योगसार (जोगसारु) मूल दोहा | Yogsar (Jogsaru) Mool Doha (Muniraj Yogindu Dev)

योगसार (जोगसारु) मूल दोहा

मुनिराज योगीन्दु देव

मुनिराज योगीन्दु देव कृत योगसार (जोगसारु) के अपभ्रंश मूल दोहे 1 से 108, क्रम से। ग्रंथ में अधिकार-विभाग नहीं है, इसलिए पढ़ने की सुविधा के लिए 27-27 दोहों के चार भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ हैं। दोहा 38 और 47 सोरठा तथा दोहा 40 चौपाई छंद में है, जैसा ग्रंथ में छपा है।

पाठ संलग्न ग्रंथ (पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर; सम्पादन डॉ. वीरसागर जैन; हिन्दी पद्यानुवाद डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल) के अनुसार है। यहाँ केवल मूल दोहे हैं, पद्यानुवाद और अर्थ नहीं। ग्रंथ के अपने पाठान्तर हर भाग के नीचे दिए हैं; जहाँ छपाई की भूल लगी, वहाँ पाठ नहीं बदला, उस भाग के नीचे टिप्पणी दी।

संबंधित: श्री योगसार महामण्डल विधान

स्रोत: Yogsaar Jogsaaru (Dr. Bharill) Jaipur Prakashan.pdf

Yogsaar Jogsaaru (Dr. Bharill) Jaipur Prakashan.pdf (129 KB)

दोहे और हर दोहे का अर्थ साथ में: योगसार (जोगसारु) दोहा एवं अर्थ (मुनिराज योगीन्दु देव) | Yogsar Doha Evam Arth (Muniraj Yogindu Dev)


योगसार मूल दोहा (दोहा 1 से 27)

णिम्मल-झाण-परिट्ठिया, कम्म-कलंक डहेवि।
अप्पा लद्धउ जेण परु, ते परमप्प णवेवि।।1।।

घाइ-चउक्कहँ किउ विलउ, णंत-चउक्कु पदिट्ठु।
तह जिणइंदहँ पय णविवि, अक्खमि कव्वु सु-इट्ठु।।2।।

संसारहँ भयभीयहँ, मोक्खहँ लालसियाहँ।
अप्पा-संबोहण-कयइ, दोहा एक्कमणाहँ।।3।।

कालु अणाइ अणाइ जिउ, भव-सायरु जि अणंतु।
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, णवि सुह दुक्ख जि पत्तु।।4।।

जइ बीहउ चउ-गइ-गमण, तो पर-भाव चएहि।
अप्पा झायहि णिम्मलउ, जिम सिव-सुक्ख लहेहि।।5।।

ति-पयारो अप्पा मुणहि, परु अंतरु बहिरप्पु।
पर झायहि अंतर-सहिउ, बाहिरु चयहि णिभंतु।।6।।

मिच्छा-दंसण-मोहियउ, परु अप्पा ण मुणेइ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुण संसार भमेइ।।7।।

जो परियाणइ अप्पु परु, जो परभाव चएइ।
सो पंडिउ अप्पा मुणहु, सो संसारु मुएइ।।8।।

णिम्मलु णिक्कलु सुद्धु जिणु, विण्हु बुद्धु सिवु संतु।
सो परमप्पा जिण-भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु।।9।।

देहादिउ जे पर कहिय, ते अप्पाणु मुणेइ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुणु संसारु भमेइ।।10।।

देहादिउ जे पर कहिय, ते अप्पाणु ण होहि।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, अप्पा अप्प मुणेहि।।11।।

अप्पा अप्पउ जइ मुणहि, तो णिव्वाणु लहेहि।
पर अप्पा जइ मुणहि तुहुँ, तो संसारु भमेहि।।12।।

इच्छा-रहियउ तव करहि, अप्पा अप्पु मुणेहि।
तो लहु पावहि परम-गई, फुडु संसारु ण एहि।।13।।

परिणामे बंधु जि कहिउ, मोक्ख वि तह जि वियाणि।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, तहभाव हु परियाणि।।14।।

