एकादशः सर्गः (भाग 1/2)
तत उत्थाय भूमिशो नत्वा तं मणिमालिनं। पप्रच्छ गमने हेतुं स्वगृहाद् बहिरुन्नतः ॥१॥
प्रोवाच मणिमाली तं वक्ष्ये स्वोदंतमुत्तमं। विस्तीर्णं वृषसद्धेतुं शृणुत्वं शुभचेतसा ॥२॥
अत्रैव विषयः ख्यातो मण्यादिवतनाम भाक्। मणिभिर्नररत्नैश्च देशेषु च मणीयते ॥३॥
दंतच्छेदेष्वधरतायाचना पाणिपीडने। क्विप्प्रत्यये विनाशश्च बंधनं शुकपक्षिणि ॥४॥
मदो दंतिसमूहेषु मारकत्वं यमाह्वये। साध्वसं कामिनां यत्र कामिन्या भूत सदृषः ॥५॥
तस्करो भोगगंधानां हारित्वान्मारुतः पुनः। पतनं वृक्षपर्णेषु चापलत्वं च मारुते ॥६॥
अर्थ (श्लोक 1 से 6): मुनिवर जिनपाल द्वारा वचनगुप्ति-कथा के समाप्त हो जाने पर राजा-रानी ने उन्हें भक्तिपूर्वक नमस्कार किया। धर्म-प्रेमी वे दोनों दंपती मुनिवर मणिमाली के पास गये। उन्हें भक्ति पूर्वक नमस्कार कर राजा श्रेणिक ने विनय से पूछा-संसार-तारक स्वामिन्! मेरे शुभोदय से आप राजमंदिर में आहारार्थ गये थे। किन्तु आप बिना कारण आहार के बिना ही लौटे आये। यह क्या हुआ? मेरे मन में इस बात का बड़ा संशय बैठा है, कृपया मेरे इस संशय को शीघ्र मिटावें। राजा श्रेणिक के ऐसे वचन सुन मुनिराज ने कहा-राजन्! रानी चेलना ने-हे त्रिगुप्तिपालक मुनिराज आप आहारार्थ राजमंदिर में विराजें इस रीति से हमारा आह्वानन किया था। मेरे कायगुप्ति थी नहीं इसलिए मैं वहाँ आहार के लिए न ठहरा वह क्यों नहीं थी ? उसका कारण सुनाता हूँ। आप ध्यानपूर्वक सुनें-इसी पृथ्वीतल में अतिशय शुभ एक मणिवत नामक देश है। मणिवत साक्षात् समस्त देशों में मणि के समान है। मणि देश में (अधरता) धन, विद्या आदि की असहायता हो, यह बात नहीं है। वहाँ के निवासी धनी एवं विद्वान्-धन और विद्या से बराबर सहायता करने वाले हैं। एकमात्र अधरता है तो स्त्रियों के ओठों में ही है। इसलिए कोई किसी से किसी चीज की याचना भी नहीं करता। यदि याचना का व्यवहार है तो वर के लिए कन्या और कन्या के लिए वर का ही है। उस देश में किसी का विनाश भी नहीं किया जाता। यदि विनाश व्यवहार है तो व्याकरण में क्विप्प्रत्यय में ही है-क्विप्प्रत्यय का ही लोप किया जाता है। वहाँ के मनुष्य निरपराधी हैं इसलिए वहाँ कोई किसी का बंधन नहीं करता यदि बंधन व्यवहार है तो मनोहर शब्द करने वाले पक्षियों में ही है-वे ही पिंजरे में बँधे रहते हैं। मणिवत देश में कोई आलसी भी नजर नहीं आता आलसीपना है तो वहाँ के मतवाले हाथियों में ही है-वे ही झूमते-झूमते मंद गति से चलते हैं। कोई किसी को वहाँ पर मारने-सताने वाला भी नहीं है। यदि मारता-सताता है तो यमराज ही है। वहाँ के निवासियों को भय किसी से नहीं है केवल कामी पुरुष अपनी प्राणवल्लभाओं के क्रोध से डरते हैं-कामियों को प्रतिक्षण इस बात का डर बना रहता है, कहीं यह नाराज न हो जाय। उस देश में कोई चोर नहीं है यदि चोर का व्यवहार है तो पवन में है वहीं जहाँ कहीं की सुगंधी चुरा ले आता है। वहाँ का कोई मनुष्य जाति-पतित नहीं है यदि पतन व्यवहार है तो वृक्षों के पत्तों में है वे ही पवन के जोर से जमीन पर गिरते हैं। वृक्षों के पत्ते छोड़कर उस देश में कोई चपल भी नहीं है किन्तु वहाँ के निवासी सब लोग गम्भीर और उदार हैं।
नितंबे जड़ता यत्र कट्यां च कृशता शुभा।
कामिन्याः प्रस्तरे यत्र मूकत्वं वर्त्तते खलु ॥७॥
निग्रहः करणग्रामे योगिनां योगचेतसां।
कालुष्यं सरसि प्रोक्तं गजांदोलितवारिणि ॥८॥
विकोशत्वं च पद्मेषु स्पर्धा दानादिसंभवा।
व्यसनं सन्मते यत्र नान्यत्र भुवि वर्त्तते ॥९॥
यति योगप्रभावेण विपिनानि घनानि च।
सर्वकालफलाढ्यानि यत्र संति शुभावहे ॥१०॥
अर्थ (श्लोक 7 से 10): वहाँ पर कोई मनुष्य जड़ नहीं है यदि जड़ता है तो स्त्रियों के नितंबों में है। कृशता भी वहाँ पर स्त्रियों के कटिभाग में ही है-स्त्रियों की वहाँ कमर ही पतली है और कोई कृश नहीं। वहाँ के पत्थर ही नहीं बोलते-चालते हैं मनुष्य कोई गूंगा नहीं। उस देश में कोई किसी का दमन नहीं करता एकमात्र योगीश्वर ही इन्द्रियों का दमन करते हैं। मलिन भी वहाँ कोई नहीं रहता एकमात्र मलिनता वहाँ के तालाबों में है। हाथी आकर वहाँ के तालाबों को गंदला कर देते हैं। उस देश में निष्कोषता कमलों में ही है, सूर्यास्त होने पर वे ही मुंद जाते हैं किन्तु वहाँ निष्कोषता खजाना न हो, यह बात नहीं। लोग उस देश में दान आदि उत्तम कार्यों में ईर्ष्या-द्वेष करते हैं किन्तु इनसे अतिरिक्त और किसी कार्य में उन्हें ईर्ष्या-द्वेष नहीं। वहाँ के लोग उत्तमोत्तम व्याख्यान सुनने के व्यसनी हैं-जुआ आदि का कोई व्यसन नहीं तथा उस देश में उत्तमोत्तम मुनियों के ध्यान-प्रभाव से वृक्ष सदा फले-फूले रहते हैं।
वसंत इव सा ब्रूते सदा च पिककामिनी।
पराजिता पुरंध्रीभिः काशयंती निजां कलां ॥११॥
वने दंतिपुरंध्यश्च शिष्यंति गमनक्रियां।
यत्र नार्यः सलज्जाश्च निःकाश्य पर स्थिताः ॥१२॥
अर्थ (श्लोक 11 से 12): योग्य वर्षा हुआ करती है, उसके मनोहर बागों में सदा कोकिला बोलती रहती है। वहाँ की स्त्रियों से हथनी भी मंद गमन की शिक्षा लेती हैं और स्वभाव से वे स्त्रियाँ लज्जावती एवं पति भक्ता होती है ॥१-१२॥
तत्रास्ति पत्तनं रम्यं देशनाम्ना मनोहरम्।
तुंगसौधाग्रशृंगेण दारयच्चंद्रमंडलं ॥१३॥
भिन्ने तमसि बालानां वक्त्रचंद्रैर्नर्थतां।
सूर्याचंद्रप्रदीपाद्याः समीयुः क्षणदाहि च ॥१४॥
यत्र गोपुरकामिन्याश्चंद्रश्चूड़ामणीयते।
क्षणं स्थितः क्षपायां च तारामुक्तावलीश्रितः ॥१५॥
तच्छास्ता मणिमाली वै बभूव भववेदकः।
मूर्तीभूत इवोत्तुंगः क्षात्रो धर्मः सनातनः ॥१६॥
अर्थ (श्लोक 13 से 16): इसी मणिवत देश में एक अतिशय रमणीय दारा नाम का नगर है। दारा नगर के ऊँचे-ऊँचे महल सदा चन्द्रमंडल को भेदन किया करते हैं। उसकी स्त्रियों के मुख चन्द्रमा की कृपा से अंधकार सदा दूर रहता है इसलिए वहाँ दीपक आदि की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस समय वहाँ की स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ जाती हैं उस समय चन्द्रमा उनका चूड़ामणि तुल्य जान पड़ता है और तारागण चूड़ामणि में जड़े हुए सफेद मोती सरीखे मालूम पड़ते हैं। दारा नगर का स्वामी
गुणमालाभिधा राज्ञी ममाभूत्प्राणवल्लभा।
मणिशेखरनामाभूत्तनूजो नयसंगतः ॥१७॥
कुर्वन्नाज्यं जनांतोषं दधद्धर्मं समर्जयन्। कारणं शर्म संभुंजन् जातं कालं न वेद्म्यहं ॥१८॥
कौतुकेनेकदा राज्ञा कचा मम मनोहराः। तया विरलयंत्या च पलितं वीक्ष्यं तत्र च ॥१९॥
इत्युक्तं यमदूतोऽय महोआरात्समागतः। व्याप्तं येन जगत्सर्वं सेंद्रचक्रिहरादिकम् ॥२०॥
राज्ञाऽभाणि क्व कांते स आटितो भयदायकः। इत्युक्ते सा सितं केशं दर्शयामास भूपतेः ॥२१॥
सवधिस्थं यमं मत्वा विरज्याखिलशर्मतः। सतां त्याज्यं महाराज्यं नियुज्य मणिशेखरे ॥२२॥
ज्ञानसागरमासाद्य गुरुं बहुनृपोद्भवैः। अदीक्षितसुसिद्धांतं पठनोद्यतमानसः ॥२३॥
सकलागमवेत्ताहं भूत्वा तपसि संस्थितः। विजहार चिरं भूमि मेकाकी सिंहवत्सदा ॥२४॥
अर्थ (श्लोक 13 से 24): भली प्रकार नीति-कला में निष्णात क्षत्रियवंशी मैं राजा मणिमाली था। मेरी स्त्री जो कि अतिशय गुणवती थी, गुणमाला से उत्पन्न मेरा एक पुत्र था, उसका नाम मणिशेखर था और वह अतिशय नीति युक्त था। मैं भोगों में इतना मस्त था कि मुझे जाते हुए काल का भी ज्ञान न था। मैं सदा जिनधर्म का पालन करता हुआ आनंद से राज्य करता था। कदाचित् मैं आनंद से बैठा था। मेरी पटरानी मेरे केशों को सँभाल रही थी। अचानक ही उसे मेरे सिर में एक सफेद बाल दीख पड़ा। वह एकदम अचम्भे में पड़ गई और कहने लगी- हाय! जिस यमराज ने बड़े-बड़े चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायणों को अपना कवल बना लिया उसी यमराज का दूत यहाँ आकर भी प्रकट हो गया। बस!!! ज्योंही मैंने रानी गुणमाला के ये वचन सुने मेरी आनंद-तरंगें एकदम शांत हो गई। मेरे मुख से उस समय ये ही शब्द निकले-प्रिये! समस्त लोक में भय उत्पन्न करने वाला वह यमदूत कहाँ है? मुझे भी शीघ्र दिखा। मैं उसे देखना चाहता हूँ। मेरे वचन सुनते ही रानी ने बाल शीघ्र उखाड़ लिया और मेरी हथेली पर रख दिया। ज्योंही मैंने अपना सफेद बाल देखा। अपना काल अति समीप जान मैं उसी समय राज्य से विरक्त हो गया। जो विषयभोग कुछ समय पहले मुझे अमृत जान पड़ते थे वे ही हलाहल विष बन गये। मैं अपने प्यारे पुत्र और स्त्रियों को भी अपना शत्रु समझने लगा। मैंने शीघ्र ही मणिशेखर को बुलाया-और राज्य-कार्य उसे सौंप तत्काल वन की ओर चल पड़ा। वन में आते ही मुझे मुनिवर ज्ञानसागर के दर्शन हुए। मैंने शीघ्र ही अनेक राजाओं के साथ मुनि-दीक्षा धारण कर ली। जैन सिद्धान्त के पढ़ने में अपना मन लगाया एवं जब मैं जैन सिद्धान्त का भली प्रकार ज्ञाता हो गया और उग्र तपस्वी बन गया तो मैं सिंह के समान इस पृथ्वी-मंडल पर अकेला ही विहार करने लगा ॥१३-२४॥
