पद्मपुराण श्लोक एवं अर्थ (आचार्य रविषेण) | Padma Puran Shlok evam Arth (Acharya Ravishena)

५०. पञ्चाशत्तमं पर्व (महेन्द्रदुहितासमागमाभिधानं)

अथासावाञ्जनो गच्छन्नम्बरे परमोदयः । स्वसारमिव वैदेहीमानिनीषुरराजत ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर परम अभ्युदयको धारण करनेवाला हनुमान् आकाशमें जाता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बहन सीताको लेनेके लिए भामण्डल ही जा रहा हो ॥१॥


सुहृदाज्ञाप्रवृत्तस्य विनीतस्य महात्मनः । शुद्धभावस्य तस्यासीदुत्सवः कोऽपि चेतसः ॥२॥

अर्थ: मित्र - श्रीरामकी आज्ञामें प्रवृत्त, विनयवान्, उदाराशय एवं शुद्धभावके धारक हनुमान्के हृदयमें उस समय कोई अद्भुत आनन्द छाया हुआ था ॥२॥


पश्यतः प्रौढया दृष्ट्या स्थितस्य रविगोचरे । दिशां मण्डलमस्यासीच्छरीरावयवोपमम् ॥३॥

अर्थ: सूर्यके मार्गमें स्थित हनुमान् जब प्रौढ़ दृष्टिसे दिङ्मण्डलकी ओर देखता था तब उसे दिङ्मण्डल शरीरके अवयवोंके समान जान पड़ता था ॥३॥


लङ्कां जिगमिषोरस्य महेन्द्रनगरोपमम् । महेन्द्रनगरं दृष्टेराभिमुख्यमुपागतम् ॥४॥

अर्थ: लंकाकी ओर जानेके लिए इच्छुक हनुमान्की दृष्टिके सामने राजा महेन्द्रका नगर आया जो इन्द्रके नगरके समान जान पड़ता था ॥४॥


वेदिकापुण्डरीकाभैः प्रासादैः शशिपाण्डुरैः । पर्वतस्य स्थितं मूर्ध्नि तद्विदूरे प्रकाशते ॥५॥

अर्थ: वह नगर पर्वतके शिखरपर स्थित था तथा वेदिका-पर स्थित सफेद कमलोंके समान आभाको धारण करनेवाले चन्द्रतुल्य धवल भवनोंके द्वारा दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था ॥५॥


वज्रपाणेरिवामुष्य तस्मिन् वालिपुरोपमे । न बभूवतरां प्रीतिः तस्मादेवमचिन्तयत् ॥६॥

अर्थ: जिस प्रकार बालिके नगरमें इन्द्रको प्रीति नहीं हुई थी उसी प्रकार राजा महेन्द्रके उस नगरमें हनुमान्को कोई प्रीति उत्पन्न नहीं हुई अपितु उसे देखकर वह विचार करने लगा ॥६॥


इदं शिखरिणो मूर्ध्नि तन्महेन्द्रपुरं स्थितम् । महेन्द्रको नृपो यत्र दुर्मतिः सोऽवतिष्ठते ॥७॥

अर्थ: कि यह पर्वतके शिखरपर राजा महेन्द्रका नगर स्थित है जिसमें कि वह दुर्बुद्धि राजा महेन्द्र निवास करता है ॥७॥


दुःखतापितसर्वाङ्गा माता येनागता मम । निर्वासिता मयि प्राप्ते कुक्षिवासं दुरात्मना ॥८॥

अर्थ: मेरे गर्भवासके समय दुःखसे भरी मेरी माता इसके नगर आयी पर इस दुष्टने उसे निकाल दिया ॥८॥


एषाऽसौ विजनेऽरण्ये गुहा यत्र स सन्मुनिः । पर्यङ्कयोगयुक्तात्मा नाम्नामितगतिः स्थितः ॥९॥

अस्यां भगवता तेन साधुवाक्यैः कृपा कृता । माता मां जनिताश्वासा प्रसूता बन्धुवर्जिता ॥१०॥

अर्थ: तब मेरी माता निर्जन वनकी उस गुफामें - जिनमें कि पर्यंक योगसे अमितगति नामा मुनि विराजमान थे - रहीं ! इसी गुफामें उन दयालु मुनिराजने उत्तम वचनों-के द्वारा उसे सान्त्वना दी और बन्धुजनोंसे रहित अकेली रहकर उसने मुझे जन्म दिया ॥९-१०॥


श्रुतं केसरिजं कृच्छ्रं श्रुत्वा मातुरुपप्लवम् । साधोश्च संगमं सैषा रम्या रम्या च मे गुहा ॥११॥

अर्थ: इसी गुफामें माताको सिंहसे उत्पन्न कष्ट प्राप्त हुआ था और इसी गुफामें उसे मुनिराजका सन्निधान प्राप्त हुआ था इसलिए यह गुफा मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥११॥


मातरं शरणं प्राप्तां मम निर्वास्य यः कृती । व्यसनप्रतिदानेन महेन्द्रं किंनु तं भजेत् ॥१२॥

अर्थ: जो मेरी शरणागत माताको निकाल-कर कृतकृत्य हुआ था उस महेन्द्रको अब मैं कष्टका बदला देकर क्या उसकी सेवा करूँ ॥१२॥


अहंयुरयमत्यन्तं मां किल द्वेष्टि संततम् । महेन्द्र ( महेन्द्रो ) गर्वमेतस्य तस्मादपनयाम्यहम् ॥१३॥

अर्थ: यह महेन्द्र बड़ा अहंकारी है तथा मुझसे निरन्तर द्वेष रखता है इसलिए इसका गर्व अवश्य ही दूर करता हूँ ॥१३॥


प्रलम्बाम्बुदवृन्दोरुनादा दुन्दुभयस्ततः । महालम्पाकभेर्यश्च पटहाश्च समाहताः ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर ऐसा विचार कर उसने घूमते हुए मेघसमूहके समान उच्च शब्द करनेवाली दुन्दुभियाँ, महाविकट शब्द करनेवाली भेरियाँ और नगाड़े बजवाये ॥१४॥


ध्माताः शङ्खा जगत्कम्पा भटैरुत्कटचेष्टितैः । युद्धशौण्डैः समुत्कृष्टं समुल्लासितहेतिभिः ॥१५॥

अर्थ: उत्कृष्ट चेष्टाओंको धारण करनेवाले योद्धाओंने जगत्को कँपा देनेवाले शंख फूँके तथा शस्त्रोंको चमकानेवाले रणवीर योद्धाओंने जोरसे गर्जना की ॥१५॥


श्रुत्वा परबलं प्राप्तं महेन्द्रः सर्वसेनया । प्रत्यैक्षत विनिःक्रम्य मेघवृन्दमिवाचलः ॥१६॥

अर्थ: परबलको आया सुन, राजा महेन्द्र सर्व सेनाके साथ बाहर निकला और जिस प्रकार पर्वत, मेघसमूहको रोकता है उसी प्रकार उसने हनुमान्के दलको रोका ॥१६॥


संप्रहारैस्ततो लग्नैर्दृष्ट्वासीदन्निजं बलम् । चापमुद्यम्य माहेन्द्रिः प्राप्तश्छत्री रथस्थितः ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर लगी हुई चोटोंसे अपनी सेनाको नष्ट होती देख, छत्रधारी, तथा रथपर बैठा हुआ राजा महेन्द्रका पुत्र धनुष तानकर सामने आया ॥१७॥


हनूमानिषुभिस्तस्य धनुस्तिसृभिरायतम् । चिच्छेद गुप्तिभिर्योगी यथामानं समुत्थितम् ॥१८॥

अर्थ: सो हनुमान्ने तीन बाण छोड़कर उसके लम्बे धनुषको उस तरह छेद डाला जिस तरह कि मुनि तीन गुप्तियोंके द्वारा उठते हुए मानको छेद डालते हैं ॥१८॥


चापं यावद्द्वितीयं स गृह्णात्याकुलमानसः । शरैस्तावद्रथान्मुक्ताः प्रचण्डास्तस्य वाजिनः ॥१९॥

अर्थ: वह व्याकुल चित्त होकर जबतक दूसरा धनुष लेता है तबतक हनुमान्ने तीक्ष्ण बाण चलाकर उसके चंचल घोड़े रथसे छुड़ा दिये ॥१९॥


रथात्ते विगताः शीघ्राश्चपला बभ्रमुर्भृशम् । हृषीकाणीव मनसो मुक्तानि विषयैषिणः ॥२०॥

अर्थ: सो रथसे छूटे हुए वे चंचल घोड़े शीघ्र ही इधर-उधर इस प्रकार घूमने लगे जिस प्रकार कि विषयाभिलाषी मनुष्यकी मनसे छूटी हुई इन्द्रियाँ इधर-उधर घूमने लगती हैं ॥२०॥


माहेन्द्रिरथ संभ्रान्तो विमानं वरमाश्रितः । तदप्यस्य शरैर्लूनं मतं दुष्टमतेरिव ॥२१॥

अर्थ: अथानन्तर महेन्द्रका पुत्र घबड़ाकर उत्तम विमानपर आरूढ़ हुआ सो हनुमान्के बाणोंसे वह विमान भी उस तरह खण्डित हो गया जिस तरह कि किसी दुर्बुद्धिका मत खण्डित हो जाता है ॥२१॥


माहेन्द्रिर्मुदितो भूयो विद्याबलविकारगः । पतत्रिचक्रकनकैर्युयुधेऽलातमासुरैः ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याके बलसे विकारको प्राप्त हुआ महेन्द्रपुत्र पुनः हर्षित हो अलातचक्रके समान देदीप्यमान बाण, चक्र तथा कनक नामक शस्त्रोंसे युद्ध करने लगा ॥२२॥


विद्ययाऽनिलपुत्रोऽपि तं शस्त्रौघमवारयत् । यथात्मचिन्तया योगी परीषहकदम्बकम् ॥२३॥

अर्थ: तब हनुमान्ने भी विद्याके द्वारा उस शस्त्रसमूहको उस तरह रोका जिस तरह कि योगी आत्मध्यानके द्वारा परीषहोंके समूहको रोकता है ॥२३॥


निर्दयोन्मुक्तशस्त्रोऽसावास्तृणानो महाग्निवत् । गृहीतो वायुपुत्रेण गरुडेनेव पन्नगः ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर जो निर्दयताके साथ शस्त्र छोड़ रहा था और प्रचण्ड अग्निके समान सब ओरसे आच्छादित कर रहा था ऐसे महेन्द्रपुत्रको हनुमान्ने उस तरह पकड़ लिया जिस तरह कि गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है ॥२४॥


प्राप्तरोधं सुतं दृष्ट्वा महेन्द्रः क्रोधलोहितः । रथी मारुतिमभ्यार रामं सुग्रीवरूपवत् ॥२५॥

अर्थ: पुत्रको पकड़ा देख क्रोधसे लाल होता हुआ महेन्द्र रथपर सवार हो हनुमान्के सम्मुख उस तरह आया जिस तरह कि सुग्रीवका रूप धारण करनेवाला कृत्रिम सुग्रीव रामके सम्मुख आया था ॥२५॥


अर्कार्मस्यन्दनः सोऽपि हारिहारो धनुर्धरः । शूराणामग्रणी दीप्तो मातुः पितरमभ्यगात् ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका रथ सूर्यके समान देदीप्यमान था, जो सुन्दर हारका धारक था, धनुर्धारी था, शूरोंमें श्रेष्ठ था तथा अतिशय देदीप्यमान था ऐसा हनुमान् भी माताके पिता राजा महेन्द्रके सम्मुख गया ॥२६॥


तयोरभून्महत्संख्यं क्रकचासिशिलीमुखैः । परस्परकृताघातं वायुवश्याब्दयोरिव ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर वायुके वशीभूत दो मेघोंमें जिस प्रकार परस्पर टक्कर होती है उसी प्रकार उन दोनोंमें करोंत, खड्ग तथा बाणोंके द्वारा परस्पर एक दूसरेका घात करनेवाला महायुद्ध हुआ ॥२७॥


सिंहाविव महारोषौ तावुद्धतबलान्वितौ । ज्वलत्स्फुलिङ्गरक्ताक्षौ श्वसन्तौ भुजगाविव ॥२८॥

परस्परकृताक्षेपौ गर्वहासस्फुटस्वनौ । धिक् ते शौर्यमहो युद्धमित्यादिवचनोद्यतौ ॥२९॥

चक्रतुः परमं युद्धं मायाबलसमन्वितौ । हाकारजयकारादि कारयन्तौ मुहुर्निजैः ॥३०॥

अर्थ: जो सिंहोंके समान महाक्रोधी तथा उत्कट बलसे सहित थे, जिनके नेत्र देदीप्यमान तिलगोंके समान लाल थे, जो सर्पोंके समान साँसें भर रहे थे - फुंकार रहे थे, जो एक दूसरेपर आक्षेप कर रहे थे, जिनके अहंकारपूर्ण हास्यका स्फुट शब्द हो रहा था, ‘तेरी शूर-वीरताको धिक्कार है, अहो ! युद्ध करने चला है’ जो इस प्रकारके शब्द कह रहे थे, जो मायाबलसे सहित थे और जो अपने पक्षके लोगोंसे कभी हाहाकार कराते थे तो कभी जय-जयकार कराते थे ऐसे हनुमान् तथा राजा महेन्द्र दोनों ही चिरकाल तक परमयुद्ध करते रहे ॥२८-३०॥


महेन्द्रोऽथ महावीर्यो विक्रियाशक्तिसंगतः । क्रोधस्फुरितदेहश्रीर्मुमोचायुधसंहतिम् ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर जो महाबलवान् था, विक्रिया शक्तिसे संगत था और क्रोधसे जिसके शरीरकी शोभा देदीप्यमान हो रही थी ऐसा महेन्द्र हनूमान्के ऊपर शस्त्रोंका समूह छोड़ने लगा ॥३१॥


भुषुण्ढीः परशून् बाणान् शतघ्नीर्मुद्गरान् गदाः । शिखराणि च शैलानां शालन्यग्रोधपादपान् ॥३२॥

अर्थ: भुषुण्डी, परशु, बाण, शतघ्नी, मुद्गर, गदा, पहाड़ोंके शिखर और सागौन तथा वटके वृक्ष उसने हनुमान्पर छोड़े ॥३२॥


एतैरन्यैश्च विविधैरायुधौघैर्मरुत्सुतः । न विव्यथे यथा शैलो महामेघकदम्बकैः ॥३३॥

अर्थ: सो इनसे तथा नाना प्रकारके अन्य शस्त्रोंके समूहसे हनुमान् उस तरह विचलित नहीं हुआ जिस प्रकार कि महामेघोंके समूहसे पर्वत विचलित नहीं होता है ॥३३॥


तद्दिव्यमायया सृष्टं शस्त्रवर्षं महेन्द्रजम् । उल्काविद्याप्रभावेण वायुसूनुरचूर्णयत् ॥३४॥

अर्थ: राजा महेन्द्रकी दिव्यमायासे उत्पन्न शस्त्रोंकी उस वर्षाको पवन-पुत्र हनुमान्ने अपनी उल्का-विद्याके प्रभावसे चूर-चूर कर डाला ॥३४॥


उत्पत्य च रथे तस्य निपत्य सुमहाजवः । ककुप्करिकराकारकराभ्यां कृतरोधनम् ॥३५॥

मातामहं समादाय बलं बिभ्रदनुत्तमम् । दत्तसाधुस्वनः शूरैः समारोहन्निजं रथम् ॥३६॥

अर्थ: और उसी समय वेगसे भरे, दिग्गजोंके शुण्डादण्डके समान विशाल हाथोंसे युक्त तथा उत्तम बलको धारण करनेवाले हनुमान्ने मातामह महेन्द्रके रथपर उछलकर उसे रोकनेपर भो पकड़ लिया । शूरवीरोंने उसे साधुवाद दिया और वह पकड़े हुआ मातामहको लेकर अपने रथपर आरूढ़ हो गया ॥३५-३६॥


उल्कालाङ्गूलपाणिं तं दौहित्रं परमोदयम् । प्रशंसितुं समारब्धो महेन्द्रः सौम्यया गिरा ॥३७॥

अर्थ: वहाँ जिसकी विक्रियाकृत लांगल और हाथोंसे उल्काएँ निकल रही थीं तथा जो परम अभ्युदयको धारण करनेवाला था ऐसे दौहित्र-हनुमान्की वह महेन्द्र सौम्य वाणी द्वारा स्तुति करने लगा ॥३७॥


अहो ते वत्स माहात्म्यं परमेतन्मया श्रुतम् । पूर्वमासीदिदानीं तु नियतं प्रत्यक्षगोचरम् ॥३८॥

अर्थ: कि अहो वत्स ! तेरा यह उत्तम माहात्म्य यद्यपि मैंने पहलेसे सुन रखा था पर आज प्रत्यक्ष ही देख लिया ॥३८॥


आसीद्देवेन्द्रयुद्धेऽपि निर्जितो यो न केनचित् । विजयार्धनगस्योर्ध्वमहाविद्यायुधाकुले ॥३९॥

असौ प्रसन्नकीर्तिर्मे पुत्रो माहात्म्यसंगतः । त्वया पराजितः प्राप्तो रोद्धुं चित्रमिदं परम् ॥४०॥

अर्थ: विजयार्ध पर्वतके ऊपर महाविद्याओं तथा शस्त्रोंसे आकुल इन्द्र विद्याधरके युद्धमें भी जो किसीके द्वारा पराजित नहीं हुआ था तथा जो माहात्म्यसे युक्त था ऐसा मेरा पुत्र प्रसन्नकीर्ति तुमसे पराजित हो बन्धनको प्राप्त हुआ, यह बड़ा आश्चर्य है ॥३९-४०॥


अहो पराक्रमो भद्र तव धैर्यमहो परम् । अहो रूपमनौपम्यमहो संग्रामशौण्डता ॥४१॥

अर्थ: अहो भद्र ! तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है, तुम्हारा धैर्य परम आश्चर्यकारी है, अहो तुम्हारा रूप अनुपम है और युद्धकी सामर्थ्य भी आश्चर्यकारी है ॥४१॥


प्रजातेन त्वया वत्स महानिश्चययोगिना । कुलमुद्योतितं सर्वमस्मदीयं सुकर्मणा ॥४२॥

अर्थ: हे वत्स ! निश्चयको धारण करनेवाले तुमने हमारे पुण्योदयसे जन्म लेकर हमारा समस्त कुल प्रकाशमान किया है ॥४२॥


विनयाद्यैर्गुणैर्युक्तो राशिः परमतेजसः । कल्याणमूर्तिरत्यर्थं कल्पवृक्षस्त्वमुद्गतः ॥४३॥

अर्थ: तू विनयादि गुणोंसे युक्त है, परम तेजकी राशि है, कल्याणकी मूर्ति है तथा कल्पवृक्षके समान उदयको प्राप्त हुआ है ॥४३॥


जगतो गुरुभूतस्त्वं बान्धवानां समाश्रयः । दुःखादित्यप्रतप्तानां समस्तानां घनाघनः ॥४४॥

अर्थ: तू जगत्का गुरु है, बान्धवजनोंका आधार है और दुःखरूपी सूर्यसे सन्तप्त समस्त मनुष्योंके लिए मेघस्वरूप है ॥४४॥


इति प्रशस्य तं स्नेहादुदस्राक्षश्चलत्करः । अजिघ्रन्मस्तके नम्रं पुलकी परिषस्वजे ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार प्रशंसा कर स्नेहके कारण जिसके नेत्रोंसे अश्रु छलक रहे थे तथा जिसके हाथ हिल रहे थे, ऐसे मातामह महेन्द्रने उसका मस्तक सूँघा और रोमांचित हो उसका आलिंगन किया ॥४५॥


प्रणम्य वायुपुत्रोऽपि तमार्यं विहिताञ्जलिः । अतितिक्षद्विनीतात्मा क्षणाद्यातोऽन्यतामिव ॥४६॥

अर्थ: वायुपुत्र - हनुमान्ने भी हाथ जोड़कर उन आर्य-मातामहको प्रणाम किया तथा क्षमाके प्रभावसे विनीतात्मा होकर वह क्षणभरमें ऐसा हो गया मानो अन्यरूपताको ही प्राप्त हुआ हो ॥४६॥


मया शिशुतया किंचिदार्य यत्ते विचेष्टितम् । दोषमेवं समस्तं मे प्रतीक्ष्य क्षन्तुमर्हसि ॥४७॥

अर्थ: उसने कहा कि हे आर्य ! मैंने लड़कपनके कारण आपके प्रति जो कुछ चेष्टा की है सो हे पूज्य ! मेरे इस समस्त अपराधको आप क्षमा करनेके योग्य हैं ॥४७॥


समस्तं च समाख्यातं तेनागमनकारणम् । पद्मागमादिकं यावदात्मागमनमादृतम् ॥४८॥

अर्थ: उसने रामचन्द्रके आगमनको आदि लेकर अपने आगमन तकका समस्त वृत्तान्त बड़े आदरके साथ प्रकट किया ॥४८॥


अहमार्य गमिष्यामि त्रिकूटमतिकारणम् । त्वं किष्किन्धपुरं गच्छ कार्यं दाशरथेः कुरु ॥४९॥

अर्थ: उसने यह भी कहा कि हे आर्य ! मैं अत्यावश्यक कारणसे त्रिकूटाचलको जाता हूँ तब तक तुम किष्किन्धपुर जाओ और श्रीरामका काम करो ॥४९॥


इत्युक्त्वा वायुसंभूतः खमुत्पत्य ययौ सुखम् । त्रिकूटाभिमुखः क्षिप्रं सुरलोकमिवामरः ॥५०॥

अर्थ: इतना कह हनुमान् आकाशमें उड़कर शीघ्र त्रिकूटाचलकी ओर सुखपूर्वक इस प्रकार गया जिस प्रकार कि देव स्वर्गकी ओर जाता है ॥५०॥


गत्वा महेन्द्रकेतुश्च तनयां नयकोविदः । प्रसन्नकीर्तिना सार्द्धं वत्सलः समपूजयत् ॥५१॥

अर्थ: नीतिनिपुण तथा स्नेहपूर्ण राजा महेन्द्रकेतुने अपने प्रियपुत्र प्रसन्नकीर्तिके साथ जाकर पुत्री - अंजनाका सम्मान किया ॥५१॥


मातापितृसमायोगं सोदरस्य च दर्शनम् । अञ्जनासुन्दरी प्राप्य जगाम परमां धृतिम् ॥५२॥

अर्थ: अंजना सुन्दरी, माता-पिताके साथ समागम तथा भाईका दर्शन प्राप्त कर परम धैर्यको प्राप्त हुई ॥५२॥


महेन्द्रं निभृतं श्रुत्वा किष्किन्धाभिमुखोऽगमन् । विराधितप्रभृतयस्तोषमाययुरुत्तमम् ॥५३॥

अर्थ: राजा महेन्द्रको आया सुनकर किष्किन्धाका पति सुग्रीव उसे लेनेके लिए सम्मुख गया तथा विराधित आदि उत्तम सन्तोषको प्राप्त हुए ॥५३॥


पुरा विशिष्टं चरितं कृतात्मनां सुचेतसामुत्तमचारुतेजसाम् ।
महात्मनामुन्नतगर्वशालिनो भवन्ति वश्याः पुरुषा बलान्विताः ॥५४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि कृतकृत्य, सुचेता तथा उत्तम सुन्दर तेजको धारण करनेवाले पुण्यात्मा जीवोंका पूर्वचरित ही ऐसा विशिष्ट होता है कि उन्नत गर्वसे सुशोभित बलशाली मनुष्य उनके अधीन - आज्ञाकारी होते हैं ॥५४॥


ततः समन्तादनुपाल्य मानसं जना यतध्वं सततं सुकर्मणि ।
फलं यदीयं समवाप्य पुष्कलं रवेः समानामुपयाथ दीप्तताम् ॥५५॥

अर्थ: इसलिए हे भव्यजनो ! सब ओरसे मनकी रक्षा कर सदा उस शुभ कार्यमें यत्न करो कि जिसका पुष्कल फल पाकर सूर्यके समान दीप्तताको प्राप्त होओ ॥५५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे महेन्द्रदुहितासमागमाभिधानं नाम पञ्चाशत्तमं पर्व ॥५०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें महेन्द्रका पुत्रीके साथ समागमका वर्णन करनेवाला पचासवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५०॥


५१. एकपञ्चाशत्तमं पर्व (पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं)

श्रीशैलस्य वियत्युच्चैर्विमानस्थस्य गच्छतः । बभूव सुगुणैर्युक्तो द्वीपो दधिमुखोऽन्तरे ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जब हनुमान् विमानमें बैठकर आकाशमें बहुत ऊँचे जा रहा था तब उत्तम गुणोंसे युक्त दधिमुख नामक द्वीप बीचमें पड़ा ॥१॥


यस्मिन् दधिमुखं नामा प्रासादैर्दधिपाण्डुरैः । पुरं परममायामि चारुकाञ्चनतोरणम् ॥२॥

अर्थ: उस दधिमुख द्वीपमें एक दधिमुख नामका नगर था जो दहीके समान सफेद महलोंसे सुशोभित तथा लम्बायमान स्वर्णके सुन्दर तोरणोंसे युक्त था ॥२॥


नवमेघप्रतीकाशैरुद्यानैः कुसुमोज्ज्वलैः । प्रदेशा यस्य शोभन्ते सनक्षत्राम्बरोपमाः ॥३॥

अर्थ: नवीन मेघके समान श्याम तथा पुष्पोंसे उज्ज्वल उद्यानोंसे उसके प्रदेश ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रोंसे सहित आकाशके प्रदेश ही हों ॥३॥


स्फटिकस्वच्छकलिला वाप्यः सोपानशोभिताः । पद्मोत्पलादिभिश्छन्ना यत्र भान्ति क्वचित् क्वचित् ॥४॥

अर्थ: उस नगरमें जहाँ-तहाँ स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे भरी, सीढ़ियोंसे सुशोभित एवं कमल तथा उत्पल आदिसे आच्छादित वापिकाएँ सुशोभित थीं ॥४॥


तस्मिन् विप्रकृष्टे तु देशे नगरगोचरात् । बृहत्तृणलतावल्लीद्रुमकण्टकसंकटे ॥५॥

अर्थ: नगरसे दूर चलकर एक महाभयंकर वन मिला जो बड़े-बड़े तृणों, लताओं, वेलों, वृक्षों और काँटोंसे व्याप्त था ॥५॥


शुष्कागकृतसंरोधे रौद्रश्वापदनादिते । घोरेऽतिपरुषाकारे प्रचण्डानिलचञ्चले ॥६॥

पतितोदारवृक्षौघे महाभयसमावहे । विशुद्धक्षारसरसि कङ्कगृद्ध्रादिसेविते ॥७॥

दुर्वने विजने राजन् साधुयुग्मं नभश्चरम् । अष्टाहं लम्बितभुजं योगमुग्रमुपाश्रितम् ॥८॥

अर्थ: वह वन सूखे वृक्षोंसे घिरा था, भयंकर जंगली पशुओंके शब्दसे शब्दायमान था, भयंकर था, अत्यन्त कठोर था, प्रचण्ड वायुसे चंचल था, गिरे हुए बड़े-बड़े वृक्षोंके समूहसे युक्त था, महाभय उत्पन्न करनेवाला था, अत्यन्त खारे जलके सरोवरोंसे सहित था, कंक, गृद्ध आदि पक्षियोंसे सेवित था तथा मनुष्योंसे रहित था । गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उस वनमें दो चारण ऋद्धिधारी मुनि आठ दिनका कठिन योग लेकर विराजमान थे । उनकी भुजाएँ नीचेको ओर लटक रही थीं ॥६-८॥


तस्य क्रोशचतुर्भागमात्रदेशे व्यवस्थिताः । मनोज्ञनयनाः कन्याः सितवस्त्रा जटाधराः ॥९॥

तप्यन्ते विधिवद्घोरं तपस्तिस्रः सुचेतसः । शोभालोकत्रयस्येव नवभूषणतां गताः ॥१०॥

अर्थ: उन मुनियोंसे पावकोश दूरी-पर तीन कन्याएँ, जिनके नेत्र अत्यन्त मनोहर थे, जो शुक्लवस्त्रसे सहित थीं, जटाएँ धारण कर रही थीं, शुद्ध हृदयसे युक्त थीं, तीन लोककी मानो शोभा थीं । और नूतन आभूषण स्वरूप थीं, विधिपूर्वक घोर तप कर रही थीं ॥९-१०॥


अथासौ साधुयुगलं ग्रस्यमानं महाग्निना । अञ्जनातनयोऽपश्यत् पादपद्वयनिश्चलम् ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने देखा कि दोनों मुनि महाअग्निसे ग्रस्त हो रहे हैं और वृक्ष युगलके समान निश्चल खड़े हैं ॥११॥


असमाप्तव्रताः ताश्च कन्याः लावण्यपूरिताः । उद्गमद्धूमजालेन स्पृष्टा बहलवर्तिना ॥१२॥

अर्थ: जिनका व्रत समाप्त नहीं हुआ था तथा जो लावण्यसे युक्त थीं ऐसी वे तीनों कन्याएँ भी निकलते हुए अत्यधिक धूमसे स्पृष्ट हो रही थीं ॥१२॥


अथातस्थौ सनिर्ग्रन्थौ युक्तयोगौ शिवस्पृहौ । त्यक्तारागादिसंगेच्छौ निरस्तांशुकभूषणौ ॥१३॥

प्रलम्बितमहाबाहू प्रशान्तवदनाकृती । युगान्तार्पितसद्दृष्टी प्रतिमास्थानमाश्रितौ ॥१४॥

मृत्युजीवननिःकाङ्क्षावनघौ शान्तमानसौ । समप्रियाप्रियासंगौ समपाषाणकाञ्चनौ ॥१५॥

दावेन महता राजन् तेनात्यासन्नवर्तिना । अभिभूतौ समालोक्य वात्सल्यं कर्तुमुद्यतः ॥१६॥

अर्थ: उन्हें देख हनुमान्के हृदयमें उन सबके प्रति बड़ी आस्था उत्पन्न हुई । तदनन्तर जो योग अर्थात् ध्यानसे युक्त थे, मोक्षकी इच्छासे सहित थे, जिन्होंने रागादि परिग्रहकी इच्छा छोड़ दी थी, वस्त्र तथा आभूषण दूर कर दिये थे, भुजाएँ नीचेकी ओर लटका रखी थीं, जिनके मुखकी आकृति अत्यन्त शान्त थी, युगप्रमाण दूरीपर जिनकी दृष्टि पड़ रही थी, जो प्रतिमा योगसे विराजमान थे, जीवन और मरणकी आकांक्षासे रहित थे, निष्पाप थे, शान्तचित्त थे, इष्ट-अनिष्ट समागममें मध्यस्थ थे, तथा पाषाण और कांचनमें जो समभाव रखते थे ऐसे उन दोनों मुनियोंको अत्यन्त निकटवर्ती बड़ी भारी दावानलसे आक्रान्त देख, हे राजन् ! हनूमान् वात्सल्यभाव प्रकट करनेके लिए उद्यत हुआ ॥१३-१६॥


आकृष्य सागरजलं मेघहस्तः ससंभ्रमः । अवर्षदुन्नतो व्योम्नि परमं भक्तिसंगतः ॥१७॥

अर्थ: भक्तिसे भरे हनुमान्ने शीघ्रतासे समुद्रका जल खींच, मेघ हाथमें धारण किया और आकाशमें ऊँचे जाकर अत्यधिक वर्षा की ॥१७॥


सुभृशं तेन वह्निः स वारिपूरेण नाशितः । महाक्रोध इवोद्भूतः क्षान्तिभावेन साधुना ॥१८॥

अर्थ: उस बरसे हुए जलप्रवाहसे वह दावाग्नि उस प्रकार शान्त हो गयी जिस प्रकार कि उत्पन्न हुआ महाक्रोध, मुनिके क्षमाभावसे शान्त हो जाता है ॥१८॥


यावच्च कुरुते पूजां भक्त्या पवननन्दनः । तयोर्भदन्तयोर्नानापुष्पादिद्रव्यसंपदा ॥१९॥

तावत्ताः सिद्धसंसाध्या मेरुं कृत्वा प्रदक्षिणम् । तत्सकाशमनुप्राप्ताः कुमार्यः सुमनोहराः ॥२०॥

अर्थ: भक्तिसे भरा हनुमान् जबतक नाना प्रकारकी पुष्पादि सामग्रीसे उन दोनों मुनियोंकी पूजा करता है तबतक जिनके मनोरथ सिद्ध हो गये थे ऐसी वे तीनों मनोहर कन्याएँ मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देकर उसके पास आ गयीं ॥१९-२०॥


प्रणेमुश्च समं तेन साधू ध्यानपरायणौ । विनयान्वितया बुद्ध्या प्रशशंसुश्च मारुतिम् ॥२१॥

अहो जिनेश्वरे भक्तिर्व्रजता क्वापि यद्द्रुतम् । त्वया तात परित्राता वयं साधुसमाश्रयात् ॥२२॥

अर्थ: उन्होंने ध्यानमें तत्पर दोनों मुनियोंको हनुमान्के साथ-साथ विनयपूर्वक नमस्कार किया तथा हनुमान्की इस प्रकार प्रशंसा की कि अहो ! तुम्हारी जिनेन्द्रदेवमें बड़ी भक्ति है जो शीघ्रतासे कहीं अन्यत्र जाते हुए तुमने मुनियोंके आश्रयसे हम सबकी रक्षा की ॥२१-२२॥


अस्मद्द्वारसमायातो महानयमुपप्लवः । स्तोकेनाप्तो न योगिभ्यामहो नो भवितव्यता ॥२३॥

अर्थ: हमारे निमित्तसे यह महाउपद्रव उत्पन्न हुआ था सो मुनियोंको रंचमात्र भी प्राप्त नहीं हो पाया । अहो ! हमारी भवितव्यता धन्य है ॥२३॥


अथाञ्जनात्मजोऽपृच्छदेवं संशुद्धमानसः । भवन्त्य इह निःशून्ये का वनेऽत्यन्तभीषणे ॥२४॥

अर्थ: अथानन्तर पवित्र हृदयके धारक हनुमान्ने उनसे इस प्रकार पूछा कि इस अत्यन्त भयंकर निर्जन वनमें आप लोग कौन हैं ? ॥२४॥


अवोचज्ज्यायसी तासां पुरे दधिमुखाह्वये । अत्र गन्धर्वराजस्य वयं तिस्रोऽमरासुताः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर उन कन्याओंमें जो ज्येष्ठ कन्या थी वह कहने लगी कि हम तीनों दधिमुख नगरके राजा गन्धर्वकी अमरा नामक रानीकी पुत्रियाँ हैं ॥२५॥


प्रथमा चन्द्रलेखाख्या ज्ञेया विद्युत्प्रभा ततः । अन्या तरङ्गमालेति सर्वगोत्रस्य वल्लभाः ॥२६॥

अर्थ: इनमें प्रथम कन्या चन्द्रलेखा, दूसरी विद्युत्प्रभा और तीसरी तरंगमाला है । हम सभी अपने समस्त कुलके लिए अत्यन्त प्यारी हैं ॥२६॥


यावन्तो भुवने केचिद्विजयार्द्धादिसंभवाः । विद्याधरकुमारेन्द्राः कुलपुष्करभास्कराः ॥२७॥

तेऽस्मदर्थे शिवं क्वापि न विन्दन्तेऽर्थिनो भृशम् । दुष्टस्त्वङ्गारको नाम तापं धत्ते विशेषतः ॥२८॥

अर्थ: इस संसारमें अपने कुलरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिए सूर्यके समान, विजयार्ध आदि स्थानोंमें उत्पन्न हुए जितने कुछ विद्याधर कुमार हैं वे सब हम लोगोंके अत्यन्त इच्छुक हो कहीं भी सुख नहीं पा रहे हैं। उन कुमारोंमें अंगारक नामक दुष्ट कुमार विशेष रूपसे सन्तापको धारण कर रहा है ॥२७-२८॥


अन्यदा परिपृष्टश्च तातेनाष्टाङ्गविन्मुनिः । स्थानेषु भगवन् केषु भव्या दुहितरो मम ॥२९॥

अर्थ: किसी एक दिन हमारे पिताने अष्टांगनिमित्तके ज्ञाता मुनिराजसे पूछा कि हे भगवन्! मेरी पुत्रियाँ किन स्थानोंमें जावेंगी ॥२९॥


सोऽवोचत् साहसगतिं यो हनिष्यति संयुगे । आसां कतिपयाहोभो रमणोऽसौ भविष्यति ॥३०॥

अर्थ: इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा था कि जो युद्धमें साहसगतिको मारेगा वह कुछ ही दिनोंमें इनका भर्ता होगा ॥३०॥


निशम्यामोघवाक्यस्य मुनेस्तद्वचनं ततः । अचिन्तयत् पिताऽस्माकं विधाय स्मेरमाननम् ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर अमोघ वचनके धारक मुनिराजका वह वचन सुन हमारे पिता मुखको मन्द हास्यसे युक्त करते हुए विचार करने लगे कि ॥३१॥


कस्त्वसौ भविता लोके नरो वज्रायुधोपमः । विजयार्धोत्तरश्रेणीश्रेष्ठं यो हन्ति साहसम् ॥३२॥

अर्थ: संसारमें इन्द्रके समान ऐसा कौन पुरुष होगा जो विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें श्रेष्ठ साहसगतिको मार सकेगा ॥३२॥


अथवा न मुनेर्वाक्यं कदाचिज्जायतेऽनृतम् । इति विस्मयमाविष्टः पिता माता जनस्तथा ॥३३॥

अर्थ: अथवा मुनिके वचन कभी मिथ्या नहीं होते यह विचारकर माता-पिता आदि आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥३३॥


चिरं प्रार्थयमानोऽपि यदासौ लब्धवान्न नः । तदास्मद्दुःखचिन्तास्थः संजातोऽङ्गारकेतुकः ॥३४॥

अर्थ: चिरकाल तक याचना करनेपर भी जब अंगारक हम लोगोंको नहीं पा सका तब वह हम लोगोंको दुःख देनेवाले कारणोंकी चिन्तामें निमग्न हो गया ॥३४॥


ततः प्रभृति चास्माकमयमेव मनोरथः । द्रक्ष्यामस्तं कदा वीरमिति साहससूदनम् ॥३५॥

अर्थ: उस समयसे लेकर हम लोगोंका यही एक मनोरथ रहता है कि हम साहसगतिको नष्ट करनेवाले उस वीरको कब देखेंगी ॥३५॥


एतच्च वनमायाता दारुणद्रुमसंकटम् । मनोऽनुगामिनीं नाम विद्यां साधयितुं पराम् ॥३६॥

अर्थ: हम तीनों कन्याएँ मनोनुगामिनी नामक उत्तम विद्या सिद्ध करनेके लिए कठोर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें आयी थीं ॥३६॥


दिवसो द्वादशोऽस्माकं वसन्तीनामिहान्तरे । प्राप्तस्य साधुयुग्मस्य वर्तते दिवसोऽष्टमः ॥३७॥

अर्थ: यहाँ रहते हुए हम लोगोंका यह बारहवाँ दिन है और इन दोनों मुनियोंको आये हुए आज आठवाँ दिवस है ॥३७॥


अङ्गारकेतुना तेन वीक्षिताश्च दुरात्मना । ततस्तेनानुबन्धेन क्रोधेन पूरितोऽभवत् ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर उस दुष्ट अंगारकेतुने हम लोगोंको यहाँ देखा और उक्त पूर्वोक्त संस्कारके कारण वह क्रोधसे परिपूर्ण हो गया ॥३८॥


ततोऽस्माकं वधं कर्तुमेता दश दिशः क्षणात् । धूमाङ्गारकवर्षेण वह्निना पिञ्जरीकृताः ॥३९॥

अर्थ: तत्पश्चात् हम लोगोंका वध करनेके लिए उसने उसी क्षण दशों दिशाओंको धूम तथा अंगारकी वर्षा करनेवाली अग्निसे पिंजर वर्ण - पीत वर्ण कर दिया ॥३९॥


षड्भिः संवत्सरैः साग्रैर्यद्दुःसाध्यं प्रसाध्यते । दत्वाङ्गमुपसर्गस्य तदद्यैव हि साधितम् ॥४०॥

अर्थ: जो विद्या छह वर्षसे भी अधिक समयमें बड़ी कठिनाईसे सिद्ध होती है वह विद्या उपसर्गका निमित्त पाकर आज ही सिद्ध हो गयी ॥४०॥


इहापदि महाभाग नागमिष्यद् भवान् यदि । अधक्ष्याम हि योगिभ्यां सहारण्ये ततो ध्रुवम् ॥४१॥

अर्थ: हे महाभाग ! यदि इस आपत्तिके समय आप यहाँ नहीं होते तो निश्चित ही हम सब दोनों मुनियोंके साथ-साथ वनमें जल जातीं ॥४१॥


साधु साध्विति संस्मित्य ततो मारुतिरब्रवीत् । भवतीनां श्रमः श्लाघ्यः फलयुक्तश्च निश्चयः ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने ‘ठीक है’ ‘ठीक है’ इस तरह मन्दहास पूर्वक कहा कि आप लोगोंका श्रम प्रशंसनीय है तथा निश्चित ही फलसे युक्त है ॥४२॥


अहो वो विमला बुद्धिरहो स्थाने मनोरथः । अहो भव्यत्वमुत्तुङ्गं येन विद्या प्रसाधिता ॥४३॥

अर्थ: अहो ! तुम सबकी बुद्धि निर्मल है। अहो ! तुम सबका मनोरथ योग्य स्थानमें लगा। अहो ! तुम्हारी उत्तम होनहार थी जिससे यह विद्या सिद्ध की ॥४३॥


आख्यातं च क्रमात् सर्वं यथावृत्तं सविस्तरम् । पद्मागमादिकं यावदात्मागमनकारणम् ॥४४॥

अर्थ: तत्पश्चात् हनुमान्ने रामके आगमनको आदि लेकर अपने यहाँ आने तक-का समस्त वृत्तान्त ज्योंका त्यों विस्तारके साथ क्रमपूर्वक कहा ॥४४॥


तत्तश्च श्रुतवृत्तान्तो गन्धर्वोऽमरया सह । समागतो महातेजास्तमुद्देशं सहानुगः ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर समाचार सुनकर महातेजस्वी गन्धर्व राजा अपनी अमरा नामकी रानी और अनुचरोंके साथ वहाँ आ पहुँचा ॥४५॥


नभश्चरसमायोगे देवागमनसंनिभे । क्षणेन तद्वनं जातं सर्वं नन्दनसुन्दरम् ॥४६॥

अर्थ: इस प्रकार क्षण-भरमें वह समस्त वन देवागमनके समान विद्याधरोंका समागम होनेसे नन्दन वनके समान हो गया ॥४६॥


किष्किन्धं च पुरं गत्वा भूत्या दुहितृभिः समम् । शासने पद्मनामस्य गन्धर्वो रतिमाश्रयत् ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर राजा गन्धर्व पुत्रियोंको साथ ले बड़े वैभवसे किष्किन्धपुर गया और वहाँ रामकी आज्ञामें रहकर प्रीतिको प्राप्त हुआ ॥४७॥


ताश्च निस्सीमसौभाग्या विभूत्या परयान्विताः । उपनिन्ये पराः कन्या रामायाक्लिष्टकर्मणे ॥४८॥

अर्थ: उसने असीम सौभाग्यकी धारक तथा परम विभूतिसे युक्त तीनों उत्कृष्ट कन्याएँ शान्त चेष्टाके धारक रामके लिए समर्पित कीं ॥४८॥


एताभिरपराभिश्च सेव्यमानो विभूतिभिः । अपश्यन् जानकीं पद्मो मेने शून्या दिशो दश ॥४९॥

अर्थ: सो राम इन कन्याओंसे तथा अन्य विभूतियोंसे यद्यपि सेव्यमान रहते थे तथापि सीता-को न देखते हुए वे दशों दिशाओंको शून्य मानते ॥४९॥


गुणान्वितैर्भवति जनैरलंकृता समस्तभूः शुभकलितैः सुसुन्दरैः । विना जनं मनसि कृतास्पदं सदा व्रजत्यसौ गहनवनेन तुल्यताम् ॥५०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि समस्त भूमि गुणोंसे सहित, शुभ चेष्टाओंके धारक तथा अतिशय सुन्दर मनुष्योंसे अलंकृत रहे तो भी मनमें वास करनेवाले मनुष्यके बिना वह भूमि गहन वन की तुल्यता धारण करती है ॥५०॥


पुराकृतादतिनिचितात् समुत्कटाज्जनः परां रतिमनुयाति कर्मणः । ततो जगत्सकलमिदं स्वगोचरे प्रवर्तते विधिरविणा प्रकाशते ॥५१॥

अर्थ: पूर्वोपार्जित तथा तीव्र रूपसे बन्धको प्राप्त हुए उत्कट कर्मसे यह जीव परम रतिको प्राप्त होता है और उस रतिके कारण यह समस्त संसार अपने अधीन रहता है तथा कर्मरूपी सूर्यसे प्रकाशमान होता है ॥५१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं नाम एकपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यकथित पद्मपुराणमें रामको गन्धर्व कन्याओंकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला इक्यावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५१॥


५२. द्विपञ्चाशत्तमं पर्व (हनूमल्लङ्कासुन्दरीकन्यालाभाभिधानं)

असौ पवनपुत्रोऽपि प्रतापाढ्यो महाबलः । त्रिकूटाभिमुखोऽयासीत् सोमवन्मन्दरं प्रति ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर प्रतापसे सहित महाबलवान् हनुमान् त्रिकूटाचलके सम्मुख इस प्रकार चला जिस प्रकार कि सुमेरुके सन्मुख सोम चलता है ॥१॥


अथास्य व्रजतो व्योम्नि सुमहाकार्मुकाकृतिम् । वक्रमेघाप्रतीकाशं जातं सैन्यं निरोधवत् ॥२॥

अर्थ: तदनन्तर आकाशमें चलते हुए हनुमान्की सेना अचानक रुककर किसी बड़े धनुषके समान हो गयी और ऐसो जान पड़ने लगी मानो कुटिल मेघोंका समूह ही हो ॥२॥


उवाच च गतिः केन मम सैन्यस्य विघ्निता । अहो विज्ञायतां क्षिप्रं कस्येदमनुचेष्टितम् ॥३॥

अर्थ: यह देख, हनुमान्ने कहा कि मेरी सेनाकी गति किसने रोकी है ? अहो ! शीघ्र ही मालूम करो कि यह किसकी चेष्टा है ? ॥३॥


किं स्यादसुरनाथोऽयं चमरो गर्वपर्वतः । आखण्डलः शिखण्डी वा नैषामेकोऽपि युज्यते ॥४॥

अर्थ: क्या यहाँ असुरोंका इन्द्र चमर है, अथवा इन्द्र है या शिखण्डी है ? अथवा इनमें-से यहाँ एकका भी होना उचित नहीं जान पड़ता ॥४॥


प्रतिमा किंतु जैनेन्द्री शिखरेऽस्य महीभृतः । भवेद् वा भगवान् कश्चिन्मुनिश्चरमविग्रहः ॥५॥

अर्थ: किन्तु हो सकता है कि इस पर्वतके शिखरपर जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमा हो, अथवा कोई ऐश्वर्यवान् चरम शरीरी मुनिराज विराजमान हों ॥५॥


तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वितर्ककृतवर्त्तनम् । मन्त्री पृथुमतिर्नाम वाक्यमेतदुदाहरत् ॥६॥

निवर्त्तस्व महाबुद्धे श्रीशैल ननु किं तव । क्रूरयन्त्रयुतो नायं मायाशालो मतिं गतः ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्के वितर्कपूर्ण वचन सुनकर पृथुमति मन्त्रीने यह वचन कहे कि हे महाबुद्धिमन् श्रीशैल ! तुम शीघ्र ही लौट जाओ, तुम्हें इससे क्या प्रयोजन है ? यह आगे क्रूर यन्त्रोंसे युक्त मायामयी कोट जान पड़ता है ॥६-७॥


चक्षुस्ततो नियुज्यासावपश्यत्पद्मलोचनः । दुःप्रवेशं महाशालं विरक्तस्त्रीमनःसमम् ॥८॥

अर्थ: तत्पश्चात् कमल-लोचन हनुमान्ने स्वयं दृष्टि डालकर उक्त मायामयी महाकोटको देखा । वह कोट विरक्त स्त्रीके मनके समान दुष्प्रवेश था ॥८॥


अनेकाकारवक्त्राढ्यं भीममाशालिकात्मकम् । त्रिदशैरपि दुर्लोक्यं सर्वभक्षं प्रभासुरम् ॥९॥

अर्थ: अनेक आकारके मुखोंसे सहित था, भयंकर पुतलियोंसे युक्त था, सबको भक्षण करनेवाला था, देदीप्यमान था और देवोंके द्वारा भी दुर्गम्य था ॥९॥


संकटोत्कटतीक्ष्णाग्रक्रकचावलिवेष्टितम् । रुधिरोद्गारचिह्नाग्रसहस्रविलसत्तटम् ॥१०॥

अर्थ: जिनके अग्रभाग संकटसे उत्कट तथा अत्यन्त तीक्ष्ण थे ऐसी करोंतोंकी श्रेणीसे वह कोट वेष्टित था, तथा उसके तट रुधिरको उगलनेवाली हजारों जिह्वाओंके अग्रभागसे सुशोभित थे ॥१०॥


स्फुरद्भुजङ्गविस्फारिफणाशूत्कारशब्दितम् । विषधूमान्धकारान्तज्ज्वलदङ्गारदुःसहम् ॥११॥

अर्थ: चंचल सर्पोंके तने हुए फणाओंकी शूत्कारसे शब्दायमान था तथा जिनसे विषैला धूमरूपी अन्धकार उठ रहा था ऐसे जलते हुए अंगारोंसे दुःसह था ॥११॥


यस्तं सर्पति मूढात्मा शौर्यमानसमुद्धतः । निःक्रामति न भूयोऽसौ मण्डूकोऽहिमुखादिव ॥१२॥

अर्थ: शूरवीरताके अहंकारसे उद्धत जो मनुष्य उस कोटके पास जाता है वह फिर उस तरह लौटकर नही आता जिस प्रकार कि साँपके मुखसे मेंढक ॥१२॥


लङ्काशालपरिक्षेपं सूर्यमार्गसमुन्नतम् । दुर्लङ्घ्यं दुर्निरीक्ष्यं च सर्वदिक्षु सुयोजितम् ॥१३॥

युगान्तकालमेघौघनिर्घोषसमभीषणम् । हिंसाग्रन्थमिवात्यन्तपापकर्मविनिर्मितम् ॥१४॥

अर्थ: यह लंकाके कोटका घेरा सूर्यके मार्ग तक ऊँचा है, दुर्लंघ्य है, दुर्निरीक्ष्य है, सब दिशाओंमें फैला है, प्रलयकालीन मेघसमूहकी गर्जनाके समान तीक्ष्ण गर्जनासे भयंकर है, तथा हिंसामय शास्त्रके समान अत्यन्त पापकर्मा जनोंके द्वारा निर्मित है ॥१३-१४॥


तं दृष्ट्वा मारुतिर्दध्यावहो नाथेन रक्षसाम् । दाक्षिण्यमुज्झितं पूर्वं मायाप्राकारकारिणा ॥१५॥

अर्थ: उसे देखकर हनुमान्ने विचार किया कि अहो ! मायामयी कोटका निर्माण करनेवाले रावणने अपनी पहलेकी सरलता छोड़ दी है ॥१५॥


उन्मूलयन्निदं यन्त्रं विद्याबलसमूर्जितम् । मानमुन्मूलयाम्यस्य ध्यानी मोहमलं यथा ॥१६॥

अर्थ: मैं विद्याबलसे बलिष्ठ इस यन्त्रको उखाड़ता हुआ इसके मानको उस तरह उखाड़ दूँगा, जिस तरह कि ध्यानी मनुष्य मोहको उखाड़ देता है ॥१६॥


युद्धे च मानसं कृत्वा तत्सैन्यं स्वं महास्वनम् । गगने सागराकारं समयेऽतिष्ठिपत् सुधीः ॥१७॥

विद्याकवचयुक्तं च कृत्वात्मानं गदाकरः । विवेश सालिकावक्त्रं राहुवक्त्रं रविर्यथा ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर बुद्धिमान् हनुमान्ने युद्धमें मन लगाकर अर्थात् युद्धका विचार कर अपनी गरजती हुई समुद्राकार सेनाको तो संकेत देकर आकाशमें खड़ा कर दिया और अपने स्वयं विद्यामय कवच धारण कर तथा गदा हाथमें ले पुतलीके मुखमें उस तरह घुस गया जिस तरह कि राहुके मुखमें सूर्यं प्रवेश करता है ॥१७-१८॥


ततः कुक्षिगुहां तस्याः परीतकैकसावृताम् । विद्यानखैरलं तीक्ष्णैः केसरीव व्यपाटयत् ॥१९॥

अर्थ: तत्पश्चात् चारों ओरसे हड्डियोंसे आवृत उस पुतलीकी उदररूपी गुहाको उसने सिंहकी भाँति विद्यामयी तीक्ष्ण नखोंसे अच्छी तरह चीर डाला ॥१९॥


निर्दयैश्च गदाघातैर्घोरघोषैरचूर्णयत् । घातिकर्मस्थितिं यद्वद्ध्यानी भावैः सुनिर्मलैः ॥२०॥

अर्थ: और भयंकर शब्द करनेवाले गदाके निर्दय प्रहारोंसे उसे उस प्रकार चूर-चूर कर डाला जिस प्रकार कि ध्यानी मनुष्य अपने अतिशय निर्मल भावोंसे घातिया कर्मोंकी स्थितिको चूर-चूर कर डालता है ॥२०॥


अथाशालिकविद्याया यास्या भेदं भयावहम् । समो नीलाम्बुवाहानामभूच्चटचटाध्वनिः ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर भंगको प्राप्त होती हुई आशालिक विद्याका नील मेघोंके समान भयंकर चट-चट शब्द हुआ ॥२१॥


तेन संभाव्यमानोऽसौ शालो नष्टोऽतिचञ्चलः । स्तोत्रेणेव जिनेन्द्राणां कलुषः कर्मसंचयः ॥२२॥

अर्थ: उस शब्दसे यह अतिशय चंचल मायामय कोट इस प्रकार नष्ट हो गया जिस प्रकार कि जिनेन्द्र भगवान्की स्तुतिसे पापकर्मोंका समूह नष्ट हो जाता है ॥२२॥


ततस्तन्निनदं श्रुत्वा युगान्तजलदोन्नतम् । दृष्ट्वा विशीर्यमाणं च यन्त्रप्राकारमण्डलम् ॥२३॥

राजन् वज्रमुखः क्रुद्धः शालरक्षाधिकारवान् । त्वरितं रथमारुह्य सिंहो दावमिवाभ्यगात् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर प्रलयकालके मेघोंके समान उन्नत उस शब्दको सुनकर तथा यन्त्रमय कोटको नष्ट होता देख, कोटकी रक्षाका अधिकारी वज्रमुख नामका राजा कुपित हो शीघ्र ही रथ पर आरूढ़ हो हनुमान्के सन्मुख उस प्रकार आया जिस प्रकार कि सिंह दावानलके सम्मुख जाता है ॥२३-२४॥


ततोऽभिमुखमेतस्य वीक्ष्य मारुतनन्दनम् । नानायानयुधा योधाः प्रचण्डा योद्धुमुद्यताः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्को उसके सन्मुख देख, नाना प्रकारके वाहनों और शस्त्रोंसे सहित प्रचण्ड योधा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥२५॥


बलं वाज्रमुखं दृष्ट्वा प्रबलं योद्धुमुद्यतम् । परमं क्षोभमायातं हनूमत्सैन्यमुत्थितम् ॥२६॥

अर्थ: इधर वज्रमुखकी प्रबल सेनाको युद्धके लिए उद्यत देख परम क्षोभको प्राप्त हुई हनुमान्की सेना भी युद्धके लिए उठी ॥२६॥


किमत्र बहुनोक्तेन प्रवृत्तं तत्तथा रणम् । यथा स्वामिकृते पूर्वं सन्माननविमानने ॥२७॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? उन दोनों सेनाओंमें उस तरह युद्ध हुआ जिस तरह कि पहले स्वामीके द्वारा किये हुए सम्मान और तिरस्कारमें होता है ॥२७॥


स्वामिनो दृष्टिमार्गस्थाः सुभटाः कृतगर्जिताः । जीवितेष्वपि विस्नेहा बभूवुः किमिहोच्यताम् ॥२८॥

अर्थ: जो योद्धा स्वामीकी दृष्टिके मार्गमें स्थित थे अर्थात् स्वामी जिनकी ओर दृष्टि उठाकर देखता था वे योद्धा गर्जना करते हुए प्राणोंका भी स्नेह छोड़ देते थे इस विषयमें अधिक क्या कहा जाये ? ॥२८॥


ततः कपिध्वजैर्योधाश्चिरंकृतमहाहवाः । वज्रायुधस्य निर्भग्नाः क्षणान्नेशुरितस्ततः ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने चिरकाल तक बड़े-बड़े युद्ध किये थे ऐसे वज्रायुद्धके योद्धा वानरोंके द्वारा क्षणभरमें पराजित होकर इधर-उधर नष्ट हो गये - भाग गये ॥२९॥


चक्रेणानिलसूनुश्च तेजोऽहरत् विद्विषाम् । ऋक्षविम्बमिवाकाशादपातयदरेः शिरः ॥३०॥

अर्थ: और हनुमान्ने चक्रके द्वारा शत्रुओंका तेज हर लिया तथा नक्षत्र बिम्बके समान शत्रुका शिर काटकर आकाशसे नीचे गिरा दिया ॥३०॥


संख्ये पितुर्वधं दृष्ट्वा तं लङ्कासुन्दरी तदा । नियम्य कृच्छ्रतः शोकममर्षविषदूषिता ॥३१॥

जवनाश्वरथारूढा कुण्डलोद्योतितानना । शरासनायतोरस्का कुञ्चितभ्रूलतायुगा ॥३२॥

उल्केव संगतादित्यतेजोमण्डलधारिणी । धूमोद्गारसमायुक्ता घनप्राग्भारवर्त्तिनी ॥३३॥

संरम्भवशसंफुल्ललोहिताम्भोजलोचना । क्रूरसंदृष्टबिम्बोष्ठी क्रुद्धेव श्रीः शचीपतेः ॥३४॥

अर्थ: युद्धमें पिताका वध देख वज्रायुधकी पुत्री लंकासुन्दरी कठिनाईसे शोकको रोककर क्रोधरूपी विषसे दूषित हो हनुमान्की ओर दौड़ी । उस समय वह वेगशाली घोड़ोंके रथपर बैठी थी, कुण्डलोंके प्रकाशसे उसका मुख प्रकाशित हो रहा था, धनुषके समान उसका वक्षःस्थल आयत था, उसकी दोनों भृकुटियाँ टेढ़ी हो रही थीं, वह ऐसी जान पड़ती थी मानो उल्का ही प्रकट हुई हो, वह सूर्यके समान तेजका मण्डल धारण कर रही थी, धूमके उद्गारसे सहित थी, अर्थात् उसके शरीरसे कुछ-कुछ धुआँ-सा निकलता दिखता था और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो मेघसमूहके बीचमें विद्यमान थी, क्रोधके कारण उसके नेत्र फूले हुए लाल कमलोंके समान जान पड़ते थे, वह क्रोधसे अपना ओठ चाब रही थी, तथा ऐसी जान पड़ती थी मानो क्रोधसे भरी इन्द्रकी लक्ष्मी ही हो ॥३१-३४॥


अधावदिषुमुद्धृत्य कत्थमाना मनोहरा । मया श्रीशैल दृष्टोऽसि तिष्ठ ते शक्तिरस्ति चेत् ॥३५॥

अर्थ: वह देखनेमें सुन्दर थी तथा अपनी प्रशंसा कर रही थी, इस तरह धनुषपर बाण चढ़ाकर वह दौड़ी और बोली कि अरे श्रीशैल ! मैंने तुझे देख लिया है, यदि तुझमें कुछ शक्ति है तो खड़ा रह ॥३५॥


अद्य ते रावणः क्रुद्धो नभश्चरमहेश्वरः । करिष्यति यदेतत्ते करोमि हतचेष्टित ॥३६॥

अर्थ: आज कुपित हुआ विद्याधरोंका राजा रावण तेरा जो कुछ करेगा रे नीच ! वही मैं तेरा करती हूँ ॥३६॥


इयं यमालयं पापं भवन्तं प्रेषयाम्यहम् । दिग्मूढ इव जातस्त्वमनिष्टस्थानगोचरः ॥३७॥

अर्थ: यह मैं तुझ पापीको यमराजके घर भेजती हूँ, तू दिग्भ्रान्तकी तरह आज इस अनिष्ट स्थानमें आ पड़ा है ॥३७॥


तस्यास्त्वरितमायान्त्या यावच्छत्रमपातयत् । बाणेन तावदेतस्य तया चापं द्विधा कृतम् ॥३८॥

अर्थ: वेगसे आती हुई लंकासुन्दरीका छत्र जबतक हनुमान्ने नीचे गिराया तबतक उसने एक बाण छोड़कर हनुमान्के धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥३८॥


सा यावदगृहीच्छक्तिं तावन्मारुतिना शरैः । नभश्छन्नं समायान्ती भिन्ना शक्तिश्च सान्तरे ॥३९॥

अर्थ: लंकासुन्दरी जबतक शक्ति नामक शस्त्र उठाती है तबतक हनुमान्ने बाणोंसे आकाशको आच्छादित कर दिया और आती हुई उसकी शक्तिको बीचमें ही तोड़ डाला ॥३९॥


सा विद्याबलगम्भीरा वज्रदण्डसमान् शरान् । परशुकुन्तचक्राणि शतघ्नीमुशलान् शिलाः ॥४०॥

ववर्ष वायुपुत्रस्य रथे हिमवदुन्नते । विकाले वारिणो भेदान् मेघसंध्या यथोन्नता ॥४१॥

अर्थ: विद्याबलसे गम्भीर लंकासुन्दरीने हनुमान्के हिमालयके समान ऊँचे रथपर वज्रदण्डके समान बाण, परशु, कुन्त, चक्र, शतघ्नी, मुसल तथा शिलाएँ उस प्रकार बरसायीं जिस प्रकार कि उत्पातके समय उच्च मेघावली नाना प्रकारके जल बरसाती है ॥४०-४१॥


तया नानायुधाटोपैः सर्ववेगसमीरितैः । आच्छाद्यत महातेजाः शुचिसूर्य इवाम्बुदैः ॥४२॥

अर्थ: उसके पूर्ण वेगसे छोड़े हुए नाना प्रकारके शस्त्रसमूहसे महातेजस्वी हनुमान् उस तरह आच्छादित हो गया जिस प्रकार कि मेघोंसे आषाढ़का सूर्य आच्छादित हो जाता है ॥४२॥


विक्रान्तः स च शस्त्रौघमनिर्विण्णोऽन्तरस्थितम् । व्यपोहत निजैः शस्त्रैर्मायाविधिविशारदः ॥४३॥

अर्थ: इतना सब होनेपर भी खेदसे रहित, पराक्रमी एवं मायाके विस्तारमें निपुण हनुमान्ने अपने शस्त्रोंके द्वारा उसके शस्त्रसमूहको बीचमें ही दूर कर दिया ॥४३॥


शराः शरैरलुप्यन्त तोमराद्याः स्वजातिभिः । शक्तयः शक्तिभिर्नुन्ना समोल्का दूरमुद्ययुः ॥४४॥

अर्थ: उसके बाण बाणोंसे लुप्त हो गये, तोमर आदि तोमर आदिके द्वारा, तथा शक्तियाँ शक्तियोंके द्वारा खण्डित होकर उल्काओंके समान दूर जा गिरीं ॥४४॥


चक्रक्रकचसंवर्तकनकाटोपपिञ्जरम् । बभूव भीषणं व्योम विद्युद्भिरिव संकुलम् ॥४५॥

अर्थ: चक्र, क्रकच, संवर्तक तथा कनक आदिके विस्तारसे पीतवर्ण आकाश ऐसा भयंकर हो गया मानो बिजलियोंसे ही व्याप्त हो गया हो ॥४५॥


तं लङ्कासुन्दरी भूयो रूपेणालब्धसंनिमा । धीरा स्वभावतो राजन् लक्ष्मीः कमललोचना ॥४६॥

ज्ञानध्यानहरैः कान्तैर्दुर्द्धरैर्गुणसंनतैः । लावण्याहतसौन्दर्यैर्मनोऽन्तर्भेदकोविदैः ॥४७॥

नेत्रचापविनिर्मुक्तैर्विव्यधे स्मरसायकैः । तथेतरधनुर्मुक्तैः शरैराकर्णसंहतैः ॥४८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! तदनन्तर रूपसे अनुपम, स्वभावसे धीर, कमललोचना, लक्ष्मीके समान लंकासुन्दरी, नेत्ररूपी धनुषसे छोड़े हुए कामके बाणों अर्थात् कटाक्षोंसे हनुमान्को उधर पृथक् भेद रही थी और इधर अन्य धनुषसे छोड़े तथा कान तक खींचे हुए बाणोंसे पृथक् भेद रही थी । लंकासुन्दरीके वे कामबाण, ज्ञान-ध्यानके हरनेवाले थे, मनोहर थे, दुर्धर थे, गुणोंसे युक्त थे, लावण्यके द्वारा सौन्दर्यको हरनेवाले थे, और मनके भीतर भेदनेमें निपुण थे ॥४६-४८॥


विस्मये जगतः शक्ता सौभाग्यगुणगर्विता । तस्यालसक्रियस्यैवं प्रविष्टा हृदयोदरम् ॥४९॥

अर्थ: इस तरह जगत्को आश्चर्य करनेमें समर्थ तथा सौभाग्यरूपी गुणसे गर्वित लंकासुन्दरी हनुमान्के हृदयके भीतर प्रविष्ट हो गयी ॥४९॥


शरशक्तिशतघ्नीभिर्न तथा समपीड्यत । यथा मदनबाणौघैर्मर्मदारणकारिभिः ॥५०॥

अर्थ: वह हनुमान्, बाण, शक्ति तथा शतघ्नी आदि शस्त्रोंसे उस प्रकार पीड़ित नहीं हुआ था जिस प्रकार कि मर्मको विदारण करनेवाले कामके बाणोंसे पीड़ित हुआ था ॥५०॥


इयं मनोहराकारा ललितैर्विशिखैरपि । सबाह्याभ्यन्तरं हन्ति मामित्येवमचिन्तयत् ॥५१॥

अर्थ: हनुमान् विचार करने लगा कि यह मनोहराकारकी धारक, अपनी ललित चेष्टारूपी बाणोंसे मुझे भीतर और बाहर दोनों ही स्थानोंपर घायल कर रही है ॥५१॥


वरमस्मिन् मृधे मृत्युः पूर्यमाणस्य सायकैः । अनया विप्रयुक्तस्य जीवितं न सुरालये ॥५२॥

अर्थ: इस युद्धमें बाणोंसे भरकर मर जाना अच्छा है किन्तु इसके बिना स्वर्गमें भी जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥५२॥


चिन्तयत्येवमेतस्मिन् साप्यनङ्गेन चोदिता । त्रिकूटसुन्दरी कन्या करुणासक्तमानसा ॥५३॥

विकस्वरमनोदेहं तं पद्मच्छदलोचनम् । अबालेन्दुमुखं बालं किरीटन्यस्तवानरम् ॥५४॥

मूर्तियुक्तमिवानङ्गं सुन्दरं वायुनन्दनम् । हन्तुं समुद्यतां शक्तिं संजहार त्वरावती ॥५५॥

अर्थ: इधर इस प्रकार हनुमान् विचार कर रहा था उधर जिसका मन दयामें आसक्त था तथा जो त्रिकूटाचलकी अद्वितीय सुन्दरी थी ऐसी कन्या लंकासुन्दरीने कामसे प्रेरित हो, देदीप्यमान मन तथा शरीरके धारक, कमलदललोचन, तरुण चन्द्रवदन, मुकुट-पर वानरका चिह्न धारण करनेवाले, नवयौवनसे युक्त एवं मूर्तिधारी कामदेवके समान सुन्दर हनुमान्को मारनेके लिए उठायी हुई शक्ति शीघ्र ही संहृत कर ली - पीछे हटा ली ॥५३-५५॥


दध्यौ च मारयाम्येतं कथं दोषमपि श्रितम् । रूपेणानुपमानेन छिन्ते मर्माणि यो मम ॥५६॥

अर्थ: वह विचार करने लगी कि यद्यपि यह पिताके मारनेसे दोषी है तो भी जो अनुपम रूपसे मेरे मर्मस्थान विदार रहा है ऐसे इसे किस प्रकार मारूँ ? ॥५६॥


यद्यनेन समं सक्ता काममोगोदयद्युतिम् । न निषेवे च लोकेऽस्मिन् ततो मे जन्म निष्फलम् ॥५७॥

अर्थ: यदि इसके साथ मिलकर कामभोगरूपी अभ्युदयका सेवन न करूँ तो इस लोकमें मेरा जन्म लेना निष्फल है ॥५७॥


अतः सत्पथमुद्दिश्य स्वनामाङ्कं हनूमते । प्रजिघाय शरं मुग्धा विह्वलेनान्तरात्मना ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर विह्वल मनसे मुग्ध उस लंकासुन्दरीने समीचीन मार्गके उद्देश्यसे अपने नामसे अंकित एक बाण हनुमान्के पास भेजा ॥५८॥


पराजिता त्वया नाथ साहं मन्मथसायकैः । सुरैरपि न या शक्या जेतुं संघातवर्तिभिः ॥५९॥

अर्थ: उस बाणमें उसने यह भी लिखा था कि हे नाथ ! जो मैं इकट्ठे हुए देवोंके द्वारा भी नहीं जीती जा सकती थी वह मैं, आपके द्वारा कामके बाणोंसे पराजित हो गयी ॥५९॥


प्रवाच्य मारुतिर्बाणमङ्कं स्वैरमुपागतम् । धृतिं परां परिप्राप्तो रथादरमवातरत् ॥६०॥

अर्थ: गोदमें आये हुए उस बाणको अच्छी तरह बाँच कर परम धैर्यको प्राप्त हुआ हनुमान् शीघ्र ही रथसे उतरा ॥६०॥


उपसृत्य च तां कन्यां मृगेन्द्रसमविक्रमः । कृत्वाङ्के गाढमालिङ्गत् कामो रतिमिवापराम् ॥६१॥

अर्थ: और उसके पास जाकर सिंहके समान पराक्रमी हनुमान् उसे गोदमें बिठा उसका ऐसा गाढ आलिंगन किया मानो कामदेवने दूसरी रतिका ही आलिंगन किया हो ॥६१॥


अथ प्रशान्तवैरासावस्रदुर्दिनलोचना । तातप्रयाणशोकार्ता जगदे वायुसूनुना ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका वैर शान्त हो गया था, जिसके नेत्रोंसे दुर्दिन की भाँति अविरल अश्रुओं-की वर्षा हो रही थी तथा जो पिताके मरण-सम्बन्धी शोकसे पीड़ित थी ऐसी उस लंकासुन्दरीसे हनुमान्ने कहा ॥६२॥


मा रोदीः सौम्यवक्त्रे त्वमलं शोकेन भामिनि । विहिता गतिरेषैव क्षात्रधर्मे सनातने ॥६३॥

अर्थ: कि हे सौम्यमुखि ! रोओ मत । हे भामिनि ! शोक करना व्यर्थ है । सनातन क्षत्रिय धर्मकी तो यही रीति है ॥६३॥


ननु ते ज्ञातमेवैतद्यथा राज्यविधौ स्थिताः । पित्रादीनपि निघ्नन्ति नराः कर्मबलेरिताः ॥६४॥

अर्थ: यह तो तुम्हें विदित ही है कि राजकार्यमें स्थित मनुष्य, कर्मबलसे प्रेरित हो पिता आदिको भी मार डालते हैं ॥६४॥


वृथा रोदिषि किन्त्वेतद्ध्यानमार्तं विवर्जय । अस्मिन् हि सकले लोके विहितं भुज्यते प्रिये ॥६५॥

अर्थ: व्यर्थ ही क्यों रोती हो ? इस आर्तध्यानको छोड़ो । हे प्रिये ! इस समस्त संसारमें अपना किया हुआ ही सब भोगते हैं अर्थात् जो जैसा करता है वैसा भोगता है ॥६५॥


निहितोऽयमनेनेति द्विडत्र व्याजमात्रकम् । आयुःकर्मानुभावेन प्राप्तकालो विपद्यते ॥६६॥

अर्थ: ‘यह शत्रु इसके द्वारा मारा गया’ यह कहना तो छलमात्र है । यथार्थमें तो आयुकर्मके प्रभावसे समय पाकर यह जीव मरता है ॥६६॥


वचोभिरेमिरन्यैश्च मुक्तशोका व्यराजत । सहिता वातिना यद्वदिन्दुना निर्घना निशा ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार इन तथा अन्य वचनोंसे जिसका शोक छूट गया था ऐसी लंकासुन्दरी हनुमान्के साथ इस प्रकार सुशोभित हो रही थी जिस प्रकार कि मेघरहित रात्रि चन्द्रमाके साथ सुशोभित होती है ॥६७॥


प्रेमनिर्झरपूर्णेन तयोरालिङ्गनेन सः । संग्रामजः श्रमो दूरमथायातः सुचेतसोः ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम हृदयके धारक उन दोनोंका संग्रामसे उत्पन्न हुआ श्रम, प्रेमरूपी निर्झरसे परिपूर्ण आलिंगन-के द्वारा दूर भाग गया ॥६८॥


ततो यत्र नभोदेशे स्तम्भिन्या विद्यया खगाः । स्तम्भिता बलमत्रैव रचितावासमाश्रितम् ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर स्तम्भिनी विद्याके द्वारा आकाशके जिस प्रदेशमें विद्याधर रोक दिये गये थे उस प्रदेशमें आवास बनाकर वह सेना ठहरायी गयी ॥६९॥


संध्यारक्ताभ्रसंकाशं गीर्वाणनगरोपमम् । श्रीशैलस्य तदत्यन्तं शिविरं पर्यराजत ॥७०॥

अर्थ: सन्ध्याके रक्त मेघके समान दिखनेवाला उसी हनुमान्का वह शिविर देवनगरके तुल्य अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥७०॥


गजवाजिविमानस्था रथस्थाश्च महानृपाः । तत्पुरं ध्वजमालाढ्यं विविशुः पृष्टवातयः ॥७१॥

अर्थ: उस सेनामें जो बड़े-बड़े राजा थे उन्होंने हनुमान्से पूछकर हाथियों, घोड़ों, विमानों तथा रथोंपर सवार हो ध्वजाओंके समूहसे युक्त उस नगरमें प्रवेश किया ॥७१॥


स्थितास्तत्र यथान्यायं लब्धोत्साहसमुत्सवाः । कथाभिरतिचित्राभिः सूरसंग्रामजन्मभिः ॥७२॥

अर्थ: वे शूर-वीरोंके संग्रामसे उत्पन्न नाना प्रकारकी कथाएँ करते हुए उस नगरमें उत्साह और उल्लासको प्राप्त कर यथायोग्य ठहरे ॥७२॥


अथ तं त्वरितात्मानं वातिं गन्तुं समुद्यतम् । बाला विश्रब्धमप्राक्षीदिति प्रेमपरायणा ॥७३॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका मन शीघ्रतासे युक्त था ऐसे हनुमान्को जानेके लिए उद्यत देख प्रेमसे भरी लंकासुन्दरीने एकान्तमें उससे पूछा कि ॥७३॥


विविधागोभिरापूर्णः श्रुतदुःसहविक्रमः । कान्त लङ्कां किमर्थं त्वं वद गन्तुं समुद्यतः ॥७४॥

अर्थ: हे नाथ ! आप रावणके दुःसह पराक्रमकी बात सुन चुके हैं और स्वयं नाना अपराधोंसे परिपूर्ण हैं फिर किसलिए लंका जानेको उद्यत हैं सो तो कहो ॥७४॥


तस्यै जगाद वृत्तान्तमशेषं वायुनन्दनः । कृत्यं प्रत्युपकारस्य बान्धवैरनुमोदितम् ॥७५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्ने उसे सब वृत्तान्त कहा और यह बताया कि प्रत्युपकारका करना बन्धुजनोंके द्वारा अनुमोदित है ॥७५॥


सीतया सह रामस्य भद्रे भद्रसमागमः । हृतया राक्षसेन्द्रेण कर्तव्यः सर्वथा मया ॥७६॥

अर्थ: हे भद्रे ! राक्षसोंका इन्द्र रावण सीताको हर ले गया है सो उसके साथ रामका समागम मुझे अवश्य कराना है ॥७६॥


साऽब्रवीत् समतिक्रान्तं सौहार्दं तत्पुरातनम् । श्रद्धास्नेहक्षये नष्टा प्रदीपस्य यथा शिखा ॥७७॥

अर्थ: यह सुन लंकासुन्दरीने कहा कि रावणके साथ आपका जो पुराना सौहार्द था वह नष्ट हो चुका है जिस प्रकार नेत्रके नष्ट हो जानेसे दीपकी शिखा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार आपके प्रति श्रद्धाके नष्ट हो जानेसे रावणका सौहार्द नष्ट हो गया है ॥७७॥


आसीद् रथ्योपशोभाढ्यां ध्वजमालाकुलीकृताम् । प्राविक्षदादृतो लङ्कां भवान् दिवमिवामरः ॥७८॥

अर्थ: एक समय था कि जब आप मार्गोंकी शोभासे युक्त तथा ध्वजाओं-की पंक्तिसे अलंकृत लंकामें बड़े आदरके साथ उस तरह प्रवेश करते थे जिस तरह कि देव स्वर्गमें प्रवेश करता है ॥७८॥


अधुना त्वयि दोषाढ्ये रावणश्चण्डशासनः । प्रकाशं व्रजति क्रोधं गृहीष्यति न संशयः ॥७९॥

अर्थ: परन्तु आज आप अपराधी होकर यदि लंकामें प्रकट रूपसे जाते हैं तो कठोर शासनको धारण करनेवाला रावण आपपर क्रोध ग्रहण करेगा इसमें संशय नहीं है ॥७९॥


यदोपलभ्यते चार्वी विशुद्धिः कालदेशयोः । विशुद्धात्मानमव्यग्रं तदा तं द्रष्टुमर्हसि ॥८०॥

अर्थ: अतः जिस समय देश और कालकी उत्तम शुद्धि - अनुकूलता प्राप्त हो तथा रावणका हृदय शुद्ध एवं व्यग्रता रहित हो उस समय उसका साक्षात्कार करना योग्य है ॥८०॥


एवमेवेति सोऽवोचद्यद्ब्रवीषि विचक्षणे । आकूतं तस्य विज्ञातुं गत्वा वाञ्छामि सुन्दरि ॥८१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्ने कहा कि विदुषि ! तुमने जैसा कहा है यथार्थमें वैसा ही है । किन्तु हे सुन्दरि ! मैं रावणका अभिप्राय जानना चाहता हूँ ॥८१॥


कीदृशी वा सती सीता रूपेण प्रथिता भवेत् । चालितं मेरुवद्धीरं रावणस्य मनो यया ॥८२॥

अर्थ: और यह भी देखना चाहता हूँ कि वह सती सीता कैसी रूपवती है कि जिसने मेरुके समान धीर, वीर रावणका मन विचलित कर दिया है ॥८२॥


एवमुक्त्वा मरुत्पुत्रस्तद्विन्यस्तमहाबलः । तया मुक्तो विवेकिन्या त्रिकूटाभिमुखं ययौ ॥८३॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा अपनी सेना उसीके पास छोड़कर हनूमान् उस विवेकवतीसे छूटकर त्रिकूटाचल- की ओर चला ॥८३॥


चित्रमिदं परमत्र नृलोके, यत्परिहाय भृशं रसमेकम् । तत्क्षणमेव विशुद्धशरीरं जन्तुरुपैति रसान्तरसंगम् ॥८४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस संसारमें यह परम आश्चर्यकी बात है कि प्राणी एक रसको छोड़कर उसी क्षण विशुद्ध रूपको धारण करनेवाले दूसरे रसको प्राप्त हो जाता है ॥८४॥


कर्मविचेष्टितमेतदमुष्मिन् किन्त्वथवाद्भुतमस्ति निसर्गे । सर्वमिदं स्वशरीरनिबद्धं दक्षिणमुत्तरतश्च रवीहा ॥८५॥

अर्थ: सो इस संसारमें यह प्राणियोंके कर्मकी ही अद्भुत चेष्टा है । जिस प्रकार सूर्यकी गति कभी दक्षिण दिशाकी ओर होती है और कभी उत्तर दिशाकी ओर । उसी प्रकार प्राणियोंके शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाला यह सब व्यवहार कर्मकी चेष्टानुसार कभी इस रसरूप होता है और कभी उस रसरूप होता है ॥८५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हनूमल्लङ्कासुन्दरीकन्यालाभाभिधानं नाम द्विपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें हनुमान्को लंकासुन्दरी कन्याकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला बावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५२॥

५३. त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व (हनुमत्प्रत्यभिगमनं)

मगधेन्द्र ततो वातिः प्रभावोदयसंगतः । लङ्कां विवेश निःशंकः स्वल्पानुगसमन्वितः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे मगधराज ! प्रभाव और अभ्युदयसे सहित तथा स्वल्प अनुचरोंसे युक्त हनुमान्ने निःशंक होकर लंकामें प्रवेश किया ॥१॥


द्वारे च रचिताभ्यर्चे विभीषणनिकेतनम् । विवेश योग्यमेतेन सम्मानं च समाहृतः ॥२॥

अर्थ: वहाँ जिसके द्वारपर सत्कार किया गया था ऐसे विभीषणके महलमें प्रवेश किया और विभीषणने यथायोग्य उनका सम्मान किया ॥२॥


ततः स्थित्वा क्षणं किंचित् संस्पृष्टामिः परस्परम् । वार्ताभिरिति सद्वाक्यं व्याजहार मरुत्सुतः ॥३॥

उचितं किमिदं कर्तुं यद्वास्यार्द्धपतिः स्वयम् । कुरुते क्षुद्रवत्कश्चिच्चोरणं परयोषितः ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ परस्पर इधर-उधरकी कुछ वार्ताएँ करते हुए क्षण भर ठहर कर हनुमान्ने इस प्रकारके सद्वचन कहे कि तीन खण्डका अधिपति किसी क्षुद्र मनुष्यकी तरह पर-स्त्रीकी चोरी करता है सो क्या ऐसा करना उचित है ? ॥३-४॥


मर्यादानां नृपो मूलमापगानां यथा नगः । अनाचारे स्थिते तस्मिन् लोकस्तत्र प्रवर्तते ॥५॥

अर्थ: जिस प्रकार पर्वत नदियोंका मूल है उसी प्रकार राजा मर्यादाओंका मूल है । यदि राजा स्वयं अनाचारमें स्थित रहता है तो उसकी प्रजा भी अनाचारमें प्रवृत्ति करने लगती है ॥५॥


ईदृशे चरिते कृत्ये सर्वलोकविनिन्दिते । सहनीयं समस्तानां दुःखमेष्यति नो ध्रुवम् ॥६॥

अर्थ: फिर ऐसा कार्य तो सर्वलोक विनिन्दित है - सब लोगोंकी निन्दाका पात्र है । इसके करने पर सब लोगोंको दुःख सहन करना पड़ता है और हम लोगोंको तो निश्चित ही दुःख प्राप्त होता है ॥६॥


तत् क्षेमंकरमस्माकं हिताय जगतां तथा । उच्यतां रावणः शीघ्रं वचो न्यायानुपालकम् ॥७॥

अर्थ: इसलिए हम सबके कल्याणके लिए शीघ्र ही रावणसे ऐसे वचन कहिए जो न्यायकी रक्षा करनेवाले हों ॥७॥


यथा किल द्वये लोके निन्दनीयं विचेष्टितम् । मा कार्षीः जगतो नाथ कीर्तिविध्वंसकारणम् ॥८॥

अर्थ: उन्हें बतलाइए कि हे जगत्के नाथ ! दोनों लोकोंमें निन्दनीय तथा कीर्तिको नष्ट करनेवाली चेष्टा मत कीजिए ॥८॥


विमलं चरितं लोके न केवलमिहेष्यते । किन्तु गीर्वाणलोकेऽपि रचिताञ्जलिभिः सुरैः ॥९॥

अर्थ: निर्मल-निर्दोष चरित्रकी न केवल इस लोकमें चाह है अपितु स्वर्गलोकमें देव भी हाथ जोड़कर उसकी चाह करते हैं ॥९॥


कैकसीनन्दनोऽवोचद् बहुशोऽभिहितो मया । ततः प्रभृति नैवासौ मया संभाषते समम् ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणने कहा कि मैंने रावणसे अनेक बार कहा है पर वह उस समयसे मेरे साथ बात ही नहीं करता है ॥१०॥


तथापि भवतो वाक्यान् श्वः समेत्य नरेश्वरम् । वक्तास्मि किन्तु दुःखेन त्यक्ष्यत्येतदसौ ग्रहम् ॥११॥

अर्थ: फिर भी आपके कहनेसे मैं कल राजाके पास जाकर कहूँगा किन्तु यह निश्चित है कि वह बड़े दुःखसे ही इस हठको छोड़ेगा ॥११॥


अहोऽद्यैकादशं जातं सीताया वल्मनोज्झने । तथापि विरतिः काचिल्लङ्केन्द्रस्य न जायते ॥१२॥

अर्थ: यद्यपि आज सीताको आहार पानी छोड़े ग्यारहवाँ दिन है तथापि लंकाधिपतिको कुछ भी विरति नहीं है - इस कार्यसे रंचमात्र भी विरक्तता नहीं है ॥१२॥


तच्छ्रुत्वा वचनं सद्यः महाकारुण्यसंगतः । प्रमदाह्वयमुद्यानं मारुतिर्गन्तुमुद्यतः ॥१३॥

अर्थ: विभीषणके यह वचन सुन महादयाभावसे युक्त हनुमान् प्रमदोद्यानमें जानेके लिए उद्यत हुआ ॥१३॥


अपश्यच्च लताजालैस्तत्रवैराकुलीकृतम् । अरुणैः पल्लवैः ब्यासं वरस्त्रीकरचारुभिः ॥१४॥

भ्रमरप्रावृतैर्गुच्छैः सुजातैर्बद्धशेखरम् । फलैरानतशाखाग्रं किंचित् पवनकम्पितम् ॥१५॥

पद्मादिच्छादितैः स्वच्छैः सरोभिः सदलंकृतम् । भासुरं कल्पवल्लीभिः संगताभिर्महातरुम् ॥१६॥

गीर्वाणकुरुदेशाभं प्रसूनरजसावृतम् । नन्दनस्य दधत्साम्यमनेकाद्भुतसंकुलम् ॥१७॥

अर्थ: जाकर उसने उस प्रमदोद्यानको देखा जो कि नयी-नयी लताओंके समूहसे व्याप्त था, उत्तम स्त्रियोंके हाथोंके समान सुन्दर लाल-लाल पल्लवोंसे युक्त था, भ्रमरोंसे आच्छादित सुन्दर गुच्छोंके द्वारा जिसपर सेहरा बँध रहा था, जहाँ फलोंके भारसे शाखाओंके अग्रभाग नम्रीभूत हो रहे थे, जो वायुके द्वारा कुछ-कुछ हिल रहा था, कमल आदिसे आच्छादित स्वच्छ सरोवरोंसे जो अलंकृत था, जो बड़े-बड़े वृक्षोंसे लिपटी हुई कल्पलताओंसे देदीप्यमान था, जो देवकुरु प्रदेशके समान जान पड़ता था, फूलोंकी परागसे आवृत था, अनेक आश्चर्योंसे व्याप्त था तथा नन्दनवनकी समानता धारण कर रहा था ॥१४-१७॥


ततो लीलां वहन् रम्यां वायू राजीवलोचनः । विवेश परमोद्यानं सीतादर्शनकाङ्क्षया ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर मनोहर लीलाको धारण करता हुआ कमललोचन हनुमान् सीताके दर्शनकी इच्छासे उस उत्कृष्ट उद्यानमें प्रविष्ट हुआ ॥१८॥


प्रजिघाय च सर्वासु दिक्षु चक्षुरतित्वरम् । विविधद्रुमदेशेषु गहनेषु दलादिभिः ॥१९॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने शीघ्र ही समस्त दिशाओंमें तथा पल्लवों आदिसे सघन नाना वृक्षोंके समूहमें दृष्टि डाली ॥१९॥


दृष्ट्वा च दूरतः सीतामन्यदर्शनवर्जितः । अचिन्तयदसौ सैषा रामदेवस्य सुन्दरी ॥२०॥

अर्थ: वहाँ दूरसे ही सीताको देखकर वह अन्य वस्तुओंके दर्शनसे रहित हो गया अर्थात् उसी ओर टकटकी लगाकर देखता रहा । तदनन्तर उसने विचार किया कि वह रामदेवकी सुन्दरी यही है ॥२०॥


स्निग्धज्वलनसंकाशा बाष्पपूरितलोचना । करविन्यस्तवक्त्रेन्दुर्मुक्तकेशी कृशोदरी ॥२१॥

अर्थ: यह स्निग्ध अग्निके समान है, इसके नेत्र आँसुओंसे भर रहे हैं, वह हथेलीपर मुखरूपी चन्द्रमाको रखे हुई है, केश इसके खुले हुए हैं तथा उदर इसका अत्यन्त कृश है ॥२१॥


अहो रूपमिदं लोके जिताशेषमनोहरम् । परमां ख्यातिमायातं सत्यवस्तुनिबन्धनम् ॥२२॥

अर्थ: उसे देखकर हनुमान् विचार करने लगा कि अहो ! लोकमें इसका रूप समस्त मनोहर पदार्थोंको पराजित करनेवाला है, परम ख्यातिको प्राप्त है तथा सत्य वस्तुओंका कारण है ॥२२॥


रहिता शतपत्रेण नास्या लक्ष्मीः समा भवेत् । दुःखार्णवं गताप्येषा सदृशी नान्ययोषिता ॥२३॥

अर्थ: कमलसे रहित लक्ष्मी अर्थात् कमलसे निकली हुई साक्षात् लक्ष्मी इसकी बराबरी नहीं कर सकती । अहो ! यह दुःखरूपी सागरमें निमग्न है तो भी अन्य स्त्रियोंके समान नहीं है ॥२३॥


निपत्य शिखरादद्रेरस्य मृत्युमुपैम्यहम् । विरहे पद्मनाभस्य धारयामि न जीवितम् ॥२४॥

अर्थ: वह इस प्रकार विचार कर रही थी कि मैं इस पर्वतके शिखरसे गिरकर मृत्युको प्राप्त कर सकती हूँ परन्तु रामके विरहमें जीवन नहीं धारण करूँगी ॥२४॥


कृतप्रचिन्तनामेवं वैदेहीं पवनात्मजः । निःशब्दपादसंपातः प्राप्तो रूपान्तरं दधत् ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करती हुई सीताके पास, हनुमान् चुपचाप पैर रखता हुआ दूसरा रूप धारण कर गया ॥२५॥


ततोऽङ्गुलीयकं तस्या विससर्जाङ्कवाससि । सहसा सा तमालोक्य स्मेराऽभूत्पुलकाचिता ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने सीताकी गोदके वस्त्रपर अँगूठी छोड़ी उसे देखकर वह सहसा हँस पड़ी तथा रोमांचोंसे युक्त हो गयी ॥२६॥


तस्यामेवंमवस्थायां गत्वा नार्यस्त्वरान्विताः । तोषादवर्धयन् दिष्ट्या रावणं तत्परायणम् ॥२७॥

अर्थ: सीताकी ऐसी अवस्था होनेपर वहाँ जो स्त्रियाँ थीं उन्होंने शीघ्रतासे जाकर सीताका समाचार जाननेमें तत्पर रहनेवाले रावणको शुभ समाचार सुना हर्षसे वृद्धिगत किया ॥२७॥


संतुष्टोऽङ्गगतं ताभ्यो वस्त्ररत्नादिकं ददौ । श्रुत्वा स्मेराननां सीतां सिद्धं कार्यं विचिन्तयन् ॥२८॥

अर्थ: रावणने सन्तुष्ट होकर उन स्त्रियोंके लिए अपने शरीरपर स्थित वस्त्र तथा रत्न आदिक दिये और सीताको प्रसन्नमुखो सुन अपना कार्य सिद्ध हुआ समझा ॥२८॥


विधातुं महिमानं च किंचिदादिशदुत्सुकः । सुधापूरमिव प्राप्तः समुल्लासधरे हृदि ॥२९॥

अर्थ: उसके हृदयमें इतना उल्लास हुआ मानो अमृतके पूरको ही प्राप्त हुआ हो । उसी समय उसने उत्सुक हो अनिर्वचनीय उत्सव करनेका आदेश दिया ॥२९॥


स्वनाथवचनात् साध्वी सर्वान्तःपुरसंयुता । गता मन्दोदरी शीघ्रं यत्रासौ जनकात्मजा ॥३०॥

अर्थ: अपने पतिके कहनेसे पतिव्रता मन्दोदरी भी समस्त अन्तःपुरके साथ शीघ्र ही वहाँ गयी जहाँ सीता विद्यमान थी ॥३०॥


विकचास्यद्युतिं सीतां दृष्ट्वा मन्दोदरी चिरात् । जगौ बाले त्वयाऽस्माकं परमोऽनुग्रहः कृतः ॥३१॥

अर्थ: बहुत दिन बाद आज जिसके मुखकमलकी कान्ति विकसित हो रही थी ऐसी सीताको देख मन्दोदरीने कहा कि हे बाले ! आज तूने हम सबपर बड़ा अनुग्रह किया है ॥३१॥


अधुना भज लोकेशं रावणं शोकवर्जिता । सुराणां श्रीरिवाधीशं लब्धनिःशेषसंपदम् ॥३२॥

अर्थ: जिस प्रकार समस्त सम्पदाओंसे युक्त देवेन्द्रकी लक्ष्मी सेवा करती है उसी प्रकार तू भी अब शोक रहित हो जगत्पति रावणकी सेवा कर ॥३२॥


इत्युक्ता कुपितावोचद्यदीदं भवतीरितम् । पद्मः खेचरि जानाति म्रियते ते पतिर्ध्रुवम् ॥३३॥

अर्थ: मन्दोदरीके इस प्रकार कहनेपर सीताने कुपित होकर कहा कि हे विद्याधरि ! यदि तेरा यह कहना राम जान पावें तो तेरा पति निश्चित ही मारा जावे ॥३३॥


वार्ता समागता भर्तुरिति तोषमुपागता । अकार्षं वदनं स्मेरं भजन्ती परमां धृतिम् ॥३४॥

अर्थ: आज मेरे भर्ताका समाचार आया है इसलिए सन्तोषको प्राप्त हो परम धैर्यको प्राप्त हुई हूँ और इसीलिए मैंने मुखको मन्दहास्यसे युक्त किया है ॥३४॥


इति ता वचनं श्रुत्वा राक्षसेशस्य योषितः । ऊचुः क्षुद्भववातेन लपत्येषेति सस्मिता ॥३५॥

अर्थ: सीताके यह वचन सुनकर स्त्रियाँ कहने लगीं कि क्षुधाके कारण इसे वायुरोग हो गया है इसीलिए यह हँसती हुई ऐसा बक रही है ॥३५॥


ततः श्रेणिक वैदेही नितान्तं तुङ्गया गिरा । परमं विस्मयं प्राप्ता जगादैवं समुत्सुका ॥३६॥

गताया व्यसनं घोरमब्धिद्वीपे महाभये । कोऽयं संनिहितः साधुर्बन्धुभूतोऽतिवत्सलः ॥३७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इसके बाद परम आश्चर्यको प्राप्त हुई सीताने अत्यन्त उत्सुक हो अतिशय उच्च वाणीमें इस प्रकार कहा कि जो समुद्रके भीतर विद्यमान महाभयदायक इस द्वीपमें कष्टको प्राप्त हुई है ऐसा मेरा कौन स्नेही उत्तम बन्धु यहाँ निकट आया है ॥३६-३७॥


ततो नभस्वतः सूनुरेवमर्थितदर्शनः । अभिप्रायमिमं चक्रे साधुतायुक्तमानसः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके दर्शनकी प्रार्थना की गयी थी तथा जिसका मन सज्जनतासे युक्त था ऐसे हनुमान्ने इस प्रकार विचार किया कि ॥३८॥


परार्थं यः पुरस्कृत्य पुनः स्वं विनिगूहति । सोऽतिभीरुतयात्यन्तं जायते निकृतो नरः ॥३९॥

अर्थ: जो मनुष्य दूसरेका कार्य आगे कर अर्थात् पहलेसे स्वीकृत कर फिर अपने आपको छिपाता है वह अत्यन्त भीरु होनेके कारण नीच मनुष्य होता है ॥३९॥


परमापदि सीदन्तं जनं संधारयन्ति ये । अनुकम्पनशीलानां तेषां जन्म सुनिर्मलम् ॥४०॥

अर्थ: और जो आपत्तिमें पड़े हुए दूसरे मनुष्यको आलम्बन देते हैं उन दयालु मनुष्योंका जन्म अत्यन्त निर्मल होता है ॥४०॥


हानिः पुरुषकारस्य न चात्मनि निदर्शिते । प्रकाश्ये गुरुतां याति जगति श्रीर्यशस्विनी ॥४१॥

अर्थ: इसके सिवाय अपने आपको प्रकट कर देनेमें पुरुषत्वकी कुछ हानि भी तो नहीं मालूम होती अपितु प्रकट कर देनेपर यशस्विनी लक्ष्मी संसारमें गौरवको प्राप्त होती है ॥४१॥


उत्तमस्त्रीसहस्राणां ततो मध्यगताभिमाम् । प्रभामण्डलकल्पोऽसौ पद्मपत्नीमुपागमत् ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान् भामण्डलको नाईं हजारों उत्तम स्त्रियोंके बीच बैठी हुई सीताके समीप गया ॥४२॥


निःशङ्कद्विपविक्रान्तः संपूर्णेन्दुसमाननः । सहस्रांशुसमो दीप्त्या माल्याम्बरविभूषितः ॥४३॥

रूपेणाप्रतिमो युक्तः कान्त्या निर्मृगचन्द्रमाः । किरीटे वानरं बिभ्रदामोदाहृतषट्पदः ॥४४॥

चन्दनार्चितसर्वाङ्गः पीतचर्चाविराजितः । ताम्बूलारक्तबिम्बोष्ठः प्रलम्बांशुकशोभितः ॥४५॥

चलत्कुण्डलविद्योतविहसद्गण्डमण्डलः । परं संहननं बिभ्रद्वीर्येणान्तविवर्जितः ॥४६॥

सर्पन् सीतां समुद्दिश्य हनूमान् गुणभूषणः । महाप्रतापसंयुक्तः शोभामुपययौ पराम् ॥४७॥

अर्थ: जो शंका रहित हाथीके समान पराक्रमी था, जिसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर था, जो दीप्तिसे सूर्यके समान था, माला और वस्त्रोंसे सुशोभित था । रूपसे अनुपम था । कान्तिसे मृग रहित चन्द्रमाके समान जान पड़ता था, मुकुटमें वानरका चिह्न धारण कर रहा था, सुगन्धिसे जो भ्रमरोंको आकर्षित कर रहा था, चन्दनसे जिसका समस्त शरीर चर्चित था, जो पीत विलेपनसे सुशोभित था, जिसका बिम्बोष्ठ ताम्बूलके रससे लाल था, जो नीचे लटकते हुए वस्त्रसे सुशोभित था, चंचल कुण्डलोंके प्रकाशसे जिसका गण्डस्थल सुशोभित हो रहा था, जो उत्कृष्ट संहननको धारण कर रहा था, जिसके पराक्रमकी सीमा नहीं थी, जो गुणरूपी आभूषणोंसे युक्त था, तथा महाप्रतापसे सहित था ऐसा हनुमान् सीताको लक्ष्य कर धीरे-धीरे जाता हुआ परम शोभाको प्राप्त हो रहा था ॥४३-४७॥


कान्तिमासिमुखं दृष्ट्वा तं युतं परया श्रिया । पद्मायतेक्षणा नार्यस्ता बभूवुः समाकुलाः ॥४८॥

अर्थ: जिसका मुख कान्तिसे सुशोभित था, ऐसे उत्कृष्ट लक्ष्मीसे युक्त हनुमान्को देखकर वे कमललोचना स्त्रियाँ व्याकुल हो उठीं ॥४८॥


दधती हृदये कम्पं मन्दोदर्यात्तविस्मया । समालोकत सीतायाः समीपे वायुनन्दनम् ॥४९॥

अर्थ: जिसके हृदयमें कँपकँपी छूट रही थी ऐसी मन्दोदरीने सीताके समीप हनुमान्को आश्चर्यके साथ देखा ॥४९॥


उपगम्य ततः सीतां विनीतः पवनात्मजः । करकुड्मलमाधाय मस्तके नम्रतायुषि ॥५०॥

कुलं गोत्रं च संश्राव्य पितरं जननीं तथा । अवेदयच्च विश्रब्धं पद्मनाथेन चोदितम् ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर सीताके समीप पहुँचकर परम विनीत हनुमान्ने झुके हुए मस्तकपर अंजलि बाँध पहले अपने कुल, गोत्र तथा माता-पिताका नाम सुनाया । उसके बाद निश्चिन्त हो रामका सन्देश कहा ॥५०-५१॥


त्रिविष्टपसमे साध्वि विमाने विभवान्विते । रतिं न लभते रामो मग्नस्त्वद्विरहार्णवे ॥५२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे पतिव्रते ! तुम्हारे विरहरूपी सागरमें डूबे राम, स्वर्गके समान वैभवसे युक्त विमानमें भी रतिको प्राप्त नहीं हो रहे हैं ॥५२॥


त्यक्तनिःशेषकर्तव्यो मौनं प्रायेण धारयन् । स त्वां मुनिरिव ध्यायन्नेकतानोऽवतिष्ठते ॥५३॥

अर्थ: अन्य सब कार्य छोड़कर वे प्रायः मौन धारण किये रहते हैं और मुनिकी भाँति एकाग्र चित्त हो तुम्हारा ध्यान करते हुए बैठे रहते हैं ॥५३॥


वेणुतन्त्रीसमायुक्तं गीतं प्रवरयोषिताम् । न कर्णजाहमेतस्य कदाचिद्याति पावने ॥५४॥

अर्थ: हे पावने - हे पवित्रकारिणि ! बाँसुरी तथा वीणासे युक्त उत्तम स्त्रियोंका संगीत कभी भी उनके कर्णमूलमें नहीं पहुँचता है ॥५४॥


सदा करोति सर्वस्मै कथां स्वामिनि ते मुदा । त्वदीक्षणाशया प्राणान् बद्ध्वा धत्ते स केवलम् ॥५५॥

अर्थ: हे स्वामिनि ! वे सदा सबके सामने बड़े हर्षसे तुम्हारी ही कथा करते रहते हैं और केवल तुम्हारे दर्शनकी अभिलाषासे ही प्राणोंको बाँधकर धारण किये हुए हैं ॥५५॥


इति तद्वचनं श्रुत्वा पतिजीवनवेदनम् । प्रमोदं परमं प्राप्ता सीता विकसितेक्षणा ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकार पतिके जीवनको सूचित करनेवाले हनुमान्के वचन सुन सीता परम प्रमोदको प्राप्त हुई। उसके नेत्र-कमल खिल उठे ॥५६॥


विषादं संगता भूयो जलपूरितलोचना । ऊचे शान्ता हनूमन्तं विनीतं स्थितमग्रतः ॥५७॥

साहमस्यामवस्थायां निमग्ना कपिलक्षण । तुष्टा किं ते प्रयच्छामि हतेन विधिनान्विता ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर विषादको प्राप्त, शान्त सीताने नेत्रमें जल भरकर सामने बैठे हुए विनयी हनुमान्से कहा कि हे कपिध्वज ! मैं इस अवस्थामें निमग्न तथा दुर्भाग्यसे युक्त हूँ । सन्तुष्ट होकर तुझे क्या दूँ ? ॥५७-५८॥


ऊचे च वायुपुत्रेण दर्शनेनैव ते शुभे । अद्य मे सुलभं सर्वं जातं जगति पूजिते ॥५९॥

अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्ने कहा कि हे शुभे - हे मंगलरूपिणि ! हे पूजिते ! आज आपके दर्शनसे ही मुझे संसारमें सब कुछ सुलभ हो गया है ॥५९॥


ततो मुक्ताफलस्थूलबाष्पबिन्दुचिताधरा । सीता श्रीरिव दुःखार्ता पप्रच्छ कपिलक्षणम् ॥६०॥

मकरग्राहनक्रादिक्षोभितं भीममर्णवम् । भद्र दुस्तरमुल्लङ्घ्य विस्तीर्णं कथमागतः ॥६१॥

अवस्थां वा गतामेतां कायसंसिद्धिमागताम् । किमर्थं मामिहागत्य नयस्याश्वासमुत्तमम् ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर मोतियोंके समान बड़ी-बड़ी अश्रुओंकी बूँदोंसे जिसका ओंठ व्याप्त हो रहा था तथा जो दुःखसे पीड़ित लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ऐसी सीताने हनुमान्से पूछा कि हे भद्र ! मकर - ग्राह तथा नाक आदिसे क्षोभित इस भयंकर दुस्तर तथा लम्बे-चौड़े समुद्रको लाँघकर तू किस प्रकार आया है ? इस अवस्था अथवा कार्यकी सिद्धिको प्राप्त हुई जो मैं हूँ सो मुझे यहाँ आकर तू किस लिए उत्तम धैर्य प्राप्त करा रहा है ॥६०-६२॥


लावण्यद्युतिरूपाढ्यः कान्तिसागरसंवृतः । श्रिया कीर्त्या च संयुक्तः प्रियो मे भद्र बान्धवः ॥६३॥

अर्थ: हे भद्र ! तू लावण्य-कान्ति तथा रूपसे सहित, कान्तिरूपी सागरसे घिरा, तथा लक्ष्मी और कीर्तिसे युक्त मेरा प्यारा भाई ही है ॥६३॥


प्रदेशे स त्वया कस्मिन् प्राणनाथो ममेक्षितः । सत्यं जीवति सद्गोत्र क्वचिल्लक्ष्मणसंगतः ॥६४॥

अर्थ: तूने मेरे प्राणनाथको कहाँ देखा था ? हे कुलीन ! क्या सचमुच ही मेरे प्राणनाथ, लक्ष्मणके साथ कहीं जीवित हैं ? ॥६४॥


किं नु दुःखेचरैः संख्ये मोमैः व्यापादितोऽनुजः । लक्ष्मणेनैव तुल्यः स्यात्पद्मः पद्माभलोचनः ॥६५॥

अर्थ: ऐसा तो नहीं है कि उन भयंकर दुष्ट विद्याधरोंके द्वारा युद्धमें छोटा भाई लक्ष्मण मारा गया हो और उस दुःखसे दुःखी हो कमललोचन राम भी उसीकी तुल्य अवस्थाको प्राप्त हो गये हों ॥६५॥


किं वा मद्विरहादुग्रदुःखं नाथः समाश्रितः । संदिश्य भवतः किंचिद्वने लोकान्तरं गतः ॥६६॥

अर्थ: अथवा तुम्हें सन्देश देनेके बाद मेरे विरहसे अत्यन्त उग्र दुःखको प्राप्त हो नाथ, किसी वनमें लोकान्तरको प्राप्त हो गये हों ? ॥६६॥


जिनेन्द्रविहिते मार्गे निःशेषग्रन्थवर्जितः । तपस्यन् किमसावास्ते भवनिर्वेदपण्डितः ॥६७॥

अर्थ: अथवा वे संसारसे विरक्त रहनेमें निपुण थे अतः समस्त परिग्रहका त्यागकर जिनेन्द्र प्रणीत मार्गमें दीक्षित हो कहीं तपस्या करते हुए विद्यमान हैं ? ॥६७॥


शिथिलीभूतनिःशेषशरीरस्य वियोगतः । अङ्गुलीतश्च्युतं प्राप्तं त्वया स्यादङ्गुलीयकम् ॥६८॥

अर्थ: अथवा वियोगके कारण जिनका समस्त शरीर शिथिल हो गया है ऐसे श्रीरामकी अँगुलीसे यह अँगूठी कहीं गिर गयी होगी सो तुम्हें मिली है ? ॥६८॥


त्वया सह परिज्ञातिर्नासीदेव मम प्रभोः । कार्येण रहितः प्राप्तः कथं त्वं तस्य मित्रताम् ॥६९॥

अर्थ: तुम्हारे साथ मेरे स्वामीका परिचय पहले नहीं था फिर बिना कारण तू उनकी मित्रताको कैसे प्राप्त हो गया ? ॥६९॥


न च प्रत्युपकाराय शक्ता तुष्टाप्यहं तव । अङ्गुलीयकमेतच्च समानीतं कृपावता ॥७०॥

अर्थ: तू दयालु होकर यह अँगूठी लाया है सो सन्तुष्ट होकर भी मैं तेरा प्रत्युपकार करनेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥७०॥


एतत्सर्वं मम भ्रातः समाचक्ष्व विशेषतः । सत्येन श्रावितः पित्रोर्देवस्य च मनोजुषः ॥७१॥

अर्थ: हे भाई ! तू अपने माता-पिता अथवा हृदयमें विद्यमान श्रीजिनेन्द्रदेवके कारण सत्य ही कथन करेगा ॥७१॥


इति पृष्टः समाधानी शाखामृगकिरीटभृत् । शिरस्थकरराजीवो जगाद विकचेक्षणः ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार पूछे जानेपर चित्तकी एकाग्रतासे युक्त, वानर-चिह्नित मुकुटको धारण करनेवाला, तथा विकसित नेत्रोंसे सहित हनुमान्, हस्त-कमल जोड़ मस्तकसे लगा इस प्रकार कहने लगा ॥७२॥ कि


सायके रविहासाख्ये लक्ष्मणेन निजीकृते । गत्वा चन्द्रनखानिष्टा रमणं समरोषयत् ॥७३॥

अर्थ: कि जब लक्ष्मणने सूर्यहास खड्ग अपने अधीन कर लिया और चन्द्रनखाको जब राम-लक्ष्मणने चाहा नहीं तब उसने अपने पति खरदूषणको रोषयुक्त कर दिया अर्थात् विपरीत भिड़ाकर उसे कुपित कर दिया ॥७३॥


यावदाहूयते स्वामी रक्षसां सुमहाबलः । दूषणस्तावदायातो योद्धुं दाशरथिं द्रुतम् ॥७४॥

अर्थ: सहायताके लिए जबतक महाबलवान् राक्षसोंके स्वामी - रावणको बुलाया तबतक खरदूषण शीघ्र ही युद्ध करनेके लिए रामके समीप आया ॥७४॥


लक्ष्मणो दूषणेनामा युध्यते यावदुद्धतम् । तावद्दशमुखः प्रासस्तमुद्देशं बलान्वितः ॥७५॥

अर्थ: उधर लक्ष्मण जबतक खरदूषणके साथ विकट युद्ध करता है तबतक इधर अतिशय बलवान् रावण उस स्थानपर आता है ॥७५॥


धर्माधर्मविवेकज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः । भवतीं वीक्ष्य स क्षुद्रो बभूव मनसो वशः ॥७६॥

अर्थ: यद्यपि रावण धर्म-अधर्मके विवेकको जाननेवाला एवं समस्त शास्त्रोंका विशारद था, तो भी वह क्षुद्र आपको देख मनके वशीभूत हो गया ॥७६॥


भ्रष्टनिःशेषनीतिश्च निस्सारीभूतचेतनः । मायासिंहस्वनं चक्रे भवतीस्तेनकारणम् ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी समस्त नीति भ्रष्ट हो गयी थी और चेतना निःसार हो चुकी थी ऐसे उस रावणने आपको चुरानेके लिए मायामय सिंहनाद किया ॥७७॥


श्रुत्वा सिंहस्वनं पद्मो ययौ यावद्रणस्थितम् । लक्ष्मणं तावदेतेन पापेन त्वमिहाहृता ॥७८॥

अर्थ: उस सिंहनादको सुन जबतक राम, युद्धमें स्थित लक्ष्मणके पास गये तबतक यह पापी तुम्हें हरकर यहाँ ले आया ॥७८॥


प्रेषितः पद्मनाभश्च लक्ष्मणेन त्वरावता । गत्वा भूयस्तमुद्देशं न त्वामैक्षत सत्तमे ॥७९॥

अर्थ: उधर लक्ष्मणने शीघ्र ही युद्धक्षेत्रसे रामको वापस किया सो वहाँसे आकर जब वे पुनः उस स्थानपर आये तब हे पतिव्रते ! उन्होंने तुम्हें नहीं देखा ॥७९॥


ततश्चिरं वनं भ्रान्त्वा त्वद्गवेषणकारणम् । ईक्षांचक्रे श्लथप्राणं मृत्य्वासन्नं जटायुषम् ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर तुम्हें खोजनेके लिए चिरकाल तक वनमें भ्रमण कर उन्होंने शिथिल प्राण एवं मरणासन्न जटायुको देखा ॥८०॥


तस्मै दत्त्वा स जैनेन्द्रीं म्रियमाणाय देशनाम् । अवतस्थे वने दुःखी भवतीगतमानसः ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर उस मरणोन्मुखके लिए जिनेन्द्र धर्मका उपदेश देकर वे दुःखी हो वनमें बैठ गये । उस समय उनका मन एक आपमें ही लग रहा था ॥८१॥


गतश्च लक्ष्मणः पद्मं निहत्य खरदूषणम् । आनीता रत्नजटिना त्वत्प्रवृत्तिः प्रियस्य ते ॥८२॥

अर्थ: लक्ष्मण, खरदूषणको मारकर रामके पास आये और रत्नजटी तुम्हारे पतिके लिए तुम्हारा वृत्तान्त ले आया ॥८२॥


सुग्रीवरूपसंयुक्तः पद्मनाभेन साहसः । बलं हन्तुं समुद्युक्तो विद्यया वर्जितो हतः ॥८३॥

अर्थ: इसी बीचमें सुग्रीवके रूपसे युक्त साहसगति नामका विद्याधर रामको मारनेके लिए उद्यत हुआ परन्तु रामके प्रभावसे विद्यासे रहित होनेके कारण वह स्वयं मारा गया ॥८३॥


कृतस्यास्योपकारस्य कुलपावनकारिणः । अहं प्रत्युपकाराय प्रेषितो गुरुबान्धवैः ॥८४॥

अर्थ: इस प्रकार रामने हमारे कुलको पवित्र करनेवाला यह जो महान् उपकार किया था उसका बदला चुकानेके लिए हो गुरुजनोंने मुझे भेजा है ॥८४॥


प्रीत्या विमोचयामि त्वां विग्रहो निःप्रयोजनः । कार्यसिद्धिरिहाभीष्टा सर्वथा नयशालिभिः ॥८५॥

अर्थ: मैं तुम्हें प्रीतिपूर्वक छुड़वाता हूँ । युद्ध करना निष्प्रयोजन है क्योंकि नीतिज्ञ मनुष्योंको सब तरहसे कार्यकी सिद्धि करना ही संसारमें इष्ट है ॥८५॥


सोऽयं लङ्कापुरीनाथो घृणावान् विनयान्वितः । धर्मार्थकामवान् धीरो हृदयेन मृदुः परम् ॥८६॥

अर्थ: यह लंकापुरीका राजा रावण दयालु है, विनयी है, धर्म-अर्थ-कामरूप त्रिवर्गसे सहित है, धीर है, हृदयसे अत्यन्त कोमल है ॥८६॥


सौम्यः क्रौर्यविनिर्मुक्तः सत्यव्रतकृतस्थितिः । करिष्यति वचो नूनं मम त्वामर्पयिष्यति ॥८७॥

अर्थ: सौम्य है, क्रूरतासे रहित है और सत्यव्रतका पालनेवाला है, अतः निश्चित ही मेरा कहा करेगा और तुम्हें मेरे लिए सौंप देगा ॥८७॥


कीर्तिरस्य निजा पाल्या धवला लोकविश्रुता । लोकापवादतश्चैष बिभेति नितरां कृती ॥८८॥

अर्थ: इसे अपनी लोकप्रसिद्ध उज्ज्वल कीर्तिकी भी तो रक्षा करनी है अतः यह विद्वान् लोकापवादसे बहुत डरता है ॥८८॥


ततः परं परिप्राप्ता प्रमोदं जनकात्मजा । हनूमन्तमिदं वाक्यं जगाद विपुलेक्षणा ॥८९॥

पराक्रमेण धैर्येण रूपेण विनयेन च । कपिध्वजास्त्वया तुल्याः कियन्तो मत्प्रियाश्रिताः ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर परम हर्षको प्राप्त हुई विशाललोचना सीता हनुमान्से यह वचन बोली कि पराक्रमसे, धैर्यसे, रूपसे और विनयसे तुम्हारी सदृशता धारण करनेवाले कितने वानरध्वज हमारे प्राणनाथके साथ हैं ? ॥८९-९०॥


मन्दोदरी ततोऽवोचच्छूराः सत्त्वयशोऽन्विताः । गुणोत्कटा न शंसन्ति धीराः स्वं स्वयमुत्तमाः ॥९१॥

अर्थ: तब मन्दोदरी बोली कि जो शूरवीर हैं, सत्त्व और यशसे सहित हैं, गुणोंसे उत्कट हैं तथा धीर-वीर हैं ऐसे उत्तम पुरुष स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करते ॥९१॥


वैदेहि तव न ज्ञातः किमयं येन पृच्छसि । कपिध्वजः समानोऽस्य वास्येऽप्यस्मिन्न विद्यते ॥९२॥

अर्थ: हे वैदेहि ! तू इसे क्या जानती नहीं है जिससे पूछ रही है ? इस भरत क्षेत्र-भरमें इसके समान दूसरा वानरध्वज नहीं है ॥९२॥


विमानवाहनघण्टासंघट्टपरिमण्डले । रणे दशमुखस्यायं प्राप्तः साहाय्यकं परम् ॥९३॥

अर्थ: विमानों तथा नाना प्रकारके वाहनोंके समूहकी जहां अत्यधिक भीड़ होती है ऐसे संग्राममें यह रावणकी परम सहायता करता है ॥९३॥


दशाननसहायत्वं कृतं येन महारणे । स हनूमानिति ख्यातश्चाञ्जनातनयः परः ॥९४॥

अर्थ: जिसने महायुद्धमें रावणकी सहायता की है ऐसा यह हनुमान् इस नामसे प्रसिद्ध अंजनाका उत्कृष्ट पुत्र है ॥९४॥


महापदि निमग्नस्य दशवक्त्रस्य विद्विषः । खेटा मनोव्यधाभिख्या एकेनानेन निर्जिताः ॥९५॥

अर्थ: एक बार रावण महाविपत्तिमें फँस गया था तब उसके ऐसे अनेक शत्रु विद्याधरोंको इसने अकेले ही मार भगाया था जिनके कि नाम सुनने मात्रसे मनको पीड़ा होती थी ॥९५॥


अनङ्गकुसुमा लब्धा येन चन्द्रनखात्मजा । गम्भीरस्य जनो यस्य सदा वाञ्छति दर्शनम् ॥९६॥

अर्थ: जिसने चन्द्रनखाकी पुत्री अनंगकुसुमा प्राप्त की है । जो इतना गम्भीर है कि मनुष्य सदा जिसके दर्शनकी इच्छा करते हैं ॥९६॥


अस्य पौरसमुद्रस्य यः कान्तः शिशिरांशुवत् । सहोदरसमं वेत्ति यं लङ्कापरमेश्वरः ॥९७॥

अर्थ: जो यहाँके नागरिक जनरूपी समुद्रको वृद्धिगत करनेके लिए चन्द्रमाके समान मनोहर है और लंकाका अधिपति रावण जिसे भाईके समान समझता है ॥९७॥


हनूमानिति विख्यातः सोऽयं सकलविष्टपे । गुणैः समुन्नतो नीतो दूतत्त्वं क्षितिगोचरैः ॥९८॥

अर्थ: ऐसा यह हनुमान् समस्त संसारमें प्रसिद्ध, उत्कृष्ट गुणोंका धारक है फिर भी भूमिगोचरियोंने इसे दूत बनाया है ॥९८॥


अहो परमिदं चित्रं निन्दनीयं विशेषतः । नीतः प्राकृतवत्कश्चिद्भूगैर्यद्भृत्यतामयम् ॥९९॥

अर्थ: यह बड़े आश्चर्यकी बात है । इससे अधिक निन्दनीय और क्या होगा कि इसे साधारण मनुष्यके समान, भूमिगोचरियों-ने दासता प्राप्त करायी है अर्थात् अपना दास बनाया है ॥९९॥


इत्युक्ते वचनं वातिर्जगाद स्थिरमानसः । अहो परममूढत्वं भवत्येदमनुष्ठितम् ॥१००॥

अर्थ: मन्दोदरीके इस प्रकार कहनेपर दृढ़चित्तके धारक हनुमान्ने इस प्रकार कहा कि अहो ! तुमने जो यह कार्य किया है सो परम मूर्खता की है ॥१००॥


सुखं प्रसादतो यस्य जीव्यते विभवान्वितः । अकार्यं वाञ्छतस्तस्य दीयते न मतिः कथम् ॥१०१॥

अर्थ: जिसके प्रसादसे वैभवके साथ सुखपूर्वक जीवन बिताया जा रहा है वह यदि अकार्य करना चाहता है तो उसे सद्बुद्धि क्यों नहीं दी जाती है ? ॥१०१॥


आहारं भोक्तुकामस्य विज्ञातं विषमिश्रितम् । मित्रस्य कृतकामस्य कथं न प्रतिषिध्यते ॥१०२॥

अर्थ: इच्छानुसार काम करनेवाला मित्र यदि विषमिश्रित भोजन करना चाहता है तो उसे मना क्यों नहीं किया जाता है ? ॥१०२॥


भवितव्यं कृतज्ञेन जनेन सुखमीयुषा । वेत्ति स्वार्थं न यस्तस्य जीवितं पशुना समम् ॥१०३॥

अर्थ: सुख प्राप्त करनेवाले मनुष्यको कृतज्ञ होना चाहिए। जो सुखदायकके लाभको नहीं समझता है उसका जीवन पशुके समान है ॥१०३॥


मन्दोदरि परं गर्वं निःसारं वहसे मुधा । यदग्रमहिषी भूत्वा दूतीत्वमसि संश्रिता ॥१०४॥

अर्थ: हे मन्दोदरि ! तुम व्यर्थ ही निःसार गर्व धारण करती हो जो पटराज्ञी होकर भी दूतीका कार्य कर रही हो ॥१०४॥


क्व यातमधुना तत्ते सौभाग्यं रूपमुन्नतम् । अन्यस्त्रीगतचित्तस्य दूतीत्वं संश्रितासि यत् ॥१०५॥

अर्थ: तुम्हारा वह सौभाग्य तथा उन्नत रूप इस समय कहाँ गया जो परस्त्रीसक्त पुरुषकी दूती बनने बैठी हो ? ॥१०५॥


प्राकृता परमा सा त्वं वर्त्तसे रतिवस्तुनि । महिषीत्वं न मन्येऽहं जाता गौरसि दुर्भगे ॥१०६॥

अर्थ: जान पड़ता है कि तुम रतिकार्यके विषयमें अत्यन्त साधारण स्त्री हो गयी हो। अब मैं तुममें महिषीत्व (पट्टरानीपना) नहीं मानता, हे दुर्भगे ! अब तो तुम गौ हो गयी हो ॥१०६॥


मन्दोदरी ततोऽवोचत् कोपालिङ्गितमानसा । अहो तव सदोषस्य प्रगल्भत्वं निरर्थकम् ॥१०७॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मन क्रोधसे आलिंगित हो रहा था ऐसी मन्दोदरीने कहा कि अहो ! अपराधी होकर भी तू निरर्थक प्रगल्भता बता रहा है - बढ़-बढ़कर बात कर रहा है ॥१०७॥


दूतत्त्वेनागतं सीतां यदि त्वां वेत्ति रावणः । भवेत्प्रकरणं तत्ते जातं यन्नैव कस्यचित् ॥१०८॥

अर्थ: तू दूत बनकर सीताके पास आया है यदि यह बात रावण जान पायेगा तो तेरी वह दशा होगी जो किसीकी नहीं हुई होगी ॥१०८॥


येनैवेन्दुनखानाथो दैवयोगेन मारितः । पुरस्कृत्य तमेवास्य कथं सुग्रीवकादयः ॥१०९॥

भृत्यत्वं दशवक्त्रस्य विस्मृत्य स्वल्पचेतसः । स्थिताः किमथवा कुर्युर्वराकाः कालचोदिताः ॥११०॥

अर्थ: जिसने दैव योगसे चन्द्रनखाके पति - खरदूषणको मारा है उसीको आगे कर ये क्षुद्रचेता सुग्रीवादि रावणकी दासता भूल एकत्रित हुए हैं, सो यमके प्रेरे ये नीच कर ही क्या सकते हैं ? ॥१०९-११०॥


अतिमूढहतात्मानो निर्लज्जाः क्षुद्रवृत्तयः । अकृतज्ञा वृथोत्सिक्ताः स्थितास्ते मृत्युसंनिधौ ॥१११॥

अर्थ: जान पड़ता है कि जिनकी आत्मा अत्यन्त मूढ़तासे उपहत है, जो निर्लज्ज हैं, क्षुद्रचेष्टाके धारक हैं, अकृतज्ञ हैं, और व्यर्थ ही अहंकारमें फूल रहे हैं ऐसे वे सब मृत्युके निकट आ पहुँचे हैं ॥१११॥


इत्युक्ते वचनं सीता जगौ कोपसमाश्रिता । मन्दोदरि सुमन्दा त्वमेवं या कत्थसे वृथा ॥११२॥

अर्थ: मन्दोदरीके इस प्रकार कहनेपर सीताने कुपित होकर कहा कि हे मन्दोदरि ! तू अत्यन्त मूर्ख है जो इस तरह व्यर्थ ही अपनी प्रशंसा कर रही है ॥११२॥


शूरकोविदगोष्ठीषु कीर्त्यमानो न किं त्वया । प्रियो मे पद्मनाभोऽसौ श्रुतोऽस्यद्भुतविक्रमः ॥११३॥

अर्थ: शूरवीर तथा विद्वानोंकी गोष्ठीमें जिनकी अत्यन्त प्रशंसा होती है तथा जो अद्भुत पराक्रमके धारक हैं ऐसे मेरे पति रामका नाम क्या तूने नहीं सुना है ? ॥११३॥


वज्रावर्तधनुर्घोषं श्रुत्वा यस्य रणागमे । भयज्वरितकम्पाङ्गाः सीदन्ति रणशालिनः ॥११४॥

अर्थ: रणके प्रारम्भमें जिनके वज्रावर्त धनुषका शब्द सुनकर युद्धमें निपुण मनुष्य ज्वरसे काँपते हुए दुःखी होने लगते हैं ॥११४॥


लक्ष्मीधरोऽनुजो यस्य लक्ष्मीनिलयविग्रहः । शत्रुपक्षक्षयं कर्तुं समर्थो वीक्षणादपि ॥११५॥

अर्थ: जिसके शरीरमें लक्ष्मीका निवास है ऐसा लक्ष्मण जिनका छोटा भाई है ऐसा भाई कि जो देखने मात्रसे शत्रुपक्षका क्षय करनेमें समर्थ है ॥११५॥


किमत्र बहुनोक्तेन समुत्तीर्य महार्णवम् । पतिरेष समायाति लक्ष्मणेन समन्वितः ॥११६॥

अर्थ: इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? हमारा पति लक्ष्मणके साथ समुद्रको तैरकर अभी आता है ॥११६॥


पश्यात्मीयं पतिं युद्धे स्वल्पकैरेव वासरैः । निहतं मम नाथेन जगदुत्कटतेजसा ॥११७॥

अर्थ: तू कुछ ही दिनोंमें लोकोत्तर तेजके धारक मेरे पतिके द्वारा अपने पतिको युद्धमें मरा हुआ देखेगी ॥११७॥


एषा गन्तासि वैधव्यं क्रन्दस्येषा चिरोज्झिता । या त्वं पापरतेर्भर्तुरनुकूलत्वमागता ॥११८॥

अर्थ: जो तू पापमें प्रीति रखनेवाले पतिकी अनुकूलताको प्राप्त हुई है सो इसके फलस्वरूप वैधव्यको प्राप्त होगी और पतिरहित होकर चिरकाल तक रुदन करेगी ॥११८॥


मयदैत्यात्मजा तीव्रमेवमुक्तातिकोपगा । परमं क्षोभमायाता कम्पमानाऽधराधरा ॥११९॥

अर्थ: इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर जो अत्यन्त कोपको प्राप्त हो रही थी तथा जो काँपते हुए ओठको धारण कर रही थी ऐसी मन्दोदरी परम क्षोभको प्राप्त हुई ॥११९॥


एका नानासपत्नीनां सहस्रैः संभ्रमस्पृशाम् । अष्टादशभिरत्युग्रैः कोपकम्पितमूर्तिभिः ॥१२०॥

समं करतलैर्हन्तुमुद्यता वेगधारिभिः । निर्भर्त्सनमतिक्रूरैराक्रोशैः कुर्वती भृशम् ॥१२१॥

अर्थ: यद्यपि मन्दोदरी एक थी तो भी वह सम्भ्रमको प्राप्त तथा क्रोधसे कम्पित शरीरको धारण करनेवाली अपनी अठारह हजार सपत्नियोंके साथ सीता- को वेगशाली करतलोंसे मारनेके लिए उद्यत हुई । वह उस समय अत्यन्त क्रूर अपशब्दोंसे उसका अत्यधिक तिरस्कार कर रही थी ॥१२०-१२१॥


श्रीमांस्तावन्मरुत्पुत्रः समुत्थाय जवान्वितः । अवस्थितोऽन्तरे तासां सरितामिव भूधरः ॥१२२॥

अर्थ: उसी समय लक्ष्मीसे सुशोभित तथा वेगसे युक्त हनुमान् उठकर उन सबके बीचमें उस प्रकार खड़ा हो गया जिस प्रकार कि नदियोंके बीच कोई पर्वत आ खड़ा होता है ॥१२२॥


ता दुःखहेतवः सर्वा वैदेहीं हन्तुमुद्यताः । वेदना इव वैद्येन श्रीशैलेन निवारिताः ॥१२३॥

अर्थ: दुःखकी कारण, तथा सीताको मारनेके लिए उद्यत उन सब स्त्रियों- को हनुमान्ने उस प्रकार रोक दिया जिस प्रकार कि वैद्य वेदनाओंको रोक देता है ॥१२३॥


पादताडितभूभागा विभूषादरवर्जिताः । ययुः क्रूराशयाः सर्वा वनितास्ता दशाननम् ॥१२४॥

अर्थ: तद- नन्तर जो पैरोंसे पृथिवीके प्रदेश ताड़ित कर रही थीं तथा जिन्होंने आभूषण धारण करनेका आदर छोड़ दिया था ऐसी दुष्ट अभिप्रायको धारण करनेवाली वे सब स्त्रियाँ रावणके पास गयीं ॥१२४॥


आञ्जनेन ततः सीता प्रणिपत्य महादरम् । विज्ञापिता सुवाक्येन भोजनं प्रति साधुना ॥१२५॥

अर्थ: तदनन्तर साधु स्वभावके धारक हनुमान्ने बड़े आदरके साथ सीताको प्रणाम कर उत्तम वचनोंके द्वारा भोजन करनेकी प्रार्थना की ॥१२५॥


समर्थितप्रतिज्ञासौ सुनिर्मलमनोरथा । अभ्युपागच्छदाहारं कालदेशज्ञमानसा ॥१२६॥

अर्थ: सो जिसकी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी थी, जिसका मनोरथ निर्मल था और जिसका मन देश कालका ज्ञाता था ऐसी सीताने आहार ग्रहण करना स्वीकृत कर लिया ॥१२६॥


ससागरा मही देवि रामदेवस्य शासने । वर्त्तते तेन नैवेदमन्नं सत्यक्तुमर्हसि ॥१२७॥

अर्थ: प्रार्थना करते समय हनुमान्ने इस प्रकार समझाया था कि हे देवि ! यह समुद्र सहित पृथिवी राम देवके शासनमें है इसलिए यहाँका यह अन्न छोड़नेके योग्य नहीं है ॥१२७॥


एवं हि बोधिता तेन वैदेही करुणावनिः । ऐच्छदन्नं यतः साध्वी सर्वाचारविचक्षणा ॥१२८॥

अर्थ: इस प्रकार समझाये जानेपर दयाकी भूमि सीताने अन्न ग्रहण करनेकी इच्छा की थी, सो ठीक ही है क्योंकि वह पतिव्रता सब प्रकारका आचार जाननेमें निपुण थी ॥१२८॥


इरा नाम ततस्तेन चोदिता कुलपालिता । यथान्नं प्रवरं श्लाघ्यं द्रुतमानीयतामिति ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने इरा नामकी कुलपालितासे कहा कि शीघ्र हो उत्तम तथा प्रशंसनीय अन्न लाओ ॥१२९॥


मुक्ता कन्या स्वशिविरं श्रीशैलेन क्षपाक्षये । मानावभ्युदिते जातो विभीषणसमागमः ॥१३०॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर कन्या अपने शिविर अर्थात् डेरेमें गयी और रात्रि समाप्त होने तथा सूर्योदय होनेपर हनुमान्का विभीषणके साथ समागम हुआ ॥१३०॥


आहारो वायुपुत्रेण तत्र भुक्तो मनोहरः । एवं कर्तव्ययोगेन मुहूर्तास्ते त्रयो गताः ॥१३१॥

अर्थ: हनुमान्ने विभीषणके घर ही मनोहर आहार ग्रहण किया । इस प्रकार कर्तव्य कार्य करते हुए तीन मुहूर्त निकल गये ॥१३१॥


मुहूर्तेऽथ चतुर्थे नु समानीतमिराख्यिया । आहारं मैथिलीभुक्तमिति जानन्ति कोविदाः ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर चतुर्थ मुहूर्तमें इरा, सीताके भोजनके योग्य आहार ले आयी ॥१३२॥


चन्दनादिभिरालिप्ते भूतले दर्पणप्रभे । पुष्पोपकारसपन्ने नलिनीपत्रशोभिनि ॥१३३॥

अर्थ: वहाँकी भूमि चन्दनादिसे लीपकर दर्पणके समान स्वच्छ की गयी, फूलोंके उपकारसे सजायी गयी जिससे वह कमलिनी पत्रके समान सुशोभित हो उठी ॥१३३॥


सद्गन्धं विपुलं स्वच्छं पथ्यं पेयादिपूर्वकम् । स्थाल्यादिभिर्महापात्रैः सौवर्णादिभिराहृतम् ॥१३४॥

अर्थ: स्वर्ण आदिसे बने हुए स्थाली आदि बड़े-बड़े पात्रोंमें सुगन्धित, अत्यधिक, स्वच्छ और हितकारी पेय आदि पदार्थ लाये गये ॥१३४॥


घृतसूपादिभिः काश्चित्पात्र्यो राजन्ति पूरिताः । कुन्दपुष्पसमच्छायैः शालीनां काश्चिदोदनैः ॥१३५॥

अर्थ: वहाँ कितनी ही थालियाँ दाल आदिसे भरी हुई सुशोभित हो रही थीं, कितनी ही कुन्दके फूलके समान उज्ज्वल धानके भातसे युक्त थीं ॥१३५॥


षड्रसैरुपदंशैश्च काश्चिद्रोचनकारिभिः । व्यञ्जनैस्तरलैः काश्चित्पिण्डीबन्धोचितैस्तथा ॥१३६॥

अर्थ: कितनी ही थालियाँ रुचि बढ़ानेवाले षट्रसके भोजनोंसे परिपूर्ण थीं, कितनी ही पतली तथा कितनी ही पिण्ड बँधनेके योग्य व्यंजनोंसे युक्त थीं ॥१३६॥


पयसा संस्कृतैः काश्चिदन्याः परमदाधिकैः । लेह्यैः काश्चिन्महास्वादैरन्याः पश्चान्निषेवितैः ॥१३७॥

अर्थ: कितनी ही दूधसे निर्मित, कितनी ही दहीसे निर्मित पदार्थोंसे युक्त थीं, कितनी ही चाटनेके योग्य रबड़ी आदिसे, कितनी ही महास्वादिष्ट भोजनोंसे तथा कितनी ही भोजनके बाद सेवन करने योग्य पदार्थोंसे परिपूर्ण थीं ॥१३७॥


एवं परममाहारमिरा परिजनान्विता । हनूमन्तं पुरस्कृत्य भ्रातृभावेन वत्सला ॥१३८॥

महाश्रद्धान्वितस्वान्ता प्रणिपत्य जिनेश्वरान् । समाप्य नियमं धीरा ध्यातातिथिसमागमा ॥१३९॥

निधाय हृदये राममभिरामं पतिव्रता । पवित्राङ्गा दिने भुङ्क्ते साधुलोकप्रपूजितम् ॥१४०॥

रविरश्मिकृतोद्योतं सुपवित्रं मनोहरम् । पुण्यवर्धनमारोग्यं दिवाभुक्तं प्रशस्यते ॥१४१॥

अर्थ: इस प्रकार इरा अपने परिजनके साथ उत्तम आहार ले आयी, सो हनुमान्को आगे कर जिसके भाईका स्नेह उमड़ रहा था, ऐसी सीताने हृदयमें महाश्रद्धा धारण कर जिनेन्द्र भगवान्को नमस्कार किया, ‘जबतक पतिका समाचार नहीं मिलेगा तबतक आहार नहीं लूँगी’ यह जो नियम लिया था उसको बड़ी धीरतासे समाप्त किया । अतिथियोंके समागमका विचार किया, स्नानादिकसे शरीरको पवित्र किया । तदनन्तर अभिराम ( मनोहर ) रामको हृदयमें धारण कर उस पतिव्रताने दिनके समय साधुजनोंके द्वारा प्रशंसित उत्तम आहार ग्रहण किया, सो ठीक ही है क्योंकि जो सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित है, अतिशय पवित्र है, मनोहर है, पुण्यको बढ़ानेवाला है, आरोग्यदायक है और दिनमें ही ग्रहण किया जाता है ऐसा भोजन ही प्रशंसनीय माना गया है ॥१३८-१४१॥


निवृत्तभोजनविधिः किंचिद्विश्रब्धतां गता । विज्ञापितेति भूयोऽपि सीता पवनसूनुना ॥१४२॥

आरोह देवि मे स्कन्धे पवित्रे गुणभूषणे । समुल्लङ्घ्य नदीनाथं नेष्यामि भवतीं क्षणात् ॥१४३॥

अर्थ: तदनन्तर भोजन करनेके बाद जब सीता कुछ विश्रामको प्राप्त हो चुकी तब हनुमान्ने जाकर उससे पुनः इस प्रकार निवेदन किया कि हे देवि ! हे पवित्रे ! हे गुणभूषणे ! मेरे कन्धेपर चढ़ो मैं समुद्रको लाँघकर अभी क्षण-भरमें आपको ले चलूँगा ॥१४२-१४३॥


पश्य तं विभवैर्युक्तं राघवं त्वत्परायणम् । भवद्योगसमानन्दं जनोऽनुभवतु प्रियः ॥१४४॥

अर्थ: तुम वैभवसे युक्त एवं तुम्हारे ध्यानमें तत्पर रहनेवाले रामके दर्शन करो तथा प्रेमी जन - मित्रगण आप दोनोंके समागमसे उत्पन्न होनेवाले हर्षका अनुभव करें ॥१४४॥


ततोऽञ्जलिपुटं बद्ध्वा रुदती जनकात्मजा । जगादादरसंयुक्ता विचिन्तितयथास्थितिः ॥१४५॥

अन्तरेण प्रभोराज्ञां गमनं मे न युज्यते । इत्यवस्थां गता दास्ये तस्मै किमहमुत्तरम् ॥१४६॥

अर्थ: तदनन्तर सब स्थितिका यथायोग्य विचार करनेवाली एवं आदरसे संयुक्त सीताने हाथ जोड़कर रोती हुई यह कहा कि स्वामीकी आज्ञाके बिना मेरा जाना योग्य नहीं है । इस अवस्थामें पड़ी हुई मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगी ॥१४५-१४६॥


प्रत्येति नाधुना लोकः शुद्धिं मे मृत्युना विना । नाथ एव ततः कृत्यं मम ज्ञास्यति सांप्रतम् ॥१४७॥

अर्थ: इस समय लोग मृत्युके बिना मेरी शुद्धिका प्रत्यय नहीं करेंगे, इसलिए प्राणनाथ ही आकर मेरे कार्यको योग्य जानेंगे ॥१४७॥


यावन्नोपद्रवः कश्चिज्जायते दशवक्त्रकात् । तावद्व्रज द्रुतं भ्रातर्नालम्बनमिह क्षणम् ॥१४८॥

अर्थ: हे भाई ! जबतक रावणकी ओरसे कोई उपद्रव नहीं होता है तबतक तू शीघ्र ही यहाँसे चला जा । यहाँ क्षणभर भी विलम्ब मत कर ॥१४८॥


त्वया मद्वचनाद् वाच्यः सम्यक् प्राणमहेश्वरः । अभिधानैरिमैर्मूर्ध्नि निधाय करकुड्मलम् ॥१४९॥

तस्मिन् देव मया सार्द्धं मुनयो व्योमचारिणः । वन्दिताः परमं भक्त्या त्वया स्तवनकारिणा ॥१५०॥

अर्थ: तू हाथ जोड़ मस्तकसे लगा, इन परिचायक कथानकोंके साथ-साथ मेरे वचनोंमें प्राणनाथसे अच्छी तरह कहना कि हे देव ! उस वनमें एक दिन स्तवन करते हुए आपने मेरे साथ बड़ी भक्तिसे आकाशगामी मुनियोंकी वन्दना की थी ॥१४९-१५०॥


विमलाम्भसि पद्मिन्या नितरामुपशोभिते । सरसि क्रीडतां स्वेच्छमस्माकमतिसुन्दरम् ॥१५१॥

आरण्यकस्तदा हस्ती समायातो भयंकरः । ततो मया समाहूतस्त्वमुन्मग्नो जलान्तरात् ॥१५२॥

अर्थ: एक बार निर्मल जलसे युक्त तथा कमलिनियोंसे सुशोभित सरोवरमें हम लोग इच्छानुसार सुन्दर क्रीड़ा कर रहे थे कि इतनेमें एक भयंकर जंगली हाथी वहाँ आ गया था, उस समय मैंने आपको पुकारा था सो आप जलके मध्यसे तत्काल ऊपर निकल आये थे ॥१५१-१५२॥


उद्दामाऽसौ महानागश्चारुक्रीडनकारिणा । समस्तं त्याजितो दर्पं भवता निश्चलीकृतः ॥१५३॥

अर्थ: और सुन्दर क्रीड़ा करते हुए आपने उस उद्दण्ड महाहस्तीका सब गर्व छुड़ाकर उसे निश्चल कर दिया था ॥१५३॥


आसीच्च नन्दनच्छाये वने पुष्पभरानते । शाखां पल्लवलोभेन नमयन्ती प्रयासिनी ॥१५४॥

भ्रमद्भिश्चञ्चलैर्भृङ्गैरभिभूता ससंभ्रमा । भुजाभ्यां भवताश्लिष्य जनिताकुलतोज्झिता ॥१५५॥

अर्थ: एक बार नन्दनवनके समान सुन्दर तथा फूलोंके भारसे झुके हुए वनमें, मैं नूतन पत्रोंके लोभसे प्रयत्नपूर्वक वृक्षकी एक शाखाको झुका रही थी । तब उड़ते हुए चंचल भ्रमरोंने धावा बोलकर मुझे आकुल कर दिया था, उस समय मुझ घबड़ायी हुईको आपने अपनी भुजाओंसे आलिंगन कर छुड़ाया था ॥१५४-१५५॥


उद्यन्तमन्यदा भानुं माहेन्द्रीदिग्विभूषणम् । अहमम्भोजषण्डस्य त्वया सह तटे स्थिता ॥१५६॥

अशंसिषं ततः किंचिदीर्ष्यारसमुपेयुषा । बालेनोत्पलनालेन मधुरं ताडिता त्वया ॥१५७॥

अर्थ: एक बार मैं आपके साथ कमलवनके तटपर बैठी थी उसी समय पूर्व दिशाके आभूषणस्वरूप सूर्यको उदित होता देख मैंने उसकी प्रशंसा की थी तब आपने कुछ ईर्ष्यारसको प्राप्त हो मुझे नीलकमलकी एक छोटी-सी दण्डीसे मधुर रीतिसे ताडित किया ॥१५६-१५७॥


अन्यदा रतिशैलस्य प्राग्भारस्य मया प्रिय । पृष्टस्त्वमिति बिभ्रत्या कौतुकं परशोभया ॥१५८॥

एतस्मिन् कुसुमैः पूर्णा विपुला स्निग्धताजुषः । किंनामानो द्रुमा नाथ मनोहरणकोविदाः ॥१५९॥

अर्थ: एक बार रतिगिरिके शिखरपर अत्यधिक शोभाके कारण कौतुकको धारण करती हुई मैंने आपसे पूछा था कि हे प्रिय ! इधर फूलोंसे परिपूर्ण, विशाल, स्निग्धताको धारण करनेवाले एवं मनके हरण करनेमें निपुण ये कौन-से वृक्ष हैं ? ॥१५८-१५९॥


ततस्त्वयेति पृष्टेन प्रसन्नमुखशोभिना । आख्यातमिति देव्येते यथा नन्दिद्रुमा इति ॥१६०॥

अर्थ: तब इस प्रकार पूछे जानेपर आपने प्रसन्न मुखमुद्रासे सुशोभित हुए कहा कि हे देवि ! ये नन्दि वृक्ष हैं ॥१६०॥


कर्णकुण्डलनद्याश्च स्थितास्तीरे वयं यदा । तदा संनिहितौ जातौ मध्याह्ने व्योमगौ मुनी ॥१६१॥

अर्थ: एक बार हम सब कर्णकुण्डल नदीके तीरपर ठहरे हुए थे, उसी समय मध्याह्न कालमें दो आकाशगामी मुनि निकट आये थे ॥१६१॥


त्वया मया च भिक्षार्थं तयोरागतयोस्ततः । अभ्युत्थाय महाश्राद्धं रचितं पूजनं महत् ॥१६२॥

अर्थ: तब आपने और मैंने उठकर, भिक्षाके लिए आये हुए उन मुनियोंकी बड़ी श्रद्धाके साथ विशाल पूजा की थी ॥१६२॥


अन्नं च परमं ताभ्यां दत्तं विधिसमन्वितम् । पञ्च चातिशया जातास्तत्प्रभावेन सुन्दराः ॥१६३॥

अर्थ: तथा विधिपूर्वक उन्हें उत्तम आहार दिया था, उसके प्रभावसे वहाँ अत्यन्त सुन्दर पंच आश्चर्य हुए थे ॥१६३॥


पात्रदानमहोदानं महादानमिति ध्वनिः । अन्तरिक्षेऽमरैश्चक्रे साधु सम्यग्ध्वनिश्रितः ॥१६४॥

अर्थ: आकाशमें देवोंने यह मधुर शब्द किये कि अहो ! पात्रदान ही दान है, यही सबसे बड़ा दान है ॥१६४॥


अदृष्टतनुभिर्देवैर्दुन्दुभिः सध्वनिः कृतः । पपात गगनाद्वृष्टिः कौसुमी भृङ्गनादिता ॥१६५॥

अर्थ: जिनका शरीर दीख नहीं रहा था ऐसे देवोंने दुन्दुभि बाजे बजाये, आकाशसे जिसपर भ्रमर शब्द कर रहे थे ऐसी पुष्पवृष्टि हुई ॥१६५॥


सुखशीतो ववौ वायुः सुगन्धिर्नीरजो मृदुः । मणिरत्नसुवर्णाङ्का धाराश्रममपूरयत् ॥१६६॥

अर्थ: सुखकारी, शीतल, सुगन्धित एवं धूलि रहित कोमल वायु चली थी और मणि, रत्न तथा सुवर्णकी धाराने उस आश्रमको भर दिया था ॥१६६॥


चूडामणिमिमं चोर्द्धं दृढप्रत्ययकारणम् । दर्शयिष्यसि नाथाय तस्यात्यन्तमयं प्रियः ॥१६७॥

अर्थ: हे भाई ! इसके बाद दृढ़ विश्वासका कारण यह उत्तम चूड़ामणि प्राणनाथको दिखाना, क्योंकि यह उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥१६७॥


जानामि नाथ ते भावं प्रसादिनमलं मयि । तथापि यत्नतः प्राणाः पाल्याः संगमनाशया ॥१६८॥

अर्थ: ऊपरसे यह सन्देश कहना कि हे नाथ ! आपका मुझपर अतिशय प्रसन्नतासे भरा जो भाव है उसे मैं यद्यपि जानती हूँ तो भी पुनः समागमकी आशासे प्राण प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने योग्य हैं ॥१६८॥


प्रमादाद्भवतो जातो वियोगोऽयं मया सह । सांप्रतं त्वयि यत्नस्थे संगमो नौ विसंशयः ॥१६९॥

अर्थ: प्रमादके कारण मेरे साथ आपका यह वियोग हुआ है परन्तु इस समय जबकि आप प्रयत्न कर रहे हैं तब हम दोनोंका समागम निःसन्देह होगा ॥१६९॥


इत्युक्ते रुदतीं सीतां समाश्वास्य प्रयत्नतः । यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा निरैत्सीताप्रदेशतः ॥१७०॥

अर्थ: इतना कहकर सीता रोने लगी, तदनन्तर उसे प्रयत्नपूर्वक सान्त्वना देकर और ‘जैसी आज्ञा हो’ यह कहकर हनुमान्, सीताके उस स्थानसे बाहर निकल आया ॥१७०॥


पाण्यङ्गुलीयकं सीता तदाशक्तशरीरिका । मानसस्य कृताश्वासं मेने पत्युः समागमम् ॥१७१॥

अर्थ: उस समय जिसका शरीर अशक्त हो रहा था ऐसी सीताने अँगूठीको हाथमें पहनकर ऐसा माना था मानो मनको आनन्द देनेवाला पतिका समागम ही प्राप्त हुआ हो ॥१७१॥


अथोद्यानगता नार्यस्त्रस्तसारङ्गलोचनाः । वायुनन्दनमालोक्य स्मितविस्मितसंगताः ॥१७२॥

परस्परं समालापमिति कर्तुं समुद्यताः । अस्य पुष्पनगस्योर्द्धं कोऽप्यहो नरपुङ्गवः ॥१७३॥

अवतीर्णः किमेष स्याद्विग्रही कुसुमायुधः । देवः कोऽपि तु शैलस्य शोभां द्रष्टुं समागतः ॥१७४॥

अर्थ: अथानन्तर उस उद्यानमें भयभीत मृगके समान नेत्रोंको धारण करनेवाली जो स्त्रियाँ थीं वे हनुमान्को देख मन्द मुसकान और आश्चर्यसे युक्त हो परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगीं कि अहो ! इस फूलोंके पर्वतके ऊपर यह कोई श्रेष्ठ पुरुष अवतीर्ण हुआ है सो क्या यह शरीरधारी कामदेव है ? अथवा पर्वतकी शोभा देखनेके लिए कोई देव आया है ? ॥१७२-१७४॥


तासामाकुलिका काचिन्निधाय शिरसि स्रजम् । उपवीणनमारेभे कतुं किन्नरनिस्वना ॥१७५॥

अर्थ: उन स्त्रियोंमें कामसे आकुल होकर कोई स्त्री सिरपर माला रख किन्नरके समान मधुर स्वरसे वीणा बजाने लगी ॥१७५॥


काचिदिन्दुमुखी वामे हस्तेऽवस्थाप्य दर्पणम् । दिदृक्षन्ती समालोक्य तं बभूवान्यथामनाः ॥१७६॥

अर्थ: कोई चन्द्रमुखी बायें हाथमें दर्पण रख उसमें हनुमान्का प्रतिबिम्ब देखनेकी इच्छा करती हुई अन्यथा चित्त हो गयी ॥१७६॥


ईषत्काचिदभिज्ञाय वधूरिदमचिन्तयत् । अलब्धद्वारसंमानः कुतो मारुतिरागतः ॥१७७॥

अर्थ: कोई स्त्री कुछ-कुछ पहचानकर यह विचार करने लगी कि जिसे द्वारपर सम्मान प्राप्त नहीं हुआ ऐसा यह हनुमान् यहाँ कहाँ आ गया ? ॥१७७॥


वरस्त्रीजनमुद्याने कृत्वा संभ्रान्तमानसम् । हारमाल्याम्बरधरो भास्वान् वह्निकुमारवत् ॥१७८॥

निसर्गकान्तया गत्या प्रदेशं किंचिदभ्यगात् । तथाविधां च तां वार्त्तामशृणोद्राक्षसाधिपः ॥१७९॥

अर्थ: इस प्रकार वनमें स्थित उत्तम स्त्रियोंको सम्भ्रान्त चित्त कर हार, माला तथा उत्तम वस्त्रोंको धारण करनेवाला एवं अग्निकुमारके समान देदीप्यमान हनुमान्, अपनी स्वभावसुन्दर चालसे किसी स्थानकी ओर जा रहा था कि रावणने यह सब समाचार सुना ॥१७८-१७९॥


क्रोधसंस्पृष्टचित्तेन निरपेक्षत्वमीयुषा । तावदाज्ञापिताः शूरा रावणेनोऽग्रकिङ्कराः ॥१८०॥

विचारेण न वः कृत्यं पुष्पोद्यानान्निरेति यः । मद्द्रोही कोऽप्ययं क्षिप्रं नीयतामन्तमायुषः ॥१८१॥

अर्थ: सुनते ही जिसका चित्त आगबबूला हो गया था तथा जो निरपेक्ष भावको प्राप्त हो चुका था - सब प्रकारका स्नेह भुला चुका था ऐसे रावणने उसी समय अपने शूरवीर प्रधान किंकरोंको आज्ञा दी कि तुम लोगोंको विचार करनेसे प्रयोजन नहीं है । पुष्पोद्यानसे जो पुरुष बाहर निकल रहा है वह कोई द्रोही है उसे शीघ्र ही आयुका अन्त कराया जाये - मारा जाये ॥१८०-१८१॥


अमी ततः समागत्य दध्युर्विस्मयमागताः । किमिन्द्रजिन्नरेशः स्याद्भास्करः श्रवणोऽथवा ॥१८२॥

अर्थ: तदनन्तर किंकर आकर आश्चर्यको प्राप्त हो इस प्रकार विचार करने लगे कि क्या यह इन्द्रको जीतनेवाला कोई राजा है, या सूर्य है अथवा श्रवण नक्षत्र है ? ॥१८२॥


पश्यामस्तावदित्युक्त्वा तैरित्युक्तं समन्ततः । भो भो शृणुत निःशेषा उद्यानस्याभिरक्षकाः ॥१८३॥

किं तिष्ठत सुविश्रब्धाः किङ्कराः कृतितां श्रिताः । किमिति श्रुतमस्माभिः कथ्यमानमिदं बहिः ॥१८४॥

कोऽप्युद्दामतयोद्यानं प्रविष्टो दुष्टखेचरः । स क्षिप्रं मार्यतामेष गृह्यतां दुर्विनीतकः ॥१८५॥

अर्थ: अथवा कुछ भी हो चलकर देखते हैं इस प्रकार कहकर उन्होंने सब ओर आवाज लगायी कि हे उद्यानके समस्त रक्षको ! सुनो, तुम लोग निश्चिन्त होकर क्यों बैठे हो ? हमने उद्यानके बाहर चर्चा सुनी है कि कोई एक दुष्ट विद्याधर अपनी उद्दण्डतासे उद्यानमें प्रविष्ट हुआ है सो यह क्या बात है ? उस दुर्विनीतको शीघ्र ही मारा जाये अथवा पकड़ा जाये ॥१८३-१८५॥


धावध्वमसकौ कोऽसौ सोऽयमेव यतः कुतः । कस्य कस्तादृशः क्वेति किङ्करध्वनिरुद्गतः ॥१८६॥

अर्थ: रावणके प्रधान किंकरोंकी बात सुनकर उद्यानके किंकरोंने ‘दौड़ो, कौन है वह, यहीं कहीं होगा, वह किसका कौन है ? उसके समान कौन कहाँ ?’ इस प्रकारका हल्ला मचाया ॥१८६॥


ततः कार्मुकिकान् दृष्ट्वा शाक्तिकान् गदिकांश्च तान् । खड्गिकान् कौन्तिकान् बद्धसंघातानायतो बहून् ॥१८७॥

किंचित् संभ्रान्तधीर्वातिर्मृगाधिपपराक्रमः । रत्नशाखामृगच्छायासमुद्दीपितपुष्करः ॥१८८॥

अर्थ: उन किंकरोंमें कोई धनुष लिये हुए थे, कोई शक्ति धारण कर रहे थे, कोई गदाके धारक थे, कोई तलवारोंसे युक्त थे, कोई भाले सँभाले हुए थे, और कोई झुण्ड-के-झुण्ड बनाकर बहुसंख्यामें आ रहे थे । उन सबको देख हनुमान्के मनमें कुछ सम्भ्रम उत्पन्न हुआ परन्तु वह तो सिंहके समान पराक्रमी था उसने रत्नमयी बानर-जैसो कान्तिसे आकाशको देदीप्यमान कर दिया ॥१८७-१८८॥


अवरोहंस्ततो देशात्तैरदृश्यत किङ्करैः । आकुलत्वविनिर्मुक्तः प्रलम्बं बिभ्रदम्बरम् ॥१८९॥

अर्थ: तदनन्तर आकुलतासे रहित एवं लटकते हुए लम्बे वस्त्रको धारण करनेवाला हनुमान् जब उद्यानके उस प्रदेशसे नीचे उतर रहा था तब किंकरोंने उसे देखा ॥१८९॥


ततस्तमुद्यदादित्यमण्डलप्रतिमत्विषम् । प्रदष्टाधरमालोक्य विशीर्णाः किङ्करा गणाः ॥१९०॥

अर्थ: उस समय क्रोधके कारण हनुमान्‌की कान्ति उदित होते हुए सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान हो रही थी तथा वह अपना ओठ चबा रहा था । उसे देख किंकरोंके झुण्ड भाग खड़े हुए ॥१९०॥


ततः किलापरैः क्रूरैः प्रख्यातैः किङ्कराधिपैः । तत्किङ्करबलं गच्छदितश्चेतश्च धारितम् ॥१९१॥

अर्थ: तदनन्तर जो किंकरोंमें प्रधान क्रूर एवं प्रसिद्ध दूसरे किंकर थे उन्होंने इधर-उधर भागते हुए किंकरोंके दलको इकट्ठा किया ॥१९१॥


शक्तितोमरचक्रासिगदाकार्मुकपाणयः । सर्वतो वास्तृणन्नेतं मुखराः किङ्करास्ततः ॥१९२॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके हाथमें शक्ति, तोमर, चक्र, खड्ग, गदा और धनुष थे ऐसे उन किंकरोंने चिल्लाकर सब ओरसे हनुमान्‌को घेर लिया ॥१९२॥


मुमुचुश्च घनं शस्त्रं ज्येष्ठवाता यथा बुसम् । अदृष्टभास्करोद्योताः परं संघातवर्तिनः ॥१९३॥

अर्थ: वे किंकर इतनी अधिक भीड़ इकट्ठी कर विद्यमान थे कि उनके कारण सूर्यका प्रकाश भी अदृष्ट हो रहा था । तदनन्तर जिस प्रकार जेठ मासकी वायु भूसा उड़ाती है उसी प्रकार वे अत्यधिक शस्त्र छोड़ने लगे ॥१९३॥


उत्पाट्य वायुपुत्रोऽपि निःशस्त्रो धीरपुङ्गवः । संघातं तुङ्गवृक्षाणां शिलानां वारमक्षिपत् ॥१९४॥

अर्थ: धीरशिरोमणि पवन-पुत्र हनुमान् यद्यपि शस्त्र रहित था परन्तु तो भी उसने बड़े-बड़े वृक्षों और शिलाओंके समूह उखाड़-उखाड़कर फेंके ॥१९४॥


भीमभोगिमहद्भोगभास्वद्भुजजवेरितैः । पादपादिभिराहिंसन् कालमेघ इवोन्नतः ॥१९५॥

अर्थ: भयंकर शेषनागके शरीरके समान सुशोभित भुजाओंके वेगसे फेंके हुए वृक्ष आदिसे प्रहार करता हुआ हनुमान् उस समय प्रलयकालके उन्नत मेघके समान जान पड़ता था ॥१९५॥


अश्वत्थान् शालन्यग्रोधान्नन्दिचम्पककेसरान् । नीपाशोककदम्बांश्च पुन्नागानर्जुनान् धवान् ॥१९६॥

आम्रानाम्रातकांल्लोध्रां ( स्तृणराजान् ) स्थवीयसः । विशालान् पनसाद्यांश्च चिक्षेप क्षेपवर्जितः ॥१९७॥

अर्थ: हनुमान् बिना किसी विलम्बके पीपल, सागौन, वट, नन्दी, चम्पक, बकुल, नीम, अशोक, कदम्ब, नागकेसर, कोहा, धवा, आम, मिलमाँ, लोध्र, खजूर तथा कटहल आदिके बड़े मोटे तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उखाड़कर फेंक रहा था ॥१९६-१९७॥


बभञ्ज त्वरितं कांश्चिदपरानुदमूलयत् । मुष्टिपादप्रहारेण पिपेषान्यान् महाबलः ॥१९८॥

अर्थ: उस महाबलवान्ने ही लोगोंको शीघ्र ही खण्डित कर दिया, कितने ही योधाओंको उखाड़ डाला - पैर पकड़कर पछाड़ दिया और कितने ही किंकरोंको लात तथा घूँसोंके प्रहारसे पीस डाला ॥१९८॥


आकूपारसमं तेन सैन्यमेकेन तत्कृतम् । समाकुलं गतं क्वापि क्षणेन प्रियजीवितम् ॥१९९॥

अर्थ: उस अकेलेने ही समुद्रके समान भारी सेनाकी वह दशा की कि जिससे वह व्याकुल हो क्षण भरमें प्राण बचाकर कहीं भाग गयी ॥१९९॥


सहायैर्मृगराजस्य कुर्वतो मृगशासनम् । कियद्भिरपरैः कृत्यं त्यक्त्वा सत्त्वं सहोद्भवम् ॥२००॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मृगोंपर शासन करनेवाले मृगराज - सिंहको अन्य सहायकोंकी क्या आवश्यकता है ? और जो स्वाभाविक तेजको छोड़ चुके हैं उन्हें दूसरे सहायकोंसे क्या लाभ है - निस्तेज मनुष्यका अन्य सहायक क्या भला कर सकते हैं ? ॥२००॥


पुष्पाद्रेरवतीर्णस्य कंकुब्वलयरोधनम् । भूयो युद्धमभूदुग्रं प्रान्तविध्वस्तकिङ्करम् ॥२०१॥

अर्थ: तदनन्तर पुष्पगिरिसे नीचे उतरे हुए हनुमान्‌का दिङ्मण्डलको रोकनेवाला तथा जिसमें निकटवर्ती किंकर मारे गये थे ऐसा भयंकर युद्ध पुनः हुआ ॥२०१॥


सभावापीविमानानामुद्यानोत्तमसद्मनाम् । चूर्णितानां तदाघातैर्भू मयः केवलाः स्थिताः ॥२०२॥

अर्थ: उस समय हनुमान्के प्रहारसे जो चूर-चूर किये गये थे ऐसे सभा, वापिका, विमान तथा बाग बगीचोंसे सुशोभित मकानोंमें केवल भूमि ही शेष रह गयी थी ॥२०२॥


पादमार्गप्रदेशेषु ध्वस्तेषु वनवेश्मसु । महारथ्यापथा जाताः शुष्कसागरसंनिभाः ॥२०३॥

अर्थ: उसके पैदल चलनेके मार्गोंमें जो बाग-बगीचे तथा महल थे उन सबको उसने नष्ट कर दिया था, जिससे वे लम्बे-चौड़े मार्ग सूखे समुद्रके समान हो गये थे ॥२०३॥


भग्नोत्तुङ्गापणश्रेणिः पातिताऽनेककिङ्करः । बभूव राजमार्गोऽपि महासंग्रामभूसमः ॥२०४॥

अर्थ: जहाँ अनेक ऊँची-ऊँची दुकानोंकी पंक्तियाँ तोड़कर गिरा दी गयी थीं, तथा अनेक किंकर मारकर गिरा दिये गये थे ऐसा राजमार्ग भी महायुद्धकी भूमिके समान हो गया था ॥२०४॥


पतद्भिस्तोरणैस्तुङ्गैः कम्पितध्वजपङ्क्तिभिः । बभूवाम्बरमुत्पातादिव भ्रश्यत्सुरायुधम् ॥२०५॥

अर्थ: गिरते हुए ऊँचे-ऊँचे तोरणों और काँपती हुई ध्वजाओंकी पंक्तिसे उस समय आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो उत्पातके कारण उससे वज्र ही गिर रहा हो ॥२०५॥


जङ्घावेगात्समुद्यद्भी रजोभिर्बहुवर्णकैः । इन्द्रायुधसहस्राणि रचितानीव पुष्करे ॥२०६॥

अर्थ: जंघाओंके वेगसे उड़ती हुई रंग विरंगी धूलियोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशमें हजारों इन्द्रधनुष ही बनाये गये हों ॥२०६॥


पादावष्टम्भभिन्नेषु भूमागेषु निमज्जताम् । बभूव गृहशैलानां पातालेष्विव निस्वनः ॥२०७॥

अर्थ: चरणोंके प्रहारसे विदीर्ण हुई भूमिमें महलरूपी पर्वत नीचेको धँस रहे थे जिससे ऐसा भारी शब्द हो रहा था मानो वे महल रूपी पर्वत पातालमें ही धँसे जा रहे हों ॥२०७॥


दृष्ट्या कंचित्करेणान्यं कंचित्पादेन किङ्करम् । उरसा कंचिदंसेन वातेनान्यं जघान सः ॥२०८॥

अर्थ: वह किसी किंकरको दृष्टिसे मार रहा था, किसीको हाथसे पीस रहा था, किसीको पैरसे पीट रहा था, किसीको वक्षःस्थलसे मार रहा था, किसीको कन्धेसे नष्ट कर रहा था और किसीको वायुसे ही उड़ा रहा था ॥२०८॥


आलीयमानमात्राणां किङ्कराणां सहस्रशः । पततामुत्करै रथ्या जाता पूरसमागता ॥२०९॥

अर्थ: आते ही के साथ गिरनेवाले हजारों किंकरोंके समूहसे वह लम्बा-चौड़ा मार्ग ऐसा हो गया था मानो उसमें पूर ही आ गया हो ॥२०९॥


हाहाहीकारगम्भीरः पौराणामुद्गतो ध्वनिः । क्वचिच्च रत्नकूटानां भङ्गात्कणकणस्वनः ॥२१०॥

अर्थ: कहीं नागरिक जनोंका हा हा ही आदिका गम्भीर शब्द उठ रहा था तो कहीं रत्नमय शिखरोंके टूटनेसे कण-कण शब्द हो रहा था ॥२१०॥


वेगेनोत्पततस्तस्य समाकृष्टमहाध्वजाः । कोपादिवोद्ययुः पश्चात्कृतघण्टादिनिःस्वनाः ॥२११॥

अर्थ: जब हनुमान् ऊपरको छलांग भरता था तब उसके वेगसे बड़ी-बड़ी ध्वजाएँ खिचीं चली जाती थीं जिससे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो घण्टाका शब्द करती हुई क्रोधसे उसके पीछे ही उड़ी जा रही हों ॥२११॥


उन्मूलितमहालाना बभ्रमुः परमा गजाः । वायुमण्डलपर्णानामश्वास्तुल्यत्वमागताः ॥२१२॥

अर्थ: बड़े-बड़े हाथी खम्भे उखाड़ कर इधर-उधर घूमने लगे और घोड़े वायु मण्डलसे उड़ते हुए पत्तोंकी तुल्यताको प्राप्त हो गये ॥२१२॥


अधस्तात् स्फुटिता वाप्यः प्राप्ताः पङ्कावशेषताम् । चक्रारूढेव निःशेषा जाता लङ्का समाकुला ॥२१३॥

अर्थ: वापिकाएँ नीचेसे फूटकर बह गयीं जिससे उनमें कीचड़ मात्र ही शेष रह गया तथा सम्पूर्ण लंका चक्र पर चढ़ी हुईके समान व्याकुल हो उठी ॥२१३॥


लङ्काकमलिनीखण्डं ध्वस्तराक्षसमीनकम् । श्रीशैलवारणो यावद्विक्षोभ्य बहिराश्रितः ॥२१४॥

अर्थ: जिसमें राक्षसरूपी मीन मारे गये थे ऐसे लंकारूपी कमलवनको क्षोभित कर ज्योंही हनुमान्‌रूपी हाथी बाहर आया ॥२१४॥


तावत्तोयदवाहेन समं संनह्य वेगतः । पश्चादिन्द्रजितो लग्नो द्विपस्यन्दनमध्यगः ॥२१५॥

अर्थ: त्योंही हाथियोंके रथपर सवार इन्द्रजित मेघवाहनके साथ तैयार होकर शीघ्र ही उसके पीछे लग गया ॥२१५॥


हनूमान्यावदेतेन समं योद्धुं समुद्यतः । प्राप्तं तावदिदं तस्य बलं यन्मेघपृष्ठगम् ॥२१६॥

अर्थ: हनुमान् जब तक इसके साथ युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ तब तक मेघ-वाहनके पीछे लगी सेना आ पहुँची ॥२१६॥


बाह्यायां भुवि लङ्कायां महाप्रतिभयं रणम् । जातं हनूमतः खेटैः लक्ष्मणस्येव दौषणम् ॥२१७॥

अर्थ: तदनन्तर लंकाकी बाह्यभूमिमें हनुमान्‌का विद्याधरोंके साथ उस तरह महाभयंकर युद्ध हुआ जिस प्रकार कि लक्ष्मणका खरदूषणके साथ हुआ था ॥२१७॥


युक्तं सुचतुरैरश्वै रथमारुह्य पावनिः । समुद्धृत्य शरं सैन्यं राक्षसानामधावत ॥२१८॥

अर्थ: हनुमान् चार घोड़ोंसे जुते रथ पर सवार हो बाण खींचकर राक्षसोंकी ओर दौड़ा ॥२१८॥


अथेन्द्रजितवीरेण पाशैर्माहोरगैस्सितः । चिरमायोधितो नीतः पुरं किंचिद्विचिन्तयन् ॥२१९॥

अर्थ: अथानन्तर चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद जो वीर इन्द्रजितके द्वारा नागपाशसे बाँध लिया गया था ऐसा हनुमान् कुछ विचार करता हुआ नगरके भीतर ले जाया गया ॥२१९॥


ततो नगरलोकेन विश्रब्धं स निरीक्षितः । कुर्वन् भञ्जनमासीद्यो विद्युद्दण्डवदीक्षितः ॥२२०॥

अर्थ: जो पहले तोड़-फोड़ करता हुआ विद्युद्दण्डके समान देखा गया था वही हनुमान् अब नगरवासियोंके द्वारा निश्चिन्ततापूर्वक देखा गया ॥२२०॥


प्रवेशितस्य चास्थान्यां तस्य दोषान् दशाननः । कथ्यमानान् शृणोति स्म तद्विद्भिः पुरुषैर्निजैः ॥२२१॥

अर्थ: तदनन्तर वह रावणकी सभामें ले जाया गया वहाँ रावणने अपने विज्ञ पुरुषोंके द्वारा कहे हुए उसके अपराध श्रवण किये ॥२२१॥


दूताहूतः समायातः किष्किन्धं स्वपुरादयम् । महेन्द्रनगरध्वंसं चक्रे तं च वशं रिपोः ॥२२२॥

अर्थ: विज्ञ पुरुषोंने उसके विषयमें बताया कि यह दूतके द्वारा बुलाये जाने पर अपने नगरसे किष्किन्ध नगर गया । वहाँसे लंका आते समय इसने राजा महेन्द्रका नगर ध्वस्त किया तथा उसे शत्रुके अधीन किया ॥२२२॥


साधूपसर्गमथने द्वीपे दधिमुखाह्वये । गन्धर्वकन्यकास्तिस्रः पद्मस्याभ्यनुमोदिताः ॥२२३॥

अर्थ: दधिमुखनामक द्वीपमें मुनियुगलका उपसर्ग दूर किया और गन्धर्वराजकी तीन कन्याएँ रामको वरनेके लिए उत्सुक थीं सो उनका अनुमोदन किया ॥२२३॥


विध्वंसं वज्रशालस्य चक्रे वज्रमुखस्य च । । कन्यामभिलषन्यस्य बहिरस्थापयद् बलम् ॥२२४॥

अर्थ: राजा वज्रमुखके वज्रकोटका विध्वंस किया तथा उसकी कन्या लंकासुन्दरीको स्वीकृत कर उसके नगरके बाहर अपनी सेना रक्खी ॥२२४॥


भग्नं पुष्पनगोद्यानं तत्पाल्यः विह्वलीकृताः । बहवः किङ्करा ध्वस्ताः प्रपादि च विनाशितम् ॥२२५॥

अर्थ: पुष्पगिरिका उद्यान नष्ट किया, उसकी रक्षक स्त्रियोंको विह्वल किया, बहुतसे किंकर नष्ट किये और प्रपा-पानी पीने आदिके स्थान विनष्ट किये ॥२२५॥


घटस्तनविमुक्तेन पुत्रस्नेहान्निरन्तरम् । पयसा पोषिताः स्त्रीभिर्वृक्षका ध्वंसमाहृताः ॥२२६॥

अर्थ: स्त्रियोंने जिन्हें पुत्रके समान स्नेहसे घट रूपी स्तनोंसे छोड़े हुए जलके द्वारा निरन्तर पुष्ट किया था वे छोटे-छोटे वृक्ष इसने नष्ट कर दिये हैं ॥२२६॥


वृक्षैर्वियोजिता वल्ल्यस्तरलायितपल्लवाः । धरण्यां पतिता भान्ति विधवा इव योषितः ॥२२७॥

अर्थ: जिनके पल्लव चंचल हो रहे हैं ऐसी लताएँ इसने वृक्षोंसे अलग कर पृथिवीपर गिरा दी हैं जिससे वे विधवा स्त्रियोंके समान जान पड़ती हैं ॥२२७॥


फलपुष्पभरानम्रा विविधास्तरुजातयः । श्मशानपादपच्छाया एतेन ध्वंसिताः स्थिताः ॥२२८॥

अर्थ: फल और फूलोंके भारसे झुकी हुई नाना वृक्षोंकी जातियाँ इसके द्वारा नष्ट-भ्रष्ट कर दो गयी हैं जिससे वे श्मशानके वृक्षोंके समान जान पड़ने लगी हैं ॥२२८॥


अपराधानिमान् श्रुत्वा रावणः कोपमागतः । अबन्धयत्तमाहूय विनागं लोहशृङ्खलैः ॥२२९॥

अर्थ: हनुमान्‌के इन अपराधोंको सुनकर रावण क्रोधको प्राप्त हुआ तथा विशिष्ट प्रकारके नागपाशसे वेष्टित हुए उसे समीपमें बुलाकर लोहेकी साँकलोंसे बँधवा दिया ॥२२९॥


उपविष्टोऽर्कसंकाशो दशास्यः सिंहविष्टरे । पूजायोग्यं पुरा वातिमाक्रोशदिति निर्दयम् ॥२३०॥

अर्थ: तदनन्तर सिंहासनपर बैठा, सूर्यके समान देदीप्यमान रावण, पहले जिसकी पूजा करता था ऐसे हनुमान्‌के प्रति निर्दयताके साथ इस प्रकार कठोर वचन बकने लगा ॥२३०॥


उद्वृत्तोऽयमसौ पापः निरपेक्षस्त्रपोज्झितः । अधुनैतस्य का छाया धिगेतेनेक्षितेन किम् ॥२३१॥

अर्थ: कि यह दुराचारी है, पापी है, निरपेक्ष है, निर्लज्ज है, अब इसकी क्या शोभा है ? इसे धिक्कार है, इसके देखनेसे क्या लाभ है ? ॥२३१॥


व्यापाद्यते न किं दुष्टः कर्ता नानागसामयम् । कथं न गणितं पूर्वं मम दाक्षिण्यमुन्नतम् ॥२३२॥

अर्थ: नाना अपराधोंको करनेवाला यह दुष्ट क्यों नहीं मारा जाय ? अरे ! मैंने पहले इसके साथ जो अत्यन्त उदारताका व्यवहार किया इसने उसे कुछ भी नहीं गिना ॥२३२॥


ततस्तन्मण्डलप्रान्तस्थिताः प्रवरविभ्रमाः । महाभाग्या विलासिन्यो नवयौवनपूजिताः ॥२३३॥

कोपस्मितसमायुक्ता निर्मीलितविलोचनाः । विधाय शिरसः कम्पमेवमूचुरनादरात् ॥२३४॥

प्रसादाद्यस्य यातोऽसि प्रभुतां क्षितिमण्डले । पृथिव्यां विचरन् स्वेच्छं समस्तबलवर्जितः ॥२३५॥

अर्थ: तदनन्तर रावणके समीप ही उत्तम चेष्टाओंसे युक्त महाभाग्यशाली एवं नवयौवनसे सुशोभित जो विलासिनी स्त्रियाँ खड़ी थीं वे क्रोध तथा मन्द हास्यसे युक्त हो नेत्र बन्द करतीं तथा शिर हिलाती हुई अनादरसे इस प्रकार कहने लगीं कि हे हनुमान् ! तू जिसके प्रसादसे पृथिवीमण्डलपर प्रभुताको प्राप्त हुआ है तथा समस्त प्रकारके बलसे रहित होकर भी पृथिवीपर इच्छानुसार सर्वत्र भ्रमण करता है ॥२३३-२३५॥


एतत्तस्स्वामिनः प्रीतेर्भवता दर्शितं फलम् । भूमिगोचरदूतत्त्वं यत्प्राप्तोऽस्यतिनिन्दितम् ॥२३६॥

अर्थ: उस स्वामीकी प्रसन्नताका तूने यह फल दिखाया है कि भूमिगोचरियोंकी अतिशय निन्दनीय दूतताको प्राप्त हुआ है ॥२३६॥


सुकृतं दशवक्त्रस्य कथमाधाय पृष्ठतः । वसुधाहिण्डनक्लिष्टौ भवता तौ पुरस्कृतौ ॥२३७॥

अर्थ: रावणके द्वारा किये हुए उपकारको पीछे कर तुमने पृथिवीपर परिभ्रमण करनेसे खेदको प्राप्त हुए राम-लक्ष्मणको कैसे आगे किया ॥२३७॥


पवनस्य सुतो न त्वं जातोऽस्यन्येन केनचित् । अदृष्टमकुलीनस्य निवेदयति चेष्टितम् ॥२३८॥

अर्थ: जान पड़ता है कि तू पवनंजयका पुत्र नहीं है, किसी अन्यके द्वारा उत्पन्न हुआ है, क्योंकि अकुलीन मनुष्यकी चेष्टा ही उसके अदृष्ट कार्यको सूचित कर देती है ॥२३८॥


चिह्नानि विटजातस्य सन्ति नाङ्गेषु कानिचित् । अनार्यमाचरन् किंचिज्जायते नीचगोचरः ॥२३९॥

अर्थ: जारसे उत्पन्न हुए मनुष्यके शरीरपर कोई चिह्न नहीं होते, किन्तु जब वह खोटा आचरण करता है तभी नीच जान पड़ता है ॥२३९॥


मत्ताः केसरिणोऽरण्ये श्रृगालानाश्रयन्ति किम् । नहि नीचं समाश्रित्य जीवन्ति कुलजा नराः ॥२४०॥

अर्थ: वनमें क्या मदोन्मत्त सिंह सियारोंकी सेवा करते हैं ? ठीक ही कहा है कि कुलीन मनुष्य नीचका आश्रय लेकर जीवित नहीं रहते ॥२४०॥


सर्वस्वेनापि यः पूज्यो यद्यप्यसकृदागतः । सुचिरादागतो द्रोही त्वं निग्राह्यस्तु वर्तसे ॥२४१॥

अर्थ: तू यद्यपि पहले अनेक बार आया फिर भी सर्वस्वके द्वारा पूज्य रहा परन्तु अबकी बार बहुत काल बाद आया और राजद्रोही बनकर आया अतः निग्रह करनेके योग्य है ॥२४१॥


इमैर्निगदितैः क्रोधात् प्रहस्योवाच मारुतिः । को जानाति विना पुण्यैर्निग्राह्यः को विधेरिति ॥२४२॥

अर्थ: इन वचनोंसे हनुमान्‌को क्रोध आ गया जिससे वह हँस कर बोला कि कौन जानता है पुण्यके बिना विधाताका निग्राह्य - दण्ड देने योग्य कौन है ॥२४२॥


स्वयं दुर्मतिना सार्द्धमनेनासन्नमृत्युना । इतो दिनैः कतिपयैर्द्रक्ष्यामः क्व प्रयास्यथ ॥२४३॥

अर्थ: जिसकी मृत्यु निकट है ऐसे इस दुर्बुद्धिके साथ स्वयं ही यहाँ कुछ दिनोंमें देखेंगे कहाँ जाओगे ॥२४३॥


सौमित्रिः सह पद्मेन बलोत्तुङ्गः समापतन् । न मेघ इव संरोद्धुं नगैः शक्यो भवेन्नृपैः ॥२४४॥

अर्थ: प्रचण्ड बलका धारी लक्ष्मण रामके साथ आ रहा है सो जिस प्रकार पर्वत मेघको नहीं रोक सकते उसी प्रकार राजा उसे नहीं रोक सकते ॥२४४॥


अतृप्तः परमाहारैः कामिकैरमृतोपमैः । याति कश्चिद्यथा नाशमेकेन विषबिन्दुना ॥२४५॥

अतृप्तः स्त्रीसहस्त्रौघैरिन्धनैरिव पावकः । परस्त्रीतृष्णया सोऽयं विनाशं क्षिप्रमेष्यति ॥२४६॥

अर्थ: जिस प्रकार इच्छानुसार प्राप्त हुए अमृत तुल्य उत्तम आहारोंसे तृप्त नहीं होनेवाला कोई मनुष्य विषकी एक बूँदसे नाशको प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार जो ईंधनोंसे अग्निके समान हजारों स्त्रियोंके समूहसे तृप्त नहीं हुआ ऐसा यह दशानन परस्त्रीकी तृष्णासे शीघ्र ही नाशको प्राप्त होगा ॥२४५-२४६॥


या येन भाविता बुद्धिः शुभाशुभगता दृढम् । न सा शक्याऽन्यथाकर्तुं पुरन्दरसमैरपि ॥२४७॥

अर्थ: जिसने जो शुभ-अशुभ बुद्धि प्राप्त की है उसे इन्द्रके समान पुरुष भी अन्यथा करनेके लिए समर्थ नहीं है ॥२४७॥


निरर्थकं प्रियशतैर्दुर्मतौ दीयते मतिः । नूनं विहितमस्यैतद्विहितेन हतो हतः ॥२४८॥

अर्थ: दुर्बुद्धि मनुष्यके लिए सैकड़ों प्रियवचनोंके द्वारा हितका उपदेश व्यर्थ ही दिया जाता है। जान पड़ता है कि इसकी यह होनहार निश्चित ही है अतः वह अपनी होनहारसे ही नष्ट होता है ॥२४८॥


प्राप्ते विनाशकालेऽपि बुद्धिर्जन्तोर्विनश्यति । विधिना प्रेरितस्तेन कर्मपाकं विचेष्टते ॥२४९॥

अर्थ: विनाशका अवसर प्राप्त होनेपर जीवकी बुद्धि नष्ट हो जाती है। सो ठीक है, क्योंकि भवितव्यताके द्वारा प्रेरित हुआ यह जीव कर्मोदयके अनुसार चेष्टा करता है ॥२४९॥


मर्त्यधर्मा यथा कश्चित्सुगन्धि मधुरं पयः । प्रमादी विषसम्मिश्रं पीत्वा ध्वंसं प्रपद्यते ॥२५०॥

तथाविधो दशास्य त्वं परस्त्रीसुखलोलुपः । वचनेन विना क्षिप्रं विनाशं प्रतिपत्स्यते ॥२५१॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई प्रमादी मनुष्य विषमिश्रित सुगन्धित मधुर दुग्ध पीकर विनाशको प्राप्त होता है उसी प्रकार हे रावण ! तू परस्त्री सुखका लोभी हुआ बिना कुछ कहे ही शीघ्र ही विनाशको प्राप्त होगा ॥२५०-२५१॥


गुरून् परिजनं वृद्धान् मित्राणि प्रियबान्धवान् । मात्रादीनपकर्ण्य त्वं प्रवृत्तः पापवस्तुनि ॥२५२॥

अर्थ: गुरु, परिजन, वृद्ध, मित्र, प्रियबन्धु तथा माता आदिको अनसुना कर तू पापकर्ममें प्रवृत्त हुआ है ॥२५२॥


कदाचारसमुद्रे त्वं मदनावर्तमध्यगः । प्राप्तो नरकपातालं कष्टं दुःखमवाप्स्यसि ॥२५३॥

अर्थ: तू दुराचाररूप समुद्रमें कामरूपी भ्रमरके बीच फँसकर नीचे नरकमें जावेगा और वहाँ अतिशय दुःख प्राप्त करेगा ॥२५३॥


त्वया दशास्य जातेन महारत्नश्रवो नृपात् । अन्वयोऽधमपुत्रेण रक्षसां क्षयमाहृतः ॥२५४॥

अर्थ: हे दशानन ! महाराजा रत्नश्रवासे उत्पन्न हुए तुझ अधम पुत्रने राक्षसोंका वंश नष्ट कर दिया ॥२५४॥


अनुपालितमर्यादाः क्षितौ पूजितचेष्टिताः । पुङ्गवा भवतो वंश्यास्त्वं तु तेषां पुलाकवत् ॥२५५॥

अर्थ: तुम्हारे वंशज पृथिवीपर मर्यादाका पालन करनेवाले प्रशस्त चेष्टाके धारक उत्तम पुरुष हुए परन्तु तू उन सबमें छिलकेके समान निःसार हुआ है ॥२५५॥


इत्युक्तः क्रोधसंरक्तः खड्गमालोक्य रावणः । जगाद दुर्विनीतोऽयं सुदुर्वचननिर्भरः ॥२५६॥

त्यक्तमृत्युभयो विभ्रत्प्रगल्भत्वं ममाग्रतः । द्राक् खलीक्रियतां मध्ये नगरस्य दुरीहितः ॥२५७॥

अर्थ: इस प्रकार कहनेपर रावण क्रोधसे लाल हो गया। वह कृपाणकी ओर देखकर बोला कि यह उद्दण्ड अत्यधिक दुर्वचनोंसे भरा है तथा मृत्युका भय छोड़कर मेरे सामने बड़प्पन धारण कर रहा है अतः नगरके बीच ले जाकर इस दुष्ट की शीघ्र ही दुर्दशा की जाये ॥२५६-२५७॥


सशब्दैरायतैः स्थूलैर्बद्धो रज्जुभिरायसैः । ग्रीवायां हस्तपादे च रेणुरूक्षितविग्रहः ॥२५८॥

वेष्टितः किङ्करैः क्रूरैर्भ्राम्यतां च गृहे गृहे । हास्यमानः खरैर्वाक्यैः कृतमण्डलपूत्कृतः ॥२५९॥

अर्थ: शब्द करनेवाली लम्बी मोटी लोहेकी सांकलोंसे इसे गरदन तथा हाथों और पैरोंमें कसकर बांधा जाये, धूलिसे इसकी शरीर धूसर किया जाये, दुष्ट किंकर इसे घेरकर कठोर वचनोंसे इसकी हँसी करें तथा घर-घर घुमावें । इस दुर्दशासे यह रो उठेगा ॥२५८-२५९॥


इमकं वनिता दृष्ट्वा नराश्च पुरवासिनः । शोचन्ति कृतधिक्कारा विकृता कम्पिताननाः ॥२६०॥

अर्थ: इसे देख स्त्रियाँ तथा नगरके लोग धिक्कार देते तथा मुखको विकृत और कम्पित करते हुए इसके प्रति शोक प्रकट करेंगे ॥२६०॥


क्षितिगोचरदूतोऽयं सोऽयं दूतः प्रपूजितः । पश्यतैनमिति स्वानः पुरे सर्वत्र घोष्यताम् ॥२६१॥

अर्थ: इसके आगे-आगे नगरमें सर्वत्र यह घोषणा की जाये कि यह वही सम्मानको प्राप्त हुआ भूमिगोचरीका दूत है इसे सब लोग देखें ॥२६१॥


ततस्तैर्विविधाक्रोशैः संप्राप्तः कोपमुत्तमम् । अयासीद् बन्धनं छित्वा मोहपाशं यथा यतिः ॥२६२॥

अर्थ: तदनन्तर उन विविध प्रकारके अपशब्दोंसे परम क्रोधको प्राप्त हुआ हनुमान् बन्धनको छेदकर उस प्रकार चला गया जिस प्रकार कि यति मोहरूपी पाशको छेदकर चला जाता है ॥२६२॥


पादविन्यासमात्रेण भङ्क्त्वा गोपुरमुन्नतम् । द्वाराणि च तथान्यानि खमुत्पत्य ययौ मुदा ॥२६३॥

अर्थ: वह पैर रखने मात्रसे उन्नत गोपुर तथा अन्य दरवाजोंको तोड़कर हर्षपूर्वक आकाशमें जा उड़ा ॥२६३॥


शक्रप्रासादसंकाशं भवनं रक्षसां विभोः । हनूमत्पादघातेन विस्तीर्णं स्तम्भसंकुलम् ॥२६४॥

अर्थ: रावणका जो भवन इन्द्रभवनके समान था वह हनुमान्‌के पैरकी आघातसे इस प्रकार बिखर गया कि उसमें खाली खम्भे-ही-खम्भे शेष रह गये ॥२६४॥


पतता वेश्मना तेन यन्त्रितापि महानगैः । धरणी कम्पमानौसा पादवेगानुघाततः ॥२६५॥

अर्थ: यद्यपि वहाँकी पृथिवी बड़े-बड़े पर्वतोंसे जकड़ी हुई थी तथापि चरणोंके वेगके अनुघातसे गिरते हुए उस भवनके द्वारा हिल उठी ॥२६५॥


भूमिसंप्राप्तसौवर्णप्राकारं रन्ध्रगह्वरम् । वज्रचूर्णितशैलाभं जातं दाशमुखं गृहम् ॥२६६॥

अर्थ: जिसका स्वर्णमय कोट भूमिमें मिल गया था तथा जिसमें अनेक गहरे गड्ढे हो गये थे ऐसा रावणका घर वज्रसे चूर-चूर हुए पर्वतके समान हो गया ॥२६६॥


कपिमौलिभृतामीशं श्रुत्वैवंविधविक्रमम् । प्रमोदं जानकी प्राप्ता विषादं च मुहुर्मुहुः ॥२६७॥

अर्थ: मुकुटमें कपिका चिह्न धारण करनेवाले वानरवंशियोंके राजा हनुमान्को इस प्रकारका पराक्रमी सुन सीता हर्षको प्राप्त हुईं तथा बन्धनका समाचार सुन बार-बार विषादको प्राप्त हुईं ॥२६७॥


वज्रोदरी ततोऽवोचत् किं वृथा देवि रोदिषि । संत्रोट्य शृङ्खलं पश्य यातं मारुतिमम्बरम् ॥२६८॥

अर्थ: तदनन्तर पासमें बैठी हुई वज्रोदरीने कहा कि हे देवि ! व्यर्थ ही क्यों रुदन करती हो ? देखो, वह हनुमान् बन्धन तोड़कर आकाशमें उड़ा जा रहा है ॥२६८॥


निशम्य वचनं तस्या विकसन्नेत्रपङ्कजा । गच्छन्तं मारुतिं दृष्ट्वा निजसैन्यसमागतम् ॥२६९॥

अर्थ: उसके उक्त वचन सुन तथा अपनी सेनाके साथ हनुमान्‌को जाता देख सीताके नयनकमल खिल उठे ॥२६९॥


अचिन्तयदयं वार्तां मह्यं नाथस्य मे ध्रुवम् । कथयिष्यति यस्यैष गच्छतः प्रवरो जवः ॥२७०॥

अर्थ: वह विचार करने लगी कि जिसका जाते समय यह तीव्र वेग है ऐसा यह हनुमान् अवश्य ही मेरे लिए मेरे नाथकी वार्ता कहेगा ॥२७०॥


पृष्ठतश्चास्य सानन्दं पुष्पाञ्जलिममुञ्चत । समाधानपरा भूत्वा श्रीरिवेशस्य तेजसाम् ॥२७१॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर सावधान चित्त की धारक सीताने हर्षपूर्वक हनुमान्के पीछे उस प्रकार पुष्पांजलि छोड़ी जिस प्रकार कि लक्ष्मी तेजके स्वामीके पीछे छोड़ती है ॥२७१॥


उवाच च ग्रहाः सर्वे भवन्तु सुखदास्तव । हतविघ्नश्चिरंजीव भोगवान् वायुनन्दन ॥२७२॥

अर्थ: साथ ही उसने यह कहा कि हे पवन पुत्र ! समस्त ग्रह तेरे लिए सुखदायक हों तथा तू विघ्नोंको नष्ट कर भोग युक्त होता हुआ चिरकाल तक जीवित रह ॥२७२॥


इति सुविहितवृत्ताः पूर्वजन्मन्युदाराः सकलभुवनरोधिव्याप्यकीर्तिप्रधानाः । अभिसरपरिमुक्ताः कर्म तत्कर्तुमीशाः जनयति परमं तद्विस्मयं दुर्विचिन्त्यम् ॥२७३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें उत्तम आचरण किया है, जो उदार है, तथा जिनकी कीर्तिका समूह समस्त संसारमें व्याप्त है ऐसे मनुष्य परिभ्रमणसे रहित हो वह कर्म करनेके लिए समर्थ होते हैं जो कि बहुत भारी अचिन्तनीय आश्चर्य उत्पन्न करता है ॥२७३॥


भजत सुकृतसंगं तेन निर्मुच्य सर्वं विरसफलविधायि क्षुद्रकर्म प्रयत्नात् । भवत परमसौख्यास्वादलोमप्रसक्ताः परिजितरविभासो जन्तवः कान्तलीलाः ॥२७४॥

अर्थ: इसलिए नीरस फल देनेवाले समस्त क्षुद्र कर्मको प्रयत्न पूर्वक छोड़ कर एक पुण्यका ही समागम प्राप्त करो जिससे परम सुखके आस्वादके लोभी हो, पुरुष अपनी प्रभासे सूर्यकी प्रभाको जीतनेवाला एवं मनोहर लीलाओंका धारक होता है ॥२७४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हनुमत्प्रत्यभिगमनं नाम त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यकथित पद्मपुराणमें हनुमान्के लौटने आदिका वर्णन करनेवाला तिरपनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५३॥


५४. चतुःपञ्चाशत्तमं पर्व (लङ्काप्रस्थानं)

अथाससाद कैष्किन्धं हनूमान् बलमग्रतः । विधाय पुरि विध्वस्तध्वजछत्रादिचारुताम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर - जिसकी ध्वजाओं और छत्रादिकी सुन्दरता नष्ट हो गयी थी ऐसी सेना आगे कर हनुमान् किष्किन्धा नगरीको प्राप्त हुआ ॥१॥


बहिर्निष्क्रान्तकैष्किन्धिजनसागरवीक्षितः । विवेश नगरं धीरो निसर्गोदारविभ्रमः ॥२॥

अर्थ: तदनन्तर किष्किन्धा निवासी मनुष्योंकी सागरके समान अपार भीड़ने बाहर निकल कर जिसके दर्शन किये थे, जो धीर था तथा स्वभावसे ही उत्तम चेष्टाओंका धारक था ऐसे हनुमान्ने नगरमें प्रवेश किया ॥२॥


विक्षताङ्गान् महायोधान् द्रष्टुं नगरयोषिताम् । गवाक्षार्पितवक्त्राणां संभ्रमः परमोऽभवत् ॥३॥

अर्थ: उस समय क्षत-विक्षत शरीरके धारक महायोधाओंको देखनेके लिए जिन्होंने झरोखोंमें मुख लगा रक्खे थे, ऐसी नगर-निवासिनी स्त्रियोंमें बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ ॥३॥


प्राप्य च वासमात्मीयं हितो भूत्वा पिता यथा । वातिरावासयत् सैन्यं यथायोग्यं समन्ततः ॥४॥

अर्थ: तत्पश्चात् अपने निवास स्थान पर आकर हनुमान्ने पिताकी तरह हितकारी हो सेनाको सब ओर यथायोग्य ठहराया ॥४॥


ततः सुग्रीवराजेन संगत्य ज्ञापितक्रियः । जगाम पद्मनाभस्य पादमूलं निवेदितुम् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर राजा सुग्रीवके साथ मिलकर, लंकामें जो कार्य हुआ था वह उसे बतलाया । तत्पश्चात् समाचार देनेके लिए रामके चरणमूलमें गया ॥५॥


प्रिया जीवति ते भद्रेत्येवमागत्य मारुतिः । वेदयिष्यति मे साधुरिति चिन्तामुपागतम् ॥६॥

अर्थ: उस समय श्रीराम इस प्रकारकी चिन्ता करते हुए बैठे थे कि सत्पुरुष हनुमान् आकर मुझसे कहेगा कि हे भद्र ! तुम्हारी प्रिया जीवित है ॥६॥


क्षीणमत्यभिरामाङ्गं क्षीयमाणं निरङ्कुशम् । वियोगवह्निना नागं दावेनैवाकुलीकृतम् ॥७॥

अर्थ: अत्यन्त सुन्दर शरीरके धारक राम क्षीण हो चुके थे तथा उत्तरोत्तर क्षीण होते जा रहे थे । वे वियोगरूपी अग्निसे उस तरह आकुलित हो रहे थे जिस तरह कि दावानलसे कोई हाथी आकुलित होता है ॥७॥


वर्तमानं महाशोकपाताले द्विष्टविष्टपम् । पद्मं वातिरुपासर्पन् मूर्धन्यस्तकराम्बुरुट् ॥८॥

अर्थ: वे महा शोकरूपी पातालमें विद्यमान थे तथा समस्त संसारसे उन्हें द्वेष उत्पन्न हो रहा था । हनुमान् हस्तकमल जोड़कर तथा मस्तकसे लगाकर उनके पास गया ॥८॥


प्रथमं वातिना हर्षध्रियमाणोरुचक्षुषा । वक्त्रेण जानकीवार्ता शिष्टावाचा ततोऽखिला ॥९॥

अर्थ: प्रथम तो हनुमान्ने, जिसके विशाल नेत्र, हर्षसे युक्त थे ऐसे मुखके द्वारा जानकीका समाचार कहा और उसके बाद उत्तम वचनोंके द्वारा सब समाचार प्रकट किया ॥९॥


अभिज्ञानादिकं सर्वं निवेद्योक्तं स सीतया । चूडामणिं नरेन्द्राय समर्प्यागात् कृतार्थताम् ॥१०॥

अर्थ: सीताने जो कुछ अभिज्ञान अर्थात् परिचय कारक वृत्तान्त कहे थे वे सब कह चुकनेके बाद उसने राजा रामचन्द्रके लिए चूडामणि दिया और इस तरह वह कृतकृत्यताको प्राप्त हुआ ॥१०॥


चिन्तयेव हतच्छायो निषण्णः श्रान्तवत्करे । शोकक्लान्त इवासीत्स वेणीबन्धमलीमसः ॥११॥

अर्थ: वह चूडामणि कान्ति रहित था, सो ऐसा जान पड़ता मानो चिन्ताके कारण ही उसकी कान्ति जाती रही हो । वह रामके हाथमें इस प्रकार विद्यमान था मानो थककर ही बैठा हो और सीताकी चोटीमें बँधे रहनेसे मलिन हो गया था सो ऐसा जान पड़ता था मानो शोकसे ही दुःखी होकर मलिन गया हो ॥११॥


पद्मस्याञ्जलियातोऽसौ पतद्बाष्पो हतप्रभः । दृशा दृष्टो नु पीतो नु वार्ता पृष्टानु संभ्रमात् ॥१२॥

अर्थ: वह प्रभाहीन चूडामणि रामकी अंजलिमें पहुँचकर ऐसा लगने लगा मानो अश्रु ही छोड़ रहा हो। रामने उसे बड़ी उत्सुकताके कारण नेत्रोंसे देखा था, या पिया था, या उससे कुशल समाचार पूछा था सो कहनेमें नहीं आता ॥१२॥


आसीनमञ्जलावेनं दौर्बल्यविरलाङ्गुलौ । गलत्किरणधारौघं शुशोच धरणीपतिः ॥१३॥

अर्थ: दुर्बलताके कारण जिसकी अंगुलियाँ विरल हो गयी थीं ऐसी अंजलिमें विद्यमान तथा जिससे किरणरूपी धाराओंका समूह झर रहा था ऐसे उस चूड़ामणिके प्रति रामने शोक प्रकट किया ॥१३॥


पूरिताञ्जलिमंशूनामालोकेन तमानने । चक्रे सोऽपि रुदित्वैव नरेशः सलिलाञ्जलिम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर किरणोंके प्रकाशसे जिसने अंजलि भर दी थी ऐसे उस चूड़ामणिको रामने मस्तकपर धारण किया । उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो उस चूड़ामणिने स्वयं रोकर ही जलकी अंजलि भर दी हो ॥१४॥


प्रियायास्तदभिज्ञानं यत्राप्यङ्गे नियोजितम् । तेन तस्यापि वैदेहीपरिष्वङ्गः इवाभवत् ॥१५॥

अर्थ: प्रियाके उस अभिज्ञानको रामने अपने जिस अंगपर धारण किया उसीने मानो सीताका आलिंगन प्राप्त कर लिया था ॥१५॥


सर्वव्यापी समुद्भिन्नो रोमाञ्चः कर्कशो घनः । अङ्गेष्वसंभवस्तस्य प्रमोद इव निर्झरः ॥१६॥

अर्थ: उस समय उनके समस्त अंगोंमें जिसकी सम्भावना भी नहीं थी ऐसा सर्वव्यापी, कठोर तथा सघन रोमांच निकल आया मानो हर्षका निर्झर ही फूट पड़ा हो ॥१६॥


अपृच्छच्च परिष्वज्य मारुतिं कृतसंभ्रमः । अपि सत्यं प्रिया प्राणान् धारयत्यतिकोमला ॥१७॥

अर्थ: रामने बड़े सम्भ्रमके साथ हनुमान्‌का आलिंगन कर उससे पूछा कि क्या सचमुच ही मेरी कोमलांगी प्रिया प्राण धारण कर रही है - जीवित है ? ॥१७॥


जगाद प्रणतो वातिः नाथ जीवति नान्यथा । मया वार्त्ता समानीता सुखी भव इलापते ॥१८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्‌ने नम्रीभूत होकर कहा कि हे नाथ ! जीवित है। मैं अन्यथा समाचार नहीं लाया हूँ, हे राजन् ! सुखी होइए ॥१८॥


किंतु त्वद्विरहोदारदावमध्यविवर्त्तिनी । गुणौघनिम्नगा बाला नेत्राम्बुकृतदुर्दिना ॥१९॥

अर्थ: किन्तु इतना अवश्य है कि गुणोंके समूहकी नदी स्वरूप वह बाला तुम्हारे विरहरूपी दावानलके मध्यमें वर्तमान है, अश्रुओंके द्वारा दुर्दिन बना रही है - निरन्तर वर्षा करती रहती है ॥१९॥


वेणीबन्धच्युतिच्छायमूर्द्धजात्यन्तदुःखिता । मुहुर्निश्वसती दीनं चिन्तासागरवर्तिनी ॥२०॥

अर्थ: वेणीबन्धनके छूट जानेसे उसके केश कान्तिहीन हो गये हैं, वह अत्यन्त दुःखी है, बार-बार दीनतापूर्वक साँसें भरती है और चिन्तारूपी सागरमें डूबी है ॥२०॥


तनूदरी स्वभावेन विशेषेण वियोगतः । आराध्यमानिका स्त्रीभिः क्रुद्धाभी रक्षसां विभोः ॥२१॥

अर्थ: वह कृशोदरी तो स्वभावसे ही थी पर अब आपके वियोगसे और भी अधिक कृशोदरी जान पड़ती है । रावणकी क्रोधभरी स्त्रियाँ उसकी निरन्तर आराधना करती रहती हैं ॥२१॥


सततं चिन्तयन्ती त्वां त्यक्तसर्वतनुस्थितिः । दुःखं जीवति ते कान्ता कुरु देव यथोचितम् ॥२२॥

अर्थ: वह शरीरकी सर्व चिन्ता छोड़ निरन्तर आपकी ही चिन्ता करती रहती हैं। इस तरह हे देव ! आपकी प्रियवल्लभा दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही है अतः यथायोग्य प्रयत्न कीजिए ॥२२॥


सामीरणिवचः श्रुत्वा म्लानपद्मेक्षणश्चिरम् । चिन्तयाकुलितः पद्मो बभूवात्यन्तदुःखितः ॥२३॥

अर्थ: हनुमान्‌के उक्त वचन सुनकर रामके नेत्रकमल म्लान हो गये। वे बहुत देर तक चिन्तासे आकुलित हो अत्यन्त दुःखी हो उठे ॥२३॥


दीर्घमुष्णं च निश्वस्य स्रस्तालसशरीरभृत् । निनिन्द जीवितं स्वस्य जन्म चानेकधा भृशम् ॥२४॥

अर्थ: शिथिल एवं अलसाये शरीरको धारण करनेवाले राम लम्बी तथा गरम साँस भरकर अपने जीवनकी अनेक प्रकारसे अत्यधिक निन्दा करने लगे ॥२४॥


ततस्तदिङ्गितं ज्ञात्वा सौमित्रिरिदमब्रवीत् । किं शोचसि महाबुद्धे कर्तव्ये दीयतां मनः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर उनकी चेष्टा जानकर हनुमान्ने यह कहा कि हे महाबुद्धिमान्! शोक क्यों करते हो? कर्तव्यमें मन दीजिए ॥२५॥


लक्ष्यते दीर्घसूत्रत्वं किष्किन्धनगरप्रभोः । कृताह्वानश्च भूयोऽपि सीताभ्राता चिरायति ॥२६॥

अर्थ: किष्किन्ध नगरके राजा सुग्रीवकी दीर्घसूत्रता जान पड़ती है और सीताका भाई भामण्डल बार-बार बुलानेपर भी देर कर रहा है ॥२६॥


दशास्यकस्य नगरीं श्वो गन्तास्म विसंशयम् । नौभिरर्णवमुत्तीर्य बाहुभ्यामेव वा द्रुतम् ॥२७॥

अर्थ: इसलिए हम लोग नौकाओं अथवा भुजाओंसे ही शीघ्र समुद्रको तैरकर कल ही निःसन्देह नीच रावणकी नगरी लंकाको चलेंगे ॥२७॥


अथोचे सिंहनादाख्यो मधुरो खेचरो महान् । अभिमानिसमं मैवं भाषिष्ठाः कोविदो भवान् ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर सिंहनाद नामक महाबुद्धिमान् विद्याधरने कहा कि इस तरह अभिमानीके समान मत कहो। आप विद्वान् पुरुष हैं ॥२८॥


भवतो या गतिः सैव जातास्माकमिहाधुना । अतो निरूप्य कर्तव्यं सर्वेभ्यो हितमादरात् ॥२९॥

अर्थ: आपकी जो दशा लंकामें हुई है वही इस समय यहाँ हम लोगोंकी होगी इसलिए आदरपूर्वक सब कुछ निश्चय कर हितकारी कार्य करना चाहिए ॥२९॥


गत्वा पवनपुत्रेण सप्राकाराट्टगोपुरा । लङ्का विध्वंसिता तेन सोद्यानोपवनान्विता ॥३०॥

अर्थ: पवनपुत्र हनुमान्ने कोट, अट्टालिकाएँ तथा गोपुरोंसे सहित एवं बाग-बगीचोंसे सुशोभित लंका-पुरीको नष्ट किया है ॥३०॥


अधुना रावणे क्रुद्धे महाविद्याधराधिपे । संघातमृत्युरस्माकं संप्राप्तोऽयं विधेर्वशात् ॥३१॥

अर्थ: इसलिए महाविद्याधरोंका अधिपति रावण इस समय क्रुद्ध हो रहा है और उसके क्रुद्ध होनेपर दैववश हम सबको यह सामूहिक मृत्यु प्राप्त हुई है ॥३१॥


ऊचे चन्द्रमरीचिश्च परं वचनमूर्जितम् । किं त्वं हरेरिव प्राप्तः संत्रासं मृगवत्परम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रमरीचि नामक विद्याधरने अत्यन्त ओजपूर्ण वचन कहे कि क्या तुम सिंहसे हरिणके समान अत्यन्त भयको प्राप्त हो रहे हो? ॥३२॥


बिभेति दशवक्त्राह्वः को वासौ किं प्रयोजनम् । अन्यायकारिणस्तस्य वर्तते मृत्युरग्रतः ॥३३॥

अर्थ: भयभीत तो रावणको होना चाहिए अथवा वह कौन है और उससे क्या प्रयोजन है? उसने अन्याय किया है इसलिए मृत्यु उसके आगे नाच रही है ॥३३॥


अस्माकं बहवः सन्ति खेचरेन्द्रा महारथाः । विद्याविभवसंपन्नाः कृताश्चर्याः सहस्रशः ॥३४॥

अर्थ: हमारे पास ऐसे बहुत विद्याधर राजा हैं जो महावेगशाली हैं तथा जिन्होंने हजारों बार अपने चमत्कार दिखाये हैं ॥३४॥


ख्यातो घनगतिस्तीव्रो भूतनादो गजस्वनः । क्रूरः केली किलो भीमः कुण्डो गोरतिरङ्गदः ॥३५॥

नलो नीलो तडिद्वक्त्रो मन्दरोऽशनिरर्णवः । चन्द्रज्योतिर्मृगेन्द्राह्वो वज्रदंष्ट्रो दिवाकरः ॥३६॥

उल्कालाङ्गूलदिव्यास्त्रप्रत्यूहोज्झितपौरुषः । हनूमान् सुमहाविद्यः प्रभामण्डलसुन्दरः ॥३७॥

महेन्द्रकेतुरत्युग्रसमीरणपराक्रमः । प्रसन्नकीर्तिरुद्वृत्तः सुतास्तस्य महाबलाः ॥३८॥

किष्किन्धस्वामिनोऽन्येऽपि सामन्ताः परमौजसः । विद्यन्तेऽक्षतकर्माणो निर्भृत्याः शासनैषिणः ॥३९॥

अर्थ: उनके नाम हैं घनगति, तीव्र, भूतनाद, गजस्वन, क्रूर, केलीकिल, भीम, कुण्ड, गोरति, अंगद, नल, नील, तडिद्वक्त्र, मन्दर, अशनि, अर्णव, चन्द्रज्योति, मृगेन्द्र, वज्रदंष्ट्र, दिवाकर, उल्का और लांगूल नामक दिव्य अस्त्रोंके समूहमें निर्वाध पौरुषको धारण करनेवाला हनुमान्, महाविद्याओंका स्वामी भामण्डल, तीक्ष्ण पवनके समान पराक्रमका धारक महेन्द्रकेतु, अद्भुत पराक्रमी प्रसन्नकीर्ति और उसके महाबलवान् पुत्र । इनके सिवाय किष्किन्धनगरके स्वामी राजा सुग्रीवके और भी अनेक महापराक्रमी सामन्त हैं जो कार्यको प्रारम्भ कर बीचमें नहीं छोड़ते, आज्ञाकारी हैं और आदेशकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥३५-३९॥


ततस्तद्वचनं श्रुत्वा खेचराश्चक्षुरानतम् । लक्ष्मीधराग्रजं तेन निदधुर्विनयान्वितम् ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रमरीचिके वचन सुनकर विद्याधरोंने अपने नीचे नेत्र विनयपूर्वक रामके ऊपर लगाये अर्थात् उनकी ओर देखा ॥४०॥


अथेक्षांचक्रिरे तस्य वदनेऽव्यक्तसौम्यके । भ्रुकुटीजालकं भीमं मृत्योरिव लतागृहम् ॥४१॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसका सौम्यभाव अव्यक्त था ऐसे रामके मुखपर उन्होंने वह भयंकर भृकुटीका जाल देखा जो कि यमराजके लतागृह-निकुंजके समान जान पड़ता था ॥४१॥


लङ्कायां तेन विन्यस्तां दृष्टिं शोणस्फुरत्विषम् । केतुरेखामिवोद्यातां राक्षसक्षयशंसिनीम् ॥४२॥

अर्थ: उन्होंने देखा कि श्रीराम लंकाकी ओर जो लाल-लाल दृष्टि लगाये हुए हैं, वह राक्षसोंका क्षय सूचित करनेके लिए उदित केतुकी रेखाके समान जान पड़ती है ॥४२॥


तामेव च पुनर्न्यस्तां चिरमध्यस्थतां गते । दृष्टस्थाम्नि निजे चापे कृतान्तभ्रूलतोपमे ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने देखा कि रामने वही दृष्टि अपने उस सुदृढ़ धनुष पर लगा रक्खी है जो चिरकालसे मध्यस्थताको प्राप्त हुआ है, तथा यमराजकी भृकुटीरूपी लताकी उपमा धारण करनेवाला है ॥४३॥


कोपकम्पश्लथं चास्य केशमारं स्फुरद्युतिम् । निधानमिव कालस्य निरोद्धुं तमसा जगत् ॥४४॥

अर्थ: उनका केशोंका समूह क्रोधसे कम्पित तथा शिथिल होकर बिखर गया था और ऐसा जान पड़ता था मानो अन्धकारके द्वारा जगत्को व्याप्त करनेके लिए यमराजका खजाना ही खुल गया था ॥४४॥


तथाविधं च तद्वक्त्रं ज्योतिर्वलयमध्यगम् । जरठीभवदुत्पातप्रभाभास्करसंनिभम् ॥४५॥

अर्थ: तेजोमण्डलके बीचमें स्थित उनका उस प्रकारका मुख ऐसा जान पड़ता था मानो प्रलय कालका देदीप्यमान तरुण सूर्य ही हो ॥४५॥


गृहीतगमनक्ष्वेडं रक्षसां नाशनायतम् । दृष्ट्वा ते गमने सज्जा जाता संभ्रान्तमानसाः ॥४६॥

अर्थ: इस तरह राक्षसोंका नाश करनेके लिए जो गमन सम्बन्धी उतावली कर रहे थे ऐसे रामको देखकर उन सब विद्याधरोंके मन क्षुभित हो उठे तथा सब शीघ्र ही प्रस्थान करनेके लिए उद्यत हो गये ॥४६॥


राघवाकूतनुन्नास्ते संपूज्येन्दुश्रुतेगिराम् । चलिताः व्योमगाश्चित्रहेतयः संपदान्विताः ॥४७॥

अर्थ: अथानन्तर रामकी चेष्टाओंसे प्रेरित हुए समस्त विद्याधर चन्द्रमरीचिकी वाणीका सम्मान कर आकाशमार्गसे चल पड़े । उस समय वे सब विद्याधर नाना प्रकारके शस्त्र धारण किये हुए थे और उत्तमोत्तम सम्पदाओंसे सहित थे ॥४७॥


प्रयाणतूर्यसंघातं नादपूरितगह्वरम् । दापयित्वा रणौत्सुक्यौ प्रस्थितौ रघुनन्दनौ ॥४८॥

अर्थ: युद्धकी उत्कण्ठासे युक्त राम और लक्ष्मणने, ध्वनिके द्वारा गुफाओंको पूर्ण करनेवाले प्रयाणकालिक बाजे बजवाकर प्रस्थान किया ॥४८॥


बहुले मार्गशीर्षस्य पञ्चम्यामुदिते रवौ । सोत्साहैः शकुनैरेभिस्तेषां ज्ञेयं प्रयाणकम् ॥४९॥

अर्थ: मार्गशीर्ष वदी पंचमीके दिन सूर्योदयके समय उन सबका प्रस्थान हुआ था और प्रस्थान कालमें होनेवाले निम्नां- कित शुभ शकुनोंसे उनका उत्साह बढ़ रहा था ॥४९॥


दक्षिणावर्त्तनिर्धू मज्वाला रम्यस्वनः शिखी । परमालंकृता नारी सुरभिप्रेरकोऽनिलः ॥५०॥

अर्थ: उस समय उन्होंने देखा कि 'निर्धूम अग्निकी ज्वाला दक्षिणावर्तसे प्रज्वलित हो रही है, समीप ही मयूर मनोहर शब्द कर रहा है, उत्तमोत्तम अलंकारोंसे युक्त स्त्री सामने खड़ी है, सुगन्धिको फैलानेवाली वायु बह रही है ॥५०॥


निर्ग्रन्थसंयतश्छत्रं गम्भीरं वाजिहेषितम् । घण्टानिस्वनितं कान्तं कलशो दधिपूरितः ॥५१॥

अर्थ: निर्ग्रन्थ मुनिराज सामनेसे आ रहे हैं, आकाशमें छत्र फिर रहा है, घोड़ोंकी गम्भीर हिनहिनाहट फैल रही है, घण्टाका मधुर शब्द हो रहा है, दहीसे भरा कलश सामनेसे आ रहा है ॥५१॥


उत्किरन्नितरां दृष्टो वामतो गोमयं नवम् । वायसो विस्फुरत्पक्षो निर्मुक्तमधुरस्वरः ॥५२॥

अर्थ: बायीं ओर नवीन गोबरको बार-बार बिखेरता तथा पंखोंको फैलाता हुआ काक मधुर शब्द कर रहा है ॥५२॥


भेरीशंखरवः सिद्धिर्जय नन्द व्रज द्रुतम् । निर्विघ्नमिति शब्दाश्च तेषां मङ्गलमुद्ययुः ॥५३॥

अर्थ: भेरी और शंखका शब्द हो रहा है, सिद्धि हो, जय हो, समृद्धिमान् होओ, तथा किसी विघ्न-बाधाके बिना ही शीघ्र प्रस्थान करो । इत्यादि मंगल शब्द हो रहे हैं ॥५३॥


चतुर्दिग्भ्यः समायातैः पूर्यमाणो नभश्चरैः । सुग्रीवो गन्तुमुद्युक्तः सितपक्षविधूपमः ॥५४॥

अर्थ: इन मंगलरूप शुभशकुनोंसे उन सबका उत्साह वृद्धिगत हो रहा था । चारों दिशाओंसे आये हुए विद्याधरोंसे जिसकी सेना बढ़ रही थी और इसलिए जो शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी उपमा धारण कर रहा था ऐसा सुग्रीव चलनेके लिए उद्यत हुआ ॥५४॥


नानायानविमानास्ते नानावाहनकेतनाः । व्रजन्तो व्योम्नि वेगेन बभुः खेचरपुंगवाः ॥५५॥

अर्थ: जो नाना प्रकारके यान और विमानोंसे सहित थे तथा जिनका वाहनोंपर नाना प्रकारकी पताकाएँ फहरा रही थीं ऐसे वे सब विद्याधर राजा वेगसे आकाशमें जाते हुए अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥५५॥


किष्किन्धाधिपतिर्वातिः शल्यो दुर्मर्षणो नलः । नीलः कालः सुषेणश्च कुमुदाद्यास्तथा नृपाः ॥५६॥

एते ध्वजोपरिन्यस्तमहाभासुरवानराः । ग्रसमाना इवाकाशं प्रवृत्ताः सुमहाबलाः ॥५७॥

अर्थ: किष्किन्ध नगरके राजा सुग्रीव, हनुमान्, शल्य, दुर्मर्षण, नल, नील, काल, सुषेण तथा कुमुद आदि राजा आकाशमें उड़े जा रहे थे, सो जिनकी ध्वजाओंमें अत्यन्त देदीप्यमान वानरके चिह्न थे ऐसे ये महाबलवान् विद्याधर ऐसे जान पड़ते थे मानो आकाशको ग्रसनेके लिए ही उद्यत हुए हों ॥५६-५७॥


रेजे विराधितस्यापि हारो निर्झरभासुरः । जाम्बवस्य महावृक्षो व्याघ्रो सिंहरवस्य च ॥५८॥

वारणो मेघकान्तस्य शेषाणामन्वयागताः । ध्वजेषु चिह्नतां याता भावाश्छत्रेषु चोज्ज्वलाः ॥५९॥

अर्थ: विराधितकी ध्वजामें निर्झरके समान हार, जाम्बवकी ध्वजामें महावृक्ष, सिंहरवकी ध्वजामें व्याघ्र, मेघकान्तकी ध्वजामें हाथी तथा अन्य विद्याधरोंकी ध्वजाओंमें वंश-परम्परासे चले आये अनेक चिह्न सुशोभित थे । ये सभी उज्ज्वल छत्रोंके धारक थे ॥५८-५९॥


तेषां बभूव तेजस्वी भूतनादः पुरस्सरः । लोकपालोपमस्तस्य स्थितः पश्चान्मरुत्सुतः ॥६०॥

अर्थ: अत्यन्त तेजस्वी भूतनाद उनके आगे चल रहा था और लोकपालके समान हनुमान् उसके पीछे स्थित था ॥६०॥


वृताः सामन्तचक्रेण यथास्वं परमौजसः । लङ्कां प्रति व्रजन्तस्ते रेजुः संजातसंमदाः ॥६१॥

अर्थ: यथायोग्य सामन्तोंके समूहसे घिरे, परम तेजस्वी तथा हर्षसे भरे वे सब विद्याधर लंका जाते हुए अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥६१॥


सुकेशतनयाः पूर्वं लङ्कां माल्यादयो यथा । विमानशिखरारूढाश्चेलुः पद्मादयो नृपाः ॥६२॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले सुकेशके पुत्र माल्य आदिने लंकाकी ओर प्रयाण किया था उसी प्रकार राम आदि राजाओंने विमानोंके अग्रभागपर आरूढ़ हो लंकाकी ओर प्रयाण किया ॥६२॥


पार्श्वस्थः पद्मनामस्य विराधितनभश्चरः । पृष्ठतो जाम्बवस्तस्थौ सचिवैरन्वितो निजैः ॥६३॥

अर्थ: विराधित विद्याधर रामको बगलमें स्थित था और अपने मन्त्रियोंसे सहित जाम्बव उनके पीछे चल रहा था ॥६३॥


वामे भुजे सुषेणश्च सुग्रीवो दक्षिणे स्थितः । निमेषेण च संप्राप्ता वेलंधरमहीधरम् ॥६४॥

अर्थ: बायें हाथकी ओर सुषेण और दाहिने हाथकी ओर सुग्रीव स्थित था । इस प्रकार व्यवस्थासे चलते हुए वे सब निमेष मात्रमें वेलन्धर नामक पर्वतपर जा पहुँचे ॥६४॥


वेलंधरपुरस्वामी समुद्रो नाम तत्र च । नलस्य परमं युद्धमातिथ्यं समुपानयन् ॥६५॥

अर्थ: वेलन्धर नगरका स्वामी समुद्र नामका विद्याधर था सो उसने परम युद्धके द्वारा नलका आतिथ्य किया ॥६५॥


ततो नलेन सस्पर्द्धं जित्वा निहतसैनिकः । बद्धो बाहुबलाढ्येन समुद्रः खेचरः परः ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर बाहुबलसे युक्त नलने स्पर्द्धाके साथ उसके सैनिक मार डाले और उसे बाँध लिया ॥६६॥


संपूज्य च पुनर्मुक्तः पद्मनामस्य शासने । स्थापितोऽवस्थिताश्चैते पुरे तत्र यथोचितम् ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर रामका आज्ञाकारी होनेपर उसे सम्मानित कर छोड़ दिया तथा उसी नगरका राजा बना दिया । राम आदि सन्त लोग भी उसके नगरमें यथायोग्य ठहरे ॥६७॥


सत्यश्रीः कमला चैव गुणमाला तथापराः । रत्नचूला तथा कन्या समुद्रेण प्रमोदिना ॥६८॥

कल्पिताः पुरुशोभाढ्याः योषिद्गुणविभूषिताः । लक्ष्मीधरकुमाराय सुरस्त्रीसमविभ्रमाः ॥६९॥

अर्थ: राजा समुद्रकी सत्यश्री, कमला, गुणमाला और रत्नचूला नामकी कन्याएँ थीं जो उत्तम शोभासे युक्त थीं, स्त्रियोंके गुणोंसे विभूषित थीं तथा देवांगनाओंके समान जान पड़ती थीं । हर्षसे भरे राजा समुद्रने वे सब कन्याएँ लक्ष्मणके लिए समर्पित कीं ॥६८-६९॥


तत्रैकां रजनीं स्थित्वा सुवेलमचलं गताः । सुवेलनगरे तत्र सुवेलो नाम खेचरः ॥७०॥

अर्थ: उस नगरमें एक रात्रि ठहरकर सब लोग सुवेलगिरिको चले गये । वहाँ सुवेल नगरमें सुवेल नामका विद्याधर राज्य करता था ॥७०॥


जित्वा तमपि संग्रामे हेलामात्रेण खेचराः । चिक्रीडुर्मुदितास्तत्र त्रिदशा इव नन्दने ॥७१॥

अर्थ: सो उसे भी युद्धमें अनायास जीतकर विद्याधरोंने हर्षित हो वहाँ उस प्रकार क्रीड़ा की जिस प्रकार कि देव नन्दन वनमें रहते हैं ॥७१॥


तत्राक्षयवने रम्ये सुखेनाक्षेपितक्षपाः । अन्येद्युरुद्यता गन्तुं लङ्कां तेन सुविभ्रमाः ॥७२॥

अर्थ: वहाँ अक्षय नामक मनोहर वनमें कुशलतापूर्वक रात्रि व्यतीत कर दूसरे दिन उत्तम शोभाको धारण करनेवाले विद्याधर लंका जानेके लिए उद्यत हुए ॥७२॥


तुङ्गप्राकारयुक्तां तां हेमसद्मसमाकुलाम् । कैलासशिखराकारैः पुण्डरीकैर्विराजिताम् ॥७३॥

विचित्रैः कुट्टिमतलैरालोकेनावभासतीम् । पद्मोद्यानसमायुक्तां प्रपादिकृतिभूषणाम् ॥७४॥

चैत्यालयैरलंतुङ्गैर्नानावर्णसमुज्ज्वलैः । विभूषितां पवित्रां च महेन्द्रनगरीसमाम् ॥७५॥

लङ्कां दृष्ट्वा समासन्नां सर्वे खेचरपुंगवाः । हंसद्वीपकृतावासा बभूवुः परमोदयाः ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर जो ऊँचे प्राकारसे युक्त थी, सुवर्णमय भवनोंसे व्याप्त थी, कैलासके शिखरके समान सफेद कमलोंसे सुशोभित थी, नाना प्रकारके फर्शों और प्रकाशसे देदीप्यमान थी, कमल वनोंसे युक्त थी, प्याऊ आदिकी रचनाओंसे अलंकृत थी, नाना रंगोंसे उज्ज्वल ऊँचे-ऊँचे जिन-मन्दिरोंसे अलंकृत तथा पवित्र थी और महेन्द्रकी नगरीके समान जान पड़ती थी ऐसी लंकाको निकटवर्तिनी देख परम वैभवके धारक विद्याधर हंसद्वीपमें ठहर गये ॥७३-७६॥


युद्धे हंसरथं तत्र विजित्य सुमहाबलम् । रम्ये हंसपुरे क्रीडां चक्रुरिच्छानुगामिनीम् ॥७७॥

अर्थ: वहाँके हंसपुर नामा नगरमें महाबलवान् राजा हंसरथको जीतकर सबने इच्छानुसार क्रीड़ा की ॥७७॥


मुहुः प्रेषितदूतोऽयमद्य श्वो वा विसंशयम् । भामण्डलः समायातीत्येवमाकाङ्क्षयास्थिताः ॥७८॥

अर्थ: जिसके पास बार-बार दूत भेजा गया है ऐसा भामण्डल आज या कल अवश्य आ जावेगा इस प्रकार प्रतीक्षा करते हुए सब वहाँ ठहरे थे ॥७८॥


यं यं देशं विहितसुकृताः प्राणभाजः श्रयन्ते तस्मिंस्तस्मिन् विजितरिपवो भोगसंगं भजन्ते । नह्येतेषां परजनमतं किंचिदापद्युतानां सर्वं तेषां भवति मनसि स्थापितं हस्तसक्तम् ॥७९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि पुण्यात्मा प्राणी जिस-जिस देशमें जाते हैं उसी-उसी देशमें वे शत्रुओंको जीतकर भोगोंका समागम प्राप्त करते हैं। उद्यमशील पुण्यात्मा जीवोंके लिए कोई भी वस्तु परके हाथमें नहीं रहती। समस्त मनचाही वस्तुएँ उनके हाथमें आ जाती हैं ॥७९॥


तस्माद् भोगं भुवनविकटं भोक्तुकामेन कृत्यः । श्लाघ्यो धर्मो जिनवरमुखादुद्गतः सर्वसारः । आस्तां तावत्क्षयपरिचितो भोगसंगोऽपि मोक्षम् । धर्मादस्माद् व्रजति रवितोऽप्युज्ज्वलं भव्यलोकः ॥८०॥

अर्थ: इसलिए जो भव्य संसारमें उत्तम भोग भोगना चाहता है उसे जिनेन्द्रदेवके मुखारविन्दसे उदित सर्वश्रेष्ठ प्रशंसनीय धर्मका पालन करना चाहिए। क्योंकि भोगोंका नश्वर संगम तो दूर रहा वह इस धर्मके प्रभावसे सूर्यसे भी अधिक उज्ज्वल मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥८०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे लङ्काप्रस्थानं नाम चतुःपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें लंकाके लिए प्रस्थानका वर्णन करनेवाला चौवनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५४॥

५५. पञ्चपञ्चाशत्तमं पर्व (विभीषणसमागमाभिधानं)

अथाभ्यर्णस्थितं ज्ञात्वा प्रतिसैन्यबलं पुरु । युगान्ताम्भोधिवेलेव लङ्का क्षोभमुपागतम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर शत्रुकी बड़ी भारी सेनाको निकटमें स्थित जानकर लंका, प्रलयकालीन समुद्रकी वेलाके समान क्षोभको प्राप्त हुई ॥१॥


संभ्रान्तमानसः किंचित्कोपमाप दशाननः । चक्रे रणकथां लोको वृन्दबन्धव्यवस्थितः ॥२॥

अर्थ: जिसका चित्त सम्भ्रान्त हो रहा था ऐसा रावण कुछ क्रोधको प्राप्त हुआ और गोलाकार झुण्डोंके बीच बैठे हुए लोग रणकी चर्चा करने लगे ॥२॥


महार्णवरवा भेर्यस्ताडिताः सुभयावहाः । तूर्यशङ्खस्वनस्तुङ्गो बभ्राम गगनाङ्गणे ॥३॥

अर्थ: जिनका शब्द महासागरकी गर्जनाके समान था ऐसी भय उत्पन्न करनेवाली भेरियां बजायी गयीं तथा तुरही और शंखोंका विशाल शब्द आकाशरूपी अंगणमें घूमने लगा ॥३॥


रणभेरीनिनादेन परं प्रमुदिता भटाः । संनद्धा रावणं तेन प्राप्ताः स्वामिहितैषिणः ॥४॥

अर्थ: उस रणभेरीके शब्दसे परम प्रमोदको प्राप्त हुए, स्वामीके हितचिन्तक योद्धा तैयार होकर रावणके समीप आने लगे ॥४॥


मारीचोऽमलचन्द्रश्च भास्करः स्यन्दनो विभुः । तथा हस्तप्रहस्ताद्याः संनद्धाः स्वामिनं श्रिताः ॥५॥

अर्थ: मारीच, अमलचन्द्र, भास्कर, स्यन्दन, हस्त, प्रहस्त आदि अनेक योद्धा कवच धारण कर स्वामीके पास आये ॥५॥


अथ लङ्केश्वरं वीरं संग्रामाय समुद्यतम् । विभीषणोऽभ्युपागम्य प्रणम्य रचिताञ्जलिः ॥६॥

शास्त्रानुगतमत्युद्धं शिष्टानामतिसंमतम् । आयत्यां च तदात्वे च हितं स्वस्य जनस्य च ॥७॥

शिवं सौम्याननो वाक्यं पदवाक्यविशारदः । प्रमाणकोविदो धीरः प्रशान्तमिदमब्रवीत् ॥८॥

अर्थ: अथानन्तर लंकाके अधिपति वीर रावणको युद्धके लिए उद्यत देख विभीषण उसके समीप गया और हाथ जोड़ प्रणाम कर शास्त्रानुकूल, अत्यन्त श्रेष्ठ, शिष्ट मनुष्योंके लिए अत्यन्त इष्ट, आगामी तथा वर्तमान कालमें हितकारी, आनन्दरूप एवं शान्तिपूर्ण निम्नांकित वचन कहने लगा । विभीषण, सौम्यमुखका धारी, पदवाक्यका विद्वान्, प्रमाणशास्त्रमें निपुण एवं अत्यन्त धीर था ॥६-८॥


विस्तीर्णा प्रवरा संपन्महेन्द्रस्येव ते प्रभोः । स्थिता च रोदसी व्याप्य कीर्तिः कुन्ददलामला ॥९॥

अर्थ: उसने कहा कि हे प्रभो ! आपकी सम्पदा इन्द्रकी सम्पदाके समान अत्यन्त विस्तृत तथा उत्कृष्ट है और आपकी कुन्दकलीके समान निर्मल कीर्ति आकाश एवं पृथिवीको व्याप्त कर स्थित है ॥९॥


स्त्रीहेतोः क्षणमात्रेण सेयं मागात् परिक्षयम् । स्वामिन् संध्याभ्ररेखेव प्रसीद परमेश्वर ॥१०॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! हे परमेश्वर ! परस्त्रीके कारण आपकी यह निर्मल कीर्ति सन्ध्याकालीन मेघकी रेखाके समान क्षणभरमें नष्ट न हो जाये अतः प्रसन्न होओ ॥१०॥


क्षिप्रं समर्प्यतां सीता तव किं कार्यमेतया । दृश्यते न च दोषोऽत्र प्रस्पष्टः केवलो गुणः ॥११॥

अर्थ: इसलिए शीघ्र ही सीता रामके लिए सौंप दी जाये । इससे आपको क्या कार्य ही है ? सौंप देनेमें दोष नहीं दिखाई देता है ॥११॥


सुखोदधौ निमग्नस्त्वं स्वस्थस्तिष्ठ विचक्षण । अनवद्यो महाभोगस्तवात्मीयं समन्ततः ॥१२॥

अर्थ: हे बुद्धिमन् ! तुम तो सुखरूपी सागरमें निमग्न हो सुखसे बैठो । तुम्हारे अपने सब महाभोग सब ओरसे निर्दोष हैं ॥१२॥


समाने जानकी तस्मिन् पद्मनाभे नियुज्यताम् । निजः प्रकृतिसंबन्धः सर्वथैव प्रशस्यते ॥१३॥

अर्थ: श्रीराम यहाँ पधारे हैं सो उनका सम्मान कर सीता उन्हें सौंप दी जाये क्योंकि अपने स्वभावका सम्बन्ध ही सर्व प्रकारसे प्रशंसनीय है ॥१३॥


श्रुत्वा तदिन्द्रजिद्वाक्यं जगाद पितृचित्तवित् । स्वभावात्यन्तमानाढ्यमागमप्रतिकूलनम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर पिताके चित्तको जाननेवाला इन्द्रजित् विभीषणके उक्त वचन सुन, स्वभावसे ही अत्यन्त मानपूर्ण तथा आगमके विरुद्ध निम्नांकित वचन बोला ॥१४॥


साधो केनासि पृष्टस्त्वं कोऽधिकारोऽपि वा तव । येनैवं भाषसे वाक्यमुन्मत्तगदितोपमम् ॥१५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे भले पुरुष ! तुमसे किसने पूछा है ? तथा तुम्हें क्या अधिकार है ? जिससे इस तरह उन्मत्तके वचनोंके समान वचन बोले जा रहे हो ? ॥१५॥


अत्यन्तं यद्यधीरस्त्वं भीरुश्च क्लीबमानसः । स्ववेश्मविवरे स्वस्थस्तिष्ठ किं तव भाषितैः ॥१६॥

अर्थ: यदि तुम अत्यन्त अधीर-डरपोंक या नपुंसक-जैसे दीनहृदयके धारक हो तो अपने घरके बिलमें आरामसे बैठो । तुम्हें इस प्रकारके शब्द कहनेसे क्या प्रयोजन है ? ॥१६॥


यदर्थे मत्तमातङ्गमहावृन्दान्धकारिणि । पतद्विविधशस्त्रौघे संग्रामेऽत्यन्तभीषणे ॥१७॥

हत्वा शत्रून् समुद्वृत्तास्तीक्ष्णया खड्गधारया । भुजेनोपार्ज्यते लक्ष्मीः सुकृच्छ्राद् वीरसुन्दरी ॥१८॥

तुदुर्लभममिदं प्राप्य तत्स्त्रीरत्नमनुत्तमम् । मूढवन्मुच्यते कस्मात् त्वया व्यर्थमुदाहृतम् ॥१९॥

अर्थ: जिसके लिए मदोन्मत्त हाथियोंके झुण्डसे अन्धकार युक्त, पड़ते हुए अनेक शस्त्रोंके समूहसे सहित एवं अत्यन्त भयदायक संग्राममें तलवारकी पैनी धारासे उद्दण्ड शत्रुओंको मारकर अपनी भुजाओं द्वारा बड़े कष्टसे वीर सुन्दरी लक्ष्मीका उपार्जन किया जाता है ऐसे उस सर्वोत्कृष्ट अत्यन्त दुर्लभ स्त्री-रत्नको पाकर मूर्ख पुरुषकी तरह क्यों छोड़ दिया जाये ? इसलिए तुम्हारा यह कहना व्यर्थ है ॥१७-१९॥


ततो विभीषणोऽवोचदिति निर्भर्त्सनोद्यतः । पुत्रनामासि शत्रुस्त्वमस्य दुःस्थितचेतसः ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर डाँट दिखानेमें तत्पर विभीषणने इस प्रकार कहा कि तू मलिनचित्तको धारण करनेवाले इस रावणका पुत्र नामधारी शत्रु है ॥२०॥


महाशीतपरीतस्त्वमजानन् हितमात्मनः । अन्यचित्तानुरोधेन हिमवारिणि मज्जसि ॥२१॥

अर्थ: तू अपना हित नहीं जानता हुआ महाशीतकी बाधासे युक्त हो दूसरेकी इच्छानुसार शीतल जलमें डूब रहा है - गोता लगा रहा है ॥२१॥


उद्गतं भवने वह्निं शुष्कैः पूरयसीन्धनैः । अहो मोहग्रहार्तस्य विपरीतं तवेहितम् ॥२२॥

अर्थ: तू गृहमें लगी अग्निको सूखे ईंधनसे पूर्ण कर रहा है, अहो ! मोहरूपी पिशाचसे पीड़ित होनेके कारण तेरी विपरीत चेष्टा हो रही है ॥२२॥


जाम्बूनदमयो यावत्सप्राकारविमानिका । लक्ष्मणेन शरैस्तीक्ष्णैर्लङ्का न परिचूर्ण्यते ॥२३॥

तावन्नृपसुतां साध्वीं पद्माय स्थिरचेतसे । क्षेमाय सर्वलोकस्य युक्तमर्पयितुं द्रुतम् ॥२४॥

अर्थ: इसलिए यह कोट तथा उत्तम भवनोंसे युक्त सुवर्णमयी लंका जबतक लक्ष्मणके बाणोंसे चूर नहीं की जाती है तबतक गम्भीर चित्तके धारक रामके लिए शीघ्र ही पतिव्रता राजपुत्री - सीताका सौंप देना सब लोगोंके कल्याणके लिए उचित है ॥२३-२४॥


नैषा सीता समानीता पित्रा तव कुबुद्धिना । रक्षोमोगिविलं लङ्कामेषानीता विषौषधिः ॥२५॥

अर्थ: तेरा दुर्बुद्धि पिता यह सीता नहीं लाया है किन्तु राक्षसरूपी सर्पोंके रहनेके लिए बिलस्वरूप इस लंका नगरीमें विषकी औषधि लाया है ॥२५॥


सुमित्रानन्दनं क्रुद्धं तं लक्ष्मीधरपुंगवम् । सिंहं रणमुखे शक्ता न यूयं व्यूहितुं गजाः ॥२६॥

अर्थ: लक्ष्मीधरोंमें श्रेष्ठ एवं क्रोधसे युक्त लक्ष्मण सिंहके समान है और तुम लोग हाथियोंके तुल्य हो अतः रणके अग्रभागमें उसे घेरनेके लिए तुम समर्थ नहीं हो ॥२६॥


अर्णवाह्वं धनुर्यस्य यस्यादित्यमुखाः शराः । पक्षे भामण्डलो यस्य स कथं जीयते जनैः ॥२७॥

अर्थ: जिसके पास सागरावर्त धनुष और आदित्यमुख बाण हैं तथा भामण्डल जिसके पक्षमें है वह तुम्हारे द्वारा कैसे जीता जा सकता है ? ॥२७॥


ये तस्य प्रणतास्तुङ्गाः खेचराणां महाधिपाः । महेन्द्रा मलयास्तीराः श्रीपर्वततनूरुहाः ॥२८॥

किष्किन्धास्त्रिपुरा रत्नद्वीपवेलन्धरालकाः । कैलीकिला खतिलका संध्याह्वाः हैहयास्तथा ॥२९॥

प्राग्भारदधिवक्त्राश्च तथान्ये सुमहाबलाः । विद्याविभवसंपन्नास्ते तु विद्याधरा न किम् ॥३०॥

अर्थ: जो महेन्द्र, मलय, तीर, श्रीपर्वत, किष्किन्धा, त्रिपुर, रत्नद्वीप, वेलन्धर, अलका, केलीकिल, गगनतिलक, सन्ध्या, हैहय, प्राग्भार तथा दधिमुख आदिके बड़े-बड़े अभिमानी राजा तथा विद्याविभवसे सम्पन्न अतिशय बलवान् अन्य नृपति उन्हें प्रणाम कर रहे हैं - उनसे जा मिले हैं, सो क्या वे विद्याधर नहीं हैं ॥२८-३०॥


एवं प्रवदमानं तं क्रोधप्रेरितमानसः । उत्खाय रावणः खड्गमुद्गतो हन्तुमुद्यतः ॥३१॥

अर्थ: इस प्रकार उच्च स्वरसे कहनेवाले विभीषणको मारनेके लिए उधर क्रोधसे भरा रावण तलवार उभारकर खड़ा हो गया ॥३१॥


तेनापि कोपवश्येन दृष्टान्तेनोपदेशने । उन्मूलितः प्रचण्डेन स्तम्भो वज्रमयो महान् ॥३२॥

अर्थ: और इधर उपदेश देनेके लिए जिसका दृष्टान्त दिया जाता था ऐसे महाबलवान् विभीषणने भी क्रोधके वशीभूत हो एक वज्रमयी बड़ा खम्भा उखाड़ लिया ॥३२॥


युद्धार्थमुद्गतावेतौ भ्रातरावुग्रतेजसौ । सचिवैर्वारितौ कृच्छ्राद्गतौ स्वं स्वं निवेशनम् ॥३३॥

अर्थ: युद्धके लिए उद्यत, उग्र तेजके धारक इन दोनों भाइयोंको मन्त्रियोंने बड़ी कठिनाईसे रोका । तदनन्तर रोके जानेपर वे अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥३३॥


कुम्भकर्णेन्द्रजिन्मुख्यैरेतैः प्रत्यायितस्ततः । जगाद रावणो बिभ्रन्मानसं पौरुषाशयम् ॥३४॥

आश्रयाश इव स्वस्य स्थानस्याहिततत्परः । दुरात्मा मत्पुरीतोऽयं परिनिःक्रामतु द्रुतम् ॥३५॥

अर्थ: तत्पश्चात् कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् आदि मुख्य-मुख्य आप्त जनोंने जिसे विश्वास दिलाया था ऐसा रावण कठोर चित्तको धारण करता हुआ बोला कि जो अग्निके समान अपने ही आश्रयका अहित करनेमें तत्पर है ऐसा यह दुष्ट शीघ्र ही मेरे नगरसे निकल जावे ॥३४-३५॥


अनर्थोद्यतचित्तेन स्थितेन किमिहामुना । स्वाङ्गेनापि न मे कृत्यं प्रतिकूलप्रवृत्तिना ॥३६॥

अर्थ: जिसका चित्त अनर्थ करनेमें उद्यत रहता है ऐसे इसके यहाँ रहनेसे क्या लाभ है ? मुझे तो विपरीत प्रवृत्ति करनेवाले अपने अंगसे भी कार्य नहीं है ॥३६॥


तिष्ठन्तमिह मृत्युं चेदेतकं न नयाम्यहम् । ततो रावण एवाहं न भवामि विसंशयम् ॥३७॥

अर्थ: यहाँ रहते हुए इसे यदि मैं मृत्युको प्राप्त न कराऊँ तो मैं रावण ही नहीं कहलाऊँ ॥३७॥


श्रीरत्नश्रवसः पुत्रः सोऽप्यहं न भवामि किम् । इत्युक्त्वा निर्ययौ मानी लङ्कातोऽथ विभीषणः ॥३८॥

अर्थ: अथानन्तर ‘क्या मैं भी रत्नश्रवाका पुत्र नहीं हूँ’ यह कहकर मानो विभीषण लंकासे निकल गया ॥३८॥


साग्राभिश्चारुशस्त्राभिः त्रिंशद्भिः परिवारितः । अक्षौहिणीभिरुद्युक्तो गन्तुं पद्मस्य संश्रयम् ॥३९॥

अर्थ: वह सुन्दर शस्त्रोंको धारण करनेवाली कुछ अधिक तीस अक्षौहिणी सेनाओंसे परिवृत हो रामके समीप जानेके लिए उद्यत हुआ ॥३९॥


विद्युद्घनेभवज्रेन्द्रप्रचण्डचपलाभिधाः । उद्गताशनिसंघाताः कालाद्याश्च महाबलाः ॥४०॥

शूराः परमसामन्ता विभीषणसमाश्रयाः । सान्तःपुराः ससर्वस्वा नानाशस्त्रविराजिताः ॥४१॥

अर्थ: विद्युद्घन, इभवज्र, इन्द्रप्रचण्ड, चपल, काल, महाकाल आदि जो बड़े-बड़े शूरवीर सामन्त विभीषणके आश्रयमें रहनेवाले थे वे वज्रमय शस्त्र उभारकर अपने-अपने अन्तःपुर और सारभूत श्रेष्ठ धन लेकर नाना शस्त्रोंसे सुशोभित होते हुए चल पड़े ॥४०-४१॥


व्रजन्तो वाहनैश्चित्रैश्छादयित्वा नमस्तलम् । परिच्छदसमायुक्ताः हंसद्वीपं समागताः ॥४२॥

अर्थ: नाना प्रकारके वाहनोंसे आकाशको आच्छादित कर अपने परिवारके साथ जाते हुए वे हंसद्वीपमें पहुँचे ॥४२॥


द्वीपस्य तस्य पर्यन्ते सुमनोज्ञे ततस्तटे । ते सरिच्चुम्बिते तस्थुः सुरा नन्दीश्वरे यथा ॥४३॥

अर्थ: और नदियोंसे सुशोभित उस द्वीपके सुन्दर तटपर इस प्रकार ठहर गये जिस प्रकार कि देव नन्दीश्वर द्वीपमें ठहरते हैं ॥४३॥


विभीषणागमे जाते जातो वानरिणां महान् । हिमागमे दरिद्राणामिवाकम्पः समन्ततः ॥४४॥

अर्थ: जिस प्रकार शीतकालके आनेपर दरिद्रोंके शरीरमें सब ओरसे कँपकँपी छूटने लगती है उसी प्रकार विभीषण-का आगमन होते ही वानरोंके शरीरमें सब ओरसे कँपकँपी छूटने लगी ॥४४॥


समुद्रावर्तभृत्सूर्यहासं लक्ष्मीभृदैक्षत । वज्रावर्तं धनुः पद्मः परामृशदुदादरः ॥४५॥

अर्थ: सागरावर्त धनुषको धारण करनेवाले लक्ष्मणने सूर्यहास खड्गकी ओर देखा तथा उत्कृष्ट आदर धारण करनेवाले रामने वज्रावर्त धनुषका स्पर्श किया ॥४५॥


अमन्त्रयन्त सभूय मन्त्रिणः स्वैरमाकुलाः । सिंहादैभमिव त्रस्तं वृन्दबन्धमगाद् बलम् ॥४६॥

अर्थ: घबड़ाये हुए मन्त्री एकत्रित हो इच्छानुसार मन्त्रणा करने लगे तथा जिस प्रकार सिंहसे भयभीत होकर हाथियोंकी सेना झुण्डके रूपमें एकत्रित हो जाती है उसी प्रकार वानरोंकी समस्त सेना भयभीत हो झुण्डके रूपमें एकत्रित होने लगी ॥४६॥


युवा विभीषणेनाथ दण्डपाणिर्विचक्षणः । प्रेषितः पद्मनाथस्य सकाशं मधुराक्षरः ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणने अपना बुद्धिमान् एवं मधुरभाषी द्वारपाल रामके पास भेजा ॥४७॥


समायामुपविष्टोऽसौ कृतप्रणतिराहृतः । निजगादानुपूर्वेण विरोधं भ्रातृसंभवम् ॥४८॥

अर्थ: बुलाये जानेपर वह सभामें गया और प्रणाम कर बैठ गया । तदनन्तर उसने यथाक्रमसे दोनों भाइयोंके विरोधकी बात कही ॥४८॥


इति चावेदयन्नाथ तव पद्म विभीषणः । पादौ विज्ञापयत्येवं धर्मकार्यसमुद्यतः ॥४९॥

भवन्तं शरणं भक्तः प्राप्तोऽहं श्रितवत्सल । आज्ञादानेन मे तस्मात्प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥५०॥

अर्थ: तत्पश्चात् यह कहा कि हे नाथ ! हे पद्म ! सदा धर्म कार्यमें उद्यत रहनेवाला विभीषण आपके चरणोंमें इस प्रकार निवेदन करता है कि हे आश्रितवत्सल ! मैं भक्तिसे युक्त हो आपकी शरणमें आया हूँ, सो आप आज्ञा देकर मुझे कृतकृत्य कीजिए ॥४९-५०॥


प्रदेशान्तरमेतस्मिन् प्रतीहारेण भाषिते । संमन्त्रो मन्त्रिभिः सार्द्धं पद्मस्यैवमजायत ॥५१॥

अर्थ: इस प्रकार जब द्वारपालने कहा तब रामके निकटस्थ मन्त्रियोंके साथ इस तरह उत्तम सलाह हुई ॥५१॥


मतिकान्तोऽब्रवीत्पद्मं कदाचिच्छद्मनैषकः । प्रेषितः स्याद्दशास्येन विचित्रं हि नृपेहितम् ॥५२॥

अर्थ: मतिकान्त मन्त्रीने कहा कि कदाचित् रावणने छलसे इसे भेजा हो क्योंकि राजाओंकी चेष्टा विचित्र होती है ॥५२॥


परस्पराभिघाताद्वा कलुषत्वमुपागतम् । प्रसादं पुनरप्येति कुलं जलमिव ध्रुवम् ॥५३॥

अर्थ: अथवा परस्परके विरोधसे कलुषताको प्राप्त हुआ कुल, जलकी तरह निश्चित ही फिरसे प्रसाद ( पक्षमें स्वच्छता ) को प्राप्त हो जाता है ॥५३॥


ततो मतिसमुद्रेण जगदे मतिशालिना । विरोधो हि तयोर्जातः श्रूयते जनवक्त्रतः ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर बुद्धिशाली मतिसागर नामक मन्त्रीने कहा कि लोगोंके मुखसे यह तो सुना है कि इन दोनों भाइयोंमें विरोध हो गया है ॥५४॥


धर्मपक्षो महानीतिः शास्त्राम्बुक्षालिताशयः । अनुग्रहपरो नित्यं श्रूयते हि विभीषणः ॥५५॥

अर्थ: सुना जाता है कि विभीषण धर्मका पक्ष ग्रहण करनेवाला है, महानीतिमान् है, शास्त्ररूपी जलसे उसका अभिप्राय धुला हुआ है और निरन्तर अनुग्रह - उपकार करनेमें तत्पर रहता है ॥५५॥


सौदर्यकारणं नात्र कर्महेतुः पृथक् पृथक् । सततं तत्प्रभावेण स्थिता जगति चित्रता ॥५६॥

अर्थ: इसमें भाईपना कारण नहीं है किन्तु अपना पृथक्-पृथक् कर्म ही कारण है । कर्मके प्रभावसे ही संसारमें यह विचित्रता स्थित है ॥५६॥


प्रकृतेऽस्मिन् त्वमाख्यानं श्रुतौ कुरुत नैषिके । गिरिगोभूतिनामानावभूतां वटुकौ किल ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकरणमें तुम एक कथा सुनो - नैषिक नामक ग्राममें गिरि और गोभूति नामक दो ब्राह्मणोंके बालक थे ॥५७॥


तस्मिंश्च सूर्यदेवस्य राज्ञो नाम्ना मतिप्रिया । अददाद् व्रतकं ताभ्यामिदं सुकृतवाञ्छया ॥५८॥

ओदनच्छादिते हेमपूर्णे पृथुकपालिके । गिरिः सुवर्णमालोक्य लोभादितरमक्षिणोत् ॥५९॥

अर्थ: उसी ग्राममें राजा सूर्यदेवकी रानी मतिप्रियाने पुण्यकी इच्छासे एक व्रतके रूपमें उन दोनों बालकोंके लिए मिट्टीके बड़े-बड़े कपालोंमें स्वर्ण रखकर तथा ऊपरसे भात ढककर दान दिया । उन दोनों बालकोंमें से गिरि नामक बालकने देख लिया कि इन कपालोंमें स्वर्ण है तब उसने स्वर्णके लोभसे दूसरे बालकको मार डाला और उसका स्वर्ण ले लिया ॥५८-५९॥


अन्यच्च खलु कौशम्ब्यां वणिग्नाम्ना बृहद्घनः । तद्भार्या कुरुविन्दाख्या तस्य पुत्रौ बभूवतुः ॥६०॥

अहिदेवमहीदेवौ तौ मृते जनके गतौ । सुधनौ यानपात्रेण विमवच्छेदभीरुकौ ॥६१॥

सर्वभाण्डेन तौ रत्नमेकमानयतां परम् । यस्य तज्जायते हस्ते स जिघांसति हीतरम् ॥६२॥

अर्थ: दूसरी कथा यह है कि कौशाम्बी नामा नगरीमें एक बृहद्घन नामका वणिक् रहता था । कुरुविन्दा उसकी स्त्रीका नाम था और उससे उसके अहिदेव और महीदेव नामके दो पुत्र हुए थे । जब उन पुत्रोंका पिता मर गया तब वे जहाजमें बैठकर कहीं गये । ‘सूनेमें कोई धन चुरा न ले’ इस भयसे वे अपना सारभूत धन साथ ले गये थे । वहाँ सब बर्तन आदि बेचकर वे एक उत्तम रत्न लाये । वह रत्न दोनों भाइयोंमेंसे जिसके हाथमें जाता था वह दूसरे भाईको मारनेकी इच्छा करने लगता था ॥६०-६२॥


परस्परं च दुश्चिन्तां तौ विवेद्य समं गतौ । मात्रे चानीय तद्रत्नं विरागाभ्यां समर्पितम् ॥६३॥

अर्थ: दोनों भाई अपने खोटे विचार एक दूसरेको बताकर साथ-ही-साथ घर आये और दोनोंने विरक्त होकर वह रत्न माताके लिए दे दिया ॥६३॥


माता विषेण तौ हन्तुमैच्छद्बोधमिता पुनः । कालिन्द्यां तैर्विरक्तैस्तद्रत्नं क्षिप्तं झषोऽगिलत् ॥६४॥

अर्थ: माताने भी विष देकर पहले उन दोनों पुत्रोंको मारनेकी इच्छा की परन्तु पीछे चलकर वह ज्ञानको प्राप्त हो गयी । तदनन्तर माता और दोनों पुत्रोंने विरक्त होकर वह रत्न यमुना नदीमें फेंक दिया जिसे एक मच्छने निगल लिया ॥६४॥


आनायिकगृहीतोऽसौ विक्रीतस्तद्गृहे पुनः । ततस्तयोः स्वसा मत्स्यं छिन्दाना रत्नमैक्षत ॥६५॥

अर्थ: उस मच्छको एक धीवर पकड़ लाया जो इन्हीं तीनोंके घर बेचा गया । तदनन्तर इनकी बहनने मच्छको काटते समय वह रत्न देखा ॥६५॥


मातरं भ्रातरौ चैषा विष्यान्कर्तुं ततोऽलषत् । लोभमोहप्रभावेण स्नेहाच्च शममागता ॥६६॥

अर्थ: सो लोभ और मोहके प्रभावसे वह माता तथा दोनों भाइयोंको विष देकर मारनेकी इच्छा करने लगी, परन्तु स्नेहवश पीछे शान्त हो गयी ॥६६॥


ग्राव्णा निश्चूर्ण्य तद्रत्नं ज्ञाताकूताः परस्परम् । संसारमावनिर्विण्णाः समस्तास्ते प्रवव्रजुः ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर परस्पर एक दूसरेका अभिप्राय जानकर उन्होंने उस रत्नको पत्थरसे चूर-चूरकर फेंक दिया और उसके बाद संसारकी दशासे विरक्त हो सभी ने दीक्षा धारण कर ली ॥६७॥


तस्माद्द्रव्यादिलोभेन भ्रात्रादीनामपि स्फुटम् । संसारे जायते वैरं यौनबन्धो न कारणम् ॥६८॥

अर्थ: इस कथासे यह स्पष्ट सिद्ध है कि द्रव्य आदिके लोभसे भाई आदिके बीच भी संसारमें वैर होता है इसमें योनि सम्बन्ध कारण नहीं है ॥६८॥


दृश्यते वैरमेतस्मिन् दैवयोगात् पुनः शमः । गोभूतिः सोदरो लोभाद्गिरिणा हत एव सः ॥६९॥

अर्थ: इस कथामें वैर दिखाई तो दिया है परन्तु दैवयोगसे पुनः शान्त होता गया है और पूर्व कथामें गिरिने अपने सगे भाई गोभूतिको मार ही डाला है ॥६९॥


तस्मात्प्रेषितदूतोऽयं महाबुद्धिविभीषणः । आनीयतां न योनीयदृष्टान्तोऽत्र परिस्फुटः ॥७०॥

अर्थ: इसलिए दूत भेजनेवाले इस महाबुद्धिमान् विभीषणको बुलाया जाय । इसके विषयमें योनि सम्बन्धी दृष्टान्त स्पष्ट नहीं होता अर्थात् एक योनिसे उत्पन्न होनेके कारण जिस प्रकार रावण दुष्ट है उसी प्रकार विभीषणको भी दुष्ट होना चाहिए यह बात नहीं है ॥७०॥


ततो दण्डिनमाहूय जगुरेत्विति तेन च । गत्वा निवेदिते प्राप्तो पद्मं रत्नश्रवःसुतः ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर द्वारपालको बुलाकर सबने कहा कि विभीषण आवे । तत्पश्चात् द्वारपालके द्वारा जाकर खबर दी जानेपर विभीषण रामके पास आया ॥७१॥


ऊचे विभीषणो नत्वा प्रभुः स्वमिह जन्मनि । परत्र जिननाथश्च ममायं निश्चयः प्रभो ॥७२॥

अर्थ: उसने आते ही प्रणामकर कहा कि हे प्रभो ! मेरा यह निश्चय है कि इस जन्ममें आप मेरे स्वामी हैं और पर जन्ममें भी श्री जिनेन्द्र देव ॥७२॥


समये हि कृते तेन प्रोचे रामो विसंशयम् । योजयामि स्वकं लङ्कां भव संदेहवर्जितः ॥७३॥

अर्थ: जब विभीषण निश्छलताकी शपथ कर चुका तब रामने संशय रहित होकर कहा कि तुम्हें लंकाका राजा बनाऊँगा, सन्देह रहित होओ ॥७३॥


विभीषणसमायोगे वर्त्तते यावदुत्सवः । तावत्सिद्धमहाविद्यः प्राप्तः पुष्पवतीसुतः ॥७४॥

अर्थ: इधर विभीषणका समागम होनेसे जब तक उत्सव मनाया जा रहा था तब तक उधर अनेक महाविद्याओंको सिद्ध करनेवाला पुष्पवतीका पुत्र भामण्डल आ पहुँचा ॥७४॥


प्रभामण्डलमायातं विजयार्द्धखगाधिपम् । पद्मादयः परं दृष्ट्वा समानर्चुः प्रभाविणम् ॥७५॥

अर्थ: विजयार्धके अधिपति, परम प्रभावशाली भामण्डल को आया देख राम आदिने उसका अत्यधिक सन्मान किया ॥७५॥


निर्वाह्य दिवसानष्टौ नगरे हंसनामनि । सम्यग्निश्चितकर्तव्या लङ्काभिमुखमव्रजन् ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर उस हंस नामक नगरमें आठ दिन बिताकर और अपने कर्तव्यका अच्छी तरह निश्चितकर सबने लंकाकी ओर प्रयाण किया ॥७६॥


स्यन्दनैर्विविधैर्यानैः स्थूरीपृष्ठैर्मरुज्जवैः । प्रावृषेण्यघनच्छायैरनेकपकदम्बकैः ॥७७॥

अनुरागोत्कटैर्भृत्यैः वीरैः सन्नाहभूषणैः । ययुः खेचरसामन्ताः समन्ताच्छन्नपुष्कराः ॥७८॥

अर्थ: अथानन्तर रथों, नाना प्रकारके वाहनों, वायुके समान वेगशाली घोड़ों, वर्षाकालीन मेघोंके समान कान्तिवाले हाथियोंके समूहों, अनुरागसे भरे भृत्यों और कवचरूपी आभूषणोंसे विभूषित वीर योद्धाओंके द्वारा जिन्होंने आकाशको सब ओरसे आच्छादित कर लिया था ऐसे विद्याधर राजा बड़े उत्साहसे आ रहे थे ॥७७-७८॥


अग्रप्रयाणकन्यस्ताः प्रवीराः कपिकेतवः । संग्रामधरणीं प्रापुस्तद्योग्यत्वमुदाहृतम् ॥७९॥

अर्थ: वे सबके आगे चलनेवाले अत्यन्त वीर वानरवंशी राजा युद्धकी भूमिमें सबसे पहले जा पहुँचे सो यह उनके लिए उचित ही था ॥७९॥


विंशतिर्योजनान्यस्या रुन्द्रतापरिकीर्तिता । आयामस्य तु नैवास्ति परिच्छेदो रणक्षितेः ॥८०॥

अर्थ: इस रणभूमिकी चौड़ाई बीस योजन थी और लम्बाईका कुछ परिमाण ही नहीं था ॥८०॥


नानायुधविचिह्नानां सहस्रैरुपलक्षिता । मृत्युचङ्क्रमणक्ष्मेव समवर्त्तत युद्धभूः ॥८१॥

अर्थ: नाना प्रकार शस्त्र और विविध चिह्नोंको धारण करनेवाले हजारों योद्धाओंसे सहित वह युद्धकी भूमि मृत्युकी संसार भूमिके समान जान पड़ती थी ॥८१॥


ततो नागाश्वसिंहानां दुन्दुभीनां च निःस्वनम् । श्रुत्वा हर्षं दशास्योऽगाच्चिरागतरणोत्सवः ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे चिरकाल बाद उत्सव प्राप्त हुआ था ऐसा रावण हाथी, घोड़े, सिंह और दुन्दुभियोंका शब्द सुन परम हर्षको प्राप्त हुआ ॥८२॥


आज्ञादानेन चाशेषान् सामन्तान्समबीभवत् । नहि ते वञ्चितास्तेन युद्धानन्देन जातुचित् ॥८३॥

अर्थ: उसने आज्ञा देकर समस्त सामन्तोंका आदर किया सो ठीक ही है क्योंकि उसने उन्हें युद्धके आनन्दसे कभी वंचित नहीं किया था ॥८३॥


भास्कराभाः पयोदाह्वाः काञ्चना व्योमवल्लभाः । गन्धर्वगीतनगराः कम्पनाः शिवमन्दिराः ॥८४॥

सूर्योदयामृताभिख्याः शोभासिंहपुराभिधाः । नृत्यगीतपुरालक्ष्मीकिन्नरस्वनसंज्ञकाः ॥८५॥

बहुनादा महाशैलाश्चक्राह्वाः सुरनूपुराः । श्रीमन्तो मलयानन्दाः श्रीगुहा श्रीमनोहराः ॥८६॥

रिपुञ्जयाः शशिस्थानाः मार्तण्डाभविशालकाः । ज्योतिर्दण्डाः परिक्षोदा अश्वरत्नपराजयाः ॥८७॥

एवमाद्याः पुराभिख्याः महाखेचरपार्थिवाः । सचिवैरन्विताः प्रीता दशाननमुपागताः ॥८८॥

अर्थ: सूर्याभपुर, मेघपुर, कांचनपुर, गगनवल्लभपुर, गन्धर्वगीतनगर, कम्पनपुर, शिवमन्दिरपुर, सूर्योदयपुर, अमृत, शोभापुर, सिंहपुर, नृत्यगीतपुर, लक्ष्मीगीतपुर, किन्नरगीतपुर, बहुनादपुर, महाशैलपुर, चक्रपुर, सुरनूपुर, श्रीमन्तपुर, मलयानन्दपुर, श्रीगुहापुर, श्रीमनोहरपुर, रिपुंजयपुर, शशिस्थानपुर, मार्तण्डाभपुर, विशालपुर, ज्योतिर्दण्डपुर, परिक्षोदपुर, अश्वपुर, रत्नपुर और पराजयपुर आदि अनेक नगरोंके बड़े-बड़े विद्याधर राजा, प्रसन्न हो, अपने-अपने मन्त्रियोंके साथ रावणके समीप आ गये ॥८४-८८॥


अस्त्रवाहनसंनाहप्रभृतिप्रतिपत्तिभिः । रावणोऽपूजयद्भूपान् सुत्रामा त्रिदशानिव ॥८९॥

अर्थ: रावणने अस्त्र, वाहन तथा कवच आदि देकर उन सब राजाओंका उस तरह सम्मान किया जिस तरह कि इन्द्र देवोंका सम्मान करता है ॥८९॥


अक्षौहिणीसहस्राणि चत्वारि त्रिककुप् प्रभोः । स्वशक्तिजनितं प्रोक्तं बलस्य प्रमितं बुधैः ॥९०॥

अर्थ: विद्वानोंने रावणकी सेनाका प्रमाण चार हजार अक्षौहिणी दल बतलाया है। उनका यह दल अपनी सामर्थ्यसे परिपूर्ण था ॥९०॥


एकमक्षौहिणीनां तु किष्किन्धनगरप्रभोः । सहस्रं साग्रमेकं तु भामण्डलविभोरपि ॥९१॥

अर्थ: किष्किन्धनगरके राजा सुग्रीवकी सेनाका प्रमाण एक हजार अक्षौहिणी और भामण्डलकी सेनाका प्रमाण कुछ अधिक एक हजार अक्षौहिणी दल था ॥९१॥


सुग्रीवः सचिवैः साकं तथा पुष्पवतीसुतः । आवृत्य परमोद्युक्तौ तस्थतुः पद्मलक्ष्मणौ ॥९२॥

अर्थ: परम उद्योगी सदा सावधान रहनेवाले सुग्रीव और भामण्डल, अपने-अपने मन्त्रियोंके साथ सदा राम-लक्ष्मणके समीप रहते थे ॥९२॥


अनेकगोत्रचरणा नानाजात्युपलक्षणाः । नानागुणक्रियाख्याता नानाशब्दा नभश्चराः ॥९३॥

अर्थ: उस समय युद्ध-भूमिमें नानावंश, नानाजातियाँ, नानागुण तथा नानाक्रियाओंसे प्रसिद्ध एवं नानाप्रकारके शब्दोंका उच्चारण करनेवाले विद्याधर एकत्रित हुए थे ॥९३॥


पुण्यानुभावेन महानराणां भवन्ति शत्रोरपि पार्थिवाः स्वाः । कुपुण्यभाजां तु चिरं सुशक्ता विनाशकाले परतां भजन्ते ॥९४॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! पुण्यके प्रभावसे महापुरुषोंके शत्रु राजा भी आत्मीय हो जाते हैं और पुण्यहीन मनुष्योंके चिरकालीन मित्र भी विनाशके समय पर हो जाते हैं ॥९४॥


भ्राता ममायं सुहृदेष वश्यो ममैष बन्धुः सुखदः सदेति । संसारवैचित्र्यविदा नरेण नैतन्मनीषारविणा विचिन्त्या ॥९५॥

अर्थ: यह मेरा भाई है, यह मेरा मित्र है, यह मेरे अधीन है, यह मेरा बन्धु है और यह मेरा सदा सुख देनेवाला है, इस प्रकार बुद्धिरूपी सूर्यसे सहित तथा संसारकी विचित्रताको जाननेवाले मनुष्यको कभी नहीं विचारना चाहिए ॥९५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे विभीषणसमागमाभिधानं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें विभीषणके समागमका वर्णन करनेवाला पचपनवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥५५॥


५६. षट्पञ्चाशत्तमं पर्व (उभयबलप्रमाणविधानं)

मगधेन्द्रस्ततोऽपृच्छत् पुनरेवं गणेश्वरम् । अक्षौहिण्याः प्रमाणं मे वक्तुमर्हसि संमुने ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर मगधपति राजा श्रेणिकने गौतम गणधरसे इस प्रकार पूछा कि हे सन्मुने ! मेरे लिए अक्षौहिणीका प्रमाण कहिए ॥१॥


शक्रभूतिरथागादीच्छृणु श्रेणिक पार्थिव । अक्षौहिण्याः प्रमाणं ते संक्षेपेण वदाम्यहम् ॥२॥

अर्थ: इसके उत्तरमें इन्द्रभूति - गौतम गणधरने कहा कि हे राजन् श्रेणिक ! सुन, मैं तेरे लिए संक्षेपसे अक्षौहिणी प्रमाण कहता हूँ ॥२॥


अष्टाविमे गताः ख्यातिं प्रकारा गणनाकृताः । चतुर्णां भेदमङ्गानां कीर्त्यमानं विबोध्यताम् ॥३॥

अर्थ: हाथी, घोड़ा, रथ और पयादे ये सेनाके चार अंग कहे गये हैं । इनकी गणना करनेके लिए नीचे लिखे आठ भेद प्रसिद्ध हैं ॥३॥


पत्तिः प्रथमभेदोऽत्र तथा सेना प्रकीर्तिता । सेनामुखं ततो गुल्मं वाहिनी पृतना चमूः ॥४॥

अष्टमोऽनीकिनीसंज्ञस्तत्र भेदो बुधैः स्मृतः । यथा भवन्त्यमी भेदास्तथेदानीं वदामि ते ॥५॥

अर्थ: प्रथम भेद पत्ति, दूसरा सेना, तीसरा सेनामुख, चौथा गुल्म, पाँचवाँ वाहिनी, छठा पृतना, सातवाँ चमू और आठवाँ अनीकिनी । अब उक्त चार अंगोंमें ये जिस प्रकार होते हैं उनका कथन करता हूँ ॥४-५॥


एको रथो गजश्चैकस्तथा पञ्च पदातयः । त्रयस्तुरङ्गमाः सैषा पत्तिरित्यभिधीयते ॥६॥

अर्थ: जिसमें एक रथ, एक हाथी, पाँच पयादे और तीन घोड़े होते हैं वह पत्ति कहलाता है ॥६॥


पत्तिस्त्रिगुणिता सेना तिस्रः सेनामुखं च ताः । सेनामुखानि च त्रीणि गुल्ममित्यनुकीर्त्यते ॥७॥

अर्थ: तीन पत्तिकी एक सेना होती है, तीन सेनाओंका एक सेनामुख होता है, तीन सेनामुखोंका एक गुल्म कहलाता है ॥७॥


वाहिनी त्रीणि गुल्मानि पृतना वाहिनीत्रयम् । चमूस्त्रिपृतना ज्ञेया चमूत्रयमनीकिनी ॥८॥

अर्थ: तीन गुल्मोंकी एक वाहिनी होती है, तीन वाहिनियोंकी एक पृतना होती है, तीन पृतनाओंकी एक चमू होती है और तीन चमूकी एक अनीकिनी होती है ॥८॥


अनीकिन्यो दश प्रोक्ता प्राज्ञैरक्षौहिणीति सा । तत्राङ्गानां पृथक् संख्यां चतुर्णां कथयामि ते ॥९॥

अर्थ: विद्वानोंने दस अनीकिनीकी एक अक्षौहिणी कही है । हे श्रेणिक ! अब मैं तेरे लिए अक्षौहिणीके चारों अंगोंकी पृथक्-पृथक् संख्या कहता हूँ ॥९॥


अक्षौहिण्यां प्रकीर्त्यानि रथानां सूर्यवर्चसाम् । एकविंशतिसंख्यानि सहस्राणि विचक्षणैः ॥१०॥

अष्टौ शतानि सप्तत्या सहितान्यपराणि च । गजानां कथितं ज्ञेयं संख्यानं रथसंख्यया ॥११॥

अर्थ: विद्वानोंने एक अक्षौहिणीमें सूर्यके समान देदीप्यमान रथों की संख्या इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर बतलायी है । हाथियोंकी संख्या रथोंकी संख्याके समान जानना चाहिए ॥१०-११॥


एकलक्षं सहस्राणि नव, पञ्चाशदन्वितम् । शतत्रयं च विज्ञेयमक्षौहिण्याः पदातयः ॥१२॥

पञ्चषष्टिसहस्राणि षट्शती च दशोत्तरा । अक्षौहिण्यामियं संख्या वाजिनां परिकीर्तिता ॥१३॥

अर्थ: पदाति एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास होते हैं और घोड़ोंकी संख्या पैंसठ हजार छह सौ दस कही गयी है ॥१२-१३॥


एवं संख्यबलोपेतं विज्ञायापि दशाननम् । बलं कैष्किन्धमभ्यार तं भयेन विवर्जितम् ॥१४॥

अर्थ: इस प्रकार चार हजार अक्षौहिणी रावणके पास थीं । सो इस प्रकारकी सेना से सहित रावणको अतिशय बलवान् जानकर भी किष्किन्धपति - सुग्रीवकी सेना निर्भय होकर रावणके सम्मुख चली ॥१४॥


तस्मिन्नासन्नतां प्राप्ते पद्मनाभप्रभोर्बले । जनानामित्यभूद्वाणी नानापक्षगतात्मनाम् ॥१५॥

अर्थ: जब रामकी सेना निकट आयी तब नाना पक्षमें विभक्त लोगोंमें इस प्रकारकी चर्चा होने लगी ॥१५॥


पश्यताम्बरयानोडुगणेशः शास्त्रधीकरः । दशास्यचन्द्रमाश्छन्नः परस्त्रीच्छाबलाहकैः ॥१६॥

अर्थ: कोई कहता था कि देखो जो विद्याधररूपी नक्षत्रोंके समूहका स्वामी है और जो शास्त्र-ज्ञानरूपी किरणोंसे सहित है ऐसा यह रावणरूपी चन्द्रमा परनारीकी इच्छारूपी मेघोंसे आच्छादित हो रहा है ॥१६॥


अष्टादश सहस्राणि पत्नीनां यस्य सुत्विषाम् । सीतायाः पश्यतैकस्याः कृते तं शोकशल्यितम् ॥१७॥

अर्थ: जिसकी उत्तम कान्तिको धारण करनेवाली अठारह हजार स्त्रियाँ हैं वह एक सीताके लिए देखो शोकसे शल्ययुक्त हो रहा है ॥१७॥


रक्षसां वानराणां च कस्य नाम क्षयो भवेत् । एवं बभूव संदेहः सैन्यद्वितयवर्तिनाम् ॥१८॥

अर्थ: देखें राक्षसों और वानरोंमें-से किसका क्षय होता है ? इस प्रकार दोनों सेनाओंके लोगोंको सन्देह हो रहा था ॥१८॥


बलेऽस्मिन्मारदेशीयो मारुतिर्नाम भीषणः । विस्फुरच्छौर्यतिग्मांशुः सूर्यतुल्योऽत्र शक्रजित् ॥१९॥

अर्थ: उधर वानरोंकी सेनामें कामदेवके समान जो हनुमान् है वह अत्यन्त भयंकर है, उसका शौर्यरूपी सूर्य अतिशय देदीप्यमान हो रहा है और इधर राक्षसोंकी सेनामें इन्द्रजित् सूर्यके समान है ॥१९॥


सागरोदारमत्युग्रं साक्षादितिबलोपमम् । साधनं रावणस्येति नराः केचिद् बभाषिरे ॥२०॥

अर्थ: कोई कह रहे थे कि रावणकी यह सेना समुद्रके समान विशाल, अत्यन्त उग्र तथा साक्षात् दैत्योंकी सेनाके समान है ॥२०॥


अन्तरं वित्थ शूरस्याशूरस्य च न जातुचित् । न तज्ज्ञातमतिक्रान्तं किं न वो धीरबोधनम् ॥२१॥

अर्थ: क्या तुम कभी शूर-वीर और अशूर-वीरका अन्तर नहीं जानते ? क्या तुम्हें पिछली बात याद नहीं है ? और क्या तुम सबको धीर-वीर मनुष्यकी पहचान नहीं है ? ॥२१॥


यद्वृत्तं दण्डकाख्यस्य वनस्य महतोऽन्तरे । अत्यन्तदारुणं युद्धं लक्ष्मणस्य महात्मनः ॥२२॥

चन्द्रोदरसुतं प्राप्य तुल्यं स्वाङ्गेन केवलम् । मृत्योरातिथ्यमानीतो येनासौ खरदूषणः ॥२३॥

अतिप्रकटवीर्यस्य लक्ष्मीनिलयवक्षसः । भवतां तस्य न ज्ञातं किं वा बलमनुत्तमम् ॥२४॥

अर्थ: कोई कह रहे थे कि विशाल दण्डकवनके मध्यमें महाबलवान् लक्ष्मणका जो युद्ध हुआ था और उसमें केवल अपने शरीरके तुल्य चन्द्रोदरके पुत्र - विराधितको पाकर उसने खरदूषणको यमका अतिथि बना दिया था । इस प्रकार अत्यन्त प्रकट पराक्रमके धारक लक्ष्मणका उत्कृष्ट बल क्या आप लोगोंको विदित नहीं है ? ॥२२-२४॥


एकेन वायुपुत्रेण निर्भर्त्स्यं मयसंभवाम् । रामपत्नीं समाश्वास्य परार्थासक्तवृत्तिना ॥२५॥

रावणस्य महासैन्यं विजित्यात्यन्तदारुणम् । लङ्कापुरी परिध्वस्ता भग्नप्राकारतोरणा ॥२६॥

अर्थ: कोई कह रहा था कि उस समय परहितमें लगे हुए अकेले हनुमान्ने मन्दोदरीको डाँटकर तथा सीताको सान्त्वना देकर रावणकी अत्यन्त उग्र सेना जीत ली थी तथा जिसके कोट और तोरण तोड़ दिये गये थे ऐसी लंकाको क्षत-विक्षत कर दिया था ॥२५-२६॥


एवं विदिततत्त्वानां स्फुटं वचसि निर्गते । जगाद प्रहसन् वाक्यं सुवक्त्रो गर्वनिर्भरः ॥२७॥

अर्थ: इस प्रकार तत्त्वज्ञ मनुष्योंके स्पष्ट वचन निकलनेपर गर्वसे भरा सुमुख राक्षस हँसता हुआ निम्न प्रकारके वचन बोला ॥२७॥


गोष्पदप्रमितं क्वैतद्बलं वानरलक्ष्मणाम् । क्व चैतत्सागरोदारं सैन्यं त्रैकूटमुद्धतम् ॥२८॥

अर्थ: वह कहने लगा कि वानर चिह्नको धारण करनेवाले वानर-वंशियोंकी यह गोखुरके समान तुच्छ सेना कहाँ ? और यह त्रिकूटवासियोंकी समुद्रके समान विशाल एवं उत्कट सेना कहाँ ? ॥२८॥


इन्द्रेण साधितो यो न पतिर्विद्याभृतामयम् । एकस्य चापिनः साध्यो रावणः किं नु जायते ॥२९॥

अर्थ: जो विद्याधरोंका अधिपति रावण इन्द्रके द्वारा भी वशमें नहीं किया जा सका वह एक धनुर्धारीके वश कैसे हो सकता है ? ॥२९॥


सर्वतेजस्विमूर्धानं विभोरस्याधितिष्ठतः । श्रोतुं नामापि कः शक्तश्चेतनश्चक्रवर्तिनः ॥३०॥

अर्थ: जो समस्त तेजस्वी मनुष्योंके मस्तकपर अधिष्ठित है अर्थात् समस्त प्रतापी मनुष्योंमें श्रेष्ठ है ऐसे ( अर्ध ) चक्रवर्ती रावणका नाम भी सुननेके लिए कौन समर्थ है ? ॥३०॥


सुपीवरभुजो वीरो दुर्द्धरस्त्रिदशैरपि । भुवने कस्य न ज्ञातः कुम्भकर्णो महाबलः ॥३१॥

अर्थ: जिसकी भुजाएँ अत्यन्त स्थूल हैं एवं जो देवोंके. द्वारा भी दुर्धर है - रोका नहीं जा सकता ऐसे महाबलवान् कुम्भकर्णको कौन नहीं जानता ? ॥३१॥


यस्त्रिशूलधरः संख्ये कालाग्निरिव दीप्यते । सोऽयं विजीयते केन जगदुत्कटविक्रमः ॥३२॥

अर्थ: जो त्रिशूलका धारक, युद्धमें प्रलयकालकी अग्निके समान देदीप्यमान होता है तथा जिसका पराक्रम संसारमें सबसे अधिक है ऐसा यह कुम्भकर्ण किसके द्वारा जीता जा सकता है ? ॥३२॥


यस्यातपत्रमालोक्य शरदिन्दुमिवोद्गतम् । शत्रुसैन्यतमोध्वंसमुपयाति समन्ततः ॥३३॥

उदात्ततेजसस्तस्य स्थातुं यस्याग्रतोऽपि कः । समर्थः पुरुषो लोके निजजीवितनिस्पृहः ॥३४॥

अर्थ: उदित हुए शरत्कालीन चन्द्रमाके समान जिसका छत्र देखकर शत्रुओंकी सेनारूपी अन्धकार सब ओरसे नष्ट हो जाता है उस प्रबल पराक्रमी कुम्भकर्णके सामने संसारमें ऐसा कौन समर्थ मनुष्य है जो अपने जीवनसे निःस्पृह हो खड़ा होनेके लिए भी समर्थ हो ॥३३-३४॥


इति बहुविधवाचां द्वेषरागाश्रितानां प्रकटितनिजचित्तप्रार्थनासंकटानाम् । द्वितयबलजनानां दृष्टनानाक्रियाणाम् अजनि जनितशङ्को भावमार्गो विचित्रः ॥३५॥

अर्थ: इस प्रकार जो नाना भाँतिके वचन बोल रहे थे, जो राग और द्वेषके आधार थे, जिन्होंने अपने मनोगत विचारोंके संकट प्रकट किये थे, तथा जिनकी नाना प्रकारकी क्रियाएँ देखी गयी थीं ऐसे उभयपक्षके लोगोंकी विचारधारा विचित्र एवं शंकाको उत्पन्न करनेवाली हुई थीं ॥३५॥


चरितजननकालाऽभ्यस्तरागेतराणां भवमपरमितानामप्ययं चित्तमार्गः । भवति खलु तथैव व्यक्तमेतं हि लोकं स्वचरितरविरेव प्रेरयत्यात्मकार्ये ॥३६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य संयम उत्पत्तिके योग्य समयमें भी रागी, द्वेषी बने रहते हैं अन्य भवमें पहुँच जानेपर भी उनका मनोमार्ग वास्तवमें वैसा ही रहा आता है - राग-द्वेषका अभ्यासी बना रहता है सो उचित ही है क्योंकि मनुष्यका अपना चारित्ररूपी सूर्य ही उसे आत्म-कार्यमें प्रेरित करता रहता है ॥३६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे उभयबलप्रमाणविधानं नाम षट्पञ्चाशत्तमं पर्व ॥५६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें राम और रावणकी सेनाओंके प्रयाणका कथन करनेवाला छप्पनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५६॥


५७. सप्तपञ्चाशत्तमं पर्व (रावणबलनिर्गमनं)

परसैन्यसमाश्लेषममृष्यन्तोऽथ मानवाः । उद्गच्छद्दर्पसंक्षोभ्या हृष्टाः संनद्धुमुद्यताः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर परचक्रके आक्रमणको नहीं सहन करनेवाले मनुष्य उठते हुए अहंकारसे क्षुभित हो हर्षपूर्वक कवच आदिक धारण करनेके लिए उद्यत हुए ॥१॥


उद्वेष्ट्य दयिताबाहुपाशं कृच्छ्रेण केचन । संक्षुभ्य सिंहसंकाशा लङ्कातो निर्ययुर्भटाः ॥२॥

अर्थ: सिंहकी समानता करनेवाले कितने ही शूर-वीर योद्धा गलेमें पड़े हुए प्राणवल्लभाके बाहुपाशको बड़ी कठिनाईसे दूर कर क्षुभित हो लंकासे बाहर निकल आये ॥२॥


वीरपत्नी प्रियं काचिदालिङ्ग्यैवमभाषत । श्रुतानेकमहायोधपरमाहवविभ्रमा ॥३॥

अर्थ: जिसने महायुद्धमें अनेक बड़े-बड़े योद्धाओंकी चेष्टाओंका वर्णन सुन रखा था, ऐसी किसी वीरपत्नीने पतिका आलिंगन कर इस प्रकार कहा कि ॥३॥


संपराये विक्षतः पृष्ठे यदि नाथागमिष्यसि । दुर्यशस्तदहं प्राणान् मोक्ष्यामि श्रुतिमात्रतः ॥४॥

अर्थ: हे नाथ ! यदि संग्रामसे घायल होकर पीछे आओगे तो बड़ा अपयश होगा और उसके सुनने मात्रसे ही मैं प्राण छोड़ दूँगी ॥४॥


किङ्कराणामतः पत्न्यो वीराणामतिगर्विताः । धिक्शब्दं मे प्रदास्यन्ति किं नु कष्टमतः परम् ॥५॥

अर्थ: क्योंकि ऐसा होनेसे वीर किंकरोंकी गर्वीली पत्नियाँ मुझे धिक्कार देंगी । इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या होगी ? ॥५॥


रणप्रत्यागतं धीरमुरोव्रणविभूषणम् । विशीर्णकवचं प्राप्तजयलब्धभटस्तवम् ॥६॥

द्रक्ष्यामि यदि धन्याहं भवन्तमविकत्थनम् । जिनेन्द्रानर्चयिष्यामि ततो जाम्बूनदाम्बुजैः ॥७॥

अर्थ: जिनके वक्षस्थलमें घाव आभूषणके समान सुशोभित हैं, जिनका कवच टूट गया है, प्राप्त हुई विजयसे योद्धागण जिनकी स्तुति कर रहे हैं, जो अतिशय धीर हैं तथा गम्भीरताके कारण जो अपनी प्रशंसा स्वयं नहीं कर रहे हैं ऐसे आपको युद्धसे लौटा हुआ यदि देखूँगी तो मैं सुवर्णमय कमलोंसे जिनेन्द्रदेवकी पूजा करूँगी ॥६-७॥


आभिमुख्यागतं मृत्युं वरं प्राप्ता महाभटाः । पराङ्मुखा न जीवन्तो धिक्शब्दमलिनीकृताः ॥८॥

अर्थ: महा-योद्धाओंका सम्मुखागत मृत्युको प्राप्त हो जाना अच्छा है किन्तु पराङ्मुखको धिक्कार शब्दसे मलिन जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥८॥


स्तनद्वयसमुत्पीडं काचिदालिङ्ग्य मानवम् ! जगाद पुनरेवं सा ग्रहीष्यामि जयान्वितम् ॥९॥

अर्थ: कोई स्त्री दोनों स्तनोंसे पतिका आलिंगन कर बोली कि जब आप विजयी हो लौटकर आवेंगे तब फिर ऐसा ही आलिंगन करूँगी ॥९॥


भवद्वक्षस्थलस्थानरक्तचन्दनचर्चया । परां स्तनद्वयं शोभां मम यास्यति सर्वथा ॥१०॥

अर्थ: आपके वक्षस्थल-के गाढ़े-गाढ़े रक्तरूपी चन्दनोंकी चर्चासे मेरे दोनों स्तन सब प्रकारसे परम शोभाको प्राप्त होंगे ॥१०॥


प्रातिवेश्मिकयोधानामपि पत्नीं जितप्रियाम् । न सहे कुत एवेश सहिष्ये त्वां विनिर्जितम् ॥११॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! जिसका पति हार जाता है ऐसी पड़ोसी योद्धाओंकी पत्नीको भी मैं सहन नहीं करती फिर हारे हुए आपको किस प्रकार सहन करूँगी ? ॥११॥


काचिज्जगाद ते नाथ हताशं व्रणभूषणम् । पुराणं रूढकं जातं ततो नैवातिशोभसे ॥१२॥

अर्थ: कोई स्त्री बोली कि हे नाथ ! आपका यह अभागा पुराना घावरूपी आभूषण रूढ़ हो गया है - पुरकर सूख गया है, इसलिए आप अधिक सुशोभित नहीं हो रहे हैं ॥१२॥


अतो नवव्रणन्यस्तस्तनमण्डलसौख्यदम् । द्रक्ष्येऽहं वीरपत्नीभिर्विकासिमुखपङ्कजा ॥१३॥

अर्थ: अब नूतन घावपर रखे हुए स्तनमण्डलको सुख पहुँचानेवाले आपको जब देखूँगी तो मेरा मुखकमल खिल उठेगा और वीर पत्नियाँ मुझे बड़े गौरवसे देखेंगी ॥१३॥


काचिदूचे यथैतत्ते वदनं चुम्बितं मया । यथा वक्षसि संजातं चुम्बिष्यामि व्रणाननम् ॥१४॥

अर्थ: कोई स्त्री बोली कि मैंने जिस प्रकार आपके इस मुखका चुम्बन किया है उसी प्रकार वक्षस्थलपर उत्पन्न हुए घावके मुखका चुम्बन करूँगी ॥१४॥


अनतिप्रौढिका काचिद्वधूरभिनवोढिका । संग्रामे प्रोद्यते नाथे प्रौढत्वं समुपागता ॥१५॥

अर्थ: कोई नवविवाहिता स्त्री यद्यपि प्रौढ़ नहीं थी तथापि पतिके युद्धके लिए उद्यत होनेपर प्रौढ़ताको प्राप्त हो गयी ॥१५॥


चिराय रक्षितं मानं काचिन्नाथे रणोन्मुखे । तत्याजैकपदे कान्ता कान्तसंश्लेषतत्परा ॥१६॥

अर्थ: कोई स्त्री चिरकालसे मानकी रक्षा करती बैठी थी परन्तु जब पति युद्धके सम्मुख हो गया तब उसने सब मान एक साथ छोड़ दिया और पतिका आलिंगन करनेमें तत्पर हो गयी ॥१६॥


अवितृप्तं मटी काचिद्भर्तृवक्त्रासवं पपौ । तथापि मदनप्राप्ता रणयोग्यमशिक्षयत् ॥१७॥

अर्थ: यद्यपि किसी योद्धाकी स्त्री पतिके मुखकी मदिरा पीती-पीती तृप्त नहीं हुई थी तथापि कामाकुलित हो उसने पतिके लिए रणके योग्य शिक्षा दी थी ॥१७॥


काचिदुत्तानितं भर्तुर्वदनं वनजेक्षणा । नैमिषोज्झितमद्राक्षीत् सुचिरं कृतचुम्बना ॥१८॥

अर्थ: कोई कमललोचना स्त्री पतिके ऊपर उठाये हुए मुखको टिमकाररहित नेत्रोंसे चिरकाल तक देखती रही और उसका चुम्बन करती रही ॥१८॥


काचिद्वक्षस्तटे भर्तुः करजव्रणमुज्ज्वलम् । भविष्यच्छस्त्रपातस्य सत्यंकारमिवार्पयत् ॥१९॥

अर्थ: किसी स्त्रीने पतिके वक्षःस्थलपर नखका उज्ज्वल घाव बना दिया मानो आगे चलकर जो शस्त्रपात होगा उसका बयाना ही दे दिया था ॥१९॥


इति संजातचेष्टासु दयितासु यथायथम् । भटानामित्यभूद्वाणी महासंग्रामशालिनाम् ॥२०॥

अर्थ: इस प्रकार जब स्त्रियोंमें नाना प्रकारकी चेष्टाएँ हो रही थीं तब महायुद्धसे सुशोभित योद्धाओंकी इस प्रकार वाणी प्रकट हुई ॥२०॥


नरास्ते दयिते श्लाघ्या ये गता रणमस्तकम् । त्यजन्त्यभिमुखा जीवं शत्रूणां लब्धकीर्तयः ॥२१॥

अर्थ: कोई बोला कि हे प्रिये ! वे मनुष्य प्रशंसनीय हैं जो रणाग्रभागमें जाकर शत्रुओंके समुख प्राण छोड़ते हैं तथा सुयश प्राप्त करते हैं ॥२१॥


उद्भिन्नदन्तिदन्ताग्रदोलादुर्ललितं भटाः । कुर्वन्ति न विना पुण्यैः शत्रुभिर्घोषितस्तवाः ॥२२॥

अर्थ: शत्रु भी जिनका विरद बखान रहे हैं, ऐसे योद्धा पुण्यके बिना मदोन्मत्त हाथियोंके दाँतोंके अग्रभागसे झूला नहीं झूल सकते ॥२२॥


गजदन्ताग्रभिन्नस्य कुम्भदारणकारिणः । यत्सुखं नरसिंहस्य तत् कः कथयितुं क्षमः ॥२३॥

अर्थ: हाथीदाँतके अग्रभागसे विदीर्ण तथा हाथीके गण्डस्थलको विदीर्ण करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्यको जो सुख होता है उसे कहनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२३॥


त्रस्तं शरणमायातं दत्तपृष्ठं च्युतायुधम् । परित्यज्य पतिष्यामो दयिते शत्रुमस्तके ॥२४॥

अर्थ: कोई कहने लगा कि हे प्रिये ! मैं भयभीत, शरणागत, पीठ दिखानेवाले एवं शस्त्र डाल देनेवाले पुरुषको छोड़ शत्रुके मस्तकपर टूट पड़ूँगा ॥२४॥


भवत्या वाञ्छितं कृत्वा प्रत्यागत्य रणाजिरात् । प्रार्थयिष्ये समाश्लेषं भवन्तीं तोषधारिणीम् ॥२५॥

अर्थ: कोई कहने लगा कि मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण कर तथा रणांगणसे लौटकर जब आपको सन्तुष्ट कर दूँगा तभी आपसे आलिंगनकी प्रार्थना करूँगा ॥२५॥


एवमादिभिरालापैः परिसान्त्व्य निजप्रियाः । धीरा निर्गन्तुमुद्युक्ताः संखयसौख्यसमुत्सुकाः ॥२६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकारके वार्तालापोंसे अपनी प्राण-वल्लभाओंको सान्त्वना देकर युद्धसम्बन्धी सुख प्राप्त करनेमें उत्सुक वीर मनुष्य घरोंसे बाहर निकलनेके लिए उद्यत हुए ॥२६॥


यियासोः शस्त्रहस्तस्य कण्ठार्पितभुजद्वया । काचिद्दोलायनं चक्रे गजेन्द्रस्येव पद्मिनी ॥२७॥

अर्थ: किसीका पति हाथमें शस्त्र लेकर जब जाने लगा तब वह उसके गलेमें दोनों भुजाएँ डालकर ऐसी झूल गयी मानो किसी गजराजके गलेमें कमलिनी ही झूल रही हो ॥२७॥


काचित्संनाहरुद्धस्य पत्युर्देहस्य संगमम् । अप्राप्य परमं प्राप्ता पीडामङ्कमपि श्रिता ॥२८॥

अर्थ: किसी स्त्रीके पतिने कवच पहन रखा था इसलिए उसके शरीरका संगम न प्राप्त होनेसे वह गोदमें स्थित होनेपर भी परम पीड़ाको प्राप्त हो रही थी ॥२८॥


अर्द्धबाहुलिकां दृष्ट्वा काचित्कान्तस्य वक्षसि । ईर्ष्यारसेन संस्पृष्टा किंचित्कुञ्चितलोचना ॥२९॥

अर्थ: कोई एक स्त्री पतिके वक्षःस्थल-पर अर्द्धबाहुलिका देख ईर्ष्यासे भर गयी तथा उसके नेत्र कुछ-कुछ संकुचित हो गये ॥२९॥


अर्द्धसंनाहनामायं मया परिहिता प्रिये । इति पुंशब्दयोगेन पुनस्तोषमुपागता ॥३०॥

अर्थ: उसे अप्रसन्न जान पतिने कहा कि हे प्रिये ! यह आधा कवच मैंने पहना है । इस प्रकार पतिके कहनेसे पुनः सन्तोषको प्राप्त हो गयी ॥३०॥


ताम्बूलप्रार्थनव्याजात् काचित् प्राप्य प्रियाधरम् । अमुञ्चत् सुखिनी कृच्छ्रात् कृत्वा व्रणविभूषितम् ॥३१॥

अर्थ: किसी सुखिया स्त्रीने ताम्बूल याचनाके बहाने पतिका अधरोष्ठ पाकर उसे दन्ताघातसे विभूषित कर बड़ी कठिनाईसे छोड़ा ॥३१॥


काचिन्निवर्त्यमानापि प्रियेण रणकाङ्क्षिणा । संनाहकण्ठसूत्रस्य बन्धव्याजेन गच्छति ॥३२॥

अर्थ: रणके अभिलाषी किसी पुरुषने यद्यपि अपनी स्त्रीको लौटा दिया था तथापि वह कवचके कण्ठका सूत्र बाँधनेके बहाने चली जा रही थी ॥३२॥


एकतो दयितादृष्टिरन्यतः तूर्यनिस्वनः । इति हेतुद्वयादोलामारूढं भटमानसम् ॥३३॥

अर्थ: एक ओर तो वल्लभाकी दृष्टि और दूसरी ओर तुरहीका शब्द, इस प्रकार योद्धाका मन दो कारणरूपी दोलाके ऊपर आरूढ़ हो रहा था ॥३३॥


स्त्रीणां परिहरन्तीनां वाष्पपातममङ्गलम् । सत्यामपि दिदृक्षायां निमेषो नाभवत् दृशाम् ॥३४॥

अर्थ: अमांगलिक अश्रुपातको बचानेवाली स्त्रियोंके यद्यपि पतिको देखनेकी इच्छा थी तो भी वे नेत्रोंका पलक नहीं झपाती थीं ॥३४॥


अगृहीत्वैव संनाहं केचित् त्वरितमानसाः । यथालब्धायुधं योधा निर्युर्दर्पशालिनः ॥३५॥

अर्थ: जिनके मन उतावलीसे भर रहे थे ऐसे कितने ही अहंकारी योद्धा, कवच पहने बिना ही जो शस्त्र मिला उसे ही लेकर निकल पड़े ॥३५॥


रणसंजाततोषेण शरीरे पुष्टिमागते । कस्यचिद् रणशौण्डस्य वर्म माति स्म नो निजम् ॥३६॥

अर्थ: किसी रणवीरका शरीर रणसे उत्पन्न सन्तोषके कारण इतना पुष्ट हो गया कि उसका निजका कवच भी शरीरमें नहीं माता था ॥३६॥


श्रुत्वा परचमूतूर्यस्वनं कश्चिद् भटोत्तमः । चिररूढैर्व्रणै रक्तं मुमोचोच्छ्वासविग्रहः ॥३७॥

अर्थ: किसी उत्तम योद्धाका शरीर पर-चक्रकी तुरहीका शब्द सुनकर इतना फूल गया कि वह चिरकालके भरे घावोंसे रक्त छोड़ने लगा ॥३७॥


पिनद्धं कस्यचिद् वर्म सुदृढं तोषहारिणः । वर्द्धमानं ततः शीर्णं पुराणकङ्कटायितम् ॥३८॥

अर्थ: किसी योद्धाने नया मजबूत कवच पहना था परन्तु हर्षित होनेके कारण उसका शरीर इतना बढ़ गया कि कवज फटकर पुराने कवचके समान जान पड़ने लगा ॥३८॥


विश्रब्धं कस्यचिज्जाया समाधानपरायणा । सारयन्ती मुहुस्तस्थौ शिरस्त्राणं सुभाषिता ॥३९॥

अर्थ: किसीका टोप ठीक नहीं बैठ रहा था सो उसे ठीक करनेमें तत्पर उसकी स्त्री निश्चिन्ततापूर्वक मधुर शब्द कहती हुई बार-बार टोपको चला रही थी ॥३९॥


प्रियापरिमलं कश्चिद्वीयमानैः स्ववक्षसः । कङ्कटं प्रति नो चक्रे मनः संग्रामलालसः ॥४०॥

अर्थ: किसीकी स्त्रीने पतिके वक्षःस्थलपर सुगन्धिका लेप लगा दिया था सो उसकी रक्षा करते हुए उसने युद्धकी अभिलाषा होते हुए भी कवच धारण करनेकी ओर मन नहीं किया था - कवच धारण करनेका विचार नहीं किया था ॥४०॥


एवं विनिर्गता योधाः कृच्छ्रतः सान्त्वितप्रियाः । आकुलीभूतचित्ताश्च शयनीयेषु ताः स्थिताः ॥४१॥

अर्थ: इस प्रकार जो बड़ी कठिनाईसे प्रियाओंको समझा-बुझा सके थे ऐसे योधा तो बाहर निकले और उनकी स्त्रियाँ व्याकुलचित्त होती हुई शय्याओंपर पड़ रहीं ॥४१॥


अथाग्रकीर्तिमाध्वीकरसास्वादनलालसौ । द्विरदस्यन्दनारूढावसोढारिबलस्वनौ ॥४२॥

प्रथमं निर्गतोदात्तप्रतापौ शौर्यशालिनौ । हस्तप्रहस्तनामानौ लङ्कातो निर्गतौ नृपौ ॥४३॥

अर्थ: अथानन्तर उत्तम कीर्तिरूपी मधुरसके आस्वादनमें जिनका मन लग रहा था, जो हाथियोंके रथपर आरूढ़ थे, जिन्होंने शत्रु सेनाका शब्द सहन नहीं किया था, जिनका उत्कट प्रताप पहले ही निकल चुका था, और जो शूरवीरतासे सुशोभित थे, ऐसे हस्त और प्रहस्त नामके दो राजा लंकासे सर्वप्रथम निकले ॥४२-४३॥


अनापृच्छयाऽपि तत्काले स्वामिनो राजते तयोः । दोषोऽपि हि गुणीभावं प्रस्तावे प्रतिपद्यते ॥४४॥

अर्थ: यद्यपि वे दोनों स्वामीसे पूछकर नहीं निकले थे तथापि उस समय उनका स्वामीसे नहीं पूछना शोभा देता था क्योंकि अवसरपर दोष भी गुणरूपताको प्राप्त हो जाता है ॥४४॥


मारीचः सिंहजवनः स्वयंभूः शम्भुरुत्तमः । पृथुः पृथुबलोपेतश्चन्द्रार्कौ शुकसारणौ ॥४५॥

गजवीभत्सनामानौ वज्राक्षो वज्रभृद्द्युतिः । गंभीरनिनदो नक्रो मकरः कुलिशस्वनः ॥४६॥

उग्रनादस्तथा सुन्दः निकुम्भकुम्भशब्दितः । संध्याक्षो विभ्रमक्रूरो माल्यवान् खरनिस्वनः ॥४७॥

जम्बूमाली शिखावीरो दुर्द्धर्षश्च महाबलः । एते केसरिभिर्युक्तैः सामन्ता निर्ययू रथैः ॥४८॥

अर्थ: मारीच, सिंहजवन, स्वयम्भू, शम्भु, उत्तम, विशाल सेनासे सुशोभित पृथु, चन्द्र, सूर्य, शुक, सारण, गज, वीभत्स इन्द्रके समान कान्तिको धारण करनेवाला वज्राक्ष, गम्भीर-नाद, नक्र, वज्रनाद, उग्रनाथ, सुन्द, निकुम्भ, सन्ध्याक्ष, विभ्रम, क्रूर, माल्यवान्, खरनाद, जम्बूमाली, शिखीवीर और महाबलवान् दुर्द्धर्ष ये सब सामन्त सिंहोंसे जुते हुए रथोंपर सवार हो बाहर निकले ॥४५-४८॥


वज्रोदरोऽथ शक्राभः कृतान्तो विघटोदरः । महाशनिरवश्चन्द्रनखो मृत्युः सुभीषणः ॥४९॥

कुलिशोदरनामा च धूम्राक्षो मुदितस्तथा । विद्युज्जिह्वो महामाली कनकः क्रोधनध्वनिः ॥५०॥

क्षोभणो धुन्धुरुद्धामा डिण्डिडिण्डिमडम्बराः । प्रचण्डो डमरश्चण्डकुण्डहालाहलादयः ॥५१॥

व्याघ्रयुक्तैरिमैस्तुङ्गै रथैरुद्भासिताम्बरैः । अहंयवो विनिर्याताः शत्रुविध्वंसबुद्धयः ॥५२॥

अर्थ: उनके पीछे वज्रोदर, शक्राभ, कृतान्त, विघटोदर, महावज्ररव, चन्द्रनख, मृत्यु, सुभीषण, वज्रोदर, धूम्राक्ष, मुदित, विद्युज्जिह्व, महामाली, कनक, क्रोधनध्वनि, क्षोभण, धुन्धु, उद्धामा, डिण्ड, डिण्डिम, डम्बर, प्रचण्ड, डमर, चण्ड, कुण्ड और हालाहल आदि सामन्त, जिनमें व्याघ्र जुते थे, जो ऊँचे थे तथा आकाशको देदीप्यमान करनेवाले थे ऐसे रथोंपर सवार हो बाहर निकले । ये सभी सामन्त महाअहंकारी तथा शत्रुनाशकी भावना रखनेवाले थे ॥४९-५२॥


विद्याकौशिकविख्यातिः सर्पबाहुर्महाद्युतिः । शंखप्रशंखनामानौ रागो भिन्नाञ्जनप्रभः ॥५३॥

पुष्पचूडो महारक्तो घटास्त्रः पुष्पखेचरः । अनङ्गकुसुमः कामः कामावर्त्तस्मरायणौ ॥५४॥

कामाग्निः कामराशिश्च कनकाभः शिलीमुखः । सौम्यवक्त्रो महाकामो हेमगौरादयस्तथा ॥५५॥

एतेऽपि वातरंहोभी रथैर्युक्तुरङ्गमैः । यथायथं विनिर्जग्मुरालयेभ्यो रसद्बलाः ॥५६॥

अर्थ: उनके पीछे विद्याकौशिक, सर्पबाहु, महाद्युति, शंख, प्रशंख, राग, भिन्नांजनप्रभ, पुष्पचूड, महारक्त, घटास्त्र, पुष्पखेचर, अनंगकुसुम, काम, कामावर्त, स्मरायण, कामाग्नि, कामराशि, कनकाभ, शिलीमुख, सौम्यवक्त्र, महाकाम तथा हेमगौर आदि सामन्त, वायुके समान वेगशाली घोड़ोंके रथोंमें सवार हो यथायोग्य अपने-अपने घरोंसे निकले । इन सबकी सेनाएँ प्रचण्ड शब्द कर रही थीं ॥५३-५६॥


कदम्बविटपौ भीमो भीमनादो भयानकः । शार्दूलक्रीडितः हिंसश्चलाङ्गो विद्युदम्बुकः ॥५७॥

ह्लादनश्चपलश्चोलश्चलश्चञ्चलकादयः । गजादिभिरिमैर्युक्तैर्निर्ययुर्भास्वरैः रथैः ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर कदम्ब, विटप, भीम, भीमनाद, भयानक, शार्दूलविक्रीडित, सिंह, चलांग, विद्युदम्बुक, ह्लादन, चपल, चोल, चल और चंचल आदि सामन्त हाथियों आदिसे जुते हुए देदीप्यमान रथोंपर आरूढ़ होकर निकले ॥५७-५८॥


कियन्तः कथयिष्यन्ते नाम्ना प्राग्रहराः नराः । अध्यर्द्धपञ्चमीकोट्यः कुमाराणां स्मृता बुधैः ॥५९॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! नाम ले-लेकर कितने प्रधान पुरुष कहे जावेंगे ? उस समय सब मिलाकर साढ़े चार करोड़ कुमार बाहर निकले थे ऐसा विद्वज्जन कहते हैं ॥५९॥


विशुद्धराक्षसानूकाः कुमारास्तुल्यविक्रमाः । प्रख्यातयशसः सर्वे विज्ञेया गुणमण्डनाः ॥६०॥

अर्थ: ये सभी कुमार विशुद्ध राक्षसवंशी, समान पराक्रमके धारी, प्रसिद्ध यशसे सुशोभित एवं गुणरूपी आभूषणोंको धारण करनेवाले थे ॥६०॥


आवृतास्ते समुद्युक्तैः कुमारैर्मारविभ्रमाः । बलिनो मेघवाहाद्याः कुमारेन्द्रा विनिर्ययुः ॥६१॥

अर्थ: युद्धके लिए उद्यत इन सब कुमारोंसे घिरे, कामके समान सुन्दर, महाबलवान् मेघवाहन आदि श्रेष्ठ राजकुमार भी बाहर निकले ॥६१॥


अर्ककीर्तिसमो भूत्या दशाननमहाप्रियः । इन्द्रजिन्निर्ययौ कान्तो जयन्त इव धीरधीः ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर जो विभूतिसे सूर्यके समान था और रावणको अतिशय प्यारा था, ऐसा धीर-वीर बुद्धिका धारक सुन्दर इन्द्रजित्, जयन्तके समान बाहर निकला ॥६२॥


विमानमर्कसंकाशं नाम्ना ज्योतिःप्रभं महत् । कुम्भकर्णः समारूढस्त्रिशूलास्त्रो विनिर्गतः ॥६३॥

अर्थ: त्रिशूल शस्त्रका धारी कुम्भकर्ण, सूर्यके समान देदीप्यमान ज्योतिःप्रभ नामक विशाल विमानपर आरूढ़ होकर निकला ॥६३॥


मेरुशृङ्गप्रतीकाशं लोकत्रितयशब्दितम् । विमानं पुष्पकाभिख्याभारूढः शक्रविक्रमः ॥६४॥

संछाद्य रोदसी सैन्यैर्भास्वरायुधपाणिभिः । निष्क्रान्तो रावणस्तिग्मकिरणप्रतिमद्युतिः ॥६५॥

अर्थ: तदनन्तर जो तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध मेरुके शिखरके समान सुशोभित पुष्पक विमानपर आरूढ़ था, इन्द्रके समान पराक्रमी था और सूर्यके समान कान्तिका धारक था ऐसा रावण हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले सैनिकोंसे आकाश और पृथ्वीके अन्तरालको आच्छादित कर निकला ॥६४-६५॥


स्यन्दनैर्वारणैः सिंहैर्वराहैः रुरुभिर्मृगैः । सृमरैर्विहगैश्चित्रैः सौरभेयैः क्रमेलकैः ॥६६॥

ययुभिर्महिषैरन्यैर्जलस्थलसमुद्भवैः । सामन्ता निर्ययुः शीघ्रं वाहनैर्बहुरूपकैः ॥६७॥

अर्थ: तत्पश्चात् रथ, हाथी, सिंह, सूकर, कृष्णमृग, सामान्यमृग, सामर, नाना प्रकारके पक्षी, बैल, ऊँट, घोड़े, भैंसे आदि जलथलमें उत्पन्न हुए नाना प्रकारके वाहनोंपर सवार होकर सामन्त लोग बाहर निकले ॥६६-६७॥


भामण्डलं प्रतिक्रुद्धाः किष्किन्धाधिपतिं तथा । हिता राक्षसनाथाय निर्ययुः खेचराधिपाः ॥६८॥

अर्थ: जो भामण्डल और सुग्रीवके प्रति क्रुद्ध थे तथा रावणके हितकारी थे ऐसा विद्याधर राजा बाहर निकले ॥६८॥


अथ दक्षिणतो दृष्टा भयानकमहास्वनाः । प्रयाणवारणोद्युक्ता भल्लूका बद्धमण्डलाः ॥६९॥

अर्थ: अथानन्तर जो महाभयंकर शब्द कर रहे थे, जो प्रयाणके रोकनेमें तत्पर थे तथा जो मण्डल बाँधकर खड़े हुए थे ऐसे रीछ दक्षिणकी ओर दिखाई दिये ॥६९॥


बद्धान्धतमसा पक्षैर्गृध्रा विकृतनिस्वनाः । भ्राम्यन्ति गगने भीमाः कथयन्तो महाक्षयम् ॥७०॥

अर्थ: जिन्होंने अपने पंखोंसे गाढ़ अन्धकार उत्पन्न कर रखा था, जिनका शब्द अत्यन्त विकृत था तथा जो महाविनाशकी सूचना दे रहे थे ऐसे भयंकर गीध आकाशमें उड़ रहे थे ॥७०॥


अन्येऽपि शकुनाः क्रूरं क्रन्दन्तो भयशंसिनः । बभूवुराकुलीभूता भौमा वैहायसास्तथा ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार क्रूर शब्द करते तथा भयकी सूचना देते हुए पृथ्वी तथा आकाशमें चलनेवाले अन्य अनेक पक्षी व्याकुल हो रहे थे ॥७१॥


शौर्यातिगर्वसंमूढा विदन्तोऽप्यशुभानिमान् । महासैन्योद्धता योद्धुं रक्षोवर्गा विनिर्ययुः ॥७२॥

अर्थ: शूरवीरताके बहुत भारी गर्वसे मूढ़ तथा बड़ी-बड़ी सेनाओंसे उद्धत राक्षसोंके समूह यद्यपि इन अशुभ स्वप्नको जानते थे तो भी युद्ध करनेके लिए बराबर नगरीसे बाहर निकल रहे थे ॥७२॥


प्राप्ते काले कर्मणामानुरूप्याद्दातुं योग्यं तत्फलं निश्चयाप्यम् । शक्तो रोद्धुं नैव शक्रोऽपि लोके वार्तान्येषां केव वाङ्मात्रभाजाम् ॥७३॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि जब कर्मोंकी अनुकूलताका समय आता है तब देनेके योग्य समस्त पर्यायकी प्राप्ति निश्चयसे होतो है उसे रोकनेके लिए लोकमें इन्द्र भी समर्थ नहीं है । फिर दूसरे प्राणियोंकी तो वार्ता ही क्या है ॥७३॥


वीरा योद्धुं दत्तचित्ता महान्तो वाहारूढाः शस्त्रमाराजिहस्ताः । कृत्वावज्ञां वारकाणां समेषां यान्त्यप्युद्ग्राही रविं प्रत्यमीताः ॥७४॥

अर्थ: जिनका चित्त युद्धमें लग रहा था, जो स्वयं महान् थे, वाहनोंपर सवार थे और शस्त्रोंकी कान्तिका समूह जिनके हाथमें था अथवा जिनके हाथ शस्त्रोंकी कान्तिसे सुशोभित थे ऐसे शूरवीर मनुष्य निर्भीक हो निषेध करनेवाले इन समस्त अशकुनोंकी उपेक्षा करते हुए उस प्रकार आगे बढ़े जाते थे जिस प्रकार राहु सूर्यमण्डलके प्रति बढ़ता जाता है ॥७४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रावणबलनिर्गमनं नाम सप्तपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें रावणकी सेना लंकासे बाहर निकली इस बातका वर्णन करनेवाला सत्तावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५७॥


५८. अष्टपञ्चाशत्तमं पर्व (हस्तप्रहस्तवधाभिधानं)

आस्तृणद्वीक्ष्य तत्सैन्यमुद्वेलमिव सागरम् । नलनीलमरुत्पुत्रजाम्बवाद्याः सुखेचराः ॥१॥

रामकार्यसमुद्युक्ताः परमोदारचेष्टिताः । महाद्विपयुतैर्दीप्तैः स्यन्दनैर्निर्ययुर्वरैः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर लहराते हुए सागरके समान व्याप्त होती हुई रावणकी उस सेनाको देख, श्रीरामके कार्य करनेमें उद्यत परम उदार चेष्टाओंके धारक नल, नील, हनुमान्, जाम्बव आदि विद्याधर, महागजोंसे जुते देदीप्यमान उत्तम हाथियोंसे युक्त रथोंपर सवार हो कटकसे निकले ॥१-२॥


संमानो जयमित्रश्च चन्द्राभो रतिवर्द्धनः । कुमुदावर्तसंज्ञश्च महेन्द्रो भानुमण्डलः ॥३॥

अनुद्धरो दृढरथः प्रीतिकण्ठो महाबलः । समुन्नतबलः सूर्यज्योतिः सर्वप्रियो बलः ॥४॥

सर्वसारश्च दुर्बुद्धिः सर्वदः सरभो मरः । अभृष्टो निर्विनष्टश्च संत्रासो विघ्नसूदनः ॥५॥

नादो वर्वरकः पापो लोलपाटनमण्डलौ । संग्रामचपलाद्याश्च परमा खेचराधिपाः ॥६॥

शार्दूलसंगतैस्तुङ्गैः रथैः परमसुन्दरैः । नानायुधधृताटोपा निर्जग्मुः पृथुतेजसः ॥७॥

अर्थ: सम्मान, जयमित्र, चन्द्राभ, रतिवर्धन, कुमुदावर्त, महेन्द्र, भानुमण्डल, अनुद्धर, दृढरथ, प्रीतिकण्ठ, महाबल, समुन्नतबल, सूर्यज्योति, सर्वप्रिय, बल, सर्वसार, दुर्बुद्धि, सर्वद, सरभ, भर, अमृष्ट, निर्विनष्ट, सन्त्रास, विघ्नसूदन, नाद, वर्वरक, पाप, लोल, पाटनमण्डल और संग्रामचपल आदि उत्तमोत्तम विद्याधर राजा व्याघ्रोंसे जुते हुए परम सुन्दर ऊँचे रथोंपर सवार हो बाहर निकले । ये सभी विद्याधर नाना प्रकार के शस्त्रोंके समूहको धारण कर रहे थे तथा विशाल तेजके धारक थे ॥३-७॥


प्रस्तरो हिमवान् मङ्गः प्रियरूपादयस्तथा । एते द्विपयुतैर्योद्धुं निर्ययुः सुमहारथैः ॥८॥

अर्थ: प्रस्तर, हिमवान्, भंग तथा प्रियरूप आदि ये सब हाथियोंसे जुते उत्तम रथोंपर सवार हो युद्धके लिए निकले ॥८॥


दुःप्रेक्षः पूर्णचन्द्रश्च विधिः सागरनिःस्वनः । प्रियविग्रहनामा च स्कन्दश्चन्दनपादपः ॥९॥

चन्द्रांशुरप्रतीघातो महाभैरवकीर्तनः । दुष्टसिंहकटिः कृष्टः समाधिबहुलो हलः ॥१०॥

इन्द्रायुधो गतत्रासः संकटप्रहरादयः । एते हरियुतैस्तूर्णं सामन्ता निर्ययू रथैः ॥११॥

अर्थ: दुष्प्रेक्ष, पूर्णचन्द्र, विधि, सागरनिःस्वन, प्रियविग्रह, स्कन्द, चन्दनपादप, चन्द्रांशु, अप्रतोघात, महाभैरव, दुष्ट, सिंहकटि, कृष्ट, समाधिबहुल, हल, इन्द्रायुध, गतत्रास और संकटप्रहार आदि, ये सब सामन्त सिंहोंसे जुते रथोंपर सवार हो शीघ्र ही निकले ॥९-११॥


विद्युत्कर्णो बलः शीलः स्वपक्षरचनो घनः । संमेदो विचलः सालः कालः क्षितिवरोऽङ्गदः ॥१२॥

विकालो लोलकः कालिर्मङ्गश्चण्डोर्मिरूर्जितः । तरङ्गस्तिलकः कीलः सुषेणस्तरलो बलिः ॥१३॥

भीमो मीमरथो धर्मो मनोहरमुखः सुखः । प्रमत्तो मर्दको मत्तः सारो रत्नजटी शिवः ॥१४॥

दूषणो भीषणः कोणः विघटाख्यो विराधितः । मेरू रणखनिः क्षेमः बेलाक्षेपी महाधरः ॥१५॥

नक्षत्रलुब्धसंज्ञश्च संग्रामो विजयो जयः । नक्षत्रमालकः क्षोदः तथातिविजयादयः ॥१६॥

एते वाजियुतैः कान्तैर्मनोरथजवै रथैः । महासैनिकमध्यस्थैरध्यासत रणाजिरम् ॥१७॥

अर्थ: विद्युत्कर्ण, बल, शील, स्वपक्षरचन, घन, सम्मेद, विचल, साल, काल, क्षितिवर, अंगद, विकाल, लोलक, कालि, भंग, चण्डोर्मि, ऊर्जित, तरंग, तिलक, कील, सुषेण, तरल, बलि, भीम, भोमरथ, धर्म, मनोहरमुख, सुख, प्रमत्त, मर्दक, मत्त, सार, रत्नजटी, शिव, दूषण, भीषण, कोण, विघट, विराधित, मेरु, रणखान, क्षेम, बेलाक्षेपी, महाधर, नक्षत्रलुब्ध, संग्राम, विजय, रथ, नक्षत्रमालक, क्षोद तथा अतिविजय आदि घोड़ोंसे जुते मनोहर, इच्छानुसार वेगवाले, तथा महासैनिकोंके मध्य स्थित रथोंपर सवार हो रणांगणमें पहुँचे ॥१२-१७॥


विद्युद्वाहो मरुद्वाहुः सानुर्जलदवाहनः । रवियानः प्रचण्डालिरिमेऽपि घनसंनिभैः ॥१८॥

महारथवरैर्नानादाहनोद्भासिताम्बरैः । युद्धश्रद्धासमायुक्ता दधावुर्मारुतैः समाः ॥१९॥

अर्थ: विद्युद्वाह, मरुद्वाहु, सानु, मेघवाहन, रवियान और प्रचण्डालि ये सब सामन्त भी मेघोंके समान नाना प्रकारके वाहनोंसे आकाशको देदीप्यमान करनेवाले उत्तमोत्तम रथोंपर सवार हो युद्धकी अभिलाषासे दौड़े ! ये सब वायुके समान तीव्र वेगवाले थे ॥१८-१९॥


विमानमुत्तमाकारं नाम्ना रत्नप्रभं महत् । आरूढो यत्नवानस्थात् पद्मपक्षो विभीषणः ॥२०॥

अर्थ: जिसे रामकी पक्ष थी ऐसा यत्नवान् विभीषण रत्नप्रभ नामक उत्तम विमानपर आरूढ़ हुआ ॥२०॥


युद्धावर्त्तो वसन्तश्च कान्तः कौमुदिनन्दनः । भूरिः कोलाहलो हेडो भावितः साधुवत्सलः ॥२१॥

अर्द्धचन्द्रो जिनप्रेमा सागरः सागरोपमः । मनोज्ञो जिनसंज्ञश्च तथा जिनमतादयः ॥२२॥

नानावर्णविमानाग्रभूमिकास्थितमूर्तयः । दुर्द्धरा निर्ययुर्योद्धुं बद्धसंनाहविग्रहाः ॥२३॥

अर्थ: युद्धावर्त, वसन्त, कान्त, कौमुदि-नन्दन, भूरि, कोलाहल, हेड, भावित, साधुवत्सल, अर्द्धचन्द्र, जिनप्रेमा, सागर, सागरोपम, मनोज्ञ, जिनसंज्ञ तथा जिनमत आदि योद्धा युद्ध करनेके लिए बाहर निकले । ये सब नाना वर्णोंवाले विमानोंकी अग्रभूमिमें स्थित थे, दुर्धर थे और सबके शरीर कवचोंसे कसे हुए थे ॥२१-२३॥


पद्मनाभः सुमित्राजः सुग्रीवो जनकात्मजः । एते हंसविमानस्था विरेजुर्गगनान्तरे ॥२४॥

अर्थ: पद्मनाभ - राम, लक्ष्मण, सुग्रीव और भामण्डल ये सब हंसोंके विमानोंमें बैठे हुए आकाशके बीचमें अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥२४॥


महाम्बुदप्रतीकाशा नानायानसमाश्रिताः । लङ्काभिमुखमुद्युक्ता गन्तुं खेचरपार्थिवाः ॥२५॥

अर्थ: जो महामेघके समान जान पड़ते थे तथा नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़ थे, ऐसे विद्याधर राजा लंकाकी ओर जानेके लिए तत्पर हुए ॥२५॥


संहारलम्बिताम्भोदवृन्दनिर्घोषभैरवाः । शङ्खकोटिस्वनोन्मिश्रास्तूर्याणामुद्ययुः स्वनाः ॥२६॥

अर्थ: प्रलयकालीन घनघटाकी गर्जनाके समान जिनके भयंकर शत्रु थे, तथा जो करोड़ों शंखोंके शब्दसे मिले हुए थे ऐसे तुरही वादित्रोंके शब्द उत्पन्न होने लगे ॥२६॥


मम्भाभेर्यो मृदङ्गाश्च लम्पाका धुन्धुमण्डुकाः । झम्लाम्लातकहक्काश्च हुङ्कारा दुन्दुकाणकाः ॥२७॥

झर्झरा हेतुगुञ्जाश्च काहला दर्दुरादयः । समाहता महानादं मुमुचुः कर्णघूर्णकम् ॥२८॥

अर्थ: भंभा, भेरी, मृदंग, लम्पाक, धुन्धु, मण्डुक, झम्ला, अम्लातक, हक्का, हुंकार, दुन्दुकाणक, झर्झर, हेतुगुंजा, काहल और दर्दुर आदि बाजे ताड़ित होकर कानोंको घुमानेवाले महाशब्द छोड़ने लगे ॥२७-२८॥


वेणुनादाट्टहासाश्च ताराहलहलारवाः । ययुः सिंहद्विपस्वाना महिषस्यन्दनस्वनाः ॥२९॥

क्रमेलकमहारावा निनादा मृगपक्षिणाम् । उत्तस्थुः पिहिताशेषाशेषविष्टपनिःस्वनाः ॥३०॥

अर्थ: बाँसोंके शब्द, अट्टहासकी ध्वनि, तारा तथा हलहलाके शब्द, सिंहों और हाथियोंके शब्द, भैंसाओं और रथोंके शब्द, ऊँटोंके विशाल शब्द तथा मृग और पक्षियोंके शब्द उठने लगे । इन सबके शब्दोंने शेष समस्त संसारके शब्दोंको आच्छादित कर दिया ॥२९-३०॥


तयोरन्योन्यमासंगे जाते परमसैन्ययोः । लोकः संशयमारूढः समस्तो जीवितं प्रति ॥३१॥

अर्थ: जब उन दोनों विशाल सेनाओंका परस्परमें समागम हुआ तब समस्त लोक अपने जीवनके प्रति संशयमें पड़ गये ॥३१॥