अह पुणु अप्पा णवि मुणहि, पुण्णु जि करहि असेस।
तो वि ण पावहि सिद्ध-सुहु, पुणु संसारु भमेस।।15।।

अप्पा-दंसणु एक्कु परु, अण्णु ण किं पि वियाणि।
मोक्खहँ कारण जोइया, णिच्छइँ एहउ जाणि।।16।।

मग्गण-गुणठाणइ कहिय, विवहारेण वि दिट्ठि।
णिच्छय-णइँ अप्पा मुणहि, जिम पावहु परमेट्ठि।।17।।

गिहि-वावार-परिट्ठिया, हेयाहेउ मुणंति।
अणुदिणु झायहिं देउ जिणु, लहु णिव्वाणु लहंति।।18।।

जिणु सुमिरहु जिणु चिंतवहु, जिणु झायहु सुमणेण।
सो झायंतहँ परम-पउ, लब्भइ एक्क-खणेण।।19।।

सुद्धप्पा अरु जिणवरहँ, भेउ म किं पि वियाणि।
मोक्खहँ कारण जोइया, णिच्छइँ एउ वियाणि।।20।।

जो जिणु सो अप्पा मुणहु, इहु सिद्धंतहँ सारु।
इउ जाणेविणु जोइयहो, अण्णु म करहु वियप्पु।।21।।

जो परमप्पा सो जि हउँ, जो हउँ सो परमप्पु।
इउ जाणेविणु जोइया, अण्णु म करहु वियप्पु।।22।।

सुद्ध-पएसहँ पूरियउ, लोयायास-पमाणु।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, पावहु लहु णिव्वाणु।।23।।

णिच्छइँ लोय-पमाणु मुणि, ववहारेँ सुसरीरु।
एहउ अप्प-सहाउ मुणि, लहु पावहि भव-तीरु।।24।।

चउरासी लक्खहिँ फिरिउ, कालु अणाइ अणंतु।
पर सम्मत्तु ण लद्धु जिय, एहउ जाणि णिभंतु।।25।।

सुद्ध सचेयणु बुद्धु जिणु, केवल-णाण-सहाउ।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, जइ चाहहु सिव-लाहु।।26।।

जाम ण भावहि जीव तुहुँ, णिम्मल अप्प-सहाउ।
ताम ण लब्भइ सिव-गमणु, जहिँ भावइ तहिँ जाउ।।27।।


ग्रंथ की टिप्पणी: दोहा 2 - पाठान्तर : घाइचउक्क हनेवि किउ।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 21 की दूसरी पंक्ति का उत्तरार्ध “अण्णु म करहु वियप्पु” छपा है, जो दोहा 22 का ही अंत है; परंपरागत पाठ “छंडहु मायाचारु” है (पहली पंक्ति के “सारु” से तुक मिलती है)।

योगसार मूल दोहा (दोहा 28 से 54)

जो तइलोयहँ झेउ जिणु, सो अप्पा णिरु वुत्तु।
णिच्छय-णइँ एमइ भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु।।28।।

वय-तव-संजम-मूलगुण, मूढहँ मोक्ख ण वुत्तु।
जाव ण जाणइ इक्क पर, सुद्धउ भाउ पवित्तु।।29।।

जइ णिम्मल अप्पा मुणइ, वय-संजम-संजुत्तु।
तो लहु पावइ सिद्धि-सुह, इउ जिणणाहहँ उत्तु।।30।।

वउ तउ संजमु सीलु जिय, ए सव्वइँ अकयत्थु।
जाव ण जाणइ इक्क परु, सुद्धउ भाउ पवित्तु।।31।।

पुण्णिं पावइ सग्ग जिउ, पावएँ णरय-णिवासु।
बे छंडिवि अप्पा मुणइ, तो लब्भइ सिववासु।।32।।

वउ तउ संजमु सीलु जिय, इउ सव्वइँ ववहारु।
मोक्खहँ कारणु एक्कु मुणि, जो तइलोयहँ सारु।।33।।

