पाहुडदोहा मूल (मुनि रामसिंह) | Pahuddoha Mool (Muni Ramsingh)

पाहुडदोहा मूल

मुनि रामसिंह

मुनि रामसिंह कृत पाहुडदोहा के अपभ्रंश मूल दोहे 1 से 220, ग्रंथ के क्रमांक अनुसार। पढ़ने की सुविधा के लिए 44, 44 दोहों के पाँच भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ हैं। कुछ दोहे ग्रंथ में चार पंक्तियों में छपे हैं, वे वैसे ही रखे हैं। दोहा 212 में कर्ता का नाम आता है: “रामसीहु मुणि इम भणइ”।

पाठ संलग्न ग्रंथ (भारतीय ज्ञानपीठ; सम्पादन देवेन्द्रकुमार शास्त्री) के अनुसार है, जो प्रस्तावना के अनुसार हस्तलिखित प्रतियों (अ, ब, स, क, द) और डॉ. हीरालाल जैन के मुद्रित संस्करण के आधार पर तैयार हुआ है। प्रस्तावना में प्रति अ और ब के बारे में लिखा है कि अंत के दो संस्कृत श्लोक मिलाकर उनमें 222 पद्य हैं; इस ग्रंथ में मूल दोहे 220 हैं। शब्दार्थ, अर्थ, भावार्थ और पाठान्तर (पाद टिप्पणियाँ) यहाँ नहीं लिए; वे नीचे की पीडीएफ में हैं। जहाँ छपाई की भूल लगी, वहाँ पाठ नहीं बदला, उस भाग के नीचे टिप्पणी दी।

सम्बन्धित: पाहुडदोहा का मंगलाचरण

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दोहे और हर दोहे का अर्थ साथ में: पाहुडदोहा दोहा एवं अर्थ (मुनि रामसिंह) | Pahuddoha Doha Evam Arth (Muni Ramsingh)


पाहुडदोहा मूल (दोहा 1 से 44)

गुरु दिणयरु गुरु हिमकिरणु गुरु दीवउ गुरु देउ।
अप्पहं परहं परंपरहं जो दरिसावइ भेउ ॥1॥

बलिहारी गुरु अप्पणइं दिउ हांडी सय वार।
माणस हुंतउं देउ किउ करंत ण लग्गइ वार ॥2॥

अप्पायत्तउ जं जि सुहु तेण जि करि संतोसु।
पर सुहु वढ चिंतंतयहं हियइ ण फिट्टइ सोसु ॥3॥

जं सुहु विसयपरंमुहउ णिय अप्पा झायंतु।
तं सुहु इंदु वि णवि लहइ देविहिं कोडि रमंतु ॥4॥

आभुंजंतउ विसयसुहु जे णवि हियइ धरंति।
ते सासयसुहु लहु लहहिं जिणवर एम भणंति ॥5॥

णवि भुंजंता विसयसुहु हियडइ भाउ धरंति।
सालिसित्थु जिम वप्पुडउ णर णरयहं णिवडंति ॥6॥

धंधइं पडियउ सयलु जगु कम्मइं करइ अयाणु।
मोक्खह कारणु एक्कु खणु णवि चिंतइ अप्पाणु ॥7॥

आयइं अडबड वडवडइ पर रंजिज्जइ लोउ।
मणसुद्धइ णिच्चल ठियइ पाविज्जइ परलोउ ॥8॥

जोणिहिं लक्खहिं परिभमइ अप्पा दुक्खु सहंतु।
पुत्तकलत्तहं मोहियउ जाव ण बोहि लहंतु ॥9॥

अण्णु म जाणहि अप्पणउ घरु-परियणु जो इटठु।
कम्मायत्तउ कारिमउ आगमि जोइहिँ सिट्ठु ॥10॥

जं दुक्खु वि तं सुक्खु किउ जं सुहु तं पि य दुक्खु।
पइं जिय मोहहिं वसि गयउ तेण ण पायउ मोक्खु ॥11॥

मोक्खु ण पावहि जीव तुहुं धणु-परियणु चिंतंतु
तोउ वि चिंतहि तउ वि तउ पावहि सुक्खु महंतु ॥12॥

घरवासउ मा जाणि जिय दुक्कियवासउ एहु।
पासु कयंते मंडियउ अविचलु णीसंदेहु ॥13॥

मूढा सयलु वि कारिमउ मं फुडु तुहुं तुस कंडि।
सिवपहि णिम्मलि करहि रइ घरु-परियणु लहु छंडि ॥14॥

मोहु विलिज्जइ मणु मरइ तुट्टइ सासु-णिसासु।
केवलणाणु वि परिणवइ अंबरि जाह णिवासु ॥15॥

सप्पें मुक्की कंचुलिय जं विसु तं ण मुएइ।
भोयहं भाउ ण परिहरइ लिंगग्गहणु करेइ ॥16॥

जो मुणि छंडिवि विसयसुह पुणु अहिलासु करेइ।
लुंचणु सोसणु सो सहइ पुणु संसारु भमेइ ॥17॥

विसया-सुह दुइ दिवहडा पुणु दुक्खहं परिवाडि।
भुल्लउ जीव म बाहि तुहं अप्पाखंधि कुहाडि ॥18॥

उव्वडि चोप्पडि चिट्ठ करि देहि सुमिट्ठाहारु।
सयल वि देह-णिरत्थ गय जिम दुज्जण-उवयारु ॥19॥

