प्रवचनसार गाथा एवं अर्थ (आचार्य कुन्दकुन्द) | Pravachansar Gatha Evam Arth (Acharya Kundkund)

प्रवचनसार गाथा एवं अर्थ

आचार्य कुन्दकुन्द

प्रवचनसार के मूल गाथा 1 से 275, हर गाथा के नीचे उसका अन्वयार्थ, भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। अन्वयार्थ “श्री प्रवचनसार परमागम” हिन्दी संस्करण में हर गाथा के बाद छपे “अन्वयार्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; अमृतचन्द्र टीका का अनुवाद और वृन्दावनदास जी के पद्य नहीं लिए। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल गाथा (छपाई की टिप्पणियों सहित): प्रवचनसार मूल गाथा (आचार्य कुन्दकुन्द) | Pravachansar Mool Gatha (Acharya Kundkund)

स्रोत: Pravachansar_Hi.pdf

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ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन: पीठिका (गाथा 1 से 12)

एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघाइकम्ममलं ।
पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं ॥1॥ ॥1॥

अन्वयार्थ: यह मैं जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रों से वन्दित हैं तथा जिन्होंने घाति कर्ममल को धो डाला है ऐसे तीर्थरूप और धर्म के कर्ता श्री वर्द्धमान स्वामी को नमस्कार करता हूँ।


सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे ।
समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे ॥2॥ ॥2॥

अन्वयार्थ: और विशुद्ध सत्तावाले शेष तीर्थंकरों को सर्व सिद्धभगवन्तों के साथ ही, और ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार युक्त श्रमणों को नमस्कार करता हूँ।


ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं ।
वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥3॥ ॥3॥

अन्वयार्थ: उन - उन सबको तथा मनुष्य क्षेत्र में विद्यमान अरहन्तों को साथ ही साथ - समुदायरूप से और प्रत्येक प्रत्येक को - व्यक्तिगत वन्दना करता हूँ।


किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं ।
अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेवि सव्वेसिं ॥4॥ ॥4॥

अन्वयार्थ: इस प्रकार अरहन्तों को सिद्धों को आचार्यों को उपाध्ययवर्ग को और सर्व साधुओं को नमस्कार करके उनके विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधान आश्रम को प्राप्त करके मैं साम्य को प्राप्त करता हूँ जिससे निर्वाण की प्राप्ति होती है।


तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्ज ।
उवसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्वाणसंपत्ती ॥5॥ ॥5॥

अन्वयार्थ: इस प्रकार अरहन्तों को सिद्धों को आचार्यों को उपाध्ययवर्ग को और सर्व साधुओं को नमस्कार करके उनके विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधान आश्रम को प्राप्त करके मैं साम्य को प्राप्त करता हूँ जिससे निर्वाण की प्राप्ति होती है।


संपज्जदि णिव्वाणं देवासुरमणुयरायविहवेहिं ।
जीवस्स चरित्तादो दंसणणाणप्पहाणादो ॥6॥ ॥6॥

अन्वयार्थ: जीव को दर्शनज्ञानप्रधान चारित्र से देवेन्द्र, असुरेन्द्र और नरेन्द्र के वैभवों के साथ निर्वाण प्राप्त होता है। (जीव को सरागचारित्र से देवेन्द्र इत्यादि के वैभवों की और वीतरागचारित्र से निर्वाण की प्राप्ति होती है।)


चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो ।
मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो ॥7॥ ॥7॥

अन्वयार्थ: चारित्र वास्तव में धर्म है। जो धर्म है वह साम्य है ऐसा (शास्त्रो में) कहा है। साम्य मोहक्षोभरहित ऐसा आत्मा का परिणाम (भाव) है।


परिणमदि जेण दव्वं तक्कालं तम्मयं ति पण्णत्तं ।
तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेयव्वो ॥8॥ ॥8॥

अन्वयार्थ: द्रव्य जिस समय जिस भावरूप से परिणमन करता है उस समय उस मय है ऐसा (जिनेन्द्र देव ने) कहा है; इसलिए धर्मपरिणत आत्मा को धर्म समझना चाहिए।


जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो ।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥9॥ ॥9॥

अन्वयार्थ: जीव परिणामस्वभावी होने से जब शुभ या अशुभ भावरूप परिणमन करता है, तब शुभ या अशुभ (स्वयं ही) होता है, और जब शुद्धभावरूप परिणमित होता है तब शुद्ध होता है।


णत्थि विणा परिणामं अत्थो अत्थं विणेह परिणतमो ।
दव्वगुणपज्जयत्थो अत्थो अत्थित्तणिव्वत्तो ॥10॥ ॥10॥

अन्वयार्थ: इस लोक में परिणाम के बिना पदार्थ नहीं है, पदार्थ के बिना परिणाम नहीं है; पदार्थ द्रव्य-गुण-पर्याय में रहनेवाला और (उत्पादव्ययध्रौव्यमय) अस्तित्व से बना हुआ है।


धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपओगजुदो ।
पावदि णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं ॥11॥ ॥11॥

अन्वयार्थ: धर्म से परिणमित स्वरूपवाला आत्मा यदि शुद्ध उपयोग में युक्त हो तो मोक्ष सुख को प्राप्त करता है और यदि शुभोपयोगवाला हो तो (स्वर्गसुखं) स्वर्ग के सुख को (बन्ध को) प्राप्त करता है।


असुहोदएण आदा कुणरो तिरियो भवीय णेरइयो ।
दुक्खसहस्सेहिं सदा अभिद्दुदो भमदि अच्चंतं ॥12॥ ॥12॥

अन्वयार्थ: अशुभ उदय से आत्मा कुमनुष्य तिर्यंच और नारकी होकर हजारों दुःखों से सदा पीड़ित होता हुआ (संसार में) अत्यंत भ्रमण करता है।

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन: शुद्धोपयोग अधिकार (गाथा 13 से 20)

अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणंतं ।
अव्वुच्छिण्णं च सुहं सुद्धुवओगप्पसिद्धाणं ॥13॥ ॥13॥

अन्वयार्थ: शुद्धोपयोग से निष्पन्न हुए आत्माओं का (केवली और सिद्धों का) सुख अतिशय आत्मोत्पन्न विषयातीत (अतीन्द्रिय) अनुपम अनन्त (अविनाशी) और अविच्छिन्न (अटूट) है।


सुविदिदपयत्थसुत्तो संजमतवसंजुदो विगदरागो ।
समणो समसुहदुक्खो भणिदो सुद्धोवओगो त्ति ॥14॥ ॥14॥

अन्वयार्थ: जिन्होंने (निज शुद्ध आत्मादि) पदार्थों को और सूत्रों को भलीभाँति जान लिया है, जो संयम और तपयुक्त हैं, जो वीतराग अर्थात् राग रहित हैं और जिन्हें सुख-दुःख समान हैं, ऐसे श्रमण को (मुनिवर को) ‘शुद्धोपयोगी’ कहा गया है।


उवओगविसुद्धो जो विगदावरणंतरायमोहरओ ।
भूदो सयमेवादा जादि परं णेयभूदाणं ॥15॥ ॥15॥

अन्वयार्थ: जो उपयोग विशुद्ध (शुद्धोपयोगी) है वह आत्मा ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और मोहरूप रज से रहित स्वयमेव होता हुआ ज्ञेयभूत पदार्थों के पार को प्राप्त होता है।


तह सो लद्धसहावो सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो ।
भूदो सयमेवादा हवदि सयंभु त्ति णिद्दिट्ठो ॥16॥ ॥16॥

अन्वयार्थ: इस प्रकार वह आत्मा स्वभाव को प्राप्त सर्वज्ञ और सर्व (तीन) लो के अधिपतियों से पूजित स्वयमेव हुआ होने से ‘स्वयंभू’ है ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है।


भंगविहूणो य भवो संभवपरिवज्जिदो विणासो हि ।
विज्जदि तस्सेव पुणो ठिदिसंभवणाससमवाओ ॥17॥ ॥17॥

अन्वयार्थ: उसके (शुद्धात्मस्वभाव को प्राप्त आत्मा के) विनाश रहित उत्पाद है, और उत्पाद रहित विनाश है। उसके ही फिर स्थिति, उत्पाद और विनाश का समवाय मिलाप, एकत्रपना विद्यमान है।


उप्पादो य विणासो विज्जदि सव्वस्स अट्ठजादस्स ।
पज्जाएण दु केणवि अट्ठो खलु होदि सब्भूदो ॥18॥ ॥18॥

अन्वयार्थ: किसी पर्याय से उत्पाद और किसी पर्याय से विनाश सर्व पदार्थमात्र के होता है; और किसी पर्याय से पदार्थ वास्तव में ध्रुव है।


पक्खीणघादिकम्मो अणंतवरवीरिओ अहियतेजो ।
जादो अदिंदिओ सो णाणं सोक्खं च परिणमदि ॥19॥ ॥19॥

अन्वयार्थ: जिसके घातिकर्म क्षय हो चुके हैं, जो अतीन्द्रिय हो गया है, अनन्त जिसका उत्तम वीर्य है और अधिक जिसका (केवलज्ञान और केवलदर्शनरूप) तेज है, ऐसा वह (स्वयंभू आत्मा) ज्ञान और सुखरूप परिणमन करता है।


सोक्खं वा पुण दुक्खं केवलणाणिस्स णत्थि देहगदं ।
जम्हा अदिंदियत्तं जादं तम्हा दु तं णेयं ॥20॥ ॥20॥

अन्वयार्थ: केवलज्ञानी के शरीरसम्बन्धी सुख या दुःख नहीं है, क्योंकि अतीन्द्रियता उत्पन्न हुई है, इसलिए ऐसा जानना चाहिए।

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन: ज्ञान अधिकार (गाथा 21 से 52)

परिणमदो खलु णाणं पञ्चक्खा सव्वदव्वपज्जाया ।
सो णेव ते विजाणदि उग्गहपुव्वाहिं किरियाहिं ॥21॥ ॥21॥

अन्वयार्थ: वास्तव में ज्ञानरूप से (केवलज्ञानरूप से) परिणमित होते हुए केवलीभगवान् के सर्व द्रव्य-पर्यायें प्रत्यक्ष हैं; वे उन्हें अवग्रहादि क्रियाओं से नहीं जानते।


णत्थि परोक्खं किंचि वि समंत सव्वक्खगुणसमिद्धस्स ।
अक्खातीदस्स सदा सयमेव हि णाणजादस्स ॥22॥ ॥22॥

अन्वयार्थ: जो सदा इन्द्रियातीत हैं, जो सर्व ओर से (सर्व आत्मप्रदेशों से) सर्व इन्द्रिय गुणों से समृद्ध हैं और जो स्वयमेव ज्ञानरूप हुए हैं, उन केवलीभगवान् को कुछ भी परोक्ष नहीं है।


आदा णाणपमाणं णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं ।
णेयं लोयालोयं तम्हा णाणं तु सव्वगयं ॥23॥ ॥23॥

अन्वयार्थ: आत्मा ज्ञान प्रमाण है; ज्ञान ज्ञेय प्रमाण कहा गया है। ज्ञेय लोकालोक है, इसलिए ज्ञान सर्वगत - सर्व व्यापक है।


णाणप्पमाणमादा ण हवदि जस्सेह तस्स सो आदा ।
हीणो वा अहिओ वा णाणादो हवदि धुवमेव ॥24॥ ॥24॥

अन्वयार्थ: इस जगत् में जिसके मत में आत्मा ज्ञानप्रमाण नहीं है, उसके मत में वह आत्मा अवश्य ज्ञान से हीन अथवा अधिक होना चाहिए।


हीणो जदि सो आदा तण्णाणमचेदणं ण जाणादि ।
अहि वा णाणादो णाणेण विणा कहं णादि ॥25॥ ॥25॥

अन्वयार्थ: यदि वह आत्मा ज्ञान से ही हो तो वह ज्ञान अचेतन होने से नहीं जानेगा, और यदि (आत्मा) ज्ञान से अधिक हो तो (वह आत्मा) ज्ञान के बिना कैसे जानेगा?


सव्वगदो जिणवसहो सव्वे वि य तग्गया जगदि अट्ठा ।
णाणमयादो य जिणो विसयादो तस्स ते भणिदा ॥26॥ ॥26॥

अन्वयार्थ: जिनवर सर्वगत हैं और जगत् के सर्व पदार्थ जिनवरगत (जिनवर से प्राप्त) हैं; क्योंकि जिन ज्ञानमय हैं और वे सब पदार्थ ज्ञान के विषय होने से जिनके विषय कहे गये हैं।


णाणं अप्प त्ति मदं वट्टदि णाणं विणा ण अप्पाणं ।
तम्हा णाणं अप्पा अप्पा णाणं व अण्णं वा ॥27॥ ॥27॥

अन्वयार्थ: ज्ञान आत्मा है ऐसा जिनदेव का मत है। आत्मा के बिना (अन्य किसी द्रव्य में) ज्ञान नहीं होता, इसलिए ज्ञान आत्मा है; और आत्मा (ज्ञान गुण द्वारा) ज्ञान है अथवा (सुखादि अन्य गुण द्वारा) अन्य है।


णाणी णाणसहावो अट्ठा णेयप्पगा हि णाणिस्स ।
रूवाणि व चक्खूणं णेवण्णोण्णेसु वट्टंति ॥28॥ ॥28॥

अन्वयार्थ: आत्मा ज्ञान स्वभाव है और पदार्थ आत्मा के ज्ञेय स्वरूप हैं, जैसे कि रूप (रूपी पदार्थ) नेत्रों का ज्ञेय है वैसे वे एक-दूसरे में नहीं वर्तते।


ण पविट्ठो णाविट्ठो णाणी णेयेसु रूवभिव चक्खू ।
जाणदि पस्सदि णियदं अक्खातीदो जगमसेसं ॥29॥ ॥29॥

अन्वयार्थ: जैसे चक्षु रूप को (ज्ञेयों में अप्रविष्ट रहकर तथा अप्रविष्ट न रहकर जानती-देखती है) उसी प्रकार आत्मा इन्द्रियातीत होता हुआ अशेष जगत् को (-समस्त लोकालोक को) ज्ञेयों में अप्रविष्ट रहकर तथा अप्रविष्ट न रहकर निरन्तर जानता-देखता है।


रयणमिह इंदणीलं दुद्धज्झासियं जहा सभासाए ।
अभिभूय तं पि दुद्धं वट्टदि तह णाणमट्ठेसु ॥30॥ ॥30॥

अन्वयार्थ: जैसे इस जगत् में दूध में पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न अपनी प्रभा के द्वारा उस दूध में व्याप्त होकर वर्तता है, उसी प्रकार ज्ञान (अर्थात् ज्ञातृद्रव्य) पदार्थों में व्याप्त होकर वर्तता है।


जदि ते ण संति अट्ठा णाणे णाणं ण होदि सव्वगयं ।
सव्वगयं वा णाणं कहं ण णाणट्ठिया अट्ठा ॥31॥ ॥31॥

अन्वयार्थ: यदि वे पदार्थ ज्ञान में न हों तो ज्ञान सर्वगत नहीं हो सकता और यदि ज्ञान सर्वगत है तो पदार्थ ज्ञानस्थित कैसे नहीं हैं? (अर्थात् अवश्य हैं)।


गेण्हदि णेव ण मुंचदि ण परं परिणमदि केवली भगवं ।
पेच्छदि समंतदो सो जाणदि सव्वं णिखसेसं ॥32॥ ॥32॥

अन्वयार्थ: केवली भगवान् पर को ग्रहण नहीं करते, छोड़ते नहीं, पररूप परिणमित नहीं होते; वे निरवशेषरूप से सबको (सम्पूर्ण आत्मा को, सर्व ज्ञेयों को) सर्व ओर से ( सर्व आत्मप्रदेशों से) देखते-जानते हैं।


जो हि सुदेण विजाणदि अप्पाणं जाणगं सहावेण ।
तं सुदकेवलिमिसिणो भणंति लोगप्पदीवयरा ॥33॥ ॥33॥

अन्वयार्थ: जो वास्तव में श्रुतज्ञान के द्वारा स्वभाव से ज्ञायक (अर्थात् ज्ञायकस्वभाव) आत्मा को जानता है, उसे लोक के प्रकाशक ऋषीश्वरगण श्रुतकेवली कहते हैं।


सुत्तं जिणोवदिट्ठं पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं ।
तं जाणणा हि णाणं सुत्तस्स य जाणणा भणिया ॥34॥ ॥34॥

अन्वयार्थ: सूत्र अर्थात् पुद्गलद्रव्यात्मक वचनों के द्वारा जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा उपदिष्ट वह उसकी ज्ञप्ति ज्ञान है और उसे सूत्र की ज्ञप्ति (श्रुतज्ञान) कहा गया है।


जो जाणदि सो णाणं ण हवदि णाणेण जाणगो आदा ।
णाणं परिणमदि सयं अट्ठा णाणट्ठिया सव्वे ॥35॥ ॥35॥

अन्वयार्थ: जो जानता है सो ज्ञान है (अर्थात् जो ज्ञायक है वही ज्ञान है), ज्ञान के द्वारा आत्मा ज्ञायक है, ऐसा नहीं है। स्वयं ही ज्ञानरूप परिणमित होता है और सर्व पदार्थ ज्ञानस्थित हैं।


तम्हा णाणं जीवो णेयं दव्वं तिहा समक्खादं ।
दव्वं ति पुणो आदा परं च परिणामसंबद्धं ॥36॥ ॥36॥

अन्वयार्थ: इसलिए जीव ज्ञान है और ज्ञेय तीन प्रकार से वर्णित (त्रिकालस्पर्शी) द्रव्य है। (वह ज्ञेयभूत) द्रव्य अर्थात् आत्मा (स्वात्मा) और पर जो कि परिणामवाले हैं।


तक्कालिगेव सव्वे सदसब्भूदा हि पज्जया तासिं ।
वट्टंते ते णाणे विसेसदो दव्वजादीणं ॥37॥ ॥37॥

अन्वयार्थ: उन (जीवादि) द्रव्यजातियों की समस्त विद्यमान और अविद्यमान पर्यायें तात्कालिक (वर्तमान) पर्यायों की भाँति, विशिष्टता-पूर्वक (अपने-अपने भिन्न-भिन्न स्वरूप में) ज्ञान में वर्तती हैं।


जे णेव हि संजाया जे खलु णट्ठा भवीय पज्जाया ।
ते होंति असब्भूदा पज्जाया णाणपच्चक्खा ॥38॥ ॥38॥

अन्वयार्थ: जो पर्यायें वास्तव में उत्पन्न नहीं हुई हैं, तथा जो पर्यायें वास्तव में उत्पन्न होकर नष्ट हो गई हैं, वे अविद्यमान पर्यायें ज्ञान प्रत्यक्ष हैं।


जदि पच्चक्खमजादं पज्जायं पलयिदं च णाणस्स ।
ण हवदि वा तं णाणं दिव्वं ति हि के परूवेंति ॥39॥ ॥39॥

अन्वयार्थ: यदि अनुत्पन्न पर्याय तथा नष्ट पर्याय ज्ञान के (केवलज्ञान के) प्रत्यक्ष न हो तो उस ज्ञान को ‘दिव्य’ कौन प्ररूपेगा?


