी प्रतिध्वनि हो है ॥१३८॥


इत्युक्त्वा पुनरध्यासीत् किमदृष्टेन चोदिता । कृतान्तशत्रुणा बाला समासन्ना सती सती ॥१३९॥

चण्डोर्मिमालयाऽत्यन्तं वेगवत्याविवेकया । कान्ता हृता भवेन्नद्या विद्येव दुरितेच्छया ॥१४०॥

अर्थ: इतना कहकर वे पुनः विचार करने लगे कि वह सती बाला दुर्दैवसे प्रेरित होकर कहाँ गयी होगी ? जिस प्रकारकी इच्छा विद्याको हर लेती है उसी प्रकार जिसमें बड़ी-बड़ी तीक्ष्ण तरंगें उठ रही हैं। जो अत्यन्त वेगसे बहती है तथा जिसमें विवेक नहीं है ऐसी नदीने कहीं प्रियाको नहीं हर लिया हो ॥१३९-१४०॥


किंवाऽत्यन्तक्षुधार्तेन नितान्तक्रूरचेतसा । इमारिणा भवेद्भुक्ता साधुवर्गस्य वत्सला ॥१४१॥

अर्थ: अथवा अत्यन्त भूखसे पीड़ित तथा अतिशय क्रूर चित्तके धारक किसी सिंहने साधुओंके साथ स्नेह करनेवाली उस प्रियाको खा लिया है ॥१४१॥


पशोर्मीमैककार्यस्य सिंहस्योत्केसरस्य सा । म्रियते दृष्टिमात्रेण नखादिस्पर्शनाद्विना ॥१४२॥

अर्थ: जिसका कार्य अत्यन्त भयंकर है तथा जिसकी गरदनके बाल खड़े हुए हैं ऐसे सिंहके देखने मात्रसे नखादिके स्पर्शके बिना ही वह मर गयी होगी ॥१४२॥


भ्राता मम मृधे भीमे लक्ष्मणः संशयं श्रितः । सीतया विरहश्चायं तेन जानामि नो रतिम् ॥१४३॥

अर्थ: मेरा भाई लक्ष्मण भयंकर युद्धमें संशयको प्राप्त है और इधर यह सीताके साथ विरह आ पड़ा है इससे मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता ॥१४३॥


जीवलोकमिमं वेद्मि सकलं प्राप्तसंशयम् । जानामि च पुनः शून्यमहो दुःखस्य चित्रता ॥१४४॥

अर्थ: मैं इस समस्त संसारको संशयमें पड़ा जानता हूँ अथवा ऐसा जान पड़ता है कि समस्त संसार शून्य दशाको प्राप्त हुआ है सो ठीक ही है क्योंकि दुःखकी बड़ी विचित्रता है ॥१४४॥


दुःखस्य यावदेकस्य नावसानं व्रजाम्यहम् । द्वितीयं तावदायातमहो दुःखार्णवो महान् ॥१४५॥

अर्थ: जबतक मैं एक दुःखके अन्तको प्राप्त नहीं हो पाता हूँ तबतक दूसरा दुःख आ पड़ता है। अहो ! यह दुःखरूपी सागर बहुत विशाल है ॥१४५॥


खञ्जपादस्य खण्डोऽयं हिमदग्धस्य पावकः । स्खलितस्यावटे पातः प्रायोऽनर्था बहुत्वगाः ॥१४६॥

अर्थ: प्रायः देखा जाता है कि जो पैर लँगड़ा होता है उसीमें चोट लगती है, जो वृक्ष तुषारसे सूख जाता है उसीमें आग लगती है और जो फिसलता है वही गर्तमें पड़ता है प्रायः करके अनर्थ बहु संख्यामें आते हैं ॥१४६॥


ततः पर्यट्य विपिने पश्यन्मृगगरुत्मतः । विवेश स्वाश्रयं भूयः श्रिया शून्यमरण्यकम् ॥१४७॥

अर्थ: तदनन्तर वनमें भ्रमण कर मृग और पक्षियोंको देखते हुए राम अपने रहनेके स्थानस्वरूप वनमें पुनः प्रविष्ट हुए। वह वन उस समय सीताके बिना शोभासे शून्य जान पड़ता था ॥१४७॥


अत्यन्तदीनवदनः कृत्वा निर्ज्यां धनुर्लताम् । सितश्लक्ष्णपटच्छिन्नस्तस्थौ पर्यस्य भूतले ॥१४८॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका मुख अत्यन्त दीन था तथा जिन्होंने सफेद और महीन वस्त्र ओढ़ रखा था ऐसे राम धनुषको डोरी रहित कर पृथिवीपर पड़ रहे ॥१४८॥


भूयो भूयो बहु ध्यायन् क्षणनिश्चलविग्रहः । निराशतां परिप्राप्तः सूत्कारमुखराननः ॥१४९॥

अर्थ: वे बार-बार बहुत देर तक ध्यान करते रहते थे, क्षण-क्षणमें उनका शरीर निश्चल हो जाता था, वे निराशताको प्राप्त थे तथा सूत्कार शब्दसे उनका मुख शब्दायमान हो रहा था ॥१४९॥


महानरानिति पुरुदुःखलङ्घितान् पुराकृतादसुकृतकर्मजृम्भणात् । अहो जना भृशमवलोक्य दीयतां मतिः सदा जिनवरधर्मकर्मणि ॥१५०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो जनो ! इस प्रकार पूर्वोपार्जित पाप कर्मके उदयसे बड़े-बड़े पुरुषोंको अतिशय दुःखी देख, जिनेन्द्र कथित धर्ममें सदा बुद्धि लगाओ ॥१५०॥


न ये भवप्रभवविकारसंगतेः पराङ्मुखा जिनवचनान्युपासते ।
वशीकृतान् शरणविवर्जितानमून् तपत्यलं स्वकृतरविः सुदुस्सहः ॥१५१॥

अर्थ: जो मनुष्य संसार सम्बन्धी विकारोंकी संगतिसे दूर रहकर जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंको उपासना नहीं करते हैं उन शरणरहित तथा इन्द्रियोंके वशीभूत मनुष्योंको अपना पूर्वोपार्जित कर्मरूपी दुःसह सूर्य सदा सन्तप्त करता रहता है ॥१५१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते सीताहरणरामविलापाभिधानं
नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४४॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें सीताहरण और
रामविलापका वर्णन करनेवाला चौवालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४४॥


४५. पञ्चचत्वारिंशत्तमं पर्व (सीतावियोगदाहाभिधानं)

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः पूर्वशिष्टो विराधितः । समेतः सचिवैश्शूरैः संनद्धः शस्त्रसंकुलः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें जिसका पहले उल्लेख किया गया था ऐसा खरदूषणका शत्रु विराधित, मन्त्रियों और शूर-वीरोंसे सहित अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित हो वहाँ आया ॥१॥


एकाकिनमसौ ज्ञाता युद्धयमानं महानरम् । स्वार्थसंसिद्धिसंभूतिं दीप्यमानं महौजसा ॥२॥

अर्थ: उसने महातेजसे देदीप्यमान लक्ष्मणको अकेला युद्ध करते देख महापुरुष समझा और यह निश्चय किया कि इससे हमारे स्वार्थकी सिद्धि होगी ॥२॥


जानुं क्षितितले न्यस्य मूर्द्धन्यस्तकरद्वयः । अब्रवीदिति नम्राङ्गः परमं विनयं वहन् ॥३॥

नाथ ! भक्तोऽस्मि ते किंचिद्विज्ञाप्यं श्रूयतां मम । त्वद्विधानां हि संसर्गो निकारक्षयकारणम् ॥४॥

अर्थ: पृथिवीतलपर घुटने टेककर तथा मस्तकपर दोनों हाथ लगाकर परम विनयको धारण करनेवाले विराधितने नम्र होकर इस प्रकार कहा कि हे नाथ ! मैं आपका भक्त हूँ। मुझे आपसे कुछ निवेदन करना है सो सुनिए क्योंकि आप-जैसे महापुरुषोंकी संगति दुःखक्षयका कारण है ॥३-४॥


कृतार्धभाषणस्यास्य करं विन्यस्य मस्तके । पृष्ठतस्तिष्ठ माभैषीरित्यवोचत लक्ष्मणः ॥५॥

अर्थ: विराधित आधी बात ही कह पाया था कि लक्ष्मणने उसके मस्तकपर हाथ रखकर कहा कि हमारे पीछे खड़े हो जाओ ॥५॥


ततः प्रणम्य भूयोऽसौ महाविस्मयसंगतः । जगाद क्षणसंजातमहातेजाः प्रियं वचः ॥६॥

महाशक्तिमिमं शत्रुं त्वमेकं विनिवारय । रणाजिरे भटान् शेषान् निधनं प्रापयाम्यहम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर जो महाआश्चर्यसे युक्त था और जिसे तत्काल महातेज उत्पन्न हुआ था ऐसा विराधित पुनः प्रणाम कर प्रिय वचन बोला कि इस महाशक्तिशाली एक शत्रु - खरदूषणको तो आप निवारण करो और युद्धके आँगनमें जो अन्य योद्धा हैं मैं उन सबको मृत्यु प्राप्त कराता हूँ ॥६-७॥


इत्युक्त्वा दौषणं सैन्यं तेन शीघ्रं विराधितम् । अधावद् बलसंपन्नः प्रह्लद्धेतिसंहतिः ॥८॥

अर्थ: इतना कहकर उसने शीघ्र ही खरदूषणकी सेनाको नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया । वह सेनाके साथ लहलहाते शस्त्रोंके समूहसे युक्त हो खरदूषणकी सेनाकी ओर दौड़ा ॥८॥


उवाच च चिरात् सोऽहं चन्द्रोदरनृपात्मजः । प्राप्तो विराधितः ख्यातो रणातिथ्यसमुत्सुकः ॥९॥

अर्थ: उसने जाकर कहा कि मैं राजा चन्द्रोदरका पुत्र विराधित युद्धमें आतिथ्य पानेके लिए उत्सुक हुआ चिरकाल बाद आया हूँ ॥९॥


क्वेदानीं गम्यते साधु स्थीयतां युद्धशौण्डिकैः । अद्य तद्वः प्रदास्यामि यत्कृतान्तोऽतिदारुणः ॥१०॥

अर्थ: अब कहाँ जाइएगा ? जो युद्धमें शूर-वीर हैं वे अच्छी तरह खड़े हो जावें । आज मैं आप लोगोंको वह फल दूँगा जो कि अत्यन्त दारुण - कठोर यमराज देता है ॥१०॥


इत्युक्ते वैरसंपन्नो भटानामतिसंकुलः । बभूव शस्त्रसंपातः सुमहात्र जनसंक्षयः ॥११॥

अर्थ: इतना कहते ही दोनों ओरके योद्धाओंमें वैर भरा तथा मनुष्योंका सहारा करनेवाला बहुत भारी शस्त्रोंका सम्पात होने लगा - दोनों ओरसे शस्त्रोंकी वर्षा होने लगी ॥११॥


पत्तयः पत्तिभिर्लग्नाः सादिनः सादिभिः समम् । गजिनो गजिभिः सत्रा रथिनो रथिभिः सह ॥१२॥

अर्थ: पैदल पैदलोंसे, घुड़सवार घुड़सवारोंसे, गजसवार गजसवारोंसे और रथसवार रथसवारोंके साथ भिड़ गये ॥१२॥


परस्परकृताह्वानैरति संहर्षिभिर्भटैः । संकुलैर्जनिते युद्धे कृत्तान्योन्यमहायुधैः ॥१३॥

रणाजिरे परं तेजो भजमानो नवं नवम् । दिव्यकार्मुकमुद्यम्य शरच्छन्नदिगम्बरः ॥१४॥

खरेण सह संग्रामं चक्रे परमभैरवम् । लक्ष्मीधरः शुनासीरः स्वामिनेव सुरद्विषाम् ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर जो परस्पर एक दूसरेको बुला रहे थे, जो अत्यन्त हर्षित हो रहे थे, जो अत्यन्त संकुल - व्यग्र थे और जिन्होंने एक दूसरेके बड़े-बड़े शस्त्र काट दिये थे ऐसे योद्धाओंके द्वारा उधर महायुद्ध हो रहा था इधर रणके मैदानमें नवीन-नवीन परम तेजको धारण करनेवाला लक्ष्मण, दिव्यधनुष उठाकर बाणोंसे दिशाओं और आकाशको व्याप्त करता हुआ खरके साथ उस तरह अत्यन्त भयंकर युद्ध कर रहा था जिस तरह कि इन्द्र दैत्येन्द्रके साथ करता था ॥१३-१५॥


ततः क्रोधपरीतेन खरेण खरनिस्वनम् । अवाचि लक्ष्मणः संख्ये स्फुरल्लोहितचक्षुषा ॥१६॥

ममात्मजमुदासीनं हत्वा परमचापल । कान्ताकुचौ च संमृश्य पापाद्यापि क्व गम्यते ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे व्याप्त एवं चंचल और लाल-लाल नेत्रोंको धारण करनेवाले खरदूषणने कठोर शब्दोंमें लक्ष्मणसे कहा कि हे अतिशय चपल पापी ! मेरे निर्वैर पुत्रको मारकर तथा मेरी स्त्रीके स्तनोंका स्पर्श कर अब तू कहाँ जाता है ? ॥१६-१७॥


अद्य ते निशितैर्बाणैर्जीवितं नाशयाम्यहम् । कृत्वा तथाविधं कर्म फलं तस्यानुभूयताम् ॥१८॥

अर्थ: आज तीक्ष्ण बाणोंसे तेरा जीवन नष्ट करता हूँ । तूने जैसा कर्म किया है वैसा फल भोग ॥१८॥


अत्यन्तक्षुद्र निर्लज्ज परस्त्रीसंगलोलुप । ममाभिमुखतां गत्वा परलोकं व्रजाधुना ॥१९॥

अर्थ: हे अत्यन्त क्षुद्र ! निर्लज्ज ! परस्त्री संगका लोलुप ! अब मेरे सम्मुख आकर परलोकको प्राप्त हो ॥१९॥


ततस्तैः परुषैर्वाक्यैः समुद्दीपितमानसः । उवाच लक्ष्मणो वाचं पूरयन् सकलं नभः ॥२०॥

किं वृथा गर्जसि क्षुद्र दुःखेचरः शुना समः । अहं नयामि तत्र त्वां यत्र ते तनयो गतः ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर उन कठोर वचनोंसे जिनका मन प्रदीप्त हो रहा था ऐसे लक्ष्मणने समस्त आकाशको गुँजाते हुए निम्नांकित वचन कहे । उन्होंने कहा कि रे क्षुद्र विद्याधर ! तू कुत्तेके समान व्यर्थ ही क्यों गरज रहा है ? मैं जहाँ तेरा पुत्र गया है वहीं तुझे पहुँचाता हूँ ॥२०-२१॥


इत्युक्त्वावस्थितं व्योम्नि विरथं खरदूषणम् । चकार लक्ष्मणः छिन्नचापकेतुं च निःप्रभम् ॥२२॥

अर्थ: इतना कहकर लक्ष्मणने आकाशमें स्थित खरदूषणको रथरहित कर दिया, उसका धनुष और पताका काट डाली तथा उसे निष्प्रभ कर दिया ॥२२॥


ततोऽसौ पतितः क्षोण्यां नभस्तः क्रोधलोहितः । प्रक्षीणेष्विव पुण्येषु ग्रहस्तरलविग्रहः ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार पुण्यके क्षीण होनेपर चंचल शरीरको धारण करनेवाला ग्रह पृथिवीपर आ पड़ता है उसी प्रकार क्रोधसे लाल-लाल दीखनेवाला खरदूषण आकाशसे पृथिवीपर नीचे आ पड़ा ॥२३॥


खड्गांशुलीढदेहश्च सौमित्रिं प्रत्यधावत । असिरत्नं समाकृष्य सोऽप्यस्याभिमुखं ययौ ॥२४॥

अर्थ: खड्गकी किरणोंसे जिसका शरीर व्याप्त हो रहा था ऐसा खरदूषण लक्ष्मणकी ओर दौड़ा और लक्ष्मण भी सूर्यहास खड्ग खींचकर उसके सामने जा डटे ॥२४॥


इत्यासन्नं तयोरासीच्चित्रं युद्धं भयानकम् । मुमुचुः स्वस्थिता देवाः सपुष्पान् साधुनिस्वनान् ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार उन दोनोंमें निकटसे नाना प्रकारका भयंकर युद्ध हुआ तथा स्वर्गमें स्थित देवोंने साधु-साधु - धन्य-धन्य शब्दोंके साथ उनपर पुष्पोंकी वर्षा की ॥२५॥


तावच्छिरसि संक्रुद्धो दूषणस्य न्यपातयत् । सूर्यहासं यथार्थाख्यं लक्ष्मणोऽक्षतविग्रहः ॥२६॥

अर्थ: उसी समय अखण्डित शरीरके धारक लक्ष्मणने कुपित हो खरदूषणके सिरपर यथार्थ नामवाला सूर्यहास खड्ग गिराया ॥२६॥


निर्जीवः पतितः क्षोण्यां बभूव खरदूषणः । आलेख्यरविसंकाशो यद्वत्स्वर्गच्युतोऽमरः ॥२७॥

अर्थ: जिससे वह निर्जीव होकर चित्रलिखित सूर्यके समान उस तरह पृथिवीपर आ पड़ा जिस तरह कि स्वर्गसे च्युत हुआ कोई देव पृथिवीपर आ पड़ता है ॥२७॥


अथवा दयितो रत्या निश्चेष्टीभूतविग्रहः । रत्नपर्वतखण्डो वा दिग्गजेन निपातितः ॥२८॥

अर्थ: पृथिवीपर पड़ा निर्जीव खरदूषण ऐसा जान पड़ता था मानो निश्चेष्ट शरीरका धारक कामदेव ही हो अथवा दिग्गजके द्वारा गिराया हुआ रत्नगिरिका एक खण्ड ही हो ॥२८॥


अथ सेनापतिर्नाम्ना दूषणः खारदूषणः । विरथं कर्तुमारेभे चन्द्रोदरनृपात्मजम् ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर खरदूषणका दूषण नामक सेनापति चन्द्रोदर राजाके पुत्र विराधितको रथरहित करनेके लिए उद्यत हुआ ॥२९॥


लक्ष्मणेनेषुणा तावद्गाढं मर्मणि ताडितः । घूर्णमानो गतो भूमिं समाश्वासनमाश्नुत ॥३०॥

अर्थ: उसी समय लक्ष्मणने उसके मर्मस्थलमें बाणसे इतनी गहरी चोट पहुँचायी कि बेचारा घूमता हुआ पृथिवीपर आ गिरा और तत्काल मृत्युको प्राप्त हो गया ॥३०॥


दत्त्वा विराधितायाथ तद्बलं खारदूषणम् । प्रययौ लक्ष्मणः प्रीतः प्रदेशं पद्मसंश्रितम् ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर खरदूषणकी वह समस्त सेना विराधितके लिए देकर प्रीतिसे भरे लक्ष्मण उस स्थानपर गये जहाँ श्रीराम विराजमान थे ॥३१॥


यावत्पश्यति तं सुप्तं भूमौ सीताविवर्जितम् । जगौ चोत्तिष्ठ किं नाथ याता क्व वद जानकी ॥३२॥

अर्थ: जाते ही लक्ष्मणने सीता रहित रामको पृथिवीपर सोते हुए देखा । देखकर लक्ष्मणने कहा कि हे नाथ ! उठो और कहो कि सीता कहाँ गयी हैं ? ॥३२॥


उत्थाय सहसा दृष्ट्वा लक्ष्मणं निर्व्रणाङ्ककम् । किंचित्प्रमोदमायातः परिष्वजनतत्परः ॥३३॥

अर्थ: राम सहसा उठ बैठे और लक्ष्मणको घाव रहित शरीरका धारक देख कुछ हर्षित हो उनका आलिंगन करने लगे ॥३३॥


जगाद भद्र नो वेद्मि देवी केनापि किं हृता । उत सिंहेन निर्भुक्ता न दृष्टात्र गवेषिता ॥३४॥

अर्थ: उन्होंने लक्ष्मणसे कहा कि हे भद्र ! मैं नहीं जानता हूँ कि देवीको क्या किसीने हर लिया है या सिंहने खा लिया है । मैंने इस वनमें बहुत खोजा पर दीखी नहीं ॥३४॥


पातालं किं भवेन्नीता नभःशिखरमेव वा । उद्वेगेन विलीना वा सुकुमारशरीरिका ॥३५॥

अर्थ: उसे कोई पातालमें ले गया है या आकाशके शिखरमें पहुँचा दी गयी है अथवा वह सुकुमारांगी भयके कारण विलीन हो गयी है ॥३५॥


ततः क्रोधपरीताङ्गो विषादी लक्ष्मणोऽगदत् । देवोद्वेगानुबन्धेन न किंचिदपि कारणम् ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका शरीर क्रोधसे व्याप्त था ऐसे लक्ष्मणने विषादयुक्त होकर कहा कि हे देव ! उद्वेगकी परम्परा बढ़ानेसे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥३६॥


नूनं दैत्येन केनापि हृता केनापि जानकी । ध्रियमाणामिमां लप्स्ये कर्तव्योऽत्र न संशयः ॥३७॥

अर्थ: जान पड़ता है कि जानकी किसी दैत्यके द्वारा हरी गयी है सो कोई भी क्यों नहीं इसे धारण किये हो मैं अवश्य ही प्राप्त करूँगा इसमें संशय नहीं करना चाहिए ॥३७॥


परिसान्त्व्योत्तमैर्वाक्यैर्विविधैः श्रुतिपेशलैः । विमलेनाम्भसा तस्य मुखं प्राक्षालयत् सुधीः ॥३८॥

अर्थ: इस प्रकार कानोंको प्रिय लगनेवाले विविध प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना देकर बुद्धिमान् लक्ष्मणने निर्मल जलसे रामका मुख धुलाया ॥३८॥


श्रुत्वा तावदलं तारं शब्दमुत्तानिताननः । अपृच्छत् श्रीधरं रामः संभ्रमं किंचिदापयन् ॥३९॥

किमेषा नर्दति क्षोणी गगनात्किमयं ध्वनिः । किं कृतं भवता पूर्वं शत्रुशेषं मयोज्झितम् ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर उस समय अतिशय उच्च शब्द सुन कुछ-कुछ सम्भ्रमको धारण करनेवाले रामने ऊपरकी ओर मुख कर लक्ष्मणसे पूछा कि क्या यह पृथिवी शब्द कर रही है या आकाशसे यह शब्द आ रहा है ? क्या तुमने पहले मेरे द्वारा छोड़े हुए शत्रुको शेष रहने दिया है ? ॥३९-४०॥


सुमित्राजस्ततोऽवोचन्नाथाऽत्र हि महाहवे । उपकारो महान् काले खेचरेण कृतो मम ॥४१॥

चन्द्रोदरसुतः सोऽयं विराधित इति श्रुतः । प्रस्तावे दैवतेनैष हितेन परिढौकितः ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने कहा कि हे नाथ ! इस महायुद्धमें विद्याधरने समयपर मेरा बड़ा उपकार किया है । वह विद्याधर राजा चन्द्रोदरका पुत्र विराधित है जो हितकारी दैवके द्वारा ही मानो अवसरपर मेरे समीप भेजा गया था ॥४१-४२॥


चतुर्विधेन महता बलेनास्य सुचेतसः । आगच्छतो महानेष शब्दः श्रुतिमुपागतः ॥४३॥

अर्थ: उत्तम हृदयको धारण करनेवाला वह विद्याधर चार प्रकारकी बड़ी भारी सेनाके साथ आपके पास आ रहा है सो यह महान् शब्द उसीका सुनाई दे रहा है ॥४३॥


विश्रब्धचेतसोर्यावत् कथेयं वर्त्तते तयोः । तावन्महाबलोपेतः परिप्राप विराधितः ॥४४॥

अर्थ: इधर विश्वस्त चित्तके धारक राम-लक्ष्मणके बीच जबतक यह कथा चलती है तबतक बड़ी भारी सेनाके साथ विराधित वहाँ आ पहुँचा ॥४४॥


ततो जयजयस्वानं कृत्वा विरचिताञ्जलिः । जगाद खेचरस्वामी प्रणतैः सचिवैः समम् ॥४५॥

स्वामी त्वं परमोऽस्माभिश्चिरात् प्राप्तो नरोत्तमः । अतः प्रदीयतामाज्ञा नाथ कर्तव्यवस्तुनि ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याधरोंके राजा विराधितने नम्रीभूत मन्त्रियोंके साथ-साथ हाथ जोड़कर तथा जय-जय शब्दका उच्चारण कर कहा कि आप मनुष्योंमें उत्तम उत्कृष्ट स्वामी चिरकाल बाद प्राप्त हुए हो सो करने योग्य कार्यके विषयमें मुझे आज्ञा दीजिए ॥४५-४६॥


इत्युक्तो लक्ष्मणोऽभाणीत् साधो शृणु सुवर्तनम् । गुरोः केनापि मे पत्नी हृता दुर्नयवर्तिना ॥४७॥

तया विरहितः सोऽयं पद्मः शोकवशीकृतः । यदि नाम त्यजेत् प्राणांस्तांवह्निं विशाम्यहम् ॥४८॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर लक्ष्मणने कहा कि हे सज्जन ! सुनो, किसी दुराचारीने मेरे अग्रज - रामकी पत्नी हर ली है सो उससे रहित राम, शोकके वशीभूत हो यदि प्राण छोड़ते हैं तो मैं निश्चय हो अग्निमें प्रवेश करूँगा ॥४७-४८॥


एतत्प्राणदृढासक्तान् भद्र प्राणानवेहि मे । ततोऽत्र प्रकृते किंचित्कर्तव्यं कारणं परम् ॥४९॥

अर्थ: क्योंकि हे भद्र ! तुम यह निश्चित जानो कि मेरे प्राण इन्हींके प्राणोंके साथ मजबूत बँधे हुए हैं इसलिए इस विषयमें कुछ उत्तम उपाय करना चाहिए ॥४९॥


ततो नताननः किंचित्खगप्रभुरचिन्तयत् । कृत्वापि श्रममेतं मे कष्टमाशा न पूरिता ॥५०॥

अर्थ: तब विद्याधरोंका राजा विराधित नीचा मुख कर कुछ विचार करने लगा कि अहो ! इतना श्रम करनेपर भी मेरी आशा पूर्ण नहीं हुई ॥५०॥


सुखं संवसता स्वेष्टं नानावनविहारिणा । पश्यात्मा योजितः कष्टे कथं संशयगह्वरे ॥५१॥

अर्थ: मैं पहले सुखसे इच्छानुसार निवास करता था फिर स्थानभ्रष्ट हो नाना वनोंमें भ्रमण करता रहा । अब मैंने अपने आपको इनकी शरणमें सौंपा सो देखो ये स्वयं कष्टकारी संशयके गर्तमें पड़ रहे हैं ॥५१॥


दुःखार्णवतटं प्राप्तो यां यां गृह्णाम्यहं लताम् । दैवेनोन्मूल्यते सा सा कृत्स्नं विधिवशं जगत् ॥५२॥

अर्थ: दुःखरूपी सागरके तटको प्राप्त हुआ मैं जिस-जिस लताको पकड़ता हूँ सो दैवके द्वारा वही-वही लता उखाड़ दी जाती है, वास्तवमें समस्त संसार कर्मोंके अधीन है ॥५२॥


तथाप्युत्साहमाश्रित्य कर्तव्यं समुपागतम् । करोमि कुर्वतो भद्रमभद्रं वा स्वकर्मजम् ॥५३॥

अर्थ: यद्यपि ये अपने कर्मके अनुसार हमारा भला या बुरा कुछ भी करें तो भी मैं उत्साह धारण कर इनके इस उपस्थित कार्यको अवश्य करूँगा ॥५३॥


इति ध्यात्वावहीरूपं भजन्नुत्साहसंस्तुतम् । जगाद सचिवान् धीरो वचसा स्फुटतेजसा ॥५४॥

पत्नी महानरस्यास्य नीता यदि महीतलम् । अथाकाशं गिरिं वारि स्थलं वा विपिनं पुरम् ॥५५॥

गवेषयत यत्नेन सर्वाशासु समन्ततः । यदिच्छत कृतार्थानां तद्दास्यामि महाभटाः ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार अन्तरंगमें विचारकर उत्साहको धारण करते हुए धीर-वीर विराधितने तेजपूर्ण वचनोंमें मन्त्रियोंसे कहा कि इन महामानवकी पत्नी महीतल, आकाश, पर्वत, जल, स्थल, वन अथवा नगरमें कहीं भी ले जायी गयी हो यत्नपूर्वक समस्त दिशाओंमें सब ओरसे उसकी खोज करो । हे महायोद्धाओ ! खोज करनेपर तुम लोग जो चाहोगे वह प्रदान करूँगा ॥५४-५६॥


इत्युक्ताः संमदोपेताः संनद्धाः परमौजसः । नानाकल्पाः खगा जग्मुर्दिशो दश यशोर्थिनः ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर हर्षसे युक्त, अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित, परम तेजके धारक, नाना प्रकारकी वेष-भूषासे सुशोभित और यशके इच्छुक विद्याधर दशों दिशाओंमें गये ॥५७॥


अथार्कजटिनः सूनुर्नाम्ना रत्नजटी खगः । खड्गी द्रागिति शुश्राव दूरतो रुदितध्वनिम् ॥५८॥

अर्थ: अथानन्तर अर्कजटीके पुत्र रत्नजटी नामक खड्गधारी विद्याधरने दूरसे शीघ्र ही रोनेका शब्द सुना ॥५८॥


आशां च मजमानस्तामाकर्णदिति निस्वनम् । हा राम हा कुमारेति जलधेरूर्ध्वमम्बरे ॥५९॥

अर्थ: जिस दिशासे रोनेका शब्द आ रहा था उसी दिशामें जाकर उसने समुद्रके ऊपर आकाशमें ‘हा राम ! हा कुमार लक्ष्मण !’ इस प्रकारका शब्द सुना ॥५९॥


परिदेवननिस्वानं श्रुत्वा तं सपरिस्फुटम् । समुत्पपात तं देशं विमानं यावदीक्षते ॥६०॥

अर्थ: विलापके साथ आते हुए उस अत्यन्त स्पष्ट शब्दको सुनकर जब वह उस स्थानकी ओर उड़ा तब उसने एक विमान देखा ॥६०॥


अस्योपरि परिक्रन्दं कुर्वन्तीमतिविह्वलाम् । वैदेहीं स समालोक्य बभाण क्रोधपूरितः ॥६१॥

तिष्ठ तिष्ठ महापाप दुष्ट विद्याधराधम । कृत्वापराधमीदृक्षं क त्वया गम्यतेऽधुना ॥६२॥

अर्थ: उस विमानके ऊपर विलाप करती हुई अतिशय विह्वल सीताको देखकर वह क्रोध-युक्त हो बोला कि अरे ठहर-ठहर, महापापी दुष्ट नीच विद्याधर ! ऐसा अपराध कर अब तू कहाँ जाता है ? ॥६१-६२॥


दयितां रामदेवस्य प्रभामण्डलसोदराम् । मुञ्च शीघ्रमभीष्टं ते जीवितं यदि दुर्मते ॥६३॥

अर्थ: हे दुर्बुद्धे ! यदि तुझे जीवन इष्ट है तो रामदेवकी स्त्री और भामण्डलकी बहनको शीघ्र ही छोड़ ॥६३॥


ततो दशाननोऽप्येनमाक्रोश्य परुषरवनम् । युद्धे समुद्यतः क्रुद्धो विह्वलीभूतमानसः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर कर्कश शब्द कहनेवाले रत्नजटीके प्रति कर्कश शब्दोंका उच्चारण कर क्रोधसे भरा तथा विह्वल चित्तका धारक रावण युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ ॥६४॥


पुनश्चाचिन्तयद्युद्धे प्रवृत्ते सति विह्वला । मयानिरूपिता सीता कदाचित्पञ्चतां भजेत् ॥६५॥

आकुलां रक्षता चैतां परमव्याकुलात्मना । न व्यापादयितुं शक्यः क्षुद्रोऽप्येष नभश्चरः ॥६६॥

अर्थ: फिर उसने विचार किया कि ‘युद्ध होनेपर मैं इस विह्वल सीताको देख नहीं सकूँगा और उस दशामें सम्भव है कि यह कदाचित् मृत्युको प्राप्त हो जाये और यदि इस घबड़ायी हुई सीताकी रक्षा भी करता रहूँगा तो अत्यन्त व्याकुल चित्त होनेके कारण, यद्यपि यह विद्याधर क्षुद्र है तो भी मेरे द्वारा मारा नहीं जा सकेगा’ ॥६५-६६॥


इति संचिन्त्य संभ्रान्तश्लथमौल्युत्तराम्बरः । खस्थस्य रत्नजटिनो बली विद्यामपाहरत् ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर हड़बड़ाहटके कारण जिसके मुकुट और उत्तरीय वस्त्र शिथिल हो गये थे ऐसे बलवान् रावणने आकाशमें स्थित रत्नजटी विद्याधरकी विद्या हर ली ॥६७॥


अथ रत्नजटी त्रस्तः किंचिन्मन्त्रप्रभावतः । पपात शनकैरुल्कास्फुलिङ्ग इव मेदिनीम् ॥६८॥

अर्थ: अथानन्तर भयभीत रत्नजटी किसी मन्त्रके प्रभावसे उल्काके समान धीरे-धीरे पृथ्वीपर आ पड़ा ॥६८॥


समुद्रजलमध्यस्थं कम्बुद्वीपं समाश्रितः । आयुर्वर्तनसामर्थ्याद्भग्नपोतो यथा वणिक् ॥६९॥

अर्थ: जिसका जहाज डूब गया है ऐसे वणिक्के समान वह आयुका अस्तित्व शेष रहनेके कारण समुद्र जलके मध्यमें स्थित कम्बुनामक द्वीपमें पहुँचा ॥६९॥


निश्चलश्च क्षणं स्थित्वा समुच्छ्वस्यायतं भृशम् । कम्बुपर्वतमारुह्य दिशाचक्रं व्यलोकयत् ॥७०॥

अर्थ: वहाँ वह क्षण-भर निश्चल बैठा फिर बार-बार लम्बी सांस लेकर वह कम्बु पर्वतपर चढ़कर दिशाओंकी ओर देखने लगा ॥७०॥


ततः समुद्रवातेन शिशिरत्वमुपेयुषा । अपनीतश्रमस्वेदः समाशश्वास दुःखितः ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर समुद्रकी शीतल वायुसे जिसका परिश्रम और पसीना दूर हो गया था ऐसा दुःखी रत्नजटी कुछ सन्तुष्ट हुआ ॥७१॥


येऽप्यन्येऽन्वेषणं कर्तुं गतास्तेऽन्विष्य शक्तितः । राघवस्यान्तिकं प्राप्ताः प्रणष्टवदनौजसः ॥७२॥

अर्थ: जो अन्य विद्याधर सीताकी खोज करनेके लिए गये थे वे शक्ति-भर खोज-कर रामके समीप वापस पहुँचे। उस समय प्रयोजनकी सिद्धि नहीं होनेसे उनके मुखका तेज नष्ट हो गया था ॥७२॥


तेषां ज्ञात्वा मनः शून्यं महीविन्यस्तचक्षुषाम् । पद्मो जगाद दीर्घोष्णं निश्वस्य म्लानलोचनः ॥७३॥

निजां शक्तिममुञ्चद्भिर्भवद्भिः साधुखेचराः । अस्मत्कार्ये कृतो यत्नो दैवं तु प्रतिकूलकम् ॥७४॥

अर्थ: जिनके नेत्र पृथ्वीपर लग रहे थे ऐसे उन विद्याधरोंका मन शून्य जानकर म्लाननेत्रोंके धारक रामने लम्बी और गरम सांस भरकर कहा कि हे धन्य विद्याधरो! आप लोगोंने अपनी शक्ति न छोड़ते हुए हमारे कार्यमें प्रयत्न किया है पर मेरा भाग्य ही विपरीत है ॥७३-७४॥


तिष्ठत स्वेच्छयेदानीं यात वा स्वं समाश्रयम् । वाडवास्यगतं रत्नं करात् किं पुनरीक्ष्यते ॥७५॥

अर्थ: अब आप लोग अपनी इच्छानुसार बैठिए अथवा अपने-अपने घर जाइए। जो रत्न हाथसे छूटकर बडवानलमें जा गिरता है वह क्या फिर दिखाई देता है? ॥७५॥


नूनं सर्वं कृतं कर्म प्रापणीयं फलं मया । तत्कर्तुमन्यथा शक्यं न भवद्भिर्मयापि वा ॥७६॥

अर्थ: निश्चय ही जो कुछ कर्म मैंने किया है उसका फल प्राप्त करने योग्य है उसे न आप लोग अन्यथा कर सकते हैं और न मैं भी अन्यथा कर सकता हूँ ॥७६॥


विमुक्तं बन्धुभिः कष्टं विकृष्टं वनमाश्रितम् । अनुकम्पा न तत्रापि जनिता दैवशत्रुणा ॥७७॥

अर्थ: मैंने भाई-बन्धुओंसे रहित, कष्टकारी दूरवर्ती वनका आश्रय लिया सो वहाँ भी भाग्यरूपी शत्रुने मुझपर दया नहीं की ॥७७॥


मन्ये यथानुबन्धेन लग्नोऽयं विधिरुद्धतः । तथैतस्मात्परं दुःखं किं नामान्यत्करिष्यति ॥७८॥

अर्थ: जान पड़ता है कि यह उत्कट दुर्दैव मेरे पीछे लग गया है सो इससे अधिक दुःख और क्या करेगा? ॥७८॥


परिदेवनमारब्धे कर्तुमेवं नराधिपे । धीरं विराधितोऽवोचत् परिसान्त्वनपण्डितः ॥७९॥

विषादमतुलं देव किमेवमनुसेवसे । स्वल्पैरेव दिनैः पश्य प्रियामनघविग्रहाम् ॥८०॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर राम विलाप करने लगे तब सान्त्वना देनेमें निपुण विराधितने बड़ी धीरतासे कहा कि हे देव! आप इस तरह अनुपम विषाद क्यों करते हैं? आप थोड़े ही दिनोंमें निष्पाप शरीरकी धारक प्रियाको देखेंगे ॥७९-८०॥


शोको हि नाम कोऽप्येष विषभेदो महत्तमः । नाशयत्याश्रितं देहं का कथान्येषु वस्तुषु ॥८१॥

अर्थ: यथार्थमें यह शोक कोई बड़ा भारी विषका भेद है जो आश्रित शरीरको नष्ट कर देता है अन्य वस्तुओंकी तो चर्चा ही क्या है? ॥८१॥


तस्मादवलम्ब्यतां धैर्यं महापुरुषसेवितम् । भवद्विधा विवेकानां भवनं क्षेत्रमुत्तमम् ॥८२॥

अर्थ: इसलिए महापुरुषोंके द्वारा सेवित धैर्यका अवलम्बन कीजिए। आप-जैसे उत्तम-पुरुष विवेककी उत्पत्तिके उत्तम क्षेत्र हैं ॥८२॥


जीवन् पश्यति भद्राणि धीरश्चिरतरादपि । ग्रहो ह्रस्वमतिर्भद्रं कृच्छ्रादपि न पश्यति ॥८३॥

अर्थ: धीरवीर मनुष्य यदि जीवित रहता है तो बहुत समय बाद भी कल्याणको देख लेता है और जो तुच्छ बुद्धि-का धारी अधीर मनुष्य है वह कष्ट भोगकर भी कल्याणको नहीं देख पाता है ॥८३॥


कालो नैष विषादस्य दीयतां कारणे मनः । औदासीन्यमिहानर्थं कुरुते परमं पुरा ॥८४॥

अर्थ: यह विषाद करनेका समय नहीं है कार्य करनेमें मन दीजिए क्योंकि उदासीनता बड़ा अनर्थ करनेवाली है ॥८४॥


विद्याधरमहाराजे निहते खरदूषणे । अर्थान्तरमनुप्राप्तं दुरन्तमवधार्यताम् ॥८५॥

अर्थ: विद्याधरोंके राजा खरदूषणके मारे जानेपर दूसरी बात हो गयी है और जिसका फल अच्छा नहीं होगा ऐसा आप समझ लीजिए ॥८५॥


किष्किन्धेन्द्रेन्द्रजिद्वीरौ भानुकर्णस्तथैव च । त्रिशिराः क्षोभणो भीमः क्रूरकर्मा महोदरः ॥८६॥

एवमाद्या महायोधा नानाविद्यामहौजसः । यास्यन्ति सांप्रतं क्षोभं मित्रस्वजनदुःखतः ॥८७॥

अर्थ: किष्किन्धापुरीका राजा सुग्रीव, इन्द्रजित्, भानुकर्ण, त्रिशिरा, क्षोभण, भीम, क्रूरकर्मा और महोदर आदि बड़े-बड़े योद्धा जो नाना विद्याओंके धारक तथा महा-तेजस्वी हैं इस समय अपने मित्र - खरदूषणके कुटुम्बी जनोंके दुःखसे क्षोभको प्राप्त होंगे ॥८६-८७॥


नानायुद्धसहस्रेषु सर्वेऽमी लब्धकीर्तयः । विजयार्धनगावासखगेन्द्रेणाप्यसाधिताः ॥८८॥

अर्थ: इन सब योद्धाओंने नाना प्रकारके हजारों युद्धोंमें सुयश प्राप्त किया है तथा विजयार्ध पर्वतपर रहनेवाला विद्याधरोंका राजा भी इन्हें वश नहीं कर सकता ॥८८॥


पवनस्यात्मजः ख्यातो यस्य वानरलक्षितम् । केतुं दूरात् समालोक्य विद्रवन्ति द्विषां गणाः ॥८९॥

अर्थ: पवनंजयका पुत्र हनुमान् अतिशय प्रसिद्ध है जिसकी वानर चिह्नित ध्वजा देखकर शत्रुओंके झुण्ड दूरसे ही भाग जाते हैं ॥८९॥


तस्याभिमुखतां प्राप्य दैवयोगात् सुरा अपि । त्यजन्ति विजये बुद्धिं स हि कोऽपि महाशयः ॥९०॥

अर्थ: दैवयोगसे देव भी उसका सामना कर विजयकी अभिलाषा छोड़ देते हैं यथार्थमें वह कोई अद्भुत महायशस्वी पुरुष है ॥९०॥


तस्मादुत्तिष्ठ तत् स्थानमलंकाराख्यमाश्रिताः । भामण्डलस्वसुर्वार्तां स्वस्थीभूता लभामहे ॥९१॥

अर्थ: इसलिए उठिए, अलंकारपुर नामक सुरक्षित स्थानका आश्रय लें वहीं निश्चिन्ततासे रहकर भामण्डलकी बहनका समाचार प्राप्त करें ॥९१॥


तद्धि नः पुरमायातमन्वयेन रसातले । तत्र दुर्गे स्थिताः कार्यं चिन्तयामो यथोचितम् ॥९२॥

अर्थ: वह अलंकारपुर पृथिवीके नीचे है और हम लोगोंकी वंश-परम्परासे चला आया है उसी दुर्गम स्थानमें स्थित रहकर हम लोग यथायोग्य कार्यकी चिन्ता करेंगे ॥९२॥


इत्युक्ते चतुरैरश्वैश्चतुर्भिर्युक्तमुत्तमम् । भास्वरं रथमारुह्य प्रस्थितौ रघुनन्दनौ ॥९३॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर चार चतुर घोड़ोंसे जुते हुए उत्तम देदीप्यमान रथपर सवार होकर राम-लक्ष्मणने प्रस्थान किया ॥९३॥


शुशुभाते तदात्यन्तं न तौ पुरुषसत्तमौ । सीतया रहितौ सम्यग्दृष्ट्या बोधशमाविव ॥९४॥

अर्थ: जिस प्रकार सम्यग्दर्शनसे रहित ज्ञान और चारित्र सुशोभित नहीं होते हैं उसी प्रकार उस समय सीतासे रहित राम और लक्ष्मण सुशोभित नहीं हो रहे थे ॥९४॥


चतुर्विधमहासैन्यसागरेण समावृतः । त्वरावानग्रतस्तस्थौ चन्द्रोदरनृपात्मजः ॥९५॥

अर्थ: चार प्रकारकी महासेनारूपी सागरसे घिरा विराधित शीघ्रता करता हुआ उनके आगे स्थित था ॥९५॥


तावच्चन्द्रनखासूनुं नगरद्वारनिःसृतम् । कृतयुद्धं पराजित्य प्रविष्टः परमं पुरम् ॥९६॥

अर्थ: जबतक वह पहुँचा तबतक चन्द्रनखाका पुत्र नगरके द्वारसे निकलकर युद्ध करने लगा सो उसे पराजित कर वह परम सुन्दर नगरके भीतर प्रविष्ट हुआ ॥९६॥


तत्र देवनिवासाभे पुरे रत्नसमुज्ज्वले । यथोचितं स्थितं चक्रुः खरदूषणवेश्मनि ॥९७॥

अर्थ: वह नगर देवोंके निवास-स्थानके समान रत्नोंसे देदीप्यमान था। वहाँ जाकर विराधित तथा राम-लक्ष्मण खरदूषणके भवनमें यथायोग्य निवास करने लगे ॥९७॥


