११८. अष्टादशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते लक्ष्मणसंस्कारकरणं कल्याणमित्रदेवाभिगमाभिधानं)
सुग्रीवाद्यैस्ततो भूपैर्विज्ञप्तं देव साम्प्रतम् । चितां कुर्मो नरेन्द्रस्य देहं संस्कारमापय ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर सुग्रीव आदि राजाओंने कहा कि हे देव ! हम लोग चिता बनाते हैं सो उसपर राजा लक्ष्मीधरके शरीरको संस्कार प्राप्त कराइए ॥१॥
कलुषात्मा जगादासौ मातृभिः पितृभिः समम् । चितायामाशु दह्यन्तां भवन्तः सपितामहाः ॥२॥
अर्थ: इसके उत्तरमें कुपित होकर रामने कहा कि चितापर माताओं, पिताओं और पितामहोंके साथ आप लोग ही जलें ॥२॥
यः कश्चिद् विद्यते बन्धुर्युष्माकं पापचेतसाम् । भवन्त एव तेनाऽमा व्रजन्तु निधनं द्रुतम् ॥३॥
अर्थ: अथवा पाप पूर्ण विचार रखनेवाले आप लोगोंका जो भी कोई इष्ट बन्धु हो उसके साथ आप लोग ही शीघ्र मृत्युको प्राप्त हों ॥३॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गच्छामः प्रदेशं लक्ष्मणाऽपरम् । शृणुमो नेदृशं यत्र खलानां कटुकं वचः ॥४॥
अर्थ: इस प्रकार अन्य सब राजाओंको उत्तर देकर वे लक्ष्मणके प्रति बोले कि भाई लक्ष्मण ! उठो, उठो, चलो दूसरे स्थानपर चलें। जहाँ दुष्टोंके ऐसे वचन नहीं सुनने पड़ें ॥४॥
एवमुक्त्वा तनुं भ्रातुर्जिघृक्षोरस्य सत्वरम् । पृष्ठस्कन्धादि राजानो ददुः सम्भ्रमवर्त्तिनः ॥५॥
अर्थ: इतना कहकर वे शीघ्र ही भाईका शरीर उठाने लगे तब घबड़ाये हुए राजाओंने उन्हें पीठ तथा कन्धा आदिका सहारा दिया ॥५॥
अविश्वसन् स तेभ्यस्तु स्वयमादाय लक्ष्मणम् । प्रदेशमपरं यातः शिशुर्विषफलं यथा ॥६॥
अर्थ: राम, उन सबका विश्वास नहीं रखते थे इसलिए स्वयं अकेले ही लक्ष्मणको लेकर उस तरह दूसरे स्थानपर चले गये जिस तरह कि बालक विषफलको लेकर चला जाता है ॥६॥
जगौ वाष्पपरीताक्षो भ्रातः किं सुप्यते चिरम् । उत्तिष्ठ वर्त्तते वेला स्नानभूमिर्निषेव्यताम् ॥७॥
अर्थ: वहाँ वे नेत्रोंमें आँसू भरकर कहे कि भाई ! इतनी देर क्यों सोते हो ? उठो, समय हो गया, स्नान-भूमिमें चलो ॥७॥
इत्युक्त्वा तं मृतं कृत्वा साश्रये स्नानविष्टरे । अभ्यषिञ्चन्महामोहो हेमकुम्भाम्भसा चिरम् ॥८॥
अर्थ: इतना कहकर उन्होंने मृत लक्ष्मणको आश्रयसहित ( टिकनेके उपकरणसे सहित ) स्नानकी चौकीपर बैठा दिया और स्वयं महामोहसे युक्त हो सुवर्णकलशमें रक्खे जलसे चिरकाल उसका अभिषेक करते रहे ॥८॥
अलङ्कृत्य च निःशेषभूषणैर्मुकुटादिभिः । सदाज्ञोऽज्ञापयत् क्षिप्रं भुक्तिभूसत्कृतानिति ॥९॥
नानारत्नशरीराणि जाम्बूनदमयानि च । भाजनानि विधीयन्तां भक्तं चाऽऽनीयतां परम् ॥१०॥
अर्थ: तदनन्तर मुकुट आदि समस्त आभूषणोंसे अलंकृत कर, भोजन-गृहके अधिकारियोंको शीघ्र ही आज्ञा दिलाई कि नाना रत्नमय एवं स्वर्णमय पात्र इकट्ठे कर उनमें उत्तम भोजन लाया जाय ॥९-१०॥
समुपाह्रियतामच्छा बाढं कादम्बरी वरा । विचित्रमुपदंशं च रसबोधनकारणम् ॥११॥
एवमाज्ञां समासाद्य परिवर्गेण सादरम् । तथाविधं कृतं सर्वं नाथबुद्ध्यनुवर्त्तिना ॥१२॥
अर्थ: उत्तम एवं स्वच्छ मदिरा लाई जाय तथा रससे भरे हुए नाना प्रकारके स्वादिष्ट व्यञ्जन उपस्थित किये जावें। इस प्रकार आज्ञा पाकर स्वामीकी इच्छानुसार काम करनेवाले सेवकोंने आदरपूर्वक सब सामग्री लाकर रख दी ॥११-१२॥
लक्ष्मणस्यान्तरास्यस्य राघवः पिण्डमादधे । न त्वविशज्जिनेन्द्रोक्तमभव्यश्रवणे यथा । ॥१३॥
अर्थ: तदनन्तर रामने लक्ष्मणके मुखके भीतर भोजनका ग्रास रक्खा। पर वह उस तरह भीतर प्रविष्ट नहीं हो सका, जिस तरह कि जिनेन्द्र भगवान्का वचन अभव्यके कानमें प्रविष्ट नहीं होता है ॥१३॥
ततोऽगदद् यदि क्रोधो मयि देव कृतस्त्वया । ततोऽस्यात्र किमायातममृतस्वादिनोऽन्धसः ॥१४॥
अर्थ: तत्पश्चात् रामने कहा कि हे देव ! तुम्हारा मुझपर क्रोध है तो यहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट इस भोजनने क्या बिगाड़ा ? इसे तो ग्रहण करो ॥१४॥
इयं श्रीधर ते नित्यं दयिता मदिरोत्तमा । इमां तावत् पिब न्यस्तां चषके विकचोत्पले ॥१५॥
अर्थ: हे लक्ष्मीधर ! तुम्हें यह उत्तम मदिरा निरन्तर प्रिय रहती थी सो खिले हुए नील कमलसे सुशोभित पान-पात्रमें रखी हुई इस मदिराको पिओ ॥१५॥
इत्युक्त्वा तां मुखे न्यस्य चकार सुमहादरः । कथं विशतु सा तत्र चार्वी संक्रान्तचेतने ॥१६॥
अर्थ: ऐसा कहकर उन्होंने बड़े आदरके साथ वह मदिरा उनके मुखमें रख दी पर वह सुन्दर मदिरा निश्चेतन मुखमें कैसे प्रवेश करती ॥१६॥
इत्यशेषं क्रियाजातं जीवतीव स लक्ष्मणे । चकार स्नेहमूढात्मा मोघं निर्वेदवर्जितः ॥१७॥
अर्थ: इस प्रकार जिनकी आत्मा स्नेहसे मूढ़ थी तथा जो वैराग्यसे रहित थे ऐसे रामने जीवित दशाके समान लक्ष्मणके विषयमें व्यर्थ ही समस्त क्रियाएँ कीं ॥१७॥
गीतैः स चारुभिर्वेणुवीणानिस्वनसङ्गतैः । परासुरपि रामाज्ञां प्राप्तामापद्य लक्ष्मणः ॥१८॥
अर्थ: यद्यपि लक्ष्मण निष्प्राण हो चुके थे तथापि रामने उनके आगे वीणा बाँसुरी आदिके शब्दोंसे सहित सुन्दर संगीत कराया ॥१८॥
चन्दनाचिंतदेहं तं दोर्भ्यामुद्यम्य सस्पृहः । कृत्वाङ्के मस्तकेऽचुम्बत् पुनर्गण्डे पुनः करे ॥१९॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका शरीर चन्दनसे चर्चित था ऐसे लक्ष्मणको बड़ी इच्छाके साथ दोनों भुजाओं-से उठाकर रामने अपनी गोदमें रख लिया और उनके मस्तक कपोल तथा हाथका बार-बार चुम्बन किया ॥१९॥
अपि लक्ष्मण किन्ते स्यादिदं सञ्जातमीदृशम् । न येन मुञ्चसे निद्रां सकृदेव निवेदय ॥२०॥
अर्थ: वे उनसे कहते कि हे लक्ष्मण, तुझे यह ऐसा हो क्या गया जिससे तू नींद नहीं छोड़ता, एक बार तो बता ॥२०॥
इति स्नेहग्रहाविष्टो यावदेष विचेष्टते । महामोहकृतासङ्गे कर्मण्युदयमागते ॥२१॥
तावद्विदितवृत्तान्ता रिपवः क्षोभमागता । परे तेजसि कालास्ते गर्जन्तो विषदा इव ॥२२॥
अर्थ: इस प्रकार महामोहसे सम्बद्ध कर्मका उदय आने-पर स्नेह रूपी पिशाचसे आक्रान्त राम जब तक यहाँ यह चेष्टा करते हैं तब तक वहाँ यह वृत्तान्त जान शत्रु उस तरह क्षोभको प्राप्त हो गये जिस तरह कि परम तेजअर्थात् सूर्यको आच्छादित करनेके लिए गरजते हुए काले मेघ ॥२१-२२॥
विरोधिताशया दूरं सामर्षा सुन्दनन्दनम् । चारुरत्नाख्यमाजग्मुरसौ कुलिशमालिनम् ॥२३॥
अर्थ: जिनके अभिप्रायमें बहुत दूर तक विरोध समाया हुआ था तथा जो अत्यधिक क्रोधसे सहित थे ऐसे शत्रु, शम्बूकके भाई सुन्दके पुत्र चारुरत्नके पास गये और चारुरत्न उन सबको साथ ले इन्द्रजित्के पुत्र वज्रमालीके पास गया ॥२३॥
ऊचे च 'मद्गुरोर्येन मीत्वा सोदरकारकौ । पातालनगरे चासौ राज्येऽस्थापि विराधितः ॥२४॥
अर्थ: उसे उत्तेजित करता हुआ चारुरत्न बोला कि लक्ष्मणने हमारे काका और बाबा दोनोंको मारकर पाताल लंकाके राज्यपर विराधितको स्थापित किया ॥२४॥
वानरध्वजिनीचन्द्रं सुग्रीवं प्राप्य बान्धवम् । उदन्तोऽलम्भि कान्ताया रामेणाऽऽर्त्तिमता ततः ॥२५॥
अर्थ: तदनन्तर वानर-वंशियोंकी सेनाको हर्षित करनेके लिए चन्द्रमा स्वरूप एवं भाईके समान हितकारी सुग्रीवको पाकर विरहसे पीड़ित रामने अपनी स्त्री सीताका समाचार प्राप्त किया ॥२५॥
उदन्वन्तं समुल्लङ्घ्य नभोगैर्यानवाहनैः । द्वीपा विध्वंसितास्तेन लङ्कां जेतुं युयुत्सुना ॥२६॥
अर्थ: तत्पश्चात् लंका-को जीतनेके लिए युद्ध करनेके इच्छुक रामने विद्याधरोंके साथ विमानों द्वारा समुद्रको लाँघकर अनेक द्वीप नष्ट किये ॥२६॥
सिंहतार्क्ष्यमहाविद्ये रामलक्ष्मणयोस्तयोः । उत्पन्ने बन्दितां नीतास्ताभ्यामिन्द्रजितादयः ॥२७॥
अर्थ: राम-लक्ष्मणको सिंहवाहिनी एवं गरुडवाहिनी नामक विद्याएँ प्राप्त हुईं। उनके प्रभावसे उन्होंने इन्द्रजित आदिको बन्दी बनाया ॥२७॥
चक्ररत्नं समासाद्य येनाऽघाति दशाननः । अधुना कालचक्रेण लक्ष्मणोऽसौ निपातितः ॥२८॥
अर्थ: तथा जिस लक्ष्मणने चक्र-रत्न पाकर रावणको मारा था इस समय वही लक्ष्मण कालके चक्रसे मारा गया है ॥२८॥
आसंस्तस्य भुजच्छायां श्रित्वा मत्ता प्लवङ्गमाः । साम्प्रतं लूनपक्षास्ते परमास्कन्द्यतां गताः ॥२९॥
अद्यास्ति द्वादशः पक्षो राघवस्येयुषः शुचम् । प्रेताङ्कं वहमानस्य व्यामोहः कोऽपरोऽस्त्वतः ॥३०॥
अर्थ: उसकी भुजाओंकी छाया पाकर वानरवंशी उन्मत्त हो रहे थे पर इस समय वे पक्ष कट जानेसे अत्यन्त आक्रमणके योग्य अवस्थाको प्राप्त हुए हैं । शोकको प्राप्त हुए रामको आज बारहवाँ पक्ष है वे लक्ष्मणके मृतक शरीरको लिये फिरते हैं अतः कोई विचित्र प्रकारका मोह - पागलपन उनपर सवार है ॥२९-३०॥
यद्यप्यप्रतिमल्लोऽसौ हलरत्नादिमर्दनः । तथापि लङ्घितुं शक्यः शोकपङ्कगतोऽभवत् ॥३१॥
अर्थ: यद्यपि हल-मुसल आदि शस्त्रोंको धारण करनेवाले राम अपनी सानी नहीं रखते तथापि इस समय शोकरूपी पंकमें फँसे होनेके कारण उनपर आक्रमण करना शक्य है ॥३१॥
तस्यैव बिभिमस्त्वस्य न जात्वन्यस्य कस्यचित् । यस्यानुजेन विध्वस्ता सर्वास्मद्वंशसङ्गतिः ॥३२॥
अर्थ: यदि हमलोग डरते हैं तो एक उन्हींसे डरते हैं और किसीसे नहीं जिनके कि छोटे भाई लक्ष्मणने हमारे वंशकी सब संगति नष्ट कर दी ॥३२॥
अथैन्द्रजितिराकर्ण्य व्यसनं स्वोरुगोत्रजम् । प्रतिद्यासितमार्गेण जज्वाल क्षुब्धमानसः ॥३३॥
अर्थ: अथानन्तर इन्द्रजितका पुत्र वज्रमाली अपने विशाल वंशपर उत्पन्न पूर्व संकटको सुनकर क्षुभित हो उठा और प्रसिद्ध मार्गसे प्रज्वलित होने लगा अर्थात् क्षत्रिय कुल प्रसिद्ध तेजसे दमकने लगा ॥३३॥
आज्ञाप्य सचिवान् सर्वान् भेर्या संयति राजितान् । प्रययौ प्रति साकेतं सुन्दतोकसमन्वितः ॥३४॥
अर्थ: वह मन्त्रियोंको आज्ञा दे तथा भेरीके द्वारा सब लोगोंको युद्धमें इकट्ठाकर सुन्दपुत्र चारुरत्नके साथ अयोध्याकी ओर चला ॥३४॥
सैन्याकूपारगुप्तौ तौ सुग्रीवं प्रति कोपितौ । पद्मनाभमयासिष्टां प्रकोपयितुमुद्यतौ ॥३५॥
अर्थ: जो सेना रूपी समुद्रसे सुरक्षित थे तथा सुग्रीवके प्रति जिनका क्रोध उमड़ रहा था ऐसे वे दोनों - वज्रमाली और चारुरत्न, रामको कुपित करनेके लिए उद्यत हो उनकी ओर चले ॥३५॥
वज्रमालिनमायातं श्रुत्वा सौन्दिसमन्वितम् । सर्वे विद्याधराधीशा रघुचन्द्रमशिश्रियन् ॥३६॥
अर्थ: चारुरत्नके साथ वज्रमालीको आया सुन सब विद्याधर राजा रामचन्द्रके पास आये ॥३६॥
वितानतां परिप्राप्ता क्षुब्धाऽयोध्या समन्ततः । लवणाङ्कुशयोर्यद्वदागमे भीतिवेपिता ॥३७॥
अर्थ: उस समय अयोध्या किंकर्तव्यमूढ़ताको प्राप्त हो सब ओरसे क्षुभित हो उठी तथा जिस प्रकार लवणांकुशके आनेपर भयसे काँपने लगी थी उसी प्रकार भयसे काँपने लगी ॥३७॥
अरातिसैन्यमभ्यर्णमालोक्य रघुभास्करः । कृत्वाङ्के लक्ष्मणं सत्त्वं वहमानस्तथाविधम् ॥३८॥
उपनीतं समं बाणैर्वज्रावर्त्तमहाधनुः । आलोकत स्वभावस्थं कृतान्तभ्रूलतोपमम् ॥३९॥
अर्थ: अनुपम पराक्रमको धारण करनेवाले रामने जब शत्रुसेनाको निकट देखा तब वे मृत लक्ष्मणको गोदमें रख बाणोंके साथ लाये हुए उस वज्रावर्त नामक महाधनुषकी ओर देखने लगे कि जो अपने स्वभावमें स्थित था तथा यमराजकी भ्रुकुटि रूपी लताके समान कुटिल था ॥३८-३९॥
एतस्मिन्नन्तरे नाके जातो विष्टरवेपथुः । कृतान्तवक्त्रदेवस्य जटायुत्रिदशस्य च ॥४०॥
अर्थ: इसी समय स्वर्गमें कृतान्तवक्त्र सेनापति तथा जटायु पक्षीके जीव जो देव हुए थे उनके आसन कम्पायमान हुए ॥४०॥
विमाने यत्र सम्भूतो जटायुस्त्रिदशोत्तमः । तस्मिन्नेव कृतान्तोऽपि तस्यैव विभुतां गतः ॥४१॥
अर्थ: जिस विमानमें जटायुका जीव उत्तम देव हुआ था उसी विमानमें कृतान्तवक्त्र भी उसीके समान वैभवका धारी देव हुआ था ॥४१॥
कृतान्तत्रिदशोऽवोचद् भो गीर्वाणपते कुतः । इमं यातोऽसि संरम्भं सोऽगदद्योजितावधिः ॥४२॥
यदाऽहमभवं गृध्रस्तदा येनेष्टपुत्रवत् । लालितः शोकतप्तं तमेति शत्रुबलं महत् ॥४३॥
अर्थ: कृतान्तवक्त्रके जीवने जटायुके जीवसे कहा कि हे देवराज ! आज इस क्रोधको क्यों प्राप्त हुए हो ? इसके उत्तरमें अवधिज्ञानको जोड़नेवाले जटायुके जीवने कहा कि जब मैं गृध्र पर्यायमें था तब जिसने प्रिय पुत्रके समान मेरा लालन-पालन किया था आज उसके संमुख शत्रुकी बड़ी भारी सेना आ रही है और वह स्वयं भाईके मरणसे शोक-संतप्त है ॥४२-४३॥
