५०. पञ्चाशत्तमं पर्व (महेन्द्रदुहितासमागमाभिधानं)
अथासावाञ्जनो गच्छन्नम्बरे परमोदयः । स्वसारमिव वैदेहीमानिनीषुरराजत ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर परम अभ्युदयको धारण करनेवाला हनुमान् आकाशमें जाता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बहन सीताको लेनेके लिए भामण्डल ही जा रहा हो ॥१॥
सुहृदाज्ञाप्रवृत्तस्य विनीतस्य महात्मनः । शुद्धभावस्य तस्यासीदुत्सवः कोऽपि चेतसः ॥२॥
अर्थ: मित्र - श्रीरामकी आज्ञामें प्रवृत्त, विनयवान्, उदाराशय एवं शुद्धभावके धारक हनुमान्के हृदयमें उस समय कोई अद्भुत आनन्द छाया हुआ था ॥२॥
पश्यतः प्रौढया दृष्ट्या स्थितस्य रविगोचरे । दिशां मण्डलमस्यासीच्छरीरावयवोपमम् ॥३॥
अर्थ: सूर्यके मार्गमें स्थित हनुमान् जब प्रौढ़ दृष्टिसे दिङ्मण्डलकी ओर देखता था तब उसे दिङ्मण्डल शरीरके अवयवोंके समान जान पड़ता था ॥३॥
लङ्कां जिगमिषोरस्य महेन्द्रनगरोपमम् । महेन्द्रनगरं दृष्टेराभिमुख्यमुपागतम् ॥४॥
अर्थ: लंकाकी ओर जानेके लिए इच्छुक हनुमान्की दृष्टिके सामने राजा महेन्द्रका नगर आया जो इन्द्रके नगरके समान जान पड़ता था ॥४॥
वेदिकापुण्डरीकाभैः प्रासादैः शशिपाण्डुरैः । पर्वतस्य स्थितं मूर्ध्नि तद्विदूरे प्रकाशते ॥५॥
अर्थ: वह नगर पर्वतके शिखरपर स्थित था तथा वेदिका-पर स्थित सफेद कमलोंके समान आभाको धारण करनेवाले चन्द्रतुल्य धवल भवनोंके द्वारा दूरसे ही प्रकाशित हो रहा था ॥५॥
वज्रपाणेरिवामुष्य तस्मिन् वालिपुरोपमे । न बभूवतरां प्रीतिः तस्मादेवमचिन्तयत् ॥६॥
अर्थ: जिस प्रकार बालिके नगरमें इन्द्रको प्रीति नहीं हुई थी उसी प्रकार राजा महेन्द्रके उस नगरमें हनुमान्को कोई प्रीति उत्पन्न नहीं हुई अपितु उसे देखकर वह विचार करने लगा ॥६॥
इदं शिखरिणो मूर्ध्नि तन्महेन्द्रपुरं स्थितम् । महेन्द्रको नृपो यत्र दुर्मतिः सोऽवतिष्ठते ॥७॥
अर्थ: कि यह पर्वतके शिखरपर राजा महेन्द्रका नगर स्थित है जिसमें कि वह दुर्बुद्धि राजा महेन्द्र निवास करता है ॥७॥
दुःखतापितसर्वाङ्गा माता येनागता मम । निर्वासिता मयि प्राप्ते कुक्षिवासं दुरात्मना ॥८॥
अर्थ: मेरे गर्भवासके समय दुःखसे भरी मेरी माता इसके नगर आयी पर इस दुष्टने उसे निकाल दिया ॥८॥
एषाऽसौ विजनेऽरण्ये गुहा यत्र स सन्मुनिः । पर्यङ्कयोगयुक्तात्मा नाम्नामितगतिः स्थितः ॥९॥
अस्यां भगवता तेन साधुवाक्यैः कृपा कृता । माता मां जनिताश्वासा प्रसूता बन्धुवर्जिता ॥१०॥
अर्थ: तब मेरी माता निर्जन वनकी उस गुफामें - जिनमें कि पर्यंक योगसे अमितगति नामा मुनि विराजमान थे - रहीं ! इसी गुफामें उन दयालु मुनिराजने उत्तम वचनों-के द्वारा उसे सान्त्वना दी और बन्धुजनोंसे रहित अकेली रहकर उसने मुझे जन्म दिया ॥९-१०॥
श्रुतं केसरिजं कृच्छ्रं श्रुत्वा मातुरुपप्लवम् । साधोश्च संगमं सैषा रम्या रम्या च मे गुहा ॥११॥
अर्थ: इसी गुफामें माताको सिंहसे उत्पन्न कष्ट प्राप्त हुआ था और इसी गुफामें उसे मुनिराजका सन्निधान प्राप्त हुआ था इसलिए यह गुफा मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥११॥
मातरं शरणं प्राप्तां मम निर्वास्य यः कृती । व्यसनप्रतिदानेन महेन्द्रं किंनु तं भजेत् ॥१२॥
अर्थ: जो मेरी शरणागत माताको निकाल-कर कृतकृत्य हुआ था उस महेन्द्रको अब मैं कष्टका बदला देकर क्या उसकी सेवा करूँ ॥१२॥
अहंयुरयमत्यन्तं मां किल द्वेष्टि संततम् । महेन्द्र ( महेन्द्रो ) गर्वमेतस्य तस्मादपनयाम्यहम् ॥१३॥
अर्थ: यह महेन्द्र बड़ा अहंकारी है तथा मुझसे निरन्तर द्वेष रखता है इसलिए इसका गर्व अवश्य ही दूर करता हूँ ॥१३॥
प्रलम्बाम्बुदवृन्दोरुनादा दुन्दुभयस्ततः । महालम्पाकभेर्यश्च पटहाश्च समाहताः ॥१४॥
अर्थ: तदनन्तर ऐसा विचार कर उसने घूमते हुए मेघसमूहके समान उच्च शब्द करनेवाली दुन्दुभियाँ, महाविकट शब्द करनेवाली भेरियाँ और नगाड़े बजवाये ॥१४॥
ध्माताः शङ्खा जगत्कम्पा भटैरुत्कटचेष्टितैः । युद्धशौण्डैः समुत्कृष्टं समुल्लासितहेतिभिः ॥१५॥
अर्थ: उत्कृष्ट चेष्टाओंको धारण करनेवाले योद्धाओंने जगत्को कँपा देनेवाले शंख फूँके तथा शस्त्रोंको चमकानेवाले रणवीर योद्धाओंने जोरसे गर्जना की ॥१५॥
श्रुत्वा परबलं प्राप्तं महेन्द्रः सर्वसेनया । प्रत्यैक्षत विनिःक्रम्य मेघवृन्दमिवाचलः ॥१६॥
अर्थ: परबलको आया सुन, राजा महेन्द्र सर्व सेनाके साथ बाहर निकला और जिस प्रकार पर्वत, मेघसमूहको रोकता है उसी प्रकार उसने हनुमान्के दलको रोका ॥१६॥
संप्रहारैस्ततो लग्नैर्दृष्ट्वासीदन्निजं बलम् । चापमुद्यम्य माहेन्द्रिः प्राप्तश्छत्री रथस्थितः ॥१७॥
अर्थ: तदनन्तर लगी हुई चोटोंसे अपनी सेनाको नष्ट होती देख, छत्रधारी, तथा रथपर बैठा हुआ राजा महेन्द्रका पुत्र धनुष तानकर सामने आया ॥१७॥
हनूमानिषुभिस्तस्य धनुस्तिसृभिरायतम् । चिच्छेद गुप्तिभिर्योगी यथामानं समुत्थितम् ॥१८॥
अर्थ: सो हनुमान्ने तीन बाण छोड़कर उसके लम्बे धनुषको उस तरह छेद डाला जिस तरह कि मुनि तीन गुप्तियोंके द्वारा उठते हुए मानको छेद डालते हैं ॥१८॥
चापं यावद्द्वितीयं स गृह्णात्याकुलमानसः । शरैस्तावद्रथान्मुक्ताः प्रचण्डास्तस्य वाजिनः ॥१९॥
अर्थ: वह व्याकुल चित्त होकर जबतक दूसरा धनुष लेता है तबतक हनुमान्ने तीक्ष्ण बाण चलाकर उसके चंचल घोड़े रथसे छुड़ा दिये ॥१९॥
रथात्ते विगताः शीघ्राश्चपला बभ्रमुर्भृशम् । हृषीकाणीव मनसो मुक्तानि विषयैषिणः ॥२०॥
अर्थ: सो रथसे छूटे हुए वे चंचल घोड़े शीघ्र ही इधर-उधर इस प्रकार घूमने लगे जिस प्रकार कि विषयाभिलाषी मनुष्यकी मनसे छूटी हुई इन्द्रियाँ इधर-उधर घूमने लगती हैं ॥२०॥
माहेन्द्रिरथ संभ्रान्तो विमानं वरमाश्रितः । तदप्यस्य शरैर्लूनं मतं दुष्टमतेरिव ॥२१॥
अर्थ: अथानन्तर महेन्द्रका पुत्र घबड़ाकर उत्तम विमानपर आरूढ़ हुआ सो हनुमान्के बाणोंसे वह विमान भी उस तरह खण्डित हो गया जिस तरह कि किसी दुर्बुद्धिका मत खण्डित हो जाता है ॥२१॥
माहेन्द्रिर्मुदितो भूयो विद्याबलविकारगः । पतत्रिचक्रकनकैर्युयुधेऽलातमासुरैः ॥२२॥
अर्थ: तदनन्तर विद्याके बलसे विकारको प्राप्त हुआ महेन्द्रपुत्र पुनः हर्षित हो अलातचक्रके समान देदीप्यमान बाण, चक्र तथा कनक नामक शस्त्रोंसे युद्ध करने लगा ॥२२॥
विद्ययाऽनिलपुत्रोऽपि तं शस्त्रौघमवारयत् । यथात्मचिन्तया योगी परीषहकदम्बकम् ॥२३॥
अर्थ: तब हनुमान्ने भी विद्याके द्वारा उस शस्त्रसमूहको उस तरह रोका जिस तरह कि योगी आत्मध्यानके द्वारा परीषहोंके समूहको रोकता है ॥२३॥
निर्दयोन्मुक्तशस्त्रोऽसावास्तृणानो महाग्निवत् । गृहीतो वायुपुत्रेण गरुडेनेव पन्नगः ॥२४॥
अर्थ: तदनन्तर जो निर्दयताके साथ शस्त्र छोड़ रहा था और प्रचण्ड अग्निके समान सब ओरसे आच्छादित कर रहा था ऐसे महेन्द्रपुत्रको हनुमान्ने उस तरह पकड़ लिया जिस तरह कि गरुड़ सर्पको पकड़ लेता है ॥२४॥
