१४. चतुर्दशं पर्व (अनन्तबलधर्माभिधानं) (जारी)
का वा नरान्तराश्लेषदूषितप्रमदातनौ । ओष्ठचर्मदधानायां परदन्तकृतव्रणम् ॥३६८॥
दुर्गन्धायां स्वभावेन वर्चोराशौ भवेद्धृतिः । नरस्य दधतश्चित्तं मानसंस्कारभाजनम् ॥३६९॥
अर्थ: अथवा जो मनुष्य मान और संस्कारके पात्र स्वरूप मनको धारण करता है उसे अन्य मनुष्यके संसर्गसे दूषित स्त्रीके उस शरीरमें धैर्य - सन्तोष हो ही कैसे सकता है कि जो अन्य पुरुषके दाँतों द्वारा किये हुए घावसे युक्त ओठको धारण करता है, स्वभावसे ही दुर्गन्धित है और मलकी राशि स्वरूप है ॥३६८-३६९॥
अवधार्येतिभावेन प्रणम्यानन्तविक्रमम् । देवासुरसमक्षं स प्रकाशमिदमभ्यधात् ॥३७०॥
अर्थ: ऐसा विचारकर रावणने पहले तो अनन्तबल केवलीको भाव पूर्वक नमस्कार किया । फिर देवों और असुरोंके समक्ष स्पष्ट रूपसे यह कहा कि ॥३७०॥
भगवन्न मया नारी परस्येच्छाविवर्जिता । गृहीतव्येति नियमो ममायं कृतनिश्चयः ॥३७१॥
अर्थ: हे भगवन् ! ‘जो परस्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे ग्रहण नहीं करूँगा’ मैंने यह दृढ़ नियम लिया है ॥३७१॥
चतुःशरणमाश्रित्य भानुकर्णोऽपि कर्णवान् । इमं नियममातस्थे मन्दरस्थिरमानसः ॥३७२॥
करोमि प्रातरुत्थाय सांप्रतं प्रतिवासरम् । स्तुत्वा पूजां जिनेन्द्राणामभिषेकसमन्विताम् ॥३७३॥
वरिवस्यामवस्त्राणामकृत्वा विधिनान्वितम् । अद्य प्रभृति नाहारं करोमीति ससंमदः ॥३७४॥
अर्थ: जो समस्त बातोंको सुन रहा था तथा जिसका मन सुमेरुके समान स्थिर था ऐसे भानुकर्ण ( कुम्भकर्ण ) ने भी अरहन्त सिद्ध साधु और जिन धर्म इन चारकी शरणमें जाकर यह नियम लिया कि ‘मैं प्रतिदिन प्रातः काल उठकर तथा स्तुति कर अभिषेक-पूर्वक जिनेन्द्र देवकी पूजा करूँगा । साथ ही जबतक मैं निर्ग्रन्थ साधुओंकी पूजा नहीं कर लूँगा तबतक आजसे लेकर आहार नहीं करूँगा’ । भानुकर्णने यह प्रतिज्ञा बड़े हर्षसे की ॥३७२-३७४॥
जानुभ्यां भुवमाक्रम्य प्रणम्य मुनिमादरात् । अन्यानपि महाशक्तिनियमान् स समार्जयत् ॥३७५॥
अर्थ: इसके सिवाय उसने पृथिवीपर घुटने टेक मुनिराजको आदरपूर्वक नमस्कार कर और भी बड़े-बड़े नियम लिये ॥३७५॥
ततो देवा सुरा भक्ताः प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । यथास्वं निलयं जग्मुर्हर्षविस्तारितेक्षणाः ॥३७६॥
अर्थ: तदनन्तर हर्षसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे भक्त और असुर मुनिराजको नमस्कार कर अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥३७६॥
अभि लङ्कां दशास्योऽपि प्रतस्थे पृथुविक्रमः । खमुत्पत्य दधल्लीलां सुरनाथसमुद्भवाम् ॥३७७॥
अर्थ: विशाल पराक्रमका धारी रावण भी आकाश-में उड़कर इन्द्रकी लीला धारण करता हुआ लंकाकी ओर चला ॥३७७॥
वरस्त्रीजनसंघातैः कृतप्रणतिपूजनः । नगरीं स्वां विवेशासौ वस्त्रादिकृतभूषणाम् ॥३७८॥
अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियोंके समूहने प्रणामपूर्वक जिसकी पूजा की थी ऐसे रावणने वस्त्रादिसे सुसज्जित अपनी नगरीमें प्रवेश किया ॥३७८॥
प्रविश्य वसतिं स्वां च समस्तविभवार्चिताम् । अनावृत इवातिष्ठद्गंभीरां मान्दरीं गुहाम् ॥३७९॥
अर्थ: जिस प्रकार अनावृत देव मेरुपर्वतकी गम्भीर गुहामें रहता है उसी प्रकार रावण भी समस्त वैभवसे युक्त अपने निवासगृहमें प्रवेश कर रहने लगा ॥३७९॥
भवन्ति कर्माणि यदा शरीरिणां प्रशान्तियुक्तानि विमुक्तिभाविनाम् । ततोपदेशं परमं गुरोर्मुखादवाप्नुवन्ति प्रभवं शुभस्य ते ॥३८०॥
अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जब भव्य जीवोंके कर्म उपशम भावको प्राप्त होते हैं तब वे सुगुरुके मुखसे कल्याणकारी उत्तम उपदेश प्राप्त करते हैं ॥३८०॥
इति प्रबुद्धोद्यतमानसा जना जिनश्रुतौ सज्जत भो पुनः पुनः । परेण धर्मं विनयेन शृण्वतां भवत्यमन्दोऽवगमो यथा रविः ॥३८१॥
अर्थ: ऐसा जानकर हे प्रबुद्ध एवं उद्यमशील हृदयके धारक भव्य जनो ! तुम लोग बार-बार जिनधर्मके सुननेमें तत्पर होओ क्योंकि जो उत्तम विनयपूर्वक धर्म श्रवण करते हैं उन्हें सूर्यके समान विपुल ज्ञान प्राप्त होता है ॥३८१॥
इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते अनन्तबलधर्माभिधानं नाम चतुर्दशं पर्व ॥१८॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्यके द्वारा कथित पद्मचरितमें अनन्तबल केवलीके द्वारा धर्मोपदेशका निरूपण करनेवाला चौदहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१४॥
१५. पञ्चदशं पर्व (अञ्जनासुन्दरीविवाहाभिधानं)
तस्यैव च मुनेः पार्श्वे हनूमान् गृहिणां व्रतम् । विभीषणश्च जग्राह कृत्वा भावं सुनिश्चितम् ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर उन्हीं मुनिराजके पास हनुमान् और विभीषणने भी अभिप्रायको सुदृढ़ कर गृहस्थोंके व्रत ग्रहण किये ॥१॥
न तया गिरिराजस्य स्थिरत्वं शस्यते बुधैः । हनूमच्छीलसम्यक्त्वं यथा परमनिश्चलम् ॥२॥
अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि विद्वान् लोग सुमेरुपर्वतकी स्थिरताकी उस प्रकार प्रशंसा नहीं करते जिस प्रकार कि परमनिश्चलताको प्राप्त हुए हनुमान्के शील और सम्यग्दर्शनकी करते हैं ॥२॥
सौभाग्यादिमिरत्यन्तं हनूमति ततः स्तुते । इत्यूचे मगधाधीशो रोमाञ्चं बिभ्रदुत्कटम् ॥३॥
अर्थ: इस प्रकार जब गौतमस्वामीने सौभाग्य आदिके द्वारा हनुमान्की अत्यधिक प्रशंसा की तब उत्कट रोमांचको धारण करता हुआ श्रेणिक बोला कि ॥३॥
हनूमान् को गणाधीश किंविशिष्टः कुतः क्व वा । भगवन्नस्य तत्त्वेन ज्ञातुमिच्छामि चेष्टितम् ॥४॥
अर्थ: हे गणनाथ ! हनुमान् कौन ? इसकी क्या विशेषता है ? कहाँ किससे इसकी उत्पत्ति हुई है ? हे भगवन् ! मैं इसका चरित्र यथार्थमें जानना चाहता हूँ ॥४॥
ततः सत्पुरुषाभिख्यासंजातपुरुसंमदः । वाचाह्लादनकारिण्या गणप्राग्रहरोऽवदत् ॥५॥
अर्थ: तदनन्तर सत्पुरुषका नाम सुननेसे जिन्हें अत्यधिक हर्ष उत्पन्न हो रहा था ऐसे गणधर भगवान् आह्लाद उत्पन्न करनेवाली वाणीमें कहने लगे ॥५॥
दक्षिणस्यां नृप श्रेण्यां विजयार्धस्य भूभृतः । दशयोजनमध्वानमतिक्रम्य व्यवस्थितम् ॥६॥
आदित्यनगराभिख्यं पुरमस्ति मनोहरम् । प्रह्लादस्तत्र राजास्य नाम्ना केतुमती प्रिया ॥७॥
अर्थ: हे राजन् ! विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें दश योजनका मार्ग लांघकर आदित्यपुर नामक एक मनोहर नगर है । वहाँके राजा प्रह्लाद और उनकी रानीका नाम केतुमती था ॥६-७॥
शुभो वायुगतिर्नाम बभूव तनयोऽनयोः । लक्ष्म्या वक्षस्थलं यस्य विपुलं निलयीकृतम् ॥८॥
अर्थ: इन दोनोंके पवनगति नामका उत्तम पुत्र हुआ । पवनगतिके विशाल वक्षःस्थलको लक्ष्मीने अपना निवासस्थल बनाया था ॥८॥
संपूर्णयौवनं दृष्ट्वा तं तद्दारक्रियां प्रति । चकार जनकश्चिन्तां संतानच्छेदकातरः ॥९॥
अर्थ: उसे पूर्णयौवन देख, सन्तान-विच्छेदका भय रखनेवाले पिताने उसके विवाहकी चिन्ता की ॥९॥
आस्तां तावदिदं राजन्निदमन्यन्मतौ कुरु । वचनं येन तद्दारसंभवः परिकीर्त्यते ॥१०॥
अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! यह कथा तो अब रहने दो । दूसरी कथा हृदयमें धारण करो जिससे कि पवनगतिके विवाहकी चर्चा सम्भव हो सके ॥१०॥
वासस्य भरतस्यान्ते संनिकृष्टे महोदधेः । पूर्वदक्षिणदिग्भागे दन्तीत्यस्ति महीधरः ॥११॥
अर्थ: इसी भरत क्षेत्रके अन्तमें महासागरके निकट आग्नेय दिशामें एक दन्ती नामका पर्वत है ॥११॥
विपुलाभ्रंलिहोदारतेजःशिखरसंकटः । नानाद्रुमौषधिव्याप्तः सुनिर्झरमहातटः ॥१२॥
अर्थ: जो बड़ी-बड़ी गगनचुम्बी चमकीले शिखरोंसे युक्त है, नाना प्रकारके वृक्ष और औषधियोंसे व्याप्त है तथा जिसके लम्बे-चौड़े किनारे उत्तमोत्तम झरनोंसे युक्त हैं ॥१२॥
यतः प्रभृति तत्रास्थात्संनिवेश्य वरं पुरम् । विद्याधरो महेन्द्राख्यो महेन्द्रोपमविक्रमः ॥१३॥
तत आरभ्य संप्राप महेन्द्राख्यां रसाधरः । महेन्द्रनगरं तच्च पुरं तत्र प्रकीर्तितम् ॥१४॥
अर्थ: महेन्द्रके समान पराक्रमको धारण करनेवाला महेन्द्र विद्याधर उत्तम नगर बसाकर जबसे उस पर्वतपर रहने लगा था तभीसे उस पर्वतका ‘महेन्द्रगिरि’ नाम पड़ गया था और उस नगरका महेन्द्रनगर नाम प्रसिद्ध हो गया था ॥१३-१४॥
नार्यां हृदयवेगायामजायन्त महेन्द्रतः । गुणवन्तः शतं पुत्रा नामतोऽरिंदमादयः ॥१५॥
अर्थ: राजा महेन्द्रकी हृदयवेगा रानीमें अरिंदम आदि सौ गुणवान् पुत्र उत्पन्न हुए ॥१५॥
उदपाद्यनुजा तेषां कीर्तिताञ्जनसुन्दरी । त्रैलोक्यसुन्दरीरूपसंदोहेनैव निर्मिता ॥१६॥