तस्मिन्नमरसद्माभे भवने रघुनन्दनः । सीताया गमनाल्लेभे धृतिं तु न मनागपि ॥९८॥

अर्थ: यद्यपि वह भवन देवभवनके समान था तो भी राम सीताके चले जानेसे वहाँ रंच मात्र भी धैर्यको प्राप्त नहीं होते थे - वहाँ उन्हें सीताके बिना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था ॥९८॥


अरण्यमपि रम्यत्वं याति कान्तासमागमे । कान्तावियोगदग्धस्य सर्वं विन्ध्यवनायते ॥९९॥

अर्थ: स्त्रीके समागममें वन भी रमणीयताको प्राप्त होता है और स्त्रीके वियोगसे जलते हुए मनुष्यको सब कुछ विन्ध्य वनके समान जान पड़ता है ॥९९॥


अथकान्ते गृहस्यास्य तरुषण्डविराजिते । प्रासादमतुलं वीक्ष्य ससार रघुनन्दनः ॥१००॥

अर्थ: अथानन्तर वृक्षोंके समूहसे सुशोभित, उस भवनके एकान्त स्थानमें अनुपम मन्दिर देखकर राम वहाँ गये ॥१००॥


तत्रार्हत्प्रतिमां दृष्ट्वा रत्नपुष्पकृतार्चनाम् । क्षणविस्मृतसंतापः पद्मो धृतिमुपागतः ॥१०१॥

अर्थ: उस मन्दिरमें रत्न तथा पुष्पोंसे जिसकी पूजा को गयी थी ऐसी जिनेन्द्र प्रतिमाके दर्शन कर वे क्षण-भर सब सन्ताप भूलकर परम धैर्यको प्राप्त हुए ॥१०१॥


इतस्ततश्च तत्रार्चां वीक्षमाणः कृतानतिः । किंचित् प्रशान्तदुःखोर्मिरवतस्थे रघूत्तमः ॥१०२॥

अर्थ: उस मन्दिरमें इधर-उधर जो और भी प्रतिमाएँ थीं उनके दर्शन करते तथा नमस्कार करते हुए राम वहाँ रहने लगे । जिनेन्द्र प्रतिमाओंके दर्शन करनेसे उनके दुःखकी लहरें कुछ शान्त हो गयी थीं ॥१०२॥


आत्मीयबलगुप्तश्च सुन्दो मात्रा समन्वितः । पितृभ्रातृविनाशेन शोकी लङ्कामुपाविशत् ॥१०३॥

अर्थ: पिता और भाईके मरनेसे जिसे शोक हो रहा था ऐसा सुन्द, अपनी सेनासे सुरक्षित होता हुआ माता चन्द्रनखाके साथ लंकामें चला गया ॥१०३॥


एवं संगान् सावसानान् विदित्वा नानादुःखैः प्रापणीयानुपायैः । विघ्नैर्युक्तान् भूरिभिर्दुर्निवारैरिच्छां तेषु प्राणिनो मा कुरुध्वम् ॥१०४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार जो नाना प्रकारके दुःखदायी उपायोंसे प्राप्त करने योग्य हैं तथा अनेक प्रकारके दुर्निवारसे युक्त हैं ऐसे इन परिग्रहोंको नश्वर जानकर हे भव्यजनो ! उनमें अभिलाषा मत करो ॥१०४॥


यद्यप्याशापूर्वकर्मानुभावात् संगं कर्तुं जायते प्राणभाजाम् । प्राप्य ज्ञानं साधुवर्गोपदेशाद्गन्त्री नाशं सा रवेः शर्वरीव ॥१०५॥

अर्थ: यद्यपि पूर्व कर्मोदयसे प्राणियोंके परिग्रह संचित करनेकी आशा होती है तो भी मुनि-समूहके उपदेशसे ज्ञान प्राप्त कर वह आशा उस तरह नष्ट हो जाती है जिस तरह कि सूर्यसे प्रकाश पाकर रात्रि नष्ट हो जाती है ॥१०५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सीतावियोगदाहाभिधानं नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें सीताके वियोगजन्य दाहका वर्णन करनेवाला पैंतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४५॥

४६. षट्चत्वारिंशत्तमं पर्व (मायाप्रकाराभिधानं)

तत्रासावुत्तमे तुङ्गे विमानशिखरे स्थितः । स्वैरं स्वैरं व्रजन् रेजे रावणो दिवि भानुवत् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर विमानके ऊँचे शिखरपर बैठा इच्छानुसार गमन करता हुआ रावण आकाशमें सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥१॥


सीतायाः शोकतप्ताया म्लानं वीक्ष्यास्यपङ्कजम् । रतिरागविमूढात्मा दध्यौ किमपि रावणः ॥२॥

अर्थ: रति सम्बन्धी रागसे जिसकी आत्मा विमूढ़ हो रही थी ऐसा रावण शोक-सन्तप्त सीताके मुरझाये हुए मुख-कमलका ध्यान कर रहा था - उसी ओर देख रहा था ॥२॥


अश्रुदुर्दिनवक्त्रायाः सीतायाः कृपणं परम् । नानाप्रियशतान्यूचे पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः ॥३॥

अर्थ: जिसके मुखसे निरन्तर अश्रुओंकी वर्षा हो रही थी ऐसी सीताके आगे-पीछे तथा बगलमें खड़ा होकर रावण बड़ी दीनताके साथ नाना प्रकारके सैकड़ों प्रिय वचन बोलता था ॥३॥


मारस्यात्यन्तमृदुभिर्हतोऽहं कुसुमेषुभिः । म्रिये यदि ततः साध्वि नरहत्या भवेत्तव ॥४॥

अर्थ: वह कहता था कि मैं कामदेवके अतिशय कोमल पुष्पमयी बाणोंसे घायल होकर यदि मर जाऊँगा तो हे साध्वि ! तुझे नरहत्या लगेगी ॥४॥


वक्त्रारविन्दमेतत्ते सकोपमपि सुन्दरि । राजते चारुभावानां सर्वथैव हि चारुता ॥५॥

अर्थ: हे सुन्दरि ! तेरा यह मुखारविन्द क्रोध सहित होनेपर भी सुशोभित हो रहा है सो ठीक ही है क्योंकि जो सुन्दर हैं उनमें सभी प्रकारसे सुन्दरता रहती है ॥५॥


प्रसीद देवि भृत्यास्ये सकृच्चक्षुर्विधीयताम् । त्वच्चक्षुःकान्तितोयेन स्नातस्यापैतु मे श्रमः ॥६॥

अर्थ: हे देवि ! प्रसन्न होओ और इस दासके मुखपर एक बार चक्षु डालो । तुम्हारे चक्षुकी कान्तिरूपी जलसे नहानेपर मेरा सब श्रम दूर हो जायेगा ॥६॥


यदि दृष्टिप्रसादं मे न करोषि वरानने । एतेन पादपद्मेन सकृत् ताडय मस्तके ॥७॥

अर्थ: हे सुमुखि ! यदि दृष्टिका प्रसाद नहीं करती हो - आँख उठाकर मेरी ओर नहीं देखती हो तो इस चरण-कमलसे ही एक बार मेरे मस्तकपर आघात कर दो ॥७॥


भवत्या रमणोद्याने किं न जातोऽस्म्यशोककः । सुलभा यस्य ते श्लाघ्या पादपद्मतलाहतिः ॥८॥

अर्थ: मैं तुम्हारे मनोहर उद्यानमें अशोक वृक्ष क्यों नहीं हो गया ? क्योंकि वहाँ तुम्हारे इस चरण-कमलका प्रशंसनीय तल-प्रहार सुलभ रहता ॥८॥


कृशोदरि गवाक्षेण विमानशिखरस्थिता । दिशः पश्य प्रयातोऽस्मि वियदूर्ध्वं रवेरपि ॥९॥

अर्थ: हे कृशोदरि ! विमानकी छतपर बैठकर झरोखेसे जरा दिशाओंको तो देखो मैं सूर्यसे भी कितने ऊपर आकाशमें चल रहा हूँ ॥९॥


कुलपर्वतसंयुक्तां समेरुं सहसागराम् । पश्य क्षोणीमिमां देवि शिल्पिनेव विनिर्मिताम् ॥१०॥

अर्थ: हे देवि ! कुलाचलों, मेरु पर्वत और सागरसे सहित इस पृथिवीको देखो। यह ऐसी जान पड़ती है मानो किसी कारीगरके द्वारा ही बनायी गयी हो ॥१०॥


एवमुक्ता सती सीता पराचीनव्यवस्थिता । अन्तरे तृणमाधाय जगादारुचिताक्षरम् ॥११॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर पीठ देकर बैठी हुई सीता बीचमें तृण रखकर निम्नांकित अप्रिय वचन बोली ॥११॥


अवसर्प ममाङ्गानि मा स्पृशः पुरुषाधम । निन्द्याक्षरामिमां वाणीमीदृशीं भाषसे कथम् ॥१२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नीच पुरुष ! हट, मेरे अंग मत छू। तू इस प्रकारकी यह निन्दनीय वाणी क्यों बोल रहा है ? ॥१२॥


पापात्मकमनायुष्यमस्वर्ग्यमयशस्करम् । असदीहितमेतत्ते विरुद्धं भयकारि च ॥१३॥

अर्थ: तेरी यह दुष्ट चेष्टा पापरूप है, आयुको कम करनेवाली है, नरकका कारण है, अपकीर्तिको करनेवाली है, विरुद्ध है तथा भय उत्पन्न करनेवाली है ॥१३॥


परदारान् समाकाङ्क्षन् महादुःखमवाप्स्यसि । पश्चात्तापपरीताङ्गो भस्मच्छन्नानलोपमम् ॥१४॥

अर्थ: परस्त्रीकी इच्छा करता हुआ तू महादुःखको प्राप्त होगा तथा भस्मसे आच्छादित अग्निके समान पश्चात्ताप-से तेरा समस्त शरीर व्याप्त होगा ॥१४॥


महता मोहपङ्केन तवोपचितचेतसः । मुधा धर्मोपदेशोऽयमन्धे नृत्यविलासवत् ॥१५॥

अर्थ: अथवा तेरा चित्त पापरूपी महापंकसे व्याप्त है अतः तुझे धर्मका उपदेश देना उसी प्रकार व्यर्थ है जिस प्रकार कि अन्धेके सामने नृत्यके हाव-भाव दिखाना व्यर्थ होता है ॥१५॥


इच्छामात्रादपि क्षुद्र बद्ध्वा पापमनुत्तमम् । नरके वासमासाद्य कष्टं वर्तनमाप्स्यसि ॥१६॥

अर्थ: अरे नीच ! परस्त्रीकी इच्छा मात्रसे तू बहुत भारी पाप बाँधकर नरकमें जायेगा और वहाँ कष्टकारी अवस्थाको प्राप्त होगा ॥१६॥


रूक्षाक्षराभिधानाभिः परं वाणीभिरित्यपि । मदनाहतचित्तस्य प्रेमास्य न निवर्त्तते (न्यवर्त्तत) ॥१७॥

अर्थ: इस प्रकार यद्यपि सीताने कठोर अक्षरोंसे भरी वाणीके द्वारा रावणका तिरस्कार किया तो भी कामसे आहत चित्त होनेके कारण उसका प्रेम दूर नहीं हुआ ॥१७॥


तत्र दूषणसंग्रामे निवृत्ते परमप्रियाः । शुकहस्तप्रहस्ताद्याः सोद्वेगाः स्वाम्यदर्शनात् ॥१८॥

चलत्केतुमहाखण्डं कुमारार्कसमप्रभम् । विमानं वीक्ष्य दाशास्यं मुदितास्तं ढुढौकिरे ॥१९॥

अर्थ: वहाँ खरदूषणका युद्ध समाप्त होनेपर भी स्वामी रावणका दर्शन न होनेसे परम स्नेहके भरे शुक, हस्त, प्रहस्त आदि मन्त्री परम उद्वेगको प्राप्त हो रहे थे सो जब उन्होंने हिलती हुई पताकासे सुशोभित प्रातःकालीन सूर्यके समान रावणका विमान आता देखा तब वे हर्षित होकर उसके पास गये ॥१८-१९॥


प्रदानैर्दिव्यवस्तूनां संमानैश्चाटुभिः परैः । तामिश्च भृत्यसंपद्भिरग्राह्या जनकात्मजा ॥२०॥

अर्थ: उन्होंने दिव्य वस्तुओंकी भेंट देकर सम्मान प्रदर्शित कर तथा अतिशय प्रिय वचन कहकर रावणकी अगवानी की तो भी भृत्योंकी उन सम्पदाओंसे सीता वशीभूत नहीं हुई ॥२०॥


शक्नोति सुखधीः पातुं कः शिखामाशुशुक्षणेः । को वा नागवधूमूर्ध्नि स्पृशेद् रत्नशलाकिकाम् ॥२१॥

अर्थ: संसारमें ऐसा कौन चतुर मनुष्य है जो अग्निशिखाका पान कर सके अथवा नागिनके शिरपर स्थित रत्नमयी शलाकाका स्पर्श कर सके ॥२१॥


कृत्वा करपुटं मूर्ध्नि दशाङ्गुलिसमाहितम् । ननाम रावणः सीतां निन्दितोऽपि तृणाग्रवत् ॥२२॥

अर्थ: यद्यपि सीताने तृणके अग्रभागके समान रावणका तिरस्कार किया था तो भी वह दशों अंगुलियोंसे सहित अंजलि शिरपर धारण कर उसे बार-बार नमस्कार करता था ॥२२॥


महेन्द्रसदृशैस्तावद्विभवैः सचिवैर्भृशम् । नानादिग्भ्यः समायातैरावृतो रक्षसां पतिः ॥२३॥

जय वर्धस्व नन्देति शब्दैः श्रवणहारिभिः । उपगीतः परिप्राप्तो लङ्कामाखण्डलोपमः ॥२४॥

अर्थ: नाना दिशाओंसे आये हुए तथा इन्द्रके समान पूर्ण वैभवको धारण करनेवाले मन्त्रियोंने जिसे घेर लिया था और ‘जय हो, बढ़ते रहो, स्मृद्धिमान् होओ’ इत्यादि कर्णप्रिय वचनोंसे जिसकी स्तुति हो रही थी ऐसे इन्द्रतुल्य रावणने लंकामें प्रवेश किया ॥२३-२४॥


अचिन्तयच्च रामस्त्री सोऽयं विद्याधराधिपः । यत्राचरत्यमर्यादां तत्र किं शरणं भवेत् ॥२५॥

अर्थ: उस समय सीताने विचार किया कि यह विद्याधरोंका राजा ही जहाँ अमर्यादाका आचरण कर रहा है वहाँ दूसरा कौन शरण हो सकता है ? ॥२५॥


यावत्प्राप्नोमि नो वार्तां भर्तुः कुशलवर्तिनः । तावदाहारकार्यस्य प्रत्याख्यानमिदं मम ॥२६॥

अर्थ: फिर भी मेरा यह नियम है कि जब तक भर्ताका कुशल समाचार नहीं प्राप्त कर लेती हूँ तबतक मेरे आहार कार्यका त्याग है ॥२६॥


उदीचीनं प्रतीचीनं तत्रास्ति परमोज्ज्वलम् । गीर्वाणरमणं ख्यातमुद्यानं स्वर्गसंनिभम् ॥२७॥

तत्र कल्पतरुच्छायमहापादपसंकुले । स्थापयित्वा रहः सीतां विवेश स्वनिकेतनम् ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर पश्चिमोत्तर दिशामें विद्यमान अतिशय उज्ज्वल, स्वर्गके समान सुन्दर देवारण्य नामक उद्यान है सो कल्पवृक्षके समान कान्तिवाले बड़े-बड़े वृक्षोंसे व्याप्त उस उद्यानमें एक जगह सीताको ठहराकर रावण अपने महलमें चला गया ॥२७-२८॥


तावद्दूषणपञ्चत्वादग्रतोऽस्य महाशुचा । अष्टादश सहस्राणि विप्रलेपुर्महास्वरम् ॥२९॥

अर्थ: इतनेमें ही खरदूषणके मरणका समाचार पाकर रावणकी अठारह हजार रानियाँ बहुत भारी शोकके कारण महाशब्द करती हुई रावणके सामने विलाप करने लगीं ॥२९॥


भ्रातुश्चन्द्रनखा पादौ संसृत्योन्मुक्तकण्ठकम् । अभाग्या हा हतास्मीति विललापास्तदुर्दिनम् ॥३०॥

अर्थ: चन्द्रनखा भाईके चरणोंमें जाकर तथा गला फाड़-फाड़कर ‘हाय-हाय मैं अभागिनी मारी गयी’ इस तरह अश्रुवर्षासे दुर्दिनको पराजित करती हुई विलाप करने लगी ॥३०॥


रमणात्मजपञ्चत्ववह्निनिर्दग्धमानसाम् । विलपन्तीमिमां भूरि जगादैवं सहोदरः ॥३१॥

अर्थ: पति और पुत्रकी मृत्युरूपी अग्निसे जिसका मन जल रहा था ऐसी अत्यधिक विलाप करती हुई चन्द्रनखासे भाई - रावणने इस प्रकार कहा ॥३१॥


अलं वत्से रुदित्वा ते प्रसिद्धं किं न विद्यते । जगत्प्राग्विहितं सर्वं प्राप्नोत्यत्र न संशयः ॥३२॥

अर्थ: कि हे वत्से ! तेरा रोना व्यर्थ है। यह क्या प्रसिद्ध नहीं है कि संसारके प्राणी पूर्वभवमें जो कुछ करते हैं उस सबका फल अवश्य ही प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है ॥३२॥


अन्यथा क महीचारा जनाः क्षुद्रकशक्तयः । कायमेवंविधो भर्ता भवत्या व्योमगोचरः ॥३३॥

अर्थ: यदि ऐसा नहीं है तो क्षुद्रशक्तिके धारक भूमिगोचरी मनुष्य कहाँ और तुम्हारा ऐसा आकाशगामी भर्ता कहाँ ? ॥३३॥


मयेदमर्जितं पूर्वं व्यक्तं न्यायागतं फलम् । इति ज्ञात्वा शुचं कर्तुं कस्य मर्त्यस्य युज्यते ॥३४॥

अर्थ: ‘मैंने यह सब पूर्वमें संचित किया था सो उसीका यह न्यायागत फल प्राप्त हुआ है’ ऐसा जानकर किसी मनुष्यको शोक करना उचित नहीं है ॥३४॥


नाकाले म्रियते कश्चिद्वज्रेणापि समाहतः । मृत्युकालेऽमृतं जन्तोर्विषतां प्रतिपद्यते ॥३५॥

अर्थ: जबतक मृत्यु का समय नहीं आता है तबतक वज्रसे आहत होने पर भी कोई नहीं मरता है और जब मृत्युका समय आ पहुँचता है तब अमृत भी जीवके लिए विष हो जाता है ॥३५॥


येन व्यापादितो वत्से समरे खरदूषणः । अन्येषां वाहितेच्छानां मृत्युरेष भवाम्यहम् ॥३६॥

अर्थ: हे वत्से ! जिसने युद्धमें खरदूषणको मारा है उसके साथ अन्य सब शत्रुओं-के लिए मैं मृत्युस्वरूप हूँ अर्थात् मैं उन सबको मारूँगा ॥३६॥


स्वसारमेवमाश्वास्य दत्तादेशो जिनार्चने । दह्यमानमना वासभवनं रावणोऽविशत् ॥३७॥

अर्थ: इस प्रकार बहनको आश्वासन तथा जिनेन्द्र देवकी अर्चाका उपदेश देकर जिसका मन जल रहा था ऐसा रावण निवासगृहमें चला गया ॥३७॥


तत्रादरनिराकाङ्क्षं तल्पविक्षिप्तविग्रहम् । सोन्मादकेशरिच्छायं निःश्वसन्तमिवोरगम् ॥३८॥

अर्थ: वहाँ जाकर रावण आदरकी प्रतीक्षा किये बिना ही शय्यापर जा पड़ा। उस समय वह उन्मत्त सिंहके समान अथवा साँस भरते हुए सर्पके समान जान पड़ता था ॥३८॥


भर्तारं दुःखयुक्तेव भूषणादरवर्जिता । महादरमुवाचैवमुपसृत्य मयात्मजा ॥३९॥

अर्थ: भर्ताको ऐसा देख, दुःखयुक्तकी तरह आभूषणोंके आदरसे रहित मन्दोदरी बड़े आदरसे उसके पास जाकर इस प्रकार बोली ॥३९॥


किं नाथाकुलतां धत्से खरदूषणमृत्युना । न विषादोऽस्ति शूराणामापत्सु महतीष्वपि ॥४०॥

अर्थ: कि हे नाथ ! क्या खरदूषणकी मृत्युसे आकुलताको धारण कर रहे हो ? परन्तु यह ठीक नहीं है क्योंकि शूर-वीरोंको बड़ी-बड़ी आपत्तियोंमें भी विषाद नहीं होता ॥४०॥


पुरानेकत्र संग्रामे सुहृदस्ते क्षयं गताः । न च ते शोचिता जातु दूषणं किंनु शोचसि ॥४१॥

अर्थ: पहले अनेक संग्रामोंमें तुम्हारे मित्र क्षयको प्राप्त हुए हैं उन सबका तुमने शोक नहीं किया किन्तु आज खरदूषणके प्रति शोक कर रहे हो ? ॥४१॥


आसन्महेन्द्रसंग्रामे श्रीमालिप्रमुखाः नृपाः । बान्धवास्ते क्षयं याताः शोचितास्ते न जातुचित् ॥४२॥

अर्थ: राजा इन्द्रके संग्राममें श्रीमाली आदि अनेक राजा जो तुम्हारे बन्धुजन थे क्षयको प्राप्त हुए थे पर उन सबका तुमने कभी शोक नहीं किया ॥४२॥


अभूतसर्वशोकस्त्वमासीदपि महापदि । शोकं किं वहसीदानीं जिज्ञासामि विमो वद ॥४३॥

अर्थ: पहले बड़ी-बड़ी आपत्तिमें रहनेपर भी तुम्हें किसीका शोक नहीं हुआ पर इस समय क्यों शोकको धारण करते हो यह मैं जानना चाहती हूँ सो हे स्वामिन्, इसका कारण बतलाइए ॥४३॥


ततो महादरः स्वैरं निश्वस्योवाच रावणः । तल्पं किंचित्परित्यज्य धारितोदीरिताक्षरम् ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर महान् आदरसे युक्त रावण साँस लेकर तथा कुछ शय्या छोड़कर कहने लगा । उस समय उसके अक्षर कुछ तो मुखके भीतर रह जाते थे और कुछ बाहर प्रकट होते थे ॥४४॥


शृणु सुन्दरि सद्भावमेकं ते कथयाम्यहम् । स्वामिन्यसि ममासूनां सर्वदा कृतवाञ्छिता ॥४५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे सुन्दरि ! सुनो एक सद्भावकी बात तुमसे कहता हूँ। तुम मेरे प्राणोंकी स्वामिनी हो और सदा मैंने तुम्हें चाहा है ॥४५॥


यदि वाञ्छसि जीवन्तं मां ततो देवि नार्हसि । कोपं कर्तुं ननु प्राणा मूलं सर्वस्य वस्तुनः ॥४६॥

अर्थ: यदि मुझे जीवित रहने देना चाहती हो तो हे देवि ! क्रोध करना योग्य नहीं है, क्योंकि प्राण ही तो सब वस्तुओंके मूल कारण हैं ॥४६॥


ततस्तयैवमित्युक्ते शपथैर्विनियम्य ताम् । विलक्ष इव किंचित्स रावणः समभाषत ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर ‘ऐसा ही है’ इस प्रकार मन्दोदरीके कहनेपर उसे अनेक प्रकारकी शपथोंसे नियममें लाकर कुछ-कुछ लज्जित होते हुए-की तरह रावण कहने लगा ॥४७॥


यदि सा वेधसः सृष्टिरपूर्वा दुःखवर्णना । सीता पतिं न मां वष्टि ततो मे नास्ति जीवितम् ॥४८॥

अर्थ: कि जिसका वर्णन करना कठिन है ऐसी विधाता की अपूर्व सृष्टिस्वरूप वह सीता यदि मुझे पति रूपसे नहीं चाहती है तो मेरा जीवन नहीं रहेगा ॥४८॥


लावण्यं यौवनं रूपं माधुर्यं चारुचेष्टितम् । प्राप्य तां सुन्दरीमेकां कृतार्थत्वमुपागतम् ॥४९॥

अर्थ: लावण्य, यौवन, रूप, माधुर्य और सुन्दर चेष्टा सभी उस एक सुन्दरीको पाकर कृतकृत्यताको प्राप्त हुए हैं ॥४९॥


ततो मन्दोदरी कष्टां ज्ञात्वा तस्य दशामिमाम् । विहसन्ती जगादैवं विस्फुरद्दन्तचन्द्रिका ॥५०॥

इदं नाथ महाश्चर्यं वरो यत् कुरुतेऽर्थनम् । अपुण्या साबला नूनं या त्वां नार्थयते स्वयम् ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर रावणकी इस कष्टकर दशाको जानकर हँसती तथा दाँतोंकी कान्तिरूपी चाँदनी-को फैलाती हुई मन्दोदरी इस प्रकार बोली कि हे नाथ ! यह बड़ा आश्चर्य है कि वर याचना कर रहा है । जान पड़ता है कि वह स्त्री पुण्यहीन है जो स्वयं आपसे प्रार्थना नहीं कर रही है ॥५०-५१॥


अथवा निखिले लोके सैवैका परमोदया । या त्वया मानकूटेन याच्यते परमापदा ॥५२॥

अर्थ: अथवा समस्त संसारमें वही एक परम अभ्युदयको धारण करनेवाली है। जिसकी कि तुम्हारे जैसे अभिमानी पुरुष बड़ी दीनतासे याचना करते हैं ॥५२॥


केयूररत्नजटिलैरिमैः करिकरोपमैः । आलिङ्ग्य बाहुभिः कस्माद् बलात् कामयसे न ताम् ॥५३॥

अर्थ: अथवा बाजूबन्दके रत्नोंसे जटिल तथा हाथीकी सूँड़की उपमा धारण करनेवाली इन भुजाओंसे बलपूर्वक आलिंगन कर क्यों नहीं उसे चाह लेते हो ? ॥५३॥


सोऽवोचद्देवि विज्ञाप्यमस्त्यत्र शृणु कारणम् । प्रसभं येन गृह्णामि न तां सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥५४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें रावणने कहा कि हे देवि ! मैं जिस कारण उस सर्वांग सुन्दरीको जबर्दस्ती ग्रहण नहीं करता हूँ इसमें निवेदन करने योग्य कारण है उसे सुनो ॥५४॥


आसीदनन्तवीर्यस्य मूले भगवतो मया । आत्तमेकं व्रतं साक्षाद्देवि निर्ग्रन्थसंसदि ॥५५॥

अर्थ: हे देवि ! मैंने अनन्तवीर्य भगवान्के समीप निर्ग्रन्थ मुनियोंकी सभामें साक्षात् एक व्रत लिया था ॥५५॥


तेन देवेन्द्रवन्द्येन व्याख्यातमिदमीदृशम् । तथा निवृत्तिरेकापि ददाति परमं फलम् ॥५६॥

अर्थ: इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय अनन्तवीर्य भगवान्ने एक बार ऐसा व्याख्यान किया कि एक वस्तुका त्याग भी परम फल प्रदान करता है ॥५६॥


जन्तूनां दुःखभूयिष्ठभवसन्ततिसारिणाम् । पापान्निवृत्तिरल्पापि संसारोत्तारकारणम् ॥५७॥

अर्थ: दुःखोंसे भरी भव-परम्परामें भ्रमण करनेवाले प्राणियोंके पापसे थोड़ी भी निवृत्ति हो जावे तो वह उनके संसारसे पार होनेका कारण हो जाती है ॥५७॥


येषां विरतिरेकापि कुतश्चिन्नोपजायते । नरास्ते जर्जरीभूतकलशा इव निर्गुणाः ॥५८॥

अर्थ: जिन मनुष्योंके किसी पदार्थके त्यागरूप एक भी नियम नहीं है वे फूटे घटके समान निर्गुण हैं ॥५८॥


मनुष्याणां पशूनां च तेषां यत् किंचिदन्तरम् । येषां न विद्यते कश्चिद्विरामो मोक्षकारणम् ॥५९॥

अर्थ: उन मनुष्यों और पशुओंमें कुछ भी अन्तर नहीं है जिनके कि मोक्षका कारणभूत एक भी नियम नहीं है ॥५९॥


शक्त्या मुञ्चत पापानि गृह्णीत सुकृतं धनम् । जात्यन्धा इव संसारे न भ्राम्यथ यतश्चिरम् ॥६०॥

अर्थ: हे भव्य जीवो ! शक्तिके अनुसार पाप छोड़ो और पुण्यरूपी धनका संचय करो जिससे जन्मान्ध मनुष्योंके समान चिर काल तक संसारमें परिभ्रमण न करना पड़े ॥६०॥


एवं भगवतो वक्त्रकमलान्निर्गतं वचः । मधु पीत्वा नराः केचिद्गगनाम्बरतां गताः ॥६१॥

सागारधर्ममपरे श्रिता विकलशक्तयः । कर्मानुभावतः सर्वे न भवन्ति समक्रियाः ॥६२॥

अर्थ: इस प्रकार भगवान्के मुखकमलसे निकले हुए वचनरूपी मकरन्दको पीकर कितने ही मनुष्य निर्ग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हुए और हीनशक्तिको धारण करनेवाले कितने ही लोग गृहस्थधर्मको प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि कर्मोदयके कारण सब एक समान क्रियाके धारक नहीं होते ॥६१-६२॥


एकेन साधुना तत्र प्रोक्तोऽहं सौम्यचेतसा । दशानन गृहाणैकां निवृत्तिमिति शक्तितः ॥६३॥

अर्थ: उस समय सौम्य चित्तके धारक एक मुनिराजने मुझसे कहा कि हे दशानन ! शक्तिके अनुसार तुम भी एक नियम ग्रहण करो ॥६३॥


धर्मरत्नोज्ज्वलद्वीपं प्राप्तः शून्यमनस्करः । कथं व्रजसि विज्ञानी गुणसंग्रहकोविदः ॥६४॥

अर्थ: तुम धर्मरूपी उज्ज्वल रत्नद्वीपको प्राप्त हुए हो सो विज्ञानी तथा गुणोंके संग्रह करनेमें निपुण होकर भी खाली मन एवं खाली हाथ क्यों जाते हो ॥६४॥


इत्युक्तेन मया देवि प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । देवासुरमहर्षीणां प्रत्यक्षमिति भाषितम् ॥६५॥

यावन्नेच्छति मां नारी परकीया मनस्विनी । प्रसभं सा मया तावन्नाभिगम्यापि दुःखिना ॥६६॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर हे देवि ! मैंने मुनिराजको प्रणाम कर सुर-असुर तथा मुनियोंके समक्ष इस तरह कहा कि जबतक मानवती परस्त्री मुझे स्वयं नहीं चाहेगी तबतक दुखी होनेपर भी मैं बलपूर्वक उसका सेवन नहीं करूँगा ॥६५-६६॥


एतच्चाप्यभिमानेन गृहीतं दयिते व्रतम् । का मां किल समालोक्य साध्वी मानं करिष्यति ॥६७॥

अर्थ: हे प्रिये ! मैंने यह व्रत भी इस अभिमान से ही लिया था कि मुझे देखकर कौन पतिव्रता मान करेगी ? ॥६७॥


अतो न तां स्वयं देवि गृह्णामि सुमनोहराम् । सकृज्जल्पन्ति राजानः प्रत्यवायोऽन्यथा महान् ॥६८॥

अर्थ: इसलिए हे देवि ! मैं उस मनोहरांगीको स्वयं नहीं ग्रहण करता हूँ क्योंकि राजा एक बार ही कहते हैं अन्यथा बहुत भारी बाधा आ पड़ती है ॥६८॥


यावन्मुञ्चामि नो प्राणान् तावत् सीता प्रसाद्यताम् । भस्मभावङ्गते गेहे कूपखानश्रमो वृथा ॥६९॥

अर्थ: अतः जबतक मैं प्राण नहीं छोड़ता हूँ तबतक सीताको प्रसन्न करो क्योंकि घरके भस्म हो जानेपर कूप खुदानेका श्रम व्यर्थ है ॥६९॥


ततस्तं तादृशं ज्ञात्वा संजातकरुणोदया । बभाण रमणी नाथ स्वल्पमेतत् समीहितम् ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर रावणको वैसा जान जिसे दया उत्पन्न हुई थी ऐसी मन्दोदरी बोली कि हे नाथ ! यह तो बहुत छोटी बात है ॥७०॥


ततः किंचिन्मधुस्वादविलासवशवर्तिनी । सा देवरमगोद्यानं जगाम कमलेक्षणा ॥७१॥

अर्थ: तत्पश्चात् कुछ मधुर विलासोंकी वशवर्तिनी कमललोचना मन्दोदरी देवारण्य नामक उद्यानमें गयी ॥७१॥


तदाज्ञां प्राप्य संपद्भिरष्टादशमहौजसाम् । दशाननवरस्त्रीणां सहस्राण्यनुवव्रजुः ॥७२॥

अर्थ: उसकी आज्ञा पाकर रावणकी अठारह हजार मानवती स्त्रियाँ भी वैभवके साथ उसके पीछे चलीं ॥७२॥


मन्दोदरी क्रमात्प्राप्य सीतामेवमभाषत । समस्तनयविज्ञानकृतमण्डनमानसा ॥७३॥

अर्थ: समस्त नय-नीतियोंके विज्ञानसे जिसका मन अलंकृत था ऐसी मन्दोदरीने क्रम-क्रमसे सीताके पास जाकर इस प्रकार कहा ॥७३॥


अयि सुन्दरि हर्षस्य स्थाने कस्माद्विषीदसि । त्रैलोक्येऽपि हि सा धन्या पतिर्यस्या दशाननः ॥७४॥

अर्थ: कि हे सुन्दरि ! हर्षके स्थानमें विषाद क्यों कर रही हो ? वह स्त्री तीनों लोकोंमें धन्य है जिसका कि रावण पति है ॥७४॥


सर्वविद्याधराधीशं पराजितसुराधिपम् । त्रैलोक्यसुन्दरं कस्मात्पतिं नेच्छसि रावणम् ॥७५॥

अर्थ: जो समस्त विद्याधरोंका अधिपति है, जिसने इन्द्रको पराजित कर दिया है, तथा जो तीनों लोकोंमें अद्वितीय सुन्दर है ऐसे रावणको तुम पतिरूपसे क्यों नहीं चाहती हो ? ॥७५॥


निःस्वःक्ष्मागोचरः कोऽपि तस्यार्थे दुःखितासि किम् । सर्वलोकवरिष्ठस्य स्वस्य सौख्यं विधीयताम् ॥७६॥

अर्थ: तुम्हारा पति कोई निर्धन भूमिगोचरी मनुष्य है सो उसके लिए इतना दुखी क्यों हो ? सर्व लोकसे श्रेष्ठ अपने आपको सुखी करना चाहिए ॥७६॥


आत्मार्थं कुर्वतः कर्म सुमहासुखसाधनम् । दोषो न विद्यते कश्चित्सर्वं हि सुखकारणम् ॥७७॥

अर्थ: अपने लिए महासुखके साधनभूत कार्यके करनेवालेको कोई दोष नहीं है क्योंकि मनुष्यके सब प्रयत्न सुखके लिए ही होते हैं ॥७७॥


मयेति गदितं वाक्यं यदि न प्रतिपद्यते । ततो यद्भविता तत्ते शत्रुभिः प्रतिपद्यताम् ॥७८॥

अर्थ: इस प्रकार मेरे द्वारा कहे हुए वचन यदि तुम स्वीकृत नहीं करती हो तो फिर जो दशा होगी वह तुम्हारे शत्रुओंको प्राप्त हो ॥७८॥


बलीयान् रावणः स्वामी प्रतिपक्षविवर्जितः । कामेन पीडितः कोपं गच्छेत्प्रार्थनभञ्जनात् ॥७९॥

अर्थ: रावण अतिशय बलवान् तथा शत्रुसे रहित है प्रार्थना भंग करनेपर वह कामपीड़ित हो क्रोधको प्राप्त हो जायेगा ॥७९॥


यौ रामलक्ष्मणौ नाम तव काववि संमतौ । तयोरपि हि सन्देहः क्रुद्धे सति दशानने ॥८०॥

अर्थ: जो राम-लक्ष्मण नामक कोई पुरुष तुझे इष्ट हैं सो रावणके कुपित होनेपर उन दोनोंका भी सन्देह ही है ॥८०॥


प्रतिपद्यस्व तत् क्षिप्रं विद्याधरमहेश्वरम् । ऐश्वर्यं परमं प्राप्ता सौरीं लीलां समाश्रय ॥८१॥

अर्थ: इसलिए तुम शीघ्र ही विद्याधरों-के अधिपति रावणको स्वीकृत करो और परम ऐश्वर्यको प्राप्त हो देवों सम्बन्धी लीलाको धारण करो ॥८१॥


इत्युक्ता वाष्पसंभारगद्गदोद्गीर्णवर्णिका । जगाद जानकी जातजललोचनधारिणी ॥८२॥

वनिते सर्वमेतत्ते विरुद्धं वचनं परम् । सतीनामीदृशं वक्त्रात्कथं निर्गन्तुमर्हति ॥८३॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर जिसके मुखसे वाष्पभारके कारण गद्गद वर्ण निकल रहे थे तथा जो अश्रुपूर्ण नेत्र धारण कर रही थी ऐसी सीता बोली कि हे वनिते ! तेरे ये सब वचन अत्यन्त विरुद्ध हैं । पतिव्रता स्त्रियोंके मुखसे ऐसे वचन नहीं निकल सकते हैं ? ॥८२-८३॥


इदमेव शरीरं मे छिन्द भिन्द्याथवा हत । भर्तुः पुरुषमन्यं तु न करोमि मनस्यपि ॥८४॥

अर्थ: मेरे इस शरीर- को तुम लोग चाहे छेद डालो, भेद डालो अथवा नष्ट कर दो परन्तु अपने भर्ताके सिवाय अन्य पुरुषको मनमें भी नहीं ला सकती हूँ ॥८४॥


सनत्कुमाररूपोऽपि यदि वाखण्डलोपमः । नरस्तथापि तं भर्तुरन्यं नेच्छामि सर्वथा ॥८५॥

अर्थ: यद्यपि मनुष्य सनत्कुमारके समान रूपका धारक हो अथवा इन्द्रके तुल्य हो तो भी भर्ताके सिवाय अन्य पुरुषकी मैं किसी तरह इच्छा नहीं कर सकती ॥८५॥


युष्मान्ब्रवीमि संक्षेपाद्दारान् सर्वानिहागतान् । यथा ब्रूत तथा नैतत्करोमि कुरुतेप्सितम् ॥८६॥

अर्थ: मैं यहाँ आयी हुई तुम सब स्त्रियोंसे संक्षेपमें इतना ही कहती हूँ कि तुम लोग जो कह रही हो वह मैं नहीं करूँगी तुम जो चाहो सो करो ॥८६॥


एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः स्वयमेव दशाननः । सीतां मदनतापार्तो गङ्गावेणीमिव द्विपः ॥८७॥

अर्थ: इसी बीचमें जिस प्रकार हाथी गंगाकी धाराके पास पहुँचता है उसी प्रकार कामके सन्तापसे दुःखी रावण स्वयं सीताके पास पहुँचा ॥८७॥


समीपीभूय चोवाच परं करुणया गिरा । किंचिद्विहसितं कुर्वन्मुखचन्द्रं महादरः ॥८८॥

मा यासीर्देवि संत्रासं भक्तोऽहं तव सुन्दरि । शृणु विज्ञाप्यमेकं मे प्रसीदावहिता भव ॥८९॥

अर्थ: और पासमें स्थित हो मुखरूपी चन्द्रमाको कुछ-कुछ हास्यसे युक्त करता हुआ बड़े आदरके साथ अत्यन्त दयनीय वाणीमें बोला कि हे देवि ! भयको प्राप्त मत होओ, हे सुन्दरि ! मैं तुम्हारा भक्त हूँ, मेरी एक प्रार्थना सुनो, प्रसन्न होओ और सावधान बनो ॥८८-८९॥


वस्तुना केन हीनोऽहं जगत्त्रितयवर्तिना । न मां वृणोषि यद्योग्यमात्मनः पतिमुत्तमम् ॥९०॥

अर्थ: बताओ कि मैं तीनों लोकोंमें वर्तमान किस वस्तुसे हीन हूँ जिससे तुम मुझे अपने योग्य उत्तम पति स्वीकृत नहीं करती हो ॥९०॥


इत्युक्त्वा स्प्रष्टुकामं तं सीतावोचत्ससंभ्रमा । अपसर्प ममाङ्गानि मा स्पृशः पापमानसः ॥९१॥

अर्थ: इतना कहकर रावणने स्पर्श करनेकी चेष्टा प्रकट की तब सीताने हड़बड़ाकर कहा कि पापी हृदय ! हट, मेरे अंगोंका स्पर्श मत कर ॥९१॥


उवाच रावणो देवि त्यज कोपाभिमानताम् । प्रसीद दिव्यभोगानां शचीव स्वामिनी भव ॥९२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें रावणने कहा कि हे देवि ! क्रोध तथा अभिमान छोड़ो, प्रसन्न होओ और इन्द्राणीके समान दिव्य भोगोंकी स्वामिनी बनो ॥९२॥


सीतोवाच कुशीलस्य विभवाः केवलं मलम् । जनस्य साधुशीलस्य दारिद्र्यमपि भूषणम् ॥९३॥

अर्थ: सीताने कहा कि कुशील मनुष्यकी सम्पदाएँ केवल मल हैं और सुशील मनुष्यकी दरिद्रता भी आभूषण है ॥९३॥


चारुवंशप्रसूतानां जनानां शीलहारतः । लोकद्वयविरोधेन शरणं मरणं वरम् ॥९४॥

अर्थ: उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्योंको शीलकी हानि कर दोनों लोकोंके विरुद्ध कार्य करनेसे मरणकी शरणमें जाना ही अच्छा है ॥९४॥


परयोषित्कृताशस्य तवेदं जीवितं मुधा । शीलस्य पालनं कुर्वन् यो जीवति स जीवति ॥९५॥

अर्थ: तू परस्त्रीकी आशा रखता है अतः तेरा यह जीवन वृथा है। जो मनुष्य शीलकी रक्षा करता हुआ जीता है वास्तवमें वह जीता है ॥९५॥


एवं तिरस्कृतो मायां कर्तुं प्रववृते द्रुतम् । नेशुर्देव्यः परित्रस्ताः संजातं सर्वमाकुलम् ॥९६॥

अर्थ: इस प्रकार तिरस्कारको प्राप्त हुआ रावण शीघ्र ही माया करनेके लिए प्रवृत्त हुआ। सब देवियाँ भयभीत होकर भाग गयीं और वहाँका सब कुछ आकुलतासे पूर्ण हो गया ॥९६॥


एतस्मिन्नन्तरे जाते भानुर्मायाभयादिव । सभं किरणचक्रेण प्रविवेशास्तगह्वरम् ॥९७॥

अर्थ: इसी बीच में सूर्य, किरणसमूहके साथ-साथ अस्ताचलकी गुहामें प्रविष्ट हो गया सो मानो रावणकी मायाके भयसे ही प्रविष्ट हो गया था ॥९७॥


प्रचण्डैर्विगलद्गण्डैः करिभिर्घनबृंहितैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥९८॥

अर्थ: जो अत्यन्त क्रोधसे युक्त थे, जिनके गण्डस्थलसे मद चू रहा था तथा जो अत्यधिक गर्जना कर रहे थे ऐसे हाथियोंसे डराये जानेपर भी सीता रावणकी शरणमें नहीं गयी ॥९८॥


दंष्ट्राकरालदशनैर्व्याघ्रैर्दुःसहनिःस्वनैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥९९॥

अर्थ: जिनके दाँत दाढ़ोंसे अत्यन्त भयंकर दिखाई देते थे और जो दुःसह शब्द कर रहे थे ऐसे व्याघ्रोंके द्वारा डराये जानेपर सीता रावणकी शरणमें नहीं गयी ॥९९॥


चलत्केसरसंघातैः सिंहैरुग्रनखाङ्कुशैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥१००॥

अर्थ: जिनकी गरदनके बाल हिल रहे थे तथा जिनके नखरूपी अंकुश अत्यन्त तीक्ष्ण थे ऐसे सिंहोंके द्वारा डराये जानेपर भी सीता रावणकी शरणमें नहीं गयीं ॥१००॥


ज्वलत्स्फुलिङ्गभीमाक्षैर्लसज्जिह्वैर्महोरगैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥१०१॥

अर्थ: जिनके नेत्र देदीप्यमान तिलगोंके समान भयंकर थे तथा जिनकी जिह्वाएँ लपलपा रही थीं ऐसे बड़े-बड़े साँपोंके द्वारा डराये जानेपर भी सीता रावणकी शरणमें नहीं गयो ॥१०१॥


व्यात्ताननैः कृतोत्पातपतनैः क्रूरवानरैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥१०२॥

अर्थ: जिनके मुख खुले हुए थे, जो बार-बार ऊपरकी ओर उड़ान भरते थे तथा नीचेकी ओर गिरते थे ऐसे वानरोंके द्वारा डराये जानेपर भी सीता रावणकी शरणमें नहीं गयी ॥१०२॥