अथिरेण थिरा मइलेण णिम्मला णिग्गुणेण गुणसारा।
काएण जा विढप्पइ सा किरिया किण्ण कायव्वा ॥20॥

उम्मूलिवि ते मूलगुण उत्तरगुणहिं विलग्ग।
वाण्णर जेम पलंबचुय बहुय पडेविणु भग्ग ॥21॥

वरु विसु विसहरु वरु जलणु वरु सेविउ वणवासु।
णउ जिणधम्परम्मुहउ मिच्छत्तिय सहु वासु ॥22॥

सो णत्थि इह पएसो चउरासीलक्खजोणिमज्झम्मि।
जिणवयणं अलहंतो जत्थ ण दुरुदुल्लिओ जीवो ॥23॥

अप्पा बुज्झिउ णिच्चु जइ केवलणाणसहाउ।
ता परि किज्जइ काइं वढ तणु उप्परि अणुराउ ॥24॥

जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ कम्महं हेउ करंतु।
सो मुणि पावइ सोक्खु णवि सयलइं सत्थ मुणंतु ॥25॥

बोहिविवज्जिउ जीव तुहुं विवरिउ तच्चु मुणेहि।
कम्मविणिम्मिय भावडा ते अप्पाण भणेहि ॥26॥

हउं गोरउ हउं सामलउ हउं जि विभिण्णउ वण्णु।
हउं तणु अंगउ थूलु हउं एउह जीव ण मण्णु ॥27॥

णवि तुहुं पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु।
णवि गुरु कोइ वि सीसु णवि सव्वइं कम्मविसेसु ॥28॥

णवि तुहुं कारणु कज्जु णवि णवि सामिउ णवि भिच्चु।
सूरउ कायरु जीव णवि णवि उत्तमु णवि णिच्चु ॥29॥

पुण्णु वि पाउ वि कालु णहु धम्मु अहम्मु ण काउ।
एक्कु वि जीव ण होहि तुहुं मेल्लिवि चेयणभाउ ॥30॥

णवि गोरउ णवि सामलउ णवि तुहुं एक्कु वि वण्णु।
णवि तणु अंगउ थूलु णवि एहउ जाणि सवण्णु ॥31॥

हउं वरु बंभणु णवि वइसु णउ खत्तिउ णवि सेसु।
पुरिसु णउंसउ इत्थि णवि एहउ जाणि विसेसु ॥32॥

तरुणउ बुड्ढउ बालु हउं सूरउ पंडिउ दिव्वु।
खवणउ वंदउ सेवडउ एहउ चिंति म सव्वु ॥33॥

देहहो पिक्खिवि जरमरणु मा भउ जीव करेहि।
जो अजरामरु बंभु परु सो अप्पाण मुणेहि ॥34॥

देहहं उब्भउ जरमरणु देहहं वण्ण विचित्त।
देहहं रोया जाणि तुहुं देहहं लिंगइं मित्त ॥35॥

अत्थि ण उब्भउ जरमरणु रोय वि लिंगइं वण्ण।
णिच्छइ अप्पा जाणि तुहुं जीवहं णेक्क वि सण्ण ॥36॥

कम्महं केरउ भावडउ जइ अप्पणा भणेहि।
तो वि ण पावहि परमपउ पुणु संसार भमेहि ॥37॥

अप्पा मेल्लिवि णाणमउ अवरु परायउ भाउ।
सो छंडेविणु जीव तुहुं झायहि सुद्धसहाउ ॥38॥

वण्णविहूणउ णाणमउ जो भावइ सब्भाउ।
संतु णिरंजणु सो जि सिउ तहिं किज्जइ अणुराउ ॥39॥

तिहुवणि दीसइ देउ जिणु जिणवरु तिहुवणु एउ।
जिणवरु दीसइ सयलु जगु को वि ण किज्जइ भेउ ॥40॥

बुज्झहु बुज्झहु जिणु भणइ को बुज्झइ हलि अण्णु।
अप्पा देहहं णाणमउ छुडु बुज्झियउ विभिण्णु ॥41॥

वंदहु वंदहु जिणु भणइ को वंदउ हलि एत्थु।
णियदेहहं णिवसंतयहं जइ जाणिउ परमत्थु ॥42॥

उपलाणहिं जोइय करहुलउ दावणु छोडिहिं जिम चरइ।
जसु अक्खयणी रामा गयउ मणु सो किम बुहु जगि रइ करइ ॥43॥

ढिल्लउ होहि म इंदियहं पंचइं विण्णि णिवारि।
एक्क णिवारहि जीहडिय अण्ण पराइय णारि ॥44॥


टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 10 में “इटठु” छपा है (शब्दार्थ में भी); “इट्ठु” होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 21 में “वाण्णर” छपा है (शब्दार्थ में भी); “वाणर” (वानर) होना चाहिए।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 22 में “जिणधम्परम्मुहउ” छपा है; “जिणधम्मपरम्मुहउ” होना चाहिए (ग्रंथ के शब्दार्थ में भी यही है)।

टिप्पणी (छपाई की संभावित भूल, पाठ ग्रंथ अनुसार ही रखा है): दोहा 27 में “एउह” छपा है; “एहउ” होना चाहिए (ग्रंथ के शब्दार्थ में भी “एहउ” है)।