अर्थ: उनके अंजनासुन्दरी नामसे प्रसिद्ध छोटी बहन उत्पन्न हुई । वह ऐसी जान पड़ती थी मानो तीन लोककी सुन्दर स्त्रियोंका रूप इकट्ठा कर उसके समूहसे ही उसकी रचना हुई थी ॥१६॥
नीलनीरजनिर्मासा प्रशस्तकरपल्लवा । पद्मगर्भाभचरणा कुम्भिकुम्भनिभस्तनी ॥१७॥
अर्थ: उसकी प्रभा नील कमलके समान सुन्दर थी, हस्तरूप पल्लव अत्यन्त प्रशस्त थे, चरण कमलके भीतरी भागके समान थे, स्तन हाथीके गण्डस्थलके तुल्य थे ॥१७॥
तनुमध्या पृथुश्रोणी सुजानूरूः सुलक्षणा । प्रफुल्लमालतीमालामृदुबाहुलतायुगा ॥१८॥
अर्थ: उसकी कमर पतली थी, नितम्ब स्थूल थे, जंघाएँ उत्तम घुटनोंसे युक्त थीं, उसके शरीरमें अनेक शुभ लक्षण थे, उसकी दोनों भुजलताएँ प्रफुल्ल मालतीकी मालाके समान कोमल थीं ॥१८॥
कर्णान्तसंगते कान्तिकृतपुङ्खे सुदूरगे । इषू ते कामदेवस्य ननु तस्या विलोचने ॥१९॥
अर्थ: कानों तक लम्बे एवं कान्तिरूपी मूठसे युक्त उसके दोनों नेत्र ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेवके सुदूरगामी बाण ही हों ॥१९॥
गन्धर्वादिकलाभिज्ञा साक्षादिव सरस्वती । लक्ष्मीरिव च रूपेण सा बभूव गुणान्विता ॥२०॥
अर्थ: वह गन्धर्व आदि कलाओंको जाननेवाली थी इसलिए साक्षात् सरस्वतीके समान जान पड़ती थी और रूपसे लक्ष्मीके तुल्य लगती थी ॥२०॥
अन्यदा कन्दुकेनासौ रममाणा सरेचकम् । जनकेनेक्षिताभ्यग्रयौवनाञ्चितविग्रहा ॥२१॥
सुलोचनासुताभर्तृवरचिन्तातिदुःखिनः । अकम्पननृपस्येव सद्गुणार्पितचेतसः ॥२२॥
तद्वरान्वेषणे तस्य ततः सक्तामवन्मतिः । अत्यन्तव्याकुलप्रायः कन्यादुःखं मनस्विनाम् ॥२३॥
अर्थ: इस प्रकार अनेक गुणोंसे सहित वह कन्या किसी समय गोलाकार भ्रमण करती हुई गेंद खेल रही थी कि पिताकी उसपर दृष्टि पड़ी । पिताने देखा कि कन्याका शरीर नव-यौवनसे सुशोभित हो रहा है । उसे देख जिस प्रकार उत्तम गुणोंमें चित्त लगानेवाले राजा अकम्पनको अपनी पुत्री सुलोचनाके योग्य वर ढूँढ़नेकी चिन्ता हुई थी और उससे वह अत्यन्त दुःखी हुआ था उसी प्रकार राजा महेन्द्रको भी पुत्रीके योग्य वर ढूँढ़नेकी चिन्ता हुई सो ठीक ही है क्योंकि स्वाभिमानी मनुष्योंको कन्याका दुःख अत्यन्त व्याकुलता उत्पन्न करनेवाला होता है ॥२१-२३॥
गमिष्यति पतिं श्लाघ्यं रमयिष्यति तं चिरम् । भविष्यत्युज्झिता दोषैरतिचिन्ता नृणां सुता ॥२४॥
अर्थ: कन्याके पिताको सदा यह चिन्ता लगी रहती है कि कन्या उत्तम पतिको प्राप्त होगी या नहीं, यह उसे चिरकाल तक रमण करा सकेगी या नहीं और निर्दोष रह सकेगी या नहीं । यथार्थमें पुत्री मनुष्यके लिए बड़ी चिन्ता है ॥२४॥
आहूय सुहृदः सर्वांस्ततो विज्ञानभूषणान् । राजा वरविनिश्चित्यै रहोगेहमशिश्रियत् ॥२५॥
अर्थ: अथानन्तर राजा महेन्द्र ज्ञानरूपी अलंकारसे अलंकृत समस्त मित्रजनोंको बुलाकर वरका निश्चय करनेके लिए एकान्त घरमें गये ॥२५॥
जगाद मन्त्रिणश्चैव महो निखिलवेदिनः । सूरयो मम कन्याया वदत प्रवरं वरम् ॥२६॥
अर्थ: वहाँ उन्होंने मन्त्रियोंसे कहा कि अहो मन्त्रिजनो ! आप लोग सब कुछ जानते हैं तथा विद्वान् हैं अतः मेरी कन्याके योग्य उत्तम वर बतलाइए ॥२६॥
तत्र मन्त्री जगादैकः कन्येयं भरताधिपे । योज्यतां रक्षसामीश इति मे निश्चितं मतम् ॥२७॥
अर्थ: तब एक मन्त्रीने कहा कि यह कन्या भरत क्षेत्रके स्वामी राक्षसोंके अधिपति रावणके लिए दी जानी चाहिए ऐसा मेरा निश्चित मत है ॥२७॥
रावणं स्वजनं प्राप्य सर्वविद्याधराधिपम् । जगत्यां सागरान्तायां प्रभावस्ते भ्रमिष्यति ॥२८॥
अर्थ: समस्त विद्याधरोंके स्वामी रावण जैसे स्वजनको पाकर आपका प्रभाव समुद्रान्त पृथिवीमें फैल जायेगा ॥२८॥
अथवेन्द्रजिते यूने मेघनादाय वा नृप । दीयतामेवमप्येष रावणस्तत्र बान्धवः ॥२९॥
अर्थ: अथवा हे राजन् ! रावणके पुत्र इन्द्रजित् और मेघनाद तरुण हैं सो इन्हें यह कन्या दीजिए क्योंकि उन्हें देनेपर भी रावण स्वजन होगा ॥२९॥
अथैतन्न तवाभीष्टं ततः कन्या स्वयंवरा । विमुच्यतां न वैरी ते तथा सत्युपजायते ॥३०॥
अर्थ: अथवा यह बात भी आपको इष्ट नहीं है तो फिर कन्याको स्वयं पति चुननेके लिए छोड़ दीजिए अर्थात् इसका स्वयंवर कीजिए । ऐसा करनेसे आपका कोई वैरी नहीं बन सकेगा ॥३०॥
इत्युक्त्वा विरतिं याते मन्त्रिण्यमरसागरे । विद्वान्सुमतिसंज्ञाको जगाद वचनं स्फुटम् ॥३१॥
अर्थ: इतना कहकर जब अमरसागर मन्त्री चुप हो गया तब सुमति नामका दूसरा विद्वान् मन्त्री स्पष्ट वचन बोला ॥३१॥
दशास्योऽनेकपत्नीको महाहङ्कारगोचरः । इमां प्राप्यापि नो तस्य प्रीतिरस्मासु जायते ॥३२॥
अर्थ: उसने कहा कि रावणके अनेक पत्नियाँ हैं, साथ ही वह महाअहंकारी है इसलिए इसे पाकर भी उसकी हम लोगोंमें प्रीति उत्पन्न नहीं होगी ॥३२॥
षोडशाब्दसमानेऽपि सत्याकारेऽस्य भोगिनः । उत्कृष्टमेव विज्ञेयं नयः परमतेजसः ॥३३॥
अर्थ: यद्यपि इस परम प्रतापी भोगी रावणका आकार सोलह वर्षके पुरुषके समान है तो भी उसकी आयु अधिक तो है ही ॥३३॥
इन्द्रजिन्मेघवाहाय सति दाने प्रकुप्यति । मेघवाहस्तथा तस्मै तस्मात्तावपि नो वरौ ॥३४॥
अर्थ: अतः इसके लिए कन्या देना मैं उचित नहीं समझता । दूसरा पक्ष इन्द्रजित् और मेघनादका रखा सो यदि मेघनादके लिए कन्या दी जाती है तो इन्द्रजित् कुपित होता है और इन्द्रजित्के लिए देते हैं जो मेघनाद कुपित होता है इसलिए ये दोनों वर भी ठीक नहीं हैं ॥३४॥
श्रीषेणसुतयोरासीद् गणिकार्थं तदा महत् । पितृदुःखकरं युद्धं स्त्रीहेतोः किं न वेष्यते ॥३५॥
अर्थ: पहले राजा श्रीषेणके पुत्रोंमें एक गणिकाके निमित्त पिताको दुःखी करनेवाला बड़ा युद्ध हुआ था यह सुननेमें आता है सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रीका निमित्त पाकर क्या नहीं होता है ? ॥३५॥
वाक्यं ततोऽनुमन्येदं नाम्ना ताराधरायणः । जगाद वचनं चैनं भावेन धृतमानसः ॥३६॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका हृदय सदभिप्रायसे युक्त था ऐसा ताराधरायण नामका मन्त्री, पूर्व मन्त्रीके वचनोंकी अनुमोदना कर इस प्रकारके वचन बोला ॥३६॥
नगाद्रिदक्षिणं स्थानं कनकं नाम विद्यते । राजा तत्र हिरण्याभः सुमनास्तस्य भामिनी ॥३७॥
अर्थ: उसने कहा कि विजयार्ध-पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक कनकपुर नामका नगर है । वहाँ राजा हिरण्याभ रहते हैं उनकी रानीका नाम सुमना है ॥३७॥
अभवत्तनयस्तस्य नाम्ना सौदामिनीप्रभः । महता यशसा कान्त्या वयसा चातिशोभनः ॥३८॥
अर्थ: उन दोनोंके विद्युत्प्रभ नामका पुत्र उत्पन्न हुआ है जो बहुत भारी यश, कान्ति और अवस्थासे अत्यन्त सुन्दर है ॥३८॥
सर्वविद्याकलापारो लोकनेत्रमहोत्सवः । गुणैरनुपमश्चेष्टारञ्जिताखिलविष्टपः ॥३९॥
अर्थ: वह समस्त विद्याओं और कलाओंका पारगामी है, लोगोंके नेत्रोंका मानो महोत्सव ही है, गुणोंसे अनुपम है, और अपनी चेष्टाओंसे उसने समस्त लोकको अनुरंजित कर रखा है ॥३९॥
सुरविद्याधरैः सर्वैरेकीभूयापि यत्नतः । अजय्यस्त्रिजगच्छक्तिसंग्रहेणेवे निर्मितः ॥४०॥
अर्थ: समस्त देव-विद्याधर एक होकर भी उसे प्रयत्नपूर्वक नहीं जीत सकते हैं । ऐसा जान पड़ता है कि मानो वह तीनों लोकोंकी शक्ति इकट्ठी कर ही बनाया गया है ॥४०॥
कन्येयं दीयतां तस्मै भवतां यदि संमतम् । चिरादुत्पद्यतां योगो दम्पत्योरनुरूपयोः ॥४१॥
अर्थ: यदि आपकी सम्मति हो तो यह कन्या उसे दी जावे जिससे योग्य दम्पतियोंका चिरकालके लिए संयोग उत्पन्न हो सके ॥४१॥
उत्तमाङ्गं ततो धूत्वा संमील्य नयने चिरम् । जगाद वचनं मन्त्री नाम्ना संदेहपारगः ॥४२॥
अर्थ: तदनन्तर सन्देहपारग नामका मन्त्री सिर हिलाकर तथा चिरकाल तक नेत्र बन्द कर निम्नांकित वचन बोला ॥४२॥
भव्योऽयं पूर्वजा याता मम क्वेति विचिन्तयत् । संसारप्रकृतिं बुद्ध्वा निर्वेदं परमेष्यति ॥४३॥
अर्थ: उसने कहा कि यह निकट भव्य है तथा निरन्तर ऐसा विचार करता रहता है कि मेरे पूर्वज कहाँ गये ? सो इससे जान पड़ता है कि यह संसारका स्वभाव जानकर परम वैराग्यको प्राप्त हो जायेगा ॥४३॥
विषयेष्वप्रसक्तात्मा वर्षेऽष्टादशसंख्यके । मङ्क्त्वा भोगमहालानं गृहितां परिहास्यति ॥४४॥
अर्थ: जिसकी आत्मा विषयोंमें अनासक्त रहती है ऐसा यह कुमार अठारह वर्षकी अवस्थामें भोगरूपी महाआलानका भंग कर गृहस्थ अवस्था छोड़ देगा ॥४४॥
बहिरन्तश्च स सङ्गं परित्यज्य महामनाः । केवलज्ञानमुत्पाद्य किल निर्वाणमेष्यति ॥४५॥
अर्थ: वह महामना बहिरंग और अन्तरंग परिग्रहका त्याग कर तथा केवलज्ञान उत्पन्न कर निर्वाणको प्राप्त होगा ॥४५॥
