अन्तर्ध्वनि पुष्प 1 — जैन स्वाध्याय सामग्री | Antardhvani Pushp 1

अन्तर्ध्वनि पुष्प 1

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अन्तर्ध्वनि पुष्प 1

सच्चे जिनवर सच्चे, सारे जग के जाननहारे
अन्तर्मुख रहते हो भगवन फिर भी तारनहारे
सच्चे जिनवर सच्चे…

तुम ना किसी को कुछ देते हो बिन मांगे मिल जाता है
इन्द्रादिक चक्रों का पद भी सहज उसे मिल जाता है
बिन मांगे ही मुक्ति देते, ऐसे देवनहारे
सच्चे जिनवर सच्चे…

द्रव्य और गुण पर्यायों से जो भी तुमको ध्याता है
मोह भाव का नाश करे वह निज स्वरूप पा जाता है
भव रोगों से मुक्ति देते ऐसे पालनहारे
सच्चे जिनवर सच्चे…

तीन लोक तीनों कालों के तुम तो ज्ञाता दृष्टा हो
लेकिन छह द्रव्यों में नहीं तुम अणु मात्र के सृष्टा हो
कर्ता धर्ता नहीं जगत के फिर भी हो रखवारे
सच्चे जिनवर सच्चे…

जिनशासन बड़ा निराला मानों अमृत का प्याला
सभी द्रव्य हैं भिन्न-2 यहाँ निर्भार हमें कर डाला
जिनशासन …

मोह उदय से जग के प्राणी चतुर्गति भरमायें
कर्मांदय से भिन्न आत्मा कुन्द कुन्द फरमायें
मुनिराजों ने खोल दिया मानों मुक्ति का ताला
जिनशासन …

वीतरागी हैं देव हमारे उनसे हम क्या मांगें
रत्नत्रय के आगे स्वर्गों का वैभव भी त्यागें
सारी दुनिया में नहीं देखा तुमसा देने वाला
जिनशासन …

पंचमकाल लगा भारी अध्यात्म की नदियां सूख गई
प्राणों की कीमत देने पर जिनवाणी लिपिबद्ध हुई
मुनिराजों ने तीर्थंकर का विरहा भुला ही डाला
जिनशासन …

आओ हम उन ऋषि मुनियों का ऋण ये आज चुकायें
तत्त्वज्ञान का अमृत पीकर अपनी प्यास बुझायें
काल अनंत हमें कोई फिर दुखी ना करने वाला
जिनशासन …

धन्य मुनिराज हमारे हैं हमें प्राणों से प्यारे हैं

धन्य मुनिराज की मुद्रा धन्य मुनिराज की निद्रा
धन्य मुनिराज की चर्या, धन्य मुनिराज की चर्चा
धन्य मुनिराज की समता, धन्य मुनिराज की क्षमता
धन्य मुनिराज हमारे हैं…

धन्य मुनिराज की गुप्ति, धन्य संसार से विरक्ति
धन्य मुनिराज की भक्ति, धन्य मुनिराज की शक्ति
धन्य मुनिराज का वैभव, धन्य मुनिराज का गौरव
धन्य मुनिराज हमारे हैं…

धन्य मुनिराज का आहार, धन्य मुनिराज का विहार
धन्य मुनिराज का संयम, धन्य मुनिराज का उद्यम
धन्य मुनिराज का अध्ययन, धन्य मुनिराज का चिंतन
धन्य मुनिराज हमारे हैं…

धन्य मुनिराज का सन्देश, धन्य मुनिराज का उपदेश
धन्य मुनिराज की दृष्टि, धन्य आनन्द की वृष्टि
धन्य मुनिराज का जीवन, है शत् शत् बार उन्हें वन्दन
धन्य मुनिराज हमारे हैं…

मैं रागी बनूँगा ना मैं द्वेषी बनूँगा
भगवान की संतान हूँ भगवान बनूँगा।

इस मोह भाव ने मुझे संसार भ्रमाया
विपरीत मान्यता से मैं दुःख ही पाया
और व्यर्थ में ही यूँ अनंत काल गँवाया
संसार में फिर से नहीं मैं जन्म धरूँगा
भगवान की संतान…