ततः कृतान्तदेवोऽपि प्रयुज्यावधिलोचनम् । अधोभूयिष्ठदुःखार्त्तो बभाषे चातिभासुरः ॥४४॥
सखे सत्यं ममाप्येष प्रभुरासीत् सुवत्सलः । प्रसादादस्य भूपृष्ठे कृतं दुर्लङितं मया ॥४५॥
अर्थ: तदनन्तर कृतान्तवक्त्रके जीवने भी अवधिज्ञान रूपी लोचनका प्रयोगकर नीचे होनेवाले अत्यधिक दुःखसे दुःखी तथा क्रोधसे देदीप्यमान होते हुए कहा कि मित्र, सच है वह हमारा भी स्नेही स्वामी रहा है । इसके प्रसादसे मैंने पृथिवीतलपर अनेक दुर्दान्त चेष्टाएँ की थीं ॥४४-४५॥
भाषितश्चाहमेतेन गहनात्परमोचनम् । तदिदं जातमेतस्य तदेह्येनमिमो लघु ॥४६॥
अर्थ: इसने मुझसे कहा भी था कि संकटसे मुझे छुड़ाना । आज वह संकट इसे प्राप्त हुआ है इसलिए आओ शीघ्र ही इसके पास चलें ॥४६॥
इत्युक्त्वा प्रचलन्नीलकेशकुन्तलसंहती । स्फुरत्किरीटभाचक्रौ विलसन्मणिकुण्डलौ ॥४७॥
माहेन्द्रकल्पतो देवौ श्रीमन्तौ प्रति कोसलाम् । जग्मतुः परमोद्योगौ प्रतिपक्षविचक्षणौ ॥४८॥
अर्थ: इतना कहकर जिनके काले-काले केश तथा कुन्तलोंका समूह हिल रहा था, जिनके मुकुटोंका कान्तिचक्र देदीप्यमान हो रहा था, जिनके मणिमय कुण्डल सुशोभित थे, जो परम उद्योगी थे तथा शत्रुका पक्ष नष्ट करनेमें निपुण थे ऐसे वे दोनों श्रीमान् देव, माहेन्द्र स्वर्गसे अयोध्याकी ओर चले ॥४७-४८॥
सामानिकं कृतान्तोऽगाद् व्रज त्वं द्विषतां बलम् । विमोहय रघुश्रेष्ठं रक्षितुं तु व्रजाम्यहम् ॥४९॥
अर्थ: कृतान्तवक्त्रके जीवने जटायुके जीवसे कहा कि तुम तो जाकर शत्रु सेनाको मोहित करो - उसकी बुद्धि भ्रष्ट करो और मैं रामकी रक्षा करनेके लिए जाता हूँ ॥४९॥
ततो जटायुर्गीर्वाणः कामरूपविवर्त्तकृत् । सुधीरुदारमत्यन्तं परसैन्यममोहयत् ॥५०॥
अर्थ: तदनन्तर इच्छानुसार रूपपरिवर्तित करनेवाले बुद्धिमान् जटायुके जीवने शत्रुकी उस बड़ी भारी सेनाको मोहयुक्त कर दिया - भ्रममें डाल दिया ॥५०॥
आगच्छतामरातीनामयोध्यामीक्षितां पुरः । पुनः प्रदर्शयामास पर्वतं पृष्ठतः पुनः ॥५१॥
निरस्याऽऽरादधीयांस्तां शत्रुखेचरवाहिनीम् । आरेभे रोदसी व्याप्तुमयोध्याभिरनन्तरम् ॥५२॥
अर्थ: ‘यह अयोध्या दिख रही है’ ऐसा सोचकर जो शत्रु उसके समीप आ रहे थे उस देवने मायासे उनके आगे और पीछे बड़े-बड़े पर्वत दिखलाये । तदनन्तर अयोध्याके निकट खड़े होकर उसने शत्रु विद्याधरोंकी समस्त सेनाका निराकरण किया और पृथिवी तथा आकाश दोनोंको अयोध्या नगरियोंसे अविरल व्याप्त करना शुरू किया ॥५१-५२॥
अयोध्यैष विनीतेयमियं सा कोशला पुरी । अहो सर्वमिदं जातं नगरीगहनात्मकम् ॥५३॥
अर्थ: जिससे ‘यह अयोध्या है, यह विनीता है, यह कोशलापुरी है, इस तरह वहाँकी समस्तभूमि और आकाश अयोध्या नगरियोंसे तन्मय हो गया ॥५३॥
इति वीक्ष्य महीपृष्ठं खं चायोध्यासमाकुलम् । मानोन्नत्या वियुक्तं तद्वीक्ष्यापक्षमभूद्बलम् ॥५४॥
अर्थ: इस प्रकार पृथिवी और आकाश दोनोंको अयोध्याओंसे व्याप्त देखकर शत्रुओंकी वह सेना अभिमान-से रहित हो आपत्तिमें पड़ गई ॥५४॥
बभणुश्चाधुना केन प्रकारेण स्वजीवितम् । धारयामः परा यत्र काऽप्येषा रामदेवता ॥५५॥
अर्थ: सेनाके लोग परस्पर कहने लगे कि जहाँ यह राम नामका कोई अद्भुत देव विद्यमान है वहाँ अब हम अपने प्राण किस तरह धारण करें - जीवित कैसे रहें ? ॥५५॥
ईदृशी विक्रिया शक्तिः कुतो विद्याधरर्द्धिषु । किमिदं कृतमस्माभिरनालोचितकारिभिः ॥५६॥
अर्थ: विद्याधरोंकी ऋद्धियोंमें ऐसी विक्रिया शक्ति कहाँसे आई ? बिना विचारे काम करने-वाले हमलोगोंने यह क्या किया ? ॥५६॥
विरुद्धा अपि हंसस्य खद्योताः किं नु कुर्वते । यस्यामीषुसहस्राप्तं परिजाज्वल्यते जगत् ॥५७॥
अर्थ: जिसकी हजार किरणोंसे व्याप्त हुआ जगत् सब ओर-से देदीप्यमान हो रहा है, बहुतसे जुगनूँ विरुद्ध होकर भी उस सूर्यका क्या कर सकते हैं ? ॥५७॥
प्रपलायितुकामानामपि नः साम्प्रतं सखे । नास्ति मार्गः सुभीमेऽस्मिन्बले स्तृणाति विष्टपम् ॥५८॥
अर्थ: जबकि यह भयंकर सेना समस्त जगत्में व्याप्त हो रही है तब हे सखे ! हम भागना भी चाहें तो भी भागनेके लिए मार्ग नहीं है ॥५८॥
महान्न मरणेऽप्यस्ति गुणो जीवन् हि मानवः । कदाचिद्देति कल्याणं स्वकर्मपरिपाकतः ॥५९॥
अर्थ: मरनेमें कोई बड़ा लाभ नहीं है क्योंकि जीवित रहनेवाला मनुष्य कदाचित् अपने कर्मोंके उदयवश कल्याणको प्राप्त हो जाता है ॥५९॥
बुद्बुदा इव यद्यस्मिन्नर्मीभिः सैनिकोर्मिभिः । आनीताः स्म प्रविध्वंसं किं भवेदूर्जितं ततः ॥६०॥
अर्थ: यदि हम इन सैनिक रूपी तरङ्गोंके द्वारा बबूलोंके समान नाशको भी प्राप्त हो गये तो उससे क्या मिल जायगा ? ॥६०॥
इत्यन्योन्यकृताऽऽलापमुद्भूतपृथुवेपथुं । विद्याधरबलं सर्वं जातमत्यन्तविह्वलम् ॥६१॥
अर्थ: इस प्रकार जो परस्पर वार्तालाप कर रही थी तथा जिसे अत्यधिक कँपकँपी छूट रही थी ऐसी वह विद्याधरोंकी समस्त सेना अत्यन्त विह्वल हो गई ॥६१॥
विक्रियाक्रीडनं कृत्वा जटायुरिति पार्थिव । पलायनपथं तेषां दक्षिणं कृपया ददौ ॥६२॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! तदनन्तर जटायुके जीवने इस तरह विक्रिया द्वारा क्रीड़ाकर दयापूर्वक उन विद्याधर शत्रुओंको दक्षिण दिशाकी ओर भागनेका मार्ग दे दिया ॥६२॥
प्रस्पन्दमानचित्तास्ते कम्पमानशरीरकाः । भृशं ते खेचरा नेशुः श्येनत्रस्ता द्विजा इव ॥६३॥
अर्थ: इस प्रकार जिनके चित्त चञ्चल थे तथा जिनके शरीर काँप रहे थे ऐसे वे सब विद्याधर बाजसे डरे पक्षियोंके समान बड़े वेगसे भागे ॥६३॥
तस्मै विभीषणायाऽग्रे दास्यामो नु किमुत्तरम् । का वा शोभाऽधुनाऽस्माकमत्यन्तोपहतात्मनाम् ॥६४॥
अर्थ: अब आगे विभीषणके लिए क्या उत्तर देंगे ? इस समय जिनकी आत्मा एक दम दीन हो रही है ऐसे हम लोगोंकी क्या शोभा है ? ॥६४॥
छायया दर्शयिष्यामः कया वक्त्रं स्वदेहिनाम् । कुतो वा धृतिरस्माकं का वा जीवितशेमुषी ॥६५॥
अर्थ: हम अपने ही लोगोंको क्या कान्ति लेकर मुख दिखावेंगे ? हम लोगोंको धैर्य कहाँ हो सकता है ? अथवा जीवित रहनेकी इच्छा ही हम लोगोंको कहाँ हो सकती है ? ॥६५॥
अवधार्येति सव्रीडस्तस्मिन्निन्द्रजितात्मजः । प्राप्तो विरागमैश्वर्ये विभूतिं वीक्ष्य दैविकीम् ॥६६॥
समेतश्चारुरत्नेन स्निग्धकैश्च सभूमिभिः । रतिवेगमुनेः पार्श्वे विरोषः श्रमणोऽभवत् ॥६७॥
अर्थ: ऐसा निश्चय कर उनमें जो इन्द्रजितका पुत्र वज्रमाली था वह लज्जासे युक्त हो गया । यतश्च वह देवोंका प्रभाव देख चुका था अतः उसे अपने ऐश्वर्यमें वैराग्य उत्पन्न हो गया । फल स्वरूप वह सुन्दके पुत्र चारुरत्न तथा अन्य स्नेही जनोंके साथ, क्रोध छोड़ रतिवेग नामक मुनिके पास साधु हो गया ॥६६-६७॥
दृष्ट्वाऽनन्तरदेहांस्तान्निर्मुक्तकलुषान्नृपान् । विद्युत्प्रहरणं देवः समहार्षीत् प्रभीषणः ॥६८॥
अर्थ: भयभीत करनेके लिए जटायुका जीव देव, विद्युत्प्रहार नामक शस्त्र लेकर उन सबको दक्षिणकी ओर खदेड़ रहा था सो उन सब राजाओंको नग्न तथा क्रोधरहित देख उसने अपना विद्युत्प्रहार नामक शस्त्र संकुचित कर लिया ॥६८॥
दध्यावुद्विग्नचित्तः स कृतावधिनियोजनः । अहोऽमी प्रतिबोधाख्याः संवृत्ताः परमर्षयः ॥६९॥
अर्थ: उद्विग्न चित्तका धारी वह देव अवधिज्ञानका प्रयोगकर विचार करने लगा कि अहो ! ये सब तो प्रतिबोधको प्राप्त हो परम ऋषि हो गये हैं ॥६९॥
दोषांस्तदास्मिन्दासित्वा साधूनां विमलात्मनाम् । महादुःखं परिप्राप्तं तिर्यक्षु नरकेषु च ॥७०॥
यस्यानुबन्धमद्यापि सहे शत्रोर्दुरात्मनः । येन स्तोकेन न भ्रान्तः पुनर्दीर्घं भवार्णवम् ॥७१॥
अर्थ: उस समय ( राजा दण्डककी पर्यायमें ) मैंने निर्दोष आत्माके धारी साधुओंको दोष दिया था - घानीमें पिलवाया था सो उसके फल स्वरूप तिर्यञ्चों और नरकोंमें मैंने बहुत भारी दुःख उठाया है । तथा अब भी उसी दुष्ट शत्रुका संस्कार भोग रहा हूँ परन्तु वह संस्कार इतना थोड़ा रह गया है कि उसके निमित्तसे पुनः दीर्घ संसारमें भ्रमण नहीं करना पड़ेगा ॥७०-७१॥
इति सञ्चिन्त्य शान्तात्मा स्वं निवेद्य यथाविधि । प्रणम्य भक्तिसम्पन्नः सुधीः साधूनमर्षयत् ॥७२॥
अर्थ: ऐसा विचारकर उस बुद्धिमान्ने शान्त हो अपने आपका परिचय दिया और भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन मुनियोंसे क्षमा माँगी ॥७२॥
तथा कृत्वा च साकेतामगाद् यत्र विमोहितः । भ्रातृशोकेन काकुत्स्थः शिशुवत्परिचेष्टते ॥७३॥
अर्थ: तदनन्तर इतना सब कर, वह अयोध्यामें वहाँ पहुँचा जहाँ भाईके शोकसे मोहित हो राम बालकके समान चेष्टा कर रहे थे ॥७३॥
आकल्पान्तरमापन्नं सिञ्चन्तं शुष्कपादपम् । पद्मनाभप्रबोधार्थं कृतान्तं वीक्ष्य सादरम् ॥७४॥
अर्थ: वहाँ उसने बड़े ओदरसे देखा कि कृतान्तवक्त्रका जीव रामको समझानेके लिए वेष बदलकर एक सूखे वृक्षको सींच रहा है ॥७४॥
जटायुः शीरमासाद्य गोकलेवरयुग्मके । बीजं शिलातले वप्तुमुद्यतः प्राजनं दधत् ॥७५॥
अर्थ: यह देख जटायुका जीव भी दो मृतक बैलोंके शरीरपर हल रखकर परेना हाथमें लिये शिलातलपर बीज बोनेका उद्यम करने लगा ॥७५॥
कृपीटपूरितां कुम्भीं कृतान्तस्तत्पुरोऽमथत् । जटायुश्चक्रमारोप्य सिकतां पर्यपीडयत् ॥७६॥
अर्थ: कुछ समय बाद कृतान्तवक्त्रका जीव रामके आगे जलसे भरी मटकीको मथने लगा और जटायुका जीव घानीमें बालू डाल पेलने लगा ॥७६॥
अन्यानि चार्थहीनानि कार्याणि त्रिदशाविमौ । चक्रतुः स ततो गत्वा पप्रच्छेति क्रमान्वितम् ॥७७॥
परेतं सिञ्चसे मूढ कस्मादेनमनोकहम् । कलेवरे हलं प्राव्णि बीजं हारयसे कुतः ॥७८॥
नीरनिर्मथने लब्धिर्नवनीतस्य किं कृता । बालुकापीडनाद्बाल स्नेहः सञ्जायतेऽथ किम् ॥७९॥
केवलं श्रम एवात्र फलं नाण्वपि काङ्क्षितम् । लभ्यते किमिदं व्यर्थं समारब्धं विचेष्टितम् ॥८०॥
अर्थ: इस प्रकार इन्हें आदि लेकर और भी दूसरे-दूसरे निरर्थक कार्य इन दोनों देवोंने रामके आगे किये। तदनन्तर रामने यथाक्रमसे उनके पास जाकर पूछा कि अरे मूर्ख ! इस मृत वृक्षको क्यों सींच रहा है ? मृतक कलेवरपर हल क्यों रक्खे हुए हैं ?, पत्थरपर बीज क्यों बरबाद करता है ? पानीके मथनेमें मक्खनकी प्राप्ति कैसे होगी ? और रे बालक ! बालूके पेलनेसे क्या कहीं तेल उत्पन्न होता है ? इन सब कार्योंमें केवल परिश्रम ही हाथ रहता है इच्छित फल तो परमाणु बराबर भी नहीं मिलता फिर यह व्यर्थकी चेष्टा क्यों प्रारम्भ कर रक्खी है ॥७७-८०॥
ऊचतुस्तौ क्रमेणैतं पृच्छावश्चापि सत्यतः । जीवेन रहितामेतां तनुं वहसि किं वृथा ॥८१॥
अर्थ: तदनन्तर क्रमसे उन दोनों देवोंने कहा कि हम भी एक यथार्थ बात आपसे पूछते हैं कि आप इस जीवरहित शरीरको व्यर्थ ही क्यों धारण कर रहे हैं ? ॥८१॥
लक्ष्मणाङ्गं ततो दोर्भ्यामालिङ्ग्य वरलक्षणम् । इदं जगाद भूदेवः कलुषीभूतमानसः ॥८२॥
भो भो कुत्सयते कस्मात् सौमित्रिं पुरुषोत्तमम् । अमङ्गलाभिधानस्य किं ते दोषो न विद्यते ॥८३॥
अर्थ: तब जिनका मन कलुषित हो रहा था ऐसे श्री रामदेवने उत्तम लक्षणोंके धारक लक्ष्मणके शरीरका भुजाओंसे आलिङ्गनकर कहा कि अरे अरे ! तुम पुरुषोत्तम लक्ष्मणकी बुराई क्यों करते हो ? ऐसे अमाङ्गलिक शब्दके कहनेमें क्या तुम्हें दोष नहीं लगता ? ॥८२-८३॥
कृतान्तेन समं यावद् विवादोऽस्येति वर्त्तते । जटायुस्तावदायातो वहन्नरकलेवरम् ॥८४॥
अर्थ: इस प्रकार जब तक रामका कृतान्तवक्त्रके जीवके साथ उक्त विवाद चल रहा था तब तक जटायुका जीव एक मृतक मनुष्यका शरीर लिये हुए वहाँ आ पहुँचा ॥८४॥
तं दृष्ट्वाऽभिमुखं रामो बभाषे केन हेतुना । कलेवरमिदं स्कन्धे वहसे मोहसङ्गतः ॥८५॥
अर्थ: उसे सामने खड़ा देख रामने उससे पूछा कि तू मोह युक्त हुआ इस मृत शरीरको कन्धे पर क्यों रक्खे हुए है ? ॥८५॥
तेनोक्तमनुयुङ्क्षे मां कस्मान्न त्वं विचक्षणः । यतः प्राणनिमेषादिमुक्तं वहसि विग्रहम् ॥८६॥
अर्थ: इसके उत्तरमें जटायुके जीवने कहा कि तुम विद्वान् होकर भी हमसे पूछते हो पर स्वयं अपने आपसे क्यों नहीं पूछते जो श्वासोच्छ्वास तथा नेत्रोंकी टिमकार आदिसे रहित शरीरको धारण कर रहे हो ॥८६॥
