पंचदशः सर्गः
श्री पद्मनाभंवर भावितीर्थं नत्वा समस्तार्थविबोधनेऽहं।
वक्ष्ये च कल्याणक पंचक च तस्यागहान्यैशिवशर्मसिद्धयै ॥१॥
अर्थ: समस्त पदार्थों के प्रकाश करने में सूर्य के समान भावी तीर्थंकर श्री पद्मनाभ भगवान् को नमस्कार कर स्वकल्याण सिद्ध्यर्थ उन्हीं भगवान् के आचार्यों द्वारा प्रतिपादित पाँच कल्याणों का वर्णन करता हूँ।
एकविंशतिसहस्त्रवर्षके पंचमस्य समयस्य संगते।
हायने च युगषष्टयोगते पंचमस्य समकालवर्त्तिनः ॥२॥
उत्सर्पिणी युगमकालसहस्त्रवर्षे ख्याताश्च षोडशशुभा मनवो बभूवुः।
नानासुनीति निपुणा वरबोधभावा न्याये जनान् शुभधिया खलु योजयंतः ॥३॥
तत्रांत्यमः शुभकरः सुरसेव्यपादो नानागुणः कुलकरश्च महादिपद्मः।
शुभन्मयूखहतता ममको गभीरो विख्यातकीर्तिरतुलाभरणैर्विशिष्टः ॥४॥
वक्त्रेण चंद्रं नयनेन तारां वक्षस्थलेनैव शिलां जिगाय।
दंतेन कुंदं भुजयुग्मकेन शेषं च भूभृज्जिननाथ तातः ॥५॥
गुणांइच रूपं सकलाः कलाश्च शीलं यशो लोकविभागचारि।
नरेशताऽशेषं विशेषवित्वं यस्मिन् बभूवुर्नरनाथ सेव्ये ॥६॥
अर्थ (श्लोक 2 से 6): उत्सर्पिणी काल के एक हजार वर्ष बाद अतिशय चतुर उत्तम ज्ञान के धारक चौदह कुलकर ‘मनु’ होंगे और वे अपने बुद्धिबल से प्रजा को शुभ कार्य में लगायेंगे। उन सब में शुभ कर्ता, अनेक देवों से पूजित, अनेक गुणों के आकर, अपनी किरणों से समस्त अन्धकार नाश करने वाले गंभीर, अनेक आभरणों से शोभित और अतिशय प्रसिद्ध तीर्थंकर पद्मनाभ के पिता अन्तिमकुलकर महापद्म होंगे। कुलकर महापद्म मुख से चन्द्रमा को, नेत्रों से ताराओं को, वक्षःस्थल से शिला को, दाँतों से कुन्दपुष्प को और बाहुयुग्म से शेषनाग को जीतेंगे। अनेक राजाओं से वंदित राजा महापद्म में उत्तमोत्तम गुण, रूप, समस्त कलाएँ, शील, यश आदि होंगे।
जीवायते यो वर बुद्धिलब्ध्या मारायते रूप वयोमयूखैः।
देवायते संततभूतिभावैः सूर्यायते कांतिवितानवृन्दैः ॥७॥
वासाय वै यस्य सुभारते च निर्मापिता पूर्वमधवाज्ञयाहि।
श्री किंनरेशेन विचित्ररत्नाऽयोध्या ऽभिधाभूषितभूमिभागा ॥८॥
अर्थ (श्लोक 7 से 8): महापद्म अपने उत्तम बुद्धिबल से जीवेंगे। मनोहर रूप से कामदेव की तुलना करेंगे। निरन्तर विभूति के प्रभाव से देवतुल्य और अपने शरीर की कांति से सूर्य के समान होंगे। महापद्म के रहने के लिए इन्द्र की आज्ञा से कुबेर अनेक रत्नों से जड़ित, मनोहर भूमियों से शोभित, अयोध्या नगरी का निर्माण करेगा।
यस्यां च शालः सरसैर्मयूखैः मुक्ताफलैर्नूत्नविरत्नवर्गैः।
संराजते नाकसमं समंतात्स्पर्द्धां वहंत्यां शुभैगृहैश्च ॥९॥
गृहैर्विमाना मनुजैर्दिधीशाः सीमंतिनीभिः सुरयोषितश्च।
भूपैः शचिशास्तरुभिश्च कल्पा जिता यया चारुविभूतिभावात् ॥१०॥
योषिन्मुखैरिंदुगणो नखैश्च तारासुनेत्रैर्वरं पद्मवृन्दम्।
कांत्या च शूरो विजिताय यैते सीमंतिनीनां गमनेन नागाः ॥११॥
अभ्रं लिहैः केतनमालिकाभिः संलिह्यते दीप्रसुधांशुबिम्बं।
समंदिरैः किं सकलंकयुक्तः संजातवांश्चेत्यरथा विशुद्धः ॥१२॥
किं वर्ण्यते सा घटिता सुरेण स्थित्यै जिनेशस्य महामहीशः।
इंद्राज्ञया किंनरनायकेन लोकत्रये संतिलकायते या ॥१३॥
तत्र स्थितो सौ नरनाथसेव्यो विकासयन् कीर्तिलतां च मह्यां।
संपूर्णपुण्यः सुभगः प्रवीणः सुसप्तहस्तोच्छ्रितिदेहभाजी ॥१४॥
सुंदरीत्यभिधया वरमूर्ति रंगनाललित चारुशरीरा।
तार मार दयिते वसुभावा तस्य चित्तवर पद्मयूखा ॥१५॥
यस्या विरेजुः सरसाः कचाश्च मूर्ध्नि प्रभाढ्या भ्रमराः सुगंधात्।
संसेवितुं वक्त्रमहोत्पलस्य स्थिताश्च चूडामणि रत्नदीप्ताः ॥१६॥
यस्या विशालं वरभालपट्टं संराजते सत्तिलकायितं च।
त्रैलोक्य नारी विजयाय बद्धं पत्रं विधात्रेव वराक्षराढ्यं ॥१७॥
अर्थ (श्लोक 9 से 17): अयोध्या का परकोटा मनोहर किरणों से व्याप्त, मुक्ताफल और भी अनेक रत्नों से निर्माण किया स्वर्ग की समता को धारण करेगा और घर स्वर्ग घरों के साथ स्पर्द्धा करेंगे। अयोध्या के घर विमानों को जीतेंगे। मनुष्य देवों को, स्त्रियाँ देवांगनाओं को, राजा इन्द्रों को और वृक्ष कल्पवृक्षों को नीचा दिखायेंगे। अयोध्या में रहने वाली कामिनियों के मुख से चन्द्रमंडल जीता जायेगा। नखों से तारागण, मनोहर नेत्रों से कमल और गमन से हाथी पराजित होंगे। अयोध्यापुरी के महलों पर लगी ध्वजा चन्द्रमण्डल का स्पर्श करेगी। अयोध्यापुरी का विशेष कहाँ तक वर्णन किया जाये ? जिनेन्द्र के रहने के लिए कुबेर इन्द्र की आज्ञा से उसे एक ही बनायेगा और वहाँ अनेक राजाओं से पूजित चौतरफा अपनी कीर्ति प्रसार करने वाले अतिशय पुण्यवान्, चतुर, सुन्दर और सात हाथ शरीर के धारक कुलकर महापद्म की प्रिय भार्या सुन्दरी होगी। सुन्दरी अतिशय शरीर की धारक, पद्म के समान सुन्दर, रति के समान होगी। उसके केश अतिशय देदीप्यमान और उत्तम होंगे। मुख कमल की सुगन्धि से उसके मुख पर भौंरे गिरेंगे और उसके सिर पर रत्न जड़ित देदीप्यमान चूड़ामणि शोभित होगा। अतिशय तिलक से युक्त उसका भाल अतिशय शोभा को धारण करेगा और वह ऐसा मालूम पड़ेगा मानो त्रिलोक की स्त्रियों के विजय के लिए विधाता ने एक नवीन यंत्र रचा हो।
आकर्णविस्तारि सुनेत्रयुग्मं रक्तं सुकोपादिवमार्गरोधात्।
श्रुत्योरलक्षा खिलकूपकृत्योः क्रीड़ाकृते पद्मदलं विधातुः ॥१८॥
अर्थ: कानों तक विस्तृत विशाल और रक्त उसके नेत्र होंगे और वे पद्मदल की शोभा धारण करेंगे ॥१-१८॥