वियुक्तानेन बालेयं भ्रष्टशोभा भविष्यति । शर्वरीव शशाङ्केन जगदालोककारिणा ॥४६॥
अर्थ: सो जिस प्रकार जगत्को प्रकाशित करनेवाले चन्द्रमासे रहित होनेपर रात्रि शोभाहीन हो जाती है उसी प्रकार इससे वियुक्त होनेपर यह बाला शोभाहीन हो जावेगी ॥४६॥
श्रृणुतातोऽस्ति नगरमादित्यपुरसंज्ञकम् । पुरन्दरपुराकारं रत्नैरादित्यभासुरम् ॥४७॥
नभश्चरशशाङ्कोऽत्र प्रह्लादो नाम भोगवान् । तस्य केतुमती पत्नी केतुर्मानसवासिनः ॥४८॥
अर्थ: इसलिए मेरी बात सुनो, इन्द्रके नगरके समान सुन्दर तथा रत्नोंसे सूर्यके समान देदीप्यमान एक आदित्यपुर नामका नगर है इसमें प्रह्लाद नामका राजा रहता है जो भोगोंसे युक्त है तथा विद्याधरोंके बीच चन्द्रमाके समान जान पड़ता है । प्रह्लादकी रानी केतुमती है जो कि सौन्दर्यके कारण कामदेवकी पताकाके समान सुशोभित है ॥४७-४८॥
तयोर्विक्रमसंमारो रूपशीलो गुणाम्बुधिः । पवनञ्जयनामास्ति तनयो नयमण्डनः ॥४९॥
अर्थ: उन दोनोंके एक पवनंजय नामका पुत्र है जो अत्यन्त पराक्रमी, रूपवान्, गुणोंका सागर तथा नयरूपी आभूषणोंसे विभूषित है ॥४९॥
शुभलक्षणसंच्छन्नविशालोत्तुङ्गविग्रहः । कलानां निलयो वीरो दूरीभूतदुरीहितः ॥५०॥
अर्थ: उसका अतिशय ऊँचा शरीर अनेक शुभ लक्षणोंसे व्याप्त है, वह कलाओंका घर, शूरवीर तथा खोटी चेष्टाओंसे दूर रहनेवाला है ॥५०॥
संवत्सरशतेनापि यस्य वक्तुं न शक्यते । गुणग्रामोऽखिलः प्राप्तसमस्तजनचेतसः ॥५१॥
अर्थ: वह सब लोगोंके चित्तमें बसा हुआ है तथा सौ वर्षमें भी उसके समस्त गुणोंका समूह कहा नहीं जा सकता है ॥५१॥
अथवा वचनज्ञानमस्पष्टमुपजायते । अतो गत्वैव वीक्षध्वमिमं देवसमद्युतिम् ॥५२॥
अर्थ: अथवा वचनोंके द्वारा जो किसीका ज्ञान कराया जाता है वह अस्पष्ट ही रहता है इसलिए देवतुल्य कान्तिको धारण करनेवाले इस युवाको स्वयं जाकर ही देख लीजिए ॥५२॥
ततः कैतुमतस्योच्चैर्गुणैः श्रोत्रपथं गतैः । सर्वे ते परमं प्राप्ताः प्रमोदं कृतसंमदाः ॥५३॥
अर्थ: तदनन्तर कर्ण मार्गको प्राप्त हुए पवनंजयके उत्कृष्ट गुणोंसे सब लोग परम हर्षको प्राप्त हो आन्तरिक प्रसन्नता प्रकट करने लगे ॥५३॥
श्रुत्वा कन्यापि तां वार्तां विचकास प्रमोदतः । निशाकरकरालोकमात्रादिव कुमुद्वती ॥५४॥
अर्थ: तथा कन्या भी उस वार्ताको सुनकर हर्षसे इस तरह खिल उठी जिस तरह कि चन्द्रमाकी किरणोंको देखने मात्रसे कुमुदिनी खिल उठती है ॥५४॥
अत्रान्तरेऽत्ययं प्राप्तः कालो हिमकणान्वितः । कामिनीवदनाम्भोजलावण्यहरणोद्यतः ॥५५॥
अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें वसन्त ऋतु आयी और स्त्रियोंके मुख कमलकी सुन्दरताके अपहरणमें उद्यत शीतकाल समाप्त हुआ ॥५५॥
नवं पटलमब्जानां नलिनीनामजायत । चिरोत्कण्ठितमध्वाशसमूहकृतसङ्गमम् ॥५६॥
अर्थ: कमलिनी प्रफुल्लित हुई और नये कमलोंके समूह चिरकालसे उत्कण्ठित भ्रमर-समूहके साथ समागम करने लगे अर्थात् उनपर भ्रमरोंके समूह गूँजने लगे ॥५६॥
घनः शाखाभृतां जज्ञे पत्रपुष्पाङ्कुरोद्भवः । मधुलक्ष्मीपरिष्वङ्गसंजातपुलकाकृतिः ॥५७॥
अर्थ: वृक्षोंके पत्र, पुष्प, अंकुर आदि घनी मात्रामें उत्पन्न हुए जो ऐसे जान पड़ते थे मानो वसन्त लक्ष्मीके आलिंगनसे उनमें रोमांच ही उत्पन्न हुए हों ॥५७॥
चूतस्य मञ्जरीजालं मधुव्रतकृतस्वनम् । मनोलोकस्य विव्याध पटलं मारसायकम् ॥५८॥
अर्थ: जिनपर भ्रमर गुंजार कर रहे थे ऐसे आमके मौरोंके समूह कामदेवके बाणोंके पटलके समान लोगोंका मन बेधने लगे ॥५८॥
कोकिलानां स्वनश्चक्रे मानिनीमानमञ्जनः । जनस्य व्याकुलीभावं वसन्तालापतां गतः ॥५९॥
अर्थ: मानवती स्त्रियोंके मानको भंग करनेवाला कोकिलाओंका मधुर शब्द लोगोंको व्याकुलता उत्पन्न करने लगा । वह कोकिलाओंका शब्द ऐसा जान पड़ता था मानो उसके बहाने वसन्त ऋतु ही वार्तालाप कर रही हो ॥५९॥
रमणद्विजदष्टानामोष्ठानां वेदनाभृताम् । उदपद्यत वैशद्यं चिरेण वरयोषिताम् ॥६०॥
अर्थ: स्त्रियोंके जो ओठ पतिके दाँतोंसे डँसे जानेके कारण पहले वेदनासे युक्त रहते थे अब चिरकाल बाद उनमें विशदता उत्पन्न हुई ॥६०॥
स्नेहो बभूव चात्यन्तमन्योन्यं जगतः परम् । उपकारसमाधानपरेहाप्रकटीकृतः ॥६१॥
अर्थ: जगत्के जीवोंमें परस्पर बहुत भारी स्नेह प्रकट होने लगा । उनका यह स्नेह उपकारपरक चेष्टाओंसे स्पष्ट ही प्रकट हो रहा था ॥६१॥
भ्रमरीं भ्रमणश्रान्तां रमणः पक्षवायुना । परितो भ्रमणं कुर्वंश्चकार विगतश्रमाम् ॥६२॥
अर्थ: चारों ओर भ्रमण करता हुआ भ्रमर अपने पंखोंकी वायुसे, थकी हुई भ्रमरीको श्रमरहित करने लगा ॥६२॥
दूर्वाप्रवालमुद्धृत्य सारङ्गयै पृषतो ददौ । तस्यास्तेनामृतेनेव कापि प्रीतिरजायत ॥६३॥
अर्थ: उस समय हरिण दूर्वाके प्रवाल उखाड़-उखाड़कर हरिणीके लिए दे रहा था और उससे हरिणीको ऐसा प्रेम उत्पन्न हो रहा था मानो अमृत ही उसे मिल रहा हो ॥६३॥
कैरिकण्डूयनं रेजे वदनभ्रंशिपल्लवम् । करिण्याः सुखसंभारनिमीलितविलोचनम् ॥६४॥
अर्थ: हाथी हथिनीके लिए खुजला रहा था । इस कार्यमें उसके मुखका पल्लव छूटकर नीचे गिर गया था और हथिनीके नेत्र सुखके भारसे निमीलित हो गये थे ॥६४॥
स्तबकस्तननम्राभिश्चलत्पल्लवपाणिभिः । समालिङ्गयन्त वल्लीभिर्भ्रमराक्षीभिरङ्घ्रिपाः ॥६५॥
अर्थ: जो गुच्छेरूपी स्तनोंसे झुक रही थीं, जिनके पल्लवरूपी हाथ हिल रहे थे और ऊपर बैठे हुए भ्रमर ही जिनके नेत्र थे ऐसी लतारूपी स्त्रियाँ वृक्षरूप पुरुषोंका आलिंगन कर रही थीं ॥६५॥
दक्षिणाशामुखोद्गीर्णः प्रावर्तत समीरणः । प्रेर्यमाण इवानेन रविरासीदुदग्गतिः ॥६६॥
अर्थ: दक्षिण दिशाके मुखसे प्रकट हुआ मलय- समीर बहने लगा और सूर्य उत्तरायण हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो इस मलयसमीरसे प्रेरित होकर ही सूर्य उत्तरायण हो गया था ॥६६॥
समीरणकृताकम्पः केसरप्रकरः पतन् । मधुसिंहस्य पान्थेन ददृशे केसरोत्करः ॥६७॥
अर्थ: वायुसे हिलते हुए मौलश्रीके फूलोंका समूह नीचे गिर रहा था जिसे पथिक लोग ऐसा समझ रहे थे मानो वसन्तरूपी सिंहकी जटाओंका समूह ही हो ॥६७॥
दंष्ट्रा वसन्तसिंहस्य मानस्तम्बेरमाङ्कुशः । अङ्कोलकेशरं रेजे प्रोषितस्त्रीभयङ्करम् ॥६८॥
अर्थ: विरहिणी स्त्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाली अंकोल वृक्षके पुष्पोंकी केशर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो वसन्तरूपी सिंहकी दंष्ट्रा अर्थात् जबड़े ही हों अथवा मानरूपी हाथीका अंकुश ही हो ॥६८॥
घनं कैरवजं जालं क्वणद्भृङ्गकदम्बकम् । वियोगिनीमनांसीव मधुनाक्रष्टुमुज्झितम् ॥६९॥
अर्थ: जिसपर भ्रमर गूँज रहे थे ऐसा कुमुदोंका सघन जाल ऐसा जान पड़ता था मानो वियोगिनी स्त्रियोंके मनको खींचनेके लिए वसन्तने जाल ही छोड़ रखा था ॥६९॥
कुड्मलोद्दीपितोऽशोकः प्रचलन्नवपल्लवः । प्राचुर्याद्वनितोदीर्णरागराशिरिवाबभौ ॥७०॥
अर्थ: जिसके नये-नये पत्ते हिल रहे थे ऐसा बोंडियोंसे सुशोभित अशोकका वृक्ष ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अधिकताके कारण स्त्रियोंके द्वारा उगला हुआ रागका समूह ही हो ॥७०॥
किंशुकं घनमत्यन्तं दिदीपे वनराजिषु । वियोगिनीमनःस्थातिरिक्तदुःखानिलोपमम् ॥७१॥
अर्थ: वनश्रेणियोंमें पलाशके सघन वृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो विरहिणी स्त्रियोंके मनमें ठहरनेसे बाकी बचे हुए दुःखरूपी अग्निके समूह ही हों ॥७१॥
व्याप्तदिक्चक्रवालेन रजसा पुष्पजन्मना । वसन्तः पटवासेन चकारेव महोत्सवम् ॥७२॥
अर्थ: समस्त दिशाओंको व्याप्त करनेवाला फूलोंका पराग सब ओर फैल रहा था उससे ऐसा जान पड़ता था मानो वसन्त सुगन्धित चूर्णके द्वारा महोत्सव हो मना रहा था ॥७२॥
निमेषमपि सेहाते न स्त्रीपुंसावदर्शनम् । कुत एवान्यदेशेन संगमं प्रेमबन्धनौ ॥७३॥
अर्थ: जब प्रेमरूपी बन्धनसे बँधे स्त्री-पुरुष पल-भरके लिए भी एक दूसरेका अदर्शन नहीं सहन कर पाते थे तब अन्य देशमें गमन किस प्रकार सहन करते ? ॥७३॥
गन्तुमारेभिरे देवा जिनभक्तिप्रचोदिताः । नन्दीश्वरं महामोदाः फाल्गुनाष्टदिनोत्सवे ॥७४॥
अर्थ: फाल्गुन मासके अन्तिम आठ दिनमें आष्टाह्निक महोत्सव आया सो जिनभक्तिसे प्रेरित तथा महाहर्षसे भरे देव नन्दीश्वर द्वीपको जाने लगे ॥७४॥
जग्मुरष्टापदे तत्र काले विद्याधराधिपाः । पूजोपकरणव्यग्रकरभृत्यगणान्विताः ॥७५॥
अर्थ: उसी समय पूजाके उपकरणोंसे व्यग्र हाथोंवाले सेवकोंसे सहित विद्याधर राजा कैलास पर्वतपर गये ॥७५॥
पूज्यं नाभेयनिर्वृत्या तमद्रिं भक्तिनिर्भरः । समेतो बन्धुवर्गेण महेन्द्रोऽपि समीयिवान् ॥७६॥