तमःपिण्डासितैस्तुङ्गैर्वेतालैः कृतहुङ्कृतैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥१०३॥

अर्थ: जो अन्धकारके पिण्डके समान काले थे, ऊँचे थे, तथा हुंकार कर रहे थे ऐसे वेतालोंके द्वारा डराये जानेपर भी सीता रावणके शरणमें नहीं गयी ॥१०३॥


एवं नानाविधैरुग्रैरुपसर्गैः क्षणोद्भूतैः । भीषिताप्यगमत्सीता शरणं न दशाननम् ॥१०४॥

अर्थ: इस प्रकार क्षण-क्षण में किये जानेवाले नाना प्रकारके भयंकर उपसर्गोंके द्वारा डराये जानेपर सीता रावणकी शरणमें नहीं गयी ॥१०४॥


तावच्च समतीतायां विभावर्यां भयादिव । जिनेन्द्रवेश्मसूत्तस्थौ शङ्खभेर्यादिनिःस्वनः ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर भयसे ही मानो रात्रि व्यतीत ही गयी और जिन मन्दिरोंमें शंख-भेरी आदिका शब्द होने लगा ॥१०५॥


उद्घाटितकपाटानि द्वाराणि वरवेश्मनाम् । प्रभाते गतनिद्राणि लोचनानीव रेजिरे ॥१०६॥

अर्थ: प्रभात होते ही बड़े-बड़े महलोंके द्वार सम्बन्धी किवाड़ खुल गये सो उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो निद्रा-रहित नेत्र ही उन्होंने खोले हों ॥१०६॥


संध्यया रञ्जिता प्राची दिगत्यन्तमराजत । कुङ्कुमस्येव पङ्केन मानोरागच्छतः कृता ॥१०७॥

अर्थ: सन्ध्यासे रँगी हुई पूर्व दिशा अत्यन्त सुशोभित हो रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो आनेवाले सूर्यकी अगवानीके लिए कुंकुमके पंकसे ही लिप्त की गयी हो ॥१०७॥


नैशं ध्वान्तं समुत्सार्य कृत्वेन्दुं विगतप्रभम् । उदियाय सहस्रांशुः पङ्कजानि न्यबोधयत् ॥१०८॥

अर्थ: रात्रि सम्बन्धी अन्धकारको नष्ट कर तथा चन्द्रमाको निष्प्रभ बनाकर सूर्य उदित हुआ और कमलोंको विकसित करने लगा ॥१०८॥


ततो विमलतां प्राप्ते प्रभाते चलपक्षिणि । विभीषणादयः प्रापुर्दशास्यं प्रियबान्धवाः ॥१०९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें पक्षी उड़ रहे थे ऐसे प्रातःकालकी निर्मलताको प्राप्त होनेपर विभीषण आदि प्रिय बान्धव रावणके समीप पहुँचे ॥१०९॥


खरदूषणशोकेन ते निर्वाक्यनताननाः । सबाष्पलोचना भूमौ समासीना यथोचितम् ॥११०॥

अर्थ: खरदूषणके शोकसे जिसके मुख चुपचाप नीचेकी ओर झुक रहे थे तथा जिनके नेत्र अश्रुओंसे युक्त थे ऐसे वे सब यथायोग्य भूमिपर बैठ गये ॥११०॥


तावत्पटान्तरस्थाया रुदत्याः शोकनिर्भरम् । शुश्राव योषितः शब्दं मनोभेदं विभीषणः ॥१११॥

अर्थ: उसी समय विभीषणने पटके भीतर स्थित शोकके भारसे रोती हुई स्त्रीका हृदय-विदारक शब्द सुना ॥१११॥


जगाद व्याकुलः किंचिदपूर्वेयमिहाङ्गना । का नाम करुणं रौति स्वामिनेव वियोजिता ॥११२॥

अर्थ: सुनकर व्याकुल होते हुए विभीषणने कहा कि यह यहाँ कौन अपूर्व स्त्री करुण शब्द कर रही है ऐसा जान पड़ता है मानो यह पतिके साथ वियोगको प्राप्त हुई है ॥११२॥


शब्दोऽयं शोकसंभूतमस्याः कम्पं समुल्वणम् । निवेदयति देहस्य दुःखसंभारवाहिनः ॥११३॥

अर्थ: इसका यह शब्द दुःखके भारको धारण करनेवाले शरीरके शोकोत्पन्न-उत्कट कम्पनको सूचित कर रहा है ॥११३॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य सीता तारतरस्वनम् । रुरोद सज्जनस्याग्रे नूनं शोकः प्रवर्द्धते ॥११४॥

अर्थ: इस प्रकार विभीषणके उक्त शब्द सुनकर सीता और भी अधिक रोने लगी सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनके आगे शोक बढ़ता है ॥११४॥


जगौ च वाष्पपूर्णास्याप्रस्खलन्निर्गताक्षरम् । इह को मे देव बन्धुस्त्वं यत्पृच्छसि वत्सलः ॥११५॥

अर्थ: उसने अश्रुपूर्ण मुखसे टूटे-फूटे अक्षर प्रकट करते हुए कहा कि हे देव ! यहाँ मेरा बन्धु तू कौन है ? जो इस प्रकार स्नेहके साथ पूछ रहा है ॥११५॥


सुता जनकराजस्य स्वसा भामण्डलस्य च । काकुत्स्थस्याहकं पत्नी सीता दशरथस्नुषा ॥११६॥

अर्थ: मैं राजा जनककी पुत्री, भामण्डलकी बहन, रामकी पत्नी और दशरथकी पुत्रवधू सीता हूँ ॥११६॥


वार्तान्वेषी गतो यावद्भर्ता मे भ्रातुराहवे । रन्ध्रेऽहं तावदेतेन हृता कुत्सितचेतसा ॥११७॥

अर्थ: मेरा भर्ता कुशल वार्ता लेने के लिए जबतक भाईके युद्धमें गया था तबतक छिद्र देख इस दुष्ट-हृदयने मेरा हरण किया है ॥११७॥


यावन्न मुञ्चति प्राणान् रामो विरहितो मया । भ्रातरस्मै द्रुतं तावन्नीत्वा मामर्पयोदितः ॥११८॥

अर्थ: मुझसे बिछुड़े राम जबतक प्राण नहीं छोड़ देते हैं हे भाई ! तबतक मुझे शीघ्र ही ले जाकर उन्हें सौंप दें ॥११८॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य क्रुद्धचेता विभीषणः । जगाद विनयं बिभ्रद् भ्रातरं गुरुवत्सलः ॥११९॥

आशीविषाग्निभूतेयं मोहाद् भ्रातः कुतस्त्वया । परनारी समानीता सर्वथा भयदायिनी ॥१२०॥

अर्थ: इस प्रकार सीताके शब्द सुनकर विभीषण-का चित्त कुपित हो उठा । तदनन्तर विनयको धारण करनेवाले गुरुजन-स्नेही विभीषणने भाईसे कहा कि हे भाई ! आशीविष - सर्पकी विषरूपी अग्निके समान सब प्रकारसे भय उत्पन्न करनेवाली यह पर-नारी तू मोहवश कहाँसे ले आया है ? ॥११९-१२०॥


बालबुद्धेरपि स्वामिन् विज्ञाप्यं श्रूयतां मम । दत्तो हि मम देवेन प्रसादो वचनं प्रति ॥१२१॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! यद्यपि मैं बालबुद्धि हूँ तो भी मेरी प्रार्थना श्रवण कीजिए । वचनके विषयमें आपने मुझपर प्रसन्नता की है अर्थात् मुझे वचन कहने की स्वतन्त्रता दी है ॥१२१॥


मवत्कीर्तिलताजालैर्जटिलं वलयं दिशाम् । मा धाक्षोदयशोदावः प्रसीद स्थितिकोविद ॥१२२॥

अर्थ: हे मर्यादाके जाननेमें निपुण ! यह दिशाओंका समूह आपकी कीर्तिरूपी लताओंके जालसे व्याप्त हो रहा है सो इसे अपयशरूपी दावानल जला न दे अतः प्रसन्न होइए ॥१२२॥


परदाराभिलाषोऽयमयुक्तोऽतिभयङ्करः । लज्जनीयो जुगुप्स्यश्च लोकद्वयनिषूदनः ॥१२३॥

अर्थ: यह परस्त्रीकी अभिलाषा अनुचित है, अत्यन्त भयंकर है, लज्जा उत्पन्न करनेवाली है, घृणित है और दोनों लोकोंको नष्ट करनेवाली है ॥१२३॥


धिक्शब्दः प्राप्यते योऽयं सज्जनेभ्यः समन्ततः । सोऽयं विदारणे शक्तो हृदयस्य सुचेतसाम् ॥१२४॥

अर्थ: सर्वत्र सज्जनों-से यह धिक् शब्द प्राप्त होता है वही सहृदय मनुष्योंके हृदयके विदारण करनेमें समर्थ है अर्थात् लोकनिन्दा विचारवान् मनुष्योंके हृदयको भेदन करनेवाली है ॥१२४॥


जानन् सकलमर्यादां विद्याधरमहेश्वरः । ज्वलन्तमुल्मुकं कस्मात्करोषि हृदये निजे ॥१२५॥

अर्थ: आप तो मर्यादाको जानने-वाले, विद्याधरोंके अधिपति हैं फिर इस जलते हुए उल्मुकको अपने हृदयपर क्यों रख रहे हो ? ॥१२५॥


यो ना परकलत्राणि पापबुद्धिर्निषेवते । नरकं स विशत्येष लोहपिण्डो यथा जलम् ॥१२६॥

अर्थ: जो पापबुद्धि मनुष्य परस्त्रियोंका सेवन करता है वह विनयसे उस तरह नरकमें प्रवेश करता है जिस तरह कि लोहका पिण्ड जलमें प्रवेश करता है ॥१२६॥


तच्छ्रुत्वा रावणोऽवोचत् किं तद्द्रव्यं महीतले । भ्रातर्यस्यास्मि न स्वामी परकीयं कुतो मम ॥१२७॥

अर्थ: यह सुनकर रावणने कहा कि हे भाई ! पृथ्वीतलपर वह कौन पदार्थ है जिसका मैं स्वामी न होऊँ ? अतः मेरे लिए यह परकीय वस्तु कैसे हुई ? ॥१२७॥


इत्युक्त्वा विकथाः कर्तुं प्रारेभे भिन्नमानसः । लब्धान्तरश्च मारीचो महानीतिरवोचत ॥१२८॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर उस भिन्न हृदय-ने विकथाएँ करना प्रारम्भ कर दिया । तदनन्तर अवसर पाकर महानीतिज्ञ मारीच बोला ॥१२८॥


जानन्नपि कथं सर्वं लोकवृत्तं दशानन । अकरोदीदृशं कर्म मोहस्येदं विचेष्टितम् ॥१२९॥

अर्थ: कि हे दशानन ! लोकका सब वृत्तान्त जानते हुए भी तुमने ऐसा कार्य क्यों किया ? यथार्थमें यह मोहकी ही चेष्टा है ॥१२९॥


सर्वथा प्रातरुत्थाय पुरुषेण सुचेतसा । कुशलाकुशलं स्वस्य चिन्तनीयं विवेकतः ॥१३०॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्यको सब तरहसे प्रातःकाल उठकर विवेकपूर्वक अपने हिताहितका विचार करना चाहिए ॥१३०॥


निरपेक्षं प्रवृत्तेऽस्मिन् वक्तुमेवं महामतौ । सभायाः क्षोभनं कुर्वन्नुत्तस्थौ रक्षसां प्रभुः ॥१३१॥

अर्थ: इस प्रकार महाबुद्धिमान् मारीच जब निरपेक्ष भावसे यह सब कह रहा था तब बीचमें ही सभाके क्षोभको करता हुआ रावण उठकर खड़ा हो गया ॥१३१॥


त्रिजगन्मण्डनाभिख्यमारुरोह च वारणम् । महर्द्धिभिश्च सामन्तैर्वाहारूढैः समावृतः ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर बड़ी-बड़ी ऋद्धियों और अश्वारूढ़ सामन्तोंसे घिरा हुआ रावण त्रिलोकमण्डन नामक हाथीपर सवार हो गया ॥१३२॥


पुष्पकाग्रं समारोप्य सीतां शोकसभाकुलाम् । पुरः कृत्वा महाभूत्या प्रययौ नगरीदिशा ॥१३३॥

अर्थ: वह शोकसे व्याकुल सीताको पुष्पक विमानपर चढ़ाकर तथा आगे कर बड़े वैभवसे नगरीकी ओर चला ॥१३३॥


कुन्तासितोऽमरच्छत्रध्वजाद्यर्पितपाणयः । अग्रतः पुरुषाः सस्रुः कृतसंभ्रमनिस्वनाः ॥१३४॥

अर्थ: भाले, खड्ग, छत्र तथा ध्वजा आदि जिनके हाथमें थे और जो सम्भ्रमपूर्वक जोरदार नारे लगा रहे थे ऐसे पुरुष आगे-आगे चल रहे थे ॥१३४॥


चलिताश्चञ्चलग्रीवाः स्थूरीपृष्ठाः सहस्रशः । चञ्चत्खुराननक्षुण्णक्षितयश्चारुसादिनः ॥१३५॥

अर्थ: जिनकी ग्रीवाएँ चंचल थीं, जो सुशोभित खुरोंके अग्रभागसे पृथ्वीको खोद रहे थे तथा जिनपर मनोहर सवार बैठे हुए थे ऐसे हजारों घोड़े चल पड़े ॥१३५॥


प्रचण्डनिस्वनद्घण्टाः कृतजीमूतगर्जिताः । प्रचेलुर्वेत्तृभिर्नुन्ना गण्डशैलसमा गजाः ॥१३६॥

अर्थ: जिनके घण्टे प्रचण्ड शब्द कर रहे थे, जो मेघोंके समान गर्जना कर रहे थे, जिन्हें महावत प्रेरित कर रहे थे और गण्डशैल - काली चट्टानोंवाले पर्वतोंके समान जान पड़ते थे ऐसे हाथी चलने लगे ॥१३६॥


अट्टहासान् विमुञ्चन्तः कृतनानाविचेष्टिताः । स्फोटयन्त इवाकाशं प्रजग्मुर्मानवाः पुरः ॥१३७॥

अर्थ: जो अट्टहास छोड़ रहे थे अर्थात् ठहाका मारकर हँस रहे थे, नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर रहे थे और आकाशको फोड़ते हुए-से जान पड़ते थे ऐसे मनुष्य उसके आगे-आगे जा रहे थे ॥१३७॥


सहस्रसंख्यतूर्याणां ध्वनिना पूरयन् दिशः । लङ्कां दशाननोऽविक्षन् मणिकाञ्चनतोरणाम् ॥१३८॥

अर्थ: इस प्रकार हजारों तुरहियोंके शब्दसे दिशाओंको पूर्ण करता हुआ रावण मणि तथा स्वर्णनिर्मित तोरणोंसे अलंकृत लंका नगरीमें प्रविष्ट हुआ ॥१३८॥


संपद्भिरेवमाद्याभिर्वृतोऽप्यत्यन्तचारुभिः । सीता दशाननं मेने तृणादपि जघन्यकम् ॥१३९॥

अर्थ: यद्यपि रावण इस प्रकारकी अत्यन्त सुन्दर सम्पदाओंसे घिरा हुआ था तो भी सीता उसे तृणसे भी तुच्छ समझती थी ॥१३९॥


अकल्मषं स्वभावेन वैदेहीमानसं नृपः । न शक्यं लोभमानेतुं लेपमम्बु यथाम्बुजम् ॥१४०॥

अर्थ: स्वभावसे ही निर्मल सीताके मनको रावण उस तरह लोभ प्राप्त करानेके लिए समर्थ नहीं हो सका जिस प्रकारकी पानी कमल-को लेप प्राप्त करानेके लिए समर्थ नहीं होता है ॥१४०॥


समन्तकुसुमं तावन्नानातरुलताकुलम् । प्रमदाख्यं वनं सीता नीता नन्दनसुन्दरम् ॥१४१॥

अर्थ: अथानन्तर जिसमें सब ओरसे फूल फूल रहे थे, जो नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे युक्त था तथा जो नन्दन वनके समान सुन्दर था ऐसे प्रमद नामक वनमें सीता ले जायी गयी ॥१४१॥


स्थितं फुल्लनगस्योद्ध्वं दृष्ट्वा यद् दृष्टिबन्धनम् । उन्मादो मनसस्तुङ्गो देवानामपि जायते ॥१४२॥

अर्थ: फूलोंके पर्वतके ऊपर स्थिति तथा दृष्टिको बांधनेवाले जिस प्रमदवनको देखकर देवोंके मनमें भी अत्यधिक उन्माद उत्पन्न हो जाता है ॥१४२॥


गिरिः सप्तभिरुद्यानैर्वेष्टितः स्वायतैः स च । रराज भद्रशालाद्यैः सूर्यावर्त्त इवोज्ज्वलः ॥१४३॥

अर्थ: अत्यन्त लम्बे-लम्बे सात उद्यानोंसे घिरा हुआ वह पर्वत ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो भद्रशाल आदि वनोंसे घिरा अतिशय उज्ज्वल सुमेरु पर्वत ही हो ॥१४३॥


एकदेशानहं तस्य विविधाद्भुतसंकुलान् । नामतः संप्रवक्ष्यामि तव राजन् निबोध्यताम् ॥१४४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए उसके एक देशरूप जो सघन वन हैं हम उनके नाम कहते हैं सो सुनो ॥१४४॥


प्रकीर्णकं जनानन्दं सुखसेव्यं समुच्चयम् । चारणप्रियसंज्ञं च निबोध प्रमदं तथा ॥१४५॥

अर्थ: उस पर्वतपर जो सात वन हैं उनके नाम इस प्रकार हैं - १ प्रकीर्णक, २ जनानन्द, ३ सुखसेव्य, ४ समुच्चय, ५ चारणप्रिय, ६ निबोध और ७ प्रमद ॥१४५॥


प्रकीर्णकं महीपृष्ठे जनानन्दं ततः परम् । यत्रानिषिद्धसंचारो जनः क्रीडति नागरः ॥१४६॥

अर्थ: इनमें-से प्रकीर्णक नामका वन पृथ्वीतल है पर उसके आगे जनानन्द नामका वह वन है जिसमें कि वे ही क्रीड़ा करते हैं जिनका कि आना-जाना निषिद्ध नहीं है अन्य लोग नहीं ॥१४६॥


तृतीयेऽलं वने रम्ये मृदुपादपसंकुले । घनवृन्दप्रतीकाशे सरिद्वापीमनोहरे ॥१४७॥

दशव्यामायता वृक्षा रविमार्गोपरोधिनः । केतकीयूथिकोपेतास्ताम्बूलीकृतसंगमाः ॥१४८॥

अर्थ: उसके ऊपर चलकर तीसरा सुखसेव्य नामका वन है जो कोमल वृक्षोंसे व्याप्त है, मेघसमूहके समान है, तथा नदियों और वापिकाओंसे मनोहर है । उस वनमें सूर्यके मार्गको रोकनेवाले, केतकी और जूहीसे सहित तथा पानकी लताओंसे लिपटे दशवेमां प्रमाण लम्बे-लम्बे वृक्ष हैं ॥१४७-१४८॥


निरुपद्रवसञ्चारे तत्रोद्यानसमुच्चये । विलसन्ति विलासिन्यः क्वचिद्देशे च संनराः ॥१४९॥

अर्थ: उसके ऊपर उपद्रव रहित गमनागमनसे युक्त समुच्चय नामका चौथा वन है जिसमें कहीं हाव-भावको धारण करनेवाली स्त्रियाँ सुशोभित हैं तो कहीं उत्तमोत्तम मनुष्य सुशोभित हो रहे हैं ॥१४९॥


चारणप्रियमुद्यानं मनोज्ञं पापनाशनम् । स्वाध्यायनिरता यत्र श्रमणा व्योमचारिणः ॥१५०॥

अर्थ: उसके ऊपर चारणप्रिय नामक पाँचवाँ पापापहारी मनोहर वन है जिसमें चारणऋद्धिधारी मुनिराज स्वाध्यायमें तत्पर रहते हैं ॥१५०॥


तस्योपरि समारुह्य ययुपृष्ठमनिन्दितम् । सुखारोहणसोपानं दृश्यते प्रमदामिधम् ॥१५१॥

अर्थ: [ उसके ऊपर छठवाँ निबोध नामका का वन है जो ज्ञानका निवास है] और उसके आगे चढ़कर प्रमद नामका सातवां वन है जो घोड़ेके पृष्ठके समान उत्तम प्रथा सुखसे चढ़नेके योग्य सीढ़ियोंसे युक्त दिखलाई देता है ॥१५१॥


स्नानक्रीडोचिता रम्या वाप्योऽस्मिन् पद्मशोभिता । प्रपाः सभाश्च विद्यन्ते रचितानेकभूमयः ॥१५२॥

अर्थ: इस प्रमद वनमें स्नानक्रीड़ाके योग्य, कमलोंसे सुशोभित मनोहर वापिकाएँ हैं, स्थान-स्थानपर पानीय-शालाएँ और अनेक खण्डोंसे युक्त सभागृह विद्यमान हैं ॥१५२॥


नारिङ्गमातुलिङ्गाद्यैः फलैर्यत्र निरन्तराः । खर्जूरैर्नालिकेरैश्च तालैरन्यैश्च वेष्टिताः ॥१५३॥

अर्थ: जहाँ खजूर, नारियल, ताल तथा अन्य वृक्षोंसे घिरे एवं फलोंसे लदे नारिंग और बीजपूर आदिके वृक्ष हैं ॥१५३॥


तत्र च प्रमदोद्याने सर्वा एवागजातयः । कुसुमस्तवकैश्छन्ना गीयन्ते मत्तषट्पदैः ॥१५४॥

अर्थ: उस प्रमद नामक उद्यानमें वृक्षोंकी सब जातियाँ विद्यमान हैं जो कि फूलोंसे आच्छादित हैं और मदोन्मत्त भ्रमर जिनपर गुंजार करते हैं ॥१५४॥


कुर्वन्तीव लतालीलां कोमलैः पल्लवैः करैः । घूर्णिता मन्दवातेन फलपुष्पमनोहरा ॥१५५॥

अर्थ: वहाँ मन्द-मन्द वायुसे हिलती और फलों तथा फलोंसे मनोहर लता अपने कोमल पल्लवोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो हाथ चलाती हुई नृत्य ही कर रही हो ॥१५५॥


सारङ्गदयितामिश्र प्रलम्बाम्बुदशोभिनः । समस्तर्तुकृतच्छायाः सेव्यन्ते घनपादपाः ॥१५६॥

अर्थ: वहाँ नीचे लपकते हुए मेघोंके समान सुशोभित तथा समस्त ऋतुओंमें छाया उत्पन्न करनेवाले सघन वृक्षोंकी हरिणियाँ सदा सेवा करती हैं - उनके नीचे विश्राम लेती हैं ॥१५६॥


विभूतिं तस्य तां वाप्यः सहस्रच्छदनाननाः । आलोकन्त इवातृप्ता असितोत्पललोचनैः ॥१५७॥

अर्थ: कमलरूपी मुखोंसे सहित वहांकी वापिकाएँ नील कमलरूपी नेत्रोंके द्वारा उस वनकी उस विभूतिको मानो अतृप्त होकर ही सदा देखती रहती हैं ॥१५७॥


गहनान् कोकिलालापान् नृत्यन्त्यो मन्दवायुना । दीर्घिका विहसन्तीव राजहंसकदम्बकैः ॥१५८॥

अर्थ: जहाँ मन्द-मन्द वायुसे नृत्य करती हुईं वापिकाएँ राजहंस पक्षियोंके समूहसे ऐसी जान पड़ती हैं मानो कोकिलाओंके आलापसे युक्त सघन वनोंकी हँसी ही कर रही हों ॥१५८॥


प्रमदाभिख्यमुद्यानं सर्वभोगोत्सवावहम् । अत्र किं बहुनोक्तेन स्याद्वरं नन्दनादपि ॥१५९॥

अर्थ: इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या ? इतना ही बहुत है कि समस्त भोगों और उत्सवोंको धारण करनेवाला वह प्रमद नामक उद्यान नन्दन वनसे भी अधिक सुन्दर है ॥१५९॥


अशोकमालिनी नाम पत्रपद्मविराजिता । वापी कनकसोपाना विचित्राकारगोपुरा ॥१६०॥

अर्थ: उस प्रमद वनमें अशोक मालिनी नामकी वापी है जो कि कमल पत्रोंसे सुशोभित है, स्वर्णमय सोपानोंसे युक्त है, और विचित्र आकारवाले गोपुरसे अलंकृत है ॥१६०॥


मनोहरैर्गृहैर्भाति गवाक्षाद्युपशोभितैः । सल्लतालिङ्गितप्रान्तैर्निर्झरैश्च ससीकरैः ॥१६१॥

अर्थ: इसके सिवाय वह प्रमद वन झरोखे आदिसे अलंकृत तथा उत्तमोत्तम लताओंसे आलिंगित मनोहर गृहों और जल कणोंसे युक्त निर्झरोंसे सुशोभित है ॥१६१॥


तत्राशोकतरुच्छन्ने स्थापिता शोकधारिणी । देशे शक्रालयाद् भ्रष्टा स्वयं श्रीरिव जानकी ॥१६२॥

अर्थ: उस प्रमद वनके अशोक वृक्षसे आच्छादित एक देशमें बैठी शोकवती सीता ऐसी जान पड़ती थी मानो स्वर्गसे गिरी साक्षात् लक्ष्मी हो ॥१६२॥


तस्मिन् दशाननोक्ताभिः स्त्रीभिरन्तरवर्जितम् । सीता प्रसाद्यते वस्त्रगन्धालंकारपाणिभिः ॥१६३॥

अर्थ: वहाँ रावणकी आज्ञानुसार वस्त्र, गन्ध तथा अलंकारोंको हाथोंमें धारण करनेवाली स्त्रियाँ निरन्तर सीताको प्रसन्न करनेकी चेष्टा करती थीं ॥१६३॥


दिव्यैः सनर्त्तनैर्गीतैर्वाक्यैश्चामृतहारिभिः । अनुनेतुं न सा शक्या संपदा चामरामया ॥१६४॥

अर्थ: किन्तु नृत्य सहित दिव्य संगीतों, अमृतके समान मनोहर वचनों और देवतुल्य सम्पदाके द्वारा सीता अनुकूल नहीं की जा सकी ॥१६४॥


उपर्युपरि संरक्तो दूतीं विद्याधराधिपः । प्राहिणोद्धि स्मरोदारदावज्वालाकुलीकृतः ॥१६५॥

अर्थ: इतनेपर भी कामरूपी दावानलकी प्रचण्ड ज्वालाओंसे व्याकुल हुआ रागी रावण एकके बाद एक दूती भेजता रहता था ॥१६५॥


दूति सीतां व्रज ब्रूहि दशास्यमनुरक्तकम् । न सांप्रतमवज्ञातुं प्रसीदेत्यादिभाषते ॥१६६॥

अर्थ: वह कहता था कि हे दूति ! जाओ और सीतासे कहो कि अब अनुरागसे भरे रावणकी उपेक्षा करना उचित नहीं है अतः प्रसन्न होओ ॥१६६॥


गताऽऽगता च सा तस्मै वदतीति वितेजसे । देव साहारमुत्सृज्य स्थिता त्वां वृणुते कथम् ॥१६७॥

अर्थ: दूती सीताके पास जाती और वापस आकर तेजरहित रावणसे कहती कि हे देव ! वह तो आहार छोड़कर बैठी है तुम्हें किस प्रकार स्वीकृत करे ॥१६७॥


न जल्पति निषण्णाङ्गी नालं कायेन चेष्टते । न ददादि महाशोका दृष्टिमस्मासु जानकी ॥१६८॥

अर्थ: वह चुपचाप बैठी है, न कुछ बोलती है, न शरीरसे कुछ चेष्टा करती है और न महाशोकसे युक्त होनेके कारण हम लोगोंपर दृष्टि ही डालती है ॥१६८॥


अमृतादपि सुस्वादैः पयःप्रभृतिभिः श्रितम् । सुगन्धि वृणुते नाङ्गं विचित्रं बहुवर्णकम् ॥१६९॥

अर्थ: अमृतसे भी अधिक स्वादिष्ट, दूध आदिसे युक्त सुगन्धित, तथा अनेक वर्णोंका विचित्र भोजन उसे दिया जाता है पर वह स्वीकृत नहीं करती है ॥१६९॥


ततो मदनदीप्ताग्निज्वालालीढः समन्ततः । आर्त्तो व्यचिन्तयत् भूरि मग्नोऽसौ व्यसनार्णवे ॥१७०॥

अर्थ: दूतोकी बात सुनकर जो सब ओरसे कामरूपी प्रचण्ड अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त था तथा दुःखरूपी सागरमें निमग्न था ऐसा रावण अत्यधिक दुःखी होता हुआ पुनः चिन्तामें पड़ जाता था ॥१७०॥


शोचत्युन्मुक्तदीर्घोष्णनिश्वासानिलसन्ततिः । शुष्यन्मुखः पुनः,किंचिद्गायत्यविदिताक्षरम् ॥१७१॥

अर्थ: वह कभी लम्बी तथा गरम श्वासोच्छ्वास-की वायुको छोड़ता हुआ शोक करता था तो कभी मुख सूख जानेसे अस्पष्ट अक्षरों द्वारा कुछ गाने लगता था ॥१७१॥


स्मरप्रालेयनिर्दग्धं धुनाति मुखपङ्कजम् । मुहुः किमपि संचित्य स्मयते क्षणनिश्चलः ॥१७२॥

अर्थ: वह कामरूपी तुषारसे जले हुए मुखकमलको बार-बार हिलाता था और कभी क्षणभरके लिए निश्चल बैठकर तथा कुछ सोचकर हँसने लगता था ॥१७२॥


अनुबन्धमहादाहा समस्तावयवानलम् । क्षिपत्यविरतं भूमौ कुट्टिमायां विवर्त्तकः ॥१७३॥

अर्थ: वह रत्नखचित फर्शपर लोटता और महादाहसे युक्त समस्त अवयवोंको बार-बार फैलाता था ॥१७३॥


उत्तिष्ठति पुनः शून्यः सेवते निजमासनम् । निःक्रामति पुनर्दृष्ट्वा जनं प्रतिनिवर्त्तते ॥१७४॥

अर्थ: फिर उठकर खड़ा हो जाता, कभी शून्य हृदय हो अपने आसनपर जा बैठता, कभी बाहर निकलता और किसी मनुष्यको देखकर फिर लौट जाता ॥१७४॥


नागेन्द्र इव हस्तेन सर्वदिङ्मुखगामिना । आस्फालयति निःशङ्कः कुट्टिमं कम्पमानयन् ॥१७५॥

अर्थ: जिस प्रकार हाथी सब दिशाओंमें जानेवाली सूँड़से किसीका आस्फालन करता है उसी प्रकार रावण भी निःशंक हो सब दिशाओंमें घूमनेवाले अपने हाथसे कम्पित करता हुआ फर्शको आस्फालन करता था अर्थात् फर्शपर घुमा-घुमाकर हाथ पटकता था और उससे फर्शको कम्पित करता था ॥१७५॥


स्मरन् सीतां मनोयातामात्मानं पौरुषं विधिम् । निरपेक्षमुपालब्धुं साश्रुनेत्रः प्रवर्त्तते ॥१७६॥

अर्थ: वह मनमें आयी हुई सीताका स्मरण करता हुआ अपने पुरुषार्थ, तथा निरपेक्ष भाग्यको उलाहना दनेके लिए प्रवृत्त होता था और उस समय उसके नेत्रोंसे अश्रु निकलने लगते थे ॥१७६॥


किंचिदाह्वयते दत्तहुङ्कारश्चातिकैर्जनैः । तूष्णीमास्ते पुनः किं किमिति शून्यं प्रभाषते ॥१७७॥

अर्थ: वह किसीको बुलाता था और समीपवर्ती लोग जब हुँकार देते थे तब चुप रह जाता था। तदनन्तर बार-बार क्या है ? क्या है ? इस प्रकार बिना किसी लक्ष्यके बकता रहता था ॥१७७॥


सीता सीतेति कृत्वास्यमुत्तानं भाषते मुहुः । तिष्ठत्यवाङ्मुखं भूयो नखेन विलिखन् महीम् ॥१७८॥

अर्थ: वह कभी मुखको ऊपर कर ‘सीता सीता’ इस प्रकार बार-बार चिल्लाता था और कभी मुख नीचा कर नखसे पृथिवीको खोदता हुआ चुप बैठा रहता था ॥१७८॥


करेण हृदयं मार्ष्टि बाहुमूर्द्धानमीक्षते । पुनर्मुञ्चति हुङ्कारं तल्पं मुञ्चति सेवते ॥१७९॥

अर्थ: वह कभी हाथसे वक्षःस्थलको साफ करता था, कभी भुजाओंके अग्रभागको देखता, कभी हुंकार छोड़ता, कभी विस्तरपर जा लेटता था ॥१७९॥


दधाति हृदये पद्मं पुनर्दू रं निरस्यति । मुहुः पठति शृङ्गारं गगनाङ्गणमीक्षते ॥१८०॥

अर्थ: कभो हृदयपर कमल रखता, कभी उसे दूर फेंक देता, कभी बार-बार श्रृंगारका पाठ करता - श्रृंगार भरे शब्दोंका उच्चारण करता और कभी आकाशकी ओर देखने लगता था ॥१८०॥


हस्तं हस्तेन संस्पृश्य हन्ति पादेन मेदिनीम् । निश्वासदहनश्याममाकृष्याधरमीक्ष्यते ॥१८१॥

अर्थ: कभी हाथसे हाथका स्पर्श कर पैरसे पृथिवीको ताड़ित करता था, कभी श्वासोच्छ्वासरूपी अग्निसे काले पड़े हुए अधरोष्ठको खींचकर देखता था ॥१८१॥


धत्ते कहकहं स्वानं केशान् वर्त्तयति क्षणम् । कोपेन दुस्सहां दृष्टिं क्वचिदेव विमुञ्चति ॥१८२॥

अर्थ: कभी ‘कह-कह’ शब्द करता था, कभी केशोंको खोलकर फैलाता था, कभी किसीपर क्रोधसे दुःसह दृष्टि छोड़ता था ॥१८२॥


जृम्भोत्तानीकृतोरस्को वाष्पाच्छादितलोचनः । बाहुतोरणमुद्यम्य भिनत्ति स्फुटदङ्गुलिः ॥१८३॥

अर्थ: कभी जिमुहाई लेते समय वक्षःस्थलको फुलाकर आगेको उभार लेता था, कभी नेत्रोंको आंसुओंसे आच्छादित करता था, कभी भुजाओंका तोरण ऊपर उठा अंगुलियां चटकाता हुआ उसे तोड़ता था ॥१८३॥


अंशुकान्तेन हृदय वीजयत्याहितेक्षणम् । कुसुमैः कुरुते रूपं पुनर्नाशयति द्रुतम् ॥१८४॥

अर्थ: कभी हृदयकी ओर दृष्टि डालकर वस्त्रके अंचलसे हवा करता था, कभी फूलोंसे रूप बनाता और फिर उसे शीघ्र ही नष्ट कर देता था ॥१८४॥


चित्रयत्यादरी सीतां द्रवयत्यश्रुभिः पुनः । दीनः क्षिपति हाकारान् न न मामेति जल्पति ॥१८५॥

अर्थ: कभी आदरके साथ सीताका चित्र बनाता और फिर उसे आंसुओंसे गीला करता था, कभी दीनताके साथ हाहाकार करता और कभी ‘न, न’ ‘मा, मा’ शब्दोंका उच्चारण करता था ॥१८५॥


एवमाद्याः क्रियाः क्लिष्टा मदनग्रहपीडितः । करोति करुणालापं चित्रं हि स्मरचेष्टितम् ॥१८६॥

अर्थ: इस प्रकार कामरूपी ग्रहसे पीडित रावण अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करता तथा करुणापूर्ण वार्तालाप करता था सो ठीक ही है क्योंकि कामकी चेष्टा विचित्र होती है ॥१८६॥


तस्य स्मराग्निना दीप्तं हृदयेन समं वपुः । अनुबन्धमहाधूपं ज्वलत्याशाकृतेन्धनम् ॥१८७॥

अर्थ: जिसमें वासनारूपी महाधूम उठ रहा था, तथा आशा जिसमें इँधन बन रही थी ऐसा उसका शरीर कामाग्निसे दीप्त हो हृदयके साथ जल रहा था ॥१८७॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं कामवस्थामहं गतः । येनेदमपि शक्नोमि न वोढुं स्वशरीरकम् ॥१८८॥

अर्थ: वह कभी विचार करता कि हाय मैं किस अवस्थाको प्राप्त हो गया जिससे अपने इस शरीरको भी धारण करनेके लिए समर्थ नहीं रहा ॥१८८॥


दुर्गसागरमध्यस्था बृहद्विद्याधरा मया । जिताः सहस्रशो युद्धे किमिदं वर्ततेऽधुना ॥१८९॥

अर्थ: मैंने दुर्गम समुद्रके बीचमें रहनेवाले हजारों बड़े-बड़े विद्याधर युद्धमें जीते हैं पर इस समय यह क्या हो रहा है ? ॥१८९॥


सर्वत्र जगति ख्यातलोकपालपरिच्छदः । वन्दीगृहमुपानीतो महेन्द्रोऽपि पुरा मया ॥१९०॥

अनेकयुद्धनिर्भग्ननराधिपकदम्बकः । सोऽहं संप्रति मोहेन भस्मीकर्तुं प्रवर्तितः ॥१९१॥

अर्थ: जिसका लोकपालरूपी परिकर समस्त संसारमें प्रसिद्ध था ऐसे राजा इन्द्रको भी मैंने पहले बन्दीगृहमें डाल रखा था तथा अनेक युद्धोंमें जिसने राजाओंके समूहको पराजित किया था ऐसा मैं इस समय मोहके द्वारा भस्मीभूत हो रहा हूँ ॥१९०-१९१॥


चिन्तयन्निदमन्यच्च कामाचार्यवशंगतः । आस्तां तावदसौ राजन्निदमन्यद्विबुध्यताम् ॥१९२॥

अर्थ: गौतम कहते हैं कि हे राजन् ! यह तथा अन्य वस्तुओंका चिन्तवन करता हुआ रावण कामरूपी आचार्यके वशीभूत हो रहा था सो यह रहने दो अब दूसरी बात सुनो ॥१९२॥


आकुलो मन्त्रिभिः साकं महामन्त्रविशारदः । विभीषणः समारेभे निरूपयितुमीदृशम् ॥१९३॥

अर्थ: अथानन्तर आकुलतासे भरा तथा बड़ी-बड़ी मन्त्रणा करनेमें निपुण विभीषण मन्त्रियोंके साथ बैठकर इस प्रकार निरूपण करनेके लिए तत्पर हुआ ॥१९३॥


स हि रावणराष्ट्रस्य धुरं धत्ते गतश्रमः । समस्तशास्त्रबोधाम्बुधौतनिर्मलमानसः ॥१९४॥

अर्थ: यथार्थमें समस्त शास्त्रोंके ज्ञान जलसे धुलकर जिसका मन अत्यन्त निर्मल हो गया था तथा जो सब प्रकारके श्रमको सहन करनेवाला था ऐसा विभीषण ही रावणके राष्ट्रका भार धारण करनेवाला था ॥१९४॥


रावणस्य हि तत्तुल्यो न हितो विद्यते परः । तस्य सर्वोपयोगेन चिन्तनीये स वर्तते ॥१९५॥

अर्थ: विभीषण-के समान रावणका हित करनेवाला दूसरा मनुष्य नहीं था। वह उसके करने योग्य समस्त कार्योंमें सर्व प्रकारका उपयोग लगाकर सदा जागरूक रहता था ॥१९५॥


उवाचासावहो वृद्धा राजनीत्थं व्यवस्थिते । उपक्षिपत कर्तव्यमस्माकमधुनोचितम् ॥१९६॥

अर्थ: विभीषणने मन्त्रियोंसे कहा कि अहो वृद्धजनो ! राजाकी ऐसी चेष्टा होनेपर अब हम लोगोंका क्या कर्तव्य है सो कहो ॥१९६॥


विभीषणोदितं श्रुत्वा संभिन्नमतिरभ्यधात् । अतः परं वदामः किं गतं कार्यमकार्यताम् ॥१९७॥

अर्थ: विभीषणका कथन सुनकर संभिन्नमति बोला कि इससे अधिक और क्या कहें कि सब कार्य अकार्यताको प्राप्त हो गया है अर्थात् सब कार्य गड़बड़ हो गया है ॥१९७॥


स्वामिनो दशवक्त्रस्य सहसा दैवयोगतः । दक्षिणः पतितो बाहुः खरदूषणसंज्ञकः ॥१९८॥

अर्थ: स्वामी दशाननकी दक्षिण भुजाके समान जो खरदूषण था वह दैवयोगसे सहसा नष्ट हो गया ॥१९८॥


विराधितोऽपरः कोऽपि कारणं यो न कस्यचित् । सोऽयं गोमायुतां मुक्त्वा केसरित्वं समाश्रितः ॥१९९॥

अर्थ: वह विराधित नामका विद्याधर जो कि किसीके लिए कुछ भी नहीं था वह आज शृगालपना छोड़कर सिंहपनेको प्राप्त हुआ है ॥१९९॥


भव्यतां पश्यतामुष्य साधुकर्मोदयादिमाम् । लक्ष्मणस्याहवे यातो बन्धुतां यत्सुचेष्टितः ॥२००॥

अर्थ: पुण्य कर्मके उदयसे प्राप्त हुई इसकी इस भव्यताको तो देखो कि उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला यह युद्धमें लक्ष्मणकी मित्रताको प्राप्त हो गया ॥२००॥


एतेऽपि बलिनः सर्वे मानिनः कपिकेतवः । भवन्त्याक्रान्तितो वश्या निर्भृत्यास्तु न जातुचित् ॥२०१॥

अर्थ: इधर ये सभी वानरवंशी भी अभिमानी तथा बलवान् हो रहे हैं सो ये आक्रमणसे ही वशमें हो सकते हैं बिना आक्रमणके कभी वशीभूत नहीं हो सकते ॥२०१॥


अमीषामन्य आकारो मानसं त्वन्यथा स्थितम् । भुजङ्गानामिवात्यन्तमन्तरे दारुणं विषम् ॥२०२॥

अर्थ: इनका आकार कुछ दूसरा ही है और मन दूसरे ही प्रकारका स्थित है जिस प्रकार साँपोंके बाह्यमें तो कोमलता रहती है और भीतर दारुण विष रहता है ॥२०२॥


नेता वानरमौलीनामनङ्गकुसुमापतिः । न्यक्षेण भजते पक्षं सुग्रीवस्य मरुत्सुतः ॥२०३॥

ततः पञ्चमुखोऽवोचद्विधायानादरस्मितम् । खरदूषणवृत्तेन गणितेनेह को गुणः ॥२०४॥

अर्थ: खरदूषणकी पुत्री अनंगकुसुमाका पति हनुमान् इस समय वानर वंशियोंका नेता बन रहा है और वह खासकर सुग्रीवका ही पक्ष लेता है। इस प्रकार संभिन्नमतिके कह चुकनेपर पंचमुख मन्त्री अनादरपूर्वक हँसता हुआ बोला कि यहाँ खरदूषणका वृत्तान्त गिननेसे अर्थात् उसकी मृत्युका सोच करनेसे क्या लाभ है ? ॥२०३-२०४॥


वृत्तान्तेनामुना कस्य संत्रासोऽकीर्तिरेव च । भवत्येव हि शूराणामीदृशी समरे गतिः ॥२०५॥

अर्थ: इस वृत्तान्तसे किसे भय तथा किसकी अपकीर्ति है ? अर्थात् किसीकी नहीं क्योंकि युद्धमें शूरवीरोंकी ऐसी गति होती ही है ॥२०५॥


वातेनापहृते सिन्धोः कणे का न्यूनता भवेत् । रावणस्य बलं स्फीतं किं दूषणसमीहया ॥२०६॥

व्रीडां व्रजति मे चेतः कुर्वतः संप्रधारणम् । कार्यं दशाननः स्वामी क्वान्ये केऽपि वनौकसः ॥२०७॥

अर्थ: वायुके द्वारा समुद्रकी एक कणिका हर लेनेपर समुद्रमें क्या न्यूनता आ गयी ? अर्थात् कुछ भी नहीं। रावणका बल बहुत है, उसके दोष देखनेसे क्या। ऐसी बात सोचते हुए मेरे मनमें लज्जा आती है। कहाँ यह जगत्‌का स्वामी रावण और कहाँ अन्य वनवासी ? ॥२०६-२०७॥


सूर्यहासधरेणापि क्रियते लक्ष्मणेन किम् । विराधितः क्व नामैव यस्येच्छामनुवर्तते ॥२०८॥

अर्थ: लक्ष्मण यद्यपि सूर्यहास खड्गको धारण करनेवाला है तो भी उससे क्या और विराधित उसकी इच्छानुकूल प्रवृत्ति करता है - उसका मित्र है इससे भी क्या ? ॥२०८॥


मृगेन्द्राधिष्ठितात्मानमपि काननसंगतम् । दन्दह्यते न किं दावो गिरिं परमदुःसहम् ॥२०९॥

