पाहुडदोहा दोहा एवं अर्थ
मुनि रामसिंह
मुनि रामसिंह कृत पाहुडदोहा के अपभ्रंश मूल दोहे 1 से 220, हर दोहे के नीचे उसका अर्थ, 44-44 दोहों के पाँच भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ। अर्थ संलग्न ग्रंथ (भारतीय ज्ञानपीठ; सम्पादन देवेन्द्रकुमार शास्त्री) में हर दोहे के बाद छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; शब्दार्थ, भावार्थ और पाठान्तर नहीं लिए, वे नीचे की पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।
केवल मूल दोहे (छपाई की टिप्पणियों सहित): पाहुडदोहा मूल (मुनि रामसिंह) | Pahuddoha Mool (Muni Ramsingh)
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दोहा 1 से 44
गुरु दिणयरु गुरु हिमकिरणु गुरु दीवउ गुरु देउ।
अप्पहं परहं परंपरहं जो दरिसावइ भेउ ॥1॥
अर्थ: जो परम्परा से आत्मा (निज शुद्धात्मा) और पर (पराया) का भेद दर्शाति हैं - ऐसे गुरु सूर्य (दिनकर) हैं, गुरु चन्द्रमा (हिमकिरण) हैं, गुरु दीपक हैं और गुरु देव हैं।
बलिहारी गुरु अप्पणइं दिउ हांडी सय वार।
माणस हुंतउं देउ किउ करंत ण लग्गइ वार ॥2॥
अर्थ: उन गुरु की बलिहारी है जिन ने एक बार नहीं सैकड़ों बार हमें मनुष्य से देव बनाया है। देव पर्याय का जन्म देने में उन्होंने देर नहीं लगाई।
अप्पायत्तउ जं जि सुहु तेण जि करि संतोसु।
पर सुहु वढ चिंतंतयहं हियइ ण फिट्टइ सोसु ॥3॥
अर्थ: हे मूढ! जो सुख आत्मा के अधीन (आश्रित) है, उससे ही सन्तोष कर। जो पर में (अन्य के अवलम्बन से) सुख का चिन्तन करता है, उसकी चिन्ता हृदय से दूर नहीं होती।
जं सुहु विसयपरंमुहउ णिय अप्पा झायंतु।
तं सुहु इंदु वि णवि लहइ देविहिं कोडि रमंतु ॥4॥
अर्थ: इन्द्रियों के विषयों से पराङ्मुख, निवृत्त होकर अपने आत्मा के ध्यान से जो सुख मिलता है, वह सुख करोड़ों देवियों के साथ रमण करने वाले इन्द्र को भी नहीं मिलता है।
आभुंजंतउ विसयसुहु जे णवि हियइ धरंति।
ते सासयसुहु लहु लहहिं जिणवर एम भणंति ॥5॥
अर्थ: विषय-सुख का भोग करते हुए भी जो उसे हृदय में धारण नहीं करते अर्थात् आसक्त नहीं होते, वे अल्पकाल में शाश्वत सुख को प्राप्त करते हैं; ऐसा जिनवर कहते हैं।
णवि भुंजंता विसयसुहु हियडइ भाउ धरंति।
सालिसित्थु जिम वप्पुडउ णर णरयहं णिवडंति ॥6॥
अर्थ: विषय-सुख का भोग न करते हुए भी जो प्राणी हृदय में उसे भोगने का भाव धारण करते हैं, वे तन्दुल मच्छ (शालिसिक्थ) की तरह नरक में उत्पन्न होते (पड़ते) हैं।
धंधइं पडियउ सयलु जगु कम्मइं करइ अयाणु।
मोक्खह कारणु एक्कु खणु णवि चिंतइ अप्पाणु ॥7॥
अर्थ: धन्धे में लगा हुआ सम्पूर्ण जग अज्ञान से कर्म करता है, किन्तु मोक्ष के कारणभूत निज शुद्धात्मा का चिन्तन एक क्षण के लिए भी नहीं करता है।
आयइं अडबड वडवडइ पर रंजिज्जइ लोउ।
मणसुद्धइ णिच्चल ठियइ पाविज्जइ परलोउ ॥8॥
अर्थ: ये जो अड़बड़ (ऊटपटाँग) बड़बड़ाते हैं, उनसे लोक में अन्य लोगों का मनोरंजन होता है। किन्तु मन के शुद्ध तथा निश्चल हो जाने पर परलोक में परम सुख प्राप्त किया जा सकता है।
जोणिहिं लक्खहिं परिभमइ अप्पा दुक्खु सहंतु।
पुत्तकलत्तहं मोहियउ जाव ण बोहि लहंतु ॥9॥
अर्थ: जब तक यह आत्मा बोधि को प्राप्त नहीं करता, तब तक पुत्र-स्त्री आदि में मोहित होकर दुःख सहता हुआ लाखों योनियों में परिभ्रमण करता है।
अण्णु म जाणहि अप्पणउ घरु-परियणु जो इटठु।
कम्मायत्तउ कारिमउ आगमि जोइहिँ सिट्ठु ॥10॥
अर्थ: हे जीव! जिन घर-परिजनों को तुम अपना इष्ट समझ रहे हो, वे तुमसे अन्य (भिन्न) हैं, उनको अपना मत जानो। क्योंकि कर्म के वश से इनकी रचना हुई है। योगियों ने इसे (कर्म-रचना को) आगम की शिक्षा कहा है।
जं दुक्खु वि तं सुक्खु किउ जं सुहु तं पि य दुक्खु।
पइं जिय मोहहिं वसि गयउ तेण ण पायउ मोक्खु ॥11॥
अर्थ: हे जीव! मोह के वश होकर तुमने दुःख को सुख माना और सुख को दुःख मान लिया; इसलिए मोक्ष प्राप्त नहीं किया।
मोक्खु ण पावहि जीव तुहुं धणु-परियणु चिंतंतु
तोउ वि चिंतहि तउ वि तउ पावहि सुक्खु महंतु ॥12॥
अर्थ: हे जीव! तुम धन और परिवार के लोगों की चिन्ता करते रहते हो, इसलिए कर्म से छुटकारा नहीं पा सकते। अब तुम निज शुद्धात्मा का चिन्तन करो, जिससे महान् सुख को प्राप्त करोगे।
घरवासउ मा जाणि जिय दुक्कियवासउ एहु।
पासु कयंते मंडियउ अविचलु णीसंदेहु ॥13॥
अर्थ: हे जीव! इसे गृहवास मत जानो। यह तो दुष्कृतवास (पापों में बसा हुआ) है। यह निःसन्देह है कि यम (आयुकर्म) के द्वारा फैलाया गया यह अविचल, निश्चल जाल है।
मूढा सयलु वि कारिमउ मं फुडु तुहुं तुस कंडि।
सिवपहि णिम्मलि करहि रइ घरु-परियणु लहु छंडि ॥14॥
अर्थ: हे मूढ! (बाहर में) यह सब कर्म कृत है। अतः प्रकट रूप से तुम भूसे को मत कूटो। शीघ्र ही घर-परिजन को छोड़कर निर्मल मोक्षमार्ग में प्रीति करो।
मोहु विलिज्जइ मणु मरइ तुट्टइ सासु-णिसासु।
केवलणाणु वि परिणवइ अंबरि जाह णिवासु ॥15॥
अर्थ: आकाश (ध्रुव स्वभाव) में जिसका वास हो जाता है, उसका मोह नष्ट हो जाता है, मन मर जाता है, श्वासोच्छ्वास छूट जाता है, टूट जाता है; केवल केवलज्ञान रूप परिणमन करता है।
सप्पें मुक्की कंचुलिय जं विसु तं ण मुएइ।
भोयहं भाउ ण परिहरइ लिंगग्गहणु करेइ ॥16॥
अर्थ: जिस प्रकार साँप केंचुली को छोड़ देता है, लेकिन विष को नहीं छोड़ता है; उसी प्रकार अज्ञानी जीव द्रव्यलिंग धारण कर बाहर में त्याग करता है, किन्तु भीतर में से विषय-भोगों की भावना को नहीं छोड़ता।
जो मुणि छंडिवि विसयसुह पुणु अहिलासु करेइ।
लुंचणु सोसणु सो सहइ पुणु संसारु भमेइ ॥17॥
अर्थ: जो मुनि विषय-सुखों को छोड़कर फिर उनको प्राप्त करने की अभिलाषा करता है, वह केशलोंचन तथा शरीर-शोषण के क्लेश सहता हुआ पुनः संसार में परिभ्रमण करता है।
विसया-सुह दुइ दिवहडा पुणु दुक्खहं परिवाडि।
भुल्लउ जीव म बाहि तुहं अप्पाखंधि कुहाडि ॥18॥
अर्थ: विषयों के सुख तो दो दिन के हैं। फिर, दुक्खों की परिपाटी चलेगी। इसलिए हे भोले जीव! तुम अपने कन्धे पर कुल्हाड़ी मत मारो।
उव्वडि चोप्पडि चिट्ठ करि देहि सुमिट्ठाहारु।
सयल वि देह-णिरत्थ गय जिम दुज्जण-उवयारु ॥19॥
अर्थ: उबटन, तेल-मर्दन कर एवं मीठा भोजन खिलाकर शरीर को चाहे जितना सजाया जाए, लेकिन दुर्जन के प्रति किए गए सभी उपकारों की भाँति शरीर के लिए किए गए समस्त कार्य निरर्थक हैं।
अथिरेण थिरा मइलेण णिम्मला णिग्गुणेण गुणसारा।
काएण जा विढप्पइ सा किरिया किण्ण कायव्वा ॥20॥
अर्थ: चंचल, मैले, निर्गुण शरीर से यदि स्थिर, निर्मल और गुणसार क्रिया पैदा की जा सकती है, तो क्यों नहीं कमानी चाहिए?