पाहुडदोहा मूल (दोहा 45 से 88)

पंच बलद्द ण रक्खियइं णंदणवणु ण गओसि।
अप्पु ण जाणिउ णवि परु वि एमइं पव्वइओसि ॥45॥

पंचहिं बाहिरु णेहडउ हलि सहि लग्गु पियस्स।
तासु ण दीसइ आगमणु जो खलु मिलिउ परस्स ॥46॥

मणु जाणइ उवएसडउ जहिं सोवइ अचिंतु।
अचित्तहं चित्तु जो मेलवइ सो पुणु होइ णिचिंतु ॥47॥

वट्टडिया अणुलग्गयहं अग्गउ जोवंताहं।
कंटउ भग्गउ पाउ जइ भज्जउ दोसु ण ताहं ॥48॥

मेल्लउ मेल्लउ मोक्कलउ जहिं भावइ तहिं जाउ।
सिद्धिमहापुरि पइसरउ मा करि हरिसु विसाउ ॥49॥

मणु मिलियउ परमेसरहं परमेसरु वि मणस्स।
विण्णि वि समरसि हुइ रहिय पुज्ज चढाउं कस्स ॥50॥

आराहिज्जइ काइं देउ परमेसरु कहिं गयउ।
वीसारिज्जइ काइं तासु जो सिउ सव्वंगउ ॥51॥

अम्मिए जो परु सो जि परु परु अप्पाण ण होइ।
हउं डज्झउ सो उव्वरइ वलिवि ण जोवइ सोइ ॥52॥

मूढा सयलु वि कारिमउ णिक्कारिमउ ण कोइ।
जीवहु जंत ण कुडि गयइ यहु पडिछंदा जोइ ॥53॥

देहादेवलि जो वसइ सत्तिहिं सहियउ देउ।
को तहिं जोइय सत्तिसिउ सिग्घु गवेसहि भेउ ॥54॥

जरइ ण मरइ ण संभवइ जो परि को वि अणंतु।
तिहुवणसामिउ णाणमउ सो सिवदेउ णिभंतु ॥55॥

सिव विणु सत्ति ण वावरइ सिउ पुणु सत्तिविहीणु।
दोहिं वि जाणइ सयलु जगु बुज्झइ मोहविलीणु ॥56॥

अण्णु तुहारउ णाणमउ लक्खिउ जाम ण भाउ।
संकप्प-वियप्प अणाणमउ दड्ढउ चित्तु वराउ ॥57॥

णिच्चु णिरामउ णाणमउ परमाणंदसहाउ।
अप्पा बुज्झिउ जेण परु तासु ण अण्णु हि भाउ ॥58॥

अम्हहिं जाणिउ एकु जिणु जाणिउ देउ अणंतु।
णवरि सु मोहें मोहियउ अच्छइ दूरि भमंतु ॥59॥

अप्पा केवलणाणमउ हियडइ णिवसइ जासु।
तिहुवणि अच्छउ मोक्कलउ पावु ण लग्गइ तासु ॥60॥

चिंतइ जंपइ कुणइ णवि जो मुणि बंधणहेउ।
केवलणाणफुरंततणु सो परमप्पउ देउ ॥61॥

अब्भिंतरचित्तु जु मइलियइ बाहिरि काइं तवेण।
चित्ति णिरंजणु कोवि धरि मुच्चहि जेम मलेण ॥62॥

जेण णिरंजणि मणु धरिउ विसयकसायहिं जंतु।
मोक्खह कारणु एहु वढ अवरइ तंतु ण मंतु ॥63॥

खंतु पिवंतु वि जीव जइ पावहि सासयमोक्खु।
रिसहु भडारउ किं चवइ सयलु वि इंदियसोक्खु ॥64॥

देहमहेली एह वढ तउ संतावइ ताम।
चित्तु णिरंजणु परेण सहु समरसि होइ ण जाम ॥65॥

जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ सव्व वियप्प हणंतु।
सो किम पावइ णिच्चसुहु सयलइं धम्म कहंतु ॥66॥

जसु मणि णिवसइ परमपउ सयलइं चिंत चवेवि।
सो पर पावइ परमगइ अट्ठइं कम्म हणेवि ॥67॥

अप्पा मेल्लिवि गुणणिलउ अण्णु जि झायहि झाणु।
वढ अण्णाणविमीसियहं कहं तहं केवलणाणु ॥68॥

अप्पा-दंसणु केवलउ अण्णु सयलु ववहारु।
एक्कु सो जोयइ झाइयइ जो तइलोयहं सारु ॥69॥

अप्पा दंसणणाणमउ सयलु वि अण्णु पयालु।
इम जाणेविणु जोइयउ छंडहु माया-जालु ॥70॥

अप्पा मेल्लिवि जगतिलउ जे परदव्वि रमंति।
अण्णु कि मिच्छादिट्ठियह मत्थइं सिंगइं होंति ॥71॥

अप्पा मेल्लिवि जगतिलउ मूढ म झायहि अण्णु।
जइ मरगउ परियाणियउ तहु किं कच्चहु गण्णु ॥72॥

सुहपरिणामहिं धम्मु वढ असुहइं होइ अहम्मु।
दोहिवि एहिं विवज्जियउ पावइ जीउ ण जम्मु ॥73॥