बालाग्रमात्रकं दोषं परस्य क्षिप्रमीक्षसे । मेरुकूटप्रमाणान् स्वान् कथं दोषान्न पश्यसि ॥८७॥
अर्थ: दूसरेके तो बालके अग्रभाग बराबर सूक्ष्म दोषको जल्दीसे देख लेते हो पर अपने मेरुके शिखर बराबर बड़े-बड़े दोषोंको भी नहीं देखते हो ? ॥८७॥
दृष्ट्वा भवन्तमस्माकं परमा प्रीतिरुद्गता । सदृशः सदृशेष्वेव रज्यन्तीति सुभाषितम् ॥८८॥
अर्थ: आपको देखकर हम लोगोंको बड़ा प्रेम उत्पन्न हुआ क्यों कि यह सूक्ति भी है कि सदृश प्राणी अपने ही सदृश प्राणीमें अनुराग करते हैं ॥८८॥
सर्वेषामस्मदादीनां यथेप्सितविधायिनाम् । भवान् पूर्वं पिशाचानां त्वं राजा परमेप्सितः ॥८९॥
अर्थ: इच्छानुसार कार्य करनेवाले हम सब पिशाचोंके आप सर्वप्रथम मनोनीत राजा हैं ॥८९॥
उन्मत्तेन्द्रध्वजं दत्वा भ्रमामः सकलां महीम् । उन्मत्तां प्रवणीकुर्मः समस्तां प्रत्यवस्थिताम् ॥९०॥
अर्थ: हम उन्मत्तोंके राजाकी ध्वजा लेकर समस्त पृथिवीमें घूमते फिरते हैं और उन्मत्त तथा प्रतिकूल खड़ी समस्त पृथिवीको अपने अनुकूल करने जाते हैं ॥९०॥
एवमुक्तमनुश्रित्य मोहे शिथिलतां गते । गुरुवाक्यभवं चाऽन्यत् स्मृत्वा ह्रीमानभून्नृपः ॥९१॥
अर्थ: इस प्रकार देवोंके वचनोंका आलम्बन पाकर रामका मोह शिथिल हो गया और वे गुरुओंके वचनोंका स्मरण कर अपनी मूर्खतापर लज्जित हो उठे ॥९१॥
मुक्तमोहघनव्रातः प्रतिबोधमरीचिभिः । नृपदाशायणीभर्त्ता राजते परमं तदा ॥९२॥
अर्थ: उस समय जिनका मोहरूपी मेघ-समूहका आवरण दूर हो गया था ऐसे राजा रामचन्द्र रूपी चन्द्रमा प्रतिबोधरूपी किरणोंसे अत्यधिक सुशोभित हो रहे थे ॥९२॥
घनपङ्कविनिर्मुक्तमिव शारदमम्बरम् । विमलं तस्य सञ्जातं मानसं सत्त्वसङ्गतम् ॥९३॥
अर्थ: उस समय धैर्यगुणसे सहित रामका मन मेघ-रूपी कीचड़से रहित शरद् ऋतुके आकाशके समान निर्मल हो गया था ॥९३॥
स्मृतैरमृतसम्पन्नैर्हृतशोको गुरूदितैः । पुरेव नन्दनस्वास्थ्यं दधानः शुशुभेतराम् ॥९४॥
अर्थ: स्मरणमें आये तथा अमृतसे निर्मितकी तरह मधुर गुरुओंके वचनोंसे जिनका शोक हर लिया गया था ऐसे राम उस समय उस तरह अत्यधिक सुशोभित हुए थे जिस तरह कि पहले पुत्रोंके मिलाप-सम्बन्धी सुखको धारण करते हुए सुशोभित हुए थे ॥९४॥
अवलम्बितधीरत्वस्तैरेव पुरुषोत्तमः । छायां प्राप यथा मेरुर्जिनाभिषववारिभिः ॥९५॥
अर्थ: उस समय उन्हीं गुरुओंके वचनोंसे जिन्होंने धैर्य धारण किया था ऐसे पुरुषोत्तम राम, जिनेन्द्र भगवान्के जन्माभिषेकके जलसे मेरुके समान कान्तिको प्राप्त हुए थे ॥९५॥
प्रालेयवातसम्पर्कविमुक्ताम्भोजखण्डवत् । प्रजह्लादे विशुद्धात्मा विमुक्तकलुषाशयः ॥९६॥
अर्थ: जिनकी आत्मा विशुद्ध थी तथा अभिप्राय कलुषतासे रहित था ऐसे राम उस समय तुषारकी वायुसे रहित कमल वनके समान आह्लादसे युक्त थे ॥९६॥
महान्तध्वान्तसम्मूढो भानोः प्राप्त इवोदयम् । महाक्षुदर्दितो लेभे परमान्नमिवेप्सितम् ॥९७॥
अर्थ: उस समय उन्हें ऐसा हर्ष हो रहा था मानो महान् गाढ़ अन्धकारमें भूला व्यक्ति सूर्यके उदयको प्राप्त होगया हो, अथवा तीव्र क्षुधासे पीड़ित व्यक्ति इच्छानुकूल उत्तम भोजनको प्राप्त हुआ हो ॥९७॥
तृषा परमया ग्रस्तो महासर इवागमत् । महौषधमिव प्रापदत्यन्तव्याधिपीडितः ॥९८॥
अर्थ: अथवा तीव्र प्याससे ग्रस्त मनुष्य किसी महासरोवरको प्राप्त हुआ हो अथवा अत्यधिक रोगसे पीड़ित मनुष्य महौषधिको प्राप्त होगया हो ॥९८॥
यानपात्रमिवासादत्तर्त्तुकामो महार्णवम् । उत्पथप्रतिपन्नः सन्मार्गं प्राप्येव नागरः ॥९९॥
अर्थ: अथवा महासागरको पार करनेके लिए इच्छुक मनुष्यको जहाज मिल गई हो अथवा कुमार्गमें पड़ा नागरिक सुमार्गमें आ गया हो ॥९९॥
गन्तुमिच्छन्निजं देशं महासार्थमिव श्रितः । निर्गन्तुं चारकादिच्छोर्भग्नेव सुदृढाऽर्गला ॥१००॥
अर्थ: अथवा अपने देशको जानेके लिए इच्छुक मनुष्य व्यापारियोंके किसी महासंघमें आ मिला हो अथवा कारागृहसे निकलनेके लिए इच्छुक मनुष्यका मजबूत अर्गल टूट गया हो ॥१००॥
जिनमार्गस्मृतिं प्राप्य पद्मनाभः प्रमोदवान् । अधारयत् परां कान्तिं प्रबुद्धकमलेक्षणः ॥१०१॥
अर्थ: जिन मार्गका स्मरण पाकर राम हर्षसे खिल उठे और फूले हुए कमलके समान नेत्रोंको धारण करते हुए परम कान्तिको धारण करने लगे ॥१०१॥
मन्यमानः स्वमुत्तीर्णमन्धकूपोदरादिव । भवान्तरमिव प्राप्तो मनसीदं समादधे ॥१०२॥
अर्थ: उन्होंने मनमें ऐसा विचार किया कि जैसे मैं अन्धकूपके मध्यसे निकल कर बाहर आया हूँ अथवा दूसरे ही भवको प्राप्त हुआ हूँ ॥१०२॥
अहो तृणाग्रसंसक्तजलबिन्दुचलाचलम् । मनुष्यजीवितं यद्वत्क्षणान्नाशमुपागतम् ॥१०३॥
अर्थ: वे विचार करने लगे कि अहो, तृणके अग्रभागपर स्थित जलकी बूँदोंके समान चञ्चल यह मनुष्यका जीवन क्षणभरमें नष्ट हो जाता है ॥१०३॥
भ्रमताऽत्यन्तकृच्छ्रेण चतुर्गतिभवान्तरे । नृशरीरं मया प्राप्तं कथं मूढोऽस्म्यनर्थकः ॥१०४॥
अर्थ: चतुर्गति रूप संसारके बीच भ्रमण करते हुए मैंने बड़ी कठिनाईसे मनुष्य-शरीर पाया है फिर व्यर्थ ही क्यों मूर्ख बन रहा हूँ ? ॥१०४॥
कस्येष्टानि कलत्राणि कस्यार्थाः कस्य बान्धवाः । संसारे सुलभं ह्येतद् बोधिरेका सुदुर्लभा ॥१०५॥
अर्थ: ये इष्ट स्त्रियाँ किसकी हैं ? ये धन, वैभव किसके हैं ? और ये भाई-बान्धव किसके हैं ? संसारमें ये सब सुलभ हैं परन्तु एक बोधि ही अत्यन्त दुर्लभ है ॥१०५॥
इति ज्ञात्वा प्रबुद्धं तं मायां संहृत्य तौ सुरौ । चक्रतुस्त्रैदशीमृद्धिं लोकविस्मयकारिणीम् ॥१०६॥
अर्थ: इस प्रकार श्री रामको प्रबुद्ध जान कर उक्त दोनों देवोंने अपनी माया समेट ली तथा लोगोंको आश्चर्यमें डालनेवाली देवोंकी विभूति प्रकट की ॥१०६॥
अपूर्वः प्रववौ वायुः सुखस्पर्शः सुसौरभः । नभो यानैर्विमानैश्च व्याप्तमत्यन्तसुन्दरैः ॥१०७॥
अर्थ: सुखकर स्पर्शसे सहित तथा सुगन्धिसे भरी हुई अपूर्व वायु बहने लगी और आकाश अत्यन्त सुन्दर वाहनों और विमानोंसे व्याप्त हो गया ॥१०७॥
गीयमाने सुरस्त्रीभिर्वीणानिःस्वनसङ्गतम् । आत्मीयं चरितं रामः शृणोति स्म क्रमस्थितम् ॥१०८॥
अर्थ: देवाङ्गनाओं द्वारा वीणाके मधुर शब्दके साथ गाया हुआ अपना क्रमपूर्ण चरित श्री रामने सुना ॥१०८॥
एतस्मिन्नन्तरे देवः कृतान्तोऽमा जटायुषा । रामं पप्रच्छ किं नाथ प्रेरिताः दिवसाः सुखम् ॥१०९॥
एवमुक्तौ जगौ राजा पृच्छथः किं शिवं मम । तेषां सर्वसुखान्येव ये श्रामण्यमुपागताः ॥११०॥
अर्थ: इसी बीचमें कृतान्तवक्त्रके जीवने जटायुके जीवके साथ मिलकर श्री रामसे पूछा कि हे नाथ ! क्या ये दिन सुखसे व्यतीत हुए ? देवोंके ऐसा पूछनेपर राजा रामचन्द्रने उत्तर दिया कि मेरा सुख क्या पूछते हो ? समस्त सुख तो उन्हींको प्राप्त हैं जो मुनि पदको प्राप्त हो चुके हैं ॥१०९-११०॥
भवन्तावस्मि पृच्छामि कौ युवां सौम्यदर्शनौ । केन वा कारणेनेदं कृतमीदृग्विचेष्टितम् ॥१११॥
अर्थ: मैं आपसे पूछता हूँ कि सौम्य दर्शन वाले आप दोनों कौन हैं ? और किस कारण आप लोगोंने ऐसी चेष्टा की ? ॥१११॥
ततो जटायुर्देवोऽगादिति जानासि भूपते । गृध्रोऽरण्ये यदाशिष्ये शमिष्यामि मुनीक्षणात् ॥११२॥
अर्थ: तदनन्तर जटायुके जीव देवने कहा कि हे राजन् ! जानते हैं आप, जब मैं वनमें गीध था और मुनिराजके दर्शनसे शान्तिको प्राप्त हुआ था ॥११२॥
लालयिष्ये च यत्तत्र भ्रात्रा देव्या सह त्वया । सीता हृता हनिष्ये च रावगेनाऽभियोगकृत् ॥११३॥
अर्थ: वहाँ आपने भाई लक्ष्मण और देवी - सीताके साथ मेरा लालन-पालन किया था । सीता हरी गई थी और उसमें मैं रुकावट डालनेवाला था अतः रावणके द्वारा मारा गया था ॥११३॥
यश्च कर्णेजपः शोकविह्वलेन त्वया प्रभो । दापिष्यते नमस्कारः पञ्चसत्पूरुषाश्रितः ॥११४॥
अर्थ: हे प्रभो ! उस समय शोकसे विह्वल होकर आपने मेरे कानमें पञ्च परमेष्ठियोंसे सम्बन्ध रखने वाला पञ्च नमस्कार मन्त्रका जाप दिलाया था ॥११४॥
सोऽहं भवत्प्रसादेन समारोहं त्रिविष्टपम् । तथाविधं परित्यज्य दुःखं तिर्यग्भवोद्भवम् ॥११५॥
अर्थ: मैं वही जटायु, आपके प्रसादसे उस प्रकारके तिर्यञ्च गति सम्बन्धी दुःखका परित्याग कर स्वर्गमें उत्पन्न हुआ था ॥११५॥
सुरसौख्यैर्महोदारैर्मोहितेन मया गुरो । अविज्ञेन हि न ज्ञाता तवासाता गतेयती ॥११६॥
अर्थ: हे गुरो ! देवोंके अत्यन्त उदार महासुखोंसे मोहित होकर मुझ अज्ञानीने नहीं जाना कि आपपर इतनी विपत्ति आई है ॥११६॥
अवसानेऽधुना देव त्वत्कर्मकृतचेतनः । किञ्चित्किल प्रतीकारं समनुष्ठातुमागतः ॥११७॥
अर्थ: हे देव ! जब आपकी विपत्तिका अन्त आया तब आपके कर्मोदयने मुझे इस ओर ध्यान दिलाया और कुछ प्रतीकार करनेके लिए आया हूँ ॥११७॥
ऊचे कृतान्तदेवोऽपि गत्वा किञ्चित् सुवेषताम् । सोऽहं नाथ कृतान्ताख्यः सेनानीरभवं तव ॥११८॥
अर्थ: तदनन्तर कृतान्तवक्त्रका जीव भी कुछ अच्छा-सा वेष धारणकर बोला कि हे नाथ ! मैं आपका कृतान्तवक्त्र सेनापति था ॥११८॥
स्मर्त्तव्योऽसि त्वया कृच्छ्रे इति बुद्ध्वोदितं त्वया । विधातुं तदहं स्वामिन् भवदन्तिकमागतः ॥११९॥
अर्थ: आपने कहा था कि ‘कष्टके समय मेरा स्मरण रखना’ सो हे स्वामिन् ! आपका वही आदेश बुद्धिगतकर आपके समीप आया हूँ ॥११९॥
विलोक्य वैबुधीमृद्धिं भूतभोगचरा जनाः । परमं विस्मयं प्राप्ता बभूवुर्विमलाशयाः ॥१२०॥
अर्थ: उस समय देवोंकी उस ऋद्धिको देख भोगी मनुष्य परम आश्चर्यको प्राप्त होते हुए निर्मलचित्त हो गये ॥१२०॥
रामो जगाद सेनान्यमप्रमेयं सुरेशिनाम् । उदसीसरतां भद्रौ प्रत्यनीकस्थितात्मनाम् ॥१२१॥
अर्थ: तदनन्तर रामने कृतान्तवक्त्र सेनापति तथा देवोंके अधिपति जटायुके जीवोंसे कहा कि अहो भद्र पुरुषो ! तुम दोनों विपत्तिग्रस्त जीवोंका उद्धार करनेवाले हो ॥१२१॥
तौ युवामागतौ नाकान्मां प्रबोधयितुं सुरौ । महाप्रभावसम्पन्नावत्यन्तशुद्धमानसौ ॥१२२॥
अर्थ: देखो, महाप्रभावसे सम्पन्न एवं अत्यन्त शुद्ध हृदयके धारक तुम दोनों देव मुझे प्रबुद्ध करनेके लिए स्वर्गसे यहाँ आये ॥१२२॥
इति सम्भाष्य तौ रामो निष्क्रान्तः शोकसङ्कटात् । सरयूरोधसंवृत्या लक्ष्मणं समिधीकरत् ॥१२३॥
अर्थ: इस प्रकार उन दोनोंसे वार्तालाप कर शोकरूपी संकटसे पार हुए रामने सरयू नदीके तटपर लक्ष्मणका दाह संस्कार किया ॥१२३॥
परं विबुद्धभावश्च विषादपरिवर्जितः । जगाद धर्ममर्यादापालनार्थमिदं वचः ॥१२४॥
अर्थ: तदनन्तर वैराग्यपूर्ण हृदयके धारक विषादरहित रामने धर्म-मर्यादाकी रक्षा करनेवाले निम्नाङ्कित वचन शत्रुघ्नसे कहे ॥१२४॥
शत्रुघ्न राज्यं कुरु मर्त्यलोके तपोवनं सम्प्रविशाम्यहं तु । सर्वस्पृहादूरितमानसात्मा पदं समाराधयितुं जिनानाम् ॥१२५॥
अर्थ: उन्होंने कहा कि हे शत्रुघ्न ! तुम मनुष्यलोकका राज्य करो । सब प्रकारकी इच्छाओंसे जिसका मन और आत्मा दूर हो गई है ऐसा मैं मुक्ति पदकी आराधना करनेके लिए तपोवनमें प्रवेश करता हूँ ॥१२५॥
रागादहं नो खलु भोगलुब्धः मनस्तु निःसङ्गसमाधिराज्ये । समाश्रयिष्यामि तदेव देव त्वया समं नास्ति गतिर्ममान्या ॥१२६॥
अर्थ: इसके उत्तरमें शत्रुघ्नने कहा कि देव ! मैं रागके कारण भोगोंमें लुब्ध नहीं हूँ । मेरा मन निर्ग्रन्थ समाधिरूपी राज्यमें लग रहा है इसलिए मैं आपके साथ उसी निर्ग्रन्थ समाधि रूप राज्यको प्राप्त करूँगा । इसके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है ॥१२६॥
कामोपभोगेषु मनोहरेषु सुहृत्सु सम्बन्धिषु बान्धवेषु । वस्तुष्वभीष्टेषु च जीवितेषु कस्यास्ति तृप्तिर्नृरवे भवेऽस्मिन् ॥१२७॥
अर्थ: हे नरसूर्य ! इस संसारमें मनको हरण करनेवाले कामोपभोगोंमें, मित्रोंमें, सम्बन्धियोंमें, भाई-बान्धवोंमें, अभीष्ट वस्तुओंमें तथा स्वयं अपने आपके जीवनमें किसे तृप्ति हुई है ? ॥१२७॥
इत्यार्षे पद्मपुराणे श्रीरविषेणाचार्यप्रणीते लक्ष्मणसंस्कारकरणं कल्याणमित्रदेवाभिगमाभिधानं नामाष्टादशोत्तरशतं पर्व ॥११८॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य प्रणीत पद्मपुराणमें लक्ष्मणके संस्कारका वर्णन करनेवाला एक सौ अठारहवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥११८॥