क्षोणी क्षोभं परं प्राप्ता विकम्पितमहीधरा । प्रशोषं गन्तुमारब्धः प्रक्षुब्धः क्षारसागरः ॥३२॥

अर्थ: पृथिवी अत्यन्त क्षोभको प्राप्त हुई, पर्वत हिलने लगे और क्षुभित हुआ लवण समुद्र शोषणको प्राप्त होने लगा ॥३२॥


सदर्पैर्निर्गतैर्योधैरसहैर्निजवर्गतः । दन्तुरीभूतमत्युग्रं बलद्वयमलक्ष्यत ॥३३॥

अर्थ: अपने-अपने वर्गसे निकलकर बाहर आये हुए, असहनशील, अहंकारी योद्धाओंसे व्याप्त हुईं दोनों सेनाएँ अत्यन्त भयंकर दिखने लगीं ॥३३॥


चक्रक्रकचकुन्तासिगदाशक्तिशिलीमुखैः । भिण्डिमालादिभिश्चोग्रं प्रवृत्तं युद्धमेतयोः ॥३४॥

अर्थ: कुछ ही समय बाद दोनों सेनाओंमें चक्र, क्रकच, कुन्त, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और भिण्डिमाल आदि शस्त्रोंसे भयंकर युद्ध होने लगा ॥३४॥


ओह्वयन्तः सुसंनद्धाः शस्त्रज्वलितबाहवः । समुत्पेतुर्भटाः शूराः परसैन्यं विवक्षवः ॥३५॥

अर्थ: जो एक दूसरेको बुला रहे थे, जो कवचोंसे युक्त थे, जिनकी भुजाएँ शस्त्रोंसे देदीप्यमान हो रही थीं और जो पर-चक्रमें प्रवेश करना चाहते थे ऐसे शूरवीर योद्धा उछल रहे थे ॥३५॥


अतिवेगसमुत्पाताः प्रविष्टाः शात्रवं बलम् । शस्त्रसंचारमार्गार्थमपसस्रुः पुनर्मनाक् ॥३६॥

अर्थ: ये योद्धा अत्यन्त वेगसे उछलकर पहले तो शत्रुओंके दलमें जा चुके अनन्तर शस्त्र चलानेके योग्य मार्ग प्राप्त करनेकी इच्छासे पुनः कुछ पीछे हट गये ॥३६॥


लङ्कानिवासिभिर्योधैरुद्गतैरतिभूरिभिः । सिंहैरिव गजा भङ्गं नीता वानरपक्षिणः ॥३७॥

अर्थ: लंका निवासी योद्धा अधिक संख्या में थे तथा अत्यधिक शक्तिशाली थे इसलिए उन्होंने वानर-पक्षके योद्धाओंको उस तरह पराजित कर दिया जिस तरह कि सिंह हाथियोंको पराजित कर देते हैं ॥३७॥


पुनरन्यैर्भटैः शीघ्रमसीदन्तः समुज्ज्वलाः । रक्षोयोधान् विनिर्जघ्नुर्भासुरा वानरध्वजाः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर शीघ्र ही जो अन्य योद्धाओंके द्वारा नहीं दबाये जा सकते थे ऐसे प्रतापी तथा देदीप्यमान वानर राजाओंने राक्षस योद्धाओंको मारना शुरू किया ॥३८॥


भेद्यमानं बलं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य सर्वतः । स्वामिरागसमाकृष्टौ महाबलसमावृतौ ॥३९॥

गजध्वजसमालक्ष्यौ गजस्यन्दनवर्तिनौ । मा भैष्टेति कृतस्वानौ परमोत्कटविग्रहौ ॥४०॥

हस्तप्रहस्तसामन्तावुत्थाय सुमहाजवौ । निन्यतुः परमं भङ्गं बलं वानरलक्ष्मणाम् ॥४१॥

अर्थ: तत्पश्चात् रावणकी सेनाको सब ओरसे नष्ट होती देख स्वामीके प्रेमसे खिंचे तथा बड़ी भारी सेनासे घिरे हस्त और प्रहस्त नामक सामन्त उठकर आगे आये । ये हाथीके चिह्नसे सुशोभित ध्वजासे पृथक् ही जान पड़ते थे, हाथियोंके रथपर आरूढ़ थे, ‘डरो मत, डरो मत’ यह शब्द कर रहे थे, अत्यन्त उत्कृष्ट शरीरके धारक थे और महावेगशाली थे । इन्होंने आते ही वानरोंकी सेनामें तीव्र मार-काट मचा दी ॥३९-४१॥


शाखामृगध्वजौ तावत्प्रतापं बिभ्रतौ परम् । क्रोडवारणसंवृत्तवाहव्यूढमहारथौ ॥४२॥

शौर्यगर्वाविवायुक्तशरीरौ परमद्युती । नलनीलौ परिक्रुद्धौ भीषणौ योद्धुमुद्यतौ ॥४३॥

अर्थ: यह देख जो परम प्रतापको धारण कर रहे थे, सूकर, हाथी तथा घोड़े जिनके बड़े-बड़े रथ खींच रहे थे, जो शरीरधारी शूरवीरता और गर्वके समान जान पड़ते थे, परमदीप्तिके धारक थे, अत्यन्त क्रुद्ध एवं भयंकर थे, ऐसे वानरवंशी नल और नील युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥४२-४३॥


ततो बहुविधैः शस्त्रैश्चिरं जाते महाहवे । क्रमाप्तसाधुनिस्वाने निपतद्भटसंकटे ॥४४॥

नलेनोत्पत्य हस्तो वा विह्वलो विरथीकृतः । प्रहस्त इव नीलेन कृतश्च गतजीवितः ॥४५॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें क्रम-क्रमसे साधु-साधु बहुत अच्छा बहुत अच्छाका शब्द हो रहा था तथा जो गिरते हुए योद्धाओंसे व्याप्त था ऐसा महायुद्ध जब चिरकाल तक नाना प्रकारके शस्त्रोंसे हो चुका तब नलने उछलकर हस्तको रथ रहित तथा विह्वल कर दिया और नीलने प्रहस्तको निर्जीव बना दिया ॥४४-४५॥


तावालोक्य ततो राजन् विपर्यस्तौ महीतले । विनायका बभूवैतद्वाहिनीयं पराङ्मुखा ॥४६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! तदनन्तर हस्त आर प्रहस्तको पृथ्वीपर पड़ा देख रावणकी सेना, नायकसे रहित होनेके कारण विमुख हो गयी - भाग खड़ी हुई ॥४६॥


बिभर्ति तावद् दृढनिश्चयं जनः प्रभोर्मुखं पश्यति यावदुन्नतम् ।
गते विनाशं स्वपतौ विशीर्यते यथारचक्रं परिशीर्णतुम्बकम् ॥४७॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि जबतक यह मनुष्य, स्वामीके ऊँचे उठे मुखको देखता रहता है तभी तक निश्चयको धारण करता है और जब अपना स्वामी नष्ट हो जाता है तब समस्त सेना जिसका पुट्ठा बिखर गया है ऐसी गाड़ीके पहियेके समान बिखर जाती है ॥४७॥


सुनिश्चितानामपि संनराणां विना प्रधानेन न कार्ययोगः ।
शिरस्यपेते हि शरीरबन्धः प्रपद्यते सर्वत एव नाशम् ॥४८॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि यद्यपि निश्चित किये हुए मनुष्योंका कार्य किसी प्रधान पुरुष के बिना नहीं होता है क्योंकि शिर नष्ट हो जानेपर शरीर सब ओर से नाश ही को प्राप्त होता है ॥४८॥


प्रधानसंबन्धमिदं हि सर्वं जगद्यथेष्टं फलमभ्युपैति । राहूपसृष्टस्य रवेर्विनाशं प्रयाति मन्दो निकरः कराणाम् ॥४९॥

अर्थ: प्रधानके साथ सम्बन्ध रखनेवाला यह समस्त जगत् यथेष्ट फलको प्राप्त होता है, सो ठीक ही है क्योंकि राहुके द्वारा आक्रान्त सूर्यकी किरणोंका समूह मन्द होता हुआ विनाशको ही प्राप्त होता है ॥४९॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हस्तप्रहस्तवधाभिधानं नामाष्टपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य विरचित पद्मपुराणमें हस्त-प्रहस्तके वधका कथन करनेवाला अट्ठावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५८॥


५९. एकोनषष्टितमं पर्व (हस्तप्रहस्तनलनीलपूर्वभवानुकीर्त्तनं)

उवाच श्रेणिकोऽथैवं विद्याविधिविशारदौ । हस्तप्रहस्तसामन्तौ जितपूर्वौ न केनचित् ॥१॥

महदाश्चर्यमेतन्मे ताभ्यां तौ निहतौ कथम् । अत्र मे कारणं नाथ गणभृद्वक्तुमर्हसि ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे इस प्रकार कहा कि हे भगवन् ! विद्याओंकी विधिमें निपुण जो हस्त और प्रहस्त नामक सामन्त पहले किसीके द्वारा नहीं जीते जा सके वे बड़ा आश्चर्य है कि नल और नीलके द्वारा कैसे मारे गये ? हे नाथ ! आप मेरे लिए इसका कारण कहिए ॥१-२॥


ततो गणधरोऽवोचच्छृणु तत्त्वविशारदः । राजन् कर्माभिनुन्नानां जन्तूनां गतिरीदृशी ॥३॥

अर्थ: तदनन्तर श्रुत रहस्यके ज्ञाता गौतम गणधरने कहा कि हे राजन् ! कर्मोंसे प्रेरित प्राणियोंकी ऐसी ही गति होती है ॥३॥


पूर्वकर्मानुभावेन स्थितिर्दुःकृतिनामियम् । असौ मारयिता तस्य यो येन निहितः पुरा ॥४॥

अर्थ: पूर्वकर्मके प्रभावसे पापी जीवोंकी यह दशा है कि पहले जो जिसके द्वारा मारा जाता है वह उसे मारता है ॥४॥


असौ मोचयिता तस्य बन्धनव्यसनादिषु । यो येन मोचितं पूर्वमनर्थे पतितो नरः ॥५॥

अर्थ: पहले जिसने विपत्तिमें पड़े हुए जिस मनुष्यको उस विपत्तिसे छुड़ाया है वह उसे भी बन्धन तथा व्यसन-संकट आदिके समय छुड़ाता है ॥५॥


आसँल्लौकिकमर्यादाः प्रातिवेश्मिकवासिनः । निःस्वाः कुटुम्बिनः स्थाने कुशस्थलकनामनि ॥६॥

अर्थ: इनकी कथा इस प्रकार है कि कुशस्थल नामक नगरमें लौकिक मर्यादाको पालनेवाले कुछ दरिद्र कुटुम्बी पास-पासमें रहते थे ॥६॥


इन्धकः पल्लवश्चैव तत्रैकोदरसंभवौ । पुत्रदारपरिक्लिष्टौ विप्रौ लाङ्गलकर्मकौ ॥७॥

सानुकम्पौ स्वभावेन साधुनिन्दापराङ्मुखौ । जैनमित्रपरिष्वङ्गाद् भिक्षादानादिसेविनौ ॥८॥

अर्थ: उनमें इन्धक और पल्लवक नामक दो भाई थे जो एक ही माताके उदरसे उत्पन्न थे, पुत्रों तथा स्त्रियोंके कारण क्लेशको प्राप्त रहते थे, जातिके ब्राह्मण थे, हल चलानेका काम करते थे, स्वभावसे दयालु थे, साधुओंकी निन्दासे विमुख थे, तथा अपने एक जैन-मित्रकी संगतिसे आहारदान आदि कार्योंमें तत्पर रहते थे ॥७-८॥


द्वितीयं निःस्वयुगलं प्रतिवेश्मोषितं तयोः । स्वभावनिर्दयं क्रूरं लौकिकोन्मार्गमोहितम् ॥९॥

अर्थ: उन दोनोंके पड़ोसमें ही एक दूसरा दरिद्र कुटुम्बियोंका युगल रहता था जो स्वभावसे निर्दय था, दुष्ट था और लौकिक मिथ्या प्रवृत्तियोंसे मोहित रहता था ॥९॥


वण्टने राजदानस्य संजाते कलहे सति । ताभ्यामत्यन्तरौद्राभ्यां तताविन्धकपल्लवौ ॥१०॥

अर्थ: एक बार राजाकी ओरसे जो दान बँटता था उसमें कलह हो गयी जिससे अत्यन्त क्रूर परिणामोंके धारक उन दरिद्र कुटुम्बियोंके द्वारा इन्धक और पल्लवक मारे गये ॥१०॥


साधुदानाद्धरिक्षेत्रे जातौ सद्भोगभोजिनौ । पल्यद्वयक्षये जातौ देवलोकनिवेशिनौ ॥११॥

अर्थ: मुनिदानके प्रभावसे दोनों, हरिक्षेत्रमें उत्तम भोगोंको भोगनेवाले आर्य हुए। वहाँ दो पल्यकी उनकी आयु थी । उसके पूर्ण होनेपर दोनों ही देवलोकमें उत्पन्न हुए ॥११॥


अधर्मपरिणामेन क्रूरौ तु प्राप्तपञ्चतौ । शशौ कालेञ्जरारण्ये जातौ दुःखातिसंकटे ॥१२॥

अर्थ: दूसरे जो क्रूर दरिद्र कुटुम्बी थे वे अधर्मरूप परिणामसे मरकर दुःखोंसे परिपूर्ण कालंजर नामक वनमें खरगोश हुए ॥१२॥


मिथ्यादर्शनयुक्तानां साधुनिन्दनकारिणाम् । प्राणिनां पापकूटानां भवत्येवेदृशी गतिः ॥१३॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि मिथ्यादर्शनसे युक्त तथा साधुओंकी निन्दा करनेवाले पापी प्राणियों की ऐसी ही गति होती है ॥१३॥


ततस्तिर्यक्षु सुचिरं भ्रान्त्वा विविधयोनिषु । कृच्छ्रान्मनुष्यतां प्राप्तौ तापसत्वमुपागतौ ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर तिर्यंचोंकी नाना योनियोंमें चिरकाल तक भ्रमण कर दोनों बड़ी कठिनतासे मनुष्य पर्याय प्राप्त कर तापस हुए ॥१४॥


बृहज्जटौ बृहत्कायौ फलपर्णादिभोजिनौ । तपोभिः कर्शितौ तीव्रैः कुज्ञाने द्वौ मृतौ च तौ ॥१५॥

अर्थ: वहाँ वे बड़ी-बड़ी जटाएँ रखाये हुए थे, डील-डौलके विशाल थे, फल तथा पत्ते आदिका भोजन करते थे और तीव्र तपस्यासे दुर्बल हो रहे थे । मिथ्याज्ञानके समय ही दोनोंकी मृत्यु हुई ॥१५॥


क्रमादरिंजये जातावश्विन्याः कुक्षिसंभवौ । पुत्रौ वह्निकुमारस्य विजयार्द्धस्य दक्षिणे ॥१६॥

अर्थ: दोनों ही मरकर विजयार्ध पर्वतके दक्षिणमें वह्निकुमार विद्याधरकी अश्विनी नामा स्त्रीकी कुक्षिसे दो पुत्र हुए ॥१६॥


आशुकारासुराकाराविमौ जगति विश्रुतौ । हस्तप्रहस्तनामानौ सचिवौ रक्षसां विभोः ॥१७॥

अर्थ: ये दोनों ही शीघ्रतासे कार्य करनेवाले असुरोंके समान आकारके धारक थे, जगत्में अतिशय प्रसिद्ध थे तथा आगे चलकर रावणके हस्त, प्रहस्त नामक मन्त्री हुए थे ॥१७॥


पूर्वौ तु प्रच्युतौ नाकात् सुमनुष्यत्वमागतौ । गृहाश्रमे तपः कृत्वा पुनर्जातौ सुरोत्तमौ ॥१८॥

अर्थ: पहले जिनका कथन कर आये हैं ऐसे इन्धक और पल्लवक स्वर्गसे च्युत होकर उत्तम मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुए । तदनन्तर गृहस्थाश्रममें ही तपकर दोनों उत्तम देव हुए ॥१८॥


पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टौ स्वर्गादिन्धकपल्लवौ । किष्कुसंज्ञे पुरे जातौ नलनीलौ महाबलौ ॥१९॥

अर्थ: फिर पुण्यका क्षय होनेसे स्वर्गसे च्युत हो किष्कु नामक नगरमें महाबलके धारक नल और नील हुए ॥१९॥


यत्तद्धस्तप्रहस्ताभ्यां नलनीलौ भवान्तरे । निहतौ फलमेतस्य परावृत्य तदागतम् ॥२०॥

अर्थ: हस्त और प्रहस्तने भवान्तरमें जो नल और नीलको मारा था इसका फल लौटकर इस भवमें उन्हींको प्राप्त हुआ अर्थात् उनके द्वारा वे मारे गये ॥२०॥


हतवान् हन्यते पूर्वं पालकः पाल्यतेऽधुना । औदासीन्यमुदासीने जायते प्राणधारिणाम् ॥२१॥

अर्थ: पूर्वभवमें जो जिसे मारता है वह इस भवमें उसके द्वारा मारा जाता है, पूर्वभवमें जो जिसकी रक्षा करता है वह इस भवमें उसके द्वारा रक्षित होता है तथा पूर्वभवमें जो जिसके प्रति उदासीन रहता है वह इस भवमें उसके प्रति उदासीन रहता है ॥२१॥


यं वीक्ष्य जायते कोपो दृष्टकारणवर्जितः । निःसंदिग्धं परिज्ञेयः स रिपुः पारलौकिकः ॥२२॥

अर्थ: जिसे देखकर अकारण क्रोध उत्पन्न होता है उसे निःसन्देह परलोक सम्बन्धी शत्रु जानना चाहिए ॥२२॥


यं वीक्ष्य जायते चित्तं प्रह्लादि सह चक्षुषा । असंदिग्धं सुविज्ञेयो मित्रमन्यत्र जन्मनि ॥२३॥

अर्थ: और जिसे देखकर नेत्रोंके साथ-साथ मन आह्लादित हो जाता है उसे निःसन्देह पूर्वभवका मित्र जानना चाहिए ॥२३॥


क्षुब्धोर्मिणि जले सिन्धोः शीर्णपोतं झषादयः । स्थले म्लेच्छाश्च बाधन्ते यत्तद्दुःकृतजं फलम् ॥२४॥

अर्थ: समुद्रके लहराते जलमें जर्जर नाववाले मनुष्यको जो मगर, मच्छ आदि बाधा पहुँचाते हैं तथा स्थलमें म्लेच्छ पीड़ा पहुँचाते हैं वह सब पापकर्मका फल है ॥२४॥


मत्तैर्गिरिनिभैर्नागैर्योधैर्बहुविधायुधैः । सुवेगैर्वाजिभिर्दृप्तैर्भृत्यैश्च कवचावृतैः ॥२५॥

विग्रहेऽविग्रहे वापि निःप्रमादस्य संततम् । जन्तोः स्वपुण्यहीनस्य रक्षा नैवोपजायते ॥२६॥

अर्थ: पर्वतोंके समान मदोन्मत्त हाथियों, नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले योद्धाओं, तीव्र वेगके धारक घोड़ों एवं कवच धारण करनेवाले अहंकारी भृत्योंके साथ युद्ध हो अथवा नहीं हो और आप स्वयं सदा प्रमादरहित सावधान रहे तो भी पुण्यहीन मनुष्यकी रक्षा नहीं होती ॥२५-२६॥


निरस्तमपि निर्यन्तं यत्र तत्र स्थितं परम् । तपोदानानि रक्षन्ति न देवा न च बान्धवः ॥२७॥

अर्थ: इसके विपरीत पुण्यात्मा मनुष्य जहाँसे हटता है, जहाँसे बाहर निकलता है अथवा जहाँ स्थिर रहता है वहाँ तप तथा दान ही उसकी रक्षा करते हैं, यथार्थमें न देव रक्षा करते हैं और न भाई-बन्धु ही ॥२७॥


दृश्यते बन्धुमध्यस्थ पित्राप्यालिङ्गितो धनी । म्रियमाणोऽतिशूरश्च कोऽन्यः शक्तोऽभिरक्षितुम् ॥२८॥

अर्थ: देखा जाता है कि जो भाई-बन्धुओंके मध्यमें स्थित है, पिता जिसका आलिंगन कर रहा है, जो धनी और अत्यन्त शूरवीर है वह भी मृत्युको प्राप्त होता है, कोई दूसरा पुरुष उसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता है ॥२८॥


पात्रदानैः व्रतैः शीलैः सम्यक्त्वपरितोषितैः । विग्रहेऽविग्रहे वापि रक्ष्यते रक्षितैर्नरः ॥२९॥

अर्थ: युद्ध हो चाहे न हो सम्यग्दर्शनके साथ-साथ अच्छी तरह पाले हुए पात्रदान, व्रत तथा शील ही इस मनुष्यकी रक्षा करते हैं ॥२९॥


दयादानादिना येन धर्मो नोपार्जितः पुरा१ । जीवितं चेष्यते दीर्घं वाञ्छा तस्यातिनिःफला ॥३०॥

अर्थ: जिसने पूर्व पर्यायमें दया, दान आदि के द्वारा धर्मका उपार्जन नहीं किया है और फिर भी दीर्घ जीवनकी इच्छा करता है सो उसकी वह इच्छा अत्यन्त निष्फल है ॥३०॥


न विनश्यन्ति कर्माणि जनानां तपसा विना । इति ज्ञात्वा क्षमा कार्या विपश्चिद्भिररिष्वपि ॥३१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि ‘तपके बिना मनुष्योंके कर्म नष्ट नहीं होते’ यह जानकर विज्ञ पुरुषोंको शत्रुओंपर भी क्षमा करनी चाहिए ॥३१॥


एष ममोपकरोति सुचेताः दुष्टतरोऽपकरोति ममायम् । बुद्धिरियं निपुणा न जनानां कारणमत्र निजार्जितकर्म ॥३२॥

अर्थ: यह उत्तम हृदयका धारक पुरुष मेरा उपकार करता है और यह अतिशय दुष्ट मनुष्य मेरा अपकार करता है। लोगोंको ऐसा विचार करना अच्छा नहीं है क्योंकि इसमें अपने ही द्वारा अर्जित कर्म कारण हैं ॥३२॥


इत्यधिगम्य विचक्षणमुख्यैर्बाह्यसुखासुखगौणनिमित्तैः । रागतरं कलुषं च निमित्तं कृत्यमपोज्झितकुत्सितचेष्टैः ॥३३॥

अर्थ: ऐसा जानकर जिन्होंने सुख-दुःखके बाह्य निमित्तोंको गौण कर खोटी चेष्टाओंका परित्याग कर दिया है ऐसे श्रेष्ठ विद्वानोंको निमित्त कारणोंमें तीव्र राग अथवा दोष नहीं करना चाहिए ॥३३॥


भूविवरेषु निपातमुपैति ग्रावणि सज्जति गच्छति सर्पम् । संतमसा पिहिते पथि नेत्री नो रविणा जनितप्रकटत्वे ॥३४॥

अर्थ: गाढ़ अन्धकारके द्वारा आच्छादित मार्ग जब सूर्यके द्वारा प्रकाशित हो जाता है तब नेत्रवान् मनुष्य न तो पृथ्वीके गड्ढोंमें गिरता है; न पत्थर-पर टकराता है और न सर्प ही को प्राप्त होता है ॥३४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हस्तप्रहस्तनलनीलपूर्वभवानुकीर्त्तनं नामैकोनषष्टितमं पर्व ॥५९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यकथित पद्मपुराणमें हस्त-प्रहस्त और नल-नीलके पूर्वभवोंका वर्णन करनेवाला उनसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५९॥

६०. षष्टितमं पर्व (विद्यालाभो)

हस्तप्रहस्तसद्वीरौ विज्ञाय निहतौ ततः । अन्येद्युरुद्धुरक्रोधा बहवो योद्धुमुद्यताः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर हस्त और प्रहस्त वीरोंको मरा सुन दूसरे दिन उत्कट क्रोधसे भरे बहुत-से योद्धा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥१॥


मारीचः सिंहजघनः स्वयंभुः शम्भुरूर्जितः । शुकसारणचन्द्रार्कजगद्वीभत्सनिःस्वनाः ॥२॥

ज्वरोग्रनक्रमकरा वज्राख्योद्यामनिष्ठुराः । गंभीरनिनदाद्याश्च संनद्धा रमसान्विताः ॥३॥

सिंहसंवृद्धवाहोढस्यन्दनार्पितमूर्तयः । क्षोभयन्तः परिप्राप्ताः कपिकेतुवरूथिनीम् ॥४॥

अर्थ: जिनके कुछ नाम इस प्रकार हैं - मारीच, सिंहजघन, स्वयम्भू, शम्भु, अजित, शुक, सारण, चन्द्र, अर्क, जगद्वीभत्स, निःस्वन, ज्वर, उग्र, नक्र, मकर, वज्राख्य, उद्याम, निष्ठुर और गम्भीर, निनद आदि । ये सभी योद्धा कवच धारण कर युद्धके लिए तैयार थे, वेगसे सहित थे, सिंहों और परिपुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर आरूढ़ थे तथा वानरवंशियोंकी सेनाको क्षोभित करते हुए आ पहुँचे ॥२-४॥


तान् समापततो दृष्ट्वा राक्षसान् पार्थिवान्परान् । इमे वानरवंशाग्र्याः पार्थिवा योद्धुमुद्यताः ॥५॥

अर्थ: उन राक्षसवंशी उत्तमोत्तम राजाओंको आते देख वानरवंशके प्रधान राजा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥५॥


मदनाङ्कुरसंतापप्रस्थिताक्रोशनेन्दनाः । दुरितानघपुष्पास्त्रविघ्नप्रीतिंकरादयः ॥६॥

अर्थ: इनमें-से कुछके नाम इस प्रकार हैं - मदन, अंकुर, सन्ताप, प्रस्थित, आक्रोश, नन्दन, दुरित, अनघ, पुष्पास्त्र, विघ्न और प्रीतिकर आदि ॥६॥


अन्योन्याहूतमेतेषाममवत् परमं रणम् । कुर्वद्भिर्जटिलं व्योम शस्त्रैर्बहुविधैर्घनम् ॥७॥

अर्थ: आकाशको अत्यन्त जटिल करनेवाले नाना प्रकारके शस्त्रोंसे दोनों पक्षके लोगोंका एक दूसरेको ललकार-ललकारकर भयंकर युद्ध हुआ ॥७॥


अभिलष्यति संतापो मारीचं समरे तदा । प्रथितः सिंहजघनमुद्यानं विघ्नसंज्ञकः ॥८॥

आक्रोशः सारणं पापः शुकाख्यं नन्दनो ज्वरम् । तेषां स्पर्द्धावतामेवं युद्धं जातं नियन्त्रितम् ॥९॥

अर्थ: उस समय युद्धमें सन्ताप, मारीचको चाह रहा था; प्रथित, सिंहजघनको; विघ्न, उद्यामको; आक्रोश, सारणको; पाप, शुकको और नन्दन, ज्वरको; देख रहा था । इस प्रकार स्पर्धासे भरे हुए इन सब योद्धाओंका विकट युद्ध हुआ ॥८-९॥


ततः क्लिष्टेन संतापो मारीचेन निपातितः । नन्दनेन हतः कृच्छ्राज्ज्वरः कुन्तेन वक्षसि ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर क्लेशसे भरे हुए मारीचने सन्तापको गिरा दिया । नन्दनने वक्षःस्थलमें भालेका प्रहार कर बड़े कष्टसे ज्वरको मार डाला ॥१०॥


प्रथितः सिंहकटिना विघ्नश्चोद्दामकीर्तिना । हतोऽथ युद्धसंहारः सवितास्तं समागमत् ॥११॥

अर्थ: सिंहजघनने प्रथितको और उद्यामने विघ्नको मार गिराया । तदनन्तर सूर्य अस्त हुआ और उस दिनके युद्धका उपसंहार हुआ ॥११॥


श्रुत्वा स्वं स्वं हतं नाथं निमग्नाः शोकसागरे । स्त्रियो विभावरीमेतामनन्तामिव मेनिरे ॥१२॥

अर्थ: अपने-अपने पतिको मरा सुन स्त्रियाँ शोकरूपी सागरमें निमग्न हुईं और उस रात्रिको अनन्त - बहुत भारी मानने लगीं ॥१२॥


अन्येद्युः संततक्रोधाः सामन्ता योद्धुमुद्यताः । वज्राख्यः क्षपितारिश्च मृगेन्द्रदमनो विधिः ॥१३॥

शम्भुः स्वयंभुश्चन्द्रार्कास्तथा वज्रोदरादयः । राक्षसाधिपवर्गीयास्तेभ्योऽन्ये वानरध्वजाः ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर दूसरे दिन तीव्र क्रोधसे भरे वज्राख्य, क्षपितारि, मृगेन्द्रदमन, विधि, शम्भु, स्वयम्भु, चन्द्र, अर्क तथा वज्रोदर आदि राक्षस पक्षके और उनसे भिन्न दूसरे वानर पक्षके योद्धा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥१३-१४॥


जन्मान्तरार्जितक्रोधकर्मबन्धोदयेन ते । योद्धुं परममासक्ता निजजीवितनिस्पृहाः ॥१५॥

अर्थ: जन्मान्तरोंमें संचित क्रोध कर्मके तीव्र उदयसे वे अपने जीवनसे निःस्पृह हो भयंकर युद्ध करनेमें जुट पड़े ॥१५॥


क्षपितारिः समाहूतः संक्रोधेन महारुषा । मृगारिदमनो बलिना संहूतो बाहुशालिना ॥१६॥

विधिर्वितापिनाऽन्योन्यमेवं जाते महाहवे । भटेष्वज्ञातसंज्ञेषु निपतत्सूपलेष्विव ॥१७॥

अर्थ: महाक्रोधसे भरे संक्रोधने क्षपितारिको ललकारा, भुजाओंसे सुशोभित बलीने सिंहदमनको बुलाया और वितापिने विधिको पुकारा। इस प्रकार परस्पर महायुद्ध होनेपर जिनके नामोंका पता नहीं था ऐसे अनेक योद्धा मर-मरकर ऐसे गिरने लगे मानो पत्थर ही बरस रहे हों ॥१६-१७॥


शार्दूलस्ताडितः पूर्वं वज्रोदरमताडयत् । सक्रोधं सुचिरं युद्धं क्षपितारिरमारयत् ॥१८॥

अर्थ: जिसपर पहले प्रहार किया गया था ऐसे शार्दूलने वज्रोदरको मारा। दीर्घकाल तक युद्ध करनेवाले संक्रोधको क्षपितारिने मार डाला ॥१८॥


विशालद्युतिनामा च शम्भुना विनिपातितः । मृत्युं स्वयंभुवा नीतो विजयो यष्टिताडितः ॥१९॥

वितापिर्विधिना ध्वस्तो गदाघातेन कृच्छ्रतः । सामन्तैरिति हन्यन्ते सामन्ताः शतशस्तदा ॥२०॥

अर्थ: शम्भुने विशालद्युतिको मार गिराया, स्वयम्भूने यष्टिकी चोटसे विजयको मृत्यु प्राप्त करा दी और विधिने गदाके प्रहारसे वितापिको बड़ी कठिनाईसे मारा था । इस प्रकार उस समय सामन्तोंके द्वारा सैकड़ों सामन्त मारे गये थे ॥१९-२०॥


अवसीदत्ततो दृष्ट्वा स्वं किष्किन्धपतिर्बलम् । परमक्रोधसंभारो यावत्संनद्धुमुद्यतः ॥२१॥

अञ्जनातनयस्तावत्तत्स्वसैन्येन युग्महीम् । वारणोढं रथं हेममारूढो योद्धुमुद्ययौ ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी सेनाको नष्ट होती देख परमक्रोधसे भरा सुग्रीव जबतक कवच धारण करनेके लिए उद्यत हुआ तबतक अपनी सेनासे पृथिवीको व्याप्त करनेवाला हनुमान् हाथियोंसे जुते स्वर्णमय रथपर सवार हो युद्ध करनेके लिए उठ खड़ा हुआ ॥२१-२२॥


रक्षःसामन्तसंघातो दृष्ट्वैव पवनात्मजम् । गवामिव गणो भ्रान्तस्त्रस्तः केशरिदर्शनात् ॥२३॥

अर्थ: जिस प्रकार सिंहको देखकर गायोंका समूह भयभीत हो इधर-उधर भागने लगता है, उसी प्रकार हनुमान्‌को देख राक्षस-सामन्तोंका समूह भयभीत हो इधर-उधर भागने लगा ॥२३॥


ऊचुश्च राक्षसाः सोऽयं हनूमान् वानरध्वजः । अद्यैव विधवा योषाः परं बह्वीः करिष्यति ॥२४॥

अर्थ: राक्षस परस्पर कहने लगे कि यह हनुमान् आज ही अनेक स्त्रियोंको विधवाएँ कर देगा ॥२४॥


माली तस्याग्रतो भूतो युद्धार्थी राक्षसोत्तमः । समुद्धृत्य शरं तस्य पुरो वातिरजायत ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धका अभिलाषी राक्षसोंका शिरोमणि, माली हनुमान्‌के आगे आया सो हनुमान् भी बाण निकालकर उसके सामने जा पहुँचा ॥२५॥


तयोरभून्महद्युद्धं शरैराकर्णसंहितैः । उपात्तसाधुनिस्वानं क्रमेण परमोद्धतम् ॥२६॥

अर्थ: कानों तक खींच-खींचकर चढ़ाये हुए बाणोंसे उन दोनोंका ऐसा महायुद्ध हुआ कि जिसमें क्रम-क्रमसे ठीक-ठीक शब्दका उच्चारण हो रहा था, तथा जो परम उद्धततासे युक्त था ॥२६॥


सचिवाः सचिवैः साकं रथिनो रथिभिस्तथा । सादिनो सादिभिः सत्रा लग्ना युक्तरणोद्यताः ॥२७॥

अर्थ: योग्य युद्ध करनेमें तत्पर सचिव सचिवोंके साथ, रथी रथियोंके साथ और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझ पड़े ॥२७॥


मालिनं नष्टमालोक्य शक्त्या पवनजन्मनः । वज्रोदरोऽभवत्तस्य पुरः परमविक्रमः ॥२८॥

अर्थ: हनुमान्‌की शक्तिसे मालीको नष्ट हुआ देख परम पराक्रमी वज्रोदर उसके सामने आया ॥२८॥


चिरंकृतरणोऽथायं वातिना विरथीकृतः । रथमन्यं समारुह्य मारुतिं समधावत ॥२९॥

अर्थ: चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद हनुमान् ने जब उसे रथरहित कर दिया तब वह दूसरे रथपर सवार हो हनुमान्‌की ओर दौड़ा ॥२९॥


कृत्वा तं विरथं भूयो मारुतिः परमोदयः । उपर्यवाहयत्तस्य रथं मारुतरंहसम् ॥३०॥

अर्थ: परम अभ्युदयके धारक हनुमान्ने उसे पुनः रथरहित कर दिया और उसके ऊपर वायुके समान वेगशाली अपना रथ चढ़ा दिया ॥३०॥


स्यन्दनोद्वाहिनागांह्रिचूर्णितः स रणाजिरे । अमुञ्चत द्रुतं प्राणान् हुङ्कारेणापि वर्जितः ॥३१॥

अर्थ: जिससे रथको खींचनेवाले हाथियोंके पैरोंसे चूर-चूर होकर उसने रणांगणमें शीघ्र ही प्राण छोड़ दिये । अब हुँकारसे भी रहित हो गया ॥३१॥


ततोऽस्याभिमुखं तस्थौ स्वपक्षवधकोपितः । जम्बूमालीति विख्यातो रावणस्य सुतो बली ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर रावणका जम्बूमाली नामका प्रसिद्ध बलवान् पुत्र, अपने पक्षके लोगोंकी मृत्युसे कुपित हो हनुमान्के सामने खड़ा हुआ ॥३२॥


असावुत्थितमात्रश्च ध्वजं वानरलाञ्छनम् । चिच्छेद वायुपुत्रस्य चन्द्रार्द्धसदृशेषुणा ॥३३॥

अर्थ: इसने खड़े होते ही, अर्धचन्द्र सदृश बाणके द्वारा हनुमान् की वानरचिह्नित ध्वजा छेद डाली ॥३३॥


केतुकल्पनहृष्टेन तस्य मारुतिना धनुः । कवचं च ततो नीतं पुराणतृणशीर्णताम् ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर ध्वजाके छेदसे हर्षित हुए हनुमान्ने उसके धनुष और कवचको जीर्ण तृणके समान जर्जरताको प्राप्त करा दी अर्थात् उसका धनुष और कवच दोनों ही तोड़ दिये ॥३४॥


ततस्तनूदरीसूनुर्वध्वान्यं कवचं दृढम् । अताडयन्मरुत्सूनुं तीक्ष्णैर्वक्षसि सायकैः ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर मन्दोदरीके पुत्र जम्बूमालीने तत्काल ही दूसरा मजबूत कवच धारण कर तीक्ष्ण बाणों द्वारा हनुमान्के वक्षःस्थलपर प्रहार किया ॥३५॥


बालनीलोत्पलम्लाननालस्पर्शसमुद्भवैः । असेवत स तैः सौख्यं धरणीधरधीरधीः ॥३६॥

अर्थ: सो पहाड़के समान अत्यन्त धीर बुद्धिको धारण करनेवाले हनुमान्ने उन बाणोंसे ऐसे सुखका अनुभव किया मानो बाल नीलकमलके मुरझाये हुए नालोंके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुखका ही अनुभव कर रहा हो ॥३६॥


अथास्य वायुपुत्रेण रथयुक्तं महोद्धतम् । मुक्तं सिंहशतं षष्ठीचन्द्रवक्रेण पत्रिणा ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने षष्ठीके चन्द्रमाके समान कुटिल बाणके द्वारा जम्बूमालीके रथमें जुते हुए महा उद्धत सौ सिंह छोड़ दिये अर्थात् एक ऐसा बाण चलाया कि उससे जम्बूमालीके रथमें जुते सौ सिंह छूट गये ॥३७॥


दंष्ट्राकरालवदनैः स्फुरल्लोहितलोचनैः । तैरुत्पत्य निजं सैन्यं सकलं विह्वलीकृतम् ॥३८॥

अर्थ: जिनके मुख दाढ़ोंसे भयंकर थे तथा लाल-लाल आँखें चमक रही थीं ऐसे उन सिंहोंने उछलकर अपनी समस्त सेनाको विह्वल कर दिया ॥३८॥


महाकल्लोलसंकाशास्तस्य सैन्यार्णवस्य ते । क्रूरनक्रसमाना वा जाताः प्रबलमूर्तयः ॥३९॥

अर्थ: उस सेनारूपी सागरके मध्यमें वे सिंह बड़ी-बड़ी तरंगोंके समान जान पड़ते थे अथवा अतिशय बलवान् क्रूर मगर-मच्छोंके समान दिखाई देते थे ॥३९॥


चण्डसौदामिनीदण्डमण्डलाकारहारिणः । सैन्यमेघसमूहं ते परमं क्षोभमानयन् ॥४०॥

अर्थ: चमकते हुए विद्युद्दण्डके समूहका आकार धारण करनेवाले उन सिंहोंने सेनारूपी मेघोंके समूहको अत्यन्त क्षोभ प्राप्त कराया था ॥४०॥


रणसंसारचक्रेऽसौ सैन्यलोकः समन्ततः । सिंहकर्मभिरत्यर्थमहादुःखवशीकृतः ॥४१॥

अर्थ: युद्धरूपी संसारचक्रके बीचमें सैनिकरूपी प्राणी, सिंहरूपी कर्मोंके द्वारा सब ओरसे अत्यन्त दुःखी किये गये थे ॥४१॥


वाजिनो वारणा मत्ता रथारोहाश्च विह्वलाः । रणव्यापारनिर्मुक्तार्नेशुर्दश दिशस्ततः ॥४२॥

अर्थ: घोड़े, मदोन्मत्त हाथी और रथोंके सवार - सभी लोग विह्वल हो युद्ध सम्बन्धी कार्य छोड़ दशों दिशाओंमें भागने लगे ॥४२॥


ततो नष्टेषु सर्वेषु सामन्तेषु यथायथम् । अपश्यद्रावणं वातिदूरेऽवस्थितमग्रतः ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर यथायोग्य रीतिसे सब सामन्तोंके भाग जानेपर हनुमान्ने कुछ दूर सामने स्थित रावणको देखा ॥४३॥


आरुह्य च रथं सिंहैर्युक्तं परमभासुरैः । अधावद्बाणमुद्धृत्य विंशत्यर्द्धमुखं प्रति ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर वह अत्यन्त देदीप्यमान सिंहोंसे युक्त रथपर सवार हो बाण खींचकर रावणकी ओर दौड़ा ॥४४॥


दशास्यस्त्रासितं वीक्ष्य निजं केसरिभिर्बलम् । समीपं चाञ्जनासूनुं कृतान्तमिव दुर्द्धरम् ॥४५॥

चक्रे योद्धुमभिप्रायं यावत्संनाहतत्परः । तावन्महोदरोऽस्यान्ते संरम्भेण समुद्ययौ ॥४६॥

अर्थ: अपनी सेनाको सिंहोंके द्वारा त्रासित तथा यमराजके समान दुर्धर हनुमान्को पास आया देख, कवच आदि धारण करनेमें तत्पर रावणने ज्योंही युद्धका विचार किया त्योंही उसके पास बैठा महोदर क्रोधपूर्वक उठ खड़ा हुआ ॥४५-४६॥


महोदरस्य च वातेश्च वर्त्तते यावदाहवः । तावत्ते हरयः प्राज्ञैर्गृहीताः स्वामिभिः शनैः ॥४७॥

अर्थ: इधर जबतक महोदर और हनुमान्का युद्ध होता है तबतक वे छूटे हुए सिंह धीरे-धीरे बुद्धिमान् स्वामियोंके द्वारा पकड़ लिये गये ॥४७॥


वशीभूतेषु सिंहेषु जाता संतो महारुषः । वायुपुत्रं समुत्पेतुः समस्ता राक्षसध्वजाः ॥४८॥

अर्थ: सिंहोंके वशीभूत होनेपर जिनका तीव्र क्रोध बढ़ रहा था ऐसे समस्त राक्षस यद्यपि पवनपुत्रपर टूट पड़े ॥४८॥


तथाप्यनिलसूनुस्तान् मुञ्चतः शरसंहतीः । दधार मण्डलीभूतान् पतत्रिसचिवैः कृती ॥४९॥

अर्थ: तथापि अतिशय कुशल हनुमान्ने, बाणसमूहको छोड़नेवाले उन समस्त राक्षसोंको बाणरूपी मन्त्रियोंके द्वारा रोक लिया ॥४९॥


ते शिलीमुखसंघाताः प्रहितास्तस्य राक्षसैः । संयतस्य यथाऽऽक्रोशा नाभवन्कम्पकारिणः ॥५०॥

अर्थ: जिस प्रकार दुर्जन मनुष्योंके द्वारा कहे हुए दुर्वचन संयमी मनुष्यके कम्पन उत्पन्न करनेवाले नहीं होते उसी प्रकार राक्षसोंके द्वारा छोड़े हुए बाणोंके समूह हनुमान्के कम्पन उत्पन्न करनेवाले नहीं हुए अर्थात् धीरवीर हनुमान्, राक्षसोंके बाणोंसे कुछ भी विचलित नहीं हुआ ॥५०॥


रक्षोभिर्वेष्टितं दृष्ट्वा तैस्तमतिभूरिभिः । इमे वानरवर्गीणाः समराय समुद्ययुः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर हनुमान्को बहुत-से राक्षसोंके द्वारा घिरा देख वानर पक्षके ये योद्धा युद्धके लिए उद्यत हुए ॥५१॥


सुषेणो नलनीलौ च प्रीतिंकरो विराधितः । संत्रासको हरिकटिः सूर्यज्योतिर्महाबलः ॥५२॥

जाम्बूनदसुताद्याश्च सिंहेभाश्वयुतैः रथैः । कृच्छ्राद्रावणसैन्यस्य निवारयितुमुद्यताः ॥५३॥

अर्थ: सुषेण, नल, नील, प्रीतिकर, विराधित, सन्त्रासक, हरिकटि, सूर्यज्योति, महाबल और जाम्बूनदके पुत्र आदि । ये सब सिंह, हाथी और घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर सवार हो बड़ी कठिनाईसे रावणकी सेनाको रोकनेके लिए उद्यत हुए ॥५२-५३॥


तैः समापतितैः सैन्यं दशग्रीवस्य सर्वतः । परीषहैरिव ध्वस्तं महातुच्छधृतं व्रतम् ॥५४॥

अर्थ: जिस प्रकार किसी अत्यन्त तुच्छ पुरुषके द्वारा धारण किया हुआ व्रत परिषहोंके द्वारा ध्वस्त - नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है उसी प्रकार सब ओरसे आते हुए वानरपक्षके योद्धाओंसे रावणकी सेना ध्वस्त हो गयी ॥५४॥


आत्मीयानाकुलान् दृष्ट्वा युयुत्सुं च दशाननम् । आदित्यश्रवणो योद्धुमुद्गतो सुमहाबलः ॥५५॥

अर्थ: अपने पक्षके लोगोंको व्याकुल देख रावण युद्ध करनेका अभिलाषी हुआ, सो उसे देख महाबलवान् भानुकर्ण ( कुम्भकर्ण ) युद्ध करनेके लिए उठा ॥५५॥


दृष्ट्वा तमुद्गतं वीरं ज्वलन्तं रणतेजसा । सुषेणादीनिमे प्रापुः साधारयितुमाकुलाः ॥५६॥

अर्थ: रणके तेजसे देदीप्यमान वीर भानुकर्णको उठा देख, ये लोग सुषेण आदिको सहारा देनेके लिए पहुँचे ॥५६॥


इन्दुरश्मिर्जयस्कन्दश्चन्द्राभो रतिवर्द्धनः । अङ्गोऽङ्गदोऽथ संमेदः कुमुदः शशिमण्डलः ॥५७॥

बलिश्चण्डतरङ्गश्च सारो रत्नजटी जयः । बेलाक्षेपी वसन्तश्च तथा कोलाहलादयः ॥५८॥

अर्थ: चन्द्ररश्मि, जयस्कन्द, चन्द्राभ, रतिवर्धन, अंग, अंगद, सम्मेद, कुमुद, चन्द्रमण्डल, बलि, चण्डतरंग, सार, रत्नजटी, जय, बेलाक्षेपी, वसन्त, तथा कोलाहल आदि ॥५७-५८॥


ततस्ते बहुबलत्वेन प्रवीराः पद्मपक्षिणः । लग्ना महाहवं कर्तुं शत्रुसामन्तदुःसहम् ॥५९॥

अर्थ: ये सब राम पक्षके अत्यन्त बलवान् योद्धा, ऐसा महायुद्ध करने लगे कि जो शत्रु-सामन्तोंको अत्यन्त दुःसह था ॥५९॥


क्रुद्धेन कुम्भकर्णेन ततस्ते रणपामनाः । विद्यया स्वापिताः सर्वे दर्शनावरणीजया ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर रणकी खाजसे युक्त उन सब वीरोंको क्रोधसे भरे भानुकर्णने निद्रा नामा विद्याके द्वारा सुला दिया ॥६०॥


निद्राघूर्णितनेत्राणां तेषां शस्त्रावसंगिनाम् । करेभ्यः सायकाः पेतुः शिथिलेभ्यः समन्ततः ॥६१॥

अर्थ: तत्पश्चात् निद्रासे जिनके नेत्र घूम रहे थे ऐसे शस्त्रोंको धारण करनेवाले उन वीरोंके हाथ सब ओरसे शिथिल पड़ गये तथा उनसे अस्त्र-शस्त्र नीचे गिरने लगे ॥६१॥


निद्राविद्राणसंग्रामानेतानव्यक्तचेतनान् । दृष्ट्वाऽमुञ्चत सुग्रीवो विद्यां द्राक्प्रतिबोधिनीम् ॥६२॥

अर्थ: निद्राके कारण जिनका युद्ध बन्द हो गया था तथा जिनकी चेतना अव्यक्त हो चुकी थी ऐसे उन सबको देख सुग्रीवने शीघ्र ही प्रतिबोधिनी नामकी विद्या छोड़ी ॥६२॥


प्रतिबुद्धास्तया तेऽथ सुतरां जाततेजसः । हनूमदादयो योद्धुं प्रवृत्ताः संकुलं परम् ॥६३॥

अर्थ: तदनन्तर उस विद्याके प्रभावसे प्रतिबुद्ध होनेके कारण जिनका तेज अत्यन्त बढ़ गया था ऐसे हनुमान् आदि वीर अत्यन्त भयंकर युद्ध करनेके लिए प्रवृत्त हुए ॥६३॥


शाखाकेसरिचिह्नानां बलमत्यर्थपुष्कलम् । छत्रासिपत्रसंकीर्णमच्छिन्नरणलालसम् ॥६४॥

स्पर्द्धमानं समालोक्य क्षुब्धसागरसंनिभम् । अवस्थां च स्ववाहिन्याः परिप्राप्तामसुन्दरीम् ॥६५॥

उत्सेहे रावणो योद्धुं प्रणम्य च तमिन्द्रजित् । कृताञ्जलिरिदं वाक्यमभाषत महाद्युतिः ॥६६॥

अर्थ: वानरवंशियोंकी वह सेना बहुत बड़ी थी, छत्र, खड्ग तथा वाहनोंसे व्याप्त थी, उसकी युद्धकी लालसा समाप्त नहीं हुई थी, उत्तरोत्तर स्पर्धा करनेवाली थी, और क्षोभको प्राप्त हुए सागरके समान जान पड़ती थी। इसके विपरीत रावणकी सेनाकी दशा अत्यन्त अशोभनीय हो रही थी सो वानरवंशियोंकी सेना तथा अपनी सेनाकी दशा देख रावण युद्धके लिए उत्साही हुआ सो महादीप्तिका धारक इन्द्रजित् प्रणाम कर तथा हाथ जोड़कर यह कहने लगा कि ॥६४-६६॥


तात तात न ते युक्तं संप्राप्तं मयि तिष्ठति । निष्फलत्वं हि मे जन्म सत्येवं प्रतिपद्यते ॥६७॥

अर्थ: हे तात ! हे तात ! मेरे रहते हुए इस समय आपका युद्धके लिए तत्पर होना उचित नहीं है क्योंकि ऐसा होनेपर मेरा जन्म निष्फलताको प्राप्त होता है ॥६७॥


नखच्छेद्ये तृणे किं वा परशोरुचिता गतिः । ततो भव सुविश्रब्धः करोम्येष तवेप्सितम् ॥६८॥

अर्थ: अरे ! जो तृण नखके द्वारा छेदा जा सकता है वहाँ परशुका प्रयोग करना क्या उचित है ? इसलिए आप निश्चिन्त रहिए आपका मनोरथ मैं पूर्ण करता हूँ ॥६८॥


इत्युक्त्वा मुदितोऽत्यन्तमारुह्य गिरिसंनिभम् । त्रैलोक्यकण्टकाभिख्यं गजेन्द्रं परमप्रियम् ॥६९॥

गृहीतादरसर्वस्वो महासचिवसंगतः । ऋद्धयाखण्डलसंकाशः प्रवीरो योद्धुमुद्यतः ॥७०॥

अर्थ: इतना कहकर अत्यधिक प्रसन्नतासे भरा इन्द्रजित् पर्वतके समान त्रैलोक्यकण्टक नामक अपने परम प्रिय गजेन्द्रपर सवार होकर युद्धके लिए उद्यत हुआ । उस समय जिसने आदररूपी सर्वस्व ग्रहण किया था, ऐसा वह इन्द्रजित् महामन्त्रियोंसे सहित था, सम्पदासे इन्द्रके समान जान पड़ता था तथा अतिशय धोर-वीर था ॥६९-७०॥


कपिध्वजबलं तेन विविधायुधसंकटम् । ग्रस्तमुत्थितमात्रेण महावीर्येण मानिना ॥७१॥

अर्थ: उस महाबलवान् मानी इन्द्रजित्ने उठते ही नाना शस्त्रोंसे भरी वानरोंकी सेना क्षणमात्रमें ग्रस ली - दबा दी ॥७१॥


किष्किन्धाधिपतेः सैन्ये न सोऽस्ति कपिकेतनः । यो न शक्रजिता विद्धः शरैराकर्णसंहितैः ॥७२॥

अर्थ: सुग्रीवकी सेनामें ऐसा एक भी वानर नहीं था जिसे इन्द्रजित्ने कान तक खिंचे हुए बाणोंसे घायल नहीं किया हो ॥७२॥


किमयं शक्रजिन्नायं शक्रो वह्निरयं नु किम् । उतायमपरो भानुरिति वाचः समुद्ययुः ॥७३॥

अर्थ: उस समय लोगोंके मुखसे इस प्रकारके वचन निकल रहे थे कि - यह इन्द्रजित् नहीं है ? किन्तु इन्द्र है ? अथवा अग्निकुमार देव है, अथवा कोई दूसरा सूर्य ही उदित हुआ है ॥७३॥


ग्रस्यमानं निजं सैन्यं वीक्ष्य शक्रजिता ततः । सुग्रीवः स्वयमुद्यातः प्रभामण्डल एव च ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर अपनी सेनाको इन्द्रजित्के द्वारा दबी देख स्वयं सुग्रीव और भामण्डल युद्धके लिए उठे ॥७४॥


तद्भटानामभूद्युद्धमन्योन्याह्वानसंकुलम् । शस्त्रान्धकारिताकाशमनपेक्षितजीवितम् ॥७५॥

अर्थ: तत्पश्चात् उनके योद्धाओंमें ऐसा युद्ध हुआ कि जो परस्परके बुलानेके शब्दसे व्याप्त था, शस्त्रोंके द्वारा जिसमें आकाश अन्धकारयुक्त हो रहा था और जिसमें प्राणोंकी अपेक्षा नहीं थी ॥७५॥


अश्वैरश्वाः समं लग्नाः नागा नागै रथा रथैः । निजनाथानुरागेण महोत्साहा भटा भटैः ॥७६॥

अर्थ: घोड़े घोड़ोंसे, हाथी हाथियोंसे, रथ रथोंसे और अपने स्वामीके अनुरागके कारण महोत्साहसे युक्त पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंसे भिड़ गये ॥७६॥


जगादेन्द्रजितः क्रुद्धः किष्किन्धेशं पुरः स्थितम् । अपूर्वशस्त्रभूतेन स्वरेण गगनस्पृशा ॥७७॥

अर्थ: अथानन्तर क्रोधसे भरा इन्द्रजित् सामने खड़े हुए सुग्रीवको लक्ष्य कर अपूर्व शस्त्रभूत गगनस्पर्शी स्वरसे बोला ॥७७॥


दशास्यशासनं त्यक्त्वा शाखामृगपशो त्वया । क्वाधुना गम्यते पाप मयि कोपमुपागते ॥७८॥

अर्थ: कि अरे ! पशुतुल्य नीच वानर ! पापी ! रावणकी आज्ञा छोड़कर अब तू मेरे कुपित रहते हुए कहाँ जाता है ? ॥७८॥


इन्दीवरनिभेनाद्य सायकेन तवामुना । शिरश्छिनद्मि संरक्षां कुरुतां क्षितिगोचरौ ॥७९॥

अर्थ: आज मैं इस नील कमलके समान श्याम तलवारसे तेरा मस्तक काटता हूँ, भूमिगोचरी राम-लक्ष्मण तेरी रक्षा करें ॥७९॥


किष्किन्धेशस्ततोऽवोचत् किमेभिर्गर्जितैर्मुधा । मानशृङ्गमिदं भग्नं तव पश्य मयाधुना ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर सुग्रीवने कहा कि इन व्यर्थकी गर्जनाओंसे क्या लाभ है ? देख तेरा मानरूपी शिखर मैं अभी ही भग्न करता हूँ ॥८०॥


इत्युक्ते कोपसंभारं वहन्निन्द्रजितोऽद्भुतम् । चापमास्फालयन्नस्य समीपत्वमुपागतः ॥८१॥

अर्थ: इतना कहते ही क्रोधके भारको धारण करनेवाला इन्द्रजित् अद्भुत रूपसे धनुषका आस्फालन करता हुआ सुग्रीवके समीप पहुँचा ॥८१॥


शशिमण्डलसंकाशच्छत्रच्छायानुसेवितः । मुमोच शरसंघातं किष्किन्धाधिपतिं प्रति ॥८२॥

अर्थ: तत्पश्चात् इधर चन्द्रमण्डलके समान छत्रकी छायासे सेवित इन्द्रजित्ने सुग्रीवको लक्ष्य कर बाणोंका समूह छोड़ा ॥८२॥


सोऽप्याकर्णसमाकृष्टान् बाणान्नादोपलक्षितान् । निजरक्षामहादक्षश्चिक्षेपेन्द्रजितं प्रति ॥८३॥

अर्थ: उधर अपनी रक्षा करनेमें अत्यन्त चतुर सुग्रीवने भी कान तक खिंचे तथा शब्दसे युक्त बाण इन्द्रजित्की ओर छोड़े ॥८३॥


तेन बाणसमूहेन संततेन निरन्तरम् । जातं नभस्तलं सर्वं मूर्तियुक्तमिवापरम् ॥८४॥

अर्थ: उन विस्तृत बाणोंके समूहसे निरन्तर व्याप्त हुआ समस्त आकाश ऐसा हो गया मानो मूर्तिधारी दूसरा ही आकाश हो ॥८४॥


मेघवाहनवीरेण प्रभामण्डलसुन्दरः । आहूतो वज्रनक्रश्च विराधितमहीभृता ॥८५॥

अर्थ: उधरसे वीर मेघवाहनने भामण्डलको ललकारा और इधरसे राजा विराधितने वज्रनक्रको पुकारा ॥८५॥


विराधितनरेन्द्रेण वज्रनक्रनरोत्तमः । राजन् वक्षसि चक्रेण भासुरेणाभिपातितः ॥८६॥

अर्थ: गौतम स्वामी श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! राजा विराधितने वज्रनक्र राजाकी छातीपर देदीप्यमान चक्रकी चोट देकर उसे गिरा दिया ॥८६॥


ताडितो वज्रनक्रेण सोऽपि चक्रेण वक्षसि । विना हि प्रतिदानेन महती जायते त्रपा ॥८७॥

अर्थ: इसके बदले वज्रनक्रने भी सँभलकर विराधितकी छातीपर चक्रका प्रहार किया सो ठीक ही है क्योंकि बदला चुकाये बिना बड़ी लज्जा उत्पन्न होती है ॥८७॥


चक्रसंनाहनिष्पेषजन्मवह्निकणोत्करैः । चञ्चदुल्कास्फुलिङ्गौघपिङ्गतां गगनं गतम् ॥८८॥

अर्थ: उस समय चक्र और कवचकी टक्करसे जो अग्निके कण उत्पन्न हुए थे, उनके समूहसे आकाश इस प्रकार पीला हो गया मानो चमकती हुई उल्काओंके तिलगोंके समूहसे ही पीला हो रहा हो ॥८८॥


लङ्कानाथस्य पुत्रेण निरस्त्रः सूर्यनन्दनः । कृतः संग्रामशौण्डेन संग्रामादनिवर्तकः ॥८९॥

अर्थ: युद्ध-निपुण लंकानाथके पुत्र इन्द्रजित्ने सुग्रीवको निःशस्त्र कर दिया फिर भी वह संग्रामसे पीछे नहीं हटा ॥८९॥


तेनापि तस्य वज्रेण सर्वशस्त्रं निराकृतम् । पुण्यानुकूलितानां हि नैरन्तर्यं न जायते ॥९०॥

अर्थ: प्रत्युत इसके विपरीत सुग्रीवने भी वज्रके द्वारा इन्द्रजित्के सर्वशस्त्र दूर कर दिये सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यात्मा जीवोंके किसी कार्यमें अन्तर नहीं पड़ता ॥९०॥


अवतीर्य ततः क्रुद्धो नागादिन्द्रजितो द्रुतम् । सिंहस्यन्दनमारुह्य पिञ्जरीकृतपुष्करम् ॥९१॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोध से भरा इन्द्रजित् शीघ्र ही हाथीसे उतरकर आकाशको पीला करनेवाले सिंहोंके रथपर आरूढ़ हुआ ॥९१॥


समाहितमतिर्नानाविद्यास्त्रगतिपण्डितः । योद्धुमभ्युद्यतो बिभ्रद्रसन्नवमिवाहवे ॥९२॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसकी बुद्धि स्थिर थी, जो नाना विद्यामय अस्त्र-शस्त्रोंके चलानेमें निपुण था और जो युद्धमें मानो नवीन रस धारण कर रहा था ऐसा इन्द्रजित् मायामय युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ ॥९२॥


अस्त्रं घनौघनिर्घोषं संप्रयुज्य सवारुणम् । दिशः किष्किन्धराजस्य चकारालोकवर्जिताः ॥९३॥

अर्थ: प्रथम ही उसने मेघ-समूहके समान गर्जना करनेवाला वारुण अस्त्र छोड़कर सुग्रीवको दिशाओंको प्रकाशसे रहित कर दिया ॥९३॥


तेनापि पवनास्त्रेण कृसछत्रध्वजादिना । तदस्त्रं वारुणं क्वापि नीतं तूलोल्करोपमम् ॥९४॥

अर्थ: इसके बदले सुग्रीवने भी छत्र तथा ध्वजा आदिको छेदनेवाला पवन बाण चलाया जिससे इन्द्रजित्का वारुण अस्त्र रुईके समूहके समान कहीं चला गया ॥९४॥


घनवाहनवीरोऽपि प्रभामण्डलभूभृतः । आग्नेयास्त्रनियोगेन चकार धनुरिन्धनम् ॥९५॥

अर्थ: उधर वीर मेघवाहनने भी आग्नेय बाण चलाकर राजा भामण्डलके धनुषको ईन्धन बना दिया अर्थात् जला दिया ॥९५॥


तस्य स्फुलिङ्गसंसर्गादन्येषामपि चापिनाम् । धूमोद्गारानमुञ्चन्त धनूंषि भयवीक्षितम् ॥९६॥

अर्थ: उस धनुषके तिलगोंके सम्बन्धसे अन्य धनुषधारियोंके धनुष भी धूम छोड़ने लगे जिसे सब सेनाने बड़े भयसे देखा ॥९६॥


नितान्तबहुयोद्धृणां जीवितग्रसनादिव । प्राप्तानां परमाजीर्णं धनुषां ते तदाभवन् ॥९७॥

अर्थ: उन धनुषोंने अनेक योद्धाओंके प्राण ग्रसित किये थे इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो उन्हें अत्यधिक अजीर्ण ही हो गया हो ॥९७॥


वारुणेन ततोऽस्त्रेण त्वरितं जनकात्मजः । आग्नेयास्त्रं निराचक्रे स्वचक्रे कृतपालनः ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर अपने चक्र - सेनाकी रक्षा करते हुए भामण्डलने शीघ्र ही वारुण अस्त्र छोड़कर आग्नेय अस्त्रका निराकरण कर दिया ॥९८॥


ततो मन्दोदरीसूनुश्चक्रे तं रथवर्जितम् । तथाविधमहासत्त्वमाकुलत्वविवर्जितम् ॥९९॥

अर्थ: तत्पश्चात् मन्दोदरीके पुत्र मेघवाहनने उस प्रकारके महापराक्रमी एवं आकुलतासे रहित भामण्डलको रथरहित कर दिया अर्थात् उसका रथ तोड़ डाला ॥९९॥


प्रयोगकुशलश्चारुमस्त्रं तामसमक्षिपत् । तेनान्धकारितं सैन्यं सर्वं जनकजन्मनः ॥१००॥

अर्थ: यही नहीं प्रयोग करनेमें कुशल मेघवाहनने सुन्दर तामस बाण भी चलाया जिससे भामण्डलकी समस्त सेना अन्धकारसे युक्त हो गयी ॥१००॥


स नाजानाद् द्विपं न क्ष्मां नात्मीयं न च शात्रवम् । अन्धध्वान्तपरिच्छन्नो मूर्च्छामिव समागतः ॥१०१॥

अर्थ: वह उस समय अन्धकारके कारण न अपने हाथी तथा पृथिवीको जान पाता था, न शत्रु सम्बन्धी हाथी तथा पृथिवी ही को जान पाता था। गाढ़ अन्धकारसे आच्छादित हुआ वह मानो मूर्च्छाको ही प्राप्त हो रहा था ॥१०१॥


अन्धीभूतो दशास्यस्य सुतेन जनकात्मजः । विमुक्तविषधूमौघैः वेष्टितो नागसायकैः ॥१०२॥

अर्थ: जब भामण्डल उस तामसबाणसे अन्धा हो रहा था तब मेघवाहनने उसे विषरूपी धूमका समूह छोड़नेवाले नागबाणोंसे वेष्टित कर लिया ॥१०२॥


तैरसौ व्याप्तसर्वाङ्गो विस्फुरद्भोगभासुरैः । चन्दनद्रुमसंकाशः पपात वसुधातले ॥१०३॥

अर्थ: उठते हुए फनोंसे सुशोभित उन नागोंसे जिसका समस्त शरीर व्याप्त था और इसलिए जो चन्दन वृक्षके समान जान पड़ता था ऐसा भामण्डल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥१०३॥


एवमिन्द्रजितेनापि कृता किष्किन्धभूभृतः । अवस्थाध्वान्तनागास्त्रद्वयव्यापारकारिणा ॥१०४॥

अर्थ: इसी प्रकार तामस और नागपाश इन दो अस्त्रोंको चलानेवाले इन्द्रजित्ने भी सुग्रीवकी दशा की अर्थात् उसे तामसास्त्रसे अन्धा कर नागपाशसे बाँध लिया ॥१०४॥


ततो विभीषणो विद्वान् विद्यास्त्ररणवस्तुनि । कृत्वा करपुटं मूर्ध्नि बभाषे पद्मलक्ष्मणौ ॥१०५॥

पद्म पद्म महाबाहो वीर लक्ष्मण लक्ष्मण । एताः पश्य दिशश्छन्नाः शरैरिन्द्रजितेरितैः ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर विद्यामय शस्त्रोंसे युद्ध करनेमें कुशल विभीषणने हाथ जोड़ मस्तकसे लगा राम-लक्ष्मणसे कहा कि हे महाबाहो ! राम ! राम ! हे वीर ! लक्ष्मण ! लक्ष्मण ! देखो, ये दिशाएँ इन्द्रजित्के द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे आच्छादित हो रही हैं ॥१०५-१०६॥


वियत्तलं धरित्री च तस्य बाणैर्निरन्तरैः । उत्पातभूतनागाभैराततेऽत्यन्तदुःखदैः ॥१०७॥

अर्थ: उत्पातकारी नागोंके समान आभावाले, अत्यन्त दुःखदायी उसके निरन्तर बाणोंसे आकाश और पृथिवी व्याप्त हो रही है ॥१०७॥


कृतौ सुग्रीववैदेहौ निरस्त्रौ नागसायकैः । बद्धौ निपातितौ भूमौ मयजासुतनिःसृतैः ॥१०८॥

अर्थ: मन्दोदरीके पुत्रोंने सुग्रीव और भामण्डलको अस्त्ररहित कर दिया है, तथा अपने द्वारा छोड़े हुए नाग बाणोंसे उन्हें बाँधकर पृथिवीपर गिरा दिया है ॥१०८॥


उदारे विजिते देव श्रीभामण्डलपण्डिते । वीरे सुग्रीवराजे च बहुविद्याधराधिपे ॥१०९॥

संघातमृत्युमस्माकमासन्नं विद्धि राघव । एतौ हि नायकावुग्रावस्मत्पक्षस्य केवलौ ॥११०॥

अर्थ: हे देव ! अतिशय चतुर भामण्डल और अनेक विद्याधरोंके राजा वीर सुग्रीवके पराजित होनेपर हे राघव ! समझ लीजिए कि हम लोगोंकी सामूहिक मृत्यु निकटवर्ती है, क्योंकि ये दोनों ही हमारे पक्षके प्रमुख नायक हैं ॥१०९-११०॥


एतामनायकीभूतां विद्याधरवरूथिनीम् । पलायनोद्यतां पश्य समाश्रित्य दिशो दश ॥१११॥

अर्थ: इधर देखो, यह विद्याधरोंकी सेना नायकसे रहित होनेके कारण दशों दिशाओंमें भागनेके लिए उद्यत हो रही है ॥१११॥


आदित्यश्रवणेनासौ पश्य मारुतनन्दनः । विजित्य सुमहायुद्धे कराभ्यां बद्धविग्रहः ॥११२॥

अर्थ: उधर देखो, कुम्भकर्णने महायुद्धमें हनुमान्को जीतकर अपने हाथोंसे उसे कैद कर रखा है ॥११२॥


शरजर्जरितच्छत्रकेतुकार्मुककङ्कटः । गृहीतः प्रसभं वीरः प्लवङ्गध्वजपुंगवः ॥११३॥

अर्थ: जिसका छत्र, ध्वज, धनुष और कवच बाणोंसे जर्जर कर दिया गया है, ऐसा यह वीर हनुमान् बलात् कैद किया गया है ॥११३॥


यावत्सुग्रीवभाचक्रौ पतितौ धरणीतले । न संभावयते क्षिप्रं रावणी रणकोविदः ॥११४॥

तावदेतौ स्वयं गत्वा निश्चेष्टावानयाम्यहम् । त्वं साधारय निर्नाथामिमां खेचरवाहिनीम् ॥११५॥

अर्थ: रणविशारद रावण-का पुत्र, जबतक पृथिवीपर पड़े हुए सुग्रीव और भामण्डलके समीप शीघ्रतासे नहीं पहुँचता है तबतक निश्चेष्ट पड़े हुए इन दोनोंको मैं स्वयं जाकर ले आता हूँ, तुम नायक-रहित इस विद्याधर सेनाको आश्रय दो ॥११४-११५॥


यावदेवमसौ पद्मं लक्ष्मणं चाभिभाषते । सुतारातनयस्तावद् गत्वा स्वैरमलक्षितः ॥११६॥

अम्बरं भानुकर्णस्य परिधानममुञ्चत । ह्रीभाराकुलितो जातः स तद्धरणविह्वलः ॥११७॥

अर्थ: इस तरह जबतक विभीषण राम और लक्ष्मणसे कहता है तबतक सुताराके पुत्र अंगदने छिपे-छिपे जाकर कुम्भकर्णका अधोवस्त्र खोल दिया जिससे वह लज्जासे व्याकुल हो वस्त्रके सँभालनेमें लग गया ॥११६-११७॥


यावद्वासःसमाधानपरोऽसौ राक्षसोऽभवत् । भुजपाशोदरादस्य निःसृतस्तावदानिलिः ॥११८॥

अर्थ: जबतक कुम्भकर्ण वस्त्रके सँभालनेमें लगता है तबतक हनुमान् उसके भुजापाशके मध्यसे निकल भागा ॥११८॥


नवो बद्धो यथा पक्षी निर्गतः पञ्जरोदरात् । आसीत्सुचकितो वातिः प्रत्युग्रद्युतिसंगतः ॥११९॥

अर्थ: जिस प्रकार नया बँधा पक्षी पिंजड़ेके मध्यसे निकलनेपर चकित हो जाता है, उसी प्रकार हनुमान् भी कुम्भकर्णके भुजबन्धनसे निकलनेपर चकित तथा उग्र तेजसे युक्त हो गया ॥११९॥


ततो मुदितसंप्रीतौ विमानशिखरस्थितौ । हनूमदङ्गदौ वीरौ रेजतुः सुरसंनिभौ ॥१२०॥

अर्थ: तदनन्तर प्रसन्नता और सन्तोषसे युक्त वीर हनुमान् और अंगद विमानके अग्रभागपर बैठ देवोंके समान सुशोभित होने लगे ॥१२०॥


ताभ्यामङ्गकुमारेण चन्द्रोदरसुतेन च । समं लक्ष्मीधरः सेनां समाश्वासयितुं स्थितः ॥१२१॥

अर्थ: उधर अंगदके भाई अंग और चन्द्रोदरके पुत्र विराधितके साथ लक्ष्मण, विद्याधरोंकी सेनाको धैर्य बँधानेके लिए जा डटे ॥१२१॥


मन्दोदरीसुतं तावदभियाय विभीषणः । स पितृव्यं समालोक्य चिन्तामेतामुपागतः ॥१२२॥

अर्थ: अब विभीषण, मन्दोदरी के पुत्र इन्द्रजित्के सामने गया सो वह काकाको देख इस चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥१२२॥


तातस्यास्य च को भेदो न्यायो यदि निरीक्ष्यते । ततोऽभिमुखमेतस्य नावस्थातुं प्रशस्यते ॥१२३॥

अर्थ: कि यदि न्यायसे देखा जाये तो पितामें और इसमें क्या भेद है ? इसलिए इसके सम्मुख खड़ा रहना अच्छा नहीं है ॥१२३॥


नागपाशैरिमौ बद्धौ मृत्युं यातौ विसंशयम् । एतावच्चेह कर्तव्यं युक्तं तदवसर्पणम् ॥१२४॥

अर्थ: ये सुग्रीव और विभीषण नागपाशसे बँधे हैं सो निःसन्देह मृत्युको प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए इस समय यहाँसे चला जाना ही उचित है ॥१२४॥


इति संचिन्त्य निर्याताविन्द्रजिन्मेघवाहनौ । गहनाहवमेदिन्याः कृतार्थत्वाभिमानिनौ ॥१२५॥

अर्थ: ऐसा विचारकर कृतकृत्यताके अहंकारसे भरे इन्द्रजित् और मेघवाहन दोनों ही युद्धभूमिसे बाहर निकल गये ॥१२५॥


अन्तर्द्धौ सेविते ताभ्यां संभ्रान्तात्मा विभीषणः । त्रिशूलहेतिरामुक्तकङ्कटस्तरलेक्षणः ॥१२६॥

उत्तीर्य स्वरथाद्वीरस्तयोर्निष्कम्पदेहयोः । अवस्थान्तरमद्राक्षीन्नागसायकनिर्मितम् ॥१२७॥

अर्थ: उन दोनोंके अन्तर्हित हो जानेपर जिसकी आत्मा घबड़ा रही थी, जो त्रिशूल नामक शस्त्र धारण कर रहा था, जिसने कवच पहन रखा था, तथा जिसके नेत्र अत्यन्त चंचल थे ऐसा वीर विभीषण अपने रथसे उतरकर वहाँ गया जहाँ सुग्रीव और भामण्डल निश्चेष्ट पड़े हुए थे। वहाँ जाकर उसने नागपाशसे निर्मित दोनोंकी चिन्तनीय दशा देखी ॥१२६-१२७॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत् पद्मनामं विचक्षणः । श्रूयतां नाथ यत्रेमौ महाविद्याधराधिपौ ॥१२८॥

अत्यूर्जितौ महासैन्यौ महाशक्तिसमन्वितौ । श्रीभामण्डलसुग्रीवौ नीतावस्त्रविमुक्तताम् ॥१२९॥

रावणस्य कुमाराभ्यां स्यूतावुरगमार्गणैः । तत्र त्वया मया वापि साध्यते किं दशाननः ॥१३०॥

अर्थ: तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मणने रामसे कहा कि हे नाथ ! सुनिए, जहाँ वे महाविद्याधरोंके स्वामी, अतिशय बलवान्, बड़ी-बड़ी सेनाओंसे सहित और महाशक्तिसे सम्पन्न ये भामण्डल और सुग्रीव भी रावणके पुत्रों द्वारा अस्त्र रहित अवस्थाको प्राप्त हो नागपाशसे बाँध लिये गये हैं वहाँ क्या तुम्हारे या हमारे द्वारा रावण जीता जा सकता है ? ॥१२८-१३०॥


ततः पुण्योदयात्पद्मः स्मृत्वा लक्ष्मणमब्रवीत् । तदा स्मर वरं लब्धं योग्युपद्रवनाशने ॥१३१॥

अर्थ: तब पुण्योदयसे स्मरण कर रामने लक्ष्मणसे कहा कि भाई ! उस समय देशभूषण-कुलभूषण मुनियोंका उपसर्ग दूर करनेपर हम लोगोंको जो वर प्राप्त हुआ था उसका स्मरण करो ॥१३१॥


महालोचनदेवस्य तदभिध्यानमात्रतः । सुखावस्थस्य सहसा सिंहासनमकम्पत ॥१३२॥

अर्थ: उसी समय रामके स्मरण मात्रसे सुखसे बैठे हुए महालोचन नामक गरुडेन्द्रका सिंहासन सहसा कम्पायमान हुआ ॥१३२॥


आलोक्यावधिनेत्रेण ततो विज्ञाय संभ्रमी । विद्याभ्यां प्राहिणोद्युक्तं चिन्तावेगं निजं सुरम् ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर अवधिज्ञानरूपी नेत्रके द्वारा सब समाचार जानकर गरुडेन्द्रने शीघ्र ही दो विद्याओंके साथ अपना चिन्तावेग नामक देव भेजा ॥१३३॥


गत्वा कथितः क्षेमः संदेशः सादरं सुरः । ताभ्यामुद्धे ददौ विद्ये परिवारसमन्विते ॥१३४॥

अर्थ: वहाँ जाकर जिसने आदरके साथ कुशल सन्देश सुनाया था ऐसे उस देवने राम-लक्ष्मणके लिए परिवारसे सहित दो प्रशस्त विद्याएँ दीं ॥१३४॥


सैंहं पद्मावदातस्य यानमर्पयदद्भुतम् । समुद्योतितदिक्चक्रं सौमित्राय च गारुडम् ॥१३५॥

अर्थ: रामके लिए तो आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली सिंहवाहिनी विद्या और लक्ष्मणके लिए दिक्समूहको देदीप्यमान करनेवाली गरुड़वाहिनी विद्या दी ॥१३५॥


विद्ये संप्राप्य संमान्य धीरौ चिन्तागतिं मुदा । पृष्टवातौं जिनेन्द्राणां पूजां तौ चक्रतुः परम् ॥१३६॥

अर्थ: धीरवीर राम-लक्ष्मणने, दोनों विद्याएँ प्राप्त कर चिन्तागति देवका बड़ा सम्मान किया, उससे कुशल समाचार पूछा और तदनन्तर जिनेन्द्रदेवकी उत्तम पूजा की ॥१३६॥


परं साधुप्रसादं च प्रस्तावे संगतोदयम् । सशंसतुर्मुदोदारगुणग्रहणतत्परौ ॥१३७॥

अर्थ: उत्तम गुणोंके ग्रहण करनेमें तत्पर रहनेवाले राम-लक्ष्मणने योग्य अवसरपर प्राप्त हुए गरुडेन्द्रके उस उत्तम प्रसादकी बड़े हर्षसे स्तुतिकी प्रशंसा की ॥१३७॥


अद्राक्षां च सुरास्त्राणि भासुराणि सहस्रशः । वारुणाग्निमरुत्सृष्टिप्रभृतीनि सुविभ्रमौ ॥१३८॥

अर्थ: उत्तम शोभाको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मणने उसी समय वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा वायव्यास्त्र आदि हजारों देवोपनीत देदीप्यमान शस्त्र सामने खड़े देखे अर्थात् उस देवने वे सब शस्त्र उन्हें दिये ॥१३८॥


चन्द्रादित्यसमे छत्रे चारुचामरमण्डिते । रत्नानि च प्रदत्तानि पिहितानि निजौजसा ॥१३९॥

अर्थ: सुन्दर चमरोंसे सुशोभित चन्द्रमा और सूर्यके समान छत्र तथा अपनी कान्तिसे आच्छादित अनेक रत्न भी उस देवने प्रदान किये ॥१३९॥


गदाप्रहरणं विद्युद्वक्त्रा लक्ष्मीधरं श्रिता । हलं समुसलं पद्मं दैत्यानां भयकारणम् ॥१४०॥

अर्थ: विद्युद्वक्त्र नामक गदा लक्ष्मणको प्राप्त हुई और दैत्योंको भय उत्पन्न करनेवाले हल तथा मुसल नामक शस्त्र रामको प्राप्त हुए ॥१४०॥


महिमानं परं प्राप्य ताभ्यां संमदसंगतः । आशीःशतानि दत्त्वासौ गतो देवस्त्रिविष्टपम् ॥१४१॥

अर्थ: इस प्रकार वह देव राम-लक्ष्मणके साथ हर्षपूर्वक मिलकर तथा परम महिमाको प्राप्त कर उन्हें सैकड़ों आशीर्वाद देता हुआ अपने स्थानको चला गया है ॥१४१॥


धर्मस्यैतद्विधियुतकृतस्यानवद्यस्य धीरैर्ज्ञेयं स्तुत्यं फलमनुपमं युक्तकालोपजातम् । यत्संप्राप्य प्रमदकलिताः दूरमुक्तोपसर्गाः संजायन्ते स्वपरकुशलं कर्तुमुद्भूतवीर्याः ॥१४२॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जो योग्य समयपर प्रशंसनीय एवं अनुपम फलकी प्राप्ति होती है वह विधिपूर्वक किये हुए निर्दोष धर्मका ही फल है ऐसा धीरवीर मनुष्योंको जानना चाहिए । धर्मसे वह फल प्राप्त होता है जिसे पाकर मनुष्य उत्तम हर्षसे युक्त होते हैं, उनके उपसर्ग दूरसे ही छूट जाते हैं और वे महाशक्तिसे सम्पन्न हो स्वपरका कल्याण करनेमें समर्थ होते हैं ॥१४२॥


आस्तां तावन्मनुजजनिताः संपदः काङ्क्षितानां यच्छन्तीष्टादधिकमतुलं वस्तु नाकश्रितोऽपि । तस्मात्पुण्यं कुरुत सततं हे जनाः सौख्यकाङ्क्षाः येनानेकं रविसमरुचः प्राप्नुताश्चर्ययोगम् ॥१४३॥

अर्थ: अथवा मनुष्य पर्यायमें उत्पन्न होनेवाली सम्पदाओंकी बात दूर रहे, स्वर्ग सम्बन्धी सम्पदाएँ भी इसे इच्छासे भी अधिक अनुपम सामग्री प्रदान करती हैं । इसलिए सुखकी इच्छा रखनेवाले हे भव्यजनो ! निरन्तर पुण्य करो जिससे सूर्यके समान कान्तिके धारक होते हुए तुम अनेक आश्चर्यकारी वस्तुओंके संयोगको प्राप्त हो सको ॥१४३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे विद्यालाभो नाम षष्टितमं पर्व ॥६०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राम-लक्ष्मणको विद्याओंकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला साठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६०॥


६१. एकषष्टितमं पर्व (सुग्रीवभामण्डलसमाश्वासनं)

एतस्मिन्नन्तरे दिव्यकवचच्छन्नविग्रहौ । लक्ष्मीश्रीवत्सलक्ष्माणौ तेजोमण्डलमध्यगौ ॥१॥

नागारिवाहनारूढौ सुकान्तौ पद्मलक्ष्मणौ । सैन्यसागरमध्यस्थौ सैंहगारुडकेतनौ ॥२॥

परपक्षक्षयं कर्तुमुद्यतौ परमेश्वरौ । संग्रामधरणीमध्यं तेन सन्नतुरुत्कटौ ॥३॥

अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें जिनके शरीर दिव्य कवचोंसे आच्छादित थे, जो लक्ष्मी और श्रीवत्स चिह्नके धारक थे, तेजोमण्डलके मध्यमें गमन कर रहे थे, सिंह तथा गरुड़ वाहनपर आरूढ़ थे, अत्यन्त सुन्दर थे, सेनारूपी सागरके मध्यमें स्थित थे, सिंह तथा गरुड़ चिह्नसे चिह्नित पताकाओंसे युक्त थे, पर-पक्षका क्षय करनेके लिए उद्यत थे और उत्कट बलके धारक थे, ऐसे परममहिमा सम्पन्न राम और लक्ष्मण विभीषणके साथ रणभूमिके मध्यमें आये ॥१-३॥


अग्रतस्त्वरितो जातः सौमित्रिर्मित्रवत्सलः । दिव्यातपत्रविक्षिप्तदूरभास्करदीधितिः ॥४॥

अर्थ: जिन्होंने दिव्यछत्रके द्वारा सूर्यकी किरणें दूर हटा दी थीं तथा जो मित्रोंके साथ स्नेह करनेवाले थे ऐसे शीघ्रतासे भरे लक्ष्मण आगे हुए ॥४॥


श्रीशैलप्रमुखैर्वीरैर्वृतः प्लवगकेतनैः । दधानस्त्रैदशं रूपमशक्यपरिवर्णनम् ॥५॥

अर्थ: उस समय लक्ष्मण हनुमान् आदि प्रमुख वानरवंशी वीरोंसे घिरे थे तथा जिसका वर्णन करना अशक्य था ऐसे देवसदृश रूपको धारण कर रहे थे ॥५॥


अग्रतः प्रस्थिते तस्मिन् द्वादशादित्यभास्वरम् । दृष्टं विभीषणेनेदं जगद्विस्मिततेजसा ॥६॥

अर्थ: लक्ष्मणके आगे प्रस्थान करनेपर आश्चर्यजनक तेजके धारक विभीषणने देखा कि यह संसार एक साथ उदित हुए बारह सूर्योंसे ही मानो देदीप्यमान हो रहा है ॥६॥


गरुत्मत्केतने तस्मिन् संप्राप्ते तत्तथाघनम् । अस्त्रं सान्तमसं क्वापि गतं गरुडतेजसा ॥७॥

अर्थ: लक्ष्मणके आते ही वह उस प्रकारका सघन तामस अस्त्र गरुड़के तेजसे न जाने कहाँ चला गया ॥७॥


गरुत्मत्पक्षवातेन क्षोभितक्षारसिन्धुना । नीता विषधरा नाशं कुभावा इव साधुना ॥८॥

अर्थ: लवण समुद्रके जलको क्षोभित करनेवाली गरुड़के पंखोंकी वायुसे सब नाग इस प्रकार नष्ट हो गये जिस प्रकार कि साधुके द्वारा खोटे भाव नष्ट हो जाते हैं ॥८॥


तार्क्ष्यपक्षविनिर्मुक्तमयूखालोकसंगतम् । जाम्बूनदरसेनेव जगदासीद्विनिर्मितम् ॥९॥

अर्थ: गरुड़के पंखोंसे छोड़ी हुई किरणोंके प्रकाशसे युक्त संसार ऐसा जान पड़ने लगा मानो स्वर्णरससे ही बना हो ॥९॥


ततो नमश्चराधीशौ गतपन्नगबन्धनौ । प्रभामण्डलसुग्रीवौ समाश्वासनमापतुः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नागपाशके बन्धन दूर हो गये थे ऐसे विद्याधरोंके अधिपति सुग्रीव और भामण्डल धैर्यको प्राप्त हुए ॥१०॥


सुखेन प्राप्य निद्रां च रत्नांशुकसमावृतौ । अलगर्दलतारेखासमलंकृतविग्रहौ ॥११॥

अधिकं भासमानाङ्गौ व्यक्तोच्छ्वासविनिर्गमौ । निद्राक्षये परं कान्तौ स्वस्थसुप्ताविवोत्थितौ ॥१२॥

अर्थ: जो सुखसे निद्रा प्राप्तकर रत्नमयी कम्बलोंसे आवृत थे, सर्परूपी लताओंकी रेखाओंसे जिनके शरीर अलंकृत थे अर्थात् जिनके शरीरमें नागपाशके गड़रा पड़ गये थे, जो पहलेसे कहीं अधिक सुशोभित थे, और जिनके श्वासोच्छ्वासका निकलना अब स्पष्ट हो गया था, ऐसे दोनों ही राजा इस प्रकार उठ बैठे, जिस प्रकार कि सुखसे सोये पुरुष निद्राक्षय होनेपर उठ बैठते हैं ॥११-१२॥


ततो विस्मयमापन्नाः श्रीवृक्षप्रथितादयः । विद्याधरगणाधीशाः पप्रच्छुः कृतपूजनाः ॥१३॥

नाथावापत्सु वामेषा दृष्टपूर्वा न जातुचित् । विभूतिरद्भुता जाता कुतश्चिदिति कथ्यताम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर आश्चर्यको प्राप्त हुए श्रीवृक्ष आदि विद्याधर राजाओंने पूजा कर राम लक्ष्मणसे पूछा कि हे नाथ ! आप दोनोंकी विपत्तिके समय जो पहले कभी देखनेमें नहीं आयी ऐसी यह अद्भुत विभूति किस कारण प्राप्त हुई है सो कहिए ॥१३-१४॥


वाहनावस्त्रसंपत्तिरातपत्रे परा द्युतिः । ध्वजौ रत्नानि चित्राणि श्रूयते दिव्यमीदृशम् ॥१५॥

अर्थ: वाहन, अस्त्ररूपी सम्पत्ति, छत्र, परम कान्ति, ध्वजाएँ और नाना प्रकारके रत्न जो कुछ आपको प्राप्त हुए हैं वे सब दिव्य हैं, देवोपनीत हैं ऐसा सुना जाता है ॥१५॥


पद्मनाभस्ततोऽगादीत्तेभ्यो हिण्डनमात्मनः । उपसर्गे च शैलाग्रे देशगोत्रविभूषयोः ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर रामने उन सबके लिए कहा कि एक बार वंशस्थविल पर्वतके अग्रभागपर देशभूषण और कुलभूषण मुनियोंको उपसर्ग हो रहा था सो मैं वहाँ पहुँच गया ॥१६॥


चतुराननयोगेन स्थितयोर्देवनिर्मितम् । प्रातिहार्यं समुद्भूतं केवलं च सुरागमम् ॥१७॥

गरुडेन्द्रस्य तोषं च परिप्राप्तिं वरस्य च । अनुध्यानप्रयोगेन महाविद्यासमागमम् ॥१८॥

अर्थ: मैंने उपसर्ग दूर किया, उसी समय दोनों मुनिराजोंको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ, चतुर्मुखाकार होकर दोनों विराजमान हुए, देवनिर्मित प्रातिहार्य उत्पन्न हुए, देवोंका आगमन हुआ, गरुडेन्द्र हमसे सन्तुष्ट हुआ और उससे हमें घरकी प्राप्ति हुई । इस समय उसी गरुड़ेन्द्रके ध्यानसे इन महाविद्याओंकी प्राप्ति हुई ॥१७-१८॥


ततस्तेऽवहिताः श्रुत्वा परमां योगिसंकथाम् । इदमूचुः परिप्राप्ताः प्रमोदं विकचाननाः ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर सावधान हो मुनियोंकी उत्तम कथा श्रवण कर, जो परम प्रमोदको प्राप्त हो रहे थे और जिनके मुखकमल हर्षसे विकसित हो रहे थे ऐसे उन सब विद्याधर राजाओंने कहा कि ॥१९॥


इहैव लोके विकटं परं यशो मतिप्रगल्भत्वमुदारचेष्टितम् । अवाप्यते पुण्यविधिश्च निर्मलो नरेण भक्त्यार्पितसाधुसेवया ॥२०॥

अर्थ: भक्तिपूर्वक की हुई साधुसेवाके प्रभावसे मनुष्य इसी भवमें विशाल उत्तम यश, बुद्धिको प्रगल्भता, उदार चेष्टा और निर्मल पुण्य विधिको प्राप्त होता है ॥२०॥


तथा न माता न पिता न वा सुहृत् सहोदरो वा कुरुते नृणां प्रियम् । प्रदाय धर्मे मतिमुत्तमां यथा हितं परं साधुजनः शुभोदयाम् ॥२१॥

अर्थ: मुनिजन उत्तम बुद्धिको धर्ममें लगाकर मनुष्योंका जैसा शुभोदयसे सम्पन्न परम प्रिय हित करते हैं वैसा हित न माता करती है, न पिता करता है, न मित्र करता है और न सगा भाई ही करता है ॥२१॥


इतिप्रशंसार्पितभाविताश्चिरं जिनेन्द्रमार्गोन्नतिविस्मिताः परम् । बलं सनारायणमाश्रिता बभुर्महाविभूत्या समुपाश्रिता नृपाः ॥२२॥

अर्थ: इस प्रकार चिरकाल तक प्रशंसा कर जिन्होंने अपनी भावनाएँ समर्पित की थीं और जिनेन्द्रमार्गकी उन्नतिसे जो परम आश्चर्यको प्राप्त हो रहे थे, ऐसे महावैभवसे युक्त राजा, राम और लक्ष्मणका आश्रय पाकर अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ॥२२॥


भव्याम्भोजमहासमुत्सवकरीं श्रुत्वा पवित्रां कथां सर्वे हर्षमहारसोदधिगताः प्रीतिं दधानाः पराम् । तौ निद्रोज्झितपुण्डरीकनयनौ संप्राप्तदेवार्चनौ ते विद्याधरपुंगवाः सुरसमाः सर्वात्मनापूजयन् ॥२३॥

अर्थ: इस तरह भव्य जीवरूपी कमलोंके उत्सवको करनेवाली पवित्र कथा सुनकर जो हर्षरूपी महारसके सागरमें निमग्न हो परम प्रीतिको धारण कर रहे थे, ऐसे देवोंके समान समस्त विद्याधर राजाओंने, विकसित कमलोंके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले उन देवपूजित राम-लक्ष्मणकी सब प्रकारसे पूजा की ॥२३॥


उपात्तपुण्यो जननान्तरे जनः करोति योगं परमैरिहोत्सवैः । न केवलं स्वस्य परस्य भूयसा रविर्यथा सर्वपदार्थदर्शनात् ॥२४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जन्मान्तरमें पुण्यका संचय करनेवाला मनुष्य, इस संसारमें न केवल अपने आपका ही उत्तम उत्सवोंसे संयोग करता है किन्तु सूर्यके समान समस्त पदार्थोंको दिखाकर अन्य लोगोंका भी अत्यधिक वैभवके साथ संयोग करता है अर्थात् पुण्यात्मा मनुष्य स्वयं वैभवको प्राप्त होता है और दूसरोंको भी वैभव प्राप्त कराता है ॥२४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सुग्रीवभामण्डलसमाश्वासनं नामैकषष्टितमं पर्व ॥६१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यकथित पद्मपुराणमें सुग्रीव और भामण्डलका नागपाशसे युक्त हो आश्वासन प्राप्तिका वर्णन करनेवाला इकसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६१॥


६२. द्वाषष्टितमं पर्व (शक्तिसंतापाभिधानं)

अपरेद्युर्महोद्भूतविक्रमाक्रमकोविदाः । युद्धार्थोपात्तसंभारा रणशौण्डाः समुद्ययुः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर दूसरे दिन जिन्हें महापराक्रम उत्पन्न हुआ था, जो क्रमको जाननेमें निपुण थे, एवं युद्धके लिए जिन्होंने सब सामग्री ग्रहण की थी ऐसे रणबांकुरे वीर युद्धके लिए उद्यत हुए ॥१॥


वानरीयैः खमालोक्य सैन्यैर्व्याप्तं निरन्तरम् । शङ्खदुन्दुभिसंमिश्रं श्रुत्वेभाश्वध्वनिं तथा ॥२॥

अभ्यूर्जितमतिर्मानी सादरोऽमरविभ्रमः । सत्त्वप्रतापसंयुक्तः सैन्यार्णवसमावृतः ॥३॥

तेजसा शस्त्रजातेन ज्वलयन्निव विष्टपम् । कैलासोद्धारवीरोऽपि निरैद्भ्रात्रादिभिः समम् ॥४॥

अर्थ: वानरोंकी सेनासे समस्त आकाशको निरन्तर व्याप्त देख तथा शंखों और दुन्दुभियोंके शब्दोंसे मिली हाथियों और घोड़ोंकी आवाज सुन कैलासको उठानेवाला वीर रावण भी भाइयों आदिके साथ निकला। रावण अत्यन्त बलवती बुद्धिका धारक था, मानी था, आदरसे युक्त था, देवोंके समान शोभासे सहित था, सत्त्व और प्रतापसे युक्त था, सेनारूपी सागरसे घिरा हुआ था, और शस्त्रसे उत्पन्न तेजके द्वारा संसारको जलाता हुआ-सा जान पड़ता था ॥२-४॥


उद्धता बद्धकवचाः संग्रामात्यर्थलालसाः । नानायानसमारूढा नानाविधमहायुधाः ॥५॥

पूर्वानुबन्धसंक्रोधमहारौरवसंनिभाः । परस्परं भटा धीराः लग्नास्ताडनकर्मणि ॥६॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने उठकर कवच बाँध रखे थे, जिन्हें संग्रामकी उत्कट लालसा भरी हुई थी, जो नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़ थे, नाना प्रकारके बड़े-बड़े शस्त्र जिन्होंने धारण कर रखे थे और जो पूर्वानुबद्ध क्रोधके कारण महानारकोंके समान जान पड़ते थे, ऐसे धीर-वीर योद्धा परस्पर मार-काट करनेमें लग गये ॥५-६॥


चक्रक्रकचपाशासियष्ट्यार्ष्टिघनमुद्गरैः । कनकैः परिघाद्यैश्च गगनं गहनीकृतम् ॥७॥

अर्थ: चक्र, क्रकच, पाश, खड्ग, यष्टि, वज्र, घन, मुद्गर, कनक तथा परिघ आदि शस्त्रोंसे आकाश सघन हो गया ॥७॥


लग्नमश्वीयमश्वीयैर्गजता गजतामगात् । रथिनश्च महाधीरा उद्यता रथिभिः समम् ॥८॥

अर्थ: घोड़ोंका समूह घोड़ोंके साथ जुट पड़ा, हाथियोंका समूह हाथियोंके समूहके सम्मुख गया, महाधीर-वीर रथोंके सवार रथसवारोंके साथ खड़े हो गये ॥८॥


सैंहं सैंहेन पादातं पादातेन च चञ्चलम् । समं महाहवं कर्तुमुद्यतं समविक्रमम् ॥९॥

अर्थ: सिंहोंके सवार सिंहोंके सवारोंके साथ और चंचल तथा समान पराक्रमको धारण करनेवाला पैदल सैनिकोंका समूह पैदल सैनिकोंके साथ महायुद्ध करनेके लिए उद्यत हो गया ॥९॥


ततः कापिध्वजं सैन्यं रक्षोयोधैः पराजितम् । नीलादिभिः पुनर्नीतं शस्त्रसंपातयोग्यताम् ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर प्रथम तो राक्षस योद्धाओंने वानरोंकी सेनाको पराजित कर दी, परन्तु उसके बाद नील आदि वानरोंने उसे पुनः शस्त्रवर्षा करनेकी योग्यता प्राप्त करा दी अर्थात् वानरोंकी सेना पहले तो कुछ पीछे हटी, परन्तु ज्योंही नील आदि वानर आगे आये कि वह पुनः राक्षसोंपर शस्त्र वर्षा करने लगी ॥१०॥


भूयोजलधिकल्लोललोललङ्केन्द्रपार्थिवाः । इमे समुद्ययुर्दृष्ट्वा निजसैन्यपराभवम् ॥११॥

अर्थ: पश्चात् अपनी सेनाका पराभव देख, समुद्रकी तरंगोंके समान चंचल लंकाके निम्नांकित राजा पुनः युद्धके लिए उद्यत हुए ॥११॥


विद्युद्वदनमारीचचन्द्रार्कशुकसारणाः । कृतान्तमृत्युजीमूतनादसंक्रोधनादयः ॥१२॥

अर्थ: विद्युद्वक्त्र, मारीच, चन्द्र, अर्क, शुक, सारण, कृतान्त, मृत्यु, मेघनाद और संक्रोधन आदि ॥१२॥


भज्यमानं निजं सैन्यं वीक्ष्य तैः राक्षसोत्तमैः । कपिध्वजमहायोधाः परिप्रापुः सहस्रशः ॥१३॥

अर्थ: इन राक्षस योद्धाओंके द्वारा अपनी सेनाको नष्ट होते देख वानर पक्षके हजारों महायोद्धा आ पहुँचे ॥१३॥


ग्रस्ता राक्षससैन्यास्तैरुच्छ्रितैर्विविधायुधैः । महाप्रतिमयैर्वीरैरत्युदात्तविचेष्टितैः ॥१४॥

अर्थ: और आते ही उन्नत, नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले, महाभयंकर, वीर और अत्यन्त उदात्त चेष्टाओंके धारक उन वानर योद्धाओंने राक्षसोंकी सेनाको धर दबाया ॥१४॥


निजसैन्यार्णवं दृष्ट्वा पीयमानं समन्ततः । शस्त्रज्वालाविलासेन कपिप्रलयवह्निना ॥१५॥

लङ्केशः कोपनो योद्धुं बलवान् स्वयमुत्थितः । शुष्कपत्रोपमान् दूरं विक्षिपन् शत्रुसैनिकान् ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर शस्त्ररूपी ज्वालाओंसे सुशोभित वानररूपी प्रलयाग्निके द्वारा अपनी सेनारूपी सागरको सब ओरसे पिया जाता देख क्रोधसे भरा बलवान् रावण, शत्रु सैनिकोंको सूखे पत्तोंके समान दूर फेंकता हुआ युद्ध करनेके लिए स्वयं उद्यत हुआ ॥१५-१६॥


ततः पलायनोद्युक्तान् परिपाल्य तदा द्रुतम् । स्थितो विभीषणो योद्धुं महायोधविभीषणः ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर महायोद्धाओंको भयभीत करनेवाला विभीषण भागनेमें तत्पर वानरोंकी शीघ्र ही रक्षा कर युद्ध करनेके लिए खड़ा हुआ ॥१७॥


आहवेऽभिमुखीभूतं भ्रातरं वीक्ष्य रावणः । बभाण पृथुकक्रोधो वाक्यमादरवर्जितः ॥१८॥

कनीयानसि स त्वं मे भ्राता हन्तुं न युज्यते । अपसर्पाग्रतो मास्थाः न त्वां शक्तोऽस्मि वीक्षितुम् ॥१९॥

अर्थ: युद्धमें भाईको सम्मुख खड़ा देख जिसका क्रोध भड़क उठा था ऐसा रावण निरादरताके साथ यह वचन बोला कि तूँ छोटा भाई है अतः मुझे तेरा मारना योग्य नहीं है, तू सामनेसे हट जा, खड़ा मत रह, मैं तुझे देखनेके लिए भी समर्थ नहीं हूँ ॥१८-१९॥


विभीषणकुमारेण जगदे पूर्वजस्ततः । कालेन गोचरत्वं मे नीतः किमवसर्प्यते ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणने बड़े भाई - रावणसे कहा कि तू यमके द्वारा मेरे सामने भेजा गया है अतः अब पीछे क्यों हटता है ? ॥२०॥


ततः कुमारकोपस्तं पुनरप्याह रावणः । क्लीब क्लिष्ट धिगस्तु त्वां नरकाक कुचेष्टितम् ॥२१॥

अर्थ: पश्चात् विभीषणकुमारपर क्रोध प्रकट करते हुए रावणने उससे पुनः कहा कि रे नपुंसक ! संक्लिष्ट ! नरकाक ! तुझ कुचेष्टीको धिक्कार है ॥२१॥


त्वया व्यापादितेनापि नैव मे जन्यते धृतिः । भवद्विधा हि नो योग्याः कर्तुं हर्षं न दीनताम् ॥२२॥

अर्थ: तुझे मार डालनेपर भी मेरा यश नहीं होगा, क्योंकि तेरे समान तुच्छ मनुष्य न मुझे हर्ष उत्पन्न कर सकते हैं और न दीनता ही उत्पन्न करनेके योग्य हैं ॥२२॥


यद्विद्याधरसंतानं त्यक्त्वा मूढोऽन्यमाश्रितः । कर्मणामतिदौरात्म्याज्जैनं त्यक्त्वेव शासनम् ॥२३॥

अर्थ: जिस प्रकार कोई, कर्मोंका अत्यन्त अशुभ उदय होनेसे जिनशासनको छोड़ अन्य शासनको ग्रहण करता है, उसी प्रकार तुझ मूर्खने भी विद्याधरकी सन्तानको छोड़ अन्य भूमिगोचरीको ग्रहण किया है ॥२३॥


ततो विभीषणोऽवोचत् किमत्र बहुभाषितैः । शृणु रावण कल्याणं भण्यमानमनुत्तमम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणने कहा कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? हे रावण ! तेरे कल्याणके लिए जो उत्तम वचन कहे जा रहे हैं उन्हें सुन ॥२४॥


एवं गतोऽपि चेत् कर्तुं स्वस्य श्रेयः समिच्छसि । राघवेण समं प्रीतिं कुरु सीतां समर्पय ॥२५॥

अर्थ: इस स्थितिमें आनेपर भी यदि तू अपना भला करना चाहता है तो रामके साथ मित्रता कर और सीताको समर्पित कर दे ॥२५॥


अभिमानोन्नतिं त्यक्त्वा प्रसादय रघूत्तमम् । मा कलङ्कं स्ववंशस्य कार्षीर्योषिन्निमित्तकम् ॥२६॥

अर्थ: अहंकार छोड़कर रामको प्रसन्न कर स्त्रीके निमित्त अपने वंशको कलंकित मत कर ॥२६॥


अथवा मर्तुमिष्टं ते कुरुषे यन्न मद्वचः । मोहस्य दुस्तरं किं वा बलिनो बलिनामपि ॥२७॥

अर्थ: अथवा तुझे मरना ही इष्ट है इसीलिए मेरी बात नहीं मान रहा है सो ठीक ही है क्योंकि बलवान् मनुष्योंको भी इस बलवान् मोहका तिरना अत्यन्त कठिन है ॥२७॥


विनिशम्य वचस्तस्य तरुणक्रोधसंगतः । निशातं बाणमुद्धृत्य समधावत रावणः ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणके वचन सुन तीव्र क्रोधसे युक्त हुआ रावण तीक्ष्ण बाण चढ़ाकर दौड़ा ॥२८॥


रथाश्ववारणारूढाः स्वामितोषे हि तत्पराः । अन्येऽपि पार्थिवा लग्ना रणे सुभटदारुणे ॥२९॥

अर्थ: स्वामीको सन्तुष्ट करनेमें तत्पर रहनेवाले, रथों, घोड़ों और हाथियोंपर बैठे हुए अन्य राजा लोग भी योद्धाओंको भय उत्पन्न करनेवाले युद्धमें लग गये ॥२९॥


आयातोऽभिमुखं तस्य राक्षसेन्द्रस्य रंहसा । अष्टमीचन्द्रवक्रेण ध्वजं भ्रान्तेषुणाऽच्छिनत् ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर बड़े वेगसे सम्मुख जाकर विभीषणने अष्टमी के चन्द्रके समान कुटिल घूमनेवाले बाणसे रावणकी ध्वजा छेद डाली ॥३०॥


तेनापि तस्य संरम्भसंभाराक्रान्तचेतसा । धनुर्द्विधाकृतं क्षिप्त्वा सायकं निशिताननम् ॥३१॥

अर्थ: और क्रोधके भारसे जिसका चित्त व्याप्त था ऐसे रावणने भी एक तीक्ष्णमुख बाण चलाकर विभीषणके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥३१॥


ततोऽपरमुपादाय चापमाशु विभीषणः । द्विधाकरोद्धनुस्तस्य प्रतिकारविचक्षणः ॥३२॥

अर्थ: पश्चात् प्रतिकार करनेमें निपुण विभीषणने शीघ्र ही दूसरा धनुष लेकर रावणके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥३२॥


एवं तयोर्महायुद्धे प्रवृत्ते वीरसंक्षये । जनकस्य परं भक्तः शक्रजिद्योद्धुमुद्ययौ ॥३३॥

अर्थ: इस प्रकार जब रावण और विभीषणके बीच अनेक वीरोंका क्षय करनेवाला महायुद्ध चल रहा था तब पिताका परमभक्त इन्द्रजित् युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ ॥३३॥


लक्ष्मीधरेण रुद्धोऽसौ पर्वतेनेव सागरः । पद्मनेत्रेण पद्मेन भानुकर्णोऽग्रतः कृतः ॥३४॥

अर्थ: सो जिस प्रकार पर्वत समुद्रको रोकता है उसी प्रकार लक्ष्मणने उसे रोका और कमललोचन रामने भानुकर्णको अपने आगे किया अर्थात् उससे युद्ध करना प्रारम्भ किया ॥३४॥


ययौ सिंहकटिं नीलो युद्धशम्भुं तथा नलः । स्वयंभुं दुर्मतिः क्रुद्धो दुर्मर्षोऽपि घटोदरम् ॥३५॥

दुष्टः शक्राशनिं कालिस्तथा चन्द्रनखं नृपम् । स्कन्दो भिन्नाञ्जनं विघ्नं विराधितनराधिपः ॥३६॥

ख्यातं मयमहादैत्यमङ्गदो भासुराङ्गदः । कुम्भकर्णसुतं कुम्भं समीरणसमुद्भवः ॥३७॥

किष्किन्धेशः समाल्याख्यं केतुं जनकनन्दनः । कामं दृढरथः क्षुब्धः क्षोभणाभिख्यमूर्जितम् ॥३८॥

अर्थ: नील, सिंहकटि (सिंहजघन) के सम्मुख गया, नलने युद्ध शम्भुका, दुर्मतिने स्वयम्भुका, क्रोधसे भरे दुर्मर्षने कुम्भोदरका, दुष्टने इन्द्रवज्रका, कान्तिने चन्द्रनखका, स्कन्धने भिन्नांजनका, विराधित राजाने विघ्नका, देदीप्यमान केयूरके धारक अंगदने प्रसिद्ध मय नामक महादैत्यका, हनुमान्ने कुम्भकर्णके पुत्र कुम्भका, सुग्रीवने सुमालीका, भामण्डलने केतुका, दृढरथने कामका और क्षुब्धने क्षोभण नामक बलवान् सामन्तका सामना किया ॥३५-३८॥


अन्येऽप्येवं महायोधा यथायोग्यं परस्परम् । आरेभिरे रणं कर्तुमाह्वानमुखराननाः ॥३९॥

अर्थ: इनके सिवाय बुलानेके शब्दसे जिनके मुख शब्दायमान हो रहे थे ऐसे अन्य महायोधाओंने भी परस्पर यथायोग्य युद्ध करना प्रारम्भ किया ॥३९॥


गृहाण प्रहरागच्छ जहि व्यापादयोद्गिरः । छिन्धि भिन्धि क्षिपोत्तिष्ठ तिष्ठ दारय धारय ॥४०॥

अर्थ: उस समय योद्धाओंमें परस्पर इस प्रकारके शब्द हो रहे थे कोई किसीसे कहता था कि लो, इसके उत्तरमें दूसरा कहता था कि मारो, आओ, मारो, जानसे मार डालो, छेदो, भेदो, फेंक दो, उठो, बैठो, खड़े रहो, विदारण करो और धारण करो ॥४०॥


बधान स्फोटयाकर्ष मुञ्च चूर्णय नाशय । सहस्व दत्स्व निःसर्प संधत्स्वोच्छ्रय कल्पय ॥४१॥

किं भीतोऽसि न हन्मि त्वां धिक्त्वां कातरको भवान् । कस्त्वं बिभेसि नष्टोऽसि मा कम्पिष्ठा क्व गम्यते ॥४२॥

अर्थ: बाँधो, फोड़ डालो, घसीटो, छोड़ो, चूर-चूर कर डालो, छोड़ो, नष्ट करो, सहन करो, देओ, पीछे हटो, सन्धि करो, उन्नत होओ, समर्थ बनो। तू क्यों डर रहा है ? मैं तुझे नहीं मारता, तुझे धिक्कार है, तू बड़ा कातर है, तुझे धिक्कार है, तू क्यों कम्पित हुआ जा रहा है ? क्या तू भूल गया है ? कम्पित मत हो, तू अकेला कहाँ जायेगा ? ॥४१-४२॥


अयं स वर्तते कालः शूराशूरविचारकः । भुज्यतेऽन्नं यथा मृष्टं न तथा युध्यते रणे ॥४३॥

अर्थ: यह वह समय है जिसमें शूर और कायरका विचार किया जाता है। जैसा मीठा अन्न खाया है वैसा रणमें युद्ध नहीं कर रहे हो ॥४३॥


गर्जितैरिति धीराणां तूर्यनादैस्तथोन्नतैः । नर्दन्तीव दिशो मत्ताः क्षतजातान्धकारिताः ॥४४॥

अर्थ: इस प्रकार धीर-वीरोंकी गर्जना और तुरहीके उन्नत शब्दोंसे दिशाएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो रुधिरकी वर्षासे अन्धकारयुक्त तथा पागल हो चिल्ला ही रही हों ॥४४॥


चक्रशक्तिगदायष्टिकनकार्ष्टिघनादिभिः । दंष्ट्रालमिव संजातं गगनं भीषणं परम् ॥४५॥

अर्थ: चक्र, शक्ति, गदा, यष्टि, कनक, आर्ष्टि और घन आदि शस्त्रोंसे आकाश उस प्रकार अत्यन्त भयंकर हो गया मानो सबको निगलनेके लिए दाँढ़े ही धारण कर रहा हो ॥४५॥


रक्ताशोकवनं किं तत् किं वा किंशुककाननम् । परिभद्रद्रुमारण्यमुत जातं क्षतं बलम् ॥४६॥

अर्थ: खूनसे लथपथ घायल सेनाको देखकर ऐसा सन्देह होता था कि क्या यह अशोकका लाल वन है ? या पलाशका कानन है, या पारिभद्र वृक्षोंका वन है ? ॥४६॥


कश्चिद्विघटितं दृष्ट्वा कङ्कटं छिन्नबन्धनम् । संधत्ते त्वरितं भूयः स्नेहं साधुजनो यथा ॥४७॥

अर्थ: किसीका कवच टूट गया तथा उसके बन्धन खुल गये, इसलिए उसने शीघ्र ही दूसरा कवच उस प्रकार धारण किया जिस प्रकार कि साधु पुरुष एक बार स्नेहके टूट जानेपर उसे शीघ्र ही पुनः धारण कर लेते हैं ॥४७॥


कश्चित्संधार्य दन्ताग्रैः खड्गं परिकरं दृढम् । बध्वा दीप्रः पुनर्योद्धुं श्रममुक्तः प्रवर्तते ॥४८॥

अर्थ: कोई तेजस्वी योद्धा दाँतोंके अग्रभागसे तलवार दबा तथा हाथोंसे कमर कसकर श्रमरहित हो फिरसे युद्ध करनेके लिए तैयार हो गया ॥४८॥


मत्तवारणदन्ताग्रक्षतवक्षस्थलोऽपरः । चलत्कर्णसमुद्धूतैर्वीजितः कर्णचामरैः ॥४९॥

अर्थ: मदोन्मत्त हाथीके दन्ताग्रसे जिसका वक्षःस्थल घायल हो गया था ऐसा कोई योद्धा हाथीके चंचल कानोंसे ऊपर उठे हुए कर्णचामरोंसे वीजित हो रहा था ॥४९॥


उत्तीर्णस्वामिकर्तव्यो निराकुलमतिः परम् । दन्तोत्संगे ततः शिश्ये संप्रसार्य भुजद्वयम् ॥५०॥

अर्थ: जिसने स्वामीका कर्तव्य पूरा किया था ऐसा कोई एक योद्धा निराकुल चित्त हो दोनों हाथ पसारकर हाथीके दाँतोंके बीच सो रहा था ॥५०॥


धातुपर्वतसंकाशाः केचित् क्षतजनिर्झराः । मुमुचुः शीकरासारसेकबोधितमूर्च्छिताम् ॥५१॥

अर्थ: जिनसे खूनके निर्झर झर रहे थे तथा जो गेरूके पर्वतके समान जान पड़ते थे ऐसे कितने ही योद्धाओंने जलकणोंकी वर्षाके सिंचनसे सचेत हो मूर्च्छा छोड़ी थी ॥५१॥


पर्यस्ता भूतले केचिद्दष्टौष्ठाः शस्त्रपाणयः । कुञ्चितभ्रूदुरीक्ष्यास्या वीरा मुञ्चन्ति जीवितम् ॥५२॥

अर्थ: जो ओठ डँस रहे थे, हाथोंमें शस्त्र लिये थे और टेढ़ी भौंहोंसे जिनके मुख भयंकर दिख रहे थे ऐसे कितने ही योद्धा पृथिवीपर पड़कर प्राण छोड़ रहे थे ॥५२॥


उपसंहृत्य संरम्भं त्यक्तशस्त्रास्तथापरे । मुञ्चन्ति जीवितं धीरा ध्यायन्तः परमाक्षरम् ॥५३॥

अर्थ: कितने ही धीर-वीर योद्धा ऐसे भी थे जो क्रोधका संकोच तथा शस्त्रोंका त्याग कर परब्रह्मका ध्यान करते हुए प्राण छोड़ रहे थे ॥५३॥


विषाणकोटिसंसक्तपाणयः केचिदुत्कटाः । आन्दोलनं गजेन्द्राणामग्रतः समुपासिरे ॥५४॥

अर्थ: कितने ही प्रचण्ड वीर खीसोंके अग्रभागको हाथोंसे पकड़कर हाथियोंके आगे झूला झूल रहे थे ॥५४॥


रक्तच्छटां विमुञ्चन्तश्चञ्चलाः शस्त्रपाणयः । कबन्धा नर्त्तनं चक्रुः शतशोऽतिभयानकम् ॥५५॥

अर्थ: जो रक्तकी छटा छोड़ रहे थे तथा हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए थे, ऐसे सैकड़ों उछलते कबन्ध - शिररहित धड़ अत्यन्त भयंकर नृत्य कर रहे थे ॥५५॥


केचिदस्त्रविनिर्मुक्ता जर्जरीभूतकङ्कटाः । प्रविष्टाः सलिलं क्लिष्टा जीविताशापराङ्मुखाः ॥५६॥

अर्थ: जिनके कवच जर्जर हो गये थे ऐसे कितने ही दुःखी योद्धा, जीवनकी आशासे विमुख हो शस्त्र छोड़ पानीमें घुस गये ॥५६॥


ईदृशे समरे जाते लोकसंत्रासकारिणि । परस्परसमुद्भूतमहाभटपरिक्षये ॥५७॥

महेन्द्रजिदसौ बाणैर्लक्ष्मीमन्तं सिताननैः । लग्नश्छादयितुं वीरस्तथा तमपि लक्ष्मणः ॥५८॥

अर्थ: इस तरह जब परस्पर महायोद्धाओंका क्षय करनेवाला, लोकसन्त्रासकारी महायुद्ध हो रहा था तब इन्द्रजित् तीक्ष्ण बाणोंसे लक्ष्मणको और लक्ष्मण इन्द्रजित्को आच्छादित करनेमें लीन थे ॥५७-५८॥


महातामसशस्त्रं च भोमं शक्रजिदक्षिपत् । विनाशं मानवीयेन तदस्त्रेणानयद्रिपुः ॥५९॥

अर्थ: इन्द्रजित्ने अत्यन्त भयंकर महातामस नामक शस्त्र छोड़ा जिसे लक्ष्मणने सूर्यास्त्रके द्वारा नष्ट कर दिया ॥५९॥


तमुग्रैः शक्रजिद्भूयः शरैराशीविषात्मकैः । आरब्धो वेष्टितुं क्रुद्धः सरथं शस्त्रवाहनम् ॥६०॥

वैनतेयास्त्रयोगेन नागास्त्रं स निराकरोत् । पूर्वोपात्तं यथा पापजालं योगी महातपाः ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे भरे इन्द्रजित्ने नाग बाणोंके द्वारा रथ, शस्त्र तथा वाहनके साथ लक्ष्मणको वेष्टित करना प्रारम्भ किया। तब लक्ष्मणने गरुडास्त्रके द्वारा उस नागास्त्रको उस तरह दूर कर दिया जिस प्रकार कि महातपस्वी योगी पूर्वोपार्जित पापोंके समूहको दूर कर देता है ॥६०-६१॥


ततोऽमात्यगणान्तस्थं हस्तिवृन्दस्थलावृतम् । विरथं लक्ष्मणश्चक्रे दशवक्त्रसमुद्भवम् ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्रिसमूहके मध्यमें स्थित तथा हाथियोंके समूहसे वेष्टित इन्द्रजित्को लक्ष्मणने रथरहित कर दिया ॥६२॥


पालयन् स निजं सैन्यं वचसा कर्मणा तथा । प्रायुङ्क्तास्त्रं महाध्वान्तपिहितारिदशास्यकम् ॥६३॥

अर्थ: तब वचन तथा क्रियासे अपनी सेनाकी रक्षा करते हुए इन्द्रजित्ने ऐसा तामसास्त्र छोड़ा कि जिसने महाअन्धकारसे रावणको छिपा लिया ॥६३॥


विद्यया तपनास्त्रं च हत्वा तस्य विचिन्तितम् । चिक्षेपेच्छाधृताकारानाशीमुखशिलीमुखान् ॥६४॥

अर्थ: इसके बदले लक्ष्मणने सूर्यास्त्र छोड़कर इन्द्रजित्का मनोरथ नष्ट कर दिया और इच्छानुसार आकृतिको धारण करनेवाले नागबाण छोड़े ॥६४॥


संग्रामाभिमुखो नागैः कुटिलं व्याप्तविग्रहः । इन्द्रजित्पतितो भूमौ पुरा भामण्डलो यथा ॥६५॥

अर्थ: इनके फलस्वरूप संग्रामके लिए आते हुए इन्द्रजित्का समस्त शरीर नागोंके द्वारा व्याप्त हो गया और उनके कारण जिस प्रकार पहले भामण्डल पृथिवीपर गिर पड़ा था उसी प्रकार वह भी पृथिवीपर गिर पड़ा ॥६५॥


पद्मेनाऽऽदित्यकर्णोऽपि सुयुद्धे विरथीकृतः । आदित्यास्त्रं शनैर्हत्वा नागास्त्रं संप्रयुज्य च ॥६६॥

अर्थ: उधर रामने भी धीरेसे सूर्यास्त्रको नष्ट कर तथा नागास्त्रको चलाकर युद्धमें भानुकर्णको रथरहित कर दिया ॥६६॥


संवेष्ट्य सर्वतो नागैः पतितो धरणीतले । पुरेव बाहुबलिना श्रीकण्ठो नमिनन्दनः ॥६७॥

अर्थ: पहले जिस प्रकार बाहुबलीने नमिके पुत्र श्रीकण्ठको जीतकर नागपाशसे बाँध लिया था, उसी प्रकार रामने भी भानुकर्णको सब ओरसे नागपाशसे वेष्टित कर लिया जिससे वह पृथिवीतलपर गिर पड़ा ॥६७॥


चित्रं श्रेणिक ते बाणाः भवन्ति धनुराश्रिताः । उल्कामुखास्तु गच्छन्तः शरीरे नागमूर्त्तयः ॥६८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! वे बाण बड़े ही विचित्र थे। जब वे धनुषपर चढ़ाये जाते थे तब बाणरूप रहते थे, चलते समय उल्काके समान मुखवाले हो जाते थे और शरीरपर जाकर नागरूप हो जाते थे ॥६८॥


क्षणं बाणाः क्षणं दण्डाः क्षणं पाशत्वमागताः । आमरा ह्यस्त्रभेदास्ते यथा चिन्तितरूपगाः ॥६९॥

अर्थ: वे बाण क्षण भरके लिए बाण हो जाते थे, क्षण-भरमें दण्डरूप हो जाते थे और क्षण-भरमें नागपाशरूप हो जाते थे, यथार्थमें ये सब शस्त्रोंके भेद देवोपनीत थे तथा मनचाहे रूपको धारण करनेवाले थे ॥६९॥


कर्मपाशैर्यथा जीवो नागपाशैः स वेष्टितः । भामण्डलेन पद्माज्ञां प्राप्याऽऽत्मीये रथे कृतः ॥७०॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार संसारी प्राणी कर्मरूपी पाशसे वेष्टित रहता है, उसी प्रकार भानुकर्ण भी नागपाशसे वेष्टित हो गया । तदनन्तर रामकी आज्ञा पाकर भामण्डलने उसे अपने रथपर डाल लिया ॥७०॥


मन्दोदरीसुतोऽप्येष बद्धो नारायणाज्ञया । विराधितेन याने स्वे स्थापितः क्लान्तविग्रहः ॥७१॥

अर्थ: उधर जिसका शरीर बेचैन हो रहा था ऐसे नागपाशसे बँधे हुए इन्द्रजित्को भी लक्ष्मणकी आज्ञासे विराधितने अपने रथपर रख लिया ॥७१॥


तावद्रणमुखेऽभाणीद् दशवक्त्रो विभीषणम् । संक्रुद्धोऽभिमुखीभूतं चिरं सोढारणक्रियम् ॥७२॥

अर्थ: उसी समय रणके मैदानमें क्रोधसे भरे रावणने, चिरकाल तक रणक्रियाको सहन करनेवाले विभीषणने कहा कि ॥७२॥


प्रहारमिममेकं मे प्रतीच्छ यदि मन्यसे । सत्यं पुरुषमात्मानं रणकण्डूप्रचण्डकम् ॥७३॥

अर्थ: यदि तू अपने आपको सचमुच ही रणकी खाजसे प्रचण्ड पुरुष मानता है तो मेरे इस एक प्रहारको झेल ॥७३॥


इत्युक्त्वा विस्फुरत्पिङ्गस्फुलिङ्गालिङ्गिताम्बरम् । शूलं चिक्षेप लुप्तोऽसौ लक्ष्मणेनान्तरे शरैः ॥७४॥

अर्थ: इतना कहकर उसने निकलते हुए पीले तिलगोंसे आकाशको व्याप्त करनेवाला शूल चलाया, सो लक्ष्मणने उसे अपने बाणोंसे बीचमें ही समाप्त कर दिया ॥७४॥


तं भस्मीकृतमालोक्य शूलमत्युग्रमायुधम् । अधिकं रावणः क्रुद्धः शक्तिं जग्राह दारुणाम् ॥७५॥

अर्थ: उस अत्यन्त भयंकर शूल नामक शस्त्रको भस्मीकृत देख रावणने अत्यन्त कुपित हो भयानक शक्ति उठायी ॥७५॥


यावत्पश्यति संजातमग्रतो गरुडध्वजम् । प्रौढेन्दीवरसंकाशं भासुरं पुरुषोत्तमम् ॥७६॥

अर्थ: रावण शक्ति उठाकर ज्यों ही सामने देखता है तो उसे आगे खड़े हुए, तरुण नील कमलके समान श्याम, देदीप्यमान पुरुषोत्तम, लक्ष्मण दिखाई दिये ॥७६॥


प्रलयाम्भोदसंभारगंभीरोदारनिस्वनः । विशल्यर्द्धमुखोऽवोचत् तमेवं ताडयन्निव ॥७७॥

अर्थ: लक्ष्मणको देख प्रलयकालीन मेघसमूहके समान गम्भीर शब्द करनेवाला रावण ताड़न करते हुए के समान इस प्रकार बोला ॥७७॥


अन्यस्यैव मया शस्त्रमुद्यतं वधकारणम् । यदि तस्कोऽधिकारस्ते स्थातुमासंनतो मम ॥७८॥

अर्थ: कि जब मैंने दूसरेका ही वध करनेके लिए शस्त्र उठाया है तब तुझे मेरे निकट खड़े होनेका क्या अधिकार है ? ॥७८॥


त्वमिवाञ्छसि मर्त्तुं वा यदि दुर्मत लक्ष्मण । प्रतीच्छेमं प्रहारं मे तिष्ठ प्रगुणविग्रहः ॥७९॥

अर्थ: अथवा रे मूर्ख लक्ष्मण ! यदि तू मरना ही चाहता है तो सीधा खड़ा हो और मेरा यह प्रहार झेल ॥७९॥


विभीषणं समुत्सार्य सोऽपि कृच्छ्रेण मानवान् । दशास्यमभिदुद्राव चिरं संग्रामखेदितम् ॥८०॥

अर्थ: यह सुन मानो लक्ष्मण भी कठिनाईसे विभीषणको अलग कर जो चिरकाल तक युद्ध करनेसे खेदखिन्न हो गया था ऐसे रावणके सम्मुख दौड़ा ॥८०॥


निःसर्पत्तारकाकारस्फुलिङ्गनिकरां ततः । चिक्षेप रावणः शक्तिं कोपसंभारसंगतः ॥८१॥

वक्षस्तस्य तया भिन्नं महाशैलतटोपमम् । अमोघक्षेपया शक्त्या दिव्ययात्यन्तदीप्रया ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधके भारसे भरे रावणने जिससे ताराओंके समान तिलगोंका समूह निकल रहा था ऐसी शक्ति चलायी और जिसका चलाना कभी व्यर्थ नहीं जाता तथा जो अत्यन्त देदीप्यमान थी ऐसी उस शक्तिसे महापर्वतके तटके समान लक्ष्मणका वक्षःस्थल खण्डित हो गया ॥८१-८२॥


लक्ष्मणोरसि सा सक्ता भासुराङ्गमनोहरा । परमप्रेमसंबद्धा शोभते स्म वधूरिव ॥८३॥

अर्थ: लक्ष्मणके वक्षस्थलपर लगी देदीप्यमान आकृतिसे मनोहर वह शक्ति, परम प्रेमसे लिपटी स्त्रीके समान सुशोभित हो रही थी ॥८३॥


गाढप्रहारदुःखार्त्तः स परायत्तविग्रहः । महीतलं परिप्राप्तो गिरिर्वज्राहतो यथा ॥८४॥

अर्थ: जो गाढ़ प्रहारजन्य दुःखसे दुःखी थे तथा जिनका शरीर विवश हो गया था ऐसे लक्ष्मण वज्रसे ताड़ित पर्वतके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥८४॥


दृष्ट्वा तं पतितं भूमौ पद्मः पद्माभलोचनः । विनियम्य परं शोकं शत्रुघातार्थमुद्यतः ॥८५॥

अर्थ: उन्हें भूमिपर पड़े देख कमल लोचन राम, तीव्र शोकको रोककर शत्रुका घात करनेके लिए उद्यत हुए ॥८५॥


सिंहयुक्तं समारूढः स्यन्दनं क्रोधपूरितः । शत्रुमायातमात्रेण चकार विरथं बली ॥८६॥

अर्थ: सिंहजुते रथपर बैठे एवं क्रोधसे भरे बलवान् रामने सामने जाते ही शत्रुको रथरहित कर दिया ॥८६॥


रथान्तरं समारूढश्छिन्नपूर्वशरासनः । यावच्चापं समादत्ते भूयोऽथ विरथीकृतः ॥८७॥

अर्थ: जबतक वह दूसरे रथपर चढ़ता है तबतक रामने उसका धनुष तोड़ दिया । तदनन्तर वह जबतक दूसरा धनुष उठाता है तबतक उसे पुनः रथरहित कर दिया ॥८७॥


पद्माभस्य शरैर्ग्रस्तो दशास्यो विह्वलीकृतः । न समर्थो बभूवेषुं ग्रहीतुं न च कार्मुकम् ॥८८॥

अर्थ: रामके बाणोंसे ग्रस्त हुआ रावण इतना विह्वल हो गया कि वह न तो बाण ग्रहण करनेके लिए समर्थ था और न धनुष हो ॥८८॥


लोठितोऽपि शरैस्तीव्रैस्तथापि धरणीतले । रथे विलोक्यते भूयो रावणः खेदसंगतः ॥८९॥

अर्थ: यद्यपि रामने तीव्र बाणोंके द्वारा रावणको पृथिवीपर लिटा दिया था तथापि वह खेद-खिन्न हो पुनः दूसरे रथपर आरूढ़ हो गया ॥८९॥


विच्छिन्नचापकवचः षड्वारं विरथीकृतः । तथापि शक्यते नैव स साधयितुमद्भुतः ॥९०॥

अर्थ: इस प्रकार यद्यपि रामने छह बार उसका धनुष तोड़ा तथा छह बार उसे रथरहित किया तथापि आश्चर्यसे भरा रावण जीता नहीं जा सका ॥९०॥


प्रोक्तश्च पद्मनाभेन परं प्राप्तेन विस्मयम् । नाल्पायुष्को भवानेव यो न प्राप्तोऽसि पञ्चताम् ॥९१॥

अर्थ: तब परम आश्चर्यको प्राप्त हुए रामने उससे कहा कि आप जब इस तरह मृत्युको प्राप्त नहीं हुए तब अल्पायुष्क नहीं हो, यह निश्चित है ॥९१॥


मद्बाहुप्रेरितैर्बाणैर्वेगवद्भिः शिताननैः । महीभृतोऽपि शीर्यन्ते मन्येऽन्यत्र किमुच्यताम् ॥९२॥

अर्थ: मैं समझता हूँ कि मेरी भुजाओंसे छोड़े हुए वेगशाली तीक्ष्णमुख बाणोंसे पहाड़ भी ढह जाते हैं फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है ॥९२॥


तथापि रक्षितः पुण्यैर्जन्मान्तरसमर्जितैः । शृणु जल्पामि किंचित्ते वचनं खेचराधिप ॥९३॥

अर्थ: इतना होनेपर भी जन्मान्तरमें संचित पुण्य कर्मने तेरी रक्षा की है । अब हे विद्याधरराज ! सुन, मैं तुझसे कुछ वचन कहता हूँ ॥९३॥


संग्रामेऽभिमुखो भ्राता यो मे शक्त्या त्वया हतः । प्रेतस्याभिमुखं तस्य वीक्षे यद्यनुमन्यसे ॥९४॥

अर्थ: संग्राममें सामने आये हुए मेरे जिस भाईको तूने शक्तिके द्वारा घायल किया है वह मरनेके सम्मुख है, यदि तू अनुमति दे तो उसका मुख देख लूँ ॥९४॥


एवमस्त्विति संभाष्य प्रार्थनाभङ्गदुर्विधः । ययौ दशाननो लङ्कामृद्ध्याऽऽखण्डलसंनिभः ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर जो प्रार्थना भंग करनेमें दरिद्र था और इन्द्रके समान जिसकी शोभा बढ़ रही थी ऐसा रावण ‘एवमस्तु’ कहकर वैभवके साथ लंकाकी ओर चला गया ॥९५॥


एकस्तावदयं ध्वस्तो मया शत्रुर्महोत्कटः । इति किंचिद्धृतिं प्राप्तो विवेश भवनं निजम् ॥९६॥

अर्थ: ‘यह एक महाबलवान् शत्रु तो मेरे द्वारा मारा गया’ इस प्रकार हृदयमें कुछ धैर्यको प्राप्त हुए रावणने अपने भवनमें प्रवेश किया ॥९६॥


अन्विष्य विक्षतांस्तत्र योधान् विक्रान्तवत्सलः । विवेशान्तःपुरं धीरो दर्शनश्रमनोदनः ॥९७॥

अर्थ: पराक्रमी मनुष्योंके साथ स्नेह रखनेवाले धीर-वीर रावणने घायल योद्धाओंकी खोज कराकर उनकी ओर प्रेमपूर्ण दृष्टिसे देखा तथा इस तरह उनका खेद दूर कर अन्तःपुरमें प्रवेश किया ॥९७॥


निरुद्धं भ्रातरं श्रुत्वा पुत्राचरणकारिणौ । शोचन् प्रियजनं पश्यन्नाशां चक्रे दशाननः ॥९८॥

अर्थ: भाई कुम्भकर्ण और युद्ध करनेवाले इन्द्रजित् तथा मेघवाहन नामक दो पुत्रोंको शत्रुके पास रुका सुन रावण शोक करने लगा परन्तु प्रियजनोंकी ओर देखते हुए उसने उन्हें शीघ्र ही छुड़ानेकी आशा की ॥९८॥


इति निजचरितस्यानेकरूपस्य हेतोर्व्यतिगतभवजस्यावश्यलभ्योदयस्य । इह जनुषु विचित्रं कर्मणो मावयन्ते फलमविरतयोगाज्जन्तवो भूरिभावाः ॥९९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! नाना प्रकारके भावोंको धारण करनेवाले जीव, अपने विविध आचरणोंके अनुरूप पूर्वभवोंमें जो कर्मका संचय करते हैं उन्हें उसका उदय अवश्य ही भोगना पड़ता है और उसके उदयके अनुरूप ही वे इस जन्ममें निरन्तर नाना प्रकारका फल भोगते हैं ॥९९॥


व्रजति विधिनियोगात्कश्चिदेवेह नाशं हतरिपुरपरश्च स्वं पदं याति धीरः ।
विफलितपृथुशक्तिर्बन्धनं सेवतेऽन्यो रविरुचितपदार्थोद्भासने हि प्रवीणः ॥१००॥

अर्थ: इस संसारमें कर्मयोगसे कोई नाशको प्राप्त होता है, कोई धीर-वीर शत्रुको नष्ट कर अपने पदको प्राप्त होता है, कोई अपनी विशाल शक्तिके निष्फल हो जानेसे बन्धनको प्राप्त होता है और कोई सूर्यके समान योग्य पदार्थोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होता है ॥१००॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे शक्तिसंतापाभिधानं नाम द्वाषष्टितमं पर्व ॥६२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें लक्ष्मणके शक्ति लगनेके दुःखका वर्णन करनेवाला बासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६२॥


६३. त्रिषष्टितमं पर्व (शक्तिभेदरामविलापाभिधानं)

ततः समाकुलस्वान्तः पद्मः शोकेन ताडितः । परिप्राप तमुद्देशं यत्र तिष्ठति लक्ष्मणः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जिनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो रहा था तथा जो शोकसे पीड़ित हो रहे थे ऐसे श्रीराम उस स्थानपर पहुँचे जहाँ लक्ष्मण पड़े थे ॥१॥


निर्विचेष्टं तमालोक्य क्षितिमण्डलमण्डनम् । शक्त्याऽऽलिङ्गितवक्षस्कं पद्मो मूर्च्छामुपागतः ॥२॥

अर्थ: जिनका वक्षःस्थल शक्तिसे आलिंगित था ऐसे पृथिवीतलके अलंकारस्वरूप लक्ष्मणको निश्चेष्ट देख राम मूर्च्छाको प्राप्त हो गये ॥२॥


संप्राप्य च चिरात् संज्ञां महाशोकसमन्वितः । दुःखाग्निदीपितोऽत्यन्तं विप्रलापमसेवत ॥३॥

अर्थ: चिरकाल बाद जब सचेत हुए तब महाशोकसे युक्त एवं दुःखरूपी अग्निसे जलते हुए अत्यन्त विलाप करने लगे ॥३॥


हा वत्स विधियोगेन महादुर्लङ्घ्यमर्णवम् । उत्तीर्य संगतोऽस्येतामवस्थामतिदारुणाम् ॥४॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हाय वत्स ! तू कर्मयोगसे इ[?] दुर्लंघ्य सागर को उल्लंघ कर अब इस अत्यन्त कठिन दशाको प्राप्त हुआ है ॥४॥


अयि मद्भक्तिसच्चेष्टो मदर्थं सततोद्यतः । क्षिप्रं प्रयच्छ मे वाचं किं मौनेनावतिष्ठसे ॥५॥

अर्थ: अये वत्स ! तू सदा मेरी भक्तिमें सचेष्ट रहता था और मेरे कार्यके लिए सदा तत्पर रहता था, अतः शीघ्र ही मुझे वचन दे-मुझसे वार्तालाप कर, मौनसे क्यों बैठा है ? ॥५॥


जानास्येव वियोगं ते मुहूर्त्तमपि नो सहे । कुर्वालिङ्गनमुत्तिष्ठ क्व गतोऽसौ तवादरः ॥६॥

अर्थ: तू यह तो जानता ही है कि मैं तेरा वियोग मुहूर्त-भरके लिए भी सहन नहीं कर सकता हूँ अतः उठ आलिंगन कर, तेरा वह आदर कहाँ गया ? ॥६॥


अद्य केयूरदष्टौ मे भुजावेतौ महायतौ । मावमात्रकरौ जातौ निष्क्रियौ निष्प्रयोजनौ ॥७॥

अर्थ: आज बाजूबन्दसे सुशोभित मेरी ये लम्बी भुजाएँ नाममात्रकी रह गयीं, तेरे बिना सर्वथा निष्फल और निष्क्रिय हो गयीं ॥७॥


निक्षेपो गुरुभिस्त्वं मे प्रयत्नेन समर्पितः । गत्वा किमुत्तरं तेभ्यो दास्यामि त्रपयोज्झितः ॥८॥

अर्थ: माता-पिता आदि गुरुजनोंने तुझे धरोहरके रूपमें प्रयत्नपूर्वक मेरे लिए सौंपा था, अब मैं लज्जारहित हुआ जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा ? ॥८॥


क्व सौमित्रिः क्व सौमित्रिरिति गाढं समुत्सुकः । लोकोऽपि हि समस्तो मे प्रक्ष्यति प्रेमनिर्भरः ॥९॥

अर्थ: प्रेमसे भरे समस्त लोग अत्यन्त उत्सुक हो मुझसे पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है ? लक्ष्मण कहाँ है ? ॥९॥


रत्नं पुरुषवीराणां हारयित्वा त्वकामहम् । मन्ये जीवितमात्मीयं हतं निहतपौरुषः ॥१०॥

अर्थ: तू वीर पुरुषोंमें रत्नके समान था सो तुझे हराकर मैं पुरुषार्थहीन [?]आ अपने जीवनको नष्ट हुआ समझता हूँ ॥१०॥


दुष्कृतस्योदयस्थस्य रचितस्य भवान्तरे । फलमेतन्मया प्राप्तं सीतया मे किमन्यथा ॥११॥

अर्थ: भवान्तरमें जो मैंने दुष्कृत-पाप कर्म किया था वह इस समय उदयमें आ रहा है । और उसीका फल मुझे प्राप्त हुआ है, हे भाई ! मुझे तेरे बिना सीतासे क्या प्रयोजन है ? ॥११॥


यस्याः कृते क्षतोरस्कं शक्त्या निर्दयनुन्नया । भवन्तं भूतले सुप्तं पश्यामि दृढमानसः ॥१२॥

अर्थ: मुझे उस सीतासे क्या प्रयोजन है जिसके लिए निर्दय-रावणके द्वारा चलायी हुई शक्तिसे तेरा वक्षःस्थल विदीर्ण हुआ है तथा मैं कठोर हृदय हो तुझे पृथिवीपर सोया हुआ देख रहा हूँ ॥१२॥


कामार्थाः सुलभाः सर्वे पुरुषस्यागमास्तथा । विविधाश्चैव संबन्धा विष्टपेऽस्मिन् यथा तथा ॥१३॥

अर्थ: इस संसारमें पुरुषको काम और अर्थ तथा नाना प्रकारके सम्बन्ध सर्वत्र सुलभ हैं ॥१३॥


पर्यट्य पृथिवीं सर्वां स्थानं पश्यामि तन्ननु । यस्मिन्नवाप्यते भ्राता जननी जनकोऽपि वा ॥१४॥

अर्थ: समस्त पृथिवीमें घूम-कर मैं वह स्थान नहीं देख सका जिसमें भाई, माता तथा पिता पुनः प्राप्त हो सकते हों ॥१४॥


हे सुग्रीव सुहृत्त्वं ते दर्शितं खेचराधिप । व्रजाऽधुना निजं देशं भामण्डल भवानपि ॥१५॥

अर्थ: हे विद्याधरोंके राजा सुग्रीव ! तुमने अपनी मित्रता दिखायी । अब अपने देश जाओ । इसी तरह हे भामण्डल ! तुम भी अपने देश जाओ ॥१५॥


जीविताशां परित्यज्य दयितां जानकीमिव । ज्वलनं श्वः प्रवेष्टास्मि समं भ्रात्रा विसंशयम् ॥१६॥

अर्थ: इसमें संशय नहीं कि मैं प्रिया जानकीके समान जीवनकी आशा छोड़ कल भाईके साथ अग्निमें प्रवेश करूँगा ॥१६॥


विभीषण न मे शोकस्तथा सीताऽनुजोद्भवः । यथा निरुपकारित्वं मम संबाधते त्वयि ॥१७॥

अर्थ: हे विभीषण ! मुझे सीता तथा छोटे भाईके वियोगसे उत्पन्न हुआ शोक उस प्रकार पीड़ा नहीं पहुँचा रहा है जिस प्रकार कि तुम्हारा कुछ उपकार नहीं कर सकना ॥१७॥


उत्तमा उपकुर्वन्ति पूर्वं पश्चात्तु मध्यमाः । पश्चादपि न ये तेषामधमत्वं हतात्मनाम् ॥१८॥

अर्थ: उत्तम मनुष्य कार्यके पूर्व तथा मध्यम मनुष्य कार्यके पश्चात् उपकार करते हैं परन्तु जो कार्यके पीछे भी उपकार नहीं करते हैं उन दुष्टोंमें नीचताका ही निवास समझना चाहिए ॥१८॥


कृतपूर्वोपकारस्य साधोर्बन्धुविरोधिनः । यत्ते नोपकृतं किंचित्तेन दह्येतरामहम् ॥१९॥

अर्थ: हे विभीषण ! तू साधु पुरुष है । तूने मेरा पहले उपकार किया और मेरे पीछे बन्धुसे विरोध किया है फिर भी मैं तेरा कुछ भी उपकार नहीं कर सका इससे मन ही मन जल रहा हूँ ॥१९॥


भो भामण्डलसुग्रीवौ चितां रचयतां द्रुतम् । परलोकं गमिष्यामि कुरुतं युक्तमात्मनः ॥२०॥

अर्थ: हे भामण्डल और सुग्रीव ! शीघ्र ही चिता बनाओ । मैं परलोक जाऊँगा, आप दोनों अपने योग्य कार्य करो । जिसमें तुम्हारा कल्याण हो सो करो ॥२०॥


ततो लक्ष्मीधरं स्प्रष्टुमिच्छन्तं रघुनन्दनम् । अवारयन्महाबुद्धिर्जाम्बूनदमहत्तरः ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर रामने लक्ष्मणके स्पर्श करनेकी इच्छा की सो उन्हें महाबुद्धिमान् जाम्बूनदने मना किया ॥२१॥


मा स्प्राक्षीर्लक्ष्मणं देव दिव्यास्त्रपरिमूर्च्छितम् । प्रमादो जायते ह्येवं प्रायो हि स्थितिरीदृशी ॥२२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे देव ! दिव्य अस्त्रसे मूर्च्छित लक्ष्मणको मत छुओ क्योंकि ऐसा करनेसे प्रायः प्रमाद हो जाता है । इन दिव्य अस्त्रोंकी ऐसी ही स्थिति है ॥२२॥


प्रपद्यस्व च धीरत्वं कातरत्वं परित्यज । भवन्तीह प्रतीकाराः प्रायो विपदमीयुषाम् ॥२३॥

अर्थ: आप धीरताको प्राप्त होओ, कातरता छोड़ो, विपत्तिमें पड़े हुए लोगोंके प्रतीकार इस संसारमें अधिकांश विद्यमान हैं ॥२३॥


प्रतीकारो विलापोऽत्र नानुदात्तजनोचितः । परमार्थानुसारेण क्रियतां धीरमानसम् ॥२४॥

अर्थ: क्षुद्र मनुष्योंके योग्य विलाप करना इसका प्रतीकार नहीं है, हृदयको यथार्थमें धैर्ययुक्त किया जाये ॥२४॥


उपायः सर्वथा कश्चिदिह देव भविष्यति । जीविष्यति तव भ्राता ननु नारायणो ह्ययम् ॥२५॥

अर्थ: हे देव ! इसका कोई न कोई उपाय अवश्य होगा और तुम्हारा भाई जीवित होगा क्योंकि यह नारायण है, नारायणका असमयमें मरण नहीं होता ॥२५॥


ततो विषादिनः सर्वे परं विद्याधराधिपाः । उपायचिन्तनासक्ताश्चक्रुरित्यन्तरात्मनि ॥२६॥

दिव्या शक्तिरियं शक्या न निराकर्त्तुमौषधैः । उद्गते ज्योतिषामीशे दुःखं जीवति लक्ष्मणः ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर विषादसे भरे सब विद्याधर राजा उपायके चिन्तनमें तत्पर हो मनमें इस प्रकार विचार करने लगे कि यह दिव्य शक्ति औषधियोंके द्वारा दूर नहीं की जा सकती और सूर्योदय होनेपर लक्ष्मण बड़ी कठिनाईसे जीवित रह सकेंगे अर्थात् सूर्योदयके पूर्व इसका प्रतीकार नहीं किया गया तो जीवित रहना कठिन हो जायेगा ॥२६-२७॥


अथोत्सार्य कबन्धादीन्निमिषार्द्धेन सा मही । किङ्करैर्विहितोत्तुङ्गदूष्यप्राकारमण्डपा ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर किंकरोंने आधे निमेषमें ही शिररहित धड़ आदिको हटाकर उस युद्धभूमिको शुद्ध किया और वहाँ कपड़ेके ऊँचे-ऊँचे डेरे-कनातें तथा मण्डप आदि खड़े कर दिये ॥२८॥


सप्तकक्ष्याट्टसंपन्ना कृतदिक्चयनिर्गमा । बहिः कवचितैर्योधैर्गुप्ता कार्मुकधारिभिः ॥२९॥

अर्थ: उस भूमिको सात चौकियोंसे युक्त किया,दिशाओंमें आवागमन बन्द किया और कवच तथा धनुषको धारण करनेवाले योद्धाओंने बाहर खड़े रह उसकी रक्षा की ॥२९॥


प्रथमे गोपुरे नीलश्चापपाणिः प्रतिष्ठितः । द्वितीये तु नलस्तस्थौ गदाहस्तो घनोपमः ॥३०॥

विभीषणस्तृतीये तु शूलपाणिर्महामनाः । स्रङ्माल्यचित्ररत्नांशुरीशानवदशोभत ॥३१॥

अर्थ: पहले गोपुरपर धनुष हाथमें लेकर नील बैठा, दूसरे गोपुरमें गदा हाथमें धारण करनेवाला मेघतुल्य नल खड़ा हुआ, तीसरे गोपुरमें हाथमें शूल धारण करनेवाला उदारचेता विभीषण खड़ा हुआ । वहाँ जिसकी मालाओंमें लगे नाना प्रकारके रत्नोंकी किरणें सब ओर फैल रही थीं ऐसा विभीषण ऐशानेन्द्रके समान सुशोभित हो रहा था ॥३०-३१॥


संनद्धबद्धतूणीरस्तुरीये कुमुदः स्थितः । सुषेणः पञ्चमे ज्ञेयः कुन्तहस्तः प्रतापवान् ॥३२॥

अर्थ: कवच और तरकसको धारण करनेवाला कुमुद चौथे गोपुरपर खड़ा हुआ । पांचवें गोपुरमें भाला हाथमें लिये प्रतापी सुषेण खड़ा हुआ ॥३२॥


सुपीवरभुजो वीरः सुग्रीवः स्वयमेव च । रराज भिण्डिमालेन षष्ठे वज्रधरोपमः ॥३३॥

प्रदेशे सप्तमे राजमहारिपुबळान्तकः । मण्डलाग्रं समाकृष्य स्वयं भामण्डलः स्थितः ॥३४॥

अर्थ: जिसकी भुजाएँ अत्यन्त स्थूल थीं और भिण्डिमाल नामक शस्त्रसे इन्द्रके समान जान पड़ता था ऐसा वीर सुग्रीव स्वयं छठवें गोपुरमें सुशोभित हो रहा था । तथा सातवें गोपुरमें बड़े-बड़े शत्रुराजाओंकी सेनाको मौतके घाट उतारनेवाला भामण्डल स्वयं तलवार खींचकर खड़ा था ॥३३-३४॥


पूर्वद्वारेण संचारे शरभः शरभध्वजः । रराज पश्चिमे द्वारे कुमारो जाम्बवो यथा ॥३५॥

प्रदेशमौत्तरद्वारं व्याप्यामात्यौघसंकुलम् । स्थितश्चन्द्रमरीचिश्च बालिपुत्रो महाबलः ॥३६॥

अर्थ: पूर्वं द्वारके मार्ग-में शरभ चिह्नसे चिह्नित ध्वजाको धारण करनेवाला शरभ पहरा दे रहा था, पश्चिम द्वारमें जाम्बव कुमार सुशोभित हो रहा था और मन्त्रिसमूहसे युक्त उत्तर द्वारको घेरकर चन्द्ररश्मि नामका बालिका महाबलवान् पुत्र खड़ा हुआ था ॥३५-३६॥


एवं विरचिता क्षोणी खेचरेशैः प्रयत्निभिः । रराज द्यौरिवात्यर्थं निर्मलैरुडुमण्डलैः ॥३७॥

अर्थ: इस प्रकार प्रयत्नशील विद्याधर राजाओंके द्वारा रची हुई वह भूमि, निर्मल नक्षत्रोंके समूहसे आकाशके समान अत्यन्त सुशोभित हो रही थी ॥३७॥


यावन्तः केचिदन्ये तु समरादनिवर्त्तिनः । ते स्थिता दक्षिणामाशां व्याप्य वानरकेतवः ॥३८॥

अर्थ: इनके सिवाय युद्धसे नहीं लौटनेवाले जो अन्य वानरध्वज राजा थे वे सब दक्षिण दिशाको व्याप्त कर खड़े हो गये ॥३८॥


एवं प्रयत्नाः कृतयोग्यरक्षाः संदेहिनो लक्ष्मणजीवयोगे । सविस्मयाः सोरुशुचः समानाः स्थिताः समस्ता गगनायनेशाः ॥३९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्होंने इस प्रकार प्रयत्न कर योग्य रक्षा की थी, जिन्हें लक्ष्मणके जीवित होनेमें सन्देह था, जो आश्चर्यसे युक्त थे, बहुत भारी शोकसे सहित थे एवं मानी थे ऐसे सब विद्याधर राजा यथास्थान खड़े हो गये ॥३९॥


न तन्नरा नो ययवो न नागा न चापि देवा विनिवारयन्ति । यदात्मना संजनितस्य लभ्य-फलं नृणां कर्मरवेः प्रकाशम् ॥४०॥

अर्थ: अपने ही द्वारा अर्जित कर्मरूपी सूर्यके प्रकाशस्वरूप जो फल मनुष्योंको प्राप्त होनेवाला है उसे न मनुष्य दूर कर सकते हैं, न घोड़े, न हाथी, और न देव भी ॥४०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे शक्तिभेदरामविलापाभिधानं नाम त्रिषष्टितमं पर्व ॥६३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें शक्तिभेद एवं रामविलापका वर्णन करनेवाला तिरसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६३॥

६४. चतुःषष्टितमं पर्व (विशल्यापूर्वभवाभिधानं)

नियतं मरणं ज्ञात्वा लक्ष्मणस्य दशाननः । पुत्रभ्रातृवधं बुद्धौ चकारात्यन्तदुःखितः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रावण लक्ष्मणका मरण निश्चित जान अत्यन्त दुखी होता हुआ मनमें पुत्रों और भाईके बधका विचार करने लगा । भावार्थ - रावणको यह निश्चय हो गया कि शक्तिके प्रहारसे लक्ष्मण अवश्य मर गया होगा और उसके प्रतिकारस्वरूप रामपक्षके लोगोंने कैद किये हुए इन्द्रजित् तथा मेघवाहन इन दो पुत्रों और कुम्भकर्ण भाईको अवश्य मार डाला होगा । इस विचारसे वह मन ही मन बहुत दुःखी हुआ ॥१॥


हा भ्रातः परमोदार ममात्यन्तहितोद्यतः । कथमेतामवाप्नोषि बन्धावस्थामसंगताम् ॥२॥

अर्थ: वह विलाप करने लगा कि हाय भाई ! तू अत्यन्त उदार था और मेरा हित करनेमें सदा उद्यत रहता था सो इस अयुक्त बन्धनकी अवस्थाको कैसे प्राप्त हो गया ? ॥२॥


हा पुत्रौ सुमहावीर्यौ भुजाविव दृढौ मम । विधेर्नियोगतः प्राप्तौ भवन्तौ बन्धनं नवम् ॥३॥

अर्थ: हाय पुत्रो ! तुम तो महाबलवान् और मेरी भुजाओंके समान दृढ़ थे । कर्मके नियोगसे ही तुम इस नूतन बन्धनको प्राप्त हुए हो ॥३॥


किं करिष्यति वः शत्रुरित्याकुलितमानसः । न वेद्मि दुरितात्माहं विरसं वा करिष्यति ॥४॥

अर्थ: शत्रु तुम लोगोंका क्या करेगा ? यह सोचकर मेरा मन अत्यन्त व्याकुल हो रहा है । मैं पापी शत्रुके कर्तव्यको नहीं जानता हूँ अथवा निश्चित ही है कि वह अनिष्ट ही करेगा अर्थात् तुम्हें मारेगा ही ॥४॥


भवद्भिरुत्तमैः प्रीतैर्बन्धदुःखं समागतैः । बाध्येऽहं नितरां कष्टं किमिदं मम वर्त्तते ॥५॥

अर्थ: आप-जैसे उत्तम, प्रीतिके पात्र पुरुष बन्धनके दुःखको प्राप्त हुए हैं इसलिए मैं अत्यधिक पीड़ाको प्राप्त हो रहा हूँ । हाय, यह कष्ट मुझे क्यों रहा है ? ॥५॥


एवं गजेन्द्रवद्बद्धनिजयूथमहागजः । अप्रकाशं परं शोकमसेवत स संततम् ॥६॥

अर्थ: इस प्रकार जिसके यूथ - झुण्डका महागज पकड़ लिया गया है ऐसे अन्य गजराजकी तरह वह रावण निरन्तर अप्रकट रूपसे मन ही मन शोकका अनुभव करने लगा ॥६॥


शक्त्या हतं गतं भूमिं श्रुत्वा लक्ष्मीधरं परम् । संप्राप्ता जानकी शोकमकरोत्परिदेवनम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर जब सीताने सुना कि लक्ष्मण शक्तिसे घायल हो पृथिवीपर गिर पड़े हैं तब वह शोकको प्राप्त हो विलाप करने लगी ॥७॥


हा भद्र लक्ष्मण प्राप्तस्त्वमवस्थामिमां हताम् । कृते मे मन्दभाग्याया विनीत गुणभूषण ॥८॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हाय भाई लक्ष्मण ! हाय विनीत ! हाय गुण रूपी आभूषणसे सहित ! तुम मुझ अभागिनीके लिए इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो ॥८॥


ईदृक्षमपि वाञ्छामि भवन्तमहमीक्षितुम् । विमुक्ता हतदैवेन न लभे पापकारिणी ॥९॥

अर्थ: यद्यपि मैं इस तरह संकटमें पड़ी हुई भी तुम्हारा दर्शन करना चाहती हूँ तथापि मैं अभागिनी पापिनी आपका दर्शन नहीं पा रही हूँ ॥९॥


भवन्तं तादृशं वीरं घ्नता पापेन शत्रुणा । क्व मे कृतो न संदेहः प्रवीरे मरणं प्रति ॥१०॥

अर्थ: आप-जैसे वीरको मारते हुए पापी शत्रुने किस वीरके मारनेका सन्देह मुझे उत्पन्न नहीं किया है ? अर्थात् जब उसने आप-जैसे वीरको मार डाला है तब वह प्रत्येक वीरको मार सकता है ॥१०॥


वियुक्तो बन्धुभिः भ्रातुरिष्टे संसक्तमानसः । अवस्थामागतोऽस्येतां कृच्छ्रादुत्तीर्य सागरम् ॥११॥

अर्थ: तुम भाईका भला करनेमें चिन्ता लगा पहले बन्धुजनोंसे बिछोहको प्राप्त हुए और अब बड़ी कठिनाईसे समुद्रको पार कर इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो ॥११॥


अपि नाम पुनः क्रीडाकोविदं विनयान्वितम् । पश्येयं चारुवाक्यं त्वा परमाद्भुतकारिणम् ॥१२॥

अर्थ: क्या मैं क्रीड़ा करनेमें निपुण विनयी, सुन्दर वचन बोलनेवाले एवं परम आश्चर्यके कार्य करनेवाले तुम्हें फिर भी देख सकूँगी ? ॥१२॥


कुर्वन्तु सर्वथा देवास्तव जीवितपालनम् । विशल्यतां द्रुतं गच्छ सर्वलोकमनोहर ॥१३॥

अर्थ: देव सब प्रकारसे तुम्हारे जीवनक रक्षा करें और सब लोगोंके मनको हरण करनेवाले तुम शीघ्र ही शल्यरहित अवस्थाको प्राप्त होओ ॥१३॥


एवं विलापिनी कृच्छ्राच्छोकिनी जनकात्मजा । भावप्रीतिभिरानीता खेचरीभिः प्रसान्त्वनम् ॥१४॥

अर्थ: इस प्रकार विलाप करनेवाली शोकवती सीताको भावसे स्नेह रखनेवाली विद्याधरियोंने सान्त्वना प्राप्त करायी ॥१४॥


ज्ञायते देवि नाद्यापि निश्चयो देवरस्य ते । अतो न वर्तते कर्तुमेतस्मिन् परिदेवनम् ॥१५॥

अर्थ: उन्होंने समझाते हुए कहा कि हे देवि ! तुम्हारे देवरका अभी तक निश्चय नहीं जान पड़ा है इसलिए इसके विषयमें विलाप करना उचित नहीं है ॥१५॥


भव धीरा प्रवीराणां भवत्येवेदृशी गतिः । भवन्ति च प्रतीकाराश्चित्रं हि जगतीहितम् ॥१६॥

अर्थ: धैर्य धारण करो, वीरोंकी तो ऐसी गति होती ही है । जो हो चुकता है उसके प्रतीकार होते हैं यथार्थमें पृथिवीकी चेष्टा विचित्र है ॥१६॥


इति विद्याधरीवाक्यात्किंचित्साऽभूदनाकुला । श्रृण्विदानीं यदेतस्मिञ्जातं लक्ष्मणपर्वणि ॥१७॥

अर्थ: इस प्रकार विद्याधरियोंके कहनेसे सीता कुछ निराकुल हुई । गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अब इस लक्ष्मण पर्वमें जो कुछ हुआ उसे श्रवण कर ॥१७॥


प्राप्तो दूष्यगृहद्वारं पुरुषश्चारुदर्शनः । प्रभामण्डलवीरेण प्रविशन्निति नोदिता ॥१८॥

कस्त्वं कस्य कुतो वाऽसि किमर्थं वा विविक्षसि । तिष्ठ तिष्ठ समाचक्ष्व नात्राविदितसंगमः ॥१९॥

अर्थ: अथानन्तर इसी बीचमें एक सुन्दर मनुष्य डेरेके द्वारपर आकर भीतर प्रवेश करने लगा तब भामण्डलने उसे रोकते हुए कहा कि तू कौन है ? किसका आदमी है ? कहाँसे आया है ? और किस लिए प्रवेश करना चाहता है ? खड़ा रह, खड़ा रह, सब बात ठीक-ठीक बता, यहाँ अपरिचित लोगोंका आगमन निषिद्ध है ॥१८-१९॥


सोऽवोचदद्य मे मासः साग्रः प्राप्तस्य वर्तते । पद्मं समाश्रयामीति प्रस्तावो न त्वलभ्यत ॥२०॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उस पुरुषने कहा कि मुझे यहाँ आये कुछ अधिक एक मास हो गया । मैं रामका दर्शन करना चाहता हूँ परन्तु अब तक अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ ॥२०॥


अधुना दर्शये शीघ्रं जीवन्तं यदि लक्ष्मणम् । द्रष्टुं भवति वाञ्छा वस्तत्रोपायं वदाम्यहम् ॥२१॥

अर्थ: इस समय उनका दर्शन करता हूँ । यदि आप लोगोंकी लक्ष्मणको शीघ्र ही जीवित देखनेकी इच्छा है तो मैं आपको इसका उपाय बताता हूँ ॥२१॥


इत्युक्ते परितुष्टेन भामण्डलमहीभृता । दत्त्वा प्रतिनिधिं द्वारे नीतोऽसौ पद्मगोचरम् ॥२२॥

अर्थ: उसके इतना कहते ही राजा भामण्डल बहुत सन्तुष्ट हुआ । वह द्वार पर अपना प्रतिनिधि बैठाकर उसे रामके समीप ले गया ॥२२॥


संप्रयुज्य प्रणामं च स जगाद महादरः । मा खित्स्थास्त्वं महाराज कुमारो जावति ध्रुवम् ॥२३॥

अर्थ: उस पुरुषने बड़े आदरसे रामको प्रणाम कर कहा कि हे महाराज ! खेद मत कीजिए, कुमार निश्चित ही जीवित हैं ॥२३॥


सुप्रभा नाम मे माता जनकः शशिमण्डलः । देवगीते पुरेऽहं च चन्द्रप्रतिमसंज्ञकः ॥२४॥

अर्थ: मेरी माताका नाम सुप्रभा तथा पिताका नाम चन्द्रमण्डल है । मैं देवगीतपुरका रहनेवाला हूँ तथा चन्द्रप्रतिम मेरा नाम है ॥२४॥


जातुचिद्विचरन् व्योम्नि वेलाध्यक्षस्य सूनुना । सहस्रविजयाख्येन बैरिणाऽहं निरीक्षितः ॥२५॥

अर्थ: किसी समय मैं आकाशमें घूम रहा था उसी समय राजा वेलाध्यक्षके पुत्र सहस्रविजयने जो कि हमारा शत्रु था मुझे देख लिया ॥२५॥


ततो मैथुनिकाबैरं स्मृत्वा क्रोधं समीयुषः । तस्य जातं मया सार्द्धं रणं सुभटदारुणम् ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर स्त्री सम्बन्धी वैरका स्मरण कर वह क्रोधको प्राप्त हो गया जिससे उसका मेरे साथ योद्धाओंको भय उत्पन्न करनेवाला - कठिन युद्ध हुआ ॥२६॥


ततोऽहं चण्डरवया शक्त्या तेन समाहतः । खान्महेन्द्रोदयोद्याने नक्तं निपतितो घने ॥२७॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसने मुझे चण्डरवा नामक शक्तिसे मारा जिससे मैं रात्रिके समय आकाशसे अयोध्याके महेन्द्रोदय नामक सघन वनमें गिरा ॥२७॥


पतन्तं मां समालोक्य तारकाबिम्बसंनिभम् । साकेताधिपतिस्तर्की भरतः समढौकत ॥२८॥

अर्थ: आकाशसे पड़ते हुए ताराबिम्बके समान मुझे देख अयोध्याके राजा भरत तर्क करते हुए मेरे समीप आये ॥२८॥


शक्तिशल्यितवक्षाश्च सिक्तश्चन्दनवारिणा । तेनाहं करुणार्त्तेन साधुना जीवदायिना ॥२९॥

अर्थ: शक्ति लगनेसे जिसका वक्षःस्थल शल्ययुक्त था ऐसे मुझको देख राजा भरत दयासे दुखी हो उठे । तदनन्तर जीवन दान देनेवाले उन सत्पुरुषने मुझे चन्दनके जलसे सींचा ॥२९॥


शक्तिः पलायिता काऽपि जातं रूपं च पूर्वकम् । अधिकं च सुखं जातं तेन मे गन्धवारिणा ॥३०॥

अर्थ: उसी समय शक्ति कहीं भाग गयी और मेरा रूप पहलेके समान हो गया तथा उस सुगन्धित जलसे मुझे अत्यधिक सुख उत्पन्न हुआ ॥३०॥


तेन मे पुरुषेन्द्रेण भरतेन महात्मना । जन्मान्तरमिदं दत्तं फलं यस्य त्वदीक्षणम् ॥३१॥

अर्थ: पुरुषोंमें इन्द्रके समान श्रेष्ठ उन महात्मा भरतने मुझे यह दूसरा जन्म दिया है जिसका कि फल आपका दर्शन करना है । भावार्थ - शक्ति निकालकर उन्होंने मुझे जीवित किया उसीके फलस्वरूप आपके दर्शन पा सका हूँ ॥३१॥


अत्रान्तरे स संभ्रान्तः सुरूपो रघुनन्दनः । पप्रच्छ भद्र जानासि तद्गन्धोदकसंभवम् ॥३२॥

अर्थ: इसी बीचमें परम हर्षको प्राप्त हुए, सुन्दर रूपके धारक रामने उससे पूछा कि हे भद्र ! उस गन्धोदककी उत्पत्ति भो जानते हो ? ॥३२॥


सोऽवोचद्देव जानामि श्रूयतां वेदयामि ते । पृष्टो हि स मया राजा तेन चेति निवेदितम् ॥३३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उसने कहा कि हे देव ! जानता हूँ सुनिए, मैं आपके लिए बताता हूँ । मैंने राजा भरतसे पूछा था तब उन्होंने इस प्रकार कहा था ॥३३॥


यथा किल समस्तोऽयं देशः पुरसमन्वितः । अभिभूतो महारोगैरासीदप्रतिकारकैः ॥३४॥

अर्थ: कि नगर-ग्रामादिसे सहित यह देश एक बार जिनका प्रतिकार नहीं किया जा सकता था ऐसे अनेक महारोगोंसे आक्रान्त हो गया ॥३४॥


उरोघातमहादाहज्वरलालापरिस्रवाः । सर्वशूलारुचिच्छर्दिश्वयथुस्फोटकादयः ॥३५॥

क्रुद्धा इव परं तीव्राः सर्वे रोगास्तदाऽभवन् । यैरत्र विषये प्राणी नैकोऽप्यस्ति न पातितः ॥३६॥

अर्थ: उरोघात - जिसमें वक्षःस्थल-पसली आदिमें दर्द होने लगता है, महादाहज्वर - जिसमें महादाह उत्पन्न होता है, लालापरिस्राव - जिसमें मुँहसे लार बहने लगती है, सर्व-शूल - जिसमें सर्वांगमें पीड़ा होती है, अरुचि - जिसमें भोजनादिकी रुचि नष्ट हो जाती है, छर्दि - जिसमें वमन होने लगते हैं, श्वयथु - जिसमें शरीर-पर सूजन आ जाता है, और स्फोटक - जिसमें शरीरपर फोड़े निकल आते हैं, इत्यादि समस्त रोग उस समय मानो परम क्रुद्ध हो रहे थे । इस देशमें ऐसा एक भी प्राणी नहीं बचा था जो कि इन रोगों द्वारा गिराया न गया हो ॥३५-३६॥


केवलो द्रोणमेघाह्वः सामात्यपशुबान्धवः । नृपो देव इवारोगः श्रुतो निजपुरे मया ॥३७॥

अर्थ: केवल द्रोणमेघ नामका राजा मन्त्रियों, पशुओं तथा बन्धु आदि परिवारके साथ अपने नगरमें देवके समान नीरोग बचा था ऐसा मेरे सुननेमें आया ॥३७॥


आह्वाय स मयाऽवाचि माम त्वं नीरुजो यथा । कालक्षेपविनिर्मुक्तं तथा मां कर्तुमर्हसि ॥३८॥

अर्थ: मैंने उसे बुलाकर कहा कि हे माम ! जिस प्रकार तुम नीरोग हो उसी प्रकार मुझे भी अविलम्ब नीरोग करनेके योग्य हो ॥३८॥


ततः सौरभसंरुद्धदूरदिग्वलयं जलम् । तेन सिक्तोऽहमानाय्य प्राप्तश्चोल्लाघतां पराम् ॥३९॥

अर्थ: तदनन्तर उसने बुलाकर अपनी सुगन्धिसे दूर-दूर तकके दिङ्मण्डलको व्याप्त करनेवाला जल मुझपर सींचा और मुझे परम नीरोगता प्राप्त करा दी ॥३९॥


न केवलमहं तेन वारिणाऽन्तःपुरं मम । पुरं देशश्च संजातं सर्वरोगविवर्जितम् ॥४०॥

अर्थ: उस जलसे न केवल मैं ही नीरोग हुआ किन्तु मेरा अन्तःपुर, नगर और समस्त देश रोगरहित हो गया ॥४०॥


कर्ता रोगसहस्त्राणां वायुरत्यन्तदुःसहः । प्रणष्टो वारिणा तेन मर्मसंभेदकोविदः ॥४१॥

अर्थ: हजारों रोगोंको उत्पन्न करनेवाली, अत्यन्त दुःसह, एवं मर्मघात करनेमें निपुण दूषित वायु ही उस जलसे नष्ट हो गयी ॥४१॥


मयैवं सततं पृष्टो मामैतदुदकं कुतः । येनाऽऽश्चर्यमिदं शीघ्रं कृतं रोगविनाशनम् ॥४२॥

अर्थ: मैंने राजा द्रोणमेघसे बार-बार पूछा कि हे माम ! यह जल कहाँसे प्राप्त हुआ है जिसने शीघ्र ही रोगोंको नष्ट करनेवाला यह आश्चर्य उत्पन्न किया है ॥४२॥


सोऽवोचच्छ्रूयतां राजन्नस्ति मे गुणशालिनी । विशल्या नाम दुहिता सर्वविज्ञानकोविदा ॥४३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें द्रोणमेघने कहा कि हे राजन् ! सुनिए, मेरी गुणोंसे सुशोभित तथा सब प्रकारके विज्ञानमें निपुण विशल्या नामकी पुत्री है ॥४३॥


यस्यां गर्भप्रपन्नायामनेकव्याधिपीडिता । देवी ममोपकाराऽभूत्सर्वरोगविवर्जिता ॥४४॥

अर्थ: जिसके गर्भमें आते ही अनेक रोगोंसे पीड़ित मेरी स्त्री सर्व रोगोंसे रहित हो मेरा उपकार करनेवाली हुई थी ॥४४॥


जिनेन्द्रशासनासक्ता नित्यं पूजासमुद्यता । शेषेव सर्वबन्धूनां पूजनीया मनोहरा ॥४५॥

अर्थ: वह जिन-शासनमें आसक्त है, निरन्तर पूजा करनेमें तत्पर रहती है, मनोहारिणी है और शेषाक्षतके समान सर्व बन्धु जनोंकी पूज्या है ॥४५॥


स्नानोदकमिदं तस्या महासौरभ्यसंगतम् । कुरुते सर्वरोगाणां तत्क्षणेन विनाशनम् ॥४६॥

अर्थ: यह महासुगन्धिसे सहित उसीका स्नान-जल है जो कि क्षण-भरमें सब रोगोंको नाश कर देता है ॥४६॥


तदस्तदहमाकर्ण्य द्रोणमेघस्य भाषितम् । परं विस्मयमापन्नैः संपदा तामपूजयम् ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर द्रोणमेघके वह वचन सुन मैं परम आश्चर्यको प्राप्त हुआ और बड़े वैभवसे मैंने उस पुत्रीकी पूजा की ॥४७॥


नगरीतश्च निष्क्रम्य नाम्ना सत्त्वहितं मुनिम् । गणेश्वरं समप्राक्षं प्रणम्य विनयान्वितः ॥४८॥

अर्थ: नगरीसे निकलकर जब वापस आ रहा था तब सत्यहित नामक मुनिराज जो कि मुनिसंघके स्वामी थे वे मिले। मैंने विनयपूर्वक प्रणाम कर उनसे विशल्याका चरित्र पूछा ॥४८॥


ततः खेचरपृष्टोऽसौ समाख्यासीन्महायतिः । वैशल्यं चरितं दिव्यं चतुर्ज्ञानी सुवत्सलः ॥४९॥

अर्थ: राजा भरत विद्याधरसे कहते हैं कि हे विद्याधर ! तदनन्तर मेरे पूछनेपर चार ज्ञानके धारी, महास्नेही मुनिराज विशल्याका दिव्य चरित्र इस प्रकार कहने लगे कि - ॥४९॥


विदेहे पौण्डरीकाख्ये विषये स्वर्गसंनिभे । चक्री त्रिभुवनानन्दः पुरे चक्रधरेऽभवत् ॥५०॥

अर्थ: विदेह क्षेत्रमें स्वर्गके समान पुण्डरीक नामक देश है। उसके चक्रधर नामक नगरमें त्रिभुवनानन्द नामका चक्रवर्ती रहता था ॥५०॥


नाम्नाऽनङ्गशरा तस्य तनया गुणमण्डना । अपूर्वा कर्मणां सृष्टिर्लावण्यप्लवकारिणी ॥५१॥

अर्थ: उसकी अनंगशरा नामकी एक कन्या थी जो गुणरूपी आभूषणोंसे सहित थी, कर्मोंकी अपूर्व सृष्टि थी और सौन्दर्यका प्रवाह बहानेवाली थी ॥५१॥


तां प्रतिष्ठपुराधीशः सामन्तोऽस्य पुनर्वसुः । दुर्धीराहरदारोप्य विमानं स्मरचोदितः ॥५२॥

अर्थ: चक्रवर्ती त्रिभुवनानन्दका एक पुनर्वसु नामका सामन्त था जो कि प्रतिष्ठपुर नगरका स्वामी था। कामसे प्रेरित हो उस दुर्बुद्धिने विमानपर चढ़ाकर उस कन्याका अपहरण किया ॥५२॥


क्रुद्धाच्चक्रधरादाज्ञां संप्राप्यामुष्य किङ्करैः । चिरं कृतवतो युद्धं विमानं चूर्णितं भृशम् ॥५३॥

अर्थ: क्रोधसे भरे चक्रवर्तीकी आज्ञा पाकर सेवकोंने उसका पीछा किया और बहुत काल तक युद्ध कर उसके विमानको अत्यधिक चूर कर डाला ॥५३॥


चूर्ण्यमानविमानेन मुक्ता तेनाकुलात्मना । पपात नभसः कान्तिरिव चन्द्रस्य शारदी ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका विमान चूर-चूर किया जा रहा था ऐसे उस पुनर्वसुने कन्याको विमानसे छोड़ दिया जिससे वह चन्द्रमाकी शरद्कालीन कान्तिके समान आकाशसे नीचे गिरी ॥५४॥


विद्यया पर्णलघ्व्याऽसौ पुनर्वसुनियुक्तया । अटवीमागता स्वैरं नाम्ना श्वापदरौरवाम् ॥५५॥

अर्थ: पुनर्वसुके द्वारा नियुक्त की हुई पर्णलघ्वी नामक विद्याके सहारे स्वेच्छासे उतरती हुई वह श्वापद नामक अटवीमें आयी ॥५५॥


महाप्रतिमयाकारां महाविद्याभृतामपि । दुःप्रवेशां कृतध्वान्तां महाविटपसंकटैः ॥५६॥

नानावल्लीसमाश्लिष्टविविधोत्तुङ्गपादपाम् । पल्लवोद्वासितैर्मुक्तां भीतैरिव रवेः करैः ॥५७॥

तरक्षुशरभद्वीपिव्याघ्रसिंहादिसेविताम् । उच्चावचखरक्षोणीं महाविवरसंगताम् ॥५८॥

अरण्यानीं गता सेयं महाभयसमागता । कान्ता शिखेव दीपस्य सीदति स्म वराकिका ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर जो बड़े-बड़े विद्याधरोंके लिए भी भय उत्पन्न करनेवाली थी, जिसमें प्रवेश करना कठिन था, बड़े-बड़े वृक्षोंकी सघन झाड़ियोंसे जिसमें अन्धकार फैल रहा था, जहाँ विविध प्रकारके ऊँचे वृक्ष नाना लताओंसे आलिंगित थे, पल्लवोंकी सघन छायासे दूर की हुई सूर्यके किरणोंने भयभीत होकर ही मानो जिसे छोड़ दिया था, जो भेड़िये, शरभ, चीते, तेंदुए तथा सिंहों आदिसे सेवित थी, जहांकी कठोर भूमि ऊँची-नीची थी, और जो बड़े-बड़े बिलोंसे सहित थी ऐसी उस महाअटवीमें जाकर महाभयको प्राप्त हुई बेचारी अनंगसेना दीपककी शिखाके समान कांपने लगी ॥५६-५९॥


नदीतीरं समागम्य कृत्वा दिगवलोकनम् । महाखेदसमायुक्ता स्मृतबन्धुः स्म रोदिति ॥६०॥

अर्थ: नदीके तीर आकर और सब दिशाओंकी ओर देख महाखेदसे युक्त होती हुई वह कुटुम्बीजनोंको चितार-चितारकर रोने लगी ॥६०॥


तेनाहं लोकपालेन देवेन्द्रप्रतिभासिना । सुचक्रवर्त्तिना जाता महादुर्ललितात्मिका ॥६१॥

विधिना वारुणेनेमामवस्थामनुसारिता । किं करोमि परिप्राप्ता वनं दुःखनिरोक्षणम् ॥६२॥

अर्थ: वह कहती थी कि हाय मैं लोककी रक्षा करनेवाले, इन्द्रके समान सुशोभित उन चक्रवर्ती पितासे उत्पन्न हुई और महास्नेहसे लालित हुई। आज प्रतिकूल दैवसे - भाग्यकी विपरीततासे इस अवस्थाको प्राप्त हुई हूँ। हाय, जिसका देखना भी कठिन है ऐसे इस वनमें आ पड़ी हूँ क्या करूँ ? ॥६१-६२॥


हा मात सकलं लोकं त्वं पालयसि विक्रमी । कथं मामपरित्राणां विपिने नानुकम्पसे ॥६३॥

अर्थ: हाय पिता ! तुम तो महापराक्रमी, सब लोककी रक्षा करते हो फिर वनमें असहाय पड़ी हुई मुझपर दया क्यों नहीं करते हो ? ॥६३॥


हा मातस्तादृशं दुःखं कुक्षिवारणपूर्वकम् । विषह्य सांप्रतं कस्मात् कुरुषे नानुकम्पनम् ॥६४॥

अर्थ: हाय माता ! गर्भ धारणका वैसा दुःख सहकर इस समय दया क्यों नहीं कर रही हो ? ॥६४॥


हो मेऽन्तःकरणच्छायपरिवर्गगुणोत्तम । अमुक्तां क्षणमप्येकं कथं त्यजसि सांप्रतम् ॥६५॥

अर्थ: हाय मेरे अन्तःकरणके समान प्रवृत्ति करनेवाले तथा उत्तम गुणोंसे युक्त परिजन ! तुमने तो मुझे एक क्षणके लिए भी कभी नहीं छोड़ा फिर इस समय क्यों छोड़ रहे हो ? ॥६५॥


जातमात्रा मृता नाऽहं कस्माद्दुःखस्य भूमिका । अथवा न विना पुण्यैरभिवाञ्छितमाप्यते ॥६६॥

अर्थ: मैं दुखिया क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किसका आश्रय लूँ ? किसे देखूँ और इस महावनमें मैं पापिनी कैसे रहूँ ? ॥६६॥


किं करोमि क्व गच्छामि दुःखिनी संश्रयामि कम् । कं पश्यामि महाऽरण्ये कथं तिष्ठामि पापिनी ॥६७॥

स्वप्नः किमेष संप्राप्तं जन्मेदं नरके मया । सैव किं स्यादहं कोऽयं प्रकारः सहसोद्गतः ॥६८॥

अर्थ: क्या यह स्वप्न है ? अथवा नरकमें मेरा जन्म हुआ है ? क्या मैं वही हूँ अथवा यह कौन-सी दशा सहसा प्रकट हुई है ? ॥६७-६८॥


एवमादि चिरं कृत्वा विप्रलापं सुविह्वला । पशूनामपि तीव्राणां मनोद्रवणकारणम् ॥६९॥

अर्थ: इस प्रकार चिरकाल तक विलापकर वह अत्यन्त विह्वल हो गयी। उसका वह विलाप क्रूर पशुओंके भी मनको पिघला देनेवाला था ॥६९॥


क्षुत्तृष्णापरिदग्धाङ्गा शोकसागरवर्त्तिनी । फलपर्णादिभिर्वृत्तिमकरोद्दीनमानसा ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर भूख-प्यासकी बाधासे जिसका शरीर झुलस गया था, जो निरन्तर शोकरूपी सागरमें निमग्न रहती थी और जिसका मन अत्यन्त दीन हो गया था ऐसी अनंगसेना फल तथा पत्रोंसे निर्वाह करने लगी ॥७०॥


अरण्याम्बुजखण्डानां शोभासर्वस्वमर्दनः । हिमकालस्तया निन्ये ध्रुवं कर्मानुभावतः ॥७१॥

अर्थ: वनके कमलसमूहकी शोभाका सर्वस्व हरनेवाला शीत काल आया सो उसने कर्मोंका फल भोगते हुए व्यतीत किया ॥७१॥


श्वसत्पशुगणस्तीव्रः शोषितानेकपादपः । सोढस्तथैव रूक्षाङ्गो ग्रीष्मसूर्यातपस्तया ॥७२॥

अर्थ: जिसमें पशुओंके समूह साँसें भरते थे, अनेक वृक्ष सूख गये थे, तथा जिससे शरीर अत्यन्त रूक्ष पड़ गया था ऐसे ग्रीष्म ऋतुके सूर्यका आतप उसने उसी प्रकार सहन किया ॥७२॥


स्फुरच्चण्डाचिरज्ज्योतिः शीतधारान्धकारितः । घनकालोऽपि निस्तीर्णः प्रवृत्तौघो यथा तथा ॥७३॥

अर्थ: जिसमें तीक्ष्ण बिजली कौंध रही थी, शीतल जलधारासे अन्धकार फैल रहा था, और नदियोंके प्रवाह बढ़ रहे थे ऐसा वर्षा काल भी उसने जिस किसी तरह पूर्ण किया ॥७३॥


निश्छायं स्फुटितं क्षामं शीर्णकेशं मलावृतम् । वर्षोपहतचित्राभं स्थितं तस्याः शरीरकम् ॥७४॥

अर्थ: कान्तिहीन, फटा, दुबला, बिखरे बालोंसे युक्त एवं मलसे आवृत उसका शरीर वर्षासे भीगे चित्रके समान निष्प्रभ हो गया था ॥७४॥


सूर्यालोकहतच्छाया क्षीणेव शशिनः कला । जाता तन्वी तनुस्तस्या लावण्यपरिवर्जिता ॥७५॥

अर्थ: जिस प्रकार चन्द्रमाकी क्षीण कला सूर्यके प्रकाशसे निष्प्रभ हो जाती है उसी प्रकार उसका दुर्बल शरीर लावण्यसे रहित हो गया ॥७५॥


कपित्थवनमानम्रं फलैः पाकाभिधूसरैः । श्रित्वा तातमनुध्याय करुणं सा स्म रोदिति ॥७६॥

अर्थ: परिपाकके कारण धूसर वर्णसे युक्त फलोंसे झुके हुए कैथाओंके वनमें जाकर वह बार-बार पिताका स्मरण कर रोने लगती थी ॥७६॥


जाता चक्रधरेणाऽहं प्राप्तावस्थामिमां वने । ध्रुवं कर्मानुभावेन सुपापेनान्यजन्मना ॥७७॥

अर्थ: मैं चक्रवर्तीसे उत्पन्न हो वनमें इस दशाको प्राप्त हो रही हूँ सो निश्चित ही जन्मान्तरमें किये हुए पापकर्मके उदयसे मेरी यह दशा हुई है ॥७७॥


इत्यश्रुदुर्दिनोभूतवदना वीक्षितक्षितिः । फलान्यादाय सा शान्ता पतितानि स्वपाकतः ॥७८॥

अर्थ: इस प्रकार अविरल अश्रुवर्षासे जिसका मुख दुर्दिनके समान हो गया था ऐसी वह अनंगसेना नीची दृष्टिसे पृथिवीकी ओर देख पक जानेके कारण अपने आप गिरे हुए फल लेकर शान्त हो जाती थी ॥७८॥


उपवासैः कृशीभूता परं षष्ठाष्टमादिभिः । अम्बुना वाकरोद् बाला पारणामेकवेलिकाम् ॥७९॥

अर्थ: वेला-तेला आदि उपवासोंसे जिसका शरीर अत्यन्त कृश हो गया था ऐसी वह बाला जब कभी केवल पानीसे ही पारणा करती थी सो भी एक ही बार ॥७९॥


शयनीयगतैः पुष्पैर्या स्वकेशच्युतैरपि । अग्रहीत् खेदमेवासौ स्थण्डिलेऽशेत केवले ॥८०॥

अर्थ: जो अनंगसेना पहले अपने केशोंसे च्युत हो शय्या पर पड़े फूलोंसे भी खेदको प्राप्त होती थी आज वह मात्र पृथिवीपर शयन करती थी ॥८०॥


पितुः संगीतकं श्रुत्वा या प्रबोधमसेवत । सेयं शिवादिनिर्मुक्तैरधुना भीषणैः स्वनैः ॥८१॥

अर्थ: जो पहले पिताका संगीत सुन जागती थी वह आज शृगाल आदिके द्वारा छोड़े हुए भयंकर शब्द सुनकर जागती थी ॥८१॥


एवं वर्षसहस्राणि त्रीणि दुःखमहासहा । अकरोत्सा तपो बाह्यं प्रासुकाहारपारणा ॥८२॥

अर्थ: इस प्रकार महादुःख सहन करती तथा बीच-बीचमें प्रासुक आहारकी पारणा करती हुई उस अनंगसेनाने तीन हजार वर्ष तक बाह्य तप किया ॥८२॥


ततो निर्वेदमापन्ना त्यक्त्वाहारं चतुर्विधम् । निराशतां गता धीरा श्रिता सल्लेखनामसौ ॥८३॥

अर्थ: तदनन्तर जब वह निराशताको प्राप्त हो गयी तब विरक्त हो उस धीर-वीराने चारों प्रकारका आहार त्यागकर सल्लेखना धारण कर ली ॥८३॥


बाह्यं हस्तशताद्भूमिं न गन्तव्यं मयेति च । जग्राह नियमं पूर्वं श्रुतं जैनेन्द्रशासने ॥८४॥

अर्थ: उसने जिन-शासनमें पहले जैसा सुन रखा था वैसा नियम ग्रहण किया कि मैं सौ हाथसे बाहरकी भूमिमें नहीं जाऊँगी ॥८४॥


नियमावधितोऽतीते षड्रात्रेऽथ नभश्चरः । लब्धिदास इति ख्यातो वन्दित्वा मेरुमाव्रजत् ॥८५॥

तामपश्यत्ततो नेतुमारेभे तां समुद्यतः । पितुः स्थानं निषिद्धश्च तया सल्लेखनोक्तितः ॥८६॥

अर्थ: अथानन्तर उसे सल्लेखनाका नियम लिये हुए जब छह रात्रियाँ व्यतीत हो चुकीं तब लब्धिदास नामक एक पुरुष मेरु पर्वतकी वन्दना कर लौट रहा था सो उसने उस कन्याको देखा। तदनन्तर जब लब्धिदास उसे पिताके घर ले जानेके लिए उद्यत हुआ तब उसने यह कहकर मना कर दिया कि मैं सल्लेखना धारण कर चुकी हूँ ॥८५-८६॥


लब्धिदासो लघु प्राप्तः सकाशं चक्रवर्त्तिनः । समं तेन समायातस्तमुद्देशमसौ गतः ॥८७॥

अर्थ: तत्पश्चात् लब्धिदास शीघ्र ही चक्रवर्तीके पास गया और उसके साथ पुनः उस स्थानपर आया ॥८७॥


अथ तामतिरौद्रेण शयुनाऽतिस्थवीयसा । भक्ष्यमाणामसौ दृष्ट्वा समाधानप्रदोऽभवत् ॥८८॥

अर्थ: जब वह आया तब अत्यन्त भयंकर एक बड़ा मोटा अजगर उसे खा रहा था यह देख उसे समाधान करनेमें तत्पर हुआ ॥८८॥


प्राप्तसल्लेखनां क्षीणां संवृत्तामपरामिव । तादृशीं तां सुतां दृष्ट्वा चक्री निर्वेदमागतः ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसने सल्लेखना धारण की थी, और दुर्बलताके कारण जो ऐसी जान पड़ती थी मानो दूसरी ही हो ऐसी उस पुत्रीको देख चक्रवर्ती वैराग्यको प्राप्त हो गया ॥८९॥


समं पुत्रसहस्राणां द्वाविंशत्या गतस्पृहः । महावैराग्यसंपन्नः श्रमणत्वमुपागतः ॥९०॥

अर्थ: जिससे उसने सब प्रकारकी इच्छा छोड़ महावैराग्यसे युक्त हो बाईस हजार पुत्रोंके साथ दीक्षा धारण कर ली ॥९०॥


कन्या त्वर्थे क्षुधार्त्तेन प्राप्तेनातिस्थवीयसा । भक्षिताऽजगरेणागात्सती सानत्कुमारताम् ॥९१॥

अर्थ: भूखसे पीड़ित होनेके कारण सामने आये हुए उस अत्यन्त स्थूल अजगरके द्वारा खायी हुई वह कन्या मरकर ईशान स्वर्गमें गयी ॥९१॥


जानत्याऽपि तया मृत्युं न समुत्सारितः शयुः । माभूत्स्वल्पापि पीडाऽस्य काचिदित्यनुकम्पया ॥९२॥

अर्थ: यद्यपि वह जानती थी कि इस अजगरसे मेरी मृत्यु होगी तथापि उसने उसे इस दया भावसे कि इसे थोड़ी भी पीड़ा नहीं हो दूर नहीं हटाया था ॥९२॥


उत्सार्य खेचरान् संख्ये समस्तांश्च पुनर्वसुः । तदानङ्गशरामिष्टामपश्यन्विरहावनौ ॥९३॥

द्रुमसेनमुनेः पार्श्वे गृहीतं श्रमणव्रतम् । अत्यन्तदुःखितस्तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ॥९४॥

कृत्वा निदानमेतस्याः कृतेऽयं प्राप्तपञ्चतः । सुरो जातश्च्युतश्चायं जातो लक्ष्मणसुन्दरः ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर जब पुनर्वसु युद्धमें समस्त विद्याधरोंको परास्त कर आया तब वह अपनी प्रेमपात्र अनंगशराको नहीं देख विरहकी भूमिमें पड़ बहुत दुखी हुआ । अन्तमें उसने द्रुमसेन नामक मुनिराजके समीप दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली और अत्यन्त कठिन तप तप कर इसीका निदान करता हुआ मरा जिससे स्वर्गमें देव हुआ और वहाँसे च्युत हो यह अत्यन्त सुन्दर लक्ष्मण हुआ है ॥९३-९५॥


प्रभ्रष्टा सुरलोकाच्च जाताऽनङ्गशराचरी । सुतेयं द्रोणमेघस्य विशल्येति प्रकीर्त्तिता ॥९६॥

अर्थ: पहलेकी अनंगशरा देवलोकसे च्युत हो राजा द्रोणमेघकी यह विशल्या नामकी पुत्री हुई है ॥९६॥


सैतस्मिन्नगरे देशे भरते वा महागुणा । पूर्वकर्मानुभावेन संजाताऽत्यन्तमुत्तमा ॥९७॥

अर्थ: महागुणोंको धारण करनेवाली विशल्या इस नगर-देश अथवा भरत क्षेत्रमें पूर्वकर्मोंके प्रभावसे अत्यन्त उत्तम हुई ॥९७॥


परमं स्नानवारीदं तेन तस्या महागुणम् । सोपसर्गं कृतं पूर्वं तया येन महातपः ॥९८॥

अर्थ: यतश्च उसने पूर्व भवमें उत्सर्ग सहित महातप किया था इसलिए उसका स्नानजल महागुणोंसे सहित है ॥९८॥


अनेन वारिणाऽमुस्मिन्देशेऽयं विषमोऽनिलः । महारोगकरो यातः क्षयं शासितविष्टपः ॥९९॥

अर्थ: इस देशमें जिसने सब लोगोंपर शासन जमा रखा था तथा जो महारोग उत्पन्न करनेवाली थी ऐसी विषम वायु इस जलसे क्षयको प्राप्त हो गयी है ॥९९॥


कुतोऽयमीदृशो वायुरिति पृष्टेन भाषितम् । मुनिना भरतायैवं तदा कौतुकयोगिने ॥१००॥

अर्थ: ‘यह वायु ऐसी क्यों हो गयी ?’ इस प्रकार पूछनेपर उस समय मुनिराजने कौतूहलको धारण करनेवाले भरतके लिए इस प्रकार कहा कि ॥१००॥


गजाह्वान्नगरादेत्य विन्ध्यो नामा महाधनः । अयोध्यां सार्थवाहेशः खरोष्ट्रमहिषादिभिः ॥१०१॥

मासानेकादशामुष्यां त्वन्नगर्यामसौ स्थितः । तस्यैकमहिषस्तीव्ररोगभारेण पीडितः ॥१०२॥

पुरमध्ये महादुःखं कृत्वा कालं व्रणान्वितः । अकामनिर्जरायोगाद्देवभूयमशिश्रियत् ॥१०३॥

अर्थ: विन्ध्या नामका एक महा धनवान् व्यापारी गधे, ऊँट तथा भैंसे आदि जानवर लदाकर गजपुर नगरसे आया और तुम्हारी उस अयोध्यानगरीमें ग्यारह माह तक रहा। अनेक वर्णोंसे सहित उसका एक भैंसा तीव्र रोगके भारसे पीड़ित हो नगरके बीच मरा और अकाम निर्जराके योगसे देव हुआ ॥१०१-१०३॥


जातो वायुकुमारोऽसावश्वकेतुर्महाबलः । वाय्वावर्त्त इति ख्यातो वायुदेवमहेश्वरः ॥१०४॥

श्रेयस्करपुरस्वामी रसातलगतो महान् । असुरो भासुरः क्रूरो मनोयातक्रियासहः ॥१०५॥

अर्थ: वह अश्वचिह्नसे चिह्नित महाबलवान् वायुकुमार जातिका देव हुआ। वाय्वावर्त उसका नाम था, वह वायुकुमार देवोंका स्वामी था, श्रेयस्करपुर नगरका स्वामी, रसातलमें निवास करनेवाला देदीप्यमान, क्रूर और इच्छानुसार क्रियाओंको करनेवाला वह बहुत बड़ा भवनवासी देव था ॥१०४-१०५॥


अज्ञासीत्सावधिज्ञानः प्राप्तपूर्वपराभवम् । सोऽहं महिषकोऽभूवं प्राप्तोऽयोध्यां तदा व्रणी ॥१०६॥

क्षुत्तृष्णापरिदिग्धाङ्गो महारोगनिपीडितः । रथ्याकर्दमनिर्मग्नस्ताडितो जनसंपदा ॥१०७॥

कृत्वा मे मस्तके पादं तदाऽयासीज्जनोऽखिलः । पतितस्य विचेष्टस्य निर्दयो विड्मलाञ्चितम् ॥१०८॥

अर्थ: अवधिज्ञानसे सहित होनेके कारण उसने पूर्वभवमें प्राप्त हुए पराभवको जान लिया। उसे विदित हो गया कि मैं पहले भैंसा था और अयोध्यामें आकर रहा था। उस समय मेरे शरीरपर अनेक घाव थे। भूख-प्यास आदिसे मेरा शरीर लिप्त था, अनेक रोगोंसे पीड़ित हुआ मैं मार्गकी कीचड़में पड़ा था, लोग मुझे पीटते थे। उस समय मैं गोबर आदि मलसे व्याप्त हुआ निश्चेष्ट पड़ा था और सब लोग मेरे मस्तकपर पैर रखकर जाते थे ॥१०६-१०८॥


अचिरान्निग्रहं घोरं तस्य चेन्न करोम्यहम् । अनर्थकं सुरत्वं मे तदेवं जायते महत् ॥१०९॥

अर्थ: अब यदि मैं शीघ्र ही उसका भयंकर निग्रह नहीं करता हूँ - बदला नहीं चुकाता हूँ तो मेरा यह इस प्रकारका बड़प्पनयुक्त देवपर्याय पाना व्यर्थ है ॥१०९॥


इति ध्वात्वा पुरेऽमुष्मिन् सदेशे क्रोधपूरितः । प्रावर्त्तयदसौ वायुं नानारोगसमावहम् ॥११०॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर उसने क्रोधसे पूरित हो उस देशमें नाना रोगोंको उत्पन्न करनेवाली वायु चलायी ॥११०॥


सोऽयं नीतो विशल्याया वारिणा प्रलयं क्षणात् । भवन्ति हि बलीयांसो बलिनामपि विष्टपे ॥१११॥

अर्थ: यह वही देव विशल्याके स्नान-जलके द्वारा क्षण-भरमें विनाशको प्राप्त कराया गया है सो ठीक ही है क्योंकि लोकमें बलवानोंके लिए भी उनसे अधिक बलवान् होते हैं ॥१११॥


यथा सत्त्वहितेनेदं भरताय निवेदितम् । भरतेनापि मे तद्वन्मया ते पद्म वेदितम् ॥११२॥

अर्थ: चन्द्रप्रतिम विद्याधर, रामसे कहता है कि यह कथा सत्त्वहित नामा मुनिने राजा भरतसे जिस प्रकार कही और भरतने जिस प्रकार मुझसे कही उसी प्रकार हे राम ! मैंने आपसे कही हैं ॥११२॥


अभिषेकजलं तस्या तदा नेतुमतित्वरम् । यत्नं कुरुत नास्त्यन्या गतिर्लक्ष्मणजीविते ॥११३॥

अर्थ: इसलिए शीघ्र ही विशल्याका स्नान जल लानेका यत्न करो । लक्ष्मणके जीवित होनेका और दूसरा उपाय नहीं है ॥११३॥


इति स्थितानामपि मृत्युमार्गे जनैरशेषैरपि निश्चितानाम् । महात्मनां पुण्यफलोदयेन भवत्युपायो विदितोऽसुदायी ॥११४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो इस तरह मृत्युके मार्गमें स्थित हैं तथा समस्त लोग जिनके मरणका निश्चय कर चुके हैं ऐसे महापुरुषोंके पुण्यकर्मके उदयसे जीवन प्रदान करनेवाला कोई न कोई उपाय विदित हो ही जाता है ॥११४॥


अहो महान्तः परमा जनास्ते येषां महापत्तिसमागतानाम् । जनो वदत्युद्भवनाभ्युपायं रवेः समस्तत्त्वनिवेदनेन ॥११५॥

अर्थ: अहो ! वे पुरुष अत्यन्त महान् तथा उत्कृष्ट हैं कि महाविपत्तिमें पड़े हुए जिनके लिए सूर्यके समान उज्ज्वल पुरुष यथार्थ तत्त्वका निवेदन कर विपत्तिसे निकलनेका उपाय बतलाते हैं - प्रकट करते हैं ॥११५॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे विशल्यापूर्वभवाभिधानं नाम चतुःषष्टितमं पर्व ॥६४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें विशल्याके पूर्वभवका वर्णन करनेवाला चौंसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६४॥


६५. पञ्चषष्टितमं पर्व (विशल्यासमागमाभिधानं)

प्रतीन्दोर्वचनं श्रुत्वा राघवोऽत्यन्तसंमदः । समं विद्याधराधीशैर्विस्मितस्तमपूजयत् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर प्रतिचन्द्र विद्याधरके वचन सुन जिन्हें अत्यन्त हर्ष हो रहा था ऐसे श्रीरामने आश्चर्यचकित हो विद्याधर राजाओंके साथ-साथ उसका बहुत आदर किया ॥१॥


अञ्जनाजविदेहाजसुताराजास्ततः कृताः । अयोध्यां गमिनः कृत्वा संमन्त्रं निश्चितं द्रुतम् ॥२॥

अर्थ: और शीघ्र ही निश्चित मन्त्रणाकर हनुमान् भामण्डल तथा अंगदको अयोध्याकी ओर रवाना किया ॥२॥


ततश्चिन्तितमात्रेण ते ययुर्यत्र पार्थिवः । भरतः प्रवरः कीर्त्या प्रतापी गुणसंगतः ॥३॥

अर्थ: तदनन्तर इच्छा करते ही वे सब वहाँ पहुँच गये जहाँ उत्तम कीर्तिके धारक प्रतापी एवं गुणवान् राजा भरत विराजमान थे ॥३॥


सुप्तस्योत्थाप्यमानस्य सहसास्यासुखासिका । मा भूदिति सुखं गीतं वैदेहादिभिराश्रितम् ॥४॥

अर्थ: उस समय भरत सोये हुए थे इसलिए सहसा उठानेसे उन्हें दुःख न हो ऐसा विचार कर भामण्डल आदिने सुखदायी संगीत प्रारम्भ किया ॥४॥


ततः संगीतमाकर्ण्य दिव्यं श्रुतिमनोहरम् । शनैर्भावसमारूढमुत्तस्थौ कोशलेश्वरः ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर कर्ण और मनको हरण करनेवाले उस भावपूर्ण दिव्य संगीतको सुनकर भरत महाराज धीरे-धीरे जाग उठे ॥५॥


ज्ञापिताः सेवितद्वारास्ततस्तस्मै समागताः । वैदेह्या हरणं प्रोचुर्निपातं लक्ष्मणस्य च ॥६॥

अर्थ: हनुमान आदि द्वारके पास तो खड़े ही थे इसलिए जागते ही खबर देकर उनके पास जा पहुँचे । वहाँ पहुँचकर उन्होंने सीताका हरा जाना तथा शक्ति लगनेसे लक्ष्मणका गिर जाना यह समाचार कहा ॥६॥


अथ शोकरसादुग्रात् क्षणमात्रभुवः परम् । राजा क्रोधरसं भेजे परमं भरतश्रुतिः ॥७॥

अर्थ: अथानन्तर क्षणमात्रमें उत्पन्न हुए, अतिशय उग्र शोकरससे राजा भरत परम क्रोधको प्राप्त हुए ॥७॥


महाभेरीध्वनिं चाशु रणप्रीतिमकारयत् । सकला येन साकेता संप्राप्ताऽऽकुलतां परम् ॥८॥

अर्थ: उन्होंने उसी समय रणमें प्रीति उत्पन्न करानेवाली रणभेरीका महाशब्द कराया जिसे सुनकर समस्त अयोध्या परम आकुलताको प्राप्त हो गयी ॥८॥


लोको जगाद किं न्वेतद्वर्त्तते राजसद्मनि । महान् कलकलः शब्दः श्रूयतेऽत्यन्तभीषणः ॥९॥

अर्थ: लोग कहने लगे कि राजभवनमें अत्यन्त भय उत्पन्न करनेवाला महान् कल-कल शब्द सुनाई पड़ रहा है सो यह क्या कारण है ? ॥९॥


किन्नु रात्रौ निशीथेऽस्मिन् काले दुष्टमतिः परः । अतिवीर्यसुतः प्राप्तो भवेदापातपण्डितः ॥१०॥

अर्थ: क्या इस अर्धरात्रिके समय दुष्ट बुद्धिका धारक तथा आक्रमण करनेमें निपुण अतिवीर्यका पुत्र आ पहुँचा है ? ॥१०॥


कश्चिदङ्कगतां कान्तां त्यक्त्वा सन्नद्धुमुद्यतः । सन्नाहनिरपेक्षोऽन्यः सायके करमर्पयत् ॥११॥

अर्थ: कोई एक योद्धा अंकमें स्थित कान्ताको छोड़ कवच धारण करनेके लिए उद्यत हुआ और कोई दूसरा योद्धा कवचसे निरपेक्ष हो तलवार पर हाथ रखने लगा ॥११॥


मुग्धबालकमादाय काचिदङ्के मृगेक्षणा । हस्तं स्तनतटे न्यस्य चक्रे दिगवलोकनम् ॥१२॥

अर्थ: कोई मृगनयनी स्त्री, सुन्दर बालकको गोदमें ले तथा स्तन तट पर हाथ रखकर दिशाओंका अवलोकन करने लगी अर्थात् भयसे इधर-उधर देखने लगी ॥१२॥


काचिदीर्ष्याकृतं त्यक्त्वा निद्रारहितलोचना । सुप्तमाश्रयते कान्तं शयनीयैकपार्श्वगम् ॥१३॥

अर्थ: कोई एक स्त्री ईर्ष्या वश पतिसे हटकर पड़ी हुई थी और उसके नेत्रोंमें नींद नहीं आ रही थी । रणभेरीका शब्द सुन वह इतनी भयभीत हुई कि ईर्ष्याभाव छोड़ शय्याके एक ओर पड़े हुए निद्रातिमग्न पतिसे जा मिली - उससे सटकर पड़ रही ॥१३॥


पार्थिवप्रतिमः कश्चिद्घनी कान्तामुदाहरत् । कान्ते बुद्ध्यस्व किं शेषे किमपीदमशोभनम् ॥१४॥

अर्थ: राजाकी तुलना प्राप्त करनेवाला कोई धनी मनुष्य अपनी स्त्रीसे कहने लगा कि हे प्रिये ! जागो, क्यों सो रही हो ? यह कोई अशोभनीय बात है ॥१४॥


राजालये समुद्योतो लक्ष्यते जात्वलक्षितः । सन्नद्धा रथिनो मत्ता करिणोऽमी च संहिताः ॥१५॥

अर्थ: राजभवनमें जो कभी दिखाई नहीं दिया ऐसा प्रकाश दिखाई दे रहा है । रथोंके सवार तैयार खड़े हैं और ये मदोन्मत्त हाथी भी एकत्रित हैं ॥१५॥


नीतिज्ञैः सततं भाव्यमप्रमत्तैः सुपण्डितैः । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोपाय स्वापतेयं प्रयत्नतः ॥१६॥

अर्थ: नीतिके जानकार पण्डित जनोंको सदा सावधान रहना चाहिए । उठो उठो धनको प्रयत्नपूर्वक छिपा दो ॥१६॥


शातकौम्भानिमान्कुम्भान् कलधौतमयांस्तथा । मणिरत्नकरण्डांश्च कुरु भूमिगृहान्तरे ॥१७॥

अर्थ: ये सुवर्ण और चाँदीके घट तथा मणि और रत्नोंके पिटारे तलगृहके भीतर कर दो ॥१७॥


पट्टवस्त्रादिसंपूर्णानिमान् गर्भालयान् द्रुतम् । तालयान्यदपि द्रव्यं दुःस्थितं सुस्थितं कुरु ॥१८॥

अर्थ: रेशमी वस्त्र आदिसे भरे हुए इन गर्भगृहोंको शीघ्र ही बन्द कर दो तथा और जो दूसरा सामान अस्त-व्यस्त पड़ा है उसे ठीक तरहसे रख दो ॥१८॥


शत्रुघ्नोऽपि सुसंभ्रान्तो निद्रारुणितलोचनः । आरुह्य द्विरदं शीघ्रं घण्टाटङ्कारनादिनम् ॥१९॥

सचिवैः परमैर्युक्तः शस्त्राधिष्ठितपाणिभिः । विमुञ्चन् बकुलामोदं चलदम्बरपल्लवः ॥२०॥

भरतस्यालयं प्राप्तस्तथाऽन्ये नरपुङ्गवाः । शस्त्रहस्ताः सुसंनद्धा नरेन्द्रहिततत्पराः ॥२१॥

अर्थ: जिसके नेत्र निद्रासे लाल-लाल हो रहे थे ऐसा घबड़ाया हुआ शत्रुघ्न भी घंटाका शब्द करनेवाले हाथी पर शीघ्र ही सवार हो भरतके महलमें जा पहुँचा । शत्रुघ्न, हाथोंमें शस्त्र धारण करनेवाले उत्तमोत्तम मन्त्रियोंसे सहित था, वकुलकी सुगन्धिको छोड़ रहा था तथा उसका वस्त्र चंचल-चंचल हो रहा था । शत्रुघ्नके सिवाय दूसरे अन्य राजा भी जो हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए थे, कवचोंसे युक्त थे तथा राजाका हित करनेमें तत्पर थे भरतके महलमें जा पहुँचे ॥१९-२१॥


यच्छन्नाज्ञां नरेशानां युद्धाय स्वयमुद्यतः । विनीताधिपतिः प्रोक्तो नत्वा भामण्डलादिभिः ॥२२॥

अर्थ: अयोध्याके स्वामी भरत, राजाओंको आज्ञा देते हुए स्वयं युद्धके लिए उद्यत हो गये तब भामण्डल आदिने नमस्कार कर कहा कि ॥२२॥


दूरे लङ्कापुरी देव गन्तुं नार्हति तां विभुः । क्षुब्धोर्मिजलजो घोरो वर्त्तते सागरोऽन्तरे ॥२३॥

अर्थ: हे देव ! लंकापुरी दूर है, वहाँ जानेके लिए आप समर्थ नहीं हैं, जिसकी लहरें और शंख क्षोभको प्राप्त हो रहे हैं ऐसा भयंकर समुद्र बीचमें पड़ा है ॥२३॥


मया किं तर्हि कर्त्तव्यमिति राज्ञि कृतस्वने । उच्चारितं विशल्यायाश्चरितं तैर्मनोहरम् ॥२४॥

अर्थ: तो मुझे क्या करना चाहिए, इस प्रकार राजा भरतके कहने पर उन सबने विशल्याका मनोहर चरित कहा ॥२४॥


अघप्रमथनं नाथ पुण्यं जीवितपालनम् । द्रोणमेघसुतास्नानवारिदानं द्रुतं भज ॥२५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे नाथ ! द्रोणमेघकी पुत्रीका स्नानजल पापको नष्ट करनेवाला, पवित्र और जीवनकी रक्षा करनेवाला है सो उसे शीघ्र ही दिलाओ ॥२५॥


प्रसादं कुरु यास्यामो यावन्नोदेति भास्करः । हतोऽरिमथनः शक्त्या दुःखं तिष्ठति लक्ष्मणः ॥२६॥

अर्थ: प्रसाद करो, जब तक सूर्य उदित नहीं होता है उसके पहले ही हम चले जायेंगे । शत्रुओंका संहार करनेवाले लक्ष्मण शक्तिसे घायल हो दुःखमें पड़े हैं ॥२६॥


भरतेन ततोऽवाचि किं वा ग्रहणमम्भसा । स्वयं सा सुभगा तत्र यातु द्रोणवनात्मजा ॥२७॥

अर्थ: तब भरतने कहा कि जलका क्या ले जाना, वह द्रोणमेघकी सुन्दरी पुत्री स्वयं ही वहाँ जावे अर्थात् उसे ही ले जाओ ॥२७॥


मुनीशेन समादिष्टा तस्यैवासौ सुभामिनी । स्त्रीरत्नमुत्तमं सा हि कस्य वाऽन्यस्य युज्यते ॥२८॥

अर्थ: मुनिराजने कहा है कि यह उन्हींकी वल्लभा होगी । यथार्थमें वह उत्तम स्त्रीरत्न है सो अन्य किसके योग्य हो सकती है ? ॥२८॥


ततो द्रोणघनाह्वस्य सकाशं प्रेषितो निजः । स चापि कुपितो योद्धुं मानस्तम्भसमुद्यतः ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर भरतने द्रोणमेघके पास अपना आदमी भेजा सो मान दमन करनेमें उद्यत वह द्रोणमेघ भी युद्ध करनेके लिए कुपित हुआ ॥२९॥


संक्षुब्धास्तनयास्तस्य सन्नद्धाः सचिवैः सह । परमाकुलतां प्राप्तां महादुर्लंडितक्रियाः ॥३०॥

अर्थ: प्रचण्ड बलको धारण करनेवाले उसके जो पुत्र थे वे भी परम आकुलताको प्राप्त हो क्षुभित हो उठे तथा युद्ध करनेके लिए मन्त्रियोंके साथ साथ तैयार हो गये ॥३०॥


भरतस्य ततो मात्रा स्वयं गत्वा महादरम् । प्रतिबोधमुपानीतः स तेन तनयामदात् ॥३१॥

अर्थ: तब भरतकी माता केकयीने स्वयं जाकर उसे बड़े आदरसे समझाया जिससे उसने अपनी पुत्री दे दी ॥३१॥


सा भामण्डलचन्द्रेण विमानशिखरं निजम् । आरोपिता महारथ्यं कान्तिपूरितदिङ्मुखा ॥३२॥

अर्थ: कान्तिसे दिशाओंको पूर्ण करनेवाली उस कन्याको भामण्डलने अपने शीघ्रगामी विमानके अग्रभाग पर बैठाया ॥३२॥


सहस्रमधिकं चान्यत्कन्यानां सुमनोहरम् । राजगोत्रप्रसूतानां कृतं गामि समं तया ॥३३॥

अर्थ: इसके सिवाय राजकुलमें उत्पन्न हुई एक हजारसे भी अधिक दूसरी मनोहर कन्याएँ विशल्याके साथ भेजीं ॥३३॥


ततो निमेषमात्रेण प्राप्ता संग्राममेदिनीम् । अर्घ्यादिभिः कृताभ्यर्हा सर्वैः खेचरपुङ्गवैः ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर निमेष मात्रमें वह युद्धभूमिमें पहुँच गयी सो समस्त विद्याधरोंने अर्घ्य आदिसे उसका योग्य सन्मान किया ॥३४॥


अवतीर्णा विमानाग्रात्ततः कन्याभिरावृता । चारुचामरसंघातैः वीज्यमाना शनैः सुखम् ॥३५॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो कन्याओंसे घिरी थी और जिसपर सुन्दर चमरोंके समूह धीरे-धीरे सुख पूर्वक झेले जा रहे थे ऐसी विशल्या विमानके अग्रभागसे नीचे उतरी ॥३५॥


पश्यन्ती तुरगान् द्वारे मत्तांश्च वरवारणान् । महत्तरैः कृतानुज्ञा पुण्डरीकनिमानना ॥३६॥

अर्थ: द्वार पर खड़े घोड़ों और मदोन्मत्त हाथियोंको देखती हुई वह आगे बढ़ी । बड़े-बड़े लोग उसकी आज्ञा पालन करनेमें तत्पर थे तथा कमलके समान उसका मुख था ॥३६॥


यथा यथा महाभाग्या विशल्या सोपसर्पति । तथा तथामजत्सौख्यं सुमित्रातनयोऽद्भुतम् ॥३७॥

अर्थ: महाभाग्यशालिनी विशल्या जैसे-जैसे पास आती जाती थी वैसे-वैसे लक्ष्मण आश्चर्यकारी सुखदशाको प्राप्त होते जाते थे ॥३७॥


प्रभापरिकरा शक्तिस्ततो लक्ष्मणवक्षसः । चकिता दुष्टयोषेव कामुकात् परिनिःसृता ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार दुष्ट स्त्री चकित हो पतिके घरसे निकल जाती है उसी प्रकार कान्तिके मण्डलको धारण करनेवाली शक्ति लक्ष्मणके वक्षःस्थलसे बाहर निकल गयी ॥३८॥


स्फुरत्स्फुलिङ्गज्वाला च लङ्घयन्ती द्रुतं नभः । उत्पत्य वायुपुत्रेण गृहीता वेगशालिना ॥३९॥

अर्थ: जिससे तिलगे और ज्वालाएँ निकल रही थीं ऐसी वह शक्ति, शीघ्र ही आकाशको लांघती हुई जाने लगी सो वेगशाली हनुमान्ने उछलकर उसे पकड़ लिया ॥३९॥


दिव्यस्त्रीरूपसंपन्ना ततः संगतपाणिका । सा जगाद हनूमन्तं संभ्रान्ता बद्धवेपथुः ॥४०॥

अर्थ: तब वह दिव्यस्त्रीके रूपमें परिणत हो हाथ जोड़कर हनुमान्से बोली । उस समय वह घबड़ायी हुई थी तथा उसके शरीरसे कँपकँपी छूट रही थी ॥४०॥


प्रसीद नाथ मुञ्चस्व न मे दोषोऽस्ति कश्चन । कुत्सितास्मद्विधानां हि प्रेष्याणां स्थितिरीदृशी ॥४१॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! प्रसन्न होओ, मुझे छोड़ो, इसमें मेरा दोष नहीं है, हमारे जैसे सेवकोंकी ऐसी ही निन्द्य दशा है ॥४१॥


अमोघविजया नाम प्रज्ञप्तेरहकं स्वसा । विद्या लोकत्रये ख्याता रावणेन प्रसाधिता ॥४२॥

अर्थ: मैं तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध अमोघ-विजया नामकी विद्या हूँ, प्रज्ञप्तिकी बहन हूँ और रावणने मुझे सिद्ध किया है ॥४२॥


कैलासपर्वते पूर्वं बालौ प्रतिमया स्थिते । सन्निधौ जिनबिम्बानां गायता भावितात्मना ॥४३॥

निजे भुजे समुत्कृत्य शिरातन्त्रीं मनोहराम् । उपवीणयता दिव्यं जिनेन्द्रचरितं शुभम् ॥४४॥

लब्धाऽहं दशवक्त्रेण धरणान्नागराजतः । कम्पितासनतः प्राप्तप्रमोदं बिभ्रतः परम् ॥४५॥

अनिच्छन्नप्यसौ तेन रक्षसां परमेश्वरः । मां परिग्राहितः कृच्छ्रात् स हि ग्रहणदुर्विधः ॥४६॥

अर्थ: कैलास पर्वत पर पहले जब बालिमुनि प्रतिमा योगसे विराजमान थे तब रावणने जिन-प्रतिमाओंके समीप भुजाकी नाड़ी रूपी मनोहर तन्त्री निकाल कर जिनेन्द्र भगवान्का दिव्य एवं शुभचरित वीणाद्वारा गाया था । रावणकी भक्तिके प्रभावसे धरणेन्द्रका आसन कम्पायमान हुआ था जिससे परम प्रमोदको धारण करते हुए उसने वहाँ आकर रावणके लिए मुझे दिया था । यद्यपि राक्षसोंका इन्द्र रावण मुझे नहीं चाहता था तथापि धरणेन्द्रने प्रेरणाकर बड़ी कठिनाईसे मुझे स्वीकृत कराया था । यथार्थमें रावण किसीसे वस्तुग्रहण करनेमें सदा संकुचित रहता था ॥४३-४६॥


साहं न कस्यचिच्छक्या भुवनेऽत्र व्यपोहितुम् । विशल्यासुन्दरीमेकां मुक्त्वा दुःसहतेजसम् ॥४७॥

अर्थ: वह मैं, इस संसारमें दुःसह तेजकी धारक एक विशल्याको छोड़ और किसीकी पकड़में नहीं आ सकती ॥४७॥


मन्ये पराजये देवान् बलिनो नितरामपि । अनया तु विकीर्णाहं महत्या दूरगोचरा ॥४८॥

अर्थ: मैं अतिशय बलवान् देवोंको भी पराजित कर देती हूँ किन्तु इस विशल्याने दूर रहने पर भी मुझे पृथक् कर दिया ॥४८॥


अनुष्णं भास्करं कुर्यादशीतं शशलक्ष्मणम् । अनया हि तपोऽत्युग्रं चरितं पूर्वजन्मनि ॥४९॥

अर्थ: यह सूर्यको ठण्डा और चन्द्रमाको गरम कर सकती है क्योंकि इसने पूर्वभवमें ऐसा ही अत्यन्त कठिन तपश्चरण किया है ॥४९॥


शिरीषकुसुमासारं शरीरमनया पुरा । नियुक्तं तपसि प्रायो मुनीनामपि दुःसहे ॥५०॥

अर्थ: इसने पूर्वभवमें अपना शिरीषके फूलके समान सुकुमार शरीर ऐसे तपमें लगाया था कि जो प्रायः मुनियोंके लिए भी कठिन था ॥५०॥


एतावतैव संसारः सुसारः प्रतिभाति मे । ईदृशानि प्रसाध्यन्ते यत्तपांसीह जन्तुभिः ॥५१॥

अर्थ: मुझे इतने ही कार्यसे संसार सारभूत जान पड़ता है कि इसमें जीवों द्वारा ऐसे-ऐसे कठिन तप सिद्ध किये जाते हैं ॥५१॥


वर्षाशीतातपैर्घोरैर्महावातसुदुःसहैः । एषा न कम्पिता तन्वी मन्दरस्येव चूलिका ॥५२॥

अर्थ: तीव्र वायुसे जिनका सहन करना कठिन था ऐसे भयंकर वर्षा शीत और घामसे यह कृशांगी सुमेरुकी चूलिकाके समान रंचमात्र भी कम्पित नहीं हुई ॥५२॥


अहो रूपमहो सत्त्वमहो धर्मदृढं मनः । अशक्यं ध्यातुमप्यस्याः सुतपोऽन्याङ्गनाजनैः ॥५३॥

अर्थ: अहो इसका रूप धन्य है, अहो इसका धैर्य धन्य है और अहो धर्ममें दृढ़ रहनेवाला इसका मन धन्य है। इसने जो तप किया है अन्य स्त्रियाँ उसका ध्यान भी नहीं कर सकतीं ॥५३॥


सर्वथा जिनचन्द्राणां मतेनोद्वह्यते तपः । लोकत्रये जयत्येकं यस्येदं फलमीदृशम् ॥५४॥

अर्थ: सर्वथा जिनेन्द्र भगवान्के मतमें ही ऐसा विशाल तप धारण किया जाता है कि जिसका इस प्रकारका फल तीनों लोकोंमें एक जुदा ही जयवन्त रहता है ॥५४॥


अथवा नैव विज्ञेयमाश्चर्यमिदमीदृशम् । प्राप्यते येन निर्वाणं किमन्यत्तस्य दुष्करम् ॥५५॥

अर्थ: अथवा इसे कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए क्योंकि जिससे मोक्ष प्राप्त हो सकता है उसके लिए और दूसरा कौन कार्य कठिन है ? ॥५५॥


पराधीनक्रिया साहं तपसा निर्जितानया । व्रजामि स्वं पदं साधो क्षम्यतां दुर्विचेष्टितम् ॥५६॥

अर्थ: मेरा काम तो पराधीन है देखिए न, इसने मुझे तपसे जीत लिया। हे सत्पुरुष ! अब मैं अपने स्थान पर जाती हूँ - मेरी दुश्चेष्टा क्षमा की जाय ॥५६॥


एवं कृतसमालापां तत्त्वज्ञः शक्तिदेवताम् । विसृज्यावस्थितो वातिः स्वसैन्येऽद्भुतचेष्टितः ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार वार्तालाप करनेवाली उस शक्तिरूपी देवताको छोड़कर तत्त्वका जानकार तथा अद्भुत चेष्टाका धारक हनुमान् अपनी सेनामें स्थित हो गया ॥५७॥


सुता तु द्रोणमेघस्य ह्रियालंकृतदेहिका । पादपद्मद्वयं पाद्मं प्रणम्य विहिताञ्जलिः ॥५८॥

विद्याधरमहामन्त्रिवचोभिः कृतशंसना । वन्दिता खेचरैरन्यैराशीभिरभिनन्दिता ॥५९॥

शक्रस्येव शची पार्श्वे लक्ष्मणस्य सुलक्षणा । अवस्थिता महाभाग्या सखीवचनकारिणी ॥६०॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका शरीर लज्जासे अलंकृत था, जिसने श्रीरामके चरण-कमलोंमें प्रणाम कर हाथ जोड़े थे, विद्याधर महामन्त्रियोंके वचनोंसे जिसकी प्रशंसा की गयी थी, अन्य विद्याधरों ने जिसे वन्दना कर शुभाशीर्वादसे अभिनन्दित किया था, जो उत्तम लक्षणोंको धारण करनेवाली थी; महाभाग्यवती थी, और सखियोंकी आज्ञाकारिणी थी ऐसी द्रोणमेघकी पुत्री विशल्या लक्ष्मणके पास जाकर उस प्रकार खड़ी हो गयी जिस प्रकार मानो इन्द्रके पास इन्द्राणी ही खड़ी हो ॥५८-६०॥


मुग्धा मुग्धमृगीनेत्रा पूर्णचन्द्रनिभानना । महानुरागसंभारप्रेरितोदारमानसा ॥६१॥

परिष्वज्य रहो नाथं सुखसुप्तं महीतले । सुकुमारकराम्भोजसंवाहनसुचारुणा ॥६२॥

गोशीर्षचन्दनेनैवमन्वलिम्पत सर्वतः । तथा पद्ममपि व्रीडाकिंचित्कम्पितपाणिका ॥६३॥

अर्थ: जो अत्यन्त सुन्दरी थी, भोली मृगीके समान जिसके नेत्र थे, पूर्णचन्द्रके समान जिसका मुख था, और महा अनुरागके भारसे जिसका उदार हृदय प्रेरित था ऐसी विशल्याने एकान्तमें पृथिवी तल पर सुखसे सोये हुए प्राणनाथ लक्ष्मणका आलिगन कर उन्हें सुकोमल हस्त-कमलमें स्थित होनेसे अत्यन्त सुन्दर दिखनेवाले गोशीर्ष चन्दनसे खूब अनुलिप्त किया तथा लज्जासे कुछ-कुछ काँपते हुए हाथसे श्रीरामको भी चन्दनका लेप लगाया ॥६१-६३॥


शेषाः कन्या यथायोग्यं शेषाणां खेचरेशिनाम् । चन्दनेनास्पृशन्गात्रं विशल्याहस्तसंगिना ॥६४॥

अर्थ: शेष कन्याओंने विशल्याके हाथमें स्थित चन्दनके द्वारा अन्य विद्याधरोंके शरीरका स्पर्श किया ॥६४॥


विशल्याहस्तसंस्पृष्टं चन्दनं पद्मवाक्यतः । कान्तमिन्द्रजितादीनामुपनीतं यथाक्रमम् ॥६५॥

अर्थ: श्रीरामके आज्ञानुसार विशल्याके हाथका छुआ सुन्दर चन्दन यथाक्रमसे इन्द्रजित आदिके पास भी भेजा गया ॥६५॥


शीतलं तं समाघ्राय कृत्वाङ्गेषु च सादरम् । निर्वृतिं परमां प्राप्ताः शुद्धात्मानो गतज्वराः ॥६६॥

अर्थ: सो उस शीतल चन्दनको सूँघकर तथा आदरके साथ शरीर पर लगाकर वे सब परम सुखको प्राप्त हुए । सबकी आत्माएँ शुद्ध हो गयीं तथा सबका ज्वर जाता रहा ॥६६॥


अन्ये च योधाः क्षतविक्षताङ्गा द्विपास्तुरङ्गाः पदचारिणश्च । अभ्युक्षितास्तत्सलिलेन जाता प्रणष्टशल्या नवभास्कराङ्गाः ॥६७॥

अर्थ: इन सबके सिवाय क्षत-विक्षत शरीरके धारक जो अन्य योधा, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक थे वे सब उसके जलसे सींचे जाकर शल्यरहित तथा नूतन सूर्य - प्रातःकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान शरीरसे युक्त हो गये ॥६७॥


जन्मान्तरं प्राप्त इवाथ कान्तः स्वभावनिद्रामिव सेवमानः । उत्थाप्यते स्म प्रवरैर्नितान्तं संगीतकैर्वेणुनिनादगीतैः ॥६८॥

अर्थ: अथानन्तर जो दूसरे जन्मको प्राप्त हुए के समान सुन्दर थे और मानो स्वाभाविक निद्राका ही सेवन कर रहे थे ऐसे लक्ष्मणको बाँसुरीकी मधुर तानसे मिश्रित उत्तम संगीतके द्वारा उठाया गया ॥६८॥


ततः शनैरुच्छ्वसितोरुवक्षा नेत्रे समुन्मील्य तिगिञ्छताम्रे । विक्षिप्तबाहुः शनकैर्निकुञ्च्य लक्ष्मीधरोऽमुञ्चत मोहशय्याम् ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका विशाल वक्षःस्थल धीरे-धीरे उच्छ्वसित हो रहा था और जिनकी भुजाएँ फैली हुई थीं ऐसे लक्ष्मणने कमलके समान लाल नेत्र खोलकर तथा भुजाओंको संकोचित कर मोहरूपी शय्याका परित्याग किया ॥६९॥


त्यक्त्वोपपादाङ्कशिलामिवासौ रणक्षितिं देव इवोग्रकायः ।
उत्थाय रुष्टः ककुभो निरीक्ष्य क्वासौ गतो रावण इत्युवाच ॥७०॥

अर्थ: जिस प्रकार उपपाद शय्याको छोड़कर उत्तम शरीरका धारक देव उठकर खड़ा होता है उसी प्रकार लक्ष्मण भी रणभूमिको छोड़ खड़े हो गये और दिशाओंकी ओर देख रुष्ट होते हुए बोले कि वह रावण कहाँ गया ? ॥७०॥


ततः प्रफुल्लाम्बुजलोचनेन महाभिनन्दं भजताऽग्रजेन ।
उदाररोमाञ्चसुकर्कशेन प्रोक्तः परिष्वज्य लसद्भुजेन ॥७१॥

कृतार्थवत्तात दशाननोऽसौ हत्वा भवन्तं विजहार शक्त्या ।
त्वमप्यमुष्याश्चरितेन जीवं भूयोऽभजः संस्तुतकन्यकायाः ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नेत्रकमल विकसित हो रहे थे जो महान् आनन्दको प्राप्त थे, उत्कट रोमांचोंसे जिनका शरीर कर्कश हो रहा था और जिनकी भुजाएँ अतिशय शोभायमान थीं ऐसे बड़े भाई श्रीरामने आलिंगन कर कहा कि हे तात ! रावण तो शक्तिके द्वारा आपको मार कृतकृत्यकी तरह चला गया है और तुम भी इस प्रशस्त कन्याके चरित्रसे पुनर्जन्मको प्राप्त हुए हो ॥७१-७२॥


निःशेषतश्चास्य निवेदितं तच्छक्त्याहतिप्रेरणवस्तुवृत्तम् ।
अपूर्वमाश्चर्यमुदारभावं सुविस्मितैर्जाम्बवसुन्दराद्यैः ॥७३॥

अर्थ: तत्पश्चात् अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए जाम्बव और सुन्दर आदिने शक्ति लगनेसे लेकर समस्त वृत्तान्त लक्ष्मणके लिए निवेदन किया-सुनाया तथा उदार भावनासे युक्त अपूर्व आश्चर्य प्रकट किया ॥७३॥


तावत् त्रिवर्णाब्जविलासिनेत्रां शरत्समृद्धेन्दुसमानवक्त्राम् ।
शातोदरीं दिग्गजकुम्भशोभिस्तनद्वयां नूतनयौवनस्थाम् ॥७४॥

शरीरबद्धामिव मन्मथस्य क्रीडां विशालालससन्नितम्बाम् ।
संगृह्य शोभामिव सार्वलोकां विनिर्मितां कर्मभिरेकतानैः ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र लाल सफेद और नीले इन तीन रंगके कमलोंके समान सुशोभित थे, जिसका मुख शरदृतुके पूर्णचन्द्रमाके समान था, जिसका उदर कृश था, जिसके दोनों स्तन दिग्गजके गण्डस्थलके समान सुशोभित थे, जो नूतन यौवन अवस्थामें स्थित थी जो, मानो शरीर-धारिणी कामकी क्रीड़ा ही थी, जिसके उत्तम नितम्ब विशाल तथा अलसाये हुए थे, और जिसे कर्मोंने एकाग्र चित्त हो सर्व संसारकी शोभा ग्रहण कर ही मानो बनाया था ॥७४-७५॥


तां वीक्ष्य लक्ष्मीनिलयोऽन्तिकस्थामचिन्तयद् विस्मयरुद्धचित्तः ।
लक्ष्मीरियं किन्नु सुरेश्वरस्य कान्तिर्नु चन्द्रस्य नु भानुदीप्तिः ॥७६॥

अर्थ: ऐसी समीपमें स्थित उस विशल्याको देख लक्ष्मणने आश्चर्यसे अवरुद्ध चित्त हो विचार किया कि क्या यह इन्द्रकी लक्ष्मी है ? या चन्द्रमाकी कान्ति है ? अथवा सूर्यकी प्रभा है ? ॥७६॥


ध्यायन्तमेवं परिगम्य योषास्तमेवमूचुः कुशलप्रधानाः ।
स्वामिन् विवाहोत्सवमेतया ते दृष्टं जनो वाञ्छति संगतोऽयम् ॥७७॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ता करते हुए लक्ष्मणको देख, मंगलाचार करनेमें निपुण स्त्रियाँ उनसे बोलीं कि हे स्वामिन् ! यहाँ इकट्ठे हुए सब लोग इसके साथ आपका विवाहोत्सव देखना चाहते हैं ॥७७॥


कृतस्मितोऽसावगदत् समीपे ससंशये युक्तमिदं कथं नु ।
ऊचुः पुनस्ते ननु वृत्त एव स्पर्शोऽनया ते प्रकटस्तु नासीत् ॥७८॥

अर्थ: यह सुन लक्ष्मणने मुसकराते हुए कहा कि जहाँ प्राणोंका संशय विद्यमान है ऐसे युद्ध क्षेत्रमें यह किस प्रकार उचित हो सकता है ? इसके उत्तरमें सबने पुनः कहा कि इसके द्वारा आपका स्पर्श तो हो ही चुका है परन्तु आपको प्रकट नहीं हुआ है ॥७८॥


भवत्प्रभावक्षतसर्वविघ्नं पाणिग्रहं नाथ भज त्वमस्याः । इत्यर्थनाद्गौरवतश्च वाक्यादियेष लक्ष्मीनिलयो विवाहम् ॥७९॥

अर्थ: हे नाथ ! आपके प्रभावसे जिसके समस्त विघ्न नष्ट हो चुके हैं ऐसा इसका पाणिग्रहण आप स्वीकृत करो। इस प्रकार लोगोंकी प्रार्थना तथा गौरवपूर्ण वचनोंसे लक्ष्मणने विवाह करनेकी इच्छा की ॥७९॥


क्षणविरचितसर्वश्लाघ्यकर्त्तव्ययोगः पवनपथविहारिस्फीतभूतिप्रपञ्चः । अभवदमरसंपत्कल्पितानन्दतुल्यः प्रधनभुवि विशल्यालक्ष्मणोद्वाहकल्पः ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर जिसमें क्षणभरमें समस्त प्रशंसनीय कार्योंका योग किया गया था, विद्याधरोंने जिसमें विशाल वैभवका विस्तार प्रदर्शित किया था, और जो देव-सम्पदासे कल्पित आनन्दके समान था ऐसा विशल्या और लक्ष्मणका विवाहोत्सव युद्धभूमिमें ही सम्पन्न हुआ ॥८०॥


इति विहितसुचेष्टाः पूर्वजन्मन्युदाराः परमपि परिजित्य प्राप्तमायुर्विनाशम् । द्रुतमुपगतचारुद्रव्यसंबन्धभाजो विधुरविगुणतुल्यां स्वामवस्थां भजन्ते ॥८१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें उत्तम आचरण किया है ऐसे उदार पुरुष प्राप्त हुए मरणको भी जीतकर शीघ्र ही उत्तम पदार्थोंके समागमको प्राप्त होते हैं और चन्द्रमा तथा सूर्यके गुणोंके समान अपनी अवस्था को प्राप्त करते हैं ॥८१॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते श्रीपद्मचरिते विशल्यासमागमाभिधानं नाम पञ्चषष्टितमं पर्व ॥६५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरितमें विशल्याके समागमका वर्णन करनेवाला पैंसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६५॥


६६. षट्षष्टितमं पर्व (रावणदूतागमागमाभिधानं)

अथ लक्ष्मीधरं स्वन्तं विशल्याचरितोचितम् । चारेभ्यो रावणः श्रुत्वा जज्ञे विस्मयमत्सरी ॥१॥

जगाद च स्मितं कृत्वा को दोष इति मन्दगीः । ततोऽगादि मृगाङ्काद्यैर्मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर रावण, गुप्तचरोंके द्वारा विशल्याके चरितके अनुरूप लक्ष्मणका स्वस्थ होना आदि समाचार सुन आश्चर्य और ईर्ष्या दोनोंसे सहित हुआ तथा मन्द हास्य कर धीमी आवाज से बोला कि क्या हानि है ? तदनन्तर मन्त्र करनेमें निपुण मृगाङ्क आदि मन्त्रियोंने उससे कहा ॥१-२॥


यथार्थं भाष्यसे देव ! सुपथ्यं कुप्य तुष्य वा । परमार्थो हि निर्भीकैरुपदेशोऽनुजीविभिः ॥३॥

अर्थ: कि हे देव ! यथार्थ एवं हितकारी बात आपसे कहता हूँ आप कुपित हो चाहें संतुष्ट । यथार्थमें सेवकोंको निर्भीक हो कर हितकारी उपदेश देना चाहिए ॥३॥


सैंहगारुडविद्ये तु रामलक्ष्मणयोस्त्वया । दृष्टे यत्नाद्विना लब्धे पुण्यकर्मानुभावतः ॥४॥

अर्थ: हे देव ! आप देख चुके हैं कि राम-लक्ष्मणको पुण्य कर्मके प्रभावसे यत्नके विना ही सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी विद्याएँ प्राप्त हो चुकी हैं ॥४॥


बन्धनं कुम्भकर्णस्य दृष्टमात्मजयोस्तथा । शक्तेरनर्थकत्वं च दिव्यायाः परमौजसः ॥५॥

अर्थ: आपने यह भी देखा है कि उनके यहाँ भाई कुम्भकर्ण तथा दो पुत्र बन्धनमें पड़े हैं तथा परम तेजकी धारक दिव्य शक्ति व्यर्थ हो गई है ॥५॥


सम्भाव्य सम्भवं शत्रुस्त्वया जीयेत यद्यपि । तथापि भ्रातृपुत्राणां विनाशस्तव निश्चितः ॥६॥

अर्थ: संभव है कि यद्यपि आप शत्रुको जीत लें तथापि यह निश्चित समझिए कि आपके भाई तथा पुत्रोंका विनाश अवश्य हो जायगा ॥६॥


इति ज्ञात्वा प्रसादं नः कुरु नाथाभियाचितः । अस्मदीयं हितं वाक्यं भग्नं पूर्वं न जातुचित् ॥७॥

अर्थ: हे नाथ ! हम सब याचना करते हैं कि आप यह जान कर हम पर प्रसाद करो - हम सब पर प्रसन्न हूजिए । आपने हमारे हितकारी वचनको पहले कभी भग्न नहीं किया ॥७॥


त्यज सीतां भजात्मीयां धर्मबुद्धिं पुरातनीम् । कुशली जायतां लोकः सकलः पालितस्त्वया ॥८॥

अर्थ: सीताको छोड़ो और अपनी पहले जैसी धर्मबुद्धिको धारण करो । तुम्हारे द्वारा पालित समस्त लोग कुशल-मंगलसे युक्त हों ॥८॥


राघवेण समं सन्धिं कुरु सुन्दरभाषितम् । एवं कृते न दोषोऽस्ति दृश्यते तु महागुणः ॥९॥

अर्थ: रामके साथ सन्धि तथा मधुर वार्तालाप करो क्योंकि ऐसा करनेमें कोई हानि नहीं दिखाई देती अपितु बहुत लाभ ही दिखाई देता है ॥९॥


भवता परिपाल्यन्ते मर्यादाः सर्वविष्टपे । धर्माणां प्रभवस्त्वं हि रत्नानामिव सागरः ॥१०॥

अर्थ: समस्त संसारकी मर्यादाएँ आपके ही द्वारा सुरक्षित हैं - आप ही सब मर्यादाओंका पालन करते हैं। यथार्थमें जिस प्रकार समुद्र रत्नोंकी उत्पत्तिका कारण है उसी प्रकार आप धर्मोंकी उत्पत्तिके कारण हैं ॥१०॥


इत्युक्त्वा प्रणता वृद्धाः शिरःस्थकरकुड्मलाः । उत्थाप्य सम्भ्रमाच्चैतांस्तथेत्यूचे दशाननः ॥११॥

अर्थ: इतना कह वृद्ध मन्त्रीजनोंने शिरपर अञ्जलि बाँधकर रावणको नमस्कार किया और रावणने शीघ्रतासे उन्हें उठाकर कहा कि आप लोग जैसा कहते हैं वैसा ही करूँगा। ॥११॥


मन्त्रविद्भिस्ततस्तुष्टैः सन्दिष्टोऽत्यन्तशोभनः । द्रुतं गमीकृतो दूतः सामन्तो नयकोविदः ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर मन्त्रके जाननेवाले मन्त्रियोंने सन्तुष्ट होकर अत्यन्त शोभायमान एवं नीति-निपुण सामन्तको सन्देश देकर शीघ्र ही दूतके रूपमें भेजनेका निश्चय किया ॥१२॥


तं निमेषेङ्गिताकूतपरिबोधविचक्षणम् । रावणः संज्ञया स्वस्मै रुचितं द्रागजिग्रहत् ॥१३॥

अर्थ: वह दूत दृष्टिके संकेतसे अभिप्रायके समझनेमें निपुण था इसलिए रावणने उसे संकेत द्वारा अपना रुचिकर सन्देश शीघ्र ही ग्रहण करा दिया - अपना सब भाव समझा दिया ॥१३॥


दूतस्य मन्त्रिसन्दिष्टं नितान्तमपि सुन्दरम् । महौषधं विषेणेव रावणार्थेन दूषितम् ॥१४॥

अर्थ: मन्त्रियोंने दूतके लिए जो सन्देश दिया था वह यद्यपि बहुत सुन्दर था तथापि रावणके अभिप्रायने उसे इस प्रकार दूषित कर दिया जिस प्रकार कि विष किसी महौषधिको दूषित कर देता है ॥१४॥


अथ शुक्रसमो बुद्ध्या महौजस्कः प्रतापवान् । कृतवाक्यो नृपैर्भूयः श्रुतिपेशलभाषणः ॥१५॥

प्रणम्य स्वामिनं तुष्टः सामन्तो गन्तुमुद्यतः । बुद्ध्यवष्टम्भतः पश्यन् लोकं गोष्पदसम्मितम् ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर जो बुद्धिके द्वारा शुक्राचार्यके समान था, महा ओजस्वी था, प्रतापी था, राजा लोग जिसकी बात मानते थे और जो कर्णप्रिय भाषण करनेमें निपुण था, ऐसा सामन्त सन्तुष्ट हो स्वामीको प्रणाम कर जानेके लिए उद्यत हुआ। वह सामन्त अपनी बुद्धिके बलसे समस्त लोकको गोष्पदके समान तुच्छ देखता था ॥१५-१६॥


गच्छतोऽस्य बलं भीमं नानाशस्त्रसमुज्ज्वलम् । बुद्ध्येव निर्मितं तस्य बभूव भयवर्जितम् ॥१७॥

अर्थ: जब वह जाने लगा तब नाना शस्त्रोंसे देदीप्यमान एक भयङ्कर सेना जो उसकी बुद्धिसे ही मानो निर्मित थी, निर्भय हो उसके साथ हो गई ॥१७॥


तस्य तूर्यरवं श्रुत्वा क्षुब्धा वानरसैनिकाः । खमीक्षाञ्चक्रिरे भीता रावणागमशङ्किनः ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर दूतकी तुरहीका शब्द सुनकर वानर पक्षके सैनिक क्षुभित हो गये और रावणके आनेकी शङ्का करते हुए भयभीत हो आकाशकी ओर देखने लगे ॥१८॥


तस्मिन्नासन्नतां प्राप्ते पुरुषान्तरवेदिते । विश्रब्धतां पुनर्भेजे बलं प्लवगलक्षणम् ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर वह दूत जब निकट आ गया और यह रावण नहीं किन्तु दूसरा पुरुष है, इसप्रकार समझमें आ गया तब वानरोंकी सेना पुनः निश्चिन्तताको प्राप्त हुई ॥१९॥


दूतः प्राप्तो विदेहाजप्रतीहारनिवेदितः । आप्तैः कतिपयैः साकं बाह्यावासितसैनिकः ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर भामण्डलरूपी द्वारपालने जिसकी खबर दी थी तथा डेरेके बाहर जिसने अपने सैनिक ठहरा दिये थे, ऐसा वह दूत कुछ आप्तजनोंके साथ भीतर पहुँचा ॥२०॥


दृष्ट्वा पद्मं प्रणम्यासौ कृतदूतोचितक्रियः । जगौ क्षणमिव स्थित्वा वचनं क्रमसङ्गतम् ॥२१॥

अर्थ: वहाँ उसने रामके दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया। दूतके योग्य सब कार्य किये। तदनन्तर क्षणभर ठहर कर क्रमपूर्ण निम्नाङ्कित वचन कहे ॥२१॥


पद्म ! मद्वचनैः स्वामी भवन्तमिति भाषते । श्रोत्रावधानदानेन प्रयत्नः क्रियतां क्षणम् ॥२२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे पद्म ! मेरे वचनों द्वारा स्वामी रावण, आपसे इस प्रकार कहते हैं सो आप कर्णोंको एकाग्रकर क्षणभर श्रवण करनेका प्रयत्न कीजिए ॥२२॥


यथा किल न युद्धेन किञ्चिदत्र प्रयोजनम् । बहवो हि क्षयं प्राप्ता नरा युद्धाभिमानिनः ॥२३॥

अर्थ: वे कहते हैं कि मुझे इस विषयमें युद्धसे कुछ भी प्रयोजन नहीं है क्योंकि युद्धका अभिमान करनेवाले बहुतसे मनुष्य क्षयको प्राप्त हो चुके हैं ॥२३॥


प्रीत्यैव शोभना सिद्धिर्युद्धतस्तु जनक्षयः । असिद्धिश्च महान् दोषः सापवादाश्च सिद्धयः ॥२४॥

अर्थ: कार्यकी उत्तम सिद्धि प्रीतिसे ही होती है, युद्धसे तो केवल नरसंहार ही होता है, युद्धमें यदि सफलता नहीं मिली तो यह सबसे बड़ा दोष है और यदि सफलता मिलती भी है तो अनेक अपवादोंसे सहित मिलती है ॥२४॥


दुर्वृत्तो नरकः शङ्खो धवलाङ्गोऽसुरस्तथा । निधनं शम्बराद्याश्च सङ्ग्रामश्रद्धया गताः ॥२५॥

अर्थ: पहले युद्धकी श्रद्धासे दुर्वृत्त, नरक, शङ्ख, धवलाङ्ग तथा शम्बर आदि राजा विनाशको प्राप्त हो चुके हैं ॥२५॥


प्रीतिरेव मया सार्द्धं भवते नितरां हिता । ननु सिंहो गुहां प्राप्य महाद्रेर्जायते सुखी ॥२६॥

अर्थ: हमारे साथ प्रीति करना ही आपके लिए अत्यन्त हितकारी है, यथार्थमें सिंह महापर्वतकी गुफा पाकर ही सुखी होता है ॥२६॥


महेन्द्रदमनो येन समरेऽमरभीषणः । सुन्दरीजनसामान्यं बन्दीगृहमुपाहृतः ॥२७॥

अर्थ: युद्धमें देवोंको भय उत्पन्न करने वाले राजा इन्द्रको जिसने सामान्य स्त्रियोंके योग्य बन्दीगृहमें भेजा था ॥२७॥


पाताले भूतले व्योम्नि गतिर्यस्येच्छया कृता । सुरासुरैरपि क्रुद्धैः प्रतिहन्तुं न शक्यते ॥२८॥

अर्थ: पाताल, पृथिवीतल तथा आकाशमें स्वेच्छासे की हुई जिसकी गतिको, कुपित हुए सुर और असुर भी खण्डित करनेके लिए समर्थ नहीं हैं ॥२८॥


नानानेकमहायुद्धवीरलक्ष्मीस्वयंग्रही । सोऽहं दशाननो जातु भवता किं तु न श्रुतः ॥२९॥

अर्थ: नाना प्रकारके अनेक महायुद्धोंमें वीर लक्ष्मीको स्वयं ग्रहण करने वाला मैं रावण क्या कभी आपके सुननेमें नहीं आया ॥२९॥


सागरान्तां महीमेतां विद्याधरसमन्विताम् । लङ्कां भागद्वयोपेतां राजन्नेव ददामि ते ॥३०॥

अर्थ: हे राजन् ! मैं विद्याधरोंसे सहित यह समुद्र पर्यन्तकी समस्त पृथिवी और लङ्काके दो भाग कर एक भाग तुम्हारे लिए देता हूँ ॥३०॥


अद्य मे सोदरं प्रेष्य तनयौ च सुमानसः । अनुमन्यस्व सीतां च ततः क्षेमं भविष्यति ॥३१॥

अर्थ: तुम आज अच्छे हृदयसे मेरे भाई तथा पुत्रोंको भेजकर सीता देना स्वीकृत करो, उसीसे तुम्हारा कल्याण होगा ॥३१॥


न चेदेवं करोषि त्वं ततस्ते कुशलं कुतः । एताँश्च समरे बद्धानानेष्यामि बलादहम् ॥३२॥

अर्थ: यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो तुम्हारी कुशलता कैसे हो सकती है ? क्योंकि सीता तो हमारे पास है ही और युद्धमें बाँधे हुए भाई तथा पुत्रोंको हम बलपूर्वक छीन लावेंगे ॥३२॥


पद्मनाभस्ततोऽवोचन्न मे राज्येन कारणम् । न चान्यप्रमदाजेन भोगेन महताऽपि हि ॥३३॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीरामने कहा कि मुझे राज्यसे प्रयोजन नहीं है और न अन्य स्त्रियों तथा बड़े-बड़े भोगों से मतलब है ॥३३॥


एष प्रेष्यामि ते पुत्रौ भ्रातरं च दशानन । सम्प्राप्य परमां पूजां सीतां प्रेष्यसि मे यदि ॥३४॥

अर्थ: यदि तुम परम सत्कारके साथ सीताको भेजते हो तो हे दशानन ! मैं तुम्हारे भाई और दोनों पुत्रोंको अभी भेज देता हूँ ॥३४॥


एतया सहितोऽरण्ये मृगसामान्यगोचरे । यथासुखं भ्रमिष्यामि महीं त्वं भुङ्क्ष्व पुष्कलाम् ॥३५॥

अर्थ: मैं इस सीताके साथ मृगादि जन्तुओंके स्थानभूत वनमें सुखपूर्वक भ्रमण करूँगा और तुम समग्र पृथिवीका उपभोग करो ॥३५॥


गत्वैवं ब्रूहि दूत त्वं तं लङ्कापरमेश्वरम् । एतदेव हि पथ्यं ते कर्तव्यं नान्यथाविधम् ॥३६॥

अर्थ: हे दूत ! तू जाकर लङ्काके धनीसे इस प्रकार कह दे कि यही कार्य तेरे लिए हितकारी है, अन्य कार्य नहीं ॥३६॥


सर्वैः प्रपूजितं श्रुत्वा पद्मनाभस्य तद्वचः । सौष्ठवेन समायुक्तं सामन्तो वचनं जगौ ॥३७॥

अर्थ: सबके द्वारा पूजित तथा सुन्दरतासे युक्त रामके वे वचन सुन सामन्त दूत इस प्रकार बोला कि ॥३७॥


न वेत्सि नृपते कार्यं बहुकल्याणकारणम् । यदुल्लङ्घ्याम्बुधिं भीममागतोऽसि भयोज्झितः ॥३८॥

अर्थ: हे राजन् ! यतश्च तुम भयङ्कर समुद्रको लाँघ कर निर्भय हो यहाँ आये हो इससे जान पड़ता है कि तुम कहुकल्याणकारी कार्यको नहीं जानते हो ॥३८॥


न शोभना नितान्तं ते प्रत्याशा जानकीं प्रति । लङ्केन्द्रे सङ्गते कोपं त्यजाऽऽशामपि जीविते ॥३९॥

अर्थ: सीताके प्रति तुम्हारी आशा बिलकल ही अच्छी नहीं है । अथवा सीताकी बात दूर रही, रावणके कुपित होनेपर अपने जीवनकी भी आशा छोड़ो ॥३९॥


नरेण सर्वथा स्वस्य कर्त्तव्यं बुद्धिशालिना । रक्षणं सततं यत्नाद्दारैरपि धनैरपि ॥४०॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्यको अपने आपकी रक्षा सदा स्त्रियों और धनके द्वारा भी सब प्रकारसे करना चाहिए ॥४०॥


प्रेषितं तार्क्ष्यनाथेन यदि वाहनयुग्मकम् । यदि वा छिद्रतो बद्धा मम पुत्रसहोदराः ॥४१॥

तथाऽपि नाम कोऽमुष्मिन् गर्वस्तव समुद्यतः । नैतावता कृतित्वं ते मयि जीवति जायते ॥४२॥

अर्थ: यदि गरुडेन्द्रने तुम्हें दो वाहन भेज दिये हैं अथवा छल पूर्वक तुमने मेरे पुत्रों और भाईको बाँध लिया है तो इतनेसे तुम्हारा यह कौन-सा बढ़ा-चढ़ा अहंकार है ? क्योंकि मेरे जीवित रहते हुए इतने मात्रसे तुम्हारी कृत-कृत्यता नहीं हो जाती ॥४१-४२॥


विग्रहे कुर्वतो यत्नं न ते सीता न जीवितम् । मा भूरुभयतो भ्रष्टस्त्यज सीतानुबन्धिताम् ॥४३॥

अर्थ: युद्धमें यत्न करने पर न सीता तुम्हारे हाथ लगेगी और न तुम्हारा जीवन ही शेष रह जायगा । इसलिए दोनों ओरसे भ्रष्ट न होओ सीता सम्बन्धी हठ छोड़ो ॥४३॥


लब्धवर्णाः समस्तेषु शास्त्रेषु परमेश्वराः । सुरेन्द्रप्रतिमा नीताः खेचरा निधनं मया ॥४४॥

अर्थ: समस्त शास्त्रोंमें निपुण इन्द्र जैसे बड़े-बड़े विद्याधर राजाओंको मैंने मृत्यु प्राप्त करा दी है ॥४४॥


पश्याष्टापदकूटाभानिमान् कैकससञ्चयान् । उपेयुषां क्षयं राज्ञां मदीयभुजवीर्यतः ॥४५॥

अर्थ: मेरी भुजाओंके बलसे क्षयको प्राप्त हुए राजाओंके जो ये कैलासके शिखरके समान हड्डियोंके ढेर लगे हुए हैं इन्हें देखो ॥४५॥


इति प्रभाषिते दूते क्रोधतो जनकात्मजः । जगाद विस्फुरद्वक्त्रज्योतिर्ज्वलितपुष्करः ॥४६॥

आः पाप दूत गोमायो ! वाक्यसंस्कारकूटक । दुर्बुद्धे भाषसे व्यर्थं किमित्येवमशङ्कितः ॥४७॥

अर्थ: इस प्रकार दूतके कहने पर, मुखकी देदीप्यमान ज्योतिसे आकाशको प्रज्वलित करता हुआ भामण्डल क्रोधसे बोला कि अरे पापी ! दूत ! शृगाल ! बातें बनानेमें निपुण ! दुर्बुद्ध ! इस तरह व्यर्थ ही निःशंक हो, क्यों बके जा रहा है ॥४६-४७॥


सीतां प्रति कथा केयं पद्माधिक्षेपमेव वा । को नाम रावणो रक्षः पशुः कुत्सितचेष्टितः ॥४८॥

अर्थ: सीताकी तो चर्चा ही क्या है ? रामकी निन्दा करनेके विषयमें नीच चेष्टाका धारी पशुके समान नीच राक्षस रावण है ही कौन ? ॥४८॥


इत्युक्त्वा सायकं यावज्जग्राह जनकात्मजः । केकयीसूनुना तावन्निरुद्धो नयचक्षुषा ॥४९॥

अर्थ: इतना कहकर ज्योंही भामण्डलने तलवार उठाई त्योंही नीति रूपी नेत्रके धारक लक्ष्मणने उसे रोक लिया ॥४९॥


रक्तोत्पलदलच्छाये नेत्रे जनकजन्मनः । कोपेन दूषिते जाते सन्ध्याकारानुहारिणी ॥५०॥

अर्थ: भामण्डलके जो नेत्र लाल कमलदलके समान थे वे क्रोधसे दूषित हो सन्ध्याका आकार धारण करते हुए दूषित हो गये - सन्ध्याके समान लाल-लाल दिखने लगे ॥५०॥


स्वैरं स मन्त्रिभिर्नीतः शमं साधूपदेशतः । मन्त्रेणेव महासर्पः स्फुरद्विषकणद्युतिः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार विषकणोंकी कान्तिको प्रकट करनेवाला महासर्प मन्त्रके द्वारा शान्त किया जाता है उसी प्रकार वह भामण्डल मन्त्रियोंके द्वारा उत्तम उपदेशसे धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त कराया गया ॥५१॥


नरेन्द्र ! त्यज संरम्भं समुद्गतमगोचरे । अनेन मारितेनापि कोऽर्थः प्रेषणकारिणा ॥५२॥

अर्थ: मन्त्रियोंने कहा कि हे राजन् ! अयोग्य विषयमें प्रकट हुए क्रोधको छोड़ो । इस दूतको यदि मार भी डाला तो इससे कौनसा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ? ॥५२॥


प्रावृषेण्यघनाकारगजमर्दनपण्डितः । नाखौ संक्षोभमायाति सिंहः प्रचलकेसरः ॥५३॥

अर्थ: वर्षाऋतुके मेघके समान विशाल हाथियोंके नष्ट करनेमें निपुण चञ्चल केसरोंवाला सिंह चूहे पर क्षोभको प्राप्त नहीं होता ॥५३॥


प्रतिशब्देषु कः कोपः छायापुरुषकेऽपि वा । तिर्यक्षु वा शुकाद्येषु यन्त्रबिम्बेषु वा सताम् ॥५४॥

अर्थ: प्रतिध्वनियों पर, लकड़ी आदिके बने पुरुषाकार पुतलों पर, सुआ आदि तिर्यञ्चों पर और यन्त्रसे चलनेवाली मनुष्याकार पुतलियों पर सत्पुरुषोंका क्या क्रोध करना है ? अर्थात् इस दूतके शब्द निजके शब्द नहीं हैं ये तो रावणके शब्दोंकी मानो प्रतिध्वनि ही हैं । यह दीन पुरुष नहीं है, पुरुष तो रावण है और यह उसका आकार मात्र पुतला है, जिस प्रकार सुआ आदि पक्षियोंको जैसा पढ़ा दो वैसा पढ़ने लगता है । इसी प्रकार इस दूतको रावणने जैसा पढ़ा दिया वैसा पढ़ रहा है और कठपुतली जिस प्रकार स्वयं चेष्टा नहीं करती उसी प्रकार यह भी स्वयं चेष्टा नहीं करता - मालिककी इच्छानुसार चेष्टा कर रहा है अतः इसके ऊपर क्या क्रोध करना है ? ॥५४॥


लक्ष्मणेनैवमुक्तोऽसौ शान्तोऽभूज्जनकात्मजः । अभ्यधाच्च पुनर्दूतः पद्मं साध्वसवर्जितः ॥५५॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मणके कहनेपर भामण्डल शान्त हो गया। तदनन्तर निर्भय हो उस दूतने रामसे पुनः कहा कि ॥५५॥


सचिवापसदैर्भूयः सम्प्रमूढैस्त्वमीदृशैः । संयोज्यसे दुरुद्योगैः संशये दुर्विदग्धकैः ॥५६॥

अर्थ: तुम इस प्रकार मूर्ख नीच मन्त्रियोंके द्वारा अविवेकपूर्ण दुष्प्रवृत्तियोंसे संशयमें डाले जा रहे हो अर्थात् खेद है कि तुम इन मन्त्रियोंकी प्रेरणासे व्यर्थ ही अविचारित रम्य प्रवृत्ति कर अपने आपको संशयमें डाल रहे हो ॥५६॥


प्रतार्यमाणमात्मानं प्रबुद्धयस्व त्वमेतकैः । निरूपय हितं स्वस्य स्वयं बुद्ध्या प्रवीणया ॥५७॥

अर्थ: तुम इनके द्वारा छले जानेवाले अपने आपको समझो और स्वयं अपनी निपुण बुद्धिसे अपने हितका विचार करो ॥५७॥


त्यज सीतासमासङ्गं भवेन्द्रः सर्वविष्टपे । भ्रम पुष्पकमारूढो यथेष्टं विभवान्वितः ॥५८॥

अर्थ: सीताका समागम छोड़ो, समस्त लोकके स्वामी होओ, और वैभवके साथ पुष्पक विमानमें आरूढ़ हो इच्छानुसार भ्रमण करो ॥५८॥


मिथ्याग्रहं विमुञ्चस्व मा श्रौषीः क्षुद्रभाषितम् । करणीये मनो दत्स्व भृशमेधि महासुखम् ॥५९॥

अर्थ: मिथ्या हठको छोड़ो, क्षुद्र मनुष्योंका कथन मत सुनो, करने योग्य कार्यमें मन लगाओ और इस तरह महा सुखी होओ ॥५९॥


क्षुद्रस्योत्तरमेतस्य को ददातीति जानके । तूष्णीं स्थितेऽथ दूतोऽसावन्यैर्निर्भर्त्सितः परम् ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर इस क्षुद्रका उत्तर कौन देता है ? यह सोचकर भामण्डल तो चुप बैठा रहा परन्तु अन्य लोगोंने उस दूतका अत्यधिक तिरस्कार किया - उसे खूब धौंस दिखायी ॥६०॥


स विद्धो वाक्शरैस्तीक्ष्णैरसत्कारमलं श्रितः । जगाम स्वामिनः पार्श्वे मनस्यत्यन्तपीडितः ॥६१॥

अर्थ: अथानन्तर वचन रूपी तीक्ष्ण बाणोंसे बिंधा और परम असत्कारको प्राप्त हुआ वह दूत मनमें अत्यन्त पीड़ित होता हुआ स्वामीके समीप गया ॥६१॥


स उवाच तवाऽऽदेशान्नाथ रामो मयोदितः । क्रमेण नयविन्यासकारिणा त्वत्प्रभावतः ॥६२॥

नानाजनपदार्कीर्णामाकूपारनिवारिताम् । बहुरत्नाकरां क्षोणीं विद्याभृत्यसमन्विताम् ॥६३॥

ददामि ते महानागांस्तुरगांश्च रथांस्तथा । कामगं पुष्पकं यानमप्रधृष्यं सुरैरपि ॥६४॥

सहस्रत्रितयं चारुकन्यानां परिवर्गवत् । सिंहासनं रविच्छायं छत्रं च शशिसन्निभम् ॥६५॥

भज निष्कण्टकं राज्यं सीता यदि तवाऽऽज्ञया । मां वृणोति किमन्येन भाषितेनेह भूरिणा ॥६६॥

अर्थ: वहाँ जाकर उसने कहा कि हे नाथ ! आपका आदेश पा आपके प्रभावसे नय-विन्याससे युक्त पद्धतिसे मैंने रामसे कहा कि मैं नाना देशोंसे युक्त, अनेक रत्नोंकी खानोंसे सहित तथा विद्याधरोंसे समन्वित समुद्रान्त पृथिवी, बड़े-बड़े हाथी, घोड़े, रथ, देव भी जिसका तिरस्कार नहीं कर सकते ऐसा पुष्पक विमान, अपने- अपने परिकरोंसे सहित तीन हजार सुन्दर कन्याएँ, सूर्यके समान कान्तिवाला सिंहासन और चन्द्रतुल्य छत्र देता हूँ। अथवा इस विषयमें अन्य अधिक कहनेसे क्या ? यदि तुम्हारी आज्ञासे मुझे सीता स्वीकृत कर लेती है तो इस समस्त निष्कण्टक राज्यका सेवन करो ॥६२-६६॥


अर्थ: हे देव ! इस प्रकार मैंने शत्रुके चरित्रका जैसा कुछ अनुभव किया है वह निःशङ्क होकर आपसे निवेदन किया है। अब इस विषयमें जो कुछ उचित हो सो करो क्योंकि हमारे जैसे पुरुष तो केवल आज्ञा पालन करनेवाले होते हैं ॥६४॥


अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्हें अनेक शास्त्रोंके समूह अच्छी तरह विदित हैं, जो नीतिके विषयमें सदा उद्यत रहते हैं तथा जिनके समीप अच्छे-अच्छे मन्त्री विद्यमान रहते हैं ऐसे मनुष्य भी पुरुष रूपी सूर्यके मोह रूपी सघन मेघसे आच्छादित हो जाने पर मोह भावको प्राप्त हो जाते हैं ॥६५॥


वयं वेत्रासनेनैव सन्तुष्टाः स्वल्पवृत्तयः । भविष्यामो मदुक्तं चेत् करोषि सुविचक्षण ॥६७॥

अर्थ: हे विद्वान् ! यदि हमारा कहा करते हो तो हम थोड़ी-सी आजीविका लेकर एक बेंतके आसनसे ही संतुष्ट हो जावेंगे ॥६७॥


एवमादीनि वाक्यानि प्रोक्तोऽपि स मया मुहुः । सीताग्राहं न तन्निष्ठो मुञ्चते रघुनन्दनः ॥६८॥

अर्थ: इत्यादि वचन मैंने यद्यपि उससे बार-बार कहे तथापि वह सीताकी हठ नहीं छोड़ता है उसी एकमें उसकी निष्ठा लग रही है ॥६८॥


साधोरिवातिशान्तस्य चर्या सा तस्य भाषिता । अशक्यमोचना दानात् त्रैलोक्यस्यापि सुन्दरी ॥६९॥

अर्थ: जिस प्रकार अत्यन्त शान्त साधुकी अपनी चर्या प्रिय होती है उसी प्रकार वह सीता भी रामको अत्यन्त प्रिय है। हे स्वामिन् ! आपका राज्य तो दूर रहा, तीन लोक भी देकर उस सुन्दरीको उससे कोई नहीं छुड़ा सकता ॥६९॥


ब्रवीत्येवं च रामस्त्वां यथा तव दशानन । न युक्तमीदृशं वक्तुं सर्वलोकविगर्हितम् ॥७०॥

अर्थ: और रामने आपसे इस प्रकार कहा है कि हे दशानन ! तुम्हें ऐसा सर्वजन निन्दित कार्य करना योग्य नहीं है ॥७०॥


तवैवं भाषमाणस्य नृणामधमजन्मनः । रसनं न कथं यातं शतधा पापचेतसः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार कहते हुए तुझ पापी नीच मनुष्यकी जिह्वाके सौ टुकड़े क्यों नहीं हो गये ॥७१॥


अपि देवेन्द्रभोगैर्मे न कृत्यं सीतया विना । भुंक्ष्व त्वं पृथिवीं सर्वामाश्रयिष्याम्यहं वनम् ॥७२॥

अर्थ: मुझे सीताके बिना इन्द्रके भोगोंकी भी आवश्यकता नहीं है। तू समस्त पृथिवीका उपभोग कर और मैं वनमें निवास करूँगा ॥७२॥


पराङ्गनां समुद्दिश्य यदि त्वं मर्तुमुद्यतः । अहं पुनः कथं स्वस्याः प्रियाया न कृते तथा ॥७३॥

अर्थ: यदि तू पर-स्त्रीके उद्देश्यसे मरनेके लिए उद्यत हुआ है तो मैं अपनी निजकी स्त्रीके लिए क्यों नहीं प्रयत्न करूँ ? ॥७३॥


सर्वलोकगताः कन्यास्त्वमेव भज सुन्दर । फलपर्णादिभोजी तु सीतयाऽमा भ्रमाम्यहम् ॥७४॥

अर्थ: हे सुन्दर ! समस्त लोकमें जितनी कन्याएँ हैं उन सबका उपभोग तुम्हीं करो, मैं तो फल तथा पत्तों आदिका खानेवाला हूँ, केवल सीताके साथ ही घूमता रहता हूँ ॥७४॥


शाखामृगध्वजाधीशस्त्वां प्रहस्याभणीदिदम् । यथा किल ग्रहेणाऽसौ भवत्स्वामी वशीकृतः ॥७५॥

अर्थ: दूत रावणसे कहता जाता है कि हे नाथ ! वानरोंके अधिपति सुग्रीवने तुम्हारी हँसी उड़ा कर यह कहा था कि जान पड़ता है तुम्हारा वह स्वामी किसी पिशाचके वशीभूत हो गया है ॥७५॥


वायुना वाऽतिचण्डेन विप्रलापादिहेतुना । येनेदं विपरीतत्त्वं वराकः समुपागतः ॥७६॥

अर्थ: अथवा बकवादका कारण जो अत्यन्त तीव्र वायु है उससे तुम्हारा स्वामी ग्रस्त है। यही कारण है कि वह बेचारा इस प्रकार विपरीतताको प्राप्त हो रहा है ॥७६॥


नूनं न सन्ति लङ्कायां कुशला मन्त्रवादिनः । पक्वतैलादिवायेन क्रियते तच्चिकित्सितम् ॥७७॥

अर्थ: जान पड़ता है कि लंकामें कुशल वैद्य अथवा मन्त्रवादी नहीं हैं अन्यथा पक्व तैलादि वायुहर पदार्थोंके द्वारा उसकी चिकित्सा अवश्य की जाती ॥७७॥


आवेशं सायकैः कृत्वा क्षिप्रं सङ्ग्राममण्डले । लक्ष्मीधरनरेन्द्रोऽस्य रुजः सर्वा हरिष्यति ॥७८॥

अर्थ: अथवा लक्ष्मणरूपी विषवैद्य संग्रामरूपी मण्डलमें शीघ्र ही बाणों द्वारा आवेश कर इसके सब रोगोंको हरेगा ॥७८॥


ततो मया तदाक्रोशवह्निज्वलितचेतसा । शुना द्विप इवाक्रुष्टो वानरध्वजचन्द्रमाः ॥७९॥

अर्थ: तदनन्तर उसके कुवचन रूपी अग्निसे जिसका चित्त प्रज्वलित हो रहा था, ऐसे मैंने उस सुग्रीवको इस प्रकार धौंसा जिस प्रकार कि श्वान हाथीको धौंसता है ॥७९॥


सुग्रीव ! पद्मगर्वेण नूनं त्वं मर्तुमिच्छसि । अधिक्षिपसि यत् क्रुद्धं विद्याधरमहेश्वरम् ॥८०॥

अर्थ: मैंने कहा कि अरे सुग्रीव ! जान पड़ता है कि तू रामके गर्वसे मरना चाहता है, जो कुपित हुए विद्याधरोंके अधिपतिकी निन्दा कर रहा है ॥८०॥


ऊचे विराधितश्च त्वां यथा ते शक्तिरस्ति चेत् । आगच्छतु ममैकस्य युद्धं यच्छ किमास्यते ॥८१॥

अर्थ: हे नाथ ! विराधितने भी आपसे कहा है कि यदि तेरी शक्ति है तो आ, मुझ एकके लिए ही युद्ध प्रदान कर। बैठा क्यों है ? ॥८१॥


उक्तो दाशरथिर्भूयो मया राम ! रणाजिरे । रावणस्य न किं दृष्टस्त्वया परमविक्रमः ॥८२॥

अर्थ: मैंने रामसे पुनः कहा कि हे राम ! क्या तुमने रणाङ्गणमें रावणका परम पराक्रम नहीं देखा है ? ॥८२॥


यतः क्षमान्वितं वीरं राजखद्योतभास्करम् । सामप्रयोगमिच्छन्तं भवत्पुण्यानुभावतः ॥८३॥

वदान्यं त्रिजगत्ख्यातप्रतापं प्रणतप्रियम् । नेतुमिच्छसि संक्षोभं कैलासक्षोभकारिणम् ॥८४॥

अर्थ: जिससे कि तुम उसे क्षोभको प्राप्त कराना चाहते हो । जो राजा रूपी जुगनुओंको दबानेके लिए सूर्यके समान है, वीर है और तीनों जगत्में जिसका प्रताप प्रख्यात है, ऐसा रावण, इस समय आपके पुण्य प्रभावसे क्षमा युक्त है । साम - शान्तिका प्रयोग करनेका इच्छुक है, उदार-त्यागी है, एवं नम्र मनुष्योंसे प्रेम करनेवाला है ॥८३-८४॥


चण्डसैन्योर्मिमालाढ्यं शस्त्रयादोगणाकुलम् । तर्तुमिच्छसि किं दोर्भ्यां दशग्रीवमहार्णवम् ॥८५॥

अर्थ: जो बलवान् सेना रूपी तरङ्गोंकी मालासे युक्त है तथा शस्त्र रूपी जल-जन्तुओंके समूहसे सहित है ऐसे रावण रूपी समुद्रको तुम क्या दो भुजाओंसे तैरना चाहते हो ? ॥८५॥


ययुद्विपमहाव्यालां पदातिद्रुमसङ्कटाम् । विवक्षसि कथं दुर्गां दशग्रीवमहाटवीम् ॥८६॥

अर्थ: घोड़े और हाथी ही जिसमें हिंसक जानवर हैं तथा जो पैदल सैनिक रूपी वृक्षोंसे संकीर्ण हैं ऐसी दुर्गम रावण रूपी अटवीमें तुम क्यों घुसना चाहते हो ? ॥८६॥


न पद्मवातेन सुमेरुरुह्यते न सागरः शुष्यति सूर्यरश्मिभिः । गवेन्द्रश्रृङ्गैर्धरणी न कम्पते न साध्यते त्वत्सदृशैर्दशाननः ॥८७॥

अर्थ: मैंने कहा कि हे पद्म ! वायु के द्वारा सुमेरु नहीं उठाया जाता, सूर्यकी किरणोंसे समुद्र नहीं सूखता, बैलकी सींगोंसे पृथिवी नहीं काँपती और और तुम्हारे जैसे लोगोंसे दशानन नहीं जीता जाता ॥८७॥


इति प्रचण्डं मयि भाषमाणे भामण्डलः क्रोधकषायनेत्रः । यावत् समाकर्षदसिं प्रदीप्तं तावत् सुमित्रातनयेन रुद्धः ॥८८॥

अर्थ: इस प्रकार क्रोधपूर्वक मेरे कहनेपर क्रोधसे लाल-लाल नेत्र दिखाता हुआ भामण्डल जबतक चमकती तलवार खींचता है तबतक लक्ष्मणने उसे मना कर दिया ॥८८॥


प्रसीद वैदेह ! विमुञ्च कोपं न जम्बुके कोपमुपैति सिंहः । गजेन्द्रकुम्भस्थलदारणेन क्रीडां स मुक्तानिकरैः करोति ॥८९॥

अर्थ: लक्ष्मणने भामण्डलसे कहा कि हे विदेहासुत ! क्रोध छोड़ो, सिंह सियार पर क्रोध नहीं करता, वह तो हाथीका गण्डस्थल चीरकर मोतियोंके समूहसे क्रीड़ा करता है ॥८९॥


नरेश्वरा ऊर्जितशौर्यचेष्टा न भीतिभाजां प्रहरन्ति जातु । न ब्राह्मणं न श्रमणं न शून्यं स्त्रियं न बालं न पशुं न दूतम् ॥९०॥

अर्थ: जो राजा अतिशय बलिष्ठ शूरवीरोंकी चेष्टाको धारण करनेवाले हैं वे कभी न भयभीत पर, न ब्राह्मण पर, न मुनि पर, न निहत्थे पर, न स्त्रीपर, न बालकपर, न पशुपर और न दूतपर प्रहार करते हैं ॥९०॥


इत्यादिभिर्वाङ्निवहैः सुयुक्तैर्यदा स लक्ष्मीधरपण्डितेन । नीतः प्रबोधं शनकैरमुञ्चत् क्रोधं तथा दुःसहदीप्तिचक्रः ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंसे जब लक्ष्मण रूपी पण्डितने उसे समझाया तब कहीं दुःसह दीप्तिचक्रको धारण करनेवाले भामण्डलने धीरे-धीरे क्रोध छोड़ा ॥९१॥


निर्भर्त्सितः क्रूरकुमारचक्रैः वाक्यैरलं वज्रनिघाततुल्यैः । अपूर्वहेतुप्रलघूकृतात्मा स्वं मन्यमानः तृणतोऽप्यसारम् ॥९२॥

नभः समुत्पत्य भयार्दितोऽहं त्वत्पादमूलं पुनरागतोऽयम् । लक्ष्मीधरोऽसौ यदि नाऽभविष्यद्वैदेहतो देव ! ततोऽमरिष्यम् ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर दुष्टता भरे अन्य कुमारोंने वज्र प्रहारके समान क्रूर वचनोंसे जिसका अत्यधिक तिरस्कार किया तथा अपूर्व कारणोंसे जिसकी आत्मा अत्यन्त लघु हो रही थी, ऐसा मैं अपने आपको तृणसे अधिक निःसार मानता हुआ भयसे दुःखी हो आकाशमें उड़कर आपके पादमूलमें पुनः आया हूँ। हे देव ! यदि लक्ष्मण नहीं होता तो मैं आज अवश्य ही भामण्डलसे मारा जाता ॥९२-९३॥


इति गदितमिदं यथाऽनुभूतं रिपुचरितं तव देव ! निर्विशङ्कम् । कुरु यदुचितमत्र साम्प्रतं वचनकरा हि भवन्ति मद्विधास्तु ॥९४॥


बहु विदितमलं सुशास्त्रजालं नयविषयेषु सुमन्त्रिणोऽभियुक्ताः । अखिलमिदमुपैति मोहभावं पुरुषरवौ घनमोहमेघरुद्धे ॥९५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रावणदूतागमागमाभिधानं नाम षट्षष्टितमं पर्व ॥६६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें रावणके दूतका रामके पास जाने और वहाँसे आनेका वर्णन करने वाला छयासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६६॥


६७. सप्तषष्टितमं पर्व (शान्तिगृहकीर्तनं)

स्वदूतवचनं श्रुत्वा राक्षसानामधीश्वरः । क्षणं सन्मन्त्रणं कृत्वा मन्त्रज्ञैः सह मन्त्रिभिः ॥१॥

कृत्वा पाणितले गण्डं कुण्डलालोकभासुरम् । अधोमुखः स्थितः किञ्चिदिति चिन्तामुपागतः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर राक्षसोंका अधीश्वर रावण अपने दूतके वचन सुनकर क्षणभर मन्त्रके जानकार मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा करता रहा। तदनन्तर कुण्डलोंके आलोकसे देदीप्यमान गण्डस्थलको हथेली पर रख अधोमुख बैठ इस प्रकार चिन्ता करने लगा कि ॥१-२॥


नागेन्द्रवृन्दसङ्घट्टे युद्धे शत्रुं जयामि चेत् । तथा सति कुमाराणां प्रमादः परिदृश्यते ॥३॥

अर्थ: यदि हस्तिसमूहके संघट्टसे युक्त युद्धमें शत्रुओंको जीतता हूँ तो ऐसा करनेसे कुमारोंकी हानि दिखाई देती है ॥३॥


सुप्ते शत्रुबले दत्त्वा समास्कन्दमवेदितः । आनयामि कुमारान् किं किं करोमि कथं शिवम् ॥४॥

अर्थ: इसलिए जब शत्रुसमूह सो जावे तब अज्ञात रूपसे धावा देकर कुमारोंको वापिस ले आऊँ ? अथवा क्या करूँ ? क्या करनेसे कल्याण होगा ? ॥४॥


इति चिन्तयतस्तस्य मागधेश्वरशेमुषी । इयं समुद्गता जातो यया सुखितमानसः ॥५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे मगधेश्वर ! इस प्रकार विचार करते हुए उसे यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि उसका हृदय प्रसन्न हो गया ॥५॥


साधयामि महाविद्यां बहुरूपामिति श्रुताम् । प्रतिव्यूहितुमुद्युक्तैरशक्यां त्रिदशैरपि ॥६॥

अर्थ: उसने विचार किया कि मैं बहुरूपिणी नामसे प्रसिद्ध वह विद्या सिद्ध करता हूँ कि जिसमें सदा तत्पर रहनेवाले देव भी विघ्न उत्पन्न नहीं कर सकते ॥६॥


इति ध्यात्वा समाहूय किङ्करानशिषद् द्रुतम् । कुरुध्वं शान्तिगेहस्य शोभां सत्तोरणादिभिः ॥७॥

अर्थ: ऐसा विचार कर उसने शीघ्र ही किंकरोंको बुला आदेश दिया कि शान्तिजिनालयकी उत्तम तोरण आदिसे सजावट करो ॥७॥


पूजां च सर्वचैत्येषु सर्वसंस्कारयोगिषु । सर्वश्चायं भरो न्यस्तो मन्दोदर्यां सुचेतसि ॥८॥

अर्थ: तथा सब प्रकारके उपकरणोंसे युक्त सर्वमन्दिरोंमें जिनभगवान्की पूजा करो। किङ्करोंको ऐसा आदेश दे उसने पूजाकी व्यवस्थाका सब भार उत्तमचित्तकी धारक मन्दोदरीके ऊपर रक्खा ॥८॥


विंशस्य देवदेवस्य वन्दितस्य सुरासुरैः । मुनिसुव्रतनाथस्य तस्मिन् काले महोदये ॥९॥

सर्वत्र भरतक्षेत्रे सुविस्तीर्णे महायते । अर्हच्चैत्यैरियं पुण्यैर्वसुधाऽऽसीदलङ्कृता ॥१०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि वह सुर और असुरों द्वारा वन्दित बीसवें मुनिसुव्रत भगवान्का महाभ्युदयकारी समय था । उस समय लम्बे-चौड़े समस्त भरत क्षेत्रमें यह पृथ्वी अर्हन्तभगवान्की पवित्र प्रतिमाओंसे अलंकृत थी ॥९-१०॥


राष्ट्राधिपतिभिर्भूपैः श्रेष्ठिभिर्ग्रामभोगिभिः । उत्थापितास्तदा जैनाः प्रासादाः पृथुतेजसः ॥११॥

अर्थ: देशके अधिपति राजाओं तथा गाँवोंका उपभोग करनेवाले सेठोंके द्वारा जगह-जगह देदीप्यमान जिन-मन्दिर खड़े किये गये थे ॥११॥


अधिष्ठिता भृशं भक्तियुक्तैः शासनदैवतैः । सद्धर्मपक्षसंरक्षाप्रवणैः शुभकारिभिः ॥१२॥

अर्थ: वे मन्दिर, समीचीन धर्मके पक्षकी रक्षा करनेमें निपुण, कल्याणकारी, भक्तियुक्त शासन-देवोंसे अधिष्ठित थे ॥१२॥


सदा जनपदैः स्फीतैः कृताभिषवपूजनाः । रेजुः स्वर्गविमानाभा भव्यलोकनिषेविताः ॥१३॥

अर्थ: देशवासी लोग सदा वैभवके साथ जिनमें अभिषेक तथा पूजन करते थे और भव्य जीव सदा जिनकी आराधना करते थे, ऐसे वे जिनालय स्वर्गके विमानोंके समान सुशोभित होते थे ॥१३॥


पर्वते पर्वते चारौ ग्रामे ग्रामे वने वने । पत्तने पत्तने राजन् हर्म्ये हर्म्ये पुरे पुरे ॥१४॥

सङ्गमे सङ्गमे रम्ये चत्वरे चत्वरे पृथौ । बभूवुश्चैत्यसङ्घाता महाशोभासमन्विताः ॥१५॥

अर्थ: हे राजन् ! उस समय पर्वत पर्वतपर, अतिशय सुन्दर गाँव गाँवमें, वन वनमें पत्तन पत्तनमें, महल महलमें, नगर नगरमें, संगम संगममें, तथा मनोहर और सुन्दर चौराहे चौराहे पर महाशोभासे युक्त जिनमन्दिर बने हुए थे ॥१४-१५॥


शरच्चन्द्रसितच्छायाः सङ्गीतध्वनिहारिणः । नानातूर्यस्वनोद्भूतक्षुब्धसिन्धुसमस्वनाः ॥१६॥

अर्थ: वे मन्दिर शरद्ऋतुके चन्द्रमाके समान कान्तिसे युक्त थे, संगीतकी ध्वनिसे मनोहर थे, तथा नाना वादित्रोंके शब्दसे उनमें क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान शब्द हो रहे थे ॥१६॥


त्रिसन्ध्यं वन्दनोद्युक्तैः साधुसङ्घैः समाकुलाः । गम्भीरा विविधाश्चर्याश्चित्रपुष्पोपशोभिताः ॥१७॥

अर्थ: वे मन्दिर तीनों संध्याओंमें वन्दनाके लिए उद्यत साधुओंके समूहसे व्याप्त रहते थे, गम्भीर थे, नाना आचार्योंसे सहित थे और विविध प्रकारके पुष्पोंके उपहारसे सुशोभित थे ॥१७॥


विभूत्या परया युक्ता नानावर्णमणित्विषः । सुविस्तीर्णाः समुत्तुङ्गा महाध्वजविराजिताः ॥१८॥

अर्थ: परम विभूतिसे युक्त थे, नाना रङ्गके मणियोंकी कान्तिसे जगमगा रहे थे, अत्यन्त विस्तृत थे, ऊँचे थे और बड़ी-बड़ी ध्वजाओंसे सहित थे ॥१८॥


जिनेन्द्रप्रतिमास्तेषु हेमरूप्यादिमूर्तयः । पञ्चवर्णा भृशं रेजुः परिवारसमन्विताः ॥१९॥

अर्थ: उन मन्दिरोंमें सुवर्ण, चाँदी आदिकी बनी छत्रत्रय चमरादि परिवारसे सहित पाँच वर्णकी जिनप्रतिमाएँ अत्यन्त सुशोभित थीं ॥१९॥


पुरे च खेचराणां च स्थाने स्थानेऽतिचारुभिः । जिनप्रासादसत्कूटैर्विजयार्द्धगिरिर्वरः ॥२०॥

अर्थ: विद्याधरोंके नगरमें स्थान-स्थानपर बने हुए अत्यन्त सुन्दर जिनमन्दिरोंके शिखरोंसे विजयार्ध पर्वत उत्कृष्ट हो रहा था ॥२०॥


नानारत्नमयैः कान्तैरुद्यानादिविभूषितैः । व्याप्तं जगदिदं रेजे जिनेन्द्रभवनैः शुभैः ॥२१॥

अर्थ: इस प्रकार यह समस्त संसार बाग-बगीचोंसे सुशोभित, नानारत्नमयी, शुभ और सुन्दर जिनमन्दिरोंसे व्याप्त हुआ अत्यधिक सुशोभित था ॥२१॥


महेन्द्रनगराकारा लङ्काऽप्येवं मनोहरा । अन्तर्बहिश्च जैनेन्द्रैर्भवनैः पापहारिभिः ॥२२॥

अर्थ: इन्द्रके नगरके समान वह लङ्का भी भीतर और बाहर बने हुए पापापहारी जिनमन्दिरोंसे अत्यन्त मनोहर थी ॥२२॥


यथाष्टादशसङ्ख्यानां सहस्राणां सुयोषिताम् । पद्मिनीनां सहस्रांशुः स चिक्रीड दशाननः ॥२३॥

प्रावृड्मेघदलच्छायो नागनासा महाभुजः । पूर्णेन्दुवदनः कान्तो बन्धूकच्छदनाधरः ॥२४॥

विशालनयनो नारीमनःकर्षणविभ्रमः । लक्ष्मीधरसमाकारो दिव्यरूपसमन्वितः ॥२५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि वर्षाऋतुके मेघसमूहके समान जिसकी कान्ति थी, हाथीकी सूँड़के समान जिसकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ थीं, पूर्णचन्द्रके समान जिसका मुख था, दुपहरियाके फूलके समान जिसके लाल-लाल ओंठ थे, जो स्वयं सुन्दर था, जिसके बड़े-बड़े नेत्र थे, जिसकी चेष्टाएँ स्त्रियोंके मनको आकृष्ट करनेवाली थीं, लक्ष्मीधर-लक्ष्मणके समान जिसका आकार था और जो दिव्यरूपसे सहित था, ऐसा दशानन, कमलिनियोंके साथ सूर्यके समान अपनी अठारह हजार स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करता था ॥२३-२५॥


तस्मिन्नाश्रितसर्वलोकनयने प्रासादमालावृते नानारत्नमये दशाननगृहे चैत्यालयोद्भासिते । हेमस्तम्भसहस्रशोभि विपुलं मध्ये स्थितं भासुरं तुङ्गं शान्तिगृहं स यत्र भगवान् शान्तिर्जिनः स्थापितः ॥२६॥

अर्थ: जिसपर सब लोगोंके नेत्र लग रहे थे, जो अन्य महलोंकी पंक्तिसे घिरा था, नानारत्नोंसे निर्मित था और चैत्यालयोंसे सुशोभित था, ऐसे दशाननके घरमें सुवर्णमयी हजारों खम्भोंसे सुशोभित, विस्तृत, मध्यमें स्थित, देदीप्यमान और अतिशय ऊँचा वह शान्तिजिनालय था कि जिसमें शान्तिजिनेन्द्र विराजमान थे ॥२६॥


वन्द्यानां त्रिदशेन्द्रमौलिशिखरप्रत्युप्तरत्नस्फुरत्- स्फीतांशुप्रकरात्प्रसारिचरणप्रोत्सर्पिनख्यत्विषाम् ज्ञात्वा सर्वमशाश्वतं परिदृढामाधाय धर्मे मतिं धन्याः सद्युति कारयन्ति परमं लोके जिनानां गृहम् ॥२७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि उत्तम भाग्यशाली मनुष्य, धर्ममें दृढ़ बुद्धि लगाकर तथा संसारके सब पदार्थोंको अस्थिर जानकर जगत्में उन जिनेन्द्र भगवान्के कान्तिसम्पन्न, उत्तम मन्दिर बनवाते हैं जो सबके द्वारा वन्दनीय हैं तथा इन्द्रके मुकुटोंके शिखरमें लगे रत्नोंकी देदीप्यमान किरणोंके समूहसे जिनके चरणनखोंकी कान्ति अत्यधिक वृद्धिगत होती रहती है ॥२७॥


वित्तस्य जातस्य फलं विशालं वदन्ति सुज्ञाः सुकृतोपलम्भम् ।
धर्मश्च जैनः परमोऽखिलेऽस्मिञ्जगत्यभीष्टस्य रविप्रकाशे ॥२८॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्य कहते हैं कि प्राप्त हुए विशाल धनका फल पुण्यकी प्राप्ति करना है और इस समस्त संसारमें एक जैनधर्म ही उत्कृष्ट पदार्थ है, यही इष्ट पदार्थको सूर्यके समान प्रकाशित करनेवाला है ॥२८॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते शान्तिगृहकीर्तनं नाम सप्तषष्टितमं पर्व ॥६७॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें शान्ति जिनालयका वर्णन करने वाला सड़सठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६७॥


६८. अष्टषष्टितमं पर्व (फाल्गुनाष्टाह्निकामहिमविधानं)

अथ फाल्गुनिके मासे गृहीत्वा धवलाष्टमीम् । पौर्णमासीं तिथिं यावल्लग्नो नन्दीश्वरो महः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीसे लेकर पौर्णमासी पर्यन्त नन्दीश्वर-अष्टाह्निक महोत्सव आया ॥१॥


नन्दीश्वरमहे तस्मिन् प्राप्ते परमसम्मदः । बलद्वयेऽपि लोकोऽभून्नियमग्रहणोद्यतः ॥२॥

अर्थ: उस नन्दीश्वर महोत्सव के आने पर दोनों पक्षकी सेनाओंके लोग परम हर्षसे युक्त होते हुए नियम ग्रहण करनेमें तत्पर हुए ॥२॥


एवं च मानसे चक्रुः सर्वे सैनिकपुङ्गवाः । सुपुण्यानि दिनान्यष्टावेतानि भुवनत्रये ॥३॥

अर्थ: सब सैनिक मनमें ऐसा विचार करने लगे कि ये आठ दिन तीनों लोकोंमें अत्यन्त पवित्र हैं ॥३॥


नैतेषु विग्रहं कुर्मो न चान्यदपि हिंसनम् । यजामहे यथाशक्ति स्वश्रेयसि परायणाः ॥४॥

अर्थ: इन दिनोंमें हम न युद्ध करेंगे और न कोई दूसरी प्रकारकी हिंसा करेंगे, किन्तु आत्म-कल्याणमें तत्पर रहते हुए यथाशक्ति भगवान् जिनेन्द्र की पूजा करेंगे ॥४॥


भवन्ति दिवसेष्वेषु भोगादिपरिवर्जिताः । सुरा अपि जिनेन्द्राणां सेन्द्राः पूजनतत्पराः ॥५॥

अर्थ: इन दिनोंमें देव भी भोगादिसे रहित हो जाते हैं तथा इन्द्रोंके साथ जिनेन्द्र देवकी पूजा करनेमें तत्पर रहते हैं ॥५॥


क्षीरोदवारि सम्पूर्णैः कुम्भैरम्भोजशोभिभिः । शातकुम्भैरलं भक्ताः स्नपयन्ति जिनान् सुराः ॥६॥

अर्थ: भक्त देव, क्षीर समुद्रके जलसे भरे तथा कमलोंसे सुशोभित स्वर्णमयी कलशोंसे श्रीजिनेन्द्रका अभिषेक करते हैं ॥६॥


अन्यैरपि जिनेन्द्राणां प्रतिमाः प्रतिमोज्झिताः । भावितैरभिषेक्तव्याः पलाशादिपुटैरपि ॥७॥

अर्थ: अन्य लोगोंको भी चाहिए कि वे भक्तिभावसे युक्त हो कलश न हों तो पत्तों आदिके बने दोनोंसे भी जिनेन्द्र देवकी अनुपम प्रतिमाओंका अभिषेक करें ॥७॥


गत्वा नन्दीश्वरं भक्त्या पूजयन्ति जिनेश्वरान् । देवेश्वरा न ते पूज्याः क्षुद्रकैः किमिहस्थितैः ॥८॥

अर्थ: इन्द्र नन्दीश्वर द्वीप जाकर भक्ति पूर्वक जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं, तो क्या यहाँ रहनेवाले क्षुद्र मनुष्योंके द्वारा जिनेन्द्र पूजनीय नहीं हैं ? ॥८॥


अर्चयन्ति सुराः पद्मै रत्नजाम्बूनदात्मकैः । जिनास्ते भुवि निर्वित्तैः पूज्याश्चित्तदलैरपि ॥९॥

अर्थ: देव रत्न तथा स्वर्णमय कमलोंसे जिनेन्द्र देवकी पूजा करते हैं तो पृथ्वी पर स्थित निर्धन मनुष्योंको अन्य कुछ न हो तो मनरूपी कलिका द्वारा भी उनकी पूजा करना चाहिए ॥९॥


इति ध्यानमुपायाता लङ्काद्वीपे मनोरमे । जनाश्चैत्यानि सोत्साहाः पताकाद्यैरभूषयद् ॥१०॥

अर्थ: इस प्रकार ध्यानको प्राप्त हुए मनुष्योंने बड़े उत्साहके साथ मनोहर लङ्का द्वीपमें जो मन्दिर थे उन्हें पताका आदि से अलंकृत किया ॥१०॥


सभाः प्रपाश्च मञ्चाश्च पट्टशाला मनोहराः । नाट्यशाला विशालाश्च वाप्यश्च रचिताः शुभाः ॥११॥

अर्थ: एकसे एक बढ़कर सभाएँ, प्याऊ, मञ्च, पट्टशालाएँ, मनोहर नाट्य शालाएँ तथा बड़ी-बड़ी वापिकाएँ बनाई गईं ॥११॥


सरांसि पद्मरम्याणि भान्ति सोपानकैर्वरैः । तटोद्भासितवस्त्रादिचैत्यकूटानि भूरिशः ॥१२॥

अर्थ: जो उत्तमोत्तम सीढ़ियोंसे सहित थे तथा जिनके तटों पर वस्त्रादिसे निर्मित जिनमन्दिर शोभा पा रहे थे, ऐसे कमलोंसे मनोहर अनेक सरोवर सुशोभित हो रहे थे ॥१२॥


कनकादिरजश्चित्रमण्डलादिविराजितैः । रेजुश्चैत्यानि सद्द्वारैर्वस्त्ररम्भादिभूषितैः ॥१३॥

अर्थ: जिनालय, स्वर्णादिकी परागसे निर्मित नाना प्रकारके मण्डलादिसे अलंकृत एवं वस्त्र तथा कदली आदिसे सुशोभित उत्तम द्वारोंसे शोभा पा रहे थे ॥१३॥


घृतक्षीरादिभिः पूर्णाः कलशाः कमलाननाः । मुक्तादामादिसत्कण्ठा रत्नरश्मिविराजिताः ॥१४॥

जनबिम्बाभिषेकार्थमाहूता भक्तिभासुराः । दृश्यन्ते भोगिगेहेषु शतशोऽथ सहस्रशः ॥१५॥

अर्थ: जो घी, दूध आदिसे भरे हुए थे, जिनके मुख पर कमल ढके हुए थे, जिनके कण्ठमें मोतियोंकी मालाएँ लटक रही थीं, जो रत्नोंकी किरणोंसे सुशोभित थे, जो नाना प्रकारके बेलबूटोंसे देदीप्यमान थे तथा जो जिन-प्रतिमाओंके अभिषेकके लिए इकट्ठे किये गये थे ऐसे सैकड़ों हजारों कलश गृहस्थोंके घरोंमें दिखायी देते थे ॥१४-१५॥


नन्दनप्रभवैः फुल्लैः कर्णिकारातिमुक्तकैः । कदम्बैः सहकारैश्च चम्पकैः पारिजातकैः ॥१६॥

मन्दारैः सौरभाबद्धमधुव्रतकदम्बकैः । स्रजो विरचिता रेजुश्चैत्येषु परमोज्ज्वलाः ॥१७॥

अर्थ: मन्दिरोंमें सुगन्धिके कारण जिन पर भ्रमरोंके समूह मँडरा रहे थे, ऐसे नन्दन-वनमें उत्पन्न हुए कर्णिकार, अतिमुक्तक, कदम्ब, सहकार, चम्पक, पारिजातक, तथा मन्दार आदिके फूलोंसे निर्मित अत्यन्त उज्ज्वल मालाएँ सुशोभित हो रही थीं ॥१६-१७॥


जातरूपमयैः पद्मै रजतादिमयैस्तथा । मणिरत्नशरीरैश्च पूजा विरचिता परा ॥१८॥

अर्थ: स्वर्ण चाँदी तथा मणिरत्न आदिसे निर्मित कमलोंके द्वारा श्री जिनेन्द्र देवकी उत्कृष्ट पूजा की गई थी ॥१८॥


पटुभिः पटहैस्तूर्यैर्मृदङ्गैः काहलादिभिः । शङ्खैश्चाशु महानादैश्चैत्येषु समजायत ॥१९॥

अर्थ: उत्तमोत्तम नगाड़े, तुरही, मृदङ्ग, शङ्ख तथा काहल आदि वादित्रोंसे मन्दिरोंमें शीघ्र ही विशाल शब्द होने लगा ॥१९॥


प्रशान्तवैरसम्बद्धैर्महानन्दसमागतैः । जिनानां महिमा चक्रे लङ्कापुरनिवासिभिः ॥२०॥

अर्थ: जिनका पारस्परिक वैरभाव शान्त हो गया था और जो महान् आनन्दसे मिल रहे थे, ऐसे लङ्कानिवासियोंने जिनेन्द्र देवकी परम महिमा प्रकट की ॥२०॥


ते विभूतिं परां चक्रुर्विद्येशा भक्तितत्पराः । नन्दीश्वरे यथा देवा जिनबिम्बार्चनोद्यताः ॥२१॥

अर्थ: जिस प्रकार नन्दीश्वर द्वीपमें जिन-बिम्बकी अर्चा करनेमें उद्यत देव बड़ी विभूति प्रकट करते हैं उसी प्रकार भक्तिमें तत्पर विद्याधर राजाओंने बड़ी विभूति प्रकट की थीं ॥२१॥


अयमपि राक्षसवृषभः पृथुप्रतापः सुशान्तिगृहमभिगम्य । पूजां करोति भक्त्या बलिरिव पूर्वं मनोहरां शुचिर्भूत्वा ॥२२॥

अर्थ: विशाल प्रतापके धारक रावणने भी श्री शान्ति-जिनालयमें जाकर पवित्र हो पहले जिस प्रकार बलि राजाने की थी, उस प्रकार भक्तीसे श्री जिनेन्द्र देवकी मनोहर अर्चा की ॥२२॥


समुचितविभवयुतानां जिनेन्द्रचन्द्रान् सुभक्तिभारधराणाम् । पूजयतां पुरुषाणां कः शक्तः पुण्यसञ्चयान् प्रचोदयितुम् ॥२३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो योग्य वैभवसे युक्त हैं तथा उत्तम भक्तिके भारको धारण करने वाले हैं ऐसे श्री जिनेन्द्र देवकी पूजा करने वाले पुरुषोंके पुण्य-समूहका निरूपण करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२३॥


भुक्त्वा देवविभूतिं लब्ध्वा चक्राङ्कभोगसंयोगम् । रवितोऽपि तपस्तीव्रं कृत्वा जैनं व्रजन्ति मुक्तिं परमाम् ॥२४॥

अर्थ: ऐसे जीव देवोंकी सम्पदाका उपभोग कर तथा चक्रवर्तीके भोगोंका सुयोग पा कर और अन्तमें सूर्यसे भी अधिक जिनेन्द्र प्रणीत तपश्चरण कर श्रेष्ठ मुक्तिको प्राप्त होते हैं ॥२४॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे फाल्गुनाष्टाह्निकामहिमविधानं नामाष्टषष्टितमं पर्व ॥६८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें फाल्गुनमासकी अष्टाहिकाओंकी महिमाका निरूपण करने वाला अड़सठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६८॥


६९. एकोनसप्ततितमं पर्व (लोकनियमकरणाभिधानं)

अथ शान्तिजिनेन्द्रस्य भवनं शान्तिकारणम् । कैलासकूटसङ्काशं शरदभ्रचयोपमम् ॥१॥

स्वयम्प्रभासुरं दिव्यं प्रासादालीसमावृतम् । जम्बूद्वीपस्य मध्यस्थं महामेरुमिवोत्थितम् ॥२॥

विद्यासाधनसंयुक्तमानसः स्थिरनिश्चयः । प्रविश्य रावणः पूजामकरोत् परमाद्भुताम् ॥३॥

अर्थ: अथानन्तर जो शान्तिका कारण था, कैलासके शिखरके समान जान पड़ता था, शरद्-ऋतुके मेघमण्डलकी उपमा धारण करता था, स्वयं देदीप्यमान था, दिव्य अर्थात् मनोहर था, महलोंकी पंक्तिसे घिरा था और जम्बूद्वीपके मध्यमें स्थित महामेरुके समान खड़ा था - ऐसा श्रीशान्तिजिनेन्द्रके मन्दिरमें, विद्या साधनकी इच्छासे युक्त रावणने दृढ़ निश्चयके साथ प्रवेश कर श्रीजिनेन्द्रदेवकी परम अद्भुत पूजा की ॥१-३॥


अभिषेकैः सवादित्रैर्माल्यैरतिमनोहरैः । धूपैर्वल्युपहारैश्च सद्वर्णैरनुलेपनैः ॥४॥

चक्रे शान्तिजिनेन्द्रस्य शान्तचेता दशाननः । पूजां परमया द्युत्या शुनाशीर इवोद्यतः ॥५॥

अर्थ: जो उत्कृष्ट कान्तिसे खड़े हुए इन्द्रके समान जान पड़ता था ऐसे शान्तचित्त दशाननने वादित्र सहित अभिषेकों, अत्यन्त मनोहर मालाओं, धूपों, नैवेद्यके उपहारों और उत्तमवर्णके विलेपनोंसे श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्रकी पूजा की ॥४-५॥


चूडामणिहसद्बद्धकेशमौलिर्महाद्युतिः । शुक्लांशुकधरः पीनकेयूरार्चितसद्भुजः ॥६॥

कृताञ्जलिपुटः क्षोणीं पीडयन् जानुसङ्गमात् । प्रणामं शान्तिनाथस्य चकार त्रिविधेन सः ॥७॥

अर्थ: जिसके बँधे हुए केश चूडामणिसे सुशोभित थे तथा उनपर मुकुट लगा हुआ था, जो महाकान्तिमान् था, शुक्ल वस्त्रको धारण कर रहा था, जिसकी मोटी-मोटी उत्तम भुजाएँ बाजूवन्दोंसे अलंकृत थीं, जो हाथ जोड़े हुए था, और घुटनोंके समागमसे जो पृथ्वीको पीड़ा पहुँचा रहा था ऐसे दशाननने मन, वचन, कायसे श्रीशान्तिनाथ भगवान्को प्रणाम किया ॥६-७॥


शान्तेरभिमुखः स्थित्वा निर्मले धरणीतले । पर्यङ्कार्धनियुक्ताङ्गः पुष्परागिणि कुट्टिमे ॥८॥

बिभ्रत्स्फटिकनिर्माणामक्षमालां करोदरे । वलाकापङ्क्तिसंयुक्तनीलाम्भोदचयोपमः ॥९॥

एकाग्रध्यानसम्पन्नो नासाग्रस्थितलोचनः । विद्यायाः साधनं धीरः प्रारेभे राक्षसाधिपः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर जो निर्मल पृथ्वीतलमें पुष्परागमणिसे निर्मित फर्सपर श्रीशान्तिनाथ भगवान्के सामने बैठा था, जो हाथोंके मध्यमें स्फटिकमणिसे निर्मित अक्षमालाको धारण कर रहा था, और इसीलिए बलाकाओंकी पंक्तिसे युक्त नीलमेघोंके समूहके समान जान पड़ता था, जो एकाग्र ध्यानसे युक्त था, जिसने अपने नेत्र नासाके अग्रभाग पर लगा रक्खे थे, तथा जो अत्यन्त धीर था ऐसे रावणने विद्याका सिद्ध करना प्रारम्भ किया ॥८-१०॥


दत्ताज्ञा पूर्वमेवाथ नाथेन प्रियवर्तिनी । अमात्यं यमदण्डाख्यमादिदेश मयात्मजा ॥११॥

दाप्यतां घोषणा स्थाने यथा लोकः समन्ततः । नियमेषु नियुक्तात्मा जायतां सुदयापरः ॥१२॥

अर्थ: अथानन्तर जिसे स्वामीने पहले ही आज्ञा दे रक्खी थी ऐसी प्रियकारिणी मन्दोदरीने यमदण्डनामक मन्त्रीको आदेश दिया कि जगह-जगह ऐसी घोषणा दिलाई जावे कि जिससे लोग सब ओर नियम - आखड़ियोंमें तत्पर और उत्तम दयासे युक्त होवें ॥११-१२॥


जिनचन्द्राः प्रपूज्यन्तां शेषव्यापारवर्जितैः । दीयतां धनमर्थिभ्यो यथेष्टं हृतमत्सरैः ॥१३॥

अर्थ: अन्य सब कार्य छोड़कर जिनचन्द्रकी पूजा की जावे और मत्सरभावको दूर कर याचकोंके लिए इच्छानुसार धन दिया जावे ॥१३॥


यावत्समाप्यते योगो नायं भुवनभोगिनः । तावत् श्रद्धापरो भूत्वा जनस्तिष्ठतु संयमी ॥१४॥

अर्थ: जबतक जगत्के स्वामी - दशाननका यह योग समाप्त नहीं होता है तबतक सब लोग श्रद्धामें तत्पर एवं संयमी होकर रहें ॥१४॥


निकारो यद्युदारोऽपि कुतश्चिन्नीचतो भवेत् । निश्चितं सोऽपि सोढव्यो महाबलयुतैरपि ॥१५॥

अर्थ: यदि किसी नीच मनुष्यकी ओरसे अत्यधिक तिरस्कार भी होवे तो भी महाबलवान् पुरुषोंको उसे निश्चित रूपसे सह लेना चाहिये ॥१५॥


क्रोधाद्विकुरुते किञ्चिद्दिवसेष्वेषु यो जनः । पिताऽपि किं पुनः शेषः स मे वध्यो भविष्यति ॥१६॥

अर्थ: इन दिनोंमें जो भी पुरुष क्रोधसे विकार दिखावेगा वह पिता भी हो, फिर शेषकी तो बात ही क्या है ? मेरा वध्य होगा ॥१६॥


युक्तो बोधिसमाधिभ्यां संसारं सोऽन्तवर्जितम् । प्रतिपद्येत यो न स्यात् समादिष्टस्य कारकः ॥१७॥

अर्थ: जो मनुष्य इस आदेशका पालन नहीं करेगा वह बोधि और समाधिसे युक्त होने पर भी अनन्त संसारको ही प्राप्त होगा - उससे छूटकर मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा ॥१७॥


ततो यथाऽऽज्ञापयसीति सम्भ्रमी मुदा तदाज्ञां शिरसा प्रतीष्य सः । चकार सर्वं गदितं जनैश्च तथा कृतं संशयसङ्गवर्जितैः ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर ‘जैसी आपकी आज्ञा हो’ इस प्रकार शीघ्रतासे कहकर तथा हर्ष पूर्वक मन्दोदरीकी आज्ञा शिरोधार्यकर यमदण्ड मन्त्रीने घोषणा कराई और सब लोगोंने संशयसे रहित हो घोषणाके अनुसार ही सब कार्य किये ॥१८॥


जिनेन्द्रपूजाकरणप्रसक्ता प्रजा बभूवापरकार्यमुक्ता । रविप्रभाणां परमालयानामन्तर्गता निर्मलतुङ्गभावा ॥१९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि सूर्यके समान कान्तिवाले उत्तमोत्तम महलोंके भीतर विद्यमान तथा निर्मल और उन्नत भावोंको धारण करने वाली लङ्काकी समस्त प्रजा, अन्य सब कार्य छोड़ जिनेन्द्र देवकी पूजा करनेमें ही लीन हो गई ॥१९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते लोकनियमकरणाभिधानं नामैकोनसप्ततितमं पर्व ॥६९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लोगोंके नियम करनेका वर्णन करने वाला उनहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥६९॥

७०. सप्ततितमं पर्व (सम्यग्दृष्टिदेवप्रातिहार्यकीर्तनं)

स वृत्तान्तश्चरास्येभ्यस्तत्र परबले श्रुतः । ऊचुश्च खेचराधीशा जयप्राप्तिपरायणाः ॥१॥

किल शान्तिजिनेन्द्रस्य प्रविश्य शरणं सुधीः । विद्यां साधयितुं लग्नः स लङ्कापरमेश्वरः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर 'रावण बहुरूपिणी विद्या साध रहा है । ’ यह समाचार गुप्तचरोंके मुखसे रामकी सेनामें सुनाई पड़ा सो विजय प्राप्त करनेमें तत्पर विद्याधर राजा कहने लगे कि ऐसा सुननेमें आया है कि लङ्काका स्वामी रावण श्री शान्ति-जिनेन्द्रके मन्दिरमें प्रवेश कर विद्या सिद्ध करनेमें लगा हुआ है ॥१-२॥


चतुर्विंशतिभिः सिद्धिं वासरैः प्रतिपद्यते । बहुरूपेति सा विद्या सुराणामपि भञ्जनी ॥३॥

अर्थ: वह बहुरूपिणी विद्या चौबीस दिनमें सिद्धिको प्राप्त होती है तथा देवोंका भी मद भञ्जन करनेवाली है ॥३॥


यावद्भगवती तस्य सा सिद्धिं न प्रपद्यते । तावत् कोपयत क्षिप्रं तं गत्वा नियमस्थितम् ॥४॥

अर्थ: इसलिए वह भगवती विद्या जब तक उसे सिद्ध नहीं होती है तब तक शीघ्र ही जाकर नियममें बैठे रावणको क्रोध उत्पन्न करो ॥४॥


तस्यां सिद्धिमुपेतायां देवेन्द्रैरपि शक्यते । न स साधयितुं कैव क्षुद्रेष्वस्मासु सङ्कथा ॥५॥

अर्थ: बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हो जाने पर वह इन्द्रोंके द्वारा भी नहीं जीता जा सकेगा फिर हमारे जैसे क्षुद्र पुरुषोंकी तो कथा ही क्या है ? ॥५॥


ततो विभीषणेनोक्तं कर्त्तव्यं चेदिदं ध्रुवम् । द्रुतं प्रारभ्यतां कस्माद्भवद्भिरवलम्ब्यते ॥६॥

अर्थ: तब विभीषणने कहा कि यदि निश्चित ही यह कार्य करना है तो शीघ्र ही प्रारम्भ किया जाय । आप लोग विलम्ब किसलिए कर रहे हैं ॥६॥


सम्प्रधार्य समस्तैस्तैः पद्मनाभाय वेदितम् । गदितं च यथा लङ्काप्रस्तावे गृह्यतामिति ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर इस प्रकार सलाह कर सब विद्याधरोंने श्रीरामसे कहा कि ‘इस अवसर पर लङ्का ग्रहण की जाय’ ॥७॥


बाध्यतां रावणः कृत्यं क्रियतां च यथेप्सितम् । इत्युक्तः स जगौ धीरो महापुरुषचेष्टितः ॥८॥

भीतादिष्वपि नो तावत् कर्तुं युक्तं विहिंसनम् । किं पुनर्नियमावस्थे जने जिनगृहस्थिते ॥९॥

अर्थ: रावणको मारा जाय और इच्छानुसार कार्य किया जाय । इस प्रकार कहे जाने पर महा-पुरुषोंकी चेष्टासे युक्त धीर वीर रामने कहा कि जो मनुष्य अत्यन्त भयभीत हैं उन आदिके ऊपर भी जब हिंसापूर्ण कार्य करना योग्य नहीं हैं तब जो नियम लेकर जिन-मन्दिरमें बैठा है उस पर यह कुकृत्य करना कैसे योग्य हो सकता है ? ॥८-९॥


नैषा कुलसमुत्थानां क्षत्रियाणां प्रशस्यते । प्रवृत्तिर्गर्वतुङ्गानां खिन्नानां शस्त्रकर्मणि ॥१०॥

अर्थ: जो उच्चकुलमें उत्पन्न हैं, अहङ्कारसे उन्नत हैं तथा शस्त्र चलानेके कार्यमें जिन्होंने श्रम किया है ऐसे क्षत्रियोंकी यह प्रवृत्ति प्रशंसनीय नहीं हैं ॥१०॥


महानुभावधीर्देवो विधर्मे न प्रवर्त्तते । इति प्रधार्य ते चक्रुः कुमारान् गामिनो रहः ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर ‘हमारे स्वामी राम महापुरुष हैं, ये अधर्ममें प्रवृत्ति नहीं करेंगे’ ऐसा निश्चय कर उन्होंने एकान्तमें अपने-अपने कुमार लङ्काकी ओर रवाना किये ॥११॥


श्वो गन्तास्म इति प्राप्ता अपि बुद्धिं नभश्चराः । अष्टमात्रदिनं कालं सम्प्रधारणया स्थिताः ॥१२॥

अर्थ: ‘तत्पश्चात् कल चलेंगे’ इस प्रकार निश्चय कर लेने पर भी विद्याधर आठ दिन तक सलाह ही करते रहे ॥१२॥


पूर्णमास्यां ततः पूर्णशशाङ्कसदृशाननाः । पद्मायतेक्षणा नानालक्षणध्वजशोभिनः ॥१३॥

सिंहव्याघ्रवराहेभशरभादियुतान् रथान् । विमानानि तथाऽऽरूढा गृहीतपरमायुधाः ॥१४॥

कुमाराः प्रस्थिता लङ्कां शङ्कामुत्सृज्य सादराः । रावणक्षोभणाकूता भवनामरभासुराः ॥१५॥

अर्थ: अथानन्तर पूर्णिमाका दिन आया तब पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखके धारक, कमलके समान दीर्घ नेत्रोंसे युक्त एवं नाना लक्षणोंकी ध्वजाओंसे सुशोभित विद्याधर कुमार सिंह, व्याघ्र, वाराह, हाथी और शरभ आदिसे युक्त रथों तथा विमानों पर आरूढ़ हो निशङ्क होते हुए आदरके साथ लङ्काकी ओर चले। उस समय उत्तमोत्तम शस्त्रोंको धारण करने वाले तथा रावणको कुपित करनेकी भावनासे युक्त वे वानर कुमार भवनवासी देवोंके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥१३-१५॥


मकरध्वजसाटोपचन्द्राभरतिवर्द्धनाः । वातायनो गुरुभरः सूर्यज्योतिर्महारथः ॥१६॥

प्रीतिङ्करो दृढरथः समुन्नतबलस्तथा । नन्दनः सर्वदो दुष्टः सिंहः सर्वप्रियो नलः ॥१७॥

नीलः सागरनिस्वानः ससुतः पूर्णचन्द्रमाः । स्कन्दश्चन्द्रमरीचिश्च जाम्बवः सङ्कटस्तथा ॥१८॥

समाधिबहुलः सिंहकटिरिन्द्राशनिर्बलः । तुरङ्गशतमेतेषां प्रत्येकं योजितं रथे ॥१९॥

अर्थ: उन कुमारोंसे कुछके नाम इस प्रकार हैं । मकरध्वज, साटोप, चन्द्राभ, वातायन, गुरुभर, सूर्यज्योति, महारथ, प्रीतिङ्कर, दृढ़रथ, समुन्नतबल, नन्दन, सर्वद, दुष्ट, सिंह, सर्वप्रिय, नल, नील, समुद्रघोष, पुत्र सहित पूर्णचन्द्र, स्कन्द, चन्द्ररश्मि, जाम्बव, सङ्कट, समाधिबहुल, सिंहजघन, इन्द्रवज्र और बल । इनमेंसे प्रत्येकके रथ में सौ-सौ घोड़े जुते हुए थे ॥१६-१९॥


शेषाः सिंहवराहेभव्याघ्रयानैर्मनोजवैः । पदातिपटलांतस्थाः प्रस्थिताः परमौजसः ॥२०॥

अर्थ: पदातियोंके मध्यमें स्थित, परम तेजस्वी शेषकुमार मनके समान वेगशाली सिंह वराह हाथी और व्याघ रूपी वाहनोंके द्वारा लङ्काकी ओर चले ॥२०॥


नानाचिह्नातपत्रास्ते नानातोरणलाञ्छनाः । चित्राभिर्वैजयन्तीभिर्लक्षिता गगनाङ्गणे ॥२१॥

सैन्यार्णवसमुद्भूतमहागम्भीरनिःस्वनाः । आस्तृणाना दिशो मानमुद्वहन्तः समुन्नताः ॥२२॥

प्राप्ता लङ्कापुरीबाह्योद्देशमेवमचिन्तयन् । आश्चर्यं किमिदं लङ्का निश्चिन्तेयमवस्थिता ॥२३॥

अर्थ: जिनके ऊपर नाना चिह्नोंको धारण करने वाले छत्र फिर रहे थे, जो नाना तोरणोंसे चिह्नित थे, आकाशाङ्गणमें जो रङ्ग-विरङ्गी ध्वजाओंसे सहित थे, जिनकी सेनारूपी सागरसे अत्यन्त गर्म्भीर शब्द उठ रहा था, जो मानको धारण कर रहे थे, तथा अतिशय उन्नत थे ऐसे वे सब कुमार दिशाओंको आच्छादित करते हुए लङ्कापुरीके बाह्य मैदानमें पहुँचकर इस प्रकार विचार करने लगे कि यह क्या आश्चर्य है ? जो यह लङ्का निश्चिन्त स्थित है ॥२१-२३॥


स्वस्थो जनपदोऽमुष्यां सुचेताः परिलक्ष्यते । अवृत्तपूर्वसङ्ग्रामा इव चास्यां भटाः स्थिताः ॥२४॥

अर्थ: इस लङ्काके निवासी स्वस्थ तथा शान्तचित्त दिखाई पड़ते हैं और यहाँके योद्धा भी ऐसे स्थित हैं मानो इनके यहाँ पहले युद्ध हुआ ही नहीं हो ॥२४॥


अहो लङ्केश्वरस्येदं धैर्यमत्यन्तमुन्नतम् । गम्भीरत्वं तथा सत्त्वं श्रीप्रतापसमुन्नतम् ॥२५॥

अर्थ: अहो लङ्कापतिका यह विशाल धैर्य, यह उन्नत गाम्भीर्य, और यह लक्ष्मी तथा प्रतापसे उन्नत सत्त्व-बल धन्य हैं ॥२५॥


बन्दिग्रहणमानीतः कुम्भकर्णो महाबलः । इन्द्रजिन्मेघनादश्च दुर्धरैरपि दुर्धराः ॥२६॥

अक्षाद्या बहवः शूरा नीता निधनमाहवे । न तथापि विभोः शङ्का काचिदस्योपजायते ॥२७॥

अर्थ: यद्यपि महाबलवान् कुम्भकर्ण, इन्द्रजित् तथा मेघनाद बन्दी-गृहमें पड़े हुए हैं, तथा प्रचण्ड बलशाली भी जिन्हें पकड़ नहीं सकते थे ऐसे अक्ष आदि अनेक शूर वीर युद्धमें मारे गये हैं तथापि इस धनी को कोई शङ्का उत्पन्न नहीं हो रही है ॥२६-२७॥


इति सञ्चिन्त्य कृत्वा च समालापं परस्परम् । विस्मयं परमं प्राप्ताः कुमाराः शङ्किता इव ॥२८॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर तथा परस्पर वार्तालाप कर परम आश्चर्यको प्राप्त हुए कुमार कुछ शङ्कितसे हो गये ॥२८॥


अथ वैभीषणिर्वाक्यं ख्यातो नाम्ना सुभूषणः । जगाद धैर्यसम्पन्नं निर्भ्रान्तं मारुतायनम् ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर सुभूषण नामसे प्रसिद्ध विभीषणके पुत्रने, धैर्यशाली, भ्रान्तिरहित वातायनसे इस प्रकार कहा कि ॥२९॥


भयासङ्गं समुत्सृज्य क्षिप्रं लङ्कां प्रविश्य ताम् । लोलयामि त्विमान् सर्वान् परित्यज्य कुलाङ्गनाः ॥३०॥

अर्थ: भय छोड़ शीघ्र ही लङ्कामें प्रवेश कर कुलाङ्गनाओंको छोड़ इस समस्त लोगोंको अभी हिलाता हूँ ॥३०॥


वचनं तस्य सम्पूज्य ते विद्याधरदारकाः । महाशौर्यसमुन्नद्धा दुर्दान्ताः कलहप्रियाः ॥३१॥

आशीविषसमाश्चण्डा उद्धताश्चपलाश्चलाः । भोगदुर्ललिता नानासङ्ग्रामोद्भूतकीर्त्तयः ॥३२॥

ग्रसमाना इवाशेषां नगरीं तां समास्तृणन् । महासैन्यसमायुक्ताः शस्त्ररश्मिविराजिताः ॥३३॥

अर्थ: उसके वचन सुन विद्याधरोंके कुमार समस्त नगरीको ग्रसते हुए के समान सर्वत्र छा गये । वे कुमार महाशूरवीरतासे अत्यन्त उद्दण्ड थे, कठिनतासे वशमें करने योग्य थे, कलह-प्रिय थे, आशीविष-सर्पके समान थे, अत्यन्त क्रोधी थे, गर्वीले थे, बिजलीके समान चञ्चल थे, भोगोंसे लालित हुए थे, अनेक संग्रामोंमें कीर्तिको उपार्जित करनेवाले थे, बहुत भारी सेनासे युक्त थे तथा शस्त्रोंकी किरणोंसे सुशोभित थे ॥३१-३३॥


सिंहेभादिरवोन्मिश्रभेरीदुन्दुभिनिस्वनम् ॥ श्रुत्वातिभीषणं लङ्का परमं कम्पमागता ॥३४॥

अर्थ: सिंह तथा हाथी आदिके शब्दोंसे मिश्रित भेरी एवं दुन्दुभी आदिके अत्यन्त भयङ्कर शब्दको सुन लङ्का परम कम्पनको प्राप्त हुई - सारी लङ्का काँप उठी ॥३४॥


सहसा चकितत्रस्ता विलोलनयनाः स्त्रियः । स्वनद्गलदलङ्काराः प्रियाणामङ्कमाश्रिताः ॥३५॥

अर्थ: जो आश्चर्यचकित हो भयभीत हो गई थीं, जिनके नेत्र अत्यन्त चञ्चल थे और जिनके आभूषण गिर-गिरकर शब्द कर रहे थे ऐसी स्त्रियाँ सहसा पतियोंकी गोदमें जा छिपीं ॥३५॥


विद्याभृन्मिथुनान्युच्चैर्विह्वलानि नभोऽङ्गणे । बभ्रमुश्चक्रवद्भ्रान्त्या चलद्वासांसि सस्वनम् ॥३६॥

अर्थ: जो अत्यन्त विह्वल थे तथा जिनके वस्त्र वायुसे इधर-उधर उड़ रहे थे ऐसे विद्याधरोंके युगल आकाशमें बहुत ऊँचाई पर शब्द करते हुए चक्राकार भ्रमण करने लगे ॥३६॥


भवने राक्षसेन्द्रस्य महारत्नांशुभासुरे । स्वनन्मङ्गलगम्भीरवीरतूर्यमृदङ्गके ॥३७॥

अव्युच्छिन्नसुसङ्गीतनृत्यनिष्णातयोषिति । जिनपूजासमुद्युक्तकन्याजनसमाकुले ॥३८॥

विलासैः परमस्त्रीणामप्युन्मादितमन्मथे । क्रूरतूर्यस्वनं श्रुत्वा क्षुब्धेऽन्तःपुरसागरे ॥३९॥