सइं मिलिया सइं विहडिया जोइय कम्म णिभंति।
तरलसहावहिं पंथियहिं अण्णु कि गाम वसंति ॥74॥

अण्णु जि जीउ म चिंति तुहु जइ वीहउ दुक्खस्स।
तिलतुसमित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ॥75॥

अप्पाए वि विभावियइं णासइ पाउ खणेण।
सूरु विणासइ तिमिरहरु एकल्लउ णिमिसेण ॥76॥

जोइय हियडइ जासु पर इक्कु वि णिवसइ देउ।
जम्मणमरणविवज्जियउ सो पावइ परलोउ ॥77॥

कम्मु पुराइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ।
परमणिरंजणु जो णवइ सो परमप्पउ होइ ॥78॥

पाउवि अप्पहिं परिणवइ कम्मइं ताम करेइ।
परमणिरंजणु जाम णवि णिम्मलु होइ मुणेइ ॥79॥

अण्णु णिरंजणु देउ णवि अप्पा दंसणणाणु।
अप्पा सच्चउ मोक्खपहु एहउ मूढ वियाणु ॥80॥

ताम कुतित्थइं परिभमइं धुत्तिम ताम करंति।
गुरुहु पसाएं जाम णवि देहहं देउ मुणंति ॥81॥

लोहिं मोहिउ ताम तुहु विसयहं सुक्ख मुणेहि।
गुरुहुं पसाएं जाम णवि अविचल बोहि लहेहि ॥82॥

उप्पज्जइ जेण विबोहु णवि बहिरण्णउ तेण णाणेण।
तइलोय पायडेण वि असुंदरो जत्थ परिणामो ॥83॥

तासु लीह दिढ दिज्जइ जिम पढियइ तिम किज्जइ।
अहव ण गम्मागम्मइ तासु भंजेसहि अप्पणु कम्मइं ॥84॥

वक्खाणडा करंतु बुहु-अप्पि ण दिण्णा चितु।
कणहिं जि रहिउ पयालु जिम पर संगहिउ बहुत्तु ॥85॥

पंडियपंडिय पंडिया कणु छंडिवि तुस कंडिया।
अत्थे गंथे तुट्ठो सि परमत्थु ण जाणहि मूढो सि ॥86॥

अक्खरडेहिं जि गव्विया कारणु ते ण मुणंति।
वंसविहीणउ डोमु जिम सिरहत्थडा धुणंति ॥87॥

णाणतिडिक्की सिक्खि वढ किं पढियइं बहुएण।
जा संधुक्की णिड्डहइ पुण्णु वि पाउ खणेण ॥88॥

पाहुडदोहा मूल (दोहा 89 से 132)

सयलु वि कोवि तडप्फडइ सिद्धत्तणहु तणेण।
सिद्धत्तणु परि पावियइ चित्तहं णिम्मलएण ॥89॥

केवलु मलपरिवज्जियउ जहिं सो ठाइ अणाइ।
तस उरि सवु जगु संचरइ परइ ण कोइ वि जाइ ॥90॥

अप्पा अप्पि परिट्ठियउ कहिं वि ण लग्गइ लेउ।
सव्वु जि दोसु महंतु तसु जं पुणु होइ वि छेउ ॥91॥

जोइय जोएं लइयेण जइ धंधइ ण पडीसि।
देहकुडिल्ली परिखिवइ तुहुं तेमइ अच्छेसि ॥92॥

अरि मणकरह म रइ करहि इंदियविसयसुहेण।
सोक्खु णिरंतरु जेहिं णवि मुच्चहि ते वि खणेण ॥93॥

तूसि म रूसि म कोहु करि कोहें णासइ धम्मु।
धम्मिं णट्ठें णरयगइ अह गउ माणुसजम्मु ॥94॥

हत्थ अहुट्ठ जु देवलि वालहं णाहि पवेसु।
संतु णिरंजणु तहिं वसइ णिम्मलु होइ गवेसु ॥95॥

अप्पापरहं ण मेलयउ मणु मोडिवि सहसत्ति।
सो वढ जोइय किं करइ जासु ण एही सत्ति ॥96॥

सो जोयउ जो जोगवइ णिम्मलु जोयइ जोइ।
जो पुणु इंदियवसि गयउ सो इह सावयलोइ ॥97॥

बहुयइं पढियइं मूढ पर तालू सुक्कइ जेण।
एक्कु जि अक्खरु तं पढहु सिवपुरि गम्मइ जेण ॥98॥

अंतो णत्थि सुईणं कालो थोओ वि अम्ह दुम्मेहा।
तं णवर सिक्खियव्वं जं जरमरणक्खयं कुणहि ॥99॥

णिल्लक्खणु इत्थीबाहिरउ अकुलीणउ महु मणि ठियउ।
तासु कारण झाणी माहुर जेण गवंगउ संठियउ ॥100॥

हउं सगुणी पिउ णिग्गुणउ णिल्लक्खणु णीसंगु।
एक्कहिं अंगि वसंतयहं मिलिउ ण अंगहिं अंगु ॥101॥

सव्वहिं रायहिं छहरसहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥102॥

तव तणुअंगु सरीरयहं संगु परिट्ठिउ जाहं।
ताहं वि मरणदवक्कडिय दुसहा होइ णराहं ॥103॥

देहं गलंतहं सव्वु गलइ मइ-सुइ-धारण-धेउ।
तहिं तेहइं वढ अवसरहिं विरला सुमरहिं देउ ॥104॥