११९. एकोनविंशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाऽऽचार्यप्रणीते बलदेवनिष्क्रमणाभिधानं)
ततस्य वचनं श्रुत्वा हितमत्यन्तनिश्चितम् । मनसा क्षणमालोच्य सर्वकर्त्तव्यदक्षिणम् ॥१॥
विलोक्याऽऽसीनमासन्नमनङ्गलवणात्मजम् । क्षितीश्वरपदं तस्मै ददौ स परमर्द्धिकम् ॥२॥
अर्थ: अथानन्तर शत्रुघ्नके हितकारी और दृढ़ निश्चयपूर्ण वचन सुनकर राम क्षणभरके लिए विचारमें पड़ गये । तदनन्तर मनसे विचार कर अनङ्गलवणके पुत्रको समीपमें बैठा देख उन्होंने उसीके लिए परम ऋद्धिसे युक्त राज्यपद प्रदान किया ॥१-२॥
अनन्तलवणः सोऽपि पितृतुल्यगुणक्रियः । प्रणताऽखिलसामन्तो जातः कुलधुरावहः ॥३॥
अर्थ: जो पिताके समान गुण और क्रियाओंसे युक्त था, तथा जिसे समस्त सामन्त प्रणाम करते थे ऐसा वह अनन्तलवण भी कुलका भार उठानेवाला हुआ ॥३॥
परं प्रतिष्ठितः सोऽयमनुरागप्रतापवान् । धरणीमङ्गलं सर्वमापच्च विजयो यथा ॥४॥
अर्थ: परम प्रतिष्ठाको प्राप्त एवं उत्कट अनुराग और प्रतापको धारण करनेवाले अनन्तलवणने विजय बलभद्रके समान पृथिवीतलके समस्त मङ्गल प्राप्त किये ॥४॥
सुभूषणाय पुत्राय लङ्काराज्यं विभीषणः । सुग्रीवोऽपि निजं राज्यमङ्गदाङ्गभुवे ददौ ॥५॥
अर्थ: विभीषणने लंकाका राज्य अपने पुत्र सुभूषणके लिए दिया और सुग्रीवने भी अपना राज्य अङ्गदके पुत्रके लिए प्रदान किया ॥५॥
ततो दाशरथी रामः सविषान्नमिवेक्षितम् । कलत्रमिव चागस्वि राज्यं भरतवज्जहौ ॥६॥
अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार पहले भरतने राज्य छोड़ दिया था उसी प्रकार रामने राज्यको विष मिले अन्नके समान अथवा अपराधी स्त्रीके समान देखकर छोड़ दिया ॥६॥
एकं निःश्रेयसस्याङ्गं देवासुरनमस्कृतम् । साधकैर्मुनिभिर्जुष्टं सममानगुणोदितम् ॥७॥
जन्ममृत्युपरित्रस्तः श्लथकर्मकलङ्कभृत् । विधिमार्गं वृणोति स्म मुनिसुव्रतदेशितम् । ॥८॥
अर्थ: जो जन्म-मरणसे भयभीत थे तथा जो शिथिलीभूत कर्म कलङ्कको धारणकर रहे थे ऐसे श्रीरामने भगवान् मुनिसुव्रतनाथके द्वारा प्रदर्शित आत्म-कल्याणका एक वही मार्ग चुना जो कि मोक्षका कारण था, सुर-असुरोंके द्वारा नमस्कृत था, साधक मुनियोंके द्वारा सेवित था तथा जिसमें माध्यस्थ्य भाव रूप गुणका उदय होता था ॥७-८॥
बोधिं सम्प्राप्य काकुत्स्थः क्लेशभावविनिर्गतः । अदीपिष्टाधिकं मेघव्रजनिःसृतभानुवत् ॥९॥
अर्थ: बोधिको पाकर क्लेश भावसे निकले राम, मेघ-मण्डलसे निर्गत सूर्यके समान अत्यधिक देदीप्यमान हो रहे थे ॥९॥
अथार्हद्दासनामानं श्रेष्ठिनं द्रष्टुमागतम् । कुशलं सर्वसङ्घस्य पप्रच्छेह सदःस्थितः ॥१०॥
अर्थ: अथानन्तर राम सभामें विराजमान थे उसी समय अर्हद्दास नामका एक सेठ उनके दर्शन करनेके लिए आया था, सो रामने उससे समस्त मुनिसंघकी कुशल पूछी ॥१०॥
उवाच स महाराज व्यसनेन तवाऽमुना । व्यथनं परमं प्राप्ता यतयोऽपि महीतले ॥११॥
अर्थ: सेठने उत्तर दिया कि हे महाराज ! आपके इस कष्टसे पृथिवीतलपर मुनि भी परम व्यथाको प्राप्त हुए हैं ॥११॥
अवबुध्य विबन्धात्मा किल व्योमचरो मुनिः । सुव्रतो भगवान् प्राप मुनिसुव्रतवंशभृत् ॥१२॥
अर्थ: उसी समय मुनिसुव्रत भगवान्की वंश-परम्पराको धारण करनेवाले निर्बन्ध आत्माके धारक, आकाशगामी भगवान् सुव्रत नामक मुनि रामकी दशा जान वहाँ आये ॥१२॥
इति श्रुत्वा महामोदप्रजातपुलकोद्गमः । विस्तारिलोचनः श्रीमान् सम्प्रतस्थेऽन्तिकं यतेः ॥१३॥
अर्थ: मुनि आये हैं यह सुन अत्यधिक हर्षके कारण जिन्हें रोमाञ्च निकल आये थे तथा जिनके नेत्र फूल गये थे ऐसे श्रीराम मुनिके समीप गये ॥१३॥
भूखेचरमहाराजैः सेव्यमानो महोदयः । विजयः स्वर्णकुम्भं वा सुभक्तियुतमागमत् ॥१४॥
गुणप्रवरनिर्ग्रन्थसहस्रकृतपूजनम् । प्रणनामोपसृत्यैव शिरसा रचिताञ्जलिः ॥१५॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि जिस प्रकार पहले विजय बलभद्र स्वर्ण कुम्भ नामक मुनिराज के समीप गये थे उसी प्रकार भूमिगोचरी तथा विद्याधर राजाओंके द्वारा सेवित एवं महाभ्युदयके धारक राम सुभक्तिके साथ सुव्रत मुनिके पास पहुँचे । गुणोंके श्रेष्ठ हजारों निर्ग्रन्थ जिनकी पूजा कर रहे थे ऐसे उन मुनिके पास जाकर रामने हाथ जोड़ शिरसे नमस्कार किया ॥१४-१५॥
दृष्ट्वा स तं महात्मानं मुक्तिकारणमुत्तमम् । जज्ञे निमग्नमात्मानममृतस्येव सागरे ॥१६॥
अर्थ: मुक्तिके कारणभूत उन उत्तम महात्माके दर्शन कर रामने अपने आपको ऐसा जाना मानो अमृतके सागरमें ही निमग्न होगया होऊँ ॥१६॥
अविधं महिमानं च परं श्रद्धातिपूरितः । पूर्वं यथा महापद्मः सुव्रतस्येव योगिनः ॥१७॥
अर्थ: जिस प्रकार पहले महापद्म चक्रवर्तीने मुनिसुव्रत भगवान् की परम महिमा की थी उसी प्रकार श्रद्धासे भरे श्रीमान् रामने उन सुव्रत नामक मुनिराजकी परम महिमा की ॥१७॥
सर्वादरार्थितात्मानो विहायश्चरणा अपि । ध्वजतोरणवृत्तार्घसङ्गीतर्द्धीर्व्यधुः परम् ॥१८॥
अर्थ: सब प्रकारके आदर करनेमें योग देने वाले विद्याधरोंने भी ध्वजा तोरण अर्घदान तथा संगीत आदिकी उत्कृष्ट व्यवस्था की थी ॥१८॥
त्रियामायामतीतायां भास्करेऽभिनिवेदिते । प्रणम्य राघवः साधून् वव्रे निर्ग्रन्थदीक्षणम् ॥१९॥
अर्थ: तदनन्तर रात व्यतीत होनेपर जब सूर्योदय हो चुका तब रामने मुनियोंको नमस्कार कर निर्ग्रन्थ दीक्षा देनेकी प्रार्थना की ॥१९॥
विधूतकल्मषस्त्यक्तरागद्वेषो यथाविधि । प्रसादात्तव योगीन्द्र विहर्तु महमुन्मनाः ॥२०॥
अर्थ: उन्होंने कहा कि हे योगिराज ! जिसके समस्त पाप दूर होगये हैं तथा राग-द्वेषका परिहार हो चुका है ऐसा मैं आपके प्रसादसे विधिपूर्वक विहार करनेके लिए उत्कण्ठित हूँ ॥२०॥
अवोचत गणाधीशः परमं नृप साम्प्रतम् । किमनेन समस्तेन विनाशित्वावसादिना ॥२१॥
अर्थ: इसके उत्तरमें मुनिसंघके स्वामीने कहा कि हे राजन् ! तुमने बहुत अच्छा विचार किया, विनाशसे नष्ट हो जाने वाले इस समस्त परिकरसे क्या प्रयोजन है ? ॥२१॥
सनातननिराबाधपरातिशयसौख्यदम् । मनीषितं परं युक्तं जिनधर्मं वगाहितुम् ॥२२॥
अर्थ: सनातन, निराबाध तथा उत्तम अतिशयसे युक्त सुखको देने वाले जिनधर्ममें अवगाहन करनेकी जो तुम्हारी भावना है वह बहुत उत्तम है ॥२२॥
एवं प्रभाषिते साधौ विरागी भववस्तुनि । दत्तं प्रदक्षिणं चक्रे मुनेर्मेरौ यथा रविः ॥२३॥
अर्थ: मुनिराजके इस प्रकार कहनेपर संसारकी वस्तुओंमें विराग रखनेवाले रामने उन्हें उस प्रकार प्रदक्षिणा दी जिस प्रकार कि सूर्य सुमेरु पर्वतकी देता है ॥२३॥
समुत्पन्नमहाबोधिः महासंवेगकङ्कटः । बद्धकक्षो महाधृत्या कर्माणि क्षपणोद्यतः ॥२४॥
आशापाशं समुच्छिद्य निर्दह्य स्नेहपञ्जरम् । भित्त्वा कलत्रहिञ्जीरं मोहदर्पं निहत्य च ॥२५॥
आहारं कुण्डलं मौलिमपनीयाम्बरं तथा । परमार्थार्पितस्वान्तस्तनुलग्नमलावलिः ॥२६॥
श्वेताब्जसुकुमाराभिरङ्गुलीभिः शिरोरुहान् । निराचकार काकुत्स्थः पर्यङ्कासनमास्थितः ॥२७॥
अर्थ: जिन्हें महाबोधि उत्पन्न हुई थी, जो महासंवेग रूपी कवचको धारण कर रहे थे और जो कमर कसकर बड़े धैर्यके साथ कर्मोंका क्षय करनेके लिए उद्यत हुए थे ऐसे श्री राम आशारूपी पाशको छोड़कर, स्नेहरूपी पिजड़ेको जलाकर, स्त्री रूपी सांकलको तोड़कर, मोहका घमण्ड चूरकर, और आहार, कुण्डल, मुकुट तथा वस्त्रको छोड़कर पर्यङ्कासनसे विराजमान होगये । उनका हृदय परमार्थके चिन्तनमें लग रहा था, उनके शरीरपर मलका पुञ्ज लग रहा था, और उन्होंने श्वेत कमलके समान सुकुमार अंगुलियोंके द्वारा शिरके बाल ऊखाड़ कर फेंक दिये थे ॥२४-२७॥
रराज सुतरां रामस्त्यक्ताशेषपरिग्रहः । सैंहिकेयविनिर्मुक्तो हंसमण्डलविभ्रमः ॥२८॥
अर्थ: जिनका सब परिग्रह छूट गया था ऐसे राम उस समय राहुके चङ्गुलसे छूटे हुए सूर्यके समान सुशोभित हो रहे थे ॥२८॥
शीलतानिलयीभूतो गुप्तो गुप्त्याऽभिरूपया । पञ्चकं समितेः प्राप्तः पञ्चसर्वव्रतं श्रितः ॥२९॥
अर्थ: जो शीलव्रतके घर थे, उत्तम गुप्तियोंसे सुरक्षित थे , पञ्च समितियोंको प्राप्त थे और पाँच महाव्रतोंकी सेवा करते थे ॥२९॥
षट्जीवकायरक्षस्थो दण्डत्रितयसूदनः । सप्तभीतिविनिर्मुक्तः षोडशार्द्धमदार्दनः ॥३०॥
अर्थ: छह कामके जीवोंकी रक्षा करनेमें तत्पर थे, मन, वचन, कायकी प्रवृत्ति रूप तीन प्रकारके दण्डको नष्ट करने वाले थे, सप्त भयसे रहित थे, आठ प्रकारके मदको नष्ट करने वाले थे ॥३०॥
श्रीवत्सभूषितोरस्को गुणभूषणमानसः । जातः सुश्रमणः पद्मो मुक्तितत्त्वविधौ दृढः ॥३१॥
अर्थ: जिनका वक्षस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे अलंकृत था, गुणरूपी आभूषणोंके धारण करनेमें जिनका मन लगा था और जो मुक्तिरूपी तत्त्वके प्राप्त करनेमें सुदृढ़ थे ऐसे राम उत्तम श्रमण होगये ॥३१॥
अदृष्टविग्रहैर्देवैराजघ्ने सुरदुन्दुभिः । दिव्यप्रसूनवृष्टिश्च विविक्तैर्भक्तितत्परैः ॥३२॥
अर्थ: जिनका शरीर दिख नहीं रहा था ऐसे देवोंने देवदुन्दुभि बजाई, तथा भक्ति प्रकट करनेमें तत्पर पवित्र भावनाके धारक देवोंने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की ॥३२॥
निष्कामति तदा रामे गृहिभावोरुकल्मषात् । चक्रे कल्याणमित्राभ्यां देवाभ्यां परमोत्सवः ॥३३॥
अर्थ: उस समय श्री रामके गृहस्थावस्था रूपी महापापसे निष्क्रान्त होनेपर कल्याणकारी मित्र - कृतान्तवक्त्र और जटायुके जीवरूप देवोंने महान् उत्सव किया ॥३३॥
भूदेवे तत्र निष्क्रान्ते सनृपा भूवियच्चराः । चिन्तान्तरमिदं जग्मुर्विस्मयव्याप्तमानसाः ॥३४॥
विभूतिरत्नमीदृक्षं यत्र त्यक्त्वाऽतिदुस्त्यजम् । देवैरपि कृतस्वार्थो रामदेवोऽभवन्मुनिः ॥३५॥
तत्रास्माकं परित्याज्यं किमिवास्ति प्रलोभकम् । तिष्ठामः केवलं येन व्रतेच्छाविकलात्मकाः ॥३६॥
अर्थ: वहाँ श्री रामके दीक्षित होनेपर राजाओं सहित समस्त भूमिगोचरी और विद्याधर आश्चर्यसे चकितचित्त हो इस प्रकार विचार करने लगे कि देवोंने भी जिनका कल्याण किया ऐसे राम देव जहाँ इस प्रकारकी दुस्त्यज विभूतिको छोड़कर मुनि हो गये वहाँ हम लोगोंके पास छोड़नेके योग्य प्रलोभन है ही क्या ? जिसके कारण हम व्रतकी इच्छासे रहित हैं ॥३४-३६॥
एवमादि परिध्याय कृत्वान्तःपरिदेवनम् । संवेगिनो निराक्रान्ता बहवो गृहबन्धनात् ॥३७॥
अर्थ: इस प्रकार विचारकर तथा हृदयमें अपनी आसक्तिपर दुःख प्रकटकर संवेगसे भरे अनेकों लोग घरके बन्धनसे निकल भागे ॥३७॥
छित्त्वा रागमयं पाशं निहत्य द्वेषवैरिणम् । सर्वसङ्गविनिर्मुक्तः शत्रुघ्नः श्रमणोऽभवत् ॥३८॥
अर्थ: शत्रुघ्न भी रागरूपी पाशको छेदकर, द्वेषरूपी वैरीको नष्टकर तथा समस्त परिग्रहसे निर्मुक्त हो श्रमण हो गया ॥३८॥
विभीषणोऽथ सुग्रीवो नीलश्चन्द्रनखो नलः । क्रव्यो विराधिताद्याश्च निरीयुः खेचरेश्वराः ॥३९॥
अर्थ: तदनन्तर विभीषण, सुग्रीव, नील, चन्द्रनख, नल, क्रव्य तथा विराधित आदि अनेक विद्याधर राजा भी बाहर निकले ॥३९॥
विद्याभृतां परित्यज्य विद्यां प्राव्राज्यमीयुषाम् । केषाञ्चिच्चारणी लब्धिर्भूयोजन्माऽभवत्पुनः ॥४०॥
अर्थ: जिन विद्याधरोंने विद्याका परि- त्यागकर दीक्षा धारण की थी उनमेंसे कितने ही लोगोंको पुनः चारणऋद्धि उत्पन्न हो गई थी ॥४०॥
एवं श्रीमति निष्क्रान्ते रामे जातानि षोडश । श्रमणानां सहस्राणि साधिकानि महीपते ॥४१॥
सप्तविंशसहस्राणि प्रधानवरयोषिताम् । श्रीमतीश्रमणीपार्श्वे बभूवुः परमार्यिकाः ॥४२॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! उस समय रामके दीक्षा लेनेपर कुल अधिक सोलह हजार साधु हुए और सत्ताईस हजार प्रमुख प्रमुख स्त्रियाँ श्रीमती नामक साध्वीके पास आर्यिका हुईं ॥४१-४२॥
अथ पद्माभनिर्ग्रन्थो गुरोः प्राप्यानुमोदनम् । एकाकी विहतद्वन्द्वो विहारं प्रतिपन्नवान् ॥४३॥
अर्थ: अथानन्तर गुरुकी आज्ञा पाकर श्रीराम’निर्ग्रन्थ मुनि, सुख-दुःखादिके द्वन्द्वको दूरकर एकाकी विहारको प्राप्त हुए ॥४३॥
गिरिगह्वरदेशेषु भीमेषु क्षुब्धचेतसाम् । क्रूरश्वापदशब्देषु रात्रौ वासमसेवत ॥४४॥
अर्थ: वे रात्रिके समय पहाड़ोंकी उन गुफाओंमें निवास करते थे जो चञ्चल चित्त मनुष्योंके लिए भय उत्पन्न करनेवाले थे तथा जहाँ क्रूर हिंसक जन्तुओंके शब्द व्याप्त हो रहे थे ॥४४॥