अर्थ: रावणका जो भवन महारत्नोंकी किरणोंसे देदीप्यमान था, जिसमें मङ्गलमय तुरही तथा मृदङ्गोंका गम्भीर शब्द हो रहा था, जिसमें रहनेवाली स्त्रियाँ अविरल उत्तम संगीत तथा नृत्यमें निपुण थीं, जो जिनपूजामें तत्पर कन्याजनोंसे व्याप्त थी और जिसमें उत्तम स्त्रियोंके विलासोंसे भी काम उन्मादको प्राप्त नहीं हो रहा था ऐसे रावणके भवनमें जो अन्तःपुररूपी सागर विद्यमान था वह तुरहीके कठोर शब्दको सुन क्षोभको प्राप्त हो गया ॥३७-३९॥


उदयौ निःस्वनो रम्यो भूषणस्वनसङ्गतः । समन्तादाकुलो मन्द्रो वल्लकीनामिवायतः ॥४०॥

अर्थ: सब ओरसे आकुलतासे भरा भूषणोंके शब्दसे मिश्रित ऐसा मनोहर एवं गम्भीर शब्द उठा जो मानो वीणाका ही विशाल शब्द था ॥४०॥


विह्वलाऽचिन्तयत् काचित् कष्टं किमिदमागतम् । मर्तव्यमद्य किं क्रूरे कृते कर्मणि शत्रुभिः ॥४१॥

अर्थ: कोई स्त्री विह्वल होती हुई विचार करने लगी कि हाय हाय यह क्या कष्ट आ पड़ा । शत्रुओंके द्वारा किये हुए इस क्रूरतापूर्ण कार्यमें क्या आज मरना पड़ेगा ? ॥४१॥


अन्या दध्यौ भवेत्पापैः किं नु बन्दिग्रहो मम । किंवा विवसनीभूता क्षिप्ये लवणसागरे ॥४२॥

अर्थ: कोई स्त्री सोचने लगी कि न जाने मुझे पापी लोग बन्दीगृहमें डालते हैं या वस्त्ररहित कर लवणसमुद्रमें फेंकते हैं ॥४२॥


एवमाकुलतां प्राप्ते समस्ते नगरीजने । विह्वलेषु प्रवृत्तेषु निःस्वनेषु समन्ततः ॥४३॥

क्रुद्धो मयमहादैत्यः पिनद्धकवचो द्रुतम् । सन्नद्धैः सचिवैः सार्द्धं समुन्नतपराक्रमः ॥४४॥

युद्धार्थमुद्यतो दीप्तः प्राप लङ्केशमन्दिरम् । श्रीमान् हरिणकेशीव सुनाशीरनिकेतनम् ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार जब नगरीके समस्त लोग आकुलताको प्राप्त थे तथा सब ओरसे घबड़ाहटके शब्द सुनाई पड़ रहे थे तब क्रोधसे भरा एवं उन्नत पराक्रमका धारी, मन्दोदरीका पिता मयनामक महादैत्य कवच पहिनकर, कवच धारण करनेवाले मन्त्रियोंके साथ युद्धके लिए उद्यत हो देदीप्यमान हुआ रावणके भवनमें उस प्रकार पहुँचा जिस प्रकार कि श्रीसम्पन्न हरिणकेशी इन्द्रके भवन आता है, ॥४३-४५॥


ऊचे मन्दोदरी तं च कृत्वा निर्भर्त्सनं परम् । कर्त्तव्यं तात नैतत्ते दोषार्णवनिमज्जनम् ॥४६॥

अर्थ: तब मन्दोदरीने पिताको बड़ी डाँट दिखाकर कहा कि हे तात ! इस तरह आपको दोषरूपी सागरमें निमज्जन नहीं करना चाहिए ॥४६॥


समयो घोष्यमाणोऽसौ जैनः किं न त्वया श्रुतः । प्रसादं कुरु वांछा चेदस्ति स्वश्रेयसं प्रति ॥४७॥

अर्थ: जिसकी घोषणा की गई थी ऐसा जैनाचार क्या तुमने सुना नहीं था । इसलिए यदि अपनी भलाई चाहते हो तो प्रसाद करो-शान्त होओ ॥४७॥


दुहितुः स्वहितं वाक्यं श्रुत्वा दैत्यपतिर्मयः । प्रशान्तः सञ्जहारास्त्रं रश्मिचक्रं यथा रविः ॥४८॥

अर्थ: पुत्रीके स्वहितकारी वचन सुनकर दैत्यपति मयने शान्त हो अपना शस्त्र उस तरह संकोच लिया जिस तरह कि सूर्य अपनी किरणोंके समूहको संकोच लेता है ॥४८॥


दुर्भेदकवचच्छन्नो मणिकुण्डलमण्डितः । हारराजितवक्षस्को विवेश स्वं जिनालयम् ॥४९॥

अर्थ: तदनन्तर जो दुर्भेद्य कवचसे आच्छादित था, मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत था और जिसका वक्षःस्थल हारसे सुशोभित था ऐसे मयने अपने जिनालयमें प्रवेश किया ॥४९॥


उद्वेलसागराकाराः कुमारास्तावदागताः । प्राकारं वेगवातेन कुर्वन्तः शिखरोज्झितम् ॥५०॥

अर्थ: इतनेमें ही उद्वेलसागरके समान आकारको धारण करनेवाले कुमार, वेग सम्बन्धी वायुसे प्राकारको शिखर रहित करते हुए आ पहुँचे ॥५०॥


भग्नवज्रकपाटं च कृत्वा गोपुरमायतम् । प्रविष्टा नगरीं धीरा महोपद्रवलालसाः ॥५१॥

अर्थ: महान् उपद्रव करनेमें जिनकी लालसा थी ऐसे वे धीर वीर कुमार, लम्बे-चौड़े गोपुरके वज्रमय किवाड़ तोड़कर नगरीके भीतर घुस गये ॥५१॥


इमे प्राप्ता द्रुतं नश्य क्व यानि प्रविशालयम् । हा मातः किमिदं प्राप्तं तात तात निरीक्ष्यताम् ॥५२॥

त्रायस्व भद्र हा भ्रातः किं किं ही ही कथं कथम् । आर्यपुत्र निवर्त्तस्व तिष्ठ हा हा महद्भयम् ॥५३॥

एवं प्रवृत्तनिस्वानैराकुलैर्नगरीजनैः । सन्त्रस्तैर्दशवक्त्रस्य भवनं परिपूर्यता ॥५४॥

अर्थ: उनके पहुँचते ही नगरीमें इस प्रकारका हल्ला मच गया कि ‘ये आ गए’, ‘जल्दी भागो’ ‘कहाँ जाऊँ ?’ ‘घरमें घुस जाओ’ ‘हाय मातः यह क्या आ पड़ा है ?’ ‘हे तात ! तात ! देखो तो सही’ ‘अरे भले आदमी बचाओ’ हे भाई ! ‘क्या क्या’ ‘ही ही’ क्यों क्यों’ हे आर्य पुत्र ! लौटो, ठहरो, हाय हाय बड़ा भय है’ इस प्रकार भयसे व्याकुल हो चिल्लाते हुए नगरवासियोंसे रावणका भवन भर गया ॥५२-५४॥


काचिद्विगलितां काञ्चीमाक्रम्यात्यन्तमाकुला । स्वेनैव चरणेनाग्रे जानुखण्डं गता भुवि ॥५५॥

अर्थ: कोई एक स्त्री इतनी अधिक घबड़ा गई थी कि वह अपनी गिरी हुई मेखलाको अपने ही पैरसे लाँघती हुई आगे बढ़ गई और अन्तमें पृथ्वीपर ऐसी गिरी कि उसके घुटने टूट गये ॥५५॥


हस्तालम्बितविस्रंस्तवसनान्यतिविह्वला । गृहीतपृथुका तन्वी चकम्पे गन्तुमुद्यता ॥५६॥

अर्थ: खिसकते हुए वस्त्रको जिसने हाथसे पकड़ रक्खा था, जो अत्यन्त घबड़ाई हुई थी, जिसने बच्चेको उठा रक्खा था और जो कहीं जानेके लिए तैयार थी ऐसी कोई दुबली-पतली स्त्री भयसे काँप रही थी ॥५६॥


सम्भ्रमत्रुटितस्थूलमुक्तानिकरवर्षिणी । मेघरेखेव काचित्तु प्रस्थिता वेगधारिणी ॥५७॥

अर्थ: हड़बड़ाहटके कारण हारके टूट जानेसे जो मोतियोंके समूहकी वर्षा कर रही थी ऐसी कोई एक स्त्री मेघकी रेखाके समान बड़े वेगसे कहीं भागी जा रही थी ॥५७॥


सन्त्रस्तहरिणीनेत्रा स्रस्तकेशकलापिका । वक्षः प्राप्य प्रियस्यान्या बभूवोत्कम्पितोज्झिता ॥५८॥

अर्थ: भयभीत हरिणीके समान जिसके नेत्र थे, तथा जिसके बालोंका समूह बिखर गया था ऐसी कोई एक स्त्री पतिके वक्षःस्थलसे जब लिपट गई तभी उसकी कँपकँपी छूटी ॥५८॥


एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा लोकं भयपरायणम् । शासनान्तर्गता देवाः शान्तिप्रासादसंश्रिताः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर इसी बीचमें लोगोंको भयभीत देख शान्ति जिनालयके आश्रयमें रहने वाले शासन देव, अपने पक्षकी रक्षा करनेमें उद्यत तथा दयालु चित्त हो भाव पूर्ण मनसे शीघ्र ही द्वार-पालपना करनेके लिए प्रवृत्त हुए अर्थात् उन्होंने किसीको अन्दर नहीं आने दिया ॥५९॥


स्वपक्षपालनोद्युक्ता करुणासक्तमानसाः । प्रातिहार्यं द्रुतं कर्तुं प्रवृत्ता भावतत्पराः ॥६०॥

उत्पत्य भैरवाकाराः शान्तिचैत्यालयादमी । गृहीतविविधा कल्पा दंष्ट्रालीसङ्कटाननाः ॥६१॥

मध्याह्नार्कदुरीक्षाक्षाः क्षुब्धाः क्रोधोद्वमद्विषाः । दष्टाधरा महाकाया नानावर्णमहारवाः ॥६२॥

देहदर्शनमात्रेण विकारैर्विषमैर्युताः । वानराङ्कबलं भङ्गं निन्युरत्यन्तविह्वलम् ॥६३॥

अर्थ: जिनके आकार अत्यन्त भयङ्कर थे, जिन्होंने नाना प्रकारके वेष धारण कर रक्खे थे, जिनके मुख दाँढ़ोंकी पङ्क्तिसे व्याप्त थे, जिनके नेत्र मध्याह्नके सूर्यके समान दुर्निरीक्ष्य थे, जो क्षुभित थे, क्रोधसे विष उगल रहे थे, ओंठ चाप रहे थे, डील-डौलके बड़े थे, नाना वर्णके महाशब्द कर रहे थे - और जो शरीरके देखने मात्रसे विषम विकारोंमे युक्त थे ऐसे वे शासन देव शान्ति जिनालयसे निकलकर वानरोंकी सेना पर ऐसे झपटे कि उसे अत्यन्त विह्वल कर क्षण भरमें खदेड़ दिया ॥६०-६३॥


क्षणं सिंहाः क्षणं वह्निः क्षणं मेघाः क्षणं द्विपाः । क्षणं सर्पाः क्षणं वायुस्ते भवन्ति क्षणं नगाः ॥६४॥

अर्थ: वे शासन देव क्षण भरमें सिंह, क्षण भरमें अग्नि, क्षण भर में मेघ, क्षण भरमें हाथी, क्षण भरमें सर्प, क्षण भरमें वायु और क्षण भरमें पर्वत बन जाते थे ॥६४॥


अभिभूतानिमान् ज्ञात्वा देवैः शान्तिगृहाश्रयैः । जिनालयकृतावासास्तेषामपि हिते रताः ॥६५॥

देवाः समागता योद्धुं विकृताकारवर्त्तिनः । निजस्थानेषु तेषां हि ते वसन्त्यनुपालकाः ॥६६॥

अर्थ: शान्ति जिनालयके आश्रयमें रहने वाले देवोंके द्वारा इन वानरकुमारोंको पराभूत देख; वानरोंके हितमें तत्पर रहने वाले जो देव शिबिरके जिनालयोंमें रहते थे वे भी विक्रियासे आकार बदल कर युद्ध करनेके लिए आ पहुँचे सो ठीक ही है क्योंकि जो अपने स्थानों में निवास करते हैं देव लोग उनके रक्षक होते हैं ॥६५-६६॥


प्रवृत्ते तुमुले क्रूरे गीर्वाणानां परस्परम् । आसीद्भावस्वभावेऽपि सन्देहो विकृतिं प्रति ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर देवोंका परस्पर भयङ्कर युद्ध प्रवृत्त होने पर उनकी विकृति देख परमार्थ स्वभावमें भी सन्देह होने लगा था ॥६७॥


सीदतः स्वान् सुरान् दृष्ट्वा बलिनश्च परामरान् । कपिकेतूंश्च संदष्टान्पुनर्लङ्कामुखं स्थितान् ॥६८॥

महान्तं क्रोधमापन्नः प्रभावपरमः सुधीः । यक्षेशः पूर्णभद्राख्यो मणिभद्रमिदं जगौ ॥६९॥

अर्थ: अथानन्तर अपने देवोंको पराजित होते, दूसरे देवोंको बलवान् होते और अहङ्कारी वानरोंको लङ्काके सन्मुख प्रस्थान करते देख महाक्रोधको प्राप्त हुआ परमप्रभावी बुद्धिमान पूर्णभद्र नामका यक्षेन्द्र मणिभद्र नामक यक्षसे इस प्रकार बोला ॥६८-६९॥


एतान्पश्य कृपामुक्तान् शाखाकेसरिकेतनान् । जानन्तोऽपि समस्तानि शास्त्राणि विकृतिं गता ॥७०॥

अर्थ: कि इन दया हीन वानरोंको तो देखो जो सब शास्त्रोंको जानते हुए भी विकारको प्राप्त हुए हैं ॥७०॥


स्थित्याचारविनिर्मुक्तान् त्यक्ताहारं दशाननम् । योगसंयोजितात्मानं देहेऽपि रहितस्पृहम् ॥७१॥

प्रशान्तहृदयं हन्तुमुद्यतान्पापचेष्टितान् । रन्ध्रप्रहारिणः क्षुद्रान् त्यक्तवीरविचेष्टितान् ॥७२॥

अर्थ: ये लोक मर्यादा और आचारसे रहित हैं। देखो, रावण तो आहार छोड़ ध्यानमें आत्माको लगा शरीरमें भी निस्पृह हो रहा है तथा अत्यन्त शान्तचित्त है फिर भी ये उसे मारनेके लिए उद्यत हैं, पाप पूर्ण चेष्टा युक्त हैं, छिद्र देख प्रहार करने वाले हैं, क्षुद्र हैं और वीरोंकी चेष्टासे रहित हैं ॥७१-७२॥


मणिभद्रस्ततोऽवोचत्पूर्णभद्रसमोऽपरः । सम्यक्त्वभावितं वीरं जिनेन्द्रचरणाश्रितम् ॥७३॥

चारुलक्षणसम्पूर्णं शान्तात्मानं महाद्युतिम् । रावणं न सुरेन्द्रोऽपि नेतुं शक्तः पराभवम् ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर जो दूसरे पूर्णभद्रके समान था ऐसा मणिभद्र बोला कि जो सम्यक्त्वकी भावनासे सहित है, वीर है, जिनेन्द्र भगवान्‌के चरणोंका सेवक है, उत्तम लक्षणोंसे पूर्ण है, शान्त चित्त है और महा दीप्तिका धारक है ऐसे रावणको पराभव प्राप्त करानेके लिए इन्द्र भी समर्थ नहीं है फिर इनकी तो बात ही क्या है ? ॥७३-७४॥


ततस्तथाऽस्त्विति प्रोक्ते पूर्णभद्रेण तेजसा । गुह्यकाधिपयुग्मं तज्जातं विघ्नस्य नाशकम् ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर तेजस्वी पूर्णभद्रके ‘तथास्तु’ इस प्रकार कहने पर दोनों यक्षेन्द्र विघ्नका नाश करने वाले हुए ॥७५॥


यक्षेश्वरौ परिक्रुद्धौ दृष्ट्वा योद्धुं समुद्यतौ । लज्जान्विताश्च भीताश्च गताः स्वं स्वं परामराः ॥७६॥

अर्थ: तत्पश्चात् क्रोधसे भरे दोनों यक्षेन्द्रोंको युद्धके लिए उद्यत देख दूसरे देव लज्जासे युक्त तथा भयभीत होते हुए अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥७६॥


यक्षेश्वरौ महावायुप्रेरितोपलवर्षिणौ । युगान्तमेघसङ्काशौ जातौ घोरोरुगर्जितौ ॥७७॥

अर्थ: दोनों यक्षेन्द्र तीव्र आँधीसे प्रेरित पाषाणोंकी वर्षा करने लगे तथा अत्यन्त भयंकर विशाल गर्जना करते हुए प्रलय कालके मेघके समान हो गये ॥७७॥


तयोर्जङ्घासमीरेण सा नभश्चरवाहिनी । प्रेरितोदारवेगेन शुष्कपर्णचयोपमा ॥७८॥

अर्थ: उन यक्षेन्द्रोंकी अत्यन्त वेग- शाली जंघाओंकी वायुसे प्रेरित हुई विद्याधरोंकी सेना सूखे पत्तोंके ढेरके समान हो गई अर्थात् भयसे इधर-उधर भागने लगी ॥७८॥


तेषां पलायमानानां भूत्वानुपदिकाविमौ । उपालम्भकृताकूतावेकस्थौ पद्ममागतौ ॥७९॥

अर्थ: उन भागते हुए वानरोंका पीछा करते हुए दोनों यक्षेन्द्रः उलाहना देनेके अभिप्रायसे भी रामके पास आये ॥७९॥


अभिनन्द्य च तं सम्यक् पूर्णभद्रः सुधीर्जगौ । राज्ञो दशरथस्य त्वं श्रीमतस्तस्य नन्दनः ॥८०॥

अर्थ: उनमेंसे बुद्धिमान् पूर्णभद्र रामकी अच्छी तरह प्रशंसाकर बोला कि तुम श्रीमान् राजा दशरथके पुत्र हो ॥८०॥


अश्लाघ्येषु निवृत्तात्मा श्लाघ्यकृत्येषु चोद्यतः । तीर्णः शास्त्रसमुद्रस्य पारं शुद्धगुणोन्नतः ॥८१॥

अर्थ: अप्रशस्त कार्योंसे तुम सदा दूर रहते और शुभ कार्योंमें सदा उद्यत रहते हो। शास्त्रों रूपी समुद्रके पारको प्राप्त हो तथा शुद्ध गुणोंसे उन्नत हो ॥८१॥


ईदृशस्य सतो भद्र किमेतत्सदृशं विभोः । तव सेनाश्रितैः पौरजनो ध्वंसमुपाहृतः ॥८२॥

अर्थ: हे भद्र ! इस तरह सामर्थ्यवान् होने पर भी क्या यह कार्य उचित है कि आपकी सेनाके लोगोंने नगरवासी जनोंको नष्ट-भ्रष्ट किया है ॥८२॥


यो यस्य हरते द्रव्यं प्रयत्नेन समार्जितम् । स तस्य हरते प्राणान् बाह्यमेतद्धि जीवितम् ॥८३॥

अर्थ: जो जिसके प्रयत्न पूर्वक कमाये हुए धनका हरण करता है वह उसके प्राणोंको हरता है क्योंकि धन बाह्य प्राण कहा गया ॥८३॥


अनर्घवज्रवैडूर्यविद्रुमादिभिराचिता । लङ्कापुरी परिध्वस्ता त्वदीयैराकुलाङ्गना ॥८४॥

अर्थ: आपके लोगोंने अमूल्य हीरा वैडूर्य मणि तथा मूंगा आदिसे व्याप्त लंका पुरीको विध्वस्त कर दिया है तथा उसकी स्त्रियोंको व्याकुल किया है ॥८४॥


प्रौढेन्दीवरसंकाशस्ततो गरुडकेतनः । जगाद तेजसा युक्तं वचनं विधिकोविदः ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर सब प्रकारकी विधियोंके जाननेमें निपुण, प्रौढ़ नीलकमलके समान कान्तिको धारण करने वाले लक्ष्मणने ओज पूर्ण वचन कहे ॥८५॥


एतस्य रघुचन्द्रस्य प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । महागुणधरी पत्नी शीलालङ्कारधारिणी ॥८६॥

दुरात्मना छलं प्राप्य हृता सा येन रक्षसा । अनुकम्पा त्वया तस्य रावणस्य कथं कृता ॥८७॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि जिस दुष्ट राक्षसने इन रामचन्द्रकी प्राणों की अधिक, महागुणोंकी धारक एवं शीलव्रत रूपी अलंकारको धारण करने वाली प्रियाको छलसे हरा है उस रावणके ऊपर तुम दया क्यों कर रहे हो ? ॥८६-८७॥


किं तेऽपकृतमस्माभिः किं वा तेन प्रियं कृतम् । कथ्यतां गुह्यकाधीश किञ्चिदप्यणुमात्रकम् ॥८८॥

अर्थ: हम लोगोंने तुम्हारा क्या अपकार किया है और उसने क्या उपकार किया है सो हे यक्षराज ! कुछ थोड़ा भी तो कहो ॥८८॥


कुटिलां भृकुटीं कृत्वा भीमां सन्ध्यारुणेऽलिके । क्रुद्धोऽसि येन यक्षेन्द्र विना कार्यं समागतः ॥८९॥

अर्थ: जिससे संध्याके समान लाल लाल ललाट पर कुटिल तथा भयंकर भृकुटि कर कुपित हुए हो तथा विना कार्य ही यहाँ पधारे हो ॥८९॥


अर्धं काञ्चनपात्रेण तस्य दत्त्वातिसाध्वसः । कपिध्वजाधिपोऽवोचत् कोपो यक्षेन्द्र ! मुच्यताम् ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त भयभीत सुग्रीवने सुवर्णमय पात्रसे उसे अर्घ देकर कहा कि हे यक्षराज ! क्रोध छोड़िए ॥९०॥


पश्य त्वं समभावेन मद्बलस्य निजां स्थितिम् । लङ्काबलार्णवस्यापि साक्षादीतित्वमीयुषः ॥९१॥

अर्थ: आप समभावसे हमारी सेना तथा साक्षात् ईतिपनाको प्राप्त हुए लंकाके सैन्य सागरकी भी स्थिति देखिए । देखिए दोनोंमें क्या अन्तर है ॥९१॥


तथाप्येव प्रयत्नोऽस्य वर्त्तते रक्षसां विभोः । केनायं पूर्वकः साध्यः किं पुनर्बहुरूपया ॥९२॥

अर्थ: इतना सब होने पर भी राक्षसोंके अधिपति रावणका यह प्रयत्न जारी है । यह रावण पहले भी किसके द्वारा साध्य था ? और फिर बहुरूपिणी विद्याके सिद्ध होने पर तो कहना ही क्या है ? ॥९२॥


संक्रुद्धस्य मृधे तस्य स्खलन्त्यभिमुखा नृपाः । जैनोक्तिलब्धवर्णस्य प्रवादे वादिनो यथा ॥९३॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनागमके निपुण विद्वान्के सामने प्रवादी लोग लड़खड़ा जाते हैं उसी प्रकार युद्धमें कुपित हुए रावणके सामने अन्य राजा लड़खड़ा जाते हैं ॥९३॥


तस्मात्क्षमार्पितात्मानं क्षोभयिष्यामि रावणम् । यत्साधयति नो विद्यां यथा सिद्धिं कुदर्शनः ॥९४॥

अर्थ: इसलिए इस समय मैं क्षमाभावसे बैठे हुए रावणको क्षोभयुक्त करूंगा क्योंकि जिस प्रकार मिथ्यादृष्टि मनुष्य सिद्धिको प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार क्षोभयुक्त साधारण पुरुष भी विद्याको सिद्ध नहीं कर पाता ॥९४॥


तत्तुल्यविभवा भूत्वा येन नाथेन रक्षसाम् । समं युद्धं करिष्यामो विषमं जायतेऽन्यथा ॥९५॥

अर्थ: रावणको क्षोभित करनेका हमारा उद्देश्य यह है कि हम तुल्य विभवके धारक हो उसके साथ युद्ध करेंगे अन्यथा हमारा और उसका युद्ध विषम युद्ध होगा ॥९५॥


पूर्णभद्रस्ततोऽवोचदस्त्वेवं किं तु पीडनम् । कृत्यं नाण्वपि लङ्कायां साधो जीर्णतृणेष्वपि ॥९६॥

अर्थ: तदनन्तर पूर्णभद्रने कहा कि ऐसा हो सकता है किन्तु हे सत्पुरुष ! लङ्कामें जीर्णतृणको भी अणुमात्र भी पीड़ा नहीं करना चाहिए ॥९६॥


क्षेमेण रावणाङ्गस्य वेदनाद्यविधानतः । क्षोभं कुरुत मन्ये नु दुःखं क्षुभ्यति रावणः ॥९७॥

अर्थ: वेदना आदिक न पहुँचा कर रावणके शरीरकी कुशलता रखते हुए उसे क्षोभ उत्पन्न करो । परन्तु मैं समझता हूँ कि रावण बड़ी कठिनाईसे क्षोभको प्राप्त होगा ॥९७॥


एवमुक्त्वा प्रसन्नाक्षौ तौ भव्यजनवत्सलौ । भक्तौ श्रमणसङ्घस्य वैयावृत्यसमुद्यतौ ॥९८॥

शशाङ्कवदनौ राजन् यक्षाणां परमेश्वरौ । अभिनन्दितपद्माद्यावन्तर्द्धिं सानुगौ गतौ ॥९९॥

अर्थ: इस प्रकार कह कर जिनके नेत्र प्रसन्न थे, जो भव्य जनोंपर स्नेह करने वाले थे, भक्त थे, मुनि संघकी वैयावृत्य करनेमें सदा तत्पर रहते थे, और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल मुखके धारक थे ऐसे यक्षोंके दोनों अधिपति रामकी प्रशंसा करते हुए सेवकोंके साथ अन्तर्हित हो गये ॥९८-९९॥


सम्प्राप्योपालम्भं लक्ष्मणवचनात् सुलज्जितौ तौ हि ।
सञ्जातौ समचित्तौ निर्व्यापारौ स्थितौ येन ॥१००॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, जो यक्षेन्द्र उलाहना देने आये थे वे लक्ष्मणके कहनेसे अत्यन्त लज्जित होते हुए समचित्त होकर चुपचाप बैठ रहे ॥१००॥


तावद्भवति जनानामधिका प्रीतिः समाश्रयासन्ना ।
यावन्निर्दोषत्वं रविमिच्छति कः सहोत्पातम् ॥१०१॥

अर्थ: जब तक निर्दोषता है तभी तक निकटवर्ती पुरुषोंमें अधिक प्रीति रहती है सो ठीक ही है क्योंकि उत्पात सहित सूर्यकी कौन इच्छा करता है ? अर्थात् कोई नहीं । भावार्थ - जिस प्रकार लोग उत्पात रहित सूर्यको चाहते हैं उसी प्रकार दोष रहित निकटवर्ती मनुष्यको चाहते हैं ॥१०१॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सम्यग्दृष्टिदेवप्रातिहार्यकीर्तनं नाम सप्ततितमं पर्व ॥७०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें सम्यग्दृष्टि देवोंके प्रातिहार्य-पनेका वर्णन करने वाला सत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७०॥


७१. एकसप्ततितमं पर्व (बहुरूपविद्यासंनिधानाभिधानं)

शान्तं यक्षाधिपं ज्ञात्वा सुतारात्मजसुन्दरः । दशाननपुरीं द्रष्टुमुद्यतः परमोर्जितः ॥१॥

उदाराम्बुदवृन्दाभं मुक्तामाल्यविभूषितम् । धवलैश्चामरैर्दीप्तं महाघण्टानिनादितम् ॥२॥

किष्किन्धकाण्डनामानमारूढो वरवारणम् । रराज मेघपृष्ठस्थपौर्णमासीशशाङ्कवत् ॥३॥

अर्थ: अथानन्तर यक्षराजको शान्त सुन अतिशय बलवान् अङ्गद, लंका देखनेके लिए उद्यत हुआ। महामेघ मण्डलके समान जिसकी आभा थी, जो मोतियोंकी मालाओंसे अलंकृत था, सफेद चामरोंसे देदीप्यमान था और महाघण्टाके शब्दसे शब्दायमान था, ऐसे किष्किन्धकाण्ड नामक हाथी पर सवार हुआ अङ्गद मेघपृष्ठ पर स्थित पौर्णमासीके चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥१-३॥


तथा स्कन्देन्द्रनीलाद्या महर्द्धिपरिराजिताः । तुरङ्गादिसमारूढाः कुमारा गन्तुमुद्यताः ॥४॥

अर्थ: इसके सिवाय जो बड़ी सम्पदासे सुशोभित थे ऐसे स्कन्द तथा नील आदि कुमार भी घोड़े आदि पर आरूढ़ हो जानेके लिए उद्यत हुए ॥४॥


पदातयो महासंख्याश्चन्दनाचितविग्रहाः । ताम्बूलरागिणो नानामुण्डमालामनोहराः ॥५॥

कटकोद्भासिबाह्वन्ताः स्कन्धन्यस्तासिखेटकाः । चलावतंसकाश्चित्रपरमांशुकधारिणः ॥६॥

हेमसूत्रपरिक्षिप्तमौलयश्चारुविभ्रमाः । अग्रतः प्रसृता गर्वकृतालापाः सुतेजसः ॥७॥

अर्थ: जिनके शरीर चन्दनसे अर्चित थे, जिनके ओंठ ताम्बूलके रङ्गसे लाल थे, जो नाना प्रकारके मस्तकोंके समूहसे मनोहर थे, जिनकी भुजाओंके अन्त प्रदेश अर्थात् मणिवन्ध कटकोंसे देदीप्यमान थे, जिन्होंने अपने कन्धों पर तलवारें रख छोड़ीं थीं, जिनके कर्णाभरण चञ्चल थे, जो चित्र-विचित्र उत्तम वस्त्र धारण किये हुए थे, जिनके मुकुट सुवर्ण-सूत्रोंसे वेष्टित थे, जो सुन्दर चेष्टाओंके धारक थे, जो दर्प पूर्ण वार्तालाप करते जाते थे, तथा जो उत्तम तेजके धारक थे ऐसे पदाति उन कुमारोंके आगे-आगे जा रहे थे ॥५-७॥


वेणुवीणामृदङ्गादिवादित्रसदृशं वरम् । पुरो जनः प्रवीणोऽस्य चक्रे शृङ्गारनर्तनम् ॥८॥

अर्थ: चतुर मनुष्य इनके आगे बाँसुरी वीणा मृदङ्ग आदि बाजोंके अनुरूप शृङ्गार पूर्ण उत्तम नृत्य करते जाते थे ॥८॥


मन्द्रस्तूर्यस्वनश्चित्रो मनोहरणपण्डितः । शङ्खनिःस्वनसंयुक्तः काहलावत् समुद्ययौ ॥९॥

अर्थ: जो मनके हरण करनेमें निपुण था तथा शङ्खके शब्दोंसे संयुक्त था, ऐसा तुरहियोंका नाना प्रकारका गम्भीर शब्द काहला - रण तूर्यके शब्दके समान जोर-शोरसे उठ रहा था ॥९॥


विविशुश्च कुमारेशाः सविलासविभूषणाः । लङ्कां देवपुरीतुल्यामसुरा इव चञ्चलाः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर विलास और विभूषणोंसे युक्त उन चपल कुमारोंने स्वर्ग सदृश लंकामें असुर कुमारोंके समान प्रवेश किया ॥१०॥


महिम्ना पुरुणा युक्तंदशास्यनगरीं ततः । प्रविष्टमङ्गदं वीक्ष्य जगावित्यङ्गनाजनः ॥११॥

अर्थ: तत्पश्चात् महा महिमासे युक्त अङ्गदको लंका नगरीमें प्रविष्ट देख वहाँकी स्त्रियाँ परस्पर इस प्रकार कहने लगीं ॥११॥


यस्यैषा ललिता कर्णे विमला दन्तनिर्मिता । विराजते महाकान्तिकोमला तलपत्रिका ॥१२॥

ग्रहाणामिव सर्वेषां समवायो महाप्रभः । द्वितीयेश्रवणे चायं चपलो मणिकुण्डलः ॥१३॥

अपूर्वकौमुदीसर्गप्रवीणः सोऽयमुद्गतः । अङ्गदेन्दुर्दशास्यस्य नगर्यां पश्य निर्भयः ॥१४॥

अर्थ: हे सखि ! देख, जिसके एक कानमें दन्त निर्मित महाकान्तिसे कोमल निर्मल तालपत्रिका सुशोभित हो रही है और दूसरे कानमें समस्त ग्रहोंके समूहके समान महाप्रभासे युक्त यह चञ्चल मणिमय कुण्डल शोभा पा रहा है तथा जो अपूर्व चाँदनीकी सृष्टि करनेमें निपुण है ऐसा यह अङ्गद रूपी चन्द्रमा रावणकी नगरीमें निर्भय हो उदित हुआ है ॥१२-१४॥


किमनेनेदमारब्धं कथमेतद्भविष्यति । क्रीडेयं लडिताऽमुष्य निरघा किन्तु सेत्स्यति ॥१५॥

अर्थ: देख, इसने यह क्या प्रारम्भ कर रक्खा है ? यह कैसे होगा ? क्या इसकी यह सुन्दर क्रीड़ा निर्दोष सिद्ध होगी ? ॥१५॥


रावणालयबाह्यक्ष्मामणिकुट्टिमसङ्गताः । ग्राहवत्सरसोऽभिज्ञास्त्रासमीयुः पदातयः ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर जब अङ्गदके पदाति रावणके भवनकी मणिमय बाह्यभूमिमें पहुँचे तो उसे मगर-मच्छसे युक्त सरोवर समझकर भयको प्राप्त हुए ॥१६॥


रूपनिश्चलतां दृष्ट्वा निर्ज्ञातमणिकुट्टिमाः । पुनः प्रसरणं चक्रुर्भटाः विस्मयपूरिताः ॥१७॥

अर्थ: पश्चात् उस भूमिके रूपकी निश्चलता देख जब उन्हें निश्चय हो गया कि यह तो मणिमय फर्स है तब कहीं वे आश्चर्यसे चकित होते हुए आगे बढ़े ॥१७॥


पर्वतेन्द्रगुहाकारे महारत्नविनिर्मिते । गम्भीरे भवनद्वारे मणितोरणभासुरे ॥१८॥

अञ्जनाद्रिप्रतीकाशानिन्द्रनीलमयान् गजान् । स्निग्धगण्डस्थलान् स्थूलदन्तानत्यन्तभासुरान् ॥१९॥

सिंहबालांश्च तन्मूर्द्धन्यस्ताङ्घ्रीनूर्द्ध्वबालधीन् । दंष्ट्राकरालवदनान् भीषणाक्षान् सुकेसरान् ॥२०॥

दृष्ट्वा पादचरास्त्रस्ताः सत्यव्यालाभिशङ्किताः । पलायितुं समारब्धाः प्राप्ता विह्वलतां पराम् ॥२१॥

अर्थ: सुमेरुकी गुहाके आकार, बड़े-बड़े रत्नोंसे निर्मित तथा मणिमय तोरणोंसे देदीप्यमान- जब भवनके विशाल द्वार पर पहुँचे तो वहाँ, जो अंजनगिरिके समान थे, जिनके गण्डस्थल अत्यन्त चिकने थे, जिनके बड़े-बड़े दाँत थे, तथा जो अत्यन्त देदीप्यमान थे ऐसे इन्द्र-नीलमणि निर्मित हाथियोंको और उनके मस्तकपर जिन्होंने पैर जमा रक्खे थे, जिनकी पूँछ ऊँपरको उठी हुई थी, जिनके मुख दाँढ़ोंसे अत्यन्त भयंकर थे, जिनके नेत्रोंसे भय टपक रहा था तथा जिनकी मनोहर जटाएँ थीं ऐसे सिंहके बच्चोंको देख सचमुचके हाथी तथा सिंह समझ पैदल सैनिक भयभीत हो गये और परम विह्वलताको प्राप्त होते हुए भागने लगे ॥१८-२१॥


ततोऽङ्गदकुमारेण तदभिज्ञेन कृच्छ्रतः । प्रबोधिता प्रतीपं ते पदानि निदधुश्चिरात् ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर उनके यथार्थ रूपके जानने वाले अङ्गदने जब उन्हें समझाया तब कहीं बड़ी कठिनाईसे बहुत देर बाद उन्होंने उल्टे पैर रक्खे अर्थात् वापिस लौटे ॥२२॥


प्रविष्टाश्च चलन्नेत्रा भटाः शङ्कासमन्विताः । रावणस्य गृहं सैंहं पदं मृगगणा इव ॥२३॥

अर्थ: जिनके नेत्र चञ्चल हो रहे थे ऐसे योद्धाओंने रावणके भवनमें डरते-डरते इस प्रकार प्रवेश किया जिस प्रकार कि मृगोंके झुण्ड सिंहके स्थानमें प्रवेश करते हैं ॥२३॥


द्वाराण्युल्लङ्घ्य भूरीणि परतो गन्तुमक्षमाः । गहने गृहविन्यासे जात्यन्धा इव बभ्रमुः ॥२४॥

अर्थ: बहुतसे द्वारोंको उल्लंघकर जब वे आगे जानेके लिए असमर्थ हो गये तब सघन भवनोंकी रचनामें जन्मान्धके समान इधर-उधर भटकने लगे ॥२४॥


इन्द्रनीलात्मिका भित्तीः पश्यन्तो द्वारमोहिनः । आकाशाशङ्कयोपेतुं स्फटिकच्छद्मसद्मसु ॥२५॥

शिलाताडितमूर्धानः पतिता रभसात्पुनः । परमाकुलतां प्राप्ता वेदनाकूणितेक्षणाः ॥२६॥

अर्थ: वे इन्द्र-नीलमणि निर्मित दीवालोंको देखकर उन्हें द्वार समझने लगते थे और स्फटिक मणियोंसे खचित भवनोंको आकाश समझ उनके पास जाते थे जिसके फल स्वरूप दोनों ही स्थानोंमें शिलाओंसे मस्तक टकरा जानेके कारण वे वेगसे गिर जाते थे, अत्यधिक आकुलताको प्राप्त होते थे और वेदनाके कारण उनके नेत्र बन्द हो जाते थे ॥२५-२६॥


कथञ्चिज्जातसञ्चाराः कक्षान्तरमुपाश्रिताः । व्रजन्तो रभसा सक्ता नभःस्फटिकभित्तिषु ॥२७॥

अर्थ: किसी तरह उठकर आगे बढ़ते थे तो दूसरी कक्षमें पहुँच कर फिर आकाशस्फटिककी दीवालोंमें वेगसे टकरा जाते थे ॥२७॥


क्षुण्णाङ्घ्रिजानवस्तीव्रललाटस्फोटदुःखिताः । निववर्त्तिषवोऽप्येते न ययुर्निर्गमं पुनः ॥२८॥

अर्थ: जिनके पैर और घुटने टूट रहे थे तथा जो ललाटकी तीव्र चोटसे तिलमिला रहे थे, ऐसे वे पदाति यद्यपि लौटना चाहते थे पर उन्हें निकलनेका मार्ग ही नहीं मिलता था ॥२८॥


इन्द्रनीलमयीं भूमिं स्मृत्वा काञ्चित्समानया । बुद्धया प्रतारिताः सन्तः पेतुर्भूतलवेश्मसु ॥२९॥

अर्थ: जिस किसी तरह इन्द्रनील-मणिमय भूमिका स्मरणकर वे लौटे तो उसीके समान दूसरी भूमि देख उससे छकाये गये और पृथिवीके नीचे जो घर बने हुए थे उनमें जा गिरे ॥२९॥


तत उद्गतभूच्छेदशङ्कया शरणान्तरे । भूमिष्वथैन्द्रनीलीषु ज्ञात्वा ज्ञात्वा पदं ददुः ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर कहीं पृथिवी तो नहीं फट पड़ी है, इस शङ्कासे दूसरे घरमें गये और वहाँ इन्द्रनीलमणिमय जो भूमियाँ थीं उनमें जान-जानकर धीरे-धीरे डग देने लगे ॥३०॥


नारीं स्फटिकसोपानानामग्रगमनोद्यताम् । व्योम्नीति विविदुः पादन्यासान् तु पुनरन्यथा ॥३१॥

अर्थ: कोई एक स्त्री स्फटिककी सीढ़ियोंसे ऊपर जानेके लिए उद्यत थी उसे देखकर पहले तो उन्होंने समझा कि यह स्त्री अधर आकाशमें स्थित है परन्तु बादमें पैरोंके रखने उठानेकी क्रियासे निश्चय कर सके कि यह नीचे ही है ॥३१॥


तां पिपृच्छिषवो यान्तः शङ्किताः पुनरन्तरा । भित्तिष्वापतितास्तस्थुः स्फाटिकीषु सुविह्वलाः ॥३२॥

अर्थ: उस स्त्रीसे पूछनेकी इच्छासे भीतरकी दीवालोंमें टकराकर रह गये तथा विह्वल होने लगे ॥३२॥


पश्यन्ति शिखरं शान्तिभवनस्य समुन्नतम् । गन्तुं पुनर्न ते शक्ता भित्तिभिः स्फटिकात्मभिः ॥३३॥

अर्थ: वे शान्ति-जिनालयके ऊँचे शिखर देख तो रहे थे परन्तु स्फटिककी दीवालोंके कारण वहाँ तक जानेमें समर्थ नहीं थे ॥३३॥


विलासिनि वदाध्वानमिति कश्चित्त्वरान्वितः । करे स्तम्भसमासक्तामगृहीच्छालभञ्जिकाम् ॥३४॥

अर्थ: हे विलासिनि ! मुझे मार्ग बताओ इस प्रकार पूछनेके लिए शीघ्रतासे भरे किसी सुभटने खम्भेमें लगी हुई पुतलीका हाथ पकड़ लिया ॥३४॥


दृष्टं कश्चित्प्रतीहारं हेमवेत्रलताकरम् । जगाद शान्तिगेहस्य पन्थानं देशयाऽऽश्विति ॥३५॥

अर्थ: आगे चलकर हाथमें स्वर्णमयी वेत्रलताको धारण करने वाला एक कृत्रिम द्वारपाल दिखा उससे किसी सुभटने पूछा कि शीघ्र ही शान्ति-जिनालयका मार्ग कहो ॥३५॥


कथं न किञ्चिदुक्तिको ब्रवीत्येष विसम्भ्रमः । इति घ्नन् पाणिना वेगादवापाङ्गुलिचूर्णनम् ॥३६॥

अर्थ: परन्तु वह कृत्रिम द्वारपाल क्या उत्तर देता ? जब कुछ उत्तर नहीं मिला तो अरे यह अहंकारी तो कुछ कहता ही नहीं है यह कहकर किसी सुभटने उसे वेगसे एक थप्पड़ मार दी पर इससे उसीकी अंगुलियाँ चूर-चूर हो गईं ॥३६॥


कृत्रिमोऽयमिति ज्ञात्वा हस्तस्पर्शनपूर्वकम् । किञ्चित् कक्षान्तरं जग्मुर्द्वारं विज्ञाय कृच्छ्रतः ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर हाथसे स्पर्शकर उन्होंने जाना कि यह सचमुचका द्वारपाल नहीं किन्तु कृत्रिम द्वारपाल है - पत्थरका पुतला है । इसके पश्चात् बड़ी कठिनाईसे द्वार मालूमकर वे दूसरी कक्षमें गये ॥३७॥


द्वारमेतन्न कुड्यं तु महानीलमयं भवेत् । इति ते संशयं प्राप्ताः करं पूर्वमसारयन् ॥३८॥

अर्थ: ऐसा तो नहीं है कि कहीं यह द्वार न हो किन्तु महानीलमणियोंसे निर्मित दीवाल हो’ इस प्रकारके संशयको प्राप्त हो उन्होंने पहले हाथ पसारकर देख लिया ॥३८॥


स्वयमप्यागतं मार्गं पुनर्निर्गन्तुमक्षमाः । शान्त्यालयगतौ बुद्धिं कुटिलभ्रान्तयो दधुः ॥३९॥

अर्थ: उन सबकी भ्रान्ति इतनी कुटिल हो गई कि वे स्वयं जिस मार्गसे आये थे उसी मार्गसे निकलनेमें असमर्थ हो गये अतः निरुपाय हो उन्होंने शान्ति-जिनालयमें पहुँचनेका ही विचार स्थिर किया ॥३९॥


ततः कञ्चिन्नरं दृष्ट्वा वाचा विज्ञाय सत्यकम् । कश्चिज्जग्राह केशेषु जगाद च सुनिष्ठुरम् ॥४०॥

गच्छ गच्छाग्रतो मार्गं शान्तिहर्म्यस्य दर्शय । इति तस्मिन् पुरो याति ते बभूवुर्निराकुलाः ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर किसी मनुष्यको देख और उसकी बोलीसे उसे सचमुचका मनुष्य जान किसी सुभटने उसके केश पकड़कर कठोर शब्दोंमें कहा कि चल आगे चल शान्ति-जिनालयका मार्ग दिखा । इसप्रकार कहनेपर जब वह आगे चलने लगा तब कहीं वे निराकुल हुए ॥४०-४१॥


प्राप्ताश्च शान्तिनाथस्य भवनं मदमुद्वहत् । कुसुमाञ्जलिभिः साकं विमुञ्चन्तो जयस्वनम् ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर कुसुमाञ्जलियोंके साथ-साथ जय-जय ध्वनिको छोड़ते हुए वे सब हर्ष उत्पन्न करने वाले भी शान्ति-जिनालयमें पहुँचे ॥४२॥


धृतानि स्फटिकस्तम्भै रम्यदेशेषु केषुचित् । पुराणि ददृशुर्व्योम्नि स्थितानीव सुविस्मयाः ॥४३॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने कितने ही सुन्दर प्रदेशोंमें स्फटिक मणिके खम्भों द्वारा धारण किये हुए नगर आश्चर्य चकित हो इस प्रकार देखे मानो आकाशमें ही स्थित हों ॥४३॥


इदं चित्रमिदं चित्रमिदमन्यन्महाद्भुतम् । इति ते दर्शयांचक्रुः सद्मवस्तु परस्परम् ॥४४॥

अर्थ: यह आश्चर्य देखो, यह आश्चर्य देखो और यह सबसे बड़ा आश्चर्य देखो इस प्रकार वे सब परस्पर एक दूसरेको जिनालयकी उत्तम वस्तुएँ दिखला रहे थे ॥४४॥


पूर्वमेव परित्यक्तवाहनोऽङ्गदसुन्दरः । श्लाघिताद्भुतजैनेन्द्रवास्तुयातपरिच्छदः ॥४५॥

ललाटोपरिविन्यस्तकरराजीवकुड्मलः । कृतप्रदक्षिणः स्तोत्रमुखरं मुखमुद्वहन् ॥४६॥

अन्तरङ्गैर्वृतो बाह्यकक्षस्थापितसैन्यकः । बिलासिनीमनःक्षोभदक्षो विकसितेक्षणः ॥४७॥

सुप्तचित्रार्पितं पश्यन् चरितं जैनपुङ्गवम् । भावेन च नमस्कुर्वन्नाद्यमण्डपभित्तिषु ॥४८॥

धीरो भगवतः शान्तेर्विवेश परमालयम् । वन्दनां च विधानेन चकार पुरुसम्मदः ॥४९॥

अर्थ: अथानन्तर जिसने वाहनका पहलेसे ही त्याग कर दिया था, जो मन्दिरके आश्चर्यकारी उपकरणोंकी प्रशंसा कर रहा था, जिसने हस्त रूपी कमलकी बोडियाँ ललाटपर धारण कर रक्खी थीं, जिसने प्रदक्षिणाएँ दी थीं, जो स्तोत्र पाठ से मुखर मुखको धारण कर रहा था, जिसने समस्त सैनिकोंको बाह्य कक्षमें ही खड़ा कर दिया था जो प्रमुख-प्रमुख निकटके लोगोंसे घिरा था, जो विलासिनी जनोंका मन चञ्चल करनेमें समर्थ था; जिसके नेत्र-कमल खिल रहे थे जो आद्य मण्डपकी दीवालों पर मूक चित्रों द्वारा प्रस्तुत जिनेन्द्र भगवान्के चरितको देखता हुआ उन्हें भाव नमस्कार कर रहा था, अत्यन्त धीर था और विशाल आनन्दसे युक्त था, ऐसे अंगदकुमारने शान्तिनाथ भगवान्के उत्तम जिनालयमें प्रवेश किया तथा विधिपूर्वक वन्दना की ॥४५-४९॥


तत्रेन्द्रनीलसङ्घातमयूखनिकरप्रभम् । सम्मुखं शान्तिनाथस्य स्वर्भानुमिव भास्वतः ॥५०॥

अपश्यच्च दशास्यं स सामिपर्यङ्कसंस्थितम् । ध्यायन् विद्यां समाधानीं प्रव्रज्यां भरतो यथा ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ उसने श्री शान्तिनाथ भगवान्के सम्मुख अर्धपर्यङ्कासन बैठे हुए रावणको देखा । वह रावण, इन्द्रनीलमणियोंके किरण-समूहके समान कान्ति वाला था और भगवान्के सामने ऐसा बैठा था मानो सूर्यके सामने राहु ही बैठा हो । वह एकाग्र चित्त हो विद्याका उस प्रकार ध्यान कर रहा था जिस प्रकार कि भरत दीक्षा लेनेका विचार करता रहता था ॥५०-५१॥


जगाद चाधुना वार्त्ता का ते रावण कथ्यताम् । तत्ते करोमि यत् कर्तुं क्रुद्धोऽपि न यमः क्षमः ॥५२॥

अर्थ: उसने रावणसे कहा कि रे रावण ! इस समय तेरा क्या हाल है ? सो कह । अब मैं तेरी वह दशा करता हूँ जिसे क्रुद्ध हुआ यम भी करनेके लिए समर्थ नहीं है ॥५२॥


कोऽयं प्रवर्त्तितो दम्भो जिनेन्द्राणां पुरस्त्वया । धिक् त्वां दुरितकर्माणं वृथा प्रारब्धसत्क्रियम् ॥५३॥

अर्थ: तूने जिनेन्द्रदेवके सामने यह क्या कपट फैला रक्खा है ? तुझ पापीको धिक्कार है । तूने व्यर्थ ही सत्क्रिया का प्रारम्भ किया है ॥५३॥


एवमुक्त्वोत्तरीयान्तदलेन तमताडयत् । कृत्वा कहकहाशब्दं विभ्रमी गर्वनिर्भरम् ॥५४॥

अर्थ: ऐसा कह कर उसने उसीके उत्तरीय वस्त्रके एक खण्डसे उसे पीटना शुरू किया तथा मुँह बना कर गर्वके साथ कहकहा शब्द किया अर्थात् जोरका अट्टहास किया ॥५४॥


अग्रतोऽवस्थितान्यस्य पुष्पाण्यादाय तीव्रगी- । अताडयदधो वक्त्रे निभृतं प्रमदाजनम् ॥५५॥

अर्थ: वह रावणके सामने रखे हुए पुष्पोंको उठा कठोर शब्द करता हुआ नीचे स्थित स्त्री जनों के मुख पर कठोर प्रहार करने लगा ॥५५॥


आकृष्य दारपाणिभ्यां निष्ठुरं कुञ्चितेक्षणः । तापनीयानि पद्मानि चकार जिनपूजनम् ॥५६॥

अर्थ: उसने नेत्रोंको कुछ संकुचित कर दुष्टतापूर्वक स्त्रीके दोनों हाथोंसे स्वर्णमय कमल छीन लिये तथा उनसे जिनेन्द्र भगवान्‌की पूजा की ॥५६॥


पुनरागम्य दुःखाभिर्वाग्भिः सञ्चोदयन्मुहुः । अक्षमालां करादस्य गृहीत्वा चपलोऽच्छिनत् ॥५७॥

अर्थ: फिर आकर दुःखदायी वचनोंसे उसे बार-बार खिझाकर उस चपल अंगदने रावणके हाथसे अक्षमाला लेकर तोड़ डाली ॥५७॥


विकीर्णां तां पुरस्तस्य पुनरादाय सर्वतः । शनैरघटयद् भूयः करे चास्य समर्पयत् ॥५८॥

अर्थ: जिससे वह माला उसके सामने बिखर गई। थोड़ी देर बाद सब जगह से बिखरी हुई उसी मालाको उठा धीरे-धीरे पिरोया और फिर उसके हाथमें दे दी ॥५८॥


करे चाकृष्य चिच्छेद पुनश्चाघट्टयच्चलः । चकार गलके भूयो निदधे मस्तके पुनः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर उस चपल अंगदने रावणका हाथ खींच वह माला पुनः तोड़ डाली और फिर पिरो कर उसके गले में डाली। फिर निकाल कर मस्तक पर रक्खी ॥५९॥


ततोऽन्तःपुरराजीवखण्डमध्यमुपागतः । चक्रे ग्रीष्माभितप्तस्य क्रीडां वन्यस्य दन्तिनः ॥६०॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह अन्तःपुर रूपी कमल वनके बीचमें जाकर गरमीके कारण संतप्त जंगली हाथीकी क्रीड़ा करने लगा अर्थात् जिस प्रकार गरमीसे संतप्त हाथी कमलवनमें जाकर उपद्रव करता है उसी प्रकार अंगद भी अन्तःपुरमें जाकर उपद्रव करने लगा ॥६०॥


प्रभ्रष्टदुष्टदुर्दान्तस्थूरीपृष्ठकचञ्चलः । प्रवृत्तः शङ्कया मुक्तः सोऽन्तःपुरविलोलने ॥६१॥

अर्थ: बन्धनसे छुटे दुष्ट दुर्दान्त घोड़ेके समान चञ्चल अङ्गद निःशङ्क हो अन्तःपुरके विलोड़न करनेमें प्रवृत्त हुआ ॥६१॥


कृतग्रन्थिकमाधाय कण्ठे कस्याश्चिदंशुकम् । गुर्वारोपयति द्रव्यं किञ्चिस्मितपरायणः ॥६२॥

अर्थ: उसने किसी स्त्रीका वस्त्र छीन उसकी रस्सी बना उसीके कण्ठमें बांधी और उस पर बहुत वजनदार पदार्थ रखवाये। यह सब करता हुआ वह कुछ-कुछ हँसता जाता था ॥६२॥


उत्तरीयेण कण्ठेऽन्यां संयम्यालम्बयत्पुरः । स्तम्भेऽमुञ्चत्पुनः शीघ्रं कृतदुःखविचेष्टिताम् ॥६३॥

अर्थ: किसी स्त्रीके कण्ठमें उत्तरीय वस्त्र बाँधकर उसे खम्भेसे लटका दिया फिर जब वह दुःखसे छटपटाने लगी तब उसे शीघ्र ही छोड़ दिया ॥६३॥


दीनारैः पञ्चभिः काञ्चित् काञ्चीगुणसमन्विताम् । हस्ते निजमनुष्यस्य व्यक्रीणात्क्रीडनोद्यतः ॥६४॥

अर्थ: क्रीड़ा करनेमें उद्यत अङ्गदने मेखला सूत्रसे सहित किसी स्त्रीको अपने ही आदमीके हाथमें पाँच दीनारमें बेंच दिया ॥६४॥


नूपुरौ कर्णयोश्चक्रे केशपाशे च मेखलाम् । कस्याश्चिन्मूर्द्धिन रत्नं च चकार चरणस्थितम् ॥६५॥

अर्थ: उसने किसी स्त्रीके नूपुर कानोंमें, और मेखला केशपाशमें पहिना दी तथा मस्तकका मणि चरणोंमें बाँध दिया ॥६५॥


अन्योन्यं मूर्द्धजैरन्या बबन्ध कृतवेपनाः । चकार मस्तकेऽन्यस्याश्छेकं कूजन्मयूरकम् ॥६६॥

अर्थ: उसने भयसे काँपती हुई कितनी ही अन्य स्त्रियोंको परस्पर एक दूसरेके शिरके बालोंसे बाँध दिया तथा किसी अन्य स्त्रीके मस्तक पर शब्द करता हुआ चतुर मयूर बैठा दिया ॥६६॥


एवं महावृषेणेव गोकुलं परमाकुलम् । कृतमन्तःपुरं तेन सन्निधौ रक्षसां विभोः ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार जिस तरह कोई सांड़ गायोंके समूहको अत्यन्त व्याकुल कर देता है। उसी तरह उसने रावणके समीप ही उसके अन्तःपुरको अत्यन्त व्याकुल कर दिया था ॥६७॥


अभाणीद्रावणं क्रुद्धस्त्वया रे राक्षसाधम । मायया सत्त्वहीनेन राजपुत्री तदा हृता ॥६८॥

अधुना पश्यतस्तेऽहं सर्वमेव प्रियाजनम् । हरामि यदि शक्नोषि प्रतीकारं ततः कुरु ॥६९॥

अर्थ: उसने क्रुद्ध होकर रावणसे कहा कि अरे नीच राक्षस! तूने उस समय पराक्रमसे रहित होनेके कारण मायासे राजपुत्रीका अपहरण किया था परन्तु इस समय मैं तेरे देखते देखते तेरी सब स्त्रियोंको अपहरण करता हूँ। यदि तेरी शक्ति हो तो प्रतीकार कर ॥६८-६९॥


एवमुक्त्वा समुत्पत्य पुरोऽस्य मृगराजवत् । महिषीं सर्वतोऽभीष्टां प्राप्तप्रवणवेपथुम् ॥७०॥

विलोलनयनां वेण्यां गृहीत्वाऽत्यन्तकातराम् । आचकर्ष यथा राजलक्ष्मीं भरतपार्थिवः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार कह वह सिंहके समान रावणके सामने उछला और जो उसे सबसे अधिक प्रिय थी, जो भयसे काँप रही थी, जिसके नेत्र अत्यन्त चञ्चल थे और जो अत्यन्त कातर थी ऐसी पट्टरानी मन्दोदरीकी चोटी पकड़कर उस तरह खींच लाया जिस तरह कि राजा भरत राजलक्ष्मीको खींच लाये थे ॥७०-७१॥


जगौ च शूर सेयं ते दयिता जीवितादपि । मन्दोदरी महादेवी ह्रियते गुणमेदिनी ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर उसने रावणसे कहा कि हे शूर ! जो तुझे प्राणोंसे अधिक प्यारी है तथा जो गुणोंकी भूमि है, ऐसी यह वही मन्दोदरी महारानी हरी जा रही है ॥७२॥


इयं विद्याधरेन्द्रस्य सभामण्डपवर्तिनः । चामरग्राहिणी चार्वी सुग्रीवस्य भविष्यति ॥७३॥

अर्थ: यह सभामण्डपमें वर्तमान विद्याधरोंके राजा सुग्रीवकी उत्तम चमर ढोलनेवाली होगी ॥७३॥


ततोऽसौ कम्पविस्रंसिस्तनकुम्भतटांशुकम् । समाहितं मुहुस्तन्वी कुर्वती चलपाणिना ॥७४॥

बाध्यमानाधरा नेत्रवारिणानन्तरं स्रुता । चलद्भूषणनिःस्वानमुखरीकृतविग्रहा ॥७५॥

सजन्ती पादयोर्भूयः प्रविशन्ती भुजान्तरम् । दैन्यं परममापन्ना भर्तारमिदमभ्यधात् ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर जो कँपकँपीके कारण खिसकते हुए स्तनतटके वस्त्रको अपने चञ्चल हाथसे वार-बार ठीक कर रही थी, निरन्तर झरते हुए अश्रुजलसे जिसका अधरोष्ठ बाधित हो रहा था और हिलते हुए आभूषणोंके शब्दसे जिसका समस्त शरीर शब्दायमान हो रहा था ऐसी कृशाङ्गी मन्दोदरी परमदीनताको प्राप्त हो कभी भर्तारके चरणोंमें पड़ती और कभी भुजाओंके मध्य प्रवेश करती हुई भर्तारसे इस प्रकार बोली कि ॥७४-७६॥


त्रायस्व नाथ किन्त्वेतामवस्थां मे न पश्यसि । किमन्य एव जातोऽसि नासि सः स्याद्दशानन ॥

अर्थ: हे नाथ ! मेरी रक्षा करो, क्या मेरी इस दशाको नहीं देख रहे हो ? क्या तुम और ही हो गए हो ? क्या अब तुम वह दशानन नहीं रहे ? ॥७७॥


अहो ते वीतरागत्वं निर्ग्रन्थानां समाश्रितम् । ईदृशे सङ्गते दुःखे किमनेन भविष्यति ॥७८॥

अर्थ: अहो ! तुमने तो निर्ग्रन्थ मुनियों जैसी वीतरागता धारण कर ली पर इस प्रकारके दुःख उपस्थित होने पर इस वीतरागतासे क्या होगा ? ॥७८॥


धिगस्तु तव वीर्येण किमपि ध्यानमीयुषः । यदस्य पापचेष्टस्य छिनत्सि न शिरोऽसिना ॥७९॥

अर्थ: कुछ भी ध्यान करनेवाले तुम्हारे इस पराक्रमको धिक्कार हो जो खड्गसे इस पापीका शिर नहीं काटते हो ॥७९॥


चन्द्रादित्यसमानेभ्यः पुरुषेभ्यः पराभवम् । नासि सोढाऽधुना कस्मात्सहसे क्षुद्रतोऽमुतः ॥८०॥

अर्थ: जिसे तुमने पहले कभी चन्द्र और सूर्यके समान तेजस्वी मनुष्योंसे प्राप्त होनेवाला पराभव नहीं सहा सो इस समय इस क्षुद्रसे क्यों सह रहे हो ? ॥८०॥


लङ्केश्वरस्तु सङ्गाढध्यानसङ्गतमानसः । न किञ्चिदशृणोन्नापि पश्यतिस्म सुनिश्चयः ॥८१॥

अर्द्धपर्यंकसंविष्टो दूरस्थापितमत्सरः । मन्दरोरुगुहायातरत्नकूटमहाद्युतिः ॥८२॥

सर्वेन्द्रियक्रियामुक्तो विद्याराधनतत्परः । निष्कम्पविग्रहो धीरः स ह्यासीत्पुस्तकायवत् ॥८३॥

अर्थ: यह सब हो रहा था परन्तु रावण निश्चयके साथ प्रगाढ़ ध्यानमें अपना चित्त लगाये हुआ था वह मानो कुछ सुन ही नहीं रहा था। वह अर्धपर्यङ्कासनसे बैठा था, मत्सरभावको उसने दूर कर दिया था, मन्दरगिरिकी विशाल गुफाओंसे प्राप्त हुई रत्नराशिके समान उसकी महाकान्ति थी, वह समस्त इन्द्रियों की क्रियासे रहित था, विद्याकी आराधनामें तत्पर था, निष्कम्प शरीरका धारक था, अत्यन्त धीर था और ऐसा जान पड़ता था मानो मिट्टीका पुतला ही हो ॥८१-८३॥


विद्यां विचिन्तयन्नेष मैथिलीमिव राघवः । जगाम मन्दरस्याद्रेः स्थिरत्वेन समानताम् ॥८४॥

अर्थ: जिस प्रकार राम सीताका ध्यान करते थे उसी प्रकार वह विद्याका ध्यान कर रहा था। इस तरह वह अपनी स्थिरतासे मन्दर-गिरिकी समानताको प्राप्त हो रहा था ॥८४॥


ततोऽथ गदतः स्पष्टं द्योतयन्ती दिशो दश । जयेति जनितालापा तस्य विद्या पुरः स्थिता ॥८५॥

अर्थ: अथानन्तर जिस समय मन्दोदरी रावणसे उस प्रकार कह रही थी उसी समय दशों दिशाओंको प्रकाशित करती एवं जय-जय शब्दका उच्चारण करती बहुरूपिणी विद्या उसके सामने खड़ी हो गई ॥८५॥


जगौ च देव सिद्धाऽहं तवाज्ञाकरणोद्यता । नियोगो दीयतां नाथ साध्यः सकलविष्टपे ॥८६॥

अर्थ: उसने कहा भी कि हे देव ! मैं सिद्ध हो गई हूँ, आपकी आज्ञा पालन करनेमें उद्यत हूँ, हे नाथ ! आज्ञा दी जाय, समस्त संसारमें मुझे सब साध्य है ॥८६॥


एकं चक्रधरं मुक्त्वा प्रतिकूलमवस्थितम् । वशीकरोमि ते लोकं भवदिच्छानुवर्त्तिनी ॥८७॥

अर्थ: प्रतिकूल खड़े हुए एक चक्रधरको छोड़ मैं आपकी इच्छानुसार प्रवृत्ति करती हुई समस्त लोकको आपके अधीन कर सकती हूँ ॥८७॥


करे च चक्ररत्नं च तवैवोत्तम वर्तते । पद्मलक्ष्मीधराद्यैर्मे ग्रहणं किमिवापरैः ॥८८॥

अर्थ: हे उत्तम पुरुष ! चक्ररत्न तो तुम्हारे ही हाथमें है। राम लक्ष्मण आदि अन्य पुरुष मेरा क्या ग्रहण करेंगे अर्थात् उनमें मेरे ग्रहण करनेकी शक्ति ही क्या है ? ॥८८॥


मद्विधानां निसर्गोऽयं यन्न चक्रिणि शक्नुमः । किञ्चित्पराभवं कर्तुमन्यत्र तु किमुच्यते ॥८९॥

अर्थ: हमारी जैसी विद्याओंका यही स्वभाव है कि हम चक्रवर्तीका कुछ भी पराभव करनेके लिए समर्थ नहीं हैं और इसके अतिरिक्त दूसरेका तो कहना ही क्या है ? ॥८९॥


ब्रूह्यद्य सर्वदैत्यानां करोमि किमु मारणम् । भवत्यप्रियचित्तानां किं वा स्वर्गौकसामपि ॥९०॥

अर्थ: कहो आज, आपसे अप्रसन्न रहनेवाले समस्त दैत्योंका संहार करूँ या समस्त देवोंका ? ॥९०॥


क्षुद्रविद्यात्तगर्वेषु नभस्वत्पथगामिषु । आदरो नैव मे कश्चिद्वराकेषु तृणेष्विव ॥९१॥

अर्थ: क्षुद्र विद्याओंसे गर्वीले, तृणके समान तुच्छ दयनीय विद्याधरोंमें मेरा कुछ भी आदर नहीं है अर्थात् उन्हें कुछ भी नहीं समझती हूँ ॥९१॥


प्रणम्य विद्या समुपासितोऽसौ समाप्तयोगः परमद्युतिस्थः । दशाननो यावदुदारचेष्टः प्रदक्षिणं शान्तिगृहं करोति ॥९२॥

तावत्परित्यज्य मनोभिरामां मन्दोदरीं खेदपरीतदेहाम् । उत्पत्य खं पद्मसमागमेन गतोऽङ्गदोऽसौ रविवत्सुतेजाः ॥९३॥

अर्थ: इस तरह प्रणाम कर विद्या जिसकी उपासना कर रही थी, जिसका ध्यान पूर्ण हो चुका था, जो परमदीप्तिके मध्य स्थित था तथा जो उदार चेष्टाका धारक था ऐसा दशानन जब तक शान्ति-जिनालयकी प्रदक्षिणा करता है तब तक सूर्यके समान तेजस्वी अङ्गद, खेदखिन्न शरीरकी धारक सुन्दरी मन्दोदरीको छोड़ आकाशमें उड़कर रामसे जा मिला ॥९२-९३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे पद्मायने बहुरूपविद्यासंनिधानाभिधानं नामैकसप्ततितमं पर्व ॥७१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराण नामक पद्मायनमें रावणके बहुरूपिणी विद्याकी सिद्धिका वर्णन करनेवाला इकहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७१॥


७२. द्वासप्ततितमं पर्व (युद्धनिश्चयकीर्तनाभिधानं)

ततः स्त्रीणां सहस्राणि समस्तान्यस्य पादयोः । रुदन्त्यः प्रणिपत्योचुः युगपच्चारुनिःस्वनम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रावणकी अठारह हजार स्त्रियाँ एक साथ रुदन करती उसके चरणोंमें पड़कर निम्नप्रकार मधुर शब्द कहने लगीं ॥१॥


सर्वविद्याधराधीशे वर्तमाने त्वयि प्रभो । बालकेनाङ्गदेनैत्य वयमद्य खलीकृताः ॥२॥

अर्थ: उन्होंने कहा हे नाथ ! समस्त विद्याधरोंके अधिपति जो आप सो आपके विद्यमान रहते हुए भी बालक अङ्गदने आकर आज हम सबको अपमानित किया है ॥२॥


त्वयि ध्यानमुपासीने परमे तेजसास्पदे । विद्याधरकखद्योतो विकारं सोऽपि संश्रितः ॥३॥

अर्थ: तेजके उत्तम स्थानस्वरूप आपके ध्यानारूढ रहने पर वह नीच विद्याधररूपी जुगनू विकारभावको प्राप्त हुआ ॥३॥


पश्यैतकामवस्थां नो विहिता हतचेतसा । सौग्रीविणा विशङ्केम शिशुना भवतः पुरः ॥४॥

अर्थ: आपके सामने सुग्रीवके दुष्ट बालकने निशङ्क हो हम लोगोंकी जो दशा की है उसे आप देखो ॥४॥


श्रुत्वा तद्वचनं तासां समाश्वासनतत्परः । त्रिकूटाधिपतिः क्रुद्धो जगाद विमलेक्षणः ॥५॥

मृत्युपाशेन बद्धोऽसौ ध्रुवं यदिति चेष्टते । देव्यो विमुच्यतां दुःखं भवत प्रकृतिस्थिताः ॥६॥

अर्थ: उन स्त्रियोंके वचन सुनकर जो उन्हें सान्त्वना देनेमें तत्पर था तथा जिसकी दृष्टि निर्मल थी ऐसा रावण कुपित होता हुआ बोला कि हे देवियो ! दुःख छोड़ो और प्रकृतिस्थ होओ - शान्ति धारण करो । वह जो ऐसी चेष्टा करता है सो निश्चित जानो कि वह मृत्युके पाशमें बद्ध हो चुका है ॥५-६॥


कान्ताः ! कर्तास्मि सुग्रीवं निर्ग्रीवं श्वो रणाजिरे । तमोमण्डलकं तं च प्रभामण्डलनामकम् ॥७॥

अर्थ: हे वल्लभाओ ! मैं कल ही रणाङ्गणमें सुग्रीवको निर्ग्रीव - ग्रीवारहित और प्रभामण्डलको तमोमण्डलरूप कर दूँगा ॥७॥


तयोस्तु कीदृशः कोपो भूमिगोचरकीटयोः । दुष्टविद्याधरान् सर्वान् निहन्तास्मि न संशयः ॥८॥

अर्थ: कीटके समान तुच्छ उन भूमिगोचरियों राम लक्ष्मणके ऊपर क्या क्रोध करना है ? किन्तु उनके पक्षपर एकत्रित हुए जो समस्त विद्याधर हैं उन्हें अवश्य मारूँगा ॥८॥


भ्रूक्षेपमात्रकस्यापि दयिता मम शत्रवः । गम्याः किमु महारूपविद्यया स्युस्तथा न ते ॥९॥

अर्थ: हे प्रिय स्त्रियो ! शत्रु तो मेरी भौंहके इशारे मात्रसे साध्य हैं फिर अब तो बहुरूपिणी विद्या सिद्ध हुई अतः उससे वशीभूत क्यों न होंगे ? ॥९॥


एवं ताः सान्त्व्य दयिता बुद्धया निहतशात्रवः । तस्थौ देहस्थितौ राजा निष्क्रम्य जिनसद्मनः ॥१०॥

अर्थ: इस प्रकार उन स्त्रियोंको सान्त्वना देकर रावणने मनमें सोचा कि अब तो मैंने शत्रुओंको मार लिया। तदनन्तर जिनमन्दिरसे निकलकर वह स्नान आदि शरीर सम्बन्धी कार्य करनेमें लीन हुआ ॥१०॥


नानावाद्यकृतानन्दश्चित्रनाट्यसमायुतः । जज्ञे स्नानविधिस्तस्य पुष्पायुधसमाकृतेः ॥११॥

अर्थ: अथानन्तर जिसमें नानाप्रकारके वादित्रोंसे आनन्द मनाया जा रहा था तथा जो नाना- प्रकारके अद्भुत नृत्योंसे सहित था ऐसा, कामदेवके समान सुन्दर रावणका स्नान-समारोह सम्पन्न हुआ ॥११॥


राजतैः कलशैः कैश्चित् सम्पूर्णशशिसन्निभैः । श्यामाभिः स्नाप्यते कान्तिज्योत्स्नासम्प्लावितात्मभिः ॥१२॥

अर्थ: जो कान्तिरूपी चाँदनीमें निमग्न होनेके कारण श्यामा अर्थात् रात्रिके समान जान पड़ती थी ऐसी कितनी ही श्यामा अर्थात् नवयौवनवती स्त्रियोंने पूर्णचन्द्रके समान चाँदीके कलशोंसे उसे स्नान कराया ॥१२॥


पद्मकान्तिभिरन्याभिः सन्ध्याभिरिव सादरम् । बालभास्वरसङ्काशैः कलशैर्हाटकात्मभिः ॥१३॥

अर्थ: कमलके समान कान्तिवाली होनेसे जो प्रातःसंध्याके समान जान पड़ती थी ऐसी कितनी ही स्त्रियोंने बालसूर्यके समान देदीप्यमान स्वर्णमय कलशोंसे आदरपूर्वक उसे नहलाया था ॥१३॥


गरुत्ममणिनिर्माणैः कुम्भैरन्याभिरुत्तमैः । स्त्रीभिः साक्षादिव श्रीभिः पद्मपत्रपुटैरिव ॥१४॥

अर्थ: कुछ अन्य स्त्रियोंने नीलमणिसे निर्मित उत्तम कलशोंसे उसे स्नान कराया था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो कमलके पत्रपुटोंसे लक्ष्मीनामक देवियोंने ही स्नान कराया हो ॥१४॥


कैश्चिद्वालातपच्छायैः कदलीगर्भपाण्डुभिः । अन्यैर्गन्धसमाकृष्टमधुव्रतकदम्बकैः ॥१५॥

अर्थ: कितनी ही स्त्रियोंने प्रातःकालीन घामके समान लालवर्णके कलशोंसे, कितनी ही स्त्रियोंने कदली वृक्षके भीतरी भागके समान सफेद रङ्गके कलशोंसे तथा कितनी ही स्त्रियोंने सुगन्धिके द्वारा भ्रमरसमूहको आकर्षित करनेवाले अन्य कलशोंसे उसे नहलाया था ॥१५॥


उद्वर्त्तनैः सुलीलाभिः स्त्रीभिरुद्वर्त्तितोऽभजत् । स्नानं नानामणिस्फीतप्रभाभाजि वरासने ॥१६॥

अर्थ: स्नानके पूर्व उत्तम लीलावती स्त्रियोंने उससे नानाप्रकारके सुगन्धित उबटनोंसे उबटन लगाया था और उसके बाद उसने नाना प्रकारके मणियोंकी फैलती हुई कान्तिसे युक्त उत्तम आसन पर बैठकर स्नान किया था ॥१६॥


सुस्नातोऽलंकृतः कान्तः प्रयतो भावपूरितः । पुनः शान्तिजिनेन्द्रस्य विवेश भवनं नृपः ॥१७॥

अर्थ: स्नान करनेके बाद उसने अलंकार धारण किये और तदनन्तर उत्तम भावोंसे युक्त हो श्रीशान्ति-जिनालयमें पुनः प्रवेश किया ॥१७॥


कृत्वा तत्र परां पूजामर्हतां स्तुतितत्परः । चिरं त्रिभिः प्रणामं च भेजे भोजनमण्डपम् ॥१८॥

अर्थ: वहाँ उसने स्तुतिमें तत्पर रहकर चिरकाल तक अर्हन्तभगवान्की उत्तम पूजा की, मन, वचन, कायसे प्रणाम किया और उसके बाद भोजन गृहमें प्रवेश किया ॥१८॥


चतुर्विधोत्तमाहारविधिं निर्माय पार्थिवः । विद्यापरीक्षणं कर्तुमार क्रीडनभूमिकाम् ॥१९॥

अर्थ: वहाँ चार प्रकारका उत्तम आहार कर वह विद्याकी परीक्षा करनेके लिए क्रीडाभूमिमें गया ॥१९॥


अनेकरूपनिर्माणं जनितं तेन विद्यया । विविधं चाद्भुतं कर्म विद्याधरजनातिगम् ॥२०॥

अर्थ: वहाँ उसने विद्याके प्रभावसे अनेक रूप बनाये तथा नानाप्रकारके ऐसे आश्चर्यजनक कार्य किये जो अन्य विद्याधरोंको दुर्लभ थे ॥२०॥


तत् कराहतभूकम्पसमाघूर्णितविग्रहम् । जातं परबलं भीतं जगौ निधनशङ्कितम् ॥२१॥

अर्थ: उसने पृथ्वीपर इतने जोरसे हाथ पटका कि पृथ्वी काँप उठी और उसपर स्थित शत्रुओंके शरीर घूमने लगे तथा शत्रुसेना भयभीत हो मरणकी शंकासे चिल्लाने लगी ॥२१॥


ततस्तं सचिवाः प्रोचुः कृतविद्यापरीक्षणम् । अधुना नाथ मुक्त्वा त्वां नास्ति राघवसूदनः ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याकी परीक्षा कर चुकनेवाले रावणसे मन्त्रियोंने कहा कि हे नाथ ! इस समय आपको छोड़ और कोई दूसरा रामको मारनेवाला नहीं है ॥२२॥


भवतो नापरः कश्चित् पद्मस्य क्रोधसङ्गिनः । इष्वासस्य पुरः स्थातुं समर्थः समराजिरे ॥२३॥

अर्थ: रणाङ्गणमें कुपित हो बाण छोड़नेवाले रामके सामने खड़ा होनेके लिए आपके सिवाय और कोई दूसरा समर्थ नहीं है ॥२३॥


विद्ययाथ महर्द्धिस्थो विकृत्य परमं बलम् । सम्प्रति प्रमदोद्यानं प्रतस्थे प्रतिचक्रभृत् ॥२४॥

अर्थ: अथानन्तर बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंसे सम्पन्न रावण, विद्याके प्रभावसे एक बड़ी सेना बना, चक्ररत्नको धारण करता हुआ उस प्रमदनामक उद्यानकी ओर चला जहाँ सीताका निवास था ॥२४॥


सचिवैरावृतो धीरैः सुरैराखण्डलो यथा । अप्रधृष्यः समागच्छन् स रेजे भास्करोपमः ॥२५॥

अर्थ: उस समय धीर वीर मन्त्रियोंसे घिरा हुआ रावण ऐसा जान पड़ता था मानो देवोंसे घिरा हुआ इन्द्र ही हो । अथवा जो बिना किसी रोक-टोकके चला आ रहा था ऐसा रावण सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था ॥२५॥


तमालोक्य समायान्तं विद्याधर्यो बभाषिरे । पश्य पश्य शुभे सीते रावणस्य महाद्युतिम् ॥२६॥

अर्थ: उसे आता देख विद्याधरियोंने कहा कि हे शुभे ! सीते ! देख, रावणकी महाकान्ति देख ॥२६॥


पुष्पकाग्रादयं श्रीमान् अवतीर्य महाबलः । नानाधातुविचित्राङ्गान् महीभृद्गह्वरादिव ॥२७॥

गजेन्द्र इव सक्षीबः सूर्यांशुपरितापितः । स्मरानलपरीताङ्गः पूर्णचन्द्रनिभाननः ॥२८॥

अर्थ: जो नाना धातुओंसे चित्र-विचित्र हो रहा है ऐसे पुष्पक विमानसे उतरकर यह श्रीमान् महाबलवान् ऐसा चला आ रहा है मानो पर्वतकी गुफासे निकलकर सूर्यकी किरणोंसे सन्तप्त हुआ उन्मत्त गजराज ही आ रहा हो । इसका समस्त शरीर कामग्निसे व्याप्त है तथा यह पूर्णचन्द्रके समान मुखको धारण कर रहा है ॥२७-२८॥


पुष्पशोभापरिच्छन्नमुपगीतं षडङ्घ्रिभिः । विशति प्रमदोद्यानं दृष्टिरत्र निधीयताम् ॥२९॥

अर्थ: यह फूलोंकी शोभासे व्याप्त तथा भ्रमरोंके संगीतसे मुखरित प्रमद उद्यानमें प्रवेश कर रहा है । जरा, इसपर दृष्टि तो डालो ॥२९॥


त्रिकूटाधिपतावस्मिन् रूपं निरुपमं श्रिते । सफला जायतां ते दृग् रूपं चास्येदमुत्तमम् ॥३०॥

अर्थ: अनुपम रूपको धारण करनेवाले इस रावणको देखकर तेरी दृष्टि सफल हो जावेगी । यथार्थमें इसका रूप ही उत्तम है ॥३०॥


ततो विमलया दृष्ट्या तया बाह्यान्तरात्मनः । चापान्धकारितं वीक्ष्य बलमेवमचिन्तयत ॥३१॥

अदृष्टपारमुद्वृत्तं बलमीदृङ् महाप्रभम् । रामो लक्ष्मीधरो वाऽपि दुःखं जयति संयुगे ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर सीताने निर्मल दृष्टिसे बाहर और भीतर धनुषके द्वारा अन्धकार उत्पन्न करनेवाले रावणका बल देख इस प्रकार विचार किया कि इसके इस प्रचण्ड बलका पार नहीं है । राम और लक्ष्मण भी इसे युद्धमें बड़ी कठिनाईसे जीत सकेंगे ॥३१-३२॥


अधन्या किं नु पद्माभं किं वा लक्ष्मणसुन्दरम् । हतं श्रोष्यामि सङ्ग्रामे किं वा पापा सहोदरम् ॥३३॥

अर्थ: मैं बड़ी अभागिनी हूँ, बड़ी पापिनी हूँ जो युद्धमें राम लक्ष्मण अथवा भाई भामण्डलके मरनेका समाचार सुनूँगी ॥३३॥


एवं चिन्तामुपायातां परमाकुलितात्मिकाम् । कम्पमानां परित्रस्तां सीतामागत्य रावणः ॥३४॥

जगाद देवि ! पापेन त्वं मया छद्मना हृता । क्षात्रगोत्रप्रसूतानां किमिदं साम्प्रतं सताम् ॥३५॥

अर्थ: इस प्रकार चिन्ताको प्राप्त होनेसे जिसकी आत्मा अत्यन्त विह्वल हो रही थी, तथा जो भयसे काँप रही थी ऐसी सीताके पास आकर रावण बोला कि हे देवि ! मुझ पापीने तुम्हें छलसे हरा था सो क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुए सत्पुरुषोंके लिए क्या यह उचित है ? ॥३४-३५॥


अवश्यम्भाविनो नूनं कर्मणो गतिरीदृशी । स्नेहस्य परमस्येयं मोहस्य बलिनोऽथ वा ॥३६॥

अर्थ: जान पड़ता है कि किसी अवश्य भावी कर्मकी यह दशा है अथवा परम स्नेह और सातिशय बलवान् मोहका यह परिणाम है ॥३६॥


साधूनां सन्निधौ पूर्वं व्रतं भगवतो मया । वन्द्यस्यानन्तवीर्यस्य पादमूले समार्जितम् ॥३७॥

या वृणोति न मां नारी रमयामि न तामहम् । यद्युर्वशी स्वयं रम्भा यदि वाऽन्या मनोरमा ॥३८॥

अर्थ: मैंने पहले अनेक मुनियोंके सन्निधानमें वन्दनीय श्रीभगवान् अनन्तवीर्य केवलीके पादमूलमें यह व्रत लिया था कि जो स्त्री मुझे नहीं बरेगी मैं उसके साथ रमण नहीं करूँगा भले ही वह उर्वशी, रम्भा अथवा और कोई मनोहारिणी स्त्री हो ॥३७-३८॥


इति पालयता सत्यं प्रसादापेक्षिणा मया । प्रसभं रमिता नासि जगदुत्तमसुन्दरि ॥३९॥

अर्थ: हे जगत्की सर्वोत्तम सुन्दरि ! इस सत्यव्रतका पालन करता हुआ मैं तुम्हारे प्रसादकी प्रतीक्षा करता रहा हूँ और बलपूर्वक मैंने तुम्हारा रमण नहीं किया है ॥३९॥


अधुनाऽऽलम्बने छिन्ने मद्भुजप्रेरितैः शरैः । वैदेहि ! पुष्पकारूढा विहर स्वेच्छया जगत् ॥४०॥

अर्थ: हे वैदेहि ! अब मेरी भुजाओंसे प्रेरित बाणोंसे तुम्हारा आलम्बन जो राम था सो छिन्न होनेवाला है इसलिए पुष्पक विमानमें आरूढ़ हो अपनी इच्छानुसार जगत्में विहार करो ॥४०॥


शिखराण्यगराजस्य चैत्यकूटानि सागरम् । महानदीश्च पश्यन्ती जनयात्मसुखासिकाम् ॥४१॥

अर्थ: सुमेरुके शिखर, अकृत्रिम चैत्यालय, समुद्र और महानदियोंको देखती हुई अपने आपको सुखी करो ॥४१॥


कृत्वा करपुटं सीता ततः करुणमभ्यधात् । बाष्पसम्भारसंरुद्धकण्ठा कृच्छ्रेण सादरम् ॥४२॥

अर्थ: तदनन्तर अश्रुओंके भारसे जिसका कण्ठ रुँध गया था ऐसी सीता बड़े कष्टसे आदर-पूर्वक हाथ जोड़ करुण स्वरमें रावणसे बोली ॥४२॥


दशानन ! यदि प्रीतिर्विद्यते तव मां प्रति । प्रसादो वा ततः कर्तुं ममेदं वाक्यमर्हसि ॥४३॥

अर्थ: कि हे दशानन ! यदि मेरी प्रति तुम्हारी प्रीति है अथवा मुझ पर तुम्हारी प्रसन्नता है तो मेरा यह वचन पूर्ण करनेके योग्य हो ॥४३॥


क्रुद्धेनापि त्वया संख्ये प्राप्तोऽभिमुखतामसौ । अनिवेदितसन्देशो न हन्तव्यः प्रियो मम ॥४४॥

अर्थ: युद्धमें राम तुम्हारे सामने आवें तो कुपित होने पर भी तुम मेरा सन्देश कहे बिना उन्हें नहीं मारना ॥४४॥


पद्म भामण्डलस्वस्रा तव सन्दिष्टमीदृशम् । यथा श्रुत्वाऽन्यथा त्वाहं विधियोगेन संयुगे ॥४५॥

महता शोकभारेण समाक्रान्ता सती प्रभो । वात्याहतप्रदीपस्य शिखेव क्षणमात्रतः ॥४६॥

राजर्षेस्तनया शोच्या जनकस्य महात्मनः । प्राणानेषा न मुञ्चामि त्वत्समागमनोत्सुका ॥४७॥

अर्थ: उनसे कहना कि हे राम ! भामण्डलकी बहिनने तुम्हारे लिए ऐसा सन्देश दिया है कि कर्मयोगसे तुम्हारे विषयकी युद्धमें अन्यथा बात सुन महात्मा राजर्षि जनककी पुत्री सीता, अत्यधिक शोकके भारसे आक्रान्त होती हुई आँधीसे ताड़ित दीपककी शिखाके समान क्षणभर में शोचनीय दशाको प्राप्त हुई है । हे प्रभो ! मैंने जो अभीतक प्राण नहीं छोड़े हैं सो आपके समागमकी उत्कण्ठासे ही नहीं छोड़े हैं ॥४५-४७॥


इत्युक्त्वा मूर्च्छिता भूमौ पपात मुकुलेक्षणा । हेमकल्पलता यद्वद्भग्ना मत्तेन दन्तिना ॥४८॥

अर्थ: इतना कह वह मूर्छित हो नेत्र बन्द करती हुई उस तरह पृथिवी पर गिर पड़ी जिस तरह कि मदोन्मत्त हाथीके द्वारा खण्डित सुवर्णमयी कल्पलता गिर पड़ती है ॥४८॥


तदवस्थामिमां दृष्ट्वा रावणो मृदुमानसः । बभूव परमं दुःखी चिन्ता चैतामुपागतः ॥४९॥

अहो निकाचितस्नेहः कर्मबन्धोदयादयम् । अवसानविनिर्मुक्तः कोऽपि संसारगह्वरे ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर सीताकी वैसी दशा देख कोमल चित्तका धारी रावण परम दुखी हुआ तथा इस प्रकार विचार करने लगा कि अहो ! कर्मबन्धके कारण इनका यह स्नेह निकाचित स्नेह है - कभी छूटनेवाला नहीं है । जान पड़ता है कि इसका संसार रूपी गर्तमें रहते कभी अवसान नहीं होगा ॥४९-५०॥


धिक् धिक् किमिदमश्लाघ्यं कृतं सुविकृतं मया । यदन्योन्यरतं भीरुमिथुनं सद्वियोजितम् ॥५१॥

अर्थ: मुझे बार-बार धिक्कार है मैंने यह क्या निन्दनीय कार्य किया जो परस्पर प्रेयसे युक्त इस मिथुनका विछोह कराया ॥५१॥


पापातुरो विना कार्यं पृथग्जनसमो महत् । अयशोमलमाप्तोऽस्मि सद्भिरत्यन्तनिन्दितम् ॥५२॥

अर्थ: मैं अत्यन्त पापी हूँ बिना प्रयोजन ही मैंने साधारण मनुष्यके समान सत् पुरुषोंसे अत्यन्त निन्दनीय अपयश रूपी मल प्राप्त किया है ॥५२॥


शुद्धाम्भोजसमं गोत्रं विपुलं मलिनीकृतम् । दुरात्मना मया कष्टं कथमेतदनुष्ठितम् ॥५३॥

अर्थ: मुझ दुष्टने कमलके समान शुद्ध विशाल कुलको मलिन किया है । हाय हाय मैंने यह अकार्य कैसे किया ? ॥५३॥


धिङ्नारी पुरुषेन्द्राणां सहसा मारणात्मिकाम् । किम्पाकफलदेशीयां क्लेशोत्पत्तिवसुन्धराम् ॥५४॥

अर्थ: जो बड़े-बड़े पुरुषोंको सहसा मार डालती है, जो किंपाक फलके समान है तथा दुःखोंकी उत्पत्तिकी भूमि है ऐसी स्त्रीको धिक्कार है ॥५४॥


भोगिमूर्द्धमणिच्छायासदृशी मोहकारिणी । सामान्येनाङ्गना तावत् परस्त्री तु विशेषतः ॥५५॥

अर्थ: सामान्य रूपसे स्त्री मात्र, नागराजके फणपर स्थित मणिकी कान्तिके समान मोह उत्पन्न करनेवाली है और परस्त्री विशेष रूपसे मोह उत्पन्न करनेवाली है ॥५५॥


नदीव कुटिला भीमा धर्मार्थपरिनाशिनी । वर्जनीया सतां यत्नात्सर्वाशुभमहाखनिः ॥५६॥

अर्थ: यह नदीके समान कुटिल है, भयंकर है, धर्म अर्थको नष्ट करनेवाली है, और समस्त अशुभोंकी खानि है । यह सत्पुरुषोंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक छोड़नेके योग्य है ॥५६॥


अमृतेनेव या दृष्टा मामसिञ्चन्मनोहरा । अमरीभ्योऽपि दयिता सर्वाभ्यः पूर्वमुत्तमा ॥५७॥

अद्यैव सा परासक्तहृदया जनकात्मजा । विषकुम्भीसमात्यन्तं सञ्जातोद्वेजनी मम ॥५८॥

अर्थ: जो सीता पहले इतनी मनोहर थी कि दिखनेपर मानो अमृतसे ही मुझे सींचती थी और समस्त देवियोंसे भी अधिक प्रिय जान पड़ती थी आज वही परासक्तहृदया होनेसे विषभृत कलशीके समान मुझे अत्यन्त उद्वेग उत्पन्न कर रही है ॥५७-५८॥


अनिच्छन्त्यपि मे पूर्वमशून्यं याकरोन्मनः । सैवेयमधुना जीर्णतृणानादरमागता ॥५९॥

अर्थ: नहीं चाहने पर भी जो पहले मेरे मनको अशून्य करती थी अर्थात् जो मुझे नहीं चाहती थी फिर भी मैं मनमें निरन्तर जिसका ध्यान किया करता था वही आज जीर्ण तृणके समान अनादरको प्राप्त हुई है ॥५९॥


अधुनाऽन्याहितस्वान्ता यद्यपीच्छेदियं तु माम् । तथापि काऽनया प्रीतिः सद्भावपरिमुक्तया ॥६०॥

अर्थ: अन्य पुरुषमें जिसका चित्त लग रहा है ऐसी यह सीता यदि मुझे चाहती भी है तो सद्भावसे रहित इससे मुझे क्या प्रीति हो सकती है ? ॥६०॥


आसीद्यदानुकूलो मे विद्वान् भ्राता विभीषणः । उपदेष्टा तदा नैवं शमं दग्धं मनो गतम् ॥६१॥

अर्थ: जिस समय मेरा विद्वान् भाई विभीषण, मेरे अनुकूल था तथा उसने हितका उपदेश दिया था उस समय यह दुष्ट मन इस प्रकार शान्तिको प्राप्त नहीं हुआ ॥६१॥


प्रमादाद्विकृतिं प्राप्तं मनः समुपदेशतः । प्रायः पुण्यवतां पुंसां वशीभावेऽवतिष्ठते ॥६२॥

अर्थ: अपितु उसके उपदेशसे प्रमादके वशीभूत हो उल्टा विकार भावको प्राप्त हुआ सो ठीक ही है क्योंकि प्रायःकर पुण्यात्मा पुरुषों का ही मन वशमें रहता है ॥६२॥


श्वः संग्रामकृतौ सार्द्धं सचिवैर्मन्त्रणं कृतम् । अधुना कीदृशी मैत्री वीरलोकविगर्हिता ॥६३॥

अर्थ: यह विचार करनेके अनन्तर रावणने पुनः विचार किया कि कल संग्राम करनेके विषयमें मन्त्रियोंके साथ मन्त्रणा की थी फिर इस समय वीर लोगोंके द्वारा निन्दित मित्रता की चर्चा कैसी ? ॥६३॥


योद्धव्यं करुणा चेति द्वयमेतद्विरुध्यते । अहो सङ्कटमापन्नः प्राकृतोऽहमिदं महत् ॥६४॥

अर्थ: युद्ध करना और करुणा प्रकट करना ये दो काम विरुद्ध हैं । अहो ! मैं एक साधारण पुरुषकी तरह इस महान् संकटको प्राप्त हुआ हूँ ॥६४॥


यद्यर्पयामि पद्माय जानकीं कृपयाऽधुना । लोको दुर्ग्रहचित्तोऽयं ततो मां वेत्त्यशक्तकम् ॥६५॥

अर्थ: यदि मैं इस समय दया वश रामके लिए सीताको सौंपता हूँ तो लोग मुझे असमर्थ समझेंगे क्योंकि सबके चित्तको समझना कठिन है ॥६५॥


यत् किञ्चित्करणोन्मुक्तः सुखं जीवति निर्घृणः । जीवत्यस्मद्विधो दुःखं करुणामृदुमानसः ॥६६॥

अर्थ: जो चाहे जो करनेमें स्वतन्त्र है ऐसा निर्दय मनुष्य सुखसे जीवन बिताता और जिसका मन दयासे कोमल है ऐसा मेरे समान पुरुष दुःखसे जीवन काटता है ॥६६॥


अर्थ: जिससे कि तीनों लोकोंके नाथके द्वारा स्तुत तीर्थङ्कर जिनेन्द्र, चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण तथा हमारे जैसे पुरुष इसी वंशमें जन्म ग्रहण करेंगे ॥६६॥


हरितार्च्यसमुन्नद्धौ तौ कृत्वाऽऽजौ निरस्त्रकौ । जीवग्राहं गृहीतौ च पद्मलक्षणसंज्ञकौ ॥६७॥

पश्चाद्विभवसंयुक्तो पद्मनाभाय मैथिलीम् । अर्पयामि न मे पापं तथा सत्युपजायते ॥६८॥

अर्थ: यदि मैं सिंहवाहिनी और गरुडवाहिनी विद्याओंसे युक्त राम-लक्ष्मणको युद्धमें निरस्त्र कर जीवित पकड़ लूँ और पश्चात् वैभवके साथ रामके लिए सीताको वापिस सौंपूँ तो ऐसा करनेसे मुझे सन्ताप नहीं होगा ॥६७-६८॥


अर्थ: जिस मनुष्यने निकाचित कर्म बाँधा है वह उसका फल नियमसे भोगता है । अन्यथा शास्त्र रूपी सूर्यके देदीप्यमान रहते हुए किस मनुष्य रूपी उलूकके अन्धकार रह सकता है ॥६७॥


महाँल्लोकापवादश्च भयान्यायसमुद्भवः । न जायते करोम्येवं ततो निश्चिन्तमानसः ॥६९॥

अर्थ: साथ ही भय और अन्यायसे उत्पन्न हुआ बहुत भारी लोकापवाद भी नहीं होगा अतः मैं निश्चिन्त चित्त होकर ऐसा ही करता हूँ ॥६९॥


मनसा सम्प्रधार्यैवं महाविभवसङ्गतः । ययावन्तःपुराम्भोजखण्डं रावणवारणः ॥७०॥

अर्थ: मनसे इस प्रकार निश्चय कर महा वैभवसे युक्त रावण रूपी हाथी अन्तःपुर रूपी कमल वनमें चला गया ॥७०॥


ततः परिभवं स्मृत्वा महान्तं शत्रुसम्भवम् । क्रोधारुणेक्षणो भीमः संवृत्तोऽन्तकसन्निभः ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रु की ओरसे उत्पन्न महान् परिभवका स्मरण कर रावणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह स्वयं यमराजके समान भयंकर हो गया ॥७१॥


बभाण दशवक्त्रस्तद्वचनं स्फुरिताधरः । स्त्रीणां मध्ये ज्वरो येन समुद्भूतः सुदुःसहः ॥७२॥

अर्थ: जिसका ओठ काँप रहा था ऐसा रावण वह वचन बोला कि जिससे स्त्रियोंके बीचमें अत्यन्त दुःसह ज्वर उत्पन्न हो आया ॥७२॥


गृहीत्वा समरे पापं तं दुर्ग्रीवं सहाङ्गदम् । भागद्वयं करोम्येष खड्गेन द्युतिहासिना ॥७३॥

अर्थ: उसने कहा कि मैं युद्धमें अङ्गद सहित उस पापी दुर्ग्रीवको पकड़ कर किरणोंसे हँसनेवाला तलवारसे उसके दो टुकड़े अभी हाल करता हूँ ॥७३॥


तमोमण्डलकं तं च गृहीत्वा दृढसंयतम् । लोहमुद्गरनिर्घातैस्त्याजयिष्यामि जीवितम् ॥७४॥

अर्थ: उस भामण्डलको पकड़ कर तथा अच्छी तरह बाँध कर लोहके मुद्गरोंकी मारसे उसके प्राण घुटाऊँगा ॥७४॥


करालतीक्ष्णधारेण क्रकचेन मरुत्सुतम् । यन्त्रितं काष्ठयुग्मेन पाटयिष्यामि दुर्णयम् ॥७५॥

अर्थ: और अन्यायी हनूमान्को दो लकड़ियोंके सिकंजेमें कस कर अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाली करोंतसे चीरूँगा ॥७५॥


मुक्त्वा राघवमुद्वृत्तानखिलानाहवे परान् । अस्त्रौघैश्चूर्णयिष्यामि दुराचारान् हतात्मनः ॥७६॥

अर्थ: एक रामको छोड़ कर मर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाले जितने अन्य दुराचारी दुष्ट शत्रु हैं उन सबको युद्धमें शस्त्र-समूहसे चूर-चूर कर डालूँगा ॥७६॥


इति निश्चयमापन्ने वर्तमाने दशानने । वाचो नैमित्तवक्त्रेषु चरन्ति मगधेश्वर ॥७७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे मगधेश्वर ! जब रावण उक्त प्रकारका निश्चय कर रहा था तब निमित्तज्ञानियोंके मुखोंमें निम्न प्रकारके वचन विचरण कर रहे थे अर्थात् वे परस्पर इस प्रकार की चर्चा कर रहे थे कि ॥७७॥


उत्पाताः शतशो भीमाः सम्प्रत्येते समुद्गताः । आयुधप्रतिमो रूक्षः परिवेषः खरत्विषः ॥७८॥

अर्थ: देखो, ये सैकड़ां प्रकारके उत्पात हो रहे हैं। सूर्यके चारों ओर शस्त्रके समान अत्यन्त रूक्ष परिवेष - परिमण्डल रहता है ॥७८॥


समस्तां रजनीं चन्द्रो नष्टः क्वापि भयादिव । निपेतुर्घोरनिर्घाता भूकम्पः सुमहानभूत् ॥७९॥

अर्थ: पूरी की पूरी रात्रि भर चन्द्रमा भयसे ही मानों कहीं छिपा रहता है, भयंकर वज्रपात होते हैं, अत्यधिक भूकम्प होता है ॥७९॥


वेपमाना दिशि प्राच्या मुल्का शोणितसन्निभा । पपात विरसं रेदुरुत्तरेण तथा शिवाः ॥८०॥

अर्थ: पूर्व दिशामें काँपती हुई रुधिरके समान लाल उल्का गिरी थी और उत्तर दिशामें शृगाल नीरस शब्द कर रहे थे ॥८०॥


हेषन्ति कम्पितग्रीवास्तुरङ्गाः प्रखरस्वनाः । हस्तिनो रूक्षनिःस्वाना घ्नंति हस्तेन मेदिनीम् ॥८१॥

अर्थ: घोड़े ग्रीवाको कँपाते तथा प्रखर शब्द करते हुए हींसते हैं और हाथी कठोर शब्द करते हुए सूंड़से पृथिवीको ताड़ित करते हैं अर्थात् पृथिवी पर सूंड़ पटकते हैं ॥८१॥


दैवतप्रतिमा जाता लोचनोदकदुर्दिनाः । निपतन्ति महावृक्षा विना दृष्टेन हेतुना ॥८२॥

अर्थ: देवताओंकी प्रतिमाएँ अश्रुजलकी वर्षाके लिए दुर्दिन स्वरूप बन गई हैं। बड़े बड़े वृक्ष बिना किसी दृष्ट कारणके गिर रहे हैं ॥८२॥


आदित्याभिमुखीभूताः काकाः खरतरस्वनाः । सङ्घातवर्जिता जाताः स्त्रस्तपक्षा महाकुलाः ॥८३॥

अर्थ: सूर्यके सन्मुख हुए कौए अत्यन्त तीक्ष्ण शब्द कर रहे हैं, अपने झुण्डको छोड़ अलग-अलग जाकर बैठे हैं, उनके पङ्ख ढीले पड़ गये हैं तथा वे अत्यन्त व्याकुल दिखाई देते हैं ॥८३॥


सरांसि सहसा शोषं प्राप्तानि विपुलान्यपि । निपेतुर्गिरिशृङ्गाणि नभो वर्षति शोणितम् ॥८४॥

अर्थ: बड़े से बड़े तालाब भी अचानक सूख गये हैं। पहाड़ोंकी चोटियाँ नीचे गिरती हैं, आकाश रुधिर की वर्षा करता है ॥८४॥


स्वल्पैरेव दिनैः प्रायः प्रभोराचक्षते मृतिम् । विकाराः खलु भावानां जायन्ते नान्यथेदृशाः ॥८५॥

अर्थ: प्रायः ये सब उत्पात थोड़े ही दिनोंमें स्वामीके मरणकी सूचना दे रहे हैं क्योंकि पदार्थोंमें इस प्रकारके अन्यथा विकार होते नहीं हैं ॥८५॥


क्षीणेष्वात्मीयपुण्येषु याति शक्रोऽपि विच्युतिम् । जनता कर्मतन्त्रेयं गुणभूतं हि पौरुषम् ॥८६॥

अर्थ: अपने पुण्यके क्षीण हो जाने पर इन्द्र भी तो च्युत हो जाता है। यथार्थमें जन-समूह कर्मोंके अधीन है और पुरुषार्थ गुणीभूत है - अप्रधान है ॥८६॥


लभ्यते खलु लब्धव्यं नातः शक्यं पलायितुम् । न काचिच्छूरता दैवे प्राणिनां स्वकृताशिनाम् ॥८७॥

अर्थ: जो वस्तु प्राप्त होनेवाली है वह प्राप्त होती ही है उससे दूर नहीं भागा जा सकता। दैवके रहते प्राणियोंकी कोई शूरवीरता नहीं चलती उन्हें अपने कियेका फल भोगना ही पड़ता है ॥८७॥


सर्वेषु नयशास्त्रेषु कुशलो लोकतन्त्रवित् । जैनव्याकरणाभिज्ञो महागुणविभूषितः ॥८८॥

एवंविधो भवन् सोऽयं दशवक्त्रः स्वकर्मभिः । वाहितः प्रस्थितः कष्टमुन्मार्गेण विमूढधीः ॥८९॥

अर्थ: देखो, जो समस्त नीति शास्त्रमें कुशल है, लोकतन्त्रको जानने वाला है, जैन व्याख्यानका जानकार है और महागुणोंसे विभूषित है ऐसा रावण इस प्रकारका होता हुआ भी स्वकृत कर्मोंके द्वारा कैसा चक्रमें डाला गया कि हाय, बेचारा विमूढ़ बुद्धि हो उन्मार्गमें चला गया ॥८८-८९॥


मरणात्परमं दुःखं न लोके विद्यते परम् । न चिन्तयत्ययं पश्य तदप्यत्यन्तगर्वितः ॥९०॥

अर्थ: संसारमें मरणसे बढ़कर कोई दुःख नहीं है पर देखो, अत्यन्त गर्वसे भरा रावण उस मरणकी भी चिन्ता नहीं कर रहा है ॥९०॥


नक्षत्रबलनिर्मुक्तो ग्रहैः सुकुटिलैः स्थितैः । पीड्यमानो रणक्षोणीमाकांक्षत्येष दुर्मनाः ॥९१॥

अर्थ: यह यद्यपि नक्षत्र बलसे रहित है तथा कुटिल-पाप ग्रहोंसे पीड़ित है तथापि मूर्ख हुआ रणभूमिमें जाना चाहता है ॥९१॥


प्रतापभङ्गभीतोऽयं वीरैकरसभावितः । कृतखेदोऽपि शास्त्रेषु युक्तायुक्तं न वीक्षते ॥९२॥

अर्थ: यह प्रतापके भङ्गसे भयभीत है, एक वीर रसकी ही भावनासे युक्त है तथा शास्त्रोंका अभ्यास यद्यपि इसने किया है तथापि युक्त-अयुक्तको नहीं देखता है ॥९२॥


अतः परं महाराज दशग्रीवस्य मानिनः । मनसि स्थितमर्थं ते वदामि शृणु तत्त्वतः ॥९३॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे महाराज! अब मैं मानी रावणके मनमें जो बात थी उसे कहता हूँ तू यथार्थमें सुन ॥९३॥


जित्वा सर्वजनं सर्वान् मुक्त्वा पुत्रसहोदरान् । प्रविशामि पुनर्लङ्कामिदं पश्चात्करोमि च ॥९४॥

अर्थ: रावणके मनमें था कि सब लोगोंको जीतकर तथा पुत्र और भाईको छुड़ा कर मैं पुनः लंकामें प्रवेश करूँ ? और यह सब पीछे करता रहूँ ॥९४॥


उद्वासयामि सर्वस्मिन्नेतस्मिन्वसुधातले । क्षुद्रान् भूगोचरान् श्लाघ्यान् स्थापयामि नभश्चरान् ॥९५॥

अर्थ: इस पृथिवीतलमें जितने क्षुद्रभूमि गोचरी हैं मैं उन सबको यहाँसे हटाऊँगा और प्रशंसनीय जो विद्याधर हैं, उन्हें ही यहाँ बसाऊँगा ॥९५॥


येनाऽत्र वंशे सुरवर्त्मगानां त्रिलोकनाथाभिनुता जिनेन्द्राः । चक्रायुधा रामजनार्दनाश्च जन्म ग्रहीष्यन्ति तथाऽऽस्मदाद्याः ॥९६॥


निकाचितं कर्म नरेण येन यत्तस्य भुंक्ते सफलं नियोगात् । कस्यान्यथा शास्त्ररवौ सुदीप्ते तमो भवेन्मानुषकौशिकस्य ॥९७॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे युद्धनिश्चयकीर्तनाभिधानं नाम द्वासप्ततितमं पर्व ॥७२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें रावणके युद्ध सम्बन्धी निश्चयका कथन करनेवाला बहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७२॥

७३. त्रिसप्ततितमं पर्व (उद्योगाभिधानं)

ततो दशाननोऽन्यत्र दिने परमभासुरः । आस्थानमण्डपे तस्थावुदिते दिवसाधिपे ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर दूसरे दिन दिनकरका उदय होनेपर परम देदीप्यमान रावण सभामण्डपमें विराजमान हुआ ॥१॥


कुबेरवरुणेशानयमसोमसमैर्नृपैः । रराज सेवितस्तत्र त्रिदशानामिवाधिपः ॥२॥

अर्थ: कुबेर, वरुण, ईशान, यम और सोमके समान अनेक राजा उसकी सेवा कर रहे थे जिससे वह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो इन्द्र ही हो ॥२॥


वृतः कुलोद्गतैर्वीरैः स्थितः केसरिविष्टरे । स बभार परां कान्ति निशाकर इव ग्रहैः ॥३॥

अर्थ: कुलमें उत्पन्न हुए वीर मनुष्योंसे घिरा तथा सिंहासनपर विराजमान रावण ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान परम कान्तिको धारण कर रहा था ॥३॥


अत्यन्तसुरभिर्दिव्यवस्त्रस्रगनुलेपनः । हारातिहारिवक्षस्कः सुभगः सौम्यदर्शनः ॥४॥

अर्थ: वह अत्यन्त सुगन्धिसे युक्त था, उसके वस्त्र, मालाएँ तथा अनुलेपन सभी दिव्य थे, हारसे उसका वक्षःस्थल अत्यन्त सुशोभित हो रहा था, वह सुन्दर था और सौम्य दृष्टिसे युक्त था ॥४॥


सदोऽवलोकमानोऽगादिति चिन्तां महामनाः । मेघवाहनवीरोऽत्र स्वप्रदेशे न दृश्यते ॥५॥

अर्थ: वह उदारचेता सभाकी ओर देखता हुआ इस प्रकार चिन्ता करने लगा कि यहाँ वीर मेघवाहन अपने स्थानपर नहीं दिख रहा है ॥५॥


महेन्द्रविभ्रमो नेतः शक्रजिन्नयनप्रियः । इतो भानुप्रभो भानुकर्णोऽसौ न निरीक्ष्यते ॥६॥

अर्थ: इधर महेन्द्रके समान शोभाको धारण करनेवाला नयनाभिरामी इन्द्रजित् नहीं है और उधर सूर्यके समान प्रभाको धारण करनेवाला भानुकर्ण ( कुम्भकर्ण ) भी नहीं दिख रहा है ॥६॥


नेदं सदःसरः शोभां धारयत्यधुना पराम् । निर्महापुरुषाम्भोजं शेषपुंस्कुमुदाञ्चितम् ॥७॥

अर्थ: यद्यपि यह सभा रूपी सरोवर शेष पुरुष रूपी कुमुदोंसे सुशोभित है तथापि उक्त महापुरुष रूपी कमलोंसे रहित होनेके कारण इस समय उत्कृष्ट शोभाको प्राप्त नहीं हो रहा है ॥७॥


उत्फुल्लपुण्डरीकाक्षः स मनोज्ञोऽपि तादृशः । चिन्तादुःखविकारेण कृतो दुःसहदर्शनः ॥८॥

अर्थ: यद्यपि उस रावणके नेत्र कमलके समान फूल रहे थे और वह स्वयं अनुपम मनोहर था तथापि चिन्ताजन्य दुःखके विकारसे उसकी ओर देखना कठिन जान पड़ता था ॥८॥


कुटिलभ्रूकुटीबन्धघनध्वान्तालिकाङ्गणम् । सरोषाशीविषच्छायं कृतान्तमिव भीषणम् ॥९॥

गाढदष्टाधरं स्वांशुचक्रमग्नं समीक्ष्य तम् । सचिवेशा भृशं भीताः किङ्कर्त्तव्यत्वगह्वराः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर टेढ़ी भौंहोंके बन्धनसे जिसके ललाट रूपी आँगनमें सघन अन्धकार फैल रहा था, जो कुपित नागके समान कान्तिको धारण करनेवाला था, जो यमराजके समान भयङ्कर था, जो बड़े जोरसे अपना ओठ डश रहा था, जो अपनी किरणोंके समूहमें निमग्न था ऐसे उस रावणको देख, बड़े-बड़े मन्त्री अत्यन्त भयभीत हो 'क्या करना चाहिये, इस विचारमें गम्भीर थे ॥९-१०॥


ममायं कुपितोऽमुष्य तस्येत्याकुलमानसाः । स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे धरणीगतमस्तकाः ॥११॥

अर्थ: ‘यह मुझपर कुपित है या उसपर’ इस प्रकार जिनके मन व्याकुल हो रहे थे तथा जो हाथ जोड़े हुए पृथिवीकी ओर देखते बैठे थे ॥११॥


मयोग्रशुकलोकाक्षसारणाद्याः सलज्जिताः । परस्परं विविक्षन्तः क्षितिं च विनताननाः ॥१२॥

अर्थ: ऐसे मय, उग्र, शुक, लोकाक्ष और सारण आदि मन्त्री परस्पर एक दूसरेसे लज्जित होते हुए नीचेको मुख कर बैठे थे तथा ऐसे जान पड़ते थे मानो पृथिवीमें ही प्रवेश करना चाहते हों ॥१२॥


प्रचलत्कुण्डला राजन् ते भटाः पार्श्ववर्तिनः । मुहुर्देव प्रसीदेति त्वरावन्तो बभाषिरे ॥१३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिनके कुण्डल हिल रहे थे ऐसे वे समीपवर्ती सुभट ‘हे देव प्रसन्न होओ प्रसन्न होओ’ इस तरह शीघ्रतासे बार-बार कह रहे थे ॥१३॥


कैलासकूटकल्पासु रत्नभासुरभित्तिषु । स्थिताः प्रासादमालासु त्रस्तास्तं ददृशुः स्त्रियः ॥१४॥

अर्थ: कैलासके शिखरके समान ऊँचे तथा रत्नोंसे देदीप्यमान दीवालोंसे युक्त महलोंमें रहनेवाली स्त्रियाँ भयभीत हो उसे देख रही थीं ॥१४॥


मणिजालगवाक्षान्तन्यस्तसम्भ्रान्तलोचना । मन्दोदरी ददर्शैनं समालोडितमानसा ॥१५॥

अर्थ: मणिमय झरोखों के अन्तमें जिसने अपने घबड़ाये हुए नेत्र लगा रक्खे थे, तथा जिसका मन अत्यन्त विह्वल था ऐसी मन्दोदरीने भी उसे देखा ॥१५॥


लोहिताक्षः प्रतापाढ्यः समुत्थाय दशाननः । अमोघरत्नशस्त्राढ्यमायुधालयमुज्ज्वलम् ॥१६॥

वज्रालयमिवेशानः सुराणां गन्तुमुद्यतः । विशतश्च ममेतस्य दुर्निमित्तानि जज्ञिरे ॥१७॥

अर्थ: अथानन्तर लाल लाल नेत्रोंको धारण करनेवाला प्रतापी रावण उठकर अमोघ शस्त्ररूपी रत्नोंसे युक्त उज्वल शस्त्रागारमें जानेके लिए उस प्रकार उद्यत हुआ जिस प्रकार कि वज्रालयमें जानेके लिए इन्द्र उद्यत होता है । जब वह शस्त्रागारमें प्रवेश करने लगा तब निम्नाङ्कित अपशकुन हुए ॥१६-१७॥


पृष्ठतः क्षुतमग्रे च छिन्नो मार्गो महाहिना । हाही धिङ्त्वां क यासीति वचांसि तमिवावदन् ॥१८॥

अर्थ: पीछेकी ओर छींक हुई, आगे महानागने मार्ग काट दिया, ऐसा लगने लगा जैसे लोग उससे यह शब्द कह रहे हों कि हा, ही, तुझे धिक्कार है कहाँ जा रहा है ॥१८॥


वातूलप्रेरितं छत्रं भग्नं वैडूर्यदण्डकम् । निपपातोत्तरीयं च बलिभुग्दक्षिणोऽरटत् ॥१९॥

अर्थ: नील मणिमय दण्डसे युक्त उसका छत्र वायुसे प्रेरित हो टूट गया, उसका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया और दाहिनी ओर कौआ काँव काँव करने लगा ॥१९॥


अन्येऽपि शकुनाः क्रूरास्तं युद्धाय न्यवर्त्तयन् । वचसा कर्मणा ते हि न कायेनानुमोदकाः ॥२०॥

अर्थ: इनके सिवाय और भी क्रूर अपशकुनोंने उसे युद्धके लिए मना किया । यथार्थमें वे सब अपशकुन उसे युद्धके लिए न वचनसे अनुमति देते थे न क्रियासे और न कामसे ही ॥२०॥


नानाशकुनविज्ञानप्रवीणधिषणा ततः । दृष्ट्वा पापान्महोत्पातानत्यन्ताकुलमानसाः ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर नाना शकुनोंके ज्ञानमें जिनकी बुद्धि निपुण थी ऐसे लोग उन पाप पूर्ण महा उत्पातोंको देख अत्यन्त व्यग्रचित्त हो गए ॥२१॥


मन्दोदरी समाहूय शुकादीन् सारमन्त्रिणः । जगाद नोच्यते कस्माद्भवद्भिः स्वहितं नृपः ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर मन्दोदरीने शुक आदि श्रेष्ठ मन्त्रियोंको बुलाकर कहा कि आप लोग राजासे हितकारी बात क्यों नहीं कहते हैं ॥२२॥


किमेतच्चेष्ट्यतेऽद्यापि विज्ञातस्वपरक्रियैः । अशक्ताः कुम्भकर्णाद्याः कियद्बन्धनमागताः ॥२३॥

अर्थ: निज और परकी क्रियाओंको जानने वाले होकर भी आप अभी तक यह क्या चेष्टा कर रहे हैं ? कुम्भकर्णादिक अशक्त हो कितने दिनसे बन्धनमें पड़े हैं ? ॥२३॥


लोकपालौजसो वीराः कृतानेकमहाद्भुताः । शत्रुरोधमिमे प्राप्ताः किं नु कुर्वन्ति वः शमम् ॥२४॥

अर्थ: लोकपालोंके समान जिनका तेज है तथा जिन्होंने अनेक आश्चर्यके काम किये हैं ऐसे ये वीर, शत्रुके यहाँ बन्धनको प्राप्त होकर क्या आप लोगोंको शक्ति उत्पन्न कर रहे हैं ? ॥२४॥


प्रणिपत्य ततो देवीमित्याहुर्मुख्यमन्त्रिणः । कृतान्तशासनो मानी स्वप्रधानो दशाननः ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर मुख्य मन्त्रियोंने प्रणाम कर मन्दोदरी से इस प्रकार कहा कि हे देवि ! दशाननका शासन यमराजके शासनके समान है, वे अत्यन्त मानी और अपने आपको ही प्रधान मानने वाले हैं ॥२५॥


वचनं कुरुते यस्य नरस्य परमं हितम् । न स स्वामिनि ! लोकेऽस्मिन् समस्तेऽप्युपलभ्यते ॥२६॥

अर्थ: जिस मनुष्यके परम हितकारी वचनको वे स्वीकृत कर सकें हे स्वामिनि ! समस्त लोकमें ऐसा मनुष्य नहीं दिखाई देता ॥२६॥


या काचिद्भविता बुद्धिर्नृणां कर्मानुवर्त्तिनाम् । अशक्या साऽन्यथाकर्त्तुं सेन्द्रैः सुरगणैरपि ॥२७॥

अर्थ: कर्मानुकूल प्रवृत्ति करनेवाले मनुष्योंकी जो बुद्धि होनेवाली है उसे इन्द्र तथा देवोंके समूह भी अन्यथा नहीं कर सकते ॥२७॥


अर्थसाराणि शास्त्राणि नय नौशनसं परम् । जानन्नपि त्रिकूटेन्द्रः पश्य मोहेन बाध्यते ॥२८॥

अर्थ: देखो, रावण समस्त अर्थ शास्त्र और सम्पूर्ण नीतिशास्त्रको जानते हैं तो भी मोहके द्वारा पीड़ित हो रहे हैं ॥२८॥


उक्तः स बहुशोऽस्माभिः प्रकारेण न केन सः । तथापि तस्य नो चित्तमभिप्रेतान्निवर्त्तते ॥२९॥

अर्थ: हम लोगोंने उन्हें अनेकों बार किस प्रकार नहीं समझाया है ? अर्थात् ऐसा प्रकार शेष नहीं रहा जिससे हमने उन्हें न समझाया हो फिर भी उनका चित्त इष्ट वस्तु - सीतासे पीछे नहीं हट रहा है ॥२९॥


महापूरकृतोत्पीडः पयोत्राहसमागमे । दुष्करो हि नदो धर्तुं जीवो वा कर्मचोदितः ॥३०॥

अर्थ: वर्षा ऋतुके समय जिसमें जलका महा प्रवाह उल्लंघ कर बह रहा है ऐसे महानदको अथवा कर्मसे प्रेरित मनुष्यको रोक रखना कठिन काम है ॥३०॥


ईशे तथापि को दोषः स्वयं वक्तुं त्वमर्हसि । कदाचित्ते मतिं कुर्यादुपेक्षणमसाम्प्रतम् ॥३१॥

अर्थ: हे स्वामिनि ! यद्यपि हम लोग कह कर हार चुके हैं तथापि आप स्वयं कहिये इसमें क्या दोष है ? संभव है कि कदाचित् आपका कहना उन्हें सुबुद्धि उत्पन्न कर सके । उपेक्षा करना अनुचित है ॥३१॥


इत्युदाहृतमाधाय निश्चिन्तस्वान्तधारिणी । परिवेपवती लक्ष्मीरिव सम्भ्रमवर्त्तिनी ॥३२॥

स्वच्छायतविचित्रेण पयःसादृश्यधारिणा । अंशुकेनावृता देवी गन्तुं रावणमुद्यता ॥३३॥

अर्थ: इस प्रकार मन्त्रियोंका कहा श्रवण कर जिसने रावणके पास जाने का निश्चित विचार किया था, जो भय से काँप रही थी तथा घबड़ाई हुई लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, जो स्वच्छ, लम्बे, विचित्र और जल की सदृशताको धारण करनेवाले वस्त्रसे आवृत्त थी ऐसी मन्दोदरी रावणके पास जानेके लिए उद्यत हुई ॥३२-३३॥


मन्मथस्यान्तिकं गन्तुं तां प्रवृत्तां रतिं यथा । परिवर्गः समालोक्य तत्परत्वमुपागतः ॥३४॥

अर्थ: कामदेवके समीप जानेके लिए उद्यत रतिके समान, रावणके समीप जाती हुई मन्दोदरीको देख परिवारके समस्त लोगोंका ध्यान उसीकी ओर जा लगा ॥३४॥


छत्रचामरधारीभिरङ्गनाभिः समन्ततः । आपूर्यत शचीवेन्द्रं व्रजन्तो प्रवरानना ॥३५॥

अर्थ: छत्र तथा चमरोंको धारण करनेवाली स्त्रियाँ जिसे सब ओरसे घेरे हुई थीं ऐसी सुमुखी मन्दोदरी ऐसी जान पड़ती थी मानो इन्द्रके पास जाती हुई शची ही हो - इन्द्राणी ही हो ॥३५॥


श्वसन्ती प्रस्खलन्ती च किञ्चिच्छिथिलमेखला । प्रियकार्यरता नित्यमनुरागमहानदी ॥३६॥

आयान्ती तेन सा दृष्टा लीलावर्त्तेन चक्षुषा । स्पृशता कवचं मुख्यं शस्त्रजातं च सादरम् ॥३७॥

अर्थ: जो लम्बी साँस भर रही थी, जो चलती-चलती बीचमें स्खलित हो जाती थी, जिसकी करधनी कुछ-कुछ ढीली हो रही थी, जो निरन्तर पतिका कार्य करनेमें तत्पर थी और जो अनुरागकी मानो महानदी ही थी ऐसी आती हुई मन्दोदरीको रावण ने लीलापूर्ण चक्षुसे देखा । उस समय रावण अपने कवच तथा मुख्य-मुख्य शस्त्रोंके समूहका आदरपूर्वक स्पर्श कर रहा था ॥३६-३७॥


उक्ता मनोहरे हंसवधूललितगामिनि । रभसेन किमायान्त्यास्तव देवि प्रयोजनम् ॥३८॥

अर्थ: रावणने कहा कि हे मनोहरे ! हे हंसोके समान सुन्दर चालसे चलनेवाली प्रिये ! हे देवि ! बड़े वेगसे तुम्हारे यहाँ आनेका प्रयोजन क्या है ? ॥३८॥


ह्रियते हृदयं कस्माद्दशवक्त्रस्य भामिनि । सन्निधानमिव स्वप्ने प्रस्तावपरिवर्जितम् ॥३९॥

अर्थ: हे भामिनि ! स्वप्नमें अकस्मात् प्राप्त हुए सन्निधानके समान तुम्हारा आगमन रावणके हृदयको क्यों हर रहा है ? ॥३९॥


ततो निर्मलसम्पूर्णशशाङ्कप्रतिमानना । सम्फुल्लाम्भोजनयना निसर्गोत्तमविभ्रमा ॥४०॥

मनोहरकटाक्षेषु विसर्जनविचक्षणा । मदनावासभूताङ्गा मधुरस्खलितस्वना ॥४१॥

दन्ताधरविचित्रोरुच्छायापिञ्जरविग्रहा । स्तनहेममहाकुम्भभारसन्नमितोदरी ॥४२॥

स्खलद्वलित्रयात्यन्तसुकुमाराऽतिसुन्दरी । जगाद प्रणता नाथप्रसादस्यातिभूमिका ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मुख निर्मल पूर्णचन्द्रकी तुलनाको प्राप्त था,जसके नेत्र खिले हुए कमलके समान थे, जो स्वभावसे ही उत्तम हाव-भावको धारण करनेवाली थी, जो मनोहर कटाक्षोंके छोड़नेमें चतुर थी, जिसका शरीर मानो कामदेवके रहनेका स्थान था, जिसके मधुर शब्द बीच-बीचमें स्खलित हो रहे थे, जिसका शरीर दाँत तथा ओठोंकी रङ्ग-विरङ्गी विशाल कान्तिसे पिञ्जरवर्ण हो रहा था, जिसका उदर स्तनरूपी स्वर्णमय महाकलशोंसे झुक रहा था, जिसकी त्रिवलिरूपी रेखाएँ स्खलित हो रहीं थीं, जो अत्यन्त सुकुमार थी, अत्यधिक सुन्दरी थी, और जो पतिके प्रसादकी उत्तम भूमि थी ऐसी मन्दोदरी प्रणाम कर बोली कि ॥४०-४३॥


प्रयच्छ देव मे भर्तृभिक्षामेहि प्रसन्नताम् । प्रेम्णा परेग धर्मेण कारुण्येन च सङ्गतः ॥४४॥

अर्थ: हे देव ! आप परमप्रेम और दया-धर्मसे सहित हो अतः मेरे लिए पतिकी भीख देओ प्रसन्नताको प्राप्त होओ ॥४४॥


वियोगनिम्नगादुःखजले सङ्कल्पवीचिके। महाराज निमज्जन्तीं मकामुत्तम धारय ॥४५॥

अर्थ: हे महाराज ! हे उत्तम संकल्परूपी तरङ्गोंसे युक्त ! वियोगरूपी नदीके दुःखरूपी जलमें डूबती हुई मुझको आलम्बन देकर रोको-मेरी रक्षा करो ॥४५॥


कुलपद्मवनं गच्छत्प्रलयं विपुलं परम् । मो पेक्षिष्ठा महाबुद्धे बान्धवव्योमभास्करः ॥४६॥

अर्थ: हे महाबुद्धिमन् ! तुम अपने परिजन रूपी आकाशमें सूर्यके समान हो इसलिए प्रलयको प्राप्त होते हुए इस विशाल कुलरूपी कमल वन की अत्यन्त उपेक्षा न करो ॥४६॥


किञ्चिदाकर्णय स्वामिन् वचः परुषमप्यदः । क्षन्तुमर्हसि मे यस्माद्दत्तमेव त्वया पदम् ॥४७॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! यद्यपि मेरे वचन कठोर हैं तथापि कुछ श्रवण कीजिये । यतश्च यह पद मुझे आपने ही दिया है अतः आप मेरा अपराध क्षमा करनेके योग्य हैं ॥४७॥


अविरुद्धं स्वभावस्थं परिणामसुखावहम् । वचोऽप्रियमपि ग्राह्यं सुहृदामौषधं यथा ॥४८॥

अर्थ: मित्रोंके जो वचन विरोध रहित हैं, स्वभावमें स्थित हैं और फलकालमें सुख देने वाले हैं वे अप्रिय होने पर भी औषधिके समान ग्रहण करनेके योग्य है ॥४८॥


किमर्थं संशयतुलामारूढोऽस्य तुलामिमाम् । सन्तापयसि कस्मात्त्वमस्मांश्च निरवग्रहः ॥४९॥

अर्थ: आप इस उपमा रहित संशयकी तुला पर किसलिए आरूढ़ हो रहे हैं ? और किसलिए किसी रुकावटके विना ही अपने आपको तथा हम लोगोंको सन्ताप पहुँचा रहे हो ॥४९॥


अद्यापि किमतीतं ते सैव भूमिः पुरातनी । उन्मार्गप्रस्थितं चित्तं केवलं देव वारय ॥५०॥

अर्थ: आज भी आपका क्या चला गया ? वही आपकी पुरातनी अर्थात् पहलेकी भूमि है केवल हे देव ! उन्मार्गमें गए हुए चित्तको रोक लीजिए ॥५०॥


मनोरथः प्रवृत्तोऽयं नितान्तं तव सङ्कटे । इन्द्रियाश्वान्नियच्छाऽऽशु विवेकदृढरश्मिभृत् ॥५१॥

अर्थ: आपका यह मनोरथ अत्यन्त संकटमें प्रवृत्त हुआ है इसलिए इन इन्द्रियरूपी घोड़ोंको शीघ्र ही रोक लीजिए । आप तो विवेकरूपी मजबूत लगामको धारण करनेवाले हैं ॥५१॥


उद्धैर्यत्वं गभीरत्वं परिज्ञातं च तत्कृते । गतं येन कुमार्गेण नाथ केनापि नीयसे ॥५२॥

अर्थ: आपकी उत्कृष्ट धीरता, गम्भीरता और विचारकता उस सीताके लिए जिस कुमार्गसे गई है हे नाथ ! जान पड़ता है कि आप भी किसीके द्वारा उसी कुमार्गसे ले जाये जा रहे हैं ॥५२॥


दृष्ट्वा शरभवच्छायामात्मीयां कूपवारिणि । किं प्रवृत्तोऽसि परमामापदायासदायिनि ॥५३॥

अर्थ: जिस प्रकार अष्टापद कुएँके जलमें अपनी परिछाईं देख दुःखको प्राप्त हुआ उसी प्रकार अत्यन्त दुःख देनेवाली आपत्तियोंमें तुम किसलिए प्रवृत्त हो रहे हो ॥५३॥


अयशः शालमुत्तुङ्गं भित्त्वा क्लेशकरं परम् । कदलीस्तम्भनिःसारं फलं किमभिवाञ्छसि ॥५४॥

अर्थ: अत्यधिक क्लेश उत्पन्न करनेवाले अपयशरूपी ऊँचे वृक्षको भेदन कर सुखसे रहिये । आप केलेके स्तम्भके समान किस निःसार फलकी इच्छा रखते हैं ॥५४॥


श्लाघ्यं जलधिगम्भीरं कुलं भूयो विभूषय । शिरोऽर्त्ति कुलजातानां मुञ्च भूगोचरस्त्रियम् ॥५५॥

अर्थ: हे समुद्रके समान गम्भीर ! अपने प्रशस्त कुलको फिरसे अलंकृत कीजिए और कुलीन मनुष्योंके शिर दर्दके समान भूमिगोचरीकी स्त्री-सीताको शीघ्र ही छोड़िए ॥५५॥


विरोधः क्रियते स्वामिन् वीरैः स्वाप्तिप्रयोजनः । मृत्युं च मानसे कृत्वा परेषामात्मनोऽपि वा ॥५६॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! वीर सामन्त जो एक दूसरेका विरोध करते हैं सो धनकी प्राप्तिके प्रयोजनसे करते हैं अथवा मनमें ऐसा विचारकर करते हैं कि या तो पर को मारूँ या मैं स्वयं मरूँ । सो यहाँ धनकी प्राप्ति तो आपके विरोधका प्रयोजन हो नहीं सकती क्योंकि आपको धनकी क्या कमी है ? और दूसरा प्रयोजन अपना पराया मरना है सो किसलिए मरना ? पराई स्त्रीके लिए मरना यह तो हास्यकर बात है ॥५६॥


पराजित्यापि संघातं नाथ सम्बन्धिनां तव । कोऽर्थः सम्पद्यते तस्मात्त्यज सीतामयं ग्रहम् ॥५७॥

अर्थ: अथवा माना कि शत्रुओंके समूहका पराजित करना विरोधका प्रयोजन है सो शत्रु समूहको पराजित करने पर आपका कौनसा प्रयोजन सम्पन्न होता है ? अतः हे स्वामिन् ! सीतारूपी हठ छोड़िए ॥५७॥


अन्यदास्तां व्रतं तावत्परस्त्रीमुक्तिमात्रतः । पुमान् जन्मद्वये शंसां सुशीलः प्रतिपद्यते ॥५८॥

अर्थ: और दूसरा व्रत रहने दीजिए एक परस्त्रीत्याग व्रत के द्वारा ही उत्तम शीलको धारण करनेवाला पुरुष दोनों जन्मोंमें प्रशंसाको प्राप्त होता है ॥५८॥


कज्जलोपमकारीषु परनारीषु लोलुपः । मेरुगौरवयुक्तोऽपि तृणलाघवमेति ना ॥५९॥

अर्थ: कज्जलकी उपमा धारण करनेवाली परस्त्रियोंका लोभी मनुष्य, मेरुके समान गौरवसे युक्त होने पर भी तृणके समान तुच्छताको प्राप्त हो जाता है ॥५९॥


देवैरनुगृहीतोऽपि चक्रवर्त्तिसुतोऽपि वा । परस्त्रीसङ्गपङ्केन दिग्धोऽकीर्त्तिं व्रजेत्पराम् ॥६०॥

योऽन्यप्रमदया साकं कुरुते मूढको रतिम् । आशीविषभुजङ्ग्यासौ रमते पापमानसः ॥६१॥

अर्थ: देव जिस पर अनुग्रह करते हैं अथवा जो चक्रवर्तीका पुत्र है वह भी परस्त्रीकी आसक्तिरूपी कर्दमसे लिप्त होता हुआ परम अकीर्तिको प्राप्त होता है, जो मूर्ख परस्त्रीके साथ प्रेम करता है मानो वह पापी आशीविष नामक सर्पिणीके साथ रमण करता है ॥६०-६१॥


निर्मलं कुलमत्यन्तं मायशोमलिनं कुरु । आत्मानं च करोषि त्वं तस्माद्वर्जय दुर्मतिम् ॥६२॥

अर्थ: अत्यन्त निर्मल कुलको अपकीर्तिसे मलिन मत कीजिए । अथवा आप स्वयं अपने आपको मलिन कर रहे हैं सो इस दुर्बुद्धिको छोड़िए ॥६२॥


धवान्तराबलेच्छातः प्राप्ताः नाशं महाबलाः । सुमुखाशनिघोषाद्यास्ते च किं न गताः श्रुतिम् ॥६३॥

अर्थ: सुमुख तथा वज्रघोष आदि महाबलवान् पुरुष, परस्त्रीकी इच्छा मात्रसे नाशको प्राप्त हो चुके सो क्या वे आपके सुननेमें नहीं आये ? ॥६३॥


सितचन्दनदिग्धाङ्गो नवजीमूतसन्निभः । मन्दोदरीमथावोचद्रावणः कमलेक्षणः ॥६४॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका समस्त शरीर सफेद चन्दनसे लिप्त था तथा जो स्वयं नूतन मेघके समान श्यामल वर्ण था ऐसा कमल-लोचन रावण मन्दोदरीसे बोला कि ॥६४॥


अयि कान्ते किमर्थं त्वमेवं कातरतां गता । भीरुस्त्वाद्धीरुभावासि नाम हीदं सहार्थकम् ॥६५॥

अर्थ: हे प्रिये ! तू क्यों इस तरह अत्यन्त कातरताको प्राप्त हो रही है ? भीरु अर्थात् स्त्री होनेके कारण ही तू भीरु अर्थात् कातर भावको धारण कर रही है । अहो ! स्त्रीका भीरु यह नाम सार्थक ही है ॥६५॥


सूर्यकीर्त्तिरहं नासौ न चाप्यशनिघोषकः । न चेतरो नरः कश्चित्किमर्थमिति भाषसे ॥६६॥

अर्थ: मैं न अर्ककीर्ति हूँ, न वज्रघोष हूँ और न कोई दूसरा ही मनुष्य हूँ फिर इस तरह क्यों कह रही है ? ॥६६॥


मृत्युदावानलः सोऽहं शत्रुपादपसंहतेः । समर्पयामि नो सीतां मा भैर्षामन्दमानसे ॥६७॥

अर्थ: मैं शत्रुरूप वृक्षोंके समूहको भस्म करनेवाला वह मृत्युरूपी दावानल हूँ इसलिए सीताको वापिस नहीं लौटाऊँगा । हे मन्दमते ! भय मत कर ॥६७॥


अनया कथया किं ते रक्षायां त्वं नियोजिता । शक्नोषि रक्षितुं नाथ मह्यमर्पय तां द्रुतम् ॥६८॥

अर्थ: अथवा इस चर्चा से तुम्हें क्या प्रयोजन है ? तू तो सीताकी रक्षा करनेके लिए नियुक्त की गई है सो यदि रक्षा करनेमें समर्थ नहीं है तो मुझे शीघ्र ही वापिस सौंप दे ॥६८॥


ऊचे मन्दोदरी सार्द्धं तया रतिसुखं भवान् । वाञ्छत्यर्पय मे तामित्येवं च वदतेऽत्रपः ॥६९॥

अर्थ: यह सुन मन्दोदरीने कहा कि आप उसके साथ रति-सुख चाहते हैं इसीलिए निर्लज्ज हो इस प्रकार कह रहे हैं कि उसे मुझे सौंप दो ॥६९॥


इत्युक्त्वेर्ष्यामिवं क्रोधं वहती विपुलेक्षणा । कर्णोत्पलेन सौभाग्यमतिरेनमताडयत् ॥७०॥

अर्थ: इतना कह ईर्ष्या सम्बन्धी क्रोधको धारण करनेवाली उस दीर्घलोचना मन्दोदरीने सौभाग्यकी इच्छासे कर्णोत्पलके द्वारा रावणको ताड़ा ॥७०॥


पुनरीर्ष्यां नियम्यान्तर्जगाद वद सुन्दर । किं माहात्म्यं त्वया तस्या दृष्टं तां यदभीच्छसि ॥७१॥

अर्थ: पुनः मन ही मन ईर्ष्याको रोककर उसने कहा कि हे सुन्दर ! बताओ तो सही कि तुमने उसका क्या माहात्म्य देखा है ? जिससे उसे इस तरह चाहते हो ॥७१॥


न सा गुणवती ज्ञाता ललामा न च रूपतः । कलासु च न निष्णाता न च चित्तानुवर्त्तिनी ॥७२॥

अर्थ: न तो वह गुणवती जान पड़ी है, न रूपमें सुन्दर है, न कलाओं में निपुण है और न आपके मनके अनुसार प्रवृत्ति करनेवाली है ॥७२॥


ईदृश्याऽपि तया साकं कान्त का ते रतौ मतिः । आत्मनो लाघवं शुद्धं भवस्त्वं नानुबुद्ध्यसे ॥७३॥

अर्थ: फिर भी ऐसी सीताके साथ रमण करने की हे वल्लभ ! तुम्हारी कौन बुद्धि है । मेरी दृष्टिमें तो केवल अपनी लघुता ही प्रकट हो रही है जिसे आप समझ नहीं रहे हैं ॥७३॥


न कश्चित्स्वयमात्मानं शंसन्नाप्नोति गौरवम् । गुणा हि गुणतां यांति गुण्यमानाः पराननैः ॥७४॥

अर्थ: कोई भी पुरुष स्वयं अपने आपकी प्रशंसा करता हुआ गौरवको प्राप्त नहीं होता यथार्थमें जो गुण दूसरोंके मुखोंसे प्रशंसित होते हैं वे ही गुणपनेको प्राप्त होते हैं ॥७४॥


तदहं नो वदाम्येवं किं नु वेत्सि त्वमेव हि । वराक्या सीतया किं वा न श्रीरपि समेति मे ॥७५॥

अर्थ: इसीलिए मैं ऐसा कुछ नहीं कहती हूँ किन्तु आप स्वयं जानते हैं कि बेचारी सीताकी तो बात ही क्या, लक्ष्मी भी मेरे समान नहीं है ॥७५॥


विजहीहि विभोऽत्यन्तं सीतासङ्गेप्सितात्मकम् । माऽनुषङ्गानले तीव्रे प्राप्तो निःपरिहारके ॥७६॥

अर्थ: इसलिए हे विभो ! सीताके साथ समागम की जो अत्यधिक लालसा है उसे छोड़िये, जिसका परिहार नहीं ऐसी अपवादरूपी तीव्र अग्निमें मत पड़िये ॥७६॥


मदवज्ञाकरो वाञ्छन् भूमिगोचरिणीमिमाम् । शिशुर्वैडूर्यमुत्सृज्य काचमिच्छसि मन्दकः ॥७७॥

अर्थ: आप मेरा अनादर कर इस भूमिगोचरीको चाह रहे हैं सो ऐसा जान पड़ता है मानो कोई मूर्ख बालक वैडूर्यमणिको छोड़कर काँचकी इच्छा करता है ॥७७॥


न दिव्यं रूपमेतस्या जायते मनसि स्थितम् । इमां ग्रामेयकाकारां नाथ कामयसे कथम् ॥७८॥

अर्थ: इससे आपका मनचाहा दिव्य रूप भी नहीं हो सकता अर्थात् यह विक्रियासे आपकी इच्छानुसार रूप नहीं परिवर्तित कर सकती फिर हे नाथ ! आप इस ग्रामीण स्त्रीको क्यों चाहते हैं ? ॥७८॥


यथासमीहिताकल्पकल्पनाऽतिविचक्षणा । भवामि कीदृशी ब्रूहि जाये त्वच्चित्तहारिणी ॥७९॥

पद्मालयारतिः सद्यः श्रीर्भवामि किमीश्वर । शक्रलोचनविश्रान्तभूमिः किं वा शची प्रभो ॥८०॥

अर्थ: मैं आपकी इच्छानुसार रूपको धरनेमें अतिशय निपुण हूँ सो मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं कैसी हो जाऊँ । हे स्वामिन् ! क्या शीघ्र ही तुम्हारे चित्तको हरण करनेवाली एवं कमलरूपी घरमें प्रीति धारण करनेवाला लक्ष्मी बन जाऊँ ? अथवा हे प्रभो ! इन्द्रके नेत्रोंकी विश्रामभूमिस्वरूप इन्द्राणी हो जाऊँ ? ॥७९-८०॥


मकरध्वजचित्तस्य बन्धनी रतिरेव वा । साक्षाद्भवामि किं देव भवदिच्छानुवर्त्तिनी ॥८१॥

अर्थ: अथवा कामदेवके चित्तको रोकनेवाली साक्षात् रति ही बन जाऊँ ? अथवा हे देव ! आपकी इच्छानुसार प्रवृत्ति करनेवाली क्या हो जाऊँ ? ॥८१॥


ततः किंचिदधोवक्त्रो रावणोर्द्धाक्षवीक्षणः । सव्रीडः स्वैरमूचेऽहं परस्त्रीहस्त्वयोदितः ॥८२॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मुख नीचे की ओर था, जिसके नेत्र आधे खुले थे, तथा जो लज्जासे सहित था ऐसा रावण धीरे-धीरे बोला कि हे प्रिये ! तुमने मुझे परस्त्रीसेवी कहा सो ठीक है ॥८२॥


किं मयोपचितं पश्य परमाकीर्त्तिगामिना । आत्मा लघूकृतो मूढः परस्त्रीसक्तचेतसा ॥८३॥

अर्थ: देखो मैंने यह क्या किया ? परस्त्रीमें चित्तसे आसक्त होनेसे परम अकीर्तिको प्राप्त होते हुए मैंने इस मूर्ख आत्माको अत्यन्त लघु कर दिया है ॥८२-८३॥


विषयाऽऽमिषसक्तात्मन् पापभाजनचञ्चल । धिगस्तु हृदयत्वं ते हृदयक्षुद्रचेष्टिता ॥८४॥

अर्थ: जो विषयरूपी मांसमें आसक्त है, पापका भाजन है तथा चञ्चल है ऐसे इस हृदयको धिक्कार है । रे हृदय ! तेरी यह अत्यन्त नीच चेष्टा है ॥८४॥


विलक्ष इव चोत्सर्पिमुखेन्दुस्मितचन्द्रिकः । बुद्धाक्षिकुमुदः कान्तामेवमूचे दशाननः ॥८५॥

अर्थ: इतना कह जिसके मुखचन्द्रकी मुसकान रूपी चाँदनी ऊपर की ओर फैल रही थी, तथा जिसके नेत्ररूपी कुमुद विकसित हो रहे थे ऐसे दशाननने मन्दोदरीसे पुनः इस प्रकार कहा कि ॥८५॥


देवि वैक्रियरूपेण विनैव प्रकृतिस्थिता । अत्यन्तदयिता त्वं मे किमन्यस्त्रीभिरुत्तमे ॥८६॥

अर्थ: हे देवि ! विक्रिया निर्मित रूपके विना स्वभावमें स्थित रहने पर भी तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो । हे उत्तमे ! मुझे अन्य स्त्रियोंसे क्या प्रयोजन है ? ॥८६॥


लब्धप्रसादया देव्या ततो मुदितचित्तया । भाषितं देव किं भानोर्दीपोद्योताय युज्यते ॥८७॥

अर्थ: तदनन्तर स्वामीकी प्रसन्नता प्राप्त होनेसे जिसका चित्त खिल उठा था ऐसी मन्दोदरीने पुनः कहा कि हे देव ! सूर्यके लिए दीपकका प्रकाश दिखाना क्या उचित है ? अर्थात् आपसे मेरा कुछ निवेदन करना उसी तरह व्यर्थ है जिस तरह कि सूर्यको दीपक दिखाना ॥८७॥


दशानन सुहृन्मध्ये यन्मयोक्तमिदं हितम् । अन्यानपि बुधान् पृच्छ वेद्मि नेत्यबला सती ॥८८॥

अर्थ: हे दशानन ! मैंने मित्रोंके बीच जो यह हितकारी बात कही है सो उसे अन्य विद्वानोंसे भी पूछ लीजिये । मैं अबला होनेसे कुछ समझती नहीं हूँ ॥८८॥


जानन्नपि नयं सर्वं प्रमादं दैवयोगतः । जन्तुना हितकामेन बोधनीयो न किं प्रभुः ॥८९॥

अर्थ: अथवा समस्त शास्त्रोंको जाननेवाला भी प्रभु यदि कदाचित् दैवयोगसे प्रमाद करता है तो क्या हित की इच्छा रखनेवाले प्राणीको उसे समझाना चाहिए ॥८९॥


आसीद्विष्णुरसौ साधुर्विक्रियाविस्मृतात्मकः । सिद्धान्तगीतिकाभिः किं न प्रबोधमुपाहृतः ॥९०॥

अर्थ: जैसे कि विष्णुकुमार मुनि विक्रिया द्वारा आत्माको भूल गये थे सो क्या उन्हें सिद्धान्तके उपदेश द्वारा प्रबोधको प्राप्त नहीं कराया गया था ॥९०॥


अयं पुमानियं स्त्रीति विकल्पोऽयममेधसाम् । सर्वतो वचनं साधु समीहन्ते सुमेधसः ॥९१॥

अर्थ: ‘यह पुरुष है और यह स्त्री है’ इस प्रकारका विकल्प निर्बुद्धि पुरुषोंको ही होता है यथार्थमें जो बुद्धिमान हैं वे स्त्री-पुरुष सभीसे हितकारी वचनोंकी अपेक्षा रखते हैं ॥९१॥


स्वल्पोऽपि यदि कश्चित्ते प्रसादो मयि विद्यते । ततो वदामि ते मुञ्च परस्त्रीरतमार्गणम् ॥९२॥

अर्थ: हे नाथ ! यदि आपकी मेरे ऊपर कुछ थोड़ी भी प्रसन्नता है तो मैं कहती हूँ कि परस्त्रीसे रतिकी याचना छोड़ो अथवा परस्त्रीमें रत पुरुषका मार्ग तजो ॥९२॥


गृहीत्वा जानकीं कृत्वा स्वामेव च समाश्रयम् । प्रत्यापयामि गत्वाऽहं रामं भवदनुज्ञया ॥९३॥

उपगृह्य सुतौ तेऽहं शक्रजिन्मेघवाहनौ । भ्रातरं चोपनेष्यामि किं भूरिजनहिंसया ॥९४॥

अर्थ: यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं जानकीको ले जाकर रामको आपकी शरणमें ले आती हूँ तथा तुम्हारे इन्द्रजित् और मेघवाहन नामक दोनों पुत्रों तथा भाई कुम्भकर्णको वापिस लिये आती हूँ । अधिक जनोंकी हिंसासे क्या प्रयोजन है ? ॥९३-९४॥


एवमुक्तो भृशं क्रुद्धो रक्षसामधिपोऽवदत् । गच्छ गच्छ द्रुतं यत्र न पश्यामि मुखं तव ॥९५॥

अर्थ: मन्दोदरीके इस प्रकार कहने पर रावण अत्यधिक कुपित होता हुआ बोला कि जा जा जल्दी जा, वहाँ जा जहाँ कि मैं तेरा मुख नहीं देखूँ ॥९५॥


अहो त्वं पण्डितम्मन्या यद्विहायोन्नतिं निजाम् । परपक्षप्रशंसायां प्रवृत्ता दीनचेष्टिता ॥९६॥

अर्थ: अहो ! तू अपने आपको बड़ी पण्डिता मानती है जो अपनी उन्नतिको छोड़ दीन चेष्टा की धारक हो शत्रु पक्षकी प्रशंसा करनेमें तत्पर हुई है ॥९६॥


त्वं वीरजननी भूत्वा ममाग्रमहिषी सती । या वक्षि क्लीबमेवं तत्कातरास्ति न ते परा ॥९७॥

अर्थ: तू वीरकी माता और मेरी पट्टरानी होकर भी जो इस प्रकार दीन वचन कह रही है तो जान पड़ता है कि तुझसे बढ़ कर कोई दूसरी कायर स्त्री नहीं है ॥९७॥


एवमुक्ता जगौ देवी शृणु यद्गदितं बुधैः । हलिनां चक्रिणां जन्म तथा च प्रतिचक्रिणाम् ॥९८॥

अर्थ: इस प्रकार रावणके कहने पर मन्दोदरीने कहा कि हे नाथ ! विद्वानोंने बलभद्रों, नारायणों तथा प्रतिनारायणोंका जन्म जिस प्रकार कहा है उसे सुनिये ॥९८॥


विजयोऽथ त्रिपृष्ठश्च द्विपृष्टोऽचल एव च । स्वयम्भूरिति च ख्यातस्तथा च पुरुषोत्तमः ॥९९॥

नरसिंह प्रतीतिश्च पुण्डरीकश्च विश्रुतः । दत्तश्चेति जगद्वीरा हरयोऽस्मिन् युगे स्मृताः ॥१००॥

समये तु महावीर्यौ पद्मनारायणौ स्मृतौ । यौ तौ भुवमिमौ जातौ दशानन समागतौ ॥१०१॥

प्रत्यनीका ययुग्रीवतारकाद्या यथा गताः । नाशमेभ्यस्तथा नूनं त्वमस्माद्गन्तुमिच्छसि ॥१०२॥

अर्थ: हे देव ! इस युगमें अबतक विजय तथा अचल आदि सात बलभद्र और त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयम्भू, पुरुषोत्तम, नृसिंह, पुण्डरीक और दत्त ये सात नारायण हो चुके हैं । ये सभी जगत्में अत्यन्त धीरवीर तथा प्रसिद्ध पुरुष हुए हैं । इस समय पद्म और लक्ष्मण नामक बलभद्र तथा नारायण होंगे । सो हे दशानन जान पड़ता है कि ये दोनों ही यहाँ आ पहुँचे हैं । जिसप्रकार अश्वग्रीव और तारक आदि प्रतिनारायण इनसे नाशको प्राप्त हुए हैं उसी प्रकार जान पड़ता है कि तुम भी इनसे नाशको प्राप्त होना चाहते हो ॥९९-१०२॥


असिचापगदाकुन्तभासुराटोपसङ्कटाः । प्रचलच्चामरच्छत्रच्छायामण्डलशोभिनः ॥१६१॥

आशुकारसमुद्युक्ताः सुराकाराः प्रतापिनः । विद्याधराधिपा योद्धुं निर्ययुः प्रवरर्द्धयः ॥१६२॥

अर्थ: जो खड्ग, धनुष, गदा, भाले आदि चमकते हुए शस्त्र समूहको धारण कर रहे थे, जो हिलते हुए चमर और छत्रोंकी छायासे सुशोभित थे, जो शीघ्रता करनेमें तत्पर थे, देवोंके समान थे और अतिशय प्रतापी थे ऐसे विद्याधर राजा बड़े ठाट-बाटसे युद्ध करनेके लिए निकले ॥१०१-१६२॥


तावताशङ्कयते नाथ वक्तुं तत्त्वं हिते रतम् । यावत्प्रज्ञापनीयस्य निश्चयान्तो न दृश्यते ॥१०३॥

अर्थ: हे नाथ ! हित करनेमें तत्पर तत्त्वका निरूपण करनेके लिए तब तक आशंका की जाती है जब तक कि निरूपणादि तत्त्वका पूर्ण निश्चय नहीं दिखाई पड़ता है ॥१०३॥


तत्कार्यं बुद्धियुक्तेन परत्रेह च यत्सुखम् । न तु दुःखाङ्कुरोत्पत्तिकारणं कुत्सनास्पदम् ॥१०४॥

अर्थ: बुद्धिमान् मनुष्यको वह कार्य करना चाहिए जो इस लोक तथा परलोकमें सुखका देनेवाला हो । दुःखरूपी अङ्कुरको उत्पत्तिका कारण तथा निन्दाका स्थान न हो ॥१०४॥


विषयैः सुचिरं भुक्तैर्यः पुमाँस्तृप्तिमागतः । त्रैलोक्येऽपि वदैकं तं पापमोहित रावण ॥१०५॥

अर्थ: चिरकाल तक भोगे हुए भोगोंसे जो तृप्तिको प्राप्त हुआ हो ऐसा तीन लोकमें भी यदि कोई एक पुरुष हो तो हे पापसे मोहित रावण ! उसका नाम कहो ॥१०५॥


भुक्त्वापि सकलं भोगं मुनित्वं चेन्न सेवसे । गृहिधर्मरतो भूत्वा कुरु दुःखविनाशनम् ॥१०६॥

अर्थ: यदि समस्त भोगोंको भोगनेके बाद भी तुम मुनि पदको धारण नहीं कर सकते हो तो कमसे कम गृहस्थ धर्ममें तत्पर होकर भी दुःखका नाश करो ॥१०६॥


अणुव्रतासिदीप्ताङ्गो नियमच्छत्रशोभितः । सम्यग्दर्शनसन्नाहः शीलकेतनलक्षितः ॥१०७॥

भावनाचन्दनार्द्राङ्गः सुप्रबोधशरासनः । वशेन्द्रियबलोपेतः शुभध्यानप्रतापवान् ॥१०८॥

मर्यादांकुशसंयुक्तो निश्चयानेकपस्थितः । जिनभक्तिमहाशक्तिर्जय दुर्गतिवाहिनीम् ॥१०९॥

इयं हि कुटिला पापा महावेगा सुदुःसहा । बुधेन जीयते जित्वा तामेतां सुखितो भव ॥११०॥

अर्थ: हे नाथ ! अणुव्रत रूपी तलवारसे जिसका शरीर देदीप्यमान है, जो नियमरूपी छत्रसे सुशोभित है, जिसने सम्यग्दर्शन रूपी कवच धारण किया है, जो शीलव्रत रूपी पताकासे युक्त है, जिसका शरीर भावनारूपी चन्दनसे आर्द्र है । सम्यग्ज्ञान ही जिसका धनुष है, जो जिते- न्द्रियता रूपी वलसे सहित है, शुभध्यान रूपी प्रतापसे युक्त है, मर्यादा रूपी अङ्कुशसे सहित है, जो निश्चय रूपी हाथी पर सवार है, और जिनेन्द्र भक्ति ही जिसकी महाशक्ति है ऐसे होकर तुम दुर्गति रूपी सेनाको जीतो । यथार्थमें यह दुर्गति रूपी सेना अत्यन्त कुटिल, पापरूपिणी, और अत्यन्त दुःसह है सो इसे जीतकर तुम सुखी होओ ॥१०७-११०॥


हिमवन्मन्दराद्येषु पर्वतेषु जिनालयान् । पूजयन् वशया सार्द्धं जम्बूद्वीपं मया चर ॥१११॥

अर्थ: हिमवत् तथा मेरु आदि पर्वतों पर जो अकृत्रिम जिनालय हैं उनकी मेरे साथ पूजा करते हुए जम्बू द्वीपमें विचरण करो ॥१११॥


अष्टादशसहस्रस्त्रीपाणिपल्लवलालितः । क्रीड मन्दरकुञ्जेषु मन्दाकिन्यास्तटेषु च ॥११२॥

अर्थ: अठारह हजार स्त्रियोंके हस्तरूपी पल्लवोंसे ललित होते हुए तुम मन्दरगिरिके निकुञ्जों और गङ्गा नदीके तटों में क्रीड़ा करो ॥११२॥


ईप्सितेषु प्रदेशेषु रमणीयेषु सुन्दर । विद्याधरयुगं स्वेच्छं करोति विहृतिं सुखम् ॥११३॥

अर्थ: हे सुन्दर ! विद्याधर दम्पति अपने अभिलषित मनोहर स्थानोंमें इच्छानुसार सुख पूर्वक विहार करते हैं ॥११३॥


लब्धवर्णं न युद्धेन किञ्चिदस्ति प्रयोजनम् । प्रसीद कुरु मे वाक्यं सर्वथैव सुखावहम् ॥११४॥

अर्थ: हे विद्वन् ! अथवा हे यशस्विन् ! युद्ध से कुछ प्रयोजन नहीं है । प्रसन्न होओ और सब प्रकारसे सुख उत्पन्न करने वाले मेरे वचन अङ्गीकृत करो ॥११४॥


क्ष्वेडवद्दुर्जनं निंद्यं परमानर्थकारणम् । जनवादमिमं मुञ्च किं मज्जस्ययशोंबुधौ ॥११५॥

अर्थ: विषके समान दुष्ट, निन्दनीय, तथा परम अनर्थका कारण जो यह लोकापवाद है सो इसे छोड़ो । व्यर्थ ही अपयश रूप सागरमें क्यों डूबते हो ? ॥११५॥


इति प्रसादयन्ती सा बद्धपाण्यब्जकुड्मला । पपात पादयोस्तस्य वांछन्ती परमं हितम् ॥११६॥

अर्थ: इस प्रकार प्रसन्न करती तथा उसका परम हित चाहती हुई मन्दोदरी हस्तकमल जोड़कर रावणके चरणोंमें गिर पड़ी ॥११६॥


विहसन्नथ तामूचे भीतां भयविवर्जितः । उत्थाप्य भीतिमेवं किं गता त्वं कारणं विना ॥११७॥

अर्थ: अथानन्तर निर्भय रावण ने हँसते हुए उस भयभीत मन्दोदरीको उठाकर कहा कि तू इस तरह कारणके बिना ही भय को क्यों प्राप्त हो रही है ? ॥११७॥


मत्तोऽस्ति नाधिकः कश्चिद्वरारोहे नरोत्तमः । अलीका भीरुता केयं स्त्रैणादालम्ब्यते त्वया ॥११८॥

अर्थ: हे सुन्दरि ! मुझसे बढ़कर कोई दूसरा उत्तम मनुष्य नहीं है। तू स्त्रीपनाके कारण इस किस मिथ्या भीरुताका आलम्बन ले रही है ? अर्थात् स्त्री होनेके कारण व्यर्थ ही क्यों भयभीत हो रही है ? ॥११८॥


गदितं यत्त्वयाऽन्यस्य पक्षस्योद्भवसूचनम् । नारायण इति स्पष्टं तव देवि निरूप्यते ॥११९॥

नामनारायणाः सन्ति बलदेवाश्च भूरिशः । नामोपलब्धिमात्रेण कार्यसिद्धिः किमिष्यते ॥१२०॥

अर्थ: ‘वे नारायण हैं’ इस प्रकार दूसरे पक्षके अभ्युदयको सूचित करनेवाली जो बात तूने कही है सो हे देवि ! तुझे स्पष्ट बात बताऊँ कि नारायण और बलदेव इस नामको धारण करनेवाले पुरुष बहुतसे हैं क्या नामकी उपलब्धिमात्रसे कार्यकी सिद्धि हो जाती है ॥११९-१२०॥


तिर्यक् कश्चिन्मनुष्यो वा कृतसिद्धाभिधानकः । वाङ्मात्रतः स किं सैद्धं सुखमाप्नोति कातरे ॥१२१॥

अर्थ: हे भीरु ! यदि किसी तिर्यञ्च या मनुष्यका सिद्ध नाम रख लिया जाय तो क्या नाममात्रसे वह सिद्ध सम्बन्धी सुखको प्राप्त हो सकता है ? ॥१२१॥


रथनूपुरधामेशो यथेंद्रोऽनिन्द्रतां मया । नीतस्तथेममीक्षस्व त्वमनारायणं कृतम् ॥१२२॥

अर्थ: जिस प्रकार रथनूपुर नगरके अधिपति इन्द्रको मैंने अनिन्द्रपना प्राप्त करा दिया था उसी प्रकार तुम देखना कि मैंने इस नारायणको अनारायण बना दिया है ॥१२२॥


इत्यूर्जितमुदाहृत्य प्रतिशत्रुः प्रतापवान् । स्वप्रभापटलच्छन्नशरीरः परमेश्वरः ॥१२३॥

क्रीडागृहमुपाविक्षन्मन्दोदर्या समन्वितः । श्रियेव सहितः शक्रो यथा कालाश्रितक्रियः ॥१२४॥

अर्थ: इस प्रकार अपनी कान्तिके समूहसे जिसका शरीर व्याप्त हो रहा था तथा जिसकी क्रियाएँ यमराजके आश्रित थीं ऐसा प्रतापी परमेश्वर रावण, अपनी सबलताका निरूपण कर मन्दोदरीके साथ क्रीड़ा गृहमें उस तरह प्रविष्ट हुआ जिस तरह कि लक्ष्मीके साथ इन्द्र प्रवेश करता है ॥१२३-१२४॥


सायाह्नसमये तावत्सन्ध्यानिर्गतमण्डलः । सविता संहरत्यंशून्कषायानिव संयतः ॥१२५॥

अर्थ: अथानन्तर सायंकालका समय आया तो संन्ध्याके कारण जिसका मण्डल अस्तोन्मुख हो गया था ऐसे सूर्यने किरणोंको उस तरह संकोच लिया जिस तरह कि मुनि अपनी कषायोंको संकोच लेता है ॥१२५॥


सन्ध्यावलिविदष्टौष्टपुरुसंरंभलोहितः । निर्भर्त्सयन्निव दिनं गतः क्वापि दिवाकरः ॥१२६॥

अर्थ: सूर्य लाल-लाल होकर अस्त हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो संन्ध्यावलि रूप ओष्ठ जिसमें डसा जा रहा था ऐसे बहुत भारी क्रोधसे लाल-लाल हो दिनको डाँट दिखाता हुआ कहीं चला गया था ॥१२६॥


बद्धपद्माञ्जलिपुटा नलिन्योऽस्तं गतं रविम् । विरुतैश्चक्रवाकानां दीनमाकारयन्निव ॥१२७॥

अर्थ: कमलिनियोंके कमल बन्द हो गये थे सो ऐसा जान पड़ता था मानो कमल रूपी अंजलिको बाँधने वाली कमलिनियाँ चक्रवाक पक्षियोंके शब्दके द्वारा अस्त हुए सूर्यको दीनता पूर्वक बुला ही रही थीं ॥१२७॥


अनुमार्गेण च प्राप्ता ग्रहनक्षत्रवाहिनी । विक्षेपेणेव सरितुं मृगांकेन विसर्जिता ॥१२८॥

अर्थ: सूर्यके अस्त होते ही उसी मार्गसे ग्रह और नक्षत्रोंकी सेना आ पहुँची सो ऐसी जान पड़ती थी मानो चन्द्रमाने उसे स्वच्छन्दता-पूर्वक घूमनेके लिए छोड़ ही दिया था - उसे आज्ञा ही दे रक्खी थी ॥१२८॥


प्रदोषे तत्र संवृत्ते दीपिकारत्नदीपिते । प्रभाभिर्नगरी लङ्का रेजे मेरोः शिखा यथा ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर दीपिका रूपी रत्नोंसे प्रकाशित प्रदोष कालके प्रकट होने पर प्रभासे जगमगाती हुई लंका मेरुकी शिखाके समान सुशोभित हो उठी ॥१२९॥


प्रियं प्रणयिनी काचिदालिंग्योचे सवेपथुः । अप्येकां शर्वरीमेतां मानयामि त्वया सह ॥१३०॥

अर्थ: उस समय कोई स्त्री पतिका आलिङ्गन कर काँपती हुई बोली कि तुम्हारे साथ यह एक रात तो आनन्दसे बिता लूँ कल जो होगा सो होगा ॥१३०॥


उद्गमद्यूथिकाऽऽमोदमधुमत्ता विघूर्णिता । पर्यस्ता काचिदंशाङ्के पुष्पवृष्टिः सुकोमला ॥१३१॥

अर्थ: जिसकी चोटीमें गुँथी हुई जुहीकी मालासे सुगन्धि निकल रही थी तथा जो मधुके नशामें मत्त हो झूम रही थी ऐसी कोई एक स्त्री पतिकी गोदमें उस तरह लोट गई मानो अत्यन्त कोमल पुष्प वृष्टि ही बिखेर दी गई हो ॥१३१॥


अब्जतुल्यक्रमा काचित् पीवरोरुपयोधरा । वपुष्मती वपुष्मन्तं दयिता दयितं ययौ ॥१३२॥

अर्थ: जिसके चरण कमलके समान थे तथा जिसकी जाँघें और स्तन अत्यन्त स्थूल थे ऐसी सुन्दर शरीरकी धारक कोई स्त्री सुन्दर शरीरके धारक वल्लभके पास गई हो ॥१३२॥


जग्राह भूषणं काचित्स्वभावेनैव सुन्दरी । कुर्वन्ती हेमरत्नानां चारुभावा कृतार्थताम् ॥१३३॥

अर्थ: जो स्वभावसे ही सुन्दरी थी तथा सुन्दर हाव-भावको धारण करनेवाली थी ऐसी किसी स्त्रीने सुवर्ण और रत्नोंको कृत-कृत्य करनेके लिए ही मानो उसने आभूषण धारण किये थे ॥१३३॥


सुविद्याधरयुग्मानि प्रचिक्रीडुर्यथेप्सितम् । भवने भवने भान्ति सदृशं भोगभूमिषु ॥१३४॥

अर्थ: विद्याधर और विद्याधरियोंके युगल इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे थे और वे घर-घरमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भोगभूमियोंमें ही हों ॥१३४॥


गीतानङ्गद्रवालापैर्वीणावंशादिनिःस्वनैः । जल्पतीव तदा लङ्का मुदिता क्षणदाऽऽगमे ॥१३५॥

अर्थ: संगीतके कामोत्तेजक आलापों और वीणा बाँसुरी आदिके शब्दोंसे उस समय लंका ऐसी जान पड़ती थी मानो रात्रिका आगमन होने पर हर्षित हो वार्तालाप ही कर रही हो ॥१३५॥


ताम्बूलगन्धमाल्याद्यैरुपभोगैः सुरोपमैः । पिबन्तो मदिरामन्ये रमन्ते दयितान्विताः ॥१३६॥

अर्थ: कितने ही अन्य लोग ताम्बूल गन्धमाला आदि देवोपम उपभोगोंसे मदिरा पीते हुए अपनी वल्लभाओंके साथ क्रीड़ा करते थे ॥१३६॥


काचित्स्ववदनं दृष्ट्वा चषकप्रतिबिम्बितम् । ईर्ष्ययेन्दीवरेणेशं प्राप्ता मदमताडयत् ॥१३७॥

अर्थ: नशामें निमग्न हुई कोई एक स्त्री मदिराके प्यालेमें प्रतिबिम्बित अपना ही मुख देख ईर्ष्यावश नीलकमलसे पतिको पीट रही थी ॥१३७॥


मदिरायां परिन्यस्तं नारीभिर्मुखसौरभम् । लोचनेषु निजो रागस्तासां मदिरया कृतः ॥१३८॥

अर्थ: स्त्रियोंने मदिरामें अपने मुखकी सुगन्धि छोड़ी थी और मदिराने उसके बदले स्त्रियोंके नेत्रोंमें अपनी लालिमा छोड़ रक्खी थी ॥१३८॥


तदेव वस्तु संसर्गाद्धत्ते परमचारुताम् । तथाहि दयितापीतशेषं स्वाद्वभवन्मधु ॥१३९॥

अर्थ: वही वस्तु इष्टजनोंके संसर्गसे परम सुन्दरताको धारण करने लगती है इसी लिए तो स्त्रीके पीनेसे शेष रहा मधु स्वादिष्ट हो गया था ॥१३९॥


मदिरापतितां काञ्चिदात्मीयां लोचनद्युतिम् । गृह्णन्तीन्दीवरप्रीत्या कान्तेन हसिता चिरम् ॥१४०॥

अर्थ: कोई एक स्त्री मदिरामें पड़ी हुई अपने नेत्रोंकी कान्तिको नीलकमल समझ ग्रहण कर रही थी सो पतिने उसकी चिरकाल तक हँसी की ॥१४०॥


अप्रौढापि सती काचिच्छनकैः पायिता सुराम् । जगाम प्रौढतां बाला मन्मथोचितवस्तुनि ॥१४१॥

अर्थ: कोई एक स्त्री यद्यपि प्रौढ़ नहीं थी तथापि धीरे-धीरे उसे इतनी अधिक मदिरा पिला दी गई कि वह कामके योग्य कार्यमें प्रौढ़ताको प्राप्त हो गई अर्थात् प्रौढ़ा स्त्रीके समान कामभोगके योग्य हो गई ॥१४१॥


लज्जासखीमपाकृत्य तासामत्यन्तमीप्सितम् । कृतं कादम्बरीसख्या प्रियेषु क्रीडितं परम् ॥१४२॥

अर्थ: उस मदिरारूपी सखीने लज्जारूपी सखीको दूर कर उन स्त्रियोंकी पतियोंके विषयमें ऐसी क्रीड़ा कराई जो उन्हें अत्यन्त इष्ट थी अर्थात् स्त्रियाँ मदिराके कारण लज्जा छोड़ पतियोंके साथ इच्छानुकूल क्रीड़ा करने लगीं ॥१४२॥


घूर्णमानेक्षणं भूयः ४कलस्खलितजल्पितम् । चेष्टितं विकटं स्त्रीणां पुंसां जातं मनोहरम् ॥१४३॥

अर्थ: जिसमें नेत्र घूम रहे थे तथा बार-बार मधुर अधकटे शब्दोंका उच्चारण हो रहा था ऐसी स्त्रियों और पुरुषोंकी मनको हरण करनेवाली विकट चेष्टा होने लगी ॥१४३॥


दम्पती मधु वाञ्छन्तौ पीतशेषं परस्परम् । चक्रतुः प्रसृतोल्लापौ चषकस्य गतागतम् ॥१४४॥

अर्थ: पीते-पीते जो मदिरा शेष बच रही थी उसे भी दम्पती पी लेना चाहते थे इसलिए ‘तुम पियो तुम पियो’ इस प्रकार जोरसे शब्द करते हुए प्यालेको एक दूसरेकी ओर बढ़ा रहे थे ॥१४४॥


चषके विगतप्रीतिः कान्तामालिंग्य सुन्दरः । गण्डूषमदिरां कश्चित्पपौ मुकुलितेक्षणः ॥१४५॥

अर्थ: किसी सुन्दर पुरुषकी प्रीति प्यालेमें समाप्त हो गई थी इसलिए वह वल्लभाका आलिङ्गनकर नेत्र बन्द करता हुआ उसके मुखके भीतर स्थित कुरलेकी मदिराका पान कर रहा था ॥१४५॥


आसीद्विद्रुमकल्पानां किञ्चित्स्फुरणसेविनाम् । मधुक्षालितरागाणामधराणां परा द्युतिः ॥१४६॥

अर्थ: जो मूँगाके समान थे, जो कुछ-कुछ फड़क रहे थे तथा मदिराके द्वारा जिनकी कृत्रिम लाली धुल गई थी ऐसे अधरोष्ठोंकी अत्यधिक शोभा बढ़ रही थी ॥१४६॥


दन्ताधरेक्षणच्छायासंसर्गिचषके मधु । शुक्लारुणासिताम्भोजयुक्तं सर इवाभवत् ॥१४७॥

अर्थ: दाँत, ओष्ठ और नेत्रों की कान्तिसे युक्त प्यालेमें जो मधु रक्खा था वह सफेद लाल और नील कमलोंसे युक्त सरोवरके समान जान पड़ता था ॥१४७॥


गोपनीयानदर्शयन्त प्रदेशान् सुरया स्त्रियः । वाक्यान्यभाषणीयान्यभाषन्त च गतत्रपाः ॥१४८॥

अर्थ: उस समय मदिराके कारण जिनकी लज्जा दूर हो गई थी ऐसी स्त्रियाँ अपने गुप्त प्रदेशोंको दिखा रही थीं तथा जिनका उच्चारण नहीं करना चाहिये ऐसे शब्दोंका उच्चारण कर रही थीं ॥१४८॥


चन्द्रोदयेन मधुना यौवनेन च भूमिकाम् । आरूढो मदनस्तेषां तासां चात्यन्तमुन्नताम् ॥१४९॥

अर्थ: चन्द्रोदय, मदिरा और यौवनके कारण उस समय उन स्त्री-पुरुषोंका काम अत्यन्त उन्नत अवस्थाको प्राप्त हो चुका था ॥१४९॥


कृतक्षतं ससीत्कारं गृहीतौष्ठं समाकुलम् । सुरतं भावियुद्धस्य मङ्गलग्रहणायितम् ॥१५०॥

अर्थ: जिसमें नखक्षत किये गये थे, जो सीत्कारसे सहित था, जिसमें ओष्ठ डँशा गया था तथा जो आकुलतासे युक्त था ऐसा स्त्री-पुरुषोंका संभोग आगे होनेवाले युद्धका मानो मङ्गलाचार ही था ॥१५०॥


एषोऽपि रक्षसामिन्द्रश्चारुचेष्टितसङ्गतः । सममानयदुद्धश्रीरन्तःपुरमशेषतः ॥१५१॥

अर्थ: इधर सुन्दर चेष्टासे युक्त रावणने भी समस्त अन्तःपुरको एक साथ उत्तम शोभा प्राप्त कराई अर्थात् अन्तःपुरकी समस्त स्त्रियोंको प्रसन्न किया ॥१५१॥


मुहुर्मुहुः समालिङ्ग्य स्नेहान्मन्दोदरी विभोः । अपश्यद्वदनं तृप्तिमगच्छन्ती सुलोचना ॥१५२॥

अर्थ: उत्तम नेत्रोंसे युक्त मन्दोदरी बार-बार आलिङ्गनकर बड़े स्नेहसे पतिका मुख देखती थी तो भी तृप्त नहीं होती थी ॥१५२॥


इतः समरसंवृत्तात्परिप्राप्तजयस्य ते । आगतस्य सदा कान्त करिष्याम्यवगूहनम् ॥१५३॥

अर्थ: वह कह रही थी कि हे कान्त ! जब तुम विजयी हो यहाँ लौटकर आओगे तब मैं सदा तुम्हारा आलिङ्गन करूँगी ॥१५३॥


मोक्ष्यामि क्षणमप्येकं न त्वां भूयो मनोहर । लतेव बाहुबलिनं सर्वाङ्गकृतसङ्गतिः ॥१५४॥

अर्थ: हे मनोहर ! मैं तुम्हें एक क्षणके लिए भी न छोड़ूँगी और जिस प्रकार लताएँ बाहुबली स्वामीके समस्त शरीरमें समा गई थीं उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे समस्त शरीरमें समा जाऊँगी ॥१५४॥


वदन्त्यामेवमेतस्यां प्रेमकातरचेतसि । रुतं ताम्रशिखश्चक्रे समाप्तिं च निशा गता ॥१५५॥

अर्थ: इधर प्रेमसे कातर चित्तको धारण करनेवाली मन्दोदरी इस प्रकार कह रही थी उधर मुर्गा बोलने लगा और रात्रि समाप्त हो गई ॥१५५॥


नक्षत्रदीधितिभ्रंशे प्राप्ते संध्यारुणागमे । गीतध्वनिरभूद्रम्यो भवने भवनेऽर्हताम् ॥१५६॥

अर्थ: अथानन्तर नक्षत्रोंकी कान्तिको नष्ट करनेवाली सन्ध्याकी लाली आकाशमें आ पहुँची और अरहन्त भगवान्‌के मन्दिर-मन्दिरमें संगीतका मधुर शब्द होने लगा ॥१५६॥


कालाग्निमण्डलाकारो रश्मिभिश्छादयन् दिशः । जगामोदयसम्बन्धं भास्करो लोकलोचनः ॥१५७॥

अर्थ: प्रलयकालीन अग्निसमूहके समान जिसका आकार था ऐसा लोकलोचन सूर्य, किरणोंसे दिशाओंको आच्छादित करता हुआ उदयाचलके साथ सम्बन्धको प्राप्त हुआ ॥१५७॥


प्रभातसमये देव्यो व्यग्राः कृच्छ्रेण सान्त्विताः । दयितेन मनस्यूहुः किं किमित्यतिदुःसहम् ॥१५८॥

अर्थ: प्रातःकालके समय पति जिन्हें बड़ी कठिनाईसे सान्त्वना दे रहा था ऐसी स्त्रियाँ व्यग्र होती हुई मनमें न जाने क्या-क्या दुःसह विचार धारण कर रही थीं ॥१५८॥


गम्भीरास्ताडिता भेर्यः शङ्खशब्दपुरःसराः । रावणस्याऽऽज्ञया युद्धसंज्ञादानविचक्षणाः ॥१५९॥

अर्थ: तदनन्तर रावणकी आज्ञासे युद्धका संकेत देनेमें निपुण शङ्ख फूँके गये और गम्भीर भेरियाँ बजाई गईं ॥१५९॥


परस्परमहंकारं वहन्तः परमोद्धताः । प्रहृष्टा निर्ययुर्योधा ययिद्विपरथस्थिताः ॥१६०॥

अर्थ: जो परस्पर अहंकार धारण कर रहे थे तथा अत्यन्त उद्धत थे ऐसे योद्धा घोड़े हाथी और रथोंपर सवार हो हर्षित होते हुए बाहर निकले ॥१६०॥


तत्र पङ्कजनेत्राणां कारुण्यं पुरयोषिताम् । निरीक्ष्य दुर्जनस्यापि चित्तमासीत्सुदुःखितम् ॥१६३॥

अर्थ: उस समय निरन्तर रुदन करनेसे जिनके नेत्र कमलके समान लाल हो गये थे ऐसी नगरकी स्त्रियोंकी दीनदशा देख दुष्ट पुरुषका भी चित्त अत्यन्त दुःखी हो उठता था ॥१६३॥


निर्गतो दयितां कश्चिदनुव्रज्यापरायणाम् । अयि मुग्धे निवर्त्तस्व व्रजामि संख्ये सत्यवाक् ॥१६४॥

अर्थ: कोई एक योद्धा पीछे-पीछे आनेवाली स्त्रीसे यह कहकर कि ‘अरी पगली ! लौट जा मैं सचमुच ही युद्धमें जा रहा हूँ’ बाहर निकल आया ॥१६४॥


उष्णीषं भो गृहाणेति व्याजादभिमुखं प्रियम् । चक्रे काचिन्मृगीनेत्रा वक्त्रदर्शनलालसा ॥१६५॥

अर्थ: किसी मृगनयनी स्त्रीको पतिका मुख देखनेकी लालसा थी इसलिए उसने इस बहाने कि अरे शिरका टोप तो लेते जाओ, पतिको अपने सम्मुख किया था ॥१६५॥


दृष्टिगोचरतोऽतीते प्रिये काचिद्वराङ्गना । पतन्ती सह वाष्पेण सखीभिर्मूर्च्छिता वृता ॥१६६॥

अर्थ: जब पति दृष्टिके ओझल हो गया तब अश्रुओंके साथ-साथ कोई स्त्री मूर्च्छित हो नीचे गिर पड़ी और सखियोंने उसे घेर लिया ॥१६६॥


निवृत्य काचिदाश्रित्य शयनीयस्य पट्टिकाम् । तस्थौ मौनमुपादाय पुस्तोपमशरीरिका ॥१६७॥

अर्थ: कोई एक स्त्री वापिस लौट, शय्याकी पाटी पकड़, मौन लेकर मिट्टीकी पुतलीकी तरह चुपचाप बैठ गई ॥१६७॥


सम्यग्दर्शनसम्पन्नः शूरः कश्चिदणुव्रती । पृष्ठतो वीक्ष्यते पत्न्या पुरश्चिदशकन्यया ॥१६८॥

अर्थ: कोई एक शूरवीर सम्यग्दृष्टि तथा अणुव्रतोंका धारक था इसलिए उसे पीछेसे तो उसकी पत्नी देख रही थी और आगेसे देवकन्या देख रही थी ॥१६८॥


पूर्वं पूर्णेन्दुवत्सौम्या बभूवुस्तुमुलागमे । शूराः कवचितोरस्काः कृतान्ताकारभासुराः ॥१६९॥

अर्थ: जो योद्धा पहले पूर्ण चन्द्रके समान सौम्य थे वे ही युद्ध उपस्थित होनेपर कवच धारण कर यमराजके समान दमकने लगे ॥१६९॥


चतुरङ्गेन सैन्येन चापच्छत्रादिसंकुलः । संप्राप्तस्तत्र मारीचो नैगमे च्चीवतेजसा ॥१७०॥

अर्थ: जो धनुष तथा छत्र आदिसे सहित था ऐसा मारीच चतुरङ्गिणी सेना ले बड़े तेजके साथ नगरके बाहर आया ॥१७०॥


असौ विमलचन्द्रश्च धनुष्मान् विमलाम्बुदः । सुनन्दानन्दनन्दाद्याः शतशोऽथ सहस्रशः ॥१७१॥

विद्याविनिर्मितैर्दिव्यै रथैर्हुतवहप्रभैः । रेजुरग्निकुमाराभा भासयन्तो दशो दिश ॥१७२॥

अर्थ: धनुषको धारण करनेवाले विमलचन्द्र, विमलमेघ, सुनन्द, आनन्द तथा नन्दको आदि लेकर सैकड़ों हजारों योद्धा युद्धस्थलमें आये सो वे विद्या निर्मित, अग्निके समान देदीप्यमान रथोंसे दशों दिशाओंको देदीप्यमान करते हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो अग्निकुमार देव ही हों ॥१७१-१७२॥


केचिद्दीप्तास्त्रसम्पूर्णैर्हिमवत्संनिभैरिभैः । ककुभश्छादयन्ति स्म सविद्युद्भिरिवांबुदैः ॥१७३॥

अर्थ: कितने ही सुभट देदीप्यमान शस्त्रोंसे युक्त तथा हिमालयके समान भारी-भारी हाथियोंसे दिशाओंको इस प्रकार आच्छादित कर रहे थे मानो बिजली सहित मेघोंसे ही आच्छादित कर रहे हों ॥१७३॥


केचिद्वरतुरंगौघैर्दशार्धायुधसङ्कटाः । सहसा ज्योतिषां चक्रं चूर्णयन्तीव वेगिनः ॥१७४॥

अर्थ: पाँचों प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त कितने ही वेगशाली सुभट उत्तम घोड़ोंके समूहसे ऐसे जान पड़ते थे मानो नक्षत्र मण्डलको सहसा चूर-चूर ही कर रहे हों ॥१७४॥


बृहद्विविधवादित्रैर्हयानां हेषितैस्तथा । गजानां गर्जितारावैः पदात्याकारितैरपि ॥१७५॥

योधानां सिंहनादैश्च जयशब्दैश्च वन्दिनाम् । गीतैः कुशीलवानां न समुत्साहनकोविदैः ॥१७६॥

इत्यन्यैश्च महानादैरेकीभूतैः समंततः । विननर्देव गगनं युगान्तजलदाकुलम् ॥१७७॥

अर्थ: नाना प्रकारके बड़े-बड़े वादित्रों, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंकी गर्जना, पैदल सैनिकोंके बुलानेके शब्द, योद्धाओंकी सिंहनाद, चारणोंकी जयजय ध्वनि, नटोंके गीत तथा उत्साह बढ़ाने में निपुण अन्य प्रकारके महाशब्द सब ओरसे मिलकर एक हो रहे थे इसलिए उनसे ऐसा जान पड़ता था मानो आकाश प्रलयकालीन मेघोंसे व्याप्त हो दुःखसे चिल्ला ही रहा हो ॥१७५-१७७॥


जनेशिनोऽश्वरथपदातिसंकुलाः परस्परातिशयविभूतिभासुराः । बृहद्भुजाः क्वचिततुंगवक्षसस्तडित्प्रभाः प्रववृतिरे जयैषिणः ॥१७८॥

अर्थ: उस समय जो घोड़े रथ तथा पैदल सैनिकोंसे युक्त थे, जो परस्पर - एक दूसरेसे बढ़ी-चढ़ी विभूतिसे देदीप्यमान थे, जिनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं तथा जिन्होंने अपने उन्नत वक्षःस्थलोंपर कवच धारण कर रक्खे थे ऐसे विजयके अभिलाषी अनेक राजा बिजलीके समान जान पड़ते थे ॥१७८॥


पदातयोऽपि हि करवालचञ्चलाः पुरो ययुः प्रभुपरितोषणैषिणः । समैश्च तैर्विविधसमूहिभिः कृतं निरर्गलं गगनतलं दिशस्तथा ॥१७९॥

अर्थ: जिनके हाथोंमें तलवारें लपलपा रही थीं तथा जो स्वामीके संतोषकी इच्छा कर रहे थे ऐसे पैदल सैनिक भी उन राजाओंके आगे-आगे जा रहे थे, विविध झुण्डोंको धारण करनेवाले उन सब सैनिकोंसे आकाश तथा दिशाएँ ठसाठस भर गई थीं ॥१७९॥


इति स्थिते विगतभवाभिसञ्चिते शुभाशुभे त्रिभुवनभाजि कर्मणि । जनः करोत्यतिबहुधानुचेष्टितं न तं क्षमो रविरपि कर्तुमन्यथा ॥१८०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस प्रकार पिछले पूर्वभवोंमें संचित त्रिभुवन सम्बन्धी, शुभ-अशुभ कर्मके विद्यमान रहते हुए यह प्राणी यद्यपि नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करता है तथापि सूर्य भी उसे अन्यथा करनेमें समर्थ नहीं है ॥१८०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे उद्योगाभिधानं नाम त्रिसप्ततितमं पर्व ॥७३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें युद्धके उद्योगका वर्णन करने वाला तेहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७३॥


७४. चतुःसप्ततितमं पर्व (रावण-लक्ष्मणयुद्धवर्णनाभिधानं)

विधिक्रमेण पूर्वेण सादरो मुदमुद्वहन् । आपृच्छत त्रिकूटेशो दयितामित्यपि प्रियाम् ॥१॥

को जानाति प्रिये भूयो दर्शनं चारुदर्शने । महाप्रतिभये युद्धे किं भवेन्न भवेदिति ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर पूर्वकृत पुण्योदयसे हर्षको धारण करता हुआ रावण आदरके साथ अपनी प्रिय स्त्री मन्दोदरीसे इस प्रकार पूछता है कि हे प्रिये ! चारुदर्शने ! महा भयकारी युद्ध होना है अतः कौन जाने फिर तुम्हारा दर्शन हो या न हो ॥१-२॥


उचुस्तं दयिता नाथ नन्द नन्द रिपूञ्जय । द्रक्ष्यामः सर्वथा भूयः संख्यंतस्त्वां समागतम् ॥३॥

अर्थ: यह सुन सब स्त्रियोंने कहा कि हे नाथ ! सदा वृद्धिको प्राप्त होओ, शत्रुओंको जीतो । तुम्हें हम सब शीघ्र ही युद्धसे लौटा हुआ देखेंगी ॥३॥


इत्युक्तो दयितानेत्रसहस्रैरभिवीक्षितः । निर्जगाम बहिर्नाथो रक्षसां विकटप्रभः ॥४॥

अर्थ: ऐसा कहकर जिसे हजारों स्त्रियाँ अपने नेत्रोंसे देख रही थीं तथा जिसकी प्रभा अत्यन्त विशाल थी ऐसा राक्षसोंका राजा रावण नगरके बाहर निकला ॥४॥


अपश्यच्च शरद्भानुभास्वरं बहुरूपया । विद्यया कृतनिर्माणमैन्द्रं नाम महारथम् ॥५॥

अर्थ: बाहर निकलते ही उसने बहुरूपिणी विद्याके द्वारा निर्मित तथा शरद् ऋतुके सूर्यके समान देदीप्यमान ऐन्द्र नामका महारथ देखा ॥५॥


युक्तं दन्तिसहस्रेण प्रावृषेण्यघनत्विषा । प्रभापरिकरं मेरुं जिगीषन्तमिव स्थितम् ॥६॥

अर्थ: वह महारथ वर्षाकालीन मेघोंके समान कान्तिवाले एक हजार हाथियोंसे जुता था, कान्तिके मण्डलसे सहित था, ऐसा जान पड़ता था मानो मेरु पर्वतको ही जीतना चाहता हो ॥६॥


मत्तास्ते करिणो गण्डप्रगलद्दाननिर्झराः । सितपीतचतुर्दंष्ट्राः शङ्खचामरशोभिनः ॥७॥

मुक्तादामसमाकीर्णा महाघण्टानिनादिताः । ऐरावतसमा नानाधातुरागविभूषिताः ॥८॥

दुर्दान्ता विनयाधानभूमयो घनगर्जिताः । विरेजुः कालमेघौघसन्निभाश्चारुविभ्रमाः ॥९॥

अर्थ: उसमें जुते हुए हाथी मदोन्मत्त थे, इनके गण्डस्थलोंसे झरने झर रहे थे, उनके सफेद पीले रंगके चार चार खड़े दाँत थे, वे शङ्खों तथा चमरोंसे सुशोभित थे, मोतियों की मालाओंसे युक्त थे, उनके गलेमें बँधे बड़े बड़े घण्टा शब्द कर रहे थे, वे ऐरावत हाथीके समान थे, नाना धातुओंके रंगसे सुशोभित थे, उनका जीतना अशक्य था, वे विनयकी भूमि थे, मेघोंके समान गर्जनासे युक्त थे, कृष्ण मेघोंके समूहके समान थे तथा सुन्दर विभ्रमको धारण करते हुए शोभायमान थे ॥७-९॥


मनोहराभकेयूरविदष्टभुजमस्तकः । तमसौ रथमारूढः शुनासीरसमद्युतिः ॥१०॥

अर्थ: जिसकी भुजाके अग्रभागपर मनोहर बाजूबन्द बँधा हुआ था तथा जिसकी कान्ति इन्द्रके समान थी, ऐसा रावण उस विद्या निर्मित रथपर आरूढ हुआ ॥१०॥


विशालनयनस्तत्र स्थितो निरुपमाकृतिः । ओजसा सकलं लोकमग्रसिष्टेव रावणः ॥११॥

अर्थ: विशाल नयन तथा अनुपम आकृतिको धारण करनेवाला रावण उस रथपर आरूढ हुआ अपने तेजसे मानो समस्त लोकको ग्रस ही रहा था ॥११॥


सहस्रैर्दशभिः स्वस्य सदृशैः खेचराधिपैः । वियद्वल्लभनाथाद्यैः स्वहितैः कृतमण्डलः ॥१२॥

महाबलैः सुरच्छायैरभिप्रायानुवेदिभिः । क्रुद्धः सुग्रीववैदेहौ प्रत्यभीयाय रावणः ॥१३॥

दृष्ट्वा दक्षिणतोऽत्यन्तभीमनिःस्वानकारिणः । भल्लुका गगने गृध्रा भ्रमन्ति छन्नभास्कराः ॥१४॥

अर्थ: जो अपने समान थे, अपना हित करनेवाले थे, महा बलवान् थे, देवोंके समान कान्तिसे युक्त थे और अभिप्रायको जाननेवाले थे ऐसे गगन-वल्लभनगरके स्वामीको आदि लेकर दश हजार विद्याधर राजाओंसे घिरा रावण सुग्रीव और भामण्डलको देख कुपित होता हुआ उनके सन्मुख गया । रावणकी दक्षिण दिशामें भालू अत्यन्त भयङ्कर शब्द कर रहे थे और आकाशमें सूर्यको आच्छादित करते हुए गीध मँडरा रहे थे ॥१२-१४॥


जानन्तोऽपि निमित्तानि कथयन्ति महाक्षयम् । शौर्यमानोत्कटाः क्रुद्धा ययुरेव महानराः ॥१५॥

अर्थ: शूरवीरताके अहंकारसे भरे महासुभट यद्यपि यह जानते थे कि ये अपशकुन मरणको सूचित कर रहे हैं तथापि वे कुपित हो आगे बढ़े जाते थे ॥१५॥


पद्माभोऽपि स्वसैन्यस्थः पर्यपृच्छत् सविस्मयः । भो भो मध्येयमेतस्या नगर्यास्तेजसा ज्वलन् ॥१६॥

जाम्बूनदमयैः कूटैः सुविशालैरलङ्कृतः । सतडिन्मेघसंघातच्छायः किंनामको गिरिः ॥१७॥

अर्थ: अपनी सेनाके मध्यमें स्थित रामने भी आश्चर्य चकित हो सैनिकोंसे पूछा कि हे भद्र-पुरुषो ! इस नगरीके बीचमें तेजसे देदीप्यमान, सुवर्णमयी बड़े-बड़े शिखरोंसे अलंकृत, तथा बिजलीसे सहित मेघ समूहके समान कान्तिको धारण करनेवाला यह कौन सा पर्वत है ? ॥१६-१७॥


पृच्छतेऽस्मै सुषेणाद्या सम्मोहं समुपागताः । न शेकुः सहसा वक्तुमपृच्छच्च स तान्मुहुः ॥१८॥

ब्रूत किं नामधेयोऽयं गिरिरत्र निरीक्ष्यते । अगदञ्जाम्बवाद्यास्तमथो वेपथुमन्थराः ॥१९॥

दृश्यते पद्मनाभायं रथोऽयं बहुरूपया । विद्यया कल्पितोऽस्माकं मृत्युसंज्वरकोविदः ॥२०॥

अर्थ: सुषेण आदि विद्याधर स्वयं भ्रान्तिमें पड़ गये इसलिए वे पूछनेवाले रामके लिए सहसा उत्तर देनेके लिए समर्थ नहीं हो सके । फिर भी राम उनसे बार बार पूछे जा रहे थे कि कहो यह यहाँ कौन सा पर्वत दिखाई दे रहा है ? तदनन्तर भयसे काँपते हुए जाम्बव आदिने धीमे स्वरमें कहा कि हे राम ! यह बहुरूपिणी विद्याके द्वारा निर्मित वह रथ है जो हम लोगोंको कालज्वर उत्पन्न करनेमें निपुण है ॥१८-२०॥


किष्किन्धराजपुत्रेण योऽसौ गत्वाभिरोषितः । रावणोऽवस्थितः सोऽत्र महामायामयोदयः ॥२१॥

अर्थ: सुग्रीवके पुत्र अङ्गदने जाकर जिसे कुपित किया था ऐसा वह महामायामय अभ्युदयको धारण करनेवाला रावण इस पर सवार है ॥२१॥


श्रुत्वा तद्वचनं तेषां लक्ष्मणः सारथिं जगौ । रथं समानय क्षिप्रमित्युक्तः स तथाऽकरोत् ॥२२॥

अर्थ: जाम्बव आदिके उक्त वचन सुन लक्ष्मणने सारथिसे कहा कि शीघ्र ही रथ लाओ । सुनते ही सारथिने आज्ञा पालन किया अर्थात् रथ लाकर उपस्थित कर दिया ॥२२॥


ततः क्षुब्धार्णवस्वाना भीमा भेर्यः समाहताः । शङ्खकोटिस्वनोन्मिश्राः शेषवादित्रसङ्गताः ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके शब्द क्षुभित समुद्रके शब्दके समान थे, जिनके शब्दोंके साथ करोड़ों शङ्खोंके शब्द मिल रहे थे ऐसी भयंकर भेरियाँ बजाई गईं ॥२३॥


श्रुत्वा तं निनदं हृष्टा भटा विकटचेष्टिताः । सन्नद्धा बद्धतूणीरा लक्ष्मणस्यान्तिके स्थिताः ॥२४॥

अर्थ: उस शब्दको सुनकर विकट चेष्टाओंके धारक योद्धा, कवच पहिन तथा तरकस बाँध लक्ष्मणके पास आ खड़े हुए ॥२४॥


मा भैषीर्दयिते तिष्ठ निवर्त्तस्व शुचं त्यज । अहं लङ्केश्वरं जित्वा प्रत्येम्यद्य तवान्तिकम् ॥२५॥

इति गर्वोत्कटा वीरा समाश्वास्य वराङ्गनाः । अन्तःपुरात् सुसन्नद्धा विनिर्जग्मुर्यथायथम् ॥२६॥

अर्थ: ‘हे प्रिये ! डर मत, यहीं ठहर, लौट जा, शोक तज, मैं लङ्केश्वरको जीतकर आज ही तेरे समीप वापिस आ जाऊँगा’ इस प्रकार गर्वीले वीर, अपनी उत्तम स्त्रियोंको सान्त्वना दे कवच आदिसे तैयार हो यथायोग्य रीतिसे बाहर निकले ॥२५-२६॥


परस्परप्रतिस्पर्द्धावेगचोदितवाहनाः । रथादिभिर्ययुर्योधाः शस्त्रावेक्षणचञ्चलाः ॥२७॥

अर्थ: जो परस्परकी प्रतिस्पर्धा वश वेगसे अपने वाहनोंको प्रेरित कर रहे थे, तथा जो शस्त्रोंकी ओर देख देख कर चञ्चल हो रहे थे ऐसे योधा रथ आदि वाहनोंपर आरूढ हो चले ॥२७॥


रथं महेभसंयुक्तं गम्भीरोदारनिस्वनम् । भूतस्वनः समारूढो विरेजे खेचराधिपः ॥२८॥

अर्थ: महागज से जुते तथा गम्भीर और उदार शब्द करनेवाले रथ पर सवार हुआ विद्याधरोंका राजा भूतस्वन अलग ही सुशोभित हो रहा था ॥२८॥


तेनैव विधिनाऽन्येऽपि विद्याधरजनाधिपाः । सहर्षाः प्रस्थिता योद्धुं क्रुद्धा लङ्केश्वरं प्रति ॥२९॥

अर्थ: इसी विधिसे दूसरे विद्याधर राजाओंने भी हर्षके साथ क्रुद्ध हो युद्ध करनेके लिए लङ्केश्वरके प्रति प्रस्थान किया ॥२९॥


तं प्रति प्रसृता वीराः क्षुब्धाम्भोधिसमाकृतिम् । संघट्टं परमं प्रापुर्गंगातुङ्गोर्मिसन्निभाः ॥३०॥

अर्थ: क्षुभित समुद्रके समान आकृति को धारण करनेवाले रावणके प्रति बड़े वेगसे दौड़ते हुए योद्धा, गङ्गानदीकी बड़ी ऊँची तरङ्गोंकी भाँति अत्यधिक धक्काधूमीको प्राप्त हो रहे थे ॥३०॥


ततः 'सितयशोव्याप्तभुवनौ परमाकृती । स्ववासतो विनिष्क्रान्तौ युद्धार्थौ रामलक्ष्मणौ ॥३१॥

अर्थ: तदनन्दर जिन्होंने धवल यशसे संसारको व्याप्त कर रक्खा था तथा जो उत्तम आकृति को धारण करनेवाले थे ऐसे राम लक्ष्मण युद्धके लिए अपने निवास स्थानसे बाहर निकले ॥३१॥


रथे सिंहयुते चारौ सन्नद्धकवचो बली । नवोदित इवादित्यः पद्मनाभो व्यराजत ॥३२॥

गारुडं रथमारूढो वैनतेयमहाध्वजः । समुन्नताम्बुदच्छायश्छायाश्यामलिताम्बरः ॥३३॥

मुकुटी कुण्डली धन्वी कवची सायकी कुणी । सन्ध्यांसक्तार्जनागाभः सुमित्राजो व्यराजत ॥३४॥

अर्थ: जो गरुड़के रथपर आरूढ़ थे, जिनकी ध्वजामें गरुड़का चिह्न था, जिनके शरीरकी कान्ति उन्नत मेघके समान थी, जिन्होंने अपनी कान्तिसे आकाशको श्याम कर दिया था, जो मुकुट, कुण्डल, धनुष, कवच, बाण और तरकससे युक्त थे, तथा जो सन्ध्याकी लालीसे युक्त अञ्जनगिरिके समान आभाके धारक थे ऐसे लक्ष्मण अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥३२-३४॥


महाविद्याधराश्चान्ये भालङ्कारपुरःसुराः । योद्धुं श्रेणिक निर्याता नानायानविमानगाः ॥३५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! कान्तिरूपी अलंकारोंसे सुशोभित तथा नाना प्रकारके यान और विमानोंसे गमन करनेवाले अनेक बड़े-बड़े विद्याधर भी युद्ध करनेके लिए निकले ॥३५॥


गमने शकुनास्तेषां कृतकोमलनिस्वनाः । आनन्दयन् यथापूर्वमिष्टदेशनिवेशिनः ॥३६॥

अर्थ: जब राम लक्ष्मणका गमन हुआ तब पहलेकी भाँति इष्ट स्थानोंपर बैठकर कोमल शब्द करनेवाले पक्षियोंने उन्हें आनन्दयुक्त किया ॥३६॥


तेषामभिमुखः क्रुद्धो महाबलसमन्वितः । प्रययौ रावणो वेगी महादावसमाकृतिः ॥३७॥

अर्थ: अथानन्तर क्रोधसे युक्त, महाबलसे सहित, वेगवान् एवं महादावानलके समान प्रचण्ड आकृतिको धारण करनेवाला रावण उनके सामने चला ॥३७॥


गन्धर्वाप्सरसस्तेषां बलद्वितयवर्तिनाम् । नभःस्थिता नृवीराणां पुष्पाणि मुमुचुर्मुहुः ॥३८॥

अर्थ: आकाशमें स्थित गन्धर्वों और अप्सराओंने दोनों सेनाओंमें रहनेवाले सुभटोंके ऊपर बार-बार फूलोंकी वर्षा की ॥३८॥


पादातैः परितो गुप्ता निपुणाधोरणेरिताः । अञ्जनाद्रिसमाकाराः प्रसस्नुर्मत्तदन्तिनः ॥३९॥

अर्थ: पैदल सैनिकोंके समूह जिनकी चारों ओरसे रक्षा कर रहे थे, चतुर महावत जिन्हें चला रहे थे तथा जो अञ्जनगिरिके समान विशाल आकारसे युक्त थे ऐसे मदोन्मत्त हाथी मद झरा रहे थे ॥३९॥


दिवाकररथाकारा रथाः प्रचलवाजिनः । युक्ताः सारथिभिः सान्द्रनादाः परमरंहसः ॥४०॥

अर्थ: सूर्यके रथके समान जिनके आकार थे, जिनमें चञ्चल घोड़े जुते हुए थे, जो सारथियोंसे सहित थे, जिनसे विशाल शब्द निकल रहा था तथा जो तीव्र वेगसे सहित थे ऐसे रथ आगे बढ़े जा रहे थे ॥४०॥


ववल्गुः परमं हृष्टाः समुल्लासितहेतयः । पदातयो रणक्षोण्यां सगर्वा बद्धमण्डलाः ॥४१॥

अर्थ: जो अत्यधिक हर्षसे युक्त थे, जिनके शस्त्र चमक रहे थे, तथा जिन्होंने अपने झुण्डके झुण्ड बना रक्खे थे ऐसे गर्वीले पैदल सैनिक रणभूमिमें उछलते जा रहे थे ॥४१॥


स्थूरीपृष्ठसमारूढाः खङ्गर्ष्टिप्रासपाणयः । खेटकाच्छादितोरस्काः संख्यचमां विविशुर्भटाः ॥४२॥

अर्थ: जो घोड़ोंके पीठपर सवार थे, हाथोंमें तलवार बरछी तथा भाले लिये हुए थे और कवचसे जिनके वक्षःस्थल आच्छादित थे ऐसे योद्धाओंने रणभूमिमें प्रवेश किया ॥४२॥


आस्तृणंत्यभिधावन्ति स्पर्द्धन्ते निर्जयन्ति च । जीयन्ते घ्नन्ति हन्यन्ते कुर्वन्ति भटगर्जितम् ॥४३॥

अर्थ: वे योद्धा परस्पर एक दूसरेको आच्छादित कर लेते थे, एक दूसरेके सामने दौड़ते थे, एक दूसरेसे स्पर्धा करते थे, एक दूसरेको जीतते थे, उनसे जीते जाते थे, उन्हें मारते थे, उनसे मारे जाते थे और वीरगर्जना करते थे ॥४३॥


तुरगाः क्वचिदुद्दीप्ता भ्रमन्त्याकुलमूर्त्तयः । कचमुष्टिगदायुद्धं प्रवृत्तं गहनं क्वचित् ॥४४॥

अर्थ: कहीं व्यग्रमुद्राके धारक तेजस्वी घोड़े घूम रहे थे तो कहीं केश मुट्ठी और गदाका भयंकर युद्ध हो रहा था ॥४४॥


केचित्खङ्गक्षतोरस्काः केचिद्विशिखताडिताः । केचित्कुंताहताः शत्रुं ताडयन्ति पुनस्तथा ॥४५॥

अर्थ: कितने ही वीरोंके वक्षःस्थलमें तलवारसे घाव हो गये थे, कोई बाणोंसे घायल हो गये थे और कोई भालोंकी चोट खाये हुए थे तथा बदला चुकानेके लिए वे वीर भी शत्रुओंको उसी प्रकार ताड़ित कर रहे थे ॥४५॥


सततं लालितैः केचिदभीष्टार्थानुसेवनैः । इन्द्रियैः परिमुच्यन्ते कुमित्रैरिव भूमिगाः ॥४६॥

अर्थ: अभीष्ट पदार्थोंके सेवनसे जिन्हें निरन्तर लालित किया था ऐसी इन्द्रियाँ कितने ही सुभटोंको इस प्रकार छोड़ रही थीं, जिस प्रकार कि खोटे मित्र काम निकलनेपर छोड़ देते हैं ॥४६॥


गलदन्त्रचयाः केचिदनावृत्योरुवेदनाम् । पतन्ति शत्रुणा सार्धं दन्तनिष्पीडिताधराः ॥४७॥

अर्थ: जिनकी आँतोंका समूह बाहर निकल आया था ऐसे कितने ही सुभट अपनी बहुत भारी वेदनाको प्रकट नहीं कर रहे थे किन्तु उसे छिपाकर दाँतोंसे ओठ काटते हुए शत्रुपर प्रहार करते थे और उसीके साथ नीचे गिरते थे ॥४७॥


प्रासादशिखरे देवकुमारप्रतिमौजसः । प्रचिक्रीडुर्महाभोगा ये कान्तातनुलालिताः ॥४८॥

ते चक्रकनकच्छिन्नाः संग्रामक्षितिशायिनः । भक्ष्यन्ते विकृताकारा गृध्रगोमायुपंक्तिभिः ॥४९॥

अर्थ: देवकुमारोंके समान तेजस्वी, महाभोगोंके भोगनेवाले और स्त्रियोंके शरीरसे लड़ाये हुए जो सुभट पहले महलोंके शिखरोंपर क्रीड़ा करते थे वे ही उस समय चक्र तथा कनक आदि शस्त्रोंसे खण्डित हो रणभूमिमें सो रहे थे, उनके शरीर विकृत हो गये थे तथा गीध और शियारोंके समूह उन्हें खा रहे थे ॥४८-४९॥


नखक्षतकृताकूता कामिनीव शिवा भटम् । वहन्ती सङ्गमप्रीतिं प्रसुप्तमुपसर्पति ॥५०॥

अर्थ: जिस प्रकार समागमकी इच्छा रखनेवाली स्त्री, नख क्षत देनेके अभिप्रायसे सोते हुए पतिके पास पहुँचती है उसी प्रकार नाखूनोंसे लोंचका अभिप्राय रखनेवाली शृगाली रणभूमिमें पड़े हुए किसी सुभटके पास पहुँच रही थी ॥५०॥


स्फुरणेन पुनर्ज्ञात्वा जीवतीति ससम्भ्रमा । निवर्तते यथा भीता डाकिनी मन्त्रवादिनः ॥५१॥

अर्थ: पास पहुँचनेपर उसके हलन-चलनको देख जब शृगालीको यह जान पड़ा कि यह तो जीवित है तब वह हड़बड़ाती हुई डरकर इस प्रकार भागी जिस प्रकार कि मन्त्रवादीके पाससे डाकिनी भागती है ॥५१॥


शूरं विज्ञाय जीवन्तं बिभ्यती विहगी शनैः । दुष्टनारीव साशङ्का,चलनेत्रापसर्पति ॥५२॥

अर्थ: कोई एक यक्षिणी किसी शूरवीरको जीवित जानकर भयभीत हो धीरे-धीरे इस प्रकार भागी जिस प्रकार कि कोई व्यभिचारिणी पतिको जीवित जान शंकासे युक्त हो नेत्र चलाती हुई भाग जाती है ॥५२॥


शुभाशुभा च जन्तूनां प्रकृतिस्तत्र लक्ष्यते । प्रत्यक्षादविशिष्टैव भंगेन विजयेन च ॥५३॥

अर्थ: युद्धभूमिमें किसीकी पराजय होती थी और किसीकी हार। इससे जीवोंके शुभ अशुभ कर्मोंका उदय वहाँ समान रूपसे प्रत्यक्ष ही दिखाई दे रहा था ॥५३॥


केचित् सुकृतसामर्थ्याद्विजयन्ते बहून्यपि । कृतपापाः प्रपद्यन्ते बहवोऽपि पराजयम् ॥५४॥

अर्थ: कितने ही सुभट पुण्य कर्मके सामर्थ्यसे अनेक शत्रुओंपर विजय प्राप्त करते थे और पूर्वभवमें पाप करनेवाले बहुतसे योद्धा पराजयको प्राप्त हो रहे थे ॥५४॥


मिश्रितं मत्सरेणापि तयोर्यैरर्जितं पुरा । ते जयन्ति विजीयन्ते तत्र प्रलयमागते ॥५५॥

अर्थ: जिन्होंने पूर्वपर्यायमें मत्सर भावसे पुण्य और पाप दोनोंका मिश्रित रूपसे संचय किया था वे युद्धभूमिमें दूसरोंको जीतते थे और मृत्यु निकट आनेपर दूसरोंके द्वारा जीते भी जाते थे ॥५५॥


धर्मो रक्षति मर्माणि धर्मो जयति दुर्जयम् । धर्मः सञ्जायते पक्षः धर्मः पश्यति सर्वतः ॥५६॥

अर्थ: इससे जान पड़ता है कि धर्म ही मर्मस्थानोंकी रक्षा करता है, धर्म ही दुर्जेय शत्रुको जीतता है, धर्म ही सहायक होता है और धर्म ही सब ओरसे देख-रेख रखता है ॥५६॥


रथैरश्वयुतैर्दिव्यैरिभैर्भूधरसन्निभैः । अश्वैः पवनरंहोभिर्भृत्यैरसुरभासुरैः ॥५७॥

न शक्यो रक्षितुं पूर्वसुकृतेनोज्झितो नरः । एको विजयते शत्रुं पुण्येन परिपालितः ॥५८॥

अर्थ: जो मनुष्य पूर्वभवके पुण्यसे रहित है। उसकी घोड़ोंसे जुते हुए दिव्य रथ, पर्वतके समान हाथी, पवनके समान वेगशाली घोड़े और असुरोंके समान देदीप्यमान पैदल सैनिक भी रक्षा नहीं कर सकते और जो पूर्वपुण्यसे रक्षित है वह अकेला ही शत्रुको जीत लेता है ॥५७-५८॥


एवं संयति संवृत्ते प्रवीरभटसङ्कटे । योधा व्यवहिता योधैरवकाशं न लेभिरे ॥५९॥

अर्थ: इस प्रकार प्रचण्ड बलशाली योद्धाओंसे परिपूर्ण युद्धके होनेपर योद्धा, दूसरे योद्धाओंसे इतने पिछल जाते थे कि उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता था ॥५९॥


उत्पतद्भिः पतद्भिश्च भटैरायुधभासुरैः । उत्पातघनसंछन्नमिव जातं नभस्तलम् ॥६०॥

अर्थ: शस्त्रोंसे चमकते हुए कितने ही योद्धा ऊपरको उछल रहे थे और कितने ही मर-मर कर नीचे गिर रहे थे उनसे आकाश ऐसा हो गया था मानो उत्पातके मेघोंसे ही घिर गया हो ॥६०॥


मारीचचन्द्रनिकरवज्राक्षशुकसारणैः । अन्यैश्च राक्षसाधीशैर्बलमुत्सारितं द्विषाम् ॥६१॥

अर्थ: अथानन्तर मारीच, चन्द्रनिकर, वज्राक्ष, शुक, सारण तथा अन्य राक्षस राजाओंने शत्रुओं की सेनाको पीछे हटा दिया ॥६१॥


श्रीशैलेन्दुमरीचिभ्यां नीलेन कुमुदेन च । तथा भूतस्वनाद्यैश्च विध्वस्तं रक्षसां बलम् ॥६२॥

अर्थ: तब हनूमान्, चन्द्ररश्मि, नील, कुमुद तथा भूतस्वन आदि बानरवंशीय राजाओंने राक्षसोंकी सेनाको नष्ट कर दिया ॥६२॥


कुन्दः कुम्भो निकुम्भश्च विक्रमः क्रमणस्तथा । श्रीजम्बुमालिवीरश्च सूर्यारो मकरध्वजः ॥६३॥

तथाऽशनिरथाद्याश्च राक्षसीया महानृपाः । उत्थिता वेगिनो योधास्तेषां साधारणोद्यताः ॥६४॥

अर्थ: तत्पश्चात् कुन्द, कुम्भ, निकुम्भ, विक्रम, श्रीजम्बूमाली, सूर्यार, मकरध्वज तथा वज्ररथ आदि राक्षस पक्ष के बड़े-बड़े राजा तथा वेगशाली योद्धा उन्हें सहायता देनेके लिए खड़े हुए ॥६३-६४॥


भूधराचलसम्मेदविकालकुटिलाङ्गदाः । सुषेणकालचक्रोर्मितरङ्गाद्याः कपिध्वजाः ॥६५॥

तेषामभिमुखीभूता निजसाधारणोद्यताः । नालक्ष्यत भटः कश्चित्तदा प्रतिभटोज्झितः ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर भूधर, अचल, संमेद, विकाल, कुटिल, अंगद, सुषेण, कालचक्र और ऊर्मितरङ्ग आदि बानर पक्षीय योद्धा, अपने पक्षके लोगोंको आलम्बन देनेके लिए उद्यत हो उनके सामने आये । उस समय ऐसा कोई योद्धा नहीं दिखाई देता था जो किसी प्रतिद्वन्दीसे रहित हो ॥६५-६६॥


अञ्जनायाः सुतस्तस्मिन्नारुह्य द्विपयोजितम् । रथं क्रीडति पद्माढ्ये सरसीव महागजः ॥६७॥

अर्थ: जिस प्रकार कमलोंसे सहित सरोवरमें महागज क्रीड़ा करता है उसी प्रकार अंजनाका पुत्र हनूमान् हाथियोंसे जुते रथपर सवार हो उस युद्धभूमिमें क्रीड़ा कर रहा था ॥६७॥


तेन श्रेणिक शूरेण रक्षसां सुमहद्बलम् । कृतमुन्मत्तकीभूतं यथारुचितकारिणा ॥६८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इच्छानुसार काम करनेवाले उस एक शूरवीरने राक्षसोंकी बड़ी भारी सेनाको उन्मत्त जैसा कर दिया - उसका होश गायब कर दिया ॥६८॥


एतस्मिन्नन्तरे क्रोधसङ्गदूषितलोचनः । प्राप्तो मयमहादैत्यः प्रजहार मरुत्सुतम् ॥६९॥

अर्थ: इसी बीचमें क्रोधके कारण जिसके नेत्र दूषित हो रहे थे ऐसे महादैत्य मयने आकर हनूमान्पर प्रहार किया ॥६९॥


उद्धृत्य विशिखं सोऽपि पुण्डरीकनिभेक्षणः । शरवृष्टिभिरुग्राभिरकरोद्विरथं मयम् ॥७०॥

अर्थ: सो पुण्डरीकके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले हनूमान् ने भी बाण निकालकर तीक्ष्ण बाणवर्षासे मयको रथरहित कर दिया ॥७०॥


स रथान्तरमारुह्य पुनर्योद्धुं समुद्यतः । श्रीशैलेन पुनस्तस्य सायकैर्दलितो रथः ॥७१॥

अर्थ: मयको विह्वल देख रावणने शीघ्र ही बहुरूपिणी विद्याके द्वारा निर्मित रथ उसके पास भेजा ॥७१॥


मयं विह्वलमालोक्य विद्यया बहुरूपया । रथं दशमुखः सृष्टं प्रहिणोतिस्म सत्वरम् ॥७२॥

स तं रथं समारुह्य नाम्ना प्रज्वलितोत्तमम् । सम्बाध्य विरथं चक्रे हनूमन्तं महाद्युतिः ॥७३॥

अर्थ: महाकान्तिके धारक मयने प्रज्वलितोत्तम नामक उस रथपर आरूढ़ हो हनूमान्के साथ युद्ध कर उसे रथरहित कर दिया ॥७२-७३॥


धावमानां समालोक्य वानरध्वजिनीं भटाः । जगुः प्राप्तमिदं नाम कृतात्यन्तविपर्ययम् ॥७४॥

अर्थ: तब वानरोंकी सेना भाग खड़ी हुई । उसे भागती देख राक्षण पक्षके सुभट कहने लगे कि इसने जैसा किया ठीक उसके विपरीत फल प्राप्त कर लिया अर्थात् करनीका फल इसे प्राप्त हो गया ॥७४॥


वातिं व्यस्त्रकृतं दृष्ट्वा वैदेहः समधावत । कृतो विस्यन्दनः सोऽपि मयेन शरवर्षिणा ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर हनूमानको शस्त्ररहित देख भामण्डल दौड़ा सो बाणवर्षा करनेवाले मयने उसे भी रथरहित कर दिया ॥७५॥


ततः किष्किन्धराजोऽस्य कुपितोऽवस्थितः पुरः । निरस्त्रोऽसावपि क्षोणीं तेन दैत्येन लम्भितः ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर किष्किन्धनगर का राजा सुग्रीव कुपित हो मयके सामने खड़ा हुआ सो मयने उसे भी शस्त्ररहित कर पृथिवीपर पहुँचा दिया ॥७६॥


ततो मयं पुरश्चक्रे सुसंरब्धो विभीषणः । तयोरभूत् परं युद्धमन्योन्यशरताडितम् ॥७७॥

अर्थ: तत्पश्चात् क्रोधसे भरे विभीषणने मयको आगे किया सो दोनोंमें परस्पर एक दूसरेके बाणोंको काटनेवाला महायुद्ध हुआ ॥७७॥


विभिन्नकवचं दृष्ट्वा कैकसीनन्दनं ततः । रक्ताशोकद्रुमच्छायं प्रसक्तरुधिरस्रुतिम् ॥७८॥

अर्थ: युद्ध करते-करते विभीषणका कवच टूट गया जिससे रुधिरकी धारा बहने लगी और वह फूले हुए अशोक वृक्षके समान लाल दिखने लगा ॥७८॥


निरीक्ष्योन्मत्तभूतं च परित्रस्तं पराङ्मुखम् । कपिध्वजबलं शीर्णं रामो योद्धुं समुद्यतः ॥७९॥

अर्थ: सो विभीषणको ऐसा देख तथा वानरोंकी सेनाको विह्वल, भयभीत पराङ्मुख और बिखरी हुई देखकर राम युद्धके लिए उद्यत हुए ॥७९॥


विद्याकेसरियुक्तं च रथमारुह्य सत्वरम् । मा भैषीरिति सस्वानो दधाव विहितस्मितः ॥८०॥

अर्थ: वे विद्यामयी सिंहोंसे युक्त रथपर सवार हो ‘डरो मत’ यह शब्द करते तथा मुसकराते हुए शीघ्र ही दौड़े ॥८०॥


सतडित्प्रावृडम्भोदघनसङ्घट्टसन्निभम् । विवेश परसैन्यं स बालार्कप्रतिमद्युतिः ॥८१॥

अर्थ: रावणकी सेना बिजली सहित वर्षाकालीन मेघोंकी सघन घटाके समान थी और राम प्रातःकालके सूर्यके समान कान्तिके धारक थे सो इन्होंने रावणकी सेनामें प्रवेश किया ॥८१॥


तस्मिन् परबलध्वंसं नरेन्द्रे कर्तुमुद्यते । वातिवैदेहसुग्रीवकैकसेया धृतिं ययुः ॥८२॥

अर्थ: जब राम, शत्रु सेनाका संहार करनेके लिए उद्यत हुए तब हनूमान् भामण्डल, सुग्रीव और विभीषण भी धैर्यको प्राप्त हुए ॥८२॥


शाखामृगबलं भूयः कर्तुं युद्धं समुद्यतम् । रामतो बलमासाद्य त्यक्तनिःशेषसाध्वसम् ॥८३॥

अर्थ: रामसे बल पाकर जिसका समस्त भय छूट गया था ऐसी वानरोंकी सेना पुनः युद्ध करनेके लिए प्रवृत्त हुई ॥८३॥


प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते सुराणां रोमहर्षणे । लोकोऽन्य इव सञ्जातस्तदालोकविवर्जितः ॥८४॥

अर्थ: उस समय देवोंके रोमाञ्च उत्पन्न करनेवाले शस्त्रोंकी वर्षा होनेपर लोकमें अन्धकार छा गया और वह ऐसा लगने लगा मानो दूसरा ही लोक हो ॥८४॥


ततः पद्मो मयं बाणैर्लग्नश्छादयितुं भृशम् । स्वल्पेनैव प्रयासेन वज्रीव चमरासुरम् ॥८५॥

अर्थ: तदनन्तर राम, थोड़े ही प्रयाससे मयको बाणोंसे आच्छादित करनेके लिए उस तरह अत्यधिक तल्लीन हो गये जिस तरह कि चमरेन्द्रको बाणाच्छादित करनेके लिए इन्द्र तल्लीन हुआ था ॥८५॥


मयं विह्वलितं दृष्ट्वा नितान्तं रामसायकैः । दधाव रावणः क्रुद्धः कृतान्त इव तेजसा ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर रामके वाणोंसे मयको विह्वल देख तेजसे यमकी तुलना करनेवाला रावण कुपित हो दौड़ा ॥८६॥


अथ लक्ष्मणवीरेण भाषितः परमौजसा । प्रस्थितः क्व मया दृष्टो भवानद्यापि भो खग ॥८७॥

अर्थ: तब परम प्रतापी वीर लक्ष्मणने उससे कहा कि ओ विद्याधर ! कहाँ जा रहे हो ? मैं आज तुम्हें देख पाया हूँ ॥८७॥


तिष्ठ तिष्ठ रणं यच्छ क्षुद्र तस्कर पापक । परस्त्रीदीपशलभ पुरुषाधम दुष्क्रिय ॥८८॥

अर्थ: रे क्षुद्र ! चोर ! पापी ! परस्त्रीरूपी दीपकपर मर मिटनेवाले शलभ ! नीच पुरुष ! दुश्चेष्ट ! खड़ा रह खड़ा रह मुझसे युद्धकर ॥८८॥


अद्य प्रकरणं तत्ते करोमि कृतसाहसम् । कुर्यान्नवापि यत्क्रुद्धः कृतान्तोऽपि कुमानसः ॥८९॥

अर्थ: आज साहसपूर्वक तेरी वह दशा करता हूँ जिसे कुपित दुष्ट यम भी नहीं करेगा ? ॥८९॥


अयं राघवदेवोऽद्य समस्तवसुधापतिः । चौरस्य ते वधं कर्तुं समादिशति धर्मधीः ॥९०॥

अर्थ: यह भी राघव देव समस्त पृथिवीके अधिपति हैं। धर्ममय बुद्धिको धारण करनेवाले इन्होंने तुझ चोरका वध करनेके लिए मुझे आज्ञा दी है ॥९०॥


अवोचल्लक्ष्मणं कोपी विंशत्यर्धाननस्ततः । मूढ ते किं न विज्ञातं लोके प्रख्यातमीदृशम् ॥९१॥

यच्चारु भूतले सारं किञ्चिद्द्रव्यं सुखावहम् । अर्हामि तदहं राजा तच्चापि मयि शोभते ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे भरे रावणने लक्ष्मणसे कहा कि अरे मूर्ख ! क्या तुझे यह ऐसी लोक-प्रसिद्ध बात विदित नहीं है कि पृथिवीतलपर जो कुछ सुन्दर श्रेष्ठ और सुखदायक वस्तु है मैं ही उसके योग्य हूँ । यतश्च मैं राजा हूँ अतएव वह मुझमें ही शोभा पाती हैं अन्यत्र नहीं ॥९१-९२॥


न गजस्योचिता घण्टा सारमेयस्य शोभते । तदत्र का कथाऽद्यापि योग्यद्रव्यसमागमे ॥९३॥

अर्थ: हाथीके योग्य घण्टा कुत्ताके लिए शोभा नहीं देता । इसलिए योग्य द्रव्यका योग्य द्रव्यके साथ समागम हुआ इसकी आज भी क्या चर्चा करनी है ॥९३॥


त्वया मानुषमात्रेण यत्किंचनविलापिना । विधातुमसमानेन युद्धं दीनेन लज्ज्यते ॥९४॥

अर्थ: तू एक साधारण मनुष्य है, चाहे जो बकनेवाला है, मेरी समानता नहीं रखता तथा अत्यन्त दीन है अतः तेरे साथ युद्ध करनेमें यद्यपि मुझे लज्जा आती है ॥९४॥


विप्रलब्धस्तथाप्येतैर्युद्धं चेत्कर्तु मर्हसि । प्रव्यक्तं काललब्धोऽसि निर्वेदीवासि जीविते ॥९५॥

अर्थ: तथापि इन सबके द्वारा बहकाया जाकर यदि युद्ध करना चाहता है तो स्पष्ट है कि तेरे मरनेका काल आ पहुँचा है अथवा तू अपने जीवनसे मानो उदास हो चुका है ॥९५॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचद्वेद्मि त्वं यादृशः प्रभुः । अद्य ते गर्जितं पाप हरामि किमिहोदितैः ॥९६॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने कहा कि तू जैसा प्रभु है मैं जानता हूँ । अरे पापी ! इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या ? मैं तेरी सब गर्जना अभी हरता हूँ ॥९६॥


इत्युक्तो रावणो वाणैः सुवाणैः कैकेयीसुतम् । प्रावृषेण्यघनाकारो गिरिकल्पं निरुद्धवान् ॥९७॥

अर्थ: इतना कहनेपर रावणने सनसनाते हुए वाणोंसे लक्ष्मणको इस प्रकार रोका जिस प्रकार कि वर्षाऋतुका मेघ किसी पर्वतको आ रोकता है ॥९७॥


वज्रदण्डैः शरैस्तस्य विशल्यारमणः शरान् । अदृष्टचापसम्बन्धैरन्तराले न्यवारयत् ॥९८॥

अर्थ: इधरसे जिनका वज्रमयी दण्ड था तथा शीघ्रताके कारण जिन्होंने मानो धनुषका सम्बन्ध देखा ही नहीं था ऐसे वाणोंसे लक्ष्मणने उसके वाणोंको बीचमें ही नष्ट कर दिया ॥९८॥


छिन्नैर्विपाटितैः क्षोदं गतैश्च विशिखोत्करैः । द्यौश्च भूमिश्च सञ्जाता विवेकपरिवर्जिता ॥९९॥

अर्थ: उस समय टूटे-फूटे और चूर-चूर हुए वाणोंके समूहसे आकाश और भूमि भेदरहित हो गई थी ॥९९॥


कैकयीसूनुना व्यस्त्रः कैकसीनन्दनः कृतः । माहेन्द्रमस्त्रमुत्सृष्टं चकार गगनासनम् ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर जब लक्ष्मणने रावणको शस्त्ररहित कर दिया तब उसने आकाशको व्याप्त करने- वाला माहेन्द्र शस्त्र छोड़ा ॥१००॥


सम्प्रयुज्य समीरास्त्रमस्त्रक्रमविपश्चिता । सौमित्रिणा परिध्वंसं तन्नीतं क्षणमात्रतः ॥१०१॥

अर्थ: इधरसे शस्त्रोंका क्रम जाननेमें निपुण लक्ष्मणने पवन वाणका प्रयोगकर उसके उस माहेन्द्र शस्त्रको क्षणभरमें नष्ट कर दिया ॥१०१॥


भूयः श्रेणिक संरम्भस्फुरिताननतेजसा । रावणेनास्त्रमाग्नेयं क्षिप्तं ज्वलितसर्वदिक् ॥१०२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! क्रोधसे जिसके मुखका तेज दमक रहा था ऐसे रावणने फिर आग्नेय वाण चलाया जिससे समस्त दिशाएँ देदीप्यमान हो उठीं ॥१०२॥


लक्ष्मीधरेण तच्चापि वारुणास्त्रप्रयोगतः । निर्वापितं निमेषेण स्थितं कार्यविवर्जितम् ॥१०३॥

अर्थ: इधरसे लक्ष्मणने वारुणास्त्र चलाकर उस आग्नेय वाणको, वह कार्य प्रारम्भ करे कि उसके पूर्व ही निमेष मात्रमें, बुझा दिया ॥१०३॥


कैकयेयस्ततः पापमस्त्रं चिक्षेप रक्षसि । रक्षसा तच्च धर्मास्त्रप्रयोगेण निवारितम् ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने रावणपर पाप नामका शस्त्र छोड़ा सो उधरसे रावणने धर्म नामक शस्त्रके प्रयोगसे उसका निवारण कर दिया ॥१०४॥


ततोऽस्त्रमिंधनं नाम लक्ष्मणेन प्रयुज्यते । इन्धनेनैव तन्नीतं रावणेन हतार्थताम् ॥१०५॥

अर्थ: तत्पश्चात् लक्ष्मणने इन्धन नामक शस्त्रका प्रयोग किया जिसे रावणने इन्धन नामक शस्त्रसे निरर्थक कर दिया ॥१०५॥


फलासारं विमुञ्चद्भिः प्रसूनपल्लवान्वितम् । गगनं वृक्षसंघातैरत्यन्तगहनीकृतम् ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने फल और फूलोंकी वर्षा करनेवाले वृक्षोंके समूहसे आकाशको अत्यन्त व्याप्त कर दिया ॥१०६॥


भूयस्तामसवाणौघैरन्धकारीकृताम्बरैः । लक्ष्मीधरकुमारेण छादितो राक्षसाधिपः ॥१०७॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने आकाशको अन्धकार युक्त करनेवाले तामसवाणोंके समूहसे रावणको आच्छादित कर दिया ॥१०७॥


सहस्रकिरणास्त्रेण तामसास्त्रमपोह्य सः । प्रायुङ्क्त दन्दशूकास्त्रं विस्फुरत्फणमण्डलम् ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने सहस्रकिरण अस्त्रके द्वारा तामस अस्त्रको नष्ट कर जिसमें फनोंका समूह उठ रहा था ऐसा दन्दशूक अस्त्र चलाया ॥१०८॥


ततस्तार्क्ष्यसमास्त्रेण लक्ष्मणेन निराकृतम् । पन्नगास्त्रं नभश्चाभूद्धेमभासेव पूरितम् ॥१०९॥

अर्थ: तत्पश्चात् इधरसे लक्ष्मणने गरुड़वाण चलाकर उस दन्दशूक अस्त्रका निराकरण कर दिया जिससे आकाश ऐसा हो गया मानो स्वर्णकी कान्तिसे ही भर गया हो ॥१०९॥


संहाराम्बुदनिर्घोषमुरगास्त्रमथो पुनः । पद्मनाभानुजोऽमुञ्चद् विषाग्निकणदुःसहम् ॥११०॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने प्रलयकालके मेघके समान शब्द करनेवाला तथा विषरूपी अग्निके कणोंसे दुःसह उरगास्त्र छोड़ा ॥११०॥


बर्हणास्त्रेण तद्वीरस्त्रिकूटेन्दुरसारयत् । प्रायोक्षीच्च दुरुत्सारमस्त्रं विघ्नविनायकम् ॥१११॥

अर्थ: जिसे धीर वीर रावणने वर्हणास्त्रके प्रयोगसे दूर कर दिया और उसके बदले जिसका दूर करना अशक्य था ऐसा विघ्नविनाशक नामका शस्त्र छोड़ा ॥१११॥


विसृष्टे तत्र विघ्नास्त्रे वाञ्छितच्छेदकारिणि । प्रयोगे त्रिदशास्त्राणां लक्ष्मणो मोहमागमत् ॥११२॥

अर्थ: तदनन्तर इच्छित वस्तुओंमें विघ्न डालनेवाले उस विघ्नविनाशक शस्त्रके छोड़नेपर लक्ष्मण देवोपनीत शस्त्रोंके प्रयोग करनेमें मोहको प्राप्त हो गये अर्थात् उसे निवारण करनेके लिए कौन शस्त्र चलाना चाहिये इसका निर्णय नहीं कर सके ॥११२॥


वज्रदण्डान् शरानेव विससर्ज स भूरिशः । रावणोऽपि शरैरेव स्वभावस्थैरयुध्यत ॥११३॥

अर्थ: तब वे केवल वज्रमय दण्डोंसे युक्त वाणोंको ही अधिक मात्रामें चलाते रहे और रावण भी उस दशामें स्वाभाविक वाणोंसे हो युद्ध करता रहा ॥११३॥


आकर्णसंहतैर्वाणैरासीद्युद्धं तयोः समम् । लक्ष्मीभृद्रक्षसोर्घोरं त्रिपृष्ठयथिकण्ठयोः ॥११४॥

अर्थ: उस समय लक्ष्मण और रावणके बीच कान तक खिंचे वाणोंसे ऐसा भयंकर युद्ध हुआ जैसा कि पहले त्रिपृष्ठ और अश्वग्रीवमें हुआ था ॥११४॥


कर्मण्युपेतेऽभ्युदयं पुराणे संप्रेरके सत्यतिदारुणाङ्गे । तस्योचितं प्राप्तफलं मनुष्याः क्रियापवर्गप्रकृतं भजन्ते ॥११५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जब प्रेरणा देनेवाले पूर्वोपार्जित पुण्य-पापकर्म उदयको प्राप्त होते हैं तब मनुष्य उन्हींके अनुरूप कार्यको सिद्ध अथवा असिद्ध करनेवाले फलको प्राप्त होते हैं ॥११५॥


उदारसंरम्भवशं प्रपन्नाः प्रारब्धकार्यार्थनियुक्तचित्ताः । नरा न तीव्रं गणयन्ति शस्त्रं न पावकं नैव रविं न वायुम् ॥११६॥

अर्थ: जो अत्यधिक क्रोधकी अधीनताको प्राप्त हैं और जिन्होंने अपना चित्त प्रारम्भ किये हुए कार्यकी सिद्धिमें लगा दिया है ऐसे मनुष्य न तीव्र शस्त्रको गिनते हैं, न अग्निको गिनते हैं, न सूर्यको गिनते हैं और न वायुको ही गिनते हैं ॥११६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रावण-लक्ष्मणयुद्धवर्णनाभिधानं नाम चतुःसप्ततितमं पर्व ॥७४॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें रावण और लक्ष्मणके युद्धका वर्णन करनेवाला चौहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७४॥


७५. पंचसप्ततितमं पर्व (चक्ररत्नोत्पत्तिवर्णनं)

खिन्नाभ्यां दीयते स्वादु जलं ताभ्यां सुशीतलम् । महातर्षाभिभूताभ्यामयं हि समरे विधिः ॥१॥

अमृतोपममन्नं च क्षुधाग्लपनमीयुषोः । गोशीर्षचन्दनं स्वेदसंगिनोर्ह्लादकारणम् ॥२॥

तालवृन्तादिवातश्च हिमवारिकणो रणे । क्रियते तत्परैः कार्यं तथान्यदपि पार्श्वगैः ॥३॥

तथा तयोस्तथाऽन्येषामपि स्वपरवर्गतः । इति कर्तव्यतासिद्धिः सकला प्रतिपद्यते ॥४॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! युद्धकी यह विधि है कि दोनों पक्षके खेदखिन्न तथा महाप्याससे पीड़ित मनुष्योंके लिए मधुर तथा शीतल जल दिया जाता है । क्षुधासे दुखी मनुष्योंके लिए अमृततुल्य भोजन दिया जाता है । पसीनासे युक्त मनुष्योंके लिए आह्लादका कारण गोशीर्ष चन्दन दिया जाता है । पङ्खे आदिसे हवाकी जाती है । बर्फके जलके छींटे दिये जाते हैं तथा इनके सिवाय जिसके लिए जो कार्य आवश्यक हो उसकी पूर्ति समीपमें रहनेवाले मनुष्य तत्परताके साथ करते हैं । युद्धकी यह विधि जिस प्रकार अपने पक्षके लोगोंके लिए है उसी प्रकार दूसरे पक्षके लोगोंके लिए भी है । युद्धमें निज और परका भेद नहीं होता । ऐसा करनेसे ही कर्तव्यकी समग्र सिद्धि होती है ॥१-४॥


दशाहोऽतिगतस्तीव्रमेतयोर्युध्यमानयोः । बलिनोर्भङ्गनिर्मुक्तचित्तयोरतिवीरयोः ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके चित्तमें हारका नाम भी नहीं था तथा जो अतिशय बलवान् थे ऐसे प्रचण्ड वीर लक्ष्मण और रावणको युद्ध करते हुए दश दिन बीत गये ॥५॥


रावणेन समं युद्धं लक्ष्मणस्य बभूव यत् । लक्ष्मणेन समं युद्धं रावणस्य बभूव यत् ॥६॥

अर्थ: लक्ष्मणका जो युद्ध रावणके साथ हुआ था वही युद्ध रावणका लक्ष्मणके साथ हुआ था अर्थात् उनका युद्ध उन्हींके समान था ॥६॥


यक्षकिन्नरगन्धर्वाप्सरसो विस्मयं गताः । साधुशब्दविमिश्राणि पुष्पवर्षाणि चिक्षिपुः ॥७॥

अर्थ: उनका युद्ध देख यक्ष किन्नर गन्धर्व तथा अप्सराएँ आदि आश्चर्यको प्राप्त हो धन्यवाद देते और उनपर पुष्पवृष्टि छोड़ते थे ॥७॥


चन्द्रवर्धननाम्नोऽथ विद्याधरजनप्रभोः । अष्टौ दुहितरो व्योम्नि विमानशिखरस्थिताः ॥८॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रवर्धन नामक विद्याधर राजाकी आठ कन्याएँ आकाशमें विमानकी शिखरपर बैठी थीं ॥८॥


अप्रमत्तैर्महाशंकैः कृतरक्षामहत्तरैः । पृष्टाः संगतिमेताभिरप्सरोभिः कुतूहलात् ॥९॥

का यूयं देवताकारा भक्तिं लक्ष्मणसुन्दरे । दधाना इव वर्त्तध्वे सुकुमारशरीरिकाः ॥१०॥

अर्थ: महती आशंकासे युक्त बड़े-बड़े प्रतीहारी सावधान रहकर जिनकी रक्षा कर रहे थे ऐसी उन कन्याओंसे समागमको प्राप्त हुई अप्सराओंने कुतूहलवश पूछा कि आपलोग देवताओंके समान आकारको धारण करनेवालीं तथा सुकुमार शरीरसे युक्त कौन हैं ? ऐसा जान पड़ता है मानो लक्ष्मणमें आपलोग अधिक भक्ति धारण कर रही हैं ॥९-१०॥


सलज्जा इव ता ऊचुः श्रूयतां यदि कौतुकम् । वैदेहीवरणे पूर्वमस्माभिः सहितः पिता ॥११॥

आसीद्गतः तदास्थानं राज्ञां कौतुकचोदितः । दृष्ट्वा च लक्ष्मणं तत्र ददावस्मै धियैव नः ॥१२॥

अर्थ: तब वे कन्याएँ लज्जित होतो हुई बोलीं कि यदि आपको कौतुक है तो सुनिये । पहले जब सीताका स्वयंवर हो रहा था तब हमारे पिता हमलोगोंके साथ कौतुकसे प्रेरित हो सभामण्डपमें गये थे वहाँ लक्ष्मणको देखकर उन्होंने हमलोगोंको उन्हें देनेका संकल्प किया था ॥११-१२॥


ततोऽधिगम्य मात्रातो वृत्तमेतन्निवेदितम् । दर्शनादेव चाऽऽरभ्य मनस्येष व्यवस्थितः ॥१३॥

अर्थ: वहाँसे आकर यह वृत्तान्त पिताने माताके लिए कहा और उससे हमलोगोंको विदित हुआ । साथ हीं स्वयंवरमें जबसे हमलोगोंने इसे देखा था तभीसे यह हमारे मनमें स्थित था ॥१३॥


सोऽयं महति संग्रामे वर्त्तते संशयावहे । भविष्यति कथं त्वेतदिति विद्मो न दुःखिताः ॥१४॥

अर्थ: वही लक्ष्मण इस समय जीवन-मरणके संशयको धारण करनेवाले इस महासंग्राममें विद्यमान है । सो संग्राममें क्या कैसा होगा यह हमलोग नहीं जानतीं इसीलिए दुःखी हो रही हैं ॥१४॥


अस्य मानवचन्द्रस्य हृदयेशस्य या गतिः । लक्ष्मीधरकुमारस्य सैवास्माभिर्विनिश्चिता ॥१५॥

अर्थ: मनुष्योंमें चन्द्रमाके समान इस हृदयवल्लभ लक्ष्मणकी जो दशा होगी वही हमारी होगी ऐसा हम सबने निश्चित किया है ॥१५॥


मनोहरस्वनं तासां श्रुत्वा तद्वचनं ततः । चक्षुरूर्ध्वं नियुञ्जानो लक्ष्मणस्ता व्यलोकत ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर उन कन्याओंके मनोहर वचन सुन लक्ष्मणने ऊपरकी ओर नेत्र उठाकर उन्हें देखा ॥१६॥


तद्दर्शनात्परं प्राप्ताः प्रमोदं ताः सुकन्यकाः । सिद्धार्थः सर्वथा नाथ भवेत्युदगिरन् स्वनम् ॥१७॥

अर्थ: लक्ष्मणके देखनेसे वे उत्तम कन्याएँ परम प्रमोदको प्राप्त हो इस प्रकारके शब्द बोलीं कि हे नाथ ! तुम सब प्रकारसे सिद्धार्थ होओ - तुम्हारी भावना सब तरह सिद्ध हो ॥१७॥


सिद्धार्थशब्दनात्तस्मात् स्मृत्वा विहसिताननः । अस्त्रं सिद्धार्थनामानं लक्ष्मणः कृतितां गतः ॥१८॥

अर्थ: उन कन्याओंके मुखसे सिद्धार्थ शब्द सुनकर लक्ष्मणको सिद्धार्थ नामक अस्त्रका स्मरण आ गया जिससे उनका मुख खिल उठा तथा वे कृतकृत्यताको प्राप्त हो गये ॥१८॥


स सिद्धार्थमहास्त्रेण क्षिप्रं विघ्नविनायकम् । अस्त्रमस्तगतं कृत्वा सुदीप्तं योद्धुमुद्यतः ॥१९॥

अर्थ: फिर क्या था, शीघ्र ही सिद्धार्थ महास्त्रके द्वारा रावणके विघ्नविनाशक अस्त्रको नष्टकर लक्ष्मण बड़ी तेजीसे युद्ध करनेके लिए उद्यत हो गये ॥१९॥


गृह्णाति रावणो यद्यदस्त्रं शस्त्रविशारदः । छिनत्ति लक्ष्मणस्तत्तत्परमास्त्रविशारदः ॥२०॥

अर्थ: शस्त्रोंके चलानेमें निपुण रावण जिस-जिस शस्त्रको ग्रहण करता था परमास्त्रोंके चलानेमें निपुण लक्ष्मण उसी-उसी शस्त्रको काट डालता था ॥२०॥


ततः पतत्रिसंघातैरस्य पत्रीन्द्रकेतुना । सर्वा दिशः परिच्छन्ना जीमूतैरिव भूभृतः ॥२१॥

अर्थ: तदनन्तर ध्वजामें पक्षिराज - गरुडका चिह्न धारण करनेवाले लक्ष्मणके वाणसमूहसे सब दिशाएँ इस प्रकार व्याप्त हो गईं जिस प्रकार कि मेघोंसे पर्वत व्याप्त हो जाते हैं ॥२१॥


ततो भगवतीं विद्यां बहुरूपविधायिनीम् । प्रविश्य रक्षसामीशः समरक्रीडनं श्रितः ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर रावण भगवती बहुरूपिणी विद्यामें प्रवेश कर युद्ध-क्रीड़ा करने लगा ॥२२॥


लक्ष्मीधरशरैस्तीक्ष्णैः शिरो लङ्कापुरीप्रभोः । छिन्नं छिन्नमभूद्भूयः श्रीमत्कुण्डलमण्डितम् ॥२३॥

अर्थ: यही कारण था कि उसका शिर यद्यपि लक्ष्मण के तीक्ष्ण बाणों से बार-बार कट जाता था तथापि वह बार-बार देदीप्यमान कुण्डलोंसे सुशोभित हो उठता था ॥२३॥


एकस्मिन् शिरसिच्छिन्ने शिरोद्वयमजायत । तयोरुत्कृत्तयोर्वृद्धिं शिरांसि द्विगुणां ययुः ॥२४॥

अर्थ: एक शिर कटता था तो दो शिर उत्पन्न हो जाते थे और दो कटते थे तो उससे दुगुनी वृद्धिको प्राप्त हो जाते थे ॥२४॥


निकृत्ते बाहुयुग्मे च जज्ञे बाहुचतुष्टयम् । तस्मिन् छिन्ने ययौ वृद्धिं द्विगुणा बाहुसन्ततिः ॥२५॥

अर्थ: दो भुजाएँ कटती थीं तो चार हो जातीं थीं और चार कटती थीं उससे दूनी हो जाती थीं ॥२५॥


सहस्रैरुत्तमाङ्गानां भुजानां चातिभूरिभिः । पद्मखण्डैरगण्यैश्च ज्ञायते रावणो वृतः ॥२६॥

अर्थ: हजारों शिरों और अत्यधिक भुजाओंसे घिरा हुआ रावण ऐसा जान पड़ता था मानो अगणित कमलोंके समूहसे घिरा हो ॥२६॥


नभःकरिकराकारैः करैः केयूरभूषितैः । शिरोभिश्चाभवत्पूर्णं शस्त्ररत्नांशुपिंजरम् ॥२७॥

अर्थ: हाथीकी सूँडके समान आकारसे युक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित भुजाओं और शिरोंसे भरा आकाश शस्त्र तथा रत्नोंकी किरणोंसे पिञ्जर वर्ण हो गया ॥२७॥


शिरोग्राहसहस्रोग्रस्तुंगबाहुतरंगभृत् । अवर्द्धत महार्भीमो राक्षसाधिपसागरः ॥२८॥

अर्थ: जो शिररूपी हजारों मगरमच्छोंसे भयंकर था तथा भुजाओं रूपी ऊँची-ऊँची तरङ्गोंको धारण करता था ऐसा रावणरूपी महाभयंकर सागर उत्तरोत्तर बढ़ता जाता था ॥२८॥


बाहुसौदामिनीदण्डप्रचण्डो घोरनिस्वनः । शिरःशिखरसंघातैर्ववृधे रावणाम्बुदः ॥२९॥

अर्थ: अथवा जो भुजारूपी विद्युद् दण्डोंसे प्रचण्ड था और भयंकर शब्द कर रहा था ऐसा रावणरूपी मेघ शिररूपी शिखरोंके समूहसे बढ़ता जाता था ॥२९॥


बाहुमस्तकसंघट्टनिःस्वनच्छत्रभूषणः । महासैन्यसमानोऽभूदेकोऽपि त्रिककुप्पतिः ॥३०॥

अर्थ: भुजाओं और मस्तकोंके संघटनसे जिसके छत्र तथा आभूषण शब्द कर रहे थे ऐसा रावण एक होने पर भी महासेनाके समान जान पड़ता था ॥३०॥


पुराऽनेकेन युद्धोऽहमधुनैकाकिनाऽमुना । युद्धे कथमितीवायं लक्ष्मणेन बहूकृतः ॥३१॥

अर्थ: ‘मैंने पहले अनेकोंके साथ युद्ध किया है अब इस अकेलेके साथ क्या करूँ’ यह सोच कर ही मानो लक्ष्मणने उसे अनेक रूप कर लिया था ॥३१॥


रत्नशस्त्रांशुसंघातकरजालप्रदीपितः । सञ्जातो राक्षसाधीशो दह्यमानवनोपमः ॥३२॥

अर्थ: आभूषणोंके रत्न तथा शस्त्र समूह की किरणोंको देदीप्यमान रावण जलते हुए बनके समान हो गया था ॥३२॥


चक्रेषुशक्तिकुन्तादिशस्त्रवर्षेण रावणः । सक्तश्छादयितुं बाहुसहस्रैरपि लक्ष्मणम् ॥३३॥

अर्थ: रावण अपनी हजारों भुजाओंके द्वारा चक्र, बाण, शक्ति तथा भाले आदि शस्त्रोंकी वर्षासे लक्ष्मणको आच्छादित करनेमें लगा था ॥३३॥


लक्ष्मणोऽपि परं क्रुद्धो विषादपरिवर्जितः । अर्कतुण्डैः शरैः शत्रुं प्रच्छादयितुमुद्यतः ॥३४॥

अर्थ: और क्रोधसे भरे तथा विवादसे रहित लक्ष्मण भी सूर्यमुखी बाणोंसे शत्रुको आच्छादित करनेमें झुके हुए थे ॥३४॥


एकं द्वे त्रीणि चत्वारि पञ्च षड् दश विंशतिः । शतं सहस्रमयुतं चिच्छेदारिशिरांसि सः ॥३५॥

अर्थ: उन्होंने शत्रुके एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, दश, बीस, सौ, हजार तथा दश हजार शिर काट डाले ॥३५॥


शिरःसहस्रसंछन्नं पतद्भिः सह बाहुभिः । सोल्कादण्डं पतज्ज्योतिश्चक्रमासीदिवाम्बरम् ॥३६॥

अर्थ: हजारों शिरोंसे व्याप्त तथा पड़ती हुई भुजाओंसे युक्त आकाश, उस समय ऐसा हो गया था मानो उल्कादण्डोंसे युक्त तथा जिसमें तारा मण्डल गिर रहा है ऐसा हो गया था ॥३६॥


सबाहुमस्तकच्छन्ना रणक्षोणी निरन्तरम् । सनागभोगराजीवखण्डशोभामधारयत् ॥३७॥

अर्थ: उस समय भुजाओं और मस्तकसे निरन्तर आच्छादित युद्धभूमि सर्पों के फणासे युक्त कमल समूहकी शोभा धारण कर रही थी ॥३७॥


समुत्पन्नं समुत्पन्नं शिरोबाहुकदम्बकम् । रक्षसो लक्ष्मणोच्छित्तकर्मेव मुनिपुङ्गवः ॥३८॥

अर्थ: उसके शिर और भुजाओंका समूह जैसा जैसा उत्पन्न होता जाता था लक्ष्मण वैसा वैसा ही उसे उस प्रकार काटता जाता था जिस प्रकार कि मुनिराज नये नये बँधते हुए कर्मोंको काटते जाते हैं ॥३८॥


गलद्रुधिरधाराभिः सन्तताभिः समाकुलम् । वियत्सन्ध्याविनिर्माणं समुद्भूतमिवापरम् ॥३९॥

अर्थ: निकलते हुए रुधिरकी लम्बी चौड़ी धाराओंसे व्याप्त आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो जिसमें संध्याका निर्माण हुआ है ऐसा दूसरा ही आकाश उत्पन्न हुआ हो ॥३९॥


असंख्यातभुजः शत्रुर्लक्ष्मणेन द्विबाहुना । महानुभावयुक्तेन कृतो निष्फलविग्रहः ॥४०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि देखो, महानुभावसे युक्त द्विबाहु लक्ष्मणने असंख्यात भुजाओंके धारक रावण को निष्फल शरीरका धारक कर दिया ॥४०॥


निरुच्छ्वासाननः स्वेदबिन्दुजालचिताननः । सत्त्ववानाकुलस्वांगः संवृत्तो रावणः क्षणम् ॥४१॥

अर्थ: देखो, पराक्रमी रावण क्षण भरमें क्यासे क्या हो गया ? उसके मुखसे श्वास निकलना बंद हो गया, उसका मुख पसीनाकी बूंदोंके समूहसे व्याप्त हो गया और उसका समस्त शरीर आकुल-व्याकुल हो गया ॥४१॥


तावच्छ्रेणिक निर्वृत्ते तस्मिन्संख्येऽतिरौरवे । स्वभावावस्थितो भूत्वा रावणः क्रोधदीपितः ॥४२॥

युगावसानमध्याह्नसहस्रकिरणप्रभम् । परपक्षक्षयक्षीबंश्चक्ररत्नमचिन्तयत् ॥४३॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! जब तक वह अत्यन्त भयंकर युद्ध होता है तब तक क्रोधसे प्रदीप्त रावणने कुछ स्वभावस्थ हो कर उस चक्र रत्नका चिन्तवन किया जो कि प्रलयकालीन मध्याह्नके सूर्यके समान प्रभापूर्ण था तथा शत्रु पक्षका क्षय करनेमें उन्मत्त था ॥४२-४३॥


अप्रमेयप्रभाजालं मुक्ताजालपरिष्कृतम् । स्वयंप्रभास्वरं दिव्यं वज्रतुण्डं महाद्भुतम् ॥४४॥

नानारत्नपरीताङ्ग दिव्यमाल्यानुलेपनम् । अग्निप्राकारसङ्काशंधारामण्डलदीधिति ॥४५॥

वैडूर्यारसहस्रेण युक्तं दर्शनदुःसहम् । सदा यक्षसहस्रेण कृतरक्षं प्रयत्नतः ॥४६॥

महासंरंभसंबद्धकृतान्ताननसन्निभम् । चिन्तानन्तरमेतस्य चक्रं सन्निहितं करे ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर-जो अपरिमित कान्तिके समूहका धारक था, मोतियोंकी झालरसे युक्त था, स्वयं देदीप्यमान था, दिव्य था, वज्रमय मुखसे सहित था, महा अद्भुत था, नाना रत्नोंसे जिसका शरीर व्याप्त था, दिव्य मालाओं और विलेपनसे सहित था, जिसकी धारोंकी मण्डलाकार किरणें अग्निके कोटके समान जान पड़ती थीं, जो वैडूर्यमणिनिर्मित हजार आरोंसे सहित था, जिसका देखना कठिन था, हजार यक्ष जिसकी सदा प्रयत्न पूर्वक रक्षा करते थे, और जो प्रलय काल सम्बद्ध यमराजके मुखके समान था ऐसा चक्र, चिन्ता करते ही उसके हाथमें आ गया ॥४४-४७॥


कृतस्तत्र प्रभास्त्रेण निष्प्रभो ज्योतिषां पतिः । चित्रार्पितरविच्छायमात्रशेषो व्यवस्थितः ॥४८॥

अर्थ: उस प्रभापूर्ण दिव्य अस्त्रके द्वारा सूर्य प्रभा हीन कर दिया गया जिससे वह चित्रलिखित सूर्य के समान कान्ति मात्र है शेष जिसमें ऐसा रह गया ॥४८॥


गन्धर्वाऽप्सरसो विश्वावसुतुम्बुरुनारदाः । परित्यज्य रणप्रेक्षां गताः क्वापि विगीतिकाः ॥४९॥

अर्थ: गन्धर्व, अप्सराएं, विश्वावसु, तुम्बुरु, और नारद युद्धका देखना छोड़ गायन भूल कर कहीं चले गये ॥४९॥


मर्तव्यमिति निश्चित्य तथाप्यत्यन्तधीरधीः । शत्रुं तथाविधं वीक्ष्य पद्मनाभानुजोऽवदत् ॥५०॥

सङ्गतेनामुना किं त्वं स्थितोऽस्येवं कदर्यवत् । शक्तिश्चेदस्ति ते काचित्प्रहरस्व नराधम ॥५१॥

अर्थ: ‘अब तो मरना ही होगा’ ऐसा निश्चय यद्यपि लक्ष्मणने कर लिया था तथापि वे अत्यन्त धीर बुद्धिके धारक हो उस प्रकारके शत्रुकी ओर देख जोरसे बोले कि रे नराधम ! इस चक्रको पाकर भी कृपणके समान इस तरह क्यों खड़ा है यदि कोई शक्ति है तो प्रहार कर ॥५०-५१॥


इत्युक्तः परमं क्रुद्धो दन्तदष्टरदच्छदः । मण्डलीकृतविस्फारिप्रभापटललोचनः ॥५२॥

क्षुब्धमेघकुलस्वानं प्रभ्रम्य सुमहाजवम् । चिक्षेप रावणश्चक्रं जनसंशयकारणम् ॥५३॥

अर्थ: इतना कहते ही जो अत्यन्त कुपित हो गया था, जो दांतोंसे ओठको डश रहा था, तथा जिसके नेत्रोंसे मण्डलाकार विशाल कान्तिका समूह निकल रहा था ऐसे रावणने घुमा कर चक्ररत्न छोड़ा। वह चक्ररत्न क्षोभको प्राप्त हुए मेघमण्डलके समान भयंकर शब्द कर रहा था, महावेगशाली था, और मनुष्योंके संशयका कारण था ॥५२-५३॥


दृष्ट्वाऽभिमुखमागच्छत्तदुत्पातार्कसंनिभम् । निवारयितुमुद्युक्तो वज्रास्यैर्लक्ष्मणः शरैः ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर प्रलय कालके सूर्यके समान सामने आते हुए उस चक्ररत्नको देख कर लक्ष्मण वज्रमुखी बाणोंसे उसे रोकनेके लिए उद्यत हुए ॥५४॥


वज्रावर्त्तेन पद्माभो धनुषा वेगशालिना । हलेन चोग्रपोत्रेण भ्रामितेनान्यबाहुना ॥५५॥

संभ्रमं परमं बिभ्रत्सुग्रीवो गदया तदा । मण्डलाग्रेण तीक्ष्णेन प्रभामण्डलसुन्दरः ॥५६॥

अरातिप्रतिकूलेन शूलेनासौ विभीषणः । उल्कामुद्गरलांगूलकनकाद्यैर्मरुत्सुतः ॥५७॥

अंगदः परिघेनाङ्गः कुठारेणोरुतेजसा । शेषा अपि तथा शेषैः शस्त्रैः खेचरपुङ्गवाः ॥५८॥

एकीभूय समुद्युक्ता अपि जीवितनिःस्पृहाः । ते निवारयितुं शेकुर्न तत्त्रिदशपालितम् ॥५९॥

अर्थ: रामचद्रजी एक हाथसे वेगशाली वज्रावर्त नामक धनुषसे और दूसरे हाथ से घुमाये हुए तीक्ष्णमुख हलसे, अत्यधिक क्षोभको धारण करने वाला सुग्रीव गदासे, भामण्डल तीक्ष्ण तलवारसे, विभीषण शत्रुका विघात करने वाले त्रिशूलसे, हनूमान् उल्का, मुद्गर, लाङ्गूल तथा कनक आदिसे, अङ्गद परिघसे, अङ्ग अत्यन्त तीक्ष्ण कुठारसे और अन्य विद्याधर राजा भी शेष अस्त्र-शस्त्रोंसे एक साथ मिल कर जीवनकी आशा छोड़ उसे रोकनेके लिए उद्यत हुए पर वे सब मिलकर भी इन्द्रके द्वारा रक्षित उस चक्ररत्नको रोकनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥५४-५९॥


तेनाऽऽगत्य परीत्य त्रिर्विनयस्थितरक्षकम् । सुखं शान्तवपुः स्वैरं लक्ष्मणस्य करे स्थितम् ॥६०॥

अर्थ: इधर रामकी सेनामें व्यग्रता बढ़ी जा रही थी पर भाग्य की बात देखो कि उसने आकर लक्ष्मणकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, उसके सब रक्षक विनयसे खड़े हो गये, उसका आकार सुखकारी तथा शान्त हो गया और वह स्वेच्छासे लक्ष्मणके हाथमें आकर रुक गया ॥६०॥


माहात्म्यमेतत्सुसमासतस्ते निवेदितं कर्तृ सुविस्मयस्य । रामस्य नारायणसङ्गतस्य महर्द्धिकं श्रेणिक ! लोकतुङ्गम् ॥६१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मैंने तुझे राम-लक्ष्मणका यह अत्यन्त आश्चर्यको करने वाला महा विभूतिसे सम्पन्न एवं लोकश्रेष्ठ माहात्म्य संक्षेपसे कहा है ॥६१॥


एकस्य पुण्योदयकालभाजः सञ्जायते नुँः परमा विभूतिः । पुण्यक्षयेऽन्यस्य विनाशयोगश्चन्द्रोऽभ्युदेत्येति रविर्यथाऽस्तम् ॥६२॥

अर्थ: पुण्योदयके कालको प्राप्त हुए एक मनुष्यके परम विभूति प्रकट होती है तो पुण्यका क्षय होने पर दूसरे मनुष्यके विनाशका योग उपस्थित होता है । जिस प्रकार कि चन्द्रमा उदित होता है और सूर्य अस्तको प्राप्त होता है ॥६२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे चक्ररत्नोत्पत्तिवर्णनं नाम पञ्चसप्ततितमं पर्व ॥७५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लक्ष्मणके चक्ररत्नकी उत्पत्तिका वर्णन करने वाला पचहत्तरवां पर्व पूर्ण हुआ ॥७५॥

७६. षट्सप्ततितमं पर्व (दशग्रीववधाभिधानं)

उत्पन्नचक्ररत्नं तं वीक्ष्य लक्ष्मणसुन्दरम् । हृष्टा विद्याधराधीशाश्चक्रुरित्यभिनन्दनम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जिन्हें चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था ऐसे लक्ष्मण सुन्दरको देख कर विद्याधर राजाओंने हर्षित हो उनका इस प्रकार अभिनन्दन किया ॥१॥


ऊचुश्चासीत् समादिष्टः पुरा भगवता तदा । नाथेनानन्तवीर्येण योऽष्टमः कृष्णतायुजाम् ॥२॥

जातो नारायणः सोऽयं चक्रपाणिर्महाद्युतिः । अत्युत्तमवपुः श्रीमान् न शक्यो बलवर्णने ॥३॥

अर्थ: वे कहने लगे कि पहले भगवान् अनन्तवीर्य स्वामीने जिस आठवें नारायणका कथन किया था यह वही उत्पन्न हुआ है । चक्ररत्न इसके हाथमें आया है । यह महाकान्तिमान् , अत्युत्तम शरीरका धारक और श्रीमान् है तथा इसके बलका वर्णन करना अशक्य है ॥२-३॥


अयं च बलदेवोऽसौ रथं यस्य वहन्त्यमी । उद्वृत्तकेसरसटाः सिंहा भास्करभासुराः ॥४॥

अर्थ: और यह राम, आठवां बलभद्र है जिसके रथको खड़ी जटाओंको धारण करने वाले तथा सूर्यके समान देदीप्यमान सिंह खींचते हैं ॥४॥


नीतो मयमहादैत्यो येन वन्दिगृहं रणे । हलरत्नं करे यस्य भृशमेतद्विराजते ॥५॥

अर्थ: जिसने रणमें मय नामक महादैत्यको बन्दीगृहमें भेजा था तथा जिसके हाथमें यह हल रूपी रत्न अत्यन्त शोभा देता है ॥५॥


रामनाराणावेतौ तौ जातौ पुरुषोत्तमौ । पुण्यानुभावयोगेन परमप्रेमसङ्गतौ ॥६॥

अर्थ: ये दोनों ही पुरुषोत्तम पुण्यके प्रभावसे बलभद्र और नारायण हुए हैं तथा परम प्रीतिसे युक्त हैं ॥६॥


लक्ष्मणस्य स्थितं पाणौ समालोक्य सुदर्शनम् । रक्षसामधिपश्चिन्तायोगमेवमुपागतः ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर सुदर्शन चक्रको लक्ष्मणके हाथमें स्थित देख, राक्षसाधिपति रावण इस प्रकारकी चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥७॥


वन्द्येनानन्तवीर्येण दिव्यं यद्भाषितं तदा । ध्रुवं तदिदमायातं कर्मानिलसमीरितम् ॥८॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि उस समय वन्दनीय अनन्तवीर्य केवलीने जो दिव्यध्वनिमें कहा था जान पड़ता है कि वही यह कर्म रूपी वायुसे प्रेरित हो आया है ॥८॥


यस्यातपत्रमालोक्य सन्त्रस्ताः खेचराधिपाः । भङ्गं प्रापुर्महासैन्याः पर्यस्तच्छत्रकेतनाः ॥९॥

आकूपारपयोवासा हिमवद्विन्ध्यसुस्तना । दासीवाज्ञाकरी यस्य त्रिखण्डवसुधाभवत् ॥१०॥

अर्थ: जिसका छत्र देख विद्याधर राजा भयभीत हो जाते थे, बड़ी बड़ी सेनाएं छत्र तथा पताकाएं फेंक विनाशको प्राप्त हो जाती थीं तथा समुद्रका जल ही जिसका वस्त्र है और हिमालय तथा विन्ध्ययाचल जिसके स्तन हैं ऐसी तीन खण्डकी वसुधा दासीके समान जिसकी आज्ञाकारिणी थी ॥९-१०॥


सोऽहं भूगोचरेणाजौ जेतुमालोचितः कथम् । कष्टेयं वर्त्ततेऽवस्था पश्यताद्भुतमीदृशम् ॥११॥

अर्थ: वही मैं आज युद्धमें एक भूमिगोचरीके द्वारा पराजित होनेके लिए किस प्रकार देखा गया हूँ ? अहो ! यह बड़ी कष्टकर अवस्था है ? यह आश्चर्य भी देखो ॥११॥


धिगिमां नृपतेर्लक्ष्मीं कुलटासमचेष्टिताम् । भक्तुमेकपदे पापान् त्यजन्ती चिरसंस्तुतान् ॥१२॥

अर्थ: कुलटाके समान चेष्टाको धारण करने वाली इस राजलक्ष्मीको धिक्कार हो यह पापी मनुष्योंका सेवन करनेके लिए चिर परिचित पुरुषोंको एक साथ छोड़ देती है ॥१२॥


किम्पाकफलवद्भोगा विपाकविरसा भृशम् । अनन्तदुःखसम्बन्धकारिणः साधुगर्हिताः ॥१३॥

अर्थ: ये पञ्चेन्द्रियोंके भोग किंपाक फलके समान परिपाक कालमें अत्यन्त विरस हैं, अनन्त दुःखोंका संसर्ग कराने वाले हैं और साधुजनोंके द्वारा निन्दित हैं ॥१३॥


भरताद्याः सधन्यास्ते पुरुषा भुवनोत्तमाः । चक्राङ्कं ये परिस्फीतं राज्यं कण्टकवर्जितम् ॥१४॥

विषमिश्रान्नवत्यक्त्वा जैनेन्द्रं व्रतमाश्रिताः । रत्नत्रयं समाराध्य प्रापुश्च परमं पदम् ॥१५॥

अर्थ: वे संसार श्रेष्ठ भरतादि पुरुष धन्य हैं जो चक्ररत्नसे सहित निष्कण्टक विशाल राज्यको विष मिश्रित अन्नके समान छोड़कर जिनेन्द्र सम्बन्धी व्रतको प्राप्त हुए तथा रत्नत्रयकी आराधाना कर परम पदको प्राप्त हुए ॥१४-१५॥


मोहेन बलिनाऽत्यन्तं संसारस्फातिकारिणा । पराजितो वराकोऽहं धिङ्मामीदृशचेष्टितम् ॥१६॥

अर्थ: मैं दीन पुरुष संसार वृद्धिका अतिशय कारण जो बलवान् मोह कर्म है उसके द्वारा पराजित हुआ हूँ। ऐसी चेष्टाको धारण करने वाले मुझको धिक्कार है ॥१६॥


उत्पन्नचक्ररत्नेन लक्ष्मणेनाथ रावणः । विभीषणास्यमालोक्य जगदे पुरुतेजसा ॥१७॥

अद्यापि खगसम्पूज्य समर्प्य जनकात्मजाम् । रामदेवप्रसादेन जीवामीति वचो वद ॥१८॥

ततस्तथाविधैवेयं तव लक्ष्मीरवस्थिता । विश्राय मानभङ्गं हि सन्तो यान्ति कृतार्थताम् ॥१९॥

अर्थ: अथानन्तर जिन्हें चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था ऐसे विशाल तेजके धारक लक्ष्मणने विभीषण का मुख देख कर कहा कि हे विद्याधरोंके पूज्य ! यदि अब भी तुम सीताको सौंप कर यह वचन कहो कि मैं भी रामदेवके प्रसादसे जीवित हूँ तो तुम्हारी यह लक्ष्मी ज्यों की त्यों अवस्थित है क्यों कि सत्पुरुष मान भङ्ग करके ही कृतकृत्यताको प्राप्त हो जाते हैं ॥१७-१९॥


रावणेन ततोऽवोचि लक्ष्मणः स्मितकारिणा । अहो कारणनिर्मुक्तो गर्वः क्षुद्रस्य ते मुधा ॥२०॥

अर्थ: तब मन्द हास्य करने वाले रावणने लक्ष्मणसे कहा कि अहो ! तुझ क्षुद्रका यह अकारण गर्व करना व्यर्थ है ॥२०॥


दर्शयाम्यद्य तेऽवस्थां यां तामनुभवाधम । अहं रावण एवाऽसौ स च त्वं धरणीचरः ॥२१॥

अर्थ: अरे नीच ! मैं आज तुझे जो दशा दिखाता हूँ उसका अनुभव कर । मैं वह रावण ही हूँ और तू वही भूमिगोचरी है ॥२१॥


लक्ष्मणेन ततोऽभाणि किमत्र बहुभाषितैः । सर्वथाऽहं समुत्पन्नो हन्ता नारायणस्तव ॥२२॥

अर्थ: तब लक्ष्मणने कहा कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? मैं सब तरहसे तुम्हें मारने वाला नारायण उत्पन्न हुआ हूँ ॥२२॥


उक्तं तेन निजाकूताद्यदि नारायणायसे । इच्छामात्रात् सुरेन्द्रत्वं कस्मान्न प्रतिपद्यसे ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने व्यङ्ग पूर्ण चेष्टा बनाते हुए कहा कि यदि इच्छा मात्रसे नारायण बन रहा है तो फिर इच्छा मात्रसे इन्द्र-पना क्यों नहीं प्राप्त कर लेता ॥२३॥


निर्वासितस्य ते पित्रा दुःखिनो वनचारिणः । अपत्रपाविहीनस्य ज्ञाता केशवता मया ॥२४॥

अर्थ: पिताने तुझे घरसे निकाला जिससे दुखी होता हुआ वन वनमें भटकता रहा अब निर्लज्ज हो नारायण बनने चला है सो तेरा नारायणपना मैं खूब जानता हूँ ॥२४॥


नारायणो भवाऽन्यो वा यत्ते मनसि वर्त्तते । विस्फूर्जितं करोम्येष तव भङ्गं मनोरथम् ॥२५॥

अर्थ: अथवा तू नारायण रह अथवा जो कुछ तेरे मनमें हो सो बन जा परन्तु मैं लगे हाथ तेरे मनोरथको भङ्ग करता हूँ ॥२५॥


अनेनालातचक्रेण किल त्वं कृतितां गतः । अथवा क्षुद्रजन्तूनां खलेनाऽपि महोत्सवम् ॥२६॥

अर्थ: तू इस अलातचक्रसे कृत-कृत्यताको प्राप्त हुआ है सो ठीक ही है क्यों कि क्षुद्र जन्तुओंको दुष्ट वस्तुसे भी महान् उत्सव होता है ॥२६॥


सहामीभिः खगैः पापैः सचक्रं सहवाहनम् । पाताले त्वां नयाम्यद्य कथितेनापरेण किम् ॥२७॥

अर्थ: अथवा अधिक कहने से क्या ? मैं आज तुझे इन पापी विद्याधरोंके साथ चक्रके साथ और वाहनके साथ सीधा पाताल भेजता हूँ ॥२७॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य नवनारायणो रुषा । प्रभ्रम्य चक्रमुद्यम्य चिक्षेप प्रति रावणम् ॥२८॥

अर्थ: यह वचन सुन नूतन नारायण-लक्ष्मणने क्रोध वश घुमाकर रावणको ओर चक्र-रत्न फेंका ॥२८॥


वज्रप्रभवमेघौघघोरनिर्घोषभीषणम् । प्रलयार्कसमच्छायं तच्चक्रमभवत्तदा ॥२९॥

अर्थ: उस समय वह चक्र वज्रको जन्म देने वाले मेघ समूहकी घोर गर्जनाके समान भयंकर तथा प्रलयकालीन सूर्यके समान कान्तिका धारक था ॥२९॥


हिरण्यकशिपुः क्षिप्तं हरिणेव तदायुधम् । निवारयितुमुद्युक्तः संरब्धो रावणः शरैः ॥३०॥

अर्थ: जिसतरह पूर्वमें, नारायण के द्वारा चलाये हुए चक्रको रोकनेके लिए हिरण्यकशिपु उद्यत हुआ था उसी प्रकार क्रोधसे भरा रावण बाणोंके द्वारा उस चक्रको रोकनेके लिए उद्यत हुआ ॥३०॥


भूयश्चण्डेन दण्डेन जविना पविना पुनः । तथाऽपि डौकते चक्रं वक्रं पुण्यपरिक्षये ॥३१॥

अर्थ: यद्यपि उसने तीक्ष्ण दण्ड और वेगशाली वज्रके द्वारा भी उसे रोकनेका प्रयत्न किया तथापि पुण्य क्षीण हो जानेसे वह कुटिल चक्र रुका नहीं किन्तु उसके विपरीत समीप ही आता गया ॥३१॥


चन्द्रहासं समाकृष्य ततोऽभ्यर्णत्वमागतम् । जघान गहनोत्सर्पिस्फुलिंगांचितपुष्करम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर रावणने चन्द्रहास खड्ग खींचकर समीप आये हुए चक्ररत्न पर प्रहार किया सो उसकी टक्करसे प्रचुर मात्रामें निकलने वाले तिलगोंसे आकाश व्याप्त हो गया ॥३२॥


स्थितस्याभिमुखस्यास्य राक्षसेन्द्रस्य शालिनः । तेन चक्रेण निर्भिन्नं वज्रसारमुरःस्थलम् ॥३३॥

अर्थ: तत्पश्चात् उस चक्ररत्नने सन्मुख खड़े हुए शोभाशाली रावणका वज्रके समान वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया ॥३३॥


उत्पातवातसन्नुन्नमहाञ्जनगिरिप्रभः । पपात रावणः क्षोण्यां पतिते पुण्यकर्मणि ॥३४॥

अर्थ: जिससे पुण्य कर्म क्षीण होने पर प्रलय कालकी वायुसे प्रेरित विशाल अञ्जनगिरिके समान रावण पृथिवी पर गिर पड़ा ॥३४॥


रतेरिव पतिः सुप्तश्च्युतः स्वर्गादिवामरः । महीस्थितो रराजासौ संदष्टदशनच्छदः ॥३५॥

अर्थ: ओंठोंको डशने वाला रावण पृथिवी पर पड़ा ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो कामदेव ही सो रहा हो अथवा स्वर्गसे कोई देव ही आकर च्युत हुआ हो ॥३५॥


स्वामिनं पतितं दृष्ट्वा सैन्यं सागरनिस्वनम् । शीर्णं वितानतां प्राप्तं पर्यस्तच्छत्रकेतुकम् ॥३६॥

अर्थ: स्वामीको पड़ा देख समुद्रके समान शब्द करने वाली जीर्ण शीर्ण सेना छत्र तथा पताकाएँ फेंक चौड़ी हो गई अर्थात् भाग गई ॥३६॥


उत्सारय रथं देहि मार्गमश्वमितो नय । प्राप्तोऽयं पृष्ठतो हस्ती विमानं कुरु पार्श्वतः ॥३७॥

पतितोऽयमहो नाथः कष्टं जातमनुत्तमम् । इत्यालापमलं भ्रान्तं बलं तत्रैव विह्वलम् ॥३८॥

अर्थ: ‘रथ हटाओ, मार्ग देओ, घोड़ा इधर ले जाओ, यह पीछेसे हाथी आ रहा है, विमानको बगलमें करो, अहो ! यह स्वामी गिर पड़ा है, बड़ा कष्ट हुआ’ इस प्रकार वार्तालाप करती हुई वह सेना विह्वल हो भाग खड़ी हुई ॥३७-३८॥


अन्योन्यापूरणासक्तान्महाभयविकम्पितान् । दृष्ट्वा निःशरणानेताञ्जनान् पतितमस्तकान् ॥३९॥

किष्किन्धपतिवैदेहसमोरणसुतादयः । न भेतव्यं न भेतव्यमिति साधारमानयन् ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर जो परस्पर एक दूसरे पर पड़ रहे थे, जो महाभयसे कंपायमान थे, और जिनके मस्तक पृथिवी पर पड़ रहे थे ऐसे इन शरण हीन मनुष्योंको देख कर सुग्रीव भामण्डल तथा हनूमान् आदिने ‘नहीं डरना चाहिए’ ‘नहीं डरना चाहिए’ आदि शब्द कह कर सान्त्वना प्राप्त कराई ॥३९-४०॥


भ्रमितोपरिवस्त्रान्तपल्लवानां समन्ततः । सैन्यमाश्वासितं तेषां वाक्यैः कर्णरसायनैः ॥४१॥

अर्थ: जिन्होंने सब ओर ऊपर वस्त्रका छोर घुमाया था ऐसे उन सुग्रीव आदि महा पुरुषोंके, कानोंके लिए रसायनके समान मधुर वचनोंसे सेना सान्त्वनाको प्राप्त हुई ॥४१॥


तथाविधां श्रियमनुभूय भूयसीं कृताद्भुतां जगति समुद्रवारिते । परिक्षये सति सुकृतस्य कर्मणः खलामिमां प्रकृतिमितो दशाननः ॥४२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! समुद्रान्त पृथिवीमें अनेक आश्चर्यके कार्य करने वाली उस प्रकारकी लक्ष्मीका उपभोग कर रावण, पुण्य कर्मका क्षय होने पर इस दुर्दशाको प्राप्त हुआ ॥४२॥


धिगीदृशीं श्रियमतिचञ्चलात्मिकां विवर्जितां सुकृतसमागमाशया ।
इति स्फुटं मनसि निधाय भो जनास्तपोधना भवत रवेर्जितौजसः ॥४३॥

अर्थ: इसलिए अत्यन्त चञ्चल एवं पुण्यप्राप्तिकी आशासे रहित इस लक्ष्मीको धिक्कार है। हे भव्य जनो! ऐसा मनमें विचार कर सूर्यके तेजको जीतने वाले तपोधन होओ - तपके धारक बनो ॥४३॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे दशग्रीववधाभिधानं नाम षट्सप्ततितमं पर्व ॥७६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें रावणके वधका कथन करने वाला छिहंत्तरवां पर्व समाप्त हुआ ॥७६॥


७७. सप्तसप्ततितमं पर्व (प्रीतिङ्करोपाख्यानं)

सोदरं पतितं दृष्ट्वा महादुःखसमन्वितः । क्षुरिकायां करं चक्रे स्ववधाय विभीषणः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर भाईको पड़ा देख महादुःखसे युक्त विभीषणने अपना वध करनेके लिए छुरीपर हाथ रक्खा ॥१॥


वारयन्ती वधं तस्य निश्चेष्टीकृतविग्रहा । मूर्च्छा कालं कियन्तं चिच्चकारोपकृतिं पराम् ॥२॥

अर्थ: सो उसके इस वधको रोकती तथा शरीरको निश्चेष्ट करती मूर्च्छाने कुछ काल तक उसका बड़ा उपकार किया ॥२॥


लब्धसंज्ञो जिघांसुः स्वं तापं दुःसहमुद्वहन् । रामेण विधुतः कृच्छ्रादुत्तीर्य निजतो रथात् ॥३॥

अर्थ: जब सचेत हुआ तब पुनः आत्मघातकी इच्छा करने लगा सो राम ने अपने रथसे उतर कर उसे बड़ी कठिनाईसे पकड़ कर रक्खा ॥३॥


त्यक्तास्त्रकवचो भूम्यां पुनर्मूर्च्छामुपागतः । प्रतिबुद्धः पुनश्चक्रे विलापं करुणाकरम् ॥४॥

अर्थ: जिसने अस्त्र और कवच छोड़ दिये थे ऐसा विभीषण पुनः मूर्च्छित हो पृथिवी पर पड़ा रहा । तत्पश्चात् जब पुनः सचेत हुआ तब करुणा उत्पन्न करने वाला विलाप करने लगा ॥४॥


हा भ्रातः करुणोदार शूर संश्रितवत्सल । मनोहर कथं प्राप्तोऽस्यवस्थामिति पापिकाम् ॥५॥

अर्थ: वह कह रहा था कि हे भाई ! हे उदार करुणाके धारी ! हे शूर वीर ! हे आश्रितजनवत्सल ! हे मनोहर ! तुम इस पाप पूर्ण दशाको कैसे प्राप्त हो गये ? ॥५॥


किं तन्मद्वचनं नाथ गद्यमानं हितं परम् । न मानितं यतो युद्धे वीक्षे त्वां चक्रताडितम् ॥६॥

अर्थ: हे नाथ ! क्या उस समय तुमने मेरे कहे हुए हितकारी वचन नहीं माने इसीलिए युद्धमें तुम्हें चक्र से ताड़ित देख रहा हूँ ॥६॥


कष्टं भूमितले देव विद्याधरमहेश्वर । कथं सुप्तोऽसि लङ्केश भोगदुर्ललितात्मकः ॥७॥

अर्थ: हे देव ! हे विद्याधरों के अधिपति ! हे लंकाके स्वामी ! तुम तो भोगोंसे लालित हुए थे फिर आज पृथिवीतल पर क्यों सो रहे हो ? ॥७॥


उत्तिष्ठ देहि मे वाक्यं चारुवाक्य गुणाकर । साधारय कृपाधार मग्नं मां शोकसागरे ॥८॥

अर्थ: हे सुन्दर वचन बोलने वाले ! हे गुणोंके खानि ! उठो मुझे बचन देओ-मुझसे वार्तालाप करो । हे कृपाके आधार ! शोक रूपी सागरमें डूबे हुए मुझे सान्त्वना देओ ॥८॥


एतस्मिन्नन्तरे ज्ञातदशानननिपातनम् । क्षुब्धमन्तःपुरं शोकमहाकल्लोलसङ्कुलम् ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर इसी बीचमें जिसे रावणके गिरनेका समाचार विदित हो गया था ऐसा अन्तः-पर शोकको बड़ी बड़ी लहरोंसे व्याप्त होता हुआ क्षुभित हो उठा ॥९॥


सर्वाश्च वनिता वाष्पधारासिक्तमहीतलाः । रणक्षोणीं समाजग्मुर्मुहुःप्रस्खलितक्रमाः ॥१०॥

अर्थ: जिन्होंने अश्रुधारासे पृथिवी तलको सींचा था तथा जिनके पैर बारबार लड़खड़ा रहे थे ऐसी समस्त स्त्रियां रणभूमि में आ गई ॥१०॥


तं चूडामणिसङ्काशं क्षितेरालोक्य सुन्दरम् । निश्चेतनं पतिं नार्यो निपेतुरतिवेगतः ॥११॥

अर्थ: और पृथिवीके चूडामणिके समान सुन्दर पतिको निश्चेतन देख अत्यन्त वेगसे भूमिपर गिर पड़ीं ॥११॥


रम्भा चन्द्रानना चन्द्रमण्डला प्रवरोर्वशी । मन्दोदरी महादेवी सुन्दरी कमलानना ॥१२॥

रूपिणी रुक्मिणी शीला रत्नमाला तनूदरी । श्रीकान्ता श्रीमती भद्रा कनकाभा मृगावती ॥१३॥

श्रीमाला मानवी लक्ष्मीरानन्दानङ्गसुन्दरी । वसुन्धरा तडिन्माला पद्मा पद्मावती सुखा ॥१४॥

देवी पद्मावती कान्तिः प्रीतिः सन्ध्यावली शुभा । प्रभावती मनोवेगा रतिकान्ता मनोवती ॥१५॥

अष्टादशैवमादीनां सहस्राणि सुयोषिताम् । परिवार्य पतिं चक्रुराक्रन्दं सुमहाशुचा ॥१६॥

अर्थ: रम्भा, चन्द्रानना, चन्द्रमण्डला, प्रवरा, उर्वशी, मन्दोदरी, महादेवी, सुन्दरी, कमलानना, रूपिणी, रुक्मिणी, शीला, रत्नमाला, तनूदरी, श्रीकान्ता, श्रीमती, भद्रा, कनकाभा, मृगावती, श्रीमाला, मानवी, लक्ष्मी, आनन्दा, अनङ्गसुन्दरी, वसुन्धरा, तडिन्माला, पद्मा, पद्मावती, सुखा, देवी, पद्मावती, कान्ति, प्रीति, सन्ध्यावली, शुभा, प्रभावती, मनोवेगा, रतिकान्ता और मनोवती, आदि अठारह हजार स्त्रियाँ पतिको घेर कर महाशोक से रुदन करने लगीं ॥१२-१६॥


काश्चिन्मोहं गताः सत्यः सिक्ताश्चन्दनवारिणा । समुत्खातमृणालानां पद्मिनीनां श्रियं दधुः ॥१७॥

अर्थ: जिनके ऊपर चन्दनका जल सींचा गया था ऐसी मूर्च्छाको प्राप्त हुई कितनी ही स्त्रियाँ, जिनके मृणाल उखाड़ लिये गये हैं ऐसी कमलिनियोंकी शोभा धारण कर रहीं थीं ॥१७॥


आश्लिष्टदयिताः काश्चिद्गाढं मूर्च्छामुपागताः । अञ्जनाद्रिसमासक्तसन्ध्यारेखाद्युतिं दधुः ॥१८॥

अर्थ: पतिका आलिङ्गन कर गाढ़ मूर्च्छाको प्राप्त हुई कितनी ही स्त्रियां अञ्जनगिरिसे संसक्त संध्याकी कान्तिको धारण कर रहीं थीं ॥१८॥


निर्व्यूढमूर्छनाः काश्चिदुरस्ताडनचञ्चलाः । घनाघनसमासङ्गितडिन्मालाकृतिं श्रिताः ॥१९॥

अर्थ: जिनकी मूर्च्छा दूर हो गई थी तथा जो छातीके पीटनेमें चञ्चल थीं ऐसीं कितनी ही स्त्रियां मेघ कौंधती हुई विद्युन्मालाकी आकृतिको धारण कर रही थीं ॥१९॥


विधाय वदनाम्भोजं काचिदङ्के सुविह्वला । वक्षःस्थलपरामर्शकारिणी मूर्छिता मुहुः ॥२०॥

अर्थ: कोई एक स्त्री पतिका मुखकमल अपनी गोदमें रख अत्यन्त विह्वल हो रही थी तथा वक्षःस्थलका स्पर्श करती हुई बारबार मूर्च्छित हो रही थी ॥२०॥


हा हा नाथ गतः क्वासि त्यक्त्वा मामतिकातराम् । कथं नाऽपेक्षसे दुःखनिमग्नं जनमात्मनः ॥२१॥

अर्थ: वे कह रही थीं कि हाय हाय हे नाथ! तुम मुझ अतिशय भीरुको छोड़ कहाँ चले गये हो ? दुःखमें डूबे हुए अपने लोगोंकी ओर क्यों नहीं देखते हो ? ॥२१॥


स त्वं सत्त्वयुतः कान्तिमण्डनः परमद्युतिः । विभूत्या शक्रसङ्काशो मानी भरतभूपतिः ॥२२॥

प्रधानपुरुषो भूत्वा महाराज मनोरमः । किमर्थं स्वपिषि क्षोण्यां विद्याधरमहेश्वरः ॥२३॥

अर्थ: हे महाराज ! तुम तो धैर्य गुणसे सहित हो, कान्ति रूपी आभूषणसे विभूषित हो, परम कीर्तिके धारक हो, विभूतिमें इन्द्रके समान हो, मानी हो, भरत क्षेत्रके स्वामी हो, प्रधान पुरुष हो, मनको रमण करने वाले हो, और विद्याधरोंके राजा हो फिर इसतरह पृथिवी पर क्यों सो रहे हो ? ॥२२-२३॥


उत्तिष्ठ कान्त कारुण्य-पर स्वजनवत्सल । अमृतप्रतिमं वाक्यं यच्छैकमपि सुन्दरम् ॥२४॥

अर्थ: हे कान्त ! हे दयातत्पर, हे स्वजनवत्सल ! उठो एक बार तो अमृत तुल्य सुन्दर वचन देओ ॥२४॥


अपराधविमुक्तानामस्माकं सक्तचेतसाम् । प्राणेश्वर किमित्येवं स्थितस्त्वं कोपसङ्गतः ॥२५॥

अर्थ: हे प्राणनाथ ! हम लोग अपराधसे रहित हैं तथा हम लोगोंका चित्त एक आप ही में आसक्त है फिर क्यों इसतरह कोपको प्राप्त हुए हो ? ॥२५॥


परिहासकथासक्तं दन्तज्योत्स्नामनोहरम् । वदनेन्दुमिमं नाथ सकृद्धारय पूर्ववत् ॥२६॥

अर्थ: हे नाथ ! परिहासकी कथामें तत्पर और दांतोंकी कान्ति रूपी चांदनीसे मनोहर इस मुख रूपी चन्द्रमाको एक बार तो पहलेके समान धारण करो ॥२६॥


वराङ्गनापरिक्रीडास्थानेऽस्मिन्नपि सुन्दरे । वक्षःस्थले कथं न्यस्तं पदं ते चक्रधारया ॥२७॥

अर्थ: तुम्हारा यह सुन्दर वक्षःस्थल उत्तम स्त्रियोंका क्रीड़ा स्थल है फिर भी इसपर चक्र धाराने कैसे स्थान जमा लिया ? ॥२७॥


बन्धूकपुष्पसङ्काशस्तवायं दशनच्छदः । नार्मोत्तरप्रदानाय कथं स्फुरति नाधुना ॥२८॥

अर्थ: हे नाथ ! दुपहरियाके फूलके समान लाल लाल यह तुम्हारा ओंठ क्रीड़ा पूर्ण उत्तर देनेके लिए इस समय क्यों नहीं फड़क रहा है ? ॥२८॥


प्रसीद न चिरं कोपः सेवितो जातुचित्त्वया । प्रत्युतास्माकमेव त्वमकरोः सान्त्वनं पुरा ॥२९॥

अर्थ: प्रसन्न होओ, तुमने कभी इतना लम्बा क्रोध नहीं किया अपितु हम लोगोंको तुम पहले सान्त्वना देते रहे हो ॥२९॥


उदपाद्येष यस्त्वत्तः कल्पलोकात् परिच्युतः । बन्धने मेघवाहोऽसौ दुःखमास्ते तथेन्द्रजित् ॥३०॥

अर्थ: जिसने स्वर्ग लोकसे च्युत हो कर आपसे जन्म ग्रहण किया था ऐसा वह मेघवाहन और इन्द्रजित् शत्रुके बन्धनमें दुःख भोग रहा है ॥३०॥


विधाय सुकृतज्ञेन वीरेण गुणशालिना । पद्माभेन सह प्रीतिं भ्रातृपुत्रौ विमोचय ॥३१॥

अर्थ: सो सुकृतको जानने वाले गुणशाली वीर रामके साथ प्रीति कर अपने भाई कुम्भकर्ण तथा पुत्रोंको बन्धनसे छुड़ाओ ॥३१॥


जीवितेश समुत्तिष्ठ प्रयच्छ वचनं प्रियम् । सुचिरं देव किं शेषे विधत्स्व नृपतेः क्रियाम् ॥३२॥

अर्थ: हे प्राणनाथ ! उठो, प्रिय वचन प्रदान करो । हे देव ! चिरकाल तक क्यों सो रहे हो ? उठो राजकार्य करो ॥३२॥


विरहाग्निप्रदीप्तानि भृशं सुन्दरविभ्रम । कान्त विध्यापयाङ्गानि प्रसीद प्रणयिप्रिय ॥३३॥

अर्थ: हे सुन्दर चेष्टाओंके धारक ! हे कान्त ! हे प्रेमियोंसे प्रेम करने वाले ! प्रसन्न होओ और विरह रूपी अग्निसे जलते हुए हमारे अंगोंको शान्त करो ॥३३॥


अवस्थामेतकां प्राप्तमिदं वदनपङ्कजम् । प्रियस्य हृदयालोक्य दीर्यते शतधा न किम् ॥३४॥

अर्थ: रे हृदय ! इस अवस्थाको प्राप्त हुए पतिके मुख कमलको देखकर तू सौ टूक क्यों नहीं हो जाता है ? ॥३४॥


वज्रसारमिदं नूनं हृदयं दुःखभाजनम् । ज्ञात्वापि यत्तवावस्थामिमां तिष्ठति निर्दयम् ॥३५॥

अर्थ: जान पड़ता है कि हमारा यह दुःखका भाजन हृदय वज्रका बना हुआ है इसीलिए तो तुम्हारी इस अवस्थाको जानकर भी निर्दय हुआ स्थित है ॥३५॥


विधे किं कृतमस्माभिर्भवतः सुन्दरेतरम् । विहितं येन कर्मेदं त्वया निर्दयदुष्करम् ॥३६॥

अर्थ: हे विधातः ! हम लोगोंने तुम्हारा कौन सा अशोभनीक कार्य किया था जिससे तुमने यह ऐसा कार्य किया जो निर्दय मनुष्योंके लिए भी दुष्कर है - कठिन है ॥३६॥


समालिङ्गनमात्रेण दूरं निर्धूय मानकम् । परस्परार्पणस्वादु नाथ यन्मधुसेवितम् ॥३७॥

अर्थ: हे नाथ ! आलिङ्गन-मात्रसे मानको दूरकर परस्पर - एक दूसरेके आदान-प्रदानसे मनोहर जो मधुका पान किया था ॥३७॥


यच्चान्यप्रमदागोत्रग्रहणस्खलिते सति । काञ्चीगुणेन नीतोऽसि बहुशो बन्धनं प्रिय ॥३८॥

अर्थ: हे प्रिय ! अन्य स्त्रीका नाम लेनेरूप अपराध होने पर जो मैंने तुम्हें अनेकों वार मेखला-सूत्रसे बन्धनमें डाला था ॥३८॥


वतंसेन्दीवराघातात् कोपप्रस्फुरिताधरम् । प्रापितोऽसि प्रभो यच्च किञ्जल्कोच्छ्वसितालिकम् ॥३९॥

अर्थ: हे प्रभो ! मैंने क्रोधसे ओंठको कम्पित करते हुए जो उस समय तुम्हें कर्णाभरणके नील कमलसे ताड़ित किया था और उस कमलकी केशर तुम्हारे ललाटमें जा लगी थी ॥३९॥


प्रेमकोपविनाशाय यच्चातिप्रियवादिना । कृतं पदार्पणं मूर्ध्नि हृदयद्रवकारणम् ॥४०॥

यानि चात्यन्तरम्याणि रतानि परमेश्वर । कान्त चाटुसमेतानि सेवितानि यथेप्सितम् ॥४१॥

परमानन्दकारीणि तदेतानि मनोहर । अधुना स्मर्यमाणानि दहन्ति हृदये भृशम् ॥४२॥

अर्थ: प्रणय कोपको नष्ट करनेके लिए मधुर वचन कहते हुए जो तुमने हमारे पैर उठा कर अपने मस्तक पर रख लिये थे और उससे हमारा हृदय तत्काल द्रवीभूत हो गया था, और हे परमेश्वर ! हे कान्त ! मधुर वचनोंसे सहित अत्यन्त रमणीय जो रत इच्छानुसार आपके साथ सेवन किये गये थे । हे मनोहर ! परम आनन्दको करने वाले वे सब कार्य इस समय एक-एककर स्मृति-पथमें आते हुए हृदयमें तीव्र दाह उत्पन्न कर रहे हैं ॥४०-४२॥


कुरु प्रसादमुत्तिष्ठ पादावेषा नमामि ते । न हि प्रियजने कोपः सुचिरं नाथ शोभते ॥४३॥

अर्थ: हे नाथ ! प्रसन्न होओ, उठो, मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करती हूँ । क्योंकि प्रियजनों पर चिरकालतक रहने वाला क्रोध शोभा नहीं देता ॥४३॥


एवं रावणपत्नीनां श्रुत्वापि परिदेवनम् । कस्य न प्राणिनः प्राप्तं हृदयं द्रवतामलम् ॥४४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस तरह रावणकी स्त्रियोंका विलाप सुनकर किस प्राणीका हृदय अत्यन्त द्रवताको प्राप्त नहीं हुआ था ? ॥४४॥


अथ पद्माभसौमित्रौ साकं खेचरपुङ्गवैः । स्नेहगर्भं परिष्वज्य बाष्पापूरितलोचनौ ॥४५॥

ऊचतुः करुणोद्युक्तौ परिसान्त्वनकोविदौ । विभीषणमिदं वाक्यं लोकवृत्तान्तपण्डितौ ॥४६॥

अर्थ: अथानन्तर जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे, जो करुणा प्रकट करनेमें उद्यत थे, सान्त्वना देनेमें निपुण थे, तथा लोक व्यवहारके पण्डित थे ऐसे राम-लक्ष्मण श्रेष्ठ विद्याधरोंके साथ विभीषणका स्नेहपूर्ण आलिङ्गन कर यह वचन बोले ॥४५-४६॥


राजन्नलं रुदित्वैवं विषादमधुना त्यज । जानास्येव ननु व्यक्तं कर्मणामिति चेष्टितम् ॥४७॥

अर्थ: कि हे राजन् ! इस तरह रोना व्यर्थ है, अब विषाद छोड़ो, आप जानते हैं कि यह कर्मों की चेष्टा है ॥४७॥


पूर्वकर्मानुभावेन प्रमादं भजतां नृणाम् । प्राप्तव्यं जायतेऽवश्यं तत्र शोकस्य कः क्रमः ॥४८॥

अर्थ: पूर्व कर्मके प्रभावसे प्रमाद करनेवाले मनुष्योंको जो वस्तु प्राप्त होने योग्य है वह अवश्य ही प्राप्त होती है इसमें शोकका क्या अवसर है ? ॥४८॥


प्रवर्त्तते यदाऽकार्ये जनो ननु तदैव सः । मृतश्चिरंमृते तस्मिन् किं शोकः क्रियतेऽधुना ॥४९॥

अर्थ: मनुष्य जब अकार्यमें प्रवृत्त होता है वह तभी मर जाता है फिर रावण तो चिरकाल बाद मरा है अतः अब शोक क्यों किया जाता है ? ॥४९॥


यः सदा परमप्रीत्या हिताय जगतो रतः । समाहितमतिर्बाढं प्रजाकर्मणि पण्डितः ॥५०॥

सर्वशास्त्रार्थसम्बोधक्षालितात्मापि रावणः । मोहेन बलिना नीतोऽवस्थामेतां सुदारुणाम् ॥५१॥

अर्थ: जो सदा परम प्रीतिपूर्वक जगत्का हित करनेमें तत्पर रहता था, जिसकी बुद्धि सदा सावधान रूप रहती थी, जो प्रजाके कार्यमें पण्डित था, और समस्त शास्त्रों के अर्थ ज्ञानसे जिसकी आत्मा धुली हुई थी ऐसा रावण बलवान् मोहके द्वारा इस अवस्था को प्राप्त हुआ है ॥५०-५१॥


असौ विनाशमेतेन प्रकारेणानुभूतवान् । नूनं विनाशकाले हि नृणां ध्वान्तायते मतिः ॥५२॥

अर्थ: उस रावणने इस अपराधसे विनाशका अनुभव किया है सो ठीक ही है क्योंकि विनाशके समय मनुष्योंकी बुद्धि अन्धकारके समान हो जाती है ॥५२॥


रामीयवचनस्यान्ते प्रभामण्डलपण्डितः । जगाद वचनं बिभ्रन्माधुर्यं परमोत्कटम् ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर रामके कहनेके बाद अतिशय चतुर भामण्डलने परमोत्कट माधुर्यको धारण करनेवाले निम्नांकित वचन कहे ॥५३॥


विभीषण रणे भीमे युध्यमानो महामनाः । मृत्युना वीरयोग्येन रावणः स्वस्थितिं श्रितः ॥५४॥

अर्थ: उसने कहा कि हे विभीषण ! भयंकर रणमें युद्ध करता हुआ महामनस्वी रावण वीरोंके योग्य मृत्युसे मर कर आत्मस्थिति अथवा स्वर्गस्थितिको प्राप्त हुआ है ॥५४॥


किं तस्य पतितं यस्य मानो न पतितः प्रभोः । नन्वत्यन्तमसौ धन्यो योऽसून्प्रत्यर्यमुञ्चत ॥५५॥

अर्थ: जिस प्रभुका मान नष्ट नहीं हुआ उसका क्या नष्ट हुआ ? अर्थात् कुछ नहीं । यथार्थमें रावण अत्यन्त धन्य है जिसने शत्रुके सम्मुख प्राण छोड़े ॥५५॥


महासत्त्वस्य वीरस्य शोच्यं तस्य न विद्यते । शत्रुन्दमसमा लोके शोच्याः पार्थिवगोत्रजाः ॥५६॥

अर्थ: वह तो महा धैर्यशाली वीर रहा अतः उसके विषयमें शोक करने योग्य बात ही नहीं है । लोक में जो क्षत्रिय अरिंदमके समान हैं वे ही शोक करने योग्य हैं ॥५६॥


लक्ष्मीहरिध्वजोद्भूतो बभूवाक्षपुरे नृपः । अरिन्दम इति ख्यातः पुरन्दरसमश्रिया ॥५७॥

अर्थ: इसकी कथा इस प्रकार है कि अक्षपुर नामा नगरमें लक्ष्मी और हरिध्वजसे उत्पन्न हुआ अरिंदम नामका एक राजा था जो इन्द्रके समान सम्पत्तिसे प्रसिद्ध था ॥५७॥


स जित्वा शत्रुसङ्घातं नानादेशव्यवस्थितम् । प्रत्यागच्छन्निजं स्थानं देवीदर्शनकांक्षया ॥५८॥

अर्थ: वह एक बार नाना देशोंमें स्थित शत्रु समूहको जीत कर अपनी स्त्रीको देखने की इच्छासे अपने घरकी ओर लौट रहा था ॥५८॥


परमोत्कण्ठया युक्तः केतुतोरणमण्डितम् । पुरं विवेश सोऽकस्मादश्वैर्मानसगत्वरैः ॥५९॥

अर्थ: तीव्र उत्कंठासे युक्त होनेके कारण उसने मनके समान शीघ्रगामी घोड़ोंसे अकस्मात् ही पताकाओं और तोरणोंसे अलंकृत नगरमें प्रवेश किया ॥५९॥


स्वं गृहं संस्कृतं दृष्ट्वा भूषितां च स्वसुन्दरीन् । अपृच्छद्विदितोऽहं ते कथमेतीत्यवेदितम् ॥६०॥

अर्थ: अपने घरको सजा हुआ तथा स्त्रीको आभूषणादिसे अलंकृत देख उसने पूछा कि विना कहे तुमने कैसे जान लिया कि ये आ रहे हैं ॥६०॥


सा जगौ मुनिमुख्येन नाथ कीर्तिधरेण मे । अवधिज्ञानिना शिष्टं पृष्टेनैतेन पारणाम् ॥६१॥

अर्थ: स्त्रीने कहा कि हे नाथ ! आज मुनियोंमें मुख्य अवधिज्ञानी कीर्तिधर मुनि पारणाके लिए आये थे मैंने उनसे आपके आनेका समय पूछा था तो उन्होंने कहा कि राजा आज ही अकस्मात् आवेंगे ॥६१॥


अवोचदीर्ष्यया युक्तो गत्वाऽसौ मुनिपुङ्गवम् । यदि त्वं वेत्सि तच्चिन्तां मदीया मम बोधय ॥६२॥

अर्थ: राजा अरिंदमको मुनिके भविष्य-ज्ञान पर कुछ ईर्ष्या हुई अतः वह उनके पास जाकर बोला कि यदि तुम जानते हो तो मेरे मन की बात बताओ ॥६२॥


मुनिना गदितं चित्ते त्वयेदं विनिवेशितम् । यथा किल कथं मृत्युः कदा वा मे भविष्यति ॥६३॥

अर्थ: मुनिने कहा कि तुमने मनमें यह बात रख छोड़ी है कि मेरी कब और किस प्रकार मृत्यु होगी ? ॥६३॥


स त्वमस्माद्दिनादह्नि सप्तमे वज्रताडितः । मृत्वा भविष्यसि स्वस्मिन् कीटो विड्भवने महान् ॥६४॥

अर्थ: सो तुम आजसे सातवें दिन वज्रपातसे मर कर अपने विष्ठा-गृहमें महान् कीड़ा होओगे ॥६४॥


ततः प्रीतिङ्कराभिख्यमागत्य तनयं जगौ । त्वयाऽहं विड्गृहे जातो हन्तव्यः स्थूलकीटकः ॥६५॥

अर्थ: वहाँसे आकर राजा अरिंदमने अपने पुत्र प्रीतिंकरसे कहा कि मैं विष्ठागृहमें एक बड़ा कीड़ा होऊँगा सो तुम मुझे मार डालना ॥६५॥


तथाभूतं स दृष्ट्वा तं तनयं हन्तुमुद्यतम् । विड्मध्यमविशद्दूरं मृत्युभीतिपरिद्रुतः ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर जब पुत्र विष्ठागृहमें स्थूल कीडाको देखकर मारनेके लिए उद्यत हुआ तब वह कीड़ा मृत्युके भयसे भागकर बहुत दूर विष्ठाके भीतर घुस गया ॥६६॥


मुनिं प्रीतिङ्करो गत्वा पप्रच्छ भगवन् कुतः । संदिश्य मार्यमाणोऽसौ कीटो दूरं पलायते ॥६७॥

अर्थ: प्रीतिङ्करने मुनिराजके पास जाकर पूछा कि हे भगवन् ! कहे अनुसार जब मैं उस कीड़ेको मारता हूँ तब वह दूर क्यों भाग जाता है ? ॥६७॥


उवाच वचनं साधुर्विषादमिह मा कृथाः । योनिं यामश्नुते जन्तुस्तत्रैव रतिमेति सः ॥६८॥

अर्थ: मुनिराजने कहा कि इस विषयमें विवाद मत करो । यह प्राणी जिस योनिमें जाता है उसीमें प्रीतिको प्राप्त हो जाता है ॥६८॥


आत्मनस्तत्कुरु श्रेयो मुच्यसे येन किल्विषात् । ननु स्वकृतसम्प्राप्तिप्रवणाः सर्वदेहिनः ॥६९॥

अर्थ: इसीलिए आत्माका कल्याण करनेवाला वह कार्य करो जिससे कि आत्मा पापसे छूट जाय । यह निश्चित है कि सब प्राणी अपने द्वारा किये हुए कर्मका फल प्राप्त करनेमें ही लीन हैं ॥६९॥


एवं भवस्थितिं ज्ञात्वा परमासुखकारिणीम् । प्रीतिङ्करो महायोगी बभूव विगतस्पृहः ॥७०॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त दुःखको उत्पन्न करनेवाली संसार दशाको जानकर प्रीतिङ्कर निःस्पृह हो महामुनि हो गया ॥७०॥


एवं ते विविधा विभीषण न किं ज्ञाता जगत्संस्थिति- र्यच्छूरं कृतनिश्चयं विधिवशान्नारायणेनाहतम् । सङ्ग्रामेऽभिमुखं प्रधानपुरुषं शोचस्यहो रावणं स्वार्थे सम्प्रति यच्च चित्तममुना शोकेन किं कारणम् ॥७१॥

श्रुत्वेमां प्रतिबोधदानकुशलां चित्रस्वभावान्वितां सत्प्रीतिङ्करसंयतस्य चरितप्रोत्कीर्त्तनीयां कथाम् । सर्वैः खेचरपुङ्गवैरभिहिते साधूदितं साध्विति भ्रष्टः शुक्तिमिराद्विभीषणरविर्लोकोत्तराचारवित् ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार भामण्डल विभीषणसे कहता है कि हे विभीषण ! क्या तुझे यह संसारकी विविध दशा ज्ञात नहीं है जो शूरवीर, दृढ़ निश्चयी एवं कर्मोदयके कारण युद्धमें नारायणके द्वारा सम्मुख मारे हुए प्रधान पुरुष रावणके प्रति शोक कर रहा है । अब तो अपने कार्यमें चित्त देओ इस शोकसे क्या प्रयोजन है ? इस प्रकार प्रतिबोधके देनेमें कुशल, नाना स्वभावसे सहित, एवं प्रीतिङ्कर मुनिराजके चरितको निरूपण करनेवाली कथा सुनकर सब विद्याधर राजाओंने ठीक ठीक यह शब्द कहे और लोको-त्तर - सर्वश्रेष्ठ आचारको जाननेवाला विभीषण रूपी सूर्य शोकरूपी अन्धकारसे छूट गया अर्थात् विभीषणका शोक दूर हो गया ॥७१-७२॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे पद्मायने प्रीतिङ्करोपाख्यानं नाम सप्तसप्ततितमं पर्व ॥७७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराण या पद्मायन नामक ग्रन्थमें प्रीतिङ्करका उपाख्यान करनेवाला सतहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७७॥


७८. अष्टसप्ततितमं पर्व (इन्द्रजितादिनिष्क्रमणाभिधाने)

ततो हलधरोऽवोचत् कर्त्तव्यं किमतः परम् । मरणान्तानि वैराणि जायन्ते हि विपश्चिताम् ॥१॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीरामने कहा कि अब क्या करना चाहिए ? क्योंकि विद्वानोंके वैर तो मरण पर्यन्त ही होते हैं ॥१॥


परलोके गतस्यातो लङ्केशस्योत्तमं वपुः । महानरस्य संस्कारं प्रापयामः सुखैधितम् ॥२॥

अर्थ: अच्छा हो कि हम लोग परलोकको प्राप्त हुए महामानव लङ्केश्वरको सुखसे बढ़ाये हुए उत्तम शरीरका दाह संस्कार करावें ॥२॥


तत्राभिनन्दिते वाक्ये विभीषणसमन्वितौ । बलनारायणौ साकं शेषैस्तां ककुभं श्रितौ ॥३॥

यत्र मन्दोदरी शोकविह्वला कुररीसमम् । योषित्सहस्रमध्यस्था विरौति करुणावहम् ॥४॥

अर्थ: रामके उक्त वचनकी सबने प्रशंसा की । तब विभीषण सहित राम लक्ष्मण अन्य सब विद्याधर राजाओंके साथ उस दिशामें पहुँचे जहाँ हजारों स्त्रियोंके बीच बैठी मन्दोदरी शोकसे विह्वल हो कुररीके समान करुण विलाप कर रही थी ॥३-४॥


अवतीर्य महानागात् सत्वरं बलकेशवौ । मन्दोदरीमुपायातौ साकं खेचरपुङ्गवैः ॥५॥

अर्थ: राम और लक्ष्मण महागजसे उतर कर प्रमुख विद्याधरोंके साथ मन्दोदरीके पास गये ॥५॥


दृष्ट्वा तौ सुतरां नार्यो रुरुदुर्मुक्तकण्ठकम् । विरुग्णरत्नवलया वसुधापांसुधूसराः ॥६॥

अर्थ: जिन्होंने रत्नोंकी चूड़ियाँ तोड़कर फेंक दी थीं तथा जो पृथिवीकी धूलिसे धूसर शरीर हो रही थीं ऐसी सब स्त्रियाँ राम लक्ष्मणको देख गला फाड़ फाड़कर अत्यधिक रोने लगीं ॥६॥


मन्दोदर्या समं सर्वमङ्गनानिवहं बलः । वाग्भिश्चित्राभिरानिन्ये समाश्वासं विचक्षणः ॥७॥

अर्थ: बुद्धिमान् रामने मन्दोदरीके साथ साथ समस्त स्त्रियोंके समूहको नाना प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना प्राप्त कराई ॥७॥


कर्पूरागुरुगोशीर्षचन्दनादिभिरुत्तमैः । संस्कार्य रावणं याताः सर्वे पद्मसरो महत् ॥८॥

अर्थ: तदनन्तर कपूर, अगुरु, गोशीर्ष और चन्दन आदि उत्तम पदार्थोंसे रावणका संस्कार कर सब पद्म नामक महासरोवर पर गये ॥८॥


उपविश्य सरस्तीरे पद्मेनोक्तं सुचेतसा । कुम्भादयो विमुच्यन्तां सामन्तैः सहिता इति ॥९॥

अर्थ: उत्तम चित्तके धारक रामने सरोवरके तीरपर बैठकर कहा कि सब सामन्तोंके साथ कुम्भकर्णादि छोड़ दिये जावें ॥९॥


खेचरेशैस्ततः कैश्चिदुक्तं ते क्रूरमानसाः । हन्यन्तां वैरिणो यद्वन्म्रियन्तां बन्धने स्वयम् ॥१०॥

अर्थ: यह सुन कुछ विद्याधर राजाओंने कहा कि वे बड़े क्रूर हृदय हैं अतः उन्हें शत्रुओंके समान मारा जाय अथवा वे स्वयं ही बन्धनमें पड़े पड़े मर जावें ॥१०॥


बलदेवो जगौ भूयः क्षात्रं नेदं विचेष्टितम् । प्रसिद्धा वा न विज्ञाता भवद्भिः किमियं स्थितिः ॥११॥

सुप्तबद्धनतत्रस्तदन्तदष्टादयो भटाः । न हन्तव्या इति क्षात्रो धर्मो जगति राजते ॥१२॥

अर्थ: तब रामने कहा कि यह क्षत्रियोंकी चेष्टा नहीं । क्या आप लोग क्षत्रियोंकी इस प्रसिद्ध नीतिको नहीं जानते कि सोते हुए, बन्धनमें बँधे हुए, नम्रीभूत, भयभीत तथा दाँतोंमें तृण दबाये हुए आदि योधा मारने योग्य नहीं हैं । यह क्षत्रियोंका धर्म जगत्में सर्वत्र सुशोभित है ॥११-१२॥


एवमस्त्विति सन्नद्धास्तानानेतुं महाभटाः । नानाऽऽयुधधरा जग्मुः स्वाम्यादेशपरायणाः ॥१३॥

अर्थ: तब ‘एवमस्तु’ कहकर स्वामीकी आज्ञा पालन करनेमें तत्पर, नाना प्रकारके शस्त्रोंके धारक महायोद्धा कवचादिसे युक्त हो उन्हें लानेके लिये गये ॥१३॥


इन्द्रजित्कुम्भकर्णश्च मारीचो घनवाहनः । तथा मयमहादैत्यप्रमुखाः खेचरोत्तमाः ॥१४॥

पूरिता निगडैः स्थूलैरमी खणखणायितैः । प्रमादरहितैः शूरैरानीयन्ते समाहितैः ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रजित्, कुम्भकर्ण, मारीच, मेघवाहन तथा मय महादैत्यको आदि लेकर अनेक उत्तम विद्याधर जो रामके कटकमें कैद थे तथा खन खन करनेवाली बड़ी मोटी बेड़ियोंसे जो सहित थे वे प्रमाद रहित सावधान चित्तके धारक शूरवीरों द्वारा लाये गये ॥१४-१५॥


विलोक्यानीयमानांस्तान्दिङ्मतङ्गजसन्निभान् । जजल्पुः कपयः स्वैरं संहतिस्थाः परस्परम् ॥१६॥

प्रज्वलन्तीं चितां वीक्ष्य रावणीयां रुषं यदि । प्रयातीन्द्रजितो जातु कुम्भकर्णनृपोऽपि वा ॥१७॥

अनयोरेककस्यापि ततो विकृतिमीयुषः । कः समर्थः पुरः स्थातुं कपिध्वजबले नृपः ॥१८॥

अर्थ: दिग्गजोंके समान उन सबको लाये जाते देख, समूहके बीच बैठे हुए विद्याधर इच्छानुसार परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे कि यदि कहीं रावणकी जलती चिताको देखकर इन्द्रजित् अथवा कुम्भकर्ण क्रोधको प्राप्त होता है अथवा इन दोमें से एक भी बिगड़ उठता है तो उसके सामने खड़ा होनेके लिए वानरोंकी सेनामें कौन राजा समर्थ हैं ? ॥१६-१८॥


यो यत्रावस्थितस्तस्मात् स्थानादुद्याति नैव सः । अनयोर्हि बलं दृष्टमेतैः सङ्ग्राममूर्द्धनि ॥१९॥

अर्थ: उस समय जो जहाँ बैठा था उस स्थानसे नहीं उठा सो ठीक ही है क्योंकि ये सब रणके अग्रभागमें उनका बल देख चुके थे ॥१९॥


भामण्डलेन चात्मीया गदिता भटपुङ्गवाः । यथा नाद्यापि विश्रम्भो विधातव्यो विभीषणे ॥२०॥

अर्थ: भामण्डलने अपने प्रधान योद्धाओंसे कह दिया कि विभीषणका अब भी विश्वास नहीं करना चाहिये ॥२०॥


कदाचित् स्वजनानेतान् प्राप्य निर्धूतबन्धनान् । भ्रातृदुःखानुतप्तस्य जायतेऽस्य विकारिता ॥२१॥

अर्थ: क्योंकि कदाचित् बन्धनसे छूटे हुए इन आत्मीय जनोंको पाकर भाईके दुःखसे संतप्त रहनेवाले इसके बिकार उत्पन्न हो सकता है ॥२१॥


इत्युद्भूतसमाशङ्कैर्वैदेहादिभिरावृताः । नीयन्ते कुम्भकर्णाद्या बलनारायणान्तिकम् ॥२२॥

अर्थ: इस प्रकार जिन्हें नाना प्रकारकी शङ्काएँ उत्पन्न हो रही थीं ऐसे भामण्डल आदिके द्वारा घिरे हुए कुम्भकर्णादि राम लक्ष्मणके समीप लाये गये ॥२२॥


रागद्वेषविनिर्मुक्ता मनसा मुनितां गताः । धरणीं सौम्यया दृष्ट्या वीक्षमाणाः शुभाननाः ॥२३॥

अर्थ: वे कुम्भकर्णादि सभी पुरुष राग-द्वेषसे रहित हो हृदयसे मुनिपनाको प्राप्त हो चुके थे, सौम्य दृष्टिसे पृथिवीको देखते हुए आ रहे थे, सबके मुख अत्यन्त शुभ-शान्त थे ॥२३॥


संसारे सारगन्धोऽपि न कश्चिदिह विद्यते । धर्म एको महाबन्धुः सारः सर्वशरीरिणाम् ॥२४॥

विमोचं यदि नामास्मात् प्राप्स्यामो बन्धनाद् वयम् । पारणां पाणिपात्रेण करिष्यामो निरम्बराः ॥२५॥

प्रतिज्ञामेवमारूढा रामस्यान्तिकमाश्रिताः । विभीषणं समाजग्मुः कुम्भकर्णादयो नृपाः ॥२६॥

अर्थ: वे अपने मनमें यह प्रतिज्ञा कर चुके थे कि इस संसारमें कुछ भी सार नहीं है एक धर्म ही सार है जो सब प्राणियोंका महाबन्धु है । यदि हम इस बन्धनसे छुटकारा प्राप्त करेंगे तो निर्ग्रन्थ साधु हो पाणि-मात्र से ही आहार ग्रहण करेंगे । इस प्रकारकी प्रतिज्ञाको प्राप्त हुए वे सब रामके समीप आये । कुम्भकर्ण आदि राजा विभीषणके भी सम्मुख गये ॥२४-२६॥


वृत्ते यथायथं तत्र दुःखसम्भाषणेऽगदन् । प्रशान्ताः कुम्भकर्णाद्या बलनारायणाविति ॥२७॥

अहो वः परमं धैर्यं गाम्भीर्यं चेष्टितं बलम् । सुरैरप्यजयो नीतो मृत्युं यद्राक्षसाधिपः ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर जब दुःखके समयका वार्तालाप धीरे-धीरे समाप्त हो गया तब परम शान्तिको धारण करनेवाले कुम्भकर्णादि ने राम-लक्ष्मणसे इस प्रकार कहा कि अहो ! आप लोगोंका धैर्य, गाम्भीर्य, चेष्टा तथा बल आदि सभी उत्कृष्ट है क्योंकि जो देवों के द्वारा भी अजेय था ऐसे रावणको आपने मृत्यु प्राप्त करा दी ॥२७-२८॥


परं कृतापकारोऽपि मानी निर्व्यूढभाषितः । अत्युन्नतगुणः शत्रुः श्लाघनीयो विपश्चिताम् ॥२९॥

अर्थ: अत्यन्त अपकारी, मानी और कटुभाषी होनेपर भी यदि शत्रुमें उत्कृष्ट गुण हैं तो वह विद्वानोंका प्रशंसनीय ही होता है ॥२९॥


परिसान्त्व्य ततश्चक्री वचनैर्हृदयङ्गमैः । जगाद पूर्ववद्यूयं भोगैस्तिष्ठत सङ्गताः ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर लक्ष्मणने मनोहर वचनों द्वारा सान्त्वना देकर कहा कि आप सब पहले की तरह भोगोपभोग करते हुए आनन्दसे रहिये ॥३०॥


गदितं तैरलं भोगैरस्माकं विषदारुणैः । महामोहावहैर्भीमैः सुमहादुःखदायिभिः ॥३१॥

अर्थ: यह सुन उन्होंने कहा कि विषके समान दारुण, महामोहको उत्पन्न करनेवाले, भयङ्कर तथा महादुःख देनेवाले भोगोंकी हमें आवश्यकता नहीं है ॥३१॥


उपायाः सन्ति ते नैव यैर्न ते कृतसान्त्वनाः । तथापि भोगसम्बन्धं प्रतीयुर्न मनस्विनः ॥३२॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! उस समय वे उपाय शेष नहीं रह गये थे जिनसे उन्हें सान्त्वना न दी गई हो परन्तु फिर भी उन मनस्वी मनुष्योंने भोगोंका सम्बन्ध स्वीकृत नहीं किया ॥३२॥


नारायणे तथालग्ने स्वयं हलधरेऽपि च । दृष्टिर्भोगे पराचीना तेषामासीद्रवाविव ॥३३॥

अर्थ: यद्यपि नारायण और बलभद्र स्वयं उस तरह उनके पीछे लगे हुए थे अर्थात् उन्हें भोग स्वीकृत करानेके लिए बार-बार समझा रहे थे तथापि उनकी दृष्टि भोगोंसे उस तरह विमुख ही रही जिस तरह कि सूर्यसे लगी दृष्टि अन्धकारसे विमुख रहती है ॥३३॥


भिन्नाञ्जनदलच्छाये तस्मिन् सुसरसो जले । अबन्धनैरिभैः साकं स्नाताः सर्वे सगन्धिनि ॥३४॥

अर्थ: मसले हुए अञ्जनके कणोंके समान कान्तिवाले उस सरोवरके सुगन्धित जलमें बन्धनमुक्त कुम्भकर्णादिके साथ सबने स्नान किया ॥३४॥


राजीवसरसस्तस्मादुत्तीर्यानुक्रमेण च । यथा स्वं निलयं जग्मुः कपयो राक्षसास्तथा ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर उस पद्मसरोवरसे निकलकर सब वानर और राक्षस, यथायोग्य अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥३५॥


सरसोऽस्य तटे रम्ये खेचरा बद्धमण्डलाः । केचिच्छूरकथां चक्रुर्विस्मयव्याप्तमानसाः ॥३६॥

अर्थ: कितने ही विद्याधर इस सरोवरके मनोहर तटपर मण्डल बाँधकर बैठ गये और आश्चर्यसे चकितचित्त होते हुए शूरवीरोंकी कथा करने लगे ॥३६॥


ददुः केचिदुपालम्भं दैवस्य क्रूरकर्मणः । मुमुचुः केचिदस्राणि सन्ततानि स्वनोज्झितम् ॥३७॥

अर्थ: कितने ही विद्याधर क्रूरकर्मा दैवके लिए उपालम्भ देने लगे और कितने ही शब्दरहित-चुपचाप अत्यधिक अश्रु छोड़ने लगे ॥३७॥


आपूर्यमाणचेतस्का गुणैः स्मृतिपथं गतैः । रावणीयैर्जनाः केचिद्रुरुदुर्मुक्तकण्ठकम् ॥३८॥

अर्थ: स्मृतिमें आये हुए रावणके गुणोंसे जिनके चित्त भर रहे थे ऐसे कितने ही लोग गला फाड़-फाड़कर रो रहे थे ॥३८॥


चित्रतां कर्मणां केचिदवोचन्नतिसङ्कटाम् । अन्ये संसारकान्तारं निनिन्दुरतिदुस्तरम् ॥३९॥

अर्थ: कितने ही लोग कर्मोंकी अत्यन्त संकटपूर्ण विचित्रताका निरूपण कर रहे थे और कितने ही अत्यन्त दुस्तर संसाररूपी अटवीकी निन्दा कर रहे थे ॥३९॥


केचिद्भोगेषु विद्वेषं परमं समुपागताः । राजलक्ष्मीं चलां केचिदमन्यन्त निरर्थकाम् ॥४०॥

अर्थ: कितने ही लोग भोगोंमें परम विद्वेषको प्राप्त होते हुए राज्य-लक्ष्मीको चञ्चल एवं निरर्थक मान रहे थे ॥४०॥