अत्थं अक्खणिवदिदं ईहापुव्वेहिं जे विजाणंति ।
तेसिं परोक्खभूदं णादुमसक्कं ति पण्णत्तं ॥40॥ ॥40॥

अन्वयार्थ: जो अक्षपतित अर्थात् इन्द्रियगोचर पदार्थ को ईहादिक द्वारा जानते हैं, उनके लिये परोक्षभूत पदार्थ को जानना अशक्य है, ऐसा सर्वज्ञदेव ने कहा है। ‘’


अपदेसं सपदेसं मुत्तममुत्तं च पज्जयमजादं ।
पलयं गदं च जाणदि तं णाणमदिंदियं भणियं ॥41॥ ॥41॥

अन्वयार्थ: जो ज्ञान अप्रदेश को, सप्रदेश को, मूर्त को, और अमूर्त को तथा अनुत्पन्न और नष्ट पर्याय को जानता है, वह ज्ञान अतीन्द्रिय कहा गया है।


परिणमदि णेयमट्ठं णादा जदि णेव खाइगं तस्स ।
णाणं ति तं जिणिंदा खवयंतं कम्ममेवुत्ता ॥42॥ ॥42॥

अन्वयार्थ: ज्ञाता यदि ज्ञेय पदार्थरूप परिणमित होता हो तो उसके क्षायिक ज्ञान होता ही नहीं। जिनेन्द्रदेवों ने उसे कर्म को ही अनुभव करनेवाला कहा है।


उदयगदा कम्मंसा जिणवरवसहेहिं णियदिणा भणिया ।
तेसु विमूढो रत्तो दुट्ठो वा बंधमणुभवदि ॥43॥ ॥43॥

अन्वयार्थ: (संसारी जीव के) उदय प्राप्त कर्मांश (ज्ञानावरणीय आदि पुद्गलकर्म के भेद) नियम से जिनवर वृषभों ने कहे हैं। जीव उन कर्मांशों के होने पर, मोही, रागी अथवा द्वेषी होता हुआ बन्ध का अनुभव करता है।


ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं ।
अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ॥44॥ ॥44॥

अन्वयार्थ: उन अरहन्त भगवन्तों के उस समय खड़े रहना, बैठना, विहार और धर्मोपदेश स्त्रियों के मायाचार की भाँति, स्वाभाविक ही - प्रयत्न बिना ही - होता है।


पुण्णफला अरहंता तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया ।
मोहादीहिं विरहिदा तम्हा सा खाइग त्ति मदा ॥45॥ ॥45॥

अन्वयार्थ: अरहन्त भगवान् पुण्यफलवाले हैं और उनकी क्रिया औदयिकी है; मोहादि से रहित है इसलिए वह क्षायिकी मानी गई है।


जदि सो सुहो व असुहो ण हवदि आदा सयं सहावेण ।
संसारो वि ण विज्जदि सव्वेसिं जीवकायाणं ॥46॥ ॥46॥

अन्वयार्थ: यदि (ऐसा माना जाये कि) आत्मा स्वयं स्वभाव से (-अपने भाव से) शुभ या अशुभ नहीं होता ( शुभाशुभ भाव में परिणमित ही नहीं होता) तो समस्त जीवनिकायों के संसार भी विद्यमान नहीं है ऐसा सिद्ध होगा।


जं तक्कालियमिदरं जाणदि जुगवं समंतदो सव्वं ।
अत्थं विचित्तविसमं तं णाणं खाइयं भणियं ॥47॥ ॥47॥

अन्वयार्थ: जो एक ही साथ सर्वत: (सर्व आत्मप्रदेशों से) तात्कालिक या अतात्कालिक, विचित्र ( - अनेक प्रकार के) और विषम (मूर्त, अमूर्त आदि असमान जाति के) समस्त पदार्थों को जानता है, उस ज्ञान को क्षायिक कहा है।


जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तिक्कालिगे तिहुवणत्थे ।
णादुं तस्स ण सक्कं सपज्जयं दव्वमेगं वा ॥48॥ ॥48॥

अन्वयार्थ: जो एक ही साथ त्रैकालिक त्रिभुवनस्थ ( - तीनों काल के और तीनों लोक के) पदार्थों को नहीं जानता, उसे पर्याय सहित एक द्रव्य भी जानना शक्य नहीं है।


दव्वं अणंतपज्जयमेगमणंताणि दव्वजादाणि ।
ण विजाणदि जदि जुगवं किध सो सव्वाणि जाणादि ॥49॥ ॥49॥

अन्वयार्थ: यदि अनन्त पर्यायवाले एक द्रव्य को (-आत्मद्रव्य को) तथा अनन्त द्रव्यसमूह को एक ही साथ नहीं जानता तो वह पुरुष सबको (-अनन्त द्रव्यसमूह को) कैसे जान सकेगा? (अर्थात् जो आत्मद्रव्य को नहीं जानता हो वह समस्त द्रव्यसमूह को नहीं जा सकता)। ‘’


उपज्जदि जदि णाणं कमसो अट्ठे पडुच्च णाणिस्स ।
तं णेव हवदि णिच्चं ण खाइगं णेव सव्वगदं ॥50॥ ॥50॥

अन्वयार्थ: यदि आत्मा का ज्ञान क्रमशः पदार्थों का अवलम्बन लेकर उत्पन्न होता हो तो वह (ज्ञान) नित्य नहीं है, क्षायिक नहीं है, और सर्वगत नहीं है।


तिक्कालणिच्चविसमं सयलं सव्वत्थसंभवं चित्तं ।
जुगवं जाणदि जोण्हं अहो हि णाणस्स माहप्पं ॥51॥ ॥51॥

अन्वयार्थ: तीनों काल में सदा विषम (असमान जाति के), सर्व क्षेत्र के अनेक प्रकार के समस्त पदार्थों को जिनदेव का ज्ञान एक साथ जानता है, अहो! ज्ञान का माहात्म्य!


ण वि परिणमदि ण गेण्हदि उप्पज्जदि णेव तेसु अट्ठेसु ।
जाणण्णवि ते आदा अबंधगो तेण पण्णत्तो ॥52॥ ॥52॥

अन्वयार्थ: (केवलज्ञानी) आत्मा पदार्थों को जानता हुआ भी उसरूप परिणमित नहीं होता, उन्हें ग्रहण नहीं करता और उन पदार्थों के रूप में उत्पन्न नहीं होत, इसलिए उसे अबन्धक कहा है।

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन: सुख अधिकार (गाथा 53 से 68)

अत्थि अमुत्तं मुत्तं अदिंदियं इंदियं च अत्थेसु ।
णाणं च तहा सोक्खं जं तेसु परं च तं णेयं ॥53॥ ॥53॥

अन्वयार्थ: पदार्थ सम्बन्धी ज्ञान अमूर्त या मूर्त, अतीन्द्रिय या एकेन्द्रिय होता है; और इसी प्रकार (अमूर्त या मूर्त, अतीन्द्रिय या एकेन्द्रिय) सुख होता है। उसमें जो प्रधान - उत्कृष्ट है, वह उपादेयरूप जानना।


जं पेच्छदो अमुत्तं मुत्तेसु अदिंदियं च पच्छण्णं ।
सयलं सगं च इदरं तं णाणं हवदि पच्चक्खं ॥54॥ ॥54॥

अन्वयार्थ: देखनेवाले का जो ज्ञान अमूर्त को, मूर्त पदार्थों में भी अतीन्द्रिय को, और प्रच्छन्न को, इन सबको - स्व तथा पर को देखता है, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है।


जीवो सयं अमुत्तो मुत्तिगदो तेण मुत्तिणा मुत्तं ।
ओगेण्हित्ता जोग्गं जाणदि वा तं ण जाणादि ॥55॥ ॥55॥

अन्वयार्थ: स्वयं अमूर्त ऐसा जीव मूर्त शरीर को प्राप्त होता हुआ, उस मूर्त शरीर के द्वारा योग्य मूर्त पदार्थ को अवग्रह करके (-इन्द्रियग्रहणयोग्य मूर्त पदार्थ का अवग्रह करके) उसे जानता है अथवा नहीं जानता (-कभी जानता है और कभी नहीं जानता)।


फासो रसो य गंधो वण्णो सद्दो य पोग्गला होंति ।
अक्खाणं ते अक्खा जुगवं ते णेव गेण्हंति ॥56॥ ॥56॥

अन्वयार्थ: स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द पुद्गल हैं, वे इन्द्रियों के विषय हैं (परन्तु) वे इन्द्रियाँ उन्हें (भी) एक साथ ग्रहण नहीं करतीं (नहीं जान सकतीं)।


परदव्वं ते अक्खा णेव सहावो त्ति अप्पणो भणिदा ।
उवलद्धं तेहि कधं पच्चक्खं अप्पणो होदि ॥57॥ ॥57॥

अन्वयार्थ: वे इन्द्रियाँ परद्रव्य हैं, उन्हें आत्मस्वभावरूप नहीं कहा है; उनके द्वारा ज्ञात आत्मा का प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है?


जं परदो विण्णाणं तं तु परोक्खं ति भणिदमट्ठेसु ।
जदि केवलेण णादं हवदि हि जीवेण पच्चक्खं ॥58॥ ॥58॥

अन्वयार्थ: पर के द्वारा होनेवाला जो पदार्थ सम्बन्धी विज्ञान है, वह तो परोक्ष कहा गया है, यदि मात्र जीव के द्वारा ही जाना जाये तो वह ज्ञान प्रत्यक्ष है।


जादं सयं समंतं णाणमणंतत्थवित्थडं विमलं ।
रहिदं तु ओग्गहादिहिं सुहं ति एगंतियं भणिदं ॥59॥ ॥59॥

अन्वयार्थ: अपने आप ही उत्पन्न समंत (सर्व प्रदेशों से जानता हुआ) अनन्त पदार्थों में विस्तृत विमल और अवग्रहादि से रहित ऐसा ज्ञान ऐकान्तिक सुख है ऐसा (सर्वज्ञदेव ने) कहा है।


जं केवलं ति णाणं तं सोक्खं परिणमं च सो चेव ।
खेदो तस्स ण भणिदो जम्हा घादी खयं जादा ॥60॥ ॥60॥

अन्वयार्थ: जो ‘केवल’ नाम का ज्ञान है वह सुख है परिणाम भी वही है उसे खेद नहीं कहा है (अर्थात् केवलज्ञान में सर्वज्ञदेव ने खेद नहीं कहा) क्योंकि घातिकर्म क्षय को प्राप्त हुए हैं।


णाणं अत्थंतगयं लोयालोएसु वित्थडा दिट्ठी ।
णट्ठमणिट्ठं सव्वं इट्ठं पुण जं तु तं लद्धं ॥61॥ ॥61॥

अन्वयार्थ: ज्ञान पदार्थों के पार को प्राप्त है और दर्शन लोकालोक में विस्तृत है; सर्व अनिष्ट नष्ट हो चुका है और जो इष्ट है वह सब प्राप्त हुआ है। (इसलिए केवल अर्थात् केवलज्ञान सुखस्वरूप है।)


णो सद्दहंति सोक्खं सुहेसु परमं ति विगदघादीणं ।
सुणिदूण ते अभव्वा भव्वा वा तं पडिच्छंति ॥62॥ ॥62॥

अन्वयार्थ: ‘जिनके घातिकर्म नष्ट हो गये हैं, उनका सुख (सर्व) सुखों में परम अर्थात् उत्कृष्ट हैं’ ऐसा वचन सुनकर जो श्रद्धा नहीं करते वे अभव्य हैं; और भव्य उसे स्वीकार (आदर) करते हैं - उसकी श्रद्धा करते हैं।


मणुआसुरामरिंदा अहिहुदा इंदिएहिं सहजेहिं ।
असहंता तं दुक्खं रमंति विसएसु रम्मेसु ॥63॥ ॥63॥

अन्वयार्थ: मनुष्येन्द्र (चक्रवर्ती) असुरेन्द्र और सुरेन्द्र स्वाभाविक (परोक्षज्ञानवालों को जो स्वाभाविक है ऐसी) इन्द्रियों से पीड़ित वर्तते हुए उस दुःख को सहन न कर सकने से रम्य विषयों में रमण करते हैं।


जेसिं विसएसु रदी तेसिं दुक्खं वियाण सब्भावं ।
जइ तं ण हि सब्भावं वावारो णत्थि विसयत्थं ॥64॥ ॥64॥

अन्वयार्थ: जिन्हें विषयों में रति है, उन्हें दुःख स्वाभाविक जानो; क्योंकि यदि वह दुःख स्वभाव न हो तो विषयार्थ में व्यापार न हो।


पप्पा इट्ठे विसये फासेहिं समस्सिदे सहावेण ।
परिणममाणो अप्पा सयमेव सुहं ण हवदि देहो ॥65॥ ॥65॥

अन्वयार्थ: स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ जिनका आश्रय लेती हैं, ऐसे इष्ट विषयों को पाकर (अपने शुद्ध) स्वभाव से परिणमन करता हुआ आत्मा स्वयं ही सुखरूप (इन्द्रियसुखरूप) होता है देह सुखरूप नहीं होती।


एगंतेण हि देहो सुहं ण देहिस्स कुणदि सग्गे वा ।
विसयवसेण दु सोक्खं दुक्खं वा हवदि सयमादा ॥66॥ ॥66॥

अन्वयार्थ: एकान्त से अर्थात् नियम से स्वर्ग में भी शरीर शरीरी ( - आत्मा को) सुख नहीं देता परन्तु विषयों के वश से सुख अथवा दुःखरूप स्वयं आत्मा होता है।


तिभिरहरा जइ दिट्ठी जणस्स दीवेण णत्थि कायव्वं ।
तह सोक्खं सयमादा विसया किं तत्थ कुव्वंति ॥67॥ ॥67॥

अन्वयार्थ: यदि प्राणी की दृष्टि तिमिरनाशक हो तो दीपक से कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात् दीपक कुछ नहीं कर सकता, उसी प्रकार जहाँ आत्मा स्वयं सुखरूप परिणमन करता है वहाँ विषय क्या कर सकते हैं?।


सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा णभसि ।
सिद्धो वि तहा णाणं सुहं च लोगे तहा देवो ॥68॥ ॥68॥

अन्वयार्थ: जैसे आकाश में सूर्य अपने आप ही तेज, उष्ण और देव है, उसी प्रकार लोक में सिद्ध भगवान् भी (स्वयमेव) ज्ञान सुख और देव हैं।