अज्ञानता में मैंने जिस वस्तु को जाना
एकत्व और ममत्व से अपना उसे माना
जो जानने के योग्य था बस वो ही ना जाना
मैं भेदज्ञान पूर्वक आत्मज्ञान करूँगा
भगवान की संतान…

व्रत शील और संयम बाहर से ही किये
इच्छा निरोध के कभी प्रयास ना किये
और पाप छोड़ पुण्य में संतुष्ट ही रहे
मैं तो विकार से भी भेदज्ञान करूँगा
भगवान की संतान…

मैं चेतन हूँ, जड़ पुद्गल से भिन्न सदा ही रहता हूँ
शुभ और अशुभ तो दूर रहो पर्याय से भी भिन्न रहता हूँ

मेरा ज्ञान अनंत है जिसमें, स्पष्ट झलकते ज्ञेय सभी
लेकिन ज्ञेय ना मुझमें आते, मैं ना समाता उनमें कभी-2
फिर भी मैं सब कुछ जानूँ और ज्ञानानंद में रहता हूँ
शुभ और अशुभ…

भाव शुभाशुभ पल पल होकर मुझको छलते रहते हैं
किन्तु स्वभाव से भिन्न सदा वो उपर उपर तिरते हैं-2
जैसे जल में तेल जुदा है वैसे जुदा मैं रहता हूँ
शुभ और अशुभ…

पर्यायें आती जाती हैं पर मेरी ध्रुवता ना जाये
पर्यायों में रहकर भी मुझसे मेरी प्रभुता ना जाये-2
पर्यायों से भी पार सदा मैं अपने में ध्रुव रहता हूँ
शुभ और अशुभ…

जिनेन्द्र मूरत में हमने देखा स्वयं की सूरत झलक रही है
लिया जो अनुभव में हमने उनको सहज में दृष्टि सुलझ रही है।
जिनेन्द्र मूरत…

भले ही सारा ये जग निहारें वो किन्तु स्व में ही स्व निहारें
लिया जो श्रद्धा में हमने उनको कली रत्नत्रय की खिल रही है
जिनेन्द्र मूरत…

हैं वीतरागी प्रभु हमारे, उन्हीं के चरणों में सिर हमारे
लिया जो भक्ति में हमने उनको विपत्तियां सारी टल रही है
जिनेन्द्र मूरत…

सुनी देशना प्रभु तुम्हारी, कमबद्ध हो गयी मति हमारी
होना है जो वो निश्चित ही होगा, कर्तव्य हिमगिरी पिघल रही है।
जिनेन्द्र मूरत…

काव्य

शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ
मैं नित्य निरंजन हूँ, सब जाननहारा हूँ

मैं ज्ञाता दृष्टा हूँ चेतन चिद्रूपी हूँ
गुण ज्ञान अनंत सहित मैं सिद्ध स्परूपी हूँ
मैं अमल अखंड अतुल अविकल अविनाशी हूँ
अविकारी अजर अमर निज ज्योति प्रकाशी हूँ
रागादिक भाव मलिन मैं तो उजियारा हूँ।। मैं नित्य निरंजन हूँ सब जाननहारा हूँ

मैं ज्ञानानन्द मयी अविकल अविनाशी हूँ
चैतन्य स्वरूपी हूँ परद्रव्य प्रभावी हूँ
परभावों में पडकर मैं निज को भूल गया
पुदगल की संपत्ति पा निज के प्रतिकूल गया।
अब अपने को लख लूँ, मुनिगण का प्यारा हूँ। शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ।

है संग अचेतन का भव भव में भटका हूँ
पुदगल का रूप धरे चहुँगति में अटका हूँ
शुभ अशुभ विभाव किये आश्रव को अपनाया।
संवर से दूर रहा, भव भव में दुख पाया।
चौरासी लाख भटक थक थक के हारा हूँ।। मैं नित्य निरंजन हूँ, सब जाननहारा हूँ।

