योगसार (जोगसारु) दोहा एवं अर्थ (मुनिराज योगीन्दु देव) | Yogsar Doha Evam Arth (Muniraj Yogindu Dev)

योगसार (जोगसारु) दोहा एवं अर्थ

मुनिराज योगीन्दु देव

योगसार के अपभ्रंश मूल दोहे 1 से 108, हर दोहे के नीचे उसका अर्थ, 27-27 दोहों के चार भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। अर्थ संलग्न ग्रंथ (डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल, जयपुर) में हर दोहे के बाद छपे गद्य अर्थ से ज्यों का त्यों लिया है; हरिगीत पद्यानुवाद नहीं लिया, वह नीचे की पीडीएफ में है। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल दोहे (छपाई की टिप्पणियों सहित): योगसार (जोगसारु) मूल दोहा | Yogsar (Jogsaru) Mool Doha (Muniraj Yogindu Dev)

स्रोत: Yogsaar Jogsaaru (Dr. Bharill) Jaipur Prakashan.pdf

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दोहा 1 से 27

णिम्मल-झाण-परिट्ठिया, कम्म-कलंक डहेवि।
अप्पा लद्धउ जेण परु, ते परमप्प णवेवि ॥1॥

अर्थ: जिसने निर्मल ध्यान में पूर्णतः स्थित होकर कर्मरूपी कलंक को जला दिया है और अपने आत्मा को उपलब्ध कर लिया है, उस परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ।


घाइ-चउक्कहँ किउ विलउ, णंत-चउक्कु पदिट्ठु।
तह जिणइंदहँ पय णविवि, अक्खमि कव्वु सु-इट्ठु ॥2॥

अर्थ: जिन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश करके अनन्त चतुष्टय को प्रकट किया है, उन जिनेन्द्र देव के चरणों को नमस्कार करके मैं यहाँ अत्यन्त इष्ट काव्य को कहता हूँ।


संसारहँ भयभीयहँ, मोक्खहँ लालसियाहँ।
अप्पा-संबोहण-कयइ, दोहा एक्कमणाहँ ॥3॥

अर्थ: जो जीव संसार से भयभीत हैं और मोक्ष के लिए लालायित हैं, उनके लिए और अपने आप को भी संबोधित करने के लिए मैंने एकाग्रचित से इन दोहों की रचना की है ।


कालु अणाइ अणाइ जिउ, भव-सायरु जि अणंतु।
मिच्छा-दंसण-मोहियउ, णवि सुह दुक्ख जि पत्तु ॥4॥

अर्थ: काल अनादि-अनन्त है, जीव अनादि-अनन्त है और यह संसार-सागर भी अनादि-अनन्त है । यहाँ मिथ्यादर्शन से मोहित जीव ने कभी भी सुख नहीं प्राप्त किया, अपितु दुःख ही प्राप्त किया ।


जइ बीहउ चउ-गइ-गमण, तो पर-भाव चएहि।
अप्पा झायहि णिम्मलउ, जिम सिव-सुक्ख लहेहि ॥5॥

अर्थ: हे जीव ! यदि तू चतुर्गति के भ्रमण से भयभीत है, तो परभाव का त्याग कर और निर्मल आत्मा का ध्यान कर, ताकि तू मोक्ष-सुख को प्राप्त कर सके ।


ति-पयारो अप्पा मुणहि, परु अंतरु बहिरप्पु।
पर झायहि अंतर-सहिउ, बाहिरु चयहि णिभंतु ॥6॥

अर्थ: आत्मा तीन प्रकार का है - परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा। इनमें से अन्तरात्मा होकर परमात्मा का ध्यान करो और भ्रान्ति - रहित होकर बहिरात्मा का त्याग कर दो।


मिच्छा-दंसण-मोहियउ, परु अप्पा ण मुणेइ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुण संसार भमेइ ॥7॥

अर्थ: जो जीव मिथ्यादर्शन से मोहित है और परमात्मा (अथवा स्व और पर) को नहीं पहिचानता है, उसे जिनेन्द्र देव ने बहिरात्मा कहा है। वह पुनः पुनः संसार में परिभ्रमण करता है।


जो परियाणइ अप्पु परु, जो परभाव चएइ।
सो पंडिउ अप्पा मुणहु, सो संसारु मुएइ ॥8॥

अर्थ: जो जीव परमात्मा (अथवा स्व और पर) को पहिचानता है और परभावों का त्याग कर देता है, उसे पंडित - आत्मा (अन्तरात्मा) समझो। वह संसार को छोड़ देता है।


णिम्मलु णिक्कलु सुद्धु जिणु, विण्हु बुद्धु सिवु संतु।
सो परमप्पा जिण-भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ॥9॥

अर्थ: जो निर्मल है, निष्कल है, शुद्ध है, जिन है, विष्णु है, बुद्ध है, शिव है और शान्त है उसे जिनेन्द्रदेव ने परमात्मा कहा है - ऐसा निःसन्देह जानो।


देहादिउ जे पर कहिय, ते अप्पाणु मुणेइ।
सो बहिरप्पा जिण-भणिउ, पुणु संसारु भमेइ ॥10॥

अर्थ: जो जीव, देह आदि पदार्थों को, जो कि पर कहे गये हैं, आत्मा समझता है, उसे जिनेन्द्र देव ने बहिरात्मा कहा है। वह संसार में पुनः पुनः परिभ्रमण करता रहता है।


देहादिउ जे पर कहिय, ते अप्पाणु ण होहि।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, अप्पा अप्प मुणेहि ॥11॥

अर्थ: हे जीव ! ये जो देह आदि पदार्थ हैं वे पर कहे गये हैं; वे आत्मा नहीं हो सकते। - यह जानकर तू आत्मा को ही आत्मा मान।


अप्पा अप्पउ जइ मुणहि, तो णिव्वाणु लहेहि।
पर अप्पा जइ मुणहि तुहुँ, तो संसारु भमेहि ॥12॥