गृहीतोत्तमयोगस्य विधिसद्भावसङ्गिनः । तस्यामेवास्य शर्वर्यामवधिज्ञानमुद्गतम् ॥४५॥
अर्थ: उत्तम योगके धारक एवं योग्य विधिका पालन करनेवाले उन मुनिको उसी रातमें अवधिज्ञान उत्पन्न हो गया ॥४५॥
आलोकत यथाऽवस्थं रूपि येनाखिलं जगत् । यथा पाणितलन्यस्तं विमलं स्फटिकोपलम् ॥४६॥
अर्थ: उस अवधिज्ञानके प्रभावसे वे समस्त रूपी जगत्को हथेलीपर रखे हुए निर्मल स्फटिकके समान ज्यों-का-त्यों देखने लगे ॥४६॥
ततो विदितमेतेनापरतो लक्ष्मणो यथा । विक्रियां तु मनो नास्य गतं विच्छिन्नबन्धनम् ॥४७॥
अर्थ: उस अवधिज्ञानके द्वारा उन्होंने यह भी जान लिया कि लक्ष्मण परभवमें कहाँ गया परन्तु यतश्च उनका मन सब प्रकारके बन्धन तोड़ चुका था इसलिए विकारको प्राप्त नहीं हुआ ॥४७॥
समा शतं कुमारत्वे मण्डलित्वे शतत्रयम् । चत्वारिंशच्च विजये यस्य संवत्सरा मताः ॥४८॥
अर्थ: वे सोचने लगे कि देखो, जिसके सौ वर्ष कुमार अवस्थामें, तीन सौ वर्ष मण्डलेश्वर अवस्थामें और चालीस वर्ष दिग्विजयमें व्यतीत हुए ॥४८॥
एकादशसहस्राणि तथा पञ्चशतानि च । अब्दानां षष्टिरन्या च साम्राज्यं येन सेवितम् ॥४९॥
अर्थ: जिसने ग्यारह हजार पाँच सौ साठ वर्ष तक साम्राज्य पदका सेवन किया ॥४९॥
योऽसौ वर्षसहस्राणि प्राप्य द्वादश भोगिताम् । ऊनानि पञ्चविंशत्या वितृप्तिरवरं गतः ॥५०॥
अर्थ: और जिसने पच्चीस कम बारह हजार वर्ष भोगीपना प्राप्तकर व्यतीत किये वह लक्ष्मण अन्तमें भोगोंसे तृप्त न होकर नीचे गया ॥५०॥
देवयोस्तत्र नो दोषः सर्वाकारेण विद्यते । तथा हि प्राप्तकालोऽयं भ्रातृमृत्युव्यपदेशतः ॥५१॥
अर्थ: लक्ष्मणके मरणमें उन दोनों देवोंका कोई दोष नहीं है, यथार्थमें भाईकी मृत्युके बहाने उसका वह काल ही आ पहुँचा था ॥५१॥
अनेकं मम तस्यापि विविधं जन्म तद्गतम् । वसुदत्तादिकं मोहपरायत्तितचेतसः ॥५२॥
अर्थ: जिसका चित्त मोहके अधीन था ऐसे मेरे तथा उसके वसुदत्तको आदि लेकर अनेक प्रकारके नाना जन्म साथ-साथ बीत चुके हैं ॥५२॥
एवं सर्वमतिक्रान्तमज्ञासीत् पद्मसंयतः । धैर्यमत्युत्तमं बिभ्रद्व्रतशीलधराधरः ॥५३॥
अर्थ: इस प्रकार व्रत और शीलके पर्वत तथा उत्तम धैर्यको धारण करनेवाले पद्ममुनिने समस्त बीती बात जान ली ॥५३॥
परया लेश्यया युक्तो गम्भीरो गुणसागरः । बभूव स महाचेताः सिद्धिलक्ष्मीपरायणः ॥५४॥
अर्थ: वे पद्ममुनि उत्तम लेश्यासे युक्त, गम्भीर, गुणोंके सागर, उदार हृदय एवं मुक्ति रूपी लक्ष्मीके प्राप्त करनेमें तत्पर थे ॥५४॥
युष्मानपि वदाम्यस्मिन् सर्वानिह समागतान् । रमध्वं तत्र सन्मार्गे रतो यत्र रघूत्तमः ॥५५॥
अर्थ: गौतमस्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! मैं यहाँ आये हुए तुम सब लोगोंसे भी कहता हूँ कि तुम लोग उसी मार्गमें रमण करो जिसमें कि रघूत्तम - राममुनि रमण करते थे ॥५५॥
जैने शक्त्या च भक्त्या च शासने सङ्गतत्पराः । जना बिभ्रति लभ्यार्थं जन्म मुक्तिपदान्तिकम् ॥५६॥
अर्थ: जिन-शासनमें शक्ति और भक्तिपूर्वक प्रवृत्त रहनेवाले मनुष्य, जिस समस्त प्रयोजनकी प्राप्ति होती है ऐसे मुक्तिपदके निकटवर्ती जन्मको प्राप्त होते हैं ॥५६॥
जिनाक्षरमहारत्ननिधानं प्राप्य भो जनाः । कुलिङ्गसमयं सर्वं परित्यजत दुःखदम् ॥५७॥
अर्थ: हे भव्य जनो ! तुम सब जिनवाणी रूपी महारत्नोंके खजानेको पाकर कुलिङ्गियोंके दुःखदायी समस्त शास्त्रोंका परित्याग करो ॥५७॥
कुग्रन्थैर्मोहितात्मानः सदम्भकलुषक्रियाः । जात्यन्धा इव गच्छन्ति त्यक्त्वा कल्याणमन्यतः ॥५८॥
अर्थ: जिनकी आत्मा खोटे शास्त्रोंसे मोहित हो रही है तथा जो कपट सहित कलुषित क्रिया करते हैं ऐसे मनुष्य जन्मान्धोंकी तरह कल्याण मार्गको छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं ॥५८॥
नानोपकरणं दृष्ट्वा साधनं शक्तिवर्जिताः । निर्दोषमिति भाषित्वा गृह्णते मुखराः परे ॥५९॥
व्यर्थमेव कुलिङ्गास्ते मूढैरन्यैः पुरस्कृताः । प्रखिन्नतनवो भारं वहन्ति भृतका इव ॥६०॥
अर्थ: कितने ही शक्तिहीन बकवादी मनुष्य नाना उपकरणोंको साधन समझ ‘इनके ग्रहणमें दोष नहीं है’ ऐसा कहकर उन्हें ग्रहण करते हैं सो वे कुलिङ्गी हैं । मूर्ख मनुष्य उन्हें व्यर्थ ही आगे करते हैं वे खिन्न शरीर होते हुए बोझा ढोनेवालोंके समान भारको धारण करते हैं ॥५९-६०॥
ऋषयस्ते खलु येषां परिग्रहे नास्ति याचने वा बुद्धिः । तस्मात्ते निर्ग्रन्थाः साधुगुणैरन्विता बुधैः संसेव्याः ॥६१॥
श्रुत्वा बलदेवस्य त्यक्त्वा भोगं परं विमुक्तिग्रहणम् । भवत भवभावशिथिला व्यसनरवेस्तापमाप्नुत न पुनर्यत्नात् ॥६२॥
अर्थ: वास्तवमें ऋषि वे ही हैं जिनकी परिग्रहमें और उसको याचनामें बुद्धि नहीं है । इसलिए उत्तम गुणोंके धारक निर्मल निर्ग्रन्थ साधुओंकी ही विद्वज्जनोंकी सेवा करनी चाहिए । गौतम स्वामी कहते हैं कि हे भव्य-जनो ! इस तरह बलदेवका चरित सुनकर तथा संसारके कारणभूत समस्त उत्तम भोगोंका त्याग-कर यत्नपूर्वक संसारवर्धक भावोंसे शिथिल होओ जिससे फिर कष्टरूपी सूर्यके संतापको प्राप्त न हो सको ॥६१-६२॥
इत्यार्षे श्रीपद्मपुराणे श्रीरविषेणाऽऽचार्यप्रणीते बलदेवनिष्क्रमणाभिधानं नाम एकोनविंशोत्तरशतं पर्व ॥११९॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध तथा रविषेणाचार्य प्रणीत पद्मपुराणमें बलदेवकी दीक्षाका वर्णन करनेवाला एकसौ उन्नीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥११९॥
१२०. विंशोत्तरशतं पर्व (श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पुरसंक्षोभाभिधानं)
एवमादीन् गुणान् राजन् बलदेवस्य योगिनः । धरणोऽप्यक्षमो वक्तुं जिह्वाकोटिविकारगः ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! इस तरह योगी बलदेवके गुणोंका वर्णन करनेके लिए एक करोड़ जिह्वाओंकी विक्रिया करनेवाला धरणेन्द्र भी समर्थ नहीं है ॥१॥
उपोष्य द्वादशं सोऽथ धीरो विधिसमन्वितः । नन्दस्थलीं पुरीं भेजे पारणार्थं महातपाः ॥२॥
अर्थ: तदनन्तर पाँच दिनका उपवासकर धीर वीर महातपस्वी योगी राम पारणा करनेके लिए विधि-पूर्वक - ईर्यासमितिसे चार हाथ पृथिवी देखते हुए नन्दस्थली नगरीमें गये ॥२॥
तरुणं तरणिं दीप्त्या द्वितीयमिव भूधरम् । अन्यं दाक्षायणीनाथमगम्यमिव भास्वतः ॥३॥
वीध्रस्फटिकसंशुद्धहृदयं पुरुषोत्तमम् । मूर्त्येव सङ्गतं धर्ममनुरागं त्रिलोकगम् ॥४॥
आनन्दमिव सर्वेषां गत्वैकत्वमिव स्थितम् । महाकान्तिप्रवाहेण प्लावयन्तमिव क्षितिम् ॥५॥
धवलाम्भोजखण्डानां पूरयन्तमिवाम्बरम् । तं वीक्ष्य नगरीलोकः समस्तः क्षोभमागतः ॥६॥
अर्थ: वे राम अपनी दीप्तिसे ऐसे जान पड़ते थे मानो तरुण सूर्य ही हों, स्थिरतासे ऐसे लगते थे मानो दूसरा पर्वत ही हों, शान्त स्वभावके कारण ऐसे जान पड़ते थे मानो सूर्यके अगम्य दूसरा चन्द्रमा ही हों, उनका हृदय धवल स्फटिकके समान शुद्ध था, वे पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे, ऐसे जान पड़ते थे मानो मूर्तिधारी धर्म ही हों, अथवा तीन लोकके जीवोंका अनुराग ही हों, अथवा सब जीवोंका आनन्द एकरूपताको प्राप्त होकर स्थिति हुआ हो, वे महाकान्तिके प्रवाहसे पृथिवीको तर कर रहे थे, और आकाशको सफेद कमलोंके समूहसे पूर्ण कर रहे थे । ऐसे श्रीरामको देख नगरीके समस्त लोग क्षोभको प्राप्त हो गये ॥३-६॥
अहो चित्रमहो चित्रं भो भो पश्यत पश्यत । अदृष्टचरमीदृक्षमाकारं भुवनातिगम् ॥७॥
अर्थ: लोग परस्पर कहने लगे कि अहो ! आश्चर्य देखो, अहो आश्चर्य देखो जो पहले कभी देखनेमें नहीं आया ऐसा यह लोकोत्तर आकार देखो ॥७॥
अयं कोऽपि महोक्षेति आयातीह सुसुन्दरः । प्रलम्बदोर्युगः श्रीमानपूर्वनरमन्दरः ॥८॥
अर्थ: यह कोई अत्यन्त सुन्दर महावृषभ यहाँ आ रहा है, अथवा जिसकी दोनों लम्बी भुजाएँ नीचे लटक रही हैं ऐसा यह कोई अद्भुत मनुष्य रूपी मंदराचल है ॥८॥
अहो धैर्यमहो सत्त्वमहो रूपमहो द्युतिः । अहो कान्तिरहो शान्तिरहो मुक्तिरहो गतिः ॥९॥
अर्थ: अहो, इनका धैर्य धन्य है, सत्त्व-पराक्रम धन्य है, रूप धन्य है, कान्ति धन्य है, शान्ति धन्य है, मुक्ति धन्य है और गति धन्य है ॥९॥
कोऽयमीदृक्कुतः कस्मिन् समभ्येति मनोहरः । युगान्तरस्थिरन्यस्तशान्तदृष्टिः समाहितः ॥१०॥
अर्थ: जो एक युग प्रमाण अन्तरपर बड़ी सावधानीसे अपनी शान्तदृष्टि रखता है ऐसा यह कौन मनोहर पुरुष यहाँ कहाँसे आ रहा है ॥१०॥
उदारपुण्यमेतेन कतरन्मण्डितं कुलम् । कुर्यादनुग्रहं कस्य गृह्णानोऽन्नं सुकर्मणः ॥११॥
अर्थ: उदार पुण्यको प्राप्त हुए इसके द्वारा कौनसा कुल मण्डित हुआ है - यह किस कुलका अलंकार है ? और आहार ग्रहणकर किसपर अनुग्रह करता है ? ॥११॥
सुरेन्द्रसदृशं रूपं कुतोऽत्र भुवने परम् । अक्षोभ्यसत्त्वशैलोऽयं रामः पुरुषसत्तमः ॥१२॥
अर्थ: इस संसारमें इन्द्रके समान ऐसा दूसरा रूप कहाँ हो सकता है ? अरे ! जिनका पराक्रम रूपी पर्वत क्षोभ रहित है ऐसे ये पुरुषोत्तम राम हैं ॥१२॥
एतैत चेतसो दृष्टेर्जन्मनः कर्मणो मतेः । कुरुध्वं चरितार्थत्वं देहस्य चरितस्य च ॥१३॥
इतिदर्शनसक्तानां पौराणां पुरुविस्मयः । समाकुलः समुत्तस्थौ रमणीयः परं ध्वनिः ॥१४॥
अर्थ: आओ आओ इन्हें देखकर अपने चित्त, दृष्टि, जन्म, कर्म, बुद्धि, शरीर और चरितको सार्थक करो। इस प्रकार श्रीरामके दर्शनमें लगे हुए नगरवासी लोगोंका बहुत भारी आश्चर्यसे भरा सुन्दर कोलाहल-पूर्ण शब्द उठ खड़ा हुआ ॥१३-१४॥
प्रविष्टे नगरीं रामे यथासमयचेष्टितैः । नारीपुरुषसङ्घातै रथ्याः मार्गाः प्रपूरिताः ॥१५॥
अर्थ: तदनन्तर नगरीमें रामके प्रवेश करते ही समयानुकूल चेष्टा करनेवाले नर-नारियोंके समूहसे नगरके लम्बे-चौड़े मार्ग भर गये ॥१५॥
विचित्रभक्ष्यसम्पूर्णपात्रहस्ताः समुत्सुकाः । प्रवराः प्रमदास्तस्थुः गृहीतकरकाम्भसः ॥१६॥
अर्थ: नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंसे परिपूर्ण पात्र जिनके हाथमें थे तथा जो जलकी झारी धारण कर रही थी ऐसी उत्सुकतासे भरी अनेक उत्तम स्त्रियाँ खड़ी हो गईं ॥१६॥
दृढं परिकरं बद्ध्वा मनोज्ञजलपूरितम् । आदाय कलशं पूर्णमाजग्मुर्बहवो नराः ॥१७॥
अर्थ: अनेकों मनुष्य पूर्ण तैयारीके साथ मनोज्ञ जलसे भरे पूर्ण कलश ले-लेकर आ पहुँचे ॥१७॥
इतः स्वामिन्नितः स्वामिन् स्थीयतामिह सन्मुने । प्रसादाद्भूयतामत्र विचेरुरिति सद्गिरः ॥१८॥
अर्थ: ‘हे स्वामिन् ! यहाँ आइए, हे स्वामिन् ! यहाँ ठहरिए, हे मुनिराज ! प्रसन्नतापूर्वक यहाँ विराजिए’ इत्यादि उत्तमोत्तम शब्द चारों ओर फैल गये ॥१८॥
अमाति हृदये हर्षे हृष्टदेहरुहोऽपरे । उत्कृष्टक्ष्वेडितास्फोटसिंहनादानजीजनन् ॥१९॥
अर्थ: हृदयमें हर्षके नहीं समानेपर जिनके शरीरमें रोमाञ्च निकल रहे थे ऐसे कितने ही लोग जोर-जोरसे अस्पष्ट सिंहनाद कर रहे थे ॥१९॥
मुनीन्द्र जय वर्द्धस्व नन्द पुण्यमहीधर । एवं च पुनरुक्ताभिर्वाग्भिरापूरितं नभः ॥२०॥
अर्थ: हे मुनीन्द्र ! जय हो, हे पुण्यके पर्वत ! वृद्धिंगत होओ तथा समृद्धिमान् होओ’ इस प्रकारके पुनरुक्त वचनोंसे आकाश भर गया था ॥२०॥
अमत्रमानय क्षिप्रं स्थालमालोकय द्रुतम् । जाम्बूनदमयीं पात्रीमवलम्बितमाहर ॥२१॥
क्षीरमानीयतामिक्षुः सन्निधीक्रियतां दधि । राजते भाजने भव्ये लघु स्थापय पायसम् ॥२२॥
शर्करां कर्करां कर्कामरं कुरु करण्डके । कर्पूरपूरितां क्षिप्रं पूरकापटलं नय ॥२३॥
रसालां कलशे सारां तरसा विधिवद्धिते । मोदकान् परमोदारान् प्रमोदाद्देहि दक्षिणे ॥२४॥
एवमादिभिरालापैराकुलैः कुलयोषिताम् । पुरुषाणां च तन्मध्ये पुरमासीत्तदात्मकम् ॥२५॥
अर्थ: ‘शीघ्र ही बर्तन लाओ, स्थालको जल्दी देखो, सुवर्णकी थाली जल्दी लाओ, दूध लाओ, गन्ना लाओ, दही पासमें रक्खो, चांदीके उत्तम बर्तनमें शीघ्र ही खीर रक्खो, शीघ्र ही खड़ी शक्कर-मिश्री लाओ, इस बर्तनमें कर्पूरसे सुवासित शीतल जल भरो, शीघ्र ही पूड़ियोंका समूह लाओ, कलशमें शीघ्र ही विधिपूर्वक उत्तम शिखरिणी रखो, अरी, चतुरे ! हर्षपूर्वक उत्तम बड़े बड़े लड्डू दे’ इत्यादि कुलाङ्गनाओं और पुरुषोंके शब्दोंसे वह नगर तन्मय हो गया ॥२१-२५॥