मध्ये भ्रुवोर्भाति च येन यस्या ओंकार मंत्रो लिखितो विधात्रा।
जगद्वशायापरथा कथं स्यान् नरो वशी तामवलोक्य तूर्णं ॥१९॥
आस्यपद्मभवभाति सुंदरं दंतकेसरमनौपमं वरं।
नासिकाविशमनोहरं परमोष्टपर्णकलितं नतध्रुवः ॥२०॥
चारुकंबुललितं त्रिरेखितं भाति वक्त्रगृहकाष्ठतां गतं।
कोकिलध्वनि समाजसुंदरं सुध्रुवो वटुविराजितं परं ॥२१॥
वक्षःस्थले भाति विशालहारो मुक्ताफलाढ्यो वररत्नभासी।
रक्षाकृते नाग इव स्तनस्य यस्या मनोभूवर सेविधेश्च ॥२२॥
सुदुर्लभौ हार भुजंगसेवितौ सूचूचकाच्छादितवक्त्रपंकजौ।
स्थितावगाधौकुचकुंभकौ परौ सुसेविधेः कम्पघटौ मनोभुवि ॥२३॥
अंगुलिच्छदनमंडितं परं बाहुदण्डमवभाति दीपकं।
पाणिपंकजतरं मृगीदृशः कंकणोन्नतसुकेसराश्रितं ॥२४॥
उदरे यस्या नाभितडागे मदनद्विप वरपीडितमध्यः।
शुभगः श्लक्ष्णाकुंतलपद्मो मदनाहतजनवांछितकेलिः ॥२५॥
कटीतटं तत्र विराजति स्म च नितंबतुंगस्तनभारमध्यतः।
कृशं तयोर्युग्मकयोर्भयादिव। मध्यस्थितस्यैव मयं भवेत्सदा ॥२६॥
अर्थ (श्लोक 19 से 26): सुन्दरी के भ्रुकुटियों के मध्य में ओंकार अतिशय शोभा को धारण करेगा। विधाता उसे समस्त जगत् को वश में करने के लिए निर्माण करेगा। ऐसा मालूम पड़ता है। दाँतरूपी अनुपम केशर का धारक नाशिका रूपी विष से मनोहर ओष्ठ रूपी पल्लवों से व्याप्त उसका मुख कमल अतिशय शोभा धारण करेगा। मनोहर कंबु के समान सुन्दर, तीन रेखा का धारक, मुखरूपी घर के लिए खम्भे के समान कोकिल ध्वनि युक्त उसकी ग्रीवा अतिशय शोभित होगी। मुक्ताफल से शोभित भाँति-भाँति के रत्नों से देदीप्यमान सुन्दरी के वक्षःस्थल का हार अतिशय शोभा धारण करेगा और वह ऐसा जान पड़ेगा मानो विधाता ने स्तन कलशों की रक्षार्थ मनोहर सर्प का ही निर्माण किया हो। सुदुर्लभ हार रूपी सर्पों से शोभित चूचुक रूपी वस्त्र से आच्छादित उसके दोनों स्तन मनोहर घड़े के समान जान पड़ेंगे। अंगुलीरूपी पत्तों से व्याप्त, बाहुरूपी दण्डों का धारक, कंकणरूपी उन्नत केशर से शोभित उनके दोनों कर-कमल अतिशय शोभा धारण करेंगे। मनोहरांगी सुन्दरी का कामदेव रूपी हाथी से युक्त मनोहर बिखरे हुए केशरूपी पद्म का धारक कामीजनों की क्रीड़ा का इष्टस्थल नाभिरूपी तालाब संसार में एक ही होगा। सुन्दरी का उन्नत स्तनों के भार से अतिशय कृश कटिभाग अति शोभित होगा सो ठीक ही है। दो आदमियों के विवाद में मध्यस्थ मारे भय के कृश हो ही जाता है ॥१९-२६॥
सुरम्यजानुद्वितयं विराजते परं सुरंभासुभगं मनोभुवः।
शरद्वयं कामिजनस्य घातिने स्थित यथा चारुसुलक्षणान्वितं ॥२७॥
मीनशंखकुलिशादिलक्षणं पादपद्ममवभातिमेदुरं।
अंगुलीय नखरत्नराजितम् भ्राजितं सर इवास्त्र सज्जसैः ॥२८॥
अर्थ (श्लोक 27 से 28): सुन्दरी के दोनों जानु कदली स्तंभ के समान शोभा धारण करेंगे। कामीजनों को वश में करने के लिए वे कामदेव के दो बाण कहलाये जायेंगे और अनेक शुभ लक्षणों के धारक होंगे। मीन, शंख आदि उत्तोमत्तम गुणों से उसके दोनों चरण अत्यन्त शोभित होंगे।
यस्या रूपं विधात्रा विविधशुभकरै, रिंदुभिर्वक्त्रपद्मं।
नेत्रं पंकेजपत्रैरदनवसनकं विद्रुमै पक्व बिंबैः।
शाखाभिर्बाहुयुग्मं कनकगिरितटै र्वक्ष एवं स्तनौ च।
पीनौ स्वर्णस्य कुभैश्चरणयुगलकं पद्मपत्रैर्व्यधायि ॥२९॥
सालंकृतिः सर्वगुणा विदोषा सुरीतिसंदीपितमध्यभावा।
नानारसैः सा विरराज नित्यं सुभारती वासुकवेः शुभार्था ॥३०॥
अर्थ (श्लोक 28 से 30): नखरूपी रत्नों से युक्त उसकी अंगुली होगी। विधाता सुन्दरी का रूप तो अनेक उपायों से रचेगा और मुख चन्द्रमा से, नेत्र कमल पत्रों से, दाँत मूँगों से, ओठ पके बिंबा फलों से, दोनों भुजा शाखाओं से, वक्षस्थल सुवर्ण तटों से, दोनों स्तन सुवर्ण कलशों से एवं दोनों चरणकमल पत्रों से बनावेगा। माता सुन्दरी सरस्वती के समान शोभित होगी क्योंकि सरस्वती जैसी सालंकृति अलंकार युक्त होती है सुन्दरी भी निर्दोष होगी।
गत्या करेणुं नयनेन दीप्र मृगांगनां सा च जिगाय वाचा।
पिकांगनां रूपगुणेन रम्यां रतिं मुखेनेंदु गणं च कम्रा ॥३१॥
इंद्रादेशात्प्रथमनरये श्रेणिकस्याथ रक्षां। चेक्रीयंते नरकनिकरं वार्यमाणो सुराः स्म।
उच्छिष्टे वै नरकतनुजं चायुषां षट्कमासे। हित्वा दुःखप्रथमभरते भावि तीर्थेश्वरस्य ॥३२॥
तस्यालयेऽथ सुरपः खलु षट्कमासान् संकारयिष्यति धनाधिपकेन पूर्वं।
रत्नादिवर्षणममोघसुमेघवन्दैः संकालयं तदनु मासनवप्रमाणं ॥३३॥
अर्थ (श्लोक 30 से 33): सरस्वती उत्तम रीति से देदीप्यमान होती है उसी प्रकार सुन्दरी भी अतिशय सुडौल होगी। सरस्वती जैसी अनेक रसों से युक्त होती है सुन्दरी भी लावण्य युक्त होगी। सरस्वती जैसी शुभ अर्थयुक्त होती है, सुन्दरी भी अपने अवयवों से सुडौल होगी। माता सुन्दरी गति से हथिनी जीतेगी और नयन से मृगी, वाणी से कोकिल, रूप से रति एवं मुख से चन्द्रमा जीतेगी। भगवान् के जन्म के छह मास पहले से जन्म तक पन्द्रह मास पर्यन्त कुबेर इन्द्र की आज्ञा से तीनों काल अमोघ
संप्रेशिताः सुर वरेण सुरांगनाश्चाष्टाविंशतिर्दिक्कहताजिनमातृभक्त्यै।
आगत्य ता नरपतिं धृतमौलिहस्ता नत्वाज्ञया नृपगृहं विविशुः समस्ताः ॥३४॥
एकदा निशि नरेंद्रकामिनी स्वजसंचयमिमं समैक्षत।
पश्चिमे प्रहरके च तल्पके निद्रिता कमललोचनाशुभा ॥३५॥