उम्मूलिवि ते मूलगुण उत्तरगुणहिं विलग्ग।
वाण्णर जेम पलंबचुय बहुय पडेविणु भग्ग ॥21॥
अर्थ: जो साधु मूलगुणों को खण्डित कर उत्तरगुणों से अलग हो जाता है, वह डाल से चूके हुए बन्दर के समान बहुत नीचे गिरकर भग्न/घायल हो जाता है।
वरु विसु विसहरु वरु जलणु वरु सेविउ वणवासु।
णउ जिणधम्परम्मुहउ मिच्छत्तिय सहु वासु ॥22॥
अर्थ: कदाचित् विष, विषधर (साँप), अग्नि तथा वनवास का सेवन भला है, किन्तु जैनधर्म से पराङ्मुख मिथ्यादृष्टियों का संग भला नहीं है।
सो णत्थि इह पएसो चउरासीलक्खजोणिमज्झम्मि।
जिणवयणं अलहंतो जत्थ ण दुरुदुल्लिओ जीवो ॥23॥
अर्थ: चौरासी लाख योनियों में ऐसा कोई प्रदेश नहीं है जहाँ जिनवचन (जिनवाणी) को प्राप्त किए बिना यह जीव भ्रमण नहीं कर चुका हो।
अप्पा बुज्झिउ णिच्चु जइ केवलणाणसहाउ।
ता परि किज्जइ काइं वढ तणु उप्परि अणुराउ ॥24॥
अर्थ: यदि अपने आप को नित्य तथा केवलज्ञान स्वभावी जान लिया, तो हे मूढ! इस शरीर पर ममता (अनुराग) क्यों करता है?
जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ कम्महं हेउ करंतु।
सो मुणि पावइ सोक्खु णवि सयलइं सत्थ मुणंतु ॥25॥
अर्थ: जिस मुनि (साधु, सन्त) के मन में ज्ञान (आत्मज्ञान, सम्यग्ज्ञान) प्रकाशित नहीं होता, वह सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञाता होने पर भी जिन कारणों से कर्म बँधते हैं, उनको करता हुआ सुख प्राप्त नहीं करता।
बोहिविवज्जिउ जीव तुहुं विवरिउ तच्चु मुणेहि।
कम्मविणिम्मिय भावडा ते अप्पाण भणेहि ॥26॥
अर्थ: हे जीव! तुम तत्त्वज्ञान से रहित होने के कारण तत्त्व (वस्तु-स्वरूप) को विपरीत मानते हो। जो भाव कर्मों से बने हुए हैं, उनको तुम अपना कहते हो।
हउं गोरउ हउं सामलउ हउं जि विभिण्णउ वण्णु।
हउं तणु अंगउ थूलु हउं एउह जीव ण मण्णु ॥27॥
अर्थ: मैं गोरा हूँ, मैं साँवला हूँ तथा मैं विभिन्न रंगों का हूँ। मैं पतले अंग का हूँ, मैं मोटा हूँ - ऐसा मत मान।
णवि तुहुं पंडिउ मुक्खु णवि णवि ईसरु णवि णीसु।
णवि गुरु कोइ वि सीसु णवि सव्वइं कम्मविसेसु ॥28॥
अर्थ: न तुम पण्डित हो, न मूर्ख; न तुम ईश्वर हो, न नरेश; न गुरु हो, न कोई शिष्य - (ये सब रूप) सभी कर्म की विशेषताएँ हैं।
णवि तुहुं कारणु कज्जु णवि णवि सामिउ णवि भिच्चु।
सूरउ कायरु जीव णवि णवि उत्तमु णवि णिच्चु ॥29॥
अर्थ: न तुम कारण हो (किसी के) और न कार्य; न तुम स्वामी हो, न सेवक; न शूरवीर हो, न कायर; न तुम उत्तम हो और न नीच।
पुण्णु वि पाउ वि कालु णहु धम्मु अहम्मु ण काउ।
एक्कु वि जीव ण होहि तुहुं मेल्लिवि चेयणभाउ ॥30॥
अर्थ: हे जीव! तुम एक चेतन भाव को छोड़कर न पुण्य, न पाप, न काल, न आकाश, न धर्म, न अधर्म और न शरीर हो।
णवि गोरउ णवि सामलउ णवि तुहुं एक्कु वि वण्णु।
णवि तणु अंगउ थूलु णवि एहउ जाणि सवण्णु ॥31॥
अर्थ: न तुम गोरे हो, न साँवले। तुम एक भी रंग के नहीं हो। न तुम दुबले अंग के हो और न स्थूल हो। इन सबको तुम अपनी जाति का मत समझो।
हउं वरु बंभणु णवि वइसु णउ खत्तिउ णवि सेसु।
पुरिसु णउंसउ इत्थि णवि एहउ जाणि विसेसु ॥32॥
अर्थ: मैं न श्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ और न वैश्य। मैं क्षत्रिय तथा शूद्र भी नहीं हूँ। मैं पुरुष, स्त्री और नपुंसक भी नहीं हूँ। यही विशेष रूप से जानो।
तरुणउ बुड्ढउ बालु हउं सूरउ पंडिउ दिव्वु।
खवणउ वंदउ सेवडउ एहउ चिंति म सव्वु ॥33॥
अर्थ: मैं जवान हूँ, बूढ़ा हूँ, बालक हूँ, शूरवीर हूँ, दिव्य पण्डित हूँ, क्षपणक (दिगम्बर), वन्दक (भगवा वस्त्रधारी), श्वेताम्बर हूँ - इस सब की चिन्ता मत कर।
देहहो पिक्खिवि जरमरणु मा भउ जीव करेहि।
जो अजरामरु बंभु परु सो अप्पाण मुणेहि ॥34॥
अर्थ: हे जीव! देह का बुढ़ापा-मरण देखकर भय मत कर। जो अजर, अमर, परम ब्रह्म है, उसे ही अपना (स्वरूप) मान।
देहहं उब्भउ जरमरणु देहहं वण्ण विचित्त।
देहहं रोया जाणि तुहुं देहहं लिंगइं मित्त ॥35॥
अर्थ: हे मित्र! बुढ़ापा और मरण ये दोनों शरीर के हैं। विचित्र रंग भी शरीर के ही हैं। रोग तथा स्त्री-पुरुषादि लिंग शरीर के ही जानना चाहिए।
अत्थि ण उब्भउ जरमरणु रोय वि लिंगइं वण्ण।
णिच्छइ अप्पा जाणि तुहुं जीवहं णेक्क वि सण्ण ॥36॥
अर्थ: बुढ़ापा और मरण ये दोनों आत्मा के नहीं हैं। रोग, लिंग तथा वर्ण भी आत्मा में नहीं हैं। हे आत्मन्! निश्चय से यह जान कि तुममें किसी एक का भी अस्तित्व नहीं है।
कम्महं केरउ भावडउ जइ अप्पणा भणेहि।
तो वि ण पावहि परमपउ पुणु संसार भमेहि ॥37॥
अर्थ: यदि तुम कर्मों के भाव को अपना भाव कहते हो, तो फिर निर्वाण (परम पद) प्राप्त नहीं कर सकते। तुम इस संसार में ही भ्रमण करते रहोगे।
अप्पा मेल्लिवि णाणमउ अवरु परायउ भाउ।
सो छंडेविणु जीव तुहुं झायहि सुद्धसहाउ ॥38॥
अर्थ: हे जीव! ज्ञानमय आत्मा के (भाव के) अतिरिक्त अन्य सभी भाव परभाव हैं। उनको छोड़कर तुम अपने शुद्ध स्वभाव का ध्यान करो।
वण्णविहूणउ णाणमउ जो भावइ सब्भाउ।
संतु णिरंजणु सो जि सिउ तहिं किज्जइ अणुराउ ॥39॥
अर्थ: राग-रंग से विहीन, ज्ञानमय जो निज स्वभाव की भावना भाता है एवं जो सन्त, निरंजन है, वही शिव है तथा उसी में अनुराग करना चाहिए।
तिहुवणि दीसइ देउ जिणु जिणवरु तिहुवणु एउ।
जिणवरु दीसइ सयलु जगु को वि ण किज्जइ भेउ ॥40॥
अर्थ: तीनों लोकों में एक देव जिनदेव दिखलाई पड़ते हैं और तीनों लोक उन जिनवर में झलकते हैं। जिनवर के ज्ञान में सम्पूर्ण लोक एक साथ प्रतिबिम्बित होता है। अतः इसमें कोई भेद नहीं करना चाहिए।
बुज्झहु बुज्झहु जिणु भणइ को बुज्झइ हलि अण्णु।
अप्पा देहहं णाणमउ छुडु बुज्झियउ विभिण्णु ॥41॥
अर्थ: जिनदेव कहते हैं कि जानो! जानो! यदि ज्ञानस्वरूपी आत्मा को देह से भिन्न जान लिया, तो फिर अरे! अन्य को जानने से क्या?