गतिरेषैव वीराणामिति केचिद् बभाषिरे । अकार्यगर्हणं केचिच्चक्रुरुत्तमबुद्धयः ॥४१॥

अर्थ: कोई यह कह रहे थे कि वीरोंकी ऐसी ही गति होती है और कोई उत्तम बुद्धिके धारक अकार्य-खोटे कार्यकी निन्दा कर रहे थे ॥४१॥


रावणस्य कथां केचिदभजन् गर्वशालिनीम् । केचित्पद्मगुणानूचुः शक्तिं केचिच्च लाक्ष्मणीम् ॥४२॥

अर्थ: कोई रावणकी गर्वभरी कथा कर रहे थे, कोई रामके गुण गा रहे थे और कोई लक्ष्मणकी शक्तिकी चर्चा कर रहे थे ॥४२॥


केचिद् बलममृष्यन्तो मन्दकम्पितमस्तकाः । सुकृतस्य फलं वीराः शशंसुः स्वच्छचेतसः ॥४३॥

अर्थ: जिनका मस्तक धीरे-धीरे हिल रहा था तथा जिनका चित्त अत्यन्त स्वच्छ था ऐसे कितने ही वीर, रामकी प्रशंसा न कर पुण्यके फलकी प्रशंसा कर रहे थे ॥४३॥


गृहे गृहे तदा सर्वाः क्रियाः प्राप्ताः परिक्षयम् । प्रावर्त्तन्त कथा एव शिशूनामपि केवलाः ॥४४॥

अर्थ: उस समय घर-घरमें सब कार्य समाप्त हो गये थे केवल बालकोंमें कथाएँ चल रहीं थीं ॥४४॥ उस


लङ्कायां सर्वलोकस्य बाष्पदुर्दिनकारिणः । शोकेनैव व्यलीयन्त महता कुट्टिमान्यपि ॥४५॥

अर्थ: उस समय लङ्कामें जब कि सब लोग दुर्दिनकी भाँति लगातार अश्रुओंकी वर्षा कर रहे थे तब ऐसा जान पड़ता था मानो वहाँके फर्स भी बहुत भारी शोकके कारण पिघल गये हों ॥४५॥


शेषभूतव्यपोहेन जलात्मकमिवाभवत् । नयनेभ्यः प्रवृत्तेन वारिणा भुवनं तदा ॥४६॥

अर्थ: उस समय लङ्कामें जहाँ देखो वहाँ नेत्रोंसे पानी ही पानी झर रहा था इससे ऐसा जान पड़ता था मानो संसार अन्य तीन भूतोंको दूर कर केवल जल रूप ही हो गया था ॥४६॥


हृदयेषु पदं चक्रुस्तापाः परमदुःसहाः । नेत्रवारिप्रवाहेभ्यो भीता इव समन्ततः ॥४७॥

अर्थ: सब ओर बहनेवाले नेत्र-जलके प्रवाहोंसे भयभीत होकर ही मानो अत्यन्त दुःसह सन्तापोंने हृदयोंमें स्थान जमा रक्खा था ॥४७॥


धिक्धिक्कष्टमहो हा ही किमिदं जातमद्भुतम् । एवं निर्जग्मुरालापा जनेभ्यो वाष्पसङ्गताः ॥४८॥

अर्थ: धिक्कार हो, धिक्कार हो, हाय-हाय बड़े कष्टकी बात है, अहो हा-ही यह क्या अद्भुत कार्य हो गया, उस समय लोगोंके मुखसे अश्रुओंके साथ-साथ ऐसे ही शब्द निकल रहे थे ॥४८॥


भूमिशय्यासु मौनेन केचिन्नियमिताननाः । निष्कम्पविग्रहास्तस्थुः पुस्तकर्मगता इव ॥४९॥

अर्थ: कितने ही लोग मौनसे मुँह बन्दकर पृथ्वीरूपी शय्यापर निश्चल शरीर होकर इस प्रकार बैठे थे मानो मिट्टीके पुतले ही हों ॥४९॥


बभञ्जुः केचिदस्त्राणि चिक्षिपुर्भूषणानि च । रमणीवदनाम्भोजदृष्टिद्वेषमुपागताः ॥५०॥

अर्थ: कितने ही लोगोंने शस्त्र तोड़ डाले, आभूषण फेंक दिये और स्त्रियोंके मुख कमलसे दृष्टि हटा ली ॥५०॥


उष्णैर्निश्वासवातूलैर्दीर्घिष्ठैः कलुषैरलम् । अमुञ्चदिव तद्दुःखं प्ररोहान्विरलेतरान् ॥५१॥

अर्थ: कितने ही लोगोंके मुखसे गरम लम्बे और कलुषित श्वासके बघरूले निकल रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो उनका दुःख अविरल अंकुर ही छोड़ रहा हो ॥५१॥


केचित् संसारभावेभ्यो निर्वेदं परमागताः । चक्रुर्दैगम्बरीं दीक्षां मानसे जिनभाषिताम् ॥५२॥

अर्थ: कितने ही लोग संसारसे परम निर्वेदको प्राप्त हो मनमें जिन-कथित दिगम्बर दीक्षाको धारण कर रहे थे ॥५२॥


अथ तस्य दिनस्यान्ते महासङ्घसमन्वितः । अप्रमेयबलः ख्यातो लङ्कां प्राप्तो मुनीश्वरः ॥५३॥

अर्थ: अथानन्तर उस दिनके अन्तिम पहरमें अनन्तवीर्य नामक मुनिराज महासंघके साथ लङ्का नगरीमें आये ॥५३॥


रावणे जीवति प्राप्तो यदि स्यात् स महामुनिः । लक्ष्मणेन समं प्रीतिर्जाता स्यात्तस्य पुष्कला ॥५४॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि यदि रावणके जीवित रहते वे महामुनि लङ्कामें आये होते तो लक्ष्मणके साथ रावणकी घनी प्रीति होती ॥५४॥


तिष्ठन्ति मुनयो यस्मिन् देशे परमलब्धयः । तथा केवलिनस्तत्र योजनानां शतद्वयम् ॥५५॥

पृथिवी स्वर्गसङ्काशा जायते निरुपद्रवा । वैरानुबन्धमुक्ताश्च भवन्ति निकटे नृपाः ॥५६॥

अर्थ: क्योंकि जिस देशमें ऋद्धिधारी मुनिराज और केवली विद्यमान रहते हैं वहाँ दो सौ योजनतककी पृथ्वी स्वर्गके सदृश सर्वप्रकारके उपद्रवोंसे रहित होती है और उनके निकट रहनेवाले राजा निर्वैर हो जाते हैं ॥५५-५६॥


अमूर्त्तत्वं यथा व्योम्नश्चलत्वमनिलस्य च । महामुनेर्निसर्गेण लोकस्याह्लादनं तथा ॥५७॥

अर्थ: जिस प्रकार आकाशमें अमूर्तिकपना और वायुमें चञ्चलता स्वभावसे हैं उसी प्रकार महामुनिमें लोगोंको आह्लादित करनेकी क्षमता स्वभावसे ही होती है ॥५७॥


अनेकाद्भुतसम्पन्नैर्मुनिभिः स समावृतः । यथाऽऽगतस्तथा वक्तुं केन श्रेणिक शक्यते ॥५८॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अनेक आश्चर्योंसे युक्त मुनियोंसे घिरे हुए वे अनन्तवीर्य मुनिराज लङ्कामें जिस प्रकार आये थे उसका कथन कौन कर सकता है ? ॥५८॥


सुवर्णकुम्भसङ्काशः संयतर्द्धया स सङ्गतः । आगत्याऽऽवासितो धीमानुद्याने कुसुमायुधे ॥५९॥

अर्थ: जो अनेक ऋद्धियोंसे सहित होनेके कारण सुवर्णकलशके समान जान पड़ते थे, ऐसे वे मुनि लङ्कामें आकर कुसुमायुधनामक उद्यानमें ठहरे ॥५९॥


षट्पञ्चाशत्सहस्रैस्तु खेचरैर्मुनिभिः परैः । रेजे तत्र समासीनो ग्रहैर्विधुरिवाऽऽवृतः ॥६०॥

अर्थ: वे छप्पन हजार आकाशगामी उत्तम मुनियोंके साथ उस उद्यानमें बैठे हुए ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रोंसे घिरा हुआ चन्द्रमा ही हो ॥६०॥


शुक्लध्यानप्रवृत्तस्य सद्विविक्ते शिलातले । तस्यामेव समुत्पन्नं शर्वर्यां तस्य केवलम् ॥६१॥

अर्थ: निर्मल शिलातलपर शुक्लध्यानमें आरूढ हुए उन मुनिराजको उसी रात्रिमें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ॥६१॥


तस्यातिशयसम्बन्धं कीर्त्यमानं मनोहरम् । शृणु श्रेणिक ! पापस्य नोदनं परमाद्भुतम् ॥६२॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! मैं पापको दूर करनेवाला परमआश्चर्यसे युक्त उनके मनोहर अतिशयोंका वर्णन करता हूँ सो सुन ॥६२॥


उपजातिवृत्तम् अथेन्द्रजिद्वारिदवाहनाभ्यां पृष्टः स्वपूर्वं जननं मुनीन्द्रः । उवाच कौशाम्ब्यभिधानपुर्यां भ्रातृद्वयं निःस्वकुलीनमासीत् ॥६३॥

आद्योऽत्र नाम्ना ‘प्रथमो’ द्वितीयः प्रकीर्त्तितः ‘पश्चिम’ नामधेयः ।
अथाऽन्यदा तां भवदत्तनामा पुरीं प्रयातो विहरन् भदन्तः ॥६४॥

अर्थ: अथानन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होते ही वे मुनिराज वीर्यान्तराय कर्मका क्षय हो जानेसे अनन्तबलके स्वामी हो गये तथा देवनिर्मित सिंहासन पर आरूढ हुए । पृथ्वीके नीचे पाताललोकमें निवास करनेवाले वायुकुमार, नागकुमार, विद्युत्कुमार तथा सुवर्णकुमार आदि दश प्रकारके भवनवासी, किन्नरोंको आदि लेकर आठ प्रकारके व्यन्तर, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह आदि पाँच प्रकारके ज्यौतिषी और सौधर्म आदि सोलह प्रकारके कल्पवासी इस तरह चारों निकायके देव घातकी खण्डद्वीपमें उत्पन्न हुए किसी तीर्थङ्करके जन्मकल्याणक सम्बन्धी उत्सवमें गये हुए थे, वहाँ विशाल पूजा तथा सुमेरु पर्वतके उत्तम शिखर पर विराजमान देवाधिदेव जिनेन्द्र बालकका शुभ रत्नमयी एवं सुवर्णमयी कलशों द्वारा अभिषेक कर उन्होंने उत्तम शब्दोंसे उनकी स्तुति की । तदनन्तर वहाँसे लौटकर जिन बालकको माताकी गोदमें सुखसे विराजमान किया । जो बालक अवस्था होने पर भी बालकों जैसी चपलतासे रहित थे ऐसे जिन बालकको नमस्कार कर उन देवोंने हर्षित हो, मेरुसे लौटनेके बाद तीर्थङ्करके घर पर होनेवाले ताण्डवनृत्य आदि कार्य यथायोग्य रीतिसे किये । तदनन्तर वहाँसे लौटकर लङ्कामें अनन्तवीर्य मुनिका केवलज्ञान महोत्सव देख उनके समीप आये । मुनिराजके प्रभावसे खिंचे हुए उन देवोंमें कितने ही देव रत्नोंकी बड़ी-बड़ी मालाओंसे युक्त, सूर्यबिम्बके समान प्रकाशमान एवं योग्य प्रमाणसे सहित उत्तम विमानोंमें आरूढ थे, कितने ही शङ्खके समान सफेद उत्तमराज हँसोंपर सवार थे, कितने ही उन हाथियोंकी पीठपर आरूढ थे, जिनके कि गण्डस्थल अत्यधिक मद सम्बन्धी श्रेष्ठ सुगन्धिके सम्बन्धसे गूँजते हुए भ्रमरसमूहकी श्यामकांतिके कारण कुछ बढ़े हुए-से दिखायी देते थे और कितने ही बालचंद्रमाके समान दाढ़ोंसे भयङ्कर मुखवाले व्याघ्र-सिंह आदि वाहनों पर आरूढ़ थे । वे सब देव प्रसन्न चित्तके धारक हो उन मुनिराजके समीप आ रहे थे । उस समय जोर-जोरसे बजनेवाले पटह, मृदङ्ग, गम्भीर और भेरियोंके नादसे, बजती हुई वासुरियों और वीणाओंकी उत्तम झनकारसे, झन-झन करनेवाली झाँझोंसे शब्द करनेवाले अनेक शङ्खोंसे, महा मेघमण्डलकी गर्जनाके समान गम्भीर ध्वनिसे युक्त दुन्दुभि-समूहके रमणीय शब्दोंसे और मनको हरण करने वाली देवाङ्गनाओंके सुन्दर सङ्गीतसे आकाशमण्डल व्याप्त हो गया था । उस अर्ध रात्रिके समय सहसा अन्धकार विलीन हो गया और विमानोंमें लगे हुए रत्नों आदिका प्रकाश फैल गया, सो उसे देख तथा दुन्दुभियोंकी गम्भीर गर्जना सुनकर राम-लक्ष्मण पहले तो कुछ उद्विग्नचित्त हुए फिर क्षण-एकमें ही यथार्थ समाचार जानकर सन्तोषको प्राप्त हुए । वानरों और राक्षसोंकी सेनामें ऐसी हलचल मच गई मानो समुद्र ही लहराने लगा हो । तदनन्तर भक्तिसे प्रेरित विद्याधर, राम-लक्ष्मण आदि सत्पुरुष और भानुकर्ण, इन्द्रजित्, मेघवाहन आदि राक्षस, कोई उत्तम हाथियों पर आरूढ होकर और कोई रथ तथा उत्तम घोड़ों पर सवार हो केवल भगवान्के समीप चले । उस समय वे अपने सफेद छत्रों, ध्वजाओं और तरुण हंसावलीके समान शोभायमान चमरोंसे युक्त थे तथा आकाशको आच्छादित करते हुए जा रहे थे । जिस प्रकार अत्यधिक हर्षसे युक्त गन्धर्व, यक्ष और अप्सराओंके समूहसे सेवित इन्द्र अपने कामोद्यानमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार सब लोगोंने अपने-अपने वाहनोंसे उतरकर तथा ध्वजा छत्रादिके संयोगका त्यागकर लङ्काके उस कुसुमायुध उद्यानमें प्रवेश किया । समीपमें जाकर सबने मुनिराजकी पूजा की, उनके चरण कमल युगलमें प्रणाम किया और उत्तम स्तोत्र तथा मन्त्रोंसे परिपूर्ण वचनोंसे भक्ति पूर्वक स्तुति की । तदनन्तर धर्मश्रवण करनेकी इच्छासे सब यथायोग्य पृथिवी पर बैठ गये और सावधान चित्त होकर मुनिराजके मुखसे निकले हुए धर्मका इस प्रकार श्रवण करने लगे - उन्होंने कहा कि इस संसारमें नरक तिर्यञ्च मनुष्य और देवके भेदसे चार गतियाँ हैं जिनमें नाना प्रकारके महादुःखरूपी चक्र पर चढ़े हुए समस्त प्राणी निरन्तर घूमते रहते हैं तथा अष्टकर्मोंसे बद्ध हो स्वयं शुभ अशुभ कर्म करते हैं । सदा आर्त्तरौद्र ध्यानसे युक्त रहते हैं तथा मोहनीय कर्म उन्हें बुद्धिरहित कर देता है । ये प्राणी सदा प्राणिघात, असत्य भाषण, पर-द्रव्यापहरण, परस्त्री समालिङ्गन और अपरिमित धनका समागम, महालोभ कषायके साथ वृद्धिको प्राप्त हुए इन पाँच पापोंके साथ संसर्गको प्राप्त होते हैं । अन्तमें खोटे कर्मोंसे प्रेरित हुए मानव, मृत्युको प्राप्त हो नीचे पाताललोकमें जन्म लेते हैं । नीचेकी पृथिवीके नाम इस प्रकार हैं - रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा और महातमःप्रभा । ये पृथिवियाँ निरन्तर महा अन्धकारसे युक्त, अत्यन्त दुर्गन्धित, घृणित दुर्दृश्य एवं दुःखदायी स्पर्श रूप हैं । महादारुण हैं, वहाँ की पृथिवी तपे हुए लोहे के समान हैं । सबकी सब तीव्र आक्रन्दन, आक्रोशन और भयसे आकुल हैं । जिन पृथिवियोंमें नारकी जीव पापसे बँधे हुए दुष्कर्मके कारण सदा महा तीव्र दुःख अनेक सागरोंकी स्थिति पर्यन्त प्राप्त होते रहते हैं । ऐसा जान कर हे विद्वज्जन हो पापबन्धसे चित्तको द्वेष युक्त कर उत्तम धर्ममें रमण करो । जो प्राणी व्रत-नियम आदिसे तो रहित हैं परन्तु स्वाभाविक सरलता आदि गुणोंसे सहित हैं ऐसे कितने ही प्राणी मनुष्य गतिको प्राप्त होते हैं और कितने ही नाना प्रकारके तपश्चरण कर देवगतिको प्राप्त होते हैं । वहाँसे च्युत हो पुनः मनुष्य पर्याय पाकर जो धर्म की अभिलाषा छोड़ देते हैं वे कल्याणसे रहित हो पुनः उग्र दुःखसे दुःखी होते हुए जन्म-मरणरूपी वृक्षोंसे युक्त विशाल संसार वनमें भ्रमण करते रहते हैं । अथानन्तर जो भव्य प्राणी देवाधिदेव जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंसे अत्यन्त प्रभावित हो मोक्षमार्गके अनुरूप शील, सत्य, शौच, सम्यक् तप, दर्शन, ज्ञान और चारित्रके युक्त होते हुए अष्ट कर्मोंके नाशका प्रयत्न करते हैं, वे उत्कृष्ट वैभवसे युक्त हो देवोंके उत्तम स्वामी होते हैं और वहाँ अनेक सागर पर्यन्त नाना प्रकारका सुख प्राप्त करते रहते हैं । तदनन्तर वहाँसे च्युत हो अवशिष्ट धर्मके फल स्वरूप बहुत भारी भोग और लक्ष्मीको प्राप्त होते हैं और अन्तमें रत्नत्रयको प्राप्त कर राज्यादि वैभवका त्याग कर जैनलिङ्ग - निर्ग्रन्थ मुद्रा धारण करते हैं तथा अत्यन्त तीव्र तपश्चरण कर शुक्लध्यानके धारी हो केवलज्ञान प्राप्त करते हैं और आयुःका क्षय होनेपर समस्त कर्मोंसे रहित होते हुए तीन लोकके अग्र भाग पर आरूढ़ हो सिद्ध बनते हैं एवं अन्तरहित आत्मस्वभावमय आह्लाद-रूप अनन्त सुख प्राप्त करते हैं । अथानन्तर इन्द्रजित् और मेघवाहनने अनन्तवीय मुनिराजसे अपने पूर्वभव पूछे । सो इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि कौशाम्बी नगरीमें दरिद्रकुलमें उत्पन्न हुए दो भाई रहते थे । पहलेका नाम ‘प्रथम’ था और दूसरा ‘पश्चिम’ कहलाता था। किसी एक दिन विहार करते हुए भवदत्त मुनि उस नगरीमें आये ॥६३-६४॥


श्रुत्वाऽस्य पार्श्वे विनयेन धर्मं तौ भ्रातरौ क्षुल्लकरूपमेतौ । मुनिं च तं द्रष्टुमितो नगर्यास्तस्याः पतिः सद्युतिरिन्दुनामा ॥६५॥

उपेक्षयैवाऽऽदरकार्यमुक्तः स्थितः समालोक्य मुनिर्मनीषी ।
मिथ्या यतो दर्शनमस्य राज्ञो विज्ञातमेतेन तदानुपायम् ॥६६॥

अर्थ: उनके पास धर्म श्रवणकर दोनों भाई क्षुल्लक हो गये। किसी दिन उस नगरीका कान्तिमान इन्दु नामका राजा उन मुनिराजके दर्शन करने आया, सो उसे देख मुनिराज उपेक्षा भावसे बैठे रहे। उन्होंने राजाके प्रति कुछ भी आदर भाव प्रकट नहीं किया। इसका कारण यह था कि बुद्धिमान् मुनिराजने यह जान लिया था कि राजाका मिथ्या दर्शन अनुपाय है - दूर नहीं किया जा सकता ॥६५-६६॥


श्रेष्ठीति नन्दीति जिनेन्द्रभक्तस्ततः पुरो द्रष्टुमितो भदन्तम् ।
तस्यादरो राजसमस्य भूत्या कृतोऽनगारेण यथाभिधानम् ॥६७॥

अर्थ: तदनन्तर राजाके चले जानेके बाद नगरका नन्दी नामक जिनेन्द्र भक्त सेठ मुनिके दर्शन करनेके लिये आया। वह सेठ विभूति में राजाके ही समान था और मुनिने उसके प्रति यथायोग्य सम्मान प्रकट किया ॥६७॥


तमादृतं वीक्ष्य मुनीश्वरेण निदानमाबाध्यत पश्चिमेन । भवाम्यहं नन्दिसुतो यथेति धर्मं तदर्थं च कुधीरकार्षीत् ॥६८॥

अर्थ: नन्दी सेठको मुनिराजके द्वारा आदृत देख पश्चिम नामक क्षुल्लकने निदान बाँधा कि मैं नन्दी सेठके पुत्र होऊँ। यथार्थमें वह दुर्बुद्धि इसके लिए ही धर्म कर रहा था ॥६८॥


स बोध्यमानोऽप्यनिवृत्तचित्तो मृतो निदानग्रहदूषितात्मा । सुतोऽभवन्नन्दिन इन्दुमुख्यां सुयोषिति श्लाघ्यगुणान्वितायाम् ॥६९॥

अर्थ: यद्यपि उसे बहुत समझाया गया तथापि उसका चित्त उस ओरसे नहीं हटा, अन्तमें वह निदान बन्धसे दूषित चित्त होता हुआ मरा और मरकर नन्दी सेठकी प्रशंसनीय गुणोंसे युक्त इन्दुमुखी नामक स्त्रीके पुत्र हुआ ॥६९॥


गर्भस्थ एवाऽत्र महीपतीनां स्थानेषु लिङ्गानि बहून्यभूवन् ।
एतस्य राज्योद्भवसूचनानि प्राकारपातप्रभृतीनि सद्यः ॥७०॥

अर्थ: जब यह गर्भमें स्थित था तभी इसकी राज्य प्राप्तिकी सूचना देनेवाले, कोटका गिरना आदि बहुतसे चिह्न राजाओंके स्थानोंमें होने लगे थे ॥७०॥


ज्ञात्वा नृपास्तं विविधैर्निमित्तैर्महानरं भाविनमुग्रसूतिम् ।
जन्मप्रभृत्यादरसम्प्रयुक्तैर्द्रव्यैरसेवन्त सुदूतनीतैः ॥७१॥

अर्थ: नाना प्रकारके निमित्तोंसे यह जानकर कि यह आगे चलकर महापुरुष होगा। राजा लोग जन्मसे ही लेकर उत्तम दूतोंके द्वारा आदर पूर्वक भेजे हुए पदार्थोंसे उसकी सेवा करने लगे थे ॥७१॥


रतेरसौ वर्द्धनमादधानः समस्तलोकस्य यथार्थशब्दः ।
अभून्नरेशो रतिवर्द्धनाख्यो यस्येन्दुरप्यागतवान् प्रणामम् ॥७२॥

अर्थ: वह सब लोगोंकी रति अर्थात् प्रीतिकी वृद्धि करता था, इसलिए सार्थक नामको धारण करने वाला रतिवर्द्धन नामका राजा हुआ। ऐसा राजा कि कौशाम्बीका अधिपति इन्दु भी जिसे प्रणाम करता था ॥७२॥


एवं स तावत्सुमहाविभूत्या मत्तोऽभवद् यः पुनरस्य पूर्वम् ।
ज्यायानभूद्धर्ममसौ विधाय मृत्वा गतः कल्पनिवासिभावम् ॥७३॥

अर्थ: इस प्रकार प्रथम और पश्चिम इन दो भाइयोंमें पश्चिम तो महाविभूति पाकर मत्त हो गया उसके मदमें भूल गया और पूर्वभवमें जो उसका बड़ा भाई प्रथम था वह मरकर स्वर्गमें देव पर्यायको प्राप्त हुआ ॥७३॥


स पूर्वमेव प्रतिबोधकार्ये कनीयसा याचित उद्धदेवः । समाश्रितः क्षुल्लकरूपमेतं प्रबोधमानेतुमभूत्कृताशः ॥७४॥

गृहं च तस्य प्रविशन्नियुक्तैर्द्वारे नरैर्दूरनिराकृतः सन् । रूपं श्रितोऽसौ रतिवर्द्धनस्य देवः क्षणेनोपनतं यथावत् ॥७५॥

कृत्वा च तं तन्नगरप्रभावितोन्मत्तकाकारमरण्यमारात् । निर्वास्य गत्वा गदति स्म का ते वार्त्ताऽधुना मत्परिभूतिभाजः ॥७६॥

अर्थ: पश्चिमने प्रथमसे उस पर्यायमें याचना की थी कि यदि तुम देवताओं और मैं मनुष्य होऊँ तो तुम मुझे सम्बोधन करना। इस याचनाकी स्मृतिमें रखता हुआ प्रथमका जीव देव रतिवर्धनको सम्बोधनेके लिए क्षुल्लकका रूपधर कर उसके घरमें प्रवेश कर रहा था कि द्वार पर नियुक्त पुरुषों द्वारा उसने उसे दूर हटा दिया। तदनन्तर उस देवने क्षणभरमें रतिवर्धनका रूप रख लिया और असली रतिवर्धनको पागल जैसा बनाकर जङ्गलमें दूर खदेड़ दिया। तदनन्तर उसके पास जाकर बोला कि तुमने मेरा अनादर किया था, अब कहो तुम्हारा क्या हाल है ? ॥७४-७६॥


जगौ च पूर्वं जननं यथावत्ततः प्रबोधं समुपागतोऽसौ । सम्यक्त्वयुक्तो रतिवर्द्धनोऽभून्नन्द्यादयश्चापि नृपा विशेषात् ॥७७॥

अर्थ: इतना कहकर उस देवने रतिवर्धनके लिए अपने पूर्व जन्मका यथार्थ निरूपण किया जिससे वह शीघ्र ही प्रबोधको प्राप्त हो सम्यग्दृष्टि हो गया। साथ ही नन्दी सेठ आदि भी सम्यग्दृष्टि हो गये ॥७७॥


प्रव्रज्य राजा प्रथमामरस्य गतः सकाशं कृतकालधर्मः । ततश्च्युतौ तौ विजयेऽभिजातौ उर्वोर्वसाख्यौ नगरे नरेन्द्रात् ॥७८॥

अर्थ: तदनन्तर राजा रतिवर्धन दीक्षा धारण कर कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त होता हुआ बड़े भाई प्रथमका जीव जहाँ देव था वहीं जाकर उत्पन्न हुआ । तदनन्तर दोनों देव वहाँसे च्युत हो विजय नामक नगरमें वहाँके राजाके उर्व और उर्वस् नामक पुत्र हुए ॥७८॥


सहोदरौ तौ पुनरेव धर्मं विधाय जैनं त्रिदशावभूताम् ।
ततश्च्युताविन्द्रजिदब्दवाहौ जातौ भवन्ताविह खेचरेशौ ॥७९॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिनेन्द्र प्रणीत धर्म धारण कर दोनों भाई फिरसे देव हुए और वहाँसे च्युत हो आप दोनों यहाँ इन्द्रजित् और मेघवाहन नामक विद्याधराधिपति हुए हो ॥७९॥


या नन्दिनश्चेन्दुमुखी द्वितीया भवान्तरान्तर्हितजन्मिका सा । मन्दोदरी स्नेहवशेन सेयं माताऽभवद्वा जिनधर्मसक्ता ॥८०॥

अर्थ: और जो नन्दी सेठकी इन्द्रमुखी नामकी भार्या थी वह भवान्तरमें एक जन्मका अन्तर ले स्नेहके कारण जिनधर्ममें लीन तुम्हारी माता मन्दोदरी हुई है ॥८०॥


श्रुत्वा भवमिति विविधं त्यक्त्वा संसारवस्तुनि प्रीतिम् । पुरुसंवेगसमेतौ जगृहतुरुग्रामिमौ दीक्षाम् ॥८१॥

कुम्भश्रुतिमारीचावन्येऽत्र महाविशालसंवेगाः । अपगतकषायरागाः श्रामण्येऽवस्थिताः परमे ॥८२॥

अर्थ: इस प्रकार अपने अनेक भव सुन संसार सम्बन्धी वस्तुओंमें प्रीति छोड़ परम संवेगसे युक्त हुए इन्द्रजित् और मेघनादने कठिन दीक्षा धारण कर ली । इनके सिवाय जो कुम्भकर्ण तथा मारीच आदि अन्य विद्याधर थे वे भी अत्यधिक संवेगसे युक्त हो कषाय तथा रागभाव छोड़कर उत्तम मुनि पदमें स्थित हो गये ॥८१-८२॥


तृणमिव खेचरविभवं विहाय विधिना सुधर्मचरणस्थाः । बहुविधलब्धिसमेताः पर्याटुरिमे महीं मुनयः ॥८३॥

अर्थ: जिन्होंने विद्याधरोंके विभवको तृणके समान छोड़ दिया था, जो विधिपूर्वक उत्तम धर्मका आचरण करते थे, तथा जो नानाप्रकारकी ऋद्धियोंसे सहित थे, ऐसे ये मुनिराज पृथिवीमें सर्वत्र भ्रमण करने लगे ॥८३॥


मुनिसुव्रततीर्थकृतस्तीर्थे तपसा परेण सम्बद्धाः ।
ज्ञेयास्ते वरमुनयो वन्द्या भव्यासुवाहानाम् ॥८४॥

अर्थ: मुनिसुव्रत तीर्थङ्करके तीर्थमें वे परम तपसे युक्त तथा भव्य जीवोंके वन्दना करने योग्य उत्तम मुनि हुए हैं, ऐसा जानना चाहिए ॥८४॥


पतिपुत्रविरहदुःखज्वलनेन विदीपिता सती जाता ।
मन्दोदरी नितान्तं विह्वलहृदया महाशोका ॥८५॥

अर्थ: जो पति और पुत्रोंके विरहजन्य दुःखाग्निसे जल रही थी ऐसी मन्दोदरी महाशोकसे युक्त हो अत्यन्त विह्वल हृदय हो गई ॥८५॥


मूर्च्छामेत्य विबोधं प्राप्य पुनः कुररकामिनी करुणम् ।
कुरुते स्म समाक्रन्दं पतिता दुःखाम्बुधावुग्रे ॥८६॥

अर्थ: दुःखरूपी भयङ्कर समुद्रमें पड़ी मन्दोदरी पहले तो मूर्छित हो गई फिर सचेत हो कुररीके समान करुण विलाप करने लगी ॥८६॥


हा पुत्रेन्द्रजितेदं व्यवसितमीदृक् कथं त्वया कृत्यम् ।
हा मेघवाहन कथं जननी नापेक्षिता दीना ॥८७॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हाय पुत्र इन्द्रजित् ! तूने यह ऐसा कार्य क्यों किया ? हाय मेघवाहन ! तूने दुःखिनी माताकी अपेक्षा क्यों नहीं की ? ॥८७॥


युक्तमिदं किं भवतोरनपेक्ष्य यदुग्रदुःखसन्तप्ताम् । मातरमेतद्विहितं किञ्चित्कार्यं सुदुःखेन ॥८८॥

अर्थ: तीव्र दुःखसे सन्तप्त माताकी उपेक्षा कर अतिशय दुःखसे दुःखी हो तुम लोगोंने यह जो कुछ कार्य किया है सो क्या ऐसा करना तुम्हें उचित था ? ॥८८॥


विरहितविद्याविभवौ मुक्ततनू क्षितितले कथं परुषे । स्थातास्थो मे वत्सौ देवोपमभोगदुर्ललितौ ॥८९॥

अर्थ: हे पुत्रो ! तुम देवतुल्य भोगोंसे लड़ाये हुए हो । अब विद्याके विभवसे रहित हो, शरीरसे स्नेह छोड़ कठोर पृथ्वीतल पर कैसे पड़ोगे ? ॥८९॥


हा तात कृतं किमिदं भवताऽपि विमुच्य भोगमुत्तमं रूपम् । एकपदे कथय कथं त्यक्तः स्नेहस्त्वया त्वपत्यासक्तः ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर मन्दोदरी भयको लक्ष्य कर बोली कि हाय पिता ! तुमने भी उत्तम भोग छोड़कर यह क्या किया ? कहो तुमने अपनी सन्तानका स्नेह एक साथ कैसे छोड़ दिया ? ॥९०॥


जनको भर्त्ता पुत्रः स्त्रीणामेतावदेव रक्षानिमित्तम् । मुक्ता सर्वैरेभिः कं शरणं संश्रयामि पुण्यविहीना ॥९१॥

अर्थ: पिता, भर्ता और पुत्र इतने ही तो स्त्रियोंकी रक्षाके निमित्त हैं, सो मैं पापिनी इन सबके द्वारा छोड़ी गई हूँ, अब किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥९१॥


परिदेवनमिति करुणं भजमाना बाष्पदुर्दिनं जनयन्ती ।
शशिकान्तयाऽऽर्ययाऽसौ प्रतिबोधं वाग्भिरुत्तमाभिरानीता ॥९२॥

अर्थ: इस तरह जो करुण विलापको प्राप्त होती हुई आँसुओंकी अविरल वर्षा कर रही थी ऐसी मन्दोदरीको शशिकान्ता नामक आर्यिकाने उत्तम वचनोंके द्वारा प्रतिबोध प्राप्त कराया ॥९२॥


मूढे ! रोदिषि किं त्वनादिसमये संसारचक्रे त्वया तिर्यङ्मानुषभूरियोनिनिवहे सम्भूतिमायातया । नानाबन्धुवियोगविह्वलधिया भूयः कृतं रोदनम् किं दुःखं पुनरभ्युपैषि पदवीं स्वास्थ्यं भजस्वाधुना ॥९३॥

अर्थ: आर्यिकाने समझाया कि अरी मूर्खे ! व्यर्थ ही क्यों रो रही है ? इस अनादि कालीन संसारचक्रमें भ्रमण करतो हुई तू तिर्यञ्च और मनुष्योंकी नाना योनियोंमें उत्पन्न हुई है, वहाँ तूने नाना बन्धुजनोंके वियोगसे विह्वल बुद्धि हो अत्यधिक रुदन किया है । अब फिर क्यों दुःखको प्राप्त हो रही है आत्मपदमें लीन हो स्वस्थताको प्राप्त हो ॥९३॥


संसारप्रकृतिप्रबोधनपरैर्वाक्यैर्मनोहारिभि - स्तस्याः प्राप्य विबोधमुत्तमगुणा संवेगमुग्रं श्रिता । त्यक्ताशेषगृहस्थवेषरचना मन्दोदरी संयता जाताऽत्यन्तविशुद्धधर्मनिरता शुक्लैकवस्त्राऽऽवृता ॥९४॥

अर्थ: तदनन्तर जो संसार दशाका निरूपण करनेमें तत्पर शशिकान्ता आर्यिकाके मनोहारी वचनोंसे प्रबोधको प्राप्त हो उत्कृष्ट संवेगको प्राप्त हुई थी ऐसी उत्तम गुणोंकी धारक मन्दोदरी गृहस्थ सम्बन्धी समस्त वेष रचनाको छोड़ अत्यन्त विशुद्ध धर्ममें लीन होती हुई एक सफेद वस्त्रसे आवृत आर्यिका हो गई ॥९४॥


लब्ध्वा बोधिमनुत्तमां शशिनखाऽप्यार्यामिमामाश्रिता संशुद्धश्रमणा व्रतोरुविभवा जाता नितान्तोत्कटा । चत्वारिंशदथाष्टकं सुमनसां ज्ञेयं सहस्राणि हि स्त्रीणां संयममाश्रितानि परमं तुल्यानि भासां रवेः ॥९५॥

अर्थ: रावणकी बहिन चन्द्रनखा भी इन्हीं आर्याके पास उत्तम रत्नत्रयको पाकर व्रतरूपी विशाल-सम्पदाको धारण करने वाली उत्तम साध्वी हुई । गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिस दिन मन्दोदरी आदिने दीक्षा ली उस दिन उत्तम हृदयको धारण करने वालीं एवं सूर्यकी दीप्तिके समान देदीप्यमान अड़तालीस हजार स्त्रियोंने संयम धारण किया ॥९५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे इन्द्रजितादिनिष्क्रमणाभिधाने नामाष्टसप्ततिमं पर्व ॥७८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें इन्द्रजित् आदिकी दीक्षाका वर्णन करने वाला अठहत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७८॥


७९. एकोनाशीतितमं पर्व (सीतासमागमाभिधानं)

ततश्च पद्मनाभस्य लक्ष्मणस्य च पार्थिव । कर्त्तव्या सुमहाभूतिः कथा लङ्काप्रवेशने ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! अब राम और लक्ष्मण का महावैभवके साथ लङ्कामें प्रवेश हुआ, सो उसकी कथा करना चाहिए ॥१॥


महाविमानसङ्घातैर्घंटाभिश्च सुदन्तिनाम् । परमैरश्ववृन्दैश्च रथैश्च भवनोपमैः ॥२॥

निकुञ्जप्रतिस्वानबधिरीकृतदिङ्मुखैः । वादित्रनिःस्वनै रम्यैः शङ्खस्वनविमिश्रितैः ॥३॥

विद्याधरमहाचक्रसमेतौ परमद्युतौ । बलनारायणौ लङ्कां प्रविष्टाविन्द्रसन्निभौ ॥४॥

अर्थ: महाविमानोंके समूह, उत्तम हाथियोंके घण्टा, उत्कृष्ट घोड़ोंके समूह, मन्दिर तुल्य रथ, लतागृहोंमें गूंजने वाली प्रतिध्वनिसे जिनने दिशाएँ बहरी कर दी थीं तथा जो शङ्खके शब्दोंसे मिले थे ऐसे वादित्रोंके मनोहर शब्दोंसे तथा विद्याधरोंके महा चक्रसे सहित, उत्कृष्ट कान्तिके धारक, इन्द्र समान राम और लक्ष्मणने लङ्कामें प्रवेश किया ॥२-४॥


दृष्ट्वा तौ परमं हर्षं जनता समुपागता । मेने जन्मान्तरोपात्तधर्मस्य विपुलं फलम् ॥५॥

अर्थ: उन्हें देख जनता परम हर्षको प्राप्त हुई और जन्मान्तर में संचित धर्मका महा फल मानती हुई ॥५॥


तस्मिन् राजपथे प्राप्ते बलदेवे सचक्रिणि । व्यापाराः पौरलोकस्य प्रयाताः कापि पूर्वकाः ॥६॥

अर्थ: जब चक्रवर्ती-लक्ष्मणके साथ बलभद्र - श्री राम राज पथमें आये तब नगरवासी जनोंके पूर्व व्यापार मानों कहीं चले गये अर्थात् जे अन्य सब कार्य छोड़ इन्हें देखने लगे ॥६॥


विकचाक्षैर्मुखैः स्त्रीणां जालमार्गास्तिरोहिताः । सनीलोत्पलराजीवैरिव रेजुर्निरन्तरम् ॥७॥

अर्थ: जिनके नेत्र फूल रहे थे, ऐसे स्त्रियोंके मुखोंसे आच्छादित झरोखे निरन्तर इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो नीलकमल और लाल कमलोंसे ही युक्त हों ॥७॥


महाकौतुकयुक्तानामाकुलानां निरीक्षणे । तासां मुखेषु निश्चेरुरिति वाचो मनोहराः ॥८॥

अर्थ: जो राम-लक्ष्मणके देखनेमें आकुल हो महा कौतुकसे युक्त थीं ऐसी उन स्त्रियोंके मुखसे इस प्रकार के मनोहर वचन निकलने लगे ॥८॥


सखि पश्यैष रामोऽसौ राजा दशरथात्मजः । राजत्युत्तमया योऽयं रत्नराशिरिव श्रिया ॥९॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि सखि ! देख, ये दशरथके पुत्र राजा रामचन्द्र हैं जो अपनी उत्तम शोभासे रत्न राशिके समान सुशोभित हो रहे हैं ॥९॥


सम्पूर्णचन्द्रसङ्काशः पुण्डरीकायतेक्षणः । अपूर्वकर्मणां सर्गः कोऽपि स्तुत्यधिकाकृतिः ॥१०॥

अर्थ: जो पूर्ण चन्द्रमाके समान हैं, जिनके नेत्र पुण्डरीकके समान विशाल हैं तथा जिनकी आकृति स्तुतिसे अधिक है ऐसे ये राम मानों अपूर्व कर्मों की कोई अद्भुत सृष्टि ही हैं ॥१०॥


इमं या लभते कन्या धन्या रमणमुत्तमम् । कीर्तिस्तम्भस्तया लोके स्थापितोऽयं स्वरूपया ॥११॥

अर्थ: जो कन्या इस उत्तम पतिको प्राप्त होती है वही धन्या है तथा उसी सुन्दरीने लोकमें अपनी कीर्तिका स्तम्भ स्थापित किया है ॥११॥


परमश्चरितो धर्मश्चिरं जन्मान्तरे यया । ईदृशं लभते नाथं सा सुनारी कुतोऽपरा ॥१२॥

अर्थ: जिसने जन्मान्तरमें चिर काल तक परम धर्मका आचरण किया है वही ऐसे पतिको प्राप्त होती है । उस स्त्रीसे बढ़कर और दूसरी उत्तम स्त्री कौन होगी ? ॥१२॥


सहायतां निशास्वस्य या नारी प्रतिपद्यते । सैवैका योषितां मूर्ध्नि वर्त्तते परया तु किम् ॥१३॥

अर्थ: जो स्त्री रात्रिमें इसकी सहायताको प्राप्त होती है वही एक मानों स्त्रियोंके मस्तक पर विद्यमान है अन्य स्त्रीसे क्या प्रयोजन है ? ॥१३॥


स्वर्गतः प्रच्युता नूनं कल्याणी जनकात्मजा । इमं रमयति श्लाघ्यं पतिमिन्द्रं शचीव या ॥१४॥

अर्थ: कल्याणवती जानकी निश्चित ही स्वर्गसे च्युत हुई है जो इन्द्राणीके समान इस प्रशंसनीय पतिको रमण कराती है ॥१४॥


असुरेन्द्रसमो येन रावणो रणमस्तके । साधितो लक्ष्मणः सोऽयं चक्रपाणिर्विराजते ॥१५॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि जिसने रणके अग्रभागमें असुरेन्द्रके समान रावणको जीता है ऐसे ये चक्र हाथमें लिये लक्ष्मण सुशोभित हो रहे हैं ॥१५॥


भिन्नाञ्जनदलच्छाया कान्तिरस्य बलत्विषा । भिन्ना प्रयागतीर्थस्य धत्ते शोभां विसारिणीम् ॥१६॥

अर्थ: श्री रामकी धवल कान्तिसे मिली तथा मसले हुए अंजन कणकी समानता रखने वाली इनकी श्यामल कान्ति प्रयाग तीर्थकी विस्तृत शोभा धारण कर रही है ॥१६॥


चन्द्रोदरसुतः सोऽयं विराधितनरेश्वरः । नययोगेन येनेयं विपुला श्रीरवाप्यते ॥१७॥

अर्थ: कोई कह रही था कि यह चन्दोदरका पुत्र राजा विराधित है जिसने नीतिके संयोगसे यह विपुल लक्ष्मी प्राप्त की है ॥१७॥


असौ किष्किन्धराजोऽयं सुग्रीवः सत्त्वसङ्गतः । परमं रामदेवेन प्रेम यत्र नियोजितम् ॥१८॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि किष्किन्धका राजा बकशाली सुग्रीव है जिस पर श्री रामने अपना परम प्रेम स्थापित किया है ॥१८॥


अयं स जानकीभ्राता प्रभामण्डलमण्डितः । इन्दुना खेचरेन्द्रेण यो नीतः पदमीदृशम् ॥१९॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि यह जानकीका भाई भामण्डल है जो चन्द्रगति विद्याधरके द्वारा ऐसे पदको प्राप्त हुआ है ॥१९॥


वीरोऽङ्गदकुमारोऽयमसौ दुर्लडितः परम् । यस्तदा राक्षसेन्द्रस्य विघ्नं कर्त्तुं समुद्यतः ॥२०॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि यह अत्यन्त लड़ाया हुआ वीर अंगद कुमार है जो उस समय रावणके विघ्न करनेके लिए उद्यत हुआ था ॥२०॥


पश्य पश्येममुत्तुङ्गं स्यन्दनं सखि सुन्दरम् । वातेरितमहाध्मातघनाभा यत्र दन्तिनः ॥२१॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि हे सखि ! देख-देख इस ऊँचे सुन्दर रथको देख, जिसमें वायुसे कम्पित गरजते मेघके समान हाथी जुते हैं ॥२१॥


रणाङ्गणे विपक्षाणां यस्य वानरलक्ष्मगा । ध्वजयष्टिरलं भीष्मा श्रीशैलोऽयं स मारुतिः ॥२२॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि जिसकी वानर चिह्नित ध्वजा रणाङ्गणमें शत्रुओंके लिए अत्यन्त भय उपजाने वाली थी ऐसा यह पवनञ्जयका पुत्र श्री शैल-हनूमान है ॥२२॥


एवं वाग्भिर्विचित्राभिः पूज्यमाना महौजसः । राजमार्गं व्यगाहन्त पद्मनाभादयः सुखम् ॥२३॥

अर्थ: इस तरह नाना प्रकारके वचनोंसे जिनकी पूजा हो रही थी तथा जो उत्तम प्रतापसे युक्त थे ऐसे राम आदिने सुखसे राजमार्गमें प्रवेश किया ॥२३॥


अथान्तिकस्थितामुक्त्वा पद्मश्चामरधारिणीम् । पप्रच्छ सादरं प्रेमरसार्द्रहृदयः परम् ॥२४॥

या सा मद्विरहे दुःखं परिप्राप्ता सुदुःसहम् । भामण्डलस्वसा कासाविह देशेऽवतिष्ठते ॥२५॥

अर्थ: अथानन्तर प्रेम रूपी रससे जिनका हृदय आर्द्र हो रहा था ऐसे श्री रामने अपने समीप में स्थित चमर ढोलने वाली स्त्रीसे परम आदरके साथ पूछा कि जो हमारे विरहमें अत्यन्त दुःसह दुःखको प्राप्त हुई है ऐसी भामण्डलकी बहिन यहाँ किस स्थानमें विद्यमान है ? ॥२४-२५॥


ततोऽसौ रत्नवलयप्रभाजटिलबाहुका । करशाखां प्रसार्योचे स्वामितोषणतत्परा ॥२६॥

अट्टहासान्विमुञ्चन्तमिमं निर्झरवारिभिः । पुष्पप्रकीर्णनामानं राजन् पश्यति यं गिरिम् ॥२७॥

नन्दनप्रतिमेऽमुष्मिन्नुद्याने जनकात्मजा । कीर्त्तिशीलपरीवारा रमणी तव तिष्ठति ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर रत्नमयी चूड़ियोंकी प्रभासे जिसकी भुजाएँ व्याप्त थीं एवं जो स्वामीको संतुष्ट करनेमें तत्पर थी ऐसी चमर ग्राहिणी स्त्री अङ्गुली पसार कर बोली कि यह जो सामने नीभरनोंके जलसे अट्टहासको छोड़ते हुए पुष्प-प्रकीर्णक नामा पर्वत देख रहे हो इसीके नन्दन वनके समान उद्यान में कीर्ति और शील रूपी परिवारसे सहित आपकी प्रिया विद्यमान है ॥२६-२८॥


तस्या अपि समीपस्था सखी सुप्रियकारिणी । अङ्गुलीमूर्मिकारम्यां प्रसार्यैवमभाषत ॥२९॥

आतपत्रमिदं यस्य चन्द्रमण्डलसन्निभम् । चन्द्रादित्यप्रतीकाशे धत्ते यश्चैष कुण्डले ॥३०॥

शरन्निर्झरसंकाशो हारो यस्य विराजते । सोऽयं मनोहरो देवि महाभूतिर्नरोत्तमः ॥३१॥

परमं त्वद्वियोगेन सुवक्त्रे खेदमुद्वहन् । दिग्गजेन्द्र इवाऽऽयाति पद्मः पद्मनिरीक्षणे ॥३२॥

अर्थ: उधर सीताके समीपमें भी जो सुप्रिय कारिणी सखी थी वह अंगूठीसे सुशोभित अङ्गुली पसार कर इस प्रकार बोली कि जिनके ऊपर यह चन्द्रमण्डलके समान छत्र फिर रहा है, जो चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान कुण्डलोंको धारण कर रहे हैं तथा जिनके वक्षःस्थलमें शरदृऋतुके निर्झरके समान हार शोभा दे रहा है, हे कमल लोचने देवि ! वही ये महा वैभवके धारी नरोत्तम श्री राम तुम्हारे वियोगसे परम खेदको धारण करते हुए दिग्गजेन्द्रके समान आ रहे हैं ॥२९-३२॥


मुखारविन्दमालोक्य प्राणनाथस्य जानकी । चिरात्स्वप्नमिव प्राप्तं मेने भूयो विषादिनी ॥३३॥

अर्थ: अत्यधिक विषादसे युक्त सीताने चिरकाल बाद प्राणनाथका मुखकमल देख ऐसा माना, मानो स्वप्न ही प्राप्त हुआ हो ॥३३॥


उत्तीर्य द्विरदाधीशात्पद्मनाभः ससम्भ्रमः । प्रमोदमुद्वहन्सीतां ससार विकचेक्षणः ॥३४॥

अर्थ: जिनके नेत्र विकसित हो रहे थे ऐसे राम शीघ्र ही गजराजसे उतर कर हर्ष धारण करते हुए सीताके समीप चले ॥३४॥


घनवृन्दादिवोत्तीर्य चन्द्रवल्लाङ्गलायुधः । रोहिण्या इव वैदेह्यास्तुष्टिं चक्रे समाव्रजन् ॥३५॥

अर्थ: जिसप्रकार मेघमण्डल से उतर कर आता हुआ चन्द्रमा रोहिणीको संतोष उत्पन्न करता है उसी प्रकार हाथीसे उतर कर आते हुए श्री रामने सीताको संतोष उत्पन्न किया ॥३५॥


प्रत्यासन्नत्वमायातं ज्ञात्वा नाथं ससम्भ्रमा । मृगीवदाकुला सीता समुत्तस्थौ महाधृतिः ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर रामको निकट आया देख महा संतोषको धारण करने वाली सीता संभ्रमके साथ मृगीके समान आकुल होती हुई उठ कर खड़ी हो गई ॥३६॥


भूरेणुधूसरीभूतकेशीं मलिनदेहिकाम् । कालनिर्गलितच्छायबन्धूकसदृशाधराम् ॥३७॥


स्वभावेनैव तन्वङ्गीं विरहेण विशेषतः । तथापि किञ्चिदुच्छ्वासं दर्शनेन समागताम् ॥३८॥

आलिङ्गन्तीमिव स्निग्धैर्मयूखैः करजोद्गतैः । स्नपयन्तीमिवोद्वेलविलोचनमरीचिभिः ॥३९॥

लिम्पन्तीमिव लावण्यसम्पदा क्षणवृद्धया । वीजयन्तीमिवोच्छ्वासैर्हर्षनिर्भरनिर्गतैः ॥४०॥

पृथुलारोहवच्छ्रोणीं नेत्रविश्रामभूमिकाम् । पाणिपल्लवसौन्दर्यजितश्रीपाणिपङ्कजाम् ॥४१॥

सौभाग्यरत्नसम्भूतिधारिणीं धर्मरक्षिताम् । सम्पूर्णचन्द्रवदनां कलङ्कपरिवर्जिताम् ॥४२॥

सौदामिनीसदृच्छायामतिधीरत्वयोगिनीम् । मुखचन्द्रान्तरोद्भूतस्फीतनेत्रसरोरुहाम् ॥४३॥

कलुषत्वविनिर्मुक्तां समुन्नतपयोधराम् । चापयष्टिमनङ्गस्य वक्रतापरिवर्जिताम् ॥४४॥

आयान्तीमन्तिकं किञ्चिद्वैदेहीमापराजितः । विलोक्य निरुपाख्यानं भावं कमपि सङ्गतः ॥४५॥

अर्थ: अथानन्तर जिसके केश पृथिवीकी धूलिसे धूसरित थे, जिसका शरीर मलिन था, जिसके ओठ मुरझाये हुए बन्धूकके फूलके समान निष्प्रभ थे, जो स्वभावसे ही दुबली थी और उस समय विरहके कारण जो और भी अधिक दुबली हो गई थी, यद्यपि दुबली थी तथापि पतिके दर्शनसे जो कुछ-कुछ उल्लासको धारण कर रही थी, जो नखोंसे उत्पन्न हुई सचिक्कण किरणोंसे मानो आलिङ्गन कर रही थी, खिले हुए नेत्रोंकी किरणोंसे मानो अभिषेक कर रही थी, क्षण-क्षणमें बढ़ती हुई लावण्य रूप सम्पत्तिके द्वारा मानो लिप्त कर रही थी और हर्षके भारसे निकले हुए उच्छ्वासोंसे मानों पङ्खा ही चल रही थी, जिसके नितम्ब स्थूल थी, जो नेत्रोंके विश्राम करनेकी भूमि थी, जिसने कर-किसलयके सौन्दर्यसे लक्ष्मीके हस्त-कमलको जीत लिया था, जो सौभाग्यरूपी रत्न-संपदाको धारण कर रही थी, धर्मने ही जिसकी रक्षा की थी, जिसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान था, अत्यन्त धैर्यगुणसे सहित थी, जिसके मुखरूपी चन्द्रमाके भीतर विशाल नेत्ररूपी कमल उत्पन्न हुए थे, जो कलुषतासे रहित थी, जिसके स्तन अत्यन्त उन्नत थे, और जो कामदेवकी मानो कुटिलतासे रहित-सीधी धनुषयष्टि हो ऐसी सीताको कुछ समीप आती देख श्रीराम किसी अनिर्वचनीयभावको प्राप्त हुए ॥३८-४५॥


विनयेन समासाद्य रमणं रतिसुन्दरी । वाष्पाकुलेक्षणा तस्थौ पुरः सङ्गमनाकुला ॥४६॥

अर्थ: रतिके समान सुन्दरी सीता विनय पूर्वक पतिके समीप जाकर मिलनेकी इच्छासे आकुल होती हुई सामने खड़ी हो गई । उस समय उसके नेत्र हर्षके अश्रुओंसे व्याप्त हो रहे थे ॥४६॥


शचीव सङ्गता शक्रं रतिर्वा कुसुमायुधम् । निजधर्ममहिंसा नु सुभद्रा भरतेश्वरम् ॥४७॥

अर्थ: उस समय रामके समीप खड़ी सीता ऐसी जान पड़ती थी मानो इन्द्रके समीप इन्द्राणी ही आई हो, कामके समीप मानो रति ही आई हो, जिन धर्मके समीप मानो अहिंसा ही आई हो और भरत चक्रवर्तीके समीप मानो सुभद्रा ही आई हो ॥४७॥


चिरस्यालोक्य तां पद्मः सङ्गमं नूतनं विदन् । मनोरथशतैर्लब्धां फलभारप्रणामिभिः ॥४८॥

अर्थ: जो फलके भारसे नम्रीभूत हो रहे थे ऐसे सैकड़ों मनोरथोंसे प्राप्त सीताको चिरकाल-बाद देखकर रामने ऐसा समझा मानो नवीन समागम ही प्राप्त हुआ हो ॥४८॥


हृदयेन वहन् कम्पं चिरासङ्गस्वभावजम् । महाद्युतिधरः कान्तः सम्भ्रान्ततरलेक्षणः ॥४९॥

केयूरदष्टमूलाभ्यां भुजाभ्यां क्षणमात्रतः । सञ्जातपीवरत्वाभ्यामालिलिङ्ग रसाधिकम् ॥५०॥

अर्थ: अथानन्तर जो चिरकाल बाद होने वाले समागमके स्वभावसे उत्पन्न हुए कम्पनको हृदयमें धारण कर रहे थे, जो महा दीप्तिके धारक थे, सुन्दर थे और जिनके चञ्चल नेत्र घूम रहे थे ऐसे श्रीरामने अपनी उन भुजाओंसे रसनिमग्न हो सीताका आलिङ्गन किया, जिनके कि मूल भाग बाजूबन्दोंसे अलंकृत थे तथा क्षणमात्रमें ही जो स्थूल हो गई थीं ॥४९-५०॥


तामालिङ्गन्विलीनो नु मग्नो नु सुखसागरे । हृदयं सम्प्रविष्टो नु पुनर्विरहतो भयात् ॥५१॥

अर्थ: सीताका आलिङ्गन करते हुए राम क्या विलीन हो गये थे, या सुख रूपी सागरमें निमग्न हो गये थे या पुनः विरहके भयसे मानो हृदयमें प्रविष्ट हो गये थे ॥५१॥


प्रियकण्ठसमासक्तबाहुपाशा सुमानसा । कल्पपादपसंसक्तहेमवल्लीव सा बभौ ॥५२॥

अर्थ: पतिके गलेमें जिसके भुजपाश पड़े थे, ऐसी प्रसन्न चित्तकी धारक सीता उस समय कल्पवृक्षसे लिपटी सुवर्णलताके समान सुशोभित हो रही थी ॥५२॥


उद्भूतपुलकस्यास्य सङ्गमेनातिसौख्यतः । मिथुनस्योपमां प्राप्तं तदेव मिथुनं परम् ॥५३॥

अर्थ: समागमके कारण बहुत भारी सुखसे जिसे रोमाञ्च उठ आये थे ऐसे इस दम्पतीकी उपमा उस समय उसी दम्पतीको प्राप्त थी ॥५३॥


दृष्ट्वा सुविहितं सीतारामदेवसमागमम् । तमम्बरगता देवा मुमुचुः कुसुमाञ्जलिम् ॥५४॥

अर्थ: सीता और श्रीरामदेवका सुखसमागम देख आकाशमें स्थित देवोंने उनपर पुष्पाञ्जलियाँ छोड़ीं ॥५४॥


गन्धोदकं च संगुञ्जद् भ्रान्तभ्रमरभीरुकम् । विमुच्य मेघपृष्ठस्थाः ससृजुर्भारतीरिति ॥५५॥

अर्थ: मेघोंके ऊपर स्थित देवोंने, गुञ्जारके साथ घूमते हुए भ्रमरोंको भय देनेवाला गन्धोदक वर्षा कर निम्नलिखित वचन कहे ॥५५॥


अहो निरुपमं धैर्यं सीतायाः साधुचेतसः । अहो गाम्भीर्यमक्षोभमहो शीलमनोज्ञता ॥५६॥

अहो नु व्रतनैष्कम्प्यमहो सत्त्वं समुन्नतम् । मनसाऽपि यया नेष्टो रावणः शुद्धवृत्तया ॥५७॥

अर्थ: वे कहने लगे कि अहो ! पवित्र चित्तकी धारक सीताका धैर्य अनुपम है । अहो ! इसका गाम्भीर्य क्षोभ रहित है, अहो ! इसका शीलव्रत कितना मनोज्ञ है ? अहो ! इसकी व्रत सम्बन्धी दृढ़ता कैसी अद्भुत है ? अहो ! इसका धैर्य कितना उन्नत है कि शुद्ध आचारको धारण करने वाली इसने रावणको मनसे भी नहीं चाहा ॥५६-५७॥


सम्भ्रान्तो लक्ष्मणस्तावद् वैदेह्याश्चरणद्वयम् । अभिवाद्य पुरस्तस्थौ विनयानतविग्रहः ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर जो हड़बड़ाये हुए थे और विनयसे जिनका शरीर नम्रीभूत हो रहा था ऐसे लक्ष्मण सीताके चरण युगलको नमस्कार कर सामने खड़े हो गये ॥५८॥


पुरन्दरसमच्छायं दृष्ट्वा चक्रधरं तदा । अस्रान्वितेक्षणा साध्वी जानकी परिषस्वजे ॥५९॥

अर्थ: उस समय इन्द्रके समान कान्तिके धारक चक्रधरको देख साध्वी सीताके नेत्रोंमें वात्सल्यके अश्रु निकल आये और उसने बड़े स्नेहसे उनका आलिङ्गन किया ॥५९॥


उवाच च यथा भद्र गदितं श्रमणोत्तमैः । महाज्ञानधरैः प्राप्तं पदमुच्चैस्तथा त्वया ॥६०॥

अर्थ: साथ ही उसने कहा कि हे भद्र ! महाज्ञानके धारक मुनियोंने जैसा कहा था वैसा ही तुमने उच्च पद प्राप्त किया है ॥६०॥


स त्वं चक्राङ्कराज्यस्य भाजनत्वमुपागतः । न हि निर्ग्रन्थसम्भूतं वचनं जायतेऽन्यथा ॥६१॥

अर्थ: अब तुम चक्र चिह्नित राज्य - नारायण पदकी पात्रताको प्राप्त हुए हो । सच है कि निर्ग्रन्थ मुनियोंसे उत्पन्न वचन कभी अन्यथा नहीं होते ॥६१॥


एषोऽसौ बलदेवत्वं तव ज्येष्ठः समागतः । विरहानलमग्नाया येन मे जनिता कृपा ॥६२॥

अर्थ: यह तुम्हारे बड़े भाई बलदेव पदको प्राप्त हुए हैं जिन्होंने विरहाग्निमें डूबी हुई मेरे ऊपर बड़ी कृपा की है ॥६२॥


उडुनाथांशुविशदद्युतिस्तावदुपाययौ । स्वसुःसमीपधरणीं श्रीभामण्डलमण्डितः ॥६३॥

अर्थ: इतनेमें ही चन्द्रमाकी किरणोंके समान कान्तिको धारण करनेवाला भामण्डल बहिनकी समीपवर्ती भूमिमें आया ॥६३॥


दृष्ट्वा तं मुदितं सीता सौदर्यस्नेहनिर्भरा । रणप्रत्यागतं वीरं विनीतं परिषस्वजे ॥६४॥

अर्थ: प्रसन्नतासे भरे, रणसे लौटे उस विजयी वीरको देख, भाईके स्नेहसे युक्त सीताने उसका आलिङ्गन किया ॥६४॥


सुग्रीवो वायुतनयो नलो नीलोऽङ्गदस्तथा । विराधितोऽथ चन्द्राभः सुषेणो जाम्बवो बली ॥६५॥

जीमूतशल्यदेवाद्यास्तथा परमखेचराः । संश्राव्य निजनामानि मूर्ध्ना कृत्वाभिवादनम् ॥६६॥

अर्थ: सुग्रीव, हनूमान्, नल, नील, अङ्गद, विराधित, चन्द्राभ, सुषेण, बलवान् जाम्बव, जीमूत और शल्यदेव आदि उत्तमोत्तम विद्याधरोंने अपने-अपने नाम सुनाकर सीताको शिरसे अभिवादन किया ॥६५-६६॥


विलेपनानि चारूणि वस्त्राण्याभरणानि च । पारिजातादिजातानि माल्यानि सुरभीणि च ॥६७॥

सीताचरणराजीवयुगलान्तिकभूतले । अतिष्ठिपन् सुवर्णादिपात्रस्थानि प्रमोदिनः ॥६८॥

अर्थ: उन सबने हर्षसे युक्त हो सीताके चरणयुगलकी समीपवर्ती भूमिमें सुवर्णादिके पात्रमें स्थित सुन्दर विलेपन, वस्त्र, आभरण और पारिजात आदि वृक्षोंकी सुगन्धित मालाएँ भेट कीं ॥६७-६८॥


ऊचुश्च देवि त्वमुदारभावा सर्वत्र लोके प्रथितप्रभावा । श्रिया महत्या गुणसम्पदा च प्राप्ता पदं तुङ्गतमं मनोज्ञम् ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर सबने कहा कि हे देवि ! तुम उत्कृष्ट भावको धारण करने वाली हो, तुम्हारा प्रभाव समस्त लोकमें प्रसिद्ध है तथा तुम बहुत भारी लक्ष्मी और गुणरूप सम्पदाके द्वारा अत्यन्त श्रेष्ठ मनोहर पदको प्राप्त हुई हो ॥६९॥


देवस्तुताचारविभूतिधार्नी प्रीताऽधुना मङ्गलभूतदेहा । जीया जयश्रीर्बलदेवयुक्ता प्रभारवेर्यद्वदुदात्तलीला ॥७०॥

अर्थ: तुम देवोंके द्वारा स्तुत आचाररूपी विभूतिको धारण करनेवाली हो, प्रसन्न हो, तुम्हारा शरीर मङ्गल रूप है, तुम विजय लक्ष्मी स्वरूप हो, उत्कृष्ट लीलाकी धारक हो, ऐसी हे देवि ! तुम सूर्यकी प्रभाके समान बलदेवके साथ चिरकाल तक जयवन्त रहो ॥७०॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सीतासमागमाभिधानं नामैकोनाशीतितमं पर्व ॥७६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें सीताके समागमका वर्णन करने वाला उन्यासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥७६॥

८०. अशीतितमं पर्व (मयोपाख्यानं)

ततस्तां सङ्गमादित्यप्रबोधितमुखाम्बुजाम् । पाणावादाय हस्तेन समुत्तस्थौ हलायुधः ॥१॥

ऐरावतोपमं नागमारोप्य स्ववशानुगम् । आरोपयन् महातेजाः समग्रां कान्तिमुद्वहन् ॥२॥

चलद्घण्टाभिरामस्य नागमेघस्य पृष्ठतः । जानकीरोहिणीयुक्तः शुशुभे पद्मचन्द्रमाः ॥३॥

अर्थ: अथानन्तर समागमरूपी सूर्यसे जिसका मुखकमल खिल उठा था ऐसी सीताका हाथ अपने हाथसे पकड़ श्रीराम उठे और इच्छानुकूल चलनेवाले ऐरावतके समान हाथी पर बैठाकर स्वयं उसपर आरूढ़ हुए। महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण कान्तिको धारण करनेवाले श्रीराम हिलते हुए घंटोंसे मनोहर हाथीरूपी मेघपर सीतारूपी रोहिणीके साथ बैठे हुए चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१-३॥


समाहितमतिः प्रीतिं दधानोऽत्यर्थमुन्नताम् । पूर्यमाणो जनौघेन महद्धर्या परितो वृतः ॥४॥

महद्भिरनुयातेन खेचरैरनुरागिभिः । अन्वितश्चक्रहस्तेन लक्ष्मणेनोत्तमत्विषा ॥५॥

रावणस्य विमानाभं भवनं भुवनद्युतेः । पद्मनाभः परिप्राप्तः प्रविष्टश्च विचक्षणः ॥६॥

अर्थ: जिनकी बुद्धि स्थिर थी, जो अत्यधिक उन्नत प्रीतिको धारण कर रहे थे, बहुत भारी जनसमूह जिनके साथ था, जो चारों ओरसे बहुत बड़ी सम्पदासे घिरे थे, बड़े-बड़े अनुरागी विद्याधरोंसे अनुगत, उत्तम कान्तियुक्त चक्रपाणि लक्ष्मणसे जो सहित थे तथा अतिशय निपुण थे ऐसे श्रीराम, सूर्यके विमान समान जो रावणका भवन था उसमें जाकर प्रविष्ट हुए ॥४-६॥


अपश्यच्च गृहस्यास्य मध्ये परमसुन्दरम् । भवनं शान्तिनाथस्य युक्तविस्तारतुङ्गतम् ॥७॥

हेमस्तम्भसहस्रेण रचितं विकटद्युति । नानारत्नसमाकीर्णभित्तिभागं मनोरमम् ॥८॥

विदेहमध्यदेशस्थमन्दराकारशोभितम् । क्षीरोदफेनपटलच्छायं नयनबन्धनम् ॥९॥

क्वणत्किङ्किणिकाजालमहाध्वजविराजितम् । मनोज्ञरूपसङ्कीर्णमशक्यपरिवर्णनम् ॥१०॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने भवनके मध्यमें स्थित श्रीशान्तिनाथ भगवान्का परमसुन्दर मन्दिर देखा। वह मन्दिर योग्य विस्तार और ऊँचाईसे सहित था, स्वर्णके हजार खम्भोंसे निर्मित था, विशाल कान्तिका धारक था, उसकी दीवालोंके प्रदेश नानाप्रकारके रत्नोंसे युक्त थे, वह मनको आनन्द देनेवाला था, विदेह क्षेत्रके मध्यमें स्थित मेरुपर्वतके समान था, क्षीर समुद्रके फेनपटलके समान कान्तिवाला था, नेत्रोंको बाँधनेवाला था, रुणझुण करनेवाली किङ्किणियोंके समूह एवं बड़ी-बड़ी ध्वजाओंसे सुशोभित था, मनोज्ञरूपसे युक्त था तथा उसका वर्णन करना अशक्य था ॥७-१०॥


उत्तीर्य नागतो मत्तनागेन्द्रसमविक्रमः । प्रसन्ननयनः श्रीमान् तद्विवेश सहाङ्गनः ॥११॥

अर्थ: तदनन्तर, जो मत्तगजराजके समान पराक्रमी थे, निर्मल नेत्रोंके धारक थे तथा श्रेष्ठ लक्ष्मीसे सहित थे, ऐसे श्रीरामने हाथीसे उतरकर सीताके साथ उस मन्दिरमें प्रवेश किया ॥११॥


कायोत्सर्गविधानेन प्रलम्बितभुजद्वयः । प्रशान्तहृदयः कृत्वा सामायिकपरिग्रहम् ॥१२॥

बद्ध्वा करद्वयाम्भोजकुड्मलं सह सीतया । अघप्रमथनं पुण्यं रामः स्तोत्रमुदाहरत् ॥१३॥

अर्थ: तत्पश्चात् कायोत्सर्ग करनेके लिए जिन्होंने अपने दोनों हाथ नीचे लटका लिये थे और जिनका हृदय अत्यन्त शान्त था, ऐसे श्रीरामने सामायिककर सीताके साथ दोनों करकमलरूपी कुड्मलोंको जोड़कर श्रीशान्तिनाथ भगवान्का पापभञ्जक पुण्यवर्धक स्तोत्र पढ़ा ॥१२-१३॥


यस्यावतरणे शान्तिर्जाता सर्वत्र विष्टपे । प्रलयं सर्वरोगाणां कुर्वती द्युतिकारिणी ॥१४॥

अर्थ: स्तोत्र पाठ करते हुए उन्होंने कहा कि जिनके जन्म लेते ही संसारमें सर्वत्र ऐसी शान्ति छा गई कि जो सब रोगोंका नाश करनेवाली थी तथा दीप्तिको बढ़ानेवाली थी ॥१४॥


चलिताऽऽसनकैरिन्द्रैरागत्योत्तमभूतिभिः । यो मेरुशिखरे हृष्टैरभिषिक्तः सुभक्तिभिः ॥१५॥

अर्थ: जिनके आसन कम्पायमान हुए थे तथा जो उत्तम विभूतिसे युक्त थे ऐसे हर्षसे भरे भक्तिमन्त इन्द्रोंने आकर जिनका मेरुके शिखर पर अभिषेक किया था ॥१५॥


चक्रेणारिगणं जित्वा बाह्यं बाह्येन यो नृपः । आन्तरं ध्यानचक्रेण जिगाय मुनिपुङ्गवः ॥१६॥

अर्थ: जिन्होंने राज्यअवस्थामें बाह्यचक्रके द्वारा बाह्यशत्रुओंके समूहको जीता था और मुनि होने पर ध्यानरूपी चक्रके द्वारा अन्तरङ्ग शत्रु-समूहको जीता था ॥१६॥


मृत्युजन्मजराभीतिखड्गाद्यायुधचञ्चलम् । भवासुरं परिध्वस्य योऽगात्सिद्धिपुरं शिवम् ॥१७॥

अर्थ: जो जन्म, जरा, मृत्यु, भयरूपी खड्ग आदि शस्त्रोंसे चञ्चल संसाररूपी असुरको नष्ट कर कल्याणकारी सिद्धिपर मोक्षको प्राप्त हुए थे ॥१७॥


उपमारहितं नित्यं शुद्धमात्माश्रयं परम् । प्राप्तं निर्वाणसाम्राज्यं येनात्यन्तदुरासदम् ॥१८॥

तस्मै ते शान्तिनाथाय त्रिजगच्छान्तिहेतवे । नमस्त्रिधा महेशाय प्राप्तात्यन्तिकशान्तये ॥१९॥

अर्थ: जिन्होंने उपमा रहित, नित्य, शुद्ध, आत्माश्रय, उत्कृष्ट और अत्यन्त दुरासद निर्वाणका साम्राज्य प्राप्त किया था, जो तीनों लोकोंकी शान्तिके कारण थे, जो महा ऐश्वर्यसे सहित थे तथा जिन्होंने अनन्त शान्ति प्राप्त की थी ऐसे श्रीशान्तिनाथ भगवान्के लिए मन, वचन, कायसे नमस्कार हो ॥१८-१९॥


चराचरस्य सर्वस्य नाथ त्वमतिवत्सलः । शरण्यः परमस्त्राता समाधिद्युतिबोधिदः ॥२०॥

अर्थ: हे नाथ ! आप समस्त चराचर विश्वसे अत्यन्त स्नेह करनेवाले हैं, शरणदाता हैं, परम रक्षक हैं, समाधिरूप तेज तथा रत्नत्रयरूपी बोधिको देनेवाले हैं ॥२०॥


गुरुर्बन्धुः प्रणेता च त्वमेकः परमेश्वरः । चतुर्णिकायदेवानां सशक्राणां समर्चितः ॥२१॥

अर्थ: तुम्हीं एक गुरु हो, बन्धु हो, प्रणेता हो, परमेश्वर हो, इन्द्र सहित चारों निकायोंके देवोंसे पूजित हो ॥२१॥


त्वं कर्ता धर्मतीर्थस्य येन भव्यजनः सुखम् । प्राप्नोति परमं स्थानं सर्वदुःखविमोक्षदम् ॥२२॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप उस धर्मरूपी तीर्थके कर्ता हो जिससे भव्य जीव अनायास ही समस्त दुःखोंसे छुटकारा देनेवाला परम स्थान-मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ॥२२॥


नमस्ते देवदेवाय नमस्ते स्वस्तिकर्मणे । नमस्ते कृतकृत्याय लब्धलभ्याय ते नमः ॥२३॥

अर्थ: हे नाथ ! आप देवोंके देव हो इसलिये आपको नमस्कार हो, आप कल्याणरूप कार्यके करनेवाले हो इसलिये आपको नमस्कार हो, आप कृतकृत्य हैं अतः आपको नमस्कार हो और आप प्राप्त करने योग्य समस्त पदार्थोंको प्राप्त कर चुके हैं इसलिये आपको नमस्कार हो ॥२३॥


महाशान्तिस्वभावस्थं सर्वदोषविवर्जितम् । प्रसीद भगवन्नुच्चैः पदं नित्यं विदेहिनः ॥२४॥

अर्थ: हे भगवन् ! प्रसन्न हूजिये और हमलोगोंके लिये महाशान्तिरूप स्वभावमें स्थित, सर्वदोष रहित, उत्कृष्ट तथा नित्यपद-मोक्षपद प्रदान कीजिये ॥२४॥


एवमादि पठन् स्तोत्रं पद्मः पद्मायतेक्षणः । चैत्यं प्रदक्षिणं चक्रे दक्षिणः पुण्यकर्मणि ॥२५॥

अर्थ: इसप्रकार स्तोत्र पाठ पढ़ते हुए कमलायतलोचन तथा पुण्य कर्ममें दक्ष श्रीरामने शान्तिजिनेन्द्रकी तीन प्रदक्षिणाएँ दी ॥२५॥


प्रह्वाङ्गा पृष्ठतस्तस्य जानकी स्तुतितत्परा । समाहितकराम्भोजकुड्मला भाविनी स्थिता ॥२६॥

अर्थ: जिसका शरीर नम्र था, जो स्तुति पाठ करनेमें तत्पर थी तथा जिसने हस्तकमल जोड़ रक्खे थे ऐसी भाव भीनी सीता श्रीरामके पीछे खड़ी थी ॥२६॥


महादुन्दुभिनिर्घोषप्रतिमे रामनिस्वने । जानकीस्वनितं जज्ञे वीणानिःक्वणकोमलम् ॥२७॥

अर्थ: रामका स्वर महादुन्दुभिके स्वरके समान अत्यन्त परुष था तो सीताका स्वर वीणाके स्वरके समान अत्यन्त कोमल था ॥२७॥


सविशल्यस्ततश्चक्री सुग्रीवो रश्मिमण्डलः । तथा वायुसुताद्याश्च मङ्गलस्तोत्रतत्पराः ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर विशल्या सहित लक्ष्मण, सुग्रीव, भामण्डल तथा हनूमान् आदि सभी लोग मङ्गलमय स्तोत्र पढ़नेमें तत्पर थे ॥२८॥


बद्धपाणिपुटा धन्या भाविता जिनपुङ्गवे । गृहीतमुकुलाम्भोजा इव राजन्ति ते तदा ॥२९॥

अर्थ: जिन्होंने हाथ जोड़ रक्खे थे तथा जो जिनेन्द्र भगवान्में अपनी भावना लगाये हुए थे, ऐसे वे सब धन्यभाग विद्याधर उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो कमलकी बोंड़ियाँ ही धारण कर रहे हो ॥२९॥


विमुञ्चत्सु स्वनं तेषु मुरजस्वनसुन्दरम् । मेघध्वनिकृताशङ्का ननृतुश्छेकबर्हिणः ॥३०॥

अर्थ: जब वे मृदङ्ग ध्वनिके समान सुन्दर शब्द छोड़ रहे थे तब चतुर मयूर मेघगर्जनाकी शङ्का करते हुए नृत्य कर रहे थे ॥३०॥


कृत्वा स्तुतिं प्रणामं च भूयो भूयः सुचेतसः । यथासुखं समासीनाः प्राङ्गणे जिनवेश्मनः ॥३१॥

अर्थ: इसप्रकार बार-बार स्तुति तथा प्रणाम कर शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले वे सब जिन मन्दिरके चौकमें यथायोग्य सुखसे बैठ गये ॥३१॥


यावत्ते वन्दनां चक्रुस्तावद्राजा विभीषणः । सुमालिमाल्यवद्रत्नश्रवप्रभृतिबान्धवान् ॥३२॥

संसारानित्यताभावदेशनात्यन्तकोविदः । परिसान्त्वनमानिन्ये महादुःखनिपीडितान् ॥३३॥

अर्थ: जब तक इन सबने वन्दनाकी तब तक राजा विभीषणने सुमाली, माल्यवान् तथा रत्नश्रवा आदि परिवारके लोगोंको जो कि महादुःखसे पड़ित हो रहे थे सान्त्वना दी । विभीषण संसारकी अनित्यताका भाव बतलानेमें अत्यन्त निपुण था ॥३२-३३॥


आर्यौ तात स्वकर्मोत्थफलभोजिषु जन्तुषु । विधीयते मुधा शोकः क्रियतां स्वहिते मनः ॥३४॥

अर्थ: उसने सान्त्वना देते हुए कहा कि हे आर्यो ! हे तात ! संसारके प्राणी अपने-अपने कर्मोंके अनुसार फलको भोगते ही हैं अतः शोक करना व्यर्थ है आत्महितमें मन लगाइए ॥३४॥


दृष्टागमा महाचित्ता यूयमेवं विचक्षणाः । वित्थ जातो यदि प्राणी मृत्युं न प्रतिपद्यते ॥३५॥

अर्थ: आप लोग तो आगमके दृष्टा, विशाल हृदय और विज्ञपुरुष हैं अतः जानते हैं कि उत्पन्न हुआ प्राणी मृत्युको प्राप्त होता है या नहीं ॥३५॥


पुष्पसौन्दर्यसङ्काशं यौवनं दुर्व्यतिक्रमम् । पल्लवश्रीसमालक्ष्मीर्जीवितं विद्युदध्रुवम् ॥३६॥

अर्थ: जिसका वर्णन करना बड़ा कठिन है ऐसा यौवन फूलके सौन्दर्यके समान है, लक्ष्मी पल्लवकी शोभाके समान है, जीवन बिजलीके समान अनित्य है ॥३६॥


जलबुद्बुदसंयोगप्रतिमा बन्धुसङ्गमाः । सन्ध्यारागसमा भोगाः क्रियाः स्वप्नक्रियोपमाः ॥३७॥

अर्थ: बन्धु जनोंके समागम जलके बबूलेके समान हैं, भोग सन्ध्याकी लालीके तुल्य है, और क्रियाएँ स्वप्नकी क्रियाओंके समान हैं ॥३७॥


यदि नाम प्रपद्येरन् जन्तवो नैव पञ्चताम् । कथं स भवतां गोत्रमागतः स्याद्भवान्तरात् ॥३८॥

अर्थ: यदि ये प्राणी मृत्युको प्राप्त नहीं होते तो वह रावण भवान्तरसे आपके गोत्रमें कैसे आता ? ॥३८॥


आत्मनोऽपि यदा नाम नियमाद्विशरारुता । तदा कथमिवात्यर्थं क्रियते शोकमूढता ॥३९॥

अर्थ: अरे ! जब हम लोगोंको भी एक दिन नियमसे नष्ट हो जाना है तब यह शोक विषयक मूर्खता किस लिए की जाती है ? ॥३९॥


एवमेतदिति ध्यानं संसाराचारगोचरम् । सतां शोकविनाशाय पर्याप्तं क्षणमात्रकम् ॥४०॥

अर्थ: ‘यह ऐसा है’ अर्थात् नष्ट होना इसका स्वभाव ही है इस प्रकार संसारके स्वभावका ध्यान करना सत्पुरुषोंके शोकको क्षणमात्रमें नष्ट करनेके लिए पर्याप्त है । भावार्थ - जो ऐसा विचार करते हैं कि संसारके पदार्थ नश्वर ही हैं उनका शोक क्षण मात्रमें नष्ट हो जाता है ॥४०॥


भाषितान्यनुभूतानि दृष्टानि च सुबन्धुभिः । समं वृत्तानि साधूनां तापयन्ति मनः क्षणम् ॥४१॥

अर्थ: बन्धुजनोंके साथ कथित, अनुभूत और दृष्ट पदार्थ सत् पुरुषोंके मनको एक क्षण ही सन्ताप देते हैं अधिक नहीं ॥४१॥


भवत्येव हि शोकेन सङ्गो बन्धुवियोगिनः । बलादिव विशालेन स्मृतिविभ्रंशकारिणा ॥४२॥

तथाऽप्यनादिकेऽमुष्मिन्संसारे भ्रमतो मम । केन बान्धवतां प्राप्ता इति ज्ञात्वा सुगुह्यताम् ॥४३॥

अर्थ: जिसका बन्धु-जनोंके साथ वियोग होता है यद्यपि उसका स्मृतिको नष्ट करनेवाले विशाल शोकके साथ समागम मानो बल पूर्वक ही होता है तथापि इस अनादि संसारमें भ्रमण करते हुए मेरे कौन-कौन लोग बन्धु नहीं हुए हैं ऐसा विचार कर उस शोकको छिपाना चाहिए ॥४२-४३॥


यथा शक्त्या जिनेन्द्राणां भवध्वंसविधायिनाम् । विधाय शासने चित्तमात्मा स्वार्थे नियुज्यताम् ॥४४॥

अर्थ: इसलिए संसारको नष्ट करनेवाले श्री जिनेन्द्रदेवके शासनमें यथाशक्ति मन लगाकर आत्माको आत्माके हितमें लगाइए ॥४४॥


एवमादिभिरालापैर्मधुरैर्हृदयङ्गमैः । परिसान्त्व्य समाधाय बन्धून् कृत्ये गृहं गतः ॥४५॥

अर्थ: इत्यादि हृदयको लगने वाले मधुर वचनोंसे सबकों काममें लगाकर विभीषण अपने घर गया ॥४५॥


अग्रां देवीसहस्रस्य व्यवहारविचक्षणाम् । प्रजिघाय विदग्धाख्यां महिषीं हलिनोऽन्तिकम् ॥४६॥

अर्थ: घर आकर उसने एक हजार स्त्रियोंमें प्रधान तथा सब व्यवहारमें विचक्षण विदग्धा नामक रानीको श्री रामके समीप भेजा ॥४६॥


आगत्य साभिजातेन प्रणामेन कृतार्थताम् । ससीतौ भ्रातरौ वाक्यमिदं क्रमविदब्रवीत् ॥४७॥

अस्मत्स्वामिगृहं देव स्वगृहाशयलक्षितम् । कर्तुं पादतलासङ्गान्महानुग्रहमर्हसि ॥४८॥

अर्थ: तदनन्तर क्रमको जानने वाली विदग्धाने आकर प्रथम ही सीता सहित राम-लक्ष्मणको कुलके योग्य प्रणाम किया । तत्पश्चात् यह वचन कहे कि हे देव ! हमारे स्वामीके घरको अपना घर समझ चरण-तलके संसर्गसे पवित्र कीजिए ॥४७-४८॥


वर्तते सङ्कथा यावत्तेषां वार्तासमुद्भवा । स्वयं बिभीषणस्तावत्प्राप्तोऽत्यन्तमहादरः ॥४९॥

अर्थ: जब तक उन सबके बीचमें यह वार्ता हो रही थी तब तक महा आदरसे भरा विभीषण स्वयं आ पहुँचा ॥४९॥


उत्तिष्ठत गृहं यामः प्रसादः क्रियतामिति । तेनोक्तः सानुगः पद्मस्तद्गृहं गन्तुमुद्यतः ॥५०॥

अर्थ: आते ही उसने कहा कि उठिए, घर चलें प्रसन्नता कीजिए । इस प्रकार विभीषणके कहने पर राम, अपने अनुगामियोंके साथ उसके घर जानेके लिए उद्यत हो गये ॥५०॥


यानैर्नानाविधैस्तुङ्गैर्गजैरम्बुदसन्निभैः । तरङ्गचञ्चलैरश्वै रथैः प्रासादशोभिभिः ॥५१॥

विधाय कृतसंस्कारं राजमार्गं निरन्तरम् । विभीषणगृहं तेन प्रस्थितास्ते यथाक्रमम् ॥५२॥

अर्थ: राज मार्ग की अविरल सजावट की गई और उससे वे नाना प्रकारके वाहनों, मेघ समान ऊँचे हाथियों, लहरों के समान चञ्चल घोड़ों और महलोंके समान सुशोभित रथों पर यथाक्रमसे सवार हो विभीषणके घरकी ओर चले ॥५१-५२॥


प्रलयाम्बुदनिर्घोषास्तूर्यशब्दाः समुद्गताः । शङ्खकोटिरवोन्मिश्रा गह्वरप्रतिनादिनः ॥५३॥

अर्थ: प्रलय कालीन मेघोंकी गर्जनाके समान जिनका विशाल शब्द था जिनमें करोड़ों शङ्खोंका शब्द मिल रहा था तथा गुफाओंमें जिनकी प्रतिध्वनि पड़ रही थी ऐसे तुरहीके विशाल शब्द उत्पन्न हुए ॥५३॥


भम्भाभेरीमृदङ्गानां पटहानां सहस्रशः । लम्पाककाहलाधुन्धुदुन्दुभीनां च निःस्वनैः ॥५४॥

झल्लाम्लातकढक्कानां हैकानां च निरन्तरम् । गुञ्जाहुङ्कारसुन्दानां तथा पूरितमम्बरम् ॥५५॥

अर्थ: भंभा, भेरी, मृदङ्ग, हजारों पटह, लंपाक, काहला, धुन्धु, दुन्दुभि, झांझ, अम्लातक, ढक्का, हैका, गुंजा, हुंकार और सुन्द नामक वादित्रोंके शब्दसे आकाश भर गया ॥५४-५५॥


स्फीतैर्हलहलाशब्दैरट्टहासैश्च सन्ततैः । नानावाहननादैश्च दिगन्ता बधिरीकृताः ॥५६॥

अर्थ: अत्यन्त विस्तारको प्राप्त हुआ हल हला शब्द, बहुत भारी अट्टहास और नाना वाहनोंके शब्दोंसे दिशाएँ बहिरी हो गईं ॥५६॥


केचिच्छार्दूलपृष्ठस्थाः केचित् केसरिपृष्ठगाः । केचिद् रथादिभिर्वीराः प्रस्थिताः खेचरेश्वराः ॥५७॥

अर्थ: कितने ही विद्याधर व्याघ्रोंकी पीठ पर बैठ कर जा रहे थे, कितने ही सिंहोंकी पीठ पर सवार हो कर चल रहे थे और कितने ही रथ आदि वाहनोंसे प्रस्थान कर रहे थे ॥५७॥


नर्त्तकीनटभण्डाद्यैर्नृत्यद्भिरतिसुन्दरम् । वन्दिवृन्दैश्च ते जग्मुः स्तूयमाना महास्वनैः ॥५८॥

अर्थ: उनके आगे आगे नर्तकियाँ नट तथा भांड़ आदि सुन्दर नृत्य करते जाते थे तथा चारणोंके समूह बड़ी उच्च ध्वनिमें उनका विरद बखानते जा रहे थे ॥५८॥


अकाण्डकौमुदीसर्गमण्डितैश्छत्रमण्डलैः । नानायुधदलैश्चासन् भानुभासस्तिरोहिताः ॥५९॥

अर्थ: असमयमें प्रकट हुई चाँदनीके समान मनोहर छत्रोंके समूहसे तथा नाना शस्त्रोंके समूहसे सूर्यकी किरणें आच्छादित हो गईं थी ॥५९॥


दिव्यस्त्रीवदनाम्भोजखण्डनन्दनमुत्तमम् । कुर्वन्तस्ते परिप्राप्ता विभीषणनृपालयम् ॥६०॥

अर्थ: इस प्रकार सुन्दरी स्त्रियोंके मुख-कमलोंको विकसित करते हुए वे सब विभीषणके राजभवनमें पहुँचे ॥६०॥


विभूतिर्या तदा तेषां बभूव शुभलक्षणा । सा परं द्युनिवासानां विद्यते जनिताद्भुता ॥६१॥

अर्थ: उस समय राम लक्ष्मण आदिकी शुभ-लक्षणोंसे युक्त जो विभूति थी वह देवोंके लिए भी आश्चर्य उत्पन्न करने वाली थी ॥६१॥


अवतीर्याथ नागेन्द्राद् रत्नार्घादिपुरस्कृतौ । रम्यं विविशतुः सद्म ससीतौ रामलक्ष्मणौ ॥६२॥

अर्थ: अथानन्तर हाथीसे उतरकर, जिनका रत्नोंके अर्ध आदिसे सत्कार किया गया था ऐसे सीता सहित राम लक्ष्मणने विभीषणके सुन्दर भवनमें प्रवेश किया ॥६२॥


मध्ये महालयस्यास्य रत्नतोरणसङ्गतम् । पद्मप्रभजिनेन्द्रस्य भवनं हेमसन्निभम् ॥६३॥

प्रान्तावस्थितहर्म्यालीपरिवारमनोहरम् । शेषपर्वतमध्यस्थं मन्दरौपम्यमागतम् ॥६४॥

हेमस्तम्भसहस्रेण धृतमुत्तमभासुरम् । पूजितायामविस्तारं नानामणिगणार्चितम् ॥६५॥

बहुरूपधरैर्युक्तं चन्द्राभैर्वलभीपुटैः । गवाक्षप्रान्तसंसक्तैर्मुक्ताजालैर्विराजितम् ॥६६॥

अनेकाद्भुतसङ्कीर्णैर्युक्तैः प्रतिसरादिभिः । प्रदेशैर्विविधैः कान्तं पापप्रमथनं परम् ॥६७॥

अर्थ: विभीषणके विशाल भवनके मध्यमें श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्रका वह मन्दिर था जो रत्नमयी तोरणोंसे सहित था, स्वर्णके समान देदीप्यमान था, समीपमें स्थित महलोंके समूहसे मनोहर था, शेष नामक पर्वतके मध्यमें स्थित था, प्रेमकी उपमाको प्राप्त था, स्वर्णमयी हजार खम्भोंसे युक्त था, उत्तम देदीप्यमान था, योग्य लम्बाई और विस्तारसे सहित था, नाना मणियोंके समूहसे शोभित था, चन्द्रमाके समान चमकती हुई नाना प्रकारकी वलभियोंसे युक्त था, झरोखोंके समीप लटकती हुई मोतियोंकी जालीसे सुशोभित था, अनेक अद्भुत रचनाओंसे युक्त प्रतिसर आदि विविध प्रदेशोंसे सुन्दर था, और पापको नष्ट करने वाला था ॥६३-६७॥


एवंविधे गृहे तस्मिन् पद्मरागमयीं प्रभोः । पद्मप्रभजिनेन्द्रस्य प्रतिमां प्रतिमोज्झिताम् ॥६८॥

भासमम्भोजखण्डानां दिशन्तीं मणिभूमिषु । स्तुत्वा च परिवन्दित्वा यथाऽर्हं समवस्थिताः ॥६९॥

अर्थ: इस प्रकारके उस मन्दिरमें श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्र की पद्मराग मणि निर्मित वह अनुपम प्रतिमा विराजमान थी । जो अपनी प्रभासे मणिमय भूमिमें कमल-समूह की शोभा प्रकट कर रही थी । सबलोग उस प्रतिमाकी स्तुति-वन्दना कर यथा योग्य बैठ गये ॥६८-६९॥


यथायथं ततो याता खेचरेन्द्रा निरूपितम् । समाश्रयं बलं चित्ते बिभ्राणाश्चक्रिणां तथा ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर विद्याधर राजा, हृदयमें राम और लक्ष्मणको धारण करते हुए जहाँ जिसके लिए जो स्थान बनाया गया था वहाँ यथा योग्य रीतिसे चले गये ॥७०॥


अथ विद्याधरस्त्रीभिः पद्मलक्ष्मणयोः पृथक् । सीतायाश्च शरीरस्य क्रियायोगः प्रवर्त्तितः ॥७१॥

अर्थ: यथानन्तर विद्याधर स्त्रियोंने राम-लक्ष्मण और सीताके स्नानकी पृथक् पृथक् विधि प्रस्तुत की ॥७१॥


अक्ताः सुगन्धिभिः पथ्यैः स्नेहैः वर्णमनोहरैः । घ्राणदेहानुकूलैश्च शुभैरुद्वर्तनैः कृतः ॥७२॥

अर्थ: सर्व प्रथम उन्हें सुगन्धित हितकारी तथा मनोहर वर्ण वाले तेलका मर्दन किया गया, फिर घ्राण और शरीरके अनुकूल पदार्थोंका उपटन किया गिया ॥७२॥


स्थितानां स्नानपीठेषु प्राङ्मुखानां सुमङ्गलः । ऋद्ध्या स्नानविधिस्तेषां क्रमयुक्तः प्रवर्त्तितः ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर स्नानकी चौकीपर पूर्व दिशाकी ओर मुख कर बैठे हुए उनका बड़े वैभवसे क्रमपूर्वक मङ्गल मय स्नान कराया गया ॥७३॥


वपुःकषणपानीयविसर्जनलयान्वितम् । हारि प्रवृत्तमातोद्यं सर्वोपकरणाश्रितम् ॥७४॥

अर्थ: उस समय शरीरको घिसना पानी छोड़ना आदि की लयसे सहित मनको हरण करने वाले तथा सब प्रकारकी साज-सामग्रीसे युक्त बाजे बज रहे थे ॥७४॥


हैमैर्मारकतैर्वाज्रैः स्फाटिकैरिन्द्रनीलजैः । कुम्भैर्गन्धोदकापूर्णैः स्नानं तेषां समापितम् ॥७५॥

अर्थ: गन्धोदकसे परिपूर्ण सुवर्ण, मरकत मणि, हीरा, स्फटिक मणि तथा इन्द्रनीलमणि निर्मित कलशोंसे उनका अभिषेक पूर्ण हुआ ॥७५॥


पवित्रवस्त्रसंवीताः सुस्नाताः सदलंकृताः । प्रविश्य चैत्यभवनं पद्माभं ते ववन्दिरे ॥७६॥

अर्थ: तदनन्तर अच्छी तरह स्नान करनेके बाद उन्होंने पवित्र वस्त्र धारण किये, उत्तम अलंकारोंसे शरीर अलंकृत किया और तदनन्तर मन्दिरमें प्रवेश कर श्री पद्मप्रभ जिनेन्द्रकी वन्दना की ॥७६॥


तेषां प्रत्यवसानार्था कार्या विस्तारिणी कथा । घृताद्यैः पूरिता वाप्यः सद्भक्ष्यैः पर्वताः कृताः ॥७७॥

अर्थ: अथानन्तर उन सबके लिए जो भोजन तैयार किया गया था, उसकी कथा बहुत विस्तृत है । उस समय घी दूध दही आदिकी बावड़ियाँ भरी गई थीं और खाने योग्य उत्तमोत्तम पदार्थोंके मानो पर्वत बनाये गये थे अर्थात् पर्वतोंके समान बड़ी-बड़ी राशियाँ लगाई गई थीं ॥७७॥


वनेषु नन्दनाद्येषु वस्तुजातं यदुद्गतम् । मनोघ्राणेक्षणाभीष्टं तत्कृतं भोजनावनौ ॥७८॥

अर्थ: मन घ्राण और नेत्रोंके लिए अभीष्ट जो भी वस्तुएँ चन्दन आदि वनोंमें उत्पन्न हुई थीं वे लाकर भोजन-भूमिमें एकत्रित की गई थीं ॥७८॥


मृष्टमन्नं स्वभावेन जानक्या तु समन्ततः । कथं वर्णयितुं शक्यं पद्मनाभस्य चेतसः ॥७९॥

अर्थ: वह भोजन स्वभावसे ही मधुर था फिर जानकीके समीप रहते हुए तो कहना ही क्या था ? उस समय श्रीरामके मनकी जो दशा थी उसका वर्णन कैसे किया जा सकता है ! ॥७९॥


पञ्चानामर्थयुक्तत्वमिन्द्रियाणां तदैव हि । यदाभीष्टसमायोगे जायते कृतनिर्वृतिः ॥८०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! पाँचो इन्द्रियोंकी सार्थकता तभी है जब इष्ट पदार्थोंका संयोग होने पर उन्हें संतोष उत्पन्न होता है ॥८०॥


तदा भुक्तं तदा घ्रातं तदा स्पृष्टं तदेक्षितम् । तदा श्रुतं यदा जन्तोर्जायते प्रियसङ्गमः ॥८१॥

अर्थ: इस जन्तुने उसी समय भोजन किया है, उसी समय सूँघा है, उसी समय स्पर्श किया है, उसी समय देखा है और उसी समय सुना है जब कि उसे प्रियजनका समागम प्राप्त होता है । भावार्थ - प्रियजनके विरहमें भोजन आदि कार्य निःसार जान पड़ते हैं ॥८१॥


विषयः स्वर्गतुल्योऽपि विरहे नरकायते । स्वर्गायते महारण्यमपि प्रियसमागमे ॥८२॥

अर्थ: विरह कालमें स्वर्ग तुल्य भी देश नरकके समान जान पड़ता है और प्रियजनके समागम रहते हुए महावन भी स्वर्गके समान जान पड़ता है ॥८२॥


रसायनरसैः कान्तैरद्भुतैर्बहुवर्णकैः । भक्ष्यैश्च विविधैस्तेषां निवृत्ता भोजनक्रिया ॥८३॥

अर्थ: सुन्दर अद्भुत और बहुत प्रकारके रसायन सम्बन्धी रसों की तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंसे उन सब की भोजन-क्रिया पूर्ण हुई ॥८३॥


खेचरेन्द्रा यथायोग्यं कृतभूमिनिवेशनाः । भोजिता कृतसन्मानाः परिवारसमन्विताः ॥८४॥

अर्थ: जो यथा योग्य भूमि पर बैठाये गये थे, जिनका सम्मान किया गया था तथा जो अपने अपने परिवार इष्ट जनोंसे सहित थे ऐसे समस्त विद्याधर राजाओंको भोजन कराया गया ॥८४॥


चन्दनाद्यैः कृताः सर्वैर्गन्धैरावद्धषट्पदैः । भद्रशालाद्यरण्योत्थैः कुसुमैश्च विभूषिताः ॥८५॥

अर्थ: जिनपर भ्रमरोंने मण्डल बाँध रक्खे थे ऐसे चन्दन आदि सब प्रकारकी गन्धोंसे तथा भद्रशाल आदि वनोंमें उत्पन्न हुए पुष्पोंसे सब विभूषित किये गये ॥८५॥


स्पर्शानुकूललघुभिर्वस्त्रैर्युक्ता महाघनैः । नानारत्नप्रभाजालकरालितदिगाननाः ॥८६॥

सर्वे सम्भाविताः सर्वे फलयुक्तमनोरथाः । दिवा रात्रौ च चित्राभिः कथाभी रतिमागताः ॥८७॥

अर्थ: जो स्पर्शके अनुकूल, हल्के और अत्यन्त सघन बुने हुए वस्त्रोंसे युक्त थे तथा नाना प्रकारके रत्नोंकी किरणोंसे जिन्होंने दिशाओंको व्याप्त कर रक्खा था ऐसे उन सब लोगोंका सम्मान किया गया था, उनके सब मनोरथ सफल किये थे, और रात दिन नाना प्रकार की कथाओंसे सबको प्रसन्न किया गया था ॥८६-८७॥


अहो राक्षसवंशस्य भूषणोऽयं विभीषणः । अनुवृत्तिरियं येन कृतेदक्पद्मचक्रिणोः ॥८८॥

अर्थ: अहो ! यह विभीषण राक्षसवंशका आभूषण है, जिसने कि इस प्रकार राम-लक्ष्मणकी अनुवृत्ति की - उनके अनुकूल आचरण किया ॥८८॥


श्लाघ्यो महानुभावोऽयं जगत्युत्तुङ्गतां यतः । कृतार्थो भवने यस्य स्थितः पद्मः सलक्ष्मणः ॥८९॥

अर्थ: यह महानुभाव प्रशंसनीय है तथा जगत्में अत्यन्त उत्तम अवस्थाको प्राप्त हुआ है । जिसके घरमें कृतकृत्य हो राम-लक्ष्मणने निवास किया उसकी महिमाका क्या कहना है ? ॥८९॥


एवं विभीषणाधारगुणग्रहणतत्परः । विद्याधरजनस्तस्थौ सुखं मत्सरवर्जितः ॥९०॥

अर्थ: इस प्रकार विभीषणमें पाये जाने वाले गुणोंके ग्रहण करनेमें जो तत्पर थे तथा मात्सर्य भावसे रहित थे ऐसे सब विद्याधर भी विभीषणके घर सुखसे रहे ॥९०॥


पद्मलक्ष्मणवैदेहीविभीषणकथागतः । पौरलोकः समस्तोऽभूत् परित्यक्तान्यसङ्कथः ॥९१॥

अर्थ: उस समय नगरीके समस्त लोक राम, लक्ष्मण, सीता और विभीषणकी ही कथामें संलग्न रहते थे - अन्य सब कथाएँ उन्होंने छोड़ दी थीं ॥९१॥


सम्प्राप्तबलदेवत्वं पद्मं लाङ्गललक्षणम् । नारायणं च सम्प्राप्तचक्ररत्नं नरेश्वरम् ॥९२॥

अभिषेक्तुं समासक्ता विभीषणपुरःसराः । सर्वविद्याधराधीशा विनयेन ढुढौकिरे ॥९३॥

अर्थ: अथानन्तर विभीषण आदि समस्त विद्याधर राजा जिन्हें बलदेव पद प्राप्त हुआ था ऐसे हल लक्षणधारी राम और जिन्हें नारायण पद प्राप्त हुआ था ऐसे चक्ररत्नके धारी राजा लक्ष्मण का अभिषेक करनेके लिए उद्यत हो विनयपूर्वक आये ॥९२-९३॥


ऊचतुस्तौ गुरोः पूर्वमभिषेकमवाप्तवान् । प्रभुर्भरत एवाऽऽस्तेऽयोध्यायां वः स एव नौ ॥९४॥

अर्थ: तब राम लक्ष्मणने कहा कि पहले, पिता दशरथसे जिसे राज्याभिषेक प्राप्त हुआ है ऐसा राजा भरत अयोध्यामें विद्यमान है वही तुम्हारा और हम दोनोंका स्वामी है ॥९४॥


उक्तं तैरेवमेवैतत्तथाप्यभिषवेऽत्र कः । मङ्गले दृश्यते दोषो महापुरुषसेविते ॥९५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें विभीषणादिने कहा कि जैसा आप कह रहे हैं यद्यपि वैसा ही है तथापि महापुरुषोंके द्वारा सेवित इस मङ्गलमय अभिषेकमें क्या दोष दिखाई देता है ? अर्थात् कुछ नहीं ? ॥९५॥


क्रियमाणामसौ पूजां भवतोरनुमन्यते । श्रूयतेऽत्यन्तधीरोऽसौ मनसो नैति विक्रियाम् ॥९६॥

अर्थ: आप दोनोंके इस किये जाने वाले सत्कारको राजा भरत अवश्य ही स्वीकृत करेंगे क्योंकि वे अत्यन्त धीर-गम्भीर सुने जाते हैं । वे मनसे रञ्च मात्र भी विकारको प्राप्त नहीं होते ॥९६॥


वस्तुतो बलदेवत्वचक्रित्वप्राप्तिकारणात् । सम्प्रतिष्ठा तयोरासीत् पूजासम्भारसङ्गता ॥९७॥

अर्थ: यथार्थमें बलदेवत्व और चक्रवर्तित्व की प्राप्तिके कारण उनके अनेक प्रकारकी पूजासे युक्त प्रतिष्ठा हुई थी ॥९७॥


एवमत्युन्नतां लक्ष्मीं सम्प्राप्तौ रामलक्ष्मणौ । लङ्कायामूषतुः स्वर्गनगर्यां त्रिदशाविव ॥९८॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त उन्नत लक्ष्मीको प्राप्त हुए राम-लक्ष्मण लङ्कामें इस प्रकार रहे जिस प्रकार कि स्वर्गकी नगरीमें दो देव रहते हैं ॥९८॥


पुरे तत्रेन्द्रनगरप्रतिमे स्फीतभोगदे । नदीसरस्तटाद्येषु देशेष्वस्थुर्नभश्चराः ॥९९॥

अर्थ: इन्द्रके नगरके समान अत्यधिक भोगोंको देनेवाले उस नगरमें विद्याधर लोग, नदियों और तालाबों आदिके तटोंपर आनन्दसे बैठते थे ॥९९॥


दिव्यालङ्कारताम्बूलवस्त्रहारविलेपनाः । चिक्रीडुस्तत्र ते स्वेच्छं सस्त्रीकाः स्वर्गिणो यथा ॥१००॥

अर्थ: दिव्य अलंकार, पान, वस्त्र, हार और विलेपन आदिसे सहित वे सब विद्याधर अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उस लङ्कामें इच्छानुसार देवोंके समान क्रीड़ा करते थे ॥१००॥


दिनरत्नकरालीढसितपद्मान्तरद्युति । वैदेहीवदनं पश्यन् पद्मस्तृप्तिमियाय न ॥१०१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सीताका मुख सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त सफेद कमलके भीतरी भागके समान कान्तियुक्त था, उसे देखते हुए श्री राम तृप्तिको प्राप्त नहीं हो रहे थे ॥१०१॥


विरामरहितं रामस्तयात्यन्ताभिरामया । रामया सहितो रेमे रमणीयासु भूमिषु ॥१०२॥

अर्थ: उस अत्यन्त सुन्दरी स्त्रीके साथ राम, निरन्तर मनोहर भूमियोंमें क्रीड़ा करते थे ॥१०२॥


विशल्यासुन्दरीयुक्तस्तथा नारायणो रतिम् । जगाम चिन्तितप्राप्तसर्ववस्तुसमागमः ॥१०३॥

अर्थ: जिन्हें इच्छा करते ही सर्व वस्तुओंका समागम प्राप्त हो रहा था ऐसे राम लक्ष्मण विशल्या सुन्दरीके साथ अलग ही प्रीतिको प्राप्त हो रहे थे ॥१०३॥


यातास्मः श्व इति स्वान्तं कृत्वापि पुनरुत्तमाम् । सम्प्राप्य रतिमेतेषां गमनं स्मृतितश्च्युतम् ॥१०४॥

अर्थ: वे यद्यपि हम कल चले जावेंगे, ऐसा मनमें सङ्कल्प करते थे तथापि विभीषणादिका उत्तम प्रेम पाकर ‘जाना’ इनकी स्मृतिसे छूट जाता था ॥१०४॥


तयोर्बहूनि वर्षाणि रतिभोगोपयुक्तयोः । गतान्येकदिनौपम्यं भजमानानि सौख्यतः ॥१०५॥

अर्थ: इस प्रकार रति और भोगोपभोगकी सामग्रीसे युक्त राम लक्ष्मणके सुखसे भोगे जाने वाले अनेक वर्ष एक दिनके समान व्यतीत हो गये ॥१०५॥


कदाचिदथ संस्मृत्य लक्ष्मणश्चारुलक्षणः । पुराणि कूबरादीनि प्रजिघाय विराधितम् ॥१०६॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन सुन्दर लक्षणोंके धारक लक्ष्मणने स्मरण कर विराधितको कूबरादि नगर भेजा ॥१०६॥


साभिज्ञानानसौ लेखानुपादाय महर्द्धिकः । कन्याभ्योऽदर्शयद् गत्वा क्रमेण विधिकोविदः ॥१०७॥

अर्थ: सो महाविभूतिके धारक, एवं सब प्रकारकी विधि मिलानेमें निपुण विराधितने क्रम-क्रमसे जाकर कन्याओंके लिए परिचायक चिह्नोंके साथ लक्ष्मणके पत्र दिखाये ॥१०७॥


संवादजनितानन्दाः पितृभ्यामनुमोदिताः । आजग्मुरनुरूपेण परिवारेण सङ्गताः ॥१०८॥

अर्थ: तदनन्तर शुभ-समाचारसे जिन्हें हर्ष उत्पन्न हुआ था और माता-पिताने जिन्हें अनुमति दे रक्खी थी ऐसी वे कन्याएँ अनुकूल परिवारके साथ वहाँ आईं ॥१०८॥


दशाङ्गभोगनगरस्वामिनः कुलिशश्रुतेः । प्राप्ता रूपवती नाम कन्या रूपवती परा ॥१०९॥

अर्थ: कहाँ-कहाँसे कौन-कौन कन्याएँ आईं थीं इसका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है । दशपुर नगरके स्वामी राजा वज्रकर्णकी रूपवती नामकी अत्यन्त सुन्दरी कन्या आई थी ॥१०९॥


कूबरस्थाननाथस्य वालिखिल्यस्य देहजा । सर्वकल्याणमालाख्या प्राप्ता परमसुन्दरी ॥११०॥

अर्थ: कूबर स्थान नगरके राजा वालिखिलपकी सर्वकल्याणमाला नामकी सुन्दरी पुत्री आई ॥११०॥


पृथिवीपुरनाथस्य पृथिवीधरभूभृतः । प्रथिता वनमालेति दुहिता समुपागता ॥१११॥

अर्थ: पृथिवीपुर नगरके राजा पृथिवीधरकी प्रसिद्ध पुत्री वनमाला आई ॥१११॥


क्षेमाञ्जलिपुरेशस्य जितशत्रोर्महीक्षितः । जितपद्मेति विख्याता तनया समुपागमत् ॥११२॥

अर्थ: क्षेमाञ्जलिपुरके राजा जितशत्रुकी प्रसिद्ध पुत्री जितपद्मा आई ॥११२॥


उज्जयिन्यादितोऽप्येता नगराद् राजकन्यकाः । जन्मान्तरकृतात् पुण्यात् परमात्पतिमीदृशम् ॥११३॥

अर्थ: इनके सिवाय उज्जयिनी आदि नगरोंसे आई हुईं राजकन्याओंने जन्मान्तरमें किये हुए परम पुण्यसे ऐसा पति प्राप्त किया ॥११३॥


दमदानदयायुक्तं शीलाढ्यं गुरुसाक्षिकम् । नह्युत्तमं तपोऽकृत्वा प्राप्यते पतिरीदृशः ॥११४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! दम, दान और दयासे युक्त, शीलसे सहित एवं गुरुकी साक्षी पूर्वक लिये हुए उत्तम तपके किये बिना ऐसा पति नहीं प्राप्त हो सकता ॥११४॥


नूनं नास्तमिते भानौ भुक्तं साध्वी न दूषिता । विमानिता न दिग्वस्त्रा जातोऽयं पतिरीदृशः ॥११५॥

अर्थ: सूर्यास्त होने पर जिसने भोजन नहीं किया है, जिसने कभी आर्यिकाको दोष नहीं लगाया है और दिगम्बर मुनि जिसके द्वारा अपमानित नहीं हुए, उसी स्त्रीका ऐसा पति होता है ॥११५॥


योग्यो नारायणस्तासां योग्या नारायणस्य ताः । अन्योऽन्यं तेन ताभिश्च गृहीतं सुरतामृतम् ॥११६॥

अर्थ: नारायण उन सबके योग्य थे और वे सब नारायणके योग्य थीं, इसीलिए नारायण और उन स्त्रियोंने परस्पर संभोग रूपी अमृत ग्रहण किया था ॥११६॥


न सा सम्पन्नसा शोभा न सा लीला न सा कला । तस्य तासां च या नाऽऽसीत् तत्र श्रेणिक का कथा ॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! न तो वह सम्पत्ति थी, न वह शोभा थी, न वह लीला थी और न वह कला थी जो लक्ष्मण और उनकी उन स्त्रियोंमें न पाई जाती फिर औरकी क्या कथा की जाय ? ॥११७॥


कथं पद्मं कथं चन्द्रः कथं लक्ष्मीः कथं रतिः । भण्यतां सुन्दरत्वेन श्रुत्वा तं किल तास्तथा ॥११८॥

अर्थ: सौन्दर्यकी अपेक्षा उनके मुखको देख कर कहा जाय कि कमल क्या है ? चन्द्रमा क्या है ? और उन स्त्रियोंको देख कर कहा जाय कि लक्ष्मी क्या है? और रति क्या है ? ॥११८॥


रामलक्ष्मणयोर्दृष्ट्वा सम्पदं तां तथाविधाम् । विद्याधरजनौघानां विस्मयः परमोऽभवत् ॥११९॥

अर्थ: राम-लक्ष्मणकी उस-उस प्रकारकी संपदाको देख कर विद्याधरजनोंको बड़ा आश्चर्य हो रहा था ॥११९॥


चन्द्रवर्द्धनजातानामपि सङ्गमनी कथा । कर्तव्या सुमहानन्दा विवाहस्य च सूचनी ॥१२०॥

अर्थ: यहाँ चन्द्रवर्धनकी पुत्रियोंका समागम कराने तथा उनके विवाहकी आनन्दमयी सूचना देने वाली कथाका निरूपण करना भी उचित जान पड़ता है ॥१२०॥


पद्मनाभस्य कन्यानां सर्वासां सङ्गमस्तथा । स विवाहोऽभवत्सर्वलोकानन्दकरः परः ॥१२१॥

अर्थ: उस समय श्री राम तथा चन्द्रवर्धनकी समस्त कन्याओंका समागम कराने वाला वह विवाहोत्सव हुआ जो समस्त लोगोंको परम आनन्दका करने वाला था ॥१२१॥


यथेप्सितमहाभोगसम्बन्धसुखभागिनौ । ताविन्द्राविव लङ्कायां रेमाते प्रमदान्वितौ ॥१२२॥

अर्थ: इच्छानुसार महाभोगोंके सम्बन्धसे सुखको प्राप्त होने वाले वे राम लक्ष्मण, अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ लङ्कामें इन्द्र-प्रतीन्द्रके समान क्रीड़ा करते थे ॥१२२॥


वैदेहीदेहविन्यस्तसमस्तेन्द्रियसम्पदः । वर्षाणि षडतीतानि लङ्कायां सीरलक्ष्मणः ॥१२३॥

अर्थ: जिनकी समस्त इन्द्रियोंकी सम्पदा सीताके शरीरके अधीन थी, ऐसे श्री रामको लङ्कामें रहते हुए छह वर्ष व्यतीत हो गये ॥१२३॥


सुखार्णवे निमग्नस्य चारुचेष्टाविधायिनः । काकुत्स्थस्य तदा सर्वमन्यत्स्मृतिपथाच्च्युतम् ॥१२४॥

अर्थ: उस समय उत्तम चेष्टाओंके धारक रामचन्द्र, सुखके सागरमें ऐसे निमग्न हुए कि अन्य सब कुछ उनकी स्मृतिके मार्गसे च्युत हो गया ॥१२४॥


एवं तावदिदं वृत्तं कथान्तरमिदं पुनः । पापक्षयकरं भूप शृणु तत्परमानसः ॥१२५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस प्रकारकी यह कथा तो रहने दो अब एकाग्र चित्त हो पापका क्षय करने वाली दूसरी कथा सुनो ॥१२५॥


असाविन्द्रजितो योगी भगवान् सर्वपापहा । विद्यालब्धिसुसम्पन्नो विजहार महीतलम् ॥१२६॥

अर्थ: अथानन्तर समस्त पापोंको नष्ट करने वाले भगवान् इन्द्र जित् मुनिराज, अनेक ऋद्धियोंकी प्राप्तिसे युक्त हो पृथिवीतल पर विहार करने लगे ॥१२६॥


वैराग्यानिलयुक्तेन सम्यक्त्वारणिजन्मना । कर्मकक्षं महाघोरमदहद्ध्यानवह्निना ॥१२७॥

अर्थ: उन्होंने वैराग्य रूपी पवनसे युक्त तथा सम्यग्दर्शन रूपी वाससे उत्पन्न ध्यान रूपी अग्निके द्वारा कर्म रूपी भयंकर बनको भस्म कर दिया था ॥१२७॥


मेघवाहोऽनगारोऽपि विषयेन्धनपावकः । केवलज्ञानतः प्राप्तः स्वभावं जीवगोचरम् ॥१२८॥

अर्थ: विषय रूपी ईन्धनको जलानेके लिए अग्निके समान जो मेघ वाहन मुनिराज थे वे केवलज्ञान प्राप्त कर आत्म स्वभावको प्राप्त हुए ॥१२८॥


तयोरनन्तरं सम्यग्दर्शनज्ञानचेष्टितः । शुक्ललेश्याविशुद्धात्मा कलशश्रवणो मुनिः ॥१२९॥

पश्यंल्लोकमलोकं च केवलेन तथाविधम् । विरजस्कः परिप्राप्तः परमं पदमच्युतम् ॥१३०॥

अर्थ: उन दोनोंके बाद सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चरित्रको धारण करने वाले कुम्भकर्ण मुनिराज भी शुक्ल लेश्याके प्रभावसे अत्यन्त विशुद्धात्मा हो केवलज्ञानके द्वारा लोक और अलोकको ज्योंका त्यों देखते हुए कर्मधूलिको दूर कर अविनाशी परम पदको प्राप्त हुए ॥१२९-१३०॥


सुरासुरजनाधीशैरुद्गीतोत्तमकीर्त्तयः । शुद्धशीलधरा दीप्ताः प्रणताश्च महर्षयः ॥१३१॥

गोष्पदीकृतनिःशेषगहनज्ञेयतेजसः । संसारक्लेशदुर्मोचजालबन्धननिर्गताः ॥१३२॥

अपुनःपतनस्थानसम्प्राप्तिस्वार्थसङ्गताः । उपमानविनिर्मुक्तनिष्प्रत्यूहसुखात्मकाः ॥१३३॥

एतेऽन्ये च महात्मानः सिद्धा निर्धूतशत्रवः । दिशन्तु बोधिमारोग्यं श्रोतणां जिनशासने ॥१३४॥

अर्थ: इनके सिवाय सुरेन्द्र, असुरेन्द्र तथा चक्रवर्ती जिनकी उत्तम कीर्तिका गान करते थे, जो शुद्ध शीलके धारक थे, देदीप्यमान थे, गर्व रहित थे, जो समस्त पदार्थ रूपी सघन ज्ञेयको गोष्पदके समान तुच्छ करने वाले तेजसे सहित थे, जो संसारके क्लेश रूपी कठिन बन्धनके जालसे निकल चुके थे, जहाँसे पुनः लौटकर नहीं आना पड़ता ऐसे मोक्ष स्थानकी प्राप्ति रूपी स्वार्थसे जो सहित थे, अनुपम तथा निर्विघ्न सुख ही जिनका स्वरूप था, जिनकी आत्मा महान् थी, जो सिद्ध थे तथा शत्रुओंको नष्ट करने वाले थे, ऐसे ये तथा अन्य जो महर्षि थे वे जिनशासनके श्रोता मनुष्योंके लिए रत्नत्रय रूपी आरोग्य प्रदान करें ॥१३१-१३४॥


यशसा परिवीतान्यद्यत्वेऽपि परमात्मनाम् । स्थानानि तानि दृश्यन्ते दृश्यन्ते साधवो न ते ॥१३५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उनपर महात्माओंका प्रभाव तो देखो कि आज भी उन परमात्माओंके यशसे व्याप्त वे दिखाई देते हैं पर वे साधु नहीं दिखाई देते ॥१३५॥


विन्ध्यारण्यमहास्थल्यां सार्द्धमिन्द्रजिता यतः । मेघनादः स्थितस्तेन तीर्थं मेघरवं स्मृतम् ॥१३६॥

अर्थ: विन्ध्यवन की महाभूमिमें जहाँ इन्द्रजित्के साथ मेघवाहन मुनिराज विराजमान रहे वहाँ आज मेघरव नामका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ है ॥१३६॥


तूर्णीगतिमहाशैले नानाद्रुमलताकुले । नानापक्षिगणाकीर्णे नानाश्वापदसेविते ॥१३७॥

परिप्राप्तोऽहमिन्द्रत्वं जम्बुमाली महाबलः । अहिंसादिगुणाढ्यस्य किमु धर्मस्य दुष्करम् ॥१३८॥

अर्थ: अनेक वृक्षों और लताओंसे व्याप्त, नानापक्षियोंके समूहसे युक्त एवं नाना जानवरोंसे सेवित तूणीगति नामक महाशैल पर महा बलवान् जम्बुमाली नामक मुनि अहमिन्द्र अवस्थाको, प्राप्त हुआ सो ठीक ही है क्योंकि अहिंसादि गुणोंसे युक्त धर्मके लिए क्या कठिन है ? ॥१३७-१३८॥


ऐरावतेऽवतीर्यासौ महाव्रतविभूषणः । कैवल्यतेजसा युक्तः सिद्धस्थानं गमिष्यति ॥१३९॥

अर्थ: यह जम्बुमालीका जीव ऐरावत क्षेत्रमें अवतार ले महाव्रत रूपी विभूषणसे अलंकृत तथा केवल ज्ञान रूपी तेजसे युक्त हो मुक्ति स्थानको प्राप्त होगा ॥१३९॥


अरजा निस्तमो योगी कुम्भकर्णो महामुनिः । निर्वृत्तो नर्मदातीरे तत्तीर्थं पिठरक्षतम् ॥१४०॥

अर्थ: रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित महामुनि कुम्भकर्ण योगी नर्मदाके जिस तीर पर निर्वाणको प्राप्त हुए थे वहाँ पिठरक्षत नामका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ ॥१४०॥


नभोविचारिणीं पूर्वं लब्धिं प्राप्य महाद्युतिः । मयो विहरणं चक्रे स्वेच्छं निर्वाणभूमिषु ॥१४१॥

अर्थ: महा दीप्तिके धारक मय मुनिने आकाश-गामिनी ऋद्धि पाकर इच्छानुसार निर्वाण-भूमियोंमें विहार किया ॥१४१॥


प्रदेशानृषभादीनां देवागमनसेवितान् । महाद्युतिपरोऽपश्यद्रत्नत्रितयमण्डनः ॥१४२॥

अर्थ: रत्नत्रय रूपी मण्डनको धारण करने वाले तथा महान् धैर्यके धारक उन मय मुनिने देवागमनसे सेवित ऋषभादि तीर्थंकरोंके कल्याणक प्रदेशोंके दर्शन किये ॥१४२॥


मारीचः कल्पवासित्वं प्राप्याऽन्ये च महर्षयः । सत्त्वं यथाविधं यस्य फलं तस्य तथाविधम् ॥१४३॥

अर्थ: मारीच मुनि कल्पवासी देव हुए तथा अन्य महर्षियोंने जिसका जैसा तपोबल था उसने वैसा ही फल प्राप्त किया ॥१४३॥


वैदेह्याः पश्य माहात्म्यं दृढव्रतसमुद्भवम् । यथा सम्पालितं शीलं द्विषन्तश्च विवर्जिताः ॥१४४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! शीलव्रतकी दृढ़तासे उत्पन्न सीताका माहात्म्य तो देखो कि उसने शीलव्रतका पालन किया तथा शत्रुओंको नष्ट कर दिखाया ॥१४४॥


सीताया अतुलं धैर्यं रूपं सुभगता मतिः । कल्याणगुणपूर्णायाः स्नेहबन्धश्च भर्तरि ॥१४५॥

अर्थ: कल्याणकारी गुणोंसे परिपूर्ण सीताका धैर्य, रूप, सौभाग्य, बुद्धि और पति विषयक स्नेहका बन्धन - सभी अनुपम था ॥१४५॥


शीलतः स्वर्गगामिन्या स्वभर्तृपरितुष्टया । चरितं रामदेवस्य सीतया साधु भूषितम् ॥१४६॥

अर्थ: जो शीलव्रतके प्रभावसे स्वर्गगामिनी थी तथा अपने पतिमें ही सन्तुष्ट रहती थी ऐसी सीताने श्रीराम देवके चरितको अच्छी तरह अलंकृत किया था ॥१४६॥


एकेन व्रतरत्नेन पुरुषान्तरवर्जिना । स्वर्गारोहणसामर्थ्यं योषितामपि विद्यते ॥१४७॥

अर्थ: पर-पुरुषका त्याग करने वाले एक व्रत रूपी रत्नके द्वारा स्त्रियोंमें भी स्वर्ग प्राप्त करनेकी सामर्थ्य विद्यमान है ॥१४७॥


मयोऽपि मायया तीव्रः कृत्वा प्राणिवधान् बहून् । प्रपद्य वीतरागत्वं पापलब्धीः सुसंयतः ॥१४८॥

अर्थ: जिस विकट मायावी मयने पहले अनेक जीवोंका वध किया था, अब उसने भी वीत राग भावको धारण कर उत्तम मुनि हो अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त की थीं ॥१४८॥


उवाच श्रेणिको नाथ ! श्रुतमिन्द्रजितादिजम् । माहात्म्यमधुना श्रोतुं वाञ्छामि मयसम्भवम् ॥१४९॥

अर्थ: तदनन्तर राजा श्रेणिकने कहा कि हे नाथ ! मैंने इन्द्रजित् आदिका माहात्म्य तो सुन लिया है अब मयका माहाम्य सुनना चाहता हूँ ॥१४९॥


सन्त्यन्याः शीलवत्यश्च नृणां वसुमतीतले । स्वभर्तृनिरतात्मानस्ता नु किं स्वर्गभाविताः ॥१५०॥

अर्थ: हे भगवन् ! इस पृथिवी तल पर मनुष्योंकी और भी शीलवती ऐसी स्त्रियाँ हुई हैं जो कि अपने पतिमें ही लीन रही हैं सो क्या वे सब भी स्वर्गको प्राप्त हुई हैं ? ॥१५०॥


गण्यूचे यदि सीताया निश्चयेन व्रतेन च । तुल्याः पतिव्रताः स्वर्गं व्रजन्त्येव गुणान्विताः ॥१५१॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गणधर बोले कि यदि वे निश्चय और व्रतकी अपेक्षा सीताके समान हैं, पातिव्रत्य धर्मसे सहित एवं अनेक गुणोंसे युक्त हैं तो नियमसे स्वर्गको ही जाती हैं ॥१५१॥


सुकृतासुकृतास्वादनिस्पन्दीकृतवृत्तयः । शीलवत्यः समा राजन् ननु सर्वा विचेष्टितैः ॥१५२॥

अर्थ: हे राजन् ! पुण्य, पापका फल भोगनेमें जिनकी आत्मा निश्चल है अर्थात् जो समता भावसे पूर्वकृत पुण्य, पापका फल भोगती हैं ऐसी सभी शीलवती स्त्रियाँ अपनी चेष्टाओंसे समान ही होती हैं ॥१५२॥


वीरुदश्वेभलोहानामुपलद्रुमवाससाम् । योषितां पुरुषाणां च विशेषोऽस्ति महान् नृप ॥१५३॥

अर्थ: वैसे हे राजन् ! लता, घोड़ा, हाथी, लोहा, पाषाण, वृक्ष, वस्त्र, स्त्री और पुरुष इनमें परस्पर बड़ा अन्तर होता है ॥१५३॥


न हि चित्रभृतं वल्ल्यां वल्ल्यां कूष्माण्डमेव वा । एवं न सर्वनारीषु सद्वृत्तं नृप विद्यते ॥१५४॥

अर्थ: जिस प्रकार हरएक लतामें न ककड़ी फलती है और न कुम्हड़ा ही, इसी प्रकार हे राजन् ! सब स्त्रियोंमें सदाचार नहीं पाया जाता ॥१५४॥


पतिव्रताभिमाना प्रागतिवंशसमुद्भवा । शीलाङ्कुशादिनिर्याता प्राप्ता दुर्मतवारणम् ॥१५५॥

अर्थ: पहले अति-वंशमें उत्पन्न हुई एक अभिमाना नामकी स्त्री हो गई है जो अपने आपको पतिव्रता प्रकट करती थी किन्तु यथार्थमें शील रूपी अङ्कुशसे रहित हो दुर्मत रूपी वारणको प्राप्त हुई थी । भावार्थ - इस प्रकार मूठ-मूठ ही पतिव्रताका अभिमान रखने वाली स्त्री पति-व्रता नहीं है ॥१५५॥


लोकशास्त्रातिनिःसारसृणिना नैष शक्यते । वशीकर्तुं मनोहस्ती कुगतिं नयते ततः ॥१५६॥

अर्थ: यह मन रूपी. हाथी लौकिक शास्त्ररूपी निर्बल अंकुशके द्वारा वश नहीं किया जा सकता इसलिए वह इस जीवको कुमतिमें ले जाता है ॥१५६॥


सर्वज्ञोक्त्यङ्कुशेनैव दयासौख्यान्विते पथि । शक्यो योजयितुं युक्तमतिना भव्यजन्तुना ॥१५७॥

अर्थ: उत्तम बुद्धिको धारण करने वाला भव्यजीव, जिनवाणी रूपी अङ्कुशके द्वारा ही मनरूपी हाथीको दया और सुखसे सहित समीचीनमार्गमें ले जा सकता है ॥१५७॥


श्रृणु संक्षेपतो वच्येऽभिमानाशीलवर्णनम् । परम्परासमायातमाख्यानकं विपश्चिताम् ॥१५८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अब मैं विद्वानोंके बीच परम्परासे आगत अभिमानाके शील वर्णनकी कथा संक्षेपमें कहता हूँ सो सुन ॥१५८॥


आसीज्जनपदो यस्मिन् काले रोगानिलाहतः । धान्यग्रामात्तदा पत्न्या सहैको निर्गतो द्विजः ॥१५९॥

अर्थ: वे कहने लगे कि जिस समय समस्त देश रोगरूपी वायुसे पीडित था उस समय धान्यग्राम का रहने वाला एक ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ उस ग्रामसे बाहर निकला ॥१५९॥


आसीन्नोदननामासावभिमानाभिधाङ्गना । अग्निनाम्ना समुत्पन्ना मानिन्यामभिमानिनी ॥१६०॥

अर्थ: उस ब्राह्मणका नाम नोदन था और उसकी स्त्रीका नाम अभिमाना था। अभिमाना अग्निनामक पितासे मानिनी नामक स्त्रीमें उत्पन्न हुई थी तथा अत्यधिक अभिमानको धारण करने वाली थी ॥१६०॥


नोदनेनाभिमानासौ क्षुद्बाधाविह्वलात्मना । त्यक्ता गजवने प्राप्ता पतिं कररुहं नृपम् ॥१६१॥

अर्थ: तदनन्तर भूख की बाधासे जिसकी आत्मा विह्वल हो रही थी ऐसे नोदनने अभिमानाको छोड़ दिया । धीरे धीरे अभिमाना हाथियोंके वनमें पहुँची वहाँ उसने राजा करुरुहको अपना पति बना लिया ॥१६१॥


पुष्पप्रकीर्णनगरस्वामी लब्धप्रसादया । पादेन मस्तके जातु तयाऽसौ ताडितो रतौ ॥१६२॥

अर्थ: राजा करुरुह पुष्पप्रकीर्ण नगरका स्वामी था । तदनन्तर जिसे पतिकी प्रसन्नता प्राप्त थी ऐसी उस अभिमानाने किसी समय रतिकालमें राजा करुरुहके शिरमें अपने पैरसे आघात किया अर्थात् उसके शिरमें लात मारी ॥१६२॥


आस्थानस्थः प्रभातेऽसौ पर्यपृच्छद् बहुश्रुतान् । पादेनाऽऽहन्ति यो राजशिरस्तस्य किमिष्यते ॥१६३॥

अर्थ: दूसरे दिन प्रभात होने पर जब राजा सभामें बैठा तब उसने बहुश्रुत विद्वानोंसे पूछा कि जो राजाके शिरको पैरके आघातसे पीडित करे उसका क्या करना चाहिए ॥१६३॥


तस्मिन् बहवः प्रोचुः सभ्याः पण्डितमानिनः । यथाऽस्य छिद्यते पादः प्राणैर्वा स वियोज्यताम् ॥१६४॥

अर्थ: राजाका प्रश्न सुन, सभामें अपने आपको पण्डित माननेवाले जो बहुतसे सभा- सद् बैठे थे उन्होंने कहा कि उसका पैर काट दिया जाय अथवा उसे प्राणोंसे वियुक्त किया जाय ? ॥१६४॥


हेमाङ्कस्तत्र नामैको विप्रोऽभिप्रायकोविदः । जगाद तस्य पादोऽसौ पूजां सम्प्राप्यतां पराम् ॥१६५॥

अर्थ: उसी सभामें राजाके अभिप्रायको जाननेवाला एक हेमाङ्क नामका ब्राह्मण भी बैठा था सो उसने कहा कि राजन्, उसके पैरकी अत्यधिक पूजा की जाय अर्थात् अलंकार आदिसे अलंकृत कर उसका सत्कार किया जाय ॥१६५॥


कोविदः कथमीदक् त्वमिति पृष्टः स भूभृता । इष्टस्त्रीदन्तशस्त्रीयं क्षतमिष्टं स्वमैक्षयत् ॥१६६॥

अर्थ: राजाने उससे पूछा कि तुम इस प्रकार विद्वान् कैसे हुए अर्थात् तुमने यथार्थ बात कैसे जान ली ? तब उसने कहा कि इष्टस्त्रीके इस दन्तरूपी शस्त्रने अपने इष्टको अपने द्वारा घायल दिखलाया है अर्थात् आपके ओठमें स्त्रीका दन्ताघात देख कर मैंने सब रहस्य जाना है ॥१६६॥


अभिप्रायविदित्येष हेमाङ्कस्तेन भूभृता । प्रापितः परमामृद्धिं सर्वेभ्यश्चान्तरं गतम् ॥१६७॥

अर्थ: यह सुन राजाने ‘यह अभिप्रायका जानने वाला है’ ऐसा समझ हेमाङ्क को बहुत सम्पदा दी तथा अपनी निकटता प्राप्त कराई ॥१६७॥


हेमाङ्कस्य गृहे तस्य नाम्ना मित्रयशाः सती । अमोघशरसञ्ज्ञस्य भार्गवस्य प्रियाऽवसत् ॥१६८॥

विधवा दुःखिनी तस्मिन् वसन्ती भवने सुतम् । अशिक्षयदसावेवं स्मृतभर्तृगुणोत्करा ॥१६९॥

अर्थ: हेमाङ्कके घरमें अमोघशर नामक ब्राह्मणकी मित्रयशा नामकी पतिव्रता पत्नी रहती थी। वह बेचारी विधवा तथा दुःखिनी होकर उसी घरमें निवास करती और अपने पतिके गुणोंका स्मरण कर पुत्रको ऐसी शिक्षा देती थी ॥१६८-१६९॥


सुनिश्चितात्मना येन बाल्ये विद्यागमः कृतः । हेमाङ्कस्य द्युतिं तस्य विदुषः पश्य पुत्रक ॥१७०॥

अर्थ: कि हे पुत्र ! जिसने बाल्य अवस्थामें निश्चिन्तचित्त होकर विद्याभ्यास किया था उस विद्वान् हेमाङ्कका प्रभाव देख ॥१७०॥


शरविज्ञाननिर्धूतसर्वभार्गवसम्पदः । पितुस्तथाविधस्य त्वं तनयो बालिशोऽभवः ॥१७१॥

अर्थ: जिसने बाणविद्याके द्वारा समस्त ब्राह्मणों अथवा परशुरामकी सम्पदाको तिरस्कृत कर दिया था उस पिताके तू ऐसा मूर्ख पुत्र हुआ है ॥१७१॥


वाष्पविप्लुतनेत्रायाः श्रुत्वा मातुर्वचस्तदा । प्रशाम्यतां गतो विद्यां शिक्षितुं सोऽभिमानवान् ॥१७२॥

अर्थ: आँसुओंसे जिसके नेत्र भर रहे थे ऐसी माताके वचन सुन उसका श्रीवर्धित नामका अभिमानी बालक माताको सान्त्वना देकर उसी समय विद्या सीखनेके लिए चला गया ॥१७२॥


ततो व्याघ्रपुरे सर्वाः कलाः प्राप्य गुरोर्गृहे । तत्प्रदेशसुकान्तस्य सुतां हृत्वा विनिर्गतः ॥१७३॥

अर्थ: तदनन्तर व्याघ्रपुर नगरमें गुरुके घर समस्त कलाओंको सीख विद्वान् हुआ और वहाँके राजा सुकान्तकी पुत्रीका हरणकर वहाँसे निकल भागा ॥१७३॥


तस्याः शीलाभिधानायाः कन्यकाया सहोदरः । सिंहेन्दुरिति निर्यातो युद्धार्थी पुरुविक्रमः ॥१७४॥

अर्थ: पुत्रीका नाम शीला था और उसके भाईका नाम सिंहेन्दु था, सो प्रबल पराक्रमका धारक सिंहेन्दु बहिनको वापिस लानेके लिए युद्धकी इच्छा करता हुआ निकला ॥१७४॥


एकको बलसम्पन्नं जित्वा सिंहेन्दुमाहवे । श्रीवर्द्धितोऽन्वितो मात्रा सम्प्राप्तः परमां धृतिम् ॥१७५॥

अर्थ: परन्तु श्रीवर्धित अस्त्र-शस्त्रमें इतना निपुण हो गया था कि उसने अकेले ही सेनासे युक्त सिंहेन्दुको युद्धमें जीत लिया और वह घर आकर तथा मातासे मिलकर परम सन्तोषको प्राप्त हुआ ॥१७५॥


महाविज्ञानयुक्तेन तेन प्रख्यातकीर्तिना । लब्धं कररुहाद्राज्यं नगरे पोदनाह्वये ॥१७६॥

अर्थ: श्रीवर्धित महाविज्ञानी तो था ही धीरे-धीरे उसका यश भी प्रसिद्ध हो गया, अतः उसे राजा कररुहसे पोदनपुर नगरका राज्य मिल गया ॥१७६॥


सुकान्ते पञ्चतां प्राप्ते सिंहेन्दुर्द्युतिशत्रुणा । अभिभूतः समं देव्या निरैद्गेहात् सुरङ्गया ॥१७७॥

अर्थ: कालक्रमसे जब व्याघ्रपुरका राजा सुकान्त मृत्युको प्राप्त हो गया तब द्युतिनामक शत्रुने उसके पुत्र सिंहेन्दुपर आक्रमण किया जिससे भयभीत हो वह अपनी स्त्रीके साथ एक सुरंग द्वारा घरसे बाहर निकल गया ॥१७७॥


सम्भ्रान्तः शरणं गच्छन् भगिनीं खेदवान् भृशम् । प्राप्तस्ताम्बूलिकैर्भारं वाहितः सह भार्यया ॥१७८॥

भानावस्तङ्गतेऽभ्याशं पोदनस्य स सङ्गतः । मुक्तो राजभटै रात्रौ त्रासितो गहनं श्रितः ॥१७९॥

अर्थ: वह अत्यन्त घबड़ा गया था तथा बहुत खिन्न होता हुआ बहिनकी शरणमें जा रहा था। मार्गमें तंबोलियोंका साथ हो गया सो उनका भार शिर-पर रखते हुए वह अपनी स्त्री सहित सूर्यास्त होनेके बाद पोदनपुरके समीप पहुँचा। वहाँ राजाके योद्धाओंने उसे पकड़कर धमकाया सो जिस-किसी तरह छूटकर भयभीत होता हुआ वनमें पहुँचा ॥१७८-१७९॥


महोरगेण सन्दष्टस्तं देवी परिदेविनी । कृत्वा स्कन्धे परिप्राप्ता देशं यत्र मयः स्थितः ॥१८०॥

अर्थ: सो वहाँ एक महासर्पने उसे डँस लिया जिससे विलाप करती हुई उसकी स्त्री उसे कन्धेपर रखकर उस स्थानपर पहुँची जहाँ मयमुनि विराजमान थे ॥१८०॥


वज्रस्तम्भसमानस्य प्रतिमास्थानमीयुषः । महालब्धेः समीपस्य पादयोस्तमतिष्ठिपत् ॥१८१॥

अर्थ: महा-ऋद्धियोंके धारक मयमुनि प्रतिमा योग धारण कर वज्र स्तम्भके समान निश्चल खड़े थे, सो रानीने सिंहेन्दुको उनके चरणोंके समीप लिटा दिया ॥१८१॥


पादौ मुनेः परामृश्य पत्युर्गात्रं समास्पृशत् । देवी ततः परिप्राप्तः सिंहेन्दुर्जीवितं पुनः ॥१८२॥

अर्थ: सिंहेन्दुकी स्त्रीने मुनिराजके चरणोंका स्पर्श कर पतिके शरीरका स्पर्श किया जिससे वह पुनः जीवित हो गया ॥१८२॥


चैत्यस्य वन्दनां कृत्वा भक्त्या केसरिचन्द्रमाः । प्रणनाम मुनिं भूयो भूयो दयितया समम् ॥१८३॥

अर्थ: तदनन्तर सिंहेन्दुने भक्तिपूर्वक प्रतिमाकी वन्दना की और उसके बाद आकर अपनी स्त्रीके साथ बार-बार मुनिराज-को प्रणाम किया ॥१८३॥


उद्गते भास्करे साधुः समाप्तनियमोऽभवत् । प्राप्तो विनयदत्तस्तं वन्दनार्थमुपासकः ॥१८४॥

अर्थ: अथानन्तर सूर्योदय होनेपर मुनिराजका नियम समाप्त हुआ, उसी समय वन्दनाके लिए विनयदत्त नामका श्रावक उनके समीप आया ॥१८४॥


सन्देशाच्छ्रावको गत्वा पुरं श्रीवर्द्धिताय तम् । सिंहेन्दुं प्राप्तमाचख्यौ श्रुत्वा सन्नद्धुमुद्यतः ॥१८५॥

अर्थ: सिंहेन्दुके संदेशसे श्रावकने नगरमें जाकर श्रीवर्धितके लिए बताया कि राजा सिंहेन्दु आया है। यह सुन श्रीवर्धित युद्धके लिए तैयार हो गया ॥१८५॥


ततो यथावदाख्याते प्रीतिसङ्गतमानसः । महोपचारशेमुष्या श्यालं श्रीवर्द्धितोऽगमत् ॥१८६॥

अर्थ: तदनन्तर जब यथार्थ बात मालूम हुई तब प्रीतियुक्त चित्त होता हुआ श्रीवर्धित सन्मान करनेकी भावनासे अपने सालेके पास गया ॥१८६॥


ततो बन्धुसमायोगं प्राप्तः परमसम्मदः । श्रीवर्द्धितः सुखासीनं पप्रच्छेति मयं नतः ॥१८७॥

भगवन् ज्ञातुमिच्छामि पूर्वं जननमात्मनः । स्वजनानां च सत्साधुस्ततो वचनमब्रवीत् ॥१८८॥

अर्थ: तत्पश्चात् इष्टजनोंका समागम प्राप्त कर हर्षित होते हुए श्रीवर्धितने सुखसे बैठे हुए मय मुनिराजसे विनयपूर्वक पूछा कि हे भगवन् ! मैं अपने तथा अपने परिवारके लोगोंके पूर्वभव जानना चाहता हूँ । तदनन्तर उत्तम मुनिराज इस प्रकार वचन बोले कि ॥१८७-१८८॥


आसीच्छोभपुरे नाम्ना भद्राचार्यो दिगम्बरः । अमलाख्यः पुरस्यास्य स्वामी गुणसमुत्करः ॥१८९॥

अर्थ: शोभपुर नगरमें एक भद्राचार्य नामक दिगम्बर मुनिराज थे। उस नगरका राजा अमल था जो कि गुणोंके समूहसे सुशोभित था ॥१८९॥


स तं प्रत्यहमाचार्यं सेवितुं याति सन्मनाः । अन्यदा गन्धमाजघ्रौ देशे तत्र सुदुःसहम् ॥१९०॥

अर्थ: उत्तम हृदयको धारण करनेवाला अमल प्रतिदिन उन आचार्यकी सेवा करनेके लिए आता था। एक दिन आनेपर उसे उस स्थानपर अत्यन्त दुःसह दुर्गन्ध आई ॥१९०॥


स तं गन्धं समाघ्राय कुष्टिन्यङ्गसमुद्गतम् । पद्भ्यामेव निजं गेहं गतोऽसहनको द्रुतम् ॥१९१॥

अर्थ: कोढ़िनीके शरीरसे उत्पन्न हुई वह दुर्गन्ध इतनी भयंकर थी कि राजा उसे सहन नहीं कर सका और पैदल ही शीघ्र अपने घर चला गया ॥१९१॥


अन्यतः कुष्टिनी सा तु प्राप्ता चैत्यान्तिके तदा । विश्रान्ताऽऽसीद्व्रणेभ्योऽस्या दुर्गन्धोऽसौ विनिर्ययौ ॥१९२॥

अर्थ: वह कोढ़िनी स्त्री किसी अन्य स्थानसे आकर उस मन्दिरके समीप ठहरी थी, उसीके घावोंसे वह दुर्गन्ध निकल रही थी ॥१९२॥


अणुव्रतानि सा प्राप्य भद्राचार्यसकाशतः । देवलोकं गता च्युत्वाऽसौ कान्ता शीलवत्यभूत् ॥१९३॥

अर्थ: उस स्त्रीने भद्राचार्यके पास अणुव्रत धारण किये जिसके फल-स्वरूप वह मरकर स्वर्ग गई और वहाँसे च्युत होकर यह शीला नामक तुम्हारी स्त्री हुई है ॥१९३॥


यस्त्वसावमलो राजा पुत्रन्यस्तनृपक्रियः । सन्तुष्टः सोऽष्टभिर्ग्रामैः श्रावकत्वमुपाचरत् ॥१९४॥

अर्थ: वहाँ जो अमल नामका राजा था उसने सब राज्यकार्य पुत्रके लिए सौंप दिया और स्वयं वह आठ गाँवोंसे संतुष्ट हो श्रावक हो गया ॥१९४॥


देवलोकमसौ गत्वा च्युतः श्रीवर्द्धितोऽभवत् । अधुना पूर्वकं जन्म मातुस्तव वदाम्यहम् ॥१९५॥

अर्थ: आयुके अन्तमें वह स्वर्ग गया और वहाँसे च्युत हो श्रीवर्धित हुआ । इतना कहकर मय मुनिराजने कहा कि अब मैं तुम्हारी माताका पूर्व भव कहता हूँ ॥१९५॥


एको वैदेशिको भ्राम्यन् ग्रामं क्षुद्व्याधितोऽविशत् । स भोजनगृहे भुक्तिमलब्ध्वा कोपसङ्गतः ॥१९६॥

सर्वं ग्रामं दहामीति निगद्य कटुकस्वरम् । निष्क्रान्तः सृष्टितोऽसौ च ग्रामः प्राप्तः प्रदीपनम् ॥१९७॥

अर्थ: एक बार एक विदेशी मनुष्य भूखसे पीड़ित हो घूमता हुआ नगरमें प्रविष्ट हुआ । नगरकी भोजनशालामें भोजन न पाकर वह कुपित होता हुआ कटुक शब्दोंमें यह कहकर बाहर निकल गया कि ‘मैं समस्त गाँवको अभी जलाता हूँ’ । भाग्यकी बात कि उसी समय गाँवमें आग लग गई ॥१९६-१९७॥


ग्राम्यैरानीय सङ्क्रुद्धैः क्षिप्तोऽसौ तत्र पावके । मृतो दुःखेन सम्भूतः सूपकारी नृपालये ॥१९८॥

अर्थ: तब क्रोधसे भरे ग्रामवासियोंने उसे लाकर उसी अग्निमें डाल दिया, जिससे दुःखपूर्वक मरकर वह राजाके घर रसोइन हुआ ॥१९८॥


ततो मृता परिप्राप्ता नरकं घोरवेदनम् । तस्मादुत्तीर्य माताऽभूत्तव मित्रयशोऽभिधा ॥१९९॥

अर्थ: तदनन्तर मरकर घोर वेदनासे युक्त नरक पहुँची और वहाँसे निकलकर तुम्हारी माता मित्रयशा हुई है ॥१९९॥


बभूव पोदनस्थाने नाम्ना गोवाणिजो महान् । भुजपत्रेति तद्भार्या सौकान्तिः सोऽभवन्मृतः ॥२००॥

भुजपत्रापि जाताऽस्य कामिनी रतिवर्द्धनी । पीडनाद्गर्दभादीनां पुरा भारं च वाहितौ ॥२०१॥

अर्थ: पोदनपुरमें एक गोवाणिज नामका बड़ा गृहस्थ था, भुजपत्रा उसकी स्त्रीका नाम था । गोवाणिज मरकर सिंहेन्दु हुआ और भुजपत्रा उसकी रतिवर्धनी नामकी स्त्री हुई । इन दोनोंने पूर्वभवमें गर्दभ आदि पशुओंपर अधिक बोझ लाद-लाद उन्हें पीड़ा पहुँचाई थी इसलिए उन्हें भी तंबोलियोंका भार उठाना पड़ा ॥२००-२०१॥


एवमुक्त्वा मयो व्योम भासयन् स्वेप्सितं ययौ । श्रीवर्द्धितोऽपि नगरं प्राप्तबन्धुसमागमः ॥२०२॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर मय मुनिराज आकाशको देदीप्यमान करते हुए अपने इच्छित स्थानपर चले गये और श्रीवर्धित भी इष्टजनोंका समागम प्राप्त कर नगरमें चला गया ॥२०२॥


पूर्वभाग्योदयाद्राजन् संसारे चित्रकर्मणि । राज्यं कश्चिदवाप्नोति प्राप्तं नश्यति कस्यचित् ॥२०३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस विचित्र संसारमें पूर्वकृत भाग्यका उदय होनेपर कोई राज्यको प्राप्त होता है और किसीका प्राप्त हुआ राज्य नष्ट हो जाता है ॥२०३॥


अप्येकस्माद्गुरोः प्राप्य जन्तूनां धर्मसङ्गतिम् । निदाननिर्निदानाभ्यां मरणाभ्यां पृथग्गतिः ॥२०४॥

अर्थ: एक ही गुरुसे धर्मकी संगति पाकर निदान अथवा निदानरहित मरणसे जीवोंकी गति भिन्न-भिन्न होती है ॥२०४॥


उत्तरन्त्युदधिं केचिद्रत्नपूर्णाः सुखान्विताः । मध्ये केचिद्विशीर्यन्ते तटे केचिद्घनाधिपाः ॥२०५॥

अर्थ: रत्नोंसे पूर्णताको प्राप्त हुए कितने ही धनेश्वरी मनुष्य सुखपूर्वक समुद्रको पार करते हैं, कितने ही बीचमें डूब जाते हैं और कितने ही तटपर डूब मरते हैं ॥२०५॥


इति ज्ञात्वाऽऽत्मनः श्रेयः सदा कार्यं मनीषिभिः । दयादमतपःशुद्धया विनयेनागमेन वा ॥२०६॥

अर्थ: ऐसा जानकर बुद्धिमान् मनुष्योंको सदा दया, दम, तपश्चरणकी शुद्धि, विनय तथा आगमके अभ्याससे आत्माका कल्याण करना चाहिए ॥२०६॥


सकलं पोदनं नूनं तदा मयवचःश्रुतेः । उपशान्तमभूद्धर्मगतचित्तं नराधिप ॥२०७॥

अर्थ: हे राजन् ! उस समय मय मुनिराजके वचन सुनकर समस्त पोदनपुर अत्यन्त शान्त हो गया तथा धर्ममें उसका चित्त लग गया ॥२०७॥


ईदृग्गुणो विधिज्ञः प्रासुविहारी मयः प्रशान्तात्मा । पण्डितमरणं प्राप्तोऽभूदीशाने सुरश्रेष्ठः ॥२०८॥

अर्थ: इस प्रकारके गुणोंसे युक्त, धर्मकी विधिको जाननेवाले, प्रशान्त चित्त तथा प्रासुक स्थानमें बिहार करनेवाले मय मुनिराज, पण्डित मरणको प्राप्त हो श्रेष्ठ देव हुए ॥२०८॥


एतन्मयस्य साधोर्माहात्म्यं ये पठन्ति सच्चित्ताः । अरयः क्रव्यादा वा हिंसन्ति न तान् कदाचिदपि ॥२०९॥

अर्थ: इस तरह जो उत्तम चित्त होकर मय मुनिराजके इस माहात्म्यको पढ़ते हैं, शत्रु अथवा मांसभोजी सिंहादि उनकी कभी भी हिंसा नहीं करते ॥२०९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मयोपाख्यानं नामाऽशीतितमं पर्व ॥८०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें मय मुनिराजका वर्णन करनेवाला अस्सीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८०॥


८१. एकाशीतितमं पर्व (साकेतनगरीवर्णनं)

ब्रह्मलोकभवाकारां लक्ष्मीं लक्ष्मणपूर्वजः । चन्द्राङ्कचूडदेवेन्द्रप्रतिमोऽनुभवन्नसौ ॥१॥

भर्तृपुत्रवियोगाग्निज्वालाशोषितविग्रहाम् । विस्मृतः कथमेकान्तं जननीमपराजिताम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो स्वर्ग लोककी लक्ष्मीके समान राजलक्ष्मीका उपभोग कर रहे थे ऐसे चन्द्राङ्कचूड इन्द्रके तुल्य श्रीराम, पति और पुत्रके वियोगरूपी अग्निकी ज्वालासे जिनका शरीर सूख गया था ऐसी माता कौसल्याको एकदम क्यों भूल गये थे ? ॥१-२॥


सप्तमं तलमारूढा प्रासादस्य सखीवृता । उद्विग्नाऽस्रप्रपूर्णाक्षा नवधेनुरिवाकुला ॥३॥

वीक्षते सा दिशः सर्वाः पुत्रस्नेहपरायणा । कांक्षन्ती दर्शनं तीव्रशोकसागरवर्त्तिनी ॥४॥

अर्थ: जो निरन्तर उद्विग्न रहती थी, जिसके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त रहते थे, जो नवप्रसूता गायके समान अपने पुत्रसे मिलनेके लिए अत्यन्त व्याकुल थी, पुत्रके प्रति स्नेह प्रकट करनेमें तत्पर थी, तीव्र शोकरूपी सागरमें विद्यमान थी और पुत्रके दर्शनकी इच्छा रखती थी, ऐसी कौसल्या सखियोंके साथ महलके सातवें खण्डपर चढ़ कर सब दिशाओंकी ओर देखती रखती थी ॥३-४॥


पताकाशिखरे तिष्ठन्नुत्पतोत्पतवायस । पद्मः पुत्रो ममाऽऽयातु तव दास्यामि पायसम् ॥५॥

अर्थ: वह पागलकी भाँति पताकाके शिखरपर बैठे हुए काकसे कहती थी कि रे वायस ! उड़-उड़ । यदि मेरा पुत्र राम आ जायगा तो मैं तुझे खीरका भोजन देऊँगी ॥५॥


इत्युक्त्वा चेष्टितं तस्य ध्यात्वा ध्यानं मनोहरम् । विलापं कुरुते नेत्रवाष्पदुर्दिनकारिणी ॥६॥

अर्थ: ऐसा कहकर उसकी मनोहर चेष्टाओंका ध्यान करती और जब उसको ओरसे कुछ उत्तर नहीं मिलता तब नेत्रोंसे आँसुओंकी घनघोर वर्षा करती हुई विलाप करने लगती ॥६॥


हा वत्सक क्व यातोऽसि सततं सुखलालितः । विदेशभ्रमणे प्रीतिस्तव केयं समुद्गता ॥७॥

अर्थ: वह कहती कि हाय पुत्र ! तू कहाँ चला गया ? तू निरन्तर सुखसे लड़ाया गया था । तुझे विदेश भ्रमणकी यह कौन-सी प्रीति उत्पन्न हुई है ? ॥७॥


पादपल्लवयोः पीडां प्राप्नोषि परुषे पथि । विश्रमिष्यसि कस्याऽधो गहनस्योत्कटश्रमः ॥८॥

अर्थ: तू कठोर मार्गमें चरण-किसलयोंकी पीड़ाको प्राप्त हो रहा होगा । अर्थात् कंकरीले पथरीले मार्गमें चलते-चलते तेरे कोमल पैर दुखने लगते होंगे तब तू अत्यन्त थक कर किस वनके नीचे विश्राम करता होगा ? ॥८॥


मन्दभाग्यां परित्यज्य मकामत्यर्थदुःखिताम् । यातोऽसि कतमामाशां भ्रात्रा पुत्रकलङ्गतः ॥९॥

अर्थ: हाय बेटा ! अत्यन्त दुःखिनी मुझ मन्दभागिनीको छोड़ तू भाई लक्ष्मणके साथ किस दिशामें चला गया है ? ॥९॥


परदेवनमारेभे सा कर्त्तुं चैवमादिकम् । देवर्षिश्च परिप्राप्तो गगनाङ्गणगोचरः ॥१०॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! वह कौसल्या जिस समय इस प्रकारका विलाप कर रही थी उसी समय आकाशमार्गमें विहार करनेवाले देवर्षि नारद वहाँ आये ॥१०॥


जटाकूर्चधरः शुक्लवस्त्रप्रावृतविग्रहः । अवद्वारगुणाभिख्यो नारदः क्षितिविश्रुतः ॥११॥

अर्थ: वे नारद जटारूपी कूर्चको धारण किये हुए थे, सफेद वस्त्रसे उनका शरीर आवृत था, अवद्वार नामके धारक थे और पृथिवीमें सर्वत्र प्रसिद्ध थे ॥११॥


तं समीपत्वमायातमभ्युत्थायापराजिता । आसानाद्युपचारेण सादरं सममानयत् ॥१२॥

अर्थ: उन्हें समीपमें आया देख कौसल्याने उठकर तथा आसन आदि देकर उनका आदर किया ॥१२॥


सिद्धयोगमुनिर्दृष्ट्वा तामश्रुतरलेक्षणाम् । आकारसूचितोदारशोकां सम्परिपृष्टवान् ॥१३॥

कुतः प्राप्ताऽसि कल्याणि विमाननमिदं यतः । रुद्यते न तु सम्भाव्यं तव दुःखस्य कारणम् ॥१४॥

अर्थ: जिसके नेत्र आँसुओंसे तरल थे तथा जिसकी आकृतिसे ही बहुत भारी शोक प्रकट हो रहा था ऐसी कौसल्याको देख नारदने पूछा कि हे कल्याणि ! तुमने किससे अनादर प्राप्त किया है, जिससे रो रही हो ? तुम्हारे दुःखका कारण तो सम्भव नहीं जान पड़ता ? ॥१३-१४॥


सुकोशलमहाराजदुहिता लोकविश्रुता । श्लाघ्याऽपराजिताभिख्या पत्नी दशरथश्रुतेः ॥१५॥

अर्थ: तुम सुकोशल महाराजकी लोकप्रसिद्ध पुत्री हो, प्रशंसनीय हो तथा राजा दशरथकी अपराजिता नामकी पत्नी हो ॥१५॥


पद्मनाभनृरत्नस्य प्रसवित्री सुलक्षणा । येन त्वं कोपिता मान्या देवतेव हतात्मना ॥१६॥

अद्यैव कुरुते तस्य प्रतापाक्रान्तविष्टपः । नृपो दशरथः श्रीमान्निग्रहं प्राणहारिणम् ॥१७॥

अर्थ: मनुष्योंमें रत्नस्वरूप श्रीरामकी माता हो, उत्तम लक्षणोंसे युक्त हो तथा देवताके समान माननीय हो । जिस दुष्टने तुम्हें क्रोध उत्पन्न कराया है, प्रतापसे समस्त संसारको व्याप्त करनेवाले श्रीमान् राजा दशरथ आज ही उसका प्रणापहारी निग्रह करेंगे अर्थात् उसे प्राणदण्ड देंगे ॥१६-१७॥


उवाच नारदं देवी स त्वं चिरतरागतः । देवर्षे वेत्सि वृत्तान्तं नेमं येनेति भाषसे ॥१८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें देवी कौसल्याने कहा कि हे देवर्षे ! तुम बहुत समय बाद आये हो इस-लिए इस समाचारको नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कह रहे हो ॥१८॥


अन्य एवासि संवृत्तो वात्सल्यं तत्पुरातनम् । कुतो विशिथिलीभूतं लक्ष्यते निष्ठुरस्य ते ॥१९॥

अर्थ: जान पड़ता है कि अब तुम दूसरे ही हो गये हो और तुम्हारी निष्ठुरता बढ़ गई है अन्यथा तुम्हारा वह पुराना वात्सल्य शिथिल क्यों दिखाई देता ? ॥१९॥


कथं वार्त्तामपीदानीं त्वं नोपलभसे गुरुः । अतिदूरादिवायातः कुतोऽपि भ्रमणप्रियः ॥२०॥

अर्थ: आज तक भी तुम इस वार्ताको क्यों नहीं प्राप्त हो सके ? जान पड़ता हैकि तुम भ्रमणप्रिय हो और अभी कहीं बहुत दूरसे आ रहे हो ॥२०॥


तेनोक्तं धातकीखण्डे सुरेन्द्ररमणे पुरे । विदेहेऽजनि पूर्वस्मिंस्त्रैलोक्यपरमेश्वरः ॥२१॥

अर्थ: नारदने कहा कि धातकी खण्ड-द्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें एक सुरेन्द्ररमण नामका नगर है वहाँ श्रीतीर्थंकर भगवान्‌का जन्म हुआ था ॥२१॥


मन्दरे तस्य देवेन्द्रैः सुरासुरसमन्वितैः । दिव्ययाऽद्भुतया भूत्या जननाभिषवः कृतः ॥२२॥

अर्थ: सुरासुरसहित इन्द्रोंने सुमेरु पर्वतपर आश्चर्यकारी दिव्य वैभवके साथ उनका जन्माभिषेक किया था ॥२२॥


तस्य देवाधिदेवस्य सर्वपापप्रणाशनः । अभिषेको मया दृष्टः पुण्यकर्मप्रवर्द्धकः ॥२३॥

अर्थ: सो समस्त पापोंको नष्ट करने एवं पुण्यकर्म-को बढ़ानेवाला तीर्थंकर भगवान्‌का वह अभिषेक मैंने देखा है ॥२३॥


आनन्दं ननृतुस्तत्र देवाः प्रमुदिताः परम् । विद्याधराश्च बिभ्राणा विभूतिमतिशोभनाम् ॥२४॥

अर्थ: उस उत्सवमें आनन्दसे भरे देवोंने तथा अत्यन्त शोभायमान विभूतिको धारण करनेवाले विद्याधरोंने आनन्दसे नृत्य किया था ॥२४॥


जिनेन्द्रदर्शनासक्तस्तस्मिन्नतिमनोहरे । त्रयोविंशतिवर्षाणि द्वीपेऽहमुषितः सुखम् ॥२५॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्‌के दर्शनोंमें आसक्त हो मैं उस अतिशय मनोहारी द्वीपमें यद्यपि तेईस वर्ष तक सुखसे निवास करता रहा ॥२५॥


तथापि जननीतुल्यां संस्मृत्य भरतक्षितिम् । महाधृतिकरीमेष प्राप्तोऽहं चिरसेविताम् ॥२६॥

अर्थ: तथापि चिरकालसे सेवित तथा महान् धैर्य उत्पन्न करनेवाली माताके तुल्य इस भरत-क्षेत्रकी भूमिका स्मरण कर यहाँ पुनः आ पहुँचा हूँ ॥२६॥


जम्बूभरतमागत्य व्रजाम्यद्यापि न क्वचित् । भवतीं द्रष्टुमायातो वार्त्ताज्ञानपिपासितः ॥२७॥

अर्थ: जम्बूद्वीपके भरत-क्षेत्रमें आकर मैं अभीतक कहीं अन्यत्र नहीं गया हूँ, सीधा समाचार, जाननेकी प्यास लेकर तुम्हारा दर्शन करनेके लिए आया हूँ ॥२७॥


ततोऽपराजिताऽवादीद् यथावृत्तमशेषतः । सर्वप्राणिहिताचार्यस्यागतिं गणधारिणः ॥२८॥

वैदेहस्य समायोगं महाविद्याधरप्रभोः । दशस्यन्दनराजस्य प्रव्रज्यां पार्थिवैः समम् ॥२९॥

सीतालक्ष्मणयुक्तस्य पद्मनाभस्य निर्गमम् । वियोगं सीतया साकं सुग्रीवादिसमागमम् ॥३०॥

लक्ष्मणं समरे शक्त्या लङ्कानाथेन ताडितम् । द्रोणमेघस्य कन्याया नयनं त्वरयान्वितम् ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर अपराजिता ( कौसल्या ) ने जो वृत्तान्त जैसा हुआ था वह सब नारदसे कहा । उसने कहा कि सङ्घसहित सर्वभूतहित आचार्यका आगमन हुआ । महा विद्याधरोंके राजा भामण्डलका संयोग हुआ । राजा दशरथने अनेक राजाओंके साथ दीक्षा धारण की, सीता और लक्ष्मणके साथ राम वनको गये, वहाँ सीताके साथ उनका वियोग हुआ, सुग्रीवादिके साथ समागम हुआ, युद्धमें लङ्काके धनी-रावणने लक्ष्मणको शक्तिसे ताड़ित किया और द्रोणमेघकी कन्या विशल्या शीघ्रतासे वहाँ ले जाई गई ॥२८-३१॥


इत्युक्त्वाऽनुस्मृतात्यन्ततीव्रदुःखपरायणा । अश्रुधारां विमुञ्चन्ती सा पुनः पर्यदेवत ॥३२॥

अर्थ: इतना कहते ही जिसे तीव्र दुःखका स्मरण हो आया था ऐसी कौसल्या अश्रुधारा छोड़ती हुई पुनः विलाप करने लगी ॥३२॥


हा हा पुत्र गतः क्वासि चिरमेहि प्रयच्छ मे । वचनं कुरु साधारं मग्नायाः शोकसागरे ॥३३॥

अर्थ: हाय हाय पुत्र ! तू कहाँ गया ? कहाँ है ? बहुत समय हो गया, शीघ्र ही आ, मेरे लिए वचन दे - मुझसे वार्तालाप कर और शोकसागरमें डूबी हुई मेरे लिए सान्त्वना दे ॥३३॥


पुण्योज्झिता त्वदीयास्यमपश्यन्ती सुजातक । तीव्रदुःखानलालीढा हतं मन्ये स्वजीवितम् ॥३४॥

अर्थ: हे सत्पुत्र ! मैं पुण्यहीना तुम्हारे मुखको न देखती तथा तीव्र दुःखाग्निसे व्याप्त हुई अपने जीवनको निरर्थक मानती हूँ ॥३४॥


वन्दीगृहं समानीता राजपुत्री सुखैधिता । बाला वनमृगीमुग्धा सीता दुःखेन तिष्ठति ॥३५॥

अर्थ: सुखसे जिसका लालन-पालन हुआ तथा जो वनकी हरिणीके समान भोली है ऐसी राजपुत्री बेटी सीता शत्रुके बन्दीगृहमें पड़ी दुःखसे समय काट रही होगी ॥३५॥


निर्घृणेन दशास्येन शक्त्या लक्ष्मणसुन्दरः । ताडितो जीवितं धत्ते नेति वार्त्ता न विद्यते ॥३६॥

अर्थ: निर्दय रावणने लक्ष्मणको शक्तिसे घायल किया सो जीवित है या नहीं इसकी कोई खबर नहीं है ॥३६॥


हा सुदुर्लभकौ पुत्रौ हा सीते सति बालिके । प्राप्तासि जलधेर्मध्ये कथं दुःखमिदं परम् ॥३७॥

अर्थ: हाय मेरे अत्यन्त दुर्लभ पुत्रो ! और हाय मेरी पतिव्रते बेटी सीते ! तुम समुद्रके मध्य इस भयङ्कर दुःखको कैसे प्राप्त हो गई ॥३७॥


तं वृत्तान्तं ततो ज्ञात्वा वीणां क्षिप्त्वा महीतले । उद्विग्नो नारदस्तस्थौ हस्तावाधाय मस्तके ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर यह वृत्तान्त जानकर नारदने वीणा पृथ्वीपर फेंक दी और स्वयं उद्विग्न हो दोनों हाथ मस्तकसे लगा चुपचाप बैठ गये ॥३८॥


क्षणनिष्कम्पदेहश्च विमृश्य बहुवीक्षितः । अब्रवीद् देवि नो सम्यग्वृत्तमेतद्विभाति मे ॥३९॥

अर्थ: उनका शरीर क्षणमात्रमें निश्चल पड़ गया । जब विचारकर उनकी ओर अनेक बार देखा तब वे बोले कि हे देवि ! मुझे यह बात अच्छी नहीं जान पड़ती ॥३९॥


त्रिखण्डाधिपतिश्चण्डो विद्याधरमहेश्वरः । वैदेहकपिनाथाभ्यां रावणः किं प्रकोपितः ॥४०॥

अर्थ: रावण तीन खण्डका स्वामी है, अत्यन्त क्रोधी तथा समस्त विद्याधरोंका स्वामी है सो उसे भामण्डल तथा सुग्रीवने क्यों कुपित कर दिया ? ॥४०॥


तथापि कौशले शोकं मा कृथाः परमं शुभे । अचिरादेष ते वार्त्तामानयामि न संशयः ॥४१॥

अर्थ: फिर भी हे कौसल्ये ! हे शुभे ! अत्यधिक शोक मत करो। यह मैं शीघ्र ही जाकर तुम्हारे लिए समाचार लाता हूँ इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥४१॥


कृत्यं विधातुमेतावद्देवि सामर्थ्यमस्ति मे । शक्तः स एव शेषस्य कार्यस्य तव नन्दनः ॥४२॥

अर्थ: हे देवि ! इतना ही कार्य करनेकी मेरी सामर्थ्य है। शेष कार्यके करनेमें तुम्हारा पुत्र ही समर्थ है ॥४२॥


प्रतिज्ञामेवमादाय नारदः खं समुद्गतः । वीणां कक्षान्तरे कृत्वा सखीमिव परां प्रियाम् ॥४३॥

अर्थ: इस प्रकार प्रतिज्ञा कर तथा परमप्यारी सखीके समान वीणाको बगलमें दबाकर नारद आकाशमें उड़ गये ॥४३॥


ततो वातगतिः क्षोणीं पश्यन् दुर्लंघ्यपर्वताम् । लङ्कां प्रतिकृताशङ्को नारदश्चकितं ययौ ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर वायुके समान तीव्र गतिसे जाते और दुर्लंघ्य पर्वतोंसे युक्त पृथिवीको देखते हुए नारद लंकाकी ओर चले । उस समय उनके मनमें कुछ शङ्का तथा कुछ आश्चर्य - दोनों ही उत्पन्न हो रहे थे ॥४४॥


समीपीभूय लङ्कायाश्चिन्तामेवमुपागतः । कथं वार्त्तापरिज्ञानं करोमि निरुपायकम् ॥४५॥

अर्थ: चलते-चलते नारद जब लंकाके समीप पहुँचे तब ऐसा विचार करने लगे कि मैं उपायके बिना राम-लक्ष्मणका समाचार किस प्रकार ज्ञात करूँ ? ॥४५॥


पद्मलक्ष्मणवार्त्तायाः प्रश्ने दोषोऽभिलक्ष्यते । पृच्छतो दशवक्त्रं तु स्फीतमार्गो न दृश्यते ॥४६॥

अर्थ: यदि साक्षात् रावणसे राम-लक्ष्मणकी वार्ता पूछता हूँ तो इसमें दोष दिखायी देता है । क्या करूँ ? कुछ स्पष्ट मार्ग दिखायी नहीं देता ॥४६॥


अनेनैवानुपूर्व्येण वार्त्तां ज्ञास्ये मनीषिताम् । इति ध्यात्वा सुविश्रब्धो गतः पद्मसरो यतः ॥४७॥

अर्थ: अथवा मैं इसी क्रमसे इच्छित वार्ताको जानूँगा । इस प्रकार मनमें ध्यान कर निश्चिन्त हो पद्मसरोवरकी ओर गये ॥४७॥


तस्यां च तत्र वेलायामन्तःपुरसमन्वितः । तारायास्तनयः क्रीडां कुरुते चारुविभ्रमः ॥४८॥

अर्थ: उस समय उस पद्मसरोवरमें उत्तम शोभाको धारण करनेवाला अङ्गद अपने अन्तःपुरके साथ क्रीड़ा कर रहा था ॥४८॥


तटस्थं पुरुषं तस्य कृतपूर्वप्रियोदितः । कुशलं रावणस्येति पप्रच्छावस्थितः क्षणम् ॥४९॥

अर्थ: वहाँ जाकर नारद मधुर वार्ता द्वारा तटपर स्थित किसी पुरुषसे रावणकी कुशलता पूछते हुए क्षणभर खड़े रहे ॥४९॥


श्रुत्वा तद्वचनं क्रुद्धाः किङ्कराः स्फुरिताधराः । जगदुः कथमेव त्वं दुष्टं तापस भाषसे ॥५०॥

अर्थ: उनके वचन सुन, जिनके ओंठ काँप रहे थे ऐसे सेवक कुपित हो बोले कि रे तापस ! तू इस तरह दुष्टतापूर्ण वार्ता क्यों कर रहा है ? ॥५०॥


कुतो रावणवर्गीणो मुनिखेटस्त्वमागतः । इत्युक्त्वा परिवार्यासावङ्गदस्यान्तिकीकृतः ॥५१॥

अर्थ: ‘रावणके वर्गका तू दुष्ट तापस यहाँ कहाँसे आ गया ?’ इस प्रकार कहकर तथा घेरकर किङ्कर लोग उन्हें अङ्गदके समीप ले गये ॥५१॥


कुशलं रावणस्यायं पृच्छतीत्युदिते भटैः । न कार्यं दशवक्त्रेण ममेति मुनिरभ्यधात् ॥५२॥

अर्थ: ‘यह तापस रावणकी कुशल पूछता है’ इस प्रकार जब किङ्करोंने अंगदसे कहा तब नारदने उत्तर दिया कि मुझे रावणसे कार्य नहीं है ॥५२॥


तैरुक्तं यद्यदः सत्यं तस्य कस्मात्प्रमोदवान् । कुशलोदन्तसम्प्रश्ने वर्त्तसे परमादरः ॥५३॥

अर्थ: तब किङ्करोंने कहा कि यदि यह सत्य है तो फिर तू हर्षित हो रावणका कुशल पूछनेमें परमआदरसे युक्त क्यों है ? ॥५३॥


ततोऽङ्गदः प्रहस्योचे व्रजतैनं कुतापसम् । दुरीहं पद्मनाभाय मूढं दर्शयत द्रुतम् ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर अङ्गदने हँसकर कहा कि जाओ इस खोटी चेष्टाके धारक मूर्ख तापसको शीघ्र ही पद्मनाभके दर्शन कराओ अर्थात् उनके पास ले जाओ ॥५४॥


पृष्ठतः प्रेर्यमाणोऽसौ बाह्वाकर्षणतत्परैः । सुकष्टं नीयमानस्तैरिति चिन्तामुपागतः ॥५५॥

बहवः पद्मनाभाख्याः सन्त्यत्र वसुधातले । न जाने कतमः स स्यान्नीये यस्याहमन्तिकम् ॥५६॥

अर्थ: अङ्गदके इतना कहते ही कितने ही किङ्कर नारदकी भुजा खींचकर आगे ले जाने लगे और कितने ही पीछेसे प्रेरणा देने लगे । इस प्रकार किङ्करों द्वारा कष्टपूर्वक ले जाये गये नारदने मनमें विचार किया कि इस पृथ्वीतलपर पद्मनाभ नामको धारण करनेवाले बहुतसे पुरुष हैं । न जाने वह पद्मनाभ कौन है जिसके कि पास मैं ले जाया जा रहा हूँ ? ॥५५-५६॥


अर्हच्छासनवात्सल्या देवता मम तायनम् । काचित् कुर्वीत किं नाम पतितोऽस्म्यतिसंशये ॥५७॥

अर्थ: जिनशासनसे स्नेह रखनेवाली कोई देवी मेरी रक्षा करे, मैं अत्यन्त संशयमें पड़ गया हूँ ॥५७॥


शिखान्तिकगतप्राणो नारदः पुरुवेपथुः । विभीषणगृहद्वारं प्रविष्टः सद्गुहाकृतिम् ॥५८॥

अर्थ: अथानन्तर चोटीतक जिनके प्राण पहुँच गये थे, तथा जिन्हें अत्यधिक कँपकँपी छूट रही थी ऐसे नारद उत्तम गुहाका आकार धारण करनेवाले बिभीषणके घरके द्वारमें प्रविष्ट हुए ॥५८॥


पद्माभं दूरतो दृष्ट्वा सहसोद्भ्रान्तमानसः । अब्रह्मण्यमिति स्फीतं प्रस्वेदी मुमुचे स्वरम् ॥५९॥

अर्थ: वहाँ दूरसे ही रामको देख, जिनका चित्त सहसा हर्षको प्राप्त हो रहा था ऐसे पसीनेसे लथपथ नारदने ‘अहो अन्याय हो रहा है’ इस प्रकार जोरसे आवाज लगाई ॥५९॥


श्रुत्वा तस्य रवं दत्त्वा दृष्टिं लक्ष्मणपूर्वजः । अवद्वारं परिज्ञाय स्वयमाहादरान्वितः ॥६०॥

मुञ्चध्वमाशु मुञ्चध्वमेतमित्युज्झितश्च सः । पद्माभस्यान्तिकं गत्वा प्रहृष्टोऽवस्थितः पुरः ॥६१॥

अर्थ: रामने नारदका शब्द सुन उनकी ओर दृष्टि डालकर पहिचान लिया कि ये तो अवद्वार नामक नारद हैं । उसी समय उन्होंने आदरके साथ सेवकोंसे कहा कि इन्हें छोड़ो, शीघ्र छोड़ो । तदनन्तर सेवकोंने जिन्हें तत्काल छोड़ दिया था ऐसे नारद श्रीरामके पास जाकर हर्षित हो सामने खड़े हो गये ॥६०-६१॥


स्वस्त्याशीर्भिः समानन्द्य पद्मनारायणावृषिः । परित्यक्तपरित्रासः स्थितो दत्ते सुखासने ॥६२॥

अर्थ: जिनका भय छूट गया था ऐसे ऋद्धि मङ्गलमय आशीर्वादोंसे राम-लक्ष्मणका अभिनन्दन कर दिये हुए सुखासनपर बैठ गये ॥६२॥


पद्मनाभस्ततोऽवोचत् सोऽवद्वारगतिर्भवान् । क्षुल्लकोऽभ्यागतः कस्मादुक्तश्च स जगौ क्रमात् ॥६३॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीरामने कहा कि आप तो अवद्वारगति नामक क्षुल्लक हैं । इस समय कहाँसे आ रहे हैं ? इस प्रकार श्रीरामके कहनेपर नारदने क्रम-क्रमसे कहा कि ॥६३॥


व्यसनार्णवमग्नाया जनन्या भवतोऽन्तिकात् । प्राप्तोऽस्मि वेदितुं वार्त्तां त्वत्पादकमलान्तिकम् ॥६४॥

अर्थ: मैं दुःखरूपी सागरमें निमग्न हुए आपकी माताके पाससे उनका समाचार जतानेके लिए आपके चरणकमलोंके समीप आया हूँ ॥६४॥


मान्यापराजिता देवी भव्या भगवती तव । माताऽश्रुधौतवदना दुःखमास्ते त्वया विना ॥६५॥

अर्थ: इस समय आपकी माता माननीय भगवती अपराजितादेवी आपके बिना बड़े कष्टमें हैं, वे रात-दिन आँसुओंसे मुख प्रक्षालित करती रहती हैं ॥६५॥


सिंही किशोररूपेण रहितेव समाकुला । विकीर्णकेशसम्भारा कृतकुट्टिमलोठना ॥६६॥

अर्थ: जिस प्रकार अपने बालकके बिना सिंही व्याकुल रहती है उसी प्रकार आपके बिना वे व्याकुल रहती हैं। उनके बाल बिखरे हुए हैं तथा वे पृथ्वीपर लोटती रहती हैं ॥६६॥


विलापं कुरुते देव तादृशं येन तत्क्षणम् । मन्ये सञ्जायते व्यक्तं दृषदामपि मार्दवम् ॥६७॥

अर्थ: हे देव ! वे ऐसा विलाप करती हैं कि उस समय स्पष्ट ही पत्थर भी कोमल हो जाता है ॥६७॥


तिष्ठति त्वयि सत्पुत्रे कथं तनयवत्सला । महागुणधरी स्तुत्या कृच्छ्रं सा परमं गता ॥६८॥

अर्थ: तुम सत्पुत्रके रहते हुए भी वह पुत्रवत्सला, महागुणधारिणी स्तुतिके योग्य उत्तम माता कष्ट क्यों उठा रही है ? ॥६८॥


अद्यश्वीनमिदं मन्ये तस्याः प्राणविवर्जनम् । यदि तां नेक्षसे शुष्कां त्वद्वियोगोरुभानुना ॥६९॥

अर्थ: यदि अपने वियोगरूपी सूर्यसे सूखी हुई उस माताके आप शीघ्र ही दर्शन नहीं करते हैं तो मैं समझता हूँ कि आजकलमें ही उसके प्राण छूट जावेंगे ॥६९॥


प्रसादं कुरुतां पश्य व्रजोत्तिष्ठ किमास्यते । एतस्मिन्नन्तु संसारे बन्धुर्माता प्रधानतः ॥७०॥

अर्थ: अतः प्रसन्न होओ, चलो, उठो, माताके दर्शन करो। क्यों बैठे हो ? यथार्थमें इस संसारमें माता ही सर्वश्रेष्ठ बन्धु है ॥७०॥


वार्त्तेयमेव कैकय्या अपि दुःखेन वर्त्तते । तया हि कुट्टिमतलं कृतमस्त्रेण पल्वलम् ॥७१॥

अर्थ: जो बात आपकी माताकी है ठीक यही बात दुःखसे कैकेयी सुमित्राकी हो रही है। उसने अश्रु बहा-बहाकर महलके फर्शको मानो छोटा-मोटा तालाब ही बना दिया है ॥७१॥


नाहारे शयने रात्रौ न दिवास्ति मनागपि । तस्याः स्वस्थतया योगो भवतोर्विप्रयोगतः ॥७२॥

अर्थ: आप दोनोंके वियोगसे उसे न आहारमें, न शयनमें, न दिनमें और न रात्रिमें थोड़ा भी आनन्द प्राप्त होता है ॥७२॥


कुररीव कृताक्रन्दा शावकेन वियोगिनी । उरः शिरश्च सा हन्ति कराभ्यां विह्वला भृशम् ॥७३॥

अर्थ: वह पुत्र-वियोगसे कुररीके समान रुदन करती रहती है तथा अत्यन्त विह्वल हो दोनों हाथोंसे छाती और शिर पीटती रहती है ॥७३॥


हा लक्ष्मीधर सञ्जात जननीमेहि जीवय । द्रुतं वाक्यं प्रयच्छेति विलापं सा निषेवते ॥७४॥

अर्थ: ‘हाय लक्ष्मण बेटा ! आओ माताको जीवित करो, शीघ्र ही वचन बोलो’ इस प्रकार वह निरन्तर विलाप करती रहती है ॥७४॥


तनयायोगतीव्राग्निज्वालालीढशरीरके । दर्शनामृतधाराभिर्मातरौ नयतं शमम् ॥७५॥

अर्थ: पुत्रोंके वियोगरूपी तीव्र अग्निकी ज्वालाओंसे जिनके शरीर व्याप्त हैं ऐसी दोनों माताओंको दर्शनरूपी अमृतकी धाराओंसे शान्ति प्राप्त कराओ ॥७५॥


एवमुक्तं निशम्यैतौ सञ्जातौ दुःखितौ भृशम् । विमुक्तास्रौ समाश्वासं खेचरेशैरुपाहृतौ ॥७६॥

अर्थ: यह सुनकर राम, लक्ष्मण दोनों भाई अत्यन्त दुःखी हो उठे, उनके नेत्रोंसे आँसू निकलने लगे । तब विद्याधरोंने उन्हें सान्त्वना प्राप्त कराई ॥७६॥


उवाच वचनं पद्मः कथञ्चिद्धैर्यमागतः । अहो महोपकारोऽयमस्माकं भवता कृतः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर किसी तरह धैर्यको प्राप्त हुए रामने कहा कि अहो ऋषे ! आपने हमारा बड़ा उपकार किया ॥७७॥


विकर्मणा स्मृतेरेव जननी नः परिच्युता । स्मारिता भवता साऽहं किमतोऽन्यन्महत्प्रियम् ॥७८॥

अर्थ: खोटे कर्मके उदयसे माता हम लोगोंकी स्मृतिसे ही छूट गई थी सो आपने उसका हमें स्मरण करा दिया इससे प्रिय बात और क्या हो सकती है ? ॥७८॥


पुण्यवान् स नरो लोके यो मातुर्विनये स्थितः । कुरुते परिशुश्रूषां किङ्करत्वमुपागतः ॥७९॥

अर्थ: संसारमें वह मनुष्य बड़ा पुण्यात्मा है जो माताकी विनयमें तत्पर रहता है तथा किङ्करभावको प्राप्त हो उसकी सेवा करता है ॥७९॥


एवं मातृमहास्नेहरसप्लावितमानसः । अपूजयदवद्वारं लक्ष्मणेन समं नृपः ॥८०॥

अर्थ: इस प्रकार माताके महास्नेहरूपो रससे जिनका मन आर्द्र हो रहा था ऐसे राजा रामचन्द्रने लक्ष्मणके साथ नारदकी बहुत पूजा की ॥८०॥


अतिसम्भ्रान्तचित्तश्च समाहूय विभीषणम् । प्रभामण्डलसुग्रीवसन्निधावित्यभाषत ॥८१॥

महेन्द्रभवनाकारे भवनेऽस्मिन् विभीषण । तव नो विदितोऽस्माभिर्यातः कालो महानपि ॥८२॥

अर्थ: और अत्यन्त संभ्रान्त-चित्त हो विभीषणको बुलाकर भामण्डल तथा सुग्रीवके समीप इस प्रकार कहा कि हे विभीषण ! इन्द्रभवनके समान आपके इस भवनमें हम लोगोंका बिना जाने ही बहुत भारी काल व्यतीत हो गया है ॥८१-८२॥


ग्रैष्मादित्यांशुसन्तानतापितस्यैव सत्सरः । चिरादवस्थितं चित्ते मातृदर्शनमद्य मे ॥८३॥

स्मृतमात्रवियोगाग्नितापितान्यतिमात्रकम् । तद्दर्शनाम्बुनाङ्गानि प्रापयाम्यतिनिर्वृतिम् ॥८४॥

अर्थ: जिस प्रकार ग्रीष्मकालीन सूर्यकी किरणोंके समूहसे सन्तापित मनुष्यके हृदयमें सदा उत्तम सरोवर विद्यमान रहता है उसी प्रकार हमारे हृदयमें यद्यपि चिरकालसे माताके दर्शनकी लालसा विद्यमान थी तथापि आज उस वियोगाग्निके स्मरण मात्रसे मेरे अङ्ग-अङ्ग अत्यन्त सन्तप्त हो उठे हैं सो मैं माताके दर्शन रूपी जलके द्वारा उन्हें अत्यन्त शान्ति प्राप्त कराना चाहता हूँ ॥८३-८४॥


अयोध्यानगरीं द्रष्टुं मनो मेऽत्युत्सुकं स्थितम् । सा हि माता द्वितीयेव स्मरयत्यधिकं वरा ॥८५॥

अर्थ: आज अयोध्यानगरीको देखनेके लिए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा है क्योंकि वह दूसरी माताके समान मुझे अधिक स्मरण दिला रही है ॥८५॥


ततो विभीषणोऽवोचत् स्वामिन्नेवं विधीयताम् । यथाज्ञापयसि स्वान्तं देवस्योपैतु शान्तताम् ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर विभीषणने कहा कि हे स्वामिन् ! जैसी आज्ञा हो वैसा कीजिये । आपका हृदय शान्तिको प्राप्त हो यही हमारी भावना है ॥८६॥


प्रेष्यन्ते नगरीं दूता वार्तां ज्ञापयितुं शुभाम् । भवतोश्चागमं येन जनन्यौ व्रजतः सुखम् ॥८७॥

अर्थ: हम माताओंको यह शुभ वार्ता सूचित करने के लिए अयोध्यानगरीके प्रति दूत भेजते हैं जिससे आपका आगमन जान कर माताएँ सुखको प्राप्त होंगी ॥८७॥


त्वया तु षोडशाहानि स्थातुमत्र पुरे विभो । प्रसादो मम कर्त्तव्यः समाश्रितसुवत्सल ॥८८॥

अर्थ: हे विभो ! हे आश्रितजनवत्सल ! आप सोलह दिन तक इस नगरमें ठहरनेके लिए मेरे ऊपर प्रसन्नता कीजिये ॥८८॥


इत्युक्त्वा मस्तकं न्यस्य समणिं रामपादयोः । तावद् विभीषणस्तस्थौ यावत्स प्रतिपन्नवान् ॥८९॥

अर्थ: इतना कह कर विभीषणने अपना मणि सहित मस्तक रामके चरणोंमें रख दिया और तब तक रखे रहा तब तक कि उन्होंने स्वीकृत नहीं कर लिया ॥८९॥


अथ प्रासादमूर्धस्था नित्यदक्षिणदिङ्मुखी । दूरतः खेचरान् वीक्ष्य जगादेत्यपराजिता ॥९०॥

पश्य पश्य सुदूरस्थानेतान् कैकयि खेचरान् । आयातोऽभिमुखानाशु वातेरितघनोपमान् ॥९१॥

अर्थ: अथानन्तर महलके शिखर पर खड़ी अपराजिता ( कौशल्या ) निरन्तर दक्षिण दिशाकी ओर देखती रहती थी । एक दिन उसने दूरसे विद्याधरोंको आते देख समीपमें खड़ी कैकयी ( सुमित्रा ) से कहा कि हे कैकयि ! देख देख वे बहुत दूरी पर वायुसे प्रेरित मेघोंके समान विद्याधर शीघ्रतासे इसी ओर आ रहे हैं ॥९०-९१॥


अद्यैते श्राविकेऽवश्यं कथयिष्यन्ति शोभनाम् । वार्त्तां सम्प्रेषिता नूनं सानुजेन सुतेन मे ॥९२॥

अर्थ: हे श्राविके ! जान पड़ता है कि ये छोटे भाई सहित मेरे पुत्रके द्वारा भेजे हुए हैं और आज अवश्य ही शुभ वार्ता कहेंगे ॥९२॥


सर्वथैवं भवत्वेतदिति यावत् कथा तयोः । वर्त्तते तावदायाताः समीपं दूतखेचराः ॥९३॥

अर्थ: कैकयीने कहा कि जैसा आप कहती हैं सर्वथा ऐसा ही हो । इस तरह जब तक उन दोनोंमें वार्ता चल रही थी तब तक वे विद्याधर दूत समीपमें आ गये ॥९३॥


उत्सृजन्तश्च पुष्पाणि समुत्तीर्य नभस्तलात् । प्रविश्य भवनं ज्ञाताः प्रहृष्टा भरतं ययुः ॥९४॥

अर्थ: पुष्पवर्षा करते हुए उन्होंने आकाशसे उतर कर भवनमें प्रवेश किया और अपना परिचय दे हर्षित होते हुए वे भरतके पास गये ॥९४॥


राज्ञा प्रमोदिना तेन सन्मानं समुपाहृताः । आशीर्वादप्रसक्तास्ते योग्यासनसमाश्रिताः ॥९५॥

अर्थ: राजा भरतने हर्षित हो उनका सन्मान किया और आशीर्वाद देते हुए वे योग्य आसनोंपर आरूढ़ हुए ॥९५॥


यथावद्वृत्तमाचख्युरतिसुन्दरचेतसः । पद्माभं बलदेवत्वं प्राप्तं लाङ्गललक्ष्मणम् ॥९६॥

उत्पन्नचक्ररत्नं च लक्ष्मणं हरितामितम् । तयोर्भरतवास्यस्य स्वामित्वं परमोन्नतम् ॥९७॥

रावणः पञ्चतां प्राप्ते लक्ष्मणेन हते रणे । दीक्षामिन्द्रजितादीनां वन्दिगृहमुपेयुषाम् ॥९८॥

तार्क्ष्यकेसरिसद्विद्याप्राप्तिं साधुप्रसादतः । विभीषणमहाप्रीतिं भोगं लङ्काप्रवेशनम् ॥९९॥

अर्थ: सुन्दर चित्तको धारण करनेवाले उन विद्याधर दूतोंने सब समाचार यथायोग्य कहे । उन्होंने कहा कि रामको बलदेव पद प्राप्त हुआ है । लक्ष्मणके चक्ररत्न प्रकट हुआ है तथा उन्हें नारायण पद मिला है । राम-लक्ष्मण दोनोंको भरत क्षेत्रका उत्कृष्ट स्वामित्व प्राप्त हुआ है । युद्धमें लक्ष्मणके द्वारा घायल हो रावण मृत्युको प्राप्त हुआ है, वन्दीगृहमें रहनेवाले इन्द्रजित् आदिने जिन दीक्षा धारण कर ली है, देशभूषण और कुलभूषण मुनिका उपसर्ग दूर करनेसे गरुडेन्द्र प्रसन्न हुआ था सो उसके द्वारा राम-लक्ष्मणको सिंहवाहिनी तथा गरुडवाहिनी विद्याएँ प्राप्त हुई हैं । विभीषणके साथ महाप्रेम उत्पन्न हुआ है, उत्तमोत्तम भोग-सम्पदाएँ प्राप्त हुई हैं तथा लंकामें उनका प्रवेश हुआ है ॥९६-९९॥


एवं पद्माभलक्ष्मीभृदुदयस्तुतिसम्मदी । स्रक्ताम्बूलसुगन्धाद्यैर्दूतानभ्यर्हयन्नृपः ॥१००॥

अर्थ: इस प्रकार राम-लक्ष्मणके अभ्युदयसूचक समाचारोंसे प्रसन्न हुए राजा भरतने उन दूतोंका माला पान तथा सुगन्ध आदिके द्वारा सन्मान किया ॥१००॥


गृहीत्वा तांस्तयोर्मात्रोः सकाशं भरतो ययौ । शोकिन्यौ बाष्पपूर्णाक्ष्यौ ते समानन्दिते च तैः ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर भरत उन विद्याधरोंको लेकर उन माताओंके पास गया और विद्याधरोंने निरन्तर शोक करने तथा अश्रुपूर्ण नेत्रोंको धारण करनेवाली उन माताओंको आनन्दित किया ॥१०१॥


पद्माभचक्रभृन्मात्रोर्दूतानां च सुसंकथा । मनःप्रह्लादिनी यावद् वर्त्तते भूतिशंसिनी ॥१०२॥

रवेरावृत्य पन्थानं तावत्तत्र सहस्रशः । हेमरत्नादिसम्पूर्णैर्वाहनैरतिगत्वरैः ॥१०३॥

विचित्रजलदाकाराः प्रादुर्वैद्याधरा गणाः । जिनावतरणे काले देवा इव महौजसः ॥१०४॥

अर्थ: राम-लक्ष्मणकी माताओं और उन विद्याधर दूतोंके बीच मनको प्रसन्न करने तथा उनकी बिभूतिको सूचित करनेवाली यह मनोहर कथा जबतक चलती है तबतक सुवर्ण और रत्नादिसे परिपूर्ण हजारों शीघ्रगामी वाहनोंसे सूर्यका मार्ग रोककर रङ्ग-विरङ्गे मेघोंका आकार धारण करनेवाले हजारों विद्याधरोंके झुण्ड उस तरह आ पहुँचे जिस तरह कि जिनेन्द्रावतारके समय महातेजस्वी देव आ पहुँचते हैं ॥१०२-१०४॥


ततस्ते व्योमपृष्ठस्था नानारत्नमयीं पुरि । वृष्टिं मुमुचुरुद्योतपूरिताशां समन्ततः ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर आकाशमें स्थित उन विद्याधरोंने सब ओरसे दिशाओंको प्रकाशके द्वारा परिपूर्ण करनेवाली नानारत्नमयी वृष्टि छोड़ी ॥१०५॥


पूरितायामयोध्यायामेकैकस्य कुटुम्बिनः । गृहेषु भूधराकाराः कृता हेमादिराशयः ॥१०६॥

अर्थ: अयोध्याके भर जाने पर हर एक कुटुम्बके घरमें पर्वतोंके समान सुवर्णादिकी राशियाँ लग गईं ॥१०६॥


जन्मान्तरकृतश्लाघ्यकर्मा स्वर्गच्युतोऽथवा । लोकोऽयोध्यानिवासी यो येन प्राप्तस्तथा श्रियम् ॥१०७॥

अर्थ: जान पड़ता था कि अयोध्यानिवासी लोगोंने जन्मान्तरमें पुण्य कर्म किये थे अथवा स्वर्गसे चयकर वहाँ आये थे इसीलिए तो उन्हें उस समय उस प्रकारकी लक्ष्मी प्राप्त हुई थी ॥१०७॥


तस्मिन्नेव पुरे दत्ता घोषणाऽनेन वस्तुना । मणिचामीकराद्येन यो न तृप्तिमुपागतः ॥१०८॥

प्रविश्य स नरः स्त्री वा निर्भयं पार्थिवालयम् । द्रव्येण पूरयत्वाऽऽत्मभवनं निजयेच्छया ॥१०९॥

अर्थ: उसी समय भरतने नगरमें यह घोषणा दिलवाई कि जो रत्न तथा स्वर्णादि वस्तुओंसे सन्तोषको प्राप्त नहीं हुआ हो वह पुरुष अथवा स्त्री निर्भय हो राजमहलमें प्रवेश कर अपनी इच्छानुसार द्रव्यसे अपने घरको भर ले ॥१०८-१०९॥


श्रुत्वा तां घोषणां सर्वस्तस्यां जनपदोऽगदत् । अस्माकं भवने शून्यं स्थानमेव न विद्यते ॥११०॥

अर्थ: उस घोषणाको सुनकर अयोध्यावासी लोगोंने आकर कहा कि हमारे घरमें खाली स्थान ही नहीं है ॥११०॥


विस्मयादित्यसम्पर्कविकचाननपङ्कजाः । शशंसुर्वनिताः पद्मं कृतदारिद्र्यनाशनाः ॥१११॥

अर्थ: विस्मयरूपी सूर्यके संपर्कसे जिनके मुख कमल खिल रहे थे तथा जिनकी दरिद्रता नष्ट हो चुकी थी ऐसी स्त्रियाँ रामकी स्तुति कर रही थीं ॥१११॥


आगत्य बहुभिस्तावद्दक्षैः खेचरशिल्पिभिः । रूप्यहेमादिभिर्लेपैर्लिप्ता भवनभूमयः ॥११२॥

अर्थ: उसी समय बहुतसे चतुर विद्याधर कारीगरोंने आकर चाँदी तथा सुवर्णादिके लेपसे भवनकी भूमियोंको लिप्त किया ॥११२॥


चैत्यागाराणि दिव्यानि जनितान्यतिभूरिशः । महाप्रासादमालाश्च विन्ध्यकूटावलीसमाः ॥११३॥

अर्थ: अच्छे-अच्छे बहुतसे जिन-मन्दिर तथा विन्ध्याचलके शिखरोंके समान अत्यन्त उन्नत बड़े-बड़े महलोंके समूहकी रचना की ॥११३॥


सहस्रस्तम्भसम्पन्ना मुक्तादामविराजिताः । रचिता मण्डपाश्चित्राश्चित्रपुस्तोपशोभिताः ॥११४॥

अर्थ: जो हजारों खम्भोंसे सहित थे, मोतियोंकी मालाओंसे सुशोभित थे, तथा नाना प्रकारके पुतलोंसे युक्त थे ऐसे विविध प्रकारके मण्डप बनाये ॥११४॥


खचितानि महारत्नैर्द्वाराणि करभास्वरैः । पताकालीसमायुक्तास्तोरणौघाः समुच्छ्रिताः ॥११५॥

अर्थ: दरवाजे किरणोंसे चमकते हुए बड़े-बड़े रत्नोंसे खचित किये तथा पताकाओंकी पंक्तिसे युक्त तोरणोंके समूह खड़े किये ॥११५॥


अनेकाश्चर्यसम्पूर्णा प्रवृत्तसुमहोत्सवा । साऽयोध्या नगरी जाता लङ्कादिजयकारिणी ॥११६॥

अर्थ: इस तरह जो अनेक आश्चर्योंसे परिपूर्ण थी तथा जिसमें निरन्तर महोत्सव होते रहते थे ऐसी वह अयोध्यानगरी लंका आदिको जीतनेवाली हो रही थी ॥११६॥


महेन्द्रशिखराभेषु चैत्यगेहेषु सन्तताः । अभिषेकोत्सवा लग्नाः सङ्गीतध्वनिनादिताः ॥११७॥

अर्थ: महेन्द्र गिरिके शिखरोंके समान आभावाले जिन मन्दिरोंमें निरन्तर संगीतध्वनिके साथ अभिषेकोत्सव होते रहते थे ॥११७॥


भ्रमरैरुपगीतानि समानि सजलैर्घनैः । उद्यानानि सपुष्पाणि जातानि सफलानि च ॥११८॥

अर्थ: जो जंलभृत मेघोंके समान श्यामवर्ण थे तथा जिनपर भ्रमर गुञ्जार करते रहते थे ऐसे बाग-बगीचे उत्तमोत्तम फूलों और फलोंसे युक्त हो गये थे ॥११८॥


बहिराशास्वशेषासु वनैर्मुदितजन्तुभिः । नन्दनप्रतिमैर्जाता नगरी सुमनोहरा ॥११९॥

अर्थ: बाहरकी समस्त दिशाओंमें अर्थात् चारों ओर प्रमुदित जन्तुओंसे युक्त नन्दन वनके समान सुन्दर वनोंसे वह नगरी अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थी ॥११९॥


नवयोजनविस्तारा द्वादशायामसङ्गता । द्वयधिकानि तु षड्त्रिंशत्परिक्षेपेण पूरसौ ॥१२०॥

अर्थ: वह नगरी नौ योजन चौड़ी बारह योजन लम्बी और अड़तीस योजन परिधिसे सहित थी ॥१२०॥


दिनैः षोडशभिश्चारुनभोगोचरशिल्पिभिः । निर्मिता शंसितुं शक्या न सा वर्षशतैरपि ॥१२१॥

अर्थ: सोलह दिनोंमें चतुर विद्याधर कारीगरोंने अयोध्याको ऐसा बना दिया कि सौ वर्षोंमें भी उसकी स्तुति नहीं हो सकती थी ॥१२१॥


वाप्यः काञ्चनसोपाना दीर्घिकाश्च सुरोधसः । पद्मादिभिः समाकीर्णा जाता ग्रीष्मेऽप्यशोषिताः ॥१२२॥

अर्थ: जिनमें सुवर्णकी सीढ़ियाँ लगी थीं ऐसी वापिकाएँ तथा जिनके सुन्दर-सुन्दर तट थे ऐसी परिखाएँ कमल आदिके फूलोंसे आच्छादित हो गईं और उनमें इतना पानी भर गया कि ग्रीष्म ऋतुमें भी नहीं सूख सकती थीं ॥१२२॥


स्नानक्रीडातिसम्भोग्यास्तटस्थितजिनालयाः । दधुस्ताः परमां शोभां वृक्षपालीसमावृताः ॥१२३॥

अर्थ: जो स्नान सम्बन्धी क्रीड़ासे उपभोग करने योग्य थीं, जिनके तटोंपर उत्तमोत्तम जिनालय स्थित थे तथा जो हरेभरे वृक्षोंकी कतारोंसे सुशोभित थीं ऐसी परिखाएँ उत्तम शोभा धारण करती थीं ॥१२३॥


कृतां स्वर्गपुरीतुल्यां ज्ञात्वा तां नगरीं हली । श्वोयानशंसिनीं स्थाने घोषणां समदापयत् ॥१२४॥

अर्थ: अयोध्या-पुरीको स्वर्गपुरीके समानकी हुई जानकर हलके धारक श्रीरामने स्थान-स्थान पर आगामी दिन प्रस्थानको सूचित करनेवाली घोषणा दिलवाई ॥१२४॥


यदैव वार्तां गगनाङ्गणायनो मुनिस्तयोर्मातृसमुद्भवां जगौ । ततः प्रभृत्येव हि सीरिचक्रिणौ सदा सवित्र्यौ हृदयेन बभ्रतुः ॥१२५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! आकाशरूपी आँगनमें विहार करनेवाले नारद ऋषिने जबसे माताओं सम्बन्धी समाचार सुनाया था तभीसे राम-लक्ष्मण अपनी-अपनी माताओंको हृदयमें धारण कर रहे थे ॥१२५॥


अचिन्तितं कृत्स्नमुपैति चारुतां कृतेन पुण्येन पुराऽसुधारिणाम् । ततो जनः पुण्यपरोऽस्तु सन्ततं न येन चिन्तारवितापमश्नुते ॥१२६॥

अर्थ: पूर्वभवमें किये हुए पुण्यकर्मके प्रभावसे प्राणियोंके समस्त अचिन्तित कार्य सुन्दरताको प्राप्त होते हैं इसलिए समस्तलोग सदा पुण्य संचय करनेमें तत्पर रहें जिससे कि उन्हें चिन्ता रूपी सूर्यका संताप न भोगना पड़े ॥१२६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे साकेतनगरीवर्णनं नामैकाशीतितमं पर्व ॥८१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें अयोध्याका वर्णन करनेवाला इक्यासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८१॥

८२. द्व्यशीतितमं पर्व (रामलक्ष्मणसमागमाभिधानं)

अथोदयमिते भानौ पद्मनारायणौ तदा । यानं पुष्पकमारुह्य साकेतां प्रस्थितौ शुभौ ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर सूर्योदय होने पर शुभ चेष्टाओंके धारक राम और लक्ष्मण पुष्पक विमानमें आरूढ हो अयोध्याकी ओर चले ॥१॥


परिवारसमायुक्ता विविधैर्यानवाहनैः । विद्याधरेश्वरा गन्तुं सक्तास्तत्सेवनोद्यताः ॥२॥

अर्थ: उनकी सेवामें तत्पर रहनेवाले अनेक विद्याधरोंके अधिपति अपने-अपने परिवारके साथ नाना प्रकारके यानों और वाहनों पर सवार हो साथ चले ॥२॥


छत्रध्वजनिरुद्धार्ककिरणं वायुगोचरम् । समाश्रिता महीं दूरं पश्यन्तो गिरिभूषिताम् ॥३॥

अर्थ: छत्रों और ध्वजाओंसे जहाँ सूर्यकी किरणें रुक गई थीं ऐसे आकाश में स्थित सब लोग पर्वतोंसे भूषित पृथिवीको दूरसे देख रहे थे ॥३॥


विलसद्विविधप्राणिसङ्घातं क्षारसागरम् । व्यतीत्य खेचरा लीलां वहन्तो यान्ति हर्षिणः ॥४॥

अर्थ: जिसमें नाना प्रकारके प्राणियोंके समूह क्रीड़ा कर रहे थे ऐसे लवण-समुद्रको लाँघ कर हर्षसे भरे वे विद्याधर लीला धारण करते हुए जा रहे थे ॥४॥


पद्मस्याङ्कगता सीता सती गुणसमुत्कटा । लक्ष्मीरिव महाशोभा पुरी न्यस्तेक्षणा जगौ ॥५॥

जम्बूद्वीपतलस्येदं मध्ये नाथ किमीक्ष्यते । अत्यन्तमुज्ज्वलं पद्मस्ततोऽभाषत सुन्दरीम् ॥६॥

देवि यत्र पुरा देवैर्मुनिसुव्रततीर्थकृत् । देवदेवप्रभुर्बाल्ये हृष्टैर्नीतोऽभिषेचनम् ॥७॥

अर्थ: रामके समीप बैठी गुणगणको धारण करनेवाली सती सीता लक्ष्मीके समान महाशोभाको धारण कर रही थी । वह सामनेकी ओर दृष्टि डालती हुई रामसे बोली कि हे नाथ ! जम्बूद्वीपके मध्यमें यह अत्यन्त उज्ज्वल वस्तु क्या दिख रही है ? तब रामने सुन्दरी सीतासे कहा कि हे देवि ! जहाँ पहले बाल्यावस्थामें देवाधिदेव भगवान् मुनि-सुव्रतनाथका हर्षसे भरे देवोंने अभिषेक किया था ॥५-७॥


सोऽयं रत्नमयैस्तुङ्गैः शिखरैश्चित्तहारिभिः । विराजते नगाधीशो मन्दरो नाम विश्रुतः ॥८॥

अर्थ: यह वही रत्नमय ऊँचे मनोहारी शिखरोंसे युक्त मन्दर नामका प्रसिद्ध पर्वतराज सुशोभित हो रहा है ॥८॥


अहो वेगादतिक्रान्तं विमानं पदवीं पराम् । एहि भूयो बलं याम इति गत्वा पुनर्जगौ ॥९॥

एतत्तु दण्डकारण्यमिभाभोगमहातमः । लङ्कानाथेन यत्रस्था हृता त्वं स्वोपघातिना ॥१०॥

अर्थ: ‘अहो ! वेगके कारण विमान दूसरे मार्गमें आ गया है; आओ अब पुनः सेनाके पास चलें’ यह कह तथा सेना के पास जाकर राम बोले कि हे प्रिये ! यह वही दण्डक वन है जहाँ काले-काले हाथियोंकी घटासे महाअन्धकार फैल रहा है तथा जहाँ पर बैठी हुई तुम्हें अपना घात करनेवाला रावण हर कर ले गया था ॥९-१०॥


चारणश्रमणौ यत्र त्वया सार्द्धं मया तदा । पारणं लम्भितौ सैषा सुभगे दृश्यते नदी ॥११॥

अर्थ: हे सुन्दरि ! यह वही नदी दिखाई देती है जहाँ मेरे साथ तुमने दो चारण ऋद्धिधारी मुनियोंके लिए पारणा कराई थी ॥११॥


सोऽयं सुलोचने भूभृद्वंशोऽभिख्योऽभिलक्ष्यते । दृष्टौ यत्र मुनी युक्तौ देशगोत्रविभूषणौ ॥१२॥

अर्थ: हे सुलोचने ! यह वही वंशस्थविल नामका पर्वत दिखाई देता है जहाँ एक साथ विराजमान देशभूषण और कुलभूषण मुनियोंके दर्शन किये थे ॥१२॥


कृतं मया ययोरासीद् भवत्या लक्ष्मणेन च । प्रातिहार्यं ततो यातं केवलं शिवसौख्यदम् ॥१३॥

अर्थ: जिन मुनियोंकी मैंने, तुमने तथा लक्ष्मणने उपसर्ग दूर कर सेवा की थी और जिन्हें मोक्ष सुखका देनेवाला केवलज्ञान प्राप्त हुआ था ॥१३॥


वालिखिल्यपुरं भद्रे तदेतद् यत्र लक्ष्मणः । प्राप कल्याणमालाख्यां कन्यां काञ्चित्त्वया समाम् ॥१४॥

अर्थ: हे भद्रे ! यह बालिखिल्य का नगर है जहाँ लक्ष्मणने तुम्हारे समान कल्याणमाला नामकी अद्भुत कन्या प्राप्त की थी ॥१४॥


दशाङ्गभोगनगरमदस्तद् दृश्यते प्रिये । रूपवत्याः पिता वज्रश्रवा यच्छ्रावकः परः ॥१५॥

अर्थ: हे प्रिये ! यह दशाङ्गभोग नामका नगर दिखाई देता है जहाँ रूपवतीका पिता वज्रकर्ण नामका उत्कृष्ट श्रावक रहता था ॥१५॥


पुनरालोक्य धरणीं पुनः पप्रच्छ जानकी । कान्तेयं नगरी कस्य खेचरेशस्य दृश्यते ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर पृथिवीकी ओर देख कर सीताने पुनः पूछा कि हे कान्त ! यह नगरी किस विद्याधर राजाकी दिखाई देती है ॥१६॥


विमानसदृशैर्गेहैरियमत्यन्तमुत्कटा । न जातुचिन्मया दृष्टा त्रिविष्टपविडम्बिनी ॥१७॥

अर्थ: यह नगरी विमानोंके समान उत्तम भवनोंसे अत्यन्त व्याप्त है तथा स्वर्गकी विडम्बना करनेवाली ऐसी नगरी मैंने कभी नहीं देखी ॥१७॥


जानकीवचनं श्रुत्वा दिशश्चालोक्य मन्थरम् । क्षणं विभ्रान्तचेतस्को ज्ञात्वा पद्मः स्मिती जगौ ॥

पूरयोध्या प्रिये सेयं नूनं खेचरशिल्पिभिः । अन्येव रचिता भाति जितलङ्का परद्युतिः ॥१९॥

अर्थ: सीताके वचन सुन तथा धीरे-धीरे दिशाओंकी ओर देख रामका चित्त स्वयं क्षणभरके लिए विभ्रममें पड़ गया । परन्तु बादमें सब समाचार जान कर मन्द हास्य करते हुए बोले कि हे प्रिये ! यह अयोध्या नगरी है । जान पड़ता है कि विद्याधर कारीगरोंने इसकी ऐसी रचना की है कि यह अन्य नगरीके समान जान पड़ने लगी है, इसने लंकाको जीत लिया है तथा उत्कृष्ट कान्तिसे युक्त है ॥१८-१९॥


ततोऽत्युग्रं विहायःस्थं विमानं सहसा परम् । द्वितीयादित्यसङ्काशं वीक्ष्य क्षुब्धा नगर्यसौ ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर द्वितीय सूर्यके समान देदीप्यमान तथा आकाशके मध्यमें स्थित विमानको सहसा देख नगरी क्षोभको प्राप्त हो गई ॥२०॥


आरुह्य च महानागं भरतः प्राप्तसम्भ्रमः । विभूत्या परया युक्तः शक्रवन्निरगात् पुरः ॥२१॥

अर्थ: क्षोभको प्राप्त हुआ भरत महागजपर सवार हो महाविभूतियुक्त होता हुआ इन्द्रके समान नगरीसे बाहर निकला ॥२१॥


तावदैक्षत सर्वाशाः स्थगिता गगनायनैः । नानायानविमानस्थैर्विचित्रर्द्धिसमन्वितैः ॥२२॥

अर्थ: उसी समय उसने नाना यानों और विमानोंमें स्थित तथा विचित्र ऋद्धियोंसे युक्त विद्याधरोंसे समस्त दिशाओंको आच्छादित देखा ॥२२॥


दृष्ट्वा भरतमायान्तं भूमिस्थापितपुष्पकौ । पद्मलक्ष्मीधरौ यातौ समीपत्वं सुसम्मदौ ॥२३॥

अर्थ: भरतको आता हुआ देख जिन्होंने पुष्पकविमानको पृथिवी पर खड़ा कर दिया था ऐसे राम और लक्ष्मण हर्षित हो समीपमें आये ॥२३॥


समीपौ ताविती दृष्ट्वा गजादुत्तीर्य कैकयः । पूजामर्घशतैश्चक्रे तयोः स्नेहादिपूरितैः ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर उन दोनोंको समीपमें आया देख भरतने हाथीसे उतर कर स्नेहादिसे पूरित सैकड़ों अर्घोंसे उनकी पूजा की ॥२४॥


विमानशिखरात्तौ तं निष्क्रम्य प्रीतिनिर्भरम् । केयूरभूषितभुजावग्रजावालिलिङ्गतुः ॥२५॥

अर्थ: तत्पश्चात् विमानके शिखरसे निकल कर बाजूबंदोंसे सुशोभित भुजाओंको धारण करनेवाले दोनों अग्रजोंने बड़े प्रेमसे भरतका आलिङ्गन किया ॥२५॥


दृष्ट्वा पृष्टौ च कुशलं कृतशंसनसत्कथौ । भरतेन समेतौ तावारूढौ पुष्पकं पुनः ॥२६॥

अर्थ: एक दूसरेको देख कर तथा कुशल समाचार पूछ कर राम-लक्ष्मण पुनः भरतके साथ पुष्पकविमान पर आरूढ हुए ॥२६॥


प्रविशन्ति ततः सर्वे क्रमेण कृतसत्क्रियाम् । अयोध्यानगरीं चित्रपताकाशबलीकृताम् ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी सजावट की गई थी और जो नाना प्रकारकी पताकाओंसे चित्रित थी ऐसी अयोध्या नगरीमें क्रमसे सबने प्रवेश किया ॥२७॥


सङ्घट्टसङ्कतैर्यानैर्विमानैर्यायिभी रथैः । अनेकपघटाभिश्च मार्गोऽभूद् व्यवकाशकः ॥२८॥

अर्थ: धक्का धूमीके साथ चलनेवाले यानों, विमानों, घोड़ों, रथों और हाथियोंकी घटाओंसे अयोध्याके मार्ग अवकाशरहित हो गये ॥२८॥


प्रलम्बजलभृत्तुल्यास्तूर्यघोषाः समुद्ययुः । शङ्खकोटिरवोन्मिश्रा भम्भाभेरीमहारवाः ॥२९॥

अर्थ: लूमते हुए मेघोंकी गर्जनाके समान तुरहीके शब्द तथा करोड़ों शङ्खोंके शब्दोंसे मिश्रित भंभा और भेरियोंके शब्द होने लगे ॥२९॥


पटहानां पटीयांसो मन्द्राणां मन्द्रता ययुः । लम्पानां कम्पशम्पानां धुन्धूनां मधुरा भृशम् ॥३०॥

अर्थ: बड़े-बड़े नगाड़ोंके जोरदार शब्द तथा बिजलीके समान चञ्चल लंप और धुन्धुओंके मधुर शब्द गम्भीरताको प्राप्त हो रहे थे ॥३०॥


झल्लाम्लातकहक्कानां हैकहुङ्कारसङ्गिनाम् । गुञ्जारटितनाम्नां च वादित्राणां महास्वनाः ॥३१॥

सुकलाः काहला नादा घना हलहलारवाः । अट्टहासास्तुरङ्गेभसिंहव्याघ्रादिनिस्वनाः ॥३२॥

वंशस्वनानुगामीनि गीतानि विविधानि च । विनर्दितानि भाण्डानां वन्दिनां पठितानि च ॥३३॥

सङ्क्रीडितानि रम्याणि रथानां सूर्यतेजसाम् । वसुधाक्षोभघोषाश्च प्रतिशब्दाश्च कोटिशः ॥३४॥

अर्थ: हैक नामक वादियोंकी हुँकारसे सहित झालर, अम्लातक, हक्का, और गुञ्जा रटित नामक वादित्रोंके महाशब्द, काहलोंके अस्फुट एवं मधुर शब्द, निविडताको प्राप्त हुए हलहलाके शब्द, अट्टहासके शब्द, घोड़े, हाथी, सिंह और व्याघ्रादिके शब्द, बाँसुरीके स्वरसे मिले हुए नाना प्रकारके संगीतके शब्द, भाँड़ोंके विशाल शब्द, वंदीजनोंके विरद पाठ, सूर्यके समान तेजस्वी रथोंकी मनोहर चीत्कार, पृथिवीके कम्पनसे उत्पन्न हुए शब्द और इन सबकी करोड़ों प्रकारकी प्रतिध्वनियोंके शब्द सब एक साथ मिलकर विशाल शब्द कर रहे थे ॥३१-३४॥


एवं विद्याधराधीशैर्बिभ्रद्भिः परमां श्रियम् । वृतौ विविशतः कान्तौ पुरं पद्माभचक्रिणौ ॥३५॥

अर्थ: इस प्रकार परम शोभाको धारण करनेवाले विद्याधर राजाओंसे घिरे हुए सुन्दर शरीरके धारक राम और लक्ष्मणने नगरीमें प्रवेश किया ॥३५॥


आसन् विद्याधरा देवा इन्द्रौ पद्माभचक्रिणौ । अयोध्यानगरी स्वर्गो वर्णना तत्र कीदृशी ॥३६॥

अर्थ: उस समय विद्याधर देव थे, राम-लक्ष्मण इन्द्र थे और अयोध्यानगरी स्वर्ग थी तब उनका वर्णन कैसा किया जाय ? ॥३६॥


पद्मानननिशानाथं वीक्ष्य लोकमहोदधिः । कलध्वनिर्ययौ वृद्धिमत्यावर्त्तनवेलया ॥३७॥

अर्थ: श्रीरामके मुख रूपी चन्द्रमाको देखकर मधुरध्वनि करनेवाला लोक रूपी सागर, बढ़ती हुई वेलाके साथ वृद्धिको प्राप्त हो रहा था ॥३७॥


विज्ञायमानपुरुषैः पूज्यमानौ पदे पदे । जय वर्द्धस्व जीवेति नन्देति च कृताशिषौ ॥३८॥

अर्थ: पहिचानमें आये पुरुष जिन्हें पद-पद पर पूज रहे थे, तथा जयवन्त रहो, बढ़ते रहो, जीते रहो, समृद्धिमान् होओ, इत्यादि शब्दोंके द्वारा जिन्हें स्थान-स्थान पर आशीर्वाद दिया जा रहा था ऐसे दोनों भाई नगरमें प्रवेश कर रहे थे ॥३८॥


अत्युत्तुङ्गविमानाभभवनानां शिरः स्थिताः । सुन्दर्यस्तौ विलोकन्त्यो विकचाम्भोजलोचनाः ॥३९॥

अर्थ: अत्यन्त ऊँचे विमान तुल्य भवनोंके शिखरों पर स्थित स्त्रियोंके नेत्रकमल राम लक्ष्मणको देखते ही खिल उठते थे ॥३९॥


सम्पूर्णचन्द्रसङ्काशं पद्मं पद्मनिभेक्षणम् । प्रावृषेण्यघनच्छायं लक्ष्मणं च सुलक्षणम् ॥४०॥

नार्यो निरीक्षितुं सक्ता मुक्ताशेषापरक्रियाः । गवाक्षान् वदनैश्चक्रुर्व्योमाम्भोजवनोपमान् ॥४१॥

अर्थ: पूर्ण चन्द्रमाके समान कमललोचन राम और वर्षाकालीन मेघके समान श्याम, सुन्दर लक्षणोंके धारक लक्ष्मणको देखनेके लिए तत्पर स्त्रियाँ अन्य सब काम छोड़ अपने मुखोंसे झरोखोंको कमल वनके समान कर रहीं थीं ॥४०-४१॥


राजन्नन्योन्यसम्पर्के निर्भरे सति योषिताम् । सृष्टाऽपूर्वा तदा वृष्टिश्छिन्नहारैः पयोधरैः ॥४२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि राजन् ! उस समय परस्परमें अत्यधिक सम्पर्क होने पर जिनके हार टूट गये थे ऐसी स्त्रियोंके पयोधरों अर्थात् स्तनरूपी पयोधरों अर्थात् मेघोंने अपूर्व वृष्टि की थी ॥४२॥


च्युतं मिपतितं भूमौ काञ्चीनूपुरकुण्डलम् । तासां तद्गतचित्तानां ध्वनयश्चैवमुद्गताः ॥४३॥

अर्थ: जिनके चित्त राम-लक्ष्मणमें लग रहे थे ऐसी स्त्रियोंकी मेखला, नूपुर और कुण्डल टूट-टूटकर पृथिवी पर पड़ रहे थे तथा उनमें परस्पर इस प्रकार वार्तालाप हो रहा था ॥४३॥


यस्यैपाङ्कगता भाति प्रिया गुणधरा सती । देवी विदेहजा सोऽयं पद्मनाभो महेक्षणः ॥४४॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि जिनकी गोदमें गुणोंको धारण करनेवाली यह राजा जनककी पुत्री पतिव्रता सीता प्रिया विद्यमान है यही विशाल नेत्रोंको धारण करनेवाले राम हैं ॥४४॥


निहतः प्रधने येन सुग्रीवाकृतितस्करः । वृत्रदैत्यपतेर्नप्ता स साहसगतिः खलः ॥४५॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि हाँ, ये वे ही राम हैं जिन्होंने सुग्रीवको आकृतिके चोर दैत्यराज वृत्रके नाती दुष्ट साहसगतिको युद्धमें मारा था ॥४५॥


अयं लक्ष्मीधरो येन शक्रतुल्यपराक्रमः । हतो लङ्केश्वरो युद्धे स्वेन चक्रेण वक्षसि ॥४६॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि ये इन्द्र तुल्य पराक्रमके धारी लक्ष्मण हैं जिन्होंने युद्धमें अपने चक्रसे वक्षःस्थल पर प्रहार कर रावणको मारा था ॥४६॥


सुग्रीवोऽयं महासत्त्वस्तनयोऽस्यायमङ्गदः । अयं भामण्डलाभिख्यः सीतादेव्याः सहोदरः ॥४७॥

देवेन जातमात्रः सन्नासीद् योऽपहृतस्तदा । मुक्तोऽनुकम्पया भूयो दृष्टो विद्याधरेन्दुना ॥४८॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि यह महाशक्तिशाली सुग्रीव है, यह उसका बेटा अंगद है, यह सीतादेवीका सगा भाई भामण्डल है जिसे उत्पन्न होते ही देवने पहले तो हर लिया था फिर दयासे छोड़ दिया था और चन्द्रगति विद्याधरने देखा था ॥४७-४८॥


उन्मादेन ( ? ) वने तस्मिन् गृहीत्वा च प्रमोदिना । पुत्रस्तवायमित्युक्त्वा पुष्यवत्यै समर्पितः ॥४९॥

एषोऽसौ दिव्यरत्नात्मकुण्डलोद्योतिताननः । विद्याधरमहाधीशो भाति सार्थकशब्दितः ॥५०॥

अर्थ: यही नहीं किन्तु हर्षसे युक्त हो उसे वनमें झेला था तथा ‘यह तुम्हारा पुत्र है’ इस प्रकार कहकर रानी पुष्यवतीके लिए सौंपा था । अपने दिव्य रत्नमयी कुण्डलोंसे जिसका मुख देदीप्यमान हो रहा है तथा जो सार्थक नामका धारी है ऐसा यह विद्याधरोंका राजा भामण्डल अत्यधिक शोभित हो रहा है ॥४९-५०॥


चन्द्रोदरसुतः सोऽयं सखि श्रीमान् विराधितः । श्रीशैलः पवनस्याऽयं पुत्रो वानरकेतनः ॥५१॥

अर्थ: हे सखि ! यह चन्द्रोदरका लड़का श्रीमान् विराधित है और यह वानरचिह्नित पताकाको धारण करनेवाला पवनञ्जयका पुत्र श्रीशैल (हनूमान्) है ॥५१॥


एवं विस्मययुक्ताभिस्तोपिणीभिः समुत्कटाः । लक्षिताः पौरनारीभिः प्राप्तास्ते पार्थिवालयम् ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार आश्चर्य तथा संतोषको धारण करनेवाली नगरवासिनी स्त्रियाँ जिन्हें देख रही थीं ऐसे उत्कट शोभाके धारक सब लोग राजभवनमें पहुँचे ॥५२॥


तावत्प्रासादमूर्द्धस्थे पुत्रस्नेहपरायणे । सम्प्रस्नुतस्तने वीरमातराववतेरतुः ॥५३॥

अर्थ: जब तक ये सब राजभवनमें पहुँचे तब तक जो भवनके शिखर पर स्थित थीं, पुत्रोंके प्रति स्नेह प्रकट करनेमें तैयार थीं तथा जिनके स्तनोंसे दूध झर रहा था ऐसी दोनों वीर माताएँ ऊपरसे उतर कर नीचे आ गईं ॥५३॥


महागुणधरा देवी साधुशीलाऽपराजिता । केकयी केकया चापि सुप्रजाश्च सुचेष्टिताः ॥५४॥

भवान्तरसमायोगमिव प्राप्तास्तयोरमा । मातरोऽयुः समीपत्वं मङ्गलोद्यतचेतसः ॥५५॥

अर्थ: महागुणोंको धारण करनेवाली तथा उत्तम शीलसे युक्त अपराजिता ( कौशल्या ) कैकयी ( सुमित्रा’), केकया ( भरतकी माता ) और सुप्रजा ( सुप्रभा ) उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली तथा मङ्गलाचारमें निपुण ये चारों माताएँ साथ-साथ राम-लक्ष्मणके समीप आईं मानो भवान्तरमें ही संयोगको प्राप्त हुई हों ॥५४-५५॥


ततो मातृजनं वीक्ष्य मुदितौ कमलेक्षणौ । पुष्पयानात् समुत्तीर्य लोकपालोपमद्युती ॥५६॥

कृताञ्जलिपुटौ नम्रौ सनृपौ साङ्गनाजनौ । मातृणां नेमतुः पादावुपगम्य क्रमेण तौ ॥५७॥

अर्थ: तदनन्तर जो माताओंको देखकर प्रसन्न थे, जिनके नेत्र कमलके समान थे और जो लोकपालोंके तुल्य कान्तिको धारण करनेवाले थे ऐसे राम-लक्ष्मण दोनों भाई पुष्पक विमानसे उतर कर नीचे आये और दोनोंने हाथ जोड़कर नम्रीभूत हो साथमें आये हुए समस्त राजाओं और अपनी स्त्रियोंके साथ क्रमसे समीप जाकर माताओंके चरणोंमें नमस्कार किया ॥५६-५७॥


आशीर्वादसहस्राणि यच्छन्त्यः शुभदानि ताः । परिषस्वजिरे पुत्रौ स्वसंवेद्यमिताः सुखम् ॥५८॥

अर्थ: कल्याणकारी हजारों आशीर्वादोंको देती हुई उन माताओंने दोनों पुत्रोंका आलिङ्गन किया । उस समय वे सब स्वसंवेद्य सुखको प्राप्त हो रही थीं अर्थात् जो सुख उन्हें प्राप्त हुआ था उसका अनुभव उन्हींको हो रहा था - अन्य लोग उसका वर्णन नहीं कर सकते थे ॥५८॥


पुनः पुनः परिष्वज्य तृप्तिसम्बन्धवर्जिताः । चुचुम्बुर्मस्तके कम्पिकरामर्शनतत्पराः ॥५९॥

आनन्दवाष्पपूर्णाक्षाः कृतासनपरिग्रहाः । सुखदुःखं समावेद्य धृतिं ताः परमां ययुः ॥६०॥

अर्थ: वे बार-बार आलिङ्गन करती थीं फिर भी तृप्त नहीं होती थीं, मस्तक पर चुम्बन करती थीं, काँपते हुए हाथसे उनका स्पर्श करती थीं, और उनके नेत्र हर्षके आँसुओंसे पूर्ण हो रहे थे। तदनन्तर आसन पर आरूढ हो परस्परका सुख-दुःख पूछ कर वे सब परम धैर्यको प्राप्त हुईं ॥५९-६०॥


मनोरथसहस्राणि गुणितान्यसकृत्पुरा । तासां श्रेणिक पुण्येन फलितानीप्सिताधिकम् ॥६१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इनके जो हजारों मनोरथ पहले अनेकों बार गुणित होते रहते थे वे अब पुण्यके प्रभावसे इच्छासे भी अधिक फलीभूत हुए ॥६१॥


सर्वाः सूरजनन्यस्ताः साधुभक्ताः सुचेतसः । स्नुषाशतसमाकीर्णा लक्ष्मीविभवसङ्गताः ॥६२॥

वीरपुत्रानुभावेन निजपुण्योदयेन च । महिमानं परिप्राप्ता गौरवं च सुपूजितम् ॥६३॥

अर्थ: जो साधुओंकी भक्त थीं, उत्तम चित्तको धारण करनेवाली थीं, सैकड़ों पुत्र-वधुओंसे सहित थीं, तथा लक्ष्मीके वैभवको प्राप्त थीं ऐसी उन वीर माताओंने वीर पुत्रोंके प्रभाव और अपने पुण्योदयसे लोकोत्तर महिमा तथा गौरवको प्राप्त किया ॥६२-६३॥


क्षारोदसागरान्तायां प्रतिघातविवर्जिताः । क्षितावेकातपत्रायां ददुराज्ञां यथेप्सितम् ॥६४॥

अर्थ: वे एक छत्रसे सुशोभित लवणसमुद्रान्त पृथिवीमें विना किसी बाधाके इच्छानुसार आज्ञा प्रदान करती थीं ॥६४॥


इष्टसमागममेतं शृणोति यः पठति चातिशुद्धमतिः । लभते सम्पदमिष्टामायुः पूर्णं सुपुण्यं च ॥६५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अत्यन्त विशुद्ध बुद्धिको धारण करनेवाला जो मनुष्य इस इष्ट समागमके प्रकरणको सुनता है अथवा पढ़ता है वह इष्ट सम्पत्ति पूर्ण आयु तथा उत्तम पुण्यको प्राप्त होता है ॥६५॥


एकोऽपि कृतो नियमः प्राप्तोऽभ्युदयं जनस्य सद्बुद्धेः । कुरुते प्रकाशमुच्चै रविरिव तस्मादिमं कुरुत ॥६६॥

अर्थ: सद्बुद्धि मनुष्यका किया हुआ एक नियम भी अभ्युदयको प्राप्त हो सूर्यके समान उत्तम प्रकाश करता है। हे भव्य जनो ! इस नियमको अवश्य करो ॥६६॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामलक्ष्मणसमागमाभिधानं नाम द्व्यशीतितमं पर्व ॥८२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राम-लक्ष्मणके समागमका वर्णन करनेवाला व्यासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८२॥


८३. त्र्यशीतितमं पर्व (त्रिभुवनालङ्कारक्षोभाभिधानं)

पुनः प्रणम्य शिरसा पृच्छति श्रेणिको यतिम् । गृहे श्रीविस्तरं तेषां समुद्भूतातिकौतुकः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जिसे अत्यन्त कौतुक उत्पन्न हुआ था ऐसे राजा श्रेणिकने शिरसे प्रणाम कर गौतम स्वामीसे पूछा कि हे भगवन् ! उन राम-लक्ष्मणके घरमें लक्ष्मीका विस्तार कैसा था ? ॥१॥


उवाच गौतमः पाद्माः लाक्ष्मणा भारता नृप । शात्रुघ्नाश्च न शक्यन्ते भोगाः कार्त्स्न्येन शंसितुम् ॥२॥

तथाऽपि शृणु ते राजन् वेदयामि समासतः । रामचक्रिप्रभावेण विभवस्य समुद्भवम् ॥३॥

अर्थ: तब गौतम स्वामीने कहा कि हे राजन् ! यद्यपि राम-लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नके भोगोंका वर्णन सम्पूर्ण रूपसे नहीं किया जा सकता तथापि हे राजन् ! बलभद्र और नारायणके प्रभावसे उनके जो वैभव प्रकट हुआ था वह संक्षेपसे कहता हूँ सो सुन ॥२-३॥


नन्द्यावर्त्ताख्यसंस्थानं बहुद्वारोच्चगोपुरम् । शक्रालयसमं कान्तं भवनं भवनं श्रियः ॥४॥

अर्थ: उनके अनेक द्वारों तथा उच्च गोपुरोंसे युक्त, इन्द्रभवनके समान सुन्दर लक्ष्मीका निवासभूत नन्द्यावर्त नामका भवन था ॥४॥


चतुःशाल इति ख्यातः प्राकारोऽस्य विराजते । महाद्रिशिखरोत्तुङ्गो वैजयन्त्यभिधा सभा ॥५॥

शाला चन्द्रमणी रम्या सुवीथीति प्रकीर्त्तिता । प्रासादकूटमत्यन्तमुत्तुङ्गमवलोकनम् ॥६॥

प्रेक्षागृहं च विन्ध्याभं वर्द्धमानककीर्त्तनम् । परिकर्मोपयुक्तानि कर्मान्तभवनानि च ॥७॥

कुक्कुटाण्डप्रभं गर्भगृहकूटं महाद्भुतम् । एकस्तम्भधृतं कल्पतरुतुल्यं मनोहरम् ॥८॥

अर्थ: किसी महागिरिके शिखरोंके समान ऊँचा चतुःशाल नामका कोट था, वैजयन्ती नामकी सभा थी। चन्द्रकान्त मणियोंसे निर्मित सुवीथी नामकी मनोहरशाला थी, अत्यन्त ऊँचा तथा सब दिशाओंका अवलोकन करानेवाला प्रासादकूट था, विन्ध्यगिरिके समान ऊँचा वर्द्धमानक नामक प्रेक्षागृह था, अनेक प्रकारके उपकरणोंसे युक्त कार्यालय थे, उनका गर्भगृह कुक्कुटीके अण्डेके समान महान् आश्चर्यकारी था, एक खम्भे पर खड़ा था, और कल्पवृक्षके समान मनोहर था, ॥५-८॥


मण्डलेन तदावृत्य देवीनां गृहपालिका । तरङ्गाली परिख्याता स्थिता रत्नसमुज्ज्वला ॥९॥

अर्थ: उस गर्भगृहको चारों ओरसे घेर कर तरङ्गाली नामसे प्रसिद्ध तथा रत्नोंसे देदीप्यमान रानियोंके महलोंकी पंक्ति थी ॥९॥


महदम्भोजकाण्डं च विद्युद्दलसमद्युति । सुश्लिष्टा सुभगस्पर्शा शय्या सिंहशिरःस्थिता ॥१०॥

उद्यद्भास्करसङ्काशमुत्तमं हरिविष्टरम् । चामराणि शशाङ्कांशुसञ्चयप्रतिमानि च ॥११॥

अर्थ: बिजलीके खण्डोंके समान कान्तिवाला अम्भोजकाण्ड नामका शय्यागृह था, सुन्दर, सुकोमल स्पर्शवाली तथा सिंहके शिरके समान पायों पर स्थित शय्या थी, उगते हुए सूर्यके समान उत्तम सिंहासन था, चन्द्रमाकी किरणोंके समूहके समान चमर थे ॥१०-११॥


इष्टच्छायकरं स्फीतं छत्रं तारापतिप्रभम् । सुखेन गमने कान्ते पादुके विषमोचिके ॥१२॥

अर्थ: इच्छानुकूल छायाको करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिसे युक्त बड़ा भारी छत्र था, सुखसे गमन करानेवाली विषमोचिका नामकी दो खड़ाऊँ थीं ॥१२॥


अनर्घाणि च वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । दुर्भेद्यं कवचं कान्तं मणिकुण्डलयुग्मकम् ॥१३॥

अमोघाश्च गदाखड्गकनकारिशिलीमुखाः । अन्यानि च महास्त्राणि भासुराणि रणाजिरे ॥१४॥

अर्थ: अनर्घ्य वस्त्र थे, दिव्य आभूषण थे, दुर्भेद्य कवच था, देदीप्यमान मणिमय कुण्डलोंका जोड़ा था, कभी व्यर्थ नहीं जानेवाले गदा, खड्ग, कनक, चक्र, बाण तथा रणाङ्गणमें चमकनेवाले अन्य बड़े-बड़े शस्त्र थे ॥१३-१४॥


पञ्चाशद्धलकोटीनां लक्षाणि गदितानि च । स्वयं चरणशीलानां कोटिरभ्यधिका गवाम् ॥१५॥

अर्थ: पचास लाख हल थे, एक करोड़से अधिक अपने आप दूध देनेवाली गायें थीं ॥१५॥


सप्ततिः साधिकाः कोटयः कुलानां स्फीतसम्पदाम् । नित्यं न्यायप्रवृत्तानां साकेतनगरीजुषाम् ॥१६॥

अर्थ: जो अत्यधिक सम्पत्तिके धारक थे तथा निरन्तर न्यायमें प्रवृत्त रहने थे ऐसे अयोध्या-नगरीमें निवास करनेवाले कुलोंकी संख्या कुछ अधिक सत्तर करोड़ थी ॥१६॥


भवनान्यतिशुभ्राणि सर्वाणि विविधानि च । अक्षीणकोशपूर्णानि रत्नवन्ति कुटुम्बिनाम् ॥१७॥

अर्थ: गृहस्थोंके समस्त घर अत्यन्त सफेद, नाना आकारोंके धारक, अक्षीण खजानोंसे परिपूर्ण तथा रत्नोंसे युक्त थे ॥१७॥


पाल्या बहुविधैर्धान्यैः पूर्णा गण्डाद्रिसन्निभाः । विज्ञेयाः कुट्टमितलाश्चतुःशालाः सुखावहाः ॥१८॥

अर्थ: नानाप्रकारके अन्नोंसे परिपूर्ण नगरके बाह्य प्रदेश छोटे मोटे गोल पर्वतोंके समान जान पड़ते थे और पक्के फरसोंसे युक्त भवनोंकी चौशालें अत्यन्त सुखदायी थीं ॥१८॥


प्रवरोद्यानमध्यस्था नानाकुसुमशोभिताः । दीर्घिकाश्चारुसोपानाः परिक्रीडनकोचिताः ॥१९॥

अर्थ: उत्तमोत्तम बगीचोंके मध्यमें स्थित, नाना प्रकारके फूलोंसे सुशोभित, उत्तम सीढ़ियोंसे युक्त एवं क्रीडाके योग्य अनेकों वापिकाएँ थीं ॥१९॥


प्रेक्ष्यगोमहिषीवृन्दस्फीतास्तत्र कुटुम्बिनः । सौख्येन महता युक्ताः रेजुः सुरवरा इव ॥२०॥

अर्थ: देखनेके योग्य अर्थात् सुन्दर सुन्दर गायों और भैंसोंके समूहसे युक्त वहाँके कुटुम्बी अत्यधिक सुखसे सहित होनेके कारण उत्तम देवोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२०॥


दण्डनायकसामन्ता लोकपाला इवोदिताः । महेन्द्रतुल्यविभवा राजानः पुरुतेजसः ॥२१॥

अर्थ: सेनाके नायक स्वरूप जो सामन्त थे वे लोकपालोंके समान कहे गये थे तथा विशाल तेजके धारक राजा लोग महेन्द्रके समान वैभवसे युक्त थे ॥२१॥


सुन्दर्योऽप्सरसां तुल्याः संसारसुखभूमयः । निखिलं चोपकरणं यथाभिमतसौख्यदम् ॥२२॥

अर्थ: अप्सराओंके समान संसारके सुखकी भूमि स्वरूप अनेक सुन्दरी स्त्रियाँ थीं, और इच्छानुकूल सुखके देनेवाले अनेक उपकरण थे ॥२२॥


एवं रामेण भरतं नीतं शोभां परामिदम् । हरिषेणनरेन्द्रेण यथा चक्रभृता पुरा ॥२३॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले, चक्ररत्नको धारण करनेवाले राजा हरिषेणके द्वारा यह भरत क्षेत्र परम शोभाको प्राप्त हुआ था उसी प्रकार यह भरत क्षेत्र रामके द्वारा परम शोभाको प्राप्त हुआ था ॥२३॥


चैत्यानि रामदेवेन कारितानि सहस्रशः । भान्ति भव्यजनैर्नित्यं पूजितानि महर्द्धिभिः ॥२४॥

अर्थ: अत्यधिक सम्पदाको धारण करनेवाले भव्यजन जिनकी निरन्तर पूजा करते थे ऐसे हजारों चैत्यालय श्री रामदेवने निर्मित कराये थे ॥२४॥


देशग्रामपुरारण्यगृहरथ्यागतो जनः । सदेति सङ्कथां चक्रे सुखी रचितमण्डलः ॥२५॥

अर्थ: देश, गाँव, नगर, वन, घर और गलियोंके मध्यमें स्थित सुखिया मनुष्य मण्डल बाँध-बाँधकर सदा यह चर्चा करते रहते थे ॥२५॥


साकेतविषयः सर्वः सर्वथा पश्यताऽधुना । विलम्बयितुमुद्युक्तश्चित्रं गीर्वाणविष्टपम् ॥२६॥

अर्थ: कि देखो यह समस्त साकेत देश, इस समय आश्चर्यकारी स्वर्ग लोककी उपमा प्राप्त करनेके लिए उद्यत है ॥२६॥


मध्ये शक्रपुरीतुल्या नगरी यस्य राजते । अयोध्या निलयैस्तुङ्गैरशक्यपरिवर्णनैः ॥२७॥

अर्थ: जिस देशके मध्यमें जिनका वर्णन करना शक्य नहीं है ऐसे ऊँचे ऊँचे भवनोंसे अयोध्यापुरी इन्द्रकी नगरीके समान सुशोभित हो रही है ॥२७॥


किमर्मा त्रिदशक्रीडापर्वतास्तेजसाऽऽवृताः । आहोस्विच्छरदभ्रौघाः किंवा विद्यामहालयाः ॥२८॥

अर्थ: वहाँके बड़े बड़े विद्यालयोंको देखकर यह संदेह उत्पन्न होता था कि क्या ये तेजसे आवृत देवोंके क्रीड़ाचल हैं अथवा शरद् ऋतुके मेघोंका समूह है ? ॥२८॥


प्राकारोऽयं समस्ताशा द्योतयन् परमोन्नतः । समुद्रवेदिकातुल्यो महाशिखरशोभितः ॥२९॥

अर्थ: इस नगरीका यह प्राकार समस्त दिशाओंको देदीप्यमान कर रहा है, अत्यन्त ऊँचा है, समुद्रकी वेदिकाके समान है और बड़े-बड़े शिखरोंसे सुशोभित है ॥२९॥


सुवर्णरत्नसंघातो रश्मिदीपितपुष्करः । कुत ईदक्त्रिलोकेऽस्मिन् मानसस्याप्यगोचरः ॥३०॥

अर्थ: जिसने अपनी किरणोंसे आकाशको प्रकाशित कर रक्खा है तथा जिसका चिन्तवन मनसे भी नहीं किया जा सकता ऐसे सुवर्ण और रत्नोंकी राशि जैसी अयोध्यामें थी वैसी तीनलोकमें भी अन्यत्र उपलब्ध नहीं थी ॥३०॥


नूनं पुण्यजनैरेषा विर्नीता नगरी शुभा । सम्पूर्णा रामदेवेन विहिताऽन्येव शोभना ॥३१॥

अर्थ: जान पड़ता है कि पुण्यजनोंके द्वारा भरी हुई यह शुभ और शोभायमान नगरी श्रीरामदेवके द्वारा मानो अन्य ही कर दी गई है ॥३१॥


सम्प्रदायेन यः स्वर्गः श्रूयते कोऽपि सुन्दरः । नूनं तमेवमादाय सम्प्राप्तौ रामलक्ष्मणौ ॥३२॥

अर्थ: सम्प्रदाय वश सुननेमें आता है कि स्वर्ग नामका कोई सुन्दर पदार्थ है सो ऐसा लगता है मानो उस स्वर्गको लेकर ही राम-लक्ष्मण यहाँ पधारे हों ॥३२॥


आहोस्वित् सैव पूर्वेयं भवेदुत्तरकोशला । दुर्गमा जनितात्यन्तं प्राणिनां पुण्यवर्जिनाम् ॥३३॥

अर्थ: अथवा यह वही पहलेकी उत्तरकोशल पुरी है जो कि पुण्यहीन मनुष्योंके लिए अत्यन्त दुर्गम हो गई है ॥३३॥


सशरीरेण लोकेन सस्त्रीपशुधनादिना । त्रिदिवं रघुचन्द्रेण नीता कान्तिमिमां गता ॥३४॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता है कि इस कान्तिको प्राप्त हुई यह नगरी श्री रामचन्द्रके द्वारा इसी शरीर तथा स्त्री पशु और धनादि सहित लोगोंके साथ ही साथ स्वर्ग भेज दी गई है ॥३४॥


एक एव महान् दोषः सुप्रकाशेऽत्र दृश्यते । महानिन्दात्रपाहेतुः सतामत्यन्तदुस्त्यजः ॥३५॥

अर्थ: इस नगरीमें यही एक सबसे बड़ा दोष दिखाई देता है जो कि महानिन्दा और लज्जाका कारण है तथा सत्पुरुषोंके अत्यन्त दुःख पूर्वक छोड़नेके योग्य है ॥३५॥


यद्विद्याधरनाथेन हताभिरमता ध्रुवम् । वैदेही पुनरानीता तत्किं पद्मस्य युज्यते ॥३६॥

अर्थ: वह दोष यह है कि विद्याधरोंका राजा रावण सीताको हर ले गया था सो उसने अवश्य ही उसका सेवन किया होगा । अब वही सीता फिरसे लाई गई है सो क्या रामको ऐसा करना उचित है ? ॥३६॥


क्षत्रियस्य कुलीनस्य ज्ञानिनो मानशालिनः । जनाः पश्यत कर्मेदं किमन्यस्याभिधीयताम् ॥३७॥

अर्थ: अहो जनो ! देखो जब क्षत्रिय, कुलीन, ज्ञानी और मानी पुरुषका यह काम है तब अन्य पुरुषका क्या कहना है ॥३७॥


इति क्षुद्रजनोद्गीतः परिवादः समन्ततः । सीतायाः कर्मतः पूर्वाद् विस्तारं विष्टपे गतः ॥३८॥

अर्थ: इस प्रकार क्षुद्र मनुष्योंके द्वारा प्रकट हुआ सीताका अपवाद, पूर्व कर्मोदयसे लोकमें सर्वत्र विस्तारको प्राप्त हो गया ॥३८॥


अथासौ भरतस्तत्र पुरे स्वर्गत्रपाकरे । सुरेन्द्रसदृशैर्भोगैरपि नो विन्दते रतिम् ॥३९॥

अर्थ: अथानन्तर स्वर्गको लज्जा करनेवाले इस नगरमें रहता हुआ भरत इन्द्र तुल्य भोगोंसे भी प्रीतिको प्राप्त नहीं हो रहा था ॥३९॥


स्त्रीणां शतस्य सार्द्धस्य भर्त्ता प्राणमहेश्वरः । विद्वेष्टि सन्ततं राज्यलक्ष्मीं तुङ्गां तथापि ताम् ॥४०॥

अर्थ: वह यद्यपि डेढ़ सौ स्त्रियोंका प्राणनाथ था तथापि निरन्तर उस उन्नत राज्यलक्ष्मीके साथ द्वेष करता रहता था ॥४०॥


निर्व्यूहवलभीश्रृङ्गप्रघणद्युतिहारिभिः । प्रासादैर्मण्डलीबन्धरचितैरुपशोभिते ॥४१॥

विचित्रमणिनिर्माणकुट्टिमे चारुदीर्घिके । मुक्तादामचिते हेमखचिते पुष्पितद्रुमे ॥४२॥

अनेकाश्चर्यसंकीर्णे यथाकालमनोहरे । सवंशमुरजस्थाने सुन्दरीजनसंकुले ॥४३॥

प्रान्तस्थितमदक्लिन्नकपोलवरवारणे । वासिते मदगन्धेन तुरङ्गरवहारिणि ॥४४॥

कृतकोमलसङ्गीते रत्नोद्योतपटावृते । रम्ये क्रीडनकस्थाने रुचिष्ये स्वर्गिणामपि ॥४५॥

संसारभीरुरत्यन्तं नृपश्चकितमानसः । धृतिं न लभते व्याधभीरुः सारङ्गको यथा ॥४६॥

अर्थ: वह ऐसे मनोहर क्रीड़ास्थलमें जो कि छपरियों-अट्टालिकाओं, शिखरों और देहलियोंकी मनोहर कान्तिसे युक्त, पंक्तिबद्धरचित बड़े-बड़े महलोंसे सुशोभित था, जहाँके फर्स नाना प्रकारके रङ्ग-विरङ्गे मणियोंसे बना हुआ था, जहाँ सुन्दर सुन्दर वापिकाएँ थीं, जो मोतियोंकी मालाओंसे व्याप्त था, सुवर्णजटित था, जहाँ वृक्ष फूलोंसे युक्त थे, जो अनेक आश्चर्यकारी पदार्थोंसे व्याप्त था, समयानुकूल मनको हरण करनेवाला था, बांसुरी और मृदङ्गके बजनेका स्थान था, सुन्दरी स्त्रियोंसे युक्त था, जिसके समीप ही मदभीगे कपोलोंसे युक्त हाथी विद्यमान थे, जो मदकी गन्धसे सुवासित था, घोड़ोकी हिनहिनाहटसे मनोहर था, जहाँ कोमल संगीत हो रहा था, जो रत्नोंके प्रकाशरूपी पटसे आवृत था, तथा देवोंके लिए भी रुचिकर था, धैर्यको प्राप्त नहीं होता था । चकित चित्तका धारक भरत संसारसे अत्यन्त भयभीत रहता था । जिस प्रकार शिकारीसे भयको प्राप्त हुआ हरिण सुन्दर स्थानोंमें धैर्यको प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार भरत भी उक्त प्रकारके सुन्दर स्थानोंमें धैर्यको प्राप्त नहीं हो रहा था ॥४१-४६॥


लभ्यं दुःखेन मानुष्यं चपलं जलबिन्दुवत् । यौवनं फेनपुञ्जेन सदृशं दोषसङ्कटम् ॥४७॥

अर्थ: वह सोचता रहता था कि मनुष्य पर्याय बड़े दुःखसे प्राप्त होती है फिर भी पानीकी बूँदके समान चञ्चल है, यौवन फेनके समूहके समान भङ्गुर तथा अनेक दोषोंसे संकट पूर्ण है ॥४७॥


समाप्तिविरसा भोगा जीवितं स्वप्नसन्निभम् । सम्बन्धो बन्धुभिः सार्द्धं पक्षिसङ्गमनोपमः ॥४८॥

अर्थ: भोग अन्तिम कालमें विरस अर्थात् रससे रहित है, जीवन स्वप्नके समान है और भाई-बन्धुओंका सम्बन्ध पक्षियोंके समागमके समान है ॥४८॥


इति निश्चित्य यो धर्मं करोति न शिवावहम् । स जराजर्जरः पश्चाद्दह्यते शोकवह्निना ॥४९॥

अर्थ: ऐसा निश्चय करनेके बाद भी जो मनुष्य मोक्ष-सुखदायी धर्म धारण नहीं करता है वह पीछे जरासे जर्जर चित्त हो शोक-रूपी अग्निसे जलता रहता है ॥४९॥


यौवनेऽभिनवे रागः कोऽस्मिन् मूढकवल्लभे । अपवादकुलावासे सन्ध्योद्योतविनश्वरे ॥५०॥

अर्थ: जो मूर्ख मनुष्योंको प्रिय है, अपवाद अर्थात् निन्दाका कुलभवन है एवं सन्ध्याके प्रकाशके समान विनश्वर है ऐसे नवयौवनमें क्या राग करना है ? ॥५०॥


अवश्यं त्यजनीये च नानाव्याधिकुलालये । शुक्रशोणितसम्मूले देहयन्त्रेऽपि का रतिः ॥५१॥

अर्थ: जो अवश्य ही छोड़ने योग्य है, नाना व्याधियोंका कुलभवन है, और रजवीर्य जिसका मूल कारण है ऐसे इस शरीर रूपी यन्त्रमें क्या प्रीति करना है ? ॥५१॥


न तृप्यतीन्धनैर्वह्निः सलिलैर्न नदीपतिः । न जीवो विषयैर्यावत्संसारमपि सेवितैः ॥५२॥

अर्थ: जिस प्रकार ईन्धनसे अग्नि नहीं तृप्त होती और जलसे समुद्र नहीं तृप्त होता उसी प्रकार जब तक संसार है तब तक सेवन किये हुए विषयोंसे यह प्राणी तृप्त नहीं होता ॥५२॥


कामासक्तमतिः पापो न किञ्चिद् वेत्ति देहवान् । यत्पतङ्गसमो लोभी दुखं प्राप्नोति दारुणम् ॥५३॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि पापमें आसक्त हो रही है ऐसा पापी मनुष्य कुछ भी नहीं समझता है और लोभी मनुष्य पतंगके समान दारुण दुःखको प्राप्त होता है ॥५३॥


गलगण्डसमानेषु क्लेदक्षरणकारिषु । स्तनाख्यमांसपिण्डेषु बीभत्सेषु कथं रतिः ॥५४॥

अर्थ: जिनका आकार गलगण्डके समान है तथा जिनसे निरन्तर पसीना झरता रहता है, ऐसे स्तन नामक मांसके घृणित पिण्डोंमें क्या प्रेम करना है ? ॥५४॥


दन्तकीटकसम्पूर्णे ताम्बूलरसलोहिते । क्षुरिकाच्छेदसदृशे शोभा वक्त्रबिले नु का ॥५५॥

अर्थ: जो दाँतरूपी कीड़ोंसे युक्त है तथा जो ताम्बूलके रसरूपी रुधिरसे सहित है ऐसे छुरीके छापके समान जो मुखरूपी बिल है उसमें क्या शोभा है ? ॥५५॥


नारीणां चेष्टिते वायुदोषादिव समुद्गते । उन्मादजनिते प्रीतिर्विलासाभिहितेऽपि का ॥५६॥

अर्थ: स्त्रियोंकी जो चेष्टा मानो वायुके दोषसे ही उत्पन्न हुई है अथवा उन्माद जनित है उसके विलासपूर्ण होने पर भी उसमें क्या प्रीति करना है ? ॥५६॥


गृहान्तर्ध्वनिना तुल्ये मनोधृतिनिवासिनी । सङ्गीते रुदिते चैव विशेषो नोपलक्ष्यते ॥५७॥

अर्थ: जो घरके भीतरकी ध्वनिके समान है तथा जो मनके धैर्यमें निवास करता है ( रोदन पक्षमें मनके अधैर्यमें निवास करता है ) ऐसे संगीत तथा रोदनमें कोई विशेषता नहीं दिखाई देती ॥५७॥


अमेध्यमयदेहाभिश्छन्नाभिः केवलं त्वचा । नारीभिः कीदृशं सौख्यं सेवमानस्य जायते ॥५८॥

अर्थ: जिनका शरीर अपवित्र वस्तुओंसे तन्मय है तथा जो केवल चमड़ेसे आच्छादित हैं ऐसी स्त्रियोंसे उनकी सेवा करने वाले पुरुषको क्या सुख होता है ? ॥५८॥


विट्कुम्भद्वितयं नीत्वा संयोगमतिलज्जनम् । विमूढमानसः लोकः सुखमित्यभिमन्यते ॥५९॥

अर्थ: मूर्खमना प्राणी मलभृत घटके समान अत्यन्त लज्जाकारी संयोगको प्राप्त हो मुझे सुख हुआ है ऐसा मानता है ॥५९॥


इच्छामात्रसमुद्भूतैर्दिव्यैर्यो भोगविस्तरैः । न तृप्यति कथं तस्य तृप्तिर्मानुषभोगकैः ॥६०॥

अर्थ: अरे ! जो इच्छामात्रसे उत्पन्न होनेवाले स्वर्गसम्बन्धी भोगोंके समूहसे तृप्त नहीं होता उसे मनुष्य पर्यायके तुच्छ भोगोंसे कैसे तृप्ति हो सकती है ? ॥६०॥


तृप्तिं न तृणकोटिस्थैरवश्यायकणैर्वने । व्रजतीन्धनविक्रायः केवलं श्रममृच्छति ॥६१॥

अर्थ: ईन्धन बेचने वाला मनुष्य वनमें तृणोंके अग्रभाग पर स्थित ओसके कणोंसे तृप्तिको प्राप्त नहीं होता केवल श्रमको ही प्राप्त होता है ॥६१॥


तथाऽप्युत्तमया राज्यश्रिया तृप्तिमनासवान् । सौदासः कुत्सितं कर्म तथाविधमसेवत ॥६२॥

अर्थ: उस सौदासको तो देखो जो राजलक्ष्मीसे तृप्त नहीं हुआ किन्तु इसके विपरीत जिसने नरमांस-भक्षण जैसा अयोग्य कार्य किया ॥६२॥


गङ्गायां पूरयुक्तायां प्रविष्टा मांसलुब्धकाः । काका हस्तिशवं मृत्युं प्राप्नुवन्ति महोदधौ ॥६३॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रवाह-युक्त गङ्गामें मांसके लोभी काक, मृत हस्तीके शवको चूथते हुए तृप्त नहीं होते और अन्तमें महासागरमें प्रविष्ट हो मृत्युको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार संसारके प्राणी विषयोंमें तृप्त न हो अन्तमें भवसागरमें डूबते हैं ॥६३॥


मोहपङ्कनिमग्नेयं प्रजामण्डूकिकाद्य ते । लोभाहिनाऽतितीव्रेण नरकच्छिद्रमापिता ॥६४॥

अर्थ: हे आत्मन् ! मोहरूपी कीचड़में फँसी यह तेरी प्रजारूपी मेंडकी लोभरूपी तीव्र सर्पके द्वारा ग्रस्त हो आज नरक रूपी बिलमें ले जाई जा रही है ॥६४॥


एवं चिन्तयतस्तस्य भरतस्य विरागिणः । विघ्नेन बहवो यान्ति दिवसाः शान्तचेतसः ॥६५॥

अर्थ: इस प्रकार विचार करते हुए उस शान्त चित्तके धारक विरागी भरतकी दीक्षामें विघ्न करने वाले बहुतसे दिन व्यतीत हो गये ॥६५॥


व्रतमप्राप्नुवञ्जैनं सर्वदुःखविनाशनम् । पञ्जरस्थो यथा सिंहः स समर्थोऽपि सीदति ॥६६॥

अर्थ: जिस प्रकार समर्थ होने पर भी पिंजड़ेमें स्थित सिंह दुखी होता है उसी प्रकार भरत दीक्षाधारण करनेमें समर्थ होता हुआ भी सर्व दुःखको नष्ट करने वाले जिनेन्द्रव्रतको नहीं प्राप्त होता हुआ दुःखी हो रहा था ॥६६॥


प्रशान्तहृदयोऽत्यर्थकेकयायाचनादसौ । ध्रियते हलिचक्रिभ्यां सस्नेहाभ्यां समुत्कटम् ॥६७॥

उच्यते च यथा भ्रातस्त्वमेव पृथिवीतले । सकले स्थापितो राजा पित्रा दीक्षाभिलाषिणा ॥६८॥

अर्थ: भरतकी माता केकयाने उसे रोकनेके लिए रामलक्ष्मणसे याचना की सो अत्यधिक स्नेहके धारक रामलक्ष्मणने प्रशान्तचित्त भरतको रोक कर इस प्रकार समझाया कि हे भाई ! दीक्षाके अभिलाषी पिताने तुम्हींको सकल पृथिवीतलका राजा स्थापित किया था ॥६७-६८॥


सोऽभिषिक्तो भवान्नाथो गुरुणा विष्टपे न नु । अस्माकमपि हि स्वामी कुरु लोकस्य पालनम् ॥६९॥

अर्थ: यतश्च पिताने जगत्का शासन करनेके लिए निश्चयसे आपका अभिषेक किया था इसलिए हमलोगोंके भी आप ही स्वामी हो । अतः आप ही लोकका पालन कीजिये ॥६९॥


इदं सुदर्शनं चक्रमिमे विद्याधराधिपाः । तवाज्ञासाधनं पत्नीमिव भुंक्ष्व वसुन्धराम् ॥७०॥

अर्थ: यह सुदर्शनचक्र और ये विद्याधर राजा तुम्हारी आज्ञाके साधन हैं इसलिए पत्नीके समान इस वसुधाका उपभोग करो ॥७०॥


धारयामि स्वयं छत्रं शशाङ्कधवलं तव । शत्रुघ्नश्चामरं धत्ते मन्त्री लक्ष्मणसुन्दरः ॥७१॥

अर्थ: मैं स्वयं तुम्हारे ऊपर चन्द्रमाके समान सफेद छत्र धारण करता हूँ, शत्रुघ्न चमर धारण करता है और लक्ष्मण तेरा मन्त्री है ॥७१॥


इत्युक्तोऽपि न चेद्वाक्यं ममेदं कुरुते भवान् । यास्यामोऽद्य ततो भूयस्तदेव मृगवद्वनम् ॥७२॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर भी यदि तुम मेरी बात नहीं मानते हो तो मैं फिर उसी तरह हरिणकी नाईं आज वनमें चला जाऊँगा ॥७२॥


जित्वा राक्षसवंशस्य तिलकं रावणाभिधम् । भवद्दर्शनसौख्यस्य तृषिता वयमागताः ॥७३॥

अर्थ: राक्षस वंशके तिलक रावणको जीत कर हम लोग आपके दर्शन सम्बन्धी सुखकी तृष्णासे ही यहाँ आये हैं ॥७३॥


निःप्रत्यूहमिदं राज्यं भुज्यतां तावदायतम् । अस्माभिः सहितः पश्चात्प्रवेक्ष्यसि तपोवनम् ॥७४॥

अर्थ: अभी तुम इस निर्विघ्न विशालराज्यका उपभोग करो पश्चात् हमारे साथ तपोवनमें प्रवेश करना ॥७४॥


एवं भाषितुमासक्तमेनं पद्मं सुचेतसम् । जगाद भरतोऽत्यन्तविषयासक्तिनिःस्पृहः ॥७५॥

अर्थ: विषय सम्बन्धी आसक्तिसे जिसका हृदय अत्यन्त निःस्पृह हो गया था ऐसे भरतने पूर्वोक्त प्रकार कथन करनेमें तत्पर एवं उत्तम हृदयके धारक रामसे इस तरह कहा कि ॥७५॥


इच्छामि देव सन्त्यक्तुमेतां राज्यश्रियं द्रुतम् । त्यक्त्वा यां सत्तपः कृत्वा वीरा मोक्षं समाश्रिताः ॥७६॥

अर्थ: हे देव ! जिसे छोड़कर तथा उत्तम तप कर वीर मनुष्य मोक्षको प्राप्त हुए हैं मैं उस राज्यलक्ष्मीका शीघ्र ही त्याग करना चाहता हूँ ॥७६॥


सदा नरेन्द्र कामार्थौ चञ्चलौ दुःखसङ्गतौ । विद्वेष्यौ सूरिलोकस्य सुमूढजनसेवितौ ॥७७॥

अर्थ: हे राजन् ! ये काम और अर्थ चञ्चल हैं, दुःखसे प्राप्त होते हैं, अत्यन्त मूर्ख जनोंके द्वारा सेवित हैं तथा विद्वज्जनोंके द्वेषके पात्र हैं ॥७७॥


अशाश्वतेषु भोगेषु सुरलोकसमेष्वपि । हलायुध न मे तृष्णा समुद्रौपम्यवत्स्वपि ॥७८॥

अर्थ: हे हलायुध ! ये नश्वर भोग स्वर्ग लोकके समान हों अथवा समुद्र की उपमाको धारण करनेवाले हों तो भी मेरी इनमें तृष्णा नहीं है ॥७८॥


संसारसागरं घोरं मृत्युपातालसङ्कुलम् । जन्मकल्लोलसङ्कीर्णं रत्यरत्युरुवीचिकम् ॥७९॥

रागद्वेषमहाग्राहं नानादुःखभयङ्करम् । व्रतपोतं समारुह्य वाञ्छामि तरितुं नृप ॥८०॥

अर्थ: हे राजन् ! जो अत्यन्त भयंकर है, मृत्यु रूपी पाताल तक व्याप्त है, जन्म रूपी कल्लोलोंसे युक्त है, जिसमें रति और अरति रूपी बड़ी-बड़ी लहरें उठ रही हैं, जो राग-द्वेष रूपी बड़े-बड़े मगर-मच्छोंसे सहित है एवं नाना प्रकारके दुःखोंसे भयंकर है, ऐसे इस संसार रूपी सागरको मैं व्रत रूपी जहाज पर आरूढ़ हो तैरना चाहता हूँ ॥७९-८०॥


पुनःपुनरहं राजन् भ्राम्यन् विविधयोनिषु । गर्भवासादिषु श्रान्तो दुःसहं दुःखमाप्तवान् ॥८१॥

अर्थ: हे राजन् ! नाना योनियोंमें बार-बार भ्रमण करता हुआ मैं गर्भवासादिके दुःसह दुःख प्राप्त कर थक गया हूँ ॥८१॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य वाष्पव्याकुललोचनाः । नृपा विस्मयमापन्ना जगदुः कम्पितस्वनाः ॥८२॥

वचनं कुरु तातीयं लोकं पालय पार्थिव । यदि तेऽवमता लक्ष्मीर्मुनिः पश्चाद् भविष्यसि ॥८३॥

अर्थ: इस प्रकार भरतके शब्द सुन जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त हो रहे थे, जो आश्चर्यको प्राप्त थे तथा जिनके स्वर कम्पित थे ऐसे राजा बोले कि हे राजन् ! पिताका वचन अङ्गीकृत करो और लोकका पालन करो । यदि लक्ष्मी तुम्हें इष्ट नहीं है तो कुछ समय पीछे मुनि हो जाना ॥८२-८३॥


उवाच भरतो वाढं तातस्योक्तं मया कृतम् । चिरं प्रपालितो लोको मानितो भोगविस्तरः ॥८४॥

अर्थ: इसके उत्तरमें भरतने कहा कि मैंने पिताके वचनका अच्छी तरह पालन किया है, चिरकाल तक लोककी रक्षा की है, भोगसमूहका सम्मान किया है ॥८४॥


दत्तं च परमं दानं साधुवर्गः सुतर्पितः । तातेन यत्कृतं कर्तुं तदपीच्छामि साम्प्रतम् ॥८५॥

अर्थ: परम दान दिया है, साधुओंके समूहको संतुष्ट किया है, अब जो कार्य पिताने किया था वही करना चाहता हूँ ॥८५॥


अनुमोदनमद्यैव मह्यं किं न प्रयच्छत । श्लाघ्ये वस्तुनि सम्बन्धः कर्तव्यो हि यथा तथा ॥८६॥

अर्थ: आप लोग मेरे लिए आज ही अनुमति क्यों नहीं देते हैं ? यथार्थमें उत्तम कार्यके साथ तो जिस तरह बने उसी तरह सम्बन्ध जोड़ना चाहिए ॥८६॥


जित्वा शत्रुगणं संख्ये द्विपसङ्घातभीषणे । नन्दाद्यैरिव या लक्ष्मीर्भवद्भिः समुपार्जिता ॥८७॥

महत्यपि न सा तृप्तिं ममोत्पादयितुं क्षमा । गङ्गेव वारि नाथस्य तत्त्वमार्गे घटे ततः ॥८८॥

अर्थ: हाथियोंकी भीड़से भयङ्कर युद्धमें शत्रुसमूहको जीतकर नन्द आदि पूर्व बलभद्र और नारायणोंके समान आपने जो लक्ष्मी उपार्जित की है वह यद्यपि बहुत बड़ी है तथापि मुझे संतोष उत्पन्न करनेके लिए समर्थ नहीं है। जिस प्रकार गङ्गा नदी समुद्र को तृप्त करनेमें समर्थ नहीं है उसी प्रकार यह लक्ष्मी भी मुझे तृप्त करनेमें समर्थ नहीं है, इसलिए अब तो मैं यथार्थ मार्गमें ही प्रवृत्त होता हूँ ॥८७-८८॥


इत्युक्त्वात्यन्तसंविग्नस्तानापृच्छ्य ससम्भ्रमः । सिंहासनात् समुत्तस्थौ भरतो भरतो यथा ॥८९॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा उनसे पूछकर तीव्र संवेगसे युक्त भरत संभ्रमके साथ भरत चक्रवर्तीकी नाईं शीघ्र ही सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ ॥८९॥


मनोहरगतिश्चैव यावद् गन्तुं समुद्यतः । नारायणेन संरुद्धस्तावत् सस्नेहसम्भ्रमम् ॥९०॥

अर्थ: अथानन्तर मनोहर गतिको धारण करनेवाला भरत ज्यों ही वनको जानेके लिए उद्यत हुआ त्योंही लक्ष्मणने स्नेह और संभ्रमके साथ उसे रोक लिया अर्थात् उसका हाथ पकड़ लिया ॥९०॥


करेणोद्वर्तयन्नेव सौमित्रिकरपल्लवम् । यावदाश्वासयत्यश्रुदुर्दिनास्यां च मातरम् ॥९१॥

तावद् रामाज्ञया प्राप्ताः स्त्रियो लक्ष्मीसुविभ्रमाः । रुरुदुर्भरतं वातकम्पितोत्पललोचनाः ॥९२॥

अर्थ: अपने हाथसे लक्ष्मणके करपल्लवको अलग करता हुआ भरत जब तक अविरल अश्रुवर्षा करनेवाली माताको समझाता है तब तक रामकी आज्ञासे, जिनकी लक्ष्मीके समान चेष्टाएँ थीं तथा जिनके नेत्र वायुसे कम्पित नील कमलके समान थे ऐसी भरतकी स्त्रियाँ आकर उसके प्रति रोदन करने लगीं ॥९१-९२॥


एतस्मिन्नन्तरे सीता स्वयं श्रीरिव देहिनी । उर्वी भानुमती देवी विशल्या सुन्दरी तथा ॥९३॥

ऐन्द्री रत्नवती लक्ष्मीः सार्था गुणवतीश्रुतिः । कान्ता बन्धुमती भद्रा कौबेरी नलकूबरा ॥९४॥

तथा कल्याणमालासौ चन्द्रिणी मानसोत्सवा । मनोरमा प्रियानन्दा चन्द्रकान्ता कलावती ॥९५॥

रत्नस्थली सुरवती श्रीकान्ता गुणसागरा । पद्मावती तथाऽन्याश्च स्त्रियो दुःशक्यवर्णनाः ॥९६॥

अर्थ: इसी बीचमें शरीरधारिणी साक्षात् लक्ष्मीके समान सीता, उर्वी, भानुमती, विशल्या, सुन्दरी, ऐन्द्री, रत्नवती, लक्ष्मी, सार्थक नामको धारण करने वाली गुणवती, कान्ता, बन्धुमती, भद्रा, कौबेरी, नलकूबरा, कल्याणमाला, चन्द्रिणी, मानसोत्सवा, मनोरमा, प्रियानन्दा, चन्द्रकान्ता, कलावती, रत्नस्थली, सुरवती, श्रीकान्ता, गुणसागरा, पद्मावती, तथा जिनका वर्णन करना अशक्य है ऐसी दोनों भाइयोंकी अन्य अनेक स्त्रियाँ वहाँ आ पहुँचीं ॥९३-९६॥


मनःप्रहरणाकारा दिव्यवस्त्रविभूषणाः । समुद्भवशुभक्षेत्रभूमयः स्नेहगोत्रजाः ॥९७॥

कलासमस्तसन्दोहफलदर्शनतत्पराः । वृत्ताः समन्ततश्चारुचेतसो लोभनोद्यताः ॥९८॥

सर्वादरेण भरतं जगदुर्हारिनिःस्वनाः । वातोद्धूतनवोदारपद्मिनीखण्डकान्तयः ॥९९॥

अर्थ: उन सब स्त्रियोंका आकार मनको हरण करनेवाला था, वे सब दिव्य वस्त्राभूषणोंसे सहित थीं, अनेक शुभभावोंके उत्पन्न होनेकी क्षेत्र थीं, स्नेह की वंशज थीं, समस्त कलाओंके समूह एवं फलके दिखानेमें तत्पर थीं, घेरकर सब ओर खड़ी थीं, सुन्दर चित्तकी धारक थीं, लुभावनेमें उद्यत थीं, मनोहर शब्दोंसे युक्त थीं, तथा वायुसे कम्पित कमलिनियोंके समूहके समान कान्तिकी धारक थीं। उन सबने बड़े आदरके साथ भरतसे कहा ॥९७-९९॥


देवर क्रियतामेकः प्रसादोऽस्माकमुन्नतः । सेवामहे जलक्रीडां भवता सह सुन्दरीम् ॥१००॥

अर्थ: कि देवर ! हम लोगों पर एक बड़ी प्रसन्नता कीजिए। हम लोग आपके साथ मनोहर जलक्रीड़ा करना चाहती हैं ॥१००॥


त्यज्यतामपरा चिंता नाथ मानसखेदिनी । भ्रातृजायासमूहस्य क्रियतामस्य सुप्रियम् ॥१०१॥

अर्थ: हे नाथ ! मनको खिन्न करनेवाली अन्य चिन्ता छोड़िए, और अपनी भौजाइयोंके समूहकी यह प्रिय प्रार्थना स्वीकृत कीजिए ॥१०१॥


तादृशीभिस्तथाप्यस्य सङ्गतस्य न मानसम् । जगाम विक्रियां काञ्चिद् दाक्षिण्यं केवलं श्रितः ॥१०२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि उन सब स्त्रियोंने भरतको घेर लिया था फिर भी उसका चित्त रञ्चमात्र भी विकारको प्राप्त नहीं हुआ । केवल दाक्षिण्य वश उसने उनकी प्रार्थना स्वीकृत कर ली ॥१०२॥


सम्प्राप्तप्रसरास्तस्मात्ततः शङ्काविवर्जिताः । नार्यस्ता भरतीयाश्च प्रापुः परमसम्मदम् ॥१०३॥

अर्थ: तदनन्तर आज्ञा प्राप्तकर राम, लक्ष्मण और भरतकी स्त्रियाँ शङ्कारहित हो परम आनन्दको प्राप्त हुईं ॥१०३॥


परिवार्य ततस्तास्तं समस्ताश्चारुविभ्रमाः । अवतीर्णा महारम्यं सरः सरसिजेक्षणाः ॥१०४॥

अर्थ: तत्पश्चात् सुन्दर चेष्टाओंसे युक्त वे कमललोचना स्त्रियाँ भरतको घेरकर महारमणीय सरोवरमें उतरीं ॥१०४॥


क्रीडानिस्पृहचित्तोऽसौ तत्त्वार्थगतमानसः । योषितामनुरोधेन जलसङ्गमशिश्रियत् ॥१०५॥

अर्थ: जिसका चित्त तत्त्वके चिन्तन करनेमें लगा हुआ था तथा क्रीड़ासे निःस्पृह था ऐसा भरत केवल स्त्रियोंके अनुरोधसे ही जलके समागमको प्राप्त हुआ था अर्थात् जलमें उतरा था ॥१०५॥


देवीजनसमाकीर्णो विनयेन समन्वितः । विरराज सरः प्राप्तः करी यूथपतिर्यथा ॥१०६॥

अर्थ: स्त्रियोंसे घिरा हुआ विनयी भरत, सरोवरमें पहुँचकर ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो झुण्डका स्वामी गजराज ही हो ॥१०६॥


स्निग्धैः सुगन्धिभिः कान्तैस्त्रिभिरुद्वर्त्तनैरसौ । उद्वर्त्तितः पृथुच्छायापट्टरञ्जितवारिभिः ॥१०७॥

अर्थ: अपनी विशाल कान्तिसे जलको रङ्गीन करनेवाले, चिकनाईसे युक्त, सुन्दर तथा सुगन्धित तीन उपटन उस भरतकी देहपर लगाये गये थे ॥१०७॥


किञ्चित्संक्रीड्य सच्चेष्टः सुस्नातः सुमनोहरः । सरसः केकयीसुनुरुत्तीर्णः परमेश्वरः ॥१०८॥

अर्थ: उत्तम चेष्टाओंसे युक्त एवं अतिशय मनोहर राजा भरत, कुछ क्रीड़ाकर तथा अच्छी तरह स्नानकर सरोवरसे बाहर निकल आये ॥१०८॥


विहितार्हन्महापूजः पद्मनीलोत्पलादिभिः । सादरेणाङ्गनौघेन स समग्रमलङ्कृतः ॥१०९॥

अर्थ: तदनन्तर कमल और नीलोत्पल आदिसे जिसने अर्हन्त भगवान्‌की महापूजा की थी ऐसा भरत उन आदरपूर्ण स्त्रियोंके समूहसे अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥१०९॥


एतस्मिन्नन्तरे योऽसौ महाजलधराकृतिः । त्रिलोकमण्डनाभिख्यः ख्यातो गजपतिः शुभः ॥११०॥

आलानं स समाभिद्य महाभैरवनिःस्वनः । निःससार निजावासाद् दानदुर्दिनिताम्बरः ॥१११॥

अर्थ: इसी बीचमें महामेघके समान त्रिलोकमंडन नामका जो प्रसिद्ध गजराज था वह खम्भेको तोड़कर अपने निवासगृहसे बाहर निकल आया । उस समय वह महाभयंकर शब्द कर रहा था तथा मद जलसे आकाशको वर्षायुक्त कर रहा था ॥११०-१११॥


घनाघनघनोदारगम्भीरं तस्य गर्जितम् । श्रुत्वाऽयोध्यापुरी जाता समुन्मत्तजनेव सा ॥११२॥

अर्थ: मेघकी सघन विशाल गर्जनाके समान उसकी गर्जना सुनकर समस्त अयोध्यापुरी ऐसी हो गई मानो उसके समस्त लोग उन्मत्त ही हो गये हों ॥११२॥


जनितोदारसङ्घट्टैर्भयस्तब्धश्रुतेक्षणैः । राजमार्गान्तराः पूर्णाः सायासाधोरणैर्गजैः ॥११३॥

अर्थ: जिन्होंने भीड़के कारण धक्कामुक्की कर रक्खी थी, तथा जिनके कान और नेत्र भयसे स्थिर थे ऐसे इधर-उधर दौड़नेका श्रम उठाने वाले महावतोंसे युक्त हाथियोंसे नगरके राजमार्ग भर गये थे ॥११३॥


यथानुकूलमाश्रित्य दिशो दश महाभयाः । नेशुस्ते मदनिर्युक्ता गृहीतयमिरंहसा ॥११४॥

अर्थ: घोड़ोंके वेगको ग्रहण करनेवाले वे महाभयदायी मदोन्मत्त हाथी इच्छानुकूल दशों दिशाओंमें बिखर गये - फैल गये ॥११४॥


हेमरत्नमहाकूटं गोपुरं गिरिसन्निभम् । विध्वस्य भरतं तेन प्रवृत्तो वारणोत्तमः ॥११५॥

अर्थ: जिसके महाशिखर सुवर्ण तथा रत्नमय थे ऐसे पर्वतके समान विशाल गोपुरको तोड़कर वह त्रिलोकमण्डन हाथी जिस ओर भरत विद्यमान था उसी ओर गया ॥११५॥


त्रासाकुलेक्षणा नार्यो महासम्भ्रमसङ्गताः । शिश्रियुर्भरतं त्राणं भानुं दीधितयो तथा ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नेत्र भयसे व्याकुल थे और जो बहुत भारी बेचैनीसे युक्त थीं ऐसी समस्त स्त्रियाँ रक्षाके निमित्त भरतके समीप उस प्रकार पहुँची जिस प्रकार कि किरणें सूर्यके समीप पहुँचती हैं ॥११६॥


भरताभिमुखं यान्तं जनो वीक्ष्य गजोत्तमम् । हाहेति परमं तारं विलापं परितोऽकरोत् ॥११७॥

अर्थ: उस गजराजको भरतके सन्मुख जाता देख, लोग चारों ओर ‘हाय हाय’ इसप्रकार जोरसे विलाप करने लगे ॥११७॥


विह्वला मातरश्चास्य महोद्वेगसमागताः । बभूवुः परमाशङ्काः पुत्रस्नेहपरायणाः ॥११८॥

अर्थ: पुत्रस्नेहमें तत्पर माताएँ भी महा उद्वेगसे सहित, परम शंकासे युक्त तथा अत्यन्त विह्वल हो उठीं ॥११८॥


तावत् परिकरं बद्ध्वा पद्माभो लक्ष्मणस्तथा । उपसर्पति सच्छद्ममहाविज्ञानसङ्गतः ॥११९॥

नभश्चरमहामात्रान् समुत्सार्य भयार्दितान् । बलाद् गृहीतुमुद्युक्तो तमिभेन्द्रमलं चलम् ॥१२०॥

अर्थ: उसी समय छल तथा महाविज्ञानसे युक्त राम और लक्ष्मण, कमर कसकर भयसे पीडित विद्याधर महावतोंको दूर हटा उस अतिशय चपल गजराजको बलपूर्वक पकड़नेके लिए उद्यत हुए ॥११९-१२०॥


सरोषमुक्तनिस्वानो दुःप्रेक्ष्यः प्रबलो जवी । नागपाशैरपि गजः संरोद्धुं न स शक्यते ॥१२१॥

अर्थ: वह गजराज क्रोधपूर्वक उच्च चिंघाड़ कर रहा था, दुर्दर्शनीय था, प्रबल था, वेगशाली था और नागपाशोंके द्वारा भी नहीं रोका जा सकता था ॥१२१॥


ततोऽङ्गनाजनान्तस्थं श्रीमन्तं कमलेक्षणम् । भरतं वीक्ष्य नागोऽसौ व्यतीतं भवमस्मरत् ॥१२२॥

अर्थ: तदनन्तर स्त्रीजनोंके अन्तमें स्थित श्रीमान् कमललोचन भरतको देखकर उस हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया ॥१२२॥


सञ्जातोद्वेगभारश्च कृत्वा प्रशिथिलं करम् । भरतस्याग्रतो नागस्तस्थौ विनयसङ्गतः ॥१२३॥

अर्थ: जिसे बहुत भारी उद्वेग उत्पन्न हुआ था ऐसा वह हाथी सूंडको शिथिलकर भरतके आगे विनयसे बैठ गया ॥१२३॥


जगाद भरतश्चैनं परं मधुरया गिरा । अहोऽनेकपनाथ त्वं रोषितः केन हेतुना ॥१२४॥

अर्थ: भरतने मधुर वाणीमें उससे कहा कि अहो गजराज ! तुम किस कारण रोषको प्राप्त हुए हो ॥१२४॥


निशम्य वचनं तस्य संज्ञां सम्प्राप्य वारणः । अत्यर्थशान्तचेतस्को निश्चलः सौम्यदर्शनः ॥१२५॥

अर्थ: भरतके उक्त वचन सुन चैतन्यको प्राप्त हुआ गजराज अत्यन्त शान्तचित्त हो गया, उसकी चञ्चलता जाती रही और उसका दर्शन अत्यन्त सौम्य हो गया ॥१२५॥


स्थितमग्रे वरस्त्रीणां स्निग्धं भरतमीक्षते । पुरे वाप्सरसां वृन्दे स्वर्गे गीर्वाणसत्तमम् ॥१२६॥

अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियोंके आगे स्थित स्नेह पूर्ण भरतको वह हाथी इस प्रकार देख रहा था मानो स्वर्गमें अप्सराओंके समूहमें बैठे हुए इन्द्रको ही देख रहा हो ॥१२६॥


परिज्ञानी ततो नागश्चिन्तामेवं समाश्रितः । मुक्तात्याऽऽयतनिःश्वासो विकारपरिवर्जितः ॥१२७॥

अर्थ: तदनन्तर जो परिज्ञानी था, अत्यन्त दीर्घ उच्छ्वास छोड़ रहा था ऐसा वह विकाररहित हाथी इस प्रकारकी चिन्ताको प्राप्त हुआ ॥१२७॥


एषोऽसौ यो महानासीत् कल्पे ब्रह्मोत्तराभिधे । देवः शशाङ्कशुभ्रश्रीर्वयस्यः परमो मम ॥१२८॥

अर्थ: वह चिन्ता करने लगा कि यह वही है जो ब्रह्मोत्तर स्वर्गमें चन्द्रमाके समान शुक्ल शोभाको धारण करनेवाला मेरा परम मित्र देव था ॥१२८॥


च्युतोऽऽयं पुण्यशेषेण जातः पुरुषसत्तमः । कष्टं निन्दितकर्माहं तिर्यग्योनिमुपागतः ॥१२९॥

अर्थ: यह वहाँसे च्युत हो अवशिष्ट पुण्यके कारण उत्तम पुरुष हुआ और खेद है कि मैं निन्दित कार्य करता हुआ इस तिर्यञ्च योनिमें उत्पन्न हुआ हूँ ॥१२९॥


कार्याकार्यविवेकेन सुदूरं परिवर्जितम् । कथं प्राप्तोऽस्मि हस्तित्वं धिगेतदिति गर्हितम् ॥१३०॥

अर्थ: मैं कार्य-अकार्यके विवेकसे रहित इस हस्ती पर्यायको कैसे प्राप्त हो गया ? अहो इस पापपूर्ण चेष्टाको धिक्कार हो ॥१३०॥


परितप्येऽधुना व्यर्थं किमिदं स्मृतिसङ्गतः । करोमि कर्म तद्येन लभ्यते हितमात्मने ॥१३१॥

अर्थ: अब इस समय पूर्ण भवकी स्मृतिको प्राप्त हो व्यर्थ ही क्यों संताप करूँ, अब तो वह कार्य करता हूँ कि जिससे आत्महितकी प्राप्ति हो ॥१३१॥


उद्वेगकरणं नात्र कारणं दुःखमोचने । तस्मादुपायमेवाहं घटे सर्वादरान्वितः ॥१३२॥

अर्थ: उद्वेग करना दुःखके छूटनेका कारण नहीं है इसलिए मैं पूर्ण आदरके साथ वही उपाय करता हूँ जो दुःखके छूटनेका कारण है ॥१३२॥


इति स्मृतातीतभवो गजेन्द्रो भवे तु वैराग्यमलं प्रपन्नः । दुरीहितैकान्तपराङ्मुखात्मा स्थितः सुकर्मार्जनचिन्तनाग्रः ॥१३३॥

अर्थ: इसप्रकार जिसे पूर्वभवका स्मरण हो रहा था, जो संसारके विषयमें अत्यधिक वैराग्यको प्राप्त हुआ था, जिसकी आत्मा पापरूप चेष्टासे अत्यन्त विमुख थी तथा जो पुण्य कर्मके संचय करनेकी चिन्तासे युक्त था ऐसा वह त्रिलोकमण्डन हाथी भरतके आगे शान्तिसे बैठ गया ॥१३३॥


कृतानि कर्माण्यशुभानि पूर्वं सन्तापमुग्रं जनयन्ति पश्चात् । तस्माज्जनाः कर्म शुभं कुरुध्वं रवौ सति प्रस्खलनं न युक्तम् ॥१३४॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! पूर्वभवमें किये हुए अशुभकर्म पीछे चलकर उग्र संताप उत्पन्न करते हैं इसलिए हे भव्यजनो ! शुभ कार्य करो क्योंकि सूर्यके रहते हुए स्खलित होना उचित नहीं है ॥१३४॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे त्रिभुवनालङ्कारक्षोभाभिधानं नाम त्र्यशीतितमं पर्व ।


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें त्रिलोकमंडन हाथीके क्षुभित होनेका वर्णन करनेवाला तेरासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८३॥


८४. चतुरशीतितमं पर्व (त्रिभुवनालङ्कारशमाभिधानं)

तथा विचिन्तयन्नेष विनयी द्विपसत्तमः । पद्माभचक्रपाणिभ्यां वहद्भ्यां विस्मयं परम् ॥१॥

किञ्चिदाशङ्कितात्माभ्यामुपसृत्य शनैः शनैः । महाकालघनाकारो जगृहे भाषितप्रियः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो इस प्रकार विचार कर रहा था जिसका आकार महाश्याम मेघके समान था तथा जिसके प्रति मधुर शब्दोंका उच्चारण किया गया था ऐसे उस हाथीको परम आश्चर्य धारण करनेवाले तथा कुछ कुछ शङ्कित चित्तवाले राम लक्ष्मणने धीरे धीरे पास जाकर पकड़ लिया ॥१-२॥


प्राप्य नारायणादाज्ञामन्यैरुत्तमसम्मदैः । सर्वालङ्कारयोगेन परां पूजां च लम्भितः ॥३॥

अर्थ: लक्ष्मणकी आज्ञा पाकर उत्तम हर्षसे युक्त अन्य लोगोंने सर्व प्रकारसे अलंकार पहिनाकर उस हाथीका बहुत भारी सत्कार किया ॥३॥


प्रशान्ते द्विरदश्रेष्ठे नगर्याकुलतोज्झिता । घनाघनपटोन्मुक्ता रराज शरदा समम् ॥४॥

अर्थ: उस गजराजके शान्त होनेपर जिसकी आकुलता छूट गई थी ऐसी वह नगरी मेघरूपी पटसे रहित हो शरद् ऋतुके समान सुशोभित हो रही थी ॥४॥


विद्याधरजनाधीशैश्चण्डा यस्योत्तमा गतिः । रोद्धुं नातिबलैः शक्या नाकसद्मभिरेव वा ॥५॥

अर्थ: जिसकी अत्यन्त प्रचण्ड गति विद्याधर राजाओं तथा अत्यन्त बलवान् देवोंके द्वारा भी नहीं रोकी जा सकती थी ॥५॥


सोऽयं कैलासकम्पस्य राक्षसेन्द्रस्य वाहनः । भूतपूर्वः कथं रुद्धः सीरिणा लक्ष्मणेन च ॥६॥

अर्थ: ऐसा यह कैलासको कम्पित करनेवाले रावणका भूतपूर्व वाहन राम और बलभद्रके द्वारा कैसे रोक लिया गया ? ॥६॥


तादृशीं विकृतिं गत्वा यदयं शममागतः । तदस्य पूर्वलोकस्य पुण्यं दीर्घायुरावहम् ॥७॥

अर्थ: उस प्रकारकी विकृतिको प्राप्त होकर जो यह शान्त भावको प्राप्त हुआ है सो यह उसकी दीर्घायुका कारण पूर्व पर्यायका पुण्य ही समझना चाहिए ॥७॥


नगर्यामिति सर्वस्यां परं विस्मयमीयुषः । लोकस्य संकथा जाता विधूतकरमस्तका ॥८॥

अर्थ: इस तरह समस्त नगरीमें परम आश्चर्यको प्राप्त हुए लोगोंमें हाथ तथा मस्तकको हिलानेवाली चर्चा हो रही थी ॥८॥


ततः सीताविशल्याभ्यां समं तं वारणेश्वरम् । आरुह्य सुमहाभूतिभरतः प्रस्थितो गृहम् ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर सीता और विशल्याके साथ उस गजराज पर सवार हो महाविभूतिके धारक भरतने घरकी ओर प्रस्थान किया ॥९॥


महालङ्कारधारिण्यः शेषा अपि वराङ्गनाः । विचित्रवाहनारूढा भरतं पर्यवेष्टयन् ॥१०॥

अर्थ: जो उत्तमोत्तम अलं- कार धारण कर रही थीं तथा नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ थीं ऐसी शेष स्त्रियाँ भी भरतको घेरे हुए थीं ॥१०॥


तुरङ्गरथमारूढो विभूत्या परयाऽन्वितः । शत्रुघ्नोऽस्य महातेजाः प्रययावग्रतः स्थितः ॥११॥

अर्थ: घोड़ोंके रथपर बैठा परम विभूतिसे युक्त महातेजस्वी शत्रुघ्न, भरतके आगे आगे चल रहा था ॥११॥


कम्लाम्लातकभेर्यादिमहावादित्रनिस्वनः । सञ्जातः शङ्खशब्देन मिश्रः कोलाहलान्वितः ॥१२॥

अर्थ: शङ्खोंके शब्दसे मिश्रित तथा कोलाहलसे युक्त कम्ला अम्लातक तथा भेरी आदि महावादित्रोंका शब्द हो रहा था ॥१२॥


कुसुमामोदमुद्यानं त्यक्त्वा ते नन्दनोपमम् । त्रिदशा इव संप्रापुरालयं सुमनोहरम् ॥१३॥

अर्थ: जिस प्रकार देव नन्दन वनको छोड़कर अपने अत्यन्त मनोहर स्वर्गको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार वे सब फूलोंकी सुगन्धिसे युक्त कुसुमामोद नामक उद्यानको छोड़कर अपने मनोहर घरको प्राप्त हुए ॥१३॥


उत्तीर्य द्विरदाद् राजा प्रविश्याऽऽहारमण्डपम् । साधून् सन्तर्प्य विधिवत् प्रणम्य च विशुद्धधीः ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर विशुद्ध बुद्धिके धारक राजा भरतने हाथीसे उतरकर आहार मण्डपमें प्रवेशकर और विधिपूर्वक प्रणामकर साधुओंको सन्तुष्ट किया ॥१४॥


मित्रामात्यादिभिः सार्द्धं भ्रातृपत्नीभिरेव च । आहारमकरोत् स्वं स्वं ततो यातो जनः पदम् ॥१५॥

अर्थ: तत्पश्चात् मित्रों, मन्त्री आदि परिजनों और भौजाइयोंके साथ भोजन किया । उसके बाद सब लोग अपने अपने स्थान पर चले गये ॥१५॥


किं क्रुद्धः किं पुनः शान्तः किंस्थितो भरतान्तिके । किमेतदिति लोकस्य कथा नेभे निवर्तते ॥१६॥

अर्थ: त्रिलोकमण्डन हाथी कुपित क्यों हुआ ? फिर शान्त कैसे हो गया ? भरतके पास क्यों जा बैठा ? यह सब क्या बात है ? इस प्रकार लोगोंकी हस्तिविषयक कथा दूर ही नहीं होती थी ॥ भावार्थ - जहाँ देखो वहीं हाथीके विषयकी चर्चा होती रहती थी ॥१६॥


मगधेन्द्राथ निःशेषा महामात्राः समागताः । प्रणम्यादरिणोऽत्रोचन् पद्मं लक्ष्मणसङ्गतम् ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सब महावतोंने आकर तथा आदर पूर्वक प्रणाम कर राम लक्ष्मणसे कहा ॥१७॥


अहोऽद्य वर्तते देव तुरीयो राजदन्तिनः । विमुक्तपूर्वकृत्यस्य श्लथविग्रहधारिणः ॥१८॥

अर्थ: कि हे देव ! अहो ! सब कार्य छोड़े और शिथिल शरीरको धारण किये हुए त्रिलोकमण्डन हाथीको आज चौथा दिन है ॥१८॥


यतः प्रभृति संक्षोभं सम्प्राप्य शममागतः । तत एव समारभ्य वर्तते ध्यानसङ्गतः ॥१९॥

अर्थ: जिस समयसे वह क्षोभको प्राप्त हो शान्त हुआ है उसी समयसे लेकर वह ध्यानमें आरूढ है ॥१९॥


महायतं विनिःश्वस्य मुकुलाक्षोऽतिविह्वलः । चिरं किं किमपि ध्यात्वा हन्ति हस्तेन मेदिनीम् ॥२०॥

अर्थ: वह आँख बन्दकर अत्यन्त विह्वल होता हुआ बड़ी लम्बी सांस भरता है और चिरकाल तक कुछ कुछ ध्यान करता हुआ सूँडसे पृथ्वीको ताड़ित करता रहता है अर्थात् पृथिवीपर सूँड़ पटकता रहता है ॥२०॥


बहुप्रियशतैः स्तोत्रैः स्तूयमानोऽपि सन्ततम् । कवलं नैव गृह्णाति न रवं कुरुते श्रुतौ ॥२१॥

अर्थ: यद्यपि उसकी निरन्तर सैकड़ों प्रिय स्तोत्रोंसे स्तुति की जाती है तथापि वह न ग्रास ग्रहण करता है और न कानोंमें शब्द ही करता है अर्थात् कुछ भी सुनता नहीं है ॥२१॥


विधाय दन्तयोरग्रे करं मीलितलोचनः । लेप्यकर्म गजेन्द्रस्य चिरं याति समुन्नतम् ॥२२॥

अर्थ: वह नेत्र बन्दकर दाँतोंके अग्रभाग पर सूँड़ रखे हुए ऐसा निश्चल खड़ा है मानो चिरकाल तक स्थिर रहनेवाला हाथीका चित्राम ही है ॥२२॥


किमयं कृत्रिमो दन्ती किंवा सत्यमहाद्विपः । इति तत्र समस्तस्य मतिर्लोकस्य वर्तते ॥२३॥

अर्थ: क्या यह बनावटी हाथी है ? अथवा सचमुचका महागजराज है इस प्रकार उसके विषयमें लोगोंमें तर्क उत्पन्न होता रहता है ॥२३॥


चाटुवाक्यानुरोधेन गृहीतमपि कृच्छ्रतः । विमुञ्चत्यास्यमप्राप्तं कवलं मृष्टमप्यलम् ॥२४॥

अर्थ: मधुर वचनोंके अनुरोधसे यदि किसी तरह ग्रास ग्रहण कर भी लेता है तो वह उस मधुर ग्रासको मुख तक पहुँचनेके पहले ही छोड़ देता है ॥२४॥


त्रिपदीच्छेदललितं समुत्सृज्य शुचान्वितः । आसज्य किञ्चिदालाने विनिःश्वस्यावतिष्ठते ॥२५॥

अर्थ: वह त्रिपदी छेदकी लीलाको छोड़कर शोकसे युक्त होता हुआ किसी खम्भेमें कुछ थोड़ा अटककर सांस भरता हुआ खड़ा है ॥२५॥


समस्तशास्त्रसत्कारविमलीकृतमानसैः । प्रख्यातैरप्यलं वैद्यैर्भावो नास्योपलक्ष्यते ॥२६॥

अर्थ: समस्त शास्त्रोंके सत्कारसे जिनका मन अत्यन्त निर्मल हो गया है ऐसे प्रसिद्ध प्रसिद्ध वैद्योंके द्वारा भी इसके अभिप्रायका पता नहीं चलता ॥२६॥


रचितं स्वादरेणापि सङ्गीतं सुमनोहरम् । न शृणोति यथापूर्वं क्वापि निक्षिप्तमानसः ॥२७॥

अर्थ: जिसका चित्त किसी अन्य पदार्थमें अटक रहा है ऐसा यह हाथी बड़े आदरके साथ रचित अत्यन्त मनोहर संगीतको पहलेके समान नहीं सुनता है ॥२७॥


मङ्गलैः कौतुकैर्योगैर्मन्त्रैर्विद्याभिरौषधैः । न प्रत्यापत्तिमायाति लालितोऽपि महादरैः ॥२८॥

अर्थ: वह महान् आदरसे प्यार किये जाने पर भी मङ्गल मय कौतुक, योग, मन्त्र, विद्या और औषधि आदिके द्वारा स्वस्थताको प्राप्त नहीं हो रहा है ॥२८॥


न विहारे न निद्रायां न ग्रासे न च वारिणि । कुरुते याचितोऽपीच्छां सुहृन्मानमितो यथा ॥२९॥

अर्थ: वह मानको प्राप्त हुए मित्रके समान याचित होनेपर भी न विहारमें, न निद्रामें, न ग्रास उठानेमें और न जलमें ही इच्छा करता है ॥२९॥


दुर्ज्ञानान्तरमीदृक्षं रहस्यं परमाद्भुतम् । किमेतदिति नो विद्मो गजस्य मनसि स्थितम् ॥३०॥

अर्थ: जिसका जानना कठिन है ऐसा यह कौनसा परम अद्भुत रहस्य इस हाथीके मनमें स्थित है यह हम नहीं जानते ॥३०॥


न शक्यस्तोषमानेतुं न च लोभं कदाचन । न याति क्रोधमप्येष दन्ती चित्रार्पितो यथा ॥३१॥

अर्थ: यह हाथी न तो सन्तोषको प्राप्त हो सकता है न कभी लोभको प्राप्त होता है और न कभी क्रोधको प्राप्त होता है, यह तो चित्रलिखितके समान खड़ा है ॥३१॥


सकलस्यास्य राज्यस्य मूलमद्भुतविक्रमः । त्रिलोकभूषणो देव वर्तते करटीदृशः ॥३२॥

अर्थ: हे देव ! अद्भुत पराक्रमका धारी यह हाथी समस्त राज्यका मूल कारण है । हे देव ! यह त्रिलोकमण्डन ऐसा ही हाथी है ॥३२॥


इति विज्ञाय देवोऽत्र प्रमाणं कृत्यवस्तुनि । निवेदनक्रियामात्रसारा ह्यस्मादृशां मतिः ॥३३॥

अर्थ: हे देव ! इस प्रकार जानकर अब जो कुछ करना हो सो इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं अर्थात् जो कुछ आप जानें सो करें क्योंकि हमारे जैसे लोगोंकी बुद्धि तो निवेदन करना ही जानती है ॥३३॥


श्रुत्वेहितं नागपतेस्तदीदृक् पूर्वेहितात्यन्तविभिन्नरूपम् । जातौ नरेन्द्रावधिकं विचिन्तौ पद्माभलक्ष्मीनिलयौ क्षणेन ॥३४॥

अर्थ: इस प्रकार गजराजकी पूर्वचेष्टाओंसे अत्यन्त विभिन्न पूर्वोक्त चेष्टाको सुनकर राम लक्ष्मण राजा क्षण भरमें अत्यधिक चिन्तित हो उठे ॥३४॥


आलानगेहान्निसृतः किमर्थं शमं पुनः केन गुणेन यातः । वृणोति कस्मादशनं न नाग इत्युद्युतिः पद्मरविर्बभूव ॥३५॥

अर्थ: ‘यह हाथी बन्धनके स्थानसे किसलिए बाहर निकला ? फिर किस कारण शान्तिको प्राप्त हो गया ? और किस कारण आहारको स्वीकृत नहीं करता है’ इस प्रकार रामरूपी सूर्य अनेक वितर्क करते हुए उदित हुए ॥३५॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे त्रिभुवनालङ्कारशमाभिधानं नाम चतुरशीतितमं पर्व ॥८४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य प्रणीत पद्मपुराणमें त्रिलोकमण्डन हाथीके शान्त होनेका वर्णन करनेवाला चौरासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८४॥

८५. पञ्चाशीतितमं पर्व (भरतत्रिभुवनालङ्कारसमाध्यनुभवानुकीर्त्तनं)

एतस्मिन्नन्तरे राजन् भगवान् देशभूषणः । कुलभूषणयुक्तश्च सम्प्राप्तो मुनिभिः समम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! इसी बीचमें अनेक मुनियोंके साथ-साथ देशभूषण और कुलभूषण केवली अयोध्यामें आये ॥१॥


ययोर्वंशगिरावासीत् प्रतिमां चतुराननाम् । श्रितयोरुपसर्गोऽसौ जनितः पूर्ववैरिणा ॥२॥

पद्मलक्ष्मणवीराभ्यां प्रातिहार्ये कृते ततः । केवलज्ञानमुत्पन्नं लोकालोकावभासनम् ॥३॥

अर्थ: वे देशभूषण कुलभूषण जिन्हें कि वंशस्थविल पर्वत पर चतुरानन प्रतिमा योगको प्राप्त होने पर उनके पूर्वभवके वैरीने उपसर्ग किया था और वीर राम-लक्ष्मणके द्वारा सेवा किये जाने पर जिन्हें लोकालोकको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था ॥२-३॥


ततस्तुष्टेन तार्क्ष्येण भक्तिस्नेहमुपेयुषा । रत्नास्त्रवाहनान्याभ्यां दत्तानि विविधानि वै ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर संतोषको प्राप्त हुए गरुडेन्द्रने भक्ति और स्नेहसे युक्त हो राम-लक्ष्मणके लिए नानाप्रकारके रत्न, अस्त्र और वाहन प्रदान किये थे ॥४॥


यत्प्रसादान्निरस्त्रत्वं प्राप्तौ संशयितौ रणे । चक्रतुर्विजयं शत्रोर्यतो राज्यमवापतुः ॥५॥

अर्थ: निरस्त्र होनेके कारण रणमें संशय अवस्थाको प्राप्त हुए राम-लक्ष्मणने जिनके प्रसादसे शत्रुको जीता था तथा राज्य प्राप्त किया था ॥५॥


देवासुरस्तुतावेतौ तौ लोकत्रयविश्रुतौ । मुनीन्द्रौ नगरीमुख्यां प्राप्तावुत्तरकोशलाम् ॥६॥

अर्थ: देव और धरणेन्द्र जिनकी स्तुति कर रहे थे तथा तीनों लोकोंमें जिनकी प्रसिद्धि थी ऐसे वे मुनिराज देशभूषण तथा कुलभूषण नगरियोंमें प्रमुख अयोध्या नगरीमें आये ॥६॥


नन्दनप्रतिमे तौ च महेन्द्रोदयनामनि । उद्यानेऽवस्थितौ पूर्वं यथा सञ्जयनन्दनौ ॥७॥

अर्थ: जिसप्रकार पहले संजय और नन्दन नामक मुनिराज आये थे उसी प्रकार आकर वे नन्दनवनके समान महेन्द्रोदय नामक वनमें ठहर गये ॥७॥


महागणसमाकीर्णौ चन्द्रार्कप्रतिमाविमौ । सम्प्राप्तौ नगरीलोको विवेद् परमोदयौ ॥८॥

अर्थ: वे केवली, मुनियोंके महासंघसे सहित थे, चन्द्रमा और सूर्यके समान देदीप्यमान थे तथा परम अभ्युदयके धारक थे । उनके आते ही नगरीके लोगोंको इनका ज्ञान हो गया ॥८॥


ततः पद्माभचक्रेशौ भरतारिनिषूदनौ । एते बन्दारवो गन्तुं संयतेन्द्रान् समुद्यताः ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर वन्दना करनेके अभिलाषी राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न ये चारों भाई उन केवलियोंके पास जानेके लिए उद्यत हुए ॥९॥


आरुह्य वारणानुग्रानुक्त्वा भानौ समुद्गते । जातिस्मरं पुरस्कृत्य त्रिलोकविजयं द्विपम् ॥१०॥

देवा इव प्रदेशं तं प्रस्थिताश्चारुचेतसः । कल्याणपर्वतौ यत्र स्थितौ निर्ग्रन्थसत्तमौ ॥११॥

अर्थ: सूर्योदय होने पर उन्होंने नगरमें सर्वत्र घोषणा कराई । तदनन्तर उन्नत हाथियों पर सवार हो एवं जातिस्मरणसे युक्त त्रिलोकमण्डन हाथीको आगे कर देवोंके समान सुन्दर चित्तके धारक होते हुए वे सब उस स्थानकी ओर चले जहाँ कि कल्याणके पर्वतस्वरूप दोनों निर्ग्रन्थ मुनिराज विराजमान थे ॥१०-११॥


कैकया कैकयी देवी कोशलेन्द्रात्मजा तथा । सुप्रजाश्चेति विख्यातास्तेषां श्रेणिक मातरः ॥१२॥

जिनशासनसद्भावाः साधुभक्तिपरायणाः । देवीशतसमाकीर्णा देव्याभा गन्तुमुद्यताः ॥१३॥

मुनिदर्शनतृड्ग्रस्ता सुग्रीवप्रमुखा मुदा । विद्याधराः समायाता महाविभवसङ्गताः ॥१४॥

अर्थ: जिनका उत्तम अभिप्राय जिनशासनमें लग रहा था, जो साधुओंकी भक्ति करनेमें तत्पर थीं, सैकड़ों देवियाँ जिनके साथ थीं तथा देवाङ्गनाओंके समान जिनकी आभा थी ऐसी हे श्रेणिक ! उन चारों भाइयोंकी माताएँ कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी और सुप्रजा ( सुप्रभा ) भी जानेके लिए उद्यत हुईं जो मुनिराजके दर्शन करनेकी तृष्णासे ग्रस्त थे तथा महावैभवसे सहित थे ऐसे सुग्रीव आदि विद्याधर भी हर्षपूर्वक वहाँ आये थे ॥१२-१४॥


आतपत्रं मुनेर्दृष्ट्वा सकलोडुपसन्निभम् । उत्तीर्य पद्मनाभाद्या द्विरदेभ्यः समागताः ॥१५॥

अर्थ: पूर्णचन्द्रमाके समान मुनिराजका छत्र देखते ही रामचन्द्र आदि हाथियोंसे उतर कर पैदल चलने लगे ॥१५॥


कृताञ्जलिपुटाः स्तुत्वा प्रणम्य च यथाक्रमम् । समर्च्य च मुनींस्तस्थुरात्मयोग्यासु भूमिषु ॥१६॥

अर्थ: सबने हाथ जोड़कर यथाक्रमसे मुनियोंकी स्तुति की, प्रणाम किया, पूजा की और तदनन्तर सब अपने-अपने योग्य भूमियोंमें बैठ गये ॥१६॥


शुश्रुवुश्च मुनेर्वाक्यं सुसमाहितचेतसः । संसारकारणध्वंसि धर्मशंसनतत्परम् ॥१७॥

अर्थ: उन्होंने एकाग्र चित्त होकर संसारके कारणोंको नष्ट करनेवाले एवं धर्मकी प्रशंसा करनेमें तत्पर मुनिराजके वचन सुने ॥१७॥


अणुधर्मोऽग्रधर्मश्च श्रेयसः पदवी द्वयी । पारम्पर्येण तत्राद्या परा साक्षात्प्रकीर्तिता ॥१८॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि अणुधर्म और पूर्णधर्म - अणुव्रत और महाव्रत ये दोनों मोक्षके मार्ग हैं इनमेंसे अणुधर्म तो परम्परासे मोक्षका कारण है, पर महाधर्म साक्षात् ही मोक्षका कारण कहा गया है ॥१८॥


गृहाश्रमविधिः पूर्वः महाविस्तारसङ्गतः । परो निर्ग्रन्थशूराणां कीर्तितोऽत्यन्तदुःसहः ॥१९॥

अर्थ: पहला अणुधर्म महाविस्तारसे सहित है तथा गृहस्थाश्रममें होता है और दूसरा जो महाधर्म है वह अत्यन्त कठिन है तथा महाशूर वीर निर्ग्रन्थ साधुओंके ही होता है ॥१९॥


अनादिनिधने लोके यत्र लोभेन मोहिताः । जन्तवो दुःखमत्युग्रं प्राप्नुवन्ति कुयोनिषु ॥२०॥

अर्थ: इस अनादिनिधन संसारमें लोभसे मोहित हुए प्राणी नरक आदि कुयोनियोंमें तीव्र दुःख पाते हैं ॥२०॥


धर्मो नाम परो बन्धुः सोऽयमेको हितो महान् । मूलं यस्य दया शुद्धा फलं वक्तुं न शक्यते ॥२१॥

अर्थ: इस संसारमें धर्म ही परम बन्धु है, धर्म ही महाहितकारी है। निर्मल दया जिसकी जड़ है उस धर्मका फल नहीं कहा जा सकता ॥२१॥


ईप्सितुं जन्तुना सर्वं लभ्यते धर्मसङ्गमात् । धर्मः पूज्यतमो लोके बुधा धर्मेण भाविताः ॥२२॥

अर्थ: धर्मके समागमसे प्राणी समस्त इष्ट वस्तुओंको प्राप्त होता है। लोकमें धर्म अत्यन्त पूज्य है। जो धर्मकी भावनासे सहित हैं, लोकमें वही विद्वान् कहलाते हैं ॥२२॥


दयामूलस्तु यो धर्मो महाकल्याणकारणम् । दग्धधर्मेषु सोऽन्येषु विद्यते नैव जातुचित् ॥२३॥

अर्थ: जो धर्म दयामूलक है वही महाकल्याणका कारण है। संसारके अन्य अधम धर्मोंमें वह दयामूलक धर्म कभी भी विद्यमान नहीं है अर्थात् उनसे वह भिन्न है ॥२३॥


जिनेन्द्रविहिते सोऽयं मार्गे परमदुर्लभे । सदा सन्निहिता येन त्रैलोक्याग्रमवाप्यते ॥२४॥

अर्थ: वह दयामूलकधर्म, जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा प्रणीत परम दुर्लभमार्गमें सदा विद्यमान रहता है जिसके द्वारा तीन लोकका अग्रभाग अर्थात् मोक्ष प्राप्त होता है ॥२४॥


पातालेऽसुरनाथाद्या क्षोण्यां चक्रधरादयः । फलं शक्रादयः स्वर्गे परमं यस्य भुञ्जते ॥२५॥

अर्थ: जिस धर्मके उत्तम फलको पातालमें धरणेन्द्र आदि, पृथिवी पर चक्रवर्ती आदि और स्वर्गमें इन्द्र आदि भोगते हैं ॥२५॥


तावत् प्रस्तावमासाद्य साधुं नारायणः स्वयम् । प्रणम्य शिरसाऽपृच्छदिति सङ्गतपाणिकः ॥२६॥

उपमृद्य प्रभो स्तम्भं नागेन्द्रः क्षोभमागतः । प्रशमं हेतुना केन सहसा पुनरागतः ॥२७॥

अर्थ: उसीसमय प्रकरण पाकर लक्ष्मणने स्वयं हाथ जोड़कर शिरसे प्रणामकर मुनिराजसे यह पूछा कि हे प्रभो ! त्रिलोकमण्डन नामक गजराज खम्भेको तोड़कर किस कारण क्षोभको प्राप्त हुआ और फिर किस कारण अकस्मात् ही शान्त हो गया ? ॥२६-२७॥


भगवन्निति संशीतिमप्यपाकर्तुमर्हसि । ततो जगाद वचनं केवली देशभूषणः ॥२८॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप मेरे इस संशयको दूर करनेके लिए योग्य हैं। तदनन्तर देशभूषण केवलीने निम्नप्रकार वचन कहे ॥२८॥


बलोद्रेकादयं तुङ्गात् संक्षोभं परमं गतः । स्मृत्वा पूर्वभवं भूयः शमयोगमशिश्रियत् ॥२९॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि यह हाथी अत्यधिक पराक्रमकी उत्कटतासे पहले तो परम क्षोभको प्राप्त हुआ था और उसके बाद पूर्वभवका स्मरण होनेसे शान्तिको प्राप्त हो गया था ॥२९॥


आसीदाद्ये युगेऽयोध्यानगर्यामुत्तमश्रुतिः । नाभितो मरुदेव्याश्च निमित्तात्तनुमाश्रितः ॥३०॥

त्रैलोक्यक्षोभणं कर्म समुपार्ज्य महोदयः । प्रकटत्वं परिप्रापदिति देवेन्द्रभूतिभिः ॥३१॥

अर्थ: इस कर्म-भूमिरूपी युगके आदिमें इसी अयोध्या नगरीमें राजा नाभिराज और रानी मरुदेवीके निमित्तसे शरीरको प्राप्तकर उत्तम नामको धारण करनेवाले भगवान् ऋषभदेव प्रकट हुए थे । उन्होंने पूर्व-भवमें तीन लोकको क्षोभित करनेवाले तीर्थङ्कर नाम कर्मका बन्ध किया था उसीके फलस्वरूप वे इन्द्रके समान विभूतिसे प्रसिद्धिको प्राप्त हुए थे ॥३०-३१॥


विन्ध्यहिमनगोत्तुङ्गस्तनीं सागरमेखलाम् । पत्नीमिव निजां साध्वीं वश्यां योऽसेवत क्षितिम् ॥३२॥

अर्थ: विन्ध्याचल और हिमाचल ही जिसके उन्नत स्तन थे तथा समुद्र जिसकी करधनी थी ऐसी पृथिवीका जिन्होंने सदा अनुकूल चलनेवाली अपनी पतिव्रता पत्नीके समान सदा सेवन किया था ॥३२॥


भगवान् पुरुषेन्द्रोऽसौ लोकत्रयनमस्कृतः । पुराऽरमत पुर्यस्यां दिवीव त्रिदशाधिपः ॥३३॥

अर्थ: तीनों लोक जिन्हें नमस्कार करते थे ऐसे वे भगवान् ऋषभदेव पहले इस अयोध्यापुरीमें उस प्रकार रमण करते थे जिस प्रकार कि स्वर्गमें इन्द्र रमण करता है ॥३३॥


श्रीमानृषभदेवोऽसौ द्युतिकान्तिसमन्वितः । लक्ष्मीश्रीकान्तिसम्पन्नः कल्याणगुणसागरः ॥३४॥

त्रिज्ञानी धीरगम्भीरो दृङ्मनोहारिचेष्टितः । अभिरामवपुः सत्त्वी प्रतापी परमोऽभवत् ॥३५॥

अर्थ: वे श्रीमान् ऋषभदेव द्युति तथा कान्तिसे सहित थे, लक्ष्मी, श्री और कान्तिसे सम्पन्न थे, कल्याणकारी गुणोंके सागर थे, तीन ज्ञानके धारी थे, धीर और गम्भीर थे, नेत्र और मनको हरण करनेवाली चेष्टाओंसे सहित थे, सुन्दर शरीरके धारक थे, बलवान् थे और परम प्रतापी थे ॥३४-३५॥


सौधर्मेन्द्रप्रधानैर्यस्त्रिदशैरभिजन्मनि । हेमरत्नघटैर्मेरावभिषिक्तः सुभक्तिभिः ॥३६॥

अर्थ: जन्मके समय भक्तिसे भरे सौधर्मेन्द्र आदि देवोंने सुमेरु पर्वतपर सुवर्ण तथा रत्नमयी घटोंसे उनका अभिषेक किया था ॥३६॥


गुणान् कस्तस्य शक्नोति वक्तुं केवलिवर्जितः । ऐश्वर्यं प्रार्थ्यते यस्य सुरेन्द्रैरपि सन्ततम् ॥३७॥

अर्थ: इन्द्र भी जिनके ऐश्वर्यकी निरन्तर चाह रखते थे उन ऋषभदेवके गुणोंका वर्णन केवली भगवान्को छोड़कर कौन कर सकता है ? ॥३७॥


कालं द्राघिष्ठमत्यन्तं भुक्त्वा श्रीविभवं परम् । अप्सरःपरमां वीक्ष्य तां नीलाञ्जननर्तकीम् ॥३८॥

अर्थ: बहुत लम्बे समय तक लक्ष्मीके उत्कृष्ट वैभवका उपभोग कर वे एक दिन नीलाञ्जना नामकी अप्सराको देख प्रतिबोधको प्राप्त हुए ॥३८॥


स्तुतो लौकान्तिकैर्देवैः स्वयम्बुद्धो महेश्वरः । न्यस्य पुत्रशते राज्यं निष्क्रान्तो जगतां गुरुः ॥३९॥

अर्थ: लौकान्तिक देवोंने जिनकी स्तुति की थी ऐसे महावैभवके धारी जगद्गुरु भगवान् ऋषभदेव अपने सौ पुत्रोंपर राज्यभार सौंपकर घरसे निकल पड़े ॥३९॥


उद्याने तिलकाभिख्ये प्रजाभ्यो यदसौ गतः । प्रजागमिति तत्तेन लोके तीर्थं प्रकीर्तितम् ॥४०॥

अर्थ: यतश्च भगवान् प्रजासे निःस्पृह हो तिलकनामा उद्यानमें गये थे इसलिए लोकमें वह उद्यान प्रजाग इस नामका तीर्थ प्रसिद्ध हो गया ॥४०॥


संवत्सरसहस्रं स दिव्यं मेरुरिवाचलः । गुरुः प्रतिमया तस्थौ त्यक्ताशेषपरिग्रहः ॥४१॥

अर्थ: वे भगवान् समस्त परिग्रहका त्यागकर एक हजार वर्ष तक मेरुके समान अचल प्रतिमा योगसे खड़े रहे अर्थात् एक हजार वर्ष तक उन्होंने कठिन तपस्या की ॥४१॥


स्वामिभक्त्या समं तेन ये श्रामण्यमुपस्थिताः । षण्मासाभ्यन्तरे भग्ना दुःसहैस्ते परीषहैः ॥४२॥

अर्थ: स्वामिभक्तिके कारण उनके साथ जिन चार हजार राजाओंने मुनिव्रतका धारण किया था वे छः महीनेके भीतर ही दुःसह परीषहोंसे पराजित हो गये ॥४२॥


ते भग्ननिश्चयाः क्षुद्राः स्वेच्छाविरचितव्रताः । वल्भिनः फलमूलाद्यैर्बालवृत्तिमुपाश्रिताः ॥४३॥

अर्थ: उन क्षुद्र पुरुषोंने अपना निश्चय तोड़ दिया, स्वेच्छानुसार नाना प्रकारके व्रत धारण कर लिये और वे अज्ञानी जैसी चेष्टाको प्राप्त हो फल-मूल आदिका भोजन करने लगे ॥४३॥


तेषां मध्ये महामानो मरीचिरिति यो ह्यसौ । परिव्राज्यमयञ्चक्रे काषायी सकषायधीः ॥४४॥

अर्थ: उन भ्रष्ट राजाओंके बीच महामानी, कषायले - गेरूसे रँगे वस्त्रोंको धारण करनेवाला तथा कषाय युक्त बुद्धिसे युक्त जो मरीचि नामका साधु था उसने परिव्राजकका मत प्रचलित किया ॥४४॥


सुप्रभस्य विनीतायां सूर्यचन्द्रोद्गमौ सुतौ । प्रह्लादनाख्यमहिषीकुक्षिभूमिमहामणी ॥४५॥

अर्थ: इसी विनीता नगरीमें एक सुप्रभ नामका राजा था उसकी प्रह्लादना नामकी स्त्रीकी कुक्षिरूपी भूमिसे उत्पन्न हुए महामणियोंके समान सूर्योदय और चन्द्रोदय नामके दो पुत्र थे ॥४५॥


स्वामिना सह निष्क्रान्तौ प्रथितौ सर्वविष्टपे । भग्नौ श्रामण्यतोऽत्यन्तप्रीतौ तं शरणं गतौ ॥४६॥

अर्थ: ये दोनों पुत्र समस्त संसारमें प्रसिद्ध थे । उन्होंने भगवान् आदिनाथके साथ ही दीक्षा धारण की थी परन्तु मुनिपदसे भ्रष्ट होकर वे पारस्परिक तीव्र प्रीतिके कारण अन्तमें मरीचिकी शरणमें चले गये ॥४६॥


मरीचिशिष्ययोः कूटप्रतापव्रतमानिनोः । तयोः शिष्यगणो जातः परिव्राङ्गदितो महान् ॥४७॥

अर्थ: मायामयी तपश्चरण और व्रतको धारण करनेवाले मरीचिके उन दोनों शिष्योंके अनेक शिष्य हो गये जो परिव्राट् नामसे प्रसिद्ध हुए ॥४७॥


कुधर्माचरणाद् भ्रान्तौ संसारं तौ चतुर्गतिम् । सहितौ पूरिता क्षोणी ययोस्त्यक्तकलेवरैः ॥४८॥

अर्थ: मिथ्याधर्मका आचरण करनेसे वे दोनों चतुर्गति रूप संसारमें साथ-साथ भ्रमण करते रहे। उन दोनों भाइयोंने पूर्वभवोंमें जो शरीर छोड़े थे उनसे समस्त पृथिवी भर गई थी ॥४८॥


ततश्चन्द्रोदयः कर्मवशान्नागाभिधे पुरे । राज्ञो हरिपतेः पुत्रो मनोलूतासमुद्भवः ॥४९॥

जातः कुलंकराभिख्यः प्राप्तश्च नृपतां पराम् । पूर्वस्नेहानुबन्धेन भावितेन भवान् बहून् ॥५०॥