अप्पा अप्पइँ जो मुणइ, जो परभाउ चएइ।
सो पावइ सिवपुरि-गमणु, जिणवरु एम भणेइ।।34।।

छह दव्वइँ जे जिण-कहिय, णव पयत्थ जे तत्त।
विवहारेण य उत्तिया, ते जाणियहि पयत्त।।35।।

सव्व अचेयण जाणि जिय, एक्क सचेयणु सारु।
जो जाणेविणु परम-मुणि, लहु पावइ भवपारु।।36।।

जइ णिम्मलु अप्पा मुणहि, छंडिवि सहु ववहारु।
जिण-सामिउ एमइ भणइ, लहु पावइ भवपारु।।37।।

(सोरठा)
जीवाजीवहँ भेउ, जो जाणइ तिं जाणियउ।
मोक्खहँ कारण एउ, भणइ जोइ जोइहिँ भणिउँ।।38।।

केवल-णाण-सहाउ, सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ।
जइ चाहहि सिव-लाहु, भणइ जोइ जोइहिँ भणिउँ।।39।।

(चौपाई)
को सुसमाहि करउ को अंचउ, छोपु-अछोपु करिवि को वंचउ।
हल सहि कलहु केण समाणउ, जहिँ कहिँ जोवउ तहिँ अप्पाणउ।।40।।

ताम कुतित्थइँ परिभमइ, धुत्तिम ताम करेइ।
गुरुहु पसाएँ जाम णवि, अप्पा-देउ मुणेइ।।41।।

तित्थइँ देवलि देउ णवि, इम सुइकेवलि-वुत्तु।
देहा-देवलि देउ जिणु, एहउ जाणि णिरुत्तु।।42।।

देहा-देवलि देउ जिणु, जणु देवलिहिँ णिएइ।
हासउ महु पडिहाइ इहु, सिद्धे भिक्ख भमेइ।।43।।

मूढा देवलि देउ णवि, णवि सिलि लिप्पइ चित्ति।
देहा-देवलि देउ जिणु, सो बुज्झहि समचित्ति।।44।।

तित्थइ देउलि देउ जिणु, सव्वु वि कोइ भणेइ।
देहा-देउलि जो मुणइ, सो बुहु को वि हवेइ।।45।।

जइ जर-मरण-करालियउ, तो जिय धम्म करेहि।
धम्म-रसायणु पियहि तुहुँ, जिम अजरामर होहि।।46।।

(सोरठा)
धम्मु ण पढ़ियइँ होइ, धम्मु ण पोत्था-पिच्छियइँ।
धम्मु ण मढिय-पएसि, धम्मु ण मत्था-लुंचियइँ।।47।।

राय-रोस बे परिहरिवि, जो अप्पाणि वसेइ।
सो धम्मु वि जिण-उत्तियउ, जो पंचम-गइ णेइ।।48।।

आउ गलइ णवि मणु गलइ, णवि आसा हु गलेइ।
मोहु फुरइ ण वि अप्पहिउ, इम संसार भमेइ।।49।।

जेहउ मणु विसयहँ रमइ, तिमु जइ अप्प मुणेइ।
जोइउ भणइ हो जोइयहु, लहु णिव्वाणु लहेइ।।50।।

जेहउ जज्जरु णरय-घरु, तेहउ बुज्झि सरीरु।
अप्पा भावहि णिम्मलउ, लहु पावहि भवतीरु।।51।।

धंधइ पडियउ सयल जगि, णवि अप्पा हु मुणंति।
तहिँ कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिव्वाणु लहंति।।52।।

सत्थ पढंतहँ ते वि जड, अप्पा जे ण मुणंति।
तहिँ कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिव्वाणु लहंति।।53।।

मणु-इंदिहि वि छोडियइ, बुहु पुच्छियइ ण कोइ।
रायहँ पसरु णिवारियइ, सहज उपज्जइ सोइ।।54।।