अर्थ (श्लोक 27 से 35): रत्नों की वर्षा करेगा। माता की सेवा के लिए इन्द्र की आज्ञा से छप्पन कुमारियाँ आकर माता की सेवार्थ आवेंगी और राजा महापद्म को नमस्कार कर राजमहल में प्रवेश करेंगी ॥२७-३५॥ किसी समय कमल नेत्रा रानी सुन्दरी शयनागार में अपनी मनोहर शय्या पर शयन करेगी अचानक ही वह रात्रि के पिछले प्रहर में ये स्वप्न देखेगी-
शुभ्रं गजेंद्रं वरदानसज्जलं गावं महास्कंधधरं सनादकं।
पंचाननं दंति विदारणोद्धतं देवेंद्रदंतिस्नपितां पयोब्धिजां ॥३६॥
दाम्नी सुगन्धे भ्रमरध्वनीद्धते चंद्रं सुपूर्णं तिमिरस्य वारकं।
सूर्यं प्रतापं तनुजस्य वा परम् मीनद्वयं नेत्रयुगं स तस्य वा ॥३७॥
कुंभद्वयं दीप्र तनूजसे विधिं पद्माकरं पद्मसूमहमंडितं।
वार्द्धिं गंभीरं मणि मीन मंडितं सिंहासनं स्वर्णमणिप्रभाभृतं ॥३८॥
देवेंद्रयानं सुरभामिनीश्रितं नागेंद्रगेहं सुतसूतिसूचकं।
रत्नप्रचायं सुनिधिं सुतस्य वा निर्धूमवह्निं च ददर्श सा शुभा ॥३९॥
(चतुः कुलं)
अर्थ (श्लोक 36 से 39): (१) जिससे मद चू रहा है ऐसा सफेद हाथी, (२) उन्नत स्कंध का धारक नाद करता हुआ बैल, (३) हाथी को विदारण करता बलवान् सिंह, (४) दुग्ध से स्नान करती लक्ष्मी, (५) भ्रमरों से व्याप्त उत्तम दो माला, (६) सम्पूर्ण चन्द्रमा, (७) अन्धकार का नाशक (प्रतापी सूर्य), (८) जल में किलोल करती दो मछलियाँ, (९) दो उत्तम घड़े, (१०) अनेक पद्द्मों से व्याप्त सरोवर, (११) रत्न मीन आदि से युक्त विशाल समुद्र, (१२) मणि जड़ित सोने का सिंहासन, (१३) अनेक देवांगनाओं से शोभित सुर विमान, (१४) नागेंद्र का घर, (१५) रत्नों का ढेर, (१६) निर्धूम अग्नि।
वक्त्रे गजेंद्रं शुचि देहमुन्नतं। संविश्यमानं सुविलोचयिष्यति।
सा पूर्णचंद्राननिका मृगेक्षणा। संरक्षिता देववधू समूहकैः ॥४०॥
वीणादुंदुभिशंख काहलमहानादान्निशम्याशुसा बुद्ध्वा मागधगीतशब्दनिकरात् प्रातः परिज्ञाय वै।
उत्थायासनमुत्तमं जिनपते माताव्यलं चक्रके पूर्वाद्रिं हततामसा वरतरं भानोर्मरीचिर्यथा ॥४१॥
अर्थ (श्लोक 40 से 41): तथा उन्नत देह का धारक पवित्र किसी हाथी को अपने मुख में प्रवेश करते भी वह सुंदरी देखेगी। प्रातःकाल में वीणा, ढक्का, शंख आदि के शब्दों से और मागधों की स्तुति के साथ रानी पलंग से उठाई जायेगी और शय्या से उठते समय वह प्राची दिशा से जैसा सूर्य उदित होता है वैसी शोभा धारण करेगी। महारानी उठकर स्नान करेगी और सिर पर मुकुट, कंठ में ललित हार,
शिरसि मुकुटबंधं भालपट्टे च भालं हृदि सुललितहारं कंकणं बाहुयुग्मे।
धरति सुभगकर्णे कुंडलं मेखलां सा अतिकृश शुभकट्यां नूपुरं पादपद्मे ॥४२॥
सपद्मं महापद्मनाथं स्वनाथं समासाद्य कांतं स्थितं विष्टरे च।
प्रणम्य स्थिता वामभागे सुराज्ञी प्रगल्भा महानर्मशर्मादिवाक्या ॥४३॥
नाथ! सार्थानिमान् स्वप्नचारान् पश्चिमे यामके पश्य कं वै।
जल्पयत्वं फलं तेषां किं विभो ज्ञान विज्ञान नेत्रैः सुचित्तैः ॥४४॥
श्रुत्वेति वाचं नृपतिर्जगौ तां कांते प्रिये दंतिगते मृगाक्षि।
वक्ष्ये फलं तेऽद्य मनोजगेहे तेषां यथार्थं दयिते दयाढ्ये ॥४५॥
अर्थ (श्लोक 42 से 45): हाथों में कंगन, भुजाओं में बाजूबन्ध, कानों में कुण्डल, कमर पर करधनी एवं पैरों में नूपुर पहनेगी तथा अपने स्वामी राजा महापद्म के पास जायेगी और सिंहासन पर उनके बामभाग में बैठकर चित्त में हर्षित हो इस प्रकार कहेगी-स्वामिन्! रात्रि के पिछले प्रहर मैंने स्वप्न देखे हैं कृपाकर उनका जैसा फल हो वैसा आप कहें। रानी के ऐसे वचन सुन राजा महापद्म इस प्रकार कहेंगे-प्रिये! मृगाक्षि! जो तुमने मुझसे स्वप्नों का फल पूछा है मैं कहता हूँ तुम ध्यानपूर्वक सुनो जिससे तुम्हें सुख मिलें-
दंतीक्षणात्ते भविता तनूजो ज्येष्ठो वृषादृष्टिपके मृगारेः।
अनंतवीर्य शुभपुष्पदाम्नोः वृषस्य सम्यक् स पतिर्भविष्णुः ॥४६॥
लक्ष्म्याभिषेकात्कनकाद्रिमूर्ध्नि संस्नाप्यतेऽसौ सुरनाथवर्गैः।
चंद्राज्जनाह्लादकरश्च सूर्याद् भास्वद्युतिर्वित्तपतिश्च कुंभात् ॥४७॥
अर्थ (श्लोक 46 से 47): स्वप्न में हाथी के देखने का फल तो यह है कि तेरे पुत्र रत्न उत्पन्न होगा। बैल के देखने का फल यह है कि वह तीन लोक में अतिशय पराक्रमी होगा। तूने जो सिंह देखा है उसका फल यह है कि तेरा पुत्र अनन्त वीर शाली होगा और दो मालाओं के देखने से धर्मतीर्थ का प्रवर्तक होगा। जो तूने लक्ष्मी को स्नान करते देखा है उसका फल यह है कि मेरु पर्वत पर तेरे पुत्र को ले जाकर देवगण क्षीरोदधि के जल से स्नान करावेंगे। चन्द्रमा के देखने से तेरा पुत्र समस्त जगत् को आनन्द प्रदान करने वाला होगा। सूर्य के देखने का फल यह है कि तेरा पुत्र अद्वितीय कांति धारक होगा।
मीनादनंतसुखभाक् सरसः सुपूर्णः सल्लक्षणैरुदधितो वर बोधयुक्तः।
सिंहासनाद्भुवनराज्यपतिर्बलिष्ठः पुण्याधिपोऽमर विमान विलोकनाच्च ॥४८॥
अर्थ (श्लोक 47 से 48): कुम्भ के देखने से अगाध द्रव्य का स्वामी होगा। मीन के देखने से तेरा पुत्र सुख का भंडार होगा और उत्तमोत्तम लक्षणों का धारक होगा। समुद्र के देखने का फल यह है कि तेरा पुत्र ज्ञान का समुद्र होगा और जो तूने सिंहासन देखा है उससे तेरा पुत्र तीन लोक के राज्य का स्वामी होगा। देव विमानों के देखने से बलवान् और पुण्यवान् होगा। तूने जो नागेन्द्र का घर देखा है
नागालयादवधिबोधयुतश्च रत्नान् नानागुणोज्जवलनवीक्षणतः क्षणेन।
कर्मेधनस्य दहने खलु बद्धकक्षो वक्त्रप्रवेशनविधेर्भविता सुतस्ते ॥४९॥