प्राप्तरोधं सुतं दृष्ट्वा महेन्द्रः क्रोधलोहितः । रथी मारुतिमभ्यार रामं सुग्रीवरूपवत् ॥२५॥
अर्थ: पुत्रको पकड़ा देख क्रोधसे लाल होता हुआ महेन्द्र रथपर सवार हो हनुमान्के सम्मुख उस तरह आया जिस तरह कि सुग्रीवका रूप धारण करनेवाला कृत्रिम सुग्रीव रामके सम्मुख आया था ॥२५॥
अर्कार्मस्यन्दनः सोऽपि हारिहारो धनुर्धरः । शूराणामग्रणी दीप्तो मातुः पितरमभ्यगात् ॥२६॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका रथ सूर्यके समान देदीप्यमान था, जो सुन्दर हारका धारक था, धनुर्धारी था, शूरोंमें श्रेष्ठ था तथा अतिशय देदीप्यमान था ऐसा हनुमान् भी माताके पिता राजा महेन्द्रके सम्मुख गया ॥२६॥
तयोरभून्महत्संख्यं क्रकचासिशिलीमुखैः । परस्परकृताघातं वायुवश्याब्दयोरिव ॥२७॥
अर्थ: तदनन्तर वायुके वशीभूत दो मेघोंमें जिस प्रकार परस्पर टक्कर होती है उसी प्रकार उन दोनोंमें करोंत, खड्ग तथा बाणोंके द्वारा परस्पर एक दूसरेका घात करनेवाला महायुद्ध हुआ ॥२७॥
सिंहाविव महारोषौ तावुद्धतबलान्वितौ । ज्वलत्स्फुलिङ्गरक्ताक्षौ श्वसन्तौ भुजगाविव ॥२८॥
परस्परकृताक्षेपौ गर्वहासस्फुटस्वनौ । धिक् ते शौर्यमहो युद्धमित्यादिवचनोद्यतौ ॥२९॥
चक्रतुः परमं युद्धं मायाबलसमन्वितौ । हाकारजयकारादि कारयन्तौ मुहुर्निजैः ॥३०॥
अर्थ: जो सिंहोंके समान महाक्रोधी तथा उत्कट बलसे सहित थे, जिनके नेत्र देदीप्यमान तिलगोंके समान लाल थे, जो सर्पोंके समान साँसें भर रहे थे - फुंकार रहे थे, जो एक दूसरेपर आक्षेप कर रहे थे, जिनके अहंकारपूर्ण हास्यका स्फुट शब्द हो रहा था, ‘तेरी शूर-वीरताको धिक्कार है, अहो ! युद्ध करने चला है’ जो इस प्रकारके शब्द कह रहे थे, जो मायाबलसे सहित थे और जो अपने पक्षके लोगोंसे कभी हाहाकार कराते थे तो कभी जय-जयकार कराते थे ऐसे हनुमान् तथा राजा महेन्द्र दोनों ही चिरकाल तक परमयुद्ध करते रहे ॥२८-३०॥
महेन्द्रोऽथ महावीर्यो विक्रियाशक्तिसंगतः । क्रोधस्फुरितदेहश्रीर्मुमोचायुधसंहतिम् ॥३१॥
अर्थ: तदनन्तर जो महाबलवान् था, विक्रिया शक्तिसे संगत था और क्रोधसे जिसके शरीरकी शोभा देदीप्यमान हो रही थी ऐसा महेन्द्र हनूमान्के ऊपर शस्त्रोंका समूह छोड़ने लगा ॥३१॥
भुषुण्ढीः परशून् बाणान् शतघ्नीर्मुद्गरान् गदाः । शिखराणि च शैलानां शालन्यग्रोधपादपान् ॥३२॥
अर्थ: भुषुण्डी, परशु, बाण, शतघ्नी, मुद्गर, गदा, पहाड़ोंके शिखर और सागौन तथा वटके वृक्ष उसने हनुमान्पर छोड़े ॥३२॥
एतैरन्यैश्च विविधैरायुधौघैर्मरुत्सुतः । न विव्यथे यथा शैलो महामेघकदम्बकैः ॥३३॥
अर्थ: सो इनसे तथा नाना प्रकारके अन्य शस्त्रोंके समूहसे हनुमान् उस तरह विचलित नहीं हुआ जिस प्रकार कि महामेघोंके समूहसे पर्वत विचलित नहीं होता है ॥३३॥
तद्दिव्यमायया सृष्टं शस्त्रवर्षं महेन्द्रजम् । उल्काविद्याप्रभावेण वायुसूनुरचूर्णयत् ॥३४॥
अर्थ: राजा महेन्द्रकी दिव्यमायासे उत्पन्न शस्त्रोंकी उस वर्षाको पवन-पुत्र हनुमान्ने अपनी उल्का-विद्याके प्रभावसे चूर-चूर कर डाला ॥३४॥
उत्पत्य च रथे तस्य निपत्य सुमहाजवः । ककुप्करिकराकारकराभ्यां कृतरोधनम् ॥३५॥
मातामहं समादाय बलं बिभ्रदनुत्तमम् । दत्तसाधुस्वनः शूरैः समारोहन्निजं रथम् ॥३६॥
अर्थ: और उसी समय वेगसे भरे, दिग्गजोंके शुण्डादण्डके समान विशाल हाथोंसे युक्त तथा उत्तम बलको धारण करनेवाले हनुमान्ने मातामह महेन्द्रके रथपर उछलकर उसे रोकनेपर भो पकड़ लिया । शूरवीरोंने उसे साधुवाद दिया और वह पकड़े हुआ मातामहको लेकर अपने रथपर आरूढ़ हो गया ॥३५-३६॥
उल्कालाङ्गूलपाणिं तं दौहित्रं परमोदयम् । प्रशंसितुं समारब्धो महेन्द्रः सौम्यया गिरा ॥३७॥
अर्थ: वहाँ जिसकी विक्रियाकृत लांगल और हाथोंसे उल्काएँ निकल रही थीं तथा जो परम अभ्युदयको धारण करनेवाला था ऐसे दौहित्र-हनुमान्की वह महेन्द्र सौम्य वाणी द्वारा स्तुति करने लगा ॥३७॥
अहो ते वत्स माहात्म्यं परमेतन्मया श्रुतम् । पूर्वमासीदिदानीं तु नियतं प्रत्यक्षगोचरम् ॥३८॥
अर्थ: कि अहो वत्स ! तेरा यह उत्तम माहात्म्य यद्यपि मैंने पहलेसे सुन रखा था पर आज प्रत्यक्ष ही देख लिया ॥३८॥
आसीद्देवेन्द्रयुद्धेऽपि निर्जितो यो न केनचित् । विजयार्धनगस्योर्ध्वमहाविद्यायुधाकुले ॥३९॥
असौ प्रसन्नकीर्तिर्मे पुत्रो माहात्म्यसंगतः । त्वया पराजितः प्राप्तो रोद्धुं चित्रमिदं परम् ॥४०॥
अर्थ: विजयार्ध पर्वतके ऊपर महाविद्याओं तथा शस्त्रोंसे आकुल इन्द्र विद्याधरके युद्धमें भी जो किसीके द्वारा पराजित नहीं हुआ था तथा जो माहात्म्यसे युक्त था ऐसा मेरा पुत्र प्रसन्नकीर्ति तुमसे पराजित हो बन्धनको प्राप्त हुआ, यह बड़ा आश्चर्य है ॥३९-४०॥
अहो पराक्रमो भद्र तव धैर्यमहो परम् । अहो रूपमनौपम्यमहो संग्रामशौण्डता ॥४१॥
अर्थ: अहो भद्र ! तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है, तुम्हारा धैर्य परम आश्चर्यकारी है, अहो तुम्हारा रूप अनुपम है और युद्धकी सामर्थ्य भी आश्चर्यकारी है ॥४१॥
प्रजातेन त्वया वत्स महानिश्चययोगिना । कुलमुद्योतितं सर्वमस्मदीयं सुकर्मणा ॥४२॥
अर्थ: हे वत्स ! निश्चयको धारण करनेवाले तुमने हमारे पुण्योदयसे जन्म लेकर हमारा समस्त कुल प्रकाशमान किया है ॥४२॥
विनयाद्यैर्गुणैर्युक्तो राशिः परमतेजसः । कल्याणमूर्तिरत्यर्थं कल्पवृक्षस्त्वमुद्गतः ॥४३॥
अर्थ: तू विनयादि गुणोंसे युक्त है, परम तेजकी राशि है, कल्याणकी मूर्ति है तथा कल्पवृक्षके समान उदयको प्राप्त हुआ है ॥४३॥
जगतो गुरुभूतस्त्वं बान्धवानां समाश्रयः । दुःखादित्यप्रतप्तानां समस्तानां घनाघनः ॥४४॥
अर्थ: तू जगत्का गुरु है, बान्धवजनोंका आधार है और दुःखरूपी सूर्यसे सन्तप्त समस्त मनुष्योंके लिए मेघस्वरूप है ॥४४॥
इति प्रशस्य तं स्नेहादुदस्राक्षश्चलत्करः । अजिघ्रन्मस्तके नम्रं पुलकी परिषस्वजे ॥४५॥
अर्थ: इस प्रकार प्रशंसा कर स्नेहके कारण जिसके नेत्रोंसे अश्रु छलक रहे थे तथा जिसके हाथ हिल रहे थे, ऐसे मातामह महेन्द्रने उसका मस्तक सूँघा और रोमांचित हो उसका आलिंगन किया ॥४५॥
प्रणम्य वायुपुत्रोऽपि तमार्यं विहिताञ्जलिः । अतितिक्षद्विनीतात्मा क्षणाद्यातोऽन्यतामिव ॥४६॥
अर्थ: वायुपुत्र - हनुमान्ने भी हाथ जोड़कर उन आर्य-मातामहको प्रणाम किया तथा क्षमाके प्रभावसे विनीतात्मा होकर वह क्षणभरमें ऐसा हो गया मानो अन्यरूपताको ही प्राप्त हुआ हो ॥४६॥
मया शिशुतया किंचिदार्य यत्ते विचेष्टितम् । दोषमेवं समस्तं मे प्रतीक्ष्य क्षन्तुमर्हसि ॥४७॥
अर्थ: उसने कहा कि हे आर्य ! मैंने लड़कपनके कारण आपके प्रति जो कुछ चेष्टा की है सो हे पूज्य ! मेरे इस समस्त अपराधको आप क्षमा करनेके योग्य हैं ॥४७॥
समस्तं च समाख्यातं तेनागमनकारणम् । पद्मागमादिकं यावदात्मागमनमादृतम् ॥४८॥
अर्थ: उसने रामचन्द्रके आगमनको आदि लेकर अपने आगमन तकका समस्त वृत्तान्त बड़े आदरके साथ प्रकट किया ॥४८॥