अर्थ: क्योंकि बन सहित एक अत्यन्त दुःसह पर्वत यद्यपि सिंहसे सहित हो तो भी क्या उसे दावानल जला नहीं देता ? ॥२०९॥


सहस्रमतिनामाथ सचिवोऽनन्तरं जगौ । सूचयन् विरसं वाक्यं पूर्वं मस्तककम्पनात् ॥२१०॥

मानोद्धतैरिमैर्वाक्यैरर्थहोनैः किमीरितैः । मन्त्रणीयं हि संबद्धं स्वामिने हितमिच्छता ॥२११॥

अर्थ: तदनन्तर माथा हिलाकर पूर्व कथित वचनोंको नीरस बताता हुआ सहस्रमति मन्त्री बोला कि मानसे भरे इन निरर्थक वचनोंके कहनेसे क्या लाभ है ? स्वामीका हित चाहनेवाले व्यक्तिको ऐसी मन्त्रणा करनी चाहिए जो प्रकृत बातसे सम्बन्ध रखनेवाली हो ॥२१०-२११॥


स्वल्प इत्यनया बुद्ध्या कार्यावज्ञा न वैरिणि । कालं प्राप्य कणो वह्नेर्दहेत् सकलविष्टपम् ॥२१२॥

अर्थ: ‘वह छोटा है’ ऐसा समझकर शत्रुकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि समय पाकर अग्निका एक कण समस्त संसारको जला सकता है ॥२१२॥


अश्वग्रीवो महासैन्यः ख्यातः सर्वत्र विष्टपे । स्वल्पेनापि त्रिपृष्ठेन निहतो रणमूर्धनि ॥२१३॥

अर्थ: बड़ी भारी सेनाका स्वामी अश्वग्रीव समस्त संसारमें प्रसिद्ध था तो भी रणके अग्रभागमें छोटे-से त्रिपृष्ठके द्वारा मारा गया था ॥२१३॥


तस्मात्क्षेपविनिर्मुक्तमियं परमदुर्गमा । नगरी क्रियतां लङ्का मतिसंदोहशालिभिः ॥२१४॥

अर्थ: इसलिए बिना किसी विलम्बके इस लंका नगरीको बुद्धिमान् मनुष्योंके द्वारा अत्यन्त दुर्गम बनाया जावे ॥२१४॥


सुघोराणि प्रसार्यन्तां यन्त्राण्येतानि सर्वतः । तुङ्गप्राकारकूटेषु दृश्यतां च कृताकृतम् ॥२१५॥

अर्थ: ये महाभयानक यन्त्र सब दिशाओंमें फैला दिये जावें । अत्यन्त उन्नत प्राकारके शिखरोंपर चढ़कर ‘क्या किया गया क्या नहीं किया गया’ इसकी देख-रेख की जाये ॥२१५॥


सन्मानैर्बहुभिः शश्वत् सेव्यो जनपदोऽखिलः । स्वजनाव्यतिरेकेण दृश्यतां प्रियवादिभिः ॥२१६॥

अर्थ: अनेक प्रकारके सम्मानोंसे समस्त देशकी निरन्तर सेवा की जाये और मधुर वचन बोलनेवाले राज्याधिकारी सब लोगोंको अपने कुटुम्बीजनोंसे अभिन्न देखें ॥२१६॥


सर्वोपायविधानेन रक्ष्यतां प्रियकारिभिः । राजा दशाननो येन सुखतां प्रतिपद्यते ॥२१७॥

अर्थ: प्रिय करनेवाले मनुष्य सब प्रकारके उपायोंसे राजा दशाननकी रक्षा करें जिससे वह सुखको प्राप्त हो सके ॥२१७॥


प्रसाद्यतां सुविज्ञानैर्मैथिली परमैः प्रियैः । मधुरैर्वचनैर्दानैः क्षीरैरहिवधूरिव ॥२१८॥

अर्थ: जिस प्रकार दूधके द्वारा सर्पिणीको प्रसन्न किया जाता है उसी प्रकार उत्तम चातुर्य, परम प्रिय मधुर वचनों और इष्ट वस्तुओंके दान द्वारा सीताको प्रसन्न किया जाये ॥२१८॥


सुग्रीवं कैष्कुनगरमन्यांश्च भटपुङ्गवान् । बहिः स्थापयतोद्युक्तान्नगर्या रक्षकारिणः ॥२१९॥

अर्थ: किष्कु नगरके स्वामी सुग्रीव तथा नगरीकी रक्षा करनेमें उद्यत अन्य उत्तम योद्धाओंको नगरके बाहर रखा जावे ॥२१९॥


एवंकृते न ते भेदं जानन्ति बहिराहिताः । कार्ये नियोगदानाच्च जानन्ति स्वामिनं प्रियम् ॥२२०॥

अर्थ: ऐसा करनेपर बाहर रखे हुए सुग्रीवादि अन्तरका भेद नहीं जान सकेंगे और कार्य सौंपा जानेके कारण वे यह समझते रहेंगे कि स्वामी हमपर प्रसन्न है ॥२२०॥


एवं दुर्गतरे जाते कार्ये सर्वत्र सर्वतः । को जानाति हृतां सीतां स्थितामत्रापरत्र वा ॥२२१॥

अर्थ: इस तरह जब यहांका प्रत्येक कार्य सब जगह सब ओरसे अत्यन्त दुर्गम हो जायेगा तब कौन जान सकेगा कि हरी हुई सीता यहाँ है या अन्यत्र है ? ॥२२१॥


रहितश्चानया रामो ध्रुवं प्राणान् विमोक्ष्यति । यस्येयमीदृशी कान्ता वर्तते विरहे प्रिया ॥२२२॥

अर्थ: सीताके बिना राम निश्चित ही प्राण छोड़ देगा । क्योंकि जिसकी ऐसी प्रिय स्त्री विरहमें रहेगी वह जीवित रह ही कैसे सकेगा ॥२२२॥


रामे च पञ्चतां प्राप्ते शोकविक्लवमानसः । एकाकी क्षुद्रयुक्तो वा सौमित्रिः किं करिष्यति ॥२२३॥

अर्थ: जब राम मृत्युको प्राप्त हो जायेगा तब शोकसे दुःखी अकेला अथवा क्षुद्र सहायकोंसे युक्त लक्ष्मण क्या कर लेगा ? ॥२२३॥


अथवा रामशोकेन मरणं तस्य निश्चितम् । दीपप्रकाशयोर्यद्वदनयोः संगतं परम् ॥२२४॥

अर्थ: अथवा रामके शोकसे उसका मरण होना निश्चित है क्योंकि इन दोनोंका समागम दीप और प्रकाशके समान अविनाभावी है ॥२२४॥


अपराधाब्धिमग्नः सन् यास्यति क्व विराधितः । सुग्रीवस्यापि वाश्चन्तं श्रूयते लोकतः परम् ॥२२५॥

अर्थ: विराधित अपराधरूपी समुद्रमें मग्न है अतः कहाँ जावेगा ? अथवा जावेगा भी तो सुग्रीवके समीप जावेगा ऐसा लोगोंसे सुना जाता है ॥२२५॥


मायां सुग्रीवसंदेहकारिणीं यश्च नाशयेत् । दशवक्त्रेश्वरादस्य कोऽसौ लोके भविष्यति ॥२२६॥

अर्थ: सुग्रीवका सन्देह उत्पन्न करनेवाली मायाको जो नष्ट कर सके ऐसा पुरुष संसारमें स्वामी दशाननसे बढ़कर दूसरा कौन होगा ? ॥२२६॥


तस्मात्तद्दुर्गसंसिद्धौ स नाथं भजतेतराम् । योगश्चायं विभोर्वार्ढं परिणामे शुभावहः ॥२२७॥

अर्थ: इसलिए उस कठिन कार्यको सिद्ध करनेके लिए सुग्रीव, स्वामी - दशाननकी सेवा करेगा । और सुग्रीवके साथ दशाननका समागम होना फलकालमें शुभदायक होगा ॥२२७॥


प्रकारेणामुना शत्रूनेतानन्यांश्च जेष्यति । दशाननस्ततो यत्नः क्रियतामत्र वस्तुनि ॥२२८॥

अर्थ: इस विधिसे दशानन इन शत्रुओंको तथा अन्य लोगोंको भी जीत सकेंगे इसलिए इस विषयमें शीघ्र ही यत्न किया जावे ॥२२८॥


एवं विमृश्य विद्वांसः प्रमोदान्वितमानसाः । यथास्वं निलयं जग्मुः कर्तव्यकृतनिश्चयाः ॥२२९॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर बुद्धिमान् मन्त्री, करने योग्य कार्यका निश्चय कर हर्षित चित्त होते हुए अपने-अपने घर गये ॥२२९॥


विभीषणेन यन्त्राद्यैः शालो दुर्गतरीकृतः । विद्याभिश्च विचित्राभिर्लङ्का गह्वरतारका ॥२३०॥

अर्थ: विभीषणने यन्त्र आदिके द्वारा कोटको अत्यन्त दुर्गम कर दिया तथा नाना प्रकारकी विद्याओंके द्वारा लंकाको गह्वरों एवं पाशोंसे युक्त कर दिया ॥२३०॥


कृत्यं किंचिद्विशदमनसामाप्तवाक्यानपेक्षं नाप्तैरुक्तं फलति पुरुषस्योज्झितं पौरुषेण । दैवापेतं पुरुषकरणं कारणं नेष्टसंगे तस्माद्भव्याः कुरुत यत्नं सर्वहेतुप्रसादे ॥२३१॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! निर्मलचित्तके धारक मनुष्योंका कोई भी कार्य आप्त वचनोंसे निरपेक्ष नहीं होता अर्थात् आप्तके कहे अनुसार ही उनका प्रत्येक कार्य होता है । आप्त भगवान्ने मनुष्योंके लिए जो कार्य बतलाये हैं वे पुरुषार्थके बिना सफल नहीं होते और पुरुषार्थ दैवके बिना इष्ट सिद्धिका कारण नहीं होता इसलिए हे भव्यजीवो ! सो सबका कारण है उसके प्रसन्न करनेमें प्रयत्न करो ॥२३१॥


राजन्कर्मण्युदयसमयं सेवमाने जनानां नानाकारं कुशलवचनं नो विशत्येव चेतः । युक्तां तस्मात्स्थितिमनुनयन् कर्म कुर्यात्प्रशस्तं भूयो येन प्रतपति रविः शोकरूपो न कष्टः ॥२३२॥

अर्थ: हे राजन् ! जबतक मनुष्योंके कर्मका उदय विद्यमान रहता है तबतक नाना प्रकारके कुशल वचन उनके चित्तमें प्रवेश नहीं करते हैं इसलिए अपनी योग्य स्थितिके अनुसार प्रशस्त - पुण्यकर्म करना चाहिए जिससे कि फिर शोकरूपी कष्टदायी सूर्य सन्ताप उत्पन्न न कर सके ॥२३२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मायाप्रकाराभिधानं नाम षट्चत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें रावणके मायाके विविध रूपोंका वर्णन करनेवाला छियालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४६॥


४७. सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व (विटसुग्रीववधाख्यानं)

किष्किन्धेशस्ततो भ्राम्यन् कान्ताविरहदुःखितः । तं प्रदेशमनुप्राप्तो निवृत्तं यत्र संयुगम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर किष्किन्धापुरका स्वामी सुग्रीव स्त्रीके विरहसे दुःखी हो भ्रमण करता हुआ जहाँ कि खरदूषण तथा लक्ष्मणका युद्ध हुआ था ॥१॥


तत्राद्राक्षीद्रथान् भग्नान् गजांश्च गतजीवितान् । सामन्तानश्वसंयुक्तान्निर्भिन्नच्छिन्नविग्रहान् ॥२॥

अर्थ: वहाँ आकर उसने देखा कि कहीं टूटे हुए रथ पड़े हैं, कहीं मरे हुए हाथी पड़े हैं, कहीं जिनके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये हैं, ऐसे घोड़ोंके साथ सामन्त पड़े हैं ॥२॥


दह्यमानान् नृपान् कांश्चित् कांश्चिन्निश्वसितांस्तथा । क्रियमाणानुमरणान् कान्ताभिपरान् भटान् ॥३॥

अर्थ: कहीं कोई राजा जल रहे हैं, कोई साँसें भर रहे हैं, कहीं स्वामीके पीछे मरण करनेवाले स्वामिभक्त सुभट पड़े हैं ॥३॥


विच्छिन्नार्धभुजान् कांश्चित् कांश्चिदर्धोरुवर्जितान् । निःसृतान्त्रचयान् कांश्चित्कांश्चिद्दलितमस्तकान् ॥४॥

गोमायुप्रावृतान् कांश्चित् खगैः कांश्चिन्निषेवितान् । रुदता परिवर्गेण कांश्चिच्छादितविग्रहान् ॥५॥

अर्थ: किन्हींकी आधी भुजा कट गयी है, किन्हींकी आधी जांघ टूट चुकी है, किन्हींकी आँतोंका समूह निकल आया है, किन्हींके मस्तक फट गये हैं, किन्हींको शृगाल घेरे हुए हैं, किन्हींको पक्षी खा रहे हैं और किन्हींके मृत शरीरको रोते हुए कुटुम्बीजन आच्छादित कर रहे हैं ॥४-५॥


किमेतदिति पृष्टश्च तस्मै कश्चिदवेदयत् । सीताया हरणं ध्वस्तौ जटायुखरदूषणौ ॥६॥

अर्थ: ‘यह क्या है ?’ इस प्रकार पूछनेपर किसीने उसे बताया कि सीताका हरण हो चुका है और जटायु तथा खरदूषण मारे गये हैं ॥६॥


ततोऽभवद् भृशं दुःखी खरदूषणमृत्युतः । किष्किन्धाधिपतिश्चिन्तामेतामगमदाकुलः ॥७॥

कष्टं चिन्तितमेतन्मे किलास्मै बलशालिने । निवेद्य दयिताशोकं मोक्ष्यामीति महाशया ॥८॥

विधानदन्तिना सोऽपि कथमाशामहाद्रुमः । मग्नो मम विपुण्यस्य कथं शान्तिर्भविष्यति ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर खरदूषणकी मृत्युसे किष्किन्धापति सुग्रीव बहुत दुःखी हुआ, वह आकुल होता हुआ इस प्रकार चिन्ता करने लगा कि हाय मैंने विचार किया था कि ‘मैं उस बलशालीके लिए निवेदन कर स्त्री सम्बन्धी शोकसे छूट जाऊँगा’ इसी बड़ी आशासे मैं यहाँ आया था पर मेरे भाग्यरूपी हाथीने उस आशारूपी महावृक्षको कैसे गिरा दिया । हाय अब मुझ पापीको किस प्रकार शान्ति होगी ॥७-९॥


किमञ्जनासुतं गत्वा सादरं संश्रयाम्यहम् । मद्रूपधारिणो येन मरणं स करिष्यति ॥१०॥

अर्थ: क्या अब मैं आदरके साथ हनुमान्का आश्रय लूँ जिससे वह मेरे समान रूपका धारण करनेवाले मायामयी सुग्रीवका भरण कर सके ॥१०॥


उद्योगेन विमुक्तानां जनानां सुखिता कुतः । तस्माद् दुःखविनाशाय श्रयाम्युद्योगमुत्तमम् ॥११॥

अर्थ: उद्योगसे रहित मनुष्योंको सुख कैसे प्राप्त हो सकता है, इसलिए मैं दुःखका नाश करनेके लिए उत्तम उद्योगका आश्रय लेता हूँ ॥११॥


अथवानेकशो दृष्टोऽनादरं स करिष्यति । नवोऽनुरागवन्द्यो हि चन्द्रो लोकस्य नान्यदा ॥१२॥

अर्थ: अथवा हनुमान्को अनेक बार देखा है अतः वह अनादर करेगा क्योंकि नवीन चन्द्रमा ही लोगोंके द्वारा अनुरागके साथ वन्दनीय होता है अन्य समय नहीं ॥१२॥


तस्मान् महाबलं दीप्तं महाविद्याविशारदम् । रावणं शरणं यामि स मे शान्तिं करिष्यति ॥१३॥

अर्थ: इसलिए महाबलवान्, देदीप्यमान और महाविद्याओंमें निपुण रावणकी शरणमें जाता हूँ वही मुझे शान्ति प्रदान करेगा ॥१३॥


अजानानो विशेषं वा क्रोधचोदितमानसः । दशाननः कदाचिन्नौ हन्तुं वाञ्छेदुमावपि ॥१४॥

अर्थ: अथवा जिसका मन क्रोधसे प्रेरित हो रहा है ऐसा रावण, विशेषको न जानता हुआ कदाचित् हम दोनोंको ही मारनेकी इच्छा करे तो उलटा अनर्थ हो जायेगा ॥१४॥


मन्त्रदोषमसत्कारं दानं पुण्यं स्वशूरताम् । दुःशीलत्वं मनोदाहं दुर्मित्रेभ्यो न वेदयेत् ॥१५॥

अर्थ: इसके साथ नीति भी यह कहती है कि दुष्ट मित्रोंके लिए, मन्त्रदोष, असत्कार, दान, पुण्य, अपनी शूर-वीरता, दुष्ट स्वभाव और मनकी दाह नहीं बतलानी चाहिए ॥१५॥


तस्माद्येनैव संग्रामे निहितः खरदूषणः । तमेव शरणं यामि स मे शान्तिं करिष्यति ॥१६॥

अर्थ: इसलिए जिसने युद्धमें खरदूषणको मारा है उसीके शरणमें जाता हूँ, वही मेरे लिए शान्ति उत्पन्न करेगा ॥१६॥


तुल्यव्यसनताहेतोः कालोऽयमुपसर्पति । सद्भावं हि प्रपद्यन्ते तुल्यावस्था जना भुवि ॥१७॥

अर्थ: रामको भी स्त्रीका विरह हुआ है और मैं भी स्त्रीके विरहसे दुःखी हूँ इसलिए एक समान दुःख होनेसे यह समय उनके पास जानेके योग्य है क्योंकि पृथिवीपर समान अवस्थावाले मनुष्य सद्भाव - पारस्परिक प्रीतिको प्राप्त होते हैं ॥१७॥


एवं विमृश्य संजातचारुबुद्धिः समन्ततः । प्रजिघायादराद् दूतं प्रियं कर्तुं विराधितम् ॥१८॥

अर्थ: ऐसा विचारकर जिसे सब ओरसे उत्तम बुद्धि प्राप्त हुई थी ऐसे सुग्रीवने विराधितको अनुकूल करनेके लिए उसके पास अपना दूत भेजा ॥१८॥


सुग्रीवागमने तेन ज्ञापितेऽभूद् विराधितः । सविस्मयः सतोषश्च चकार च मनस्यदः ॥१९॥

चित्रं सुग्रीवराजो मां संसेव्यः सन्निषेवते । अथवाश्रयसामर्थ्यात् पुंसा किं नोपजायते ॥२०॥

अर्थ: जब दूतने सुग्रीवके आगमनका समाचार कहा तब विराधित आश्चर्य और सन्तोषसे युक्त होकर मनमें यह विचार करने लगा कि आश्चर्य है सुग्रीव तो हमारे द्वारा सेवा करने योग्य है फिर भी वह हमारी सेवा कर रहा है सो ठीक ही है क्योंकि आश्रयकी सामर्थ्यसे मनुष्योंके क्या नहीं होता है ? ॥१९-२०॥


ततो दुन्दुभिनिर्घोषं समाकर्ण्य घनोपमम् । पातालनगरं जातं भयाकुलमहाजनम् ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर मेघके समान दुन्दुभिका शब्द सुनकर पातालनगर, ( अलंकारपुर ), भयसे व्याकुल हैं महाजन जिसमें ऐसा हो गया ॥२१॥


ततो लक्ष्मीधरोऽपृच्छदनुराधाङ्गसंभवम् । वद तूर्यनिनादोऽयं श्रूयते कस्य संहतः ॥२२॥

अर्थ: तत्पश्चात् लक्ष्मणने विराधितसे पूछा कि कहो कि यह किसकी तुरहीका शब्द सुनाई दे रहा है ? ॥२२॥


सोऽवोचच्छ्रूयतां देव महाबलसमन्वितः । नाथोऽयं कपिकेतूनां प्राप्तस्त्वां प्रेमतत्परः ॥२३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें विराधितने कहा कि हे देव ! यह महाबलसे सहित, वानरवंशियोंका स्वामी सुग्रीव प्रेमसे युक्त हो आपके पास आया है ॥२३॥


भ्रातरौ बालिसुग्रीवौ किष्किन्धानगराधिपौ । तिग्मांशुरजसः पुत्रौ प्रख्याताववनाविमौ ॥२४॥

अर्थ: बालि और सुग्रीव ये दोनों भाई किष्किन्धा नगरीके स्वामी हैं, राजा सहस्ररश्मि रजके पुत्र हैं तथा पृथिवीपर अत्यन्त प्रसिद्ध हैं ॥२४॥


वालीति योऽत्र विख्यातः शीलशौर्यादिभिर्गुणैः । अभिमानमहाशैलो नानंसीद् दशवक्त्रकम् ॥२५॥

अर्थ: इनमें जो बालि नामसे प्रसिद्ध था वह शील, शूर-वीरता आदि गुणोंसे विख्यात था तथा अभिमानके लिए मानो सुमेरु ही था, उसने रावणको नमस्कार नहीं किया था ॥२५॥


परं प्राप्य प्रबोधं स कृत्वा सुग्रीवसाच्छ्रियम् । तपोवनमुपाविक्षत्सर्वग्रन्थविवर्जितम् ॥२६॥

अर्थ: अन्तमें परम प्रबोधको प्राप्त हो तथा राज्यलक्ष्मी सुग्रीवके अधीन कर वह सर्वपरिग्रहसे रहित तपोवनमें प्रविष्ट हो गया ॥२६॥


सुग्रीवोऽप्यभिसक्तात्मा सुतारायां श्रियान्वितः । राज्ये निःकण्टके रेमे शचीयुक्तो यथा हरिः ॥२७॥

अर्थ: सुग्रीव भी अपनी सुतारा नामक स्त्रीमें अत्यन्त आसक्त हो राज्यलक्ष्मी सहित निष्कण्टक राज्यमें इस प्रकार क्रीड़ा करता था जिस प्रकार कि इन्द्राणी सहित इन्द्र क्रीड़ा करता है ॥२७॥


सुतो यस्याङ्गदामिख्यः गुणरत्नविभूषितः । किष्किन्धाविषये यस्य संकथान्यविवर्जिता ॥२८॥

अर्थ: उस सुग्रीवका गुणरूपी रत्नोंसे विभूषित अंगद नामका ऐसा पुत्र है कि किष्किन्धा देशमें जिसकी कथा अन्य कथाओंसे रहित है अर्थात् अन्य लोगोंकी कथा छोड़कर सम्पूर्ण किष्किन्धा देशमें उसी एककी कथा होती है ॥२८॥


तयोरियं कथा यावद्वर्त्ततेऽनन्यचेतसोः । तावत्संप्राप सुग्रीवः श्रीमत्पार्थिवकेतनम् ॥२९॥

अर्थ: इस प्रकार अनन्यचित्तके धारक लक्ष्मण तथा विराधितके बीच जबतक यह वार्ता चल रही थी कि तबतक सुग्रीव राजभवनमें आ पहुँचा ॥२९॥


ज्ञातश्चानुमतिं प्राप्य विवेशेक्षितमङ्गलम् । राजाधिकृतलोकेन परमं दर्शितादरः ॥३०॥

अर्थ: राजाके अधिकारी लोगोंने ज्ञात होनेपर उसके प्रति बहुत आदर दिखलाया । तदनन्तर अनुमति पाकर उसने मंगलाचारका अवलोकन करते हुए राजभवनमें प्रवेश किया ॥३०॥


लक्ष्मीधरकुमाराद्यास्तं राजन् प्राप्तविस्मयाः । परिषस्वजिरे कान्त्या विकसद्वदनाम्बुजाः ॥३१॥

अर्थ: हे राजन् ! जिन्हें आश्चर्य प्राप्त हो रहा था तथा जिनके मुखकमल कान्तिसे खिल रहे थे ऐसे लक्ष्मण आदिने उसका आलिंगन किया ॥३१॥


उपविष्टाश्च विधिना जाम्बूनदमहीतले । योग्यं संभाषणं चक्रुरमृतोपमया गिरा ॥३२॥

अर्थ: शिष्टाचारके उपरान्त सब विधिपूर्वक स्वर्णमय पृथिवी तलपर बैठे और अमृततुल्य वाणीसे परस्पर वार्तालाप करने लगे ॥३२॥


निवेदितं ततो वृद्धैरिति पद्ममहीक्षिते । देव किष्किन्धनगरे सुग्रीवाख्योऽवनीश्वरः ॥३३॥

अर्थ: तदनन्तर वृद्धजनोंने राजा रामचन्द्रके लिए परिचय दिया कि हे देव ! यह किष्किन्ध नगरका राजा सुग्रीव है ॥३३॥


प्रभुर्महाबलो भोगी गुणवानतिसत्प्रियः । केनापि दुष्टमायेन खगेनानर्थमाहृतः ॥३४॥

अर्थ: यह महाऐश्वर्यशाली, महाबलवान्, भोगी, गुणवान् तथा सज्जनों-को अतिशय प्यारा है । परन्तु किसी दुष्ट मायावी विद्याधरने इसे अनर्थ - आपत्तिमें डाल दिया है ॥३४॥


एतस्याकृतिमाश्रित्य राज्यभोगं पुरं बलम् । सुतारां च गृहीतुं तां कोऽपि वाञ्छति दुर्मतिः ॥३५॥

अर्थ: कोई दुर्बुद्धि विद्याधर इसका रूप धर इसके राज्यभोग, नगर, सेना तथा इसकी प्रिया सुताराको भी ग्रहण करना चाहता है ॥३५॥


एतस्य वचनस्यान्ते रामस्तत्संमुखोऽभवत् । अचिन्तयच्च मत्तोऽपि दुःखितो नाम विद्यते ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर वृद्धजनोंके उक्त वचन पूर्ण होनेके बाद राम, सुग्रीवके सम्मुख उसकी ओर देखने लगे । रामने मनमें विचार किया कि अरे ! यह तो मुझसे भी अधिक दुःखी है ॥३६॥


मयायं सदृशो मन्ये यदि वाधरतां भजेत् । येनास्य दृश्यमानैकप्रतिपक्षेण बाधनम् ॥३७॥

अर्थ: यह मेरे समान है अथवा मैं समझता हूँ कि यह मुझसे भी कहीं अधिक हीनताको प्राप्त है क्योंकि इसका शत्रु तो इसके सामने ही बाधा पहुँचा रहा है ॥३७॥


अर्थोऽयं दुस्तरोऽत्यन्तं कथमेतद्भविष्यति । हानिरेवंविधस्यैषा मद्विधः किं करिष्यति ॥३८॥

अर्थ: इसका यह कार्य अत्यन्त कठिन है सो किस प्रकार होगा । इसकी यह बड़ी हानि हो रही है मेरा-जैसा व्यक्ति क्या करेगा ? ॥३८॥


सुमित्रातनयोऽपृच्छत् कृत्स्नं दुःखस्य कारणम् । सुग्रीवस्य मनस्तुल्यं धीरं जाम्बूनदश्रुतिम् ॥३९॥

अर्थ: लक्ष्मणने सुग्रीवके मनके समान जो जाम्बूनद नामक धीर-वीर मन्त्री था उससे दुःखका समस्त कारण पूछा ॥३९॥


ततोऽसौ मन्त्रिणां मुख्यो जगाद विनयान्वितः । असत्सुग्रीवरूपस्य सत्सुग्रीवस्य चान्तरम् ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्रियोंमें मुख्य जाम्बूनदने बड़ी विनयसे मायामय सुग्रीव और वास्तविक सुग्रीवका अन्तर बताया ॥४०॥


राजन् दारुणानङ्गलतापाशवशीकृतः । रूपं रूपवशः कोऽपि समं कृत्वास्य मायया ॥४१॥

अज्ञातो मन्त्रिवर्गस्य सर्वस्यात्मजनस्य च । सुग्रीवान्तःपुरं तुष्टः प्राविशत्पापचेतनः ॥४२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे राजन् ! अतिशय दारुण कामरूपी लताके पाशसे विवश तथा सुताराके रूपसे मोहित कोई पापी विद्याधर मायासे इसका रूप बनाकर मन्त्रीवर्ग तथा समस्त परिजनोंके बिना जाने, सन्तुष्ट हो सुग्रीवके अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुआ ॥४१-४२॥


प्रविशन्तं च तं दृष्ट्वा सुताराह्वा परा सती । महादेवी जगादास्य समुद्विग्ना निजं जनम् ॥४३॥

दुष्टविद्याधरः कोऽपि सुग्रीवाकृतिरेषकः । आयाति पापपूर्णात्मा चारुलक्षणवर्जितः ॥४४॥

अभ्युत्थानादिकामस्य क्रियां माकार्ष्ट पूर्ववत् । केनापि तरणीयोऽयमभ्युपायेन दुर्णयः ॥४५॥

अर्थ: उसे प्रवेश करते देख सुतारा नामकी परम सती महादेवीने भयभीत होकर अपने परिजनसे कहा कि जिसकी आत्मा पापसे पूर्ण है, तथा जो उत्तम लक्षणोंसे रहित है ऐसा यह कोई दुष्ट विद्याधर सुग्रीवका वेष रखकर आता है अतः पहलेकी तरह तुम लोग इसका सत्कार नहीं करो। यह दुर्नयरूपी सागर किसी उपायसे तिरने योग्य है - पार करने योग्य है ॥४३-४५॥


अथाशङ्काविमुक्तात्मा गम्भीरो लीलयान्वितः । गत्वा सुग्रीववद्भेजे सौग्रीवं स वरासनम् ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी आत्मा शंकासे रहित थी, जो गम्भीर था और लीलासे सहित था ऐसा वह मायामय विद्याधर सुग्रीवके समान जाकर उसके सिंहासन पर आ बैठा ॥४६॥


एतस्मिन्नन्तरे प्राप बालिराजानुजः क्रमात् । अद्राक्षीच्च जनं दीनमप्राक्षीच्च समाकुलः ॥४७॥

कस्मादयं जनोऽस्माकं म्लानवक्त्रेक्षणो भृशम् । विषादं वहते स्थाने स्थाने कृतसमागमः ॥४८॥

अर्थ: इसी बीचमें बालिराजाका अनुज वास्तविक सुग्रीव, यथाक्रमसे वहाँ आया । आते ही उसने अपने परिजनको दीन देखकर व्यग्र हो उनसे पूछा कि ये हमारे परिजन, अत्यन्त म्लानमुख एवं म्लाननेत्र होकर विषाद क्यों धारण कर रहे हैं तथा स्थान-स्थानपर इकट्ठे हो रहे हैं ? ॥४७-४८॥


किमङ्गदो गतो मेरुं वन्दनार्थी चिरायति । किं वा प्रमादतो देवी कस्याप्युपगता रुषम् ॥४९॥

अर्थ: वन्दनाकी अभिलाषासे अंगद सुमेरु पर्वतपर गया था सो क्या आनेमें विलम्ब कर रहा है अथवा महादेवी प्रमादके कारण किसीपर रोषको प्राप्त हुई है ? ॥४९॥


जन्ममृत्युजरात्युग्रनानासंसारदुःखतः । बिभ्यद् विभीषणः किं स्यात्तपोवनमुपागतः ॥५०॥

अर्थ: अथवा जन्म, मृत्यु और जरासे अत्यन्त उग्र संसारके नाना दुःखोंसे भयभीत होकर विभीषण तपोवनको प्राप्त हुआ है ॥५०॥


चिन्तयन्नित्यतिक्रम्य द्वाराणि मणितेजसा । मासमानानि सर्वाणि संयुक्तानि सुतोरणैः ॥५१॥

गीतजल्पितमुक्तानि सुप्तानीव समंततः । शङ्कितद्वारपालानि प्रयातान्यन्यतामिव ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ता करता हुआ सुग्रीव, मणियोंके तेजसे देदीप्यमान तथा उत्तमोत्तम तोरणोंसे संयुक्त उन समस्त द्वारोंको उल्लंघन कर महलके भीतर प्रविष्ट हुआ कि जो संगीतमय वार्तालापसे रहित थे, सब ओर से सन्तप्त हुएके समान जान पड़ते थे, जिनके द्वारपाल शंकासे युक्त थे तथा जो अन्यरूपताको प्राप्त हुएके समान जान पड़ते थे ॥५१-५२॥


प्रासादप्रवरोत्संगे विक्षिपन् दृष्टिमायताम् । अपश्यत्स्त्रीजनान्तस्थमात्माभं दुष्टखेचरम् ॥५३॥

अर्थ: जब उसने महलके उत्तम मध्यभागमें अपनी लम्बी दृष्टि डाली तो उसने स्त्री जनोंके पास बैठे हुए अपनी हो समान आभावाले एक दुष्ट विद्याधरको देखा ॥५३॥


दिव्यहाराम्बरं दृष्ट्वा तं शोभां दधतं पुरः । चित्रावतंसकं कान्त्या विकसद्वदनाम्बुजम् ॥५४॥

क्रुद्धो जगर्ज सुग्रीवः प्रावृषेण्यघनोपमम् । दिङ्मुखेषु क्षिपन् भासमक्ष्णोः संध्याघनारुणम् ॥५५॥

अर्थ: जो दिव्य हार और वस्त्रोंको धारण कर रहा था, परम शोभाका धारक था, चित्र-विचित्र आभूषणोंसे युक्त था, तथा कान्तिसे जिसका मुखकमल विकसित हो रहा था ऐसे दुष्ट विद्याधरको सामने देख सुग्रीव, क्रुद्ध होकर सन्ध्याके मेघ समान लाल नेत्रोंकी कान्तिको दिशाओंमें फैलाता हुआ वर्षा ऋतुके मेघके समान गरजा ॥५४-५५॥


ततः सुग्रीवतुल्योऽपि कुर्वन् परुषगर्जितम् । उत्तस्थौ कोपरक्तास्यः करीव मदविह्वलः ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीवके समान रूपको धारण करनेवाला विद्याधर भी क्रोधसे रक्तमुख हो हाथीके ससान मदसे विह्वल होता और कठोर गर्जना करता हुआ उठा ॥५६॥


संदष्टोष्ठौ महासत्त्वौ दृष्ट्वा तौ योद्धुमुद्यतौ । साम्ना निरुरुधुः क्षिप्रं श्रीचन्द्राद्याः सुमन्त्रिणः ॥५७॥

अर्थ: अथानन्तर ओठोंको डँसते हुए उन दोनों बलवानोंको युद्धके लिए उद्यत देख श्रीचन्द्र आदि मन्त्रियोंने शान्तिपूर्वक शीघ्र ही उन्हें रोक दिया ॥५७॥


सुतारेति ततोऽवोचत् दुष्टोऽयं कोऽपि खेचरः । तुल्यः सर्वेण देहेन बलेन वचसा रुचा ॥५८॥

पत्युर्मम न तुल्यस्तु लक्षणैर्मनकागपि । प्रासादशङ्खकुम्भाद्यैश्चिरसंस्थितलक्षितैः ॥५९॥

अर्थ: तत्पश्चात् सुताराने कहा कि यह कोई दुष्ट विद्याधर है । यद्यपि समस्त शरीर, बल, वचन और कान्तिसे तुल्य दिखता है परन्तु प्रासाद, शंख, कलश आदि लक्षणोंसे जो कि मेरे पतिके शरीरमें चिरकालसे स्थित हैं तथा जिन्हें मैंने अनेक बार देखा है किंचित् भी मेरे पतिके समान नहीं है ॥५८-५९॥


भर्तुर्मे भूषिताङ्गस्य महापुरुषलक्षणैः । कस्यापि वार्धमस्यास्य वाजिवालेयतुल्यता ॥६०॥

अर्थ: महापुरुषोंके लक्षणोंसे जिनका शरीर भूषित है ऐसे मेरे पतिकी तथा इस किसी नीचकी तुल्यता घोड़े और गधेकी तुल्यताके समान है ॥६०॥


श्रुत्वापीदं सुतारोक्तं सादृश्यहृतचित्तकैः । मन्त्रिभिस्तदवज्ञातं निःस्वोक्तं धनिभिर्यथा ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर दोनोंकी सदृशताके कारण जिनके चित्त हरे गये थे ऐसे मन्त्रियोंने सुताराके इन शब्दोंको सुनकर भी उनकी उस तरह अवज्ञा कर दी जिस प्रकार कि धनी मनुष्य निर्धन मनुष्यके वचनोंकी अवज्ञा कर देते हैं ॥६१॥


एकीभूय च तैः सर्वैर्मन्त्रिभिर्मतिशालिभिः । गदितं संप्रधार्येदं संदेहहृतमानसैः ॥६२॥

मद्यपस्यातिवृद्धस्य वेश्याव्यसनिनः शिशोः । प्रमदानां च वाक्यानि जातु कार्याणि नो बुधैः ॥६३॥

अर्थ: सन्देहने जिनका मन हर लिया था ऐसे उन बुद्धिशाली मन्त्रियोंने एकत्रित हो सलाह कर यह कहा कि मद्यपायी, अत्यन्त वृद्ध, वेश्या व्यसनी, बालक और स्त्रियोंके वचन विद्वज्जनोंको कभी नहीं मानना चाहिए ॥६२-६३॥


अत्यन्तदुर्लभा लोके गोत्रशुद्धिस्तया विना । नितान्तपरमेणापि न राज्येन प्रयोजनम् ॥६४॥

अर्थ: लोकमें गोत्रकी शुद्धि अत्यन्त दुर्लभ है इसलिए उसके बिना बहुत भारी राज्यसे भी प्रयोजन नहीं है ॥६४॥


संप्राप्य निर्मलं गोत्रं भव्यं शीलादिभूषितैः । तस्मादन्तःपुरं यत्नादिदं रक्ष्यं सुनिर्मलम् ॥६५॥

अर्थ: निर्मल गोत्र पाकर ही शीलादि आभूषणोंसे विभूषित हुआ जाता है इसलिए इस निर्मल अन्तःपुरकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए ॥६५॥


अकीर्तिरिति निन्द्येयमस्य नोत्पद्यते यथा । कुरुध्वमतियत्नेन विभज्याखिलमेतयोः ॥६६॥

अर्थ: जिस तरहसे सुग्रीव निन्दनीय अपकीर्ति न हो उस तरह इन दोनोंका सब विभाग कर अतियत्नपूर्वक काम करना चाहिए ॥६६॥


अङ्गः कृत्रिमसुग्रीवं पितृभ्रान्त्या समाश्रितः । अङ्गदः सत्यसुग्रीवं मातृवाक्यानुरोधतः ॥६७॥

अर्थ: अंग नामका पुत्र पिताकी भ्रान्तिसे कृत्रिम - बनावटी सुग्रीवके पास गया और अंगद नामका पुत्र माताके वचनोंके अनुरोधसे सत्य सुग्रीवके पास गया ॥६७॥


संदिहाना निजे नाथे वयमप्यतिसाम्यतः । सुतारावचनादेनं पुरस्कृत्य व्यवस्थिताः ॥६८॥

अर्थ: हम लोग भी अत्यन्त सदृशताके कारण अपने स्वामीके विषयमें सन्देहशील हैं परन्तु सुताराके कहनेसे इसीको आगे कर स्थित हैं ॥६८॥


अक्षौहिण्यस्ततः सप्त प्रभुमेकमुपाश्रिताः । इतरं चापि तावन्त्यः संशयस्य वशं गताः ॥६९॥

अर्थ: संशयके वशमें पड़ी सात अक्षौहिणी सेनाएँ एक सुग्रीवके आश्रय गयीं और उतनी ही दूसरे सुग्रीवके अधीन हुईं ॥६९॥


पुरस्य दक्षिणे भागे सुग्रीवः कृत्रिमः कृतः । उत्तरे तस्य सुग्रीवः स्थापितश्च यथाविधि ॥७०॥

अर्थ: नगरके दक्षिण भागमें कृत्रिम सुग्रीव रखा गया और वास्तविक सुग्रीव नगरके उत्तर भागमें विधिपूर्वक स्थापित किया गया ॥७०॥


अकरोच्चन्द्ररश्मिश्च प्रतिज्ञामिति संशये । बालिपुत्रो ततः कुर्वन् सर्वतः प्रतिपालनम् ॥७१॥

सुतारामवनद्वारं यो व्रजेत्कश्चिदस्य सः । प्रौढेन्दीवरशोभस्य वध्यः खड्गस्य मे ध्रुवम् ॥७२॥

अर्थ: सब ओरसे रक्षा करनेवाले बालिके पुत्र चन्द्ररश्मिने संशय उपस्थित होनेपर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा की कि इन दोनोंमें जो भी सुताराके भवनके द्वारपर जावेगा वह तरुण इन्दीवर - नीलकमलके समान सुशोभित मेरी खड्गके द्वारा अवश्य ही बध्य होगा - मेरी तलवारके द्वारा मारा जायेगा ॥७१-७२॥


ततः कपिध्वजावेवं स्थापितौ तावुभावपि । अपश्यन्तो सुतारास्यं निमग्नौ व्यसनार्णवे ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर इस प्रकार रखे हुए दोनों सुग्रीव सुताराका मुख न देखते हुए व्यसनरूपी सागरमें निमग्न हो गये ॥७३॥


ततोऽयं सत्यसुग्रीवो दयिताविरहाकुलः । बहुशः शोकहानार्थमगच्छत् खरदूषणम् ॥७४॥

अर्थ: अथानन्तर स्त्रीके विरहसे आकुल सत्य सुग्रीव, शोक दूर करनेके लिए अनेक बार खरदूषणके पास आया ॥७४॥


पुनश्च मारुतेः पार्श्वमब्रवीच्च पुनः पुनः । परित्रायस्व दुःखार्तं प्रसादं कुरु बान्धव ॥७५॥

अर्थ: फिर हनुमान्के पास जाकर उसने बार-बार कहा कि हे बान्धव ! मैं दुःखसे पीडित हूँ अतः मेरी रक्षा करो, प्रसन्न होओ ॥७५॥


मदीयं रूपमासाद्य मायया कोऽपि पापधीः । कुरुते मे परां बाधां स गत्वा मार्यतां द्रुतम् ॥७६॥

अर्थ: कोई पापबुद्धि विद्याधर मायासे मेरा रूप रखकर मुझे अत्यन्त बाधा पहुँचा रहा है सो जाकर उसे शीघ्र हो मारो ॥७६॥


सुग्रीवस्य वचः श्रुत्वा तदवस्थस्य शोकिनः । अञ्जनातनयः क्रोधाद्वाडवाग्निसमोऽभवत् ॥७७॥

अर्थ: उस प्रकारकी अवस्थामें पड़े शोकयुक्त सुग्रीवके वचन सुनकर हनुमान् क्रोधसे बडवानलके समान हो गया ॥७७॥


विमानं परमच्छायमप्रतीघातसंज्ञितम् । नानालंकारभूयिष्ठं त्रिदशावाससंनिभम् ॥७८॥

उत्साहं परमं बिभ्रदारुह्य सचिवैर्वृतः । किष्किन्धनगरं प्राप स्वर्गं सुकृतभागिव ॥७९॥

अर्थ: वह परम उत्साहको धारण करता हुआ मन्त्रियोंके साथ, अत्यन्त कान्तिमान्, नाना अलंकारोंसे प्रचुर, स्वर्गतुल्य अप्रतीघात नामक विमानमें सवार हो उस तरह किष्किन्ध नगर पहुँचा जिस तरह कि पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्गमें पहुँचता है ॥७८-७९॥


श्रुत्वा प्राप्तं हनूमन्तमसकौ विगतज्वरः । आरुह्य द्विरदं प्रीतः सुग्रीव इव निर्ययौ ॥८०॥

अर्थ: हनुमान्को आया सुन वह शीघ्र ही हाथीपर सवार हो प्रसन्नताके साथ सुग्रीवकी तरह नगरसे बाहर निकला ॥८०॥


तं कपिध्वजमालोक्य परं सादृश्यमागतम् । विस्मितो वायुपुत्रोऽपि पतितः संशयार्णवे ॥८१॥

अर्थ: अत्यन्त सादृश्यको प्राप्त हुए उस कपिध्वजको देखकर हनुमान् भी विस्मित हो संशयरूपी सागरमें पड़ गया ॥८१॥


अचिन्तयच्च सुव्यक्तं सुग्रीवो द्वाविमौ कथम् । एतयोः कतरं हन्मि यद्विशेषो न लभ्यते ॥८२॥

अर्थ: वह विचार करने लगा स्पष्ट ही ये दोनों सुग्रीव हैं जबतक कि विशेषता नहीं जान पड़ती है तबतक इन दोमें से एकको कैसे मारूँ ? ॥८२॥


अविदित्वानयोर्भेदमुभयोर्वानरेन्द्रयोः । कदाचिद् वधिषं माऽहं सुग्रीवं सुहृदां वरम् ॥८३॥

अर्थ: इन दोनों वानर राजाओंका अन्तर जाने बिना मैं कदाचित् मित्रोंमें श्रेष्ठ सुग्रीवको ही न मार बैठूँ ॥८३॥


मुहूर्तं मन्त्रिभिः सार्धं विमृश्य च यथाविधि । उदासीनतया देव मारुतिः स्वपुरं गतः ॥८४॥