वंदहु वंदहु जिणु भणइ को वंदउ हलि एत्थु।
णियदेहहं णिवसंतयहं जइ जाणिउ परमत्थु ॥42॥
अर्थ: जिनदेव कहते हैं कि वन्दन करो! वन्दन करो! अरे! जिसने अपनी देह में बसने वाले (भगवान् आत्मा) को परमार्थ से जान लिया, तो फिर यहाँ कौन किसकी वन्दना करे?
उपलाणहिं जोइय करहुलउ दावणु छोडिहिं जिम चरइ।
जसु अक्खयणी रामा गयउ मणु सो किम बुहु जगि रइ करइ ॥43॥
अर्थ: जिस प्रकार ऊँट पलान को देखकर बन्धन छोड़कर चरने के लिए निकल पड़ता है, वैसे ही अक्षयनिधि स्वरूप मुक्ति-रमा के प्रति गया हुआ (ज्ञानी का) मन इस संसार के ऊपर प्रीति कैसे कर सकता है?
ढिल्लउ होहि म इंदियहं पंचइं विण्णि णिवारि।
एक्क णिवारहि जीहडिय अण्ण पराइय णारि ॥44॥
अर्थ: इन्द्रियों के विषयों में ढीला नहीं होना चाहिए। पाँचों इन्द्रियों के विषयों में से कम से कम दो को तो रोकना ही चाहिए - एक जीभ को और दूसरी पर-स्त्री को।
दोहा 45 से 88
पंच बलद्द ण रक्खियइं णंदणवणु ण गओसि।
अप्पु ण जाणिउ णवि परु वि एमइं पव्वइओसि ॥45॥
अर्थ: तुमने न तो पाँचों बैलों की रखवाली की और न नन्दनवन में प्रवेश किया। तुमने न अपने आप को जाना और न पर (अन्य) को। क्या ऐसे ही संन्यासी बन गए हो?
पंचहिं बाहिरु णेहडउ हलि सहि लग्गु पियस्स।
तासु ण दीसइ आगमणु जो खलु मिलिउ परस्स ॥46॥
अर्थ: हे सखि! प्रियतम बाहर के (एक नहीं) पाँच के स्नेह में लगे हुए हैं। जो दुष्ट दूसरे से हिल-मिल गया है, उसका आना भी नहीं दिखलाई पड़ता है।
मणु जाणइ उवएसडउ जहिं सोवइ अचिंतु।
अचित्तहं चित्तु जो मेलवइ सो पुणु होइ णिचिंतु ॥47॥
अर्थ: जब मन निश्चिन्त होकर सो जाता है अर्थात् एकाग्र होकर थम जाता है, तभी वह उपदेश को समझता है। मन निश्चिन्त तभी होता है, जब अचित्त (अचेतन) से चित्त को अलग कर लेता है।
वट्टडिया अणुलग्गयहं अग्गउ जोवंताहं।
कंटउ भग्गउ पाउ जइ भज्जउ दोसु ण ताहं ॥48॥
अर्थ: जो मार्ग पर लगे हुए आगे (पथ) देखते हुए चलते हैं, उनके पैर में यदि काँटा लगने से वे घायल हो जाएँ, तो इसमें उनके भागने का कोई दोष नहीं है।
मेल्लउ मेल्लउ मोक्कलउ जहिं भावइ तहिं जाउ।
सिद्धिमहापुरि पइसरउ मा करि हरिसु विसाउ ॥49॥
अर्थ: छोड़ो, छोड़ो! (मन को सहज रूप से) स्वतन्त्र उन्मुक्त कर दो। जहाँ अच्छा लगे, वहाँ जाने दो। जब मुक्ति नगरी की ओर अग्रसर हो गए हो, तब हर्ष-विषाद मत करो।
मणु मिलियउ परमेसरहं परमेसरु वि मणस्स।
विण्णि वि समरसि हुइ रहिय पुज्ज चढाउं कस्स ॥50॥
अर्थ: मन परमात्मा से मिल गया है और परमात्मा मन से (मन के विलीन होने से) मिल गया है। दोनों एक समरस भाव को प्राप्त हो रहे हैं। इसलिए मैं पूजा किसकी करूँ? अर्थात् पूजा की सामग्री किसमें समारोपित कर चढ़ाऊँ?
आराहिज्जइ काइं देउ परमेसरु कहिं गयउ।
वीसारिज्जइ काइं तासु जो सिउ सव्वंगउ ॥51॥
अर्थ: क्या देव कहीं बाहर चला गया है जो उसकी आराधना की जाए? जो शिव (भगवान् आत्मा) सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है, उसका विस्मरण कैसे किया जा सकता है?
अम्मिए जो परु सो जि परु परु अप्पाण ण होइ।
हउं डज्झउ सो उव्वरइ वलिवि ण जोवइ सोइ ॥52॥
अर्थ: ओहो! जो पर (अन्य) है, वह पर ही है। पर अपना (आत्मा) नहीं हो सकता! क्योंकि मैं दग्ध (संतप्त) हो जाता हूँ और वह उबर जाता है। फिर वह लौटकर भी नहीं देखता।
मूढा सयलु वि कारिमउ णिक्कारिमउ ण कोइ।
जीवहु जंत ण कुडि गयइ यहु पडिछंदा जोइ ॥53॥
अर्थ: हे मूढो! यह सब (शरीर, मन-वचन, सुख-दुःख आदि) कर्म की रचना है। बिना कर्म के किसी की उत्पत्ति नहीं है - (अर्थात् जन्म-मरण कर्म के कारण हैं।) इसी दृष्टान्त को देख लो कि जीव के शरीर से निकलकर चले जाने पर उसके साथ शरीर नहीं जाता।
देहादेवलि जो वसइ सत्तिहिं सहियउ देउ।
को तहिं जोइय सत्तिसिउ सिग्घु गवेसहि भेउ ॥54॥
अर्थ: देह रूपी देवालय में जो शक्तियों से सहित देव वसता है; हे जोगी! वह शक्तिमान् शिव कौन है? इस रहस्य की शीघ्र ही गवेषणा, खोज कर।
जरइ ण मरइ ण संभवइ जो परि को वि अणंतु।
तिहुवणसामिउ णाणमउ सो सिवदेउ णिभंतु ॥55॥
अर्थ: जो न जूना-पुराना होता है, न मरता है और न उत्पन्न होता है, जो सबसे परे कोई अनन्त ज्ञानमय त्रिभुवन का स्वामी है, वह निर्भ्रान्त शिवदेव है। (अर्थात् त्रैकालिक ध्रुव, एक, अखण्ड, निष्क्रिय चैतन्य ज्योति मात्र परमात्म रूप है।)
सिव विणु सत्ति ण वावरइ सिउ पुणु सत्तिविहीणु।
दोहिं वि जाणइ सयलु जगु बुज्झइ मोहविलीणु ॥56॥
अर्थ: शिव के बिना शक्ति का व्यापार नहीं होता और शक्ति से रहित शिव कुछ नहीं कर सकता। इन दोनों को जान लेने पर सम्पूर्ण जगत् मोह में डूबा हुआ समझ में आने लगता है और मोह विलीन हो जाता है।
अण्णु तुहारउ णाणमउ लक्खिउ जाम ण भाउ।
संकप्प-वियप्प अणाणमउ दड्ढउ चित्तु वराउ ॥57॥
अर्थ: जब तक तुमने अपने ज्ञान भाव को नहीं लखा है, तब तक बेचारा चित्त अज्ञानमय संकल्प-विकल्प से दग्ध होता रहेगा।
णिच्चु णिरामउ णाणमउ परमाणंदसहाउ।
अप्पा बुज्झिउ जेण परु तासु ण अण्णु हि भाउ ॥58॥
अर्थ: परमानन्द स्वभावी नित्य, निरामय, ज्ञानमय आत्मा को जिसने जान लिया, उसके फिर अन्य कोई भाव नहीं रहता।
अम्हहिं जाणिउ एकु जिणु जाणिउ देउ अणंतु।
णवरि सु मोहें मोहियउ अच्छइ दूरि भमंतु ॥59॥
अर्थ: यदि हमने एक जिनदेव को जान लिया, तो अनन्त देवों को जान लिया। मोह (मिथ्यात्व) में मत चल। जो केवल दर्शनमोह से मोहित है, वह दूर ही घूमा करता है अर्थात् कभी जिनदेव के पास नहीं आता।
अप्पा केवलणाणमउ हियडइ णिवसइ जासु।
तिहुवणि अच्छउ मोक्कलउ पावु ण लग्गइ तासु ॥60॥
अर्थ: जिसके हृदय में केवल ज्ञानमय आत्मा (पूर्ण वीतरागी) निवास करता है, वह तीनों लोकों में मुक्त है। उसे कोई पाप नहीं लगता।
चिंतइ जंपइ कुणइ णवि जो मुणि बंधणहेउ।
केवलणाणफुरंततणु सो परमप्पउ देउ ॥61॥
अर्थ: जो मुनि बन्धन के कारण की न तो चिन्ता करता है, न उसके सम्बन्ध में कहता है और न करता है (अर्थात् अपने स्वभाव में लीन रहता है), वह केवलज्ञान से स्फुरायमान तन सहित परमात्मदेव है।
अब्भिंतरचित्तु जु मइलियइ बाहिरि काइं तवेण।
चित्ति णिरंजणु कोवि धरि मुच्चहि जेम मलेण ॥62॥
अर्थ: जो चित्त भीतर में मैला है, उसके लिए बाहर में तप करने से क्या? उस निरंजन सिद्ध परमात्मा की चित्त में स्थापना कर जिससे मलिनता से छुटकारा हो।
जेण णिरंजणि मणु धरिउ विसयकसायहिं जंतु।
मोक्खह कारणु एहु वढ अवरइ तंतु ण मंतु ॥63॥
अर्थ: जिसने विषय-कषायों में जाते हुए अपने मन को शुद्ध उपयोग में स्थिर कर लिया, तो वही स्थिरता मोक्ष का कारण है। हे मूढ! अन्य किसी तन्त्र या मन्त्र आदि से मोक्ष नहीं मिलता।
खंतु पिवंतु वि जीव जइ पावहि सासयमोक्खु।
रिसहु भडारउ किं चवइ सयलु वि इंदियसोक्खु ॥64॥
अर्थ: हे जीव! यदि तुम खाते-पीते हुए शाश्वत मोक्ष पाना चाहते हो (तो यह तुम्हारी भूल है), तो महाराज ऋषभदेव ने सम्पूर्ण इन्द्रियों का सुख क्यों त्यागा? (वास्तव में सुख इन्द्रियों में नहीं, अपने अतीन्द्रिय निर्विकल्प स्वभाव में है।)
देहमहेली एह वढ तउ संतावइ ताम।
चित्तु णिरंजणु परेण सहु समरसि होइ ण जाम ॥65॥
अर्थ: हे मूढ! यह देह रूपी महिला तुझे तब तक संतापित करती है, जब तक मन निरंजन (भगवान् आत्मा) के साथ समरस नहीं होता।
जसु मणि णाणु ण विप्फुरइ सव्व वियप्प हणंतु।
सो किम पावइ णिच्चसुहु सयलइं धम्म कहंतु ॥66॥
अर्थ: जिसके मन में सभी विकल्पों को दूर करने वाला ज्ञान स्फुरायमान नहीं होता, वह सभी धर्म की बातें कहता हुआ भी नित्य सुख को किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?