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन: शुभपरिणाम अधिकार (गाथा 69 से 92)

देवदजदिगुरुपूजासु चेव दाणम्मि वा सुसीलेसु ।
उववासादिसु रत्तो सुहोवओगप्पगो अप्पा ॥69॥ ॥69॥

अन्वयार्थ: देव, गुरु और यति की पूजा में, दान में एवं सुशीलों में और उपवासादिक में लीन आत्मा शुभोपयोगात्मक है।


जुत्तो सुहेण आदा तिरिओ वा माणुसो व देवो वा ।
भूदो तावदि कालं लहदि सुहं इंदियं विविहं ॥70॥ ॥70॥

अन्वयार्थ: शुभोपयोगयुक्त आत्मा तिर्यञ्च, मनुष्य अथवा देव होकर, उतने समम तक विविध इन्द्रियसुख प्राप्त करता है।


सोक्खं सहावसिद्धं णत्थि सुराणं पि सिद्धमुवदेसे ।
ते देहवेदणट्ठा रमंति विसएसु रम्मेसु ॥71॥ ॥71॥

अन्वयार्थ: (जिनेन्द्रदेव के) उपदेश से सिद्ध है कि देवों के भी स्वभावसिद्ध सुख नहीं है; वे (पञ्चेन्द्रियमय) देह की वेदना से पीड़ित होने से रम्य विषयों में रमते हैं।


णरणारयतिरियसुरा भजंति जदि देहसंभवं दुक्खं ।
किह सो सुहो व असुहो उवओगो हवदि जीवाणं ॥72॥ ॥72॥

अन्वयार्थ: मनुष्य, नारकी, तिर्यञ्च और देव (-सभी) यदि देहोत्पन्न दुःख को अनुभव करते हैं, तो जीवों का वह (शुद्धोपयोग से विलक्षण-अशुद्ध) उपयोग शुभ और अशुभ - दो प्रकार का कैसे है? (अर्थात् नहीं है।)


कुलिसाउहचक्कधरा सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं ।
देहादीणं विद्धिं करेंति सुहिदा इवाभिरदा ॥73॥ ॥73॥

अन्वयार्थ: वज्रधर और चक्रधर (इन्द्र और चक्रवर्ती) शुभोपयोगमूलक (पुण्यों के फलरूप) भोगों के द्वारा देहादि की पुष्टि करते हैं और (इस प्रकार) भोगों में रत वर्तते हुए सुखी जैसे भासित होते हैं। (इसलिए पुण्य विद्यमान अवश्य है।)


जदि संति हि पुण्णाणि य परिणामसमुब्भवाणि विविहाणि ।
जणयंति विसयतण्हं जीवाणं देवदंताणं ॥74॥ ॥74॥

अन्वयार्थ: (पूर्वोक्त प्रकार से) यदि (शुभोपयोगरूप) परिणाम से उत्पन्न होनेवाले विविध पुण्य विद्यमान हैं, तो वे देवों तक के जीवों को विषयतृष्णा उत्पन्न करते हैं।


ते पुण उदिण्णतण्हा दुहिदा तण्हाहिं विसयसोक्खाणि ।
इच्छंति अणुभवंति य आमरणं दुक्खसंतत्ता ॥75॥ ॥75॥

अन्वयार्थ: और, जिनकी तृष्णा उदित है - ऐसे वे जीव तृष्णाओं के द्वारा दुःखी होते हुए, मरणपर्यन्त विषयसुखों को चाहते हैं और दुःखों से संतप्त होते हुए ( - दुःखदाह को सहन न करते हुए) उन्हें भोगते हैं।


सपरं बाधासहिदं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं ।
जं इंदिएहिं लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा ॥76॥ ॥76॥

अन्वयार्थ: जो इन्द्रियों से प्राप्त होता है वह सुख परसम्बन्धयुक्त, बाधासहित विच्छिन्न बन्ध का कारण और विषम है; इस प्रकार वह दुःख ही है।


ण हि मण्णदि जो एवं णत्थि विसेसो त्ति पुण्णपावाणं ।
हिंडदि घोरमपारं संसारं मोहसंछण्णो ॥77॥ ॥77॥

अन्वयार्थ: इस प्रकार पुण्य और पाप में अन्तर नहीं है ऐसा जो नहीं मानता, वह मोहाच्छादित होता हुआ घोर अपार संसार में परिभ्रमण करता है।


एवं विदिदत्थो जो दव्वेसु ण रागमेदि दोसं वा ।
उवओगविसुद्धो सो खवेदि देहुब्भवं दुक्खं ॥78॥ ॥78॥

अन्वयार्थ: इस प्रकार वस्तुस्वरूप को जानकर जो द्रव्यों के प्रति राग या द्वेष को प्राप्त नहीं होता, वह उपयोगविशुद्ध होता हुआ देहोत्पन्न दुःख का क्षय करता है।


चत्ता पावारंभं समुट्ठिदो वा सुहम्मि चरियम्मि ।
ण जहदि जदि मोहादी ण लहदि सो अप्पगं सुद्धं ॥79॥ ॥79॥

अन्वयार्थ: पापारम्भ को छोड़कर शुभ चारित्र में उद्यत होने पर भी यदि जीव मोहादि को नहीं छोड़ता, तो वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त नहीं होता।


जो जाणदि अरहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं ।
सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ॥80॥ ॥80॥

अन्वयार्थ: जो अरहन्त को द्रव्यपनें गुणपनें और पर्यायपनें जानता है, वह (अपने) आत्मा को जानता है और उसका मोह अवश्म लय को प्राप्त होता है।


जीवो ववगदमोहो उवलद्धो तच्चमप्पणो सम्मं ।
जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं ॥81॥ ॥81॥

अन्वयार्थ: जिसने मोह को दूर किया है और आत्मा के सम्यक् तत्त्व को (सच्चे स्वरूप को) प्राप्त किया है, ऐसा जीव यदि राग-द्वेष को छोड़ता है, तो वह शुद्ध आत्मा को प्राप्त करता है।


सब्बे वि य अरहंता तेण विधाणेण खविदकम्मंसा ।
किच्चा तधोवदेसं णिव्वादा ते णमो तेसिं ॥82॥ ॥82॥

अन्वयार्थ: सभी अरहन्त भगवान् उसी विधि से कर्मांशों का क्षय करके तथा उसी प्रकार से उपदेश करके मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, उन्हें नमस्कार हो।


दव्वादिएसु मूढो भावो जीवस्स हवदि मोहो त्ति ।
खुब्भदि तेणुच्छण्णो पप्पा रागं व दोसं वा ॥83॥ ॥83॥

अन्वयार्थ: जीव के द्रव्यादि सम्बन्धी मूढ़ भाव ( - द्रव्यगुणपर्यायसम्बन्धी जो मूढ़तारूप परिणाम) वह मोह है उससे आच्छादित वर्तता हुआ जीव राग अथवा द्वेष को प्राप्त करके क्षुब्ध होता है।


मोहेण व रागेण व दोसेण व परिणदस्स जीवस्स ।
जायदि विविहो बंधो तम्हा ते संखवइदव्वा ॥84॥ ॥84॥

अन्वयार्थ: मोहरूप रागरूप अथवा द्वेषरूप परिणमित जीव के विविध बंध होता है; इसलिये वे (मोह-राग-द्वेष) सम्पूर्णतया क्षय करनेयोग्य हैं।


अट्ठे अजधागहणं करुणाभावो य तिरियमणुएसु ।
विसएसु य प्पसंगो मोहस्सेदाणि लिंगाणि ॥85॥ ॥85॥

अन्वयार्थ: पदार्थ का अयथाग्रहण (अर्थात् पदार्थों को जैसे हैं, वैसे सत्यस्वरूप न मानकर उनके विषय में अन्यथा समझ) और तिर्यंच-मनुष्यों के प्रति करुणाभाव, तथा विषयों की संगति (इष्ट विषयों में प्रीति और अनिष्ट विषयों में अप्रीति) - यह सब मोह के चिह्न-लक्षण हैं।


जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा ।
खीयदि मोहोवचयो तम्हा सत्थं समधिदव्वं ॥86॥ ॥86॥

अन्वयार्थ: जिनशास्त्र द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों से पदार्थों को जाननेवाले के नियम से मोहोपचय क्षय हो जाता है, इसलिए शास्त्र का सम्यक् प्रकार से अध्ययन करना चाहिए।


दव्वाणि गुणा तेसिं पज्जाया अट्ठसण्णया भणिया ।
तेसु गुणपज्जयाणं अप्पा दव्व त्ति उवदेसो ॥87॥ ॥87॥

अन्वयार्थ: द्रव्य, गुण और उनकी पर्यायें ‘अर्थ’ नाम से कही गई हैं। उनमें, गुण-पर्यायों का आत्मा द्रव्य है (गुण और पर्यायों का स्वरूप-सत्व द्रव्य ही है, वे भिन्न वस्तु नहीं हैं) इस प्रकार (जिनेन्द्र का) उपदेश है।


जो मोहरागदोसे णिहणदि उवलब्भ जोण्हमुवदेसं ।
सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण ॥88॥ ॥88॥

अन्वयार्थ: जो जिनेन्द्र के उपदेश को प्राप्त करके मोह-राग-द्वेष को हनता है, वह अल्प काल में सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है।


णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं ।
जाणदि जदि णिच्छयदो जो सो मोहक्खयं कुणदि ॥89॥ ॥89॥

अन्वयार्थ: जो निश्चय से ज्ञानात्मक ऐसे अपने को और पर को निज निज द्रव्यत्व से संबद्ध (-संयुक्त) जानता है, वह मोह का क्षय करता है।


तम्हा जिणमग्गादो गुणेहिं आदं परं च दव्वेसु ।
अभिगच्छदु णिम्मोहं इच्छदि जदि अप्पणो अप्पा ॥90॥ ॥90॥

अन्वयार्थ: इसलिए (स्व-पर के विवेक से मोह का क्षय किया जा सकता है इसलिए) यदि आत्मा अपनी निर्मोहता चाहता हो तो जिनमार्ग से गुणों के द्वारा द्रव्यों में स्व और पर को जानो (अर्थात् जिनागम के द्वारा विशेष गुणों से ऐसा विवेक करो कि - अनन्त द्रव्यों में से यह स्व है और यह पर है।)


सत्तासंबद्धेदे सविसेसे जो हि णेव सामण्णे ।
सद्दहदि ण सो समणो तत्तो धम्मो ण संभवदि ॥91॥ ॥91॥

अन्वयार्थ: जो (जीव) श्रमणावस्था में इन सत्तासंयुक्त सविशेष पदार्थों की श्रद्धा नहीं करता, वह श्रमण नहीं है; उससे धर्म का उद्भव नहीं होता (अर्थात् उस श्रमणाभास के धर्म नहीं होता।)


जो णिहदमोहदिट्ठी आगमकुसलो विरागचरियम्हि ।
अब्भुट्ठिदो महप्पा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो ॥92॥ ॥92॥

अन्वयार्थ: जो आगम में कुशल हैं, जिसकी मोहदृष्टि हत हो गई है और जो वीतरागचारित्र में आरूढ़ है, उस महात्मा श्रमण को (शास्त्र में) ‘धर्म’ कहा है।

ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन: द्रव्यसामान्य अधिकार (गाथा 93 से 126)

अत्थो खलु दव्वमओ दव्वाणि गुणप्पगाणि भणिदाणि ।
तेहिं पुणो पज्जाया पज्जयमूढा हि परसमया ॥93॥ ॥93॥

अन्वयार्थ: पदार्थ द्रव्यस्वरूप है; द्रव्य गुणात्मक कहे गये हैं; और द्रव्य तथा गुणों से पर्यायें होती हैं। पर्यायमूढ़ जीव परसमय (अर्थात् मिथ्यादृष्टि) हैं।


जे पज्जएसु णिरदा जीवा परसमइग त्ति णिद्दिठ्ठा ।
आदसहावम्हि ठिदा ते सगसमया मुणेदव्वा ॥94॥ ॥94॥

अन्वयार्थ: जो जीव पर्यायों में लीन हैं उन्हें परसमय कहा गया है जो जीव आत्मस्वभाव में स्थित हैं, वे स्वसमय जानने।


अपरिच्चत्तसहावेणुप्पादव्वयधुवत्तसंबद्धं ।
गुणवं च सपज्जायं जं तं दव्वं ति वुच्चंति ॥95॥ ॥95॥

अन्वयार्थ: स्वभाव को छोड़े बिना जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसंयुक्त है तथा गुणयुक्त और पर्यायसहित है, उसे ‘द्रव्य’ कहते हैं।


सब्भावो हि सहावो गुणेहिं सगपज्जएहिं चित्तेहिं ।
दव्वस्स सव्वकालं उप्पादव्वयधुवत्तेहिं ॥96॥ ॥96॥

अन्वयार्थ: गुण तथा अनेक प्रकार की अपनी पर्यायों से और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से द्रव्य का जो अस्तित्व है, वह वास्तव में स्वभाव है।


इह विविहलक्खणाणं लक्खणमेगं सदित्ति सव्वगयं ।
उवदिसदा खलु धम्मं जिणवरवसहेण पण्णत्तं ॥97॥ ॥97॥

अन्वयार्थ: धर्म का वास्तव में उपदेश करते हुए जिनवरवृषभ ने इस विश्व में विविध लक्षणवाले (भिन्न-भिन्न स्वरूपास्तित्ववाले सर्व) द्रव्यों का ‘सत्’ ऐसा सर्वगत लक्षण (सादृश्यास्तित्व) एक कहा है।


दव्वं सहावसिद्धं सदिति जिणा तच्चदो समक्खादा ।
सिद्धं तध आगमदो णेच्छदि जो सो हि परसमओ ॥98॥ ॥98॥

अन्वयार्थ: द्रव्य स्वभाव से सिद्ध और (स्वभाव से ही) ‘सत्’ है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने यथार्थतः कहा है; इस प्रकार आगम से सिद्ध है; जो इसे नहीं मानता वह वास्तव में परसमय है।


सदवट्ठिदं सहावे दव्वं दव्वस्स जो हि परिणामो ।
अत्थेसु सो सहावो ठिदिसंभवणाससंबद्धो ॥99॥ ॥99॥

अन्वयार्थ: स्वभाव में अवस्थित (होने से) द्रव्य ‘सत्’ है; द्रव्य का जो उत्पादव्ययध्रौव्य सहित परिणाम है, वह पदार्थों का स्वभाव है।


ण भवो भंगविहीणो भंगो वा णत्थि संभवविहीणो ।
उप्पादो वि य भंगो ण विणा धोव्वेण अत्थेण ॥100॥ ॥100॥

अन्वयार्थ: उत्पाद भंग रहित नहीं होता, और भंग बिना उत्पाद के नहीं होता; उत्पाद तथा भंग ध्रौव्य पदार्थ के बिना नहीं होते।


उप्पादट्ठिदिभंगा विज्जंते पज्जएसु पज्जाया ।
दव्वम्हि संति णियदं तम्हा दव्वं हवदि सव्वं ॥101॥ ॥101॥

अन्वयार्थ: उत्पाद, ध्रौव्य और व्यय पर्यायों में वर्तते हैं; पर्यायें नियम से द्रव्य में होती हैं, इसलिए वह सब द्रव्य है।


समवेदं खलु दव्वं संभवठिदिणाससण्णिदट्ठेहिं ।
एक्कम्हि चेव समये तम्हा दव्वं खु तत्तिदयं ॥102॥ ॥102॥

अन्वयार्थ: द्रव्य एक ही समय में उत्पाद, स्थिति और नाश नामक अर्थों के साथ वास्तव में समवेत (एकमेक) है; इसलिए यह त्रितय वास्तव में द्रव्य है।


पाडुब्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जओ वयदि अण्णो ।
दव्वस्स तं पि दव्वं णेव पणट्ठं ण उप्पण्णं ॥103॥ ॥103॥

अन्वयार्थ: द्रव्य की अन्य पर्याय उत्पन्न होती है और कोई अन्य पर्याय नष्ट होती है; फिर भी द्रव्य न तो नष्ट है, न उत्पन्न है (-वह ध्रुव है।)


परिणमदि सयं दव्वं गुणदो य गुणंतरं सदविसिट्ठं ।
तम्हा गुणपज्जाया भणिया पुण दव्वमेव त्ति ॥104॥ ॥104॥

अन्वयार्थ: सत्तापेक्षा से अविशिष्टरूप से, द्रव्य स्वयं ही गुण से गुणान्तररूप परिणमित होता है, (अर्थात् द्रव्य स्वयं ही एक गुणपर्याय में से अन्य गुणपर्यायरूप परिणमित होता है, और उसकी सत्ता गुणपर्यायों की सत्ता के साथ अविशिष्ट-अभिन्न-एक ही रहती है), और उससे गुणपर्यायें द्रव्य ही कही गई हैं।