विहरन्नन्यदा राजन्नुज्जयिन्याः श्मशानके। ध्यानसिद्धयै स्थितस्तत्र शवशय्यासमाश्रितः ॥२५॥
तावत्तत्र समायातः कौलिकः सिद्धमंत्रकः। वेतालाख्य महाविद्या सिद्धये कृतकौतुकः ॥२६॥
अर्थ (श्लोक 25 से 26): राजन्! अनेक देश एवं नगरों में विहार करता-करता किसी दिन मैं उज्जायिनी नगरी में जा पहुँचा और वहाँ की श्मशान भूमि में मुर्दे के समान आसन बाँधकर ध्यान के लिए बैठ गया। वह समय रात्रि का था इसलिए एक मंत्रवादी जो कि अनेक मंत्रों में निष्णात, वैताली विद्या की सिद्धि
कुणपं मम सद्गात्रं मत्वा मंत्रोद्यतः स च।
नरमूद्ध्नि पयो रम्य मानयामास तंडुलान् ॥२७॥
चौर मूर्द्धद्वयं नीत्वा योजयन्मुनिमस्तके।
रंधनाय चकाराशु चुल्लीं शीर्षसमुद्भवां ॥२८॥
जज्वाल ज्वलनं वेगाद्रंधयन्नवरपायसं।
एधांसि मुंचयन् सिद्धो विद्यासिद्ध्यर्थमंजसा ॥२९॥
यथा यथाग्निरेधेत ज्वलते च तथा तथा।
मुनेः शीर्ष व्यथा तीव्रा जायते मूर्ध्नि सन्मुनेः ॥३०॥
तदा सस्मार योगींद्रश्चिद्रूपं शुद्धमुत्तमं।
नोद्रव्यभावदुःकर्म विमुक्तं मुक्तिसंगतं ॥३१॥
मा कृथाऽशर्म रे जीव भुक्तपूर्वं च नारकं।
अनेकशो मया दुःखं तदग्नेरपि का कथा ॥३२॥
नरये क्षुत्प्रवर्त्तेत सर्वसस्योपजीविनी।
लभ्येत शिकणमात्रं न नारकै र्नष्टशर्मकैः ॥३३॥
तप्तैलकटाहेषु निक्षिप्तास्तत्र देहिनः।
भस्मीभवंति सर्वांगे सहमानाश्च वेदनां ॥३४॥
करपत्रादियोगेन द्विधा भवंति नारकाः।
खंडशः खंडशो भूता एकीयंते च सूतवत् ॥३५॥
भूमिस्पर्शनतोऽसातं सहस्रवृश्चिकस्पृशः।
अधिकं देहिनां यत्र जायते देहदाहकं ॥३६॥
भूमृदो दैवयोगेना-यांति लोकेऽत्रमध्यमे।
तद्गंधान्मरणं यांति नराः क्रोशादिसंस्थिताः ॥३७॥
अनेकशोमयादुःखं तद्भुक्तं पूर्वमेव च।
पराधीनतयाद्याहं क्षमिष्यामि समागतं ॥३८॥
एकाक्षविषये द्वयादिकरणे केवलं मया।
अशर्माऽभोजि चिद्रूपमजानतार्त्तचेतसा ॥३९॥
अर्थ: का इच्छुक एवं जाति का कौली था, वहाँ आया और मेरे शरीर को मृत शरीर जान तत्काल उसने मेरे मस्तक पर एक चूल्हा रख दिया एवं किसी मृत कपाल में दूध और चावल डालकर, चूल्हे में अग्नि बालकर (जलाकर) वह खीर पकाने लग गया। बस, फिर क्या था ? मंत्रवादी तो यह समझ कि कब जल्दी खीर पके और जल्दी मंत्र सिद्ध हो, बड़ी तेजी से चूल्हे में लकड़ी झोंककर आग लगाने लगा और आग लगने से जब मुझे मस्तक-मुख में तीव्र वेदना जान पड़ी तो मैं कर्म रहित शुद्ध आत्मा का स्मरण कर इस प्रकार भावना का भाव निकला-रे आत्मन्! तुझे इस समय इस दुःख से व्याकुल न होना चाहिए। तूने अनेक बार भयंकर नरक-दुःख भोगे हैं। नरक-दुःखों के सामने यह अग्नि का दुःख कुछ दुःख नहीं। देख! नरक में नारकियों को क्षुधा तो इतनी अधिक है कि यदि मिले तो वे त्रिलोक का अन्न खा जाये किन्तु उन्हें मिलता कण मात्र भी नहीं। इसलिए वे अतिशय क्लेश सहते हैं। वहाँ पर नारकियों को गरम लोहे की कड़ाहियों में डाला जाता है उनके शरीर के खंड किये जाते हैं उस समय उन्हें परम दुःख भोगना पड़ता है। हजार बिच्छुओं के काटने से जैसी शरीर में अग्नि भैराती (लगती) है उसी प्रकार नरक भूमि स्पर्श से नारकियों को दुःख भोगने पड़ते हैं। यदि नरक की मिट्टी का छोटा-सा टुकड़ा भी यहाँ आ जाये तो उसकी दुर्गन्धि से कोसों दूर बैठे जीव शीघ्र मर जाएँ किन्तु अभागे नारकी रात-दिन उसमें पड़े रहते हैं। तुझे भी अनेक बार नरक में जाकर ये दुःख भोगने पड़े हैं। जब-जब तू एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय आदि विकलेन्द्रिय योनियों में रहा है उस समय भी तूने अनेक दुःख भोगे हैं। अनेक बार तू निगोद में भी गया है और वहाँ के दुःख कितने कठिन हैं यह बात भी तू जानता है। तुझे इस समय जरा भी विचलित नहीं होना चाहिए। भाग्यवश यह नरभव मिला है प्रसन्नचित्त होकर तुझे व्रत सिद्धि
अनंतानंत संसारो नित्येतरनिगोदके। स्थितः पूर्वं सुदिष्टान्च लब्धोऽयं मानुषो भवः ॥४०॥
मानुषं भवमासाद्य जेतव्याश्च परीषहाः। मया व्रतादिसंसिद्ध्यै परीषहजयं तपः ॥४१॥
अर्थ (श्लोक 25 से 41): के लिए परीषह सहना चाहिए। ध्यान रख! परीषह सहन करने से ही व्रत-सिद्धि और सच्चा आत्मीय सुख मिल सकता है ॥२५-४१॥
दह्यमाने च मे मूर्ध्नीतीत्थंभावनया युतः। आसे यावत्पदारूढः पंचाना परमेष्ठिनां ॥४२॥
शिरासंकोचयोगेन तावन्मे मस्तकोपरि। ऊद्धीभूय करौ तूर्णं स्थितौ लष्टि सुदण्डवत् ॥४३॥
करयोगात्कपालं च पतितं दुग्धयोगतः। अग्निः शशाम वेगेन भो श्रेणिक नराधिप ॥४४॥
अर्थ (श्लोक 42 से 44): राजन्! मैं तो इस प्रकार अनित्यत्व भावना भा रहा था। मुझे अपने तन-बदन का भी होश न था। अचानक ही जब अग्नि जोर से बढ़ने लगी तो मेरे मस्तक की नसें भी सिकुड़ने लगीं। मेरे मस्तक पर रखा कपाल बेहद रीति से हिलने लगा और भली-भाँति कौलिक द्वारा डाँटे जाने पर तत्काल जमीन पर गिर गया। जो कुछ उसमें दूध, चावल आदि चीजें थीं, मिट्टी में मिल गईं और शीघ्र ही अग्नि शांत हो गई।
तदा कौलेयको वीक्ष्य मत्वाक्रुद्धं स्वमंत्रकम्। चक्रे पलायनं भीतः पश्यन् पश्यन्नवाङ्मुखं ॥४५॥
अर्थ: बस, फिर क्या था ? ज्योंही उस कौलिक ने यह दृश्य देखा मारे भय के उसके पेट में पानी हो गया। वह यह जान कि मंत्र मुझ पर कुपित हो गया है, वहाँ से तत्काल घर भागा और शीघ्र ही अपने घर आ गया।
उदयाय तदा भानुः कथयन्निव सज्जनान्। मुनेर्महोपसर्गं च कुणपायतपातिनः ॥४६॥
ननाश तामसं दूरादुच्चनीचसमानकृत्। स्तव्यग्राभेद्यमत्यंतं मिथ्यात्वं जिन भास्करात् ॥४७॥
यस्योदयप्रभावेण पद्मानि विचकासिरे। जिनोदयेन भव्यानां मनांसीव स्वभावतः ॥४८॥
अर्थ (श्लोक 46 से 48): कुछ समय बाद रात्रि में मुर्दे के धोखे से मुनिराज पर घोर उपसर्ग हुआ है। यह बात दारा नगर-निवासी सज्जनों को मानो कहता हुआ सूर्य प्राची दिशा में उदित हो गया। जिनेन्द्ररूपी सूर्य के उदय से जैसा मिथ्यात्व अंधकार तत्काल विलय को प्राप्त हो जाता है और भव्यों के चित्तरूपी कमल विकसित हो जाते हैं। उसी प्रकार सूर्य के उदय से गाढ़ अंधकार भी बातोंबात में नष्ट हो गया। जहाँ-तहाँ सरोवरों में कमल भी खिल गये। उस समय रात-भर के वियोगी चकवा-चकवी सूर्योदय से अति आनंदित हुए और परस्पर प्रेमालिंगन कर अपने को धन्य समझने लगे किन्तु रात्रि में अपनी प्राण-प्यारियों के साथ क्रीड़ा करने वाले कामीजन अति दुःख मानने लगे और बार-बार सूर्य की निंदा करने लगे। असली पूछिए तो सूर्य एक प्रकार का उत्तम साधु है क्योंकि साधु जिस प्रकार भव्य जीवों को उत्तम मार्ग का दर्शक होता है सूर्य भी पथिकों का उत्तम मार्ग का दर्शक है। साधु जैसे भव्य जीवों के अज्ञानांधकार को दूर करता है सूर्य भी उसी प्रकार गाढ़तमरूपी अंधकार को दूर करता है। साधु जिस प्रकार जीव-अजीव आदि पदार्थों का विचार करता है उनके
रथांगयुगलान्याशु नंदयंति मुहुर्मुहुः ।
वियुक्तिरात्रितो लब्धसंपर्काणि रविं मुदा ॥४९॥
कामिनां युगलान्याशु निंदयंति वियोगिनां ।
दृढालिंगनतो यस्योदयं संभिन्नतामसं ॥५०॥
साधुमार्गसमादर्शी विभिन्नखलतामसः ।
पदार्थसार्थसंस्पर्शी साधुरेव दिवाकरः ॥५१॥
यस्योदये हिमांशुश्च शुष्क पत्रायते तराम् ।
लून सर्वांगसत्कांतिस्तत्रान्येषां च का कथा ॥५२॥
भानुदर्शित सन्मार्गे चरंति जनताः शुभाः ।
जिनोपदिष्टसन्मार्गे भव्या इव हितैषिणः ॥५३॥
पतितं मां तदा भूप विदग्धार्द्धसुमस्तकम् ।
पुष्पलावी समावीक्ष्य विस्मितोऽभून्निजे हृदि ॥५४॥
आगत्य नगरे तूर्णमचीकथदुपासकान् ।
जिनदत्तादिसंमुख्यान् जिनधर्मप्रवेदकान् ॥५५॥
अर्थ (श्लोक 42 से 55): साथ संबंध रखता है। उसी प्रकार सूर्य भी अपनी किरणों से समस्त पदार्थों से संबंध रखता है। देदीप्यमान सूर्य के तेज के सामने चन्द्रमा उस समय सूखे पत्ते के समान दिखाई पड़ने लगा और तारागण तो लापता हो गये। श्मशान भूमि के पास एक बाग था इसलिए उस समय एक माली फूल तोड़ने के लिए वहाँ आया था, अचानक उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ी। ज्योंही उसने मुझे अर्ध दग्ध मस्तक युक्त और बेहोश देखा मारे आश्चर्य के उसका ठिकाना न रहा। वह शीघ्र ही भागकर नगर में आया और जिन धर्म के परम भक्त जो जिनदत्त आदि सेठ थे उनसे मेरा सारा हाल कह सुनाया ॥४२-५५॥