उम्मणि थक्का जासु मण भज्जा भूवहिं चारु।
जिम भावइ तिम संचरउ णवि भउ णवि संसारु ॥105॥

जीव वहंतइ णरयगइ अभयपदाणें सग्गु।
बे पह भव लगि दरिसियइं जहिं भावइ तहिं लग्गु ॥106॥

सुक्खअडा दुइ दिवहडइं पुणु दुक्खहं परिवाडि।
हियडा हउं पइं सिक्खवमि चित्त करिज्जहि वाडि ॥107॥

मूढा देह म रज्जियइ देह ण अप्पा होइ।
देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥108॥

जेहा पाणहं झुंपडा तेहा पुत्थिय काउ।
तित्थु जि णिवसइ पाणिवइ तहिं करि जोइय भाउ ॥109॥

मूलु छंडि जो डाल चडि कहं तह जोयाभास।
चीरु ण वुण्णइ जाइ वढ विणु उट्टियइं कपास ॥110॥

सव्ववियप्पहं तुट्टहं चेयणभावगयाहं।
कीलइ अप्पु परेण सिहु णिम्मलझाणठियाहं ॥111॥

अज्जु जिणिज्जइ करहुलउ जइ पइं देविणु लक्खु।
जित्थु चडेविणु परममुणि सव्व गयागय मोक्खु ॥112॥

करहा चरि जिणगुणथलहिं तव-विल्लडिय पगाम।
विसमी भवसंसारगइ उल्लूरियहि ण जाम ॥113॥

तव दावणु वय णियमडइ समदम कियउ पलाणु।
संजमघरहं उमाहियउ गउ करहा णिव्वाणु ॥114॥

एक्क ण जाणहि वट्टडिय अवरु ण पुच्छहि कोइ।
अड्डवियड्डहं डुंगरहं णर भज्जंता जोइ ॥115॥

वट्ट जु छोडिवि मउलियउ सो तरुवरु अकयत्थु।
रीणा पहिय ण वीसमिय फलहिं ण लायउ हत्थु ॥116॥

छहदंसण-धंधइ पडिय मणहं ण फिट्टिय भंति।
एक्कु देउ छह भेउ किउ तेण ण मोक्खहं जंति ॥117॥

अप्पा मेल्लिवि एक्कु पर अण्णु ण वइरिउ कोइ।
जेण विणिम्मिय कम्मडा जइ पर फेडइ सोइ ॥118॥

जइ वारउं तो तहिं जि पर अप्पहं मणु ण धरेइ।
विसयहं कारणि जीवडउ णरयहं दुक्ख सहेइ ॥119॥

जीव म जाणहि अप्पणा विसया होसहिं मज्झु।
फल किमपाकह जेम तिम दुक्ख करेसहिं तुज्झु ॥120॥

विसया सेवहि जीव तुहुं दुक्खहं साहक जेण।
तेण णिरारिउ पज्जलइ हुयवहु जेम घिएण ॥121॥

असरीरहं संधाणु किउ सो धाणुक्कु णिरुत्तु।
सिवतत्तिं जो संधियउ सो अच्छइ णिच्चिंतु ॥122॥

हलि सहि काइं करइ सो दप्पणु।
जहिं पडिबिंबु ण दीसइ अप्पणु ॥
धंधवालु मो जगु पडिहासइ।
घरि अच्छंतु ण घरवइ दीसइ ॥123॥

जसु जीवंतहं मणु मुवउ पंचेंदियहं समाणु।
सो जाणिज्जइ मोक्कलउ लद्धउ पउ णिव्वाणु ॥124॥

किं किज्जइ बहु अक्खरहं जे कालिं खय जंति।
जेम अणक्खरु संतु मुणि तव वढ मोक्खु कहंति ॥125॥

छहदंसणगंथिं बहुल अवरुप्परु गज्जंति।
जं कारणु तं एक्कु पर विवरेरा जाणंति ॥126॥

सिद्धंतपुराणहिं वेय वढ बुज्झंतहं णउ भंति।
आणंदेण वि जाम गउ ता वढ सिद्धि कहंति ॥127॥

सिव-सत्तिहिं मेलावडा इहु पसुवाहम्मि होइ।
भिण्णिय सत्ति सिवेण सिहु विरला बुज्झइ कोइ ॥128॥

भिण्णउ जेहिं ण जाणियउ णियदेहहं परमत्थु।
सो अंधउ अवरहं अंधयहं किम दरिसावइ पंथु ॥129॥

जोइय भिण्णउ झाय तुहुं देहहं णिय अप्पाणु।
जइ देहु वि अप्पउ मुणहि णवि पावहि णिव्वाणु ॥130॥

छत्तु वि पाइ सुगरुयडा सयलकालसंतावि।
णियदेहडइ वसंतयहं पाहण वाडि वहाइ ॥131॥

मा मुट्टा पसु गरुयडा सयल काल झंखाइ।
णियदेहहं वि वसंतयहं सुण्णा मढ सेवाइ ॥132॥

पाहुडदोहा मूल (दोहा 133 से 176)

रायवयल्लहिं छहरसहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥133॥

तोडिवि सयल वियप्पडा अप्पहं मणु वि धरेहि।
सोक्खु णिरंतरु तहिं लहहि लहु संसारु तरेहि ॥134॥