अर्थ: उसका फल यह है कि तेरा पुत्र जन्मते ही अवधि ज्ञान का धारक होगा। चित्र-विचित्र रत्न राशि देखने से तेरा पुत्र अनेक गुणों का धारक होगा। निर्धूम अग्नि के देखने का यह फल है कि तेरा पुत्र समस्त कर्म नाश कर सिद्ध पद प्राप्त करेगा और तूने जो मुख में हाथी प्रवेश करते देखा है उसका फल यह है कि तेरे शीघ्र ही पुत्र होगा।
श्रुत्वा स्वप्नफलं नृपस्य दयिता यावत्प्रमोदान्विता।
तावन्नारकतः समेत्य नृपते जीवोऽशुभे चोदरे।
तस्या देव वधू सुशोधिततरे स्थाता महापुण्यतः।
हत्वा नारकदुःख पापनिचयं तीर्थोदयाच्छुद्धधीः ॥५०॥
तस्योदयं देवगणो हि मत्वा नत्वा च पित्रोः पदपद्मयुग्मं।
कृत्वा च कल्याणपरम्परां च दत्वा सुवर्णं जनकाय मात्रे ॥५१॥
अर्थ (श्लोक 50 से 51): राजा के मुख से ज्यों ही रानी स्वप्न फल सुन हर्षित होगी त्यों ही महान् पुण्य का भंडार महाराज श्रेणिक का जीव नरक की आयु का विध्वंस कर रानी सुन्दरी के शुभ उदर में जन्म लेगा। तीर्थंकर महापद्म का आगमन अवधिज्ञान से विचार देवगण अयोध्या आवेंगे। तीर्थंकर के माता-पिता को भक्तिपूर्वक प्रणाम करेंगे। उन्हें उत्तमोत्तम वस्त्र पहनाएंगे।
वस्त्रादिकं तज्जननादिवृत्त मुक्त्वा क्षणेन त्रिदिवं गतश्च।
कुर्वन्कथां श्री जिनपस्य भक्त्या निर्मूलितारेर्वरपुण्यभाजः (युग्मं) ॥५२॥
कुमारिकास्ता जिननाथमातर मुपासते भोजनदानभक्तितः।
विडौज आज्ञा कृत शेखराः शुभा, विलेपनस्नानसुपुष्पदानतः ॥५३॥
काचित्करोति पदधोवनमंबिकायाः काचिद्दधाति वरपुष्पगणं तदग्रे।
काचित्सचंपकसुतैलविमर्दनं च काचित्पयोधिजलधैः सलिलैश्च सेकं ॥५४॥
पूपांश्च मंडक सुमोदकपायसानि माषान्नमुद्गघृतमंडकखज्जकाश्च।
प्राज्याज्यमग्नगुडलग्नसुचूर्णकानि सद्गलंजनानि दधि दुग्धकरं बकाणि ॥५५॥
अर्थ (श्लोक 52 से 55): भगवान् का गर्भ कल्याण कर सीधे स्वर्ग चले जायेंगे और वहाँ समस्त पुण्यों के भंडार समस्त कर्मनाश करने वाले भगवान् तीर्थंकर की कथा सुन आनन्द से रहेंगे। छप्पन कुमारियाँ माता की भोजनादि से भक्तिपूर्वक सेवा करेंगी। आज्ञानुसार माता का स्नेहन विलेपन आदि काम करेंगी। कोई कुमारी माता के पैर धोयेगी। कोई उनके सामने उत्तमोत्तम पुष्प लाकर धरेगी। कोई माता की देह से तेल मलेगी। कोई क्षीरोदधि जल से माता को स्नान करायेगी। कोई पूवा, माँड, लड्डु, खीर, उर्द, मूंग के स्वाद, दूध, दही और भी भाँति के व्यंजन माता को देगी। कोई माता के
काचिद्ददाति च महानसमंडपस्था सन्नूल रत्नवरभाजनरंधनार्था।
सन्नव्यभव्यवरपाककृते च दक्षा मात्रे च भोजनतरं वरपुण्यपाकात् ॥५६॥
नर्नर्ति हाववरभावगता च काचिद् वर्वर्त्ति मातृहृदयानुगता च काचित्।
वर्वर्द्धि मातृहृदये सुखमुल्वणं च चर्कर्त्ति कार्यमखिलं सुर भामिनी च ॥५७॥
तांबूलं खदिरसार युतं च दग्ध पाषाणचूर्णसहितं क्रमुकैः समेतं।
काचिद्ददाति नृपनाथ सुयोषितायै पुष्पस्रजं मधुपझंकृति संयुतां च ॥५८॥
शय्यां च काचिद्रत्नतल्पमंडितां चेक्रीयते रत्नचयैश्च दीपकान्।
काचिच्च रक्षां वर शस्त्रधारिणी विद्युल्लता वा घन मेघवर्तिनी ॥५९॥
किरीटं मस्तके कर्णे कुंडलं कंकणं करे।
हृदि हारं शुभे नेत्रे कज्जलं वदने परे ॥६०॥
तांबूलं तिलकं भाले कट्यां च कटिमेखलां।
नासायां मौक्तिकं कंठे ग्रैवेयकं सहाटकं ॥६१॥
नूपूरं चरणद्वंद्वे चांगुल्यां वृश्चिकान् परान्।
निवेशयंति कामिन्यो देवानां नृपयोषित (त्रिक्लं) ॥६२॥
अर्थ (श्लोक 56 से 62): भोजनार्थ उत्तमोत्तम भोजन बनाने के लिए उत्तमोत्तम पात्र देगी। कोई-कोई माता की प्रसन्नता के लिए हाव-भावपूर्वक नृत्य करेगी। कोई माता की आज्ञानुसार बर्ताव करेगी और कोई कुमारिका अपने योग्य बर्ताव से माता के चित्त को अतिशय आनन्द देगी। कोई-कोई कुमारी कत्था-चूना, सुपारी रखकर सुन्दरी को पान देगी। कोई उसके गले में अतिशय सुगंधित माला पहनायेगी। कोई-कोई माता के लिए मनोहर शय्या का निर्माण करेगी और कोई रत्नों के दीपक जलाएगी। कोई-कोई कुमारी माता के मस्तक पर मुकुट, कान में कुण्डल, हाथ में कंगन, गले में हार, नेत्र में काजल, मुख में पान, मस्तक पर तिलक, कमर में करधनी, नाक में मोती, कंठ में कंठी, पैरों में नूपुर, पाँव की अंगुलियों में बीछिये पहनायेगी।
अभ्यर्णे नवमे मासे प्रश्नयिष्यंति मातरं।
देवांगना क्रियागुप्तं कारकादींश्च कौतुकान् ॥६३॥
शरीराच्छादकं किं स्यात् किं च स्याद्देहदाहकं।
पुष्पाणां ग्रंथने किं स्याद्बदाद्याक्षरतः पृथक् ॥६४॥
‘‘त्वक रुक् स्रक्’’
नृसिंह तौ किमाख्या स्यात्कास्ते चंद्रस्य मंडले।
पापेन कीदृशा जीवा वद मात: स्वबुद्धितः ॥६५॥
‘‘सभा विभा अभा:’’
अर्थ (श्लोक 63 से 65): जब नौवां महीना पास आ जायेगा तब कुमारियाँ माता के विनोदार्थ क्रियागुप्त, कतृगुप्त, कर्मगुप्त और प्रहेलिका कहकर माता का आनन्द बढ़ायेगी। कोई पूछेगी, बताओ माता-शरीर का ढँकने वाला कौन है ? चन्द्र मंडल में क्या है? और पाप की कृपा से जीव कैसे होते हैं ? माता उत्तर देगी- ॥६३-६५॥ सभा विभा अभा:
अंते किं देहिनां नूनं कामिना किं विधीयते।
कीदृशो ध्यानतो योगी समादिश मम प्रिये ॥६६॥
अर्थ: कुमारियाँ फिर पूछेंगी बता माता-जीवों का अन्त में क्या होता है ? कामी लोग क्या करते हैं ? ध्यान के बल से योगी कैसा होता है ? माता उत्तर देगी- (१) विनाश, (२) विलास, (३) विपास।
अमरप नर तर समजपकर भगतमददममयजन घननतक।