जसु मणि णिवसइ परमपउ सयलइं चिंत चवेवि।
सो पर पावइ परमगइ अट्ठइं कम्म हणेवि ॥67॥
अर्थ: सभी चिन्ताओं को छोड़कर जिसका मन परमपद (सिद्ध परमात्मा) में निवास करता है, वह फिर आठों कर्मों का नाश (हनन) कर परमगति (निर्वाण) को प्राप्त करता है।
अप्पा मेल्लिवि गुणणिलउ अण्णु जि झायहि झाणु।
वढ अण्णाणविमीसियहं कहं तहं केवलणाणु ॥68॥
अर्थ: अनन्त गुणों के भण्डार आत्मा को छोड़कर जो अन्य का ध्यान करता है; हे मूर्ख! वह अज्ञान से लिप्त (मिला हुआ) है, उस को केवलज्ञान कैसे हो सकता है?
अप्पा-दंसणु केवलउ अण्णु सयलु ववहारु।
एक्कु सो जोयइ झाइयइ जो तइलोयहं सारु ॥69॥
अर्थ: केवल आत्मदर्शन ही वास्तविक परमार्थ (आत्मा पदार्थ) है, अन्य (आत्मध्यान आदि) सभी व्यवहार (सद्व्यवहार) है। तीन लोक के सारभूत इस एक पदार्थ को ही योगी जन ध्याते हैं।
अप्पा दंसणणाणमउ सयलु वि अण्णु पयालु।
इम जाणेविणु जोइयउ छंडहु माया-जालु ॥70॥
अर्थ: आत्मा दर्शन, ज्ञानमय है। अन्य भाव सभी पयार की तरह सूखी घास या भुस हैं। इस प्रकार जान कर आत्मावलोकन करो और माया-जाल को छोड़ो।
अप्पा मेल्लिवि जगतिलउ जे परदव्वि रमंति।
अण्णु कि मिच्छादिट्ठियह मत्थइं सिंगइं होंति ॥71॥
अर्थ: जो जग में श्रेष्ठ (निज) आत्म द्रव्य को छोड़कर परद्रव्य में रमण करते हैं, वे मिथ्यादृष्टि हैं। अन्य क्या मिथ्यादृष्टियों (की पहचान के लिए) के माथे पर सींग होते हैं?
अप्पा मेल्लिवि जगतिलउ मूढ म झायहि अण्णु।
जइ मरगउ परियाणियउ तहु किं कच्चहु गण्णु ॥72॥
अर्थ: हे मूढ! जग में उत्तम आत्मा (निज शुद्धात्मा) को छोड़कर अन्य किसी का ध्यान मत कर। यदि मरकत मणि पहचान ली गई है, तो काँच को गिनने से क्या?
सुहपरिणामहिं धम्मु वढ असुहइं होइ अहम्मु।
दोहिवि एहिं विवज्जियउ पावइ जीउ ण जम्मु ॥73॥
अर्थ: हे मूर्ख! शुभ परिणामों से धर्म होता है तथा अशुभ से अधर्म होता है; किन्तु इन दोनों को छोड़ने पर जीव पुनर्जन्म नहीं पाता है।
सइं मिलिया सइं विहडिया जोइय कम्म णिभंति।
तरलसहावहिं पंथियहिं अण्णु कि गाम वसंति ॥74॥
अर्थ: हे योगी! कर्म स्वयं मिलते हैं और स्वयं बिछुड़ते हैं, इसमें कोई भ्रान्ति नहीं है (अर्थात् कर्म अपनी योग्यता से मिलते-बिछुड़ते हैं। उनमें ऐसी शक्ति है)। चंचल स्वभाव के राहगीरों से क्या अन्य (नया) गाँव बसता है?
अण्णु जि जीउ म चिंति तुहु जइ वीहउ दुक्खस्स।
तिलतुसमित्तु वि सल्लडा वेयण करइ अवस्स ॥75॥
अर्थ: यदि तुम दुःख से भयभीत हो, तो अन्य (जड़ कर्म, नोकर्म) को जीव मत मानो। तिल व तुष मात्र भी शल्य (चुभन, खटक) वेदना अवश्य देती है।
अप्पाए वि विभावियइं णासइ पाउ खणेण।
सूरु विणासइ तिमिरहरु एकल्लउ णिमिसेण ॥76॥
अर्थ: आत्मा की भावना भाने से क्षण मात्र में पाप नष्ट हो जाते हैं। अकेला सूर्य एक निमेष में अन्धकार के समूह का विनाश कर देता है।
जोइय हियडइ जासु पर इक्कु वि णिवसइ देउ।
जम्मणमरणविवज्जियउ सो पावइ परलोउ ॥77॥
अर्थ: हे जोगी! जिसके हृदय में एक परमदेव निवास करता है, वह जन्म-मरण से रहित परलोक (परम गति) प्राप्त करता है।
कम्मु पुराइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ।
परमणिरंजणु जो णवइ सो परमप्पउ होइ ॥78॥
अर्थ: जो पूर्व के (पुराने) कर्मों का क्षय करता है तथा नवीन (कर्मों) का प्रवेश नहीं होने देता है, वही (श्रद्धा, ज्ञान, चारित्र से) परम निरंजन देव को नमस्कार करता है और स्वयं परमात्मा हो जाता है।
पाउवि अप्पहिं परिणवइ कम्मइं ताम करेइ।
परमणिरंजणु जाम णवि णिम्मलु होइ मुणेइ ॥79॥
अर्थ: आत्मा में पाप के परिणाम तथा कर्मबन्ध तभी तक होता है, जब तक यह जीव अपने उपयोग में शुद्धता प्रकट कर परम निरंजन (स्वरूप) को जान नहीं लेता।
अण्णु णिरंजणु देउ णवि अप्पा दंसणणाणु।
अप्पा सच्चउ मोक्खपहु एहउ मूढ वियाणु ॥80॥
अर्थ: दर्शन, ज्ञानमय निरंजन परमदेव आत्मा से अनन्य, अभिन्न है। वह अन्य नहीं है। हे मूढ! ऐसा जान कि आत्मा (के स्वभाव) में सच्चा मोक्षमार्ग है। (अर्थात् मोक्षमार्ग बाहर में नहीं है)।
ताम कुतित्थइं परिभमइं धुत्तिम ताम करंति।
गुरुहु पसाएं जाम णवि देहहं देउ मुणंति ॥81॥
अर्थ: लोग तभी तक कुतीर्थों में भ्रमण करते हैं तथा धूर्तता करते हैं, जब तक वे गुरु के प्रसाद से देहस्थित देव को नहीं पहचानते।
लोहिं मोहिउ ताम तुहु विसयहं सुक्ख मुणेहि।
गुरुहुं पसाएं जाम णवि अविचल बोहि लहेहि ॥82॥
अर्थ: तुम तभी तक लोभ से मोहित हुए विषयों में सुख मानते हो, जब तक गुरु के प्रसाद से अविचल बोध नहीं पा लेते।
उप्पज्जइ जेण विबोहु णवि बहिरण्णउ तेण णाणेण।
तइलोय पायडेण वि असुंदरो जत्थ परिणामो ॥83॥
अर्थ: जिस से विशेष बोध (आत्मज्ञान) उत्पन्न न हो; जिसमें तीन लोकों को प्रकट करने की शक्ति (न) हो, उस बहिर्मुखी ज्ञान से जीव बहिर्ज्ञानी (बहिरात्मा) रहता है, जिसका परिणाम अशुभ है।
तासु लीह दिढ दिज्जइ जिम पढियइ तिम किज्जइ।
अहव ण गम्मागम्मइ तासु भंजेसहि अप्पणु कम्मइं ॥84॥
अर्थ: उसकी दृढ़ रेखा अंकित करनी चाहिए अर्थात् निर्णय कर धारण करना चाहिए। (आगम में) जैसा स्वाध्याय करते (पढ़ते) हैं, वैसा करना चाहिए। अथवा जाने-आने (भटकने) से क्या? श्रद्धान, ज्ञान तथा चारित्र सम्यक् होने से कर्म सहज ही नष्ट हो जायेंगे।
वक्खाणडा करंतु बुहु-अप्पि ण दिण्णा चितु।
कणहिं जि रहिउ पयालु जिम पर संगहिउ बहुत्तु ॥85॥
अर्थ: व्याख्यान करने वाले विद्वान् ने यदि आत्मा में चित्त नहीं लगाया, तो यह उसी प्रकार से हुआ, जैसे उसने अन्न के कणों से रहित बहुत पयाल, अनाज की घास का संग्रह किया हो।
पंडियपंडिय पंडिया कणु छंडिवि तुस कंडिया।
अत्थे गंथे तुट्ठो सि परमत्थु ण जाणहि मूढो सि ॥86॥
अर्थ: हे पण्डितों में श्रेष्ठ पण्डित! तुमने कण को छोड़ भूसे को कूटा है। तुम ग्रन्थ और उसके अर्थ में सन्तुष्ट हो, किन्तु परमार्थ को नहीं जानते। इसलिए मूढ़ हो।
अक्खरडेहिं जि गव्विया कारणु ते ण मुणंति।