अहमार्य गमिष्यामि त्रिकूटमतिकारणम् । त्वं किष्किन्धपुरं गच्छ कार्यं दाशरथेः कुरु ॥४९॥
अर्थ: उसने यह भी कहा कि हे आर्य ! मैं अत्यावश्यक कारणसे त्रिकूटाचलको जाता हूँ तब तक तुम किष्किन्धपुर जाओ और श्रीरामका काम करो ॥४९॥
इत्युक्त्वा वायुसंभूतः खमुत्पत्य ययौ सुखम् । त्रिकूटाभिमुखः क्षिप्रं सुरलोकमिवामरः ॥५०॥
अर्थ: इतना कह हनुमान् आकाशमें उड़कर शीघ्र त्रिकूटाचलकी ओर सुखपूर्वक इस प्रकार गया जिस प्रकार कि देव स्वर्गकी ओर जाता है ॥५०॥
गत्वा महेन्द्रकेतुश्च तनयां नयकोविदः । प्रसन्नकीर्तिना सार्द्धं वत्सलः समपूजयत् ॥५१॥
अर्थ: नीतिनिपुण तथा स्नेहपूर्ण राजा महेन्द्रकेतुने अपने प्रियपुत्र प्रसन्नकीर्तिके साथ जाकर पुत्री - अंजनाका सम्मान किया ॥५१॥
मातापितृसमायोगं सोदरस्य च दर्शनम् । अञ्जनासुन्दरी प्राप्य जगाम परमां धृतिम् ॥५२॥
अर्थ: अंजना सुन्दरी, माता-पिताके साथ समागम तथा भाईका दर्शन प्राप्त कर परम धैर्यको प्राप्त हुई ॥५२॥
महेन्द्रं निभृतं श्रुत्वा किष्किन्धाभिमुखोऽगमन् । विराधितप्रभृतयस्तोषमाययुरुत्तमम् ॥५३॥
अर्थ: राजा महेन्द्रको आया सुनकर किष्किन्धाका पति सुग्रीव उसे लेनेके लिए सम्मुख गया तथा विराधित आदि उत्तम सन्तोषको प्राप्त हुए ॥५३॥
पुरा विशिष्टं चरितं कृतात्मनां सुचेतसामुत्तमचारुतेजसाम् ।
महात्मनामुन्नतगर्वशालिनो भवन्ति वश्याः पुरुषा बलान्विताः ॥५४॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि कृतकृत्य, सुचेता तथा उत्तम सुन्दर तेजको धारण करनेवाले पुण्यात्मा जीवोंका पूर्वचरित ही ऐसा विशिष्ट होता है कि उन्नत गर्वसे सुशोभित बलशाली मनुष्य उनके अधीन - आज्ञाकारी होते हैं ॥५४॥
ततः समन्तादनुपाल्य मानसं जना यतध्वं सततं सुकर्मणि ।
फलं यदीयं समवाप्य पुष्कलं रवेः समानामुपयाथ दीप्तताम् ॥५५॥
अर्थ: इसलिए हे भव्यजनो ! सब ओरसे मनकी रक्षा कर सदा उस शुभ कार्यमें यत्न करो कि जिसका पुष्कल फल पाकर सूर्यके समान दीप्तताको प्राप्त होओ ॥५५॥
इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे महेन्द्रदुहितासमागमाभिधानं नाम पञ्चाशत्तमं पर्व ॥५०॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें महेन्द्रका पुत्रीके साथ समागमका वर्णन करनेवाला पचासवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५०॥
५१. एकपञ्चाशत्तमं पर्व (पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं)
श्रीशैलस्य वियत्युच्चैर्विमानस्थस्य गच्छतः । बभूव सुगुणैर्युक्तो द्वीपो दधिमुखोऽन्तरे ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर जब हनुमान् विमानमें बैठकर आकाशमें बहुत ऊँचे जा रहा था तब उत्तम गुणोंसे युक्त दधिमुख नामक द्वीप बीचमें पड़ा ॥१॥
यस्मिन् दधिमुखं नामा प्रासादैर्दधिपाण्डुरैः । पुरं परममायामि चारुकाञ्चनतोरणम् ॥२॥
अर्थ: उस दधिमुख द्वीपमें एक दधिमुख नामका नगर था जो दहीके समान सफेद महलोंसे सुशोभित तथा लम्बायमान स्वर्णके सुन्दर तोरणोंसे युक्त था ॥२॥
नवमेघप्रतीकाशैरुद्यानैः कुसुमोज्ज्वलैः । प्रदेशा यस्य शोभन्ते सनक्षत्राम्बरोपमाः ॥३॥
अर्थ: नवीन मेघके समान श्याम तथा पुष्पोंसे उज्ज्वल उद्यानोंसे उसके प्रदेश ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो नक्षत्रोंसे सहित आकाशके प्रदेश ही हों ॥३॥
स्फटिकस्वच्छकलिला वाप्यः सोपानशोभिताः । पद्मोत्पलादिभिश्छन्ना यत्र भान्ति क्वचित् क्वचित् ॥४॥
अर्थ: उस नगरमें जहाँ-तहाँ स्फटिकके समान स्वच्छ जलसे भरी, सीढ़ियोंसे सुशोभित एवं कमल तथा उत्पल आदिसे आच्छादित वापिकाएँ सुशोभित थीं ॥४॥
तस्मिन् विप्रकृष्टे तु देशे नगरगोचरात् । बृहत्तृणलतावल्लीद्रुमकण्टकसंकटे ॥५॥
अर्थ: नगरसे दूर चलकर एक महाभयंकर वन मिला जो बड़े-बड़े तृणों, लताओं, वेलों, वृक्षों और काँटोंसे व्याप्त था ॥५॥
शुष्कागकृतसंरोधे रौद्रश्वापदनादिते । घोरेऽतिपरुषाकारे प्रचण्डानिलचञ्चले ॥६॥
पतितोदारवृक्षौघे महाभयसमावहे । विशुद्धक्षारसरसि कङ्कगृद्ध्रादिसेविते ॥७॥
दुर्वने विजने राजन् साधुयुग्मं नभश्चरम् । अष्टाहं लम्बितभुजं योगमुग्रमुपाश्रितम् ॥८॥
अर्थ: वह वन सूखे वृक्षोंसे घिरा था, भयंकर जंगली पशुओंके शब्दसे शब्दायमान था, भयंकर था, अत्यन्त कठोर था, प्रचण्ड वायुसे चंचल था, गिरे हुए बड़े-बड़े वृक्षोंके समूहसे युक्त था, महाभय उत्पन्न करनेवाला था, अत्यन्त खारे जलके सरोवरोंसे सहित था, कंक, गृद्ध आदि पक्षियोंसे सेवित था तथा मनुष्योंसे रहित था । गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उस वनमें दो चारण ऋद्धिधारी मुनि आठ दिनका कठिन योग लेकर विराजमान थे । उनकी भुजाएँ नीचेको ओर लटक रही थीं ॥६-८॥
तस्य क्रोशचतुर्भागमात्रदेशे व्यवस्थिताः । मनोज्ञनयनाः कन्याः सितवस्त्रा जटाधराः ॥९॥
तप्यन्ते विधिवद्घोरं तपस्तिस्रः सुचेतसः । शोभालोकत्रयस्येव नवभूषणतां गताः ॥१०॥
अर्थ: उन मुनियोंसे पावकोश दूरी-पर तीन कन्याएँ, जिनके नेत्र अत्यन्त मनोहर थे, जो शुक्लवस्त्रसे सहित थीं, जटाएँ धारण कर रही थीं, शुद्ध हृदयसे युक्त थीं, तीन लोककी मानो शोभा थीं । और नूतन आभूषण स्वरूप थीं, विधिपूर्वक घोर तप कर रही थीं ॥९-१०॥
अथासौ साधुयुगलं ग्रस्यमानं महाग्निना । अञ्जनातनयोऽपश्यत् पादपद्वयनिश्चलम् ॥११॥
अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने देखा कि दोनों मुनि महाअग्निसे ग्रस्त हो रहे हैं और वृक्ष युगलके समान निश्चल खड़े हैं ॥११॥
असमाप्तव्रताः ताश्च कन्याः लावण्यपूरिताः । उद्गमद्धूमजालेन स्पृष्टा बहलवर्तिना ॥१२॥
अर्थ: जिनका व्रत समाप्त नहीं हुआ था तथा जो लावण्यसे युक्त थीं ऐसी वे तीनों कन्याएँ भी निकलते हुए अत्यधिक धूमसे स्पृष्ट हो रही थीं ॥१२॥
अथातस्थौ सनिर्ग्रन्थौ युक्तयोगौ शिवस्पृहौ । त्यक्तारागादिसंगेच्छौ निरस्तांशुकभूषणौ ॥१३॥
प्रलम्बितमहाबाहू प्रशान्तवदनाकृती । युगान्तार्पितसद्दृष्टी प्रतिमास्थानमाश्रितौ ॥१४॥
मृत्युजीवननिःकाङ्क्षावनघौ शान्तमानसौ । समप्रियाप्रियासंगौ समपाषाणकाञ्चनौ ॥१५॥
दावेन महता राजन् तेनात्यासन्नवर्तिना । अभिभूतौ समालोक्य वात्सल्यं कर्तुमुद्यतः ॥१६॥
अर्थ: उन्हें देख हनुमान्के हृदयमें उन सबके प्रति बड़ी आस्था उत्पन्न हुई । तदनन्तर जो योग अर्थात् ध्यानसे युक्त थे, मोक्षकी इच्छासे सहित थे, जिन्होंने रागादि परिग्रहकी इच्छा छोड़ दी थी, वस्त्र तथा आभूषण दूर कर दिये थे, भुजाएँ नीचेकी ओर लटका रखी थीं, जिनके मुखकी आकृति अत्यन्त शान्त थी, युगप्रमाण दूरीपर जिनकी दृष्टि पड़ रही थी, जो प्रतिमा योगसे विराजमान थे, जीवन और मरणकी आकांक्षासे रहित थे, निष्पाप थे, शान्तचित्त थे, इष्ट-अनिष्ट समागममें मध्यस्थ थे, तथा पाषाण और कांचनमें जो समभाव रखते थे ऐसे उन दोनों मुनियोंको अत्यन्त निकटवर्ती बड़ी भारी दावानलसे आक्रान्त देख, हे राजन् ! हनूमान् वात्सल्यभाव प्रकट करनेके लिए उद्यत हुआ ॥१३-१६॥