अर्थ: हे जीव ! यदि तू आत्मा को ही आत्मा समझेगा तो निर्वाण प्राप्त करेगा और यदि पर को आत्मा मानेगा तो संसार में परिभ्रमण करेगा।


इच्छा-रहियउ तव करहि, अप्पा अप्पु मुणेहि।
तो लहु पावहि परम-गई, फुडु संसारु ण एहि ॥13॥

अर्थ: हे भाई ! यदि तू इच्छा-रहित होकर तप करे और आत्मा को ही आत्मा समझे, तो शीघ्र ही परमगति को प्राप्त कर ले और निश्चित रूप से पुनः संसार में न आवे।


परिणामे बंधु जि कहिउ, मोक्ख वि तह जि वियाणि।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, तहभाव हु परियाणि ॥14॥

अर्थ: हे जीव ! परिणाम से ही बंध कहा है और परिणाम से ही मोक्ष कहा है, अतः तू इस बात को अच्छी तरह जानकर अपने भावों को पहिचान।


अह पुणु अप्पा णवि मुणहि, पुण्णु जि करहि असेस।
तो वि ण पावहि सिद्ध-सुहु, पुणु संसारु भमेस ॥15॥

अर्थ: हे जीव ! यदि तू आत्मा को नहीं जानेगा और केवल पुण्य ही पुण्य करता रहेगा तो भी सिद्धसुख को नहीं पा सकेगा, अपितु पुनः पुनः संसार में ही भ्रमण करेगा।


अप्पा-दंसणु एक्कु परु, अण्णु ण किं पि वियाणि।
मोक्खहँ कारण जोइया, णिच्छइँ एहउ जाणि ॥16॥

अर्थ: हे योगी ! एक आत्मदर्शन ही मोक्ष का कारण है, अन्य कुछ भी नहीं - ऐसा तू निश्चित रूप से जान।


मग्गण-गुणठाणइ कहिय, विवहारेण वि दिट्ठि।
णिच्छय-णइँ अप्पा मुणहि, जिम पावहु परमेट्ठि ॥17॥

अर्थ: हे जीव ! मार्गणास्थान और गुणस्थान का कथन तो व्यवहारदृष्टि से किया गया है, अतः तू निश्चयनय से कथित आत्मा को पहिचान, जिससे परमेष्ठी पद प्राप्त हो।


गिहि-वावार-परिट्ठिया, हेयाहेउ मुणंति।
अणुदिणु झायहिं देउ जिणु, लहु णिव्वाणु लहंति ॥18॥

अर्थ: जो जीव गृह-व्यापार में स्थित होते हुए भी हेयाहेय (हेय-उपादेय/हेय-ज्ञेय-उपादेय) को पहिचानते हैं और प्रतिदिन जिनदेव का ध्यान करते हैं, वे शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त करते हैं।


जिणु सुमिरहु जिणु चिंतवहु, जिणु झायहु सुमणेण।
सो झायंतहँ परम-पउ, लब्भइ एक्क-खणेण ॥19॥

अर्थ: हे भाई ! शुद्ध मन से जिनदेव का स्मरण करो, जिनदेव का ही चिन्तन करो और जिनदेव का ही ध्यान करो, ताकि एक क्षण में परमपद की प्राप्ति हो ।


सुद्धप्पा अरु जिणवरहँ, भेउ म किं पि वियाणि।
मोक्खहँ कारण जोइया, णिच्छइँ एउ वियाणि ॥20॥

अर्थ: हे योगी ! शुद्धात्मा और जिनवर में कुछ भी अन्तर मत समझो और ये ही मोक्ष के कारण हैं - ऐसा निश्चित रूप से समझो ।


जो जिणु सो अप्पा मुणहु, इहु सिद्धंतहँ सारु।
इउ जाणेविणु जोइयहो, अण्णु म करहु वियप्पु ॥21॥

अर्थ: हे योगी ! सम्पूर्ण सिद्धान्तों का सार यह है कि जो जिन है वही आत्मा है, अतः तुम इसे जानो और सर्व मायाचार को छोड़ दो।


जो परमप्पा सो जि हउँ, जो हउँ सो परमप्पु।
इउ जाणेविणु जोइया, अण्णु म करहु वियप्पु ॥22॥

अर्थ: हे योगी ! जो परमात्मा है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही परमात्मा है - ऐसा जानो और अन्य कुछ भी विकल्प मत करो, बस।


सुद्ध-पएसहँ पूरियउ, लोयायास-पमाणु।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, पावहु लहु णिव्वाणु ॥23॥

अर्थ: हे योगी ! शुद्ध-प्रदेशों से परिपूर्ण लोकाकाश-प्रमाण आत्मा की नित्य श्रद्धा करो, ताकि शीघ्र निर्वाण प्राप्त हो ।


णिच्छइँ लोय-पमाणु मुणि, ववहारेँ सुसरीरु।
एहउ अप्प-सहाउ मुणि, लहु पावहि भव-तीरु ॥24॥

अर्थ: हे योगी ! इस आत्मा का स्वभाव निश्चय से लोकाकाश-प्रमाण है और व्यवहार से स्व-शरीर-प्रमाण है। तुम इसको जानो, ताकि शीघ्र संसार-सागर का किनारा प्राप्त हो।


चउरासी लक्खहिँ फिरिउ, कालु अणाइ अणंतु।
पर सम्मत्तु ण लद्धु जिय, एहउ जाणि णिभंतु ॥25॥

अर्थ: अहो ! इस जीव ने अनादि - अनन्त काल से चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण किया है और सब कुछ प्राप्त किया है, परन्तु निश्चित समझो कि कभी सम्यक्त्व को प्राप्त नहीं किया।


सुद्ध सचेयणु बुद्धु जिणु, केवल-णाण-सहाउ।
सो अप्पा अणुदिणु मुणहु, जइ चाहहु सिव-लाहु ॥26॥

अर्थ: हे योगी ! यह आत्मा शुद्ध है, सचेतन है, बुद्ध है, जिन है और केवलज्ञान स्वभावी है। यदि तुम मोक्ष चाहते हो तो इसकी नित्य श्रद्धा करो।