आकर्ण्य तत् तदा चक्रु र्हाहाकारमुपासकाः ।
जग्मुः संभूय सर्वे च मुनिपुंगवसन्निधौ ॥५६॥
निरूप्य तादृशं तं च प्रणम्य मन्युमानसाः ।
करैः सद्गत्यसंनीय नगरं ते बुधोत्तमाः ॥५७॥
योगिनं स्थापयामासुर्जिनदत्तालये मुदा ।
व्यजने व्याधिघातार्थं भस्मीभूतसुमस्तकं ॥५८॥
ततः पप्रच्छ भिषजं भेषजं जिनदत्तकः ।
व्याधिघातकृते सोऽपि निरूप्यालीलियद्वचः ॥ ५९॥
लाक्षामूलादृते तैलान्न शांतिर्भविता विभोः ।
चिकित्सेऽहं महाव्याधि तेन श्रेष्ठिन्न चान्यथा ॥६०॥
अर्थ (श्लोक 56 से 60): ज्योंही जिनदत्त आदि सेठों ने माली के मुख से मेरी ऐसी भयंकर दशा सुनी उन्हें परम दुःख हुआ। मारे दुःख के वे हा-हाकार करने लगे और सब मिलकर तत्काल श्मशान भूमि की ओर चल दिये। श्मशान भूमि में आकर मुझे उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया। मेरी ऐसी बुरी अवस्था देख वे और भी अधिक दुःख मनाने लगे। किस दुष्ट ने मुनिराज पर यह घोर उपसर्ग किया है ? इस प्रकार क्रुद्ध हो भव्य जिनदत्त ने मुझे शीघ्र उठाया और व्याधि के दूर करने के लिए मुझे अपने घर ले गया। जिस समय मैं घर पहुँच गया। तत्काल जिनदत्त किसी वैद्य के घर गया। मेरी व्याधि के शान्त्यर्थ वैद्य से उसने औषधि माँगी और मेरी सारी अवस्था कह सुनाई। भव्य जिनदत्त के मुख से मुनिराज की यह अवस्था सुन वैद्य ने कहा-प्रिय जिनदत्त ! मुनिराज का रोग अनिवार्य है। जब तक लाक्षामूल तेल न मिलेगा कदापि मैं उनकी चिकित्सा नहीं कर सकता, लाक्षामूल तेल से ही यह रोग जा सकता है। इसलिए तुम्हें लाक्षामूल रस के लिए प्रयत्न करना चाहिए। वैद्यराज के ऐसे वचन सुनकर जिनदत्त ने कहा वैद्यराज ! कृपया शीघ्र कहें लाक्षामूल तेल कहाँ और कैसे मिलेगा ? मैं उसके लिए प्रयत्न करूँ। वैद्यराज ने कहा- इसी नगर में भट्ट सोम-
क्वास्ते तदिति संपृष्टे प्रागदीद्भिषजांवरः। गृहेऽस्ति लक्षमूलं तद्वृद्धस्य सोमशर्मणः ॥६१॥
दग्धव्रणविघातोत्थ व्याधयो यांति दूरतां। तैलेन तेन तस्मात्तदा नेतव्यं त्वया लघु ॥६२॥
ततोऽगात्तस्य स सद्मं दृष्ट्वा तद्भामिनीं शुभाम्। तुंकारीं स्नेहसिद्ध्यर्थं भगिनीति वचो जगौ ॥६३॥
(हे) स्वसो रुजोपनोदार्थं लक्षमूलं मुनेर्मुदा। प्रयच्छ मूल्यमादाय श्रुत्वेति सा व्यलीलपत् ॥६४॥
मूल्यादृते गृहाण त्वं मुनेः शांतिकृते शृणु। अगदाद् गदनिर्नाशोऽमुत्र जीवस्य संभवेत् ॥६५॥
अट्टालिकायां तत्तैल काचकुंभाः समासते। तत्रैकं त्वं गृहाणाशु यावत्प्रयोजनं तथा ॥६६॥
तत्र गत्वा गृहीत्वा तं कंठे यावन्मुदा तदा। गृह्णाति क्षिप्तवान् भूमौ तैलं निःशेषमेव च ॥६७॥
भयकंपितगात्रेण तेनाकथि तदग्रके। साऽवादीदन्यमत्रत्वमंगीकुरु सहोदर ॥६८॥
अर्थ (श्लोक 56 से 68): शर्मा नाम का ब्राह्मण निवास करता है। लाक्षामूल तेल उसी के यहाँ मिल सकता है और कहीं नहीं। तुम उसके घर जाओ और शीघ्र वह तेल ले आओ। वैद्यराज के ऐसे वचन सुन शीघ्र ही भट्ट सोमशर्मा के घर गया। वहाँ उसकी तुंकारी नाम की शुभ भार्या को देखकर और उसे बहिन शब्द से पुकार कर यह निवेदन करने लगा- बहिन! मुनिवर मणिमाली का आधा मस्तक किसी दुष्ट ने जला दिया है। उनके मस्तक में इस समय प्रबल पीड़ा है कृपाकर मुनि पीड़ा की निवृत्ति के लिए मूल्य लेकर मुझे कुछ लाक्षामूल तेल दे दीजिए। जिनदत्त की ऐसी प्रिय बोली सुन तुंकारी अति प्रसन्न हुई। उसने शीघ्र ही जिनदत्त से कहा- प्रिय जिनदत्त! यदि मुनि की पीड़ा दूर करने के लिए तुम्हें तेल की आवश्यकता है तो आप ले जाइए मैं आपसे कीमत नहीं लूंगी। जो मनुष्य इस भव में जीवों को औषधि प्रदान करते हैं पर भव में उन्हें कोई रोग नहीं सताता। आप निर्भय हो मेरी अटारी चले जाइए। वहाँ बहुत-से घड़े तेल के रखे हैं, जितना तुम्हें चाहिए, उतना ले जाइए। तुंकारी के ऐसे दयामय वचन सुन जिनदत्त अति प्रसन्न हुआ। अटारी पर चढ़कर उसने एक घड़ा उठाकर अपने कंधे पर रख लिया और चलने लगा। घड़ा लेकर जिनदत्त कुछ ही दूर गया था अचानक ही उनके कंधे से घड़ा गिर गया और उसमें जितना तेल था सब फैलकर मिट्टी में मिल गया। तेल को इस प्रकार जमीन पर गिरा देख जिनदत्त का शरीर मारे भय के काँप गया। वह विचारने लगा-हाय!!! बड़ा अनर्थ हो गया। यही कठिनता से यह तेल हाथ आया था सो अब सर्वथा नष्ट हो गया। जाने अब तेल मिलेगा या नहीं ? अहा!!! अब तुंकारी मुझ पर जरूर नाराज होगी मैंने बड़ा अनर्थ किया तथा इस प्रकार अपने मन में कुछ समय संकल्प-विकल्प कर वह तुंकारी के पास गया। डरते-डरते उसे सब हाल कह सुनाया और तेल के लिए फिर से निवेदन किया। तुंकारी परम भद्रा थी उसने नुकसान पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया किन्तु शांतिपूर्वक उसने यही कहा ॥५६-६८॥
द्वितीयं काचकुंभं तमादातुं स जिघृक्षति।
भूमौ निपत्य भग्नोऽसौ तावत्कुंभो द्वितीयकः ॥६९॥
पुनस्तयाः समादेशाद् गृहीतंतृतीयं घटम्।
बभंज खिन्नचित्तोऽसौ तां तत्सर्वं न्यवेदयत् ॥७०॥
अलीलपत्तदा सापि मा भैषीस्त्वं सहोदर।
यावत्प्रयोजनं तावदंगीकुरु शुभं घटं ॥७१॥
यत्नतो घटमादाय स एकं विस्मितोऽभवत्।
तस्याः सवधिमागत्य बभाषे शुभयागिरा ॥७२॥
रे मातस्त्वत्समा बालां नाकालवलोकयं।
वृषवर्द्धितचेतस्कां शांतिपूरितविग्रहां ॥७३॥
असाधारा महाक्षांतिस्त्वयि विद्येत भो स्वसः।
मुनावपि वसत्क्षांते रीदृशा याहि संशयः ॥७४॥
भग्नेषु तेषु रे मात नारुषीस्त्वं कथंचन।
अभूच्चित्रमिदं चित्रं न दृष्टं कुत्र भूतले ॥७५॥
अशीशममहं कोपं यतस्तत्फलमुल्बणं।
अभोजमिति सावादीत् श्रेष्ठिनं कृतकौतुकं ॥७६॥
अर्थ (श्लोक 69 से 76): प्रिय जिनदत्त! यदि वह तेल फैल गया तो फैल जाने दे, मेरे यहाँ बहुत तेल रखा है, जितना तुझे चाहिए उतना ले जा और मुनिराज की पीड़ा दूर करने का उपाय कर। ब्राह्मणी के ऐसे उत्तम किन्तु संतोषप्रद वचन सुन जिनदत्त का सारा भय दूर हो गया। ब्राह्मणी की आज्ञानुसार उसने शीघ्र ही दूसरा घड़ा अपने कंधे पर रख लिया किन्तु ज्योंही घड़ा लेकर जिनदत्त कुछ चला ठोकर खा चट जमीन पर गिर गया और घड़ा फूट जाने से फिर सारा तेल फैल गया। ब्राह्मणी की आज्ञानुसार जिनदत्त ने तीसरा घड़ा भी अपने कंधे पर रखा कंधे पर रखते ही वह भी फूट गया। इस प्रकार फिर सब हाल जाकर कह सुनाया और कहते-कहते उसका मुख फीका पड़ गया। तीनों घड़ों के इस प्रकार फूट जाने से सेठ जिनदत्त को अति दुःखित देख तुंकारी का चित्त करुणा से आर्द्र हो गया। डाँट-डपट के बदले उसने जिनदत्त से यही कहा- प्यारे भाई! यदि तीन घड़े फूट गये हैं तो फूट जाने दे। उसके लिए किसी बात का भय मत कर। मेरे घर में बहुत-से घड़े रखे हैं। जब तक तुम्हारा प्रयोजन सिद्ध न हो तब तक तुम एक एक कर सबों को ले जाओ। ब्राह्मणी के ऐसे स्नेह भरे वचन सुन जिनदत्त को परम संतोष हुआ। उसकी आज्ञानुसार उसने शीघ्र ही घड़ा कंधे पर रख लिया और अपने घर की ओर चल दिया। ब्राह्मणी के ऐसे उत्तम बर्ताव से जिनदत्त के चित्त पर असाधारण असर पड़ गया था। ब्राह्मणी के स्नेह युक्त वचनों ने उसे अपना पक्का दास बना लिया था। इसलिए ज्योंही वह अपने घर पहुँचा घड़ा रखकर वह फिर तुंकारी के घर आया और विनयपूर्वक इस प्रकार निवेदन करने लगा-प्रिय बहिन! तू धन्य है, तेरा मन सर्वथा धर्म में दृढ़ है। तू क्षमा की भंडार है। मैंने आज तक तेरे समान कोई स्त्री-रत्न नहीं देखा। जैसी क्षमा तुझमें है संसार में किसी में नहीं। मुझसे बराबर तीन घड़े फूट गये, तेरा बहुत नुकसान हो गया तथापि तुझे जरा भी क्रोध न आया। जिनदत्त के ऐसे प्रशंसायुक्त किन्तु उत्तम वचन सुन तुंकारी ने कहा-भाई जिनदत्त! क्रोध का भयंकर फल मैं चख चुकी हूँ। इसलिए मैंने कुछ शांत कर दिया है मैं जरा-जरा-सी बात पर क्रोध नहीं करती। तुंकारी के ऐसे वचन सुन जिनदत्त ने कहा ॥६९-७६॥
स उवाच शुभे मातस्तत्कथां कथयस्व मां। अबीभणत्तदा सापि शृणु वृत्तांतमंजसा ॥७७॥
आनंदपूरिते रम्ये आनंदाख्यसुपत्तने। सानंदजनसंपूर्णे विस्तीर्णेऽक्षीणसंपदि ॥७८॥
शिवशर्मा महादेवो धनेभ्यो वसति स्फुटं। कमलश्री सुनामाऽभूत्तस्य जाया सुलोचना ॥७९॥