आकृष्य सागरजलं मेघहस्तः ससंभ्रमः । अवर्षदुन्नतो व्योम्नि परमं भक्तिसंगतः ॥१७॥
अर्थ: भक्तिसे भरे हनुमान्ने शीघ्रतासे समुद्रका जल खींच, मेघ हाथमें धारण किया और आकाशमें ऊँचे जाकर अत्यधिक वर्षा की ॥१७॥
सुभृशं तेन वह्निः स वारिपूरेण नाशितः । महाक्रोध इवोद्भूतः क्षान्तिभावेन साधुना ॥१८॥
अर्थ: उस बरसे हुए जलप्रवाहसे वह दावाग्नि उस प्रकार शान्त हो गयी जिस प्रकार कि उत्पन्न हुआ महाक्रोध, मुनिके क्षमाभावसे शान्त हो जाता है ॥१८॥
यावच्च कुरुते पूजां भक्त्या पवननन्दनः । तयोर्भदन्तयोर्नानापुष्पादिद्रव्यसंपदा ॥१९॥
तावत्ताः सिद्धसंसाध्या मेरुं कृत्वा प्रदक्षिणम् । तत्सकाशमनुप्राप्ताः कुमार्यः सुमनोहराः ॥२०॥
अर्थ: भक्तिसे भरा हनुमान् जबतक नाना प्रकारकी पुष्पादि सामग्रीसे उन दोनों मुनियोंकी पूजा करता है तबतक जिनके मनोरथ सिद्ध हो गये थे ऐसी वे तीनों मनोहर कन्याएँ मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा देकर उसके पास आ गयीं ॥१९-२०॥
प्रणेमुश्च समं तेन साधू ध्यानपरायणौ । विनयान्वितया बुद्ध्या प्रशशंसुश्च मारुतिम् ॥२१॥
अहो जिनेश्वरे भक्तिर्व्रजता क्वापि यद्द्रुतम् । त्वया तात परित्राता वयं साधुसमाश्रयात् ॥२२॥
अर्थ: उन्होंने ध्यानमें तत्पर दोनों मुनियोंको हनुमान्के साथ-साथ विनयपूर्वक नमस्कार किया तथा हनुमान्की इस प्रकार प्रशंसा की कि अहो ! तुम्हारी जिनेन्द्रदेवमें बड़ी भक्ति है जो शीघ्रतासे कहीं अन्यत्र जाते हुए तुमने मुनियोंके आश्रयसे हम सबकी रक्षा की ॥२१-२२॥
अस्मद्द्वारसमायातो महानयमुपप्लवः । स्तोकेनाप्तो न योगिभ्यामहो नो भवितव्यता ॥२३॥
अर्थ: हमारे निमित्तसे यह महाउपद्रव उत्पन्न हुआ था सो मुनियोंको रंचमात्र भी प्राप्त नहीं हो पाया । अहो ! हमारी भवितव्यता धन्य है ॥२३॥
अथाञ्जनात्मजोऽपृच्छदेवं संशुद्धमानसः । भवन्त्य इह निःशून्ये का वनेऽत्यन्तभीषणे ॥२४॥
अर्थ: अथानन्तर पवित्र हृदयके धारक हनुमान्ने उनसे इस प्रकार पूछा कि इस अत्यन्त भयंकर निर्जन वनमें आप लोग कौन हैं ? ॥२४॥
अवोचज्ज्यायसी तासां पुरे दधिमुखाह्वये । अत्र गन्धर्वराजस्य वयं तिस्रोऽमरासुताः ॥२५॥
अर्थ: तदनन्तर उन कन्याओंमें जो ज्येष्ठ कन्या थी वह कहने लगी कि हम तीनों दधिमुख नगरके राजा गन्धर्वकी अमरा नामक रानीकी पुत्रियाँ हैं ॥२५॥
प्रथमा चन्द्रलेखाख्या ज्ञेया विद्युत्प्रभा ततः । अन्या तरङ्गमालेति सर्वगोत्रस्य वल्लभाः ॥२६॥
अर्थ: इनमें प्रथम कन्या चन्द्रलेखा, दूसरी विद्युत्प्रभा और तीसरी तरंगमाला है । हम सभी अपने समस्त कुलके लिए अत्यन्त प्यारी हैं ॥२६॥
यावन्तो भुवने केचिद्विजयार्द्धादिसंभवाः । विद्याधरकुमारेन्द्राः कुलपुष्करभास्कराः ॥२७॥
तेऽस्मदर्थे शिवं क्वापि न विन्दन्तेऽर्थिनो भृशम् । दुष्टस्त्वङ्गारको नाम तापं धत्ते विशेषतः ॥२८॥
अर्थ: इस संसारमें अपने कुलरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिए सूर्यके समान, विजयार्ध आदि स्थानोंमें उत्पन्न हुए जितने कुछ विद्याधर कुमार हैं वे सब हम लोगोंके अत्यन्त इच्छुक हो कहीं भी सुख नहीं पा रहे हैं। उन कुमारोंमें अंगारक नामक दुष्ट कुमार विशेष रूपसे सन्तापको धारण कर रहा है ॥२७-२८॥
अन्यदा परिपृष्टश्च तातेनाष्टाङ्गविन्मुनिः । स्थानेषु भगवन् केषु भव्या दुहितरो मम ॥२९॥
अर्थ: किसी एक दिन हमारे पिताने अष्टांगनिमित्तके ज्ञाता मुनिराजसे पूछा कि हे भगवन्! मेरी पुत्रियाँ किन स्थानोंमें जावेंगी ॥२९॥
सोऽवोचत् साहसगतिं यो हनिष्यति संयुगे । आसां कतिपयाहोभो रमणोऽसौ भविष्यति ॥३०॥
अर्थ: इसके उत्तरमें मुनिराजने कहा था कि जो युद्धमें साहसगतिको मारेगा वह कुछ ही दिनोंमें इनका भर्ता होगा ॥३०॥
निशम्यामोघवाक्यस्य मुनेस्तद्वचनं ततः । अचिन्तयत् पिताऽस्माकं विधाय स्मेरमाननम् ॥३१॥
अर्थ: तदनन्तर अमोघ वचनके धारक मुनिराजका वह वचन सुन हमारे पिता मुखको मन्द हास्यसे युक्त करते हुए विचार करने लगे कि ॥३१॥
कस्त्वसौ भविता लोके नरो वज्रायुधोपमः । विजयार्धोत्तरश्रेणीश्रेष्ठं यो हन्ति साहसम् ॥३२॥
अर्थ: संसारमें इन्द्रके समान ऐसा कौन पुरुष होगा जो विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें श्रेष्ठ साहसगतिको मार सकेगा ॥३२॥
अथवा न मुनेर्वाक्यं कदाचिज्जायतेऽनृतम् । इति विस्मयमाविष्टः पिता माता जनस्तथा ॥३३॥
अर्थ: अथवा मुनिके वचन कभी मिथ्या नहीं होते यह विचारकर माता-पिता आदि आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥३३॥
चिरं प्रार्थयमानोऽपि यदासौ लब्धवान्न नः । तदास्मद्दुःखचिन्तास्थः संजातोऽङ्गारकेतुकः ॥३४॥
अर्थ: चिरकाल तक याचना करनेपर भी जब अंगारक हम लोगोंको नहीं पा सका तब वह हम लोगोंको दुःख देनेवाले कारणोंकी चिन्तामें निमग्न हो गया ॥३४॥
ततः प्रभृति चास्माकमयमेव मनोरथः । द्रक्ष्यामस्तं कदा वीरमिति साहससूदनम् ॥३५॥
अर्थ: उस समयसे लेकर हम लोगोंका यही एक मनोरथ रहता है कि हम साहसगतिको नष्ट करनेवाले उस वीरको कब देखेंगी ॥३५॥
एतच्च वनमायाता दारुणद्रुमसंकटम् । मनोऽनुगामिनीं नाम विद्यां साधयितुं पराम् ॥३६॥
अर्थ: हम तीनों कन्याएँ मनोनुगामिनी नामक उत्तम विद्या सिद्ध करनेके लिए कठोर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें आयी थीं ॥३६॥
दिवसो द्वादशोऽस्माकं वसन्तीनामिहान्तरे । प्राप्तस्य साधुयुग्मस्य वर्तते दिवसोऽष्टमः ॥३७॥
अर्थ: यहाँ रहते हुए हम लोगोंका यह बारहवाँ दिन है और इन दोनों मुनियोंको आये हुए आज आठवाँ दिवस है ॥३७॥
अङ्गारकेतुना तेन वीक्षिताश्च दुरात्मना । ततस्तेनानुबन्धेन क्रोधेन पूरितोऽभवत् ॥३८॥
अर्थ: तदनन्तर उस दुष्ट अंगारकेतुने हम लोगोंको यहाँ देखा और उक्त पूर्वोक्त संस्कारके कारण वह क्रोधसे परिपूर्ण हो गया ॥३८॥
ततोऽस्माकं वधं कर्तुमेता दश दिशः क्षणात् । धूमाङ्गारकवर्षेण वह्निना पिञ्जरीकृताः ॥३९॥
अर्थ: तत्पश्चात् हम लोगोंका वध करनेके लिए उसने उसी क्षण दशों दिशाओंको धूम तथा अंगारकी वर्षा करनेवाली अग्निसे पिंजर वर्ण - पीत वर्ण कर दिया ॥३९॥
षड्भिः संवत्सरैः साग्रैर्यद्दुःसाध्यं प्रसाध्यते । दत्वाङ्गमुपसर्गस्य तदद्यैव हि साधितम् ॥४०॥
अर्थ: जो विद्या छह वर्षसे भी अधिक समयमें बड़ी कठिनाईसे सिद्ध होती है वह विद्या उपसर्गका निमित्त पाकर आज ही सिद्ध हो गयी ॥४०॥
इहापदि महाभाग नागमिष्यद् भवान् यदि । अधक्ष्याम हि योगिभ्यां सहारण्ये ततो ध्रुवम् ॥४१॥
अर्थ: हे महाभाग ! यदि इस आपत्तिके समय आप यहाँ नहीं होते तो निश्चित ही हम सब दोनों मुनियोंके साथ-साथ वनमें जल जातीं ॥४१॥
साधु साध्विति संस्मित्य ततो मारुतिरब्रवीत् । भवतीनां श्रमः श्लाघ्यः फलयुक्तश्च निश्चयः ॥४२॥
अर्थ: तदनन्तर हनुमान्ने ‘ठीक है’ ‘ठीक है’ इस तरह मन्दहास पूर्वक कहा कि आप लोगोंका श्रम प्रशंसनीय है तथा निश्चित ही फलसे युक्त है ॥४२॥