ण हवदि जदि सद्दव्वं असद्दव्वं हवदि तं कधं दव्वं ।
हवदि पुणो अण्णं वा तम्हा दव्वं सयं सत्ता ॥105॥ ॥105॥

अन्वयार्थ: यदि द्रव्य (स्वरूप से ही) सत् न हो तो - (१) निश्चय से वह असत् होगा; (जो असत् होगा) वह द्रव्य कैसे हो सकता है? अथवा (यदि असत् न हो) तो (२) वह सत्ता से अन्य (पृथक्) हो! (सो भी कैसे हो सकता है?) इसलिए द्रव्य स्वयं ही है।


पविभत्तपदेसत्तं पुधत्तमिदि सासणं हि वीरस्स ।
अण्णत्तमतब्भावो ण तब्भवं होदि कधमेगं ॥106॥ ॥106॥

अन्वयार्थ: विभक्तप्रदेशत्व वह पृथक्त्व है, ऐसा वीर का उपदेश है। अतद्भाव (उसरूप न होना) वह अन्यत्व है। जो उसरूप न हो वह एक कैसे हो सकता है? (कथंचित् सत्ता द्रव्यरूप नहीं है और द्रव्य सत्तारूप नहीं है, इसलिए वे एक नहीं हैं।)


सद्दव्वं सच्च गुणो सच्चेव य पज्जओ त्ति वित्थारो ।
जो खलु तस्स अभावो सो तदभावो अतब्भावो ॥107॥ ॥107॥

अन्वयार्थ: ‘सत् द्रव्य’ ‘सत् गुण’ और ‘सत् पर्याय’ - इस प्रकार (सत्तागुण का) विस्तार है। (उनमें परस्पर) जो ‘उसका अभाव’ अर्थात् ‘उसरूप होने का अभाव’ है वह ‘तद्-अभाव’ अर्थात् अतद्भाव है।


जं दव्वं तं ण गुणो जो वि गुणो सो ण तच्चमत्थादो ।
एसो हि अतब्भावो णेव अभावो त्ति णिद्दिट्ठो ॥108॥ ॥108॥

अन्वयार्थ: स्वरूप अपेक्षा से जो द्रव्य है वह गुण नहीं है, और जो गुण है, यह द्रव्य नहीं है। यह अतद्भाव है; सर्वथा अभाव वह अतद्भाव नहीं है; ऐसा (जिनेन्द्रदेव द्वारा) दर्शाया गया है।


जो खलु दव्वसहावो परिणामो सो गुणो सदविसिट्ठो ।
सदवट्ठिदं सहावे दव्वं ति जिणोवदेसोयं ॥109॥ ॥109॥

अन्वयार्थ: जो द्रव्य का स्वभावभूत (उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक) परिणाम है, वह (परिणाम) ‘सत्’ से अविशिष्ट (सत्ता से अभिन्न है ऐसा) गुण है। ‘स्वभाव में अवस्थित (होने से) द्रव्य सत् है’ - ऐसा जो (९९वीं गाथा में कथित) जिनोपदेश है वही यह है। (अर्थात् ९९वीं गाथा के कथन में से इस गाथा में कथित भाव सहज ही निकलता है।)


णत्थि गुणो त्ति व कोई पज्जाओ त्तीह वा विणा दव्वं ।
दव्वत्तं पुण भावो तम्हा दव्वं सयं सत्ता ॥110॥ ॥110॥

अन्वयार्थ: इस विश्व में गुण ऐसा कुछ या पर्याय ऐसा कुछ द्रव्य के बिना (द्रव्य से पृथक्) नहीं होता; और द्रव्यत्व वह भाव है (अर्थात् अस्तित्व गुण है); इसलिए द्रव्य स्वयं सत्ता (अस्तित्व) है।


एवंविहं सहावे दव्वं दव्वत्थपज्जयत्थेहिं ।
सदसब्भावणिबद्धं पादुब्भावं सदा लभदि ॥111॥ ॥111॥

अन्वयार्थ: ऐसा (पूर्वोक्त) द्रव्य स्वभाव में द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक नयों के द्वारा सद्भावसंबद्ध और असद्भावसंबद्ध उत्पाद को सदा प्राप्त करता है।


जीवो भवं भविस्सदि णरोऽमरो वा परो भवीय पुणो ।
किं दव्वत्तं पजहदि ण जहं अण्णो कहं होदि ॥112॥ ॥112॥

अन्वयार्थ: जीव परिणमित होता हुआ मनुष्य, देव अथवा अन्य (तिर्यंच, नारकी या सिद्ध) होगा, परन्तु मनुष्य देवादि होकर क्या वह द्रव्यत्व को छोड़ देता है? नहीं छोड़ता हुआ वह अन्य कैसे हो सकता है? (अर्थात् वह अन्य नहीं, वह का वही है।)


मणुवो ण होदि देवो देवो वा माणुसो व सिद्धो वा ।
एवं अहोज्जमाणो अणण्णभावं कधं लहदि ॥113॥ ॥113॥

अन्वयार्थ: मनुष्य देव नहीं है, अथवा देव मनुष्य या सिद्ध नहीं है; ऐसा न होता हुआ अनन्यभाव को कैसे प्राप्त हो सकता है?


दव्वट्ठिएण सव्वं दव्वं तं पज्जयट्ठिएण पुणो ।
हवदि य अण्णमणण्णं तक्काले तम्मयत्तादो ॥114॥ ॥114॥

अन्वयार्थ: द्रव्यार्थिक (नय) से सब द्रव्य है; और पर्यायार्थिक (नय) से वह (द्रव्य) अन्य-अन्य है, क्योंकि उस समय तन्मय होने से (द्रव्य पर्यायों से) अनन्य है।


अत्थि त्ति य णत्थि त्ति य हवदि अवत्तव्वमिदि पुणो दव्वं ।
पज्जाएण दु केण वि तदुभयमादिट्ठमण्णं वा ॥115॥ ॥115॥

अन्वयार्थ: द्रव्य किसी पर्याय से ‘अस्ति’, किसी पर्याय से ‘नास्ति’ और किसी पर्याय से ‘अवक्तव्य’ है, और किसी पर्याय से ‘अस्ति-नास्ति’ अथवा किसी पर्याय से अन्य तीन भंगरूप कहा गया है।


एसो त्ति णत्थि कोई ण णत्थि किरिया सहावणिव्वत्ता ।
किरिया हि णत्थि अफला धम्मो जदि णिष्फलो परमो ॥116॥ ॥116॥

अन्वयार्थ: (मनुष्यादिपर्यायों में) ‘यदि’ ऐसी कोई (शाश्वत पर्याय) नहीं हैं; (क्योंकि संसारी जीव के) स्वभाव निष्पन्न क्रिया नहीं हो सो बात नहीं है; (अर्थात् विभावस्वभाव से उत्पन्न होनेवाली राग-द्वेषमय क्रिया अवश्य है।) और यदि परमधर्म अफल है तो क्रिया अवश्य अफल नहीं है; (अर्थात् एक वीतराग भाव ही मनुष्यादिपर्यायरूप फल उत्पन्न नहीं करती; राग-द्वेषमय क्रिया तो अवश्य वह फल उत्पन्न करती है।)


कम्मं णामसमक्खं सभावमध अप्पणो सहावेण ।
अभिभूयं णरं तिरियं णेरइयं वा सुरं कुणदि ॥117॥ ॥117॥

अन्वयार्थ: वहाँ ‘नाम’ संज्ञावाला कर्म अपने स्वभाव से जीव के स्वभाव का पराभव करके, मनुष्य, तिर्यञ्च, नारक अथवा देव (इन पर्यायों को) करता है।


णरणारयतिरियसुरा जीवा खलु णामकम्मणिव्वत्ता ।
ण हि ते लद्धसहावा परिणममाणा सकम्माणि ॥118॥ ॥118॥

अन्वयार्थ: मनुष्य, नारक, तिर्यंच और देवरूप जीव वास्तव में नामकर्म से निष्पन्न हैं। वास्तव में वे अपने कर्मरूप से परिणमित होते हैं, इसलिए उन्हें स्वभाव की उपलब्धि नहीं है।


जायदि णेव ण णस्सदि खणभंगसमुब्भवे जणे कोई ।
जो हि भवो सो विलओ संभवविलय त्ति ते णाणा ॥119॥ ॥119॥

अन्वयार्थ: प्रतिक्षण उत्पाद और विनाशवाले जीव लोक में कोई उत्पन्न नहीं होता और न नष्ट होता है; क्योंकि जो उत्पाद है, वही विनाश है; और उत्पाद तथा विनाश, इस प्रकार वे अनेक (भिन्न) भी हैं।


तम्हा दु णत्थि कोई सहावसमवट्ठिदो त्ति संसारे ।
संसारो पुण किरिया संसरमाणस्स दव्वस्स ॥120॥ ॥120॥

अन्वयार्थ: इसलिए संसार में स्वभाव से अवस्थित ऐसा कोई नहीं है; (अर्थात् संसार में किसी का स्वभाव केवल एकरूप रहनेवाला नहीं है); और संसार तो संसरण करते हुये (गोल फिरते हुये, परिवर्तित होते हुये) द्रव्य की क्रिया है।


आदा कम्ममलिमसो परिणामं लहदि कम्मसंजुत्तं ।
तत्तो सिलिसदि कम्मं तम्हा कम्मं तु परिणामो ॥121॥ ॥121॥

अन्वयार्थ: कर्म से मलिन आत्मा कर्मसंयुक्त परिणाम को (द्रव्यकर्म के संयोग से होनेवाले अशुद्ध परिणाम को) प्राप्त करता है, उससे कर्म चिपक जाता है (द्रव्यकर्म का बन्ध होता है); इसलिए परिणाम, वह कर्म है।


परिणामो सयमादा सा पुण किरिय त्ति होदि जीवमया ।
किरिया कम्म त्ति मदा तम्हा कम्मस्स ण दु कत्ता ॥122॥ ॥122॥

अन्वयार्थ: परिणाम स्वयं आत्मा है, और वह जीवमय क्रिया है; क्रिया को कर्म माना गया है; इसलिए आत्मा द्रव्यकर्म का कर्ता तो नहीं है।


परिणमदि चेदणाए आदा पुण चेदणा तिधाभिमदा ।
सा पुण णाणे कम्मे फलम्मि वा कम्मणो भणिदा ॥123॥ ॥123॥

अन्वयार्थ: आत्मा चेतनारूप से परिणमित होता है। और चेतना तीन प्रकार से मानी गयी है; और वह ज्ञानसंबंधी, कर्मसंबंधी अथवा कर्मफल संबंधी - ऐसी कही गयी है।


णाणं अट्ठवियप्पो कम्मं जीवेण जं समारद्धं ।
तमणेगविधं भणिदं फलं ति सोक्खं व दुक्खं वा ॥124॥ ॥124॥

अन्वयार्थ: अर्थविकल्प (अर्थात् स्व-पर पदार्थों का भिन्नतापूर्वक युगपत् अवभासन) वह ज्ञान है; जीव के द्वारा जो किया जा रहा हो वह कर्म है, वह अनेक प्रकार का है; सुख अथवा दुःख वह कर्मफल कहा गया है।


अप्पा परिणामप्पा परिणामो णाणकम्मफलभावी ।
तम्हा णाणं कम्मं फलं च आदा मुणेदव्वो ॥125॥ ॥125॥

अन्वयार्थ: आत्मा परिणामात्मक है; परिणाम ज्ञानरूप, कर्मरूप और कर्मफलरूप होता है; इसलिए ज्ञान, कर्म और कर्मफल आत्मा है - ऐसा समझना।


कत्ता करणं कम्मं फलं च अप्प त्ति णिच्छिदो समणो ।
परिणमदि णेव अण्णं जदि अप्पाणं लहदि सुद्धं ॥126॥ ॥126॥

अन्वयार्थ: यदि श्रमण ‘कर्ता, करण, कर्म और कर्मफल आत्मा है’ ऐसा निश्चयवाला होता हुआ अन्यरूप परिणमित ही नहीं हो, तो वह शुद्ध आत्मा को उपलब्ध करता है।

ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन: द्रव्यविशेष अधिकार (गाथा 127 से 144)

दव्वं जीवमजीवं जीवो पुण चेदणोवओगमओ ।
पोग्गलदव्वप्पमुहं अचेदणं हवदि य अजीवं ॥127॥ ॥127॥

अन्वयार्थ: द्रव्य जीव और अजीव है। उसमें चेतनामय तथा उपयोगमय सो जीव है, और पुद्गलद्रव्यादिक अचेतन द्रव्य वे अजीव हैं।


पोग्गलजीवणिबद्धो धम्माधम्मत्थिकायकालड्ढो ।
वट्टदि आगासे जो लोगो सो सव्वकाले दु ॥128॥ ॥128॥

अन्वयार्थ: आकाश में जो भाग जीव और पुद्गल से संयुक्त तथा धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय और काल से समृद्ध है, वह सर्व काल में लोक है। (शेष केवल आकाश वह अलोक है।)


उप्पादट्ठिदिभंगा पोग्गलजीवप्पगस्स लोगस्स ।
परिणामा जायंते संघादादो व भेदादो ॥129॥ ॥129॥

अन्वयार्थ: पुद्गल-जीवात्मक लोक के परिणमन से और संघात (मिलने) और भेद (पृथक् होने) से उत्पाद, ध्रौव्य और व्यय होते हैं।


लिंगेहिं जेहिं दव्वं जीवमजीवं च हवदि विण्णादं ।
तेऽतब्भावविसिट्ठा मुत्तामुत्ता गुणा णेया ॥130॥ ॥130॥

अन्वयार्थ: जिन लिङ्गों से द्रव्य जीव और अजीव के रूप में ज्ञात होता है, वे अतद्भाव विशिष्ट (द्रव्य से अतद्भाव के द्वारा भिन्न ऐसे) मूर्त-अमूर्त गुण जानने चाहिए।


मुत्ता इंदियगेज्झा पोग्गलदव्वप्पगा अणेगविधा ।
दव्वाणममुत्ताणं गुणा अमुत्ता मुणेदव्वा ॥131॥ ॥131॥

अन्वयार्थ: इन्द्रियग्राह्य ऐसे मूर्तगुण पुद्गलद्रव्यात्मक अनेक प्रकार के हैं; अमूर्त द्रव्यों के गुण अमूर्त जानना चाहिए।


वण्णरसगंधफासा विज्जंते पोग्गलस्स सुहुमादो ।
पुढवापरियंतस्स य सद्दो सो पोग्गलो चित्तो ॥132॥ ॥132॥

अन्वयार्थ: वर्ण, रस, गन्ध, और स्पर्श (गुण) सूक्ष्म से लेकर पृथ्वी पर्यन्त के (सर्व) पुद्गल के होते हैं; जो विविध प्रकार का शब्द है वह पुद्गल अर्थात् पौद्गलिक पर्याय है।


आगासस्सवगाहो धम्मद्दव्वस्स गमणहेदुत्तं ।
धम्मेदरदव्वस्स दु गुणो पुणो ठाणकारणदा ॥133॥ ॥133॥

अन्वयार्थ: आकाश का अवगाह, धर्मद्रव्य का गमनहेतुत्व और अधर्म द्रव्य का गुण स्थानकारणता है। काल का गुण वर्तना है, आत्मा का गुण उपयोग कहा है। इस प्रकार अमूर्त द्रव्यों के गुण संक्षेप से जानना चाहिए।


कालस्स वट्टणा से गुणोवओगो त्ति अप्पणो भणिदो ।
णेया संखेवादो गुणा हि मुत्तिप्पहीणाणं ॥134॥ ॥134॥

अन्वयार्थ: आकाश का अवगाह, धर्मद्रव्य का गमनहेतुत्व और अधर्म द्रव्य का गुण स्थानकारणता है। काल का गुण वर्तना है, आत्मा का गुण उपयोग कहा है। इस प्रकार अमूर्त द्रव्यों के गुण संक्षेप से जानना चाहिए।


जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा पुणो य आगासं ।
सपदेसेहिं असंखा णत्थि पदेस त्ति कालस्स ॥135॥ ॥135॥

अन्वयार्थ: जीव पुद्गलकाय, धर्म, अधर्म और आकाश स्व प्रदेशों की अपेक्षा से असंख्यात अर्थात् अनेक हैं; काल के प्रदेश नहीं हैं।


लोगालोगेसु णभो धम्माधम्मेहिं आददो लोगो ।
सेसे पडुच्च कालो जीवा पुण पोग्गला सेसा ॥136॥ ॥136॥

अन्वयार्थ: आकाश लोकालोक में है, लोक धर्म और अधर्म से व्याप्त है, शेष दो द्रव्यों का आश्रय लेकर काल है, और शेष दो द्रव्य जीव और पुद्गल हैं।


जध ते णभप्पदेसा तधप्पदेसा हवंति सेसाणं ।
अपदेसो परमाणू तेण पदेसुब्भवो भणिदो ॥137॥ ॥137॥