प्रमदनवन घनदहन कनर प जय जय तव वर जठरभपरम ॥६७॥
शुभेद्यजन्मसंतानसंभवं किल्विषं घनम्। प्राणिनांभ्रूणभावेन विज्ञानशतपारगे ॥६८॥
आनंदयंतु लोकानां मनांसि वचनोत्करैः। मातः कर्तृपदं गुप्तं वद भ्रूण विभावतः ॥६९॥
सुधामनयसंपन्ना लभंते किंनराः क्वचित्। स्वकर्मवशगा भीमे भवे विक्षिप्तमानसाः ॥७०॥
समस्यापूरणे मातः समस्यां वद वादिनी। भ्रूणप्रभावतस्तूर्णं मुनिर्वेश्यायते सदा ॥७१॥
नरार्थं लोकयत्येव गृहीत्वार्थं विमुंचति। धत्ते नाभविकारं च मुनिर्वेश्यायते सदा ॥७२॥
अर्थ (श्लोक 68 से 72): कोई कुमारी क्रियागुप्त श्लोक कहकर माता से पूछने लगी, बता माता- (१) शुभेद्य जन्म सन्तान सम्भवं किल्विषं धनम्। प्राणिनां भ्रूणभावेन विज्ञान शत पारगे॥ इसमें क्रिया कौन है कोई कहने लगी, बता माता- (२) आनन्दयन्तु लोकानां मनांसि वचनोत्करैः। मातः कतृपदं गुप्तं वदभ्रूण विभावतः॥ इसमें तीन कर्ता कौन हैं? कोई कहने लगी, बता माता- (३) सुधी मनयं संपन्ना लभन्ते किंनराः क्वचित्। स्वकर्म वशगा भीमे भवे विक्षिप्त मानसाः। इसमें कर्म क्या है? कोई-कोई कुमारी कहने लगी-माता! तुम समस्या पूर्ण करने में बड़ी चतुर हो। इस समय तुम गर्भवती भी हो ‘‘मुनिर्वेश्यायते सदा’’ इस समस्या की पूर्ति करो। माता ने जवाब दिया- (४) नरार्थं लोक यत्येव गृहीत्वार्थं विमुंचयति। धत्ते नाभाविकारं च मुनिर्वेश्यायते सदा ॥ (१) इसमें दो अवखंडने धातु का लोट के मध्यम पुरुष का एक वचन ‘द्य’ क्रियापद है। (२) लोगों के मन, वचनों से आनन्द को प्राप्त हों। हे माता इसमें कर्तृपद गुप्त है गर्भ के प्रभाव से आप कहें। (३) इस श्लोक में मानासिक कर्ता है। (४) विक्षेप चित्त युक्त, कर्मों के वशीभूत और नीति-रहित मनुष्य क्या संसार में कहीं उत्तम बुद्धि के धारक हो सकते हैं ? कदापि नहीं। इसमें सुधी कर्ता है। (५) जो मुनि पर धन की ओर देखता रहता है, धन लेकर धनी को छोड़ देता है और नाभि विकार युक्त होता है वह मुनि वेश्या के समान होता है।
कथयस्व समस्यां त्वं वल्लीवेश्यायते सदा। अपरां भिन्नपद्मेन धरायां संगतं नभः ॥७३॥
स्वपुष्पं दर्शयत्येव कुलीना सुपयोधरा। मधुपैश्चुंब्यमाना च वल्ली वेश्यायते सदा ॥७४॥
पानीये बालिशैर्नूनं धरास्थे प्रतिबिंबितं। दृश्यते च शुभाकारं धरायां संगतं नभः ॥७५॥
दूरस्थैर्दूरतो नूनं नरैर्विज्ञानपारगैः। ईक्ष्यते च शुभाकारं धरायां संगतं नभः ॥७६॥
अर्थ (श्लोक 73 से 76): दूसरी कुमारी बोली-माता! वली वेश्यायते सदा ? धरायां संगतं नभः। इन दो समस्याओं की पूर्ति जल्दी करो। माता ने जवाब दिया- (१) स्वपुष्पं दर्शयत्येव कुलीना सुपयोधरा। मधुपैश्चुंब्य माना च वल्ली वेश्यायते सदा ॥ (२) पानीये बालिशैर्नूनं धरास्ते प्रति बिम्बितम्। दृश्यते च शुभाकारं धरायां संगतं नभः ॥ (३) दूरस्थैर्दूरतो नूनं नरै र्विज्ञान पारगैः। इस्यते च शुभाकारं धरायां संगतं नभः ॥
सुनेत्रे च शुभाकारे प्रियवादिनि मानिनि। त्वद्गर्भे पुण्यवान् कोऽपि समस्ति नयनप्रिये ॥७७॥
बिंदुरहितं वंचनं गुरुराजस्य ये कुर्वन्ति नराः सदा। दुःखं ते यांति किं साधु पक्षपातसमुद्यताः ॥७८॥
निर्गत्यकालमखिलं जिननाथमातु रेवं सुरेश्वर वधूर्विविधां च सेवां।
चक्रे सु कालकथया वर तीर्थ चक्रि, विष्णुप्रविष्णु बलदेव कथां तथा च ॥७९॥
अर्थ (श्लोक 77 से 79): कोई कुमारी माता से यह कहेगी, शुभ लक्षणों का आकर, मृगनयनी! प्रिय वादिनी! नियम से आपके गर्भ में किसी पुण्यवान् ने अवतार लिया है। माता यह झूठ न समझो क्योंकि जो मनुष्य पक्षपाती और पूज्यों का वंचन करते हैं संसार में वे अनेक कष्ट भोगते हैं। इस प्रकार समस्त कुमारियाँ तीनों काल हृदय से माता की सेवा करेंगी और तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण, वासुदेव आदि महापुरुषों की कथा कहकर माता का मन आनन्दित करेंगी।
भ्रङ्गस्त्रिवल्या जठरे न चाभू, दालस्यतंद्रारुचिदेहगेहे।
तस्या मुखे पांडुरता न चाभूद् गुणप्रभावाच्छयने सुखं न ॥८०॥
मासेऽथ पूर्णे नवमे सुयोगे सुवासरे चंद्रबले सुलग्ने।
नक्षत्रयोगे नरनाथ पत्नी सविष्यते सत्तनुजं शुभांगं ॥८१॥
आशास्तदा निर्मलतां गतां पराः विष्णोः पदं पांशुविवर्जितं शुभम्।
क्षोणी तृणैरोमचिता प्रमोदतो मार्गाः सुरम्या नगरं शुभावहं ॥८२॥
अर्थ (श्लोक 80 से 82): प्रायः स्त्रियों के गर्भ के समय वृद्धि आलस्य तन्द्रा वगैरह हुआ करते हैं किन्तु माता के गर्भ के समय न तो उदर वृद्धि होगी, न आलस्य और तंद्रा होगी मुख पर सफेदाई भी न होगी जब पूरे नवमास हो जायेंगे तब उत्तम योग में और उत्तम दिन चन्द्रमा लग्न और नक्षत्र में माता उत्तम पुत्ररत्न जनेगी। उस समय पुत्र के शरीर की कांति से दिशा निर्मल हो जाती है।
शंखारवो भवनधाम्नि सुंदरे भेरीरवो व्यंतरपत्तनेऽखिले।
सिंहारवो ज्योतिषिमेघसन्निभो घंटा रवो नाक निकायकेऽजनि ॥८३॥
ज्ञात्वा च जन्म जिनपस्य सुरेंद्रवर्ग आरुह्यमानमभितः प्रथमेश्वरोऽपि।
ऐरावतं गजवरं मुखदंतरम्यं संरुह्य देवनिकरैश्च चचाल शच्या ॥८४॥
आगत्य तस्य नगरं सुरराजपत्नी वेगादरिष्टसदनं सुरराजदेशात्।
संप्राप्य वीक्ष्य जिनपं जननीसमेतम् संतत्य गूढवपुषा स्तुतिमाततान ॥८५॥
संयोज्यतां च शयने तनुजं विकृत्य मायामयं च विनिवेश्य सुशिष्यकायां।
आदाय तं जिनपतिं सुरराजपत्नी निर्गत्य वासवकरे समदात् प्रहृष्टा ॥८६॥