सूर्योदयः पुरेऽत्रैव ख्यातः श्रुतिरतः श्रुतौ । विश्वाङ्केनाग्निकुण्डायां जातोऽभूत्तत्पुरोहितः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर चन्द्रोदयका जीव कर्मके वशीभूत हो नाग नामक नगरमें राजा हरिपतिके मनोलूता नामक रानीसे कुलंकर नामक पुत्र हुआ जो आगे चलकर उत्तम राज्यको प्राप्त हुआ । और सूर्योदयका जीव इसी नगरमें विश्वाङ्क नामक ब्राह्मणके अग्निकुण्डा नामकी स्त्रीसे श्रुतिरत नामका विद्वान् पुत्र हुआ । अनेक भवोंमें वृद्धिको प्राप्त हुए पूर्वस्नेहके संस्कारसे श्रुतिरत राजा कुलंकरका पुरोहित हुआ ॥४९-५१॥


कुलङ्करोऽन्यदा गोत्रसन्तत्या कृतसेवनान् । तापसान् सेवितुं गच्छन्नपश्यन्मुनिपुङ्गवम् ॥५२॥

अर्थ: किसी समय राजा कुलंकर गोत्रपरम्परासे जिनकी सेवा होती आ रही थी ऐसे तपस्वियोंकी सेवा करनेके लिए जा रहा था सो मार्गमें उसने किन्हीं दिगम्बर मुनिराजके दर्शन किये ॥५२॥


अभिनन्दितसंज्ञेन तेनाऽसौ नतिमागतः । जगदेऽवधिनेत्रेण सर्वलोकहितैषिणा ॥५३॥

यत्र त्वं प्रस्थितस्तत्र तव चेभ्यः पितामहः । तापसः सर्पतां प्राप्तः काष्ठमध्येऽवतिष्ठते ॥५४॥

काष्ठे विपाट्यमाने तं तापसेन गतो भवान् । रक्षिस्यति गतस्यास्य तच्च सर्वं तथाऽभवत् ॥५५॥

अर्थ: उन मुनिराजका नाम अभिनन्दित था, वे अवधिज्ञानरूपी नेत्रसे सहित थे तथा सब लोगोंका हित चाहनेवाले थे। जब राजा कुलंकरने उन्हें नमस्कार किया तब उन्होंने कहा कि हे राजन् ! तू जहाँ जा रहा है वहाँ तेरा सम्पन्न पितामह जो तापस हो गया था मरकर साँप हुआ है और काष्ठके मध्यमें विद्यमान है। एक तापस उस काष्ठको चीर रहा है सो तू जाकर उसकी रक्षा करेगा। जब कुलंकर वहाँ गया तब मुनिराजके कहे अनुसार ही सब हुआ ॥५३-५५॥


कदागमसमापन्नान् दृष्ट्वाऽसौ तापसांस्ततः । प्रबोधमुत्तमं प्राप्तः श्रामण्यं कर्त्तुमुद्यतः ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर उन तापसोंको मिथ्याशास्त्रसे युक्त देखकर राजा कुलंकर उत्तम प्रबोधको प्राप्त हो मुनिपद धारण करनेके लिए उद्यत हुआ ॥५६॥


वसुपर्वतकश्रुत्या मूढश्रुतिरतस्ततः । तममोहयदेवं च पापकर्मा पुनर्जगौ ॥५७॥

गोत्रक्रमागतो राजन् धर्मोऽयं तव वैदिकः । ततो हरिपतेः पुत्रो यदि त्वं तत्तमाचर ॥५८॥

अर्थ: अथानन्तर राजा वसु और पर्वतके द्वारा अनुमोदित ‘अजैर्यष्टव्यम्’ इस श्रुतिसे मोहको प्राप्त हुए पापकर्मा श्रुतिरत नामा पुरोहितने उन्हें मोहमें डालकर इस प्रकार कहा कि हे राजन् ! वैदिक धर्म तुम्हारी वंशपरम्परासे चला रहा है इसलिए यदि तुम राजा हरिपतिके पुत्र हो तो उसी वैदिक धर्मका आचरण करो ॥५७-५८॥


नाथ वेदविधिं कृत्वा सुतं न्यस्य निजे पदे । करिष्यसि हितं पश्चात् प्रसादः क्रियतां मम ॥५९॥

अर्थ: हे नाथ ! अभी तो वेदमें बताई हुई विधिके अनुसार कार्य करो फिर पिछली अवस्थामें अपने पद पर पुत्रको स्थापित कर आत्माका हित करना । हे राजन् ! मुझपर प्रसाद करो - प्रसन्न होओ ॥५९॥


एवमेतदथाभीष्टा श्रीदामेति प्रकीर्त्तिता । महिष्यचिन्तयत्यस्य नूनं राज्ञाऽन्यसङ्गता ॥६०॥

ज्ञातास्मि येन वैराग्यात् प्रव्रज्यां कर्त्तुमिच्छति । प्रव्रज्येदपि किं नो वा को जानाति मनोगतिम् ॥६१॥

तस्माद्व्यापादयाम्येनं विषेणेत्यनुचिन्त्य सा । पुरोहितान्वितं पापा कुलङ्करममारयत् ॥६२॥

अर्थ: अथानन्तर राजा कुलंकरने ‘यह बात ऐसी ही है’ यह कह कर पुरोहितकी प्रार्थना स्वीकृत की। तदनन्तर राजाकी श्रीदामा नामकी प्रिय स्त्री थी जो परपुरुषासक्त थी। उसने उक्त घटनाको देखकर विचार किया कि जान पड़ता है इस राजाने मुझे अन्य पुरुषमें आसक्त जान लिया है इसीलिए यह विरक्त हो दीक्षा लेना चाहता है। अथवा यह दीक्षा लेगा या नहीं लेगा इसकी मनकी गतिको कौन जानता है ? मैं तो इसे विष देकर मारती हूँ ऐसा विचार कर उस पापिनीने पुरोहित सहित राजा कुलंकरको मार डाला ॥६०-६२॥


ततोऽनुध्यातमात्रेण पशुघातेन पापतः । कालप्राप्तावभूतां तौ निकुञ्जे शशकौ वने ॥६३॥

अर्थ: तदनन्तर पशुघातका चिन्तवन करने मात्रके पापसे वे दोनों मर कर निकुञ्ज नामक वनमें खरगोश हुए ॥६३॥


भेकत्वं मूषकत्वं च बर्हिणत्वं पृदाकुताम् । रुरुत्वं च पुनः प्राप्तौ कर्मानिलजवेरितौ ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर कर्मरूपी वायुके वेगसे प्रेरित हो क्रमसे मेंडक, चूहा, मयूर, अजगर और मृग पर्यायको प्राप्त हुए ॥६४॥


पूर्वश्रुतिरतो हस्ती दर्दुरश्चेतरोऽभवत् । तस्याक्रान्तः स पादेन चकारासुविमोचनम् ॥६५॥

अर्थ: तत्पश्चात् श्रुतिरत पुरोहितका जीव हाथी हुआ और राजा कुलंकरका जीव मेंडक हुआ सो हाथीके पैरसे दबकर मेंडक मृत्युको प्राप्त हुआ ॥६५॥


वर्षाभूत्वं पुनः प्राप्तः शुष्के सरसि भक्षितः । काकैः कुक्कुटतां प्राप्तो मार्जारत्वं तु हस्त्यसौ ॥६६॥

अर्थ: पुनः सूखे सरोवरमें मेंडक हुआ सो कौओंने उसे खाया । तदनन्तर मुर्गा हुआ और हाथीका जीव मार्जार हुआ ॥६६॥


अर्थ: सो मार्जारने मुर्गाका भक्षण किया ।


कुलङ्करचरो जन्मत्रितयं कुक्कुटोऽभवत् । भक्षितो द्विजपूर्वेण मार्जारेण नृजन्मना ॥६७॥

अर्थ: इस तरह कुलंकरका जीव तीन भव तक मुर्गा हुआ और पुरोहितका जीव जो मार्जार था वह मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ सो उसने उस मुर्गाको खाया ॥६७॥


राजद्विजचरौ मत्स्यशिशुमारत्वमागतौ । बद्धौ जालेन कैवर्त्तैः कुठारेणाऽऽहतौ मृतौ ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर राजा और पुरोहितके जीव क्रमसे मच्छ और शिशुमार अवस्थाको प्राप्त हुए। सो धीवरोंने जालमें फँसाकर उन्हें पकड़ा तथा कुल्हाड़ोंसे काटा जिससे मरणको प्राप्त हुए ॥६८॥


शिशुमारस्तयोरुल्काबह्वाशतनयोऽभवत् । विनोदो रमणो मत्स्यो द्विजो राजगृहे तयोः ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर उन दोनोंमें जो शिशुमार था वह मरकर राजगृह नगरमें बह्वाश नामक पुरुष और उल्का नामक स्त्रीके विनोद नामका पुत्र हुआ तथा जो मच्छ था वह भी कुछ समय बाद उसी नगरमें तथा उन्हीं दम्पतीके रमण नामका पुत्र हुआ ॥६९॥


निःस्वत्वेनाक्षरत्वे च सति जन्तुर्द्विपात् पशुः । रमणः सम्प्रधार्यैवं वेदार्थी निःसृतो गृहात् ॥७०॥

अर्थ: दोनों ही अत्यन्त दरिद्र तथा मूर्ख थे इसलिए रमणने विचार किया कि अत्यन्त दरिद्रता अथवा मूर्खताके रहते हुए मनुष्य मानो दो पैर वाला पशु ही है। ऐसा विचारकर वह वेद पढ़नेकी इच्छासे घरसे निकल पड़ा ॥७०॥


क्षोणीं पर्यटता तेन गुरुवेश्मसु शिक्षिताः । चत्वारः साङ्गका वेदाः प्रस्थितश्च पुनर्गृहम् ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर पृथिवीमें घूमते हुए उसने गुरुओंके घर जाकर अङ्गों सहित चारों वेदोंका अध्ययन किया। अध्ययनके बाद वह पुनः अपने घर की ओर चला ॥७१॥


मागधं नगरं प्राप्तो भ्रातृदर्शनलालसः । भास्करेऽस्तङ्गते चासौ व्योम्नि मेघान्धकारिते ॥७२॥

अर्थ: जिसे भाईके दर्शनकी लालसा लग रही थी ऐसा रमण चलता-चलता जब सूर्यास्त हो गया था और आकाशमें मेघोंमें अन्धकार छा रहा था तब राजगृह नगर आया ॥७२॥


नगरस्य बहिर्यक्षनिलये वा समाश्रितः । जीर्णोद्यानस्य मध्यस्थे तत्र चेदं प्रवर्त्तते ॥७३॥

अर्थ: वहाँ वह नगरके बाहर एक पुराने बगीचामें जो यक्षका मन्दिर था उसमें ठहर गया। वहाँ निम्न प्रकार घटना हुई ॥७३॥


विनोदस्याङ्गना तस्य समिधाख्या कुशीलिका । अशोकदत्तसंकेता तं यक्षालयमागता ॥७४॥

अर्थ: रमणका जो भाई विनोद राजगृह नगरमें रहता था उसकी स्त्रीका नाम समिधा था। यह समिधा दुराचारिणी थी सो अशोकदत्त नामक जारका संकेत पाकर उसी यक्ष-मन्दिरमें पहुँची जहाँ कि रमण ठहरा हुआ था ॥७४॥


अशोकदत्तको मार्गे गृहीतो दण्डपाशिकैः । विनोदोऽपि गृहीतासिर्भार्यानुपदमागतः ॥७५॥

अर्थ: अशोकदत्तको मार्गमें कोतवालने पकड़ लिया इसलिए वह संकेतके अनुसार समिधाके पास नहीं पहुँच सका। इधर समिधाका असली पति विनोद तलवार लेकर उसके पीछे-पीछे गया ॥७५॥


सद्भावमन्त्रणं श्रुत्वा समिधा क्रोधसंगिना । सायकेन विनोदेन रमणः प्रासुकीकृतः ॥७६॥

अर्थ: वहाँ समिधाके साथ रमणका सद्भावपूर्ण वार्तालाप सुन विनोदने क्रोधित हो रमणको तलवारसे निष्प्राण कर दिया ॥७६॥


विनोदो दयितायुक्तो हृष्टः प्रच्छन्नपापकः । गृहं गतः पुनस्तौ च संसारं पुरुमाटतुः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर प्रच्छन्न पापी विनोद हर्षित होता हुआ अपनी स्त्रीके साथ घर आया। उसके बाद वे दोनों दीर्घकाल तक संसारमें भटकते रहे ॥७७॥


महिषत्वमितोऽरण्ये विनोदो रमणः पुनः । ऋक्षो बभूव निश्चक्षुर्दग्धौ शालवने च तौ ॥७८॥

अर्थ: तत्पश्चात् विनोदका जीव तो वनमें भैंसा हुआ और रमणका जीव उसी वनमें अन्धा रीछ हुआ सो दोनों ही उस शालवनमें जलकर मरे ॥७८॥


जातौ गिरिवने व्याधौ मृतौ च हरिणौ पुनः । तयोर्बन्धुजनस्त्रासाद्दिशो यातो यथायथम् ॥७९॥

जीवन्तावेव तावात्तौ निषादैः कान्तलोचनौ । स्वयम्भूतिरथो राजा विमलं वन्दितुं गतः ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर दोनों ही गिरिवनमें व्याध हुए फिर मरकर हरिण हुए । उन हरिणोंके जो माता पिता आदि बन्धुजन थे वे भयके कारण दिशाओंमें इधर-उधर भाग गये । दोनों बच्चे अकेले रह गये । उनके नेत्र अत्यन्त सुन्दर थे इसलिए व्याधोंने उन्हें जीवित ही पकड़ लिया । अथानन्तर तीसरा नारायण राजा स्वयंभूति श्रीविमलनाथ स्वामीके दर्शन करनेके लिए गया ॥७९-८०॥


सुरासुरैः समं नत्वा जिनेन्द्रं समहर्धिकः । प्रत्यागच्छन्ददर्शैतौ स्थापितौ च जिनालये ॥८१॥

अर्थ: बहुत भारी ऋद्धिको धारण करनेवाला राजा स्वयंभू जब सुरों और असुरोंके साथ जिनेन्द्रदेवकी वन्दना करके लौट रहा था तब उसने उन दोनों हरिणोंको देखा सो व्याधोंके पाससे लेकर उसने उन्हें जिनमन्दिरमें रखवा दिया ॥८१॥


संयतान् तत्र पश्यन्तौ भक्षयन्तौ यथेप्सितम् । अन्नं राजकुले प्राप्तौ हरिणौ परमां धृतिम् ॥८२॥

अर्थ: वहाँ मुनियोंके दर्शन करते और राजदरबारसे इच्छानुकूल भोजन ग्रहण करते हुए दोनों हरिण परम धैर्यको प्राप्त हुए ॥८२॥


आयुष्येषः परिक्षीणे लब्धमृत्युः समाधिना । सुरलोकमितोऽन्योऽपि तिर्यक्षु पुनरभ्रमत् ॥८३॥

अर्थ: उन दोनों हरिणोंमें एक हरिण आयु क्षीण होनेपर समाधिमरणकर स्वर्ग गया और दूसरा तिर्यञ्चोंमें भ्रमण करता रहा ॥८३॥


ततः कथमपि प्राप कर्मयोगान्मनुष्यताम् । विनोदचरसारङ्गः स्वप्ने राज्यमिवोदितम् ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर विनोदका जीव जो हरिण था उसने कर्मयोगसे किसी तरह मनुष्य पर्याय प्राप्त की मानो स्वप्नमें राज्य ही उसे मिल गया हो ॥८४॥


जम्बूद्वीपस्य भरते काम्पिल्यनगरे धनी । द्वाविंशतिप्रमाणाभिर्हेमकोटिभिरूर्जितः ॥८५॥

अमुष्य धनदाह्वस्य वणिजो रमणोऽमरः । च्युतो भूषणनामाऽभूद् वारुण्यां तनयः शुभः ॥८६॥

अर्थ: अथानन्तर जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें कापिल्य नामक नगरके मध्य बाईस करोड़ दीनारका धनी एक धनद नामका वैश्य रहता था सो रमणका जीव मरकर जो देव हुआ था वह वहाँसे च्युत हो उसकी वारुणी नामक स्त्रीसे भूषण नामका उत्तम पुत्र हुआ ॥८५-८६॥


नैमित्तेनायमादिष्टः प्रव्रजिष्यत्ययं ध्रुवम् । श्रुत्वैवं धनदो लोकादभूदुद्विग्नमानसः ॥८७॥

अर्थ: किसी निमित्तज्ञानीने धनद वैश्यसे कहा कि तेरा यह पुत्र निश्चित ही दीक्षा धारण करेगा सो निमित्तज्ञानीके वचन सुन धनद संसारसे उद्विग्नचित्त रहने लगा ॥८७॥


सत्पुत्रप्रेमसक्तेन तेन वेश्म निधापितम् । योग्यं सर्वक्रियायोगे यत्र तिष्ठति भूषणः ॥८८॥

अर्थ: उस उत्तम पुत्रकी प्रीतिसे युक्त धनद सेठने एक ऐसा घर बनवाया जो सब कार्य करनेके योग्य था । उसी घरमें उसका भूषण नामा पुत्र रहता था । भावार्थ - उसने सब प्रकारकी सुविधाओंसे पूर्ण महल बनवाकर उसमें भूषण नामक पुत्रको इसलिए रक्खा कि कहीं बाहर जानेपर किसी मुनिको देखकर वह दीक्षा न ले ले ॥८८॥


सेव्यमानो वरस्त्रीभिर्वस्त्राहारविलेपनैः । विविधैर्ललितं चक्रे सुन्दरं तत्र भूषणः ॥८९॥

अर्थ: उत्तमोत्तम स्त्रियाँ नाना प्रकारके वस्त्र आहार और विलेपन आदिके द्वारा जिसकी सेवा करती थीं ऐसा भूषण वहाँ सुन्दर चेष्टाएँ करता था ॥८९॥


नैक्षिष्ट भानुमुद्यन्तं नास्तं यान्तं च नोडुपम् । स्वप्नेऽप्यसौ गतो भूमिं गृहशैलस्य पञ्चमीम् ॥९०॥

अर्थ: वह सदा अपने महलरूपी पर्वतके पाँचवें खण्डमें रहता था इसलिए उसने कभी स्वप्नमें भी न तो उदित हुए सूर्यको देखा था और न अस्त होता हुआ चन्द्रमा ही देखा था ॥९०॥


मनोरथशतैर्लब्धः पुत्रोऽसावेक एव हि । पूर्वस्नेहानुबन्धेन दयितो जीवितादपि ॥९१॥

अर्थ: धनद सेठने सैकड़ों मनोरथोंके बाद यह एक ही पुत्र प्राप्त किया था इसलिए वह उसे पूर्व स्नेहके संस्कारवश प्राणोंसे भी अधिक प्यारा था ॥९१॥


धनदः सोदरः पूर्वं भूषणस्य पिताऽभवत् । विचित्रं खलु संसारे प्राणिनां नटचेष्टितम् ॥९२॥

अर्थ: धनद, पूर्वभवमें भूषणका भाई था अब इस भवमें पिता हुआ सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें प्राणियोंकी चेष्टाएँ नटकी चेष्टाओंके समान विचित्र होती हैं ॥९२॥


तावत्क्षपात्यये श्रुत्वा देवदुन्दुभिनिस्वनम् । दृष्ट्वा देवागमं श्रुत्वा शब्दं चाऽभूद् विबुद्धवान् ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर किसी दिन रात्रि समाप्त होते ही भूषणने देव दुन्दुभिका शब्द सुना, देवोंका आगमन देखा और उनका शब्द सुना जिससे वह विबोधको प्राप्त हुआ ॥९३॥


स्वभावान्मृदुचेतस्कः सद्धर्माचारतत्परः । महाप्रमोदसम्पन्नः करकुड्मलमस्तकः ॥९४॥

अर्थ: वह भूषण स्वभावसे ही कोमलचित्त था, समीचीन धर्मका आचरण करनेमें तत्पर था, महाहर्षसे युक्त था तथा उसने दोनों हाथ जोड़कर मस्तकसे लगा रक्खे थे ॥९४॥


श्रीधरस्य मुनीन्द्रस्य वन्दनार्थं त्वरान्वितः । सोपानेऽवतरन्दष्टः सोऽहिना तनुमत्यजत् ॥९५॥

अर्थ: वह श्रीधर मुनिराजकी वन्दनाके लिए शीघ्रतासे सीढ़ियोंपर उतरता चला आ रहा था कि साँपके काटनेसे उसने शरीर छोड़ दिया ॥९५॥


माहेन्द्रस्वर्गमारूढश्च्युतो द्वीपे च पुष्करे । चन्द्रादित्यपुरे जातः प्रकाशयशसः सुतः ॥९६॥

माताऽस्य माधवीत्यासीत् स जगद्युतिसंज्ञितः । राजलक्ष्मीं परिप्राप्तः परमां यौवनोदये ॥९७॥

अर्थ: वह मरकर माहेन्द्र नामक चतुर्थ स्वर्गमें उत्पन्न हुआ । वहाँसे च्युत होकर पुष्करद्वीपके चन्द्रादित्य नामक नगरमें राजा प्रकाशयशका पुत्र हुआ । माधवी इसकी माता थी और स्वयं उसका जगद्द्युति नाम था । यौवनका उदय होनेपर वह अत्यन्त श्रेष्ठ राज्यलक्ष्मीको प्राप्त हुआ ॥९६-९७॥


संसारात् परमं भीरुरसौ स्थविरमन्त्रिभिः । उपदेशं प्रयच्छद्भिः राज्यं कृच्छ्रेण कार्यते ॥९८॥

अर्थ: वह संसारसे अत्यन्त भयभीत रहता था, इसलिए वृद्ध मन्त्री उपदेश दे देकर बड़ी कठिनाईसे उससे राज्य कराते थे ॥९८॥


कुलक्रमागतं वत्स राज्यं पालय सुन्दरम् । पालितेऽस्मिन् समस्तेयं सुखिनी जायते प्रजा ॥९९॥

अर्थ: वृद्ध मन्त्री उससे कहा करते थे कि हे वत्स ! कुलपरम्परासे आये हुए इस सुन्दर राज्यका पालन करो क्योंकि राज्यका पालन करनेसे ही समस्त प्रजा सुखी होती है ॥९९॥


तपोधनान् स राज्यस्थः साधून् सन्तर्प्य सन्ततम् । गत्वा देवकुरुं काले कल्पमैशानमाश्रितः ॥१००॥

अर्थ: भूषण, राज्यकार्यमें स्थिर रहता हुआ सदा तपस्वी मुनियोंको आहारादिसे सन्तुष्ट रखता था । अन्तमें वह मरकर देवकुरु नामा भोगभूमिमें गया और वहाँसे मरकर ऐशान स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥१००॥


पल्योपमान् बहून् तत्र देवीजनसमावृतः । नानारूपधरो भोगान् बुभुजे परमद्युतिः ॥१०१॥

अर्थ: वहाँ परम कान्ति को धारण करनेवाले उस भूषणके जीवने देवीजनोंसे आवृत होकर तथा नानारूपके धारक हो अनेक पल्यों तक भोगोंका उपभोग किया ॥१०१॥


च्युतो जम्बूमति द्वीपे विदेहे मेरुपश्चिमे । रत्नाख्या बालहरिणी महिष्यचलचक्रिणः ॥१०२॥

बभूव तनयस्तस्य सर्वलोकसमुत्सवः । अभिरामोऽङ्गनामाभ्यां महागुणसमुच्चयः ॥१०३॥

अर्थ: वहाँसे च्युत हो जम्बूद्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें अचल चक्रवर्तीकी बालमृगीके समान सरल, रत्ना नामकी रानीके सब लोगोंको आनन्दित करनेवाला महागुणोंका धारी पुत्र हुआ । वह पुत्र शरीर तथा नाम दोनोंसे ही अभिराम था अर्थात् ‘अभिराम’ इस नामका धारी था और शरीरसे अत्यन्त सुन्दर था ॥१०२-१०३॥


महावैराग्यसम्पन्नं प्रव्रज्याभिमुखं च तम् । ऐश्वर्येऽयोजयच्चक्री कृतवीवाहकं बलात् ॥१०४॥

अर्थ: अभिराम महावैराग्यसे सहित था तथा दीक्षा धारण करनेके लिए उद्यत था परन्तु चक्रवर्तीने उसका विवाह कर उसे जबर्दस्ती ऐश्वर्यमें - राज्यपालनमें नियुक्त कर दिया ॥१०४॥


त्रीणि नारीसहस्राणि सततं गुणवर्त्तिनम् । लालयन्ति स्म यत्नेन वारिस्थमिव वारणम् ॥१०५॥

अर्थ: सदा तीन हजार स्त्रियाँ, जलमें स्थित हाथीके समान उस गुणी पुत्रका सावधानी पूर्वक लालन करती थीं ॥१०५॥


वृतस्ताभिरसौ मेने रतिसौख्यं विषोपमम् । श्रामण्यं केवलं कर्तुं न लेभे शान्तमानसः ॥१०६॥

अर्थ: उन सब स्त्रियोंसे घिरा हुआ अभिराम, रतिसम्बन्धी सुखको विषके समान मानता था और शान्त चित्त हो केवल मुनिव्रत धारण करनेके लिए उत्कण्ठित रहता था परन्तु पिताकी परतन्त्रतासे उसे वह प्राप्त नहीं कर पाता था ॥१०६॥


असिधाराव्रतं तीव्रं तासां मध्यगतो विभुः । चकार हारकेयूरमुकुटादिविभूषितः ॥१०७॥

अर्थ: उन सब स्त्रियोंके बीचमें बैठा तथा हार केयूर मुकुट आदिसे विभूषित हुआ वह अत्यन्त कठिन असिधारा व्रतका पालन करता था ॥१०७॥


स्थितो वरासने श्रीमान् वनिताभ्यः समन्ततः । उपदेशं ददौ जैनधर्मशंसनकारिणम् ॥१०८॥

अर्थ: जिसे चारों ओरसे स्त्रियाँ घेरे हुई थीं ऐसा वह श्रीमान् अभिराम, उत्तम आसनपर बैठकर उन सबके लिए जैनधर्मकी प्रशंसा करनेवाला उपदेश देता था ॥१०८॥


चिरं संसारकान्तारे भ्राम्यता पुण्यकर्मतः । मानुष्यकमिदं कृच्छ्रात् प्राप्यते प्राणधारिणा ॥१०९॥

अर्थ: वह कहा करता था इस संसाररूपी अटवीमें चिरकालसे भ्रमण करनेवाला प्राणी पुण्यकर्मोदयसे बड़ी कठिनाईसे इस मनुष्य भवको प्राप्त होता है ॥१०९॥


जानानः को जनः कूपे क्षिपति स्वं महाशयः । विषं वा कः पिबेत् को वा भृगौ निद्रां निषेवते ॥११०॥

अर्थ: उदार अभिप्रायको धारण करनेवाला कौन मनुष्य जान-बूझकर अपने आपको कुएँमें गिरता है ? कौन मनुष्य विषपान करता है ? अथवा कौन मनुष्य पहाड़की चोटीपर शयन करता है ? ॥११०॥


को वा रत्नेप्सया नाग मस्तकं पाणिना स्पृशेत् । विनाशकेषु कामेषु धृतिर्जायेत कस्य वा ॥१११॥

अर्थ: अथवा कौन मनुष्य रत्न पानेकी इच्छासे नागके मस्तकको हाथसे छूता है ? अथवा विनाशकारी इन इन्द्रियोंके विषयोंमें किसे कब सन्तोष हुआ है ? ॥१११॥


सुकृतासक्तिरेकैव श्लाघ्या मुक्तिसुखावहा । जनानां चञ्चलेऽत्यन्तं जीविते निस्पृहात्मनाम् ॥११२॥

अर्थ: अत्यन्त चञ्चल जीवनमें जिनकी स्पृहा शान्त हो चुकी है ऐसे मनुष्योंकी जो एक पुण्यमें प्रशंसनीय आसक्ति है वही उन्हें मुक्तिका सुख देनेवाली है ॥११२॥


एवमाद्या गिरः श्रुत्वा परमार्थोपदेशिनीः । उपशान्ता स्त्रियः शक्त्या नियमेषु ररंजिरे ॥११३॥

अर्थ: इत्यादि परमार्थका उपदेश देनेवाली वाणी सुनकर उसकी वे स्त्रियाँ शान्त हो गई थीं तथा शक्ति अनुसार नियमोंका पालन करने लगी थीं ॥११३॥


राजपुत्रः सुदेहेऽपि स्वकीये रागवर्जितः । चतुर्थादिनिराहारैः कर्मकालुष्यमक्षिणोत् ॥११४॥

अर्थ: वह राजपुत्र अपने सुन्दर शरीरमें भी रागसे रहित था इसलिए वेला आदि उपवासोंसे कर्मकी कलुषताको दूर करता रहता था ॥११४॥


तपसा च विचित्रेण समाहितमना विभुः । शरीरं तनुतां निन्ये ग्रीष्मादित्य इवोदकम् ॥११५॥

अर्थ: जिसका चित्त सदा सावधान रहता था ऐसा वह राजपुत्र विचित्र तपस्याके द्वारा शरीरको उस तरह कृश करता रहता था जिस तरह कि ग्रीष्मऋतुका सूर्य पानीको कृश करता रहता है ॥११५॥


चतुःषष्टिसहस्राणि वर्षाणां स सुदर्शनः । अकम्पितमना वीरस्तपश्चक्रेऽतिदुःसहम् ॥११६॥

अर्थ: निर्मल सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले उस निश्चलचित्त वीर राजपुत्रने चौंसठ हजार वर्षतक अत्यन्त दुःसह तप किया ॥११६॥


पञ्चप्रणामसंयुक्तं समाधिमरणं श्रितः । अशिश्रियत् सुदेवत्वं कल्पे ब्रह्मोत्तरश्रुतौ ॥११७॥

अर्थ: अन्तमें पञ्चपरमेष्ठियोंके नमस्कारसे युक्त समाधिमरणको प्राप्त हो ब्रह्मोत्तर नामक स्वर्गमें उत्तम देव पर्यायको प्राप्त हुआ है ॥११७॥


असौ धनदपूर्वस्तु जीवः संसृत्य योनिषु । पोदने नगरे जज्ञे जम्बूभरतदक्षिणे ॥११८॥

शकुनाग्निमुखास्तस्य माहनौ जन्मकारणम् । नाम्ना मृदुमतिश्चासौ व्यर्थेन परिभाषितः ॥११९॥

अर्थ: अथानन्तर भूषणके भवमें जो उसका पिता धनदसेठ था उसका जीव नाना योनियोंमें भ्रमणकर जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रकी दक्षिण दिशामें स्थित जो पोदनपुर नामका नगर था उसमें अग्निमुख और शकुना नामक ब्राह्मण ब्राह्मणी उसके जन्मके कारण हुए । उन दोनोंके वह मृदुमति नामका पुत्र हुआ । वह मृदुमति निरर्थक नामका धारी था अर्थात् मृदुबुद्धि न होकर कठोर बुद्धि था ॥११८-११९॥


द्यूताविनयसक्तात्मा रथ्यारेणुसमुक्षितः । नानापराधवद्द्वेष्यः स बभूव दुरीहितः ॥१२०॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि जुआ तथा अविनयमें आसक्त रहती थी, जो मार्ग धूलिसे धूसरित रहता था तथा जो नाना प्रकारके अपराध करनेके कारण लोगोंके द्वेषका पात्र था, ऐसा वह अत्यन्त दुष्ट चेष्टाओंका धारक था ॥१२०॥


लोकोपालम्भखिन्नाभ्यां पितृभ्यां स निराकृतः । पर्यट्य धरणीं प्राप यौवने पोदनं पुनः ॥१२१॥

अर्थ: लोगोंके उलाहनोंसे खिन्न होकर माता-पिताने उसे घरसे निकाल दिया जिससे वह पृथिवीमें जहाँ तहाँ भ्रमण कर यौवनके समय पुनः पोदनपुरमें आया ॥१२१॥


प्रविष्टो भवनं किञ्चिज्जलं पातुमयाचत । अददान्माहनी तस्मै जलं निपतदश्रुका ॥१२२॥

अर्थ: वहाँ एक ब्राह्मणके घरमें प्रविष्ट हो उसने पीनेके लिए जल माँगा सो ब्राह्मणीने उसे जल दिया । जल देते समय उस ब्राह्मणीके नेत्रोंसे टप-टप कर आंसू नीचे पड़ रहे थे ॥१२२॥


सुशीतलाम्बुतृप्तात्मा पप्रच्छासौ कुतस्त्वया । रुद्यते करुणायुक्त इत्युक्ते माहनी जगौ ॥१२३॥

अर्थ: अत्यन्त शीतल जलसे जिसकी आत्मा संतुष्ट हो गई थी ऐसे उस मृदुमतिने पूछा कि हे दयावति ! तू इस तरह क्यों रो रही है ? उसके इस प्रकार कहने पर ब्राह्मणीने कहा कि ॥१२३॥


भद्र त्वदाकृतिर्बालो मया पतिसमेतया । करुणोज्झितया गेहात् पुत्रको हा निराकृतः ॥१२४॥

अर्थ: हे भद्र ! मुझने निर्दया हो अपने पतिके साथ मिलकर तेरे ही समान आकृतिवाले अपने छोटेसे पुत्रको बड़े दुःखकी बात है कि घरसे निकाल दिया था ॥१२४॥


स त्वया भ्राम्यता देशे यदि स्याद्वीक्षितः क्वचित् । नीलोत्पलप्रतीकाशस्ततो वेदय तद्गतम् ॥१२५॥

अर्थ: सो अनेक देशोंमें घूमते हुए तूने यदि कहीं उसे देखा हो तो उसका पता बता, वह नीलकमलके समान श्यामवर्ण था ॥१२५॥


ततोऽसावश्रुमानूचे सवित्रि रुदितं त्यज । समाश्वसिहि सोऽहं ते चिरदुर्लक्षकः सुतः ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर अश्रु छोड़ते हुए उसने कहा कि हे माता ! रोना छोड़, धैर्य धारण कर, वह मैं ही तेरा पुत्र हूँ जो चिरकाल बाद सामने आया हूँ ॥१२६॥


शकुनाग्निमुखेनामा पुत्रप्राप्तिमहोत्सवम् । परिप्राप्ता सुखं तस्थौ तत्क्षणप्रस्नुतस्तनी ॥१२७॥

अर्थ: शकुना ब्राह्मणी, अपने अग्निमुख नामक पतिके साथ पुत्र प्राप्तिके महोत्सवको प्राप्त हो सुखसे रहने लगी और उसके स्तनोंसे दूध झरने लगा ॥१२७॥


तेजस्वी सुन्दरो धीमान्नानाशास्त्रविशारदः । सर्वस्त्रीदृङ्मनोहारी धूर्त्तानां मस्तके स्थितः ॥१२८॥

अर्थ: मृदुमति, अत्यन्त तेजस्वी था, सुन्दर था, बुद्धिमान् था, नाना शास्त्रोंमें निपुण था, सर्व स्त्रियोंके नेत्र और मनको हरनेवाला था, धूर्तोंके मस्तकपर स्थित था अर्थात् उनमें शिरोमणि था ॥१२८॥


दुरोदरे सदा जेता सुविदग्धः कलालयः । कामोपभोगसक्तात्मा रेमे मृदुमतिः पुरे ॥१२९॥

अर्थ: वह जुआमें सदा जीतता था, अत्यन्त चतुर था, कलाओंका घर था, और कामोपभोगमें सदा आसक्त रहता था । इस तरह वह नगरमें सदा क्रीड़ा करता रहता था ॥१२९॥


वसन्तडमरा नाम गणिकानामनुत्तमा । द्वितीया रमणाचारे तस्याभूत् परमेप्सिता ॥१३०॥

अर्थ: उस पोदनपुर नगरमें एक वसन्तडमरा नामकी वेश्या, समस्त वेश्याओंमें उत्तम थी । जो कामभोगके विषयमें उसकी अत्यन्त इष्ट स्त्री थी ॥१३०॥


पितरौ बन्धुभिः सार्द्धं दारिद्र्यात्तेन मोचितौ । राजलीलां परिप्राप्तौ लब्धसर्वसमीहितौ ॥१३१॥

अर्थ: उसने अपने माता-पिताको अन्य बन्धुजनोंके साथ-साथ दरिद्रतासे मुक्त कर दिया था जिससे वे समस्त इच्छित पदार्थोंको प्राप्त कर राजा-रानी जैसी लीलाको प्राप्त हो रहे थे ॥१३१॥


कुण्डलाद्यैरलङ्कारैः पिताभूदतिभासुरः । नानाकार्यगणव्यग्रा माता काञ्च्यादिमण्डिता ॥१३२॥

अर्थ: उसका पिता कुण्डल आदि अलंकारोंसे अत्यन्त देदीप्यमान था तथा माता मेखला आदि अलंकारोंसे युक्त हो नाना कार्य-कलापमें सदा व्यग्र रहती थी ॥१३२॥


शशाङ्कनगरे राजगृहं चौर्यरतोऽन्यदा । विष्टो मृदुमतिः शब्दमश्रणोन्नन्दिवर्द्धनम् ॥१३३॥

अर्थ: एक दिन वह मृदुमति चोरी करनेके लिए शशाङ्कनामा नगरके राजमहलमें घुसा । वहाँका राजा नन्दिवर्धन विरक्त हो रानीसे कह रहा था सो उसे उसने सुना था ॥१३३॥


शशाङ्कमुखसंज्ञस्य गुरोश्चरणमूलतः । मयाद्य परमो धर्मः श्रुतः शिवसुखप्रदः ॥१३४॥

अर्थ: उसने कहा कि आज मैंने शशाङ्कमुख नामक गुरुके चरणमूलमें मोक्ष सुखका देनेवाला उत्तम धर्म सुना है ॥१३४॥


विषया विषवद्देवि परिणामे सुदारुणाः । तस्माद्व्रजाम्यहं दीक्षां न शोकं कर्त्तुमर्हसि ॥१३५॥

अर्थ: हे देवि ! ये विषय विषके समान अत्यन्त दारुण हैं इसलिए मैं दीक्षा धारण करता हूँ तुम शोक करनेके योग्य नहीं हो ॥१३५॥


शिक्षयन्तं नृपं देवीमेवं श्रीनन्दिवर्द्धनम् । श्रुत्वा मृदुमतिर्बोधिं निर्मलां समुपाश्रितः ॥१३६॥

अर्थ: इस प्रकार रानीको शिक्षा देते हुए श्री नन्दिवर्धन राजाको सुनकर वह मृदुमति अत्यन्त निर्मल बोधिको प्राप्त हुआ ॥१३६॥


संसारभावसंविग्नः साधोश्चन्द्रमुखश्रुतेः । पादमूलेऽभजद्दीक्षां सर्वग्रन्थविमोचितम् ॥१३७॥

अर्थ: संसारकी दशासे विरक्त हो उसने शशाङ्कमुख नामा गुरुके पादमूलमें सर्व परिग्रह का त्याग करानेवाली जिनदीक्षा धारण कर ली ॥१३७॥


अतपत् स तपो घोरं विधिं शास्त्रोक्तमाचरन् । भिक्षां स्यात् प्राप्नुवन्किञ्चित् प्रासुकां सत्त्वमान्वितः ॥१३८॥

अर्थ: अब वह शास्त्रोक्त विधिका आचरण करता तथा जब कभी प्रासुक भिक्षा प्राप्त करता हुआ क्षमाधर्मसे युक्त हो घोर तप करने लगा ॥१३८॥


अथ दुर्गगिरेर्मूर्द्धि नाम्ना गुणनिधिर्मुनिः । चकार चतुरो मासान्वायुकानन्नमुक्तिदान् ॥१३९॥

अर्थ: अथानन्तर गुणनिधि नामक एक उत्तम मुनिराजने दुर्गगिरि नामक पर्वतके शिखर पर आहारका परित्याग कर चार माहके लिए वर्षायोग धारण किया ॥१३९॥


सुरासुरस्तुतो धीरः समाप्तनियमोऽभवत् । उत्पपात मुनिः क्वापि विधिना गगनायनः ॥१४०॥

अर्थ: सुर और असुरोंने जिसकी स्तुति की तथा जो चारण ऋद्धिके धारक थे ऐसे वे धीर वीर मुनिराज चार माहका नियम समाप्त कर कहीं विधिपूर्वक आकाशमार्गसे उड़ गये - विहार कर गये ॥१४०॥


अथो मृदुमतिर्भिक्षाकरणार्थं सुचेष्टितः । आलोकनगरं प्राप्तो युगमात्राहितेक्षणः ॥१४१॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम चेष्टाओंके धारक एवं युगमात्र पृथिवी पर दृष्टि डालनेवाले मृदुमति नामक मुनिराज भिक्षा के लिए आलोकनामा नगरमें आये ॥१४१॥


ददर्श सम्भ्रमेणैतं पौरलोकः सपार्थिवः । शैलाग्रेऽवस्थितः सोऽयमिति ज्ञात्वा सुभक्तिकः ॥१४२॥

अर्थ: सो राजा सहित नगरवासी लोगोंने यह जानकर कि ये वे ही महामुनि हैं जो पर्वतके अग्रभाग पर स्थित थे उन्हें आते देख बड़े संभ्रमसे भक्ति सहित उनके दर्शन किये ॥१४२॥


भक्ष्यैर्बहुप्रकारैस्तं तर्पयन्ति स्म पूजितम् । जिह्वेन्द्रियरतो मायां स च भेजे कुकर्मतः ॥१४३॥

अर्थ: तथा उनकी पूजा कर उन्हें नाना प्रकारके आहारोंसे संतुष्ट किया। और जिह्वा इन्द्रियमें आसक्त हुए उन मुनिने पाप कर्मके उदयसे माया धारण की ॥१४३॥


स त्वं यः पर्वतस्याग्रे यतिनाथो व्यवस्थितः । वन्दितस्त्रिदशैरेवमुक्तः सोऽनमयच्छिरः ॥१४४॥

अर्थ: नगरवासी लोगोंने कहा कि तुम वही मुनिराज हो जो पर्वतके अग्रभागपर स्थित थे तथा देवोंने जिनकी वन्दना की थी। इस प्रकार कहने पर उन्होंने अपना सिर नीचा कर लिया किन्तु यह नहीं कहा कि मैं वह नहीं हूँ ॥१४४॥


अज्ञानादभिमानेन दुःखबीजमुपार्जितम् । स्वादगौरवसक्तेन तेनेदं स्वस्य वञ्चनम् ॥१४५॥

अर्थ: इस प्रकार भोजनके स्वादमें लीन मृदुमति मुनिने अज्ञान अथवा अभिमानके कारण दुःखके बीजस्वरूप इस आत्मवञ्चनाका उपार्जन किया अर्थात् माया की ॥१४५॥


एतत्तेन गुरोरग्रे न मायाशल्यमुद्धृतम् । दुःखभाजनतां येन सम्प्राप्तः परमामिमाम् ॥१४६॥

अर्थ: यतश्च उन्होंने गुरुके आगे अपनी यह माया शल्य नहीं निकाली इसलिए वे इस परम दुःखकी पात्रताको प्राप्त हुए ॥१४६॥


ततो मृदुमतिः कालं कृत्वा तं कल्पमाश्रितः । अभिरामोऽमरो यत्र वर्त्तते महिमान्वितः ॥१४७॥

अर्थ: तदनन्तर मृदुमति मुनि मरण कर उसी स्वर्गमें पहुँचे जहाँ कि ऋद्धियों सहित अभिराम नामका देव रहता था ॥१४७॥


पूर्वकर्मानुभावेन तयोरतिनिरन्तरा । त्रिविष्टपेऽभवत् प्रीतिः परमर्द्धिसमेतयोः ॥१४८॥

अर्थ: पूर्व कर्मके प्रभावसे परम ऋद्धिको धारण करनेवाले उन दोनों देवोंकी स्वर्गमें अत्यन्त प्रीति थी ॥१४८॥


देवीजनसमाकीर्णौ सुखसागरवर्त्तिनौ । बहूनब्धिसमांस्तत्र रेमाते तौ स्वपुण्यतः ॥१४९॥

अर्थ: देवियोंके समूहसे युक्त तथा सुखरूपी सागरमें निमग्न रहनेवाले वे दोनों देव अपने पुण्योदयसे अनेक सागरपर्यन्त उस स्वर्गमें क्रीड़ा करते रहे ॥१४९॥


च्युतो मृदुमतिस्तस्मात् पुण्यराशिपरिक्षये । मायावशेषकर्माक्तो जम्बूद्वीपं समागतः ॥१५०॥

अर्थ: तदनन्तर मृदुमतिका जीव, पुण्यराशिके क्षीण होने पर वहाँसे च्युत हो मायाचारके दोषसे दूषित होनेके कारण जम्बूद्वीपमें आया ॥१५०॥


उत्तुङ्गशिखरो नाम्ना निकुञ्ज इति भूधरः । अटव्यां तस्य शल्लक्यां गहनायां विशेषतः ॥१५१॥

अर्थ: जम्बूद्वीपमें ऊँचे-ऊँचे शिखरोंसे सहित निकुञ्ज नामका एक पर्वत है उस पर अत्यन्त सघन शल्लकी नामक वन है ॥१५१॥


अयं जीमूतसंघातसंकाशो वारणोऽभवत् । क्षुब्धार्णवसमस्वानो गतिनिर्जितमारुतः ॥१५२॥

अत्यन्तभैरवाकारः कोपकालेऽभिमानवान् । शशाङ्काकृतिसद्दंष्ट्रो दन्तिराजगुणान्वितः ॥१५३॥

विजयादिमहानागगोत्रजः परमद्युतिः । द्विषन्नैरावतस्येव स्वच्छन्दकृतविग्रहः ॥१५४॥

सिंहव्याघ्रमहावृक्षगण्डशैलविनाशकृत् । आसतां मानुषास्तावद्दुर्ग्रहः खेचरैरपि ॥१५५॥

समस्तश्वापदत्रासं कुर्वन्नामोदमात्रतः । रमते गिरिकुञ्जेषु नानापल्लवहारिषु ॥१५६॥

अर्थ: उसी वनमें यह मेघ-समूहके समान हाथी हुआ है । इसका शब्द क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान है, इसने अपनी गतिसे वायुको जीत लिया है, क्रोधके समय इसका आकार अत्यन्त भयंकर हो जाता है, यह महा अभिमानी है, इसकी दाँढ़ें चन्द्रमाके समान उज्ज्वल हैं । यह गजराजके गुणोंसे सहित है, विजय आदि महागजराजोंके वंशमें उत्पन्न हुआ है, परम दीप्तिको धारण करनेवाला है, मानो ऐरावत हाथीसे द्वेष ही रखता है, स्वेच्छानुसार युद्ध करनेवाला है, सिंह व्याघ्र बड़े-बड़े वृक्ष तथा छोटी मोटी अनेक गोल चट्टानोंका विनाश करने वाला है, मनुष्योंकी बात जाने दो विद्याधरोंके द्वारा भी इसका पकड़ा जाना सरल नहीं है, यह अपनी गन्धमात्रसे समस्त वन्य पशुओंको भय उत्पन्न करता है तथा नाना प्रकारके पल्लवोंसे युक्त पहाड़ी निकुञ्जोंमें क्रीड़ा करता रहता है । ॥१५२-१५६॥


अक्षोभ्ये विमले नानाकुसुमैरुपशोभिते । मानसे सरसि क्रीडां कुरुतेऽनुचरान्वितः ॥१५७॥

अर्थ: जिसे कोई क्षोभित नहीं कर सकता तथा जो नाना प्रकारके फूलोंसे सुशोभित है ऐसे मानस सरोवरमें यह अपने अनुयायियोंके साथ क्रीड़ा करता है ॥१५७॥


विलासं सेवते सारं कैलासे सुलभेक्षिते । मन्दाकिन्याः मनोज्ञेषु ह्रदेषु च परः सुखी ॥१५८॥

अर्थ: यह अनायास दृष्टिमें आये हुए कैलास पर्वत पर तथा गङ्गा नदीके मनोहर ह्रदोंमें अत्यन्त सुखी होता हुआ श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त होता है ॥१५८॥


अन्येषु च नगारण्यप्रदेशेष्वतिहारिषु । भजते क्रीडनं कान्तं बान्धवानां महोदयः ॥१५९॥

अर्थ: अपने बन्धुजनोंके महाभ्युदयको बढ़ानेवाला यह हाथी इनके सिवाय अत्यन्त मनोहर पहाड़ी वन प्रदेशोंमें सुन्दर क्रीड़ा करता है ॥१५९॥


अनुवृत्तिप्रसक्तानां करेणूनां स भूरिभिः । सहस्रैः सङ्गतः सौख्यं भजते यूथपोचितम् ॥१६०॥

अर्थ: अनुकूल आचरण करनेमें तत्पर रहनेवाली हजारों हथिनियोंके साथ मिलकर यह यूथपतिके योग्य सुखका उपभोग करता है ॥१६०॥


इतस्ततश्च विचरन् द्विरदौघसमावृतः । शोभते पक्षिसङ्घातैर्विनतानन्दनो यथा ॥१६१॥

अर्थ: हाथियोंके समूहसे घिरा हुआ यह हाथी जब यहाँ-वहाँ विचरण करता है तब पक्षियोंके समूहसे आवृत गरुड़के समान सुशोभित होता है ॥१६१॥


घनाघनघनस्वानो दाननिर्झरपर्वतः । लङ्केन्द्रेणेक्षितः सोऽयमासीद्वारणसत्तमः ॥१६२॥

अर्थ: जिसकी गर्जना मेघगर्जनाके समान सघन है तथा जो दानरूप झरनोंके निकलनेके लिए मानो पर्वत ही है ऐसा यह उत्तम गजराज लंकाके धनी रावणके द्वारा देखा गया अर्थात् रावणने इसे देखा ॥१६२॥


विद्यापराक्रमोग्रेण तेनायं साधितोऽभवत् । त्रिलोककण्टकाभिख्यां प्रापितश्चारुलक्षणः ॥१६३॥

अर्थ: तथा विद्या और पराक्रमसे उग्र रावणने इसे वशीभूत किया एवं सुन्दर-सुन्दर लक्षणोंसे युक्त इस हाथीका त्रिलोककंटक नाम रखा ॥१६३॥


अप्सरोभिः समं स्वर्गे प्रक्रीड्य सुचिरं सुखम् । करिणीभिः समं क्रीडामकरोत् सुकरी पुनः ॥१६४॥

अर्थ: यह पूर्वभवमें स्वर्गमें अप्सराओंके साथ चिरकाल तक क्रीड़ा कर सुखी हुआ अब हस्तिनियोंके साथ क्रीड़ा कर सुखी हो रहा है ॥१६४॥


ईदृशी कर्मणां शक्तिर्यज्जीवाः सर्वयोनिषु । वस्तुतो दुःखयुक्तासु प्राप्नुवन्ति परां रतिम् ॥१६५॥

अर्थ: यथार्थमें कर्मोंकी ऐसी ही विचित्र शक्ति है कि जीव, दुःखोंसे युक्त नाना योनियोंमें परम प्रीतिको प्राप्त होते हैं ॥१६५॥


च्युतः सन्नभिरामोऽपि साकेतानगरे नृपः । भरतोऽयमभूद्धीमान् सद्धर्मगतमानसः ॥१६६॥

अर्थ: अभिरामका जीव भी च्युत हो अयोध्या नगरीमें राजा भरत हुआ है । यह भरत अत्यन्त बुद्धिमान् है तथा समीचीन धर्ममें इसका हृदय लग रहा है ॥१६६॥


विलीनमोहनिचयः सोऽयं भोगपराङ्मुखः । श्रामण्यमीहते कर्तुं पुनर्भवनिवृत्तये ॥१६७॥

अर्थ: जिसके मोहका समूह विलीन हो चुका है तथा जो भोगोंसे विमुख है ऐसा यह भरत पुनर्भव दूर करनेके लिए मुनि दीक्षा धारण करना चाहता है ॥१६७॥


गोदण्डमार्गसदृशे यौ मरीचिप्रवर्त्तिते । समये दीक्षितावास्तां परित्यक्तमहाव्रतौ ॥१६८॥

तावेतौ मानिनौ भानुशशाङ्कोदयसंज्ञितौ । संसारदुःखितौ भ्रान्तौ भ्रातरौ कर्मचेष्टितौ ॥१६९॥

अर्थ: श्रीऋषभदेवके समय ये दोनों सूर्योदय और चन्द्रोदय नामक भाई थे तथा उन्हीं ऋषभदेवके साथ जिनधर्ममें दीक्षित हुए थे किन्तु बादमें अभिमानसे प्रेरित हो महाव्रत छोड़कर मरीचिके द्वारा चलाये हुए परिव्राजक मतमें दीक्षित हो गये जिसके फलस्वरूप संसारके दुःखसे दुःखी हो कर्मोंका फल भोगते हुए चिरकाल तक संसारमें भ्रमण करते रहे ॥१६८-१६९॥


कृतस्य कर्मणो लोके सुखदुःखविधायिनः । जना निस्तपसोऽवश्यं प्राप्नुवन्ति फलोदयम् ॥१७०॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि संसारमें जो मनुष्य तप नहीं करते हैं वे अपने द्वारा किये हुए सुख दुःखदायी कर्मका फल अवश्य ही प्राप्त करते हैं ॥१७०॥


चन्द्रः कुलङ्करो यश्च समाधिमरणी मृगः । सोऽयं नरपतिर्जातो भरतः साधुमानसः ॥१७१॥

अर्थ: जो चन्द्रोदयका जीव पहले कुलंकर और उसके बाद समाधि मरण करनेवाला मृग हुआ था वही क्रम-क्रमसे उत्तम हृदयको धारण करनेवाला राजा भरत हुआ है ॥१७१॥


आदित्यश्रुतिविप्रश्च कृष्टमृत्युः कुरङ्गकः । सम्प्राप्तो गजतामेष पापकर्मानुभावतः ॥१७२॥

अर्थ: और सूर्योदय ब्राह्मणका जीव मरकर मृग हुआ फिर क्रम-क्रमसे पापकर्मके उदयसे इस हस्ती पर्यायको प्राप्त हुआ है ॥१७२॥


प्रमृद्य बन्धनस्तम्भं बलवानुद्धतः परम् । भरतालोकनात् स्मृत्वा पूर्वजन्म शमं गतः ॥१७३॥

अर्थ: अत्यन्त उत्कट बलको धारण करनेवाला यह हाथी पहले तो बन्धनका खम्भा उखाड़ कर क्षोभको प्राप्त हुआ परन्तु बादमें भरतके देखनेसे पूर्वभवका स्मरणकर शान्त हो गया ॥१७३॥


ज्ञात्वैवं गतिमागतिं च विविधां बाह्यं सुखं वा ध्रुवं कर्मारण्यमिदं विहाय विषमं धर्मे रमध्वं बुधाः । मानुष्यं समवाप्य यैर्जिनवरप्रोक्तो न धर्मः कृत- स्ते संसारसुहृत्त्वमभ्युपगताः स्वार्थस्य दूरे स्थिताः ॥१७४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे विद्वज्जनो ! इस तरह नाना प्रकारकी गति-आगति तथा बाह्य सुख और दुःखको जानकर इस विषम कर्म अटवीको छोड़ धर्ममें रमण करो क्योंकि जिन्होंने मनुष्य पर्याय प्राप्त कर जिनेन्द्र कथित धर्म धारण नहीं किया है वे संसार-भ्रमणको प्राप्त हो आत्म-हितसे दूर रहते हैं ॥१७४॥


जिनवरवदनविनिर्गतमुपलभ्य शिवैकदानतत्परमतुलम् । निर्जितरविरुचिसुकृतं कुरुत यतो यात निर्मलं परमपदम् ॥१७५॥

अर्थ: हे भव्यजनो ! जो श्री जिनेन्द्र देवके मुखारविन्दसे प्रकट हुआ है तथा मोक्षके देनेमें तत्पर है ऐसे अनुपम जिनधर्मको पाकर सूर्यकी कान्तिको जीतनेवाला पुण्य संचय करो जिससे निर्मल परम पदको प्राप्त हो सको ॥१७५॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे भरतत्रिभुवनालङ्कारसमाध्यनुभवानुकीर्त्तनं नाम पञ्चाशीतितमं पर्व ॥८५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें भरत तथा त्रिलोकमण्डन हाथीके पूर्वभवोंका वर्णन करनेवाला पचीसवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥८५॥


८६. षडशीतितमं पर्व (भरतकेकयानिष्क्रमणाभिधानं)

साधोस्तद्वचनं श्रुत्वा सुपवित्रं तमोऽपहम् । संसारसागरे घोरे नानादुःखनिवेदनम् ॥१॥

विस्मयं परमं प्राप्ता भरतानुभवोद्भवम् । पुस्तकर्मगतैवाऽऽसीत् सा सभा चेष्टितोज्झिता ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो अत्यन्त पवित्र थे, अज्ञानरूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाले थे, संसाररूपी घोर सागरके नाना दुःखोंका निरूपण करनेवाले थे और भरतके पूर्वभवोंका वर्णन करनेवाले थे ऐसे महामुनि श्री देशभूषण केवलीके उक्त वचन सुन कर वह समस्त सभा चित्रलिखितके समान निश्चल हो गई ॥१-२॥


भरतोऽथ समुत्थाय प्रचलद्धारकुण्डलः । प्रतापप्रथितः श्रीमान् देवेन्द्रसमविभ्रमः ॥३॥

वहन् संवेगमुत्तुङ्गं प्रह्वकायो महामनाः । रभसान्वितमासाद्य बद्धपाण्यब्जकुड्मलः ॥४॥

जानुसम्पीडितक्षोणिः प्रणिपत्य मुनीश्वरम् । संसारवासखिन्नोऽसौ जगाद सुमनोहरम् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके हार और कुण्डल हिल रहे थे, जो प्रतापसे प्रसिद्ध थे, श्रीमान् थे, इन्द्रके समान विभ्रमको धारण करनेवाले थे, अत्यधिक संवेगके धारक थे, जिनका शरीर नम्रीभूत था, मन उदार था, जिन्होंने हस्तरूपी कमलकी बोंड़ियोंको बाँध रक्खा था और जो संसार सम्बन्धी निवाससे अत्यन्त खिन्न थे ऐसे भरतने पृथिवी पर घुटने टेक कर मुनिराज को नमस्कार कर इस प्रकारके अत्यन्त मनोहारी वचन कहे ॥३-५॥


नाथ योनिसहस्रेषु सङ्कटेषु चिरं भ्रमन् । महाध्वश्रमखिन्नोऽहं यच्छ मे मुक्तिकारणम् ॥६॥

अर्थ: कि हे नाथ ! मैं संकटपूर्ण हजारों योनियोंमें चिरकालसे भ्रमण करता हुआ मार्गके महाश्रमसे खिन्न हो चुका हूँ अतः मुझे मोक्षका कारण जो तपश्चरण है वह दीजिये ॥६॥


उह्यमानाय सम्भूतिमरणोग्रतरङ्गया । मह्यं संसृतिनद्या त्वं हस्तालम्बकरो भव ॥७॥

अर्थ: हे भगवन् ! मैं जन्म-मरण रूपी ऊँची लहरोंसे युक्त संसाररूपी नदीमें चिरकालसे बहता चला आ रहा हूँ सो आप मुझे हाथका सहारा दीजिये ॥७॥


इत्युक्त्वा त्यक्तनिःशेषग्रन्थपर्यङ्कबन्धगः । स्वकरेणाऽकरोल्लुञ्चं महासत्त्वसमन्वितः ॥८॥

अर्थ: इस प्रकार कह कर भरत समस्त परिग्रहका परित्याग कर पर्यङ्कासनसे स्थित हो गये तथा महाधैर्यसे युक्त हो उन्होंने अपने हाथसे केश लोंच कर डाले ॥८॥


परं सम्यक्त्वमासाद्य महाव्रतपरिग्रहः । दीक्षितो भरतो जातस्तत्क्षणेन मुनिः परः ॥९॥

अर्थ: इस प्रकार परम सम्यक्त्वको पाकर महाव्रतको धारण करनेवाले भरत तत्क्षणमें दीक्षित हो उत्कृष्ट मुनि हो गये ॥९॥


साधु साध्विति देवानामन्तरिक्षेऽभवत् स्वनः । पेतुः पुष्पाणि दिव्यानि भरते मुनितामिते ॥१०॥

अर्थ: उस समय भरतके मुनि अवस्थाको प्राप्त होनेपर आकाशमें देवोंका धन्य धन्य यह शब्द हुआ तथा दिव्य पुष्पोंकी वर्षा हुई ॥१०॥


सहस्रमधिकं राज्ञां भरतस्यानुरागतः । क्रमागतां श्रियं त्यक्त्वा श्रामण्यं समशिश्रियत् ॥११॥

अर्थ: भरतके अनुरागसे प्रेरित हो कुछ अधिक एक हजार राजाओंने क्रमागत राज्यलक्ष्मीका परित्याग कर मुनिदीक्षा धारण की ॥११॥


अनुग्रशक्तयः केचिन्नमस्कृत्य मुनिं जनाः । उपासाञ्चक्रिरे धर्मं विधिनागारसङ्गतम् ॥१२॥

अर्थ: जिनकी शक्ति हीन थी ऐसे कितने ही लोगोंने मुनिराजको नमस्कार कर विधिपूर्वक गृहस्थ धर्म धारण किया ॥१२॥


सम्भ्रान्ता केकया वाष्पदुर्दिनाऽऽकुलचेतना । धावन्ती पतिता भूमौ व्यामोहं च समागता ॥१३॥

अर्थ: जो निरन्तर अश्रुओंकी वर्षा कर रही थी, तथा जिसकी चेतना अत्यन्त आकुल थी ऐसी भरतकी माता केकया घबड़ा कर उनके पीछे-पीछे दौड़ती जा रही थी सो बीचमें ही पृथिवी पर गिर कर मूर्छित हो गई थी ॥१३॥


सुतप्रीतिभराक्रान्ता ततोऽसौ निश्चलाङ्गिका । गोशीर्षादिपयःसेकैरपि संज्ञामुपैति न ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर जो पुत्रकी प्रीतिके भारसे युक्त थी, तथा जिसका शरीर निश्चल पड़ा हुआ था ऐसी वह केकया गोशीर्ष आदि चन्दनके जलके सींचने पर भी चेतनाको प्राप्त नहीं हो रही थी ॥१४॥


व्यक्तचेतनतां प्राप्य चिराय स्वयमेव सा । अरोदीत् करुणं धेनुर्वत्सेनेव वियोजिता ॥१५॥

अर्थ: बहुत समय बाद जब वह स्वयं चेतनाको प्राप्त हुई तब बछड़ेसे रहित गायके समान करुण रोदन करने लगी ॥१५॥


हा मे वत्स मनोह्लाद सुविनीत गुणाकर । क्व प्रयातोऽसि वचनं प्रयच्छाङ्गानि धारय ॥१६॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हाय मेरे वत्स ! तू मनको आह्लादित करनेवाला था, अत्यन्त विनीत था और गुणोंकी खान था । अब तू कहाँ चला गया ? उत्तर दे और मेरे अङ्गोंको धारण कर ॥१६॥


त्वया पुत्रक संत्यक्ता दुःखसागरवर्त्तिनी । कथं स्थास्यामि शोकार्त्ता हा किमेतदनुष्ठितम् ॥१७॥

अर्थ: हाय पुत्रक ! तेरे द्वारा छोड़ी हुई मैं दुःखरूपी सागरमें निमग्न हो शोकसे पीड़ित होती हुई कैसे रहूँगी ? यह तूने क्या किया ? ॥१७॥


कुर्वन्तीति समाक्रन्दं हलिना चक्रिणा च सा । आनीयत समाश्वासं वचनैरतिसुन्दरैः ॥१८॥

अर्थ: इस प्रकार विलाप करती हुई भरतकी माताको राम और लक्ष्मणने अत्यन्त सुन्दर वचनोंसे सन्तोष प्राप्त कराया ॥१८॥


पुण्यवान् भरतो विद्वानम्ब शोकं परित्यज । आवां ननु न किं पुत्रौ तवाज्ञाकरणोद्यतौ ॥१९॥

अर्थ: उन्होंने कहा - हे माता ! भरत बड़ा पुण्यवान् और विद्वान् है, तू शोक छोड़ । क्या हम दोनों तेरे आज्ञाकारी पुत्र नहीं हैं ? ॥१९॥


इति कातरतां कृच्छ्रात्त्याजिता शान्तमानसा । सपत्नीवाक्यजातैश्च सा बभूव विशोकिका ॥२०॥

अर्थ: इस प्रकार जिससे बड़े भयसे उत्पन्न कातरता छुड़ाई गई थी तथा जिसका हृदय अत्यन्त शुद्ध था, ऐसी वह केकया सपत्नीजनोंके वचनोंसे शोकरहित हो गई थी ॥२०॥


विबुद्धा चाकरोन्निन्दामात्मनः शुद्धमानसा । धिक् स्त्रीकलेवरमिदं बहुदोषपरिप्लुतम् ॥२१॥

अर्थ: वह शुद्धहृदया जब सचेत हुई तब अपने आपकी निन्दा करने लगी । वह कहने लगी कि स्त्रीके इस शरीरको धिक्कार हो जो अनेक दोषोंसे आच्छादित है ॥२१॥


अत्यन्ताशुचिबीभत्सं नगरीनिर्झरोपमम् । करोमि कर्म तद् येन विमुच्ये पापकर्मतः ॥२२॥

अर्थ: अत्यन्त अपवित्र है, ग्लानिपूर्ण है, नगरी निर्झर अर्थात् गटरके प्रवाहके समान है । अब तो मैं वह कार्य करूँगी जिसके द्वारा पापकर्मसे मुक्त हो जाऊँगी ॥२२॥


पूर्वमेव जिनोक्तेन धर्मेणाऽसौ सुभाविता । महासंवेगसम्पन्ना सितैकवसनान्विता ॥२३॥

अर्थ: वह जिनेन्द्र प्रणीत धर्मसे तो पहले ही प्रभावित थी, इसलिए महान् वैराग्यसे प्रयुक्त हो एक सफेद साड़ीसे युक्त हो गई ॥२३॥


सकाशे पृथिवीमत्याः सह नारीशतैस्त्रिभिः । दीक्षां जग्राह सम्यक्त्वं धारयन्ती सुनिर्मलम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर निर्मल सम्यक्त्वको धारण करती हुई उसने तीन सौ स्त्रियोंके साथ साथ पृथिवीमती नामक आर्याके पास दीक्षा ग्रहण कर ली ॥२४॥


त्यक्त्वा समस्तं गृहिधर्मजालं प्राप्याऽऽर्यिकाधर्ममनुत्तमं सा । रराज मुक्ता घनसङ्गमेन शशाङ्कलेखेव कलङ्कहीना ॥२५॥

अर्थ: समस्त गृहस्थधर्मके जालको छोड़ कर तथा आर्यिकाका उत्कृष्ट धर्म धारण कर वह केकया मेघके संगमसे रहित निष्कलंक चन्द्रमाकी रेखाके समान सुशोभित हो रही थी ॥२५॥


इतोऽभवद्भिक्षुगणः सुतेजास्तथाऽऽर्यिकाणां प्रचयोऽन्यतोऽभूत् । तदा सदो भूरिसरोजयुक्तसरः समं तद्भवति स्म कान्तम् ॥२६॥

अर्थ: उस समय देशभूषण मुनिराजकी सभामें एक ओर तो उत्तम तेजको धारण करनेवाले मुनियोंका समूह विद्यमान था और दूसरी ओर आर्यिकाओंका समूह स्थित था इसलिए वह सभा अत्यधिक कमल और कमलिनियोंसे युक्त सरोवरके समान सुन्दर जान पड़ती थी ॥२६॥


एवं जनस्तत्र बभूव नाना-व्रतक्रियासङ्गपवित्रचित्तः ।
समुद्गते भव्यजनस्य कस्य रवौ प्रकाशेन न युक्तिरस्ति ॥२७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस तरह वहाँ जितने मनुष्य विद्यमान थे उन सभीके चित्त नाना प्रकारकी व्रत सम्बन्धी क्रियाओंके संगसे पवित्र हो रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि सूर्योदय होने पर कौन भव्य जन प्रकाशसे युक्त नहीं होता ? अर्थात् सभी होते हैं ॥२७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे भरतकेकयानिष्क्रमणाभिधानं नाम षडशीतितमं पर्व ॥८६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें भरत और केकयाकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला छियासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८६॥


८७. सप्ताशीतितमं पर्व (भरतनिर्वाणगमनं)

अथ साधुः प्रशान्तात्मा लोकत्रयविभूषणः । अणुव्रतानि मुनिना विधिना परिलम्भितः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जिसकी आत्मा अत्यन्त शान्त थी ऐसे उस उत्तम त्रिलोकमण्डन हाथीको मुनिराजने विधिपूर्वक अणुव्रत धारण कराये ॥१॥


सम्यग्दर्शनसंयुक्तः संज्ञानः सत्क्रियोद्यतः । सागारधर्मसम्पूर्णो मतङ्गजवरोऽभवत् ॥२॥

अर्थ: इस तरह वह उत्तम हाथी, सम्यग्दर्शनसे युक्त, सम्यग्ज्ञानका धारी, उत्तम क्रियाओंके आचरणमें तत्पर और गृहस्थ धर्मसे सहित हुआ ॥२॥


पक्षमासादिभिर्भक्तश्च्युतैः पत्रादिभिः स्वयम् । शुष्कैः स पारणां चक्रे दिनपूर्णैकवेलिकाम् ॥३॥

अर्थ: वह एक पक्ष अथवा एक मास आदिका उपवास करता था तथा उपवासके बाद अपने आप गिरे हुए सूखे पत्तोंसे दिनमें एक बार पारणा करता था ॥३॥


गजः संसारभीतोऽयं सच्चेष्टितपरायणः । अर्च्यमानो जनैः क्षोणीं विजहार विशुद्धिमान् ॥४॥

अर्थ: इस तरह जो संसारसे भयभीत था, उत्तम चेष्टाओंके धारण करनेमें तत्पर था, और अत्यन्त विशुद्धिसे युक्त था ऐसा वह गजराज मनुष्योंके द्वारा पूजित होता हुआ पृथिवी पर भ्रमण करता था ॥४॥


लड्डुकान् मण्डकान् मृष्टान्विविधाश्चारुपूरिकाः । पारणासमये तस्मै ससत्कारं ददौ जनः ॥५॥

अर्थ: लोग पारणाके समय उसके लिए बड़े सत्कारके साथ मीठे-मीठे लाडू माँडे और नाना प्रकारकी पूरियाँ देते थे ॥५॥


तनुकर्मशरीरोऽसौ संवेगाऽऽलानसंयतः । उग्रं चत्वारि वर्षाणि तपश्चक्रे यमाङ्कुशः ॥६॥

अर्थ: जिसके शरीर और कर्म - दोनों ही अत्यन्त क्षीण हो गये थे, जो संवेग रूपी खम्भेसे बँधा हुआ था, तथा यम ही जिसका अंकुश था ऐसे उस हाथीने चार वर्ष तक उग्र तप किया ॥६॥


स्वैरं स्वैरं परित्यज्य भुक्तिमुग्रतपा गजः । सल्लेखनां परिप्राप्य ब्रह्मोत्तरमशिश्रियत् ॥७॥

अर्थ: जो धीरे-धीरे भोजनका परित्याग कर अपने तपश्चरणको उग्र करता जाता था ऐसा वह हाथी सल्लेखना धारण कर ब्रह्मोत्तर स्वर्गको प्राप्त हुआ ॥७॥


वराङ्गनासमाकीर्णो हारकुण्डलमण्डितः । पूर्वं सुरसुखं प्राप्तो गजः पुण्यानुभावतः ॥८॥

अर्थ: वहाँ उत्तम स्त्रियोंसे सहित तथा हार और कुण्डलोंसे मण्डित उस हाथीने पुण्यके प्रभावसे पहले ही जैसा देवोंका सुख प्राप्त किया ॥८॥


भरतोऽपि महातेजा महाव्रतधरो विभुः । धराधरगुरुस्त्यक्तबाह्यान्तरपरिग्रहः ॥९॥

व्युत्सृष्टाङ्गो महाधीरस्तिष्ठन्नस्तमिते रवौ । विजहार यथान्यायं चतुराराधनोद्यतः ॥१०॥

अर्थ: इधर जो महातेजके धारक थे, महाव्रती थे, विभु थे, पर्वतके समान स्थिर थे, बाह्याभ्यन्तर परिग्रहके त्यागी थे, शरीरकी ममतासे रहित थे, महाधीर वीर थे, जहाँ सूर्य डूब जाता था वहीं बैठ जाते थे, और चार आराधनाओंकी आराधनामें तत्पर थे ऐसे भरत महामुनि न्यायपूर्वक विहार करते थे ॥९-१०॥


अविरुद्धो यथा वायुर्मृगेन्द्र इव निर्भयः । अकूपार इवाक्षोभ्यो निष्कम्पो मन्दरो यथा ॥११॥

अर्थ: वे वायुके समान बन्धनसे रहित थे, सिंहके समान निर्भय थे, समुद्रके समान क्षोभसे रहित थे, और मेरुके समान निष्कम्प थे ॥११॥


जातरूपधरः सत्यकवचः क्षान्तिसायकः । परीषहजयोद्युक्तस्तपःसंयत्यवर्तत ॥१२॥

अर्थ: जो दिगम्बर मुद्राको धारण करनेवाले थे, सत्यरूपी कवचसे युक्त थे, क्षमारूपी बाणोंसे सहित थे और परीषहोंके जीतनेमें सदा तत्पर रहते थे ऐसे वे भरतमुनि सदा तपरूपी युद्धमें विद्यमान रहते थे ॥१२॥


समः शत्रौ च मित्रे च समानः सुखदुःखयोः । उत्तमः श्रमणः सोऽभूत् समधीस्तृणरत्नयोः ॥१३॥

अर्थ: वे शत्रु और मित्र, सुख और दुःख तथा तृण और रत्नमें समान रहते थे । इस तरह वे समबुद्धिके धारक उत्तम मुनि थे ॥१३॥


सूचीनिचितमार्गेषु भ्राम्यतः शास्त्रपूर्वकम् । शत्रुस्थानेषु तस्याभूच्चतुरङ्गुलचारिता ॥१४॥

अर्थ: वे डाभकी अनियोंसे व्याप्त मार्गमें शास्त्रानुसार ईर्यासमितिसे चलते थे तथा शत्रुओंके स्थानोंमें भी उनका निर्भय विहार होता था ॥१४॥


अत्यन्तप्रलयं कृत्वा मोहनीयस्य कर्मणः । अवाप केवलज्ञानं लोकालोकावभासनम् ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर मोहनीय कर्मका अत्यन्त प्रलय - समूल क्षय कर वे लोक-अलोकको प्रकाशित करनेवाले केवलज्ञानको प्राप्त हुए ॥१५॥


ईदृङ्माहात्म्ययुतः काले समनुक्रमेण विगतरजस्कः । यदभीप्सितं तदेष स्थानं प्राप्तो यतो न भूयः पातः ॥१६॥

अर्थ: जो इस प्रकारकी महिमासे युक्त थे तथा अनुक्रमसे जिन्होंने कर्मरजको नष्ट किया था ऐसे वे भरतमुनि उस अभीष्ट स्थान - मुक्तिस्थानको प्राप्त हुए कि जहाँसे फिर लौटकर आना नहीं होता ॥१६॥


भरतर्षेरिदमनघं सुचरितमनुकीर्त्तयेन्नरो यो भक्त्या । स्वायुरियत्ति स कीर्त्तिं यशो बलं धनविभूतिमारोग्यं च ॥१७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य भरतमुनिके इस निर्मल चरितको भक्ति-पूर्वक कहता-सुनता है वह अपनी आयु पर्यन्त कीर्ति, यश, बल, धनवैभव और आरोग्यको प्राप्त होता है ॥१७॥


सारं सर्वकथानां परममिदं चरितमुन्नतगुणं शुभ्रम् । शृण्वन्तु जना भव्या निर्जितरवितेजसो भवन्ति यदाशु ॥१८॥

अर्थ: यह चरित्र सर्व कथाओंका उत्तम सार है, उन्नत गुणोंसे युक्त है और उज्ज्वल है। हे भव्यजनो ! इसे तुम सब ध्यानसे सुनो जिससे शीघ्र ही सूर्यके तेजको जीतनेवाले हो सको ॥१८॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे भरतनिर्वाणगमनं नामसप्ताशीतितमं पर्व ॥८७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें भरतके निर्वाणका कथन करनेवाला सतासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८७॥


८८. अष्टाशीतितमं पर्व (राज्याभिषेकाभिधानं विभागदर्शनं)

भरतेन समं वीरा निष्क्रान्ता ये महानृपाः । निःस्पृहा स्वशरीरेऽपि प्रव्रज्यां समुपागताः ॥१॥

प्राप्तानां दुर्लभं मार्गं तेषां सुपरमात्मनाम् । कीर्त्तयिष्यामि केषाञ्चिन्नामानि शृणु पार्थिव ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! अपने शरीरमें भी स्पृहा नहीं रखनेवाले जो बड़े-बड़े वीर राजा भरतके साथ दीक्षाको प्राप्त हुए थे तथा अत्यन्त दुर्लभ मार्गको प्राप्त हो जिन्होंने परमात्म पद प्राप्त किया था ऐसे उन राजाओंमेंसे कुछके नाम कहता हूँ सो सुनो ॥१-२॥


सिद्धार्थः सिद्धसाध्यार्थो रतिदो रतिवर्द्धनः । अम्बुवाहरथो जाम्बूनदः शल्यः शशाङ्कपात् ॥३॥

विरसो नन्दनो नन्द आनन्दः सुमतिः सुधीः । सदाश्रयो महाबुद्धिः सूर्यारो जनवल्लभः ॥४॥

इन्द्रध्वजः श्रुतधरः सुचन्द्रः पृथिवीधरः । अलकः सुमतिः क्रोधः कुन्दरः सत्ववान्हरिः ॥५॥

सुमित्रो धर्ममित्रायः सम्पूर्णेन्दुः प्रभाकरः । नघुषः सुन्दनः शान्तिः प्रियधर्मादयस्तथा ॥६॥

अर्थ: जिसके समस्त साध्य पदार्थ सिद्ध हो गये थे ऐसा सिद्धार्थ, रतिको देनेवाला रतिवर्द्धन, मेघरथ, जाम्बूनद, शल्य, शशाङ्कपाद् ( चन्द्रकिरण ), विरस, नन्दन, नन्द, आनन्द, सुमति, सुधी, सदाश्रय, महाबुद्धि, सूर्यार, जनवल्लभ, इन्द्रध्वज, श्रुतधर, सुचन्द्र, पृथिवीधर, अलक, सुमति, क्रोध, कुन्दर, सत्ववान्, हरि, सुमित्र, धर्ममित्राय, पूर्णचन्द्र, प्रभाकर, नघुष, सुन्दन, शान्ति और प्रियधर्म आदि ॥३-६॥


विशुद्धकुलसम्भूताः सदाचारपरायणाः । सहस्राधिकसंख्याना भुवनाख्यातचेष्टिताः ॥७॥

अर्थ: ये सभी राजा विशुद्ध कुलमें उत्पन्न हुए थे, सदाचारमें तत्पर थे, हजारसे अधिक संख्याके धारक थे और संसारमें इनकी चेष्टाएँ प्रसिद्ध थीं ॥७॥


एते हस्त्यश्वपादातं प्रवालस्वर्णमौक्तिकम् । अन्तःपुरं च राज्यं च बहुजीर्णतृणं यथा ॥८॥

महाव्रतधराः शान्ता नानालब्धिसमागताः । आत्मध्यानानुरूपेण यथायोग्यं पदं श्रिताः ॥९॥

अर्थ: ये सब हाथी, घोड़े, पैदल सैनिक, मूँगा, सोना, मोती, अन्तःपुर और राज्यको जीर्ण-तृणके समान छोड़कर महाव्रतके धारी हुए थे । सभी शान्तचित्त एवं नाना ऋद्धियोंसे युक्त थे और अपने-अपने ध्यानके अनुरूप यथायोग्य पदको प्राप्त हुए थे ॥८-९॥


निष्क्रान्ते भरते तस्मिन् भरतोपमचेष्टिते । मेने शून्यकमात्मानं लक्ष्मणः स्मृततद्गुणः ॥१०॥

अर्थ: भरत चक्रवर्तीके समान चेष्टाओंके धारक भरतके दीक्षा ले लेने पर उसके गुणोंका स्मरण करनेवाले लक्ष्मण अपने आपको सूना मानने लगे ॥१०॥


शोकाकुलितचेतस्को विषादं परमं भजन् । सूत्कारमुखरः क्लान्तलोचनेन्दीवरद्युतिः ॥११॥

विराधितभुजस्तम्भकृतावष्टम्भविग्रहः । तथापि प्रज्वलन् लक्ष्म्या मन्दवर्णमवोचत ॥१२॥

अर्थ: यद्यपि उनका चित्त शोकसे आकुलित हो रहा था, वे परम विषादको प्राप्त थे, उनके मुखसे सू-सू शब्द निकल रहा था, जिनके नेत्ररूपी नील-कमलोंकी कान्ति म्लान हो गई थी और उनका शरीर विराधितकी भुजारूपी खम्भोंके आश्रय स्थित था तथापि वे लक्ष्मीसे देदीप्यमान होते हुए धीरे-धीरे बोले कि ॥११-१२॥


अधुना वर्त्तते क्वासौ भरतो गुणभूषणः । तरुणेन सता येन शरीरे प्रीतिरुज्झिता ॥१३॥

अर्थ: गुणरूपी आभूषणोंको धारण करनेवाला वह भरत इस समय कहाँ है ? जिसने तरुण होने पर भी शरीरसे प्रीति छोड़ दी है ॥१३॥


इष्टं बन्धुजनं त्यक्त्वा राज्यं च त्रिदशोपमम् । सिद्धार्थी स कथं भेजे जैनधर्मं सुदुर्धरम् ॥१४॥

अर्थ: इष्ट बन्धुजनोंको तथा देवोंके समान राज्यको छोड़कर सिद्ध होनेकी इच्छा रखता हुआ वह अत्यन्त कठिन जैनधर्मको कैसे धारण कर गया ? ॥१४॥


आह्लादयन् सदः सर्वं ततः पद्मो विधानवित् । जगाद परमं धन्यो भरतः सुमहानसौ ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर समस्त सभाको आह्लादित करते हुए विधि-विधानके वेत्ता रामने कहा कि वह भरत परम धन्य तथा अत्यन्त महान् है ॥१५॥


तस्यैकस्य मतिः शुद्धा तस्य जन्मार्थसङ्गतम् । विषान्नमिव यस्त्यक्त्वा राज्यं प्राव्रज्यमास्थितः ॥१६॥

अर्थ: एक उसीकी बुद्धि शुद्ध है, और उसीका जन्म सार्थक है कि जो विषमिश्रित अन्नके समान राज्यका त्याग कर दीक्षाको प्राप्त हुआ है ॥१६॥


पूज्यता वर्ण्यतां तस्य कथं परमयोगिनः । देवेन्द्रा अपि नो शक्ता यस्य वक्तुं गुणाकरम् ॥१७॥

अर्थ: जिसके गुणोंकी खानका वर्णन करनेके लिए इन्द्र भी समर्थ नहीं है ऐसे उस परम योगीकी पूज्यताका कैसे वर्णन किया जाय ? ॥१७॥


कैकयानन्दनस्यैव प्रारब्धगुणकीर्त्तनाः । सुखदुःखरसोन्मिश्रा मुहूर्त्तं पार्थिवा स्थिताः ॥१८॥

अर्थ: जिन्होंने भरतके गुणोंका वर्णन करना प्रारब्ध किया था, ऐसे राजा मुहूर्त भर सुख-दुःखके रससे मिश्रित होते हुए स्थित थे ॥१८॥


ततः समुत्थिते पद्मे सोद्वेगे लक्ष्मणे तथा । तथा स्वमास्पदं याता नरेन्द्रा बहुविस्मयाः ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर उद्वेगसे सहित राम और लक्ष्मण जब उठ कर खड़े हुए तब बहुत भारी आश्चर्यसे युक्त राजा लोग अपने अपने स्थान पर चले गये ॥१९॥


सम्प्रधार्य पुनः प्राप्ताः कर्त्तव्याहितचेतसः । पद्मनाभं नमस्कृत्य प्रीत्या वचनमब्रुवन् ॥२०॥

अर्थ: अथानन्तर करने योग्य कार्यमें जिनका चित्त लग रहा था ऐसे राजा लोग परस्पर विचार कर पुनः रामके पास आये और नमस्कार कर प्रीति पूर्वक निम्न वचन बोले ॥२०॥


विदुषामज्ञकानां वा प्रसादं कुरु नाथ नः । राज्याभिषेकमन्विच्छ सुरलोकसमद्युतिः ॥२१॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे नाथ ! हम विद्वान् हों अथवा मूर्ख ! हमलोगों पर प्रसन्नता कीजिये । आप देवोंके समान कान्तिको धारण करनेवाले हैं अतः राज्याभिषेककी स्वीकृति दीजिये ॥२१॥


विदधत्स्वफलत्वं नश्चक्षुषोर्हृदयस्य च । तवाभिषेकसौख्येन भरितस्य नरोत्तम ॥२२॥

अर्थ: हे पुरुषोत्तम ! आप हमारे नेत्रों तथा अभिषेक सम्बन्धी सुखसे भरे हुए हमारे हृदयकी सफलता करो ॥२२॥


बिभ्रत्सप्तगुणैश्वर्यं राजराजो दिने दिने । पादौ नमति यत्रैव तत्र राज्येन किं मम ॥२३॥

अर्थ: यह सुन रामने कहा कि जहाँ सात गुणोंके ऐश्वर्यको धारण करनेवाला राजाओंका राजा लक्ष्मण प्रतिदिन हमारे चरणोंमें नमस्कार करता है वहाँ हमें राज्यकी क्या आवश्यकता है ? ॥२३॥


प्रतिकूलमिदं वाच्यं न भवद्भिर्मयीदृशम् । स्वेच्छाविधानमात्रं हि ननु राज्यमुदाहृतम् ॥२४॥

अर्थ: इसलिए आप लोगोंको मेरे विषयमें इस प्रकारके विरुद्ध वचन नहीं कहना चाहिये क्योंकि इच्छानुसार कार्य करना ही तो राज्य कहलाता है ॥२४॥


इत्युक्ते जयशब्देन पद्माभमभिनन्द्य ते । गत्वा नारायणं प्रोचुः स चायातो बलान्तिकम् ॥२५॥

अर्थ: कहनेका सार यह है कि आपलोग लक्ष्मणका राज्याभिषेक करो । रामके इस प्रकार कहने पर सबलोग जयध्वनिके साथ रामका अभिनन्दन कर लक्ष्मणके पास पहुँचे और नमस्कार कर राज्याभिषेक स्वीकृत करनेकी बात बोले । इसके उत्तरमें लक्ष्मण श्रीरामके समीप आये ॥२५॥


प्रावृडारम्भसम्भूतडम्बराम्भोदनिःस्वनाः । ततः समाहता भेर्यः शङ्खशब्दपुरःसराः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर वर्षाऋतुके प्रारम्भमें एकत्रित घनघटाके समान जिनका विशाल शब्द था तथा जिनके प्रारम्भमें शङ्खोंके शब्द हो रहे थे ऐसी भेरियाँ बजाई गईं ॥२६॥


दुन्दुभ्यानकझल्लर्यस्तूर्याणि प्रवराणि च । मुमुचुर्नादमुत्तुङ्गं वंशादिस्वनसङ्गतम् ॥२७॥

अर्थ: दुन्दुभि, ढक्का, झालर, और उत्तमोत्तम तूर्य, बाँसुरी आदिके शब्दोंसे सहित उच्च शब्द छोड़ रहे थे ॥२७॥


चारुमङ्गलगीतानि नाट्यानि विविधानि च । प्रवृत्तानि मनोज्ञानि यच्छन्ति प्रमदं परम् ॥२८॥

अर्थ: मङ्गलमय सुन्दर गीत, और नाना प्रकारके मनोहर नृत्य उत्तम आनन्द प्रदान कर रहे थे ॥२८॥


तस्मिन् महोत्सवे जाते स्नानीयासनवर्त्तिनौ । विभूत्या परया युक्तौ सङ्गतौ रामलक्ष्मणौ ॥२९॥

अर्थ: इस प्रकार उस महोत्सवके होने पर परम विभूतिसे युक्त राम और लक्ष्मण साथ ही साथ अभिषेकके आसन पर आरूढ हुए ॥२९॥


रुक्मकाञ्चननिर्माणैर्नानारत्नमयैस्तथा । कलशैर्युक्तपद्मास्यैरभिषिक्तौ यथाविधि ॥३०॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिनके मुख, कमलोंसे युक्तथे ऐसे चाँदी सुवर्ण तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित कलशोंके द्वारा विधिपूर्वक उनका अभिषेक हुआ ॥३०॥


मुकुटाङ्गदकेयूरहारकुण्डलभूषितौ । दिव्यस्रग्वस्त्रसम्पन्नौ वरालेपनचर्चितौ ॥३१॥

अर्थ: दोनों ही भाई मुकुट, अङ्गद, केयूर, हार और कुण्डलोंसे विभूषित किये गये। दोनों ही दिव्य मालाओं और वस्त्रोंसे सम्पन्न तथा उत्तमोत्तम विलेपनसे चर्चित किये गये ॥३१॥


सीरपाणिर्जयत्वेषश्चक्री जयतु लक्ष्मणः । इति तौ जयशब्देन खेचरैरभिनन्दितौ ॥३२॥

अर्थ: जिनके हाथमें हलायुध विद्यमान है ऐसे श्रीराम और जिनके हाथमें चक्ररत्न विद्यमान है ऐसे लक्ष्मणकी जय हो इस प्रकार जय-जयकारके द्वारा विद्याधरोंने दोनोंका अभिनन्दन किया ॥३२॥


राजेन्द्रयोस्तयोः कृत्वा खेचरेन्द्रा महोत्सवम् । गत्वाऽभिषिषिचुर्देवीं स्वामिनीं तु विदेहजाम् ॥३३॥

अर्थ: इस प्रकार उन दोनों राजाधिराजोंका महोत्सव कर विद्याधर राजाओंने स्वामिनी सीतादेवीका जाकर अभिषेक किया ॥३३॥


महासौभाग्यसम्पन्ना पूर्वमेव हि साऽभवत् । प्रधाना सर्वदेवीनामभिषेकाद् विशेषतः ॥३४॥

अर्थ: वह सीतादेवी पहलेसे ही महा सौभाग्यसे सम्पन्न थी फिर उस समय अभिषेक होनेसे विशेष कर सब देवियोंमें प्रधान हो गई थी ॥३४॥


आनन्द्य जयशब्देन वैदेहीमभिषेचनम् । ऋद्धया चक्रुर्विशल्यायाश्चक्रिपत्नीविभुत्वकृत् ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर जय-जयकारसे सीताका अभिनन्दन कर उन्होंने बड़े वैभवके साथ विशल्याका अभिषेक किया। उसका वह अभिषेक चक्रवर्तीकी पट्टराज्ञीके विभुत्वको प्रकट करनेवाला था ॥३५॥


स्वामिनी लक्ष्मणस्यापि प्राणदानाद् बभूव या । मर्यादामात्रकं तस्यास्तज्जातमभिषेचनम् ॥३६॥

अर्थ: जो विशल्या प्राणदान देनेसे लक्ष्मणकी भी स्वामिनी थी उसका अभिषेक केवल मर्यादा मात्रके लिए हुआ था अर्थात् वह स्वामिनी तो पहले से ही थी उसका अभिषेक केवल नियोग मात्र था ॥३६॥


जय त्रिखण्डनाथस्य लक्ष्मणस्याथ सुन्दरि । इति तां जयशब्देन तेऽभिनन्द्य स्थिताः सुखम् ॥३७॥

अर्थ: अथानन्तर हे तीन खण्डके अधिपति लक्ष्मणकी सुन्दरि ! तुम्हारी जय हो इस प्रकारके जय-जयकारसे उसका अभिनन्दन कर सब राजा लोग सुखसे स्थित हुए ॥३७॥


त्रिकूटशिखरे राज्यं ददौ रामो विभीषणे । सुग्रीवस्य च किष्किन्धे वानरध्वजभूभृतः ॥३८॥

श्रीपर्वते मरुज्जस्य गिरौ श्रीनगरे पुरे । विराधितनरेन्द्रस्य गोत्रक्रमनिषेविते ॥३९॥

महार्णवोर्मिसन्तानचुम्बिते बहुकौतुके । कैष्किन्धे च पुरे स्फीतं पतित्वं नलनीलयोः ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर श्री रामने विभीषणके लिए त्रिकूटाचलके शिखरका, वानरवंशियोंके राजा सुग्रीवको किष्किन्ध पर्वतका, हनूमानको श्रीपर्वतका, राजा विराधितके लिए उसकी वंशपरम्परासे सेवित श्रीपुर नगरका और नल तथा नीलके लिए महासागरकी तरङ्गोंसे चुम्बित अनेक कौतुकोंको धारण करनेवाले, किष्किन्धपुरका विशाल साम्राज्य दिया ॥३८-४०॥


विजयार्द्धदक्षिणे स्थाने प्रख्याते रथनूपुरे । राज्यं जनकपुत्रस्य प्रणतोग्रनभश्चरम् ॥४१॥

अर्थ: भामण्डलके लिए विजयार्ध पर्वतके दक्षिणमें स्थित रथनूपुर नगर नामक प्रसिद्ध स्थानमें उग्र विद्याधरोंको नम्रीभूत करनेवाला राज्य दिया ॥४१॥


दैवोपगीतनगरे कृतो रत्नजटी नृपः । शेषा अपि यथायोग्यं विषयस्वामिनः कृताः ॥४२॥

अर्थ: रत्नजटीको देवोपगीत नगरका राजा बनाया और शेष लोग भी यथायोग्य देशोंके स्वामी किये गये ॥४२॥


एवं स्वपुण्योदययोग्यमाप्ता राज्यं नरेन्द्राश्चिरमप्रकम्पम् । रामानुमत्या बहुलब्धहर्षास्तस्थुर्यथास्वं निलयेषु दीप्ताः ॥४३॥

अर्थ: इस प्रकार जो अपने-अपने पुण्योदयके योग्य चिरस्थायी राज्यको प्राप्त हुए थे तथा रामचन्द्रजीकी अनुमतिसे जिन्हें अनेक हर्षके कारण उपलब्ध थे ऐसे वे सब देदीप्यमान राजा अपने-अपने स्थानोंमें स्थित हुए ॥४३॥


पुण्यानुभावस्य फलं विशालं विज्ञाय सम्यग्जगति प्रसिद्धम् । कुर्वन्ति ये धर्मरतिं मनुष्या रवेर्द्युतिं ते जनयन्ति तन्वीम् ॥४४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य जगत्में प्रसिद्ध पुण्यके प्रभावका फल जानकर धर्ममें प्रीति करते हैं वे सूर्यकी प्रभाको भी कृश कर देते हैं ॥४४॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे राज्याभिषेकाभिधानं विभागदर्शनं नाम अष्टाशीतितमं पर्व ॥८८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राज्याभिषेकका वर्णन करनेवाला तथा अन्य राजाओंके विभागको दिखलानेवाला अठासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८८॥

८९. नवाशीतितमं पर्व (मधुसुन्दरवधाभिधानं)

अथ सम्यग्वहन् प्रीतिं पद्माभो लक्ष्मणस्तथा । ऊचे शत्रुघ्नमिष्टं त्वं विषयं रुचिमानय ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर अच्छी तरह प्रीतिको धारण करनेवाले राम और लक्ष्मणने शत्रुघ्नसे कहा कि जो देश तुझे इष्ट हो उसे स्वीकृत कर ॥१॥


गृह्णासि किमयोध्यार्द्धं साधु वा पोदनापुरम् । किं वा राजगृहं रम्यं यदि वा पौण्ड्रसुन्दरम् ॥२॥

अर्थ: क्या तू अयोध्याका आधाभाग लेना चाहता है ? या उत्तम पोदनपुरको ग्रहण करना चाहता है ? या राजगृह नगर चाहता है अथवा मनोहर पौण्ड्र-सुन्दर नगरकी इच्छा करता है ? ॥२॥


इत्याद्याः शतशस्तस्य राजधान्यः सुतेजसः । उपदिष्टा न चास्यैता निदधुर्मानसे पदम् ॥३॥

अर्थ: इस प्रकार राम-लक्ष्मणने उस तेजस्वीके लिए सैकड़ों राजधानियाँ बताईं पर वे उसके मनमें स्थान नहीं पा सकीं ॥३॥


मथुरायाचने तेन कृते पद्मः पुनर्जगौ । मधुर्नाम च तत्स्वामी त्वया ज्ञातो न किं रिपुः ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर जब शत्रुघ्नने मथुरा-की याचना की तब रामने उससे कहा कि मथुराका स्वामी मधु नामका शत्रु है यह क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है ? ॥४॥


जामाता रावणस्यासावनेकाहवशोभितः । शूलं चमरनाथेन यस्य दत्तमनिष्फलम् ॥५॥

अमरैरपि दुर्वारं तन्निदाघार्कदुःसहम् । हृत्वा प्राणान् सहस्रस्य शूलमेति पुनः करम् ॥६॥

अर्थ: वह मधु रावणका जमाई है, अनेक युद्धोंसे सुशोभित है, और चमरेन्द्रने उसके लिए कभी व्यर्थ नहीं जानेवाला वह शूल रत्न दिया है, कि जो देवोंके द्वारा भी दुर्निवार है, जो ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान अत्यन्त दुःसह है, और जो हजारोंके प्राण हरकर पुनः उसके हाथमें आ जाता है ॥५-६॥


यस्यार्थं कुर्वतां मन्त्रमस्माकं वर्त्तते समा । रात्रावपि न विन्दामो निद्रां चिन्तासमाकुलाः ॥७॥

अर्थ: जिसके लिए मन्त्रणा करते हुए हमलोग चिन्तातुर हो सारी रात निद्राको नहीं प्राप्त होते हैं ॥७॥


हरीणामन्वयो येन जायमानेन पुष्कलः । नीतः परममुद्योतं लोकस्तिग्मांशुना यथा ॥८॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य उदित होता हुआ ही समस्त लोकको परमप्रकाश प्राप्त कराता है उसी प्रकार जिसने उत्पन्न होते ही विशाल हरिवंशको परमप्रकाश प्राप्त कराया था ॥८॥


खेचरैरपि दुःसाध्यो लवणार्णवसंज्ञकः । सुतो यस्य कथं शूरं तं विजेतुं भवान् क्षमः ॥९॥

अर्थ: और जिसका लवणार्णव नामका पुत्र विद्याधरोंके द्वारा भी दुःसाध्य है उस शूरवीरको जीतनेके लिए तू किस प्रकार समर्थ हो सकेगा ? ॥९॥


ततो जगाद शत्रुघ्नः किमत्र बहुभाषितैः । प्रयच्छ मथुरां मह्यं ग्रहीष्यामि ततः स्वयम् ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुघ्नने कहा कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? आप तो मुझे मथुरा दे दीजिये मैं उससे स्वयं ले लूँगा ॥१०॥


मधूकमिव कृन्तामि मधुं यदि न संयुगे । ततो दशरथेनाहं पित्रा मानं वहामि नो ॥११॥

अर्थ: यदि मैं युद्धमें मधुको मधुके छत्तेके समान नहीं तोड़ डालूँ तो मैं पिता दशरथसे अहंकार नहीं धारण करूँ अर्थात् उनके पुत्र होनेका गर्व छोड़ दूँ ॥११॥


शरभः सिंहसङ्घातमिव तस्य बलं यदि । न चूर्णयामि न भ्राता युष्माकमहकं तदा ॥१२॥

अर्थ: जिस प्रकार अष्टापद सिंहोंके समूहको नष्ट कर देता है उसी प्रकार यदि मैं उसके बलको चूर्ण नहीं कर दूँ तो आपका भाई नहीं होऊँ ॥१२॥


नास्मि सुप्रजसः कुक्षौ सम्भूतो यदि तं रिपुम् । नयामि दीर्घनिद्रां न त्वदाशीः कृतपालनः ॥१३॥

अर्थ: आपका आशीर्वाद ही जिसकी रक्षा कर रहा है ऐसा मैं यदि उस शत्रुको दीर्घ निद्रा नहीं प्राप्त करा दूँ तो मैं सुप्रजाकी कुक्षिमें उत्पन्न हुआ नहीं कहलाऊँ ॥१३॥


एवमास्थां समारूढे तस्मिन्नुत्तमतेजसि । विस्मयं परमं प्राप्ता विद्याधरमहेश्वराः ॥१४॥

अर्थ: इस प्रकार उत्तम तेजका धारक शत्रुघ्न जब पूर्वोक्त प्रतिज्ञाको प्राप्त हुआ तब विद्याधर राजा परम आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥१४॥


ततस्तमुद्यतं गन्तुं समुत्सार्य हलायुधः । जगाद दक्षिणामेकां धीर मे यच्छ याचितः ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँ जानेके लिए उद्यत शत्रुघ्नको सामनेसे दूर हटाकर श्रीरामने कहा कि हे धीर ! मैं तुझसे याचना करता हूँ तू मुझे एक दक्षिणा दे ॥१५॥


तमरिघ्नोऽब्रवीद्दाता त्वमनन्यसमो विभुः । याचसे किं त्वतः श्लाघ्यं परं मेऽन्यद् भविष्यति ॥१६॥

अर्थ: यह सुन शत्रुघ्नने कहा कि असाधारण दाता तो आप ही हैं सो आप ही जब याचना कर रहे हैं तब मेरे लिए इससे बढ़कर अन्य प्रशंसनीय क्या होगा ? ॥१६॥


असूनामपि नाथस्त्वं का कथाऽन्यत्र वस्तुनि । युद्धविघ्नं विमुच्यैकं ब्रूहि किं करवाणि वः ॥१७॥

अर्थ: आप तो मेरे प्राणोंके भी स्वामी हैं फिर अन्य वस्तुकी क्या कथा है ? एक युद्धके विघ्नको छोड़कर कहिये कि मैं आपकी क्या करूँ ? आपकी क्या सेवा करूँ ? ॥१७॥


ध्यात्वा जगाद् पद्माभो वत्सकासौ त्वया मधुः । रहितः शूलरत्नेन क्षोभ्यः छिद्रे मदर्थनात् ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कुछ ध्यान कर उससे कहा कि हे वत्स ! मेरे कहनेसे तू एक बात मान ले । वह यह कि जब मधु शूल रत्नसे रहित हो तभी तू अवसर पाकर उसे क्षोभित करना अन्य समय नहीं ॥१८॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा सिद्धान्नत्वा समर्च्य च । भुङ्क्त्वा मातरमागत्य नत्वाऽपृच्छत् सुखस्थिताम् ॥१९॥

अर्थ: तत्पश्चात् ‘जैसी आपकी आज्ञा हो’ यह कहकर तथा सिद्ध परमेष्ठियोंको नमस्कार और उनकी पूजा कर भोजनोपरान्त शत्रुघ्न सुखसे बैठी हुई माताके पास आकर तथा प्रणाम कर पूछने लगा ॥१९॥


समीक्ष्य तनयं देवी स्नेहादाघ्राय मस्तके । जगाद जय वत्स त्वं शरैः शत्रुगणं शितैः ॥२०॥

अर्थ: रानी सुप्रजाने पुत्रको देखकर उसका मस्तक सूँघा और उसके बाद कहा कि हे पुत्र ! तू तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा शत्रु समूहको जीते ॥२०॥


वत्समर्द्धासने कृत्वा वीरसूरगदत् पुनः । वीर दर्शयितव्यं ते पृष्ठं संयति न द्विषाम् ॥२१॥

अर्थ: वीरप्रसविनी माताने पुत्रको अर्धासन पर बैठाकर पुनः कहा कि हे वीर ! तुझे युद्धमें शत्रुओंको पीठ नहीं दिखाना चाहिए ॥२१॥


प्रत्यागतं कृतार्थं त्वां वीक्ष्य जातक संयुगात् । पूजां परां करिष्यामि जिनानां हेमपङ्कजैः ॥२२॥

अर्थ: हे पुत्र ! तुझे युद्धसे विजयी हो लौटा देखकर मैं सुवर्ण कमलोंसे जिनेन्द्र भगवान्की परम पूजा करूँगी ॥२२॥


त्रैलोक्यमङ्गलात्मानः सुरासुरनमस्कृताः । मङ्गलं तव यच्छन्तु जितरागादयो जिनाः ॥२३॥

अर्थ: जो तीनों लोकोंके लिए मङ्गल स्वरूप हैं, तथा सुर और असुर जिन्हें नमस्कार करते हैं ऐसे वीतराग जिनेन्द्र तेरे लिए मङ्गल प्रदान करें ॥२३॥


संसारप्रभवो मोहो यैर्जितोऽत्यन्तदुर्जयः । अर्हन्तो भगवन्तस्ते भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२४॥

अर्थ: जिन्होंने संसारके कारण अत्यन्त दुर्जय मोहको जीत लिया है ऐसे अर्हन्त भगवान् तेरे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥२४॥


चतुर्गतिविधानं ये देशयन्ति त्रिकालगम् । ददतां ते स्वयम्बुद्धास्तव बुद्धिं रिपोर्जये ॥२५॥

अर्थ: जो तीन काल सम्बन्धी चतुर्गतिके विधानका निरूपण करते हैं ऐसे स्वयम्बुद्ध जिनेन्द्र भगवान् तेरे लिए शत्रुके जीतनेमें बुद्धि प्रदान करें ॥२५॥


करस्थामलकं यद्वल्लोकालोकं स्वतेजसा । पश्यन्तः केवलालोका भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२६॥

अर्थ: जो अपने तेजसे समस्त लोकालोकको हाथ पर रक्खे हुए आमलकके समान देखते हैं ऐसे केवलज्ञानी तुम्हारे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥२६॥


कर्मणाऽष्टप्रकारेण मुक्तास्त्रैलोक्यमूर्द्धगाः । सिद्धाः सिद्धिकरा वत्स भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२७॥

अर्थ: जो आठ प्रकारके कर्मोंसे रहित हो त्रिलोक शिखर पर विद्यमान हैं ऐसे सिद्धिके करनेवाले सिद्ध परमेष्ठी, हे वत्स ! तेरे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥२७॥


कमलादित्यचन्द्रक्ष्मामन्दराब्धिवियत् समाः । आचार्याः परमाधारा भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२८॥

अर्थ: जो कमलके समान निर्लिप्त, सूर्यके समान तेजस्वी, चन्द्रमाके समान शान्तिदायक, पृथिवीके समान निश्चल, सुमेरुके समान उन्नत-उदार, समुद्रके समान गम्भीर और आकाशके समान निःसङ्ग हैं तथा परम आधार स्वरूप हैं ऐसे आचार्य परमेष्ठी तेरे लिए मङ्गलरूप हों ॥२८॥


परात्मशासनाभिज्ञाः कृतानुगतशासनाः । सदायुष्मंनुपाध्यायाः कुर्वन्तु तव मङ्गलम् ॥२९॥

अर्थ: जो निज और पर शासनके जाननेवाले हैं तथा जो अपने अनुगामी जनोंको सदा उपदेश करते हैं ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी हे आयुष्मन् ! तेरे लिए मङ्गल रूप हों ॥२९॥


तपसा द्वादशाङ्गेन निर्वाणं साधयन्ति ये । भद्र ते साधवः शूरा भवन्तु तव मङ्गलम् ॥३०॥

अर्थ: और जो बारह प्रकारके तपके द्वारा मोक्ष सिद्ध करते हैं - निर्वाण प्राप्त करते हैं ऐसे शूरवीर साधु परमेष्ठी हे भद्र ! तेरे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥३०॥


इति प्रतीष्य विघ्नघ्नीमाशिषं दिव्यमङ्गलाम् । प्रणम्य मातरं यातः शत्रुघ्नः सद्मनो बहिः ॥३१॥

अर्थ: इस प्रकार विघ्नोंको नष्ट करनेवाले दिव्य मङ्गल स्वरूप आशीर्वादको स्वीकृत कर तथा माताको प्रणाम कर शत्रुघ्न घरसे बाहर चला गया ॥३१॥


हेमकक्षापरीतं स समारूढो महागजम् । रराजाम्बुदपृष्ठस्थः सम्पूर्ण इव चन्द्रमाः ॥३२॥

अर्थ: सुवर्णमयी मालाओंसे युक्त महागज पर बैठा शत्रुघ्न मेघपृष्ठ पर स्थित पूर्ण चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥३२॥


नानायानसमारूढैर्नरराजशतैर्वृतः । शुशुभे स वृतो देवैः सहस्रनयनो यथा ॥३३॥

अर्थ: नाना प्रकारके वाहनों पर आरूढ सैकड़ों राजाओंसे घिरा हुआ वह शत्रुघ्न, देवोंसे घिरे इन्द्रके समान सुशोभित हो रहा था ॥३३॥


त्रीनावासानुरुप्रीतिं भ्रातरं स समागतम् । जगौ पूज्य निवर्त्तस्व द्रागव्रजाम्यनपेक्षतः ॥३४॥

अर्थ: अत्यधिक प्रीतिको धारण करनेवाले भाई राम और लक्ष्मण तीन पड़ाव तक उसके साथ गये थे । तदनन्तर उसने कहा कि हे पूज्य ! आप लौट जाइये अब मैं निरपेक्ष हो शीघ्र ही आगे जाता हूँ ॥३४॥


लक्ष्मणेन धनूरत्नं समुद्रावर्तमर्पितम् । तस्मै ज्वलनवक्त्राश्च शराः पवनरंहसः ॥३५॥

अर्थ: उसके लिए लक्ष्मणने सागरावर्त नामका धनुषरत्न और वायुके समान वेगशाली अग्निमुख बाण समर्पित किये ॥३५॥


कृतान्तवक्त्रमात्माभं नियोज्यास्मै चमूपतिम् । लक्ष्मणेन समं रामश्चिन्तायुक्तो न्यवर्तत ॥३६॥

अर्थ: तत्पश्चात् अपनी समानता रखनेवाले कृतान्तवक्त्रको सेनापति बनाकर रामचन्द्रजी चिन्तायुक्त होते हुए लक्ष्मणके साथ वापिस लौट गये ॥३६॥


राजन्नरिघ्नवीरोऽपि महाबलसमन्वितः । मथुरां प्रति याति स्म मधुराजेन पालिताम् ॥३७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! बड़ी भारी सेना अथवा अत्यधिक पराक्रमसे युक्त वीर शत्रुघ्नने मधु राजाके द्वारा पालित मथुराकी ओर प्रयाण किया ॥३७॥


क्रमेण पुण्यभागायास्तीरं प्राप्य ससम्भ्रमम् । सैन्यं न्यवेशयद्दूरमध्वानं समुपागतम् ॥३८॥

अर्थ: क्रम-क्रमसे पुण्यभागा नदीका तट पाकर उसने दीर्घ मार्गको पार करनेवाली अपनी सेना संभ्रम सहित ठहरा दी ॥३८॥


कृताशेषक्रियस्तत्र मन्त्रिवर्गो गतश्रमः । चकार संशयापन्नो मन्त्रमत्यन्तसूक्ष्मधीः ॥३९॥

अर्थ: वहाँ जिन्होंने समस्त क्रिया पूर्ण की थी, जिनका श्रम दूर हो गया था और जिनकी बुद्धि अत्यन्त सूक्ष्म थी ऐसे मन्त्रियोंके समूहने संशयारूढ़ हो परस्पर इस प्रकार विचार किया ॥३९॥


मधुभङ्गकृताशंसां पश्यतास्य धियं शिशोः । केवलं योऽभिमानेन प्रवृत्तो नयवर्जितः ॥४०॥

अर्थ: कि अहो ! मधुके पराजयकी आकांक्षा करनेवाली इस बालककी बुद्धि तो देखो जो नीतिरहित हो केवल अभिमानसे ही युद्धके लिए प्रवृत्त हुआ है ॥४०॥


महावीर्यः पुरा येन मान्धाता निर्जितो रणे । खेचरैरपि दुःसाध्यो जय्यः सोऽस्य कथं मधुः ॥४१॥

अर्थ: जो विद्याधरोंके द्वारा भी दुःसाध्य था ऐसा महाशक्तिशाली मान्धाता जिसके द्वारा पहले युद्धमें जीता गया था वह मधु इस बालकके द्वारा कैसे जीता जा सकेगा ? ॥४१॥


चलत्पादाततुङ्गोर्मिशस्त्रग्राहकुलाकुलम् । कथं वाञ्छति बाहुभ्यां तरितुं मधुसागरम् ॥४२॥

अर्थ: जिसमें चलते हुए पैदल सैनिक रूपी ऊँची ऊँची लहरें उठ रही हैं तथा जो शस्त्ररूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त है ऐसे मधुरूपी सागरको यह भुजाओंसे कैसे तैरना चाहता है ? ॥४२॥


पादातसुमहावृक्षं मत्तवारणभीषणम् । प्रविश्य मधुकान्तारं को निःक्रामति जीवितः ॥४३॥

अर्थ: जो पैदल सैनिक रूपी बड़े-बड़े वृक्षोंसे युक्त तथा मदोन्मत्त हाथियोंसे भयंकर है ऐसे मधुरूपी वनमें प्रवेश कर कौन पुरुष जीवित निकलता है ? ॥४३॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य कृतान्तकुटिलोऽवदत् । यूयं भीताः किमित्येवं त्यक्त्वा मानसमुन्नतिम् ॥४४॥

अर्थ: इस प्रकार मन्त्रियोंका कहा सुनकर कृतान्तवक्त्र सेनापतिने कहा कि तुम लोग अभिमानको छोड़कर इस तरह भयभीत क्यों हो रहे हो ? ॥४४॥


अमोघेन किलाऽऽरूढो गर्वं शूलेन यद्यपि । हन्तुं तथापि तं शक्तो मधुं शत्रुघ्नसुन्दरः ॥४५॥

अर्थ: यद्यपि मधु, अमोघ शूलके कारण गर्व पर आरूढ है - अहंकार कर रहा है तथापि शत्रुघ्न उसे मारनेके लिए समर्थ हैं ॥४५॥


करेण बलवान् दन्ती पातयेद्धरणीरुहान् । प्रक्षरद्दानधारोऽपि सिंहेन तु निपात्यते ॥४६॥

अर्थ: जिसके मदकी धारा झर रही है ऐसा बलवान् हाथी यद्यपि अपनी सूँड़से वृक्षोंको गिरा देता है तथापि वह सिंहके द्वारा मारा जाता है ॥४६॥


लक्ष्मीप्रतापसम्पन्नः सत्त्ववान् बलवान् बुधः । सुसहायश्च शत्रुघ्नः शत्रुघ्नो जायते ध्रुवम् ॥४७॥

अर्थ: यतश्च शत्रुघ्न लक्ष्मी और प्रतापसे सहित है, धैर्यवान् है, बलवान् है, बुद्धिमान् है, और उत्तम सहायकोंसे युक्त है इसलिए अवश्य ही शत्रुको नष्ट करनेवाला होगा ॥४७॥


अथ मन्त्रिजनाऽऽदेशान् मथुरानगरीं गताः । प्रत्यावृत्य चरा वार्त्तां वदन्ति स्म यथाविधि ॥४८॥

शृणु देवाऽस्ति पूर्वस्यां मथुरा नगरी दिशि । उद्यानं रम्यमत्यन्तं राजलोकसमावृतम् ॥४९॥

अर्थ: अथानन्तर मन्त्रिजनोंके आदेशसे जो गुप्तचर मथुरा नगरी गये थे उन्होंने लौटकर विधिपूर्वक यह समाचार कहा कि हे देव ! सुनिये, यहाँसे उत्तर दिशामें मथुरा नगरी है। वहाँ नगरके बाहर राजलोकसे घिरा हुआ एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान है ॥४८-४९॥


मध्येऽमरकुरोर्यद्वत्कुबेरच्छदसंज्ञितम् । इच्छापूरणसम्पन्नं विपुलं राजतेतराम् ॥५०॥

अर्थ: सो जिस प्रकार देवकुरुके मध्यमें इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला कुबेरच्छन्द नामका विशाल उपवन सुशोभित है उसी प्रकार वहाँ वह उद्यान सुशोभित है ॥५०॥


जयन्त्यात्र महादेव्या सहितस्याद्य वर्त्तते । वारीगतगजस्येव स्पर्शवश्यस्य भूभृतः ॥५१॥

अर्थ: अपनी जयन्ती नामक महादेवीके साथ राजा मधु इसी उद्यानमें निवास कर रहा है। जिस प्रकार हथिनीके वशमें हुआ हाथी बन्धनमें पड़ जाता है उसी प्रकार राजा मधु भी महादेवीके वशमें हुआ बन्धनमें पड़ा है ॥५१॥


कामिनो दिवसः षष्ठस्त्यक्ताशेषान्यकर्मणः । महासुस्थाभिमानस्य प्रमादवशवर्त्तिनः ॥५२॥

अर्थ: वह राजा अत्यन्त कामी है, उसने अन्य सब काम छोड़ दिये हैं वह महा अभिमानी है तथा प्रमादके वशीभूत है। उसे उद्यानमें रहते हुए आज छठवाँ दिन है ॥५२॥


प्रतिज्ञां तव नो वेद नागमं कामवश्यधीः । बुधैरुपेक्षितो मोहात्स भिषग्भिः सरोगवत् ॥५३॥

अर्थ: जिसकी बुद्धि कामके वशीभूत है ऐसा वह मधु राजा, न तो तुम्हारी प्रतिज्ञाको जानता है और न तुम्हारे आगमनका ही उसे पता है। जिस प्रकार वैद्य किसी रोगीकी उपेक्षा कर देते हैं उसी प्रकार मोहकी प्रबलतासे विद्वानोंने भी उसकी उपेक्षा कर दी है ॥५३॥


प्रस्तावे यदि नैतस्मिन् मथुराऽध्यास्यते ततः । अन्यपुंवाहिनीवाहैर्दुःसहः स्यान्मधूदधिः ॥५४॥

अर्थ: यदि इस समय मथुरापर अधिकार नहीं किया जाता है तो फिर वह मधुरूपी सागर अन्य पुरुषोंकी सेनारूपी नदियोंके प्रवाहसे दुःसह हो जायगा - उसका जीतना कठिन हो जायगा ॥५४॥


वचनं तत्समाकर्ण्य शत्रुघ्नः क्रमकोविदः । ययौ शतसहस्रेण ययूनां मथुरां पुरीम् ॥५५॥

अर्थ: गुप्तचरोंके यह वचन सुनकर क्रमके जाननेमें निपुण शत्रुघ्न एक लाख घोड़ा लेकर मथुराकी ओर चला ॥५५॥


अर्द्धरात्रे व्यतीतेऽसौ परलोके प्रमादिनि । निवृत्य प्राविशद्द्वारस्थानं लब्धमहोदयः ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर अर्धरात्रि व्यतीत होनेपर जब सब लोग आलस्यमें निमग्न थे, तब महान् ऐश्वर्यको प्राप्त हुए शत्रुघ्नने लौटकर मथुराके द्वारमें प्रवेश किया ॥५६॥


आसीद् योगीव शत्रुघ्नः द्वारं कर्मेव चूर्णितम् । प्राप्ताऽत्यन्तमनोज्ञा च मथुरा सिद्धिभूरिव ॥५७॥

अर्थ: वह शत्रुघ्न योगीके समान था, द्वार कर्मोंके समूहके समान चूर चूर हो गया था, और अत्यन्त मनोहर मथुरा नगरी सिद्ध भूमिके समान थी ॥५७॥


देवो जयति शत्रुघ्नः श्रीमान् दशरथात्मजः । बन्दिनामिति वक्त्रेभ्यो महानादः समुद्ययौ ॥५८॥

अर्थ: ‘राजा दशरथके पुत्र शत्रुघ्नकी जय हो’ इस प्रकार वन्दीजनोंके मुखोंसे बड़ा भारी शब्द उठ रहा था ॥५८॥


परेणाथ समाक्रान्तां विज्ञाय नगरीं जनः । लङ्कायामङ्गदप्राप्तौ यथा क्षोभमितो भयात् ॥५९॥

अर्थ: अथानन्तर जिस प्रकार लंकामें अंगदके पहुँचने पर लंकाके निवासी लोग भयसे क्षोभको प्राप्त हुए थे उसी प्रकार नगरीको शत्रुके द्वारा आक्रान्त जान मथुरावासी लोग भयसे क्षोभको प्राप्त हो गये ॥५९॥


त्रासात्तरलनेत्राणां स्त्रीणामाकुलताजुषाम् । सद्यः प्रचलिता गर्भा हृदयेन समं भृशम् ॥६०॥

अर्थ: भयके कारण जिनके नेत्र चञ्चल हो रहे थे तथा जो आकुलताको प्राप्त थीं ऐसी स्त्रियोंके गर्भ उनके हृदयके साथ-साथ अत्यन्त विचलित हो गये ॥६०॥


महाकलकलारावप्रेरणे प्रतिबोधिनः । उद्ययुः सहसा शूराः सिंहा इव भयोज्झिताः ॥६१॥

अर्थ: महा कलकल शब्दकी प्रेरणा होने पर जो जाग उठे थे ऐसे निर्भय शूर-वीर सिंहोंके समान सहसा उठ खड़े हुए ॥६१॥


विध्वस्य शब्दमात्रेण शत्रुलोकं मधोर्गृहम् । सुप्रभातनयोऽविशद्दत्यन्तोर्जितविक्रमः ॥६२॥

अर्थ: तत्पश्चात् अत्यन्त प्रबल पराक्रमको धारण करनेवाला शत्रुघ्न, शब्दमात्रसे ही शत्रु-समूहको नष्ट कर राजा मधुके घरमें प्रविष्ट हुआ ॥६२॥


तत्र दिव्यायुधाकीर्णां सुतेजाः परिपालयन् । शालामवस्थितः प्रीतो यथार्हं समितोदयः ॥६३॥

अर्थ: वहाँ वह अतिशय प्रतापी शत्रुघ्न दिव्य शस्त्रोंसे व्याप्त आयुधशालाकी रक्षा करता हुआ स्थित था। वह प्रसन्न था तथा यथायोग्य अभ्युदयको प्राप्त था ॥६३॥


मधुराभिर्मनोज्ञाभिर्भारतीभिरशेषतः । नीतो लोकः समाश्वासं जहौ त्राससमागमम् ॥६४॥

अर्थ: वह मधुर तथा मनोज्ञ वाणीके द्वारा सबको सान्त्वना प्राप्त कराता था इसलिए सबने भयका परित्याग किया था ॥६४॥


शत्रुघ्नं मथुरां ज्ञात्वा प्रविष्टं मधुसुन्दरः । निरैद् रावणवत्कोपादुद्यानात् स महाबलः ॥६५॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुघ्नको मथुरामें प्रविष्ट जानकर वह महाबलवान् मधुसुन्दर रावणके समान क्रोध वश उद्यानसे बाहर निकला ॥६५॥


शत्रुघ्नरक्षितं स्थानं प्रवेष्टुं मधुपार्थिवः । निर्ग्रन्थरक्षितं मोहो यथा शक्नोति नो तदा ॥६६॥

अर्थ: उस समय जिस प्रकार निर्ग्रन्थ मुनिके द्वारा रक्षित आत्मामें मोह प्रवेश करनेके लिए समर्थ नहीं है उसी प्रकार शत्रुघ्नके द्वारा रक्षित अपने स्थानमें राजा मधु प्रवेश करनेके लिए समर्थ नहीं हुआ ॥६६॥


प्रवेशं विविधोपायैरलब्ध्वाप्यभिमानवान् । रहितश्चापि शूलेन न सन्धिं वृणुते मधुः ॥६७॥

अर्थ: यद्यपि मधु नाना उपाय करने पर भी मथुरामें प्रवेशको नहीं पा रहा था, और शूलसे रहित था तथापि वह अभिमानी होनेके कारण शत्रुघ्नसे सन्धिकी प्रार्थना नहीं करता था ॥६७॥


असहन्तः परानीकं द्रष्टुं दर्पसमुद्धुरम् । शत्रुघ्नसैनिकाः सैन्यात् स्वस्मान्निर्ययुरश्विनः ॥६८॥

अर्थ: तत्पश्चात् अहंकारसे उत्कट शत्रु सेनाको देखनेके लिए असमर्थ हुए शत्रुघ्नके घुड़सवार सैनिक अपनी सेनासे बाहर निकले ॥६८॥


तत्राहवसमारम्भे शात्रुघ्नं सकलं बलम् । प्राप्तं जातश्च संयोगस्तयोः सैन्यसमुद्रयोः ॥६९॥

अर्थ: वहाँ युद्ध प्रारम्भ होते-होते शत्रुघ्नकी समस्त सेना आ पहुँची और दोनों ही पक्षकी सेना रूपी सागरोंके बीच संयोग हो गया अर्थात् दोनों ही सेनाओंमें मुठभेड़ शुरू हुई ॥६९॥


रथेभसादिपादाताः समर्था विविधायुधाः । रथेभैः सादिपादातैरालग्नाः सह वेगिभिः ॥७०॥

अर्थ: उस समय शक्तिसे सम्पन्न तथा नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले रथ हाथी तथा घोड़ोंके सवार एवं पैदल सैनिक, वेगशाली रथ, हाथी तथा घोड़ोंके सवारों एवं पैदल सैनिकोंके साथ भिड़ गये ॥७०॥


असहन्परसैन्यस्य दर्पं रौद्रमहास्वनम् । कृतान्तकुटिलोऽविक्षद् वेगवानाहितं बलम् ॥७१॥

अर्थ: शत्रु सेनाके भयंकर शब्द करनेवाले दर्पको सहन नहीं करता हुआ कृतान्त-वक्त्र बड़े वेगसे शत्रुकी सेनामें जा घुसा ॥७१॥


अवारितगतिस्तत्र रणे क्रीडां चकार सः । स्वयम्भूरमणोद्याने त्रिविष्टपपतिर्यथा ॥७२॥

अर्थ: सो जिस प्रकार स्वयम्भूरमण समुद्रमें इन्द्र विना किसी रोक-टोकके क्रीड़ा करता है उसी प्रकार वह कृतान्तवक्त्र भी बिना किसी रोक-टोकके युद्धमें क्रीड़ा करने लगा ॥७२॥


अथ तं गोचरीकृत्य कुमारो लवणार्णवः । बाणैर्घन इवाम्भोभिस्तिरश्चक्रे महाधरम् ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार मेघ, जलके द्वारा महापर्वतको आच्छादित करता है उसी प्रकार मधुसुन्दरके पुत्र लवणार्णवने, कृतान्तवक्त्रका सामना कर उसे बाणोंसे आच्छादित किया ॥७३॥


सोऽप्याकर्णसमाकृष्टैः शरैराशीविषप्रभैः । चिच्छेद सायकानस्य तैश्च व्याप्तं महीनभः ॥७४॥

अर्थ: इधर कृतान्तवक्त्रने भी, कान तक खिंचे हुए सर्प तुल्य बाणोंके द्वारा उसके बाण काट डाले और उनसे पृथिवी तथा आकाशको व्याप्त कर दिया ॥७४॥


अन्योन्यं विरथीकृत्य सिंहाविव बलोत्कटौ । करिपृष्ठसमारूढौ सरोषौ चक्रतुर्युधम् ॥७५॥

अर्थ: सिंहोंके समान बलसे उत्कट दोनों योद्धा परस्पर एक दूसरेके रथ तोड़कर हाथीकी पीठ पर आरूढ हो क्रोध सहित युद्ध करने लगे ॥७५॥


विताडितः कृतान्तः सः प्रथमं वक्षसीषुणा । चकार कवचं शत्रुं शरैरस्त्रैरनन्तरम् ॥७६॥

अर्थ: प्रथम ही लवणार्णवने कृतान्तवक्त्रके वक्षःस्थल पर बाणसे प्रहार किया सो उसके उत्तरमें कृतान्तवक्त्रने भी बाणों तथा शस्त्रोंके प्रहारसे शत्रु और कवचको अन्तरसे रहित कर दिया अर्थात् शत्रुका कवच तोड़ डाला ॥७६॥


ततस्तोमरमुद्यम्य कृतान्तवदनं पुनः । लवणोऽताडयत् क्रोधविस्फुरल्लोचनद्युतिः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे जिसके नेत्रोंकी कान्ति देदीप्य-मान हो रही थी ऐसे लवणार्णवने तोमर उठाकर कृतान्तवक्त्र पर पुनः प्रहार किया ॥७७॥


स्वशोणितनिषेकाक्तौ महासंरम्भवर्तिनौ । विंशुकानोकहच्छायौ प्रवीरौ तौ विरेजतुः ॥७८॥

अर्थ: जो अपने रुधिरके निषेकसे युक्त थे तथा महाक्रोध पूर्वक जो भयंकर युद्ध कर रहे थे ऐसे दोनों वीर फूले हुए पलाश वृक्षके समान सुशोभित हो रहे थे ॥७८॥


गदासिचक्रसम्पातो बभूव तुमुलस्तयोः । परस्परबलोन्मादविषादकरणोत्कटः ॥७९॥

अर्थ: उन दोनोंके बीच, अपनी-अपनी सेनाके हर्ष विषाद करनेमें उत्कट गदा खड्ग और चक्र नामक शस्त्रोंकी भयंकर वर्षा हो रही थी ॥७९॥


दत्तयुद्धश्चिरं शक्त्या ताडितो लवणार्णवः । वक्षस्यपासृतः क्षोणीं स्वर्गीव सुकृतक्षयात् ॥८०॥

अर्थ: तदनन्तर चिरकाल तक युद्ध करनेके बाद जिसके वक्षःस्थल पर शक्ति नामक शस्त्रसे प्रहार किया गया था ऐसा लवणार्णव पृथिवी पर इस प्रकार गिर पड़ा जिस प्रकार कि पुण्य क्षय होनेसे कोई देव पृथिवी पर आ पड़ता है ॥८०॥


पतितं तनयं वीक्ष्य मधुराहवमस्तके । धावन् कृतान्तवक्त्राय शत्रुघ्नेन विशब्दितः ॥८१॥

अर्थ: रणाग्र भागमें पुत्रको गिरा देख मधु कृतान्तवक्त्रको लक्ष्य कर दौड़ा परन्तु शत्रुघ्नने उसे बीचमें धर ललकारा ॥८१॥


शत्रुघ्नगिरिणा रुद्धो मधुवाहो व्यवर्द्धत । गृहीतः शोककोपाभ्यां दुःसहाभ्यामुपक्रमन् ॥८२॥

अर्थ: जो दुःखसे सहन करने योग्य शोक और क्रोधके वशीभूत था ऐसा मधुरूपी प्रवाह शत्रुघ्नरूपी पर्वतसे रुककर समीपमें वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥८२॥


दृष्टिमाशीविषस्येव तस्याशक्तं निरीक्षितुम् । सैन्यं व्यद्रवदत्युग्राद् वाताद् वानदलौघवत् ॥८३॥

अर्थ: आशीविष सर्पके समान उसकी दृष्टिको देखनेके लिए असमर्थ हुई शत्रुघ्नकी सेना उस प्रकार भाग उठी जिस प्रकार कि तीक्ष्ण वायुसे सूखे पत्तोंका समूह भाग उठता है ॥८३॥


तस्याभिमुखमालोक्य व्रजन्तं सुप्रजः सुतम् । अभिमानसमारूढा योधाः प्रत्यागता मुहुः ॥८४॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुघ्नको उसके सामने जाते देख जो अभिमानी योद्धा थे वे पुनः लौट आये ॥८४॥


तावदेव प्रपद्यन्ते भङ्गं भीत्याऽनुगामिनः । यावत्स्वामिनमीक्षन्ते न पुरो विकचाननम् ॥८५॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि अनुगामी-सैनिक भयसे तभी तक पराजयको प्राप्त होते हैं जब तक कि वे सामने प्रसन्नमुख स्वामीको नहीं देख लेते हैं ॥८५॥


अथोत्तमरथारूढो दिव्यं कार्मुकमाश्रयन् । हारराजितवक्षस्को मुकुटीलोलकुण्डलः ॥८६॥

शरदादित्यसङ्काशो निःप्रत्यूहगतिः प्रभुः । प्रजन्नभिमुखः शत्रोरत्युग्रक्रोधसङ्गतः ॥८७॥

अर्थ: अथानन्तर जो उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ दिव्य धनुषको धारण कर रहा था, जिसका वक्षःस्थल हारसे सुशोभित था, जो शिर पर मुकुट धारण किये हुए था, जिसके कुण्डल हिल रहे थे, जो शरत् ऋतुके सूर्यके समान देदीप्यमान था, जिसकी चालको कोई रोक नहीं सकता था, जो सब प्रकारसे समर्थ था, और अत्यन्त तीक्ष्ण क्रोधसे युक्त था ऐसा शत्रुघ्न शत्रुके सामने जा रहा था ॥८६-८७॥


तदा शतानि योधानां बहूनि दहति क्षणात् । संशुष्कपत्रकूटानि यथा दावोऽरिमर्दनः ॥८८॥

अर्थ: जिस प्रकार दावानल, सूखे पत्तोंकी राशिको क्षण भरमें जला देता है उसी प्रकार शत्रुओंको नष्ट करनेवाला वह शत्रुघ्न सैकड़ों योधाओंको क्षण भरमें जला देता था ॥८८॥


न कश्चिदग्रतस्तस्य रणे वीरोऽवतिष्ठते । जिनशासनवीरस्य यथान्यमतदूषितः ॥८९॥

अर्थ: जिस प्रकार जिनशासनमें निपुण विद्वान्के सामने अन्य मतसे दूषित मनुष्य नहीं ठहर पाता है उसी प्रकार कोई भी वीर युद्धमें उसके आगे नहीं ठहर पाता था ॥८९॥


योऽपि तेन समं योद्धुं कश्चिद् वाञ्छति मानवान् । सोऽपि दन्तीव सिंहाग्रे विध्वंसं व्रजति क्षणात् ॥९०॥

अर्थ: जो कोई भी मानी मनुष्य, उसके साथ युद्ध करनेकी इच्छा करता था वह सिंहके आगे हाथीके समान क्षणभरमें विनाशको प्राप्त हो जाता था ॥९०॥


उन्मत्तसदृशं जातं तत्सैन्यं परमाकुलम् । निपतत्क्षतभूयिष्टं मधुं शरणमाश्रितम् ॥९१॥

अर्थ: जो उन्मत्तके समान अत्यन्त आकुल थी तथा जो अधिकांश घायल होकर गिरे हुए योद्धाओंसे प्रचुर थी ऐसी राजा मधुकी सेना मधुकी शरणमें पहुँची ॥९१॥


रंहसा गच्छतस्तस्य मधुश्चिच्छेद केतनम् । रथाश्वास्तस्य तेनाऽपि विलुप्ताः क्षुरसायकैः ॥९२॥

अर्थ: अथानन्तर मधुने वेगसे जाते हुए शत्रुघ्नकी ध्वजा काट डाली और शत्रुघ्नने भी छुराके समान तीक्ष्ण बाणोंसे उसके रथ और घोड़े छेद दिये ॥९२॥


ततः सम्भ्रान्तचेतस्को मधुः क्षितिधरोपमम् । वारुणेन्द्रं समारुह्य क्रोधज्वलितविग्रहः ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त संभ्रान्त था, और जिसका शरीर क्रोधसे प्रज्वलित हो रहा था ऐसा मधु पर्वतके समान विशाल गजराज पर आरूढ़ होकर निकला ॥९३॥


प्रच्छादयितुमुद्युक्तः शरैरन्तरवर्जितैः । महामेघ इवादित्यबिम्बं दशरथात्मजः ॥९४॥

अर्थ: सो जिस प्रकार महामेघ सूर्यके बिम्बको आच्छादित कर लेता है उसी प्रकार मधु भी निरन्तर छोड़े हुए बाणोंसे शत्रुघ्नको आच्छादित करनेके लिए उद्यत हुआ ॥९४॥


छिन्दानेन शरान् बद्धकवचं तस्य पुष्कलः । रणप्राघूर्णकाचारः कृतः शत्रुघ्नसूरिणा ॥९५॥

अर्थ: इधर चतुर शत्रुघ्नने भी उसके बाण और कसे हुए कवचको छेदकर रणके पाहुनेका जैसा सत्कार होना चाहिए वैसा पुष्कलताके साथ उसका सत्कार किया अर्थात् खूब खबर ली ॥९५॥


अथ शूलायुधत्यक्तं ज्ञात्वाऽऽत्मानं निबोधवान् । सुतमृत्युमहाशोको वीक्ष्य शत्रुं सुदुर्जयम् ॥९६॥

बुद्ध्वाऽऽत्मनोऽवसानं च कर्म च क्षीणमूर्जितम् । नैर्ग्रन्थ्यं वचनं धीरः सस्मारानुशयान्वितः ॥९७॥

अर्थ: अथानन्तर जो अपने आपको शूल नामक शस्त्रसे सहित जानकर प्रतिबोधको प्राप्त हुआ था तथा पुत्रकी मृत्युका महाशोक जिसे पीड़ित कर रहा था ऐसे मधुने शत्रुको दुर्जेय देख कर विचार किया कि अब मेरा अन्त होनेवाला है । भाग्य की बात कि उसी समय उसके प्रबल कर्मका उदय क्षीण हो गया जिससे उसने बड़ी धीरता और पश्चात्तापके साथ दिगम्बर मुनियोंके वचनका स्मरण किया ॥९६-९७॥


अशाश्वते समस्तेऽस्मिन्नारम्भे दुःखदायिनि । कर्मैकमेव संसारे शस्यते धर्मकारणम् ॥९८॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि यह समस्त आरम्भ क्षणभङ्गुर तथा दुःख देनेवाला है। इस संसारमें एक वही कार्य प्रशंसा योग्य है जो धर्मका कारण है ॥९८॥


नृजन्म सुकृती प्राप्य धर्मे दत्ते न यो मतिम् । स मोहकर्मणा जन्तुर्वञ्चितः परमार्थतः ॥९९॥

अर्थ: जो पुण्यात्मा प्राणी मनुष्य जन्म पाकर धर्ममें बुद्धि नहीं लगाता है वह यथार्थमें मोह कर्मके द्वारा ठगा गया है ॥९९॥


ध्रुवं पुनर्भवं ज्ञात्वा पापेनात्महितं मया । न कृतं स्ववशे काले धिङ्मां मूढं प्रमादिनम् ॥१००॥

अर्थ: पुनर्जन्म अवश्य ही होगा ऐसा जानकर भी मुझ पापीने उस समय अपना हित नहीं किया जिस समय कि काल अपने अधीन था अतः प्रमाद करनेवाले मुझ मूर्खको धिक्कार है ॥१००॥


आत्माधीनस्य पापस्य कथं जाता न मे सुधीः । पुरस्कृतोऽरिणेदानीं किं करोमि हताशकः ॥१०१॥

अर्थ: मैं पापी जब स्वाधीन था तब मुझे सद्बुद्धि क्यों नहीं उत्पन्न हुई ? अब जब कि शत्रु मुझे अपने सामने किये हुए है तब मैं अभागा क्या करूँ ? ॥१०१॥


प्रदीप्ते भवने कीदृक् तडागखननादरः । को वा भुजङ्गदष्टस्य कालो मन्त्रस्य साधने ॥१०२॥

अर्थ: जब भवन जलने लगता है तब कुँआ खुदवानेके प्रति आदर कैसा ? और जिसे साँपने डस लिया है उसे मन्त्र सिद्ध करनेका समय क्या है ? अर्थात् ये सब कार्य तो पहलेसे करनेके योग्य होते हैं ॥१०२॥


सर्वथा यावदेतस्मिन् समये स्वार्थकारणम् । शुभं मनःसमाधानं कुर्वे तावदनाकुलः ॥१०३॥

अर्थ: इस समय तो सब प्रकारसे यही उचित जान पड़ता है कि मैं निराकुल हो मनका शुभ समाधान करूँ क्योंकि वही आत्महितका कारण है ॥१०३॥


अर्हद्भ्योऽथ विमुक्तेभ्य आचार्येभ्यस्तथा त्रिधा । उपाध्यायगुरुभ्यश्च साधुभ्यश्च नमो नमः ॥१०४॥

अर्थ: अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु इन पाँचों परमेष्ठियोंके लिए मन, वचन कायसे बार बार नमस्कार हो ॥१०४॥


अर्हन्तोऽथ विमुक्ताश्च साधवः केवलीरितः । धर्मश्च मङ्गलं शश्वदुत्तमं मे चतुष्टयम् ॥१०५॥

अर्थ: अर्हन्त, सिद्ध, साधु और केवली भगवान्के द्वारा कहा हुआ धर्म ये चारों पदार्थ मेरे लिए सदा मङ्गल स्वरूप हैं ॥१०५॥


द्वीपेष्वर्धतृतीयेषु त्रिपञ्चार्जनभूमिषु । अर्हतां लोकनाथानामेषोऽस्मि प्रणतस्त्रिधा ॥१०६॥

अर्थ: अढ़ाई द्वीप सम्बन्धी पन्द्रह कर्मभूमियोंमें जितने अर्हन्त हैं मैं उन सबको मन वचन कायसे नमस्कार करता हूँ ॥१०६॥


यावज्जीवं सहावद्यं योगं मुञ्चे न चात्मकम् । निन्दामि च पुरोपात्तं प्रत्याख्यानपरायणः ॥१०७॥

अर्थ: मैं जीवन पर्यन्तके लिए सावद्य योगका त्याग करता हूँ उसके विपरीत शुद्ध आत्माका त्याग नहीं करता हूँ तथा प्रत्याख्यानमें तत्पर होकर पूर्वोपार्जित पाप कर्मकी निन्दा करता हूँ ॥१०७॥


अनादौ भवकान्तारे यन्मया समुपार्जितम् । मिथ्या दुष्कृतमेतन्मे स्थितोऽहं तत्त्वसङ्गतौ ॥१०८॥

अर्थ: इस आदिरहित संसार रूप अटवीमें मैंने जो पाप किया है वह मिथ्या हो । अब मैं तत्त्व विचार करनेमें लीन होता हूँ ॥१०८॥


व्युत्सृजाम्येष हातव्यमुपादेयमुपाददे । ज्ञानं दर्शनमात्मा मे शेषं संयोगलक्षणम् ॥१०९॥

अर्थ: यह मैं छोड़ने योग्य समस्त कार्योंको छोड़ता हूँ और ग्रहण करने योग्य कार्यको ग्रहण करता हूँ, ज्ञान दर्शन ही मेरी आत्मा है पर पदार्थके संयोगसे होनेवाले अन्य भाव सब पर पदार्थ हैं ॥१०९॥


संस्तरः परमार्थेन न तृणं न च भूः शुभा । मत्या कलुषया मुक्तो जीव एव हि संस्तरः ॥११०॥

अर्थ: समाधिमरणके लिए यथार्थमें न तृण ही सांथरा है और न उत्तम भूमि ही सांथरा है किन्तु कलुषित बुद्धिसे रहित आत्मा ही उत्तम सांथरा है ॥११०॥


एवं सद्ध्यानमारुह्य त्यक्त्वा ग्रन्थं द्वयात्मकम् । द्रव्यतो गजपृष्ठस्थो मधुः केशानपानयत् ॥१११॥

अर्थ: इस प्रकार समीचीन ध्यान पर आरूढ हो उसने अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग दोनों प्रकारके परिग्रह छोड़ दिये और बाह्यमें हाथीपर बैठे बैठे ही उसने केश उखाड़कर फेंक दिये ॥१११॥


गाढक्षतशरीरोऽसौ धृतिं परमदुर्धराम् । अध्यासीनः कृतोत्सर्गः कायादेः सुविशुद्धधीः ॥११२॥

अर्थ: यद्यपि उसके शरीरमें गहरे घाव लग रहे थे, तथापि वह अत्यन्त दुर्धर धैर्यको धारण कर रहा था । उसने शरीर आदिकी ममता छोड़ दी थी और अत्यन्त विशुद्ध बुद्धि धारण की थी ॥११२॥


शत्रुघ्नोऽपि तदाऽऽगत्य नमस्कारपरायणः । क्षन्तव्यं च त्वया साधो मम दुष्कृतकारिणः ॥११३॥

अर्थ: जब शत्रुघ्नने यह हाल देखा तब उसने आकर उसे नमस्कार किया और कहा कि हे साधो ! मुझ पापीके लिए क्षमा कीजिए ॥११३॥


अमराप्सरसः संख्यं निरीक्षितुमुपागताः । पुष्पाणि मुमुचुस्तस्मै विस्मिता भावतत्पराः ॥११४॥

अर्थ: उस समय जो अप्सराएँ युद्ध देखनेके लिए आई थीं उन्होंने आश्चर्यसे चकित हो विशुद्ध भावनासे उस पर पुष्प छोड़े ॥११४॥


ततः समाधिं समुपेत्य कालं कृत्वा मधुस्तत्क्षणमात्रकेण । महासुखाम्भोधिनिमग्नचेताः सनत्कुमारे विबुधोत्तमोऽभूत् ॥११५॥

अर्थ: तदनन्तर समाधिमरणकर मधु क्षण मात्रमें ही जिसका हृदय उत्तम सुखरूपी सागरमें निमग्न था ऐसा सनत्कुमार स्वर्गमें उत्तम देव हुआ ॥११५॥


शत्रुघ्नवीरोऽप्यभवत्कृतार्थो विवेश मोदी मथुरां सुतेजाः । स्थितश्च तस्यां गजसंज्ञितायां पुरीव मेघेश्वरसुन्दरोऽसौ ॥११६॥

अर्थ: इधर वीर शत्रुघ्न भी कृतकृत्य हो गया । अब उत्तम तेजके धारक उस शत्रुघ्नने बड़ी प्रसन्नतासे मथुरामें प्रवेश किया और जिस प्रकार हस्तिनापुरमें मेघेश्वर - जयकुमार रहते थे उसी प्रकार वह मथुरामें रहने लगा ॥११६॥


एवं जनस्य स्वविधानभाजो भवे भवत्यात्मनि दिव्यरूपम् । तस्मात् सदा कर्म शुभं कुरुध्वं रवेः परां येन रुचिं प्रयाताः ॥११७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस प्रकार समाधि धारण करनेवाले पुरुष जो भव धारण करते हैं उसमें उन्हें दिव्य रूप प्राप्त होता है इसलिए हे भव्य जनो ! सदा शुभ कार्य ही करो जिससे सूर्यसे भी अधिक उत्कृष्ट कान्तिको प्राप्त हो सको ॥११७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मधुसुन्दरवधाभिधानं नाम नवाशीतितमं पर्व ॥८९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें मधु सुन्दरके वधका वर्णन करनेवाला नवासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८९॥


९०. नवतितमं पर्व (मथुरोपसर्गाभिधानं)

ततोऽरिघ्नानुभावेन विफलं तेजसोज्झितम् । अमोघमपि तद्दिव्यं शूलरत्नं विधिच्युतम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर मधु सुन्दरका वह दिव्य शूल रत्न यद्यपि अमोघ था तथापि शत्रुघ्नके प्रभावसे निष्फल हो गया था, उसका तेज छूट गया था और वह अपनी विधिसे च्युत हो गया था ॥१॥


वहन् खेदं च शोकं च त्रपां च जवमुक्तवत् । स्वामिनोऽसुरनाथस्य चमरस्यान्तिकं ययौ ॥२॥

अर्थ: अन्तमें वह खेद शोक और लज्जाको धारण करता हुआ निर्वेगकी तरह अपने स्वामी असुरोंके अधिपति चमरेन्द्रके पास गया ॥२॥


मरणे कथिते तेन मधोश्चमरपुङ्गवः । आहतः खेदशोकाभ्यां तत्सौहार्दगतस्मृतिः ॥३॥

अर्थ: शूल रत्नके द्वारा मधुके मरणका समाचार कहे जाने पर उसके सौहार्दका जिसे बार-बार स्मरण आ रहा था ऐसा चमरेन्द्र खेद और शोकसे पीड़ित हुआ ॥३॥


रसातलात्समुत्थाय त्वरावानतिभासुरः । प्रवृत्तो मथुरां गन्तुमसौ संरम्भसङ्गतः ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर वेगसे युक्त, अत्यन्त देदीप्यमान और क्रोधसे सहित वह चमरेन्द्र पातालसे उठकर मथुरा जानेके लिए उद्यत हुआ ॥४॥


भ्राम्यन्नथ सुपर्णेन्द्रो वेणुदारी तमैक्षत । अपृच्छच्च क्व दैत्येन्द्र गमनं प्रस्तुतं त्वया ॥५॥

अर्थ: अथानान्तर भ्रमण करते हुए गरुड़कुमार देवोंके इन्द्र वेणुदारीने चमरेन्द्रको देखा और देखकर उससे पूछा कि हे दैत्यराज ! तुमने कहाँ जानेकी तैयारी की है ? ॥५॥


ऊचेऽसौ परमं मित्रं येन मे निहतं मधुः । सजनस्यास्य वैषम्यं विधातुमहमुद्यतः ॥६॥

अर्थ: तब चमरेन्द्रने कहा कि जिसने मेरे परम मित्र मधु सुन्दरको मारा है उस मनुष्यकी विषमता करनेके लिए यह मैं उद्यत हुआ हूँ ॥६॥


सुपर्णेशो जगौ किं न विशल्यासम्भवं त्वया । माहात्म्यं निहितं कर्णे येनैवमभिलष्यसि ॥७॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गरुडेन्द्रने कहा कि क्या तुमने कभी विशल्याका माहात्म्य कर्णमें धारण नहीं किया - नहीं सुना जिससे कि ऐसा कह रहे हो ? ॥७॥


जगादासावतिक्रान्ताः कालास्ते परमाद्भुताः । अचिन्त्यं येन माहात्म्यं विशल्यायास्तथाविधम् ॥८॥

अर्थ: यह सुन चमरेन्द्रने कहा कि अब अत्यन्त आश्चर्यको करनेवाला वह समय व्यतीत हो गया जिस समय कि विशल्याका वैसा अचिन्त्य माहात्म्य था ॥८॥


कौमारव्रतयुक्तासावासीदद्भुतकारिणी । योगेन जनितेदानीं निर्विषेव भुजङ्गिका ॥९॥

अर्थ: जब वह कौमार व्रतसे युक्त थी तभी आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली थी अब इस समय तो नारायणके संयोगसे वह विष रहित भुजंगीके समान हो गई है ॥९॥


नियताचारयुक्तानां प्रभवन्ति मनीषिणाम् । भावा निरतिचाराणां श्लाघ्याः पूर्वकपुण्यजाः ॥१०॥

अर्थ: जो मनुष्य नियमित आचारका पालन करते हैं, बुद्धिमान् हैं तथा सब प्रकारके अतिचारोंसे रहित हैं उन्हींके पूर्व पुण्यसे उत्पन्न हुए प्रशंसनीय भाव अपना प्रभाव दिखाते हैं ॥१०॥


जितं विशल्यया तावद् गर्वमाश्रितया परम् । यावन्नारायणस्यास्यं न दृष्टं मदनावहम् ॥११॥

अर्थ: अत्यधिक गर्वको धारण करनेवाली विशल्याने तभी तक विजय पाई है जब तक कि उसने काम चेष्टाको धारण करनेवाला नारायणका मुख नहीं देखा था ॥११॥


सुरासुरपिशाचाद्या बिभ्यति व्रतचारिणाम् । तावद् यावन्न ते तीक्ष्णं निश्चयासि जहत्यहो ॥१२॥

अर्थ: व्रतका आचरण करनेवाले मनुष्योंसे सुर-असुर तथा पिशाच आदि तभी तक डरते हैं जब तक कि वे निश्चय रूपी तीक्ष्ण खड्गको नहीं छोड़ देते हैं ॥१२॥


मद्यामिषनिवृत्तस्य तावद्धस्तशतान्तरम् । लङ्घयन्ति न दुःसत्त्वा यावत् सालोऽस्य नैयमः ॥१३॥

अर्थ: जो मनुष्य मद्य मांससे निवृत्त है, सैकड़ों प्रतिपक्षियोंको नष्ट करनेवाले उसके अन्तरको दुष्ट जीव तब तक नहीं लाँघ सकते जब तक कि इसके नियमरूपी कोट विद्यमान रहता है ॥१३॥


कालाग्निर्नाम रुद्राणां दारुणो न श्रुतस्त्वया । सक्तो दयितया साकं निर्विद्यो निधने गतः ॥१४॥

अर्थ: रुद्रोंमें एक कालाग्नि नामक भयंकर रुद्रका नाम क्या तुमने नहीं सुना जो आसक्त होनेके कारण विद्या रहित हो स्त्रीके साथ ही साथ मृत्युको प्राप्त हुआ था ॥१४॥


व्रज वा किं तवैतेन कुरु कृत्यं मनीषितम् । ज्ञास्यामि स्वयमेवाहं कर्त्तव्यं मित्रविद्विषः ॥१५॥

अर्थ: अथवा जाओ, तुम्हे इससे क्या प्रयोजन ? इच्छानुसार काम करो, मैं स्वयं ही मित्र और शत्रुका कर्तव्य ज्ञात करूँगा ॥१५॥


इत्युक्त्वा खं व्यतिक्रम्य मथुरायां सुदुर्मनाः । ऐक्षतोत्सवमत्यन्तं महान्तं सर्वलोकगम् ॥१६॥

अर्थ: इतना कहकर अत्यन्त दुष्ट चित्तको धारण करनेवाला वह चमरेन्द्र आकाशको लाँघकर मथुरा पहुँचा और वहाँ पहुँच कर उसने समस्त लोगोंमें व्याप्त बहुत भारी उत्सव देखा ॥१६॥


अचिन्तयच्च लोकोऽयमकृतज्ञो महाखलः । स्थाने राष्ट्रे च यद्दैन्यस्थाने तोषमितः परम् ॥१७॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि ये मथुराके लोग अकृतज्ञ तथा महादुष्ट हैं जो घर अथवा देशमें दुःखका अवसर होने पर भी परम संतोषको प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् खेदके समय हर्ष मना रहे हैं ॥१७॥


बाहुच्छायां समाश्रित्य सुचिरं सुरसौख्यवान् । स्थितो यः स कथं लोको मधोर्मृत्योर्न दुःखितः ॥१८॥

अर्थ: जिसकी भुजाओंकी छाया प्राप्त कर जो चिरकाल तक देवों जैसा सुख भोगते रहे वे अब उस मधुकी मृत्युसे दुःखी क्यों नहीं हो रहे हैं ? ॥१८॥


प्रवीरः कातरैः शूरसहस्रेण च पण्डितः । सेव्यः किञ्चिद्भजेन्मूर्खमकृतज्ञं परित्यजेत् ॥१९॥

अर्थ: शूर-वीर मनुष्य कायर मनुष्योंके द्वारा सेवनीय है और पण्डित-जन हजारों शूर-वीरोंके द्वारा सेव्य है सो कदाचित् मूर्खकी तो सेवा की जा सकती है पर अकृतज्ञ मनुष्यको छोड़ देना चाहिए ॥१९॥


आस्तां तावदसौ राजा स्निग्धो मे येन सूदितः । संस्थानं राष्ट्रमेवैतत्क्षयं तावन्नयाम्यहम् ॥२०॥

अर्थ: अथवा यह सब रहें, जिसने हमारे स्नेही राजाको मारा है मैं उसके निवास स्वरूप इस समस्त देशको पूर्ण रूपसे क्षय प्राप्त कराता हूँ ॥२०॥


इति ध्यात्वा महारौद्रः क्रोधसम्भारचोदितः । उपसर्गं समारेभे कर्त्तुं लोकस्य दुःसहम् ॥२१॥

अर्थ: इस प्रकार विचारकर महारौद्र परिणामोंके धारक चमरेन्द्रने क्रोधके भारसे प्रेरित हो लोगोंपर दुःसह उपसर्ग करना प्रारम्भ किया ॥२१॥


विकृत्य सुमहारोगांल्लोकं दग्धुं समुद्यतः । क्षयदाव इवोदारं कक्ष्यं कारुण्यवर्जितः ॥२२॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रलयकालका दावानल विशाल वनको जलानेके लिए उद्यत होता है उसी प्रकार वह निर्दय चरमेन्द्र अनेक महारोग फैलाकर लोगोंको जलानेके लिए उद्यत हुआ ॥२२॥


यत्रैव यः स्थितः स्थाने निविष्टः शयितोऽपि वा । अचलस्तत्र तत्रैव दीर्घनिद्रामसौवितः ॥२३॥

अर्थ: जो मनुष्य जिस स्थानपर खड़ा था, बैठा था अथवा सो रहा था वह वहीं अचल हो दीर्घ निद्रा-मृत्युको प्राप्त हो गया ॥२३॥


उपसर्गं समालोक्य कुलदैवतचोदितः । अयोध्यानगरीं यातः शत्रुघ्नः साधनान्वितः ॥२४॥

अर्थ: उपसर्ग देखकर कुल-देवतासे प्रेरित हुआ शत्रुघ्न अपनी सेनाके साथ अयोध्या चला गया ॥२४॥


तमुपात्तजयं शूरं प्रत्यायातं महाहवात् । समभ्यनन्दयन् हृष्टा बलचक्रधरादयः ॥२५॥

अर्थ: विजय प्राप्त कर महायुद्धसे लौटे हुए शूरवीर शत्रुघ्नका राम, लक्ष्मण आदिने हर्षित हो अभिनन्दन किया ॥२५॥


पूर्णाशा सुप्रजाश्चासौ विधाय जिनपूजनम् । धार्मिकेभ्यो महादानं दुःखितेभ्यस्तथाऽददात् ॥२६॥

अर्थ: जिसकी आशा पूर्ण हो गई थी ऐसी शत्रुघ्नकी माता सुप्रजाने जिनपूजा कर धर्मात्माओं तथा दीन-दुःखी मनुष्योंके लिए दान दिया ॥२६॥


यद्यपि महाभिरामा साकेता काञ्चनोज्ज्वलैः प्रासादैः । धेनुरिव सर्वकामप्रदानचतुरा त्रिविष्टपोपभोगा ॥२७॥

शत्रुघ्नकुमारोऽसौ मथुरापुर्यां सुरक्तहृदयोऽत्यन्तम् ।
न तथापि धृतिं भेजे वैदेह्या विरहितो तथासीद् रामः ॥२८॥

अर्थ: यद्यपि अयोध्या नगरी सुवर्णमयी महलोंसे अत्यन्त सुन्दर थी, कामधेनुके समान समस्त मनोरथोंके प्रदान करनेमें चतुर थी और स्वर्ग जैसे भोगो- पभोगोंसे सहित थी तथापि शत्रुघ्नकुमारका हृदय मथुरामें ही अत्यन्त अनुरक्त रहता था वह, जिस प्रकार सीताके बिना राम, धैर्यको प्राप्त नहीं होते थे उसी प्रकार मथुराके बिना धैर्यको प्राप्त नहीं होता था ॥२७-२८॥


स्वप्न इव भवति चारुसंयोगः प्राणिनां यदा तनुकालः । जनयति परमं तापं निदाघरविरश्मिजनितादधिकम् ॥२९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! प्राणियोंको सुन्दर वस्तुओंका समागम जब स्वप्नके समान अल्प कालके लिए होता है तब वह ग्रीष्मऋतु सम्बन्धी सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न सन्तापसे भी कहीं अधिक सन्तापको उत्पन्न करता है ॥२९॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते श्रीपद्मपुराणे मथुरोपसर्गाभिधानं नाम नवतितमं पर्व ॥९०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यद्वारा कथित पद्मपुराणमें मथुरापर उपसर्गका वर्णन करनेवाला नब्बेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९०॥


९१. एकनवतितमं पर्व (शत्रुघ्नभवानुकीर्तनं)

अथ राजगृहस्वामी जगादाद्भुतकौतुकः । भगवन्केन कार्येण तामेवासावयाचत ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर अद्भुत कौतुकको धारण करने वाले राजा श्रेणिकने गौतम स्वामीसे पूछा कि हे भगवन् ! वह शत्रुघ्न किस कार्यसे उसी मथुराकी याचना करता था ॥१॥


बह्व्यो राजधान्योऽन्याः सन्ति स्वर्लोकसन्निभाः । तत्र शत्रुघ्नवीरस्य का प्रीतिर्मथुरां प्रति ॥२॥

अर्थ: स्वर्गलोकके समान अन्य बहुत सी राजधानियाँ हैं उनमेंसे केवल मथुराके प्रति ही वीर शत्रुघ्नकी प्रीति क्यों है ? ॥२॥


दिव्यज्ञानसमुद्रेण गणोडुशशिना ततः । गौतमेनोच्यत प्रीतिर्यथा तत्कुरु चेतसि ॥३॥

अर्थ: तब दिव्य ज्ञानके सागर एवं गणरूपी नक्षत्रोंके बीच चन्द्रमाके समान गौतम गणधरने कहा कि जिस कारण शत्रुघ्नकी मथुरामें प्रीति थी उसे मैं कहता हूँ तू चित्तमें धारण कर ॥३॥


बहवो हि भवास्तस्य तस्यामेवाभवँस्ततः । तामेव प्रति सोद्रेकं स्नेहमेष न्यषेवत ॥४॥

अर्थ: यतश्च उसके बहुतसे भव उसी मथुरामें हुए थे इसलिए उसीके प्रति वह अत्यधिक स्नेह धारण करता था ॥४॥


संसारार्णवसंसेवी जीवः कर्मस्वभावतः । जम्बूमद्द्वीपभरते मथुरां समुपागतः ॥५॥

क्रूरो यमुनदेवाख्यो धर्मैकान्तपराङ्मुखः । स प्रेत्य क्रोडवालेयवायसत्वान्यसेवत ॥६॥

अर्थ: संसार रूपी सागरका सेवन करने वाला एक जीव कर्मस्वभावके कारण जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रकी मथुरा नगरीमें यमुनदेव नामसे उत्पन्न हुआ । वह स्वभावका क्रूर था तथा धर्मसे अत्यन्त विमुख रहता था । मरनेके बाद वह क्रमसे सूकर, गधा और कौआ हुआ ॥५-६॥


अजत्वं च परिप्राप्तो मृतो भवनदाहतः । महिषो जलवाहोऽभूदायते गबले वहन् ॥७॥

अर्थ: फिर बकरा हुआ, तदनन्तर भवनमें आग लगनेसे मर कर लम्बे-लम्बे सींगोंको धारण करनेवाला भैंसा हुआ । यह भैंसा पानी ढोनेके काम आता था ॥७॥


षड्वारान्महिषो भूत्वा दुःखप्रापणसङ्गतः । पञ्चकृत्वो मनुष्यत्वं दुःकुलेष्वधनोऽभजत् ॥८॥

अर्थ: यह यमुनदेवका जीव छह बार तो नाना दुःखोंको प्राप्त करनेवाला भैंसा हुआ और पाँच बार नीच कुलोंमें निर्धन मनुष्य हुआ ॥८॥


मध्यकर्मसमाचाराः प्राप्यार्यत्वं मनुष्यताम् । प्राणिनः प्रतिपद्यन्ते किञ्चित्कर्मपरिक्षयम् ॥९॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि जो प्राणी मध्यम आचरण करते हैं वे आर्य मनुष्य हो कुछ-कुछ कर्मोंका क्षय करते हैं ॥९॥


ततः कुलन्धराभिख्यः साधुसेवापरायणः । विप्रोऽसावभवद्रूपी शीलसेवाविवर्जितः ॥१०॥

अर्थ: तदनन्तर वह साधुओंकी सेवामें तत्पर रहने वाला कुलन्धर नामका ब्राह्मण हुआ । वह कुलन्धर रूपवान् तो था पर शीलकी आराधनासे रहित था ॥१०॥


अशङ्कित इव स्वामी पुरस्तस्या जयाशया । यातो देशान्तरं तस्य महिषी ललिताभिधा ॥११॥

प्रासादस्था कदाचित्सा वातायनगतेक्षणा । निरैक्षत तकं विप्रं दुश्चेष्टं कृतकारणम् ॥१२॥

अर्थ: एक दिन उस नगरका राजा विजय प्राप्त करनेकी आशासे निःशङ्क की तरह दूसरे देशको गया था और उसकी ललिता नामकी रानी महलमें अकेली थी । एक दिन वह झरोखेपर दृष्टि डाल रही थी कि उसने संकेत करनेवाले उस दुश्चेष्ट ब्राह्मणको देखा ॥११-१२॥


सा तं क्रीडन्तमालोक्य मनोभवशराहता । आनाययद्रहोऽत्यन्तमाप्तया चित्तहारिणम् ॥१३॥

अर्थ: क्रीडा करते हुए उस कुलन्धर ब्राह्मणको देख कर रानी कामके बाणोंसे घायल हो गई जिससे उसने एक विश्वासपात्र सखीके द्वारा उस हृदयहारीको अत्यन्त एकान्त स्थानमें बुलवाया ॥१३॥


तस्या एकासने चासावुपविष्टो नृपश्च सः । अज्ञातागमनोऽपश्यत्सहसा तद्विचेष्टितम् ॥१४॥

अर्थ: महलमें जाकर वह रानीके साथ जिस समय एक आसनपर बैठा था उसी समय राजा भी कहींसे अकस्मात् आ गया और उसने उसकी वह चेष्टा देख ली ॥१४॥


मायाप्रवीणया तावद्देव्या क्रन्दितमुन्नतम् । वन्दिकोऽयमिति त्रस्तो गृहीतश्च भटैरसौ ॥१५॥

अर्थ: यद्यपि मायाचारमें प्रवीण रानीने जोरसे रोदन करते हुए कहा कि यह वन्दी जन है तथापि राजाने उसका विश्वास नहीं किया और योद्धाओंने उस भयभीत ब्राह्मणको पकड़ लिया ॥१५॥


अष्टाङ्गनिग्रहं कर्तुं नगरीतो बहिः कृतः । सेवितेनासकृद्दृष्टः कल्याणाख्येन साधुना ॥१६॥

यदि प्रव्रजसीत्युक्त्वा तेनासौ प्रतिपन्नवान् । राज्ञः क्रूरमनुष्येभ्यो मोचितः श्रमणोऽभवत् ॥१७॥

अर्थ: तदनन्तर आठों अङ्गोंका निग्रह करनेके लिए वह कुलन्धर विप्र नगरीके बाहर ले जाया गया वहाँ जिसकी इसने कई बार सेवा की थी ऐसे कल्याण नामक साधुने इसे देखा और देखकर कहा कि यदि तू दीक्षा ले ले तो तुझे छुड़ाता हूँ । कुलन्धरने दीक्षा लेना स्वीकृत कर लिया जिससे साधुने राजाके दुष्ट मनुष्योंसे उसे छुड़ाया और छुड़ाते ही वह श्रमण साधु हो गया ॥१६-१७॥


सोऽतिकष्टं तपः कृत्वा महाभावनयान्वितः । अभूदृतुविमानेशः किन्नु धर्मस्य दुष्करम् ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर बहुत बड़ी भावनाके साथ अत्यन्त कष्टदायी तप तपकर वह सौधर्मस्वर्गके ऋतुविमानका स्वामी हुआ सो ठीक ही है क्योंकि धर्मके लिए क्या कठिन है ? ॥१८॥


मथुरायां महाचित्तश्चन्द्रभद्र इति प्रभुः । तस्य भार्या धरा नाम त्रयस्तस्याश्च सोदराः ॥१९॥

सूर्याब्धियमुनाशब्दैर्देवान्तैर्नामभिः स्मृता । श्रीसस्विन्द्रप्रभोग्रार्का मुखान्ताश्चापराः सुताः ॥२०॥

अर्थ: अथानन्तर मथुरामें चन्द्रभद्र नामका उदारचित्त राजा था, उसकी स्त्रीका नाम धरा था और धराके तीन भाई थे - सूर्यदेव, सागरदेव और यमुनादेव । इन भाइयोंके सिवाय उसके श्रीमुख, सन्मुख, सुमुख, इन्द्रमुख, प्रभामुख, उग्रमुख, अर्कमुख और अपरमुख ये आठ पुत्र थे । ॥१९-२०॥


द्वितीया चन्द्रभद्रस्याद्वितीया कनकप्रभा । आगत्यर्तुविमानात् स तस्यां जातोऽचलाभिधः ॥२१॥

अर्थ: उसी चन्द्रभद्र राजाकी द्वितीय होने पर भी जो अद्वितीय - अनुपम थी ऐसी कनकप्रभा नामकी द्वितीय पत्नी थी सो कुलंधर विप्रका जीव ऋतु-विमानसे च्युत हो उसके अचल नामका पुत्र हुआ ॥२१॥


कलागुणसमृद्धोऽसौ सर्वलोकमनोहरः । बभौ देवकुमाराभः सत्क्रीडाकरणोद्यतः ॥२२॥

अर्थ: वह अचल कला और गुणोंसे समृद्ध था, सब लोगोंके मनको हरनेवाला था और समीचीन क्रीड़ा करनेमें उद्यत रहता था इसलिए देव कुमारके समान सुशोभित होता था ॥२२॥


अथान्यः कश्चिदङ्काख्यः कृत्वा धर्मानुमोदनम् । श्रावस्त्यामङ्गिकागर्भे कम्पेनापाभिधोऽभवत् ॥२३॥

अर्थ: अथानन्तर कोई अङ्क नामका मनुष्य धर्मकी अनुमोदना कर श्रावस्ती नामा नगरीमें कम्प नामक पुरुषकी अङ्गिका नामक स्त्रीसे अप नामका पुत्र हुआ ॥२३॥


कवाटजीविना तेन कम्पेनाविनयान्वितः । अपो निर्घाटितो गेहाद् दुद्राव भयदुःखितः ॥२४॥

अर्थ: कम्प कपाट बनानेकी आजीविका करता था अर्थात् जातिका बढ़ई था और उसका पुत्र अत्यन्त अविनयी था इसलिए उसने उसे घरसे निकाल दिया था । फलस्वरूप वह भयसे दुखी होता हुआ इधर-उधर भटकता रहा ॥२४॥


अथाचलकुमारोऽसौ नितान्तं दयितः पितुः । धराया भ्रातृभिस्तैश्च मुखान्तैरष्टभिः सुतैः ॥२५॥

ईर्ष्यमाणो रहो हन्तुं मात्रा ज्ञात्वा पलायितः । महता कण्टकेनाङ्घ्रौ ताडितस्तिलके वने ॥२६॥

गृहीतदारुभारेण तेनापेनाथ वीक्षितम् । अतिकष्टं क्वणन् खेदादचलो निश्चलः स्थितः ॥२७॥

अर्थ: अथानन्तर पूर्वोक्त अचलकुमार पिताका अत्यन्त प्यारा था इसलिए इसकी सौतेली माता धराके तीन भाई तथा मुखान्त नामको धारण करनेवाले आठों पुत्र एकान्तमें मारनेके लिए उसके साथ ईर्ष्या करते रहते थे । अचलकी माता कनकप्रभाको उनकी इस ईर्ष्याका पता चल गया इसलिए उसने उसे कहीं बाहर भगा दिया । एक दिन अचल तिलक नामक वनमें जा रहा था कि उसके पैरमें एक बड़ा भारी काँटा लग गया । काँटा लग जानेके कारण दुःखसे अत्यन्त दुःखदायी शब्द करता हुआ वह उसी तिलक वनमें एक ओर खड़ा हो गया । उसी समय लकड़ियोंका भार लिये हुए अप वहाँसे निकला और उसने अचलको देखा ॥२५-२७॥


दारुभारं परित्यज्य तेन तस्यासिकन्यया । आकृष्टः कण्टको दत्त्वा कटकं चेति भाषितः ॥२८॥

यदि नामाचलं किञ्चिच्छृणुयाल्लोकविश्रुतम् । त्वया तस्य ततोऽभ्याशं गन्तव्यं संशयोज्झितम् ॥२९॥

अर्थ: अपने लकड़ियोंका भार छोड़ छुरीसे उसका काँटा निकाला । इसके बदले अचलने उसे अपने हाथका कड़ा देकर कहा कि यदि तू कभी किसी लोक प्रसिद्ध अचलका नाम सुने तो तुझे संशय छोड़कर उसके पास जाना चाहिए ॥२८-२९॥


अपो यथोचितं यातो राजपुत्रोऽपि दुःखवान् । कौशाम्बीबाह्यमुद्देशं प्राप्तः सत्त्वसमुन्नतः ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर अप यथायोग्य स्थान पर चला गया और राजपुत्र अचल भी दुःखी होता हुआ धैर्यसे युक्त हो कौशाम्बी नगरीके बाह्यप्रदेशमें पहुँचा ॥३०॥


तत्रेन्द्रदत्तनामानं कोशावत्ससमुद्भवम् । ययौ कलकलाशब्दात् सेवमानं खरूलिकाम् ॥३१॥

अर्थ: वहाँ कौशाम्बीके राजा कोशावत्सका पुत्र इन्द्रदत्त, बाण चलानेके स्थानमें बाण विद्याका अभ्यास कर रहा था सो उसका कलकला शब्द सुन अचल उसके पास चला गया ॥३१॥


विजित्य विशिखाचार्यं लब्धपूजोऽथ भूभृता । प्रवेश्य नगरीमिन्द्रदत्ताख्यां लम्भितः सुताम् ॥३२॥

अर्थ: वहाँ इन्द्रदत्तके साथ जो उसका विशिखाचार्य अर्थात् शस्त्र विद्या सिखानेवाला गुरु था उसे अचलने पराजित किया था । तदनन्तर जब राजा कोशावत्सको इसका पता चला तब उसने अचलका बहुत सन्मान किया और सम्मानके साथ नगरीमें प्रवेश कराकर उसे अपनी इन्द्रदत्ता नामकी कन्या विवाह दी ॥३२॥


क्रमेण चानुभावेन चारुणा पूर्वकर्मणा । उपाध्याय इति ख्यातो वीरोऽसौ पार्थिवोऽभवत् ॥३३॥

अर्थ: तदनन्तर वह क्रम-क्रमसे अपने प्रभाव और पूर्वोपार्जित पुण्यकर्मसे पहले तो उपाध्याय इस नामसे प्रसिद्ध था और उसके बाद राजा हो गया ॥३३॥


अङ्गाद्यान् विषयाञ्जित्वा प्रतापी मथुरां श्रितः । बाह्योद्देशे कृतावासः स्थितः कटकसङ्गतः ॥३४॥

अर्थ: तत्पश्चात् वह प्रतापी अङ्ग आदि देशोंको जीत कर मथुरा आया और उसके बाह्य स्थानमें डेरे देकर सेनाके साथ ठहर गया ॥३४॥


चन्द्रभद्रनृपः पुत्रमारोऽयमिति भाषितैः । सामन्ताः सकलास्तस्य भिन्नास्येनार्थसङ्गतैः ॥३५॥

अर्थ: यह चन्द्रभद्र राजा ‘पुत्रको मारनेवाला है’ ऐसे यथार्थ शब्द कहकर उसने उसके समस्त सामन्तोंको अपनी ओर फोड़ लिया ॥३५॥


एकाकी चन्द्रभद्रश्च विषादं परमं भजन् । श्यालान् सम्प्रेषयद्देवशब्दान्तान् सन्धिवाञ्छया ॥३६॥

अर्थ: जिससे चन्द्रभद्र अकेला रह गया । अन्तमें परम विषादको प्राप्त होते हुए उसने सन्धिकी इच्छासे अपने सूर्यदेव, अब्धिदेव और यमुनादेव नामक तीन साले भेजे ॥३६॥


दृष्ट्वा ते तं परिज्ञाय विलक्षास्त्राससमागताः । अदृष्टसेवकाः साकं धरायास्तनयैः कृताः ॥३७॥

अर्थ: सो वे उसे देख तथा पहिचान कर लज्जित हो भयको प्राप्त हुए और धरा रानीके आठों पुत्रोंके साथ-साथ सेवकोंसे रहित हो गये अर्थात् भयसे भाग गये ॥३७॥


अचलस्य समं मात्रा सञ्जातः परमोत्सवः । राज्यं च प्रणताशेषराजकं गुणपूजितम् ॥३८॥

अर्थ: अचलको माताके साथ मिलकर बड़ा उल्लास हुआ और जिसमें समस्त राजा नम्रीभूत थे तथा जो गुणोंसे पूजित था ऐसा राज्य उसे प्राप्त हुआ ॥३८॥


अन्यदा नटरङ्गस्य मध्ये तमपमागतम् । हन्यमानं प्रतीहारैर्दृष्ट्वाऽभिज्ञातवान् नृपः ॥३९॥

अर्थ: अथानन्तर किसी एक समय पैरका काँटा निकालनेवाला अप नटोंकी रङ्गभूमिमें आया सो प्रतीहारी लोग उसे मार रहे थे । राजा अचलने उसे देखते ही पहिचान लिया ॥३९॥


तस्मै संयुक्तमापाद्य श्रावस्तीं जन्मभूमिकाम् । कृतापरङ्गसंज्ञाय ददावचलभूपतिः ॥४०॥

अर्थ: और अपने पास बुलाकर उसका अपरंग नाम रक्खा तथा उसकी जन्मभूमि स्वरूप श्रावस्ती नगरी उसके लिए दे दी ॥४०॥


तावुद्यानं गतौ क्रीडां विधातुं पुरुसम्पदौ । यशःसमुद्रमाचार्यं दृष्ट्वा नैर्ग्रन्थ्यमाश्रितौ ॥४१॥

अर्थ: ये दोनों ही मित्र साथ-साथ ही रहते थे । परम सम्पदाको धारण करनेवाले दोनों मित्र एक दिन क्रीड़ा करनेके लिए उद्यान गये थे सो वहाँ यशःसमुद्र नामक आचार्यके दर्शन कर उनके समीप दोनों ही निर्ग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हो गये ॥४१॥


संयमं परमं कृत्वा सम्यग्दर्शनभावितौ । मृतौ समाधिना जातौ देवेशौ कमलोत्तरे ॥४२॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनकी भावनासे युक्त दोनों मुनियोंने परम संयम धारण किया और दोनों ही आयुके अन्तमें समाधिमरण कर स्वर्गमें देवेन्द्र हुए ॥४२॥


ततश्च्युतः समानोऽसावचलः पुण्यशेषतः । सुप्रजोलोचनानन्दः शत्रुघ्नोऽयमभून्नृपः ॥४३॥

अर्थ: सन्मानसे सुशोभित वह अचलका जीव, स्वर्गसे च्युत हो अवशिष्ट पुण्यके प्रभावसे माता सुप्रजाके नेत्रोंको आनन्दित करनेवाला यह राजा शत्रुघ्न हुआ है ॥४३॥


तेनानेकभवप्राप्तिसम्बन्धेनास्य भूपतेः । बभूव परमप्रीतिर्मथुरां प्रति पार्थिव ॥४४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! अनेक भवोंमें प्राप्तिका सम्बन्ध होनेसे इसकी मथुराके प्रति परम प्रीति है ॥४४॥


गृहस्य शाखिनो वाऽपि यस्यच्छायां समाश्रयेत् । स्थीयते दिनमप्येकं प्रीतिस्तत्रापि जायते ॥४५॥

अर्थ: जिस घर अथवा वृक्षकी छायाका आश्रय लिया जाता है अथवा वहाँ एक दिन भी ठहरा जाता है उसकी उसमें प्रीति हो जाती है ॥४५॥


किं पुनर्यत्र भूयोऽपि जन्मभिः संगतिः कृता । संसारभावयुक्तानां जीवानामीदृशी गतिः ॥४६॥

अर्थ: फिर जहाँ अनेक जन्मोंमें बार-बार रहना पड़ता है उसका क्या कहना है ? यथार्थमें संसारमें परिभ्रमण करनेवाले जीवोंकी ऐसी ही गति होती है ॥४६॥


परिच्युत्यापरङ्गोऽपि पुण्यशेषादभूदसौ । कृतान्तवक्त्रविख्यातः सेनायाः पतिरूर्जितः ॥४७॥

अर्थ: अपरंगका जीव भी स्वर्गसे च्युत हो पुण्य शेष रहनेसे कृतान्तवक्त्र नामका प्रसिद्ध एवं बलवान् सेनापति हुआ है ॥४७॥


इति धर्मार्जनादेतौ प्राप्तौ परमसम्पदः । धर्मेण रहितैर्लभ्यं न हि किञ्चित्सुखावहम् ॥४८॥

अर्थ: इस प्रकार धर्मार्जनके प्रभावसे ये दोनों परम सम्पदाको प्राप्त हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि धर्मसे रहित प्राणी किसी सुखदायक वस्तुको नहीं प्राप्त कर पाते हैं ॥४८॥


अनेकमपि सञ्चित्य जन्तुर्दुःखमलक्षये । धर्मतीर्थे श्रुते(श्रयेत्) शुद्धिं जलतीर्थमनर्थकम् ॥४९॥

अर्थ: इस प्राणीने अनेक भवोंमें पापका संचय किया है सो दुःख रूपी मलका क्षय करनेवाले धर्मरूपी तीर्थमें शुद्धिको प्राप्त करना चाहिए इसके लिए जलरूपी तीर्थका आश्रय लेना निरर्थक है ॥४९॥


एवं पारम्पर्यादागतमिदमद्भुतं नितान्तमुदारम् । कथितं शत्रुघ्नायनमवबुध्य बुधा भवन्तु धर्मसुरक्ताः ॥५०॥

अर्थ: इस प्रकार आचार्य परम्परासे आगत, अत्यन्त आश्चर्यकारी एवं उत्कृष्ट शत्रुघ्नके इस चरितको जानकर हे विद्वज्जनो ! सदा धर्ममें अनुरक्त होओ ॥५०॥


श्रुत्वा परमं धर्मं न भवति येषां सदीहिते प्रीतिः ।
शुभनेत्राणां तेषां रविरुदितोऽनर्थकीभवति ॥५१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस परमधर्मको सुनकर जिनको उत्तम चेष्टामें प्रवृत्ति नहीं होती शुभ नेत्रोंको धारण करनेवाले उन लोगोंके लिए उदित हुआ सूर्य भी निरर्थक हो जाता है ॥५१॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे शत्रुघ्नभवानुकीर्तनं नामैकनवतितमं पर्व ॥९१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें शत्रुघ्नके भवोंका वर्णन करनेवाला एकानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९१॥


९२. द्विनवतितमं पर्व (मथुरापुरीनिवेशऋषिदानगुणोपसर्गहनननाभिधानं)

विहरन्तोऽन्यदा प्राप्ता निर्ग्रन्था मथुरां पुरीम् । गगनायनिनः सप्त सप्तसप्तिसमत्विषः ॥१॥

सुरमन्युर्द्वितीयश्च श्रीमन्युरिति कीर्तितः । अन्यः श्रीनिचयो नाम तुरीयः सर्वसुन्दरः ॥२॥

पञ्चमो जयवान् ज्ञेयः षष्ठो विनयलालसः । चरमो जयमित्राख्यः सर्वे चारित्रसुन्दराः ॥३॥

राज्ञः श्रीनन्दनस्यैते धरणीसुन्दरीभवाः । तनया जगति ख्याता गुणैः शुद्धैः प्रभापुरे ॥४॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय गगनगामी एवं सूर्यके समान कान्तिके धारक सात निर्ग्रन्थ मुनि विहार करते हुए मथुरापुरी आये । उनमेंसे प्रथम सुरमन्यु, द्वितीय श्रीमन्यु, तृतीय श्रीनिचय, चतुर्थ सर्वसुन्दर, पञ्चम जयवान्, षष्ठ विनयलालस और सप्तम जयमित्र नामके धारक थे । ये सभी चारित्रसे सुन्दर थे अर्थात् निर्दोष चारित्रके पालक थे । राजा श्रीनन्दनकी धरणी नामक रानीसे उत्पन्न हुए पुत्र थे, निर्दोष गुणोंसे जगत्में प्रसिद्ध थे तथा प्रभापुर नगरके रहने वाले थे ॥१-४॥


प्रीतिङ्करमुनीन्द्रस्य देवागममुदीक्ष्य ते । प्रतिबुद्धाः समं पित्रा धर्मं कर्तुं समुद्यताः ॥५॥

अर्थ: ये सभी, प्रीतिङ्कर मुनिराजके केवलज्ञानके समय देवोंका आगमन देख प्रतिबोधको प्राप्त हो पिताके साथ धर्म करनेके लिए उद्यत हुए थे ॥५॥


मासजातं नृपो न्यस्य राज्ये डमरमङ्गलम् । प्रवव्राज समं पुत्रैर्वीरः प्रीतिङ्करान्तिके ॥६॥

अर्थ: वीरशिरोमणि राजा श्रीनन्दन, डमर-मङ्गल नामक एक माहके बालकको राज्य देकर अपने पुत्रोंके साथ प्रीतिङ्कर मुनिराजके समीप दीक्षित हुए थे ॥६॥


केवलज्ञानमुत्पाद्य काले श्रीनन्दनोऽविशत् । सप्तर्षयस्त्वमी तस्य तनया मुनिसत्तमाः ॥७॥

अर्थ: समय पाकर श्रीनन्दन राजा तो केवलज्ञान उत्पन्न कर सिद्धालयमें प्रविष्ट हुए और उनके उक्त पुत्र उत्तम मुनि हो सप्तर्षि हुए ॥७॥


काले विकालवत्काले कन्दवृन्दावृतान्तरे । न्यग्रोधतरुमूले ते योगं सन्मुनयः श्रिताः ॥८॥

अर्थ: जहाँ परस्परका अन्तर कन्दोंके समूहसे आवृत्त था ऐसे वर्षाकालके समय वे सब मुनि मथुरा नगरीके समीप वटवृक्षके नीचे वर्षा योग लेकर विराजमान हुए ॥८॥


तेषां तपःप्रभावेन चमरासुरनिर्मिता । मारी श्वशुरदृष्टेव नारी विटगताऽनशत् ॥९॥

अर्थ: उन मुनियोंके तपके प्रभावसे चमरेन्द्रके द्वारा निर्मित महामारी उस प्रकार नष्ट हो गई जिस प्रकार कि श्वसुरके द्वारा देखी हुई विट मनुष्यके पास गई नारी नष्ट हो जाती है ॥९॥


घनजीमूतसंसिक्ता मथुराविषयोर्वरा । अकृष्टपच्यसस्यौघैः सञ्छन्ना सुमहाशयैः ॥१०॥

अर्थ: अत्यधिक मेघोंसे सींची गई मथुराके देशोंकी उपजाऊ भूमि बिना जोते बखरे अर्थात् अनायास ही उत्पन्न होने वाले बहुत भारी धान्यके समूहसे व्याप्त हो गई ॥१०॥


रोगेति परिनिर्मुक्ता मथुरानगरी शुभा । पितृदर्शनतुष्टेव रराज नविका वधूः ॥११॥

अर्थ: उस समय रोग और ईतियोंसे छूटी शुभ मथुरा नगरी उस प्रकार सुशोभित हो रही थी, जिस प्रकार कि पिताके देखनेसे सन्तुष्ट हुई नई बहू सुशोभित होती है ॥११॥


युक्तं बहुप्रकारेण रसत्यागादिकेन ते । षष्ठादिनोपवासेन चक्रुरत्युत्कटं तपः ॥१२॥

अर्थ: वे सप्तर्षि नाना प्रकारके रस परित्याग आदि तथा वेला तेला आदि उपवासोंके साथ अत्यन्त उत्कट तप करते थे ॥१२॥


नभो निमेषमात्रेण विप्रकृष्टं विलङ्घ्य ते । चक्रुः पुरेषु विजयपोदनादिषु पारणाम् ॥१३॥

अर्थ: वे अत्यन्त दूरवर्ती आकाशको निमेष मात्रमें लाँघकर विजयपुर, पोदनपुर आदि दूर-दूरवर्ती नगरोंमें पारणा करते थे ॥१३॥


लब्धां परगृहे भिक्षां पाणिपात्रतलस्थिताम् । शरीरस्थितिमात्राय जक्षुस्ते क्षपणोत्तमाः ॥१४॥

अर्थ: वे उत्तम मुनिराज परगृहमें प्राप्त एवं हस्तरूपी पात्रमें स्थित भिक्षाको केवल शरीरकी स्थिरताके लिए ही भक्षण करते थे ॥१४॥


नभोमध्यगते भानावन्यदा ते महाशमाः । साकेतामविशन् वीरा युगमात्रावलोकिनः ॥१५॥

अर्थ: अथानन्तर किसी एक दिन जब कि सूर्य आकाशके मध्यमें स्थित था तब महा शान्तिको धारण करने वाले वे धोर-वीर मुनिराज जूड़ा प्रमाण भूमिको देखते हुए अयोध्या नगरीमें प्रविष्ट हुए ॥१५॥


शुद्धभिक्षैषणाकूताः प्रलम्बितमहाभुजाः । अर्हद्दत्तगृहं प्राप्ता भ्राम्यन्तस्ते यथाविधि ॥१६॥

अर्थ: जो शुद्ध भिक्षा ग्रहण करनेके अभिप्रायसे युक्त थे और जिनकी लम्बी-लम्बी भुजाएँ नीचे की ओर लटक रही थीं ऐसे वे मुनि विधि पूर्वक भ्रमण करते हुए अर्हद्दत्त सेठके घर पहुँचे ॥१६॥


अर्हद्दत्तश्च सम्प्राप्तश्चिन्तामेतामसम्भ्रमः । वर्षाकालः क्व चेदृक्षः क्व चेदं मुनिचेष्टितम् ॥१७॥

अर्थ: उन मुनियोंको देखकर संभ्रमसे रहित अर्हद्दत्त सेठ इस प्रकार विचार करने लगा कि यह ऐसा वर्षा काल कहाँ और यह मुनियोंकी चेष्टा कहाँ ? ॥१७॥


प्राग्भारकन्दरासिन्धुतटे मूले च शाखिनः । शून्यालये जिनागारे ये चान्यत्र क्वचित्स्थिताः ॥१८॥

नगर्यां श्रमणा अस्यां नेमे समयखण्डनम् । कृत्वा हिण्डनशीलत्वं प्रपद्यन्ते सुचेष्टिताः ॥१९॥

अर्थ: इस नगरीके आस-पास प्राग्भार पर्वतकी कन्दराओंमें, नदीके तटपर, वृक्षके मूलमें, शून्य घरमें, जिनालयमें तथा अन्य स्थानोंमें जहाँ कहीं जो मुनिराज स्थित हैं उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाले वे मुनिराज समयका खण्डन कर अर्थात् वर्षा योग पूरा किये बिना इधर-उधर परिभ्रमण नहीं करते ॥१८-१९॥


प्रतिकूलितसूत्रार्था एते तु ज्ञानवर्जिताः । निराचार्या निराचाराः कथं कालेऽत्र हिण्डकाः ॥२०॥

अर्थ: परन्तु ये मुनि आगमके अर्थको विपरीत करनेवाले हैं, ज्ञानसे रहित हैं, आचार्योंसे रहित हैं और आचारसे भ्रष्ट हैं इसीलिए इस समय यहाँ घूम रहे हैं ॥२०॥


अकालेऽपि किल प्राप्ताः स्नुषयाऽस्य सुभक्तया । तर्पिताः प्रासुकान्नेन ते गृहीतार्थया तया ॥२१॥

अर्थ: यद्यपि वे मुनि असमयमें आये थे तो भी अर्हद्दत्त सेठकी भक्त एवं अभिप्रायको ग्रहण करनेवाली वधूने उन्हें आहार देकर सन्तुष्ट किया था ॥२१॥


आर्हतं भवनं जग्मुः शुद्धसंयतसङ्कुलम् । यत्र त्रिभुवनानन्दः स्थापितो मुनिसुव्रतः ॥२२॥

अर्थ: आहारके बाद वे शुद्ध-निर्दोष प्रवृत्ति करनेवाले मुनियोंसे व्याप्त अर्हन्त भगवान् के उस मन्दिरमें गये जहाँ कि तीन लोकको आनन्दित करनेवाले श्री मुनिसुव्रत भगवान्की प्रतिमा विराजमान थी ॥२२॥


चतुरङ्गुलमानेन ते त्यक्तधरणीतलाः । आयान्तो द्युतिना दृष्टा लब्धिप्राप्ताः प्रसाधवः ॥२३॥

अर्थ: अथानन्तर जो पृथिवीसे चार अंगुल ऊपर चल रहे थे ऐसे उन ऋद्धिधारी उत्तम मुनियोंको मन्दिरमें विद्यमान श्री द्युतिभट्टारकने देखा ॥२३॥


पद्भ्यामेव जिनागारं प्रविष्टाः श्रद्धयोद्धया । अभ्युत्थाननमस्यादिविधिना द्युतिनार्चिताः ॥२४॥

अर्थ: उन मुनियोंने उत्तम श्रद्धाके साथ पैदल चल कर ही जिन मन्दिरमें प्रवेश किया तथा द्युतिभट्टारकने खड़े होकर नमस्कार करना आदि विधिसे उनकी पूजा की ॥२४॥


अस्मदीयोऽयमाचार्यो यत्किञ्चिद्वन्दनोद्यतः । इति ज्ञात्वा द्युतेः शिष्या दध्युः सप्तर्षिनिन्दनम् ॥२५॥

अर्थ: ‘यह हमारे आचार्य चाहे जिसकी वन्दना करनेके लिए उद्यत हो जाते हैं ।’ यह जानकर द्युतिभट्टारकके शिष्योंने उन सप्तर्षियोंकी निन्दा का विचार किया ॥२५॥


जिनेन्द्रवन्दनां कृत्वा सम्यक् स्तुतिपरायणाः । यातास्ते वियदुत्पत्य स्वमाश्रमपदं पुनः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर सम्यक् प्रकारसे स्तुति करनेमें तत्पर वे सप्तर्षि, जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना कर आकाशमार्गसे पुनः अपने स्थानको चले गये ॥२६॥


चारणश्रमणान् ज्ञात्वा मुनींस्ते मुनयः पुनः । स्वनिंदनादिना युक्ताः साधुचित्तमुपागताः ॥२७॥

अर्थ: जब वे आकाशमें उड़े तब उन्हें चारण ऋद्धिके धारक जान कर द्युतिभट्टारकके शिष्य जो अन्य मुनि थे वे अपनी निन्दा गर्हा आदि करते हुए निर्मल हृदयको प्राप्त हुए अर्थात् जो मुनि पहले उन्हें उन्मार्गगामी समझकर उनकी निन्दाका विचार कर रहे थे वे ही मुनि अब उन्हें चारण ऋद्धिके धारक जान कर अपने अज्ञानकी निन्दा करने लगे तथा अपने चित्तकी कलुषताको उन्होंने दूर कर दिया ॥२७॥


अर्हद्दत्ताय याताय जिनालयमिहान्तरे । द्युतिना गदितं दृष्टाः साधवः स्युस्त्वयोत्तमाः ॥२८॥

अर्थ: इसी बीचमें अर्हद्दत्त सेठ जिन-मन्दिरमें आया सो द्युतिभट्टारकने उससे कहा कि आज तुमने उत्तम मुनि देखे होंगे ? ॥२८॥


वन्दिताः पूजिता वा स्युर्महासत्त्वा महोजसः । मथुराकृतसंवासा मयाऽमी कृतसंकथाः ॥२९॥

अर्थ: वे मुनि सबके द्वारा वन्दित हैं, पूजित हैं, महाधैर्यशाली हैं, एवं महाप्रतापी हैं । वे मथुराके निवासी हैं और उन्होंने मेरे साथ वार्तालाप किया है ॥२९॥


महातपोधना दृष्टास्तेऽस्माभिः शुभचेष्टिताः । मुनयः परमोदारा वन्द्या गगनगामिनः ॥३०॥

अर्थ: महातपश्चरण ही जिनका धन है, जो शुभ चेष्टाओंके धारक हैं, अत्यन्त उदार हैं, वन्दनीय हैं और आकाशमें गमन करनेवाले हैं ऐसे उन मुनियोंके आज हमने दर्शन किये हैं ॥३०॥


ततः प्रभावमाकर्ण्य साधूनां श्रावकाधिपः । तदा विषण्णहृदयः पश्चात्तापेन तप्यते ॥३१॥

अर्थ: तदनन्तर द्युतिभट्टारकसे साधुओंका प्रभाव सुनकर अर्हद्दत्त सेठ बहुत ही खिन्न चित्त हो पश्चात्तापसे संतप्त हो गया ॥३१॥


धिक् सोऽहमगृहीतार्थः सम्यग्दर्शनवर्जितः । अयुक्तोऽसदाचारो न तुल्यो मेऽस्त्यधार्मिकः ॥३२॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि यथार्थ अर्थको नहीं समझने वाले मुझ मिथ्यादृष्टिको धिक्कार हो । मेरा अनिष्ट आचरण अयुक्त था, अनुचित था, मेरे समान दूसरा अधार्मिक नहीं है ॥३२॥


मिथ्यादृष्टिः कुतोऽस्त्यन्यो मत्तः प्रत्यपरोऽधुना । अभ्युत्थायार्चिता नत्वा साधवो यन्न तर्पिताः ॥३३॥

अर्थ: इस समय मुझसे बढ़कर दूसरा मिथ्यादृष्टि कौन होगा जिसने उठ कर मुनियोंकी पूजा नहीं की तथा नमस्कार कर उन्हें आहारसे सन्तुष्ट नहीं किया ॥३३॥


साधुरूपं समालोक्य न मुञ्चत्यासनं तु यः । दृष्ट्वाऽपमन्यते यश्च स मिथ्यादृष्टिरुच्यते ॥३४॥

अर्थ: जो मुनिको देखकर आसन नहीं छोड़ता है तथा देख कर उनका अपमान करता है वह मिथ्यादृष्टि कहलाता है ॥३४॥


पापोऽहं पापकर्मा च पापात्मा पापभाजनम् । यो वा निन्द्यतमः कश्चिज्जिनवाक्यबहिःकृतः ॥३५॥

अर्थ: मैं पापी हूँ, पापकर्मा हूँ, पापात्मा हूँ, पापका पात्र हूँ अथवा जिनागमकी श्रद्धासे दूर रहनेवाला जो कोई निन्द्यतम है वह मैं हूँ ॥३५॥


शरीरे मर्मसंघाते तावन्मे दह्यते मनः । यावदञ्जलिमुद्धृत्य साधवस्ते न वन्दिताः ॥३६॥

अर्थ: जब तक मैं हाथ जोड़कर उन मुनियोंकी वन्दना नहीं कर लेता तब तक शरीर एवं मर्मस्थलमें मेरा मन दाहको प्राप्त होता रहेगा ॥३६॥


अहंकारसमुत्थस्य पापस्यास्य न विद्यते । प्रायश्चित्तं परं तेषां मुनीनां वन्दनादृते ॥३७॥

अर्थ: अहंकारसे उत्पन्न हुए इस पापका प्रायश्चित्त उन मुनियोंकी वन्दनाके सिवाय और कुछ नहीं हो सकता ॥३७॥


अथ ज्ञात्वा समासन्नां कार्तिकीं परमोत्सुकः । अर्हच्छ्रेष्ठी महादृष्टिर्नृपतुल्यपरिच्छदः ॥३८॥

निर्ज्ञातमुनिमाहात्म्यः स्वनिन्दाकरणोद्यतः । सप्तर्षिपूजनं कर्तुं प्रस्थितो बन्धुभिः समम् ॥३९॥

अर्थ: अथानन्तर कार्तिकी पूर्णिमाको निकटवर्ती जानकर जिसकी उत्सुकता बढ़ रही थी, जो महासम्यग्दृष्टि था, राजाके समान वैभवका धारक था, मुनियोंके माहात्म्यको अच्छी तरह जानता था, तथा अपनी निन्दा करनेमें तत्पर था ऐसा अर्हद्दत्त सेठ सप्तर्षियोंकी पूजा करनेके लिए अपने बन्धुजनोंके साथ मथुराकी ओर चला ॥३८-३९॥


रथकुञ्जरपादाततुरङ्गौघसमन्वितः । पूजां यौगेश्वरीं कर्तुमसौ याति स्म सत्वरम् ॥४०॥

अर्थ: रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंके समूहके साथ वह सप्तर्षियोंकी पूजा करनेके लिए बड़ी शीघ्रतासे जा रहा था ॥४०॥


समृद्ध्या परया युक्तः शुभध्यानपरायणः । कार्त्तिकामलसप्तम्यां प्राप्तः सप्तमुनेः पदम् ॥४१॥

अर्थ: परम समृद्धिसे युक्त एवं शुभध्यान करनेमें तत्पर रहनेवाला वह सेठ कार्तिक शुक्ला सप्तमीके दिन सप्तर्षियोंके स्थान पर पहुँच गया ॥४१॥


तत्राप्युत्तमसम्यक्त्वो विधाय मुनिवन्दनाम् । पूजोपकरणं कर्तुमुद्यतः सर्वयत्नतः ॥४२॥

अर्थ: वहाँ उत्तम सम्यक्त्वको धारण करनेवाला वह श्रेष्ठ मुनियोंकी वन्दना कर पूर्ण प्रयत्नसे पूजाकी तैयारी करनेके लिए उद्यत हुआ ॥४२॥


प्रपानाटकसङ्गीतशालादिपरिराजितम् । जातं तदाश्रमस्थानं स्वर्गदेशमनोहरम् ॥४३॥

अर्थ: प्याऊ, नाटक-गृह तथा संगीत-शाला आदिसे सुशोभित वह आश्रमका स्थान स्वर्गप्रदेशके समान मनोहर हो गया ॥४३॥


तं वृत्तान्तं समाकर्ण्य शत्रुघ्नः स्वतुरीयकः । महातुरङ्गमारूढः सप्तमुन्यन्तिकं ययौ ॥४४॥

अर्थ: यह वृत्तान्त सुन राजा दशरथका चतुर्थ पुत्र शत्रुघ्न महातुरङ्ग पर सवार हो सप्तर्षियोंके समीप गया ॥४४॥


मुनीनां परया भक्त्या पुत्रस्नेहाच्च पुष्कलात् । माताऽप्यस्य गता पश्चात् समुद्ग्राहितकोष्ठिका ॥४५॥

अर्थ: मुनियोंकी परम भक्ति और पुत्रके अत्यधिक स्नेहसे उसकी माता सुप्रजा भी खजाना लेकर उसके पीछे आ पहुँची ॥४५॥


ततः प्रणम्य भक्तात्मा सम्मदी रिपुमर्दनः । मुनीन् समाप्तनियमान् पारणार्थमयाचत ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर भक्त हृदय एवं हर्षसे भरे शत्रुघ्नने नियमको पूर्ण करनेवाले मुनियोंको नमस्कार कर उनसे पारणा करनेकी प्रार्थना की ॥४६॥


तत्रोक्तं मुनिमुख्येन नरपुङ्गव कल्पितम् । उपेत्य भोक्तुमाहारं संयतानां न वर्त्तते ॥४७॥

अर्थ: तब उन मुनियोंमें जो मुख्य मुनि थे उन्होंने कहा कि हे नरश्रेष्ठ ! जो आहार मुनियोंके लिए संकल्प कर बनाया जाता है उसे ग्रहण करनेके लिए मुनि प्रवृत्ति नहीं करते ॥४७॥


अकृताकारितां भिक्षां मनसा नानुमोदिताम् । गृह्णतां विधिना युक्तां तपः पुष्यति योगिनाम् ॥४८॥

अर्थ: जो न स्वयं की गई है, न दूसरेसे कराई गई और न मनसे जिसकी अनुमोदना की गई है ऐसी भिक्षाको विधि पूर्वक ग्रहण करनेवाले योगियोंका तप पुष्ट होता है ॥४८॥


ततो जगाद शत्रुघ्नः प्रसादं मुनिपुङ्गवाः । ममेदं कर्तुमर्हन्ति विज्ञापकसुवत्सलाः ॥४९॥

कियन्तमपि कालं मे नगर्यामिह तिष्ठत । शिवं सुभिक्षमेतस्यां प्रजानां येन जायते ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुघ्नने कहा कि हे मुनिश्रेष्ठो ! आप प्रार्थना करनेवालों पर अत्यधिक स्नेह रखते हैं अतः हमारे ऊपर यह प्रसन्नता करनेके योग्य हैं कि आप कुछ काल तक मेरी इस नगरीमें और ठहरिये जिससे कि इसमें रहनेवाली प्रजाको आनन्ददायी सुभिक्षकी प्राप्ति हो सके ॥४९-५०॥


आगतेषु भवत्स्वेषा समृद्धा सर्वतोऽभवत् । नष्टापातेषु नलिनी यथा विसरदुत्सवा ॥५१॥

अर्थ: आप लोगोंके आने पर यह नगरी उस तरह सब ओरसे समृद्ध हो गई है जिस तरह कि वर्षाके नष्ट हो जाने पर कमलिनी सब ओरसे समृद्ध हो जाती है - खिल उठती है ॥५१॥


इत्युक्त्वाऽचिन्तयच्छ्राद्धः कदा नु खलु वाञ्छितम् । अन्नं दास्यामि साधुभ्यो विधिना सुसमाहितः ॥५२॥

अर्थ: इतना कहकर श्रद्धासे भरा शत्रुघ्न चिन्ता करने लगा कि मैं प्रमाद रहित हो विधि पूर्वक मुनियोंके लिए मन वाञ्छित आहार कब दूंगा ॥५२॥


अथ श्रेणिक शत्रुघ्नं निरीक्ष्याऽऽनतमस्तकम् । कालानुभावमाचख्यौ यथावन्मुनिसत्तमः ॥५३॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! शत्रुघ्नको नतमस्तक देखकर उन उत्तम मुनिराजने उसके लिए यथायोग्य कालके प्रभावका निरूपण किया ॥५३॥


धर्मनन्दनकालेषु व्ययं यातेष्वनुक्रमात् । भविष्यति प्रचण्डोऽत्र निर्धर्मसमयो महान् ॥५४॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि जब अनुक्रमसे तीर्थंकरोंका काल व्यतीत हो जायगा तब यहाँ धर्मकर्मसे रहित अत्यन्त भयंकर समय होगा ॥५४॥


दुःपाषण्डैरिदं जैनं शासनं परमोन्नतम् । तिरोधायिष्यते क्षुद्रैरजोभिर्भानुबिम्बवत् ॥५५॥

अर्थ: दुष्ट पाखण्डी लोगोंके द्वारा यह परमोन्नत जैन शासन उस तरह तिरोहित हो जायगा जिस तरह कि धूलिके छोटे-छोटे कणोंके द्वारा सूर्यका बिम्ब तिरोहित हो जाता है ॥५५॥ उस


श्मशानसदृशा ग्रामाः प्रेतलोकोपमाः पुरः । क्लिष्टा जनपदाः कुत्स्या भविष्यन्ति दुरीहिताः ॥५६॥

अर्थ: उस समय ग्राम श्मशानके समान, नगर यमलोकके समान और देश क्लेशसे युक्त निन्दित तथा दुष्ट चेष्टाओंके करनेवाले होंगे ॥५६॥


कुकर्मनिरतैः क्रूरैश्चोरैरिव निरन्तरम् । दुःपाषण्डैरयं लोको भविष्यति समाकुलः ॥५७॥

अर्थ: यह संसार चोरोंके समान कुकर्ममें निरत तथा क्रूर दुष्ट पाषण्डी लोगोंसे निरन्तर व्याप्त होगा ॥५७॥


महीतलं खलं द्रव्यपरिमुक्ताः कुटुम्बिनः । हिंसाक्लेशसहस्राणि भविष्यन्तीह सन्ततम् ॥५८॥

अर्थ: यह पृथिवीतल दुष्ट तथा गृहस्थ निर्धन होंगे साथ ही यहाँ हिंसा सम्बन्धी हजारों दुःख निरन्तर प्राप्त होते रहेंगे ॥५८॥


पितरौ प्रति निःस्नेहाः पुत्रास्तौ च सुतान् प्रति । चौरा इव च राजानो भविष्यन्ति कलौ सति ॥५९॥

अर्थ: पुत्र, माता-पिताके प्रति और माता-पिता पुत्रोंके प्रति स्नेह रहित होंगे तथा कलिकालके प्रकट होने पर राजा लोग चोरोंके समान धनके अपहर्ता होंगे ॥५९॥


सुखिनोऽपि नराः केचिन् मोहयन्तः परस्परम् । कथाभिर्दुर्गतीशाभी रंस्यन्ते पापमानसाः ॥६०॥

अर्थ: कितने ही मनुष्य यद्यपि सुखी होंगे तथापि उनके मनमें पाप होगा और वे दुर्गतिको प्राप्त करानेमें समर्थ कथाओंसे परस्पर एक दूसरेको मोहित करते हुए क्रीड़ा करेंगे ॥६०॥


नंक्ष्यन्त्यतिशयाः सर्वे त्रिदशागमनादयः । कषायबहुले काले शत्रुघ्न ! समुपागते ॥६१॥

अर्थ: हे शत्रुघ्न ! कषाय बहुल समयके आने पर देवागमन आदि समस्त अतिशय नष्ट हो जावेंगे ॥६१॥


जातरूपधरान् दृष्ट्वा साधून् व्रतगुणान्वितान् । सञ्जुगुप्सां करिष्यन्ति महामोहान्विता जनाः ॥६२॥

अर्थ: तीव्र मिथ्यात्वसे युक्त मनुष्य व्रत रूप गुणोंसे सहित एवं दिगम्बर मुद्राके धारक मुनियोंको देखकर ग्लानि करेंगे ॥६२॥


अप्रशस्ते प्रशस्तत्वं मन्यमानाः कुचेतसः । भयपक्षे पतिष्यन्ति पतङ्गा इन मानवाः ॥६३॥

अर्थ: अप्रशस्तको प्रशस्त मानते हुए कितने ही दुर्हृदय लोग भयके पक्षमें उस तरह जा पड़ेंगे जिस तरह कि पतङ्गे अग्निमें जा पड़ते हैं ॥६३॥


प्रशान्तहृदयान् साधून् निर्भर्त्स्य विहसोद्यताः । मूढा मूढेषु दास्यन्ति केचिदन्नं प्रयत्नतः ॥६४॥

अर्थ: हँसी करनेमें उद्यत कितने ही मूढ मनुष्य शान्त चित्त मुनियोंको तिरस्कृत कर मूढ मनुष्योंके लिए आहार देवेंगे ॥६४॥


इत्थमेतं निराकृत्य प्राहूयान्यं समागतम् । यतिनो मोहिनो देयं दास्यन्त्यहितभावनाः ॥६५॥

अर्थ: इस प्रकार अनिष्ट भावनाको धारण करनेवाले गृहस्थ उत्तम मुनिका तिरस्कार कर तथा मोही मुनिको बुलाकर उसके लिए योग्य आहार आदि देंगे ॥६५॥


बीजं शिलातले न्यस्तं सिच्यमानं सदापि हि । अनर्थकं यथा दानं तथाशीलेषु गेहिनाम् ॥६६॥

अर्थ: जिस प्रकार शिलातल पर रखा हुआ बीज यद्यपि सदा सींचा जाय तथापि निरर्थक होता है - उसमें फल नहीं लगता है उसी प्रकार शील रहित मनुष्योंके लिए दिया हुआ गृहस्थोंका दान भी निरर्थक होता है ॥६६॥


अवज्ञाय मुनीन् गेही गेहिने यः प्रयच्छति । त्यक्त्वा स चन्दनं मूढो गृह्णात्येव विभीतकम् ॥६७॥

अर्थ: जो गृहस्थ मुनियोंकी अवज्ञाकर गृहस्थके लिए आहार आदि देता है वह मूर्ख चन्दनको छोड़कर बहेड़ा ग्रहण करता है ॥६७॥


इति ज्ञात्वा समायातं कालं दुःषमताधमम् । विधत्स्वात्महितं किञ्चित्स्थिरैकार्यं शुभोदयम् ॥६८॥

अर्थ: इस प्रकार दुःषमताके कारण अधम कालको आया जान आत्माका हित करनेवाला कुछ शुभ तथा स्थायी कार्य कर ॥६८॥


नामग्रहणकोऽस्माकं भिक्षावृत्तिमवाससाम् । परिकल्पय तत्सारं तव द्रविणसम्पदः ॥६९॥

अर्थ: तू नामी पुरुष है अतः निर्ग्रन्थ मुनियोंको भिक्षावृत्ति देनेका निश्चय कर। यही तेरी धन-सम्पदाका सार है ॥६९॥


आगमिष्यति काले सा श्रान्तानां त्यक्तवेश्मनाम् । भविष्यत्याश्रयो राजन् स्वगृहाशयसम्मिता ॥७०॥

तस्माद्दानमिदं दत्त्वा वत्स स्वमधुना भज । सागारशीलनियमं कुरुजन्मार्थसङ्गतम् ॥७१॥

अर्थ: हे राजन् ! आगे आनेवाले कालमें थके हुए मुनियोंके लिए भिक्षा देना अपने गृहदानके समान एक बड़ा भारी आश्रय होगा इसलिए हे वत्स ! तू यह दान देकर इस समय गृहस्थके शीलव्रतका नियम धारण कर तथा अपना जीवन सार्थक बना ॥७०-७१॥


जायतां मथुरालोकः सम्यग्धर्मपरायणः । दयावात्सल्यसम्पन्नो जिनशासनभावितः ॥७२॥

अर्थ: मथुराके समस्त लोग समीचीन धर्मके धारण करनेमें तत्पर, दया और वात्सल्य भावसे सम्पन्न तथा जिन शासनकी भावनासे युक्त हों ॥७२॥


स्थाप्यन्तां जिनबिम्बानि पूजितानि गृहे गृहे । अभिषेकाः प्रवर्त्यन्तां विधिना पाल्यतां प्रजा ॥७३॥

अर्थ: घर-घरमें जिन-प्रतिमाएँ स्थापित की जावें, उनकी पूजाएँ हों, अभिषेक हों और विधिपूर्वक प्रजाका पालन किया जाय ॥७३॥


सप्तर्षिप्रतिमा दिक्षु चतसृष्वपि यत्नतः । नगर्यां कुरु शत्रुघ्न तेन शान्तिर्भविष्यति ॥७४॥

अर्थ: हे शत्रुघ्न ! इस नगरीकी चारो दिशाओंमें सप्तर्षियोंकी प्रतिमाएँ स्थापित करो । उसीसे सब प्रकारकी शान्ति होगी ॥७४॥


अद्यप्रभृति यद्गेहे बिम्बं जैनं न विद्यते । मारी भक्षयति यद्व्याघ्री यथाऽनाथं कुरङ्गकम् ॥७५॥

अर्थ: आजसे लेकर जिस घरमें जिन-प्रतिमा नहीं होगी उस घरको मारी उस तरह खा जायगी जिस तरह कि व्याघ्री अनाथ मृगको खा जाती है ॥७५॥


यस्यांगुष्ठप्रमाणापि जैनेन्द्री प्रतियातना । गृहे तस्य न मारी स्यात्तार्क्ष्यभीता यथोरगी ॥७६॥

अर्थ: जिसके घरमें अँगूठा प्रमाण भी जिन-प्रतिमा होगी उसके घरमें गरुड़से डरी हुई सर्पिणीके समान मारीका प्रवेश नहीं होगा ॥७६॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्ताः शत्रुघ्नेन प्रमोदिना । समुत्पत्य नभो याताः साधवः साधुवाञ्छिताः ॥७७॥

अर्थ: तदनन्तर ‘जैसी आप आज्ञा करते हैं वैसा ही होगा’ इस प्रकार हर्षसे युक्त सुग्रीवने कहा और उसके बाद उत्तम अभिप्रायको धारण करनेवाले वे सभी साधु आकाशमें उड़कर चले गये ॥७७॥


अथ निर्वाणधामानि परिसृत्य प्रदक्षिणम् । मुनयो जानकीगेहमवतेरुः शुभायनाः ॥७८॥

अर्थ: अथानन्तर निर्वाण क्षेत्रोंकी प्रदक्षिणा देकर शुभगतिको धारण करनेवाले वे मुनिराज सीताके घरमें उतरे ॥७८॥


वहन्ती सम्मदं तुङ्गं श्रद्धादिगुणशालिनी । परमान्नेन तान् सीता विधियुक्तमपारयत् ॥७९॥

अर्थ: सो अत्यधिक हर्षको धारण करनेवाली एवं श्रद्धा आदि गुणोंसे सुशोभित सीताने उन्हें विधि पूर्वक उत्तम अन्नसे पारणा कराई ॥७९॥


जानक्या भक्तितो दत्तमन्नं सर्वगुणान्वितम् । भुक्त्वा पाणितले दत्त्वाऽऽशीर्वादं मुनयो ययुः ॥८०॥

अर्थ: जानकीके द्वारा भक्ति पूर्वक दिये हुए सर्वगुणसम्पन्न अन्नको अपने हस्ततलमें ग्रहणकर तथा आशीर्वाद देकर वे मुनि चले गये ॥८०॥


नगर्यां बहिरन्तश्च शत्रुघ्नः प्रतिमास्ततः । अतिष्ठिपज्जिनेन्द्राणां प्रतिमारहितात्मनाम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर शत्रुघ्नने नगरके भीतर और बाहर सर्वत्र उपमा रहित जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमाएँ स्थापित कराईं ॥८१॥


सप्तर्षिप्रतिमाश्चापि काष्ठासु चतसृष्वपि । अस्थापयन्मनोज्ञाङ्गा सर्वेतिकृतवारणाः ॥८२॥

अर्थ: और सुन्दर अवयवों की धारक तथा समस्त ईतियोंका निवारण करनेवाली सप्तर्षियोंकी प्रतिमाएँ भी चारों दिशाओंमें विराजमान कराईं ॥८२॥


पृष्ठे त्रिविष्टपस्यैव पुरमन्यां न्यवेशयत् । मनोज्ञां सर्वतः स्फीतां सर्वोपद्रववर्जिताम् ॥८३॥

योजनत्रयविस्तारां सर्वतस्त्रिगुणां च यत् । अधिकां मण्डलत्वेन स्थितामुत्तमतेजसम् ॥८४॥

अर्थ: उसने एक दूसरी ही नगरीकी रचना कराई जो ऐसी जान पड़ती थी मानो स्वर्गके ऊपर ही रची गई हो । वह सब ओरसे मनोहर थी, विस्तृत थी, सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित थी, तीन योजन विस्तार वाली थी, सब ओरसे त्रिगुण थी, विशाल थी, मण्डलाकारमें स्थित थी और उत्तम तेजकी धारक थी ॥८३-८४॥


आपातालतलाद् भिन्नमूलाः पृथ्व्यो मनोहराः । परिखा भाति सुमहासालवासगृहोपमा ॥८५॥

अर्थ: जिनकी जड़ें पातालतक फूटी थीं ऐसी सुन्दर वहाँ की भूमियाँ थीं तथा जो बड़े- बड़े वृक्षोंके निवास गृहके समान जान पड़ती थीं ऐसी परिखा उसके चारों ओर सुशोभित हो रही थी ॥८५॥


उद्यानान्यधिकां शोभां दधुः पुष्पफलाकुलाम् । वाप्यः पद्मोत्पलच्छन्ना जाताः शकुनिनादिताः ॥८६॥

अर्थ: वहाँके बाग-बगीचे फूलों और फलोंसे युक्त अत्यधिक शोभाको धारण कर रहे थे और कमल तथा कुमुदोंसे आच्छादित वहाँकी वापिकाएँ पक्षियोंके नादसे मुखरित हो रही थीं ॥८६॥


कैलाससानुसङ्काशाः प्रासादाश्चारुलक्षणाः । विमानप्रतिमा रेजुः विलोचनमलिम्लुचाः ॥८७॥

अर्थ: जो कैलासके शिखरोंके समान थे, सुन्दर-सुन्दर लक्षणोंसे युक्त थे, तथा नेत्रोंके चोर थे ऐसे वहाँके भवन विमानोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥८७॥


सुवर्णधान्यरत्नाढ्याः सम्मेदशिखरोपमाः । नरेन्द्रख्यातयः श्लाघ्या जाताः सर्वकुटुम्बिनः ॥८८॥

अर्थ: वहाँके सर्व कुटुम्बी सुवर्ण अनाज तथा रत्न आदिसे सम्पन्न थे, सम्मेद शिखरकी उपमा धारण करते थे, राजाओंके समान प्रसिद्धिसे युक्त तथा अत्यन्त प्रशंसनीय थे ॥८८॥


राजानस्त्रिदशैस्तुल्या असमानविभूतयः । धर्मार्थकामसंसक्ताः साधुचेष्टापरायणाः ॥८९॥

अर्थ: वहाँके राजा देवोंके समान अनुपम विभूतिके धारक थे, धर्म, अर्थ और काममें सदा आसक्त रहते थे तथा उत्तम चेष्टाओंके करनेमें निपुण थे ॥८९॥


प्रयच्छन्निच्छया तेषामाज्ञां विज्ञानसङ्गतः । रराज पुरि शत्रुघ्नः सुराणां वरुणो यथा ॥९०॥

अर्थ: इच्छानुसार उन राजाओंपर आज्ञा चलाता हुआ विशिष्ट ज्ञानी शत्रुघ्न मथुरा नगरीमें उस प्रकार सुशोभित होता था जिस प्रकार कि देवोंपर आज्ञा चलाता हुआ वरुण सुशोभित होता है ॥९०॥


एवं मथुरापुर्यां निवेशमत्यद्भुतं च सप्तर्षीणाम् । शृण्वन् कथयन्वापि प्राप्नोति जनश्चतुष्टयं भद्रनरम् ॥९१॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि जो इस प्रकार मथुरापुरीमें सप्तर्षियोंके निवास और उनके आश्चर्यकारी प्रभावको सुनता अथवा कहता है वह शीघ्र ही चारों प्रकारके मङ्गलको प्राप्त होता है ॥९१॥


साधुसमागमसक्ताः पुरुषाः सर्वमनीषितं सेवन्ते । तस्मात् साधुसमागममाश्रित्य सदारवेः समास्थ दीप्ताः ॥९२॥

अर्थ: जो मनुष्य साधुओंके समागममें सदा तत्पर रहते हैं वे सर्व मनोरथोंको प्राप्त होते हैं इसीलिए हे सत्पुरुषो ! साधुओंका समागमकर सदा सूर्यके समान देदीप्यमान होओ ॥९२॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मथुरापुरीनिवेशऋषिदानगुणोपसर्गहनननाभिधानं नाम द्विनवतितमं पर्व ॥९२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें मथुरापुरीमें सप्तर्षियोंके निवास, दान, गुण तथा उपसर्गके नष्ट होनेका वर्णन करनेवाला बानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९२॥


९३. त्रिनवतितमं पर्व (मनोरमालंभाभिधानं)

अथ रत्नपुरं नाम विजयार्द्धेऽस्ति दक्षिणम् । पुरं रत्नरथस्तत्र राजा विद्याधराधिपः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण दिशामें रत्नपुर नामका नगर है । वहाँ विद्याधरोंका राजा रत्नरथ राज्य करता था ॥१॥


मनोरमेति तस्यास्ति दुहिता रूपशालिनी । पूर्णचन्द्राननाऽभिख्यमहिषीकुक्षिसम्भवा ॥२॥

अर्थ: उसकी पूर्ण चन्द्रानना नामकी रानीके उदरसे उत्पन्न मनोरमा नामकी रूपवती पुत्री थी ॥२॥


समीक्ष्य यौवनं तस्या नवं राजा सुचेतनः । वरान्वेषणशेमुष्या बभूव परमाकुलः ॥३॥

अर्थ: पुत्रीका नव-यौवन देख विचारवान् राजा वरके अन्वेषणकी बुद्धिसे परम आकुल हुआ ॥३॥


मन्त्रिभिः सह सङ्गत्य स चक्रे सम्प्रधारणाम् । कस्मै योग्याय यच्छामः कुमारीमेतकामिति ॥४॥

अर्थ: 'यह कन्या किस योग्य वरके लिए देवें, इस प्रकार उसने मन्त्रियोंके साथ मिलकर विचार किया ॥४॥


एवं दिनेषु गच्छत्सु राज्ञि चिन्तावशीकृते । कदाचिन्नारदः प्राप्तस्ततः स मानमाप च ॥५॥

अर्थ: इस तरह राजाके चिन्ताकुल रहते हुए जब कितने ही दिन बीत गये तब किसी समय नारद आये और राजासे उन्होंने सन्मान प्राप्त किया ॥५॥


तस्मै विदितनिःशेषलोकचेष्टितबुद्धये । राजा प्रस्तुतमाचख्यौ सुखासीनाय सादरः ॥६॥

अर्थ: जिनकी बुद्धि समस्त लोककी चेष्टाको जाननेवाली थी ऐसे नारद जब सुखसे बैठ गये तब राजाने आदरके साथ उनसे प्रकृत बात कही ॥६॥


अवद्वारो जगौ राजन् विज्ञातो भवता न किम् । भ्राता युगप्रधानस्य पुंसो लाङ्गललक्ष्मणः ॥७॥

बिभ्राणः परमां लक्ष्मीं लक्ष्मणश्चारुलक्षणः । चक्रानुभावविनतसमस्तप्रतिमानवः ॥८॥

अर्थ: इसके उत्तरमें अवद्वार नामके धारक नारदने कहा कि हे राजन्! क्या आप इस युगके प्रधान पुरुष श्री रामके भाई लक्ष्मणको नहीं जानते ? वह लक्ष्मण उत्कृष्ट लक्ष्मीको धारण करनेवाला है, सुन्दर लक्षणोंसे सहित है तथा चक्रके प्रभावसे उसने समस्त शत्रुओंको नतमस्तक कर दिया है ॥७-८॥


तस्येयं सदृशी कन्या हृदयानन्ददायिनी । ज्योत्स्ना कुमुदखण्डस्य यथा परमसुन्दरी ॥९॥

अर्थ: सो जिस प्रकार चन्द्रिका कुमुदवनको आनन्द देनेवाली है उसी प्रकार हृदयको आनन्द देनेवाली यह परम सुन्दरी कन्या उसके अनुरूप है ॥९॥


एवं प्रभाषमाणेऽस्मिन् रत्नस्यन्दनसूनवः । क्रुद्धा हरिमनोवातवेगाद्या मानशालिनः ॥१०॥

अर्थ: नारदके इस प्रकार कहने पर रत्नरथके हरिवेग, मनोवेग तथा वायुवेग आदि अभिमानी पुत्र-कुपित हो उठे ॥१०॥


स्मृत्वा स्वजनघातोत्थं वैरं प्रत्यग्रमुन्नतम् । जगुः कालाग्निवद्दीप्ताः परिस्फुरितविग्रहाः ॥११॥

अद्यैव व्यतिपत्याऽऽशु समाहूय दुरीहितः । अस्माभिर्यो विहन्तव्यस्तस्मै कन्या न दीयते ॥१२॥

अर्थ: आत्मीय जनोंके घातसे उत्पन्न अत्यधिक नूतन वैरका स्मरण कर वे प्रलय कालकी अग्निके समान प्रदीप्त हो उठे तथा उनके शरीर क्रोधसे काँपने लगे । उन्होंने कहा कि जिस दुष्टको आज ही जाकर तथा शीघ्र ही बुलाकर हमलोगोंको मारना चाहिए उसके लिए कन्या नहीं दी जाती है ॥११-१२॥


इत्युक्ते राजपुत्रभ्रूविकारपरिचोदितैः । किङ्करौघैरवद्वारः पादाकर्षणमापितः ॥१३॥

नभस्तलं समुत्पत्य ततः सुरमुनिद्रु तम् । साकेतायां सुमित्राजमुपसृप्तो महादरः ॥१४॥

अर्थ: इतना कहने पर राजपुत्रोंकी भौंहोंके विकारसे प्रेरित हुए किङ्करोंके समूहने नारदके पैर पकड़ कर खींचना चाहा परन्तु उसी समय देवर्षि नारद शीघ्र ही आकाश-तलमें उड़ गये और बड़े आदरके साथ अयोध्या नगरीमें लक्ष्मणके समीप जा पहुँचे ॥१३-१४॥


अस्य विस्तरतो वार्तां निवेद्य भुवनस्थिताम् । कन्यायाश्च विशेषेण व्यक्तकौतुकलक्षणः ॥१५॥

कन्यामदर्शयंश्चित्रे चित्रां दृक्चित्तहारिणीम् । त्रैलोक्यसुन्दरीशोभामेकीकृत्येव निर्मिताम् ॥१६॥

अर्थ: पहले तो नारदने विस्तारके साथ लक्ष्मणके लिए समस्त संसारकी वार्ता सुनाई और उसके बाद मनोरमा कन्याकी वार्ता विशेष रूपसे बतलाई । उसी समय कौतुकके चिह्न प्रकट करते हुए नारदने चित्रपटमें अङ्कित वह अद्भुत कन्या दिखाई । वह कन्या नेत्र तथा हृदयको हरनेवाली थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो तीन लोकको सुन्दरियोंकी शोभाको एकत्रित कर ही बनाई गई हो ॥१५-१६॥


तां समालोक्य सौमित्रिः पुस्तनिष्कम्पलोचनः । अनन्यजस्य वीरोऽपि परिप्राप्तोऽतिवश्यताम् ॥१७॥

अर्थ: उस कन्याको देखकर जिसके नेत्र मृण्मय पुतलेके समान निश्चल हो गये थे ऐसा लक्ष्मण वीर होने पर भी कामके वशीभूत हो गया ॥१७॥


अचिन्तयच्च यद्येतत्स्त्रीरत्नं न लभे ततः । इदं मे निष्फलं राज्यं शून्यं जीवितमेव वा ॥१८॥

अर्थ: वह विचार करने लगा कि यदि यह स्त्रीरत्न मुझे नहीं प्राप्त होता है तो मेरा यह राज्य निष्फल है तथा यह जीवन भी सूना है ॥१८॥


उवाच चादरं बिभ्रद् भगवन् गुणकीर्त्तनन् । कुर्वन् मम कुमारैस्तैः कथं वा त्वं खलीकृतः ॥१९॥

अर्थ: आदरको धारण करते हुए लक्ष्मणने नारदसे कहा कि हे भगवन् ! मेरे गुणोंका निरूपण करते हुए आपको उन कुमारोंने दुःखी क्यों किया ? ॥१९॥


प्रचण्डत्वमिदं तेषां पापानां विक्षिपाम्यहम् । असमीक्षितकार्याणां क्षुद्राणां निहतात्मनाम् ॥२०॥

अर्थ: कार्यका विचार नहीं करनेवाले उन हृदयहीन पापी क्षुद्र पुरुषोंकी इस प्रचण्डताको मैं अभी हाल नष्ट करता हूँ ॥२०॥


व्रज स्वास्थ्यं रजः शुद्धं तव मूर्द्धानमाश्रितम् । पादस्तु शिरसि न्यस्तो मदीयेऽसौ महामुने ॥२१॥

अर्थ: हे महामुने ! उन कुमारोंने जो पादप्रहार किया है सो उसकी धूलि आपके मस्तकका आश्रय पाकर शुद्ध हो गई है और उस पादप्रहारको मैं समझता हूँ कि वह मेरे मस्तक पर ही किया गया है अतः आप स्वस्थताको प्राप्त हों ॥२१॥


इत्युक्त्वाऽऽह्वाय संरब्धो विराधितखगेश्वरम् । जगाद लक्ष्मणो रत्नपुरं गम्यं त्वरान्वितम् ॥२२॥

अर्थ: इतना कहकर क्रोधसे भरे लक्ष्मणने विराधित नामक विद्याधरोंके राजाको बुलाकर कहा कि मुझे शीघ्र ही रत्नपुर पर चढ़ाई करनी है ॥२२॥


तस्माद्देशय पन्थानमित्युक्तः स रणोत्कटः । लेखैराह्वाय यत् सर्वान् तीव्राज्ञः खेचराधिपान् ॥२३॥

अर्थ: इसलिए मार्ग दिखाओ । इस प्रकार कहने पर कठिन आज्ञाको धारण करनेवाले उस रणवीर विराधितने पत्र लिखकर समस्त विद्याधर राजाओंको बुला लिया ॥२३॥


महेन्द्रविन्ध्यकिष्किन्धमलयादिपुराधिपाः । विमानाच्छादिताऽऽकाशाः साकेतामागतास्ततः ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर महेन्द्र, विन्ध्य, किष्किन्ध और मलय आदि पर्वतोंपर बसे नगरोंके अधिपति, विमानोंके द्वारा आकाशको आच्छादित करते हुए अयोध्या आ पहुँचे ॥२४॥


वृतस्तैः सुमहासैन्यैर्लक्ष्मणो विजयोन्मुखः । लोकपालैर्यथा लेखो ययौ पद्मपुरःसरः ॥२५॥

अर्थ: बहुत भारी सेनासे सहित उन विद्याधर राजाओंके द्वारा घिरा हुआ लक्ष्मण विजयके सम्मुख हो रामचन्द्रजीको आगे कर उस प्रकार चला जिस प्रकार कि लोकपालोंसे घिरा हुआ देव चलता है ॥२५॥


नानाशस्त्रदलग्रस्तदिवाकरमरीचयः । प्राप्ता रत्नपुरं भूपाः सितच्छत्रोपशोभिताः ॥२६॥

अर्थ: जिन्होंने नाना शस्त्रोंके समूहसे सूर्यकी किरणें आच्छादित कर ली थीं तथा जो सफेद छत्रोंसे सुशोभित थे ऐसे राजा रत्नपुर पहुँचे ॥२६॥


ततः परबलं प्राप्तं ज्ञात्वा रत्नपुरो नृपः । साकं समस्तसामन्तैः सङ्ख्यचुञ्चुर्विनिर्ययौ ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर परचक्रको आया जान, रत्नपुरका युद्धनिपुण राजा समस्त सामन्तोंके साथ बाहर निकला ॥२७॥


तेन निष्क्रान्तमात्रेण महारभसधारिणा । विस्तीर्णदक्षिणं सैन्यं क्षणं ग्रस्तमिवाभवत् ॥२८॥

अर्थ: महावेगको धारण करनेवाले उस राजाने निकलते ही दक्षिणकी समस्त सेनाको क्षण भरमें ग्रस्त जैसा कर लिया ॥२८॥


चक्रक्रकचबाणासिकुन्तपाशगदादिभिः । बभूव गहनं तेषां युद्धमुद्धतयोद्भवम् ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर चक्र, क्रकच, बाण, खड्ग, कुन्त, पाश, गदा आदि शस्त्रोंके द्वारा उन सबका उद्दण्डताके कारण गहन युद्ध हुआ ॥२९॥


अप्सरःसंहतिर्योग्यनभोदेशव्यवस्थिता । मुमोचाद्भुतयुक्तेषु स्थानेषु कुसुमाञ्जलीः ॥३०॥

अर्थ: आकाशमें योग्य स्थानपर स्थित अप्सराओंका समूह आश्चर्यसे युक्त स्थानोंपर पुष्पाञ्जलियाँ छोड़ रहे थे ॥३०॥


ततः परबलाम्भोधौ सौमित्रिर्वडवानलः । विजृम्भितुं समायुक्तो योधयादःपरिक्षयः ॥३१॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो योधा रूपी जलजन्तुओंका क्षय करनेवाला था ऐसा लक्ष्मणरूपी बड़वानलपर चक्ररूपी समुद्रके बीच अपना विस्तार करनेके लिए उद्यत हुआ ॥३१॥


रथा वरतुरङ्गाश्च नागाश्च मदतोयदाः । तृणवत्तस्य वेगेन दिशो दश समाश्रिताः ॥३२॥

अर्थ: रथ, उत्तमोत्तम घोड़े, तथा मद रूपी जलको बहाने वाले हाथी, उसके वेगसे तृणके समान दशों दिशाओंमें भाग गये ॥३२॥


युद्धक्रीडां क्वचिच्चक्रे शक्रशक्तिर्हलायुधः । किष्किन्धपार्थिवोऽन्यत्र परमः कपिलक्ष्मण ॥३३॥

अर्थ: कहीं इन्द्रके समान शक्तिको धारण करनेवाले राम युद्ध-क्रीड़ा करते थे तो कहीं वानर रूप चिह्नसे उत्कृष्ट सुग्रीव युद्धकी क्रीड़ा कर रहे थे ॥३३॥


अपरत्र प्रभाजालपरवीरो महाजवः । लाङ्गूलपाणिरुग्रात्मा विविधाद्भुतचेष्टितः ॥३४॥

अर्थ: और किसी एक जगह प्रभाजालसे युक्त, महावेगशाली, उग्र हृदय एवं नाना प्रकारकी अद्भुत चेष्टाओंको करने वाला हनूमान् युद्धक्रीड़ाका अनुभव कर रहा था ॥३४॥


एवमेतैर्महायोधैर्विजयार्द्धबलं महत् । शरत्प्रभातमेघाभं क्वापि नीतं मरुत्समैः ॥३५॥

अर्थ: जिस प्रकार शरद्ऋतुके प्रातःकालीन मेघ वायुके द्वारा कहीं ले जाये जाते हैं - तितर-बितर कर दिये जाते हैं उसी प्रकार इन महायोद्धाओंके द्वारा विजयार्ध पर्वतकी बड़ी भारी सेना कहीं ले जाई गई थी - पराजित कर इधर-उधर खदेड़ दी गई थी ॥३५॥


ततोऽधिपतिना साकं विजयाद्रिभुवो नृपाः । स्वस्थानाभिमुखा नेशुः प्रक्षीणप्रधनेप्सिताः ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके युद्धके मनोरथ नष्ट हो गये थे ऐसे विजयार्ध-पर्वतपरके राजा अपने अधिपति - स्वामीके साथ अपने-अपने स्थानोंकी ओर भाग गये ॥३६॥


दृष्ट्वा पलायमानांस्तान् वीरान् रत्नरथात्मजान् । परमामर्षसम्पूर्णान्नारदः कलहप्रियः ॥३७॥

कृत्वा कलकलं व्योम्नि कृततालमहास्वनः । जगाद विस्फुरद्गात्रः स्मितास्यो विकचेक्षणः ॥३८॥

अर्थ: तीव्र क्रोधसे भरे, रत्नरथके उन वीर पुत्रोंको भागते हुए देख कर जिन्होंने आकाशमें ताली पीटनेका बड़ा शब्द किया था, जिनका शरीर चञ्चल था, मुख हास्यसे युक्त था, तथा नेत्र खिल रहे थे ऐसे कलहप्रिय नारदने कल-कल शब्द कर कहा कि ॥३७-३८॥


एते ते चपलाः क्रुद्धा दुश्चेष्टा मन्दबुद्धयः । पलायन्ते न संसोढा यैर्लक्ष्मणगुणोन्नतिः ॥३९॥

अर्थ: अहो ! ये वे ही चपल, क्रोधी, दुष्ट चेष्टाके धारक तथा मन्दबुद्धिसे युक्त रत्नरथके पुत्र भागे जा रहे हैं जिन्होंने कि लक्ष्मणके गुणोंकी उन्नति सहन नहीं की थी ॥३९॥


दुर्विनीतान् प्रसह्यैतान्नरं गृह्णीत मानवाः । पराभवं तदा कृत्वा क्वाधुना मे पलाय्यते ॥४०॥

अर्थ: अरे मानवो ! इन उद्दण्ड लोगोंको शीघ्र ही बलपूर्वक पकड़ो । उस समय मेरा अनादर कर अब कहाँ भागना हो रहा है ? ॥४०॥


इत्युक्ते पृष्ठतस्तेषामुपात्तजयकीर्तयः । प्रतापपरमा धीराः प्रस्थिता ग्रहणोद्यताः ॥४१॥

अर्थ: इतना कहनेपर जिन्होंने जीतका यश प्राप्त किया था तथा जो प्रतापसे श्रेष्ठ थे, ऐसे कितने ही धीर-वीर उन्हें पकड़नेके लिए उद्यत हो उनके पीछे दौड़े ॥४१॥


प्रत्यासन्नेषु तेष्वासीत्तदा रत्नपुरं पुरम् । आसन्नपार्श्वसंसक्तमहादाववनोपमम् ॥४२॥

अर्थ: उस समय उन सबके निकटस्थ होनेपर रत्नपुर नगर उस वनके समान हो गया था जिसके कि समीप बहुत बड़ा दावानल लग रहा था ॥४२॥


तावत् सुकन्यका रत्नभूता तत्र मनोरमा । सखीभिरावृता दृष्टमात्रलोकमनोरमा ॥४३॥

सम्भ्रान्ताम्बरमारूढा महाप्रेमवशीकृता । सौमित्रिमुपसम्पन्ना पौलोमीव विडौजसम् ॥४४॥

अर्थ: अथानन्तर उसी समय, जो दृष्टिमें आये हुए मनुष्यमात्रके मनको आनन्दित करनेवाली थी, घबड़ाई हुई थी, घोड़ोंके रथपर आरूढ़ थी, तथा महाप्रेमके वशीभूत थी ऐसी रत्नस्वरूप मनोरमा कन्या वहाँ लक्ष्मणके समीप उस प्रकार आई जिस प्रकार कि इन्द्राणी इन्द्रके पास जाती है ॥४३-४४॥


तां प्रसादनसंयुक्तां प्रसाद्यां प्राप्य लक्ष्मणः । प्रशान्तकलुषो जातो भ्रुकुटीरहिताननः ॥४५॥

अर्थ: जो प्रसाद करनेवाले लोगोंसे सहित थी तथा जो स्वयं प्रसाद करानेके योग्य थी ऐसी उस कन्याको पाकर लक्ष्मणकी कलुषता शान्त हो गई तथा उसका मुख भृकुटियोंसे रहित हो गया ॥४५॥


ततो रत्नरथः साकं सुतैर्मानविवर्जितः । प्रीत्या निर्गत्य नगरादुपायनसमन्वितः ॥४६॥

देशकालविधानज्ञो दृष्टात्मपरपौरुषः । सङ्गत्य सुष्ठु तुष्टाव मृगनागारिकेतनौ ॥४७॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसका मान नष्ट हो गया था, जो देशकालकी विधिको जाननेवाला था, जिसने अपना-पराया पौरुष देख लिया था और जो योग्य भेंटसे सहित था ऐसे राजा रत्नरथने प्रीतिपूर्वक पुत्रोंके साथ नगरसे बाहर निकल कर सिंह और गरुडकी पताकाओंको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मणकी अच्छी तरह स्तुति की ॥४६-४७॥


अन्तरेऽत्र समागत्य सुमहाजनमध्यगम् । नारदोऽह्वेपयद्रत्नरथं सस्मितभाषितैः ॥४८॥

का वार्त्ता तेऽधुना रत्नरथ पांशुरथोऽथ वा । केचित्कुशलमुत्तुङ्गभटगर्जितकारिणः ॥४९॥

अर्थ: इसी बीचमें नारदने आकर बहुत बड़ी भीड़के मध्यमें स्थित रत्नरथको मन्द हास्यपूर्ण वचनोंसे इस प्रकार लज्जित किया कि अहो ! अब तेरा क्या हाल है ? तू रत्नरथ था अथवा रजोरथ ? तू बहुत बड़े योद्धाओंके कारण गर्जना कर रहा था सो अब तेरी कुशल तो है ? ॥४८-४९॥


नूनं रत्नरथो न त्वं स हि गर्वमहाचलः । नारायणांघ्रिसेवास्थो भवन् कोऽप्यपरो नृपः ॥५०॥

अर्थ: जान पड़ता है कि तू गर्वका महापर्वत स्वरूप वह रत्नरथ नहीं है किन्तु नारायणके चरणोंकी सेवामें स्थित रहनेवाला कोई दूसरा ही राजा है ॥५०॥


कृत्वा कहकहाशब्दं कराहतकरः पुनः । जगौ भो स्थीयते कच्चित्सुखं रत्नरथाङ्गजाः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर कहकहा शब्द कर तथा एक हाथसे दूसरे हाथकी ताली पीटते हुए कहा कि अहो ! रत्नरथके पुत्रो ! सुखसे तो हो ? ॥५१॥


सोऽयं नारायणो यस्य भयद्भिस्तादृशं तदा । गदितं हृदयग्राहि स्वगृहोद्धतचेष्टितैः ॥५२॥

अर्थ: यह वही नारायण है कि जिसके विषयमें उस समय अपने घरमें ही उद्धत चेष्टा दिखानेवाले आप लोगोंने उस तरह हृदयको पकड़नेवाली बात कही थी ॥५२॥


एवं सत्यपि तैरुक्तं त्वयि नारद कोपिते । महापुरुषसम्पर्कः प्राप्तोऽस्माभिः सुदुर्लभः ॥५३॥

अर्थ: इस प्रकार यह होने पर भी उन सबने कहा कि हे नारद ! तुम्हें कुपित किया उसीका यह फल है कि हमलोगोंको जिसका मिलना अत्यन्त दुर्लभ था ऐसा महापुरुषोंका संपर्क प्राप्त हुआ ॥५३॥


इति नर्मसमेताभिः कथाभिः क्षणमात्रकम् । अवस्थाय पुरं सर्वे विविशुः परमर्द्धयः ॥५४॥

अर्थ: इस प्रकार विनोद पूर्ण कथाओंसे वहाँ क्षणभर ठहर कर सब लोगोंने बड़े वैभवके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥५४॥


श्रीदामनामा रतितुल्यरूपा रामाय दत्ता सुमनोऽभिरामा । रामामिमां प्राप्य परं स रेमे मेरुप्रभावः कृतपाणियोगः ॥५५॥

अर्थ: उसी समय जो रतिके समान रूपकी धारक थी तथा देवोंको भी आनन्दित करनेवाली थी ऐसी श्रीदामा नामकी कन्या रामके लिए दी गई। ऐसी स्त्रीको पाकर जिनका मेरुके समान प्रभाव था तथा जिन्होंने उसका पाणिग्रहण किया था ऐसे श्रीराम अत्यधिक प्रसन्न हुए ॥५५॥


दत्ता तथा रत्नरथेन जाता स्वयं दशास्यक्षयकारणाय । मनोरमार्थप्रतिपन्ननामा तयोश्च वृत्ता परिणीतिरुद्धा ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर राजा रत्नरथने रावणका क्षय करनेवाले लक्ष्मणके लिए सार्थक नामवाली मनोरमा कन्या दी और उन दोनोंका उत्तम पाणिग्रहण हुआ ॥५६॥


एवं प्रचण्डा अपि यान्ति साम रत्नान्यनर्घाणि च संश्रयन्ते ।
पुण्यानुभावेन यतो जनानां ततः कुरुध्वं रविनिर्मलं तत् ॥५७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यतश्च इस तरह मनुष्योंके पुण्य प्रभावसे अत्यन्त क्रोधी मनुष्य भी शान्तिको प्राप्त हो जाते हैं और अमूल्य रत्न उन्हें प्राप्त होते रहते हैं इसलिए हे भव्यजनो ! सूर्यके समान निर्मल पुण्यका संचय करो ॥५७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मनोरमालंभाभिधानं नाम त्रिनवतितमं पर्व ॥९३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्यद्वारा कथित पद्मपुराणमें मनोरमाकी प्राप्तिका कथन करनेवाला तेरानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९३॥

९४. चतुर्णवतितमं पर्व (रामलक्ष्मणविभूतिदर्शनीयाभिधानं)

अन्येऽपि दक्षिणश्रेण्यां विजयार्धस्य खेचराः । शस्त्रान्धकारिते संख्ये लक्ष्मणेन वशीकृताः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें रत्नरथके सिवाय जो अन्य विद्याधर थे शस्त्रोंके अन्धकारसे युक्त युद्धमें लक्ष्मणने उन सबको भी वश कर लिया ॥१॥


अत्यन्तदुःसहाः सन्तो महापन्नगसन्निभाः । शौर्यक्ष्वेडविनिर्मुक्ता जाता रामानुसेविनः ॥२॥

अर्थ: जो विद्याधर पहले महानागके समान अत्यन्त दुःसह थे वे अब शूर-वीरता रूपी विषसे रहित हो रामके सेवक हो गये ॥२॥


नामानि राजधानीनां तासां ख्यातानि कानिचित् । कीर्त्तयिष्यामि ते राजन् स्वःपुरीसमतेजसाम् ॥३॥

अर्थ: हे राजन् ! अब मैं स्वर्गके समान तेजको धारण करने वाली उन नगरियोंके कुछ नाम तेरे लिए कहूँगा सो श्रवण कर ॥३॥


पुरं रविनिभं नाम तथा वह्निप्रभं शुभम् । काञ्चनं मेघसंज्ञं च तथा च शिवमन्दिरम् ॥४॥

गन्धर्वगीतममृतं पुरं लक्ष्मीधरं तथा । किन्नरोद्गीतसंज्ञं च जीमूतशिखरं परम् ॥५॥

मर्त्यानुगीतं चक्राह्वं विश्रुतं रथनूपुरम् । श्रीमद्बहुरवाभिख्यं चारुश्रीमलयश्रुतिम् ॥६॥

श्रीगृहं भास्कराभं च तथारिञ्जयसंज्ञकम् । ज्योतिःपुरं शशिच्छायं गान्धारमलयं घनम् ॥७॥

सिंहस्थानं मनोज्ञं च भद्रं श्रीविजयस्वनम् । कान्तं यक्षपुरं रम्यं तिलकस्थानमेव च ॥८॥

परमाण्येवमादीनि पुराणि पुरुषोत्तम । परिक्रान्तानि भूरीणि लक्ष्मणेन महात्मना ॥९॥

अर्थ: रविप्रभ, वह्निप्रभ, काञ्चन, मेघ, शिवमन्दिर, गन्धर्वगीत, अमृतपुर, लक्ष्मीधर, किन्नरोद्गीत, जीमूतशिखर, मर्त्यानुगीत, चक्रपुर, रथनूपुर, बहुरव, मलय, श्रीगृह, भास्कराभ, अरिञ्जय, ज्योतिःपुर, शशिच्छाय, गान्धार, मलय, सिंहपुर, श्रीविजयपुर, यक्षपुर और तिलकपुर । हे पुरुषोत्तम ! इन्हें आदि लेकर अनेक उत्तमोत्तम नगर उन महापुरुष लक्ष्मणने वशमें किये ॥४-९॥


प्रसाद्य धरणीं सर्वां रत्नैः सप्तभिरन्वितः । नारायणपदं कृत्स्नं प्राप लक्ष्मणसुन्दरः ॥१०॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मणसुन्दर समस्त पृथिवीको वश कर सात रत्नोंसे सहित होता हुआ सम्पूर्ण नारायण पदको प्राप्त हुआ ॥१०॥


चक्रं छत्रं धनुः शक्तिर्गदा मणिरसिस्तथा । एतानि सप्त रत्नानि परिप्राप्तानि लक्ष्मणम् ॥११॥

अर्थ: चक्र, छत्र, धनुष, शक्ति, गदा, मणि और खड्ग ये सात रत्न लक्ष्मणको प्राप्त हुए थे ॥११॥


उवाच श्रेणिको भूपो भगवंस्त्वत्प्रसादतः । रामलक्ष्मणयोर्ज्ञातं माहात्म्यं विधिना मया ॥१२॥

अधुना ज्ञातुमिच्छामि लवणाङ्कुशसम्भवम् । सौमित्रिपुत्रसम्भूतिं तथा तद्वक्तुमर्हसि ॥१३॥

अर्थ: [ तथा हल, मुसल, गदा और रत्नमाला ये चार रत्न रामको प्राप्त थे । ] तदनन्तर श्रेणिकने गौतम स्वामीसे कहा कि हे भगवन् ! मैंने आपके प्रसादसे विधिपूर्वक राम और लक्ष्मणका माहात्म्य जान लिया है अब लवणाङ्कुशकी उत्पत्ति तथा लक्ष्मणके पुत्रोंका जन्म जानना चाहता हूँ सो आप कहनेके योग्य हैं ॥१२-१३॥


ततो मुनिगणस्वामी जगाद परमस्वनम् । शृणु वक्ष्यामि ते राजन् कथावस्तु मनीषितम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिसंघके स्वामी श्री गौतम गणधरने उच्चस्वरमें कहा कि हे राजन् ! सुन, मैं तेरी इच्छित कथावस्तु कहता हूँ ॥१४॥


युगप्रधाननरयोः पद्मलक्ष्मणयोस्तयोः । निष्कण्टकमहाराज्यजातभोगोपयुक्तयोः ॥१५॥

व्रजन्त्यहानि पक्षाश्च मासा वर्षयुगानि च । दोदुन्दकामराज्ञातसुमहासुखसक्तयोः ॥१६॥

अर्थ: अथानन्तर युगके प्रधान पुरुष जो राम, लक्ष्मण थे वे निष्कण्टक महाराज्यसे उत्पन्न भोगोपभोगकी सामग्रीसे सहित थे तथा दोदुंदक नामक देवके द्वारा अनुज्ञात महासुखमें आसक्त थे । इस तरह उनके दिन, पक्ष, मास, वर्ष और युग व्यतीत हो गये ॥१५-१६॥


सुरस्त्रीभिः समानानां स्त्रीणां सत्कुलजन्मनाम् । सहस्राण्यवबोध्यानि दश सप्त च लक्ष्मणे ॥१७॥

अर्थ: जो देवाङ्गनाओंके समान थीं तथा उत्तम कुलमें जिनका जन्म हुआ था ऐसी सत्तरह हजार स्त्रियाँ लक्ष्मणकी थीं ॥१७॥


तासामष्टौ महादेव्यः कीर्तिश्रीरतिसन्निभाः । गुणशीलकलावत्यः सौम्याः सुन्दरविभ्रमाः ॥१८॥

अर्थ: उन स्त्रियोंमें कीर्त्ति, लक्ष्मी और रतिकी समानता प्राप्त करनेवाली गुणवती, शीलवती, कलावती, सौम्य और सुन्दर चेष्टाओंको धारण करनेवाली आठ महादेवियाँ थीं ॥१८॥


तासां जगत्प्रसिद्धानि कीर्त्यमानानि भूपते । शृणु नामानि चारूणि यथावदनुपूर्वशः ॥१९॥

अर्थ: हे राजन् ! अब मैं यथा क्रमसे उन महादेवियोंके सुन्दर नाम कहता हूँ सो सुन ॥१९॥


राज्ञः श्रीद्रोणमेघस्य विशल्याख्या सुतादितः । ततो रूपवती ख्याता प्रतिरूपविवर्जिता ॥२०॥

तृतीया वनमालेति वसन्तश्रीयुतेव सा । अन्या कल्याणमालाख्या नामाख्यातमहागुणा ॥२१॥

पञ्चमी रतिमालेति रतिमालेव रूपिणी । षष्ठी च जितपद्मेति जितपद्मा मुखश्रिया ॥२२॥

अन्या भगवती नाम चरमा च मनोरमा । अग्रपत्न्य इमा अष्टावुक्ता गरुडलक्ष्मणः ॥२३॥

अर्थ: सर्वप्रथम राजा द्रोणमेघकी पुत्री विशल्या, उसके अनन्तर उपमासे रहित रूपवती, फिर तीसरी वनमाला, जो कि वसन्तकी लक्ष्मीसे मानो सहित ही थी, जिसके नामसे ही महागुणोंकी सूचना मिल रही थी ऐसी चौथी कल्याणमाला, जो रतिमालाके समान रूपवती थी ऐसी पाँचवीं रतिमाला, जिसने अपने मुखसे कमलको जीत लिया था ऐसी छठवीं जितपद्मा, सातवीं भगवती और आठवीं मनोरमा ये लक्ष्मणकी आठ प्रमुख स्त्रियाँ थीं ॥२०-२३॥


दयिताष्टसहस्त्री तु पद्माभस्यामरीसमा । चतस्रश्च महादेव्यो जगत्प्रख्यातकीर्त्तयः ॥२४॥

अर्थ: रामचन्द्र जीको देवाङ्गनाओंके समान आठ हजार स्त्रियाँ थीं। उनमें जगत् प्रसिद्ध कीर्तिको धारण करनेवाली चार महादेवियाँ थीं ॥२४॥


प्रथमा जानकी ख्याता द्वितीया च प्रभावती । ततो रतिनिभाऽभिख्या श्रीदामा च रमा स्मृता ॥२५॥

अर्थ: प्रथम सीता, द्वितीय प्रभावती, तृतीय रतिनिभा और चतुर्थ श्रीदामा ये उन महादेवियोंके नाम हैं ॥२५॥


एतासां च समस्तानां मध्यस्था चारुलक्षणा । जानकी शोभतेऽत्यर्थं सतारेन्दुकला यथा ॥२६॥

अर्थ: इन सब स्त्रियोंके मध्यमें स्थित सुन्दर लक्षणों वाली सीता, ताराओंके मध्यमें स्थित चन्द्रकलाके समान सुशोभित होती थी ॥२६॥


द्वे शते शतमर्द्धं च पुत्राणां तार्क्ष्यलक्ष्मणः । तेषां च कीर्तयिष्यामि शृणु नामानि कानिचित् ॥२७॥

अर्थ: लक्ष्मणके अढ़ाई सौ पुत्र थे उनमेंसे कुछके नाम कहता हूँ सो सुन ॥२७॥


वृषभो धरणश्चन्द्रः शरभो मकरध्वजः । धारणो हरिनागश्च श्रीधरो मदनोऽच्युतः ॥२८॥

अर्थ: वृषभ, धरण, चन्द्र, शरभ, मकरध्वज, धारण, हरिनाग, श्रीधर, मदन और अच्युत ॥२८॥


तेषामष्टौ प्रधानाश्च कुमाराश्चारुचेष्टिताः । अनुरक्ता गुणैर्येषामनन्यमनसो जनाः ॥२९॥

अर्थ: जिनके गुणोंमें अनुरक्त हुए पुरुष अनन्यचित्त हो जाते थे ऐसे सुन्दर चेष्टाओंको धारण करने वाले आठ कुमार उन पुत्रोंमें प्रमुख थे ॥२९॥


विशल्यासुन्दरीसूनुः प्रथमं श्रीधरः स्मृतः । असौ पुरि विनीतायां राजते दिवि चन्द्रवत् ॥३०॥

अर्थ: उनमेंसे श्रीधर, विशल्या सुन्दरीका पुत्र था जो अयोध्यापुरीमें उस प्रकार सुशोभित होता था जिस प्रकार कि आकाशमें चन्द्रमा सुशोभित होता है ॥३०॥


ज्ञेयो रूपवतीपुत्रः पृथिवीतिलकाभिधः । पृथिवीतलविख्यातः पृथ्वीं कान्तिं समुद्वहन् ॥३१॥

अर्थ: रूपवतीके पुत्रका नाम पृथिवी-तिलक था जो उत्तम कान्तिको धारण करता हुआ पृथिवीतल पर अत्यन्त प्रसिद्ध था ॥३१॥


पुत्रः कल्याणमालाया बहुकल्याणभाजनम् । बभूव मङ्गलाभिख्यो मङ्गलैकक्रियोदितः ॥३२॥

अर्थ: कल्याणमालाका पुत्र मङ्गल नामसे प्रसिद्ध था वह अनेक कल्याणोंका पात्र था तथा माङ्गलिक क्रियाओंके करनेमें सदा तत्पर रहता था ॥३२॥


विमलप्रभनामाऽभूत् पद्मावत्यां शरीरजः । तनयोऽर्जुनवृक्षाख्यो वनमालासमुद्भवः ॥३३॥

अर्थ: पद्मावतीके विमलप्रभ नामका पुत्र हुआ था। वनमालाने अर्जुनवृत्त नामक पुत्रको जन्म दिया था ॥३३॥


अतिवीर्यस्य तनया श्रीकेशिनमसूत च । आत्मजो भगवत्याश्च सत्यकीर्त्तिः प्रकीर्त्तितः ॥३४॥

अर्थ: राजा अतिवीर्यकी पुत्रीने श्रीकेशी नामक पुत्र उत्पन्न किया था । भगवतीका पुत्र सत्यकीर्ति इस नामसे प्रसिद्ध था ॥३४॥


सुपार्श्वकीर्त्तिनामानं सुतं प्राप मनोरमा । सर्वे चैते महासत्त्वाः शस्त्रशास्त्रविशारदाः ॥३५॥

अर्थ: और मनोरमाने सुपार्श्वकीर्ति नामक पुत्र प्राप्त किया था । ये सभी कुमार महाशक्तिशाली तथा शस्त्र और शास्त्र दोनोंमें निपुण थे ॥३५॥


नखमांसवदेतेषां भ्रातृणां संगतिर्दृढा । सर्वत्र शस्यते लोके समानोचितचेष्टिता ॥३६॥

अर्थ: इन सब भाइयोंकी नख और मांसके समान सुदृढ संगति थी तथा इन सबकी समान एवं उचित चेष्टा लोकमें सर्वत्र प्रशंसा प्राप्त करती थी ॥३६॥


अन्योन्यहृदयासीनाः प्रेमनिर्भरचेतसः । अष्टौ दिवीव वसवो रेमिरे स्वेप्सितं पुरि ॥३७॥

अर्थ: सो परस्पर एक दूसरेके हृदयमें विद्यमान थे तथा जिनके चित्त प्रेमसे परिपूर्ण थे ऐसे ये आठों कुमार स्वर्गमें आठ वसुओंके समान नगरमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा करते थे ॥३७॥


पूर्वं जनितपुण्यानां प्राणिनां शुभचेतसाम् । आरभ्य जन्मतः सर्वं जायते सुमनोहरम् ॥३८॥

एवं च कात्स्न्र्येन कुमारकोटयः स्मृता नरेन्द्रप्रभवाश्चतस्रः । कोट्यर्द्धयुक्ताः पुरि तत्र शक्त्या ख्याता नितान्तं परया मनोज्ञाः ॥३९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जिन्होंने पूर्व पर्यायमें पुण्य उत्पन्न किया है तथा जिनका चित्त शुभभाव रूप रहा है ऐसे प्राणियोंकी समस्त चेष्टाएँ जन्मसे ही अत्यन्त मनोहर होती हैं इस प्रकार उस नगरीमें सब मिलाकर साढ़े चार करोड़ राजकुमार थे जो उत्कृष्ट शक्तिसे प्रसिद्ध तथा अत्यन्त मनोहर थे ॥३८-३९॥


नानाजनपदनिरतं परिगतमुकुटोत्तमाङ्कं नृपचक्रम् । षोडशसहस्रसंख्यं बलहरिचरणानुगं स्मृतं रवितेजः ॥४०॥

अर्थ: जो नाना देशोंमें निवास करते थे, जिनके मस्तक पर मुकुट बँधे हुए थे, तथा जिनका तेज सूर्यके समान था ऐसे सोलह हजार राजा राम और लक्ष्मणके चरणोंकी सेवा करते थे ॥४०॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामलक्ष्मणविभूतिदर्शनीयाभिधानं नाम चतुर्णवतितमं पर्व ॥९४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राम-लक्ष्मणकी विभूतिको दिखानेवाला चौरानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९४॥


९५. पञ्चनवतितमं पर्व (जिनेन्द्रपूजादोहदाभिधानं)

एवं दिनेषु गच्छत्सु भोगसम्भारयोगिषु । धर्मार्थकामसम्बन्धनितान्तरतिकारिषु ॥१॥

विमानाभेऽन्यदा सुप्ता भवने जानकी सुखम् । शयनीये शरन्मेघमालासम्मितमार्दवे ॥२॥

अपश्यत् पश्चिमे यामे स्वप्नमम्भोजलोचना । दिव्यतूर्यनिनादैश्च मङ्गलैर्बोधमागता ॥३॥

अर्थ: अथानन्तर इस प्रकार भोगोंके समूहसे युक्त तथा धर्म अर्थ और कामके सम्बन्धसे अत्यन्त प्रीति उत्पन्न करनेवाले दिनोंके व्यतीत होने पर किसी दिन सीता विमान तुल्य भवनमें शरद् ऋतुकी मेघमालाके समान कोमल शय्या पर सुखसे सो रही थी कि उस कमललोचनाने रात्रिके पिछले प्रहरमें स्वप्न देखा और देखते ही दिव्य वादित्रोंके मङ्गलमय शब्दसे वह जागृत हो गई ॥१-३॥


ततोऽतिविमले जाते प्रभाते संशयान्विता । कृतदेहस्थितिः कान्तमियाय सुसखीवृता ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त निर्मल प्रभातके होने पर संशयको प्राप्त सीता, शरीर सम्बन्धी क्रियाएँ करके सखियों सहित पतिके पास गई ॥४॥


अपृच्छच्च मया नाथ स्वप्नो योऽद्य निरीक्षितः । अर्थं कथयितुं तस्य लब्धवर्णं त्वमर्हसि ॥५॥

अर्थ: और पूछने लगी कि हे नाथ ! आज मैंने जो स्वप्न देखा है हे विद्वन् ! आप उसका फल कहनेके लिए योग्य हैं ॥५॥


शरदिन्दुसमच्छायौ क्षुब्धसागरनिःस्वनौ । कैलासशिखराकारौ सर्वालङ्कारभूषितौ ॥६॥

कान्तिमत्सितसद्दंष्ट्रौ प्रवरौ शरभोत्तमौ । प्रविष्टौ मे मुखं मन्ये विलसत्सितकेसरौ ॥७॥

अर्थ: मुझे ऐसा जान पड़ता है कि शरद्ऋतुके चन्द्रमाके समान जिनकी कान्ति थी, क्षोभको प्राप्त हुए सागरके समान जिनका शब्द था, कैलाशके शिखरके समान जिनका आकार था, जो सब प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत थे, जिनकी उत्तम दाढ़े कान्तिमान् एवं सफेद थीं और जिनकी गरदनकी उत्तम जटाएँ सुशोभित हो रही थीं ऐसे अत्यन्त श्रेष्ठ दो अष्टापद मेरे मुखमें प्रविष्ट हुए हैं ॥६-७॥


शिखरात् पुष्पकस्याथ सम्भ्रमेणोरुणान्विता । वातनुन्ना पताकेवापतितास्मि किल क्षितौ ॥८॥

अर्थ: यह देखनेके बाद दूसरे स्वप्नमें मैंने देखा है कि मैं वायुसे प्रेरित पताकाके समान अत्यधिक सम्भ्रमसे युक्त हो पुष्पक-विमानके शिखरसे गिरकर नीचे पृथिवीपर आ पड़ी हूँ ॥८॥


पद्मनाभस्ततोऽवोचच्छरभद्वयदर्शनात् । प्रवरोर्वचिरेणैव पुत्रयुग्ममवाप्स्यसि ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि हे वरोरू ! अष्टापदोंका युगल देखनेसे तू शीघ्र ही दो पुत्र प्राप्त करेगी ॥९॥


पतनं पुष्पकस्याग्राद्दयिते न प्रशस्यते । अथवा शमदानस्थाः प्रयान्तु प्रशमं ग्रहाः ॥१०॥

अर्थ: हे प्रिये ! यद्यपि पुष्पकविमानके अग्रभागसे गिरना अच्छा नहीं है तथापि चिन्ताकी बात नहीं है क्योंकि शान्तिकर्म तथा दान करनेसे पापग्रह शान्तिको प्राप्त हो जावेंगे ॥१०॥


वसन्तोऽथ परिप्राप्तस्तिलकामुक्तकङ्कटः । नीपनागेश्वरारूढः सहकारशरासनः ॥११॥

पद्मनाराचसंयुक्तः केसरापूरितेषुधिः । गीयमानोऽमलश्लोकैर्मधुव्रतकदम्बकैः ॥१२॥

कदम्बघनवातेन हारिणा निःश्वसन्निव । मल्लिकाकुसुमोद्योतैः शत्रूनन्यान् हसन्निव ॥१३॥

कलपुंस्कोकिलालापैर्जल्पन्निव निजोचितम् । विभ्रन्नरपतेर्लीलां लोकाकुलत्वकारिणीम् ॥१४॥

अर्थ: अथानन्तर जो तिलकपुष्परूपी कवचको धारण किये हुए था। कदम्बरूपी गजराजपर आरूढ था, आम्ररूपी धनुष साथ लिये था, कमलरूपी बाणोंसे युक्त था, बकुल रूपी भरे हुए तरकसोंसे सहित था, निर्मल गुञ्जार करनेवाले भ्रमरोंके समूह जिसका सुयश गा रहे थे, जो कदम्बसे सुवासित सघन सुन्दर वायुसे मानो सांस ही ले रहा था, मालतीके फूलोंके प्रकाशसे जो मानो दूसरे शत्रुओंकी हँसी कर रहा था और कोकिलाओंके मधुर आलापसे जो मानो अपने योग्य वार्तालाप ही कर रहा था ऐसा लोकमें आकुलता उत्पन्न करने वाली राजाकी शोभाको धारण करता हुआ वसन्तकाल आ पहुँचा ॥११-१४॥


अङ्कोटनखरो बिभ्रद्दंष्ट्राङ्कुरबकात्मिकाम् । लोहिताशोकनयनश्चलत्पल्लवजिह्वकः ॥१५॥

वसन्तकेसरी प्राप्तो विदेशजनमानसम् । नयमानः परं त्रासं सिंहकेसरकेसरः ॥१६॥

अर्थ: अङ्कोट पुष्प ही जिसके नाखून थे, जो कुरवक रूपी दाढ़को धारण कर रहा था, लाल लाल अशोक ही जिसके नेत्र थे, चञ्चल किसलय ही जिसकी जिह्वा थी, जो परदेशी मनुष्यके मनको परम भय प्राप्त करा रहा था और बकुल पुष्प ही जिसकी गरदनके बाल थे ऐसा वसन्तरूपी सिंह आ पहुँचा ॥१५-१६॥


रमणीयं स्वभावेन वसन्तेन विशेषतः । महेन्द्रोदयमुद्यानं जातं नन्दनसुन्दरम् ॥१७॥

अर्थ: अयोध्याका महेन्द्रोदय उद्यान स्वभावसे ही सुन्दर था परन्तु उस समय वसन्तके कारण विशेष रूपसे नन्दन-वनके समान सुन्दर हो गया था ॥१७॥


विचित्रकुसुमा वृक्षा विचित्रचलपल्लवा । मत्ता इव विघूर्णन्ते दक्षिणानिलसङ्गताः ॥१८॥

अर्थ: जिनमें रङ्ग-विरङ्गे फूल फूल रहे थे तथा जिनके नाना प्रकारके पल्लव हिल रहे थे, ऐसे वृक्ष दक्षिणके मलय समीरसे मिलकर मानो पागलकी तरह झूम रहे थे ॥१८॥


पद्मोत्पलादिसञ्छन्नाः शकुन्तगणनादिताः । वाप्यो वरं विराजन्ते जनसेवितरोधसः ॥१९॥

अर्थ: जो कमल तथा नील कमल आदिसे आच्छादित थीं, पक्षियोंके समूह जहाँ शब्द कर रहे थे, और जिनके तट मनुष्योंसे सेवित थे ऐसी वापिकाएँ अत्यधिक सुशोभित हो रही थीं ॥१९॥


हंससारसचक्राह्वकुरराणां मनोहराः । स्वनाः कारण्डवानां च प्रवृत्ता रागिदुःसहाः ॥२०॥

अर्थ: रागी मनुष्योंके लिए जिनका सहना कठिन था ऐसे हंस, सारस, चकवा, कुरर और कारण्डव पक्षियोंके मनोहर शब्द होने लगे ॥२०॥


निपातोत्पतनैस्तेषां विमलं लुलितं जलम् । प्रमोदादिव संवृत्तं तरङ्गाढ्यं समाकुलम् ॥२१॥

अर्थ: उन पक्षियोंके उत्पतन और विपतनसे क्षोभको प्राप्त हुआ निर्मल जल हर्षसे ही मानो तरङ्ग युक्त होता हुआ व्याकुल हो रहा था ॥२१॥


पद्मादिभिर्जलं व्याप्तं स्थलं कुरबकादिभिः । गगनं रजसा तेषां वसन्ते जृम्भिते सति ॥२२॥

अर्थ: वसन्तका विस्तार होनेपर जल, कमल आदिसे, स्थल कुरवक आदिसे और आकाश उनकी परागसे व्याप्त हो गया था ॥२२॥


गुच्छगुल्मलतावृक्षाः प्रकारा बहुधा स्थिताः । वनस्पतेः परां शोभामुपजग्मुः समन्ततः ॥२३॥

अर्थ: उस समय गुच्छे, गुल्म, लता तथा वृक्ष आदि जो वनस्पतिकी जातियाँ अनेक प्रकारसे स्थित थीं वे सब ओरसे परम शोभाको प्राप्त हो रही थीं ॥२३॥


काले तस्मिन्नरेन्द्रस्य जनकस्य शरीरजाम् । किञ्चिद् गर्भकृतश्रान्तिकृशीभूतशरीरिकाम् ॥२४॥

वीक्ष्य पृच्छति पद्माभः किं ते कान्ते मनोहरम् । सम्पादयाम्यहं ब्रूहि दोहकं किमसीदृशी ॥२५॥

अर्थ: उस समय गर्भके द्वारा की हुई थकावटसे जिसका शरीर कुछ-कुछ भ्रान्त हो रहा था ऐसी जनकनन्दिनीको देखकर रामने पूछा कि हे कान्ते ! तुझे क्या अच्छा लगता है ? सो कह । मैं अभी तेरी इच्छा पूर्ण करता हूँ तू ऐसी क्यों हो रही है ? ॥२४-२५॥


ततः संस्मित्य वैदेही जगाद कमलानना । नाथ चैत्यालयान्द्रष्टुं भूरीन् वाञ्छामि भूतले ॥२६॥

अर्थ: तब कमलमुखी सीताने मुसकरा कर कहा कि हे नाथ ! मैं पृथिवीतल पर स्थित अनेक चैत्यालयोंके दर्शन करना चाहती हूँ ॥२६॥


त्रैलोक्यमङ्गलात्मभ्यः पञ्चवर्णेभ्य आदरात् । जिनेन्द्रप्रतिबिम्बेभ्यो नमस्कर्तुं ममाशयः ॥२७॥

अर्थ: जिनका स्वरूप तीनों लोकोंके लिए मङ्गल रूप है ऐसी पञ्चवर्णकी जिन-प्रतिमाओंको आदर पूर्वक नमस्कार करनेका मेरा भाव है ॥२७॥


हेमरत्नमयैः पुष्पैः पूजयामि जिनानिति । इयं मे महती श्रद्धा किमन्यदभिवाञ्छ्यते ॥२८॥

अर्थ: सुवर्ण तथा रत्नमयी पुष्पोंसे जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करूँ यह मेरी बड़ी श्रद्धा है । इसके सिवाय और क्या इच्छा करूँ ? ॥२८॥


एवमाकर्ण्य पद्माभः स्मेरवक्त्रः प्रमोदवान् । समादिशत् प्रतीहारीं तत्क्षणप्रणताङ्गिकाम् ॥२९॥

अयि कल्याणि ! निक्षेपममात्यो गद्यतामिति । जिनालयेषु क्रियतामर्चना महतीत्यलम् ॥३०॥

अर्थ: यह सुनकर हर्षसे मुसकराते हुए रामने तत्काल ही नम्रीभूत शरीरको धारण करनेवाली द्वारपालिनी से कहा कि हे कल्याणि ! विलम्ब किये विना ही मन्त्रीसे यह कहो कि जिनालयोंमें अच्छी तरह विशाल पूजा की जावे ॥२९-३०॥


महेन्द्रोदयमुद्यानं समेत्य सुमहादरम् । क्रियतां सर्वलोकेन सुशोभा जिनवेश्मनाम् ॥३१॥

अर्थ: सब लोग बहुत भारी आदरके साथ महेन्द्रोदय उद्यानमें जाकर जिन-मन्दिरोंकी शोभा करें ॥३१॥


तोरणैर्वैजयन्तीभिर्घण्टालम्बूषबुद्बुदैः । अर्धचन्द्रैर्वितानैश्च वस्त्रैश्च सुमनोहरैः ॥३२॥

तथोपकरणैरन्यैः समस्तैरतिसुन्दरैः । लोको मह्यां समस्तायां करोतु जिनपूजनम् ॥३३॥

अर्थ: तोरण, पताका, घंटा, लम्बूष, गोले, अर्धचन्द्र, चंदोवा, अत्यन्त मनोहर वस्त्र, तथा अत्यन्त सुन्दर अन्यान्य समस्त उपकरणोंके द्वारा लोग सम्पूर्ण पृथिवी पर जिन-पूजा करें ॥३२-३३॥


निर्वाणधामचैत्यानि विभूष्यन्तां विशेषतः । महानन्दाः प्रवर्त्यन्तां सर्वसम्पत्तिसङ्गताः ॥३४॥

अर्थ: निर्वाण क्षेत्रोंके मन्दिर विशेष रूपसे विभूषित किये जावें तथा सर्व सम्पत्तिसे सहित महा आनन्द - बहुत भारी हर्षके कारण प्रवृत्त किये जावें ॥३४॥


कल्याणं दोहदं तेषु वैदेह्याः प्रतिपूजयन् । विहराम्यनया साकं महिमानं समेधयन् ॥३५॥

अर्थ: उन सबमें पूजा करनेका जो सीताका दोहला है वह बहुत ही उत्तम है सो मैं पूजा करता हुआ तथा जिन शासन की महिमा बढ़ाता हुआ इसके साथ विहार करूँगा ॥३५॥


आदिष्टया तयेत्यात्मपदे कृत्वाऽऽत्मसस्मिताम् । यथोक्तं गदितोऽमात्यस्तेनादिष्टाः स्वकिङ्कराः ॥३६॥

अर्थ: इस प्रकार आज्ञा पाकर द्वारपालिनीने अपने स्थान पर अपने ही समान किसी दूसरी स्त्रीको नियुक्त कर रामके कहे अनुसार मन्त्रीसे कह दिया और मन्त्रीने भी अपने सेवकोंके लिए तत्काल आज्ञा दे दी ॥३६॥


व्यतिपत्य महोद्योगैस्ततस्तैः सम्मदान्वितैः । उपशोभा जिनेन्द्राणामालयेषु प्रवर्त्तिता ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर महान् उद्योगी एवं हर्षसे सहित उन सेवकोंने शीघ्र ही जाकर जिन-मन्दिरोंमें सजावट कर दी ॥३७॥


महागिरिगुहाद्वारगम्भीरेषु मनोहराः । स्थापिताः पूर्णकलशाः सुहारादिविभूषिताः ॥३८॥

अर्थ: महापर्वतकी गुफाओंके समान जो मन्दिरोंके विशाल द्वार थे उन पर उत्तम हार आदिसे अलंकृत पूर्ण कलश स्थापित किये गये ॥३८॥


मणिचित्रसमाकृष्टचित्ता परमपट्टकाः । प्रसारिता विशालासु हेममण्डलभित्तिषु ॥३९॥

अर्थ: मन्दिरोंकी सुवर्णमयी लम्बी-चौड़ी दीवालों पर मणिमय चित्रोंसे चित्तको आकर्षित करनेवाले उत्तमोत्तम चित्रपट फैलाये गये ॥३९॥


अत्यन्तविमलाः शुद्धाः स्तम्भेषु मणिदर्पणाः । हारा गवाक्षवक्त्रेषु स्वच्छनिर्झरहारिणः ॥४०॥

अर्थ: खम्भोंके ऊपर अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध मणियोंके दर्पण लगाये गये और झरोखोंके अग्रभागमें स्वच्छ झरनेके समान मनोहर हार लटकाये गये ॥४०॥


विचित्रा भक्तयो न्यस्ता रत्नचूर्णेन चारुणा । विभक्ताः पञ्चवर्णेन पादगोचरभूमिषु ॥४१॥

अर्थ: मनुष्योंके जहाँ चरण पड़ते थे ऐसी भूमियोंमें पाँच वर्णके रत्नमय सुन्दर चूर्णोंसे नाना प्रकारके बेल-बूटे खींचे गये थे ॥४१॥


न्यस्तानि शतपत्राणि सहस्रच्छदनानि च । देहलीकाण्डयुक्तानि कमलान्यपरत्र च ॥४२॥

अर्थ: जिनमें सौ अथवा हजार कलिकाएँ थीं तथा जो लम्बी डंडीसे युक्त थे ऐसे कमल उन मन्दिरोंकी देहलियों पर तथा अन्य स्थानों पर रक्खे गये थे ॥४२॥


हस्तसम्पर्कयोग्येषु स्थानेषु कृतमुज्ज्वलम् । किङ्किणीजालकं मत्तकामिनीसमनिःस्वनम् ॥४३॥

अर्थ: हाथसे पाने योग्य स्थानोंमें मत्त स्त्रीके समान शब्द करनेवाली उज्ज्वल छोटी-छोटी घंटियोंके समूह लगाये गये थे ॥४३॥


पञ्चवर्णैर्विकाराढ्यैश्चामरैर्मणिदण्डकैः । संयुक्ताः पट्टलम्बूषाः स्वायताङ्गाः प्रलम्बिताः ॥४४॥

अर्थ: जिनकी मणिमय डंडियाँ थीं ऐसे पाँचवर्णके कामदार चमरोंके साथ-साथ बड़ी-बड़ी हाँडियाँ लटकाई गईं थीं ॥४४॥


माल्यान्यत्यन्तचित्राणि प्रापितानि प्रसारणम् । सौरभाकृष्टभृङ्गाणि कृतान्युत्तमशिल्पिभिः ॥४५॥

अर्थ: जो सुगन्धिसे भ्रमरोंको आकर्षित कर रही थीं तथा उत्तम कारीगरोंने जिन्हें निर्मित किया था ऐसी नाना प्रकारकी मालाएँ फैलाई गई थीं ॥४५॥


विशालातोद्यशालाभिः कल्पिताभिश्च नैकशः । तथा प्रेक्षकशालाभिः तदुद्यानमलङ्कृतम् ॥४६॥

अर्थ: अनेकोंकी संख्यामें जगह-जगह बनाई गई विशाल वादनशालाओं और प्रेक्षकशालाओं - दर्शकगृहोंसे वह उद्यान अलंकृत किया गया था ॥४६॥


एवमत्यन्तचार्वीभिरत्युर्वीभिर्विभूतिभिः । महेन्द्रोदयमुद्यानं जातं नन्दनसुन्दरम् ॥४७॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त सुन्दर विशाल विभूतियोंसे वह महेन्द्रोदय उद्यान नन्दनवनके समान सुन्दर हो गया था ॥४७॥


अथ भूत्यासुरपतिवत्सपुरजनपदसमन्वितो देवीभिः । सर्वामात्यसमेतः पद्मः सीतान्वितो ययावुद्यानम् ॥४८॥

अर्थ: अथानन्तर नगरवासी तथा देशवासी लोगोंके साथ, स्त्रियोंके साथ, समस्त मन्त्रियोंके साथ, और सीताके साथ रामचन्द्रजी इन्द्रके समान बड़े वैभवसे उस उद्यानकी ओर चले ॥४८॥


परमं गजमारूढः सीतायुक्तो रराज बाढं पद्मः । ऐरावतपृष्ठगतः शच्या यथा दिवौकसां नाथः ॥४९॥

अर्थ: सीताके साथ-साथ उत्तम हाथी पर बैठे हुए राम ठीक उस तरह सुशोभित हो रहे थे जिस तरह इन्द्राणीके साथ ऐरावतके पृष्ठपर बैठा हुआ इन्द्र सुशोभित होता है ॥४९॥


नारायणोऽपि च यथा परमामृद्धिं समुद्वहन् याति स्म । शेषजनश्च सदार्हं हृष्टः स्फीतो महान्नपानसमृद्धः ॥५०॥

अर्थ: यथायोग्य ऋद्धिको धारण करनेवाले लक्ष्मण तथा हर्षसे युक्त एवं अत्यधिक अन्न पानकी सामग्रीसे सहित शेष लोग भी अपनी-अपनी योग्यताके अनुसार जा रहे थे ॥५०॥


कदलीगृहमनोहरगृहेष्वतिमुक्तकमण्डपेषु च मनोज्ञेषु । देव्यः स्थिता महद्धर्या यथार्हमन्यो जनश्च सुखमासीनः ॥५१॥

अर्थ: वहाँ जाकर देवियाँ मनोहर कदली गृहोंमें तथा अतिमुक्तक लताके सुन्दर निकुञ्जोंमें महावैभवके साथ ठहर गईं तथा अन्य लोग भी यथा योग्य स्थानोंमें सुखसे बैठ गये ॥५१॥


अवतीर्य गजाद् रामः कामः कमलोत्पलसङ्कुले समुद्रोदारे । सरसि सुखं विमलजले रेमे क्षीरोदसागरे शक्र इव ॥५२॥

अर्थ: हाथीसे उतर कर रामने कमलों तथा नील कमलोंसे व्याप्त एवं समुद्रके समान विशाल, निर्मल जलवाले सरोवरमें सुखपूर्वक उस तरह क्रीड़ा की जिस तरह कि क्षीरसागरमें इन्द्र करता है ॥५२॥


तस्मिन् सङ्क्रीड्य चिरं कृत्वा पुष्पोच्चयं जलादुत्तीर्य । दिव्येनार्चनविधिना वैदेह्या सङ्गतो जिनानानर्च ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर सरोवरमें चिर काल तक क्रीड़ा कर, उन्होंने फूल तोड़े और जलसे बाहर निकल कर पूजाकी दिव्य सामग्रीसे सीताके साथ मिलकर जिनेन्द्र भगवान्की पूजा की ॥५३॥


रामो मनोभिरामः काननलक्ष्मीसमाभिरुद्धस्त्रीभिः । कृतपरिवरणो रेजे वसन्त इव मूर्तिमानुपेतः श्रीमान् ॥५४॥

अर्थ: वनलक्ष्मियोंके समान उत्तमोत्तम स्त्रियोंसे घिरे हुए मनोहारी राम उस समय ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो शरीरधारी श्रीमान् वसन्त ही आ पहुँचा हो ॥५४॥


देवीभिरनुपमाभिः सोऽष्टसहस्रप्रमाणसङ्ख्याभिः ।
रेजे निर्मलदेहस्ताराभिरिवावृतो ग्रहाणामधिपः ॥५५॥

अर्थ: आठ हजार प्रमाण अनुपम देवियोंसे घिरे हुए, निर्मल शरीरके धारक राम उस समय ताराओंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥५५॥


अमृताहारविलेपनशयनासनवासगन्धमाल्यादिभवम् ।
शब्दरसरूपगन्धस्पर्शसुखं तत्र राम आपोदारम् ॥५६॥

अर्थ: उस उद्यानमें रामने अमृतमय आहार, विलेपन, शयन, आसन, निवास, गन्ध तथा माला आदिसे उत्पन्न होनेवाले शब्द, रस, रूप, गन्ध और स्पर्श सम्बन्धी उत्तम सुख प्राप्त किया था ॥५६॥


एवं जिनेन्द्रभवने प्रतिदिनपूजाविधानयोगरतस्य ।
रामस्य रतिः परमा जाता रवितेजसः सुदारयुतस्य ॥५७॥

अर्थ: इस प्रकार जिनेन्द्र मन्दिरमें प्रतिदिन पूजा-विधान करनेमें तत्पर सूर्यके समान तेजस्वी, उत्तम स्त्रियोंसे सहित रामको अत्यधिक प्रीति उत्पन्न हुई ॥५७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे जिनेन्द्रपूजादोहदाभिधानं नाम पञ्चनवतितमं पर्व ॥९५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें जिनेन्द्र पूजारूप दोहलेका वर्णन करनेवाला पंचानबेवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥९५॥


९६. षण्णवतितमं पर्व (जनपरीवादचिन्ताभिधानं)

उद्यानेऽवस्थितस्यैवं राघवस्य सुचेतसः । तृषिता इव सम्प्रापुः प्रजा दर्शनकांक्षया ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर जब इस प्रकार शुद्ध हृदयके धारक राम महेन्द्रोदय नामक उद्यानमें अवस्थित थे तब उनके दर्शनकी आकांक्षासे प्रजा उनके समीप इस प्रकार पहुँची मानो प्यासी ही हो ॥१॥


श्रावितं प्रतिहारीभिः पारम्पर्यात् प्रजागमम् । विज्ञाय दक्षिणस्याक्ष्णः स्पन्दं प्राप विदेहजा ॥२॥

अर्थ: ‘प्रजाका आगमन हुआ है’ यह समाचार परम्परासे प्रतिहारियोंने सीताको सुनाया, सो सीताने जिस समय इस समाचारको जाना उसी समय उसकी दाहिनी आँख फड़कने लगी ॥२॥


अचिन्तयच्च किं न्वेतन्निवेदयति मे परम् । दुःखस्याऽऽगमनं नेत्रमधस्तात् स्पन्दनं भजत् ॥३॥

अर्थ: सीताने विचार किया कि अधोभागमें फड़कनेवाला नेत्र मेरे लिए किस भारी दुःखके आगमनकी सूचना दे रहा है ॥३॥


पापेन विधिना दुःखं प्रापिता सागरान्तरे । दुष्टस्तेन न सन्तुष्टः किमन्यत् प्रापयिष्यति ॥४॥

अर्थ: पापी विधाताने मुझे समुद्रके बीच दुःख प्राप्त कराया है सो जान पड़ता है कि वह दुष्ट उससे संतुष्ट नहीं हुआ, देखूँ अब वह और क्या प्राप्त कराता है ? ॥४॥


निर्मितानां स्वयं शश्वत् कर्मणामुचितं फलम् । ध्रुवं प्राणिभिराप्तव्यं न तच्छक्यनिवारणम् ॥५॥

अर्थ: प्राणियोंने जो निरन्तर स्वयं कर्म उपार्जित किये हैं उनका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है - उसका निवारण करना शक्य नहीं है ॥५॥


उपगुण्य प्रयत्नेन शीतांशुकमिवांशुमान् । पालयन्नपि नित्यं स्वं कर्मणां फलमश्नुते ॥६॥

अगदच्च विचेतस्का देव्यो ब्रूत श्रुतागमाः । सम्यग्विचार्य मेऽधस्तान्नेत्रस्पन्दनजं फलम् ॥७॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य यद्यपि चन्द्रमाका पालन करता है परन्तु प्रयत्न पूर्वक अपने तेजसे उसे तिरोहित कर पालन करता है इसलिए वह निरन्तर अपने कर्मका फल भोगता है (?) व्याकुल होकर सीताने अन्य देवियोंसे कहा कि अहो देवियो ! तुमने तो आगमको सुना है इसलिए अच्छी तरह विचार कर कहो कि मेरे नेत्रके अधोभागके फड़कनेका क्या फल है ? ॥६-७॥


तासामनुमती नाम देवी निश्चयकोविदा । जगाद देवि को नाम विधिरन्योऽत्र दृश्यते ॥८॥

अर्थ: उन देवियोंके बीच निश्चय करनेमें निपुण जो अनुमती नामकी देवी थी वह बोली कि हे देवि ! इस संसारमें विधि नामका दूसरा कौन पदार्थ दिखाई देता है ? ॥८॥


यत् कर्म निर्मितं पूर्वं सितं मलिनमेव वा । स कृतान्तो विधिश्चासौ दैवं तच्च तदीश्वरः ॥९॥

अर्थ: पूर्व पर्यायमें जो अच्छा या बुरा कर्म किया है वही कृतान्त, विधि, दैव अथवा ईश्वर कहलाता है ॥९॥


कृतान्तेनाहमानीता व्यवस्थामेतिकामिति । पृथङ्निरूपणं तत्र जनस्याज्ञानसम्भवम् ॥१०॥

अर्थ: 'मैं पृथग् रहनेवाले कृतान्तके द्वारा इस अवस्थाको प्राप्त कराई गई हूँ, ऐसा जो मनुष्यका निरूपण करना है वह अज्ञानमूलक है ॥१०॥


अथातो गुणदोषज्ञा गुणमालेति कीर्त्तिता । जगाद सान्त्वनोद्युक्ता देवीं देवनयाऽन्विताम् ॥११॥

देवि त्वमेव देवस्य सर्वतोऽपि गरीयसी । तवैव च प्रसादेन जनस्यान्यस्य संयुता ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर गुण दोषको जाननेवाली गुणमाला नामकी दूसरी देवीने सान्त्वना देनेमें उद्यत हो दुःखिनी सीतासे कहा कि हे देवि ! प्राणनाथको तुम्हीं सबसे अधिक प्रिय हो और तुम्हारे ही प्रसादसे दूसरे लोगोंको सुखका योग प्राप्त होता है ॥११-१२॥


ततोऽहं न प्रपश्यामि सुयुक्तेनापि चेतसा । यत्ते यास्यति दुःखस्य कारणत्वं सुचेष्टिते ॥१३॥

अर्थ: इसलिए सावधान चित्तसे भी मैं उस पदार्थको नहीं देखता जो हे सुचेष्टिते ! तुम्हारे दुःखका कारणपना प्राप्त कर सके ॥१३॥


अन्यास्तत्र जगुर्देव्यो देव्यत्र जनितेन किम् । वितर्केण विशालेन शान्तिकर्म विधीयताम् ॥१४॥

अर्थ: उक्त दोके सिवाय जो वहाँ अन्य देवियाँ थीं उन्होंने कहा कि हे देवि ! इस विषयमें अत्यधिक तर्क-वितर्क करनेसे क्या लाभ है ? शान्तिकर्म करना चाहिए ॥१४॥


अभिषेकैर्जिनेन्द्राणामत्युदारैश्च पूजनैः । दानैरिच्छाभिपूरैश्च क्रियतामशुभेरणम् ॥१५॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के अभिषेक, अत्युदार पूजन और किमिच्छक दानके द्वारा अशुभ कर्मको दूर हटाना चाहिए ॥१५॥


एवमुक्ता जगौ सीता देव्यः साधु समीरितम् । दानं पूजाऽभिषेकश्च तपश्चाशुभसूदनम् ॥१६॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर सीताने कहा कि हे देवियो ! आप लोगोंने ठीक कहा है क्योंकि दान, पूजा, अभिषेक और तप अशुभ कर्मोंको नष्ट करनेवाला है ॥१६॥


विघ्नानां नाशनं दानं रिपूणां वैरनाशनम् । पुण्यस्य समुपादानं महतो यशसस्तथा ॥१७॥

अर्थ: दान विघ्नोंका नाश करनेवाला है, शत्रुओंका वैर दूर करनेवाला है, पुण्यका उपादान है तथा बहुत भारी यशका कारण है ॥१७॥


इत्युक्त्वा भद्रकलशं समाहूय जगाविति । किमिच्छदानमासूतेर्दीयतां प्रतिवासरम् ॥१८॥

अर्थ: इतना कहकर सीताने भद्रकलश नामक कोषाध्यक्षको बुलाकर कहा कि प्रसूति पर्यन्त प्रतिदिन किमिच्छक दान दिया जावे ॥१८॥


यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा द्रविणाधिकृतो ययौ । इयमप्यादरे तस्थौ जिनपूजादिगोचरे ॥१९॥

अर्थ: ‘जैसी आज्ञा हो’ यह कहकर उधर कोषाध्यक्ष चला गया और इधर यह सीता भी जिनपूजा आदि सम्बन्धी आदरमें निमग्न हो गई ॥१९॥


ततो जिनेन्द्रगेहेषु तूर्यशब्दाः समुद्ययुः । शङ्खकोटिरवोन्मिश्राः प्रावड्घनरवोपमाः ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर जिन मन्दिरोंमें करोड़ों शङ्खोंके शब्दमें मिश्रित, एवं वर्षाकालिक मेघ गर्जनाकी उपमा धारण करनेवाले तुरही आदि वादित्रोंके शब्द उठने लगे ॥२०॥


जिनेन्द्रचरितन्यस्तचित्रपट्टाः प्रसारिताः । पयोघृतादिसम्पूर्णाः कलशाः समुपाहृताः ॥२१॥

अर्थ: जिनेन्द्र भगवान्के चरित्रसे सम्बन्ध रखनेवाले चित्रपट फैलाये गये और दूध, घृत आदिसे भरे हुए कलश बुलाये गये ॥२१॥


भूषिताङ्गो द्विपारूढः कञ्चुकी सितवस्त्रभृत् । कः केनार्थीत्ययोध्यायां घोषणामददात् स्वयम् ॥२२॥

अर्थ: आभूषणोंसे आभूषित तथा श्वेत वस्त्रको धारण करनेवाले कञ्चुकीने हाथी पर सवार हो अयोध्यामें स्वयं यह घोषणा दी कि कौन किस पदार्थकी इच्छा रखता है ? ॥२२॥


एवं सुविधिना दानं महोत्साहमदीयत । विविधं नियमं देवी निजशक्त्या चकार च ॥२३॥

अर्थ: इस प्रकार विधि पूर्वक बड़े उत्साहसे दान दिया जाने लगा और देवी सीताने अपनी शक्तिके अनुसार नाना प्रकारके नियम ग्रहण किये ॥२३॥


प्रावर्त्यन्त महापूजा अभिषेकाः सुसम्पदः । पापवस्तुनिवृत्तात्मा बभूव समधीर्जनः ॥२४॥

अर्थ: उत्तम वैभवके अनुरूप महापूजाएँ और अभिषेक किये गये तथा मनुष्य पापपूर्ण वस्तुसे निवृत्त हो शान्तचित्त हो गये ॥२४॥


इतिक्रियाप्रसक्तायां सीतायां शान्तचेतसि । आस्थानमण्डपे तस्थौ दर्शने शक्रवद्बलः ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार जब शान्त चित्तकी धारक सीता दान आदि क्रियाओंमें आसक्त थी तब रामचन्द्र इन्द्रके समान सभामण्डपमें आसीन थे ॥२५॥


प्रतीहारविनिर्मुक्तद्वाराः सम्भ्रान्तचेतसः । ततो जनपदाः सैंहं धामेवास्थानमाश्रिताः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर द्वारपालोंने जिन्हें द्वार छोड़ दिये थे तथा जिनके चित्त व्यग्र थे ऐसे देशवासी लोग सभा मण्डपमें उस तरह डरते-डरते पहुँचे जिस तरह कि मानो सिंहके स्थान पर ही जा रहे हों ॥२६॥


रत्नकाञ्चननिर्माणामदृष्टां जातुचित् पुनः । सभामालोक्य गम्भीरां प्रजानां चलितं मनः ॥२७॥

अर्थ: रत्न और सुवर्णसे जिसकी रचना हुई थी तथा जो पहले कभी देखनेमें नहीं आई थी ऐसी इस गम्भीर सभाको देखकर प्रजाके लोगोंका मन चञ्चल हो गया ॥२७॥


हृदयानन्दनं राममालोक्य नयनोत्सवम् । उल्लसन् मनसो नेमुः प्रबद्धाञ्जलयः प्रजाः ॥२८॥

अर्थ: हृदयको आनन्दित करनेवाले और नेत्रोंको उत्सव देनेवाले श्रीरामको देखकर जिनके चित्त खिल उठे थे ऐसे प्रजाके लोगोंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया ॥२८॥


वीक्ष्य कम्पितदेहास्ता मुहुः कम्पितमानसाः । पद्मो जगाद भो भद्रा ब्रूतागमनकारणम् ॥२९॥

अर्थ: जिनके शरीर कम्पित थे तथा जिनका मन बार-बार काँप रहा था ऐसे प्रजाजनोंको देखकर रामने कहा कि अहो भद्रजनो ! अपने आगमनका कारण कहो ॥२९॥


विजयोऽथ सुराजिश्च मधुमान् वसुलो धरः । काश्यपः पिङ्गलः कालः क्षेमाद्याश्च महत्तराः ॥३०॥

निश्चलारचरणन्यस्तलोचना गलितौजसः । न किञ्चिदूचुराक्रान्ताः प्रभावेण महीपतेः ॥३१॥

अर्थ: अथानन्तर विजय, सुराजि, मधुमान्, वसुल, धर, काश्यप, पिङ्गल, काल और क्षेम आदि बड़े-बड़े पुरुष, राजा रामचन्द्रजीके प्रभावसे आक्रान्त हो कुछ भी नहीं कह सके । वे चरणोंमें नेत्र लगाकर निश्चल खड़े रहे और सबका ओज समाप्त हो गया ॥३०-३१॥


चिरादुत्सहते वक्तुं मतिर्यद्यपि कृच्छ्रतः । निःक्रामति तथाप्येषा वक्त्रागारान्न वाग्वधूः ॥३२॥

अर्थ: यद्यपि उनकी बुद्धि कुछ कहनेके लिए चिरकालसे उत्साहित थी तथापि उनकी वाणी रूपी वधू मुखरूपी घरसे बड़ी कठिनाईसे नहीं निकलती थी ॥३२॥


गिरा सान्त्वनकारिण्या पद्मः पुनरभाषत । ब्रूत स्वागतिनो ब्रूत कैमर्थ्येन समागताः ॥३३॥

अर्थ: तदनन्तर रामने सान्त्वना देने वाली वाणीसे पुनः कहा कि आप सबलोगोंका स्वागत है। कहिये आप सब किस प्रयोजनसे यहाँ आये हैं ॥३३॥


इत्युक्ता अपि ते भूयः समस्तकरणोज्झिताः । तस्थुः पुस्त इव न्यस्ताः सुनिष्णातेन शिल्पिना ॥३४॥

अर्थ: इतना कहने पर भी वे पुनः समस्त इंद्रियोंसे रहितके समान खड़े रहे । निश्चल खड़े हुए वे सब ऐसे जान पड़ते थे कि मानो किसी कुशल कारीगरने उन्हें मिट्टी आदिके खिलौनेके रूपमें रच कर निक्षिप्त किया हो - वहाँ रख दिया हो ॥३४॥


ह्रीपाशकण्ठबद्धास्ते किञ्चिच्चञ्चललोचनाः । अर्भका इव सारङ्गा जग्लुराकुलचेतसः ॥३५॥

अर्थ: जिनके कण्ठ लज्जा रूपी पाशसे बँधे हुए थे, जो मृगोंके बच्चोंके समान कुछ कुछ चञ्चल लोचनवाले थे तथा जिनके हृदय अत्यन्त आकुल हो रहे थे ऐसे वे प्रजाजन उल्लाससे रहित हो गये - म्लान मुख हो गये ॥३५॥


ततः प्राग्रहरस्तेषामुवाच चलिताक्षरम् । देवाभयप्रसादेन प्रसादः क्रियतामिति ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर उनमें जो मुखिया था वह जिस किसी तरह टूटे-फूटे अक्षरोंमें बोला कि हे देव ! अभय दान देकर प्रसन्नता कीजिये ॥३६॥


ऊचे नरपतिर्भद्रा न किञ्चिद्भवतां भयम् । प्रकाशयत चित्तस्थं स्वस्थतामुपगच्छत ॥३७॥

अर्थ: तब राजा रामचन्द्रने कहा कि हे भद्र पुरुषो ! आप लोगोंको कुछ भी भय नहीं है, हृदयमें स्थित बातको प्रकट करो और स्वस्थताको प्राप्त होओ ॥३७॥


अवद्यं सकलं त्यक्त्वा साध्विदानीं भजाम्यहम् । मिश्रीभूतं जलं त्यक्त्वा यथा हंसः स्तनोद्भवम् ॥३८॥

अर्थ: मैं इस समय समस्त पापका परित्याग कर उस तरह निर्दोष वस्तुको ग्रहण करता हूँ जिस प्रकार कि हंस मिले हुए जलको छोड़कर केवल दूधको ग्रहण करता है ॥३८॥


अभयेऽपि ततो लब्धे कृच्छ्रप्रस्थापिताक्षरः । जगाद मन्दनिःस्वानो विजयोऽञ्जलिमस्तकः ॥३९॥

विज्ञाप्यं श्रूयतां नाथ पद्मनाभ नरोत्तम । प्रजाधुनाऽखिला जाता मर्यादारहितात्मिका ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर अभय प्राप्त होने पर भी जो बड़ी कठिनाईसे अक्षरोंको स्थिर कर सका था ऐसा विजय नामक पुरुष हाथ जोड़ मस्तकसे लगा मन्द स्वरमें बोला कि हे नाथ ! हे राम ! हे नरोत्तम ! मैं जो निवेदन करना चाहता हूँ उसे सुनिये, इस समय समस्त प्रजा मर्यादासे रहित हो गई है ॥३९-४०॥


स्वभावादेव लोकोऽयं महाकुटिलमानसः । प्रकटं प्राप्य दृष्टान्तं न किञ्चित्तस्य दुष्करम् ॥४१॥

अर्थ: यह मनुष्य स्वभावसे ही महाकुटिलचित्त है फिर यदि कोई दृष्टान्त प्रकट मिल जाता है तो फिर उसे कुछ भी कठिन नहीं रहता ॥४१॥


परमं चापलं धत्ते निसर्गेण प्लवङ्गमः । किमङ्ग पुनरारुह्य चपलं यन्त्रपञ्जरम् ॥४२॥

अर्थ: वानर स्वभावसे ही परम चञ्चलता धारण करता है फिर यदि चञ्चल यन्त्र रूपी पञ्जर पर आरूढ़ हो जावे तो कहना ही क्या है ॥४२॥


तरुण्यो रूपसम्पन्नाः पुंसामल्पबलात्मनाम् । ह्रियन्ते बलिभिः छिद्रे पापचित्तैः प्रसह्य च ॥४३॥

अर्थ: जिनके चित्तमें पाप समाया हुआ है ऐसे बलवान् मनुष्य अवसर पाकर निर्बल मनुष्योंकी तरुण स्त्रियोंको बलात् हरने लगे हैं ॥४३॥


प्राप्तदुःखां प्रियां साध्वीं विरहात्यन्तदुःखितः । कश्चित् सहायमासाद्य पुनरानयते गृहम् ॥४४॥

अर्थ: कोई मनुष्य अपनी साध्वी प्रियाको पहले तो परित्यक्त कर अत्यन्त दुखी करता है फिर उसके विरहसे स्वयं अत्यन्त दुखी हो किसीकी सहायतासे उसे घर बुलवा लेता है ॥४४॥


प्रलीनधर्ममर्यादा यावन्नश्यति नावनिः । उपायश्चिन्त्यतां तावत्प्रजानां हितकाम्यया ॥४५॥

अर्थ: इसलिए हे नाथ ! धर्मकी मर्यादा छूट जानेसे जबतक पृथ्वी नष्ट नहीं हो जाती है तब तक प्रजाके हितकी इच्छासे कुछ उपाय सोचा जाय ॥४५॥


राजा मनुष्यलोकेऽस्मिन्नधुना त्वं यदा प्रजाः । न पासि विधिना नाशमिमा यान्ति तदा ध्रुवम् ॥४६॥

अर्थ: आप इस समय मनुष्य लोकके राजा होकर भी यदि विधि पूर्वक प्रजाकी रक्षा नहीं करते हैं तो वह अवश्य ही नाशको प्राप्त हो जायगी ॥४६॥


नद्युद्यानसभाग्रामप्रपाध्वपुरवेश्मसु । अवर्णवादमेकं ते मुक्त्वा नान्यास्ति सङ्कथा ॥४७॥

स तु दाशरथी रामः सर्वशास्त्रविशारदः । हृतां विद्याधरेशेन जानकीं पुनरानयत् ॥४८॥

अर्थ: नदी, उपवन, सभा, ग्राम, प्याऊ, मार्ग, नगर तथा घरोंमें इस समय आपके इस एक अवर्णवादको छोड़कर और दूसरी चर्चा ही नहीं है कि राजा दशरथके पुत्र राम समस्त शास्त्रों में निपुण होकर भी विद्याधरोंके अधिपति रावणके द्वारा हृत सीताको पुनः वापिस ले आये ॥४७-४८॥


तत्र नूनं न दोषोऽस्ति कश्चिदप्येवमाश्रिते । व्यवहारेऽपि विद्वांसः प्रमाणं जगतः परम् ॥४९॥

किं च यादृशमुर्वीशः कर्मयोगं निषेवते । स एव सहतेऽस्माकमपि नाथानुवर्तिनाम् ॥५०॥

अर्थ: यदि हम लोग भी ऐसे व्यवहारका आश्रय लें तो उसमें कुछ भी दोष नहीं है क्योंकि जगत्के लिए तो विद्वान् ही परम प्रमाण हैं। दूसरी बात यह है कि राजा जैसा काम करता है वैसा ही काम उसका अनुकरण करनेवाले हम लोगोंमें भी बलात् होने लगता है ॥४९-५०॥


एवं प्रदुष्टचित्तस्य वदमानस्य भूतले । निरङ्कुशस्य लोकस्य काकुत्स्थ कुरु निग्रहम् ॥५१॥

अर्थ: इस प्रकार दुष्ट हृदय मनुष्य स्वच्छन्द होकर पृथिवी पर अपवाद कर रहे हैं सो हे काकुत्स्थ ! उनका निग्रह करो ॥५१॥


एक एव हि दोषोऽयमभविष्यन्न चेत्ततः । व्यलम्बयिष्यदेतत्ते राज्यमाखण्डलेशताम् ॥५२॥

अर्थ: यदि आपके राज्यमें एक यही दोष नहीं होता तो यह राज्य इन्द्रके भी साम्राज्य को विलम्बित कर देता ॥५२॥


एवमुक्तं समाकर्ण्य क्षणमेकमभून्नृपः । विषादमुद्गराघातविचलद्धृदयो भृशम् ॥५३॥

अर्थ: इस प्रकार उक्त निवेदनको सुनकर एक क्षणके लिए राम, विषाद रूपी मुद्गरकी चोटसे जिनका हृदय अत्यन्त विचलित हो रहा था ऐसे हो गये ॥५३॥


अचिन्तयच्च हा कष्टमिदमन्यत्समागतम् । यद्यशोम्बुजखण्डं मे दग्धुं लग्नोऽयशोऽनलः ॥५४॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि हाय हाय, यह बड़ा कष्ट आ पड़ा। जो मेरे यश रूपी कमलवनको जलानेके लिए अपयशरूपी अग्नि लग गई ॥५४॥


यत्कृतं दुःसहं सोढं विरहव्यसनं मया । सा क्रिया कुलचन्द्रं मे प्रकरोति मलीमसम् ॥५५॥

अर्थ: जिसके द्वारा किया हुआ विरहका दुःसह दुःख मैंने सहन किया है वही क्रिया मेरे कुल रूपी चन्द्रमाको अत्यन्त मलिन कर रही है ॥५५॥


विनीतां यां समुद्दिश्य प्रवीराः कपिकेतवः । करोति मलिनां सीता सा मे गोत्रकुमुद्वतीम् ॥५६॥

अर्थ: जिस विनयवती सीताको लक्ष्य कर वानरोंने वीरता दिखाई वही सीता मेरे गोत्ररूपी कुमुदिनीको मलिन कर रही है ॥५६॥


यदर्थमब्धिमुत्तीर्य रिपुध्वंसि रणं कृतम् । करोति कलुषं सा मे जानकी कुलदर्पणम् ॥५७॥

अर्थ: जिसके लिए मैंने समुद्र उतर कर शत्रुओंका संहार करनेवाला युद्ध किया था वही जानकी मेरे कुलरूपी दर्पणको मलिन कर रही है ॥५७॥


युक्तं जनपदो वक्ति दुष्टपुंसि परालये । अवस्थिता कथं सीता लोकनिन्द्या मयाहृता ॥५८॥

अर्थ: देशके लोग ठीक ही तो कहते हैं कि जिस घरका पुरुष दुष्ट है, ऐसे पराये घरमें स्थित लोक निन्द्य सीताको मैं क्यों ले आया ? ॥५८॥


अपश्यन् क्षणमात्रं यां भवामि विरहाकुलः । अनुरक्तां त्यजाम्येतां दयितामधुना कथम् ॥५९॥

अर्थ: जिसे मैं क्षणमात्र भी नहीं देखता तो विरहाकुल हो जाता हूँ इस अनुरागसे भरी प्रिय दयिताको इस समय कैसे छोड़ दूँ ? ॥५९॥


चक्षुर्मानसयोर्वासं कृत्वा याऽवस्थिता मम । गुणधानीमदोषां तां कथं मुञ्चामि जानकीम् ॥६०॥

अर्थ: जो मेरे चक्षु और मनमें निवास कर अवस्थित है उस गुणोंकी भाण्डार एवं निर्दोष सीताका परित्याग कैसे कर दूँ ? ॥६०॥


अथवा वेत्ति नारीणां चेतसः को विचेष्टितम् । दोषाणां प्रभवो यासु साक्षाद्वसति मन्मथः ॥६१॥

अर्थ: अथवा उन स्त्रियोंके चित्तकी चेष्टा को कौन जानता है जिनमें दोषोंका कारण काम साक्षात् निवास करता है ॥६१॥


धिक्स्त्रियं सर्वदोषाणामाकरं तापकारणम् । विशुद्धकुलजातानां पुंसां पङ्कं सुदुस्त्यजम् ॥६२॥

अर्थ: जो समस्त दोषोंकी खान है । संतापका कारण है तथा निर्मलकुलमें उत्पन्न हुए मनुष्योंके लिए कठिनाईसे छोड़ने योग्य पङ्क स्वरूप है उस स्त्रीके लिए धिक्कार है ॥६२॥


अभिहन्त्रीं समस्तानां बलानां रागसंश्रयाम् । स्मृतीनां परमं भ्रंशं सत्यस्खलनखातिकाम् ॥६३॥

विघ्नं निर्वाणसौख्यस्य ज्ञानप्रभवसूदनीम् । भस्मच्छन्नाग्निसङ्काशां दर्भसूचीसमानिकाम् ॥६४॥

दृङ्मात्ररमणीयां तां निर्मुक्तमिव पन्नगः । तस्मात्त्यजामि वैदेहीं महादुःखजिहासया ॥६५॥

अर्थ: यह स्त्री समस्त बलोंको नष्ट करने वाली है, रागका आश्रय है, स्मृतियोंके नाशका परम कारण है, सत्यव्रतके स्खलित होनेके लिए खाई रूप है, मोक्ष सुखके लिए विघ्न स्वरूप है, ज्ञानकी उत्पत्तिको नष्ट करने वाली है, भस्मसे आच्छादित अग्निके समान है, डाभकी अनीके तुल्य है अथवा देखने मात्रमें रमणीय है । इसलिए जिस प्रकार साँप काँचुलीको छोड़ देता है उसी प्रकार मैं महादुःखको छोड़नेकी इच्छासे सीताको छोड़ता हूँ ॥६३-६५॥


अशून्यं सर्वदा तीव्रस्नेहबन्धवशीकृतम् । यया मे हृदयं मुख्यां विरहामि कथं तकाम् ॥६६॥

अर्थ: उत्कट स्नेह रूपी बन्धनसे वशीभूत हुआ मेरा हृदय सदा जिससे अशून्य रहता है उस मुख्य सीताको कैसे छोड़ दूँ ? ॥६६॥


यद्यप्यहं स्थिरस्वान्तस्तथाप्यासन्नवर्तिनी । अर्चिर्वन्मम वैदेही मनोविलयनक्षमा ॥६७॥

अर्थ: यद्यपि मैं दृढ चित्त हूँ तथापि समीप में रहने वाली सीता ज्वालाके समान मेरे मनको विलीन करनेमें समर्थ है ॥६७॥


मन्ये दूरस्थिताऽप्येषा चन्द्ररेखा कुमुद्वतीम् । यथा चालयितुं शक्ता धृतिं मम मनोहरा ॥६८॥

अर्थ: मैं मानता हूँ कि जिस प्रकार चन्द्रमाकी रेखा दूरवर्तिनी होकर भी कुमुदिनीको विचलित करनेमें समर्थ है उसी प्रकार यह सुन्दरी सीता भी मेरे धैर्यको विचलित करनेमें समर्थ है ॥६८॥


इतो जनपरीवादश्चेतः स्नेहः सुदुस्त्यजः । अहोऽस्मि भयरागाभ्यां प्रक्षिप्तो गहनान्तरे ॥६९॥

अर्थ: इस ओर लोकनिन्दा है और दूसरी ओर कठिनाईसे छूटने योग्य स्नेह है । अहो ! मुझे भय और रागने सघन वनके बीचमें ला पटका है ॥६९॥


श्रेष्ठा सर्वप्रकारेण दिवौकोयोषितामपि । कथं त्यजामि तां साध्वीं प्रीत्या यातामिवैकताम् ॥७०॥

अर्थ: जो देवाङ्गनाओंमें भी सब प्रकारसे श्रेष्ठ है तथा जो प्रीतिके कारण मानो एकताको प्राप्त है उस साध्वी सीताको कैसे छोड़ दूँ ॥७०॥


एतां यदि न मुञ्चामि साक्षाद्दुःकीर्त्तिमुद्गताम् । कृपणो मत्समो मह्यां तदैतस्यां न विद्यते ॥७१॥

अर्थ: अथवा उठी हुई साक्षात् अपकीर्तिके समान इसे यदि नहीं छोड़ता हूँ तो पृथिवी पर इसके विषयमें मेरे समान दूसरा कृपण नहीं होगा ॥७१॥


स्नेहापवादभयसङ्गतमानसस्य व्यामिश्रतीव्ररसवेगवशीकृतस्य ।
रामस्य गाढपरितापसमाकुलस्य कालस्तदा निरुपमः स बभूव कृच्छ्रः ॥७२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जिनका मन स्नेह अपवाद और भयसे संगत था, जो मिश्रित तीव्र रसके वेगसे वशीभूत थे, तथा जो अत्यधिक संतापसे व्याकुल थे ऐसे रामका वह समय उन्हें अनुपम दुःख स्वरूप हुआ था ॥७२॥


विरुद्धपूर्वोत्तरमाकुलं परं विसन्धिसातेतरवेदनान्वितम् ।
अभूदिदं केसरिकेतुचिन्तनं निदाघमध्याह्नरवेः सुदुःसहम् ॥७३॥

अर्थ: जिसमें पूर्वापर विरोध पड़ता था जो अत्यन्त आकुलता रूप था, जो स्थिर अभिप्रायसे रहित था और दुःखके अनुभवसे सहित था ऐसा यह रामका चिन्तन उन्हें ग्रीष्मऋतु सम्बन्धी मध्याह्नके सूर्यसे भी अधिक अत्यन्त दुःसह था ॥७३॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे जनपरीवादचिन्ताभिधानं नाम षण्णवतितमं पर्व ॥९६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लोकनिन्दाकी चिन्ताका उल्लेख करनेवाला छियानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९६॥


९७. सप्तनवतितमं पर्व (सीतानिर्वासनविप्रलापवज्रजङ्घगमनाभिधानं)

ततः कथमपि न्यस्य चिन्तामेकत्र वस्तुनि । आज्ञापयत् प्रतीहारं लक्ष्मणाकारणं प्रति ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर किसी तरह एक वस्तुमें चिन्ताको स्थिर कर श्रीरामने लक्ष्मणको बुलानेके लिए द्वारपालको आज्ञा दी ॥१॥


प्रतीहारवचः श्रुत्वा लक्ष्मणः सम्भ्रमान्वितः । तुरङ्गं चलमारुह्य कृत्येक्षागतमानसः ॥२॥

रामस्यासन्नतां प्राप्य प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । आसीनो भूतले रम्ये तत्पादनिहितेक्षणः ॥३॥

अर्थ: कार्योंके देखनेमें जिनका मन लग रहा था ऐसे लक्ष्मण, द्वारपालके वचन सुन हड़बड़ाहटके साथ चञ्चल घोड़े पर सवार हो श्रीरामके निकट पहुँचे और हाथ जोड़ नमस्कार कर उनके चरणोंमें दृष्टि लगाये हुए मनोहर पृथिवी पर बैठ गये ॥२-३॥


स्वयमुत्थाप्य तं पद्मो विनयानतविग्रहम् । परमाश्रवताभाजं चक्रेऽर्धासनसङ्गतम् ॥४॥

अर्थ: जिनका शरीर विनयसे नम्रीभूत था तथा जो परम आज्ञाकारी थे ऐसे लक्ष्मणको स्वयं उठाकर रामने अर्धासन पर बैठाया ॥४॥


शत्रुघ्नाग्रेसराः भूपाश्चन्द्रोदरसुतादयः । तथाऽविशन् कृतानुज्ञा आसीनाश्च यथोचितम् ॥५॥

अर्थ: जिनमें शत्रुघ्न प्रधान था ऐसे विराधित आदि राजा भी आज्ञा लेकर भीतर प्रविष्ट हुए और सब यथायोग्य स्थानों पर बैठ गये ॥५॥


पुरोहितः पुरः श्रेष्ठी मन्त्रिणोऽन्ये च सज्जनाः । यथायोग्यं समासीनाः कुतूहलसमन्विताः ॥६॥

अर्थ: पुरोहित, नगरसेठ, मन्त्री तथा अन्य सज्जन कुतूहलसे युक्त हो यथायोग्य स्थान पर बैठ गये ॥६॥


ततः क्षणमिव स्थित्वा बलदेवो यथाक्रमम् । लक्ष्मणाय परीवादसमुत्पत्तिं न्यवेदयत् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर क्षण भर ठहर कर रामने यथाक्रमसे लक्ष्मणके लिए अपवाद उत्पन्न होनेका समाचार सुनाया ॥७॥


तदाकर्ण्य सुमित्राजो रोषलोहितलोचनः । सन्नद्धुमादिशन् योधानिदं च पुनरभ्यधात् ॥८॥

अद्य गच्छाम्यहं शीघ्रमन्तं दुर्जनवारिधेः । करोमि धरणीं मिथ्यावाक्यजिह्वातिरोहिताम् ॥९॥

अर्थ: सो उसे सुनकर लक्ष्मणके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उन्होंने उसी समय योद्धाओंको तैयार होनेका आदेश दिया तथा स्वयं कहा कि मैं आज दुर्जन रूपी समुद्रके अन्तको प्राप्त होता हूँ और मिथ्यावादी लोगोंकी जिह्वाओंसे पृथिवीको आच्छादित करता हूँ ॥८-९॥


उपमानविनिर्मुक्तशीलसम्भारधारिणीम् । द्विषन्ति गुणगम्भीरां सीतां ये तान्नये क्षयम् ॥१०॥

अर्थ: अनुपम शीलके समूहको धारण करनेवाली एवं गुणोंसे गम्भीर सीताके प्रति जो द्वेष करते हैं मैं उन्हें आज क्षयको प्राप्त कराता हूँ ॥१०॥


ततो दुरीक्षितां प्राप्तं हरिं क्रोधवशीकृतम् । संक्षुब्धसंसदं वाक्यैरिमैरशमयन्नृपः ॥११॥

सौम्यर्षभकृतौपम्यैः सदृशैर्भरतस्य च । महीसागरपर्यन्ता पालितेयं नरोत्तमैः ॥१२॥

अर्थ: तदनन्तर जो क्रोधके वशीभूत हो दुर्दर्शनीय अवस्थाको प्राप्त हुए थे तथा जिन्होंने सभाको क्षोभ युक्त कर दिया था ऐसे लक्ष्मणको रामने इन वचनोंसे शान्त किया कि हे सौम्य ! यह समुद्रान्त पृथिवी भगवान् ऋषभदेव तथा भरत चक्रवर्ती जैसे उत्तमोत्तम पुरुषोंके द्वारा चिरकालसे पालित है ॥११-१२॥


इक्ष्वाकुवंशतिलका आदित्ययशसादयः । आसन्नेषां रणे पृष्ठं दृष्टं नेन्दोरिवारिभिः ॥१३॥

अर्थ: अर्ककीर्ति आदि राजा इक्ष्वाकुवंशके तिलक थे । जिस प्रकार कोई चन्द्रमाकी पीठ नहीं देख सकता उसी प्रकार इनकी पीठ भी युद्धमें शत्रु नहीं देख सके थे ॥१३॥


तेषां यशःप्रतानेन कौमुदीपटशोभिना । अलङ्कृतमिदं लोकत्रितयं रहितान्तरम् ॥१४॥

अर्थ: चाँदनी रूपी पटके समान सुशोभित उनके यशके समूहसे ये तीनों लोक निरन्तर सुशोभित हैं ॥१४॥


कथं तद्रागमात्रस्य कृते पापस्य भङ्गिनः । वहन्निरर्थकं प्राणान् विदधामि मलीमसम् ॥१५॥

अर्थ: निष्प्रयोजन प्राणोंको धारण करता हुआ मैं, पापी एवं भङ्गुर स्नेहके लिए उस कुलको मलिन कैसे कर दूँ ? ॥१५॥


अकीर्त्तिः परमल्पापि याति वृद्धिमुपेक्षिता । कीर्त्तिरल्पापि देवानामपि नाथैः प्रयुज्यते ॥१६॥

अर्थ: अल्प भी अकीर्ति उपेक्षा करने पर वृद्धिको प्राप्त हो जाती है और थोड़ी भी कीर्ति इन्द्रोंके द्वारा भी प्रयोगमें लाई जाती है - गाई जाती है ॥१६॥


भोगैः किं परमोदारैरपि प्रक्षयवत्सलैः । कीर्त्युद्यानं प्ररूढं यद्दह्यतेऽकीर्तिवह्निना ॥१७॥

अर्थ: जब कि अकीर्ति रूपी अग्निके द्वारा हरा-भरा कीर्तिरूपी उद्यान जल रहा है तब इन नश्वर विशाल भोगोंसे क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ? ॥१७॥


तच्चैतच्छस्त्रशास्त्राणां वध्यं नावर्णभाषितम् । देव्यामस्मद्गृहस्थायां सत्यामपि सुचेतसि ॥१८॥

अर्थ: मैं जानता हूँ कि देवी सीता, सती और शुद्ध हृदयवाली नारी है पर जब तक वह हमारे घरमें स्थित रहती है तब तक यह अवर्णवाद शस्त्र और शास्त्रोंके द्वारा दूर नहीं किया जा सकता ॥१८॥


पश्याम्भोजवनानन्दकारिणस्तिग्मतेजसः । अस्तं यातस्य को रात्रौ सत्यामस्ति निवर्त्तकः ॥१९॥

अर्थ: देखो, कमल वनको आनन्दित करनेवाला सूर्य रात्रि होते ही अस्त हो जाता है सो उसे रोकनेवाला कौन है ? ॥१९॥


अपवादरजोभिर्मे महाविस्तारगामिभिः । छायायाः क्रियते हानं मा भूदेतदवारणम् ॥२०॥

अर्थ: महाविस्तारको प्राप्त होनेवाली अपवाद रूपी रजसे मेरी कान्तिका ह्रास किया जा रहा है सो यह अनिवारित न रहे - इसकी रुकावट होना चाहिए ॥२०॥


शशाङ्कविमलं गोत्रमकीर्त्तिघनलेखया । मारुधत्प्राप्य मां भ्रातरित्यहं यत्नतत्परः ॥२१॥

अर्थ: हे भाई ! चन्द्रमाके समान निर्मल कुल मुझे पाकर अकीर्ति रूपी मेघकी रेखासे आवृत न हो जाय इसीलिए मैं यत्न कर रहा हूँ ॥२१॥


शुष्केन्धनमहाकूटे सलिलाप्लाववर्जितः । मावर्द्धिष्ट यथा वह्निरयशो भुवने कृतम् ॥२२॥

अर्थ: जिस प्रकार सूखे ईन्धनके समूहमें जलके प्रवाहसे रहित अग्नि बढ़ती जाती है उस प्रकार उत्पन्न हुआ यह अपयश संसारमें बढ़ता न रहे ॥२२॥


कुलं महार्हमेतन्मे प्रकाशममलोज्ज्वलम् । यावत्कलङ्क्यते नाऽरं तावदौपायिकं कुरु ॥२३॥

अर्थ: मेरा यह महायोग्य, प्रकाशमान, अत्यन्त निर्मल एवं उज्ज्वल कुल जबतक कलङ्कित नहीं होता है तब तक शीघ्र ही इसका उपाय करो ॥२३॥


अपि त्यजामि वैदेहीं निर्दोषां शीलशालिनीम् । प्रमादयामि नो कीर्त्तिं लोकसौख्यहतात्मकः ॥२४॥

अर्थ: जो जनताके सुखके लिए अपने आपको अर्पित कर सकता है ऐसा मैं निर्दोष एवं शीलसे सुशोभित सीताको छोड़ सकता हूँ परन्तु कीर्तिको नष्ट नहीं होने दूँगा ॥२४॥


ततो जगाद सौमित्रिर्भ्रातृस्नेहपरायणः । राजन्न खलु वैदेह्यां विधातुं शोकमर्हसि ॥२५॥

अर्थ: तदनन्तर भाईके स्नेहमें तत्पर लक्ष्मणने कहा कि हे राजन् ! सीताके विषयमें शोक नहीं करना चाहिए ॥२५॥


लोकापवादमात्रेण कथं त्यजसि जानकीम् । स्थितां सर्वसतीमूर्ध्नि सर्वाकारमनिन्दिताम् ॥२६॥

अर्थ: समस्त सतियोंके मस्तक पर स्थित एवं सर्व प्रकारसे अनिन्दित सीताको आप मात्र लोकापवादके भयसे क्यों छोड़ रहे हैं ? ॥२६॥