मिथ्यात्व महातम की छायी बदरी कारी
समकित की किरणों से आयेगी उजियारी
रतनत्रय धारूँ तो अंतर उजियारा हो
भव बंधन कट जायें दुख से छुटकारा हो
ज्योति झिलमिल चमके मैं अनुपम तारा हूँ। शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ।

काव्य

मोक्ष के प्रेमी हमने कर्मों से लड़ते देखे
मखमल पर सोने वाले भूमि पर चलते देखे।

सरसों का भी इक दाना जिनके तन में चुभता था
काया की सुध छोड़ी गीदड़ तन खाते देखे ।
मोक्ष के …

ऐसे श्री पारस स्वामि तद्भव थे मोक्षगामी
कर्मों ने नाहीं बख्शा, पत्थर तक गिरते देखे
मोक्ष के …

सेठों में सेठ सुदर्शन कामी रानी का बंधन
शील को नाहीं छोड़ा सूली पर चढ़ते देखे
मोक्ष के …

ऐसे निकलंक स्वामि अध्ययन करने की ठानी
जिनशासन नाहीं छोड़ा मस्तक तक कटते देखे
मोक्ष के …

भोगों को अब तो त्यागो जागो चेतन अब जागो
आशा ना पूरी होती मरघट तक जाते देखे
मोक्ष के …

अर्जुन व भीम जिनके बल का ना पार था
आत्म उन्नति के कारण अग्नि में जलते देखे
मोक्ष के …

अन्तर्ध्वनि पुष्प 2

भले रूठ जाये ये सारा जमाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना
ये श्रद्धान मेरा है मेरू समाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना

मेरे ज्ञान और ध्यान में बस तुम्हीं हो, अटल मेरे श्रद्धान में बस तुम्हीं हो
नहीं लाज गौरव ना भय मुझको खाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना

तुम्हीं से मुझे मुक्तिमार्ग मिला है, रतनत्रय का सुन्दर चमन ये खिला है
ना तीर्थंकरों के है कुल को लजाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना

मैं हूँ मात्र ज्ञायक ये अनुभव में जाना, तिहूँ लोक में बस उपादेय माना
ये ऋषियों का ऋण है मुझे जो चुकाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना

हैं आदर्श अकलंक गुरुवर हमारे हैं निकलंक हम सबको प्राणों से प्यारे
धर्म के लिये जिनने मस्तक कटाया, नहीं जैन कुल को उन्होंने लजाया
उसी मार्ग पर हमको चलके दिखाना, नहीं रागियों की शरण में है जाना
बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना, बस इक वीतरागी को सिर है झुकाना

ज्ञान सम्यक मेरा हो गया, ज्ञान सम्यक मेरा हो गया
मिथ्याभ्रम का अंधेरा विलय हो गया, ज्ञान सम्यक मेरा हो गया

दृष्टि एकांत की ही बनी थी मेरी, और अनेकांत से बेखबर मैं रहा-2
स्याद्वादी सहज हो गया, ज्ञान में ज्ञान का ज्ञान अब हो गया
ज्ञान सम्यक मेरा हो गया…

माना अपना उसे जो ना अपना हुआ, जो था अपना उसी से पराया रहा-2
भेदविज्ञान अब हो गया, इक अभेद की धारा में मैं बह गया
ज्ञान सम्यक मेरा हो गया…

वीतरागी प्रभु वीतरागी गुरु, मोक्ष की मानों तैयारी हो गई शुरू-2
धन्य नरभव मेरा हो गया, राग जाने ना जाने कहाँ खो गया
ज्ञान सम्यक मेरा हो गया…

दृष्टि में आत्मा भवित परमात्मा, ऐसी आराधना होउँ सिद्धात्मा-2
मार्ग ऐसा मुझे मिल गया, मानो भव के भ्रमण का हरण हो गया।
ज्ञान सम्यक मेरा हो गया…