अर्थ (श्लोक 83 से 86): भवनवासियों के घरों में शंख शब्द होने लगेंगे। व्यंतरों के घरों में भेरी बजेगी। ज्योतिषियों के घर मेघ ध्वनि के समान सिंहारव और वैमानिक देवों के घर घंटा शब्द होंगे। अपने अवधि बल से तीर्थंकर का जन्म जान देवगण अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर अयोध्या आयेंगे। प्रथम स्वर्ग का इन्द्र भी अतिशय शोभनीय ऐरावत गज पर सवार हो अपनी इन्द्राणी के साथ अयोध्या आयेगा। अयोध्या आकर इन्द्राणी इन्द्र की आज्ञा से शीघ्र ही प्रसूति घर में प्रवेश करेगी। वहाँ तीर्थंकर को अपनी माता के साथ सोता देख उनकी गूढ़भाव से स्तुति करेगी। माता को किसी प्रकार का कष्ट न हो इसलिए इन्द्राणी उस समय एक मायामयी पुत्र का निर्माण करेगी और उसे माता के पास सुलाकर और भगवान् को हाथ में लेकर इन्द्र के हाथ में देगी। भगवान् को देख इन्द्र अति प्रसन्न होगा ॥८३-८६॥
आरोप्य तं निज करे मघवा गजस्थः संसेवितः सुर वरैर्जयवृंदवादी।
ईशानशक्रधृतरम्यवरातपत्रं शक्रद्विकैर्ललित चामरवीज्यमानं ॥८७॥
आकाशमार्गमवलंब्य विमुच्य तूर्णं ज्योतिर्गणं सुरगिरिं क्षणतः समाप।
सत्पांडुकं वर वनं वर पांडुकायां मारोपयज्जिनपतिं सुरपः शिलायां ॥८८॥
क्षीरोदधेश्च पयसा परिपूर्णकुंभै, रष्टाधिकैर्दशशतैक शताभि संख्यैः।
अस्नापयज्जिनपतिं सुरपः सकृच्च शेषैः सुरैः सहजयारव वादिभिश्च ॥८९॥
चक्रे च जिष्णुर्जिनपस्य नाम श्री पद्मनाभेति विशिष्टचेताः।
नाना स्तवैः सन्नुतिमाततान भक्त्या सहस्राक्षसमन्वितोऽभूत् ॥९०॥
अर्थ (श्लोक 87 से 90): शीघ्र ही हाथी पर विराजमान करेगा। उस समय ईशान इन्द्र भगवान् पर छत्र लगायेगा। सनत्कुमार और माहेन्द्र दोनों इन्द्र चमर ढोरेंगे एवं सबके सब मिलकर आकाश मार्ग से मेरु पर्वत की ओर उसी क्षण चल देंगे। मेरु पर्वत पर पहुँच इन्द्र भगवान् को पांडुक शिला पर बिठाएगा। उस समय देवगण एक हजार आठ कलशों से भगवान् का अभिषेक करेंगे। इन्द्र उसी समय भगवान् का नाम पद्मनाभ रखेगा। अनेक प्रकार भगवान् की स्तुति करेंगे और उस समय भगवान् का रूप देख तृप्त न होता हुआ सहस्त्राक्ष होगा। बालक भगवान् को इन्द्राणी अपनी गोद में लेगी
परिष्कृतः सोऽपि सुरेंद्रपत्न्या रराज रम्याभरणैर्विशिष्टैः।
अनेकसूरप्रतिमप्रभाढ्ये नरामरैः पूजितपादपद्मः॥९१॥
दुंदुभ्यानक शंख काहलमहानादैर्नटंतः सुरा,
वीणावंशमृदंगताल निनदैः संपूरयंतो दिशः।
गायंतः सरसं सुरागकलितं गीतं भणंतः स्तुतिं,
कुर्वंतो जयनादमुन्नतपदाश्चक्रुः क्षणं जन्मजं॥ ९२॥
आरुह्य द्विरदं सुरेश्वरपतिर्नानासुरैः सेवितः,
कृत्वांके जिनपं शिशुं सुरपथि प्राप्तोत्सवैः प्राप्तवान्।
रम्यां तां वर हारि शालकलितां तुंगप्रतोलीपरां,
नाना केतुकराश्रितां शुभ महाधामालिसंराजितां ॥९३॥
पित्रोस्तं तनयं विशालनयनं दत्वा सुरेशः शुभं,
नत्वा तत्पदपंकजं सुरगिरौ संजातवृत्तं मुदा।
आख्यन्नामकृतिं सुनृत्यनृपतेरग्रे शुभैर्नर्तनै,
र्दत्वा भोग कदंबकं सुरवरैः सार्द्धं स्वगेहेऽगमत् ॥९४॥
असुरनिकरसेव्यो वर्द्धयन् पद्मनाभो जनयति मुदमिद्धं
भूरिपित्रोर्यथेष्टं सकल कनकभूषा-
ऽभूषितो रम्य देहो, विशदतरगुणाढ्यो मूत्रविद्योणहीनः ॥९५॥
अर्थ (श्लोक 87 से 95): और अनेक भूषणों से भूषित करेगी। भूषण भूषित भगवान् उस समय सूर्य के समान जान पड़ेंगे और दुंदुभि, आनक, शंख, काहलों के शब्दों के साथ नृत्य करते हुए, ताल के शब्दों से समस्त दिशा पूर्ण करते हुए, लयपूर्वक राग सहित सरस गान करते हुए और जय-जय शब्द करते हुए समस्त देव मेरु पर्वत पर भगवान् के जन्मकाल का उत्सव मनायेंगे। पश्चात् अनेक देवों से सेवित इन्द्र भगवान् को गोद में लेकर हाथी पर विराजमान करेगा। अनेक शालि-धान्य युक्त, बड़ी-बड़ी गलियों से व्याप्त ध्वजायुक्त, अनेक मकानों से शोभित अयोध्यापुरी में आयेगा बड़े-बड़े नेत्रों से शोभित भगवान् को पिता के सुपुर्द करेगा। मेरु पर्वत पर जो काम होगा इन्द्र उस सबको भगवान् के पिता महापद्म से कहेगा। पिता-माता के विनोदार्थ इन्द्र फिर नृत्य करेगा एवं भगवान् को अनेक भूषण प्रदान कर और भगवान् को भक्तिपूर्वक नमस्कार कर इन्द्र समस्त देवों के साथ स्वर्ग चला जायेगा। इस प्रकार समस्त देवों से पूजित भाँति-भाँति के आभरण-युक्त देह का धारक, अनेक गुणों का आकार बालक पद्मनाभ दिनों-दिन बढ़ता हुआ पिता-माता का संतोष स्थान होगा।
वामांगुष्ठं पादपद्मस्य रम्यं, पीयूषाढ्यं संलिहन् पूतदेहः।
एधे वेगाद्बालचंद्रः कलाभिस्, विज्ञानाढ्यो लक्षणैः पूर्णगात्रः ॥९६॥
अर्थ: पद्मनाभ अमृत से परिपूर्ण अपने पाँव के अंगूठे को चूसेगा और पवित्र देह का धारक शुभ
सप्तहस्तोच्छ्रितिदेहः षोडशाधिकसत्शत।
आयुस्तयाऽभवत्पूर्णं दशातिशयभागिनः ॥९७॥
उत्तमां ललितलक्षणान्वितां कामिनीं,
कनककांति कोमलां यौवने ससुरपाग्रहात्।
शुभां प्राप्तवान् परमशर्मसंगतः ॥९८॥
अर्थ (श्लोक 96 से 98): लक्षणों का स्थान वह कलाओं से जैसा चन्द्रमा बढ़ता चला जाता है वैसा ही शुभ लक्षणों से बढ़ता चला जायेगा। अतिशय पुण्यात्मा तीर्थंकर पद्मनाभ के शरीर की ऊँचाई सात हाथ होगी और आयु ११६ वर्ष की होगी। तीर्थंकर पद्मनाभ की स्त्रियाँ उत्तम अनेक गुणों से भूषित सुवर्ण के समान कांति की धारक शुभ और यौवनकाल में अतिशय शोभायुक्त होंगी।
सुतास्तस्याभवंश्चक्रवर्तिनो भरतादयः।
नाभेयस्य यथापूर्वं भरताद्याः सुलक्षणाः ॥९९॥