अन्वयार्थ: जैसे वे आकाशप्रदेश हैं, उसी प्रकार शेष द्रव्यों के प्रदेश हैं (अर्थात् जैसे, आकाश के प्रदेश परमाणुरूपी गज से नापे जाते हैं, उसी प्रकार शेष द्रव्यों के प्रदेश भी इसी प्रकार नापे जाते हैं)। परमाणु अप्रदेशी हैं; उसके द्वारा प्रदेशोद्भव कहा है।


समओ दु अप्पदेसो पदेसमेत्तस्स दव्वजादस्स ।
वदिवददो सो वट्टदि पदेसमागासदव्वस्स ॥138॥ ॥138॥

अन्वयार्थ: काल तो अप्रदेशी है, प्रदेशमात्र पुद्गल-परमाणु आकाशद्रव्य के प्रदेश को मन्दगति से उल्लंघन कर रहा हो तब वह वर्तता है अर्थात् निमित्तभूततया परिणमित होता है।


वदिवददो तं देसं तस्सम समओ तदो परो पुव्वो ।
जो अत्थो सो कालो समओ उप्पण्णपद्धंसी ॥139॥ ॥139॥

अन्वयार्थ: परमाणु एक आकाश प्रदेश का (मन्दगति से) उल्लंघन करता है तब उसके बराबर जो काल (लगता है) वह ‘समय’ है; उस (समय) से पूर्व तथा पश्चात् ऐसा (नित्य) जो पदार्थ है वह कालद्रव्य है; ‘समय’ उत्पन्नध्वंसी है।


आगासमणुणिविट्ठं आगासपदेससण्णया भणिदं ।
सव्वेसिं च अणूणं सक्कदि तं देदुमवगासं ॥140॥ ॥140॥

अन्वयार्थ: एक परमाणु जितने आकाश में रहता है उतने आकाश को ‘आकाशप्रदेश’ ऐसे नाम से कहा गया है। और वह समस्त परमाणुओं को अवकाश देने को समर्थ है।


एक्को व दुगे बहुगा संखातीदा तदो अणंता य ।
दव्वाणं च पदेसा संति हि समय त्ति कालस्स ॥141॥ ॥141॥

अन्वयार्थ: द्रव्यों के एक, दो, बहुत से, असंख्य, अथवा अनन्त प्रदेश हैं। काल के ‘समय’ हैं।


उप्पादो पद्धंसो विज्जदि जदि जस्स एगसमयम्हि ।
समयस्स सो वि समओ सभावसमवट्ठिदो हवदि ॥142॥ ॥142॥

अन्वयार्थ: यदि काल का एक समय में उत्पाद और विनाश पाया जाता है, तो वह भी काल स्वभाव में अवस्थित अर्थात् ध्रुव (सिद्ध) है।


एगम्हि संति समये संभवठिदिणाससण्णिदा अट्ठा ।
समयस्स सव्वकालं एस हि कालाणुसब्भावो ॥143॥ ॥143॥

अन्वयार्थ: एक-एक समय में उत्पाद, ध्रौव्य और व्यय नामक अर्थ काल के सदा होते हैं। यही कालाणु का सद्भाव है; (यही कालाणु के अस्तित्व की सिद्धि है।)


जस्स ण संति पदेसा पदेसमेत्तं व तच्चदो णादुं ।
सुण्णं जाण तमत्थं अत्थंतरभूदमत्थीदो ॥144॥ ॥144॥

अन्वयार्थ: जिस पदार्थ के प्रदेश अथवा एकप्रदेश भी परमार्थतः ज्ञात नहीं होते, उस पदार्थ को शून्य जानो - जो कि अस्तित्व से अर्थान्तरभूत (अन्य) है।

ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन: ज्ञानज्ञेयविभाग अधिकार (गाथा 145 से 200)

सपदेसेहिं समग्गो लोगो अट्ठेहिं णिट्ठिदो णिच्चो ।
जो तं जाणदि जीवो पाणचदुक्काभिसंबद्धो ॥145॥ ॥145॥

अन्वयार्थ: सप्रदेश पदार्थों के द्वारा समाप्ति को प्राप्त सम्पूर्ण लोक नित्य है, उसे जो जानता है वह जीव है, - जो कि (संसार दशा में) चार प्राणों से संयुक्त है।


इंदियपाणो य तधा बलपाणो तह य आउपाणो य ।
आणप्पाणप्पाणो जीवाणं होंति पाणा ते ॥146॥ ॥146॥

अन्वयार्थ: इन्द्रिय प्राण बल प्राण, आयुप्राण और श्वासोच्छ्वास प्राण; ये (चार) जीवों के प्राण हैं।


पाणेहिं चदुहिं जीवदि जीविस्सदि जो हि जीविदो पुव्वं ।
सो जीवो पाणा पुण पोग्गलदव्वेहिं णिव्वत्ता ॥147॥ ॥147॥

अन्वयार्थ: जो चार प्राणों से, जीता है, जियेगा और पहले जीता था, वह जीव है। फिर भी प्राण तो पुद्गल द्रव्यों से निष्पन्न (रचित) हैं।


जीवो पाणणिबद्धो बद्धो मोहादिएहिं कम्मेहिं ।
उवभुंजं कम्मफलं बज्झदि अण्णेहिं कम्मेहिं ॥148॥ ॥148॥

अन्वयार्थ: मोहादिक कर्मों से बँधा हुआ होने से जीव प्राणों से संयुक्त होता हुआ कर्मफल को भोगता हुआ अन्य कर्मों से बँधता है।


पाणाबाधं जीवो मोहपदेसेहिं कुणदि जीवाणं ।
जदि सो हवदि हि बंधो णाणावरणादिकम्मेहिं ॥149॥ ॥149॥

अन्वयार्थ: यदि जीव मोह और द्वेष के द्वारा जीवों के (स्वजीव के तथा परजीव के) प्राणों को बाधा पहुँचाते हैं, तो पूर्वकथित ज्ञानावरणादिक कर्मों के द्वारा बंध होता है।


आदा कम्ममलिमसो धरेदि पाणे पुणो पुणो अण्णे ।
ण चयदि जाव ममत्तिं देहपधाणेसु विसयेसु ॥150॥ ॥150॥

अन्वयार्थ: जब तक देहप्रधान विषयों में ममत्व को नहीं छोड़ता, तब तक कर्म से मलिन आत्मा पुनः-पुनः अन्य-अन्य प्राणों को धारण करता है।


जो इंदियादिविजई भवीय उवओगमप्पगं झादि ।
कम्मेहिं सो ण रज्जदि किह तं पाणा अणुचरंति ॥151॥ ॥151॥

अन्वयार्थ: जो इन्द्रियादि का विजयी होकर उपयोगमात्र आत्मा का ध्यान करता है, वह अन्य कर्मों द्वारा रंजित नहीं होता; उसे प्राण कैसे अनुसरेंगे ? (अर्थात् उसके प्राणों का सम्बन्ध नहीं होता।)


अत्थित्तणिच्छिदस्स हि अत्थस्सत्थंतरम्हि संभूदो ।
अत्थो पज्जाओ सो संठाणादिप्पभेदेहिं ॥152॥ ॥152॥

अन्वयार्थ: अस्तित्व से निश्चित अर्थ का (द्रव्य का) अन्य अर्थ में (द्रव्य में) उत्पन्न जो अर्थ (भाव) वह पर्याय है - कि जो संस्थानादि भेदों सहित होती है।


णरणारयतिरियसुरा संठाणादीहिं अण्णहा जादा ।
पज्जाया जीवाणं उदयादिहिं णामकम्मस्स ॥153॥ ॥153॥

अन्वयार्थ: मनुष्य, नारक, तिर्यंच, और देव - ये नामकर्म के उदयादिक के कारण जीवों की पर्यायें हैं - जो कि संस्थानादि के द्वारा अन्य-अन्य प्रकार की होती हैं।


तं सब्भावणिबद्धं दव्वसहावं तिहा समक्खादं ।
जाणदि जो सवियप्पं ण मुहदि सो अण्णदवियम्हि ॥154॥ ॥154॥

अन्वयार्थ: जो जीव उस (पूर्वोक्त) अस्तित्व -निष्पन्न, तीन प्रकार से कथित, भेदोंवाले द्रव्य-स्वभाव को जानता है, वह अन्य द्रव्य में मोह को प्राप्त नहीं होता।


अप्पा उवओगप्पा उवओगो णाणदंसणं भणिदो ।
सो वि सुहो असुहो वा उवओगो अप्पणो हवदि ॥155॥ ॥155॥

अन्वयार्थ: आत्मा उपयोगात्मक है; उपयोग ज्ञान - दर्शन कहा गया है; और आत्मा का वह उपयोग शुभ अथवा अशुभ होता है।


उवओगो जदि हि सुहो पुण्णं जीवस्स संचयं जादि ।
असुहो वा तध पावं तेसिमभावे ण चयमत्थि ॥156॥ ॥156॥

अन्वयार्थ: आत्मा उपयोगात्मक है; उपयोग ज्ञान-दर्शन कहा गया है; और आत्मा का वह उपयोग शुभ अथवा अशुभ होता है।

उपयोग यदि शुभ हो तो जीव के पुण्य संचय को प्राप्त होता है और यदि अशुभ हो तो पाप संचय होता है। उनके (दोनों के) अभाव में संचय नहीं होता।


जो जाणादि जिणिंदे पेच्छदि सिद्धे तहेव अणगारे ।
जीवेसु साणुकंपो उवओगो सो सुहो तस्स ॥157॥ ॥157॥

अन्वयार्थ: जिनेन्द्रों को जानता है, सिद्धों तथा अनागारों की (आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधुओं की) श्रद्धा करता है, और जीवों के प्रति अनुकम्पायुक्त है, उसके वह शुभ उपयोग है।


विसयकसाओगाढो दुस्सुदिदुच्चित्तदुट्ठगोट्ठिजुदो ।
उग्गो उम्मग्गपरो उवओगो जस्स सो असुहो ॥158॥ ॥158॥

अन्वयार्थ: जिसका उपयोग विषय-कषाय में अवगाढ़ (मग्न) है, कुश्रुति, कुविचार और कुसंगति में लगा हुआ है, उग्र है तथा उन्मार्ग में लगा हुआ है, उसका वह अशुभोपयोग है।


असुहोवओगरहिदो सुहोवजुत्तो ण अण्णदवियम्हि ।
होज्जं मज्झत्थोऽहं णाणप्पगमप्पगं झाए ॥159॥ ॥159॥

अन्वयार्थ: अन्य द्रव्य में मध्यस्थ होता हुआ मैं अशुभोपयोग रहित होता हुआ तथा शुभोपयुक्त नहीं होता हुआ ज्ञानात्मक आत्मा को ध्याता हूँ।


णाहं देहो ण मणो ण चेव वाणी ण कारणं तेसिं ।
कत्ता ण ण कारयिदा अणुमंता णेव कत्तीणं ॥160॥ ॥160॥

अन्वयार्थ: मैं न देह हूँ, न मन हूँ, और न वाणी हूँ; उनका कारण नहीं हूँ कर्ता नहीं हूँ, करानेवाला नहीं हूँ; (और) कर्ता का अनुमोदक नहीं हूँ।


देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिद्दिट्ठा ।
पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदव्वाणं ॥161॥ ॥161॥

अन्वयार्थ: देह, मन और वाणी पुद्गलद्रव्यात्मक हैं, ऐसा (वीतरागदेव ने) कहा है और वे पुद्गलद्रव्य परमाणुद्रव्यों का पिण्ड है।


णाहं पोग्गलमइओ ण ते मया पोग्गला कया पिंडं ।
तम्हा हि ण देहोऽहं कत्ता वा तस्स देहस्स ॥162॥ ॥162॥

अन्वयार्थ: मैं पुद्गलमय नहीं हूँ और वे पुद्गल मेरे द्वारा पिण्डरूप नहीं किये गये हैं, इसलिए मैं देह नहीं हूँ, तथा उस देह का कर्ता नहीं हूँ।


अपदेसो परमाणू पदेसमेत्तो य सयमसद्दो जो ।
णिद्धो वा लुक्खो वा दुपदेसादित्तमणुभवदि ॥163॥ ॥163॥

अन्वयार्थ: परमाणु जो कि अप्रदेश है, प्रदेशमात्र है और स्वयं अशब्द है, वह स्निग्ध अथवा रूक्ष होता हुआ द्विप्रदेशादिपने का अनुभव करता है।


एगुत्तरमेगादी अणुस्स णिद्धत्तणं च लुक्खत्तं ।
परिणामादो भणिदं जाव अणंतत्तमणुभवदि ॥164॥ ॥164॥

अन्वयार्थ: परमाणु के परिणमन के कारण एक से (एक अविभाग प्रतिच्छेद से) लेकर एक-एक बढ़ते हुए जब तक अनन्तपने को (अनन्त अविभागी प्रतिच्छेदपने को) प्राप्त हो तब तक स्निगधत्व अथवा रूक्षत्व होता है ऐसा (जिनेन्द्र देव ने) कहा है।


णिद्धा वा लुक्खा वा अणुपरिणामा समा व विसमा वा ।
समदो दुराधिगा जदि बज्झंति हि आदिपरिहीणा ॥165॥ ॥165॥

अन्वयार्थ: परमाणु-परिणाम, स्निग्ध हों या रूक्ष हों सम अंशवाले हों या विषम अंशवाले हों यदि समान से दो अधिक अंशवाले हों तो बँधते हैं, जघन्यांशवाले नहीं बँधते।


णिद्धत्तणेण दुगुणो चदुगुणणिद्धेण बंधमणुभवदि ।
लुक्खेण वा तिगुणिदो अणु बज्झदि पंचगुणजुत्तो ॥166॥ ॥166॥

अन्वयार्थ: स्निग्धरूप से दो अंशवाला परमाणु चार अंशवाले स्निग्ध (अथवा रूक्ष) परमाणु के साथ बंध का अनुभव करता है। अथवा रूक्षरूप से तीन अंशवाला परमाणु पाँच अंशवाले के साथ युक्त होता हुआ बँधता है।


दुपदेसादी खंधा सुहुमा वा बादरा ससंठाणा ।
पुढविजलतेउवाऊ सगपरिणामेहिं जायंते ॥167॥ ॥167॥

अन्वयार्थ: द्विप्रदेशादिक (दो से लेकर अनन्त प्रदेशवाले) स्कंध जो कि सूक्ष्म अथवा बादर होते हैं और संस्थानों (आकारों) सहित होते हैं वे - पृथ्वी, जल, तेज और वायुरूप अपने परिणामों से होते हैं।


ओगाढगाढणिचिदो पोग्गलकायेहिं सव्वदो लोगो ।
सुहुमेहि बादरेहि य अप्पाओग्गेहिं जोग्गेहिं ॥168॥ ॥168॥

अन्वयार्थ: लोक सर्वतः सूक्ष्म तथा बादर और कर्मत्व के अयोग्य तथा कर्मत्व के योग्य पुद्गल स्कन्धों के द्वारा (विशिष्ट प्रकार से) अवगाहित होकर गाढ़ (-घनिष्ट) भरा हुआ है।


कम्मत्तणपाओग्गा खंधा जीवस्स परिणइं पप्पा ।
गच्छंति कम्मभावं ण हि ते जीवेण परिणमिदा ॥169॥ ॥169॥

अन्वयार्थ: कर्मत्व के योग्य स्कंध जीव की परिणति को प्राप्त करके कर्मभाव को प्राप्त होते हैं; जीव उनको नहीं परिणमाता।


ते ते कम्मत्तगदा पोग्गलकाया पुणो वि जीवस्स ।
संजायंते देहा देहंतरसंकमं पप्पा ॥170॥ ॥170॥

अन्वयार्थ: कर्मरूप परिणत वे-वे पुद्गलपिण्ड देहान्तररूप परिवर्तन को प्राप्त करके पुनः पुनः जीव के शरीर होते हैं।


ओरालिओ य देहो देहो वेउव्विओ य तेजसिओ ।
आहारय कम्मइओ पोग्गलदव्वप्पगा सव्वे ॥171॥ ॥171॥

अन्वयार्थ: औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, तैजस शरीर, आहारक शरीर और कार्मण शरीर - सब पुद्गलद्रव्यात्मक हैं।


अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं ।
जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ॥172॥ ॥172॥

अन्वयार्थ: जीव को अरस, अरूप अगंध, अव्यक्त, चेतनागुणयुक्त, अशब्द, अलिंगग्रहण (लिंग द्वारा ग्रहण न होने योग्य) और जिसका कोई संस्थान नहीं कहा गया है, ऐसा जानो।


मुत्तो रूवादिगुणो बज्झदि फासेहिं अण्णमण्णेहिं ।
तव्विवरीदो अप्पा बज्झदि किध पोग्गलं कम्मं ॥173॥ ॥173॥

अन्वयार्थ: मूर्त (ऐसे पुद्गल) तो रूपादिगुणयुक्त होने से परस्पर (बन्धयोग्य) स्पर्शों से बँधते हैं; (परन्तु) उससे विपरीत (अमूर्त) ऐसा आत्मा पौद्गलिक कर्म को कैसे बाँधता है?