जब मुनिवर आते हैं वैराग्य जगाते हैं
परद्रव्यों से हमको वो भिन्न बताते हैं, परभावों से हमको वो भिन्न बताते हैं।

मुनिराज रहें वन में, नहीं राग करें तन में,
बारह भावना रहे बस जिनके चिन्तन
सिद्धों जैसा बनने का मार्ग बताते हैं-2
परद्रव्यों से हमको वो भिन्न बताते हैं, परभावों से हमको वो भिन्न बताते हैं।

नहिं विषयों की आशा बोले हित मित भाषा
परिग्रह से दूर रहें नहिं रखते अभिलाषा
समता और शांति का वो पाठ पढ़ाते हैं
परद्रव्यों से हमको वो भिन्न बताते हैं, परभावों से हमको वो भिन्न बताते हैं।

अरि मित्र अरु महल मसान, निंदक या स्तुतिवान
कोई अर्घ्य उतारनवार, कोई असि से करे प्रहार
प्रत्येक स्थिति में समभाव जगाते हैं-2
परद्रव्यों से हमको वो भिन्न बताते हैं, परभावों से हमको वो भिन्न बताते हैं।

कर भव्यों पर करुणा, करते श्रुत की रचना
और अशुभ भाव से वो बस चाहते हैं बचना
शुद्धोपयोग का ही पुरुषार्थ बढ़ाते हैं-2
परद्रव्यों से हमको वो भिन्न बताते हैं, परभावों से हमको वो भिन्न बताते हैं।

स्वर्ग से सुन्दर अनुपम है ये जिनवर का दरबार
श्रद्धा से जो ध्याये निश्चित हो जाता भव पार
यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा

कभी ना टूटे श्रद्धा तुम पर भगवान हमारी
झुक जायेगी जीवन में प्रतिकूलता सारी
है विश्वास हमारा इक दिन छूटेगा संसार
यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा

निर्वाछक है भगवन ये आराधना हमारी
होवे दशा हमारी बस जैसी हुई तुम्हारी
रत्नत्रय का मार्ग चलेंगे पायें मुक्ति द्वार
यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा

स्यादवाद वाणी ही भ्रम का अज्ञान मिटाये
निजगुण पर्यायें ही है अपना परिवार बताये
ना भूलेंगे मुनिराजों का ये अनंत उपकार
यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा

लोकालोक झलकते कैवल्य ज्ञान है पाया
फिर भी शुद्धातम ही बस उपादेय बतलाया
मानों आज मिला मुझको ये द्वादशांग का सार
यही श्रद्धान हमारा, नमन हो तुम्हें हमारा

अपना करना हो कल्याण सांचे गुरुवर को पहिचान
जिनकी वाणी में अमृत बरसता है-2
अपना करना हो…

रहते शुद्धात्म में लीन जो हैं विषय कषाय विहीन
जिनके ज्ञान में ज्ञायक झलकता है।
अपना करना हो…

जिनकी वीतराग छवि प्यारी, मिथ्या तिमिर मिटावनहारी
जिनके चरणों में चक्की भी झुकता है
अपना करना हो…

पाकर ऐसे गुरु का संग ध्याओ ज्ञायक रूप असंग
निज के आश्रय से ही शिव मिलता है।
अपना करना हो…

अनुभव करो ज्ञान में ज्ञान, होवे ध्येय रूप का ध्यान
फेरा भव भव का ऐसे ही मिटता है।
अपना करना हो…

मेरी मैली परिणति नाथ कब निर्मल होगी
कब परसन्मुखता त्याग स्वसन्मुख होगी
मेरी मैली…

काल अनादि से भववासी, भ्रमता आया लख चौरासी
यह भवदुखदायी चाल मंगलमय होगी
मेरी मैली…

आपा पर का भेद ना जाना रत्नत्रय निधि ना पहिचाना
कब घर जैनागम सार समकितमय होगी
मेरी मैली…

पंच समिति और पंच महाव्रत, षट् आवश्यक सात शेषधर
तज अज्ञ विषय विष पांच मुनि बन शुद्ध होगी
मेरी मैली…