आसाद्य राज्यं नृपतेर्जिनेश्वरः स पालयामास महीं मनोहराम्।
कृष्यादिषट्कर्मरताः प्रजाः पराः कुर्वंश्च नाभेय इव प्रमोदनः ॥१००॥
देशग्राममटंबकर्वटपुरद्रोणादिकान् पत्तनं
वर्णादीन्नृपवंशभेदगणनां राज्ञां च नीतिं परां।
व्यापारं वणिजां विवाहसुविधिं भोज्यादिनानाक्रियां
देवो गोत्रभिदा युगादि जिनवत्संकारयामास च ॥१०१॥
कृत्वा च राज्यं सुरनाथसेव्यः, किंचिन्निमित्तं समवाप्य बुद्धः।
भवांगभोगेषुविरक्ततां च, समाप सद्धर्मरतः सुधीश्च ॥१०२॥
अर्थ (श्लोक 99 से 102): भगवान् वृषभदेव के जैसे भरत चक्रवर्ती आदि शुभ लक्षणों के धारक पुत्र हुए थे। वैसे ही तीर्थंकर पद्मनाभ के भी चक्रवर्ती पुत्र होंगे। तीर्थंकर वृषभदेव के ही समान तीर्थंकर पद्मनाभ राज्य करेंगे। नीतिपूर्वक प्रजा का पालन करेंगे और प्रजा वर्ग को षट्कर्म की ओर योजित करेगे तथा देश, ग्राम, पुर, द्रोण आदि की रचना करायेंगे। वर्णभेद और नृपवंश भेद का निर्माण करेंगे। राजा लोगों को नीति की शिक्षा देंगे, व्यापार का ढंग सिखलायेंगे और भोजनादि सामग्री की शिक्षा प्रदान करेंगे। इस रीति से भगवान् पद्मनाभ कुछ दिन राज्य करेंगे पश्चात् कुछ निमित्त पाकर शीघ्र ही भवभोगों से विरक्त हो जायेंगे और सद्धर्म की ओर अपना ध्यान खींचेंगे।
लोकांतिकैर्बोधित बुद्धिभावो, देवैः कृताराधनतो जिनेशः।
संदीक्षतां बोधचतुष्ट्याढ्यो, भावीकृतप्रोषण पारणश्च ॥१०३॥
अर्थ: भगवान् को भवभोगों से विरक्त जान शीघ्र ही लौकांतिक देव आयेंगे और भगवान् की बार-बार स्तुति कर उन्हें पालकी में बैठाकर ले जायेंगे।
कृत्वा क्षयं घाति चतुष्टयानां प्राप्तः सुबोधं खलु पंचमं च।
देवागमैर्भूषितभूमिभागः संराजितो वै समवैः शरण्यैः ॥१०४॥
अर्थ: भगवान् तप धारण कर और तप के प्रभाव से मनःपर्ययज्ञान प्राप्त करेंगे और पीछे केवलज्ञान प्राप्त करेंगे। भगवान् को केवल ज्ञानी जान देवगण आयेंगे और समवसरण की रचना करेंगे। भगवान् समवसरण में सिंहासन पर विराजमान हो भव्य जीवों को धर्मोपदेश देंगे।
दत्वोपदेशं विविधं नराणां विहृत्य भूमिं वरधर्मदानैः।
संतृप्त लोकानगमच्छिवं स नित्यं परं दुःखविहीनभावम् ॥१०५॥
निर्वाणमाप्तं जिननाथदेवं मत्वा सुरापत्य समं कलत्रैः।
कृत्वा च निर्वाणमहोत्सवं ते प्राप्ताः स्वनाकं परमर्द्धियुक्ताः ॥१०६॥
अर्थ (श्लोक 87 से 106): जहाँ-तहाँ विहार भी करेंगे और अपने उपदेशरूपी अमृत से भव्य जीवों के मन संतुष्ट कर समस्त कर्मों का नाशकर निर्वाण स्थान चले जायेंगे जिस समय भगवान् मोक्ष चले जायेंगे उस समय देव निर्वाण कल्याण मनायेंगे तथा सानन्द अपनी देवांगनाओं के साथ स्वर्ग चले जायेंगे और वहाँ आनन्द से रहेंगे ॥८७-१०६॥
श्रीपद्मनाभस्य भविष्यतश्च कल्याणचित्रं परमं पुराणं।
पायादपायाद्भवतः समस्तात् श्री श्रेणिकोद्भासि विभासितार्थ ॥१०७॥
इदं चरित्रं पठते च सोमं दत्तं सुधर्मं शिवमार्ग कारि।
श्री पद्मनाभेन भविष्यता च तीर्थेश्वरेणैव वहितार्थवेन ॥१०८॥
छंदोविरुद्धं वरलक्षणैश्च न्यायैः पुराणैः सुगुणैर्विरुद्धं।
अलंक्रियाभिः क्षमयंत्तु संत कृतं मयात्रेव विबुद्धिना वा ॥१०९॥
अर्थ (श्लोक 107 से 109): भविष्यकाल में होने वाले श्री पद्मनाभ तीर्थंकर का तथा श्री श्रेणिक को प्रकट करने वाला कहे हुए अर्थ का कल्याणस्वरूप परम पुराण इस समस्त संसार के दुःखों से रक्षा करें। जो यह चरित्र पढ़ता है, उसे अमृतस्वरूप श्रेष्ठ धर्म प्राप्त होता है जो मोक्षमार्ग को करने वाला है, भविष्यकाल में होने वाले श्री पद्मनाभ तीर्थंकर के द्वारा भी जीवों का हित होगा। छन्द के विरुद्ध श्रेष्ठ लक्षण, न्याय, पुराण, श्रेष्ठ गुण और अलंकारों के विपरीत यदि कुछ मेरे द्वारा किया गया हो तो संत पुरुष उसे बुद्धिहीन समझ कर क्षमा करें ॥१०७-१०९॥
प्रायः कलौ संति महानुपापा दुर्ज्जना हास्यरताः परेषु।
उपास्यमानाऽपि दुर्विभावा नागा इवात्यंतविरूपचित्ताः ॥११०॥
अर्थ: प्रायः कलिकाल में महापापी दुर्जन लोग दूसरों की हँसी उड़ाने में ही तत्पर रहते हैं उन दुर्जनों की यदि उपासना भी किया जाये तो भी वे अपने दुर्भाव को नहीं छोड़ते हैं, नाग के समान अत्यन्त विकृत चित्त वाले होते हैं ॥११०॥
दृष्ट्वा खलः कुप्यति साधुवर्गं गुणैर्गरिष्टं सुकरं विदोषं।
नित्योदयं भानुमिव स्वभावाद् ध्वांक्षोऽहितस्तामसभाववृत्तः ॥१११॥
खलः स्वभावान्सुगुणान् जनानां निहंति नानाहित कारणिश्च।
संदर्शतानेकपदार्थवृंदान् भास्वत्करान्नाहुरिवप्रबुद्धान् ॥११२॥
अर्थ (श्लोक 111 से 112): दुष्ट पुरुष स्वभाव से ही गुणों से गरिष्ठ, अच्छे कार्य करने वाले दोष रहित, भानु के समान सदा उदित रहने वाले साधु वर्ग को देखकर तामस भाव से घिरे हुए अंधकार की तरह अहित करता हुआ कुपित होता है। सूर्य की किरणों के समान जागृत करने वाले अनेक प्रकार का अहित करने वाले अनेक पदार्थों के समूह को दिखाने वाले, सज्जनों के श्रेष्ठ स्वाभाविक गुणों को नष्ट करता है। ऐसा ज्ञानी जन कहते हैं ॥१११-११२॥
प्रसादितो दुर्जन एव दोषं करोति दक्षैर्वर दान वाक्यैः।
अहिर्यथा मिष्टपयः प्रदानै र्जीवैः कृताशेषपरोपकारैः ॥११३॥
वरं विधात्रा विहिताः खलाश्च परस्य दोषग्रहणे समर्थाः।
तथा च काव्यानि विदूषितानि पुराणि कोलैर्मलनाशिते च ॥११४॥