वंसविहीणउ डोमु जिम सिरहत्थडा धुणंति ॥87॥
अर्थ: जो शब्दों (को पढ़कर) गर्व करते हैं, वे मूल भाव (भावार्थ) नहीं समझते हैं वे वंशविहीन डोम के समान अपना सिर पीटते हैं, धुनते हैं।
णाणतिडिक्की सिक्खि वढ किं पढियइं बहुएण।
जा संधुक्की णिड्डहइ पुण्णु वि पाउ खणेण ॥88॥
अर्थ: हे मूर्ख! बहुत पढ़ने से क्या? आत्मज्ञान (ज्ञान-स्फुलिंग) की शिक्षा प्राप्त कर, जिसके प्रज्वलित (जागृत) होने पर क्षण भर में पुण्य-पाप भस्म हो जाते हैं।
दोहा 89 से 132
सयलु वि कोवि तडप्फडइ सिद्धत्तणहु तणेण।
सिद्धत्तणु परि पावियइ चित्तहं णिम्मलएण ॥89॥
अर्थ: सब कोई सिद्ध होने के लिए तड़पते हैं; किन्तु सिद्धत्व चित्त के निर्मल होने के उपरान्त ही प्राप्त होता है।
केवलु मलपरिवज्जियउ जहिं सो ठाइ अणाइ।
तस उरि सवु जगु संचरइ परइ ण कोइ वि जाइ ॥90॥
अर्थ: जहाँ पर मल से रहित, अनादि केवलज्ञानी भगवान् स्थित है, वहीं उनके हृदय में तीन लोक परिणमनशील प्रतिबिम्बित होता है। उनके ज्ञान के परे कोई भी नहीं जा सकता है।
अप्पा अप्पि परिट्ठियउ कहिं वि ण लग्गइ लेउ।
सव्वु जि दोसु महंतु तसु जं पुणु होइ वि छेउ ॥91॥
अर्थ: जब आत्मा अपने आप में स्थिर हो जाती है, तब कहीं भी उसमें कोई मल नहीं लगता और वे सभी महादोष भी नष्ट हो जाते हैं जो पुरातन काल से संयोग में हैं।
जोइय जोएं लइयेण जइ धंधइ ण पडीसि।
देहकुडिल्ली परिखिवइ तुहुं तेमइ अच्छेसि ॥92॥
अर्थ: हे जोगी! योग धारण कर (अर्थात् आत्मस्वभाव में लीन रहा करो) यदि धन्धे (संकल्प-विकल्प) में नहीं पड़ोगे, तो तुम अक्षय हो जाओगे और इस देह रूपी कुटिया का क्षय हो जाएगा।
अरि मणकरह म रइ करहि इंदियविसयसुहेण।
सोक्खु णिरंतरु जेहिं णवि मुच्चहि ते वि खणेण ॥93॥
अर्थ: अरे मन रूपी ऊँट! इन्द्रियों के विषयों के सुख से राग भाव मत कर। जिनसे निरन्तर (अक्षय) सुख नहीं मिल सकता, उन सब को क्षण मात्र में छोड़ देना चाहिए।
तूसि म रूसि म कोहु करि कोहें णासइ धम्मु।
धम्मिं णट्ठें णरयगइ अह गउ माणुसजम्मु ॥94॥
अर्थ: तुम अपने में तुष्ट रहो। रोष, क्रोध मत करो। क्योंकि क्रोध से धर्म नष्ट होता है। धर्म का नाश होने पर नरक गति मिलती है। तो समझना चाहिए कि मनुष्य जन्म व्यर्थ गया।
हत्थ अहुट्ठ जु देवलि वालहं णाहि पवेसु।
संतु णिरंजणु तहिं वसइ णिम्मलु होइ गवेसु ॥95॥
अर्थ: साढ़े तीन हाथ का जो देवालय है, उसके भीतर एक बाल का भी प्रवेश नहीं है, उसी में सन्त निरंजन बसता है। तुम निर्मल होकर उसकी खोज करो।
अप्पापरहं ण मेलयउ मणु मोडिवि सहसत्ति।
सो वढ जोइय किं करइ जासु ण एही सत्ति ॥96॥
अर्थ: सहसा अपने मन को मोड़ लेने पर आप का मेल पर से नहीं हो सकता। किन्तु वह मूर्ख योगी क्या करे, जिसमें इतनी शक्ति नहीं है (कि वह अपने मन को मोड़ ले)।
सो जोयउ जो जोगवइ णिम्मलु जोयइ जोइ।
जो पुणु इंदियवसि गयउ सो इह सावयलोइ ॥97॥
अर्थ: योग तो वही है जिससे योगी निर्मल ज्योति का दर्शन कर ले। जो इन्द्रियों के अधीन हो गये हैं, वे तो ये श्रावक लोग हैं।
बहुयइं पढियइं मूढ पर तालू सुक्कइ जेण।
एक्कु जि अक्खरु तं पढहु सिवपुरि गम्मइ जेण ॥98॥
अर्थ: हे मूर्ख! बहुत पढ़ा, जिससे रटते-रटते तालू सूख गया। लेकिन उस एक अक्षर को पढ़ ले, जिससे शिवपुरी में गमन हो सके।
अंतो णत्थि सुईणं कालो थोओ वि अम्ह दुम्मेहा।
तं णवर सिक्खियव्वं जं जरमरणक्खयं कुणहि ॥99॥
अर्थ: श्रुतियों का अन्त (पार) नहीं है, समय अल्प है तथा हम दुर्बुद्धि हैं। इसलिए हमें केवल इतना ही सीखना चाहिए, जिससे जरा-मरण का क्षय अर्थात् जन्म-मरण का अभाव हो सके।
णिल्लक्खणु इत्थीबाहिरउ अकुलीणउ महु मणि ठियउ।
तासु कारण झाणी माहुर जेण गवंगउ संठियउ ॥100॥
अर्थ: मेरे मन में सभी सांसारिक लक्षणों से रहित, स्त्री की पहुँच के बाहर तथा जो संसार में लीन नहीं है, ऐसा प्रियतम (शुद्धात्मा, परमात्मा) स्थित है। उसके लिए ही यह ध्यान रूपी माहुर लाया गया है तथा इन्द्रियों के अंगों को शृंगार से सजाया गया है।
हउं सगुणी पिउ णिग्गुणउ णिल्लक्खणु णीसंगु।
एक्कहिं अंगि वसंतयहं मिलिउ ण अंगहिं अंगु ॥101॥
अर्थ: मैं सगुण (गुणों से सहित, रागादि, विकारी भाव युक्त) हूँ और प्रिय (परमात्मा) निर्गुण, निराकार (लक्षण रहित), निःसंग हैं। एक ही अंग (प्रदेश) में रहने पर भी अंग (अंश) से अंग नहीं मिल पाया अर्थात् अंश मात्र भी एक-दूसरे के स्वभाव में नहीं मिल पाया है।
सव्वहिं रायहिं छहरसहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥102॥
अर्थ: हे जोगी! जिसका चित्त इस लोक में सब रागों में, छह रसों में तथा पाँच रूपों में अनुरक्त नहीं है, उसे अपना मित्र बना।
तव तणुअंगु सरीरयहं संगु परिट्ठिउ जाहं।
ताहं वि मरणदवक्कडिय दुसहा होइ णराहं ॥103॥
अर्थ: जिनकी तपस्या तनिक भी शरीर के संग होती है (अर्थात् शरीर के प्रति तनिक भी ममत्व बुद्धि होती है), उनके मरण रूपी दावाग्नि दुस्सह हो जाती है। अभिप्राय यह है कि सहनशील होने के लिए पर का संग त्यागना आवश्यक है।
देहं गलंतहं सव्वु गलइ मइ-सुइ-धारण-धेउ।
तहिं तेहइं वढ अवसरहिं विरला सुमरहिं देउ ॥104॥
अर्थ: हे मूर्ख! देह के गलते ही मति, श्रुति, धारण तथा ध्येय सब गल जाता है। इसलिए इस अवसर पर विरले ही देव का स्मरण करते हैं।
उम्मणि थक्का जासु मण भज्जा भूवहिं चारु।
जिम भावइ तिम संचरउ णवि भउ णवि संसारु ॥105॥
अर्थ: भौतिक पदार्थों से ऊबकर जिसका मन अपने में स्थित हो गया है, वह जैसा भाव करता है, वैसी ही प्रवृत्ति करता है। उसके न तो भय है और न संसार है।
जीव वहंतइ णरयगइ अभयपदाणें सग्गु।
बे पह भव लगि दरिसियइं जहिं भावइ तहिं लग्गु ॥106॥
अर्थ: जीव का वध करने से नरक गति मिलती है और अभयदान करने से स्वर्ग मिलता है। ये दोनों ही संसार के लिए हैं। इसलिए जो रुचिकर हो, उस मार्ग में लगो।
सुक्खअडा दुइ दिवहडइं पुणु दुक्खहं परिवाडि।
हियडा हउं पइं सिक्खवमि चित्त करिज्जहि वाडि ॥107॥