ग्रंथ की टिप्पणी: दोहा 48 - पाठान्तर : देइ।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 29 में “इक्क पर” छपा है; “इक्कु परु” होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 45 में “तित्थइ” छपा है; “तित्थइँ” होना चाहिए (ग्रंथ की दोहानुक्रमणिका में भी “तित्थइँ” है)।

योगसार मूल दोहा (दोहा 55 से 81)

पुग्गलु अण्णु जि अण्णु जिउ, अण्णु वि सहु ववहारु।
चयहि वि पुग्गलु गहहि जिउ, लहु पावहि भवपारु।।55।।

जे णवि मण्णहिँ जीव फुडु, जे णवि जीउ मुणंति।
ते जिण-णाहहँ उत्तिया, णउ संसार मुचंति।।56।।

रयण दीउ दिणयर दहिउ, दुद्धु घीव पाहाणु।
सुण्णउ रुउ फलिहउ अगिणि, णव दिट्ठंता जाणु।।57।।

देहादिउ जो परु मुणइ, जेहउ सुण्णु अयासु।
सो लहु पावइ बंभु परु, केवलु करइ पयासु।।58।।

जेहउ सुद्ध अयासु जिय, तेहउ अप्पा वुत्तु।
आयासु वि जडु जाणि जिय, अप्पा चेयणुवंतु।।59।।

णासग्गिँ अब्भिंतरहँ, जे जोवहिँ असरीरु।
बाहुडि जम्मि ण संभवहिँ, पिवहिँ ण जणणी-खीरु।।60।।

असरीरु वि सुसरीरु मुणि, इहु सरीरु जडु जाणि।
मिच्छा-मोहु परिच्चयहि, मुत्ति णियं वि ण माणि।।61।।

अप्पइँ अप्पु मुणंतयहँ, किं णेहा फलु होइ।
केवल-णाणु वि परिणवइ, सासय-सुक्खु लहेइ।।62।।

जे परभाव चएवि मुणि, अप्पा अप्प मुणंति।
केवल-णाण-सरुव लइ, ते संसारु मुचंति।।63।।

धण्णा ते भयवंत बुह, जे परभाव चयंति।
लोयालोय-पयासयरु, अप्पा विमल मुणंति।।64।।

सागारु वि णागारु कु वि, जो अप्पाणि वसेइ।
सो लहु पावइ सिद्धि-सुहु, जिणवरु एम भणेइ।।65।।

विरला जाणहिँ तत्तु बुह, विरला णिसुणहिँ तत्तु।
विरला झायहिँ तत्तु जिय, विरला धारहिँ तत्तु।।66।।

इहु परियण ण हु महुतणउ, इहु सुहु-दुक्खहँ हेउ।
इम चिंतंतहँ किं करइ, लहु संसारहँ छेउ।।67।।

इंद फणिंद णरिंद य वि, जीवहँ सरणु ण होंति।
असरणु जाणिवि मुणि-धवल, अप्पा अप्प मुणंति।।68।।

इक्क उपज्जइ मरइ कु वि, दुहु सुहु भुंजइ इक्कु।
णरयहँ जाइ वि इक्क जिउ, तह णिव्वाणहँ इक्कु।।69।।

एक्कुलउ जइ जाइसिहि, तो परभाव चएहि।
अप्पा झायहि णाणमउ, लहु सिव-सुक्ख लहेहि।।70।।

जो पाउ वि सो पाउ मुणि, सब्बु इ को वि मुणेहि।
जो पुण्णु वि पाउ वि भणइ, सो बुह को वि हवेइ।।71।।

जह लोहम्मिय णियउ बुह, तह सुण्णम्मिय जाणि।
जे सुह असुह परिच्चयहिँ, ते वि हवंति हु णाणि।।72।।

जइया मणु णिग्गंथु जिय, तइया तुहुँ णिग्गंथु।
जइया तुहुँ णिग्गंथु जिय, तो लब्भइ सिवपंथु।।73।।

जं वडमज्झहँ बीउ फुडु, बीयहँ वडु वि हु जाणु।
तं देहहँ देउ वि मुणहि, जो तइलोय-पहाणु।।74।।