अर्थ: वह पर्वत भगवान् ऋषभदेवके मोक्ष जानेसे अत्यन्त पूजनीय था इसलिए भक्तिसे भरा राजा महेन्द्र भी बन्धुवर्गके साथ वहाँ गया था ॥७६॥
स तत्र जिनमर्चित्वा स्तुत्वा नत्वा च भावतः । रौक्मे शिलातले श्रीमानासाञ्चक्रे यथासुखम् ॥७७॥
अर्थ: श्रीमान् वह राजा महेन्द्र वहाँपर जिन भगवान्की भावपूर्वक अर्चना, स्तुति एवं नमस्कार करके स्वर्णमय शिलातलपर सुखपूर्वक बैठ गया ॥७७॥
प्रह्लादोऽपि तदायासीत्तं गिरिं वन्दितुं जिनम् । कृताभीष्टं भ्रमन्नासीन्महेन्द्रेक्षणगोचरः ॥७८॥
अर्थ: उसी समय राजा प्रह्लाद भी जिनेन्द्र देवकी वन्दना करनेके लिए कैलास पर्वतपर गया था सो पूजाके अनन्तर भ्रमण करता हुआ राजा महेन्द्रको दिखाई दिया ॥७८॥
महेन्द्रस्य ततोऽभ्याशं सुतप्रीत्या महादरः । ससर्प विकसन्नेत्रः प्रह्लादः प्रीतिमानसः ॥७९॥
अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र विकसित हो रहे थे और मन प्रीतिसे भर रहा था ऐसा प्रह्लाद पुत्रकी प्रीतिसे बड़े आदरके साथ राजा महेन्द्रके पास गया ॥७९॥
अभ्युत्थाय महेन्द्रोऽपि मुदितः पुरुसंभ्रमः । आलिङ्गन्तं समालिङ्गत् प्रह्लादं ह्लादकारणम् ॥८०॥
अर्थ: सो हर्षसे भरे महेन्द्रने भी सहसा उठकर उसकी अगवानी की और आनन्दके कारण आलिंगन करते हुए प्रह्लादका आलिंगन किया ॥८०॥
उपविष्टौ च विश्रब्धौ तौ मनोज्ञशिलातले । परस्परं शरीरादिकुशलं पर्यपृच्छताम् ॥८१॥
अर्थ: तदनन्तर दोनों ही राजा निश्चित होकर मनोहर शिलातलपर बैठे और परस्पर शरीरादिकी कुशलता पूछने लगे ॥८१॥
उवाचेति महेन्द्रोऽथ सखे किं कुशलं मम । कन्यानुरूपसंबन्धचिन्ताव्याकुलितात्मनः ॥८२॥
अर्थ: अथानन्तर राजा महेन्द्रने कहा कि हे मित्र ! मेरा मन तो निरन्तर कन्याके अनुरूप सम्बन्ध ढूँढ़नेकी चिन्तासे व्याकुल रहता है अतः कुशलता कैसे हो सकती है ? ॥८२॥
अस्ति मे दुहिता योग्या वरं प्राप्तुं मनोहरा । कस्मै तां प्रददामीति मम भ्राम्यति मानसम् ॥८३॥
अर्थ: मेरी एक कन्या है जो वर प्राप्त करने योग्य अवस्थामें है, किसके लिए उसे दूँ इसी चिन्तामें मन घूमता रहता है ॥८३॥
रावणो बहुपत्नीकस्तत्सुतौ व्रजतो रुषम् । दानेनान्यतरस्यातो न तेषु रुचिरस्ति मे ॥८४॥
अर्थ: रावण बहुपत्नीक है अर्थात् अनेक पत्नियोंका स्वामी है और इसके पुत्र इन्द्रजित् तथा मेघनाद किसी एकके लिए देनेसे शेष रोषको प्राप्त होते हैं अतः उन तीनोंमें मेरी रुचि नहीं है ॥८४॥
पुरे हेमपुराभिख्ये तनयः कनकद्युतेः । विद्युत्प्रभो दिनैरल्पैर्निर्वाणं प्रतिपत्स्यते ॥८५॥
अर्थ: हेमपुर नगरमें राजा कनकद्युतिके विद्युत्प्रभ नामका पुत्र है सो वह थोड़े ही दिनोंमें निर्वाण प्राप्त करेगा ॥८५॥
मयेयं विदिता वार्ता प्रकटा सर्वविष्टपे । केनापि कथितं नूनं संज्ञानेनेति योगिना ॥८६॥
अर्थ: यह बात किसी सम्यग्ज्ञानी मुनिने कही है सो समस्त लोकमें प्रसिद्ध है और परम्परावश मुझे भी विदित हुई है ॥८६॥
मन्त्रिमण्डलयुक्तस्य ततो मम विनिश्चितः । पुत्रस्तव वरत्वेन निर्वाच्यः पवनञ्जयः ॥८७॥
अर्थ: अतः मन्त्रिमण्डलके साथ बैठकर मैंने निश्चय किया है कि आपके पुत्र पवनंजयको ही कन्याका वर चुनना चाहिए ॥८७॥
मनोरथोऽयमायाता त्वया प्रह्लाद पूरितः । समयेनास्मि संजातः क्षणेन परिनिर्वृतः ॥८८॥
अर्थ: सो हे प्रह्लाद ! यहाँ पधारकर तुमने मेरे इस मनोरथको पूर्ण किया है । मैं तुम्हें देखकर क्षण-भरमें ही सन्तुष्ट हो गया हूँ ॥८८॥
ततोऽवोचदलं प्रीतः प्रह्लादो लब्धवाञ्छितः । चिन्ता ममापि पुत्रस्य द्वितीयान्वेषणं प्रति ॥८९॥
अर्थ: तदनन्तर जिसे अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति हो रही है ऐसे प्रह्लादने बड़ी प्रसन्नतासे कहा कि पुत्रके अनुरूप वधू ढूँढ़नेकी मुझे भी चिन्ता है ॥८९॥
ततोऽहमपि वाक्येन त्वदीयेनामुना सुहृत् । शब्दगोचरतायुक्तां परिप्राप्तः सुखासिकाम् ॥९०॥
अर्थ: सो हे मित्र ! आपके इस वचनसे मैं जो शब्दोंसे न कही जाये ऐसी निश्चिन्तताको प्राप्त हुआ हूँ ॥९०॥
सरसो मानसाख्यस्य तटेऽथात्यन्तचारुणि । गुरुभ्यां वाञ्छितं कर्तुं तयोर्वैवाहमङ्गलम् ॥९१॥
अर्थ: अथानन्तर अंजना और पवनंजयके पिताने वहीं मानुषोत्तर पर्वतके अत्यन्त सुन्दर तटपर उनका विवाह-मंगल करनेकी इच्छा की ॥९१॥
स्थिते तत्रोभयोः सेने क्षणकल्पितसंश्रये । गजवाजिपदातीनामनुकूलरवाकुले ॥९२॥
अर्थ: इसलिए क्षण-भरमें ही जिनके डेरे-तम्बू तैयार हो गये थे तथा जो हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके अनुकूल शब्दोंसे व्याप्त था ऐसी उन दोनोंकी सेनाएँ वहीं ठहर गयीं ॥९२॥
दिनेषु त्रिषु यातेषु तयोः सांवत्सरा जगुः । कल्याणदिवसं ज्ञातनिखिलज्योतिरीहिताः ॥९३॥
अर्थ: समस्त ज्योतिषियोंकी गतिविधिको जाननेवाले ज्योतिषियोंने तीन दिन बीतनेके बाद विवाहके योग्य दिन बतलाया था ॥९३॥
श्रुत्वा परिजनादेतां सर्वावयवसुन्दरीम् । दिवसानां त्रयं सेहे न प्राह्लादिः प्रतीक्षितुम् ॥९४॥
अर्थ: पवनंजयने परिजनोंके मुखसे सुन रखा था कि अंजनासुन्दरी सर्वांगसुन्दरी है इसलिए उसे देखनेके लिए वह तीन दिनका व्यवधान सहन नहीं कर सका ॥९४॥
संगमोत्कण्ठितः सोऽयमेभिर्मन्मथसंभवैः । पूरितो दशभिर्वेगैर्भटो बाणैरिवाहवे ॥९५॥
अर्थ: निरन्तर समागमकी उत्कण्ठा रखनेवाला यह पवनंजय कामके दस वेगोंसे इस प्रकार पूर्ण हो गया जिस प्रकार कि युद्धमें कोई योद्धा शत्रुके बाणोंसे पूर्ण हो जाता है - भर जाता है ॥९५॥
आद्ये तद्विषया चिन्ता वेगे समुपजायते । द्वितीये द्रष्टुमाकारो बहिः समभिलष्यते ॥९६॥
अर्थ: प्रथम वेगमें उसे अंजनाविषयक चिन्ता होने लगी अर्थात् मनमें अंजनाकी इच्छा उत्पन्न हुई । दूसरे वेगके समय बाह्यमें उसकी आकृति देखनेकी इच्छा हुई ॥९६॥
तृतीये मन्ददीर्घोष्णनिःश्वासानां विनिर्गमः । चतुर्थे संज्वरो दृष्टज्वलनोपमचन्दनः ॥९७॥
अर्थ: तीसरे वेगमें मन्द-लम्बी और गरम साँसें निकलने लगीं । चौथे वेगमें ऐसा ज्वर उत्पन्न हो गया कि जिसमें चन्दन अग्निके समान सन्तापकारी जान पड़ने लगा ॥९७॥
विवर्तः पञ्चमेऽङ्गस्य कुसुमप्रस्तरादिषु । मन्यते विविधं स्वादु षष्ठे भक्तं विषोपमम् ॥९८॥
अर्थ: पंचम वेगमें उसका शरीर फूलोंकी शय्यापर करवटें बदलने लगा । छठें वेगमें अनेक प्रकारके स्वादिष्ट भोजनको वह विषके समान मानने लगा ॥९८॥
सप्तमे तत्कथासक्त्या विप्रलापसमुद्भवः । उन्मत्तताष्टमे गीतनृत्यविभ्रमकारिणी ॥९९॥
अर्थ: सातवें वेगमें उसीकी चर्चामें आसक्त रहकर विप्रलाप - बकवाद करने लगा । आठवें वेगमें उन्मत्तता प्रकट हो गयी जिससे कभी गाने लगता और कभी नाचने लगता था ॥९९॥
मदनोरगदष्टस्य नवमे मूर्च्छनोद्भवः । दशमे दुःखसंभारः स्वसंवेद्यः प्रवर्तते ॥१००॥
अर्थ: कामरूपी सर्पके द्वारा डसे हुए उस पवनंजयको नौवें वेगमें मूर्च्छा आने लगी और दसवें वेगमें जिसका स्वयं ही अनुभव होता था ऐसा दुःखका भार प्राप्त होने लगा ॥१००॥
विवेकिनोऽपि तस्येदं तदा जातमनङ्कुशम् । चरितं वायुवेगस्य हताशं धिगनङ्गकम् ॥१०१॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि वह पवनंजय विवेकसे युक्त था तो भी उस समय उसका चरित्र स्वच्छन्द हो गया था सो ऐसे दुष्ट कामके लिए धिक्कार हो ॥१०१॥
अथ चेतोभुवो वेगैरसौ धैर्यात्परिच्युतः । उद्वर्तितकरच्छन्ननिश्वासप्रचलाननः ॥१०२॥
अर्थ: अथानन्तर कामके उपर्युक्त वेगोंके कारण पवनंजयका धैर्य छूट गया । उसका मुख निरन्तर निकलनेवाले श्वासोच्छ्वासोंसे चंचल हो गया और वह उसे अपनी हथेलियोंसे ढँकने लगा ॥१०२॥
करसङ्गारुणीभूतस्वेदवद्गण्डमण्डलः । उष्णातिदीर्घनिश्वासग्लपितासनपल्लवः ॥१०३॥
अर्थ: वह स्वेदसे भरे अपने कपोलमण्डलको सदा हथेलीपर रखे रहता था जिससे उसमें लालिमा उत्पन्न हो गयी थी । वह शीतलता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे पल्लवोंके आसनपर बैठता था तथा उसे गरम-गरम लम्बी श्वासोंसे म्लान करता रहता था ॥१०३॥
जृम्भणं कम्पनं जम्भां मन्दं कुर्वन् पुनः पुनः । निःसहं धारयन्कायं गाढाकल्पकशल्यतः ॥१०४॥
अर्थ: बाणोंके गहरे प्रहारसे असहनीय कामको धारण करनेवाला वह पवनंजय बार-बार जमुहाई लेता था, बार-बार सिहर उठता था और बार-बार अँगड़ाई लेता था ॥१०४॥
रामामिध्यानतो मोघं हृषीकपटलं दधत् । मनोज्ञेष्वपि देशेषु महतीमधृतिं व्रजन् ॥१०५॥
अर्थ: निरन्तर स्त्रीका ध्यान रखनेसे उसकी इन्द्रियोंका समूह व्यर्थ हो गया था अर्थात् उसकी कोई भी इन्द्रिय अपना कार्य नहीं करती थी और अच्छे-से-अच्छे स्थानोंमें भी उसे धैर्य प्राप्त नहीं होता था - वह सदा अधीर ही बना रहता था ॥१०५॥