अन्तर बाहिर परिग्रह त्यागूं द्वादश विधि तप को आचारूँ
कब घर निज ध्रुव का ध्यान, ध्रुवमय ही होगी
मेरी मैली…

तेरा ज्ञानामृत रस पीकर काल अनादि का जहर फुलाकर
कब अनंतकाल को नाथ आनंदमय होगी
मेरी मैली…

छोड़ जगत की आश वास सब, तेरी शरणा गही नाथ अब
कर नेम प्राप्त ध्वनिसार, तन्मय ही होगी।
मेरी मैली…

घर में वैरागी भरत जी घर में ही वैरागी
जड़ वैभव से भिन्न स्वयं में निज वैभव अनुरागी
घर में ही …

छह खण्डों को तुमने जीता ये कहने में आता
लेकिन जग की विजय में उनने खुद को हारा पाया
भोर भयी समकित की अंतर रैन मोह की भागी
घर में ही …

धन्य धन्य हैं लोग वही जो दिव्यध्वनि सुन पाते
किन्तु भरत जी छह खण्डों पर विजय ध्वजा फहराते
भाग्यवान कहे सारी दुनियाँ, पर समझें वो अभागी
घर में ही …

चक्रवर्ति थे छह खण्डों के पर अखण्ड अंतर में
बाहर से भोगी दिखते पर योगी अभ्यंतर में
चक्की पद भी नहीं सुहाये, शुद्धात्म रुचि लागी
घर में ही …

भावलिंगी सन्तों की प्रतिदिन भरत प्रतिज्ञा करते
नवदा भक्ति से पड़गाहन का भाव हृदय में धरते
हुये एक अंतर्मुहूर्त में सारे जग के त्यागी
घर में ही …

काव्य

ज्ञायक उसके लक्ष्य में आवे जो पढ़ ले इक बार
समयसार समयसार महाग्रंथ समयसार
कुन्द कुन्द मुनि के चरणों में वन्दन बारंबार
समयसार समयसार…

काम भोग बंधन की कथा तो सबको सहज सुलभ है
पर से भिन्न एकत्व भाव की उपलब्धि दुर्लभ है
दुर्लभ सहज सुलभ हो जावे ऐसा चमत्कार, समयसार समयसार…

कौतुहली निजातम का मरकर भी तुम हो जाना
और पडौसी बनकर पर का आतम अनुभव लाना
पर द्रव्यों से भिन्न त्रिकाली जब अनुभव में आयेगा
शरीरादि पुदगल द्रव्यों का सर्व विमोह पलायेगा
ऐसा निर्मल भेदज्ञान ही आत्मख्याति का सार, समयसार समयसार…

जैसे लोह समान स्वर्ण की बेड़ी भी है बांधती
वैसे ही शुभ अशुभ कर्म की दोनों बेड़ी बांधती
पुण्य भला है पाप बुरा है अज्ञानी ये मानता
लेकिन इनमें कोई ना अंतर सम्यकज्ञानी जानता
नवतत्वों में छिपा हुआ है ऐसा जाननहार। समयसार समयसार…

धन का अर्थी जैसे जग में राजा की सेवा करे
चले उसी की आज्ञा में और रुचिपूर्वक श्रद्धा करे
यदि चाहिये मोक्ष तुम्हें तो जीवराज को जानिये
करो लीनता उसमें ही और श्रद्धा से पहिचानिये
अशरीरी होने का मानों स्वप्न हुआ साकार। समयसार समयसार…

काव्य

कोई ना दे सकता है इस जग में किसी का साथ
इसीलिये प्रभु रख लिये तुमने हाथों पे हाथ
तुमने बतलाया प्रभुवर हर जीव स्वयं का नाथ।
इसीलिये प्रभु रख लिये तुमने हाथों पे हाथ

वीतराग भावों से प्रभुवर तुमने जगत निहारा है।
अंतर में अपने चैतन्य प्रभु का लिया सहारा है।
हो धन्य आप है जिनवर छोडे सब पुण्य रू पाप
इसीलिये…