जो जिण सो हउँ सो जि हउँ, एहउ भाउ णिभंतु।
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु।।75।।

बे ते चउ पंच वि णवह, सत्तहँ छह पंचाहँ।
चउगुण-सहियउ सो मुणह, एयइँ लक्खण जाहँ।।76।।

बे छंडिवि बे-गुण-सहिउ, जो अप्पाणि वसेइ।
जिणु सामिउ एमइँ भणइ, लहु णिव्वाणु लहेइ।।77।।

तिहिँ रहियउ तिहिँ गुण-सहिउ, जो अप्पाणि वसेइ।
सो सासय-सुइ-भायणु वि, जिणवरु एम भणेइ।।78।।

चउ-कसाय-सण्णा-रहिउ, चउ-गुण-सहियउ वुत्तु।
सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ, जिम परु होहि पवित्तु।।79।।

बे-पंचहँ रहियउ मुणहि, बे-पंचहँ संजुत्तु।
बे-पंचहँ जो गुणसहिउ, सो अप्पा णिरु वुत्तु।।80।।

अप्पा दंसणु णाणु मुणि, अप्पा चरणु वियाणि।
अप्पा संजमु सील तउ, अप्पा पच्चक्खाणि।।81।।


टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 71 में “मुणेहि” छपा है; “मुणेइ” होना चाहिए (“हवेइ” से तुक)।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 78 में “सासय-सुइ-भायणु” छपा है; “सासय-सुह-भायणु” होना चाहिए।

योगसार मूल दोहा (दोहा 82 से 108)

जो परियाणइ अप्प परु, सो परु चयइ णिभंतु।
सो सण्णासु मुणेहि तहुँ, केवल-णाणिं उत्तु।।82।।

रयणत्तय-संजुत्त जिउ, उत्तिमु तित्थु पवित्तु।
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु।।83।।

दंसणु जं पिच्छियइ बुह, अप्पा विमल महंतु।
पुणु पुणु अप्पा भावियए, सो चारित्त पवित्तु।।84।।

जहिँ अप्पा तहिँ सयल-गुण, केवलि एम भणंति।
तिहिँ कारणएँ जोइ फुडु, अप्पा विमलु मुणंति।।85।।

एक्कलउ इंदिय-रहियउ, मण-वय-काय-ति-सुद्धि।
अप्पा अप्पु मुणेहि तुहुँ, लहु पावहि सिव-सिद्धि।।86।।

जइ बद्धउ मुक्कउ मुणहि, तो बंधियहि णिभंतु।
सहज-सरूवइ जइ रमहि, तो पायहि सिव संतु।।87।।

सम्माइट्ठी-जीवडहँ, दुग्गइ-गमणु ण होइ।
जइ जाइ वि तो दोसु णवि, पुव्वक्किउ खवणेइ।।88।।

अप्प-सरूवइँ जो रमइ, छंडिवि सहु ववहारु।
सो सम्माइट्ठी हवइ, लहु पावइ भवपारु।।89।।

जो सम्मत्त-पहाण बुहु, सो तइलोय-पहाणु।
केवल-णाण वि लहु लहइ, सासय-सुक्ख-णिहाणु।।90।।

अजरु अमरु गुण-गण-णिलउ, जहिँ अप्पा थिरु ठाइ।
सो कम्मेहिँ ण बंधियउ, संचिय-पुव्व विलाइ।।91।।

जह सलिलेण ण लिप्पियइ, कमलणि-पत्त कया वि।
तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ, जइ रइ अप्प-सहावि।।92।।

जो सम-सुक्ख-णिलीणु बुहु, पुण पुण अप्पु मुणेइ।
कम्मक्खउ करि सो वि फुडु, लहु णिव्वाणु लहेइ।।93।।

पुरिसायार-पमाणु जिय, अप्पा एहु पवित्तु।
जोइज्जइ गुण-गण-णिलउ, णिम्मल-तेय-फुरंतु।।94।।