तयोर्बभूवुरष्टौ च पुत्राः पौरंदरोपमाः। भव्ययौवनलीलाढ्या धनाद्याष्टमदावहाः ॥८०॥
ततस्तयोरहंभद्रा तनुजाऽसीच्छिवावहा। पित्रादीनां सदा मान्या लालिता बंधुसत्करैः ॥८१॥
सरूपा सकला सारा मानिता भ्रातृजायया। मानयंति जनाः सर्वे गृहीत्वा नाम चोत्तमं ॥८२॥
ततो विज्ञापयामास भूपालमिति सादरं। भवद्भिर्जनमुख्यैश्च बांधवैर्नागरैस्तथा ॥८३॥
तुंकारनिनदो राजन्न विधेयः कदाचन। मत्पुत्र्या इति चादेशं सा प्रापद्भूपतस्तदा ॥८४॥
तुंकार वचनं कोऽपि दत्ते दैवाच्च मां प्रति। करोम्यनर्थसंतानं तस्य भूपसमक्षकं ॥८५॥
तदा प्रभृति मन्नाम तुंकारीतिकृतं जनैः। इत्थं तातादिसन्मान्या स्थिता धाम्नि सकोपिका ॥८६॥
अर्थ (श्लोक 77 से 86): बहिन! तुम क्रोध का फल कब चख चुकी हो, कृपा कर मुझे उसका सविस्तार समाचार सुनाओ। इस कथा के सुनने की मुझे विशेष लालसा है। जिनदत्त के ऐसे वचन सुन तुंकारी ने कहा-भाई! यदि तुझे इस कथा के सुनने की अभिलाषा है तो मैं कहती हूँ, तू ध्यानपूर्वक सुन-इसी पृथ्वीतल में आनंदित जनों से परिपूर्ण मनोहर एवं आनंद का आकर एक आनंद नाम का नगर है। आनंद नगर में अक्षय संपत्ति का धारक कोई शिवशर्मा नामक ब्राह्मण निवास करता था। शिवशर्मा की प्रिय भार्या कमलश्री थी। कमलश्री अतिशय मनोहरा, सुवर्ण वर्णा एवं विशाल नेत्रा थी। शिवशर्मा के प्रिय भार्या कमलश्री से उत्पन्न आठ पुत्र-रत्न थे। आठों ही पुत्र इन्द्र के समान सुन्दर थे, भव्य थे और धन आदि से मत्त थे। उन आठों भाइयों के बीच में अकेली बहिन थी। मेरा नाम भद्रा था। माता-पिता का मुझ पर असीम प्रेम था। सदा वे मेरा सम्मान करते रहते थे। मेरे भाई भी मुझ पर परम स्नेह रखते थे। मैं अतिशय रूपवती और समस्त स्त्रियों में सारभूत थी। इसलिए मेरी भौजाई भी मेरा पूरा-पूरा सम्मान करती थी। पास पड़ोसी भी मुझ पर अधिक प्रेम रखते थे और मुझे शुभ नाम से पुकारते थे। मुझे तुंकार शब्द से बड़ी चिढ़ थी। इसलिए मेरे पिता ने राज-सभा में भी जाकर कह दिया राजन्! मेरी पुत्री तुंकार शब्द से बहुत चिढ़ती है इसलिए क्या तो मंत्री, क्या नगर निवासी और बांधव कोई भी उसके सामने तुंकार शब्द न कहे। मेरे पिता के ऐसे वचन सुन राजा ने मुझे भी बुलाया। राजा की आज्ञानुसार मैं दरबार में गई। मैंने वहाँ स्पष्ट रीति से यह कह दिया कि जो मुझे तुंकारी शब्द से पुकारेगा राजा के सामने ही मैं उसके अनेक अनर्थ कर डालूँगी तथा ऐसा कहकर मैं अपने घर लौट आई। उस दिन से सब लोगों ने चिढ़ से मेरा नाम तुंकारी ही रख दिया और मैं क्रोधपूर्वक माता-पिता के घर रहने लगी ॥७७-८६॥
अथैकदा वने शुभे गुणसागरसन्मुनिम्। आटितं संपरिज्ञाय राजाद्या वंदितुं ययुः ॥८७॥
अर्थ: कदाचित् शुभ्र नाम के वन में एक परम पवित्र मुनिराज, जिनका नाम गुणसागर था, आये मुनिराज का आगमन-समाचार सुन राजा आदि समस्त लोग उनकी वंदनार्थ गये। मुनिराज के
नत्वा योगीश्वरं सर्वे तस्थुस्तत्र वृषेच्छवः।
मुनिवक्त्रात्ततो धर्मं शुश्रुवुः सा तदायिनं ॥८८॥
यथायथं व्रतं सर्वे जगृहर्हितसिद्धये।
तदा श्रेष्ठिन्मया रम्यं गृहीतं श्रावकव्रतं ॥८९॥
अर्थ (श्लोक 87 से 89): पास पहुँचकर सभी ने भक्ति-भाव से उन्हें नमस्कार किया और सबके सब उनके पास भूमि पर बैठ गये। उन सभी को उपदेश-श्रवण के लिए लालायित देख मुनिराज ने उपदेश दिया। उपदेश सुनकर सभी को परम संतोष हुआ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार यथायोग्य सभी ने व्रत भी धारण किये। मैं भी मुनिराज का उपदेश सुन रही थी मैंने भी श्रावक व्रत धारण कर लिए।
विना तुंकारशब्देन विना कोपं मयाद्रुतम्।
उरीकृतमेवात्र नियमादिकसद्व्रतम् ॥९०॥
आगत्य मंदिरे सर्वैरहं तस्थौ मदावहा।
मदाष्टकैः समाकीर्णा भ्रात्रष्टकसमुद्भवैः ॥९१॥
मत् शीलं संपरिज्ञाय मां वृणोति न कश्चन।
पितॄणां च तदा कष्टं जातं मद्यौवने क्षणात् ॥९२॥
अर्थ (श्लोक 90 से 92): किन्तु व्रत धारण करते समय तुंकार शब्द से उत्पन्न क्रोध का त्याग नहीं किया था। मुनिराज के उपदेश के समाप्त हो जाने पर सब लोग नगर में आ गये। मैं भी अपने घर आ गई। मेरे भाई जैसे आठ मदयुक्त थे उनके संसर्ग से मैं भी आठ मदयुक्त हो गई। जिस बात की मैं हठ करती थी उसे पूरा करके मानती थी। यहाँ तक कि मुझे हठीली जान मेरा कोई विवाह भी नहीं करता था इसलिए जिस समय मैं युवती हुई तो मेरे पिता को परम कष्ट होने लगा। मेरी विवाह संबंधी चिंता उन्हें रात-दिन सताने लगी।
एकदा सोमशर्माख्यो द्युतव्यसनवंचितः।
द्विजो वित्तं महाद्यूते हारयामास पापतः ॥९३॥
द्यूतकृद्भिस्तदा सोऽपि याच्यद्भिर्निजं वसु।
वृक्षे संरोप्य सल्लोष्टैस्ताड्यते यष्टिमुष्टिभिः ॥९४॥
श्रुत्वा मज्जनकस्तत्र गत्वा तं कैतवं प्रति।
इत्याख्यद् द्विज मे कन्यां चेद्वरिष्यसि सत्वरं ॥९५॥
मोचयामि तदा वित्तं दत्त्वैतेभ्यः शुभावहम्।
सोऽवोचद् द्विजाधीश शिवशर्मन् धनाधिप ॥९६॥
केन दोषेण सा कन्या दीयते मम पापिनः।
द्यूतव्यसनशक्तस्य पीड्यमानात्मनः खलैः ॥९७॥
अर्थ (श्लोक 93 से 97): उसी समय एक सोमशर्मा नाम का ब्राह्मण था। सोमशर्मा पक्का जुआरी था। कदाचित् सोमशर्मा जुआ खेल रहा था। उसने किसी बाजू पर अपना सब धन रख दिया और तीव्र दुर्भाग्योदय से उसे वह हार गया। सब धन हारने पर सब जुआरियों ने सोमशर्मा से अपना धन माँगा तो वह न दे सका इसलिए जुआरियों ने उसे किसी वृक्ष से बाँध दिया और बुरी तरह लात, डंडे, घूसों से मारने लगे। शिवशर्मा के कान तक भी यह बात पहुँची वह भागता-भागता शीघ्र ही सोमशर्मा के पास गया और उससे इस प्रकार कहने लगा प्रिय ब्राह्मण! यदि तुम मेरी पुत्री के साथ विवाह करना स्वीकार करो तो मैं इन जुआरियों का कर्जा निपटा दूँ और तुम्हें इनके चंगुल से छुड़ा लूँ। बस, हे श्रेष्ठिन्! मेरे पिता के ऐसे हितकारी वचन सुन सोमशर्मा ने कहा-ब्राह्मण सरदार! आपकी कन्या में ऐसा कौन-सा दुर्गुण है जिससे उसके लिए कोई योग्य वर नहीं मिलता और पापी,
मत्पितेति वचोऽवादीन्न दोषो भूपसंभवः।
किन्तु कोपकृतो दोषो मत्सुतायां यथाकथम् ॥९८॥
त्वंकारप्रभवं शब्दं सहते सा न सुंदरी।
यूयं वयं प्रकर्त्तव्यं त्वया जीवनहेतवे ॥९९॥
तथेति प्रतिपन्नोऽसौ कष्टेन वसुवर्षणैः।
मत्पित्रा मोचितो दुःखादानीतो निजवेश्मनि ॥१००॥
महता संभ्रमेणैव कारिता पाणिपीडनम्।
तेनाहं सुखमालेभे ततो रतिसमुद्भवं ॥१०१॥
यूयं यूयमिति कृत्वा माँ स वादयते सदा।
अतः सुखमवाप्ताहं प्रौढयौवनसंभवं ॥१०२॥
अर्थ (श्लोक 87 से 102): जुआरी, दुष्टों द्वारा दंडित, मुझ नकुछ पुरुष के साथ उसका विवाह करना चाहते हैं। सोमशर्मा के ऐसे वचन सुन शिवशर्मा ने कहा-प्रियवर! मेरी पुत्री में रूप आदि का कुछ भी दोष नहीं है वह अतिशय रूपवती, सुन्दरी है। अनेक कला-कौशलों की भंडार है किन्तु उसमें क्रोध की कुछ मात्रा अधिक है। वह तुंकार शब्द को सहन नहीं कर सकती। बस, जो-कुछ दोष है सो यही है। तुम अपने जीवन-सुख भोगने के लिए यही करना कि हम-तुम का ही व्यवहार रखना, मैं-तू का नहीं रखना। इसके अतिरिक्त दूसरा तुम्हें कोई कष्ट न भोगना पड़ेगा। शिवशर्मा के ऐसे वचन सुन और उस कष्ट को कुछ न समझ सोमशर्मा ने उसके साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया एवं मेरे पिता ने तत्काल जुआरियों का कर्ज पटा दिया और आनंदपूर्वक उसे अपने घर ले आये। कुछ दिन बाद किसी उत्तम मुहूर्त में सोमशर्मा के साथ मेरा विवाह हो गया। मैं उसके साथ आनंदपूर्वक भोग भोगने लगी। वह मुझसे सदा तुम का व्यवहार रखता था। इसलिए मुझे परम संतोष रहता था एवं हम दोनों दंपती का आपस में स्नेह बढ़ता ही चला जाता था ॥८७-१०२॥
अन्यदा नटनाद्यं स लोकयंस्तत्र संस्थितः।
विविधाद्भुत सद्वेषं चित्राश्चर्य सुहासकृत् ॥१०३॥
गणरात्रमतिक्रम्याजगाम धरणीसुरः।
स्थित्वा द्वाराग्रदेशे सोऽभाणीन्मधुरया गिरा ॥१०४॥
उद्घाटयत भो कांता यूयं द्वारं स्वभावतः।
पौनः पुण्येन वाचालमिति कांतं प्रति क्रुधा ॥१०५॥
बृहत्कालक्रमेणैव नो वच्मि च यथाकथं।
वादिता मानवादेन वहंती गर्वमुल्बणं ॥१०६॥
बृहद्वेलामतिक्रम्य खिन्नचेतो वचोऽवदत्।
शीघ्रं त्वंकारवाचालो रे रे मुद्घाटयत्वकं ॥१०७॥
सा त्वंकारं समाकर्ण्य द्वारमुद्घाट्य चांजसा।
मुक्त्वा कांतं गृहं वित्तं निर्गता योषमाश्रिता ॥१०८॥