सुना है शरणागत भव्यों को मुक्तिमार्ग बतलाते हो
भोगों में सुख नहीं है हमको सच्ची बात बताते हो।
अमृतमय दिव्यध्वनि की करते हो तुम बरसात,
इसीलिये…

आराधक के जीवन में शुभ भाव सहज ही आता है
बहूँ शुभाशुभ भावों से बस यही भावना भाता है
हूँ स्वयं पूर्ण अपने में बस एक यही परमार्थ
इसीलिये…

विषयों की अभिलाषा ले जो शरण आपकी आते हैं।
वीतराग मुद्रा को लखकर निर्वांछक हो जाते हैं।
भिक्षा लेने आते हैं और दीक्षा लेकर जाते हैं।
अपनी प्रभुता अपने में प्रगटे अपने ही आप
इसीलिये…

काव्य

जिनको जिनधर्म सुहाया जिनराज हो गये
वे तीन लोक के देखो सिरताज हो गये।

निज साधन से निज साधक को जिनने साध्य बनाया।
जंगल में मंगल स्वरूप निज आत्म तत्व को ध्याया
वो धरके दिगम्बर चोला मुनिराज हो गये।
जिनको…

समयसार दर्पण में जिनको जाननहार जणाया
फिर प्रमत्त अप्रमत्त दशा से खुद को भिन्न लखाया
जो पडे अधूरे मानो सब काज हो गये।
जिनको…

अनेकान्त की छाया में मुझे अनेकान्त दिखलाया
रहकर स्वयं अकर्ता मुझको अकर्तृत्व समझाया।
वो बिन बोले दिव्यध्वनि की आवाज हो गये
जिनको…

अहो प्रयोजन-भूत तत्त्व जब से दृष्टि में आया
चक्रवर्ति और इन्द्र सम्पदा को असार है पाया
वो खेल खेल में तारण तरण जिहाज हो गये।
जिनको…

क्रोध भाव से भिन्न निहारा क्षमा भाव प्रगटाया
द्रव्य दृष्टि से देखा तो परमात्म पना ही पाया
जिनशासन का वो राज कर महाराज हो गये।
जिनको…

ये प्रण है हमारा, ना जन्में दोबारा
क्योंकि विषयों में आनन्द हमको आता नहीं
अरे इस झूठे जग में रहना हमको भाता नहीं।

1 जिन जिन संयोगों में हमने अपनापन दिखलाया
भ्रम बुद्धि से हमने खुद अपना संसार बढ़ाया।
भव भव से हो छुटकारा, संकल्प हमारा
क्योंकि …

2 द्रव्य क्षेत्र अरु काल भाव से मैं इस जग से न्यारा
छह द्रव्यों से भिन्न चाल है मेरा रूप निराला
चैतन्य प्रभु हमारा जब से हमने निहारा
तब से विषयों में आनन्द हमको आता नहीं
अरे …

3 धन्य धन्य हैं कुन्द कुन्द जो समयसार दिखलाया
अमृतचन्द्र गुरु उपकारी हमको भगवान बताया
निग्रंथ मार्ग है प्यारा लेंगे उसका सहारा
क्योंकि …

4 ग्रहण किया प्रज्ञा से मैं चैतक ही हूँ ये जाना
अन्य सभी परभाव भिन्न मुझसे ये मैंने माना
प्रज्ञा से ही भेद और प्रज्ञा से ग्रहण बताया
भेदों में भी इक अभेद दृष्टि में आज समाया
निज में निज की प्रभुता को जब से हमने स्वीकारा
तब से…

अंतर में सिद्धों की महिमा समायी, बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई
परमात्म अपना देता दिखाई बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई

1 कहने को सिद्धालय वासी, किन्तु आप तो ज्ञान निवासी
राग द्वेष विन निर्विकल्प, ज्ञान दृष्टि से हो सविकल्प
दृष्टि अनेकांत की उपजायी, बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई

