बन्धनों में मुक्त को स्वीकार करता हूँ | Bandhanon Mein Mukt Ko Svikar Karta Hun

बन्धनों में मुक्त को स्वीकार करता हूँ

बन्धनों में मुक्त को स्वीकार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ
धन्य थे सुकुमाल मुनि जिन धैर्य को धारा
देह में रहते हुये निर्देही निहारा
ऐसी सम्यक् दृष्टि का सत्कार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ
मुक्त होने की कला गुरुओं ने समझाई
चल पड़े जो मार्ग पर उनने सहज पाई
भव भ्रमण का आज उपसंहार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ
धर्म का मंडन करें खंडन करें भ्रम का
मुक्त की आराधना, पुरुषार्थ मुक्ति का
अब तो सम्यक् रत्नों का श्रृंगार करता हूँ
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ
चाहते हो भव दुःखों से मुक्त जो होना
तो हो अंगीकार बस भ्रामण्य का होना
व्यक्त से अव्यक्त का निर्धार करता हूँ ।
अपने ज्ञायक भाव में विहार करता हूँ


स्रोत: अन्तर्ध्वनि पुष्प १ (अन्तर्ध्वनि पुष्प 1 - जैन स्वाध्याय सामग्री | Antardhvani Pushp 1)