अहो वो विमला बुद्धिरहो स्थाने मनोरथः । अहो भव्यत्वमुत्तुङ्गं येन विद्या प्रसाधिता ॥४३॥
अर्थ: अहो ! तुम सबकी बुद्धि निर्मल है। अहो ! तुम सबका मनोरथ योग्य स्थानमें लगा। अहो ! तुम्हारी उत्तम होनहार थी जिससे यह विद्या सिद्ध की ॥४३॥
आख्यातं च क्रमात् सर्वं यथावृत्तं सविस्तरम् । पद्मागमादिकं यावदात्मागमनकारणम् ॥४४॥
अर्थ: तत्पश्चात् हनुमान्ने रामके आगमनको आदि लेकर अपने यहाँ आने तक-का समस्त वृत्तान्त ज्योंका त्यों विस्तारके साथ क्रमपूर्वक कहा ॥४४॥
तत्तश्च श्रुतवृत्तान्तो गन्धर्वोऽमरया सह । समागतो महातेजास्तमुद्देशं सहानुगः ॥४५॥
अर्थ: तदनन्तर समाचार सुनकर महातेजस्वी गन्धर्व राजा अपनी अमरा नामकी रानी और अनुचरोंके साथ वहाँ आ पहुँचा ॥४५॥
नभश्चरसमायोगे देवागमनसंनिभे । क्षणेन तद्वनं जातं सर्वं नन्दनसुन्दरम् ॥४६॥
अर्थ: इस प्रकार क्षण-भरमें वह समस्त वन देवागमनके समान विद्याधरोंका समागम होनेसे नन्दन वनके समान हो गया ॥४६॥
किष्किन्धं च पुरं गत्वा भूत्या दुहितृभिः समम् । शासने पद्मनामस्य गन्धर्वो रतिमाश्रयत् ॥४७॥
अर्थ: तदनन्तर राजा गन्धर्व पुत्रियोंको साथ ले बड़े वैभवसे किष्किन्धपुर गया और वहाँ रामकी आज्ञामें रहकर प्रीतिको प्राप्त हुआ ॥४७॥
ताश्च निस्सीमसौभाग्या विभूत्या परयान्विताः । उपनिन्ये पराः कन्या रामायाक्लिष्टकर्मणे ॥४८॥
अर्थ: उसने असीम सौभाग्यकी धारक तथा परम विभूतिसे युक्त तीनों उत्कृष्ट कन्याएँ शान्त चेष्टाके धारक रामके लिए समर्पित कीं ॥४८॥
एताभिरपराभिश्च सेव्यमानो विभूतिभिः । अपश्यन् जानकीं पद्मो मेने शून्या दिशो दश ॥४९॥
अर्थ: सो राम इन कन्याओंसे तथा अन्य विभूतियोंसे यद्यपि सेव्यमान रहते थे तथापि सीता-को न देखते हुए वे दशों दिशाओंको शून्य मानते ॥४९॥
गुणान्वितैर्भवति जनैरलंकृता समस्तभूः शुभकलितैः सुसुन्दरैः । विना जनं मनसि कृतास्पदं सदा व्रजत्यसौ गहनवनेन तुल्यताम् ॥५०॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि समस्त भूमि गुणोंसे सहित, शुभ चेष्टाओंके धारक तथा अतिशय सुन्दर मनुष्योंसे अलंकृत रहे तो भी मनमें वास करनेवाले मनुष्यके बिना वह भूमि गहन वन की तुल्यता धारण करती है ॥५०॥
पुराकृतादतिनिचितात् समुत्कटाज्जनः परां रतिमनुयाति कर्मणः । ततो जगत्सकलमिदं स्वगोचरे प्रवर्तते विधिरविणा प्रकाशते ॥५१॥
अर्थ: पूर्वोपार्जित तथा तीव्र रूपसे बन्धको प्राप्त हुए उत्कट कर्मसे यह जीव परम रतिको प्राप्त होता है और उस रतिके कारण यह समस्त संसार अपने अधीन रहता है तथा कर्मरूपी सूर्यसे प्रकाशमान होता है ॥५१॥
इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं नाम एकपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५१॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्यकथित पद्मपुराणमें रामको गन्धर्व कन्याओंकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला इक्यावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५१॥
५२. द्विपञ्चाशत्तमं पर्व (हनूमल्लङ्कासुन्दरीकन्यालाभाभिधानं)
असौ पवनपुत्रोऽपि प्रतापाढ्यो महाबलः । त्रिकूटाभिमुखोऽयासीत् सोमवन्मन्दरं प्रति ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर प्रतापसे सहित महाबलवान् हनुमान् त्रिकूटाचलके सम्मुख इस प्रकार चला जिस प्रकार कि सुमेरुके सन्मुख सोम चलता है ॥१॥
अथास्य व्रजतो व्योम्नि सुमहाकार्मुकाकृतिम् । वक्रमेघाप्रतीकाशं जातं सैन्यं निरोधवत् ॥२॥
अर्थ: तदनन्तर आकाशमें चलते हुए हनुमान्की सेना अचानक रुककर किसी बड़े धनुषके समान हो गयी और ऐसो जान पड़ने लगी मानो कुटिल मेघोंका समूह ही हो ॥२॥
उवाच च गतिः केन मम सैन्यस्य विघ्निता । अहो विज्ञायतां क्षिप्रं कस्येदमनुचेष्टितम् ॥३॥
अर्थ: यह देख, हनुमान्ने कहा कि मेरी सेनाकी गति किसने रोकी है ? अहो ! शीघ्र ही मालूम करो कि यह किसकी चेष्टा है ? ॥३॥
किं स्यादसुरनाथोऽयं चमरो गर्वपर्वतः । आखण्डलः शिखण्डी वा नैषामेकोऽपि युज्यते ॥४॥
अर्थ: क्या यहाँ असुरोंका इन्द्र चमर है, अथवा इन्द्र है या शिखण्डी है ? अथवा इनमें-से यहाँ एकका भी होना उचित नहीं जान पड़ता ॥४॥
प्रतिमा किंतु जैनेन्द्री शिखरेऽस्य महीभृतः । भवेद् वा भगवान् कश्चिन्मुनिश्चरमविग्रहः ॥५॥
अर्थ: किन्तु हो सकता है कि इस पर्वतके शिखरपर जिनेन्द्र भगवान्की प्रतिमा हो, अथवा कोई ऐश्वर्यवान् चरम शरीरी मुनिराज विराजमान हों ॥५॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वितर्ककृतवर्त्तनम् । मन्त्री पृथुमतिर्नाम वाक्यमेतदुदाहरत् ॥६॥
निवर्त्तस्व महाबुद्धे श्रीशैल ननु किं तव । क्रूरयन्त्रयुतो नायं मायाशालो मतिं गतः ॥७॥
अर्थ: तदनन्तर हनुमान्के वितर्कपूर्ण वचन सुनकर पृथुमति मन्त्रीने यह वचन कहे कि हे महाबुद्धिमन् श्रीशैल ! तुम शीघ्र ही लौट जाओ, तुम्हें इससे क्या प्रयोजन है ? यह आगे क्रूर यन्त्रोंसे युक्त मायामयी कोट जान पड़ता है ॥६-७॥
चक्षुस्ततो नियुज्यासावपश्यत्पद्मलोचनः । दुःप्रवेशं महाशालं विरक्तस्त्रीमनःसमम् ॥८॥
अर्थ: तत्पश्चात् कमल-लोचन हनुमान्ने स्वयं दृष्टि डालकर उक्त मायामयी महाकोटको देखा । वह कोट विरक्त स्त्रीके मनके समान दुष्प्रवेश था ॥८॥
अनेकाकारवक्त्राढ्यं भीममाशालिकात्मकम् । त्रिदशैरपि दुर्लोक्यं सर्वभक्षं प्रभासुरम् ॥९॥
अर्थ: अनेक आकारके मुखोंसे सहित था, भयंकर पुतलियोंसे युक्त था, सबको भक्षण करनेवाला था, देदीप्यमान था और देवोंके द्वारा भी दुर्गम्य था ॥९॥
संकटोत्कटतीक्ष्णाग्रक्रकचावलिवेष्टितम् । रुधिरोद्गारचिह्नाग्रसहस्रविलसत्तटम् ॥१०॥
अर्थ: जिनके अग्रभाग संकटसे उत्कट तथा अत्यन्त तीक्ष्ण थे ऐसी करोंतोंकी श्रेणीसे वह कोट वेष्टित था, तथा उसके तट रुधिरको उगलनेवाली हजारों जिह्वाओंके अग्रभागसे सुशोभित थे ॥१०॥
स्फुरद्भुजङ्गविस्फारिफणाशूत्कारशब्दितम् । विषधूमान्धकारान्तज्ज्वलदङ्गारदुःसहम् ॥११॥
अर्थ: चंचल सर्पोंके तने हुए फणाओंकी शूत्कारसे शब्दायमान था तथा जिनसे विषैला धूमरूपी अन्धकार उठ रहा था ऐसे जलते हुए अंगारोंसे दुःसह था ॥११॥
यस्तं सर्पति मूढात्मा शौर्यमानसमुद्धतः । निःक्रामति न भूयोऽसौ मण्डूकोऽहिमुखादिव ॥१२॥
अर्थ: शूरवीरताके अहंकारसे उद्धत जो मनुष्य उस कोटके पास जाता है वह फिर उस तरह लौटकर नही आता जिस प्रकार कि साँपके मुखसे मेंढक ॥१२॥
लङ्काशालपरिक्षेपं सूर्यमार्गसमुन्नतम् । दुर्लङ्घ्यं दुर्निरीक्ष्यं च सर्वदिक्षु सुयोजितम् ॥१३॥
युगान्तकालमेघौघनिर्घोषसमभीषणम् । हिंसाग्रन्थमिवात्यन्तपापकर्मविनिर्मितम् ॥१४॥
अर्थ: यह लंकाके कोटका घेरा सूर्यके मार्ग तक ऊँचा है, दुर्लंघ्य है, दुर्निरीक्ष्य है, सब दिशाओंमें फैला है, प्रलयकालीन मेघसमूहकी गर्जनाके समान तीक्ष्ण गर्जनासे भयंकर है, तथा हिंसामय शास्त्रके समान अत्यन्त पापकर्मा जनोंके द्वारा निर्मित है ॥१३-१४॥