अर्थ: सुख तो दो दिन का है, फिर दुःखों की परिपाटी है। अतः हे हृदय! मैं तुझे सिखाता हूँ कि सम्यक् मार्ग पर चित्त दे।
मूढा देह म रज्जियइ देह ण अप्पा होइ।
देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥108॥
अर्थ: हे मूढ़! देह में रंजायमान मत हो। देह आत्मा नहीं है। देह से भिन्न जो ज्ञानस्वरूपी आत्मा है, उसका तुम अवलोकन करो।
जेहा पाणहं झुंपडा तेहा पुत्थिय काउ।
तित्थु जि णिवसइ पाणिवइ तहिं करि जोइय भाउ ॥109॥
अर्थ: हे जोगी! जैसे देह प्राणों का झोंपड़ा है, वैसे ही पृथ्वीकाय (पुद्गल, मिट्टी का पिण्ड) है। उसमें प्राणों का अधिपति निवास करता है, उसी में भाव कर।
मूलु छंडि जो डाल चडि कहं तह जोयाभास।
चीरु ण वुण्णइ जाइ वढ विणु उट्टियइं कपास ॥110॥
अर्थ: हे मूर्ख! मूल को छोड़कर जो डाली पर चढ़ता है अर्थात् सम्यक् श्रद्धान के बिना ज्ञान-ध्यान करना चाहता है, उसके योग का अभ्यास कहाँ है? क्योंकि कपास को ओंटे बिना वस्त्र कैसे बुना जा सकता है?
सव्ववियप्पहं तुट्टहं चेयणभावगयाहं।
कीलइ अप्पु परेण सिहु णिम्मलझाणठियाहं ॥111॥
अर्थ: जिनके सभी विकल्प छूट गये हैं और जो चैतन्य भाव में स्थित हैं, वे अपने में रमण करते हैं; पर के साथ नहीं रमते हैं। वास्तव में वे निर्मल ध्यान में स्थित कहे गये हैं।
अज्जु जिणिज्जइ करहुलउ जइ पइं देविणु लक्खु।
जित्थु चडेविणु परममुणि सव्व गयागय मोक्खु ॥112॥
अर्थ: यदि तुम लक्ष्य देते हो तो आज ही मन रूपी ऊँट को जीता जा सकता है, जिस पर सवार होकर परम मुनि सभी गमनागमन से मुक्त हो जाते हैं।
करहा चरि जिणगुणथलहिं तव-विल्लडिय पगाम।
विसमी भवसंसारगइ उल्लूरियहि ण जाम ॥113॥
अर्थ: हे करभ! जब तक विषम भव-संसार की गति का उच्छेदन न हो जाए, तब तक जिन-गुण रूपी स्थली में चरो, तप रूपी वेलि पर्याप्त रूप से फैली हुई है।
तव दावणु वय णियमडइ समदम कियउ पलाणु।
संजमघरहं उमाहियउ गउ करहा णिव्वाणु ॥114॥
अर्थ: जिसका तप का दामन (बन्धन) है, व्रत का साज नियम से है तथा शम-दम का पलेंघा बनाया गया है, वह मन रूपी ऊँट संयम रूपी घर में उमाही (उदासीन) हुआ निर्वाण को प्राप्त हो गया है।
एक्क ण जाणहि वट्टडिय अवरु ण पुच्छहि कोइ।
अड्डवियड्डहं डुंगरहं णर भज्जंता जोइ ॥115॥
अर्थ: एक तो तुम मार्ग नहीं जानते हो, दूसरे किसी से पूछते नहीं हो। अतः ऐसे लोगों को अटवी से अटवी तथा पर्वतों पर भागते, भटकते हुए देख।
वट्ट जु छोडिवि मउलियउ सो तरुवरु अकयत्थु।
रीणा पहिय ण वीसमिय फलहिं ण लायउ हत्थु ॥116॥
अर्थ: पत्तों को छोड़कर जो मुकलित हुआ है, वह तरुवर अकृतार्थ है। क्योंकि न तो थके हुए पथिकों को वहाँ विश्राम मिलता है और न फलों में कोई हाथ लगा पाता है।
इस दोहे का व्यंग्य अर्थ यह है कि उस वैभव के प्रदर्शन से क्या लाभ है जो धन दीन-दुखियों की भलाई में नहीं लगता है। परोपकार की बुद्धि होने पर दान देने से ही धन की सार्थकता है अर्थात् पत्तों के बिना वृक्ष का फलना व्यर्थ है।
छहदंसण-धंधइ पडिय मणहं ण फिट्टिय भंति।
एक्कु देउ छह भेउ किउ तेण ण मोक्खहं जंति ॥117॥
अर्थ: षट्दर्शन के धन्धे में पड़कर मन की भ्रान्ति नहीं मिटी। क्योंकि छहों दर्शन अविद्या, अज्ञान या क्लेश से मुक्ति का प्रतिपादन करते हैं। किन्तु इसने एक देव के छह भेद कर लिए। इसलिए यह मुक्ति को प्राप्त नहीं करता। यथार्थ में वास्तविक दर्शन, देव, मार्ग, मुक्ति एक है; अनेक नहीं हैं।
अप्पा मेल्लिवि एक्कु पर अण्णु ण वइरिउ कोइ।
जेण विणिम्मिय कम्मडा जइ पर फेडइ सोइ ॥118॥
अर्थ: हे आत्मन्! एक अपनी आत्मा को छोड़कर अन्य कोई वैरी नहीं है। जिसके भाव (राग, द्वेष, मोह) के द्वारा कर्म निर्मित हुए हैं, उस परभाव को जो फेंट देता है, मिटा देता है, (वास्तव में) यही यति है।
जइ वारउं तो तहिं जि पर अप्पहं मणु ण धरेइ।
विसयहं कारणि जीवडउ णरयहं दुक्ख सहेइ ॥119॥
अर्थ: यद्यपि मैं मन को रोकता हूँ, फिर भी वह पर में जाता है; आत्मा को मन में धारण नहीं करता। विषयों में प्रवृत्ति होने के कारण ही जीव को नरकों के दुःख सहन करने पड़ते हैं।
जीव म जाणहि अप्पणा विसया होसहिं मज्झु।
फल किमपाकह जेम तिम दुक्ख करेसहिं तुज्झु ॥120॥
अर्थ: हे जीव! ऐसा मत जानो कि ये विषय मेरे हो जाएंगे। किंपाक फल के समान (जो देखने में बहुत सुन्दर होते हैं, पर खाने पर मरण होता है) ये तुझे दुःख ही देंगे।
विसया सेवहि जीव तुहुं दुक्खहं साहक जेण।
तेण णिरारिउ पज्जलइ हुयवहु जेम घिएण ॥121॥
अर्थ: हे जीव! तुम जिन विषयों का सेवन करते हो, वे दुःख के साधक हैं। इसलिए तुम्हें बहुत जलना पड़ता है, जैसे घृत से अग्नि प्रज्वलित होती है।
असरीरहं संधाणु किउ सो धाणुक्कु णिरुत्तु।
सिवतत्तिं जो संधियउ सो अच्छइ णिच्चिंतु ॥122॥
अर्थ: जिसने अशरीरी सिद्धात्मा का लक्ष्य बनाया, वही निश्चित धनुर्धर है। जो शिवत्व या शिवतत्त्व का सन्धान करता है, वही निश्चिन्त रहता है। भाव यह है कि अपनी शुद्धात्मा का लक्ष्य कर उसमें तल्लीन रहना ही सच्चा कौशल है।
हलि सहि काइं करइ सो दप्पणु।
जहिं पडिबिंबु ण दीसइ अप्पणु ॥
धंधवालु मो जगु पडिहासइ।
घरि अच्छंतु ण घरवइ दीसइ ॥123॥
अर्थ: हे सखि! उस दर्पण का क्या करें, जिसमें अपना प्रतिबिम्ब न दिखाई पड़ता हो। धन्धा करने वाला यह जगत् मुझे प्रतिभासित होता है। किन्तु घर में रहते हुए भी गृहस्वामी का दर्शन नहीं होता।
जसु जीवंतहं मणु मुवउ पंचेंदियहं समाणु।
सो जाणिज्जइ मोक्कलउ लद्धउ पउ णिव्वाणु ॥124॥
अर्थ: जिसके जीवित रहते हुए पाँचों इन्द्रियों के साथ मन मर गया अर्थात् भावमन स्वभाव में विलीन हो गया, उसे मुक्त जानना चाहिए; क्योंकि वह जीवन-मुक्त हो गया है।
किं किज्जइ बहु अक्खरहं जे कालिं खय जंति।
जेम अणक्खरु संतु मुणि तव वढ मोक्खु कहंति ॥125॥
अर्थ: हे मूर्ख! बहुत अक्षरों (को पढ़ने) से क्या किया जाए, क्योंकि वे कुछ समय में क्षय को प्राप्त हो जाते हैं। जिससे मुनि अनक्षर (जिसका क्षरण, क्षय न हो) हो जाए, उस अक्षयता को मोक्ष कहते हैं।