जाम ण भावहि जीव तुहुँ, णिम्मल अप्प-सहाउ।
ताम ण लब्भइ सिव-गमणु, जहिँ भावइ तहिँ जाउ ॥27॥

अर्थ: हे जीव ! जब तक तू निर्मल आत्मस्वभाव की भावना नहीं करेगा, तब तक मोक्ष को नहीं प्राप्त कर सकता। जहाँ इच्छा हो, वहाँ जा।

दोहा 28 से 54

जो तइलोयहँ झेउ जिणु, सो अप्पा णिरु वुत्तु।
णिच्छय-णइँ एमइ भणिउ, एहउ जाणि णिभंतु ॥28॥

अर्थ: हे भाई ! निश्चयनय ऐसा कहता है कि जो तीन लोक का ध्येय है, जिन है, वही शुद्ध आत्मा है। तू उसे निःसन्देह जान ! उसमें भ्रान्ति मत कर।


वय-तव-संजम-मूलगुण, मूढहँ मोक्ख ण वुत्तु।
जाव ण जाणइ इक्क पर, सुद्धउ भाउ पवित्तु ॥29॥

अर्थ: जब तक यह जीव एक परमशुद्ध पवित्र भाव को नहीं जानता, तब तक मूढ़ है और ऐसे मूढ़ जीव के व्रत, तप, संयम और मूलगुणों को मोक्ष का कारण नहीं कहा गया है।


जइ णिम्मल अप्पा मुणइ, वय-संजम-संजुत्तु।
तो लहु पावइ सिद्धि-सुह, इउ जिणणाहहँ उत्तु ॥30॥

अर्थ: जिनेन्द्र देव ने कहा है कि यदि कोई जीव निर्मल आत्मा को पहिचानता है और व्रत-संयम से युक्त होता है तो वह शीघ्र ही सिद्धि-सुख को प्राप्त करता है।


वउ तउ संजमु सीलु जिय, ए सव्वइँ अकयत्थु।
जाव ण जाणइ इक्क परु, सुद्धउ भाउ पवित्तु ॥31॥

अर्थ: जब तक यह जीव एक परमशुद्ध पवित्र भाव को नहीं जानता, तब तक व्रत, तप, संयम और शील - ये कुछ भी कार्यकारी नहीं होते।


पुण्णिं पावइ सग्ग जिउ, पावएँ णरय-णिवासु।
बे छंडिवि अप्पा मुणइ, तो लब्भइ सिववासु ॥32॥

अर्थ: पुण्य से जीव स्वर्ग पाता है और पाप से नरक; परन्तु जो पाप एवं पुण्य दोनों को छोड़कर आत्मा को जानता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।


वउ तउ संजमु सीलु जिय, इउ सव्वइँ ववहारु।
मोक्खहँ कारणु एक्कु मुणि, जो तइलोयहँ सारु ॥33॥

अर्थ: हे जीव ! व्रत, तप, संयम एवं शील तो व्यवहार से मोक्ष का कारण है। निश्चय से तो जो तीन लोक का सार है - ऐसा एक आत्मा ही मोक्ष का कारण है।


अप्पा अप्पइँ जो मुणइ, जो परभाउ चएइ।
सो पावइ सिवपुरि-गमणु, जिणवरु एम भणेइ ॥34॥

अर्थ: जिनेन्द्र देव कहते हैं कि जो जीव आत्मा से आत्मा को जानता है और परभाव को छोड़ देता है, वही शिवपुरी को जाता है।


छह दव्वइँ जे जिण-कहिय, णव पयत्थ जे तत्त।
विवहारेण य उत्तिया, ते जाणियहि पयत्त ॥35॥

अर्थ: हे भाई ! जिनेन्द्र देव ने जो छह द्रव्य, सात तत्त्व और नौ पदार्थ कहे हैं, वे सब व्यवहारनय से कहे हैं। तुम उनको प्रयत्न करके जानो।


सव्व अचेयण जाणि जिय, एक्क सचेयणु सारु।
जो जाणेविणु परम-मुणि, लहु पावइ भवपारु ॥36॥

अर्थ: जगत् के सर्व पदार्थ अचेतन हैं। मात्र एक जीव ही सचेतन है और वही सार अर्थात् श्रेष्ठ है। उसे जानकर परममुनि शीघ्र संसार-सागर से पार हो जाते हैं।


जइ णिम्मलु अप्पा मुणहि, छंडिवि सहु ववहारु।
जिण-सामिउ एमइ भणइ, लहु पावइ भवपारु ॥37॥

अर्थ: हे योगी ! यदि तू सर्व व्यवहार को छोड़कर एक निर्मल आत्मा को ही जाने तो शीघ्र संसार से पार हो जाए - ऐसा जिनस्वामी कहते हैं।


(सोरठा)
जीवाजीवहँ भेउ, जो जाणइ तिं जाणियउ।
मोक्खहँ कारण एउ, भणइ जोइ जोइहिँ भणिउँ ॥38॥

अर्थ: हे योगी ! जो जीव और अजीव के भेद को जानता है, वही वास्तव में सब कुछ जानता है। तथा जीव और अजीव के भेदज्ञान को ही योगियों ने मोक्ष का कारण कहा है।


केवल-णाण-सहाउ, सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ।
जइ चाहहि सिव-लाहु, भणइ जोइ जोइहिँ भणिउँ ॥39॥

अर्थ: हे जीव ! यदि तू मोक्ष प्राप्त करना चाहता है तो केवलज्ञान-स्वभावी आत्मा को जान - ऐसा योगियों ने कहा है।


(चौपाई)
को सुसमाहि करउ को अंचउ, छोपु-अछोपु करिवि को वंचउ।
हल सहि कलहु केण समाणउ, जहिँ कहिँ जोवउ तहिँ अप्पाणउ ॥40॥

अर्थ: अहो ! कौन समाधि करे? कौन पूजन करे? कौन छूआछूत करके अपने आप को ठगे? कौन किससे मैत्री करे? कौन किससे कलह करे? जहाँ देखो, वहाँ आत्मा ही है।