अतिपात्यपि नो कार्यं मन्यते, नार्भका अपि । आलोक्यन्ते तदा तत्र सुमहासम्भ्रमैर्जनैः ॥२६॥
अर्थ: उस समय उस नगरमें लोग इतने संभ्रममें पड़े हुए थे कि भारी जरूरतके कार्यको भी लोभ नहीं मानते थे और न कोई बच्चोंको ही देखते थे ॥२६॥
वेगिभिः पुरुषैः कैश्चिदागच्छद्भिः सुसङ्कटे । पात्यन्ते विशिखामार्गे जना भाजनपाणयः ॥२७॥
अर्थ: सकड़ी गलियोंमें बड़े वेगसे आनेवाले कितने ही लोगोंने हाथोंमें बर्तन लेकर खड़े हुए मनुष्य गिरा दिये ॥२७॥
एवमत्युन्नतस्वान्तं कृतसम्भ्रान्तचेष्टितम् । उन्मत्तमिव संवृत्तं नगरं तत्समन्ततः ॥२८॥
अर्थ: इस प्रकार जिसमें लोगोंके हृदय अत्यन्त उन्नत थे तथा जिसमें हड़बड़ाहटके कारण विरुद्ध चेष्टाएँ की जा रही थीं ऐसा वह नगर सब ओरसे उन्मत्तके समान हो गया था ॥२८॥
कोलाहलेन लोकस्य यतस्तेन च तेजसा । आलानविपुलस्तम्भान् बभञ्जुः कुञ्जरा अपि ॥२९॥
अर्थ: लोगोंके उस भारी कोलाहल और तेजके कारण हाथियोंने भी बाँधनेके खम्भे तोड़ डाले ॥२९॥
तेषां कपोलपालीषु पालिता विपुलाश्चिरम् । प्लावयन्तः पयःपूरा गण्डश्रोत्रविनिर्गताः ॥३०॥
अर्थ: उनकी कपोल-पालियोंमें जो मदजल अधिक मात्रामें चिरकालसे सुरक्षित था वह गण्डस्थल तथा कानोंके विवरोंसे निकल-निकलकर पृथिवीको तर करने लगा ॥३०॥
उत्कर्णनेत्रमध्यस्थतारकाः कवलत्यजः । उद्ग्रीवा वाजिनस्तस्थुः कृतगम्भीरहेषिताः ॥३१॥
अर्थ: जिनके कान खड़े थे, जिनके नेत्रोंकी पुतलियाँ नेत्रोंके मध्यमें स्थित थीं, जिन्होंने घास खाना छोड़ दिया था, और जिनकी गरदन ऊपरकी ओर उठ रही थी ऐसे घोड़े गम्भीर हिनहिनाहट करते हुए भयभीत दशामें खड़े थे ॥३१॥
आकुलाध्यक्षलोकेन कृतानुगमनाः परे । चक्रुरत्याकुलं लोकं त्रस्तास्त्रुटितबन्धनाः ॥३२॥
अर्थ: जिन्होंने भयभीत होकर बन्धन तोड़ दिये थे तथा जिनके पीछे पीछे घबड़ाये हुए सईस दौड़ रहे थे ऐसे कितने ही घोड़ोंने मनुष्योंको व्याकुल कर दिया ॥३२॥
एवंविधो जनो यावदभवद्दानतत्परः । परस्परमहाक्षोभपरिपूरणचञ्चलः ॥३३॥
तावच्छ्रुत्वा घनं घोरं क्षुब्धसागरसम्मितम् । प्रासादान्तर्गतो राजा प्रतिनन्दीत्यनन्दितः ॥३४॥
सहसा क्षोभमापन्नः किमेतदिति सत्वरम् । हर्म्यमूर्द्धानमारुक्षत् परिच्छदसमन्वितः ॥३५॥
अर्थ: इस प्रकार जब तक दान देनेमें तत्पर मनुष्य पारस्परिक महाक्षोभसे चञ्चल हो रहे थे तब तक क्षुभित सागरके समान उनका घोर शब्द सुनकर महलके भीतर स्थित प्रतिनन्दी नामका राजा कुछ रुष्ट हो सहसा क्षोभको प्राप्त हुआ और ‘यह क्या है’ इस प्रकार शब्द करता हुआ परिकरके साथ शीघ्र ही महलकी छतपर चढ़ गया ॥३३-३५॥
ततः प्रधानसाधुं तं वीक्ष्य लोकविशेषकम् । कलङ्कपङ्कनिर्मुक्तशशाङ्कधवलच्छविम् ॥३६॥
आज्ञापयद् बहून् वीरान् यथैनं मुनिसत्तमम् । व्यतिपत्य द्रुतं प्रीत्या परिप्रापयतात्र मे ॥३७॥
अर्थ: तदनन्तर महलकी छतसे लोगोंके तिलक और कलंक रूपी पङ्कसे रहित चन्द्रमाके समान धवल कान्तिके धारक उन प्रधान साधुको देखकर राजाने बहुतसे वीरोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही जाकर तथा प्रीतिपूर्वक नमस्कार कर इन उत्तम मुनिराजको यहाँ मेरे पास लेआओ ॥३६-३७॥
यदाज्ञापयति स्वामीत्युक्त्वा प्रव्रजितास्ततः । राजमानवसिंहास्ते समुत्सारितजन्तवः ॥३८॥
अर्थ: ‘स्वामी जो आज्ञा करें’ इस प्रकार कह कर राजाके प्रधान पुरुष, लोगोंकी भीड़को चीरते हुए उनके पास गये ॥३८॥
गत्वा व्यज्ञापयन्नेवं मस्तकन्यस्तपाणयः । मुनिं मधुरवाणीकास्तत्कान्तिहृतचेतसः ॥३९॥
अर्थ: और वहाँ जाकर हाथ जोड़ मस्तकसे लगा मधुर वाणीसे युक्त और उनकी कान्तिसे हृत चित्त होते हुए इस प्रकार निवेदन करने लगे कि ॥३९॥
भगवन्नीप्सितं वस्तु गृहाणेत्यस्मदीश्वरः । विज्ञापयति भक्त्या त्वां सदनं तस्य गम्यताम् ॥४०॥
अर्थ: हे भगवन् ! इच्छित वस्तु ग्रहण कीजिए’ इस प्रकार हमारे स्वामी भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं सो उनके घर पधारिए ॥४०॥
अपथ्येन विवर्णेन विरसेन रसेन च । पृथग्जनप्रणीतेन किमनेन तवान्धसा ॥४१॥
अर्थ: अन्य साधारण मनुष्योंके द्वारा निर्मित अपथ्य, विवर्ण और विरस भोजनसे आपको क्या प्रयोजन है ॥४१॥
एह्यागच्छ महासाधो प्रसादं कुरु याचितः । अन्नं यथेप्सितं स्वैरमुपभुङ्क्ष्व निराकुलम् ॥४२॥
अर्थ: हे महासाधो ! आओ प्रसन्नता करो, और इच्छानुसार निराकुलता पूर्वक अभिलषित आहार ग्रहण करो ॥४२॥
इत्युक्त्वा दातुमुद्युक्ता भिक्षां प्रवरयोषितः । विषण्णचेतसो राजपुरुषैरपसारिताः ॥४३॥
अर्थ: ऐसा कहकर भिक्षा देनेके लिए उद्यत उत्तम स्त्रियोंको राजाके सिपाहियोंने दूर हटा दिया जिससे उनके चित्त विषाद युक्त हो गये ॥४३॥
उपचारप्रकारेण जातं ज्ञात्वान्तरायकम् । राजपौरान्नतः साधुः सर्वतोऽभूत्पराङ्मुखः ॥४४॥
अर्थ: इस तरह उपचारकी विधिसे उत्पन्न हुआ अन्तराय जानकर मुनिराज, राजा तथा नगरवासी दोनोंके अन्नसे विमुख होगये ॥४४॥
नगर्यास्तत्र निर्याति यतावतियतात्मनि । पूर्वस्मादपि सञ्जातः सङ्क्षोभः परमो जने ॥४५॥
अर्थ: तदनन्तर अत्यन्त यत्नाचार पूर्वक प्रवृत्ति करने वाले मुनिराज जब नगरीसे वापिस लौट गये तब लोगोंमें पहलेकी अपेक्षा अत्यधिक क्षोभ होगया ॥४५॥
उत्कण्ठाकुलहृदयं कृत्वा लोकं समस्तमस्तसुखः । गत्वा श्रमणोऽरण्यं गहनं नक्तं समाचचार प्रतिमाम् ॥४६॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जिन्होंने इन्द्रिय सम्बन्धी सुखका त्याग कर दिया था ऐसे मुनिराजने समस्त मनुष्योंको उत्कण्ठासे व्याकुलहृदय कर सघन वनमें चले गये और वहाँ उन्होंने रात्रि भरके लिए प्रतिमा योग धारण कर लिया अर्थात् सारी रात कायोत्सर्गसे खड़े रहे ॥४६॥
दृष्ट्वा तथाविधं तं पुरुषरविं चारुचेष्टितं नयनहरम् । जाते पुनर्वियोगे तिर्यञ्चोऽप्युत्तमामधृतिमाजग्मुः ॥४७॥
अर्थ: सुन्दर चेष्टाओंके धारक नेत्रोंको हरण करने वाले तथा पुरुषोंमें सूर्य समान उन वैसे मुनिराजको देखनेके बाद जब पुनः वियोग होता था तब तिर्यञ्च भी अत्यधिक अधीरताको प्राप्त हो जाते थे ॥४७॥
इत्यार्षे पद्मपुराणे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पुरसंक्षोभाभिधानं नाम विंशोत्तरशतं पर्व ॥१२०॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध श्री रविषेणाचार्य द्वारा प्रणीत पद्मपुराणमें नगरके क्षोभका वर्णन करने वाला एकसौ बीसवां पर्व समाप्त हुआ ॥१२०॥
१२१. एकविंशोत्तरशतं पर्व (दानप्रसङ्गाभिधानं)
अथ द्वादशमादाय द्वितीयं मुनिपुङ्गवः । सहिष्णुरितरागम्यं चकार समवग्रहम् ॥१॥
अस्मिन् मृगकुलाकीर्णे वने या मम जायते । भिक्षा तामेव गृह्णामि सन्निवेशं विशामि न ॥२॥
अर्थ: अथानन्तर कष्ट सहन करने वाले, मुनिश्रेष्ठ श्री रामने पाँच दिनका दूसरा उपवास लेकर यह अवग्रह किया कि मृग समूहसे भरे हुए इस वनमें मुझे जो भिक्षा प्राप्त होगी उसे ही मैं ग्रहण करूँगा - भिक्षाके लिए नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥१-२॥
इति तत्र समारूढे मुनौ घोरमुपग्रहम् । दुष्टाश्वेन हृतो राजा प्रतिनन्दी प्रसूतिना ॥३॥
अर्थ: इस प्रकार कठिन अवग्रह लेकर जब मुनिराज वनमें विराजमान थे तब एक प्रतिनन्दी नामका राजा दुष्ट घोड़ेके द्वारा हरा गया ॥३॥
अन्विष्यन्ती जनौघेभ्यो हृतिमार्ग समाकुला । स्थूरीपृष्ठसमारूढा महिषी प्रभवाह्वया ॥४॥
किं भवेदिति भूयिष्ठं चिन्तयन्ती त्वरावती । प्रातिष्ठतानुमार्गेण भटचक्रसमन्विता ॥५॥
अर्थ: तदनन्तर उसकी प्रभवा नामकी रानी शोकातुर हो मनुष्योंके समूहसे हरणका मार्ग खोजती हुई घोड़ेपर चढ़कर निकली । अनेक योधाओंका समूह उसके साथ था । ‘क्या होगा ? कैसे राजाका पता चलेगा ?’ इस प्रकार अत्यधिक चिन्ता करती हुई वह बड़े वेगसे उसी मार्गसे निकली ॥४-५॥
ह्रियमाणस्य भूपस्य सरः संवृत्तमन्तरे । तत्र पङ्के ययुर्मग्नः कलत्र इव गेहिकः ॥६॥
अर्थ: हरे जानेवाले राजाके बीचमें एक तालाब पड़ा सो वह दुष्ट अश्व उस तालाबकी कीचड़में उस तरह फँस गया जिस तरह कि गृहस्थ स्त्रीमें फँस रहता है ॥६॥
ततः प्राप्ता वरारोहा वीक्ष्य पद्मादिमत्सरः । किञ्चित्स्मिताननाऽवोचत्साध्वेवाश्वो नृपाव्यधात् ।
अर्थ: तदनन्तर सुन्दरी रानी, वहाँ पहुँचकर और कमल आदिसे युक्त सरोवरको देखकर कुछ मुसकराती हुई बोली कि राजन् ! घोड़ाने अच्छा ही किया ॥७॥
अपाहरिष्यथ नो चेदद्रक्ष्यत ततः कुतः । सरो नन्दनपुष्पाढ्यमभिकाङ्क्षितदर्शनम् ॥८॥
सफलोद्यानयात्राऽथो याता यत्सुमनोहरम् । वनान्तरमिदं दृष्टमासेचनकदर्शनम् ॥९॥
अर्थ: यदि आप इस घोड़ेके द्वारा नहीं हरे जाते तो नन्दन वन जैसे पुष्पोंसे सहित यह सुन्दर सरोवर कहाँ पाते ? इसके उत्तर में राजाने कहा कि हाँ यह उद्यान-यात्रा आज सफल हुई जब कि जिसके देखनेसे तृप्ति नहीं होती ऐसे इस अत्यन्त सुन्दर वनके मध्य तुम आ पहुँची ॥८-९॥
इति नर्मपरं कृत्वा जल्पितं प्रियसङ्गता । सखीजनावृता तस्थौ सरसस्तस्य रोधसि ॥१०॥
अर्थ: इस प्रकार हास्यपूर्ण वार्ताकर पतिके साथ मिली रानी, सखियोंसे आवृत हो उसी सरोवरके किनारे ठहर गई ॥१०॥
प्रक्रीड्य विमले तोये विधाय कुसुमोच्चयम् । परस्परमलंकृत्य दम्पती भोजने स्थितौ ॥११॥
एतस्मिन्नन्तरे साधुरुपवासविधिं गतः । तयोः सन्निधिमासीदत् क्रियामार्गविशारदः ॥१२॥
अर्थ: तदनन्तर निर्मल जलमें क्रीडा कर, फूल तोड़कर तथा परस्पर एक दूसरेको अलंकृत कर जब दोनों दम्पति भोजन करनेके लिए बैठे तब इसी बीचमें उपवासकी समाप्तिको प्राप्त एवं साधुकी क्रियामें निपुण मुनिराज राम, उनके समीप आये ॥११-१२॥
तं समीक्ष्य समुद्भूतप्रमदः पुलकान्वितः । अभ्युत्तस्थौ सपत्नीको राजा परमसम्भ्रमः ॥१३॥
अर्थ: उन्हें देख जिसे हर्ष उत्पन्न हुआ था, तथा रोमाञ्च उठ आये थे ऐसा राजा रानीके साथ घबड़ा कर उठकर खड़ा होगया ॥१३॥
प्रणम्य स्थीयतामत्र भगवन्निति शब्दवान् । संशोध्य भूतलं चक्रे कमलादिभिरर्चितम् ॥१४॥
अर्थ: उसने प्रणाम कर कहा कि हे भगवन् ! खड़े रहिए, तदनन्तर पृथिवीतलको शुद्ध कर उसे कमल आदिसे पूजित किया ॥१४॥
सुगन्धिजलसम्पूर्णं पात्रमुद्धृत्य भामिनी । देवी वारि ददौ राजा पादावक्षालयन्मुनेः ॥१५॥
अर्थ: रानीने सुगन्धित जलसे भरा पात्र उठाकर जल दिया और राजाने मुनिके पैर धोये ॥१५॥
शुचिश्चामोदसर्वाङ्गस्ततो राजा महादरः । क्षैरेयादिकमाहारं सद्गन्धरसदर्शनम् ॥१६॥
हेमपात्रगतं कृत्वा श्रद्धया परयान्वितः । श्राद्धं स्म परिवेवेष्टि पात्रे परममुत्तमे ॥१७॥
अर्थ: तदनन्तर जिसका समस्त शरीर हर्षसे युक्त था ऐसे उज्ज्वल राजाने बड़े आदरके साथ उत्तम गन्ध रस और रूपसे युक्त खीर आदिक आहार सुवर्ण पात्रमें रक्खा और उसके बाद उत्कृष्ट श्रद्धासे सहित हो वह उत्तम आहार उत्तम पात्र अर्थात् मुनिराजको समर्पित किया ॥१६-१७॥
ततोऽन्नं दीयमानं तद्वृद्धिमेत्यभिभाजनम् । सुदानकारणादार्द्रमनोरथगुणोपमम् ॥१८॥
अर्थ: तदनन्तर जिस प्रकार दयालु मनुष्यका दान देनेका मनोरथ बढ़ता जाता है उसी प्रकार मुनिके लिए दिया जाने वाला अन्न उत्तम दानके कारण बर्तनमें वृद्धिको प्राप्त होगया था । भावार्थ - श्री राम मुनि अक्षीणऋद्धिके धारक थे इसलिए उन्हें जो अन्न दिया गया था वह अपने बर्तनमें अक्षीण हो गया था ॥१८॥
तुष्ट्यादिभिर्गुणैर्युक्तं ज्ञात्वा दातारमुत्तमम् । प्रहृष्टमनसो देवा विहायस्यभ्यनन्दयन् ॥१९॥
अर्थ: दाताको श्रद्धा तुष्टि भक्ति आदि गुणोंसे युक्त उत्तम दाता जानकर देवोंने प्रसन्नचित्त हो आकाशमें उसका अभिनन्दन किया अर्थात् पञ्चाश्चर्य किये ॥१९॥
अनुकूलो ववौ वायुः पञ्चवर्णां सुसौरभाम् । पुष्पवृष्टिममुञ्चन्त प्रमथाः प्रमदान्विताः ॥२०॥
चित्रश्रोत्रहरो जज्ञे पुष्करे दुन्दुभिस्वनः । अप्सरोगणसङ्गीतप्रवरध्वनिसङ्गतः ॥२१॥
तुष्टाः कन्दर्पिणो देवाः कृतानेकविधस्वनाः । चकार बहुलं व्योम्नि ननृतुश्च समाकुलम् ॥२२॥
अर्थ: अनुकूल - शीतल मन्द सुगन्धित वायु चली, देवोंने हर्षित हो पाँच वर्णकी सुगन्धित पुष्पवृष्टि की, आकाशमें कानोंको हरने वाला नाना प्रकारका दुन्दुभि नाद हुआ, अप्सराओंके संगीतकी उत्तम ध्वनि उस दुन्दुभिनादके साथ मिली हुई थी, संतोषसे युक्त कन्दर्प जातिके देवोंने अनेक प्रकारके शब्द किये तथा आकाशमें नानारस पूर्ण अनेक प्रकारका नृत्य किया ॥२०-२२॥