अर्थ (श्लोक 103 से 108): कदाचित् सोमशर्मा किसी कार्यवश बाहर गये। उन्हें वहाँ कोई ऐसा स्थान दीख पड़ा जहाँ बहुत-से नृत्य आदि तमाशे हो रहे थे। वे चट वहाँ बैठ गये और तमाशा देखते-देखते उन्हें अपने समय का भी कुछ ख्याल नहीं रहा। जब बहुत-सी रात्रि बीत चुकी, खेल भी प्रायः समाप्त होने पर आ चुका, उन्हें घर की याद आई। वे शीघ्र अपने घर के द्वार पर आकर इस प्रकार पुकारने लगे-प्राणवल्लभे! कृपा कर आप दरवाजा खोलें। मैं दरवाजे पर खड़ा हूँ। मैं उस समय अर्ध निद्रित थी इसलिए दो-एक आवाज तो मैं उनकी सुन न सकी। किन्तु जब वे स्वभाव से बार-बार पुकारने लगे तो मैंने उनकी आवाज तो सुन ली परंतु ये इतनी रात तक कहाँ रहे ? क्यों अपने समय पर अपने घर न आये। ऐसा उन पर दोषारोपण कर फिर भी मैंने आवाज न दी और न दरवाजा खोला। कुछ समय बाद वे मुझे ‘तुम’ शब्द से पुकारने लगे तो भी मैंने उत्तर न दिया प्रत्युत मैं उन पर अधिक घृणा करती चली गई और मेरा गर्व भी बढ़ता चला गया। अंत में जब
भ्रातः कोपेन जीवानामिहैवाशुभमुल्बणं।
पापं संपद्यते नूनमुपहास्यफलप्रदं ॥१०९॥
क्रोधशत्रुर्नृणां पूर्वं ज्वलते निजविग्रहं।
पुनरन्यं यथा वंशस्थितो वह्निः स्वदाहकः ॥११०॥
आमर्षान्नरयं प्राप्ताः कृष्णद्वैपायनादयः।
देहज्वलनमासाद्य पूर्वं कोपो महारिपुः ॥१११॥
इहैवाशर्मसंदाता कोपोऽयं दुर्धरो रिपुः।
अमुत्र नरयादीनां दायकः पापनायकः ॥११२॥
दूरज्वलनमेवात्र त्वदग्रे कथ्यते मया।
पादाऽधो ज्वलनं कोपान्मम बंधो हितच्छृणु ॥११३॥
निर्गता पत्तने कोपाद्धृत्यखिलभूषणम्।
दिव्यस्त्री वसने पथ्या स्थूलमुक्ताफलावहा ॥११४॥
दस्यवो मां समालोक्य जगृहुर्घोररात्रौ ते।
भीमभिल्लाय वेगेन समदुर्निजस्वामिने ॥११५॥
अर्थ (श्लोक 103 से 115): सोमशर्मा अधिक घबरा गये, मेरी ओर से उन्हें कुछ भी जवाब न मिला तो उन्हें क्रोध आ गया। क्रोध के आवेश में उन्हें कुछ न सूझा वे मुझे फिर इस रीति से पुकारने लगे-अरी तुंकारी! दरवाजा तू क्यों नहीं जल्दी खोलती ? दरवाजे पर खड़े-खड़े हमें कितना समय बीत चुका है? रात्रि के अधिक व्यतीत हो जाने से हम कष्ट भोग रहे हैं। बस, फिर क्या था ? रे भाई जिनदत्त! ज्योंही मैंने अपने पति के मुख से तुंकारी शब्द सुना मेरा क्रोध के मारे शरीर भभक उठा। मेरे पति अर्ध रात्रि के बीतने पर घर आये थे इसलिए मैं स्वभाव से ही उन पर कुपित बैठी थी किन्तु तुंकारी शब्द ने मुझे बेहद कुपित बना दिया। मुझे उस समय और कुछ न सूझा किवाड़ खोल मैं घर से निकली और वन की ओर चल पड़ी। उस समय रात्रि अधिक बीत चुकी थी। नगर में चारों ओर सन्नाटा छा रहा था उस समय उल्लू, चोर आदिक ही आनंद से जहाँ-तहाँ भ्रमण करते फिरते थे और कोई नहीं जागता था। मैं थोड़ी ही दूर अपने घर से गई थी। मेरे बदन पर कीमती भूषण, वस्त्र थे इसलिए मुझ पर चोरों की दृष्टि पड़ी। वे शीघ्र मुझ पर बाघ सरीखे टूट पड़े और मुझे कड़ी रीति से पकड़कर उन्होंने तत्काल अपने सरदार किसी भील के पास पहुँचा दिया। चोरों का सरदार वह भील बड़ा दुष्ट था ज्योंही उसने मुझे देखा वह अति प्रसन्न हुआ और इस प्रकार कहने लगा- ॥१०३-११५॥
सोऽपि मां वीक्ष्य मूढात्मा जगाद वचनं तदा।
भव मे वनिता बाले गृहाणाभीष्टवस्तु च ॥११६॥
मयाऽवादी किरातेश न युक्तं कुलयोषितां।
नराणां च तथा ज्ञेयं दुःखदं शीलखंडनं ॥११७॥
तीव्रकामानलैस्तप्तो नाकर्ण्य वचनं मम।
बद्धकक्षो बभूवाशु शीलभंगाय पापधीः ॥११८॥
अर्थ: बाले! तुझे जिस बात की आवश्यकता हो कह, मैं उसे करने के लिए तैयार हूँ। तू मेरी प्राणवल्लभा बनना स्वीकार कर ले। मैं तुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी रखूँगा। तू किसी प्रकार अपने चित्त में भय न कर। भिल्लपति के ऐसे वचन सुन मैं भौंचक रह गई। किन्तु मैंने धैर्य हाथ से न जाने दिया इसलिए शीघ्र ही प्रौढ़ किन्तु शांतिपूर्वक इस प्रकार जवाब दिया भिल्ल सरदार! आपका यह कथन सर्वथा विरुद्ध और मलिन है। जो स्त्रियाँ उत्तम वंश में उत्पन्न हुई हैं और जो मनुष्य कुलीन हैं कदापि उन्हें अपना शीलव्रत नष्ट न करना चाहिए। आप यह विश्वास
निश्चलांगं मनः कृत्वा स्थितां मां व्रतरक्षितुं।
चकार विविधां चेष्टां वस्त्रोत्क्षेपणाजां स च ॥११९॥
मच्छीलेन समागत्य वनदेव्या निवारितः।
नरजन्मनि यत्सारं व्रतानामपि भूषणम् ॥१२०॥
ततः स सार्थवाहस्य क्रुद्धो मूल्यं न मां ददौ।
तेऽपि मां दिव्यकन्याभां वीक्ष्य मारशराहताः ॥१२१॥
ते शीलखंडने रक्ता बभूवुर्यावदुन्मुखाः।
वनदेव्या तदागत्य पीडिता यष्टिमुष्टिभिः ॥१२२॥
तत्रापि रक्षणे हेतुर्बभूव वनदेवता।
शीलप्रभावतो नूनं किंकरा हि सुरा नराः ॥१२३॥
अर्थ (श्लोक 116 से 123): रखें जो जीव अपने शीलव्रत की कुछ भी परवाह न कर दुष्कर्म कर डालते हैं, उन्हें दोनों जन्मों में अनेक दुःख सहने पड़ते हैं। संसार में उनको कोई भला नहीं कहता।
उस समय वह चोरों का सरदार कामबाण से बिद्ध था। भला वह धर्म-अधर्म को क्या समझ सकता था। इसलिए तप्त लौह-पिंड पर जल-बूँद जैसे तत्काल नष्ट हो जाती है-उसका नामोनिशान भी नजर नहीं आता। वैसे ही मेरे वचनों का भिल्लराज के चित्त पर जरा भी असर न पड़ा वह ‘‘कबूतरों पर जैसे बाज टूटता है’’ एकदम मुझ पर टूट पड़ा और मुझे अपनी दोनों भुजाओं में भरकर कामचेष्टा करने के लिए उद्यत हो गया।
जब मैंने उसकी यह घृणित अवस्था देखी तो मैं अपने पवित्र शीलव्रत की रक्षार्थ आसन बाँधकर निश्चल बैठ गई। मैंने उसकी ओर निहारा तक नहीं। बहुत समय तक प्रयत्न करने पर भी जब उस पापी का उद्देश्य पूर्ण न हो सका तो वह अति कुपित हो गया। उसने शीघ्र ही अपने साथियों के हाथ मुझे बेच डाला और अपने क्रोध की शांति की।
उसके साथी परम दुष्ट थे। ज्योंही उन्होंने मुझे देखा देवांगना के समान परम सुंदरी जान वे भी कामबाण से व्याकुल हो गये और बिना समझे-बूझे मेरे शीलव्रत का खंडन करना प्रारंभ कर दिया। उस समय कोई वन-रक्षिका देवी यह दृश्य देख रही थी इसलिए ज्योंही वे दुष्ट मेरे पास आवे डंडों से पीट के देवी ने उन्हें ठीक कर दिया और वह मुझे अपने यहाँ ले गई।
भाई जिनदत्त! यद्यपि मैं अतिशय पापिनी थी तो भी मैं अपने शीलव्रत में दृढ़ थी इसलिए उस भयंकर समय में उस देवी ने मेरी रक्षा की। तुम निश्चय समझो जो मनुष्य अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहते हैं देव भी उनके दास बन जाते हैं और उनके समस्त दुःख एक ओर किनारा कर जाते हैं ॥११६-१२३॥
भयत्रस्तः समानैत्कृमिरागादिकं कम्बलं।
द्वीपं पापजनाकीर्णं श्वकर्दमसमाकुलं ॥१२४॥
स मां दासकुलस्यैव ददौ मूल्येन किल्बिषात्।
स्थिताहं तत्र पश्यंती समुदीर्णं कुदादिकं ॥१२५॥
अर्थ (श्लोक 124 से 125): जिस समय देवी मुझे अपने घर ले गई थी उस समय मेरे पास कोई वस्त्र न था इसलिए उस देवी ने मुझे एक ऐसा कम्बल जो अनेक जुओं, चींटी आदि जीवों से व्याप्त था, जगह-जगह उसमें रक्त, पीब, कीचड़ आदि लगी थी, दे दिया और मुझे वहीं रहने की आज्ञा दी। मैंने भी
पक्षे समे भ्रातः कुरुते शिरमोचनं। निःकाश्य शोणितं तस्माद्वस्त्ररंजनहेतवे ॥१२६॥
गृह्णातीत्थं करोत्येवं पक्षे पक्षे निरंतरम्। सहमाना तथाऽहं च स्थिता तत्र स्वकिल्बिषात् ॥१२७॥
तुंकारशब्दमासोढुमक्षमा तातमंदिरे। क्षन्तुं शक्ता सिरामोचं विचित्रा कर्मणां गतिः ॥१२८॥
पुनः सलक्षमूलाख्य तैलाभ्यंगेन देहजाम्। निवारयति मे पीडां नारकाभ्यां शुभातिगां ॥१२९॥
अर्थ (श्लोक 124 से 129): कम्बल ले लिया और प्रबल पापोदय से उस क्षेत्र में उत्पन्न कोदों आदि धान्यों को देखती हुई रहने लगी। इतने पर भी मेरे दुःखों की शांति न हुई प्रति पक्ष में वह देवी मेरे सिर के केशों का मोचन करती थी और अपने वस्त्र रँगने के लिए उससे रक्त निकाला करती थी। रक्त निकालते समय मेरे मस्तिष्क में पीड़ा होती थी इसलिए वह देवी उस पीड़ा को लाक्षामूल तेल लगाकर दूर करती।
अथ यो धनदेवाख्यो भ्राता संप्रीतिपूरितः। उज्जयिन्याधिपेनैव प्रेषितो भूतिमंडितः ॥१३०॥
ततो देशाधिपस्यैव पारासरसुभूपतेः। समीपं कार्यसिद्ध्यर्थं संक्रमात्तत्र चागतः ॥१३१॥
पारासरं समासाद्य प्रणम्य कृतकार्यकः। यावद् बभूव तावन्मा मवैक्षत च दुःखिनीं ॥१३२॥
आलिंग्यस्नेहतो भ्राता मोचयित्वा यथा कथं। आदाय मां समानीया जगाम निजपत्तनं ॥१३३॥
दृष्ट्वा मां च जनन्याद्या जहर्षुः क्षीणविग्रहां। धनदेवस्ततोऽदान्मां मद्भर्त्रे सोमशर्मणे ॥१३४॥