रूवादिएहिं रहिदो पेच्छदि जाणादि रूवमादीणि ।
दव्वाणि गुणे य जधा तह बंधो तेण जाणीहि ॥174॥ ॥174॥

अन्वयार्थ: जैसे रूपादिरहित (जीव) रूपादि को - द्रव्यों को तथा गुणों को (रूपी द्रव्यों को और उनके गुणों को) - देखता है और जानता है उसी प्रकार उसके साथ (अरूपी का रूपी के साथ) बन्ध जानो।


उवओगमओ जीवो मुज्झदि रज्जेदि वा पदुस्सेदि ।
पप्पा विविधे विसये जो हि पुणो तेहिं सो बंधो ॥175॥ ॥175॥

अन्वयार्थ: जो उपयोगमय जीव विविध विषयों को प्राप्त करके मोह करता है, राग करता है, अथवा द्वेष करता है, वह जीव उनके द्वारा (मोह-राग-द्वेष के द्वारा) बन्धरूप है।


भावेण जेण जीवो पेच्छदि जाणादि आगदं विसये ।
रज्जदि तेणेव पुणो बज्झदि कम्म त्ति उवदेसो ॥176॥ ॥176॥

अन्वयार्थ: जीव जिस भाव से विषयागत पदार्थ को देखता है और जानता है, उसी से उपरक्त होता है; और उसी से कर्म बँधता है - ऐसा उपदेश है।


फासेहिं पोग्गलाणं बंधो जीवस्स रागमादीहिं ।
अण्णोण्णमवगाहो पोग्गलजीवप्पगो भणिदो ॥177॥ ॥177॥

अन्वयार्थ: स्पर्शों के साथ पुद्गलों का बन्ध, रागादि के साथ जीव का बन्ध और अन्योन्य अवगाह वह पुद्गलजीवात्मक बन्ध कहा गया है।


सपदेसो सो अप्पा तेसु पदेसेसु पोग्गला काया ।
पविसंति जहाजोग्गं चिट्ठंति य जंति बज्झंति ॥178॥ ॥178॥

अन्वयार्थ: वह आत्मा सप्रदेश है; उन प्रदेशों में पुद्गलसमूह प्रवेश करते हैं, यथायोग्य रहते हैं, जाते हैं, और बँधते हैं।


रत्तो बंधदि कम्मं मुच्चदिकम्मेहिं रागरहिदप्पा ।
एसो बंधसमासो जीवाणं जाण णिच्छयदो ॥179॥ ॥179॥

अन्वयार्थ: रागी आत्मा कर्म बाँधता है, रागरहित आत्मा कर्मों से मुक्त होता है - यह जीवों के बन्ध का संक्षेप निश्चय से जानो।


परिणामादो बंधो परिणामो रागदोसमोहजुदो ।
असुहो मोहपदोसो सुहो व असुहो हवदि रागो ॥180॥ ॥180॥

अन्वयार्थ: परिणाम से बन्ध है, (जो) परिणाम राग-द्वेष-मोहयुक्त है। (उनमें से) मोह और द्वेष अशुभ है, राग शुभ अथवा अशुभ होता है।


सुहपरिणामो पुण्णं असुहो पावं ति भणिदमण्णेसु ।
परिणामो णण्णगदो दुक्खक्खयकारणं समये ॥181॥ ॥181॥

अन्वयार्थ: पर के प्रति शुभ परिणाम पुण्य है, और अशुभ परिणाम पाप है, ऐसा कहा है; जो दूसरे के प्रति प्रवर्तमान नहीं है - ऐसा परिणाम समय पर दु:खक्षय का कारण है।


भणिदा पुढविप्पमुहा जीवणिकायाध थावरा य तसा ।
अण्णा ते जीवादो जीवो वि य तेहिंदो अण्णो ॥182॥ ॥182॥

अन्वयार्थ: अब स्थावर और त्रस ऐसे जो पृथ्वी आदि, जीवनिकाय कहे गये हैं, वे जीव से अन्य हैं, और जीव भी उनसे अन्य है।


जो णवि जाणदि एवं परमप्पाणं सहावमासेज्ज ।
कीरदि अज्झवसाणं अहं ममेदं ति मोहादो ॥183॥ ॥183॥

अन्वयार्थ: जो इस प्रकार स्वभाव को प्राप्त करके (जीव - पुद्गल के स्वभाव को निश्चित करके) पर को और स्व को नहीं जानता, वह मोह से ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस प्रकार अध्यवसान करता है।


कुव्वं सभावमादा हवदि हि कत्ता सगस्स भावस्स ।
पोग्गलदव्वमयाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ॥184॥ ॥184॥

अन्वयार्थ: अपने भाव को करता हुआ आत्मा वास्तव में अपने भाव का कर्ता है; परन्तु पुद्गलद्रव्यमय सर्व भावों का कर्ता नहीं है।


गेण्हदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि ।
जीवो पोग्गलमज्झे वट्टण्णवि सव्वकालेसु ॥185॥ ॥185॥

अन्वयार्थ: जीव सभी कालों में पुद्गल के मध्य में रहता हुआ भी पौद्गलिक कर्मों को वास्तव में न तो ग्रहण करता है, न छोड़ता है, और न करता है।


स इदाणिं कत्ता सं सगपरिणामस्स दव्वजादस्स ।
आदीयदे कदाइं विमुच्चदे कम्मधूलीहिं ॥186॥ ॥186॥

अन्वयार्थ: वह अभी (संसारावस्था में) द्रव्य से (आत्मद्रव्य से) उत्पन्न होनेवाले (अशुद्ध) स्वपरिणाम का कर्ता होता हुआ कर्मरज से ग्रहण किया जाता है और कदाचित् छोड़ा जाता है।


परिणमदि जदा अप्पा सुहम्हि असुहम्हि रागदोसजुदो ।
तं पविसदि कम्मरयं णाणावरणादिभावेहिं ॥187॥ ॥187॥

अन्वयार्थ: जब आत्मा रागद्वेषयुक्त होता हुआ शुभ और अशुभ में परिणमित होता है, तब कर्मरज ज्ञानावरणादिरूप से उसमें प्रवेश करती है।


सपदेसो सो अप्पा कसायिदो मोहरागदोसेहिं ।
कम्मरजेहिं सिलिट्ठो बंधो त्ति परूविदो समये ॥188॥ ॥188॥

अन्वयार्थ: प्रदेशयुक्त वह आत्मा यथा काल मोह-राग-द्वेष के द्वारा कषायित होने से कर्मरज से लिप्त या बद्ध होता हुआ ‘बन्ध’ कहा गया है।


एसो बंधसमासो जीवाणं णिच्छयेण णिद्दिट्ठो ।
अरहंतेहिं जदीणं ववहारो अण्णहा भणिदो ॥189॥ ॥189॥

अन्वयार्थ: यह (पूर्वोक्त प्रकार से), जीवों के बन्ध का संक्षेप निश्चय से अरहन्त भगवान् ने यतियों से कहा है; व्यवहार अन्य प्रकार से कहा है।


ण चयदि जो दु ममत्तिं अहं ममेदं ति देहदविणेसु ।
सो सामण्णं चत्ता पडिवण्णो होदि उम्मग्गं ॥190॥ ॥190॥

अन्वयार्थ: जो देह-धनादिक में ‘मैं यह हूँ और यह मेरा है’ ऐसी ममता को नहीं छोड़ता, वह श्रमणता को छोड़कर उन्मार्ग का आश्रय लेता है।


णाहं होमि परेसिं ण मे पेरे संति णाणमहमेक्को ।
इदि जो झायदि झाणे सो अप्पा णं हवदि झादा ॥191॥ ॥191॥

अन्वयार्थ: मैं पर का नहीं हूँ, पर मेरे नहीं हैं, मैं एक ज्ञान हूँ’ इस प्रकार जो ध्यान करता है, वह ध्याता ध्यानकाल में आत्मा अर्थात् शुद्धात्मा होता है।


एवं णाणप्पाणं दंसणभूदं अदिंदियमहत्थं ।
धुवमचलमणालंबं मण्णेऽहं अप्पगं सुद्धं ॥192॥ ॥192॥

अन्वयार्थ: मैं आत्मा को इस प्रकार ज्ञानात्मक, दर्शनभूत, अतीन्द्रिय महा पदार्थ ध्रुव, अचल, निरालम्ब और शुद्ध मानता हूँ।


देहा वा दविणा वा सुहदुक्खा वाध सत्तुमित्तजणा ।
जीवस्स ण संति धुवा धुवोवओगप्पगो अप्पा ॥193॥ ॥193॥

अन्वयार्थ: शरीर, धन, सुख-दुःख अथवा शत्रुमित्रजन (यह कुछ) जीव के ध्रुव नहीं है; ध्रुव तो उपयोगात्मक आत्मा है।


जो एवं जाणित्ता झादि परं अप्पगं विसुद्धप्पा ।
सागारोऽणागारो खवेदि सो मोहदुग्गंठिं ॥194॥ ॥194॥

अन्वयार्थ: जो ऐसा जानकर विशुद्धात्मा होता हुआ परम आत्मा का ध्यान करता है, वह साकार हो या अनाकार मोह दुर्ग्रन्थि का क्षय करता है।


जो णिहदमोहगंठी रागपदोसे खवीय सामण्णे ।
होज्जं समसुहदुक्खो सो सोक्खं अक्खयं लहदि ॥195॥ ॥195॥

अन्वयार्थ: जो मोहग्रन्थि को नष्ट करके, राग-द्वेष का क्षय करके, समसुख-दुःख होता हुआ श्रमणता (मुनित्व) में परिणमित होता है, वह अक्षय सौख्य को प्राप्त करता है।


जो खविदमोहकलुसो विसयविरत्तो मणो णिरुंभित्ता ।
समवट्ठिदो सहावे सो अप्पाणं हवदि झादा ॥196॥ ॥196॥

अन्वयार्थ: जो मोह-मल का क्षय करके, विषय से विरक्त होकर, मन का निरोध करके, स्वभाव में समवस्थित है, वह आत्मा का ध्यान करनेवाला है।


णिहदघणघादिकम्मो पच्चक्खं सव्वभावतच्चण्हू ।
णेयंतगदो समणो झादि कमट्ठं असंदेहो ॥197॥ ॥197॥

अन्वयार्थ: जिनने घनघातिकर्म का नाश किया है, जो सर्व पदार्थों के स्वरूप को प्रत्यक्ष जानते हैं और जो ज्ञेयों के पार को प्राप्त हैं, ऐसे सन्देहरहित श्रमण किस पदार्थ को ध्याते हैं ?


सव्वाबाधविजुत्तो समंतसव्वक्खसोक्खणाणड्ढो ।
भूदो अक्खातीदो झादि अणक्खो परं सोक्खं ॥198॥ ॥198॥

अन्वयार्थ: अनिन्द्रिय और इन्द्रियातीत हुआ आत्मा सर्व बाधारहित और सम्पूर्ण आत्मा में समन्त (सर्व प्रकार के, परिपूर्ण) सौख्य तथा ज्ञान से समृद्ध वर्तता हुआ परम सौख्य का ध्यान करता है।


एवं जिणा जिणिंदा सिद्धा मग्गं समुट्ठिदा समणा ।
जादा णमोत्थु तेसिं तस्स य णिव्वाणमग्गस्स ॥199॥ ॥199॥

अन्वयार्थ: जिन, जिनेन्द्र और श्रमण (अर्थात् सामान्य केवली, तीर्थंकर और मुनि) इस (पूर्वोक्त ही) प्रकार से मार्ग में आरूढ़ होते हुए सिद्ध हुए नमस्कार हो उन्हें और उस निर्वाण मार्ग को।


तम्हा तह जाणित्ता अप्पाणं जाणगं सभावेण ।
परिवज्जामि ममत्तिं उवट्ठिदो णिम्ममत्तम्हि ॥200॥ ॥200॥

अन्वयार्थ: ऐसा होने से (अर्थात् शुद्धात्मा में प्रवृत्ति के द्वारा ही मोक्ष होता होने से) इस प्रकार आत्मा को स्वभाव से ज्ञायक जानकर मैं निर्ममत्व में स्थित रहता हुआ ममता का परित्याग करता हूँ।

चरणानुयोगसूचक चूलिका: आचरण-प्रज्ञापन (गाथा 201 से 231)

एवं पणमिय सिद्धे जिणवरवसहे पुणो पुणो समणे ।
पडिवज्जदु सामण्णं जदि इच्छदि दुक्खपरिमोक्खं ॥201॥ ॥201॥

अन्वयार्थ: यदि दुःखों से परिमुक्त होने की (छुटकारा पाने की) इच्छा हो तो, पूर्वोक्त प्रकार से (ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन की प्रथम तीन गाथाओं के अनुसार) बारम्बार सिद्धों को, जिनवरवृषभों को (अरहन्तों को) तथा श्रमणों को प्रणाम करके, (जीव) श्रामण्य को अंगीकार करो।


आपिच्छ बंधुवग्गं विमोचिदो गुरुकलत्तपुत्तेहिं ।
आसिज्ज णाणदंसणचरित्ततववीरियायारं ॥202॥ ॥202॥

अन्वयार्थ: (श्रामण्यार्थी) बन्धुवर्ग से विदा माँगकर बड़ों से, स्त्री और पुत्र से मुक्त किया हुआ ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार को अंगीकार करके…


समणं गणिं गुणड्ढं कुलरूववयोविसिट्ठमिट्ठदरं ।
समणेहिं तं पि पणदो पडिच्छ मं चेदि अणुगहिदो ॥203॥ ॥203॥

अन्वयार्थ: जो श्रमण है, गुणाढ्य है, कुल, रूप तथा वय से विशिष्ट है, और श्रमणों को अति इष्ट है ऐसे गणी को ‘मुझे स्वीकार करो’ ऐसा कहकर प्रणत होता है (प्रणाम करता है) और अनुगृहीत होता है।


णाहं होमि परेसिं ण मे परे णत्थि मज्झमिह किंचि ।
इदि णिच्छिदो जिदिंदो जादो जधजादरूपवधरो ॥204॥ ॥204॥

अन्वयार्थ: मैं दूसरों का नहीं हूँ पर मेरे नहीं हैं, इस लोक में मेरा कुछ भी नहीं है - ऐसा निश्चयवान् और जितेन्द्रिय होता हुआ यथाजातरूपधर (सहजरूपधारी) होता है।


जधजादरूवजादं उप्पाडिदकेसमंसुगं सुद्धं ।
रहिदं हिंसादीदो अप्पडिकम्मं हवदि लिंगं ॥205॥ ॥205॥

अन्वयार्थ: जन्म समय के रूप जैसा रूपवाला, सिर और दाढ़ी-मूछ के बालों का लोंच किया हुआ, शुद्ध (अकिंचन), हिंसादि से रहित और प्रतिकर्म (शारीरिक श्रृंगार) से रहित - ऐसा (श्रामण्य का बहिरंग) लिंग है।


मुच्छारंभविजुत्तं जुत्तं उवओगजोगसुद्धीहिं ।
लिंगं ण परावेक्खं अपुणब्भवकारणं जेण्हं ॥206॥ ॥206॥

अन्वयार्थ: मूर्च्छा (ममत्व) और आरम्भ रहित, उपयोग और योग की शुद्धि से युक्त तथा पर की अपेक्षा से रहित - ऐसा जिनेन्द्रदेव कथित (श्रामण्य का अन्तरंग) लिंग है। जो कि मोक्ष का कारण है।


आदाय तं पि लिंगं गुरुणा परमेण तं णमंसित्ता ।
सोच्चा सवदं किरियं उवट्ठिदो होदि सो समणो ॥207॥ ॥207॥

अन्वयार्थ: परम गुरु के द्वारा प्रदत्त उन दोनों लिंगों को ग्रहण करके, उन्हें नमस्कार करके व्रत सहित क्रिया को सुनकर उपस्थित (आत्मा के समीप स्थित) होता हुआ वह श्रमण होता है।


वदसमिदिंदियरोधो लोचावस्सयमचेलमण्हाणं ।
खिदिसयणमदंतवणं ठिदिभोयणमेगभत्तं च ॥208॥ ॥208॥

अन्वयार्थ: व्रत, समिति, इन्द्रियरोध, लोच, आवश्यक, अचेलपना, अस्नान, भूमिशयन, अदंतधावन, खड़े-खड़े भोजन, और एक बार आहार - ये वास्तव में श्रमणों के मूलगुण जिनवरों ने कहे हैं; उनमें प्रमत्त होता हुआ श्रमण छेदोपस्थापक होता है।