ताम कुतित्थइँ परिभमइ, धुत्तिम ताम करेइ।
गुरुहु पसाएँ जाम णवि, अप्पा-देउ मुणेइ ॥41॥

अर्थ: यह जीव तभी तक कुतीर्थों में भ्रमण करता है, धूर्तता करता है, जब तक कि गुरु के प्रसाद से अपने आत्मदेव को नहीं जानता है।


तित्थइँ देवलि देउ णवि, इम सुइकेवलि-वुत्तु।
देहा-देवलि देउ जिणु, एहउ जाणि णिरुत्तु ॥42॥

अर्थ: श्रुतकेवलियों ने कहा है कि देव तीर्थों और मन्दिरों में नहीं है, अपितु देव तो देहरूपी देवालय में ही रहता है - ऐसा निःसन्देह जानो।


देहा-देवलि देउ जिणु, जणु देवलिहिँ णिएइ।
हासउ महु पडिहाइ इहु, सिद्धे भिक्ख भमेइ ॥43॥

अर्थ: अहो ! जिनदेव तो इस देहरूपी देवालय में रहते हैं, परन्तु लोग उसे मन्दिरों में देखते हैं, खोजते हैं। मुझे यह देखकर बड़ी हँसी आती है कि ये सिद्ध होकर भी भिक्षा-हेतु भ्रमण करते हैं।


मूढा देवलि देउ णवि, णवि सिलि लिप्पइ चित्ति।
देहा-देवलि देउ जिणु, सो बुज्झहि समचित्ति ॥44॥

अर्थ: हे मूढ़ ! देव मन्दिर में नहीं है। किसी मूर्ति, लेप या चित्र में भी देव नहीं है। देव तो इस देहरूपी देवालय में है। उसे तू समभाव से जान।


तित्थइ देउलि देउ जिणु, सव्वु वि कोइ भणेइ।
देहा-देउलि जो मुणइ, सो बुहु को वि हवेइ ॥45॥

अर्थ: देव तीर्थों और मन्दिरों में है - ऐसा सब कहते हैं, परन्तु ऐसा ज्ञानी कोई विरला ही होता है जो मानता है कि देव तो इस देहरूपी देवालय में ही है।


जइ जर-मरण-करालियउ, तो जिय धम्म करेहि।
धम्म-रसायणु पियहि तुहुँ, जिम अजरामर होहि ॥46॥

अर्थ: हे जीव ! यदि तू जरा-मरण से भयभीत है तो धर्म कर, धर्म-रसायन का पान कर; ताकि तू अजर-अमर हो सके।


(सोरठा)
धम्मु ण पढ़ियइँ होइ, धम्मु ण पोत्था-पिच्छियइँ।
धम्मु ण मढिय-पएसि, धम्मु ण मत्था-लुंचियइँ ॥47॥

अर्थ: पढ़ने से धर्म नहीं होता, पुस्तक व पिच्छी से भी धर्म नहीं होता, मठ में रहने से भी धर्म नहीं होता, और केशलोंच करने से भी धर्म नहीं होता।


राय-रोस बे परिहरिवि, जो अप्पाणि वसेइ।
सो धम्मु वि जिण-उत्तियउ, जो पंचम-गइ णेइ ॥48॥

अर्थ: जो जीव राग और द्वेष - इन दोनों को छोड़कर आत्मा में वास करता है, उसे ही जिनेन्द्र देव ने धर्म कहा है। वह धर्म जीव को पंचम गति (मोक्ष) में ले जाता है।


आउ गलइ णवि मणु गलइ, णवि आसा हु गलेइ।
मोहु फुरइ ण वि अप्पहिउ, इम संसार भमेइ ॥49॥

अर्थ: अहो ! आयु गल रही है, पर मन नहीं गल रहा है, न ही आशा गल रही है। मोह तो स्फुरित हो रहा है, परन्तु आत्महित का स्फुरण नहीं हो रहा है। यही कारण है कि यह जीव संसार में भ्रमण कर रहा है।


जेहउ मणु विसयहँ रमइ, तिमु जइ अप्प मुणेइ।
जोइउ भणइ हो जोइयहु, लहु णिव्वाणु लहेइ ॥50॥

अर्थ: हे योगियो ! यदि यह मन जिस तरह विषयों में रमण करता है, उस तरह आत्मा को जानने में लगे - आत्मा में रमण करे तो शीघ्र ही निर्वाण को प्राप्त करे - ऐसा योगी कहते हैं।


जेहउ जज्जरु णरय-घरु, तेहउ बुज्झि सरीरु।
अप्पा भावहि णिम्मलउ, लहु पावहि भवतीरु ॥51॥

अर्थ: हे योगी ! तू इस शरीर को नरकगृह के समान जर्जर (पुराना, व्यर्थ, बुरा) समझ, और एक निर्मल आत्मा की ही भावना कर, ताकि तुझे शीघ्र निर्वाण प्राप्त हो।


धंधइ पडियउ सयल जगि, णवि अप्पा हु मुणंति।
तहिँ कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिव्वाणु लहंति ॥52॥

अर्थ: अहो, संसार में सब लोग अपने - अपने धंधे में फँसे हुए हैं और आत्मा को नहीं पहिचानते हैं। यही कारण है कि वे निर्वाण को नहीं प्राप्त करते - यह स्पष्ट है।


सत्थ पढंतहँ ते वि जड, अप्पा जे ण मुणंति।
तहिँ कारणि ए जीव फुडु, ण हु णिव्वाणु लहंति ॥53॥

अर्थ: जो जीव शास्त्रों को पढ़ते हुए भी आत्मा को नहीं जानते, वे भी जड़ ही हैं और इसीकारण से वे भी निर्वाण को नहीं प्राप्त करते हैं - यह स्पष्ट है।


मणु-इंदिहि वि छोडियइ, बुहु पुच्छियइ ण कोइ।
रायहँ पसरु णिवारियइ, सहज उपज्जइ सोइ ॥54॥