असत्त्वं वक्तु दुर्लोकः प्राणिनां शीलधारिणाम् । न हि तद्वचनात्तेषां परमार्थत्वमश्नुते ॥२७॥

अर्थ: दुष्ट मनुष्य शीलवान् मनुष्योंकी बुराई कहें पर उनके कहनेसे उनकी परमार्थता नष्ट नहीं हो जाती ॥२७॥


गृह्यमाणोऽतिकृष्णोऽपि विषदूषितलोचनैः । सितत्वं परमार्थेन न विमुञ्चति चन्द्रमाः ॥२८॥

अर्थ: जिनके नेत्र विषसे दूषित हो रहे हैं ऐसे मनुष्य यद्यपि चन्द्रमाको अत्यन्त काला देखते हैं पर यथार्थमें चन्द्रमा शुक्लता नहीं छोड़ देता है ॥२८॥


आत्मा शीलसमृद्धस्य जन्तोर्व्रजति साक्षिताम् । परमार्थाय पर्याप्तं वस्तुतत्त्वं न बाह्यतः ॥२९॥

अर्थ: शीलसम्पन्न प्राणीकी आत्मा साक्षिताको प्राप्त होती है अर्थात् वह स्वयं ही अपनी वास्तविकताको कहती है । यथार्थमें वस्तुका वास्तविक भाव ही उसकी यथार्थताके लिए पर्याप्त है बाह्यरूप नहीं ॥२९॥


नो पृथग्जनवादेन संक्षोभं यान्ति कोविदाः । न शुनो भषणाद्दन्ती वैलक्ष्यं [?]पद्यते ॥३०॥

अर्थ: साधारण मनुष्यके कहनेसे विद्वज्जन क्षोभको प्राप्त नहीं होते क्योंकि कुत्ताके भोंकनेसे हाथी लज्जाको प्राप्त नहीं होता ॥३०॥


विचित्रस्यास्य लोकस्य तरङ्गसमचेष्टिनः । परदोषकथासक्तेर्निग्रहं स्वो वि[?] ॥३१॥

अर्थ: तरङ्गके समान चेष्टाको धारण करनेवाला यह विचित्र लोक दूसरेके दोष कहनेमें आसक्त है सो इसका निग्रह स्वयं इनकी आत्मा करेगी ॥३१॥


शिलामुत्पाट्य शीतांशुं जिघांसुर्मोहवत्सलः । स्वयमेव नरो नाशमसन्दिग्धं ॥३२॥

अर्थ: जो मूर्ख मनुष्य शिला उखाड़ कर चन्द्रमाको नष्ट करना चाहता है वह निःसन्देह स्वयं ही नाशको प्राप्त होता है ॥३२॥


अभ्याख्यानपरो दुष्टस्तथा परगुणासहः । नियतिं दुर्गतिं जन्तुर्दुःकर्मा प्रतिपद्य[?] ॥३३॥

अर्थ: चुगली करनेमें तत्पर एवं दूसरेके गुणोंको सहन नहीं करनेवाला दुष्कर्मा दुष्ट मनुष्य निश्चित ही दुर्गतिको प्राप्त होता है ॥३३॥


बलदेवस्ततोऽवोचद्यथा वदसि लक्ष्मण । सत्यमेवमिदं बुद्धिर्मध्यस्था तव शोभना ॥३४॥

अर्थ: तदनन्तर बलदेवने कहा कि लक्ष्मण ! तुम जैसा कह रहे हो सत्य वैसा ही है और तुम्हारी मध्यस्थ बुद्धि भी शोभाका स्थान है ॥३४॥


किन्तु लोकविरुद्धानि त्यजतः शुद्धिशालिनः । न दोषो दृश्यते कश्चिद्गुणश्चैकान्तसम्भवः ॥३५॥

अर्थ: परन्तु लोक विरुद्ध कार्यका परित्याग करनेवाले शुद्धिशाली मनुष्यका कोई दोष दिखाई नहीं देता अपितु उसके विरुद्ध गुण ही एकान्त रूपसे संभव मालूम होता है ॥३५॥


सौख्यं जगति किं तस्य का वाऽऽशा जीवितं प्रति । दिशो यस्यायशोदावज्वालालीढाः समन्ततः ॥३६॥

अर्थ: उस मनुष्यको संसारमें क्या सुख हो सकता है ? अथवा जीवनके प्रति उसे क्या आशा हो सकती है जिसकी दिशाएँ सब ओरसे निन्दारूपी दावानलकी ज्वालाओंसे व्याप्त हैं ॥३६॥


किमनर्थकृतार्थेन सविषेणौषधेन किम् । किं वीर्येण न रक्ष्यन्ते प्राणिनो येन भीगताः ॥३७॥

अर्थ: अनर्थको उत्पन्न करनेवाले अर्थसे क्या प्रयोजन है ? विष सहित औषधिसे क्या लाभ है ? और उस पराक्रमसे भी क्या मतलब है जिससे भयमें पड़े प्राणियोंकी रक्षा नहीं होती ? ॥३७॥


चारित्रेण न तेनार्थो येन नात्मा हितोद्भवः । ज्ञानेन तेन किं येन ज्ञातो नाध्यात्मगोचरः ॥३८॥

अर्थ: उस चारित्रसे प्रयोजन नहीं है जिससे आत्मा अपना हित करनेमें उद्यत नहीं होता और उस ज्ञानसे क्या लाभ जिससे अध्यात्मका ज्ञान नहीं होता ॥३८॥


प्रशस्तं जन्म नो तस्य यस्य कीर्त्तिवधूं वराम् । बली हरति दुर्वादस्ततस्तु मरणं वरम् ॥३९॥

अर्थ: उस मनुष्यका जन्म अच्छा नहीं कहा जा सकता जिसकी कीर्ति रूपी उत्तम वधूको अपयश रूपी बलवान् हर ले जाता है । अरे ! इसकी अपेक्षा तो उसका मरना ही अच्छा है ॥३९॥


आस्तां जनपरीवादो दोषोऽप्यतिमहान्मम । परपुंसा हृता सीता यत्पुनर्गृहमाहृता ॥४०॥

अर्थ: लोकापवाद जाने दो, मेरा भी तो यह बड़ा भारी दोष है जो मैं पर पुरुषके द्वारा हरी हुई सीताको फिरसे घर ले आया ॥४०॥


रक्षसो भवनोद्याने चकार वसतिं चिरम् । अभ्यर्थिता च दूतीभिर्वदमानाभिरीप्सितम् ॥४१॥

दृष्टा च दुष्टया दृष्ट्या समीपावनिवर्त्तिना । असकृद्राक्षसेन्द्रेण भाषिता च यथेप्सितम् ॥४२॥

एवंविधां तकां सीतां गृहमानयता मया । कथं न लज्जितं किंवा दुष्करं मूढचेतसाम् ॥४३॥

अर्थ: सीताने राक्षसके गृहोद्यानमें चिर काल तक निवास किया, कुत्सित वचन बोलनेवाली दूतियोंने उससे अभिलषित पदार्थकी याचना की, समीपकी भूमिमें वर्तमान रावणने उसे कई बार दुष्ट दृष्टिसे देखा तथा इच्छानुसार उससे वार्तालाप किया। ऐसी उस सीताको घर लाते हुए मैंने लज्जाका अनुभव क्यों नहीं किया ? अथवा मूर्ख मनुष्योंके लिए क्या कठिन है ? ॥४१-४३॥


कृतान्तवक्त्रसेनानीः शब्द्यतामाविलम्बितम् । सीता गर्भद्वितीया मे गृहादद्यैव नीयताम् ॥४४॥

अर्थ: कृतान्तवक्त्र सेनापतिको शीघ्र ही बुलाया जाय और अकेली गर्भिणी सीता आज ही मेरे घरसे ले जाई जाय ॥४४॥


एवमुक्तेऽञ्जलिं बद्ध्वा सौमित्रिः प्रणतात्मकः । जगाद देव नो युक्तं त्यक्तुं जनकसम्भवाम् ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर लक्ष्मणने हाथ जोड़ कर विनम्र भावसे कहा कि हे देव ! सीताको छोड़ना उचित नहीं है ॥४५॥


सुमार्दवाङ्घ्रिकमला तन्वी मुग्धा सुखैधिता । एकाकिनी यथा यातु क्व वैदेही खिलेन वा ॥४६॥

अर्थ: जिसके चरण कमल अत्यन्त कोमल हैं, जो कृशाङ्गी है, भोली है और सुख पूर्वक जिसका लालन-पालन हुआ है ऐसी अकेली सीता उपद्रवपूर्ण मार्गसे कहाँ जायगी ? ॥४६॥


गर्भभारसमाक्रान्ता परमं खेदमाश्रिता । राजपुत्री त्वया त्यक्ता संश्रयं कं प्रपद्यते ॥४७॥

अर्थ: जो गर्भके भारसे आक्रान्त है ऐसी सीता तुम्हारे द्वारा त्यक्त होने पर अत्यखेदको प्राप्त होती हुई किसकी शरणमें जायगी ? ॥४७॥


वलिपुष्पादिकं दृष्टं लोकेन तु जिनार्चकम् । कल्प्यते भक्तियुक्तेन को दोषः परदर्शने ॥४८॥

अर्थ: रावणने सीताको देखा यह कोई अपराध नहीं है क्योंकि दूसरेके द्वारा देखे हुए वलि पुष्प आदिकको क्या भक्तजन जिनेन्द्रदेवके लिए अर्पित नहीं करते ? अर्थात् करते हैं अतः दूसरेके देखनेमें क्या दोष है ? ॥४८॥


प्रसीद नाथ निर्दोषामसूर्यम्पश्यकोमलाम् । माऽत्याक्षीर्मैथिलीं वीर भवदर्पितमानसाम् ॥४९॥

अर्थ: हे नाथ ! हे वीर ! प्रसन्न होओ कि जो निर्दोष है, जिसने कभी सूर्य भी नहीं देखा है जो अत्यन्त कोमल है, तथा आपके लिए जिसने अपना हृदय अर्पित कर दिया है ऐसी सीताको मत छोड़ो ॥४९॥


ततोऽत्यन्तदृढीभूतविरागः क्रोधभारभाक् । काकुत्स्थः प्रवरोऽवोचदप्रसन्नमुखोऽनुजम् ॥५०॥

लक्ष्मीधर न वक्तव्यं त्वया किञ्चिदतः परम् । मयैतन्निश्चितं कृत्यमवश्यं साध्वसाधु वा ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका विद्वेष अत्यन्त दृढ़ हो गया था, जो क्रोधके भारको प्राप्त थे, और जिनका मुख अप्रसन्न था ऐसे रामने छोटे भाई - लक्ष्मणसे कहा कि हे लक्ष्मीधर ! अब तुम्हें इसके आगे कुछ भी नहीं कहना चाहिए । मैंने जो निश्चय कर लिया है वह अवश्य किया जायगा चाहे उचित हो चाहे अनुचित ॥५०-५१॥


निर्मानुष्ये वने त्यक्ता सहायपरिवर्जिता । जीवतु म्रियतां वाऽपि सीताऽऽत्मीयेन कर्मणा ॥५२॥

अर्थ: निर्जन वनमें सीता अकेली छोड़ी जायगी। वहाँ वह अपने कर्मसे जीवित रहे अथवा मरे ॥५२॥


क्षणमप्यत्र मे देशे मा शिष्टनगरेऽपि वा । कुत एव गृहे सीता मलवर्द्धनकारिणी ॥५३॥

अर्थ: दोषकी वृद्धि करनेवाली सीता भी मेरे इस देशमें अथवा किसी उत्तम सम्बन्धीके नगरमें अथवा किसी घरमें क्षण भरके लिए निवास न करे ॥५३॥


चतुरश्वमथाऽऽरुह्य रथं सैन्यसमावृतः । जय नन्देति शब्देन बन्दिभिः परिपूजितः ॥५४॥

समुच्छ्रितसितच्छत्रश्चापी कवचकुण्डली । कृतान्तवक्त्रसेनानीरीशितुः प्रस्थितोऽन्तिकम् ॥५५॥

अर्थ: अथानन्तर जो चार घोड़ों वाले रथ पर सवार होकर जा रहा था, सेनासे घिरा था, वन्दीजन ‘जय’ ‘नन्द’ आदि शब्दोंके द्वारा जिसकी पूजा कर रहे थे, जिसके शिर पर सफेद छत्र लगा हुआ था, जो धनुषको धारण कर रहा था तथा कवच और कुण्डलोंसे युक्त था ऐसा कृतान्तवक्त्र सेनापति स्वामीके समीप चला ॥५४-५५॥


तं तथाविधमायान्तं दृष्ट्वा नगरयोषिताम् । कथा बहुविकल्पाऽऽसीद् वितर्कागतचेतसाम् ॥५६॥

अर्थ: उसे उस प्रकार आता देख, जिनके चित्त तर्क वितर्कमें लग रहे थे ऐसी नगरकी स्त्रियोंमें अनेक प्रकारकी चर्चा होने लगी ॥५६॥


किमिदं हेतुना केन त्वरावानेष लक्ष्यते । कं प्रत्येष सुसंरम्भः किन्नु कस्य भविष्यति ॥५७॥

शस्त्रान्धकारमध्यस्थो निदाघार्कसमद्युतिः । मातः कृतान्तवक्त्रोऽयं कृतान्त इव भीषणः ॥५८॥

अर्थ: यह क्या है ? यह किस कारण उतावला दिखाई देता है ? किसके प्रति यह कुपित है ? आज किसका क्या होनेवाला है ? हे मातः ! जो शस्त्रोंके अन्धकारके मध्यमें स्थित है तथा जो ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान तेजसे युक्त है ऐसा यह कृतान्तवक्त्र यमराजके समान भयंकर है ॥५७-५८॥


एवमादिकथासक्तनगरीयोषिदीक्षितः । अन्तिकं रामदेवस्य सेनानीः समुपागमत् ॥५९॥

अर्थ: इत्यादि कथामें आसक्त नगरकी स्त्रियाँ जिसे देख रही थीं ऐसा सेनापति श्रीरामके समीप आया ॥५९॥


प्रणिपत्य ततो नाथं शिरसा धरणीस्पृशा । जगाद देव देह्याज्ञामिति सन्नतपाणिकः ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर उसने पृथिवीका स्पर्श करनेवाले शिरसे स्वामीको प्रणाम कर हाथ जोड़ते हुए यह कहा कि हे देव ! मुझे आज्ञा दीजिए ॥६०॥


पद्मनाभो जगौ गच्छ सीतामपनय द्रुतम् । मार्गे जिनेन्द्रसद्मानि दर्शयन् कृतदोहदाम् ॥६१॥

सम्मेदगिरिजैनेन्द्रनिर्वाणावनिकल्पितान् । प्रदर्श्य चैत्यसङ्घातानाशापूरणपण्डितान् ॥६२॥

अटवीं सिंहनादाऽऽख्यां नीत्वा जनविवर्जिताम् । अवस्थाप्यैतिकां सौम्य त्वरितं पुनराव्रज ॥६३॥

अर्थ: रामने कहा कि जाओ, सीताको शीघ्र ही छोड़ आओ । उसने जिनमन्दिरोंके दर्शन करनेका दोहला प्रकट किया था इसलिए मार्गमें जो जिन-मन्दिर मिलें उनके दर्शन कराते जाना । तीथकरोंकी निर्वाणभूमि सम्मेदाचल पर निर्मित, एवं आशाओंके पूर्ण करनेमें निपुण जो प्रतिमाओंके समूह हैं उनके भी उसे दर्शन कराते जाना । इस प्रकार दर्शन करानेके बाद इसे सिंहनाद नामकी निर्जन अटवीमें ले जाकर तथा वहाँ ठहरा कर हे सौम्य ! तुम शीघ्र ही वापिस आ जाओ ॥६१-६३॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा वितर्कपरिवर्जितः । जानकीं समुपागम्य सेनानीरित्यभाषत ॥६४॥

उत्तिष्ठ रथमारोह देवि कुर्वभिवाञ्छितम् । प्रपश्य चैत्यगेहानि भजाशंसाफलोदयम् ॥६५॥

अर्थ: तदनन्तर विना किसी तर्क वितर्कके ‘जो आज्ञा’ यह कह कर सेनापति सीताके पास गया और इस प्रकार बोला कि हे देवि ! उठो, रथ पर सवार होओ, इच्छित कार्य कर, जिन-मन्दिरोंके दर्शन करो और इच्छानुकूल फलका अभ्युदय प्राप्त करो ॥६४-६५॥


इति प्रसाद्यमाना सा सेनान्या मधुरस्वनम् । प्रमोदमानहृदया रथमूलमुपागता ॥६६॥

अर्थ: इस प्रकार सेनापति जिसे मधुर शब्दों द्वारा प्रसन्न कर रहा था तथा जिसका हृदय अत्यन्त हर्षित हो रहा था ऐसी सीता रथके समीप आई ॥६६॥


जगाद च चतुर्भेदः सङ्घो जयतु सन्ततम् । जैनो जयतु पद्माभः साधुवृत्तैकतत्परः ॥६७॥

अर्थ: रथके समीप आकर उसने कहा कि सदा चतुर्विध संघकी जय हो तथा उत्तम आचारके पालन करनेमें एकनिष्ठ जिनभक्त रामचन्द्र भी सदा जयवन्त रहें ॥६७॥


प्रमादापतितं किञ्चिदसुन्दरविचेष्टितम् । मृष्यन्तु सकलं देवा जिनालयनिवासिनः ॥६८॥

अर्थ: यदि हमसे प्रमाद वश कोई असुन्दर चेष्टा हो गई है तो जिनालयमें निवास करने वाले देव मेरे उस समस्त अपराधको क्षमा करें ॥६८॥


मनसा कान्तसक्तेन सकलं च सखीजनम् । न्यवर्तयन्निगद्यैवमत्यन्तोत्सुकमानसा ॥६९॥

सुखं तिष्ठत सत्सख्यो नमस्कृत्य जिनालयान् । एषाऽऽहमाव्रजाम्येव कृत्या नोत्सुकता परा ॥७०॥

अर्थ: अत्यन्त उत्सुक हृदयको धारण करनेवाली सीताने पतिमें लगे हुए हृदयसे समस्त सखीजनोंको यह कह कर लौटा दिया कि हे उत्तम सखियो ! तुम लोग सुखसे रहो । मैं जिनालयोंको नमस्कार कर अभी आती हूँ, अधिक उत्कण्ठा करना योग्य है ॥६९-७०॥


एवं तदुक्तितः पत्युरनादेशाच्च योषितः । शेषा विहरणे बुद्धिं न चक्रुश्चारुभाषिताः ॥७१॥

अर्थ: इस प्रकार सीताके कहनेसे तथा पतिका आदेश नहीं होनेसे सुन्दर भाषण करनेवाली अन्य स्त्रियोंने उसके साथ जानेकी इच्छा नहीं की थी ॥७१॥


ततः सिद्धान्नमस्कृत्य प्रमोदं परमं श्रिता । प्रसन्नवदना सीता रथमारोहदुज्ज्वलम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर परम प्रमोदको प्राप्त, प्रसन्नमुखी सीता, सिद्धोंकी नमस्कार कर उज्ज्वल रथ पर आरूढ़ हो गई ॥७२॥


सा तं रथं समारूढा रत्नकाञ्चनकल्पितम् । रेजे सुरवधूर्यद्वद्विमानं रत्नमालिनी ॥७३॥

अर्थ: रत्न तथा सुवर्ण निर्मित रथ पर आरूढ़ हुई सीता उस समय इस तरह सुशोभित हो रही थी जिस तरह कि विमान पर आरूढ़ हुई रत्नमालासे अलंकृत देवाङ्गना सुशोभित होती है ॥७३॥


रथः कृतान्तवक्त्रेण चोदितो वरवाजियुक् । ययौ भरतनिर्मुक्तो नाराच इव वेगवान् ॥७४॥

अर्थ: कृतान्तवक्त्र सेनापतिके द्वारा प्रेरित, उत्तम घोड़ोंसे जुता हुआ वह रथ भरत चक्रवर्तीके द्वारा छोड़े हुए बाणके समान बड़े वेगसे जा रहा था ॥७४॥


शुष्कद्रुमसमारूढो वायसोऽत्यन्तमाकुलः । रराट विरसं धुन्वन्नसकृत्पक्षमस्तकम् ॥७५॥

अर्थ: उस समय सूखे वृक्ष पर अत्यन्त व्याकुल कौआ, पङ्ख तथा मस्तकको बार-बार कँपाता हुआ विरस शब्द कर रहा था ॥७५॥


सुमहाशोकसन्तप्ता धुतमुक्तशिरोरुहा । रुरोदाभिमुखं नारी कुर्वती परिदेवनम् ॥७६॥

अर्थ: जो महाशोकसे संतप्त थी, जिसने अपने बाल कम्पित कर छोड़ दिये थे, तथा जो विलाप कर रही थी ऐसी एक स्त्री सामने आकर रोने लगी ॥७६॥


पश्यन्त्यप्येवमादीनि दुर्निमित्तानि जानकी । व्रजत्येव जिनासक्तमानसा स्थिरनिश्चया ॥७७॥

अर्थ: यद्यपि सीता इन सब अशकुनोंको देख रही थी तथापि जिनेन्द्र भगवान्में आसक्त चित्त होनेके कारण वह दृढ़ निश्चयके साथ आगे चली जा रही थी ॥७७॥


महीभृच्छिखरश्वभ्रकन्दरावनगह्वरम् । निमेषेण समुल्लङ्घ्य योजनं यात्यसौ रथः ॥७८॥

अर्थ: पर्वतोंके शिखर, गड्ढे, गुफाएँ और वन इन सब से ऊँची नीची भूमिको उल्लंघन कर वह रथ निमेष मात्रमें एक योजन आगे बढ़ जाता था ॥७८॥


तार्क्ष्यवेगाश्वसंयुक्तः सितकेतुविराजितः । आदित्यरथसङ्काशो रथो यात्यनिवारितः ॥७९॥

अर्थ: जिसमें गरुड़के समान वेगशाली घोड़े जुते थे, जो सफेद पताकाओंसे सुशोभित तथा जो कान्तिमें सूर्यके रथके समान था ऐसा वह रथ विना किसी रोक-टोकके आगे बढ़ता जाता था ॥७९॥


रामशक्रप्रियारूढो मनोरथजवो रथः । कृतान्तमातलिक्षिप्रनुन्नाश्वः शोभतेतराम् ॥८०॥

अर्थ: जिस पर रामरूपी इन्द्रकी प्रिया - इन्द्राणी आरूढ़ थी, जिसका वेग मनोरथके समान तीव्र था, और जिसके घोड़े कृतान्तवक्त्ररूपी मातलिके द्वारा प्रेरित थे ऐसा वह रथ अत्यधिक शोभित हो रहा था ॥८०॥


तत्रापाश्रयसंयुक्ततनुः सुपरमासना । । याति सीता सुखं क्षोणीं पश्यन्ती विविधामिति ॥८१॥

अर्थ: वहाँ जो तकियाके सहारे उत्तम आसनसे बैठी थी ऐसी सीता नाना प्रकारकी भूमिको इस प्रकार देखती हुई जा रही थी ॥८१॥


क्वचिद्ग्रामे पुरेऽरण्ये सरांसि कमलादिभिः । कुसुमैरतिरम्याणि तयाऽदृश्यन्त सोत्सुकम् ॥८२॥

अर्थ: वह कहीं गाँवमें, कहीं नगरमें और कहीं जंगलमें कमल आदिके फूलोंसे अत्यन्त मनोहर तालाबोंको बड़ी उत्सुकतासे देखती जाती थी ॥८२॥


क्वचिद्घनपटच्छन्ननभोरात्रितमः समम् । दुरालक्ष्यपृथग्भावं विशालं वृक्षगह्वरम् ॥८३॥

अर्थ: वह कहीं वृक्षोंकी उस विशाल झुरमुटको देखती जाती थी जहाँ मेघ रूपी पटसे आच्छादित आकाशवाली रात्रिके समान सघन अन्धकार था और जिसका पृथक्पना बड़ी कठिनाईसे दिखाई पड़ता था ॥८३॥


च्युतपुष्पफला तन्वी विपत्रा विरलांह्रिपा । अटवी क्वचिदच्छाया विधवा कुलजा यथा ॥८४॥

अर्थ: कहीं जिसके फल फूल और पत्ते गिर गये थे, जो कृश थी जिसकी जड़ें विरलीं विरलीं थी, तथा जो छाया (पक्षमें कान्ति) से रहित थी ऐसी कुलीन विधवाके समान अटवीको देखती जाती थी ॥८४॥


सहकारसमासक्ता क्वचित् सुन्दरमाधवी । वेश्येव चपलासक्तमशोकमभिलष्यति ॥८५॥

अर्थ: उसने देखा कि कहीं आम्रवृक्षसे लिपटी सुन्दर माधवी लता, चपल वेश्याके समान निकटवर्ती अशोक वृक्षपर अभिलाषा कर रही है ॥८५॥


महापादपसङ्घातः क्वचिद्दावविनाशितः । न भाति हृदयं साधोः खलवाक्याहतं यथा ॥८६॥

अर्थ: उसने देखा कि कहीं दावानलसे नाशको प्राप्त हुए बड़े बड़े वृक्षोंका समूह दुर्जनके वाक्योंसे ताड़ित साधुके हृदयके समान सुशोभित नहीं हो रहा है ॥८६॥


सुपल्लवलताजालैः क्वचिन् मन्दानिलेरितैः । नृत्यं वसन्तपत्नीव वनराजी निषेवते ॥८७॥

अर्थ: कहीं उसने देखा कि मन्द मन्द वायुसे हिलते हुए उत्तम पल्लवों वाली लताओंके समूहसे वनराजी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो वसन्तकी पत्नी नृत्य ही कर रही हो ॥८७॥


क्वचित् पुलिन्दसङ्घातमहाकलकलारवैः । उद्भ्रान्तविहगा दूरं गता सारङ्गसंहतिः ॥८८॥

अर्थ: कहीं उसने देखा कि भीलोंके समूहकी तीव्र कल-कल ध्वनिसे जिसने पक्षियोंको उड़ा दिया है ऐसी हरिणोंकी श्रेणी बहुत दूर आगे निकल गई है ॥८८॥


क्वचिदुन्नतशैलाग्रं पश्यन्ती चोर्ध्वमस्तका । विचित्रधातुनिर्माणैर्नयनैः कौतुकान्वितैः ॥८९॥

अर्थ: वह कहीं विचित्र धातुओंसे निर्मित, कौतुकपूर्ण नेत्रोंसे, मस्तक ऊपर उठा पर्वतकी ऊँची चोटीको देख रही थी ॥८९॥


क्वचिदच्छाल्पनीराभिः सरिद्भिः प्रोषितप्रिया । नारीवाश्रुप्रपूर्णाक्षा भाति सन्तापशोभिता ॥९०॥

अर्थ: कहीं उसने देखा कि स्वच्छ तथा अल्प जल वाली नदियोंसे यह अटवी उस संतापवती विरहिणी स्त्रीके समान जान पड़ती है कि जिसका पति परदेश गया है और जिसके नेत्र आसुओंसे परिपूर्ण हैं ॥९०॥


नानाशकुन्तनादेन जल्पतीव मनोहरम् । करोतीव क्वचिद्दीप्रनिर्झराट्टहसं मुदा ॥९१॥

अर्थ: यह अटवी कहीं तो ऐसी जान पड़ती है मानो नाना पक्षियोंके शब्दके बहाने मनोहर वार्तालाप ही कर रही हो और कहीं उज्ज्वल निर्झरों से युक्त होनेके कारण ऐसी विदित होती है मानो हर्षसे अट्टहास ही कर रही हो ॥९१॥


मकरन्दातिलुब्धाभिर्भृङ्गीभिर्मदमन्थरम् । क्वचित् संस्तूयमानेव शोभते नमिता फलैः ॥९२॥

अर्थ: कहीं मकरन्दकी लोभी भ्रमरियोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो मदसे मन्थर ध्वनिमें भ्रमरियाँ उसकी स्तुति ही कर रही हों और फलोंके भारसे वह संकोचवश नम्र हुई जा रही हों ॥९२॥


सत्पल्लवमहाशाखैर्वृक्षैर्वायुविघूर्णितैः । उपचारप्रसक्तेव पुष्पवृष्टिं विमुञ्चते ॥९३॥

अर्थ: कहीं उसने देखा कि वायुसे हिलते हुए उत्तमोत्तम पल्लवों और महाशाखाओंसे युक्त वृक्षोंके द्वारा यह अटवी विनय प्रदर्शित करनेमें संलग्नकी तरह पुष्पवृष्टि छोड़ रही है ॥९३॥


एवमादिक्रियासक्तामटवीं श्वापदाकुलाम् । पश्यन्ती याति वैदेही पद्माभापेक्षिमानसा ॥९४॥

अर्थ: जिसका मन रामकी अपेक्षा कर रहा था ऐसी सीता उपर्युक्त क्रियाओंमें आसक्त एवं वन्य पशुओंसे युक्त अटवीको देखती हुई आगे जा रही थी ॥९४॥


तावच्च मधुरं श्रुत्वा स्वनमत्यन्तमांसलम् । दध्यौ किन्वेष रामस्य दुन्दुभिध्वनिरायतः ॥९५॥

अर्थ: तदनन्तर उसी समय अत्यन्त पुष्ट मधुर शब्द सुनकर वह विचार करने लगी कि क्या यह रामके दुन्दुभिका विशाल शब्द है ? ॥९५॥


इति प्रतर्कमापन्ना दृष्ट्वा भागीरथीमसौ । एतद्घोषप्रतिस्वानं जानात्यन्यदिशि श्रुतम् ॥९६॥

अर्थ: इस प्रकारका तर्क कर तथा आगे गङ्गा नदीको देखकर उसने जान लिया कि यह अन्य दिशामें सुनाई देनेवाला इसीका शब्द है ॥९६॥


अन्तर्नक्रझषग्राहमकरादिविघट्टिताम् । उद्धतोर्मिसमासङ्गात् क्वचित्कम्पितपङ्कजाम् ॥९७॥

अर्थ: उसने देखा कि यह गङ्गानदी कहीं तो भीतर क्रीड़ा करनेवाले नाके, मच्छ तथा मकर आदिसे विघट्टित है, कहीं उठती हुई बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके संसर्गसे इसमें कमल कम्पित हो रहे हैं ॥९७॥


समूलोन्मूलितोत्तुङ्गरोधोगतमहीरुहाम् । विदारितमहाशैलग्रावसङ्घातरंहसम् ॥९८॥

अर्थ: कहीं इसने किनारे पर स्थित ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको जड़से उखाड़ डाला है, कहीं इसके वेगने बड़े-बड़े पर्वतोंकी चट्टानोंके समूहको विदारित कर दिया है ॥९८॥


समुद्रक्रोडपर्यस्तां सगरात्मजनिर्मिताम् । आरसातलगम्भीरां पुलिनैः शोभितां सितैः ॥९९॥

अर्थ: यह समुद्रकी गोदमें फैली है, राजा सगरके पुत्रों द्वारा निर्मित है, रसातल तक गहरी है, सफेद पुलिनोंसे शोभित है ॥९९॥


फेनमालासमासक्तविशालावर्त्तभैरवाम् । प्रान्तावस्थितसस्वानशकुन्तगणराजिताम् ॥१००॥

अर्थ: फेनके समूहसे सहित बड़ी-बड़ी भँवरोंसे भयंकर है, और समीपमें स्थित पक्षियोंके समूहसे सुशोभित है ॥१००॥


अश्वास्ते तां समुत्तीर्णाः पवनोपमरंहसः । सम्यक्त्वसारयोगेन संसृतिं साधवो यथा ॥१०१॥

अर्थ: पवनके समान वेगशाली वे घोड़े उस गङ्गानदीको उस तरह पार कर गये जिस तरह कि साधु सम्यग्दर्शनके सार पूर्ण योगसे संसारको पार कर जाते हैं ॥१०१॥


ततो मेरुवदक्षोभ्यचित्तोऽपि सततं भवन् । सेनानीः परमं प्राप विषादं सदयस्तदा ॥१०२॥

अर्थ: तदनन्तर कृतान्तवक्त्र सेनापति यद्यपि मेरुके समान सदा निश्चल चित्त रहता था तथापि उस समय वह दया सहित होता हुआ परम विषादको प्राप्त हो गया ॥१०२॥


किञ्चिद्वक्तुमशक्तात्मा महादुःखसमाहतः । नियन्तुमक्षमः स्थातुं प्रबलायातवाष्पकः ॥१०३॥

अर्थ: कुछ भी कहनेके लिए जिसकी आत्मा अशक्त थी, जो महादुःखसे ताड़ित हो रहा था, तथा जिसके बलात् आँसू निकल रहे थे ऐसा कृतान्तवक्त्र अपने आप पर नियन्त्रण करने तथा खड़े होनेके लिए असमर्थ हो गया ॥१०३॥


विधृत्य स्यन्दनं लग्नः कर्त्तुं क्रन्दनमुत्कटम् । निधाय मस्तके हस्तौ स्रस्ताङ्गो विगतद्युतिः ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका समस्त शरीर ढीला पड़ गया था और जिसकी कान्ति नष्ट हो गई थी ऐसा सेनापति रथ खड़ा कर और मस्तक पर दोनों हाथ रखकर जोर-जोरसे रुदन करने लगा ॥१०४॥


ततो जगाद वैदेही प्रभ्रष्टहृदया सती । कृतान्तवक्त्र कस्मात्त्वं विरौषीदं सुदुःखिवत् ॥१०५॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिसका हृदय टूट रहा था ऐसी सती सीताने कहा कि हे कृतान्तवक्त्र ! तू अत्यन्त दुःखी मनुष्यके समान इस तरह क्यों रो रहा है ? ॥१०५॥


प्रस्तावेऽत्यन्तहर्षस्य विषादयसि मामपि । विजनेऽस्मिन् महारण्ये कस्मादाश्रितरोदनः ॥१०६॥

अर्थ: तू इस अत्यधिक हर्षके अवसरमें मुझे भी विषाद युक्त कर रहा है। बता तो सही कि तू इस निर्जन महावनमें क्यों रो रहा है ॥१०६॥


स्वाम्यादेशस्य कृत्यत्वाद्वक्तव्यत्वान्नियोगतः । कथञ्चिद्रोदनं कृत्वा यथावत्स न्यवेदयत् ॥१०७॥

अर्थ: स्वामीका आदेश पालन करना चाहिए अथवा अपने नियोगके अनुसार यथार्थ बात अवश्य कहना चाहिए इन दो कारणोंसे जिस किसी तरह रोना रोक कर उसने यथार्थ बातका निरूपण किया ॥१०७॥


विषाग्निशस्त्रसदृशं शुभे दुर्जनभाषितम् । श्रुत्वा देवेन दुष्कीर्तिः परमं भयमीयुषा ॥१०८॥

सन्त्यज्य दुस्त्यजं स्नेहं दोहदानां नियोगतः । त्यक्तासि देवि रामेण श्रमणेन रतिर्यथा ॥१०९॥

अर्थ: उसने कहा कि हे शुभे ! विष अग्नि अथवा शस्त्रके समान दुर्जनोंका कथन सुनकर जो अपकीर्तिसे अत्यधिक भयभीत हो गये थे ऐसे श्रीरामने दुःखसे छूटने योग्य स्नेह छोड़कर दोहलोंके बहाने हे देवि ! तुम्हें उस तरह छोड़ दिया है जिस तरह कि मुनि रतिको छोड़ देते हैं ॥१०८-१०९॥


स्वामिन्यस्ति प्रकारोऽसौ नैव येन स विष्णुना । अनुनीतस्तवार्थेन न तथाप्यत्यजद् ग्रहम् ॥११०॥

अर्थ: हे स्वामिनि! यद्यपि ऐसा कोई प्रकार नहीं रहा जिससे कि लक्ष्मणने आपके विषयमें उन्हें समझाया नहीं हो तथापि उन्होंने अपनी हठ नहीं छोड़ी ॥११०॥


तस्मिन् स्वामिनि नीरागे शरणं तेऽस्ति न क्वचित् । धर्मसम्बन्धमुक्ताया जीवे सौख्यस्थितेरिव ॥१११॥

अर्थ: जिस प्रकार धर्मके सम्बन्धसे रहित जीवकी सुखस्थितिको कहीं शरण नहीं प्राप्त होता उसी प्रकार उन स्वामीके निःस्नेह होने पर आपके लिए कहीं कोई शरण नहीं जान पड़ता ॥१११॥


न सवित्री न च भ्राता न च बान्धवसंहतिः । आश्रयस्तेऽधुना देवि मृगाकुलमिदं वनम् ॥११२॥

अर्थ: हे देवि ! तेरे लिए न माता शरण है, न भाई शरण है, और न कुटुम्बीजनोंका समूह ही शरण है । इस समय तो तेरे लिए मृगोंसे व्याप्त यह वन ही शरण है ॥११२॥


ततस्तद्वचनं श्रुत्वा वज्रेणेवाभिताडिता । हृदये दुःखसम्भारव्याप्ता मोहमुपागता ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर सीता उसके वचन सुन हृदयमें वज्रसे ताड़ितके समान अत्यधिक दुःखसे व्याप्त होती हुई मोहको प्राप्त हो गई ॥११३॥


संज्ञां प्राप्य च कृच्छ्रेण स्खलितोद्गतवर्णगीः । जगादापृच्छनं कर्त्तुं सकृन्मे नाथमीक्षय ॥११४॥

अर्थ: बड़ी कठिनाईसे चेतना प्राप्त कर उसने लड़खड़ाते अक्षरों वाली वाणीमें कहा कि कुछ पूछनेके लिए मुझे एक बार स्वामीके दर्शन करा दो ॥११४॥


सोऽवोचद्देवि दूरं सा नगरी रहिताऽधुना । कुतः पश्यसि पद्माभं परमं चण्डशासनम् ॥११५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें कृतान्तवक्त्रने कहा कि हे देवि ! इस समय तो वह नगरी बहुत दूर रह गई है अतः अत्यधिक कठोर आज्ञा देनेवाले स्वामी-रामको किस प्रकार देख सकती हो ? ॥११५॥


ततोऽश्रुजलधाराभिः क्षालयन्त्यास्यपङ्कजम् । तथापि निर्भरस्नेहरसाक्रान्ता जगाविदम् ॥११६॥

अर्थ: तदनन्तर सीता यद्यपि अश्रुजलकी धारामें मुखकमलका प्रक्षालन कर रही थी तथापि अत्यधिक स्नेह रूपी रससे आक्रान्त हो उसने यह कहा कि ॥११६॥


सेनापते त्वया वाच्यो रामो मद्वचनादिदम् । यथा मत्त्यागजः कार्यो न विषादस्त्वया प्रभो ॥११७॥

अर्थ: हे सेनापते ! तुम मेरी ओरसे रामसे यह कहना कि हे प्रभो ! आपको मेरे त्यागसे उत्पन्न हुआ विषाद नहीं करना चाहिए ॥११७॥


अवलम्ब्य परं धैर्यं महापुरुष सर्वथा । सदा रक्ष प्रजां सम्यक्पितेव न्यायवत्सलः ॥११८॥

अर्थ: हे महापुरुष ! परम धैर्यका अवलम्बन कर सदा पिताके समान न्यायवत्सल हो प्रजाकी अच्छी तरह रक्षा करना ॥११८॥


परिप्राप्तकलापारं नृपमाह्लादकारणम् । शरच्चन्द्रमसं यद्वदिच्छन्ति सततं प्रजाः ॥११९॥

अर्थ: क्योंकि जिस प्रकार प्रजा पूर्ण कलाओंको प्राप्त करनेवाले शरद् ऋतुके चन्द्रमाकी सदा इच्छा करती है - उसे चाहती है उसी प्रकार कलाओंके पारको प्राप्त करनेवाले एवं आह्लादके कारण भूत राजाकी प्रजा सदा इच्छा करती है - उसे चाहती है ॥११९॥


संसाराद् दुःखनिर्घोरान्मुच्यन्ते येन देहिनः । भव्यास्तद्दर्शनं सम्यगाराधयितुमर्हसि ॥१२०॥

अर्थ: जिस सम्यग्दर्शनके द्वारा भव्य जीव दुःखोंसे भयंकर संसारसे छूट जाते हैं उस सम्यग्दर्शनकी अच्छी तरह आराधना करनेके योग्य हो ॥१२०॥


साम्राज्यादपि पद्माभ तदेव बहु मन्यते । नश्यत्येव पुना राज्यं दर्शनं स्थिरसौख्यदम् ॥१२१॥

अर्थ: हे राम ! साम्राज्यकी अपेक्षा वह सम्यग्दर्शन ही अधिक माना जाता है क्योंकि साम्राज्य तो नष्ट हो जाता है परन्तु सम्यग्दर्शन स्थिर सुखको देनेवाला है ॥१२१॥


तदभव्यजुगुप्सातो भीतेन पुरुषोत्तम । न कथञ्चित्त्वया त्याज्यं नितान्तं तद्धि दुर्लभम् ॥१२२॥

अर्थ: हे पुरुषोत्तम ! अभव्योंके द्वारा की हुई जुगुप्सासे भयभीत होकर तुम्हें वह सम्यग्दर्शन किसी भी तरह नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वह अत्यन्त दुर्लभ है ॥१२२॥


रत्नं पाणितलं प्राप्तं परिभ्रष्टं महोदधौ । उपायेन पुनः केन सङ्गतिं प्रतिपद्यते ॥१२३॥

अर्थ: हथेलीमें आया रत्न यदि महासागरमें गिर जाता है तो फिर वह किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? ॥१२३॥


क्षिप्त्वामृतफलं कूपे महाऽऽपत्तिभयङ्करे । परं प्रपद्यते दुःखं पश्चात्तापहतः शिशुः ॥१२४॥

अर्थ: अमृतफलको महा आपत्तिसे भयंकर कुँएमें फेंककर पश्चात्तापसे पीड़ित बालक परम दुःखको प्राप्त होता है ॥१२४॥


यस्य यत्सदृशं तस्य प्रवदत्यनिवारितः । को ह्यस्य जगतः कर्त्तुं शक्नोति मुखबन्धनम् ॥१२५॥

अर्थ: जिसके अनुरूप जो होता है वह उसे विना किसी प्रतिवन्धके कहता ही है क्योंकि इस संसारका मुख बन्धन करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥१२५॥


श्रृण्वताऽपि त्वया तत्तत्स्वार्थनाशनकारणम् । पडेनेव न कर्त्तव्यं हृदये गुणभूषण ॥१२६॥

अर्थ: हे गुणभूषण ! यद्यपि आत्म-हितको नष्ट करनेवाली अनेक बातें आप श्रवण करेंगे तथापि ग्रहिल ( पागल ) के समान उन्हें हृदयमें नहीं धारण करना - विचार पूर्वक ही कार्य करना ॥१२६॥


तीव्राज्ञोऽपि यथाभूतो जगदर्थावभासनात् । विकारमनु न प्राप्तो भवादित्य इव प्रियः ॥१२७॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्य यद्यपि अत्यन्त तेजस्वी रहता है तथापि संसारके समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेसे यथाभूत हैं एवं कभी विकारको प्राप्त नहीं होता इसलिए लोगोंको प्रिय है उसी प्रकार यद्यपि आप तीव्र शासनसे युक्त हो तथापि जगत्के समस्त पदार्थोंको ठीक-ठीक जाननेके कारण यथाभूत यथार्थ रूप रहना एवं कभी विकारको प्राप्त नहीं होनेसे सूर्यके समान सबको प्रिय रहना ॥१२७॥


भजस्व प्रस्खलं दानैः प्रीतियोगैर्निजं जनम् । परं च शोलयोगेन मित्रं सद्भावसेवनैः ॥१२८॥

अर्थ: दुष्ट मनुष्यको कुछ देकर वश करना, आत्मीय जनोंको प्रेम दिखाकर अनुकूल रखना, शत्रुको उत्तमशील अर्थात् निर्दोष आचरणसे वश करना और मित्रको सद्भाव पूर्वक की गई सेवाओंसे अनुकूल रखना ॥१२८॥


यथोपपन्नमन्नेन समेतमतिथिं गृहम् । साधून् समस्तभावेन प्रणामाभ्यर्चनादिभिः ॥१२९॥

क्षान्त्या क्रोधं मृदुत्वेन मानं निर्विपर्यस्थितम् । मायामार्जवयोगेन धृत्या लोभं तनूकुरु ॥१३०॥

अर्थ: क्षमासे क्रोधको, मार्दवसे चाहे जहाँ होनेवाले मानको, आर्जवसे मायाको और धैर्यसे लोभको कृश करना ॥१२९-१३०॥


सर्वशास्त्रप्रवीणस्य नोपदेशस्तव क्षमः । चापलं हृदयस्येदं त्वत्प्रेमग्रहयोगिनः ॥१३१॥

अर्थ: हे नाथ ! आप तो समस्त शास्त्रोंमें प्रवीण हो अतः आपको उपदेश देना योग्य नहीं है, यह जो मैंने कहा है वह आपके प्रेम रूपी ग्रहसे संयोग रखनेवाले मेरे हृदय-की चपलता है ॥१३१॥


कृतं वश्यतया किञ्चित् परिहासेन वा पुनः । मयाऽविनयमीश त्वं समस्तं क्षन्तुमर्हसि ॥१३२॥

अर्थ: हे स्वामिन् ! आपके वशीभूत होनेसे अथवा परिहासके कारण यदि मैंने कुछ अविनय किया हो तो उस सबको क्षमा कीजिये ॥१३२॥


एतावद्दर्शनं नूनं भवता सह मे प्रभो । पुनः पुनरतो वच्मि क्षन्तव्यं साध्वसाधु वा ॥१३३॥

अर्थ: हे प्रभो ! जान पड़ता है कि आपके साथ मेरा दर्शन इतना ही था इसलिए बार-बार कह रही हूँ कि मेरी प्रवृत्ति उचित हो अथवा अनुचित सब क्षमा करने योग्य है ॥१३३॥


इत्युक्त्वा पूर्वमेवासाववतीर्णा रथोदरात् । पपात धरणीपृष्ठे तृणोपलसमाकुले ॥१३४॥

अर्थ: जो रथके मध्यसे पहले ही उतर चुकी थी ऐसी सीता इस प्रकार कहकर तृण तथा पत्थरोंसे व्याप्त पृथिवी पर गिर पड़ी ॥१३४॥


धरण्यां पतिता तस्यां मूर्च्छानिश्चेतनीकृता । रराज जानकी यद्वत् पर्यस्ता रत्नसंहतिः ॥१३५॥

अर्थ: उस पृथिवी पर पड़ी, मूर्च्छासे निश्चल सीता ऐसी जान पड़ती थी मानो रत्नोंका समूह ही बिखर गया हो ॥१३५॥


नष्टचेष्टां तकां दृष्ट्वा सेनानीरतिदुःखितः । अचिन्तयदियं प्राणान् दुष्करं धारयिष्यति ॥१३६॥

अर्थ: चेष्टा हीन सीताको देखकर सेनापतिने अत्यन्त दुःखी हो इस प्रकार विचार किया कि यह प्राणोंको बड़ी कठिनाईसे धारण कर सकेगी ॥१३६॥


अरण्येऽत्र महाभीष्मे व्यालसङ्घातसङ्कुले । विदधाति न धीरोऽपि प्रत्याशां जीवितं प्रति ॥१३७॥

अर्थ: हिंसक जीवोंके समूहसे भरे हुए इस महा भयंकर वनमें धीर वीर मनुष्य भी जीवित रहनेकी आशा नहीं रख सकता ॥१३७॥


मृगाक्षीमेतिकां त्यक्त्वा विपिनेऽस्मिन्नमुत्तमे । स्थानं न तत् प्रपश्यामि यत्र मां शान्तिरेष्यति ॥१३८॥

अर्थ: इस विकट वनमें इस मृगनयनीको छोड़कर मैं वह स्थान नहीं देखता जहाँ मुझे शान्ति प्राप्त हो सकेगी ॥१३८॥


इतो निर्दयताऽत्युग्रा स्वाम्याज्ञा निश्चिताऽन्यतः । अहो दुःखमहावर्त्तमध्यं प्राप्तोऽस्मि पापकः ॥१३९॥

अर्थ: इस ओर अत्यन्त भयंकर निर्दयता है और उस ओर स्वामीकी सुदृढ आज्ञा है । अहो ! मैं पापी दुःख रूपी महाआवर्तके बीच आ पड़ा हूँ ॥१३९॥


धिग् भृत्यतां जगन्निन्द्यां यत् किञ्चन विधायिनीम् । परायत्तीकृतात्मानं क्षुद्रमानवसेविताम् ॥१४०॥

अर्थ: जिसमें इच्छाके विरुद्ध चाहे जो करना पड़ता है, आत्मा परतन्त्र हो जाती है, और क्षुद्र मनुष्य ही जिसकी सेवा करते हैं ऐसी लोकनिन्द्य दासवृत्तिको धिक्कार है ॥१४०॥


यन्त्रचेष्टिततुल्यस्य दुःखैकनिहितात्मनः । भृत्यस्य जीविताद्दूरं वरं कुक्कुरजीवितम् ॥१४१॥

अर्थ: जो यन्त्रकी चेष्टाओंके समान है तथा जिसकी आत्मा निरन्तर दुःख ही उठाती है ऐसे सेवकके जीवनकी अपेक्षा कुक्कुरका जीवन बहुत अच्छा है ॥१४१॥


नरेन्द्रशक्तिवश्यः स निन्द्यनामा पिशाचवत् । विदधाति न किं भृत्यः किं वा न परिभाषते ॥१४२॥

अर्थ: जो नरेन्द्र अर्थात् राजा ( पक्षमें मान्त्रिक ) की शक्तिके अधीन है तथा निन्द्य नामका धारक है ऐसा सेवक पिशाचके समान क्या नहीं करता है ? और क्या नहीं बोलता है ? ॥१४२॥


चित्रचापसमानस्य निःकृत्यगुणधारिणः । नित्यनम्रशरीरस्य निन्द्यं भृत्यस्य जीवितम् ॥१४३॥

अर्थ: जो चित्र लिखित धनुषके समान है, जो कार्य रहित गुण अर्थात् डोरी ( पक्षमें ज्ञानादि ) से सहित है तथा जिसका शरीर निरन्तर नम्र रहता है ऐसे भृत्यका जीवन निन्द्य जीवन है ॥१४३॥


सङ्कारकूटकस्येव पश्चान्निर्वृत्तचेतसः । निर्माल्यवाहिनो धिग्धिग्भृत्यनाम्नोऽसुधारणम् ॥१४४॥

अर्थ: सेवक कचड़ा घरके समान है । जिस प्रकार लोग कचड़ा घरमें कचड़ा डालकर पीछे उससे अपना चित्त दूर हटा लेते हैं उसी प्रकार लोग सेवकसे काम लेकर पीछे उससे चित्त हटा लेते हैं - उसके गौरवको भूल जाते हैं, जिस प्रकार कचड़ाघर निर्माल्य अर्थात् उपभुक्त वस्तुओंको धारण करता है उसी प्रकार सेवक भी स्वामीकी उपभुक्त वस्तुओंको धारण करता है । इस प्रकार सेवक नामको धारण करनेवाले मनुष्यके जीवित रहनेको बार-बार धिक्कार है ॥१४४॥


पश्चात् कृतगुरुत्वस्य तोयार्थमपि नामिनः । तुलायन्त्रसमानस्य धिग्भृत्यस्याऽसुधारणम् ॥१४५॥

अर्थ: जो अपने गौरवको पीछे कर देता है तथा पानी प्राप्त करनेके लिए भी जिसे झुकना पड़ता है इस प्रकार तुला यन्त्रकी तुल्यताको धारण करनेवाले भृत्यका जीवित रहना धिक्कार पूर्ण है ॥१४५॥


उन्नत्या त्रपया दीप्तया वर्जितस्य निजेच्छया । मा स्म भूज्जन्म भृत्यस्य पुस्तकर्मसमात्मनः ॥१४६॥

अर्थ: जो उन्नति, लज्जा, दीप्ति और स्वयं निजकी इच्छासे रहित है तथा जिसका स्वरूप मिट्टीके पुतलेके समान क्रियाहीन है ऐसे सेवकका जीवन किसीको प्राप्त न हो ॥१४६॥


विमानस्यापि मुक्तस्य गत्या गुरुतया समम् । अधस्ताद्गच्छतो नित्यं धिग्भृत्यस्यासुधारणम् ॥१४७॥

अर्थ: जो विमान अर्थात् व्योमयान ( पक्षमें मान रहित ) होकर भी गतिसे रहित है तथा जो गुरुताके साथ-साथ निरन्तर नीचे जाता है ऐसे भृत्यके जीवनको धिक्कार है ॥१४७॥


निःसत्त्वस्य महामांसविक्रयं कुर्वतः सदा । निर्मदस्यास्वतन्त्रस्य धिग्भृत्यस्यासुधारणम् ॥१४८॥

अर्थ: जो स्वयं शक्तिसे रहित है, अपना मांस भी बेचता है, सदा मदसे शून्य है और परतन्त्र है ऐसे भृत्यके जीवनको धिक्कार है ॥१४८॥


भृत्यताकरणीयेन कर्मणाऽस्मि वशीकृतः । एतां यन्न विमुञ्चामि प्रस्तावेऽप्यत्र दारुणे ॥१४९॥

अर्थ: जिसके उदयमें भृत्यता करनी पड़तो है ऐसे कर्मसे मैं विवश हो रहा हूँ इसीलिए तो इस दारुण अवसरके समय भी इस भृत्यताको नहीं छोड़ रहा हूँ ॥१४९॥


इति विमृश्य सन्त्यज्य सीतां धर्मधियं यथा । अयोध्याऽभिमुखोऽयासीत्सेनानीः सत्रपात्मकः ॥१५०॥

अर्थ: इस प्रकार विचार कर धर्म बुद्धिके समान सीताको छोड़कर सेनापति लज्जित होता हुआ अयोध्याके सम्मुख चला गया ॥१५०॥


इतराऽपि परिप्राप्तसंज्ञा परमदुःखिता । यूथभ्रष्टेव सारङ्गी बालाऽक्रन्दं समाश्रिता ॥१५१॥

अर्थ: तदनन्तर इधर जिसे चेतना प्राप्त हुई थी ऐसी सीता अत्यन्त दुःखी होती हुई यूथसे बिछुड़ी हरिणीके समान रोदन करने लगी ॥१५१॥


रुदत्याः करुणं तस्याः पुष्पमोचापदेशतः । वनस्पतिसमूहेन नूनं रुदितमेव तत् ॥१५२॥

अर्थ: करुण रोदन करनेवाली सीताके दुःखसे दुःखी होकर वृक्षोंके समूहने भी मानो पुष्प छोड़नेके बहाने हीरोदन किया था ॥१५२॥


निसर्गरमणीयेन स्वरेण परिदेवनम् । ततोऽसौ कर्त्तु मारब्धा महाशोकवशीकृता ॥१५३॥

अर्थ: तदनन्तर महा महा शोकसे वशीभूत सीता स्वभाव सुन्दर स्वरसे विलाप करने लगी ॥१५३॥


हा पद्मेक्षण हा पद्म हा नरोत्तम हा प्रभो । यच्छ प्रतिवचो देव कुरु साधारणं मम ॥१५४॥

अर्थ: वह कहने लगी कि हे कमललोचन ! हा पद्म ! हा नरोत्तम ! हा प्रभो ! हा देव ! उत्तर देओ मुझे सान्त्वना करो ॥१५४॥


सततं साधुचेष्टस्य सद्गुणस्य सचेतसः । न तेऽस्ति दोषगन्धोऽपि महापुरुषतायुजः ॥१५५॥

अर्थ: आप निरन्तर उत्तम चेष्टाके धारक हैं, सद्गुणोंसे सहित हैं, सहृदय हैं और महा-पुरुषतासे युक्त हैं। मेरे त्यागमें आपका लेश मात्र भी दोष नहीं है ॥१५५॥


पुरा स्वयंकृतस्येदं प्राप्तं मे कर्मणः फलम् । अवश्यं परिभोक्तव्यं व्यसनं परमोत्कटम् ॥१५६॥

अर्थ: मैंने पूर्व भवमें जो स्वयं कर्म किया था उसीका यह फल प्राप्त हुआ है अतः यह बहुत भारी दुःख मुझे अवश्य भोगना चाहिए ॥१५६॥


किं करोतु प्रियोऽपत्यो जनकः पुरुषोत्तमः । किं वा बान्धवलोको मे स्वकर्मण्युदयस्थिते ॥१५७॥

अर्थ: जब मेरा अपना किया कर्म उदयमें आ रहा है तब पति, पुत्र, पिता, नारायण अथवा अन्य परिवारके लोग क्या कर सकते हैं ॥१५७॥


नूनं जन्मनि पूर्वस्मिन्नसत्पुण्यमुपार्जितम् । मन्दभाग्याजनेऽरण्ये दुःखं प्रःप्ताऽस्मि यत्परम् ॥१५८॥

अर्थ: निश्चित ही मैंने पूर्व भवमें पापका उपार्जन किया होगा इसीलिए तो मैं अभागिनी निर्जन वनमें परम दुःखको प्राप्त हुई हूँ ॥१५८॥


अवर्णवचनं नूनं मया गोष्ठीष्वनुष्ठितम् । यस्योदयेन सम्प्राप्तमिदं व्यसनमीदृशम् ॥१५९॥

अर्थ: निश्चित ही मैंने गोष्ठियोंमें किसीका मिथ्या दोष कहा होगा जिसके उदयसे मुझे यह ऐसा संकट प्राप्त हुआ है ॥१५९॥


गुरोः समक्षमादाय नूनमन्यत्र जन्मनि । व्रतं मया पुनर्भग्नं यस्येदं फलमीदृशम् ॥१६०॥

अर्थ: निश्चित ही मैंने अन्य जन्ममें गुरुके समक्ष व्रत लेकर भग्न किया होगा जिसका यह ऐसा फल प्राप्त हुआ है ॥१६०॥


अथवा परुषैर्वाक्यैः कश्चित् विषफलोपमैः । निर्भर्त्सितो भवेऽन्यस्मिन् जातं यद्दुःखमीदृशम् ॥१६१॥

अर्थ: अथवा अन्य भवमें मैंने विष फलके समान कठोर वचनोंसे किसीका तिरस्कार किया होगा इसीलिए मुझे ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है ॥१६१॥


अन्यत्र जनने मन्ये पद्मखण्डस्थितं मया । चक्राह्वयुगलं भिन्नं स्वामिना रहितास्मि यत् ॥१६२॥

अर्थ: जान पड़ता है कि मैंने अन्य जन्ममें कमलवनमें स्थित चकवा चकवीके युगलको अलग किया होगा इसीलिए तो मैं भर्तासे रहित हुई हूँ ॥१६२॥


किं वा सरसि पद्मादिभूषिते रचितालयम् । पुरुषाणामुदाराणां गतिलीलाविलम्बकम् ॥१६३॥

जल्पितेन वरस्त्रीणां सौन्दर्येण कृतोपमम् । सौमित्रिसौधसच्छायं पद्मारुणमुखक्रमम् ॥१६४॥

वियोजितं भवेऽन्यस्मिन्हंसयुग्मं कुचेष्टया । प्राप्ताऽस्मि वासनं घोरं येनेदृक्षं हताशिका ॥१६५॥

अर्थ: अथवा जो कमल आदिसे विभूषित सरोवरमें निवास करता था, जो उत्तम पुरुषोंकी गमन सम्बन्धी लीलामें विलम्ब उत्पन्न करनेवाला था, जो अपने कल-कूजन और सौन्दर्यमें स्त्रियोंकी उपमा प्राप्त करता था, जो लक्ष्मणके महलके समान उत्तम कांतिसे युक्त था, और जिसके मुख तथा चरण कमलके समान लाल थे ऐसे हंस-हंसियोंके युगलको मैंने पूर्वभवमें अपनी कुचेष्टासे जुदा-जुदा किया होगा इसीलिए तो मैं अभागिनी इस घोर निष्कासनको प्राप्त हुई हूँ - घरसे अलग की गई हूँ ॥१६३-१६५॥


गुञ्जाफलार्द्धवर्णाक्षमन्योन्यार्पितमानसम् । कृष्णागुरुभवात्यन्तघनोद्यद्धूमधूसरम् ॥१६६॥

समारब्धसुखक्रीडं कण्ठस्थकलनिःस्वनम् । पारावतयुगं पापचेतसा स्यात्पृथक्कृतम् ॥१६७॥

अस्थाने स्थापितं किं वा बद्धं मारितमेव वा । सम्भावनादिनिर्युक्तं दुःखमीदग्गताऽस्मि यत् ॥१६८॥

अर्थ: अथवा गुंजाफलके अर्ध भाग के समान जिसके नेत्र थे, परस्पर एक दूसरेके लिए जिसने अपना हृदय सौंप रक्खा था,जो काला- गुरु चन्दनसे उत्पन्न हुए सघन धूमके समान धूसर वर्ण था, जो सुखसे क्रीडा कर रहा था, और कण्ठमें मनोहर अव्यक्त शब्द विद्यमान था ऐसे कबूतर-कबूतरियोंके युगलको मैंने पाप पूर्ण चित्त से जुदा जुदा किया होगा । अथवा अनुचित स्थानमें उसे रक्खा होगा अथवा बाँधा होगा अथवा मारा होगा, अथवा सन्मान - लालन-पालन आदिसे रहित किया होगा इसीलिए मै ऐसे दुःखको प्राप्त हुई हूँ ॥१६६-१६८॥


वसन्तसमये रम्ये किं वा कुसुमितांघ्रिपे । परपुष्टयुगं भिन्नं यस्येदं फलमीदृशम् ॥१६९॥

अर्थ: अथवा जब सब वृक्ष फूलोंसे युक्त हो जाते हैं ऐसे रमणीय वसन्तके समय कोकिल और कोकिलाओंके युगलको मैंने पृथक् पृथक् किया होगा जिसका यह ऐसा फल प्राप्त हुआ है ॥१६९॥


अथवा श्रमणाः क्षान्ता सद्वृत्ता निर्जितेन्द्रियाः । निंदिता विदुषां वन्द्या दुःखं प्राप्ताऽस्मि यन्महत् ॥१७०॥

अर्थ: अथवा मैंने क्षमाके धारक, सदाचारके पालक, इन्द्रियोंको जीतने वाले तथा विद्वानोंके द्वारा वन्दनीय मुनियोंकी निन्दा की होगी जिसके फलस्वरूप इस महादुःख को प्राप्त हुई हूँ ॥१७०॥


सद्भृत्यपरिवारेण शासनानन्दकारिणा । कृतसेवा सदा याहं स्थिता स्वर्गसमे गृहे ॥१७१॥

अर्थ: आज्ञा मिलते ही हर्षित होने वाले उत्तम भृत्योंके समूह जिसकी सदा सेवा करते थे ऐसी जो मैं पहले स्वर्ग तुल्य घरमें रहती थी वह मैं इस समय बन्धुजनसे रहित इस सघन वनमें कैसे रहूँगी ? मेरे पुण्यका समूह क्षय हो गया है, मैं दुःखोंके सागरमें डूब रही हूँ तथा मैं अत्यन्त पापिनी हूँ ॥१७१॥


साऽधुना क्षीणपुण्यौघा निर्बन्धुर्गहने वने । दुःखसागरनिर्मग्ना कथं तिष्ठामि पापिका ॥१७२॥

नानारत्नकरोद्योते सत्प्रच्छदपटावृते । शयनीये महारम्ये सर्वोपकरणान्विते ॥१७३॥

वंशत्रिसरिकावीणासङ्गीतमधुरस्वनैः । असेविषि सुखं निद्रां प्रत्यभुत्सि तथा च या ॥१७४॥

अर्थ: जिस पर नाना रत्नोंकी किरणोंका प्रकाश फैल रहा था, जो उत्तर चादरसे आच्छादित था, महा रमणीय था तथा सब प्रकारके उपकरणोंसे सहित था ऐसे उत्तम शयन पर सुखसे निद्राका सेवन करती थी तथा प्रातःकालके समय बाँसुरी, त्रिसरिका और वीणाके संगीतमय मधुर स्वरसे जागा करती थी ॥१७२-१७४॥


अयशोदावनिर्दग्धा साऽहं सम्प्रति दुःखिनी । प्रधाना रामदेवस्य महिषी परिकीर्त्तिता ॥१७५॥

तिष्ठाम्येकाकिनो कष्टे कान्तारे दुःकृतात्मिका । कीटकर्कशदर्भोग्रग्रावौघाढ्ये महीतले ॥१७६॥

अर्थ: वही मैं अपयश रूपी दावानलसे जली दुःखिनी, श्री रामदेवकी प्रधान रानी पापिनी अकेली इस दुःकदायी वनके बीच कीड़े, कठोर डाभ और तीक्ष्ण पत्थरोंके समूहसे युक्त पृथिवीतलमें कैसे रहूँगी ? ॥१७५-१७६॥


ध्रियन्ते यद्यवाप्येमामवस्थामीदृशीं मयि । ततो वज्रविनिर्माणाः प्राणा नूनमिमे मके ॥१७७॥

अर्थ: यदि ऐसी अवस्था पाकर भी ये प्राण मुझमें स्थित हैं तब तो कहना चाहिए कि मेरे प्राण वज्रसे निर्मित हैं ॥१७७॥


अवस्थां च परां प्राप्य शतधा यन्न दीर्यसे । अहो हृदय नास्त्यन्यः सदृशस्तव साहसी ॥१७८॥

अर्थ: अहो हृदय ! ऐसी अवस्थाको पाकर भी जो तुम सौ टुकड़े नहीं हो जाते हो उससे जान पड़ता है कि तुम्हारे समान दूसरा साहसी नहीं है ॥१७८॥


किं करोमि क्व गच्छामि कं ब्रवीमि कमाश्रये । कथं तिष्ठामि किं जातमिदं हा मातरीदृशम् ॥१७९॥

अर्थ: क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किससे कहूँ ! किसका आश्रय लूँ ? कैसे ठहरूँ ? हाय मातः ! यह ऐसा क्यों हुआ ? ॥१७९॥


हा पद्म सद्गुणाम्भोधे हा नारायण भक्तक । हा तात किं न मां वेत्सि हा मातः किं न रक्षसि ॥१८०॥

अर्थ: हे सद्गुणोंके सागर राम ! हा भक्त लक्ष्मण ! हा पिता ! क्या तुम मुझे नहीं जानते हो ? हा मातः ! तुम मेरी रक्षा क्यों नहीं करती हो ? ॥१८०॥


अहो विद्याधराधीश भ्रातः कुण्डलमण्डित । दुःखावर्तकृतभ्रान्तिरियं तिष्ठाम्यलक्षणा ॥१८१॥

अर्थ: अहो विद्याधरोंके अधीश भाई कुण्डलमण्डित ! यह मैं कुलक्षणा दुःखरूपी आवर्तमें भ्रमण करती यहाँ पड़ी हूँ ॥१८१॥


अपुण्यया मया सार्द्धं पत्या परमसम्पदा । कष्टं मह्यां जिनेन्द्राणां कृता सद्मसु नार्चना ॥१८२॥

अर्थ: खेद है कि मैं पापिनी पतिके साथ बड़े वैभवसे, पृथिवी पर जो जिनमन्दिर हैं उनमें जिनेन्द्र भगवान की पूजा नहीं कर सकी ॥१८२॥


एवं तस्यां समाक्रन्दं कुर्वन्त्यां विह्वलात्मनि । राजा कुलिशजङ्घाख्यस्तं वनान्तरमागतः ॥१८३॥

अर्थ: अथानन्तर जब विह्वल चित्ता सीता विलाप कर रही थी तब एक वज्रजंघ नामक राजा उस वनके मध्य आया ॥१८३॥


पौण्डरीकपुरः स्वामी गजबन्धार्थमागतः । प्रत्यागच्छन् महाभूतिर्गृहीतवरवारणः ॥१८४॥

अर्थ: वज्रजंघ पुण्डरीकपुरका स्वामी था, हाथी पकड़नेके लिए उस वनमें आया था और हाथी पकड़कर बड़े वैभवसे लौटकर वापिस आ रहा था ॥१८४॥


तस्य सैन्यशिरोजाताः प्लवमानाः पदातयः । नानाशस्त्रकराः कान्ताः शूरा बद्धासिधेनवः ॥१८५॥

श्रुत्वा तद्रुदितस्वानं तथाप्यतिमनोहरम् । संशयानाः परित्रस्ताः पदं न परतो ददुः ॥१८६॥

अर्थ: उसकी सेनाके अग्रभागमें जो सैनिक उछलते हुए जा रहे थे वे यद्यपि अपने हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्र लिये थे, सुन्दर थे, शूरवीर थे और छुरियाँ बाँधे हुए थे तथापि सीताका वह अतिशय मनोहर रोदनका शब्द सुनकर वे संशयमें पड़ गये तथा इतने भयभीत हो गये कि एक डग भी आगे नहीं दे सके ॥१८५-१८६॥


अश्वीयमपि संरुद्धं पुरोभागमवस्थितम् । साशङ्कैरकृतप्रेरं सादिभिः श्रुतनिःस्वनैः ॥१८७॥

अर्थ: सेनाके आगे चलने वाला जो घोड़ोंका समूह था वह भी रुक गया तथा उस रोदनका शब्द सुन आशङ्कासे युक्त घुड़सवार भी उसे प्रेरित नहीं कर सके ॥१८७॥


कुतोऽत्र भीमेऽतितरामरण्ये परासुताकारणभूरिसत्त्वे । अयं निनादो रुदितस्य रम्यः स्त्रैणो नु चित्रं परमं किमेतत् ॥१८८॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि जहाँ मृत्युके कारणभूत अनेक प्राणी विद्यमान हैं ऐसे इस अत्यन्त भयंकर वनमें यह स्त्रीके रोनेका मनोहर शब्द हो रहा है सो यह बड़ी विचित्र क्या बात है ? ॥१८८॥


मृगमहिषतरक्षुद्वीपिशार्दूललोले सृमरशरभसिंहे कोलदंष्ट्राकराले । सुविमलशशिरेखाहारिणी केयमस्मिन् हृदयहरणदक्षं कक्षमध्ये विरौति ॥१८९॥

अर्थ: जो मृग, भैंसा, भेड़िया, चीता और तिंदुआसे चञ्चल है जहाँ अष्टापद और सिंह घूम रहे हैं, तथा जो सुअरोंकी दाँढ़ोंसे भयंकर है ऐसे इस वनके मध्यमें अत्यन्त निर्मल चन्द्रमाकी रेखाके समान यह कौन हृदयके हरनेमें निपुण रो रही है ? ॥१८९॥


सुरवरवनितेयं किन्नु सौधर्मकल्पादवनितलमुपेता पातिता वासवेन । उत जनसुखगीतासा नु देवी विधात्री भुवननिधनहेतोरागता स्यात् कुतोऽपि ॥१९०॥

अर्थ: क्या यह सौधर्म स्वर्गसे इंद्रके द्वारा छोड़ी और पृथिवीतल पर आई हुई कोई इंद्राणी है अथवा मनुष्योंके सुख संगीतको नष्ट करने वाली एवं प्रलयके कारणको उत्पन्न करने वाली कोई देवी कहींसे आ पहुँची है ? ॥१९०॥


इति जनितवितर्कं वर्जिताऽऽत्मीयचेष्टं प्रजवसरणयुक्तैर्मूलगैः पूर्यमाणम् । प्रहतबहलतूरं तन्महावर्त्तकल्पं स्थितमचलमुदारं सैनिकं विस्मयाढ्यम् ॥१९१॥

अर्थ: इस प्रकार जिसे तर्क उत्पन्न हो रहा था, जिसने अपनी चेष्टा छोड़ दी थी, वेगसे चलनेवाले मूल पुरुष जिसमें आकर इकट्ठे हो रहे थे, जिसमें अत्यधिक बाजे बज रहे थे, जो किसी बड़ी भँवरके समान जान पड़ती थी और जो आश्चर्यसे युक्त थी ऐसी वह विशाल सेना निश्चल खड़ी हो गई ॥१९१॥


तुरगमकरवृन्दं प्रौढपादातमीनं विधृतवरकरेणुग्राहजालं सशब्दम् ।
रविकिरणविषक्तप्रस्फुरत्खड्गवीचिप्रतिभयमभवत्तत्सैन्यमम्भोधिकल्पम् ॥१९२॥

अर्थ: घोड़ोंके समूह ही जिसमें मगर थे, तेजस्वी पैदल सैनिक ही जिसमें मीन थे, हाथियोंके समूह ही जिसमें ग्राह थे, जो प्रचण्ड शब्दसे युक्त था और सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे चमकती हुई तलवार रूपी तरङ्गोंसे जो भय उत्पन्न करनेवाली थी ऐसी वह सेना समुद्रके समान जान पड़ती थी ॥१९२॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सीतानिर्वासनविप्रलापवज्रजङ्घगमनाभिधानं नाम सप्तनवतितमं पर्व ॥९७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा विरचित श्री पद्मपुराणमें सीताके निर्वासन, विलाप और वज्रजङ्घके आगमनका वर्णन करनेवाला सतानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९७॥

९८. अष्टनवतितमं पर्व (सीतासमाश्वासनं)

ततः पुरो महाविद्यानिरुद्धामिव जाह्नवीम् । चक्रीभूतां चमूं दृष्ट्वा वज्रजङ्घः करेणुगः ॥१॥

पप्रच्छासन्नपुरुषान् यूयमेवं कुतः स्थिताः । कुतः केन प्रतीघातो गमनस्य किमाकुलाः ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर आगे महाविद्यासे रुकी गङ्गानदीके समान चक्राकार परिणत सेनाको देख, हाथी पर चढ़े हुए वज्रजङ्घने निकटवर्ती पुरुषोंसे पूछा कि तुमलोग इस तरह क्यों खड़े हो गये ? गमनमें किसने किस कारण रुकावट डाली ? और तुमलोग व्याकुल क्यों हो रहे हो ? ॥१-२॥


पारम्पर्येण ते यावत् पृच्छन्ति स्थितिकारणम् । तावत्किञ्चित्समासीदन् राजा शुश्राव रोदनम् ॥३॥

अर्थ: निकटवर्ती पुरुष जबतक परम्परासे सेनाके रुकनेका कारण पूछते हैं तबतक कुछ निकट बढ़कर राजाने स्वयं रोनेका शब्द सुना ॥३॥


जगाद च समस्तेषु लक्षणेषु कृतश्रमः । यस्या रुदितशब्दोऽयं श्रूयते सुमनोहरः ॥४॥

विद्युद्गर्भरुचा सत्या गर्भिण्याऽप्रतिरूपया । ध्रुवं पुरुषपद्मस्य भवितव्यं स्त्रियाऽनया ॥५॥

अर्थ: समस्त लक्षणोंमें जिसने श्रम किया था ऐसा राजा वज्रजङ्घ बोला कि जिस स्त्रीका यह अत्यन्त मनोहर रोनेका शब्द सुनाई पड़ रहा है वह बिजलीके मध्यभागके समान कान्तिवाली, पतिव्रता तथा अनुपम गर्भिणी है । यही नहीं उसे निश्चय ही किसी श्रेष्ठ पुरुषकी स्त्री होना चाहिए ॥४-५॥


एवमेतत्कुतो देव सन्देहोऽत्र त्वयोदिते । अनेकमद्भुतं कर्म भवता हि पुरेक्षितम् ॥६॥

अर्थ: हे देव ! ऐसा ही है - आपके इस कथनमें संदेह कैसे हो सकता है ? क्योंकि आपने पहले अनेक आश्चर्यजनक कार्य देखे हैं ॥६॥


एवं तस्य सभृत्यस्य कथा यावत्प्रवर्त्तते । तावदग्रेसरा सीतासमीपं सत्विनो गताः ॥७॥

अर्थ: इस प्रकार सेवकों और राजा वज्रजङ्घके बीच जबतक यह वार्ता होती है तबतक आगे चलनेवाले कुछ साहसी पुरुष सीताके समीप जा पहुँचे ॥७॥


पप्रच्छुः पुरुषा देवि का त्वं निर्मानुषे वने । विरौषि करुणं शोकमसम्भाव्यमिदं श्रिता ॥८॥

अर्थ: उन्होंने पूछा कि हे देवि ! इस निर्जन वनमें तुम कौन हो ? तथा असंभाव्य शोकको प्राप्त हो यह करुण विलाप क्यों कर रही हो ? ॥८॥


न दृश्यन्ते भवादृश्यो लोकेऽत्राकृतयः शुभाः । दिव्या किमसि किं वाऽन्या काचित् सृष्टिरनुत्तमा ॥९॥

अर्थ: इस संसारमें आपके समान शुभ आकृतियाँ दिखाई नहीं देतीं । क्या तुम देवी हो ? अथवा कोई अन्य उत्तम सृष्टि हो ? ॥९॥


यदीदमीदृशं धत्से वपुरक्लिष्टमुत्तमम् । ततोऽत्यन्तं न बालचर्यः कोऽयं शोकस्तवापरः ॥१०॥

अर्थ: जब कि तुम इस प्रकारके क्लेश रहित उत्तम शरीरको धारण कर रही हो तब यह बिलकुल ही नहीं जान पड़ता कि तुम्हें यह दूसरा दुःख क्या है ? ॥१०॥


वद कल्याणि कथ्यं चेदिदं नः कौतुकं परम् । दुःखान्तोऽपि च सत्येवं कदाचिदुपजायते ॥११॥

अर्थ: हे कल्याणि ! यदि यह बात कहने योग्य है तो कहो, हमलोगोंको बड़ा कौतुक है । ऐसा होने पर कदाचित् दुःखका अन्त भी हो सकता है ॥११॥


ततस्तान् सुमहाशोकध्वान्तीकृतसमस्तदिक् । पुरुषान् सहसा दृष्ट्वा नानाशस्त्रकरोज्ज्वलान् ॥१२॥

सीता त्राससमुत्पन्नपृथुवेपथुसङ्कुला । दातुमाभरणान्येषां लोलनेत्रा समुद्यता ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर महाशोकके कारण जिसे समस्त दिशाएँ अन्धकार रूप हो गई थीं ऐसी सीता अचानक नाना शस्त्रोंकी किरणोंसे देदीप्यमान उन पुरुषोंको देखकर भयसे एक दम काँप उठी, उसके नेत्र चञ्चल हो गये और वह इन्हें आभूषण देनेके लिए उद्यत हो गई ॥१२-१३॥


तत्त्वमूढास्ततो भीता जगदुः पुरुषाः पुनः । सन्त्रासं देवि शोकं च त्यज संश्रय धीरताम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर यथार्थ बातके समझनेमें मूढ पुरुषोंने भयभीत होकर पुनः कहा कि हे देवि ! भय तथा शोक छोड़ो, धीरताका आश्रय लेओ ॥१४॥


किं वा विभूषणैरेभिस्तिष्ठन्तु त्वयि दक्षिणे । भावयोगं प्रपद्यस्व किमर्थमसि विह्वला ॥१५॥

अर्थ: हे सरले ! इन आभूषणोंसे हमें क्या प्रयोजन है ? ये तुम्हारे ही पास रहें । भाव योगको प्राप्त होओ अर्थात् हृदयको स्थिर करो और बताओ कि विह्वल क्यों हो ?–दुःखी क्यों हो रही हो ? ॥१५॥


श्रीमानयं परिप्राप्तो वज्रजङ्घ इति क्षितौ । प्रसिद्धः सकलैर्युक्तो राजधर्मैर्नरोत्तमः ॥१६॥

अर्थ: जो समस्त राजधर्मसे सहित है तथा पृथिवी पर वज्रजङ्घ नामसे प्रसिद्ध है ऐसा यह श्रीमान् उत्तम पुरुष यहाँ आया है ॥१६॥


सम्यग्दर्शनरत्नं यः सादृश्यपरिवर्जितम् । अविनाशमनाधेयमहार्यं सारसौख्यदम् ॥१७॥

शङ्कादिमलनिर्मुक्तं हेमपर्वतनिश्चलम् । हृदयेन समाधत्ते सचेता भूषणं परम् ॥१८॥

अर्थ: सावधान चित्तसे सहित यह वज्रजङ्घ सदा उस सम्यग्दर्शन रूपी रत्नको हृदयसे धारण करता है जो सादृश्यसे रहित है, अविनाशी है, अनाधेय है, अहार्य है, श्रेष्ठ सुखको देनेवाला है, शङ्कादि दोषोंसे रहित है, सुमेरुके समान निश्चल है और उत्कृष्ट आभूषण स्वरूप है ॥१७-१८॥


सम्यग्दर्शनमीदृक्षं यस्य साध्वि विराजते । गुणास्तस्य कथं श्लाघ्ये वर्ण्यन्तामस्मदादिभिः ॥१९॥

अर्थ: हे साध्वि ! हे प्रशंसनीये ! जिसके ऐसा सम्यग्दर्शन सुशोभित है उसके गुणोंका हमारे जैसे पुरुष कैसे वर्णन कर सकते हैं ? ॥१९॥


जिनशासनतत्त्वज्ञः शरणागतवत्सलः । परोपकारसंसक्तः करुणार्द्रितमानसः ॥२०॥

लब्धवर्णो विशुद्धात्मा निन्द्यकृत्यनिवृत्तधीः । पितेव रक्षिता लोके दाता भूतहिते रतः ॥२१॥

दीनादीनां विशेषेण मातुरप्यनुपालकः । शुद्धकर्मकरः शत्रुमहीधरमहाशनिः ॥२२॥

शस्त्रशास्त्रकृतश्रान्तिरश्रान्तिः शान्तिकर्मणि । जानात्यन्यकलत्रं च कूपं साजगरं यथा ॥२३॥

धर्मे परममासक्तो भवपातभयात्सदा । सत्यस्थापितसद्वाक्यो बाढं नियमितेन्द्रियः ॥२४॥

अर्थ: वह जिन शासनके रहस्यको जाननेवाला है, शरणमें आये हुए लोगोंसे स्नेह करनेवाला है, परोपकारमें तत्पर है, दयासे आर्द्रचित्त है, विद्वान् है, विशुद्ध हृदय है, निन्द्य कार्योंसे निवृत्त बुद्धि है, पिताके समान रक्षक है, प्राणिहितमें तत्पर है, दीन-हीन आदिका तथा खास कर मातृ-जातिका रक्षक है, शुद्ध कार्यको करनेवाला है, शत्रुरूपी पर्वतको नष्ट करनेके लिए महावज्र है । शस्त्र और शास्त्रका अभ्यासी है, शान्ति कार्यमें थकावटसे रहित है, परस्त्रीको अजगर सहित कूपके समान जानता है, संसार-पातके भयसे धर्ममें सदा अत्यन्त आसक्त रहता है, सत्यवादी है और अच्छी तरह इन्द्रियोंको वश करनेवाला है ॥२०-२४॥


अस्य देवि गुणान् वक्तुं योऽखिलानभिवाञ्छति । तरितुं स ध्रुवं वष्टि गात्रमात्रेण सागरम् ॥२५॥

अर्थ: हे देवि ! जो इसके समस्त गुणोंको कहना चाहता है वह मानो मात्र शरीरसे समुद्रको तैरना चाहता है ॥२५॥


यावदेषा कथा तेषां वर्तते चित्तबन्धिनी । तावन्नृपः परिप्राप्तः किञ्चिदद्भुतसङ्गतः ॥२६॥

अर्थ: जबतक उन सबके बीच मनको बाँधनेवाली यह कथा चलती है तबतक कुछ आश्चर्यसे युक्त राजा वज्रजङ्घ भी वहाँ आ पहुँचा ॥२६॥


अवतीर्य करेणोश्च योग्यं विनयमुद्वहन् । निसर्गशुद्धया दृष्ट्या पश्यन्नेवमभाषत ॥२७॥

अर्थ: हस्तिनीसे उतर कर योग्य विनय धारण करते हुए राजा वज्रजङ्घने स्वभाव शुद्ध दृष्टिसे देखकर इस प्रकार कहा कि ॥२७॥


अहो वज्रमयो नूनं पुरुषः सविचेतनः । यतस्त्यजन्निहारण्ये त्वां न दीर्णः सहस्रधा ॥२८॥

अर्थ: अहो ! जान पड़ता है कि वह पुरुष वज्रमय तथा चेतनाहीन है इसलिए इस वनमें तुम्हें छोड़ता हुआ वह हजार टूक नहीं हुआ है ॥२८॥


ब्रूहि कारणमेतस्या अवस्थाया शुभाशये । विश्वस्ता भव मा भैषीर्गर्भायासं हि मा कृथाः ॥२९॥

अर्थ: हे शुभाशये ! अपनी इस अवस्थाका कारण कहो, निश्चिन्त होओ, डरो मत तथा गर्भको कष्ट मत पहुँचाओ ॥२९॥


ततः कथयितुं कृच्छ्राद्विरताऽपि सती क्षणम् । पुना रुरोद शोकोरुचक्रपीडितमानसा ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर सती सीता यद्यपि कुछ कहनेके लिए क्षण भरको दुःखसे विरत हुई थी तथापि शोकरूपी विशाल चक्रसे हृदयके अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण वह पुनः रोने लगी ॥३०॥


मुहुस्ततोऽनुयुक्ता सा राज्ञा मधुरभाषिणा । धृत्वा मन्युं जगौ क्लिष्टहंसगद्गदनिःस्वना ॥३१॥

अर्थ: तत्पश्चात् मधुर भाषण करनेवाले राजाने जब बार बार पूछा तब वह जिस किसी तरह शोकको रोककर दुःखी हंसके समान गद्गद वाणीसे बोली ॥३१॥


विज्ञातुं यदि ते वाञ्छा राजन् यच्छ ततो मनः । कथा मे मन्दभाग्याया इयमत्यन्तदीर्घिका ॥३२॥

अर्थ: उसने कहा कि हे राजन् ! यदि तुम्हें जाननेकी इच्छा है तो इस ओर मन लगाओ क्योंकि मुझ अभागिनीकी यह कथा अत्यन्त लम्बी है ॥३२॥


सुता जनकराजस्य प्रभामण्डलसोदरा । स्नुषा दशरथस्याहं सीता पद्माभपत्निका ॥३३॥

अर्थ: मैं राजा जनककी पुत्री, भामण्डलकी बहिन, दशरथकी पुत्रवधू और रामकी पत्नी सीता हूँ ॥३३॥


केकयावरदानेन भरताय निजं पदम् । दत्वाऽनरण्यपुत्रोऽसौ तपस्विपदमाश्रयत् ॥३४॥

अर्थ: राजा दशरथ, केकयाके वरदानसे भरतके लिए अपना पद देकर तपस्वीके पदको प्राप्त हो गये ॥३४॥


रामलक्ष्मणयोः साकं मया प्रस्थितमायतम् । जातं श्रुतं त्वया नूनं पुण्यचेष्टितसङ्गतम् ॥३५॥

अर्थ: फलस्वरूप राम लक्ष्मणको मेरे साथ वनको जाना पड़ा सो हे पुण्यचेष्टित ! जो कुछ हुआ वह सब तुमने सुना होगा ॥३५॥


हृताऽस्मि राक्षसेन्द्रेण पत्युः सुग्रीवसङ्गमे । जाते भुक्तवती वार्त्तां सम्प्राप्यैकादशेऽहनि ॥३६॥

अर्थ: राक्षसोंके अधिपति रावणने मेरा हरण किया, स्वामी रामका सुग्रीवके साथ समागम हुआ और ग्यारहवें दिन समाचार पाकर मैंने भोजन किया ॥३६॥


आकाशगामिभिर्यानैरुत्तीर्य मकरालयम् । जित्वा दशमुखं युद्धे पत्याऽस्मि पुनराहृता ॥३७॥

अर्थ: आकाशगामी वाहनोंसे समुद्र तैरकर तथा युद्धमें रावणको जीतकर मेरे पति मुझे पुनः वापिस ले आये ॥३७॥


राज्यपङ्कं परित्यज्य भरतो भरतोपमः । श्रामण्यं परमाश्रित्य सिद्धिं धूतरजा ययौ ॥३८॥

अर्थ: भरत चक्रवर्तीके समान भरतने राज्यरूपी पङ्कका परित्याग कर परम दिगम्बर अवस्था धारण कर ली और कर्मरूपी धूलिको उड़ाकर निर्वाणपद प्राप्त किया ॥३८॥


अपत्यशोकनिर्दग्धा प्रव्रज्यासौ च केकया । देवी कृत्वा तपः सम्यग्देवलोकमुपागता ॥३९॥

अर्थ: पुत्रके शोकसे दुखी केकया रानी दीक्षा लेकर तथा अच्छी तरह तपश्चरण कर स्वर्ग गई ॥३९॥


महीतले विमर्यादो जनोऽयं दुष्टमानसः । ब्रवीति परिवादं मे शङ्कया परिवर्जितः ॥४०॥

रावणः परमः प्राज्ञो भूत्वाऽन्यस्त्रियमग्रहीत् । तामानीय पुना रामः सेवते धर्मशास्त्रवित् ॥४१॥

अर्थ: पृथिवीतल पर मर्यादाहीन दुष्ट हृदय मनुष्य निःशङ्क होकर मेरा अपवाद कहने लगे कि रावणने परम विद्वान् होकर परस्त्री ग्रहण की और धर्मशास्त्रके ज्ञाता राम उसे वापिस लाकर पुनः सेवन करने लगे ॥४०-४१॥


यया ह्यवस्थया राजा वर्त्तते दृढनिश्चयः । सैवाऽस्माकमपि क्षेमा नूनं दोषो न विद्यते ॥४२॥

अर्थ: दृढ़ निश्चयको धारण करने वाला राजा जिस दशामें प्रवृत्ति करता है वही दशा हमलोगोंके लिए भी हितकारी है इसमें दोष नहीं है ॥४२॥


साऽहं गर्भान्विता जाता कृशाङ्गा वसुधातले । चिन्तयन्ती जिनेन्द्राणां करोम्यभ्यर्चनामिति ॥४३॥

अर्थ: कृश शरीरको धारण करने वाली वह मैं जब गर्भवती हुई तब मैंने ऐसा विचार किया कि पृथिवी तल पर जितने जिनबिम्ब हैं उन सबकी मैं पूजा करूँ ॥४३॥


ततो भर्त्ता मया सार्द्धमुद्युक्तश्चैत्यवन्दने । जिनेन्द्रातिशयस्थानेष्वत्यन्तविभवान्वितः ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यधिक वैभवसे सहित स्वामी राम, जिनेन्द्र भगवान्के अतिशय स्थानोंमें जो जिनबिम्ब थे उनकी वन्दना करनेके लिए मेरे साथ उद्यत हुए ॥४४॥


अगदीत् प्रथमं सीते गत्वाऽष्टापदपर्वतम् । ऋषभं भुवनानन्दं प्रणंस्यावः कृतार्चनौ ॥४५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे सीते ! सर्व प्रथम कैलास पर्वत पर जाकर जगत्को आनन्दित करनेवाले श्री ऋषभ जिनेन्द्रकी पूजा कर उन्हें नमस्कार करेंगे ॥४५॥


अस्यां ततो विनीतायां जन्मभूमिप्रतिष्ठिता । प्रतिमा ऋषभादीनां नमस्यावः सुसम्पदा ॥४६॥

अर्थ: फिर इस अयोध्या नगरीमें जन्मभूमिमें प्रतिष्ठित जो ऋषभ आदि तीर्थंकरोंकी प्रतिमाएँ हैं उन्हें उत्तम वैभवके साथ नमस्कार करेंगे ॥४६॥


काम्पिल्ये विमलं नन्तुं यास्यावो भावतस्ततः । धर्मं रत्नपुरे चैव धर्मसद्भावदेशिनम् ॥४७॥

अर्थ: फिर काम्पिल्य नगरमें श्री विमलनाथको भावपूर्वक नमस्कार करनेके लिए जावेंगे और उसके बाद रत्नपुर नगरमें धर्मके सद्भावका उपदेश देनेवाले श्रीधर्मनाथको नमस्कार करनेके लिए चलेंगे ॥४७॥


श्रावस्त्यां शम्भवं शुभ्रं चम्पायां वासुपूज्यकम् । पुष्पदन्तं च काकन्द्यां कौशाम्ब्यां पद्मतेजसम् ॥४८॥

चन्द्राभं चन्द्रपुर्यां च शीतलं भद्रिकावनौ । मिथिलायां ततो मल्लिं नमस्कृत्य जिनेश्वरम् ॥४९॥

वाराणस्यां सुपार्श्वं च श्रेयांसं सिंहनिःस्वने । शान्तिं कुन्थुमरे चैव पुरे हास्तिनि नामनि ॥५०॥

कुशाग्रनगरे देवि सर्वज्ञं मुनिसुव्रतम् । धर्मचक्रमिदं यस्य ज्वलत्यद्यापि सूज्ज्वलम् ॥५१॥

अर्थ: श्रावस्ती नगरीमें शंभवनाथको, चम्पापुरीमें वासुपूज्यको, काकन्दीमें पुष्पदन्तको, कौशाम्बीमें पद्मप्रभको, चन्द्रपुरीमें चन्द्रप्रभको, भद्रिकावनिमें शीतलनाथको, मिथिलामें मल्लि जिनेश्वरको, वाराणसीमें सुपार्श्वको, सिंहपुरीमें श्रेयान्सको, हस्तिनापुरीमें शान्ति कुंथु और अरनाथको और हे देवि ! उसके बाद कुशाग्रनगर-राजगृहीमें उन सर्वज्ञ मुनि सुव्रतनाथकी वन्दना करनेके लिए चलेंगे जिनका कि आज भी यह अत्यन्त उज्ज्वल धर्मचक्र देदीप्यमान हो रहा है ॥४८-५१॥


ततोऽन्यान्यपि वैदेहि जिनातिशययोगतः । स्थानान्यतिपवित्राणि प्रथितान्यखिलेनसः ॥५२॥

त्रिदशासुरगन्धर्वैः स्तुतानि प्रणतानि च । वन्दावहे समस्तानि तत्परायणमानसौ ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर हे वैदेहि ! जिनेन्द्र भगवान्के अतिशयोंके योगसे अत्यन्त पवित्र, सर्वत्र प्रसिद्ध देव असुर और गन्धर्वोंके द्वारा स्तुत एवं प्रणत जो अन्य स्थान हैं तत्पर चित्त होकर उन सबकी वन्दना करेंगे ॥५२-५३॥


पुष्पकाग्रं समारुह्य विलङ्घ्य गगनं द्रुतम् । मया सह जिनानर्चं सुमेरुशिखरेष्वपि ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो शीघ्र ही आकाशको उल्लंघ कर मेरे साथ सुमेरुके शिखरों पर विद्यमान जिन-प्रतिमाओंकी पूजा करना ॥५४॥


भद्रशालवनोद्भूतैस्तथा नन्दनसम्भवैः । पुष्पैः सौमनसीयैश्च जिनेन्द्रानर्चय प्रिये ॥५५॥

अर्थ: हे प्रिये ! भद्रशाल वन, नन्दन वन और सौमनस वनमें उत्पन्न पुष्पोंसे जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करना ॥५५॥


कृत्रिमाकृत्रिमान्यस्मिंश्चैत्यानभ्यर्च्य विष्टपे । प्रवन्द्य चागमिष्यावः साकेतां दयिते पुनः ॥५६॥

अर्थ: फिर हे दयिते ! इस लोकमें जो कृत्रिम-अकृत्रिम प्रतिमाएँ हैं उन सबकी वन्दना कर अयोध्या वापिस आवेंगे ॥५६॥


एकोऽपि हि नमस्कारो भावेन विहितोऽर्हतः । मोचयत्येनसो जन्तुं जन्मान्तरकृतादपि ॥५७॥

अर्थ: अर्हन्त भगवान्के लिए भाव-पूर्वक किया हुआ एक ही नमस्कार इस प्राणीको जन्मान्तरमें किये हुए पापसे छुड़ा देता है ॥५७॥


ममापि परमा कान्ते तुष्टिर्मनसि वर्त्तते । चैत्यालयान् महापुण्यान् पश्यामीति त्वदाशया ॥५८॥

अर्थ: हे कान्ते ! तुम्हारी इच्छासे महापवित्र चैत्यालयोंके दर्शन कर लूँगा इस बातका मेरे मनमें भी परम संतोष है ॥५८॥


काले पूर्णं तमश्छन्ने भूते निःकिञ्चने जने । जगत्ताराधिपेनेव येनेशेन विराजितम् ॥५९॥

अर्थ: पहले जब यह काल अज्ञानान्धकारसे आच्छादित था तथा कल्पवृक्षोंके नष्ट हो जानेसे मनुष्य एकदम अकिञ्चन हो गये थे तब जिन आदिनाथ भगवान्के द्वारा यह जगत् उस तरह सुशोभित हुआ था जिस तरहकी चन्द्रमासे सुशोभित होता है ॥५९॥


प्रजानां पतिरेको यो ज्येष्ठस्त्रैलोक्यवन्दितः । भव्यानां भवभीरूणां मोक्षमार्गोपदेशकः ॥६०॥

अर्थ: जो प्रजाके अद्वितीय स्वामी थे, ज्येष्ठ थे, तीन लोकके द्वारा वन्दित थे, संसारसे डरनेवाले भव्यजीवों- के लिए मोक्षमार्गका उपदेश देनेवाले थे ॥६०॥


यस्याष्टगुणमैश्वर्यं नानातिशयशोभितम् । अजस्रपरमाश्चर्यं सुरासुरमनोहरम् ॥६१॥

अर्थ: जिनका अष्ट प्रातिहार्य रूपी ऐश्वर्य नाना प्रकारके अतिशयोंसे सुशोभित था, निरन्तर परम आश्चर्यसे युक्त था और सुरासुरोंके मनको हरनेवाला था ॥६१॥


जीवप्रभृतितत्त्वानि विशुद्धानि प्रदर्श्य यः । भव्यानां कृतकर्त्तव्यो निर्वाणं परमं गतः ॥६२॥

अर्थ: जो भव्य जीवोंके लिए जीवादि निर्दोष तत्त्वोंका स्वरूप दिखाकर अन्तमें कृतकृत्य हो निर्वाण पदको प्राप्त हुए थे ॥६२॥


सर्वरत्नमयं दिव्यमालयं चक्रवर्त्तिना । निर्माप्य यस्य कैलासे प्रतिमा स्थापिता प्रभोः ॥६३॥

सा भास्करप्रतीकाशा पञ्चचापशतोच्छ्रिता । प्रतिमाप्रतिरूपस्य दिव्या यस्य विराजते ॥६४॥

यस्याद्यापि महापूजा गन्धर्वामरकिन्नरैः । अप्सरोनागदैत्याद्यैः क्रियते यत्नतः सदा ॥६५॥

अर्थ: चक्रवर्ती भरतने कैलास पर्वत पर सर्वरत्नमय दिव्य मन्दिर बनवा कर उन भगवान्‌की जो प्रतिमा विराजमान कराई थी वह सूर्यके समान देदीप्यमान है, पाँच सौ धनुष ऊँची है, दिव्य है, तथा आज भी उसकी महापूजा गन्धर्व, देव, किन्नर, अप्सरा, नाग तथा दैत्य आदि सदा यत्नपूर्वक करते हैं ॥६३-६५


अनन्तः परमः सिद्धः शिवः सर्वगतोऽमलः । अर्हंस्त्रैलोक्यपूजार्हः यः स्वयम्भूः स्वयंप्रभुः ॥६६॥

तं कदा नु प्रभुं गत्वा कैलासे परमाचले । ऋषभं देवमभ्यर्च्य स्तोष्यामि सहितस्त्वया ॥६७॥

अर्थ: जो ऋषभदेव भगवान् अनन्त हैं - परम पारिणामिक भावकी अपेक्षा अन्त रहित हैं, परम हैं - अनन्त चतुष्टयरूप उत्कृष्ट लक्ष्मी से युक्त हैं, सिद्ध हैं - कृतकृत्य हैं, शिव हैं - आनन्दरूप हैं, ज्ञानकी अपेक्षा सर्वगत हैं, कर्ममलसे रहित होनेके कारण अमल हैं, प्रशस्तरूप होनेसे अर्हन्त हैं, त्रैलोक्यकी पूजाके योग्य हैं, स्वयंभू हैं और स्वयं प्रभु हैं । मैं उन भगवान् ऋषभदेवकी कैलास नामक उत्तम पर्वत पर जा कर तुम्हारे साथ कब पूजा करूँगा और कब स्तुति करूँगा ? ॥६६-६७॥


प्रस्थितस्य मया साकमेवं धृत्याऽतितुङ्गया । प्राप्ता जनपरीवादवार्त्ता दावाग्निदुःसहा ॥६८॥

अर्थ: इस प्रकार निश्चय कर बहुत भारी धैर्यसे उन्होंने मेरे साथ प्रस्थान कर दिया था परन्तु बीचमें ही दावानलके समान दुःसह लोकापवादकी वार्ता आ गई ॥६८॥


चिन्तितं मे ततो भर्त्रा प्रेक्षापूर्वविधायिना । लोकः स्वभाववक्रोऽयं नान्यथा याति वश्यताम् ॥६९॥

अर्थ: तदनन्तर विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मेरे स्वामीने विचार किया कि यह स्वभावसे कुटिल लोक अन्य प्रकारसे वश नहीं हो सकते ॥६९॥


वरं प्रियजने त्यक्ते मृत्युरप्यनुसेवितः । यशसो नोपघातोऽयं कल्पान्तमवस्थितः ॥७०॥

अर्थ: इसलिए प्रिय जनका परित्याग करने पर यदि मृत्युका भी सेवन करना पड़े तो अच्छा है परन्तु कल्पान्त काल तक स्थिर रहनेवाला यह यशका उपघात श्रेष्ठ नहीं है ॥७०॥


साहं जनपरीवादाद्विदुषा तेन बिभ्यता । संत्यक्ता परमेऽरण्ये दोषेण परिवर्जिता ॥७१॥

अर्थ: इस तरह यद्यपि मैं निर्दोष हूँ तथापि लोकापवादसे डरनेवाले उन बुद्धिमान् स्वामीने मुझे इस बीहड़ वनमें छुड़वा दिया है ॥७१॥


विशुद्धकुलजातस्य क्षत्रियस्य सुचेतसः । विज्ञातसर्वशास्त्रस्य भवत्येवेदमीहितम् ॥७२॥

अर्थ: सो जो विशुद्ध कुलमें उत्पन्न है, उत्तम हृदयका धारक है और सर्वशास्त्रोंका ज्ञाता है ऐसे क्षत्रियकी यह चेष्टा होती ही है ॥७२॥


एवं निर्वाससम्बन्धं वृत्तान्तं स्वं निवेद्य सा । दीना रोदितुमारब्धा शोकज्वलनतापिता ॥७३॥

अर्थ: इस तरह वह दीन सीता अपने निर्वाससे सम्बन्ध रखनेवाला अपना सब समाचार कह कर शोकाग्निसे संतप्त होती हुई पुनः रोने लगी ॥७३॥


तामश्रुजलपूर्णास्यां क्षितिरेणुसमुच्छ्रिताम् । दृष्ट्वा कुलिशजङ्घोऽपि चुक्षोभोत्तमसत्त्वभृत् ॥७४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मुख आँसुओंके जलसे पूर्ण था तथा जो पृथिवीकी धूलिसे सेवित थी ऐसी उस सीताको देखकर उत्तम सत्त्वगुणका धारक राजा वज्रजङ्घ भी क्षोभको प्राप्त हो गया ॥७४॥


ततो जनकराजस्य तनयामधिगम्य ताम् । समीपीभूय राजाऽसौ समाश्वासयदादृतः ॥७५॥

अर्थ: तत्पश्चात् उसे राजा जनककी पुत्री जान राजा वज्रजंघने पास जाकर बड़े आदरसे उसे सान्त्वना दी थी ॥७५॥


शोकं विरह मा रोदीर्जिनशासनभाविता । किमार्त्तं कुरुषे ध्यानं देवि दुःखस्य वर्द्धनम् ॥७६॥

अर्थ: साथ ही यह कहा कि हे देवि ! शोक छोड़, रो मत, तू जिन शासनकी महिमासे अवगत है । दुःखका बढ़ानेवाला जो आर्तध्यान है उसे क्यों करती है ? ॥७६॥


किं न वैदेहि ते ज्ञाता लोकेऽत्र स्थितिरीदृशी । अनित्याशरणैकत्वान्यत्वादिपरिभाविनी ॥७७॥

अर्थ: हे वैदेहि ! क्या तुझे ज्ञात नहीं है कि संसारकी स्थिति ऐसी ही अनित्य अशरण एकत्व और अन्यत्व आदि रूप है ॥७७॥


मिथ्यादृष्टिवधूर्यद्वच्छोचसि मुहुर्मुहुः । श्रुतार्थैवासि साधुभ्यः सततं चारुभावने ॥७८॥

अर्थ: जिससे तू मिथ्यादृष्टि स्त्रीके समान बार-बार शोक कर रही है । हे सुन्दर-भावनावाली ! तूने तो निरन्तर साधुओंसे यथार्थ बातको सुना है ॥७८॥


ननु जीवेन किं दुःखं न प्राप्तं मूढचेतसा । भवभ्रमणसक्तेन मोक्षमार्गमजानता ॥७९॥

अर्थ: निश्चयसे सम्यग्दर्शनको न जान कर संसार भ्रमण करनेमें आसक्त मूढ हृदय प्राणीने क्या-क्या दुःख नहीं प्राप्त किया है ? ॥७९॥


संयोगा विप्रयोगाश्च भवसागरवर्त्तिना । क्लेशावर्त्तनिमग्नेन प्राप्ता जीवेन भूरिशः ॥८०॥

अर्थ: संसार रूपी सागरमें वर्तमान तथा क्लेश रूप भँवरमें निमग्न हुए इस जीवने अनेकों बार संयोग और वियोग प्राप्त किये हैं ॥८०॥


खजलस्थलचारेण तिर्यग्योनिषु दुःसहम् । दुःखं जीवेन सम्प्राप्तं वर्षाशीतातपादिजम् ॥८१॥

अर्थ: तिर्यञ्च योनियोंमें इस जीवने खेचर जलचर और स्थलचर होकर वर्षा शीत और आतप आदिसे उत्पन्न होनेवाला दुःख सहा है ॥८१॥


अपमानपरीवादविरहाक्रोशनादिजम् । मनुष्यत्वेऽपि किं नाम दुःखं जीवेन नार्जितम् ॥८२॥

अर्थ: मनुष्य पर्यायमें भी अपमान निन्दा विरह और गाली आदिसे उत्पन्न होनेवाला कौन-सा महादुःख इस जीवने नहीं प्राप्त किया है ? ॥८२॥


कुत्सिताचारसम्भूतं ततोऽकृष्टर्द्धिदृष्टिजम् । च्युतिजं च महादुःखं सम्प्राप्तं त्रिदशेष्वपि ॥८३॥

अर्थ: देवोंमें भी हीन आचारसे उत्पन्न, बढ़ी-चढ़ी उत्कृष्ट ऋद्धिके देखनेसे उत्पन्न एवं वहाँसे च्युत होनेके कारण उत्पन्न महादुःख प्राप्त हुआ है ॥८३॥


नरकेषु तु यद्दुःखं तत् कथं कथ्यतां शुभे । शीतौष्ण्यक्षारशस्त्रौघव्यालान्योन्यसमुद्भवम् ॥८४॥

अर्थ: और हे शुभे ! नरकोंमें शीत, उष्ण, क्षार जल, शस्त्र समूह, दुष्ट जन्तु तथा परस्परके मारण ताडन आदिसे उत्पन्न जो दुःख इस जीवने प्राप्त किया है वह कैसे कहा जा सकता है ? ॥८४॥


विप्रयोगाः समुत्कण्ठा व्याधयो दुःखमृत्यवः । शोकाश्चानन्तशः प्राप्ता भवे जीवेन मैथिलि ॥८५॥

अर्थ: हे मैथिलि ! इस जीवने संसारमें अनेकों बार वियोग, उत्कण्ठा, व्याधियाँ, दुःख पूर्ण मरण और शोक प्राप्त किये हैं ॥८५॥


तिर्यगूर्ध्वमधस्ताद्वा स्थानं तन्नास्ति विष्टपे । जीवेन यत्र न प्राप्ता जन्ममृत्युजरादयः ॥८६॥

अर्थ: इस संसारमें ऊर्ध्व मध्यम अथवा अधोभागमें वह स्थान नहीं है जहाँ इस जीवने जन्म मृत्यु तथा जरा आदिके दुःख प्राप्त नहीं किये हों ॥८६॥


स्वकर्मवायुना शश्वद् भ्राम्यता भवसागरे । मनुष्यत्वेऽपि जीवेन प्राप्ता स्त्रीतनुरीदृशी ॥८७॥

अर्थ: अपने कर्मरूपी वायुके द्वारा संसार-सागरमें निरन्तर भ्रमण करनेवाले इस जीवने मनुष्य पर्यायमें भी स्त्रीका ऐसा शरीर प्राप्त किया है ॥८७॥


कर्मभिस्तव युक्तायाः परिशेषैः शुभाशुभैः । अभिरामो गुणैः रामः पतिर्जातः शुभोदयः ॥८८॥

अर्थ: शेष बचे हुए शुभाशुभ कर्मोंसे युक्त जो तू है सो तेरा गुणोंसे सुन्दर तथा शुभ अभ्युदयसे युक्त राम पति हुआ है ॥८८॥


पुण्योदयं समं तेन परिप्राप्य सुखोदयम् । अपुण्योदयतो दुःखं पुनः प्राप्तासि दुःसहम् ॥८९॥

अर्थ: पुण्योदयके अनुसार उसके साथ सुखका अभ्युदय प्राप्त कर अब पापके उदयसे तू दुःसह दुःखको प्राप्त हुई है ॥८९॥


लङ्काद्वीपेऽसि यत् प्राप्ता पत्या विप्रामृता हृता । एकादशदिने भुक्तिं मुक्तमाल्यानुलेपना ॥९०॥

प्रतिपक्षे हते तस्मिन् प्रत्यानीता ततः सती । सम्प्राप्ताऽसि पुनः सौख्यं बलदेवप्रसादतः ॥९१॥

अशुभोदयतो भूयो गर्भाधानसमन्विता । विना दोषेण मुक्तासि परिवादोरगक्षता ॥९२॥

अर्थ: देख, रावणके द्वारा हरी जा कर तू लङ्का पहुँची, वहाँ तूने माला तथा लेप आदि लगाना छोड़ दिया तथा ग्यारहवें दिन श्रीरामके प्रसादसे पुनः सुखको प्राप्त हुई अब फिर गर्भवती हो पापोदयसे निन्दारूपी साँपके द्वारा डँसी गई है और बिना दोषके ही यहाँ छोड़ी गई है ॥९०-९२॥


यः साधुकुसुमागारं प्रदीपयति दुर्गिरा । अत्यन्तदारुणः पापो वह्निना दह्यतामसौ ॥९३॥

अर्थ: जो साधुरूपी फूलोंके महलको दुर्वचनके द्वारा जला देता है वह अत्यन्त कठिन पाप अग्निके द्वारा भस्मीभूत हो अर्थात् तेरा पापकर्म शीघ्र ही नाशको प्राप्त हो ॥९३॥


परमा देवि धन्या त्वमहो सुश्लाघ्यचेष्टिता । चैत्यालयनमस्कारदोहदं यदसि श्रिता ॥९४॥

अर्थ: अहो देवि! तू परम धन्य है, और अत्यन्त प्रशंसनीय चेष्टाकी धारक है जो तू चैत्यालयोंकी वन्दनाके दोहलाको प्राप्त हुई है ॥९४॥


अद्यापि पुण्यमस्त्येव तव सच्छीलशालिनि । दृष्टासि यन्मयाऽरण्ये प्राप्तेन द्विपकारणम् ॥९५॥

अर्थ: हे उत्तम-शीलशोभिते ! आज भी तेरा पुण्य है ही जो हाथीके निमित्त वनमें आये हुए मैंने तुझे देख लिया ॥९५॥


इन्द्रवंशप्रसूतस्य शुभैकचरितात्मनः । राज्ञो द्विरदवाहस्य सुबन्धुमहिषीभवः ॥९६॥

सुतोऽहं वज्रजङ्घाख्यः पुण्डरीकपुराधिपः । त्वं मे धर्मविधानेन ज्यायसी गुणिनि स्वसा ॥९७॥

अर्थ: मैं इन्द्रवंशमें उत्पन्न, एक शुभ आचारका ही पालन करनेवाले राजा द्विरदवाहकी सुबन्धु नामक रानीसे उत्पन्न हुआ वज्रजंघ नामका पुत्र हूँ, मैं पुण्डरीकनगरका स्वामी हूँ। हे गुणवति ! तू धर्म विधिसे मेरी बड़ी बहिन है ॥९६-९७॥


एह्युत्तिष्ठोत्तमे यावः पुरं तामसमुत्सृज । राजपुत्रि कृतेऽप्यस्मिन् कार्यं किञ्चिन्न सिद्ध्यति ॥९८॥

अर्थ: हे उत्तमे, चलो उठो नगर चलें, शोक छोड़ो क्योंकि हे राजपुत्रि ! इस शोकके करनेपर भी कोई कार्य सिद्ध नहीं होता है ॥९८॥


स्थितायास्तत्र ते पद्मः पश्चात्तापसमाकुलः । पुनरन्वेषणं साध्वि करिष्यति न संशयः ॥९९॥

अर्थ: हे पतिव्रते ! तुम वहाँ रहोगी तो पश्चात्तापसे आकुल होते हुए राम फिरसे तुम्हारी खोज करेंगे इसमें संशय नहीं है ॥९९॥


परिभ्रष्टं प्रमादेन महार्घगुणमुज्ज्वलम् । रत्नं को न पुनर्विद्वानन्विष्यति महादरः ॥१००॥

अर्थ: प्रमादसे गिरे, महामूल्य गुणोंके धारक उज्ज्वल रत्नको कौन विद्वान् बड़े आदरसे फिर नहीं चाहता है ? अर्थात् सभी चाहते हैं ॥१००॥


सान्त्व्यमाना ततस्तेन धर्मसारकृतात्मना । धृतिं जगाम वैदेही परं प्राप्येव बान्धवम् ॥१०१॥

अर्थ: तदनन्तर धर्मके रहस्यसे कुशल अर्थात् धर्मके मर्मको जाननेवाले उस वज्रजंघके द्वारा समझाई गई सीता इस प्रकार धैर्यको प्राप्त हुई मानो उसे भाई ही मिल गया हो ॥१०१॥


प्रशशंस च तं स त्वं भ्राता मे परमः शुभः । यशस्वी सुमतिः सत्त्वी शूरः सज्जनवत्सलः ॥१०२॥

अधिगतसम्यग्दृष्टिर्गृहीतपरमार्थबोधिपूतात्मा । साधुरिव भावितात्मा व्रतगुणशीलार्थमुद्युक्तः ॥१०३॥

अर्थ: उसने वज्रजंघकी इस तरह प्रशंसा की कि हाँ तू मेरा वही भाई है, तू अत्यन्त शुभ है, यशस्वी है, बुद्धिमान् है, धैर्यशाली है, शूरवीर है, साधु-वत्सल है, सम्यग्दृष्टि है, परमार्थको समझनेवाला है, रत्नत्रयसे पवित्रात्मा है, साधुकी भाँति आत्मचिन्तन करनेवाला है तथा व्रत गुण और शीलकी प्राप्तिके लिए निरन्तर तत्पर रहता है ॥१०२-१०३॥


चरितं सत्पुरुषस्य व्यपगतदोषं परोपकारनियुक्तम् । क्षपयति कस्य न शोकं जिनमतनिरतप्रगाढचेतस्कस्य ॥१०४॥

अर्थ: निर्दोष एवं परोपकारमें तत्पर सत्पुरुषका चरित, किस जिनमतके प्रगाढ़ श्रद्धानीका शोक नहीं नष्ट करता ? अर्थात् सभीका करता है ॥१०४॥


नूनं पूर्वत्र भवे सहोदरस्त्वं च बभूवावितथप्रीतः ।
हरसि तमो मे येन स्फीतं रविवद्विशुद्धात्मा ॥१०५॥

अर्थ: निश्चित ही तू पूर्वभवमें मेरा यथार्थ प्रेम करनेवाला भाई रहा होगा इसीलिए तो तू सूर्यके समान निर्मल आत्माका धारक होता हुआ मेरे विस्तृत शोक रूपी अन्धकारको हरण कर रहा है ॥१०५॥


इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सीतासमाश्वासनं नामाष्टनवतितमं पर्व ॥९८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्यद्वारा विरचित पद्मपुराणमें सीताको सान्त्वना देनेका वर्णन करनेवाला अठानबेवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥९८॥


९९. नवनवतितमं पर्व (रामशोकाभिधानं)

अथ क्षणादुपानीतां सुस्तम्भां भक्तिभासुराम् । विमानसदृशीं रम्यां सत्प्रमाणप्रतिष्ठिताम् ॥१॥

वरदर्पणलम्बूषचन्द्रचामरहारिणीम् । हारबुद्बुदसंयुक्तां विचित्रांशुकशालिनीम् ॥२॥

प्रसारितमहामाल्यां चित्रकर्मविराजिताम् । सुगवाक्षां समारूढा शिबिकां जनकात्मजा ॥३॥

ऋद्ध्या परमया युक्ता महासैनिकमध्यगा । प्रतस्थे कर्मवैचित्र्यं चिन्तयन्ती सविस्मया ॥४॥

अर्थ: अथानन्तर राजा वज्रजघने क्षण भरमें एक ऐसी पालकी बुलाई जिसमें उत्तम खम्भे लगे हुए थे, जो नाना प्रकारके बेल-बूटोंसे सुशोभित थी, विमानके समान थी, रमणीय थी, योग्य प्रमाणसे बनाई गई थी, उत्तम दर्पण, फन्नूस, तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल चमरोंसे मनोहर थी, हारके बुदबुदोंसे सहित थी, रङ्ग-विरङ्गे वस्त्रोंसे सुशोभित थी, जिस पर बड़ी-बड़ी मालाएँ फैलाकर लगाई गई थीं, जो चित्र रचनासे सुन्दर थी, और उत्तमोत्तम झरोखोंसे युक्त थी । ऐसी पालकी पर सवार हो सीताने प्रस्थान किया । उस समय सीता उत्कृष्ट सम्पदासे सहित थी, महा सैनिकोंके मध्य चल रही थी, कर्मोंकी विचित्रताका चिन्तन कर रही थी तथा आश्चर्यसे चकित थी ॥१-४॥


दिनैस्त्रिभिरतिक्रम्य तदरण्यं सुभीषणम् । पुण्डरीकसुराष्ट्रं सा प्रविष्टा साधुचेष्टिता ॥५॥

अर्थ: उत्तम चेष्टाको धारण करनेवाली सीता, तीन दिनमें उस भयंकर अटवीको पारकर पुण्डरीक देशमें प्रविष्ट हुई ॥५॥


समस्तसस्यसम्पद्भिस्तिरोहितमहीतलम् । ग्रामैः कुक्कुटसम्पात्यैः पुराकारैर्विराजितम् ॥६॥

अर्थ: समस्त प्रकारकी धान्य सम्पदाओंसे जिसकी भूमि आच्छादित थी, तथा कुक्कुटसंपात्य अर्थात् निकट-निकट बसे हुए पुर और नगरोंसे जो सुशोभित था ॥६॥


पुरैर्नाकपुरच्छायैरासेचनकदर्शनम् । पश्यन्ती विषयं श्रीमदुद्यानादिविभूषितम् ॥७॥

अर्थ: स्वर्गपुरके समान कान्तिवाले नगरोंसे जो इतना अधिक सुन्दर था कि देखते-देखते तृप्ति ही नहीं होती थी, तथा जो बाग-बगीचे आदिसे विभूषित था ऐसे पुण्डरीक देशको देखती हुई वह आगे जा रही थी ॥७॥


मान्ये भगवति श्लाघ्ये दर्शनेन वयं तव । विधूतकिल्विषा जाता कृतार्था भवसङ्गिनः ॥८॥

अर्थ: हे मान्ये ! हे भगवति ! हे श्लाघ्ये ! तुम्हारे दर्शनसे हम संसारके प्राणी निष्पाप एवं कृतकृत्य हो गये ॥८॥


एवं महत्तरप्रष्ठैः स्तूयमाना कुटुम्बिभिः । सोपायनैर्नृपच्छायैर्वन्द्यमाना च भूरिशः ॥९॥

अर्थ: इस प्रकार राजाकी कान्तिको धारण करनेवाले गाँवके बड़े-बूढ़े लोग भेंट ले लेकर उसकी बार-बार वन्दना करते थे ॥९॥


रचितार्घादिसन्मानैः पार्थिवैश्च सुरोत्तमैः । कृतप्रणाममत्युच्चं शस्यमाना पदे पदे ॥१०॥

अर्थ: अर्घ आदिके द्वारा सम्मान करनेवाले देव तुल्य राजा उसे प्रणामकर पद-पद पर उसकी अत्यधिक प्रशंसा करते जाते थे ॥१०॥


अनुक्रमेण सम्प्राप पौण्डरीकपुरान्तिकम् । मनोभिराममत्यन्तं पौरलोकनिषेवितम् ॥११॥

अर्थ: अनुक्रमसे वह अत्यन्त मनोहर तथा पुरवासी लोगोंसे सेवित पुण्डरीकपुरके समीप पहुँची ॥११॥


वैदेह्यागमनं श्रुत्वा स्वाम्यादेशेन सत्वरम् । उपशोभा पुरे चक्रे परमाधिकृतैर्जनैः ॥१२॥

अर्थ: सीताका आगमन सुन स्वामीके आदेशसे अधिकारी लोगोंने शीघ्र ही नगरमें बहुत भारी सजावट की ॥१२॥


परितो हितसंस्काराः रथ्याः सत्रिकचत्वराः । सुगन्धिभिर्जलैः सिक्ताः कृताः पुष्पतिरोहिताः ॥१३॥

अर्थ: तिराहों और चौराहोंसे सहित बड़े-बड़े मार्ग सब ओरसे सजाये गये, सुगन्धित जलसे सींचे गये तथा फूलोंसे आच्छादित किये गये ॥१३॥


इन्द्रचापसमानानि तोरणान्युच्छ्रितानि च । कलशाः स्थापिता द्वारे सम्पूर्णाः पल्लवाननाः ॥१४॥

अर्थ: इन्द्रधनुषके समान रङ्ग-विरङ्गे तोरण खड़े किये गये, द्वारों पर जलसे भरे तथा मुखों पर पल्लवोंसे सुशोभित कलश रखे गये ॥१४॥


विलसद्ध्वजमालाढ्यं समुद्गतशुभस्वरम् । कर्त्तुं नृत्तमिवाऽऽसक्तं नगरं तत्प्रमोदवत् ॥१५॥

अर्थ: जो फहराती हुई ध्वजाओं और मालाओंसे सहित था, तथा जहाँ शुभ शब्द हो रहा था ऐसा वह नगर आनन्द-विभोर हो मानो नृत्य करनेके लिए ही तत्पर था ॥१५॥


गोपुरेण समं शालः समारूढमहाजनः । हर्षादिव परां वृद्धिं प्राप कोलाहलान्वितः ॥१६॥

अर्थ: गोपुरके साथ साथ जिसपर बहुत भारी लोग चढ़कर बैठे हुए थे ऐसा नगरका कोट इस प्रकार जान पड़ता था मानो हर्षके कारण कोलाहल करता हुआ परम वृद्धिको ही प्राप्त हो गया हो ॥१६॥


अन्तर्बहिश्च तत्स्थानं सीतादर्शनकाङ्क्षिभिः । जङ्गमत्वमिव प्राप्तं जनौघैः प्रचलात्मकैः ॥१७॥

अर्थ: भीतर बाहर सब जगह सीताके दर्शनकी इच्छा करनेवाले चलते-फिरते जन-समूहसे उस नगरका प्रत्येक स्थान ऐसा जान पड़ता था मानो जंगमपनाको हो प्राप्त हो गया हो अर्थात् चलने-फिरने लगा हो ॥१७॥


ततो विविधवादित्रनादेनाऽऽशाभिपूरिणा । शङ्खस्वनविमिश्रेण बन्दिनिःस्वानयोगिना ॥१८॥

विस्मयव्याप्तचित्तेन पौरेण कृतवीक्षणा । विवेश नगरं सीता लक्ष्मीरिव सुरालयम् ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर शङ्खोंके शब्दसे मिश्रित, एवं वन्दीजनोंके विरद गानसे युक्त नाना प्रकारके वादित्रों का शब्द जब दिग्दिगन्तको व्याप्त कर रहा था तब सीताने नगरमें उस तरह प्रवेश किया जिस तरह कि लक्ष्मी स्वर्गमें प्रवेश करती है । उस समय आश्चर्यसे जिनका चित्त व्याप्त हो रहा था ऐसे नगरवासी लोग सीताका बार-बार दर्शन कर रहे थे ॥१८-१९॥


उद्यानेन परिक्षिप्तं दीर्घिकाकृतमण्डनम् । मेरुकूटसमाकारं बलदेवसमच्छविम् ॥२०॥

वज्रजङ्घगृहान्तस्थं प्रासादमतिसुन्दरम् । पूज्यमाना नृपस्त्रीभिः प्रविष्टा जनकात्मजा ॥२१॥

अर्थ: तत्पश्चात् जो उद्यानसे घिरा हुआ था, वापिकाओंसे अलंकृत था, मेरुके शिखरके समान ऊँचा था और बलदेवकी कान्तिके समान सफेद था ऐसे वज्रजङ्घके घरके समीप स्थित अत्यन्त सुन्दर महलमें राजाकी स्त्रियोंसे पूजित होती हुई सीताने प्रवेश किया ॥२०-२१॥


बिभ्रता परमं तोषं वज्रजङ्घेन सूरिणा । भ्रात्रा भामण्डलेनेव पूज्यमाना सुचेतसा ॥२२॥

अर्थ: वहाँ परम सन्तोषको धारण करनेवाला, बुद्धिमान एवं उत्तम हृदयका धारक राजा वज्रजङ्घ, भाई भामण्डलके समान जिसकी पूजा करता था ॥२२॥


जय जीवाभिनन्देति वर्द्धस्वाऽऽज्ञापयेति च । ईशाने देवते पूज्ये स्वामिनीति च शब्दिता ॥२३॥

अर्थ: 'हे ईशाने ! हे देवते ! हे पूज्ये ! हे स्वामिनि ! तुम्हारी जय हो, जीवित रहो, आनन्दित होओ, बढ़ती रहो और आज्ञा देओ, इस प्रकार जिसका निरन्तर विरदगान होता रहता था ॥२३॥


आज्ञां प्रतीच्छता मूर्ध्ना सम्भ्रमं दधता परम् । प्रबद्धाञ्जलिना सार्द्धं परिवर्गेण चारुणा ॥२४॥

अवसत्तत्र वैदेही समुद्भूतमनीषिता । कथाभिर्धर्मसक्ताभिः पद्मभूभिश्च सन्ततम् ॥२५॥

अर्थ: परम संभ्रमके धारक, हाथ जोड़, मस्तक झुका आज्ञा प्राप्त करनेके इच्छुक सुन्दर परिजन सदा जिसके साथ रहते थे, तथा इच्छा करते ही जिसके मनोरथ पूर्ण होते थे ऐसी सीता वहाँ निरन्तर धर्म सम्बन्धी तथा राम सम्बन्धी कथाएँ करती हुई निवास करती थी ॥२४-२५॥


प्राभृतं यावदायाति सामन्तेभ्यो महीपतेः । दत्तेन तेन वैदेही धर्मकार्यमसेवत ॥२६॥

अर्थ: राजा वज्रजङ्घके पास सामन्तों की ओरसे जितनी भेंट आती थी वह सब सीताके लिए दे देता था और उसीसे वह धर्मकार्यका सेवन करती थी ॥२६॥


असावपि कृतान्तास्यस्तप्यमानमना भृशम् । स्थूरीपृष्ठान् परिश्रान्तान् खेदवाननुपालयन् ॥२७॥

समन्तान्नृपलोकेन पूर्यमाणस्त्वरावता । जगाम रामदेवस्य समीपं विनताननः ॥२८॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका मन अत्यन्त सन्तप्त हो रहा था, जो अत्यधिक खेदसे युक्त था, जो थके हुए घोड़ोंको विश्राम देनेवाला था और जिसे शीघ्रता करनेवाले राजाओंने सब ओरसे घेर लिया था ऐसा कृतान्तवक्त्र सेनापति, मुखको नीचा किये हुए श्रीरामदेवके समीप गया ॥२७-२८॥


अब्रवीच्च प्रभो ! सीता गर्भमात्रसहायिका । मया त्वद्वचनाद्भीमे कान्तारे स्थापिता नृप ॥२९॥

अर्थ: और बोला कि हे प्रभो ! हे राजन् ! आपके कहनेसे मैं एक गर्भ ही जिसका सहायक था ऐसी सीताको भयंकर वनमें ठहरा आया हूँ ॥२९॥


नानातिघोरनिःस्वानश्वापदौघनिषेविते । वेतालाकारदुःप्रेक्ष्यद्रुमजालान्धकारिते ॥३०॥

निसर्गद्वेषसंसक्तयुद्धव्याघ्रमहिषाधिके । निबद्धदुन्दुभिध्वाने मरुता कोटरश्रिता ॥३१॥

कन्दरोदरसम्मूर्च्छासिंहनादप्रतिध्वनौ । दारुककचजस्वानभीमसुप्तशयुस्वने ॥३२॥

तृष्यत्तरिक्षुविध्वस्तसारङ्गास्त्रस्तपुस्तिके । धातकीस्तवकालेहिशोणिताशङ्किसिंहके ॥३३॥

कृतान्तस्यापि भीभारसमुद्भवनपण्डिते । अरण्ये देव त्वद्वाक्याद्वैदेही रहिता मया ॥३४॥

अर्थ: हे देव ! आपके कहनेसे मैं सीताको उस वनमें छोड़ आया हूँ जो नाना प्रकारके अत्यन्त भयंकर शब्द करनेवाले वन्य पशुओंके समूहसे सेवित है, वेतालोंका आकार धारण करनेवाले दुर्दृश्य वृक्षोंके समूहसे जहाँ घोर अन्धकार व्याप्त है, जहाँ स्वाभाविक द्वेषसे निरन्तर युद्ध करनेवाले व्याघ्र और जंगली भैंसा अधिक हैं, जहाँ कोटरमें टकरानेवाली वायुसे निरन्तर दुन्दुभिका शब्द होता रहता है, जहाँ गुफाओंके भीतर सिंहोंके शब्दकी प्रतिध्वनि बढ़ती रहती है, जहाँ सोये हुए अजगरोंका शब्द लकड़ीपर चलने- वाली करोंतसे उत्पन्न शब्दके समान भयंकर है, जहाँ प्यासे भेड़ियोंके द्वारा हरिणोंके लटकते हुए पोते नष्ट कर डाले गये हैं । जहाँ रुधिरकी आशंका करनेवाले सिंह धातकी वृक्षके गुच्छोंको चाटते रहते हैं और जो यमराजके लिए भी भयका समूह उत्पन्न करनेमें निपुण है ॥३०-३४॥


अश्रुदुर्दिनवक्त्राया दीपिताया महाशुचा । सन्देशं देव सीताया निबोध कथयाम्यहम् ॥३५॥

अर्थ: हे देव ! जिसका मुख अश्रुओंकी वर्षासे दुर्दिनके समान हो रहा था तथा जो महाशोकसे अत्यन्त प्रज्वलित थी ऐसा सीताका संदेश मैं कहता हूँ सो सुनो ॥३५॥


त्वामाह मैथिली देवी यदीच्छस्यात्मने हितम् । जिनेन्द्रे मा मुचो भक्तिं यथा त्यक्ताऽहमीदृशी ॥३६॥

अर्थ: सीता देवीने आपसे कहा है कि यदि अपना हित चाहते हों तो जिस प्रकार मुझे छोड़ दिया है उस प्रकार जिनेन्द्रदेवमें भक्तिको नहीं छोड़ना ॥३६॥


स्नेहानुरागसंसक्तो मानी यो मां विमुञ्चति । नूनं जिनेऽप्यसौ भक्ति परित्यजति पार्थिवः ॥३७॥

अर्थ: स्नेह तथा अनुरागसे युक्त जो मानी राजा मुझे छोड़ सकता है निश्चय ही वह जिनेन्द्रदेवमें भक्ति भी छोड़ सकता है ॥३७॥


वाग्बली यस्य यत् किञ्चित् परिवादं जनः खलः । अविचार्य वदत्येव तद्विचार्यं मनीषिणा ॥३८॥

अर्थ: वचन बलको धारण करनेवाला दुष्ट मनुष्य विना विचारे चाहे जिसके विषयमें चाहे जो निन्दाकी बात कह देता है परन्तु बुद्धिमान् मनुष्य- को उसका विचार करना चाहिए ॥३८॥


निर्दोषाया जनो दोषं न तथा मम भाषते । यथा सद्धर्मरत्नस्य सम्यग्बोधबहिःकृतः ॥३९॥

अर्थ: साधारण मनुष्य मुझ निर्दोषके दोष उस प्रकार नहीं कहते जिस प्रकार कि सम्यग्ज्ञानसे रहित मनुष्य सद्धर्म रूपी रत्नके दोष कहते फिरते हैं । भावार्थ–दूसरेके कहनेसे जिस प्रकार आपने मुझे छोड़ दिया है उस प्रकार सद्धर्म रूपी रत्नको नहीं छोड़ देना क्योंकि मेरी अपेक्षा सद्धर्म रूपी रत्नकी निन्दा करनेवाले अधिक हैं ॥३९॥


को दोषो यदहं त्यक्ता भीषणे विजने वने । सम्यग्दर्शनसंशुद्धिं राम न त्यक्तुमर्हसि ॥४०॥

अर्थ: हे राम ! आपने मुझे भयंकर निर्जन वनमें छोड़ दिया है सो इसमें क्या दोष है ? परन्तु इस तरह आप सम्यग्दर्शनकी शुद्धताको छोड़नेके योग्य नहीं हैं ॥४०॥


एतदेकभवे दुःखं वियुक्तस्य मया सह । सम्यग्दर्शनहानौ तु दुःख जन्मनि जन्मनि ॥४१॥

अर्थ: क्योंकि मेरे साथ वियोगको प्राप्त हुए आपको इसी एक भवमें दुःख होगा परन्तु सम्यग्दर्शनके छूट जाने पर तो भव-भवमें दुःख होगा ॥४१॥


नरस्य सुलभं लोके निधिस्त्रीवाहनादिकम् । सम्यग्दर्शनरत्नं तु साम्राज्यादपि दुर्लभम् ॥४२॥

अर्थ: संसारमें मनुष्यको खजाना स्त्री तथा वाहन आदिका मिलना सुलभ है परन्तु सम्यग्दर्शन रूपी रत्न साम्राज्यसे भी कहीं अधिक दुर्लभ है ॥४२॥


राज्ये विधाय पापानि पतनं नरके ध्रुवम् । ऊर्ध्वं गमनमेकेन सम्यग्दर्शनतेजसा ॥४३॥

अर्थ: राज्यमें पाप करनेसे मनुष्यका नियमसे नरकमें पतन होता है परन्तु उसी राज्यमें यदि सम्यग्दर्शन साथ रहता है तो एक उसीके तेजसे ऊर्ध्वगमन होता है–स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥४३॥


सम्यग्दर्शनरत्नेन यस्यात्मा कृतभूषणः । लोकद्वितयमप्यस्य कृतार्थत्वमुपाश्नुते ॥४४॥

अर्थ: जिसकी आत्मा सम्यग्दर्शन रूपी रत्नसे अलंकृत है। उसके दोनों लोक कृतकृत्यताको प्राप्त होते हैं ॥४४॥


सन्दिष्टमिति जानक्या स्नेहनिर्भरचित्तया । श्रुत्वा कस्य न वीरस्य जायते मतिरुत्तमा ॥४५॥

अर्थ: इस प्रकार स्नेह पूर्ण चित्तको धारण करनेवाली सीताने जो संदेश दिया है उसे सुनकर किस वीरके उत्तम बुद्धि उत्पन्न नहीं होती ? ॥४५॥


स्वभावाद्भीरुका भीरुर्भीष्यमाणा सुभीहभिः । विभीपिकाभिरुग्राभिर्भीमाभिः पौंस्निनोऽप्यलम् ॥४६॥

अर्थ: जो स्वभावसे ही भीरु है यदि उसे दूसरे भय उत्पन्न कराते हैं तो उसके भीरु होनेमें क्या आश्चर्य ? परन्तु उग्र एवं भयंकर विभीषिकाओंसे तो पुरुष भी भयभीत हो जाते हैं। भावार्थ–जो भयंकर विभीषिकाएँ स्वभाव-भीरु सीताको प्राप्त हैं वे पुरुषको भी प्राप्त न हों ॥४६॥


भासुरोग्रमहाव्यालजालकालभयङ्करे । सामिशुष्कसरोमज्जच्छूत्कुर्वन्मत्तवारणे ॥४७॥

कर्कन्धुकण्टकाश्लिष्टपुच्छार्त्तचमरावले । अलीकसलिलश्रद्धाढौकमानाकुलैणके ॥४८॥

कपिकच्छूरजःसङ्गनितान्तचलमर्कटे । प्रलम्बकेसरच्छन्नवक्त्रविक्रन्ददृक्षके ॥४९॥

तृष्णातुरवृकग्रामलसद्रसनपल्लवे । गुञ्जाकोशीस्फुटाच्छोटताडनक्रुद्धभोगिनि ॥५०॥

परुषानिलसञ्चारक्रूरक्रन्दश्रिताङ्घ्रिपे । क्षणसम्भूतवातूलसमुद्धतरजोदले ॥५१॥

महाजगरसञ्चारचूर्णितानेकपादपे । उद्वृत्तमत्तनागेन्द्रध्वस्तभीमासुधारिणि ॥५२॥

वराहवाहिनीखातसरःक्रोडसुकर्कशे । कण्टकावटवल्मीककूटसङ्कटभूतले ॥५३॥

शुष्कपुष्पद्रवोत्ताम्यद्भ्राम्यद्भ्रमरोत्तगर्मुति । कुप्यच्छलिलनिर्मुक्तसूचीशतकरालिते ॥५४॥

एवंविधे महारण्ये रहिता देव जानकी । मन्ये न क्षणमप्येकं प्राणान् धारयितुं क्षमा ॥५५॥

अर्थ: हे देव ! जो अत्यन्त देदीप्यमान - दुष्ट हिंसक जन्तुओंके समूहसे यमराजको भी भय उत्पन्न करनेवाला है, जहाँ अर्ध शुष्क तालाबकी दल-दलमें फँसे हाथी शूत्कार कर रहे हैं, जहाँ बेरीके काँटोंमें पूँछके उलझ जानेसे सुरा गायोंका समूह दुःखी हो रहा है, जहाँ मृगमरीचिमें जलकी श्रद्धासे दौड़नेवाले हरिणोंके समूह व्याकुल हो रहे हैं, जहाँ करेंचकी रजके संगसे वानर अत्यन्त चञ्चल हो उठे हैं, जहाँ लम्बी-लम्बी जटाओंसे मुख ढँक जानेके कारण रीछ चिल्ला रहे हैं, जहाँ प्याससे पीड़ित भेड़ियोंके समूह अपनी जिह्वा रूपी पल्लवोंको बाहर निकाल रहे हैं, जहाँ गुमचीकी फलियोंके चटकने तथा उनके दाने ऊपर पड़नेसे साँप कुपित हो रहे हैं, जहाँ वृक्षोंका आश्रय लेनेवाले जन्तु, तीव्र वायुके संचारसे 'कहीं वृक्ष टूट कर ऊपर न गिर पड़े, इस भयसे क्रूर क्रन्दन कर रहे हैं, जहाँ क्षण एकमें उत्पन्न वघरूलेमें धूलि और पत्तोंके समूह एकदम उड़ने लगते हैं, जहाँ बड़े-बड़े अजगरोंके संचारसे अनेक वृक्ष चूर चूर हो गये हैं, जहाँ उद्दण्ड मदोन्मत्त हाथियों के द्वारा भयंकर प्राणी नष्ट कर दिये गये हैं, जो सूकरोंके समूहसे खोदे गये तालाबोंके मध्य भाग से कठोर है, जहाँका भूतल काँटे, गड्ढे, बयाठे और मिट्टीके टीलोंसे व्याप्त है, जहाँ फूलोंका रस सूख जानेसे घामसे पीड़ित भौंरे छटपटाते हुए इधर-उधर उड़ रहे हैं और जो कुपित सेहियोंके द्वारा छोड़े हुए काँटोंसे भयंकर है ऐसे महावनमें छोड़ी हुई सीता क्षणभर भी प्राण धारण करनेके लिए समर्थ नहीं है ऐसा मैं समझता हूँ ॥४७-५५॥


ततः सेनापतेर्वाक्यं श्रुत्वा रौद्रमरेरपि । विषादमगमद्रामस्तेनैव विदितात्मकम् ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर जो शत्रुसे भी अधिक कठोर थे ऐसे सेनापतिके वचन सुनकर राम विषादको प्राप्त हुए और उतनेसे ही उन्हें अपने आपका बोध हो गया - अपनी त्रुटि अनुभवमें आ गई ॥५६॥


अचिन्तयच्च किं न्वेतत्खलवाक्यवशात्मना । मयका मूढचित्तेन कृतमत्यन्तनिन्दितम् ॥५७॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि मुझ मूर्ख हृदयने दुर्जनोंके वचनोंके वशीभूत हो यह अत्यन्त निन्दित कार्य क्यों कर डाला ? ॥५७॥


तादृशी राजपुत्री क्व क्व चेदं दुःखमीदृशम् । इति सञ्चिन्त्य यातोऽसौ मूर्च्छां मुकुलितेक्षणः ॥५८॥

अर्थ: कहाँ वह वैसी राजपुत्री ? और कहाँ यह ऐसा दुःख ? इस प्रकार विचार कर राम नेत्र बन्द कर मूर्छित हो गये ॥५८॥


चिराच्च प्रतिकारेण प्राप्य संज्ञां सुदुःखितः । विप्रलापं परं चक्रे दयितागतमानसः ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर जिनका हृदय स्त्रीमें लग रहा था ऐसे राम उपाय करनेसे चिरकाल बाद सचेत हो अत्यन्त दुखी होते हुए परम विलाप करने लगे ॥५९॥


हा त्रिवर्णसरोजाक्षि हा विशुद्धगुणाम्बुधे । हा वक्त्रजिततारेशे हा पद्मान्तरकोमले ॥६०॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हाय सीते ! तेरे नेत्र तीन रङ्गके कमलके समान हैं, तू निर्मल गुणों का सागर है, तूने अपने मुखसे चन्द्रमाको जीत लिया है, तू कमलके भीतरी भागके समान कोमल है ॥६०॥


अयि वैदेहि वैदेहि देहि देहि वचो द्रुतम् । जानास्येव हि मे चित्तं त्वदृतेऽत्यन्तकातरम् ॥६१॥

अर्थ: हे वैदेहि ! हे वैदेहि ! शीघ्र ही वचन देओ । यह तो तू जानती ही है कि मेरा हृदय तेरे विना अत्यन्त कातर है ॥६१॥


उपमानविनिर्मुक्तशीलधारिणि हारिणि । हितप्रियसमालापे पापवर्जितमानसे ॥६२॥

अर्थ: तू अनुपम शीलको धारण करने वाली है, सुन्दरी है, तेरा वार्तालाप हितकारी तथा प्रिय है । तेरा मन पापसे रहित है ॥६२॥


अपराधविनिर्मुक्ता निर्घृणेन मयोज्झिता । प्रतिपन्नाऽसि कामाशां मम मानसवासिनि ॥६३॥

अर्थ: तू अपराधसे रहित थी फिर भी निर्दय होकर मैंने तुझे छोड़ दिया । हे मेरे हृदयमें वास करने वाली ! तू किस दशा को प्राप्त हुई होगी ? ॥६३॥


महाप्रतिभयेऽरण्ये क्रूरश्वापदसङ्कटे । कथं तिष्ठसि सन्त्यक्ता देवि भोगविवर्जिता ॥६४॥

अर्थ: हे देवि ! महाभयदायक एवं दुष्ट वन्य पशुओंसे भरे हुए वनमें छोड़ी गई तू भोगोंसे रहित हो किस प्रकार रहेगी ? ॥६४॥


मदासक्तचकोराक्षि लावण्यजलदीर्घिके । त्रपाविनयसम्पन्ने हा देवि क्व गतासि मे ॥६५॥

अर्थ: तेरे नेत्र मदोन्मत्त चकोरके समान हैं, तू सौन्दर्य रूपी जलकी वापिका है, लज्जा और विनयसे सम्पन्न है । हाय मेरी देवि ! तू कहाँ गई ? ॥६५॥


निःश्वासाऽऽमोदजालेन बद्धान् झङ्कारसङ्गतान् । वारयन्ती कराब्जेन भ्रमरान् खेदमाप्स्यति ॥६६॥

अर्थ: हाय देवि ! श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धिसे भ्रमर तेरे मुखके समीप इकट्ठे होकर झंकार करते होंगे उन्हें कर कमलसे दूर हटाती हुई तू अवश्य ही खेदको प्राप्त होगी ॥६६॥


क्व यास्यसि विचेतस्का यूथभ्रष्टा मृगी यथा । एकाकिनी वने भीमे चिन्तितेऽपि सुदुःसहे ॥६७॥

अर्थ: जो विचार करने पर भी अत्यन्त दुःसह है ऐसे भयंकर वनमें झुण्डसे बिछुड़ी मृगीके समान तू अकेली शून्य हृदय हो कहाँ जायगी ? ॥६७॥


अब्जगर्भमृदू कान्तौ पादुकौ चारुलक्षणौ । कथं तव सहिष्येते सङ्गं कर्कशया भुवा ॥६८॥

अर्थ: कमलके भीतरी भागके समान कोमल एवं सुन्दर लक्षणोंसे युक्त तेरे पैर कठोर भूमिके साथ समागमको किस प्रकार सहन करेंगे ? ॥६८॥


कृत्याकृत्यविवेकेन सुदूरं मुक्तमानसैः । गृहीता किमसि म्लेच्छैः पल्लीं नीता सुभीषणाम् ॥६९॥

अर्थ: अथवा जिनका मन, कृत्य और अकृत्यके विवेकसे बिलकुल ही रहित है ऐसे म्लेच्छ लोग तुझे पकड़ कर अत्यन्त भयंकर पल्लीमें ले गये होंगे ॥६९॥


पूर्वादपि प्रिये दुःखादिदं दुःखमनुत्तमम् । प्राप्तासि साध्वि कान्तारे दारुणेन मयोज्झिता ॥७०॥

अर्थ: हे प्रिये ! हे साध्वि ! मुझ दुष्टने तुझे वनमें छोड़ा है अतः अबकी बार पहले दुःखसे भी कहीं अधिक दुःखको प्राप्त हुई है ॥७०॥


रात्रौ तमसि निर्भेद्ये सुप्ता खिन्नशरीरिका । वनरेणुपरीताङ्गा किमाक्रान्ताऽसि हस्तिना ॥७१॥

अर्थ: अथवा तू खेदखिन्न एवं वनकी धूलीसे व्याप्त हो रात्रिके सघन अन्धकारमें सो रही होगी सो तुझे हाथीने दबा दिया होगा ॥७१॥


गृध्रर्क्षभल्लगोमायुशशोलूकसमाकुले । निर्मार्गे परमारण्ये भ्रियसे दुःखिता कथम् ॥७२॥

अर्थ: जो गीध रोछ भालू शृगाल खरगोश और उल्लुओंसे व्याप्त है तथा जहाँ मार्ग दृष्टिगोचर नहीं होता ऐसे बीहड़ वनमें दुखी होती हुई तू कैसे रहेगी ? ॥७२॥


दंष्ट्राकरालवक्त्रेण धृताङ्गेन महाक्षुधा । किं व्याघ्रेणोपनीताऽसि प्रियेऽवस्थामशब्दिताम् ॥७३॥

अर्थ: अथवा हे प्रिये ! जिसका मुख दाढ़ोंसे भयंकर है, अंगड़ाई लेनेसे जिसका शरीर कम्पित है तथा जो तीव्र भूखसे युक्त है ऐसे किसी व्याघ्रने तुम्हें शब्दागोचर अवस्थाको प्राप्त करा दिया है ? ॥७३॥


किं वा विलोलजिह्वेन विलसत्केसरालिना । सिंहेनास्यथवा सत्त्वशाली को योषितीदृशः ॥७४॥

अर्थ: अथवा जिसकी जिह्वा लप-लपा रही है और जिसकी गरदनके बालोंका समूह सुशोभित है ऐसे किसी सिंहने तुम्हें शब्दातीत दशाको प्राप्त करा दिया है क्योंकि ऐसा कौन है जो स्त्रियोंके विषयमें शक्ति-शाली न हो ? ॥७४॥


ज्वालाकलापिनोत्तुङ्गपादपाभावकारिणा । दावेन किन्तु नीताऽसि देव्यवस्थामशोभनाम् ॥७५॥

अर्थ: अथवा हे देवि ! ज्वालाओंके समूहसे युक्त, तथा ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंका अभाव करने वाले दावानलके द्वारा तू क्या अशोभन अवस्थाको प्राप्त कराई गई है ? ॥७५॥


अथवा ज्योतिरीशस्य करैरत्यन्तदुःसहैः । जन्तुधर्मं किमाप्ताऽसि छायासर्पणविह्वला ॥७६॥

अर्थ: अथवा तू छायामें जाने के लिए असमर्थ रही होगी इसलिए क्या सूर्यकी अत्यन्त दुःसह किरणोंसे मरणको प्राप्त हो गई है ॥७६॥


नृशंसेऽपि मयि स्वान्तं कृत्वा शोभनशीलिका । विदीर्णहृदया किन्नु मर्त्यधर्मसमाश्रिता ॥७७॥

अर्थ: अथवा तू प्रशस्त शीलकी धारक थी और मैं अत्यन्त क्रूर प्रकृतिका था। फिर भी तूने मुझमें अपना चित्त लगाया। क्या इसी असमञ्जसभावसे तेरा हृदय विदीर्ण हो गया होगा और तू मृत्युको प्राप्त हुई होगी ॥७७॥


वातिरत्नजटिभ्यां मे सदृशः को नु साम्प्रतम् । प्रापयिष्यति सीताया वार्तां कुशलशंसिनीम् ॥७८॥

अर्थ: हनूमान् और रत्नजटीके समान इस समय कौन है ? जो सीताकी कुशल वार्ता प्राप्त करा देगा ? ॥७८॥


हा प्रिये हा महाशीले हा मनस्विनि हा शुभे । क्व तिष्ठसि क्व याताऽसि किं करोषि न वेत्सि किम् ॥७९॥

अर्थ: हा प्रिये ! हा महाशीलवति ! हा मनस्विनि ! हा शुभे ! तू कहाँ है ? कहाँ चली गई ? क्या कर रही है । क्या कुछ भी नहीं जानती ? ॥७९॥


अहो कृतान्तवक्त्रासौ सत्यमेव त्वया प्रिया । त्यक्तातिदारुणेऽरण्ये कथमेवं करिष्यसि ॥८०॥

अर्थ: अहो कृतान्तवक्त्र ! क्या सचमुच ही तुमने प्रियाको अत्यन्त भयानक वनमें छोड़ दिया है ? नहीं नहीं तुम ऐसा कैसे करोगे ? ॥८०॥


ब्रूहि ब्रूहि न सा कान्ता त्यक्ता तव मयेतरम् । वक्त्रेणानेन चन्द्रेण क्षरतेवामृतोत्करम् ॥८१॥

अर्थ: इस मुखचन्द्रसे अमृतके समूहको झराते हुएके समान तुम कहो-कहो कि मैंने तुम्हारी उस कान्ताको नहीं छोड़ा है ॥८१॥


इत्युक्तोऽपत्रपाभारनतवक्त्रो गतप्रभः । प्रतिपत्तिविनिर्मुक्तः सेनानीराकुलोऽभवत् ॥८२॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर लज्जाके भारसे जिसका मुख नीचा हो गया था, जिसकी प्रभा समाप्त हो गई थी, और जो स्वीकृतिसे रहित था ऐसा सेनापति व्याकुल हो गया ॥८२॥


स्थिते निर्वचने तस्मिन् ध्यात्वा सीतां सुदुःखिताम् । पुनर्मूर्च्छां गतो रामः कृच्छ्रात्संज्ञां च लम्भितः ॥८३॥

अर्थ: जब कृतान्तवक्त्र चुप खड़ा रहा तब अत्यन्त दुःखसे युक्त सीता का ध्यान कर राम पुनः मूर्च्छाको प्राप्त हो गये और बड़ी कठिनाईसे सचेत किये गये ॥८३॥


लक्ष्मणोऽत्रान्तरे प्राप्तो जगादान्तःशुचं स्पृशन् । आकुलोऽसि किमित्येवं देव धैर्यं समाश्रय ॥८४॥

अर्थ: इसी बीचमें लक्ष्मणने आकर हृदयमें शोक धारण करनेवाले रामका स्पर्श करते हुए कहा कि हे देव ! इस तरह व्याकुल क्यों होते हो ? धैर्य धारण करो ॥८४॥


फलं पूर्वार्जितस्येदं कर्मणः समुपागतम् । सकलस्यापि लोकस्य राजपुत्र्या न केवलम् ॥८५॥

अर्थ: यह पूर्वोपार्जित कर्मका फल समस्त लोकको प्राप्त हुआ है न केवल राजपुत्रीको ही ॥८५॥


प्राप्तव्यं येन यल्लोके दुःखं कल्याणमेव वा । स तं स्वयमवाप्नोति कुतश्चिद्व्यपदेशनः ॥८६॥

अर्थ: संसारमें जिसे जो दुःख अथवा सुख प्राप्त करना है वह उसे किसी निमित्तसे स्वयमेव प्राप्त करता है ॥८६॥


आकाशमपि नीतः सन् वनं वा श्वापदाकुलम् । मूर्धानं वा महीध्रस्य पुण्येन स्वेन रक्ष्यते ॥८७॥

अर्थ: यह प्राणी चाहे आकाशमें ले जाया जाय, चाहे वन्य पशुओंसे व्याप्त वनमें ले जाया जाय और चाहे पर्वतकी चोटी पर ले जाया जाय सर्वत्र अपने पुण्यसे ही रक्षित होता है ॥८७॥


देव सीतापरित्यागश्रवणाद्भरतावनौ । अकरोदास्पदं दुःखं प्राकृतीयमनःस्वपि ॥८८॥

अर्थ: हे देव ! सीताके परित्यागका समाचार सुनकर इस भरतक्षेत्रकी समस्त वसुधामें साधारणसे साधारण मनुष्योंके भी मनमें दुःखने अपना स्थान कर लिया है ॥८८॥


प्रजानां दुःखतप्तानां विलीनानां समन्ततः । अश्रुधारापदेशेन हृदयं न्यंगलन्निव ॥८९॥

अर्थ: दुःखसे संतप्त एवं सब ओरसे द्रवीभूत प्रजा-जनोंके हृदय अश्रुधाराके बहाने मानो गल-गलकर बह रहे हैं ॥८९॥


परिदेवनमेवं च चक्रेऽत्यन्तसमाकुलः । हिमाहतप्रभाम्भोजखण्डसम्मितवक्त्रकः ॥९०॥

अर्थ: रामसे इतना कहकर अत्यन्त व्याकुल हो लक्ष्मण स्वयं विलाप करने लगे और उनका मुख हिमसे ताडित कमल-वनके समान निष्प्रभ हो गया ॥९०॥


हा दुष्टजनवाक्याग्निप्रदीपितशरीरिके । गुणसस्यसमुद्भूतिभूमिभूतसुभावने ॥९१॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हाय सीते ! तेरा शरीर दुष्टजनोंके वचन रूपी अग्निसे प्रज्वलित हो रहा है, तू गुणरूपी धान्यकी उत्पत्तिके लिए भूमि स्वरूप है तथा उत्तम भावनासे युक्त है ॥९१॥


राजपुत्रि क्व याताऽसि सुकुमाराङ्घ्रिपल्लवे । शीलाद्रिधरणक्षोणि सीते सौम्ये मनस्विनि ॥९२॥

अर्थ: हे राजपुत्रि ! तू कहाँ गई ? तेरे चरण-किसलय अत्यन्त सुकुमार थे ? तू शील रूपी पर्वतको धारण करनेके लिए पृथिवी रूप थी, हे सीते ! तू बड़ी ही सौम्य और मनस्विनी थी ॥९२॥


खलवाक्यतुषारेण मातः पश्य समन्ततः । गुणराट् विसिनी दग्धा राजहंसनिषेविता ॥९३॥

अर्थ: हे मातः ! देख, दुष्ट मनुष्योंके वचनरूपी तुषारसे गुणोंसे सुशोभित तथा राजहंसोंसे निषेवित यह कमलिनी सब ओरसे दग्ध हो गई है । भावार्थ - यहाँ अतिशयोक्ति अलंकार द्वारा विसिनी शब्दसे सीताका उल्लेख किया गया है । जिस प्रकार कमलिनी गुण अर्थात् तन्तुओंसे सुशोभित होती है उसी प्रकार सीता भी गुण अर्थात् दया दाक्षिण्य आदि गुणोंसे सुशोभित थी और जिस प्रकार कमलिनी राजहंस पक्षियोंसे सेवित होती है उसी प्रकार सीता भी राजहंस अर्थात् राजशिरोमणि रामचन्द्रसे सेवित थी ॥९३॥


सुभद्रासदृशी भद्रा सर्वाचारविचक्षणा । सुखासिकेव लोकस्य मूर्त्ता क्वासि वरे गता ॥९४॥

अर्थ: हे उत्तमे ! तू सुभद्राके समान भद्र और सर्व आचारके पालन करनेमें निपुण थी तथा समस्त लोकको मूर्तिधारिणी सुख स्थिति स्वरूप थी । तू कहाँ गई ? ॥९४॥


भास्करेण विना का द्यौः का निशा शशिना विना । स्त्रीरत्नेन विना तेन साकेता वाऽपि कीदृशी ॥९५॥

अर्थ: सूर्यके विना आकाश क्या ? और चन्द्रमाके विना रात्रि क्या ? उसी प्रकार उस स्त्रीरत्नके बिना अयोध्या कैसी ? भावार्थ - जिस प्रकार सूर्यके बिना आकाशकी और चन्द्रमाके विना रात्रिकी शोभा नहीं है उसी प्रकार सीताके विना अयोध्याकी शोभा नहीं है ॥९५॥


वेणुवीणामृदङ्गादिनिःस्वानपरिवर्जिता । नगरी देव सञ्जाता करुणाक्रन्दपूरिता ॥९६॥

अर्थ: हे देव ! समस्त नगरी बाँसुरी वीणा तथा मृदङ्ग आदिके शब्दसे रहित तथा करुण क्रन्दनसे पूर्ण हो रही है ॥९६॥


रथ्यासूद्यानदेशेषु कान्तारेषु सरित्सु च । त्रिकचत्वरभागेषु भवनेष्वापणेषु च ॥९७॥

सन्तताभिपतन्तीभिरश्रुधाराभिरुद्गतः । पङ्कः समस्तलोकस्य घनकालभवोपमः ॥९८॥

अर्थ: गलियोंमें, बागबगीचोंके प्रदेशोंमें, वनोंमें, नदियोंमें, तिराहों-चौराहोंमें, महलोंमें और बाजारोंमें निरन्तर निकलने वालीं समस्त लोगोंकी अश्रुधाराओंसे वर्षा ऋतुके समान कीचड़ उत्पन्न हो गया है ॥९७-९८॥


बाष्पगद्गदया वाचा कृच्छ्रेण समुदाहरन् । गुणप्रसूनवर्षेण परोक्षामपि जानकीम् ॥९९॥

पूजयत्यखिलो लोकस्तदेकगतमानसः । सा हि सर्वसतीमूर्ध्नि पदं चक्रे गुणोज्ज्वला ॥१००॥

अर्थ: यद्यपि जानकी परोक्ष हो गई है तथापि उसी एकमें जिसका मन लग रहा है ऐसा समस्त संसार अश्रुसे गद्गद वाणीके द्वारा बड़ी कठिनाईसे उच्चारण करता हुआ गुणरूप फूलोंकी वर्षासे उसकी पूजा करता है सो ठीक ही है क्योंकि गुणोंसे उज्ज्वल रहनेवाली उस जानकीने समस्त सती स्त्रियोंके मस्तक पर स्थान किया था अर्थात् समस्त सतियोंमें शिरोमणि थी ॥९९-१००॥


समुत्कण्ठापराधीनैः स्वयं देव्याऽनुपालितैः । छेकैरपि परं दीनं रुदितं धूतविग्रहैः ॥१०१॥

अर्थ: स्वयं सीतादेवीने जिनका पालन किया था तथा जो उसके अभावमें उत्कण्ठासे विवश हैं ऐसे शुक आदि चतुर पक्षी भी शरीरको कँपाते हुए अत्यन्त दीन रुदन करते रहते हैं ॥१०१॥


तदेवं गुणसम्बन्धसमस्तजनचेतसः । कृते कस्य न जानक्या वर्तते शुगनुत्तरा ॥१०२॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त मनुष्योंके चित्तके साथ जिसके गुणोंका संबन्ध था ऐसी जानकीके लिए किस मनुष्यको भारी शोक नहीं है ? ॥१०२॥


किन्तु कोविद नोपायः पश्चात्तापो मनीषिते । इति सञ्चिन्त्य धीरत्वमवलम्बितुमर्हसि ॥१०३॥

अर्थ: किन्तु हे विद्वन् ! पश्चात्ताप करना इच्छित वस्तुके प्राप्त करनेका उपाय नहीं है ऐसा विचार कर धैर्य धारण करना योग्य है ॥१०३॥


इति लक्ष्मणवाक्येन पद्मनाभः प्रसादितः । शोकं किञ्चित्परित्यज्य कर्त्तव्ये निदधे मनः ॥१०४॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मणके वचनसे प्रसन्न रामने कुछ शोक छोड़कर कर्तव्य - करने योग्य कार्यमें मन लगाया ॥१०४॥


प्रेतकर्मणि जानक्याः सादरं जनमादिशत् । द्राग् भद्रकलशं चैव समाहूय जगाविति ॥१०५॥

समादिष्टोऽसि वैदेह्या पूर्वं भद्र यथाविधम् । तेनैव विधिना दानं तामुद्दिश्य प्रदीयताम् ॥१०६॥

अर्थ: उन्होंने जानकीके मरणोत्तर कार्यके विषयमें आदर सहित लोगोंको आदेश दिया तथा भद्रकलश नामक खजानचीको शीघ्र ही बुलाकर यह आदेश दिया कि हे भद्र ! सीताने तुझे पहले जिस विधिसे दान देनेका आदेश दिया था उसी विधिसे उसे लक्ष्य कर अब भी दान दिया जाय ॥१०५-१०६॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा कोषाध्यक्षः सुमानसः । अर्थिनामीप्सितं द्रव्यं नवमासानशिश्रणत् ॥१०७॥

अर्थ: ‘जैसी आज्ञा हो’ यह कहकर शुद्ध हृदयको धारण करनेवाला कोषाध्यक्ष नौ मास तक याचकोंके लिए इच्छित दान देता रहा ॥१०७॥


सहस्रैरष्टभिः स्त्रीणां सेव्यमानोऽपि सन्ततम् । वैदेहीं मनसा रामो निमेषमपि नात्यजत् ॥१०८॥

अर्थ: यद्यपि आठ हजार स्त्रियाँ निरन्तर रामकी सेवा करती थीं तथापि राम पल भरके लिए भी मनसे सीताको नहीं छोड़ते थे ॥१०८॥


सीताशब्दमयस्तस्य समालापः सदाऽभवत् । सर्वं ददर्श वैदेहीं तद्गुणाकृष्टमानसः ॥१०९॥

अर्थ: उनका सदा सीता शब्द रूप ही समालाप होता था अर्थात् वे सदा ‘सीता-सीता’ कहते रहते थे और उसके गुणोंसे आकृष्ट चित्त हो सबको सीता रूप ही देखते थे अर्थात् उन्हें सर्वत्र सीता-सीता ही दिखाई देती थी ॥१०९॥


क्षितिरेणुपरीताङ्गीं गिरिगह्वरवर्तिनीम् । अपश्यज्जानकीं स्वप्ने नेत्राम्बुकृतदुर्दिनाम् ॥११०॥

अर्थ: पृथिवीकी धूलिसे जिसका शरीर व्याप्त है, जो पर्वतकी गुफामें वास कर रही है तथा अश्रुओंकी जो लगातार वर्षा कर रही है ऐसी सीताको वे स्वप्नमें देखते थे ॥११०॥


मनसा च सशल्येन गाढशोको विबुद्धवान् । अचिन्तयत्ससूत्कारो बाष्पाच्छादितलोचनः ॥१११॥

कष्टं लोकान्तरस्थाऽपि सीता सुन्दरचेष्टिता । न विमुञ्चति मां साध्वी सानुबन्धा हितोद्यता ॥११२॥

अर्थ: अत्यधिक शोकको धारण करनेवाले राम जब जागते थे तब सशल्य मनसे आंसुओंसे नेत्रोंको आच्छादित करते हुए सू-सू शब्दके साथ चिन्ता करने लगते थे कि अहो ! बड़े कष्टकी बात है कि सुन्दर चेष्टाको धारण करनेवाली सीता लोकान्तरमें स्थित होने पर भी मुझे नहीं छोड़ रही है । वह साध्वी पूर्व संस्कारसे सहित होनेके कारण अब भी मेरा हित करनेमें उद्यत है ॥१११-११२॥


स्वैरं स्वैरं ततः सीताशोके विरलतामिते । परिशिष्टवरस्त्रीभिः पद्मो धृतिमुपागमत् ॥११३॥

अर्थ: तदनन्तर धीरे-धीरे सीताका शोक विरल होने पर राम अवशिष्ट स्त्रियोंसे धैर्यको प्राप्त हुए ॥११३॥


तौ शीरचक्रदिव्यास्त्रौ परमन्यायसङ्गतौ । प्रीत्याऽनन्तरया युक्तौ प्रशस्तगुणसागरौ ॥११४॥

पालयन्तौ महीं सम्यङ्निम्नगापतिमेखलाम् । सौधर्मैशानदेवेन्द्राविव रेजतुरुत्कटम् ॥११५॥

अर्थ: जो परम न्यायसे सहित थे, अविरल प्रीतिसे युक्त थे, प्रशस्त गुणोंके सागर थे, और समुद्रान्त पृथिवीका अच्छी तरह पालन करते थे ऐसे हल और चक्र नामक दिव्य अस्त्रको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मण सौधर्मेन्द्रके समान अत्यधिक सुशोभित होते थे ॥११४-११५॥


तौ तत्र कोशलायां सुरलोकसमानमानवायां राजन् । परमान् प्राप्तौ भोगान् सुप्रभपुरुषोत्तमौ यथा पुरुषेन्द्रौ ॥११६॥

अर्थ: गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे राजन् ! जहाँ देवोंके समान मनुष्य थे ऐसी उस अयोध्या नगरीमें उत्तम कान्तिको धारण करने वाले दोनों पुरुषोत्तम, इन्द्रोंके समान परम भोगोंको प्राप्त हुए थे ॥११६॥


स्वकृतसुकर्मोदयतः सकलजनानन्ददानकोविदचरितौ । सुखसागरे निमग्नौ रविभावज्ञातकालमवतस्थाते ॥११७॥

अर्थ: अपने द्वारा किये हुए पुण्य कर्मके उदयसे जिनका चरित समस्त मनुष्योंके लिए आनन्द देने वाला था, तथा जो सूर्यके समान कान्ति वाले थे ऐसे राम लक्ष्मण अज्ञात काल तक सुखसागरमें निमग्न रहे ॥११७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामशोकाभिधानं नाम नवनवतितमं पर्व ॥९९॥


१००. शतं पर्व (लवणांकुशोद्भवाभिधानं)

एवं तावदिदं जातमिदमन्यन्नरेश्वर । शृणु वच्यामि तं वृत्तं लवणाङ्कुशगोचरम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर श्री गौतम स्वामी कहते हैं कि हे नरेश्वर ! इसप्रकार यह वृत्तान्त तो रहा अब दूसरा लवणाङ्कुशसे सम्बन्ध रखनेवाला वृत्तान्त कहता हूँ सो सुन ॥१॥


अथ सर्वप्रजापुण्यैर्गृहीताया इवामलैः । अधत्त पाण्डुतामङ्गयष्टिर्जनकजन्मनः ॥२॥

अर्थ: तदनन्तर जनकनन्दिनी-के कृश शरीरने धवलता धारण की, सो ऐसा जान पड़ता था मानो समस्त प्रजाजनोंके निर्मल पुण्यने उसे ग्रहण किया था, इसलिए उसकी धवलतासे ही उसने धवलता धारण की हो ॥२॥


श्यामतासमवष्टब्धचारुचूचुकचूलिकैः । पयोधरघटौ पुत्रपानार्थमिव मुद्रितौ ॥३॥

अर्थ: स्तनोंके सुन्दर चूचुक सम्बन्धी अग्रभाग श्यामवर्णसे युक्त हो गये, सो ऐसे जान पड़ते थे मानो पुत्रके पीनेके लिए स्तनरूपी घट मुहरबन्द करके ही रख दिये हों ॥३॥


स्तन्यार्थमानने न्यस्ता दुग्धसिन्धुरिवायता । सुस्निग्धधवला दृष्टिर्माधुर्यमदधात्परम् ॥४॥

अर्थ: उसकी स्नेहपूर्ण धवल दृष्टि उस प्रकार परम माधुर्यको धारण कर रही थी मानो दूधके लिए उसके मुख पर लम्बी-चौड़ी दूधकी नदी ही लाकर रख दी हो ॥४॥


सर्वमङ्गलसंघातैर्गात्रयष्टिरधिष्ठिता । अमन्दायतकल्याणगौरवोद्भवनादिव ॥५॥

अर्थ: उसकी शरीरयष्टि सब प्रकारके मङ्गलोंके समूहसे युक्त थी इसलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो अपरिमित एवं विशाल कल्याणोंका गौरव प्रकट करनेके लिए ही युक्त थी ॥५॥


मन्दं मन्दं प्रयच्छन्त्याः क्रमं निर्मलकुट्टिमे । प्रतिबिम्बाम्बुजेन क्षमा पूर्वसेवामिवाकरोत् ॥६॥

अर्थ: जब सीता मणिमयी निर्मल फर्सपर धीरे-धीरे पैर रखती थी तब उनका प्रति-विम्ब नीचे पड़ता था, उससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी प्रतिरूपी कमलके द्वारा उसकी पहलेसे ही सेवा कर रही हो ॥६॥


सूतिकालकृताकांक्षा कपोलप्रतिबिम्बिता । समलक्ष्यत लक्ष्मीर्वा शय्याऽपाश्रयपुत्रिका ॥७॥

अर्थ: प्रसूति कालमें जिसकी आकांक्षा की जाती है ऐसी जो पुत्तलिका सीताकी शय्याके समीप रखी गई थी उसका प्रतिविम्ब सीताके कपोलमें पड़ता था उससे वह पुत्तलिका लक्ष्मीके समान दिखाई देती थी ॥७॥


रात्रौ सौधोपयाताया व्यंशुके स्तनमण्डले । श्वेतच्छत्रमिवाधारि सङ्क्रान्तं शशिमण्डलम् ॥८॥

अर्थ: रात्रिके समय सीता महलकी छत पर चली जाती थी, उस समय उसके वस्त्र रहित स्तनमण्डल पर जो चन्द्रबिम्बका प्रतिबिम्ब पड़ता था वह ऐसा जान पड़ता था मानो गर्भके ऊपर सफेद छत्र ही धारण किया गया हो ॥८॥


वासवेश्मनि सुप्ताया अपि प्रचलबाहुकाः । चित्रचामरधारिण्यश्चामराणि व्यधूनयन् ॥९॥

अर्थ: जिस समय वह निवास-गृहमें सोती थी उस समय भी चञ्चल भुजाओंसे युक्त एवं नाना प्रकारके चमर धारण करनेवाली स्त्रियाँ उसपर चमर ढोरती रहती थीं ॥९॥


स्वप्ने पयोजिनीपुत्रपुटवारिभिरादरात् । अभिषेको महानागैरकारि परिमण्डितैः ॥१०॥

अर्थ: स्वप्नमें अलंकारोंसे अलंकृत बड़े-बड़े हाथी, कमलिनीके पत्रपुटमें रखे हुए जलके द्वारा उसका आदरपूर्वक अभिषेक करते थे ॥१०॥


असकृज्जयनिःस्वानं व्रजन्त्याः प्रतिबुद्धताम् । सचन्द्रशालिकाशालभञ्जिका अपि चक्रिरे ॥११॥

अर्थ: जब वह जागती थी तबै बार-बार जय-जय शब्द होता था, उससे ऐसा जान पड़ता था मानो महलके ऊर्ध्व भागमें सुशोभित पुत्तलियाँ ही जय-जय शब्द कर रही हों ॥११॥


परिवारजनाह्वानेष्वादिशेति ससम्भ्रमाः । अशरीरा विनिश्चेरुर्वाचः परमकोमलाः ॥१२॥

अर्थ: जब वह परिवार-के लोगोंको बुलाती थी तब ‘आज्ञा देओ’ इस प्रकारके संभ्रम सहित शरीर रहित परम कोमल वचन अपने-आप उच्चरित होने लगते थे ॥१२॥


क्रीडयाऽपि कृतं सेहे नाज्ञाभङ्गं मनस्विनी । सुक्षिप्रेष्वपि कार्येषु भ्रूर्भ्राम्यत्सविभ्रमम् ॥१३॥

अर्थ: वह मनस्विनी क्रीड़ामें भी किये गये आज्ञा भङ्गको नहीं सहन करती थी तथा अत्यधिक शीघ्रताके साथ किये हुए कार्योंमें भी विभ्रम पूर्वक भौंहें घुमाती थी ॥१३॥


यथेच्छं विद्यमानेऽपि मणिदर्पणसन्निधौ । मुखमुत्खातखड्गाग्रे जातं व्यसनमीक्षितुम् ॥१४॥

अर्थ: यद्यपि समीपमें इच्छानुकूल मणियोंके दर्पण विद्यमान रहते थे तथापि उसे उभारी हुई तलवारके अग्रभागमें मुख देखनेका व्यसन पड़ गया था ॥१४॥


समुत्सारितवीणाद्या नारीजनविरोधिनः । श्रोत्रयोरसुखायन्त कार्मुकध्वनयः परम् ॥१५॥

अर्थ: वीणा आदिको दूर कर स्त्रीजनोंको नहीं रुचनेवाली धनुषकी टंकारका शब्द ही उसके कानोंमें सुख उत्पन्न करता था ॥१५॥


चक्षुः पञ्जरसिंहेषु जगाम परमां रतिम् । ननाम कथमप्यङ्गमुत्तमं स्तम्भितं यथा ॥१६॥

अर्थ: उसके नेत्र पिंजड़ोंमें बन्द सिंहोंके ऊपर परम प्रीतिको प्राप्त होते थे और मस्तक तो बड़ी कठिनाईसे नम्रीभूत होता मानो खड़ा ही हो गया हो ॥१६॥


पूर्णेऽथ नवमे मासि चन्द्रे श्रवणसङ्गते । श्रावणस्य दिने देवी पौर्णमास्यां सुमङ्गला ॥१७॥

सर्वलक्षणसम्पूर्णा पूर्णचन्द्रनिभानना । सुखं सुखकरात्मानमसूत सुतयुग्मकम् ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर नवम महीना पूर्ण होने पर जब चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र पर था, तब श्रावण मास की पूर्णिमाके दिन, उत्तम मङ्गलाचारसे युक्त समस्त लक्षणोंसे परिपूर्ण एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली सीताने सुखपूर्वक सुखदायक दो पुत्र उत्पन्न किये ॥१७-१८॥


नृतमय्य इवाभूवंस्तयोरुद्गतयोः प्रजाः । भेरीपटहनिःस्वाना जाताः शङ्खस्वनान्विताः ॥१९॥

अर्थ: उन दोनोंके उत्पन्न होने पर प्रजा नृत्यमयीके समान हो गई और शङ्खोंके शब्दोंके साथ भेरियों एवं नगाड़ोंके शब्द होने लगे ॥१९॥


उन्मत्तमर्त्यलोकाभश्चारुसम्पत्समन्वितः । स्वसृप्रीत्या नरेन्द्रेण जनितः परमोत्सवः ॥२०॥

अर्थ: बहिनकी प्रीतिसे राजाने ऐसा महान् उत्सव किया जो उन्मत्त मनुष्य लोकके समान था और सुन्दर सम्पत्तिसे सहित था ॥२०॥


अनङ्गलवणाभिख्यामेकोऽमण्डयदेतयोः । मदनाङ्कुशनामान्यः सद्भूतार्थनियोगतः ॥२१॥

अर्थ: उनमेंसे एकने अनङ्गलवण नामको अलंकृत किया और दूसरेने सार्थक भावसे मदनाङ्कुश नामको सुशोभित किया ॥२१॥


ततः क्रमेण तौ वृद्धिं बालकौ व्रजतस्तदा । जननीहृदयानन्दौ प्रवीरपुरुषाङ्कुरौ ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर माताके हृदयको आनन्द देनेवाले, प्रवीर पुरुषके अंकुर स्वरूप वे दोनों बालक क्रम-क्रमसे वृद्धिको प्राप्त होने लगे ॥२२॥


रक्षार्थं सर्षपकणा विन्यस्ता मस्तके तयोः । समुन्मिषत्प्रतापाग्निस्फुलिङ्गा इव रेजिरे ॥२३॥

अर्थ: रक्षाके लिए उनके मस्तक पर जो सरसोंके दाने डाले गये थे वे देदीप्यमान प्रतापरूपी अग्निके तिलगोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२३॥


वपुर्गौरोचनापङ्कपिञ्जरं परिवारितम् । समभिव्यज्यमानेन सहजेनेव तेजसा ॥२४॥

अर्थ: गोरोचना की पङ्कसे पीला पीला दिखने वाला उनका शरीर ऐसा जान पड़ता था मानो अच्छी तरहसे प्रकट होनेवाले स्वाभाविक तेजसे ही घिरा हो ॥२४॥


विकटा हाटकाबद्धवैयाघ्रनखपंक्तिका । रेजे दर्पाङ्कुरालीव समुद्भेदमिता हृदि ॥२५॥

अर्थ: सुवर्णमालामें खचित व्याघ्र सम्बन्धी नखोंकी बड़ी-बड़ी पंक्ति उनके हृदय पर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो दर्पके अंकुरोंका समूह ही हो ॥२५॥


आद्यं जल्पितमव्यक्तं सर्वलोकमनोहरम् । बभूव जन्मपुण्याहः सत्यग्रहणसन्निभम् ॥२६॥

अर्थ: सब लोगोंके मनको हरण करनेवाला जो उनका अव्यक्त प्रथम शब्द था वह उनके जन्म दिनकी पवित्रताके सत्यंकारके समान जान पड़ता था अर्थात् उनका जन्म दिन पवित्र दिन है, यह सूचित कर रहा था ॥२६॥


मुग्धस्मितानि रम्याणि कुसुमानीव सर्वतः । हृदयानि समाकर्षन् कुलानीव मधुव्रतान् ॥२७॥

अर्थ: जिस प्रकार पुष्प भ्रमरोंके समूहको आकर्षित करते हैं, उसी प्रकार उनकी भोली भाली मनोहर मुसकानें सब ओरसे हृदयोंको आकर्षित करती थीं ॥२७॥


जननीक्षीरसेकोत्थविलासहसितैरिव । जातं दशनकैर्वक्त्रपद्मकं लब्धमण्डनम् ॥२८॥

अर्थ: -माताके क्षीरके सिञ्चनसे उत्पन्न विलास हास्यके समान जो छोटे-छोटे दाँत थे उनसे उनका मुख-रूपी कमल अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥२८॥


धात्रीकराङ्गुलीलग्नौ पञ्चषाणि पदानि तौ । एवंभूतौ प्रयच्छन्तौ मनः कस्य न जह्रतुः ॥२९॥

अर्थ: धायके हाथकी अँगुली पकड़ कर पाँच छह डग देनेवाले उन दोनों बालकोंने किसका मन हरण नहीं किया था ॥२९॥


पुत्रकौ तादृशौ वीक्ष्य चारुक्रीडनकारिणौ । शोकहेतुं विसस्मार समस्तं जनकात्मजा ॥३०॥

अर्थ: इस प्रकार सुन्दर क्रीड़ा करनेवाले उन पुत्रोंको देखकर माता सीता शोकके समस्त कारण भूल गई ॥३०॥


वर्द्धमानौ च तौ कान्तौ निसर्गोदात्तविभ्रमौ । देहावस्थां परिप्राप्तौ विद्यासंग्रहणोचिताम् ॥३१॥

अर्थ: इस तरह क्रम-क्रमसे बढ़ते तथा स्वभावसे उदार विभ्रमको धारण करते हुए वे दोनों सुन्दर बालक विद्या ग्रहणके योग्य शरीरकी अवस्थाको प्राप्त हुए ॥३१॥


ततस्तत्पुण्ययोगेन सिद्धार्थो नाम विश्रुतः । शुद्धात्मा क्षुल्लकः प्राप वज्रजङ्घस्य मन्दिरम् ॥३२॥

अर्थ: तदनन्तर उनके पुण्य योगसे सिद्धार्थ नामक एक प्रसिद्ध शुद्ध हृदय क्षुल्लक, राजा वज्रजङ्घके घर आया ॥३२॥


सन्ध्यात्रयमबन्ध्यं यो महाविद्यापराक्रमः । मन्दरोरसि वन्दित्वा जिनानेति पदं क्षणात् ॥३३॥

अर्थ: वह क्षुल्लक महाविद्याओंके द्वारा इतना पराक्रमी था कि तीनों संध्याओंमें प्रतिदिन मेरुपर्वत पर विद्यमान जिन-प्रतिमाओंकी वन्दना कर क्षण भरमें अपने स्थान पर आ जाता था ॥३३॥


प्रशान्तवदनो धीरो लुञ्चरञ्जितमस्तकः । साधुभावनचेतस्को वस्त्रमात्रपरिग्रहः ॥३४॥

उत्तमाणुव्रतो नानागुणशोभनभूषितः । जिनशासनतत्त्वज्ञः कलाजलधिपारगः ॥३५॥

अंशुकेनोपवीतेन सितेन प्रचलात्मना । मृणालकाण्डजालेन नागेन्द्र इव मन्थरः ॥३६॥

करञ्जालिकां कक्षे कृत्वा प्रियसखीमिव । मनोज्ञममृतास्वादं धर्मवृद्धिरिति ब्रुवन् ॥३७॥

गृहे गृहे शनैर्भिक्षां पर्यटन् विधिसङ्गतः । गृहोत्तमं समासीदद्यत्र तिष्ठति जानकी ॥३८॥

अर्थ: वह प्रशान्त मुख था, धीर वीर था, केशलुंच करनेसे उसका मस्तक सुशोभित था, उसका चित्त शुद्ध भावनाओंसे युक्त था, वह वस्त्र मात्र परिग्रहका धारक था, उत्तम अणुव्रती था, नानागुण रूपी अलंकारोंसे अलंकृत था, जिन शासनके रहस्यको जाननेवाला था, कलारूपी समुद्रका पारगामी था, धारण किये हुए सफेद चञ्चल वस्त्रसे ऐसा जान पड़ता था मानो मृणालोंके समूहसे वेष्टित मन्द मन्द चलनेवाला गजराज ही हो, जो पीछीको प्रिय सखी के समान बगलमें धारण कर अमृतके स्वादके समान मनोहर ‘धर्मवृद्धि’ शब्दका उच्चारण कर रहा था, और घर घरमें भिक्षा लेता हुआ धीरे-धीरे चल रहा था, इस तरह भ्रमण करता हुआ संयोगवश उस उत्तम घरमें पहुँचा, जहाँ सीता बैठी थी ॥३४-३८॥


जिनशासनदेवीव सा मनोहरभावना । दृष्ट्वा क्षुल्लकमुत्तीर्य सम्भ्रान्ता नवमालिकाम् ॥३९॥

अर्थ: जिनशासन देवीके समान मनोहर भावनाको धारण करनेवाली सीताने ज्योंही क्षुल्लकको देखा, त्योंही वह संभ्रमके साथ नौखण्डा महलसे उतर कर नीचे आ गई ॥३९॥


उपगत्य समाधाय करवारिरुहद्वयम् । इच्छाकारादिना सम्यक् सम्पूज्य विधिकोविदा ॥४०॥

विशिष्टेनान्नपानेन समतर्पयदादरात् । जिनेन्द्रशासनाऽऽसक्तान् सा हि पश्यति बान्धवान् ॥४१॥

अर्थ: तथा पास जाकर और दोनों हाथ जोड़कर उसने इच्छाकार आदिके द्वारा उसकी अच्छी तरह पूजा की । तदनन्तर विधिके जाननेमें निपुण सीताने उसे आदर पूर्वक विशिष्ट अन्न पान देकर संतुष्ट किया, सो ठीक ही है क्योंकि वह जिन-शासनमें आसक्त पुरुषोंको अपना बन्धु समझती है ॥४०-४१॥


निवर्तितान्यकर्त्तव्यः सविश्रब्धः सुखं स्थितः । पृष्टो जगाद सीतायै स्ववार्त्तां भ्रमणादिकम् ॥४२॥

अर्थ: भोजनके बाद अन्य कार्य छोड़ वह क्षुल्लक निश्चिन्त हो सुखसे बैठ गया । तदनन्तर पूछने पर उसने सीताके लिए अपने भ्रमण आदिकी वार्ता सुनाई ॥४२॥


महोपचारविनयप्रयोगहृतमानसः । क्षुल्लकः परितुष्टात्मा ददर्श लवणाङ्कुशौ ॥४३॥

अर्थ: अत्यधिक उपचार और विनयके प्रयोगसे जिसका मन हरा गया था, ऐसे क्षुल्लकने अत्यन्त संतुष्ट होकर लवणांकुशको देखा ॥४३॥


महानिमित्तमष्टाङ्गं ज्ञाता सुश्राविकामसौ । सम्भाषयितुमप्राक्षीद् वार्त्तां पुत्रकसङ्गताम् ॥४४॥

अर्थ: अष्टाङ्ग महानिमित्तके ज्ञाता उस क्षुल्लकने वार्तालाप बढ़ानेके लिए श्राविकाके व्रत धारण करनेवाली सीतासे उसके पुत्रोंसे सम्बन्ध रखनेवाली वार्ता पूछी ॥४४॥


तयावेदितवृत्तान्तो वाष्पदुर्दिननेत्रया । क्षणं शोकसमाक्रान्तः क्षुल्लको दुःखितोऽभवत् ॥४५॥

अर्थ: तब नेत्रोंसे अश्रुकी वर्षा करती हुई सीताने क्षुल्लकके लिए सब समाचार सुनाया, जिसे सुनकर क्षुल्लक भी शोकाक्रान्त हो दुःखी हो गया ॥४५॥


उवाच च न देवि त्वं विधातुं शोकमर्हसि । यस्या देवकुमाराभौ प्रशस्तौ बालकाविमौ ॥४६॥

अर्थ: उसने कहा भी कि हे देवि ! जिसके देवकुमारोंके समान ये दो बालक विद्यमान हैं ऐसी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए ॥४६॥


अथ तेन घनप्रेमप्रवणीकृतचेतसा । अचिराच्छस्त्रशास्त्राणि ग्राहितौ लवणाङ्कुशौ ॥४७॥

अर्थ: अथानन्तर अत्यधिक प्रेमसे जिसका हृदय वशीभूत था ऐसे उस क्षुल्लकने थोड़े ही समयमें लवणाङ्कुशको शस्त्र और शास्त्र विद्या ग्रहण करा दी ॥४७॥


ज्ञानविज्ञानसम्पन्नौ कलागुणविशारदौ । दिव्यास्त्रक्षेपसंहारविषयातिविचक्षणौ ॥४८॥

अर्थ: वे पुत्र थोड़े ही समयमें ज्ञान-विज्ञानसे संपन्न, कलाओं और गुणोंमें विशारद तथा दिव्य शस्त्रोंके आह्वान एवं छोड़नेके विषयमें अत्यन्त निपुण हो गये ॥४८॥


बिभ्रतुस्तौ परां लक्ष्मीं महापुण्यानुभावतः । ध्वस्तावरणसम्बन्धौ निधानकलशाविव ॥४९॥

अर्थ: महापुण्यके प्रभावसे वे दोनों, जिनके आवरणका सम्बन्ध नष्ट हो गया था, ऐसे खजानेके कलशोंके समान परम लक्ष्मीको धारण कर रहे थे ॥४९॥


न हि कश्चिद्गुरोः खेदः शिष्ये शक्तिसमन्विते । सुखेनैव प्रदर्श्यन्ते भावाः सूर्येण नेत्रिणे ॥५०॥

अर्थ: यदि शिष्य शक्तिसे सहित है, तो उससे गुरुको कुछ भी खेद नहीं होता, क्योंकि सूर्यके द्वारा नेत्रवान् पुरुषके लिए समस्त पदार्थ सुखसे दिखा दिये जाते हैं ॥५०॥


भजतां संस्तवं पूर्वं गुणानामागमः सुखम् । खेदोऽवतरतां कोऽसौ हंसानां मानसं हृदम् ॥५१॥

अर्थ: पूर्व परिचयको धारण करनेवाले मनुष्योंको गुणोंकी प्राप्ति सुखसे हो जाती है सो ठीक ही है क्योंकि मानस-सरोवरमें उतरनेवाले हंसोंको क्या खेद होता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥५१॥


उपदेशं ददत्पात्रे गुरुर्याति कृतार्थताम् । अनर्थकः समुद्योतो रवेः कौशिकगोचरः ॥५२॥

अर्थ: पात्रके लिए उपदेश देनेवाला गुरु कृतकृत्यताको प्राप्त होता है । क्योंकि जिस प्रकार उल्लूके लिए किया हुआ सूर्यका प्रकाश व्यर्थ होता है, उसी प्रकार अपात्रके लिए दिया हुआ गुरुका उपदेश व्यर्थ होता है ॥५२॥


स्फुरद्यशःप्रतापाभ्यामाक्रान्तभुवनावथ । अभिरामदुरालोकौ शीततिग्मकराविव ॥५३॥

अर्थ: अथानन्तर बढ़ते हुए यश और प्रतापसे जिन्होंने लोकको व्याप्त कर रक्खा था ऐसे वे दोनों पुत्र चन्द्र और सूर्यके समान सुन्दर तथा दुरालोक हो गये अर्थात् वे चन्द्रमाके समान सुन्दर थे और सूर्यके समान उनकी ओर देखना भी कठिन था ॥५३॥


व्यक्ततेजोबलावग्निमारुताविव सङ्गतौ । शिलादृढवपुःस्कन्धौ हिमविन्ध्याचलाविव ॥५४॥

अर्थ: प्रकट तेज और बलके धारण करनेवाले वे दोनों पुत्र परस्पर मिले हुए अग्नि और पवनके समान जान पड़ते थे अथवा जिनके शरीरके कन्धे शिलाके समान दृढ़ थे ऐसे वे दोनों भाई हिमाचल और विन्ध्याचलके समान दिखाई देते थे ॥५४॥


महावृषौ यथा कान्तयुगसंयोजनोचितौ । धर्माश्रमाविवात्यन्तरमणीयौ सुखावहौ ॥५५॥

अर्थ: अथवा वे कान्त युग संयोजन अर्थात् सुन्दर जुवा धारण करनेके योग्य (पक्षमें युगकी उत्तम व्यवस्था करनेमें निपुण) महावृषभोंके समान थे अथवा धर्माश्रमोंके समान रमणीय और सुखको धारण करनेवाले थे ॥५५॥


पूर्वापरककुब्भागाविव लोकालिलक्षितौ । उदयास्तमयाधाने सर्वतेजस्विनां क्षमौ ॥५६॥

अर्थ: अथवा वे समस्त तेजस्वी मनुष्योंके उदय तथा अस्त करनेमें समर्थ थे, इसलिए लोग उन्हें पूर्व और पश्चिम दिशाओंके समान देखते थे ॥५६॥


अभ्यर्णार्णवसंरोधसङ्कटे कुकुटीरके । तेजसः परिनिन्दन्तौ छायामपि पराङ्मुखीम् ॥५७॥

अर्थ: यह विशाल पृथिवी, निकटवर्ती समुद्रसे घिरी होनेके कारण उन्हें छोटी-सी कुटियाके समान जान पड़ती थी और इस पृथिवी रूपी कुटियामें यदि उनकी छाया भी तेजसे विमुख जाती थी तो उसकी भी वे निन्दा करते थे ॥५७॥


अपि पादनखस्थेन प्रतिबिम्बेन लज्जितौ । केशानामपि भङ्गेन प्राप्नुवन्तावशं परम् ॥५८॥

अर्थ: पैरके नखोंमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बसे भी वे लज्जित हो उठते थे और बालोंके भंगसे भी अत्यधिक दुःख प्राप्त करते थे ॥५८॥


चूडामणिगतेनापि छत्रेणानेन सत्रपौ । अपि दर्पणदृष्टेन प्रतिपुंसोपतापिनौ ॥५९॥

अर्थ: चूड़ामणिमें प्रतिबिम्बित छत्रसे भी वे लज्जित हो जाते थे और दर्पणमें दिखनेवाले पुरुषके प्रतिबिम्बसे भी खीझ उठते थे ॥५९॥


अम्भोधरधृतेनाऽपि धनुषा कृतकोपनौ । अनानमद्भिरालेख्यपार्थिवैरपि खेदितौ ॥६०॥

अर्थ: मेघके द्वारा धारण किये हुए धनुषसे भी उन्हें क्रोध उत्पन्न हो जाता था और नमस्कार नहीं करनेवाले चित्रलिखित राजाओंसे भी वे खेदखिन्न हो उठते थे ॥६०॥


स्वल्पमण्डलसन्तोषसङ्गतस्य रवेरपि । अनादरेण पश्यन्तौ तेजसः प्रतिघातकम् ॥६१॥

अर्थ: अपने विशाल तेज की बात दूर रहे - अत्यन्त अल्प मण्डलमें सन्तोषको प्राप्त हुए सूर्यके भी तेजमें यदि कोई रुकावट डालता था तो वे उसे अनादरकी दृष्टिसे देखते थे ॥६१॥


भिन्दन्तौ बलिनं वायुमप्यवीक्षितविग्रहम् । हिमवत्यपि सामर्षौ चमरीबालवीजिते ॥६२॥

अर्थ: जिसका शरीर दिखाई नहीं देता था ऐसी बलिष्ठ वायुको भी वे खण्डित कर देते थे तथा चमरी गायके बालोंसे वीजित हिमालयके ऊपर भी उनका क्रोध भड़क उठता था ॥६२॥


शङ्खैः सलिलनाथानामपि खेदितमानसौ । प्रचेतसमपीशानममृष्यन्तावुदन्वताम् ॥६३॥

अर्थ: समुद्रोंमें भी जो शङ्ख पड़ रहे थे उन्हींसे उनके चित्त खिन्न हो जाते थे तथा समुद्रोंके अधिपति वरुणको भी वे सहन नहीं करते थे ॥६३॥


सच्छत्रानपि निश्छायान् कुर्वाणौ धरणीक्षितः । मुखेन मधु मुञ्चन्तौ प्रसन्नौ सत्सुसेवितौ ॥६४॥

अर्थ: छत्रोंसे सहित राजाओंको भी वे निश्छाय अर्थात् छायासे रहित ( पक्षमें कान्तिसे रहित ) कर देते थे और सत्पुरुषोंके द्वारा सेवित होनेपर प्रसन्न हो मुखसे मधु छोड़ते थे अर्थात् उनसे मधुर वचन बोलते थे ॥६४॥


दुष्टभूपालवंशानामप्यनासन्नवर्त्तिनाम् । कुर्वाणावूष्मणा ग्लानिं सम्प्राप्तसहजन्मना ॥६५॥

अर्थ: वे साथ-साथ उत्पन्न हुए प्रतापसे दूरवर्ती दुष्ट राजाओंके वंशको भी ग्लानि उत्पन्न कर रहे थे अर्थात् दूरवर्त्ती दुष्ट राजाओंको भी अपने प्रतापसे हानि पहुँचाते थे फिर निकटवर्ती दुष्ट राजाओंका तो कहना ही क्या है ? ॥६५॥


शस्त्रसंस्तवनश्याममुद्वहन्तौ करोदरम् । शेषराजप्रतापाग्निपरिनिर्वापणादिव ॥६६॥

अर्थ: निरन्तर शस्त्र धारण करने से उनके हस्ततल काले पड़ गये थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो शेष अन्य राजाओंके प्रताप रूप अग्निको बुझानेसे ही काले पड़ गये थे ॥६६॥


धीरैः कार्मुकनिःस्वानैर्योग्याकाले समुद्गतैः । आलपन्ताविवासन्नाभोगाः सकलदिग्वधूः ॥६७॥

अर्थ: अभ्यासके समय उत्पन्न धनुषके गम्भीर शब्दोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो निकटवर्ती समस्त दिशारूपी स्त्रियोंसे वार्तालाप ही कर रहे हों ॥६७॥


ईदृशो लवणस्तादृगीदृशस्तादृशोऽङ्कुशः । इत्यलं विकसच्छब्दप्रादुर्भावौ शुभोदयौ ॥६८॥

अर्थ: ‘जैसा लवण है वैसा ही अंकुश है’ इस प्रकार उन दोनोंके विषयमें लोगोंके मुखसे शब्द प्रकट होते थे तथा दोनों ही शुभ अभ्युदयसे सहित थे ॥६८॥


नवयौवनसम्पन्नौ महासुन्दरचेष्टितौ । प्रकाशतां परिप्राप्तौ धरण्यां लवणाङ्कुशौ ॥६९॥

अर्थ: जो नव यौवनसे सम्पन्न थे और महासुन्दर चेष्टाओंके धारक थे, ऐसे लवण और अङ्कुश पृथिवीमें प्रसिद्धि को प्राप्त हुए ॥६९॥


अभिनन्द्यौ समस्तस्य लोकस्योत्सुकताकरौ । पुण्येन घटितात्मानौ सुखकारणदर्शनौ ॥७०॥

अर्थ: वे दोनों समस्त लोगोंके द्वारा अभिनन्दन करनेके योग्य थे और सभी लोगोंकी उत्सुकताको बढ़ानेवाले थे। पुण्यसे उनके स्वरूपकी रचना हुई थी तथा उनका दर्शन सबके लिए सुखका कारण था ॥७०॥


युवत्यास्य१ कुमुद्वत्याः शरत्पूर्णेन्दुतां गतौ । वैदेहीहृदयानन्दमयजङ्गममन्दरौ ॥७१॥

अर्थ: युवती स्त्रियोंके मुखरूपी कुमुदिनीके विकासके लिए वे दोनों शरद् ऋतुके पूर्ण चन्द्रमा थे और सीताके हृदय सम्बन्धी आनन्दके लिए मानो चलते फिरते सुमेरु ही हों ॥७१॥


कुमारादित्यसङ्काशौ पुण्डरीकनिभेक्षणौ । द्वीपदेवकुमाराभौ श्रीवत्साङ्कितवक्षसौ ॥७२॥

अर्थ: वे दोनों अन्य कुमारोंमें सूर्यके समान थे, सफेद कमलोंके समान उनके नेत्र थे। वे द्वीपकुमार नामक देवोंके समान थे तथा उनके वक्षःस्थल श्रीवत्स चिह्नसे अलंकृत थे ॥७२॥


अनन्तविक्रमाधारौ भवाम्भोधितटस्थितौ । परस्परमहाप्रेमबन्धनप्रवणीकृतौ ॥७३॥

अर्थ: अनन्त पराक्रमके आधार थे, संसार-समुद्रके तट पर स्थित थे, परस्पर महाप्रेमरूपी बन्धनसे बँधे थे ॥७३॥


मनोहरणसंसक्तौ धर्ममार्गस्थितावपि । वक्रतापरिनिर्मुक्तौ कोटिस्थितगुणावपि ॥७४॥

अर्थ: वे धर्मके मार्गमें स्थित होकर भी मनके हरण करनेमें लीन थे - मनोहारी थे और कोटिस्थित गुणों अर्थात् धनुषके दोनों छोरों पर डोरीके स्थित होने पर भी वक्रता अर्थात् कुटिलतासे रहित थे (परिहार पक्षमें उनके गुण करोड़ोंकी संख्यामें स्थित थे तथा वे मायाचार रूपी कुटिलतासे रहित थे) ॥७४॥


विजित्य तेजसा भानुं स्थितौ कान्त्या निशाकरम् । ओजसा त्रिदशाधीशं गाम्भीर्येण महोदधिम् ॥७५॥

मेरुं स्थिरत्वयोगेन क्षमाधर्मेण मेदिनीम् । शौर्येण मेघनिःस्वानं गत्या मारुतनन्दनम् ॥७६॥

अर्थ: वे तेजसे सूर्यको, कान्तिसे चन्द्रमाको, ओजसे इन्द्रको, गाम्भीर्यसे समुद्रको, स्थिरताके योगसे सुमेरुको, क्षमाधर्मसे पृथिवीको, शूर-वीरतासे जयकुमारको और गतिसे हनुमान्‌को, जीतकर स्थित थे ॥७५-७६॥


गृह्णीयातामिषुं मुक्तमपि वेगाददूरतः । मकरग्राहनक्राद्यैः कृतक्रीडौ महाजले ॥७७॥

अर्थ: वे छोड़े हुए बाणको भी अपने वेगसे पास ही में पकड़ सकते थे तथा विशाल जलमें मगरमच्छ तथा नाके आदि जल जन्तुओंके साथ क्रीड़ा करते थे ॥७७॥


श्रमसौख्यमसम्प्राप्तौ मत्तैरपि महाद्विपैः । भयादिव तनुच्छायात् ३स्खलितार्ककरोत्करौ ॥७८॥

अर्थ: मदमाते महा-गजोंके साथ युद्ध कर भी वे श्रमसम्बन्धी सुखको प्राप्त नहीं होते थे तथा उनके शरीरकी प्रभासे भयभीत होकर ही मानो सूर्यकी किरणोंका समूह स्खलित हो गया था ॥७८॥


धर्मतः सम्मितौ साधोरर्ककीर्तेश्च४ सत्त्वतः । सम्यग्दर्शनतोऽगस्य दानाच्छ्रीविजयस्य च ॥७९॥

अर्थ: वे धर्मकी अपेक्षा साधुके समान, सत्त्व अर्थात् धैर्यकी अपेक्षा अर्ककीर्तिके समान, सम्यग्दर्शनकी अपेक्षा पर्वतके समान और दानकी अपेक्षा श्री विजय बलभद्रके समान थे ॥७९॥


अयोध्यावभिमानेन साहसान्मधुकैटभौ । महाहवसमुद्योगादिन्द्रजिन्मेघवाहनौ ॥८०॥

अर्थ: अभिमानसे अयोध्य थे अर्थात् उनके साथ कोई युद्ध नहीं कर सकता था, साहससे मधुकैटभ थे और महायुद्ध सम्बन्धी उद्योग से इन्द्रजित् तथा मेघवाहन थे ॥८०॥


गुरुशुश्रूषणोद्युक्तौ जिनेश्वरकथारतौ । शत्रूणां जनितत्रासौ नाममात्रश्रुतेरपि ॥८१॥

अर्थ: वे गुरुओंकी सेवा करनेमें तत्पर रहते थे, जिनेन्द्रदेवकी कथा अर्थात् गुणगान करनेमें लीन रहते थे तथा नामके सुनने मात्रसे शत्रुओंको भय उत्पन्न करनेवाले थे ॥८१॥


एवं तौ गुणरत्नपर्वतवरौ विज्ञानपातालिनौ लक्ष्मीश्रीद्युतिकीर्तिकान्तिनिलयौ चित्तद्विपेन्द्राङ्कुशौ । सौराज्यालयभारधारणदृढस्तम्भौ महीभास्करौ संवृत्तौ लवणाङ्कुशौ नरवरौ चित्रैककर्माकरौ ॥८२॥

अर्थ: इस प्रकार वे दोनों भाई लवण और अंकुश गुणरूपी रत्नोंके उत्तम पर्वत थे, विज्ञानके सागर थे, लक्ष्मी श्री द्युति कीर्ति और कान्तिके घर थे, मनरूपी गजराजके लिए अंकुश थे, सौराज्यरूपी घरका भार धारण करनेके लिए मजबूत खम्भे थे, पृथिवीके सूर्य थे, मनुष्योंमें श्रेष्ठ थे, आश्चर्यपूर्ण कार्योंकी खान थे ॥८२॥


धीरौ प्रपौण्डनगरे रेमाते तौ यथेप्सितं नरनागौ । लज्जितरवितेजस्कौ हलधरनारायणौ यथायोग्यम् ॥८३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस तरह मनुष्योंमें श्रेष्ठ तथा सूर्यके तेजको लज्जित करने वाले वे दोनों कुमार प्रपौण्ड नगरमें बलभद्र और नारायणके समान इच्छानुसार क्रीड़ा करते थे ॥८३॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे लवणांकुशोद्भवाभिधानं नाम शतसंख्यं पर्व ॥१००॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध तथा रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लवणांकुश की उत्पत्तिका वर्णन करनेवाला सौवां पर्व पूर्ण हुआ ॥१००॥

१०१. एकाधिकशतं पर्व (लवणाङ्कुशदिग्विजयकीर्तनं)

ततो दारक्रियायोग्यौ दृष्ट्वा तावतिसुन्दरौ । वज्रजङ्घो मतिं चक्रे कन्यान्वेषणतत्पराम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर उन सुन्दर कुमारोंको विवाहके योग्य देख, राजा वज्रजंघने कन्याओंके खोजने में तत्पर बुद्धि की ॥१॥


लक्ष्मीदेव्याः समुत्पन्नां शशिचूलाभिधानकाम् । द्वात्रिंशत्कन्यकायुक्तामाद्यस्याकल्पयत्सुताम् ॥२॥

अर्थ: सो प्रथम ही अपनी लक्ष्मी रानीसे उत्पन्न शशिचूला नामकी पुत्रीको अन्य बत्तीस कन्याओंके साथ लवणको देना निश्चित किया ॥२॥


विवाहमङ्गलं द्रष्टुमुभयोर्युगपन्नृपः । अभिलष्यन् द्वितीयस्य कन्यां योग्यां समन्ततः ॥३॥

अर्थ: राजा वज्रजङ्घ दोनों कन्याओंका विवाह मङ्गल एक साथ देखना चाहता था । इसलिए वह द्वितीय पुत्रके योग्य कन्याओंकी सब ओर खोज करता रहा ॥३॥


अपश्यन्मनसा खेदं परिप्राप्त इवोत्तमाम् । सस्मार सहसा सद्यः कृतार्थत्वमिवाव्रजत् ॥४॥

अर्थ: उत्तम कन्याको न देख एक दिन वह मनमें खेदको प्राप्त हुएके समान बैठा था कि अकस्मात् उसे शीघ्र ही स्मरण आया और उससे वह मानो कृतकृत्यताको ही प्राप्त हो गया ॥४॥


पृथिवीनगरेशस्य राज्ञोऽस्ति प्रवराङ्गजा । शुद्धा कनकमालाख्याऽमृतवत्यङ्गसम्भवा ॥५॥

अर्थ: उसने स्मरण किया कि 'पृथिवी नगरके राजाकी अमृतवती रानीके गर्भसे उत्पन्न कनकमाला नामकी एक शुद्ध तथा श्रेष्ठ पुत्री है ॥५॥


रजनीपतिलेखेव सर्वलोकमलिम्लुचा । श्रियं जयति या पद्मवती पद्मविवर्जिता ॥६॥

अर्थ: वह चन्द्रमाकी रेखाके समान सब लोगोंको हरण करनेवाली है, लक्ष्मीको जीतती है और कमलोंसे रहित मानो कमलिनी ही है ॥६॥


या साम्यं शशिचूलायाः समाश्रितवती शुभा । इति सञ्चिन्त्य तद्धेतोर्दूतं प्रेषितवान्नृपः ॥७॥

अर्थ: वह शशिचूलाकी समानताको प्राप्त है तथा शुभ है’। इस प्रकार विचार कर उसके निमित्तसे राजा वज्रजंघने दूत भेजा ॥७॥


पृथिवीपुरमासाद्य स क्रमेण विचक्षणः । जगाद कृतसम्मानो राजानं पृथुसंज्ञकम् ॥८॥

अर्थ: बुद्धिमान् दूतने क्रम-क्रमसे पृथिवीपुर पहुँच कर तथा सन्मान कर वहाँके राजा पृथुसे वार्तालाप किया ॥८॥


तावद्देवेक्षितो दृष्ट्या दूतो राज्ञा विशुद्धया । कन्यायाचनसम्बन्धं यावद् गृह्णाति नो वचः ॥९॥

उवाच च न ते दूत काचिदप्यस्ति दूषिता । यतो भवान् पराधीनः परवाक्यानुवादकृत् ॥१०॥

अर्थ: उसी समय राजा पृथुने विशुद्ध दृष्टिसे दूतकी ओर देखा और दूत जब तक कन्याकी याचनासे सम्बन्ध रखनेवाला वचन ग्रहण नहीं कर पाता है कि उसके पहले ही राजा पृथु बोल उठे कि रे दूत ! इसमें तेरा कुछ भी दोष नहीं है क्योंकि तू पराधीन है और परके वचनोंका अनुवाद करनेवाला है ॥९-१०॥


निरुष्माणश्चलात्मानो बहुभङ्गसमाकुलाः । जलौघा इव नीयन्ते यथेष्टं हि भवद्विधाः ॥११॥

अर्थ: जो स्वयं ऊष्मा-आत्मगौरव ( पक्षमें गरमी ) से रहित हैं, जिनकी आत्मा चञ्चल है तथा जो बहुभंगों-अनेक अपमानों ( पक्षमें अनेक तरंगों ) से व्याप्त हैं इस तरह जलके प्रवाहके समान जो आप जैसे लोग हैं, वे इच्छानुसार चाहे जहाँ ले जाये जाते हैं ॥११॥


कर्तुं तथापि ते युक्तो निग्रहः पापभाषिणः । परेण प्रेरितं किन्न यन्त्रं हन्तृ विहन्यते ॥१२॥

अर्थ: यद्यपि यह सब है तथापि तूने पापपूर्ण वचनोंका उच्चारण किया है, अतः तेरा निग्रह करना योग्य है क्योंकि दूसरेके द्वारा चलाया हुआ विघातक यन्त्र क्या नष्ट नहीं किया जाता ? ॥१२॥


किञ्चित्कर्तुमशक्तस्य रजःपातसमात्मनः । अपाकरणमात्रेण मया ते दूत सत्कृतम् ॥१३॥

अर्थ: हे दूत ! मैं जानता हूँ कि तू धूली पानके समान है, और कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है इसलिए यहाँसे हटा देना मात्र ही तेरा सत्कार (?) अर्थात् निग्रह है ॥१३॥


कुलं शीलं धनं रूपं समानत्वं बलं वयः । देशो विद्यागमश्चेति यद्यप्युक्ता वरे गुणाः ॥१४॥

तथापि तेषु सर्वेषु सन्तोऽभिजनमेककम् । वरिष्ठमनुरुध्यन्ते शेषेषु तु मनःसमम् ॥१५॥

अर्थ: यद्यपि कुल, शील, धन, रूप, समानता, बल, अवस्था, देश और विद्या गम ये नौ वरके गुण कहे गये हैं तथापि उत्तम पुरुष उन सबमें एक कुलको ही श्रेष्ठ गुण मानते हैं - इसका होना आवश्यक समझते हैं,शेष गुणोंमें इच्छानुसार प्रवृत्ति है अर्थात् हों तो ठीक न हों तो ठीक ॥१४-१५॥


स च न ज्ञायते यस्य वरस्य प्रथमो गुणः । कथं प्रदीयते तस्मै कन्या मान्या समन्ततः ॥१६॥

अर्थ: परन्तु वही कुल नामका प्रथम गुण जिस वरमें न हो उसे सब ओरसे माननीय कन्या कैसे दी जा सकती है ? ॥१६॥


निस्त्रपं भाषमाणाय तस्मै सुप्रतिकूलनम् । दातुं युक्तं कुमारीं न कुमारीं तु ददाम्यहम् ॥१७॥

अर्थ: सो इस तरह निर्लज्जतापूर्वक विरुद्ध वचन कहनेवाले उसके लिए कुमारी अर्थात् पुत्रीका देना तो युक्त नहीं है परन्तु कुमारी अर्थात् खोटा मरण मैं अवश्य देता हूँ ॥१७॥


इत्येकान्तपरिध्वस्तवचनो निरुपायकः । दूतः श्रीवज्रजंघाय गत्वाऽवस्थां न्यवेदयत् ॥१८॥

अर्थ: इस प्रकार जिसके वचन सर्वथा उपेक्षित कर दिये गये थे ऐसे दूतने निरुपाय हो वापिस जाकर वज्रजङ्घके लिए सब समाचार कह सुनाया ॥१८॥


ततो गत्वार्धमध्वानं स्वयमेव प्रपन्नवान् । अयाचत महादूतवदनेन पृथुं पुनः ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर यद्यपि राजा वज्रजङ्घने स्वयं आधे मार्ग तक जाकर किसी महादूतके द्वारा पृथुसे कन्याकी याचना की ॥१९॥


अलब्ध्वाऽसौ ततः कन्यां तथापि जनितादरः । पृथोर्ध्वंसयितुं देशं क्रोधनुन्नः समुद्यतः ॥२०॥

अर्थ: और उसके प्रति आदर व्यक्त किया तथापि वह कन्याको प्राप्त नहीं कर सका । फलस्वरूप वह क्रोधसे प्रेरित हो पृथुका देश उजाड़नेके लिए तत्पर हो गया ॥२०॥


पृथुदेशावधेः पाता नाम्ना व्याघ्ररथो नृपः । वज्रजङ्घेन सङ्ग्रामे जित्वा बन्धनमाहृतः ॥२१॥

अर्थ: राजा पृथुके देशकी सीमाका रक्षक एक व्याघ्ररथ नामका राजा था उसे वज्रजङ्घने संग्राममें जीत कर बन्धनमें डाल दिया ॥२१॥


ज्ञात्वा व्याघ्ररथं बद्धं सामन्तं सुमहाबलम् । देशं विनाशयन्तं च वज्रजङ्घं समुद्यतम् ॥२२॥

पृथुः सहायताहेतोः पोदनाधिपतिं नृपम् । मित्रमाह्वाययामास यावत्परमसैनिकम् ॥२३॥

तावत्कुलिशजंघेन पौण्डरीकपुरं द्रुतम् । समाह्वाययितुं पुत्रान् प्रहितो लेखवान्नरः ॥२४॥

अर्थ: महाबलवान् अथवा बड़ी भारी सेनासे सहित व्याघ्ररथ सामन्त- को युद्धमें बद्ध तथा वज्रजङ्घको देश उजाड़नेके लिए उद्यत जानकर राजा पृथुने सहायताके निमित्त पोदनदेशके अधिपति अपने मित्र राजाको जो कि उत्कृष्ट सेनासे युक्त था जबतक बुलवाया तब- तक वज्रजङ्घने भी अपने पुत्रोंको बुलानेके लिए शीघ्र ही एक पत्र सहित आदमी पौण्डरीकपुरको भेज दिया ॥२२-२४॥


पितुराज्ञां समाकर्ण्य राजपुत्रास्त्वरान्विताः । भेरीशङ्खादिनिःस्वानं सन्नाहार्थमदापयन् ॥२५॥

अर्थ: पिताकी आज्ञा सुनकर राजपुत्रोंने शीघ्र ही युद्धके लिए भेरी तथा शङ्ख आदिके शब्द दिलवाये ॥२५॥


ततः कोलाहलस्तुङ्गो महान् संक्षोभकारणः । पौण्डरीकपुरे जातो घूर्णमानार्णवोपमः ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर पौण्डरीकपुरमें लहराते हुए समुद्रके समान क्षोभ उत्पन्न करनेवाला बहुत बड़ा कोलाहल उत्पन्न हुआ ॥२६॥


तावदश्रुतपूर्वं तं श्रुत्वा सन्नाहनिःस्वनम् । किमेतदिति पार्श्वस्थानप्राष्टां लवणाङ्कुशौ ॥२७॥

अर्थ: वह अश्रुतपूर्व युद्धकी तैयारीका शब्द सुन लवण और अङ्कुशने निकटवर्ती पुरुषोंसे पूछा कि यह क्या है ? ॥२७॥


स्वनिमित्तं ततः श्रुत्वा वृत्तान्तं तत्समन्ततः । वैदेहीनन्दनौ गन्तुमुद्यतौ समरार्थिनौ ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर यह सब वृत्तान्त हमारे ही निमित्त से हो रहा है, यह सब ओरसे सुन युद्धकी इच्छा रखनेवाले सीताके दोनों पुत्र जानेके लिए उद्यत हो गये ॥२८॥


अतित्वरापरीतौ तौ पराभूत्युद्भवासहौ । अपि नासहतां यानमभिव्यक्तमहाद्युती ॥२९॥

अर्थ: जो अत्यन्त उतावलीसे सहित थे, जो पराभवकी उत्पत्तिको रंचमात्र भी सहन नहीं कर सकते थे और जिनका विशाल तेज प्रकट हो रहा था ऐसे उन दोनों वीरोंने वाहनका विलम्ब भी सहन नहीं किया था ॥२९॥


तौ वारयितुमुद्युक्ता वज्रजङ्घस्य सूनवः । सर्वमन्तःपुरं चैव परिवर्गश्च यत्नतः ॥३०॥

अपकर्णिततद्वाक्यौ जानकी वीक्ष्य पुत्रकौ । जगाद तनयस्नेहपरिद्रवितमानसा ॥३१॥

बालकौ नैष युद्धस्य भवतः समयः समः । न हि वत्सौ नियुज्येते महारथधुरामुखे ॥३२॥

अर्थ: वज्रजङ्घके पुत्र, समस्त अन्तःपुर तथा परिकरके समस्त लोग उन्हें यत्नपूर्वक रोकनेके लिए उद्य हुए परन्तु उन्होंने उनके वचन अनसुने कर दिये । तदनन्तर पुत्रस्नेहसे जिसका हृदय द्रवीभूत हो रहा था ऐसी सीताने उन्हें युद्धके लिए उद्यत देख कहा कि हे बालको! यह तुम्हारा युद्धके योग्य समय नहीं है क्योंकि महारथकी धुराके आगे बछड़े नहीं जोते जाते ॥३०-३२॥


ऊचतुस्तौ त्वया मातः किमेतदिति भाषितम् । किमत्र वृद्धकैः कार्यं वीरभोग्या वसुन्धरा ॥३३॥

अर्थ: इसके उत्तरमें दोनों पुत्रोंने कहा कि हे मातः ! तुमने ऐसा क्यों कहा ? इसमें वृद्धजनोंकी क्या आवश्यकता है ? पृथिवी तो वीरभोग्या है ॥३३॥


कियता देहभारेण ज्वलनस्य प्रयोजनम् । दिधक्षतो महाकक्षं स्वभावेनेह कारणम् ॥३४॥

अर्थ: महावनको जलानेवाली अग्निके लिए कितने बड़े शरीरसे प्रयोजन है ? अर्थात् अग्निका बड़ा शरीर होना अपेक्षित नहीं है, इस विषयमें तो उसे स्वभावसे ही प्रयोजन है ॥३४॥


एवमुद्गतवाक्यौ तौ तनयौ वीक्ष्य जानकी । बाष्पं मिश्ररसोत्पन्नं नेत्रयोः किञ्चिदाश्रयत् ॥३५॥

अर्थ: इस प्रकारके वचनोंका उच्चारण करनेवाले पुत्रोंको देखकर सीताके नेत्रोंमें मिश्ररससे उत्पन्न आँसुओंने कुछ आश्रय लिया अर्थात् उसके नेत्रोंसे हर्ष और शोकके कारण कुछ-कुछ आँसू निकल आये ॥३५॥


सुस्नातौ तौ कृताहारौ ततोऽलङ्कृतविग्रहौ । प्रणम्य प्रयतौ सिद्धान् वपुषा मनसा गिरा ॥३६॥

प्रणिपत्य सवित्रीं च समस्तविधिपण्डितौ । उपयातावगारस्य बहिः सत्तममङ्गलैः ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने अच्छी तरह स्नानकर आहार किया शरीरको अलंकारोंसे अलंकृत किया और मन, वचन, कायसे सिद्ध परमेष्ठीको बड़ी सावधानीसे नमस्कार किया, ऐसे समस्त विधि-विधानके जाननेमें निपुण दोनों कुमार माताको नमस्कार कर उत्तम मङ्गलाचार पूर्वक घरसे बाहर निकले ॥३६-३७॥


रथौ ततः समारुह्य परमौ जविवाजिनौ । सम्पूर्णौ विविधैरस्त्रैरुपरि प्रस्थितौ पृथोः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर जिनमें वेगशाली घोड़े जुते थे और जो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे परिपूर्ण थे ऐसे उत्तम रथोंपर सवार होकर दोनों भाइयोंने राजा पृथुके ऊपर प्रस्थान किया ॥३८॥


तौ महासैन्यसम्पन्नौ चापन्यस्तसहायकौ । मूर्त्येव सङ्गतिं प्राप्तौ समुद्योगपराक्रमौ ॥३९॥

अर्थ: बड़ी भारी सेनासे सहित एवं धनुषमात्रको सहायक समझनेवाले दोनों कुमार ऐसे जान पड़ते थे मानो शरीरधारी उद्योग और पराक्रम ही हों ॥३९॥


परमोदारचेतस्कौ पुरुसङ्ग्रामकौतुकौ । पञ्चभिर्दिवसैः प्राप्तौ वज्रजङ्घं महोदयौ ॥४०॥

अर्थ: जिनका हृदय अत्यन्त उदार था तथा जो संग्रामके बहुत भारी कौतुकसे युक्त थे ऐसे महाभ्युदयके धारक दोनों भाई छह दिनमें वज्रजङ्घके पास पहुँच गये ॥४०॥


ततः शत्रुबलं श्रुत्वा परमोद्योगमन्तिकम् । निरैन्महाबलान्तस्थः पृथिवीनगरात्पृथुः ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर परमोद्योगी शत्रुकी सेनाको निकटवर्ती सुनकर बड़ी भारी सेनाके मध्यमें स्थित राजा पृथु अपने पृथिवीपुरसे बाहर निकला ॥४१॥


भ्रातरः सुहृदः पुत्रा मातुला मातुलाङ्गजाः । एकपात्रभुजोऽन्ये च परमप्रीतिसङ्गताः ॥४२॥

सुह्माङ्गा वङ्गमगधप्रभृतिक्षितिगोचराः । समन्तेन महीपालाः प्रस्थिताः सुमहाबलाः ॥४३॥

अर्थ: उसके भाई, मित्र, पुत्र, मामा, मामाके लड़के तथा एक बर्तनमें खानेवाले परमप्रीतिसे युक्त अन्य लोग एवं सुह्म, अङ्ग, वङ्ग, मगध आदि के महाबलवान् राजा उसके साथ चले ॥४२-४३॥


रथाश्वनागपादाताः कटकेन समावृताः । वज्रजङ्घं प्रति क्रुद्धाः प्रययुस्ते सुतेजसः ॥४४॥

अर्थ: कटक-सेनासे घिरे हुए परम प्रतापी रथ, घोड़े, हाथी तथा पैदल सैनिक क्रुद्ध होकर वज्रजंघकी ओर बढ़े चले आ रहे थे ॥४४॥


रथेभतुरगस्थानं श्रुत्वा तूर्यस्वनान्वितम् । सामन्ता वज्रजङ्घीयाः सन्नद्धा योद्धुमुद्यताः ॥४५॥

अर्थ: रथ, हाथी और घोड़ोंके स्थानको तुरहीके शब्दसे युक्त सुनकर वज्रजंघके सामन्त भी युद्ध करनेके लिए उद्यत हो गये ॥४५॥


प्रत्यासन्नं समायाते सेनाऽस्यद्वितये ततः । परानीकं महोत्साहौ प्रविष्टौ लवणाङ्कुशौ ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर जब दोनों सेनाओंके अग्रभाग अत्यन्त निकट आ पहुँचे तब अत्यधिक उत्साहको धारण करनेवाले लवण और अङ्कुश शत्रुकी सेनामें प्रविष्ट हुए ॥४६॥


अतिक्षिप्रपरावर्त्तौ तावुदाररुषाविव । आरेभाते परिक्रीडां परसैन्यमहाह्रदे ॥४७॥

अर्थ: अत्यधिक शीघ्रतासे घूमनेवाले वे दोनों कुमार, महाक्रोधको धारण करते हुएके समान शत्रुदलरूपी महासरोवरमें सब ओर क्रीड़ा करने लगे ॥४७॥


इतस्ततश्च तौ दृष्टादृष्टौ विद्युल्लतोपमौ । दुरालक्ष्यत्वमापन्नौ परासोढपराक्रमौ ॥४८॥

अर्थ: बिजलीरूपी लताकी उपमाको धारण करनेवाले वे कुमार कभी यहाँ और कभी वहाँ दिखाई देते थे और फिर अदृश्य हो जाते थे। शत्रु जिनका पराक्रम नहीं सह सका था ऐसे वे दोनों वीर बड़ी कठिनाईसे दिखाई देते थे अर्थात् उनकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था ॥४८॥


गृह्णन्तौ सन्दधानौ वा मुञ्चन्तौ वा शिलीमुखान् । नादृश्येतामदृश्यन्त केवलं निहताः परे ॥४९॥

अर्थ: बाणोंको ग्रहण करते, डोरीपर चढ़ाते और छोड़ते हुए वे दोनों कुमार दिखाई नहीं देते थे, केवल मारे हुए शत्रु ही दिखाई देते थे ॥४९॥


विभिन्नैः विशिखैः क्रूरैः पतितैः सह वाहनैः । महीतलं समाक्रान्तं कृतमत्यन्तदुर्गमम् ॥५०॥

अर्थ: तीक्ष्ण बाणों द्वारा घायल होकर गिरे हुए वाहनोंसे व्याप्त हुआ पृथिवीतल अत्यन्त दुर्गम हो गया था ॥५०॥


निमेषेण पराभग्नं सैन्यमुन्मत्तसन्निभम् । द्विपयूथं परिभ्रान्तं सिंहवित्रासितं यथा ॥५१॥

अर्थ: शत्रुकी सेना पागलके समान निमेषमात्रमें पराभूत हो गई - तितर-बितर हो गई और हाथियोंका समूह सिंहसे डराये हुएके समान इधर-उधर दौड़ने लगा ॥५१॥


ततोऽसौ क्षणमात्रेण पृथुराजस्य वाहिनी । लवणाङ्कुशसूर्येषुमयूखैः परिशोषिता ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर पृथु राजा की सेनारूपी नदी, लवणाङ्कुशरूपी सूर्यकी बाणरूपी किरणोंसे क्षणमात्रमें सुखा दी गई ॥५२॥


कुमारयोस्तयोरिच्छामन्तरेण भयार्दिताः । अर्कतूलसमूहाभा नष्टा शेषा यथा ककुप् ॥५३॥

अर्थ: जो योद्धा शेष बचे थे वे भयसे पीड़ित हो अर्कतूलके समूहके समान उन कुमारोंकी इच्छाके बिना ही दिशाओंमें भाग गये ॥५३॥


असहायो विषण्णात्मा पृथुर्भङ्गपथे स्थितः । अनुधाव्य कुमाराभ्यां सचापाभ्यामितीरितः ॥५४॥

नरखेट पृथो व्यर्थं क्वापि प्रपलाय्यते । एतौ तावागतावावामज्ञातकुलशीलकौ ॥५५॥

अर्थ: असहाय एवं खेदखिन्न पृथु पराजयके मार्गमें स्थित हुआ अर्थात् भागने लगा तब धनुर्धारी कुमारोंने उसका पीछाकर उससे इस प्रकार कहा कि अरे नीच नरपृथु ! अब व्यर्थ कहाँ भागता है ? जिनके कुल और शीलका पता नहीं ऐसे ये हम दोनों आ गये ॥५४-५५॥


अज्ञातकुलशीलाभ्यामावाभ्यां त्वं ततोऽन्यथा । पलायनमिदं कुर्वन् कथं न त्रपसेऽधुना ॥५६॥

अर्थ: जिनका कुल और शील अज्ञात है ऐसे हम लोगोंसे भागता हुआ तू इस समय लज्जित क्यों नहीं होता है ? ॥५६॥


ज्ञापयावोऽधुनात्मीये कुलशीले शिलीमुखैः । अवधानपरस्तिष्ठ बलाद्वा स्थाप्यसेऽथवा ॥५७॥

अर्थ: अब हम बाणोंके द्वारा अपने कुल और शीलका पता देते हैं, सावधान होकर खड़े हो जाओ अथवा बलात् खड़े किये जाते हो ॥५७॥


इत्युक्ते विनिवृत्यासौ पृथुराह कृताञ्जलिः । अज्ञानजनितं दोषं वीरौ मे क्षन्तुमर्हथ ॥५८॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर पृथुने लौटकर तथा हाथ जोड़कर कहा कि हे वीरो ! मेरा अज्ञात जनित दोष क्षमा करनेके योग्य हो ॥५८॥


माहात्म्यं भवदीयं मे नाऽऽयातं मतिगोचरम् । भास्करीयं यथा तेजः कुमुदप्रचयोदरम् ॥५९॥

अर्थ: जिस प्रकार सूर्यका तेज कुमुद-समूहके मध्य नहीं आता उसी प्रकार आप लोगों का माहात्म्य मेरी बुद्धिमें नहीं आया ॥५९॥


ईदृगेव हि धीराणां कुलशीलनिवेदनम् । शस्यते न तु भारत्या तद्धि सन्देहसङ्गतम् ॥६०॥

अर्थ: धीर, वीर मनुष्योंका अपने कुल, शीलका परिचय देना ऐसा ही होता है । वचनों द्वारा जो परिचय दिया जाता है वह ठीक नहीं है क्योंकि उसमें सन्देह हो सकता है ॥६०॥


अरण्यदाहशक्तस्य पावकस्य न को जनः । ज्वलनादेव सम्भूतिं मूढोऽपि प्रतिपद्यते ॥६१॥

अर्थ: ऐसा कौन मूढ़ मनुष्य है जो जलने मात्रसे, वनके जलानेमें समर्थ अग्निकी उत्पत्तिको नहीं जान लेता है ? । भावार्थ - अग्नि प्रज्वलित होती है इतने मात्रसे ही उसकी वनदाहक शक्तिका अस्तित्व मूर्खसे मूर्ख व्यक्ति भी स्वीकृत कर लेता है ॥६१॥


भवन्तौ परमौ धीरौ महाकुलसमुद्भवौ । अस्माकं स्वामिनौ प्राप्तौ यथेष्टसुखदायिनौ ॥६२॥

अर्थ: आप दोनों परम धीर, महाकुलमें उत्पन्न एवं यथेष्ट सुख देनेवाले हमारे स्वामी हो ॥६२॥


एवं प्रशस्यमानौ तौ कुमारौ नतमस्तकौ । जातौ निर्वासिताशेषकोपौ शान्तमनोमुखौ ॥६३॥

अर्थ: इस प्रकार जिनकी प्रशंसाकी जा रही थी ऐसे दोनों कुमार नतमस्तक, शान्तचित्त तथा शान्त मुख हो गये और उनका सब क्रोध दूर हो गया ॥६३॥


वज्रजङ्घप्रधानेषु ततः प्राप्तेषु राजसु । ससाक्षिकाऽभवत्प्रीतिः पृथुना सह वीरयोः ॥६४॥

अर्थ: तदनन्तर जब वज्रजंघ आदि प्रधान राजा आ गये तब उनकी साक्षी पूर्वक दोनों वीरोंकी पृथुके साथ मित्रता हो गई ॥६४॥


प्रणाममात्रतः प्रीता जायन्ते मानशालिनः । नोन्मूलयन्ति नद्योघा वेतसान् प्रणतात्मकान् ॥६५॥

अर्थ: आचार्य कहते हैं कि मानशाली मनुष्य प्रणाममात्रसे प्रसन्न हो जाते हैं, सो ठीक ही है क्योंकि नदियोंके प्रवाह नम्रीभूत वेतसके पौधोंको नहीं उखाड़ते ॥६५॥


ततस्तौ सुमहाभूत्या पृथुना पृथिवीपुरम् । प्रवेशितौ समस्तस्य जनस्यानन्दकारिणौ ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर राजा पृथुने, सब लोगोंको आनन्द उत्पन्न करनेवाले दोनों वीरोंको बड़े वैभवके साथ नगरमें प्रविष्ट कराया ॥६६॥


मदनाङ्कुशवीरस्य पृथुना परिकल्पिता । कन्या कनकमालाऽसौ महाविभवसङ्गता ॥६७॥

अर्थ: वहाँ पृथुने महाविभवसे सहित अपनी कनकमाला कन्या वीर मदनाङ्कुशके लिए देना निश्चित किया ॥६७॥


अत्र नीत्वा निशामेकां करणोयविचक्षणौ । निर्गतौ नगराज्जेतुं समस्तां पृथिवीमिमाम् ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर कार्य करनेमें निपुण दोनों वीर वहाँ एक रात्रि व्यतीतकर इस समस्त पृथिवीको जीतनेके लिए नगरसे बाहर निकल पड़े ॥६८॥


सुह्याङ्गमगधैर्वङ्गैः पोदनेशादिभिस्तथा । वृतौ लोकाक्षनगरं गन्तुमेतौ समुद्यतौ ॥६९॥

अर्थ: सुह्म, अङ्ग, मगध, वङ्ग तथा पोदनपुर आदिके राजाओंसे घिरे हुए दोनों कुमार कोकाक्षनगरको जानेके लिए उद्यत हुए ॥६९॥


आक्रामन्तौ सुखं तस्य सम्बद्धान् विषयान् बहून् । अभ्यर्णत्वं परिप्राप्तौ तौ महासाधनान्वितौ ॥७०॥

अर्थ: बहुत बड़ी सेनासे सहित दोनों वीर उससे सम्बन्ध रखनेवाले अनेक देशोंपर सुखसे आक्रमण करते हुए लोकाक्ष नगरके समीप पहुँचे ॥७०॥


कुबेरकान्तनामानं राजानं तत्र मानिनम् । समक्षोभयतां नागं पक्षाविव गरुन्मतः ॥७१॥

अर्थ: वहाँ जिस प्रकार गरुड़के पङ्ख नागको क्षोभित करते हैं उसी प्रकार उन दोनोंने वहाँके कुबेरकान्त नामक अभि- मानी राजाको क्षोभयुक्त किया ॥७१॥


चतुरङ्गाकुले भीमे परमे समराङ्गणे । जित्वा कुबेरकान्तं तौ पूर्यमाणबलौ भृशम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर चतुरङ्ग सेनासे युक्त अत्यन्त भयंकर रणाङ्गण में कुबेरकान्तको जीतकर वे आगे बढ़े, उस समय उनकी सेना अत्यधिक बढ़ती जाती थी ॥७२॥


सहस्रैर्नरनाथानामावृतौ वश्यतां गतैः । कृच्छ्राधिगमने यानैर्लम्पाकविषयं गतौ ॥७३॥

अर्थ: वहाँसे चलकर अधीनताको प्राप्त हुए हजारों राजाओंसे घिरे हुए लम्पाक देशको गये वहाँ स्थलमार्गसे जाना कठिन था इसलिए नौकाओंके द्वारा जाना पड़ा ॥७३॥


एककर्णं विनिर्जित्य राजानं तत्र पुष्कलम् । गतौ मार्गानुकूलत्वान्नरेन्द्रौ विजयस्थलीम् ॥७४॥

अर्थ: वहाँ एककर्ण नामक राजाको अच्छी तरह जीतकर मार्गकी अनुकूलता होनेसे दोनों ही कुमार विजयस्थली गये ॥७४॥


तत्र भ्रातृशतं जित्वा समालोकनमात्रतः । गतौ गङ्गां समुत्तीर्य कैलासस्योत्तरां दिशम् ॥७५॥

अर्थ: वहाँ देखने मात्रसे ही सौ भाइयोंको जीतकर तथा गङ्गा नदी उतरकर दोनों कैलास की ओर उत्तर दिशामें गये ॥७५॥


तत्र नन्दनचारूणां देशानां कृतसङ्गमौ । पूज्यमानौ नरश्रेष्ठैर्नानोपायनपाणिभिः ॥७६॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने नन्दनवनके समान सुन्दर-सुन्दर देशोंमें अच्छी तरह गमन किया तथा नाना प्रकारकी भेंट हाथमें लिये हुए उत्तम मनुष्योंने उनकी पूजा की ॥७६॥


भाषकुन्तलकालाम्बुनन्दिनन्दनसिंहलान् । शलभाननलांश्चौलान्भीमान् भूतरवादिकान् ॥७७॥

नृपान् वश्यत्वमानीय सिन्धोः कूलं परं गतौ । परार्णवतटान्तस्थान् चक्रतुः प्रणतान्नृपान् ॥७८॥

अर्थ: तदनन्तर भाषकुन्तल, कालाम्बु, नन्दी, नन्दन, सिंहल, शलभ, अनल, चौल, भीम तथा भूतरव आदि देशोंके राजाओंको वशकर वे सिन्धुके दूसरे तटपर गये तथा वहाँ पश्चिम समुद्रके दूसरे तटपर स्थित राजाओंको नम्रीभूत किया ॥७७-७८॥


पुरखेटमटम्बेन्द्रा विषयाधीश्वराश्च ये । वशत्वे स्थापितास्ताभ्यां कांश्चित्तान् कीर्तयामि ते ॥७९॥

अर्थ: पुरखेट तथा मटम्ब आदिके स्वामी एवं अन्य जिन देशोंके अधिपतियोंको उन दोनों कुमारोंने वश किया था हे श्रेणिक ! मैं यहाँ तेरे लिए उनका कुछ वर्णन करता हूँ ॥७९॥


एते जनपदाः केचिदार्या म्लेच्छास्तथा परे । विद्यमानद्वयाः केचिद् विविधाचारसम्मताः ॥८०॥

अर्थ: ये देश कुछ तो आर्य देश थे, कुछ म्लेच्छ देश थे, और कुछ नाना प्रकारके आचारसे युक्त दोनों प्रकारके थे ॥८०॥


भीरवो यवनाः कक्षाश्चारवस्त्रिजटा नटाः । शककेरलनेपाला मालवारुलशर्वराः ॥८१॥

वृषाणवैद्यकाश्मीरा हिडिम्बावष्टवर्बराः । त्रिशिराः पारशैलाश्च गौशीलोशीनरास्तकाः ॥८२॥

सूर्यारकाः सनर्ताश्च खशा विन्ध्याः शिखापदाः । मेखलाः शूरसेनाश्च वाह्लीकोलूककोसलाः ॥८३॥

दरीगान्धारसौवीराः पुरीकौबेरकोहराः । अन्ध्रकालकलिङ्गाद्या नानाभाषा पृथग्गुणाः ॥८४॥

विचित्ररत्नवस्त्राद्या बहुपादपजातयः । नानाकरसमायुक्ता हेमादिवसुशालिनः ॥८५॥

देशानामेवमादीनां स्वामिनः समराजिरे । जिताः केचिद्गताः केचित्प्रतापादेव वश्यताम् ॥८६॥

अर्थ: भीरु, यवन, कक्ष, चारु, त्रिजट, नट, शक, केरल, नेपाल, मालव, आरुल, शर्वर, वृषाण, वैद्य, काश्मीर, हिडिम्ब, अवष्ट, बर्बर, त्रिशिर, पारशैल, गौशील, उशीनर, सूर्यारक, सनर्त, खश, विन्ध्य, शिखापद, मेखल, शूरसेन, वाह्लीक, उलूक, कोसल, दरी, गांधार, सौवीर, पुरी, कौबेर, कोहर, अन्ध्र, काल और कलिङ्ग इत्यादि अनेक देशोंके स्वामी रणाङ्गणमें जीते गये थे और कितने ही प्रतापसे ही अधीनताको प्राप्त हो गये थे । इन सब देशोंमें अलग-अलग नाना प्रकार की भाषाएँ थीं, पृथक्-पृथक् गुण थे, नाना प्रकार रत्न तथा वस्त्रादिका पहिराव था, वृक्षोंकी नाना जातियाँ थीं, अनेक प्रकारकी खानें थीं और सुवर्णादि धनसे सब सुशोभित थे ॥८१-८६॥


ते महाविभवैर्युक्ता देशभाजोऽनुरागिणः । लवणाङ्कुशयोरिच्छां कुर्वाणा बभ्रमुर्महीम् ॥८७॥

अर्थ: महावैभवसे युक्त तथा अनुरागसे सहित नाना देशोंके मनुष्य लवणाङ्कुशकी इच्छानुसार कार्य करते हुए पृथिवीमें भ्रमण करते थे ॥८७॥


प्रसाद्य पृथिवीमेतामथ तौ पुरुषोत्तमौ । नानाराजसहस्राणां महतामुपरि स्थितौ ॥८८॥

अर्थ: इस प्रकर इस पृथिवीको प्रसन्न कर वे दोनों पुरुषोत्तम, अनेक हजार बड़े-बड़े राजाओंके ऊपर स्थित थे ॥८८॥


रक्षन्तौ विषयान् सम्यङ् नानाचारुकथारतौ । पौण्डरीकपुरं (?) तेन प्रस्थितौ पुरुसम्मदौ ॥८९॥

अर्थ: नाना प्रकारकी सुन्दर कथाओंमें तत्पर तथा अत्यधिक हर्षको धारण करनेवाले वे दोनों कुमार देशोंकी अच्छी तरह रक्षा करते हुए पौण्डरीकपुरकी ओर चले ॥८९॥


राष्ट्राद्यधिकृतैः पूजां प्राप्यमाणौ च भूयसीम् । समीपीभावतां प्राप्तौ पुण्डरीकस्य पार्थिवैः ॥९०॥

अर्थ: राष्ट्रोंके प्रथम अधिकारी राजाओंके द्वारा अत्यधिक सन्मानको प्राप्त कराये गये दोनों भाई क्रम-क्रमसे पौण्डरीकपुरकी समीपताको प्राप्त हुए ॥९०॥


ततः सप्तमभूपृष्ठं प्रासादस्य समाश्रिता । वृता परमनारीभिः सुखासनपरिग्रहा ॥९१॥

तरलच्छातजीमूतपरिधूसरमुत्थितम् । रजःपटलमद्राक्षीदप्राक्षीच सखीजनम् ॥९२॥

किमिदं दृश्यते सख्यो दिगाक्रमणचञ्चलम् । ऊचुस्ता देवि सैन्यस्य रजश्चक्रमिदं भवेत् ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर महलकी सातवीं भूमिपर सुखसे बैठी एवं उत्तम स्त्रियोंसे घिरी सीताने चञ्चल पतले मेघके समान धूसर वर्ण धूलिपटलको उठते देखा तथा सखीजनोंसे पूछा कि हे सखियो ! दिशाओंपर आक्रमण करनेमें चञ्चल अर्थात् सब ओर फैलनेवाली यह क्या वस्तु दिखाई देती है ? इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि यह सेनाका धूलिपटल होना चाहिये ॥९१-९३॥


तथा हि पश्य मध्येऽस्य ज्ञायते स्वच्छवारिणः । अश्वीयं मकराणां वा प्लवमानकदम्बकम् ॥९४॥

अर्थ: इसीलिए तो देखो स्वच्छ जलके समान इस धूलिपटलके बीचमें मगरमच्छोंके तैरते हुए समूहके समान घोड़ोंका समूह दिखाई दे रहा है ॥९४॥


नूनं स्वामिनि सिद्धार्थौ कुमारावागताविमौ । तथा ह्येतौ प्रदृश्येते तावेव भुवनोत्तमौ ॥९५॥

अर्थ: हे स्वामिनि ! जान पड़ता है कि ये दोनों कुमार कृत-कृत्य होकर आये हैं, हाँ देखो, वे ही लोकोत्तम कुमार दिखाई दे रहे हैं ॥९५॥


आसीदेवं कथा यावत्सीतादेव्या मनोहरा । तावदग्रेसराः प्राप्ता नरा इष्टनिवेदिनः ॥९६॥

अर्थ: इस तरह जब तक सीता देवीकी मनोहर कथा चल रही थी कि तब तक इष्ट समाचारकी सूचना देनेवाले अग्रगामी पुरुष आ पहुँचे ॥९६॥


उपशोभा ततः पृथ्वी समस्ता नगरे कृता । लोकेनादरयुक्तेन बिभ्रता तोषमुत्तमम् ॥९७॥

अर्थ: तदनन्तर उत्तम सन्तोषको धारण करनेवाले आदरयुक्त मनुष्यों ने नगरमें सब प्रकारकी विशाल शोभा की ॥९७॥


प्राकारशिखरावल्पामुच्छ्रिता विमलध्वजाः । मार्गदेशाः कृता दिव्यतोरणासङ्गसुन्दराः ॥९८॥

अर्थ: कोटके शिखरोंके ऊपर निर्मल ध्वजाएँ फहराई गईं, मार्ग दिव्यतोरणोंसे सुन्दर किये गये ॥९८॥


आगुल्फं पूरितो राजमार्गः पुष्पैः सुगन्धिभिः । चारुवन्दनमालाभिः शोभमानः पदे पदे ॥९९॥

अर्थ: राजमार्ग घुटनों तक सुगन्धित फूलोंसे भरा गया एवं पद-पद पर सुन्दर वन्दनमालाओंसे युक्त किया गया ॥९९॥


स्थापिता द्वारदेशेषु कलशाः पल्लवाननाः । पट्टवस्त्रादिभिः शोभा कृता चापणवर्त्मनि ॥१००॥

अर्थ: द्वारों पर पल्लवोंसे युक्त कलश रक्खे गये और बाजारकी गलियोंमें रेशमी वस्त्रादिसे शोभा की गई ॥१००॥


विद्याधरैः कृतं देवैराहोस्वित्पद्मया स्वयम् । पौण्डरीकपुरं जातमयोध्यासमदर्शनम् ॥१०१॥

अर्थ: उस समय पौण्डरीकपुर अयोध्याके समान दिखाई देता था, सो ऐसा जान पड़ता था मानो विद्याधरों ने, देवोंने अथवा लक्ष्मीने ही स्वयं उसकी वैसी रचना की हो ॥१०१॥


दृष्ट्वा सम्प्रविशन्तौ तौ महाविभवसङ्गतौ । आसीन्नगरनारीणां लोको दुःशक्यवर्णनः ॥१०२॥

अर्थ: महा वैभवके साथ प्रवेश करते हुए उन दोनों कुमारोंको देखकर नगरकी स्त्रियोंमें जो चेष्टा हुई उसका वर्णन करना अशक्य है ॥१०२॥


आरात्पुत्रौ समालोक्य कृतकृत्यावुपागतौ । निममज्जेव वैदेही सिन्धावमृतवारिणि ॥१०३॥

अर्थ: कृतकृत्य होकर पास आये हुए पुत्रोंको देखकर सीता तो मानो अमृतके समुद्रमें ही डूब गई ॥१०३॥


विरचितकरपुटकमलौ जननीमुपगम्य सादरौ परमम् । नेमतुरवनतशिरसौ सैन्यरजोधूसरौ वीरौ ॥१०४॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने कमलके समान अञ्जलि बाँध रक्खी थी, जो अत्यधिक आदरसे सहित थे, जिनके शिर झुके हुए थे तथा जो सेना की धूलिसे धूसर थे ऐसे दोनों वीरोंने पास आकर माताको नमस्कार किया ॥१०४॥


तनयस्नेहप्रवणा पद्मप्रमदा सुतौ परिष्वज्य । करतलकृतपरमर्शा शिरसि निनिक्षोत्तमानन्दा ॥१०५॥

अर्थ: जो पुत्रोंके प्रति स्नेह प्रकट करनेमें निपुण थी, हस्ततलसे जो उनका स्पर्श कर रही थी तथा जो उत्तम आनन्दसे युक्त थी ऐसी रामकी पत्नी-सीताने उनका मस्तक चूमा ॥१०५॥


जननीजनितं तौ पुनरभिनन्द्य परं प्रसादमानत्यौ । रविचन्द्राविव लोकव्यवहारकरौ स्थितौ योग्यम् ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर वे माताके द्वारा किये हुए परम प्रसादको पुनः पुनः नमस्कारके द्वारा स्वीकृत कर सूर्य चन्द्रमाके समान लोक व्यवहारको सम्पन्न करते हुए यथायोग्य सुखसे रहने लगे ॥१०६॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते श्रीपद्मपुराणे लवणाङ्कुशदिग्विजयकीर्तनं नामैकाधिकशतं पर्व ॥१०१॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध श्रीरविषेणाचार्य द्वारा रचित श्री पद्मपुराणमें लवणांकुश की दिग्विजयका वर्णन करनेवाला एकसौ एकवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१०॥


१०२. द्व्युत्तरशतं पर्व (लवणाङ्कुशसमेतयुद्धाभिधानं)

एवं तौ परमैश्वर्यं प्राप्तावुत्तममानवौ । स्थितावाज्ञां प्रयच्छन्तावुन्नतानां महीभृताम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर परम ऐश्वर्यको प्राप्त हुए वे दोनों पुरुषोत्तम बड़े-बड़े राजाओंको आज्ञा प्रदान करते हुए स्थित थे ॥१॥


तदा कृतान्तवक्त्रं तु नारदः परिपृष्ठवान् । जानकीत्यजनोद्देशं दुःखी भ्राम्यन् गवेषकः ॥२॥

दर्शनेऽवस्थितौ वीरौ प्राप ताभ्यां च पूजितः । आसनादिप्रदानेन गृहस्थमुनिवेषभृत् ॥३॥

अर्थ: उसी समय कृतान्तवक्त्र सेनापतिसे सीताके छोड़नेका स्थान पूछकर उसकी खोज करनेवाले दुखी नारद भ्रमण करते हुए वहाँ पहुँचे । सो दोनों ही वीर उनकी दृष्टिमें पड़े । गृहस्थमुनि अर्थात् क्षुल्लकका वेष धारण करनेवाले उन नारदजीका दोनों ही कुमारोंने आसनादि देकर सम्मान किया ॥२-३॥


ततः सुखं समासीनः परमं तोषमुद्वहन् । अब्रवीत्ताववद्वारः कृतस्निग्धनिरीक्षणः ॥४॥

रामलक्ष्मणयोर्लक्ष्मीर्यादृशी नरनाथयोः । तादृशी सर्वथा भूयादचिराद्भवतोरपि ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर सुखसे बैठे परम सन्तोषको धारण करते एवं स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखते हुए नारदने उन कुमारोंसे कहा कि राजा राम लक्ष्मणकी जैसी विभूति है सर्वथा वैसी ही विभूति शीघ्र ही आप दोनोंकी भी हो ॥४-५॥


ततस्तावूचतुः कौ तौ भगवन् रामलक्ष्मणौ । कीदृग्गुणसमाचारौ कस्य वा कुलसम्भवौ ॥६॥

अर्थ: इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! वे राम लक्ष्मण कौन हैं ? कैसे उनके गुण और समाचार हैं तथा किस कुलमें उत्पन्न हुए हैं ? ॥६॥


ततो जगाववद्वारः कृत्वा विस्मितमाननम् । स्थिरमूर्त्तिः क्षणं स्थित्वा भ्रमयन् करपल्लवम् ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर क्षणभरके लिए निश्चल शरीर बैठकर मुखको आश्चर्यसे चकित करते एवं करपल्लवको हिलाते हुए नारद बोले ॥७॥


भुजाभ्यामुत्क्षिपेन्मेरुं प्रतरन्निम्नगापतिम् । नरो न तद्गुणान् वक्तुं समर्थः कश्चिदेतयोः ॥८॥

अर्थ: कि मनुष्य भुजाओंसे मेरुको उठा सकता है और समुद्रको तैर सकता है परन्तु इन दोनोंके गुण कहनेके लिए कोई समर्थ नहीं है ॥८॥


अनन्तेनाऽपि कालेन वदनैरन्तवर्जितैः । सकलोऽपि न लोकोऽयं तयोर्वक्तुं गुणान् क्षमः ॥९॥

अर्थ: यह सबका सब संसार, अनन्तकाल तक और अनन्त जिह्वाओंके द्वारा भी उनके गुण कहनेके लिए समर्थ नहीं है ॥९॥


इदं तद्गुणसम्प्रश्नप्रतीकारसमाकुलम् । हृदयं कम्पमानं मे पश्यतां जातकौतुकौ ॥१०॥

अर्थ: आपने उनके गुणोंका प्रश्न किया सो इनके उत्तर स्वरूप प्रतिकारसे आकुल हुआ हमारा हृदय काँपने लगा है । आप कौतुकके साथ देखिये ॥१०॥


तथापि भवतोर्वाक्यात् स्थूलोच्चयसमाश्रयात् । वदामि तद्गुणं किञ्चिच्छृणुतं पुण्यवर्द्धनम् ॥११॥

अर्थ: फिर भी आपलोगोंके कहनेसे स्थूलरूपमें उनके कुछ पुण्यवर्धक गुण कहता हूँ सो सुनो ॥११॥


अस्तीक्ष्वाकुकुलव्योमसकलामलचन्द्रमाः । नाम्ना दशरथो राजा दुर्वृत्तेन्धनपावकः ॥१२॥

अर्थ: इक्ष्वाकुवंशरूपी आकाशके पूर्णचन्द्रमा तथा दुराचाररूपी ईन्धनके लिए अग्निस्वरूप एक दशरथ नामके राजा थे ॥१२॥


अधितिष्ठन् महातेजोमूर्त्तिरुत्तरकोसलम् । सवितेव प्रकाशत्वं धत्ते यः सर्वविष्टपे ॥१३॥

अर्थ: जो महातेजस्वरूप थे । उत्तर कोसल देशपर शासन करते थे तथा सूर्यके समान समस्त संसारमें प्रकाश करते थे ॥१३॥


पुरुषाद्रीन्द्रतो यस्मान्निःसृताः कीर्तिसिन्धवः । उदन्वत् सङ्गता वीध्रा ह्लादयन्त्यखिलं जगत् ॥१४॥

अर्थ: जिस पुरुषरूपी पर्वतराजसे निकलीं और समुद्रमें गिरी हुई कीर्तिरूपी उज्ज्वल नदियाँ समस्त संसारको आनन्दित करती हैं ॥१४॥


तस्य राज्यमहाभारवहनक्षमचेष्टिताः । चत्वारो गुणसम्पन्नास्तनया सुनया इव ॥१५॥

अर्थ: राज्यका महाभार उठानेमें जिनकी चेष्टाएँ समर्थ हैं तथा जो गुणोंसे सम्पन्न हैं ऐसे उनके सुनयके समान चार पुत्र हैं ॥१५॥


राम इत्यादितस्तेषामभिरामः समन्ततः । आद्यः सर्वश्रुतज्ञोऽपि विश्रुतः सर्वविष्टपे ॥१६॥

अर्थ: उन सब पुत्रोंमें राम प्रथम पुत्र हैं जो सब ओरसे सुन्दर हैं तथा सर्वशास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी जो समस्त संसारमें विश्रम अर्थात् शास्त्रसे रहित ( पक्षमें - प्रसिद्ध ) हैं ॥१६॥


लक्ष्मणेनानुजेनासौ सीतया च द्वितीयया । जनकस्य नरेन्द्रस्य सुतयाऽत्यन्तभक्तया ॥१७॥

जानकं पालयन् सत्यं कृत्वाऽयोध्यां वितानिकाम् । छद्मस्थः पर्यटन् क्षोणीं प्राविशद्दण्डकं वनम् ॥१८॥

अर्थ: अपने छोटे भाई लक्ष्मण और स्त्री सीताके साथ जो कि राजा जनककी पुत्री थी तथा अत्यन्त भक्त थी, पिताके सत्यकी रक्षा कराते हुए अयोध्याको सूनीकर छद्मस्थवेषमें पृथिवीपर भ्रमण करने लगे तथा भ्रमण कते हुए दण्डकवनमें प्रविष्ट हुए ॥१७-१८॥


स्थानं तत्र परं दुर्गं महाविद्याभृतामपि । सोऽध्यास्त स्त्रैणवृत्तान्तं जातं चन्द्रनखाभवम् ॥१९॥

अर्थ: वहाँ महाविद्याधरोंके लिए भी अत्यन्त दुर्गम स्थानमें वे रहते थे और वहीं चन्द्रनखा सम्बन्धी स्त्रीका वृत्तान्त हुआ अर्थात् चन्द्रनखाने अपना त्रियाचरित्र दिखाया ॥१९॥


संग्रामे वेदितुं वार्त्तां पद्मोऽगादनुजस्य च । दशग्रीवेण वैदेही हृता च छलवर्त्तिना ॥२०॥

अर्थ: उधर राम, छोटे भाईकी वार्ता जाननेके लिए युद्धमें गये उधर कपटवृत्ति रावणने सीताका हरण कर लिया ॥२०॥


ततो महेन्द्रकिष्किन्धश्रीशैलमलयेश्वराः । नृपा विराधिताद्याश्च प्रधानाः कपिकेतवः ॥२१॥

महासाधनसम्पन्ना महाविद्यापराक्रमाः । रामगुणानुरागेण पुण्येन च समाश्रिताः ॥२२॥

लङ्केश्वरं रणे जित्वा वैदेही पुनराहृता । देवलोकपुरीतुल्या विनीता च कृता खगैः ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर महेन्द्र, किष्किन्ध, श्रीशैल और मलयके अधिपति तथा विराधित आदि प्रधान-प्रधान वानरवंशी राजा जो कि महासाधनसे सम्पन्न और विद्यारूप महापराक्रमके धारक थे, रामके गुणोंके अनुरागसे अथवा अपने पुण्योदयसे इनके समीप आये और युद्धमें रावणको जीतकर सीताको वापिस ले आये। विद्याधरोंने अयोध्याको स्वर्गपुरीके समान कर दिया ॥२१-२३॥


तत्र तौ परमैश्वर्यसेवितौ पुरुषोत्तमौ । नागेन्द्राविव मोदेते सन्मुखं रामलक्ष्मणौ ॥२४॥

अर्थ: परम ऐश्वर्यसे सेवित, पुरुषोंमें उत्तम श्रीराम लक्ष्मण वहाँ नागेन्द्रोंके समान एक दूसरेके सम्मुख आनन्दसे समय बिताते थे ॥२४॥


रामो वां न कथं ज्ञातो यस्य लक्ष्मीधरोऽनुजः । चक्रं सुदर्शनं यस्य मोघतापरिवर्जितम् ॥२५॥

अर्थ: अथवा अभीतक आप दोनोंको उन रामका ज्ञान क्यों नहीं हुआ जिनका कि वह लक्ष्मण अनुज हैं, जिनके पास कभी व्यर्थ नहीं जाने बाला सुदर्शन चक्र विराजमान है ॥२५॥


एकैकं रक्ष्यते यस्य तदेकगतचेतसा । रत्नं देवसहस्रेण गजराजस्य कारणम् ॥२६॥

अर्थ: इसके सिवाय जिसके पास ऐसे और भी रत्न हैं जिनकी एकाग्रचित्त होकर प्रत्येककी हजार-हजार देव रक्षा करते हैं तथा जो उसके राजाधिराजत्वके कारण हैं ॥२६॥


सन्त्यक्ता जानकी येन प्रजानां हितकाम्यया । तस्य रामस्य लोकेऽस्मिन्नास्ति कश्चिदवेदकः ॥२७॥

अर्थ: जिन्होंने प्रजाके हित की इच्छासे सीताका परित्याग कर दिया, इस संसारमें ऐसा कौन है जो रामको नहीं जानता हो ॥२७॥


आस्तां तावदयं लोकः स्वर्गेऽप्यस्य गुणैः कृताः । मुखरा देवसङ्घातास्तत्परायणचेतसः ॥२८॥

अर्थ: अथवा इस लोककी बात जाने दो इसके गुणोंसे स्वर्गमें भी देवोंके समूह शब्दायमान तथा तत्परचित्त हो रहे हैं ॥२८॥


ततोऽङ्कुशो जगादासौ मुने रामेण जानकी । कस्य हेतोः परित्यक्ता वद वाञ्छामि वेदितुम् ॥२९॥

अर्थ: तदनन्तर अङ्कुशने कहा कि हे मुने ! रामने सीता किस कारण छोड़ी सो कहो मैं जानना चाहता हूँ ॥२९॥


ततः कथितनिःशेषवृत्तान्तमिदमभ्यधात् । तद्गुणाकृष्टचेतस्को देवर्षिः सास्रवीक्षणः ॥३०॥

अर्थ: तत्पश्चात् सीताके गुणोंसे जिनका चित्त आकृष्ट हो रहा था तथा जिनके नेत्रोंमें आँसू छलक आये थे ऐसे नारदने कथा पूरी करते हुए कहा ॥३०॥


विशुद्धगोत्रचारित्रहृदया गुणशालिनी । अष्टयोषित्सहस्राणामग्रणीः सुविचक्षणा ॥३१॥

सावित्रीं सह गायत्रीं श्रियं कीर्त्तिं धृतिं ह्रियम् । पवित्रत्वेन निर्जित्य स्थिता जैनश्रुतेः समा ॥३२॥

अर्थ: कि उसका गोत्र, चारित्र तथा हृदय अत्यन्त शुद्ध है, वह गुणोंसे सुशोभित हैं, आठ हजार स्त्रियोंकी अग्रणी हैं, अतिशय पण्डिता हैं, अपनी पवित्रतासे सावित्री, गायत्री, श्री, कीर्ति, धृति और ह्री देवीको पराजितकर विद्यमान हैं तथा जिनवाणीके समान हैं ॥३१-३२॥


नूनं जन्मान्तरोपात्तपापकर्मानुभावतः । जनापवादमात्रेण त्यक्ताऽसौ विजने वने ॥३३॥

अर्थ: निश्चित ही जन्मान्तरमें उपार्जित पाप कर्मके प्रभावसे केवल लोकापवादके कारण उन्होंने उसे निर्जन वनमें छोड़ा है ॥३३॥


दुर्लोकघर्मभानूक्तिदीधितिप्रतितापिता । प्रायेण विलयं प्राप्ता सती सा सुखवर्द्धिता ॥३४॥

अर्थ: सुखसे वृद्धिको प्राप्त हुई वह सती दुर्जनरूपी सूर्यकी कटूक्तिरूपी किरणोंसे संतप्त होकर प्रायः नष्ट हो गई होगी ॥३४॥


सुकुमाराः प्रपद्यन्ते दुःखमप्यणुकारणात् । म्लायन्ति मालतीमालाः प्रदीपालोकमात्रतः ॥३५॥

अर्थ: क्योंकि सुकुमार प्राणी थोड़े ही कारणसे दुःखको प्राप्त हो जाते हैं जैसे कि मालतीकी माला दीपकके प्रकाशमात्रसे मुरझा जाती है ॥३५॥


अरण्ये किं पुनर्भीमे व्यालजालसमाकुले । वैदेही धारयेत् प्राणानसूर्यम्पश्यलोचना ॥३६॥

अर्थ: जिसने अपने नेत्रोंसे कभी सूर्य नहीं देखा ऐसी सीता हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए भयंकर वनमें क्या जीवित रह सकती है ? ॥३६॥


जिह्वा दुष्टभुजङ्गीव सन्दूष्यानागसं जनम् । कथं न पापलोकस्य व्रजत्येव निवर्त्तनम् ॥३७॥

अर्थ: पापी मनुष्यकी जिह्वा दुष्ट भुजङ्गीके समान निरपराध लोगोंको दूषित कर निवृत्त क्यों नहीं होती है ? ॥३७॥


आर्जवादिगुणश्लाघ्यामत्यन्तविमलां सतीम् । अपोद्य तादृशीं लोको दुःखं प्रेत्येह चाश्नुते ॥३८॥

अर्थ: आर्जवादि गुणोंसे प्रशंसनीय और अत्यन्त निर्मल सीता जैसी सतीका जो अपवाद करता है वह इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह दुःखको प्राप्त होता है ॥३८॥


अथवा स्वोचिते नित्यं कर्मण्याश्रितजागरे । किमत्र भाष्यतां कस्य संसारोऽत्र जुगुप्सितः ॥३९॥

अर्थ: अथवा अपने द्वारा वंचित कर्म आश्रित प्राणीके नष्ट करनेके लिए जहाँ सदा जागरूक रहते हैं वहाँ किससे क्या कहा जाय ? इस विषयमें तो यह संसार ही निन्दाका पात्र है ॥३९॥


इत्युक्त्वा शोकभारेण समाक्रान्तमना मुनिः । न किञ्चिच्छक्नुवन्वक्तुं मौनयोगमुपाश्रितः ॥४०॥

अर्थ: इतना कहकर जिनका मन शोकके भारसे आक्रान्त हो गया था ऐसे नारदमुनि आगे कुछ भी नहीं कह सके अतः चुप बैठ गये ॥४०॥


अथाङ्कुशो विहस्योचे ब्रह्मन् कुलशोभनम् । कृतं रामेण वैदेहीं मुञ्चता भीषणे वने ॥४१॥

अर्थ: अथानन्तर अङ्कुशने हँस कर कहा कि हे ब्रह्मन् ! भयंकर वनमें सीताको छोड़ते हुए रामने कुलकी शोभाके अनुरूप कार्य नहीं किया ॥४१॥


बहवो जनवादस्य निराकरणहेतवः । सन्ति तत्र किमित्येवं विद्धां किल चकार सः ॥४२॥

अर्थ: लोकापवादके निराकरण करनेके अनेक उपाय हैं फिर उनके रहते हुए क्यों उन्होंने इस तरह सीताको विद्ध किया - घायल किया ॥४२॥


अनङ्गलवणोऽवोचद्विनीता नगरी मुने । कियद्दूरं ततोऽवोचद्वद्वारगतिप्रियः ॥४३॥

योजनानामयोध्या स्यादितः षष्ठ्यधिकं शतम् । यस्यां स वर्तते रामः शशाङ्कविमलप्रियः ॥४४॥

अर्थ: अनंगलवण नामक दूसरे कुमारने भी कहा कि हे मुने ! यहाँसे अयोध्या नगरी कितनी दूर है ? इसके उत्तरमें भ्रमणके प्रेमी नारदने कहा कि वह अयोध्या यहाँसे साठ योजन दूर है जिसमें चन्द्रमाके समान निर्मल प्रियाके स्वामी राम रहते हैं ॥४३-४४॥


कुमारावूचतुर्यावत्तं निर्जेतुं किमास्यते । महीकुटीरके ह्यस्मिन् कस्यान्यस्य प्रधानता ॥४५॥

अर्थ: यह सुन दोनों कुमारोंने कहा कि हम उन्हें जीतनेके लिए चलते हैं । इस पृथिवीरूपी कुटियामें किसी दूसरेकी प्रधानता कैसे रह सकती है ? ॥४५॥


ऊचतुर्वज्रजङ्घं च मामास्मिन्वसुधातले । सुह्मसिन्धुकलिङ्गाद्या राजानः सर्वसाधनाः ॥४६॥

आज्ञाप्यन्तां यथा क्षिप्रमयोध्यागमनं प्रति । सज्जीभवत सर्वेण रणयोग्येन वस्तुना ॥४७॥

अर्थ: उन्होंने वज्रजंघसे भी कहा कि हे माम ! इस वसुधा तल पर जो सुह्म, सिन्धु तथा कलिङ्ग आदि सर्वसाधनसम्पन्न राजा हैं उन्हें आज्ञा दी जाय कि आप लोग अयोध्याके प्रति चलनेके लिए रण के योग्य सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र ही तैयार हो जावें ॥४६-४७॥


संलक्ष्यन्तां महानागा विमदा मदशालिनः । समुद्भूतमहाशब्दा वाजिनो वायुरंहसः ॥४८॥

योधाः कटकविख्याताः समरादपलायिनः । निरीक्ष्यन्तां सुशस्त्राणि मार्ज्यतां कण्टकादिकम् ॥४९॥

तूर्यनादा प्रदाप्यन्तां शङ्खनिःस्वानसङ्गताः । महाहवसमारम्भसम्भाषणविचक्षणाः ॥५०॥

अर्थ: मद रहित तथा मद सहित बड़े-बड़े हाथी, महाशब्द करनेवाले तथा वायुके समान शीघ्रगामी घोड़े, सेनामें प्रसिद्ध तथा युद्धसे नहीं भागनेवाले योद्धा देखे जावें, उत्तम शस्त्रोंका निरीक्षण किया जाय, कवच आदि साफ किये जावें और महायुद्धके प्रारम्भकी खबर देनेमें निपुण तथा शङ्खके शब्दोंसे मिश्रित तुरहीके शब्द दिलाये जावें ॥४८-५०॥


एवमाज्ञाप्य सङ्ग्रामसमानन्दसमागतम् । आधाय मानसे धीरौ महासम्मदसङ्गतौ ॥५१॥

शक्राविव विनिश्चिन्त्य त्रिदशान् धरणीपतीन् । महाविभवसम्पन्नौ यथास्वं तस्थतुः सुखम् ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार राजाओंको आज्ञा दे जो प्राप्त हुए युद्ध सम्बन्धी आनन्दको हृदयमें धारण कर अत्यधिक हर्षसे युक्त थे ऐसे धीर-वीर तथा महावैभवसे सम्पन्न दोनों कुमार उन इन्द्रोंके समान जो देवोंको आज्ञा देकर निश्चिन्त हो जाते हैं निश्चिन्त हो यथा योग्य सुखसे विद्यमान हुए ॥५१-५२॥


ततस्तयोः समाकर्ण्य पद्मनाभाभिषेणनम् । उत्कण्ठां बिभ्रती तुङ्गां रुरोद जनकात्मजा ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर उनकी रामके प्रति चढ़ाई सुन अत्यधिक उत्कण्ठाको धारण करती हुई सीता रोने लगी ॥५३॥


ततः सीतासमीपस्थं सिद्धार्थो नारदं जगौ । इदमीदृक्त्वयाऽऽरब्धं कथं कार्यमशोभनम् ॥५४॥

अर्थ: तत्पश्चात् सीताके समीप खड़े नारदसे सिद्धार्थने कहा कि तुमने यह ऐसा अशोभन कार्य क्यों प्रारम्भ किया ? ॥५४॥


सम्प्रोत्साहनशीलेन रणकौतुकिना परम् । त्वयेदं रचितं पश्य कुटुम्बस्य विभेदनम् ॥५५॥

अर्थ: रणके कौतुकी एवं रणका प्रोत्साहन देनेवाले तुमने देखो यह कुटुम्बका बड़ा भेद कर दिया है - घरमें बड़ी फूट डाल दी है ॥५५॥


स जगाद न जानामि वृत्तान्तमहमीदृशम् । यतः सङ्कथनं न्यस्तं पद्मलक्ष्मणगोचरम् ॥५६॥

अर्थ: नारदने कहा कि मैं इस वृत्तान्तको ऐसा थोड़े ही जानता था । मैंने तो केवल उनके सामने राम-लक्ष्मण सम्बन्धी चर्चा ही रक्खी थी ॥५६॥


एवं गतेऽपि मा भैषीर्नैह किञ्चिदसुन्दरम् । भविष्यतीति जानामि स्वस्थतां नीयतां मनः ॥५७॥

अर्थ: किन्तु ऐसा होने पर भी डरो मत कुछ भी अशोभन कार्य नहीं होगा यह मैं जानता हूँ अतः मनको स्वस्थ करो ॥५७॥


ततः समीपतां गत्वा तां कुमाराववोचताम् । अम्बेदं रुद्यते कस्माद्द्राक्षेपविवर्जितम् ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर दोनों कुमार समीप जाकर सीतासे बोले कि हे अम्ब ! क्यों रो रही हो ? बिना किसी विलम्बके शीघ्र ही कहो ॥५८॥


प्रतिकूलं कृतं केन केन वा परिभाषितम् । दुर्मानसस्य कस्याद्य करोम्यसुवियोजनम् ॥५९॥

अर्थ: किसने तुम्हारे विरुद्ध काम किया है अथवा किसने तुम्हारे विरुद्ध कुछ कहा है ? आज किस दुष्ट हृदयके प्राणोंका वियोग करूँ ? ॥५९॥


अनौषधकरः कोऽसौ क्रीडनं कुरुतेऽहिना । कोऽसौ ते मानवः शोकं करोति त्रिदशोऽपि वा ॥६०॥

अर्थ: ओषधि जिसके हाथमें नहीं ऐसा वह कौन मनुष्य साँपके साथ क्रीड़ा करता है ? वह कौन मनुष्य अथवा देव है जो तुम्हें शोक उत्पन्न करता है ? ॥६०॥


कस्यासि कुपिता मातर्जनस्य गलितायुषः । प्रसादः क्रियतामम्ब शोकहेतुनिवेदने ॥६१॥

अर्थ: हे मातः ! आज किस क्षीणायुष्क पर कुपित हुई हो ? हे अम्ब ! शोक का कारण बतलानेकी प्रसन्नता करो ॥६१॥


एवमुक्ता सती देवी जगाद विधृतास्रका । न कस्यचिदहं पुत्रौ कुपिता कमलेक्षणौ ॥६२॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर सीता देवीने अश्रु धारण करते हुए कहा कि हे कमललोचन पुत्रो ! मैं किसी पर कुपित नहीं हूँ ॥६२॥


भवत्पितुर्मया ध्यातमद्य तेनाऽस्मि दुःखिता । रोदिमि प्रबलायातनयनोदकसन्ततिः ॥६३॥

अर्थ: आज मुझे तुम्हारे पिताका स्मरण हो आया है इसीलिए दुःखी हो गई हूँ और इसीलिए बलात् अश्रु डालती हुई रो रही हूँ ॥६३॥


उक्तवत्यामिदं तस्यां तदा श्रेणिक वीरयोः । सिद्धार्थो न पिताऽस्माकमिति बुद्धिः समुद्गता ॥६४॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! सीताके इस प्रकार कहने पर उन दोनों वीरोंकी यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि सिद्धार्थ हमारा पिता नहीं है ॥६४॥


ततस्तावूचतुर्मातः कोऽस्माकं जनकः क्व वा । इति पृष्टाऽगदत्सीता स्ववृत्तान्तमशेषतः ॥६५॥

अर्थ: तत्पश्चात् उन दोनोंने पूछा कि हे मातः ! हमारा पिता कौन है ? कहाँ है ? इस प्रकार पूछने पर सीताने अपना सब वृत्तान्त कह दिया ॥६५॥


स्वस्य सम्भवमाचख्यौ रामसम्भवमेव च । अरण्यागमनं चैव हृतिमागमनं तथा ॥६६॥

यथा देवर्षिणा ख्यातं तच्च सर्वं सविस्तरम् । वर्त्ततेऽद्यापि कः कालो वृत्तान्तस्य निगूहने ॥६७॥

अर्थ: अपना जन्म, रामका जन्म, वनमें जाना, वहाँ हरण होना तथा पुनः वापिस आना आदि जैसा वृत्तान्त नारदने कहा था वैसा सब विस्तारसे कह सुनाया क्योंकि वृत्तान्तके छिपाने का अब कौन-सा अवसर है ? ॥६६-६७॥


एतदुक्त्वा जगौ पुत्रौ भवतोर्गर्भजातयोः । किंवदन्तीभयेनाहं युष्मत्पित्रोज्झिता वने ॥६८॥

अर्थ: यह कह कर सीताने कहा कि जब तुम दोनों गर्भमें थे तब लोकापवादके भयसे तुम्हारे पिताने मुझे वनमें छोड़ दिया था ॥६८॥


तत्र सिंहरवाख्यायामटव्यां कृतरोदना । वारणार्थं गतेनाहं वज्रजङ्घेन वीक्षिता ॥६९॥

अर्थ: मैं उस सिंहरवा नामकी अटवीमें रो रही थी कि हाथी पकड़नेके लिए गये हुए वज्रजंघने मुझे देखा ॥६९॥


अनेन प्राप्तनागेन विनिवर्त्तनकारिणा । विशुद्धशीलरत्नेन श्रावकेण महात्मना ॥७०॥

अहं स्वसेति सम्भाष्य करुणासक्तचेतसा । आनीतेदं निजं स्थानं पूजया चानुपालिता ॥७१॥

अर्थ: जो हाथी प्राप्त कर अटवीसे लौट रहा था, जो विशुद्ध शक्ति रूपी रत्नका धारक था, महात्मा था एवं दयालुचित्त था, ऐसा यह श्रावक वज्रजंघ मुझे बहिन कह इस स्थान पर ले आया और बड़े सन्मानके साथ उसने हमारा पालन किया ॥७०-७१॥


तस्यास्य जनकस्येव भवने विभवान्विते । भवन्तौ सम्प्रसूताऽहं पद्मनाभशरीरजौ ॥७२॥

अर्थ: जो तुम्हारे पिताके ही समान है ऐसे इस वज्रजंघके वैभवशाली घरमें मैंने तुम दोनोंको जन्म दिया है । तुम दोनों श्रीरामके शरीरसे उत्पन्न हो ॥७२॥


तेनेयं पृथिवी वत्सौ हिमवत्सागरावधिः । लक्ष्मणानुजयुक्तेन विहिता परिचारिका ॥७३॥

अर्थ: हे वत्सो ! लक्ष्मण नामक छोटे भाईसे सहित उन श्रीरामने हिमालयसे लेकर समुद्रपर्यन्तकी इस समस्त पृथिवीको अपनी दासी बनाया है ॥७३॥


महाऽऽहवेऽधुना जाते श्रोष्यामि किमशोभनम् । नाथस्य भवतोः किंवा किं वा देवरगोचरम् ॥७४॥

अर्थ: अब आज उनके साथ तुम्हारा महायुद्ध होनेवाला है सो मैं क्या पतिकी अमाङ्गलिक वार्ता सुनूँगी ? या तुम्हारी ? अथवा देवर की ? ॥७४॥


अनेन ध्यानभारेण परिपीडितमानसा । अहं रोदिमि सत्पुत्रौ कुतोऽन्यदिह कारणम् ॥७५॥

अर्थ: इसी ध्यानके कारण खिन्न चित्त होनेसे मैं रो रही हूँ । हे भले पुत्रो ! यहाँ और दूसरा कारण क्या हो सकता है ? ॥७५॥


तच्छ्रुत्वा परमं प्राप्तौ सम्मदं स्मितकारिणौ । विकासिवदनाम्भोजावूचतुर्लवणाङ्कुशौ ॥७६॥

अहो सोऽसौ पिताऽस्माकं सुधन्वा लोकपुङ्गवः । श्रीमान् विशालसत्कीर्तिः कृतानेकमहाद्भुतः ॥७७॥

अर्थ: यह सुनकर लवणाङ्कुश परम हर्षको प्राप्त हो आश्चर्य करने लगे, और उनके मुखकमल खिल उठे । उन्होंने कहा कि अहो ! वह सुधन्वा, लोकश्रेष्ठ, श्रीमान् , विशाल एवं उज्ज्वल कीर्तिके धारक तथा अनेक महान आश्चर्यके करनेवाले श्री राम हमारे पिता हैं ॥७६-७७॥


विषादं मा गमः मातर्वने त्यक्ताहमित्यतः । भग्नां मानोन्नतिं पश्य रामलक्ष्मणयोर्द्रुतम् ॥७८॥

अर्थ: हे मातः ! ‘मैं वनमें छोड़ी गई हूँ’ इस बातका विषाद मत करो । तुम शीघ्र ही राम-लक्ष्मणका अहंकार खण्डित देखो ॥७८॥


सीताऽब्रवीदलमलं विरोद्धुं गुरुणा सुतौ । न वर्तत इदं कर्तुं व्रजतां सौम्यचित्तताम् ॥७९॥

अर्थ: तब सीताने कहा कि हे पुत्रो ! पिताके साथ विरोध करना रहने दो । यह करना उचित नहीं है । तुम लोग शान्तचित्तताको प्राप्त करो ॥७९॥


महाविनययोगेन समागत्य कृतानती । पितरं पश्यतं वत्सौ मार्गोऽयं नयसङ्गतः ॥८०॥

अर्थ: हे वत्सो ! बड़ी विनयके साथ जाओ और नमस्कार कर पिताके दर्शन करो यही मार्ग न्यायसंगत है ॥८०॥


ऊचतुस्तौ रिपुस्थानप्राप्तं मातः कथं नु तम् । ब्रूवो गत्वा वचः क्लीबमावां ते तनयाविति ॥८१॥

अर्थ: यह सुन लवणाङ्कुशने कहा कि वे हमारे शत्रुके स्थानको प्राप्त हैं अतः हे मातः ! हम लोग जाकर यह दीन वचन उनसे किस प्रकार कहें कि हम तुम्हारे लड़के हैं ॥८१॥


वरं मरणमावाभ्यां प्राप्तं सङ्ग्राममूर्द्धनि । न तु भावितमीदृक्षं प्रवीरजननिन्दितम् ॥८२॥

अर्थ: संग्रामके अग्रभाग में यदि हम लोगोंको मरण प्राप्त होता है तो अच्छा है परन्तु वीर मनुष्योंके द्वारा निन्दित ऐसा विचार रखना अच्छा नहीं है ॥८२॥


स्थितायामथ वैदेह्यां जोषं चिन्तार्तचेतसि । अभिषेकादिकं कृत्यं भेजाते लवणाङ्कुशौ ॥८३॥

अर्थ: अथानन्तर जिसका चित्त चिन्तासे दुःखी हो रहा था ऐसी सीता चुप हो रही और लवणांकुशने स्नान आदि कार्य सम्पन्न किये ॥८३॥


श्रितमङ्गलसङ्घौ च कृतसिद्धनमस्कृतौ । प्रसान्त्व्य मातरं किञ्चित् प्रणम्य च सुमङ्गलौ ॥८४॥

आरूढौ द्विरदौ चन्द्रसूर्यौ वा नगमस्तकम् । प्रस्थितावभिसाकेतं लङ्कां वा रामलक्ष्मणौ ॥८५॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिन्होंने मङ्गलमय मुनिसंघकी सेवा की थी, सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया था तथा माताको सान्त्वना देकर प्रणाम किया था ऐसे मङ्गलमय वेषको धारण करनेवाले दोनों कुमार दो हाथियों पर उस प्रकार आरूढ़ हुए जिस प्रकार कि चन्द्रमा और सूर्य पर्वतके शिखर पर आरूढ़ होते हैं । तदनन्तर दोनोंने अयोध्याकी ओर उस तरह प्रयाण किया जिस तरह कि राम-लक्ष्मणने लङ्काकी ओर किया था ॥८४-८५॥


ततः सन्नाहशब्देन ज्ञात्वा निर्गमनं तयोः । क्षिप्रं योधसहस्राणि निर्जग्मुः पौण्डरीकतः ॥८६॥

अर्थ: तत्पश्चात् तैयारीके शब्दसे उन दोनोंका निर्गमन जानकर हजारों योधा शीघ्र ही पौण्डरीकपुरसे बाहर निकल पड़े ॥८६॥


परस्परप्रतिस्पर्द्धासमुत्कर्षितचेतसाम् । सैन्यं दर्शयतां राज्ञां संघट्टः परमोऽभवत् ॥८७॥

अर्थ: परस्परकी प्रतिस्पर्धासे जिनका चित्त बढ़ रहा था ऐसे अपनी-अपनी सेनाएँ दिखलानेवाले राजाओंमें बड़ी धकम-धक्का हो रही थी ॥८७॥


स्वैरं योजनमात्रं तौ महाकटकसङ्गतौ । पालयन्तौ महीं सम्यङ्नानाशस्योपशोभिताम् ॥८८॥

अग्रतः प्रसृतोदारप्रतापौ परमेश्वरौ । प्रयातौ विषयन्यस्तैः पूज्यमानौ नरेश्वरैः ॥८९॥

अर्थ: तदनन्तर जो एक योजन तक फैली हुई बड़ी भारी सेनासे सहित थे जो नाना प्रकारके धान्यसे सुशोभित पृथिवीका अच्छी तरह पालत करते थे, जिनका उत्कृष्ट प्रताप आगे-आगे चल रहा था और जो उन-उन देशोंमें स्थापित राजाओंके द्वारा पूजा प्राप्त कर रहे थे, ऐसे दोनों भाई प्रजाकी रक्षा करते हुए चले जा रहे थे ॥८८-८९॥


महाकुठारहस्तानां तथा कुद्दालधारिणाम् । पुंसां दशसहस्राणि संप्रयांति तदग्रतः ॥९०॥

अर्थ: बड़े-बड़े कुल्हाड़े और कुदालें धारण करनेवाले दश हजार पुरुष उनके आगे-आगे चलते थे ॥९०॥


छिन्दन्तः पादपादींस्ते जनयन्ति समन्ततः । उच्चावचविनिर्मुक्तां महीं दर्पणसन्निभाम् ॥९१॥

अर्थ: वे वृक्षों आदिको काटते हुए ऊँची-नीची भूमिको सब ओरसे दर्पणके समान करते जाते थे ॥९१॥


महिषोष्ट्रमहोक्षाद्या कोशसंभारवाहिनः । प्रयान्ति प्रथमं गन्त्री पत्तयश्च मृदुस्वनाः ॥९२॥

ततः पदातिसङ्घाता युवसारङ्गविभ्रमाः । पश्चात्तुरङ्गवृन्दानि कुर्वन्त्युत्तमवल्गितम् ॥९३॥

अर्थ: सबसे पहले खजानेके भारको धारण करनेवाले भैंसे ऊँट तथा बड़े-बड़े बैल जा रहे थे। फिर कोमल शब्द करते हुए गाड़ियोंके सेवक चल रहे थे। तदनन्तर तरुण हरिणके समान उछलनेवाले पैदल सैनिकोंके समूह और उनके बाद उत्तम चेष्टाएँ करनेवाले घोड़ोंके समूह जा रहे थे ॥९२-९३॥


अथ काञ्चनकक्षाभिर्नितान्तकृतराजनाः । महाघण्टाकृतस्वानाः शङ्खचामरधारिणः ॥९४॥

बुद्बुदादर्शलम्बूषचारुवेषा महोद्धताः । अयस्ताम्रसुवर्णादिबद्धशुभ्रमहारदाः ॥९५॥

रत्नचामीकराद्यात्मकण्ठमालाविभूषिताः । चलत्पर्वतसङ्काशा नानावर्णकसङ्गिनः ॥९६॥

केचिन्निर्भरनिश्च्योतद्गण्डा मुकुलितेक्षणाः । हृष्टा दानोद्गमाः केचिद्वेगचण्डा घनोपमाः ॥९७॥

अधिष्ठिताः सुसन्नाहैर्नानाशास्त्रविशारदैः । समुद्भूतमहाशब्दैः पुरुषैः पुरुदीप्तिभिः ॥९८॥

स्वान्यसैन्यमुद्भूतनिनादज्ञानकोविदाः । सर्वशिक्षासुसम्पन्ना दन्तिनश्चारुविभ्रमाः ॥९९॥

अर्थ: उनके पश्चात् जो सुवर्णकी मालाओंसे अत्यधिक सुशोभित थे, जिनके गलेमें बँधे हुए बड़े-बड़े घण्टा शब्द कर रहे थे, जो शङ्खों और चामरोंको धारण कर रहे थे, काँचके छोटे-छोटे गोले तथा दर्पण तथा फन्नूसों आदिसे जिनका वेष बहुत सुन्दर जान पड़ता था, जो महाउद्दण्ड थे, जिनकी सफेद रङ्गकी बड़ी-बड़ी खीसें लोहा तामा तथा सुवर्णादिसे जड़ी हुई थीं, जो रत्न तथा सुवर्णादिसे निर्मित कण्ठमालाओंसे विभूषित थे, चलते-फिरते पर्वतोंके समान जान पड़ते थे, नाना रङ्गके चित्रामसे सहित थे, जिनमेंसे किन्हींके गण्डस्थलोंसे अत्यधिक मद भर रहा था, कोई नेत्र बन्द कर रहे थे, कोई हर्षसे परिपूर्ण थे, किन्हींके मदकी उत्पत्ति होनेवाली थी, कोई वेगसे तीक्ष्ण थे और कोई मेघोंके समान थे, जो कवच आदिसे युक्त, नाना शास्त्रोंमें निपुण, महाशब्द करनेवाले और अत्यन्त तेजस्वी पुरुषोंसे अधिष्ठित थे, जो अपनी तथा परायी सेनामें उत्पन्न हुए शब्दके जाननेमें निपुण थे, सर्वप्रकारकी शिक्षासे सम्पन्न थे और सुन्दर चेष्टाको धारण करनेवाले थे ऐसे हाथी जा रहे थे ॥९४-९९॥


बिभ्राणाः कवचं चारु पश्चाद्विन्यस्तखेटकाः । सादिनस्तत्र राजन्ते परमं कुन्तपाणयः ॥१००॥

अर्थ: उनके पश्चात् जो सुन्दर कवच धारण कर रहे थे, जिन्होंने पीछेकी ओर ढाल टाँग रक्खी थी तथा भाले जिनके हाथोंमें थे ऐसे घुड़सवार सुशोभित हो रहे थे ॥१००॥


अश्ववृन्दखुराघातसमुद्भूतेन रेणुना । नभः पाण्डुरजीमूतचयैरिव समन्ततम् ॥१०१॥

अर्थ: अश्वसमूहके खुराघातसे उठी धूलिसे आकाश ऐसा व्याप्त हो गया था मानो सफेद मेघोंके समूहसे ही व्याप्त हो गया हो ॥१०१॥


शस्त्रान्धकारपिहिता नानाविभ्रमकारिणः । अहंयवः समुद्वृत्ताः प्रवर्त्तन्ते पदातयः ॥१०२॥

अर्थ: उनके पश्चात् जो शस्त्रोंके अन्धकारसे आच्छादित थे, नाना प्रकारकी चेष्टाओंको करनेवाले थे, अहङ्कारी थे तथा उदात्त आचारसे युक्त थे ऐसे पदाति चल रहे थे ॥१०२॥


शयनासनताम्बूलगन्धमाल्यैर्मनोहरैः । न कश्चिद् दुःस्थितस्तत्र वस्त्राहारविलेपनैः ॥१०३॥

अर्थ: उस विशाल सेनामें शयन, आसन, पान, गन्ध, माला तथा मनोहर वस्त्र, आहार और विलेपन आदिसे कोई दुःखी नहीं था अर्थात् सबके लिए उक्त पदार्थ सुलभ थे ॥१०३॥


नियुक्ता राजवाक्येन सन्तताः पथि मानवाः । दिने दिने महादक्षा बद्धकक्षाः सुचेतसः ॥१०४॥

मधु शीधु घृतं वारि नानान्नं रसवत्परम् । परमादरसम्पन्नं प्रयच्छन्ति समन्ततः ॥१०५॥

अर्थ: राजाकी आज्ञानुसार नियुक्त होकर जो मार्गमें सब जगह व्याप्त थे, अत्यन्त चतुर थे कार्य करनेके लिए जो सदा कमर कसे रखते थे और उत्तम हृदयसे युक्त थे ऐसे मनुष्य प्रति बड़े आदरके साथ सबके लिए मधु, स्वादिष्ट पेय, घी, पानी और नाना प्रकारके रसीले भोजन सब ओर प्रदान करते रहते थे ॥१०४-१०५॥


नादर्शि मलिनस्तत्र न दीनो न बुभुक्षितः । तृषितो न कुवस्त्रो वा जनो न च विचिन्तकः ॥१०६॥

अर्थ: उस सेनामें न तो कोई मनुष्य मलिन दिखाई देता था, न दीन, न भूखा, न प्यासा, न कुत्सित वस्त्र धारण करनेवाला और न चिन्तातुर ही दिखाई पड़ता था ॥१०६॥


नानाभरणसम्पन्नाश्चारुवेषाः सुकान्तयः । पुरुषास्तत्र नार्यश्च रेजुः सैन्यमहार्णवे ॥१०७॥

अर्थ: उस सेनारूपी महासागरमें नाना आभरणोंसे युक्त, उत्तम वेशसे सुसज्जित एवं उत्तम कान्तिसे युक्त पुरुष और स्त्रियाँ सुशोभित थीं ॥१०७॥


विभूत्या परया युक्तावेवं जनकजात्मजौ । साकेताविषयं प्राप्ताविन्द्राविव सुरास्पदम् ॥१०८॥

अर्थ: इस प्रकार परमविभूतिसे युक्त सीताके दोनों पुत्र उस तरह अयोध्याके उस देशमें पहुँचे जिस तरह कि इन्द्र देवोंके स्थानमें पहुँचते हैं ॥१०८॥


यवपुण्ड्रेक्षुगोधूमप्रभृत्युत्तमसम्पदा । सस्येन शोभिता यत्र वसुधान्तरवर्जिता ॥१०९॥

अर्थ: जौ, पौंडे, ईख तथा गेहूँ आदि उत्तमोत्तम धान्योंसे जहाँकी भूमि निरन्तर सुशोभित है ॥१०९॥


सरितो राजहंसौघैः सरांसि कमलोत्पलैः । पर्वता विविधैः पुष्पैर्गीतैरुद्यानभूमयः ॥११०॥

अर्थ: वहाँकी नदियाँ राजहंसोंके समूहोंसे, तालाब कमलों और कुवलयोंसे, पर्वत नाना प्रकारके पुष्पोंसे और बाग-बगीचोंकी भूमियाँ सुन्दर संगीतोंसे सुशोभित हैं ॥११०॥


नैचिकीमहिषीव्रातैर्महोच्चस्वरहारिभिः गोपीभिर्मञ्चसक्ताभिर्यत्र भान्ति वनानि च ॥१११॥

अर्थ: जहाँ के वन बड़े-बड़े बैलोंके शब्दोंसे, सुन्दर गायों और भैंसोंके समूहसे तथा मचानपर बैठी गोपालिकाओंसे सुशोभित हैं ॥१११॥


सीमान्तावस्थिता यत्र ग्रामा नगरसन्निभाः । त्रिविष्टपपुराभानि राजन्ते नगराणि च ॥११२॥

अर्थ: जहाँकी सीमाओंपर स्थित गाँव नगरोंके समान और नगर स्वर्गपुरीके समान सुशोभित हैं ॥११२॥


स्वैरं तमुपभुञ्जानौ विषयं विषयप्रियम् । परेण तेजसा युक्तौ गच्छन्तौ लवणाङ्कुशौ ॥११३॥

अर्थ: इस तरह पञ्चेन्द्रियके विषयोंसे प्रिय उस देशका इच्छानुसार उपभोग करते हुए, परमतेजके धारक लवणाङ्कुश आनन्दसे चले जाते थे ॥११३॥


दन्तिनां रणचण्डानां गण्डनिर्गतवारिणा । कर्दमत्वं समानीता सकलाः पथि पांसवः ॥११४॥

अर्थ: रणके कारण तीव्र क्रोधको प्राप्त हुए हाथियोंके गण्डस्थलसे झरनेवाले जलसे मार्गकी समस्त धूलि कीचड़पने को प्राप्त हो गई थी ॥११४॥


भृशं पटुखुराघातैर्वाजिनां चञ्चलात्मनाम् । जर्जरत्वमिवानीता कोसलाविषयावनिः ॥११५॥

अर्थ: चञ्चल घोड़ोंके तीक्ष्ण खुराघातसे उस कोमल देशकी भूमि माने अत्यन्त जर्जर अवस्थाको प्राप्त हो गई थी ॥११५॥


ततः सन्ध्यासमासक्तघनौघेनेव सङ्गतम् । दूरे नभः समालक्ष्य जगदुर्लवणांकुशौ ॥११६॥

किमेतद्दृश्यते माम तुङ्गशोणमहाद्युति । वज्रजङ्घस्ततोऽवोचत्परिज्ञाय चिरादिव ॥११७॥

देवावेषा विनीतासौ दृश्यते नगरी परा । हेमप्राकारसञ्जाता यस्याश्छायेयमुन्नता ॥११८॥

अर्थ: तदनन्तर लवणाङ्कुश, दूरसे ही आकाशको सन्ध्याकालीन मेघोंके समूह सहित जैसा देखकर बोले कि हे माम ! जिसकी लाल-लाल विशाल कान्ति बहुत ऊँची उठ रही है ऐसा यह क्या दिखाई दे रहा है ? यह सुन वज्रजङ्घने बहुत देरतक पहिचाननेके बाद कहा कि हे देवो! यह वह उत्कृष्ट अयोध्या नगरी दिखाई दे रही है जिसके सुवर्णमय कोटकी यह कान्ति इतना ऊँची उठ रही है ॥११६-११८॥


अस्यां हलधरः श्रीमानास्तेऽसौ भवतोः पिता । यस्य नारायणो भ्राता शत्रुघ्नश्च महागुणः ॥११९॥

अर्थ: इस नगरीमें वह श्रीमान् बलभद्र रहते हैं जो कि तुम दोनोंके पिता हैं तथा नारायण और महागुणवान् शत्रुघ्न जिनके भाई हैं ॥११९॥


शौर्यमानसमेताभिः कथाभिरितिसक्तयोः । सुखेन गच्छतोरासीदन्तराले तयोर्नदी ॥१२०॥

अर्थ: इस तरह शूर-वीरता और गौरवसे सहित कथाओंसे जो अत्यन्त प्रसन्न थे ऐसे सुखसे जाते हुए उन दोनोंके बीच नदी आ पड़ी ॥१२०॥


प्रवृत्तवेगमात्रेण नगरी ग्रहणैषिणोः । जाताऽसावन्तरे तृष्णा सिद्धिप्रस्थितयोरिव ॥१२१॥

अर्थ: जो अपने चालू वेगसे ही उस नगरीको ग्रहण करनेकी इच्छा रखते थे ऐसे उन दोनों वीरोंके बीच वह नदी उस प्रकार आ पड़ी जिसप्रकार कि मोक्षके लिए प्रस्थान करनेवालेके बीच तृष्णा आ पड़ती है ॥१२१॥


सैन्यमात्रासितं तत्र परिश्रमसमागतम् । सुरसैन्यमिवोदारमुपनन्दननिम्नगाम् ॥१२२॥

अर्थ: जिस प्रकार नन्दन,वनकी नदीके समीप देवोंकी विशाल सेना ठहराई जाती है उसी प्रकार उस नदीके समीप थकी मांदी सेना ठहरा दी गई ॥१२२॥


अथ श्रुत्वा परानीकं स्थितमासन्नगोचरे । किञ्चिद्विस्मयमापन्नावूचतुः पद्मलक्ष्मणौ ॥१२३॥

अर्थ: अथानन्तर शत्रुकी सेनाको निकटवर्ती स्थानमें स्थित सुन परम आश्चर्यको प्राप्त होते हुए राम लक्ष्मणने कहा कि ॥१२३॥


त्वरितं कः पुनर्मर्त्तुमयं वाञ्छति मानवः । युद्धापदेशमाश्रित्य यदेत्यन्तिकमावयोः ॥१२४॥

अर्थ: यह कौन मनुष्य शीघ्र ही मरना चाहता है जो युद्धका बहाना लेकर हम दोनोंके पास चला आ रहा है ॥१२४॥


ददौ नारायणश्चाज्ञां विराधितमहीभृते । क्रियतां साधनं सज्जं युद्धाय क्षेपवर्जितम् ॥१२५॥

अर्थ: लक्ष्मणने उसी समय राजा विराधितको आज्ञा दी कि बिना किसी विलम्बके युद्धके लिए सेना तैयार की जाय ॥१२५॥


वृषनागप्लवङ्गादिकेतनाः खेचराधिपाः । क्रियन्तामुदितज्ञाना सम्प्राप्ते रणकर्मणि ॥१२६॥

अर्थ: रणका कार्य उपस्थित हुआ है इसलिए वृष, नाग तथा वानर आदिकी पताकाओंको धारण करने वाले विद्याधर राजाओं को सब समाचारका ज्ञान कराओ अर्थात् उनके पास सब समाचार भेजे जाँय ॥१२६॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा विराधितखगेश्वरः । नृपान् किष्किन्धनाथाद्यान् समाहूय समुद्यतः ॥१२७॥

अर्थ: ‘जैसी आप आज्ञा करते हैं वैसा ही होगा’ इस प्रकार कह कर राजा विराधित सुग्रीव आदि राजाओं को बुला कर युद्धके लिए उद्यत हो गया ॥१२७॥


दूतदर्शनमात्रेण सर्वे ते खेचरेश्वराः । अयोध्यानगरीं प्राप्ता महासाधनसङ्गताः ॥१२८॥

अर्थ: दूतके देखते ही वे सब विद्याधर राजा बड़ी-बड़ी सेनाएं लेकर अयोध्या आ पहुँचे ॥१२८॥


अथात्यन्ताकुलात्मानौ तदा सिद्धार्थनारदौ । प्रभामण्डलराजाय गत्वा ज्ञापयतां द्रुतम् ॥१२९॥

अर्थ: अथानन्तर जिनकी आत्मा अत्यन्त आकुल हो रही थी ऐसे सिद्धार्थ और नारदने शीघ्र ही जा कर भामण्डलके लिए सब खबर दी ॥१२९॥


श्रुत्वा स्वसुर्यथा वृत्तं वात्सल्यगुणयोगतः । बभूव परमं दुःखी प्रभामण्डलमण्डितः ॥१३०॥

अर्थ: बहिन सीताका जो हाल हुआ था उसे सुन कर वात्सल्य गुणके कारण भामण्डल बहुत दुखी हुआ ॥१३०॥


विषादं विस्मयं हर्षं विभ्राणश्च त्वरान्वितः । आरुह्य मनसा तुल्यं विमानं पितृसङ्गतः ॥१३१॥

समेतः सर्वसैन्येन किङ्कर्तव्यत्वविह्वलः । पौण्डरीकपुरं चैव प्रस्थितः स्नेहनिर्भरः ॥१३२॥

अर्थ: तदनन्तर विषाद विस्मय और हर्षको धारण करने वाला, शीघ्रतासे सहित एवं स्नेहसे भरा भामण्डल, किंकर्तव्यविमूढ हो पिता सहित मनके समान शीघ्रगामी विमान पर आरूढ़ हो सब सेनाके साथ पौण्डरीकपुरकी ओर चला ॥१३१-१३२॥


प्रभामण्डलमायातं जनकं मातरं तथा । दृष्ट्वा सीता नवीभूतशोकोत्थाय त्वरान्विता ॥१३३॥

विप्रलापं परिष्वज्य चक्रेऽस्रकृतदुर्दिना । निर्वासनादिकं दुःखं वेदयन्ती सुविह्वला ॥१३४॥

अर्थ: भामण्डल, पिता और माताको आया देख जिसका शोक नया हो गया था ऐसी सीता शीघ्रतासे उठ सबका आलिङ्गन कर आसुंओंकी लगातार वर्षा करती हुई विलाप करने लगी । वह उस समय अपने परित्याग आदिके दुःखको बतलाती हुई विह्वल हो उठती थी ॥१३३-१३४॥


सान्त्वयित्वाऽतिकृच्छ्रेण तां प्रभामण्डलो जगौ । देवि संशयमापन्नौ पुत्रौ ते साधु नो कृतम् ॥१३५॥

अर्थ: भामण्डलने उसे बड़ी कठिनाईसे सान्त्वना देकर कहा कि हे देवि ! तेरे पुत्र संशयको प्राप्त हुए है । उन्होंने यह अच्छा नहीं किया ॥१३५॥


हलचक्रधरौ ताभ्यामुपेत्य क्षोभितौ यतः । सुराणामपि यौ वीरौ न जय्यौ पुरुषोत्तमौ ॥१३६॥

अर्थ: उन्होंने जाकर उन बलभद्र और नारायणको क्षोभित किया है जो पुरुषोत्तम वीर देवोंके भी अजेय हैं ॥१३६॥


कुमारयोस्तयोर्यावत्प्रमादो नोपजायते । व्रजामस्तावदेद्याशु चिन्तयामोऽभिरक्षणम् ॥१३७॥

अर्थ: जब तक उन कुमारोंका प्रमाद नहीं होता है तब तक आओ शीघ्र ही चलें और रक्षाका उपाय सोचें ॥१३७॥


ततः स्नुषासमेताऽसौ भामण्डलविमानगा । प्रवृत्ता तनयौ तेन वज्रजङ्घबलान्वितौ ॥१३८॥

अर्थ: तदनन्तर पुत्र-वधुओं सहित सीता भामण्डलके विमानमें बैठ उस ओर चली जिस ओर कि वज्रजङ्घ और सेनासे सहित दोनों पुत्र गये थे ॥१३८॥


रामलक्ष्मणयोर्लक्ष्मीं कोऽसौ वर्णयितुं क्षमः । इति श्रेणिक संक्षेपात्कीर्त्यमानमिदं शृणु ॥१३९॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! राम लक्ष्मणकी पूर्ण लक्ष्मीका वर्णनके लिए कौन समर्थ है ? इसलिए संक्षेपसे ही यहाँ कहते हैं सो सुन ॥१३९॥


रथाश्वगजपादातमहार्णवसमावृतौ । वहन्ताविव संरम्भं निर्गतौ रामलक्ष्मणौ ॥१४०॥

अर्थ: रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिक रूप महासागरसे घिरे हुए राम लक्ष्मण क्रोधको धारण करते हुएके समान निकले ॥१४०॥


अश्वयुक्तरथारूढः शत्रुघ्नश्च प्रतापवान् । हारराजितवक्षस्को निर्ययौ युद्धमानसः ॥१४१॥

अर्थ: जो घोड़े जुते हुए रथ पर सवार था, जिसका वक्षः स्थल हारसे सुशोभित था तथा जिसका मन युद्धमें लग रहा था ऐसा प्रतापी शत्रुघ्न भी निकल कर बाहर आया ॥१४१॥


ततोऽभवत्कृतान्तास्यः सर्वसैन्यपुरःसरः । मानी हरिणकेशीव नाकौकःसैनिकाग्रणीः ॥१४२॥

अर्थ: जिस प्रकार हरिणकेशी देव सैनिकोंका अग्रणी होता है उसी प्रकार मानी कृतान्तवक्त्र सब सेनाका अग्रसर हुआ ॥१४२॥


शरासनकृतच्छायं चतुरङ्गं महाद्युति । अप्रमेयं बलं तस्य प्रतापपरिवारणम् ॥१४३॥

अर्थ: जिसमें धनुषोंकी छाया हो रही थी तथा जो महा कान्तिसे युक्त थी ऐसी उसकी अपरिमित चतुरङ्गिणी सेना उसके प्रतापको बढ़ा रही थी ॥१४३॥


सुरप्रासादसङ्काशो मध्यस्तम्भोऽन्तकध्वजः । शात्रवानीकदुःप्रेक्षो रेजे तस्य महारथः ॥१४४॥

अर्थ: जिसमें बीचके खम्भा के ऊपर ध्वजा फहरा रही थी, तथा जो शत्रुओंकी सेनाके द्वारा दुर्निरीक्ष्य था ऐसा उसका बड़ा भारी रथ देवोंके महलके समान सुशोभित हो रहा था ॥१४४॥


अनुमार्गं त्रिमूर्ध्नोऽस्य ततो वह्निशिखो नृपः । सिंहविक्रमनामा च तथा दीर्घभुजश्रुतिः ॥१४५॥

सिंहोदरः सुमेरुश्च बालिखिल्यो महाबलः । प्रचण्डो रौद्रभूतिश्च शरभः स्यन्दनः पृथुः ॥१४६॥

कुलिशश्रवणश्चण्डो मारिदत्तो रणप्रियः । मृगेन्द्रवाहनाद्याश्च सामन्ता मत्तमानसाः ॥१४७॥

सहस्रपञ्चकेयत्ता नानाशस्त्रान्धकारिणः । निर्जग्मुर्वन्दिनां वृन्दैरुद्गीतगुणकोटयः ॥१४८॥

अर्थ: कृतान्तवक्त्रके पीछे त्रिमूर्ध, फिर अग्निशिख, फिर सिंहविक्रम, फिर दीर्घबाहु, फिर सिंहोदर, सुमेरु, महाबलवान् बालिखिल्य, अत्यन्त क्रोधी रौद्रभूति, शरभ, स्यन्दन, क्रोधी वज्रकर्ण, युद्धका प्रेमी मारिदत्त, और मदोन्मत्त मनके धारक मृगेन्द्रवाहन आदि पाँच हजार सामन्त बाहर निकले । ये सभी सामन्त नाना शस्त्र रूपी अन्धकारको धारण करनेवाले थे तथा चारणोंके समूह उनके करोड़ों गुणोंका उद्गान कर रहे थे ॥१४५-१४८॥


एवं कुमारकोट्योऽपि कुटिलानीकसङ्गताः । दृष्टप्रत्ययशस्त्राङ्गे क्षणविन्यस्तचक्षुषः ॥१४९॥

युद्धानन्दकृतोत्साहा नाथभक्तिपरायणाः । महाबलास्त्वरावत्यो निरीयुः कम्पितक्षमाः ॥१५०॥

अर्थ: इसी प्रकार जो कुटिल सेनाओंसे सहित थी, जिन्होंने विश्वासप्रद शस्त्र के ऊपर क्षण भरके लिए अपनी दृष्टि डाली था, युद्ध सन्बन्धी हर्षसे जिनका उत्साह बढ़ रहा था, जो स्वामीकी भक्तिमें तत्पर थीं, महाबलवान् थीं, शीघ्रतासे सहित थीं और जिन्होंने पृथिवीको कम्पित कर दिया था ऐसीं कुमारोंकी अनेक श्रेणियाँ भी बाहर निकलीं ॥१४९-१५०॥


रथैः केचिन्नगैस्तुङ्गैर्द्विपैः केचिद्घनोपमैः । महार्णवतरङ्गाभैस्तुरङ्गैरपरैः परे ॥१५१॥

शिबिकाशिखरैः केचिद्युग्यैर्योग्यतरैः परे । निर्ययुर्बहुवादित्रबधिरीकृतदिङ्मुखाः ॥१५२॥

सकङ्कटशिरस्त्राणाः क्रोधालिङ्गितचेतसः । पुरादृष्टसुविक्रान्तप्रसादपरसेवकाः ॥१५३॥

अर्थ: नाना प्रकार के वादित्रोंसे जिन्होंने दिशाओंको बहिरा कर दिया था, जो कवच और टोपसे सहित थे, जिनके चित्त क्रोधसे व्याप्त थे, तथा जिनके सेवक पूर्व दृष्ट, परम पराक्रमी और प्रसन्नता प्राप्त करनेमें तत्पर थे ऐसे कितने ही लोग पर्वतोंके समान ऊँचे रथोंसे, कितने ही मेघोंके समान हाथियोंसे, कितने ही महासागरकी तरङ्गोंके समान घोड़ोंसे, कितने ही पालकीके शिखरोंसे और कितने ही अत्यन्त योग्य वृषभोंसे अर्थात् इन पर आरूढ हो बाहर निकले ॥१५१-१५३॥


ततः श्रुत्वा परानीकनिःस्वनं सम्भ्रमान्वितः । सन्नह्यतेति सैन्यं स्वं वज्रजङ्घः समादिशत् ॥१५४॥

अर्थ: तदनन्तर परकीय सेनाका शब्द सुनकर संभ्रमसे सहित वज्रजङ्घने अपनी सेनाको आदेश दिया कि तैयार होओ ॥१५४॥


ततस्ते परसैन्यस्य श्रुत्वा निःस्वनमावृताः । स्वयमेव सुसन्नद्धास्तस्यान्तिकमुपागमन् ॥१५५॥

अर्थ: तदनन्तर पर-सेनाका शब्द सुनकर कवच आदिसे आवृत सब सैनिक तैयार हो वज्रजङ्घके पास स्वयं आ गये ॥१५५॥


कालानलप्रचण्डाङ्गवङ्गा नेपालवर्वराः । पौण्ड्रा मागधसौस्नाश्च पारशैलाः ससिंहलाः ॥१५६॥

कालिङ्गकाश्च राजानो रत्नाङ्काद्या महाबलाः । एकादशसहस्राणि युक्ता ह्युत्तमतेजसा ॥१५७॥

अर्थ: प्रलय कालकी अग्निके समान प्रचण्ड अङ्ग, वङ्ग, नेपाल, वर्वर, पौण्ड, मागध, सौस्न, पारशैल, सिंहक, कालिङ्गक तथा रत्नाङ्क आदि महाबलवान् एवं उत्तमतेजसे युक्त ग्यारह हजार राजा युद्धके लिए तैयार हुए ॥१५६-१५७॥


एवं तत्परमं सैन्यं परसैन्यकृताननम् । सङ्घट्टमुत्तमं प्राप्तं चलितं प्रचलायुधम् ॥१५८॥

अर्थ: इसप्रकार जिसने शत्रुसेनाकी ओर मुख किया था, तथा जिसमें शस्त्र चल रहे थे ऐसी वह चञ्चल उत्कृष्ट सेना उत्तम संघट्टको प्राप्त हुई अर्थात् दोनों सेनाओंमें तीव्र मुठभेड़ हुई ॥१५८॥


तयोः समागमो रौद्रो देवासुरकृताद्भुतः । बभूव सुमहाशब्दः क्षुब्धाकूपारयोरिव ॥१५९॥

अर्थ: उन दोनों सेनाओंमें ऐसा भयंकर समागम हुआ जो पहले हुए देव और असुरोंके समागमसे भी कहीं आश्चर्यकारी था तथा क्षोभको प्राप्त हुए दो समुद्रोंके समागमके समान महाशब्द कर रहा था ॥१५९॥


प्रहर प्रथमं क्षुद्र मुञ्चास्त्रं किमुपेक्षसे । प्रहन्तुं प्रथमं शस्त्रं न मे जातु प्रवर्तते ॥१६०॥

अर्थ: ‘अरे क्षुद्र ! पहले प्रहार कर, शस्त्र छोड़, क्यों उपेक्षा कर रहा है ? मेरा शस्त्र पहले प्रहार करनेके लिए कभी प्रवृत्त नहीं होता ॥१६०॥


प्रहृतं लघुना तेन विशदोऽभूद्भुजो मम । प्रहरस्व वपुर्गाढं दृढपीडितमुष्टिकः ॥१६१॥

अर्थ: अरे, उसने हलका प्रहार किये इससे मेरी भुजा स्वस्थ रही आई अर्थात् उसमें कुछ हुआ ही नहीं, जरा दृढ़ मुट्ठी कस कर शरीरपर जोरदार प्रहार कर ॥१६१॥


किञ्चिद् व्रज पुरोभागं सञ्चारो नास्ति सङ्गरे । सायकस्यैनमुज्झित्वा छुरिकां वा समाश्रय ॥१६२॥

अर्थ: कुछ सामने आ, युद्धमें वाणका संचार ठीक नहीं हो रहा है, अथवा फिर वाणको छोड़ छुरी उठा ॥१६२॥


किं वेपसे न हन्मि त्वां मुञ्च मार्गमयं परः । भटो युद्धमहाकण्डूचपलोऽग्रेऽवतिष्ठताम् ॥१६३॥

अर्थ: क्यों काँप रहा है ? मैं तुझे नहीं मारता, मार्ग छोड़, युद्धकी महाखाजसे चपल यह दूसरा प्रबल योद्धा सामने खड़ा हो ॥१६३॥


किं वृथा गर्जसि क्षुद्र न वीर्यं वाचि तिष्ठति । अयं ते चेष्टितेनैव करोमि रणपूजनम् ॥१६४॥

अर्थ: अरे क्षुद्र ! व्यर्थ क्यों गरज रहा है ? वचनमें शक्ति नहीं रहती, यह मैं तेरी चेष्टासे ही रणकी पूजा करता हूँ’ ॥१६४॥


एवमाद्या महारावा भटानां शौर्यशालिनाम् । निश्चेरुरतिगम्भीरा वदनेभ्यः समन्ततः ॥१६५॥

अर्थ: इन्हें आदि लेकर, पराक्रमसे सुशोभित योद्धाओंके मुखोंसे सब ओर अत्यन्त गम्भीर महाशब्द निकल रहे थे ॥१६५॥


भूगोचरनरेन्द्राणां यथायातः समन्ततः । नभश्चरनरेन्द्राणां तथैवात्यन्तसङ्कुलः ॥१६६॥

अर्थ: जिसप्रकार भूमिगोचरी राजाओंकी ओरसे भयंकर शब्द आ रहा था उसी तरह विद्याधर राजाओंकी ओरसे भी अत्यन्त महान् शब्द आ रहा था ॥१६६॥


लवणाङ्कुशयोः पक्षे स्थितो जनकनन्दनः । वीरः पवनवेगश्च मृगाङ्को विद्युदुज्ज्वलः ॥१६७॥

महासैन्यसमायुक्ता सुरछन्दादयस्तथा । महाविद्याधरेशानां महारणविशारदाः ॥१६८॥

अर्थ: भामण्डल, वीर पवनवेग, बिजलीके समान उज्ज्वल मृगाङ्क तथा महा विद्याधर राजाओंके प्रतिनिधि देवच्छन्द आदि जो कि बड़ी बड़ी सेनाओंसे युक्त तथा महायुद्धमें निपुण थे, लवणाङ्कुशके पक्षमें खड़े हुए ॥१६७-१६८॥


लवणाङ्कुशसम्भूतिं श्रुतवानथ तत्त्वतः । ऊर्ध्वखेचरसामन्तसङ्घट्टश्लथतां नयन् ॥१६९॥

यथा कर्तव्यविज्ञानप्रयोगात्यन्तकोविदः । वैदेहीसुतयोः पक्षं वायुपुत्रोऽप्यशिश्रियत् ॥१७०॥

अर्थ: अथानन्तर जब कर्तव्यके ज्ञान और प्रयोगमें अत्यन्त निपुण हनूमान्ने लवणाङ्कुशकी वास्तविक उत्पत्ति सुनी तब वह विद्याधर राजाओंके संघट्टको शिथिल करता हुआ लवणाङ्कुशके पक्ष में आ गया ॥१६९-१७०॥


लाङ्गूलपाणिना तेन निर्यता रामसैन्यतः । प्रभामण्डलवीरस्य चित्तमानन्दवत्कृतम् ॥१७१॥

अर्थ: लाङ्गूल नामक शस्त्रको हाथमें धारण कर रामकी सेनासे निकलते हुए हनूमान्ने भामण्डलका चित्त हर्षित कर दिया ॥१७१॥


विमानशिखरारूढां ततः संदृश्य जानकीम् । औदासीन्यं ययुः सर्वे विहायश्चरपार्थिवाः ॥१७२॥

अर्थ: तदनन्तर विमानके शिखरपर आरूढ जानकीको देखकर सब विद्याधर राजा उदासीनताको प्राप्त हो गये ॥१७२॥


कृताञ्जलिपुटाश्चैनां प्रणम्य पर[?]राः । तस्थुरावृत्य बिभ्राणा विस्मयं परमोन्नतम् ॥१७३॥

अर्थ: और हाथ जोड़ बड़े आदरसे उसे प्रणाम कर अत्यधिक आश्चर्यको धारण करते हुए उसे घेरकर खड़े हो गये ॥१७३॥


वित्रस्तहरिणीनेत्रा समुद्धृष्टतनूरुहा । वैदेही बलयोः सङ्गमालुलोके सवेपथुः ॥१७४॥

अर्थ: सीताने जब दोनों सेनाओंकी मुठभेड़ देखी तब उसके नेत्र भयभीत हरिणीके समान चञ्चल हो गये, उसके शरीरमें रोमाञ्च निकल आये और कँपकँपी छूटने लगी ॥१७४॥


क्षोभयन्तावथोदारं तत्सैन्यं प्रचलद्ध्वजम् । पद्मलक्ष्मीधरौ तेन प्रवृत्तौ लवणाङ्कुशौ ॥१७५॥

अर्थ: अथानन्तर चञ्चल ध्वजाओंसे युक्त उस विशालसेनाको क्षोभित करते हुए लवणाङ्कुश, जिस ओर राम लक्ष्मण थे उसी ओर बढ़े ॥१७५॥


मृगनागारिसंलक्ष्यध्वजयोरनयोः पुरः । स्थितौ कुमारवीरौ तौ प्रतिपक्षमुखं श्रितौ ॥१७६॥

अर्थ: इसतरह प्रतिपक्ष भावको प्राप्त हुए दोनों कुमार सिंह और गरुड़की ध्वजा धारण करनेवाले राम-लक्ष्मणके सामने आ डटे ॥१७६॥


आपातमात्रकेणैव रामदेवस्य सद्ध्वजम् । अनङ्गलवणश्चापं निचकर्त्त कृतायुधः ॥१७७॥

अर्थ: आते ही के साथ अनङ्गलवणने शस्त्र चलाकर रामदेवकी ध्वजा काट डाली और धनुष छेद दिया ॥१७७॥


विहस्य कार्मुकं यावत्सोऽन्यदादातुमुद्यतः । तावल्लवणवीरेण तरसा विरथीकृतः ॥१७८॥

अर्थ: हँसकर राम जब तक दूसरा धनुष लेनेके लिए उद्यत हुए तब तक वीर लवणने वेगसे उन्हें रथ रहित कर दिया ॥१७८॥


अथान्यं रथमारुह्य काकुत्स्थोऽलघुविक्रमः । अनङ्गलवणं क्रोधात्ससर्प भ्रुकुटीं वहन् ॥१७९॥

अर्थ: अथानन्तर प्रबल पराक्रमी राम, भौंह तानते हुए, दूसरे रथ पर सवार हो क्रोधवश अनङ्गलवणकी ओर चले ॥१७९॥


घर्मार्कदुर्निरीक्ष्याक्षः समुत्क्षिप्तशरासनः । चमरासुरनाथस्य वज्रीवासौ गतोऽन्तिकम् ॥१८०॥

अर्थ: ग्रीष्म कालके सूर्यके समान दुर्निरीक्ष्य नेत्रोंसे युक्त एवं धनुष उठाये हुए राम अनङ्गलवणके समीप उस प्रकार पहुँचे जिस प्रकार कि असुर कुमारोंके इन्द्र चमरेन्द्रके पास इन्द्र पहुँचता है ॥१८०॥


स चापि जानकीसूनुरुद्धृत्य सशरं धनुः । रणप्राघूर्णकं दातुं पद्मनाभमुपागमत् ॥१८१॥

अर्थ: इधर सीतासुत अनङ्गलवण भी बाण सहित धनुष उठाकर रणकी भेंट देनेके लिए रामके समीप गये ॥१८१॥


ततः परमभूद्युद्धं पद्मस्य लवणस्य च । परस्परं समुत्कृत्तशस्त्रसङ्घातकर्कशम् ॥१८२॥

अर्थ: तदनन्तर राम और लवणके बीच परस्पर कटे हुए शस्त्रोंके समूहसे कठिन परम युद्ध हुआ ॥१८२॥


महाहवो यथा जातः पद्मस्य लवणस्य च । अनुक्रमेण तेनैव लक्ष्मणस्याङ्कुशस्य च ॥१८३॥

अर्थ: इधर जिस प्रकार राम और लवणका महायुद्ध हो रहा था उधर उसी प्रकार लक्ष्मण और अङ्कुशका भी महायुद्ध हो रहा था ॥१८३॥


एवं द्वन्द्वमभूद्युद्धं स्वामिरागमुपेयुषाम् । सामन्तानामपि स्वस्ववीरशोभाभिलाषिणाम् ॥१८४॥

अर्थ: इसी प्रकार स्वामी के रागको प्राप्त तथा अपने अपने वीरोंकी शोभा चाहने वाले सामन्तोंमें भी द्वन्द्व-युद्ध हो रहा था ॥१८४॥


अश्ववृन्दं क्वचित्तुङ्गं तरङ्गकृतरङ्गणम् । निरुद्धं परचक्रेण घनं चक्रे रणाङ्गणम् ॥१८५॥

अर्थ: कहीं परचक्रसे रुका और तरङ्गोंके समान चञ्चल ऊँचे घोड़ोंका समूह रणाङ्गणको सघन कर रहा था - वहाँकी भीड़ बढ़ा रहा था ॥१८५॥


क्वचिद्विच्छिन्नसन्नाहं प्रतिपक्षं पुरःस्थितम् । निरीक्ष्य रणकण्डूलो निदधे मुखमन्यतः ॥१८६॥

अर्थ: कवच टूट गया था ऐसे सामने खड़े शत्रुको देख रणकी खाजसे युक्त योद्धा दूसरी ओर मुख कर रहा था ॥१८६॥


केचिन्नाथं समुत्सृज्य प्रविष्टाः परवाहिनीम् । स्वामिनाम समुच्चार्य निजघ्नुरभिलक्षितम् ॥१८७॥

अर्थ: कितने ही योद्धा स्वामीको छोड़ शत्रुकी सेनामें घुस पड़े और अपने स्वामीका नाम ले कर जो भी दिखे उसे मारने लगे ॥१८७॥


अनादृतनराः केचिद्गर्वशौण्डा महाभटाः । प्रक्षरद्दानधाराणां करिणामरितामिताः ॥१८८॥

अर्थ: तीव्र अहंकारसे भरे कितने ही महायोद्धा, मनुष्योंकी उपेक्षा कर मदस्रावी हाथियोंकी शत्रुताको प्राप्त हुए ॥१८८॥


दन्तशय्यां समाश्रित्य कश्चित्समददन्तिनः । रणनिद्रासुखं लेभे परमं भटसत्तमः ॥१८९॥

अर्थ: कोई एक उत्तम योद्धा मदोन्मत्त हाथीकी दन्तरूपी शय्या का आश्रय ले रणनिद्राके उत्तम सुखको प्राप्त हुआ अर्थात् हाथीके दांतोंसे घायल हो कर कोई योद्धा मरणको प्राप्त हुआ ॥१८९॥


कश्चिदभ्यायतोऽश्वस्य भग्नशस्त्रो महाभटः । अदत्त्वा पदवीं प्राणान् ददौ स करताडनम् ॥१९०॥

अर्थ: जिसका शस्त्र टूट गया था ऐसे किसी योद्धाने सामने आते हुए घोड़ेके लिए मार्ग तो नहीं दिया किन्तु हाथ ठोक कर प्राण दे दिये ॥१९०॥


प्रच्युतं प्रथमाघाताद्भटं कश्चित्त्रपान्वितः । भणन्तमपि नो भूयः प्रजहार महामनाः ॥१९१॥

अर्थ: कोई एक योधा प्रथम प्रहारमें ही गिर गया था इसलिए उसके बकने पर भी उदारचेता किसी महायोद्धाने लज्जित हो उस पर पुनः प्रहार नहीं किया ॥१९१॥


च्युतशस्त्रं क्वचिद्वीक्ष्य भटमच्युतमानसः । शस्त्रं दूरं परित्यज्य बाहुभ्यां योद्धुमुद्यतः ॥१९२॥

अर्थ: जिसका हृदय नहीं टूटा था ऐसा कोई योद्धा, सामनेके वीरको शस्त्र रहित देख, अपना भी शस्त्र फेंककर मात्र भुजाओंसे ही युद्ध करनेके लिए उद्यत हुआ था ॥१९२॥


दातारोऽपि प्रविख्याताः सदा समरवर्त्तिनः । प्राणानपि ददुर्वीरा न पुनः पृष्ठदर्शनम् ॥१९३॥

अर्थ: कितने ही वीरोंने सदाके सुप्रसिद्ध दानी हो कर भी युद्ध क्षेत्रमें आकर अपने प्राण तो दे दिये थे पर पीठके दर्शन किसीको नहीं दिये ॥१९३॥


असृक्कर्दमनिर्मग्नचक्रकृच्छ्रचलद्रथम् । तोत्रप्रतोदनोद्युक्तः त्वरितश्च न सारथिः ॥१९४॥

अर्थ: किसी सारथिका रथ रुधिरकी कीचड़में फँस जानेके कारण बड़ी कठिनाईसे चल रहा था इसलिए वह चाबुकसे ताड़ना देनेमें तत्पर होने पर भी शीघ्रताको प्राप्त नहीं हो रहा था ॥१९४॥


क्वणदश्वसमुद्व्यूढस्यन्दनोन्मुक्तचीत्कृतम् । तुरङ्गजवविक्षिप्तभटसीमन्तिताविलम् ॥१९५॥