दधानः शून्यमात्मानं परित्यक्ताखिलक्रियः । क्षणमात्रधृतां भूयः परिमुञ्चन्नपत्रपाम् ॥१०६॥
अर्थ: उसने शून्य हृदय होकर सब काम छोड़ दिये थे । क्षण भरके लिए वह लज्जाको धारण करता भी था तो पुनः उसे छोड़ देता था ॥१०६॥
तनुभूतसमस्ताङ्गः परिभ्रष्टविभूषणः । दध्याविति सचिन्तेन परिवारेण वीक्षितः ॥१०७॥
अर्थ: जिसके समस्त अंग दुर्बल हो गये थे और जिसने सब आभूषण उतारकर अलग कर दिये थे ऐसा पवनंजय निरन्तर स्त्रीका ही ध्यान करता रहता था। परिवार-के लोग बड़ी चिन्तासे उसकी इस दशाको देखते थे ॥१०७॥
कदा नु तामहं कान्तां वीक्षे स्वाङ्कनिवेशिताम् । स्पृशन् कमलतुल्यानि गात्राणि कृतसंकथः ॥१०८॥
अर्थ: वह सोचा करता था कि मैं उस कान्ताको अपनी गोदमें बैठी कब देखूँगा और उसके कमलतुल्य शरीरका स्पर्श करता हुआ उसके साथ कब वार्तालाप करूँगा ॥१०८॥
श्रुत्वा तावदियं जाता ममावस्थातिदुःखदा । आलोक्य तां तु नो पश्यन् भवेयं पञ्चतां गतः ॥१०९॥
अर्थ: उसकी चर्चा सुनकर तो हमारी यह अत्यन्त दुःख देनेवाली अवस्था हो गयी है फिर साक्षात् देखकर तो न जाने क्या होगा ? उसे देखकर तो अवश्य ही मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगा ॥१०९॥
अहो महदिदं चित्रं मनोज्ञापि सखी मम । यदसौ दुःखभारस्य कारणत्वमुपागता ॥११०॥
अर्थ: अहो ! यह बड़ा आश्चर्य है कि वह मेरी सखी मनोहर होकर भी मेरे लिए दुःखका कारण बन रही है ॥११०॥
अयि भद्रे कथं यस्मिन्नुष्यते हृदये त्वया । दग्धुं तदेव सक्तासि पण्डिते दुःखवह्निना ॥१११॥
अर्थ: अरी भली आदमिन ? तू तो बड़ी पण्डिता है फिर जिस हृदयमें निवास कर रही है उसे ही दुःखरूपी अग्निसे जलानेके लिए तैयार क्यों बैठी है ॥१११॥
मृदुचित्ताः स्वभावेन भवन्ति किल योषितः । मद्दुःखदानतो जातं विपरीतमिदं तव ॥११२॥
अर्थ: स्त्रियाँ स्वभावसे ही कोमलचित्त होती हैं पर मेरे लिए दुःख देनेके कारण तुम्हारे विषयमें यह बात विपरीत मालूम होती है ॥११२॥
अनङ्गः सन् व्यथामेतामनङ्ग त्वं करोषि मे । यदि नाम भवेत्साङ्गस्ततः कष्टतमं भवेत् ॥११३॥
अर्थ: हे अनंग ! जब तुम शरीररहित होकर भी इतनी पीड़ा उत्पन्न कर सकते हो तब फिर यदि शरीरसहित होते तो बड़ा ही कष्ट होता ॥११३॥
क्षतं न चास्ति मे देहे वेदना च गरीयसी । तिष्ठन्नेकत्र चोद्देशे भ्रमामि क्वापि संततम् ॥११४॥
अर्थ: मेरे शरीरमें यद्यपि घाव नहीं है तो भी पीड़ा अत्यधिक हो रही है और यद्यपि एक स्थानपर बैठा हूँ तो भी निरन्तर कहीं घूमता रहता हूँ ॥११४॥
दिवसानां त्रयं नैतन्मम क्षेमेण गच्छति । यदि तां विषयीभावमानयामि न चक्षुषः ॥११५॥
अर्थ: यदि मैं उसे नेत्रोंका विषय नहीं बनाता हूँ - उसे देखता नहीं हूँ तो मेरे ये तीन दिन कुशलतापूर्वक नहीं बीत सकेंगे ॥११५॥
अतस्तद्दर्शनोपायः कतरो मे भविष्यति । यस्याधिगमतश्चित्तं प्रशान्तिमधियास्यति ॥११६॥
अर्थ: इसलिए उसके दर्शनका उपाय क्या हो सकता है जिसे प्राप्त कर चित्त शान्ति प्राप्त करेगा ॥११६॥
अथवा सर्वकार्येषु साधनीयेषु विष्टपे । मित्रं परममुज्झित्वा कारणं नान्यदीक्ष्यते ॥११७॥
अर्थ: अथवा इस संसारमें करने योग्य समस्त कार्योंमें परममित्रको छोड़कर और दूसरा कारण नहीं दिखाई देता ॥११७॥
इति ध्यात्वा स्थितं पार्श्वे छायाबिम्बमिवानुगम् । विक्रियातः समुत्पन्नं शरीरं स्वमिवापरम् ॥११८॥
नाम्ना प्रहसितं मित्रं सर्वविश्रम्भभाजनम् । मन्दगद्गदया वाचा जगाद पवनञ्जयः ॥११९॥
अर्थ: ऐसा विचारकर पवनंजयने पास ही बैठे हुए प्रहसित नामक मित्रसे धीमी एवं गद्गद वाणीमें कहा। वह मित्र छायाके समान सदा पवनंजयके साथ रहता था। विक्रियासे उत्पन्न हुए उन्हींके दूसरे शरीरके समान जान पड़ता था और सर्व विश्वासका पात्र था ॥११८-११९॥
जानास्येव ममाकूतमतः किं ते निवेद्यते । केवलं मुखरत्वं मे करोत्यत्यन्तदुःखिताम् ॥१२०॥
अर्थ: उसने कहा कि मित्र ! तुम मेरा अभिप्राय जानते ही हो अतः तुमसे क्या कहा जाये ? मेरी मुखरता केवल तुम्हें दुःखी ही करेगी ॥१२०॥
सखे कस्य वदान्यस्य दुःखमेतन्निवेद्यते । मुक्त्वा त्वां विदिताशेषजगत्त्रयविचेष्टितम् ॥१२१॥
अर्थ: हे सखे ! तीनों लोकोंकी समस्त चेष्टाओंको जाननेवाले एक आपको छोड़कर दूसरा ऐसा कौन उदारचेता है जिसके लिए यह दुःख बताया जाये ? ॥१२१॥
कुटुम्बी क्षितिपालाय गुरवेऽन्तेवसन् प्रिया । पत्यै वैद्याय रोगार्तो मात्रे शैशवसंगतः ॥१२२॥
निवेद्य मुच्यते दुःखाद्यथात्यन्तपुरोरपि । मित्रायैवं नरः प्राज्ञस्ततस्ते कथयाम्यहम् ॥१२३॥
अर्थ: जिस प्रकार गृहस्थ राजाके लिए, विद्यार्थी गुरुके लिए, स्त्री पतिके लिए, रोगी वैद्यके लिए और बालक माताके लिए प्रकटकर बड़े भारी दुःखसे छूट जाता है उसी प्रकार मनुष्य मित्रके लिए प्रकटकर दुःखसे छूट जाता है इसी कारण मैं आपसे कुछ कह रहा हूँ ॥१२२-१२३॥
श्रुत्वैव तामहं हृद्यां महेन्द्रतनुसंभवाम् । मन्मथस्य शरैर्दूरं विकलत्वमुपागतः ॥१२४॥
अर्थ: जबसे मैंने अनवद्य सुन्दरी राजा महेन्द्रकी पुत्रीकी चर्चा सुनी है तभीसे मैं कामके बाणोंसे अत्यधिक विकलता प्राप्त कर रहा हूँ ॥१२४॥
तामदृष्ट्वातिचक्षुष्यां प्रियां मानसहारिणीम् । अतिवाहयितुं नाहं प्रभवामि दिनत्रयम् ॥१२५॥
अर्थ: मनको हरनेवाली उस सुन्दरी प्रियाको देखे बिना मैं तीन दिन बितानेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥१२५॥
अतो विधत्स्व तं यत्नं येन पश्यामि तामहम् । तद्दर्शनादहं स्वस्थो मयि स्वस्थे भवानपि ॥१२६॥
अर्थ: इसलिए ऐसा प्रयत्न करो कि जिससे मैं उसे देख सकूँ। क्योंकि उसके देखनेसे मैं स्वस्थ हो सकूँगा और मेरे स्वस्थ रहनेसे आप भी स्वस्थ रह सकेंगे ॥१२६॥
जीवितं ननु सर्वस्यादिष्टं सर्वशरीरिणाम् । सति तत्रान्यकार्याणामात्मलामस्य संभवः ॥१२७॥
अर्थ: निश्चयसे सब प्राणियोंके लिए अन्य समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा अपना जीवन ही इष्ट होता है क्योंकि उसके रहते हुए ही अन्य कार्योंका होना सम्भव है ॥१२७॥
एवमुक्तस्ततोऽवोचदाशु प्रहसितो हसन् । लब्धार्थमिव कुर्वाणः सद्यो मित्रस्य मानसम् ॥१२८॥
अर्थ: तदनन्तर मित्रके मनको मानो कृतकृत्य करता हुआ प्रहसित हँसकर शीघ्र ही बोला ॥१२८॥
सखे किं बहुनोक्तेन कृत्यकालातिपातिना । वद किं करवाणीति ननु नान्यत्वमावयोः ॥१२९॥
अर्थ: कि हे मित्र ! करने योग्य कार्यका उल्लंघन करनेवाले बहुत कहनेसे क्या मतलब है कहो, मैं क्या करूँ ? यथार्थमें हम दोनोंमें पृथक्पना नहीं हैं ॥१२९॥
यावत्तयोः समालापो वर्ततेऽयं सुचित्तयोः । तावत्तदुपकारीव गतोऽस्तं घर्मदीधितिः ॥१३०॥
अर्थ: उत्तम चित्तके धारक उन मित्रोंके बीच जबतक यह वार्तालाप चलता है तबतक सूर्य अस्त हो गया सो मानो उनका उपकार करनेके लिए ही अस्त हो गया था ॥१३०॥
प्राह्लादेरिव रागेण संध्यालोकेन भानुमान् । प्रेरितो ध्वान्तसंभूतिमिच्छता प्रियकारिणा ॥१३१॥
अर्थ: जो पवनंजयके रागके समान लाल-लाल था, अन्धकारके प्रसारको चाहता था और प्रिय करनेवाला था ऐसे सन्ध्याके आलोकसे प्रेरित होकर ही मानो सूर्य अस्त हुआ था ॥१३१॥
कान्तया रहितस्यास्य दुःखं दृष्ट्वैव संध्यया । करुणायुक्तया भर्त्ता तेजसामनुवर्तितः ॥१३२॥
अर्थ: कान्तासे रहित पवनंजयका दुःख देखकर ही मानो जिसे करुणा उत्पन्न हो गयी थी ऐसी सन्ध्या अपना पति जो सूर्य सो उसके पीछे चलने लगी थी - उसके अनुकूल हो गयी थी ॥१३२॥
ततो भास्करनाथस्य वियोगादिव कृष्णताम् । आशा पौरन्दरी प्राप तमसात्यन्तभूरिणा ॥१३३॥
अर्थ: तदनन्तर पूर्व दिशा अत्यधिक अन्धकारसे कृष्णताको प्राप्त हो गयी सो मानो सूर्यरूप पतिके वियोगसे ही मलिन अवस्थाको प्राप्त हुई थी ॥१३३॥
नीलेनेव च वस्त्रेण क्षणाल्लोकस्तिरस्कृतः । रजो नीलाञ्जनस्येव प्रवृत्तं पतितुं घनम् ॥१३४॥
अर्थ: क्षण-भरमें लोक ऐसा दिखने लगा मानो नील वस्त्रसे ही आच्छादित हो गया हो अथवा नीलांजनकी सघन पराग ही सब ओर उड़-उड़कर गिरने लगी हो ॥१३४॥
ततः समुचिते काले तस्मिन् प्रस्तुतकर्मणः । इत्यवोचत सोत्साहः सुहृदं पवनंजयः ॥१३५॥
अर्थ: तदनन्तर जब प्रकृत कार्यके योग्य समय आ गया तब उत्साहसे भरे पवनंजयने मित्रसे इस प्रकार कहा ॥१३५॥
उत्तिष्ठाग्रे सखे तिष्ठ कुरु मार्गोपदेशनम् । व्रजावस्तत्र सा यत्र तिष्ठति स्वान्तहारिणी ॥१३६॥
अर्थ: हे मित्र ! उठो, मार्ग दिखलाओ, हम दोनों वहाँ चलें जहाँ कि वह हृदयको हरनेवाली विद्यमान है ॥१३६॥
इत्युक्ते प्रस्थितौ गन्तुं पूर्वप्रस्थितमानसौ । मीनाविव महानीलनीलव्योमतलार्णवे ॥१३७॥
