जैन रामायण: प्रचलित मिथक और उनका खण्डन (पद्मपुराण के आधार पर) | Jain Ramayan: Prachalit Mithak aur unka Khandan

लोक में प्रचलित रामकथा की कई बातें आचार्य रविषेण के पद्मपुराण (पद्मचरित) में अलग रूप में मिलती हैं। यही शंकाएँ राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से पूछी थीं (पर्व २, श्लोक २२९ से २४९; पर्व ३, श्लोक १७ से २३), और गणधर स्वामी ने उत्तर आरम्भ किया: “रावण राक्षस नहीं था और न मनुष्यों को ही खाता था” (पर्व ३, श्लोक २७)। नीचे हर मिथक के साथ पद्मपुराण का कथन और स्रोत दिया है।

१. मिथक: रावण राक्षस था और मनुष्यों को खाता था

पद्मपुराण: रावण राक्षसवंशी विद्याधर मनुष्य था। इस वंश में “राक्षस” नाम का एक प्रभावशाली राजा हुआ, उसके नाम से वंश राक्षसवंश कहलाया। ये विद्याधर राक्षस नामक द्वीप की रक्षा करते थे, इसलिए राक्षस कहलाए।
स्रोत: पर्व ३/२७, पर्व ५/३७८, ५/३८६

२. मिथक: सुग्रीव, बाली आदि वानर (पशु) थे

पद्मपुराण: वे वानरवंशी विद्याधर मनुष्य थे। राजा अमरप्रभ ने मुकुट, ध्वजा, महलों और छत्रों पर वानर का चिह्न बनवाया। जिन विद्याधरों के छत्र आदि में वानर चिह्न था, वे लोक में “वानर” कहलाए।
स्रोत: पर्व ६/१८९ से १९१, ६/२१४

३. मिथक: हनुमान् बन्दर थे

पद्मपुराण: हनुमान् विद्याधर राजा प्रह्लाद के पुत्र पवनंजय और अंजनासुन्दरी के पुत्र थे। उनका जन्मोत्सव हनूरुह नगर में हुआ, इसलिए “हनूमान्” नाम प्रसिद्ध हुआ। पर्वत में जन्म और शिलाओं को चूर्ण करने से उनका नाम “श्रीशैल” भी रखा गया।
स्रोत: पर्व १५/६ से ७, १५/४९, १७/४०१ से ४०३

४. मिथक: रावण के दस सिर थे

पद्मपुराण: बालक रावण ने एक दिव्य हार पहन लिया। उस हार के बड़े रत्नों में असली मुख के सिवाय नौ मुख और प्रतिबिम्बित होते थे, इसलिए उसका नाम दशानन रखा गया।
स्रोत: पर्व ७/२१५ से २२२

५. मिथक: कुम्भकर्ण छह माह सोता था और मांस खाता था

पद्मपुराण: उसका आहार परम पवित्र, मधुर और सुगन्धित होता था। वह पहले अतिथियों को सन्तुष्ट कर फिर बन्धुजनों के साथ आहार करता था। वह सन्ध्या से प्रातःकाल के बीच ही सोता था, शेष समय धार्मिक कार्यों में बीतता था। उसका नाम भानुकर्ण था; कुम्भपुर पर हुए आक्रमण के दुःखभरे शब्द उसके कानों में पड़े, तब से कुम्भकर्ण कहलाया।
स्रोत: पर्व ८/१४४ से १४८

६. मिथक: रावण ने स्वर्ग के इन्द्र को हराकर बन्दी बनाया

पद्मपुराण: यह इन्द्र स्वर्ग का इन्द्र नहीं, विद्याधर राजा सहस्रार का पुत्र था। गर्भ के समय माता को इन्द्र जैसे भोगों की इच्छा हुई, इसलिए पिता ने उसका नाम इन्द्र रखा, और उसने अपना सारा वैभव (वज्र शस्त्र, सभाएँ, अप्सराएँ, मन्त्री) इन्द्र के समान बनाया था।
स्रोत: पर्व ७/१८, ७/२९ से ३२