तं दृष्ट्वा मारुतिर्दध्यावहो नाथेन रक्षसाम् । दाक्षिण्यमुज्झितं पूर्वं मायाप्राकारकारिणा ॥१५॥
अर्थ: उसे देखकर हनुमान्ने विचार किया कि अहो ! मायामयी कोटका निर्माण करनेवाले रावणने अपनी पहलेकी सरलता छोड़ दी है ॥१५॥
उन्मूलयन्निदं यन्त्रं विद्याबलसमूर्जितम् । मानमुन्मूलयाम्यस्य ध्यानी मोहमलं यथा ॥१६॥
अर्थ: मैं विद्याबलसे बलिष्ठ इस यन्त्रको उखाड़ता हुआ इसके मानको उस तरह उखाड़ दूँगा, जिस तरह कि ध्यानी मनुष्य मोहको उखाड़ देता है ॥१६॥
युद्धे च मानसं कृत्वा तत्सैन्यं स्वं महास्वनम् । गगने सागराकारं समयेऽतिष्ठिपत् सुधीः ॥१७॥
विद्याकवचयुक्तं च कृत्वात्मानं गदाकरः । विवेश सालिकावक्त्रं राहुवक्त्रं रविर्यथा ॥१८॥
अर्थ: तदनन्तर बुद्धिमान् हनुमान्ने युद्धमें मन लगाकर अर्थात् युद्धका विचार कर अपनी गरजती हुई समुद्राकार सेनाको तो संकेत देकर आकाशमें खड़ा कर दिया और अपने स्वयं विद्यामय कवच धारण कर तथा गदा हाथमें ले पुतलीके मुखमें उस तरह घुस गया जिस तरह कि राहुके मुखमें सूर्यं प्रवेश करता है ॥१७-१८॥
ततः कुक्षिगुहां तस्याः परीतकैकसावृताम् । विद्यानखैरलं तीक्ष्णैः केसरीव व्यपाटयत् ॥१९॥
अर्थ: तत्पश्चात् चारों ओरसे हड्डियोंसे आवृत उस पुतलीकी उदररूपी गुहाको उसने सिंहकी भाँति विद्यामयी तीक्ष्ण नखोंसे अच्छी तरह चीर डाला ॥१९॥
निर्दयैश्च गदाघातैर्घोरघोषैरचूर्णयत् । घातिकर्मस्थितिं यद्वद्ध्यानी भावैः सुनिर्मलैः ॥२०॥
अर्थ: और भयंकर शब्द करनेवाले गदाके निर्दय प्रहारोंसे उसे उस प्रकार चूर-चूर कर डाला जिस प्रकार कि ध्यानी मनुष्य अपने अतिशय निर्मल भावोंसे घातिया कर्मोंकी स्थितिको चूर-चूर कर डालता है ॥२०॥
अथाशालिकविद्याया यास्या भेदं भयावहम् । समो नीलाम्बुवाहानामभूच्चटचटाध्वनिः ॥२१॥
अर्थ: तदनन्तर भंगको प्राप्त होती हुई आशालिक विद्याका नील मेघोंके समान भयंकर चट-चट शब्द हुआ ॥२१॥
तेन संभाव्यमानोऽसौ शालो नष्टोऽतिचञ्चलः । स्तोत्रेणेव जिनेन्द्राणां कलुषः कर्मसंचयः ॥२२॥
अर्थ: उस शब्दसे यह अतिशय चंचल मायामय कोट इस प्रकार नष्ट हो गया जिस प्रकार कि जिनेन्द्र भगवान्की स्तुतिसे पापकर्मोंका समूह नष्ट हो जाता है ॥२२॥
ततस्तन्निनदं श्रुत्वा युगान्तजलदोन्नतम् । दृष्ट्वा विशीर्यमाणं च यन्त्रप्राकारमण्डलम् ॥२३॥
राजन् वज्रमुखः क्रुद्धः शालरक्षाधिकारवान् । त्वरितं रथमारुह्य सिंहो दावमिवाभ्यगात् ॥२४॥
अर्थ: तदनन्तर प्रलयकालके मेघोंके समान उन्नत उस शब्दको सुनकर तथा यन्त्रमय कोटको नष्ट होता देख, कोटकी रक्षाका अधिकारी वज्रमुख नामका राजा कुपित हो शीघ्र ही रथ पर आरूढ़ हो हनुमान्के सन्मुख उस प्रकार आया जिस प्रकार कि सिंह दावानलके सम्मुख जाता है ॥२३-२४॥
ततोऽभिमुखमेतस्य वीक्ष्य मारुतनन्दनम् । नानायानयुधा योधाः प्रचण्डा योद्धुमुद्यताः ॥२५॥
अर्थ: तदनन्तर हनुमान्को उसके सन्मुख देख, नाना प्रकारके वाहनों और शस्त्रोंसे सहित प्रचण्ड योधा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥२५॥
बलं वाज्रमुखं दृष्ट्वा प्रबलं योद्धुमुद्यतम् । परमं क्षोभमायातं हनूमत्सैन्यमुत्थितम् ॥२६॥
अर्थ: इधर वज्रमुखकी प्रबल सेनाको युद्धके लिए उद्यत देख परम क्षोभको प्राप्त हुई हनुमान्की सेना भी युद्धके लिए उठी ॥२६॥
किमत्र बहुनोक्तेन प्रवृत्तं तत्तथा रणम् । यथा स्वामिकृते पूर्वं सन्माननविमानने ॥२७॥
अर्थ: आचार्य कहते हैं कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या ? उन दोनों सेनाओंमें उस तरह युद्ध हुआ जिस तरह कि पहले स्वामीके द्वारा किये हुए सम्मान और तिरस्कारमें होता है ॥२७॥
स्वामिनो दृष्टिमार्गस्थाः सुभटाः कृतगर्जिताः । जीवितेष्वपि विस्नेहा बभूवुः किमिहोच्यताम् ॥२८॥
अर्थ: जो योद्धा स्वामीकी दृष्टिके मार्गमें स्थित थे अर्थात् स्वामी जिनकी ओर दृष्टि उठाकर देखता था वे योद्धा गर्जना करते हुए प्राणोंका भी स्नेह छोड़ देते थे इस विषयमें अधिक क्या कहा जाये ? ॥२८॥
ततः कपिध्वजैर्योधाश्चिरंकृतमहाहवाः । वज्रायुधस्य निर्भग्नाः क्षणान्नेशुरितस्ततः ॥२९॥
अर्थ: तदनन्तर जिन्होंने चिरकाल तक बड़े-बड़े युद्ध किये थे ऐसे वज्रायुद्धके योद्धा वानरोंके द्वारा क्षणभरमें पराजित होकर इधर-उधर नष्ट हो गये - भाग गये ॥२९॥
चक्रेणानिलसूनुश्च तेजोऽहरत् विद्विषाम् । ऋक्षविम्बमिवाकाशादपातयदरेः शिरः ॥३०॥
अर्थ: और हनुमान्ने चक्रके द्वारा शत्रुओंका तेज हर लिया तथा नक्षत्र बिम्बके समान शत्रुका शिर काटकर आकाशसे नीचे गिरा दिया ॥३०॥
संख्ये पितुर्वधं दृष्ट्वा तं लङ्कासुन्दरी तदा । नियम्य कृच्छ्रतः शोकममर्षविषदूषिता ॥३१॥
जवनाश्वरथारूढा कुण्डलोद्योतितानना । शरासनायतोरस्का कुञ्चितभ्रूलतायुगा ॥३२॥
उल्केव संगतादित्यतेजोमण्डलधारिणी । धूमोद्गारसमायुक्ता घनप्राग्भारवर्त्तिनी ॥३३॥
संरम्भवशसंफुल्ललोहिताम्भोजलोचना । क्रूरसंदृष्टबिम्बोष्ठी क्रुद्धेव श्रीः शचीपतेः ॥३४॥
अर्थ: युद्धमें पिताका वध देख वज्रायुधकी पुत्री लंकासुन्दरी कठिनाईसे शोकको रोककर क्रोधरूपी विषसे दूषित हो हनुमान्की ओर दौड़ी । उस समय वह वेगशाली घोड़ोंके रथपर बैठी थी, कुण्डलोंके प्रकाशसे उसका मुख प्रकाशित हो रहा था, धनुषके समान उसका वक्षःस्थल आयत था, उसकी दोनों भृकुटियाँ टेढ़ी हो रही थीं, वह ऐसी जान पड़ती थी मानो उल्का ही प्रकट हुई हो, वह सूर्यके समान तेजका मण्डल धारण कर रही थी, धूमके उद्गारसे सहित थी, अर्थात् उसके शरीरसे कुछ-कुछ धुआँ-सा निकलता दिखता था और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो मेघसमूहके बीचमें विद्यमान थी, क्रोधके कारण उसके नेत्र फूले हुए लाल कमलोंके समान जान पड़ते थे, वह क्रोधसे अपना ओठ चाब रही थी, तथा ऐसी जान पड़ती थी मानो क्रोधसे भरी इन्द्रकी लक्ष्मी ही हो ॥३१-३४॥
अधावदिषुमुद्धृत्य कत्थमाना मनोहरा । मया श्रीशैल दृष्टोऽसि तिष्ठ ते शक्तिरस्ति चेत् ॥३५॥
अर्थ: वह देखनेमें सुन्दर थी तथा अपनी प्रशंसा कर रही थी, इस तरह धनुषपर बाण चढ़ाकर वह दौड़ी और बोली कि अरे श्रीशैल ! मैंने तुझे देख लिया है, यदि तुझमें कुछ शक्ति है तो खड़ा रह ॥३५॥
अद्य ते रावणः क्रुद्धो नभश्चरमहेश्वरः । करिष्यति यदेतत्ते करोमि हतचेष्टित ॥३६॥
अर्थ: आज कुपित हुआ विद्याधरोंका राजा रावण तेरा जो कुछ करेगा रे नीच ! वही मैं तेरा करती हूँ ॥३६॥
इयं यमालयं पापं भवन्तं प्रेषयाम्यहम् । दिग्मूढ इव जातस्त्वमनिष्टस्थानगोचरः ॥३७॥
अर्थ: यह मैं तुझ पापीको यमराजके घर भेजती हूँ, तू दिग्भ्रान्तकी तरह आज इस अनिष्ट स्थानमें आ पड़ा है ॥३७॥
तस्यास्त्वरितमायान्त्या यावच्छत्रमपातयत् । बाणेन तावदेतस्य तया चापं द्विधा कृतम् ॥३८॥
अर्थ: वेगसे आती हुई लंकासुन्दरीका छत्र जबतक हनुमान्ने नीचे गिराया तबतक उसने एक बाण छोड़कर हनुमान्के धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥३८॥