एदे खलु मूलगुणा समणाणं जिणवरेहिं पण्णत्ता ।
तेसु पमत्तो समणो छेदोवट्ठावगो होदि ॥209॥ ॥209॥

अन्वयार्थ: व्रत, समिति, इन्द्रियरोध, लोच, आवश्यक, अचेलपना, अस्नान, भूमिशयन, अदंतधावन, खड़े-खड़े भोजन, और एक बार आहार - ये वास्तव में श्रमणों के मूलगुण जिनवरों ने कहे हैं; उनमें प्रमत्त होता हुआ श्रमण छेदोपस्थापक होता है।


लिंगग्गहणे तेसिं गुरु त्ति पव्वज्जदायगो होदि ।
छेदेसूवट्ठवगा सेसा णिज्जावगा समणा ॥210॥ ॥210॥

अन्वयार्थ: लिंगग्रहण के समय जो प्रव्रज्या (दीक्षा) दायक हैं वह उनके गुरु हैं और जो छेदद्वय में उपस्थापक हैं (अर्थात् १-जो भेदों में स्थापित करते हैं तथा २- जो संयम में छेद होने पर पुनः स्थापित करते हैं) वे शेष श्रमण निर्यापक हैं।


पयदम्हि समारद्धे छेदो समणस्स कायचेट्ठम्हि ।
जायदि जदि तस्स पुणो आलोयणपुव्विया किरिया ॥211॥ ॥211॥

अन्वयार्थ: यदि श्रमण के प्रयत्नपूर्वक की जानेवाली कायचेष्टा में छेद होता है तो उसे तो आलोचनापूर्वक क्रिया करना चाहिए।


छेदुवजुत्तो समणो समणं ववहारिणं जिणमदम्हि ।
आसेज्जालोचित्ता उवदिट्ठं तेण कायव्वं ॥212॥ ॥212॥

अन्वयार्थ: (किन्तु) यदि श्रमण छेद में उपयुक्त हुआ हो तो उसे जैनमत में व्यवहारकुशल श्रमण के पास जाकर आलोचना करके (अपने दोष का निवेदन करके), वे जैसा उपदेश दें वह करना चाहिए।


अधिवासे व विवासे छेदविहूणो भवीय सामण्णे ।
समणो विहरदु णिच्चं परिहरमाणो णिबंधाणि ॥213॥ ॥213॥

अन्वयार्थ: अधिवास में (आत्मवास में अथवा गुरुओं के सहवास में) वसते हुए या विवास में (गुरुओं से भिन्न वास में) वसते हुए, सदा (परद्रव्यसम्बन्धी) प्रतिबन्धों को परिहरण करता हुआ श्रामण्य में छेदविहीन होकर श्रमण विहरो।


चरदि णिबद्धो णिच्चं समणो णाणम्हि दंसणमुहम्हि ।
पयदो मूलगुणेसु य जो सो पडिपुण्णसामण्णो ॥214॥ ॥214॥

अन्वयार्थ: जो श्रमण सदा ज्ञान में और दर्शनादि में प्रतिबद्ध तथा मूलगुणों में प्रयत (प्रयत्नशील) विचरण करता है, वह परिपूर्ण श्रामण्यवान् है।


भत्ते वा खमणे वा आवसधे वा पुणो विहारे वा ।
उवधिम्हि वा णिबद्धं णेच्छदि समणम्हि विकधम्हि ॥215॥ ॥215॥

अन्वयार्थ: मुनि, आहार में, क्षपण में (उपवास में), आवास में (निवासस्थान में), और विहार में उपधि में (परिग्रह में), श्रमण में (अन्य मुनि में) अथवा विकथा में प्रतिबन्ध नहीं चाहता।


अपयत्ता वा चरिया सयणासणठाणचंकमादीसु ।
समणस्स सव्वकाले हिंसा सा संतय त्ति मदा ॥216॥ ॥216॥

अन्वयार्थ: श्रमण के शयन, आसन (बैठना), स्थान (खड़े रहना), गमन इत्यादि में जो अप्रयत चर्या है, वह सदा सतत हिंसा मानी गई है।


मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा ।
पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामेत्तेण समिदस्स ॥217॥ ॥217॥

अन्वयार्थ: जीव मरे या जिये, अप्रयत आचारवाले के (अन्तरंग) हिंसा निश्चित है; प्रयत के, समितिवान् के (बहिरंग) हिंसामात्र से बन्ध नहीं है।


अयदाचारो समणो छस्सु वि कायेसु वधकरो त्ति मदो ।
चरदि जदं जदि णिच्चं कमलं व जले णिरुवलेवो ॥218॥ ॥218॥

अन्वयार्थ: अप्रयत आचारवाला श्रमण छहों काय सम्बन्धी वध का करनेवाला मानने में - कहने में आया है; यदि सदा प्रयतरूप से आचरण करे तो जल में कमल की भाँति निर्लेप कहा गया है।


हवदि व ण हवदि बंधो मदम्हि जीवेऽध कायचेट्ठम्हि ।
बंधो धुवमुवधीदो इदि समणा छड्डिया सव्वं ॥219॥ ॥219॥

अन्वयार्थ: अब (उपधि के सम्बन्ध में ऐसा है कि), कायचेष्टापूर्वक जीव के मरने पर बन्ध होता है अथवा नहीं होता; (किन्तु) उपधि से-परिग्रह से निश्चय ही बन्ध होता है; इसलिए श्रमणों (अरहन्तदेवों) ने सर्व परिग्रह को छोड़ा है।


ण हि णिरवेक्खो चागो ण हवदि भिक्खुस्स आसयविसुद्धी ।
अविसुद्धस्स य चित्ते कहं णु कम्मक्खओ विहिदो ॥220॥ ॥220॥

अन्वयार्थ: यदि निरपेक्ष (किसी भी वस्तु की अपेक्षारहित) त्याग न हो तो भिक्षु के भाव की विशुद्धि नहीं होती; और जो भाव में अविशुद्ध है उसके कर्मक्षय कैसे हो सकता है ?


किध तम्हि णत्थि मुच्छा आरंभो वा असंजमो तस्स ।
तध परदव्वम्मि रदो कधमप्पाणं पसाधयदि ॥221॥ ॥221॥

अन्वयार्थ: उपधि के सद्भाव में उस (भिक्षु) के मूर्छा, आरम्भ या असंयम न हो यह कैसे हो सकता है? (कदापि नहीं हो सकता), तथा जो परद्रव्य में रत हो वह आत्मा को कैसे साध सकता है?


छेदो जेण ण विज्जदि गहणविसग्गेसु सेवमाणस्स ।
समणो तेणिह वट्टदु कालं खेत्तं वियाणित्ता ॥222॥ ॥222॥

अन्वयार्थ: जिस उपधि के (आहार-नीहारादि के) ग्रहण-विसर्जन में सेवन करने में जिससे सेवन करनेवाले के छेद नहीं होता, उस उपधियुक्त, काल क्षेत्र को जानकर, इस लोक में श्रमण भले वर्ते।


अप्पडिकुट्ठं उवधिं अपत्थणिज्जं असंजगजणेहिं ।
मुच्छादिजणणरहिदं गेण्हदु समणो जदि वि अप्पं ॥223॥ ॥223॥

अन्वयार्थ: भले ही अल्प हो तथापि, जो अनिंदित हो, असंयतजनों से अप्रार्थनीय हो और जो मूर्च्छादि की जननरहित हो - ऐसी ही उपधि को श्रमण ग्रहण करो।


किं किंचण त्ति तक्कं अपुणब्भवकामिणोध देहे वि ।
संग त्ति जिणवरिंदा अप्पडिकम्मत्तमुद्दिट्ठा ॥224॥ ॥224॥

अन्वयार्थ: जबकि जिनवरेन्द्रों ने मोक्षाभिलाषी के, ‘देह परिग्रह है’ ऐसा कहकर देह में भी अप्रतिकर्मपना (संस्काररहितपना) कहा (उपदेशा) है, तब उनका यह (स्पष्ट) आशय है कि उसके अन्य परिग्रह तो कैसे हो सकता है ?


उवयरणं जिणमग्गे लिंगं जहजागरूपवमिदि भणिदं ।
गुरुवयणं पि य विणओ सुत्तज्झयणं च णिद्दिट्ठं ॥225॥ ॥225॥

अन्वयार्थ: यथाजातरूप (जन्मजात-नग्न) जो लिंग वह जिनमार्ग में उपकरण कहा गया है, गुरु के वचन, सूत्रों का अध्ययन और विनय भी उपकरण कही गयी है।


इङलोगणिरावेक्खो अप्पडिबद्धो परम्हि लोयम्हि ।
जुत्ताहारविहारो रहिदकसाओ हवे समणो ॥226॥ ॥226॥

अन्वयार्थ: श्रमण कषायरहित वर्तता हुआ इस लोक में निरपेक्ष और परलोक में अप्रतिबद्ध होने से युक्ताहार-विहारी होता है।


जस्स अणेसणमप्पा तं पि तवो तप्पडिच्छगा समणा ।
अण्णं मिक्खमणेसणमध ते समणा अणाहारा ॥227॥ ॥227॥

अन्वयार्थ: जिसका आत्मा एषणारहित है (अर्थात् जो अनशनस्वभावी आत्मा का ज्ञाता होने से स्वभाव से ही आहार की इच्छा से रहित है) उसे वह भी तप है; (और) उसे प्राप्त करने के लिये (अनशनस्वभाववाले आत्मा को परिपूर्णतया प्राप्त करने के लिये) प्रयत्न करनेवाले श्रमणों के अन्य (स्वरूप से पृथक्) भिक्षा एषणारहित (एषणदोष से रहित) होती है; इसलिए वे श्रमण अनाहारी हैं।


केवलदेहो समणो देहे ण मम त्ति रहिदपरिकम्मो ।
आजुत्तो तं तवसा अणिगूहिय अप्पणो सत्तिं ॥228॥ ॥228॥

अन्वयार्थ: केवलदेही (जिसके मात्र देहरूप परिग्रह वर्तता है, ऐसे) श्रमण ने शरीर में भी ‘मेरा नहीं है’ ऐसा समझकर परिकर्म रहित वर्तते हुए, अपने आत्मा की शक्ति को छुपाये बिना तप के साथ उसे (शरीर को) युक्त किया (जोड़ा) है।


एक्कं खलु तं भत्तं अप्पडिपुण्णोदरं जहालद्धं ।
चरणं भिक्खेण दिवा ण रसावेक्खं ण मधुमंसं ॥229॥ ॥229॥

अन्वयार्थ: वास्तव में वह आहार (युक्ताहार) एक बार ऊनोदर यथालब्ध (जैसा प्राप्त हो वैसा), भिक्षाचरण से, दिन में रस की अपेक्षा से रहित और मधु-माँस रहित होता है।


बालो वा वृड्ढो वा समभिहदो वा पुणो गिलाणो वा ।
चरियं चरदु सजोग्गं मूलच्छेदो जधा ण हवदि ॥230॥ ॥230॥

अन्वयार्थ: बाल, वृद्ध, श्रान्त या ग्लान श्रमण मूल का छेद जैसा न हो, उस प्रकार से अपने योग्य आचरण आचरो।


आहारे व विहारे देसं कालं समं खमं उवधिं ।
जाणित्ता ते समणो वट्टदि जदि अप्पलेवी सो ॥231॥ ॥231॥

अन्वयार्थ: यदि श्रमण आहार अथवा विहार में देश, काल, श्रम, क्षमता तथा उपधि, इनको जानकर प्रवर्ते तो वह अल्पलेपी होता है।

चरणानुयोगसूचक चूलिका: मोक्षमार्ग-प्रज्ञापन (गाथा 232 से 244)

एयग्गगदो समणो एयग्गं णिच्छिदस्स अत्थेसु ।
णिच्छित्ती आगमदो आगमचेट्ठा तदो जेट्ठा ॥232॥ ॥232॥

अन्वयार्थ: श्रमण एकाग्रता को प्राप्त होता है; एकाग्रता पदार्थों के निश्चियवान के होती है; (पदार्थों का) निश्चय आगम द्वारा होता है; इसलिए आगम में व्यापार मुख्य है।


आगमहीणो समणो णेवप्पाणं परं वियाणादि ।
अविजाणंतो अत्थे खवेदि कम्माणि किध भिक्खू ॥233॥ ॥233॥

अन्वयार्थ: आगमहीन श्रमण आत्मा को (निज को) और पर को नहीं जानता; पदार्थों को नहीं जानता हुआ भिक्षु कर्मों को किस प्रकार क्षय करे?


आगमचक्खू साहू इंदियचक्खूणि सव्वभूदाणि ।
देवा य ओहिचक्खू सिद्धा पुण सव्वदो चक्खू ॥234॥ ॥234॥

अन्वयार्थ: साधु आगमचक्षु (आगमरूप चक्षुवाले) हैं, सर्व प्राणी इन्द्रियचक्षुवाले हैं, देव अवधिचक्षु हैं और सिद्ध सर्वतः चक्षु (सर्व ओर से चक्षुवाले अर्थात् सर्वात्मप्रदेशों से चक्षुवान्) हैं।


सव्वे आगमसिद्धा अत्था गुणपज्जएहिं चित्तेहिं ।
जाणंति आगमेण हि पेच्छंता ते वि ते समणा ॥235॥ ॥235॥

अन्वयार्थ: समस्त पदार्थ विचित्र (अनेक प्रकार की) गुण-पर्यायोंसहित आगम सिद्ध हैं। उन्हें भी वे श्रमण आगम द्वारा वास्तव में देखकर जानते हैं।


आगमपुव्वा दिट्ठी ण भवदि जस्सेह संजमो तस्स ।
णत्थीदि भणदि सुत्तं असंजदो होदि किध समणो ॥236॥ ॥236॥

अन्वयार्थ: इस लोक में जिसकी आगमपूर्वक दृष्टि (दर्शन) नहीं है उसके संयम नहीं है, इस प्रकार सूत्र कहता है; और असंयत वह श्रमण कैसे हो सकता है?


ण हि आगमेण सिज्झदि सद्दहणं जदि वि णत्थि अत्थेसु ।
सद्दहमाणो अत्थे असंजदो वा ण णिव्वादि ॥237॥ ॥237॥

अन्वयार्थ: आगम से, यदि पदार्थों का श्रद्धान न हो तो, सिद्धि (मुक्ति) नहीं होती; पदार्थों का श्रद्धान करनेवाला भी यदि असंयत हो तो निर्वाण को प्राप्त नहीं होता।


जं अण्णाणी कम्मं खवेदि भवसयसहस्सकोडीहिं ।
तं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि उस्सासमेत्तेण ॥238॥ ॥238॥

अन्वयार्थ: जो कर्म अज्ञानी लक्षकोटि भवों में खपाता है, वह कर्म ज्ञानी तीन प्रकार (मन - वचन - काय) से गुप्त होने से उच्छ्वासमात्र में खपा देता है।


परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादिएसु जस्स पुणो ।
विज्जदि जदि सो सिद्धिं ण लहदि सव्वागमधरो वि ॥239॥ ॥239॥

अन्वयार्थ: और यदि जिसके शरीरादि के प्रति परमाणु मात्र भी मूर्च्छा वर्तती हो तो वह भले ही सर्वागम का धारी हो तथापि सिद्धि को प्राप्त नहीं होता।


पंचसमिदो तिगुत्तो पंचेंदियसंवुडो जिदकसाओ ।
दंसणणाणसमग्गो समणो सो संजदो भणिदो ॥240॥ ॥240॥

अन्वयार्थ: पाँच समितियुक्त, पाँच इन्द्रियों का संवरवाला तीन गुप्ति सहित, कषायों को जीतनेवाला, दर्शनज्ञान से परिपूर्ण - ऐसा जो श्रमण वह संयत कहा गया है।


समसत्तुबंधुवग्गो समसुहदुक्खो पसंसणिंदसमो ।
समलोट्ठुकंचणो पुण जीविदमरणे समो समणो ॥241॥ ॥241॥

अन्वयार्थ: जिसे शत्रु और बन्धु वर्ग समान है, सुख और दुःख समान है, प्रशंसा और निन्दा के प्रति जिसको समता है, जिसे लोष्ट (मिट्टी का ढेला) और सुवर्ण समान है, तथा जीवन-मरण के प्रति जिसको समता है, वह श्रमण है।


दंसणणाणचरित्तेसु तीसु जुगवं समुट्ठिदो जो दु ।
एयग्गगदो त्ति मदो सामण्णं तस्स पडिपुण्णं ॥242॥ ॥242॥

अन्वयार्थ: जो दर्शन, ज्ञान और चारित्र इन तीनों में एक ही साथ आरूढ़ है, वह एकाग्रता को प्राप्त है इस प्रकार (शास्त्र में) कहा है। उसके श्रामण्य परिपूर्ण है।