अहो दानमहो दानमहो पात्रमहो विधिः । अहो देयमहो दाता साधु साधु परं कृतम् ॥२३॥
अर्थ: अहो दान, अहो पात्र, अहो विधि, अहो देव, अहो दाता तथा धन्य धन्य आदि शब्द आकाशमें किये गये ॥२३॥
वर्द्धस्व जय नन्देतिप्रभृतिः परमाकुलः । विहायोमण्डपव्यापी निःस्वनस्त्रैदशोऽभवत् ॥२४॥
अर्थ: बढ़ते रहो, जय हो, तथा समृद्धिमान् होओ आदि देवोंके विशाल शब्द आकाश-रूपी मण्डपमें व्याप्त होगये ॥२४॥
नानारत्नसुवर्णादिपरमद्रविणात्मिका । पपात वसुधारा च द्योतयन्ती दिशो दश ॥२५॥
अर्थ: इनके सिवाय नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णादि उत्तम द्रव्योंसे युक्त धनकी वृष्टि दशों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई पड़ी ॥२५॥
पूजामवाप्य देवेभ्यो मुनेर्देशव्रतानि च । विशुद्धदर्शनो राजा पृथिव्यामाप गौरवम् ॥२६॥
अर्थ: विशुद्ध सम्यग्दर्शनका धारक राजा प्रतिनन्दी देवोंसे पूजा तथा मुनिसे देशव्रत प्राप्त कर पृथिवीमें गौरवको प्राप्त हुआ ॥२६॥
एवं सुदानं विनियोज्य पात्रे भक्तिप्रणम्रो नृपतिः सजानिः२ । वहन्नितान्तं परमं प्रमोदं मनुष्यजन्माऽऽप्तफलं विवेद ॥२७॥
अर्थ: इस प्रकार भक्तिसे नम्रीभूत भार्या सहित राजाने सुपात्रके लिए दान देकर अत्यधिक हर्षका अनुभव किया और मनुष्य जन्मको सफल माना ॥२७॥
रामोऽपि कृत्वा समयोदितार्थं विविक्तशय्यासनमध्यवर्ती ।
तपोऽतिदीप्तो विजहार युक्तं महीं रविः प्राप्त इव द्वितीयः ॥२८॥
अर्थ: इधर श्री रामने भी आगममें कहे अनुसार प्रवृत्ति कर, एकान्त स्थानमें शयनासन किया तथा तपसे अत्यन्त देदीप्यमान हो पृथिवीपर उस तरह योग्य विहार किया कि जिस तरह मानो दूसरा सूर्य ही पृथिवीपर आ पहुँचा हो ॥२८॥
इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे दानप्रसङ्गाभिधानं नामैकविंशोत्तरशतं पर्व ॥१२१॥
इस प्रकार आर्षनामसे प्रसिद्ध, श्रीरविषेणाचार्य विरचित पद्मपुराणमें श्रीरामके आहार दानका वर्णन करने वाला एकसौ इक्कीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥१२१॥
१२२. द्वाविंशत्युत्तरशतं पर्व (पद्मस्य केवलोत्पत्त्यभिधानं)
भगवान् बलदेवोऽसौ प्रशान्तरतिमत्सरः । अत्युन्नतं तपश्चक्रे सामान्यजनदुःसहम् ॥१॥
अर्थ: अथानन्तर जिनके राग-द्वेष शान्त हो चुके थे ऐसे श्री भगवान् बलदेवने सामान्य मनुष्यों के लिए अशक्य अत्यन्त कठिन तप किया ॥१॥
अष्टमाद्युपवासस्थः खमध्यस्थे विरोचने । पर्युपास्यत गोपाद्यैररण्ये गोचरं भ्रमन् ॥२॥
अर्थ: जब सूर्य आकाशके मध्यमें चमकता था तब तेल आदिका उपवास धारण करनेवाले राम वनमें आहारार्थ भ्रमण करते थे और गोपाल आदि उनकी उपासना करते थे ॥२॥
व्रतगुप्तिसमित्याद्यसमयज्ञो जितेन्द्रियः । साधुवात्सल्यसम्पन्नः स्वाध्यायनिरतः सुकृत् ॥३॥
लब्धानेकमहालब्धिरपि निर्विक्रियः परः । परीषहभटं मोहं पराजेतुं समुद्यतः ॥४॥
तपोऽनुभावतः शान्तैर्व्याघ्रैः सिंहैश्च वीक्षितः । विस्तारिलोचनोद्ग्रीवैर्मृगाणां च कदम्बकैः ॥५॥
निःश्रेयसगतस्वान्तः स्पृहासक्तिविवर्जितः । प्रयत्नपरमं मार्गं विजहार वनान्तरे ॥६॥
अर्थ: वे व्रत गुप्ति समिति आदिके प्ररूपक शास्त्रोंके जाननेवाले थे, जितेन्द्रिय थे, साधुओंके साथ स्नेह करनेवाले थे, स्वाध्यायमें तत्पर थे, अनेक उत्तम कार्योंके विधायक थे, अनेक महाऋद्धियाँ प्राप्त होनेपर भी निर्विकार थे, अत्यन्त श्रेष्ठ थे, परीषह रूपी योद्धा तथा मोहको जीतनेके लिए उद्यत रहते थे, तपके प्रभावसे व्याघ्र और सिंह शान्त होकर उनकी ओर देखते थे, जिनके नेत्र हर्षसे विस्तृत थे तथा जिन्होंने अपनी गरदन ऊपरको ओर उठा ली थी ऐसे मृगोंके झुण्ड बड़े प्रेमसे उन्हें देखते थे, उनका चित्त मोक्षमें लग रहा था, तथा जो इच्छा और आसक्तिसे रहित थे । इस प्रकार उत्तम गुणोंको धारण करनेवाले भगवान् राम वनके मध्य बड़े प्रयत्नसे - ईर्यासमितिपूर्वक मार्गमें विहार करते थे ॥३-६॥
शिलातलस्थितो जातु पर्यङ्कासनसंस्थितः । ध्यानान्तरं विवेशासौ भानुर्मेघान्तरं यथा ॥७॥
अर्थ: कभी शिलातलपर खड़े होकर अथवा पर्यङ्कासनसे विराजमान होकर उस तरह ध्यानके भीतर प्रवेश करते थे जिस तरह कि सूर्य मेघोंके भीतर प्रवेश करता है ॥७॥
मनोज्ञे क्वचिदुद्देशे प्रलम्बितमहाभुजः । अस्थान्मन्दरनिष्कम्पचित्ताः प्रतिमया प्रभुः ॥८॥
अर्थ: वे प्रभु कभी किसी सुन्दर स्थानमें दोनों भुजाएँ नीचे लटकाकर मेरुके समान निष्कम्पचित्त हो प्रतिमायोगसे विराजमान होते थे ॥८॥
युगान्तर्वीक्षणः श्रीमान् प्रशान्तो विहरन् क्वचित् । वनस्पतिनिवासाभिः सुरस्त्रीभिरपूज्यत ॥९॥
अर्थ: कहीं अत्यन्त शान्त एवं वैराग्य रूपी लक्ष्मीसे युक्त राम जूडा प्रमाण भूमिको देखते हुए विहार करते थे और वनस्पतियोंपर निवास करनेवाली देवाङ्गनाएँ उनकी पूजा करती थीं ॥९॥
एवं निरुपमात्मासौ तपश्चक्रे तथाविधम् । कालेऽस्मिन् दुःषमे शक्यं ध्यातुमप्यपरैर्न यत् ॥१०॥
अर्थ: इस प्रकार अनुपम आत्माके धारक महामुनि रामने जो उस प्रकार कठिन तप किया था, इस दुःषम नामक पञ्चम कालमें अन्य मनुष्य उसका ध्यान नहीं कर सकते हैं ॥१०॥
ततोऽसौ विहरन् साधुः प्राप्तः कोटिशिलां क्रमात् । नमस्कृत्योद्धृता पूर्वं भुजाभ्यां लक्ष्मणेन या ॥११॥
अर्थ: तदनन्तर विहार करते हुए राम क्रम-क्रमसे उस कोटिशिलापर पहुँचे जिसे पहले लक्ष्मणने नमस्कारकर अपनी भुजाओंसे उठाया था ॥११॥
महात्मा तां समारुह्य प्रच्छिन्नस्नेहबन्धनः । तस्थौ प्रतिमया रात्रौ कर्मक्षपणकोविदः ॥१२॥
अर्थ: जिन्होंने स्नेहका बन्धन तोड़ दिया था तथा जो कर्मोंका क्षय करनेके लिए उद्यत थे ऐसे महात्मा श्री राम उस शिलापर आरूढ़ हो रात्रिके समय प्रतिमायोगसे विराजमान हुए ॥१२॥
अथासावच्युतेन्द्रेण प्रयुक्तावधिचक्षुषा । उदारस्नेहयुक्तेन सीतापूर्वेण वीक्षितः ॥१३॥
अर्थ: अथानन्तर जिसने अवधिज्ञान रूपी नेत्रका प्रयोग किया था तथा जो अत्यधिक स्नेहसे युक्त था ऐसे सीताके पूर्व जीव अच्युत स्वर्गके प्रतीन्द्रने उन्हें देखा ॥१३॥
आत्मनो भवसंवर्त्तं संस्मृत्य च यथाक्रमम् । जिनशासनमार्गस्य प्रभवं च महोत्तमम् ॥१४॥
अर्थ: उसी समय उसने अपने पूर्व भव तथा जिन शासनके महोत्तम माहात्म्यको क्रमसे स्मरण किया ॥१४॥
दध्यौ सोऽयं नराधीशो रामो भुवनभूषणः । योऽभवन्मानुषे लोके स्त्रीभूतायाः पतिर्मम ॥१५॥
अर्थ: स्मरण करते ही उसे ध्यान आ गया कि ये संसारके आभूषण स्वरूप वे राजा राम हैं जो मनुष्य लोकमें जब मैं सीता थी तब मेरे पति थे ॥१५॥
पश्य कर्मविचित्रत्वान्मानसस्य विचेष्टितम् । अन्यथाकाङ्क्षितं पूर्वमन्यथा काङ्क्ष्यतेऽधुना ॥१६॥
अर्थ: वह प्रतीन्द्र विचार करने लगा कि अहो कर्मोंकी विचित्रतासे होनेवाली मनकी विविध चेष्टाको देखो जो पहले अन्य प्रकारकी इच्छा थी और अब अन्य प्रकारकी इच्छा हो रही है ॥१६॥
कर्मणः पश्यताधानं ही शुभाशुभयोः पृथक् । विचित्रं जन्म लोकस्य यत्साक्षादिदमीक्ष्यते ॥१७॥
अर्थ: अहो ! कार्योंकी शुभ अशुभ कर्मोंमें जो पृथक् पृथक् प्रवृत्ति है उसे देखो । लोगोंका जन्म विचित्र है जो कि यह साक्षात् ही दिखाई देता है ॥१७॥
जगतो विस्मयकरौ सीरिचक्रायुधाविमौ । जातावूर्द्ध्वाधरस्थानभाजावुचितकर्मतः ॥१८॥
अर्थ: ये बलभद्र और नारायण जगत्को आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले थे पर अपने-अपने योग्य कर्मोंके प्रभावसे ऊर्ध्व तथा अधःस्थान प्राप्त करनेवाले हुए अर्थात् एक लोकके ऊर्ध्व भागमें विराजमान होंगे और एक अधोलोकमें उत्पन्न हुआ ॥१८॥
एकः प्रक्षीणसंसारो ज्येष्ठश्चरमदेहधृक् । द्वितीयः पूर्णसंसारो निरये दुःखितोऽभवत् ॥१९॥
अर्थ: इनमें एक बड़ा तो क्षीण संसारी तथा चरम शरीरी है और दूसरा छोटा - लक्ष्मण, पूर्ण संसारी नरकमें दुःखी हो रहा है ॥१९॥
विषयैरवितृप्तात्मा लक्ष्मणो दिव्यमानुषैः । अधोलोकमनुप्राप्तः कृतपापोऽभिमानतः ॥२०॥
अर्थ: दिव्य तथा मनुष्य सम्बन्धी भोगोंसे जिसकी आत्मा तृप्त नहीं हुई ऐसा लक्ष्मण पापकर अभिमानके कारण नरकमें दुःखी हो रहा है ॥२०॥
राजीवलोचनः श्रीमानेषोऽसौ लाङ्गलायुधः । विप्रयोगेन सौमित्रेरुपेतः शरणं जिने ॥२१॥
अर्थ: यह कमललोचन श्रीमान् बलभद्र, लक्ष्मणके वियोगसे जिनेन्द्र भगवान्की शरणमें आया है ॥२१॥
बहिः शत्रून् पराजित्य हलरत्नेन सुन्दरः । इन्द्रियाण्यधुना जेतुमुद्यतो ध्यानशक्तितः ॥२२॥
अर्थ: यह सुन्दर, पहले हलरत्नसे बाह्य शत्रुओंको पराजित कर अब ध्यानकी शक्तिसे इन्द्रियोंको जीतनेके लिए उद्यत हुआ है ॥२२॥
तदस्य क्षपकश्रेणिमारूढस्य करोमि यत् । इह येन वयस्यो मे ध्यानभ्रष्टोऽभिजायते ॥२३॥
अर्थ: इस समय यह क्षपक श्रेणीमें आरूढ़ है इसलिए मैं ऐसा काम करता हूँ कि जिससे यह मेरा मित्र ध्यानसे भ्रष्ट हो जाय ॥२३॥
ततोऽनेन सह प्रीत्या महामैत्रीसमुत्थया । मेरुं नन्दीश्वरं वाऽपि सुखं यास्यामि शोभया ॥२४॥
विमानशिखरारूढौ विभूत्या परयाऽन्वितौ । अन्योन्यं वेदयिष्यावो दुःखानि च सुखानि च ॥२५॥
अर्थ: [ और मोक्ष न जाकर स्वर्गमें ही उत्पन्न हो ] तब महामित्रतासे उत्पन्न प्रीतिके कारण इसके साथ सुखपूर्वक मेरुपर्वत और नन्दीश्वर द्वीपको जाऊँगा उस समयकी शोभा ही निराली होगी । विमानके शिखरपर आरूढ़ तथा परम विभूतिके सहित हम दोनों एक दूसरेके लिए अपने दुःख और सुख बतलावेंगे ॥२४-२५॥
सौमित्रिमधरप्राप्तमानेतुं प्रतिबुद्धताम् । सह तेनागमिष्यामि रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥२६॥
अर्थ: फिर अधोलोकमें पहुँचे हुए लक्ष्मणको प्रतिबुद्धता प्राप्त करानेके लिए शुभकार्यके करनेवाले उन्हीं रामके साथ जाऊँगा ॥२६॥
इदमन्यच्च सञ्चिन्त्य सीतादेवः स्वयंप्रभः । सौधर्मकल्पमन्येन समागादारणाच्युतात् ॥२७॥
अर्थ: यह तथा इसी प्रकारका अन्य विचारकर सीताका जीव स्वयंप्रभ देव, अन्य देवोंके साथ आरुणाच्युत कल्पसे उतरकर सौधर्म कल्पमें आया ॥२७॥
तत्रावतरति स्फीतं तन्मह्यां नन्दनायते । वनं यत्र स्थितः साधुर्ध्यानयोगेन राघव ॥२८॥
अर्थ: तदनन्तर सौधर्म कल्पसे चलकर वह पृथिवीके उस विस्तृत वनमें उतरा जो कि नन्दन वनके समान जान पड़ता था और जहाँ महामुनि रामचन्द्र ध्यान लगाकर विराजमान थे ॥२८॥
बहुपुष्परजोवाही ववौ वायुः सुखावहः । कोलाहलरवो रम्यः पक्षिणां सर्वतोऽभवत् ॥२९॥
अर्थ: उस वनमें अनेक फूलोंकी परागको धारण करनेवाली सुखदायक वायु बह रही थी और सब ओर पक्षियोंका मनोहर कल-कल शब्द हो रहा था ॥२९॥
प्रबलं चञ्चरीकाणां चञ्चलं बकुले कुलम् । प्रघुष्टं परपुष्टानां पुष्टं जुष्टं कदम्बकैः ॥३०॥
अर्थ: बकुल वृक्षके ऊपर भ्रमरोंका सबल समूह चञ्चल हो रहा था तथा कोकिलाओंके समूह जोरदार मधुर शब्द कर रहे थे ॥३०॥
रुरुवुः सारिकाश्चारुनानास्वरविशारदाः । चिक्रीडुर्विशदस्वानाः शुकाः सम्प्राप्तकिंशुकाः ॥३१॥
अर्थ: नाना प्रकारके सुन्दर शब्द प्रकट करनेमें निपुण मैनाएँ मनोहर शब्द कर रहीं थीं और पलाश वृक्षोंपर बैठे शुक स्पष्ट शब्दोंका उच्चारण करते हुए क्रीड़ा कर रहे थे ॥३१॥
मञ्जर्यः सहकाराणां विरेजुर्भ्रमरान्विताः । तीरका इव संशाता नूतनाश्चित्तजन्मनः ॥३२॥
अर्थ: भ्रमरोंसे सहित आमोंकी मञ्जरियाँ कामदेवके नूतन तीक्ष्ण बाणोंके समान जान पड़ती थीं ॥३२॥
कुसुमैः कर्णिकाराणामरण्यं पिञ्जरीकृतम् । पीतपिष्टातकेनेव कर्त्तुं क्रीडनमुद्यतम् ॥३३॥
अर्थ: कनेरके फूलोंसे पीला-पीला दिखनेवाला वन ऐसा जान पड़ता था मानो पीले रङ्गके चूर्णसे क्रीड़ा करनेके लिए उद्यत ही हुआ हो ॥३३॥
अनपेक्षितगण्डूषमदिरानेकदौहदः । ववृषे बकुलः प्रावृट् नभोभवकुलैरिव ॥३४॥
अर्थ: मदिराके गण्डूषरूपी दौहदकी उपेक्षा करनेवाला वकुल वृक्ष ऐसा बरस रहा था जैसा कि वर्षा काल मेघोंके समूहसे बरसता है ॥३४॥
जानकीवेषमास्थाय कामरूपः सुरोत्तमः । समीपं रामदेवस्य मन्थरं गन्तुमुद्यतः ॥३५॥
अर्थ: अथानन्तर इच्छानुसार रूप बदलनेवाला वह स्वयंप्रभ प्रतीन्द्र जानकीका वेष रख मदमाती चालसे रामके समीप जानेके लिए उद्यत हुआ ॥३५॥