अर्थ (श्लोक 130 से 134): कदाचित् मेरा परम स्नेही भाई यौवन देव उज्जयिनी के राजा ने किसी कार्यवश बड़ी विभूति के साथ राजा पारासर के पास भेजा। वह अपना कार्य समाप्त कर उज्जयिनी लौट रहा था। मार्ग में कुछ समय के लिए जिस वन में मैं रहती थी, उसी वन में वह ठहर गया और मुझ अभागिनी पर उसकी दृष्टि पड़ गई। ज्योंही उसने मुझे देखा बड़े स्नेह से मुझे अपने हृदय से लगाया और बड़ी कठिनता से उस देवी के चंगुल से निकालकर मुझे उज्जयिनी ले गया। जिस समय मेरी माता आदि कुटुम्बियों ने मुझे देखा उन्हें परम दुःख हुआ। मेरे शरीर की दशा देख मेरी माँ अधिक दुःख मानने लगी। मेरे मिलाप से मेरा समस्त बंधुवर्ग अति प्रसन्न हुआ एवं कुछ दिन बाद मेरा भाई धनदेव मुझे यहाँ मेरे पति के घर पहुँचा गया।
अन्यदा मुनिमासाद्य गृहीतं कोपसद्व्रतं। मया सच्छीलरक्षायै वेदयंत्या च तत्फलं ॥१३५॥
अर्थ: प्रिय भाई! जब से मैं यहाँ आई हूँ तब से मैंने जरा-जरा-सी बात पर क्रोध करना छोड़ दिया। मैं क्रोध का भयंकर फल चख चुकी हूँ इसलिए और भी मैं क्रोध की मात्रा दिनोंदिन कम करती जाती हूँ। आप निश्चय समझिए यह धर्मरूपी वृक्ष सम्यग्दर्शनरूपी जड़ का धारक, शास्त्ररूपी पीड़ कर युक्त, दानरूपी शाखाओं से शोभित, अनेक प्रकार के गुणरूपी पत्तों से व्याप्त, कीर्तिरूपी पुष्पों से सुसज्जित, व्रतरूपी उत्तम आल-बाल से मनोहर, मोक्षरूपी फल का देने वाला, क्षमारूपी जल से बढ़ा हुआ परम पवित्र है। यदि इसमें किसी रीति से क्रोधरूपी अग्नि प्रवेश कर जाये तो वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, तत्काल भस्म हो जाता है इसलिए जो मनुष्य अपना हित चाहते हैं उन्हें ऐसा भयंकर फल देने वाला क्रोध सर्वथा छोड़ देना चाहिए।
दृङ्मूलः श्रुतसत्पीठो दानशाखो गुणच्छदः ।
यशः पुण्याव्रतावृत्तिर्मोक्षांतफलदायकः ॥१३६॥
शमांबुवर्द्धितो धर्म शाखी कोप धनंजयम् ।
आसाद्य वृद्धिमापन्नः क्षणेन भस्मसाद्भवेत् ॥१३७॥
इति विज्ञाय भो भ्रातर्मयाऽग्राहि क्रुधाव्रतं ।
श्रुत्वेति तां पुनः श्रेष्ठी प्रशंस्य स्वालयं गतः ॥१३८॥
ततः स लक्षमूलेन तैलेन मुनिपुंगवम् ।
निर्व्रणं कृतवान्भक्त्या नानागदविधानतः ॥१३९॥
स्वस्थीभूते मुनौ राजंश्चक्रुस्ते परमोत्सवम् ।
गृहे गृहे जिनागारे तूर्यत्रिकसमुद्भवम् ॥१४०॥
अर्थ (श्लोक 124 से 140): ब्राह्मणी तुंकारी के मुख से ऐसी कथा सुन सेठ जिनदत्त अति प्रसन्न हुआ। वह तुंकारी की बार-बार प्रशंसा करने लगा एवं प्रशंसा करता-करता कुछ समय बाद अपने घर आया। लाक्षामूल तेल एवं अन्यान्य औषधियों से जिनदत्त मेरी (मुनिराज की) परिचर्या करने लगा। कुछ दिन बाद मेरे रोग की शांति हुई। मुझे निरोग देख जिनदत्त को परम संतोष हुआ। मेरी निरोगता की खुशी में जिनदत्त आदि सेठों ने अति उत्सव मनाया। जहाँ-तहाँ जिनमंदिर में विधान होने लगे एवं कानों को अति प्रिय उत्तमोत्तम बाजे भी बजने लगे ॥१२४-१४०॥
प्रावृट् कालस्तदाऽयातो राजन्वर्षत्यनाघनम् ।
द्योतयन् विद्युतां वृंदं गंभीर गर्जयन् ध्वनिं ॥१४१॥
सशाद्वला तदा भूमिर्जज्ञेऽबुबिंदुसंयुता ।
स्थूलमुक्ता फलाकीर्णा हरिन्मणिमया यथा ॥१४२॥
बभुस्तत्र शुभाः केकाः केकिनां तांडवात्मनां ।
लोकतृप्तिकृते तूर्णमाह्वयंत्य इवांबुदं ॥१४३॥
हारायंते दिशां धाराबिंदु मुक्ताफलावहाः ।
विद्युतसंतप्तहेमाढ्या यत्र केका समाकुले ॥१४४॥
अग्नीयंते पराधाराः कामिनीनां वियोगतः ।
पीडितानां वरे चित्ते ज्वलंत्यो मारदारुभिः॥ १४५॥
अध्वगानां कृतालोपे पथि निर्गमनं कदा ।
धाराधरो न संदत्ते प्रियाविरह शंकिनां ॥१४६॥
ये ये यत्र स्थितास्ते ते तत्र तत्र महादरात् ।
घनाघनभयान्नूनं तिष्ठंति प्रीतिपीडिताः ॥१४७॥
परदेश प्रिया नारी बलाका कृत ताडकम् ।
स्वकांतगाढसंलीनं वीक्ष्येति सा व्यतर्कयत् ॥१४८॥
इयं मत्तः पराधन्या विप्रलंभभवं कदा ।
दुःखं न सहते चाहं विप्रलंभप्रतारिता ॥१४९॥
अर्थ (श्लोक 141 से 149): राजन् श्रेणिक! इधर तो मैं निरोग हुआ और उधर वर्षाकाल भी आ गया। उस समय आनंद से वृष्टि होने लगी जहाँ-तहाँ बिजली चमकने लगी एवं प्रत्येक दिशा में मेघ ध्वनि सुनाई पड़ी। उस समय प्रत्येक एवं साधारण वनस्पति से आच्छादित जल-बूँदों से व्याप्त, पृथ्वी अति मनोहर नजर आने लगी। जैसे हरित कांतमणि पर जड़े हुए सफेद मोती शोभित होते हैं वैसे हरी वनस्पति पर स्थित जल-बूँदें उस समय ठीक वैसी ही शोभा को धारण करती थीं। उस समय चारों ओर आनंद शब्द करते थे। विरहिणी कामिनियों के लिए वह मेघमाला जलती हुई अग्नि ज्वाला के समान थी और अपनी प्राणवल्लभा के अधरामृत पान के लोलुपी, क्षण-भर भी उसके विरह को सहन न करने वाले कामिनियों के मार्ग को रोकने वाली थी। जिस समय विरहिणी स्त्रियाँ अपने-अपने घोसलों में आनंदपूर्वक प्रेमालिंगन करते हुए बगली बगलों को देखती थी उन्हें परम दुःख होता था। वे अपने मन में ऐसा विचार करती थी। हाय !!! यह पति विरह दुःख हम पर कहाँ से टूट पड़ा। क्या यह दुःख हमारे ही लिए था ? हम कैसे इस दुःख को सहन करें। इस प्रकार जीवों को स्वभाव से ही सुख-दुःख के देने वाले वर्षाकाल के आ जाने से जिनदत्त आदि ने चातुर्मास के लिए मुझे उस नगर में ही रहने के लिए आग्रह किया इसलिए मैं वही रह गया एवं ध्यान में दत्तचित्त जीवों को उत्तम मार्ग का उपदेश देता हुआ में सुखपूर्वक जिनदत्त के घर में रहने लगा।
अयोगाकारधाराभिर्द्धराधरेव वर्षति। श्राद्धैराक्षिप्यमाणोऽहं जिनदत्तालये स्थितः ॥१५०॥
प्रावृद्योगं व्यवस्थाप्य मया स्थायि सुयोगतः। जिनार्चास्नानचैत्यादि कारयता महोत्सवं ॥१५१॥
एकदा निजपुत्रस्य भयात्सर्वव्यसनात्मनः। कुबेरदत्तसंज्ञस्य दुर्द्ध्यानाहत चेतसः ॥१५२॥
ताम्रकुंभं समादाय श्रेष्ठी रत्नादिसंभृतं । मुनेर्निकटमानीयं तदाऽधो गुप्तगुप्तके ॥१५३॥
विष्टराधस्तले तावद् गर्भग्रहविसंस्थितः। कुबेरो निक्षिपंतं तं ददर्श श्रेष्ठिनं क्षितौ ॥१५४॥
एकदा सततः काले गते कीयति पापधीः। निःकाश्य स्वर्णकलशं लोभसंभिन्नमानसः ॥१५५॥
अन्यत्राभीष्ट संस्थाने धृतस्तेन च पापिना। मुनिना वीक्ष्यमाणेन तूष्णीभावश्रितात्मना ॥१५६॥
अथो वयं सुखेनैव कारयंतोऽर्थकर्णनम्। प्रावृट्कालं प्रपूर्याशु विनिवर्त्य सुयोगकं ॥१५७॥
अटामो मनसः शुध्या भव्योपदेशन कृते। ईर्यापथविशुद्धाढ्या आद्येतराः विचारकाः ॥१५८॥
अर्थ (श्लोक 150 से 158): सेठ जिनदत्त का पुत्र जो कि अति व्यसनी और दुर्ध्यानी कुबेरदत्त था। कुबेरदत्त से जिनदत्त धन आदि के विषय से सदा शंकित रहता था। कदाचित् सेठ जिनदत्त ने एक ताँबे के घड़े को रत्नों से भरकर और मेरे सिंहासन के नीचे एक गहरा गड्ढा खोदकर चुपचाप रख दिया किन्तु घड़ा रखते समय कुबेरदत्त मेरे सिंहासन के नीचे छिपा था इसलिए उसने यह सब दृश्य देख लिया और कुछ दिन बाद वहाँ से उस घड़े को उखाड़कर अपने परिचित स्थान पर उसने रख दिया। कुछ दिन बाद चातुर्मास समाप्त हो गया। मैंने भी अपना ध्यान समाप्त कर दिया एवं हेयोपादेय विचार में तत्पर ईर्या समिति पूर्वक मैं वहाँ से निकला और वन की ओर चल दिया।
तावच्छ्रेष्ठी समुत्क्षिप्य धरां कुंभं सरत्नकं। अपश्यन्व्याकुलो जज्ञे व्यामोहाहतमानसः ॥१५९॥
अर्थ: मेरे चले जाने के पश्चात् सेठ जिनदत्त को अपने धन की याद आ गई। जिस स्थान पर उसने रत्न भरा घड़ा रखा था तत्काल उसे खोदा। वहाँ घड़ा नहीं मिला, जब उसे घड़ा न मिला तो वह इस प्रकार संकल्प-विकल्प करने लगा-
अहो क्व मे गतं वित्तं तस्करः कोऽत्र संगतः। केनारक्षि मम प्राण प्रख्यं रत्नं सुयत्नतः ॥१६०॥
निक्षिप्तमत्र रक्षार्थमतोपि गतमीक्ष्यते। भुनक्ति कर्कटीं वृत्तिर्यदि किं रक्ष्यतेऽन्यतः ॥१६१॥
अर्थ (श्लोक 160 से 161): हाय! मेरा धन गया ? किसने ले लिया ? अरे मेरे प्राणों के समान, यत्न से सुरक्षित, धन अब किसके पास होगा। हाय! रक्षार्थ मैंने दूसरी जगह से लाकर यहाँ रखा था उसे यहाँ से भी किसी चोर ने चुरा लिया ? जब बाढ़ ही खेत खाने लगी तो दूसरा मनुष्य कैसे उसकी रक्षा कर सकता है। मुनिराज के सिवाय इस स्थान पर दूसरा कोई मनुष्य नहीं रहता था। प्रायः मुनिराज के परिणामों में मलिनता आ गई हो। उन्होंने ही ले लिया हो। पूछने में कोई हानि नहीं, चलूँ मुनिराज से पूछ लूँ तथा ऐसा कुछ समय तक विचार कर शीघ्र ही जिनदत्त ने कुछ नौकर मेरे अन्वेषणार्थ भेजे और स्वयं भी घर से निकल पड़ा एवं कपट वृत्ति से जहाँ-तहाँ मुझे ढूँढ़ने लगा।
अहो वृत्तं दुरंतं हि गृहीतं मुनिपुंगवैः। भविष्यति न वा चित्ते तर्कयच्चेति मूढधीः ॥१६२॥
व्यावर्त्तनकृतेश्रेष्ठी मुने राजन् समूढधीः। भृत्यान्प्रस्थापयामास काष्ठासु निखिलासु च ॥१६३॥