अर्थ: यदि कोई ज्ञानी जीव मन और इन्द्रियों से छुटकारा प्राप्त कर ले, तो उसे किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं है। वह राग के प्रसार को रोक देता है और उसे सहज ही आत्मभाव प्रकट हो जाता है।

दोहा 55 से 81

पुग्गलु अण्णु जि अण्णु जिउ, अण्णु वि सहु ववहारु।
चयहि वि पुग्गलु गहहि जिउ, लहु पावहि भवपारु ॥55॥

अर्थ: पुद्गल अलग है और जीव अलग है। अन्य सब व्यवहार भी जीव से अलग है। हे जीव ! पुद्गल को छोड़ो और जीव को ग्रहण करो, ताकि तुम शीघ्र ही संसार से पार होओ।


जे णवि मण्णहिँ जीव फुडु, जे णवि जीउ मुणंति।
ते जिण-णाहहँ उत्तिया, णउ संसार मुचंति ॥56॥

अर्थ: जो लोग जीव को नहीं जानते हैं और उसकी श्रद्धा नहीं करते हैं, वे कभी भी संसार से मुक्त नहीं होते - ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है।


रयण दीउ दिणयर दहिउ, दुद्धु घीव पाहाणु।
सुण्णउ रुउ फलिहउ अगिणि, णव दिट्ठंता जाणु ॥57॥

अर्थ: जीव को समझने के लिए इन ९ दृष्टान्तों को अच्छी तरह समझो - १. रत्न, २. दीप, ३. सूर्य, ४. दही - दूध - घी (अथवा दही - दूध में घी), ५. पाषाण, ६. सोना, ७. चाँदी, ८. स्फटिक मणि और ९. अग्नि।


देहादिउ जो परु मुणइ, जेहउ सुण्णु अयासु।
सो लहु पावइ बंभु परु, केवलु करइ पयासु ॥58॥

अर्थ: जो जीव शून्य आकाश की भाँति देहादि को भी पर मानता है, वह शीघ्र परब्रह्म को प्राप्त करता है और केवलज्ञान का प्रकाश करता है।


जेहउ सुद्ध अयासु जिय, तेहउ अप्पा वुत्तु।
आयासु वि जडु जाणि जिय, अप्पा चेयणुवंतु ॥59॥

अर्थ: हे जीव ! जिनेन्द्र देव ने कहा है कि जैसा आकाश शुद्ध है, वैसा ही यह आत्मा भी शुद्ध है। उसमें भी आकाश तो जड़ है, परन्तु आत्मा चेतन है।


णासग्गिँ अब्भिंतरहँ, जे जोवहिँ असरीरु।
बाहुडि जम्मि ण संभवहिँ, पिवहिँ ण जणणी-खीरु ॥60॥

अर्थ: जो जीव नासाग्र दृष्टि से अपने अन्तर में अशरीरी आत्मा को देखते हैं, वे इस संसार में पुनः लज्जाजनक जन्म धारण नहीं करते, माँ का दूध नहीं पीते।


असरीरु वि सुसरीरु मुणि, इहु सरीरु जडु जाणि।
मिच्छा-मोहु परिच्चयहि, मुत्ति णियं वि ण माणि ॥61॥

अर्थ: हे जीव ! यद्यपि यह आत्मा अशरीरी है, तथापि तुम इसे स्वशरीर - प्रमाण भी मानो। तथा यह भी अच्छी तरह जानो कि शरीर तो जड़ और मूर्तिक है, परन्तु आत्मा जड़ और मूर्तिक नहीं है, अतः तुम अपने मिथ्या - मोह का त्याग करो और शरीर - जैसा स्वयं को मत मानो।


अप्पइँ अप्पु मुणंतयहँ, किं णेहा फलु होइ।
केवल-णाणु वि परिणवइ, सासय-सुक्खु लहेइ ॥62॥

अर्थ: अहो, आत्मा से आत्मा को जानने पर यहाँ कौन - सा फल नहीं मिलता? केवलज्ञान तक हो जाता है और जीव को शाश्वत सुख की भी प्राप्ति हो जाती है।


जे परभाव चएवि मुणि, अप्पा अप्प मुणंति।
केवल-णाण-सरुव लइ, ते संसारु मुचंति ॥63॥

अर्थ: जो मुनि समस्त परभावों का त्याग करके आत्मा से आत्मा को पहिचानते हैं, वे केवलज्ञान पाकर संसार से मुक्त हो जाते हैं।


धण्णा ते भयवंत बुह, जे परभाव चयंति।
लोयालोय-पयासयरु, अप्पा विमल मुणंति ॥64॥

अर्थ: अहो ! धन्य हैं वे भगवन्त ज्ञानी पुरुष जो सर्व परभावों का त्याग कर देते हैं और लोकालोक-प्रकाशक निर्मल आत्मा की श्रद्धा करते हैं।


सागारु वि णागारु कु वि, जो अप्पाणि वसेइ।
सो लहु पावइ सिद्धि-सुहु, जिणवरु एम भणेइ ॥65॥

अर्थ: सागार (गृहस्थ) हो या अनगार (मुनि) - जो कोई भी आत्मा में निवास करता है, वही शीघ्र सिद्धि-सुख को प्राप्त करता है - ऐसा जिनवर कहते हैं।


विरला जाणहिँ तत्तु बुह, विरला णिसुणहिँ तत्तु।
विरला झायहिँ तत्तु जिय, विरला धारहिँ तत्तु ॥66॥

अर्थ: अहो ! कोई विरला ज्ञानी ही तत्त्व को सुनता है, विरला ज्ञानी ही तत्त्व को जानता है, विरला ज्ञानी ही तत्त्व का ध्यान करता है और विरला ज्ञानी ही तत्त्व को अपने हृदय में धारण करता है।


इहु परियण ण हु महुतणउ, इहु सुहु-दुक्खहँ हेउ।
इम चिंतंतहँ किं करइ, लहु संसारहँ छेउ ॥67॥