अर्थ: इस प्रकार मुहूर्त भर मन्त्रियोंके साथ विधिपूर्वक विचार कर उदासीन भावसे हनुमान् अपने नगरको वापस चला गया ॥८४॥


निवृत्ते मरुतः पुत्रे सुग्रीवोऽभवदाकुलः । असौ च सदृशोऽमुष्य तथैवातिष्ठदाशया ॥८५॥

अर्थ: हनुमान्‌के वापस लौट जानेपर सुग्रीव बहुत व्याकुल हुआ । और जो इसके समान दूसरा मायावी सुग्रीव था वह आशा लगाये हुए उसी प्रकार स्थित रहा आया ॥८५॥


मायासहस्रसंपन्नो महावीर्यो महोदयः । उल्कायुधोऽपि संदेहं प्राप कष्टमिदं परम् ॥८६॥

अर्थ: यद्यपि सुग्रीव हजारों प्रकारकी मायासे स्वयं सम्पन्न है, महाशक्तिशाली है, महान् अभ्युदयका धारक है, और उल्कारूप अस्त्रोंका धारक है तो भी सन्देहको प्राप्त हो रहा है यह बड़े कष्टकी बात है ॥८६॥


निमग्नं संशयाम्भोधौ व्यसनग्राहसंकटे । न जानाम्यधुना देव क इमं तारयिष्यति ॥८७॥

अर्थ: हे देव ! व्यसनरूपी मगरमच्छोंसे भरे हुए संशयरूपी सागरमें निमग्न इस सुग्रीवको कौन तारेगा यह नहीं जान पड़ता ॥८७॥


कान्तावियोगदावेन प्रदीप्तं कपिकेतनम् । कृतज्ञं भज सुग्रीवं प्रसीद रघुनन्दन ॥८८॥

अर्थ: हे राघव ! स्त्रीवियोगरूपी दावानलसे प्रदीप्त तथा कृत उपकारको माननेवाले इस कपिध्वज सुग्रीवकी सेवा स्वीकृत करो, प्रसन्न होओ ॥८८॥


अयं शरणमायातो भवन्तं श्रितवत्सलम् । भवद्विधशरीरं हि परदुःखस्य नाशनम् ॥८९॥

अर्थ: यह आपको आश्रितवत्सल सुनकर आपकी शरण आया है, यथार्थमें आप-जैसे महापुरुषका शरीर परदुःखका नाश करनेवाला है ॥८९॥


ततस्तद्वचनं श्रुत्वा विस्मयव्याप्तमानसाः । जाताः पद्मादयः सर्वे धिगहोहीतिभाषिणः ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर उसके वचन सुनकर जिनके हृदय आश्चर्यसे व्याप्त हो रहे थे ऐसे राम आदि सभी लोग ‘धिक्’ ‘अहो’ ‘ही’ आदि शब्दोंका उच्चारण करने लगे ॥९०॥


अचिन्तयच्च पद्मोऽतः सखायं मम दुःखतः । जातोऽपरः समानेषु प्रायः प्रेमोपजायते ॥९१॥

अर्थ: रामने विचार किया कि अब यह दुःखके कारण मेरा दूसरा मित्र हुआ है क्योंकि प्रायःकर समान मनुष्योंमें ही प्रेम होता है ॥९१॥


एष प्रत्युपकारं मे यदि कर्तुं न शक्ष्यति । निर्ग्रन्थश्रमणो भूत्वा साधयिष्यामि निर्वृतिम् ॥९२॥

अर्थ: यदि यह मेरा प्रत्युपकार करनेमें समर्थ नहीं होगा तो मैं निर्ग्रन्थ साधु होकर मोक्षका साधन करूँगा ॥९२॥


एवं ध्यात्वानुराधाद्यैः समं संमन्त्र्य च क्षणम् । कपिमौलीन्द्रमाहूय पद्मनाभोऽभ्यभाषत् ॥९३॥

अर्थ: इस प्रकार ध्यान कर तथा विराधित आदिके साथ क्षण-भर मन्त्रणा कर सुग्रीवको बुला रामने उससे कहा ॥९३॥


सत्सुग्रीवो भवान्यो वा सर्वथा त्वं मयेप्सितः । विजित्य भवतस्तुल्यं पदं यच्छामि ते निजम् ॥९४॥

अर्थ: कि तुम चाहे यथार्थ सुग्रीव होओ और चाहे कृत्रिम सुग्रीव मैं तुम्हें चाहता हूँ और तुम्हारे सदृश जो दूसरा सुग्रीव है उसे मारकर तुम्हारा अपना पद तुम्हें देता हूँ ॥९४॥


तथाविधं पुरा राज्यं प्राप्य योगं सुतारया । सेवस्व मुदितोऽत्यन्तभग्ननिःशेषकण्टकम् ॥९५॥

अर्थ: तुम पहलेकी भाँति अपना राज्य प्राप्त कर समस्त शत्रुओंको निर्मूल करते हुए प्रसन्न हो सुताराके साथ समागमको प्राप्त होओ ॥९५॥


यदि मे निश्चयोपेतः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम् । सीतां तां गुणसंपूर्णां भद्रोपलभसे प्रियाम् ॥९६॥

अर्थ: हे भद्र ! मैंने जो निश्चय किया है उसे प्राप्त करनेके बाद यदि तुम मेरी प्राणाधिका तथा गुणोंसे परिपूर्ण सीताका पता चला सके तो उत्तम बात है ॥९६॥


कपिकेतुरुवाचेदं यदि तां तव न प्रियाम् । सप्ताहाऽभ्यन्तरे वेद्मि विशामि ज्वलनं तदा ॥९७॥

अर्थ: यह सुनकर सुग्रीवने कहा कि यदि मैं सात दिनके भीतर आपकी प्रियाका पता न चला दूँ तो अग्निमें प्रवेश करूँ ॥९७॥


अमीभिरक्षरैः पद्मः परं प्रह्लादमाश्रितः । शशाङ्करश्मिसदृशैर्दधानः कुमुदोपमाम् ॥९८॥

अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समान सुग्रीवके इन अक्षरोंसे राम कुमुदकी उपमा धारण करते हुए परम आह्लादको प्राप्त हुए ॥९८॥


प्रवाहेणामृतस्येव प्लावितो विकचाननः । रोमाञ्चनिर्भरं देहं बभार च समन्ततः ॥९९॥

अर्थ: अमृतके प्रवाहसे तर हुएके समान उनका मुख-कमल खिल उठा तथा शरीर सब ओरसे रोमांचोंसे व्याप्त हो गया ॥९९॥


अन्योन्यस्य वयं द्रोहरहिताविति चादरात् । समयं चक्रतुर्जैनं तस्मिन्नेव जिनालये ॥१००॥

अर्थ: हम दोनों परस्पर द्रोहसे रहित हैं - एक दूसरेके मित्र हैं इस प्रकार आदरके साथ उन दोनोंने उस जिनालयमें जिन-धर्मानुसार शपथ धारण की ॥१००॥


ततो रथवरारूढौ महासामन्तसेवितौ । किष्किन्धनगरं तेन प्रयातौ रामलक्ष्मणौ ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर महासामन्तोंसे सेवित राम-लक्ष्मण सुग्रीवके साथ उत्तम रथपर आरूढ़ हो किष्किन्ध नगरकी ओर चले ॥१०१॥


समीपीभूय दूतश्च प्रहितः कपिमौलिना । निर्भर्त्सितश्च कूटेन सुग्रीवेणागतः पुनः ॥१०२॥

अर्थ: नगरके समीप पहुँचकर मुकुटमें वानरका चिह्न धारण करनेवाले सुग्रीवने दूत भेजा सो मायावी सुग्रीवके द्वारा तिरस्कृत होकर पुनः वापस आ गया ॥१०२॥


ततश्चालीकसुग्रीवः संनह्य स्यन्दनस्थितः । युद्धाय निर्ययौ क्रुद्धः पृथुसैन्यसमावृतः ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे भरा कृत्रिम सुग्रीव तैयार हो रथपर बैठकर बड़ी सेनासे आवृत होता हुआ युद्धके लिए निकला ॥१०३॥


अथ कूटमटाटोपः संकटश्चण्डनिस्वनः । संप्रहारो महानासीदग्रसंलग्नसेनयोः ॥१०४॥

अर्थ: अथानन्तर जिनके आगे सेना लग रही थी ऐसे उन दोनोंमें महायुद्ध प्रारम्भ हुआ। उनका वह महायुद्ध कपटी योद्धाओंके विस्तारसे युक्त था, संकटपूर्ण था तथा तीक्ष्ण शब्दोंसे सहित था ॥१०४॥


सुग्रीवमेव सुग्रीवो जगामोद्ग्रीवमुग्ररुट् । विद्यायाः करणासक्तो दृढं योद्धुं समुद्यतः ॥१०५॥

अर्थ: जो तीक्ष्ण क्रोधका धारक था, तथा विद्याओंके करनेमें आसक्त था ऐसा सुग्रीव, अहंकारसे ग्रीवाको ऊपर उठानेवाले कृत्रिम सुग्रीवसे दृढ़ युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ ॥१०५॥


संप्रहारो महान् जातस्तयोश्चक्रेषुसायकैः । अन्धकारीकृताकाशश्चिरमप्राप्तयोः श्रमम् ॥१०६॥

अर्थ: चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद भी जिनमें थकावटका अंश भी नहीं था ऐसे उन दोनों सुग्रीवोंमें महान् युद्ध हुआ। उनके उस युद्धमें चक्र, बाण तथा खड्ग आदि शस्त्रोंसे आकाशमें अन्धकार फैल रहा था ॥१०६॥


अथ सुग्रीवमाहत्य गदय्यालीकवानरी । विज्ञाय मृत इत्येवं तुष्टः परमुपाविशत् ॥१०७॥

अर्थ: अथानन्तर कृत्रिम सुग्रीव, गदाके द्वारा सुग्रीवको चोट पहुँचाकर तथा ‘यह मर गया’ ऐसा समझकर सन्तुष्ट होता हुआ नगरमें प्रविष्ट हुआ ॥१०७॥


निश्चेष्टविग्रहश्चायं सत्यशाखामृगध्वजः । निजं शिविरमानीतः परिवार्य सुहृज्जनैः ॥१०८॥

अर्थ: इधर जिसका शरीर निश्चेष्ट पड़ा था ऐसे यथार्थ सुग्रीवको उसके मित्र जन घेरकर अपने शिविरमें ले आये ॥१०८॥


अब्रवील्लब्धसंज्ञश्च नाथ हस्तमुपागतः । जीवन्नेव कथं चौरः पुरं मम पुनर्गतः ॥१०९॥

अर्थ: जब सचेत हुआ तब रामसे बोला कि नाथ ! हाथमें आया चोर जीवित हो पुनः मेरे नगरमें कैसे चला गया ॥१०९॥


नूनं न भवितव्यं मे दुःखस्यान्तेन राघव । भवन्तमपि संप्राप्य किंतु कष्टमतः परम् ॥११०॥

अर्थ: जान पड़ता है कि राघव ! अब मेरे दुःखका अन्त नहीं होगा और फिर आपको प्राप्त कर भी । इससे बढ़कर कष्ट और क्या होगा ? ॥११०॥


ततः पद्मप्रभोऽवोचद्भवतोर्युध्यमानयोः । विशेषो न मया ज्ञातो न हतस्तेन ते समः ॥१११॥

अर्थ: तत्पश्चात् रामने कहा कि मैं युद्ध करते हुए तुम दोनोंकी विशेषता नहीं जान सका था इसीलिए मैंने तुम्हारी सदृशता करनेवाले सुग्रीवको नहीं मारा है ॥१११॥


अज्ञानदोषतो नाशं मानैषीस्त्वैव जातुचित् । सुहृदं जैनवाक्येन जनितं प्रियसंगमम् ॥११२॥

अर्थ: जिनागमका उच्चारण कर तू मेरा प्रिय मित्र हुआ है सो कहीं अज्ञानरूपी दोषसे तुझे ही नष्ट नहीं कर दूँ इस भयसे मैं चुप रहा ॥११२॥


अथाहूतः पुनः प्राप्तः सुग्रीवप्रतिमो बली । संरम्भवह्निना दीप्तः पद्मेनाभिमुखीकृतः ॥११३॥

अर्थ: अथानन्तर उस कृत्रिम सुग्रीवको फिरसे ललकारा सो वह बलवान् क्रोधाग्निसे दीप्त होता हुआ पुनः आया तथा रामने उसका सामना किया ॥११३॥


अद्रिणेव स रामेण क्षोभितः सागरोपमः । निस्त्रिंशग्राहसंघातसंचारात्यन्तसंकुलः ॥११४॥

अर्थ: जिस प्रकार पर्वतके द्वारा समुद्र क्षोभको प्राप्त होता है उसी प्रकार क्रूर योद्धारूपी मगरमच्छोंके संचारसे अतिशय भरा हुआ वह समुद्र तुल्य कृत्रिम सुग्रीव रामके द्वारा क्षोभको प्राप्त हुआ ॥११४॥


लक्ष्मणेनैव सुग्रीवः परिष्वज्य दृढं धृतः । स्त्रीवैरतः समीपं मा शत्रोः कोपेन गादिति ॥११५॥

अर्थ: इधर लक्ष्मणने वास्तविक सुग्रीवका दृढ़ आलिंगन कर उसे इस अभिप्रायसे रोक लिया कि कहीं यह स्त्रीके वैरके कारण क्रोधसे शत्रुके पास न पहुँच जावे ॥११५॥


ततः ससार पद्माभः सुग्रीवाभं समाह्वयन् । ज्वलन् संग्रामसंप्राप्तिजनितेनोरुतेजसा ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धकी प्राप्तिसे उत्पन्न विशाल तेजसे देदीप्यमान राम, कृत्रिम सुग्रीवको ललकारते हुए आगे बढ़े ॥११६॥


अथ पद्मं समालोक्य समापृच्छय च साधकम् । वैताली निःसृता विद्या नारीवोद्धतचेष्टिता ॥११७॥

अर्थ: अथानन्तर रामको आया देख सिद्ध करनेवालेसे पूछकर वैताली विद्या उसके शरीरसे इस प्रकार निकल गयी कि जिस प्रकार उद्धत चेष्टाको धारण करनेवाली स्त्री निकल जाती है ॥११७॥


सुग्रीवाकृतिनिर्मुक्तं वानराङ्कविवर्जितम् । सहसा साहसगतिमिन्द्रनीलनगोपमम् ॥११८॥

स्वभावमागतं दृष्ट्वा निःक्रान्तमिव कञ्चुकात् । शाखामृगध्वजाः सर्वे संक्षुभ्यैकत्वमाश्रिताः ॥११९॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो सुग्रीवकी आकृतिसे रहित था, जिसका वानर चिह्न दूर हो चुका, जो इन्द्रनील मणिके समान जान पड़ता था, और जो आवरणसे निकले हुएके समान अपने स्वाभाविक रूपमें स्थित था ऐसे साहसगतिको देखकर सब वानरवंशी क्षुभित हो एकरूपताको प्राप्त हो गये ॥११८-११९॥


नानायुद्धाश्च संक्रुद्धा बलिनस्तमयूयुधन् । सोऽयं सोऽयमतिस्वानं कुर्वाणाः पश्यतेति च ॥१२०॥

अर्थ: नाना शस्त्रोंसे सहित, क्रोध भरे बलवान् वानर ‘यह वही है यह वही है देखो देखो’ आदि शब्द करते हुए उससे युद्ध करने लगे ॥१२०॥


तेन तेजस्विना सैन्यं तद्द्विषामुरुशक्तिना । पुरस्कृतं दिशो भेजे यथा तूलं नभस्वता ॥१२१॥

अर्थ: सो विशाल शक्तिके धारक उस तेजस्वीने शत्रुओंकी उस सेनाको जब आगे कर खदेड़ा तब वह दिशाओंको उस प्रकार प्राप्त हुई जिस प्रकारकी पवनसे प्रेरित रूई प्राप्त होती है ॥१२१॥


तावत्ससायकं कृत्वा धनुरुद्धतविक्रमः । अधावत्पद्ममुद्दिश्य धनाघनचयोपमः ॥१२२॥

अर्थ: उस समय उद्धत पराक्रम तथा मेघसमूहकी उपमा धारण करनेवाला साहसगति, धनुषपर बाण चढ़ाकर रामकी ओर दौड़ा ॥१२२॥


शरधारां क्षिपत्यस्मिन् भृशत्वाद्रहितान्तरम् । विधाय मण्डपं बाणैरस्थात् काकुत्स्थनन्दनः ॥१२३॥

अर्थ: उधर जब वह लगातार बाणसमूहकी वर्षा कर रहा था तब इधर राम भी बाणोंके द्वारा मण्डप बनाकर स्थित थे - राम भी घनघोर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥१२३॥


समं साहसयानेन पद्मस्याभूत्परं मृधम् । आनन्दो हि स पद्मस्य चिरं यः कुरुते रणम् ॥१२४॥

अर्थ: इस प्रकार रामका साहसगतिके साथ परम युद्ध हुआ सो ठीक ही है क्योंकि जो चिरकाल तक युद्ध करता था वह रामको आनन्ददायी होता था ॥१२४॥


ततः कृत्वा रणक्रीडां चिरमूर्जितविक्रमः । क्षुरप्रैरस्य कवचं चिच्छेद रघुनन्दनः ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यधिक पराक्रमके धारक रामचन्द्रने चिरकाल तक रणक्रीड़ा कर बाणोंसे उसका कवच छेद दिया ॥१२५॥


तितवाकारदेहोऽथ कृतस्तीक्ष्णैः शिलीमुखैः । गतः सुसाहसो भूमिमालिलिङ्ग गतप्रभः ॥१२६॥

अर्थ: तत्पश्चात् तीक्ष्ण बाणोंसे जिसका शरीर चलनीके समान सछिद्र हो गया था ऐसे साहसगतिने प्रभारहित हो पृथिवीका आलिंगन किया अर्थात् प्राणरहित हो पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१२६॥


समासाद्य च तैः सर्वैः कुतूहलिभिरीक्षितः । दृष्टः साहसयानोऽसाविति ज्ञातश्च निश्चितम् ॥१२७॥

अर्थ: कुतूहलसे भरे सब विद्याधरोंने आकर उसे देखा तथा निश्चयसे जाना कि यह साहसगति ही है ॥१२७॥


ततः सभ्रातृकं पद्मं सुग्रीवः पर्यपूजयत् । स्तुतिभिश्चाभिरम्याभिस्तुष्टावोदात्तसंमदः ॥१२८॥

अर्थ: तदनन्तर उत्कट हर्षके धारक सुग्रीवने भाई - लक्ष्मण सहित रामको पूजा की तथा मनोहर स्तुतियोंसे स्तुति की ॥१२८॥


पुरे कारयितुं शोभां परमां हतकण्टके । यातः कान्तासमायोगं समुत्कण्ठां वहन् पराम् ॥१२९॥

अर्थ: शत्रुरहित नगरमें परमशोभा करानेके लिए परम उत्कण्ठाको धारण करता हुआ वह स्त्रीके साथ समागमको प्राप्त हुआ ॥१२९॥


भोगसागरमग्नोऽसौ नैवाज्ञासीदहर्निशम् । चिरंदृष्टः सुतारायां न्यस्तनिःशेषचेतनः ॥१३०॥

अर्थ: वह भोगरूपी सागरमें ऐसा मग्न हुआ कि रात-दिनका भी उसे ज्ञान नहीं रहा। वह चिरकाल बाद दिखा था अतः सुताराके लिए ही उसने अपनी समस्त चेतना समर्पित कर दी ॥१३०॥


रात्रिमेकां बहिर्नीत्वा पद्मामप्रमुखा नृपाः । ऋद्ध्या प्रविश्य किष्किन्धं महाबलसमन्विताः ॥१३१॥

अर्थ: महाबलसे सहित राम आदि प्रमुख राजाओंने एक रात्रि नगरसे बाहर बिताकर वैभवके साथ किष्किन्ध नगरमें प्रवेश किया ॥१३१॥


आनन्दोद्यानमाश्रित्य नन्दनश्रीविडम्बकम् । स्वेच्छयावस्थितिं चक्रुर्लोकपालसुरश्रियः ॥१३२॥

अर्थ: वहाँ लोकपाल देवोंके समान शोभाको धारण करनेवाले राम आदि प्रमुख राजा, नन्दनवनकी शोभाको विडम्बित करनेवाले आनन्द नामक उद्यानमें स्वेच्छासे ठहरे ॥१३२॥


तस्या वर्णनमेवातिवर्णनारम्यतापि तु । उद्यानस्यान्यथा कोऽसौ शक्तस्तद्गुणवर्णने ॥१३३॥

अर्थ: उस उद्यानकी सुन्दरताका वर्णन नहीं करना ही उसकी सबसे बड़ी सुन्दरता थी अन्यथा उसके गुण वर्णन करनेमें कौन समर्थ है? ॥१३३॥


रम्यं चैत्यगृहं तत्र न्यस्तचन्द्रप्रभार्चनम् । तद्विघ्नघ्नं प्रणम्यैतावासीनौ रामलक्ष्मणौ ॥१३४॥

अर्थ: उस उद्यानमें चन्द्रप्रभ भगवान्की प्रतिमासे सुशोभित मनोहर चैत्यालय था सो समस्त विघ्नोंको नष्ट करनेवाले चन्द्रप्रभ भगवान्को नमस्कार कर राम-लक्ष्मण वहाँ रहने लगे ॥१३४॥


बहिश्चैत्यालयस्यास्य चन्द्रोदरसुतादयः । स्वसैन्यावासनं कृत्वा बभूवुर्विगतश्रमाः ॥१३५॥

अर्थ: चन्द्रोदरके पुत्र - विराधित आदि उस चैत्यालयके बाहर अपनी सेनाएँ ठहराकर श्रमसे रहित हुए ॥१३५॥


गुणश्रुत्यनुरागेण स्वयंवरणबुद्धयः । त्रयोदश सुताः पद्मं सुग्रीवस्य ययुर्मुदा ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर रामके गुण श्रवण कर अनुरागसे भरी सुग्रीवकी तेरह पुत्रियाँ स्वयंवरणकी इच्छासे हर्षपूर्वक वहाँ आयीं ॥१३६॥


चन्द्राभा नाम चन्द्रास्या द्वितीया हृदयावली । अन्या हृदयधर्मेति चेतसः संकटोपमा ॥१३७॥

तुरीयानुन्धरो नाम्ना श्रीकान्ता श्रीरिवापरा । सुन्दरी सर्वतश्चित्तसुन्दरीत्यपरोदिता ॥१३८॥

अन्या सुरवती नाम सुरस्त्रीसमविभ्रमा । मनोवाहिन्यभिख्याता मनोवहनकोविदा ॥१३९॥

चारुश्रीरिति विख्याता चारुश्रीः परमार्थतः । मदनोत्सवभूतान्या प्रसिद्धा मदनोत्सवा ॥१४०॥

अन्या गुणवती नाम गुणमालाविभूषिता । एका पद्मावती ख्याता बुद्धपद्मसमानना ॥१४१॥

तथा जिनमतिर्नित्यं जिनपूजनतत्परा । एताः कन्याः समादाय ययौ तासां परिच्छदः ॥१४२॥

अर्थ: वे तेरह पुत्रियां इस प्रकार थीं - पहली चन्द्रमाके समान मुखवाली चन्द्रमा, दूसरी हृदयावली, तीसरी हृदयके लिए संकटकी उपमा धारण करनेवाली हृदयधर्मा, चौथी अनुन्धरी, पाँचवीं द्वितीय लक्ष्मीके समान श्रीकान्ता, छठी सर्वप्रकारसे सुन्दर चित्त सुन्दरी, सातवीं देवांगनाके समान विभ्रमको धारण करनेवाली सुरवती, आठवीं मन के धारण करनेमें निपुण मनोवाहिनी, नौवी परमार्थमें उत्तम शोभाको धारण करनेवाली चारुश्री, दशवीं मदनके उत्सवस्वरूप मदनोत्सवा, ग्यारहवीं गुणोंकी मालासे विभूषित गुणवती, बारहवीं विकसित कमलके समान मुखको धारण करनेवाली पद्मावती और तेरहवीं निरन्तर जिनपूजनमें तत्पर रहनेवाली जिनमती । इन सब कन्याओंको लेकर उनका परिकर रामके पास आया ॥१३७-१४२॥


प्रणम्य च जगौ रामं नाथैतासां स्वयंवृतम् । शरणं भव लोकेश कन्यानां बन्धुरुत्तमः ॥१४३॥

अर्थ: रामको प्रणाम कर उसने कहा कि हे नाथ ! आप इन सब कन्याओंके स्वयं-वृत शरण होओ । हे लोकेश ! इन कन्याओंके उत्तम बन्धु आप ही हैं ॥१४३॥


दुर्विदग्धैः खगैर्माभूत् विवाहोऽस्माकमित्यलम् । जातमासां मनः श्रुत्वा गोत्रस्य त्वानुपालकम् ॥१४४॥

अर्थ: गोत्रकी रक्षा करने-वाले आपका नाम सुनकर इन कन्याओंका मन स्वभावसे ही ऐसा हुआ कि हमारा विवाह नीच विद्याधरोंके साथ न हो ॥१४४॥


ततो ह्रीभारनम्रास्या वशिताः शोभया विभुम् । पद्माभमुपसंप्राप्ताः पद्माभा नवयौवनाः ॥१४५॥

अर्थ: तदनन्तर लज्जाके भारसे जिनके मुख नम्र हो रहे थे, जो शोभासे युक्त थीं, जिनकी आभा कमलके समान थी तथा जो नवयौवनसे परिपूर्ण थीं ऐसी वे सब कन्याएँ राजा रामचन्द्रके पास आयीं ॥१४५॥


विद्युद्वह्निसुवर्णाब्जगर्भभासां महीयसाम् । देहभासां विकासेन तासां रेजे नभस्तलम् ॥१४६॥

अर्थ: बिजली, अग्नि, सुवर्ण तथा कमलके भीतरी दलके समान उनकी शरीरकी विपुल कान्तिके विकाससे आकाश सुशोभित होने लगा ॥१४६॥


उपविश्य विनीतास्ता लावण्यान्वितविग्रहाः । समीपे पद्मनाभस्य तस्थुः पूजितचेष्टिताः ॥१४७॥

अर्थ: विनीत, लावण्ययुक्त शरीरकी धारक एवं प्रशस्त चेष्टाओंसे युक्त वे सब कन्याएँ रामके पास आकर बैठ गईं ॥१४७॥


रमते क्वचिदपि चित्तं पुरुषरवेः पूर्वजन्मसंबन्धात् । एषा भवपरिवर्त्ते सर्वेषां श्रेणिकावस्था ॥१४८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! पुरुषोंमें सूर्य समान रामचन्द्रका भी चित्त किन्हींमें रमणको प्राप्त हुआ सो यह दशा समस्त संसारी जीवोंकी है ॥१४८॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे विटसुग्रीववधाख्यानं नाम सप्तचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें विट सुग्रीवके वधका कथन करनेवाला सैंतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४७॥

४८. अष्टचत्वारिंशत्तमं पर्व (कोटिशिलोत्क्षेपणाभिधानं)

अथोपलालनं तस्य वाञ्छन्त्यो वरकन्यकाः । बहुभेदाः क्रियाश्चक्रुर्देवलोकादिवागताः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर श्रीरामको प्रसन्न करनेकी इच्छा करती हुई वे उत्तम कन्याएँ नाना प्रकारकी क्रियाएँ करने लगीं । वे कन्याएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो स्वर्गलोकसे ही आयी हों ॥१॥


वीणादिवादनैस्तासां गीतैश्चातिमनोहरैः । ललिताभिश्च लीलाभिर्हृतं तस्य न मानसम् ॥२॥

अर्थ: वे कन्याएँ कभी वीणा आदि वादित्र बजाती थीं, कभी अत्यन्त मनोहर गीत गाती थीं और कभी नृत्यादि ललित क्रीडाएँ करती थीं फिर भी उनकी इन चेष्टाओंसे रामका मन नहीं हरा गया ॥२॥


सर्वाकारसमानीतो विभवस्तस्य पुष्कलः । न भोगेषु मनश्चक्रे वैदेहीं प्रति संहृतम् ॥३॥

अर्थ: यद्यपि उन्हें सब प्रकारकी पुष्कल सामग्री प्राप्त थी तो भी सीताकी ओर आकर्षित मनको उन्होंने भोगोंमें नहीं लगाया ॥३॥


अनन्यमानसोऽसौ हि मुक्तनिःशेषचेष्टितः । सीतां मुनिरिव ध्यायन् सिद्धिमास्थान्महादरः ॥४॥

अर्थ: जिस प्रकार मुनि मुक्तिका ध्यान करते हैं उसी प्रकार राम अन्य सब चेष्टाओंको छोड़कर अनन्यचित्त हो आदरके साथ सीताका ही ध्यान करते थे ॥४॥


न शृणोति ध्वनिं किंचिद् रूपं पश्यति नापरम् । जानकीमयमेवास्य सर्वं प्रत्यवभासते ॥५॥

अर्थ: वे न तो उन कन्याओंके शब्दोंको सुनते थे और न उनके रूपको ही देखते थे। उन्हें सब संसार सीतामय ही जान पड़ता था ॥५॥


न करोति कथामन्यां कुरुते जानकीकथाम् । अन्यामपि च पार्श्वस्थां जानकीत्यभिभाषते ॥६॥

अर्थ: वे एक सीताकी ही कथा करते थे और दूसरी कथा ही नहीं करते थे। यदि पासमें खड़ी किसी दूसरी स्त्रीसे बोलते भी थे तो उसे सीता समझकर ही बोलते थे ॥६॥


वायसं पृच्छति प्रीत्या गिरैवं कलनादया । भ्राम्यता विपुलं देशं दृष्टा स्यात् मैथिली क्वचित् ॥७॥

अर्थ: वे कभी मधुरवाणीमें कौएसे इस प्रकार पूछते थे कि हे भाई ! तू तो समस्त देशमें भ्रमण करता है अतः तूने कहीं सीताको तो नहीं देखा ॥७॥


सरस्युन्निद्रपद्मादिकिञ्जल्कालंकृताम्भसि । चक्राह्वमिथुनं दृष्ट्वा किंचित् संचिन्त्य कुप्यति ॥८॥

अर्थ: खिले हुए कमल आदि पुष्पोंकी परागसे जिसका जल अलंकृत था ऐसे सरोवरमें क्रीड़ा करते चकवा-चकवीके युगलको देखकर वे कुछ सोच-विचारमें पड़ जाते तथा क्रोध करने लगते ॥८॥


सीताशरीरसंपर्कशङ्कया बहुमानवत् । निमील्यलोचने किंचित् समालिङ्गति मारुतम् ॥९॥

अर्थ: कभी नेत्र बन्द कर बड़े सम्मानके साथ वायुका यह विचारकर आलिंगन करते कि सम्भव है कभी इसने सीताका स्पर्श किया हो ॥९॥


एतस्यां सा निषण्णेति वसुधां बहु मन्यते । जुगुप्सितस्तया नूनमिति चन्द्रमुदीक्षते ॥१०॥

अर्थ: इस पृथिवी पर सीता बैठी थी। यह सोचकर उसे धन्य समझते और चन्द्रमाको यह सोचकर ही मानो देखते थे कि यह उसके द्वारा अपनी आभासे तिरस्कृत किया गया था ॥१०॥


अचिन्तयच्च किं सीता मद्वियोगाग्निदीपिता । तामवस्थां भवेत् प्राप्ता स्यादस्या यापदैषिणाम् ॥११॥

अर्थ: वे कभी यह विचार करने लगते कि सीता मेरी वियोगरूपी अग्निसे जलकर कहीं उस अवस्थाको तो प्राप्त नहीं हो गयी होगी जो विपत्तिग्रस्त प्राणियोंकी होती है ॥११॥


किमियं जानकी नैषा लता मन्दानिलेरिता । किमंशुकमिदं नैतच्चलत्पत्रकदम्बकम् ॥१२॥

अर्थ: क्या यह सीता है ? मन्द-मन्द वायुसे हिलती हुई लता नहीं है ? क्या यह उसका वस्त्र है, चंचल पत्रोंका समूह नहीं है ? ॥१२॥


एते किं लोचने तस्या नैते पुष्पे सषट्पदे । करोऽयं किं चलस्तस्या नायं प्रत्यग्रपल्लवः ॥१३॥

अर्थ: क्या ये उसके नेत्र हैं, भ्रमर सहित पुष्प नहीं हैं ? और क्या यह उसका चंचल हाथ है नूतन पल्लव नहीं है ? ॥१३॥


केशभारं मयूरोषु तस्याः पश्यामि सुन्दरम् । अपर्याप्तशशाङ्के च लक्ष्मीमलिकसंभवाम् ॥१४॥

त्रिवर्णाम्भोजखण्डेषु श्रियं लोचनगोचराम् । शोणपल्लवमध्यस्थसितपुष्पे स्मितत्त्विषम् ॥१५॥

स्तबकेषु सुजातेषु कान्तिमत्सु स्तनश्रियम् । जिनस्नपनवेदीनां शोभां मध्येषु मध्यमाम् ॥१६॥

तासामेवोद्ध्वभागेषु नितम्बभरताकृतिम् । ऊरुशोभां सुजातासु कदलीस्तम्भिकासुताम् ॥१७॥

पद्मेषु चरणाभिख्यां स्थलसंप्राप्तजन्मसु । शोभां तु समुदायस्य तस्याः पश्यामि न क्वचित् ॥१८॥

अर्थ: मैं उसका सुन्दर केशपाश मयूरियोंमें, ललाटकी शोभा अर्धचन्द्रमें, नेत्रोंकी शोभा तीन रंगके कमलोंमें, मन्द मुसकानकी शोभा लाल-लाल पल्लवोंके मध्यमें स्थित पुष्पमें, स्तनोंकी शोभा कान्तिसम्पन्न उत्तम गुच्छोंमें, मध्यभागकी शोभा जिनाभिषेककी वेदिकाओंके मध्यभागमें, नितम्बकी स्थूल आकृति उन्हीं वेदिकाओंके ऊर्ध्वभागमें, ऊरुओंकी अनुपम शोभा केलेके सुन्दर स्तम्भोंमें, और चरणोंकी शोभा स्थलकमलों अर्थात् गुलाबके पुष्पोंमें देखता हूँ परन्तु इन सबके समुदाय स्वरूप सीताकी शोभा किसीमें नहीं देखता हूँ ॥१४-१८॥


चिरायति कथं सोऽपि सुग्रीवः कारणं नु किम् । दृष्टा नाम भवेत् सीता किं तेन शुभदर्शिना ॥१९॥

अर्थ: वह सुग्रीव भी बिना कारण क्यों देर कर रहा है ? शुभ पदार्थोंको देखनेवाले उसने क्या किसीसे सीताका समाचार पूछा होगा ? ॥१९॥


मद्वियोगेन तप्तां वा विलीनां तां सुशीलकाम् । ज्ञात्वा निवेदनेऽशक्तः किमसौ नैति दर्शनम् ॥२०॥

अर्थ: अथवा वह शीलवती मेरे वियोगसे सन्तप्त होकर नष्ट हो गयी है ऐसा वह जानता है तो भी कहनेमें असमर्थ होता हुआ ही क्या दिखाई नहीं देता है ? ॥२०॥


किं वा कृतार्थतां प्राप्तः प्राप्य राज्यं पुनर्निजम् । स्वस्थीभूतो भवेद् दुःखं मम विस्मृत्य खेचरः ॥२१॥

अर्थ: अथवा वह विद्याधर अपना राज्य पाकर कृतकृत्यताको प्राप्त हो गया है तथा मेरा दुःख भूलकर अपने आनन्दमें निमग्न हो गया है ॥२१॥


एवं चिन्तयतस्तस्य बाष्पविप्लुतचक्षुषः । स्रस्तालसशरीरस्य विवेदावरजो मनः ॥२२॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते-करते जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त हो गये थे तथा जिनका शरीर ढीला और आलस्ययुक्त हो गया था ऐसे रामके अभिप्रायको लक्ष्मण समझ गये ॥२२॥


ततः ससंभ्रमस्वान्तःकोपारुणितलोचनः । ययौ सुग्रीवमुद्दिश्य नग्नासिविलसत्करः ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका चित्त क्षोभसे युक्त था, नेत्र क्रोधसे लाल थे, और जिनका हाथ नंगी तलवारपर सुशोभित हो रहा था ऐसे लक्ष्मण सुग्रीवको लक्ष्य कर चले ॥२३॥


गच्छतस्तस्य वातेन जङ्घास्तम्भाप्तजन्मना । दोलायितमभूत् सर्वं महोत्पाताकुलं पुरम् ॥२४॥

अर्थ: उस समय जाते हुए लक्ष्मणकी जंघाओंरूपो स्तम्भोंसे उत्पन्न वायुके द्वारा समस्त नगर ऐसा कम्पायमान हो गया मानो महान् उत्पातसे आकुल होकर ही कम्पायमान हो गया हो ॥२४॥


वेगनिक्षिप्तनिःशेषराजाधिकृतमानवैः । प्रविश्य तद्गृहं दृष्ट्वा सुग्रीवमिदमभ्यधात् ॥२५॥

अर्थ: राजाके समस्त अधिकारी मनुष्योंको अपने वेगसे गिराकर वे सुग्रीवके घरमें प्रविष्ट हो सुग्रीवसे इस प्रकार कहने लगे ॥२५॥


आः पाप दयितादुःखनिमग्ने परमेश्वरे । भार्यया सहितः सौख्यं कथं भजसि दुर्मते ॥२६॥

अर्थ: अरे पापी ! जब कि परमेश्वर-राम स्त्रीके दुःखमें निमग्न हैं तब रे दुर्बुद्धे ! तू स्त्रीके साथ सुखका उपभोग क्यों कर रहा है ? ॥२६॥


अहं त्वां खेचरध्वाङ्क्ष भोगे दुर्ललितं खल । नयामि तत्र नाथेन यत्र नीतस्त्वदाकृतिः ॥२७॥

अर्थ: अरे दुष्ट ! नीच विद्याधर ! मैं तुझ भोगासक्तको वहाँ पहुँचाता हूँ जहाँ कि रामने तेरी आकृतिको धारण करनेवाले कृत्रिम सुग्रीवको पहुँचाया है ॥२७॥


एवमुग्रान् विमुञ्चन्तं वर्णान् कोपकणानिव । लक्ष्मीधरं प्रणामेन सुग्रीवः शममानयत् ॥२८॥

अर्थ: इस प्रकार क्रोधाग्निके कणोंके समान उग्रवचन छोड़नेवाले लक्ष्मणको सुग्रीवने नमस्कार कर शान्त किया ॥२८॥


उवाच चेदमेकं मे क्षम्यतां देव विस्मृतम् । क्षुद्राणां हि भवत्येव मादृशां दुर्विचेष्टितम् ॥२९॥

अर्थ: और कहा कि हे देव ! मेरी एक भूल क्षमा की जाय क्योंकि मेरे जैसे क्षुद्र मनुष्योंकी खोटी चेष्टा होती ही है ॥२९॥


तस्यार्घपाणयो दाराः संभ्रान्ताः कम्पमूर्तयः । संप्रणामेन निःशेषं जहुर्लक्ष्मणसंभ्रमम् ॥३०॥

अर्थ: जिनके शरीर काँप रहे थे ऐसी सुग्रीवकी घबड़ायी हुई स्त्रियाँ हाथमें अर्घ ले-लेकर बाहर निकल आयीं और उन्होंने अच्छी तरह प्रणाम कर लक्ष्मणके समस्त क्रोधको नष्ट कर दिया ॥३०॥


सज्जनाम्भोदवाक्तोयधारानिकरसंगतः । प्रयाति विलयं क्वापि जनारणिभवोऽनलः ॥३१॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि मनुष्यरूपी अरणिसे उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि, सज्जनरूपी मेघ सम्बन्धी वचनरूपी जलधाराओंके साथ मिलकर शीघ्र ही कहीं विलीन हो जाती है ॥३१॥


प्रणाममात्रसाध्यो हि महतां चेतसः शमः । महद्भिरपि नो दानैरुपशाम्यन्ति दुर्जनाः ॥३२॥

अर्थ: निश्चयसे महापुरुषोंके चित्तकी शान्ति प्रणाममात्रसे सिद्ध हो जाती है जब कि दुर्जन बड़े-बड़े दानोंसे भी शान्त नहीं होते ॥३२॥


प्रतिज्ञां स्मारयंस्तस्य चक्रे लक्ष्मीधरः परम् । उपकारं यथा योगी यक्षदत्तस्य मातरम् ॥३३॥

अर्थ: लक्ष्मणने प्रतिज्ञाका स्मरण कराते हुए सुग्रीवका उस तरह परम उपकार किया जिस तरह कि योगी अर्थात् मुनिने यक्षदत्तकी माताका किया था ॥३३॥


पप्रच्छ मगधाधीशो गणेश्वरमिहान्तरे । यक्षदत्तस्य वृत्तान्तं नाथेच्छामि विवेदितुम् ॥३४॥

अर्थ: इसी बीचमें राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे पूछा कि हे नाथ ! मैं यक्षदत्तका वृत्तान्त जानना चाहता हूँ ॥३४॥


ततो गणधरोऽवोचच्छृणु श्रेणिकभूपते । चकार यक्षदत्तस्य यथा मातुः स्मृतिं मुनिः ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर गणधर भगवान्ने कहा कि हे श्रेणिक भूपाल ! मुनिने जिस प्रकार यक्षदत्तकी माताको स्मरण कराया था वह कथा कहता हूँ सो सुनो ॥३५॥


अस्ति क्रौञ्चपुरं नाम नगरं तत्र पार्थिवः । यक्षसंज्ञः प्रिया तस्य राजिलेति प्रकीर्तिता ॥३६॥

अर्थ: एक क्रौंचपुर नामका नगर है उसमें यक्ष नामका राजा था और राजिला नामसे प्रसिद्ध उसकी स्त्री थी ॥३६॥


तत्पुत्रो यक्षदत्ताख्यः स बाह्यां विहरन् सुखम् । अपश्यत् परमां नारीं स्थितां दुर्विधपाटके ॥३७॥

अर्थ: उन दोनोंके यक्षदत्त नामका पुत्र था। एक दिन उसने नगरके बाहर सुखपूर्वक भ्रमण करते समय दरिद्रोंकी बस्तीमें स्थित एक परमसुन्दरी स्त्री देखी ॥३७॥


स्मरेषुहृतचित्तोऽसौ तामुद्दिश्य व्रजन्निशि । मुनिनावधियुक्तेन मैवमित्यभ्यभाषत ॥३८॥

अर्थ: देखते ही कामके बाणोंसे उसका हृदय हरा गया सो वह रात्रिके समय उसके उद्देश्यसे जा रहा था कि अवधिज्ञानसे युक्त मुनिराजने ‘मा अर्थात् नहीं’ इस प्रकार उच्चारण किया ॥३८॥


ततस्तं विद्युदुद्योतद्योतितं वृक्षमूलगम् । ऐक्षतायननामानं मुनिं सायकपाणिकः ॥३९॥

अर्थ: तदनन्तर उसी समय बिजली चमकी सो उसके प्रकाशमें हाथमें तलवार धारण करनेवाले यक्षदत्तने एक वृक्षके नीचे बैठे हुए अयन नामक मुनिराजको देखा ॥३९॥


तमुपेत्य नतिं कृत्वा पप्रच्छ विनयान्वितः । भगवन् किं त्वया मेति निषिद्धं कौतुकं मम ॥४०॥

अर्थ: उसने बड़ी विनयसे उनके पास जाकर तथा नमस्कार कर उनसे पूछा कि हे भगवन् ! आपने ‘मा’ शब्दका उच्चारण कर निषेध किसलिए किया। इसका मुझे बड़ा कौतुक है ? ॥४०॥


सोऽवोचद् यां समुद्दिश्य प्रस्थितः कामुको भवान् ।
सा ते माता ततस्तां मा यासीः कामीति वारितः ॥४१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा कि आप कामी होकर जिसके उद्देश्यसे जा रहे थे वह आपकी माता है इसलिए ‘मत जाओ’ यह कहकर मैंने रोका है ॥४१॥


सोऽवोचत् कथमित्याख्यं ततोऽस्मिन् प्रस्तुतं मुनिः ।
मानसानि मुनीनां हि सुदिग्धान्यनुकम्पया ॥४२॥

अर्थ: यक्षदत्तने फिर पूछा कि वह मेरी माता कैसे है ? इसके उत्तरमें मुनिराजने प्रकृत वार्ता कही सो ठीक ही है क्योंकि मुनियोंके मन अनुकम्पासे युक्त होते ही हैं ॥४२॥


शृण्वस्ति मृत्तिकावत्यां कनको नाम वाणिजः ।
धूर्नाम्नि तस्य भार्यायां बन्धुदत्तः सुतोऽभवत् ॥४३॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि सुनो, मृत्तिकावती नामक नगरीमें एक कनक नामका वणिक् रहता था, उसकी धुर् नामकी स्त्रीमें एक बन्धुदत्त नामका पुत्र हुआ था ॥४३॥


भार्या मित्रवती तस्य लतादत्तसमुद्भवा । कृत्वास्या गर्भमज्ञातं पोतेन प्रस्थितः पतिः ॥४४॥

अर्थ: बन्धुदत्तकी स्त्रीका नाम मित्रवती था जो कि लतादत्तकी पुत्री थी। एक बार बन्धुदत्त अज्ञातरूपसे मित्रवतीको गर्भधारण कराकर जहाजसे अन्यत्र चला गया ॥४४॥