अर्थ: इतना कहनेपर दोनों मित्र वहाँके लिए चल पड़े । उनके मन उनके जानेके पूर्व ही प्रस्थान कर चुके थे और वे महानील मणिके समान नील आकाशतलरूपी समुद्रमें मछलियोंकी तरह जा रहे थे ॥१३७॥
क्षणेन च परिप्राप्तौ गृहमाञ्जनसुन्दरम् । सुन्दरं तत्समासत्त्या रत्नौघसममन्दरम् ॥१३८॥
अर्थ: दोनों मित्र क्षण-भरमें ही अंजनासुन्दरीके घर जा पहुँचे । उसका वह घर अंजनासुन्दरीके सन्निधानसे ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसा कि रत्नोंके समूहसे सुमेरु पर्वत सुशोभित होता है ॥१३८॥
सप्तमं स्कन्धमारुह्य तस्य वातायनस्थितौ । मुक्ताजालतिरोधानावङ्गनां तामपश्यताम् ॥१३९॥
अर्थ: उस भवनके सातवें खण्डमें चढ़कर दोनों मित्र मोतियोंकी जालीसे छिपकर झरोखेमें बैठ गये और वहींसे अंजनासुन्दरीको देखने लगे ॥१३९॥
संपूर्णवक्त्रचन्द्रांशुविफलीकृतदीपिकाम् । सितासितारुणच्छायचक्षुःशारितदिङ्मुखाम् ॥१४०॥
अर्थ: वह अंजनासुन्दरी अपने मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमाकी किरणोंसे भवनके भीतर जलनेवाले दीपकोंको निष्फल कर रही थी तथा उसके सफेद, काले और लाल-लाल नेत्रोंकी कान्तिसे दिशाएँ रंग-बिरंगी हो रही थीं ॥१४०॥
आभोगिनौ समुत्तुङ्गौ प्रियार्थं हारिणौ कुचौ । कलशाविव बिभ्राणां शृङ्गाररसपूरितौ ॥१४१॥
अर्थ: वह स्थूल, उन्नत एवं सुन्दर स्तनोंको धारण कर रही थी उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो पतिके स्वागतके लिए श्रृंगार रससे भरे हुए दो कलश ही धारण कर रही थी ॥१४१॥
नवपल्लवसच्छायं पाणिपादं सुलक्षणम् । समुद्गिरदिवाभाति लावण्यं नखरश्मिभिः ॥१४२॥
अर्थ: नवीन पल्लवोंके समान लाल-लाल कान्तिको धारण करनेवाले तथा अनेक शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण उसके हाथ और पैर ऐसे जान पड़ते थे मानो नखरूपी किरणोंसे सौन्दर्यको ही उगल रहे हों ॥१४२॥
स्तनभारादिवोदारान्मध्यं भङ्गाभिशङ्कया । त्रिवलीदामभिर्बद्धं दधतीं तनुताभृतम् ॥१४३॥
अर्थ: उसकी कमर पतली तो थी ही ऊपरसे उसपर स्तनोंका भारी बोझ पड़ रहा है इसलिए वह कहीं टूट न जाये इस भयसे ही मानो उसे त्रिवलिरूपी रस्सियोंसे उसने कसकर बाँध रखा था ॥१४३॥
तूणौ मनोभुवः स्तम्भौ बन्धनं मदकामयोः । सुवृत्तौ बिभ्रतीमूरू नदौ लावण्यवाहिनौ ॥१४४॥
अर्थ: वह अंजना जिन गोल-गोल जाँघोंको धारण कर रही थी वे कामदेवके तरकसके समान, अथवा मद और कामके बाँधनेके स्तम्भके समान अथवा सौन्दर्यरूपी जलको बहानेवाली नदियोंके समान जान पड़ती थीं ॥१४४॥
इन्दीवरावलीछायां युक्तां मुक्ताफलोडुभिः । आसक्तां प्रियचन्द्रेण मूर्तामिव विभावरीम् ॥१४५॥
अर्थ: उसकी कान्ति इन्दीवर अर्थात् नील कमलोंके समूहके समान थी, वह मुक्ताफल-रूपी नक्षत्रोंसे सहित थी तथा पतिरूपी चन्द्रमा उसके पास ही विद्यमान था इसलिए वह मूर्तिधारिणी रात्रिके समान जान पड़ती थी ॥१४५॥
आसेचनकवीक्ष्यां तामेकतानस्थितेक्षणः । संप्राप्तः सुखितामुर्वीमैक्षिष्ट पवनंजयः ॥१४६॥
अर्थ: इस प्रकार जिसके देखनेसे तृप्ति ही नहीं होती थी ऐसी अंजनाको पवनंजय एकटक नेत्रोंसे देखता हुआ परम सुखको प्राप्त हुआ ॥१४६॥
अत्रान्तरे प्रियात्यन्तं वसन्ततिलकाभिधा । अभाषत सखी वाक्यमिदमञ्जनसुन्दरीम् ॥१४७॥
अहो परमधन्या त्वं सुरूपे भर्तृदारिके । पिता वायुकुमाराय यद्दत्तासि महौजसे ॥१४८॥
अर्थ: इसी बीचमें उसकी वसन्ततिलका नामकी अत्यन्त प्यारी सखीने अंजना सुन्दरीसे यह वचन कहे कि हे सुन्दरी ! राजकुमारी ! तुम बड़ी भाग्यशालिनी हो जो पिताने तुझे महाप्रतापी पवनंजयके लिए समर्पित किया है ॥१४७-१४८॥
गुणैस्तस्य जगत्सर्वं शशाङ्ककिरणामलैः । व्याप्तमन्यगुणख्यातितिरस्करणकारणैः ॥१४९॥
अर्थ: चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल एवं अन्य मनुष्योंके गुणोंकी ख्यातिको तिरस्कृत करनेवाले उसके गुणोंसे यह समस्त संसार व्याप्त हो रहा है ॥१४९॥
कलशब्दा महारत्नप्रभापटलरञ्जिता । अङ्के स्थास्यति वीरस्य तस्य वेलेव वारिधेः ॥१५०॥
अर्थ: बड़ी प्रसन्नताकी बात है कि तुम समुद्रकी बेलाके समान महारत्नोंकी कान्तिके समूहसे प्रभासित हो, मनोहर शब्द करती हुई उसकी गोदमें बैठोगी ॥१५०॥
पतिता वसुधारा त्वं तटे रत्नमहीभृतः । श्लाघ्यसंबन्धजस्तोषो वधूनाममवत्परः ॥१५१॥
अर्थ: तुम्हारा उसके साथ सम्बन्ध होनेवाला है सो मानो रत्नाचलके तटपर रत्नोंकी धारा ही बरसनेवाली है । यथार्थमें स्त्रियोंके प्रशंसनीय सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाला सन्तोष ही सबसे बड़ा सन्तोष होता है ॥१५१॥
कीर्तयन्त्यां गुणानेवं तस्य सख्या सुमानसा । लिलेख लज्जयाङ्गुल्या कन्याङ्घ्रिनखमानता ॥१५२॥
अर्थ: इस प्रकार जब सखी वसन्तमाला पवनंजयके गुणोंका वर्णन कर रही थी तब अंजना मन ही मन प्रसन्न हो रही थी और लज्जाके कारण मुख नीचा कर अँगुलीसे पैरका नख कुरेद रही थी ॥१५२॥
नितान्तं च हतो दूरं पूरेणानन्दवारिणः । विकसन्नयनाम्भोजच्छन्नास्यः पवनंजयः ॥१५३॥
अर्थ: और खिले हुए नेत्रकमलोंसे जिसका मुख व्याप्त था ऐसे पवनंजयको आनन्दरूपी जलका प्रवाह बहुत दूर तक बहा ले गया था ॥१५३॥
नाम्नाथ मिश्रकेशीति वाक्यं सख्यपरावदत् । संकुचत्पृष्ठबिम्बोष्ठं धूतधम्मिलपल्लवम् ॥१५४॥
अर्थ: अथानन्तर मिश्रकेशी नामक दूसरी सखीने निम्नांकित वचन कहे । कहते समय वह अपने लाल-लाल ओठोंको भीतरकी ओर संकुचित कर रही थी तथा सिर हिलानेके कारण उसकी चोटीमें लगा पल्लव नीचे गिर गया था ॥१५४॥
अहो परममज्ञानं त्वया कथितमात्मनः । विद्युत्प्रभं परित्यज्य वायोर्गृह्णासि यद्गुणान् ॥१५५॥
अर्थ: उसने कहा कि चूँकि तू विद्युत्प्रभको छोड़कर पवनंजयके गुण ग्रहण कर रही है इससे तूने अपना बड़ा अज्ञान प्रकट किया है ॥१५५॥
कथा विद्युत्प्रभस्यास्मिन्मया स्वामिगृहे श्रुता । तस्मै देया न देयेयं कन्येति मुहुरुद्गता ॥१५६॥
अर्थ: मैंने राजमहलोंमें विद्युत्प्रभकी चर्चा कई बार सुनी है कि उसके लिए यह कन्या दी जाये अथवा नहीं दी जाये ॥१५६॥
उदन्वदम्भसो बिन्दुसंख्यानं योऽवगच्छति । तद्गुणानां मतिः पारं व्रजेत्तस्यामलत्विषाम् ॥१५७॥
अर्थ: जो समुद्रके जलकी बूँदोंकी संख्या जानता है उसीकी बुद्धि उसके निर्मल गुणोंका पार पा सकती है ॥१५७॥
युवा सौम्यो विनीतात्मा दीप्तो धीरः प्रतापवान् । पारेविद्यं स्थितः सर्वजगद्वाञ्छितदर्शनः ॥१५८॥
अर्थ: वह युवा है, सौम्य है, नम्र है, कान्तिमान् है, धीर-वीर है, प्रतापी है, विद्याओंका पारगामी है और समस्त संसार उसके दर्शनकी इच्छा करता है ॥१५८॥
विद्युत्प्रभो भवेदस्याः कन्याया यदि पुण्यतः । भर्ता ततोऽनया लब्धं जन्मनोऽस्य फलं भवेत् ॥१५९॥
अर्थ: यदि पुण्ययोगसे विद्युत्प्रभ इस कन्याका पति होता तो इसे इस जन्मका फल प्राप्त हो जाता ॥१५९॥
वसन्तमालिके भेदो वायोर्विद्युत्प्रभस्य च । स गतो जगति ख्यातिं गोष्पदस्याम्बुधेश्च यः ॥१६०॥
अर्थ: हे वसन्तमालिके ! पवनंजय और विद्युत्प्रभके बीच संसारमें वही भेद प्रसिद्ध है जो कि गोष्पद और समुद्रके बीच होता है ॥१६०॥
असौ संवत्सरैरल्पैर्मुनितां यास्यतीति सः । अस्याः पित्रा परित्यक्तस्तन्मे नाभाति शोभनम् ॥१६१॥
अर्थ: वह थोड़े ही वर्षोंमें मुनिपद धारण कर लेगा इस कारण इसके पिताने उसकी उपेक्षा की है पर यह बात मुझे अच्छी नहीं मालूम होती ॥१६१॥
वरं विद्युत्प्रभेणामा क्षणोऽपि सुखकारणम् । सत्रानन्तोऽपि नान्येन कालः क्षुद्रासुधारिणा ॥१६२॥
अर्थ: विद्युत्प्रभके साथ इसका एक क्षण भी बीतता तो वह सुखका कारण होता और अन्य क्षुद्र प्राणीके साथ अनन्त भी काल बीतेगा तो भी वह सुखका कारण नहीं होगा ॥१६२॥
ततः प्राह्लादिरित्युक्ते क्रोधानलविदीपितः । क्षणाच्छायापरोवर्तं संप्राप्तः पुरुवेपथुः ॥१६३॥
अर्थ: तदनन्तर मिश्रकेशीके ऐसा कहते ही पवनंजय क्रोधाग्निसे देदीप्यमान हो गया, उसका शरीर काँपने लगा और क्षण-भरमें ही उसकी कान्ति बदल गयी ॥१६३॥
दष्टाधरः संमाकर्षन् सायकं परिवारतः । निरीक्षणस्फुरच्छोणच्छायाच्छन्नदिगाननः ॥१६४॥
अर्थ: ओठ चाबते हुए उसने म्यानसे तलवार बाहर खींच ली और नेत्रोंसे निकलती हुई लाल-लाल कान्तिसे दिशाओंका अग्र भाग व्याप्त कर दिया ॥१६४॥
ऊचे प्रहसितावश्यमस्या एवेदमीप्सितम् । कन्याया यद्वदत्येवमियं नारी जुगुप्सितम् ॥१६५॥
अर्थ: उसने मित्रसे कहा कि हे प्रहसित ! यह बात अवश्य ही इस कन्याके लिए इष्ट होगी तभी तो यह स्त्री इसके समक्ष इस घृणित बातको कहे जा रही है ॥१६५॥