2 एक सिद्ध में सिद्ध अनंत, गुण पर्याय अनंतानंत
सबकी सत्ता न्यारी-न्यारी, प्रगटायो अवगाहन भारी
कणकण की स्वाधीनता चित्त भायी, बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई

3 अंतिम पौरुष मोक्ष को साधा, भव बंधन की मिट गई बाधा
नयातीत पद तुमने पाया, नय विकल्प का भेद मिटाया
ज्ञान मात्र सत्ता अनुभव में आई, बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई

4 अगुरुलघु गुण को प्रगटाया, सिद्ध सुकुल प्रभुवर ने पाया
अंतर में समभाव जगाया गोत्र कर्म समूल नशाया।
प्रभुता में गुरुता लघुता ना पायी, बधाई हो बधाई चेतन तुमको बधाई

सर्वज्ञ के वचन सदा जयवंत रहेंगे
इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

प्रतिकूलताओं में भी समता भाव संभारा, जिनने सदा स्वयं को अकर्ता ही निहारा
निश्चित ही एक दिन वो भव का अंत करेंगे, इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

चारित्र ही बस धर्म है ये पाठ पढ़ाते, बस मोक्षमार्ग में ही अपने चरण बढ़ाते
उपसर्ग परिषह में भी निष्कंप रहेंगे, इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

गौरव हैं जैन धर्म के मुनिराज हमारे, जो बंधनों में भी स्वयं को मुक्त निहारें
वो तत्व के अभ्यास में निशंक रहेंगे, इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

जो माने मुनि को वही तो पुण्य आत्मा, जो जाने मुनि का स्वरूप भव्य आत्मा
परभाव को पर जानके निर्ग्रंथ रहेंगे, इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

करते त्रिकाल वंदना वनवासी संत की, अनियत विहारी हैं सदा महिमा महन्त की
जो नंतकाल मुक्ति रमा कंत रहेंगे, इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे।

अन्तर्ध्वनि पुष्प 4

स्वयमेव इस जगत का सब काम हो रहा है।
हमको भी धीरे धीरे श्रद्धान हो रहा है।

करने को जड़ का कार्य तुझे जड़ ही होना होगा।
अज्ञान में हे चेतन अज्ञान को ही भोगा।
जो होने योग्य होता बस वो ही हो रहा है।

ज्यों स्वर्ण भाव में से नहीं लोह भाव होवे
त्यों ज्ञान भाव में से बस ज्ञान भाव होवे
कर्तृत्व का ये बोझा अब तो उतर रहा है।

केवलि स्वयं भी अपनी पर्यायों के हैं कर्ता
पर फेरफार उनमें करने में हैं अकर्ता
ज्ञातृत्व भाव में ही आनन्द हो रहा है।

हे सिद्धराज तुमने पाई दशा है जैसी
संकल्प है ये मेरा मैं भी धरूँगा वैसी
अब स्वयं का स्वयं में विश्राम हो रहा है।

रागी ने वीतरागी को राग से ही जाना
ज्ञाता स्वरूप उनका नाही कभी पिछाना
कण कण स्वतंत्र अपनी सत्ता में सो रहा है।

आये श्रद्धा में भगवान , आज मैं धन्य हुआ

अनुभव में आतम राम , आज मैं धन्य हुआ

तेरी अस्ति मेरी वस्ति, मेरी अस्ति तेरी बस्ति
ऐसी करूं प्रभु की भक्ति, आज लगा दूँ सारी शक्ति
निज में पाया विश्राम, आज मैं धन्य हुआ

सुरपति जिनको करते वन्दन, जो हैं सिद्धों के लघुनन्दन
निज स्वभाव के हैं अभिलाषी, मुक्ति पुरी के है प्रत्याशी
मिला सुख से भरा गोदाम आज मैं धन्य हुआ।

कण कण को जो भर भर देखा, पाया नहीं मैं सुख की रेखा
हे जिनवर जब तुम्हें निहारा, समता रस की बह गई धारा
भव भ्रमण में लगा विराम , आज मैं धन्य हुआ