अरि जिय जिणवरि मणु ठवहि विसयकसाय चएहि।
सिद्धमहापुरि पइसरहि दुक्खहं पाणिउ देहि ॥135॥

मुंडियमुंडिय मुंडिया, सिरु मुंडिउ चित्तु ण मुंडिया।
चित्तहं मुंडणु जे कियउ, संसारहं खंडणु ते कियउ ॥136॥

अप्पु कहिज्जइ काइं तासु जो अच्छइ सव्वंगओ संते।
पुण्ण-विसज्जणु काइं तासु जो हलि इच्छइ परमत्थें ॥137॥

गमणागमणविवज्जियउ जो तइलोयपहाणु।
गंगा गरुवइ देउ किय सो सण्णाणु अयाणु ॥138॥

पुण्णेण होइ विहवो विहवेण मओ मएण मइमोहो।
मइ-मोहेण य णरयं ते पुण्णं अम्ह मा होउ ॥139॥

कासु समाहि करउं को अंचउं
छोपु-अछोपु भणिवि को वंचउं
हलि सहि कलहु केण सम्माणउं।
जहिं जहिं जोवउं तहिं अप्पाणउं ॥140॥

जइ मणि कोहु करिवि कलहिज्जइ।
तो अहिसेउ णिरंजणु किज्जइ।
जहिं-जहिं जोवइ तहिं णहि कोविउ,
हउं णवि कासु वि मज्झु ण कोविउ ॥141॥

णमिओसि ताम जिणवर जाम ण मुणिओसि देहमज्झम्मि।
ता केण णवज्जए कस्स जइ मुणियउ देहमज्झम्मि ॥142॥

ता संकप्पवियप्पा कम्मं अकुणंतु सुहासुहजणयं।
अप्पसरूवासिद्धी जाम ण हियए परिफुरइ ॥143॥

गहिलउ गहिलउ जणु भणइ गहिलउ मं करि खोहु।
सिद्धमहापुरि पइसरहु उप्पाडेविणु मोहु ॥144॥

अणहउ अक्खरु जं उप्पज्जइ।
अणु वि किं पि अण्णाण ण किज्जइ ॥
आयइं चित्तिं लिहि मणु धारिवि।
सोउ णिचिंतिउ पाउ पसारिवि ॥145॥

कि बहुएं अडवड वडिणा देह ण अप्पा होइ।
देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥146॥

पोत्था पढएं मोक्खु कहं मणु वि असुद्धउ जासु।
वहयारउ लुद्धउ णवइ मूलट्ठिउ हरिणासु ॥147॥

दयाविहीणउ धम्मडा णाणिय कह वि ण जोइ।
बहुएँ सलिलविरोलियइं करु चोप्पडा ण होइ ॥148॥

भल्लजणाह णासंति गुण जहिं सहु संग खलेहिं।
वइसाणरु लोहहं मिलिउ पिट्टिज्जइ सुघणेहिं ॥149॥

हुयवहि णीइ ण संकया धवलत्तणु संखस्स।
फिट्टीसइ मा भंति करि छुडु मिलिया हु परस्स ॥150॥

संखसमुद्दहिं मुक्कियए एही होइ अवत्थ।
जो दुव्वाहहं चुंबिया लाएविणु गलि हत्थ ॥151॥

छंडेविणु गुणरयणणिहि अग्घथडिहिं घिप्पंति।
तहिं संखाहं विहाणु पर फुक्किज्जंति ण भंति ॥152॥

महुयर सुरतरुमंजरिहिं परिमलु रसिवि हयास।
हियडा फुट्टिवि किं ण मुयउ ढंढोलंतु पलास ॥153॥

मुंडु मुंडाइवि सिक्ख धरि धम्महं वद्धी आस।
णवरि कुडुंबउ मेलियउ छुडु मिल्लिया परास ॥154॥

णग्गत्तणि जे गव्विया विग्गुत्ता ण गणंति।
गंथहं बाहिरभिंतरहिं एक्कु वि जे ण मुअंति ॥155॥

अम्मिय यहु मणु हत्थिया विंझह जंतउ वारि।
तं भंजेसइ सील-वणु पुणु पडिसइ संसारि ॥156॥

जे पढिया जे पंडिया जाहि वि माणु-मरट्टु।
ते महिलाणहं पिडि पडिय भमियइ जेम घरट्टु ॥157॥

विद्धा वम्मा मुट्ठिएण फुसिवि लिहहि तुहुं ताम।
जह संखहं जीहालु सिवि सड्ढिल्लइ ण जाम ॥158॥

पत्तिय तोडहि तडतडाइ णाइं पइट्ठा उट्टु।
एव ण जाणहि मोहिया को तोडइ को तुट्टु ॥159॥

पत्तिय पाणिउ दब्भ तिल सव्वइं जाणि सवण्णु।
जं पुणु मोक्खहं जाइवउ तं कारणु कुइ अण्णु ॥160॥

पत्तिय तोडि म जोइया फलहिं जि हत्थु म वाहि।
जसु कारणि तोडेहि तुहुं सो सिउ एत्थु चडाहि ॥161॥

देवलु पाहणु तित्थजलु पोत्थइं सव्वइं कव्वु।
वत्थुजु दीसइ कुसुमियउ इंधणु होसइ सव्वु ॥162॥