एकस्मिन्नयने श्रेष्ठी स्वयं वीक्षणहेतवे। आट तत्कपटं चित्ते मन्यमानो मुहुर्मुहुः ॥१६४॥
अटंतं मुनिराजं तं निःशंकं गिरिवत्स्थिरं। वीक्ष्यागत्य प्रणम्याशु वचनं स व्यलीलपत् ॥१६५॥
अर्थ (श्लोक 162 से 165): मैं वन में किसी पर्वत की तलहटी में ध्यानारूढ़ था। मुझे जिनदत्त की कपट वृत्ति का कुछ भी ख्याल न था। अचानक ही घूमता-घूमता वह मेरे पास आया। भक्ति-भाव से मुझे नमस्कार किया एवं कपटवृत्ति से वह इस प्रकार प्रार्थना करने लगा ॥१६२-१६५॥
स्वामिन्नशर्मसंपूर्णास्तूर्णं त्वद्दर्शनलोलुपाः। वर्त्तंते गृहिणस्तेषां कष्टनाशं विधेहि भो ॥१६६॥
व्यावर्त्तय कृपाधीश किंचित्कार्यकृते पुनः। न गंतव्यं न गंतव्यं त्वया नाथ यथा कथं ॥१६७॥
तदाग्रहं समालोक्य शंबर्या कृतमुल्बणं। मत्वाभिप्रायमाचित्ते तर्कयन्मानसे तदा ॥१६८॥
अर्थ (श्लोक 166 से 168): प्रभो दीनबन्धो! जब से आपने उज्जयनी छोड़ दी है। तब से वहाँ के निवासी श्रावक बड़ा दुःख मान रहे हैं। आपके चले आने से वे अपने को भाग्यहीन समझते हैं और अहोरात्र आपके दर्शनों के लिए लालायित रहते हैं। कृपाकर एक समय आप जरूर ही उज्जयनी चलें और उन्हें आनंदित करें पीछे आपके आधीन बात है चाहे आप जायें या न जायें। जिनदत्त की ऐसी वचन भंगी सुन मैं अवाक् रह गया। मुझे शीघ्र ही उसके भीतरी अभिप्राय का ज्ञान हो गया। धन के लिए उसका ऐसा बर्ताव सुन मैं अपने मन में ऐसा विचार करने लगा।
अहो दुष्टमहोदुष्टं द्रविणं पापद् नृणाम्। अनिष्टपदमेवात्र दुरंतं दुःखदायकम् ॥१६९॥
अहो! शत्रुत्वमायाति सखापि प्राणवल्लभः। नागीयते शुभा भार्या व्याघ्रीयति निजांबिका ॥१७०॥
अर्थ (श्लोक 169 से 170): यह धन बड़ा निकृष्ट पदार्थ है। यह दुष्ट जीवों को घोर पाप का संचय कराने वाला और अनेक दुःख प्रदान करने वाला है। हाय!!! जो परम मित्र है अपना कैसा भी अहित नहीं चाहता वह भी इस धन की कृपा से परम शत्रु बन जाता है और अनेक अहित करने के लिए तैयार हो जाता है। प्राण-प्यारी स्त्री इस धन की कृपा से सर्पिणी के समान भयंकर बन जाती है। जन्मदात्री, सदा हित चाहने वाली, माता भी धन के फेर में पड़कर भयंकर व्याघ्री बन जाती है। धन के लिए पुत्र के मारने में वह जरा भी संकोच नहीं करती। धन के फेर में पड़कर एक भाई दूसरे भाई का भी अनिष्ट चिंतन करने लग जाता है। पिता भी धन की ही कृपा से अपने को सुखी मानता है। यदि कुटुम्बी धन नहीं देखते हैं तो जहाँ-तहाँ निंदा करते फिरते हैं। बहिन भी धन के चक्र में फँसकर हलाहल विष सरीखी जान पड़ती है। निर्धन भाई को मारने में उसे जरा भी संकोच नहीं होता। हाय!!! समस्त परिग्रह के त्यागी, आत्मिक रस में लीन, मुनिराज भी इस दुष्ट धन की कृपा से चोर बन जाते हैं। इस धन के लिए पिता अपने प्यारे पुत्र को मार देता है। पुत्र भी अपने प्यारे पिता को यमलोक पहुँचा देता है। धन के पीछे भाई भाई को मार देता है। सेवक स्वामी का
वधीयति सुतो रम्यो मित्रीयति सहोदरः। अविश्वासीयति भ्राता तातो मूर्खायतेतरां ॥१७१॥
निंदीयति स्वगोत्रं च स्वसा हालाहलायते। वित्तप्रभावतो नूनं सर्वं द्वेषायते सदा ॥१७२॥
वित्तसंसर्गयोगेन मुनिश्चोरायते तराम्। अहोनिंद्यमहोनिंद्यं वित्तं प्राणापहारकं ॥१७३॥
ध्नंति ताताः सुतं वित्तात्सु तास्तातं न संशयः। सेवकाः स्वामिनं चैव भ्रातरो भ्रातरं निजं ॥१७४॥
स्वशरीरं त्यजंत्येव नरा वित्तकृते पुनः। धिग धिग् द्रविणमेवात्र सर्वहिंसामयं खलं ॥१७५॥
इति व्यूहसमूहाढ्यं मां नीत्वा स्वगृहं गतः। सोऽवादीन्नाथ तत्रैकां कथां कथय बुद्धितः ॥१७६॥
बुद्ध्वांतः करणं तस्य जगौ योगी वणिग्वर। त्वमेवोदंतमेकं च शृणोमि गद चित्तजं ॥१७७॥
अलीलपन्निजं भावं सूचयन्ख्यातिमुत्तमां। श्रेष्ठी स्वामिन्निजं चित्तं स्थिरी कृत्य शृणु प्रभो ॥१७८॥
अर्थ (श्लोक 166 से 178): प्राणघात कर देते हैं। धन के लिए जीव अपने शरीर की भी परवाह नहीं करते। हाय!!! ऐसे धन को सहस्त्र बार धिक्कार है। वह सर्वथा हिंसामय है। इस चक्र में फँसे हुए जीव कदापि सुखी नहीं हो सकते तथा इस प्रकार धन की बार-बार निंदा करते हुए मुझे यह पुनः अपने घर ले गया एवं वहाँ पहुँचकर यह कहने लगा-नाथ कृपाकर! मुझे कोई कथा सुनाइये। मुझे आपके मुख से कथा श्रवण की अधिक अभिलाषा है। उसके ऐसे वचन सुन मैंने कहा-जिनदत्त! तुम्हीं कोई कथा कहो हम तुम्हारे मुख से ही कथा सुनना चाहते हैं बस फिर क्या था ? वह तो कथा द्वारा अपना भीतरी अभिप्राय बतलाना चाहता ही था इसलिए ज्यों ही उसने मेरे वचन सुने वह अति प्रसन्न हुआ और कहने लगा-प्रभो! आपकी आज्ञानुसार मैं कथा सुनाता हूँ आप ध्यानपूर्वक सुने और मुझे क्षमा करें।
वारणस्यां प्रफुल्लायां जितशत्रुनराधिपः। राजते राजराजेंद्रैः सेवितांघ्रिः सरोरुहः ॥१७९॥
अगदंकार एकोऽस्ति भूपते! रोगवेदकः। धनदत्ताभिधस्तस्य धनदत्ता च वल्लभा ॥१८०॥
नानाभेषजभेदज्ञो भूपत्यादींश्चिकित्सते। भूपावतीर्णसद्वृत्तिं भुंजद्भोगपुरंदरः ॥१८१॥
तयो द्वौ तनुजौ रम्याऽवभूतां प्रीतिदौ मुने। धनमित्रो धनेंदुश्च यौवनोद्भासि विग्रहौ ॥१८२॥
पित्रा संपाठ्यमानौ तौ लालनात्पठतो न हि। गदादिकमजानंतौ समूर्खौ च गृहे स्थितौ ॥१८३॥
अर्थ (श्लोक 166 से 183): इसी जंबूद्वीप में एक अतिशय मनोहर बनारस नाम की नगरी है। बनारस नगरी का स्वामी जो नीतिपूर्वक प्रजा का पालक था राजा जितमित्र था। राजा जितमित्र के यहाँ एक अगदंकार नाम का राज वैद्य था। उसकी स्त्री धनदत्ता अतिशय रूपवती एवं साक्षात् कुबेर की स्त्री के समान थी। राज्य की ओर से वैद्य अगदंकार को जो आजीविका दी जाती थी उसी से वह अपना गुजारा करता था एवं इन्द्र के समान उत्तमोत्तम भोग भोगता वहाँ आनंद से रहता था। वैद्यवर अगदंकार के अतिशय सुन्दर दो पुत्र थे। प्रथम पुत्र धनमित्र था और दूसरे का नाम धनचन्द्र था। दोनों भाई माता-पिता के लाड़ले अधिक थे इसलिए अनेक प्रयत्न करने पर भी वे फूटा अक्षर भी न पढ़ सके। रोग आदि की परीक्षा का भी उन्हें ज्ञान नहीं हुआ एवं वे निरक्षर भट्टाचार्य होकर घर में रहने लगे ॥१६६-१८३॥
अन्यदा किल्बिषात्तातस्तयोरापचपंचतां। लोपयामास तद्वृत्तिं भूपोऽन्यस्मै ददौ च तां ॥१८४॥
ततस्तौ दुःखसंपूर्णावभिमानेन पीडितौ। चंपायां जग्मतुस्तूर्णं शिवभूतेश्च पार्श्वके ॥१८५॥
अर्थ (श्लोक 184 से 185): कुछ दिन बाद अशुभ कर्म की कृपा से वैद्यवर अगदंकार का शरीरांत हो गया। वे धनमित्र और धनचन्द्र अनाथ सरीखे रह गये। राज्य की ओर से जो आजीविका बँधी थी राजा ने उसे भी उन्हें मूर्ख जान छीन ली। इसलिए उन दोनों भाइयों को और भी अधिक दुःख हुआ एवं अतिशय मिथ्या अभिमानी किन्तु अतिशय दुःखित वे दोनों भाई कुछ विद्या सीखने के लिए चम्पापुरी की ओर चल दिये। उस समय चम्पापुरी में कोई शिवभूति नाम का ब्राह्मण निवास करता था। शिवभूति वैद्य विद्या का अच्छा ज्ञाता था इसलिए वे दोनों भाई उसके पास गये एवं कुछ काल वैद्यक शास्त्रों का भली प्रकार अभ्यास कर वे भी वैद्य विद्या के उत्तम जानकार बन गये ॥१८४-१८५॥
भिषगावेदकं शास्त्रं तत्राधीत्य चिरं च तौ। चिकीर्षतः पुरं गंतुं निरगातां मुदा तदा ॥१८६॥
आटंतौ तौ वने घोरे व्याघ्रं क्रूरं भयावहं। नेत्रपीडापरिप्राप्तमद्राष्टामगदावहौ ॥१८७॥
अर्थ (श्लोक 186 से 187): जब उन्होंने देखा कि हम अच्छे विद्वान् बन गए तो उन दोनों ने अपनी जन्म-भूमि बनारस आने का विचार किया एवं प्रतिज्ञानुसार वे वहाँ से चल भी दिये। मार्ग में वे आनन्दपूर्वक आ रहे थे अचानक ही उनकी दृष्टि एक व्याघ्र पर पड़ी जो व्याघ्र सर्वथा अंधा था और आँखों के न होने से अनेक क्लेश भोग रहा था।
धनमित्र स्तदावादीदंधं व्याघ्रं सुभेषजैः। करोमीक्षाक्षमं तावत्कनिष्ठेन निवारितः ॥१८८॥
न कर्त्तव्यं न कर्त्तव्यं त्वया भेषजमुत्तमम्। दुष्टस्य विपदायै स्यादुपकारः कृतोऽपि च ॥१८९॥
अर्थ (श्लोक 188 से 189): व्याघ्र को अंधा देख धनमित्र का चित्त दया से आर्द्र हो गया। उसने शीघ्र ही अपने छोटे भाई से कहा-प्रिय धनचन्द्र! कहो तो मैं इस दीन व्याघ्र को उत्तम औषधियों के प्रताप से अभी सूझता कर दूँ ? यह विचारा आँखों के बिना बड़ा कष्ट सह रहा है। धनमित्र की ऐसी बात सुन धनचन्द्र ने कहा-नहीं भाई इसे तुम सूझता मत करो। यह स्वभाव से दुष्ट है इसके फँदे में पड़कर अपनी जान बचनी भी कठिन पड़ जायेगी। दुष्टों पर दया करने से कुछ फल नहीं मिलता।