मनोऽभिरमणे तस्मिन् वने जनविवर्जिते । विचित्रपादपव्राते सर्वर्तुकुसुमाकुले ॥३६॥
अर्थ: वह वन मनको हरण करनेवाला, एकान्त, नाना प्रकारके वृक्षोंसे युक्त एवं सब ऋतुओंके फूलोंसे व्याप्त था ॥३६॥
सीता किल महाभागा पर्यटन्ती सुखं वनम् । अकस्मादग्रतः साधोः सुन्दरी समदृश्यत ॥३७॥
अर्थ: तदनन्तर सुखपूर्वक वनमें घूमती हुई सीता महादेवी, अकस्मात् उक्त साधुके आगे प्रकट हुई ॥३७॥
अवोचत च दृष्टोऽसि कथञ्चिदपि राघव । अमन्त्या विष्टपं सर्वं मया पुण्येन भूरिणा ॥३८॥
अर्थ: वह बोली कि हे राम ! समस्त जगत्में घूमती हुई मैंने बहुत भारी पुण्यसे जिस किसी तरह आपको देख पाया है ॥३८॥
विप्रयोगोर्मिसङ्कीर्णे स्नेहमन्दाकिनीह्रदे । प्राप्तां सुवदनां नाथ मां सन्धारय साम्प्रतम् ॥३९॥
अर्थ: हे नाथ ! वियोगरूपी तरङ्गोंसे व्याप्त स्नेहरूपी गङ्गाकी धारमें पड़ी हुई मुझ सुवदनाको आप इस समय सहारा दीजिए - डूबनेसे बचाइए ॥३९॥
विचेष्टितैः सुमिष्टोक्तैर्ज्ञात्वा मुनिमकम्पनम् । मोहपापार्जितस्वान्ता पुरःपार्श्वानुवर्त्तिनी ॥४०॥
मनोभवज्वरग्रस्ता वेपमानशरीरिका । स्फुरितारुणतुङ्गौष्ठी जगादैवं मनोरमा ॥४१॥
अहं देवासमीक्ष्येव तदा पण्डितमानिनी । दीक्षिता त्वां परित्यज्य विहरामि तपस्विनी ॥४२॥
अर्थ: जब उसने नाना प्रकारकी चेष्टाओं और मधुर वचनोंसे मुनिको अकम्प समझ लिया तब मोहरूपी पापसे जिसका चित्त ग्रसा था, जो कभी मुनिके आगे खड़ी होती थी और कभी दोनों बगलोंमें जा सकती थी, जो काम ज्वरसे ग्रस्त थी, जिसका शरीर काँप रहा था और जिसका लाल-लाल ऊँचा ओंठ फड़क रहा था ऐसी मनोहारिणी सीता उनसे बोली कि हे देव, अपने आपको पण्डिता माननेवाली मैं उस समय बिना विचारे ही आपको छोड़कर दीक्षिता हो गई और तपस्विनी बनकर इधर-उधर विहार करने लगी ॥४०-४२॥
सद्विद्याधरकन्याभिस्ततश्चास्मि हृता सती । अवोचे संविपश्चिद्भिरिदं विविधदर्शनैः ॥४३॥
अलं प्रव्रज्यया तावद् वयस्येवं विरुद्धया । इयमत्यन्तबद्धानां पूज्यते ननु नैष्ठिकी ॥४४॥
अर्थ: तदनन्तर विद्याधरोंकी उत्तम कन्याएँ मुझे हरकर ले गईं। वहाँ उन विदुषी कन्याओंने नाना उदाहरण देते हुए मुझसे कहा कि ऐसी अवस्थामें यह विरुद्ध दीक्षा धारण करना व्यर्थ है क्योंकि यथार्थमें यह दीक्षा अत्यन्त वृद्धा स्त्रियोंके लिए ही शोभा देती है ॥४३-४४॥
यौवनोद्या तनुः क्वेयं क्व चेदं दुष्करं व्रतम् । शशलक्ष्मणदीधित्या भिद्यते किं महीधरः ॥४५॥
अर्थ: कहाँ तो यह यौवनपूर्ण शरीर और कहाँ यह कठिन व्रत ? क्या चन्द्रमाकी किरणसे पर्वत भेदा जा सकता है ? ॥४५॥
गच्छामस्त्वां पुरस्कृत्य वयं सर्वाः समाहिताः । बलदेवं वरिष्यामस्तव देवि समाश्रयात् ॥४६॥
अर्थ: हम सब तुम्हें आगे कर चलती हैं और हे देवि ! तुम्हारे आश्रयसे बलदेवको वरेंगी - उन्हें अपना भर्ता बनावेंगी ॥४६॥
अस्माकमपि सर्वासां त्वमग्रमहिषी भव । क्रीडामः सह रामेण जम्बूद्वीपतले सुखम् ॥४७॥
अर्थ: हम सभी कन्याओंके बीच तुम प्रधान रानी होओ। इस तरह रामके साथ हम सब जम्बूद्वीपमें सुखसे क्रीड़ा करेंगी ॥४७॥
अत्रान्तरे समं प्राप्ता नानालङ्कारभूषिताः । भूयःसहस्रसंख्यानाः कन्या दिव्यश्रियान्विताः ॥४८॥
अर्थ: इसी बीचमें नाना अलंकारोंसे भूषित तथा दिव्य लक्ष्मीसे युक्त हजारों कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं ॥४८॥
राजहंसवधूलीला मनोज्ञगतिविभ्रमाः । सीतेन्द्रविक्रियाजन्या जग्मुः पद्मसमीपताम् ॥४९॥
अर्थ: राजहंसीके समान जिनकी सुन्दर चाल थी ऐसी सीतेन्द्रकी विक्रियासे उत्पन्न हुईं वे सब कन्याएँ रामके समीप गईं ॥४९॥
वदन्त्यो मधुरं काश्चित्परपुष्टस्वनादपि । विरेजिरेतरां कन्याः साक्षाल्लक्ष्म्य इव स्थिताः ॥५०॥
अर्थ: कोयलसे भी अधिक मधुर बोलनेवाली कितनी ही कन्याएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो साक्षात् लक्ष्मी ही स्थित हों ॥५०॥
मनःप्रह्लादनकरं परं श्रोत्ररसायनम् । दिव्यं गेयामृतं चक्रुर्वंशवीणास्वनानुगम् ॥५१॥
भ्रमरासितकेश्यस्ताः क्षणांशुसमतेजसः । सुकुमारास्तलोदर्यः पीनोन्नतपयोधराः ॥५२॥
चारुश्रृङ्गारहासिन्यो नानावर्णसुवाससः । विचित्रविभ्रमालापाः कान्तिपूरितपुष्कराः ॥५३॥
कामयाञ्चक्रिरे मोहं सर्वतोऽवस्थिता मुनेः । श्रीबाहुबलिनः पूर्वं यथा त्रिदशकन्यकाः ॥५४॥
अर्थ: कितनी ही कन्याएँ मनको आह्लादित करनेवाले, कानोंके लिए उत्तम रसायन स्वरूप तथा बाँसुरी और वीणाके शब्दसे अनुगत दिव्य संगीतरूपी अमृतको प्रकट कर रही थीं । जिनके केश भ्रमरोंके समान काले थे, जिनकी कान्ति बिजलीके समान थी, जो अत्यन्त सुकुमार और कृशोदरी थीं, स्थूल और उन्नत स्तनोंको धारण करनेवाली थीं, सुन्दर श्रृंगार पूर्ण हास्य करनेवालीं थी, रङ्ग-विरङ्गे वस्त्र पहने हुई थीं, नाना प्रकारके हाव-भाव तथा आलाप करनेवाली थीं और कान्तिसे जिन्होंने आकाशको भर दिया था ऐसी वे सब कन्याएँ मुनिके चारों ओर स्थित हो उस तरह मोह उत्पन्न कर रही थीं, जिस तरह कि पहले बाहुबलीके आसपास खड़ी देव-कन्याएँ ॥५१-५४॥
आकृष्य बकुलं काचिच्छायाऽसौ चिन्वती क्वचित् । उद्वेजितालिचक्रेण श्रमणं शरणं स्थिता ॥५५॥
अर्थ: कोई एक कन्या छायाकी खोज करती हुई वकुल वृक्षके नीचे पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने उस वृक्षको खींच दिया जिससे उसपर बैठे भ्रमरोंके समूह उड़कर उस कन्याकी ओर झपटे और उनसे भयभीत हो वह कन्या मुनिकी शरणमें जा खड़ी हुई ॥५५॥
काश्चित्किल विवादेन कृतपक्षपरिग्रहाः । पप्रच्छुनिर्णयं देव किंनामाऽयं वनस्पतिः ॥५६॥
अर्थ: कितनी ही कन्याएँ किसी वृक्षके नामको लेकर विवाद करती हुई अपना पक्ष लेकर मुनिराजसे निर्णय पूछने लगीं कि देव ! इस वृक्षका क्या नाम है ? ॥५६॥
दूरस्थमाधवीपुष्पग्रहणच्छद्मना परा । स्रंसमानांशुका बाहुमूलं क्षणमदर्शयत् ॥५७॥
अर्थ: जिसका वस्त्र खिसक रहा था ऐसी किसी कन्याने ऊँचाईपर स्थित माधवी लताका फूल तोड़नेके छलसे अपना बाहुमूल दिखाया ॥५७॥
आबध्य मण्डलीमन्याश्चलिताकरपल्लवाः । सहस्रतालसङ्गीता रासकं दातुमुद्यताः ॥५८॥
अर्थ: जिनके हस्तरूपी पल्लव हिल रहे थे तथा जो हजारों प्रकारके तालोंसे युक्त संगीत कर रही थीं ऐसी कितनी ही कन्याएँ मण्डली बाँधकर रासक क्रीड़ा करनेके लिए उद्यत थीं ॥५८॥
नितम्बफलके काचिदम्भःस्वच्छारुणांशुके । चण्डातकं नभोनीलं चकार किल लज्जया ॥५९॥
अर्थ: किसी कन्याने जलके समान स्वच्छ लाल वस्त्रसे सुशोभित अपने नितम्बतटपर लज्जाके कारण आकाशके समान नील वर्णका लँहगा पहन रक्खा था ॥५९॥
एवंविधक्रियाजालैरितरस्वान्तहारिभिः । अक्षोभ्यत न पद्माभः पवनैरिव मन्दरः ॥६०॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि अन्य मनुष्योंके चित्तको हरण करनेवाली इस प्रकारकी क्रियाओंके समूहसे राम उस तरह क्षोभको प्राप्त नहीं हुए जिस प्रकार कि वायुसे मेरुपर्वत क्षोभको प्राप्त नहीं होता है ॥६०॥
ऋजुदृष्टिर्विशुद्धात्मा परीषहगणाशनिः । प्रविष्टो धवलध्यानप्रथमं सुप्रभो यथा ॥६१॥
अर्थ: उनकी दृष्टि अत्यन्त सरल थी, आत्मा अत्यन्त शुद्ध थी और वे स्वयं परीषहोंके समूहको नष्ट करनेके लिए वज्र स्वरूप थे, इस तरह वे सुप्रभके समान शुक्ल ध्यानके प्रथम पायेमें प्रविष्ट हुए ॥६१॥
तस्य सत्त्वपदन्यस्तं चित्तमत्यन्तनिर्मलम् । समेतमिन्द्रियैरासीदात्मनः प्रवणं परम् ॥६२॥
अर्थ: उनका हृदय सत्त्व गुणसे सहित था, अत्यन्त निर्मल था, तथा इन्द्रियोंके समूहके साथ आत्माके ही चिन्तनमें लग रहा था ॥६२॥
कुर्वन्तु वाञ्छितं बाह्याः क्रियाजालमनेकधा । प्रच्यवन्ते न तु स्वार्थात्परमार्थविचक्षणा ॥६३॥
अर्थ: बाह्य मनुष्य इच्छानुसार अनेक प्रकारकी क्रियाएँ करें परन्तु परमार्थके विद्वान् मनुष्य आत्मकल्याणसे च्युत नहीं होते ॥६३॥
यदा सर्वप्रयत्नेन ध्यानप्रत्यूहलालसः । चेष्टां चकार सीतेन्द्रः सुरमायाविकल्पिताम् ॥६४॥
अत्रान्तरे मुनिः पूर्वमत्यन्तशुचिरागमत् । अनादिकर्मसङ्घातं विभुर्दग्धुं समुद्यतः ॥६५॥
अर्थ: ध्यानमें विघ्न डालनेकी लालसासे युक्त सीतेन्द्र, जिस समय सर्व प्रकारके प्रयत्नके साथ देवमायासे निर्मित चेष्टा कर रहा था उस समय अत्यन्त पवित्र मुनिराज अनादि कर्म समूहको जलानेके लिए उद्यत थे ॥६४-६५॥
कर्मणः प्रकृतीः षष्टिं निपूय दृढनिश्चयः । क्षपकश्रेणिमारुक्षदुत्तरां पुरुषोत्तमः ॥६६॥
अर्थ: दृढ़ निश्चयके धारक पुरुषोत्तम, कर्मोंकी साठ प्रकृतियाँ नष्टकर उत्तरवर्ती क्षपक श्रेणीपर आरूढ़ हुए ॥६६॥
माघशुद्धस्य पक्षस्य द्वादश्यां निशि पश्चिमे । यामे केवलमुत्पन्नं ज्ञानं तस्य महात्मनः ॥६७॥
अर्थ: माघ शुक्ल द्वादशीके दिन रात्रिके पिछले पहरमें उन महात्माको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ॥६७॥
सर्वदर्शिसमुद्भूते तस्य केवलचक्षुषि । लोकालोकद्वयं जातं गोष्पदप्रतिमं प्रभोः ॥६८॥
अर्थ: सर्वदर्शी केवलज्ञान रूपी नेत्रके उत्पन्न होनेपर उन प्रभुके लिए लोक अलोक दोनों ही गोष्पदके समान तुच्छ हो गये ॥६८॥
ततः सिंहासनाकम्पप्रयुक्तावधिचक्षुषः । सप्रणामं सुराधीशाः प्रचेलुः सम्भ्रमान्विताः ॥६९॥
अर्थ: तदनन्तर सिंहासनके कम्पित होनेसे जिन्होंने अवधिज्ञानरूपी नेत्रका प्रयोग किया था ऐसे सब इन्द्र संभ्रम के साथ प्रणाम करते हुए चले ॥६९॥
आजग्मुश्च महाभूत्या महासङ्घातवर्त्तिनः । विधातुमुद्यताः श्राद्धाः केवलोत्पत्तिपूजनम् ॥७०॥
अर्थ: तदनन्तर जो देवोंके महा समूहके बीच वर्तमान थे, श्रद्धासे युक्त थे और केवलज्ञानकी उत्पत्तिकी पूजा करनेके लिए उद्यत थे ऐसे सब इन्द्र बड़े वैभवके साथ वहाँ आ पहुँचे ॥७०॥
दृष्ट्वा रामं समासीनं घातिकर्मविनाशनम् । प्रणेमुर्भक्तिसम्पन्नाश्चारणर्षिसुरासुराः ॥७१॥
अर्थ: घातिया कर्मोंका नाश करने वाले सिंहासनासीन रामके दर्शन कर चारणऋद्धिधारी मुनिराज तथा समस्त सुर और असुरोंने उन्हें प्रणाम किया ॥७१॥
तस्य जातात्मरूपस्य वन्द्यस्य भुवनेश्वरैः । जातं समवसरणं समग्रं परमेष्ठिनः ॥७२॥
अर्थ: जिन्हें आत्मरूपकी प्राप्ति हुई थी, तथा जो संसारके समस्त इन्द्रोंके द्वारा वन्दनीय थे ऐसे परमेष्ठी पदको प्राप्त श्री रामके सम्पूर्ण समवसरणकी रचना हुई ॥७२॥
ततः स्वयम्प्रभाभिख्यः सीतेन्द्रः केवलार्चनम् । कृत्वा प्रदक्षिणीकृत्य मुनिमक्षमयन्मुहुः ॥७३॥
अर्थ: तदनन्तर स्वयंप्रभ नामक सीतेन्द्रने केवलज्ञानकी पूजा कर मुनिराजको प्रदक्षिणा दी और बार-बार क्षमा कराई ॥७३॥
क्षमस्व भगवन् दोषं कृतं दुर्बुद्धिना मया । प्रसीद कर्मणामन्तं यच्छ मह्यमपि द्रुतम् ॥७४॥
अर्थ: उसने कहा कि हे भगवन् ! मुझ दुर्बुद्धिके द्वारा किया हुआ दोष क्षमा कीजिए, प्रसन्न हूजिए और मेरे लिए भी शीघ्र ही कर्मोंका अन्त प्रदान कीजिए अर्थात् मेरे कर्मोंका क्षय कीजिए ॥७४॥
एवमनन्तश्रीद्युति-कान्तियुतो नूनमनार्त्तमूर्त्तिर्भगवान् । कैवल्यसुखसमृद्धिं बलदेवोऽवाप्तवाञ्जिनोत्तमभक्त्या ॥७५॥
अर्थ: गौतम स्वामी कहते हैं कि इस प्रकार अनन्त लक्ष्मी द्युति और कान्तिसे सहित तथा प्रसन्न मुद्राके धारक भगवान् बलदेवने श्री जिनेन्द्रदेवकी उत्तम भक्तिसे केवलज्ञान तथा अनन्त सुख रूपी समृद्धिको प्राप्त किया ॥७५॥
पूजामहिमानमरं कृत्वा स्तुत्वा प्रणम्य भक्त्या परया । प्रविहरति श्रमणरवौ जग्मुर्देवा यथाक्रमं प्रमदयुताः ॥७६॥
अर्थ: मुनियोंमें सूर्यके समान तेजस्वी श्री राम मुनि जब विहार करनेको उद्यत हुए तब हर्षसे भरे देव शीघ्र ही भक्तिपूर्वक पूजाकी महिमा, स्तुति तथा प्रणाम कर यथाक्रमसे अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥७६॥
इत्यार्षे श्रीरविषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मपुराणे पद्मस्य केवलोत्पत्त्यभिधानं नाम द्वाविंशत्युत्तरशतं पर्व ॥१२२॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध श्री रविषेणाचार्य द्वारा रचित पद्मपुराणमें श्री राममुनिको केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन करनेवाला एकसौ बाईसवाँ पर्व पूर्ण हुआ ॥१२२॥