अर्थ (श्लोक 113 से 114): श्रेष्ठ वचनों के द्वारा समस्त सभी प्रकार का परोपकार करने वाले कुशल जीवों के द्वारा प्रसन्न किए जाने पर भी दोष ही करता है, जैसे कि सर्प को दूध पिलाने पर भी दोष ही करता है। विधाता के द्वारा दुष्ट पुरुषों को दूसरों के दोष ग्रहण करने में समर्थ बनाया गया है, जो ठीक ही है। इसी प्रकार से काव्यों के दूषण दूर करने में और निर्मल बनाने में दुष्ट पुरुष ही समर्थ हैं ॥११३-११४॥
किं प्रार्थ्यते सोऽपि खलो मया यः स्वभावतो दोषगणं ददाति।
संप्रार्थ्यमानोऽपि यमो नराणां नो मुंचते दुष्टगुणप्रभावात् ॥११५॥
किं प्रार्थ्यते साधुगुणः स्वभावाद् दत्ते गुणान् पक्षिविपक्षिकाभ्यां।
अप्रार्थ्यमानोऽब्दगणश्च वृष्टिं करोति निंबेक्ष्वहि शुक्तिकायाम् ॥११६॥
जयतु जित विपक्षो मूलसंघः सुपक्षो हरतु तिमिरभावं भारती गच्छवारः।
नयतु सुगतिमार्गं शासनं शुद्धवर्गम् जयतु च शुभचंद्रः कुन्दकुन्दो मुनीन्द्रः ॥११७॥
अर्थ (श्लोक 115 से 117): जो दुष्ट पुरुष स्वभाव से ही दोषों के समूह को प्रदान करता है, मेरे द्वारा उसके लिए क्या प्रार्थना की जाये क्योंकि मनुष्यों की यम से प्रार्थना किए जाने पर भी दुष्ट गुणों के प्रभाव के कारण वह छूट नहीं सकता है। साधु पुरुष स्वभाव से ही गुणों को प्रदान करता है। प्रार्थना करने से क्या होता है ? जैसे कि पक्षी और विपक्षियों के द्वारा प्रार्थना नहीं किये जाने पर भी नीम में, सर्प में और सीप में मेघसमूह वृष्टि करता ही है। जिसने विपक्षों को जीता है, जो श्रेष्ठ पक्ष को धारण करता है, ऐसा मूल संघ सरस्वती गच्छ सदा जयवन्त हो। वह अंधकार को दूर करें। शुद्ध वर्ग रूप मोक्षमार्ग के शासन को आगे बढ़ायें। शुभ चन्द्रमा के समान कुन्दकुन्द मुनीन्द्र सदा जयवन्त हों ॥११५-११७॥
तदन्वये श्री मुनिपद्मनन्दी विभाति भव्याकरपद्मनन्दी।
शोभाधिशाली वरपुष्पदन्तः सुकांतिसंभिन्नसुपुष्पदन्तः ॥११८॥
अर्थ: मुनि की परम्परा में श्री पद्मनन्दी मुनि हुए हैं, जो भव्य जीवरूपी कमलसमूह को विकसित करने वाले थे तथा श्रेष्ठ पुष्पदन्त आचार्य हुए हैं, जिन्होंने अपनी पुष्प के समान दन्त पंक्तियों की कान्ति से अंधकार को दूर किया था और जो अत्यधिक शोभाशाली थे ॥११८॥
पुराणकाव्यार्थविदांवरत्वं विकासयन्मुक्तिविदांवरत्वं।
विभातु वीरः सकलाद्य कीर्तिः कृता यके नो सकलाद्यकीर्तिः ॥११९॥
भुवनकीर्तिर्यतिर्जयताद्यमीभुवनपूरितकीर्त्तिचयः सदा।
भवनबिंबजिनागमकारणो भवनवांबुदवातभरः परः ॥१२०॥
अर्थ (श्लोक 119 से 120): पुराण और काव्यों के अर्थ को जानने वाले मुक्ति के ज्ञाता, जिनकी सकल कीर्ति आज भी शोभित है और जिन्होंने अकीर्ति स्वरूप कुछ भी नहीं किया। भुवनकीर्ति यति जयवन्त हों जो महाव्रती थे लोक जिनकी कीर्ति के समूह से भरा हुआ था। जैसे कि लोक में श्रेष्ठ मेघ हवा से सर्वत्र भर जाते हैं। ऐसे ही जिन्होंने जिनालय, जिनबिम्ब और जिनागम को पूरित किया है ॥११९-१२०॥
तत्पट्टोदयपर्वते रविरभूद् भव्यांबुजं भासयन्। सन्नेत्रास्त्रहरं तमो विघटयन्नानाकरैर्भासुरः।
भव्यानंतगतश्च विग्रहिमतः श्रीज्ञानभूषः सदा। चित्रं चंद्रकसंगतः शुभकरः श्रीवर्द्धमानोदयः ॥१२१॥
जगति विजयकीर्त्तिः पुण्यमूर्तिसुकीर्त्ति र्जयतु च यतिराजो भूमिपैः स्पृष्टपादः।
नयनलिन हिमांशुर्ज्ञानभूषस्य पट्टे विविधपरविवादिक्ष्माधरे वज्रपातः ॥१२२॥
अर्थ (श्लोक 121 से 122): उनके पट्टरूपी पर्वत पर सूर्य के समान भव्य कमलों को विकसित करते हुए अंधकार को दूर करते हुए अनेक प्रकार की किरणों से भासुर श्री ज्ञानभूषण हुए जो चन्द्रमा के समान श्री वर्धमान का शासन उदय करने वाले तथा शुभ करने वाले थे। इस जगत् में विजयकीर्ति यतिराज पुण्य की मूर्ति और श्रेष्ठ कीर्ति वाले थे। राजाओं के द्वारा जिनके चरण छुये गये थे वह सदा जयवन्त हों। नयरूपी कमलों के लिए जो सूर्य के समान थे। ज्ञानभूषण के पट्ट पर जो अनेक प्रकार के परमतवादीरूपी पर्वतों के लिए वज्रपात के समान थे ॥१२१-१२२॥
तच्छिष्येण शुभेन्दुना शुभमतः श्री ज्ञानभावेन वै। पूतं पुण्यपुराणमानुषभवं संसारविध्वंसकं।
नो कीर्त्या व्यरचि प्रमोह वशतो जैने मते केवलं। नाहंकारवशात्कवित्वमदतः श्रीपद्मनाभेहितम् ॥१२३॥
अर्थ: उनके शिष्य शुभचन्द्र ने अपने ज्ञान के वैभव से संसार का विध्वंस करने वाला पवित्र पुण्य और पुराण पुरुषों से उत्पन्न होने वाले इस शुभ काव्य की रचना की है। यह रचना न तो कीर्ति की इच्छा से की गई है और न अहंकार के कवित्व के मद से की गई है किन्तु मात्र जैनमत में प्रकृष्ट मोह के कारण से की गई है। जिसमें पद्मनाभ तीर्थंकर बनने वाले राजा श्रेणिक का चरित्र है ॥१२३॥
इदं चरित्रं पठतः शिवं वै श्रोतुश्च पद्मेश्वरवत्पवित्र ।
भविष्णुसंसारसुखं नृदेवम् संभुज्य सम्यक्त्वफलप्रदीपं ॥१२४॥
चंद्रार्क हेमगिरि सागर भूविमान गंगानदी गगनसिद्ध शिलाश्च लोके।
तिष्ठंति यावदभितो वरमर्त्यसेवास् तिष्ठंतु कोविदमनोंबुजमध्यभूताः ॥१२५॥
अर्थ (श्लोक 124 से 125): इस चरित्र को पढ़ने वाले मोक्षफल की तथा सुनने वाले को पद्मेश्वर के समान आगामी संसार की मनुष्य पर्याय और देव पर्याय का सुख भोगकर सम्यक्त्व के फल की प्राप्ति होती है। जब तक चन्द्रमा, सूर्य, हेमगिरि, सागर, पृथ्वी, विमान, गंगा नदी, आकाश और सिद्धशिला इस लोक में विद्यमान हैं, तब तक श्रेष्ठ मनुष्यों से सेवित, ज्ञानियों के हृदयकमल के मध्य में यह काव्य विराजमान रहेगा ॥१२४-१२५॥