श्वसुराभ्यां ततो ज्ञात्वा गर्भं दुश्चरितेति सा । निराकृता पुरात् क्षिप्रं दास्योत्पलिकया सह ॥४५॥

प्रस्थिता च पितुर्गेहं सार्थेन महता समम् । सर्पेणोत्पलिका दष्टा मृता च विपिनान्तरे ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर सास-श्वसुरने गर्भका ज्ञान होने पर उसे दुश्चरिता समझकर नगरसे निकाल दिया, सो गर्भवती मित्रवती, उत्पलिका नामक दासीको साथ ले एक बड़े बनजारोंके संघके साथ अपने पिताके घरकी ओर चली। परन्तु जंगलके बीच उत्पलिकाको सांपने डँस लिया जिससे वह मर गयी ॥४५-४६॥


ततः सख्या विमुक्तासौ शीलमात्रसहायिका । इमं क्रौञ्चपुरं प्राप्ता महाशोकसमाकुला ॥४७॥

अर्थ: तब वह सखीसे रहित, एक शीलव्रत रूपी सहायिकासे युक्त हो महाशोकसे व्याकुल होती हुई इस क्रौंचपुर नगरीमें आयी ॥४७॥


स्फीतदेवार्चकारामे प्रसूता यावदम्बरम् । आरात् क्षालयितुं याता शिशुस्तावद्धृतः शुना ॥४८॥

अर्थ: यहाँ स्फीत नामक देवार्चकके उपवनमें उसने पुत्र उत्पन्न किया। तदनन्तर पुत्रको रत्नकम्बलमें लपेट कर जब तक वह समीपवर्ती सरोवरमें वस्त्र धोनेके लिए गयी तब तक एक कुत्ता उस पुत्रको उठा ले गया ॥४८॥


सुतं स्वैरं समादाय रत्नकम्बलवेष्टितम् । ददौ यक्षमहीपाय नीत्वा स ह्यस्य वल्लभः ॥४९॥

अर्थ: वह कुत्ता राजाका पालतू प्यारा कुत्ता था इसलिए उसने रत्नकम्बलमें लिपटे हुए उस पुत्रको अच्छी तरह ले जाकर राजा यक्षके लिए दे दिया ॥४९॥


ततोऽनेन विपुत्राया राजिलायाः समर्पितः । सार्थां च यक्षदत्ताख्यां प्रापितस्त्वं स वर्तसे ॥५०॥

अर्थ: राजाने वह पुत्र अपनी पुत्र रहित राजिला नामकी रानीके लिए दे दिया तथा उसका यक्षदत्त यह सार्थक नाम रखा क्योंकि यक्ष कुत्ताका नाम है और वह पुत्र उसके द्वारा दिया गया था। वही यक्षदत्त तू है ॥५०॥


प्रत्यावृत्य च संभ्रान्तमपश्यन्ती प्रसूतकम् । विप्रलापं चिरं चक्रे दुःखान् मित्रवती परम् ॥५१॥

अर्थ: जब मित्रवती लौटकर आयी और उसने अपना पुत्र नहीं देखा तब वह दुःखसे चिरकाल तक बहुत विलाप करती रही ॥५१॥


देवार्चकेन सा दृष्टा कृपया कृतसान्त्वना । त्वं मे स्वसेति भाषित्वा स्वकेऽवस्थापितोटजे ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर उपवनके स्वामी देवार्चकने उसे देखकर दया पूर्वक सान्त्वना दी और यह कह कर कि ‘तू हमारी बहन है’ अपनी कुटीमें रक्खी ॥५२॥


सहायरहितत्त्वेन त्रपयाकीर्तिभीतितः । न सा गता पितुर्गेहं तत्रैव निरता ततः ॥५३॥

अर्थ: सहायक न होनेसे, लज्जासे अथवा अपकीर्तिके भयसे वह फिर पिताके घर नहीं गयी और वहीं रहने लगी ॥५३॥


सेयमत्यन्तशीलाढ्या जिनधर्मपरायणा । कुटीरे दुर्विधस्यास्ते भ्रमता या त्वयेक्षिता ॥५४॥

अर्थ: वह अत्यन्त शीलवती तथा जिनधर्मके धारण करनेमें तत्पर रहती हुई दरिद्र देवार्चककी कुटीमें बैठी थी सो भ्रमण करते हुए तुमने उसे देखा ॥५४॥


व्रजता बन्धुदत्तेन यद्दत्तं रत्नकम्बलम् । अस्यास्तद्यक्षभवने तिष्ठत्यद्यापि रक्षितम् ॥५५॥

अर्थ: उसके पति बन्धुदत्तने परदेशको जाते समय उसे जो रत्नकम्बल दिया था वह आज भी राजा यक्षके घरमें सुरक्षित रखा है ॥५५॥


इत्युक्ते संयतं नत्वा स्तुत्वा च हितकारिणम् । इयाय खड्गवानेव संभ्रमी यक्षसंनिधिम् ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर उसने हितकारी मुनिराजको नमस्कार कर उनकी बहुत स्तुति की । तदनन्तर वह तलवार लिये ही शीघ्रतासे राजा यक्षके पास गया ॥५६॥


ऊचे च तेऽसिनानेन छिनद्मि नियतं शिरः । सत्यतो यदि मे जन्म न शास्सि स्फुटकारणम् ॥५७॥

अर्थ: और बोला कि यदि तू मेरे जन्मका सच-सच कारण स्पष्ट नहीं बताता है तो मैं इसी तलवारसे तेरा मस्तक काट डालूँगा ॥५७॥


यथावद् वेदितं तेन रत्नकम्बललक्षितम् । अयं जरायुलेपेन तिष्ठत्यद्यापि दिग्धकः ॥५८॥

अर्थ: इतना कहनेपर राजा यक्षने सब कारण ज्यों-का-त्यों बतला दिया और साथ ही वह रत्नकम्बल दिखलाते हुए कहा कि यह अब भी जरायुके लेपसे लिप्त है ॥५८॥


प्रथमाभ्यां ततस्तस्य पितृभ्यां सह संगमः । जातो महोत्सवोपेतः महाविभवविस्मितः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर उसका अपने पूर्व माता-पिताके साथ समागम हो गया और महावैभवसे आश्चर्यमें डालनेवाला बड़ा उत्सव हुआ ॥५९॥


कथितं ते महाराज वृत्तान्तादिदमागतम् । अधुना प्रकृतं वक्ष्ये भवावहितमानसः ॥६०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! प्रकरण आ जानेसे यह वृत्तान्त मैंने तुझसे कहा अब फिर प्रकृत बात कहता हूँ सो सावधान होकर श्रवण कर ॥६०॥


लक्ष्मीधरं पुरस्कृत्य सुग्रीवस्त्वरितं ययौ । समीपं रामदेवस्य स तस्थौ विहितानतिः ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीव, लक्ष्मणको आगे कर शीघ्र ही रामके समीप आया और नमस्कार कर खड़ा हो गया ॥६१॥


ततो विक्रमगर्वेण सदा प्रकटचेष्टितान् । आहूय किङ्करान् सर्वान् महाकुलसमुद्भवान् ॥६२॥

कांश्चिदश्रुतवृत्तान्तान् महामोग हतात्मिकान् । वेदयन् विस्मयप्राप्तान् पद्मनिर्मितमद्भुतम् ॥६३॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसने पराक्रमके गर्वसे सदा स्पष्ट चेष्टाओंके करनेवाले एवं उच्च कुलोंमें उत्पन्न समस्त किंकरोंको बुलाकर जिन महाभोगी किंकरोंने यह वृत्तान्त नहीं सुना था उन्हें रामका अद्भुत कार्य बतलाकर आश्चर्यसे चकित किया ॥६२-६३॥


कांश्चिद् विज्ञातवृत्तान्तान् प्रभुकार्यपरायणान् । जगौ प्रत्युपकाराय वाचा संमानयन्निदम् ॥६४॥

अर्थ: तथा जो इस वृत्तान्तको जानते थे प्रभुका कार्य करनेमें तत्पर रहनेवाले उन किंकरोंका वचन द्वारा सम्मान करते हुए उनसे रामका प्रत्युपकार करनेके लिए यह कहा ॥६४॥


भो भो सुविभ्रमाः सर्वे श्रृणुत श्रीसमुत्सृताः । सीतामुपलभध्वं द्राक् क्व वर्तत इति स्फुटम् ॥६५॥

अर्थ: कि हे उत्तम विभ्रमोंको धारण करनेवाले श्रीसम्पन्न समस्त पुरुषो ! तुम लोग शीघ्र ही सीताका पता चलाओ कि वह कहाँ है ? ॥६५॥


महीतले समस्तेऽस्मिन् पाताले खे जले स्थले । जम्बूद्वीपे पयोनाथे द्वीपे वा धातकीमति ॥६६॥

कुलपर्वतकुञ्जेषु काननान्तेषु मेरुषु । नगरेषु विचित्रेषु रम्येषु व्योमचारिणाम् ॥६७॥

गहनेषु समस्तेषु नानाविद्यापराक्रमाः । जानीत दिक्षु सर्वासु सतीं भूविवरेषु च ॥६८॥

अर्थ: तुम लोग नाना प्रकारकी विद्याओं और पराक्रमसे युक्त हो अतः इस समस्त भूतलमें, पातालमें, आकाशमें, जलमें, थलमें, जम्बूद्वीपमें, समुद्रमें, धातकीखण्ड द्वीपमें, कुलाचलोंके निकुंजोंमें, वनके अन्त भागोंमें, सुमेरु पर्वतोंमें, विद्याधरोंके चित्र-विचित्र मनोहर नगरोंमें, समस्त दिशाओंमें और भूमिके विवरों अर्थात् कन्दराओंमें सीताका पता चलाओ ॥६६-६८॥


शेषामिव ततो मूर्ध्नि ते कृत्वाऽज्ञां प्रमोदिनः । उत्पत्य दिक्षु सर्वासु द्रुतं जग्मुरहंयवः ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे भरे अहंकारी वानर शेषाक्षतकी तरह सुग्रीवकी आज्ञाको शिरपर धारण कर शीघ्र ही उड़कर समस्त दिशाओंमें चले गये ॥६९॥


युवविद्याभृता लेखं नाययित्वा यथाविधि । ज्ञातनिःशेषवृत्तान्तो वैदेहोऽप्युपपादितः ॥७०॥

अर्थ: एक तरुण विद्याधरके द्वारा विधिपूर्वक पत्र भेजकर भामण्डलके लिए भी समस्त वृत्तान्तसे अवगत कराया गया ॥७०॥


ततोऽसौ स्वसृदुःखेन नितान्तोद्विग्नमानसः । सुग्रीव इव रामस्य नितरां निभृतोऽभवत् ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर बहनके दुःखसे भामण्डल अत्यन्त दुखी हुआ और सुग्रीवके समान रामका अतिशय आज्ञाकारी हुआ ॥७१॥


स्वयमेव च सुग्रीवः पर्यटन् भानुवर्त्मना । तारानिकरचक्रेण संप्रवृत्तो गवेषणे ॥७२॥

अर्थ: सुग्रीव, स्वयं भी सीताकी खोज करनेके लिए ताराओंके समूहके साथ आकाशमार्गसे चला ॥७२॥


दुष्टविद्याधरानेकपुरान्वेषणतत्परः । ध्वजं दूरात् समालोक्य समीरणविकम्पितम् ॥७३॥

जम्बूद्वीपमहीध्रस्य शिखरेणोपलक्षितम् । नभस्तलं परं प्राप चलदंशुकपल्लवः ॥७४॥

अर्थ: वह दुष्ट विद्याधरोंके अनेक नगरोंके बीच सीताकी खोज करनेमें तत्पर हुआ भ्रमण कर रहा था । तदनन्तर हवासे हिलती हुई ध्वजाको दूरसे देखकर वह जम्बूद्वीपके एक पर्वतके शिखरसे उपलक्षित आकाशमें पहुँचा । उस समय उसके वस्त्रका अंचल हवासे हिल रहा था ॥७३-७४॥


वियतोऽवतरद् वीक्ष्य विमानं भानुभासुरम् । उत्पाताशङ्कितो जातो रत्नकेशी समाकुलः ॥७५॥

अर्थ: उस पर्वत-पर रत्नकेशी विद्याधर रहता था, सो वह आकाशसे उतरते हुए सूर्यके समान देदीप्यमान सुग्रीवके विमानको देखकर उत्पातकी आशंकासे युक्त हो गया ॥७५॥


आसीदनुसमालोक्य तदसावतिविह्वलः । वैनतेयात् परित्रस्तः संचुकोच यथोरगः ॥७६॥

अर्थ: विमान को देखकर वह अत्यन्त विह्वल हो गया और जिस प्रकार गरुड़से भयभीत हो सर्प संकुचित होकर रह जाता है उसी प्रकार रत्नकेशी भी उस विमानसे भयभीत हो संकुचित होकर रह गया ॥७६॥


आसन्नं च परिज्ञाय ध्वजेन कपिलक्ष्मणम् । रत्नकेशी गतश्चिन्तामिति मृत्युभयाकुलः ॥७७॥

अर्थ: जब सुग्रीव बिलकुल निकट आ गया तब उसे उसकी ध्वजासे वानरवंशी जानकर रत्नकेशी मृत्युके भयसे व्याकुल होता हुआ इस प्रकारकी चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥७७॥


लङ्काधिपतिना नूनं क्रुद्धेन जनितागसा । प्रेषितो मद्विनाशाय सुग्रीवोऽयमुपागतः ॥७८॥

अर्थ: जान पड़ता है कि मैंने लंकाधिपति - रावणका अपराध किया था अतः कुपित होकर उसके द्वारा मुझे नष्ट करनेके लिए भेजा हुआ यह सुग्रीव आया है ॥७८॥


किं न प्रतिभये शीघ्रं मृतो रत्नाकराम्भसि । हा धिगन्यान्तरे द्वीपे मरणं समुपागतम् ॥७९॥

अर्थ: हाय मैं भय उत्पन्न करनेवाले लवण समुद्रमें गिरकर शीघ्र ही क्यों नहीं मर गया । मुझे धिक्कार है जिसे इस अन्य द्वीपमें मरण प्राप्त हुआ है - मरनेका अवसर प्राप्त हो रहा है ॥७९॥


मनोरथं पुरस्कृत्य विद्यावीर्यविवर्जितः । जीवितस्पृहयाविष्टः प्रापयिष्यामि किंन्वहम् ॥८०॥

अर्थ: मैं विद्याबलसे रहित होकर भी इच्छाओंको आगे कर जीवित रहनेकी इच्छासे युक्त हूँ सो देखूँ अब क्या प्राप्त करता हूँ ? ॥८०॥


इति चिन्तयतस्तस्य संप्राप्तो वानरध्वजः । द्योतयन् सहसा द्वीपं द्वितीय इव भास्करः ॥८१॥

अर्थ: इस प्रकार रत्नकेशी विचार कर ही रहा था कि इतनेमें द्वितीय सूर्यके समान द्वीपको प्रकाशित करता हुआ सुग्रीव वहाँ शीघ्र ही जा पहुँचा ॥८१॥


तकं धूसरसर्वाङ्गमालोक्य वनपांसुभिः । वानराङ्कध्वजोऽपृच्छदनुकम्पां समुद्वहन् ॥८२॥

अर्थ: वनकी धूलिसे जिसका समस्त शरीर धूसर हो रहा था ऐसे उस रत्नकेशीको देखकर दया धारण करते हुए सुग्रीवने पूछा ॥८२॥


स त्वं रत्नजटी पूर्वमासीद् विद्यासमुन्नतः । अवस्थामीदृशीं कस्मादधुना भद्र संगतः ॥८३॥

अर्थ: कि तू रत्नजटी तो पहले विद्याओंसे समुन्नत था । हे भद्र ! अब ऐसी दशाको किस कारण प्राप्त हुआ है ? ॥८३॥


इत्युक्तोऽप्यनुकम्पेन सुग्रीवेण सुखाकरम् । सर्वाङ्गं कम्पयन् भीत्या दीनो रत्नजटी भृशम् ॥८४॥

अर्थ: इस प्रकार दयाके धारक सुग्रीवने उससे सुखसमाचार पूछा तो भी भयके कारण उसका समस्त शरीर काँप रहा था तथा वह अत्यन्त दीन जान पड़ता था ॥८४॥


मा भैषीर्भद्र मा भैषीरित्युक्तश्च पुनः पुनः । जगौ कृतानतिर्धीरमतिः प्रकटिताक्षरम् ॥८५॥

प्रतिपक्षी भवन् साधो रावणेन दुरात्मना । सीताहरणसक्तेन छिन्नविद्योऽहमीदृशः ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीवने जब उससे बार-बार कहा कि हे भद्र ! भयभीत मत हो, भयभीत मत हो तब कहीं धैर्य धारण कर उसने नमस्कार किया और स्पष्ट अक्षरोंमें कहा कि हे सत्पुरुष ! दुष्ट रावण सीताके हरनेमें तत्पर था उस समय मैंने उसका विरोध किया जिससे उसने मेरी विद्याएँ छीनकर मुझे ऐसा कर दिया ॥८५-८६॥


जीविताशां समालम्ब्य कथंचिद्दैवयोगतः । ध्वजमेतं समुत्सृज्य स्थितोऽस्मि कपिपुंगव ॥८७॥

अर्थ: हे कपिश्रेष्ठ ! दैवयोगसे जीवित रहनेकी आशासे मैं यहाँ इस ध्वजाको ऊपर उठाकर किसी तरह स्थित हूँ - रह रहा हूँ ॥८७॥


उपलब्धप्रवृत्तिश्च तोषोद्वेगं वहन् द्रुतम् । गृहीत्वा रत्नजटिनं सुग्रीवः स्वपुरं ययौ ॥८८॥

अर्थ: तदनन्तर समाचार प्राप्त हो जानेसे जो हर्षजन्य उद्वेगको धारण कर रहा था ऐसा सुग्रीव शीघ्र ही रत्नजटीको लेकर अपने नगरकी ओर गया ॥८८॥


समक्षं लक्ष्मणस्याथ महतां च खगामिनाम् । जगौ रत्नजटी पद्म विनयी विहिताञ्जलिः ॥८९॥

देव देवी नृशंसेन सती सीता दुरात्मना । हृता लङ्कापुरीन्द्रेण विद्या च मम कोपिनः ॥९०॥

अर्थ: अथानन्तर विनयसे भरे रत्नजटीने हाथ जोड़कर लक्ष्मण तथा अन्य बड़े-बड़े विद्याधरोंके सामने रामसे कहा कि हे देव ! अतिशय दुष्ट, लंकापुरीके राजा क्रूर रावणने पतिव्रता सीतादेवीको तथा क्रोध करनेवाले मुझ रत्नजटीकी विद्याको हरा है ॥८९-९०॥


कुर्वन्ती सा महाक्रन्दं ध्वनिना चित्तहारिणा । मृगीव व्याकुलीभूता नीता तेन बलीयसा ॥९१॥

अर्थ: जो चित्तको हरण करनेवाली ध्वनिसे महारुदन करती हुई मृगीके समान व्याकुल हो रही थी ऐसी सीताको वह बलवान् हरकर ले गया है ॥९१॥


येनासीत् समरे भीमे निर्जित्य सुमहाबलः । इन्द्रो विद्याभृतामीशो बन्दिग्रहमुपाहृतः ॥९२॥

अर्थ: जिसने भयंकर संग्राममें अत्यन्त बलवान्, विद्याधरोंके अधिपति इन्द्रको जीतकर कारागारमें डाला था ॥९२॥


स्वामी भरतखण्डानां यस्त्रयाणां निरङ्कुशः । कैलासोद्धरणे येन विशालं संगतं यशः ॥९३॥

सागरान्ता मही यस्य दासीवाज्ञां प्रतीच्छति । सुरासुरैर्न यो जेतुं संहतैरपि शक्यते ॥९४॥

श्रेष्ठेन विदुषां तेन धर्माधर्मविवेकिना । कर्मेदं निर्मितं क्रूरं मोहो जयति पापिनाम् ॥९५॥

अर्थ: जो भरतक्षेत्रके तीन खण्डोंका अद्वितीय स्वामी है, जिसने कैलास पर्वतके उठानेमें विशाल यश प्राप्त किया है, समुद्रान्त पृथ्वी दासीके समान जिसकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करती है, सुर तथा असुर मिलकर भी जिसे जीतनेके लिए समर्थ नहीं हैं, जो विद्वानोंमें श्रेष्ठ है तथा धर्म-अधर्मके विवेकसे युक्त है, उसी रावणने यह क्रूर कार्य किया है सो कहना पड़ता है कि पापी जीवोंका मोह बड़ा प्रबल है ॥९३-९५॥


तच्छ्रुत्वा विविधं बिभ्रद्रसं काकुत्स्थनन्दनः । अङ्गस्पृशं ददौ सर्वं सादरं रत्नकेशिने ॥९६॥

अर्थ: यह सुनकर नाना प्रकारके स्नेहको धारण करते हुए रामने आदरके साथ रत्नजटीके लिए अपने शरीरका स्पर्श दिया अर्थात् उसका आलिंगन किया ॥९६॥


देवोपगीतसंज्ञे च पुरे गोत्रक्रमागतम् । अन्वजानादधीशत्वं विच्छिन्नमरिभिश्चिरम् ॥९७॥

अर्थ: और देवोपगीत नामक नगरका स्वामित्व रत्नजटीके वंशपरम्परासे चला आता था पर बीचमें शत्रुओंने छीन लिया था सो उसे उसका स्वामित्व प्रदान किया - वहाँका राजा बनाया ॥९७॥


पुनः पुनरपृच्छच्च वार्त्तामालिङ्ग्य तं नृपः । पुनः पुनर्जगादासौ प्रमोदव्याकुलाक्षरः ॥९८॥

अर्थ: राम, बार-बार आलिंगन कर उससे यह समाचार पूछते थे और वह हर्षसे स्खलित होते हुए अक्षरोंमें बार-बार उक्त समाचार सुनाता था ॥९८॥


ततः समुत्सुकः पद्मः पर्यपृच्छदतिद्रुतम् । लङ्कापुरी क्रियद्दूरे विवेदयत खेचराः ॥९९॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त उत्सुकतासे भरे रामने शीघ्र ही पूछा कि हे विद्याधरो ! बतलाओ कि लंका कितनी दूर है ? ॥९९॥


इत्युक्तास्ते गता मोहं निश्चलीभूतविग्रहाः । अवाङ्मुखा गतच्छाया बभूवुर्वाग्विवर्जिताः ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार रामके कहनेपर सब विद्याधर मोहको प्राप्त हो गये । उनके शरीर निश्चल हो रहे तथा वे नम्रमुख, कान्तिहीन और वचनोंसे रहित हो गये ॥१००॥


अभिप्रायं ततो ज्ञात्वा विशीर्णहृदयास्तके । अवज्ञामन्दया दृष्ट्या राघवेन विलोकिताः ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके हृदय भयसे विशीर्ण हो रहे थे ऐसे उन विद्याधरोंका अभिप्राय जानकर रामने उनकी ओर अवज्ञापूर्ण दृष्टिसे देखा ॥१०१॥


अथ भीतिपरित्रस्ताः ज्ञाताः स्म इति लज्जिताः । ऊचुर्धीरं मनः कृत्वा करकुड्मलमस्तकाः ॥१०२॥

अर्थ: तत्पश्चात् ‘हम श्रीरामकी दृष्टिमें भयभीत जाने गये हैं’ इस विचारसे जो लज्जित हो रहे थे ऐसे उन विद्याधरोंने हाथ जोड़ मस्तकसे लगा मनको धीर कर कहा कि ॥१०२॥


यदीयं देव नामापि कथंचित्समुदीरितम् । ज्वरमानयति त्रासाद्वदामस्त्वत्पुरः कथम् ॥१०३॥

अर्थ: हे देव ! किसी तरह उच्चारण किया हुआ जिसका नाम ही भयसे ज्वर उत्पन्न कर देता है उसके विषयमें हम आपके सामने क्या कहें ? ॥१०३॥


क्व वयं क्षुद्रसामर्थ्याः क्व च लङ्कामहेश्वरः । त्यजानुबन्धमेतस्मिन् ज्ञाते संप्रति वस्तुनि ॥१०४॥

अर्थ: क्षुद्र शक्तिके धारक हम लोग कहाँ और लंकाका स्वामी रावण कहाँ ? अतः इस समय आप इस जानी हुई वस्तुकी हठ छोड़िए ॥१०४॥


अथावश्यमिदं वस्तु श्रोतव्यं श्रूयतां प्रभो । कोऽत्र दोषः समक्षं ते किंचिद्वक्तुं हि शक्यते ॥१०५॥

अर्थ: अथवा हे प्रभो ! यह सुनना आवश्यक ही है तो सुनिए कहनेमें क्या दोष है ? आपके समक्ष तो कुछ कहा जा सकता है ॥१०५॥


अस्त्यत्र लवणाम्भोधौ क्रूरग्राहसमाकुले । प्रख्यातो राक्षसद्वीपः प्रभूताद्भुतसंकुलः ॥१०६॥

अर्थ: दुष्ट मगरमच्छोंसे भरे हुए इस लवणसमुद्रमें अनेक आश्चर्यकारी स्थानोंसे युक्त प्रसिद्ध राक्षसद्वीप है ॥१०६॥


शतानि सप्त विस्तीर्णो योजनानां समन्ततः । परिक्षेपेण तान्येव साधिकान्येकविंशतिः ॥१०७॥

अर्थ: जो सब ओरसे सात योजन विस्तृत है तथा कुछ अधिक इक्कीस योजन उसकी परिधि है ॥१०७॥


मध्ये मन्दरतुल्योऽस्य त्रिकूटो नाम पर्वतः । योजनानि नवोत्तुङ्गपञ्चाशद्विपुलत्वतः ॥१०८॥

अर्थ: उसके बीचमें सुमेरु पर्वतके समान त्रिकूट नामका पर्वत है जो नौ योजन ऊँचा और पचास योजन चौड़ा है ॥१०८॥


हेमनानामणिस्फीतः शिलाजालावलीचितः । आसीत्तोयदवाहस्य दत्तो नाथेन रक्षसाम् ॥१०९॥

अर्थ: सुवर्ण तथा नाना प्रकारके मणियोंसे देदीप्यमान एवं शिलाओंके समूहसे व्याप्त है । राक्षसोंके इन्द्र भीमने मेघवाहनके लिए वह दिया था ॥१०९॥


तस्य कूल्यैर्द्रुमैश्चित्रैः शिखरे कृतभूषणे । लङ्केति नगरी भाति मणिरत्नमरीचिभिः ॥११०॥

विमानसदृशैः रम्यैः प्रासादैः स्वर्गसंनिभैः । मनोहरैः प्रदेशैश्च क्रीडनादिक्रियोचितैः ॥१११॥

अर्थ: तट पर उत्पन्न हुए नाना प्रकारके चित्र-विचित्र वृक्षोंसे सुशोभित उस त्रिकूटाचलके शिखरपर लंका नामकी नगरी है जो मणि और रत्नोंकी किरणों तथा स्वर्गके विमानोंके समान मनोहर महलों एवं क्रीड़ा आदिके योग्य सुन्दर प्रदेशोंसे अत्यन्त शोभायमान है ॥११०-१११॥


त्रिंशद् योजनमानेन परिच्छिन्ना समन्ततः । महाप्राकारपरिखा द्वितीयेव वसुन्धरा ॥११२॥

अर्थ: जो सब ओरसे तीस योजन चौड़ी है तथा बहुत बड़े प्राकार और परिखासे युक्त होनेके कारण दूसरी पृथिवीके समान जान पड़ती है ॥११२॥


लङ्कायाः परिपार्श्वेषु सन्त्यन्येऽपि मनोहराः । स्वभावावस्थिता रत्नमणिकाञ्चनमूर्तयः ॥११३॥

अर्थ: लंकाके समीपमें और भी ऐसे स्वाभाविक प्रदेश हैं जो रत्न, मणि तथा स्वर्णसे निर्मित हैं ॥११३॥


प्रदेशा नगरोपेता रक्षसां क्रीडभूमयः । अधिष्ठिता महाभोगैस्ते च सर्वे नभश्चरैः ॥११४॥

अर्थ: वे सब प्रदेश उत्तमोत्तम नगरोंसे युक्त हैं, राक्षसोंकी क्रीड़ा-भूमि हैं तथा महाभोगोंसे युक्त विद्याधरोंसे सहित हैं ॥११४॥


संध्याकारः सुवेलश्च काञ्चनो ह्लादनस्तथा । योधनो हंसनामा च हरिसागरनिस्वनः ॥११५॥

अर्द्धस्वर्गोदयश्चान्ये द्वीपाः सर्वर्द्धिभोगदाः । प्रदेशा इव नाकस्य काननादिविभूषिताः ॥११६॥

अर्थ: सन्ध्याकार, सुवेल, कांचन, ह्लादन, योधन, हंस, हरिसागर और अर्द्ध स्वर्ग आदि अन्य द्वीप भी वहाँ विद्यमान हैं जो समस्त ऋद्धियों तथा भोगोंको देनेवाले हैं, वन-उपवन आदिसे विभूषित हैं तथा स्वर्ग प्रदेशोंके समान जान पड़ते हैं ॥११५-११६॥


सुहृद्भिर्भ्रातृभिः पुत्रैः कलत्रैर्बान्धवैः सह । रमते येषु लङ्केशो भृत्यवर्गसमावृतः ॥११७॥

अर्थ: लंकाधिपति रावण भृत्यवर्गसे आवृत हो मित्रों, भाइयों, पुत्रों, स्त्रियों तथा अन्य इष्टजनोंके साथ उन प्रदेशोंमें क्रीड़ा किया करता है ॥११७॥


तं क्रीडन्तं जनो दृष्ट्वा महाविद्याधराधिपम् । देवाधिपोऽपि मन्येऽहं समाशङ्कां प्रपद्यते ॥११८॥

अर्थ: क्रीड़ा करते हुए उस विद्याधरोंके अधिपतिको देखकर मैं समझता हूँ कि इन्द्र भी आशंकाको प्राप्त हो जाता है ॥११८॥


भ्राता विभीषणो यस्य बली लोकसमुत्कटः । परैरपि रैराजावजय्यो राजपुंगवः ॥११९॥

अर्थ: जिसका भाई विभीषण लोकमें अत्यधिक बलवान् है, युद्धमें बड़े-बड़े लोगोंके द्वारा भी अजेय है और राजाओंमें श्रेष्ठ है ॥११९॥


त्रिदशस्तत्समो बुद्ध्या नास्ति नास्त्येव मानुषः । तेनैकेनैव पर्याप्तं रावणस्य जगत्प्रभोः ॥१२०॥

अर्थ: बुद्धि द्वारा उसकी समानता करनेवाला देव भी नहीं है फिर मनुष्य तो निश्चित ही नहीं है । जगत्प्रभु रावणको उसी एक भाईका संसर्ग प्राप्त होना पर्याप्त है ॥१२०॥


अपरोऽप्यनुजस्तस्य विद्यते गुणभूषणः । भानुकर्ण इति ख्यातस्त्रिशूलपरमायुधः ॥१२१॥

अर्थ: उसका गुणरूपी आभूषणोंसे सहित एक छोटा भाई भी है जो कुम्भकर्ण इस नामसे प्रसिद्ध है तथा त्रिशूल नामक महाशस्त्रसे सहित है ॥१२१॥


भ्रुकुटिं कुटिलां यस्य भीष्मां कालकुटीमिव । न शक्नुवन्ति संग्रामे सुरा अप्यवलोकितुम् ॥१२२॥

अर्थ: युद्धमें यमराजकी कुटीके समान जिसकी भयंकर कुटिल भ्रकुटीको देव भी देखनेके लिए समर्थ नहीं हैं फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? ॥१२२॥


महेन्द्रजितसंज्ञश्च क्षितौ ख्यातिमुपागतः । तस्यैव तनयो यस्य जगदाभासते करे ॥१२३॥

अर्थ: युद्धमें ख्यातिको प्राप्त होनेवाला इन्द्रजित्, उसीका पुत्र है ऐसा पुत्र कि जिसके हाथमें सारा संसार जान पड़ता है ॥१२३॥


एवमाद्याः सुबहवः प्रणतास्तस्य किङ्कराः । नानाविद्याद्भुतोपेताः प्रतापप्रणतारयः ॥१२४॥

अर्थ: इन सबको आदि लेकर रावणके ऐसे अनेक किंकर हैं जो नाना प्रकारकी विद्याओंके आश्चर्यसे सहित हैं तथा प्रतापसे जिन्होंने शत्रुओंको नम्रीभूत बना दिया है ॥१२४॥


यस्यातपत्रमालोक्य पूर्णचन्द्रसमप्रभम् । त्यजन्ति रिपवो दर्पं समरे चिरपोषितम् ॥१२५॥

अर्थ: पूर्ण चन्द्रके समान आभावाले जिसके छत्रको देखकर शत्रु युद्धमें अपना चिरसंचित अहंकार छोड़ देते हैं ॥१२५॥


अमुष्य पुस्तकर्मापि चित्रं वा सहसेक्षितम् । नाम चोच्चारितं शक्तमरीणां त्रासकर्मणि ॥१२६॥

अर्थ: सहसा दृष्टिमें आया इसका पुतला, अथवा चित्र अथवा उच्चारण किया हुआ नाम भी शत्रुओंको भय उत्पन्न करनेमें समर्थ है ॥१२६॥


एवंविधममुं युद्धे कः शक्तो जेतुमुद्धतः । कथा चैषा न कर्तव्या चिन्त्यतामपरा गतिः ॥१२७॥

अर्थ: इस प्रकार-के इस रावणको युद्धमें जीतनेके लिए कौन बलवान् समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं । इसलिए यह कथा ही छोड़िए, कोई दूसरा उपाय सोचिए ॥१२७॥


ततोऽनादरतस्तेषामेकैकं वीक्ष्य लक्ष्मणः । अभाणीदूर्जितं वाक्यं घनाघनघनस्वनः ॥१२८॥

सत्यं यदीदृशः ख्यातः शक्तिमान् दशवक्त्रकः । तत् किमश्रोव्यनाम स्वमसौ स्त्रीतस्करो भवेत् ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर अनादरसे उनमें प्रत्येककी ओर देखकर मेघके समान गम्भीर शब्दको धारण करनेवाले लक्ष्मणने इस प्रकार बलपूर्ण वचन कहे कि यदि रावण सचमुच ही ऐसा प्रसिद्ध बलवान् है तो जिसका नाम भी श्रवण करने योग्य नहीं रहता ऐसा स्त्रीका चोर क्यों होता ? ॥१२८-१२९॥


दाम्भिकस्यातिभीतस्य मोहिनः पापकर्मणः । रक्षोऽधमस्य तस्यास्ति कुतः स्वल्पापि शूरता ॥१३०॥

अर्थ: वह तो कपटी, भीरु, मोही, पापकर्मा नीच राक्षस है उसमें थोड़ी भी शूरवीरता कहाँ है ? ॥१३०॥


अब्रवीत्पद्मनाभश्च किमुक्तेनेह भूरिणा । वार्तागमोऽपि दुःप्रापो दिष्ट्या लब्धो मया स च ॥१३१॥

अर्थ: रामने भी कहा कि इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या ? जिस समाचारका मिलना भी दुष्कर था वह समाचार दैवकी अनुकूलतासे हमने प्राप्त कर लिया है ॥१३१॥


चिन्त्यमस्त्यपरं नातः क्षोभ्यतां राक्षसाधमः । जायतामुचितं भावि फलं कर्मानिलेरितम् ॥१३२॥

अर्थ: इसलिए अब दूसरी बात सोचनेकी आवश्यकता नहीं है, अब तो उस नीच राक्षसको क्षोभित किया जाये। कर्मरूपी वायुसे प्रेरित हुआ उचित ही फल होगा ॥१३२॥


अथैनमूचिरे वृद्धाः क्षणं स्थित्वेव सादराः । शोकं जहीहि पद्माभ भवास्माकमधीश्वरः ॥१३३॥

विद्याधरकुमारीणां गुणैरप्सरसामिव । भव भर्ता भ्रमन् लोके वियुक्ताशेषदुःखधीः ॥१३४॥

अर्थ: अथानन्तर क्षण-भर ठहरकर वृद्ध लोगोंने आदरपूर्वक कहा कि पद्माभ ! शोक छोड़ो, हमारे स्वामी होओ, गुणोंसे अप्सराओंकी समानता करनेवालीं विद्याधर कुमारियोंके भर्ता होओ तथा सब दुःख छोड़कर आनन्दसे लोकमें भ्रमण करो ॥१३३-१३४॥


पद्मोऽवदन्न मेऽन्याभिः प्रमदाभिः प्रयोजनम् । विजयन्ते महालीलां यदि शच्या अपि स्त्रियः ॥१३५॥

अर्थ: रामने उत्तर दिया कि मुझे अन्य स्त्रियोंसे प्रयोजन नहीं है भले ही वे स्त्रियाँ इन्द्राणीकी महालीलाको जीतती हों ॥१३५॥


प्रीतिश्चेन्मयि युष्माकमस्ति कापि नभश्चराः । अनुकम्पापि वा सीतां ततो दर्शयत द्रुतम् ॥१३६॥

अर्थ: हे विद्याधरो ! यदि आप लोगोंकी मुझपर कुछ भी प्रीति अथवा दया है तो शीघ्र ही सीताको दिखाओ ॥१३६॥


जाम्बूनदस्ततोऽवोचत्प्रभो मूढग्रहैस्त्वया । त्यज्यतां क्षुद्रवन्मा भूर्मयूर इव दुःखितः ॥१३७॥

अर्थ: तदनन्तर जाम्बूनदने कहा कि हे प्रभो ! इस मूर्ख हठको छोड़ो जिस प्रकार कृत्रिम मयूरके विषयमें क्षुद्रनामा मनुष्य दुःखी हुआ था उस तरह तुम दुःखी मत होओ ॥१३७॥


अस्ति वेणातटे गेही नाम्ना सर्वरुचिः किल । सुतो विनयदत्तोऽस्य गुणपूर्णासमुद्भवः ॥१३८॥

अर्थ: मैं यह कथा कहता हूँ सो सुनो - वेणातट नामक नगरमें सर्वरुचि नामका एक गृहस्थ रहता था। उसके गुणपूर्णा नामक स्त्रीसे उत्पन्न विनयदत्त नामका पुत्र था ॥१३८॥


विशालभूतिसंज्ञश्च वयस्योऽस्यातिवल्लभः । तद्भार्यायां समासक्तो गृहलक्ष्म्यां दुरात्मकः ॥१३९॥

अर्थ: विनयदत्तका एक विशालभूति नामक अत्यन्त प्यारा मित्र था सो वह पापी, विनयदत्तकी स्त्री गृहलक्ष्मीमें आसक्त हो गया ॥१३९॥


तस्या एव च वाक्येन विद्रुतिच्छद्मना वनम् । नीत्वा विनयदत्तं स बबन्धोपरि शाखिनः ॥१४०॥

अर्थ: एक दिन उसी स्त्रीके कहनेसे विशालभूति विनयदत्तको भ्रमण करनेके छलसे वनमें ले गया और उसे वृक्षके ऊपर बाँध आया ॥१४०॥


बध्वा च तं ततो गेहं क्रूरकर्मा हताशयः । विधाय चोत्तरं किंचिदवतस्थे कृतार्थवत् ॥१४१॥

अर्थ: दुष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाला क्रूरकर्मा विशालभूति घर आकर कृतकृत्यकी तरह आनन्दसे रहने लगा तथा पूछनेपर विनयदत्तके विषयमें कुछ इधर-उधरका उत्तर देकर चुप हो जाता ॥१४१॥


अत्रान्तरे तमुद्देशं दिग्मूढः प्रच्युतः पथः । आजगाम भ्रमन् खिन्नः क्षुद्रोऽपश्यच्च तं तरुम् ॥१४२॥

अर्थ: इसी बीचमें क्षुद्र नामका एक मनुष्य दिशा भूलकर मार्गसे च्युत हो भ्रमण करता हुआ खेदखिन्न हो वहाँसे निकला और उसने उस वृक्षको देखा ॥१४२॥


घनच्छायाकृतश्रद्धस्तस्याधश्च जगाम सः । क्वणितं वाश्रणोन्मन्दमुन्मुखश्च व्यलोकयत् ॥१४३॥

अर्थ: वृक्षकी सघन छाया देखकर विश्राम करनेकी इच्छासे वह वृक्षके नीचे गया। वहाँ उसने विनयदत्तके कराहनेका मन्द-मन्द शब्द सुन ऊपरको मुख उठाकर देखा ॥१४३॥


यावत्पश्यति तं बद्धं निविडं दृढरज्जुभिः । अत्यन्ततुङ्गशाखाग्रे निश्चेष्टीकृतविग्रहम् ॥१४४॥

अर्थ: तो उसे अत्यन्त ऊँची शाखाके अग्रभागपर मजबूत रस्सियोंसे बँधा हुआ निश्चेष्ट शरीरका धारक विनयदत्त दिखा ॥१४४॥


आरुह्य तेन मुक्तः सोऽनुकम्पासक्तचेतसा । गतो विनयदत्तस्तु स्वं तेनैव समाश्रयम् ॥१४५॥

अर्थ: जिसका चित्त दयामें आसक्त था ऐसे क्षुद्र नामक पुरुषने ऊपर चढ़कर उसे बन्धन मुक्त किया। तदनन्तर विनयदत्त नीचे उतर उस क्षुद्रको साथ ले अपने घर चला गया ॥१४५॥


स्वजनस्योत्पवे जातो महानन्दसमुत्कटः । विशालभूतिरालोक्य तं च दूरात्पलायितः ॥१४६॥

अर्थ: विनयदत्तके लानेसे उसके घरमें महान् आनन्दसे युक्त उत्सव हुआ और विशालभूति उसे देख दूर भाग गया ॥१४६॥


क्षुद्रस्याथ शिखो जातु शिखिपत्रमयोऽन्यथा । रमणो वात्यया नीतः संप्राप्तो राजसूनुना ॥१४७॥

अर्थ: क्षुद्र, विनयदत्तके घर रहने लगा उसके पास मयूरपत्रका बना हुआ एक मयूरका खिलौना था सो वह खिलौना एक दिन हवामें उड़ गया और राजाके पुत्रको मिल गया ॥१४७॥


तन्निमित्तं महाशोकः क्षुद्रो मित्रमभाषत । मां चेदिच्छसि जीवन्तं यच्छ तन्मे मयूरकम् ॥१४८॥

अर्थ: उस कृत्रिम मयूरके निमित्त बहुत भारी शोक करता हुआ क्षुद्र, अपने मित्रसे बोला कि हे मित्र ! यदि मुझे जीवित चाहते हो तो मेरा वह कृत्रिम मयूर मुझे देओ ॥१४८॥


बद्धस्तथाविधो वृक्षे मया त्वं परिमोचितः । अस्योपकारमुख्यस्य प्रतिदानं प्रयच्छ मे ॥१४९॥

अर्थ: मैंने तुझे उस तरह वृक्षपर बँधा हुआ छोड़ा था सो इस मुख्य उपकारका बदला मेरे लिए देओ ॥१४९॥


ततो विनयदत्तस्तमुवाचान्यमयूरकम् । गृहाण मणिरत्नं वा कुतस्तं ते ददाम्यहम् ॥१५०॥

अर्थ: तब विनयदत्तने उससे कहा कि तुम उसके बदले दूसरा मयूर ले लो अथवा मणि या रत्न ले लो तुम्हारा वह मयूर कहाँसे दूँ ॥१५०॥


सोऽवोचद्दीयतां मह्यं स एवेति पुनः पुनः । मूढस्तथाविधो जातो भवानपि नरोत्तमः ॥१५१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें वह बार-बार यही कहता था कि नहीं, मेरे लिए तो वहीं मयूर देओ । सो क्षुद्र तो मूर्ख होकर उस प्रकार हठ करता था पर आप तो नरोत्तम होकर भी ऐसा हठ कर रहे हैं ॥१५१॥


राजपुत्रकरं प्राप्ता कृत्रिमासौ मयूरिका । कथं लभ्या वधो यस्माल्लभ्यते यत्र तत्परैः ॥१५२॥

अर्थ: आप ही कहो कि राजपुत्रके हाथमें पहुँची कृत्रिम मयूरी कैसे प्राप्त हो सकती थी। राजपुत्रसे तो केवल माँगनेवालोंको मृत्यु ही मिल सकती थी ॥१५२॥


त्रिवर्णाम्भोजनेत्राणां कन्यानां कनकत्विषाम् । पीवरस्तनकुम्भानां विशालजघनश्रियाम् ॥१५३॥

वक्त्रकान्तिजितेन्दूनां पूर्णानां चारुभिर्गुणैः । पतिर्भव महाभोग प्रसीद रघुनन्दन ॥१५४॥

अर्थ: इसलिए हे रघुनन्दन ! सीताकी इच्छा छोड़ो और जिनके नेत्र सफेद, काले तथा लाल रंगके हैं, जिनकी कान्ति सुवर्णके समान है, जिनके स्तनकलश अत्यन्त स्थूल हैं, जिनके जघनकी शोभा विशाल है, जिन्होंने मुखकी कान्तिसे चन्द्रमाको जीत लिया है तथा जो अनेक सुन्दर गुणोंसे युक्त हैं ऐसी कन्याओंके पति होकर महाभोग भोगो, प्रसन्न होओ ॥१५३-१५४॥