७. मिथक: राम ने छिपकर बाली को मारा

पद्मपुराण: बाली ने अपनी प्रतिज्ञा भी रखी और प्राणियों की हिंसा भी नहीं होने दी, इसके लिए निर्ग्रन्थ दीक्षा ली। तप से केवलज्ञान पाकर वे लोक के शिखर पर पहुँचे (मोक्ष)। राम ने जिसे मारा, वह साहसगति विद्याधर था, जो सुग्रीव का रूप बनाकर आया था।
स्रोत: पर्व ९/८५, ९/२१९ से २२१; पर्व ४७/११८ से १२६

८. मिथक: सीता हरण सोने के हिरण के छल से हुआ

पद्मपुराण: लक्ष्मण खरदूषण से युद्ध करने गए और कह गए कि मुझ पर आपत्ति आए तो मेरा सिंहनाद सुनकर जान लेना। रावण ने वैसा ही सिंहनाद कर “राम, राम” पुकारा। राम लक्ष्मण की सहायता को गए और रावण सीता को ले गया।
स्रोत: पर्व ४४/५०, ४४/७४, ४४/७८ से ७९

९. मिथक: राम ने रावण को मारा

पद्मपुराण: नारायण लक्ष्मण ने चक्ररत्न चलाया और उसी ने रावण का वक्षःस्थल विदीर्ण किया।
स्रोत: पर्व ७६/२२, ७६/२८, ७६/३३

१०. मिथक: अग्नि परीक्षा के बाद सीता धरती में समा गईं

पद्मपुराण: सीता के प्रवेश करते ही अग्नि स्फटिक जैसा स्वच्छ, शीतल जल बन गई। फिर सीता ने स्वयं केश उखाड़कर पृथ्वीमति आर्यिका से दीक्षा ली, बासठ वर्ष उत्कृष्ट तप और तैंतीस दिन सल्लेखना कर अच्युत स्वर्ग में प्रतीन्द्र हुईं।
स्रोत: पर्व १०५/२९ से ३०, १०५/७६ से ७८; पर्व १०९/१७ से १८

११. मिथक: राम किसी देवता के अवतार थे

पद्मपुराण: राम बलभद्र पद के धारक मनुष्य थे। मुनि बनकर माघ शुक्ल द्वादशी को केवलज्ञान पाया और पच्चीस वर्ष जैनाचार की आराधना कर सिद्धों के निवास, लोक के शिखर को प्राप्त हुए। वे अवतार नहीं, अपने पुरुषार्थ से भगवान् बने।
स्रोत: पर्व २/२२९, पर्व १२२/६७, पर्व १२३/१४६ से १४७

१२. मिथक: कुम्भकर्ण और इन्द्रजित् युद्ध में मारे गए

पद्मपुराण: युद्ध के बाद रावण के पुत्र इन्द्रजित् और मेघवाहन ने कठिन दीक्षा ली, कुम्भकर्ण आदि ने भी। तीनों केवलज्ञान पाकर अविनाशी परम पद को प्राप्त हुए। इन्द्रजित् और मेघवाहन मुनिराज जहाँ विन्ध्यवन में विराजे वहाँ मेघरव तीर्थ, और कुम्भकर्ण जहाँ नर्मदा तीर पर निर्वाण को प्राप्त हुए वहाँ पिठरक्षत तीर्थ प्रसिद्ध हुआ।
स्रोत: पर्व ७८/८१ से ८२, पर्व ८०/१२६ से १३०, ८०/१३६, ८०/१४०

यह तुलना किसी परम्परा की निन्दा के लिए नहीं, केवल जिनवाणी में आई बात सामने रखने के लिए है।


स्रोत ग्रन्थ: पद्मपुराण, आचार्य रविषेण, हिन्दी अनुवाद डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य (भारतीय ज्ञानपीठ)।
PDF (भाग १ से ३): पद्मपुराण (आचार्य रविषेण), हिंदी अनुवाद सहित, भाग 1 से 3 | Padma Puran (Acharya Ravishena), Parts 1 to 3
पूरे श्लोक एवं अर्थ: पद्मपुराण श्लोक एवं अर्थ (आचार्य रविषेण) | Padma Puran Shlok evam Arth (Acharya Ravishena)