मुज्झदि वा रज्जदि वा दुस्सदि वा दव्वमण्णमासेज्ज ।
जदि समणो अण्णाणी बज्झदि कम्मेहिं विविहेहिं ॥243॥ ॥243॥

अन्वयार्थ: यदि श्रमण, अन्य द्रव्य का आश्रय करके अज्ञानी होता हुआ, मोह करता है, राग करता है, अथवा द्वेष करता है, तो वह विविध कर्मों से बँधते हैं।


अट्ठेसु जो ण मुज्झदि ण हि रज्जदि णेव दोसमुवयादि ।
समणो जदि सो णियदं खवेदि कम्माणि विविहाणि ॥244॥ ॥244॥

अन्वयार्थ: यदि श्रमण पदार्थों में मोह नहीं करता, राग नहीं करता, और न द्वेष को प्राप्त होता है तो वह नियम से (निश्चित) विविध कर्मों को खपाता है।

चरणानुयोगसूचक चूलिका: शुभोपयोग-प्रज्ञापन (गाथा 245 से 270)

समणा सुद्धवजुत्ता सुहोवजुत्ता य होंति समयम्हि ।
तेसु वि सुद्धवजुत्ता अणासवा सासवा सेसा ॥245॥ ॥245॥

अन्वयार्थ: शास्त्र में (ऐसा कहा है कि), शुद्धोपयोगी वे श्रमण हैं, शुभोपयोगी भी श्रमण होते हैं; उनमें भी शुद्धोपयोगी निरास्रव हैं, शेष सास्रव हैं, (अर्थात् शुभोपयोगी आस्रव सहित हैं।)


अरहंतादिसु भत्ती वच्छलदा पवयणाभिजुत्तेसु ।
विज्जदि जदि सामण्णे सा सुहजुत्ता भवे चरिया ॥246॥ ॥246॥

अन्वयार्थ: श्रामण्य में यदि अरहन्तादि के प्रति भक्ति तथा प्रवचनरत जीवों के प्रति वात्सल्य पाया जाता है तो वह शुभयुक्त चर्या (शुभोपयोगी चारित्र) है।


वंदणणमंसणेहिं अब्भुट्ठाणाणुगमणपडिवत्ती ।
समणेसु समावणओ ण णिंदिदा रागचरियम्हि ॥247॥ ॥247॥

अन्वयार्थ: श्रमणों के प्रति वन्दन - नमस्कार सहित अभ्युत्थान और अनुगमनरूप विनीत प्रवृत्ति करना तथा उनका श्रम दूर करना वह रागचर्या में निन्दित नहीं है।


दंसणणाणुवदेसो सिस्सग्गहणं च पोसणं तेसिं ।
चरिया हि सरागाणं जिणिंदपूजोवदेसो य ॥248॥ ॥248॥

अन्वयार्थ: दर्शनज्ञान का (सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का) उपदेश, शिष्यों का ग्रहण, तथा उनका पोषण, और जिनेन्द्र की पूजा का उपदेश वास्तव में सरागियों की चर्या है।


उवकुणदि जो वि णिच्चं चादुव्वण्णस्स समणसंघस्स ।
कायविराधणरहिदं सो वि सरागप्पधाणो से ॥249॥ ॥249॥

अन्वयार्थ: जो कोई (श्रमण) सदा (छह) काय की विराधना से रहित चार प्रकार के श्रमण संघ का उपकार करता है, वह भी राग की प्रधानतावाला है।


जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चत्थमुज्जदो समणो ।
ण हवदि हवदि अगारी धम्मो सो सावयाणं से ॥250॥ ॥250॥

अन्वयार्थ: यदि (श्रमण) वैयावृत्ति के लिए उद्यमी वर्तता हुआ छह काय की पीड़ित करता है तो वह श्रमण नहीं है, गृहस्थ है; (क्योंकि) वह (छह काय की विराधना सहित वैयावृत्ति) श्रावकों का धर्म है।


जोण्हाणं णिरवेक्खं सागारणगारचरियजुत्ताणं ।
अणुकंपयोवयारं कुव्वदु लेवो जदि वि अप्पो ॥251॥ ॥251॥

अन्वयार्थ: यद्यपि अल्प लेप होता है तथापि साकार-अनाकार चर्यायुक्त जैनों का अनुकम्पा से निरपेक्षतया (शुभोपयोग से) उपकार करो।


रोगेण वा छुधाए तण्हाए वा समेण वा रूढं ।
दिट्ठा समणं साहू पडिवज्जदु आदसत्तीए ॥252॥ ॥252॥

अन्वयार्थ: रोग से, क्षुधा से, तृषा से अथवा श्रम से आक्रान्त श्रमण को देखकर साधु अपनी शक्ति के अनुसार वैयावृत्यादि करो।


वेज्जावच्चणिमित्तं गिलाणगुरुबालवुड्ढसमणाणं ।
लोगिगजणसंभासा ण णिंदिदा वा सुहोवजुदा ॥253॥ ॥253॥

अन्वयार्थ: और रोगी, गुरु (पूज्य, बड़े), बाल तथा वृद्ध श्रमणों की सेवा के निमित्त से, शुभोपयोगयुक्त लौकिकजनों के साथ की बातचीत निन्दित नहीं है।


एसा पसत्थभूदा समणाणं वा पुणो घरत्थाणं ।
चरिया परेत्ति भणिदा ताएव परं लहदि सोक्खं ॥254॥ ॥254॥

अन्वयार्थ: यह प्रशस्तभूत चर्या श्रमणों के (गौण) होती है और गृहस्थों के तो मुख्य होती है, ऐसा (शास्त्रों में) कहा है; उसी से (परम्परा से) गृहस्थ परम सौख्य को प्राप्त होता है।


रागो पसत्थभूदो वत्थुविसेसेण फलदि विवरीदं ।
णाणाभूमिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि ॥255॥ ॥255॥

अन्वयार्थ: जैसे इस जगत् में अनेक प्रकार की भूमियों में पड़े हुए बीज धान्यकाल में विपरीतरूप से फलते हैं, उसी प्रकार प्रशस्तभूत राग वस्तु-भेद से (-पात्र भेद से) विपरीतरूप से फलता है।


छदुमत्थविहिदवत्थुसु वदणियमज्झयणझाणदाणरदो ।
ण लहदि अपुणब्भावं भावं सादप्पगं लहदि ॥256॥ ॥256॥

अन्वयार्थ: जो जीव छद्मस्थविहित वस्तुओं में (छद्मस्थ-अज्ञानी के द्वारा कथित देव-गुरु-धर्मादि में) व्रत-नियम-अध्ययन-ध्यान-दान में रत होता है वह जीव मोक्ष को प्राप्त नहीं होता, (किन्तु) सातात्मक भाव को प्राप्त होता है।


अविदिदपरमत्थेसु य विसयकसायाधिगेसु परिसेसु ।
जुट्ठं कदं व दत्तं फलदि कुदेवेसु मणुवेसु ॥257॥ ॥257॥

अन्वयार्थ: जिन्होंने परमार्थ को नहीं जाना है, और जो विषय-कषाय में अधिक हैं, ऐसे पुरुषों के प्रति सेवा, उपकार या दान कुदेवरूप में और कुमनुष्यरूप में फलता है।


जदि ते विसयकसाया पाव त्ति परुविदा व सत्थेसु ।
किह ते तप्पडिबद्धा पुरिसा णित्थारगा होंति ॥258॥ ॥258॥

अन्वयार्थ: जबकि ‘वे विषयकषाय पाप हैं’ इस प्रकार शास्त्रों में प्ररूपित किया गया है, तो उनमें प्रतिबद्ध (विषय-कषायों में लीन) वे पुरुष निस्तारक (पार लगानेवाले) कैसे हो सकते हैं?


उवरदपावो पुरिसो समभावो धम्मिगेसु सव्वेसु ।
गुणसमिदिदोवसेवी हवदि स भागी सुमग्गस्स ॥259॥ ॥259॥

अन्वयार्थ: जिसके पाप रुक गया है, जो सभी धार्मिकों के प्रति समभाववान् है, और जो गुणसमुदाय का सेवन करनेवाला है, वह पुरुष सुमार्ग का भागी होता है। (अर्थात् सुमार्गवान् है)।


असुभोवओगरहिदा सुद्धुवजुत्ता सुहोवजुत्ता वा ।
णित्थारयंति लोगं तेसु पसत्थं लहदि भत्तो ॥260॥ ॥260॥

अन्वयार्थ: जो अशुभोपयोगरहित वर्तते हुए शुद्धोपयुक्त अथवा शुभोपयुक्त होते हैं, वे (श्रमण) लोगों को तार देते हैं; (और) उनके प्रति भक्तिवान जीव प्रशस्त (पुण्य) को प्राप्त करता है।


दिट्ठा पगडं वत्थुं अब्भुट्ठाणप्पधाणकिरियाहिं ।
वट्टदु तदो गुणादो विसेसिदव्वो त्ति उवदेसो ॥261॥ ॥261॥

अन्वयार्थ: प्रकृत वस्तु को देखकर (प्रथम तो) अभ्युत्थान आदि क्रियाओं से (श्रमण) वर्तो; फिर गुणानुसार भेद करना, - ऐसा उपदेश है।


अब्भुट्ठाणं गहणं उवासणं पोसणं च सक्कारं ।
अंजलिकरणं पणमं भणिदमिह गुणाधिगाणं हि ॥262॥ ॥262॥

अन्वयार्थ: गुणों में अधिक (श्रमणों के प्रति) अभ्युत्थान, ग्रहण (आदर से स्वीकार), उपासन (सेवा), पोषण (उनके अशन, शयनादि की चिन्ता), सत्कार (गुणों की प्रशंसा), अञ्जलि करना (विनयपूर्वक हाथ जोड़ना) और प्रमाण करना यहाँ कहा है।


अब्भुट्ठेया समणा सुत्तत्थविसारदा उवासेया ।
संजमतवणाणड्ढा पणिवदणीया हि समणेहिं ॥263॥ ॥263॥

अन्वयार्थ: श्रमणों के द्वारा सूत्रार्थ विशारद (सूत्रों के और सूत्रकथित पदार्थों के ज्ञान में निपुण) तथा संयम-तपज्ञानाढ्य, (संयम, तप और आत्मज्ञान में समृद्ध) श्रमण अभ्युत्थान, उपासना और प्रणाम करने योग्य हैं।


ण हवदि समणो त्ति मदो संजमतवसुत्तसंपजुत्तो वि ।
जदि सद्दहदि ण अत्थे आदपधाणे जिणक्खादे ॥264॥ ॥264॥

अन्वयार्थ: सूत्र, संयम और तप से संयुक्त होने पर भी यदि (वह जीव) जिनोक्त आत्मप्रधान पदार्थों का श्रद्धान नहीं करता तो वह श्रमण नहीं है - ऐसा (आगम में) कहा है।


अववददि सासणत्थं समणं दिट्ठा पदोसदो जो हि ।
किरियासु णाणुमण्णदि हवदि हि सो णट्ठचारित्तो ॥265॥ ॥265॥

अन्वयार्थ: जो शासनस्थ (जिनदेव के शासन में स्थित) श्रमण को देखकर द्वेष से उसका अपवाद करता है और (सत्कारादि) क्रियाओं के करने में अनुमत (प्रसन्न) नहीं है उसका चारित्र नष्ट होता है।


गुणदोधिगस्स विणयं पडिच्छगो जो वि होमि समणो त्ति ।
होज्जं गुणाधरो जदि सो होदि अणंतसंसारी ॥266॥ ॥266॥

अन्वयार्थ: जो श्रमण गुणों में हीन होने पर भी ‘मैं भी श्रमण हूँ’ ऐसा मानकर अर्थात् गर्व करके गुणों में अधिक (ऐसे श्रमण) के पाप से विनय (करवाना) चाहता है वह अनन्त संसारी होता है।


अधिगगुणा सामण्णे वट्टंति गुणाधरेहिं किरियासु ।
जदि ते मिच्छुवजुत्ता हवंति पब्भट्ठचारित्ता ॥267॥ ॥267॥

अन्वयार्थ: जो श्रामण्य में अधिक गुणवाले हैं, तथापि हीनगुणवालों के प्रति (वन्दनादि) क्रियाओं में वर्तते हैं, वे मिथ्या उपयुक्त होते हुए चारित्र से भ्रष्ट होते हैं।


णिच्छिदसुत्तत्थपदो समिदकसाओ तवोधिगो चावि ।
लोगिगजणसंसग्गं ण चयदि जदि संजदो ण हवदि ॥268॥ ॥268॥

अन्वयार्थ: जिसने सूत्रों और अर्थों के पद को - अधिष्ठान को (अर्थात् ज्ञातृतत्त्व को) निश्चित किया है, जिसने कषायों का शमन किया है, और जो अधिक तपवान् है - ऐसा जीव भी यदि लौकिकजनों के संसर्ग को नहीं छोड़ता, तो वह संयत नहीं है (अर्थात् असंयत हो जाता है) ।


णिग्गंथं पव्वइदो वट्टदि जदि एहिगेहिं कम्मेहिं ।
सो लोगिगो त्ति भणिदो संजमतवसंपजुत्तो वि ॥269॥ ॥269॥

अन्वयार्थ: जो (जीव) निर्ग्रन्थरूप से दीक्षित होने के कारण संयमतपसंयुक्त हो उसे भी, यदि वह ऐहिक कार्यों सहित वर्तता हो तो, ‘लौकिक’ कहा गया है।


तम्हा समं गुणादो समणो समणं गुणेहिं वा अहियं ।
अधिवसदु तम्हि णिच्चं इच्छदि जदि दुक्खपरिमोक्खं ॥270॥ ॥270॥

अन्वयार्थ: (लौकिकजन के संग से संयत भी असंयत होता है) इसलिए यदि श्रमण दुःख से परिमुक्त होना चाहता हो तो वह समान गुणोंवाले श्रमण के अथवा अधिक गुणोंवाले श्रमण के संग में सदा निवास करो।

चरणानुयोगसूचक चूलिका: पञ्चरत्न-प्रज्ञापन (गाथा 271 से 275)

जे अजधागहिदत्था एदे तच्च त्ति णिच्छिदा समये ।
अच्चंतफलसमिद्धं भमंति ते तो परं कालं ॥271॥ ॥271॥

अन्वयार्थ: जो भले ही समय में हों (भले ही वे द्रव्यलिंगी के रूप में जिनमत में हों) तथापि वे ‘यह तत्त्व है (वस्तुस्वरूप ऐसा ही है)’ इस प्रकार निश्चयवान वर्तते हुए पदार्थों को अयथार्थरूप से ग्रहण करते हैं (जैसे नहीं हैं, वैसा समझते हैं), वे अत्यन्त फल समृद्ध (अनन्त कर्मफलों से भरे हुए) ऐसे अब से आगामी काल में परिभ्रमण करेंगे।


अजधाचारविजुत्तो जधत्थपदणिच्छिदो पसंतप्पा ।
अफले चिरं ण जीवदि इह सो संपुण्णसामण्णो ॥272॥ ॥272॥

अन्वयार्थ: जो जीव यथार्थतया पदों का तथा अर्थों (पदार्थों) का निश्चयवाला होने से प्रशान्तात्मा है और अयथाचार (-अन्यथा आचरण, अयथार्थ आचरण) रहित है, वह सम्पूर्ण श्रामण्यवाला जीव अफल (-कर्मफल रहित हुए) इस संसार में चिरकाल तक नहीं रहता (-अल्पकाल में ही मुक्त होता है।)


सम्मं विदिदपदत्था चत्ता उवहिं बहित्थमज्झत्थं ।
विसयेसु णावसत्ता जे ते सुद्ध त्ति णिद्दिठ्ठा ॥273॥ ॥273॥

अन्वयार्थ: सम्यक् (यथार्थतया) पदार्थों को जानते हुए जो बहिरंग तथा अन्तरंग परिग्रह को छोड़कर विषयों में आसक्त नहीं हैं, वे ‘शुद्ध’ कहे गये हैं।


सुद्धस्स य सामण्णं भणियं सुद्धस्स दंसणं णाणं ।
सुद्धस्स य णिव्वाणं सो च्चिय सिद्धो णमो तस्स ॥274॥ ॥274॥

अन्वयार्थ: शुद्ध (शुद्धोपयोगी) को श्रामण्य कहा है, और शुद्ध को दर्शन तथा ज्ञान कहा है, शुद्ध के निर्वाण होता है; वही (शुद्ध ही) सिद्ध होता है; उसे नमस्कार हो।


बुज्झदि सासणमेदं सागारणगारचरियया जुत्तो ।
जो सो पवयणसारं लहुणा कालेण पप्पोदि ॥275॥ ॥275॥

अन्वयार्थ: जो साकार-अनाकार चर्या से युक्त वर्तता हुआ इस उपदेश को जानता है, वह अल्प काल में ही प्रवचन के सार को (भगवान् आत्मा को) पाता है।

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