अनुबन्धमिदं हास्यं त्यज दुःखविवर्धनम् । मयूरशष्पशोकार्तो माभूः क्षुद्रकवद् बुध ॥१५५॥

अर्थ: इस हास्यजनक दुःखवर्धक हठको छोड़ो और हे विद्वन् ! क्षुद्रके समान मयूररूपी तृणके शोकसे पीड़ित नहीं होओ ॥१५५॥


सर्वदा सुलभाः पुंसः शिखिशष्पोपमाः स्त्रियः । ब्रवीमि राघव त्वाहं प्राज्ञैः शोको न धार्यते ॥१५६॥

अर्थ: मयूररूपी तृणके समान स्त्रियाँ पुरुषको सदा सुलभ हैं इसलिए हे राघव ! मैं आपसे कह रहा हूँ । बुद्धिमान् मनुष्य कभी शोक धारण नहीं करते ॥१५६॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत्परमो वाक्यवर्त्मनि । जाम्बूनदेदृशं नेदमिदमेतादृशं शृणु ॥१५७॥

अर्थ: तदनन्तर वचनोंके मार्गमें अतिशय निपुण लक्ष्मणने कहा कि हे जाम्बूनद ! यह बात ऐसी नहीं है किन्तु ऐसी है सो सुनो ॥१५७॥


आसीद्गृहपतिः ख्यातः पुरे कुसुमनामनि । प्रमवाख्यः प्रिया तस्य यमुनेति प्रकीर्तिता ॥१५८॥

अर्थ: कुसुमपुर नामक नगरमें एक प्रभव नामका प्रसिद्ध गृहस्थ रहता था । उसकी स्त्रीका नाम यमुना था ॥१५८॥


धनबन्धुगृहक्षेत्रपशुप्रभृतयः सुताः । पालान्तास्तस्य सेवन्ते शब्दानामन्तमागताः ॥१५९॥

अर्थ: उन दोनोंके धनपाल, बन्धुपाल, गृहपाल, क्षेत्रपाल और पशुपाल नामके पाँच पुत्र थे ॥१५९॥


अन्वर्थसंज्ञकास्ते च कुटुम्बार्थं सदोद्यताः । कुर्वन्ति कर्म विश्रान्ति क्षणमप्यनुपागताः ॥१६०॥

अर्थ: ये सभी पुत्र सार्थक नामवाले थे और कुटुम्बके पालनके लिए सदा तत्पर रहते थे तथा क्षणभरके लिए भी अपने कार्यसे विश्राम नहीं लेते थे ॥१६०॥


आत्मश्रेयोभिधानश्च सुतोऽस्यैवाखिलोधरः । पुण्योदयादसौ भोगान् भुङ्क्ते देवकुमारवत् ॥१६१॥

अर्थ: इनमें सबसे छोटा आत्मश्रेय नाम कुमार था सो वह पुण्योदयसे देवकुमारके समान भोग भोगता था ॥१६१॥


भ्रातृभिः स पितृभ्यां च चिरं कटुमिरक्षरैः । निर्भर्त्सितोऽन्यदा यातो मानी बाह्यां परिभ्रमन् ॥१६२॥

अर्थ: कुछ करता नहीं था इसलिए भाई तथा माता-पिता निरन्तर कटुक अक्षरों द्वारा उसका तिरस्कार करते रहते थे । एक दिन वह मानी घरसे निकलकर नगरके बाहर चला गया ॥१६२॥


सुकुमारशरीरोऽसौ निर्वेदं परमं गतः । कर्म कर्तुमशक्तात्मा मरणं स्वस्य वाञ्छति ॥१६३॥

अर्थ: अत्यन्त सुकुमार शरीरका धारक था इसलिए कुछ कर सकनेके लिए समर्थ नहीं था अतः परम निर्वेदको प्राप्त हो आत्मघात करने की इच्छा करने लगा ॥१६३॥


पूर्वकर्मानुभावेन प्रेरितः पथिकश्च तम् । समागत्याभणीदेवं श्रूयतामयि मानव ॥१६४॥

अर्थ: उसी समय पूर्व कर्मोदयसे प्रेरित हुआ एक पथिक उसके पास आकर बोला कि हे मनुष्य ! सुन ॥१६४॥


पृथुस्थानाधिपस्याहं सुमानुरिति नन्दनः । गोत्रिकाकान्तदेशः सन् कुर्वन्नैमित्तभाषितम् ॥१६५॥

अर्थ: मैं पृथुस्थान नगरके राजाका पुत्र सुभानु हूँ । निमित्तज्ञानीके आदेशका पालन करता हुआ मैं अब तक अनेक देशोंमें भ्रमण करता रहा हूँ ॥१६५॥


पर्यटन् वसुधामेतां दैवात् कूर्म्मपुरं गतः । आचार्येणाभियोग्येन संगं प्राप्तोऽस्मि तत्र च ॥१६६॥

अर्थ: इस पृथ्वीपर भ्रमण करता हुआ मैं दैवयोगसे कूर्म्मपुर नामा नगरमें पहुँचा । वहाँ एक उत्तम आचार्यके साथ समागमको प्राप्त हुआ ॥१६६॥


अयोमयमिदं तेनं दत्तं मे वलयं शुभम् । मार्गदुःखाभिभूताय कारुण्याकरचेतसा ॥१६७॥

अर्थ: मैं मार्गके दुःखसे दुःखी था इसलिए दयालु चित्तके धारक उन आचार्यने मुझे यह लोहेका कड़ा दिया था ॥१६७॥


एतच्च सर्वरोगाणां शमनं बुद्धिवर्धनम् । ग्रहोरगपिशाचादिवशीकरणमुत्तमम् ॥१६८॥

अर्थ: यह कड़ा समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला तथा बुद्धिको बढ़ानेवाला है और ग्रह, उरग, पिशाच आदिका उत्तम वशीकरण है ॥१६८॥


नैमित्तादिष्टकालस्य संप्राप्तश्च ममावधिः । आत्मीयमधुना राज्यं कर्तुं यामि निजं पुरम् ॥१६९॥

अर्थ: निमित्तज्ञानीने मुझे भ्रमण करनेके लिए जो समय बताया था अब उसकी अवधि आ गयी है इसलिए मैं अपना राज्य करनेके लिए अपने नगरको जाता हूँ ॥१६९॥


राज्यस्थस्य प्रमादाश्च जायन्ते गणनोज्झिताः । एतच्च छिद्रमासाद्य नियतं नाशकारणम् ॥१७०॥

अर्थ: राज्य कार्यमें स्थिर रहनेवाले पुरुषके अगणित प्रमाद होते रहते हैं और किसी प्रमादको पाकर यह कड़ा निश्चित ही नाशका कारण बन सकता है ॥१७०॥


गृहाणैतत्ततस्तुभ्यं यच्छामि वलयं पुरम् । उपसर्गविनिर्मुक्तं यदि वाञ्छसि जीवितम् ॥१७१॥

अर्थ: इसलिए यदि तू उपसर्ग रहित जीवन चाहता है तो इस उत्तम कड़ेको ले ले मैं तुझे देता हूँ ॥१७१॥


लब्धस्य च पुनर्दानं शंसन्ति सुमहाफलम् । यशश्च प्राप्यते लोके पूजयन्ति च तं जनाः ॥१७२॥

अर्थ: अपने लिए प्राप्त हुई वस्तुका दूसरेके लिए दे देना महाफलकारक है, उससे यश प्राप्त होता है और लोग उसकी पूजा करते हैं ॥१७२॥


ततस्तमेवमित्युक्त्वा गृहीत्वाङ्गदमायसम् । आत्मश्रेयो गतो धाम सुभानुश्च निजं निजम् ॥१७३॥

अर्थ: तदनन्तर उससे ‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार कहकर तथा लोहेका कड़ा लेकर आत्मश्रेय अपने घर चला गया और सुभानु भी अपने नगर चला गया ॥१७३॥


यावत्पत्नी नरेन्द्रस्य दष्टा श्वसनभोजिना । निश्चेष्टा दग्धुमानीता चितोद्देशे स पश्यति ॥१७४॥

अर्थ: इतनेमें ही राजाकी पत्नीको साँपने डँस लिया था जिससे वह निश्चेष्ट हो गयी थी तथा जलानेके लिए श्मशानमें लायी गयी थी । आत्मश्रेयने उसे देखा ॥१७४॥


कटकस्य प्रसादेन तस्य लोहमयस्य ताम् । जीवयित्वा परं प्रापदसौ पूजां नरेन्द्रतः ॥१७५॥

अर्थ: और देखते ही उस लोह निर्मित कड़ेके प्रसादसे उसे जिलाकर उसने राजासे बहुत सन्मान प्राप्त किया ॥१७५॥


महान्तस्तस्य संजाता भोगाः परमसौख्यदाः । सर्वबन्धुसमेतस्य पुण्यकर्मानुभावतः ॥१७६॥

अर्थ: अब पुण्य कर्मके प्रभावसे उसके लिए समस्त बन्धुओंके साथ-साथ परम सुख देनेवाले बड़े-बड़े भोग प्राप्त हो गये ॥१७६॥


उत्तरीयांशुकस्योर्ध्वं निधाय वलयं सरः । प्रविष्टो यावदादाय गोधेरोऽनश्यदुद्धतः ॥१७७॥

अर्थ: एक बार उसने उस कड़ेको उत्तरीय वस्त्रके ऊपर रखकर जबतक सरोवरमें प्रवेश किया तबतक एक उद्दण्ड गुहेरा उसे लेकर चला गया ॥१७७॥


महातरोरधस्तावत् प्रविवेश विलं महत् । शिलानिकरसंछन्नं निर्द्वारं घोरनिस्वनम् ॥१७८॥

अर्थ: वह गुहेरा एक महावृक्षके नीचे बने हुए अपने बड़े बिलमें घुस गया। उसका वह बिल शिलाओंके समूहसे आच्छादित, प्रवेश करनेके अयोग्य तथा भयंकर शब्दसे युक्त था ॥१७८॥


तेन गोधेरशब्देन किल नित्यप्रवृत्तिना । बभूव स्थानमप्येतत्प्रलयाशङ्किमानसम् ॥१७९॥

अर्थ: वह गुहेरा उस बिलमें बैठकर निरन्तर शब्द करता रहता था जिससे उस बिलको देख मनमें प्रलयकी आशंका होती थी ॥१७९॥


आत्मश्रेयस्ततो वृक्षमुन्मूल्य स शिलाघनम् । गोधेरं नाशयित्वा तं निधानं प्राप्य साङ्गदम् ॥१८०॥

अर्थ: तदनन्तर आत्मश्रेयने शिलाओंसे सघन उस वृक्षके मूलको उखाड़कर तथा गुहेरे-को मारकर कड़ेके साथ-साथ उसका सब खजाना ले लिया ॥१८०॥


आत्मश्रेयःसमः पद्मः सीता वलयमूर्तिवत् । प्रमादवच्च कौसीद्यं शब्दस्तच्छब्दवद्रिपोः ॥१८१॥

महानिधानवल्लङ्का गोधेरो दशवक्त्रकः । जनास्त इव निर्भीता यूयं भवत सांप्रतम् ॥१८२॥

अर्थ: सो राम तो आत्मश्रेयके समान हैं, सीता कड़ेके समान है. लाभकी इच्छा प्रमादके समान है, शत्रुका शब्द गुहेरेके शब्दके समान है, लंका महानिधानके समान है, रावण गुहेरेके समान है, इसलिए हे विद्याधरो ! तुम सब इस समय निर्भय होओ ॥१८१-१८२॥


तच्छ्रुत्वा समुपाख्यानं जितजाम्बूनदोदितम् । बहवो विस्मयापन्ना बभूवुः स्मितकारिणः ॥१८३॥

अर्थ: इस प्रकार जाम्बूनदके कथनको खण्डित करनेवाला लक्ष्मणका उपाख्यान सुन बहुत लोग आश्चर्यको प्राप्त हो मन्दहास्य करने लगे ॥१८३॥


जाम्बूनदादयः सर्वे ततः कृत्वा प्रधारणम् । इदमूचुः पुनः पद्मं श्रृणु राजन् समाहितः ॥१८४॥

अर्थ: तत्पश्चात् जाम्बूनद आदि सभी विद्याधर परस्परमें विचारकर रामसे यह कहने लगे कि हे राजन् ! एकाग्र चित्त होकर सुनिए ॥१८४॥


अनन्तवीर्ययोगीन्द्रं संप्रणम्य पुरा मुदा । रावणेनात्मनो मृत्युं परिपृष्टः समादिशत् ॥१८५॥

यो निर्वाणशिलां पुण्यामतुलामर्चितां सुरैः । समुद्यतां स ते मृत्योः कारणत्वं गमिष्यति ॥१८६॥

अर्थ: पहले एक बार रावणने हर्षपूर्वक अनन्तवीर्यनामा योगीन्द्रको नमस्कार कर उनसे अपनी मृत्युका कारण पूछा था सो उन योगीन्द्रने कहा था कि जो देवोंके द्वारा पूजित, अनुपम, पुण्यमयी निर्वाण शिला - कोटिशिलाको उठावेगा वही तेरी मृत्युका कारण होगा ॥१८५-१८६॥


सर्वज्ञोक्तं निशम्यैतदचिन्तयदसाविदम् । भविता पुरुषः कोऽसौ तां यश्चालयितुं क्षमः ॥१८७॥

अर्थ: सर्वज्ञके यह वचन सुन रावणने विचार किया कि ऐसा कौन पुरुष होगा जो उसे चलानेके लिए समर्थ होगा ॥१८७॥


नास्त्येव मरणे हेतुर्ममेत्युक्तं भवत्यदः । वचोयुक्तिर्विचित्रा हि विदुषामर्थदेशने ॥१८८॥

अर्थ: भगवान्के कहनेका तात्पर्य यह है कि मेरे मरणका कोई भी कारण नहीं है सो ठीक ही है क्योंकि अर्थके प्रकट करनेमें विद्वानोंकी वचन योजना विचित्र होती है ॥१८८॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचद्गच्छामो न चिरं हितम् । ईक्षामहे शिलां सैद्धीं भव्यानां रोमहर्षणीम् ॥१८९॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने कहा कि हम लोग अभी चलते हैं विलम्ब करना हितकारी नहीं है, अन्य जीवोंको आनन्द देनेवाली सिद्धशिलाके अभी दर्शन करेंगे ॥१८९॥


रहस्यमेतत्सन्मन्त्र्य सुनिश्चित्य समन्ततः । सर्वे ते गन्तुमुद्युक्ताः प्रमादपरिवर्जिताः ॥१९०॥

अर्थ: तत्पश्चात् सब लोग परस्परमें मन्त्रणा कर तथा सब ओरसे निश्चय कर प्रमाद छोड़ लक्ष्मणके साथ जानेके लिए उद्यत हुए ॥१९०॥


जाम्बूनदो महाबुद्धिः किष्किन्धाधिपतिस्तथा । विराधितोऽर्कमाली च नलनीलौ विचक्षणौ ॥१९१॥

सपुरस्कारमारोप्य विमाने रामलक्ष्मणौ । संप्रयाता द्रुतं व्योम्नि रात्रौ तमसि गह्वरे ॥१९२॥

अर्थ: महाबुद्धिमान् जाम्बूनद, किष्किन्धाका स्वामी - सुग्रीव, विराधित, अर्कमाली, अतिशय विद्वान् नल और नील, सम्मानके साथ राम और लक्ष्मणको विमानपर बैठाकर रात्रिके सघन अन्धकारमें शीघ्र ही आकाशमार्गसे चले ॥१९१-१९२॥


अवतेरुः समीपे च यत्र सा सुमनोहरा । शिला परमगम्भीरा सुरासुरनमस्कृता ॥१९३॥

अर्थ: और जहाँ वह अत्यन्त मनोहर परम गम्भीर एवं सुर-असुरोंके द्वारा नमस्कृत सिद्धशिला पासमें थी वहाँ उतरे ॥१९३॥


उपसस्रुश्च ते सर्वे मस्तकन्यस्तपाणयः । आशारक्षानवस्थाप्य प्रयातान् सुसमाहितान् ॥१९४॥

अर्थ: तदनन्तर सावधान चित्त होकर आगे गये हुए दिशारक्षकोंको नियुक्त कर वे सब हाथ जोड़ मस्तकसे लगा उस सिद्धशिलाके समीप गये ॥१९४॥


सुगन्धिभिर्महाम्भोजैः पूर्णेन्दुपरिमण्डलैः । अन्यैश्च कुसुमैश्चित्रैरर्चिता तैरसौ शिला ॥१९५॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने अत्यन्त सुगन्धित तथा पूर्ण चन्द्रमाके बिम्बके समान सुशोभित बड़े-बड़े कमलों तथा नाना प्रकारके अन्य पुष्पोंसे उस शिलाकी पूजा की ॥१९५॥


सितचन्दनदिग्धाङ्गा कुङ्कुमांशुकधारिणी । धृतालंकरणा भाति सा शचीव मनोरमा ॥१९६॥

अर्थ: जिसके ऊपर सफेद चन्दनका लेप लगाया गया था, जो केशर रूप वस्त्रको धारण कर रही थी, तथा जो नाना अलंकारोंसे अलंकृत थी ऐसी वह शिला उस समय इन्द्राणीके समान मनोहर जान पड़ती थी ॥१९६॥


तस्यां सिद्धान्नमस्कृत्य शिरस्थकरकुड्मलाः । भक्त्या प्रदक्षिणं चक्रुः क्रमेण विधिपण्डिताः ॥१९७॥

अर्थ: उस शिलासे जो सिद्ध हुए थे उन्हें नमस्कार कर जिन्होंने हाथ जोड़ मस्तकसे लगाये थे तथा जो सब प्रकारकी विधि-विधानमें निपुण थे ऐसे उन सब लोगोंने भक्तिपूर्वक क्रमसे उस शिलाकी प्रदक्षिणा दी ॥१९७॥


ततः परिकरं बद्ध्वा सौमित्रिर्विनयं वहन् । नमस्कारपरो भक्तः स्तुतिं कर्तुं समुद्यतः ॥१९८॥

अर्थ: तदनन्तर विनयको धारण करनेवाले, नमस्कार करनेमें तत्पर एवं भक्तिसे भरे लक्ष्मण कमर कस कर स्तुति करनेके लिए उद्यत हुए ॥१९८॥


जयशब्दं समुद्घोष्य प्रहृष्टा वानरध्वजाः । स्तोत्रं परिपठन्तीदमुत्तमं सिद्धमङ्गलम् ॥१९९॥

अर्थ: हर्षसे भरे वानरध्वज राजा, जय-जय शब्दका उच्चारण कर सिद्ध भगवान्के निम्नांकित स्तोत्रको पढ़ने लगे ॥१९९॥


स्थितांस्त्रैलोक्यशिखरे स्वयं परमभास्वरे । स्वरूपभूतया स्थित्या पुनर्जन्मविवर्जितान् ॥२००॥

अर्थ: स्तोत्र पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि हम उन सिद्ध परमेष्ठियोंको नमस्कार करते हैं कि जो अतिशय देदीप्यमान तीन लोकके शिखरपर स्वयं विराजमान हैं, आत्माकी स्वरूपभूत स्थितिसे युक्त हैं तथा पुनर्जन्मसे रहित हैं ॥२००॥


भवार्णवसमुत्तीर्णान्निःश्रेयसैसमुद्भवान् । आधारान्मुक्तिसौख्यस्य केवलज्ञानदर्शनान् ॥२०१॥

अर्थ: जो संसार सागरसे पार हो चुके हैं, परमकल्याणसे युक्त हैं, मोक्ष सुखके आधार हैं तथा केवलज्ञान और केवलदर्शनसे सहित हैं ॥२०१॥


अनन्तवीर्यसंपन्नान् स्वभावसमवस्थितान् । सुसमीचीनतायुक्तान्निःशेषक्षीणकर्मणः ॥२०२॥

अर्थ: जो अनन्त बलसे युक्त हैं, आत्मस्वभावमें स्थित हैं, श्रेष्ठतासे युक्त हैं, और जिनके समस्त कर्म क्षीण हो चुके हैं ॥२०२॥


अवगाहनधर्मोक्तानमूर्तान् सूक्ष्मतायुजः । गुरुत्वलघुतामुक्तानसंख्यातप्रदेशिनः ॥२०३॥

अर्थ: जो अवगाहन गुणसे युक्त हैं, अमूर्तिक हैं, सूक्ष्मत्व गुणसे सहित हैं, गुरुता और लघुतासे रहित तथा असंख्यात-प्रदेशी हैं ॥२०३॥


अप्रमेयगुणाधारान् क्रमादिपरिवर्जितान् । साधारणान् स्वरूपेण स्वार्थकाष्ठामुपागतान् ॥२०४॥

अर्थ: जो अपरिमित - अनन्तगुणोंके आधार हैं, क्रम आदिसे रहित हैं, आत्मस्वरूपकी अपेक्षा सब समान हैं और जो आत्म प्रयोजनकी अन्तिम सीमाको प्राप्त हैं - कृतकृत्य हैं ॥२०४॥


सर्वथा शुद्धभावांश्च ज्ञातज्ञेयान्निरंजनान् । दग्धकर्ममहाकक्षान् विशुद्धध्यानतेजसा ॥२०५॥

अर्थ: जिनके भाव सर्वथा शुद्ध हैं, जिन्होंने जानने योग्य समस्त पदार्थोंको जान लिया है, जो निरंजन - कर्म कालिमासे रहित हैं और निर्मल ध्यान शुक्लध्यानरूपी अग्निके द्वारा जिन्होंने कर्मरूपी महाअटवीको भस्म कर दिया है ॥२०५॥


तेजःपटपरीतेन भक्तितो वज्रपाणिना । संस्तुतान् भवभीतेन चक्रवर्त्यादिभिस्तथा ॥२०६॥

अर्थ: संसारसे भयभीत तथा तेजरूपी पटसे परिवृत इन्द्र तथा चक्रवर्ती आदि महापुरुष जिनकी स्तुति करते हैं ॥२०६॥


संसारधर्मनिर्मुक्तान् सिद्धधर्मसमाश्रितान् । सर्वान् वन्दामहे सिद्धान् सर्वसिद्धिसमावहान् ॥२०७॥

अर्थ: जो संसाररूप धर्मसे रहित हैं, सिद्धरूप धर्मको प्राप्त हैं तथा जो सब प्रकारकी सिद्धियोंको धारण करनेवाले हैं ऐसे समस्त सिद्ध परमेष्ठियोंको हम नमस्कार करते हैं ॥२०७॥


अस्यां च ये गताः सिद्धिं शिलायां शीलधारिणः । उपगीताः पुराणेषु सर्वकर्मविवर्जिताः ॥२०८॥

जिनेन्द्रसमतां याताः कृतकृत्या महौजसः । मङ्गलस्मरणेनैतान् भक्त्या वन्दामहे मुहुः ॥२०९॥

अर्थ: शीलको धारण करनेवाले जो भी पुरुष इस शिलासे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं, पुराणोंमें जिनका कथन है, जो सर्व कर्मोंसे रहित हैं, जिनेन्द्र देवकी समानताको प्राप्त हुए हैं, कृतकृत्य हैं तथा जो महाप्रतापके धारक हैं उन सबको हम भक्तिपूर्वक मंगल स्मरण करते हुए बार-बार वन्दना करते हैं ॥२०८-२०९॥


एवं च सुचिरं स्तुत्वा पुनरेवं बभाषिरे । लक्ष्मीधरं समुद्दिश्य स्थापितैकाग्रमानसाः ॥२१०॥

शिलायामिह ये सिद्धा ये चान्ये हतकिल्विषाः । ते विघ्नसूदनाः सर्वे भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२११॥

अर्थ: इस प्रकार चिरकाल तक स्तुति कर एकाग्रचित्तके धारण उन विद्याधरोंने लक्ष्मण को लक्ष्यकर कहा कि इस शिलासे जो सिद्ध हुए हैं तथा अन्य जिन पुरुषोंने पापकर्म नष्ट किये हैं वे सब विघ्न विनाशक तुम्हारे लिए मंगलस्वरूप हों ॥२१०-२११॥


अर्हन्तो मङ्गलं सन्तु तव सिद्धाश्च मङ्गलम् । मङ्गलं साधवः सर्वे मङ्गलं जिनशासनम् ॥२१२॥

अर्थ: अरहन्त भगवान् तुम्हारे लिए मंगलस्वरूप हों, सिद्ध परमेष्ठी मंगलरूप हों । सर्व साधु परमेष्ठी मंगलस्वरूप हों और जिन शासन मंगलरूप हो ॥२१२॥


इति मङ्गलनिस्वानैर्विहायस्तलचारिणाम् । शिलामचालयत् क्षिप्रं लक्ष्मणो विमलद्युतिः ॥२१३॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याधरोंकी मंगल-ध्वनिके साथ, महातेजको धारण करनेवाले लक्ष्मणने शीघ्र ही उस शिलाको हिला दिया ॥२१३॥


सा लक्ष्मणकुमारेण नानालंकारभूषणा । केयूरकान्तबाहुभ्यां धृता कुलवधूरिव ॥२१४॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मण कुमारने कुलवधूके समान नाना अलंकारोंसे सुशोभित उस शिलाको बाजूबन्दोंसे सुशोभित अपनी भुजाओंसे ऊपर उठा लिया ॥२१४॥


अथान्तरिक्षे देवानां महाशब्दो महानभूत् । सुग्रीवाद्याश्च राजेन्द्रा विस्मयं परमं ययुः ॥२१५॥

अर्थ: उसी समय आकाशमें देवोंका महाशब्द हुआ और सुग्रीव आदि राजा परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥२१५॥


ततः सिद्धान् प्रमोदाढ्याः प्रणम्य भयवर्जितान् । सम्मेदशिखरस्थं च जिनेन्द्रं मुनिसुव्रतम् ॥२१६॥

निषद्या ऋषभादीनामभ्यर्च्य च यथाविधि । सकलं भरतक्षेत्रं बभ्रमुस्ते प्रदक्षिणम् ॥२१७॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे भरे सब लोग भयसे रहित सिद्ध परमेष्ठियों, सम्मेद शिखरपर विराजमान श्री मुनिसुव्रत नाथ जिनेन्द्रकी तथा ऋषभ आदि तीर्थंकरोंके निर्वाणस्थान कैलास आदिकी विधिपूर्वक पूजा कर समस्त भरत क्षेत्रमें घूमे ॥२१६-२१७॥


सायाह्ने सौम्यवपुषो दिव्यैर्यानैर्मनोजवैः । कृताभिवन्दना शब्दैर्जयनन्दादिभिर्भृशम् ॥२१८॥

परिवार्य महावीर्यं रामं लक्ष्मणसंगतम् । किष्किन्धनगरं प्रापुर्विविशुश्च महर्द्धयः ॥२१९॥

अर्थ: तदनन्तर वन्दना करनेके बाद सौम्यशरीरके धारक तथा महावैभवसे सम्पन्न सब लोगोंसे सायंकालके समय मनके समान वेगशाली दिव्य विमानों द्वारा ‘जय’ ‘नन्द’ आदि शब्दोंके साथ महापराक्रमी राम-लक्ष्मणको घेर-कर किष्किन्धनगरमें प्रवेश किया ॥२१८-२१९॥


शयिताश्च यथास्थानं विस्मितेनान्तरात्मना । एकीभूय पुनः प्रीता इत्यन्योन्यं बभाषिरे ॥२२०॥

अर्थ: सबने यथास्थान शयन किया । तदनन्तर आश्चर्य-चकित चित्तसे एकत्रित हो सब बड़ी प्रसन्नतासे परस्पर इस प्रकार कहने लगे ॥२२०॥


वीक्ष्यध्वं वासरैः स्वल्पैः पृथिव्यां राज्यमेतयोः । निःशेषैः कण्टकैर्मुक्तं शक्तिं धारयतोः पराम् ॥२२१॥

अर्थ: कि तुम लोग परम शक्तिको धारण करनेवाले इन दोनोंका कुछ ही दिनोंमें पृथिवीपर समस्त कण्टकों अर्थात् शत्रुओंसे रहित राज्य देखोगे ॥२२१॥


सा निर्वाणशिला येन चालयित्वा समुद्धृता । उत्सादयत्ययं क्षिप्रं रावणं नात्र संशयः ॥२२२॥

अर्थ: जिसने उस निर्वाणशिलाको चलाकर उठा लिया ऐसा यह लक्ष्मण शीघ्र ही रावणको मारेगा इसमें संशय नहीं है ॥२२२॥


तथापरे वचः प्राहुः कैलासो येन भूधरः । तदा समुद्धृतः सोऽयं शिलोद्धारस्य किं समः ॥२२३॥

अर्थ: कुछ लोग इस प्रकार कहने लगे कि उस समय जिसने कैलास उठाया था ऐसा रावण क्या इस शिला उठानेवालेके समान है ? ॥२२३॥


आहुरन्ये समुद्धारः कैलासस्य कृतो यदि । विद्याबले यतस्तत्र विस्मयः कस्य जायते ॥२२४॥

अर्थ: कुछ अन्य लोग कहने लगे कि यदि रावणने कैलास पर्वत उठाया था तो इससे क्या हुआ क्योंकि विद्याबलके रहते हुए उसके इस कार्यमें किसे आश्चर्य हो सकता है ? ॥२२४॥


एके च वचनं प्रोचुः किं विवादैरिमैर्मुधा । जगद्धिताय संध्यर्थं किं नोपायो निरूप्यते ॥२२५॥

अर्थ: कुछ लोग यह भी कहने लगे कि इन व्यर्थके विवादोंसे क्या लाभ है ? जगत्का कल्याण करनेके लिए सन्धिका उपाय क्यों नहीं बताया जाता है ? ॥२२५॥


तस्मादानीयतां सीतां समभ्यर्च्य दशाननम् । राघवायार्पयिष्यामि विग्रहे किं प्रयोजनम् ॥२२६॥

अर्थ: इसलिए रावणकी पूजा कर सीताको लाया जावे उसे हम रामके लिये सौंप देंगे फिर युद्धका क्या प्रयोजन है ? ॥२२६॥


संग्रामे तारको नष्टो मेरुकश्च महाबलः । कृतवीर्यसुताद्याश्च महासैन्यसमन्विताः ॥२२७॥

अर्थ: संग्राममें तारक, महाबलवान् मेरुक और बड़ी-बड़ी सेनाओंसे सहित कृतवीर्यके पुत्र आदि मारे गये हैं ॥२२७॥


एते खण्डत्रयाधीशा महाभागा महौजसः । अन्ये हि बहवो नष्टा रणे सामन्ततः परम् ॥२२८॥

अर्थ: ये सभी तीन खण्डके स्वामी महाभागवान् तथा महाप्रतापी थे । इनके सिवाय और भी अनेक राजा रणमें सब ओर नष्ट हुए हैं ॥२२८॥


अन्योन्यममिमन्त्र्यैवं विद्याविधिविशारदाः । राघवं विनयोपेताः संभूय ययुरादरात् ॥२२९॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याओंके प्रयोग करनेमें निपुण सब लोग परस्पर सलाह कर विनय सहित आदरपूर्वक मिलकर रामके पास आये ॥२२९॥


सुग्रीवाद्याः समासीना नयनानन्दकारिणम् । विरेजुः परितो राममरेन्द्रमिवामराः ॥२३०॥

अर्थ: नेत्रोंको आनन्द उत्पन्न करनेवाले रामके चारों ओर बैठे हुए सुग्रीव आदि राजा उस प्रकार सुशोभित हो रहे थे जिस प्रकार कि अमरेन्द्रके चारों ओर देव सुशोभित होते हैं ॥२३०॥


पद्मनाभस्ततोऽवोचत् किमद्याप्यवलम्ब्यते । मया विनान्तरे द्वीपे दुःखं तिष्ठति मैथिली ॥२३१॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि अब और किसकी अपेक्षा की जा रही है ? दूसरे द्वीपमें सीता मेरे बिना दुःखी होती होगी ॥२३१॥


दीर्घसूत्रत्वमुत्सृज्य क्षिप्रमद्यैव सर्वथा । त्रिकूटगमने सद्भिः क्रियते न किमुद्यमः ॥२३२॥

अर्थ: शीघ्र ही दीर्घसूत्रताको छोड़कर आज ही आप लोग त्रिकूटाचलपर चलनेके लिए उद्यम क्यों नहीं करते हैं ? ॥२३२॥


तमूचुर्मन्त्रिणो वृद्धा नयविस्तरकोविदाः । संशयेनात्र किं देव कथ्यतामेकनिश्चयः ॥२३३॥

अर्थ: तब नीतिके विस्तारमें निपुण वृद्ध मन्त्रियोंने कहा कि हे देव ! इस विषयमें संशयकी क्या बात है ? निश्चय बताइए कि ॥२३३॥


किं त्वमिच्छसि वैदेहीं विरोधमथ रक्षसाम् । विजयः प्राप्यते दुःखं नायं सदृशविग्रहः ॥२३४॥

अर्थ: आप सीताको चाहते हैं या राक्षसोंके साथ युद्ध ? यदि युद्ध चाहते हैं तो विजय कठिनाईसे प्राप्त होगी क्योंकि राक्षसोंका और आपका यह युद्ध सदृश युद्ध - बराबरीवालोंका युद्ध नहीं है ॥२३४॥


भरतस्य त्रिखण्डस्य प्रतिपक्षोज्झितः प्रभुः । सागरद्वीपविख्यात एक एव दशाननः ॥२३५॥

अर्थ: क्योंकि रावण द्वीप और सागरोंमें प्रसिद्ध, तीन खण्ड भरतका शत्रुरहित एक - अद्वितीय ही प्रभु है ॥२३५॥


शङ्कितो धातकीद्वीपो द्योतिषामपि भीतिदः । जाम्बूद्वीपे परं प्राप्तो महिमानं खगाधिपः ॥२३६॥

अर्थ: धातकीखण्ड नामा दूसरा द्वीप भी उससे शंकित रहता है, वह ज्योतिषी देवोंको भी भय उत्पन्न करनेवाला है तथा जम्बूद्वीपमें परम महिमाको प्राप्त अद्वितीय विद्याधरोंका स्वामी है ॥२३६॥


शल्यभूतोऽस्य विश्वस्य कृतानेकाद्भुतक्रियः । ईदृशो राक्षसो राम कथं संसाध्यते त्वया ॥२३७॥

अर्थ: जो समस्त संसारके लिए शल्य स्वरूप है, तथा जिसने अनेक अद्भुत कार्य किये हैं ऐसा राक्षस हे राम ! तुम्हारे द्वारा कैसे जीता जा सकता है ? ॥२३७॥


तस्माद्बुद्धिं रणे त्यक्त्वा यद् वयं संवदामहे । प्रसीद क्रियतां देव तदेवोद्यच्छ शान्तये ॥२३८॥

अर्थ: इसलिए हे देव ! रणकी भावना छोड़ हम लोग जो कह रहे हैं वही कीजिए, प्रसन्न होइए और शान्तिके लिए उद्योग कीजिए ॥२३८॥


मा भूत्तस्मिन् कृतक्रोधे जगदेतन्महाभयम् । विध्वस्तप्राणिसंघातं नष्टनिःशेषसत्क्रियम् ॥२३९॥

अर्थ: उसके कुपित होनेपर यह संसार महाभयसे युक्त न हो, प्राणियोंके समूहका विध्वंस न हो तथा समस्त उत्तम क्रियाएँ नष्ट न हों ॥२३९॥


योऽसौ विभीषणः ख्यातः स्वयं ब्रह्मा स कीर्तितः । क्रूरकर्मनिवृत्तात्मा भावितोऽणुव्रतैर्दृढम् ॥२४०॥

अर्थ: रावणका भाई विभीषण अत्यन्त प्रसिद्ध है, मानो स्वयं ब्रह्मा ही है । वह दुष्टतापूर्ण कार्योंसे सदा दूर रहता है और अणुव्रतोंका दृढ़तासे पालन करता है ॥२४०॥


अलङ्घ्यवचनं तस्य कुरुते खेचराधिपः । तयोर्हि परमा प्रीतिरन्तरायविवर्जिता ॥२४१॥

अर्थ: उसके वचन अलंघ्य हैं वह जो कहता है रावण वही करता है । यथार्थमें उन दोनोंमें निर्बाध परम प्रेम है ॥२४१॥


बोधितस्तेन दाक्षिण्याद् यशःपालनतोऽपि वा । लज्जया वा विदेहस्य तनयां प्रेषयिष्यति ॥२४२॥

अर्थ: विभीषण उसे समझावेगा इसलिए, अथवा उदारतासे, अथवा कीर्ति रक्षा के अभिप्रायसे अथवा लज्जाके कारण रावण सीताको भेज देगा ॥२४२॥


विज्ञापनवचोयुक्तिकुशलो नयपेशलः । अन्विष्यतामरं कश्चित्प्रसादी रावणस्य यः ॥२४३॥

अर्थ: इसलिए शीघ्र ही किसी ऐसे पुरुषकी खोज की जाये जो निवेदन करनेवाले वचनोंकी योजनामें कुशल हो, नीतिनिपुण हो और रावणको प्रसन्न करनेवाला हो ॥२४३॥


ततो महोदधिर्नाम्ना ख्यातो विद्याधराधिपः । अब्रवीदेष वृत्तान्तो भवतां नागतः श्रुतिम् ॥२४४॥

अर्थ: तदनन्तर महोदधि नामसे प्रसिद्ध विद्याधरोंके राजाने कहा कि क्या यह वृत्तान्त आप लोगोंके श्रवणमें नहीं आया ॥२४४॥


यन्त्रैर्बहुजनक्षोदैर्लङ्काऽगम्या निरन्तरम् । कृतातिशयदुःप्रेक्षा सुभीमात्यन्तगह्वरा ॥२४५॥

अर्थ: कि लंका अनेक जनोंका विघात करनेवाले यन्त्रोंसे निरन्तर अगम्य कर दी गयी है, उसका देखना भी कठिन है तथा अत्यन्त भयंकर गम्भीर गर्तोंसे युक्त हो गयी है ॥२४५॥


एषां मध्ये न पश्यामि महाविद्यं नमश्चरम् । लङ्कां गत्वा द्रुतं भूयो यः समर्थो निवर्तितुम् ॥२४६॥

अर्थ: इन सबके बीचमें महाविद्याओंके धारक एक भी ऐसे विद्याधरको नहीं देखता हूँ कि जो लंका जाकर शीघ्र ही पुनः लौटनेके लिए समर्थ हो ॥२४६॥


पवनंजयराजस्य श्रीशैलः प्रथितः सुतः । विद्यासत्त्वप्रतापाढ्यो बलोत्तुङ्गः स याच्यताम् ॥२४७॥

अर्थ: हाँ, पवनंजय राजाका पुत्र श्रीशैल विद्या, सत्त्व और प्रतापसे सहित है तथा अतिशय बलवान् है सो उससे याचना की जाये ॥२४७॥


समं दशाननेनास्य विद्यतेऽजर्यमुत्तमम् । युक्तः करोत्यसौ साम्यं निर्विघ्नं पुरुषोत्तमः ॥२४८॥

अर्थ: इसका दशाननके साथ उत्तम सम्बन्ध भी है इसलिए यदि इसे भेजा जाये तो यह श्रेष्ठ पुरुष निर्विघ्न रूपसे शान्ति स्थापित कर सकता है ॥२४८॥


प्रतिपन्नैस्ततः सर्वैरेवमस्त्विति सादरैः । मारुतेरन्तिकं दूतः श्रीभूतिः प्रहितो द्रुतम् ॥२४९॥

अर्थ: तदनन्तर सब विद्याधरोंने ‘एवमस्तु’ कहकर महोदधि विद्याधरका प्रस्ताव स्वीकृत कर श्रीशैल (हनुमान्) के पास शीघ्र ही श्रीभूति नामका दूत भेजा ॥२४९॥


शक्तिं दधतापि परां प्राप्यापि परं प्रबोधमारभ्येः । भवितव्यं नयरतिना रविरिव काले स यात्युदयम् ॥२५०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि परम शक्तिके धारक राजाको भी प्रारम्भ करने योग्य कार्यके विषयमें परम विवेकको प्राप्त कर नीतिज्ञ होना चाहिए क्योंकि ऐसा राजा ही सूर्यके समान समय आनेपर अभ्युदयको प्राप्त होता है ॥२५०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे कोटिशिलोत्क्षेपणाभिधानं नाम अष्टचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें कोटिशिला उठानेका वर्णन करनेवाला अड़तालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४८॥


४९. एकोनपञ्चाशत्तमं पर्व (हनुमत्प्रस्थानं)

ततो नभः समुत्पत्य जगामासौ मरुज्जवः । अत्युत्तुङ्गैर्गृहैः पूर्णं श्रीपुरं श्रीनिकेतनम् ॥१॥

अर्थ: तदनन्तर - वायुके समान वेगका धारक श्रीभूति दूत, आकाशमें उड़कर अत्यन्त ऊँचे-ऊँचे महलोंसे परिपूर्ण, लक्ष्मीके घरस्वरूप श्रीपुर नगरमें पहुँचा ॥१॥


तत्र हेमद्रवन्यस्तलेप्यतेजःसमुज्ज्वलम् । कुन्दामवलभीशोभि रत्ननिर्मितशेखरम् ॥२॥

मुक्तादामसमाकीर्णं वातायनविराजितम् । उद्यानाकीर्णपर्यन्तं प्राविशन्मारुतेर्गृहम् ॥३॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने श्रीशैलके उस भवनमें प्रवेश किया जो स्वर्णमय पानीके लेपसे उत्पन्न तेजसे अत्यन्त देदीप्यमान था, कुन्दके समान उज्ज्वल अट्टालिकाओंसे सुशोभित था, रत्नमयी शिखरोंसे जगमगा रहा था, मोतियोंकी मालाओंसे व्याप्त था, झरोखोंसे सुशोभित था, और जिसका समीपवर्ती प्रदेश बाग-बगीचोंसे व्याप्त था ॥२-३॥


अपूर्वलोकसंघातं पश्यतस्तस्य साद्भुतम् । मनोगतागतं भूयो गतं कृच्छ्रेण धीरताम् ॥४॥

अर्थ: वहाँ लोगोंकी अपूर्व भीड़ तथा आश्चर्यकारी अत्यधिक यातायात देख श्रीभूतिका मन बड़ी कठिनाईसे धीरताको प्राप्त हुआ ॥४॥


प्रविष्टे मारुतेर्गेहं तस्मिन् दूते ससंभ्रमे । अनङ्गकुसुमोत्पातं जगामेन्दुनखात्मजा ॥५॥

अर्थ: जब आश्चर्यमें पड़े हुए श्रीभूति दूतने हनुमान्‌के घरमें प्रवेश किया तब चन्द्रनखाकी पुत्री अनंगकुसुमा उत्पातको प्राप्त हुई ॥५॥


सस्पन्दं दक्षिणं चक्षुरवधार्य व्यचिन्तयत् । प्राप्तव्यं विधियोगेन कर्म कर्तुं न शक्यते ॥६॥

अर्थ: दक्षिण नेत्रको फड़कते देख उसने विचार किया कि दैवयोगसे जो कार्य जैसा होना होता है उसे अन्यथा नहीं किया जा सकता ॥६॥


क्षुद्रशक्तिसमासक्ता मानुषास्तावदासताम् । न सुरैरपि कर्माणि शक्यन्ते कर्तुमन्यथा ॥७॥

अर्थ: हीन शक्तिके धारक मनुष्य तो दूर रहें देवोंके द्वारा भो कर्म अन्यथा नहीं किये जा सकते ॥७॥


वेदितागमनस्तावद् दूतो नर्मदया सभाम् । प्रस्वेदकणसंपूर्णः प्रतीहार्या प्रवेशितः ॥८॥

अर्थ: तदनन्तर अनंगकुसुमाकी प्रहासिका सखीने जिसके आगमन की सूचना दी थी, और स्वेदके कणोंसे जिसका शरीर व्याप्त हो रहा था ऐसे उस श्रीभूति दूतको प्रतीहारीने सभाके भीतर प्रविष्ट कराया ॥८॥


जगादाथ यथावृत्तं निःशेषं प्रणताननः । दण्डकाद्रिं समायाताः पद्मनामादयः पुरा ॥९॥

शम्बूकस्य वधं युद्धं विषमं खरदूषणम् । पञ्चतागमनं तस्य मानवैरुत्तमैः सह ॥१०॥

अर्थ: अथानन्तर नम्र मुख होकर उसने सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों इस प्रकार सुनाया कि राम आदि दण्डक वनमें आये, शम्बूकका वध हुआ, खरदूषणके साथ विषम युद्ध हुआ, और उत्तम मनुष्योंके साथ खरदूषण मारा गया ॥९-१०॥


ततो निशम्य तां वार्तां शोकविह्वलविग्रहा । अनङ्गकुसुमा मूर्छामुपेता मुकुलेक्षणा ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर यह वार्ता सुन अनंगकुसुमा शोकसे विह्वल शरीर हो मूर्च्छित हो गयी तथा उसके नेत्र निमीलित हो गये ॥११॥


चान्दनेन द्रवेणैतां सिच्यमानां क्रियोज्झिताम् । विलोक्यान्तःपुराम्भोधिः परमं क्षोभमागतः ॥१२॥