लुनाम्यतोऽनयोः पश्य मूर्धानमुभयोरपि । विद्युत्प्रभोऽधुना रक्षां करोतु हृदयप्रियः ॥१६६॥
अर्थ: इसलिए देखो, मैं अभी इन दोनोंका मस्तक काटता हूँ। हृदयका प्यारा विद्युत्प्रभ इस समय इनकी रक्षा करे ॥१६६॥
समाकर्ण्य ततो वाक्यं मैत्रं प्रहसितो रुषा । जगाद भ्रकुटीबन्धभीषणालिकपट्टिकः ॥१६७॥
सखे सखेऽलमेतेन यत्नेनागोचरे तव । ननु ते सायकस्यारिनिरनाशः प्रयोजनम् ॥१६८॥
अर्थ: तदनन्तर मित्रके वचन सुनकर क्रोधसे जिसका ललाटतट भौंहोंसे भयंकर हो रहा था ऐसा प्रहसित बोला कि मित्र ! मित्र ! अस्थानमें यह प्रयत्न रहने दो। तुम्हारी तलवारका प्रयोजन तो शत्रुजनोंका नाश करना है न कि स्त्रीजनोंका नाश करना ॥१६७-१६८॥
अतः पश्यत वाक्रोशप्रसक्तां दुष्टयोषितम् । इमामेतेन दण्डेन करोमि गतजीविताम् ॥१६९॥
अर्थ: अतः देखो, निन्दामें तत्पर इस दुष्ट स्त्रीको मैं इन डण्डेसे ही निर्जीव किये देता हूँ ॥१६९॥
ततो दृष्ट्वास्य संरम्भं महान्तं पवनंजयः । विस्मृतात्मीयसंरम्भः खड्गं कोशं प्रतिक्षिपन् ॥१७०॥
अर्थ: तदनन्तर पवनंजय, प्रहसितके महाक्रोधको देखकर अपना क्रोध भूल गया, उसने तलवार म्यानमें वापस डाल ली ॥१७०॥
निजप्रकृतिसंप्राप्तिप्रवणाशेषविग्रहः । जगाद सुहृदं क्रूरकर्मनिश्चितमानसम् ॥१७१॥
अर्थ: और उसका समस्त शरीर अपने स्वभावकी प्राप्तिमें निपुण हो गया अर्थात् उसका क्रोध शान्त हो गया। तदनन्तर उसने क्रूर कार्यमें दृढ़ मित्रसे कहा ॥१७१॥
अयि मित्र शमं गच्छ तवाप्येष न गोचरः । कोपस्यानेकसंग्रामजयोपार्जनशालिनः ॥१७२॥
अर्थ: कि हे मित्र ! शान्तिको प्राप्त होओ। अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त करनेसे सुशोभित रहनेवाले तुम्हारे क्रोधका भी ये स्त्रियाँ विषय नहीं हैं ॥१७२॥
इतरस्यापि नो युक्तं कर्तुं नारीविपादनम् । किं पुनस्तव मत्तेभकुम्भदारणकारिणः ॥१७३॥
अर्थ: अन्य मनुष्यके लिए भी स्त्रीजनका घात करना योग्य नहीं है फिर तुम तो मदोन्मत्त हाथियोंके गण्डस्थल चीरनेवाले हो अतः तुम्हें युक्त कैसे हो सकता है ? ॥१७३॥
पुंसां कुलप्रसूतानां गुणख्यातिमुपेयुषाम् । यशो मलिनताहेतुं कर्तुमेवमसांप्रतम् ॥१७४॥
अर्थ: उच्च कुलमें उत्पन्न तथा गुणोंकी ख्यातिको प्राप्त पुरुषोंके लिए इस प्रकार यशकी मलिनता करनेवाला कार्य करना योग्य नहीं है ॥१७४॥
तस्मादुत्तिष्ठ गच्छावस्तेनैव पुनरध्वना । विचित्रा चेतसो वृत्तिर्जनस्यात्र न कुप्यते ॥१७५॥
अर्थ: इसलिए उठो उसी मार्गसे पुनः वापस चलें। मनुष्यकी मनोवृत्ति भिन्न प्रकारकी होती है अतः उसपर क्रोध करना उचित नहीं है ॥१७५॥
नूनमस्याः प्रियोऽसौ ना कन्याया येन पार्श्वगाम् । मज्जुगुप्सनसंसक्तां न मनागप्यवीवदत् ॥१७६॥
अर्थ: निश्चित ही वह विद्युत्प्रभ इस कन्याके लिए प्यारा होगा तभी तो पास बैठकर मेरी निन्दा करनेवाली इस स्त्रीसे उसने कुछ नहीं कहा ॥१७६॥
ततः समागतौ ज्ञातौ न केनचिदिमौ भृशम् । स्वैरं निःसृत्य निर्य्यूहाद् गतौ वसतिमात्मनः ॥१७७॥
अर्थ: तदनन्तर जिनके आनेका किसीको कुछ भी पता नहीं था ऐसे दोनों मित्र झरोखेसे बाहर निकलकर अपने डेरेमें चले गये ॥१७७॥
ततः परममापन्नो विरागं पवनंजयः । इति चिन्तनमारेभे प्रशान्तहृदयो भृशम् ॥१७८॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका हृदय अत्यन्त शान्त था ऐसा पवनंजय परम वैराग्यको प्राप्त होकर इस प्रकार विचार करने लगा कि ॥१७८॥
संदेहविषमावर्ता दुर्भावग्रहसंकुला । दूरतः परिहर्तव्या पररक्ताङ्गनापगा ॥१७९॥
अर्थ: जिसमें सन्देहरूपी विषम भँवरें उठ रही हैं और जो दुष्टभावरूपी मगरमच्छोंसे भरी हुई हैं ऐसी पर-पुरुषासक्त स्त्रीरूपी नदीका दूरसे ही परित्याग करना चाहिए ॥१७९॥
कुभावगहनात्यन्तं हृषीकव्यालजालिनी । बुधेन नार्यरण्यानी सेवनीया न जातुचित् ॥१८०॥
अर्थ: जो खोटे भावोंसे अत्यन्त सघन है तथा जिसमें इन्द्रियरूपी दुष्ट जीवोंका समूह व्याप्त है ऐसी यह स्त्री एक बड़ी अटवीके समान है, विद्वज्जनोंको कभी इसकी सेवा नहीं करनी चाहिए ॥१८०॥
किं राजसेवनं शत्रुसमाश्रयसमागमम् । श्लथं मित्रं स्त्रियं चान्यसक्तां प्राप्य कुतः सुखम् ॥१८१॥
अर्थ: जिसका अपने शत्रुके साथ सम्पर्क है ऐसे राजाकी सेवा करनेसे क्या लाभ है ? इसी प्रकार शिथिल मित्र और परपुरुषासक्त स्त्रीको पाकर सुख कहाँसे हो सकता है ? ॥१८१॥
इष्टान् बन्धून् सुतान् दारान् बुधा मुञ्चन्त्यसत्कृताः । पराभवजलाध्माताः क्षुद्राः नश्यन्ति तत्र तु ॥१८२॥
अर्थ: जो विज्ञ पुरुष हैं वे अनादृत होनेपर इष्ट-मित्रों, बन्धुजनों, पुत्रों और स्त्रियोंको छोड़ देते हैं पर जो क्षुद्र मनुष्य हैं वे पराभवरूपी जलमें डूबकर वहीं नष्ट हो जाते हैं ॥१८२॥
मदिरारागिणं वैद्यं द्विपं शिक्षाविवर्जितम् । अहेतुवैरिणं क्रूरं धर्मं हिंसनसंगतम् ॥१८३॥
मूर्खगोष्ठी कुमर्यादं देशं चण्डं शिशुं नृपम् । वनितां च परासक्तां सूरिर्दूरेण वर्जयेत् ॥१८४॥
अर्थ: मदिरापानमें राग रखनेवाला वैद्य, शिक्षा रहित हाथी, अहेतुक वैरी, हिंसापूर्ण दुष्ट धर्म, मूर्खोंकी गोष्ठी, मर्यादाहीन देश, क्रोधी तथा बालक राजा और परपुरुषासक्त स्त्री - बुद्धिमान् मनुष्य इन सबको दूरसे ही छोड़ देवे ॥१८३-१८४॥
एवं चिन्तयतस्तस्य कन्याप्रीतिरिवागता । क्षयं विभावरी तूर्यमाहतं च प्रबोधकम् ॥१८५॥
अर्थ: ऐसा विचार करते हुए पवनंजयकी रात्रि कन्याकी प्रीतिके समान क्षयको प्राप्त हो गयी और जगानेवाले बाजे बज उठे ॥१८५॥
ततः संध्याप्रकाशेन कौशिकीर्या दिगावृता । पवनंजयनिर्मुक्तरागेणेव निरन्तरम् ॥१८६॥
अर्थ: तदनन्तर सन्ध्याकी लालीसे पूर्व दिशा आच्छादित हो गयी सो ऐसी जान पड़ती थी मानो पवनंजयके द्वारा छोड़े हुए रागसे ही निरन्तर आच्छादित हो गयी थी ॥१८६॥
उदियाय च तिग्मांशुः स्त्रीकोपादिव लोहितम् । दधानस्तरलं बिम्बं जगच्चेष्टितकारणम् ॥१८७॥
अर्थ: और जो स्त्रीके क्रोधके कारण ही मानो लाल-लाल दिख रहा था तथा जो जगत्की चेष्टाओंका कारण था ऐसे चंचल बिम्बको धारण करता हुआ सूर्य उदित हुआ ॥१८७॥
ततो वहन्विरागेण नितान्तमलसां तनुम् । ऊचे प्रहसितं जायाविमुखः पवनंजयः ॥१८८॥
अर्थ: तदनन्तर विरागके कारण अत्यन्त अलस शरीरको धारण करता स्त्रीविमुख पवनंजय प्रहसित मित्रसे बोला कि ॥१८८॥
सखेऽत्र न समीपेऽपि युज्यतेऽवस्थितिर्मम । तत्सक्तपवनासंगो माभूदिति ततः शृणु ॥१८९॥
उत्तिष्ठ स्वपुरं यामो न युक्तमवलम्बनम् । सेना प्रयाणशङ्खेन कार्यतामवबोधिनी ॥१९०॥
अर्थ: हे मित्र ! उससे सम्पर्क रखनेवाली वायुका स्पर्श न हो जाये इसलिए यहाँ समीपमें भी मेरा रहना उचित नहीं है अतः सुनो और उठो-अपने नगरकी ओर चलें, यहाँ विलम्ब करना उचित नहीं है। प्रस्थान कालमें बजनेवाले शंखसे सेनाको सावधान कर दो ॥१८९-१९०॥
तथेति कारिते तेन क्षुब्धसागरसंनिभा । चचाल सा चमूः क्षिप्रं कृतयानोचितक्रिया ॥१९१॥
अर्थ: तदनन्तर शंखध्वनि होनेपर जो क्षुभित सागरके समान जान पड़ती थी तथा जिसने प्रस्थान कालके योग्य सर्व कार्य कर लिये थे ऐसी सेना शीघ्र ही चल पड़ी ॥१९१॥
ततो रथाश्वमातङ्गपादातप्रभवो महान् । शब्दो भेर्यादिजन्मा च कन्यायाः श्रवणेऽविशत् ॥१९२॥
अर्थ: तत्पश्चात् रथ, घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही और भेरी आदिसे उत्पन्न हुआ शब्द कन्याके कानमें प्रविष्ट हुआ ॥१९२॥
प्रयाणसूचिना तेन नितान्तं दुःखिताभवत् । विशता मुद्गराघातवेगतः शङ्कुनेव सा ॥१९३॥
अर्थ: प्रस्थानको सूचित करनेवाले उस शब्दसे कन्या अत्यन्त दुःखी हुई मानो मुद्गर प्रहार सम्बन्धी वेगसे प्रवेश करनेवाली कीलसे पीड़ित ही हुई थी ॥१९३॥
अचिन्तयच्च हा कष्टं दत्त्वा मे विधिना हृतम् । निधानं किं करोम्यत्र कथमेतद्भविष्यति ॥१९४॥
अर्थ: वह विचार करने लगी कि हाय-हाय, बड़े खेदकी बात है कि विधाताने मेरे लिए खजाना देकर छीन लिया। मैं क्या करूँ ? अब कैसा क्या होगा ? ॥१९४॥
अङ्केऽस्य पुरुषेन्द्रस्य क्रीडिष्यामीति ये कृताः । तेऽन्यथैव परावृत्ता मन्दाया मे मनोरथाः ॥१९५॥
अर्थ: इस श्रेष्ठ पुरुषकी गोदमें क्रीड़ा करूँगी इस प्रकारके जो मनोरथ मैंने किये थे मुझ अभागिनीके वे सब मनोरथ अन्यथा ही परिणत हो गये और रूप ही बदल गये ॥१९५॥
क्रियमाणमिमं ज्ञात्वा कथंचिन्निन्दमेतया । वैरिणीभूतया सख्या मयि स्याद् द्वेषमागतः ॥१९६॥
अर्थ: इस वैरिन सखीने जो उनकी निन्दा की थी जान पड़ता है.कि किसी तरह उन्हें इसका ज्ञान हो गया है इसीलिए वे मुझपर द्वेष करने लगे हैं ॥१९६॥
विवेकरहितामेतां धिक्पापां क्रूरभाषिणीम् । यथा मे दयितोऽवस्थामीदृशीमेष लम्भितः ॥१९७॥