सा यावदगृहीच्छक्तिं तावन्मारुतिना शरैः । नभश्छन्नं समायान्ती भिन्ना शक्तिश्च सान्तरे ॥३९॥
अर्थ: लंकासुन्दरी जबतक शक्ति नामक शस्त्र उठाती है तबतक हनुमान्ने बाणोंसे आकाशको आच्छादित कर दिया और आती हुई उसकी शक्तिको बीचमें ही तोड़ डाला ॥३९॥
सा विद्याबलगम्भीरा वज्रदण्डसमान् शरान् । परशुकुन्तचक्राणि शतघ्नीमुशलान् शिलाः ॥४०॥
ववर्ष वायुपुत्रस्य रथे हिमवदुन्नते । विकाले वारिणो भेदान् मेघसंध्या यथोन्नता ॥४१॥
अर्थ: विद्याबलसे गम्भीर लंकासुन्दरीने हनुमान्के हिमालयके समान ऊँचे रथपर वज्रदण्डके समान बाण, परशु, कुन्त, चक्र, शतघ्नी, मुसल तथा शिलाएँ उस प्रकार बरसायीं जिस प्रकार कि उत्पातके समय उच्च मेघावली नाना प्रकारके जल बरसाती है ॥४०-४१॥
तया नानायुधाटोपैः सर्ववेगसमीरितैः । आच्छाद्यत महातेजाः शुचिसूर्य इवाम्बुदैः ॥४२॥
अर्थ: उसके पूर्ण वेगसे छोड़े हुए नाना प्रकारके शस्त्रसमूहसे महातेजस्वी हनुमान् उस तरह आच्छादित हो गया जिस प्रकार कि मेघोंसे आषाढ़का सूर्य आच्छादित हो जाता है ॥४२॥
विक्रान्तः स च शस्त्रौघमनिर्विण्णोऽन्तरस्थितम् । व्यपोहत निजैः शस्त्रैर्मायाविधिविशारदः ॥४३॥
अर्थ: इतना सब होनेपर भी खेदसे रहित, पराक्रमी एवं मायाके विस्तारमें निपुण हनुमान्ने अपने शस्त्रोंके द्वारा उसके शस्त्रसमूहको बीचमें ही दूर कर दिया ॥४३॥
शराः शरैरलुप्यन्त तोमराद्याः स्वजातिभिः । शक्तयः शक्तिभिर्नुन्ना समोल्का दूरमुद्ययुः ॥४४॥
अर्थ: उसके बाण बाणोंसे लुप्त हो गये, तोमर आदि तोमर आदिके द्वारा, तथा शक्तियाँ शक्तियोंके द्वारा खण्डित होकर उल्काओंके समान दूर जा गिरीं ॥४४॥
चक्रक्रकचसंवर्तकनकाटोपपिञ्जरम् । बभूव भीषणं व्योम विद्युद्भिरिव संकुलम् ॥४५॥
अर्थ: चक्र, क्रकच, संवर्तक तथा कनक आदिके विस्तारसे पीतवर्ण आकाश ऐसा भयंकर हो गया मानो बिजलियोंसे ही व्याप्त हो गया हो ॥४५॥
तं लङ्कासुन्दरी भूयो रूपेणालब्धसंनिमा । धीरा स्वभावतो राजन् लक्ष्मीः कमललोचना ॥४६॥
ज्ञानध्यानहरैः कान्तैर्दुर्द्धरैर्गुणसंनतैः । लावण्याहतसौन्दर्यैर्मनोऽन्तर्भेदकोविदैः ॥४७॥
नेत्रचापविनिर्मुक्तैर्विव्यधे स्मरसायकैः । तथेतरधनुर्मुक्तैः शरैराकर्णसंहतैः ॥४८॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! तदनन्तर रूपसे अनुपम, स्वभावसे धीर, कमललोचना, लक्ष्मीके समान लंकासुन्दरी, नेत्ररूपी धनुषसे छोड़े हुए कामके बाणों अर्थात् कटाक्षोंसे हनुमान्को उधर पृथक् भेद रही थी और इधर अन्य धनुषसे छोड़े तथा कान तक खींचे हुए बाणोंसे पृथक् भेद रही थी । लंकासुन्दरीके वे कामबाण, ज्ञान-ध्यानके हरनेवाले थे, मनोहर थे, दुर्धर थे, गुणोंसे युक्त थे, लावण्यके द्वारा सौन्दर्यको हरनेवाले थे, और मनके भीतर भेदनेमें निपुण थे ॥४६-४८॥
विस्मये जगतः शक्ता सौभाग्यगुणगर्विता । तस्यालसक्रियस्यैवं प्रविष्टा हृदयोदरम् ॥४९॥
अर्थ: इस तरह जगत्को आश्चर्य करनेमें समर्थ तथा सौभाग्यरूपी गुणसे गर्वित लंकासुन्दरी हनुमान्के हृदयके भीतर प्रविष्ट हो गयी ॥४९॥
शरशक्तिशतघ्नीभिर्न तथा समपीड्यत । यथा मदनबाणौघैर्मर्मदारणकारिभिः ॥५०॥
अर्थ: वह हनुमान्, बाण, शक्ति तथा शतघ्नी आदि शस्त्रोंसे उस प्रकार पीड़ित नहीं हुआ था जिस प्रकार कि मर्मको विदारण करनेवाले कामके बाणोंसे पीड़ित हुआ था ॥५०॥
इयं मनोहराकारा ललितैर्विशिखैरपि । सबाह्याभ्यन्तरं हन्ति मामित्येवमचिन्तयत् ॥५१॥
अर्थ: हनुमान् विचार करने लगा कि यह मनोहराकारकी धारक, अपनी ललित चेष्टारूपी बाणोंसे मुझे भीतर और बाहर दोनों ही स्थानोंपर घायल कर रही है ॥५१॥
वरमस्मिन् मृधे मृत्युः पूर्यमाणस्य सायकैः । अनया विप्रयुक्तस्य जीवितं न सुरालये ॥५२॥
अर्थ: इस युद्धमें बाणोंसे भरकर मर जाना अच्छा है किन्तु इसके बिना स्वर्गमें भी जीवन बिताना अच्छा नहीं है ॥५२॥
चिन्तयत्येवमेतस्मिन् साप्यनङ्गेन चोदिता । त्रिकूटसुन्दरी कन्या करुणासक्तमानसा ॥५३॥
विकस्वरमनोदेहं तं पद्मच्छदलोचनम् । अबालेन्दुमुखं बालं किरीटन्यस्तवानरम् ॥५४॥
मूर्तियुक्तमिवानङ्गं सुन्दरं वायुनन्दनम् । हन्तुं समुद्यतां शक्तिं संजहार त्वरावती ॥५५॥
अर्थ: इधर इस प्रकार हनुमान् विचार कर रहा था उधर जिसका मन दयामें आसक्त था तथा जो त्रिकूटाचलकी अद्वितीय सुन्दरी थी ऐसी कन्या लंकासुन्दरीने कामसे प्रेरित हो, देदीप्यमान मन तथा शरीरके धारक, कमलदललोचन, तरुण चन्द्रवदन, मुकुट-पर वानरका चिह्न धारण करनेवाले, नवयौवनसे युक्त एवं मूर्तिधारी कामदेवके समान सुन्दर हनुमान्को मारनेके लिए उठायी हुई शक्ति शीघ्र ही संहृत कर ली - पीछे हटा ली ॥५३-५५॥
दध्यौ च मारयाम्येतं कथं दोषमपि श्रितम् । रूपेणानुपमानेन छिन्ते मर्माणि यो मम ॥५६॥
अर्थ: वह विचार करने लगी कि यद्यपि यह पिताके मारनेसे दोषी है तो भी जो अनुपम रूपसे मेरे मर्मस्थान विदार रहा है ऐसे इसे किस प्रकार मारूँ ? ॥५६॥
यद्यनेन समं सक्ता काममोगोदयद्युतिम् । न निषेवे च लोकेऽस्मिन् ततो मे जन्म निष्फलम् ॥५७॥
अर्थ: यदि इसके साथ मिलकर कामभोगरूपी अभ्युदयका सेवन न करूँ तो इस लोकमें मेरा जन्म लेना निष्फल है ॥५७॥
अतः सत्पथमुद्दिश्य स्वनामाङ्कं हनूमते । प्रजिघाय शरं मुग्धा विह्वलेनान्तरात्मना ॥५८॥
अर्थ: तदनन्तर विह्वल मनसे मुग्ध उस लंकासुन्दरीने समीचीन मार्गके उद्देश्यसे अपने नामसे अंकित एक बाण हनुमान्के पास भेजा ॥५८॥
पराजिता त्वया नाथ साहं मन्मथसायकैः । सुरैरपि न या शक्या जेतुं संघातवर्तिभिः ॥५९॥
अर्थ: उस बाणमें उसने यह भी लिखा था कि हे नाथ ! जो मैं इकट्ठे हुए देवोंके द्वारा भी नहीं जीती जा सकती थी वह मैं, आपके द्वारा कामके बाणोंसे पराजित हो गयी ॥५९॥
प्रवाच्य मारुतिर्बाणमङ्कं स्वैरमुपागतम् । धृतिं परां परिप्राप्तो रथादरमवातरत् ॥६०॥
अर्थ: गोदमें आये हुए उस बाणको अच्छी तरह बाँच कर परम धैर्यको प्राप्त हुआ हनुमान् शीघ्र ही रथसे उतरा ॥६०॥
उपसृत्य च तां कन्यां मृगेन्द्रसमविक्रमः । कृत्वाङ्के गाढमालिङ्गत् कामो रतिमिवापराम् ॥६१॥
अर्थ: और उसके पास जाकर सिंहके समान पराक्रमी हनुमान् उसे गोदमें बिठा उसका ऐसा गाढ आलिंगन किया मानो कामदेवने दूसरी रतिका ही आलिंगन किया हो ॥६१॥
अथ प्रशान्तवैरासावस्रदुर्दिनलोचना । तातप्रयाणशोकार्ता जगदे वायुसूनुना ॥६२॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका वैर शान्त हो गया था, जिसके नेत्रोंसे दुर्दिन की भाँति अविरल अश्रुओं-की वर्षा हो रही थी तथा जो पिताके मरण-सम्बन्धी शोकसे पीड़ित थी ऐसी उस लंकासुन्दरीसे हनुमान्ने कहा ॥६२॥
मा रोदीः सौम्यवक्त्रे त्वमलं शोकेन भामिनि । विहिता गतिरेषैव क्षात्रधर्मे सनातने ॥६३॥
अर्थ: कि हे सौम्यमुखि ! रोओ मत । हे भामिनि ! शोक करना व्यर्थ है । सनातन क्षत्रिय धर्मकी तो यही रीति है ॥६३॥
ननु ते ज्ञातमेवैतद्यथा राज्यविधौ स्थिताः । पित्रादीनपि निघ्नन्ति नराः कर्मबलेरिताः ॥६४॥