अर्थ: जो जीव ऐसा चिन्तन करते हैं कि ये परिजन मेरे नहीं हैं, अपितु ये तो क्षणिक सुख-दुःख के हेतु हैं, वे शीघ्र ही संसार का अन्त कर देते हैं।


इंद फणिंद णरिंद य वि, जीवहँ सरणु ण होंति।
असरणु जाणिवि मुणि-धवल, अप्पा अप्प मुणंति ॥68॥

अर्थ: इन्द्र, फणीन्द्र और नरेन्द्र भी जीवों को शरण नहीं हैं; अतः उन सब को अशरण जानकर उत्तम मुनिराज तो एक आत्मा से ही आत्मा को जानते हैं।


इक्क उपज्जइ मरइ कु वि, दुहु सुहु भुंजइ इक्कु।
णरयहँ जाइ वि इक्क जिउ, तह णिव्वाणहँ इक्कु ॥69॥

अर्थ: जीव अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरता है। अकेला ही सुख भोगता है और अकेला ही दुःख भोगता है। अकेला ही नरक में जाता है और अकेला ही निर्वाण में जाता है।


एक्कुलउ जइ जाइसिहि, तो परभाव चएहि।
अप्पा झायहि णाणमउ, लहु सिव-सुक्ख लहेहि ॥70॥

अर्थ: हे भाई ! इसप्रकार यदि सर्वत्र तू अकेला ही जाता है और अकेला ही जाएगा तो समस्त परभावों का त्याग कर दे और एक ज्ञानमय आत्मा का ही ध्यान कर, ताकि तुझे शीघ्र ही मोक्ष-सुख प्राप्त हो।


जो पाउ वि सो पाउ मुणि, सब्बु इ को वि मुणेहि।
जो पुण्णु वि पाउ वि भणइ, सो बुह को वि हवेइ ॥71॥

अर्थ: अहो ! जो पाप है उसे तो सभी पाप मानते हैं, परन्तु जो पुण्य को भी पाप कहता है वह कोई विरला ज्ञानी ही होता है।


जह लोहम्मिय णियउ बुह, तह सुण्णम्मिय जाणि।
जे सुह असुह परिच्चयहिँ, ते वि हवंति हु णाणि ॥72॥

अर्थ: हे ज्ञानी ! जैसी लोहे की बेड़ी होती है, वैसी ही सोने की बेड़ी होती है; अतः वास्तव में ज्ञानी तो वे ही हैं जो शुभ और अशुभ दोनों का त्याग कर देते हैं।


जइया मणु णिग्गंथु जिय, तइया तुहुँ णिग्गंथु।
जइया तुहुँ णिग्गंथु जिय, तो लब्भइ सिवपंथु ॥73॥

अर्थ: हे जीव ! जब तेरा मन निर्ग्रन्थ होगा, तभी तू सच्चा निर्ग्रन्थ होगा। और जब तू ऐसा सच्चा निर्ग्रन्थ होगा, तभी मोक्षमार्ग को प्राप्त कर सकेगा।


जं वडमज्झहँ बीउ फुडु, बीयहँ वडु वि हु जाणु।
तं देहहँ देउ वि मुणहि, जो तइलोय-पहाणु ॥74॥

अर्थ: जिसप्रकार जैसे वट में बीज होता है वैसे ही बीज में वट भी स्पष्ट ज्ञात होता है, उसीप्रकार इस देह में भी इस त्रिलोकप्रधान देव की श्रद्धा करो।


जो जिण सो हउँ सो जि हउँ, एहउ भाउ णिभंतु।
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥75॥

अर्थ: हे योगी ! जो जिन है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही जिन है - ऐसी निःसंदेह भावना करो; क्योंकि यही एक मोक्ष का कारण है। अन्य कोई तन्त्र-मन्त्र आदि मोक्ष का कारण नहीं है।


बे ते चउ पंच वि णवह, सत्तहँ छह पंचाहँ।
चउगुण-सहियउ सो मुणह, एयइँ लक्खण जाहँ ॥76॥

अर्थ: हे योगी ! दो, तीन, चार, पाँच, नौ, सात, छह, पाँच और चार गुण, इनको आत्मा के लक्षण जानो।


बे छंडिवि बे-गुण-सहिउ, जो अप्पाणि वसेइ।
जिणु सामिउ एमइँ भणइ, लहु णिव्वाणु लहेइ ॥77॥

अर्थ: जो जीव दो दोषों को छोड़कर और दो गुणों से सहित होकर आत्मा में निवास करता है, वह शीघ्र ही निर्वाण को प्राप्त करता है - ऐसा जिन स्वामी कहते हैं।


तिहिँ रहियउ तिहिँ गुण-सहिउ, जो अप्पाणि वसेइ।
सो सासय-सुइ-भायणु वि, जिणवरु एम भणेइ ॥78॥

अर्थ: जो जीव तीन दोषों से रहित होकर और तीन गुणों से सहित होकर आत्मा में निवास करता है, वह शाश्वत सुख का पात्र होता है - ऐसा जिनवर कहते हैं।


चउ-कसाय-सण्णा-रहिउ, चउ-गुण-सहियउ वुत्तु।
सो अप्पा मुणि जीव तुहुँ, जिम परु होहि पवित्तु ॥79॥

अर्थ: हे जीव ! जो चार कषायों व चार संज्ञाओं से रहित है और चार गुणों से सहित हैं, उस आत्मा की श्रद्धा कर, ताकि तू परम-पवित्र हो सके।


बे-पंचहँ रहियउ मुणहि, बे-पंचहँ संजुत्तु।
बे-पंचहँ जो गुणसहिउ, सो अप्पा णिरु वुत्तु ॥80॥

अर्थ: हे जीव ! जो दस से रहित है, दस से सहित है और दस गुणों से भी सहित है, उसे ही निश्चय से आत्मा कहा गया है। तुम उसकी श्रद्धा करो।


अप्पा दंसणु णाणु मुणि, अप्पा चरणु वियाणि।
अप्पा संजमु सील तउ, अप्पा पच्चक्खाणि ॥81॥