अर्थ: विवेकरहित, पापिनी तथा क्रूर वचन बोलनेवाली इस सखीको धिक्कार है जिसने कि मेरे प्रियतमको यह अवस्था प्राप्त करा दी ॥१९७॥
कुर्यान्मह्यं हितं तातो जीवितेशं निवर्तयेत् । अपि नाम भवेदस्य बुद्धिर्व्यावर्तनं प्रति ॥१९८॥
अर्थ: पिताजी यदि हृदयवल्लभको लौटा सकें तो मेरा बड़ा हित करेंगे और क्या इनकी भी लौटनेकी बुद्धि होगी ॥१९८॥
तत्त्वतो यदि नाथो मे परित्यागं करिष्यति । आहारवर्जनं कृत्वा ततो यास्यामि पञ्चताम् ॥१९९॥
अर्थ: यदि सचमुच ही हृदयवल्लभ मेरा परित्याग करेंगे तो मैं आहार त्याग कर मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी ॥१९९॥
इति संचिन्तयन्ती सा प्राप्ता मूर्च्छां महीतले । पपाताश्चर्यनिर्मुक्ता लूनमूललता यथा ॥२००॥
अर्थ: इस प्रकार विचार करती हुई अंजना मूर्छित हो छिन्नमूल लताके समान पृथिवीपर गिर पड़ी ॥२००॥
ततः किमिदमित्युक्त्वा संभ्रमं परमागते । शीतलक्रियया सख्यौ चक्रतुस्तां विमूर्च्छिताम् ॥२०१॥
अर्थ: तदनन्तर ‘यह क्या है ?’ ऐसा कहकर परम उद्वेगको प्राप्त हुई दोनों सखियोंने शीतलोपचारसे उसे मूर्छारहित किया ॥२०१॥
पृच्छयमाना च यत्नेन मूर्च्छाहेतुं श्लथाङ्गिका । शशाक त्रपया वक्तुं न सा स्तिमितलोचना ॥२०२॥
अर्थ: उस समय उसका समस्त शरीर ढीला हो रहा था और नेत्र निश्चल थे। सखियोंने प्रयत्नपूर्वक उससे मूर्छाका कारण पूछा पर वह लज्जाके कारण कुछ कह न सकी ॥२०२॥
अथ वायुकुमारस्य सेनायामिति मानवाः । आकुला मानसे चक्रुरहेतुगतिविस्मिताः ॥२०३॥
अविधायेप्सितं कस्मादयं गन्तुं समुद्यतः । कोपोऽस्य जनितः केन केन वा चोदितोऽन्यथा ॥२०४॥
अर्थ: अथानन्तर वायुकुमार ( पवनंजय ) की सेनाके लोग इस अकारण गमनसे चकित हो बड़ी आकुलताके साथ-मनमें विचार करने लगे कि यह कुमार इच्छित कार्यको पूरा किये बिना ही जानेके लिए उद्यत क्यों हो गया है ? इसे किसने क्रोध उत्पन्न कर दिया ? अथवा किसने इसे विपरीत प्रेरणा दी है ? ॥२०३-२०४॥
विद्यते सर्वमेवास्य कन्योपादानकारणम् । अतः किमित्ययं कस्मादभूदपगताशयः ॥२०५॥
अर्थ: इसके कन्या ग्रहण करनेकी समस्त तैयारी है ही फिर यह किस कारण उदासीन हो गया है ? ॥२०५॥
हसित्वा केचिदित्यूचुर्नामास्येदं सहार्थकम् । पवनंजय इत्येष यस्माज्जेतास्य वेगतः ॥२०६॥
अर्थ: कितने ही लोग हँसकर कहने लगे कि चूँकि इसने वेगसे पवनको जीत लिया है इसलिए इसका ‘पवनंजय’ यह नाम सार्थक है ॥२०६॥
ऊचुरन्येऽयमद्यापि न जानात्यङ्गनारसम् । नूनं येन विहायेमां कन्यां गंतुं समुद्यतः ॥२०७॥
अर्थ: कुछ लोग कहने लगे कि यह अभी तक स्त्रीका रस जानता नहीं है इसीलिए तो यह इस कन्याको छोड़कर जानेके लिए उद्यत हुआ है ॥२०७॥
यदि स्यादस्य विज्ञाता रतिः परमुदारजा । बद्धः स्यात्प्रेमबन्धेन ततो वनगजो यथा ॥२०८॥
अर्थ: यदि इसे उत्तम रतिका ज्ञान होता तो यह जंगली हाथीके समान उसके प्रेमपाशमें सदा बँधा रहता ॥२०८॥
इत्युपांशुकृतालापसामन्तशतमध्यगः । वेगवद्वाहनो गन्तुं प्रवृत्तः पवनंजयः ॥२०९॥
अर्थ: इस प्रकार एकान्तमें वार्तालाप करनेवाले सैकड़ों सामन्तोंके बीच खड़ा हुआ पवनंजय वेगशाली वाहनपर आरूढ हो चलनेके लिए प्रवृत्त हुआ ॥२०९॥
ततः कन्यापिता ज्ञात्वा प्रयाणं तस्य संभ्रमात् । समस्तैर्बन्धुभिः सार्धमाजगाम समाकुलैः ॥२१०॥
अर्थ: तदनन्तर जब कन्याके पिताको इसके प्रस्थानका पता चला तब वह हड़बड़ाकर घबड़ाये हुए समस्त बन्धुजनोंके साथ वहाँ आया ॥२१०॥
प्रह्लादेन समं तेन ततोऽसावित्यभाष्यत । भद्रेदं गमनं कस्मात्क्रियते शोककारणम् ॥२११॥
ननु केन किमुक्तोऽसि कस्य नेष्टोऽसि शोभन । चिन्तयत्यपि नो कश्चिद्यत्ते बुध न रोचते ॥२१२॥
अर्थ: उसने प्रह्लादके साथ मिलकर कुमारसे इस प्रकार कहा कि हे भद्र ! शोकका कारण जो यह गमन है सो किसलिए किया जा रहा है ? आपसे किसने क्या कह दिया ? हे भद्र पुरुष ! आप किसे प्रिय नहीं हैं ? हे विद्वन् ! जो बात आपके लिए नहीं रुचती हो उसका तो यहां कोई विचार ही नहीं करता ॥२११-२१२॥
पितुर्मम च ते वाक्यं दोषे सत्यपि युज्यते । कर्तुं किमुत निःशेषदोषसङ्गविवर्जितम् ॥२१३॥
अर्थ: दोष रहते हुए भी आपको मेरे तथा पिताके वचन मानना उचित है फिर यह कार्य तो समस्त दोषोंसे रहित है अतः इसका करना अनुचित कैसे हो सकता है ? ॥२१३॥
ततः सूरे निवर्तस्व क्रियतां नौवमीप्सितम् । भवादृशां गुरोराज्ञा नन्वानन्दस्य कारणम् ॥२१४॥
अर्थ: इसलिए हे विद्वन् ! लौटो और हम दोनोंका मनोरथ पूर्ण करो । आप जैसे पुरुषोंके लिए पिताकी आज्ञा तो आनन्दका कारण होना चाहिए ॥२१४॥
इत्युक्त्वापत्यरागेण वीरो विनतमस्तकः । श्वसुरेण धृतः पाणौ जनकेन च सादरम् ॥२१५॥
अर्थ: इतना कहकर श्वसुर तथा पिताने सन्तानके राग वश नतमस्तक वीर पवनंजयका बड़े आदरसे हाथ पकड़ा ॥२१५॥
ततस्तद्गौरवं भङ्क्तुमसमर्थो न्यवर्तत । दध्याविति च कन्यायाः कोपाद्दुःखस्य कारणम् ॥२१६॥
अर्थ: तत्पश्चात् 'श्वसुर और पिताके गौरवका भंग करनेके लिए असमर्थ होता हुआ पवनंजय वापिस लौट आया और क्रोधवश कन्याको दुःख पहुँचानेवाले कारणका इस प्रकार विचार करने लगा ॥२१६॥
समुह्य शातयाम्येनां दुःखेनासङ्गजन्मना । येनान्यतोऽपि नैवेषा प्राप्नोति पुरुषात्सुखम् ॥२१७॥
अर्थ: अब मैं इस कन्याको विवाह कर असमागमसे उत्पन्न दुःखके द्वारा सदा दुःखी करूँगा । क्योंकि विवाहके बाद यह अन्य पुरुषसे भी सुख प्राप्त नहीं कर सकेगी ॥२१७॥
चकार विदितार्थं च मित्रं तेने च भाषितः । साधु ते विदितं बुद्ध्या मयाप्येतन्निरूपितम् ॥२१८॥
अर्थ: पवनंजयने अपना यह विचार मित्रके लिए बतलाया और उसने भी उत्तर दिया कि ठीक है यही बात मैं कह रहा था जिसे तुमने अपनी बुद्धिसे स्वयं समझ लिया ॥२१८॥
निवृत्तं दयितं श्रुत्वा कन्यायाः संमदोऽभवत् । निरन्तरसमुद्भिन्नरोमाञ्चाशेषविग्रहः ॥२१९॥
अर्थ: प्रियतमको लौटा सुनकर कन्याको बहुत हर्ष हुआ । उसके समस्त शरीरमें रोमांच निकल आये ॥२१९॥
ततः समयमासाद्य तयोर्वैवाहमङ्गलम् । प्रस्तुतं बन्धुभिः कर्तुं प्राप्तसर्वसमीहितम् ॥२२०॥
अर्थ: तदनन्तर समय पाकर बन्धुजनोंने दोनोंका विवाहरूप मंगल किया जिससे सबके मनोरथ पूर्ण हुए ॥२२०॥
अशोकपल्लवस्पर्शः कन्यायाः स करोऽभवत् । विरक्तचेतसस्तस्य कृशानुरशनोपमः ॥२२१॥
अर्थ: यद्यपि कन्याका हाथ अशोकपल्लवके समान शीत स्पर्शवाला था पर उस विरक्त चित्तके लिए वह अग्निकी मेखलाके समान अत्यन्त उष्ण जान पड़ा ॥२२१॥
अनिच्छतो गता दृष्टिः कथंचित्तस्य तत्तनौ । क्षणमात्रमपि स्थातुं न सेहे तुल्यविद्युति ॥२२२॥
अर्थ: बिजली-की तुलना करनेवाले अंजनाके शरीरपर किसी तरह इच्छाके बिना ही पवनंजयकी दृष्टि गयी तो सही पर वह उसपर क्षण भरके लिए भी नहीं ठहर सकी ॥२२२॥
एष भावं न वेत्तास्या इति विज्ञाय पावकः । स्फुटल्लाजसमूहेन जहासैव कृतस्वनम् ॥२२३॥
अर्थ: यह पवनंजय इस कन्याके भावको नहीं समझ रहा है यह जानकर ही मानो चटकती हुई लाईके बहाने अग्नि शब्द करती हुई हँस रही थी ॥२२३॥
ततो विधानयोगेन कृत्वोपयमनं तयोः । परमं प्रमुदं प्राप्ताः सशब्दाः सर्वबान्धवाः ॥२२४॥
अर्थ: इस तरह विधिपूर्वक दोनोंका विवाह कर शब्द करते हुए समस्त बन्धुजन परम हर्षको प्राप्त हुए ॥२२४॥
नानाद्रुमलताकीर्णे फलपुष्पविराजिते । मासं तत्र वने कृत्वा विभूत्या परमोत्सवम् ॥२२५॥
अर्थ: नाना वृक्ष और लताओंसे व्याप्त तथा फल-फूलोंसे सुशोभित उस वनमें सब लोग बड़े वैभवसे महोत्सव करते रहे ॥२२५॥
यथोचितं कृतालापाः कृतपूजाः परस्परम् । यथास्वं ते ययुः सर्वे वियोगाद् दुःखिताः क्षणम् ॥२२६॥
अर्थ: तदनन्तर परस्पर वार्तालाप और यथा योग्य सत्कार कर सब लोग यथा स्थान गये । जाते समय सब लोग वियोगके कारण क्षण भरके लिए दुःखी हो उठे थे ॥२२६॥
अविदिततत्त्वस्थितयो विदधति यज्जन्तवः परेऽशर्म । तत्तत्र मूलहेतौ कर्मरवौ तापके दृष्टम् ॥२२७॥
अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! तत्त्वकी स्थितिको नहीं समझनेवाले प्राणी दूसरेके लिए जो दुःख अथवा सुख पहुँचाते हैं उसमें मूल कारण सन्ताप पहुँचानेवाला कर्म रूपी सूर्य ही है अर्थात् कर्मके अनुकूल या प्रतिकूल रहनेपर ही दूसरे लोग किसीको सुख या दुःख पहुँचा सकते हैं ॥२२७॥
इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरितेऽञ्जनासुन्दरीविवाहाभिधानं नाम पञ्चदशं पर्व ॥१५॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मचरितमें अञ्जनासुन्दरीके विवाहका कथन करनेवाला पन्द्रहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१५॥