समकित का संगीत सुहाया, साधन साध्य स्वयं में पाया।
तुम जैसा भगवंत मिला है, मुक्तिपुरी का पंथ मिला है।
शुद्धात्म लिया पहिचान , आज मैं धन्य हुआ।

वीतरागता की ये मस्ती, नहीं समझना इसको सस्ती
ज्ञायक भाव की अद्भूत मस्ति, नहीं समझना इसको सस्ती
मैं भी हूँ सिद्ध समान , आज मैं धन्य हुआ

गुरूओं के उपकार को हरगिज भुला सकते नहीं

तन भुला सकते हैं पर चेतन भुला सकते नहीं
गुरूओं के …

श्रुत का श्रवण और पठन पाठन जीव को हितकार है
जिसके हृदय में आ बसे बस वो जगत का ताज है–2
प्राण देकर भी कभी कीमत चुका सकते नहीं।
गुरूओं के …

है अनन्त उपकार उनका जो ये वाणी दे गये
हम भी बने भगवान हममे बीज ऐसे बो गये–2
अहो वचनातीत को वचनों में ला सकते नहीं
गुरूओं के …

केवली श्रुतकेवली भणिदं ये तीर्थ अपार है
चैतन्य प्रभु ही मात्र उस, संपूर्ण श्रुत का सार हैं–2
श्रवण बिन भव भ्रमण का फेरा मिटा सकते नहीं।
गुरूओं के …

सुपूर्ण पृथ्वी पत्र हो चाहे वनस्पति कलम हो
लवण से लेकर स्वयंभूरमण स्याही परम हो–भले स्याही परम हो।
सामर्थ्य हम असमर्थ शब्दों में बता सकते नहीं।
गुरूओं के …

जिनके सदा श्रद्धान ज्ञान चरित्र में है आत्मा
त्याग में अरू योग संवर में सदा शुद्धात्मा–है सदा शुद्धात्मा
मेरू–सम श्रद्धान मुनिवर का डिगा सकते नहीं।
गुरूओं के …

बन्धनों में मुक्त को स्वीकार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ

धन्य थे सुकुमाल मुनि जिन धैर्य को धारा
देह में रहते हुये निर्देही निहारा
ऐसी सम्यक् दृष्टि का सत्कार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ

मुक्त होने की कला गुरुओं ने समझाई
चल पड़े जो मार्ग पर उनने सहज पाई
भव भ्रमण का आज उपसंहार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ

धर्म का मंडन करें खंडन करें भ्रम का
मुक्त की आराधना, पुरुषार्थ मुक्ति का
अब तो सम्यक् रत्नों का श्रृंगार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ

चाहते हो भव दुःखों से मुक्त जो होना
तो हो अंगीकार बस भ्रामण्य का होना
व्यक्त से अव्यक्त का निर्धार करता हूँ।
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ

जो भव से तिर गये वो लोग और थे
मुक्ति में जा बसे वो लोग और थे
मरते हैं लोग उम्र भर जीने की चाह में
जो अमर हो गये वो लोग और थे
हम सो रहे थे आज तक निद्रा में मोह की
हमको जगा गये वो लोग और थे
जड़ पर झुके अनादि से चैतन्य के लिये
जग को झुका गये वो लोग और थे
मिथ्यात्व की दशा में पत्थर हम बने रहे
पत्थर को मूर्ति कर गये वो लोग और थे
विग्रह में और परिग्रह में जीवन गँवा दिया
निर्ग्रन्थ हो गये वो लोग और थे
आडम्बरों का बोझ ये ढोने में जग लगा
जो हो गये दिगम्बर वो लोग और थे
कुटिया की जरूरत महलों की चाह की
जो देह को भी तज गये वो लोग और थे
मनमानी छोड़ के हमें जिनवाणी दे गये
अमृत पिला गये वो लोग और थे
मुझे दीन हीन पामर सारा ये जग कहे
पूछो ना मुझसे कोई कितने हैं दुःख सहे
भगवान मुझको कह गये वो लोग और थे

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2113.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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