तित्थइं तित्थ भमंतयहं किं णेहा फल हूव।
बाहिरु सुद्धउ पाणियहं अब्भिंतरु किम हूव ॥163॥

तित्थइं तित्थ भमेहि वढ धोयउ चम्मु जलेण।
एहु मणु किम धोएसि तुहुं मइलउ पावमलेण ॥164॥

जोइय हियडइ जासु पर एक्कु ण णिवसइ देउ।
जम्मणमरणविवज्जियउ किम पावइ परलोउ ॥165॥

एक्कु सुवेयइ अण्णु ण वेयइ।
तासु चरिउ णउ जाणहिं देवइं ॥
जो अणुहवइ सो जि परियाणइ।
पुच्छंतहं समित्ति को आणइ ॥166॥

जं लिहिउ ण पुच्छिउ कहण जाइ,
कहियउ कासु वि णउ चित्ति ठाइ।
अह गुरुउवएसें चित्ति ठाइ,
तं तेम धरंतह कहिमि ठाइ ॥167॥

कड्ढइ सरिजलु जलहिविपिल्लउ।
जाणु पवाणु पवणपडिपिल्लिउ ॥
बोहु विबोहु तेम संघट्टइ।
अवर हि उत्तउ ता णु पयट्टइ ॥168॥

अंबरि विविहु सद्दु जो सुम्मइ।
तहिं पइसरहुं ण वुच्चइ दुम्मइ ॥
मणु पंचहिं सिहु अत्थवण जाइ।
मूढा परमतत्तु फुडु तिहिं जि ठाइ ॥169॥

अखइ णिरामइ परमगइ अज्ज वि लउ ण लहंति।
भग्गी मणहं ण भंतडी तिम दिवहडा गणंति ॥170॥

सहजअवत्थहिं करहुलउ जोइय जंतउ वारि।
अखइ णिरामइ पेसियउ सइं होसइ संहारि ॥171॥

अखइ णिरामइ परमगइ मणु घल्लेप्पिणु मिल्लि।
तुट्टेसइ मा भंति करि आवागमणहं वेल्लि ॥172॥

एम्वइ अप्पा झाइयइ अविचलु चित्तु धरेवि।
सिद्धिमहापुरि जाइयइ अट्ठ वि कम्म हणेवि ॥173॥

अक्खरचडिया मसिमिलिया पाढंता गय खीण।
एक्क ण जाणी परम कला कहिं उग्गउ कहिं लीण ॥174॥

वे भंजेविणु एक्कु किउ मणहं णु चारिय विल्लि।
तहि गुरुवहि हउं सिस्सिणी अण्णहि करमि ण लल्लि ॥175॥

अग्गइं पच्छइं दहदिहहिं जहिं जोवउं तहिं सोइ।
ता महु फिट्टिय भंतडी अवसु ण पुच्छइ कोइ ॥176॥

पाहुडदोहा मूल (दोहा 177 से 220)

जिम लोणु विलिज्जइ पाणियहं तिम जइ चित्तु विलिज्ज।
समरसि हूवइ जीवडा काइं समाहि करिज्ज ॥177॥

जइ एक्कहि पावीसि पिउ अक्किय कोडि करीसु।
णं अंगुलि पय पयडणइं जिम सव्वंगइ सीसु ॥178॥

तित्थइं तित्थ भमंतयहं संताविज्जइ देहु।
अप्पे अप्पा झाइयइ णिव्वाणह पउ देहु ॥179॥

जो पइं जोइउं जोइया तित्थइं तित्थ भमेइ।
सो सिउ पइं सिहुं हिंडियउ लहिवि ण सक्किउ तोइ ॥180॥

मूढा जोवइ देवलइं लोयहिँ जाइं कियाइं।
देह ण पिच्छइ अप्पणिय जहिँ सिउ संतु ठियाइं ॥181॥

वामिय किय अरु दाहिणिय मज्झइ हवइ णिराम।
तहिं गामडा जु जोगवइ अवर वसावइ गाम ॥182॥

देव तुहारी चिंत महु मज्झणपसरवियालि।
तुहु अच्छेसहु जाइ सुउ परम णिरामय पालि ॥183॥

तुट्टइ बुद्धि तडत्ति जहिं मणु अंथवणहं जाइ।
सो सामिय उवएसु कहि अण्णहिं देवहिं काइं ॥184॥

सयलीकरणु ण जाणियउ पाणियपसण्णह भेउ।
अप्पापरहु ण मेलियउ गंगडु पुज्जइ देउ ॥185॥

अप्पापरहं ण मेलियउ आवागमणु ण भग्गु।
तुस कंडंतहं कालु गउ तंदुलु हत्थि ण लग्गु ॥186॥

देहादेवलि सिउ वसइ तुहु देवलइं णिएहि।
हासउ महु मणि अत्थि इहु सिद्धें भिक्ख भमेहि ॥187॥

वणि देवलि तित्थइं भमहि आयासो वि णियंतु।
अम्मिय विहडिय मेडिया पसुलोगडा भमंतु ॥188॥

वे छंडेविणु पंथडा विच्चे जाइ अलक्खु।
तहो फल बेयहु किंपि णउ जइ सो पावइ लक्खु ॥189॥

जोइय विसमी जोयगइ मणु वारणह ण जाइ।
इंदियविसय जि सुक्खडा तित्थइ बलि-बलि जाइ ॥190॥

बद्धउ तिहुयणु परिभमइ मुक्कउ पउ वि ण देइ।
दिक्खु ण जोइय करहुलउ विवरेरउ पउ देइ ॥191॥