छहदंसणगंथिं बहुल अवरुप्परु गज्जंति।
जं कारणु तं एक्कु पर विवरेरा जाणंति ॥126॥
अर्थ: षट्दर्शन के ग्रन्थों में बहुत अधिक एक दूसरे पर गरजते हैं। उसका कारण एक मात्र पर ही है, वे एक दूसरे को विपरीत समझते हैं।
सिद्धंतपुराणहिं वेय वढ बुज्झंतहं णउ भंति।
आणंदेण वि जाम गउ ता वढ सिद्धि कहंति ॥127॥
अर्थ: हे मूर्ख! सिद्धान्त, पुराण तथा वेदों को पढ़ने से भ्रान्ति नहीं मिटती। जब परमानन्द की प्राप्ति हो जाती है, तब वही मूढ सिद्ध कहलाता है। भाव यह है कि आत्मा ही पुरुषार्थ करके परमात्मा होता है। सच्चिदानन्द परम ब्रह्म की उपलब्धि किसी के अनुग्रह या परावलम्बन से नहीं, किन्तु अपनी योग्यता से जीव प्रत्येक सिद्धि को प्राप्त करता है।
सिव-सत्तिहिं मेलावडा इहु पसुवाहम्मि होइ।
भिण्णिय सत्ति सिवेण सिहु विरला बुज्झइ कोइ ॥128॥
अर्थ: यह शिव तथा शक्ति का मेल पशु-वध (के लिए यज्ञ) में होता है। वस्तुतः शक्ति शिव से भिन्न है, यह कोई विरला ही समझता है। यथार्थ में प्रत्येक द्रव्य में निजी शक्ति (योग्यता) होती है। यदि उनमें शक्ति न हो, तो वे विकास नहीं कर सकते हैं। इसलिए शक्ति भिन्न है तथा योग्यता से प्राप्त हुई शिव रूप अवस्था भिन्न है। इस रहस्य को कोई परम आनन्द की अनुभूति करने वाला सच्चिदानन्द परमब्रह्म स्वरूप के स्वसंवेदन से ही विरला व्यक्ति जानता है।
भिण्णउ जेहिं ण जाणियउ णियदेहहं परमत्थु।
सो अंधउ अवरहं अंधयहं किम दरिसावइ पंथु ॥129॥
अर्थ: जिसने अपनी देह से भिन्न परमार्थ (निज शुद्धात्मा) को नहीं जाना, नहीं देखा है, वह अन्धा (अज्ञानी) है। ऐसा अन्धा दूसरे अन्धों को कैसे मार्ग (ज्ञानमार्ग) दिखा सकता है?
जोइय भिण्णउ झाय तुहुं देहहं णिय अप्पाणु।
जइ देहु वि अप्पउ मुणहि णवि पावहि णिव्वाणु ॥130॥
अर्थ: हे जोगी। तुम निज शुद्धात्मा को देह से भिन्न ध्याओ। यदि तुम देह को अपना मानोगे, तो निर्वाण की प्राप्ति नहीं होगी।
छत्तु वि पाइ सुगरुयडा सयलकालसंतावि।
णियदेहडइ वसंतयहं पाहण वाडि वहाइ ॥131॥
अर्थ: बड़े-बड़े लोग राज्य का छत्र पा कर भी सदा काल दुखी रहते हैं। अपने देह में वसने पर भी वाड़े में महल चिनवाता है। अज्ञानता के कारण यह लोभ तथा मोह के अनेक कार्य करता है।
मा मुट्टा पसु गरुयडा सयल काल झंखाइ।
णियदेहहं वि वसंतयहं सुण्णा मढ सेवाइ ॥132॥
अर्थ: सदा काल मोटे और बड़े पशुओं को सन्ताप पहुँचाने में तथा देहस्थित बुद्धि से सूने मठ में वसने से भी अपना कल्याण नहीं है (अर्थात् कल्याण तो मात्र निज शुद्धात्मा के अनुभव में ही है)।
दोहा 133 से 176
रायवयल्लहिं छहरसहिं पंचहिं रूवहिं चित्तु।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥133॥
अर्थ: हे योगी! इस लोक में जिसका चित्त राग के कोलाहल में, छह रसों में तथा पाँच तरह के रूपों में आसक्त न हो, उसे अपना मित्र बना ले।
तोडिवि सयल वियप्पडा अप्पहं मणु वि धरेहि।
सोक्खु णिरंतरु तहिं लहहि लहु संसारु तरेहि ॥134॥
अर्थ: समस्त विकल्पों को मिटा कर अपने (स्वभाव में) में मन धारण करो। वहाँ पर तुम को निरन्तर सुख मिलेगा और तुम शीघ्र ही संसार के पार हो जाओगे।
अरि जिय जिणवरि मणु ठवहि विसयकसाय चएहि।
सिद्धमहापुरि पइसरहि दुक्खहं पाणिउ देहि ॥135॥
अर्थ: रे जीव! जिनवर में मन लगाकर विषय-कषायों का त्याग कर। अब दुःखों को जलांजलि देकर सिद्धपुरी में प्रवेश कर।
मुंडियमुंडिय मुंडिया, सिरु मुंडिउ चित्तु ण मुंडिया।
चित्तहं मुंडणु जे कियउ, संसारहं खंडणु ते कियउ ॥136॥
अर्थ: हे मूँड़ मुड़ाने वालों में श्रेष्ठ मुंडी! तुमने सिर मुँड़ा लिया है, लेकिन चित्त नहीं मुँड़ाया है। जिसने मन का मुण्डन कर लिया, वास्तव में उसने संसार का खण्डन कर दिया।
अप्पु कहिज्जइ काइं तासु जो अच्छइ सव्वंगओ संते।
पुण्ण-विसज्जणु काइं तासु जो हलि इच्छइ परमत्थें ॥137॥
अर्थ: जो सम्पूर्ण शरीर में विद्यमान है, उस आप का क्या कहना है? हे सखि! जो परमार्थ चाहता है, उसके पुण्य-विसर्जन से क्या? लाभ तो आत्मा को प्राप्त करने से है।
गमणागमणविवज्जियउ जो तइलोयपहाणु।
गंगा गरुवइ देउ किय सो सण्णाणु अयाणु ॥138॥
अर्थ: जो गमनागमन से रहित (वीतरागी) तथा तीनों लोकों में प्रधान हैं, वह देव हैं - यह सत्ज्ञान की बात है। लोक में लोग गंगा नदी में भी देव (की कल्पना करते हैं) मानते हैं, किन्तु वह तो अज्ञान है।
पुण्णेण होइ विहवो विहवेण मओ मएण मइमोहो।
मइ-मोहेण य णरयं ते पुण्णं अम्ह मा होउ ॥139॥
अर्थ: पुण्य से वैभव की प्राप्ति होती है और वैभव से अभिमान तथा मान से बुद्धि-भ्रम होता है। बुद्धि के विभ्रम से पाप और पाप से नरक गति मिलती है। इसलिए ऐसा पुण्य हमारे लिए न होवे।
कासु समाहि करउं को अंचउं
छोपु-अछोपु भणिवि को वंचउं
हलि सहि कलहु केण सम्माणउं।
जहिं जहिं जोवउं तहिं अप्पाणउं ॥140॥
अर्थ: किसकी समाधि करूँ? किसे पूजूँ? स्पृश्य-अस्पृश्य कहकर किसे छोड़ दूँ? हे सखि! किसके साथ झगड़ा मचाऊँ? किसका सम्मान करूँ? क्योंकि जहाँ-जहाँ देखती हूँ, वहाँ अपनी ही शुद्ध आत्मा दिखाई देती है। 'शुद्धात्मा या ‘परमात्मा’ कहो, एक ही है।
जइ मणि कोहु करिवि कलहिज्जइ।
तो अहिसेउ णिरंजणु किज्जइ।
जहिं-जहिं जोवइ तहिं णहि कोविउ,
हउं णवि कासु वि मज्झु ण कोविउ ॥141॥
अर्थ: यदि मन क्रोध करके कलह करना चाहता है (तो रोककर), तो परम निरंजन का अभिषेक करना चाहिए। मैं जहाँ-जहाँ देखता हूँ, वहाँ कोई भी अपना नहीं है। वास्तव में मैं किसी का नहीं हूँ और कोई भी मेरा नहीं है।
णमिओसि ताम जिणवर जाम ण मुणिओसि देहमज्झम्मि।
ता केण णवज्जए कस्स जइ मुणियउ देहमज्झम्मि ॥142॥
अर्थ: हे जिनवर! जब तक देहस्थित आपको नहीं जान लिया गया है, तब तक सदा नमस्कार हो। यदि इस शरीर में स्थित आपको पहचान लिया है, तो फिर किसके द्वारा किसका नमन किया जाए?