अर्थ: इस प्रकार उन दोनों सेनाओं में वह महायुद्ध हुआ जिसमें कि शब्द करने वाले घोड़ोंके द्वारा खींचे गये रथ चीं चीं शब्द कर रहे थे, जो घोड़ोंके वेगसे उड़े हुए सामन्त भटोंसे व्याप्त था ॥१९५॥


निःक्रामद्रुधिरोद्गारसहितोरुभटस्वनम् । वेगवच्छस्त्रसम्पातजातवह्निकणोत्करम् ॥१९६॥

अर्थ: जिसमें महायोद्धाओंके शब्द निकलते हुए खूनके उद्गारसे सहित थे, जहाँ वेगशाली शस्त्रोंके पड़नेसे अग्निकणोंका समूह उत्पन्न हो रहा था ॥१९६॥


करिशूत्कृतसम्भूतसीकरासारजालकम् । करिदारितवक्षस्कभटसङ्कटभूतलम् ॥१९७॥

अर्थ: जहाँ हाथियोंके सूसू शब्दके साथ जलके छींटोंका समूह निकल रहा था, जहाँ हाथियोंके द्वारा विदीर्ण वक्षःस्थल वाले योद्धाओंसे भूतल व्याप्त था ॥१९७॥


पर्यस्तकरिसङ्रुद्धरणमार्गाकुलायतम् । नागमेघपरिश्च्योतन्मुक्ताफलमहोपलम् ॥१९८॥

अर्थ: जहाँ इधर-उधर पड़े हुए हाथियोंसे युद्धका मार्ग रुक जानेके कारण यातायातमें गड़बड़ी हो रही थी। जहाँ हाथी रूपी मेघोंसे मुक्ताफल रूपी महोपलों - बड़े बड़े ओलोंकी वर्षा हो रही थी, ॥१९८॥


मुक्तासारसमाघातविकटं कर्मरङ्गकम् । नागोच्छालितपुन्नागकृतखेचरसङ्गमम् ॥१९९॥

अर्थ: जो मोतियोंकी वर्षाके समाघातसे विकट था, नाना प्रकारके कर्मोंकी रङ्गभूमि था, जहाँ हाथियों के द्वारा उखाड़ कर ऊपर उछाले हुए पुंनागके वृक्ष, विद्याधरोंका संगम कर रहे थे ॥१९९॥


शिरःक्रीतयशोरत्नं मूर्च्छाजनितविश्रमम् । मरणप्राप्तनिर्वाणं बभूव रणमाकुलम् ॥२००॥

अर्थ: जहाँ शिरोंके द्वारा यशरूपी रत्न खरीदा गया था, जहाँ मूर्च्छासे विश्राम प्राप्त होता था, और मरणसे जहाँ निर्वाण मिलता था ॥२००॥


जीविततृष्णारहितं साधुस्वनजलधिलुब्धयौधेयम् । समरं समरसमासीन्महति लघिष्ठे च वीराणाम् ॥२०१॥

अर्थ: इस प्रकार वीरोंकी चाहे बड़ी टुकड़ी हो चाहे छोटी, सबमें वह युद्ध हुआ कि जो जीवनकी तृष्णासे रहित था, जिसमें योधाओंके समूह धन्य धन्य शब्दरूपी समुद्रके लोभी थे तथा जो समरससे सहित था - किसी भी पक्षकी जय पराजयसे रहित था ॥२०१॥


भक्तिः स्वामिनि परमा निष्क्रयदानं प्रचण्डरणकण्डूः । रवितेजसां भटानां जग्मुः सङ्ग्रामहेतुत्वम् ॥२०२॥

अर्थ: स्वामीमें अटूट भक्ति, जीविका प्राप्तिका बदला चुकाना और रणकी तेज खाज यही सब सूर्यके समान तेजस्वी योद्धाओंके संग्रामके कारणपनेको प्राप्त हुए थे ॥२०२॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते श्रीपद्मपुराणे लवणाङ्कुशसमेतयुद्धाभिधानं द्व्युत्तरशतं पर्व ॥१०२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लवणांकुश के युद्धका वर्णन करने वाला एक सौ दोवां पर्व समाप्त हुआ ॥१०२॥

१०३. त्र्युत्तरशतं पर्व (रामलवणांकुशसमागमाभिधानं)

अतो मगधराजेन्द्र भवावहितमानसः । निवेदयामि युद्धं ते विशेषकृतवर्त्तनम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधराजेन्द्र ! सावधान चित्त होओ अब मैं तेरे लिए युद्धका विशेष वर्णन करता हूँ ॥१॥


सव्येष्टा वज्रजङ्घोऽभूदनङ्गलवणाम्बुधेः । मदनांकुशनाथस्य पृथुः प्रथितविक्रमः ॥२॥

सुमित्रातनुजातस्य चन्द्रोदरनृपात्मजः । कृतान्तवक्त्रतिग्मांशुः पद्मनाभमरुत्वतः ॥३॥

अर्थ: अलङ्गलवण रूपी सागरका सारथि वज्रजङ्घ था, मदनाङ्कुशका प्रसिद्ध पराक्रमी राजा पृथु, लक्ष्मणका चन्द्रोदरका पुत्र विराधित और राम रूपी इन्द्रका सारथि कृतान्तवक्त्र रूपी सूर्य था ॥२-३॥


वज्रावर्त्तं समुद्धृत्य धनुरत्युद्धुरध्वनिः । पद्मनाभः कृतान्तास्यं जगौ गम्भीरभारतिः ॥४॥

अर्थ: विशाल गर्जना करने वाले रामने गम्भीर वाणी द्वारा वज्रावर्त नामक धनुष उठा कर कृतान्तवक्त्र सेनापतिसे कहा ॥४॥


कृतान्तवक्त्र वेगेन रथं प्रत्यरि वाहय । मोघीभवत्तनूभारः किमेवमलसायसे ॥५॥

अर्थ: कि हे कृतान्तवक्त्र! शत्रुकी ओर शीघ्र ही रथ बढ़ाओ । इस तरह शरीरके भारको शिथिल करते हुए क्यों अलसा रहे हो ? ॥५॥


सोऽवोचद्देव वीक्षस्व वाजिनो जर्जरीकृतान् । अमुना नरवीरेण सुनिशातैः शिलीमुखैः ॥६॥

अर्थ: यह सुन कृतान्तवक्त्रने कहा कि हे देव ! इस नर वीरके द्वारा अत्यन्त तीक्ष्ण वाणोंसे जर्जर हुए इन घोड़ोंको देखो ॥६॥


अमी निद्रामिव प्राप्ता देहविद्राणकारिणीम् । दूरं विकारनिर्मुक्ता जाता गलितरंहसः ॥७॥

अर्थ: वे शरीरको दूर करने वाली निद्राको ही मानो प्राप्त हो रहे हैं अथवा विकारसे निर्मुक्त हो वेग रहित हो रहे हैं ? ॥७॥


नैते चाटुशतान्युक्ता न हस्ततलताडिताः । वहन्त्यायतमङ्गं तु क्वणन्तः कुर्वते परम् ॥८॥

अर्थ: अब ये न तो सैकड़ों मीठे शब्द कहने पर और न हथेलियोंसे ताड़ित होने पर शरीरको लम्बा करते हैं - शीघ्रतासे चलते हैं किन्तु अत्यधिक शब्द करते हुए स्वयं ही लम्बा शरीर धारण कर रहे हैं ॥८॥


शोणं शोणितधाराभिः कुर्वाणा धरणीतलम् । अनुरागमिवोदारं भवते दर्शयन्त्यमी ॥९॥

अर्थ: ये रुधिर की धारासे पृथिवीतलको लाल लाल कर रहे हैं सो मानों आपके लिए अपना महान् अनुराग ही दिखला रहे हों ॥९॥


इमौ च पश्य मे बाहू शरैः कङ्कटभेदिभिः । समुत्फुल्लकदम्बस्रग्गुणसाम्यमुपागतौ ॥१०॥

अर्थ: और इधर देखो, ये मेरी भुजाएं कवचको भेदन करने वाले वाणोंसे फूले हुए कदम्ब पुष्पोंकी मालाके सादृश्यको प्राप्त हो रही हैं ॥१०॥


पद्मोऽवदन्ममाप्येवं कार्मुकं शिथिलायते । ज्ञायते कर्मनिर्मुक्तं चित्रार्पितशरासनम् ॥११॥

अर्थ: यह सुन रामने भी कहा कि इसी तरह मेरा भी धनुष शिथिल हो रहा है और चित्रलिखित धनुषकी तरह क्रिया शून्य हो रहा है ॥११॥


एतन्मुशलरत्नं च कार्येण परिवर्जितम् । सूर्यावर्त्तगुरूभूतं दोर्दण्डमुपविध्यति ॥१२॥

अर्थ: यह मुशल रत्न कार्यसे रहित हो गया है और सूर्यावर्त धनुषके कारण भारी हुए भुजदण्ड को पीड़ा पहुँचा रहा है ॥१२॥


दुर्वाररिपुनागेन्द्रसृणितां यच्च भूरिशः । गतं लाङ्गलरत्नं मे तदिदं विफलं स्थितम् ॥१३॥

अर्थ: जो दुर्वार शत्रु रूपी हाथियोंको वश करनेके लिए अनेकों बार अङ्कुशपनेको प्राप्त हुआ था ऐसा यह मेरा हल रत्न निष्फल हो गया है ॥१३॥


परपक्षपरिक्षोददक्षाणां पक्षरक्षिणाम् । अमोघानां महास्त्राणामीदृशी वर्त्तते गतिः ॥१४॥

अर्थ: शत्रुपक्षको नष्ट करने में समर्थ एवं अपने पक्षकी रक्षा करने वाले अमोघ महा शस्त्रोंकी भी ऐसी दशा हो रही है ॥१४॥


यथापराजिताजस्य वर्त्ततेऽनर्थकास्त्रता । तथा लक्ष्मीधरस्यापि मदनाङ्कुशगोचरे ॥१५॥

अर्थ: इधर लवणाङ्कुशके विषयमें जिस प्रकार रामके शस्त्र निरर्थक हो रहे थे उधर उसी प्रकार मदनाङ्कुशके विषयमें लक्ष्मणके शस्त्र भी निरर्थक हो रहे थे ॥१५॥


विज्ञातजातिसम्बन्धौ सापेक्षौ लवणाङ्कुशौ । युयुधातेऽनपेक्षौ तु निर्ज्ञातौ रामलक्ष्मणौ ॥१६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इधर लवणाङ्कुशको तो राम लक्ष्मणके साथ अपने जाति सम्बन्धका ज्ञान था अतः वे उनकी अपेक्षा रखते हुए युद्ध करते थे - अर्थात् उन्हें घातक चोट न लग जावे इसलिए बचा बचा कर युद्ध करते थे पर उधर राम लक्ष्मणको कुछ ज्ञान नही था इसलिए वे निरपेक्ष हो कर युद्ध कर रहे थे ॥१६॥


तथाप्यलं सदिव्यास्त्रो विषादपरिवर्जितः । प्रासचक्रशरासारं मुमुचे लक्ष्मणोऽङ्कुशे ॥१७॥

वज्रदण्डैः शरैर्वृष्टिं तामपाकिरदङ्कुशः । पद्मनाभविनिर्मुक्तामनङ्गलवणो यथा ॥१८॥

अर्थ: यद्यपि इस तरह लक्ष्मणके शस्त्र निरर्थक हो रहे थे तथापि वे दिव्यास्त्रसे सहित होनेके कारण विषादसे रहित थे । अबकी बार उन्होंने अङ्कुशके ऊपर भाले सामान्य चक्र तथा बाणोंकी जोरदार वर्षा की सो उसने वज्रदण्ड तथा बाणोंके द्वारा उस वर्षाको दूर कर दिया । इसी तरह अनंगलवणने भी रामके द्वारा छोड़ा अस्त्र-वृष्टिको दूर कर दिया था ॥१७-१८॥


उपवक्षस्ततः पद्मं प्रासेन लवणोऽक्षिणोत् । मदनाङ्कुशवीरश्च लक्ष्मणं नैपुणान्वितः ॥१९॥

अर्थ: तदनन्तर इधर लवणने वक्षःस्थलके समीप रामको प्रास नामा शस्त्रसे घायल किया और उधर चातुर्यसे युक्त वीर मदनांकुशने भी लक्ष्मणके ऊपर प्रहार किया ॥१९॥


लक्ष्मणं घूर्णमानाक्षिहृदयं वीक्ष्य सम्भ्रमी । विराधितो रथं चक्रे प्रतीपं कोशलां प्रति ॥२०॥

अर्थ: उसकी चोटसे जिसके नेत्र और हृदय घूमने लगे थे ऐसे लक्ष्मणको देख विराधितने घबड़ा कर रथ उलटा अयोध्याकी ओर फेर दिया ॥२०॥


ततः संज्ञां परिप्राप्य रथं दृष्ट्वाऽन्यतः स्थितम् । जगाद लक्ष्मणः कोपकपिलीकृतलोचनः ॥२१॥

भो विराधित सद्बुद्धे किमिदं भवता कृतम् । रथं निवर्त्तय क्षिप्रं रणे पृष्ठं न दीयते ॥२२॥

अर्थ: तदनन्तर चेतना प्राप्त होने पर जब लक्ष्मणने रथको दूसरी ओर देखा तब लक्ष्मणने क्रोधसे लाल लाल नेत्र करते हुए कहा कि हे बुद्धिमन् ! विराधित ! तुमने यह क्या किया ? शीघ्र ही रथ लौटाओ । क्या तुम नहीं जानते कि युद्धमें पीठ नहीं दी जाती है ? ॥२१-२२॥


पुङ्खिपूरितदेहस्य स्थितस्याभिमुखं रिपोः । शूरस्य मरणं श्लाघ्यं नेदं कर्म जुगुप्सितम् ॥२३॥

अर्थ: बाणोंसे जिसका शरीर व्याप्त है ऐसे शूर वीरका शत्रुके सन्मुख खड़े खड़े मर जाना अच्छा है पर यह घृणित कार्य अच्छा नहीं है ॥२३॥


सुरमानुषमध्येऽस्मिन् परामप्यापदं श्रिताः । कथं भजन्ति कातर्यं स्थिताः पुरुषमूर्द्धनि ॥२४॥

अर्थ: जो मनुष्य, पुरुषोंके मस्तक पर स्थित हैं अर्थात् उनमें प्रधान हैं वे देवों और मनुष्योंके बीच परम आपत्तिको प्राप्त हो कर भी कातरताको कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? ॥२४॥


पुत्रो दशरथस्याहं भ्राता लाङ्गललक्ष्मणः । नारायणः क्षितौ ख्यातस्तस्येदं सदृशं कथम् ॥२५॥

अर्थ: मैं दशरथका पुत्र, रामका भाई और पृथिवी पर नारायण नामसे प्रसिद्ध हूँ उसके लिए यह काम कैसे योग्य हो सकता है ? ॥२५॥


त्वरितं गदितेनैवं रथस्तेन निवर्त्तितः । पुनर्युद्धमभूद्घोरं प्रतीपागतसैनिकम् ॥२६॥

अर्थ: इस प्रकार कह कर लक्ष्मणने शीघ्र ही पुनः रथ लौटा दिया और पुनः जिसमें सैनिक लौट कर आये थे ऐसा भयंकर युद्ध हुआ ॥२६॥


लक्ष्मणेन ततः कोपात्सङ्ग्रामान्तचिकीर्षया । अमोघमुद्धृतं चक्रं देवासुरभयङ्करम् ॥२७॥

अर्थ: तदनन्तर कोप वश लक्ष्मणने संग्रामका अन्त करनेकी इच्छासे देवों और असुरोंको भी भय उत्पन्न करने वाला अमोघ चक्ररत्न उठाया ॥२७॥


ज्वालावलीपरीतं तद्दुःप्रेक्ष्यं पूषसन्निभम् । नारायणेन दीप्तेन प्रहितं हन्तुमङ्कुशम् ॥२८॥

अर्थ: और ज्वालावलीसे व्याप्त, दुष्प्रेक्ष्य एवं सूर्यके सदृश वह चक्ररत्न क्रोधसे देदीप्यमान लक्ष्मणने अंकुशको मारनेके लिए चला दिया ॥२८॥


अङ्कुशस्यान्तिकं गत्वा चक्रं विगलितप्रभम् । । निवृत्य लक्ष्मणस्यैव पुनः पाणितलं गतम् ॥२९॥

अर्थ: परन्तु वह चक्र अंकुशके समीप जा कर निष्प्रभ हो गया और लौट कर पुनः लक्ष्मणके ही हस्ततलमें आ गया ॥२९॥


क्षिप्तं क्षिप्तं सुकोपेन लक्ष्मणेन त्वरावता । चक्रमन्तिकमस्यैव प्रवियाति पुनः पुनः ॥३०॥

अर्थ: तीव्र क्रोधके कारण वेगसे युक्त लक्ष्मणने कई बार वह चक्र अंकुशके समीप फेंका परन्तु वह बार बार लक्ष्मणके ही समीप लौट जाता था ॥३०॥


अथाङ्कुशकुमारेण बिभ्रता विभ्रमं परम् । धनुर्दण्डः सुधीरेण भ्रामितो रणशालिना ॥३१॥

तथाभूतं समालोक्य सर्वेषां रणमीयुषाम् । विस्मयव्याप्तचित्तानां शेमुषीयमजायत ॥३२॥

अयं परमसत्त्वोऽसौ जातश्चक्रधरोऽधुना । भ्रमता यस्य चक्रेण संशये सर्वमाहितम् ॥३३॥

अर्थ: अथानन्तर परम विभ्रमको धारण करने वाले रणशाली, सुधीर अंकुश कुमारने अपने धनुष दण्डको उस तरह घुमाया कि उसे वैसा देख रणमें जितने लोग उपस्थित थे उन सबका चित्त आश्चर्यसे व्याप्त हो गया तथा सबके यह बुद्धि उत्पन्न हुई कि अब यह परम शक्तिशाली दूसरा चक्रधर नारायण उत्पन्न हुआ है जिसके कि घूमते हुए चक्रने सबको संशयमें डाल दिया है ॥३१-३३॥


किमिदं स्थिरमाहोस्विद् भ्रमणं समुपाश्रितम् । ननु न स्थिरमेतद्धि श्रूयतेऽस्यातिगर्जितम् ॥३४॥

अर्थ: क्या यह चक्र स्थिर है अथवा भ्रमणको प्राप्त है ? अत्यधिक गर्जना सुनाई पड़ रही है ॥३४॥


अलीकं लक्षणैः ख्यातं नूनं कोटिशिलादिभिः । यतस्तदिहमुत्पन्नं चक्रमन्यस्य साम्प्रतम् ॥३५॥

अर्थ: चक्ररत्न कोटिशिला आदि लक्षणोंसे प्रसिद्ध है सो यह मिथ्या जान पड़ता है क्योंकि इस समय यह चक्र यहाँ दूसरेको ही उत्पन्न हो गया है ॥३५॥


कथं वा मुनिवाक्यानामन्यथात्वं प्रजायते । किं भवन्ति वृथोक्तानि जिनेन्द्रस्यापि शासने ॥३६॥

अर्थ: अथवा मुनियोंके वचनोंमें अन्यथापन कैसे हो सकता है ? क्या जिनेन्द्र भगवान्के भी शासनमें कही हुई बातें व्यर्थ होती हैं ? ॥३६॥


भ्रमितश्चापदण्डोऽयं चक्रमेतदिति स्वनः । समाकुलः समुत्तस्थौ वक्त्रेभ्योऽस्तमनीषिणाम् ॥३७॥

अर्थ: यद्यपि वह धनुष दण्ड घुमाया गया था तथापि जिनकी बुद्धि मारी गई थी ऐसे लोगोंके मुखसे व्याकुलतासे भरा हुआ यही शब्द निकल रहा था कि यह चक्ररत्न है ॥३७॥


तावल्लक्ष्मणवीरोऽपि परमं सत्त्वमुद्वहन् । जगाद नूनमेतौ तावुदितौ बलचक्रिणौ ॥३८॥

अर्थ: उसी समय परम शक्तिको धारण करनेवाले लक्ष्मणने भी कहा कि जान पड़ता है ये दोनों बलभद्र और नारायण उत्पन्न हुए ॥३८॥


इति व्रीडापरिष्वक्तं निष्क्रियं वीक्ष्य लक्ष्मणम् । समीपं तस्य सिद्धार्थो गत्वा नारदसम्मतः ॥३९॥

जगौ नारायणो देव त्वमेवात्र कुतोऽन्यथा । जिनेन्द्रशासनोक्तं हि निष्कम्पं मन्दरादपि ॥४०॥

अर्थ: अथानन्तर लक्ष्मणको लज्जित और निश्चेष्ट देख नारदकी संमतिसे सिद्धार्थ लक्ष्मणके पास जा कर बोला कि हे देव ! नारायण तो तुम्हीं हो, जिनशासनमें कही बात अन्यथा कैसे हो सकती है ? वह तो मेरु पर्वतसे भी कहीं अधिक निष्कम्प है ॥३९-४०॥


जानक्यास्तनयावेतौ कुमारौ लवणाङ्कुशौ । ययोर्गर्भस्थयोरासीदसौ विरहिता वने ॥४१॥

अर्थ: ये दोनों कुमार जानकीके लवणाङ्कुश नामक वे पुत्र हैं जिनके कि गर्भमें रहते हुए वह वनमें छोड़ दी गई थी ॥४१॥


परिज्ञातमितः पश्चादापप्तद् दुःखसागरे । भवानिति न रत्नानामत्र जाता कृतार्थता ॥४२॥

अर्थ: मुझे यह ज्ञात है कि आप सीता-परित्यागके पश्चात् दुःख रूपी सागरमें गिर गये थे अर्थात् अपने सीता परित्यागका बहुत दुःख अनुभव किया था और आपके दुखी रहते रत्नोंकी सार्थकता नहीं थी ॥४२॥


लवणाङ्कुशमाहात्म्यं ततो ज्ञात्वा समन्ततः । मुमोच कवचं शस्त्रं लक्ष्मणः शोककर्षितः ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर सिद्धार्थसे लवणाङ्कुशका माहात्म्य जान कर शोकसे कृश लक्ष्मणने कवच और शस्त्र छोड़ दिये ॥४३॥


श्रुत्वा तमथ वृत्तान्तं विषादभरपीडितः । परित्यक्तधनुर्वर्मा घूर्णमाननिरीक्षणः ॥४४॥

स्यन्दनात्तरसोत्तीर्णो दुःखस्मरणसङ्गतः । पर्यस्तक्ष्मातले पद्मो मूर्छामीलितलोचनः ॥४५॥

अर्थ: अथानन्तर इस वृत्तान्तको सुन जो विषादके भारसे पीड़ित थे, जिन्होंने धनुष और कवच छोड़ दिये थे, जिनके नेत्र घूम रहे थे, जिन्हें पिछले दुःखका स्मरण हो आया था, जो बड़े वेगसे रथसे उतर पड़े थे तथा मूर्च्छाके कारण जिनके नेत्र निमीलित हो गये थे ऐसे राम पृथिवीतल पर गिर पड़े ॥४४-४५॥


चन्दनोदकसिक्तश्च स्पष्टां सम्प्राप्य चेतनाम् । स्नेहाकुलमना यातः पुत्रयोरन्तिकं द्रुतम् ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर चन्दन मिश्रित जलके सींचनेसे जब सचेत हुए तब स्नेहसे आकुल हृदय होते हुए शीघ्र ही पुत्रोंके समीप चले ॥४६॥


ततो रथात्समुत्तीर्य तौ युक्तकरकुड्मलौ । तातस्यानमतां पादौ शिरसा स्नेहसङ्गतौ ॥४७॥

अर्थ: तदनन्तर स्नेहसे भरे हुए दोनों पुत्रोंने रथसे उतर कर हाथ जोड़ शिरसे पिताके चरणोंको नमस्कार किया ॥४७॥


ततः पुत्रौ परिष्वज्य स्नेहद्रवितमानसः । विलापमकरोत्पद्मो वाष्पदुर्दिनिताननः ॥४८॥

अर्थ: तत्पश्चात् जिनका हृदय स्नेहसे द्रवीभूत हो गया था और जिनका मुख आंसुओंसे दुर्दिनके समान जान पड़ता था ऐसे राम दोनों पुत्रोंका आलिङ्गन कर विलाप करने लगे ॥४८॥


हा मया तनयौ कष्टं गर्भस्थौ मन्दबुद्धिना । निर्दोषौ भीषणेऽरण्ये विमुक्तौ सह सीतया ॥४९॥

अर्थ: वे कहने लगे कि हाय पुत्रो ! जब तुम गर्भमें स्थित थे तभी मुझ मन्दबुद्धिने तुम दोनों निर्दोष बालकोंको सीताके साथ भीषण वनमें छोड़ दिया था ॥४९॥


हा वत्सौ विपुलैः पुण्यैर्मयाऽपि कृतसम्भवौ । उदरस्थौ कथं प्राप्तौ व्यसनं परमं वने ॥५०॥

अर्थ: हाय पुत्रो ! बड़े पुण्यके कारण मुझसे जन्म लेकर भी तुम दोनोंने उदरस्थ अवस्थामें वनमें परम दुःख कैसे प्राप्त किया ? ॥५०॥


हा सुतौ वज्रजङ्घोऽयं वने चेत्तत्र नो भवेत् । पश्येयं वा तदा वक्त्रपूर्णचन्द्रमिमं कुतः ॥५१॥

अर्थ: हाय पुत्रो ! यदि उस समय उस वनमें यह वज्रजङ्घ नहीं होता तो तुम्हारा यह मुखरूपी पूर्ण चन्द्रमा किस प्रकार देख पाता ? ॥५१॥


हा शावकाविमैरस्त्रैरमोघैर्निहतौ न यत् । तत्सुरैः पालितौ यद्वा सुकृतैः परमोदयैः ॥५२॥

अर्थ: हाय पुत्रो ! जो तुम इन अमोघ शस्त्रोंसे नहीं हने गये हो सो जान पड़ता है कि देवोंने अथवा परम अभ्युदयसे युक्त पुण्यने तुम्हारी रक्षा की है ॥५२॥


हा वत्सौ विशिखैर्विद्धौ पतितौ सङ्युगक्षितौ । भवन्तौ जानकी वीक्ष्य किं कुर्यादिति वेद्मि न ॥५३॥

अर्थ: हाय पुत्रो ! बाणोंसे विधे और युद्धभूमिमें पड़े तुम दोनोंको देखकर जानकी क्या करती यह मैं नहीं जानता ॥५३॥


निर्वासनकृतं दुःखमितरैरपि दुःसहम् । भवद्भ्यां सा सुपुत्राभ्यां त्याजिता गुणशालिनी ॥५४॥

अर्थ: निर्वासन-परित्यागका दुःख तो अन्य मनुष्योंको भी दुःसह होता है फिर आप जैसे सुपुत्रोंके द्वारा छोड़ी गुणशालिनी सीताकी क्या दशा होती ? ॥५४॥


भवतोरन्यथाभावं प्रतिपद्य सुजातयोः । वेद्मि जीवेत् ध्रुवं नेति जानकी शोकविह्वला ॥५५॥

अर्थ: आप दोनों पुत्रोंका मरण जान शोकसे विह्वल सीता निश्चित ही जीवित नहीं रहती ॥५५॥


लक्ष्मणोऽपि सवाष्पाक्षः सम्भ्रान्तः शोकविह्वलः । स्नेहनिर्भरमालिङ्गद् विनयप्रणताविमौ ॥५६॥

अर्थ: जिनके नेत्र अश्रुओंसे पूर्ण थे, तथा जो संभ्रान्त हो शोकसे विह्वल हो रहे थे ऐसे लक्ष्मणने भी विनयसे नम्रीभूत दोनों पुत्रोंका बड़े स्नेहके साथ आलिङ्गन किया ॥५६॥


शत्रुघ्नाद्या महीपालाः श्रुत्वा वृत्तान्तमीदृशम् । तमुद्देशं गताः सर्वे प्राप्ताः प्रीतिमनुत्तमाम् ॥५७॥

अर्थ: शत्रुघ्न आदि राजा भी इस वृत्तान्तको सुन उस स्थानपर गये और सभी उत्तम आनन्दको प्राप्त हुए ॥५७॥


ततः समागमो जातः सेनयोरुभयोरपि । स्वामिनोः सङ्गमे जाते सुखविस्मयपूर्णयोः ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर जब दोनों सेनाओंके स्वामी समागम होनेपर सुख और आश्चर्यसे पूर्ण हो गये तब दोनों सेनाओंका परस्पर समागम हुआ ॥५८॥


सीताऽपि पुत्रमाहात्म्यं दृष्ट्वा सङ्गममेव च । पौण्डरीकं विमानेन प्रतीतहृदयाऽगमत् ॥५९॥

अर्थ: सीता भी पुत्रोंका माहात्म्य तथा समागम देख निश्चित हृदय हो विमान द्वारा पौण्डरीकपुर वापिस लौट गई ॥५९॥


अवतीर्य ततो व्योम्नः सम्भ्रमी जनकात्मजः । स्वस्रीयौ निर्व्रणौ पश्यन्नालिलिङ्ग सबाष्पदृक् ॥६०॥

अर्थ: तदनन्तर संभ्रमसे भरे भामण्डलने आकाशसे उतर कर घाव रहित दोनों भानेजोंको साश्रुदृष्टिसे देखते हुए उनका आलिङ्गन किया ॥६०॥


लाङ्गूलपाणिरप्येवं प्राप्तः प्रीतिपरायणः । आलिङ्गति स्म तौ साधु जातमित्युच्चरन्मुहुः ॥६१॥

अर्थ: प्रीति प्रकट करनेमें तत्पर हनूमानने भी ‘बहुत अच्छा हुआ’ इस शब्दका बार-बार उच्चारण कर उन दोनोंका आलिङ्गन किया ॥६१॥


श्रीविराधितसुग्रीवावेवं प्राप्तौ सुसङ्गमम् । नृपा विभीषणाद्याश्च सुसम्भाषणतत्पराः ॥६२॥

अर्थ: विराधित तथा सुग्रीव भी इसी तरह सत्समागमको प्राप्त हुए और विभीषण आदि राजा भी कुमारोंसे वार्तालाप करनेमें तत्पर हुए ॥६२॥


अथ भूव्योमचाराणां सुराणामिव सङ्कुलः । जातः समागमोऽत्यन्तमहानन्दसमुद्भवः ॥६३॥

अर्थ: अथानन्तर देवोंके समान भूमिगोचरियों तथा विद्याधरोंका वह समागम अत्यधिक महान् आनन्दका कारण हुआ ॥६३॥


परिप्राप्य परं कान्तं पद्मः पुत्रसमागमम् । बभार परमां लक्ष्मीं धृतिनिर्भरमानसः ॥६४॥

अर्थ: अत्यन्त सुन्दर पुत्रोंका समागम पाकर जिनका हृदय धैर्यसे भर गया था ऐसे रामने उत्कृष्ट लक्ष्मी धारण की ॥६४॥


मेने सुपुत्रलम्भं च भुवनत्रयराज्यतः । सुदूरमधिकं रम्यं भावं कमपि संश्रितः ॥६५॥

अर्थ: किसी अनिर्वचनीय भावको प्राप्त हुए श्रीरामने उन सुपुत्रोंके लाभको तीनलोकके राज्यसे भी कहीं अधिक सुन्दर माना ॥६५॥


विद्याधर्यः समानन्दं ननृतुर्गगनाङ्गणे । भूगोचरस्त्रियो भूमौ समुन्मत्तजगन्निभम् ॥६६॥

अर्थ: विद्याधरोंकी स्त्रियाँ बड़े हर्षके साथ आकाशरूपी आँगनमें और भूमिगोचरियोंकी स्त्रियाँ उन्मत्त संसारकी नांई पृथ्वीपर नृत्य कर रही थीं ॥६६॥


परं कृतार्थमात्मानं मेने नारायणस्तथा । जितं च भुवनं कृत्स्नं प्रमोदोत्फुल्ललोचनः ॥६७॥

अर्थ: हर्षसे जिनके नेत्र फूल रहे थे ऐसे नारायणने अपने आपको कृतकृत्य माना और समस्त संसारको जीता हुआ समझा ॥६७॥


सगरोऽहमिमौ तौ मे वीरभीमभगीरथौ । इति बुद्ध्या कृतौपम्यो दधार परमद्युतिम् ॥६८॥

अर्थ: मैं सगर हूँ और ये दोनों वीर भीम तथा भगीरथ हैं इस प्रकार बुद्धिसे उपमाको करते हुए लक्ष्मण परम दीप्तिको धारण कर रहे थे ॥६८॥


पद्मः प्रीतिं परां बिभ्रद्वज्रजङ्घमपूजयत् । भामण्डलसमस्त्वं मे सुचेता इति चावदत् ॥६९॥

अर्थ: परमप्रीतिको धारण करते हुए रामने वज्रजंघका खूब सम्मान किया और कहा कि सुन्दर हृदयसे युक्त तुम मेरे लिए भामण्डलके समान हो ॥६९॥


ततः पुरैव रम्यासौ पुनः स्वर्गसमा कृता । साकेता नगरी भूयः कृता परमसुन्दरी ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर वह अयोध्या नगरी स्वर्गके समान तो पहले ही की जा चुकी थी उस समय और भी अधिक सुन्दर की गई थी ॥७०॥


रम्या या स्त्रीस्वभावेन कलाज्ञानविशेषतः । आचारमात्रतस्तस्या क्रियते भूषणादरः ॥७१॥

अर्थ: जो स्त्री कला और ज्ञानकी विशेषतासे स्वभावतः सुन्दर है उसका आभूषण सम्बन्धी आदर पद्धति मात्रसे किया जाता है अर्थात् वह पद्धति मात्रसे आभूषण धारण करती है ॥७१॥


ततो गजघटापृष्ठे स्थितं सूर्यसमप्रभम् । आरूढः पुष्पकं रामः सपुत्रो भास्करो यथा ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर जो गजघटाके पृष्ठ पर स्थित सूर्यके समान कान्तिसम्पन्न था ऐसे पुष्पक विमान पर राम अपने पुत्रों सहित आरूढ हो सूर्यके समान सुशोभित होने लगे ॥७२॥


नारायणोऽपि तत्रैव स्थितो रेजे स्वलङ्कृतः । विद्युत्वाँश्च महामेघः सुमेरोः शिखरे यथा ॥७३॥

अर्थ: जिस प्रकार बिजलीसे सहित महामेघ, सुमेरुके शिखर पर आरूढ होता है उसी प्रकार उत्तम अलंकारोंसे सहित लक्ष्मण भी उसी पुष्पक विमान पर आरूढ हुए ॥७३॥


बाह्योद्यानानि चैत्यानि प्राकारं च ध्वजाकुलम् । पश्यन्तो विविधैर्यानैः प्रस्थितास्ते शनैः शनैः ॥७४॥

अर्थ: इस प्रकार वे सब नगरीके बाहरके उद्यान, मन्दिर और ध्वजाओंसे व्याप्त कोटको देखते हुए नानाप्रकारके वाहनोंसे धीरे-धीरे चले ॥७४॥


त्रिप्रस्रुतद्विपाश्वीयरथपादातसङ्कुलाः । अभवन्विशिखाश्चापध्वजछत्रान्धकारिताः ॥७५॥

अर्थ: जिनके तीन स्थानोंसे मद झर रहा था ऐसे हाथी, घोड़ोंके समूह, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे व्याप्त नगरके मार्ग, धनुष, ध्वजा और छत्रोंके द्वारा अन्धकार युक्त हो रहे थे ॥७५॥


वरसीमन्तिनोवृन्दैर्गवाक्षाः परिपूरिताः । महाकुतूहलाकीर्णैर्लवणाङ्कुशदर्शने ॥७६॥

अर्थ: महलोंके झरोखे, लवणांकुशको देखनेके लिए महा कौतूहलसे युक्त उत्तम स्त्रियोंके समूहसे परिपूर्ण थे ॥७६॥


नयनाञ्जलिभिः पातुं सुन्दर्यो लवणाङ्कुशौ । प्रवृत्ताः न पुनः प्रापुस्तृप्तिमुत्तानमानसाः ॥७७॥

अर्थ: नयन रूपी अञ्जलियोंके द्वारा लवणाङ्कुशका पान करनेके लिए प्रवृत्त उदारहृदया स्त्रियाँ संतोषको प्राप्त नहीं हो रहीं थीं ॥७७॥


तदेकगतचित्तानां पश्यन्तीनां सुयोषिताम् । महासङ्घट्टतो भ्रष्टं न ज्ञातं हारकुण्डलम् ॥७८॥

अर्थ: उन्हीं एकमें जिनका चित्त लग रहा था ऐसी देखने वाली स्त्रियोंके पारस्परिक धक्का धूमीके कारण हार और कुण्डल टूट कर गिर गये थे पर उन्हें पता भी नहीं चल सका था ॥७८॥


मातर्मनागितो वक्त्रं कुरु मे किन्न कौतुकम् । आत्मम्भरित्वमेतत्ते कियदच्छिन्नकौतुके ॥७९॥

अर्थ: हे मातः ! जरा मुख यहाँसे दूर हटा, क्या मुझे कौतुक नहीं है ? हे अखण्डकौतुके ! तेरी यह स्वार्थपरता कितनी है ? ॥७९॥


विनतं कुरु मूर्धानं सखि किञ्चित्प्रसादतः । उन्नद्धाऽसि किमित्येवं धम्मिल्लकमितो नय ॥८०॥

अर्थ: हे सखि ! प्रसन्न होकर मस्तक कुछ नीचा कर लो, इतनी तनी क्यों खड़ी हो । यहाँसे चोटीको हटा लो ॥८०॥


किमेव परमप्राणे तुदसि क्षिप्तमानसे । पुरः पश्यसि किं नेमां पीडितां भर्तृदारिकाम् ॥८१॥

अर्थ: हे प्राणहीने ! हे क्षिप्तहृदये ! इस तरह दूसरेको क्यों पीड़ित कर रही है ? क्या आगे इस पीड़ित लड़कीको नहीं देख रही है ? ॥८१॥


मनागवसृता तिष्ठ पतितास्मि गताऽसि किम् । निश्चेतनत्वमेवं त्वं किं कुमारं न वीक्षसे ॥८२॥

अर्थ: जरा हटकर खड़ी होओ, मैं गिर पड़ी हूँ, इस तरह तू क्या निश्चेतनताको प्राप्त हो रही है ? अरे कुमारको क्यों नहीं देखती है ? ॥८२॥


हा मातः कीदृशी योषिद्यदि पश्यामि तेऽत्र किम् । इमां मे प्रेरिकां कस्मात्वं वारयसि दुर्बले ॥८३॥

अर्थ: हाय मातः ! कैसी स्त्री है ? यदि मैं देखती हूँ तो तुझे इससे क्या प्रयोजन ? हे दुर्बले ! मेरी इस प्रेरणा देनेवालीको क्यों मना करती है ? ॥८३॥


एतौ तावदर्द्धचन्द्राभललाटौ लवणाङ्कुशौ । यानेतौ रामदेवस्य कुमारौ पार्श्वयोः स्थितौ ॥८४॥

अर्थ: जो ये दो कुमार श्रीरामके दोनों ओर बैठे हैं ये ही अर्धचन्द्रमाके समान ललाटको धारण करनेवाले लवण और अंकुश हैं ॥८४॥


अनङ्गलवणः कोऽत्र कतरो मदनाङ्कुशः । अहो परममेतौ हि तुल्याकारावुभावपि ॥८५॥

अर्थ: इनमें अनंग लवण कौन है और मदनांकुश कौन है ? अहो ! ये दोनों ही कुमार अत्यन्त सदृश आकारके धारक हैं ॥८५॥


महारजतरागाक्तं वारवाणं दधाति यः । लवणोऽयं शुकच्छायवस्त्रोऽसावङ्कुशो भवेत् ॥८६॥

अर्थ: जो यह महारजतके रंगसे रँगे - लालरंगके कवचको धारण करता है वह लवण है और जो तोताके पङ्खके समान हरे रंगके वस्त्र पहने है वह अंकुश है ॥८६॥


अहो पुण्यवती सीता यस्याः सुतनयाविमौ । अहो धन्यतमा सा स्त्री यानयो रमणी भवेत् ॥८७॥

अर्थ: अहो ! सीता बड़ी पुण्यवती है जिसके कि ये दोनों उत्तम पुत्र हैं। अहो ! वह स्त्री अत्यन्त धन्य है जो कि इनकी स्त्री होगी ॥८७॥


एवमाद्याः कथास्तत्र मनःश्रोत्रमलिम्लुचाः । प्रवृत्ताः परमस्त्रीणां तदेकगतचक्षुषाम् ॥८८॥

अर्थ: इस प्रकार उन्हीं एकमें जिनके नेत्र लग रहे थे ऐसी उत्तमोत्तम स्त्रियोंके बीच मन और कानोंको हरण करनेवाली अनेक कथाएँ चल रही थीं ॥८८॥


कपोलमतिसङ्घट्टात्कुण्डलोरगदंष्ट्रया । न विवेद तदा काचिद् विक्षतं तद्गतात्मिका ॥८९॥

अर्थ: उनमें जिसका चित्त लग रहा था ऐसी किसी स्त्रीने उस समय अत्यधिक धक्काधूमीके कारण कुण्डल रूपी साँपकी दाँढ़से विमान-घायल हुए अपने कपोलको नहीं जानती थी ॥८९॥


अन्यनारीभुजोत्पीडात्कस्याश्चित्सकवाटके । कञ्चुकेऽभ्युन्नतो रेजे स्तनांशः सघनेन्दुवत् ॥९०॥

अर्थ: अन्य स्त्रीकी भुजाके उत्पीड़नसे बन्द चोलीके भीतर उठा हुआ किसीका स्तन मेघ सहित चन्द्रमाके सुशोभित हो रहा था ॥९०॥


न विवेद च्युतां काञ्चीं काचिच्चिक्कणिनीमपि । प्रत्यागमनकाले तु सन्दिता स्खलिताऽभवत् ॥९१॥

अर्थ: किसी एक स्त्रीकी मेखला शब्द करती हुई नीचे गिर गई फिर भी उसे पता नहीं चला किन्तु लौटते समय उसी करधनीसे पैर फँस जानेके कारण वह गिर पड़ी ॥९१॥


धम्मिल्लमकरीदंष्ट्राकोटिस्फाटितमंशुकम् । महत्तरिकया काचिद्दृष्टैवत्परिभाषिता ॥९२॥

अर्थ: किसी स्त्रीकी चोटीमें लगी मकरीकी डाँढ़से फटे हुए वस्त्रको देखकर कोई बड़ी बूढ़ी स्त्री किसीसे कुछ कर रही थी ॥९२॥


विभ्रंशिमनसोऽन्यस्य वपुषि श्लथतां गते । विस्रस्तबाहुलतिकावदनात्कटकोऽपतत् ॥९३॥

अर्थ: जिसका मन ढीला हो रहा था ऐसे किसी दूसरे मनुष्यके शरीरके शिथिलताको प्राप्त करने पर उसकी नीचेकी ओर लटकती हुई बाहुरूपी लताके अग्रभागसे कड़ा नीचे गिर गया ॥९३॥


कस्याश्चिदन्यवनिताकर्णाभरणसङ्गतः । विच्छिन्नपतितो हारः कुसुमाञ्जलितां गतः ॥९४॥

अर्थ: किसी एक स्त्रीके कर्णाभरणमें उलझा हुआ हार टूटकर गिर गया और ऐसा जान पड़ने लगा मानो फूलोंकी अञ्जलि ही बिखेर दी गई हो ॥९४॥


बभूवुर्दृष्टयस्तासां निमेषपरिवर्जिताः । गतयोरपि कासाञ्चित्तयोर्दूरं तथा स्थिताः ॥९५॥

अर्थ: उन दोनों कुमारोंको देखकर किन्हीं स्त्रियोंके नेत्र निर्निमेष हो गये और उनके दूर चले जाने पर भी वैसे ही निर्निमेष रहे आये ॥९५॥


इति वरभवनाद्रिस्त्रीलतामुक्तपुष्पप्रकरगलितधूलीधूसराकाशदेशाः । परमविभवभाजो भूभुजो राघवाद्याः प्रविविशुरतिरम्याः मन्दिरं मङ्गलाढ्यम् ॥९६॥

अर्थ: इस प्रकार उत्तमोत्तम भवनरूपी पर्वतों पर विद्यमान स्त्री रूपी लताओंके द्वारा छोड़े हुए फूलोंके समूहसे निकली धूलीसे जिन्होंने आकाशके प्रदेशोंको धूसर-वर्ण कर दिया था तथा जो परम वैभवको प्राप्त थे ऐसे श्रीराम आदि अत्यन्त सुन्दर राजाओंने मङ्गलसे परिपूर्ण महलमें प्रवेश किया ॥९६॥


अनभिसंहितमीदृशमुत्तमं दयितजंतुसमागमनोत्सवम् । भजति पुण्यरविप्रतिबोधितप्रवरमानसवारिरुहो जनः ॥९७॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि पुण्यरूपी सूर्यके द्वारा जिसका उत्तम मनरूपी कमल विकसित हुआ है ऐसा मनुष्य इस प्रकारके अचिन्तित तथा उत्तम प्रियजनोंके समागमसे उत्पन्न आनन्दको प्राप्त होता है ॥९७॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामलवणांकुशसमागमाभिधानं नाम त्र्युत्तरशतं पर्व ॥१०३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें राम तथा लवणांकुशके समागमका वर्णन करने वाला एक सौ तीसरा पर्व समाप्त हुआ ॥१०३॥


१०४. चतुरुत्तरशतं पर्व (सकलभूषणदेवागमनाभिधानं)

अथ विज्ञापितोऽन्यस्मिन्दिने हलधरो नृपः । मरुन्नन्दनसुग्रीवविभीषणपुरःसरैः ॥१॥

नाथ प्रसीद विषयेऽन्यस्मिञ्जनकदेहजा । दुःखमास्ते समानेतुं तामादेशो विधीयताम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर किसी दिन हनूमान् सुग्रीव तथा विभीषण आदि प्रमुख राजाओंने श्री रामसे प्रार्थना की कि हे देव ! प्रसन्न होओ, सीता अन्य देशमें दुःखसे स्थित है इसलिए लानेकी आज्ञा की जाय ॥१-२॥


निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च क्षणं किञ्चिद्विचिन्त्य च । ततो जगाद पद्माभो बाष्पश्यामितदिङ्मुखः ॥३॥

अनघं वेद्मि सीतायाः शीलमुत्तमचेतसः । प्राप्तायाः परिवादं तु पश्यामि वदनं कथम् ॥४॥

अर्थ: तब लम्बी और गरम श्वास ले तथा क्षण भर कुछ विचार कर भापोंसे दिशाओं को मलिन करते हुए श्रीरामने कहा कि यद्यपि मैं उत्तम हृदयको धारण करने वाली सीताके शील को निर्दोष जानता हूँ तथापि वह यतश्च लोकापवादको प्राप्त है अतः उसका मुख किस प्रकार देखूँ ॥३-४॥


समस्तं भूतले लोकं प्रत्याययतु जानकी । ततस्तया समं वासो भवेदेव कुतोऽन्यथा ॥५॥

अर्थ: पहले सीता पृथिवीतल पर समस्त लोगोंको विश्वास उत्पन्न करावे उसके बाद ही उसके साथ हमारा निवास हो सकता है अन्य प्रकार नहीं ॥५॥


एतस्मिन्भुवने तस्मान्नृपाः जनपदैः समम् । निमंत्र्यंतां परं प्रीत्या सकलाश्च नभश्चराः ॥६॥

अर्थ: इसलिए इस संसारमें देशवासी लोगोंके साथ समस्त राजा तथा समस्त विद्याधर बड़े प्रेमसे निमन्त्रित किये जावें ॥६॥


समक्षं शपथं तेषां कृत्वा सम्यग्विधानतः । निरघप्रभवं सीता शचीव प्रतिपद्यताम् ॥७॥

अर्थ: उन सब के समक्ष अच्छी तरह शपथ कर सीता इन्द्राणीके समान निष्कलङ्क जन्मको प्राप्त हो ॥७॥


एवमस्त्विति तैरेवं कृतं क्षेपविवर्जितम् । राजानः सर्वदेशेभ्यः सर्वदिग्भ्यः समाहृताः ॥८॥

अर्थ: ‘एव-मस्तु’-‘ऐसा ही हो’ इस प्रकार कह कर उन्होंने विना किसी विलम्बके उक्त बात स्वीकृत की; फल स्वरूप नाना देशों और समस्त दिशाओंसे राजा लोग आ गये ॥८॥


नानाजनपदा बालवृद्धयोषित्समन्विताः । अयोध्यानगरीं प्राप्ता महाकौतुकसंगताः ॥९॥

अर्थ: बालक वृद्ध तथा स्त्रियोंसे सहित नाना देशोंके लोग महाकौतुकसे युक्त होते हुए अयोध्या नगरीको प्राप्त हुए ॥९॥


असूर्यंपश्यनार्योऽपि यत्राऽऽजग्मुः ससंभ्रमाः । ततः किं प्रकृतिस्थस्य जनस्यान्यस्य भण्यताम् ॥१०॥

अर्थ: सूर्यको नहीं देखने वाली स्त्रियाँ भी जब संभ्रमसे सहित हो वहाँ आई थीं तब साधारण अन्य मनुष्यके विषयमें तो कहा ही क्या जावे ? ॥१०॥


वर्षीयांसोऽतिमात्रं ये बहुवृत्तान्तकोविदाः । राष्ट्रप्राग्रहराः ख्यातास्ते चान्ये च समागताः ॥११॥

अर्थ: अत्यन्त वृद्ध अनेक लोगोंका हाल जाननेमें निपुण जो राष्ट्रके श्रेष्ठ प्रसिद्ध पुरुष थे वे तथा अन्य सब लोग वहाँ एकत्रित हुए ॥११॥


तदा दिक्षु समस्तासु मार्गत्वं सर्वमेदिनीम् । नीता जनसमूहेन परसङ्घट्टमीयुषा ॥१२॥

अर्थ: उस समय परम भीड़को प्राप्त हुए जन समूहने समस्त दिशाओंमें समस्त पृथिवीको मार्ग रूपमें परिणत कर दिया था ॥१२॥


तुरगैः स्यन्दनैर्युग्यैः शिबिकाभिर्मतङ्गजैः । अन्यैश्च विविधैर्यानैर्लोकसम्पत्समागताः ॥१३॥

अर्थ: लोगोंके समूह घोड़े, रथ, बैल, पालकी तथा नाना प्रकारके अन्य वाहनोंके द्वारा वहाँ आये थे ॥१३॥


आगच्छद्भिः खगैरूर्ध्वमधश्च क्षितिगोचरैः । जगज्जंगमेवेति तदा समुपलक्ष्यते ॥१४॥

अर्थ: ऊपर विद्याधर आ रहे थे और नीचे भूमिगोचरी, इसलिए उन सबसे उस समय यह जगत् ऐसा जान पड़ता था मानो जंगम ही हो अर्थात् चलने फिरने वाला ही हो ॥१४॥


सुप्रपञ्चाः कृता मंचाः क्रीडापर्वतसुन्दराः । विशालाः परमाः शाला मण्डिता दूष्यमण्डपाः ॥१५॥

अनेकपुरसम्पन्नाः प्रासादाः स्तम्भधारिताः । उदारजालकोपेता रचितोदारमण्डपाः ॥१६॥

अर्थ: क्रीड़ा-पर्वतोंके समान लम्बे चौड़े मञ्च तैयार किये गये, उत्तमोत्तम विशाल शालाएँ, कपड़ेके उत्तम तम्बू, तथा जिनकी अनेक गाँव समा जावें ऐसे खम्भों पर खड़े किये गये, बड़े बड़े झरोंखोंसे युक्त तथा विशाल मण्डपोंसे सुशोभित महल बनवाये गये ॥१५-१६॥


तेषु स्त्रियः समं स्त्रीभिः पुरुषाः पुरुषैः समम् । यथायोग्यं स्थिताः सर्वे शपथेक्षणकांक्षिणः ॥१७॥

अर्थ: उन सब स्थानोंमें स्त्रियाँ स्त्रियोंके साथ और पुरुष पुरुषोंके साथ, इस प्रकार शपथ देखनेके इच्छुक सब लोग यथायोग्य ठहर गये ॥१७॥


शयनासनताम्बूलभक्तमाल्यादिनाऽखिलम् । कृतमागन्तुलोकस्य सौस्थित्यं राजमानवैः ॥१८॥

अर्थ: राजाधिकारी पुरुषोंने आगन्तुक मनुष्योंके लिए शयन आसन ताम्बूल भोजन तथा माला आदिके द्वारा सब प्रकारकी सुविधा पहुँचाई थी ॥१८॥


ततो रामसमादेशात्प्रभामण्डलसुन्दरः । लङ्केशो वायुपुत्रश्च किष्किन्धाधिपतिस्तथा ॥१९॥

चन्द्रोदरसुतो रत्नजटी चेति महानृपाः । पौंडरीकं पुरं याता बलिनो नभसा क्षणात् ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर रामकी आज्ञासे भामण्डल, विभीषण, हनूमान्, सुग्रीव, विराधित और रत्नजटी आदि बड़े बड़े बलवान् राजा क्षणभरमें आकाश मार्गसे पौण्डरीकपुर गये ॥१९-२०॥


ते विन्यस्य बहिः सैन्यमन्तरङ्गजनान्विताः । विविशुर्जानकीस्थानं ज्ञापिताः सानुमोदनाः ॥२१॥

अर्थ: वे सब, सेनाको बाहर ठहरा कर अन्तरङ्ग लोगोंके साथ सूचना देकर तथा अनुमति प्राप्त कर सीताके स्थानमें प्रविष्ट हुए ॥२१॥


विधाय जयशब्दं च प्रकीर्य कुसुमाञ्जलिम् । पादयोः पाणियुग्माङ्कमस्तकेन प्रणम्य च ॥२२॥

उपविष्टा महीपृष्ठे चारुकुट्टिमभासुरे । क्रमेण सङ्कथां चक्रुः पौरस्त्या विनयानताः ॥२३॥

अर्थ: प्रवेश करते ही उन्होंने सीतादेवीका जय जयकार किया, पुष्पाञ्जलि बिखेरी, हाथ जोड़ मस्तकसे लगा चरणोंमें प्रणाम किया, सुन्दर मणिमय फर्शसे सुशोभित पृथिवी पर बैठे और सामने बैठ विनयसे नम्रीभूत हो क्रमपूर्वक वार्तालाप किया ॥२२-२३॥


सम्भाविता सुगम्भीरा सीतास्रपिहितेक्षणा । आत्माभिनिन्दनाप्रायं जगाद परिमन्थरम् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर संभाषण करनेके बाद अत्यन्त गम्भीर सीता, आंसुओंसे नेत्रोंको आच्छादित करती हुई अधिकांश आत्म निन्दा रूप वचन धीरे धीरे बोली ॥२४॥


असज्जनवचोदावदग्धान्यङ्गानि साम्प्रतम् । क्षीरोदधिजलेनापि न मे गच्छन्ति निर्वृतिम् ॥२५॥

अर्थ: उसने कहा कि दुर्जनोंके वचन रूपी दावानलसे जले हुए मेरे अङ्ग इस समय क्षीरसागरके जलसे भी शान्तिको प्राप्त नहीं हो रहे हैं ॥२५॥


ततस्ते जगदुर्देवि भगवत्यधुनोत्तमे । शोकं सौम्ये च मुञ्चस्व प्रकृतौ कुरु मानसम् ॥२६॥

अर्थ: तब उन्होंने कहा कि हे देवि ! हे भगवति ! हे उत्तमे ! हे सौम्ये ! इस समय शोक छोड़ो और मनको प्रकृतिस्थ करो ॥२६॥


असुमान्विष्टपे कोऽसौ त्वयि यः परिवादकः । कोऽसौ चालयति क्षोणीं वह्नेः पिबति कः शिखाम् ॥२७॥

अर्थ: संसारमें ऐसा कौन प्राणी है जो तुम्हारे विषयमें अपवाद करने वाला हो । वह कौन है जो पृथिवी चला सके और अग्निशिखाका पान कर सके ? ॥२७॥


सुमेरुमूर्त्तिमुत्क्षेप्तुं साहसं कस्य विद्यते । जिह्वया लेढि मूढात्मा कोऽसौ चन्द्रार्कयोस्तनुम् ॥२८॥

अर्थ: सुमेरु पर्वतको उठानेका किसमें साहस है ? चन्द्रमा और सूर्यके शरीरको कौन मूर्ख जिह्वासे चाटता है ? ॥२८॥


गुणरत्नमहीध्रं ते कोऽसौ चालयितुं क्षमः । न स्फुटत्यपवादेन कस्य जिह्वा सहस्रधा ॥२९॥

अर्थ: तुम्हारे गुण रूपी पर्वतको चलानेके लिए कौन समर्थ है ? अपवादसे किसकी जिह्वा के हजार टुकड़े नहीं होते ? ॥२९॥


अस्माभिः किङ्करगणा नियुक्ता भरतावनौ । परिवादरतो देव्या दुष्टात्मा वध्यतामिति ॥३०॥

अर्थ: हम लोगोंने भरत क्षेत्रकी भूमिमें किंकरोंके समूह यह कह कर नियुक्त कर रक्खे हैं कि जो भी देवीकी निन्दा करनेमें तत्पर हो उसे मार डाला जाय ॥३०॥


पृथिव्यां योऽतिनीचोऽपि सीतागुणकथारतः । विनीतस्य गृहे तस्य रत्नवृष्टिर्निपात्यताम् ॥३१॥

अर्थ: और जो पृथिवीमें अत्यन्त नीच होने पर भी सीताकी गुण कथामें तत्पर हो उस विनीतके घरमें रत्नवर्षा की जाय ॥३१॥


अनुरागेण ते धान्यराशिषु क्षेत्रमानवाः । कुर्वन्ति स्थापनां सस्यसम्पत्प्रार्थनतत्पराः ॥३२॥

अर्थ: हे देवि ! धान्य रूपी सम्पत्तिकी इच्छा करने वाले खेतके पुरुष अर्थात् कृषक लोग अनुराग वश धान्यकी राशियोंमें तुम्हारी स्थापना करते हैं ? भावार्थ - लोगोंका विश्वास है कि धान्य राशिमें सीताकी स्थापना करनेसे अधिक धान्य उत्पन्न होता है ॥३२॥


एतत्ते पुष्पकं देवि प्रेषितं रघुभानुना । प्रसीदारुह्यतामेतद्गम्यतां कोशलां पुरीम् ॥३३॥

अर्थ: हे देवि ! रामचन्द्र जी ने तुम्हारे लिए यह पुष्पक विमान भेजा है सो प्रसन्न हो कर इस पर चढ़ा जाय और अयोध्याकी ओर चला जाय ॥३३॥


पद्मः पुरं च देशश्च न शोभन्ते त्वया विना । यथा तरुगृहाकाशं लतादीपेन्दुमूर्त्तिभिः ॥३४॥

अर्थ: जिस प्रकार लताके बिना वृक्ष, दीपके बिना घर और चन्द्रमाके बिना आकाश सुशोभित नहीं होते उसी प्रकार तुम्हारे बिना राम, अयोध्या नगरी और देश सुशोभित नहीं होते ॥३४॥


मुखं मैथिलि पश्याद्य सद्यः पूर्णेन्दुरुक्प्रभोः । ननु पत्युर्वचः कार्यमवश्यं कोविदे त्वया ॥३५॥

अर्थ: हे मैथिलि ! आज शीघ्र ही स्वामीका पूर्णचन्द्रके समान मुख देखो । हे कोविदे ! तुम्हें पति वचन अवश्य स्वीकृत करना चाहिए ॥३५॥


एवमुक्ता प्रधानस्त्रीशतोत्तमपरिच्छदा । महर्द्धया पुष्पकारूढा तरसा नभसा ययौ ॥३६॥

अर्थ: इस प्रकार कहने पर सैकड़ों उत्तम स्त्रियोंके परिकरके साथ सीता पुष्पक विमान पर आरूढ हो गई और बड़े वैभव के साथ वेगसे आकाशमार्गसे चली ॥३६॥


अथायोध्यां पुरीं दृष्ट्वा भास्करं चास्तसङ्गतम् । सा महेन्द्रोदयोद्याने निन्ये चिन्तातुरा निशाम् ॥३७॥

अर्थ: अथानन्तर जब उसे अयोध्यानगरी दिखी उसी समय सूर्य अस्त हो गया अतः उसने चिन्तातुर हो महेन्द्रोदय नामक उद्यानमें रात्रि व्यतीत की ॥३७॥


यदुद्यानं सपद्मायास्तदासीत्सुमनोहरम् । तदेतत्स्मृतपूर्वायास्तस्या जातमसाम्प्रतम् ॥३८॥

अर्थ: रामके साथ होने पर जो उद्यान पहले उसके लिए अत्यन्त मनोहर जान पड़ता था वही उद्यान पिछली घटना स्मृत होने पर उसके लिए अयोग्य जान पड़ता था ॥३८॥


सीताशुद्धयनुरागाद्वा पद्मबन्धावथोदिते । प्रसाधितेऽखिले लोके किरणैः किङ्करैरिव ॥३९॥

शपथादिव दुर्वादे भीते ध्वान्ते क्षयं गते । समीपं पद्मनाभस्य प्रस्थिता जनकात्मजा ॥४०॥

अर्थ: अथानन्तर सीताकी शुद्धिके अनुरागसे ही मानों जब सूर्य उदित हो चुका, किङ्करोंके समान किरणोंसे जब समस्त संसार अलंकृत हो गया और शपथसे दुर्वादके समान जब अन्धकार भयभीत हो क्षयको प्राप्त हो गया तब सीता रामके समीप चली ॥३९-४०॥


सा करेणुसमारूढा दौर्मनस्याहतप्रभा । भास्करालोकदृष्टेव सानुगाऽऽसीन्महौषधिः ॥४१॥

तथाप्युत्तमनारीभिरावृता भद्रभावना । रेजे सा नितरां तन्वी ताराभिर्वा विधोः कला ॥४२॥

अर्थ: मनकी अशान्तिसे जिसकी प्रभा नष्ट हो गई थी ऐसी हस्तिनीपर चढ़ी सीता, सूर्यके प्रकाशसे आलोकित, पर्वतके शिखर पर स्थित महौषधिके समान यद्यपि निष्प्रभ थी तथापि उत्तम स्त्रियोंसे घिरी, उच्च भावनावाली दुबली पतली सीता, ताराओंसे घिरी चन्द्रमाकी कलाके समान अत्यधिक सुशोभित हो रही थी ॥४१-४२॥


ततः परिषदं पृथ्वीं गम्भीरां विनयस्थिताम् । वन्द्यमानेड्यमाना च धीरा रामाङ्गनाविशत् ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर जिसे सब लोग वन्दना कर रहे थे तथा जिसकी सब स्तुति कर रहे थे ऐसी धीर वीरा सीताने विशाल, गम्भीर एवं विनयसे स्थित सभामें प्रवेश किया ॥४३॥


विषादी विस्मयी हर्षी संक्षोभी जनसागरः । वर्द्धस्व जय नन्देति चकाराम्रेडितं स्वनम् ॥४४॥

अर्थ: विषाद, विस्मय, हर्ष और क्षोभसे सहित मनुष्योंका अपार सागर बार-बार यह शब्द कह रहा था कि वृद्धिको प्राप्त होओ, जयवन्त होओ और समृद्धिसे सम्पन्न होओ ॥४४॥


अहोरूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः । अहो महानुभावत्वमहो गाम्भीर्यमुत्तमम् ॥४५॥

अहोऽस्या वीतपङ्कत्वं समागमनसूचितम् । श्रीमज्जनकराजस्य सुतायाः सितकर्मणः ॥४६॥

अर्थ: अहो ! उज्ज्वल कार्य करनेवाली श्रीमान् राजा जनककी पुत्री सीताका रूप धन्य है ? धैर्य धन्य है, पराक्रम धन्य है, उसकी कान्ति धन्य है, महानुभावता धन्य है, और समागमसे सूचित होनेवाली इसकी निष्कलंकता धन्य है ॥४५-४६॥


एवमुद्धृषिताङ्गानां नराणां सहयोषिताम् । वदनेभ्यो विनिश्चेरुर्वाचो व्याप्तदिगन्तराः ॥४७॥

अर्थ: इस प्रकार उल्लसित शरीरोंको धारण करनेवाले मनुष्यों और स्त्रियोंके मुखोंसे दिग्दिगन्तको व्याप्त करनेवाले शब्द निकल रहे थे ॥४७॥


गगने खेचरो लोको धरण्यां धरणीचरः । उदात्तकौतुकस्तस्थौ निमेषरहितेक्षणः ॥४८॥

अर्थ: आकाशमें विद्याधर और पृथिवीमें भूमिगोचरी मनुष्य, अत्यधिक कौतुक और टिमकार रहित नेत्रोंसे युक्त थे ॥४८॥


प्रजातसम्मदाः केचित्पुरुषाः प्रमदास्तथा । अभीक्षाञ्चक्रिरे रामं सङ्क्रन्दनमिवामराः ॥४९॥

अर्थ: अत्यधिक हर्षसे सम्पन्न कितनी ही स्त्रियाँ तथा कितने ही मनुष्य रामको टकटकी लगाये हुए उस प्रकार देख रहे थे जिस प्रकार कि देव इन्द्रको देखते हैं ॥४९॥


पार्श्वस्थौ वीक्ष्य रामस्य केचिच्च लवणांकुशौ । जगदुः सदृशावस्य सुकुमाराविमाविति ॥५०॥

अर्थ: कितने ही लोग रामके समीपमें स्थित लवण और अंकुशको देखकर यह कह रहे थे कि अहो ! ये दोनों सुकुमार कुमार इनके ही सदृश हैं ॥५०॥


लक्ष्मणं केचिदैक्षन्त प्रतिपक्षक्षयक्षमम् । शत्रुघ्नसुन्दरं केचिदेके जनकनन्दनम् ॥५१॥

ख्यातं केचिद्घनूमन्तं त्रिकूटाधिपतिं परे । अन्ये विराधितं केचित्किष्किन्धनगरेश्वरम् ॥५२॥

अर्थ: कितने ही लोग शत्रुका क्षय करनेमें समर्थ लक्ष्मणको, कितने ही शत्रुघ्नको, कितने ही भामण्डलको, कितने ही हनूमान्को, कितने ही विभीषणको, कितने ही विराधितको और कितने ही सुग्रीवको देख रहे थे ॥५१-५२॥


केचिज्जनकराजस्य सुतां विस्मितचेतसः । वसतिः सा हि नेत्राणां क्षणमात्रान्यचारिणाम् ॥५३॥

अर्थ: कितने ही आश्चर्यसे चकित होते हुए जनकसुता को देख रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि वह क्षण मात्रमें अन्यत्र विचरण करनेवाले नेत्रोंकी मानो वसति ही थी ॥५३॥


उपसृत्य ततो रामं दृष्ट्वा व्याकुलमानसा । वियोगसागरस्यान्तं प्राप्तं जानक्यमन्यत ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका चित्त अत्यन्त आकुल हो रहा था ऐसी सीताके पास जाकर तथा रामको देख कर माना था कि अब वियोगरूपी सागरका अन्त आ गया है ॥५४॥


प्राप्तायाः पद्मभार्याया लक्ष्मणोऽर्घं ददौ ततः । प्रणामं चक्रिरे भूपाः सम्भ्रान्ता रामपार्श्वगाः ॥५५॥

अर्थ: आई हुई सीताके लिए लक्ष्मणने अर्घ दिया तथा रामके समीप बैठे हुए राजाओंने हड़बड़ा कर उसे प्रणाम किया ॥५५॥


ततोऽभिमुखमायान्तीं वीक्ष्य तां रभसान्विताम् । राघवोऽक्षोभ्यसत्त्वोऽपि सकम्पहृदयोऽभवत् ॥५६॥

अर्थ: तदनन्तर वेगसे सामने आती हुई सीताको देख कर यद्यपि राम अक्षोभ्य पराक्रमके धारक थे तथापि उनका हृदय कांपने लगा ॥५६॥


अचिन्तयच्च मुक्ताऽपि वने व्यालसमाकुले । मम लोचनचौरीयं कथं भूयः समागता ॥५७॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि मैंने तो इसे हिंसक जन्तुओंसे भरे वनमें छोड़ दिया था फिर मेरे नेत्रोंको चुरानेवाली यह यहाँ कैसे आ गई ? ॥५७॥


अहो विगतलज्जेयं महासत्त्वसमन्विता । यैवं निर्वास्यमानापि विरागं न प्रपद्यते ॥५८॥

अर्थ: अहो ! यह बड़ी निर्लज्ज है तथा महाशक्तिसे सम्पन्न है जो इस तरह निकाली जाने पर भी विरागको प्राप्त नहीं होती ॥५८॥


ततस्तदिङ्गितं ज्ञात्वा वितानीभूतमानसा । विरहो न मयोत्तीर्ण इति साऽभूद्विषादिनी ॥५९॥

अर्थ: तदनन्तर रामकी चेष्टा देख, शून्यहृदया सीता यह सोचकर विषाद करने लगी कि मैंने विरह रूपी सागर अभी पार नहीं कर पाया है ॥५९॥


विरहोदन्वतः कूलं मे मनःपात्रमागतम् । नूनमेष्यति विध्वंसमिति चिन्ताकुलाऽभवत् ॥६०॥

अर्थ: विरह रूपी सागरके तटको प्राप्त हुआ मेरा मनरूपी जहाज निश्चित ही विध्वंसको प्राप्त हो जायगा - नष्ट हो जायगा ऐसी चिन्तासे वह व्याकुल हो उठी ॥६०॥


किङ्कर्तव्यविमूढा सा पादाङ्गुष्ठेन सङ्गता । विलिखन्ती क्षितिं तस्थौ बलदेवसमीपगा ॥६१॥

अर्थ: ‘क्या करना चाहिए’ इस विषयका विचार करनेमें मूढ़ सीता, पैरके अंगूठेसे भूमिको कुरेदती हुई रामके समीप खड़ी थी ॥६१॥


अग्रतोऽवस्थिता तस्य विरेजे जनकात्मजा । पुरन्दरपुरे जाता लक्ष्मीरिव शरीरिणी ॥६२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि उस समय रामके आगे खड़ी सीता ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो शरीरधारिणी स्वर्गकी लक्ष्मी ही हो अथवा इन्द्रके आगे मूर्तिमती लक्ष्मी ही खड़ी हो ॥६२॥


ततोऽभ्यधायि रामेण सीते तिष्ठसि किं पुरः । अपसर्प न शक्तोऽस्मि भवतीमभिवीक्षितुम् ॥६३॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि सीते ! सामने क्यों खड़ी है ? दूर हट, मैं तुम्हें देखनेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥६३॥


मध्याह्ने दीधितिं सौरीमाशीविषमणेः शिखाम् । वरमुत्सहते चक्षुरीक्षितुं भवतीं तु नो ॥६४॥

अर्थ: मेरे नेत्र मध्याह्नके समय सूर्यकी किरणको अथवा आशीविष-सर्पके मणिकी शिखाको देखनेके लिए अच्छी तरह उत्साहित हैं परन्तु तुझे देखनेके लिए नहीं ॥६४॥


दशास्यभवने मासान् बहूनन्तः पुरावृता । स्थिता यदाहृता भूयः समस्तं किं ममोचितम् ॥६५॥

अर्थ: तू रावणके भवनमें कई मास तक उसके अन्तःपुरसे आवृत्त होकर रही फिर भी मैं तुम्हें ले आया सो यह सब क्या मेरे लिए उचित था ? ॥६५॥


ततो जगाद वैदेही निष्ठुरो नास्ति त्वत्समः । तिरस्करोषि मां येन सुविद्यां प्राकृतो यथा ॥६६॥

अर्थ: तदनन्तर सीताने कहा कि तुम्हारे समान निष्ठुर कोई दूसरा नहीं है । जिस प्रकार एक साधारण मनुष्य उत्तम विद्याका तिरस्कार करता है उसी प्रकार तुम मेरा तिरस्कार कर रहे हो ॥६६॥


दोहलच्छद्मना नीत्वा वनं कुटिलमानसः । गर्भाधानसमेतां मे त्यक्तुं किं सदृशं तव ॥६७॥

अर्थ: हे वक्रहृदय ! दोहलाके बहाने वनमें ले जाकर मुझ गर्भिणीको छोड़ना क्या तुम्हें उचित था ? ॥६७॥


असमाधिमृतिं प्राप्ता तत्र स्यामहकं यदि । ततः किं ते भवेत् सिद्धं मम दुर्गतिदायिनः ॥६८॥

अर्थ: यदि मैं वहाँ कुमरणको प्राप्त होती तो इससे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होता ? केवल मेरी ही दुर्गति होती ॥६८॥


अतिस्वल्पोऽपि सद्भावो मय्यस्ति यदि वा कृपा । क्षान्त्यार्याणां ततः किं न नीत्वा वसतिमुज्झिता ॥६९॥

अर्थ: यदि मेरे ऊपर आपका थोड़ा भी सद्भाव होता अथवा थोड़ी भी कृपा होती तो मुझे शान्तिपूर्वक आर्यिकाओंकी वसतिके पास ले जाकर क्यों नहीं छोड़ा ॥६९॥


अनाथानामबन्धूनां दरिद्राणां सुदुःखिनाम् । जिनशासनमेतद्धि शरणं परमं मतम् ॥७०॥

अर्थ: यथार्थमें अनाथ, अबन्धु, दरिद्र तथा अत्यन्त दुःखी मनुष्योंका यह जिनशासन ही परम शरण है ॥७०॥


एवं गतेऽपि पद्माभ प्रसीद किमिहोरुणा । कथितेन प्रयच्छाऽऽज्ञामित्युक्त्वा दुःखिताऽरुदत् ॥७१॥

अर्थ: हे राम ! यहाँ अधिक कहनेसे क्या ? इस दशामें भी आप प्रसन्न हों और मुझे आज्ञा दें । इस प्रकार कह कर वह अत्यन्त दुःखी हो रोने लगी ॥७१॥


रामो जगाद जानामि देवि शीलं तवानघम् । मदनुव्रततां चोच्चैर्भावस्य च विशुद्धताम् ॥७२॥

परिवादमिमं किन्तु प्राप्ताऽसि प्रकटं परम् । स्वभावकुटिलस्वान्तामेतां प्रत्यायय प्रजाम् ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि हे देवि ! मैं तुम्हारे निर्दोष शील, पातिव्रत्यधर्म एवं अभिप्रायकी उत्कृष्ट विशुद्धताको जानता हूँ किन्तु यतश्च तुम लोगोंके द्वारा इस प्रकट भारी अपवादको प्राप्त हुई हो अतः स्वभावसे ही कुटिलचित्तको धारण करनेवाली इस प्रजाको विश्वास दिलाओ । इसकी शङ्का दूर करो ॥७२-७३॥


एवमस्त्विति वैदेही जगौ सम्मदिनी ततः । दिव्यैः पञ्चभिरप्येषा लोकं प्रत्याययाम्यहम् ॥७४॥

अर्थ: तब सीताने हर्षयुक्त हो ‘एवमस्तु’ कहते हुए कहा कि मैं पाँचों ही दिव्य शपथोंसे लोगोंको विश्वास दिलाती हूँ ॥७४॥


विषाणां विषमं नाथ कालकूटं पिबाम्यहम् । आशीविषोऽपि यं घ्रात्वा सद्यो गच्छति भस्मताम् ॥७५॥

अर्थ: उसने कहा कि हे नाथ ! मैं उस कालकूटको पी सकती हूँ जो विषोंमें सबसे अधिक विषम है तथा जिसे सूंघकर आशीविष सर्प भी तत्काल भस्मपनेको प्राप्त हो जाता है ॥७५॥


आरोहामि तुलां वह्निज्वालां रौद्रां विशामि वा । यो वा भवदभिप्रेतः समयस्तं करोम्यहम् ॥७६॥

अर्थ: मैं तुलापर चढ़ सकती हूँ अथवा भयङ्कर अग्निकी ज्वालामें प्रवेश कर सकती हूँ अथवा जो भी शपथ आपको अभीष्ट हो उसे कर सकती हूँ ॥७६॥


क्षणं विचिन्त्य पद्माभो जगौ वह्निं विशेत्यतः । जगौ सीता विशामीति महासम्मद्धारिणी ॥७७॥

अर्थ: क्षणभर विचारकर रामने कहा कि अच्छा अग्निमें प्रवेश करो । इसके उत्तरमें सीताने बड़ी प्रसन्नतासे कहा कि हाँ, प्रवेश करती हूँ ॥७७॥


प्रतिपन्नोऽनया मृत्युरित्यदीर्यत नारदः । शोकोत्पीडैरपीड्यन्त श्रीशैलाद्या नरेश्वराः ॥७८॥

अर्थ: ‘इसने मृत्यु स्वीकृत कर ली’ यह विचारकर नारद विदीर्ण हो गया और हनूमान् आदि राजा शोकके भारसे पीडित हो उठे ॥७८॥


पावकं प्रविविक्षन्तीं परिनिश्चित्य मातरम् । चक्रतुस्तद्गतिं बुद्धावात्मनोर्लवणाङ्कुशौ ॥७९॥

अर्थ: ‘माता अग्निमें प्रवेश करना चाहती है’ यह निश्चयकर लवण और अङ्कुशने बुद्धिमें अपनी भी उसी गतिका विचार कर लिया अर्थात् हम दोनों भी अग्निमें प्रवेश करेंगे ऐसा उन्होंने मनमें निश्चय कर लिया ॥७९॥


महाप्रभावसम्पन्नः प्रहर्षं धारयंस्ततः । सिद्धार्थक्षुल्लकोऽवोचदुद्धृत्य भुजमुन्नतम् ॥८०॥

न सुरैरपि वैदेह्याः शीलव्रतमशेषतः । शक्यं कीर्त्तयितुं कैव कथा क्षुद्रशरीरिणाम् ॥८१॥

अर्थ: तदनन्तर महाप्रभावसे सम्पन्न एवं बहुत भारी हर्षको धारण करनेवाले सिद्धार्थ क्षुल्लकने भुजा ऊपर उठाकर कहा कि सीताके शीलव्रतका देव भी पूर्णरूपसे वर्णन नहीं कर सकते फिर क्षुद्र प्राणियोंकी तो कथा ही क्या है ? ॥८०-८१॥


अर्थ: हे राम ! मेरु पातालमें प्रवेश कर सकता है और समुद्र सूख सकते हैं परन्तु सीताके शीलव्रतमें कुछ चञ्चलता उत्पन्न नहीं की जा सकती ॥८१॥


पातालं प्रविशेन्मेरुः शुष्येयुर्मकरालयाः । न पद्मचलनं किञ्चित्सीताशीलव्रतस्य तु ॥८२॥

इन्दुरर्कत्वमागच्छेदर्कः शीतांशुतां व्रजेत् । न तु सीतापरीवादः कथञ्चित्सत्यतां व्रजेत् ॥८३॥

अर्थ: चन्द्रमा सूर्यपनेको प्राप्त हो सकता है और सूर्य चन्द्रपनेको प्राप्त कर सकता है परन्तु सीताका अपवाद किसी भी तरह सत्यताको प्राप्त नहीं हो सकता ॥८२-८३॥


विद्याबलसमृद्धेन मया पञ्चसु मेरुषु । वन्दना जिनचन्द्राणां कृता शाश्वतधामसु ॥८४॥

सा मे विफलतां यायात्पद्मनाभ सुदुर्लभा । विपत्तिर्यदि सीतायाः शीलस्यास्ति मनागपि ॥८५॥

अर्थ: मैं विद्याबलसे समृद्ध हूँ और और मैंने पाँचों मेरु पर्वतोंपर स्थित शाश्वत-अकृत्रिम चैत्यालयोंमें जो जिन-प्रतिमाएँ हैं उनकी वन्दना की है । हे राम ! मैं जोर देकर कहता हूँ कि यदि सीताके शीलमें थोड़ी भी कमी है तो मेरी वह दुर्लभ वन्दना निष्फलताको प्राप्त हो जाय ॥८४-८५॥


भूरिवर्षसहस्राणि सचेलेन मया कृतम् । तपस्तेन शपे नाहं यथेमौ तव पुत्रकौ ॥८६॥

अर्थ: मैंने वस्त्रखण्ड धारण कर कई हजार वर्ष तक तप किया सो यदि ये तुम्हारे पुत्र न हों तो मैं उस तपकी शपथ करता हूँ अर्थात् तपकी शपथपूर्वक कहता हूँ कि ये तुम्हारे ही पुत्र हैं ॥८६॥


भीमज्वालावलीभङ्गं सर्वभङ्गं सुनिष्ठुरम् । मा विशेदनलं सीता तस्मात्पद्म विचक्षण ॥८७॥

अर्थ: इसलिए हे बुद्धिमन् राम ! जिसमें भयङ्कर ज्वालावली रूप लहरें उठ रही हैं तथा जो सबका संहार करनेवाली है ऐसी अग्निमें सीता प्रवेश नहीं करे ॥८७॥


व्योम्नि वैद्याधरो लोको धरण्यां धरणीचरः । जगाद साधु साधूक्तमिति मुक्तमहास्वनः ॥८८॥

प्रसीद देव पद्माभ प्रसीद व्रज सौम्यताम् । नाथ मा राम मा राम कार्षीः पावकमानसम् ॥८९॥

अर्थ: क्षुल्लककी बात सुन आकाशमें विद्याधर और पृथ्वीपर भूमिगोचरी लोग ‘अच्छा कहा-अच्छा कहा’ इस प्रकारकी जोरदार आवाज लगाते हुए बोले कि 'हे देव प्रसन्न होओ, प्रसन्न होओ, सौम्यताको प्राप्त होओ, हे नाथ ! हे राम ! हे राम ! मनमें अग्निका विचार मत करो ॥८८-८९॥


सती सीता सती सीता न सम्भाव्यमिहान्यथा । महापुरुषपत्नीनां जायते न विकारिता ॥९०॥

अर्थ: सीता सती है, सीता सती है, इस विषयमें अन्यथा सम्भावन नहीं हो सकती । महापुरुषोंकी पत्नियोंमें विकार नहीं होता ॥९०॥


इति वाष्पभराद्वाचो गद्गदा जनसागरात् । संक्षुब्धादभिनिश्चेरुर्व्याप्तसर्वदिगन्तराः ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार समस्त दिशाओंके अन्तरालको व्याप्त करनेवाले, तथा अश्रुओंके भारसे गद्गद अवस्थाको प्राप्त हुए शब्द, संक्षुभित जनसागरसे निकलकर सब ओर फैल रहे थे ॥९१॥


महाकोलाहलस्वानैः समं सर्वासुधारिणाम् । अत्यन्तशोकिनां स्थूला निपेतुर्वाष्पबिन्दवः ॥९२॥

अर्थ: तीव्र शोकसे युक्त समस्त प्राणियोंके आंसुओंकी बड़ी-बड़ी बूँदें महान् कलकल शब्दोंके साथ-साथ निकलकर नीचे पड़ रही थीं ॥९२॥


पद्मो जगाद यद्येवं भवन्तः करुणापराः । ततः पुरा परिवादमभाषिध्वं कुतो जनाः ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर रामने कहा कि हे मानवो ! यदि इस समय आप लोग इस तरह दया प्रकट करनेमें तत्पर हैं तो पहले आप लोगोंने अपवाद क्यों कहा था ? ॥९३॥


एवमाज्ञापयत्तीव्रमनपेक्षश्च किङ्करान् । आलम्ब्य परमं सत्त्वं विशुद्धिन्यस्तमानसः ॥९४॥

अर्थ: इस प्रकार लोगोंके कथनकी अपेक्षा न कर जिन्होंने मात्र विशुद्धतामें मन लगाया था ऐसे रामने परम दृढ़ताका आलम्बनकर किङ्करोंको आज्ञा दी कि ॥९४॥


पुरुषौ द्वावधस्ताद्द्राक् खन्यतामत्र मेदिनी । शतानि त्रीणि हस्तानां चतुष्कोणा प्रमाणतः ॥९५॥

विधायैवंविधां वापीं सुशुष्कैः परिपूर्यताम् । इन्धनैः परमस्थूलैः कृष्णागरुकचन्दनैः ॥९६॥

प्रचण्डबहलज्वालो ज्वाल्यतामाशुशुक्षणिः । साक्षान्मृत्युरिवोपात्तविग्रहो निर्विलम्बितम् ॥९७॥

अर्थ: यहाँ शीघ्र ही दो पुरुष गहरी और तीन सौ हाथ चौड़ी चौकोन पृथ्वी प्रमाणके अनुसार खोदो और ऐसी वापी बनाकर उसे कालागुरु तथा चन्दनके सूखे और बड़े मोटे ईन्धन परिपूर्ण करो । तदनन्तर उसमें बिना किसी विलम्बके ऐसी अग्नि प्रज्वलित करो कि जिसमें अत्यन्त तीक्ष्ण ज्वालाएँ निकल रही हों तथा जो शरीरधारी साक्षात् मृत्युके समान जान पड़ती हो ॥९५-९७॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा महाकुद्दालपाणिभिः । किङ्करैस्तत्कृतं सर्वं कृतान्तपुरुषोत्तमैः ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर बड़े-बड़े कुदाले जिनके हाथमें थे तथा जो यमराजके सेवकोंसे भी कहीं अधिक थे ऐसे सेवकोंने ‘जो आज्ञा’ कहकर रामकी आज्ञानुसार सब काम कर दिया ॥९८॥


यस्यामेवाथ वेलाया संवादः पद्मसीतयोः । क्रियते किङ्करैर्भीममनुष्ठानं च दाहनम् ॥९९॥

तदनन्तरं शर्वर्यां ध्यानमुत्तममीयुषः । महेन्द्रोदयमेदिन्यां सर्वभूषणयोगिनः ॥१००॥

उपसर्गो महानासीज्जनितः पूर्ववैरतः । अत्यन्तरौद्रराक्षस्या विद्युद्वक्त्राभिधानया ॥१०१॥

अर्थ: अथानन्तर जिस समय राम और सीताका पूर्वोक्त संवाद हुआ था तथा किङ्कर लोग जिस समय अग्नि प्रज्वालनका भयङ्कर कार्य कर रहे थे उसी समयसे लगी हुई रात्रिमें सर्वभूषण मुनिराज महेन्द्रोदय उद्यानकी भूमिमें उत्तम ध्यान कर रहे थे सो पूर्व वैरके कारण विद्युद्वक्त्रा नामकी राक्षसीने उनपर महान् उपसर्ग किया ॥९९-१०१


अपृच्छदथ सम्बन्धं श्रेणिको मुनिपुङ्गवम् । ततो गणधरोऽवोचन्नरेन्द्र श्रूयतामिति ॥१०२॥

अर्थ: तदनन्तर राजा श्रेणिकने गौतमस्वामीसे इनके पूर्व वैरका सम्बन्ध पूछा सो गणधर भगवान् बोले कि हे नरेन्द्र ! सुनो ॥१०२॥


विजयार्द्धोत्तरे वास्ये सर्वपूर्वत्र शोभिते । गुञ्जाभिधाननगरे राजाऽभूत् सिंहविक्रमः ॥१०३॥

तस्य श्रीरित्यभूद्भार्या पुत्रः सकलभूषणः । अष्टौ शतानि तत्कान्ता अग्रा किरणमण्डला ॥१०४॥

अर्थ: विजयार्धपर्वतकी उत्तर श्रेणीमें सर्वत्र सुशोभित गुंजा नामक नगरमें एक सिंहविक्रमनामक राजा रहता था । उसकी रानीका नाम श्री था और उन दोनोंका सकलभूषण नामका पुत्र था । सकलभूषणकी आठ सौ स्त्रियाँ थीं उनमें किरणमण्डला प्रधान स्त्री थी ॥१०३-१०४॥


कदाचित्सा सपत्नीभिरुच्यमाना सुमानसा । चित्रे मैथुनिकं चक्रे देवो हेमशिखाभिधम् ॥१०५॥

तं राजा सहसा वीक्ष्य परमं कोपमागतः । पत्नीभिश्चोच्यमानश्च प्रसादं पुनरागमत् ॥१०६॥

अर्थ: शुद्धहृदयको धारण करनेवाली किरणमण्डलाने किसी समय सपत्नियोंके कहनेपर चित्रपटमें अपने मामाके पुत्र हेमशिख का रूप लिखा उसे देख राजा सहसा परम कोपको प्राप्त हुआ परन्तु अन्य पत्नियोंके कहनेपर वह पुनः प्रसन्नताको प्राप्त हो गया ॥१०५-१०६॥


सम्मदेनान्यदा सुप्ता साध्वी किरणमण्डला । मुहुर्हेमशिखाभिख्यां प्रमादात्समुपाददे ॥१०७॥

श्रुत्वा तां सुतरां क्रुद्धो राजा वैराग्यमागतः । प्राव्राजीत्साऽपि मृत्वाऽभूद्विद्युदास्येति राक्षसी ॥१०८॥

अर्थ: पतिव्रता किरणमण्डला किसी समय हर्ष सहित अपने पतिके साथ सोई हुई थी सो सोते समय प्रमादके कारण उसने बार-बार हेमरथका नाम उच्चारण किया जिसे सुनकर राजा अत्यन्त कुपित हुआ और कुपित होकर उसने वैराग्य धारण कर लिया । उधर किरणमण्डला भी साध्वी हो गई और मरकर विद्युद्वक्त्रा नामकी राक्षसी हुई ॥१०७-१०८॥


तस्य सा भ्रमतो भिक्षां कृत्वा त्रुटितबन्धनम् । मतङ्गजं परिक्रुद्धा प्रत्यूहनिरताऽभवत् ॥१०९॥

गृहदाहं रजोवर्षमश्वोक्षाभिमुखागमम् । कण्टकावृतमार्गत्वं तथा चक्रे दुरीहिता ॥११०॥

अर्थ: जब सकलभूषणमुनि भिक्षाके लिए भ्रमण करते थे तब वह दुष्ट राक्षसी कुपित हो अन्तराय करनेमें तत्पर हो जाती थी । कभी वह मत्त हाथीका बन्धन तोड़ देती थी, कभी घरमें आग लगा देती थी, कभी रजकी वर्षा करने लगती थी, कभी घोड़ा अथवा बैल बनकर उनके सामने आ जाती थी और कभी मार्गको कण्टकोंसे आवृत कर देती थी ॥१०९-११०॥


छित्वाऽन्यदा गृहे सन्धिमेतं प्रतिमया स्थितम् । स्थापयत्यानने तस्य स चौर इति गृह्यते ॥१११॥

मुच्यते च पराभूय परमार्थपराङ्मुखैः । महता जनवृन्देन स्वनता बद्धमण्डलः ॥११२॥

अर्थ: कभी प्रतिमायोगसे विराजमान मुनिराजको, घरमें सन्धि फोड़कर उसके आगे लाकर रख देती थी और यह कहकर पकड़ लेती थी कि यही चोर है तब हल्ला करते हुए लोगोंकी भीड़ उन्हें घेर लेती थी, कुछ परमार्थसे विमुख लोग उनका अनादर कर उसके बाद उन्हें छोड़ देते थे ॥१११-११२॥


कृतभिक्षस्य नियोतः कदाचिन्निजदा स्त्रियः । हारं गलेऽस्य बध्नाति स चौर इति कथ्यते ॥११३॥

अर्थ: कभी आहार कर जब बाहर निकलने लगते तब आहार देनेवाली स्त्रीका हार इनके गलेमें बाँध देती और कहने लगती कि यह चोर है ॥११३॥


अतिक्रूरमनाः पापा एवमादीनुपद्रवान् । चक्रे सा तस्य निर्वेदरहिता सततं परान् ॥११४॥

अर्थ: इस प्रकार अत्यन्त क्रूर हृदयको धारण करनेवाली वह पापिनी राक्षसी निर्वेदसे रोहित हो सदा एकसे बढ़कर उपसर्ग करती रहती थी ॥११४॥


ततोऽस्य प्रतिमास्थस्य महेन्द्रोद्यानगोचरे । उपसर्गं परं चक्रे पूर्ववैरानुबन्धतः ॥११५॥

अर्थ: तदनन्तर यही मुनिराज महेन्द्रोदयनामा उद्यानमें प्रतिमा योगसे विराजमान थे सो उस राक्षसीने पूर्व वैरके संस्कारसे उनपर परम उपसर्ग किया ॥११५॥


वेतालैः करिभिः सिंहैर्व्याघ्रैरुग्रैर्महोरगैः । नानारूपैर्गुणैर्दिव्यनारीदर्शनलोचनैः ॥११६॥

अर्थ: वह कभी वेताल बनकर कभी हाथी सिंह व्याघ्र तथा भयङ्कर सर्प होकर और कभी नानाप्रकारके गुणोंसे दिव्य स्त्रियोंका रूप दिखाकर उपसर्ग किया ॥११६॥


उपद्रवैर्यदाऽर्मीभिः स्खलितं नास्य मानसम् । तदा तस्य मुनीन्द्रस्य ज्ञानं केवलमुद्गतम् ॥११७॥

अर्थ: परन्तु जब इन उपसर्गोंसे इनका मन विचलित नहीं हुआ तब इन मुनिराजको केवलज्ञान उत्पन्न हो गया ॥११७॥


ततः केवलसम्भूतिमहिमाहितमानसाः । सुरासुराः समायाताः सुनाशीरपुरःसराः ॥११८॥

अर्थ: तदनन्तर केवलज्ञान उत्पन्न होनेकी महिमामें जिनका मन लग रहा था ऐसे इन्द्रष्ट आदि समस्त सुर असुर वहाँ आये ॥११८॥


स्तम्बेरमैर्मृगाधीशैः स्थूरीपृष्ठैः क्रमेलकैः । बालेयैरुरुभिर्व्याघ्रैः शरभैः सृमरैः खगैः ॥११९॥

विमानैः स्यन्दनैर्युग्यैर्यानैरन्यैश्च चारुभिः । ज्योतिःपथं समासाद्य महासम्पत्समन्विताः ॥१२०॥

पवनोद्धूतसत्केशवस्त्रकेतनपंक्तयः । मौलिकुण्डलहारांशुसमुद्योतितपुष्करा ॥१२१॥

अर्थ: हाथी, सिंह, घोड़े, ऊँट, गधे, बड़े-बड़े व्याघ्र, अष्टापद, सामर, पक्षी, विमान, रथ, बैल, तथा अन्य अन्य सुन्दर वाहनोंसे आकाशको आच्छादित कर सब लोग अयोध्याकी ओर आये । जिनके केश, वस्त्र तथा पताकाओंकी पङ्क्तियाँ वायुसे हिल रहीं थीं तथा जिनके मुकुट, कुण्डल और हारकी किरणोंसे आकाश प्रकाशमान हो रहा था ॥११९-१२१॥


अप्सरोगणसङ्कीर्णाः साकेताभिमुखाः सुराः । अवतेरुरलं हृष्टाः पश्यन्तो धरणीतलम् ॥१२२॥

अर्थ: जो अप्सराओंके समूहसे व्याप्त थे तथा जो अत्यन्त हर्षित हो पृथिवीतलको अच्छी तरह देख रहे थे ऐसे देव लोग नीचे उतरे ॥१२२॥


अवलोक्य ततः सीतावृत्तान्तं मेषकेतनः । शक्रं जगाद देवेन्द्र पश्येदमपि दुष्करम् ॥१२३॥

अर्थ: तदनन्तर सीताका वृत्तान्त देख मेषकेतु नामक देवने अपने इन्द्रसे कहा कि हे देवेन्द्र ! जरा इस अत्यन्त कठिन कार्यको भी देखो ॥१२३॥


सुराणामपि दुःस्पर्शो महाभयसमुद्भवः । सीताया उपसर्गोऽयं कथं नाथ प्रवर्त्तते ॥१२४॥

श्राविकायाः सुशीलायाः परमस्वच्छचेतसः । दुरीक्ष्यः कथमेतस्या जायतेऽयमुपप्लवः ॥१२५॥

अर्थ: हे नाथ ! देवोंको भी जिसका स्पर्श करना कठिन है तथा जो महाभयका कारण है ऐसा यह सीताका उपसर्ग क्यों हो रहा है ? सुशील एवं अत्यन्त स्वच्छ हृदयको धारण करनेवाली इस श्राविकाके ऊपर यह दुरीक्ष्य उपद्रव क्यों हो रहा है ? ॥१२४-१२५॥


आखण्डलस्ततोऽवोचदहं सकलभूषणम् । त्वरितं वन्दितुं यामि कर्त्तव्यं त्वमिहाश्रय ॥१२६॥

अर्थ: तदनन्तर इन्द्रने कहा कि मैं सकलभूषण केवलीकी वन्दना करनेके लिए शीघ्रतासे जा रहा हूँ इसलिए यहाँ जो कुछ करना योग्य हो वह तुम करो ॥१२६॥


अभिधायेति देवेन्द्रो महेन्द्रोदयसम्मुखम् । ययावेषोऽपि मेषाङ्कः सीतास्थानमुपागमत् ॥१२७॥

अर्थ: इतना कहकर इन्द्र महेन्द्रोदय उद्यानके सन्मुख चला और यह मेषकेतु देव सीताके स्थान पर पहुँचा ॥१२७॥


तत्र व्योमतलस्थोऽसौ विमानशिखरे स्थितः । सुमेरुशिखरच्छाये समुद्योतयते दिशाम् ॥१२८॥

अर्थ: वहाँ यह आकाशतलमें सुमेरुके शिखरके समान कान्तिसे युक्त दिशाओंको प्रकाशित करने लगा । विमानके शिखरपर स्थित हुआ ॥१२८॥


… । रविरिव विराजमानः सर्वजनमनोहरं स पश्यति रामम् ॥१२९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि उस विमानकी शिखरपर सूर्यके समान सुशोभित होनेवाले उस मेषकेतु देवने वहींसे सर्वजन मनोहारी रामको देखा ॥१२९॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे सकलभूषणदेवागमनाभिधानं नाम चतुरुत्तरशतं पर्व ॥१०४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध श्रीरविषेणाचार्य द्वारा कथित श्री पद्मपुराणमें सकलभूषणके केवलज्ञानोत्सवमें देवोंके आगमनका वर्णन करनेवाला एकसौचौथा पर्व समाप्त हुआ ॥१०४॥

१०५. पञ्चोत्तरशतं पर्व (रामधर्मश्रवणाभिधानं)

तां निरीक्ष्य ततो वापीं तृणकाष्ठप्रपूरिताम् । समाकुलमना दध्याविति काकुत्स्थचन्द्रमाः ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर तृण और काष्ठसे भरी उस वापीको देख श्रीराम व्याकुलचित्त होते हुए इस प्रकार विचार करने लगे कि ॥१॥


कुतः पुनरिमां कान्तां पश्येयं गुणतूणिकाम् । महालावण्यसम्पन्नां द्युतिशीलपरावृताम् ॥२॥

अर्थ: गुणोंकी पुञ्ज, महा सौन्दर्यसे सम्पन्न एवं कान्ति और शीलसे युक्त इस कान्ताको अब पुनः कैसे देख सकूँगा ॥२॥


विकासिमालतीमालासुकुमारशरीरिका । नूनं यास्यति विध्वंसं स्पृष्टमात्रेव वह्निना ॥३॥

अर्थ: खिली हुई मालतीकी मालाके समान सुकुमार शरीरको धारण करनेवाली यह कान्ता निश्चित ही अग्निके द्वारा स्पृष्ट होते ही नाशको प्राप्त हो जायगी ॥३॥


अभविष्यदियं नो चेत्कुले जनकभूभृतः । परिवादमिमं नाप्स्यन्मरणं च हुताशने ॥४॥

अर्थ: यदि यह राजा जनकके कुलमें उत्पन्न नहीं हुई होती तो इस लोकापवादको तथा अग्निमें मरणको प्राप्त नहीं होती ॥४॥


उपलप्स्ये कुतः सौख्यं क्षणमप्यनया विना । वरं वासोऽनयाऽरण्ये न विना दिवि राजते ॥५॥

अर्थ: इसके बिना मैं क्षण भरके लिए भी और किससे सुख प्राप्त कर सकूँगा ? इसके साथ वनमें निवास करना भी अच्छा है पर इसके बिना स्वर्गमें रहना भी शोभा नहीं देता ॥५॥


महानिश्चिन्तचित्तेयमपि मर्त्तुं व्यवस्थिता । प्रविशन्तीं कृतास्थाग्निं रोद्धुं लोकस्य लज्यते ॥६॥

अर्थ: यह भी महा निश्चिन्तहृदया है कि मरनेके लिए उद्यत हो गई। अब दृढ़ताके साथ अग्निमें प्रवेश करनेवाली है सो इसे कैसे रोका जाय ? लोगोंके समक्ष रोकनेमें लज्जा उत्पन्न हो रही है ॥६॥


उन्मुक्तसुमहाशब्दः सिद्धार्थः क्षुल्लकोऽप्ययम् । तूष्णीं स्थितः किमु व्याजं करोम्येतन्निवर्त्तते ॥७॥

अर्थ: उस समय बड़े जोरसे हल्ला करनेवाला यह सिद्धार्थ नामक क्षुल्लक भी चुप बैठा है,अतः इसे रोकनेमें क्या बहाना करूँ ? ॥७॥


अथ वा येन यादृक्षं मरणं समुपार्जितम् । नियमं स तदाऽऽप्नोति कस्तद्वारयितुं क्षमः ॥८॥

अर्थ: अथवा जिसने जिस प्रकारके मरणका अर्जन किया है नियमसे वह उसी मरणको प्राप्त होता है उसे रोकनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥८॥


तदाऽपह्रियमाणाया ऊर्ध्वं क्षारमहोदधेः । मदनुव्रतचित्ताया नेच्छत्येषेति कोपिना ॥९॥

लङ्काधिपतिना किं नालुममस्याः शिरोऽसिना । येनाऽयमपरः प्रातः संशयोऽत्यन्तदुस्तरः ॥१०॥

अर्थ: उस समय जब कि यह पतिव्रता लवण समुद्रके ऊपर हरकर ले जाई जा रही थी तब ‘यह मुझे नहीं चाहती है’ इस भावसे कुपित हो रावणने खड्गसे इसका शिर क्यों नहीं काट डाला ? जिससे कि यह इस अत्यन्त दुस्तर संशयको प्राप्त हुई है ॥९-१०॥


वरं हि मरणं श्लाघ्यं न वियोगः सुदुःसहः । श्रुतिस्मृतिहरोऽसौ हि परमः कोऽपि निन्दितः ॥११॥

अर्थ: मर जाना अच्छा है परन्तु दुःसह वियोग अच्छा नहीं है क्योंकि श्रुति तथा स्मृतिको हरण करनेवाला वियोग कोई अत्यन्त निन्दित पदार्थ है ॥११॥


यावज्जीवं हि विरहस्तापं यच्छति चेतसः । मृतेति छिद्यते स्वैरं कथाकांक्षा च तद्गता ॥१२॥

अर्थ: विरह तो जीवन-पर्यन्तके लिए चित्तका संपता प्रदान करता रहता है और ‘मर गई’ यह सुन उस सम्बन्धी कथा और इच्छा तत्काल छूट जाती है ॥१२॥


इति चिन्तातुरे तस्मिन् वाप्यां प्रज्वाल्यतेऽनलः । समुत्पन्नोरुकारुण्या रुरुदुर्नरयोषितः ॥१३॥

अर्थ: इस प्रकार रामके चिन्तातुर होनेपर वापीमें अग्नि जलाई जाने लगी। दयावती स्त्रियाँ रो उठीं ॥१३॥


ततोऽन्धकारितं व्योम धूमेन घनमुद्यता । अभूदकालसम्प्राप्तप्रावृट्मेघैरिवावृतम् ॥१४॥

अर्थ: तदनन्तर अत्यधिक उठते हुए धूमसे आकाश अन्धकारयुक्त हो गया और ऐसा जान पड़ने लगा मानो असमयमें प्राप्त हुए वर्षाकालीन मेघोंसे ही व्याप्त हो गया हो ॥१४॥


भृङ्गात्मकमिवोद्भूतं जगदन्यदिदं तदा । कोकिलात्मकमाहोस्विदाहो पारावतात्मकम् ॥१५॥

अर्थ: उस समय जगत् ऐसा जान पड़ने लगा मानो भ्रमरोंसे युक्त, कोकिलाओंसे युक्त अथवा कबूतरोंसे युक्त दूसरा ही जगत् उत्पन्न हुआ है ॥१५॥


अशक्नुवन्निव द्रष्टुमुपसर्गं तथाविधम् । दयार्द्रहृदयः शीघ्रं भानुः क्वापि तिरोदधे ॥१६॥

अर्थ: सूर्य आच्छादित हो गया सो ऐसा जान पड़ता था मानो दयासे आर्द्र हृदय होनेके कारण उस प्रकारके उपसर्गको देखनेके लिए असमर्थ होता हुआ शीघ्र ही कहीं जा छिपा हो ॥१६॥


जज्वालज्वलनश्चोग्रः सर्वाशासु महाजवः । गव्यूतिपरिमाणाभिर्ज्वालाभिर्विकरालितः ॥१७॥

अर्थ: उस वापीमें ऐसी भयङ्कर अग्नि प्रज्वलित हुई कि समस्त दिशाओंमें जिसका महावेग फैल रहा था और जो कोशों प्रमाण लम्बी-लम्बी ज्वालाओंसे विकराल थी ॥१७॥


किं निरन्तरतीव्रांशुसहस्रैश्छादितं नभः । पातालकिंशुकागौघाः सहसा किं समुत्थिताः ॥१८॥

आहोस्विद्गगनं प्राप्तमुत्पातमयसन्ध्यया । हाटकात्मकमेकं तु प्रारब्धं भवितुं जगत् ॥१९॥

सौदामिनीमयं किन्नु सञ्जातं भुवनं तदा । जिगीषया परो जातः किमु जङ्गममन्दरः ॥२०॥

अर्थ: उस समय उस अग्निको देख इस प्रकार संशय उत्पन्न होता था कि क्या एक साथ उदित हुए हजारों सूर्योंसे आकाश आच्छादित हो रहा है ? अथवा पाताललोकके पलाश वृक्षोंका समूह क्या सहसा ऊपर उठ आया है ? अथवा आकाशको क्या प्रलयकालीन सन्ध्याने घेर लिया है ? अथवा यह समस्त जगत् एक सुवर्णरूप होनेकी तैयारी कर रहा है अथवा समस्त संसार बिजलीमय हो रहा है अथवा जीतनेकी इच्छासे क्या दूसरा चलता-फिरता मेरु ही उत्पन्न हुआ है ? ॥१८-२०॥


ततः सीता समुत्थाय नितान्तस्थिरमानसा । कायोत्सर्गं क्षणं कृत्वा स्तुत्वा भावार्पितान् जिनान् ॥२१॥

ऋषभादीन्नमस्कृत्य धर्मतीर्थस्य देशकान् । सिद्धान् समस्तसाधूंश्च सुव्रतं च जिनेश्वरम् ॥२२॥

यस्य संसेव्यते तीर्थं तदा सम्मदधारिभिः । परमैश्वर्यसंयुक्तैस्त्रिदशासुरमानवैः ॥२३॥

सर्वप्राणिहिताऽऽचार्यचरणौ च मनःस्थितौ । प्रणम्योदारगम्भीरा विनीता जानकी जगौ ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका मन अत्यन्त दृढ़ था ऐसी सीताने उठकर क्षणभरके लिए कायोत्सर्ग किया, भावनासे प्राप्त जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति की, ऋषभादि तीर्थंकरोंको नमस्कार किया, सिद्ध परमेष्ठी, समस्त साधु और मुनिसुव्रत जिनेन्द्र, जिनके कि तीर्थकी उस समय हर्षके धारक एवं परम ऐश्वर्यसे युक्त देव असुर और मनुष्य सदा सेवा करते हैं और मनमें स्थित सर्वप्राणि हितैषी आचार्यके चरणयुगल इन सबको नमस्कार कर उदात्त गाम्भीर्य और अत्यधिक विनयसे युक्त सीताने कहा ॥२१-२४॥


कर्मणा मनसा वाचा रामं मुक्त्वा परं नरम् । समुद्वहामि न स्वप्नेऽप्यन्यं सत्यमिदं मम ॥२५॥

अर्थ: कि मैंने रामको छोड़कर किसी अन्य मनुष्यको स्वप्नमें भी मन-वचन और कायसे धारण नहीं किया है यह मेरा सत्य है ॥२५॥


यद्येतदनृतं वच्मि तदा मामेष पावकः । भस्मसाद्भावमप्राप्तामपि प्रापयतु क्षणात् ॥२६॥

अर्थ: यदि मैं यह मिथ्या कह रही हूँ तो यह अग्नि दूर रहने पर भी मुझे क्षण भरमें भस्मभावको प्राप्त करा दे - राखका ढेर बना दे ॥२६॥


अथ पद्माक्षरं नान्यं मनसाऽपि वहाम्यहम् । ततोऽयं ज्वलनो धाक्षीन्मा मां शुद्धिसमन्विताम् ॥२७॥

अर्थ: और यदि मैंने रामके सिवाय किसी अन्य मनुष्यको मनसे भी धारण नहीं किया है तो विशुद्धिसे सहित मुझे यह अग्नि नहीं जलावे ॥२७॥


मिथ्यादर्शनिनीं पापां क्षुद्रिकां व्यभिचारिणीम् । ज्वलनो मां दहत्येष सतीं व्रतस्थितां तु मा ॥२८॥

अर्थ: यदि मैं मिथ्यादृष्टि, पापिनी, क्षुद्रा और व्यभिचारिणी होऊँगी तो यह अग्नि मुझे जला देगी और यदि सदाचारमें स्थित सती होऊँगी तो नहीं जला सकेगी ॥२८॥


अभिधायेति सा देवि प्रविवेशानलं च तम् । जातं च स्फटिकस्वच्छं सलिलं सुखशीतलम् ॥२९॥

अर्थ: इतना कहकर उस देवीने उस अग्निमें प्रवेश किया परन्तु आश्चर्यकी बात कि वह अग्नि स्फटिकके समान स्वच्छ, सुखदायी तथा शीतल जल हो गई ॥२९॥


भित्त्वेव सहसा क्षोणीं तरसा पयसोद्यता । परमं पूरिता वापी रङ्गद्भङ्गकुलाऽभवत् ॥३०॥

अर्थ: मानो सहसा पृथिवीको फोड़ कर वेगसे उठते हुए जलसे वह वापिका लबालब भर गई तथा चञ्चल तरङ्गोंसे व्याप्त हो गई ॥३०॥


नोल्मुकानि न काष्ठानि नाङ्गारा न तृणादिकम् । आलोक्यते तदा तत्र वृत्तपावकसूचनम् ॥३१॥

अर्थ: वहाँ अग्नि थी इस बातकी सूचना देने वाले न लूगर, न काष्ठ, न अंगार और न तृणादिक कुछ भी दिखाई देते थे ॥३१॥


पर्यन्तबद्धफेनौघवलया वेगशालिनः । आवर्तास्तत्र संवृद्धा गम्भीरा भीमदर्शनाः ॥३२॥

अर्थ: उस वापिकामें ऐसी भयंकर भँवरें उठने लगीं जिनके कि चारों ओर फेनोंके समूह चक्कर लगा रहे थे जो अत्यधिक वेगसे सुशोभित थीं तथा अत्यन्त गंभीर थीं ॥३२॥


भवन्मृदङ्गनिस्वानात् क्वचिद् गुलुगुलायते । भुंभुंद्भुम्भायतेऽन्यत्र क्वचित् पटपटायते ॥३३॥

अर्थ: कहीं मृदङ्ग जैसा शब्द होनेसे ‘गुलु गुल’ शब्द होने लगा, कहीं 'भुं भुंद्भुंभ’की ध्वनि उठने लगी और कहीं 'पट पट’की आवाज आने लगी ॥३३॥


क्वचिन्मुञ्चति हुङ्कारान्धूंकारान्क्वचिदायतान् । क्वचिद्दिमिदिमिस्वानान् जुगुधुद्धुदिति क्वचित् ॥३४॥

क्वचित्कलकलारावांच्छसद्भसदिति क्वचित् । टुटु घण्टासमुद्घुष्टमिति क्वचिदितीति च ॥३५॥

अर्थ: उस वापीमें कहीं हुँकार, कहीं लम्बी-चौड़ीं धूंकार, कहीं दिमिदिमि, कहीं जुगुद् जुगुद्, कहीं कल कल ध्वनि, कहीं शसद्-भसद्, और कहीं चांदीके घण्टा जैसी आवाज आ रही थी ॥३४-३५॥


एवमादिपरिक्षुब्धसागराकारनिःस्वना । क्षणाद्रोधःस्थितं वापी लग्ना प्लावयितुं जनम् ॥३६॥

अर्थ: इस प्रकार जिसमें क्षोभको प्राप्त हुए समुद्रके समान शब्द उठ रहा था ऐसी वह वापी क्षणभरमें तटपर स्थित मनुष्योंको डुबाने लगी ॥३६॥


जानुमात्रं क्षणादम्भः श्रोणिदघ्नमभूत्क्षणात् । पुनर्निमेषमात्रेण स्तनद्वयसतां गतम् ॥३७॥

अर्थ: वह जल क्षणभरमें घुटनोंके बराबर, फिर नितम्बके बराबर, फिर निमेष मात्रमें स्तनोंके बराबर हो गया ॥३७॥


नैति पौरुषतां यावत्तावत्त्रस्ता महीचराः । किङ्कर्त्तव्यातुरा जाताः खेचरा वियदाश्रिताः ॥३८॥

अर्थ: वह जल पुरुष प्रमाण नहीं हो पाया कि उसके पूर्व ही पृथिवी पर चलने वाले लोग भयभीत हो उठे तथा क्या करना चाहिए इस विचारसे दुखी विद्याधर आकाशमें जा पहुँचे ॥३८॥


कण्ठस्पर्शि ततो जाते वारिण्युरुजवान्विते । विह्वलाः सङ्गता मञ्चास्तेऽपि चञ्चत्कतां गताः ॥३९॥

अर्थ: तदनन्तर तीव्र वेगसे युक्त जल जब कण्ठका स्पर्श करने लगा तब लोग व्याकुल हो कर मंचोंपर चढ़ गये किन्तु थोड़ी देर बाद वे मञ्च भी डूब गये ॥३९॥


केचित् प्लवितुमारब्धा जातेंभसि शिरोतिगे । वस्त्रडिंभकसम्बन्धसन्दिग्धोर्ध्वैकबाहुगाः ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर जब वह जल शिरको उल्लंघन कर गया तब कितने ही लोग तैरने लगे। उस समय उनकी एक भुजा वस्त्र तथा बच्चोंको संभालनेके लिए ऊपरकी ओर उठ रही था ॥४०॥


त्रायस्त्र देवि त्रायस्व मान्ये लक्ष्मि सरस्वति । महाकल्याणि धर्माढ्ये सर्वप्राणिहितैषिणि ॥४१॥

अर्थ: "हे देवि ! रक्षा करो, हे मान्ये ! हे लक्ष्मि ! हे सरस्वति ! हे महाकल्याणि ! हे धर्मसहिते ! हे सर्वप्राणि-हितैषिणि ! रक्षा करो ॥४१॥


दयां कुरु महासाध्वि मुनिमानसनिर्मले । इति वाचो विनिश्चेरुर्वारिविह्वललोकतः ॥४२॥

अर्थ: हे महापतिव्रते ! हे मुनिमानसनिर्मले ! दया करो । इस प्रकार जलसे भयभीत मनुष्योंके मुखसे शब्द निकल रहे थे ॥४२॥


ततः सरसिरुङ्गर्भकोमलं नखभावितम् । स्पृष्ट्वा वापीवधूरूर्मिहस्तैः पद्मक्रमद्वयम् ॥४३॥

प्रशान्तकलुषावर्त्ता त्यक्तभीषणनिस्वना । क्षणेन सौम्यतां प्राप्ता ततो लोकोऽभवत्सुखी ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर वापीरूपी वधू, तरङ्गरूपी हाथोंके द्वारा कमलके मध्यभागके समान कोमल एवं नखोंसे सुशोभित रामके चरणयुगलका स्पर्शकर क्षणभरमें सौम्यदशाको प्राप्त हो गई । उसकी मलिन भँवरें शान्त हो गईं और उसका भयंकर शब्द छूट गया । इससे लोग भी सुखी हुए ॥४३-४४॥


उत्पलैः कुमुदैः पद्मैः संछन्ना साऽभवत्क्षणात् । सौरभ्यर्चाबभृंगौघसङ्गीतकमनोहरा ॥४५॥

अर्थ: वह वापी क्षण भरमें नील कमल, सफेद कमल तथा सामान्य कमलोंसे व्याप्त हो गई और सुगन्धिसे मदोन्मत्त भ्रमर समूहके संगीतसे मनोहर दिखने लगी ॥४५॥


क्रौंचानां चक्रवाकानां हंसानां च कदम्बकैः । तथा कादम्बकादीनां सुस्वनानां विराजिता ॥४६॥

अर्थ: सुन्दर शब्द करनेवाले क्रौञ्च, चक्रवाक, हंस तथा बदक आदि पक्षियोंके समूहसे सुशोभित हो गई ॥४६॥


मणिकाञ्चनसोपानैर्वीचीसन्तानसन्निभिः । पुष्पैर्मरकतच्छायाकोमलैश्चातिसत्तटा ॥४७॥

अर्थ: मणि तथा स्वर्ण निर्मित सीढ़ियों और लहरोंके बीचमें स्थित मरकतमणिकी कान्तिके समान कोमल पुष्पोंसे उसके किनारे अत्यन्त सुन्दर दिखने लगे ॥४७॥


उत्तस्थावथ मध्येऽस्या विपुलं विमलं शुभम् । सहस्रच्छदनं पद्मविकचं विकटं मृदु ॥४८॥

नानाभक्तिपरीतांगं रत्नोद्योतांशुकावृतम् । आसीत्सिंहासनं तस्य मध्ये तुल्येन्दुमण्डलम् ॥४९॥

अर्थ: अथानन्तर उस वापीके मध्यमें एक विशाल, विमल, शुभ, खिला हुआ तथा अत्यन्त कोमल सहस्र दल कमल प्रकट हुआ और उस कमलके मध्यमें एक ऐसा सिंहासन स्थित हुआ कि जिसका आकार नानाप्रकारके बेल-बूटोंसे व्याप्त था, जो रत्नोंके प्रकाश रूपी वस्त्रसे वेष्टित था, और कान्तिसे चन्द्रमण्डलके समान था ॥४८-४९॥


तत्रामरवरस्त्रीभिर्मा भैषीरिति सान्त्विता । सीताऽवस्थापिता रेजे श्रीरिवात्यद्भुतोदया ॥५०॥

अर्थ: तदनन्तर ‘डरो मत’ इसप्रकार उत्तम देवियाँ जिसे सान्त्वना दे रहीं थीं ऐसी सीता सिंहासन पर बैठाई गई । उस समय आश्चर्यकारी अभ्युदयको धारण करनेवाली सीता लक्ष्मीके समान सुशोभित हो रही थी ॥५०॥


कुसुमाञ्जलिभिः सार्द्धं साधु साध्विति निःस्वनः । गगनस्थैः समुत्सृष्टस्तुष्टैर्देवकदम्बकैः ॥५१॥

अर्थ: आकाशमें स्थित देवोंके समूहने संतुष्ट होकर पुष्पाञ्जलियोंके साथ-साथ ‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा,’ यह शब्द छोड़े ॥५१॥


जुगुंजुर्मंजवो गुंजा विनेदुः पटहाः पटु । नान्द्यो ननन्दुरायातं चक्रणुः काहलाः कलम् ॥५२॥

अशब्दायन्त शङ्खौघा धीरं तूर्याणि दध्वनुः । ववणुर्विशदं वंशाः कांसतालानि चक्रणुः ॥५३॥

अर्थ: गुँजा नामके मनोहर वादित्र गूँजने लगे, नगाड़े जोरदार शब्द करने लगे, नान्दी लोग अत्यधिक हर्षित हो उठे, काहल मधुर शब्द करने लगे, शङ्खोंके समूह बज उठे, तूर्य गम्भीर शब्द करने लगे, बाँसुरी स्पष्ट शब्द कर उठीं तथा काँसेकी झाँझें मधुर शब्द करने लगीं ॥५२-५३॥


वल्गिता क्ष्वेडितोद्घुष्टकुष्टादिकरणोद्यताः । तुष्टा ननृतुरन्योन्यश्लिष्टा वैद्याधरा गणाः ॥५४॥

अर्थ: वल्गित, क्ष्वेडित, उद्घुष्ट तथा कुष्ट आदिके करनेमें तत्पर, संतोषसे युक्त विद्याधरोंके समूह परस्पर एक दूसरेसे मिलकर नृत्य करने लगे ॥५४॥


श्रीमज्जनकराजस्य तनया परमोदया । श्रीमतो बलदेवस्य पत्नी विजयतेतराम् ॥५५॥

अर्थ: सब ओरसे यही ध्वनि आकाश और पृथिवीके अन्त- रालको व्याप्त कर उठ रही थी कि श्रीमान् राजा जनककी पुत्री और श्रीमान् बलभद्र श्रीरामकी परम अभ्युदयवती पत्नीकी जय हो ॥५५॥


अहो चित्रमहो चित्रमहो शीलं सुनिर्मलम् । एवं स्वनः समुत्तस्थौ रोदसी प्राप्य सर्वतः ॥५६॥

अर्थ: अहो बड़ा आश्चर्य है, बड़ा आश्चर्य है इसका शील अत्यन्त निर्मल है ॥५५-५६॥


ततोऽकृत्रिमसावित्रीस्नेहसम्मग्नमानसौ । तीर्त्वा ससम्भ्रमौ प्राप्तौ जानकीं लवणाङ्कुशौ ॥५७॥

अर्थ: तदनन्तर माताके अकृत्रिम स्नेहमें जिनके हृदय डूब रहे थे ऐसे लवण और अंकुश शीघ्रतासे जलको तैर कर सीताके पास पहुँच गये ॥५७॥


स्थितौ च पार्श्वयोः पद्मपुत्रप्रीतिप्रवृद्धया । समाश्वास्य समाघ्रातौ मस्तके प्रणताङ्गकौ ॥५८॥

अर्थ: पुत्रोंकी प्रीतिसे बढ़ी हुई सीताने आश्वासन देकर जिनके मस्तक पर सूंघा था तथा जिनका शरीर विनयसे नम्रीभूत था ऐसे दोनों पुत्र उसके दोनों ओर खड़े हो गये ॥५८॥


जाम्बूनदमयीयष्टिमिव शुद्धां हुताशने । अत्युत्तमप्रभाचक्रपरिवारितविग्रहाम् ॥५९॥

मैथिलीं राघवो वीक्ष्य कमलालयवासिनीम् । महानुरागरक्तात्मा तदन्तिकमुपागमत् ॥६०॥

अर्थ: अग्निमें शुद्ध हुई स्वर्णमय यष्टिके समान जिसका शरीर अत्यधिक प्रभाके समूहसे व्याप्त था तथा जो कमल रूपी गृहमें निवास कर रही थी ऐसी सीताको देख बहुत भारी अनुरागसे अनुरक्त चित्त होते हुए राम उसके पास गये ॥५९-६०॥


जगौ च देवि कल्याणि प्रसीदोत्तमपूजिते । शरत्सम्पूर्णचन्द्रास्ये महाद्भुतविचेष्टिते ॥६१॥

अर्थ: और बोले कि हे देवि ! प्रसन्न होओ, तुम कल्याणवती हो, उत्तम मनुष्योंके द्वारा पूजित हो, तुम्हारा मुख शरद् ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान है, तथा तुम अत्यन्त अद्भुत चेष्टाकी करनेवाली हो ॥६१॥


कदाचिदपि नो भूयः करिष्याम्याग ईदृशम् । दुःखं वा ते ततोऽतीतं दोषं मे साध्वि मर्षय ॥६२॥

अर्थ: अब ऐसा अपराध फिर कभी नहीं करूँगा अथवा अब तुम्हारा दुःख बीत चुका है । हे साध्वि ! मेरा दोष क्षमा करो ॥६२॥


योषिदष्टसहस्राणामपि त्वं परमेश्वरी । स्थिता मूर्ध्नि ददस्स्वाज्ञां मय्यपि प्रभुतां कुरु ॥६३॥

अर्थ: तुम आठ हजार स्त्रियोंकी परमेश्वरी हो । उनके मस्तक पर विद्यमान हो, आज्ञा देओ और मेरे ऊपर भी अपनी प्रभुता करो ॥६३॥


अज्ञानप्रवणीभूतचेतसा मयकेदृशम् । किंवदन्तीभयात्सृष्टं कष्टं प्राप्ताऽसि यत्सति ॥६४॥

अर्थ: हे सति ! जिसका चित्त अज्ञानके अधीन था ऐसे मेरे द्वारा लोकापवादके भयसे दिया दुःख तुमने प्राप्त किया है ॥६४॥


सकाननवनामेतां सखेचरजनां महीम् । समुद्रान्तां मया साकं यथेष्टं विचर प्रिये ॥६५॥

अर्थ: हे प्रिये ! अब बन-अटवी सहित तथा विद्याधरोंसे युक्त इस समुद्रान्त पृथिवीमें मेरे साथ इच्छानुसार विचरण करो ॥६५॥


पूज्यमाना समस्तेन जगता परमादरम् । त्रिविष्टपसमान् भोगान् भावय स्वमहीतले ॥६६॥

अर्थ: समस्त जगत्के द्वारा परम आदर पूर्वक पूजी गई तुम, अपने पृथिवी तल पर देवोंके समान भोगोंको भोगो ॥६६॥


उद्यद्भास्करसङ्काशं पुष्पकं कामगत्वरम् । आरूढा मेरुसानूनि पश्य देवि समं मया ॥६७॥

अर्थ: हे देवि ! उदित होते हुए सूर्यके समान तथा इच्छानुसार गमन करनेवाले पुष्पक विमान पर आरूढ़ हो तुम मेरे साथ सुमेरुके शिखरोंको देखो अर्थात् मेरे साथ सर्वत्र भ्रमण करो ॥६७॥


तेषु तेषु प्रदेशेषु भवतीचित्तहारिषु । क्रियतां रमणं कान्ते मया वचनकारिणा ॥६८॥

अर्थ: हे कान्ते ! जो जो स्थान तुम्हारे चित्तको हरण करने वाले हैं उन उन स्थानोंमें मुझ आज्ञाकारीके साथ यथेच्छ क्रीड़ा की जाय ॥६८॥


विद्याधरवरस्त्रीभिः सुरस्त्रीभिरिवावृता । मनस्विनि भजैश्वर्यं सद्यः सिद्धमनीषिता ॥६९॥

अर्थ: हे मनस्विनि ! देवाङ्गनाओंके समान विद्याधरोंकी उत्कृष्ट स्त्रियोंसे घिरी रह कर तुम शीघ्र ही ऐश्वर्यका उपभोग करो । तुम्हारे सब मनोरथ सिद्ध हुए हैं ॥६९॥


दोषाब्धिमग्नकस्यापि विवेकरहितस्य मे । उपसन्नस्य सुश्लाघ्ये प्रसीद क्रोधमुत्सृज ॥७०॥

अर्थ: हे प्रशंसनीये ! मैं दोष रूपी सागरमें निमग्न हूँ तथा विवेकसे रहित हूँ । अब तुम्हारे समीप आया हूँ सो प्रसन्न होओ और क्रोधका परित्याग करो ॥७०॥


ततो जगाद वैदेही राजन्नैवास्मि कस्यचित् । कुपिता किं विषादं त्वमीदृशं समुपागतः ॥७१॥

अर्थ: तदनन्तर सीताने कहा कि हे राजन् ! मैं किसी पर कुपित नहीं हूँ, तुम इस तरह विषाद को क्यों प्राप्त हो रहे हो ? ॥७१॥


न कश्चिदत्र ते दोषस्तीब्रो जानपदो न च । स्वकर्मणा फलं दत्तमिदं मे परिपाकिना ॥७२॥

अर्थ: इसमें न तुम्हारा दोष है न देशके अन्य लोगोंका । यह तो परि पाकमें आनेवाले अपने कर्मके द्वारा दिया हुआ फल है ॥७२॥


बलदेव प्रसादात्ते भोगा भुक्ताः सुरोपमाः । अधुना तदहं कुर्वे जाये स्त्री न यतः पुनः ॥७३॥

अर्थ: हे बलदेव ! मैंने तुम्हारे प्रसादसे देवोंके समान भोग भोगे हैं इसलिए उनकी इच्छा नहीं । अब तो वह काम करूँगी जिससे फिर स्त्री न होना पड़े ॥७३॥


एतैर्विनाशिभिः क्षुद्रैरवसन्नैः सुदारुणैः । किं वा प्रयोजनं भोगैर्मूढमानवसेवितैः ॥७४॥

अर्थ: इन विनाशी, क्षुद्र प्राप्त हुए आकुलतामय अत्यन्त कठोर एवं मूर्ख मनुष्यों के द्वारा सेवित इन भोगोंसे मुझे क्या प्रयोजन है ? ॥७४॥


योनिलक्षाध्वसङ्क्रान्त्या खेदं प्राप्ताऽस्म्यनुत्तमम् । साहं दुःखक्षयाकांक्षा दीक्षां जैनेश्वरीं भजे ॥७५॥

अर्थ: लाखों योनियोंके मार्गमें भ्रमण करती करती इस भारी दुःखको प्राप्त हुई हूँ । अब मैं दुःखोंका क्षय करनेकी इच्छासे जैनेश्वरी दीक्षा धारण करती हूँ ॥७५॥


इत्युक्त्वाऽभिनवाशोकपल्लवोपमपाणिना । मूर्द्धजान् स्वयमुद्धृत्य पद्मायाऽर्पयदस्पृहा ॥७६॥

अर्थ: यह कह उसने निःस्पृह हो अशोकके नवीन पल्लव तुल्य हाथसे स्वयं केश उखाड़ कर रामके लिए दे दिये ॥७६॥


इन्द्रनीलद्युतिच्छायान् सुकुमारान् मनोहरान् । केशान्वीक्ष्य ययौ मोहं रामोऽपतच्च भूतले ॥७७॥

अर्थ: इन्द्रनील मणिके समान कान्ति वाले अत्यन्त कोमल मनोहर केशोंको देख राम मूर्च्छाको प्राप्त हो पृथिवी पर गिर पड़े ॥७७॥


यावदाश्वासनं तस्य प्रारब्धं चन्दनादिना । पृथ्वीमत्यार्यया तावद्दीक्षिता जनकात्मजा ॥७८॥

अर्थ: इधर जब तक चन्दन आदिके द्वारा रामको सचेत किया जाता है तब तक सीता पृथ्वीमति आर्यिकासे दीक्षित हो गई ॥७८॥


ततो दिव्यानुभावेन सा विघ्नपरिवर्जिता । संवृत्ता श्रमणा साध्वी वस्त्रमात्रपरिग्रहा ॥७९॥

अर्थ: तदनन्तर देवकृत प्रभावसे जिसके सब चिन्न दूर हो गये थे ऐसी पतिव्रता सीमा वस्त्रमात्र परिग्रहको धारण करने बाली आर्यिका हो गई ॥७९॥


महाव्रतपवित्राङ्गा महासंवेगसङ्गता । देवासुरसमायोगं ययौ चोद्यानमुत्तमम् ॥८०॥

अर्थ: महाव्रतोंके द्वारा जिसका शरीर पवित्र हो चुका था तथा जो महासंवेगको प्राप्त थी ऐसी सीता देव और असुरोंके समागमसे सहित उत्तम उद्यानमें चली गई ॥८०॥


पद्मो मौक्तिकगोशीर्षतालवृन्तानिलादिभिः । सम्प्राप्तस्पष्टचैतन्यस्तद्दिङ्न्यस्तनिरीक्षणः ॥८१॥

अदृष्ट्वा राघवः सीतां शून्यीभूतदशाशकः । शोककोपकषायात्मा समारुह्य महागजम् ॥८२॥

अर्थ: इधर मोतियोंकी माला, गोशीर्षचन्दन तथा व्यजन आदिकी वायुसे जब रामकी मूर्च्छा दूर हुई तब वे उसी दिशाकी ओर देखने लगे परन्तु वहाँ सीताको न देख उन्हें दशों दिशाएँ शून्य दिखने लगीं । अन्तमें शोक और क्रोधके कारण कलुषित चित्त होते हुए महागज पर सवार हो चले ॥८१-८२॥


समुच्छ्रितसितच्छत्रश्चामरोत्करवीजितः । नरेन्द्रैरिन्द्रवद्देवैर्वृतो हस्तितलाङ्गलैः ॥८३॥

प्रौढकोकनदच्छायः क्षणसंवृतलोचनः । उदात्तनिनदोऽवोचद्वचोऽपि निजभीतिदम् ॥८४॥

अर्थ: उस समम उनके शिर पर सफेद छत्र फहरा रहा था, चमरोंके समूह ढौरे जा रहे थे, तथा वे स्वयं अनेक राजाओंसे घिरे हुए थे । इसलिए देवोंसे आवृत इन्द्रके समान जान पड़ते थे, उन्होंने लाङ्गल नामक शस्त्र हाथमें ले रक्खा था, तरुण कोकनद - रक्त कमलके समान उनकी कान्ति थी और वे क्षण-क्षणमें लोचन बन्द कर लेते थे तदनन्तर उन्मत्तरके धारक रामने ऐसे वचन कहे जो आत्मीयजनोंको भी भय देने वाले थे ॥८३-८४॥


प्रियस्य प्राणिनो मृत्युर्वरिष्ठो विरहस्तु न । इति पूर्वं प्रतिज्ञातं मया निश्चितचेतसा ॥८५॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि प्रिय प्राणीकी मृत्यु हो जाना श्रेष्ठ है परन्तु विरह नहीं; इसी लिए मैंने पहले दृढ़चित्त हो कर अग्नि-प्रवेशकी अनुमति दी थी ॥८५॥


यदि तत् किं वृथा देवैः प्रातिहार्यमिदं शठैः । वैदेह्या विहितं येन यथेदं समनुष्ठितम् ॥८६॥

अर्थ: जब यह बात थी तब फिर क्यों अविवेकी देवोंने सीताका यह अतिशय किया जिससे कि उसने यह दीक्षाका उपक्रम किया ॥८६॥


लुप्तकेशीमपीमां मे यदि नार्पयत द्रुतम् । अद्य देवानदेवान्वः करोमि च जगद्वियत् ॥८७॥

अर्थ: हे देवो ! यद्यपि उसने केश उखाड़ लिये हैं तथापि तुम लोग यदि उस दशामें भी उसे मेरे लिए शीघ्र नहीं सौंप देते हो तो मैं आजसे तुम्हें अदेव कर दूँगा - देव नहीं रहने दूँगा और जगत्को आकाश बना दूँगा ॥८७॥


कथं मे ह्रियते पत्नी सुरैर्न्यायव्यवस्थितैः । पुरस्तिष्ठन्तु मे शस्त्रं गृह्णन्तु क्व नु ते गताः ॥८८॥

अर्थ: न्यायकी व्यवस्था करनेवाले देवों द्वारा मेरी पत्नी कैसे हरी जा सकती है ? वे मेरे सामने खड़े हों तथा शस्त्र ग्रहण करें, कहाँ गये वे सब ? ॥८८॥


एवमादिकृताचेष्टो लक्ष्मणेन विनीतिना । सान्त्व्यमानो बहूपायं प्राप्तः सुरसमागमम् ॥८९॥

अर्थ: इस प्रकार जो अनेक चेष्टाएँ कर रहे थे तथा विविध नीतिको जाननेवाले लक्ष्मण जिन्हें अनेक उपायोंसे सान्त्वना दे रहे थे ऐसे राम, जहाँ देवोंका समागम था ऐसे उद्यानमें पहुँचे ॥८९॥


सर्वभूषणमैक्षिष्ट ततः श्रवणपुङ्गवम् । गाम्भीर्यधैर्यसम्पन्नं वरासनकृतस्थितिम् ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने मुनियोंमें श्रेष्ठ उन सर्वभूषण केवलीको देखा कि जो गाम्भीर्य और धैर्यसे सम्पन्न थे, उत्तम सिंहासन पर विराजमान थे ॥९०॥


ज्वलज्ज्वलनतो दीप्तिं बिभ्राणं परमर्द्धिकम् । वहन्तं दहनं देहं कलुषस्योपसेदुषाम् ॥९१॥

अर्थ: जलती हुई अग्निसे कहीं अधिक कान्तिको धारण कर रहे थे, परम ऋद्धियोंसे युक्त थे, शरणागत मनुष्योंके पापको जलानेवाले शरीरको धारण कर रहे थे ॥९१॥


विबुधेष्वपि राजन्तं केवलज्ञानतेजसा । वीतजीमूतसङ्घातं भानुबिम्बमिवोदितम् ॥९२॥

अर्थ: जो केवलज्ञान रूपी तेजके द्वारा देवोंमें भी सुशोभित हो रहे थे, मेघोंके आवरणसे रहित उदित हुए सूर्य मण्डलके समान जान पड़ते थे, ॥९२॥


चक्षुःकुमुद्वतीकान्तं चन्द्रं वा वीतलाञ्छनम् । परेण परिवेषेण प्रवृत्तं देहतेजसा ॥९३॥

अर्थ: जो चक्षुरूपी कुमुदिनियोंके लिए प्रिय थे, अथवा कलङ्क रहित चन्द्रमाके समान थे, और मण्डलाकार परिणत अपने शरीरके उत्तम तेजसे आवृत थे ॥९३॥


तमालोक्य मुनिश्रेष्ठं सद्योगाद् अष्टमानतम् । अवतीर्य च नागेन्द्राज्जगामास्य समीपताम् ॥९४॥

अर्थ: तदनन्तर जो अभी-अभी ध्यानसे उन्मुक्त हुए थे तथा सर्व सुरासुर जिन्हें नमस्कार करते थे ऐसे उन मुनिश्रेष्ठको देखकर राम हाथीसे नीचे उतर कर उनके समीप गये ॥९४॥


विधाय चाञ्जलिं भक्त्या कृत्वा शान्तः प्रदक्षिणाम् । त्रिविधं गृहिणां नाथोऽनंसीन्नाथमवेश्मनाम् ॥९५॥

अर्थ: तत्पश्चात् गृहस्थोंके स्वामी श्रीरामने शान्त हो भक्तिपूर्वक अञ्जलि जोड़ प्रदक्षिणा देकर उन मुनिराजको मन-वचन-कायसे नमस्कार किया ॥९५॥


मुनीन्द्रदेहजच्छायास्तमितांशुकिरीटकाः । वैलक्ष्यादिव चञ्चद्भिः कुण्डलैः श्लिष्टगण्डकाः ॥९६॥

भावार्पितनमस्काराः करकुड्मलमस्तकाः । मानवेन्द्रैः समं योग्यमुपविष्टाः सुरेश्वराः ॥९७॥

अर्थ: अथानन्तर उन मुनिराजकी शरीर सम्बन्धी कान्तिके कारण जिनके मुकुट निष्प्रभ हो गये थे तथा लज्जाके कारण ही मानो चमकते हुए कुण्डलों द्वारा जिनके कपोल आलिङ्गित थे, जिन्होंने भाव पूर्वक नमस्कार किया था, और जो हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये हुए थे ऐसे देवेन्द्र वहाँ नरेन्द्रके समान यथायोग्य बैठे थे ॥९६-९७॥


चतुर्भेदजुषो देवा नानालङ्कारधारिणः । अलक्ष्यन्त मुनीन्द्रस्य रवेरिव मरीचयः ॥९८॥

अर्थ: नाना अलंकारोंको धारण करनेवाले चारों प्रकारके देव, मुनिराजके समीप ऐसे दिखाई देते थे मानो सूर्यके समीप उसकी किरणें ही हों ॥९८॥


रराज राजराजोऽपि रामो नात्यन्तदूरगः । मुनेः सुमेरुकूटस्य पार्श्वे कल्पतरुर्यथा ॥९९॥

अर्थ: मुनिराजके निकट स्थित राजाधिराज राम भी ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सुमेरुके शिखरके समीप कल्प वृक्ष ही हो ॥९९॥


लक्ष्मीधरनरेन्द्रोऽपि मौलिकुण्डलराजितः । विद्युत्वानिव जीमूतः शुशुभेऽन्तिकपर्वतः ॥१००॥

अर्थ: मुकुट और कुण्डलोंसे सुशोभित लक्ष्मण भी, किसी पर्वतके समीप स्थित बिजलीसे सहित मेघके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१००॥


शत्रुघ्नोऽपि महाशत्रुभयदानविचक्षणः । द्वितीय इव भाति स्म कुबेरश्चारुदर्शनः ॥१०१॥

अर्थ: महाशत्रुओंको भय देनेमें निपुण सुन्दर शत्रुघ्न भी द्वितीय कुबेरके समान सुशोभित हो रहा था ॥१०१॥


गुणसौभाग्यतूणीरौ वीरौ तौ च सुलक्षणौ । सूर्याचन्द्रमसौ यद्वद्रेजतुर्लवणाङ्कुशौ ॥१०२॥

अर्थ: गुण और सौभाग्यके तरकस तथा उत्तम लक्षणोंसे युक्त वे दोनों वीर लवण और अंकुश सूर्य और चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे ॥१०२॥


बाह्यालङ्कारमुक्ताऽपि वस्त्रमात्रपरिग्रहा । आर्या रराज वैदेही रविमूर्त्येव संयता ॥१०३॥

अर्थ: वस्त्रमात्र परिग्रहको धारण करनेवाली आर्या सीता यद्यपि बाह्य अलंकारोंसे सहित थी तथापि वह ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो सूर्यकी मूर्तिसे ही सम्बद्ध हो ॥१०३॥


मनुष्यनाकवासेषु धर्मश्रवणकांक्षिषु । धरण्यामुपविष्टेषु ततो विनयशालिषु ॥१०४॥

धीरोऽभयनिनादाख्यो मुनिः शिष्यगणाग्रणीः । सन्देहतापशान्त्यर्थं पप्रच्छ मुनिपुङ्गवम् ॥१०५॥

अर्थ: तदनन्तर धर्मश्रवणके इच्छुक तथा विनयसे सुशोभित समस्त मनुष्य और देव जब यथायोग्य पृथिवी पर बैठ गये तब शिष्य समूहमें प्रधान, अभयनिनाद नामक, धीर वीर मुनिने सन्देह रूपी संतापको शान्त करनेके लिए सर्वभूषण मुनिराजसे पूछा ॥१०४-१०५॥


विपुलं निपुणं शुद्धं तत्त्वार्थं मुनिबोधनम् । ततो जगाद योगीशः कर्मक्षयकरं वचः ॥१०६॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजने वह वचन कहे कि जो अत्यन्त विस्तृत थे, चातुर्यपूर्ण थे, शुद्ध थे, तत्त्वार्थके प्रतिपादक थे, मुनियोंके प्रबोधक थे और कर्मोंका क्षय करनेवाले थे ॥१०६॥


रहस्यं तत्तदा तेन विबुधानां महात्मनाम् । कथितं तत्समुद्रस्य कणमेकं वदाम्यहम् ॥१०७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि उस समय उन योगिराजने विद्वानों तथा महात्माओंके लिए जो रहस्य कहा था वह समुद्रके समान भारी था। हे श्रेणिक ! मैं तो यहाँ उसका एक कण ही कहता हूँ ॥१०७॥


प्रशस्तदर्शनज्ञाननन्दनं भव्यसम्मतम् । वस्तुतत्त्वमिदं तेन प्रोक्तं परमयोगिना ॥१०८॥

अर्थ: उन परम योगीने जो वस्तुतत्त्वका निरूपण किया था वह प्रशस्त दर्शन और ज्ञानके धारक पुरुषोंके लिए आनन्द देनेवाला था तथा भव्य जीवोंको इष्ट था ॥१०८॥


अनन्तालोकखान्तस्थो मृदङ्गद्वयसन्निभः । लोको व्यवस्थितोऽधस्तात्तिर्यगूर्ध्वव्यवस्थितः ॥१०९॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि यह लोक अनन्त अलोकाकाशके मध्यमें स्थित दो मृदङ्गोंके समान है, नीचे, बीचमें तथा ऊपरकी ओर स्थित है ॥१०९॥


त्रैविध्येनामुना तस्य ख्याता त्रिभुवनाभिधा । अधस्तान् मन्दरस्याद्रेर्विज्ञेयाः सप्तभूमयः ॥११०॥

अर्थ: इस तरह तीन प्रकारसे स्थित होनेके कारण इस लोकको त्रिलोक अथवा त्रिविध कहते हैं। मेरु पर्वतके नीचे सात भूमियाँ हैं ॥११०॥


रत्नाभा प्रथमा तत्र यस्यां भवनजाः सुराः । षडधस्तात्ततः क्षोण्यो महाभयसमावहाः ॥१११॥

शर्कराबालुकापङ्कधूमध्वान्ततमोनिभाः । सुमहादुःखदायिन्यो नित्यान्धध्वान्तसंकुलाः ॥११२॥

अर्थ: उनमें पहली भूमि रत्नप्रभा है जिसके अब्बहुल भागको छोड़कर ऊपरके दो भागोंमें भवनवासी तथा व्यन्तर देव रहते हैं। उस रत्नप्रभाके नीचे महाभय उत्पन्न करनेवाली शर्करा प्रभा, बालुका-प्रभा, पङ्कप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा नामकी छह भूमियाँ और हैं जो अत्यन्त तीव्र दुःखको देनेवाली हैं तथा निरन्तर घोर अन्धकारसे व्याप्त रहती हैं ॥१११-११२॥


तप्तायस्तलदुःस्पर्शमहाविषमदुर्गमाः । शीतोग्रवेदनाः काश्चिद्वसारुधिरकर्दमाः ॥११३॥

अर्थ: उनमेंसे कितनी ही भूमियाँ संतप्त लोहेके तलके समान दुःखदायी गरम स्पर्श होनेके कारण अत्यन्त विषम और दुर्गम हैं तथा कितनी ही शीतकी तीव्र वेदनासे युक्त हैं। उन भूमियोंमें चर्बी और रुधिरकी कीच मची रहती है ॥११३॥


श्वसर्पमनुजादीनां कुथितानां कलेवरैः । सम्मिश्रो यो भवेद्गन्धस्तादृशस्तत्र कीर्त्तितः ॥११४॥

अर्थ: जिनके शरीर सड़ गये हैं ऐसे अनेक कुत्ते, सर्प तथा मनुष्यादिकी जैसी मिश्रित गन्ध होती है वैसी ही उन भूमियोंकी बतलाई गई है ॥११४॥


नानाप्रकारदुःखौघकारणानि समाहरन् । वाति तत्र महाशब्दः प्रचण्डोद्दण्डमारुतः ॥११५॥

अर्थ: वहाँ नानाप्रकारके दुःख-समूहके कारणोंको साथमें ले आनेवाली महाशब्द करती हुई प्रचण्ड वायु चलती है ॥११५॥


रसनस्पर्शनासक्ता जीवास्तत् कर्म कुर्वते । गरिष्ठा नरके येन पतन्त्यायसपिण्डवत् ॥११६॥

अर्थ: स्पर्शन तथा रसना इन्द्रियके वशीभूत जीव उस कर्मका सञ्चय करते हैं कि जिससे वे लोहेके पिण्डके समान भारी हो उन नरकोंमें पड़ते हैं ॥११६॥


हिंसावितथचौर्यान्यस्त्रीसङ्गादनिवर्त्तनाः । नरकेषूपजायन्ते पापभारगुरूकृताः ॥११७॥

अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीसंग तथा परिग्रहसे निवृत्त नहीं होनेवाले मनुष्य पापके भारसे बोझिल हो नरकोंमें उत्पन्न होते हैं ॥११७॥


मनुष्यजन्म सम्प्राप्य सततं भोगसङ्गताः । जनाः प्रचण्डकर्माणो गच्छन्ति नरकावनिम् ॥११८॥

अर्थ: जो मनुष्य-जन्म पाकर निरन्तर भोगोंमें आसक्त रहते हैं ऐसे प्रचण्डकर्मा मनुष्य नरकभूमिमें जाते हैं ॥११८॥


विधाय कारयित्वा च पापं समनुमोद्य च । रौद्रार्त्तप्रवणा जीवा यान्ति नारकबीजताम् ॥११९॥

अर्थ: जो जीव स्वयं पाप करते हैं, दूसरेसे कराते हैं तथा अनुमोदन करते हैं, वे रौद्र तथा आर्त्तध्यानमें तत्पर रहनेवाले जीव नरकायुको प्राप्त होते हैं ॥११९॥


वज्रोपमेषु कुड्येषु निःसन्धिकृतपूरणाः । नारकेनाग्निना पापा दह्यन्ते कृतविस्वराः ॥१२०॥

अर्थ: वज्रोपम दीवालोंमें ठूँस-ठूँस कर भरे हुए पापी जीव नरकोंकी अग्निसे जलाये जाते हैं और तब वे महाभयंकर शब्द करते हैं ॥१२०॥


ज्वलद्वह्निचयाद्भीता यान्ति वैतरणीं नदीम् । शीतलाम्बुकृताकांक्षास्तस्यां मुञ्चन्ति देहकम् ॥१२१॥

अर्थ: जलती हुई अग्निके समूहसे भयभीत हो नारकी, शीतल जलकी इच्छा करते हुए वैतरणी नदीकी ओर जाते हैं और उसमें अपने शरीरको छोड़ते हैं अर्थात् गोता लगाते हैं ॥१२१॥


ततो महोत्कटक्षारदग्धदेहोरुवेदनाः । मृगा इव परित्रस्ता असिपत्रवनं स्थिताः ॥१२२॥

अर्थ: गोता लगाते ही अत्यन्त तीव्र क्षारके कारण उनके जले हुए शरीरमें भारी वेदना होती है। तदनन्तर मृगोंकी तरह भयभीत हो उस असिपत्रवनमें पहुँचते हैं ॥१२२॥


छायाप्रत्याशया यत्र सङ्गता दुष्कृतप्रियाः । प्राप्नुवन्त्यसिनाराचचक्रकुन्तादिदारणम् ॥१२३॥

अर्थ: जहाँ कि पापी जीव छायाकी इच्छासे इकट्ठे होते हैं परन्तु छायाके बदले खड्ग, बाण, चक्र तथा भाले आदि शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न दशाको प्राप्त होते हैं ॥१२३॥


खरमारुतनिर्धूतैर्नरकागसमीरितैः । तीक्ष्णैरस्त्रसमूहैस्ते दार्यन्ते शरणोज्झिताः ॥१२४॥

अर्थ: तीक्ष्ण वायुसे कम्पित नरकके वृक्षोंसे प्रेरित तीक्ष्ण अस्त्रोंके समूहसे वे शरण रहित नारकी छिन्न-भिन्न हो जाते हैं ॥१२४॥


छिन्नपादभुजस्कन्धकर्णवक्त्राक्षिनासिकाः । भिन्नतालुशिरःकुक्षिहृदया निपतन्ति ते ॥१२५॥

अर्थ: जिनके पैर, भुजा, स्कन्ध, कर्ण, मुख, आँख और नाक आदि अवयव कट गये हैं तथा जिनके तालु, शिर, पेट और हृदय विदीर्ण हो गये हैं ऐसे लोग वहाँ गिरते रहते हैं ॥१२५॥


कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते केचिदूर्ध्वीकृताङ्घ्रयः । यन्त्रैः केचिन्निपीडयन्ते बलिभिः परुषस्वनम् ॥१२६॥

अर्थ: जिनके पैर ऊपरको उठे हुए हैं ऐसे कितने ही नारकी दूसरे बलवान् नारकियोंके द्वारा कुम्भीपाकमें पकाये जाते हैं और कितने ही कठोर शब्द करते हुए घानियोंमें पेल दिये जाते हैं ॥१२६॥


अरिभिः परमक्रोधैः केचिन् मुद्गरपीडिताः । कुर्वते लोठनं भूमौ सुमहावेदनाकुलाः ॥१२७॥

अर्थ: तीव्र क्रोधसे युक्त शत्रुओंने जिन्हें मुद्गरसे पीड़ित किया है ऐसे कितने ही नारकी अत्यन्त तीव्र वेदनासे व्याकुल हो पृथिवी पर लोट जाते हैं ॥१२७॥


महातृष्णार्दिता दीना याचन्ते वारिविह्वलाः । ततः प्रदीयते तेषां त्रपुताम्रादिविद्रुतम् ॥१२८॥

अर्थ: तीव्र प्याससे पीड़ित दीन हीन नारकी विह्वल हो पानी माँगते हैं पर पानीके बदले उन्हें पिघला हुआ राँगा और ताँबा दिया जाता है ॥१२८॥


स्फुलिङ्गोद्गमरौद्रं तं तत्रोद्वीक्ष्य विकम्पिताः । परावर्तितचेतस्का बाष्पपूरितकण्ठकाः ॥१२९॥

अर्थ: निकलते हुए तिलगोंसे भयंकर उस राँगा आदिके द्रवको देखकर वे प्यासे नारकी काँप उठते हैं, उनके चित्त फिर जाते हैं तथा कण्ठ आँसुओंसे भर जाते हैं ॥१२९॥


ब्रुवते नास्ति तृष्णा मे मुञ्च मुञ्च व्रजाम्यहम् । अनिच्छतां ततस्तेषां तद्बलेन प्रदीयते ॥१३०॥

अर्थ: वे कहते हैं कि मुझे प्यास नहीं है, छोड़ो-छोड़ो मैं जाता हूँ पर नहीं चाहने पर भी उन्हें बलात् वह द्रव पिलाया जाता है ॥१३०॥


विनिपात्य क्षितावेषां क्रन्दतां लोहदण्डकैः । विदार्यास्यं विषं रक्तं कलिलं च निधीयते ॥१३१॥

अर्थ: चिल्लाते हुए उन नारकियोंको पृथिवी पर गिराकर तथा लोहेके डंडेसे उनका मुख फाड़कर उसमें बलात् विष, रक्त तथा ताँबा आदिका द्रव डाला जाता है ॥१३१॥


तत्तेषां प्रदहत्कण्ठं हृदयं स्फोटयद् भृशम् । जठरं प्राप्य निर्याति पुरीषराशिना समम् ॥१३२॥

अर्थ: वह द्रव उनके कण्ठको जलाता और हृदयको फोड़ता हुआ पेटमें पहुँचता है और मलकी राशिके साथ-साथ बाहर निकल जाता है ॥१३२॥


पश्चात्तापहताः पश्चात् पालकैर्नरकावनेः । स्मार्यन्ते दुष्कृतं दीनाः कुशास्त्रपरिभाषितम् ॥१३३॥

अर्थ: तदनन्तर जब वे पश्चात्तापसे दुःखी होते हैं तब उन दीन हीन नारकियोंको नरक भूमिके रक्षक मिथ्याशास्त्रों द्वारा कथित पापका स्मरण दिलाते हैं ॥१३३॥


गुरुलोकं समुल्लंध्य तदा वाक्पटुना सता । मांसं निर्दोषमित्युक्तं यत्ते तत् क्वाधुना गतम् ॥१३४॥

अर्थ: वे कहते हैं कि उस समय तुमने बोलनेमें चतुर होनेके कारण गुरुजनोंका उल्लंघन कर ‘मांस निर्दोष है’ यह कहा था सो अब तुम्हारा वह कहना कहाँ गया ? ॥१३४॥


माङ्सेन बहुभेदेन मधुना च पुरा कृतम् । श्राद्धं गुणवदित्युक्तं यत्ते तत् क्वाधुना गतम् ॥१३५॥

अर्थ: 'नानाप्रकारके मांस और मदिराके द्वारा किया हुआ श्राद्ध अधिक फलदायी होता है, ऐसा जो तुमने पहले कहा था सो अब तुम्हारा वह कहना कहाँ गया ? ॥१३५॥


इत्युक्त्वा वैक्रियैरन्यैराहत्याहत्य निष्ठुरम् । कुर्वाणाः कृपणं चेष्टाः खाद्यन्ते स्वशरीरकम् ॥१३६॥

अर्थ: यह कहकर उन्हें विक्रिया युक्त नारकी बड़ी निर्दयतासे मार-मारकर उन्हींका शरीर खिलाते हैं तथा वे अत्यन्त दीन चेष्टाएँ करते हैं ॥१३६॥


स्वप्नदर्शननिःसारां स्मारयित्वा च राजताम् । तज्जातैरेव पीड्यन्ते विरुवन्तो विडम्बनैः ॥१३७॥

अर्थ: ‘राज्य-अवस्था स्वप्न-दर्शनके समान निःसार है’ यह स्मरण दिलाकर उन्हींसे उत्पन्न हुए विडम्बनाकारी उन्हें पीडित करते हैं और वे करुणक्रन्दन करते हैं ॥१३७॥


एवमादीनि दुःखानि जीवाः पापकृतो नृप । निमेषमप्यविश्रान्ता लभन्ते नारकक्षितौ ॥१३८॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! पाप करनेवाले जीव नारकियोंकी भूमिमें क्षणभरके लिए भी विश्राम लिये बिना पूर्वोक्त प्रकारके दुःख पाते रहते हैं ॥१३८॥


तस्मात्फलमधर्मस्य ज्ञात्वेदमतिदुःसहम् । प्रशान्तहृदयाः सन्तः सेवध्वं जिनशासनम् ॥१३९॥

अर्थ: इसलिए हे शान्त हृदयके धारक सत्पुरुषो ! ‘यह अधर्मका फल अत्यन्त दुःसह है’ ऐसा जानकर जिन-शासनकी सेवा करो ॥१३९॥


अनन्तरमधोवासा ज्ञाता भवनवासिनाम् । देवारण्यार्णवद्वीपास्तथा योग्याश्च भूमयः ॥१४०॥

अर्थ: अनन्तरवर्ती रत्नप्रभाभूमि भवनवासी देवोंकी निवास भूमि है यह पहले ज्ञात कर चुके हैं । इसके सिवाय देवारण्य वन, सागर तथा द्वीप आदि भी उनके निवासके योग्य स्थान हैं ॥१४०॥


पृथिव्यापश्च तेजश्च मातरिश्वा वनस्पतिः । शेषास्त्रसाश्च जीवानां निकायाः षट् प्रकीर्त्तिताः ॥१४१॥

अर्थ: पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये पाँच स्थावर और एक त्रस ये जीवोंके छह निकाय कहे गये हैं ॥१४१॥


धर्माधर्मवियत्कालजीवपुद्गलभेदतः । षोढा द्रव्यं समुद्दिष्टं सरहस्यं जिनेश्वरैः ॥१४२॥

अर्थ: धर्म, अधर्म, आकाश, काल, जीव और पुद्गलके भेदसे द्रव्य छह प्रकारके हैं ऐसा श्री जिनेन्द्रदेवने रहस्य सहित कहा है ॥१४२॥


सप्तभङ्गीवचोमार्गः सम्यक्प्रतिपदं मतः । प्रमाणं सकलादेशो नयोऽवयवसाधनम् ॥१४३॥

अर्थ: प्रत्येक पदार्थका सप्तभङ्गी द्वारा निरूपण करनेका जो मार्ग है वह प्रशस्त मार्ग माना गया है । प्रमाण और नयके द्वारा पदार्थोंका कथन होता है । पदार्थके समस्त विरोधी धर्मोंका एक साथ वर्णन करना प्रमाण है और किसी एक धर्मका सिद्ध करना नय है ॥१४३॥


एकद्वित्रिचतुःपञ्चहृषीकेष्वविरोधतः । सत्त्वं जीवेषु विज्ञेयं प्रतिपक्षसमन्वितम् ॥१४४॥

अर्थ: एकेन्द्रिय, दो इद्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पाँच इन्द्रिय जीवोंमें विना किसी विरोधके सत्त्व-सत्ता-नामका गुण रहता है और यह अपने प्रतिपक्ष-विरोधी तत्त्वसे सहित होता है ॥१४४॥


सूक्ष्मबादरभेदेन ज्ञेयास्ते च शरीरतः । पर्याप्ता इतरे चैव पुनस्ते परिकीर्त्तिताः ॥१४५॥

अर्थ: वे जीव शरीरकी अपेक्षा सूक्ष्म और बादरके भेदसे दो प्रकारके जानना चाहिए । उन्हीं जीवोंके फिर पर्याप्तक और अपर्याप्तककी अपेक्षा दो भेद और भी कहे गये हैं ॥१४५॥


भव्याभव्यादिभेदं च जीवद्रव्यमुदाहृतम् । संसारे तद्द्वयोन्मुक्ताः सिद्धास्तु परिकीर्त्तिताः ॥१४६॥

अर्थ: जीवद्रव्यके भव्य अभव्य आदि भेद भी कहे गये हैं परन्तु यह सब भेद संसार अवस्थामें ही होते हैं, सिद्ध जीव इन सब भेदों रहित कहे गये हैं ॥१४६॥


ज्ञेयदृश्यस्वभावेषु परिणामः स्वशक्तितः । उपयोगश्च तद्रूपं ज्ञानदर्शनतो द्विधा ॥१४७॥

अर्थ: ज्ञेय और दृश्य स्वभावोंमें जीवका जो अपनी शक्तिसे परिणमन होता है वह उपयोग कहलाता है, उपयोग ही जीवका स्वरूप है, यह उपयोग ज्ञान दर्शनके भेदसे दो प्रकारका है ॥१४७॥


ज्ञानमष्टविधं ज्ञेयं चतुर्धा दर्शनं मतम् । संसारिणो विमुक्ताश्च ते सचित्तविचेतसः ॥१४८॥

अर्थ: ज्ञानोप-योग मतिज्ञानादिके भेदसे आठ प्रकारका है, और दर्शनोपयोग चक्षुर्दर्शन आदिके भेदसे चार प्रकारका है । जीवके संसारी और मुक्तकी अपेक्षा दो भेद हैं तथा संसारी जीव संज्ञी और असंज्ञी भेदसे दो प्रकारके हैं ॥१४८॥


वनस्पतिपृथिव्याद्याः स्थावराः शेषकास्त्रसाः । पञ्चेन्द्रियाः श्रुतिघ्राणचक्षुस्त्वग्रसनान्विताः ॥१४९॥

अर्थ: वनस्पतिकायिक तथा पृथिवीकायिक आदि स्थावर कहलाते हैं, शेष त्रस कहे जाते हैं । जो स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और कर्ण इन पाँचों इन्द्रियोंसे सहित हैं वे पञ्चेन्द्रिय कहलाते हैं ॥१४९॥


पोताण्डजजरायूनामुदितो गर्भसम्भवः । देवानामुपपादस्तु नारकाणां च कीर्त्तितः ॥१५०॥

अर्थ: पोतज, अण्डज तथा जरायुज जीवोंके गर्भजन्म कहा गया है तथा देवों और नारकियोंके उपपाद जन्म बतलाया गया है ॥१५०॥


सम्मूर्च्छनं समस्तानां शेषाणां जन्मकारणम् । योन्यस्तु विविधाः प्रोक्ताः महादुःखसमन्विताः ॥१५१॥

अर्थ: शेष जीवोंकी उत्पत्तिका कारण सम्मूर्च्छन जन्म है । इस तरह गर्भ, उपपाद और सम्मूर्च्छनकी अपेक्षा जन्मके तीन भेद हैं परन्तु तीव्र दुःखोंसे सहित योनियाँ अनेक प्रकारकी कही गई हैं ॥१५१॥


औदारिकं शरीरं तु वैक्रियाऽऽहारके तथा । तैजसं कार्मणं चैव विद्धि सूक्ष्मं परं परम् ॥१५२॥

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं। ये शरीर आगे-आगे सूक्ष्म-सूक्ष्म हैं ऐसा जानना चाहिए ॥१५२॥


असङ्ख्येयं प्रदेशेन गुणतोऽनन्तके परे । आदिसम्बन्धमुक्ते च चतुर्णामेककालता ॥१५३॥

अर्थ: औदारिक, वैक्रियिक और आहारक ये तीन शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर असंख्यात गुणित हैं तथा तैजस और कार्मण ये दो शरीर उत्तरोत्तर अनन्त गुणित हैं। तैजस और कार्मण ये दो शरीर आदि सम्बन्धसे युक्त हैं अर्थात् जीवके साथ अनादि कालसे लगे हुए हैं और उपर्युक्त पाँच शरीरोंमेंसे एक साथ चार शरीर तक हो सकते हैं ॥१५३॥


जम्बूद्वीपमुखा द्वीपा लवणाद्याश्च सागराः । प्रकीर्त्तिताः शुभा नाम संख्यानपरिवर्जिताः ॥१५४॥

अर्थ: मध्यम लोकमें जम्बूद्वीपको आदि लेकर शुभ नामवाले असंख्यात द्वीप और लवण समुद्रको आदि लेकर असंख्यात समुद्र कहे गये हैं ॥१५४॥


पूर्वाद् द्विगुणविष्कम्भाः पूर्वविक्षेपवर्तिनः । वलयाकृतयो मध्ये जम्बूद्वीपः प्रकीर्त्तितः ॥१५५॥

अर्थ: ये द्वीप-समुद्र पूर्वके द्वीप-समुद्रसे दूने विस्तार वाले हैं, पूर्व-पूर्वको घेरे हुए हैं तथा वलयके आकार हैं। सबके बीचमें जम्बूद्वीप कहा गया है ॥१५५॥


मेरुनाभिरसौ वृत्तो लक्षयोजनमानभृत् । त्रिगुणं तत्परिक्षेपादधिकं परिकीर्त्तितम् ॥१५६॥

अर्थ: जम्बूद्वीप मेरु पर्वतरूपी नाभिसे सहित है, गोलाकार है तथा एक लाख योजन विस्तार वाला है, इसकी परिधि तिगुनीसे कुछ अधिक कही गई है ॥१५६॥


पूर्वापरायतास्तत्र विज्ञेयाः कुलपर्वताः । हिमवांश्च महाज्ञेयो निषधो नील एव च ॥१५७॥

रुक्मी च शिखरी चेति समुद्रजलसङ्गताः । वास्यान्येभिर्विभक्तानि जम्बूद्वीपगतानि च ॥१५८॥

अर्थ: उस जम्बूद्वीपमें पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी ये छह कुलाचल हैं। ये सभी समुद्रके जलसे मिले हैं तथा इन्हींके द्वारा जम्बूद्वीप सम्बन्धी क्षेत्रोंका विभाग हुआ है ॥१५७-१५८॥


भरताख्यमिदं क्षेत्रं ततो हैमवतं हरिः । विदेहो रम्यकाख्यं च हैरण्यवतमेव च ॥१५९॥

ऐरावतं च विज्ञेयं गङ्गाद्याश्चापि निम्नगाः । प्रोक्तं द्विर्धातकीखण्डे पुष्करार्द्धे च पूर्वकम् ॥१६०॥

अर्थ: यह भरत क्षेत्र है इसके आगे हैमवत, उसके आगे हरि, उसके आगे विदेह, उसके आगे रम्यक, उसके आगे हैरण्यवत और उसके आगे ऐरावत - ये सात क्षेत्र जम्बूद्वीपमें हैं । इसी जम्बूद्वीपमें गङ्गा, सिन्धु आदि चौदह नदियाँ हैं । धातकीखण्ड तथा पुष्करार्धमें जम्बूद्वीपसे दूनी-दूनी रचना है ॥१५९-१६०॥


आर्या म्लेच्छा मनुष्याश्च मानुषाचलतोऽपरे । विज्ञेयास्तत्प्रभेदाश्च संख्यानपरिवर्जिताः ॥१६१॥

अर्थ: मनुष्य, मानुषोत्तर पर्वतके इसी ओर रहते हैं, इनके आर्य और म्लेच्छकी अपेक्षा मूलमें दो भेद हैं तथा इनके उत्तर भेद असंख्यात हैं ॥१६१॥


विदेहे कर्मणो भूमिर्भरतैरावते तथा । देवोत्तरकुरुर्भोगक्षेत्रं शेषाश्च भूमयः ॥१६२॥

अर्थ: देवकुरु, उत्तरकुरु रहित विदेह क्षेत्र, तथा भरत और ऐरावत इन तीन क्षेत्रोंमें कर्मभूमि है और देवकुरु, उत्तर कुरु तथा अन्य क्षेत्र भोगभूमिके क्षेत्र हैं ॥१६२॥


त्रिपल्यान्तर्मुहूर्त्तं तु स्थिती नृणां परावरे । मनुष्याणामिव ज्ञेया तिर्यग्योनिमुपेयुषाम् ॥१६३॥

अर्थ: मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्यकी और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्तकी है। तिर्यञ्चोंकी उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति मनुष्योंके समान तीन पल्य और अन्तर्मुहूर्तकी है ॥१६३॥


अष्टभेदजुषो वेद्या व्यन्तराः किन्नरादयः । तेषां क्रीडनकावासा यथायोग्यमुदाहृताः ॥१६४॥

अर्थ: व्यन्तर देवोंके किन्नर आदि आठ भेद जानना चाहिए। इन सबके क्रीड़ाके स्थान यथा- योग्य कहे गये हैं ॥१६४॥


ऊर्ध्वं व्यन्तरदेवानां ज्योतिषां चक्रमुज्ज्वलम् । मेरुप्रदक्षिणं नित्यङ्गतिश्चन्द्रार्कराजकम् ॥१६५॥

अर्थ: व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंका निवास ऊपर मध्यलोकमें है। इनमें ज्योतिषी देवोंका चक्र देदीप्यमान कान्तिका धारक है, मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देता हुआ निरन्तर चलता रहता है तथा सूर्य और चन्द्रमा उसके राजा हैं ॥१६५॥


संख्येयानि सहस्राणि योजनानां व्यतीत्य च । तत ऊर्ध्वं महालोको विज्ञेयः कल्पवासिनाम् ॥१६६॥

अर्थ: ज्योतिश्चक्रके ऊपर संख्यात हजार योजन व्यतीत कर कल्पवासी देवोंका महालोक शुरू होता है यही ऊर्ध्वलोक कहलाता है ॥१६६॥


सौधर्माख्यस्तथैशानः कल्पस्तत्र प्रकीर्त्तितः । ज्ञेयः सानत्कुमारश्च तथा माहेन्द्रसंज्ञकः ॥१६७॥

ब्रह्म ब्रह्मोत्तरो लोको लान्तवश्च प्रकीर्त्तितः । कापिष्ठश्च तथा शुक्रो महाशुक्राभिधस्तथा ॥१६८॥

शतारोऽथ सहस्रारः कल्पश्चानतशब्दितः । प्राणतश्च परिज्ञेयस्तत्परावारणच्युतौ ॥१६९॥

अर्थ: ऊर्ध्वलोकमें सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार, आनत, प्राणत और आरण, अच्युत ये आठ युगलोंमें सोलह स्वर्ग हैं ॥१६७-१६९॥


नव ग्रैवेयकास्ताभ्यामुपरिष्टात्प्रकीर्त्तिताः । अहमिन्द्रतया येषु परमास्त्रिदशाः स्थिताः ॥१७०॥

विजयो वैजयन्तश्च जयन्तोऽथापराजितः । सर्वार्थसिद्धिनामा च पञ्चैतेऽनुत्तराः स्मृताः ॥१७१॥

अर्थ: उनके ऊपर ग्रैवेयक कहे गये हैं जिनमें अहमिन्द्र रूपसे उत्कृष्ट देव स्थित हैं। (नव ग्रैवेयकके आगे नव अनुदिश हैं और उनके ऊपर) विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि ये पाँच अनुत्तर विमान हैं ॥१७०-१७१॥


अग्रे त्रिभुवनस्यास्य क्षेत्रमुत्तमभासुरम् । कर्मबन्धनमुक्तानां पदं ज्ञेयं महाद्भुतम् ॥१७२॥

अर्थ: इस लोकत्रयके ऊपर उत्तम देदीप्यमान तथा महा आश्चर्यसे युक्त सिद्धक्षेत्र है जो कर्म बन्धनसे रहित जीवोंका स्थान जानना चाहिए ॥१७२॥


ईषत्प्राग्भारसंज्ञासौ पृथिवी शुभदर्शना । उत्तानधवलच्छत्रप्रतिरूपा शुभावहा ॥१७३॥

सिद्धा यत्रावतिष्ठन्ते पुनर्भवविवर्जिताः । महासुखपरिप्राप्ताः स्वात्मशक्तिव्यवस्थिताः ॥१७४॥

अर्थ: ऊपर ईषत्प्राग्भार नामकी वह शुभ पृथ्वी है, जो ऊपरकी ओर किये हुए धवलछत्रके आकार है, शुभरूप है, और जिसके ऊपर पुनर्भवसे रहित, महासुख सम्पन्न तथा स्वात्मशक्तिसे युक्त सिद्धपरमेष्ठी विराजमान रहते हैं ॥१७३-१७४॥


रामो जगाद भगवन् तेषां विगतकर्मणाम् । संसारभावनिर्मुक्तं निर्दुःखं कीदृशं सुखम् ॥१७५॥

अर्थ: तदनन्तर इसी बीचमें रामने कहा कि हे भगवन् ! उन कर्मरहित जीवोंके संसार भावसे रहित तथा दुःखसे दूर कैसा सुख होता है ? ॥१७५॥


उवाच केवली लोकत्रितयस्यास्य यत्सुखम् । व्याबाधभङ्गदुःपाकैर्दुःखमेव हि तन्मतम् ॥१७६॥

अर्थ: इसके उत्तरमें केवली भगवान्‌ने कहा कि इस तीन लोकका जो सुख है वह आकुलतारूप, विनाशात्मक तथा दुरन्त होनेके कारण दुःख-रूप ही माना गया है ॥१७६॥


कर्मणाऽष्टप्रकारेण परतन्त्रस्य सर्वदा । नास्य संसारिजीवस्य सुखं नाम मनागपि ॥१७७॥

अर्थ: आठप्रकारके कर्मसे परतन्त्र इस संसारी जीवको कभी रञ्चमात्र भी सुख नहीं होता ॥१७७॥


यथा सुवर्णपिण्डस्य वेष्टितस्यायसा भृशम् । आत्मीया नश्यति छाया तथा जीवस्य कर्मणा ॥१७८॥

अर्थ: जिस प्रकार लोहेसे वेष्टित सुवर्णपिण्डकी अपनी निजकी कान्ति नष्ट हो जाती है उसी प्रकार कर्मसे वेष्टित जीवकी अपनी निजकी कान्ति बिलकुल ही नष्ट हो जाती है ॥१७८॥


मृत्युजन्मजराव्याधिसहस्रैः सततं जनाः । मानसैश्च महादुःखैः पीड्यन्ते सुखमत्र किम् ॥१७९॥

अर्थ: इस संसारके प्राणी निरन्तर जन्म-जरामरण तथा बीमारी आदिके हजारों एवं मान-सिक महादुखोंसे पीडित रहते हैं अतः यहाँ क्या सुख है ? ॥१७९॥


असिधारामधुस्वादसमं विषयजं सुखम् । दग्धे चन्दनवद्दिव्यं चक्रिणां सविषान्नवत् ॥१८०॥

अर्थ: विषय-जन्यसुख खड्गधारा पर लगे हुए मधुके स्वादके समान है, स्वर्गका सुख जले हुए घावपर चन्दनके लेपके समान है और चक्रवर्तीका सुख विषमिश्रित अन्नके समान है ॥१८०॥


ध्रुवं परमनाबाधमुपमानविवर्जितम् । आत्मस्वाभाविकं सौख्यं सिद्धानां परिकीर्त्तितम् ॥१८१॥

अर्थ: किन्तु सिद्ध भगवान्का जो सुख है वह नित्य है, उत्कृष्ट है, आबाधासे रहित है,अनुपम है, और आत्मस्वभावसे उत्पन्न है ॥१८१॥


सुप्तया किं ध्वस्तनिद्राणां नीरोगाणां किमौषधैः । सर्वज्ञानां कृतार्थानां किं दीपतपनादिना ॥१८२॥

आयुधैः किमभीतानां निर्मुक्तानामरातिभिः । पश्यतां विपुलं सर्वसिद्धार्थानां किमीहया ॥१८३॥

महात्म सुखतृप्तानां किं कृत्यं भोजनादिना । देवेन्द्रा अपि यत्सौख्यं वाञ्छन्ति सततोन्मुखाः ॥१८४॥

नास्ति यद्यपि तत्त्वेन प्रतिमाऽस्य तथाऽपि ते । वदामि प्रतिबोधार्थं सिद्धात्मसुखगोचरे ॥१८५॥

अर्थ: जिनकी निद्रा नष्ट हो चुकी है उन्हें शयनसे क्या ? नीरोग मनुष्योंको औषधिसे क्या ? सर्वज्ञ तथा कृतकृत्य मनुष्योंको दीपक तथा सूर्य आदिसे क्या ? शत्रुओंसे रहित निर्भीक मनुष्योंके लिए आयुधोंसे क्या ? देखते-देखते जिनके पूर्ण रूपमें सब मनोरथ सिद्ध हो गये हैं ऐसे मनुष्योंको चेष्टासे क्या ? और आत्मसम्बन्धी महा सुखसे संतुष्ट मनुष्योंको भोजनादिसे क्या प्रयोजन है ? इन्द्र लोग भी सिद्धोंके जिस सुखकी सदा उन्मुख रहकर इच्छा करते रहते हैं। यद्यपि यथार्थमें उस सुखकी उपमा नहीं है तथापि तुम्हें समझानेके लिए सिद्धोंके उस आत्मसुखके विषयमें कुछ कहता हूँ ॥१८२-१८५॥


सचक्रवर्त्तिनो मर्त्याः सेन्द्रा यच्च सुराः सुखम् । कालेनान्तविमुक्तेन सेवन्ते भवहेतुजम् ॥१८६॥

अनन्तपूरणस्यापि भागस्य तदकर्मणाम् । सुखस्य तुल्यतां नैति सिद्धानामीदृशं सुखम् ॥१८७॥

अर्थ: चक्रवर्ती सहित समस्त मनुष्य और इन्द्र सहित समस्त देव अनन्त कालमें जिस सांसारिक सुखका उपभोग करते हैं वह कर्म रहित सिद्ध भगवान्‌के अनन्तवें सुखकी भी सदृशताको प्राप्त नहीं होता। ऐसा सिद्धोंका सुख है ॥१८६-१८७॥


जनेभ्यः सुखिनो भूपाः भूपेभ्यश्चक्रवर्त्तिनः । चक्रिभ्यो व्यन्तरास्तेभ्यः सुखिनो ज्योतिषाऽमराः ॥१८८॥

अर्थ: साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा राजा सुखी हैं, राजाओंकी अपेक्षा चक्रवर्ती सुखी हैं, चक्रवर्तियोंकी अपेक्षा व्यन्तर देव सुखी हैं, व्यन्तर देवोंकी अपेक्षा ज्यौतिष देव सुखी हैं ॥१८८॥


ज्योतिर्भ्यो भवनावासास्तेभ्यः कल्पभुवः क्रमात् । ततो ग्रैवेयकावासास्ततोऽनुत्तरवासिनः ॥१८९॥

अर्थ: ज्यौतिष देवोंकी अपेक्षा भवनवासी देव सुखी हैं, भवनवासियोंकी अपेक्षा कल्पवासी देव सुखी हैं, कल्पवासी देवोंकी अपेक्षा ग्रैवेयक वासी सुखी हैं, ग्रैवेयकवासियोंकी अपेक्षा अनुत्तरवासी सुखी हैं ॥१८९॥


अनन्तानन्तगुणतस्तेभ्यः सिद्धिपदस्थिताः । सुखं नापरमुत्कृष्टं विद्यते सिद्धसौख्यतः ॥१९०॥

अर्थ: और अनुत्तरवासियोंसे अनन्तानन्त गुणित सुखी सिद्ध जीव हैं। सिद्ध जीवोंके सुखसे उत्कृष्ट दूसरा सुख नहीं है ॥१९०॥


अनन्तं दर्शनं ज्ञानं वीर्यं च सुखमेव च । आत्मनः स्वमिदं रूपं तच्च सिद्धेषु विद्यते ॥१९१॥

अर्थ: अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान, अनन्तवीर्य और अनन्तसुख यह चतुष्टय आत्माका निज स्वरूप है और वह सिद्धोंमें विद्यमान है ॥१९१॥


संसारिणस्तु तान्येव कर्मोपशमभेदतः । वैचित्र्यवन्ति जायन्ते बाह्यवस्तुनिमित्ततः ॥१९२॥

अर्थ: परन्तु संसारी जीवोंके वे ही ज्ञान दर्शन आदि कर्मोंके उपशममें भेद होनेसे तथा बाह्य वस्तुओंके निमित्तसे अनेक प्रकारके होते हैं ॥१९२॥


शब्दादिप्रभवं सौख्यं शल्यितं व्याधिकीलकैः । नवव्रणभवे तत्र सुखाशा मोहहेतुका ॥१९३॥

अर्थ: शब्द आदि इन्द्रियोंके विषयोंसे होनेवाला सुख व्याधिरूपी कीलोंके द्वारा शल्य युक्त है इसलिए शरीरसे होनेवाले सुखमें सुखकी आशा करना मोहजनित आशा है ॥१९३॥


गत्यागतिविमुक्तानां प्रक्षीणक्लेशसम्पदाम् । लोकशेखरभूतानां सिद्धानामसमं सुखम् ॥१९४॥

अर्थ: जो गमनागमनसे विमुक्त हैं, जिनके समस्त क्लेश नष्ट हो चुके हैं एवं जो लोकके मुकुट स्वरूप हैं अर्थात् लोकाग्रमें विद्यमान हैं उन सिद्धोंका सुख अपनी समानता नहीं रखता ॥१९४॥


यदीयं दर्शनं ज्ञानं लोकालोकप्रकाशकम् । क्षुद्रद्रव्यप्रकाशेन नैव ते भानुना समाः ॥१९५॥

अर्थ: जिनका दर्शन और ज्ञान लोकालोकको प्रकाशित करनेवाला है, वे क्षुद्र द्रव्योंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यके समान नहीं कहे जा सकते ॥१९५॥


करस्थामलकज्ञानसर्वभागेऽप्यपुष्कलम् । छद्मस्थपुरुषोत्पन्नं सिद्धज्ञानस्य नो समम् ॥१९६॥

अर्थ: जो हाथ पर स्थित आँवलेके सर्वभागोंके जाननेमें असमर्थ है ऐसा छद्मस्थ पुरुषोंका ज्ञान सिद्धोंके समान नहीं है ॥१९६॥


समं त्रिकालभेदेषु सर्वभावेषु केवली । ज्ञानदर्शनयुक्तात्मा नेतरः सोऽपि सर्वथा ॥१९७॥

अर्थ: त्रिकाल सम्बन्धी समस्त पदार्थोंके विषयमें एक केवली ही ज्ञान दर्शनसे सम्पन्न होता है, अन्य नहीं ॥१९७॥


ज्ञानदर्शनभेदोऽयं यथा सिद्धेतरात्मनाम् । सुखेऽपि दृश्यतां तद्वत्तथा वीर्येऽपि दृश्यताम् ॥१९८॥

अर्थ: सिद्ध और संसारी जीवोंमें जिस प्रकार यह ज्ञान दर्शनका भेद है उसी प्रकार उनके सुख और वीर्यमें भी यह भेद समझना चाहिए ॥१९८॥


दर्शनज्ञानसौख्यानि सकलत्वेन तत्त्वतः । सिद्धानां केवली वेत्ति शेषेष्वौपमिकं वचः ॥१९९॥

अर्थ: यथार्थमें सिद्धोंके दर्शन, ज्ञान और सुखको सम्पूर्ण रूपसे केवली ही जानते हैं अन्य लोगोंके वचन तो उपमा रूप ही होते हैं ॥१९९॥


अभव्यात्मभिरप्राप्यमिदं जैनेन्द्रमास्पदम् । अत्यन्तमपि यत्नाढ्यैः कायसंक्लेशकारिभिः ॥२००॥

अर्थ: यह जिनेन्द्र भगवान्का स्थान - सिद्धपद, अभव्य जीवोंको अप्राप्य है, भले हो वे अनेक यत्नोंसे सहित हों तथा अत्यधिक काय-क्लेश करनेवाले हों ॥२००॥


अनादिकालसम्बद्धां विरहेण विवर्जिताम् । अविद्यागेहिनीं ते हि शश्वदाश्लिष्य शेरते ॥२०१॥

अर्थ: इसका कारण भी यह है कि वे अनादि कालसे सम्बद्ध तथा विरहसे रहित अविद्यारूपी गृहिणीका निरन्तर आलिङ्गन कर शयन करते रहते हैं ॥२०१॥


विमुक्तिवनिताऽऽश्लेषसमुत्कण्ठापरायणाः । भव्यास्तु दिवसान् कृच्छ्रं प्रेरयन्ति तपःस्थिताः ॥२०२॥

अर्थ: इनके विपरीत मुक्तिरूपी स्त्रीके आलिङ्गन करनेमें जिनकी उत्कण्ठा बढ़ रही है ऐसे भव्य जीव तपश्चरणमें स्थित होकर बड़ी कठिनाईसे दिन व्यतीत करते हैं अर्थात् वे जिस किसी तरह संसारका समय बिताकर मुक्ति प्राप्त करना चाहते हैं ॥२०२॥


सिद्धिशक्तिविनिर्मुक्ता अभव्याः परिकीर्तिताः । भविष्यत्सिद्धयो जीवा भव्यशब्दमुपाश्रिताः ॥२०३॥

अर्थ: जो मुक्ति प्राप्त करनेकी शक्तिसे रहित हैं वे अभव्य कहलाते हैं और जिन्हें मुक्ति प्राप्त होगी वे भव्य कहे जाते हैं ॥२०३॥


जिनेन्द्रशासनादन्यशासने रघुनन्दन । न सर्वयत्नयोगेऽपि विद्यते कर्मणां क्षयः ॥२०४॥

अर्थ: सर्वभूषण केवली कहते हैं कि हे रघुनन्दन ! जिनेन्द्रशासनको छोड़कर अन्यत्र सर्व प्रकारका यत्न होने पर भी कर्मोंका क्षय नहीं होता है ॥२०४॥


यत्कर्म क्षपयत्यज्ञो भूरिभिर्भवकोटिभिः । ज्ञानी मुहूर्तयोगेन त्रिगुप्तस्तदपोहयेत् ॥२०५॥

अर्थ: अज्ञानी जीव जिस कर्मको अनेक करोड़ों भवोंमें क्षीण कर पाता है उसे तीन गुप्तियोंका धारक ज्ञानी मनुष्य एक मुहूर्तमें ही क्षय कर देता है ॥२०५॥


प्रतीतो जगतोऽप्येतत्परमात्मा निरञ्जनः । दृश्यते परमार्थेन यथा प्रक्षीणकर्मभिः ॥२०६॥

अर्थ: यह बात संसारमें भी प्रसिद्ध है कि यथार्थमें निरञ्जन - निष्कलङ्क परमात्माका दर्शन वही कर पाते हैं जिनके कि कर्म क्षीण हो गये हैं ॥२०६॥


गृहीतं बहुभिर्विद्धि लोकमार्गमसारकम् । परमार्थपरिप्राप्त्यै गृहाण जिनशासनम् ॥२०७॥

अर्थ: यह सारहीन संसारका मार्ग तो अनेक लोगोंने पकड़ रक्खा है पर इससे परमार्थकी प्राप्ति नहीं, अतः परमार्थकी प्राप्तिके लिए एक जिनशासनको ही ग्रहण करो ॥२०७॥


एवं रघूत्तमः श्रुत्वा वचः साकलभूषणम् । प्रणिपत्य जगौ नाथ तारयाऽस्माद्भवादिति ॥२०८॥

अर्थ: इस प्रकार सकलभूषणके वचन सुनकर श्रीरामने प्रणाम कर कहा कि हे नाथ ! इस संसार-सागरसे पार लगाओ ॥२०८॥


भगवन्नधमा मध्या उत्तमाश्चासुधारिणः । भव्याः केन विमुच्यन्ते विधिना भववासतः ॥२०९॥

अर्थ: उन्होंने यह भी पूछा कि हे भगवन् ! जघन्य मध्यम तथा उत्तमके भेदसे भव्य जीव तीन प्रकारके हैं सो ये संसार-वाससे किसी विधिसे छूटते हैं ? ॥२०९॥


उवाच भगवान् सम्यग्दर्शनज्ञानचेष्टितम् । मोक्षवर्त्म समुद्दिष्टमिदं जैनेन्द्रशासने ॥२१०॥

अर्थ: तब सर्वभूषण भगवान्ने कहा कि जैनेन्द्र शासन - जैनधर्ममें सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इनकी एकता ही को मोक्षका मार्ग बताया है ॥२१०॥


तत्त्वश्रद्धानमेतस्मिन् सम्यग्दर्शनमुच्यते । चेतनाचेतनं तत्त्वमनन्तगुणपर्ययम् ॥२११॥

अर्थ: इनमेंसे तत्त्वोंका श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है। अनन्त गुण और अनन्त पर्यायोंको धारण करनेवाला तत्त्व चेतन, अचेतनके भेदसे दो प्रकारका है ॥२११॥


निसर्गाधिगमद्वाराद्भक्त्या तत्त्वमुपाददत् । सम्यग्दृष्टिरिति प्रोक्तो जीवो जिनमते रतः ॥२१२॥

अर्थ: स्वभाव अथवा परोपदेशके द्वारा भक्तिपूर्वक जो तत्त्वको ग्रहण करता है वह जिनमतका श्रद्धालु सम्यग्दृष्टि जीव कहा गया है ॥२१२॥


शङ्का काङ्क्षा चिकित्सा च परशासनसंस्तवः । प्रत्यक्षोदारदोषाद्या एते सम्यक्त्वदूषणाः ॥२१३॥

अर्थ: शङ्का कांक्षा,विचिकित्सा,अन्यदृष्टि प्रशंसा और प्रत्यक्ष ही उदार मनुष्योंमें दोषादि लगाना - उनकी निन्दा करना ये सम्यग्दर्शनके पाँच अतिचार हैं ॥२१३॥


स्थैर्यं जिनवरागारे रमणं भावना पराः । शङ्कादिरहितत्वं च सम्यग्दर्शनशोधनम् ॥२१४॥

अर्थ: परिणामोंकी स्थिरता रखना, जिनायतन आदि धर्म क्षेत्रोंमें रमण करना - स्वभावसे उनका अच्छा लगना, उत्तम भावनाएँ भाना तथा शङ्कादि दोषोंसे रहित होना ये सब सम्यग्दर्शनको शुद्ध रखनेके उपाय हैं ॥२१४॥


सर्वज्ञशासनोक्तेन विधिना ज्ञानपूर्वकम् । क्रियते यदसाध्येन सुचारित्रं तदुच्यते ॥२१५॥

अर्थ: सर्वज्ञके शासनमें कही हुई विधिके अनुसार सम्यग्ज्ञान पूर्वक जितेन्द्रिय मनुष्यके द्वारा जो आचरण किया जाता है वह सम्यक्चारित्र कहलाता है ॥२१५॥


गोपायितहृषीकत्वं वचोमानसयन्त्रणम् । विद्यते यत्र निष्पापं सुचारित्रं तदुच्यते ॥२१६॥

अर्थ: जिसमें इन्द्रियोंका वशीकरण और वचन तथा मनका नियन्त्रण होता है वही निष्पाप - निर्दोष सम्यक्चारित्र कहलाता है ॥२१६॥


अहिंसा यत्र भूतेषु त्रसेषु स्थावरेषु च । क्रियते न्याययोगेषु सुचारित्रं तदुच्यते ॥२१७॥

अर्थ: जिसमें न्यायपूर्ण [?]त्ति करनेवाले त्रस स्थावर जीवोंपर अहिंसा की जाती है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२१७॥


मनःश्रोत्रपरिह्लादं स्निग्धं मधुरमर्थवत् । शिवं यत्र वचः सत्यं सुचारित्रं तदुच्यते ॥२१८॥

अर्थ: जिसमें मन और कानोंको आनन्दित करनेवाले, स्नेहपूर्ण, मधुर, सार्थक और कल्याणकारी वचन कहे जाते हैं उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२१८॥


अदत्तग्रहणे यत्र निवृत्तिः क्रियते त्रिधा । दत्तं च गृह्यते न्याय्यं सुचारित्रं तदुच्यते ॥२१९॥

अर्थ: जिसमें अदत्तवस्तुके ग्रहणमें मन, वचन, कायसे निवृत्ति की जाती है तथा न्यायपूर्ण दी हुई वस्तु ग्रहण की जाती है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२१९॥


सुराणामपि सम्पूज्यं दुर्धरं महतामपि । ब्रह्मचर्यं शुभं यत्र सुचारित्रं तदुच्यते ॥२२०॥

अर्थ: जहाँ देवोंके भी पूज्य और महापुरुषोंके भी कठिनतासे धारण करने योग्य शुभ ब्रह्मचर्य धारण किया जाता है वह सम्यक्चारित्र कहलाता है ॥२२०॥


शिवमार्गमहाविघ्नमूर्च्छात्यजनपूर्वकः । परिग्रहपरित्यागः सुचारित्रं तदुच्यते ॥२२१॥

अर्थ: जिसमें मोक्षमार्गमें महाविघ्नकारी मूर्च्छाके त्यागपूर्वक परिग्रहका त्याग किया जाता है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२२१॥


परपीडाविनिर्मुक्तं दानं श्रद्धादिसङ्गतम् । दीयते यन्निवृत्तेभ्यः सुचारित्रं तदुच्यते ॥२२२॥

अर्थ: जिसमें मुनियोंके लिए परपीडासे रहित तथा श्रद्धा आदि गुणोंसे सहित दान दिया जाता है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२२२॥


विनयो नियमः शीलं ज्ञानं दानं दया दमः । ध्यानं च यत्र मोक्षार्थं सुचारित्रं तदुच्यते ॥२२३॥

अर्थ: जिसमें विनय, नियम, शील, ज्ञान, दया, दम और मोक्षके लिए ध्यान धारण किया जाता है उसे सम्यक्चारित्र कहते हैं ॥२२३॥


एतद्गुणसमायुक्तं जिनेन्द्रवचनोदितम् । श्रेयः सम्प्राप्तये सेव्यं चारित्रं परमोदयम् ॥२२४॥

अर्थ: इस प्रकार इन गुणोंसे सहित, जिन शासनमें कथित, परम अभ्युदयका कारण जो सम्यक्चारित्र है, कल्याण प्राप्तिके लिए उसका सेवन करना चाहिए ॥२२४॥


शक्यं करोत्यशक्ये तु श्रद्धावान् स्वस्य निन्दकः । सम्यक्त्वसहितो जन्तुः शक्तश्चारित्रसङ्गतः ॥२२५॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि जीव शक्य कार्यको करता है और अशक्य कार्यकी श्रद्धा रखता है परन्तु जो शक्त अर्थात् समर्थ होता है वह चारित्र धारण करता है ॥२२५॥


यत्र त्वेते न विद्यन्ते समीचीना महागुणाः । तत्र नास्ति सुचारित्रं न च संसारनिर्गमः ॥२२६॥

अर्थ: जिसमें पूर्वोक्त समीचीन महागुण नहीं हैं उसमें सम्यक्चारित्र नहीं है, और न उसका संसारसे निकलना होता है ॥२२६॥


दयादमक्षमा यत्र न विद्यन्ते न संवरः । न ज्ञानं न परित्यागस्तत्र धर्मो न विद्यते ॥२२७॥

अर्थ: जिसमें दया, दम, क्षमा नहीं हैं, संवर नहीं है, ज्ञान नहीं है, और परित्याग नहीं हैं उसमें धर्म नहीं रहता ॥२२७॥


हिंसावितथचौर्यस्त्रीसमारम्भसमाश्रयः । क्रियते यत्र धर्मार्थं तत्र धर्मो न विद्यते ॥२२८॥

अर्थ: जिसमें धर्मके लिए हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहका आश्रय किया जाता है वहाँ धर्म नहीं है ॥२२८॥


दीक्षामुपेत्य यः पापे मूढचेताः प्रवर्त्तते । आरम्भिणोऽस्य चारित्रं विमुक्तिर्वा न विद्यते ॥२२९॥

अर्थ: जो मूर्ख हृदय दीक्षा लेकर पापमें प्रवृत्ति करता है उस आरम्भीके न चारित्र है और न उसे मुक्ति प्राप्त होती है ॥२२९॥


षण्णां जीवनिकायानां क्रियते यत्र पीडनम् । धर्मव्याजेन सौख्यार्थं न तेन शिवमाप्यते ॥२३०॥

अर्थ: जिसमें धर्मके बहाने सुख प्राप्त करनेके लिए छह कायके जीवोंकी पीडा की जाती है उस धर्मसे कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥२३०॥


वधताडनबन्धाङ्कदोहनादिविधायिनः । ग्रामक्षेत्रादिसक्तस्य प्रव्रज्या का हतात्मनः ॥२३१॥

अर्थ: जो मारना, ताडना, बाँधना, आँकना तथा दोहना आदि कार्य करता है तथा गाँव, खेत आदिमें आसक्त रहता है उस अनात्मज्ञका दीक्षा लेना क्या है ? ॥२३१॥


क्रयविक्रयसक्तस्य पक्तियाचनकारिणः । सहिरण्यस्य का मुक्तिर्दीक्षितस्य दुरात्मनः ॥२३२॥

अर्थ: जो वस्तुओंके खरीदने और बेंचनेमें आसक्त है, स्वयं भोजनादि पकाता है अथवा दूसरेसे याचना करता है, और स्वर्णादि परिग्रह साथ रखता है, ऐसे आत्महीन दीक्षित मनुष्यको क्या मुक्ति प्राप्त होगी ? ॥२३२॥


मर्दनस्नानसंस्कारमाल्यधूपानुलेपनम् । सेवन्ते दुर्विदग्धा ये दीक्षितास्ते न मोक्षगाः ॥२३३॥

अर्थ: जो अविवेकी मनुष्य दीक्षित होकर मर्दन, स्नान, संस्कार, माला, धूप तथा विलेपन आदिका सेवन करते हैं वे मोक्षगामी नहीं हैं - उन्हें मोक्ष प्राप्त नहीं होता ॥२३३॥


हिंसां दोषविनिर्मुक्तां वदन्तः स्वमनीषया । शास्त्रं वेषं च वृत्तं च दूषयन्ति समूढकाः ॥२३४॥

अर्थ: जो अपनी बुद्धिसे हिंसाको निर्दोष कहते हुए शास्त्र वेष तथा चारित्रमें दोष लगाते हैं वे मूढ़तासे सहित हैं - मिथ्यादृष्टि हैं ॥२३४॥


एकरात्रं वसन् ग्रामे नगरे पञ्चरात्रकम् । नित्यमूर्ध्वभुजस्तिष्ठन् मासे मासे च पारयन् ॥२३५॥

मृगैः सममरण्यान्यां शयानो विचरन्नपि । कुर्वन्नपि भृगोः पातं मौनवान्निःपरिग्रहः ॥२३६॥

मिथ्यादर्शनदुष्टात्मा कुलिङ्गी बीजवर्जितः । पद्भ्यामगम्यदेशं वा नैवाप्नोति शिवालयम् ॥२३७॥

अर्थ: जो गाँवमें एक रात और नगरमें पाँच रात रहता है, निरन्तर ऊपरकी ओर भुजा उठाये रहता है, महीने-महीनेमें एक बार भोजन करता है, मृगोंके साथ अटवीमें शयन करता है, उन्हींके साथ विचरण करता है, भृगुपात भी करता है, मौनसे रहता है, और परिग्रहका त्याग करता है, वह मिथ्या दर्शनसे दूषित होनेके कारण कुलिङ्गी है तथा मोक्षके कारण जो सम्यग्दर्शनादि उनसे रहित है । ऐसा जीव पैरोंसे चलकर किसी अगम्य- स्थान अथवा मोक्षको प्राप्त नहीं कर सकता ॥२३५-२३७॥


अग्निवारिप्रवेशादिपापं धर्मधिया श्रयन् । प्रयाति दुर्गतिं जीवो मूढः स्वहितवर्त्मनि ॥२३८॥

अर्थ: जो धर्म बुद्धिसे अग्निप्रवेश तथा जलप्रवेश आदि पाप करता है वह आत्महितके मार्गमें मूढ है और दुर्गतिको प्राप्त होता है ॥२३८॥


रौद्रार्तध्यानसक्तस्य सकामस्य कुकर्मणः । उपायविपरीतस्य जायते निन्दिता गतिः ॥२३९॥

अर्थ: जो रौद्र और आर्तध्यानमें आसक्त है, कामपर जिसने विजय प्राप्त नहीं की है, जो खोटे काम करता है तथा उपायसे विपरीत प्रवृत्ति करता है उसकी निन्दित गति - कुगति होती है ॥२३९॥


मिथ्यादर्शनयुक्तोऽपि यो दद्यात्साध्वसाधुषु । धर्मबुद्धिरसौ पुण्यं बध्नाति विपुलोदयम् ॥२४०॥

अर्थ: जो मनुष्य मिथ्यादर्शनसे युक्त होकर भी धर्म बुद्धिसे साधु और असाधुके लिए दान देता है वह विपुल अभ्युदयको देनेवाले पुण्य कर्मका बन्ध करता है ॥२४०॥


भुञ्जानोऽपि फलं तस्य धर्मस्यासौ त्रिविष्टपे । लक्षभागदलेनाऽपि सम्यग्दृष्टेर्न सम्मितः ॥२४१॥

अर्थ: यद्यपि ऐसा जीव स्वर्गमें उस धर्मका फल भोगता है तथापि वह सम्यग्दृष्टिको प्राप्त होनेवाले फलके लाखमेंसे एक भागके भी बराबर नहीं है ॥२४१॥


सम्यग्दर्शनमुत्तुङ्गं सुश्लाघ्याः संवहन्ति ये । देवलोकप्रधानास्ते भवन्ति नियमप्रियाः ॥२४२॥

अर्थ: जो मनुष्य उत्कृष्ट सम्यग्दर्शन धारण करते हैं तथा चारित्रसे प्रेम रखते हैं वे इस लोकमें भी प्रशंसनीय होते हैं और मरनेके बाद देवलोकमें प्रधान होते हैं ॥२४२॥


क्लेशित्वाऽपि महायत्नं मिथ्यादृष्टिः कुलिङ्गकः । देवकिङ्करभावेन फलं हीनमवाश्नुते ॥२४३॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टि कुलिङ्गी मनुष्य, बड़े प्रयत्नसे क्लेश उठाकर भी देवोंका किङ्कर बन तुच्छ फलको प्राप्त होता है । भावार्थ - मिथ्यादृष्टि कुलिङ्गी मनुष्य यद्यपि तपश्चरणके अनेक क्लेश उठाता है तथापि वह उसके फलस्वरूप स्वर्गमें उत्तम पद प्राप्त नहीं कर पाता किन्तु देवोंका किङ्कर होकर हीन फल प्राप्त कर पाता है ॥२४३॥


सप्ताष्टसु नृदेवत्वभवसङ्क्रान्तिसौख्यभाक् । श्रमणत्वं समाश्रित्य सम्यग्दृष्टिर्विमुच्यते ॥२४४॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि मनुष्य, सात आठ भवोंमें मनुष्य और देव पर्यायमें परिभ्रमणसे उत्पन्न हुए सुखको भोगता हुआ अन्तमें मुनिदीक्षा धारणकर मुक्त हो जाता है ॥२४४॥


वीतरागैः समस्तज्ञैरिमं मार्गं प्रदर्शितम् । जन्तुर्विषयमूढात्मा प्रतिपत्तुं न वाञ्छति ॥२४५॥

अर्थ: वीतराग सर्वज्ञ देवके द्वारा दिखाये हुए इस मार्गको, विषयी मनुष्य प्राप्त नहीं करना चाहता ॥२४५॥


आशापाशैर्दृढं बद्धा मोहेनाधिष्ठिता भृशम् । तृष्णागारं समानीताः पापहिञ्जीरवाहिनः ॥२४६॥

रसनं स्पर्शनं प्राप्य दुःखसौख्याभिमानिनः । वराका विविधा जीवाः क्लिश्यन्ते शरणोज्झिताः ॥२४७॥

अर्थ: जो आशारूपी पाशसे मजबूत बँधे हैं, मोहसे अत्यधिक आक्रान्त हैं, तृष्णारूपी घरमें लाकर डाले गये हैं, पापरूपी जञ्जीरको धारण कर रहे हैं तथा स्पर्श और रसको पाकर जो दुःखको ही सुख मान बैठे हैं इस तरह नाना प्रकारके शरण रहित बेचारे दीन प्राणी निरन्तर क्लेश उठाते रहते हैं ॥२४६-२४७॥


बिभेति मृत्युतो नास्य ततो मोक्षः प्रजायते । काङ्क्षत्यनारतं सौख्यं न च लाभोऽस्य सिद्ध्यति ॥२४८॥

अर्थ: यह प्राणी मृत्युसे डरता है पर उससे छुटकारा नहीं हो पाता। इसी प्रकार निरन्तर सुख चाहता है पर उसकी प्राप्ति नहीं हो पाती ॥२४८॥


इत्ययं भीतिकामाभ्यां विफलाभ्यां वशीकृतः । केवलं तापमायाति चेतनो निरुपायकः ॥२४९॥

अर्थ: इस प्रकार निष्फल भय और कामसे वश हुआ यह प्राणी निरुपाय हो मात्र संतापको प्राप्त होता रहता है ॥२४९॥


आशया नित्यमाविष्टो भोगान् भोक्तुं समीहते । न करोति धृतिं धर्मे काञ्चने मशको यथा ॥२५०॥

अर्थ: निरन्तर आशासे घिरा हुआ यह प्राणी भोग भोगनेकी चेष्टा करता है परन्तु जिस प्रकार मच्छर स्वर्णमें संतोष नहीं करता उसी प्रकार यह प्राणी धर्ममें धैर्य धारण नहीं करता ॥२५०॥


सङ्क्लेशवह्नितप्तो बह्वारम्भक्रियोद्यतः । न कञ्चिदर्थमाप्नोति हीयते चास्य सङ्गतम् ॥२५१॥

अर्थ: संक्लेशरूपी अग्निसे संतप्त हुआ यह प्राणी बहुत प्रकारके आरम्भ करनेमें तत्पर रहता है परन्तु किसी भी प्रयोजनको प्राप्त नहीं अपितु इसके पासका जो सुख है वह भी चला जाता है ॥२५१॥


असौ पुराकृतात्पापादप्राप्यार्थं मनोगतम् । प्रत्युताऽनर्थमाप्नोति महान्तमतिदुर्जरम् ॥२५२॥

अर्थ: यह जीव पूर्वकृत पापके कारण मनोभिलषित पदार्थको प्राप्त नहीं होता किन्तु अत्यन्त दुर्जर बहुत भारी अनर्थको प्राप्त होता है ॥२५२॥


इदं कृतमिदं कुर्वे करिष्येऽहंसुनिश्चितम् । मर्तांहे वस्त्वदः पापान्मृत्युं यान्तीति चिन्तकाः ॥२५३॥

अर्थ: ‘मैं यह कर चुका, यह करता हूँ और यह आगे करूँगा ।’ इस प्रकार मनुष्य निश्चय कर लेता है पर कभी मरूँगा भी इस बातका कोई विचार नहीं करते ॥२५३॥


न हि प्रतीक्षते मृत्युरसुभाजां कृताकृतम् । समाक्रामत्यकाण्डेऽसौ मृगकं केसरी यथा ॥२५४॥

अर्थ: मृत्यु इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि प्राणी, कौन काम कर चुके और कौन काम नहीं कर पाये । वह तो जिस प्रकार सिंह मृग पर आक्रमण करता है उसी प्रकार असमयमें भी आक्रमण कर बैठती है ॥२५४॥


अहिते हितमित्याशा सुदुःखे सुखसम्मतिः । अनित्ये शाश्वताकूतं शरणाशा भयावहे ॥२५५॥

हिते सुखे परित्राणे ध्रुवे च विपरीतधीः । अहो कुदृष्टिसक्तानामन्यथैव व्यवस्थितिः ॥२५६॥

अर्थ: अहो ! मिथ्या दृष्टि मनुष्य, अहितको हित, दुःखको सुख, अनित्यको नित्य, भयदायकको शरणदायक, हितको अहित, सुखको दुःख, रक्षकको अरक्षक और ध्रुवको अध्रुव समझते हैं । इस प्रकार कहना पड़ता है कि मिथ्यादृष्टि मनुष्योंकी व्यवस्था अन्य प्रकार ही है ॥२५५-२५६॥


भार्यावारीप्रविष्टः सन् मनुष्यो वनवारणः । विषयामिषसक्तश्च मत्स्यो बन्धं समश्नुते ॥२५७॥

अर्थ: यह मनुष्य रूपी जङ्गली हाथी, भार्या रूपी बन्धनमें पड़कर बन्धको प्राप्त होता है अथवा यह मनुष्य रूपी मत्स्य विषय रूपी मांसमें आसक्त हो बन्धका अनुभव करता है ॥२५७॥


कुटुम्बसुमहापङ्के विस्तरे मोहसागरे । मग्नोऽवसीदति स्फूर्जन्दुर्बलो गवली यथा ॥२५८॥

अर्थ: कुटुम्बरूपी बहुत कीचड़से युक्त एवं लम्बे-चौड़े मोहरूपी महासागरमें फँसा हुआ यह प्राणी दुबले-पतले भैंसेके समान छटपटाता हुआ दुःखी हो रहा है ॥२५८॥


मोक्षो निगडबद्धस्य भवेदन्धाच्च कूपतः । निबद्धः स्नेहपाशैस्तु ततः कृच्छ्रेण मुच्यते ॥२५९॥

अर्थ: बेड़ियोंसे बँधे हुए मनुष्यका अन्धे कुँएसे छुटकारा हो सकता है परन्तु स्नेह रूपी पाशसे बँधा प्राणी उससे बड़ी कठिनाईसे छूट पाता है ॥२५९॥


बोधिं मनुष्यलोकेऽपि जैनेन्द्रीं सुष्ठु दुर्लभाम् । प्राप्तुमर्हत्यभव्यस्तु नैव मार्गं जिनोदितम् ॥२६०॥

अर्थ: जिसका पाना मनुष्यलोकमें भी अत्यन्त दुर्लभ है ऐसी जिनेन्द्र प्रतिपादित बोधिको प्राप्त करनेके लिए अभव्य प्राणी योग्य नहीं है। इसी प्रकार जिनेन्द्र कथित रत्नत्रय मार्गको भी प्राप्त करनेके लिए अभव्य समर्थ नहीं हैं ॥२६०॥


घनकर्मकलङ्काक्ता अभव्या नित्यमेव हि । संसारचक्रमारूढा भ्राम्यन्ति क्लेशवाहिताः ॥२६१॥

अर्थ: तीव्र कर्म मल कलंकसे युक्त रहनेवाले अभव्य जीव, निरन्तर संसाररूपी चक्रपर आरूढ हो क्लेश उठाते हुए घूमते रहते हैं ॥२६१॥


ततः कृत्वाञ्जलिं मूर्ध्नि जगाद रघुनन्दनः । किमस्मि भगवन् भव्यो मुच्ये कस्मादुपायतः ॥२६२॥

अर्थ: तदनन्तर हाथ जोड़ मस्तकसे लगाकर रामने कहा कि हे भगवन् ! क्या मैं भव्य हूँ ? और किस उपायसे मुक्त होऊँगा ? ॥२६२॥


शक्नोमि पृथिवीमेतां त्यक्तुं सान्तःपुरामहम् । लक्ष्मीधरस्य सुकृतं न शक्नोम्येकमुज्झितुम् ॥२६३॥

अर्थ: मैं अन्तःपुरसे सहित इस पृथिवीको छोड़नेके लिए समर्थ हूँ, परन्तु एक लक्ष्मणका उपकार छोड़नेके लिए समर्थ नहीं हूँ ॥२६३॥


स्नेहोर्मिषु चन्द्रखण्डेषु तरन्तं लग्नतोज्झितम् । अवलम्बनदानेन मां त्रायस्व मुनीश्वर ॥२६४॥

अर्थ: मैं बिना किसी आधारके स्नेहरूपी सागरकी तरङ्गोंमें तैर रहा हूँ, सो हे मुनीन्द्र ! अवलम्बन देकर मेरी रक्षा करो ॥२६४॥


उवाच भगवान् राम न शोकं कर्त्तु मर्हसि । ऐश्वर्यं बलदेवस्य भोक्तव्यं भवता ध्रुवम् ॥२६५॥

राज्यलक्ष्मीं परिप्राप्य दिवीव त्रिदशाधिपः । जैनेश्वरं व्रतं प्राप्य कैवल्यमयमेष्यसि ॥२६६॥

अर्थ: तदनन्तर भगवान् सर्वभूषण केवलीने कहा कि हे राम ! तुम शोक करनेके योग्य नहीं हो । आपको बलदेवका वैभव अवश्य भोगना चाहिए । जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गकी राज्यलक्ष्मीको प्राप्त होता है उसी प्रकार यहाँकी राज्यलक्ष्मीको पाकर तुम अन्तमें जिनेश्वर दीक्षाको धारण करोगे तथा केवलज्ञानमय मोक्षधामको प्राप्त होओगे ॥२६५-२६६॥


श्रुत्वा केवलिभाषितमुत्तमहर्षप्रजातपुलको रामः । विकसितनयनः श्रीमान् प्रसन्नवदनो बभूव धृत्या युक्तः ॥२६७॥

अर्थ: इस प्रकार केवली भगवान् का उपदेश सुनकर जिन्हें हर्षातिरेकसे रोमाञ्च निकल आये थे, जिनके नेत्र विकसित थे, जो श्रीमान् थे एवं प्रसन्नमुख थे ऐसे श्रीराम धैर्य - सुख संतोषसे युक्त हुए ॥२६७॥


विज्ञाय चरमदेहं दाशरथिं विस्मिताः सुरासुरमनुजाः । केवलिरविणोद्योतितमत्यन्तप्रीतिमानसाः समशंसन् ॥२६८॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि वहाँ जो भी सुर-असुर और मनुष्य थे वे रामको चरम शरीरी जानकर आश्चर्यसे चकित हो गये तथा अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो केवलीरूपी सूर्यके द्वारा प्रकाशित वस्तुतत्त्वकी प्रशंसा करने लगे ॥२६८॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे रामधर्मश्रवणाभिधानं नाम पञ्चोत्तरशतं पर्व ॥१०५॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें रामके धर्म-श्रवणका वर्णन करनेवाला एकसौ पाँचवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१०५॥

१०६. षडुत्तरशतं पर्व (सपरिवर्गरामदेवपूर्वभवाभिधानं)

वृषभः खेचराणां तद्भक्तिभूषो विभीषणः । निर्भीषणमहो भूषं वृषभं व्योमवाससाम् ॥१॥

पाणियुग्ममहाम्भोजभूषितोत्तमदेहभृत् । स नमस्कृत्य पप्रच्छ धीमान् सकलभूषणम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर जो विद्याधरोंमें प्रधान था, रामकी भक्ति ही जिसका आभूषण थी, और जो हस्तयुगलरूपी महाकमलोंसे सुशोभित मस्तकको धारण कर रहा था ऐसे बुद्धिमान् विभीषणने निर्भय तेजरूपी आभूषणसे सहित एवं निर्ग्रन्थ मुनियोंमें प्रधान उन सकलभूषण केवलीको नमस्कार कर पूछा कि ॥१-२॥


भगवन् पद्मनाभेन किमनेन भवान्तरे । सुकृतं येन माहात्म्यं प्रतिपन्नोऽयमीदृशम् ॥३॥

अर्थ: हे भगवन् ! इन रामने भवान्तरमें ऐसा कौन-सा पुण्य किया था जिसके फलस्वरूप ये इस प्रकारके माहात्म्यको प्राप्त हुए हैं ॥३॥


अस्य पत्नी सती सीता दण्डकारण्यवर्त्तिनः । केनानुबन्धदोषेण रावणेन तदा हृता ॥४॥

अर्थ: जब ये दण्डकवनमें रह गये थे तब इनकी पतिव्रता पत्नी सीताको किस संस्कार दोषसे रावणने हरा था ॥४॥


धर्मार्थकाममोक्षेषु शास्त्राणि सकलं विदन् । कृत्याकृत्यविवेकज्ञो धर्माधर्मविचक्षणः ॥५॥

प्रधानगुणसम्पन्नो भूत्वा मोहवशं गतः । पतङ्गत्वमितः कस्मात्परस्त्रीलोभपावके ॥६॥

अर्थ: रावण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षविषयक समस्त शास्त्रोंका अच्छा जानकार था, कृत्य-अकृत्यके विवेकको जानता था और धर्म-अधर्मके विषयमें पण्डित था । इस प्रकार यद्यपि वह प्रधान गुणोंसे सम्पन्न था तथापि मोहके वशीभूत हो वह किस कारण परस्त्रीके लोभरूपी अग्निमें पतङ्गपनेको प्राप्त हुआ था ? ॥५-६॥


भ्रातृपक्षातिसक्तेन भूत्वा वनविचारिणा । लक्ष्मीधरेण संग्रामे स कथं भुवि मूर्च्छितः ॥७॥

अर्थ: भाईके पक्षमें अत्यन्त आसक्त लक्ष्मणने वनचारी होकर संग्राममें उसे कैसे मार दिया ॥७॥


स तादृग्बलवानासीद्विद्याधरमहेश्वरः । कृतानेका द्भुतः प्राप्तः कथं मरणमीदृशम् ॥८॥

अर्थ: रावण वैसा बलवान्, विद्याधरोंका राजा और अनेक अद्भुत कार्योंका कर्ता होकर भी इस प्रकारके मरणको कैसे प्राप्त हो गया ? ॥८॥


अथ केवलिनो वाणी जगाद बहुजन्मगम् । संसारे परमं वैरमेतेनाऽऽसीत्सहानयोः ॥९॥

अर्थ: तदनन्तर केवली भगवान्की वाणीने कहा कि इस संसारमें राम-लक्ष्मणका रावणके साथ अनेक जन्मसे उत्कट वैर चला आता था ॥९॥


इह जम्बूमतिद्वीपे भरते क्षेत्रनामनि । नगरे नयदत्ताख्यो वाणिजोऽभूत्समस्वकः ॥१०॥

सुनन्दा गेहिनी तस्य धनदत्तः शरीरजः । द्वितीयो वसुदत्तस्तत्सुहृद्यज्ञबलिद्विजः ॥११॥

अर्थ: जो इस प्रकार है - इस जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें एकक्षेत्र नामका नगर था उसमें नयदत्त नामका एक वणिक् रहता था जो कि साधारण धनका स्वामी था । उसकी सुनन्दा नामकी स्त्रीसे एक धनदत्त नामका पुत्र था जो कि रामका जीव था, दूसरा वसुदत्तनामका पुत्र था जो कि लक्ष्मणका जीव था । एक यज्ञवलिनामका ब्राह्मण वसुदेवका मित्र था सो तुम - विभीषणका जीव था ॥१०-११॥


वणिक्सागरदत्ताख्यस्तत्रैव नगरेऽपरः । पत्नी रत्नप्रभा तस्य गुणवत्युदितात्मजा ॥१२॥

अर्थ: उसी नगरमें एक सागरदत्त नामक दूसरा वणिक् रहता था, उसकी स्त्रीका नाम रत्नप्रभा था और दोनोंके एक गुणवती नामकी पुत्री थी जो कि सीताकी जीव थी ॥१२॥


रूपयौवनलावण्यकान्तिसद्विभ्रमात्मिका । अनुजो गुणवान्नामा तस्या आसीत्सुचेतसः ॥१३॥

अर्थ: वह गुणवती, रूप, यौवन, लावण्य, कान्ति और उत्तम विभ्रमसे युक्त थी । सुन्दर चित्तको धारण करनेवाली उस गुणवतीका एक गुणवान् नामका छोटा भाई था जो कि भामण्डलका जीव था ॥१३॥


पित्राकूतं परिज्ञाय प्रीतेन कुलकांक्षिणा । दत्ता प्रौढकुमारी सा धनदत्ताय सूरिणा ॥१४॥

अर्थ: जब गुणवती युवावस्थाको प्राप्त हुई तब पिताका अभिप्राय जानकर कुलकी इच्छा करनेवाले बुद्धिमान् गुणवान्ने प्रसन्न होकर उसे नयदत्तके पुत्र धनदत्तके लिए देना निश्चित कर दिया ॥१४॥


श्रीकान्त इति विख्यातो वणिक्पुत्रोऽपरो धनी । स तां सन्ततमाकांक्षद् रूपस्तनितमानसः ॥१५॥

अर्थ: उसी नगरीमें एक श्रीकान्त नामका दूसरा वणिक् पुत्र था जो अत्यन्त धनाढ्य था तथा गुणवतीके रूपसे अपहृतचित्त होनेके कारण निरन्तर उसकी इच्छा करता था । यह श्रीकान्त रावणका जीव था ॥१५॥


वित्तस्याल्पतयावज्ञां धनदत्ते विधाय च । श्रीकान्तायोद्यता दातुं माता तां क्षुद्रमानसा ॥१६॥

विचेष्टितमिदं ज्ञात्वा वसुदत्तः प्रियाग्रजः । यज्ञवल्युपदेशेन श्रीकान्तं हन्तुमुद्यतः ॥१७॥

अर्थ: गुणवतीकी माता क्षुद्र हृदयवाली थी, इसलिए वह धनकी अल्पताके कारण धनदत्तके ऊपर अवज्ञाका भाव रख श्रीकान्तको गुणवती देनेके लिए उद्यत हो गई । तदनन्तर धनदत्तका छोटा भाई वसुदत्त यह चेष्टा जान यज्ञवलिके उपदेशसे श्रीकान्तको मारनेके लिए उद्यत हुआ ॥१६-१७॥


मण्डलाग्रं समुद्यम्य रात्रौ तमसि गह्वरे । निःशब्दपदविन्यासो नीलवस्त्रावगुण्ठितः ॥१८॥

श्रीकान्तं भवनोद्याने प्रमादिनमवस्थितम् । गत्वा प्राहरदेषोऽपि श्रीकान्तेनासिना हतः ॥१९॥

अर्थ: एक दिन वह रात्रिके सघन अन्धकारमें तलवार उठा चुपके-चुपके पद रखता हुआ नीलवस्त्रसे अवगुण्ठित हो श्रीकान्तके घर गया सो वह घरके उद्यानमें प्रमादसहित बैठा था जिससे वसुदत्तने जाकर उसपर प्रहार किया । बदलेमें श्रीकान्तने भी उसपर तलवारसे प्रहार किया ॥१८-१९॥


एवमन्योन्यघातेन मृत्युं तौ समुपागतौ । विन्ध्यपादमहारण्ये समुद्भूतौ कुरङ्गकौ ॥२०॥

अर्थ: इस तरह परस्परके घातसे दोनों मरे और मरकर विन्ध्याचलकी महाअटवीमें मृग हुए ॥२०॥


दुर्जनैर्धनदत्ताय कुमारी वारिता ततः । क्रुध्यन्ति ते हि निर्व्याजादुपदेशे तु किं पुनः ॥२१॥

अर्थ: दुर्जन मनुष्योंने धनदत्तके लिए कुमारीका लेना मना कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि दुर्जन किसी कारणके बिना ही क्रोध करते हैं फिर उपदेश मिलनेपर तो कहना ही क्या है ? ॥२१॥


तेन दुर्मृत्युना भ्रातुः कुमार्यपगमेन च । धनदत्तो गृहाद्दुःखी देशानभ्रमदाकुलः ॥२२॥

अर्थ: भाईके कुमरण और कुमारीके नहीं मिलनेसे धनदत्त बहुत दुःखी हुआ जिससे वह घरसे निकलकर आकुल होता हुआ अनेक देशोंमें भ्रमण करता रहा ॥२२॥


धनदत्तापरिप्राप्तया साऽपि बाला सुदुःखिता । अनिष्टान्यवरा गेहे नियुक्तान्नप्रदाविधौ ॥२३॥

अर्थ: इधर जिसे दूसरा वर इष्ट नहीं था ऐसी गुणवती धनदत्तकी प्राप्ति नहीं होनेसे बहुत दुःखी हुई । वह अपने घरमें अन्न देनेके कार्यमें नियुक्त की गई अर्थात् घरमें सबके लिए भोजन परोसनेका काम उसे सौंपा गया ॥२३॥


मिथ्यादृष्टिस्वभावेन द्वेष्टि दृष्ट्वा निरम्बरम् । साऽसूयते समाक्रोशत्यपि निर्भर्त्सयत्यपि ॥२४॥

अर्थ: वह अपने मिथ्यादृष्टि स्वभावके कारण निर्ग्रन्थ मुनिको देखकर उनसे सदा द्वेष करती थी, उनके प्रति ईर्ष्या रखती थी, उन्हें गाली देती थी तथा उनका तिरस्कार भी करती थी ॥२४॥


जिनशासनमेकान्तान्न श्रद्धत्तेऽतिदुर्जना । मिथ्यादर्शनसक्तात्मा कर्मबन्धानुरूपतः ॥२५॥

अर्थ: कर्मबन्धके अनुरूप जिसकी आत्मा सदा मिथ्यादर्शनमें आसक्त रहती थी ऐसी वह अतिदुष्टा जिनशासनका बिलकुल ही श्रद्धान नहीं करती थी ॥२५॥


ततः कालावसानेन सार्तध्यानपरायणा । जाता तत्र मृगी यत्र वसतस्तौ कुरङ्गकौ ॥२६॥

अर्थ: तदनन्तर आयु समाप्त होने पर आर्त्तध्यानसे मर कर वह उसी अटवीमें मृगी हुई जिसमें कि वे श्रीकान्त और वसुदत्तके जीव मृग हुए थे ॥२६॥


पूर्वानुबन्धदोषेण तस्या एव कृते पुनः । मृगावन्योन्यमुद्वृत्तौ हत्वा शूकरतां गतौ ॥२७॥

अर्थ: पूर्व संस्कारके दोषसे उसी मृगीके लिए दोनों फिर लड़े और परस्पर एक दूसरेको मार कर शूकर अवस्थाको प्राप्त हुए ॥२७॥


द्विरदौ महिषौ गावौ प्लवगौ द्वीपिनौ वृकौ । रुरू च तौ समुत्पन्नावन्योन्यं च हतस्तथा ॥२८॥

अर्थ: तदनन्तर वे दोनों हाथी, भैंसा, बैल, बानर, चीता, भेड़िया और कृष्ण मृग हुए तथा सभी पर्यायोंमें एक दूसरेको मार कर मरे ॥२८॥


जले स्थले च भूयोऽपि वैरानुसरणोद्यतौ । भ्राम्यतः पापकर्माणौ म्रियमाणौ तथाविधम् ॥२९॥

अर्थ: पाप कार्यमें तत्पर रहने वाले वे दोनों जलमें, स्थलमें जहाँ भी उत्पन्न होते थे वहीं बैरका अनुसरण करनेमें तत्पर रहते थे और उसी प्रकार परस्पर एक दूसरे को मार कर मरते थे ॥२९॥


परमं दुःखितः सोऽपि धनदत्तोऽध्वखेदितः । अन्यदाऽस्तङ्गते भानौ श्रमणाश्रममागमत् ॥३०॥

अर्थ: अथानन्तर मार्गके खेदसे थका अत्यन्त दुःखी धनदत्त, एक दिन सूर्यास्त होजाने पर मुनियों के आश्रममें पहुँचा ॥३०॥


तत्र साधूनभाषिष्ट तृषितोऽस्म्युदकं मम । प्रयच्छत सुखिन्नस्य यूयं हि सुकृतप्रियाः ॥३१॥

अर्थ: वह प्यासा था इसलिए उसने मुनियोंसे कहा कि मैं बहुत दुःखी होरहा हूँ अतः मुझे पानी दीजिए आप लोग पुण्य करना अच्छा समझते हैं ॥३१॥


तत्रैकश्रमणोऽवोचन् मधुरं परिसान्त्वयन् । रात्रावप्यमृतं युक्तं न पातुं किं पुनर्जलम् ॥३२॥

अर्थ: उनमेंसे एक मुनिने सान्त्वना देते हुए मधुर शब्द कहे कि रात्रिमें अमृत पीना भी उचित नहीं है फिर पानीकी तो बात ही क्या है ? ॥३२॥


अर्थ: हे भद्र ! तुझे दुःखी होने पर भी असमयमें नहीं खाना चाहिए । तू दुःखरूपी गम्भीर पानीसे भरे हुए संसार-सागरमें मत पड़ ॥३२॥


चक्षुर्व्यापारनिर्मुक्ते काले पापैकदारुणे । अदृष्टसूक्ष्मजन्त्वाढ्ये मा शीर्वत्स विभास्करे ॥३३॥

अर्थ: हे वत्स ! जब नेत्र अपना व्यापार छोड़ देते हैं, जो पापकी प्रवृत्ति होने से अत्यन्त दारुण है, जो नहीं दिखनेवाले सूक्ष्म जन्तुओंसे सहित है, तथा जब सूर्यका अभाव हो जाता है ऐसे समय भोजन मत कर ॥३३॥


आतुरेणाऽपि भोक्तव्यं विकाले भद्र न त्वया । मा पत व्यसनोदारसलिले भवसागरे ॥३४॥


उपशान्तस्ततः पुण्यकथाभिः सोऽल्पशक्तिकः । अणुव्रतधरो जातो दयालिङ्गितमानसः ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजकी पुण्य कथासे वह शान्त हो गया, उसका चित्त दयासे आलिङ्गित हो उठा और इनके फलस्वरूप वह अणुव्रतका धारी हो गया । यतश्च वह अल्पशक्तिका धारक था इसलिए महाव्रती नहीं बन सका ॥३५॥


कालधर्मं च सम्प्राप्य सौधर्मे सत्सुरोऽभवत् । मौलिकुण्डलकेयूरहारमुद्राङ्गदोज्ज्वलः ॥३६॥

अर्थ: तदनन्तर आयुका अन्त आनेपर मरणको प्राप्त हो वह सौधर्य स्वर्गमें मुकुट, कुंडल, बाजूबन्द, हार, मुद्रा और अनन्तसे सुशोभित उत्तम देव हुआ ॥३६॥


पूर्वपुण्योदयात्तत्र सुरस्त्रीसुखलालितः । महाप्सरःपरिवारो मोदते वज्रपाणिवत् ॥३७॥

अर्थ: वहाँ वह पूर्व-पुण्योदयके कारण देवाङ्गनाओंके सुखसे लालित था, अप्सराओंके बड़े भारी परिवारसे सहित था तथा इन्द्रके समान आनन्दसे समय व्यतीत करता था ॥३७॥


ततश्च्युतः समुत्पन्नः पुरश्रेष्ठमहापुरे । धारिण्यां श्रेष्ठिनो मेरोर्जैनात् पद्मरुचिः सुतः ॥३८॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँसे च्युत होकर महापुर नामक श्रेष्ठ नगरमें जैनधर्मके श्रद्धालु मेरु नामक सेठकी धारिणी नामक स्त्रीसे पद्मरुचि नामक पुत्र हुआ ॥३८॥


तत्रैव च पुरे नाम्ना छत्रच्छायो नरेश्वरः । महिषीगुणमञ्जूषा श्रीदत्ता तस्य भामिनी ॥३९॥

अर्थ: उसी नगरमें एक छत्रच्छाय नामका राजा रहता था । उसकी श्रीदत्ता नामकी स्त्री थी जो कि रानीके गुणोंकी मानो पिटारी ही थी ॥३९॥


आगच्छन्नन्यदा गोष्ठं गत्वा तुरगपृष्ठतः । अपश्यद् भुवि पर्यस्तं मैरवो जीर्णकं वृषम् ॥४०॥

अर्थ: किसी एक दिन पद्मरुचि घोड़े पर चढ़ा अपने गोकुलकी ओर आ रहा था, सो मार्गमें उसने पृथिवी पर पड़ा एक बूढ़ा बैल देखा ॥४०॥


सुगन्धिवस्त्रमाल्योऽसाववतीर्य तुरङ्गतः । आदरेण तमुक्षाणं दयावानातुरं गतः ॥४१॥

अर्थ: सुगन्धित वस्त्र तथा माला आदिको धारण करनेवाला पद्मरुचि घोड़ेसे उतर कर दयालु होता हुआ आदरपूर्वक उस बैलके पास गया ॥४१॥


दीयमाने जपे तेन कर्णे पञ्चनमस्कृतेः । शृण्वन्नुक्षशरीरो स शरीरान्निरितस्ततः ॥४२॥

अर्थ: पद्मरुचिने उसके कानमें पञ्चनमस्कार मन्त्रका जाप सुनाया । सो जब पद्मरुचि उसके कानमें पञ्चनमस्कार मन्त्रका जप दे रहा था तभी उस मन्त्रको सुनती हुई बैलकी आत्मा उस शरीरसे बाहर निकल गई अर्थात् नमस्कार मन्त्र सुनते-सुनते उसके प्राण निकल गये ॥४२॥


श्रीदत्तायां च सञ्जज्ञे तनुदुःकर्मजालकः । छत्रच्छायोऽभवत्तोषी दुर्लभे पुत्रजन्मनि ॥४३॥

अर्थ: मन्त्रके प्रभावसे जिसके कर्मोंका जाल कुछ कम हो गया था ऐसा वह पद्मरुचि, उसी नगरके राजा छत्रच्छायकी श्रीदत्ता नामकी रानीके पुत्र हुआ । यतश्च छत्रच्छायके पुत्र नहीं था इसलिए वह उसके उत्पन्न होनेपर बहुत संतुष्ट हुआ ॥४३॥


उदारा नगरे शोभा जनिता द्रव्यसम्पदा । समुत्सवो महान् जातो वादित्रबधिरीकृतः ॥४४॥

अर्थ: नगरमें बहुत भारी संपदा खर्च कर अत्यधिक शोभा की गई तथा बाजोंसे जो बहरा हो रहा था ऐसा महान् उत्सव किया गया ॥४४॥


ततः कर्मानुभावेन पूर्वजन्मसमस्मरन् । गोदुःखं दारुणं तच्च वाहशीतातपादिजम् ॥४५॥

श्रुतिं पाञ्चनमस्कारीं चेतसा च सदा वहन् । बाललीलाप्रसक्तोऽपि महासुभगविभ्रमः ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर कर्मोंके संस्कारसे उसे अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो गया । बैलपर्यायमें बोझा ढोना, शीत तथा आतप आदिसे उत्पन्न दारुण दुःख उसने भोगे थे तथा जो उसे पञ्चनमस्कार मन्त्र श्रवण करनेका अवसर मिला था वह सब उसकी स्मृतिपटलमें झूलने लगा । महासुन्दर चेष्टाओंको धारण करता हुआ वह, जब बालकालीन क्रीड़ाओंमें आसक्त रहता था तब भी मनमें पञ्चनमस्कार मन्त्रके श्रवणका सदा ध्यान रखता था ॥४५-४६॥


कदाचिद् विहरन् प्राप्तः स तां वृषमृतक्षितिम् । पर्यज्ञासीत् प्रदेशाँश्च पूर्वमाचरितान् स्वयम् ॥४७॥

अर्थ: किसी एक दिन वह विहार करता हुआ उस स्थान पर पहुँचा जहाँ उस बैलका मरण हुआ था । उसने एक-एक कर अपने घूमनेके सब स्थानोंको पहिचान लिया ॥४७॥


वृषभध्वजनामासौ कुमारो वृषभूमिकाम् । अवतीर्य गजात् स्वैरमपश्यद् दुःखिताशयः ॥४८॥

अर्थ: तदनन्तर वृषभध्वज नामको धारण करनेवाला वह राजकुमार हाथीसे उतर कर दुःखित चित्त होता हुआ इच्छानुसार बहुत देर तक बैलके मरनेकी उस भूमिको देखता रहा ॥४८॥


बुधं समाधिरत्नस्य दातारं श्लाघ्यचेष्टितम् । अपश्यन् दर्शने तस्य दध्यौ चौपयिकं ततः ॥४९॥

अर्थ: समाधि मरण रूपी रत्नके दाता तथा उत्तम चेष्टाओंसे सहित उस बुद्धिमान पद्मरुचिको जब वह नहीं देख सका तब उसने उसके देखनेके लिए योग्य उपायका विचार किया ॥४९॥


अथ कैलासशृङ्गाभं कारयित्वा जिनालयम् । चरितानि पुराणानि पट्टकादिष्वलेखयत् ॥५०॥

अर्थ: अथानन्तर उसने उसी स्थान पर कैलासके शिखरके समान एक जिनमन्दिर बनवाया, उसमें चित्रपट आदि पर महापुरुषोंके चरित तथा पुराण लिखवाये ॥५०॥


द्वारदेशे च तस्यैव पटं स्वभवचित्रितम् । पुरुषैः पालने न्यस्तैरधिष्ठितमतिष्ठिपत् ॥५१॥

अर्थ: उसी मन्दिरके द्वारपर उसने अपने पूर्वभवके चित्रसे चित्रित एक चित्रपट लगवा दिया तथा उसकी परीक्षा करनेके लिए चतुर मनुष्य उसके समीप खड़े कर दिये ॥५१॥


बन्दारुश्चैत्यभवनं तत् पद्मरुचिरागमत् । अपश्यच्च प्रहृष्टात्मा तच्चित्रं विस्मितस्ततः ॥५२॥

तन्निबद्धेक्षणो यावदसौ तच्चित्रमीक्षते । वृषध्वजस्य पुरुषैस्तावत् संवादितं श्रुतम् ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर वन्दनाकी इच्छा करता हुआ पद्मरुचि एक दिन उस मन्दिरमें आया और हर्षित चित्त होता हुआ उस चित्रको देखने लगा । तदनन्तर आश्चर्यचकित हो उसी चित्रपर नेत्र गड़ा कर ज्यों ही वह उसे देखता है कि वृषभध्वज राजकुमारके सेवकोंने उसे उसका समाचार सुना दिया ॥५२-५३॥


ततो महर्द्धिसम्पन्नः समारुह्य द्विपोत्तमम् । इष्टसङ्गमनाकांक्षी राजपुत्रः समागमत् ॥५४॥

अर्थ: तदनन्तर विशाल सम्पदासे सहित राजपुत्र, इष्टके समागमकी इच्छा करता हुआ उत्तम हाथी पर सवार हो वहाँ आया ॥५४॥


अवतीर्य च नागेन्द्रादविशज्जिनमन्दिरम् । पश्यन्तं च तदासक्तं धारणेयं निरैक्षत ॥५५॥

अर्थ: हाथीसे उतर कर उसने जिन-मन्दिरमें प्रवेश किया और वहाँ बड़ी तल्लीनताके साथ उस चित्रपटको देखते हुए धारिणीसुत - पद्मरुचिको देखा ॥५५॥


नेत्राऽऽस्यहस्तसञ्चारसूचितोत्तुङ्गविस्मयम् । अनंसीत् पादयोरेनं परिज्ञाय वृषध्वजः ॥५६॥

अर्थ: जिसके नेत्र, मुख तथा हाथोंके सञ्चारसे अत्यधिक आश्चर्य सूचित हो रहा था ऐसे उस पद्मरुचिको पहिचान कर वृषभध्वजने उसके चरणोंमें नमस्कार किया ॥५६॥


गोदुःखमरणं तस्मै धारिणीसूनुरब्रवीत् । राजपुत्रोऽगदीत् सोऽहमिति विस्तारिलोचनः ॥५७॥

अर्थ: पद्मरुचिने उसके लिए बैलके दुःखपूर्ण मरणका समाचार कहा जिसे सुन कर उत्फुल्ल लोचनोंको धारण करनेवाला राजपुत्र बोला कि वह बैल मैं ही हूँ ॥५७॥


सम्भ्रमेण च सम्पूज्य गुरुं शिष्यवरो यथा । तुष्टः पद्मरुचिं राजतनयः समुदाहरन् ॥५८॥

मृत्युव्यसनसम्बद्धे काले तस्मिन् भवान् मम । प्रियबन्धुरिव प्राप्तः समाधेः प्रापकोऽभवत् ॥५९॥

अर्थ: जिस प्रकार उत्तम शिष्य गुरुकी पूजा कर सन्तुष्ट होता है उसी प्रकार वृषभध्वज राजकुमार भी शीघ्रतासे पद्मरुचिकी पूजा कर सन्तुष्ट हुआ । पूजाके बाद राजपुत्रने पद्मरुचिसे कहा कि मृत्युके संकटसे परिपूर्ण उस कालमें आप मेरे प्रियबन्धुके समान समाधि प्राप्त करानेके लिए आये थे ॥५८-५९॥


समाध्यमृतपाथेयं त्वया दत्तं दयालुना । स पश्य तृप्तिसम्पन्नः सम्प्राप्तोऽहमिमं भवम् ॥६०॥

अर्थ: उस समय तुमने दयालु होकर जो समाधिरूपी अमृतका सम्बल मेरे लिए दिया था देखो, उसीसे तृप्त होकर मैं इस भवको प्राप्त हुआ हूँ ॥६०॥


नैव तत् कुरुते माता न पिता न सहोदरः । न बान्धवा न गीर्वाणाः प्रियं यन्मे त्वया कृतम् ॥६१॥

अर्थ: तुमने जो मेरा भला किया है वह न माता करती है, न पिता करता है, न सगा भाई करता है, न परिवारके अन्य लोग करते हैं और न देव ही करते हैं ॥६१॥


नेक्षे पञ्चनमस्कारश्रुतिदानविनिष्क्रयम् । तथापि मे परा भक्तिः त्वयि कारयतीरितम् ॥६२॥

अर्थ: तुमने जो मुझे पञ्चनमस्कार मन्त्र श्रवणका दान दिया था उसका मूल्य यद्यपि मैं नहीं देखता तथापि आपमें जो मेरी परम भक्ति है वही यह चेष्टा करा रही है ॥६२॥


आज्ञां प्रयच्छ मे नाथ ब्रूहि किं करवाणि ते । आज्ञादानेन मां भक्तं भजस्व पुरुषोत्तम ॥६३॥

अर्थ: हे नाथ ! मुझे आज्ञा दो मैं आपका क्या करूँ ? हे पुरुषोत्तम ! आज्ञा देकर मुझ भक्तको अनुगृहीत करो ॥६३॥


गृहाण सकलं राज्यमहं ते दासरूपकः । नियुज्यतामयं देहः कर्मण्यभिसमीहिते ॥६४॥

अर्थ: तुम यह समस्त राज्य ले लो, मैं तुम्हारा दास रहूँगा । अभिलषित कार्यमें इस शरीरको नियुक्त कीजिए ॥६४॥


एवमादिसुसम्भाषं तयोः प्रेमाभवत् परम् । सम्यक्त्वं चैव राज्यं च सम्प्रयोगश्च सन्ततः ॥६५॥

अर्थ: इत्यादि उत्तम शब्दोंके साथ-साथ उन दोनोंमें परम प्रेम होगया, दोनोंको ही सम्यक्त्वकी प्राप्ति हुई, वह राज्य दोनोंका सम्मिलित राज्य हुआ और दोनोंका संयोग चिर संयोग होगया ॥६५॥


अस्थिमज्जानुरक्तौ तौ सागारव्रतसङ्गतौ । जिनबिम्बानि चैत्यानि भुव्यतिष्ठिपतां स्थिरौ ॥६६॥

अर्थ: जिनका अनुराग ऊपर ही ऊपर न रहकर हड्डी तथा मज्जा तक पहुँच गया था ऐसे वे दोनों श्रावकके व्रतसे सहित हुए । स्थिर चित्तके धारण करनेवाले उन दोनोंने पृथिवी पर अनेक जिनमन्दिर और जिनबिम्ब बनवाये ॥६६॥


स्तूपैश्च धवलाम्भोजमुकुलप्रतिमामितैः । समपादयतां क्षोणीं शतशः कृतभूषणाम् ॥६७॥

अर्थ: सफेद कमलकी बोंड़ियोंके समान स्तूपोंसे सैकड़ों बार पृथिवीको अलंकृत किया ॥६७॥


ततः समाधिमाराध्य मरणे वृषभध्वजः । त्रिदशोऽभवदीशाने पुण्यकर्मफलानुभूः ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर मरणके समय समाधिकी आराधना कर वृषभध्वज ईशान स्वर्गमें पुण्य कर्मका फल भोगनेवाला देव हुआ ॥६८॥


सुरस्त्रीनयनाम्भोजविकासिनयनद्युतिः । तथाऽक्रीडत् परिध्यातसम्पन्नसकलेप्सितः ॥६९॥

अर्थ: उस देवके नयनोंकी कान्ति देवाङ्गनाओंके नयनकमलोंको विकसित करनेवाली थी, तथा क्रीड़ा करते समय ध्यान करते ही उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते थे ॥६९॥


काले पद्मरुचिः प्राप्य समाधिमरणं तथा । ईशान एव गीर्वाणः कान्तो वैमानिकोऽभवत् ॥७०॥

अर्थ: इधर पद्मरुचि भी आयुके अन्तमें समधिमरण प्राप्तकर ईशान स्वर्गमें ही सुन्दर वैमानिक देव हुआ ॥७०॥


च्युत्वापरविदेहे तु विजयाचलमस्तके । नन्द्यावर्त्तपुरेशस्य राज्ञो नन्दीश्वरश्रुतेः ॥७१॥

उत्पन्नः कनकाभायां नयनानन्दसंज्ञकः । खेचरेन्द्रश्रियं तत्र बुभुजे परमायताम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर पद्मरुचिका जीव वहाँसे चय कर पश्चिम विदेह क्षेत्रके विजयार्ध पर्वत पर नन्द्यावर्त नगरके राजा नन्दीश्वरकी कनकाभा रानीसे नयनानन्द नामका पुत्र हुआ । वहाँ उसने चिरकाल तक विद्याधर राजाकी विशाल लक्ष्मीका उपभोग किया ॥७१-७२॥


ततः श्रामण्यमास्थाय कृत्वा सुविकटं तपः । कालधर्मं समासाद्य माहेन्द्रं कल्पमाश्रयत् ॥७३॥

अर्थ: तदनन्तर मुनि-दीक्षा ले अत्यन्त विकट तप किया और अन्तमें समाधिमरण प्राप्त कर माहेन्द्र स्वर्ग प्राप्त किया ॥७३॥


मनोज्ञपञ्चविषयद्वारं परमसुन्दरम् । परिप्राप सुखं तत्र पुण्यवल्लीमहाफलम् ॥७४॥

अर्थ: वहाँ उसने पुण्यरूपी लताके महाफलके समान पञ्चेन्द्रियोंके विषय द्वारसे अत्यन्त सुन्दर मनोहर सुख प्राप्त किया ॥७४॥


च्युतस्ततो गिरेर्मेरोर्भागे पूर्वदिशि स्थिते । क्षेमायां पुरि सञ्जातः श्रीचन्द्र इति विश्रुतः ॥७५॥

अर्थ: तदनन्तर वहाँसे च्युत होकर मेरु पर्वतके पश्चिम दिग्भागमें स्थित क्षेमपुरी नगरीमें श्रीचन्द्र नामका प्रसिद्ध राजपुत्र हुआ ॥७५॥


माता पद्मावती तस्य पिता विपुलवाहनः । तत्र स्वर्गोपभुक्तस्य निष्यन्दं कर्मणोऽभजत् ॥७६॥

अर्थ: वहाँ उसकी माताका नाम पद्मावती और पिताका नाम विपुलवाहन था । वह वहाँ स्वर्गमें भोगे हुए कर्मका जो निःस्यन्द शेष रहा था उसीका मानो उपभोग करता था ॥७६॥


तस्य पुण्यानुभावेन कोशो विषयसाधनम् । दिने दिने परां वृद्धिमसेवत समन्ततः ॥७७॥

अर्थ: उसके पुण्य प्रभावसे उसका खजाना, देश तथा सैन्य बल सब ओरसे प्रतिदिन परम वृद्धिको प्राप्त हो रहा था ॥७७॥


ग्रामस्थानीयसम्पन्नां पृथिवीं विविधाकराम् । प्रियामिव महाप्रीत्या श्रीचन्द्रः समपालयत् ॥७८॥

अर्थ: वह श्रीचन्द्र, एक ग्रामके स्थानापन्न, नानाखानोंसे सहित विशाल पृथिवीका प्रियाके समान महाप्रीतिसे पालन करता था ॥७८॥


हावभावमनोज्ञाभिर्नारीभिस्तत्र लालितः । पर्यरंसीत् सुरस्त्रीभिः सुरेन्द्र इव सङ्गतः ॥७९॥

अर्थ: वहाँ वह हाव-भावसे मनोज्ञ स्त्रियोंके द्वारा लालित होता हुआ देवाङ्गनाओंसे सहित देवेन्द्रके समान क्रीड़ा करता था ॥७९॥


संवत्सरसहस्राणि सुभूरीणि क्षणोपमम् । तस्य दोदुन्दुकस्येव महैश्वर्ययुजोऽगमन् ॥८०॥

अर्थ: दोदुंदुक देवके समान महान् ऐश्वयको प्राप्त हुए उस श्रीचन्द्रके कई हजार वर्ष एक क्षणके समान व्यतीत हो गये ॥८०॥


गुप्तिव्रतसमित्युद्यः सङ्घेन महतावृतः । समाधिगुप्तयोगीन्द्रः पुरं तदन्यदागमत् ॥८१॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय व्रत समिति और गुप्तिसे श्रेष्ठ एवं बहुत भारी संघसे आवृत समाधिगुप्त नामक मुनिराज उस नगरमें आये ॥ ॥८१॥


उद्यानेऽवस्थितस्यास्य तत्र ज्ञात्वा जनोऽखिलः । वन्दनामगमत् कर्तुं सम्मदालापतत्परः ॥८२॥

अर्थ: ‘मुनिराज आकर उद्यानमें ठहरे हैं ।’ यह जानकर मुनिकी वन्दना करनेके लिए नगरके सब लोग हर्षपूर्वक बात-चीत करते हुए उद्यानमें गये ॥८२॥


स्तुवतोऽस्य परं भक्त्या नादं घनकुलोपमम् । कर्णमादाय संश्रुत्य श्रीचन्द्रोऽपृच्छदन्तिकान् ॥८३॥

कस्यैष श्रूयते नादो महासागरसम्मितः । अजानद्भिः समादिष्टैस्तैरमात्यः कृतोऽन्तिकः ॥८४॥

अर्थ: भक्तिपूर्वक स्तुति करनेवाले जनसमूहका मेघमण्डलके समान जो भारी शब्द हो रहा था उसे कान लगाकर श्रीचन्द्रने सुना और निकटवर्ती लोगोंसे पूछा कि यह महासागरके समान किसका शब्द सुनाई दे रहा है ? जिन लोगोंसे राजाने पूछा था वे उस शब्दका कारण नहीं जानते थे इसलिए उन्होंने मन्त्रीको राजाके निकट कर दिया ॥८३-८४॥


ज्ञायतां कस्य नादोऽयमिति राज्ञा स भाषितः । गत्वा ज्ञात्वा परावृत्य मुनिं प्राप्तमवेदयत् ॥८५॥

अर्थ: तब राजाने मंत्रीसे कहा कि मालूम करो यह किसका शब्द है ? इसके उत्तरमें मंत्रीने जाकर तथा सब समाचार जानकर वापिस आ निवेदन किया कि उद्यानमें मुनिराज आये हैं ॥८५॥


ततो विकचराजीवराजमाननिरीक्षणः । सस्त्रीकः सम्मदोद्भूतपुलकः प्रस्थितो नृपः ॥८६॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र खिले हुए कमलके समान सुशोभित हो रहे थे तथा जिसके हर्षके रोमाञ्च उठ आये थे ऐसा राजा श्रीचन्द्र अपनी स्त्रीके साथ मुनिवन्दनाके लिए चला ॥८६॥


प्रसन्नमुखतारेशं निरीक्ष्य मुनिपुङ्गवम् । सम्भ्रमी शिरसा नत्वा न्यसीदद्विनयाद्भुवि ॥८७॥

अर्थ: वहाँ प्रसन्न मुखचन्द्रके धारक मुनिराजके दर्शन कर राजाने शीघ्रतासे शिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया और उसके बाद वह विनयपूर्वक पृथिवी पर बैठ गया ॥८७॥


भव्याम्भोजप्रधानस्य मुनिभास्करदर्शने । तस्यासीदात्मसंवेद्यः कोऽपि प्रेममहाभरः ॥८८॥

अर्थ: भव्यरूपी कमलोंमें प्रधान राजा श्रीचन्द्रको मुनिरूपी सूर्यके दर्शन होनेपर अपने आप अनुभवमें आने योग्य कोई अद्भुत महाप्रेम उत्पन्न हुआ ॥८८॥


ततः परमगम्भीरः सर्वश्रुतिविशारदः । अदाज्जनमहौघाय मुनिस्तत्त्वोपदेशनम् ॥८९॥

अर्थ: तत्पश्चात् परमगम्भीर और सर्वशास्त्रोंके विशारद मुनिराजने उस अपार जनसमूहके लिए तत्त्वोंका उपदेश दिया ॥८९॥


अनगारं सहागारं धर्मं द्विविधमब्रवीत् । अनेकभेदसंयुक्तं संसारोत्तारणावहम् ॥९०॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि अवान्तर अनेक भेदोंसे सहित तथा संसार सागरसे तारने वाला धर्म, अनगार और सागारके भेदसे दो प्रकारका है ॥९०॥


करणं चरणं द्रव्यं प्रथमं च सभेदकम् । अनुयोगमुखं योगी जगाद वदतां वरः ॥९१॥

अर्थ: वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिराजने अनुयोग द्वारसे वर्णन करते हुए कहा कि अनुयोगके १ प्रथमानुयोग २ करणानुयोग ३ चरणानुयोग और ४ द्रव्यानुयोगके भेदसे चार भेद हैं ॥९१॥


आक्षेपणीं पराक्षेपकारिणीमकरोत् कथाम् । ततो निक्षेपणीं तत्त्वमतनिक्षेपकोविदाम् ॥९२॥

संवेजनीं च संसारभयप्रचयबोधनीम् । निर्वेदनीं तथा पुण्यां भोगवैराग्यकारिणीम् ॥९३॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने अन्य मत-मतान्तरोंकी आलोचना करनेवाली आक्षेपणी कथा की । फिर स्वकीय तत्त्वका निरूपण करनेमें निपुण निक्षेपणी कथा की । तदनन्तर संसारसे भय उत्पन्न करनेवाली संवेजनी कथा की और उसके बाद भोगोंसे वैराग्य उत्पन्न करनेवाली पुण्यवर्धक निर्वेदनी कथा की ॥९२-९३॥


सन्धावतोऽस्य संसारे कर्मयोगेन देहिनः । कृच्छ्रेण महता प्राप्तिर्मुक्तिमार्गस्य जायते ॥९४॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि कर्मयोगसे संसारमें दौड़ लगानेवाले इस प्राणीको मोक्षमार्गकी प्राप्ति बड़े कष्टसे होती है ॥९४॥


सन्ध्याबुद्बुदफेनोर्मिविद्युदिन्द्रधनुःसमः । भङ्गुरत्वेन लोकोऽयं न किञ्चिदिह सारकम् ॥९५॥

अर्थ: यह संसार विनाशी होनेके कारण संन्ध्या, बबूले, फेन, तरङ्ग, बिजली और इन्द्र-धनुषके समान है । इसमें कुछ भी सार नहीं है ॥९५॥


नरके दुःखमेकान्तादेति तिर्यक्षु वाऽसुमान् । मनुष्यत्रिदशानां च सुखेनैवैष तृप्यति ॥९६॥

अर्थ: यह प्राणी नरक अथवा तिर्यञ्चगतिमें एकान्त रूपसे दुःख ही प्राप्त करता है और मनुष्य तथा देवोंके सुखमें यह तृप्त नहीं होता है ॥९६॥


माहेन्द्रभोगसम्पद्भिर्यो न तृप्तिमुपागतः । स कथं क्षुद्रकैस्तृप्तिं व्रजेन्मनुजभोगकैः ॥९७॥

अर्थ: जो इन्द्र सम्बन्धी भोग-सम्पदाओंसे तृप्त नहीं हुआ वह मनुष्योंके क्षुद्र भोगोंसे कैसे तृप्त हो सकता है ? ॥९७॥


कथञ्चिद् दुर्लभं लब्ध्वा निधानमधनो यथा । नरत्वं मुह्यति व्यर्थं विषयास्वादलोभतः ॥९८॥

अर्थ: जिस प्रकार निर्धन मनुष्य किसी तरह दुर्लभ खजाना पाकर यदि प्रमाद करता है तो उसका वह खजाना व्यर्थ चला जाता है । इसी प्रकार यह प्राणी किसी तरह दुर्लभ मनुष्य पर्याय पाकर विषय स्वादके लोभमें पड़ यदि प्रमाद करता है तो उसकी मनुष्य-पर्याय व्यर्थ चली जाती है ॥९८॥


काग्नेः शुष्केन्धनैस्तृप्तिः काम्बुधेरापगाजलैः । विषयास्वादसौख्यैः का तृप्तिरस्य शरीरिणः ॥९९॥

अर्थ: सूखे ईन्धनसे अग्निकी तृप्ति क्या है ? नदियोंके जलसे समुद्रकी तृप्ति क्या है ? और विषयोंके आस्वाद-सम्बन्धी सुखसे संसारी प्राणीकी तृप्ति क्या है ? ॥९९॥


मज्जन्निव जले खिन्नो विषयामिषमोहितः । दक्षोऽपि मन्दतामेति तमोऽन्धीकृतमानसः ॥१००॥

अर्थ: जलमें डूबते हुए खिन्न मनुष्यके समान विषय रूपी आमिषसे मोहित हुआ चतुर मनुष्य भी मोहान्धीकृत चित्त होकर मन्दताको प्राप्त हो जाता है ॥१००॥


दिवा तपति तिग्मांशुर्मदनस्तु दिवानिशम् । समस्ति वारणं भानोर्मदनस्य न विद्यते ॥१०१॥

अर्थ: सूर्य तो दिनमें ही तपता है पर काम रात दिन तपता रहता है । सूर्यका आवरण तो है पर कामका आवरण नहीं है ॥१०१॥


जन्ममृत्युजरादुःखं संसारे स्मृतिभीतिदम् । अरहट्टघटीयन्त्रसन्ततं कर्मसम्भवम् ॥१०२॥

अर्थ: संसारमें अरहटकी घटीके समान निरन्तर कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला जो जन्म, जरा और मृत्यु सम्बन्धी दुःख है वह स्मरण आते ही भय देने वाला है ॥१०२॥


अजङ्गमं यथाऽन्येन यन्त्रं कृतपरिभ्रमम् । शरीरमध्रुवं पूति तथा स्नेहोऽत्र मोहतः ॥१०३॥

अर्थ: जिस प्रकार अजंगम यन्त्र जंगम प्राणीके द्वारा घुमाया जाता है उसी प्रकार यह अनित्य तथा बीभत्स शरीर भी चेतन द्वारा घुमाया जाता है । इस शरीरमें जो स्नेह है वह मोहके कारण ही है ॥१०३॥


जलबुद्बुदनिःसारं ज्ञात्वा मनुजसम्भवम् । निर्विण्णाः कुलजा मार्गं प्रपद्यन्ते जिनोदितम् ॥१०४॥

अर्थ: यह मनुष्य जन्म पानीके बबूलेके समान निःसार है ऐसा जानकर कुलीन मनुष्य विरक्त हो जिन-प्रतिपादित मार्गको प्राप्त होते हैं ॥१०४॥


उत्साहकवचच्छन्ना निश्चयाश्वस्थसादिनः । ध्यानखड्गधरा धीराः प्रस्थिताः सुगतिं प्रति ॥१०५॥

अर्थ: जो उत्साह रूपी कवचसे आच्छादित हैं, निश्चय रूपी घोड़ेपर सवार हैं और ध्यानरूपी खड्गको धारण करनेवाले हैं ऐसे धीर वीर मनुष्य सुगतिके प्रति प्रस्थान करते हैं ॥१०५॥


अन्यच्छरीरमन्योऽहमिति सञ्चिन्त्य निश्चिताः । तथा शरीरके स्नेहं धर्मं कुरुत मानवाः ॥१०६॥

अर्थ: हे मानवो ! शरीर जुदा है और मैं जुदा हूँ ऐसा विचार कर निश्चय करो तथा शरीरमें स्नेह छोड़कर धर्म करो ॥१०६॥


सुखदुःखादयस्तुल्याः स्वजनेतरयोः समाः । रागद्वेषविनिर्मुक्ताः श्रमणाः पुरुषोत्तमाः ॥१०७॥

अर्थ: जिन्हें सुख-दुःखादि समान हैं, जो स्वजन और परजनोंमें समान हैं तथा राग-द्वेष आदिसे रहित हैं ऐसे मुनि ही पुरुषोत्तम हैं ॥१०७॥


तैरियं परमोदारा धवलध्यानतेजसा । कृत्स्ना कर्माटवी दग्धा दुःखश्वापदसङ्कुला ॥१०८॥

अर्थ: उन्हीं मुनियोंने अपने शुक्ल ध्यान रूपी नेत्रके द्वारा दुःख रूपी वन्य पशुओंसे व्याप्त इस अत्यन्त विशाल समस्त कर्मरूपी अटवीको भस्म किया है ॥१०८॥


निशम्येति मुनेरुक्तं श्रीचन्द्रो बोधिमाश्रितः । पराचीनत्वमागच्छन् विषयास्वादसौख्यतः ॥१०९॥

अर्थ: इस प्रकार मुनिराजका उपदेश सुन कर श्रीचन्द्र विषयास्वाद-सम्बन्धी सुखसे पराङ्मुख हो रत्नत्रयको प्राप्त हो गया ॥१०९॥


धृतिकान्ताय पुत्राय दत्वा राज्यं महामनाः । समाधिगुप्तनाथस्य पार्श्वे श्रामण्यमग्रहीत् ॥११०॥

अर्थ: फलस्वरूप उस उदारचेताने धृतिकान्त नामक पुत्रके लिए राज्य देकर समाधिगुप्त मुनिराजके समीप मुनिदीक्षा धारण कर ली ॥११०॥


सम्यग्भावनया युक्तस्त्रैयोगीं शुद्धिमादधन् । ससमित्यान्वितो गुप्तया रागद्वेषपराङ्मुखः ॥१११॥

अर्थ: अब वे श्रीचन्द्रमुनि समीचीन भावनासे सहित थे, त्रियोग सम्बन्धी शुद्धिको धारण करते थे, समितियों और गुप्तियोंसे सहित थे तथा राग-द्वेषसे विमुख थे ॥१११॥


रत्नत्रयमहाभूषः क्षान्त्यादिगुणसङ्गतः । जिनशासनसम्पूर्णः श्रमणः सुसमाहितः ॥११२॥

अर्थ: रत्नत्रय रूपी उत्तम अलंकारोंसे युक्त थे, क्षमा आदि गुणोंसे सहित थे, जिन-शासन से ओत-प्रोत थे, श्रमण थे और उत्तम सप्राधानसे युक्त थे ॥११२॥


पञ्चोदारव्रताधारः सत्त्वानामनुपालकः । सप्तभीस्थाननिर्मुक्तो धृत्या परमयान्वितः ॥११३॥

अर्थ: पञ्च महाव्रतोंके धारक थे, प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले थे, सात भयोंसे निर्मुक्त थे तथा उत्तम धैर्यसे सहित थे ॥११३॥


सुविहारपरः सोढा परीषहगणान् मुनिः । षष्ठाष्टमार्द्धमासादिकृतसंशुद्धपारणः ॥११४॥

अर्थ: ईर्यासमितिपूर्वक उत्तम विहार करनेमें तत्पर थे, परीषहोंके समूहको सहन करने वाले थे, मुनि थे, तथा बेला, तेला और पक्षोपवासादि करनेके बाद पारणा करते थे ॥११४॥


ध्यानस्वाध्याययुक्तात्मा निर्ममोऽतिजितेन्द्रियः । निर्निदानकृतिः शान्तः परः शासनवत्सलः ॥११५॥

अर्थ: ध्यान और स्वाध्यायमें निरन्तर लीन रहते थे; ममता रहित थे, इन्द्रियोंको तीव्रतासे जीतने वाले थे, उनके कार्य निदान अर्थात् आगामी भोगाकांक्षासे रहित होते थे, वे परम शान्त थे और जिन शासनके परम स्नेही थे ॥११५॥


प्रासुकाचारकुशलः सङ्घानुग्रहतत्परः । बालाग्रकोटिमात्रेऽपि स्पृहामुक्तः परिग्रहे ॥११६॥

अर्थ: अहिंसक आचरण करनेमें कुशल थे, मुनिसंघपर अनुग्रह करनेमें तत्पर थे, और बालकी अनीमात्र परिग्रहमें भी इच्छासे रहित थे ॥११६॥


अस्नानमलसाध्वङ्गो निराबन्धो निरम्बरः । एकरात्रस्थितिर्ग्रामे नगरे पञ्चरात्रभाक् ॥११७॥

अर्थ: स्नानके अभावमें उनका शरीर मलसे सुशोभित था, वे आसक्तिसे रहित थे, दिगम्बर थे, गाँवमें एक रात्रि और नगरमें पाँच रात्रि तक ही ठहरते थे ॥११७॥


कन्दरापुलिनोद्याने प्रशस्तावाससङ्गमः । व्युत्सृष्टाङ्गः स्थिरो मौनी विद्वान् सम्यक्तपोरतः ॥११८॥

अर्थ: पर्वतकी गुफाओं, नदियोंके तट अथवा बाग-बगीचोंमें ही उनका उत्तम निवास होता था, उन्होंने शरीरसे ममता छोड़ दी थी, वे स्थिर थे, मौनी थे, विद्वान् थे और सम्यक् तपमें तत्पर थे ॥११८॥


एवमादिगुणः कृत्वा जर्जरं कर्मपञ्जरम् । श्रीचन्द्रः कालमासाद्य ब्रह्मलोकाधिपोऽभवत् ॥११९॥

अर्थ: इत्यादि गुणोंसे सहित श्रीचन्द्रमुनि कामरूपी पञ्जरको जर्जर - जीर्ण-शीर्णकर तथा समाधिमरण प्राप्तकर ब्रह्मस्वर्गके इन्द्र हुए ॥११९॥


निवासे परमे तत्र श्रीकीर्तिद्युतिकान्तिभाक् । चूडामणिकृतालोको भुवनत्रयविश्रुतः ॥१२०॥

अर्थ: वहाँ वे उत्तम विमानमें श्री, कीर्त्ति, द्युति और कान्तिको प्राप्त थे, चूड़ामणिके द्वारा प्रकाश करनेवाले थे, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध थे ॥१२०॥


ऋद्धया परमया क्रीडन्समनुध्यानजन्मना । अहमिन्द्रसुरो यद्वदासीद् भरतभूपतिः ॥१२१॥

अर्थ: यद्यपि ध्यान करते ही उत्पन्न होनेवाली परम ऋद्धिसे क्रीड़ा करते थे तथापि अहमिन्द्रदेवके समान अथवा भरत चक्रवर्तीके समान निर्लिप्त ही रहते थे ॥१२१॥


नन्दनादिषु देवेन्द्राः सौधर्माद्याः सुसम्पदः । तिष्ठंत्युदीक्षमाणास्तं तदुत्कण्ठापरायणाः ॥१२२॥

अर्थ: ॥ नन्दन वन आदि स्थानोंमें उत्तम सम्पदाओंसे युक्त सौधर्म आदि इन्द्र जब उनकी ओर देखते थे तब उन जैसा वैभव प्राप्त करनेके लिए उत्कण्ठित हो जाते थे ॥१२२॥


मणिहेमात्मके कान्ते मुक्ताजालविराजिते । रमते स्म विमानेऽसौ दिव्यस्त्रीनयनोत्सवः ॥१२३॥

अर्थ: देवाङ्गनाओंके नेत्रोंको उत्सव प्रदान करनेवाले वे ब्रह्मेन्द्र, मणि तथा सुवर्णसे निर्मित एवं मोतियोंकी जालीसे सुशोभित सुन्दर विमानमें रमण करते थे ॥१२३॥


या श्रीश्चन्द्रचरस्यास्य न वा वाचस्पतेरपि । संवत्सरशतेनाऽपि शक्या वक्तुं विभीषण ॥१२४॥

अर्थ: श्रीसकलभूषण केवली कहते हैं कि हे विभीषण ! श्रीचन्द्रके जीव ब्रह्मेन्द्रकी जो विभूति थी उसे बृहस्पति भी सौ वर्षमें भी नहीं कह सकता ॥१२४॥


अनर्घ्यं परमं रत्नं रहस्यमुपमोज्झितम् । त्रैलोक्यप्रकटं मूढा न विदुर्जिनशासनम् ॥१२५॥

अर्थ: जिनशासन अमूल्य रत्न है, अनुपम रहस्य है तथा तीनों लोकोंमें प्रकट है परन्तु मोही जीव इसे नहीं जानते ॥१२५॥


मुनिधर्मजिनेन्द्राणां माहात्म्यमुपलभ्य सत् । मिथ्याभिमानसंमूढा धर्मं प्रति पराङ्मुखाः ॥१२६॥

अर्थ: मुनिधर्म तथा जिनेन्द्रदेवके उत्तम माहात्म्य को जानकर भी मिथ्या अभिमानमें चूर रहनेवाले मनुष्य धर्मसे विमुख रहते हैं ॥१२६॥


इहलोकसुखस्यार्थं शिशुर्यः कुमते रतः । तदसौ कुरुते स्वस्य ध्यायन्नपि न यद्द्विषः ॥१२७॥

अर्थ: जो बालक अर्थात् अज्ञानी इस लोकसम्बन्धी सुखके लिए मिथ्यामतमें प्रीति करता है वह अपना ध्यान रखता हुआ भी उसका वह अहित करता है जिसे शत्रु भी नहीं करते ॥१२७॥


कर्मबन्धस्य चित्रत्वान्न सर्वो बोधिभाग्जनः । केचिल्लब्ध्वाऽपि मुञ्चन्ति पुनरन्यव्यपेक्षया ॥१२८॥

अर्थ: कर्म-बन्धकी विचित्रता होनेसे सभी लोग रत्नत्रयके धारक नहीं हो जाते । कितने ही लोग उसे प्राप्त कर भी दूसरेके चक्रमें पड़कर पुनः छोड़ देते हैं ॥१२८॥


बहुकुत्सितलोकेन गृहीते बहुदोषके । मारंध्वं निन्दिते धर्मे कुरुध्वं चित्स्वबन्धुताम् ॥१२९॥

अर्थ: हे भव्यजनो ! अनेक खोटे मनुष्यों के द्वारा गृहीत एवं बहुत दोषोंसे सहित निन्दित धर्ममें रमण मत करो । अपने चित् स्वरूपके साथ बन्धुताका काम करो ॥१२९॥


जिनशासनतोऽन्यत्र दुःखमुक्तिर्न विद्यते । तस्मादनन्यचेतस्का जिनमर्चयताऽनिशम् ॥१३०॥

अर्थ: जिनशासनको छोड़कर अन्यत्र दुःखसे मुक्ति नहीं है इसलिए हे भव्यजनो ! अनन्यचित्त हो निरन्तर जिनभगवान्की अर्चा करो ॥१३०॥


त्रिदशत्वान्मनुष्यत्वं सुरत्वं मानुषत्वतः । एवं मनोहरं प्राप्तो धनदत्तो निवेदितः ॥१३१॥

अर्थ: इस प्रकार देवसे उत्तम मनुष्य पर्याय और मनुष्यसे उत्तम देवपर्यायको प्राप्त करनेवाले धनदत्तका वर्णन किया ॥१३१॥


वक्ष्याम्यतः समासेन वसुदत्तादिसंसृतिम् । कर्मणां चित्रतायोगात् चित्रत्वमनुबिभ्रतीम् ॥१३२॥

अर्थ: अब संक्षेपसे कर्मोंकी विचित्रताके कारण विविधरूपताको धारण करनेवाले, वसुदत्तादिके भ्रमणका वर्णन करता हूँ ॥१३२॥


पुरे मृणालकुण्डाख्यो प्रतापी यशसोज्ज्वलः । राजा विजयसेनाख्ये रत्नचूलास्य भामिनी ॥१३३॥

अर्थ: अथानन्तर मृणालकुण्डनामक नगरमें प्रतापवान् तथा यशसे उज्ज्वल विजयसेन नामका राजा रहता था । रत्नचूला उसकी स्त्री थी ॥१३३॥


वज्रकम्बुः सुतस्तस्य हेमवत्यस्य भामिनी । शम्भुनामा तयोः पुत्रः प्रख्यातो धरणीतले ॥१३४॥

अर्थ: उन दोनोंके वज्रकम्बु नामका पुत्र था और हेमवती उसकी स्त्री थी । उन दोनोंके पृथिवीतलपर प्रसिद्ध शम्भु नामका पुत्र था ॥१३४॥


पुरोधाः परमस्तस्य श्रीभूतिस्तत्त्वदर्शनः । तस्य पत्नीगुणैर्युक्ता पत्नी नाम्ना सरस्वती ॥१३५॥

अर्थ: उसके श्रीभूति नामका परमतत्त्वदर्शी पुरोहित था और उसकी स्त्रीके योग्य गुणोंसे सहित सरस्वती नामकी स्त्री थी ॥१३५॥


आसीद्गुणवती याऽसौ तिर्यग्योनिषु सा चिरम् । भ्रान्त्वा कर्मानुभावेन सम्यग्धर्मविवर्जिता ॥१३६॥

अर्थ: पहले जिस गुणवतीका उल्लेख कर आये हैं वह समीचीन धर्मसे रहित हो कर्मोंके प्रभावसे तिर्यञ्च योनिमें चिरकाल तक भ्रमण करती रही ॥१३६॥


मोहेन निन्दनैः स्त्रैणैर्निदानैरभिगूहनैः । स्त्रीत्वमुत्तमदुःखाक्तं भजमाना पुनः पुनः ॥१३७॥

अर्थ: वह मोह, निन्दा, स्त्री सम्बन्धी निदान तथा अपवाद आदिके कारण बार-बार तीव्र दुःखसे युक्त स्त्रीपर्यायको प्राप्त करती रही ॥१३७॥


साधुष्ववर्णवादेन दुरवस्थाखलीकृता । परिप्राप्ता करेणुत्वमासीन्मन्दाकिनीतटे ॥१३८॥

अर्थ: तदनन्तर साधुओंका अवर्णवाद करनेके कारण वह दुःखमयी अवस्थासे दुखी होती हुई गङ्गा नदीके तटपर हथिनी हुई ॥१३८॥


सुमहापङ्कनिर्मग्ना परायत्तस्थिराङ्गिका । विमुक्तमन्दसूत्कारा मुकुलीकृतलोचना ॥१३९॥

अर्थ: वहाँ वह बहुत भारी कीचड़में फँस गई जिससे उसका शरीर एकदम पराधीन होकर अचल हो गया । वह धीरे-धीरे सू-सू शब्द छोड़ने लगी तथा नेत्र बन्दकर मरणासन्न अवस्थाको प्राप्त हुई ॥१३९॥


मुमूर्षन्ती समालोक्य खेचरेण कृपावता । तरङ्गवेगनाम्नासौ कर्णेजपमुपाहृता ॥१४०॥

अर्थ: तदनन्तर उसे मरती देख तरङ्गवेग नामक दयालु विद्याधरने उसे कानमें नमस्कार मन्त्रका जाप सुनाया ॥१४०॥


ततस्तनुकषायत्वात्तत्क्षेत्रगुणतोऽपि च । प्रत्याख्यानाच्च तद्दत्ताच्छ्रीभूतेः सा सुताऽभवत् ॥१४१॥

अर्थ: उस मन्त्र के प्रभावसे उसकी कषाय मन्द पड़ गई, उसने उसी स्थानका क्षेत्र संन्यास धारण किया तथा उक्त विद्याधरने उसे प्रत्याख्यान-संयम दिया । इन सब कारणोंके मिलनेसे वह श्रीभूतिनामक पुरोहितके वेदवती नामकी पुत्री हुई ॥१४१॥


भिक्षार्थिनं मुनिं गेहं प्रविष्टमवलोक्य सा । उपहासात्ततः पित्रा शामिता श्राविकाऽभवत् ॥१४२॥

अर्थ: एक बार भिक्षाके लिए घरमें प्रविष्ट मुनिको देखकर उसने उनकी हँसी की तब पिताने उसे समझाया जिससे वह श्राविका हो गई ॥१४२॥


तस्याः परमरूपायाः सुकन्यायाः कृतेऽवनौ । उत्कण्ठिता महीपालाः शम्भुस्तेषु विशेषतः ॥१४३॥

अर्थ: वेदवती परम सुन्दरी कन्या थी अतः उसे प्राप्त करनेके लिए पृथिवीतलके राजा अत्यन्त उत्कण्ठित थे और उनमें शम्भु विशेष रूपसे उत्कण्ठित था ॥१४३॥


मिथ्यादृष्टिः कुबेरेण समो भवति यद्यपि । तथाऽपि नास्मै देयेयं प्रतिज्ञेति पुरोधसः ॥१४४॥

अर्थ: पुरोहितकी यह प्रतिज्ञा थी कि यद्यपि मिथ्यादृष्टि पुरुष सम्पत्तिमें कुबेरके समान हो तथापि उसके लिए यह कन्या नहीं दूँगा ॥१४४॥


ततः प्रकुपितेनासौ शम्भुना शयितो निशि । हिंसितः सुरतां प्राप्तो जिनधर्मप्रसादतः ॥१४५॥

अर्थ: इस प्रतिज्ञासे शम्भु बहुत कुपित हुआ और उसने रात्रिमें सोते हुए पुरोहितको मार डाला । पुरोहित मरकर जिनधर्मके प्रसादसे देव हुआ ॥१४५॥


ततो वेदवतीमेनां प्रत्यक्षां देवतामिव । अनिच्छन्तीं प्रभुत्वेन बलादुद्वोढुमुद्यतः ॥१४६॥

अर्थ: तदनन्तर जो साक्षात् देवताके समान जान पड़ती थी ऐसी इस वेदवतीको उसकी इच्छा न रहनेपर भी शम्भु अपने अधिकारसे बलात् विवाहनेके लिए उद्यत हुआ ॥१४६॥


मनसा कामतप्तेन तामालिङ्गयोपचुम्ब्य च । विस्फुरन्तीं रतिं साक्षान्मैथुनेनोपचक्रमे ॥१४७॥

अर्थ: साक्षात् रतिके समान शोभायमान उस वेदवतीका शम्भुने कामके द्वारा संतप्त मनसे आलिङ्गन किया ! चुम्बन किया और उसके साथ बलात् मैथुन किया ॥१४७॥


ततः प्रकुपितात्यन्तं चण्डा वह्निशिखेव सा । विरक्तहृदया बाला वेपमानशरीरिका ॥१४८॥

आत्मनः शीलनाशेन वधेन जनकस्य च । बिभ्राणा परमं दुःखं प्राह लोहितलोचना ॥१४९॥

व्यापाद्य पितरं पाप कामिताऽस्मि बलेन यत् । भवद्वधार्थमुत्पत्स्ये ततोऽहं पुरुषाधम ॥१५०॥

परलोकगतस्यापि पितुर्नाहं मनोरथम् । लुम्पामि तेन दुर्दृष्टिकामनान्मरणं वरम् ॥१५१॥

अर्थ: तदनन्तर जो अत्यन्त कुपित थी, अग्निशिखाके समान तीक्ष्ण थी, जिसका हृदय विरक्त था, शरीर काँप रहा था, जो अपने शील के नाश और पिताके वधसे तीव्र दुःख धारण कर रही थी - तथा जिसके नेत्र लाल-लाल थे ऐसी उस वेदवतीने शम्भुसे कहा कि अरे पापी ! नीच पुरुष ! तूने पिताको मारकर बलात् मेरे साथ काम सेवन किया है, इसलिए मैं तेरे वधके लिए ही आगामी पर्यायमें उत्पन्न होऊँगी । यद्यपि मेरे पिता परलोक चले गये हैं तथापि मैं उनकी इच्छा नष्ट नहीं करूँगी । मिथ्यादृष्टि पुरुषको चाहनेकी अपेक्षा मर जाना अच्छा है ॥१४८-१५१॥


हरिकान्तार्यिकायाश्च पार्श्वं गत्वा ससम्भ्रमम् । प्रव्रज्य साऽकरोद्बाला तपः परमदुष्करम् ॥१५२॥

अर्थ: तदनन्तर उस बालाने शीघ्र ही हरिकान्ता नामक आर्यिकाके पास जाकर दीक्षा ले अत्यन्त कठिन तपश्चरण किया ॥१५२॥


लुञ्चनोत्थितसंरूक्षमूर्द्धजा मांसवर्जिता । प्रकटास्थिसिराजाला तपसा शुष्कदेहिका ॥१५३॥

अर्थ: लोंच करनेके बाद उसके शिरपर रूखे बाल निकल आये थे, तपके कारण उसका शरीर ऐसा सूख गया था मानो मांस उसमें है ही नहीं और हड्डी तथा नसोंका समूह स्पष्ट दिखाई देने लगा था ॥१५३॥


कालधर्मं परिप्राप्य ब्रह्मलोकमुपागता । पुण्योदयसमानीतं सुरसौख्यमसेवत ॥१५४॥

अर्थ: आयुके अन्तमें मरण कर वह ब्रह्मस्वर्ग गई । वहाँ पुण्योदयसे प्राप्त हुए देवोंके सुखका उपभोग करने लगी ॥१५४॥


तया विरहितः शम्भुर्लघुत्वं भुवने गतः । विबन्धुभृत्यलक्ष्मीको प्रापदुन्मत्ततां कुधीः ॥१५५॥

अर्थ: वेदवतीसे रहित शम्भु, संसारमें एकदम हीनताको प्राप्त हो गया, उसके भाई-बन्धु, दासी-दास तथा लक्ष्मी आदि सब छूट गये और वह दुर्बुद्धि उन्मत्त अवस्थाको प्राप्त हो गया ॥१५५॥


मिथ्याभिमानसम्मूढो जिनवाक्यात्पराङ्मुखः । हसति श्रमणान् दृष्ट्वा दुरुक्ते च प्रवर्त्तते ॥१५६॥

अर्थ: वह मूठ-मूठके अभिमानमें चूर हो रहा था तथा जिनेन्द्र भगवान्के वचनोंसे पराङ्मुख रहता था । वह मुनियोंको देख उनकी हँसी उड़ाता तथा उनके प्रति दुष्ट वचन कहता था ॥१५६॥


मधुमांससुराहारः पापानुमननोद्यतः । तिर्यङ्नरकवासेषु सुदुःखेष्वभ्रमच्चिरम् ॥१५७॥

अर्थ: इस प्रकार मधु मांस और मदिरा ही जिसका आहार था तथा जो पापकी अनुमोदना करनेमें उद्यत रहता था ऐसा शम्भु तीव्र दुःख देनेवाले नरक और तिर्यञ्चगतिमें चिरकाल तक भ्रमण करता रहा ॥१५७॥


अथोपशमनात्किञ्चित्कर्मणः क्लेशकारिणः । कुशध्वजस्य विप्रस्य सावित्र्यां तनयोऽभवत् ॥१५८॥

अर्थ: अथानन्तर दुःखदायी पाप कर्मका कुछ उपशम होनेसे वह कुशध्वज ब्राह्मणकी सावित्री नामक स्त्रीमें पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१५८॥


प्रभासकुन्दनामासौ प्राप्य बोधिं सुदुर्लभाम् । पार्श्वे विचित्रसेनस्य मुनेर्दीक्षामसेवत ॥१५९॥

अर्थ: प्रभासकुन्द उसका नाम था । फिर अत्यन्त दुर्लभ रत्नत्रयको पाकर उसने विचित्रसेन मुनिके समीप दीक्षा धारण कर ली ॥१५९॥


विमुक्तरतिकन्दर्पगर्वसंरम्भमत्सरः । निर्विकारस्तपश्चक्रे दयावान्निर्जितेन्द्रियः ॥१६०॥

अर्थ: जिसने रति काम, गर्व, क्रोध तथा मत्सरको छोड़ दिया था, जो दयालु था तथा इन्द्रियोंको जीतनेवाला था ऐसे उस प्रभासकुन्दने निर्विकार होकर तपश्चरण किया ॥१६०॥


षष्ठाष्टमार्द्धमासादिनिराहारः स्पृहोज्झितः । यत्रास्तमितनिलयो वसन् शून्यवनादिषु ॥१६१॥

अर्थ: वह दो दिन, तीन दिन तथा एक पक्ष आदिके उपवास करता था, उसकी सब प्रकारकी इच्छाएँ छूट गई थीं, जहाँ सूर्य अस्त हो जाता था वहीं वह शून्य वन आदिमें ठहर जाता था ॥१६१॥


गुणशीलसुसम्पन्नः परीषहसहः परः । आतापनरतो ग्रीष्मे पिनद्धमलकञ्चुकः ॥१६२॥

वर्षासु मेघमुक्ताभिरद्भिः क्लिन्नस्तरोरधः । प्रालेयपटसंवीतो हेमन्ते पुलिनस्थितः ॥१६३॥

एवमादिक्रियायुक्तः सोऽन्यदा सिद्धमन्दिरम् । सम्मेदं वन्दितुं यातः स्मृतमप्यघनाशनम् ॥१६४॥

अर्थ: गुण और शीलसे सम्पन्न था, परीषहोंको सहन करनेवाला था, ग्रीष्मऋतुमें आतापनयोग धारण करनेमें तत्पर रहता था, मलरूपी कञ्चुक से सहित था, वर्षाऋतुमें वृक्षके नीचे मेघोंके द्वारा छोड़े हुए जलसे भींगता रहता था और हेमन्तऋतुमें बर्फरूपी वस्त्रसे आवृत होकर नदियोंके तटपर स्थित रहता था, इत्यादि क्रियाओंसे युक्त हुआ वह प्रभासकुन्द किसी समय उस सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखरकी वन्दना करनेके लिए गया जो कि स्मृतिमें आते ही पापका नाश करनेवाला था ॥१६२-१६४॥


कनकप्रभसंज्ञस्य तत्र विद्याभृतां विभोः । विभूतिं गगने वीक्ष्य प्रशान्तोऽपि न्यदानयत् ॥१६५॥

अलं विभवमुक्तेन तावन्मुक्तिपदेन मे । ईदृगैश्वर्यमाप्नोमि तपोमाहात्म्यमस्ति चेत् ॥१६६॥

अर्थ: यद्यपि वह शान्त था तथापि उसने वहाँ आकाशमें कनकप्रभ नामक विद्याधरकी विभूति देख निदान किया कि मुझे वैभवसे रहित मुक्तिपदकी आवश्यकता नहीं है । यदि मेरे तपमें कुछ माहात्म्य है तो मैं ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त करूँ ॥१६५-१६६॥


अहो पश्यत मूढत्वं जनितं पापकर्मभिः । रत्नं त्रैलोक्यमूल्यं यद्विक्रीतं शाकमुष्टिना ॥१६७॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो पापकर्मके उदयसे उत्पन्न हुई मूर्खता तो देखो कि उसने त्रिलोकी मूल्य रत्नको शाककी एक मुट्ठीमें बेंच दिया ॥१६७॥


भवन्त्युद्भवकालेषु विपद्यन्ते विपर्यये । धियः कर्मानुभावेन केन किं क्रियतामिह ॥१६८॥

अर्थ: अथवा ठीक है क्योंकि कर्मोंके प्रभावसे अभ्युदयके समय मनुष्यके सद्बुद्धि उत्पन्न होती है और विपरीत समय में सद्बुद्धि नष्ट हो जाती है। इस संसारमें कौन क्या कर सकता है ? ॥१६८॥


निदानदूषितात्मासौ कृत्वातिविकटं तपः । सनत्कुमारमारुह्यत्तत्र भोगानसेवत ॥१६९॥

अर्थ: तदनन्तर जिसकी आत्मा निदानसे दूषित हो चुकी थी ऐसा प्रभासकुन्द, अत्यन्त विकट तप कर सनत्कुमार स्वर्गमें आरूढ़ हुआ और वहाँ भोगोंका उपभोग करने लगा ॥१६९॥


च्युतः पुण्यावशेषेण भोगस्मरगमानसः । रत्नश्रवःसुतो जातो कैकस्यां रावणाभिधः ॥१७०॥

लङ्कायां च महैश्वर्यं प्राप्तो दुर्ललितक्रियम् । कृतानेकमहाश्चर्यं प्रतापाक्रान्तविष्टपम् ॥१७१॥

अर्थ: तत्पश्चात् भोगोंके स्मरण करनेमें जिसका मन लग रहा था ऐसा वह देव अवशिष्ट पुण्यके प्रभाव वश वहाँसे च्युत हो लङ्का नगरीमें राजा रत्नश्रवा और उनकी रानी कैकसीके रावण नामका पुत्र हुआ। वहाँ वह निदानके अनुसार उस महान् ऐश्वर्यको प्राप्त हुआ जिसकी क्रियाएँ अत्यन्त विलासपूर्ण थीं, जिसमें बड़े-बड़े आश्चर्यके काम किये गये थे तथा जिसने प्रतापसे समस्त लोकको व्याप्त कर रक्खा था ॥१७०-१७१॥


असौ तु ब्रह्मलोकेशो दशसागरसम्मितम् । स्थित्वा कालं च्युतो जातो रामो दशरथात्मजः ॥१७२॥

तस्यापराजितासूनोः पूर्वपुण्यावशेषतः । भूत्या रूपेण वीर्येण समो जगति दुर्लभः ॥१७३॥

अर्थ: तदनन्तर श्रीचन्द्रका जीव, जो ब्रह्मलोकमें इन्द्र हुआ था वहाँ दश सागर प्रमाण काल तक रह कर च्युत हो दशरथका पुत्र राम हुआ। उसकी माताका नाम अपराजिता था। पूर्व पुण्यके अवशिष्ट रहनेसे इस संसारमें विभूति, रूप और पराक्रमसे रामकी तुलना करनेवाला पुरुष दुर्लभ था ॥१७२-१७३॥


धनदत्तोऽभवद्योऽसौ सोऽयं पद्मो मनोहरः । यशसा चन्द्रकान्तेन समाविष्टध्वविष्टपः ॥१७४॥

अर्थ: पहले जो धनदत्त था वही चन्द्रमाके समान यशसे संसारको व्याप्त करने वाला मनोहर राम हुआ है ॥१७४॥


वसुदत्तोऽभवद्यश्च श्रीभूतिश्च द्विजः क्रमात् । जातो नारायणः सोऽयं सौमित्रिः श्रीलतातरुः ॥१७५॥

अर्थ: पहले जो वसुदत्त था फिर श्रीभूति ब्राह्मण हुआ वही क्रमसे लक्ष्मी रूपी लताके आधारके लिए वृक्षस्वरूप नारायण पदका धारी यह लक्ष्मण हुआ है ॥१७५॥


श्रीकान्तः क्रमयोगेन योऽसौ शम्भुत्वमागतः । अभूत्प्रभासकुन्दश्च सञ्जातः स दशाननः ॥१७६॥

अर्थ: पहले जो श्रीकान्त था वही क्रम-क्रमसे शम्भु हुआ फिर प्रभासकुन्द हुआ और अब रावण हुआ था ॥१७६॥


येनेह भरतक्षेत्रे खण्डत्रयमखण्डितम् । अङ्गुलान्तरविन्यस्तमिव वश्यत्वमाहृतम् ॥१७७॥

अर्थ: वह रावण कि जिसने भरतक्षेत्रके सम्पूर्ण तीन खण्ड अंगुलियोंके बीचमें दबे हुएके समान अपने वश कर लिये थे ॥१७७॥


आसीद् गुणवती या तु श्रीभूतेश्च सुता क्रमात् । सेयं जनकराजस्य सीतेति तनयाऽजनि ॥१७८॥

अर्थ: जो पहले गुणवती थी फिर क्रमसे श्रीभूति पुरोहितकी वेदवती पुत्री हुई थी वही अब क्रमसे राजा जनक की सीता नामकी पुत्री हुई है ॥१७८॥


जाता च बलदेवस्य पत्नी विनयशालिनी । शीलकोशी सुरेशस्य शचीव सुविचेष्टिता ॥१७९॥

अर्थ: यह सीता बलदेव - रामकी विनयवती पत्नी है, शीलका खजाना है तथा इन्द्रकी इन्द्राणीके समान सुन्दर चेष्टाओंको धारण करने वाली है ॥१७९॥


योऽसौ गुणवतीभ्राता गुणवानभवत्तदा । सोऽयं भामण्डलो जातः सुहृद्रामाङ्कलक्ष्मणः ॥१८०॥

अर्थ: उस समय जो गुणवतीका भाई गुणवान् था वही यह रामका परममित्र भामण्डल हुआ है ॥१८०॥


यत्रामृतवतीदेवी ब्रह्मलोकनिवासिनी । च्यवतेऽद्येति तत्रैव काले कुण्डलमण्डितः ॥१८१॥

विदेहायास्तयोर्गर्भे समुत्पन्नः समागमः । तद्भ्रातृयुगलं जातमनघं सुमनोहरम् ॥१८२॥

अर्थ: ब्रह्मलोकमें निवास करने वाली गुणवतीका जीव अमृतमती देवी जिस समय च्युत हुई थी उसी समय कुण्डल-मण्डित भी च्युत हुआ था सो इन दोनोंका जनककी रानी विदेहाके गर्भमें समागम हुआ। यह बहिन-भाईका जोड़ा अत्यन्त मनोहर तथा निर्दोष था ॥१८१-१८२॥


योऽसौ यज्ञवलिर्विप्रः स त्वं जातो विभीषणः । असौ वृषभकेतुस्तु सुग्रीवोऽयं कपिध्वजः ॥१८३॥

अर्थ: जो पहले यज्ञवलि ब्राह्मण था वह तू विभीषण हुआ है और जो वृषभकेतु था वह यह वानरकी ध्वजासे युक्त सुग्रीव हुआ है ॥१८३॥


त एते पूर्वया प्रीत्या तथा पुण्यानुभावतः । यूयं रक्तात्मका जाता रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥१८४॥

अर्थ: इस प्रकार तुम सभी पूर्व प्रीतिसे तथा पुण्यके प्रभावसे पुण्यकर्मा रामके साथ प्रीति रखने वाले हुए हो ॥१८४॥


पूर्वमाजननं बालेर्यदपृच्छद् विभीषणः । केवली च समाचख्यौ शृणु ते श्रेणिकाधुना ॥१८५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इसके बाद विभीषणने सकल-भूषण केवलीसे बालिके पूर्वभव पूछे सो केवलीने जो निरूपण किया उसे मैं कहता हूँ सो सुन ॥१८५॥


रत्यरत्यादिदुःखौघे संसारे चतुरन्तके । वृन्दारण्यस्थले जन्तुरेकः कृष्णमृगोऽभवत् ॥१८६॥

अर्थ: राग, द्वेष आदि दुःखोंके समूहसे भरे हुए इस चतुर्गति रूप संसारमें वृन्दावनके बीच एक कृष्णमृग रहता था ॥१८६॥


साधुस्वाध्यायनिःस्वानं श्रुत्वायुर्विलये मृगः । ऐरावते दितिस्थाने प्राप नृत्वमनिन्दितम् ॥१८७॥

अर्थ: आयुके अन्तके समय वह मृग मुनियोंके स्वाध्यायका शब्द सुन ऐरावत क्षेत्रके दितिनामा नगरमें उत्तम मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुआ ॥१८७॥


सम्यग्दृष्टिः पिताऽस्यासीद् विहीताख्यः सुचेष्टितः । माता शिवमतिः पुत्रो मेघदत्तस्तयोरयम् ॥१८८॥

अर्थ: वहाँ सम्यग्दृष्टि तथा उत्तम चेष्टाओंको धारण करनेवाला विहीत नामका पुरुष इसका पिता था और शिवमति इसकी माता थी । उन दोनोंके यह मेघदत्त नामका पुत्र हुआ था ॥१८८॥


अणुव्रतधरः सोऽयं जिनपूजासमुद्यतः । वन्दारुः कृतसत्कालः कल्पमैशानमाश्रयत् ॥१८९॥

अर्थ: मेघदत्त अणुव्रतका धारी था, जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनेमें सदा उद्यत रहता था और जिन-चैत्यालयोंकी वन्दना करने वाला था। आयुके अन्तमें समाधिमरण कर वह ऐशान स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ॥१८९॥


च्युत्वा जम्बूमति द्वीपे विदेहे पूर्वभूमिके । पुरोऽस्ति विजयावत्याः समीपे सततोत्सवः ॥१९०॥

सुग्रामः पत्तनाकारो नामतो मत्तकोकिलः । कान्तशोकः प्रभुस्तत्र तस्य रत्नाकिनी प्रिया ॥१९१॥

तयोः सुप्रभनामाऽभूत्तनयश्चारुदर्शनः । बहुबन्धुजनाकीर्णः शुभैकचरितप्रियः ॥१९२॥

अर्थ: जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें विजयावती नगरीके समीप एक मत्तकोकिल नामका उत्तम ग्राम है जिसमें निरन्तर उत्सव होता रहता है तथा जो नगरके समान सुन्दर है। उस ग्रामका स्वामी कान्तशोक था तथा रत्नाकिनी उसकी स्त्री थी। मेघदत्तका जीव ऐशान स्वर्गसे च्युत होकर उन्हीं दोनोंके सुप्रभ नामका सुन्दर पुत्र हुआ। यह सुप्रभ अनेक बन्धुजनोंसे सहित था तथा शुभ आचार ही उसे प्रिय था ॥१९०-१९२॥


संसारे दुर्लभां प्राप्य बोधिं जिनमतानुगाम् । अग्रहीत् संयमं पार्श्वे संयतस्य महामुनेः ॥१९३॥

अर्थ: उसने संसारमें दुर्लभ जिनमतानुगामी रत्नत्रयको पाकर संयतनामा महामुनिके पास जिन-दीक्षा धारण कर ली ॥१९३॥


अतपच्च तपस्तीव्रं यथाविधि महाशयः । संवत्सरसहस्राणि बहूनि सुमहामनाः ॥१९४॥

अर्थ: इस प्रकार उदार अभिप्राय और विशाल हृदयको धारण करनेवाले सुप्रभ मुनिने कई हजार वर्ष तक विधिपूर्वक कठिन तपश्चरण किया ॥१९४॥


नानालब्धिसमेतोऽपि यो न गर्वमुपागतः । संयोगजेषु भावेषु तत्याज ममतां च यः ॥१९५॥

अर्थ: वे सुप्रभ मुनि नानाऋद्धियोंसे सहित होनेपर भी गर्वको प्राप्त नहीं हुए थे तथा संयोगजन्य भावोंमें उन्होंने सब ममता छोड़ दी थी ॥१९५॥


विकषायसितध्यानसिद्धः स्यात्स महामुनिः । पर्याप्तं केवलं नायुरतः सर्वार्थसिद्धिमैत् ॥१९६॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्हें कषायकी उपशम अवस्थामें होनेवाला शुक्ल-ध्यानका प्रथम भेद प्रकट हुआ था ऐसे वे महामुनि सिद्ध अवस्थाको अवश्य प्राप्त होते परन्तु आयु अधिक नहीं थी इसलिए उसी उपशान्त दशामें मरणकर सर्वार्थसिद्धि गये ॥१९६॥


त्रयस्त्रिंशत्समुद्रायुस्तत्र भुक्त्वा महासुखम् । वालिनाम्नाऽजनिष्टासौ प्रतापी खेचराधिपः ॥१९७॥

अर्थ: वहाँ तैंतीस सागर तक महासुख भोगकर वे वालिनामके प्रतापी विद्याधरोंके राजा हुए ॥१९७॥


द्रव्यदर्शनराज्यं यः प्राप किष्किन्धभूधरे । भ्राता यस्यैव सुग्रीवो महागुणसमन्वितः ॥१९८॥

विरोधमतिरूढोऽपि लङ्काधिपतिना समम् । विन्यस्यात्र श्रियं जीवदयार्थं दीक्षितोऽभवत् ॥१९९॥

दशाननेन गर्वेण सामर्थ्येन समुद्धृतः । पादाङ्गुष्ठेन कैलासस्त्याजितो येन साधुना ॥२००॥

निर्दह्य स भवारण्यं परमध्यानतेजसा । त्रिलोकाग्रं समारूढः प्राप्तो जीवनिजस्थितिम् ॥२०१॥

अर्थ: जिन्होंने किष्किन्ध पर्वत पर विविध सामग्रीसे युक्त राज्य प्राप्त किया था, महागुणवान् सुग्रीव जिनका भाई है । लंकाधिपति रावणके साथ विरोध होने पर भी जो इस सुग्रीवके ऊपर राज्य-लक्ष्मी छोड़ जीवदयाके अर्थ दीक्षित हो गये थे, तथा गर्व वश रावणके द्वारा उठाये हुए कैलास को जिन्होंने साधु अवस्थामें अपनी सामर्थ्यसे केवल पैरका अंगूठा दबा कर छुड़वा दिया था । वही वालि मुनि उत्कृष्ट ध्यानके तेजसे संसार रूपी वनको भस्म कर तीन लोकके अग्रभाग पर आरूढ़ हो आत्माके निज स्वरूपमें स्थितिको प्राप्त हुए हैं ॥१९८-२०१॥


परस्परमनेकत्र भवेऽन्योन्यवधः कृतः । श्रीकान्तवसुदत्ताभ्यां महावैरानुबन्धतः ॥२०२॥

अर्थ: श्रीकान्त और वसुदत्तने महावैरके कारण अनेक भवोंमें परस्पर एक दूसरेका वध किया है ॥२०२॥


पूर्वं वेदवतीकाले सम्बन्धप्रार्थिना परम् । रावणेन हृता सीता तथा कर्मानुभावतः ॥२०३॥

अर्थ: पहले वेदवतीकी पर्यायमें रावणका जीव सीताके साथ सम्बन्ध करना चाहता था उसी संस्कारसे उसने रावणकी पर्यायमें सीताका हरण किया ॥२०३॥


श्रीभूतिर्वेदविद्विप्रः सम्यग्दृष्टिरनुत्तमः । हिंसितो वेदवत्यर्थे शम्भुना कामिना यतः ॥२०४॥

अर्थ: जब रावण शम्भु था तब उसने कामी होकर वेदवतीकी प्राप्तिके लिए वेदोंके जाननेवाले, उत्तम सम्यग्दृष्टि श्रीभूति ब्राह्मण की हत्या की थी ॥२०४॥


श्रीभूतिः स्वर्गमारुह्य प्रतिष्ठनगरे च्युतः । भूत्वा पुनर्वसुः शोकात्सनिदानतपोऽन्वितः ॥२०५॥

सनत्कुमारमारुह्य च्युत्वा दशरथात्मजः । भूत्वा रामानुजस्तीव्रस्नेहो लक्ष्मणचक्रभृत् ॥२०६॥

अर्थ: वह श्रीभूति स्वर्ग गया वहाँसे च्युत होकर प्रतिष्ठ नगरमें पुनर्वसु विद्याधर हुआ सो शोकवश निदान सहित तपकर सानत्कुमार स्वर्गमें उत्पन्न हुआ। तदनन्तर वहाँ से च्युत हो दशरथका पुत्र तथा रामका छोटा भाई परम स्नेही लक्ष्मण नामका चक्रधर हुआ ॥२०५-२०६॥


शम्भुपूर्वं ततः शत्रुमवधीत्पूर्ववैरतः । दशाननमयं वीरः सुमित्राजो निकाचितात् ॥२०७॥

अर्थ: इस वीर लक्ष्मणने, नहीं छूटनेवाले पूर्व वैरके कारण ही शम्भुका जीव जो दशानन हुआ था उसे मारा है ॥२०७॥


भ्रातुर्वियोगजं दुःखं यदाऽऽसीत्सह सीतया । निमित्तमात्रमासीत्तद्दशवक्त्रस्य संक्षये ॥२०८॥

अर्थ: यतश्च पूर्वभवमें सीताके जीवको रावणके जीवके द्वारा भाईके वियोगका दुःख उठाना पड़ा था इसलिए सीता रावणके क्षयमें निमित्त हुई है ॥२०८॥


अकूपारं समुत्तीर्य धरणीचारिणा सता । संसारभावसक्तानां जन्तूनां स्थितिरीदृशी ॥२०९॥

अर्थ: लक्ष्मणने भूमिगोचरी होनेपर भी समुद्रको पारकर पूर्व पर्यायमें अपना घात करनेवाले रावणको मारा है ॥२०९॥


राक्षसीश्रीक्षपाचन्द्रं तं निहत्य दशाननम् । सौमित्रिणा समाक्रान्ता पृथिवीयं ससागरा ॥२१०॥

अर्थ: राक्षसोंकी लक्ष्मीरूपी रात्रिको सुशोभित करनेके लिए चन्द्रमा स्वरूप रावणको मारकर लक्ष्मणने इस सागर सहित समस्त पृथिवीपर अपना अधिकार किया है ॥२१०॥


क्वासौ तथाविधः शूरः क्व चेयं गतिरीदृशी । माहात्म्यं कर्मणामेतदसम्भाव्यमवाप्यते ॥२११॥

अर्थ: सकलभूषण केवली कहते हैं कि कहाँ तो वैसा शूर वीर और कहाँ ऐसी गति ? यह कर्मोंका ही माहात्म्य है कि असम्भव वस्तु भी प्राप्त हो जाती है ॥२११॥


वध्यघातकयोरेवं जायते व्यत्ययः पुनः । संसारभावसक्तानां जन्तूनां स्थितिरीदृशी ॥२१२॥

अर्थ: इस प्रकार वध्य और घातक जीवोंमें पुनः-पुनः बदली होती रहती है अर्थात् पहली पर्यायमें जो वध्य होता है वह आगामी पर्यायमें उसका घातक होता है और पहली पर्यायमें जो घातक होता है वह आगामी पर्यायमें वध्य होता है । संसारी जीवोंकी ऐसी ही स्थिति है ॥२१२॥


क्व नाके परमा भोगाः क्व दुःखं नरके पुनः । विपरीतमहोऽत्यन्तं कर्मणां दुर्विचेष्टितम् ॥२१३॥

अर्थ: कहाँ तो स्वर्गमें उत्तम भोग और कहाँ नरकमें तीव्र दुःख ? अहो ! कर्मोंकी बड़ी विपरीत चेष्टा है ॥२१३॥


परमान्नमहाकूटं यादृशं विषदूषितम् । तपस्तादृशमेवोग्रनिदानकृतनन्दनम् ॥२१४॥

अर्थ: जिस प्रकार परम स्वादिष्ट अन्नकी महाराशि विषसे दूषित हो जाती है, उसी प्रकार परम उत्कृष्ट तप भी निदानसे दूषित हो जाता है ॥२१४॥


इयं शाक्रं द्रुमं छित्वा कोद्रवाणां वृतिः कृता । अमृतद्रवसेकेन पोषितो विषपादपः ॥२१५॥

सूत्रार्थे चूर्णिता सेयं परमा रत्नसंहतिः । गोशीर्षं चन्दनं दग्धमङ्गारहितचेतसा ॥२१६॥

अर्थ: निदान अर्थात् भोगाकांक्षाके लिए तपको दूषित करना ऐसा है जैसा कि कल्पवृक्ष काटकर कोदोंके खेतकी बाड़ी लगाना अथवा अमृत सींचकर विषवृक्षको बढ़ाना अथवा सूतके लिए उत्तम मणियोंकी मालाका चूर्ण करना अथवा अंगारके लिए गोशीर्ष चन्दनका जलाना ॥२१५-२१६॥


जीवलोकेऽबला नाम सर्वदोषमहाखनिः । किं नाम न कृते तस्याः क्रियते कर्म कुत्सितम् ॥२१७॥

अर्थ: संसारमें स्त्री समस्त दोषोंकी महाखान है । ऐसा कौन निन्दित कार्य है जो उसके लिए नहीं किया जाता हो ? ॥२१७॥


प्रत्यावृत्य कृतं कर्म फलमर्पयति ध्रुवम् । तत्कर्तुमन्यथा केन शक्यते भुवनत्रये ॥२१८॥

अर्थ: किया हुआ कर्म लौटकर अवश्य फल देता है उसे भुवनत्रयमें अन्यथा करनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥२१८॥


कृत्वापि सङ्गतिं धर्मे यद्व्रजन्तीदृशीं गतिम् । उच्यतामितरेषां किं तत्र निर्धर्मचेतसाम् ॥२१९॥

अर्थ: जब धर्म धारण करनेवाले मनुष्य भी इस गतिको प्राप्त होते हैं तब धर्महीन मनुष्योंकी बात ही क्या है ? ॥२१९॥


श्रामण्यसङ्गतस्यापि साध्यमत्सरसेविनः । कृत्वाऽप्युग्रतपो नास्ति शिवं संज्वलनस्पृशः ॥२२०॥

अर्थ: जो मुनिपद धारण करके भी साध्यपदार्थोंके विषयमें मत्सर भाव रखते हैं ऐसे संज्वलन कषायके धारक मुनियोंको उग्र तपश्चरण करने पर भी शिव अर्थात् मोक्ष अथवा वास्तविक कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥२२०॥


न शमो न तपो यस्य मिथ्यादृष्टेर्न संयमः । संसारोत्तरणे तस्य क उपायो दुरात्मनः ॥२२१॥

अर्थ: जिस मिथ्यादृष्टिके न शम अर्थात् शान्ति है, न तप है और न संयम है उस दुरात्मा के पास संसार-सागरसे उतरनेका उपाय क्या है ? ॥२२१॥


ह्रियन्ते वायुना यत्र गजेन्द्रा मदशालिनः । पूर्वमेव हृतास्तत्र शशकाः स्थलवर्त्तिनः ॥२२२॥

अर्थ: जहाँ वायुके द्वारा मदोन्मत्त हाथी हरण किये जाते हैं वहाँ स्थलमें रहनेवाले खरगोश तो पहले ही हरे जाते हैं ॥२२२॥


एवं परमदुःखानां ज्ञात्वा कारणमीदृशम् । मा कार्ष्ट वैरसम्बन्धं जनाः स्वहितकाङ्क्षिणः ॥२२३॥

अर्थ: इस प्रकार परम दुःखोंका ऐसा कारण जानकर हे आत्महितके इच्छुक भव्य जनो ! किसीके साथ वैरका सम्बन्ध मत रक्खो ॥२२३॥


भारत्यपि न वक्तव्या दुरितादानकारिणी । सीतायाः पश्यत प्राप्तो दुर्वादः शब्दमात्रतः ॥२२४॥

अर्थ: जिससे पापबन्ध हो ऐसा एक शब्द भी नहीं बोलना चाहिए । देखो, शब्द मात्रसे सीता को कैसा अपवाद प्राप्त हुआ ? ॥२२४॥


ग्रामो मण्डलिको नाम तमायातः सुदर्शनः । मुनिमुद्यानमायातं वन्दित्वा तं गता जनाः ॥२२५॥

सुदर्शनां स्थितां तत्र स्वसारं सद्वचो ब्रुवन् । ईक्षितो वेदवत्याऽसौ सत्या श्रमणया तया ॥२२६॥

ततो ग्रामीणलोकाय सम्यग्दर्शनतत्परा । जगाद पश्यतेदृक्षं श्रमणं ब्रूथ सुन्दरम् ॥२२७॥

मया सुयोषिता साकं स्थितो रहसि वीक्षितः । ततः कैश्चित् प्रतीतं तन्न तु कैश्चिद्विचक्षणैः ॥२२८॥

अर्थ: इसकी कथा इस प्रकार है कि जब सीता वेदवतीकी पर्यायमें थी तब एक मण्डलिक नामका ग्राम था । उस ग्राममें एक सुदर्शन नामक मुनि आये । मुनिको उद्यानमें आया देख लोग उनकी वन्दनाके लिए गये । वन्दना कर जब सब लोग चले गये तब उनके पास एक सुदर्शना नामकी आर्यिका जो कि मुनिकी बहिन थी बैठी रही और मुनि उसे सद्वचन कहते रहे । वेदवतीने उस उत्तम साध्वी - आर्यिकाके साथ मुनिको देखा । तदनन्तर अपने आपको सम्यग्दृष्टि बतानेमें तत्पर वेदवतीने गाँवके लोगोंसे कहा कि हाँ, आप लोग ऐसे साधुके अवश्य दर्शन करो और उन्हें अच्छा बतलाओ । मैंने उन साधुको एकान्तमें एक सुन्दर स्त्रीके साथ बैठा देखा है । वेदवतीकी यह बात किन्हींने मानी और जो विवेकी थे ऐसे किन्हीं लोगोंने नहीं मानी ॥२२५-२२८॥


अनादरो मुनेर्लोकैः कृतश्चावग्रहोऽमुना । वेदवत्या मुखं शूनं देवताया नियोगतः ॥२२९॥

अपुण्यया मयाऽलीकं चोदितं भवतामिति । तया प्रत्यायितो लोक इत्याद्यत्र कथा स्मृता ॥२३०॥

एवं सद्भ्रातृयुगलं निन्दितं यत्तदानया । अवर्णवादमीदृक्षं प्राप्तेयं वितथं ततः ॥२३१॥

अर्थ: इस प्रकरणसे लोगोंने मुनिका अनादर किया । तथा मुनिने यह प्रतिज्ञा ली कि जब तक यह अपवाद दूर न होगा तबतक आहारके लिए नहीं निकलूँगा । इस अपवादसे वेदवतीका मुख फूल गया तब उसने नगरदेवताकी प्रेरणा पा मुनिसे कहा कि मुझ पापिनीने आपके विषयमें झूठ कहा है । इस तरह मुनिसे क्षमा कराकर उसने अन्य लोगोंको भी विश्वास दिलाया । इस प्रकार वेदवतीकी पर्यायमें सीताने उन बहिन-भाईके युगलकी झूठी निन्दा की थी इसलिए इस पर्यायमें यह इस प्रकारके मिथ्या अपवादको प्राप्त हुई है ॥२२९-२३१॥


दृष्टः सत्योऽपि दोषो न वाच्यो जिनमतश्रिता । उच्यमानोऽपि चान्येन वार्यः सर्वप्रयत्नतः ॥२३२॥

अर्थ: यदि यथार्थ दोष भी देखा हो तो जिनमतके अवलम्बीको नहीं कहना चाहिए और कोई दूसरा कहता भी हो तो उसे सब प्रकारसे रोकना चाहिए ॥२३२॥


ब्रुवाणो लोकविद्वेषकरणं शासनाश्रितम् । प्रतिपद्य चिरं दुःखं संसारमवगाहते ॥२३३॥

अर्थ: फिर लोकमें विद्वेष फैलानेवाले शासन सम्बन्धी दोषको जो कहता है वह दुःख पाकर चिरकाल तक संसारमें भटकता रहता है ॥२३३॥


सम्यग्दर्शनरत्नस्य गुणोऽत्यन्तमयं महान् । यद्दोषस्य कृतस्यापि प्रयत्नादुपगूहनम् ॥२३४॥

अर्थ: किये हुए दोषको भी प्रयत्नपूर्वक छिपाना यह सम्यग्दर्शनरूपी रत्नका बड़ा भारी गुण है ॥२३४॥


अज्ञानान्मत्सराद्वापि दोषं वितथमेव तु । प्रकाशयञ्जनोऽत्यन्तं जिनमार्गाद्बहिः स्थितः ॥२३५॥

अर्थ: अज्ञान अथवा मत्सर भावसे भी जो किसीके मिथ्या दोष को प्रकाशित करता है वह मनुष्य जिनमार्गसे बिलकुल ही बाहर स्थित है ॥२३५॥


इति श्रुत्वा मुनीन्द्रस्य भाषितं परमाद्भुतम् । सुरासुरमनुष्यास्ते विस्मयं परमं गताः ॥२३६॥

अर्थ: इस प्रकार सकलभूषण केवलीका अत्यधिक आश्चर्यसे भरा हुआ उपदेश सुनकर समस्त सुर असुर और मनुष्य परम विस्मयको प्राप्त हुए ॥२३६॥


ज्ञात्वा सुदुर्जरं वैरं सौमित्रेः रावणस्य च । महादुःखभयोपेतं निर्मत्सरमभूत्सदः ॥२३७॥

अर्थ: लक्ष्मण और रावणके सुदृढ़ वैरको जानकर समस्त सभा महादुःख और भयसे सिहर उठी तथा निर्वैर हो गई । अर्थात् सभाके सब लोगोंने वैरभाव छोड़ दिया ॥२३७॥


मुनयः शङ्किता जाता देवाश्चिन्तां परां गताः । राजानः प्रापुरुद्वेगं प्रतिबुद्धाश्च केचन ॥२३८॥

अर्थ: मुनि संसारसे भयभीत हो गये, देवलोग परम चिन्ताको प्राप्त हुए, राजा उद्वेगको प्राप्त हुए और कितने ही लोग प्रतिबुद्ध हो गये ॥२३८॥


विमुक्तगर्वसम्भाराः परिशान्ताः प्रवादिनः । अपि सम्यक्त्वमायाता आसन्ये कर्मकर्कशाः ॥२३९॥

अर्थ: अपनी वक्तृत्व-शक्तिका अभिमान रखनेवाले कितने ही लोग अहंकारका भार छोड़ शान्त हो गये । जो कर्मोदयसे कठिन थे अर्थात् चारित्रमोहके तीव्रोदयसे जो चारित्र धारण करनेके लिए असमर्थ थे उन्होंने केवल सम्यग्दर्शन प्राप्त किया ॥२३९॥


कर्मदौरात्म्यसम्भारक्षणमात्रकमूर्छिता । समाश्वसत्सभा हा हा धिक् चित्रमिति वादिनी ॥२४०॥

अर्थ: कर्मोंकी दुष्टताके भारसे जो क्षणभरके लिए मूर्च्छित हो गई थी ऐसी सभा ‘हा हा, धिक् चित्रम्’ आदि शब्द कहती हुई साँसें भरने लगी ॥२४०॥


कृत्वा करपुटं मूर्ध्नि प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् । मनुष्यासुरगीर्वाणाः प्रशशंसुर्विभीषणम् ॥२४१॥

भवत्समाश्रयाद्भद्र श्रुतमस्माभिरुत्तमम् । चरितं बोधनं पुण्यं मुनिपादप्रसादतः ॥२४२॥

अर्थ: मनुष्य, असुर और देव हाथ जोड़ मस्तकसे लगा मुनिराजको प्रणामकर विभीषणकी प्रशंसा करने लगे कि हे भद्र ! आपके आश्रयसे ही मुनिराजके चरणोंका प्रसाद प्राप्त हुआ है और उससे हमलोग इस उत्तम ज्ञानवर्धक पुण्य चरितको सुन सके हैं ॥२४१-२४२॥


ततो नरेन्द्रदेवेन्द्रमुनीन्द्राः सम्मदोत्कटाः । सर्वज्ञं तुष्टुवुः सर्वे परिवर्गसमन्विताः ॥२४३॥

अर्थ: तदनन्तर हर्षसे भरे एवं अपने-अपने परिकरसे सहित समस्त नरेन्द्र सुरेन्द्र और मुनीन्द्र सर्वज्ञदेवकी स्तुति करने लगे ॥२४३॥


त्रैलोक्यं भगवन्नेतत्त्वया सकलभूषण । भूषितं तेन नामेदं तव युक्तं सहार्थकम् ॥२४४॥

अर्थ: कि हे सकलभूषण ! भगवन् ! आपके द्वारा ये तीनों लोक भूषित हुए हैं इसलिए आपका यह ‘सकलभूषण’ नाम सार्थक है ॥२४४॥


तिरस्कृत्य श्रियं सर्वां ज्ञानदर्शनवर्तिनी । केवलश्रीरियं भाति तव दूरीकृतोपमा ॥२४५॥

अर्थ: ज्ञान और दर्शनमें वर्तमान तथा उपमासे रहित आपकी यह केवलज्ञानरूपी लक्ष्मी संसारकी अन्य समस्त लक्ष्मियोंका तिरस्कार कर अत्यधिक सुशोभित हो रही है ॥२४५॥


अनाथमध्रुवं दीनं जन्ममृत्युवशीकृतम् । क्लिश्यतेऽद्यो जगत्प्राप्तं स्वं पदं जैनमुत्तमम् ॥२४६॥

अर्थ: अनाथ, अध्रुव, दीन तथा जन्म जरा मृत्युके वशीभूत हुआ यह संसार अनादि कालसे क्लेश उठा रहा है पर आज आपके प्रसादसे जिनप्रदर्शित उत्तम आत्मपदको प्राप्त हुआ है ॥२४६॥


नानाव्याधिजरावियोगमरणप्रोद्भूतिदुःखं परं । प्राप्तानां मृगयुप्रवेजितमृगव्रातोपमावर्त्तिनाम् । कृच्छ्रोत्सर्जनदारुणाशुभमहाकर्मावरुद्धात्मना- मस्माकं कृतकार्य यच्छ निकटं कर्मक्षयं केवलिन् ॥२४७॥

अर्थ: हे केवलिन् ! हे कृतकृत्य ! जो नाना प्रकारके रोग, बुढ़ापा; वियोग तथा मरणसे उत्पन्न होनेवाले परम दुःखको प्राप्त हैं, जो शिकारीके द्वारा डराये हुए मृगसमूहकी उपमाको प्राप्त हैं तथा कठिनाईसे छूटनेयोग्य दारुण एवं अशुभ महाकर्मोंसे जिनकी आत्मा अवरुद्ध है - घिरी हुई हैं ऐसे हम लोगोंके लिए शीघ्र ही कर्मोंका क्षय प्रदान कीजिए ॥२४७॥


नष्टानां विषयान्धकारगहने संसारवासे भव
त्वं दीपः शिवलब्धिकांक्षणमहातृड्खेदितानां सरः ।
वह्निः कर्मसमूहकक्षदहने व्यग्रीभवच्चेतसां
नानादुःखमहातुषारपतनव्याकम्पितानां रविः ॥२४८॥

अर्थ: हे नाथ ! विषयरूपी अन्धकारसे व्याप्त संसार-वासमें भूले हुए प्राणियोंके आप दीपक हो, मोक्षप्राप्तिकी इच्छारूप तीव्र प्याससे पीड़ित मनुष्योंके लिए सरोवर हो, कर्म-समूहरूपी वनको जलानेके लिए अग्नि हो, तथा व्याकुलचित्त एवं नाना दुःखरूपी महातुषारके पड़नेसे कम्पित पुरुषोंके लिए सूर्य हो ॥२४८॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते श्रीपद्मचरिते सपरिवर्गरामदेवपूर्वभवाभिधानं नाम षडुत्तरशतं पर्व ॥१०६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य प्रणीत पद्मपुराणमें परिवर्ग सहित रामदेव के पूर्वभवोंका वर्णन करनेवाला एक सौ छठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१०६॥


१०७. सप्तोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते प्रव्रजितसीताभिधानं)

ततः श्रुत्वा महादुःखं भवसंसृतिसम्भवम् । कृतान्तवदनोऽवोचत्पद्मं दीक्षाभिकाङ्क्षया ॥१॥

मिथ्यापथपरिभ्रान्त्या संसारेऽस्मिन्ननादिके । खिन्नोऽहमधुनेच्छामि श्रामण्यं समुपासितुम् ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर भव-भ्रमणसे उत्पन्न महादुःखको सुनकर कृतान्तवक्त्र सेनापतिने दीक्षा लेने की इच्छासे रामसे कहा कि मिथ्यामार्गमें भटक जानेके कारण मैं इस अनादि संसारमें खेद-खिन्न हो रहा हूँ अतः अब मुनिपद धारण करनेकी इच्छा करता हूँ ॥१-२॥


पद्मनाभस्ततोऽवोचदुत्सृज्य स्नेहमुत्तमम् । अत्यन्तदुर्धरां चर्यां कथं धारयसीदृशीं ॥३॥

अर्थ: तब रामने कहा कि उत्तम स्नेह छोड़कर इस अत्यन्त दुर्धरचर्याको किस प्रकार धारण करोगे ? ॥३॥


कथं सहिष्यसे तीव्रान् शीतोष्णादीन् परीषहान् । महाकण्टकतुल्यानि वाक्यानि च दुरात्मनाम् ॥४॥

अर्थ: शीत उष्ण आदिके तीव्र परीषह तथा महाकण्टकोंके समान दुर्जन मनुष्योंके वचन किस प्रकार सहोगे ? ॥४॥


अज्ञातक्लेशसम्पर्कः कमलक्रोडकोमलः । कथं भूमितलेऽरण्ये निशां व्यालिनि नेष्यसि ॥५॥

अर्थ: जिसने कभी क्लेशका सम्पर्क जाना नहीं तथा जो कमलके मध्यभागके समान कोमल है ऐसे तुम हिंसक जन्तुओंसे भरे हुए वनमें पृथिवी तलपर रात्रि किस तरह बिताओगे ? ॥५॥


प्रकटास्थिसिराजालः पक्षमासाद्युपोषितः । कथं परगृहे भिक्षां भोक्ष्यसे पाणिभाजने ॥६॥

अर्थ: जिसकी हड्डियों तथा नसोंका जाल स्पष्ट दिख रहा है तथा जिसने एक पक्ष, एक मास आदिका उपवास किया है ऐसे तुम परगृहमें हस्तरूपी पात्रमें भिक्षा-भोजन कैसे ग्रहण करोगे ? ॥६॥


नासहिष्टं द्विषां सैन्यं यो मातङ्गघटाकुलम् । नीचात्परिभवं स त्वं कथं वा विसहिष्यसे ॥७॥

अर्थ: जिसने हाथियोंके समूहसे व्याप्त शत्रुओंकी सेना कभी सहन नहीं की है ऐसे तुम नीचजनोंसे प्राप्त पराभवको किस प्रकार सहन करोगे ? ॥७॥


कृतान्तास्यस्ततोऽवोचद् यस्त्वत्स्नेहरसायनम् । परित्यक्तुमहं सोढुस्तस्यान्यत्किमसह्यकम् ॥८॥

अर्थ: तदनन्तर कृतान्तवक्त्रने कहा कि जो आपके स्नेहरूपी रसायनको छोड़नेके लिए समर्थ है उसके लिए अन्य क्या असह्य है ? ॥८॥


यावन्न मृत्युवज्रेण देहस्तम्भो निपात्यते । तावदिच्छामि निर्गन्तुं दुःखान्धाद्भवसङ्कटात् ॥९॥

अर्थ: जब तक मृत्युरूपी वज्रके द्वारा शरीर रूपी स्तम्भ नहीं गिरा दिया जाता है तब तक मैं दुःखसे अन्धे इस संसाररूपी संकटसे बाहर निकल जाना चाहता हूँ ॥९॥


धारयन्ति न निर्यातं वह्निज्वालाकुलालयात् । दयावन्तो यथा तद्वद्दुःखतप्ताद्भवादपि ॥१०॥

अर्थ: अग्निकी ज्वालाओंसे प्रज्वलित घरसे निकलते हुए मनुष्योंको जिस प्रकार दयालु मनुष्य रोककर उसी घरमें नहीं रखते हैं उसी प्रकार दुःखसे संतप्त संसारसे निकले हुए प्राणीको दयालु मनुष्य उसी संसारमें नहीं रखते हैं ॥१०॥


वियोगः सुचिरेणापि जायते यद्भवद्विधैः । ततो निन्दितसंसारः को न वेत्त्यात्मनो हितम् ॥११॥

अर्थ: जब कि अभी नहीं तो बहुत समय बाद भी आप जैसे महान् पुरुषोंके साथ वियोग होगा ही तब संसारको बुरा समझनेवाला कौन पुरुष आत्माके हित को नहीं समझेगा ? ॥११॥


अवश्यं त्वद्वियोगेन दुःखं भावि सुदुःसहम् । मा भूत्पुनरपीदृक्षमिति मे मतिरुद्यता ॥१२॥

अर्थ: यह ठीक है कि आपके वियोगसे होनेवाला दुःख अवश्य ही अत्यन्त असह्य है फिर भी ऐसा दुःख पुनः प्राप्त न हो इसीलिए मेरी यह बुद्धि उत्पन्न हुई है ॥१२॥