जो अप्पा सुद्धु वि मुणइ, असुइ-सरीर-विभिण्णु।
सो जाणइ सत्थइँ सयल, सासय-सुक्खहँ लीणु।।95।।

जो णवि जाणइ अप्पु परु, णवि परभाउ चएइ।
सो जाणउ सत्थइँ सयल, ण हु सिवसुक्खु लहेइ।।96।।

वज्जिय सयल-वियप्पइँ परम-समाहि लहंति।
जं विंदहिं साणंदु क वि सो सिव-सुक्ख भणंति।।97।।

जो पिंडत्थु पयत्थु बुह, रूवत्थु वि जिण-उत्तु।
रूवातीतु मुणेहि लहु, जिम परु होहि पवित्तु।।98।।

सव्वे जीवा णाणमया, जो सम-भाव मुणेइ।
सो सामाइउ जाणि फुडु, जिणवर एम भणेइ।।99।।

राय-रोस ये परिहरिवि, जो समभाउ मुणेइ।
सो सामाइउ जाणि फुडु, केवलि एम भणेइ।।100।।

हिंसादिउ-परिहारु करि, जो अप्पा हु ठवेइ।
सो बियऊ चारित्तु मुणि, जो पंचम-गइ णेइ।।101।।

मिच्छादिउ जो परिहरणु, सम्मद्दंसण-सुद्धि।
सो परिहार-विसुद्धि मुणि, लहु पावहि सिव-सिद्धि।।102।।

सुहुमहँ लोहहँ जो विलउ, जो सुहुमु वि परिणामु।
सो सुहुमु वि चारित्त मुणि, सो सासय-सुह-धामु।।103।।

अरहंतु वि सो सिद्धु फुडु, सो आयरिउ वियाणि।
सो उवझायउ सो जि मुणि, णिच्छइँ अप्पा जाणि।।104।।

सो सिउ संकरु विण्हु सो, सो रुद्धु वि सो बुद्धु।
सो जिणु ईसरु बंभु सो, सो अणंतु सो सिद्धु।।105।।

एव हि लक्खण-लक्खियउ, जो परु णिक्कलु देउ।
देहहँ मज्झहिँ सो वसइ, तासु ण विज्जइ भेउ।।106।।

जे सिद्धा जे सिज्झिहिहिँ, जे सिज्झहिँ जिण-उत्तु।
अप्पा-दंसणिँ ते वि फुडु, एहउ जाणि णिभंतु।।107।।

संसारहँ भय-भीयएँ, जोगिचंद-मुणिएण।
अप्पा-संबोहण कया, दोहा इक्क-मणेण।।108।।


ग्रंथ की टिप्पणी: दोहा 83-84 - किसी-किसी प्रति में इन दोनों दोहों में क्रमविपर्यय पाया जाता है अर्थात् 83 के स्थान पर 84वाँ और 84 के स्थान पर 83वाँ दोहा पाया जाता है।

ग्रंथ की टिप्पणी: दोहा 88 - पाठान्तर : खउ होइ।

ग्रंथ की टिप्पणी: दोहा 90-91 - किसी-किसी प्रति में इन दोनों दोहों में क्रमविपर्यय पाया जाता है अर्थात् 90 के स्थान पर 91वाँ और 91 के स्थान पर 90वाँ दोहा पाया जाता है।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 82 में “तहुँ” छपा है; “तुहुँ” होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 87 में “पायहि” छपा है; “पावहि” होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 100 में “ये” छपा है; “बे” होना चाहिए (ग्रंथ की दोहानुक्रमणिका में भी “राय-रोस बे परिहरिवि” है)।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 104 में “उवझायउ” छपा है; “उवज्झायउ” होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 105 में “रुद्धु” छपा है; “रुद्दु” होना चाहिए।

खोज: Yogsar Mul Doha

योगसार (जोगसारु) दोहा एवं अर्थ (मुनिराज योगीन्दु देव) | Yogsar Doha Evam Arth (Muniraj Yogindu Dev)
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
अनुयोग सूची: अनुयोग अनुसार ग्रन्थ (अ से ज्ञ)
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z