अर्थ: आत्मा ही दर्शन है, आत्मा ही ज्ञान है, आत्मा ही चारित्र है, आत्मा ही संयम है, आत्मा ही शील है, आत्मा ही तप है और आत्मा ही प्रत्याख्यान भी है। इसे अच्छी तरह जानो।

दोहा 82 से 108

जो परियाणइ अप्प परु, सो परु चयइ णिभंतु।
सो सण्णासु मुणेहि तहुँ, केवल-णाणिं उत्तु ॥82॥

अर्थ: जो जीव स्व और पर को अच्छी तरह जान लेता है, वह निःसन्देह पर का त्याग कर देता है। बस इसे ही संन्यास समझो - ऐसा केवलज्ञानियों ने कहा है।


रयणत्तय-संजुत्त जिउ, उत्तिमु तित्थु पवित्तु।
मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु ण तंतु ण मंतु ॥83॥

अर्थ: हे योगी ! रत्नत्रय से संयुक्त जीव ही उत्तम पवित्र तीर्थ है और वही मोक्ष का कारण है। अन्य कोई मंत्र-तंत्र आदि मोक्ष का कारण नहीं है।


दंसणु जं पिच्छियइ बुह, अप्पा विमल महंतु।
पुणु पुणु अप्पा भावियए, सो चारित्त पवित्तु ॥84॥

अर्थ: जो निर्मल आत्मा को देखा जाता है वही दर्शन है, जो निर्मल आत्मा को जाना जाता है वही श्रेष्ठ ज्ञान है और जो निर्मल आत्मा की पुनः पुनः भावना की जाती है वही पवित्र चारित्र है।


जहिँ अप्पा तहिँ सयल-गुण, केवलि एम भणंति।
तिहिँ कारणएँ जोइ फुडु, अप्पा विमलु मुणंति ॥85॥

अर्थ: जहाँ आत्मा है, वहीं सारे गुण हैं - ऐसा केवलज्ञानी कहते हैं। यही कारण है कि योगीजन सदा एक निर्मल आत्मा को ही जानते रहते हैं।


एक्कलउ इंदिय-रहियउ, मण-वय-काय-ति-सुद्धि।
अप्पा अप्पु मुणेहि तुहुँ, लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥86॥

अर्थ: हे भाई ! यदि तू आत्मा को बद्ध या मुक्त मानेगा तो निःसन्देह बँधेगा और यदि तू सहज-स्वरूप में रमण करेगा तो मोक्षरूप शान्त अवस्था को प्राप्त करेगा।


जइ बद्धउ मुक्कउ मुणहि, तो बंधियहि णिभंतु।
सहज-सरूवइ जइ रमहि, तो पायहि सिव संतु ॥87॥

अर्थ: हे भाई ! यदि तू आत्मा को बद्ध या मुक्त मानेगा तो निःसन्देह बँधेगा और यदि तू सहज-स्वरूप में रमण करेगा तो मोक्षरूप शान्त अवस्था को प्राप्त करेगा।


सम्माइट्ठी-जीवडहँ, दुग्गइ-गमणु ण होइ।
जइ जाइ वि तो दोसु णवि, पुव्वक्किउ खवणेइ ॥88॥

अर्थ: सम्यग्दृष्टि जीव का दुर्गति में गमन नहीं होता। यदि कदाचित् होता भी है तो कोई दोष नहीं है, क्योंकि उससे वह पूर्वकृत कर्मों का क्षय ही करता है।


अप्प-सरूवइँ जो रमइ, छंडिवि सहु ववहारु।
सो सम्माइट्ठी हवइ, लहु पावइ भवपारु ॥89॥

अर्थ: जो जीव सर्व व्यवहार को छोड़कर आत्मस्वरूप में रमण करता है, वह सम्यग्दृष्टि है और वह शीघ्र ही संसार से पार हो जाता है।


जो सम्मत्त-पहाण बुहु, सो तइलोय-पहाणु।
केवल-णाण वि लहु लहइ, सासय-सुक्ख-णिहाणु ॥90॥

अर्थ: जो सम्यक्त्व-प्रधान ज्ञान है, वही तीन लोक में श्रेष्ठ है। उसी से शीघ्र केवलज्ञान एवं शाश्वत सुख के निधान को प्राप्त किया जा सकता है।


अजरु अमरु गुण-गण-णिलउ, जहिँ अप्पा थिरु ठाइ।
सो कम्मेहिँ ण बंधियउ, संचिय-पुव्व विलाइ ॥91॥

अर्थ: जो जीव अजर, अमर और गुणों के भण्डार - ऐसे आत्मा में स्थिर हो जाता है, वह नवीन कर्मों से नहीं बँधता, अपितु उसके पूर्वसंचित कर्मों का भी नाश हो जाता है।


जह सलिलेण ण लिप्पियइ, कमलणि-पत्त कया वि।
तह कम्मेहिं ण लिप्पियइ, जइ रइ अप्प-सहावि ॥92॥

अर्थ: जिस तरह कमलिनी-पत्र कभी भी जल से लिप्त नहीं होता, उसी तरह यदि आत्मस्वभाव में लीनता हो तो जीव कर्मों से लिप्त नहीं हो।


जो सम-सुक्ख-णिलीणु बुहु, पुण पुण अप्पु मुणेइ।
कम्मक्खउ करि सो वि फुडु, लहु णिव्वाणु लहेइ ॥93॥

अर्थ: जो समसुख में लीन ज्ञानी पुनः पुनः आत्मा को जानता है वह शीघ्र ही कर्मों का क्षय करके निर्वाण को प्राप्त करता है।


पुरिसायार-पमाणु जिय, अप्पा एहु पवित्तु।
जोइज्जइ गुण-गण-णिलउ, णिम्मल-तेय-फुरंतु ॥94॥

अर्थ: हे जीव ! यह आत्मा पुरुषाकार है, पवित्र है, गुणों का भण्डार है और निर्मल तेज से स्फुरायमान दिखाई देता है।