नियम्याश्रूणि कृच्छ्रेण व्याकुलो राघवोऽवदत् । मत्तुल्यां श्रियमुज्झित्वा धन्यस्त्वं सद्व्रतोन्मुखः ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर व्यग्र हुए रामने बड़ी कठिनाईसे आँसू रोककर कहा कि मेरे समान लक्ष्मीको छोड़कर जो तुम उत्तम व्रत धारण करनेके लिए उन्मुख हुए हो अतः तुम धन्य हो ॥१३॥


एतेन जन्मना नो चेत्त्वं निर्वाणमपेष्यसि । ततो बोध्योऽस्मि देवेन त्वया सङ्कटमागतः ॥१४॥

अर्थ: इस जन्मसे यदि तुम निर्वाणको प्राप्त न हो सको और देव होओ तो संकटमें पड़ा हुआ मैं तुम्हारे द्वारा सम्बोधने योग्य हूँ ॥१४॥


यद्येकमपि किञ्चिन्मे जानास्युपकृतं ततः । नेदं विस्मरणीयं ते भद्रैवं कुरु सङ्गरम् ॥१५॥

अर्थ: हे भद्र ! यदि मेरे द्वारा किया हुआ एक भी उपकार तुम मानते हो तो यह बात भूलना नहीं। ऐसी प्रतिज्ञा करो ॥१५॥


यथाज्ञापयसीत्युक्त्वा प्रणम्य च यथाविधि । उपसृत्योरुसंवेगः सेनानीः सर्वभूषणम् ॥१६॥

प्रणम्य सकलं त्यक्त्वा बाह्यान्तरपरिग्रहम् । सौम्यवक्त्रः सुविक्रान्तो निष्क्रान्तः कान्तचेष्टितः ॥१७॥

अर्थ: 'जैसी आप आज्ञा कर रहे हैं वैसा ही होगा । ’ इस प्रकार कहकर तथा विधिपूर्वक प्रणामकर उत्कट वैराग्यसे भरा सेनापति सर्वभूषण केवलीके पास गया और प्रणाम कर तथा बाह्याभ्यन्तर सर्व प्रकारका परिग्रह छोड़ सौम्यवक्त्र हो गया । अब वह आत्महितके विषयमें तीव्र पराक्रमी हो गया, गृह जंजालसे निकल चुका तथा सुन्दर चेष्टाका धारक हो गया ॥१६-१७॥


एवमाद्या महाराजा वैराग्यं परमं गताः । महासंवेगसम्पन्ना नैर्ग्रन्थ्यं व्रतमाश्रिताः ॥१८॥

अर्थ: इस प्रकार परम वैराग्यको प्राप्त एवं महासंवेगसे सम्पन्न कितने ही महाराजाओंने निर्ग्रन्थ व्रत धारण किया - जिन-दीक्षा ली ॥१८॥


केचिच्छ्रावकतां प्राप्ताः सम्यग्दर्शनतां परे । मुदितैवं सभा साऽभाद्रत्नत्रयविभूषणा ॥१९॥

अर्थ: कितने ही लोग श्रावक हुए और कितने ही लोग सम्यग्दर्शनको प्राप्त हुए। इस प्रकार हर्षित हो रत्नत्रयरूपी आभूषणोंसे विभूषित वह सभा अत्यन्त सुशोभित हो रही थी ॥१९॥


प्रयाति नगतो नाथे ततः सकलभूषणे । प्रणम्य भक्तितो याता यथायातं सुरासुराः ॥२०॥

अर्थ: अथानन्तर जब सकलभूषण स्वामी उस पर्वतसे विहार कर गये तब भक्तिपूर्वक प्रणाम कर सुर और असुर यथास्थान चले गये ॥२०॥


पद्मोपमेक्षणः पद्मो नत्वा सकलभूषणम् । अनुक्रमेण साधूंश्च मुक्तिसाधनतत्परान् ॥२१॥

उपागमद्विनीतात्मा सीतां विमलतेजसम् । घृताहुत्या समुद्भूतां स्फीतां वह्निशिखामिव ॥२२॥

अर्थ: कमललोचन राम सकलभूषण केवली तथा मुक्तिके सिद्ध करनेमें तत्पर साधुओंको यथाक्रमसे प्रणामकर विनीत भावसे उस सीताके पास गये जो कि निर्मल तेजको धारण कर रही थी तथा घीकी आहुतिसे उत्पन्न अग्निकी शिखाके समान देदीप्यमान थी ॥२१-२२॥


शान्त्याऽऽर्यागणमध्यस्थां स्फुरत्स्वकिरणोत्कराम् । सुभ्रूयुगां ध्रुवामन्यामिव तारां गणावृताम् ॥२३॥

अर्थ: वह क्षान्तिपूर्वक आर्यिकाओंके समूहके मध्यमें स्थित थी, उसकी स्वयंकी किरणोंका समूह देदीप्यमान हो रहा था, वह उत्तम शान्त भौंहोंसे युक्त थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो समूहसे आवृत दूसरी ही ध्रुवतारा हो ॥२३॥


सद्वृत्तात्यन्तनिभृतां त्यक्तस्रग्गन्धभूषणाम् । धृतिकीर्तिरतिश्रीह्रीपरिवारां तथापि ताम् ॥२४॥

मृदुचारसितश्लक्ष्णप्रलम्बाम्बरधारिणीम् । मन्दानिलचलत्फेनपटां पुण्यनदीमिव ॥२५॥

विकासिकाशसङ्घातविशदां शरदं यथा । कौमुद्वतीमिव ज्योत्स्नां कुमुदाकरहासिनीम् ॥२६॥

महाविरागतः साक्षादिव प्रव्रजितां श्रियम् । वपुष्मतीमिव प्राप्तां जिनशासनदेवताम् ॥२७॥

अर्थ: जो सम्यक्चारित्रके धारण करनेमें अत्यन्त दृढ़ थी, जिसने माला, गन्ध तथा आभूषण छोड़ दिये थे, फिर भी जो धृति, कीर्ति, रति, श्री और लज्जारूप परिवारसे युक्त थी। जो कोमल सफेद चिकने एवं लम्बे वस्त्रको धारण कर रही थी, अतएव मन्द-मन्द वायुसे जिसके फेनका समूह मिल रहा था ऐसी पुण्यकी नदीके समान जान पड़ती थी अथवा खिले हुए काशके फूलोंके समूहसे विशद शरद् ऋतुके समान मालूम होती थी अथवा कुमुदोंके समूहको विकसित करनेवाली कार्तिकी पूर्णिमाकी चाँदनीके समान विदित होती थी, अथवा जो महाविरागसे ऐसी जान पड़ती थी मानो दीक्षाको प्राप्त हुई साक्षात् लक्ष्मी ही हो, अथवा शरीरको धारण करनेवाली साक्षात् जिनशासनकी देवी ही हो ॥२४-२७॥


एवंविधां समालोक्य सम्भ्रमभ्रष्टमानसः । कल्पद्रुम इवाकम्पो बलदेवः क्षणं स्थितः ॥२८॥

अर्थ: ऐसी उस सीताको देख संभ्रमसे जिनका हृदय टूट गया था ऐसे राम क्षण भर कल्पवृक्षके समान निश्चल खड़े रहे ॥२८॥


प्रकृतिस्थिरनेत्रभ्रूप्राप्तावेतां विचिन्तयन् । शरत्पयोदमालानां समीप इव पर्वतः ॥२९॥

अर्थ: स्वभावसे निश्चल नेत्र और भृकुटियोंकी प्राप्ति होने पर इस साध्वी सीताका ध्यान करते हुए राम ऐसे जान पड़ते थे मानो शरद् ऋतुकी मेघमालाके समीप कोई पर्वत ही खड़ा हो ॥२९॥


इयं सा मद्भुजारन्ध्रपतिप्रवरसारिका । विलोचनकुमुद्वत्याश्चन्द्रलेखा स्वभावतः ॥३०॥

अर्थ: सीताको देख-देखकर राम विचार कर रहे थे कि यह मेरी भुजाओं रूपी पिंजरेके भीतर विद्यमान उत्तम सेना है अथवा मेरे नेत्ररूपी कुमुदिनीके लिए स्वभावतः चन्द्रमाकी कला है ॥३०॥


मयुक्ताऽप्यगमत्त्रासं या पयोदरवादपि । अरण्ये सा कथं भीमे न भेष्यति तपस्विनी ॥३१॥

अर्थ: जो मेरे साथ रहनेपर भी मेघके शब्दसे भी भयको प्राप्त हो जाती थी वह बेचारी तपस्विनी भयंकर वनमें किस प्रकार भयभीत नहीं होगी ? ॥३१॥


नितम्बगुरुतायोगललितालसगामिनी । तपसा विलयं नूनं प्रयास्यति सुकोमला ॥३२॥

अर्थ: विलम्बकी गुरुताके कारण जो सुन्दर एवं अलसाई हुई चाल चलती थी वह सुकोमल सीता तप के द्वारा निश्चित ही नाशको प्राप्त हो जायगी ॥३२॥


क्वेदं वपुः क्व जैनेन्द्रं तपः परमदुष्करम् । पद्मिन्यां क इवाऽऽयासो हिमस्य तरुदाहिनः ॥३३॥

अर्थ: कहाँ यह शरीर और कहाँ जिनेन्द्रका कठोर तप ? जो हिम वृक्षको जला देता है उसे कमलिनीके जलानेमें क्या परिश्रम है ? ॥३३॥


अन्नं यथेप्सितं भुक्तं यया परमनोहरम् । यथालाभं कथं भिक्षां सैषा समधियास्यति ॥३४॥

अर्थ: जिसने पहले इच्छानुसार परम मनोहर अन्न खाया है, वह अब जिस किसी तरह प्राप्त हुई भिक्षाको कैसे ग्रहण करेगा ? ॥३४॥


वीणावेणुमृदङ्गैर्या कृतमङ्गलनिःस्वनाम् । निद्राऽसेवत सत्तल्पे कल्पकल्पालयस्थिताम् ॥३५॥

दर्भशल्याचिते सेयं वने मृगरवाकुले । कथं भयानकीं भीरुः प्रेरयिष्यति शर्वरीम् ॥३६॥

अर्थ: वीणा, बाँसुरी तथा मृदङ्गके माङ्गलिक शब्दोंसे युक्त तथा स्वर्गलोकके सदृश उत्तम भवनमें स्थित जिस सीताकी निद्रा, उत्तम शय्यापर सेवा करती थी वही कातर सीता अब डाभकी अनियोंसे व्याप्त एवं मृगोंके शब्दसे व्याप्त वनमें भयानक रात्रिको किस तरह बितावेगी ? ॥३५-३६॥


किं मयोपचितं पश्य मोहसङ्गतचेतसा । पृथग्जनपरीवादाद्धारिता प्राणवल्लभा ॥३७॥

अर्थ: देखो, चित्त मोहसे युक्त है ऐसे मैंने क्या किया ? न कुछ साधारण मनुष्योंकी निन्दा से प्रेरित हो प्राणवल्लभा छोड़ दी ॥३७॥


अनुकूला प्रिया साध्वी सर्वविष्टपसुन्दरी । प्रियंवदा सुखक्षोणी कुतोऽन्या प्रमदेदृशी ॥३८॥

अर्थ: जो अनुकूल है, प्रिय है, पतिव्रता है, सर्व संसारकी अद्वितीय सुन्दरी है, प्रिय वचन बोलनेवाली है, और सुखकी भूमि है ऐसी दूसरी स्त्री कहाँ है ? ॥३८॥


एवं चिन्ताभराक्रान्तचित्तः परमदुःखितः । वेपितात्माऽभवत्पद्मश्चलत्पद्माकरोपमः ॥३९॥

अर्थ: इस तरह चिन्ताके भारसे जिनका चित्त व्याप्त था, जो अत्यन्त दुखी थे, तथा जिनकी आत्मा काँप रही थी ऐसे राम चञ्चल कमलाकरके समान हो गये ॥३९॥


ततः केवलिनो वाक्यं संस्मृत्य विधृतास्रकः । कृच्छ्रसंस्तम्भितौत्सुक्यो बभूव विगतज्वरः ॥४०॥

अर्थ: तदनन्तर केवलीके वचनोंका स्मरण कर जिन्होंने उमड़ते हुए आँसू रोके थे तथा जो बड़ी कठिनाईसे अपनी उत्सुकता को रोक सके थे ऐसे श्रीराम किसी तरह पीड़ा रहित हुए ॥४०॥


अथ स्वाभाविकीं दृष्टिं बिभ्राणः सहसम्भ्रमः । अधिगम्य सतीं सीतां भक्तिस्नेहान्वितोऽनमत् ॥४१॥

अर्थ: अथानन्तर स्वाभाविक दृष्टिको धारण करते हुए रामने सम्भ्रमके साथ सती सीताके पास जाकर भक्ति और स्नेहके साथ उसे नमस्कार किया ॥४१॥


नारायणोऽपि सौम्यात्मा प्रणम्य रचिताञ्जलिः । अभ्यनन्दयदार्यां तां पद्मनाभमनुब्रुवन् ॥४२॥

अर्थ: रामके साथ ही साथ सौम्यहृदय लक्ष्मणने भी हाथ जोड़ प्रणामकर आर्या सीताका अभिनन्दन किया ॥४२॥


धन्या भगवति त्वं नो वन्द्या जाता सुचेष्टिता । शीलाचलेश्वरं या त्वं क्षितिवद्वहसेऽधुना ॥४३॥

अर्थ: और कहा कि हे भगवति ! तुम धन्य हो, उत्तम चेष्टा की धारक हो और यतश्च इस समय पृथिवीके समान शीलरूपी सुमेरुको धारण कर रही हो अतः हम सबकी वन्दनीय हो ॥४३॥


जिनवागमृतं लब्धं परमं प्रथमं त्वया । निरुक्तं येन संसारसमुद्रं प्रतरिष्यसि ॥४४॥

अर्थ: जिसके द्वारा तुम संसार-समुद्रको चुपचाप पार करोगी वह श्रेष्ठ जिनवचन रूपी अमृत सर्व प्रथम तुमने ही प्राप्त किया है ॥४४॥


अपरासामपि स्त्रीणां सतीनां चारुचेतसाम् । इयमेव गतिर्भूयाल्लोकद्वितयशंसिता ॥४५॥

अर्थ: हम चाहते हैं कि सुन्दर चित्तकी धारक अन्य पतिव्रता स्त्रियोंकी भी दोनों लोकोंमें प्रशंसनीय यही गति हो ॥४५॥


आत्मा कुलद्वयं लोकस्त्वया सर्वं प्रसाधितम् । एवंविधं क्रियायोगं भजन्त्या साधुचित्तया ॥४६॥

अर्थ: इस प्रकारके क्रियायोगको प्राप्त करनेवाली एवं उत्तम चित्तकी धारक तुमने अपनी आत्मा दोनों कुल तथा लोक सब कुछ वशमें किया है ॥४६॥


क्षन्तव्यं यत्कृतं किञ्चित्सुनये साध्वसाधु वा । संसारभावसक्तानां स्खलितं च पदे पदे ॥४७॥

अर्थ: हे सुनये ! हमने जो कुछ साधु अथवा असाधु-अच्छा या बुरा कर्म किया है वह क्षमा करने योग्य है क्योंकि संसार दशामें आसक्त मनुष्योंसे भूल पद-पदपर होती है ॥४७॥


त्वयैवंविधया शान्ते जिनशासनसक्तया । परमानन्दितं चित्तं विषाद्यपि मनस्विनि ॥४८॥

अर्थ: हे शान्ते ! हे मनस्विनि ! इस तरह जिन-शासनमें आसक्त रहनेवाली तुमने मेरे विषाद युक्त चित्तको भी अत्यन्त आनन्दित कर दिया है ॥४८॥


अभिनन्द्येति वैदेहीं प्रहृष्टमनसाविव । प्रयातौ नगरीं कृत्वा पुरस्ताल्लवणाङ्कुशौ ॥४९॥

अर्थ: इस प्रकार सीताकी प्रशंसा कर प्रसन्न चित्तकी तरह राम तथा लक्ष्मण, लवण और अंकुशको आगे कर नगरीकी ओर चले ॥४९॥


विद्याधरमहीपालाः प्रमोदं परमं गताः । विस्मयाकम्पिता भूत्या परया ययुरग्रतः ॥५०॥

अर्थ: परम हर्षको प्राप्त हुए विद्याधर राजा विस्मयाकम्पित होते हुए बड़े वैभवसे आगे-आगे जा रहे थे ॥५०॥


मध्ये राजसहस्राणां वर्तमानौ मनोहरौ । पुरं विविशतुर्वीराविन्द्राविव सुरावृतौ ॥५१॥

अर्थ: हजारों राजाओंके मध्यमें वर्तमान दोनों मनोहर वीरोंने, देवोंसे घिरे हुए इन्द्रोंके समान नगरमें प्रवेश किया ॥५१॥


देव्यस्तदग्रतो नानायानारूढा विचेतसः । प्रययुः परिवारेण यथाविधि समाश्रिता ॥५२॥

अर्थ: उनके आगे नाना प्रकारके वाहनोंपर आरूढ़, बेचैन एवं अपने-अपने परिकरसे विधिपूर्वक सेवित रानियाँ जा रही थीं ॥५२॥


प्रविशन्तं बलं वीक्ष्य नार्यः प्रासादमूर्द्धगाः । विचित्ररससम्पन्नमभाषन्त परस्परम् ॥५३॥

अर्थ: रामको प्रवेश करते देख महलके शिखरों पर आरूढ़ स्त्रियाँ, विचित्र रससे युक्त परस्पर वार्तालाप कर रही थीं ॥५३॥


अयं श्रीबलदेवोऽसौ मानी शुद्धिपरायणः । अनुकूला प्रिया येन हारिता सुविपश्चिता ॥५४॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि ये राम बड़े मानी तथा शुद्धिमें तत्पर हैं कि जिन्होंने विद्वान् होकर भी अपनी अनुकूल प्रिया हरा दी है - छोड़ दी है ॥५४॥


जगौ काचित्प्रवीराणां विशुद्धकुलजन्मनाम् । नराणां स्थितिरेषैव कृतमेतेन सुन्दरम् ॥५५॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि विशुद्ध कुलमें जन्म लेनेवाले वीर मनुष्यों की यही रीति है । इन्होंने जो किया है वह ठीक किया है ॥५५॥


एवं सति विशुद्धात्मा प्रव्रज्यां समुपागता । कस्य नो जानकी जाता मनसः सौख्यकारिणी ॥५६॥

अर्थ: इस प्रकारकी घटनासे निष्कलङ्क हो दीक्षा धारण करनेवाली जानकी किसके मनके लिए सुख उत्पन्न करनेवाली नहीं है ? ॥५६॥


अन्योचे सखि पश्येमं वैदेह्या पद्ममुज्झितम् । ज्योत्स्नया शशिनं मुक्तं दीप्त्या विरहितं रविम् ॥५७॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि हे सखि ! सीतासे रहित इन रामको देखो । ये चाँदनीसे रहित चन्द्रमा और दीप्तिसे रहित सूर्यके समान जान पड़ते हैं ॥५७॥


अन्योचे किं परायत्तकान्तिरस्य करिष्यति । स्वयमेवातिकान्तस्य बलदेवस्य धीमतः ॥५८॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि बुद्धिमान् राम स्वयं ही अत्यन्त सुन्दर हैं, दूसरेके अधीन होनेवाली कान्ति इनका क्या करेगी ? ॥५८॥


काचिदूचे त्वया सीते किं कृतं पुरुषोत्तमम् । ईदृशं नाथमुज्झित्वा वज्रदारुणचित्तया ॥५९॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि हे सीते ! ऐसे पुरुषोत्तम पतिको छोड़कर तूने क्या किया ? यथार्थमें तू वज्रके समान कठोर चित्तवाली है ॥५९॥


जगावन्या परं सीता धन्या चित्तवती सती । यथार्था या गृहानर्थान्निःसृता स्वहितोद्यता ॥६०॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि सीता परमधन्य, विवेकवती, पतिव्रता एवं यथार्थ स्त्री है जो कि आत्महितमें तत्पर हो घरके अनर्थसे निकल गई - दूर हो गई ॥६०॥


काचिदूचे कथं धीरौ त्वयेमौ सुकुमारकौ । रहितौ मानसानन्दौ सुभक्तौ सुकुमारकौ ॥६१॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि हे सीते ! तेरे द्वारा ये दोनों सुकुमार, मनको आनन्द देनेवाले तथा अत्यन्त भक्त पुत्र कैसे छोड़े गये ? ॥६१॥


कदाचिच्चलति प्रेम न्यस्तं भर्त्तरि योषिताम् । स्वस्तन्यकृतपोषेषु जातेषु न तु जातुचित् ॥६२॥

अर्थ: कदाचित् भर्तापर स्थित स्त्रियोंका प्रेम विचलित हो जाता है परन्तु अपने दूधसे पुष्ट किये हुए पुत्रोंपर कभी विचलित नहीं होता ॥६२॥


अन्योचे परमावेतौ पुरुषौ पुण्यपोषणौ । किमत्र कुरुते माता स्वकर्मनिरते जने ॥६३॥

अर्थ: कोई कह रही थी कि दोनों कुमार पुण्यसे पोषण प्राप्त करनेवाले परमोत्तम पुरुष हैं । यहाँ माता क्या करती है ? जब कि सब लोग अपने-अपने कर्ममें निरत हैं अर्थात् कर्मानुसार फल प्राप्त करते हैं ॥६३॥


एवमादिकृतालापाः पद्मवीक्षणतत्पराः । न तृप्तियोगमासेदुर्मधुकर्य इव स्त्रियः ॥६४॥

अर्थ: इस प्रकार वार्तालाप करनेवाली तथा पद्म अर्थात् राम ( पक्षमें कमल ) के देखनेमें तत्पर स्त्रियाँ भ्रमरियोंके समान तृप्तिको प्राप्त नहीं हुईं ॥६४॥


केचिल्लक्ष्मणमैक्षन्त जगदुश्च नरोत्तमाः । सोऽयं नारायणः श्रीमान्प्रभावाक्रान्तविष्टपः ॥६५॥

चक्रपाणिरयं राजा लक्ष्मीपतिरनुत्तमः । साक्षादरातिदाराणां वैधव्यव्रतविग्रहः ॥६६॥

अर्थ: कितने ही उत्तम मनुष्य लक्ष्मणको देखकर कह रहे थे कि यह वह नारायण है कि जो अद्भुत लक्ष्मीसे सहित है, अपने प्रभावसे जिसने संसारको आक्रान्त कर रक्खा है, जो हाथमें चक्ररत्नको धारण करनेवाला है, देदीप्यमान है, लक्ष्मीपति है, सर्वोत्तम है और शत्रु स्त्रियोंका मानो साक्षात् शरीरधारी वैधव्य व्रत ही है ॥६५-६६॥


एवं प्रशस्यमानौ नमस्यमानौ च पौरलोकसमूहैः । स्वभवनमनुप्रविष्टौ स्वयंप्रभं वरविमानमिव देवेन्द्रौ ॥६७॥

अर्थ: इस प्रकार नगरवासी लोगोंके समूह प्रशंसा कर जिन्हें नमस्कार कर रहे थे ऐसे राम और लक्ष्मण अपने भवनमें उस तरह प्रविष्ट हुए जिस तरह कि दो इन्द्र स्वयं विमानमें प्रविष्ट होते हैं ॥६७॥


एतत् पद्मस्य चरितं यो निबोधति संततम् ।
अपापो लभते लक्ष्मीं स भाति च परं रवेः ॥६८॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य रामके इस चरितको निरन्तर जानता है - अच्छी तरह इसका अध्ययन करता है वह निष्पाप हो लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा सूर्यसे भी अधिक शोभायमान होता है ॥६८॥


इत्यार्षे श्रीपद्मचरिते श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते प्रव्रजितसीताभिधानं नाम सप्तोत्तरशतं पर्व ॥१०७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित श्री पद्मपुराणमें सीताकी दीक्षा का वर्णन करनेवाला एक सौ सातवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१०७॥


१०८. अष्टोत्तरशतं पर्व (रविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशपूर्वभवाभिधानं)

पद्मस्य चरितं राजा श्रुत्वा दुरितदारणम् । निर्मुक्तसंशयात्मानं व्यशोचदिति चेतसा ॥१॥

निरस्तः सीतया दूरं स्नेहबन्धः स तादृशः । सहिष्यते महाचर्यां सुकुमारा कथं नु सा ॥२॥

अर्थ: अथानन्तर राजा श्रेणिक रामका पापापहारी चरित सुनकर अपने आपको संशययुक्त मानता हुआ मनमें इस प्रकार विचार करने लगा कि यद्यपि सीताने दूरतक बढ़ा हुआ उस प्रकारका स्नेहबन्धन तोड़ दिया है फिर भी सुकुमार शरीरकी धारक सीता महाचर्याको किस प्रकार कर सकेगी ? ॥१-२॥


पश्य धात्रा मृगाक्षौ तौ मात्रा विरहमाहृतौ । सर्वर्द्धिद्युतिसम्पन्नौ कुमारौ लवणाङ्कुशौ ॥३॥

तातावशेषतां प्राप्तौ कथं मातृवियोगजम् । दुःखं तौ विसहिष्येते निरन्तरसुखैधितौ ॥४॥

अर्थ: देखो, विधाताने मृगके समान नेत्रोंको धारण करनेवाले, सर्व-ऋद्धि और कान्तिसे सम्पन्न दोनों लवणांकुश कुमारोंको माताका विरह प्राप्त करा दिया । अब पिता ही उनके शेष रह गये सो निरन्तर सुखसे वृद्धिको प्राप्त हुए दोनों कुमार माताके वियोग-जन्य-दुखको किस प्रकार सहन करेंगे ? ॥३-४॥


महौजसामुदाराणां विषमं जायते तदा । तत्र शेषेषु काऽवस्था ध्यात्वेत्यूचे गणाधिपम् ॥५॥

सर्वज्ञेन ततो दृष्टं जगत्प्रत्ययमागतम् । इन्द्रभूतिर्जगौ तस्मै चरितं लवणाङ्कुशम् ॥६॥

अर्थ: जब महाप्रतापी बड़े-बड़े पुरुषोंकी भी ऐसी विषम दशा होती है तब अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या है ? ऐसा विचार कर श्रेणिक राजाने गौतम गणधरसे कहा कि सर्वज्ञदेवने जगत्का जो स्वरूप देखा है उसका मुझे प्रत्यय है - श्रद्धान है । तदनन्तर इन्द्रभूति गणधर, श्रेणिकके लिए लवणांकुशका चरित कहने लगे ॥५-६॥


अभूच्च पुरि काकन्द्यामधिपो रतिवर्द्धनः । पत्नी सुदर्शना तस्य पुत्रौ प्रियहितङ्करौ ॥७॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे राजन् ! काकन्दी नगरीमें राजा रतिवर्धन रहता था । उसकी स्त्रीका नाम सुदर्शन था और उन दोनोंके प्रियङ्कर नामक दो पुत्र थे ॥७॥


अमात्यः सर्वगुप्ताख्यो राज्यलक्ष्मीधुरन्धरः । ज्ञेयः प्रभोः प्रतिस्पर्द्धी वधोपायपरायणः ॥८॥

अर्थ: राजाका एक सर्वगुप्त नामका मन्त्री था जो यद्यपि राज्यलक्ष्मीका भार धारण करनेवाला था तथापि वह राजाके साथ भीतर ही भीतर स्पर्धा रखता था और उसके मारनेके उपाय जुटानेमें तत्पर रहता था ॥८॥


अमात्यवनिता रक्ता राजानं विजयावली । शनैरबोधयद्गत्वा पत्या कार्यं समीहितम् ॥९॥

अर्थ: मन्त्रीकी स्त्री विजयावली राजामें अनुरक्त थी इसलिए उसने धीरेसे जाकर राजाको मन्त्रीकी सब चेष्टा बतला दी ॥९॥


बहिरप्रत्ययं राजा श्रितः प्रत्ययमान्तरम् । अभिज्ञानं ततोऽवोचदेतस्मै विजयावली ॥१०॥

अर्थ: राजाने बाह्यमें तो विजयावलीकी बातका विश्वास नहीं किया किन्तु अन्तरङ्गमें उसका विश्वास कर लिया । तदनन्तर विजयावलीने राजाके लिए उसका चिह्न भी बतलाया ॥१०॥


कलहं सदसि श्वोऽसौ समुत्कोपयिता तव । परस्त्रीविरतो राजा बुद्ध्यैव पुनरग्रहीत् ॥११॥

अर्थ: उसने कहा कि मन्त्री कल सभामें आपकी कलहको बढ़ावेगा अर्थात् आपके प्रति बक-झक करेगा । परस्त्री विरत राजाने इस बातको बुद्धिसे ही पुनः ग्रहण किया अर्थात् अन्तरङ्गमें तो इसका विश्वास किया बाह्यमें नहीं ॥११॥


अब्रवीच्च कथं मेऽसौ परं भक्तोऽपभाषते । विजयावलि सम्भाव्यं कदाचिदपि नेदृशम् ॥१२॥

अर्थ: बाह्यमें राजाने कहा कि हे विजयावलि ! वह तो मेरा परम भक्त है वह ऐसा विरुद्ध भाषण कैसे कर सकता है ? तुमने जो कहा है वह तो किसी तरह सम्भव नहीं है ॥१२॥


ततोऽन्यत्र दिने चिह्नं भावं ज्ञात्वा महीपतिः । क्षमानिवारणेनैव प्रैरयद्दुरितागमम् ॥१३॥

अर्थ: तदनन्तर दूसरे दिन राजाने उक्त चिह्न जानकर अर्थात् कलहका अवसर जान क्षमारूप शस्त्रके द्वारा उस अनिष्टको टाल दिया ॥१३॥


राजा क्रोशति मामेष इत्युक्त्वा प्रतिपत्तितः । सामन्तानभिनत्सर्वानमात्यः पापमानसः ॥१४॥

अर्थ: ‘यह राजा मेरे प्रति क्रोध रखता है - अपशब्द कहता है’ ऐसा कहकर पापी मन्त्रीने सब सामन्तोंको भीतर ही भीतर फोड़ लिया ॥१४॥


राजवासगृहं रात्रौ ततोऽमात्यो महेन्धनैः । अदीपयन्महोशस्तु प्रमादरहितः सदा ॥१५॥

अर्थ: तदनन्तर किसी दिन उसने रात्रिके समय राजाके निवासगृहको बहुत भारी ईंधनसे प्रज्वलित कर दिया परन्तु राजा सदा सावधान रहता था ॥१५॥


प्राकारपुटगुह्येन प्रदेशेन सुरङ्गया । भार्यां पुत्रौ पुरस्कृत्य निःससार शनैः सुधीः ॥१६॥

अर्थ: इसलिए वह बुद्धिमान्, स्त्री और दोनों पुत्रोंको लेकर प्राकार-पुटसे सुगुप्त प्रदेशमें होता हुआ सुरङ्गसे धीरे-धीरेसे बाहर निकल गया ॥१६॥


यातश्च कशिपुं तेन काशीपुर्यां महीपतिम् । न्यायशीलं स्वसामन्तमुग्रवंशधुरन्धरम् ॥१७॥

अर्थ: उस मार्गसे निकलकर वह काशीपुरीके राजा कशिपुके पास गया। राजा कशिपु न्यायशील, उग्रवंशका प्रधान एवं उसका सामन्त था ॥१७॥


राज्यस्थः सर्वगुप्तोऽथ दूतं सम्प्राहिणोद्यथा । कशिपो मां नमस्येति ततोऽसौ प्रत्यभाषत ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर जब सर्वगुप्त मन्त्री राज्यगद्दी पर बैठा तब उसने दूत द्वारा सन्देश भेजा कि हे कशिपो ! मुझे नमस्कार करो। इसके उत्तरमें कशिपुने कहा ॥१८॥


स्वामिघातकृतो हन्ता दुःखदुर्गतिभाक् खलः । एवंविधो न नाम्नाऽपि कीर्त्यते सेव्यते कथम् ॥१९॥

अर्थ: वह स्वामीका घात करनेवाला दुष्ट दुःखपूर्ण दुर्गतिको प्राप्त होगा । ऐसे दुष्टका तो नाम भी नहीं लिया जाता फिर सेवा कैसे की जावे ॥१९॥


सयोषित्तनयो दग्धो येनेशो रतिवर्द्धनः । स्वामिस्त्रीबालघातं तं न स्मर्त्तुमपि वर्त्तते ॥२०॥

अर्थ: जिसने स्त्री और पुत्रों सहित अपने स्वामी रतिवर्धनको जला दिया उस स्वामी, स्त्री और बालघातीका तो स्मरण करना भी योग्य नहीं है ॥२०॥


पापस्यास्य शिरश्छित्वा सर्वलोकस्य पश्यतः । नन्वद्यैव करिष्यामि रतिवर्द्धननिष्क्रयम् ॥२१॥

अर्थ: इस पापीका सब लोगोंके देखते-देखते शिर काटकर आज ही रतिवर्धनका बदला चुकाऊँगा, यह निश्चय समझो ॥२१॥


एवं तं दूतमत्यस्य दूरं वाक्यमपास्य सः । अमूढो दुर्मतं यद्वत्स्थितः कर्त्तव्यवस्तुनि ॥२२॥

अर्थ: इस तरह, जिस प्रकार विवेकी मनुष्य मिथ्यामतको दूर हटा देता है उसी प्रकार उस दूतको दूर हटाकर तथा उसकी बात काटकर वह करने योग्य कार्यमें तत्पर हो गया ॥२२॥


स्वामिभक्तिपरस्यास्य कशिपोर्बलशालिनः । अभूद्दृष्टि प्रगन्तव्यममात्यं प्रति सर्वदा ॥२३॥

अर्थ: तदनन्तर स्वामि-भक्तिमें तत्पर इस बलशाली कशिपु की दृष्टि, सदा चढ़ाई करनेके योग्य मन्त्रीके प्रति लगी रहती थी ॥२३॥


सर्वगुप्तो महासैन्यसमेतः सह पार्थिवैः । दूतप्रचोदितः प्राप चक्रवर्त्तीव मानवान् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर दूतसे प्रेरित, चक्रवर्तीके समान मानी, सर्वगुप्त मन्त्री बड़ी भारी सेना लेकर अनेक राजाओंके साथ आ पहुँचा ॥२४॥


काशिदेशं तु विस्तीर्णं प्रविष्टः सागरोपमः । सन्धानं कशिपुर्नैच्छद्योद्धव्यमिति निश्चितः ॥२५॥

अर्थ: यद्यपि समुद्रके समान विशाल सर्वगुप्त, लम्बे चौड़े काशी देशमें प्रविष्ट हो चुका था तथापि कशिपुने सन्धि करनेकी इच्छा नहीं की किन्तु युद्ध करना चाहिए इसी निश्चयपर वह दृढ़ रहा आया ॥२५॥


रतिवर्द्धनराजेन प्रेषितः कशिपुं प्रति । दण्डपाणिर्युवा प्राप्तः प्रविष्टश्च निशागमे ॥२६॥

जगौ च वर्द्धसे दिष्ट्या देवेनो रतिवर्द्धनः । क्कासौ कासाविति स्फीतः तुष्टः कशिपुरभ्यधात् ॥२७॥

अर्थ: उसी दिन रात्रिका प्रारम्भ होते ही रतिवर्धन राजाके द्वारा कशिपुके प्रति भेजा हुआ एक युवा दण्ड हाथमें लिये वहाँ आया और बोला कि हे देव ! आप भाग्यसे बढ़ रहे हैं क्योंकि राजा रतिवर्द्धन यहाँ विद्यमान हैं। इसके उत्तरमें हर्षसे फूले हुए कशिपुने सन्तुष्ट होकर कहा कि वे कहाँ हैं ? वे कहाँ हैं ? २६-२७॥


उद्याने स्थित इत्युक्ते सुतरां प्रमदान्वितः । निर्ययावर्घपाद्येन सोऽन्तःपुरपुरःसरः ॥२८॥

अर्थ: ‘उद्यानमें स्थित हैं’ इस प्रकार कहनेपर अत्यन्त हर्षसे युक्त कशिपु अन्तःपुरके साथ अर्घ तथा पादोदक साथ ले निकला ॥२८॥


जयत्यजेयराजेन्द्रो रतिवर्द्धन इत्यभूत् । उत्सवो दर्शने तस्य कशिपोर्दानमानतः ॥२९॥

अर्थ: ‘जो किसीके द्वारा जीता न जाय ऐसा राजाधिराज रतिवर्धन जयवन्त हैं’ यह सोचकर उसके दर्शन होनेपर कशिपुने दान-सन्मान आदिसे बड़ा उत्सव किया ॥२९॥


संयुगे सर्वगुप्तस्य जीवतो ग्रहणं ततः । रतिवर्द्धनराजस्य काकन्द्यां राज्यसङ्गमः ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर युद्धमें सर्वगुप्त जीवित पकड़ा गया और राजा रतिवर्धनको राज्यकी प्राप्ति हुई ॥३०॥


विज्ञाय ते हि जीवन्तं स्वामिनं रतिवर्द्धनम् । सामन्ताः सङ्गता मुक्त्वा सर्वगुप्तं रणान्तरे ॥३१॥

अर्थ: जो सामन्त पहले सर्वगुप्तसे आ मिले थे वे स्वामी रतिवर्धनको जीवित जानकर रणके बीचमें ही सर्वगुप्तको छोड़ उसके पास आ गये थे ॥३१॥


पुनर्जन्मोत्सवश्चक्रे रतिवर्द्धनभूभृतः । महद्भिर्दानसन्मानैर्देवतानां च पूजनैः ॥३२॥

अर्थ: बड़े-बड़े दान सन्मान देवताओंका पूजन आदिसे रतिवर्धन राजाका फिरसे जन्मोत्सव किया गया ॥३२॥


नीतः प्रत्यन्तवासित्वं मृततुल्यममात्यकः । दर्शनेनोज्झितः पापः सर्वलोकविगर्हितः ॥३३॥

अर्थ: और सर्वगुप्त मन्त्री चाण्डालके समान नगरके बाहर बसाया गया, वह मृतकके समान निस्तेज हो गया, उस पापीकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता था तथा सर्वलोकमें वह निन्दित हुआ ॥३३॥


कशिपुः काशिराजोऽसौ वाराणस्यां महाद्युतिः । रेमे परमया लक्ष्म्या लोकपाल इवापरः ॥३४॥

अर्थ: महाकान्तिको धारण करनेवाला काशीका राजा कशिपु वाराणसीमें उत्कृष्ट लक्ष्मीसे ऐसी क्रीड़ा करता था मानो दूसरा लोकपाल ही हो ॥३४॥


अथ भोगविनिर्विण्णः कदाचिद्रतिवर्द्धनः । श्रमणत्वं भदन्तस्य सुभानोरन्तिकेऽग्रहीत् ॥३५॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय राजा रतिवर्धनने भोगोंसे विरक्त हो सुभानु नामक मुनिराजके समीप जिनदीक्षा धारण कर ली ॥३५॥


आसीत्तया कृतो भेदः सर्वगुप्तेन निश्चितः । ततो विद्वेष्यतां प्राप्ता परमं तस्य भामिनी ॥३६॥

अर्थ: सर्वगुप्तने निश्चय कर लिया कि यह सब भेद उसकी स्त्री विजयावलीका किया हुआ है इससे वह परम विद्वेष्यताको प्राप्त हुई अर्थात् मन्त्रीने अपनी स्त्रीसे अधिक द्वेष किया ॥३६॥


नाहं जाता नरेन्द्रस्य न पत्युरिति शोकिनी । अकामतपसा जाता राक्षसी विजयावली ॥३७॥

अर्थ: विजयावलीने देखा कि मैं न तो राजाकी हो सकी और न पतिकी हो रही इसीलिए शोकयुक्त हो अकाम तप कर वह राक्षसी हुई ॥३७॥


उपसर्गे तयोदारे क्रियमाणेतिवैरतः । सुध्याने कैवलं राज्यं सम्प्राप्तो रतिवर्द्धनः ॥३८॥

अर्थ: तीव्र वैरके कारण उसने रतिवर्धन मुनिके ऊपर घोर उपसर्ग किया परन्तु वे उत्तम ध्यानमें लीन हो केवलज्ञान रूपी राज्यको प्राप्त हुए ॥३८॥


श्रामण्यं विमलं कृत्वा प्रियङ्करहितङ्करौ । ग्रैवेयकस्थितिं प्राप्तौ चतुर्थभवतः परम् ॥३९॥

शामल्यां दामदेवस्य तत्रैव पुरि नन्दनौ । वसुदेवसुदेवाख्यौ गुण्यावस्थामितौ द्विजौ ॥४०॥

अर्थ: राजा रतिवर्धनके पुत्र प्रियङ्कर और हितङ्कर निर्मल मुनिपद धारण कर ग्रैवेयकमें उत्पन्न हुए। इस भवसे पूर्व चतुर्थ भवमें वे शामली नामक नगरमें दामदेव नामक ब्राह्मणके वसुदेव और सुदेव नामके गुणी पुत्र थे ॥३९-४०॥


विश्वाप्रियङ्गुनामानौ ज्ञेये सुवनिते तयोः । आसीद्गृहस्थभावश्च शंसनीयो मनीषिणाम् ॥४१॥

अर्थ: विश्वा और प्रियङ्गु नामकी उनकी स्त्रियाँ थीं जिनके कारण उनका गृहस्थ पद विद्वज्जनोंके द्वारा प्रशंसनीय था ॥४१॥


साधौ श्रीतिलकाभिख्ये दानं दत्त्वा सुभावनौ । त्रिपल्यभोगितां प्राप्तौ सस्त्रीकावुत्तरे कुरौ ॥४२॥

अर्थ: श्रीतिलक नामक मुनिराजके लिए उत्तम भावोंसे दान देकर वे स्त्री सहित उत्तरकुरु नामक उत्तम भोगभूमिमें तीन पल्यकी आयुको प्राप्त हुए ॥४२॥


साधुसद्दानवृक्षोत्थमहाफलसमुद्भवम् । भुक्त्वा भोगं परं तत्र प्राप्तावीशानवासिताम् ॥४३॥

अर्थ: वहाँ साधु-दान रूपी वृक्षसे उत्पन्न महाफलसे प्राप्त हुए उत्तम भोग भोग कर वे ऐशान स्वर्गमें निवासको प्राप्त हुए ॥४३॥


भुक्तभोगौ ततश्च्युत्वा बोधिलक्ष्मीसमन्वितौ । क्षीणदुर्गतिकर्माणौ जातौ प्रियहितङ्करौ ॥४४॥

अर्थ: तदनन्तर जो आत्मज्ञान रूपी लक्ष्मी से सहित थे, तथा जिनके दुर्गतिदायक कर्म क्षीण हो गये थे ऐसे दोनों देव, वहाँसे भोग भोग कर च्युत हुए तथा पूर्वोक्त राजा रतिवर्धनके प्रियङ्कर और हितङ्कर नामक पुत्र हुए ॥४४॥


चतुष्कर्ममयारण्यं शुक्लध्यानेन वह्निना । निर्दह्य निर्वृतिं प्राप्तो मुनीन्द्रो रतिवर्द्धनः ॥४५॥

अर्थ: रतिवर्धन मुनिराज शुक्ल ध्यान रूपी अग्निके द्वारा अघातिया कर्म रूपी वनको जला कर निर्वाणको प्राप्त हुए ॥४५॥


कथितौ यौ समासेन वीरौ प्रियहितङ्करौ । ग्रैवेयकाच्च्युतावेतौ भव्यौ तौ लवणाङ्कुशौ ॥४६॥

अर्थ: संक्षेपसे जिन प्रियङ्कर और हितङ्कर वीरोंका वर्णन किया गया है वे ग्रैवेयकसे ही च्युत हो भव्य लवण और अंकुश हुए ॥४६॥


राजन् सुदर्शना देवी तनयात्यन्तवत्सला । भर्तृपुत्रवियोगार्त्ता स्त्रीस्वभावानुभावतः ॥४७॥

निदानशृङ्खलाबद्धा भ्राम्यन्ती दुःखसङ्कटम् । कृच्छ्रं स्त्रीत्वं विनिर्जित्य भुक्त्वा विविधयोनिषु ॥४८॥

अयं क्रमेण सम्पन्नो मनुष्यः पुण्यचोदितः । सिद्धार्थो धर्मसक्तात्मा विद्याविधिविशारदः ॥४९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन ! काकन्दीके राजा रतिवर्धनकी जो पुत्रोंसे अत्यन्त स्नेह करनेवाली सुदर्शना नामकी रानी थी वह पति और पुत्रोंके वियोगसे पीड़ित हो स्त्रीस्वभावके कारण निदानबन्ध रूपी साँकलसे बद्ध होती हुई दुःख रूपी सङ्कटमें घूमती रही और नाना योनियोंमें स्त्री पर्यायका उपभोग कर तथा बड़ी कठिनाईसे उसे जीत कर क्रमसे मनुष्य हुई । उसमें भी पुण्यसे प्रेरित धार्मिक तथा विद्याओंकी विधिमें निपुण सिद्धार्थ नामक क्षुल्लक हुई ॥४७-४९॥


तत्पूर्वस्नेहसंसक्तौ बालकौ लवणाङ्कुशौ । अनेन संस्कृतौ जातौ त्रिदशैरपि दुर्जयौ ॥५०॥

अर्थ: उनमें पूर्व स्नेह होनेके कारण इस क्षुल्लकने लवण और अंकुश कुमारोंका विद्याओंसे इस प्रकार संस्कृत–सुशोभित किया जिससे कि वे देवोंके द्वारा भी दुर्जय हो गये ॥५०॥


एवं विदित्वा सुलभौ नितान्तं जीवस्य लोके पितरौ सदैव । कर्त्तव्यमेतद्दुविषां प्रयत्नाद्विमुच्यते येन शरीरदुःखात् ॥५१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार ‘संसारमें प्राणीको माता-पिता सदा सुलभ हैं’ ऐसा जान कर विद्वानोंको प्रयत्नपूर्वक ऐसा काम करना चाहिए कि जिससे वे शरीर सम्बन्धी दुःखसे छूट जावें ॥५१॥


विमुच्य सर्वं भववृद्धिहेतुं कर्मोरुदुःखप्रभवं जुगुप्सम् । कृत्वा तपो जैनमतोपदिष्टं रविं तिरस्कृत्य शिवं प्रयात ॥५२॥

अर्थ: संसार वृद्धिके कारण, विशाल दुःखोंके जनक एवं निन्दित समस्त कर्मको छोड़ कर हे भव्यजनो ! जैनमतमें कहा हुआ तप कर तथा सूर्यको तिरस्कृत कर मोक्षकी ओर प्रयाण करो ॥५२॥


इत्यार्षे श्रीपद्मपुराणे रविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशपूर्वभवाभिधानं नामाष्टोत्तरशतं पर्व ॥१०८॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित, पद्मपुराणमें लवणाङ्कुशके पूर्वभवोंका वर्णन करनेवाला एक सौ आठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१०८॥

१०९. नवोत्तरशतं पर्व (मधूपाख्यानं)

पतिपुत्रान् परित्यज्य विष्टपख्यातचेष्टिता । निष्क्रान्ता कुरुते सीता यत्तद्वच्यामि ते शृणु ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिसकी चेष्टाएँ समस्त संसारमें प्रसिद्धि पा चुकी थीं ऐसी सीता पति तथा पुत्रका परित्याग कर तथा दीक्षित हो जो कुछ करती थी वह तेरे लिए कहता हूँ सो सुन ॥१॥


तस्मिन् विहरते काले श्रीमान् सकलभूषणः । दिव्यज्ञानेन यो लोकमलोकं चावबुध्यते ॥२॥

अर्थ: उस समय यहाँ उन श्रीमान् सकलभूषण केवलीका विहार हो रहा था जो कि दिव्यज्ञानके द्वारा लोक अलोकको जानते थे ॥२॥


अयोध्या सकला येन गृहाश्रमविधौ कृता । सुधृत्या सुस्थितिं प्राप्ता सद्धर्मप्रतिलम्भिता ॥३॥

अर्थ: जिन्होंने समस्त अयोध्याको गृहाश्रमका पालन करनेमें निपुण, संतोषसे उत्तम अवस्थाको प्राप्त एवं समीचीन धर्मसे सुशोभित किया था ॥३॥


प्रजा च सकला तस्य वाक्ये भगवतः स्थिता । रेजे साम्राज्ययुक्तेन राज्ञेव कृतपालना ॥४॥

अर्थ: उन भगवान्के वचनमें स्थित समस्त प्रजा ऐसी सुशोभित होती थी मानो साम्राज्यसे युक्त राजा ही उसका पालन कर रहा हो ॥४॥


सद्धर्मोत्सवसन्तानस्तत्र काले महोदयः । सुप्रबोधतमो लोकः साधुपूजनतत्परः ॥५॥

अर्थ: उस समयके मनुष्य समीचीन धर्मके उत्सव करनेवाले, महाभ्युदयसे सम्पन्न, सम्यग् ज्ञानसे युक्त एवं साधुओंकी पूजा करनेमें तत्पर रहते थे ॥५॥


मुनिसुव्रतनाथस्य तत्तीर्थं भवनाशनम् । विराजतेतरां यद्वदरमल्लिजिनान्तरम् ॥६॥

अर्थ: मुनिसुव्रत भगवान्का वह संसारापहारी तीर्थ उस तरह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था जिस तरह कि अरनाथ और मल्लिनाथ जिनेन्द्रका अन्तर काल सुशोभित होता था ॥६॥


अपि या त्रिदशस्त्रीणामतिशेते मनोज्ञताम् । तपसा शोषिता साऽभूत्सीता दग्धेव माधवी ॥७॥

अर्थ: तदनन्तर जो सीता देवाङ्गनाओंकी भी सुन्दरताको जीतती थी वह तपसे सूखकर ऐसी हो गई जैसी जली हुई माधवी लता हो ॥७॥


महासंवेगसम्पन्ना दुर्भावपरिवर्जिता । अत्यन्तनिन्दितं स्त्रीत्वं चिन्तयन्ती सती सदा ॥८॥

अर्थ: वह सदा महासंवेगसे सहित तथा खोटे भावोंसे दूर रहती थी तथा स्त्री पर्यायको सदा अत्यन्त निन्दनीय समझती रहती थी ॥८॥


संसक्तभूरजोवस्त्रबद्धोरस्कशिरोरुहा । अस्नानस्वेदसञ्जातमलकञ्चुकधारिणी ॥९॥

अष्टमार्द्धर्त्तु कालादिकृतशास्त्रोक्तपारणा । शीलव्रतगुणासक्ता रत्यरत्यपवर्जिता ॥१०॥

अध्यात्मनियतात्यन्तं शान्ता स्वान्तवशात्मिका । तपोऽधिकुरुतेऽत्युग्रं जनान्तरसुदुःसहम् ॥११॥

मांसवर्जितसर्वाङ्गा व्यक्तास्थिस्नायुपञ्जरा । पार्थिवद्रव्यनिर्मुक्ता पौस्तीव प्रतियातना ॥१२॥

अन्तर्लीनकगण्डान्ता सम्बद्धा केवलं त्वचा । उत्कटभ्रूतटा शुष्का नदीव नितरामभात् ॥१३॥

युगमानमहीपृष्ठन्यस्तसौम्यनिरीक्षणा । तपःकारणदेहार्थं भिक्षां चक्रे यथाविधि ॥१४॥

अन्यथात्वमिवानीता तपसा साधुचेष्टिता । नाऽऽत्मीयपरकीयेन जनेनाऽज्ञायि गोचरे ॥१५॥

अर्थ: पृथिवीकी धूलिसे मलिन वस्त्रसे जिसका वक्षःस्थल तथा शिरके बाल सदा आच्छादित रहते थे, जो स्नानके अभावमें पसीनासे उत्पन्न मैल रूपी कञ्चुकको धारण कर रही थी, जो चार दिन, एक पक्ष तथा ऋतुकाल आदिके बाद शास्त्रोक्त विधिसे पारणा करती थी, शीलव्रत और मूलगुणोंके पालन करनेमें तत्पर रहती थी, राग-द्वेषसे रहित थी, अध्यात्मके चिन्तनमें तत्पर रहती थी, अत्यन्त शान्त थी, जिसने अपने आपको अपने मनके अधीन कर रक्खा था, जो अन्य मनुष्योंके लिए दुःसह, अत्यन्त कठिन तप करती थी, जिसका समस्त शरीर मांससे रहित था, जिसकी हड्डी और आँतोका पञ्जर प्रकट दिख रहा था, जो पार्थिव तत्त्वसे रहित लकड़ी आदिसे बनी प्रतिमा के समान जान पड़ती थी, जिसके कपोल भीतर घुस गये थे, जो केवल त्वचासे आच्छादित थी, जिसका भ्रूकुटितल ऊँचा उठा हुआ था तथा उससे जो सूखी नदीके समान जान पड़ती थी। युग प्रमाण पृथिवी पर जो अपनी सौम्यदृष्टि रखकर चलती थी, जो तपके कारण शरीरकी रक्षाके लिए विधिपूर्वक भिक्षा ग्रहण करती थी, जो उत्तम चेष्टासे युक्त थी, तथा तपके द्वारा उस प्रकार अन्यथाभावको प्राप्त हो गई थी कि विहारके समय उसे अपने पराये लोग भी नहीं पहिचान पाते थे ॥९-१५॥


दृष्ट्वा तामेव कुर्वन्ति तस्या एव सदा कथाम् । न च प्रत्यभिजानन्ति तदा तामार्यिकां जनाः ॥१६॥

अर्थ: ऐसी उस सीताको देखकर लोग सदा उसीकी कथा करते रहते थे। जो लोग उसे एक बार देखकर पुनः देखते थे वे उसे ‘यह वही है’ इस प्रकार नहीं पहिचान पाते थे ॥१६॥


एवं द्वाषष्टिवर्षाणि तपः कृत्वा समुन्नतम् । त्रयस्त्रिंशद्दिनं कृत्वा परमाराधनाविधिम् ॥१७॥

उच्छिष्टं संस्तरं यद्वत्परित्यज्य शरीरकम् । आरणाच्युतमारुह्य प्रतीन्द्रत्वमुपागमत् ॥१८॥

अर्थ: इस प्रकार बासठ वर्ष तक उत्कृष्ट तप कर तथा तैंतीस दिनकी उत्तम सल्लेखना धारणकर उपभुक्त विस्तरके समान शरीरको छोड़कर वह आरण-अच्युत युगलमें आरूढ़ हो प्रतीन्द्र पदको प्राप्त हुई ॥१७-१८॥


माहात्म्यं पश्यतेदृक्षं धर्मस्य जिनशासने । जन्तुः स्त्रीत्वं यदुज्झित्वा पुमान् जातः सुरप्रभुः ॥१९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो ! जिन-शासनमें धर्मका ऐसा माहात्म्य देखो कि यह जीव स्त्री पर्यायको छोड़ देवोंका स्वामी पुरुष हो गया ॥१९॥


तत्र कल्पे मणिच्छायासमुद्योतितपुष्करे । काञ्चनादिमहाद्रव्यविचित्रपरमाद्भुते ॥२०॥

सुमेरुशिखराकारे विमाने परिवारिणि । परमैश्वर्यसम्पन्ना सम्प्राप्ता त्रिदशेन्द्रताम् ॥२१॥

अर्थ: जहाँ मणियोंकी कान्तिसे आकाश देदीप्यमान हो रहा था तथा जो सुवर्णादि महाद्रव्योंके कारण विचित्र एवं परम आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला था ऐसे उस अच्युत स्वर्गमें वह अपने परिवारसे युक्त सुमेरुके शिखरके समान विमानमें परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न प्रतीन्द्र पदको प्राप्त हुई ॥२०-२१॥


देवीशतसहस्राणां नयनानां समाश्रयः । तारागणपरीवारः शशाङ्क इव राजते ॥२२॥

अर्थ: वहाँ लाखों देवियोंके नेत्रोंका आधारभूत वह प्रतीन्द्र, तारागणोंके परिवारसे युक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहा था ॥२२॥


इत्यन्यानि च साधूनि चरितानि नरेश्वरः । पापघातीनि शुश्राव पुराणानि गणेश्वरात् ॥२३॥

अर्थ: इस प्रकार राजा श्रेणिकने श्रीगौतम गणधरके मुखारविन्दसे अन्य उत्तमोत्तम चरित्र तथा पापोंको नष्ट करनेवाले अनेक पुराण सुने ॥२३॥


राजोचे कस्तदा नाथो देवानामारणाच्युते । बभौ यस्य प्रतिस्पर्द्धी सीतेन्द्रोऽपि तपोबलात् ॥२४॥

अर्थ: तदनन्तर राजा श्रेणिकने कहा कि उस समय आरणाच्युत कल्पमें देवोंका ऐसा कौन अधिपति अर्थात् इन्द्र सुशोभित था कि सीतेन्द्र भी तपोबलसे जिसका प्रतिस्पर्धी था ॥२४॥


मधुरित्याह भगवान् भ्राता यस्य स कैटभः । येन भुक्तं महैश्वर्यं द्वाविंशत्यब्धिसम्मितम् ॥२५॥

अर्थ: इसके उत्तरमें गणधर भगवान्ने कहा कि उस समय वह मधुका जीव आरणाच्युत स्वर्गका इन्द्र था, जिसका भाई कैटभ था तथा जिसने बाईस सागर तक इन्द्रके महान् ऐश्वर्यका उपभोग किया था ॥२५॥


चतुःषष्टिसहस्रेषु किञ्चिदग्रेष्वनुक्रमात् । वर्षाणां समतीतेषु सुकृतस्यावशेषतः ॥२६॥

इह प्रद्युम्नशाम्बौ तौ यावेतौ मधुकैटभौ । द्वारिकायां समुत्पन्नौ पुत्रौ कृष्णस्य भारते ॥२७॥

अर्थ: अनुक्रमसे कुछ अधिक चौंसठ हजार वर्ष बीत जानेपर अवशिष्ट पुण्यके प्रभावसे वे मधु और कैटभके जीव भरतक्षेत्रकी द्वारिका नगरीमें महाराज श्रीकृष्णके प्रद्युम्न तथा शाम्ब नामके पुत्र हुए ॥२६-२७॥


षष्टिवर्षसहस्राणि चत्वारि च ततः परम् । रामायणस्य विज्ञेयमन्तरं भारतस्य च ॥२८॥

अर्थ: इस तरह रामायण और महाभारतका अन्तर कुछ अधिक चौंसठ हजार वर्ष जानना चाहिए ॥२८॥


अरिष्टनेमिनाथस्य तीर्थे नाकादिह च्युतः । मधुर्बभूव रुक्मिण्यां वासुदेवस्य नन्दनः ॥२९॥

अर्थ: अरिष्टनेमि तीर्थंकरके तीर्थमें मधुका जीव स्वर्गसे च्युत होकर इसी भरत क्षेत्रमें श्रीकृष्णकी रुक्मिणी नामक स्त्रीसे प्रद्युम्न नामका पुत्र हुआ ॥२९॥


मगधाधिपतिः प्राह नाथ वागमृतस्य ते । न तृप्तिमुपगच्छामि धनस्येव धनेश्वरः ॥३०॥

अर्थ: यह सुनकर राजा श्रेणिक ने गौतम स्वामीसे कहा कि हे नाथ ! जिस प्रकार धनवान् मनुष्य धनके विषयमें तृप्तिको प्राप्त नहीं होता है उसी प्रकार मैं भी आपके वचन रूपी अमृतके विषयमें तृप्तिको प्राप्त नहीं हो रहा हूँ ॥३०॥


तावन्मधोः सुरेन्द्रस्य चरितं विनिगद्यताम् । भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रसादः क्रियतां मम ॥३१॥

अर्थ: हे भगवन् ! आप मुझे अच्युतेन्द्र मधुका पूरा चरित्र कहिए मैं सुननेकी इच्छा करता हूँ, मुझपर प्रसन्नता कीजिए ॥३१॥


कैटभस्य च तद्भ्रातुरवधानपरायण । गणेन्द्र चरितं ब्रूहि सर्वं हि विदितं तव ॥३२॥

अर्थ: इसी प्रकार हे ध्यानमें तत्पर गणराज ! मधुके भाई कैटभका भी पूर्ण चरित कहिए क्योंकि आपको वह अच्छी तरह विदित है ॥३२॥


आसीदन्यभवे तेन किं कृतं प्रकृतं भवेत् । कथं वा त्रिजगच्छ्रेष्ठा लब्धा बोधिः सुदुर्लभा ॥३३॥

अर्थ: उसने पूर्वभवमें कौन सा उत्तम कार्य किया था तथा तीनों जगत्में श्रेष्ठ अतिशय दुर्लभ रत्नत्रयकी प्राप्ति उसे किस प्रकार हुई थी ? ॥३३॥


क्रमवृत्तिरियं वाणी तावकी धीश्च मामिका । उत्सुकं च परं चित्तमहो युक्तमनुक्रमात् ॥३४॥

अर्थ: हे भगवन् ! आपकी यह वाणी क्रम-क्रमसे प्रकट होती है, और मेरी बुद्धि भी क्रम-क्रमसे पदार्थको ग्रहण करती है तथा मेरा चित्त भी अनुक्रमसे अत्यन्त उत्सुक हो रहा है इस तरह सब प्रकरण उचित ही जान पड़ता है ॥३४॥


गण्याह मगधाभिख्ये देशेऽस्मिन्सर्वसस्यके । चातुर्वर्ण्यप्रमुदिते धर्मकामार्थसंयुते ॥३५॥

चारुचैत्यालयाकीर्णे पुरग्रामाकराऽऽचिते । नद्युद्यानमहारम्ये साधुसङ्घसमाकुले ॥३६॥

राजा नित्योदितो नाम तत्र कालेऽभवन्महान् । शालिग्रामोऽस्ति तत्रैव देशे ग्रामः पुरोपमः ॥३७॥

अर्थ: तदनन्तर गौतम गणधर कहने लगे कि जो सर्व प्रकारके धान्यसे सम्पन्न है, जहाँ चारों वर्णके लोग अत्यन्त प्रसन्न हैं, जो धर्म, अर्थ और कामसे सहित है, सुन्दर-सुन्दर चैत्यालयोंसे युक्त है, पुर ग्राम तथा खानों आदिसे व्याप्त है, नदियों और बाग-बगीचोंसे अत्यन्त सुन्दर है, मुनियोंके संघसे युक्त है ऐसे इस मगध नामक देशमें उस समय नित्योदित नामका बड़ा राजा था । उसी देशमें नगरकी समता करनेवाला एक शालिग्राम नामका गाँव था ॥३५-३७॥


ब्राह्मणः सोमदेवोऽत्र भार्या तस्याग्निलेत्यभूत् । विज्ञेयौ तनयौ तस्या वह्निमारुतभूतिकौ ॥३८॥

अर्थ: उस ग्राममें एक सोमदेव नामका ब्राह्मण था। अग्निला उसकी स्त्री थी और उन दोनोंके अग्निभूति तथा वायुभूति नामके दो पुत्र थे ॥३८॥


षट्कर्मविधिसम्पन्नौ वेदशास्त्रविशारदौ । अस्मत्तः कोऽपरोऽस्तीति नित्यं पण्डितमानिनौ ॥३९॥

अर्थ: वे दोनों ही पुत्र सन्ध्या-वन्दनादि षट् कर्मोंकी विधिमें निपुण, वेद-शास्त्रके पारङ्गत, और ‘हमसे बढ़ कर दूसरा कौन है’ इस प्रकार पाण्डित्यके अभिमानमें चूर थे ॥३९॥


अभिमानमहादाहसञ्जातोद्धतविभ्रमौ । भोग एव सदा सेव्य इति धर्मपराङ्मुखौ ॥४०॥

अर्थ: अभिमान रूपी महादाहके कारण जिन्हें अत्यधिक उन्माद उत्पन्न हुआ था ऐसे वे दोनों भाई ‘सदा भोग ही सेवन करने योग्य हैं’ यह सोच कर धर्मसे विमुख रहते थे ॥४०॥


कस्यचित्त्वथ कालस्य विहरन् पृथिवीमिमाम् । बहुभिः साधुभिर्गुप्तः सम्प्राप्तो नन्दिवर्द्धनः ॥४१॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय अनेक साधुओंके साथ इस पृथ्वी पर विहार करते हुए नन्दि-वर्धन नामक मुनिराज उस शालिग्राममें आये ॥४१॥


मुनिः स चावधिज्ञानात्समस्तं जगदीक्षते । अध्युवास बहिर्ग्राममुद्यानं साधुसम्मतम् ॥४२॥

अर्थ: वे मुनि अवधि-ज्ञानसे समस्त जगत्को देखते थे तथा आकर गाँवके बाहर मुनियोंके योग्य उद्यानमें ठहर गये ॥४२॥


ततश्चागमनं श्रुत्वा श्रमणानां महात्मनाम् । शालिग्रामजनो भूत्या सर्व एव विनिर्ययौ ॥४३॥

अर्थ: तदनन्तर उत्कृष्ट आत्माके धारक मुनियोंका आगमन सुन शालिग्रामके सब लोग वैभवके साथ बाहर निकले ॥४३॥


अपृच्छतां ततो वह्निवायुभूती विलोक्य तम् । क्वायं जनपदो याति सुसङ्कीर्णः परस्परम् ॥४४॥

अर्थ: तत्पश्चात् अग्निभूति और वायुभूतिने उन नगरवासी लोगोंको जाते देख किसीसे पूछा कि ये गाँवके लोग परस्पर एक दूसरेसे मिल कर समुदाय रूपमें कहाँ जा रहे हैं ? ॥४४॥


ताभ्यां कथितमन्येन मुनिः प्राप्तो निरम्बरः । तस्यैव वन्दनां कर्तु मखिलः प्रस्थितो जनः ॥४५॥

अर्थ: तब उसने उन दोनों से कहा कि एक निर्वस्त्र दिगम्बर मुनि आये हुए हैं उन्हींकी वन्दना करनेके लिए वे सब लोग जा रहे हैं ॥४५॥


अग्निभूतिस्ततः क्रुद्धः सह भ्रात्रा विनिर्गतः । विवादे श्रमणान्सर्वान् जयामीति वचोऽवदत् ॥४६॥

अर्थ: तदनन्तर क्रोधसे भरा अग्निभूति, भाईके साथ निकल कर बाहर आया और कहने लगा कि मैं समस्त मुनियोंको वादमें अभी जीतता हूँ ॥४६॥


उपगम्य च साधूनां मुनीन्द्रं मध्यवर्तिनम् । अपश्यद्ग्रहताराणां मध्ये चन्द्रमिवोदितम् ॥४७॥

अर्थ: तत्पश्चात् पास जाकर उसने ताराओं के बीचमें उदित चन्द्रमा के समान मुनियोंके बीचमें बैठे हुए उनके स्वामी नन्दिवर्द्धन मुनिको देखा ॥४७॥


प्रधानसंयतेनैतौ प्रोक्तौ सात्यकिना ततः । एवमागच्छतां विप्रौ किञ्चिद्विधिनुतं गुरौ ॥४८॥

अर्थ: तदनन्तर सात्यकि नामक प्रधान मुनिने उनसे कहा कि हे विप्रो ! आओ और गुरु से कुछ पूछो ! ॥४८॥


उवाच प्रहसन्नग्निभूर्वद्भिः किं प्रयोजनम् । जगादागतयोरत्र दोषो नास्तीति संयतः ॥४९॥

अर्थ: तब अग्निभूतिने हँसते हुए कहा कि हमें आप लोगोंसे क्या प्रयोजन है ? इसके उत्तरमें मुनिने कहा कि यदि आप लोग यहाँ आ गये हैं तो इसमें दोष नहीं है ॥४९॥


द्विजेनैकेन च प्रोक्तमेतान् श्रमणपुङ्गवान् । वादे जेतुमुपायातौ दूरे किमधुना स्थितौ ॥५०॥

अर्थ: उसी समय एक ब्राह्मणने कहा कि ये दोनों इन मुनियोंको वादमें जीतनेके लिए आये हैं इस समय दूर क्यों बैठे हैं ॥५०॥


एवमस्त्विति सामर्षौ मुनीन्द्रस्य पुरः स्थितौ । ऊचतुश्च समुन्नद्धौ किं वेत्सीति पुनः पुनः ॥५१॥

अर्थ: तदनन्तर ‘अच्छा ऐसा ही सही’ इस प्रकार कहते हुए क्रोधसे युक्त दोनों ब्राह्मण, मुनिराजके सामने बैठ गये और बड़े अहंकारमें चूर होकर बार-बार कहने लगे कि बोल क्या जानता है ? बोल क्या जानता है ? ॥५१॥


सावधिर्भगवानाह भवन्तावागतौ कुतः । ऊचतुस्तौ न ते ज्ञातौ शालिग्रामात्किमागतौ ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर अवधिज्ञानी मुनिराज ने कहा कि आप दोनों कहाँ से आ रहे हैं ? इसके उत्तरमें विप्र-पुत्र बोले कि क्या तुझे यह भी ज्ञात नहीं है कि हम दोनों शालिग्रामसे आये हैं ॥५२॥


मुनिराहावगच्छामि शालिग्रामादुपागतौ । अनादिजन्मकान्तारे भ्रमन्तावागतौ कुतः ॥५३॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजने कहा कि आप शालिग्रामसे आये हैं यह तो मैं जानता हूँ मेरे पूछनेका अभिप्राय यह है कि इस अनादि संसार-रूपी वनमें घूमते हुए आप इस समय किस पर्यायसे आये हैं ? ॥५३॥


तौ समूचतुरन्योऽपि को वेत्तीति ततो मुनिः । जगाद श्रृणुतं विप्रावधुना कथयाम्यहम् ॥५४॥

अर्थ: तब उन्होंने कहा कि इसे क्या और भी कोई जानता है या मैं ही जानूँ । तत्पश्चात् मुनिराजने कहा कि अच्छा विप्रो ! सुनो मैं कहता हूँ ॥५४॥


ग्रामस्यैतस्य सीमान्ते वनस्थल्यामुभौ समम् । अन्योन्यानुरतावास्तां शृगालौ विकृताननौ ॥५५॥

अर्थ: इस गाँवकी सीमाके पास वनकी भूमिमें दो शृगाल साथ-साथ रहते थे । वे दोनों ही परस्पर एक दूसरेसे अधिक प्रेम रखते थे तथा दोनों ही विकृत मुखके धारक थे ॥५५॥


आसीदत्रैव च ग्रामे चिरवासः कृषीबलः । ख्यातः प्रामरको नाम गतोऽसौ क्षेत्रमन्यदा ॥५६॥

पुनरेमीति सञ्चिन्त्य भानावस्ताभिलाषिणि । त्यक्त्वोपकरणं क्षेत्रे सङ्गतः क्षुधितो गृहम् ॥५७॥

अर्थ: इसी गाँवमें एक प्रामरक नामका पुराना किसान रहता था । वह एक दिन अपने खेतपर गया । जब सूर्यास्तका समय आया तब वह भूखसे पीड़ित होकर घर गया और अभी वापिस आता हूँ यह सोचकर अपने उपकरण खेतमें ही छोड़ आया ॥५६-५७॥


तावदञ्जनशैलाभाः प्लावयन्तो महीतलम् । अकस्मादुन्नता मेघा ववर्षुर्नक्तवासरम् ॥५८॥

प्रशान्ता सप्तरात्रेण रात्रौ तमसि भीषणे । जम्बुकौ तौ विनिष्क्रान्तौ गहनादर्दितौ क्षुधा ॥५९॥

अर्थ: वह घर आया नहीं कि इतनेमें अकस्मात् उठे तथा अञ्जनगिरिके समान काले बादल पृथिवीतलको डुबाते हुए रात-दिन बरसने लगे । वे मेघ सात दिनमें शान्त हुए अर्थात् सात दिन तक झड़ी लगी रही । ऊपर जिन दो शृगालोंका उल्लेख कर आये हैं वे भूखसे पीड़ित हो रात्रिके घनघोर अन्धकारमें वनसे बाहर निकले ॥५८-५९॥


अथोपकरणं क्लिन्नं कर्दमोपलसङ्गतम् । तत्ताभ्यां भक्षितं सर्वं प्राप्तौ चोदरवेदनाम् ॥६०॥

अकामनिर्जरायुक्तौ वर्षानिलसमाहतौ । ततः कालं गतौ जातौ सोमदेवस्य नन्दनौ ॥६१॥

अर्थ: अथानन्तर वर्षासे भींगे और कीचड़ तथा पत्थरोंमें पड़े वे सब उपकरण जिन्हें कि किसान छोड़ आया था दोनों शृगालोंने खा लिये । खाते हीके साथ उनके उदरमें भारी पीड़ा उठी । अन्तमें वर्षा और वायुसे पीड़ित दोनों शृगाल अकामनिर्जराकर मरे और सोमदेव ब्राह्मणके पुत्र हुए ॥६०-६१॥


स च प्रामरकः प्राप्तोऽन्वेषकोऽपश्यदेतकौ । निर्जीवौ जम्बुकौ तेन गृहीत्वा जनितौ दृती ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर वह प्रामरक किसान अपने उपकरण ढूँढ़ता हुआ खेतमें पहुँचा तो वहाँ उसने इन मरे हुए दोनों शृगालोंको देखा । किसान उन मृतक शृगालोंको लेकर घर गया और वहाँ उसने उनकी मशकें बनाईं ॥६२॥


अचिरेण मृतश्चासौ सुतस्यैवाभवत्सुतः । जातिस्मरत्वमासाद्य मूकीभूय व्यवस्थितः ॥६३॥

अर्थ: वह प्रामरक भी जल्दी ही मर गया और मरकर अपने ही पुत्रके पुत्र हुआ । उस पुत्रको जाति-स्मरण हो गया जिससे वह गूँगा बनकर रहने लगा ॥६३॥


पुत्रं पितुरिति ज्ञात्वेत्याहरामि कथं त्वहम् । स्नुषां च मातुरित्यस्माद्धेतोर्मौनमुपाश्रितः ॥६४॥

अर्थ: ‘मैं अपने पूर्वभवके पुत्रको पिताके स्थानमें समझ कर कैसे बोलूँ तथा पूर्वभवकी पुत्र-वधूको माताके स्थानमें जानकर कैसे बोलूँ’ यह विचार कर ही वह मौनको प्राप्त हुआ है ॥६४॥


यदि न प्रत्ययः सम्यक् तत्तिष्ठत्यसावयम् । मध्ये स्वजनवर्गस्य द्विजो मां द्रष्टुमागतः ॥६५॥

अर्थ: यदि तुम्हें इस बातका ठीक ठीक विश्वास नहीं है तो वह ब्राह्मण मेरे दर्शन करनेके लिए यहाँ आया है तथा अपने परिवारके बीचमें बैठा है ॥६५॥


आहूय गुरुणा चोक्तः स त्वं प्रामरकस्तथा । आसीस्त्वमधुना जातस्तोकस्यैव शरीरजः ॥६६॥

अर्थ: मुनिराजने उसे बुलाकर कहा कि तू वही प्रामरक किसान है और इस समय अपने पुत्रका ही पुत्र हुआ है ॥६६॥


संसारस्य स्वभावोऽयं रङ्गमध्ये यथा नटः । राजा भूत्वा भवेद्भृत्यः प्रेष्यश्च प्रभुतां व्रजेत् ॥६७॥

एवं पिताऽपि तोकत्वमेति तोकश्च तातताम् । माता पत्नीत्वमायाति पत्नी चायाति मातृताम् ॥६८॥

अर्थ: यह संसारका स्वभाव है । जिस प्रकार रङ्गभूमिके मध्य नट राजा होकर दास बन जाता है और दास प्रभुताको प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार पिता भी पुत्रपनेको प्राप्त हो जाता है, और पुत्र पितृ पर्यायको प्राप्त हो जाता है । माता पत्नी हो जाती है और पत्नी माता बन जाती है ॥६७-६८॥


उद्घाटनघटीयन्त्रसदृशेऽस्मिन् भवात्मनि । उपर्यधरतां यान्ति जीवाः कर्मवशं गताः ॥६९॥

अर्थ: यह संसार अरहटके घटीयन्त्रके समान है इसमें जीव कर्मके वशीभूत हो ऊपर-नीची अवस्थाको प्राप्त होता रहता है ॥६९॥


इति ज्ञात्वा भवावस्थां नितान्तं वत्स निन्दिताम् । अधुना मूकतां मुञ्च कुरु वाचां क्रियां सतीम् ॥७०॥

अर्थ: इसलिए हे वत्स ! संसार दशाको अत्यन्त निन्दित जानकर इस समय गूँगापन छोड़ और वचनोंको उत्तम क्रिया कर अर्थात् प्रशस्त वचन बोल ॥७०॥


इत्युक्तः परमं हृष्ट उत्थाय विगतज्वरः । उद्भूतघनरोमाञ्चः प्रोत्फुल्लनयनाननः ॥७१॥

अर्थ: मुनिराजके इतना कहते ही वह अत्यन्त हर्षित होता हुआ उठा, वह ऐसा प्रसन्न हुआ मानो उसका ज्वर उतर गया हो, उसके शरीरमें सघन रोमाञ्च निकल आये, तथा उसके नेत्र और मुख हर्षसे फूल उठे ॥७१॥


गृहीत इव भूतेन परिभ्रम्य प्रदक्षिणाम् । निपपातोत्तमाङ्गेन छिन्नमूलतरुर्यथा ॥७२॥

अर्थ: भूतसे आक्रान्त हुएके समान उसने मुनिकी प्रदक्षिणाएँ दीं । तदनन्तर कटे वृक्षके समान मस्तकके बल उनके चरणोंमें गिर पड़ा ॥७२॥


उवाच विस्मितश्चोच्चैस्त्वं सर्वज्ञपराक्रमः । इहस्थः सर्वलोकस्य सकलां पश्यसि स्थितिम् ॥७३॥

अर्थ: उसने आश्चर्य चकित हो जोरसे कहा कि हे भगवन्, आप सर्वज्ञ हैं । यहाँ बैठे-बैठे ही आप समस्त लोककी सम्पूर्ण स्थितिको देखते रहते हैं ॥७३॥


संसारसागरे घोरे कष्टमेवं निमज्जतः । सत्त्वानुकम्पया बोधिस्त्वया मे नाथ दर्शिता ॥७४॥

अर्थ: मैं इस भयंकर संसार-सागरमें डूब रहा था सो आपने प्राण्यनुकम्पासे हे नाथ ! मेरे लिए रत्नत्रय रूप बोधिका दर्शन कराया है ॥७४॥


मनोगतं मम ज्ञातं भवता दिव्यबुद्धिना । इत्युक्त्वा जगृहे दीक्षां सास्रान् संत्यज्य बान्धवान् ॥७५॥

अर्थ: आप दिव्यबुद्धि हैं अतः आपने मेरा मनोगत भाव जान लिया । इस प्रकार कहकर उस प्रामरकके जीव ब्राह्मणने रोते हुए भाई-बान्धवोंको छोड़कर दीक्षा धारण कर ली ॥७५॥


तस्य प्रामरकस्यैतच्छ्रुत्वोपाख्यानमीदृशम् । संवृत्ता बहवो लोके श्रमणाः श्रावकास्तथा ॥७६॥

अर्थ: प्रामरकका यह ऐसा व्याख्यान सुन बहुतसे लोग मुनि तथा श्रावक हो गये ॥७६॥


गत्वा च ते दृती दृष्टे सर्वलोकेन तद्गृहे । ततः कलकलो जातो विस्मयश्च समन्ततः ॥७७॥

अर्थ: सब लोगोंने उसके घर जाकर पूर्वोक्त शृगालोंके शरीरसे बनी मशकें देखीं जिससे सब ओर कलकल तथा आश्चर्य छा गया ॥७७॥


अथोपहसितौ राजंस्तौ जनेन द्विजातिकौ । इमौ तौ पशुमांसादौ जम्बुकौ द्विजतां गतौ ॥७८॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! लोगोंने यह कहकर उन ब्राह्मणोंकी बहुत हँसी की कि ये वे ही पशुओंका मांस खानेवाले शृगाल ब्राह्मण पर्यायको प्राप्त हुए हैं ॥७८॥


एताभ्यां ब्रह्मतावादे विमूढाभ्यां सुखार्थिनी । प्रजेयं मुषिता सर्वा सक्ताभ्यां पशुहिंसने ॥७९॥

अर्थ: ‘सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है’ इस प्रकारके ब्रह्माद्वैतवादमें मूढ एवं पशुओंकी हिंसामें आसक्त रहनेवाले इन दोनों ब्राह्मणोंने सुखकी इच्छुक समस्त प्रजाको लूट डाला है ॥७९॥


अमी तपोधनाः शुद्धाः श्रमणा ब्राह्मणाधिकाः । ब्राह्मणा इति विख्याता हिंसामुक्तिव्रतश्रिताः ॥८०॥

अर्थ: तपरूपी धनसे युक्त ये शुद्ध मुनि ब्राह्मणोंसे अधिक श्रेष्ठ हैं क्योंकि यथार्थमें ब्राह्मण वे ही कहलाते हैं जो अहिंसा व्रतको धारण करते हैं ॥८०॥


महाव्रतशिखाटोपाः क्षान्तियज्ञोपवीतिनः । ध्यानाग्निहोत्रिणः शान्ता मुक्तिसाधनतत्पराः ॥८१॥

अर्थ: जो महाव्रत रूपी लम्बी चोटी धारण करते हैं, जो क्षमारूपी यज्ञोपवीतसे सहित हैं, जो ध्यानरूपी अग्निमें होम करनेवाले हैं, शान्त हैं तथा मुक्तिके सिद्ध करनेमें तत्पर हैं वे ही ब्राह्मण कहलाते हैं ॥८१॥


सर्वारम्भप्रवृत्ता ये नित्यमब्रह्मचारिणः । द्विजाः स्म इति भाषन्ते क्रियया न पुनर्द्विजाः ॥८२॥

अर्थ: इसके विपरीत जो सब प्रकारके आरम्भमें प्रवृत्त हैं तथा जो निरन्तर कुशीलमें लीन रहते हैं वे केवल यह कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं परन्तु क्रियासे ब्राह्मण नहीं हैं ॥८२॥


यथा केचिन्नरा लोके सिंहदेवाग्निनामकाः । तथामी विरतेर्भ्रष्टाः ब्राह्मणा नामधारकाः ॥८३॥

अर्थ: जिस प्रकार कितने ही लोग सिंह, देव अथवा अग्नि नामके धारक हैं उसी प्रकार व्रतसे भ्रष्ट रहनेवाले ये लोग भी ब्राह्मण नामके धारक हैं इनमें वास्तविक ब्राह्मणत्व कुछ भी नहीं है ॥८३॥


अमी सुश्रमणा धन्या ब्राह्मणाः परमार्थतः । ऋषयः संयता धीराः क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रियाः ॥८४॥

अर्थ: जो ऋषि, संयत, धीर, क्षान्त, दान्त और जितेन्द्रिय हैं ऐसे ये मुनि ही धन्य हैं तथा वास्तविक ब्राह्मण हैं ॥८४॥


भदन्तास्त्यक्तसन्देहा भगवन्तः सतापसाः । मुनयो यतयो वीरा लोकोत्तरगुणस्थिताः ॥८५॥

अर्थ: जो भद्रपरिणामी है, संदेहसे रहित हैं, ऐश्वर्य सम्पन्न हैं, अनेक तपस्वियोंसे सहित हैं, यति हैं और वीर हैं ऐसे मुनि ही लोकोत्तर गुणोंके धारण करनेवाले हैं ॥८५॥


परिव्रजन्ति ये मुक्तिं भवहेतौ परिग्रहे । ते परिव्राजका ज्ञेया निर्ग्रन्था एव निस्तमाः ॥८६॥

अर्थ: जो परिग्रहको संसारका कारण समझ उसे छोड़ मुक्तिको प्राप्त करते हैं वे परिव्राजक कहलाते हैं सो यथार्थमें मोहरहित निर्ग्रन्थ मुनि ही परिव्राजक हैं ऐसा जानना चाहिए ॥८६॥


तपसा क्षपयन्ति स्वं क्षीणरागाः क्षमान्विताः । क्षिण्वन्ति च यतः पापं क्षपणास्तेन कीर्त्तिताः ॥८७॥

अर्थ: चूँकि ये मुनि क्षीणराग तथा क्षमासे सहित होकर तपके द्वारा अपने आपको कृश करते हैं, पापको नष्ट करते हैं इसलिए क्षपण कहे गये हैं ॥८७॥


यमिनो वीतरागाश्च निर्मुक्ताङ्गा निरम्बराः । योगिनो ध्यानिनो वन्द्या ज्ञानिनो निःस्पृहा बुधाः ॥८८॥

अर्थ: ये सब यमी, वीतराग, निर्मुक्तशरीर, निरम्बर, योगी, ध्यानी, ज्ञानी, निःस्पृह और बुध हैं अतः ये ही वन्दना करने योग्य हैं ॥८८॥


निर्वाणं साधयन्तीति साधवः परिकीर्त्तिताः । आचार्या यत्सदाचारं चरन्त्याचारयन्ति च ॥८९॥

अर्थ: चूँकि ये निर्वाणको सिद्ध करते हैं इसलिए साधु कहलाते हैं, और उत्तम आचारका स्वयं आचरण करते हैं तथा दूसरोंको भी आचरण कराते हैं इसलिए आचार्य कहे जाते हैं ॥८९॥


अनगारगुणोपेता भिक्षवः शुद्धभिक्षया । श्रमणाः सितकर्माणः परमश्रमवर्त्तिनः ॥९०॥

अर्थ: ये गृहत्यागीके गुणोंसे सहित हैं तथा शुद्ध भिक्षासे भोजन करते हैं इसलिए भिक्षुक कहलाते हैं और उज्ज्वल कार्य करनेवाले हैं, अथवा कर्मोंका नष्ट करनेवाले हैं तथा परम निर्दोष श्रममें वर्तमान हैं इसलिए श्रमण कहे जाते हैं ॥९०॥


इति साधुस्तुतिं श्रुत्वा तथा निन्दनमात्मनः । रहःस्थितौ विलक्षौ च विमानौ विगतप्रभौ ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार साधुओंकी स्तुति और अपनी निन्दा सुनकर वे अहंकारी विप्र पुत्र लज्जित, अपमानित तथा निष्प्रभ हो एकान्तमें जा बैठे ॥९१॥


गते च सवितर्यस्तं प्रकाशनसुदुःखितौ । अन्विष्यन्तौ गतौ स्थानं यत्रासौ भगवान् स्थितः ॥९२॥

अर्थ: अथानन्तर जो अपने शृगालादि पूर्व भवोंके उल्लेखसे अत्यन्त दुखी थे ऐसे दोनों पुत्र सूर्यके अस्त होनेपर खोज करते हुए उस स्थानपर पहुँचे जहाँ कि वे भगवान् नन्दिवर्धन मुनीन्द्र विराजमान थे ॥९२॥


निःसङ्गः सङ्घमुत्सृज्य वनैकान्तेऽतिगह्वरे । करङ्कैः सङ्कटेऽत्यन्तं विविन्नचितिकाचिते ॥९३॥

क्रव्याच्छ्वापदनादाढ्ये पिशाचभुजगाकुले । सूचीभेदतमश्छन्ने महाबीभत्सदर्शने ॥९४॥

एवंविधे श्मशानेऽसौ निर्जन्तुनि शिलातले । पापाभ्यामोचितस्ताभ्यां प्रतिमास्थानमास्थितः ॥९५॥

अर्थ: वे मुनीन्द्र संघ छोड़, निःस्पृह हो वनके एकान्त भागमें स्थित उस श्मशान प्रदेशमें विद्यमान थे कि जो अत्यधिक गर्तोंसे युक्त था, नरकङ्कालोंसे परिपूर्ण था, नाना प्रकारकी चिताओंसे व्याप्त था, मांसभोजी वन्य पशुओंके शब्दसे व्याप्त था, पिशाच और सर्पोंसे आकीर्ण था, सुईके द्वारा भेदने योग्य–गाढ अन्धकारसे आच्छादित था, और जिसका देखना तीव्र घृणा उत्पन्न करनेवाला था । ऐसे श्मशानमें जीव-जन्तु रहित शिलातलपर प्रतिमायोगसे विराज- मान उन मुनिराजको उन दोनों पापियोंने देखा ॥९३-९५॥


आकृष्टखड्गहस्तौ च क्रुद्धौ जगदतुः समम् । जीवं रक्षतु ते लोकः क्व यासि श्रमणाधुना ॥९६॥

अर्थ: उन्हें देखते ही जिन्होंने तलवार खींचकर हाथमें ले ली थी तथा जो अत्यन्त कुपित हो रहे थे ऐसे उन ब्राह्मणोंने एक साथ कहा कि लोग आकर तेरे प्राणोंकी रक्षा करें । अरे श्रमण ! अब तू कहाँ जायगा ? ॥९६॥


पृथिव्यां ब्राह्मणाः श्रेष्ठा वयं प्रत्यक्षदेवताः । निर्लज्जस्त्वं महादोषो जम्बुका इति भाषसे ॥९७॥

अर्थ: हम ब्राह्मण पृथिवीमें श्रेष्ठ हैं तथा प्रत्यक्ष देवता स्वरूप हैं और तू महादोषोंसे भरा निर्लज्ज है फिर भी हम लोगोंको तू ‘शृगाल थे’ ऐसा कहता है ॥९७॥


ततोऽत्यन्तप्रचण्डौ तौ दुष्टौ रक्तकलोचनौ । जाल्मौ कृपाविनिर्मुक्तौ सुयक्षेण निरीक्षितौ ॥९८॥

अर्थ: तदनन्तर जो अत्यन्त तीव्र बोधसे युक्त थे, दुष्ट थे, लाल-लाल नेत्रोंके धारक थे, विना विचारे काम करनेवाले थे और दयासे रहित थे ऐसे उन दोनों ब्राह्मणोंको यक्षने देखा ॥९८॥


सुमनाश्चिन्तयामास पश्य निर्दोषमीदृशम् । हन्तुमभ्युद्यतौ साधुं मुक्ताङ्गं ध्यानतत्परम् ॥९९॥

अर्थ: उन्हें देखकर वह देव विचार करने लगा कि अहो ! देखो; ये ऐसे निर्दोष, शरीरसे निःस्पृह और ध्यानमें तत्पर मुनिको मारनेके लिए उद्यत हैं ॥९९॥


ततः संस्थानमास्थाय तौ चोदगिरतामसी । यक्षेण च तदग्रेण स्तम्भितौ निश्चलौ स्थितौ ॥१००॥

अर्थ: तदनन्तर तलवार चलानेके आसनसे खड़े होकर उन्होंने अपनी-अपनी तलवार ऊपर उठाई नहीं कि यक्षने उन्हें कील दिया जिससे वे मुनिराजके आगे उसी मुद्रामें निश्चल खड़े रह गये ॥१००॥


विकर्म कर्त्तु मिच्छन्तावुपसर्गं महामुनेः । प्रतीहाराविव क्रूरौ तस्थतुः पार्श्वयोरिमौ ॥१०१॥

अर्थ: महामुनिके विरुद्ध उपसर्ग करनेकी इच्छा रखनेवाले वे दोनों दुष्ट उनकी दोनों ओर इस प्रकार खड़े थे मानो उनके अंगरक्षक ही हों ॥१०१॥


ततः सुविमले काले जाते जाताब्जबान्धवे । संहृत्य सन्मुनिर्योगं निःसृत्यैकान्ततः स्थितः ॥१०२॥

अर्थ: तदनन्तर निर्मल प्रातःकालके समय सूर्योदय होनेपर वे मुनिराज योग समाप्त कर एकान्त स्थानसे निकल बाहर मैदानमें बैठे ॥१०२॥


सङ्घश्चतुर्विधः सर्वः शालिग्रामजनस्तथा । प्राप्तः परमयोगीशमिति विस्मयवान् जगौ ॥१०३॥

कावेतावीदृशौ पापौ धिक्कष्टं कर्त्तु मीहितौ अग्निवायू दुराचारावेतौ तावाततायिनौ ॥१०४॥

अर्थ: उसी समय चतुर्विध संघ तथा शालिग्रामवासी लोग उन योगिराजके पास आये सो यह दृश्य देख आश्चर्यचकित हो बोले कि अरे ! ये कौन पापी हैं ? हाय हाय कष्ट पहुँचानेके लिए उद्यत इन पापियोंको धिक्कार है । अरे ये उपद्रव करनेवाले तो वे ही आततायी अग्निभूति और वायुभूति हैं ॥१०३-१०४॥


तौ चाचिन्तयतामुच्चैः प्रभावोऽयं महामुनेः । आवां येन बलोद्वृत्तौ स्तम्भितौ स्थावरीकृतौ ॥१०५॥

अर्थ: अग्निभूति और वायुभूति भी विचार करने लगे कि अहो ! महामुनिका यह कैसा उत्कृष्ट प्रभाव है कि जिन्होंने बलका दर्प रखनेवाले हम लोगोंको कीलकर स्थावर बना दिया ॥१०५॥


अनयाऽवस्थया मुक्तौ जीविष्यामो वयं यदा । तदा सम्प्रतिपत्स्यामो दर्शनं मौनिसत्तमम् ॥१०६॥

अर्थ: इस अवस्थासे छुटकारा होनेपर यदि हम जीवित रहेंगे तो इन उत्तम मुनिराजके दर्शन अवश्य करेंगे ॥१०६॥


अत्रान्तरे परिप्राप्तः सोमदेवः ससंभ्रमः । भार्ययाऽग्निलया साकं प्रसादयति तं मुनिम् ॥१०७॥

अर्थ: इसी बीचमें घबड़ाया हुआ सोमदेव अपनी अग्निला स्त्रीके साथ वहाँ आ पहुँचा और उन मुनिराजको प्रसन्न करने लगा ॥१०७॥


भूयो भूयः प्रणामेन बहुभिश्च प्रियोदितैः । दम्पती चक्रतुश्चाटुं पादमर्दनतत्परौ ॥१०८॥

अर्थ: पैर दबानेमें तत्पर दोनों ही स्त्री पुरुष, बार-बार प्रणाम करके तथा अनेक मीठे वचन कहकर उनकी सेवा करने लगे ॥१०८॥


जीवतां देव दुःपुत्रावेतौ नः कोपमुत्सृज । सम्प्रेष्यबान्धवा नाथ वयमाज्ञाकरास्तव ॥१०९॥

अर्थ: उन्होंने कहा कि हे देव ! ये मेरे दुष्ट पुत्र जीवित रहें, क्रोध छोड़िए, हे नाथ ! हम सब भाई-बान्धवों सहित आपके आज्ञाकारी हैं ॥१०९॥


संयतो वक्ति कः कोपः साधूनां यद्ब्रवीष्यदः । वयं सर्वस्य सदयाः सममित्रारिबान्धवाः ॥११०॥

अर्थ: इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा कि मुनियोंको क्या क्रोध है ? जो तुम यह कह रहे हो, हम तो सबके ऊपर दयासहित हैं तथा मित्र शत्रु भाई बान्धव आदि सब हमारे लिए समान हैं ॥११०॥


प्राह यक्षोऽतिरक्ताक्षो बृहद्गम्भीरनिस्वनः । माऽभ्याख्यानं गुरोरस्य जनमध्ये प्रदातकम् ॥१११॥

अर्थ: तदनन्तर जिसके नेत्र अत्यन्त लाल थे ऐसा यक्ष अत्यधिक गम्भीर स्वरमें बोला कि यह कार्य इन गुरु महाराजका है ऐसा जनसमूहके बीच नहीं कहना चाहिए ॥१११॥


साधून्वीक्ष्य जुगुप्सन्ते सद्योऽनर्थं प्रयान्ति ते । न पश्यन्त्यात्मनो दौष्ट्यं दोषं कुर्वन्ति साधुषु ॥११२॥

अर्थ: क्योंकि जो मनुष्य साधुओंको देखकर उनके प्रति घृणा करते हैं वे शीघ्र ही अनर्थको प्राप्त होते हैं । दुष्ट मनुष्य अपनी दुष्टता तो देखते नहीं और साधुओंपर दोष लगाते हैं ॥११२॥


यथाऽऽदर्शतले कश्चिदात्मानमवलोकयन् । यादृशं कुरुते वक्त्रं तादृशं पश्यति ध्रुवम् ॥११३॥

अर्थ: जिस प्रकार दर्पणमें अपने आपको देखता हुआ कोई मनुष्य मुखको जैसा करता है उसे अवश्य ही वैसा देखता है ॥११३॥


तद्वत्साधुं समालोक्य प्रस्थानादिक्रियोद्यतः । यादृशं कुरुते भावं तादृक्षं लभते फलम् ॥११४॥

अर्थ: उसी प्रकार साधुको देखकर सामने जाना, खड़े होना आदि क्रियाओंके करनेमें उद्यत मनुष्य जैसा भाव करता है वैसा ही फल पाता है ॥११४॥


प्ररोदनं प्रहासेन कलहं परुषोक्तितः । वधेन मरणं प्रोक्तं विद्वेषेण च पातकम् ॥११५॥

अर्थ: जो मुनिकी हँसी करता है वह उसके बदले रोना प्राप्त करता है । जो उनके प्रति कठोर शब्द कहता है वह उसके बदले कलह प्राप्त करता है, जो मुनिको मारता है वह उसके बदले मरणको प्राप्त होता है जो उनके प्रति विद्वेष करता है वह उसके बदले पाप प्राप्त करता है ॥११५॥


इति साधोर्नियुक्तेन परिनिन्द्येन वस्तुना । फलेन तादृशेनैव कर्ता योगमुपाश्नुते ॥११६॥

अर्थ: इस प्रकार साधुके विषयमें किये हुए निन्दनीय कार्यसे उसका करनेवाला वैसे ही कार्यके साथ समागम प्राप्त करता है ॥११६॥


एतौ स्वोपचितैर्दोषैः प्रेर्यमाणौ स्वकर्मभिः । तव पुत्रौ मया विप्र स्तम्भितौ न हि साधुना ॥११७॥

अर्थ: हे विप्र ! तेरे ये पुत्र अपने ही द्वारा संचित दोष और अपने ही द्वारा कृत कर्मोंसे प्रेरित होते हुए मेरे द्वारा कीले गये हैं साधु महाराजके द्वारा नहीं ॥११७॥


वेदाभिमाननिर्दग्धावेतौ छद्मवर्नापकौ । म्रियेतां धिक्क्रियाचारौ संयतस्यातितायिनौ ॥११८॥

अर्थ: जो वेदके अभिमानसे जल रहे हैं, अत्यन्त कठिन हैं, निन्दनीय क्रियाका आचरण करनेवाले हैं तथा संयमी साधुकी हिंसा करनेवाले है ऐसे तेरे ये पुत्र मृत्युको प्राप्त हों इसमें क्या हानि है ? ॥११८॥


इति जल्पन्तमत्युग्रं यक्षं प्रतिघभीषणम् । प्रसादयति साधुं च विप्रः प्राञ्जलिमस्तकः ॥११९॥

अर्थ: हाथ जोड़कर मस्तकसे लगाये हुए ब्राह्मण, इस प्रकार कहते हुए, तीव्र, क्रोध युक्त तथा शत्रु भयदायी यक्ष और मुनिराज - दोनोंको प्रसन्न करने लगा ॥११९॥


उद्र्ध्वबाहुः परिक्रोशन्निन्दयन्ताडयन्नुरः । सममग्निलया विप्रो विप्रकीर्णात्मकोऽभवत् ॥१२०॥

अर्थ: जिसने अपनी भुजा ऊपर उठाकर रक्खी थी, जो अत्यधिक चिल्लाता था, अपनी तथा अपने पुत्रोंकी निन्दा करता था, और अपनी छाती पीट रहा था ऐसा विप्र अग्निलाके साथ अत्यन्त पीड़ित हो रहा था ॥१२०॥


गुरुराह ततः कान्त हे यक्ष कमलेक्षण । मृष्यतामनयोर्दोषो मोहप्रजडचित्तयोः ॥१२१॥

अर्थ: तदनन्तर मुनिराजने कहा कि हे कमललोचन ! सुन्दर ! यक्ष ! जिनका चित्त मोहसे अत्यन्त जड़ हो रहा है ऐसे इन दोनोंका दोष क्षमा कर दिया जाय ॥१२१॥


जिनशासनवात्सल्यं कृतं सुकृतिना त्वया । नैतं प्राणिवधं भद्र मदर्थं कर्तुमर्हसि ॥१२२॥

अर्थ: तुझ पुण्यात्माने जिन-शासनके साथ वात्सल्य दिखलाया यह ठीक है किन्तु हे भद्र ! मेरे निमित्त यह प्राणिवध करना उचित नहीं है ॥१२२॥


यथाऽऽज्ञापयसीत्युक्त्वा गुह्यकेन विसर्जितौ । आश्वस्योपसृतौ भक्त्या पादमूलं गुरोस्ततः ॥१२३॥

अर्थ: तत्पश्चात् ‘जैसी आप आज्ञा करें’ यह कहकर यक्षने दोनों विप्र-पुत्रोंको छोड़ दिया । तदनन्तर दोनों ही विप्र-पुत्र समाधान होकर भक्तिपूर्वक गुरुके चरण-मूलमें पहुँचे ॥१२३॥


नम्रौ प्रदक्षिणां कृत्वा शिरःस्थकरकुड्मलौ । साग्रवीर्यां महाचर्यां ग्रहीतुं शक्तिवर्जितौ ॥१२४॥

अणुव्रतानि गृह्णीतां सम्यग्दर्शनभूषितौ । अमूढौ श्रावकौ जातौ गृहधर्मसुखे रतौ ॥१२५॥

अर्थ: और दोनोंने ही हाथ जोड़ मस्तकसे लगा प्रदक्षिणा देकर उन्हें नमस्कार किया तथा साधु दीक्षा प्रदान करनेकी प्रार्थना की । परन्तु साधु-सम्बन्धी कठिन चर्याको ग्रहण करनेके लिए उन्हें शक्तिरहित देख मुनिराजने कहा कि तुम दोनों सम्यग्दर्शनसे विभूषित होकर अणुव्रत ग्रहण करो। आज्ञानुसार वे गृहस्थ धर्मके सुखमें लीन विवेकी श्रावक हो गये ॥१२४-१२५॥


पितरावनयोः सम्यक्श्रद्धयाऽपरिकीर्त्तितौ । कालं गतौ विना धर्माद्भ्रमितौ भवसागरे ॥१२६॥

अर्थ: इनके माता-पिता समीचीन श्रद्धासे रहित थे इसलिए मरकर धर्मके विना संसार सागरमें भ्रमण करते रहे ॥१२६॥


तौ तु सन्त्यक्तसन्देहौ जिनशासनभावितौ । हिंसाद्यं लौकिकं कार्यं वर्जयन्तौ विषं यथा ॥१२७॥

कालं कृत्वा समुत्पन्नौ सौधर्मे विबुधोत्तमौ । सर्वेन्द्रियमनोह्लादं यत्र दिव्यं महत्सुखम् ॥१२८॥

अर्थ: परन्तु अग्निभूति और वायुभूति संदेह छोड़ जिनशासनकी भावनासे ओत-प्रोत हो गये थे, तथा हिंसादिक लौकिक कार्य उन्होंने विषके समान छोड़ दिये थे इसलिए वे मरकर उस सौधर्म स्वर्गमें उत्तम देव हुए जहाँ कि समस्त इन्द्रियों और मनको आह्लादित करनेवाला दिव्य महान् सुख उपलब्ध था ॥१२७-१२८॥


एत्यायोध्यां समुद्रस्य धारिण्याः कुक्षिसम्भवौ । नन्दनौ नयनानन्दौ श्रेष्ठिनस्तौ बभूवतुः ॥१२९॥

अर्थ: तदनन्तर वे दोनों अयोध्या आकर वहाँके समुद्र सेठकी धारिणी नामक स्त्रीके उदरसे नेत्रोंको आनन्द देनेवाले पुत्र हुए ॥१२९॥


पूर्णकाञ्चनभद्राख्यौ भ्रातरावेव तौ सुखम् । पुनः श्रावकधर्मेण गतौ सौधर्मदेवताम् ॥१३०॥

अर्थ: पूर्णभद्र और काञ्चनभद्र उनके नाम थे । ये दोनों भाई सुखसे समय व्यतीत करते थे । तदनन्तर पुनः श्रावक धर्म धारणकर उसके प्रभावसे सौधर्म स्वर्गमें देव हुए ॥१३०॥


अयोध्यानगरीन्द्रस्य हेमनाभस्य भामिनी । नाम्नाऽमरावती तस्यां समुत्पन्नौ दिवश्च्युतौ ॥१३१॥

जगतीह प्रविख्यातौ संज्ञया मधुकैटभौ । अजय्यौ भ्रातरौ चारू कृतान्तसमविभ्रमौ ॥१३२॥

अर्थ: अबकी बार वे दोनों, स्वर्गसे च्युत हो अयोध्या नगरीके राजा हेमनाभ और उनकी रानी अमरावतीके इस संसारमें मधु, कैटभ नामसे प्रसिद्ध पुत्र हुए । ये दोनों भाई अजेय, सुन्दर तथा यमराजके समान विभ्रमको धारण करनेवाले थे ॥१३१-१३२॥


ताभ्यामियं समाक्रान्ता मही सामन्तसङ्कटा । स्थापिता स्ववशे राजन् प्रज्ञाभ्यां शेमुषी यथा ॥१३३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिस प्रकार विद्वान् लोग अपनी बुद्धिको अपने अधीन कर लेते हैं उसी प्रकार इन दोनोंने सामन्तोंसे भरी हुई इस पृथिवीको आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया था ॥१३३॥


नेच्छत्याज्ञां नरेन्द्रैको भीमो नाम महाबलः । शैलान्तः पुरमाश्रित्य चमरो नन्दनं यथा ॥१३४॥

अर्थ: किन्तु एक भीम नामका महाबलवान् राजा उनकी आज्ञा नहीं मानता था । जिस प्रकार चमरेन्द्र नन्दन वनको पाकर प्रफुल्लित होता है उसी प्रकार वह पहाड़ी दुर्गका आश्रय कर प्रफुल्लित था ॥१३४॥


वीरसेनेन लेखश्च प्रेषितस्तस्य भूपतेः । उद्वासितानि धामानि पृथिव्यां भीमवह्निना ॥१३५॥

अर्थ: राजा मधुके एक भक्त सामन्त वीरसेनने उसके पास इस आशयका पत्र भी भेजा कि हे नाथ ! इधर भीमरूपी अग्निने पृथिवीके समस्त घर उजाड़ कर दिये हैं ॥१३५॥


ततो मधु क्षणं क्रुद्धो भीमकस्योपरि द्रुतम् । ययौ सर्वबलौघेन युक्तो योधैः समन्ततः ॥१३६॥

अर्थ: तदनन्तर उसी क्षण क्रोधको प्राप्त हुआ राजा मधु, अपनी सब सेनाओंके समूह तथा योधाओंसे परिवृत हो राजा भीमके प्रति चल पड़ा ॥१३६॥


क्रमान्मार्गवशात्प्राप्तो न्यग्रोधनगरं च तत् । वीरसेनो नृपो यत्र प्रीतियुक्तो विवेश च ॥१३७॥

अर्थ: क्रम-क्रमसे चलता हुआ वह मार्ग-वश उस न्यग्रोध नगरमें पहुँचा जहाँ कि उसका भक्त वीरसेन रहता था। राजा मधुने बड़े प्रेमके साथ उसमें प्रवेश किया ॥१३७॥


चन्द्राभा चन्द्रकान्तास्या वीरसेनस्य भामिनी । देवी निरीक्षिता तेन मधुना जगदिन्दुना ॥१३८॥

अनया सह संवासो वरं विन्ध्यवनान्तरे । चन्द्राभया विना भूतं न राज्यं सार्वभूमिकम् ॥१३९॥

अर्थ: वहाँ जाकर जगत्के चन्द्र स्वरूप राजा मधुने वीरसेनकी चन्द्राभा नामकी चन्द्रमुखी भार्या देखी । उसे देखकर वह विचार करने लगा कि इसके साथ विन्ध्याचलके वनमें निवास करना अच्छा है । इस चन्द्राभाके विना मेरा राज्य सार्वभूमिक नहीं है - अपूर्ण है ॥१३८-१३९॥


इति सञ्चिन्तयन् राजा भीमं निर्जित्य संयुगे । आस्थापयद्वशे शत्रूनन्यांश्च तत्कृताशयः ॥१४०॥

अर्थ: ऐसा विचार करता हुआ राजा उस समय आगे चला गया और युद्धमें भीमको जीतकर अन्य शत्रुओंको भी उसने वश किया । परतु यह सब करते हुए भी उसका मन उसी चन्द्राभामें लगा रहा ॥१४०॥


अयोध्यां पुनरागत्य सपत्नीकान्नराधिपान् । आहूय विपुलैर्दानैर्विसर्जयति मानितान् ॥१४१॥

अर्थ: फलस्वरूप उसने अयोध्या आकर राजाओंको अपनी-अपनी पत्नियोंके सहित बुलाया और उन्हें बहुत भारी भेंट देकर सम्मानके साथ विदा कर दिया ॥१४१॥


आहूतो वीरसेनोऽपि सह पत्न्या ययौ द्रुतम् । अयोध्यावहिरुद्याने मध्येऽस्थात्सरयूतटे ॥१४२॥

अर्थ: राजा वीरसेनको भी बुलाया सो वह अपनी पत्नीके साथ शीघ्र ही गया और अयोध्याके बाहर बगीचेमें सरयू नदीके तटपर ठहर गया ॥१४२॥


देव्या सह समाहूतः प्रविष्टो भवनं मधोः । उदारदानसन्मानो वीरसेनो विसर्जितः ॥१४३॥

अद्यापि मन्यते नेयमिति रुद्धा मनोहरा । चन्द्राभा नरचन्द्रेण प्रेषितान्तःपुरं ततः ॥१४४॥

अर्थ: तदनन्तर सन्मानके साथ बुलाये जानेपर उसने अपनी रानीके साथ मधुके भवनमें प्रवेश किया । कुछ समय बाद उसने विशेष भेंटके द्वारा सन्मान कर वीरसेनको तो विदा कर दिया और चन्द्राभाको अपने अन्तःपुरमें भेज दिया परन्तु भोला वीरसेन अब भी यह नहीं जान पाया कि हमारी सुन्दरी प्रिया यहाँ रोक ली गई है ॥१४३-१४४॥


महादेव्यभिषेकेण प्रापिता चाभिषेचनम् । आरूढा सर्वदेवीनामुपरिस्थितमास्पदम् ॥१४५॥

अर्थ: तदनन्तर महादेवीके अभिषेक द्वारा, अभिषेकको प्राप्त हुई चन्द्राभा सब देवियोंके ऊपर स्थानको प्राप्त हुई । भावार्थ - सब देवियोंमें प्रधान देवी बन गई ॥१४५॥


श्रियेव स तया साकं निमग्नः सुखसागरे । स्वं सुरेन्द्रसमं मेने भोगान्धीकृतमानसः ॥१४६॥

अर्थ: भोगोंसे जिसका मन अन्धा हो रहा था ऐसा राजा मधु, लक्ष्मीके समान उस चन्द्राभाके साथ सुखरूपी सागरमें निमग्न होता हुआ अपने आपको इन्द्रके समान मानने लगा ॥१४६॥


वीरसेननृपः सोऽयं विज्ञाय विहृतां प्रियाम् । उन्मत्तत्वं परिप्राप्तो रतिं क्वापि न विन्दते ॥१४७॥

अर्थ: इधर राजा वीरसेनको जब पता चला कि हमारी प्रिया हरी गई है तो वह पागल हो गया और किसी भी स्थानमें रतिको प्राप्त नहीं हुआ अर्थात् उसे कहीं भी अच्छा नहीं लगा ॥१४७॥


मण्डवस्याभवच्छिष्यस्तापसोऽसौ जलप्रियः । मूढं विस्मापयंल्लोकं तपः पञ्चाग्निकं श्रितः ॥१४८॥

अर्थ: अन्तमें मूर्ख मनुष्योंको आनन्द देनेवाला राजा वीरसेन किसी मण्डवनामक तापसका शिष्य हो गया और मूर्ख मनुष्योंको आश्चर्यमें डालता हुआ पञ्चाग्नितप तपने लगा ॥१४८॥


अन्यदा मधुराजेन्द्रो धर्मासनमुपागतः । करोति मन्त्रिभिः सार्द्धं व्यवहारविचारणम् ॥१४९॥

भूपालाचारसम्पन्नं सत्यं सम्मदसङ्गतम् । प्रविष्टोऽन्तःपुरं धीरस्तपनेऽस्ताभिलाषुके ॥१५०॥

अर्थ: किसी एक दिन राजा मधु धर्मासनपर बैठकर मन्त्रियोंके साथ राज्यकार्यका विचार कर रहा था । सो ठीक ही है क्योंकि राजाओंके आचारसे सम्पन्न सत्य ही हर्षदायक होता है । उस दिन राज्यकार्यमें व्यस्त रहनेके कारण धीरवीर राजा अन्तःपुरमें तब पहुँचा जब कि सूर्य अस्त होनेके सन्मुख था ॥१४९-१५०॥


खिन्ना तं प्राह चन्द्राभा किमित्यद्य चिरायितम् । वयं क्षुदर्दिता नाथ दुःखं वेलामिमां स्थिताः ॥१५१॥

अर्थ: खेदखिन्न चन्द्राभाने राजासे कहा कि नाथ ! आज इतनी देर क्यों की ? हमलोग भूखसे अबतक पीडित रहे ॥१५१॥


सोऽवोचद्व्यवहारोऽयमरालः पारदारिकः । छेत्तुं न शक्यते यस्मात्तस्मादद्य चिरायितम् ॥१५२॥

अर्थ: राजाने कहा कि यतश्च यह परस्त्री सम्बन्धी व्यवहार ( मुकद्दमा ) टेढ़ा व्यवहार था अतः बीचमें नहीं छोड़ा जा सकता था इसीलिए आज देर हुई है ॥१५२॥


विहस्योवाच चन्द्राभा को दोषोऽन्यप्रियारतौ । परभार्या प्रिया यस्य तं पूजय यथेप्सितम् ॥१५३॥

अर्थ: तब चन्द्राभाने हँसकर कहा कि परस्त्रीसे प्रेम करनेमें दोष ही क्या है ? जिसे परस्त्री प्यारी है उसकी तो इच्छानुसार पूजा करनी चाहिए ॥१५३॥


तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा क्रुद्धो मधुविभुर्जगौ । ये पारदारिका दुष्टा निग्राह्यास्ते न संशयः ॥१५४॥

अर्थ: उसके उक्त वचन सुन राजा मधुने क्रुद्ध होकर कहा कि जो दुष्ट परस्त्री-लम्पट हैं वे अवश्य ही दण्ड देनेके योग्य हैं इसमें संशय नहीं है ॥१५४॥


दण्ड्याः पञ्चकदण्डेन निर्वास्याः पुरुषाधमाः । स्पृशन्तोऽप्यबलामन्यां भाषयन्तोऽपि दुर्मताः ॥१५५॥

सन्मूढाः परदारेषु ये पापादनिवर्त्तिनः । अधः प्रपतनं येषां ते पूज्याः कथमीदृशाः ॥१५६॥

अर्थ: जो परस्त्रीका स्पर्श करते हैं अथवा उससे वार्तालाप करते हैं ऐसे दुष्ट नीच पुरुष भी पाँच प्रकारके दण्डसे दण्डित करने योग्य हैं तथा देशसे निकालनेके योग्य हैं फिर जो पापसे निवृत्त नहीं होनेवाले परस्त्रियोंमें अत्यन्त मोहित हैं अर्थात् परस्त्रीका सेवन करते हैं उनका तो अधःपात–नरक जाना निश्चित ही है ऐसे लोग पूजा करने योग्य कैसे हो सकते हैं ? ॥१५५-१५६॥


देवी पुनरुवाचेदं सहसा कमलेक्षणा । अहो धर्मपरो जातु भवान् भूपालनोद्यतः ॥१५७॥

अर्थ: तदनन्तर कमललोचना देवी चन्द्राभाने बीचमें ही बात काटते हुए कहा कि अहो ! आप बड़े धर्मात्मा हैं ? तथा पृथिवीका पालन करनेमें उद्यत हैं ॥१५७॥


महान् यद्येष दोषोऽस्ति परदारैषिणां नृणाम् । एतं निग्रहमुर्वीश न करोषि किमात्मनः ॥१५८॥

अर्थ: यदि परदाराभिलाषी मनुष्योंका यह बड़ा भारी दोष माना जाता है तो हे राजन् ! अपने आपके लिए भी आप यह दण्ड क्यों नहीं देते ? ॥१५८॥


प्रथमस्तु भवानेव परदाराभिगामिनाम् । कोऽन्येषां क्रियते दोषो यथा राजा तथा प्रजाः ॥१५९॥

अर्थ: परस्त्रीगामियोंमें प्रथम तो आप ही हैं फिर दूसरोंको दोष क्यों दिया जाता है क्योंकि यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है कि जैसा राजा होता है वैसी प्रजा होती है ॥१५९॥


स्वयमेव नृपो यत्र नृशंसः पारदारिकः । तत्र किं व्यवहारेण कारणं स्वस्थतां व्रज ॥१६०॥

अर्थ: जहाँ राजा स्वयं क्रूर एवं परस्त्रीगामी है वहाँ व्यवहार-अभियोग देखनेसे क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ? सर्वप्रथम आप स्वस्थताको प्राप्त होइए ॥१६०॥


येन बीजाः प्ररोहन्ति जगत्तो यच्च जीवनम् । जातस्ततो जलाद्वह्निः किमिहापरमुच्यताम् ॥१६१॥

अर्थ: जिससे अङ्कुरोंकी उत्पत्ति होती है तथा जो जगत्का जीवनस्वरूप है उस जलसे भी यदि अग्नि उत्पन्न होती है तब फिर और क्या कहा जाय ? ॥१६१॥


उपलभ्येदृशं वाक्यं प्रतिरुद्धोऽभवन्मधुः । एवमेवेति तां देवीं पुनः पुनरभाषत ॥१६२॥

अर्थ: इस प्रकारके वचन सुनकर राजा मधु निरुत्तर हो गया और ‘इसी प्रकार है’ यह वचन बार-बार चन्द्राभासे कहने लगा ॥१६२॥


तथाप्यैश्वर्यपाशेन वेष्टितो दुःसुखोदधेः । भोगसंवर्त्तनी येन कर्मणा नावमुच्यते ॥१६३॥

अर्थ: इतना सब हुआ फिर भी ऐश्वर्यरूपी पाशसे वेष्टित हुआ वह दुःखरूपी सागरसे निकल नहीं सका सो ठीक है क्योंकि भोगोंमें आसक्त मनुष्य कर्मसे छूटता नहीं है ॥१६३॥


द्राघीयसि गते काले सुप्रबोधसुखान्विते । सिंहपादाह्वयः साधुः प्राप्तोऽयोध्यां महागुणः ॥१६४॥

अर्थ: अथानन्तर सम्यक्प्रबोध और सुखसे सहित बहुत भारी समय बीत जानेके बाद एक बार महागुणोंके धारक सिंहपादनामक मुनि अयोध्या आये ॥१६४॥


सहस्राम्रवने कान्ते मुनीन्द्रं समवस्थितम् । श्रुत्वा मधुः समायासीत्सपत्नीकः सहानुगः ॥१६५॥

अर्थ: और वहाँके अत्यन्त सुन्दर सहस्राम्र वनमें ठहर गये । यह सुन अपनी पत्नी तथा अनुचरोंसे सहित राजा मधु उनके पास गया ॥१६५॥


गुरुं प्रणम्य विधिना संविश्य धरणीतले । धर्मं संश्रुत्य जैनेन्द्रं भोगेभ्यो विरतोऽभवत् ॥१६६॥

अर्थ: वहाँ विधिपूर्वक गुरुको प्रणामकर वह पृथिवीतलपर बैठ गया तथा जिनेन्द्र प्रतिपादित धर्म श्रवणकर भोगोंसे विरक्त हो गया ॥१६६॥


राजपुत्री महागोत्रा रूपेणाप्रतिमा भुवि । अत्याक्षीदधिराज्यं च ज्ञात्वा दुर्गतिवेदनाम् ॥१६७॥

अर्थ: जो उच्च कुलीन थी तथा सौन्दर्यके कारण जो पृथ्वीपर अपनी सानी नहीं रखती थी ऐसी राजपुत्री तथा विशाल राज्यको उसने दुर्गतिकी वेदना जान तत्काल छोड़ दिया ॥१६७॥


विदित्वैश्वर्यमानाय्यं मुनीभूतः स कैटभः । महाचर्यासमाक्लिष्टो विजहार महीं मधुः ॥१६८॥

अर्थ: उधर मधुका भाई कैटभ भी ऐश्वर्यको चञ्चल जानकर मुनि हो गया । तदनन्तर मुनिव्रतरूपी महाचर्यासे क्लेशका अनुभव करता हुआ मधु पृथ्वीपर विहार करने लगा ॥१६८॥


ररक्ष माधवीं क्षोणीं राज्यं च कुलवर्द्धनः । सर्वस्य नयनानन्दः स्वजनस्य परस्य च ॥१६९॥

अर्थ: स्वजन और परजन-सभीके नेत्रोंको आनन्द देनेवाला कुलवर्धन राजा मधुकी विशाल पृथ्वी और राज्यका पालन करने लगा ॥१६९॥


मधुः सुघोरं परमं तपश्चरन्महामनाः वर्षशतानि भूरिशः । विधाय कालं विधिनाऽऽरणाच्युते जगाम देवेन्द्रपदं रणच्युतः ॥१७०॥

अर्थ: महामनस्वी मधुमुनि सैकड़ों वर्षों तक अत्यन्त कठिन एवं उत्कृष्ट तपश्चरण करते रहे । अन्तमें विधिपूर्वक मरणकर रणसे रहित आरणाच्युत स्वर्गमें इन्द्रपदको प्राप्त हुए ॥१७०॥


अयं प्रभावो जिनशासनस्य यदिन्द्रतापीदृशपूर्ववृत्तैः । को विस्मयो वा त्रिदशेश्वरत्वे प्रयान्ति यन्मोक्षपुरं प्रयत्नात् ॥१७१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो ! जिनशासनका प्रभाव आश्चर्यकारी है क्योंकि जिनका पूर्वजीवन ऐसा निन्दनीय रहा उन लोगोंने भी इन्द्रपद प्राप्त कर लिया । अथवा इन्द्रपद प्राप्त कर लेनेमें क्या आश्चर्य है ? क्योंकि प्रयत्न करनेसे तो मोक्षनगर तक पहुँच जाते हैं ॥१७१॥


मधोरिन्द्रस्य संभूतिरेषा ते कथिता मया । सीता यस्य प्रतिस्पर्द्धी संभूतः पाकशासनः ॥१७२॥

अर्थ: हे श्रेणिक ! मैंने तेरे लिए उस मधु इन्द्रकी उत्पत्ति कही जिसकी कि प्रतिस्पर्धा करनेवाली सीता प्रतीन्द्र हुई है ॥१७२॥


अतः परं चित्तहरं मनीषिणां कुमारवीराष्टकचेष्टितं परम् । वदामि पापस्य विनाशकारणं कुरु श्रुतौ श्रेणिक भूभृतां रवे ॥१७३॥

अर्थ: हे राजाओंके सूर्य ! श्रेणिक महाराज ! अब मैं इसके आगे विद्वानोंके चित्तको हरनेवाला, आठ वीर कुमारोंका वह चरित्र कहता हूँ कि जो पापका नाश करनेवाला है, उसे तू श्रवण कर ॥१७३॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे मधूपाख्यानं नाम नवोत्तरशतं पर्व ॥१०९॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें मधुका वर्णन करनेवाला एक सौ नौवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥१०९॥


११०. दशाधिकशतं पर्व

काञ्चनस्थाननाथस्य तनये रूपगर्विते । द्वे काञ्चनरथस्याऽऽस्तां ययोर्माता शतह्रदा ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर काञ्चनस्थान नामक नगरके राजा काञ्चनरथकी दो पुत्रियाँ थीं जो सौन्दर्यके गर्वसे गर्वित थीं तथा जिनकी माताका नाम शतह्रदा था ॥१॥


तयोः स्वयंवरार्थेन समस्तान् भूनभश्चरान् । आह्वाययत्पिता प्रीत्या लेखवाहैर्महाजवैः ॥२॥

अर्थ: उन दोनों कन्याओंके स्वयंवरके लिए उनके पिताने महावेगशाली पत्रवाहक दूत भेजकर समस्त भूमिगोचरी और विद्याधर राजाओंको बुलवाया ॥२॥


दत्तो विज्ञापितो लेखो विनीतापतये तथा । स्वयंवरविधानं मे दुहितुश्चिन्त्यतामिति ॥३॥

अर्थ: एक पत्र इस आशयका अयोध्याके राजाके पास भी भेजा गया कि मेरी पुत्रीका स्वयंवर है अतः विचारकर कुमारोंको भेजिए ॥३॥


ततस्तौ रामलक्ष्मीशौ समुत्पन्नकुतूहलौ । ऋद्ध्या परमया युक्तान् सर्वान् प्राहिणुतां सुतान् ॥४॥

अर्थ: तदनन्तर जिन्हें कुतूहल उत्पन्न हुआ था ऐसे राम और लक्ष्मणने परम सम्पदासे युक्त अपने सब कुमार वहाँ भेजे ॥४॥


ततः कुमारधीरास्ते कृत्वाऽग्रे लवणाङ्कुशौ । प्रययुः काञ्चनस्थानं सुप्रेमाणः परस्परम् ॥५॥

अर्थ: तत्पश्चात् परस्पर प्रेमसे भरे हुए, वे सब कुमार, लवण और अंकुशको आगेकर काञ्चनस्थानकी ओर चले ॥५॥


विमानशतमारूढा विद्याधरगणावृताः । श्रिया देवकुमाराभा वियन्मार्गं समागताः ॥६॥

अर्थ: सैकड़ों विमानोंमें बैठे, विद्याधरोंके समूहसे आवृत एवं लक्ष्मीसे देवकुमारोंके समान दिखनेवाले वे सब कुमार आकाश-मार्गसे जा रहे थे ॥६॥


आपूर्यमाणसत्सैन्याः पश्यन्तो दूरगां महीम् । काञ्चनस्यन्दनस्याऽऽयुः पुटभेदनमुत्तमम् ॥७॥

अर्थ: जिनकी सेना उत्तरोत्तर बढ़ रही थी तथा जो दूर छूटी पृथिवीको देखते जाते थे ऐसे सब कुमार काञ्चनरथके उत्तम नगरमें पहुँचे ॥७॥


यथार्हं द्वे अपि श्रेण्यौ निविष्टे तत्र रेजतुः । सदसीव सुधर्मायां नानालङ्कारभूषिते ॥८॥

अर्थ: वहाँ देव-सभाके समान सुशोभित सभामें नाना अलंकारोंसे भूषित यथायोग्य स्थापित विद्याधरों और भूमिगोचरियोंकी दोनों श्रेणियाँ सुशोभित हो रहीं थीं ॥८॥


समस्तविभवोपेता नरेन्द्रास्तत्र रेजिरे । विचित्रकृतसच्चेष्टास्त्रिदशा इव नन्दने ॥९॥

अर्थ: समस्त वैभवोंसे सहित राजा नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए उन श्रेणियोंमें उस तरह सुशोभित हो रहे थे जिस तरह कि नन्दन वनमें देव सुशोभित होते हैं ॥९॥


तत्र कन्ये दिनेऽन्यस्मिन्प्रशस्ते कृतमङ्गले । निर्जग्मतुर्निजावासाद्ध्री लक्ष्म्याविव सद्गुणे ॥१०॥

अर्थ: वहाँ दूसरे दिन जिनका मङ्गलाचार किया गया था तथा जो उत्तम गुणोंको धारण करने वाली थी ऐसी दोनों कन्याएँ ह्री और लक्ष्मीके समान अपने निवास-स्थानसे बाहर निकलीं ॥१०॥


देशतः कुलतो वित्ताच्चेष्टितान्नामधेयतः । ताभ्यामकथयत्सर्वान् कञ्चुकी जगतीपतीन् ॥११॥

अर्थ: स्वयंवर-सभामें जो राजा आये थे कंचुकीने उन सबका देश, कुल, धन, चेष्टा तथा नामकी अपेक्षा दोनों कन्याओंके लिए वर्णन किया ॥११॥


प्लवङ्गहरिशार्दूलवृषनागादिकेतनान् । विद्याधरान् सुकन्ये ते आलोकेतां शनैः क्रमात् ॥१२॥

अर्थ: ये सब वानर, सिंह, शार्दूल, वृषभ तथा नाग आदिकी पताकाओंसे सहित विद्याधर बैठे हैं । हे उत्तम कन्याओ ! इन्हें तुम क्रम-क्रम से देखो ॥१२॥


दृष्ट्वा निश्चित्य ते प्राप्ता वैलक्ष्यं विहतत्विषः । दृश्यमानाः समारूढास्तुलां सन्देहविग्रहाम् ॥१३॥

अर्थ: उन कन्याओंको देखकर जो लज्जाको प्राप्त हो रहे थे तथा जिनकी कान्ति फीकी पड़ गई थी ऐसे राजकुमार उन कन्याओंके द्वारा देखे जाकर संशयकी तराजूपर आरूढ़ हो रहे थे ॥१३॥


द्रक्ष्यन्ते ये तु ते स्वस्य सज्जयन्तो विभूषणम् । नाज्ञासिषुः क्रियाः कृत्यास्तिष्ठाम इति चञ्चलाः ॥१४॥

अर्थ: जो राजकुमार उन कन्याओंके द्वारा देखे जाते थे वे अपने आभूषणोंको सजाते हुए करने योग्य क्रियाओंको भूल जाते थे तथा हम कहाँ बैठे हैं यह भूल चञ्चल हो उठते थे ॥१४॥


प्रवरिष्यति कं त्वेषा रूपगर्वज्वराकुला । मन्येऽस्माकमिति प्राप्ताश्चिन्तां ते चलमानसाः ॥१५॥

अर्थ: सौन्दर्यरूपी गर्वके ज्वरसे आकुल यह कन्या हम लोगोंमेंसे किसे वरेगी इस चिन्ताको प्राप्त हुए राजकुमार चञ्चलचित्त हो रहे थे ॥१५॥


गृहीते किं विजित्यैते सुरासुरजगद्द्वयम् । पताके कामदेवेन लोकोन्मादनकारणे ॥१६॥

अर्थ: वे उन कन्याओंको देखकर विचार करने लगते थे कि क्या देव और दानवोंके दोनों जगत्को जीतकर कामदेवके द्वारा ग्रहण की हुईं, लोगोंके उन्मादकी कारणभूत ये दो पताकाएँ ही हैं ॥१६॥


अथोत्तमकुमार्यौ ते निरीक्ष्य लवणाङ्कुशौ । विद्धे मन्मथवाणेन निश्चलत्वमुपागते ॥१७॥

अर्थ: अथानन्तर वे दोनों कुमारियाँ लवणाङ्कुशको देख कामबाणसे विद्ध हो निश्चल खड़ी हो गयीं ॥१७॥


महादृष्टयाऽनुरागेण बद्धयातिमनोहरः । अनङ्गलवणोऽग्राहि मन्दाकिन्याऽग्रकन्यया ॥१८॥

अर्थ: उन दोनों कन्याओंमें मन्दाकिनी नामकी जो बड़ी कन्या थी उसने अनुरागपूर्ण महादृष्टिसे अनङ्गलवणको ग्रहण किया ॥१८॥


शशाङ्कवक्त्रया चारुभाग्यया वरकन्यया । शशाङ्कभाग्यया युक्तो जगृहे मदनाङ्कुशः ॥१९॥

अर्थ: और चन्द्रमुखी तथा सुन्दर भाग्यसे युक्त चन्द्र-भाग्या नामकी दूसरी उत्तम कन्याने अपने योग्य मदनाङ्कुशको ग्रहण किया ॥१९॥


ततो हलहलारावस्तस्मिन् सैन्ये समुत्थितः । जयोत्कृष्टहरिस्वानसहितः परमाकुलः ॥२०॥

अर्थ: तदनन्तर उस सेनामें जयध्वनिसे उत्कृष्ट सिंहनादसे सहित हलहलका तीव्र शब्द उठा ॥२०॥


मन्ये व्यपाटयन् व्योम हरितो वा समन्ततः । उड्डीयमानैर्लोकस्य मनोभिः परमत्रपैः ॥२१॥

अर्थ: ऐसा जान पड़ता था कि तीव्र लज्जासे भरे हुए लोगोंके जो मन सब ओर उड़े जा रहे थे उनसे मानों आकाश अथवा दिशाएँ ही फटी जा रही थीं ॥२१॥


अहो सदृशसम्बन्धो दृष्टोऽस्माभिरयं परः । गृहीतो यत्सुकन्याभ्यामेतौ पद्माभनन्दनौ ॥२२॥

अर्थ: उस कोलाहलके बीच समझदार मनुष्य कह रहे थे कि अहो ! हम लोगोंने यह योग्य उत्कृष्ट सम्बन्ध देख लिया जो इन कन्याओंने रामके इन पुत्रोंको ग्रहण किया है ॥२२॥


गम्भीरं भुवनाख्यातमुदारं लवणं गता । मन्दाकिनी यदेतं हि नापूर्णं कृतमेतया ॥२३॥

अर्थ: मन्दाकिनी अर्थात् गङ्गानदी, गम्भीर तथा संसारप्रसिद्ध, लवणसमुद्रके पास गयी है सो इस लवण अर्थात् अनंग लवणके पास जाती हुई इस मन्दाकिनी नामा कन्याने भी कुछ अपूर्ण अयोग्य काम नहीं किया है ॥२३॥


जेतुं सर्वजगत्कान्ति चन्द्रभाग्या समुद्यता । अकरोत्साधु यद्योग्यं मदनाङ्कुशमग्रहीत् ॥२४॥

अर्थ: और सर्व जगत्की कान्तिको जीतनेके लिए उद्यत इस चन्द्रभाग्याने जो मदनांकुशको ग्रहण किया है सो अत्यन्त योग्य कार्य किया है ॥२४॥


इति तत्र विनिश्चेरुः सज्जनानां गिरः पराः । सतां हि साधुसम्बन्धाच्चित्तमानन्दमीयते ॥२५॥

अर्थ: इस प्रकार उस सभामें सज्जनोंकी उत्तम वाणी सर्वत्र फैल रही थी सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम सम्बन्धसे सज्जनोंका चित्त आनन्दको प्राप्त होता ही है ॥२५॥


विशल्यादिमहादेवीनन्दनाश्चारुचेतसः । अष्टौ कुमारवीरास्ते प्रख्याता वसवो यथा ॥२६॥

शतैरर्द्धतृतीयैर्वा भ्रातृणां प्रीतिमानसैः । युक्तास्तारागणान्तस्था ग्रहा इव विरेजिरे ॥२७॥

अर्थ: लक्ष्मणकी विशल्या आदि आठ महादेवियोंके जो आठ वीर कुमार, सुन्दर चित्तके धारक, आठ वसुओंके समान सर्वत्र प्रसिद्ध थे वे प्रीतिसे भरे हुए अपने अढ़ाई सौ भाइयोंसे इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो तारागणोंके मध्यमें स्थित ग्रह ही हों ॥२६-२७॥


बलवन्तः समुद्वृत्तास्तेऽन्ये लक्ष्मणनन्दनाः । क्रोधादुत्पतितुं शक्ता वैदेहीनन्दनौ यतः ॥२८॥

ततोऽष्टाभिः सुकन्याभि स्तद्भ्रातृबलमुद्धतम् । मन्त्रैरिव शमं नीतं भुजङ्गमकुलं चलम् ॥२९॥

अर्थ: वहाँ उन आठके सिवाय बलवान् तथा उत्कट चेष्टाके धारक जो लक्ष्मणके अन्य पुत्र थे वे क्रोधवश लवण और अंकुशकी ओर झपटनेके लिए तत्पर हो गये परन्तु उन सुन्दर कन्याओंको लक्ष्यकर उद्धत चेष्टा दिखानेवाली भाइयोंकी उस सेनाको पूर्वोक्त आठ प्रमुख वीरोंने उस प्रकार शान्त कर दिया जिस प्रकारकी मन्त्र चञ्चल सर्पोंके समूहको शान्त कर देते हैं ॥२८-२९॥


प्रशान्तिं भ्रातरो यात तद्भ्रातृभ्यां समं ननु । किमाभ्यां क्रियते कार्यं कन्याभ्यामधुना शुभाः ॥३०॥

स्वभावाद्वनिता जिह्मा विशेषादन्यचेतसः । ततः सुहृदयस्तासामर्थे को विकृतिं भजेत् ॥३१॥

अपि निर्जितदेवीभ्यामेताभ्यां नास्ति कारणम् । अस्माकं चेत्प्रियं कर्त्तुं निवर्त्तध्वमितो मनः ॥३२॥

अर्थ: उन आठ भाइयोंने अन्य भाइयोंको समझाते हुए कहा कि ‘भाइयो ! तुम सब उन दोनों भाइयोंके साथ शान्तिको प्राप्त होओ । हे भद्र जनो ! अब इन दोनों कन्याओंसे क्या कार्य किया जाना है ? स्त्रियाँ स्वभावसे ही कुटिल हैं फिर जिनका चित्त दूसरे पुरुषमें लग रहा है उनका तो कहना ही क्या है ? इसलिए ऐसा कौन उत्तम हृदयका धारक है जो उनके लिए विकारको प्राप्त हो । भले ही इन कन्याओंने देवियोंको जीत लिया हो फिर भी इनसे हम लोगोंको क्या प्रयोजन है ? इसलिए यदि अपना कल्याण करना चाहते हो तो इनकी ओरसे मनको लौटाओ’ ॥३०-३२॥


एवमष्टकुमाराणां वचनैः प्रग्रहैरिव । तुरङ्गमबलं वृन्दं भ्रातॄणां स्थापितं वशे ॥३३॥

अर्थ: इस तरह उन आठ कुमारोंके वचनोंसे भाइयोंका वह समूह उस प्रकार वशीभूत हो गया जिस प्रकार कि लगामोंसे घोड़ोंका समूह वशीभूत हो जाता है ॥३३॥


वृत्तौ यत्र सुकन्याभ्यां वैदेहीतनुसम्भवौ । प्रदेशे तत्र संवृत्तस्तुमुलस्तूर्यनिस्वनः ॥३४॥

अर्थ: जिस स्थानमें उन उत्तम कन्याओंके द्वारा सीताके पुत्र वरे गये थे वहाँ बाजोंका तुमुलशब्द होने लगा ॥३४॥


वंशाः सकाहलाः शङ्खा भम्भोभेर्यः सझर्झराः । मनःश्रोत्रहरं नेदुर्व्याप्तदूरदिगन्तराः ॥३५॥

अर्थ: बहुत दूर तक दिग्-दिगन्तको व्याप्त करनेवाले, बाँसुरी, काहला, शंख, भंभा, भेरी तथा झर्झर आदि बाजे मन और कानोंको हरण करने वाले मनोहर शब्द करने लगे ॥३५॥


स्वायंवरीं समालोक्य विभूतिं लक्ष्मणात्मजाः । शुशुचुर्वीक्ष्य देवैन्द्रीमिव क्षुद्रर्धयः सुराः ॥३६॥

अर्थ: जिस प्रकार इन्द्रकी विभूति देख क्षुद्र ऋद्धिके धारक देव शोकको प्राप्त हो जाते हैं उसी प्रकार स्वयंवरकी विभूति देख लक्ष्मणके पुत्र क्षोभको प्राप्त हो गये ॥३६॥


नारायणस्य पुत्राः स्मो द्युतिकान्तिपरिच्छदाः । नवयौवनसम्पन्नाः सुसहाया बलोत्कटाः ॥३७॥

अर्थ: वे सोचने लगे कि हम नारायणके पुत्र हैं, दीप्ति और कान्तिसे युक्त हैं, नवयौवनसे सम्पन्न हैं, उत्तम सहायकोंसे युक्त हैं तथा बलसे प्रचण्ड हैं ॥३७॥


गुणेन केन हीनाः स्म यदेकमपि नो जनम् । परित्यज्य वृत्तावेतौ कन्याभ्यां जानकीसुतौ ॥३८॥

अर्थ: हम लोग किस गुणमें हीन हैं कि जिससे हम लोगोंमेंसे किसी एकको भी इन कन्याओंने नहीं वरा किन्तु उसके विपरीत हम सबको छोड़ जानकीके पुत्रोंको वरा ॥३८॥


अथवा विस्मयः कोऽत्र किमपीदं जगद्गतम् । कर्मवैचित्र्ययोगेन विचित्रं यच्चराचरम् ॥३९॥

अर्थ: अथवा इसमें आश्चर्य ही क्या है ? जगत्की ऐसी ही विचित्र चेष्टा है, कर्मोंकी विचित्रताके योगसे यह चराचर विश्व विचित्र ही जान पड़ता है ॥३९॥


प्रागेव यदवाप्तव्यं येन यत्र यथा यतः । तत्परिप्राप्यतेऽवश्यं तेन तत्र तथा ततः ॥४०॥

अर्थ: जिसे जहाँ जिस प्रकार जिस कारणसे जो वस्तु पहले ही प्राप्त करने योग्य होती है उसे वहाँ उसी प्रकार उसी कारणसे वही वस्तु अवश्य प्राप्त होती है ॥४०॥


एवं लक्ष्मणपुत्राणां वृन्दे प्रारब्धशोचने । ऊचे रूपवतीपुत्रः प्रहस्य गतविस्मयः ॥४१॥

स्त्रीमात्रस्य कृते कस्मादेवं शोचत सन्नराः । चेष्टितादिति वो हास्यं परमं समजायत ॥४२॥

अर्थ: इस प्रकार जब लक्ष्मणके पुत्र शोक करने लगे तब जिसका आश्चर्य नष्ट हो गया था ऐसे रूपवतीके पुत्रने हँसकर कहा कि अरे भले पुरुषो ! स्त्री मात्रके लिए इस तरह क्यों शोक कर रहे हो ? तुम लोगोंकी इस चेष्टासे परम हास्य उत्पन्न होता है - अधिक हँसी आ रही है ॥४१-४२॥


किमाभ्यां निर्वृतेर्दूती लब्धा जैनेश्वरी द्युतिः । अबुधा इव यद्व्यर्थं संशोचत पुनः पुनः ॥४३॥

अर्थ: हमें इन कन्याओंसे क्या प्रयोजन है ? हमें तो मुक्तिकी दूती स्वरूप जिनेन्द्रभगवान्की कान्तिकी प्राप्ति हो चुकी है अर्थात् हमारे मनमें जिनेन्द्र मुद्राका स्वरूप मूल रहा है । फिर क्यों मूर्खोंके समान तुम व्यर्थ ही बार-बार इसीका शोक कर रहे हो ? ॥४३॥


रम्भास्तम्भसमानानां निःसाराणां हतात्मनाम् । कामानां वशगाः शोकं हास्यं नो कर्तुमर्हथ ॥४४॥

अर्थ: केलेके स्तम्भके समान निःसार तथा आत्माको नष्ट करनेवाले कामोंके वशीभूत हो तुम लोग शोक और हास्य करनेके योग्य नहीं हो ॥४४॥


सर्वे शरीरिणः कर्मवशे वृत्तिमुपाश्रिताः । न तत्कुरुथ किं येन तत्कर्म परिणश्यति ॥४५॥

अर्थ: सब प्राणी कर्मके वशमें पड़े हुए हैं इसलिए वह काम क्यों नहीं करते कि जिससे वह कर्म नष्ट हो जाता है ॥४५॥


गहने भवकान्तारे प्रणष्टाः प्राणधारिणः । ईदृंक्षि यान्ति दुःखानि निरस्यत ततस्तकम् ॥४६॥

अर्थ: इस संसार रूपी सघन वनमें भूले हुए प्राणी ऐसे दुःखोंको प्राप्त हो रहे हैं इसलिए उस संसार वनको नष्ट करो ॥४६॥


भ्रातरः कर्मभूरेषा जनकस्य प्रसादतः । द्यौरिहावधृतास्माभिर्मोहवेष्टितबुद्धिभिः ॥४७॥

अर्थ: हे भाइयो ! यह कर्मभूमि है परन्तु पिताके प्रसादसे मोहाक्रान्त बुद्धि होकर हम लोग इसे स्वर्ग जैसा समझ रहे हैं ॥४७॥


अङ्कस्थेन पितुर्बाल्ये वाच्यमानं पुरा मया । पुस्तके श्रुतमत्यन्तं सुस्वरं वस्तु सुन्दरम् ॥४८॥

भवानां किल सर्वेषां दुर्लभो मानुषो भवः । प्राप्य तं स्वहितं यो न कुरुते स तु वञ्चितः ॥४९॥

अर्थ: पहले बाल्यावस्थामें पिताकी गोदमें स्थित रहनेवाले मैंने किसीके द्वारा पुस्तकमें बाँची गई एक बहुत ही सुन्दर वस्तु सुनी थी कि सब भवोंमें मनुष्यभव दुर्लभ भव है उसे पाकर जो अपना हित नहीं करता है वह वञ्चित रहता है - ठगाया जाता है ॥४८-४९॥


ऐश्वर्यं पात्रदानेन तपसा लभते दिवम् । ज्ञानेन च शिवं जीवो दुःखदां गतिमंहसा ॥५०॥

अर्थ: यह जीव पात्रदानसे ऐश्वर्यको, तपसे स्वर्गको, ज्ञानसे मोक्षको, और पापसे दुःखदायी गतिको प्राप्त होता है ॥५०॥


पुनर्जन्म ध्रुवं ज्ञात्वा तपः कुर्मो न चेद् वयम् । अवाप्तव्या ततो भूयो दुर्गतिर्दुःखसङ्कटा ॥५१॥

अर्थ: ‘पुनर्जन्म अवश्य होता है’ यह जानकर भी यदि हम तप नहीं करते हैं तो फिरसे दुःखोंसे भरी हुई दुर्गति प्राप्त करनी होगी ॥५१॥


एवं कुमारवीरास्ते प्रतिबोधमुपागताः । संसारसागराऽसातावेदनाऽऽवर्तभीतिगाः ॥५२॥

अर्थ: इस प्रकार संसार-सागरके मध्य दुःखानुभवरूपी भँवरसे भयभीत रहनेवाले वे वीरकुमार प्रतिबोधको प्राप्त हो गये ॥५२॥


त्वरितं पितरं गत्वा प्रणम्य विनयस्थिताः । प्राहुर्मधुरमत्यर्थं रचिताञ्जलिकुड्मलाः ॥५३॥

तात नः शृणु विज्ञातं न विघ्नं कर्तुमर्हसि । दीक्षामुपेतुमिच्छामो व्रज तत्राऽनुकूलताम् ॥५४॥

अर्थ: और शीघ्र ही पिताके पास जाकर तथा प्रणाम कर विनयसे खड़े हो हाथ जोड़ अत्यन्त मधुर स्वरमें कहने लगे कि हे पिताजी ! हमारी प्रार्थना सुनिए। आप विघ्न करनेके योग्य नहीं हैं। हम लोग दीक्षा ग्रहण करना चाहते हैं सो इसमें अनुकूलताको प्राप्त हूजिए ॥५३-५४॥


विद्युदाकालिकं ह्येतज्जगत्सारविवर्जितम् । विलोक्योदीयतेऽस्माकमत्यन्तं परमं भयम् ॥५५॥

अर्थ: इस संसारको बिजलीके समान क्षणभङ्गुर तथा साररहित देखकर हम लोगोंको अत्यन्त तीव्र भय उत्पन्न हो रहा है ॥५५॥


कथञ्चिदधुना प्राप्ता बोधिरस्माभिरुत्तमा । यया नौभूतया पारं प्रयास्यामो भवोदधेः ॥५६॥

अर्थ: हम लोग इस समय किसी तरह उस उत्तम बोधिको प्राप्त हुए हैं कि नौकास्वरूप जिस बोधिके द्वारा संसार-सागरके उस पार पहुँचेंगे ॥५६॥


आशीविषफणाभीमान् कामान् शङ्कासुकानलम् । हेतून् परमदुःखस्य वाञ्छामो दूरमुज्झितुम् ॥५७॥

अर्थ: जो आशीविष-सर्पके फनके समान भयङ्कर हैं, शङ्का अर्थात् भय जिनके प्राण हैं तथा जो परमदुःखके कारण हैं ऐसे भोगोंको हम दूरसे ही छोड़ना चाहते हैं ॥५७॥


नास्य माता पिता भ्राता बान्धवाः सुहृदोऽपि वा । सहायाः कर्मतन्त्रस्य परित्राणं शरीरिणः ॥५८॥

अर्थ: इस कर्माधीन जीवकी रक्षा करनेके लिए न माता सहायक है, न पिता सहायक है, न भाई सहायक है, न कुटुम्बीजन सहायक हैं और न मित्र लोग सहायक हैं ॥५८॥


तात विद्मस्तवाऽस्मासु वात्सल्यमुपमोज्झितम् । मातॄणां च परं ह्येतद्बन्धनं भववासिनाम् ॥५९॥

किं तर्हि सुचिरं सौख्यं भवद्वात्सल्यसंभवम् । भुक्त्वाऽपि विरहोऽवश्यं प्राप्यः क्रकचदारुणः ॥६०॥

अर्थ: हे तात ! हम लोगोंपर आपका तथा माताओंका जो उपमारहित परम वात्सल्य है उसे हम जानते हैं और यह भी जानते हैं कि संसारी प्राणियोंके लिए यही बड़ा बन्धन है परन्तु आपके स्नेहसे होनेवाला सुख क्या चिरकाल तक रह सकता है ? भोगनेके बाद भी उसका विरह अवश्य प्राप्त करना होता है और ऐसा विरह कि जो करोंतके समान भयङ्कर होता है ॥५९-६०॥


अतृप्त एव भोगेषु जीवो दुर्मित्रविभ्रमः । इमं विमोक्ष्यते देहं किं प्राप्तं जायते तदा ॥६१॥

अर्थ: यह जीव भोगोंमें तृप्त हुए बिना ही कुमित्रकी तरह इस शरीरको छोड़ देगा तब क्या प्राप्त हुआ कहलाया ? ॥६१॥


ततो लक्ष्मीधरोऽवोचत्परमस्नेहविह्वलः । आघ्राय मस्तके पुत्रानभीक्ष्य च पुनः पुनः ॥६२॥

एते कैलासशिखरप्रतिमा हेमरत्नजाः । प्रासादाः कनकस्तम्भसहस्रपरिशोभिताः ॥६३॥

नानाकुट्टिमभूभागाश्चारुनिर्व्यूहसङ्गताः । सुसेव्या विमलाः कान्ताः सर्वोपकरणान्विताः ॥६४॥

मलयाचलसद्गन्धमारुताकृष्टषट्पदाः । स्नानादिविधिसम्पत्तियोग्यनिर्मलभूमयः ॥६५॥

शरच्चन्द्रप्रभा गौराः सुरस्त्रीसमयोषितः । गुणैः समाहिताः सर्वैः कल्पप्रासादसन्निभाः ॥६६॥

वीणावेणुमृदङ्गादिसङ्गीतकमनोहराः । जिनेन्द्रचरितासक्तकथात्यन्तपवित्रिताः ॥६७॥

उषित्वा सुखमेतेषु रमणीयेषु वत्सकाः । प्रतिपद्य कथं दीक्षां वत्स्यथान्तर्वनाचलम् ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर परमस्नेहसे विह्वल लक्ष्मण उन पुत्रोंको मस्तकपर सूँघकर तथा पुनः पुनः उनकी ओर देखकर बोले कि ये महल जो कि कैलासके शिखरके समान हैं, सुवर्ण तथा रत्नोंसे निर्मित हैं, सुवर्णके हजारों खम्भोंसे सुशोभित हैं, जिनके फर्सोंकी भूमियाँ नानाप्रकारकी हैं, जो सुन्दर-सुन्दर छज्जोंसे सहित हैं, अच्छी तरह सेवन करने योग्य हैं, निर्मल हैं, सुन्दर हैं, सब प्रकारके उपकरणोंसे सहित हैं, मलयाचल जैसी सुगन्धित वायुसे जिनमें भ्रमर आकृष्ट होते रहते हैं, जहाँ स्नानादि कार्योंके योग्य जुदी-जुदी उज्ज्वल भूमियाँ हैं, जो शरद्ऋतुके चन्द्रमाके समान आभावाले हैं, शुभ्रवर्ण हैं, जिनमें देवाङ्गनाओंके समान स्त्रियोंका आवास है, जो सब प्रकारके गुणोंसे सहित हैं, स्वर्गके भवनोंके समान हैं, वीणा, वेणु, मृदङ्ग आदिके संगीतसे मनोहर हैं और जिनेन्द्र भगवान्के चरित सम्बन्धी कथाओंसे अत्यन्त पवित्र हैं, सामने खड़े हैं सो हे बालको ! इन महलोंमें सुखसे रहकर अब तुम लोग दीक्षा धारणकर वन और पहाड़ोंके बीच कैसे रहोगे ? ॥६२-६८॥


सञ्चय्य स्नेहनिघ्नं मां शोकतप्तां च मातरम् । न युक्तं वत्सका गन्तुं सेव्यतां तावदीशिता ॥६९॥

अर्थ: हे पुत्रो ! स्नेहाधीन मुझे तथा शोकसंतप्त माताको छोड़कर जाना योग्य नहीं है इसलिए ऐश्वर्यका सेवन करो ॥६९॥


स्नेहावासनचित्तास्ते संविमृश्य क्षणं धिया । भवभीता हृषीकाऽऽप्यसौख्यैकान्तपराङ्मुखाः ॥७०॥

उदारवीरतादत्तमहावष्टम्भशालिनः । ऊचुः कुमारवृषभास्तत्त्वविन्यस्तचेतसः ॥७१॥

मातरः पितरोऽन्ये च संसारेऽनन्तशो गताः । स्नेहबन्धनमेतानामेतद्धि चारकं गृहम् ॥७२॥

अर्थ: तदनन्तर स्नेहके दूर करनेमें जिनके चित्त लग रहे थे, जो संसारसे भयभीत थे, इन्द्रियोंसे प्राप्त होने योग्य सुखोंसे एकान्तरूपसे विमुख थे, उदार वीरताके द्वारा दिये हुए आलम्बनसे जो सुशोभित थे तथा तत्त्व विचार करनेमें जिनके चित्त लग रहे थे ऐसे वे सब कुमार बुद्धि द्वारा क्षणभर विचार कर बोले कि इस संसारमें माता-पिता तथा अन्य लोग अनन्तों बार प्राप्त होकर चले गये हैं। यथार्थमें स्नेहरूपी बन्धनको प्राप्त हुए मनुष्योंके लिए यह घर एक बन्दी गृहके समान है ॥७०-७२॥


पापस्य परमारम्भं नानादुःखाभिवर्द्धनम् । गृहपञ्जरकं मूढाः सेवन्ते न प्रबोधिनः ॥७३॥

अर्थ: जिसमें पापका परम आरम्भ होता है तथा जो नाना दुःखोंको बढ़ानेवाला है ऐसे गृहरूपी पिंजड़ेकी मूर्ख मनुष्य ही सेवा करते हैं बुद्धिमान् नहीं ॥७३॥


शारीरं मानसं दुःखं मा भूद्भूयोऽपि नो यथा । तथा सुनिश्चिताः कुर्मः किं वयं स्वस्य वैरिणः ॥७४॥

अर्थ: जिस तरह शारीरिक और मानसिक दुःख हमें पुनः प्राप्त न हों उस तरह ही दृढ़ निश्चय कर हम कार्य करना चाहते हैं। क्या हम अपने आपके वैरी हैं ॥७४॥


निर्दोषोऽहं न मे पापमस्तीत्यपि विचिन्तयन् । मलिनत्वं गृही याति शुक्लांशुकमिव स्थितम् ॥७५॥

अर्थ: गृहस्थ यद्यपि यह सोचता है कि मैं निर्दोष हूँ, मेरे पाप नहीं हैं, फिर भी वह रखे हुए शुक्लवस्त्रके समान मलिनताको प्राप्त हो ही जाता है ॥७५॥


उत्थायोत्थाय यन्नृणां गृहाश्रमनिवासिनाम् । पापे रतिस्ततस्त्यक्तो गृहिधर्मो महात्मभिः ॥७६॥

अर्थ: यतश्च गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले मनुष्योंको उठ-उठकर पापमें प्रीति होती है इसीलिए महात्मा पुरुषोंने गृहस्थाश्रमका त्याग किया है ॥७६॥


भुज्यतां तावदैश्वर्यमिति यत्प्रोक्तवानसि । तदन्धकारकूपे नः क्षिपसि ज्ञानवानपि ॥७७॥

अर्थ: आपने जो कहा है कि अच्छी तरह ऐश्वर्यका उपभोग करो सो आप हमें ज्ञानवान् होकर भी अन्धकूपमें फेंक रहे हैं ॥७७॥


पिबन्तं मृगकं यद्वद्व्याधो हन्ति तृषा जलम् । तथैव पुरुषं मृत्युर्हन्ति भोगैरतृप्तकम् ॥७८॥

अर्थ: जिस प्रकार प्याससे पानी पीते हुए हरिणको शिकारी मार देता है उसी प्रकार भोगोंसे अतृप्त मनुष्यको मृत्यु मार देती है ॥७८॥


विषयप्राप्तिसंसक्तमस्वतन्त्रमिदं जगत् । कामैराशीविषैः साकं क्रीडत्यज्ञमनौषधम् ॥७९॥

अर्थ: विषयोंकी प्राप्तिमें आसक्त, परतन्त्र, अज्ञानी तथा औषधसे रहित यह संसार कामरूपी सापोंके साथ क्रीड़ा कर रहा है । भावार्थ - जिस प्रकार साँपोंके साथ खेलनेवाले अज्ञानी एवं औषधरहित मनुष्य मरणको प्राप्त होता है उसी प्रकार आस्रवबन्ध और संवर निर्जराके ज्ञानसे रहित यह जीव इन्द्रिय भोगोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ मृत्युको प्राप्त होता है ॥७९॥


विषयामिषसंसक्ता मग्ना गृहजलाशये । रुजा वडिशयोगेन नरमीना व्रजन्त्यमुम् ॥८०॥

अर्थ: घररूपी जलाशयमें मग्न तथा विषयरूपी मांसमें आसक्त ये मनुष्यरूपी मच्छ रोगरूपी वंशीके योगसे मृत्युको प्राप्त होते हैं ॥८०॥


अत एव नृलोकेशो जगत्त्रितयवन्दितः । जगत्स्वकर्मणां वश्यं जगाद भगवानृषिः ॥८१॥

अर्थ: इसीलिए मनुष्यलोकके स्वामी, लोकत्रयके द्वारा वन्दित भगवान् जिनेन्द्रने जगत्को अपने कर्मके अधीन कहा है । भावार्थ - भगवान् जिनेन्द्रने बताया है कि संसारके सब प्राणी स्वीकृत कर्मोंके अधीन हैं ॥८१॥


दुरन्तैस्तदलं तात प्रियसङ्गमलोभनैः । विचक्षणजनद्विष्टैस्तडिद्दण्डचलाचलैः ॥८२॥

अर्थ: इसलिए हे तात ! जिनका परिणाम अच्छा नहीं है,प्रियजनोंका समागम जिनका प्रलोभन है, जो विद्वज्जनोंके द्वेषपात्र हैं तथा जो बिजलीके समान चञ्चल हैं ऐसे इन भोगोंसे पूरा पड़े अर्थात् इनकी आवश्यकता नहीं है ॥८२॥


ध्रुवं यदा समासाद्यो विरहो बन्धुभिः समम् । असमञ्जसरूपेऽस्मिन्संसारे का रतिस्तदा ॥८३॥

अर्थ: जब कि बन्धुजनोंके साथ विरह अवश्यंभावी है तब इस अटपटे संसारमें क्या प्रीति करना है ? ॥८३॥


अयं मे प्रिय इत्याऽऽस्थाव्यामोहोपनिबन्धना । एक एव यतो जन्तुर्गत्यागमनदुःखभाक् ॥८४॥

अर्थ: ‘यह मेरा प्यारा है’ ऐसी आस्था केवल व्यामोहके कारण उत्पन्न होती है क्योंकि यह जीव अकेला ही गमनागमनके दुःखको प्राप्त होता है ॥८४॥


वितथागमकुद्वीपे मोहसङ्गतपङ्कके । शोकसंतापफेनाढ्ये भवाऽऽवर्त्तव्रजाकुले ॥८५॥

व्याधिमृत्यूर्मिकल्लोले मोहपातालगह्वरे । क्रोधादिमकरक्रूरनक्रसंघातघट्टिते ॥८६॥

कुहेतुसमयोद्भूतनिर्ह्रादात्यन्तभैरवे । मिथ्यात्वमारुतोद्धूते दुर्गतिक्षारवारिणि ॥८७॥

नितान्तदुःसहोदारवियोगबडवानले । सुचिरं तात खिन्नाः स्मो घोरे संसारसागरे ॥८८॥

अर्थ: मिथ्याशास्त्र ही जिसमें खोटे द्वीप हैं, मोहरूपी कीचड़से जो युक्त है, जो शोक संतापरूपी फेनसे सहित है, जन्मरूपी भँवरोंके समूहसे व्याप्त है, व्याधि तथा मृत्युरूपी तरङ्गोंसे युक्त है, मोहरूपी गहरे गर्तोंसे सहित है, क्रोधादि कषाय रूपी क्रूर मकर और नाकोंके समूहसे लहरा रहा है, मिथ्या तर्कशास्त्रसे उत्पन्न शब्दोंसे अत्यन्त भयंकर है, मिथ्यात्व रूपी वायुके द्वारा कम्पित है, दुर्गतिरूपी खारे पानीसे सहित है और अत्यन्त दुःसह तथा उत्कट वियोग रूपी बड़वानलसे युक्त है ऐसे भयंकर संसार-सागरमें हे तात ! हम लोग बहुत समयसे खेद-खिन्न हो रहे हैं ॥८५-८८॥


नानायोनिषु संभ्रम्य कृच्छ्रात्प्राप्ता मनुष्यताम् । कुर्मस्तथा यथा भूयो मज्जामो नाऽत्र सागरे ॥८९॥

अर्थ: नाना योनियोंमें परिभ्रमण करनेके बाद हम बड़ी कठिनाईसे मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुए हैं इसलिए अब वह काम करना चाहते हैं कि जिससे पुनः इस संसार-सागरमें न डूबें ॥८९॥


ततः परिजनाकीर्णावापृच्छ्य पितरौ क्रमात् । अष्टौ कुमारवीरास्ते निर्जग्मुर्गृहचारकात् ॥९०॥

अर्थ: तदनन्तर परिजनके लोगोंसे घिरे हुए माता-पितासे पूछकर वे आठों वीर कुमार क्रम-क्रमसे घर रूपी कारागारसे बाहर निकले ॥९०॥


आसीन्निःकामतां तेषामीश्वरत्वे तथाविधे । बुद्धिर्जीर्णतृणे यद्वत्संसाराचारवेदिनाम् ॥९१॥

अर्थ: संसार-स्वरूपको जाननेवाले, घरसे निकलते हुए उन वीरोंकी उस प्रकारके विशाल साम्राज्यमें ठीक उस तरहकी अनादर बुद्धि हो रही थी जिस प्रकार कि जीर्ण-तृणमें होती है ॥९१॥


ते महेन्द्रोदयोद्यानं गत्वा संवेगकं ततः । महाबलमुनेः पार्श्वे जगृहुर्निरगारताम् ॥९२॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने महेन्द्रोदय नामा उद्यानमें जाकर संवेगपूर्वक महाबल मुनिके समीप निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण कर ली ॥९२॥


सर्वारम्भविरहिता विहरन्ति नित्यं निरम्बरा विधियुक्तम् । क्षान्ता दान्ता मुक्ता निरपेक्षाः परमयोगिनो ध्यानरताः ॥९३॥

अर्थ: जो सब प्रकारके आरम्भसे रहित थे, दिगम्बर थे, क्षमा युक्त थे, दमन शील थे, सब झंझटोंसे मुक्त थे, निरपेक्ष थे और ध्यानमें तत्पर थे ऐसे वे परम योगी निरन्तर विहार करते रहते थे ॥९३॥


सम्यक्तपोभिः प्रविधूय पापमध्यात्मयोगैः परिरुध्य पुण्यम् । ते क्षीणनिःशेषभवप्रपञ्चाः प्रापुः पदं जैनमनन्तसौख्यम् ॥९४॥

अर्थ: समीचीन तपके द्वारा पापको नष्ट कर, और अध्यात्मयोगके द्वारा पुण्यको रोककर जिन्होंने संसारका समस्त प्रपञ्च नष्ट कर दिया था ऐसे वे आठों मुनि अनन्त सुखसे युक्त निर्वाण पदको प्राप्त हुए ॥९४॥


एतत् कुमाराष्टकमङ्गलं यः पठेद् विनीतः शृणुयाच्च भक्त्या ।
तस्य क्षयं याति समस्तपापं रविप्रभस्योदयते च चन्द्रः ॥९५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य विनीत हो भक्ति पूर्वक इन आठ कुमारोंके मङ्गल-मय चरितको पढ़ता अथवा सुनता है सूर्यके समान कान्तिको धारण करनेवाले उस मनुष्यका सब पाप नष्ट हो जाता है तथा उत्तम चन्द्रमाका उदय होता है ॥९५॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते कुमाराष्टकनिष्क्रमणाभिधानं नाम दशोत्तरशतं पर्व ॥११०॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा प्रणीत पद्मपुराणमें आठ कुमारोंकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला एक सौ दसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११०॥


१११. एकादशोत्तरशतं पर्व (भामण्डलपरलोकाभिगमनं)

गणी वीरजिनेन्द्रस्य प्रथमः प्रथमः सताम् । अवेदयन्मनोयातं प्रभामण्डलचेष्टितम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर वीर जिनेन्द्रके प्रथम गणधर सज्जनोत्तम श्री गौतमस्वामी मनमें आये हुए भामण्डलका चरित्र कहने लगे ॥१॥


विद्याधरमहाकान्तकामिनीवीरुदुद्भवे । सौख्यपुष्पासवे सक्तः प्रभामण्डलषट्पदः ॥२॥

अचिन्तयदहं दीक्षां यद्युपैम्युपवाससाम् । तदैतदङ्गनापद्मखण्डं पद्मत्यसंशयम् ॥३॥

अर्थ: विद्याधरोंकी अन्यन्त सुन्दर स्त्री रूपी लताओंसे उत्पन्न सुख रूपी फूलोंके आसवमें आसक्त भामण्डल रूपी भ्रमर इस प्रकार विचार करता रहता था कि यदि मैं दिगम्बर मुनियोंकी दीक्षा धारण करता हूँ तो यह स्त्रीरूपी कमलोंका समूह निःसन्देह कमलके समान आचरण करता है अर्थात् कमलके ही समान कोमल है ॥२-३॥


एतासां मत्समासक्तचेतसां विरहे मम । वियोगो भविताऽवश्यं प्राणैः सुखमपालितैः ॥४॥

अर्थ: जिनका चित्त मुझमें लग रहा है ऐसी ये स्त्रियाँ मेरे विरहमें अपने प्राणोंका सुखसे पालन नहीं कर सकेंगी अतः उनका वियोग अवश्य हो जायगा ॥४॥


दुस्त्यजानि दुरापानि कामसौख्यान्यवारितम् । भुक्त्वा श्रेयस्करं पश्चात् करिष्यामि ततः परम् ॥५॥

अर्थ: अतएव जिनका छोड़ना तथा पाना दोनों ही कठिन हैं ऐसे इन काम सम्बन्धी सुखोंको पहले अच्छी तरह भोग लूँ बादमें कल्याणकारी कार्य करूँ ॥५॥


भोगैरुपार्जितं पापमत्यन्तमपि पुष्कलम् । सुध्यानवह्निनाऽवश्यं धक्ष्यामि क्षणमात्रतः ॥६॥

अर्थ: यद्यपि भोगोंके द्वारा उपार्जित किया हुआ पाप अत्यन्त पुष्कल होगा तथापि उसे सुध्यान रूपी अग्निके द्वारा एक क्षणमें जला डालूँगा ॥६॥


अत्र सेनां समावेश्य विमानक्रीडनं भजे । उद्वासयामि शत्रूणां नगराणि समन्ततः ॥७॥

अर्थ: यहाँ सेना ठहराकर विमानोंसे क्रीड़ा करूँ और सब ओर शत्रुओंके नगर उजाड़ कर दूँ ॥७॥


मानश्रृङ्गोन्नतेर्भङ्गं करोमि रिपुखड्गिनाम् । स्थापयाम्युभयश्रेण्योर्वशे शासनकारिते ॥८॥

अर्थ: दोनों श्रेणियोंमें शत्रु रूपी गेंडा हाथियोंके मान रूपी शिखरकी जो उन्नति हो रही है उसका भंग करूँ तथा उन्हें आज्ञाके द्वारा किये हुए अपने वशमें स्थापित करूँ ॥८॥


मेरोर्मरकतादीनां रत्नानां विमलेष्वलम् । शिलातलेषु रम्येषु क्रीडामि ललनान्वितः ॥९॥

अर्थ: और मेरु पर्वतके मरकत आदि मणियोंके निर्मल एवं मनोहर शिलातलोंपर स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करूँ ॥९॥


एवमादीनि वस्तूनि ध्यायतस्तस्य जानकेः । समतीयुर्मुहूर्त्तानि संवत्सरशतान्यलम् ॥१०॥

अर्थ: इत्यादि वस्तुओंका विचार करते हुए उस भामण्डलके सैकड़ों वर्ष एक मुहूर्तके समान व्यतीत हो गये ॥१०॥


कृतमेतत्करोमीदं करिष्यामीदमित्यसौ । चिन्तयन्नात्मनोऽवेदी चायुः संहारमागतम् ॥११॥

अर्थ: ‘यह कर चुका, यह करता हूँ और यह करूँगा’ वह यही विचार करता रहता था , पर अपनी आयुका अन्तिम अवसर आ चुका है यह नहीं विचारता था ॥११॥


अन्यदा सप्तमस्कन्धं प्रासादस्याधितिष्ठतः । अपप्तदशनिर्मूर्ध्नि तस्य कालं ततो गतः ॥१२॥

अर्थ: एक दिन वह महलके सातवें खण्डमें बैठा था कि उसके मस्तक पर वज्र गिरा जिससे वह मृत्युको प्राप्त हो गया ॥१२॥


अशेषतो निजं वेत्ति जन्मान्तरविचेष्टितम् । दीर्घसूत्रस्तथाऽप्यात्मसमुद्धारे स नो स्थितः ॥१३॥

अर्थ: यद्यपि वह अपने जन्मान्तरकी समस्त चेष्टाको जानता था तथापि इतना दीर्घसूत्री था कि आत्म-कल्याणमें स्थित नहीं हुआ ॥१३॥


तृष्णाविषादहन्तृणां क्षणमप्यस्ति नो शमः । मूर्धोपकण्ठदत्ताङ्घ्रिर्मृत्युः कालमुदीक्षते ॥१४॥

अर्थ: तृष्णा और विषादको नष्ट करनेवाले मनुष्योंको क्षणभरके लिए भी शान्ति नहीं होती क्योंकि उनके मस्तकके समीप पैर रखनेवाला मृत्यु सदा अवसरकी प्रतीक्षा किया करता है ॥१४॥


अस्य दग्धशरीरस्य कृते क्षणविनाशिनः । हताशः कुरुते किं न जीवो विषयदासकः ॥१५॥

अर्थ: क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाले इस अधम शरीरके लिए, विषयोंका दास हुआ यह नीच प्राणी क्या क्या नहीं करता है ? ॥१५॥


ज्ञात्वा जीवितमानाय्यं त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहम् । स्वहिते वर्त्तते यो न स नश्यत्यकृतार्थकः ॥१६॥

अर्थ: जो मनुष्य-जीवनको भङ्गुर जान समस्त परिग्रहका त्यागकर आत्महितमें प्रवृत्ति नहीं करता है वह अकृतकृत्य दशामें ही नष्ट हो जाता है ॥१६॥


सहस्रेणापि शास्त्राणां किं येनात्मा न शाम्यति । तृप्तमेकपदेनाऽपि येनाऽऽत्मा शममश्नुते ॥१७॥

अर्थ: उन हजार शास्त्रोंसे भी क्या प्रयोजन है जिससे आत्मा शान्त नहीं होती और वह एक पद भी बहुत है जिससे आत्मा शान्ति को प्राप्त हो जाता है ॥१७॥


कर्त्तुमिच्छति सद्धर्मं न करोति यथाप्ययम् । दिवं यियासुर्विच्छिन्नपक्षः काक इव श्रमम् ॥१८॥

अर्थ: जिस प्रकार कटे पक्षका काक आकाशमें उड़ना तो चाहता पर वैसा श्रम नहीं करता उसी प्रकार यह जीव सद्धर्म करना तो चाहता है पर यह जैसा चाहिए वैसा श्रम नहीं करता ॥१८॥


निमुक्तो व्यवसायेन लभते चेत्समीहितम् । न लोके विरही कश्चिद्भवेद्दविणोऽपि वा ॥१९॥

अर्थ: यदि उद्योगसे रहित मनुष्य इच्छानुकूल पदार्थको पाने लगें तो फिर संसारमें कोई भी विरही अथवा दरिद्र नहीं होना चाहिए ॥१९॥


अतिथिं द्वार्गतं साधुं गुरुवाक्यं प्रतिक्रियाम् । प्रतीक्ष्य सुकृतं चाशु नावसीदति मानवः ॥२०॥

अर्थ: जो मनुष्य द्वारपर आये हुए अतिथि साधुको आहार आदि दान देता है तथा गुरुओंके वचन सुन तदनुकूल शीघ्र आचरण करता है वह कभी दुःखी नहीं होता ॥२०॥


नानाव्यापारशतैराकुलहृदयस्य दुःखिनः प्रतिदिवसम् । रत्नमिव करतलस्थं भ्रश्यत्यायुः प्रमादतः प्राणभृतः ॥२१॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि नाना प्रकारके सैकड़ों व्यापारोंसे जिसका हृदय आकुल हो रहा है तथा इसीके कारण जो प्रतिदिन दुःखका अनुभव करता रहता है ऐसे प्राणीकी आयु हथेलीपर रखे रत्नके समान नष्ट हो जाती है ॥२१॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाऽऽचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे भामण्डलपरलोकाभिगमनं नामैकादशोत्तरशतं पर्व ॥१११॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्मपुराणमें भामण्डलके परलोकगमनका वर्णन करनेवाला एक सौ ग्यारहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१११॥

११२. द्वादशोत्तरशतं पर्व (हनुमन्निर्वेदं)

अथ याति शनैः कालः पद्मचक्राङ्कराजयोः । परस्परमहास्नेहबद्धयोस्त्रिविधः सुखम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर पारस्परिक महास्नेहसे बँधे राम-लक्ष्मणका, उष्ण वर्षा और शीतके भेदसे तीन प्रकारका काल धीरे-धीरे व्यतीत हो रहा था ॥१॥


परमैश्वर्यतानोरू राजीववनवर्त्तिनौ । यथा चन्दनदत्तौ तौ मोदेते नरकुञ्जरौ ॥२॥

अर्थ: परम ऐश्वर्यके समूहरूपी कमलवनमें विद्यमान रहनेवाले वे दोनों पुरुषोत्तम चन्दनसे लिप्त हुएके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२॥


शुष्यन्ति सरितो यस्मिन् काले दावाग्निसंकुले । तिष्ठन्त्यभिमुखा भानोः श्रमणाः प्रतिमागताः ॥३॥

तत्र तावति रम्येषु जलयन्त्रेषु सद्मसु । उद्यानेषु च निःशेषप्रियसाधनशालिषु ॥४॥

अर्थ: जिस समय नदियाँ सूख जाती हैं, वन दावानलसे व्याप्त हो जाते हैं और प्रतिमायोगको धारण करनेवाले मुनि सूर्यके सम्मुख खड़े रहते हैं । उस समय राम-लक्ष्मण, जलके फव्वारोंसे युक्त सुन्दर महलोंमें तथा समस्त प्रिय उपकरणोंसे सुशोभित उद्यानोंमें क्रीड़ा करते थे ॥३-४॥


चन्दनाम्बुमहामोदशीतशीकरवर्षिभिः । चामरैरुपवीज्यन्तौ तालवृन्तैश्च सत्तमैः ॥५॥

स्वच्छस्फटिकपट्टस्थौ चन्दनद्रवचर्चितौ । जलार्द्रनलिनीपुष्पदलमूलौघसंस्तरौ ॥६॥

एलालवङ्गकर्पूरक्षोदसंसर्गशीतलम् । विमलं सलिलं स्वादु सेवमानौ मनोहरम् ॥७॥

विचित्रसङ्कथादक्षवनिताजनसेवितौ । शीतकालमिवाऽऽनीतं बलाद्धारयतः शुचौ ॥८॥

अर्थ: चन्दनमिश्रित जलके महासुगन्धित शीतलकणोंको बरसानेवाले चमरों तथा उत्तमोत्तम पङ्खोंसे वहाँ उन्हें हवा की जाती थी । वहाँ वे स्फटिकके स्वच्छ पटियोंपर बैठते थे, चन्दनके द्रवसे उनके शरीर चर्चित रहते थे, जलसे भीगे कमलपुष्पोंकी कलियोंके समूहसे बने विस्तरोंपर शयन करते थे । इलायची लौंग कपूरके चूर्णके संसर्गसे शीतल निर्मल स्वादिष्ट और मनोहर जलका सेवन करते थे, और नानाप्रकारकी कथाओंमें दक्ष स्त्रियाँ उनकी सेवा करती थीं । इस प्रकार ऐसा जान पड़ता था मानो वे ग्रीष्म कालमें भी शीतकालको पकड़कर बलात् धारण कर रहे थे ॥५-८॥


योगिनः समये यत्र तरुमूलव्यवस्थिताः । क्षपयन्त्यशुभं कर्म धारानिर्धूतमूर्त्तयः ॥९॥

अर्थ: जिनका शरीर जलकी धाराओंसे धुल गया है ऐसे मुनिराज जिस समय वृक्षोंके मूलमें बैठकर अपने अशुभ कर्मोंका क्षय करते हैं ॥९॥


विलसद्विद्युदुद्योते तत्र मेघान्धकारिते । बृहद्घर्घरनीरौघे कूलमुद्रुजसिन्धुके ॥१०॥

मेरुशृङ्गसमाकारवर्त्तिनौ वरवाससौ । कुङ्कुमद्रवदिग्धाङ्गावुपयुक्तामितागुरू ॥११॥

महाविलासिनीनेत्रभृङ्गौघकमलाकरौ । तिष्ठतः सुन्दरीक्रीडौ यक्षेन्द्राविव तौ सुखम् ॥१२॥

अर्थ: जहाँ कहीं कौंधती हुई बिजलीके द्वारा प्रकाश फैल जाता है तो कहीं मेघोंके द्वारा अन्धकार फैला हुआ है, जहाँ जलके प्रवाह विशाल घर्-घर् शब्द करते हुए बहते हैं और जहाँ किनारोंको ढहाकर बहा ले जानेवाली नदियाँ बहती हैं, उस वर्षाकालमें वे मेरुके शिखरके समान उन्नत महलोंमें विद्यमान रहते थे, उत्तम वस्त्र धारण करते थे, कुङ्कुम-केशरके द्रवसे उनके शरीर लिप्त रहते थे, अपरिमित अगुरुचन्दनका वे उपयोग करते थे । महाविलासिनी स्त्रियोंके नेत्र रूप भ्रमर समूहके लिए वे कमलवनके समान सुखकारी थे और सुन्दरी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करते हुए यक्षेन्द्रके समान सुखसे विद्यमान रहते थे ॥१०-१२॥


प्रालेयपटसंवीता धर्मध्यानस्थचेतसः । तिष्ठन्ति योगिनो यत्र निशि स्थण्डिलपृष्ठगाः ॥१३॥

तत्र काले महाचण्डशीतवाताहतद्रुमे । पद्माकरसमुत्सादे दापितोष्णकरोद्गमे ॥१४॥

प्रासादावनिकुक्षिस्थौ तिष्ठतस्तौ यथेप्सितम् । श्रीमद्यवतिवक्षोजक्रीडालम्बनवक्षसौ ॥१५॥

वीणामृदङ्गवंशादिसम्भूतं मधुरस्वरम् । कुर्वाणौ मनसि स्वेच्छं परं श्रोत्ररसायनम् ॥१६॥

वाणीनिर्जितवीणाभिरनुकूलाभिरादरात् । सेव्यमानौ वरस्त्रीभिरमरीभिरिवामरौ ॥१७॥

नक्तं दिनं परिस्फीतभोगसम्पत्समन्वितौ । सुखं तौ नयतः कालं सर्वपुण्यानुभावतः ॥१८॥

अर्थ: जिस कालमें रात्रिके समय धर्मध्यानमें लीन, एवं वनके खुले चबूतरोंपर बैठे मुनिराज बर्फरूपी वस्त्रसे आवृत हो स्थित रहते हैं, जहाँ अत्यन्त शीत वायुसे वृक्ष नष्ट हो जाते हैं, कमलोंके वन सूख जाते हैं और जहाँ लोग सूर्योदयको अत्यन्त पसन्द करते हैं ऐसे शीतकालमें वे महलोंके गर्भगृहमें इच्छानुसार रहते थे, उनके वक्षःस्थल तरुण स्त्रियोंके स्तनोंकी क्रीड़ाके आधार थे, वीणां, मृदङ्ग, बाँसुरी आदिसे उत्पन्न, कानोंके लिए उत्तम रसायनस्वरूप मधुरस्वरको वे अपनी इच्छानुसार करते थे, जिन्होंने अपनी वाणीसे वीणाको जीत लिया था ऐसी अनुकूल स्त्रियाँ बड़े आदरसे उनकी सेवा करती थीं और इसीलिए वे देवियोंके द्वारा सेवित देवोंके समान जान पड़ते थे । इस प्रकार वे पुण्यकर्मके प्रभावसे रातदिन अत्यधिक भोगसम्पदासे युक्त रहते हुए सुखसे समय व्यतीत करते थे ॥१३-१८॥


एवं तौ तावदासेते पुरुषौ जगदुत्कटौ । अथ श्रीशैलवीरस्य वृत्तान्तं शृणु पार्थिव ॥१९॥

अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि इस तरह वे दोनों लोकोत्तम पुरुष सुखसे विद्यमान थे । हे राजन् ! अब वीर हनूमान्का वृत्तान्त सुन ॥१९॥


सेवते परमैश्वर्यं नगरे कर्णकुण्डले । पूर्वपुण्यानुभावेन स्वर्गीवानिलनन्दनः ॥२०॥

अर्थ: पूर्वपुण्यके प्रभावसे हनूमान् कर्णकुण्डल नगरमें देवके समान परम ऐश्वर्यका उपभोग कर रहा था ॥२०॥


विद्याधरमहत्त्वेन सहितः परमक्रियः । स्त्रीसहस्रपरीवारः स्वेच्छयाऽटति मेदिनीम् ॥२१॥

अर्थ: विद्याधरोंके माहात्म्यसे सहित तथा उत्तमोत्तम क्रियाओंसे युक्त हनूमान् हजारों स्त्रियोंका परिवार लिये इच्छानुसार पृथ्वीमें भ्रमण करता था ॥२१॥


वरं विमानमारूढः परमर्द्धिसमन्वितः । सत्काननादिषु श्रीमाँस्तदा क्रीडति देववत् ॥२२॥

अर्थ: उत्तम विमानपर आरूढ तथा उत्तम विभूतिसे युक्त श्रीमान् हनूमान् उत्तम वन आदि प्रदेशोंमें देवके समान क्रीड़ा करता था ॥२२॥


अन्यदा जगदुन्मादहेतौ कुसुमहासिनि । वसन्तसमये प्राप्ते प्रियामोदनभस्वति ॥२३॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय जगत्के उन्मादका कारण, फूलोंसे सुशोभित एवं प्रिय सुगन्धित वायुके संचारसे युक्त वसन्तऋतु आई ॥२३॥


जिनेन्द्रभक्तिसंवीतमानसः पवनात्मजः । हृष्टः सम्प्रस्थितो मेरुमन्तःपुरसमन्वितः ॥२४॥

अर्थ: सो उस समय जिनेन्द्र भक्तिसे जिसका चित्त व्याप्त था ऐसा हर्षसे भरा हनूमान् अन्तःपुरके साथ मेरुपर्वतकी ओर चला ॥२४॥


नानाकुसुमरम्याणि सेवितानि द्युवासिभिः । कुलपर्वतसानूनि प्रस्थितः सोऽवतिष्ठते ॥२५॥

अर्थ: वह बीचमें नाना प्रकारके फूलोंसे मनोहर और देवोंके द्वारा सेवित कुलाचलोंके शिखरोंपर ठहरता जाता था ॥२५॥


मत्तभृङ्गान्यपुष्टौघनादवन्ति मनोहरैः । सरोभिर्दर्शनीयानि स वनानि च भूरिशः ॥२६॥

मिथुनैरुपभोग्यानि पत्रपुष्पफलैस्तथा । काननानि विचित्राणि रत्नोद्योतितपर्वतान् ॥२७॥

सरितो विशदद्वीपा नितान्तविमलाम्भसः । वापीः प्रवरसोपानास्तटस्थोत्तुङ्गपादपाः ॥२८॥

नानाजलजकिञ्जल्ककिर्मीरसलिलानि च । सरांसि मधुरस्वानैः सेवितानि पतत्रिभिः ॥२९॥

महातरङ्गसङ्घोत्थफेनमालाट्टहासिनीः । महायादोगणाकीर्णा बहुचित्रा महानदीः ॥३०॥

विलसद्वनमालाभिर्युक्तान्युपवनैर्वरैः । मनोहरणदक्षाणि चित्राण्यायतनानि च ॥३१॥

जिनेन्द्रवरकूटानि नानारत्नमयानि च । कल्मषक्षोददक्षाणि युक्तमानान्यनेकशः ॥३२॥

एवमादीनि वस्तूनि वीक्षमाणः शनैः शनैः । सेव्यमानश्च कान्ताभिर्यात्यसौ परमोदयः ॥३३॥

अर्थ: जिनमें मदोन्मत्त भ्रमर और कोयलोंके समूह शब्द कर रहे थे, तथा जो मनोहर सरोवरोंसे दर्शनीय थे ऐसे अनेकों वन, पत्र, पुष्प और फलोंके कारण जो स्त्री-पुरुषोंके युगलसे सेवनीय थे ऐसे विचित्र वन, रत्नोंसे जगमगाते हुए पर्वत, जिनमें निर्मल टापू थे तथा अत्यन्त स्वच्छ पानी भरा था ऐसी नदियाँ, जिनमें उत्तम सीढ़ियाँ लगी थीं तथा जिनके तटोंपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष खड़े थे ऐसी वापिकाएँ, नानाप्रकारके कमलोंकी केशरसे जिनका पानी चित्र-विचित्र हो रहा था तथा जो मधुर शब्द करनेवाले पक्षियोंसे सेवित थे ऐसे सरोवर, जो बड़ी-बड़ी तरङ्गोंके साथ उठी हुई फेनपङ्क्तिसे मानो अट्टहास कर रही थीं तथा जो बड़े-बड़े जल-जन्तुओंसे व्याप्त थीं ऐसी अनेक आश्चर्योंसे भरी महानदियाँ, सुशोभित वन-पंक्तियों एवं उत्तमोत्तम उपवनोंसे युक्त तथा मनको हरण करनेमें निपुण नाना प्रकारके भवन, और नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित, पाप नष्ट करनेमें समर्थ तथा योग्य प्रमाणसे युक्त अनेकों जिनकूट इत्यादि वस्तुओंको देखता तथा स्त्रियोंके द्वारा सेवित होता हुआ परम अभ्युदयका धारक हनूमान् धीरे-धीरे चला जा रहा था ॥२६-३३॥


नभःशिरःसमारूढो विमानशिखरस्थितः । दर्शयन् याति तद्वस्तु कान्तां हृष्टतनूरुहः ॥३४॥

अर्थ: जो आकाशमें बहुत ऊँचे चढ़कर विमानके शिखरपर स्थित था तथा जिसके रोमाञ्च निकल रहे थे ऐसा वह हनूमान् स्त्रीके लिए तत् तत् वस्तुएँ दिखाता हुआ जा रहा था ॥३४॥


पश्य पश्य प्रिये धामान्यतिरम्याणि मन्दरे । स्नपनानि जिनेन्द्राणाममूनि शिखरान्तिके ॥३५॥

अर्थ: वह कहता जाता था कि हे प्रिये ! देखो देखो, सुमेरु पर्वतपर शिखरके समीप वे कितने सुन्दर स्थान हैं वहीं जिनेन्द्र भगवान्‌के अभिषेक हुआ करते हैं ॥३५॥


नानारत्नशरीराणि भास्करप्रतिमानि च । शिखराणि मनोज्ञानि तुङ्गानि विपुलानि च ॥३६॥

अर्थ: ये नाना रत्नोंसे निर्मित; सूर्य तुल्य, मनोहर, ऊँची और बड़े-बड़े शिखर देखो ॥३६॥


गुहा मनोहरद्वारा गम्भीरा रत्नदीपिताः । परस्परसमाकीर्णा दीधितीरतिदूरगाः ॥३७॥

अर्थ: इन मनोहर द्वारोंसे युक्त तथा रत्नों से आलोकित गम्भीर गुफाओं और परस्पर एक दूसरेसे मिलीं, दूर-दूर तक फैलनेवाली किरणों को देखो ॥३७॥


इदं महीतले रम्यं भद्रशालाह्वयं वनम् । मेखलायामिदं तच्च नन्दनं प्रथितं भुवि ॥३८॥

इदं वक्षःप्रदेशस्य कल्पद्रुमलतात्मकम् । नानारत्नशिलाशोभि वनं सौमनसं स्थितम् ॥३९॥

जिनागारसहस्राढ्यं त्रिदशक्रीडनोचितम् । पाण्डुकाख्यं वनं भाति शिखरे सुमनोहरम् ॥४०॥

अर्थ: यह पृथिवीतलपर मनोहर भद्रशाल वन है, यह मेखलापर स्थित जगत्प्रसिद्ध नन्दन वन है, यह उपरितन प्रदेशके वक्षःस्थलस्वरूप, कल्पवृक्ष और कल्पवेलोंसे तन्मय एवं नाना रत्नमयी शिलाओंसे सुशोभित सौमनस वन है, और यह उसके शिखरपर हजारों जिन-मन्दिरोंसे युक्त देवोंकी क्रीड़ाके योग्य पाण्डुक नामका अत्यन्त मनोहर वन है ॥३८-४०॥


अच्छिन्नोत्सवसन्तानमहमिन्द्रजगत्समम् । यक्षकिन्नरगन्धर्वसङ्गीतपरिनादितम् ॥४१॥

सुरकन्यासमाकीर्णमप्सरोगणसङ्कुलम् । विचित्रगणसम्पूर्णं दिव्यपुष्पसमन्वितम् ॥४२॥

सुमेरोः शिखरे रम्ये स्वभावसमवस्थिते । इदमालोक्यते जैनं भवनं परमाद्भुतम् ॥४३॥

अर्थ: यह सुमेरुके स्वाभाविक सुरम्य शिखरपर परम आश्चर्योंसे भरा हुआ वह जिनमन्दिर दिखाई देता है कि जिसमें उत्सवोंकी परम्परा कभी टूटती ही नहीं है, जो अहमिन्द्र लोकके समान है, यक्ष किन्नर और गन्धर्वोंके संगीतसे शब्दायमान है, देवकन्याओंसे व्याप्त है, अप्सराओंके समूहसे आकीर्ण है, नाना प्रकारके गणोंसे परिपूर्ण है और दिव्य पुष्पोंसे सहित है ॥४१-४३॥


ज्वलज्ज्वलनसन्ध्याक्तमेघवृन्दसमप्रभम् । जाम्बूनदमयं भानुकूटप्रतिममुन्नतम् ॥४४॥

अशेषोत्तमरत्नौघभूषितं परमाकृति । मुक्तादामसहस्राढ्यं बुद्बुदादर्शशोभितम् ॥४५॥

किङ्किणीपट्टलम्बूषप्रकीर्णकविराजितम् । प्राकारतोरणोत्तुङ्गगोपुरैः परमैर्युतम् ॥४६॥

नानावर्णचलत्केतुकाञ्चनस्तम्भभासुरम् । गम्भीरं चारुनिर्व्यूहमशक्याशेषवर्णनम् ॥४७॥

पञ्चाशद्योजनायामं षट्त्रिंशन्मानमुत्तमम् । इदं जिनगृहं कान्ते सुमेरोर्मुकुटायते ॥४८॥

अर्थ: जो जलती हुई अग्निके समान लाल-लाल सन्ध्यासे युक्त मेघ समूहके समान प्रभासे युक्त है, स्वर्णमय है, सूर्यकूटके समान है, उन्नत है, सब प्रकारके उत्तम रत्नोंके समूहसे भूषित है, उत्तम आकृतिवाला है, हजारों मोतियोंकी मालाओंसे सहित है, छोटे-छोटे गोले और दर्पणोंसे सुशोभित है, छोटी-छोटी घंटियों, रेशमी वस्त्र, फन्नूस और चमरोंसे अलंकृत है, उत्तमोत्तम प्राकार, तोरण, और ऊँचे गोपुरोंसे युक्त है, जिस पर नाना रंगकी पताकाएँ फहरा रही हैं, जो सुवर्णमय खम्भोंसे सुशोभित है, गम्भीर है, सुन्दर छज्जोंसे युक्त है, जिसका सम्पूर्ण वर्णन करना अशक्य है, जो पचास योजन लम्बा है और छत्तीस योजन चौड़ा है । हे कान्ते ! ऐसा यह जिन-मन्दिर सुमेरु पर्वतके मुकुटके समान जान पड़ता है ॥४४-४८॥


इति शंसन्महादेव्यै समीपत्वमुपागतः । अवतीर्य विमानाग्राच्चक्रे हृष्टः प्रदक्षिणाम् ॥४९॥

अर्थ: इस प्रकार महादेवीके लिए मन्दिरकी प्रशंसा करता हुआ हनूमान् जब मन्दिरके समीप पहुँचा तब विमानके अग्रभागसे उतरकर हर्षित होते हुए उसने सर्वप्रथम प्रदक्षिणा दी ॥४९॥


तत्र सर्वातिशेषस्तु महैश्वर्यसमन्वितम् । नक्षत्रग्रहताराणां शशाङ्कमिव मध्यगम् ॥५०॥

केसर्यासनमूर्द्धस्थं स्फुरत्स्फारस्वतेजसम् । शुभ्राभ्रशिखरस्याग्रे शरदीव दिवाकरम् ॥५१॥

प्रतिबिम्बं जिनेन्द्रस्य सर्वलक्षणसङ्गतम् । सान्तःपुरो नमश्चक्रे रचिताञ्जलिमस्तकः ॥५२॥

अर्थ: तदनन्तर अन्य सबको छोड़ उसने अन्तःपुरके साथ हाथ जोड़ मस्तकसे लगा जिनेन्द्र भगवान् की उस प्रतिमाको नमस्कार किया कि जो महान् ऐश्वर्यसे सहित थी, नक्षत्र ग्रह और ताराओंके बीचमें स्थित चन्द्रमाके समान सुशोभित थी, सिंहासनके अग्रभागपर स्थित थी, जिसका अपना विशाल तेज देदीप्यमान था, जो सफेद मेघके शिखरके अग्रभागपर स्थित शरत्कालीन सूर्यके समान थी, तथा सब लक्षणोंसे सहित थी ॥५०-५२॥


जिनेन्द्रदर्शनोद्भूतमहासम्मदसम्पदाम् । विद्याधरवरस्त्रीणां धृतिरासीदलं परा ॥५३॥

अर्थ: जिनेन्द्र-दर्शनसे जिन्हें महाहर्ष रूप सम्पत्तिकी उद्भूति हुई थी ऐसी विद्याधरराजकी स्त्रियोंको दर्शन कर बड़ा संतोष उत्पन्न हुआ ॥५३॥


उत्पन्नघनरोमाञ्चा विपुलाऽऽयतलोचनाः । भक्त्या परमया युक्ताः सर्वोपकरणान्विताः ॥५४॥

महाकुलप्रसूतास्ताः स्त्रियः परमचेष्टिताः । चक्रुः पूजा जिनेन्द्राणां त्रिदशप्रमदा इव ॥५५॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके सघन रोमाञ्च निकल आये थे, जिनके लम्बे नेत्र हर्षातिरेकसे और भी अधिक लम्बे दिखने लगे थे, जो उत्कृष्ट भक्तिसे युक्त थीं, सब प्रकारके उपकरणोंसे सहित थीं, महाकुलमें उत्पन्न थीं, तथा परमचेष्टाको धारण करनेवाली थीं ऐसी उन विद्याधरियोंने देवाङ्गनाओंके समान जिनेन्द्र भगवान्‌की पूजा की ॥५४-५५॥


जाम्बूनदमयैः पद्मैः पद्मरागमयैस्तथा । चन्द्रकान्तमयैश्चापि स्वभावकुसुमैरिति ॥५६॥

सौरभाक्रान्तदिक्चक्रैर्गन्धैश्च परमोज्ज्वलैः । पवित्रद्रव्यसम्भूतैर्धूपैश्चाकुलकोटिभिः ॥५७॥

भक्तिकविपतसान्निध्यै रत्नदीपैर्महाशिखैः । चित्रवल्युपहारैश्च१ जिनानानर्च मारुतिः ॥५८॥

अर्थ: सुवर्णमय, पद्मराग मणिमय तथा चन्द्रकान्तमणिमय कमल, तथा अन्य स्वाभाविक पुष्प, सुगन्धिसे दिङ्मण्डलको व्याप्त करनेवाली परम उज्ज्वल गन्ध जिसकी धूमशिखा बहुत ऊँची उठ रही थी ऐसा पवित्र द्रव्यसे उत्पन्न धूप, भक्तिसे समीपमें लाकर रक्खे हुए बड़ी-बड़ी शिखाओंवाले दीपक, और नाना प्रकारके नैवेद्यसे हनूमान्ने जिनेन्द्रदेवकी पूजा की ॥५६-५८॥


ततश्चन्दनदिग्धाङ्गः कुङ्कुमस्थासकाचितः । २सूत्रपत्रोर्णसंवीताशेषो विगतकल्मषः ॥५९॥

वानराङ्कस्फुरज्ज्योतिश्चक्रमौलिर्महामनाः । प्रमोदपरमस्फीतनेत्रांशुनिचिताननः ॥६०॥

ध्यात्वा जिनेश्वरं स्तुत्वा स्तोत्रैरघविनाशनैः । सुरासुरगुरोर्बिम्बं जिनस्य परमं मुहुः ॥६१॥

अर्थ: तदनन्तर जिसका शरीर चन्दनसे व्याप्त था, जो केशरके तिलकोंसे युक्त था, जिसका शरीर वस्त्रसे आच्छादित था, जिसके पाप छूट गये थे, जिसका मुकुट वानर चिह्नसे चिह्नित एवं स्फुरायमान किरणोंके समूहसे युक्त था और हर्षके कारण अत्यधिक विस्तृत नेत्रोंकी किरणोंसे जिसका मुख व्याप्त था ऐसे हनूमान्ने जिनेन्द्र भगवान्का ध्यान कर, तथा पापको नष्ट करनेवाले स्तोत्रोंसे सुरासुरोंके गुरु श्री जिनेन्द्रदेवकी प्रतिमाकी बार-बार उत्तम स्तुति की ॥५९-६१॥


ततः सविभ्रमस्थाभिरप्सरोभिरभीक्षितः । विधाय ३वल्लकीमङ्के गेयामृतमुदाहरत् ॥६२॥

अर्थ: तदनन्तर विलास-विभ्रमके साथ बैठी हुई अप्सराएँ जिसे देख रहीं थी ऐसे हनूमान्ने वीणा गोदमें रख संगीत रूपी अमृत प्रकट किया ॥६२॥


जिनचन्द्रार्चनन्यस्तविकासिनयना जनाः । नियमावहितात्मानः शिवं निदधते करे ॥६३॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जिन्होंने अपने नेत्र जिनेन्द्र भगवान्की पूजामें लगा रक्खे हैं तथा जिनकी आत्मा नियम पालनमें सावधान है ऐसे मनुष्य कल्याणको सदा अपने हाथमें रखते हैं ॥६३॥


न तेषां दुर्लभं किञ्चित् कल्याणं शुद्धचेतसाम् । ये जिनेन्द्रार्चनासक्ता जना मङ्गलदर्शनाः ॥६४॥

अर्थ: जो जिनेन्द्र भगवान्की पूजामें लीन हैं तथा उनके मङ्गलमय दर्शन करते हैं ऐसे निर्मल चित्तके धारक मनुष्योंके लिए कोई भी कल्याण दुर्लभ नहीं है ॥६४॥


श्रावकान्वयसम्भूतिर्भक्तिर्जिनवरे दृढा । समाधिनाऽवसानं च पर्याप्तं जन्मनः फलम् ॥६५॥

अर्थ: श्रावकके कुलमें जन्म होना, जिनेन्द्र भगवान्में सुदृढ़ भक्ति होना, और समाधिपूर्वक मरण होना, यही मनुष्य जन्मका पूर्ण फल है ॥६५॥


उपवीण्येति सुचिरं भूयः स्तुत्वा समर्च्य च । विधाय वन्दनां भक्तिमादधानो नवां नवाम् ॥६६॥

अप्रयच्छन् जिनेन्द्राणां पृष्ठं स्पष्टसुचेतसाम् । अनिच्छन्निव विश्रब्धो निर्ययावर्हदालयात् ॥६७॥

अर्थ: इस तरह चिरकाल तक वीणा बजाकर, बार-बार स्तुति और पूजा कर, वन्दना कर तथा नयी-नयी भक्तिकर आत्मज्ञ जिनेन्द्र भगवान्के लिए पीठ नहीं देता हुआ हनूमान् नहीं चाहते हुए की तरह विश्रब्ध हो जिन-मन्दिरसे बाहर निकला ॥६६-६७॥


ततो विमानमारुह्य स्त्रीसहस्रसमन्वितः । मेरोः प्रदक्षिणं चक्रे ज्योतिर्देव इवोत्तमः ॥६८॥

अर्थ: तदनन्तर हजारों स्त्रियोंके साथ विमानपर चढ़कर उसने उत्तम ज्यौतिषीदेवके समान मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा दी ॥६८॥


शैलराज इव प्रीत्या श्रीशैलः सुन्दरक्रियः । करोति स्म तदा मेरोरापृच्छामिव पश्चिमाम् ॥६९॥

अर्थ: उस समय सुन्दर क्रियाओंको धारण करनेवाला हनूमान् एक दूसरे गिरिराजके समान प्रेमवश, मानो सुमेरुसे जानेकी अन्तिम आज्ञा ही ले रहा हो ॥६९॥


प्रकीर्य वरपुष्पाणि सर्वेषु जिनवेश्मसु । जगाम मन्थरं व्योम्नि भरतक्षेत्रसम्मुखः ॥७०॥

अर्थ: तदनन्तर सब जिन-मन्दिरोंपर उत्तम फूल बरषाकर भरतक्षेत्रकी ओर धीरे-धीरे आकाशमें चला ॥७०॥


ततः परमरागाक्ता सन्ध्याऽऽश्लिष्य दिवाकरम् । अस्तक्षितिभृदावासं भेजे खेदनिनीषया ॥७१॥

अर्थ: अथानन्तर परमराग ( अत्यधिक लालिमा पक्षमें उत्कट प्रेम ) से युक्त सन्ध्या सूर्यका आलिङ्गनकर खेद दूर करनेकी इच्छासे ही मानो अस्ताचलके ऊपर निवासको प्राप्त हुई ॥७१॥


कृष्णपक्षे तदा रात्रिस्ताराबन्धुभिरावृता । रहिता चन्द्रनाथेन नितान्तं न विराजते ॥७२॥

अवतीर्य ततस्तेन सुरदुन्दुभिनामनि । शैलपादे परं रम्ये सैन्यमावासितं शनैः ॥७३॥

अर्थ: वह समय कृष्ण पक्षका था, अतः तारारूपी बन्धुओंसे आवृत और चन्द्रमारूपी पतिसे रहित रात्रि अत्यधिक सुशोभित नहीं हो रही थी इसलिए उसने आकाशसे उतर सुरदुन्दुभि नामक परम मनोहर प्रत्यन्त पर्वतपर धीरेसे अपनी सेना ठहरा दी ॥७२-७३॥


तत्र पद्मोत्पलामोदवाहिमन्थरमारुते । सुखं जिनकथाऽऽसक्ता यथास्वं सैनिकाः स्थिताः ॥७४॥

अर्थ: जहाँ कमलों और नील कमलोंकी सुगन्धिको धारण करनेवाली वायु धीरे-धीरे बह रही थी ऐसे उस प्रत्यन्त पर्वतपर जिनेन्द्रभगवान्की कथामें लीन सैनिक यथायोग्य सुखसे ठहर गये ॥७४॥


अथोपरि विमानस्य निषण्णः शिखरान्तिके । प्राग्भारचन्द्रशालायाः कैलासाधित्यकोपमे ॥७५॥

ज्योतिष्पथात्समुत्तुङ्गात्पतत्प्रस्फुरितप्रभम् । ज्योतिर्बिम्बं मरुत्सूनुरालोकत तमोऽभवत् ॥७६॥

अर्थ: अथानन्तर हनूमान् कैलास पर्वतके ऊपरो मैदानके समान विमानकी चन्द्रशाला सम्बन्धी शिखरके समीप सुखसे बैठा था कि उसने बहुत ऊँचे आकाशसे गिरते हुए तथा क्षण एकमें अन्धकार रूप हो जाने वाले देदीप्यमान कान्तिके धारक ज्योतिर्बिम्बको देखा ॥७५-७६॥


अचिन्तयच्च हा कष्टं संसारे नास्ति तत्पदम् । यत्र न क्रीडति स्वेच्छं मृत्युः सुरगणेष्वपि ॥७७॥

अर्थ: देखते ही वह विचार करने लगा कि हाय हाय बड़े दुःखकी बात है कि इस संसारमें वह स्थान नहीं है जहाँ देवसमूहके बीच भी मृत्यु इच्छानुसार क्रीड़ा नहीं करती हो ॥७७॥


तडिदुल्कातरङ्गातिभङ्गुरं जन्म सर्वतः । देवानामपि यत्र स्यात् प्राणिनां तत्र का कथा ॥७८॥

अर्थ: जहाँ देवोंका भी जन्म सब ओरसे बिजली, उल्का और तरङ्गके समान अत्यन्त भङ्गुर है वहाँ अन्य प्राणियोंकी तो कथा ही क्या है ? ॥७८॥


अनन्तशो न भुक्तं यत्संसारे चेतनावता । न तदस्ति सुखं नाम दुःखं वा भुवनत्रये ॥७९॥

अर्थ: इस प्राणीने संसारमें अनन्तबार जिस सुख-दुःखका अनुभव नहीं किया है वह तीन लोकमें भी नहीं है ॥७९॥


अहो मोहस्य माहात्म्यं परमेतद्बलान्वितम् । एतावन्तं यतः कालं दुःखपर्यटितं भवेत् ॥८०॥

अर्थ: अहो ! यह मोहकी बड़ी प्रबल महिमा है कि यह जीव इतने समय तक दुःखसे भटकता रहा है ॥८०॥


उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ भ्रान्त्वा कृच्छ्रात्सहस्रशः । अवाप्यते मनुष्यत्वं कष्टं नष्टमनाप्तवत् ॥८१॥

अर्थ: हजारों उत्सर्पिणियों और अपसर्पिणियोंमें कष्ट सहित भ्रमण करनेके बाद मनुष्य पर्याय प्राप्त होती है सो खेद है कि वह उस प्रकार नष्ट हो गई कि जिस प्रकार मानो प्राप्त ही न हुई हो ॥८१॥


विनश्वरसुखासक्ताः सौहित्यपरिवर्जिताः । परिणामं प्रपद्यन्ते प्राणिनस्तापसङ्कटम् ॥८२॥

अर्थ: विनाशी सुखोंमें आसक्त प्राणी कभी तृप्ति को प्राप्त नहीं होते और उसी अतृप्त दशामें संतापसे परिपूर्ण अन्तिम अवस्थाको प्राप्त हो जाते हैं ॥८२॥


चलान्युत्पथवृत्तानि दुःखदानि पराणि च । इन्द्रियाणि न शाम्यन्ति विना जिनपथाश्रयात् ॥८३॥

अर्थ: चञ्चल, कुमार्गमें प्रवृत्ति करने वाली और अत्यन्त दुःखदायी इन्द्रियाँ जिन-मार्गका आश्रय लिए बिना शान्त नहीं होतीं ॥८३॥


आनायेन यथा दीना बध्यन्ते मृगपक्षिणः । तथा विषयजालेन बध्यन्ते मोहिनो जनाः ॥८४॥

अर्थ: जिस प्रकार दीन मृग और पक्षी जालसे बद्ध हो जाते हैं उसी प्रकार ये मोही प्राणी विषय-जालसे बद्ध होते हैं ॥८४॥


आशीविषसमानैर्यो रमते विषयैः समम् । परिणामे स मूढात्मा दह्यते दुःखवह्निना ॥८५॥

अर्थ: जो मनुष्य सर्पके समान विषयोंके साथ क्रीड़ा करता है वह मूर्ख फलके समय दुःख रूपी अग्निसे जलता है ॥८५॥


को ह्येकदिवसं राज्यं वर्षमन्विष्य यातनाम् । प्रार्थयेत विमूढात्मा तद्वद्विषयसौख्यभाक् ॥८६॥

अर्थ: जैसे कोई मनुष्य वर्षभर कष्ट भोगकर एक दिनके राज्यकी अभिलाषा करे वैसे ही विषय-सुखका उपभोग करने- वाला यह मूर्ख प्राणी, चिरकाल तक कष्ट भोगकर थोड़े समयके लिए सुखकी आकांक्षा करता है ॥८६॥


कदाचिद् बुध्यमानोऽपि मोहतस्करवञ्चितः । न करोति जनः स्वार्थं किमतः कष्टमुत्तमम् ॥८७॥

अर्थ: यद्यपि यह प्राणी जानता हुआ भी मोहरूपी चोरके द्वारा ठगाया जाता है तथापि कभी आत्मकल्याण नहीं करता इससे अधिक कष्ट और क्या होगा ? ॥८७॥


भुक्त्वा त्रिविष्टपे धर्मं मनुष्यभवसञ्चितम् । पश्चान्मुषितवद्दीनो दुःखी भवति चेतनः ॥८८॥

अर्थ: यह प्राणी मनुष्यभवमें संचित धर्मका स्वर्गमें उपभोगकर पश्चात् लुटे हुए मनुष्यके समान दीन और दुःखी हो जाता है ॥८८॥


भुक्त्वापि त्रैदशान् भोगान् सुकृते क्षयमागते । शेषकर्मसहायः सन् चेतनः क्वापि गच्छति ॥८९॥

अर्थ: यह जीव देवों सम्बन्धी भोग भोगकर भी पुण्यके क्षीण होनेपर अवशिष्ट कर्मोंकी सहायतासे जहाँ कहीं चला जाता है ॥८९॥


एतदेवं प्रतीक्ष्येण त्रिजगत्पतिनोदितम् । यथा जन्तोर्निजं कर्म बान्धवः शत्रुरेव वा ॥९०॥

अर्थ: पूज्यवर त्रिलोकीनाथने यही कहा है कि इस प्राणीका बन्धु अथवा शत्रु अपना कर्म ही है ॥९०॥


तदलं निन्दितैरेभिर्भोगैः परमदारुणैः । विप्रयोगः सहार्मीभिरवश्यं येन जायते ॥९१॥

अर्थ: इसलिए जिनके साथ अवश्य ही वियोग होता है ऐसे उन निन्दित तथा अत्यन्त कठोर भोगोंसे पूरा पड़े - उनकी हमें आवश्यकता नहीं है ॥९१॥


प्रियं जनमिमं त्यक्त्वा करोमि न तपो यदि । तदा सुभूमचक्रीव मरिष्याम्यवितृप्तकः ॥९२॥

अर्थ: यदि मैं इन प्रियजनोंका त्यागकर तप नहीं करता हूँ तो सुभूम चक्रवर्तीके समान अतृप्त दशामें मरूँगा ॥९२॥


श्रीमत्यो हरिणीनेत्रा योषिद्गुणसमन्विताः । अत्यन्तदुस्त्यजा मुग्धा मदाहितमनोरथाः ॥९३॥

कथमेतास्त्यजामीति सञ्चिन्त्य विमनाः क्षणम् । अश्राणयदुपालम्भं हृदयस्य प्रबुद्धधीः ॥९४॥

अर्थ: ‘जो हरिणियोंके समान नेत्रोंवाली हैं, स्त्रियोंके गुणोंसे सहित हैं, अत्यन्त कठिनाईसे छोड़ने योग्य हैं, भोली हैं और मुझपर जिनके मनोरथ लगे हुए हैं ऐसी इन श्रीमती स्त्रियोंको कैसे छोड़ूँ’ ऐसा विचारकर यद्यपि वह क्षणभरके लिए बेचैन हुआ तथापि वह तत्काल ही प्रबुद्ध बुद्धि हो हृदयके लिए इस प्रकार उलाहना देने लगा ॥९३-९४॥


दीर्घं कालं रन्त्वा नाके गुणयुवतीभिः सुविभूतिभिः । मर्त्यक्षेत्रेऽप्यसमं भूयः प्रमदवरललितवनिताजनैः परिललितः ॥९५॥

को वा यातस्तृप्तिं जन्तुर्विविधविषयसुखरतिभिर्नदीभिरिवोदधिः । नानाजन्मभ्रान्त श्रान्त व्रज हृदय शममपि किमाकुलितं भवेत् ॥९६॥

अर्थ: कि हे हृदय ! जिसने दीर्घकाल तक स्वर्गमें उत्तम विभूतिकी धारक गुणवती स्त्रियोंके साथ रमण किया तथा मनुष्य-लोकमें भी जो अत्यधिक हर्षसे भरी सुन्दर स्त्रियोंसे लालित हुआ ऐसा कौन मनुष्य नदियोंसे समुद्रके समान नाना प्रकारके विषय-सुख सम्बन्धी प्रीतिसे सन्तुष्ट हुआ है ? अर्थात् कोई नहीं । इसलिए हे नाना जन्मोंमें भटकनेवाले श्रान्त हृदय ! शान्तिको प्राप्त हो, व्यर्थ ही आकुलित क्यों हो रहा है ? ॥९५-९६॥


किं न श्रुता नरकभीमविरोधरौद्रास्तीव्रासिपत्रवनसङ्कटदुर्गमार्गाः । रागोद्भवेन जनितं घनकर्मपङ्कं यन्नेच्छसि क्षपयितुं तपसा समस्तम् ॥९७॥

अर्थ: हे हृदय ! क्या नरकके भयंकर विरोधसे दुःखदायी एवं तीक्ष्ण असिपत्र वनसे संकट पूर्ण दुर्गम मार्ग, तूने सुने नहीं हैं कि जिससे रागोत्पत्तिसे उत्पन्न समस्त सघनकर्म रूपी पङ्कको तू तपके द्वारा नष्ट करनेकी इच्छा नहीं कर रहा है ॥९७॥


आसीन्निरर्थकतमो धिगतीतकालो दीर्घेऽसुखार्णवजले पतितस्य निन्द्ये । आत्मानमद्य भवपञ्जरसन्निरुद्धं मोक्षामि लब्धशुभमार्गमतिप्रकाशः ॥९८॥

अर्थ: धिक्कार है कि दीर्घ तथा निन्दनीय दुःखरूपी सागरमें डूबे हुए मेरा अतीतकाल सर्वथा निरर्थक हो गया। अब आज मुझे शुभ मार्ग और शुभ बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हुआ है इसलिए संसार रूपी पिंजड़ेके भीतर रुके आत्माको मुक्त करता हूँ - भव-बन्धनसे छुड़ाता हूँ ॥९८॥


इति कृतनिश्चयचेताः परिदृष्टयथार्थजीवलोकविवेकः । रविरिव गतघनसङ्गस्तेजस्वी गन्तुमुद्यतोऽहं मार्गम् ॥९९॥

अर्थ: इस प्रकार जिसने हृदयमें दृढ़ निश्चय किया है तथा जीव लोकका जिसने यथार्थ विवेक देख लिया है ऐसा मैं मेघके संसर्गसे रहित सूर्यके समान तेजस्वी होता हुआ सन्मार्गपर गमन करनेके लिए उद्यत हुआ हूँ ॥९९॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते पद्मपुराणे हनुमन्निर्वेदं नाम द्वादशोत्तरशतं पर्व ॥११२॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य विरचित पद्मपुराणमें हनूमान्के वैराग्यका वर्णन करनेवाला एक सौ बारहवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥११२॥


११३. त्रयोदशोत्तरशतं पर्व (हनूमन्निर्वाणाभिधानं)

अथ रात्रावतीतायां तपनीयनिभो रविः । जगदुद्योतयामास दीप्त्या साधुर्यथा गिरा ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर रात्रि व्यतीत होनेपर स्वर्णके समान सूर्यने दीप्तिसे जगत्को उस तरह प्रकाशमान कर दिया जिस तरह कि साधु वाणीके द्वारा प्रकाशमान करता है ॥१॥


नक्षत्रगणमुत्सार्य बोधिता नलिनाकराः । रविणा जिननाथेन भव्यानां निचया इव ॥२॥

अर्थ: सूर्यने नक्षत्र-समूहको हटाकर कमलोंके समूहको उस तरह विकसित कर दिया जिस तरह कि जिनेन्द्रदेव भव्योंके समूहको विकसित कर देता है ॥२॥


आपृच्छत सखीन् वातिर्महासंवेगसङ्गतः । निःस्पृहात्मा यथापूर्वं भरतोऽयन् तपोवनम् ॥३॥

अर्थ: जिस प्रकार पहले तपोवनको जाते हुए भरतने अपने मित्रजनोंसे पूछा था उसी प्रकार महासंवेगसे युक्त, तथा निःस्पृह चित्त हनूमान्ने मित्रजनोंसे पूछा ॥३॥


ततः कृपणलोलाक्षाः परमोद्वेगवाहिनः । नाथं विज्ञापयन्ति स्म सचिवाः प्रेमनिर्भराः ॥४॥

अनाथान् देव नो कर्त्तुमस्मानर्हसि सद्गुण । प्रभो प्रसीद भक्तेषु क्रियतामनुपालनम् ॥५॥

अर्थ: तदनन्तर जिनके नेत्र अत्यन्त दीन तथा चञ्चल थे, जो परम उद्वेगको धारण कर रहे थे एवं जो प्रेमसे भरे हुए थे ऐसे मन्त्रियोंने स्वामीसे प्रार्थना की कि हे देव ! आप हम लोगोंको अनाथ करनेके योग्य नहीं हैं। हे उत्तम गुणोंके धारक प्रभो ! भक्तोंपर प्रसन्न हूजिए और उनका पालन कीजिए ॥४-५॥


जगाद मारुतिर्यूयं परमप्यनुवर्त्तिनः । अनर्थबान्धवा एव मम नो हितहेतवः ॥६॥

अर्थ: इसके उत्तरमें हनूमान्ने कहा कि तुम लोग परम अनुयायी होकर भी हमारे अनर्थकारी बान्धव हो हितकारी नहीं ॥६॥


उत्तरन्तं भवाम्भोधिं तत्रैव प्रक्षिपन्ति ये । हितास्ते कथमुच्यन्ते वैरिणः परमार्थतः ॥७॥

अर्थ: जो संसार-समुद्रसे पार होते हुए मनुष्यको उसीमें गिरा देते हैं वे हितकारी कैसे कहे जा सकते हैं ? वे तो यथार्थमें वैरी ही हैं ॥७॥


माता पिता सुहृद्भ्राता न तदाऽगात्सहायताम् । यदा नरकवासेषु प्राप्तं दुःखमनुत्तमम् ॥८॥

अर्थ: जब मैंने नरकवासमें बहुत भारी दुःख पाया था तब माता-पिता, मित्र, भाई - कोई भी सहायताको प्राप्त नहीं हुए थे - किसीने सहायता नहीं की थी ॥८॥


मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य बोधिं च जिनशासने । प्रमादो नोचितः कर्त्तुं निमेषमपि धीमतः ॥९॥

अर्थ: दुर्लभ मनुष्य-पर्याय और जिन-शासनका ज्ञान प्राप्तकर बुद्धिमान् मनुष्यको निमेष मात्र भी प्रमाद करना उचित नहीं है ॥९॥


समुष्यापि परं प्रीतैर्भवद्भिः सह भोगवत् । अवश्यंभावुकस्तीव्रो विरहः कर्मनिर्मितः ॥१०॥

अर्थ: परम प्रीतिसे युक्त आप लोगोंके साथ रहकर जिस प्रकार भोगकी प्राप्ति हुई है उसी प्रकार अब कर्म-निर्मित तीव्र विरह भी अवश्यंभावी है ॥१०॥


देवासुरमनुष्येन्द्रा स्वकर्मवशवर्तिनः । कालदावानलालीढाः के वा न प्रलयं गताः ॥११॥

अर्थ: अपने-अपने कर्मके अधीन रहनेवाले ऐसे कौन देवेन्द्र असुरेन्द्र अथवा मनुष्येन्द्र हैं जो काल रूपी दावानलसे व्याप्त हो विनाशको प्राप्त न हुए हों ? ॥११॥


पल्योपमसहस्राणि त्रिदिवेऽनेकशो मया । भुक्ता भोगा न वाऽतृप्यं वह्निः शुष्केन्धनैरिव ॥१२॥

अर्थ: मैंने स्वर्गमें अनेकों बार हजारों पल्य तक भोग भोगे हैं फिर भी सूखे ईन्धनसे अग्निके समान तृप्त नहीं हुआ ॥१२॥


गताऽऽगमविधेर्दातृ मत्तोऽपि सुमहाबलम् । अपरं नाम कर्माऽस्ति जाता तनुर्ममाऽक्षमा ॥१३॥

अर्थ: गमनागमनको देनेवाला यह कर्म मुझसे भी अधिक महाबलवान् है । मेरा शरीर तो अब अक्षम - असमर्थ हो गया है ॥१३॥


देहिनो यत्र मुह्यन्ति दुर्गतं भवसङ्कटम् । विलङ्घ्य गन्तुमिच्छामि पदं गर्भविवर्जितम् ॥१४॥

अर्थ: प्राणी जिस दुर्गम जन्म संकटको पाकर मोहित हो जाते हैं - स्वरूपको भूल जाते हैं । मैं उसे उल्लङ्घनकर गर्भातीत पदको प्राप्त करना चाहता हूँ ॥१४॥


वज्रसारतनौ तस्मिन्नेवं कृतविचेष्टिते । अभूदन्तःपुरस्त्रीणां महानाक्रन्दितध्वनिः ॥१५॥

अर्थ: इस प्रकार वज्रमय शरीरको धारण करनेवाले हनूमान्ने जब अपनी दृढ़ चेष्टा दिखाई तब उसके अन्तःपुरकी स्त्रियोंमें रुदनका महाशब्द उत्पन्न हो गया ॥१५॥


समाश्वास्य विषादार्त्तं प्रमदाजनमाकुलम् । वचोभिर्बोधने शक्तैर्नानावृत्तान्तशंसिभिः ॥१६॥

तनयाँश्च समाधाय राजधर्मे यथाक्रमम् । सर्वान्नियोगकुशलः शुभावस्थितमानसः ॥१७॥

सुहृदां चक्रवालेन महता परितो वृतः । विमानभवनाद् राजा निर्ययौ वायुनन्दनः ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर समझानेमें समर्थ एवं नाना प्रकारके वृत्तान्तोंका निरूपण करनेवाले वचनोंके द्वारा विषादसे पीडित, व्यग्र स्त्रियोंको सान्त्वना देकर तथा समस्त पुत्रोंको यथाक्रमसे राजधर्ममें लगाकर व्यवस्थापटु तथा शुभ कार्यमें मनको स्थिर करने वाले राजा हनूमान्, मित्रोंके बहुत बड़े समूहसे परिवृत हो विमानरूपी भवनसे बाहर निकले ॥१६-१८॥


नरयानं समारुह्य रत्नकाञ्चनभासुरम् । बुद्बुदादर्शलम्बूषचित्रचामरसुन्दरम् ॥१९॥

द्युपुण्डरीकसङ्काशं बहुभक्तिविराजितम् । चैत्योद्यानं यतः श्रीमान् प्रस्थितः परमोदयः ॥२०॥

अर्थ: जो रत्न और सुवर्णसे देदीप्यमान थी, छोटे-छोटे गोले, दर्पण, फन्नूस तथा नाना प्रकारके चमरोंसे सुन्दर थी और दिव्य-कमलके समान नाना प्रकारके वेलबूटोंसे सुशोभित थी ऐसी पालकीपर सवार हो परम अभ्युदयको धारण करनेवाला श्रीमान् हनूमान् जिस ओर मन्दिरका उद्यान था उसी ओर चला ॥१९-२०॥


विलसत्केतुमालाढ्यं तस्य यानमुदीक्ष्य तत् । ययौ हर्षविषादं च जनः सक्ताश्रुलोचनः ॥२१॥

अर्थ: जिसपर पताकाएँ फहरा रही थीं तथा जो मालाओंसे सहित थीं ऐसी उसकी पालकी देखकर लोग हर्ष तथा विषाद दोनोंको प्राप्त हो रहे थे और दोनों ही कारणोंसे उनके नेत्रोंमें आँसू छलक रहे थे ॥२१॥


तत्र चैत्यमहोद्याने विचित्रद्रुममण्डिते । सारिकाचञ्चरीकान्यपुष्टकोलाहलाकुले ॥२२॥

नानाकुसुमकिञ्जल्कसुगन्धिसततायने । संयतो धर्मरत्नाख्यस्तदा तिष्ठति कीर्त्तिमान् ॥२३॥

अर्थ: जो नाना प्रकारके वृक्षोंसे मण्डित था, मैना, भ्रमर तथा कोयलके कोलाहलसे व्याप्त था और जिसमें नाना फूलोंकी केशरसे सुगन्धित वायु बह रही थी ऐसे मन्दिरके उस महोद्यानमें उस समय धर्मरत्न नामक यशस्वी मुनि विराजमान थे ॥२२-२३॥


धर्मरत्नमहाराशिमत्यन्तोत्तमयोगिनम् । यथा बाहुबली पूर्वं भावप्लावितमानसः ॥२४॥

नरयानात् समुत्तीर्य हनूमानाससाद तम् । भगवन्तं नभोयातं चारणर्षिगणावृतम् ॥२५॥

अर्थ: जिनका मन वैराग्यकी भावनासे आप्लुत था ऐसे बाहुबली जिस प्रकार पहले धर्मरूपी रत्नोंकी महाराशि स्वरूप अत्यन्त उत्तम योगी - श्री ऋषभ जिनेन्द्रके समीप गये थे उसी प्रकार वैराग्य भावनासे आप्लुत हृदय हनूमान् पालकीसे उतरकर आकाशगामी एवं चारणर्षियोंसे आवृत उन भगवान् धर्मरत्न नामक मुनिराजके समीप पहुँचा ॥२४-२५॥


प्रणम्य भक्तिसम्पन्नः कृत्वा गुरुमहं परम् । जगाद शिरसि न्यस्य करराजीवकुङ्मलम् ॥२६॥

उपेत्य भवतो दीक्षां निर्मुक्ताङ्गो महामुने । अहं विहत्तुमिच्छामि प्रसादः क्रियतामिति ॥२७॥

अर्थ: पहुँचते ही उसने प्रणाम किया, बहुत बड़ी गुरुपूजा की और तदनन्तर हस्तरूपी कमल-कुड्मलोंको शिरपर धारण कर कहा कि हे महामुने ! मैं आपसे दीक्षा लेकर तथा शरीरसे ममता छोड़ निर्द्वन्द्व विहार करना चाहता हूँ अतः मुझपर प्रसन्नता कीजिए ॥२६-२७॥


यतिराहोत्तमं युक्तमेवमस्तु सुमानसः । जगन्निःसारमालोक्य क्रियतां स्वहितं परम् ॥२८॥

अर्थ: यह सुन उत्तम हृदयके धारक मुनिराजने कहा कि बहुत अच्छा, ऐसा ही हो, जगत्‌को निःसार देख अपना परम कल्याण करो ॥२८॥


अशाश्वतेन देहेन विहत्तुं शाश्वतं पदम् । परमं तव कल्याणी मतिरेषा समुद्गता ॥२९॥

अर्थ: विनश्वर शरीरसे अविनाशी पद प्राप्त करनेके लिए जो तुम्हारी कल्याणरूपिणी बुद्धि उत्पन्न हुई है यह बहुत उत्तम बात है ॥२९॥


इत्यनुज्ञां मुनेः प्राप्य संवेगरभसान्वितः । कृतप्रणमनस्तुष्टः पर्यङ्कासनमाश्रितः ॥३०॥

मुकुटं कुण्डले हारमवशिष्टं विभूषणम् । समुत्ससर्ज वस्त्रं च मानसं च परिग्रहम् ॥३१॥

अर्थ: इस प्रकार मुनिकी आज्ञा पाकर जो वैराग्यके वेगसे सहित था, जिसने प्रणाम किया था, और जो संतुष्ट होकर पद्मासनसे विराजमान था ऐसे हनूमान्‌ने मुकुट, कुण्डल, हार तथा अन्य आभूषण, वस्त्र और मानसिक परिग्रहको तत्काल छोड़ दिया ॥३०-३१॥


दयितानिगडं भित्त्वा दग्ध्वा जालं ममत्वजम् । छित्वा स्नेहमयं पाशं त्यक्त्वा सौख्यं विषोपमम् ॥३२॥

वैराग्यदीपशिखया मोहध्वान्तं निरस्य च । कमप्यपकरं दृष्ट्वा शरीरमतिभङ्गुरम् ॥३३॥

स्वयं सुसुकुमाराभिर्जितपद्माभिरुत्तमम् । उत्तमाङ्गरुहो नीत्वा करशाखाभिरुत्तमः ॥३४॥

अर्थ: उसने स्त्री रूपी बेड़ी तोड़ डाली थी, ममतासे उत्पन्न जालको जला दिया था, स्नेह रूपी पाश छेद डाली थी, सुखको विषके समान छोड़ दिया था, अत्यन्त भङ्गुर शरीरको अद्‌भुत अपकारी देख वैराग्य रूपी दीपककी शिखासे मोहरूपी अन्धकारको नष्ट कर दिया था, और कमलको जीतनेवाली अपनी सुकुमार अङ्गुलियोंसे शिरके बाल नोच डाले थे । इस प्रकार समस्त परिग्रहसे रहित, मुक्ति रूपी लक्ष्मीके सेवक, महाव्रतधारी, और वैराग्य लक्ष्मीसे युक्त उत्तम हनूमान् अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥३२-३४॥


निःशेषसङ्गनिर्मुक्तो मुक्तिलक्ष्मीं समाश्रितः । महाव्रतधरः श्रीमाञ्छ्रीशैलः शुशुभेतराम् ॥३५॥

निर्वेदप्रभुरागाभ्यां प्रेरितानि महात्मनाम् । शतानि सप्त साग्राणि पञ्चाशद्भिः सुचेतसाम् ॥३६॥

विद्याधरनरेन्द्राणां महासंवेगवर्त्तिनाम् । स्वपुत्रेषु पदं दत्त्वा प्रतिपन्नानि योगिताम् ॥३७॥

अर्थ: उस समय वैराग्य और स्वामिभक्तिसे प्रेरित, उदारात्मा, शुद्ध हृदय और महासंवेगमें वर्तमान सातसौ पचास विद्याधर राजाओंने अपने-अपने पुत्रोंके लिए राज्य देकर मुनिपद धारण किया ॥३५-३७॥


विद्युद्‌गत्यादिनामानः परमप्रीतमानसाः । मुक्तसर्वकलङ्कास्ते श्रिताः श्रीशैलविभ्रमम् ॥३८॥

अर्थ: इस प्रकार जिनके चित्त अत्यन्त प्रसन्न थे, तथा जिनके सब कलंक छूट गये थे ऐसे वे विद्युद्‌गति आदि नामको धारण करनेवाले मुनि हनूमान्‌की शोभाको प्राप्त थे अर्थात् उन्हींके समान शोभायमान थे ॥३८॥


कृत्वा परमकारुण्यं विप्रलापं महाशुचम् । वियोगानलसन्तप्ताः परं निर्वेदमागताः ॥३९॥

प्रथितां बन्धुमत्याख्यामुपगम्य महत्तराम् । प्रयुज्य विनयं भक्त्या विधाय महमुत्तमम् ॥४०॥

श्रीमत्यो भवतो भीता धीमत्यो नृपयोषितः । महद्भूषणनिर्मुक्ताः शीलभूषाः प्रवव्रजुः ॥४१॥

अर्थ: तदनन्तर जो वियोगरूपी अग्निसे संतप्त थीं, महाशोकदायी अत्यन्त करुण विलाप कर परम निर्वेद - वैराग्यको प्राप्त हुई थीं, श्रीमती थीं, संसारसे भयभीत थीं, धीमती थीं, महा-आभूषणोंसे रहित थीं, और शीलरूपी आभूषणको धारण करनेवाली थीं ऐसी राजस्त्रियोंने बन्धुमती नामकी प्रसिद्ध आर्यिकाके पास जाकर तथा भक्ति पूर्वक नमस्कार और उत्तम पूजा कर दीक्षा धारण कर ली ॥३९-४१॥


बभूव विभवस्तासां तदा जीर्णतृणोपमः । महामहाजनः प्रायो रतिवद्धिरतो भृशम् ॥४२॥

अर्थ: उस समय उन सबके लिए वैभव जीर्णतृणके समान जान पड़ने लगा था सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम पुरुष राग करने वालोंसे अत्यन्त विरक्त रहते ही हैं ॥४२॥


व्रतगुप्तिसमित्युच्चैः शैलः श्रीशैलपुङ्गवः । महातपोधनो धीमान् गुणशीलविभूषणः ॥४३॥

अर्थ: इस प्रकार जो व्रत, गुप्ति और समितिके मानो उच्च पर्वत थे ऐसे श्री हनूमान् मुनि महातप रूपी धनके धारक, धीमान् और गुण तथा शील रूपी आभूषणोंसे सहित थे ॥४३॥


धरणीधरैः प्रहृष्टैरुपगीतो वन्दितोऽप्सरोभिश्च । अमलं समयविधानं सर्वज्ञोक्तं समाचर्य ॥४४॥

निर्दग्धमोहनिचयो जैनेन्द्रं प्राप्य पुष्कलं ज्ञानविधिम् । निर्वाणगिरावसिधच्छ्रीशैलः श्रमणसत्तमः पुरुषरविः ॥४५॥

अर्थ: हर्षसे भरे बड़े-बड़े राजा जिनकी स्तुति करते थे, अप्सराएँ जिन्हें नमस्कार करती थीं, जिन्होंने मोहकी राशि भस्म कर दी थी, जो मुनियोंमें उत्तम थे, तथा पुरुषोंमें सूर्यके समान थे ऐसे श्रीशैल महामुनिने सर्वज्ञ प्रतिपादित निर्मल आचारका पालन कर तथा जिनेन्द्र सम्बन्धी पूर्णज्ञान प्राप्तकर निर्वाण गिरिसे सिद्ध पद प्राप्त किया ॥४४-४५॥


इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरिते हनूमन्निर्वाणाभिधानं नाम त्रयोदशोत्तरशतं पर्व ॥११३॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें हनूमान्के निर्वाणका वर्णन करनेवाला एकसौ तेरहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११३॥


११४. चतुर्दशोत्तरशतं पर्व (रविषेणाचार्यप्रणीते शक्रसुरसंकथाभिधानं)

प्रव्रज्यामष्टवीराणां ज्ञात्वा वायुसुतस्य च । रामो जहास किं भोगो भुक्तस्तैः कातरैरिति ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर लक्ष्मणके आठ वीर कुमारों और हनूमान्की दीक्षाका समाचार सुन श्रीराम यह कहते हुए हँसे कि अरे ! इन लोगोंने क्या भोग भोगा ? ॥१॥


सन्तं सन्त्यज्य ये भोगं प्रव्रजन्त्यायतेक्षणाः । नूनं ग्रहगृहीतास्ते वायुना वा वशीकृताः ॥२॥

अर्थ: जो दूरदर्शी मनुष्य, विद्यमान भोगको छोड़कर दीक्षा लेते हैं जान पड़ता है कि वे ग्रहोंसे आक्रान्त हैं अथवा वायुके वशीभूत हैं । भावार्थ - या तो उन्हें भूत लगे हैं या वे वायुकी बीमारीसे पीड़ित हैं ॥२॥


नूनं तेषां न विद्यन्ते कुशला वैद्यवार्तिकाः । यतो मनोहरान् कामान्परित्यज्य व्यवस्थिताः ॥३॥

अर्थ: जान पड़ता है कि ऐसे लोगोंकी ओषधि करने वाले कुशल वैद्य नहीं हैं इसीलिए तो वे मनोहर भोगोंको छोड़ बैठते हैं ॥३॥


एवं भोगमहासङ्गसौख्यसागरसेविनः । आसीत्तस्य जडा बुद्धिः कर्मणा वशमीयुषः ॥४॥

अर्थ: इस प्रकार भोगोंके महासंगसे होने वाले सुख रूपी सागरमें निमग्न तथा चारित्र-मोहनीय कर्मके वशीभूत श्रीरामचन्द्रकी बुद्धि जड़ रूप हो गई थी ॥४॥


भुज्यमानाऽल्पसौख्येन संसारपदमीयुषाम् । प्रायो विस्मयते सौख्यं श्रुतमप्यतिसंसृति ॥५॥

अर्थ: भोगनेमें आये हुए अल्प सुखसे उपलक्षित संसारी प्राणियोंको यदि किसीके लोकोत्तर सुखका वर्णन सुननेमें भी आता है तो प्रायः वह आश्चर्य उत्पन्न करता है ॥५॥


एवं तयोर्महाभोगमग्नयोः प्रेमबद्धयोः । पद्मवैकुण्ठयोः कालो धर्मकुण्ठो विवर्त्तते ॥६॥

अर्थ: इस प्रकार महाभोगोंमें निमग्न तथा प्रेमसे बँधे हुए उन राम-लक्ष्मणका काल चारित्र रूपी धर्मसे निरपेक्ष होता हुआ व्यतीत हो रहा था ॥६॥


अथान्यदा समायातः सौधर्मेन्द्रो महाद्युतिः । ऋद्धया परमया युक्तो धैर्यगाम्भीर्यसंस्थितः ॥७॥

अर्थ: अथानन्तर किसी समय महा कान्तिसे युक्त, उत्कृष्ट ऋद्धिसे सहित, धैर्य और गाम्भीर्यसे उपलक्षित सौधर्मेन्द्र देवोंकी सभामें आकर विराजमान हुआ ॥७॥


सेवितः सचिवैः सर्वैर्नानालङ्कारधारिभिः । कार्त्तस्वरमहाशैल इव गण्डमहीधरैः ॥८॥

अर्थ: नाना अलंकारोंको धारण करने वाले समस्त मन्त्री उसकी सेवा कर रहे थे इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो अन्य छोटे पर्वतोंसे परिवृत सुमेरु महापर्वत ही हो ॥८॥


सुखं तेजःपरिच्छन्ने निषण्णः सिंहविष्टरे । सुमेरुशिखरस्थस्य चैत्यस्य श्रियमुद्वहन् ॥९॥

अर्थ: कान्तिसे आच्छादित सिंहासनपर बैठा हुआ वह सौधर्मेन्द्र सुमेरुके शिखरपर विराजमान जिनेन्द्रकी शोभाको धारण कर रहा था ॥९॥


चन्द्रादित्योत्तमोद्योतरत्नालङ्कृतविग्रहः । मनोहरेण रूपेण जुष्टो नेत्रसमुत्सवः ॥१०॥

अर्थ: चन्द्रमा और सूर्यके समान उत्तम प्रकाश वाले रत्नोंसे उसका शरीर अलंकृत था । वह मनोहर रूपसे सहित तथा नेत्रोंको आनन्द देने वाला था ॥१०॥


बिभ्राणो विमलं हारं तरङ्गितमहाप्रभम् । प्रवाहमिव सैतोदं श्रीमान्निषधभूधरः ॥११॥

अर्थ: जिसकी बहुतभारी कान्ति फैल रही थी ऐसे निर्मल हारको धारण करता हुआ वह ऐसा जान पड़ता था मानो सीतोदा नदीके प्रवाहको धारण करता हुआ निषध पर्वत ही हो ॥११॥


हारकुण्डलकेयूरप्रभृत्युत्तमभूषणैः । समन्तादावृतो देवैर्नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ॥१२॥

अर्थ: हार, कुण्डल, केयूर आदि उत्तम आभूषणोंको धारण करने वाले देव उस सौधर्मेन्द्रको सब ओरसे घेरे हुए थे इसलिए वह नक्षत्रोंसे आवृत चन्द्रमाके समान जान पड़ता था ॥१२॥


चन्द्रनक्षत्रसादृश्यं चाह मानुषगोचरम् । उक्तं यतोऽन्यथाकल्पज्योतिषामन्तरं महत् ॥१३॥

अर्थ: इन्द्र तथा देवोंके लिए जो चन्द्रमा और नक्षत्रोंका सादृश्य कहा है वह मनुष्यकी अपेक्षा है क्योंकि स्वर्गके देव और ज्योतिषी देवोंमें बड़ा अन्तर है । भावार्थ - मनुष्य-लोकमें चन्द्रमा और नक्षत्र उज्ज्वल दिखते हैं इसलिए इन्द्र तथा देवोंको उनका दृष्टान्त दिया है यथार्थमें चन्द्रमा नक्षत्र रूप ज्योतिषी देवोंसे स्वर्गवासी देवोंकी ज्योति अधिक है और देवोंकी ज्योतिसे इन्द्रोंकी ज्योति अधिक है ॥१३॥


महाप्रभावसम्पन्नो दिशो दश निजौजसा । भासयन्परमोदात्तस्तरुर्जैनेश्वरो यथा ॥१४॥

अर्थ: वह इन्द्र स्वयं महाप्रभावसे सम्पन्न था और अपने तेजसे दशों दिशाओंको प्रकाशमान कर रहा था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो जिनेन्द्र सम्बन्धी अत्यन्त ऊँचा अशोक वृक्ष ही हो ॥१४॥


अशक्यवर्णनो भूरि संवत्सरशतैरपि । अप्यशेषैर्जनैर्जिह्वासहस्रैरपि सर्वदा ॥१५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यदि सब लोग मिल-कर हजारों जिह्वाओंके द्वारा निरन्तर उसका वर्णन करें तो सैकड़ों वर्षोंमें भी वर्णन पूरा नहीं हो सकता ॥१५॥


लोकपालप्रधानानां सुराणां चारुचेतसाम् । यथाऽऽसनं निषण्णानां पुराणमिदमभ्यधात् ॥१६॥

अर्थ: तदनन्तर उस इन्द्रने, यथायोग्य आसनोंपर बैठे लोकपाल आदि शुद्ध हृदयके धारक देवोंके समक्ष इस पुराणका वर्णन किया ॥१६॥


येनैषोऽत्यन्तदुःसाध्यः संसारः परमासुरः । निहतो ज्ञानचक्रेण महारिः सुखसूदनः ॥१७॥

अर्हन्तं तं परं भक्त्या भावपुष्पैरनन्तरम् । नाथमर्चयताऽशेषदोषकक्षविभावसुम् ॥१८॥

अर्थ: पुराणका वर्णन करते हुए उसने कहा कि अहो देवो ! जिन्होंने अत्यन्त दुःसाध्य, सुखको नष्ट करनेवाले तथा महाशत्रु स्वरूप इस संसाररूपी महाअसुरको ज्ञानरूपी चक्रके द्वारा नष्ट कर दिया है और जो समस्त दोष रूपी अटवीको जलानेके लिए अग्निके समान हैं उन परमोत्कृष्ट अर्हन्त भगवान्‌की तुम निरन्तर भक्तिपूर्वक भाव रूपी फूलोंसे अर्चा करो ॥१७-१८॥


कषायोऽग्रतरङ्गाढ्यात् कामग्राहसमाकुलात् । यः संसारार्णवाद् भव्यान् समुत्तारयितुं क्षमः ॥१९॥

यस्य प्रजातमात्रस्य मन्दरे त्रिदशेश्वराः । अभिषेकं निषेवन्ते परं क्षीरोदवारिणा ॥२०॥

अर्चयन्ति च भक्त्याढ्यास्तदेकाग्रानुवर्त्तिनः । पुरुषार्थाऽऽहितस्वान्ताः परिवर्गसमन्विताः ॥२१॥

अर्थ: कषायरूपी उन्नत तरङ्गोंसे युक्त तथा कामरूपी मगर-मच्छोंसे व्याप्त संसार रूपी सागरसे जो भव्य जीवोंको पार लगानेमें समर्थ हैं, उत्पन्न होते ही जिनका इन्द्र लोग सुमेरु पर्वतपर क्षीरसागरके जलसे उत्कृष्ट अभिषेक करते हैं। तथा भक्तिसे युक्त, मोक्ष पुरुषार्थमें चित्तको लगानेवाले एवं अपने-अपने परिजनोंसे सहित इन्द्र लोग तदेकाग्र चित्त होकर जिनकी पूजा करते हैं ॥१९-२१॥


विन्ध्यकैलासवक्षोजां पारावारोर्मिमेखलाम् । यावत्तस्थौ महीं त्यक्त्वा गृहीत्वा सिद्धियोषिताम् ॥२२॥

अर्थ: विन्ध्य और कैलाश पर्वत जिसके स्तन हैं तथा समुद्रकी लहरें जिसकी मेखला हैं ऐसी पृथिवी रूपी स्त्रीका त्यागकर तथा मुक्ति रूपी स्त्रीको लेकर जो विद्यमान हैं ॥२२॥


महामोहतमश्छन्नं धर्महीनमपार्थिवम् । येनेदमेत्य नाकाग्रादालोकं प्रापितं जगत् ॥२३॥

अर्थ: महामोह रूपी अन्ध-कारसे आच्छादित, धर्महीन तथा स्वामी हीन इस संसारको जिन्होंने स्वर्गके अग्रभागसे आकर उत्तम प्रकाश प्राप्त कराया था ॥२३॥


अत्यन्ताद्भुतवीर्येण येनाष्टौ कर्मशत्रवः । क्षपिताः क्षणमात्रेण हरिणेवेह दन्तिनः ॥२४॥

अर्थ: और जिस प्रकार सिंह हाथियोंको नष्ट कर देता है उसी प्रकार अत्यन्त अद्भुत पराक्रमको धारण करने वाले जिन्होंने आठ कर्म रूपी शत्रुओंको क्षणभरमें नष्ट कर दिया है ॥२४॥


जिनेन्द्रो भगवानर्हन् स्वयम्भूः शम्भुरूर्जितः । स्वयम्प्रभो महादेवः स्थाणुः कालञ्जरः शिवः ॥२५॥

महाहिरण्यगर्भश्च देवदेवो महेश्वरः । सद्धर्मचक्रवर्ती च विभुस्तीर्थंकरः कृती ॥२६॥

संसारसूदनः सूरिर्ज्ञानचक्षुर्भवान्तकः । एवमादिर्यथार्थाख्यो गीयते यो मनीषिभिः ॥२७॥

अर्थ: जिनेन्द्र-भगवान्, अर्हन्त, स्वयंभू, शम्भु, ऊर्जित, स्वयंप्रभ, महादेव, स्थाणु, कालंजर, शिव, महाहिरण्यगर्भ, देवदेव, महेश्वर, सद्धर्म चक्रवर्ती, विभु, तीर्थंकर, कृति, संसारसूदन, सूरि, ज्ञानचक्षु और भवान्तक इत्यादि यथार्थ नामोंसे विद्वज्जन जिनकी स्तुति करते हैं ॥२५-२७॥


निगूढप्रकटस्वार्थैरभिधानैः सुनिर्मलैः । स्तूयते स मनुष्येन्द्रैः सुरेन्द्रैश्च सुभक्तिभिः ॥२८॥

अर्थ: उत्तम भक्तिसेयुक्त नरेन्द्र और देवेन्द्र गूढ़ तथा अगूढ़ अर्थको धारण करने वाले अत्यन्त निर्मल शब्दों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं ॥२८॥


प्रसादाद्यस्य नाथस्य कर्ममुक्ताः शरीरिणः । त्रैलोक्याग्रेऽवतिष्ठन्ते यथावत्प्रकृतिस्थिताः ॥२९॥

अर्थ: जिनके प्रसादसे जीव कर्मरहित हो तीन लोकके अग्रभागमें स्वस्वभावमें स्थित रहते हुए विद्यमान रहते हैं ॥२९॥


इत्यादि यस्य माहात्म्यं स्मृतमप्यघनाशनम् । पुराणं परमं दिव्यं सम्मदोद्भवकारणम् ॥३०॥

अर्थ: जिनका इस प्रकारका माहात्म्य स्मृतिमें आनेपर भी पापका नाश करनेवाला है और जिनका परम दिव्य पुराण हर्षकी उत्पत्तिका कारण है ॥३०॥


महाकल्याणमूलस्य स्वार्थकांक्षणतत्पराः । तस्य देवाधिदेवस्य भक्ता भवत सन्ततम् ॥३१॥

अर्थ: हे आत्मकल्याणके इच्छुक देवजनो ! उन महाकल्याणके मूल देवाधिदेव जिनेन्द्र भगवान्के तुम सदा भक्त होओ ॥३१॥


अनादिनिधने जन्तुः प्रेर्यमाणः स्वकर्मभिः । दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं धिक् कश्चिदपि मुह्यति ॥३२॥

अर्थ: इस अनादि-निधन संसारमें अपने कर्मोंसे प्रेरित हुआ कोई विरला मनुष्य ही दुर्लभ मनुष्य पर्यायको प्राप्त करता है परन्तु धिक्कार है कि वह भी मोहमें फँस जाता है ॥३२॥


चतुर्गतिमहावर्ते महासंसारमण्डले । पुनर्बोधिः कुतस्तेषां ये द्विषन्त्यर्हदक्षरम् ॥३३॥

अर्थ: जो ‘अर्हन्त’ इस अक्षरसे द्वेष करते हैं उन्हें चतुर्गति रूप बड़ी-बड़ी आवर्तोंसे सहित इस संसाररूपी महासागरमें रत्नत्रयकी प्राप्ति पुनः कैसे हो सकती है ? ॥३३॥


कृच्छ्रान्मानुषमासाद्य यः स्याद्बोधिविवर्जितः । पुनर्भ्राम्यत्यपुण्यात्मा सः स्वयंरथचक्रवत् ॥३४॥

अर्थ: जो बड़ी कठिनाईसे मनुष्यभव पाकर रत्नत्रयसे वर्जित रहता है, वह पापी रथके चक्रके समान स्वयं भ्रमण करता रहता है ॥३४॥


अहो धिङ्मानुषे लोके गतानुगतिकैर्जनैः । जिनेन्द्रो नादृतः कैश्चित्संसारारिनिषूदनः ॥३५॥

अर्थ: अहो धिक्कार है कि इस मनुष्य-लोकमें कितने ही गतानुगतिक लोगोंमें संसार-शत्रुको नष्ट करनेवाले जिनेन्द्र भगवान्का आदर नहीं किया ॥३५॥


मिथ्यातपः समाचर्य भूत्वा देवो लवर्धिकः । च्युत्वा मनुष्यतां प्राप्य कष्टं द्रुह्यति जीवकः ॥३६॥

अर्थ: यह जीव मिथ्या तपकर अल्प ऋद्धिका धारक देव होता है और वहाँसे च्युत होकर मनुष्य पर्याय पाता है फिर भी खेद है कि द्रोह करता है ॥३६॥


कुधर्माशयसक्तोऽसौ महामोहवशीकृतः । न जिनेन्द्रं महेन्द्राणामपीन्द्रं प्रतिपद्यते ॥३७॥

अर्थ: महामोहके वशीभूत हुआ यह जीव, मिथ्याधर्ममें आसक्त हो बड़े-बड़े इन्द्रोंके इन्द्र जो जिनेन्द्र भगवान् हैं उन्हें प्राप्त नहीं होता ॥३७॥


विषयामिषलुब्धात्मा जन्तुर्मनुजतां गतः । मुह्यते मोहनीयेन कर्मणा कष्टमुत्तमम् ॥३८॥

अर्थ: विषय रूपी मांसमें जिसकी आत्मा लुभा रही है ऐसा यह प्राणी मनुष्य पर्याय कर्मको पाकर मोहनीयके द्वारा मोहित हो रहा है, यह बड़े कष्टकी बात है ॥३८॥


अपि दुर्दैवयोगाद्यैः स्वर्गं प्राप्य कुतापसः । स्वहीनतां परिज्ञाय दह्यते चिन्तयाऽतुरः ॥३९॥

अर्थ: मिथ्यातप करनेवाला प्राणी दुर्दैवके योगसे यदि स्वर्ग भी प्राप्त कर लेता है तो वहाँ अपनी हीनताका अनुभव करता हुआ चिन्तातुर हो जलता रहता है ॥३९॥


रत्नद्वीपोपमे रम्ये तदा धिङ्मन्दबुद्धिना । मयार्हच्छासने किं नु श्रेयो न कृतमात्मनः ॥४०॥

अर्थ: वहाँ वह सोचता है कि अहो ! रत्नद्वीपके समान सुन्दर जिन-शासनमें पहुँचकर भी मुझ मन्दबुद्धिने आत्माका हित नहीं किया अतः मुझे धिक्कार है ॥४०॥


हा धिक्कुशास्त्रनिवहैस्तैश्च वाक्पटुभिः खलैः । पापैर्मानिभिरुन्मार्गे पातितः पतितैः कथम् ॥४१॥

अर्थ: हाय हाय धिक्कार है कि मैं उन मिथ्या शास्त्रोंके समूह तथा वचन-रचनामें चतुर, पापी, मानी तथा स्वयं पतित दुष्ट मनुष्योंके द्वारा कुमार्गमें कैसे गिरा दिया गया ? ॥४१॥


एवं मानुष्यमासाद्य जैनेन्द्रमतमुत्तमम् । दुर्विज्ञेयमधन्यानां जन्तूनां दुःखभागिनाम् ॥४२॥

अर्थ: इस प्रकार मनुष्य-भव पाकर भी अधन्य तथा निरन्तर दुःख उठानेवाले मनुष्योंके लिए यह उत्तम जिन-शासन दुर्ज्ञेय ही बना रहता है ॥४२॥


महर्धिकस्य देवस्य च्युतस्य स्वर्गतो भवेत् । आर्हती दुर्लभा बोधिर्देहिनोऽन्यस्य किं पुनः ॥४३॥

अर्थ: स्वर्गसे च्युत हुए महर्द्धिक देवके लिए भी जिनेन्द्र प्रतिपादित रत्नत्रयका पाना दुर्लभ है फिर अन्य प्राणीकी तो बात ही क्या है ? ॥४३॥


धन्यः सोऽनुगृहीतश्च मानुषत्वे भवोत्तमे । यः करोत्यात्मनः श्रेयो बोधिमासाद्य नैष्ठिकीम् ॥४४॥

अर्थ: सब पर्यायोंमें उत्तम मनुष्य-पर्यायमें निष्ठापूर्ण रत्नत्रय पाकर जो आत्माका कल्याण करता है वही धन्य है तथा वही अनुगृहीत-उपकृत है ॥४४॥


तत्रैवात्मगतं प्राह सुरश्रेष्ठो विभावसुः । कदा नु खलु मानुष्यं प्राप्स्यामि स्थितिसंक्षये ॥४५॥

अर्थ: उसी सभामें बैठा हुआ इन्द्ररूपी सूर्य, मन-ही-मन कहता है कि यहाँकी आयुपूर्ण होनेपर मैं मनुष्य-पर्यायको कब प्राप्त करूँगा ? ॥४५॥


विषयारिं परित्यज्य स्थापयित्वा वशे मनः । नीत्वा कर्म प्रयास्यामि तपसा गतिमार्हतीम् ॥४६॥

अर्थ: कब विषयरूपी शत्रुको छोड़कर मनको अपने वश कर, तथा कर्मको नष्टकर तपके द्वारा मैं जिनेन्द्र सम्बन्धी गति अर्थात् मोक्ष प्राप्त करूँगा ॥४६॥


तत्रैको विबुधः प्राह स्वर्गस्थस्येदृशी मतिः । अस्माकमपि सर्वेषां नृत्वं प्राप्य विमुह्यति ॥४७॥

अर्थ: यह सुन देवोंमें से एक देव बोला कि जब तक यह जीव स्वर्गमें रहता है तभी तक उसके ऐसा विचार होता है, जब हम सब लोग भी मनुष्य-पर्यायको पा लेते हैं तब यह सब विचार भूल जाता है ॥४७॥


यदि प्रत्ययसे नैतद् ब्रह्मलोकात् परिच्युतम् । मानुष्यैश्वर्यसंयुक्तं पद्माभं किं न पश्यसि ॥४८॥

अर्थ: यदि इस बातका विश्वास नहीं है तो ब्रह्मलोकसे च्युत तथा मनुष्योंके से युक्त राम-बलभद्रको जाकर क्यों नहीं देख लेते ? ॥४८॥


अत्रोवाच महातेजाः शचीपतिरसौ स्वयम् । सर्वेषां बन्धनानां तु स्नेहबन्धो महादृढः ॥४९॥

अर्थ: इसके उत्तरमें महातेजस्वी इन्द्रने स्वयं कहा कि सब बन्धनोंमें स्नेहका बन्धन अत्यन्त दृढ़ है ॥४९॥


हस्तपादाङ्गबद्धस्य मोक्षः स्यादसुधारिणः । स्नेहबन्धनबद्धस्य कुतो मुक्तिर्विधीयते ॥५०॥

अर्थ: जो हाथ-पैर आदि अवयवोंसे बँधा है ऐसे प्राणीको मोक्ष हो सकता है परन्तु स्नेहरूपी बन्धनसे बँधे प्राणीको मोक्ष कैसे हो सकता है ? ॥५०॥


योजनानां सहस्राणि निगडैः पूरितो व्रजेत् । शक्तो नाङ्गुलमप्येकं बद्धः स्नेहेन मानवः ॥५१॥

अर्थ: बेड़ियोंसे बँधा मनुष्य हजारों योजन भी जा सकता है परन्तु स्नेहसे बँधा मनुष्य एक अङ्गुल भी जानेके लिए समर्थ नहीं है ॥५१॥


अस्य लाङ्गलिनो नित्यमनुरक्तो गदायुधः । अतृप्तो दर्शने कृत्यं जीवितेनाऽपि वाञ्छति ॥५२॥

अर्थ: लक्ष्मण, राममें सदा अनुरक्त रहता है वह इसके दर्शन करते-करते कभी तृप्त ही नहीं होता और अपने प्राण देकर भी उसका कार्य करना चाहता है ॥५२॥


निमेषमपि नो यस्य विकलं हलिनो मनः । स तं लक्ष्मीधरं त्यक्तुं शक्नोति सुकृतं कथम् ॥५३॥

अर्थ: पलभरके लिए भी जिसके दूर होनेपर रामका मन बेचैन हो उठता है वह उस उपकारी लक्ष्मणको छोड़नेके लिए कैसे समर्थ हो सकता है ? ॥५३॥


कर्मणामिदमीदृशमीहितं बुद्धिमानपि यदेति विमूढताम् । अन्यथा श्रुतसर्वनिजायतिः कः करोति न हितं सचेतनः ॥५४॥

अर्थ: कर्मकी यह ऐसी ही अद्भुत चेष्टा है कि बुद्धिमान् मनुष्य भी विमोहको प्राप्त हो जाता है अन्यथा जिसने अपना समस्त भविष्य सुन रक्खा है ऐसा कौन सचेतन प्राणी आत्महित नहीं करता ॥५४॥


एवमेतदहो त्रिदशाः स्थितं देहिनामपरमत्र किमुच्यताम् । कृत्यमत्र भवारिविनाशनं यत्नमेत्य परमं सुचेतसा ॥५५॥

अर्थ: इस प्रकार अहो देवो ! प्राणियोंके विषयमें यहाँ और क्या कहा जाय ? इतना ही निश्चित हुआ कि उत्तम प्रयत्न कर अच्छे हृदयसे संसार रूपी शत्रुका नाश करना चाहिए ॥५५॥


इति सुरपतिमार्गं तत्त्वमार्गानुरक्तं जिनवरगुणसङ्गात्यन्तपूतं मनोज्ञम् । रविशशिमरुदाद्याः प्राप्य चेतोविशुद्धा भवभयमभिजग्मुर्मानवत्वाभिकाङ्क्षाः ॥५६॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार यथार्थ मार्गसे अनुरक्त एवं जिनेन्द्र भगवान्के गुणोंके संगसे अत्यन्त पवित्र, सुरपतिके द्वारा प्रदर्शित मनोहर मार्गको पाकर जिनके चित्त विशुद्ध हो गये थे तथा जो मनुष्य-पर्याय प्राप्त करनेकी आकांक्षा रखते थे ऐसे सूर्य, चन्द्र तथा कल्पवासी आदि देव संसारसे भयको प्राप्त हुए ॥५६॥


इत्यार्षे श्रीपद्मचरिते रविषेणाचार्यप्रणीते शक्रसुरसंकथाभिधानं नाम
चतुर्दशोत्तरशतं पर्व ॥११४॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा प्रणीत पद्मपुराणमें इन्द्र और देवोंके बीच हुई कथाका वर्णन करनेवाला एकसौ चौदहवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥११४॥


११५. पञ्चदशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशतपोऽभिधानं)

अथाऽऽसनं विमुञ्चन्तं शक्रं नत्वा सुरासुराः । यथायथं ययुश्चित्रं वहन्तो भावमुत्कटम् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर आसनको छोड़ते हुए इन्द्रको नमस्कारकर नाना प्रकारके उत्कट भावको धारण करनेवाले सुर और असुर यथायोग्य स्थानोंपर गये ॥१॥


कुतूहलतया द्वौ तु विबुधौ कृतनिश्चयौ । पद्मनारायणस्नेहमीहमानौ परीक्षितुम् ॥२॥

क्रीडैकरसिकात्मानावन्योन्यप्रेमसङ्गतौ । पश्यावः प्रीतिमनयोरित्यागातां प्रधारणाम् ॥३॥

अर्थ: उनमेंसे राम और लक्ष्मणके स्नेहकी परीक्षा करनेके लिए चेष्टा करनेवाले, क्रीड़ाके रसिक तथा पारस्परिक प्रेमसे सहित दो देवोंने कुतूहलवश यह निश्चय किया, यह सलाह बाँधी कि चलो इन दोनोंकी प्रीति देखें ॥२-३॥


दिवसं विश्वसित्येकमप्यस्यादर्शनं न यः । मरणे पूर्वजस्यासौ हरिः किमु विचेष्टते ॥४॥

शोकविह्वलितस्यास्य वीक्षमाणौ विचेष्टितम् । परिहासं क्षणं कुर्वो गच्छावः कोशलां पुरीम् ॥५॥

शोकाकुलं मुखं विष्णोर्जायते कीदृशं तु तत् । कस्मै कुप्यति याति क्व करोति किमु भाषणम् ॥६॥

कृत्वा प्रधारणामेतां रत्नचूलो दुरीहितः । नामतो मृगचूलश्च विनीतां नगरीं गतौ ॥७॥

अर्थ: जो उनके एक दिनके भी अदर्शनको सहन नहीं कर पाता है ऐसा नारायण अपने अग्रजके मरणका समाचार पाकर देखें क्या चेष्टा करता है ? शोकसे विह्वल नारायणकी चेष्टा देखते हुए क्षण-भरके लिए परिहास करें। चलो, अयोध्यापुरी चलें और देखें कि विष्णुका शोकाकुल मुख कैसा होता है ? वह किसके प्रति क्रोध करता है और क्या कहता है ? ऐसी सलाहकर रत्नचूल और मृगचूल नामके दो दुराचारी देव अयोध्याकी ओर चले ॥४-७॥


तत्रैत्याकुरुतां पद्मभवने क्रन्दितध्वनिम् । समस्तान्तःपुरस्त्रीणां दिव्यमायासमुद्भवम् ॥८॥

प्रतीहारसुहृन्मन्त्रिपुरोहितपुरोगमाः । अधोमुखा ययुर्विष्णुं जगुश्च बलपञ्चताम् ॥९॥

मृतो राघव इत्येतद्वाक्यं श्रुत्वा गदायुधः । मन्दप्रभञ्जनाधूतनीलोत्पलनिभेक्षणः ॥१०॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने रामके भवन-में दिव्य मायासे अन्तःपुरकी समस्त स्त्रियोंके रुदनका शब्द कराया तथा ऐसी विक्रिया की कि द्वारपाल, मित्र, मन्त्री, पुरोहित तथा आगे चलनेवाले अन्य पुरुष नीचा मुख किये लक्ष्मणके पास गये और रामकी मृत्युका समाचार कहने लगे। उन्होंने कहा कि ‘हे नाथ ! रामकी मृत्यु हुई है’। यह सुनते ही लक्ष्मणके नेत्र मन्द-मन्द वायुसे कम्पित नीलोत्पलके वनसमान चञ्चल हो उठे ॥८-१०॥


हा किमिदं समुद्भूतमित्यर्द्धकृतजल्पनः । मनोवितानतां प्राप्तः सहसाऽश्रूण्यमुञ्चत ॥११॥

अर्थ: ‘हाय यह क्या हुआ ?’ वे इस शब्दका आधा उच्चारण ही कर पाये थे कि उनका मन शून्य हो गया और वे अश्रु छोड़ने लगे ॥११॥


ताडितोऽशनिनेवाऽसौ काञ्चनस्तम्भसंश्रितः । सिंहासनगतः पुस्तकर्मन्यस्त इव स्थितः ॥१२॥

अर्थ: वज्रसे ताड़ित हुए के समान वे स्वर्णके खम्भेसे टिक गये और सिंहासनपर बैठे-बैठे ही मिट्टीके पुतलेकी तरह निश्चेष्ट हो गये ॥१२॥


अनिमीलितनेत्रोऽसौ तथाऽवस्थितविग्रहः । दधार जीवतो रूपं क्वापि प्रहितचेतसः ॥१३॥

अर्थ: उनके नेत्र यद्यपि बन्द नहीं हुए थे तथापि उनका शरीर ज्योंका त्यों निश्चेष्ट हो गया। वे उस समय उस जीवित मनुष्यका रूप धारणकर रहे थे जिसका कि चित्त कहीं अन्यत्र लगा हुआ है ॥१३॥


वीक्ष्य निर्गतजीवं तं भ्रातृमृत्यनलाहतम् । त्रिदशौ व्याकुलीभूतौ जीवितुं दातुमक्षमौ ॥१४॥

अर्थ: भाईकी मृत्यु रूपी अग्निसे ताड़ित लक्ष्मणको निर्जीव देख दोनों देव बहुत व्याकुल हुए परन्तु वे जीवन देनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥१४॥


नूनमस्येदृशो मृत्युर्विधिनेति कृताशयौ । विषादविस्मयाऽऽपूर्णौ सौधर्मंमरुची गतौ ॥१५॥

अर्थ: ‘निश्चय ही इसकी इसी विधिसे मृत्यु होनी होगी’ ऐसा विचारकर विषाद और आश्चर्यसे भरे हुए दोनों देव निष्प्रभ हो सौधर्म स्वर्ग चले गये ॥१५॥


पश्चात्तापाऽनलज्वालाकास्न्योपालीढमानसौ । न तत्र तौ धृतिं जातु सम्प्राप्तौ निन्दितात्मकौ ॥१६॥

अर्थ: पश्चात्ताप रूपी अग्निकी ज्वालासे जिनका मन समस्तरूपसे व्याप्त हो रहा था तथा जिनकी आत्मा अत्यन्त निन्दित थी ऐसे वे दोनों देव स्वर्गमें कभी धैर्यको प्राप्त नहीं होते थे अर्थात् रात-दिन पश्चात्तापकी ज्वालामें झुलसते रहते थे ॥१६॥


अप्रेक्ष्यकारिणां पापमानसानां हतात्मनाम् । अनुष्ठितं स्वयं कर्म जायते तापकारणम् ॥१७॥

अर्थ: सो ठीक ही है क्योंकि विना विचारे काम करनेवाले नीच, पापी मनुष्योंका किया कार्य उन्हें स्वयं सन्तापका कारण होता है ॥१७॥


दिव्यमायाकृतं कर्म तदा ज्ञात्वा तथाविधम् । प्रसादयितुमुद्युक्ताः सौमित्रिं प्रवराः स्त्रियः ॥१८॥

अर्थ: तदनन्तर ‘यह कार्य लक्ष्मणने अपनी दिव्य मायासे किया है’ ऐसा जानकर उस समय उनकी उत्तमोत्तम स्त्रियाँ उन्हें प्रसन्न करनेके लिए उद्यत हुईं ॥१८॥


कयाऽकृतज्ञया नाथ मूढयाऽस्यपमानितः । सौभाग्यगर्ववाहिन्या परमं दुर्विदग्धया ॥१९॥

अर्थ: कोई स्त्री कहने लगी कि हे नाथ ! सौभाग्यके गर्वको धारण करनेवाली किस अकृतज्ञ, मूर्ख और कुचतुर स्त्रीने आपका अपमान किया है ? ॥१९॥


प्रसीद मुच्यतां कोपो देव दुःखासिकापि वा । ननु यत्र जने कोपः क्रियतां तत्र यन्मतम् ॥२०॥

अर्थ: हे देव ! प्रसन्न हूजिए, क्रोध छोड़िए तथा यह दुःखदायी आसन भी दूर कीजिए । यथार्थमें जिसपर आपका क्रोध हो उसका जो चाहें सो कीजिए ॥२०॥


इत्युक्त्वा काश्चिदालिङ्ग्य परमप्रेमभूमिकाः । निपेतुः पादयोर्नानाचाटुजल्पिततत्पराः ॥२१॥

अर्थ: यह कहकर परम प्रेमकी भूमि तथा नाना प्रकारके मधुर वचन कहनेमें तत्पर कितनी ही स्त्रियाँ आलिङ्गन कर उनके चरणोंमें लोट गईं ॥२१॥


काश्चिद्वीणां विधायाङ्के तद्गुणग्रामसङ्गतम् । जगुर्मधुरमत्यन्तं प्रसादनकृताशयाः ॥२२॥

अर्थ: प्रसन्न करनेकी भावना रखनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ गोदमें वीणा रख उनके गुण-समूहसे सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त मधुर गान गाने लगीं ॥२२॥


काश्चिदाननमालोक्य कृतप्रियशतोद्यताः । समाभाषयितुं यत्नं सर्वसन्दोहतोऽभवन् ॥२३॥

अर्थ: सैकड़ों प्रिय वचन कहनेमें तत्पर कितनी ही स्त्रियाँ उनका मुख देख वार्तालाप करानेके लिए सामूहिक यत्न कर रही थीं ॥२३॥


स्तनोपपीडमाश्लिष्य काश्चिद् विमलविभ्रमाः । कान्तस्य कान्तमाजिघ्रन् गण्डं कुण्डलमण्डितम् ॥२४॥

अर्थ: उज्ज्वल शोभाको धारण करनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ स्तनों को पीड़ित करनेवाला आलिङ्गन कर पतिके कुण्डलमण्डित सुन्दर कपोलको सूँघ रही थीं ॥२४॥


ईषत्पादं समुद्धृत्य काश्चिन्मधुरभाषिताः । चक्रुः शिरसि संफुल्लकमलोदरसन्निभम् ॥२५॥

अर्थ: मधुर भाषण करनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ, विकसित कमलके भीतरी भागके समान सुन्दर उनके पैरको कुछ ऊपर उठाकर शिरपर रख रही थीं ॥२५॥


काश्चिदर्भकसारङ्गीलोचनाः कर्त्तु मुद्यताः । सोन्मादविभ्रमक्षिप्तकटाक्षोत्पलशेखरम् ॥२६॥

अर्थ: बालमृगीके समान चञ्चल नेत्रोंको धारण करनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ उन्माद तथा विभ्रमके साथ छोड़े हुए कटाक्ष रूपी नील कमलोंका सेहरा बनानेके लिए ही मानो उद्यत थीं ॥२६॥


जम्भज्जृम्भायताः काश्चित्तदाननकृतेक्षणाः । मन्दं बभञ्जुरङ्गानि स्वनन्त्यखिलसन्धिषु ॥२७॥

अर्थ: लम्बी जमुहाई लेनेवाली कितनी ही स्त्रियाँ उनके मुखकी ओर दृष्टि डालकर धीरे-धीरे अँगड़ाई ले रही थीं और अँगुलियोंकी संधिया चटका रही थीं ॥२७॥


एवं विचेष्टमानानां तासामुत्तमयोषिताम् । यत्नोऽनर्थकतां प्राप तत्र चैतन्यवर्जिते ॥२८॥

अर्थ: इस प्रकार चेष्टा करने वाली उन उत्तम स्त्रियोंका सब यत्न चेतनारहित लक्ष्मणके विषयमें निरर्थकपनेको प्राप्त हो गया ॥२८॥


तानि सप्तदश स्त्रीणां सहस्राणि हरेर्दधुः । मन्दमारुतनिर्धूतचित्राम्बुजवनश्रियम् ॥२९॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि उस समय लक्ष्मणकी सत्रह हजार स्त्रियाँ मन्द-मन्द वायुसे कम्पित नाना प्रकारके कमल वनकी शोभा धारण कर रही थीं ॥२९॥


तस्मिंस्तथाविधे नाथे स्थिते कृच्छ्रसमागतः । व्याकुले मनसि स्त्रीणां निदधे संशयः पदम् ॥३०॥

अर्थ: तदनन्तर जब लक्ष्मण उसी प्रकार स्थित रहे आये तब बड़ी कठिनाईसे प्राप्त हुए संशयने उन स्त्रियोंके व्यग्र मनमें अपना पैर रक्खा ॥३०॥


सुदुश्चिन्तं च दुर्भाष्यं भावं दुःश्रवमेव च । कृत्वा मनसि मुग्धाच्यः पस्पृशुर्मोहसङ्गताः ॥३१॥

अर्थ: मोहमें पड़ी हुई वे भोली-भाली स्त्रियाँ मनमें ऐसा विचार करती हुईं उनका स्पर्श कर रही थीं कि सम्भव है हमलोगोंने इनके प्रति मनमें कुछ खोटा विचार किया हो, कोई न कहने योग्य शब्द कहा हो, अथवा जिसका सुनना भी दुःखदायी है, ऐसा कोई भाव किया हो ॥३१॥


सुरेन्द्रवनिताचक्रसमचेष्टिततेजसाम् । तदा शोकाभितप्तानां नैतासां चारुताऽभवत् ॥३२॥

अर्थ: इन्द्राणियोंके समूहके समान चेष्टा और तेजको धारण करनेवाली वे स्त्रियाँ उस समय शोकसे ऐसी संतप्त हो गई कि उनकी सब सुन्दरता समाप्त हो गई ॥३२॥


श्रुत्वाऽन्तश्चरवक्त्रेभ्यस्तं वृत्तान्तं तथाविधम् । ससम्भ्रमं परिप्राप्तः पद्माभः सचिवैर्वृतः ॥३३॥

अर्थ: अथानन्तर अन्तःपुरचारी प्रतिहारोंके मुखसे यह समाचार सुन मन्त्रियोंसे घिरे राम घबड़ाहटके साथ वहाँ आये ॥३३॥


अन्तःपुरं प्रविष्टश्च परमाप्तजनावृतः । ससम्भ्रमैर्जनैर्दृष्टो विक्षिप्तविरलक्रमः ॥३४॥

अर्थ: उस समय घबड़ाये हुए लोगोंने देखा कि परम प्रामाणिक जनोंसे घिरे राम जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए अन्तःपुरमें प्रवेश कर रहे हैं ॥३४॥


ततोऽपश्यदतिक्रान्तकान्तद्युतिसमुद्भवम् । वदनं धरणीन्द्रस्य प्रभातशशिपाण्डुरम् ॥३५॥

अर्थ: तदनन्तर उन्होंने जिसकी सुन्दर कान्ति निकल चुकी थी और जो प्रातःकालीन चन्द्रमाके समान पाण्डुर वर्ण था ऐसा लक्ष्मणका मुख देखा ॥३५॥


न सुश्लिष्टमिवात्यन्तं परिभ्रष्टं स्वभावतः । तत्कालभग्नमूलाम्बुरुहसाम्यमुपागतम् ॥३६॥

अर्थ: वह मुख पहलेके समान व्यवस्थित नहीं था, स्वभावसे बिलकुल भ्रष्ट हो चुका था, और तत्काल उखाड़े हुए कमलकी सदृशताको प्राप्त हो रहा था ॥३६॥


अचिन्तयच्च किं नाम कारणं येन मे स्वयम् । आस्ते रुष्टो विषादी च किञ्चिद्विनतमस्तकः ॥३७॥

अर्थ: वे विचार करने लगे कि ऐसा कौन-सा कारण आ पड़ा कि जिससे आज लक्ष्मण मुझसे रूखा तथा विषादयुक्त हो शिरको कुछ नीचा झुकाकर बैठा है ॥३७॥


उपसृत्य च सस्नेहं मुहुराघ्राय मूर्द्धनि । हिमाऽऽहतनगाकारं पद्मस्तं परिषस्वजे ॥३८॥

अर्थ: रामने पास जाकर बड़े स्नेहसे बार-बार उनके मस्तकपर सूँघा और तुषारसे पीड़ित वृक्षके समान आकारवाले उनका बार-बार आलिङ्गन किया ॥३८॥


चिह्नानि जीवमुक्तस्य पश्यन्नपि समन्ततः । अमृतं लक्ष्मणं मेने काकुत्स्थः स्नेहनिर्भरः ॥३९॥

अर्थ: यद्यपि राम सब ओरसे मृतकके चिह्न देख रहे थे तथापि स्नेहसे परिपूर्ण होनेके कारण वे उन्हें अमृत अर्थात् जीवित ही समझ रहे थे ॥३९॥


नताङ्गयष्टिरावक्रा ग्रीवा दोःपरिघौ श्लथौ । प्राणनाकुञ्चनोन्मेषप्रभृतीहोज्झिता तनुः ॥४०॥

अर्थ: उनकी शरीर-यष्टि झुक गई थी, गरदन टेढ़ी हो गई थी, भुजा रूपी अर्गल ढीले पड़ गये थे और शरीर, साँस लेना, हस्त-पादादिक अवयवोंको सिकोड़ना तथा नेत्रोंका टिमकार पड़ना आदि चेष्टाओंसे रहित हो गया था ॥४०॥


ईदृशं लक्ष्मणं वीक्ष्य विमुक्तं स्वशरीरिणा । उद्वेगोरुभयाक्रान्तः प्रसिष्वेदापराजितः ॥४१॥

अर्थ: इस प्रकार लक्ष्मणको अपनी आत्मासे विमुक्त देख उद्वेग तथा तीव्र भयसे आक्रान्त राम पसीनासे तर हो गये ॥४१॥


अथाऽसौ दीनदीनास्यो मूर्च्छमानो मुहुर्मुहुः । बाष्पाकुलेक्षणोऽपश्यदस्याङ्गानि समन्ततः ॥४२॥

अर्थ: अथानन्तर जिनका मुख अत्यन्त दीन हो रहा था, जो बार-बार मूर्च्छित हो जाते थे, और जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे, ऐसे राम सब ओरसे उनके अंगोंको देख रहे थे ॥४२॥


न क्षतं नखरेखाया अपि तुल्यमिहेक्ष्यते । अवस्थामीदृशीं केन भवेदयमुपागतः ॥४३॥

अर्थ: वे कह रहे थे कि इस शरीरमें कहीं नखकी खरोंच बराबर भी तो घाव नहीं दिखाई देता फिर यह ऐसी अवस्थाको किसके द्वारा प्राप्त कराया गया ? - इसकी यह दशा किसने कर दी ? ॥४३॥


इति ध्यायन् समुद्भूतवेपथुस्तद्विदं जनम् । आह्वाययद्विषण्णात्मा तूर्णं विद्वानपि स्वयम् ॥४४॥

अर्थ: ऐसा विचार करते-करते रामके शरीरमें कँप-कँपी छूटने लगी तथा उनकी आत्मा विषादसे भर गई । यद्यपि वे स्वयं विद्वान् थे तथापि उन्होंने शीघ्र ही इस विषयके जानकार लोगोंको बुलवाया ॥४४॥


यदा वैद्यगणैः सर्वैर्मन्त्रौषधिविशारदैः । प्रतिशिष्टः कलापारैः परीक्ष्य धरणीधरः ॥४५॥

तदाहताशतां प्राप्तो रामो मूर्च्छां समागतः । पर्यासे वसुधापृष्ठे छिन्नमूलस्तरुर्यथा ॥४६॥

अर्थ: जब मन्त्र और औषधिमें निपुण, कलाके पारगामी समस्त वैद्योंने परीक्षा कर उत्तर दे दिया तब निराशाको प्राप्त हुए राम मूर्च्छाको प्राप्त हो गये और उखड़े वृक्षके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥४५-४६॥


हारैश्चन्दननीरैश्च तालवृन्तानिलैर्निभैः । कृच्छ्रेण त्याजितो मोहं विललाप सुविह्वलः ॥४७॥

अर्थ: जब हार, चन्दन मिश्रित जल और तालवृन्तके अनुकूल पवनके द्वारा बड़ी कठिनाईसे मूर्च्छा छुड़ाई गई तब अत्यन्त विह्वल हो विलाप करने लगे ॥४७॥


समं शोकविषादाभ्यामसौ पीडनमाश्रितः । उत्ससर्ज यदश्रूणां प्रवाहं पिहिताननम् ॥४८॥

अर्थ: चूँकि राम शोक और विषादके द्वारा साथ ही साथ पीड़ाको प्राप्त हुए थे इसीलिए वे मुखको आच्छादित करनेवाला अश्रुओंका प्रवाह छोड़ रहे थे ॥४८॥


बाष्पेण पिहितं वक्त्रं रामदेवस्य लक्षितम् । विरलाम्भोदसंवीतचन्द्रमण्डलसन्निभम् ॥४९॥

अर्थ: उस समय आँसुओंसे आच्छादित रामका मुख विरले-विरले मेघोंसे टँके चन्द्रमण्डलके समान जान पड़ता था ॥४९॥


अत्यन्तविक्लवीभूतं तमालोक्य तथाविधम् । वितानतां परिप्रापदन्तःपुरमहार्णवः ॥५०॥

अर्थ: उस प्रकारके गम्भीर हृदय रामको अत्यन्त दुःखी देख अन्तःपुर रूपी महासागर निर्मर्याद अवस्थाको प्राप्त हो गया अर्थात् उसके शोककी सीमा नहीं रही ॥५०॥


दुःखसागरनिर्मग्नाः शुष्यदङ्गा वरस्त्रियः । भृशं व्यानशिरे बाष्पाऽऽक्रन्दाभ्यां रोदसी समम् ॥५१॥

अर्थ: जो दुःखरूपी सागरमें निमग्न थीं तथा जिनके शरीर सूख गये थे ऐसी उत्तम स्त्रियोंने अत्यधिक आँसू और रोनेकी ध्वनिसे पृथिवी तथा आकाशको एक साथ व्याप्त कर दिया था ॥५१॥


हा नाथ भुवनानन्द सर्वसुन्दरजीवित । प्रयच्छ दयितां वाचं क्वासि यातः किमर्थकम् ॥५२॥

अर्थ: वे कह रही थीं कि हा नाथ ! हा जगदानन्द ! हा सर्वसुन्दर जीवित ! प्रिय वचन देओ, कहाँ हो ? किस लिए चले गये हो ? ॥५२॥


अपराधादृते कस्मादस्मानेवं विमुञ्चसि । नन्वाऽऽगः सत्यमप्यास्ते जने तिष्ठति नो चिरम् ॥५३॥

अर्थ: इस तरह अपराधके विना ही हमलोगोंको क्यों छोड़ रहे हो ? और अपराध यदि सत्य भी हो तो भी वह मनुष्यमें दीर्घ काल तक नहीं रहता ॥५३॥


एतस्मिन्नन्तरे श्रुत्वा तद्वस्तु लवणाङ्कुशौ । विषादं परमं प्राप्ताविति चिन्तामुपागतौ ॥५४॥

धिगसारं मनुष्यत्वं नाऽतोऽस्त्यन्यन्महाधमम् । मृत्युर्यच्छत्यवस्कन्दं यदज्ञातो निमेषतः ॥५५॥

अर्थ: इसी बीचमें यह समाचार सुनकर परम विषादको प्राप्त हुए लवण और अंकुश इस प्रकार विचार करने लगे कि सारहीन इस मनुष्य-पर्यायको धिक्कार हो। इससे बढ़कर दूसरा महानीच नहीं है क्योंकि मृत्यु बिना जाने ही निमेषमात्रमें इसपर आक्रमण कर देती है ॥५४-५५॥


यो न निर्व्यूहितं शक्यः सुरविद्याधरैरपि । नारायणोऽप्यसौ नीतः कालपाशेन वश्यताम् ॥५६॥

अर्थ: जिसे देव और विद्याधर भी वश नहीं कर सके थे ऐसा यह नारायण भी कालके पाशसे वशीभूत अवस्थाको प्राप्त हो गया ॥५६॥


आनाय्येव शरीरेण किमनेन धनेन च । अवधार्येति सम्बोधं वैदेहीजावुपेयतुः ॥५७॥

अर्थ: इन नश्वर शरीर और नश्वर धनसे हमें क्या आवश्यकता है ? ऐसा विचारकर सीताके दोनों पुत्र प्रतिबोधको प्राप्त हो गये ॥५७॥


पुनर्गर्भाशयाद् भीतौ नत्वा तातक्रमद्वयम् । महेन्द्रोदयमुद्यानं शिविकाऽवस्थितौ गतौ ॥५८॥

अर्थ: तदनन्तर ‘पुनः गर्भवासमें न जाना पड़े’ इससे भयभीत हुए दोनों वीर, पिताके चरण-युगलको नमस्कार कर पालकीमें बैठ महेन्द्रोदय नामक उद्यानमें चले गये ॥५८॥


तत्रामृतस्वराभिख्यं शरणीकृत्य संयतम् । बभूवतुर्महाभागौ श्रमणौ लवणाङ्कुशौ ॥५९॥

अर्थ: वहाँ अमृतस्वर नामक मुनिराजकी शरण प्राप्तकर दोनों बड़भागी मुनि हो गये ॥५९॥


गृह्णतोरनयोर्दीक्षां तदा सत्तमचेतसोः । पृथिव्यामभवद् बुद्धिर्मृत्तिकागोलकाहिता ॥६०॥

अर्थ: उत्तम चित्तके धारक लवण और अंकुश जब दीक्षा ग्रहण कर रहे थे तब विशाल पृथिवीके ऊपर उनकी मिट्टीके गोलेके समान अनादरपूर्ण बुद्धि हो रही थी ॥६०॥


एकतः पुत्रविरहो भ्रातृमृत्युवशमन्यतः । इति शोकमहावर्त्ते परावर्त्तत राघवः ॥६१॥

अर्थ: एक ओर पुत्रोंका विरह और दूसरी ओर भाईकी मृत्युका दुःख - इस प्रकार राम शोक रूपी बड़ी भँवरमें घूम रहे थे ॥६१॥


राज्यतः पुत्रतश्चापि स्वभूताज्जीवितादपि । तथाऽपि दयितोऽतोऽस्य परं लक्ष्मीधरः प्रियः ॥६२॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि रामको लक्ष्मण राज्यसे, पुत्रसे, स्त्रीसे और अपने द्वारा धारण किये जीवनसे भी कहीं अधिक प्रिय थे ॥६२॥


कर्मनियोगेनैवं प्राप्तेऽवस्थामशोभनामाप्तजने । सशोकं वैराग्यं च प्रतिपद्यन्ते विचित्रचित्ताः पुरुषाः ॥६३॥

अर्थ: संसारमें मनुष्य नाना प्रकारके हृदयके धारक हैं इसीलिए कर्मयोगसे आप्तजनोंके ऐसी अशोभन अवस्थाको प्राप्त होनेपर कोई तो शोकको प्राप्त होते हैं और कोई वैराग्यको प्राप्त होते हैं ॥६३॥


कालं प्राप्य जनानां किञ्चिच्च निमित्तमात्रकं परभावम् । सम्बोधरविरुदेति स्वकृतविपाकेऽन्तरङ्गहेतौ जाते ॥६४॥

अर्थ: जब समय पाकर स्वकृत कर्मका उदयरूप अन्तरङ्ग निमित्त मिलता है तब बाह्यमें किसी भी परपदार्थका निमित्त पाकर जीवोंके प्रतिबोध रूपी सूर्य उदित होता है उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो जाता है ॥६४॥


इत्यार्षे श्रीपद्मपुराणे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लवणाङ्कुशतपोऽभिधानं नाम पञ्चदशोत्तरशतं पर्व ॥११५॥


इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा विरचित पद्मपुराणमें लक्ष्मणका मरण और लवणांकुशके तपका वर्णन करनेवाला एकसौ पन्द्रहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११५॥


११६. षोडशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते रामदेवविप्रलापं)

कालधर्मं परिप्राप्ते राजन् लक्ष्मणपुङ्गवे । त्यक्तं युगप्रधानेन रामेण व्याकुलं जगत् ॥१॥

अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! लक्ष्मणके मृत्युको प्राप्त होनेपर युग-प्रधान रामने इस व्याकुल संसारको छोड़ दिया ॥१॥


स्वरूपमृदु सद्गन्धं स्वभावेन हरेर्वपुः । जीवेनाऽपि परित्यक्तं न पद्माभस्तदाऽत्यजत् ॥२॥

अर्थ: उस समय स्वरूपसे कोमल और स्वभाव सुगन्धित नारायणका शरीर यद्यपि निर्जीव हो गया था तथापि राम उसे छोड़ नहीं रहे थे ॥२॥


आलिङ्गति निधायाङ्के मार्ष्टि जिघ्रति निह्नुति । निषीदति समाधाय सस्पृहं भुजपञ्जरे ॥३॥

अर्थ: वे उसका आलिङ्गन करते थे, गोदमें रखकर उसे पोंछते थे, सूँघते थे, चूमते थे और बड़ी उमंग के साथ भुजपंजरमें रखकर बैठते थे ॥३॥


अवाप्नोति न विश्वासं क्षणमप्यस्य मोचने । बालोऽमृतफलं यद्वत् स तं मेने महाप्रियम् ॥४॥

अर्थ: इसके छोड़नेमें वे क्षणभरके लिए भी विश्वासको प्राप्त नहीं होते थे। जिस प्रकार बालक अमृत फलको महाप्रिय मानता है। उसी प्रकार वे उस मृत शरीर को महाप्रिय मानते थे ॥४॥


विललाप च हा भ्रातः किमिदं युक्तमीदृशम् । यत्परित्यज्य मां गन्तुं मतिरेकाकिना कृता ॥५॥

अर्थ: कभी विलाप करने लगते कि हाय भाई ! क्या तुझे यह ऐसा करना उचित था। मुझे छोड़कर अकेले ही तूने चल दिया ॥५॥


ननु नाऽहं किमु ज्ञातस्तवः त्वद्विरहासहः । यन्मां निक्षिप्य दुःखाग्नावकस्मादिदमीहसे ॥६॥

अर्थ: क्या तुझे यह विदित नहीं कि मैं तेरे विरहको सहन नहीं कर सकता जिससे तू मुझे दुःख रूपी अग्निमें डालकर अकस्मात् यह करना चाहता है ॥६॥


हा तात किमिदं क्रूरं परं व्यवसितं त्वया । यदसंवाद्य मे लोकमन्यं दत्तं प्रयाणकम् ॥७॥

अर्थ: हाय तात ! तूने यह अत्यन्त क्रूर कार्य क्यों करना चाहा जिससे कि मुझसे पूछे बिना ही परलोकके लिए प्रयाण कर दिया ॥७॥


प्रयच्छ सकृदप्याशु वत्स प्रतिवचोऽमृतम् । दोषान् किं नाऽसि किं क्रुद्धो ममापि सुविनीतकः ॥८॥

अर्थ: हे वत्स ! एक बार तो प्रत्युत्तर रूपी अमृत शीघ्र प्रदान कर । तू तो बड़ा विनयवान था फिर दोषके बिना ही मेरे ऊपर भी कुपित क्यों हो गया है ? ॥८॥


कृतवानसि नो जातु मानं मयि मनोहर । अन्य एवाऽसि किं जातो वद वा किं मया कृतम् ॥९॥

अर्थ: हे मनोहर ! तूने मेरे ऊपर कभी मान नहीं किया, फिर अब क्यों अन्य-रूप हो गया है ? कह, मैंने क्या किया है ? ॥९॥


दूरादेवान्यदा दृष्ट्वा दत्त्वाऽभ्युत्थानमादृतः । रामं सिंहासने कृत्वा महीपृष्ठं न्यसेवयः ॥१०॥

अर्थ: तू अन्य समय तो रामको दूरसे ही देखकर आदरपूर्वक खड़ा हो जाता था और उसे सिंहासनपर बैठाकर स्वयं पृथिवीपर नीचे बैठता था ॥१०॥


अधुना मे शिरस्यस्मिन्निन्दुकान्तनखावलौ । पादेऽपि लक्ष्मणन्यस्ते रुषे मृश्यति नो कथम् ॥११॥

अर्थ: हे लक्ष्मण ! इस समय चन्द्रमाके समान सुन्दर नखावलीसे युक्त तेरा पैर मेरे मस्तकपर रखा है फिर भी तू क्रोध ही करता है क्षमा क्यों नहीं करता ? ॥११॥


देव त्वरितमुत्तिष्ठ मम पुत्रौ वनं गतौ । दूरं न गच्छतो यावत्तावत्तावानयामहे ॥१२॥

अर्थ: हे देव ! शीघ्र उठ, मेरे पुत्र वनको चले गये हैं सो जब तक वे दूर नहीं पहुँच जाते हैं तब तक उन्हें वापिस ले आवें ॥१२॥


त्वया विरहिता एताः कृतार्तकुररीरवाः । भवद्गुणग्रहग्रस्ता विलोलन्ति महीतले ॥१३॥

अर्थ: तुम्हारे गुणग्रहणसे ग्रस्त ये स्त्रियाँ तुम्हारे बिना कुररीके समान करुण शब्द करती हुई पृथिवीतलमें लोट रही हैं ॥१३॥


भ्रष्टहारशिरोरत्नमेखलाकुण्डलादिकम् । आक्रन्दन्तं प्रियालोकं वारयस्याकुलं न किम् ॥१४॥

अर्थ: हार, चूड़ामणि, मेखला तथा कुण्डल आदि आभूषण नीचे गिर गये हैं ऐसी करुण रुदन करती हुई इन व्याकुल स्त्रियोंको मना क्यों नहीं करते हो ? ॥१४॥


किं करोमि क्व गच्छामि त्वया विरहितोऽधुना । स्थानं तन्नानुपश्यामि जायते यत्र निर्वृतिः ॥१५॥

अर्थ: अब तेरे विना क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? वह स्थान नहीं देखता हूँ जहाँ पहुँचनेपर सन्तोष उत्पन्न हो सके ॥१५॥


आसेचनकमेतत्ते पश्याम्यद्यापि वक्त्रकम् । अनुरक्तात्मकं तत्किं त्यक्तुं समुचितं तव ॥१६॥

अर्थ: जिसे देखते-देखते तृप्ति ही नहीं होती थी ऐसे तेरे इस मुखको मैं अब भी देख रहा हूँ फिर अनुरागसे भरे हुए मुझे छोड़ना क्या तुझे उचित था ? ॥१६॥


मरणव्यसने भ्रातुरपूर्वोऽयं ममाङ्ककम् । दग्धुं शोकानलः सक्तः किं करोमि विपुण्यकः ॥१७॥

अर्थ: इधर भाईपर मरणरूपी संकट पड़ा है उधर यह अपूर्व शोकाग्नि मेरे शरीरको जलानेके लिए तत्पर है, हाय मैं अभागा क्या करूँ ? ॥१७॥


न कृशानुर्दहत्येवं नैवं शोषयते विषम् । उपमानविनिर्मुक्तं यथा भ्रातुः परायणम् ॥१८॥

अर्थ: भाईका उपमातीत मरण शरीरको जिस प्रकार जलाता और सुखाता है उस प्रकार न अग्नि जलाती है और न विष सुखाता है ॥१८॥


अहो लक्ष्मीधर क्रोधधैर्यं संहर साम्प्रतम् । वेलाऽतीताऽनगाराणां महर्षीणामियं हि सा ॥१९॥

अर्थ: अहो लक्ष्मण ! इस समय क्रोधकी आसक्तिको दूर करो । यह गृहत्यागी मुनियोंके संचारका समय निकल गया ॥१९॥


अयं रविरुपैत्यस्तं वीक्षस्वैतानि साम्प्रतम् । पद्मानि त्वत्सनिद्राक्षिसमानि सरसां जले ॥२०॥

अर्थ: देखो, यह सूर्य अस्त होने जा रहा है और तालाबोंके जलमें कमल तुम्हारे निद्रा निमीलित नेत्रोंके समान हो रहे हैं ॥२०॥


शय्यां व्यरचयत् क्षिप्रं कृत्वा विष्णुं भुजान्तरे । व्यापारान्तरनिर्मुक्तः स्वप्तुं रामः प्रचक्रमे ॥२१॥

अर्थ: यह कहकर अन्य सब कामोंसे निवृत्त रामने शीघ्र ही शय्या बनाई और लक्ष्मण को छातीसे लगा सोनेका उपक्रम किया ॥२१॥


श्रवणे देवसद्भावं ममैकस्य निवेदय । केनासि कारणेनैतामवस्थामीदृशीमितः ॥२२॥

अर्थ: वे कहते कि हे देव ! इस समय मैं अकेला हूँ । आप मेरे कानमें अपना अभिप्राय बता दो कि किस कारणसे तुम इस अवस्थाको प्राप्त हुए हो ? ॥२२॥


प्रसन्नचन्द्रकान्तं ते वक्त्रमासीन्मनोहरम् । अधुना विगतच्छायं कस्मादीदृगिदं स्थितम् ॥२३॥

अर्थ: तुम्हारा मनोहर मुख तो उज्ज्वल चन्द्रमाके समान सुन्दर था पर इस समय यह ऐसा कान्तिहीन कैसे हो गया ? ॥२३॥


मृदुप्रभञ्जनाऽऽधूतकरपल्लवसन्निभे । आस्तां निरीक्षणे कस्मादधुना म्लानिमागते ॥२४॥

अर्थ: तुम्हारे नेत्र मन्द-मन्द वायुसे कम्पित पल्लवके समान थे फिर इस समय म्लानिको प्राप्त कैसे हो गये ? ॥२४॥


ब्रूहि ब्रूहि किमिष्टं ते सर्वं सम्पादयाम्यहम् । एवं न शोभसे विष्णो सव्यापारं मुखं कुरु ॥२५॥

अर्थ: कह, कह, तुझे क्या इष्ट है ? मैं सब अभी ही पूर्ण किये देता हूँ । हे विष्णो ! तू इस प्रकार शोभा नहीं देता, मुखको व्यापारसहित कर अर्थात् मुखसे कुछ बोल ॥२५॥


देवी सीता स्मृता किन्ते समदुःखसहायिनी । परलोकं गता साध्वी विषण्णोऽसि भवेत्ततः ॥२६॥

अर्थ: क्या तुझे सुख-दुःखमें सहायता देनेवाली सीता देवीका स्मरण हो आया है परन्तु वह साध्वी तो परलोक चली गई है क्या इसी लिए तुम विषादयुक्त हो ॥२६॥


विषादं मुञ्च लक्ष्मीश विरुद्धा खगसंहतिः । अवस्कन्दागता सेयं साकेतामवगाहते ॥२७॥

अर्थ: हे लक्ष्मीपते ! विषाद छोड़ो, देखो विद्याधरोंका समूह विरुद्ध होकर आक्रमणके लिए आ पहुँचा है और अयोध्यामें प्रवेश कर रहा है ॥२७॥


क्रुद्धस्यापीदृशं वक्त्रं मनोहर न जातुचित् । तवाऽऽसीदधुना वत्स मुञ्च मुञ्च विचेष्टितम् ॥२८॥

अर्थ: हे मनोहर ! कभी क्रुद्ध दशामें भी तुम्हारा ऐसा मुख नहीं हुआ फिर अब क्यों रहा है ? हे वत्स ! ऐसी विरुद्ध चेष्टा अब तो छोड़ो ॥२८॥


प्रसीदैष तवावृत्तपूर्वं पादौ नमाम्यहम् । ननु ख्यातोऽखिले लोके मम त्वमनुकूलने ॥२९॥

अर्थ: प्रसन्न होओ, देखो मैंने कभी तुझे नमस्कार नहीं किया किन्तु आज तेरे चरणोंमें नमस्कार करता हूँ । अरे ! तू तो मुझे अनुकूल रखनेके लिए समस्त लोकमें प्रसिद्ध है ॥२९॥


असमानप्रकाशस्त्वं जगद्दीपः समुन्नतः । वलिनाऽकालवातेन प्रायो निर्वापितोऽभवत् ॥३०॥

अर्थ: तू अनुपम प्रकाशका धारी बहुत बड़ा लोकप्रदीप है सो इस असमयमें चलनेवाली प्रचण्ड वायुके द्वारा प्रायः बुझ गया है ॥३०॥


राजराजत्वमासाद्य नीत्वा लोकं महोत्सवम् । अनाथीकृत्य तं कस्माद् भवितागमनं तव ॥३१॥

अर्थ: तुमने राजाधिराज पद पाकर लोकको बहुत भारी उत्सव प्राप्त कराया था अब उसे अनाथकर तुम्हारा जाना किस प्रकार होगा ? ॥३१॥


चक्रेण द्विषतां चक्रं जित्वा सकलमूर्जितम् । कथं नु सहसेऽद्य त्वं कालचक्रपराभवम् ॥३२॥

अर्थ: अपने चक्ररत्नके द्वारा शत्रुओंके समस्त सबल दलको जीतकर अब तुम कालचक्रका पराभव क्यों सहन करते हो ॥३२॥


राजश्रिया तवाराजद्यदिदं सुन्दरं वपुः । तदद्यापि तथैवेदं शोभते जीवितोज्झितम् ॥३३॥

अर्थ: तुम्हारा जो सुन्दर शरीर पहले राजलक्ष्मीसे जैसा सुशोभित था वैसा ही अब निर्जीव होनेपर भी सुशोभित है ॥३३॥


निद्रां राजेन्द्र मुञ्चस्व समतीता विभावरी । निवेदयति सन्ध्येयं परिप्राप्तं दिवाकरम् ॥३४॥

अर्थ: हे राजेन्द्र ! उठो, निद्रा छोड़ो, रात्रि व्यतीत हो गई, यह सन्ध्या सूचित कर रही है कि अब सूर्यका उदय होनेवाला है ॥३४॥


सुप्रभातं जिनेन्द्राणां लोकालोकावलोकिनाम् । अन्येषां भव्यपद्मानां शरणं मुनिसुव्रतः ॥३५॥

अर्थ: लोकालोकको देखनेवाले जिनेन्द्र भगवान्का सदा सुप्रभात है तथा भगवान् मुनिसुव्रतदेव अन्य भव्य जीवरूपी कमलोंके लिए शरणस्वरूप हैं ॥३५॥


प्रभातमपि जानामि ध्वान्तमेतदहं परम् । वदनं यन्नरेन्द्रस्य पश्यामि गतविभ्रमम् ॥३६॥

अर्थ: इस प्रभातको भी मैं परम अन्धकार स्वरूप ही जानता हूँ क्योंकि मैं तुम्हारे मुखको चेष्टारहित देख रहा हूँ ॥३६॥


उत्तिष्ठ मा चिरं स्वाप्सीर्मुञ्च निद्रां विचक्षण । आश्रयावः सभास्थानं तिष्ठ सामन्तदर्शने ॥३७॥

अर्थ: हे चतुर ! उठ, देर तक मत सो, निद्रा छोड़, चल सभास्थलमें चलें, सामन्तोंको दर्शन देनेके लिए सभास्थलमें बैठ ॥३७॥


प्राप्तो विनिद्रतामेष सशोकः कमलाकरः । कस्मादभ्युत्थितस्त्वं तु निद्रितं सेवते भवान् ॥३८॥

अर्थ: देख, यह शोकसे भरा कमलाकर विनिद्र अवस्थाको प्राप्त हो गया है - विकसित हो गया है पर तू विद्वान् होकर भी निद्राका सेवन क्यों कर रहा है ? ॥३८॥


विपरीतमिदं जातु त्वया नैवमनुष्ठितम् । उत्तिष्ठ राजकृत्येषु भवावहितमानसः ॥३९॥

अर्थ: तूने कभी ऐसी विपरीत चेष्टा नहीं की अतः उठ और राजकार्योंमें सावधानचित्त हो ॥३९॥


भ्रातस्त्वयि चिरं सुप्ते जिनवेश्मसु नोचिताः । क्रियन्ते चारुसङ्गीता भेरीमङ्गलनिःस्वनाः ॥४०॥

अर्थ: हे भाई ! तेरे बहुत समय तक सोते रहनेसे जिन-मन्दिरोंमें सुन्दर सङ्गीत तथा भेरियोंके माङ्गलिक शब्द आदि उचित क्रियाएँ नहीं हो रही हैं ॥४०॥


श्लथप्रभातकर्तव्याः करुणासक्तचेतसः । उद्वेगं परमं प्राप्ता यतयोऽपि त्वयीदृशे ॥४१॥

अर्थ: तेरे ऐसे होनेपर जिनके प्रातःकालोन कार्य शिथिल हो गये ऐसे दयालु मुनिराज भी परम उद्वेगको प्राप्त हो रहे हैं ॥४१॥


वीणावेणुमृदङ्गादिनिस्वानपरिवर्जिता । त्वद्वियोगाकुलीभूता नगरीयं न राजते ॥४२॥

अर्थ: तुम्हारे वियोगसे दुःखी हुई यह नगरी वीणा बाँसुरी तथा मृदङ्ग आदिके शब्दसे रहित होनेके कारण सुशोभित नहीं हो रही है ॥४२॥


पूर्वोपचितमशुद्धं नूनं मे कर्म पाकमायातम् । भ्रातृवियोगव्यसनं प्राप्तोऽस्मि यदीदृशं कष्टम् ॥४३॥

अर्थ: जान पड़ता है कि मेरा पूर्वोपार्जित पाप कर्म उदयमें आया है इसीलिए मैं भाईके वियोगसे दुःखपूर्ण ऐसे कष्टको प्राप्त हुआ हूँ ॥४३॥


युद्ध इव शोकभाजश्चैतन्यसमागमानन्दम् ।
उत्तिष्ठ मानवरवे कुरु सकृदत्यन्तखिन्नस्य ॥४४॥

अर्थ: हे मानव सूर्य ! जिस प्रकार तूने पहले युद्धमें सचेत हो मुझ शोकातुरके लिए आनन्द उत्पन्न किया था उसी प्रकार अब भी उठ और अत्यन्त खेदसे खिन्न मेरे लिए एक बार आनन्द उत्पन्न कर ॥४४॥


इत्यार्षे श्रीपद्मपुराणे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते रामदेवविप्रलापं नाम षोडशोत्तरशतं पर्व ॥११६॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य प्रणीत पद्मपुराणमें श्रीरामदेवके विप्रलापका वर्णन करनेवाला एक सौ सोलहवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११६॥


११७. सप्तदशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लक्ष्मणवियोगविभीषणसंसारस्थितिवर्णनं)

ततो विदितवृत्तान्ताः सर्वे विद्याधराधिपाः । सह स्त्रीभिः समायातास्त्वरिताः कोशलां पुरीम् ॥१॥

अर्थ: समाचार मिलनेपर समस्त विद्याधर राजा अपनी स्त्रियोंके साथ शीघ्र ही अयोध्यापुरी आये ॥१॥


विभीषणः समं पुत्रैश्चन्द्रोदरनृपात्मजः । समेतः परिवर्गेण सुग्रीवः शशिवर्द्धनः ॥२॥

अर्थ: अपने पुत्रोंके साथ विभीषण, राजा विराधित, परिजनोंसे सहित सुग्रीव और चन्द्रवर्धन आदि सभी लोग आये ॥२॥


बाष्पविप्लुतनेत्रास्ते सम्भ्रान्तमनसोऽविशन् । भवनं पद्मनाभस्य भरिताञ्जलयो नताः ॥३॥

अर्थ: जिनके नेत्र आँसुओंसे व्याप्त थे तथा मन घबड़ाये हुए थे ऐसे सब लोगोंने अञ्जलि बाँधे-बाँधे रामके भवनमें प्रवेश किया ॥३॥


विषादिनो विधिं कृत्वा पुरस्तात्ते महीतले । उपविश्य क्षणं स्थित्वा मन्दं व्यज्ञापयन्निदम् ॥४॥

देव यद्यपि दुर्मोचः शोकोऽयं परमात्मजः । ज्ञातज्ञेयस्तथापि त्वमेनं सन्त्यक्तुमर्हसि ॥५॥

अर्थ: विषादसे भरे हुए सब लोग योग्य शिष्टाचारकी विधि कर रामके आगे पृथिवीतलपर बैठ गये और क्षणभर चुपचाप बैठनेके बाद धीरे-धीरे यह निवेदन करने लगे कि हे देव ! यद्यपि परम इष्टजनके वियोगसे उत्पन्न हुआ यह शोक दुःखसे छूटने योग्य है तथापि आप पदार्थके ज्ञाता हैं अतः इस शोकको छोड़नेके योग्य हैं ॥४-५॥


एवमुक्त्वा स्थितेष्वेषु वचः प्रोचे विभीषणः । परमार्थस्वभावस्य लोकतत्त्वविचक्षणः ॥६॥

अर्थ: इस प्रकार कहकर जब सब लोग चुप बैठ गये तब परमार्थ स्वभाववाले आत्माके लौकिक स्वरूपके जाननेमें निपुण विभीषण निम्नाङ्कित वचन बोला ॥६॥


अनादिनिधना राजन् स्थितिरेषा व्यवस्थिता । अधुना नेयमस्यैव प्रवृत्ता भुवनोदरे ॥७॥

अर्थ: उसने कहा कि हे राजन् ! यह स्थिति अनादिनिधन है । संसारके भीतर आज इन्हीं एककी यह दशा नहीं हुई है ॥७॥


जातेनाऽवश्यमर्त्तव्यमत्र संसारपञ्जरे । प्रतिक्रियाऽस्ति नो मृत्योरुपायैर्विविधैरपि ॥८॥

अर्थ: इस संसाररूपी पिंजड़ेके भीतर जो उत्पन्न हुआ है उसे अवश्य मरना पड़ता है। नाना उपायोंके द्वारा भी मृत्युका प्रतिकार नहीं किया जा सकता ॥८॥


आनाय्ये नियतं देहे शोकस्यालम्बनं मुधा । उपायैर्हि प्रवर्त्तन्ते स्वार्थस्य कृतबुद्धयः ॥९॥

अर्थ: जब यह शरीर निश्चित ही विनश्वर है तब इसके विषयमें शोकका आश्रय लेना व्यर्थ है । यथार्थमें बात यह है कि जो कुशलबुद्धि मनुष्य हैं वे आत्महितके उपायोंमें ही प्रवृत्ति करते हैं ॥९॥


आक्रन्दितेन नो कश्चित्परलोकगतो गिरम् । प्रयच्छति ततः शोकं न राजन् कर्त्तुमर्हसि ॥१०॥

अर्थ: हे राजन् ! परलोक गया हुआ कोई मनुष्य रोनेसे उत्तर नहीं देता इसलिए आप शोक करनेके योग्य नहीं हैं ॥१०॥


नारीपुरुषसंयोगाच्छरीराणि शरीरिणाम् । उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च प्राप्तसाम्यानि बुद्बुदैः ॥११॥

अर्थ: स्त्री और पुरुषके संयोगसे प्राणियोंके शरीर उत्पन्न होते हैं और पानीके बबूलेके समान अनायास ही नष्ट हो जाते हैं ॥११॥


लोकपालसमेतानामिन्द्राणामपि नाकतः । नष्टा योनिजदेहानां प्रच्युतिः पुण्यसंक्षये ॥१२॥

अर्थ: पुण्यक्षय होनेपर जिनका वैक्रियिक शरीर नष्ट हो गया है ऐसे लोकपालसहित इन्द्रों को भी स्वर्गसे च्युत होना पड़ता है ॥१२॥


गर्भाक्लिष्टे रुजाकीर्णे तृणबिन्दुचलाचले । क्लेदकैकससङ्घाते काऽऽस्था मर्त्यशरीरके ॥१३॥

अर्थ: गर्भके क्लेशोंसे युक्त, रोगोंसे व्याप्त, तृणके ऊपर स्थित बूँदके समान चञ्चल तथा मांस और हड्डियोंके समूह स्वरूप मनुष्यके तुच्छ शरीरमें क्या आदर करना है ? ॥१३॥


अजरामरणंमन्यः किं शोचति जनो मृतम् । मृत्युदंष्ट्रान्तरक्लिष्टमात्मानं किं न शोचति ॥१४॥

अर्थ: अपने आपको अजर-अमर मानता हुआ यह मनुष्य मृत व्यक्तिके प्रति क्यों शोक करता है ? वह मृत्युकी डाँढ़ोंके बीच क्लेश उठानेवाले अपने आपके प्रति शोक क्यों नहीं करता ? ॥१४॥


यदा निधनमस्यैव केवलस्य तदा सति । उच्चैराक्रन्दितुं युक्तं न सामान्ये पराभवे ॥१५॥

अर्थ: यदि इन्हीं एकका मरण होता तब तो जोरसे रोना उचित था परन्तु जब यह मरण सम्बन्धी पराभव सबके लिए समानरूपसे प्राप्त होता है तब रोना उचित नहीं है ॥१५॥


यदैव हि जनो जातो मृत्युनाधिष्ठितस्तदा । तत्र साधारणे धर्मे ध्रुवे किमिति शोच्यते ॥१६॥

अर्थ: जिस समय यह प्राणी उत्पन्न होता है उसी समय मृत्यु इसे आ घेरती है । इस तरह जब मृत्यु सबके लिए साधारण धर्म है तब शोक क्यों किया जाता है ? ॥१६॥


अभीष्टसङ्गमाकाङ्क्षो मुधा शुष्यति शोकवान् । शबरार्त्त इवारण्ये चमरः केशलोभतः ॥१७॥

अर्थ: जिस प्रकार जङ्गलमें भीलके द्वारा पीड़ित चमरी मृग - बालोंके लोभसे दुःख उठाता है उसी प्रकार इष्ट पदार्थोंके समागमकी आकांक्षा रखनेवाला यह प्राणी शोक करता हुआ व्यर्थ ही दुःख उठाता है ॥१७॥


सर्वैरेभिर्यदास्माभिरितो गम्यं वियोगतः । तदा किं क्रियते शोकः प्रथमं तत्र निर्गते ॥१८॥

अर्थ: जब हम सभी लोगोंको वियुक्त होकर यहाँसे जाना है तब सर्वप्रथम उनके चले जानेपर शोक क्यों किया जा रहा है ? ॥१८॥


लोकस्य साहसं पश्य निर्भीस्तिष्ठति यत्पुरः । मृत्योर्वज्राग्रदण्डस्य सिंहस्येव कुरङ्गकः ॥१९॥

अर्थ: अरे, इस प्राणीका साहस तो देखो जो यह सिंहके सामने मृगके समान वज्रदण्डके धारक यमके आगे निर्भय होकर बैठा है ॥१९॥


लोकनाथं विमुच्यैकं कश्चिदन्यः श्रुतस्त्वया । पाताले भूतले वा यो न जातो मृत्युनाऽर्दितः ॥२०॥

अर्थ: एक लक्ष्मीधरको छोड़कर समस्त पाताल अथवा पृथिवीतलपर किसी ऐसे दूसरेका नाम आपने सुना कि जो मृत्युसे पीड़ित नहीं हुआ हो ॥२०॥


संसारमण्डलापन्नं दह्यमानं सुगन्धिना । सदा च विन्ध्यदावाभं भुवनं किं न वीक्षसे ॥२१॥

अर्थ: जिस प्रकार सुगन्धिसे उपलक्षित विन्ध्याचलका वन, दावानलसे जलता है उसी प्रकार संसारके चक्रको प्राप्त हुआ यह जगत् कालानलसे जल रहा है, यह क्या आप नहीं देख रहे हैं ? ॥२१॥


पर्यट्य भवकान्तारं प्राप्य कामभुजिष्यताम् । मत्तद्विपा इवाऽऽयान्ति कालपाशस्य वश्यताम् ॥२२॥

अर्थ: संसाररूपी अटवीमें घूमकर तथा कामकी अधीनता प्राप्तकर ये प्राणी मदोन्मत्त हाथियोंके समान कालपाशकी अधीनताको प्राप्त करते हैं ॥२२॥


धर्ममार्गं समासाद्य गतोऽपि त्रिदशालयम् । अशाश्वततया नद्या पात्यते तटवृक्षवत् ॥२३॥

अर्थ: यह प्राणी धर्मका मार्ग प्राप्तकर यद्यपि स्वर्ग पहुँच जाता है तथापि नश्वरताके द्वारा उस तरह नीचे गिरा दिया जाता है जिस प्रकार कि नदीके द्वारा तटका वृक्ष ॥२३॥


सुरमानवनाथानां चयाः शतसहस्रशः । निधनं समुपानीताः कालमेघेन वह्नयः ॥२४॥

अर्थ: जिस प्रकार प्रलयकालीन मेघके द्वारा अग्नियाँ नष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार नरेन्द्र और देवेन्द्रोंके लाखों समूह कालरूपी मेघके द्वारा नाशको प्राप्त हो चुके हैं ॥२४॥


दूरमम्बरमुल्लङ्घ्य समापत्य रसातलम् । स्थानं तन्न प्रपश्यामि यन्न मृत्योरगोचरः ॥२५॥

अर्थ: आकाशमें बहुत दूर तक उड़कर और नीचे रसातलमें बहुत दूर तक जाकर भी मैं उस स्थानको नहीं देख सका हूँ जो मृत्युका अगोचर न हो ॥२५॥


षष्ठकालक्षये सर्वं क्षीयते भारतं जगत् । धराधरा विशीर्यन्ते मर्त्यकाये तु का कथा ॥२६॥

अर्थ: छठवें कालकी समाप्ति होनेपर यह समस्त भारतवर्ष नष्ट हो जाता है और बड़े-बड़े पर्वत भी विशीर्ण हो जाते हैं तब फिर मनुष्यके शरीरकी तो कथा ही क्या है ? ॥२६॥


वज्रर्षभवपुर्बद्धा अप्यबध्याः सुरासुरैः । नन्वनित्यतया लब्धा रम्भागर्भोपमैस्तु किम् ॥२७॥

अर्थ: जो वज्रमय शरीरसे युक्त थे तथा सुर और असुर भी जिन्हें मार नहीं सकते थे ऐसे लोगोंको भी अनित्यताने प्राप्त कर लिया है फिर केलेके भीतरी भागके समान निःसार मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? ॥२७॥


जनन्यापि समाश्लिष्टं मृत्युर्हरति देहिनम् । पातालान्तर्गतं यद्वत् काद्रवेयं द्विजोत्तमः ॥२८॥

अर्थ: जिस प्रकार पातालके अन्दर छिपे हुए नागको गरुड़ खींच लेता है उसी प्रकार मातासे आलिङ्गित प्राणीको भी मृत्यु हर लेती है ॥२८॥


हा भ्रातर्दयिते पुत्रेत्येवं क्रन्दन् सुदुःखितः । कालाहिना जगद्भेको ग्रासतामुपनीयते ॥२९॥

अर्थ: हाय भाई ! हाय प्रिये ! हाय पुत्र ! इस प्रकार चिल्लाता हुआ यह अत्यन्त दुःखी संसाररूपी मेंढक, कालरूपी साँपके द्वारा अपना ग्रास बना लिया जाता है ॥२९॥


करोम्येतत्करिष्यामि वदत्येवमनिष्टधीः । जनो विशति कालास्यं भीमं पोत इवार्णवम् ॥३०॥

अर्थ: ‘मैं यह कर रहा हूँ और यह आगे करूँगा’ इस प्रकार दुर्बुद्धि मनुष्य कहता रहता है फिर भी यमराजके भयंकर मुखमें उस तरह प्रवेश कर जाता है जिस तरह कि कोई जहाज समुद्रके भीतर ॥३०॥


जनं भवान्तरं प्राप्तमनुगच्छेज्जनो यदि । द्विष्टैरिष्टैश्च नो जातु जायेत विरहस्ततः ॥३१॥

अर्थ: यदि भवान्तरमें गये हुए मनुष्यके पीछे यहाँके लोग जाने लगें तो फिर शत्रु मित्र - किसीके भी साथ कभी वियोग ही न हो ॥३१॥


परे स्वजनमानी यः कुरुते स्नेहसम्मतिम् । विशति क्लेशवह्निं स मनुष्यकलभो ध्रुवम् ॥३२॥

अर्थ: जो परको स्वजन मानकर उसके साथ स्नेह करता है वह नरकुञ्जर अवश्य ही दुःखरूपी अग्निमें प्रवेश करता है ॥३२॥


स्वजनौघाः परिप्राप्ताः संसारे येऽसुधारिणाम् । सिन्धुसैकतसङ्घाता अपि सन्ति न तत्समाः ॥३३॥

अर्थ: संसारमें प्राणियोंको जितने आत्मीयजनोंके समूह प्राप्त हुए हैं समस्त समुद्रोंकी बालूके कण भी उनके बराबर नहीं हैं । भावार्थ - असंख्यात समुद्रोंमें बालूके जितने कण हैं उनसे भी अधिक इस जीवके आत्मीयजन हो चुके हैं ॥३३॥


य एव लालितोऽन्यत्र विविधप्रियकारिणा । स एव रिपुतां प्राप्तो हन्यते तु महारुषा ॥३४॥

अर्थ: नाना प्रकारकी प्रियचेष्टाओंको करनेवाला यह प्राणी, अन्य भवमें जिसका बड़े लाड़-प्यारसे लालन-पालन करता है वही दूसरे भवमें इसका शत्रु हो जाता है और तीव्र क्रोधको धारण करनेवाले उसी प्राणीके द्वारा मारा जाता है ॥३४॥


पीतौ पयोधरौ यस्य जीवस्य जननान्तरे । त्रस्ताहतस्य तस्यैव खाद्यते मांसमत्र धिक् ॥३५॥

अर्थ: जन्मान्तरमें जिस प्राणीके स्तन पिये हैं, इस जन्ममें भयभीत एवं मारे हुए उसी जीवका माँस खाया जाता है, ऐसे संसारको धिक्कार है ॥३५॥


स्वामीति पूजितः पूर्वं यः शिरोनमनादिभिः । स एव दासतां प्राप्तो हन्यते पादताडनैः ॥३६॥

अर्थ: ‘यह हमारा स्वामी है’ ऐसा मानकर जिसे पहले शिरोनमन - शिर झुकाना आदि विनयपूर्ण क्रियाओंसे पूजित किया था वही इस जन्ममें दासताको प्राप्त होकर लातोंसे पीटा जाता है ॥३६॥


विभोः पश्यत मोहस्य शक्तिं येन वशीकृतः । जनोऽन्विष्यति संयोगं हस्तेनेव महोरगम् ॥३७॥

अर्थ: अहो ! इस सामर्थ्यवान् मोहकी शक्ति तो देखो जिसके द्वारा वशीभूत हुआ यह प्राणी इष्टजनोंके संयोगको उस तरह ढूँढ़ता फिरता है जिस तरह कि कोई हाथसे महानागको ॥३७॥


प्रदेशस्तिलमात्रोऽपि विष्टपे न स विद्यते । यत्र जीवः परिप्राप्तो न मृत्युं जन्म एव वा ॥३८॥

अर्थ: इस संसारमें तिलमात्र भी वह स्थान नहीं है जहाँ यह जीव मृत्यु अथवा जन्मको प्राप्त नहीं हुआ हो ॥३८॥


ताम्रादिकलिलं पीतं जीवेन नरकेषु यत् । स्वयम्भूरमणे तावत् सलिलं न हि विद्यते ॥३९॥

अर्थ: इस जीवने नरकोंमें ताँबा आदिका जितना पिघला हुआ रस पिया है उतना स्वयंभूरमण समुद्रमें पानी भी नहीं है ॥३९॥


वराहभवयुक्तेन यो नीहारोऽशनीकृतः । मन्ये विन्ध्यसहस्रेभ्यो बहुशोऽत्यन्तदूरतः ॥४०॥

अर्थ: इस जीवने सूकरका भव धारणकर जितने विष्ठाको अपना भोजन बनाया है मैं समझता हूँ कि वह हजारों विन्ध्याचलोंसे भी कहीं बहुत अधिक अत्यन्त ऊँचा होगा ॥४०॥


परस्परस्वनाशेन कृता या मूर्द्धसंहतिः । ज्योतिषां मार्गमुल्लङ्घ्य यायात्सा यदि रुध्यते ॥४१॥

अर्थ: इस जीवने परस्पर एक दूसरेको मारकर जो मस्तकोंका समूह काटा है यदि उसे एक जगह रोका जाय - एक स्थानपर इकट्ठा किया जाय तो वह ज्योतिषी देवोंके मार्गको भी उल्लंघन कर आगे जा सकता है ॥४१॥


शर्कराधरणीयातैर्दुःखं प्राप्तमनुत्तमम् । श्रुत्वा तत्कस्य रोचेत मोहेन सह मित्रता ॥४२॥

अर्थ: नरक-भूमिमें गये हुए जीवोंने जो भारी दुःख उठाया है उसे सुन मोहके साथ मित्रता करना किसे अच्छा लगेगा ? ॥४२॥


यस्य कृतेऽपि निमेषं नेच्छति दुःखानि विषयसुखसंसक्तः । पर्यटति च संसारे ग्रस्तो मोहग्रहेण मत्तवदात्मा ॥४३॥

एतद् दग्धशरीरं युक्तं त्यक्तुं कषायचिन्तायासम् । अन्यस्मादन्यतरं किं पुनरीदृग्विधं कलेवरभारम् ॥४४॥

अर्थ: विषय-सुखमें आसक्त हुआ यह प्राणी जिस शरीरके पीछे पलभरके लिए भी दुःख नहीं उठाना चाहता तथा मोहरूपी ग्रहसे ग्रस्त हुआ पागलके समान संसारमें भ्रमण करता रहता है, ऐसे कषाय और चिन्तासे खेद उत्पन्न करनेवाले इस शरीरको छोड़ देना ही उचित है क्योंकि इनका यह ऐसा शरीर क्या अन्य शरीरसे भिन्न है - विलक्षण है ? ॥४३-४४॥


इत्युक्तोऽपि विविक्तं खेचररविणा विपश्चिता रामः । नोज्झति लक्ष्मणमूर्त्तिं गुरोरिवाऽऽज्ञां विनीतात्मा ॥४५॥

अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि विद्याधरोंमें सूर्य स्वरूप बुद्धिमान् विभीषणने यद्यपि रामको इस तरह बहुत कुछ समझाया था तथापि उन्होंने लक्ष्मणका शरीर उस तरह नहीं छोड़ा जिस तरह कि विनयी शिष्य गुरुकी आज्ञा नहीं छोड़ता है ॥४५॥


इत्यार्षे श्रीपद्मपुराणे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते लक्ष्मणवियोगविभीषणसंसारस्थितिवर्णनं नाम सप्तदशोत्तरशतं पर्व ॥११७॥


इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराणमें लक्ष्मणके वियोगको लेकर विभीषणके द्वारा संसारकी स्थितिका वर्णन करने वाला एकसौ सत्रहवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥११७॥