संतु ण दीसइ तत्तु ण वि संसारेहिं भमंतु।
खंधावारिउ जिउ भमइ अवराडइहिं रहंतु ॥192॥

उव्वस वसिया जो करइ वसिया करइ जु सुण्णु।
बलि किज्जउ तसु जोइयहि जासु ण पाउ ण पुण्णु ॥193॥

कम्मु पुराइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ।
अणुदिणु झायइ देउ जिणु सो परमप्पउ होइ ॥194॥

विसया सेवइ जो वि परु बहुला पाउ करेइ।
गच्छइ णरयहँ पाहुणउ कम्मु सहाउ लएइ ॥195॥

कुहिएण पूरिएण य छिद्देण य खारमुत्तगंधेण।
संताविज्जइ लोओ जह सुणहो चम्मखंडेण ॥196॥

देखंताहं वि मूढ वढ रमियइं सुक्खु ण होइ।
अम्मिए मुत्तहं छिद्दु लहु तो वि ण विणडइ कोइ ॥197॥

जिणवरु झायहि जीव तुहु विसयकसायहं खोइ।
दुक्खु ण देक्खहि कहिं मि वढ अजरामरु पउ होइ ॥198॥

विसयकसाय चएवि वढ अप्पहं मणु वि धरेहि।
चूरिवि चउगइ णित्तुलउ परमप्पउ पावेहि ॥199॥

इंदियपसरु णिवारि वढ मण जाणहि परमत्थु।
अप्पा मेल्लिवि णाणमउ अवरु विडावइ सत्थु ॥200॥

विसया चिंति म जीव तुहु विसय ण भल्ला होंति।
सेवंताहं वि महुर वढ पच्छइं दुक्खइं दिंति ॥201॥

विसयकसायहं रंजियउ अप्पहिं चित्तु ण देइ।
बंधिवि दुक्कियकम्मडा चिरु संसारु भमेइ ॥202॥

इंदियविसय चएवि वढ करि मोहहं परिचाउ।
अणुदिणु झावहि परमपउ तो एहउ ववसाउ ॥203॥

णिज्जियसासो णिप्फंदलोयणो मुक्कसयलवावारो।
एयाइं अवत्थ गओ सो जोयउ णत्थि संदेहो ॥204॥

तुट्टे मणवावारे भग्गे तह रायरोससब्भावे।
परमप्पयम्मि अप्पे परिट्ठिए होइ णिव्वाणं ॥205॥

विसया सेवहि जीव तुहु छंडिवि अप्पसहाउ।
अण्णइं दुग्गइं जाइसिहि तं एहउ ववसाउ ॥206॥

मंतु ण तंतु ण धेउ ण धारणु।
ण वि उच्छासह किज्जइ कारणु ॥
एमइ परमसुक्खु मुणि सुव्वइ।
एही गलगल कासु ण रुच्चइ ॥207॥

उववासविसेस करेवि बहु एहु वि संवरु होइ।
इच्छइ किं बहु वित्थरेण मा पुच्छिज्जइ कोइ ॥208॥

तउ करि दहविहु धम्मु करि जिणभासिउ सुपसिद्धु।
कम्महं णिज्जर एहु जिय फुडु अक्खिउ मइं तुज्झु ॥209॥

दहविहु जिणवरभासियउ धम्मु अहिंसासारु।
अहो जिय भावहि एक्कमणु जिम तोडहि संसारु ॥210॥

भवि भवि दंसणु मलरहिउ भवि भवि करउं समाहि।
भवि भवि रिसि गुरु होइ महु णिहय मणुब्भववाहि ॥211॥

अणुपेहा बारह वि जिय भाविवि एक्कमणेण।
रामसीहु मुणि इम भणइ सिवपुरि पावहि जेण ॥212॥

सुण्णं ण होइ सुण्णं दीसइ सुण्णं च तिहुवणे सुण्णं।
अवहरइ पावपुण्णं सुण्णसहावे गओ अप्पा ॥213॥

बेपंथेहिं ण गम्मइ बेमुहसूई ण सिज्जए कंथा।
विण्णि ण हुंति अयाणा इंदियसोक्खं च मोक्खं च ॥214॥

उववासह होइ पलेवणा संताविज्जइ देहु।
घरु डज्झइ इंदियतणउ मोक्खहं कारणु एहु ॥215॥

अच्छउ भोयणु ताह घरि सिद्धु हरेप्पिणु जेत्थु।
ताह समउ जय कारियइं ता मेलियइ संमत्तु ॥216॥

जइ लद्धउ माणिक्कडउ जोइय पुहवि भमंत।
बंधिज्जइ णियकप्पडइं जोइज्जइ एक्कंत ॥217॥

वादविवादा जे करहिं जाहिं ण फिट्टिय भंति।
जे रत्ता गउपावियइं ते गुप्पंत भमंति ॥218॥

कालहि पवणहि रविससिहि चहु एक्कट्ठइ वासु।
हउं तुहिं पुच्छउं जोइया पहिले कासु विणासु ॥219॥

ससि पोखइ रवि पज्जलइ पवणु हलोले लेइ।
सत्त रज्जु तमु पिल्लि करि कम्महं कालु गिलेइ ॥220॥

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