अर्थ: उसका हलन-चलन बन्द हो गया तथा चन्दनके द्रवसे उसे सींचा जाने लगा, यह देख समस्त अन्तःपुररूपी सागर परम क्षोभको प्राप्त हुआ ॥१२॥


वीणातन्त्रीसहस्राणां प्राप्तानां कोणताडनम् । क्रन्दन्तीनां समं रम्यो ध्वनिः स्त्रीणां समुद्गतः ॥१३॥

अर्थ: अन्तःपुरकी समस्त स्त्रियां एक साथ रुदन करने लगीं सो उनके रुदनका शब्द ऐसा उठा मानो वीणाओंके हजारों तार कोणके ताड़नको प्राप्त हो एक साथ शब्द करने लगे हों ॥१३॥


अनङ्गकुसुमा कृच्छ्राल्लम्भिता प्राणसंगमम् । अश्रुसिक्तस्तनी तारं विललापातिदुःखिता ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर अनंगकुसुमा बड़े कष्टसे प्राणोंके समागमको प्राप्त हुई अर्थात् सचेत हुई। सचेत होनेपर अश्रुओंसे स्तनोंको सिक्त करती तथा अतिशय दुःख प्रकट करती हुई वह जोर-जोरसे विलाप करने लगी ॥१४॥


हा तात क्व प्रयातोऽसि प्रयच्छ वचनं मम । हा भ्रातः किमिदं जातं दीयतां दर्शनं सकृत् ॥१५॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हाय तात ! तुम कहाँ गये; मुझे वचन देओ - मुझसे वार्तालाप करो । हाय भाई ! यह क्या हुआ ? एक बार तो दर्शन देओ ॥१५॥


वनेऽतिभीषणे कष्टं रणाभिमुखतां गतः । भूगोचरैः कथं तात मरणत्वमुपाहृतः ॥१६॥

अर्थ: हे तात ! अत्यन्त भयंकर वनमें रणके सम्मुख हुए तुम भूमिगोचरियोंके द्वारा मरणको कैसे प्राप्त हो गये ? ॥१६॥


शोकाकुलजनाकीर्णे जाते श्रीशैलवेश्मनि । नीतो नर्मदया दूतः प्रदेशं वचनोचितम् ॥१७॥

अर्थ: इस प्रकार जब श्रीशैलका भवन शोकाकुल मनुष्योंसे भर गया तब अनंगकुसुमाकी नर्मदा - सखी दूतको बात करने योग्य स्थानपर ले गयी ॥१७॥


पितुर्भ्रातुश्च दुःखेन तप्ता चन्द्रनखात्मजा । कृच्छ्रेण शमनं नीता सद्भिः प्रशमकोविदैः ॥१८॥

अर्थ: पिता और भाईके दुःखसे सन्तप्त चन्द्रनखाकी पुत्री अनंगकुसुमा, सान्त्वना देनेमें निपुण सत्पुरुषोंके द्वारा बड़ी कठिनाईसे शान्तिको प्राप्त करायी गयी ॥१८॥


जिनमार्गप्रवीणासौ बुद्ध्वा संसारसंस्थितिम् । लोकाचारानुकूलत्वाच्चक्रे प्रेतक्रियाविधिम् ॥१९॥

अर्थ: जिनमार्गमें प्रवीण अनंगकुसुमाने संसारकी स्थिति जानकर लोकाचारके अनुकूल पिताकी मरणोत्तर क्रिया की ॥१९॥


अन्येद्युर्दू तमाहूय पवनंजयनन्दनः । अपृच्छच्छोकसंस्पृष्टः मौललोकसमावृतः ॥२०॥

निःशेषं दूत यद्वृत्तं तन्निवेदय सांप्रतम् । इत्युक्त्वा कारणं मृत्योः खरदूषणमस्मरत् ॥२१॥

अर्थ: अथानन्तर दूसरे दिन शोकसे व्याप्त तथा मन्त्री आदि मौलवर्गसे परिवृत श्रीशैल - हनुमान्ने दूतको बुलाकर पूछा कि हे दूत ! खरदूषणकी मृत्युका जो कुछ कारण हुआ है वह सब कहो, यह कहकर हनुमान् खरदूषणका स्मरण करने लगा ॥२०-२१॥


ततोऽस्य क्रोधसंरुद्धसर्वाङ्गस्य महाद्युतेः । भ्रूस्तरङ्गवती रेजे तडिद्रेखेव चञ्चला ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था ऐसे महादीप्तिमान् हनुमान्की फड़कती हुई भौंह चंचल बिजली की रेखाके समान जान पड़ती थी ॥२२॥


ततस्त्रासपरीताङ्गो सुहृद् दूतः प्रतापवान् । जगाद मधुरं प्राज्ञः कोपविध्वंसकारणम् ॥२३॥

अर्थ: तत्पश्चात् भयसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था ऐसे महाप्रतापी बुद्धिमान्ने हनुमान्का क्रोध दूर करनेवाले निम्नांकित मधुर वचन कहे ॥२३॥


ज्ञातमेव हि देवस्य किष्किन्धाधिपतेः परम् । दयितादुःखमुत्पन्नं तत्समाकारहेतुकम् ॥२४॥

अर्थ: उसने कहा कि हे देव ! आपको यह तो विदित ही है कि किष्किन्धाके अधिपति सुग्रीवको उसीके समान रूप धारण करनेवाले साहसगति विद्याधरके कारण स्त्रीसम्बन्धी दुःख उपस्थित हुआ था ॥२४॥


आर्तस्तेन स दुःखेन पद्मं शरणमागमत् । प्रतीक्ष्य सोऽर्तिविध्वंसं किष्किन्धनगरं गतः ॥२५॥

अर्थ: उस दुःखसे दुखी हुआ सुग्रीव रामकी शरणमें आया था और राम भी उसका दुःख नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा कर किष्किन्धनगर गये थे ॥२५॥


सुग्रीवाकृतिचौरेण समं तत्र महानभूत् । चिरं श्रान्तमहायोधः संग्रामः श्वसुरस्य ते ॥२६॥

अर्थ: वहाँ आपके श्वसुर - सुग्रीवका, उसकी आकृतिके चौर - कृत्रिम सुग्रीवके साथ बड़े-बड़े योद्धाओंको थका देनेवाला चिरकाल तक महायुद्ध हुआ ॥२६॥


उत्थाय पद्मनाभेन ततो भूयो महौजसा । तस्याहूतस्य नष्टासौ वेताली स्तेयकारणम् ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर महातेजस्वी रामने उठकर उसे ललकारा । उन्हें देखते ही चोरीका कारण जो वेतालो-विद्या थी वह नष्ट हो गयी ॥२७॥


ततः साहसगत्याख्यः स्वस्वभावं समाश्रितः । विज्ञातो रामनिर्मुक्तैर्मृत्युं नीतः शिलीमुखैः ॥२८॥

अर्थ: तब साहसगति अपने असली स्वरूपको प्राप्त हो गया, सबकी पहचानमें आया और रामके द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे मृत्युको प्राप्त हुआ ॥२८॥


तच्छ्रुत्वा विगतक्रोधो जातः पवननन्दनः । पुनरुक्तं जगौ तुष्टः विकसन्मुखपङ्कजः ॥२९॥

कृतं कृतमहो साधु प्रियं पद्मेन नः परम् । यत्सुग्रीवकुलं मज्जदकीर्तौ क्षिप्रमुद्धृतम् ॥३०॥

अर्थ: यह सुनकर हनुमान् क्रोधरहित हो गया । प्रसन्नतासे उसका मुखकमल खिल उठा और सन्तुष्ट होकर उसने बार-बार कहा कि अहो ! रामने बहुत अच्छा किया, मुझे बहुत अच्छा लगा जो उन्होंने अपकीर्तिमें डूबते हुए सुग्रीवके कुलका शीघ्र ही उद्धार कर लिया ॥२९-३०॥


हेमकुम्भोपमं गोत्रं अयशःकूपगह्वरे । निमज्जद्गुणहस्तेन तेन सन्मतिनोद्धृतम् ॥३१॥

अर्थ: स्वर्णकलशके समान सुग्रीवका कुल अपयशरूपी कूपके गर्तमें पड़कर डूब रहा था सो उत्तम बुद्धिके धारक रामने गुणरूपी रस्सी हाथमें ले उसे निकाला है ॥३१॥


एवमादिपरं भूरि प्रशंसन् रामलक्ष्मणौ । कस्मिन्नपि ममज्जासौ सारसौख्यमहार्णवे ॥३२॥

अर्थ: इस प्रकार रामलक्ष्मणकी अत्यधिक प्रशंसा करता हुआ हनुमान् किसी अद्भुत श्रेष्ठ सुखरूपी सागरमें निमग्न हो गया ॥३२॥


श्रुत्वा पङ्कजरागायाः पितुः शोकपरिक्षयम् । उत्सवः सुमहान् जातो दानपूजादिसंस्तुतः ॥३३॥

अर्थ: हनुमान्‌की दूसरी स्त्री सुग्रीवकी पुत्री पद्मरागा थी सो पिताके शोकका क्षय सुनकर उसे बड़ा हर्ष हुआ । उसने दान-पूजा आदिके द्वारा महाउत्सव किया ॥३३॥


उद्वेगानन्दसंपन्नं हतच्छायसमुज्ज्वलम् । श्रीशैलभवनं जातं रसद्वयसमुत्कटम् ॥३४॥

अर्थ: उस समय हनुमान्‌के भवनमें एक ओर तो शोक मनाया जा रहा था और दूसरी ओर हर्ष प्रकट किया जा रहा था । वह एक ओर तो कान्तिसे शून्य हो रहा था और दूसरी ओर देदीप्यमान हो रहा था । इस प्रकार दो स्त्रियोंके कारण वह दो प्रकारके रससे युक्त था ॥३४॥


एवं विषमतां प्राप्ते स्वजने पावनंजयिः । किंचित्समत्वमाधाय किष्किन्धाभिमुखं ययौ ॥३५॥

अर्थ: इस प्रकार जब कुटुम्बके लोग विषमताको प्राप्त हो रहे थे तब हनुमान् कुछ-कुछ मध्यस्थताको धारण कर किष्किन्धानगरकी ओर चला ॥३५॥


ऋध्याभिगच्छतस्तस्य बलेनात्यर्थभूरिणा । जगदन्यदिवोद्भूतमाकाशपरिवर्जितम् ॥३६॥

अर्थ: वैभवके साथ जाते हुए हनुमान्‌की बहुत बड़ी सेनासे उस समय संसार आकाशसे रहित होनेके कारण ऐसा जान पड़ता था मानो दूसरा ही उत्पन्न हुआ हो ॥३६॥


विमानं सुमहत्तस्य मणिरत्नसमुज्ज्वलम् । प्रभां दिवसरत्नस्य जहार स्वमरीचिभिः ॥३७॥

अर्थ: मणियों और रत्नोंसे जगमगाता हुआ उसका बड़ा भारी विमान, अपनी किरणोंसे सूर्यकी प्रभाको हर रहा था ॥३७॥


गच्छन्तं तं महाभाग्यं शतशो बन्धुपार्थिवाः । अनुजग्मुः सुनासीरं यथा त्रिदशपुंगवाः ॥३८॥

अर्थ: जाते हुए उस महाभाग्यशालीके पीछे सैकड़ों मित्रराजा उस प्रकार चल रहे थे जिस प्रकार कि इन्द्रके पीछे उत्तमोत्तम देव चलते हैं ॥३८॥


अग्रतः पृष्ठतश्चास्य पार्श्वतश्च जयस्वनैः । गच्छतां खेचरेन्द्राणामासीच्छब्दमयं नभः ॥३९॥

अर्थ: उसके आगे-पीछे और दोनों ओर चलनेवाले विद्याधर राजाओंकी जयध्वनिसे आकाश शब्दमय हो गया था ॥३९॥


चित्रमासीद्यदश्वानां विहायस्तलगामिनाम् । मनोहारी गजानां च विलासः स्वतनूचितः ॥४०॥

अर्थ: आकाशतलमें चलनेवाले उसके घोड़ोंसे आश्चर्य उत्पन्न हो रहा था तथा हाथियोंकी अपने शरीरके अनुरूप मनोहारी चेष्टा प्रकट हो रही थी ॥४०॥


महातुरङ्गसंयुक्तैः रथैरुच्छ्रितकेतुभिः । विहायसस्तलं जातं मन्ये कल्पनगाकुलम् ॥४१॥

अर्थ: जिनमें बड़े-बड़े घोड़े जुते हुए थे तथा जिनपर पताकाएँ फहरा रही थीं ऐसे रथोंसे उस समय आकाशतल ऐसा जान पड़ता था मानो कल्पवृक्षोंसे व्याप्त ही हो ॥४१॥


सितानामातपत्राणां गण्डलेन महीयसा । जातं कुमुदखण्डानामिव पूर्णं वियत्तलम् ॥४२॥

अर्थ: धवल छत्रोंके विशाल समूहसे आकाशतल ऐसा जान पड़ता था मानो कुमुदोंके समूहसे ही व्याप्त हो ॥४२॥


गम्भीरो दौन्दुभो धीरो ध्वानो ध्वस्तापरध्वनिः । चक्रबालं दिशां व्याप्य प्रतिध्वनिघनः स्थितः ॥४३॥

अर्थ: दूसरोंकी ध्वनिको नष्ट करनेवाला उसकी दुन्दुभिका धीर गम्भीर शब्द दिशाओंके मण्डलको व्याप्त कर स्थित था तथा उसकी जोरदार प्रतिध्वनि उठ रही थी ॥४३॥


संकुलं चलता येन सैन्येन गगनाङ्गणम् । खण्डखण्डैरिवच्छन्नमन्तरेषु व्यलोक्यते ॥४४॥

अर्थ: उसकी चलती हुई सेनासे व्याप्त आकाशांगण ऐसा दिखाई देता था मानो बीच-बीचमें खण्ड-खण्डोंसे आच्छादित हो ॥४४॥


भासां भूषणजातानां बहुवर्णयुजां चयैः । विशिष्टशिल्पिना रक्तं नभो वस्त्रमिवाभवत् ॥४५॥

अर्थ: उसके नाना प्रकारके भूषणोंके समूहकी कान्तिसे रँगा हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो किसी विशिष्ट - कुशल शिल्पीके द्वारा रँगा वस्त्र ही हो ॥४५॥


ध्वनिं मारुतितूर्यस्य श्रुत्वा संनह्य गह्वरम् । तोषं कपिध्वजाः प्रापुः शिखिनोऽब्दध्वनिं यथा ॥४६॥

अर्थ: हनुमान्‌की तुरहीका गम्भीर शब्द श्रवण कर सब वानरवंशी इस प्रकार सन्तोषको प्राप्त हुए जिस प्रकार कि मेघका शब्द सुनकर मयूर सन्तोषको प्राप्त होते हैं ॥४६॥


कृतापणमहाशोभं ध्वजमालासमाकुलम् । रत्नतोरणसंयुक्तं किष्किन्धनगरं कृतम् ॥४७॥

अर्थ: उस समय किष्किन्धनगरके बाजारोंमें महाशोभा की गयी; ध्वजाओं तथा मालाओंसे नगर सजाया गया और रत्नमयी तोरणोंसे युक्त किया गया ॥४७॥


बहुभिः पूज्यमानोऽसौ विभवैस्त्रिदशोपमैः । विवेश नगरं सद्म सुग्रीवस्य च पुष्कलम् ॥४८॥

अर्थ: देवोंके समान अनेक विद्याधरोंने बड़े वैभवसे जिसकी पूजा की थी ऐसा हनुमान् सुग्रीवके विशाल महलमें प्रविष्ट हुआ ॥४८॥


सुग्रीवेण प्रतीष्टश्च यथार्हं रचितादरः । कथितं चाखिलं तस्य पद्मनाभादिचेष्टितम् ॥४९॥

अर्थ: सुग्रीवने यथायोग्य आदर कर उसका सम्मान किया तथा राम आदिकी समस्त चेष्टाएँ उसके समक्ष कहीं ॥४९॥


अनेनैव ततो युक्ताः सुग्रीवाद्या नरेश्वराः । धारयन्तः परं हर्षं पद्मनाभमुपाययुः ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्से युक्त सुग्रीव आदि राजा परम हर्षकी धारण करते हुए रामके समीप आये ॥५०॥


अपश्यच्च नरश्रेष्ठं तं लक्ष्मीधरपूर्वजम् । नीलकुञ्चितसूक्ष्मातिस्निग्धकेशं मरुत्सुतः ॥५१॥

अर्थ: तत्पश्चात् हनुमान्‌ने उन श्रीरामको देखा जो मनुष्योंमें श्रेष्ठ थे, लक्ष्मणके अग्रज थे, जिनके केश काले, घुँघराले, सूक्ष्म तथा अत्यन्त स्निग्ध थे ॥५१॥


लक्ष्मीलताविषक्ताङ्गं कुमारमिव भास्करम् । शशाङ्कमिव लिम्पन्तं कान्तिपङ्केन पुष्करम् ॥५२॥

अर्थ: जिनका शरीर लक्ष्मीरूपी लतासे आलिंगित था, जो बालसूर्यके समान जान पड़ते थे अथवा जो कान्तिरूपी पंकके आकाशको लिप्त करते हुए चन्द्रमाके समान सुशोभित थे ॥५२॥


नयनानां समानन्दं मनोहरणकोविदम् । अपूर्वकर्मणां सर्गं स्वर्गादिव समागतम् ॥५३॥

अर्थ: जो नेत्रोंको आनन्द देनेवाले थे, मनके हरण करनेमें निपुण थे, अपूर्व कर्मोंकी मानो सृष्टि ही थे और स्वर्गसे आये हुए के समान जान पड़ते थे ॥५३॥


ज्वलद्विशुद्धरुक्माम्बुरुहगर्भसमप्रभम् । मनोज्ञा गतनासाग्रं संगतश्रवणद्वयम् ॥५४॥

अर्थ: देदीप्यमान निर्मल स्वर्ण-कमलके भीतरी भागके समान जिसकी प्रभा थी, जिनकी नासाका अग्रभाग मनोहर था, जिनके दोनों कर्ण उत्तम सुडौल अथवा सज्जनोंको प्रिय थे ॥५४॥


मूर्तिमन्तमिवानङ्गं पुण्डरीकनिभेक्षणम् । चापानतभ्रुवं पूर्णशारदेन्दुनिभाननम् ॥५५॥

अर्थ: जो मूर्तिधारी कामदेवके समान जान पड़ते थे, जिनके नेत्र कमलके समान थे, जिनकी भौंह चढ़े हुए धनुषके समान नम्रीभूत थी, जिनका मुख शरद् ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान था ॥५५॥


बिम्बप्रवालरक्तोष्ठं कुन्दश्वेतद्विजावलिम् । कम्बुकण्ठं मृगेन्द्राभवक्षोभाजं महाभुजम् ॥५६॥

अर्थ: जिनका ओंठ बिम्ब अथवा मूँगा या किसलयके समान लाल था जिसकी दाँतोंकी पंक्ति कुन्द कुसुमके समान शुक्ल थी, कण्ठ शंखके समान था, जो सिंहके समान विस्तृत वक्षःस्थलके धारक थे, महाभुजाओंसे युक्त थे ॥५६॥


श्रीवत्सकान्तिसंपूर्णमहाशोभस्तनान्तरम् । गम्भीरनाभिवक्षाममध्यदेशविराजितम् ॥५७॥

अर्थ: जिनके स्तनोंका मध्यभाग श्रीवत्स चिह्नकी कान्तिसे परिपूर्ण महाशोभाको धारण करनेवाला था, जो गम्भीर नाभिसे युक्त तथा पतली कमरसे सुशोभित थे ॥५७॥


प्रशान्तगुणसंपूर्णं नानालक्षणभूषितम् । सुकुमारकरं वृत्तपीवरोरुद्वयस्तुतम् ॥५८॥

अर्थ: जो प्रशान्त गुणोंसे युक्त थे, नाना लक्षणोंसे विभूषित थे, जिनके हाथ अत्यन्त सुकुमार थे, जिनकी दोनों जाँघे गोल तथा स्थूल थीं ॥५८॥


कूर्मपृष्ठमहातेजःसुकुमारक्रमद्वयम् । चन्द्राङ्कुरारुणच्छायानखपङ्क्तिसमुज्ज्वलम् ॥५९॥

अर्थ: जिनके दोनों चरण कछुवेके पृष्ठभागके समान महातेजस्वी तथा सुकुमार थे, जो चन्द्रमाकी किरणरूपी अंकुरोंसे लाल-लाल दीखनेवाली नखावलीसे उज्ज्वल थे ॥५९॥


अक्षोभ्यसत्त्वगम्भीरं वज्रसंघातविग्रहम् । सर्वसुन्दरसन्दोहमिव कृत्वा विनिर्मितम् ॥६०॥

अर्थ: जो अक्षोभ्य धैर्यसे गम्भीर थे, जिनका शरीर मानो वज्रका समूह ही था, अथवा समस्त सुन्दर वस्तुओंको एकत्रित कर ही मानो जिनकी रचना हुई थी ॥६०॥


महाप्रभावसंपन्नं न्यग्रोधपरिमण्डलम् । प्रियाङ्गनावियोगेन बालसिंहमिवाकुलम् ॥६१॥

अर्थ: जो महाप्रभावसे युक्त थे, न्यग्रोध अर्थात् वट-वृक्षके समान जिनका मण्डल था, जो प्रिय स्त्रीके विरहके कारण बालसिंहके समान व्याकुल थे ॥६१॥


शच्येव रहितं शक्रं रोहिण्येव विना विधुम् । रूपसौभाग्यसंपन्नं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥६२॥

अर्थ: जो इन्द्राणीसे रहित इन्द्रके समान, अथवा रोहिणीसे रहित चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे, जो रूप तथा सौभाग्य दोनोंसे युक्त थे, समस्त शास्त्रोंमें निपुण थे ॥६२॥


शौर्यमाहात्म्यसंयुक्तं मेधादिगुणसंयुतम् । एवंविधं समालोक्य मारुतिः क्षोभमागतः ॥६३॥

अर्थ: शूर-वीरताके माहात्म्यसे युक्त थे तथा मेधा - सद्बुद्धि आदि गुणोंसे युक्त थे । ऐसे श्रीरामको देखकर हनुमान् क्षोभको प्राप्त हुआ ॥६३॥


अचिन्तयच्च संभ्रान्तस्तत्प्रभाववशीकृतः । तच्छरीरप्रभा जालसमालिङ्गितविग्रहः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर जो रामके प्रभावसे वशीभूत हो गया था और उनके शरीरकी कान्तिके समूहसे जिसका शरीर आलिंगित हो रहा था ऐसा हनुमान् सम्भ्रममें पड़ विचार करने लगा ॥६४॥


श्रीमानयमसौ राजा रामो दशरथात्मजः । यस्येह लक्ष्मणो भ्राता लोकश्रेष्ठः स्थितो वशे ॥६५॥

अर्थ: कि यह वही दशरथके पुत्र लक्ष्मीमान् राजा रामचन्द्र हैं, लोकश्रेष्ठ लक्ष्मण जैसा भाई जिनका आज्ञाकारी है ॥६५॥


यस्यालोक्य तदा संख्ये छत्रं शीतांशुसंनिभम् । सा साहसगतेर्माया वैताली परिनिःसृता ॥६६॥

अर्थ: उस समय युद्धमें जिनका चन्द्रतुल्य छत्र देखकर साहसगति की वह वैताली विद्या निकल गयी ॥६६॥


दृष्ट्वा वज्रधरं पूर्वं हृदयं यन्न कम्पितम् । तदद्य मम दृष्ट्वैनं संक्षोभं परमं गतम् ॥६७॥

अर्थ: मेरा जो हृदय पहले इन्द्रको देखकर भी कम्पित नहीं हुआ वह आज इन्हें देखकर परम क्षोभको प्राप्त हुआ है ॥६७॥


इति विस्मयमापन्नः समनुसृत्य तान् गुणान् । ससार पावनिः पद्मं श्रीमदम्भोजलोचनम् ॥६८॥

अर्थ: इस प्रकार आश्चर्यको प्राप्त हुआ हनुमान् इनके गुणोंका अनुसरण कर कमललोचन रामके पास पहुँचा ॥६८॥


दूरादुत्थाय दृष्ट्वैवं पद्मलक्ष्मीधरादिभिः । असौ प्रहृष्टचेतोभिः परिष्वक्तो यथाक्रमम् ॥६९॥

अर्थ: जिनका चित्त हर्षित हो रहा था ऐसे राम, लक्ष्मण आदिने इसे देख दूरसे ही उठाकर यथाक्रमसे इसका आलिगन किया ॥६९॥


परस्परं समालोक्य संभाष्य विनयोचितम् । उपधानविचित्रेषु स्वासनेष्ववतस्थिरे ॥७०॥

अर्थ: परस्पर एक दूसरेको देखकर तथा विनयके योग्य वार्तालाप कर सब नाना प्रकार तालियोंसे सुशोभित अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये ॥७०॥


तत्र भद्रासने रम्ये स्थितः काकुत्स्थनन्दनः । केयूरभूषितभुजो ज्वलल्लक्ष्म्या समन्ततः ॥७१॥

स्वच्छनीलाम्बरधरश्चूडामणिरिवोज्ज्वलः । रराज वरहारेण सोडुचन्द्र इवोद्गतः ॥७२॥

अर्थ: वहाँ जो उत्तम आसनपर विराजमान थे, जिनकी भुजा बाजूबन्दसे सुशोभित थी, जो लक्ष्मीके द्वारा सब ओरसे देदीप्यमान थे, जो स्वच्छ नीलवस्त्र धारण किये हुए थे तथा उत्तम हारसे सुशोभित थे ऐसे श्रीराम नक्षत्र सहित उदित हुए चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे ॥७१-७२॥


दिव्यपीताम्बरधरो हारकेयूरकुण्डली । सुमित्रातनयो रेजे सतडिज्जलदो यथा ॥७३॥

अर्थ: दिव्य पीताम्बरको धारण करनेवाले तथा हार, केयूर और कुण्डलोंसे अलंकृत लक्ष्मण बिजली सहित मेघके समान सुशोभित हो रहे थे ॥७३॥


वानराभोगमुकुटः सुरवारणविक्रमः । अभात्सुग्रीवराजोऽपि लोकपाल इवोर्जितः ॥७४॥

अर्थ: जिसका सुविस्तृत मुकुट वानरके चिह्नसे युक्त था, तथा देवगज - ऐरावतके समान जिसका पराक्रम था ऐसा सुग्रीवराजा भी अतिशय बलवान् लोकपालके समान सुशोभित हो रहा था ॥७४॥


विराधितः कुमारोऽपि सौमित्रेः पृष्ठतः स्थितः । अलक्ष्यत नृसिंहस्य चक्ररत्नमिवौजसा ॥७५॥

अर्थ: लक्ष्मणके पीछे बैठा विराधित कुमार भी अपने तेजसे ऐसा दिखाई देता था मानो नारायणके समीप रखा हुआ चक्ररत्न ही हो ॥७५॥


हनूमानप्यलं रेजे पद्मनाभस्य धीमतः । समीपे पूर्णचन्द्रस्य स्फीतो बुध इवोदितः ॥७६॥

अर्थ: अतिशय बुद्धिमान् रामचन्द्रके समीप हनुमान् भी ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पूर्णचन्द्रके समीप उदित हुआ अत्यन्त देदीप्यमान बुधग्रह ही हो ॥७६॥


सुगन्धिमाल्यवस्त्राद्यैरलंकारैश्च भूषितौ । अङ्गाङ्गदावेभासेतां यमवैश्रवणाविव ॥७७॥

अर्थ: सुगन्धित माला तथा वस्त्रादि एवं अलंकारोंसे अलंकृत अंग और अंगद यम तथा वैश्रवणके समान सुशोभित हो रहे थे ॥७७॥


नलनीलप्रभृतयः शतशोऽन्ये च पार्थिवाः । आसीना रेजुरत्यन्तमावृत्य रघुनन्दनम् ॥७८॥

अर्थ: इनके सिवाय रामको घेर कर बैठे हुए नल, नील आदि सैकड़ों अन्य राजा भी उस समय अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥७८॥


पञ्चसद्गन्धताम्बूलगन्धसंगतमारुता । विभूषणकृतोद्योता सा सभेन्द्रसभोपमा ॥७९॥

अर्थ: नाना प्रकारकी उत्तम गन्धसे युक्त ताम्बूल तथा सुगन्धित अन्य पदार्थोंके समागमसे जहाँ वायु सुगन्धित हो रही थी तथा जहाँ आभूषणोंके द्वारा प्रकाश फैल रहा था ऐसी वह सभा इन्द्रकी सभाके समान जान पड़ती थी ॥७९॥


विस्मित्य सुचिरं रामं प्रीतः पावनिरब्रवीत् । समक्षं न गुणा ग्राह्या भवतो रघुनन्दन ॥८०॥

इहापि निखिले लोके दृश्यते स्थितिरीदृशी । किमपि प्रियवक्तॄणां प्रत्यक्षगुणकीर्तनम् ॥८१॥

आसीद्यस्याधिमाहात्म्यं श्रुतमस्माभिरूर्जितम् । दृष्टः सत्त्वहितः स त्वं सत्त्ववान् चक्षुषा स्वयम् ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर चिरकाल तक आश्चर्यमें पड़कर प्रीतियुक्त हनुमान्ने रामसे कहा कि हे राघव ! यद्यपि आपके गुण आपके ही समक्ष नहीं कहना चाहिए क्योंकि इस लोकमें भी ऐसी ही रीति देखी जाती है फिर भी प्रत्यक्ष ही आपके गुण कथन करनेकी उत्कट लालसा है सो ठीक ही है क्योंकि जो प्रिय वक्ता हैं उन्हें प्रत्यक्ष ही गुणोंका कथन करना अद्भुत आह्लादकारी होता है ॥८०-८२॥


सर्वसौन्दर्ययुक्तस्य गुणरत्नाकरस्य ते । शुभ्रेण यशसा राजन् जगदेतदलङ्कृतम् ॥८३॥

अर्थ: जिनका बलपूर्ण लोकोत्तर माहात्म्य हमने पहलेसे सुन रखा था उन प्राणि हितकारी धैर्यशाली आपको मैं स्वयं नेत्रोंसे देख रहा हूँ ॥८३॥


अर्थ: हे राजन् ! आप सम्पूर्ण सौन्दर्यसे युक्त हैं, तथा गुणरूपी रत्नोंकी आकर अर्थात् खान अथवा समुद्र हैं। आपके शुक्ल यशसे यह संसार अलंकृत हो रहा है ॥८३॥


धनुर्लम्भोदये लब्धः सहस्रामररक्षिते । सीतास्वयंवरेऽस्माभिः श्रुतस्तव पराक्रमः ॥८४॥

अर्थ: हे नाथ ! वज्रावर्त धनुषकी प्राप्तिसे जिसका अभ्युदय हुआ था तथा एक हजार देव जिसकी रक्षा करते थे ऐसे सीताके स्वयंवरमें आपको जो पराक्रम प्राप्त हुआ था वह सब हमने सुना है ॥८४॥


पिता दशरथो यस्य यस्य भामण्डलः सुहृत् । भ्राता यस्य च सौमित्रिः स त्वं राम जगत्पतिः ॥८५॥

अर्थ: दशरथ जिनका पिता है, भामण्डल जिनका मित्र है, और लक्ष्मण जिनका भाई है, ऐसे आप जगत्के स्वामी राजा राम हैं ॥८५॥


अहो शक्तिरहोरूपमेष नारायणः स्वयम् । समुद्रावर्तचापेशो यस्याज्ञाकरणे रतः ॥८६॥

अर्थ: अहो ! आपकी शक्ति अद्भुत है, अहो ! आपका रूप आश्चर्यकारी है कि सागरावर्त धनुषका स्वामी नारायण स्वयं ही जिनकी आज्ञा पालन करनेमें तत्पर है ॥८६॥


अहो धैर्यमहो त्यागो यत्पितुः पालयन् वचः । महाप्रतिभयाकारं प्रविष्टो दण्डकं वनम् ॥८७॥

अर्थ: अहो ! आपका धैर्य आश्चर्यकारी है, अहो ! आपका त्याग अद्भुत है जो पिताके वचनका पालन करते हुए आप महाभय उत्पन्न करनेवाले दण्डक वनमें प्रविष्ट हुए हैं ॥८७॥


एतन्न कुरुते बन्धुस्तुष्टश्च त्रिदशाधिपः । अहो त्वया नाथ कृतं यदस्माकमतिप्रियम् ॥८८॥

अर्थ: हे नाथ ! आपने हम लोगोंका जो उपकार किया है वह न तो भाई ही कर सकता है और न सन्तुष्ट हुआ इन्द्र ही ॥८८॥


सुग्रीवरूपसंपन्नं हत्वा संयति साहसम् । यत्कपिध्वजवंशस्य कलङ्को दूरमुज्झितः ॥८९॥

अर्थ: आपने सुग्रीवका रूप धारण करनेवाले साहसगतिको युद्धमें मारकर वानरवंशका कलंक दूर किया है ॥८९॥


विद्याबलविधिज्ञैर्यद्यस्य मायामयं वपुः । अस्माभिरपि नो सह्यं दुर्जयं च विशेषतः ॥९०॥

तेन सुग्रीवरूपेण ग्रहीतुं प्लावगं बलम् । दर्शनादेव युष्माकं तद्रूपं तस्य निःसृतम् ॥९१॥

अर्थ: विद्याबलकी विधिके जाननेवाले हम लोग भी जिसके मायामय शरीरको सहन नहीं कर सकते थे तथा हम लोगोंके लिए भी जिसका जीतना कठिन था उस सुग्रीव रूपधारी साहसगतिने वानर वंशी सेनाको प्राप्त करनेके लिए कितना प्रयत्न किया परन्तु आपके दर्शनमात्रसे उसका वह रूप निकल गया ॥९०-९१॥


कर्तुं प्रत्युपकारं यो न शक्तोऽत्युपकारिणः । सुलभां भावशुद्धिं स तस्मै न कुरुते कुतः ॥९२॥

अर्थ: जो अत्यन्त उपकारी मनुष्यका प्रत्युपकार करनेके लिए समर्थ नहीं है वह उसके विषयमें भावशुद्धि क्यों नहीं करता अर्थात् उसके प्रति अपने परिणाम निर्मल क्यों नहीं करता जबकि यह भावशुद्धि बिलकुल ही सुलभ है ॥९२॥


का तस्य बुद्धिर्न्यायेषु भवेदेकमपि क्षणम् । यः कृतस्योपकारस्य विशेषं नावबुध्यते ॥९३॥

अर्थ: जो मनुष्य, किये हुए उपकार की विशेषताको नहीं जानता है उसकी एक अज्ञके लिए भी न्यायमें बुद्धि कैसे हो सकती है ? ॥९३॥


श्वपाकादपि पापीयान् लुब्धकादपि निर्घृणः । असंभाष्यः सतां नित्यं योऽकृतज्ञो नराधमः ॥९४॥

अर्थ: जो नीच मनुष्य अकृतज्ञ है वह चाण्डालसे भी अधिक पापी है, शिकारीसे भी अधिक निर्दय है और सत्पुरुषोंसे निरन्तर वार्तालाप करनेके लिए भी योग्य नहीं है ॥९४॥


स्वशरीरमपि त्यक्त्वा सत्यं वयमनन्यगाः । सर्वे समुद्यताः कर्तुमुपकारं तव प्रभो ॥९५॥

अर्थ: हे प्रभो ! हम सब किसी अन्य की शरणमें न जाकर आपकी ही शरणमें आये हैं और सचमुच ही अपना शरीर छोड़कर भी आपका उपकार करनेके लिए उद्यत हैं ॥९५॥


गत्वा प्रबोधयिष्यामि त्रिकूटाधिपतिं बुधम् । तव पत्नीं महाबाहो त्वरावानानयाम्यहम् ॥९६॥

अर्थ: हे महाबाहो ! मैं जाकर रावणको समझाऊँगा । वह बुद्धिमान् है अतः अवश्य समझेगा और मैं शीघ्र ही आपकी पत्नीको वापस ले आता हूँ ॥९६॥


सीताया वदनाम्भोजं प्रसन्नेन्दुमिवोदितम् । संदेहेन विनिर्मुक्तं शीघ्रं पश्यसि राघव ॥९७॥

अर्थ: हे राघव ! इसमें सन्देह नहीं कि तुम उदित हुए चन्द्रमाके समान निर्मल सीताका मुखकमल शीघ्र ही देखोगे ॥९७॥


मन्त्री जाम्बूनदोऽवोचत्ततो वाक्यं परं हितम् । वत्स वत्स महत्पुत्र त्वमेकोऽस्माकमाश्रयः ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीवके मन्त्री जाम्बूनदने परम हितकारी वचन कहे कि हे वत्स हनुमान् ! हम लोगोंका आधार एक तू ही है ॥९८॥


अप्रमत्तेन गन्तव्यं लङ्कां रावणपालिताम् । न विरोधः क्वचित् कार्यः कदाचित् केनचित्सह ॥९९॥

अर्थ: अतः तुझे सावधान होकर रावणके द्वारा पालित लंका जाना चाहिए और कहीं कभी किसीके साथ विरोध नहीं करना चाहिए ॥९९॥


एवमस्त्विति संभाष्य तं संप्रस्थितमुन्नतम् । विलोक्य परमां प्रीतिं पद्मनामः समागमत् ॥१००॥

अर्थ: ‘एवमस्तु’ - ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर उदार हनुमान् लंकाकी ओर प्रस्थान करनेके लिए उद्यत हुआ सो उसे देख राम परम प्रीतिको प्राप्त हुए ॥१००॥


पुनः पुनः समाहूय मारुतिं चारुलक्षणम् । सर्वादरं जगादेदं स्फीता राजीवलोचनः ॥१०१॥

मद्वाक्यादुच्यतां सीता त्वद्वियोगात् स राघवः । अधुना विन्दते साध्वि य मनोनिर्वृतिं क्वचित् ॥१०२॥

अर्थ: विदलित कमललोचन रामने सुन्दर लक्षणोंके धारक हनुमान्को बार-बार बुलाकर बड़े आदरके साथ यह कहा कि तुम मेरी ओरसे सीतासे कहना कि हे साध्वि ! इस समय राम तुम्हारे वियोगसे किसी भी वस्तुमें मानसिक शान्तिको प्राप्त नहीं हो रहे हैं - उनका मन किसी भी पदार्थमें नहीं लगता है ॥१०१-१०२॥


अत्यन्तं तदहं मन्ये हतं पौरुषमात्मनः । प्रतिरोधं प्रपन्नासि वर्तमानेऽपि यन्मयि ॥१०३॥

अर्थ: मेरे रहते हुए जो तुम अन्यत्र प्रतिरोध - रुकावटको प्राप्त हो रही हो सो इसे मैं अपने पौरुषका अत्यधिक घात समझता हूँ ॥१०३॥


वेद्मि निर्मलशीलाढ्या यथा त्वं मदनुव्रता । जीवितं वाञ्छसि त्यक्तुं मद्वियोगेन दुःखिता ॥१०४॥

अलं तथापि सद्वक्त्रे दुःसमाधानमृत्युना । धार्यन्तां मैथिलि प्राणा न जीवं त्यक्तुमर्हसि ॥१०५॥

अर्थ: तुम जिस प्रकार निर्मल शीलव्रतसे सहित हो तथा एक ही व्रत धारण करती हो उससे समझता हूँ कि तुम मेरे वियोगसे दुःखी होकर यद्यपि जीवन छोड़ना चाहती होगी पर हे सुमुखि ! तो भी खोटे परिणामोंसे मरना व्यर्थ है । हे मैथिलि ! प्राण धारण करो । जीवनका त्याग करना उचित नहीं है ॥१०४-१०५॥


दुर्लभः संगमो भूयः पूजितः सर्ववस्तुषु । ततोऽपि दुर्लभो धर्मो जिनेन्द्रवदनोद्गतः ॥१०६॥

अर्थ: सर्व वस्तुओंका पुनः उत्तम समागम प्राप्त होना दुर्लभ है और उससे भी दुर्लभ अरहन्त भगवान्के मुखारविन्दसे प्रकट हुआ धर्म है ॥१०६॥


दुर्लभादप्यलं तस्मान्मरणं सुसमाहितम् । तस्मिन्नसति जन्मेदं तुषनिःसारमीक्षितम् ॥१०७॥

अर्थ: यद्यपि उक्त धर्म दुर्लभ है तो भी समाधि-मरण उसकी अपेक्षा दुर्लभ है क्योंकि समाधि मरणके बिना यह जीवन तुषके समान साररहित देखा गया है ॥१०७॥


इदं च प्रत्ययोत्पादि प्रियायै मम जीवतः । सततं संस्तुतं देवमङ्गुलीयकमुत्तमम् ॥१०८॥

अर्थ: और प्रियाके लिए मेरे जीवित रहनेका प्रत्यय - विश्वास उत्पन्न हो जाये इसलिए यह सदाकी परिचित उत्तम अँगूठी उसे दे देना ॥१०८॥


वायुपुत्र द्रुतं गत्वा सीतायास्तं महाप्रभम् । ममापि प्रत्ययकरं चूडामणिमिहानय ॥१०९॥

अर्थ: तथा हे पवनपुत्र ! तुम शीघ्र ही जाकर मुझे विश्वास उत्पन्न करनेवाला सीताका महाकान्तिमान् चूड़ामणि यहाँ ले आना ॥१०९॥


यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा रत्नवानरमौलिभृत् । कृताञ्जलिपुटो नत्वा सौमित्रिं च समाञ्जलिः ॥११०॥

बहिर्विनिर्ययौ हृष्टः पूर्यमाणो विभूतिभिः । क्षोभयन् तेजसा सर्वं सुग्रीवभवनाजिरम् ॥१११॥

अर्थ: ‘जैसी आज्ञा हो’ यह कहकर रत्नमय वानरसे चिह्नित मुकुटको धारण करनेवाला हनुमान् राम तथा लक्ष्मणको हाथ जोड़ नमस्कार कर बाहर निकल आया । उस समय वह अत्यन्त हर्षित था, विभूतियोंसे युक्त था और अपने तेजसे सुग्रीवके भवन सम्बन्धी समस्त आंगनको क्षोभयुक्त कर रहा था ॥११०-१११॥


संदिदेश च सुग्रीवं यावदागमनं मम । स्थातव्यं तावदत्रैव प्रमादपरिवर्जितैः ॥११२॥

अर्थ: उसने सुग्रीवसे कहा कि जबतक मैं न आ जाऊँ तबतक आपको यहीं सावधान होकर ठहरना चाहिए ॥११२॥


विमानं चारुशिखरमारूढो मारुतिस्ततः । विभाति मस्तके मेरोश्चैत्यालय इवोज्ज्वलः ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान् सुन्दर शिखरसे युक्त विमानपर आरूढ़ हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि सुमेरुके शिखरपर देदीप्यमान चैत्यालय सुशोभित होता है ॥११३॥


प्रययौ परया द्युत्या सितच्छत्रोपशोभितः । विलसद्धंससंकाशैश्चामरैरुपजीवितः ॥११४॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसने परम कान्तिसे युक्त हो प्रयाण किया। उस समय वह सफेद छत्रसे सुशोभित था और उड़ते हुए हंसोंकी समानता करनेवाले चमर उसपर ढोरे जा रहे थे ॥११४॥


वायुशावेसमैरश्वैर्जङ्गमाद्रिसमैर्गजैः । सैन्यैस्त्रिदशसंकाशैर्जगाम परितो वृतः ॥११५॥

अर्थ: वह वायुके समान वेगशाली घोड़ों, चलते-फिरते पर्वतोंके समान हाथियों और देवोंके समान सैनिकोंसे घिरा हुआ जा रहा था ॥११५॥


एवं युक्तो महाभूत्या रामादिभिरुदीक्षितः । समाक्रम्य रवेर्मार्गमयासीत्सुनिरन्तरम् ॥११६॥

अर्थ: इस प्रकार जो महाविभूतिसे युक्त था, तथा राम आदि जिसे ऊपरको दृष्टि कर देख रहे थे, ऐसा वह हनुमान् सूर्यके मार्गका उल्लंघन कर निरन्तर आगे बढ़ा जाता था ॥११६॥


पूर्णं जगत्तिष्ठति जन्तुवर्गैर्नानाविधैरुत्तमभोगयुक्तैः । कश्चित्तु तेषां परमार्थकृत्ये नियुज्यते यत्परमं यशस्तत् ॥११७॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! यह समस्त संसार नाना प्रकारके उत्तम भोगोंसे युक्त जन्तुओंसे भरा हुआ है। उनमें-से कोई विरला पुरुष ही परमार्थरूप कार्यमें लगता है तथा परम यशको प्राप्त होता है ॥११७॥


कृतं परेणाप्युपकारयोगं स्मरन्ति नित्यं कृतिनो मनुष्याः । तेषां न तुल्यो भुवने शशाङ्को न वा कुबेरो न रविर्न शक्रः ॥११८॥

अर्थ: जो उत्तम मनुष्य दूसरेके द्वारा किये हुए उपकारका निरन्तर स्मरण रखते हैं इस संसारमें उनके समान न चन्द्रमा है, न कुबेर हैं, न सूर्य है और न इन्द्र ही है ॥११८॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हनुमत्प्रस्थानं नाम एकोनपञ्चाशत्तमं पर्व ॥४९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित, पद्मपुराणमें हनुमान्के प्रस्थानका वर्णन करनेवाला उनचासवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥४९॥