जो भव से तिर गये वो लोग और थे
मुक्ति में जा बसे वो लोग और थे
मरते हैं लोग उम्र भर जीने की चाह में
जो अमर हो गये वो लोग और थे
हम सो रहे थे आज तक निद्रा में मोह की
हमको जगा गये वो लोग और थे
जड़ पर झुके अनादि से चैतन्य के लिये
जग को झुका गये वो लोग और थे
मिथ्यात्व की दशा में पत्थर हम बने रहे
पत्थर को मूर्ति कर गये वो लोग और थे
विग्रह में और परिग्रह में जीवन गँवा दिया
निर्ग्रन्थ हो गये वो लोग और थे
आडम्बरों का बोझ ये ढोने में जग लगा
जो हो गये दिगम्बर वो लोग और थे
कुटिया की जरूरत महलों की चाह की
जो देह को भी तज गये वो लोग और थे
मनमानी छोड़ के हमें जिनवाणी दे गये
अमृत पिला गये वो लोग और थे
मुझे दीन हीन पामर सारा ये जग कहे
पूछो ना मुझसे कोई कितने हैं दुःख सहे
भगवान मुझको कह गये वो लोग और थे
स्रोत: अन्तर्ध्वनि पुष्प १ (अन्तर्ध्वनि पुष्प 1 - जैन स्वाध्याय सामग्री | Antardhvani Pushp 1)