मैं चेतन हूँ, जड़ पुद्गल से भिन्न | Main Chetan Hun, Jad Pudgal Se Bhinn

मैं चेतन हूँ, जड़ पुद्गल से भिन्न

मैं चेतन हूँ, जड़ पुद्गल से भिन्न सदा ही रहता हूँ
शुभ और अशुभ तो दूर रहो पर्याय से भी भिन्न रहता हूँ
मेरा ज्ञान अनंत है जिसमें, स्पष्ट झलकते ज्ञेय सभी
लेकिन ज्ञेय ना मुझमें आते, मैं ना समाता उनमें कभी-2
फिर भी मैं सब कुछ जानूँ और ज्ञानानंद में रहता हूँ

शुभ और अशुभ…

भाव शुभाशुभ पल पल होकर मुझको छलते रहते हैं
किन्तु स्वभाव से भिन्न सदा वो उपर उपर तिरते हैं-2
जैसे जल में तेल जुदा है वैसे जुदा मैं रहता हूँ

शुभ और अशुभ…

पर्यायें आती जाती हैं पर मेरी ध्रुवता ना जाये
पर्यायों में रहकर भी मुझसे मेरी प्रभुता ना जाये-2
पर्यायों से भी पार सदा मैं अपने में ध्रुव रहता हूँ

शुभ और अशुभ…


स्रोत: अन्तर्ध्वनि पुष्प १ (अन्तर्ध्वनि पुष्प 1 - जैन स्वाध्याय सामग्री | Antardhvani Pushp 1)

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