अर्थ: यह तो तुम्हें विदित ही है कि राजकार्यमें स्थित मनुष्य, कर्मबलसे प्रेरित हो पिता आदिको भी मार डालते हैं ॥६४॥
वृथा रोदिषि किन्त्वेतद्ध्यानमार्तं विवर्जय । अस्मिन् हि सकले लोके विहितं भुज्यते प्रिये ॥६५॥
अर्थ: व्यर्थ ही क्यों रोती हो ? इस आर्तध्यानको छोड़ो । हे प्रिये ! इस समस्त संसारमें अपना किया हुआ ही सब भोगते हैं अर्थात् जो जैसा करता है वैसा भोगता है ॥६५॥
निहितोऽयमनेनेति द्विडत्र व्याजमात्रकम् । आयुःकर्मानुभावेन प्राप्तकालो विपद्यते ॥६६॥
अर्थ: ‘यह शत्रु इसके द्वारा मारा गया’ यह कहना तो छलमात्र है । यथार्थमें तो आयुकर्मके प्रभावसे समय पाकर यह जीव मरता है ॥६६॥
वचोभिरेमिरन्यैश्च मुक्तशोका व्यराजत । सहिता वातिना यद्वदिन्दुना निर्घना निशा ॥६७॥
अर्थ: इस प्रकार इन तथा अन्य वचनोंसे जिसका शोक छूट गया था ऐसी लंकासुन्दरी हनुमान्के साथ इस प्रकार सुशोभित हो रही थी जिस प्रकार कि मेघरहित रात्रि चन्द्रमाके साथ सुशोभित होती है ॥६७॥
प्रेमनिर्झरपूर्णेन तयोरालिङ्गनेन सः । संग्रामजः श्रमो दूरमथायातः सुचेतसोः ॥६८॥
अर्थ: तदनन्तर उत्तम हृदयके धारक उन दोनोंका संग्रामसे उत्पन्न हुआ श्रम, प्रेमरूपी निर्झरसे परिपूर्ण आलिंगन-के द्वारा दूर भाग गया ॥६८॥
ततो यत्र नभोदेशे स्तम्भिन्या विद्यया खगाः । स्तम्भिता बलमत्रैव रचितावासमाश्रितम् ॥६९॥
अर्थ: तदनन्तर स्तम्भिनी विद्याके द्वारा आकाशके जिस प्रदेशमें विद्याधर रोक दिये गये थे उस प्रदेशमें आवास बनाकर वह सेना ठहरायी गयी ॥६९॥
संध्यारक्ताभ्रसंकाशं गीर्वाणनगरोपमम् । श्रीशैलस्य तदत्यन्तं शिविरं पर्यराजत ॥७०॥
अर्थ: सन्ध्याके रक्त मेघके समान दिखनेवाला उसी हनुमान्का वह शिविर देवनगरके तुल्य अत्यधिक सुशोभित हो रहा था ॥७०॥
गजवाजिविमानस्था रथस्थाश्च महानृपाः । तत्पुरं ध्वजमालाढ्यं विविशुः पृष्टवातयः ॥७१॥
अर्थ: उस सेनामें जो बड़े-बड़े राजा थे उन्होंने हनुमान्से पूछकर हाथियों, घोड़ों, विमानों तथा रथोंपर सवार हो ध्वजाओंके समूहसे युक्त उस नगरमें प्रवेश किया ॥७१॥
स्थितास्तत्र यथान्यायं लब्धोत्साहसमुत्सवाः । कथाभिरतिचित्राभिः सूरसंग्रामजन्मभिः ॥७२॥
अर्थ: वे शूर-वीरोंके संग्रामसे उत्पन्न नाना प्रकारकी कथाएँ करते हुए उस नगरमें उत्साह और उल्लासको प्राप्त कर यथायोग्य ठहरे ॥७२॥
अथ तं त्वरितात्मानं वातिं गन्तुं समुद्यतम् । बाला विश्रब्धमप्राक्षीदिति प्रेमपरायणा ॥७३॥
अर्थ: अथानन्तर जिसका मन शीघ्रतासे युक्त था ऐसे हनुमान्को जानेके लिए उद्यत देख प्रेमसे भरी लंकासुन्दरीने एकान्तमें उससे पूछा कि ॥७३॥
विविधागोभिरापूर्णः श्रुतदुःसहविक्रमः । कान्त लङ्कां किमर्थं त्वं वद गन्तुं समुद्यतः ॥७४॥
अर्थ: हे नाथ ! आप रावणके दुःसह पराक्रमकी बात सुन चुके हैं और स्वयं नाना अपराधोंसे परिपूर्ण हैं फिर किसलिए लंका जानेको उद्यत हैं सो तो कहो ॥७४॥
तस्यै जगाद वृत्तान्तमशेषं वायुनन्दनः । कृत्यं प्रत्युपकारस्य बान्धवैरनुमोदितम् ॥७५॥
अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्ने उसे सब वृत्तान्त कहा और यह बताया कि प्रत्युपकारका करना बन्धुजनोंके द्वारा अनुमोदित है ॥७५॥
सीतया सह रामस्य भद्रे भद्रसमागमः । हृतया राक्षसेन्द्रेण कर्तव्यः सर्वथा मया ॥७६॥
अर्थ: हे भद्रे ! राक्षसोंका इन्द्र रावण सीताको हर ले गया है सो उसके साथ रामका समागम मुझे अवश्य कराना है ॥७६॥
साऽब्रवीत् समतिक्रान्तं सौहार्दं तत्पुरातनम् । श्रद्धास्नेहक्षये नष्टा प्रदीपस्य यथा शिखा ॥७७॥
अर्थ: यह सुन लंकासुन्दरीने कहा कि रावणके साथ आपका जो पुराना सौहार्द था वह नष्ट हो चुका है जिस प्रकार नेत्रके नष्ट हो जानेसे दीपकी शिखा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार आपके प्रति श्रद्धाके नष्ट हो जानेसे रावणका सौहार्द नष्ट हो गया है ॥७७॥
आसीद् रथ्योपशोभाढ्यां ध्वजमालाकुलीकृताम् । प्राविक्षदादृतो लङ्कां भवान् दिवमिवामरः ॥७८॥
अर्थ: एक समय था कि जब आप मार्गोंकी शोभासे युक्त तथा ध्वजाओं-की पंक्तिसे अलंकृत लंकामें बड़े आदरके साथ उस तरह प्रवेश करते थे जिस तरह कि देव स्वर्गमें प्रवेश करता है ॥७८॥
अधुना त्वयि दोषाढ्ये रावणश्चण्डशासनः । प्रकाशं व्रजति क्रोधं गृहीष्यति न संशयः ॥७९॥
अर्थ: परन्तु आज आप अपराधी होकर यदि लंकामें प्रकट रूपसे जाते हैं तो कठोर शासनको धारण करनेवाला रावण आपपर क्रोध ग्रहण करेगा इसमें संशय नहीं है ॥७९॥
यदोपलभ्यते चार्वी विशुद्धिः कालदेशयोः । विशुद्धात्मानमव्यग्रं तदा तं द्रष्टुमर्हसि ॥८०॥
अर्थ: अतः जिस समय देश और कालकी उत्तम शुद्धि - अनुकूलता प्राप्त हो तथा रावणका हृदय शुद्ध एवं व्यग्रता रहित हो उस समय उसका साक्षात्कार करना योग्य है ॥८०॥
एवमेवेति सोऽवोचद्यद्ब्रवीषि विचक्षणे । आकूतं तस्य विज्ञातुं गत्वा वाञ्छामि सुन्दरि ॥८१॥
अर्थ: इसके उत्तरमें हनुमान्ने कहा कि विदुषि ! तुमने जैसा कहा है यथार्थमें वैसा ही है । किन्तु हे सुन्दरि ! मैं रावणका अभिप्राय जानना चाहता हूँ ॥८१॥
कीदृशी वा सती सीता रूपेण प्रथिता भवेत् । चालितं मेरुवद्धीरं रावणस्य मनो यया ॥८२॥
अर्थ: और यह भी देखना चाहता हूँ कि वह सती सीता कैसी रूपवती है कि जिसने मेरुके समान धीर, वीर रावणका मन विचलित कर दिया है ॥८२॥
एवमुक्त्वा मरुत्पुत्रस्तद्विन्यस्तमहाबलः । तया मुक्तो विवेकिन्या त्रिकूटाभिमुखं ययौ ॥८३॥
अर्थ: इस प्रकार कहकर तथा अपनी सेना उसीके पास छोड़कर हनूमान् उस विवेकवतीसे छूटकर त्रिकूटाचल- की ओर चला ॥८३॥
चित्रमिदं परमत्र नृलोके, यत्परिहाय भृशं रसमेकम् । तत्क्षणमेव विशुद्धशरीरं जन्तुरुपैति रसान्तरसंगम् ॥८४॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस संसारमें यह परम आश्चर्यकी बात है कि प्राणी एक रसको छोड़कर उसी क्षण विशुद्ध रूपको धारण करनेवाले दूसरे रसको प्राप्त हो जाता है ॥८४॥
कर्मविचेष्टितमेतदमुष्मिन् किन्त्वथवाद्भुतमस्ति निसर्गे । सर्वमिदं स्वशरीरनिबद्धं दक्षिणमुत्तरतश्च रवीहा ॥८५॥
अर्थ: सो इस संसारमें यह प्राणियोंके कर्मकी ही अद्भुत चेष्टा है । जिस प्रकार सूर्यकी गति कभी दक्षिण दिशाकी ओर होती है और कभी उत्तर दिशाकी ओर । उसी प्रकार प्राणियोंके शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाला यह सब व्यवहार कर्मकी चेष्टानुसार कभी इस रसरूप होता है और कभी उस रसरूप होता है ॥८५॥
इत्यार्षे रविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे हनूमल्लङ्कासुन्दरीकन्यालाभाभिधानं नाम द्विपञ्चाशत्तमं पर्व ॥५२॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें हनुमान्को लंकासुन्दरी कन्याकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला बावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५२॥