इति निर्वर्तितः सोऽपि ना स्थात्तावत्क्व निष्कंटः। नगमारुह्य संस्थाताऽभूच्च विज्ञानपारगः ॥१९०॥
अर्थ: धनमित्र का काल सिर पर छा रहा था। उसने छोटे भाई धनचन्द्र की जरा भी बात न मानी और तत्काल व्याघ्र को सूझता बनाने के लिए तत्पर हो गया। जब धनचन्द्र ने देखा कि धनमित्र मेरी बात को नहीं मानता है तो वह शीघ्र ही समीपवर्ती किसी वृक्ष पर चढ़ गया और पत्तियों से अपने को छिपाकर सब दृश्य देखने लगा। धनमित्र व्याघ्र की आँखों की दवा करने लगा औषधियों के प्रभाव से बात की बात में धनमित्र ने उसे सूझता बना दिया किन्तु दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ते। ज्यों ही व्याघ्र सूझता हो गया। उसने तत्काल ही धनमित्र को खा लिया और आनंद से
मूढो ज्येष्ठो व्यधात्तस्य नेत्रयोर्वरभेषजम्। तदा निवृत्तपीडोऽसौ बभूव वरभेषजात् ॥१९१॥
स एव तेन चाभोक्षि तस्य युक्तं महामुने। पतत्कृतोपकारस्य वद मां पापभाजिनः ॥१९२॥
कृतघ्न एव शार्दूलः श्रेष्ठिन्नात्र विचारणा। नोचितं तस्य चैतद्धि योगीत्यबीभणद्वचः ॥१९३॥
शुभाशुभं कृतं घ्नंति कृतघ्नास्ते महीतले। सप्तमं नरयं यांति परमर्मप्रकाशकाः ॥१९४॥
कथ्यमाना कथा श्रेष्ठिन् श्रोतव्यात्र मया त्वया। यथा ते यांति विश्वासं मानसं मानसं गतं ॥१९५॥
अर्थ (श्लोक 186 से 195): जहाँ-तहाँ घूमने लगा। इसलिए हे प्रभो मुने! क्या व्याघ्र को यह उचित था जो कि वह अपने परमोपकारी दुःख दूर करने वाले धनमित्र को खा गया ? कृपया आप मुझे कहें ? सेठ जिनदत्त के मुख से ऐसी कथा सुन मुनिराज ने कहा-जिनदत्त! व्याघ्र बड़ा कृतघ्नी निकला निःसन्देह उसने परमोपकारी धनमित्र के साथ अनुचित बर्ताव किया। तुम निश्चय समझो जो मनुष्यकृत उपकार का ख्याल नहीं करते वे घोर पापी समझे जाते हैं संसार में उन्हें नरक आदि दुर्गतियों के फल भोगने पड़ते हैं। मैं तुम्हारी कथा सुन चुका। अब तुम मेरी कथा सुनो जिससे संशय दूर हो ॥१८६-१९५॥
हस्ति हस्तहता मित्रे विचित्रे हस्तिनागके। पत्तने पृथिवीं पाति विश्वसेनो विशिष्टधीः ॥१९६॥
जायाऽस्य जितनागश्रीः संत्रस्तहरिणीदृशा। वसुकांता सुकांतांगा पूर्णचंद्रानना परा ॥१९७॥
तयोरभूत्सुतः सात निमग्ननिजमानसः। वसुवृद्धिकरो वीरो वसुदत्ताभिधोऽग्रणीः ॥१९८॥
निशांतनाथया साकं भूपो भुंक्ते सुखादिकम्। एकदा सार्थवाहेन केनचिद्भक्तिसिद्धये ॥१९९॥
अर्थ (श्लोक 196 से 199): इसी जंबूद्वीप में एक हस्तिनापुर नाम का एक विशाल नगर है किसी समय हस्तिनापुर का स्वामी अतिशय बुद्धिमान् विश्वसेन राजा था। विश्वसेन की प्रिय भार्या रानी वसुकांता थी। वसुकांता अतिशय मनोहरा चन्द्रवदना मृगनयनी कृशांगी एवं पूर्ण चन्द्रानना थी। राजा विश्वसेन की रानी वसुकांता से उत्पन्न एक पुत्र जो कि शुभ लक्षणों का धारक सदा, धन वृद्धि का इच्छुक, वीर एवं सर्वोत्कृष्ट वसुदत्त था। राजा विश्वसेन ने वसुदत्त को योग्य समझ राज्य भार उसे ही दे दिया था। आनन्दपूर्वक भोग भोगते वे अपने अन्तःपुर में रहते थे।
भूपतेः प्राभृतं चक्रे रसालफलबीजकं। वीक्ष्य भूपोऽगदीद्वाक्यं किमेतत्प्राभृतं वद ॥२००॥
आम्नादौ यांति सद्रोगान्पलितत्वं नराधिप। इति तस्य वचः श्रुत्वा तुतोष धरणीपतिः ॥२०१॥
अर्थ (श्लोक 199 से 201): कदाचित् वे आनंद में बैठे थे उस समय कोई एक सार्थवाह मनुष्य उनके पास आया। उसने भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया एवं अपनी भक्ति प्रकट करने के लिए एक आम की गुठली उनको भेंट की। राजा विश्वसेन ने गुठली तो ले ली किन्तु वे उसकी परीक्षा न कर सके इसलिए उन्होंने शीघ्र ही सार्थवाह से पूछा-कहो भाई यह क्या चीज है मैं इसको पहचान न सका। राजा के ऐसे वचन सुन सार्थवाह ने कहा-कृपानाथ! समस्त रोगों के नाश करने वाले आम्र फल का यह बीज है। इस देश में यह फल होता नहीं इसलिए यह अपूर्व पदार्थ जान मैंने आपकी सेवा में आकर भेंट किया है।
मोहतो वसुकांतायै ददाविति व्यचिंतयत्। मया निर्व्याधिना किं वै विना राज्ञा च जीवितं ॥२०२॥
महिष्येति वितर्क्याशु मया किं जीव्यमानया। भवितव्यः स्थिरः पुत्रो राज्यभारोद्धरक्षमः ॥२०३॥
ततस्तस्मै प्रदत्तं तत्तेनापि पितृमोहतः। दत्तं पित्रे तदापृष्टः पित्रा तत्किमु भो सुत ॥२०४॥
कुतः समागतं चेति श्रुत्वा वृत्तांतमंजसा। आचख्यौ स नृपस्याग्रे तदाभूद्विस्मितोनृपः ॥२०५॥
स्त्रीषु पुत्रेषु दुर्लङ्घ्यं दधत्स्नेहं विभेदितं। उपकारकृते राजा बीजवृद्धौ मतिं दधौ ॥२०६॥
वनपालाय दक्षाय तद्बीजं च समर्पितम्। तेनोप्तं यत्नतो वेगात्पालयतांबुसेवनैः ॥२०७॥
अर्थ (श्लोक 202 से 207): सार्थवाह के ऐसे विनय वचनों से राजा विश्वसेन अति प्रसन्न हुए। उनका प्रेम रानी वसुकांता में अधिक था इसलिए उन्होंने यह समझ कि बिना रानी के मेरा नीरोगी होना किस काम का ? चट रानी को बीज दे दिया। रानी का प्रेम पुत्र वसुदत्त पर अधिक था इसलिए उसने उठा वसुदत्त को दे दिया। जब वह आम का बीज वसुदत्त के हाथ में आया तो वे उसे जान न सके और उनका प्रेम पिता पर अधिक था इसलिए उन्होंने शीघ्र ही वह बीज पिता को दे दिया और विनय से यह प्रार्थना की कि पूज्य पिता! यह क्या चीज है कृपाकर मुझे बताएँ ? वसुदत्त के ऐसे वचन सुन राजा विश्वसेन ने कहा-प्यारे पुत्र! अमृतफल आम पैदा करने वाला यह आम का बीज है। इससे जो फल उत्पन्न होता है उससे समस्त रोग शान्त हो जाते हैं। यह फल हमें सार्थवाह ने भेंट किया है तथा ऐसा कहते-कहते उन्होंने शीघ्र ही किसी चतुर माली को बुलाया और स्त्री-पुत्र आदि के नीरोगपने की आशा से किसी उत्तम क्षेत्र में बोने के लिए उसे शीघ्र ही आज्ञा दे दी।
सांद्रच्छायः क्रमेणासीत्सफलः पल्लवान्वितः।
स वृक्षः सर्वशोभाढ्यः कालात्किं न जायते ॥२०८॥
अर्थ: राजा की आज्ञानुसार माली ने उसे किसी उत्तम क्षेत्र में बो दिया। प्रतिदिन स्वच्छ जल सींचना भी प्रारम्भ कर दिया। कुछ दिन बाद माली का परिश्रम सफल हो गया। वह वृक्ष उत्तमोत्तम फलों से लदबदा गया एवं वह प्रतिदिन माली को आनंद देने लगा।
खे गृध्रे सर्पमास्ये च गृहीत्वा सति गच्छति। फलस्योपरि सद्बिंदु विषस्य पतितं तदा ॥२०९॥
ततस्तदूष्मणा पक्वं फलमेकं मनोहरम्। वीक्ष्य तद्रक्षकस्तूर्णमादाय प्रीतिपूर्वकम् ॥२१०॥
ददौ भूपाय संवीक्ष्य सोऽपि तस्मै ददौ धनं। तत्फलं युवराजायादनाय स वितीर्णवान् ॥२११॥
चर्वणात्सोऽपि तद्भूमौ विषव्याप्तस्वविग्रहः। तदा तं तादृशं वीक्ष्य वृक्षोपरि चुकोप सः ॥२१२॥
अर्थ (श्लोक 209 से 212): किसी समय एक गृद्ध पक्षी आकाश मार्ग से किसी एक जहरीले सर्प को मुख में दबाये चला आ रहा था। भाग्यवश एक फल पर सर्प की विष बूँद गिर गई। विष की गर्मी से वह फल भी जल्दी पक गया। माली ने आनंदित हो फल तोड़ लिया और उसे राजा की सभा में जाकर भेंट कर दिया। राजा विश्वसेन को फल देख परमानंद हुआ। उन्होंने माली को उचित पारितोषिक दे सन्तुष्ट किया एवं अपने प्रिय पुत्र को बुलाकर उसे फल खाने की आज्ञा दे दी। आम्रफल विष-बूँद से विषमय हो चुका था इसलिए ज्यों ही कुमार ने फल खाया खाते ही उसके शरीर में विष
(समाकर्ण्य नराः केचिद् दुःखजराविपीडिताः। तत्फलानि अदत्तानि बभूवुस्ते नवयौवनाः)
तदा तं खंडयामास शाखिनं फलशालिनं। सपप्रच्छ तदा वैद्यं तज्जीवनकृते लघु ॥२१३॥
अर्थ: फैल गया। बातोंबात में वह मूर्च्छित हो जमीन पर गिर गया और उसकी चेतना एक ओर किनारा कर गई। अपने इकलौते और प्रिय पुत्र वसुदत्त की यह दशा देख राजा विश्वसेन बेहोश हो गये उन्होंने वह सब कार्य आम फल का जान तत्काल उसे कटवाने की आज्ञा दे दी एवं पुत्र की रक्षार्थ शीघ्र ही राज वैद्य को बुलाया।
विषजां विक्रियां मत्वानीय तत्फलमुल्वणं। तस्मिन्दत्ते सुखी सोऽभून्निर्मुक्त विषविग्रहः ॥२१४॥
पश्चात्तापहतो राजा पुनर्दुःखं दधौ हृदि। अपरीक्ष्य मया चैतत्कृतं किं मूढचेतसा ॥२१५॥
अर्थ (श्लोक 214 से 215): राजवैद्य ने कुमार की नाड़ी देखी। नाड़ी में उसे विष-विकार जान पड़ा इसलिए उसने शीघ्र ही उसी आम्र फल का एक फल मँगाया और कुमार को खिलाकर तत्काल निर्विष कर दिया। राजा विश्वसेन ने जब आम्र फल का यह माहात्म्य देखा तो उन्हें बड़ा शोक हुआ वे अपने उस अविचारित कार्य के लिए बार-बार पश्चाताप (पछतावा) करने लगे और अपनी मूर्खता के लिए सहस्त्र बार धिक्कार देने लगे।
अपरीक्ष्य च ये मूढा प्रप्लोषंति शुभाशुभं। त एव निधनं नूनं समायांति विमानसा ॥२१६॥