जो अप्पा सुद्धु वि मुणइ, असुइ-सरीर-विभिण्णु।
सो जाणइ सत्थइँ सयल, सासय-सुक्खहँ लीणु ॥95॥

अर्थ: जो आत्मा को शुद्ध एवं अशुचि शरीर से अत्यन्त भिन्न मानता है, वही सारे शास्त्रों को जानता है और वही शाश्वत सुख में लीन होता है।


जो णवि जाणइ अप्पु परु, णवि परभाउ चएइ।
सो जाणउ सत्थइँ सयल, ण हु सिवसुक्खु लहेइ ॥96॥

अर्थ: जो जीव स्व और पर को नहीं जानता है और परभावों का त्याग भी नहीं करता है, वह भले ही सर्वशास्त्रों को जानता हो, पर मोक्ष-सुख को प्राप्त नहीं करता।


वज्जिय सयल-वियप्पइँ परम-समाहि लहंति।
जं विंदहिं साणंदु क वि सो सिव-सुक्ख भणंति ॥97॥

अर्थ: जीव जब समस्त विकल्पों से रहित होकर परमसमाधि को प्राप्त करते हैं, उस समय उनको जिस आनन्द का अनुभव होता है, उसे मोक्ष-सुख कहते हैं।


जो पिंडत्थु पयत्थु बुह, रूवत्थु वि जिण-उत्तु।
रूवातीतु मुणेहि लहु, जिम परु होहि पवित्तु ॥98॥

अर्थ: हे ज्ञानी ! जिनेन्द्र द्वारा कथित पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत ध्यानों को भलीप्रकार समझो, ताकि तुम शीघ्र ही परम पवित्र हो जाओ।


सव्वे जीवा णाणमया, जो सम-भाव मुणेइ।
सो सामाइउ जाणि फुडु, जिणवर एम भणेइ ॥99॥

अर्थ: जिनवर देव कहते हैं कि जब यह जीव समभाव के द्वारा ऐसा जानता है कि सब जीव ज्ञानमय हैं, तब उसके सामायिक होता है - ऐसा स्पष्ट जानो।


राय-रोस ये परिहरिवि, जो समभाउ मुणेइ।
सो सामाइउ जाणि फुडु, केवलि एम भणेइ ॥100॥

अर्थ: केवलज्ञानी कहते हैं कि राग और द्वेष दोनों को छोड़कर जो समभाव धारण किया जाता है, वही सामायिक है - ऐसा स्पष्ट जानो।


हिंसादिउ-परिहारु करि, जो अप्पा हु ठवेइ।
सो बियऊ चारित्तु मुणि, जो पंचम-गइ णेइ ॥101॥

अर्थ: जो जीव हिंसादि का त्याग करके आत्मा को आत्मा में स्थापित करता है, उसके छेदोपस्थापना नामक दूसरा चारित्र होता है, जो जीव को पंचम गति में ले जाता है।


मिच्छादिउ जो परिहरणु, सम्मद्दंसण-सुद्धि।
सो परिहार-विसुद्धि मुणि, लहु पावहि सिव-सिद्धि ॥102॥

अर्थ: मिथ्यात्वादिक के परिहार (त्याग) से जो सम्यग्दर्शन की शुद्धि होती है, उसे परिहारविशुद्धि नामक तीसरा चारित्र जानो। इससे जीव शीघ्र मोक्षसिद्धि को प्राप्त करता है।


सुहुमहँ लोहहँ जो विलउ, जो सुहुमु वि परिणामु।
सो सुहुमु वि चारित्त मुणि, सो सासय-सुह-धामु ॥103॥

अर्थ: सूक्ष्म लोभ के नष्ट हो जाने पर जो सूक्ष्म परिणाम होता है उसे सूक्ष्मसाम्पराय नामक चारित्र जानो। वह अविनाशी सुख का धाम है।


अरहंतु वि सो सिद्धु फुडु, सो आयरिउ वियाणि।
सो उवझायउ सो जि मुणि, णिच्छइँ अप्पा जाणि ॥104॥

अर्थ: निश्चय से आत्मा ही अरिहंत है, आत्मा ही सिद्ध है, आत्मा ही आचार्य है, आत्मा ही उपाध्याय है और आत्मा ही मुनि है - ऐसा जानो।


सो सिउ संकरु विण्हु सो, सो रुद्धु वि सो बुद्धु।
सो जिणु ईसरु बंभु सो, सो अणंतु सो सिद्धु ॥105॥

अर्थ: आत्मा ही शिव है, आत्मा ही शंकर है, आत्मा ही विष्णु है, आत्मा ही रुद्र है, आत्मा ही बुद्ध है, आत्मा ही जिन है, आत्मा ही ब्रह्मा है, आत्मा ही अनन्त है और आत्मा ही सिद्ध भी है।


एव हि लक्खण-लक्खियउ, जो परु णिक्कलु देउ।
देहहँ मज्झहिँ सो वसइ, तासु ण विज्जइ भेउ ॥106॥

अर्थ: उपर्युक्त विविध नामों से लक्षित जो परम निष्कल (शरीर रहित) देव है, वह इस शरीर में ही रहता है। उसमें और इसमें कोई अन्तर नहीं है।


जे सिद्धा जे सिज्झिहिहिँ, जे सिज्झहिँ जिण-उत्तु।
अप्पा-दंसणिँ ते वि फुडु, एहउ जाणि णिभंतु ॥107॥

अर्थ: जितने भी जीव भूतकाल में सिद्ध हुए हैं, भविष्य में होंगे और वर्तमान में हो रहे हैं, वे सब आत्मदर्शन से ही हो रहे हैं - ऐसा निःसन्देह जानो।


संसारहँ भय-भीयएँ, जोगिचंद-मुणिएण।
अप्पा-संबोहण कया, दोहा इक्क-मणेण ॥108॥

अर्थ: संसार से भयभीत योगीन्दु मुनि ने आत्मसम्बोधन के लिए एकाग्र मन से इन दोहों की रचना की है।