ता संकप्पवियप्पा कम्मं अकुणंतु सुहासुहजणयं।
अप्पसरूवासिद्धी जाम ण हियए परिफुरइ ॥143॥
अर्थ: बाहर में कार्य नहीं करते हुए भी शुभ तथा अशुभ भावों को उत्पन्न करने वाले संकल्प-विकल्प तब तक उठते रहते हैं, जब तक अन्तरंग में आत्मस्वरूप की सिद्धि स्फुरायमान नहीं होती।
गहिलउ गहिलउ जणु भणइ गहिलउ मं करि खोहु।
सिद्धमहापुरि पइसरहु उप्पाडेविणु मोहु ॥144॥
अर्थ: हे हठी! लोगों के “हठीला, हठीला” कहने से तुम क्षोभ को मत प्राप्त होओ। तुम्हें तो मोह को उखाड़कर सिद्धपुरी में प्रवेश करना चाहिए।
अणहउ अक्खरु जं उप्पज्जइ।
अणु वि किं पि अण्णाण ण किज्जइ ॥
आयइं चित्तिं लिहि मणु धारिवि।
सोउ णिचिंतिउ पाउ पसारिवि ॥145॥
अर्थ: बिना नाद के जो अक्षर उत्पन्न होता है अर्थात् कोलाहल हुए बिना जो अक्षय स्वरूप प्रकट होता है, यह ज्ञानस्वरूप आत्मा ही है। अतः कोई अज्ञान भाव नहीं करना चाहिए। इतना ही चित्त में लिखकर मन में धारण कर और निश्चिन्त होकर पाँव पसार कर अपने में विश्राम करना योग्य है।
कि बहुएं अडवड वडिणा देह ण अप्पा होइ।
देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥146॥
अर्थ: बहुत अधिक अटपटा बड़बड़ाने से क्या लाभ? इतना ही समझना है कि देह से ज्ञान स्वरूपी आत्मा भिन्न है और हे जोगी! वही तुम हो।
पोत्था पढएं मोक्खु कहं मणु वि असुद्धउ जासु।
वहयारउ लुद्धउ णवइ मूलट्ठिउ हरिणासु ॥147॥
अर्थ: जिसका मन अशुद्ध है, उसके शास्त्र पढ़ने से कहीं मोक्ष हो सकता है? नहीं। वध करने वाले शिकारी को भी हिरन के सामने झुकना पड़ता है। इसी प्रकार विनय भाव पूर्वक ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
दयाविहीणउ धम्मडा णाणिय कह वि ण जोइ।
बहुएँ सलिलविरोलियइं करु चोप्पडा ण होइ ॥148॥
अर्थ: कोई भी ज्ञानी किसी भी प्रकार दयारहित धर्म का अवलोकन नहीं करता है। बहुत अधिक पानी बिलोने पर भी क्या हाथ चिकना हो सकता है? नहीं होता है।
भल्लजणाह णासंति गुण जहिं सहु संग खलेहिं।
वइसाणरु लोहहं मिलिउ पिट्टिज्जइ सुघणेहिं ॥149॥
अर्थ: दुष्टों के साथ संगति करने से भले लोगों के भी गुण नष्ट हो जाते हैं। अग्नि का साथ करने से लोहा भी अग्नि के संग घनों से पीटा जाता है।
हुयवहि णीइ ण संकया धवलत्तणु संखस्स।
फिट्टीसइ मा भंति करि छुडु मिलिया हु परस्स ॥150॥
अर्थ: अग्नि के संस्कार से शंख की सफेदी नष्ट नहीं होती। इसमें किसी प्रकार की शंका नहीं करनी चाहिए। इस बात में कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए कि वह अन्य किसी से मिलकर अपना गुण छोड़ देगा या उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन हो जाएगा।
संखसमुद्दहिं मुक्कियए एही होइ अवत्थ।
जो दुव्वाहहं चुंबिया लाएविणु गलि हत्थ ॥151॥
अर्थ: शंख की पेटी में पड़े हुए मोती की ऐसी अवस्था होती है कि वह धीवरों के द्वारा गले पर हाथ लेकर बाहर निकाले जाते हैं।
छंडेविणु गुणरयणणिहि अग्घथडिहिं घिप्पंति।
तहिं संखाहं विहाणु पर फुक्किज्जंति ण भंति ॥152॥
अर्थ: गुणों के रत्नाकर समुद्र (की सत्संगति) को छोड़ देने के कारण शंख की यह दुरवस्था होती है कि वे बिकी के स्थलों पर पटके जाते हैं, फेंके जाते हैं और फिर खरीद लिए जाने पर फूँके जाते हैं - इसमें कोई भ्रान्ति नहीं है।
महुयर सुरतरुमंजरिहिं परिमलु रसिवि हयास।
हियडा फुट्टिवि किं ण मुयउ ढंढोलंतु पलास ॥153॥
अर्थ: हे हताश मधुकर! तुम कल्पवृक्ष की मंजरी के पराग का रस लेकर अब पलाश (ढाक, टेसू) के लिए घूमते-फिरते हो। तुम्हारा हृदय फूट क्यों नहीं गया और तुम मर क्यों नहीं गये?
मुंडु मुंडाइवि सिक्ख धरि धम्महं वद्धी आस।
णवरि कुडुंबउ मेलियउ छुडु मिल्लिया परास ॥154॥
अर्थ: जिन्होंने मूँड़-मुँड़ाकर संयम की शिक्षा धारण कर धर्म की आशा बढ़ाई है, उन्होंने केवल कुटुम्ब छोड़ा है; पराई आशा नहीं छोड़ी है।
णग्गत्तणि जे गव्विया विग्गुत्ता ण गणंति।
गंथहं बाहिरभिंतरहिं एक्कु वि जे ण मुअंति ॥155॥
अर्थ: जो नग्नत्व का गर्व करते हैं और व्याकुलता को कुछ नहीं गिनते हैं, वे बाहरी-भीतरी परिग्रह में से एक का भी त्याग नहीं करते।
अम्मिय यहु मणु हत्थिया विंझह जंतउ वारि।
तं भंजेसइ सील-वणु पुणु पडिसइ संसारि ॥156॥
अर्थ: अहो! इस मन रूपी हाथी को विन्ध्यपर्वत (अभिमान शिखर) की ओर जाने से रोको। यह इस शील रूपी वन को छिन्न-भिन्न कर देगा, जिससे फिर संसार (दुर्गति) में पतन होगा।
जे पढिया जे पंडिया जाहि वि माणु-मरट्टु।
ते महिलाणहं पिडि पडिय भमियइ जेम घरट्टु ॥157॥
अर्थ: जो सुशिक्षित हैं, पण्डित-विद्वान् हैं, जिनके मान-मर्यादा बनी हुई है, वे भी जब महिलाओं के रूप-सौन्दर्य पर मोहित हो जाते हैं, तब ऐसा समझना चाहिए कि वे देह-पिण्ड के पीछे पड़कर ऐसे चक्कर काटते हैं, जैसे चक्की घूमती हो।
विद्धा वम्मा मुट्ठिएण फुसिवि लिहहि तुहुं ताम।
जह संखहं जीहालु सिवि सड्ढिल्लइ ण जाम ॥158॥
अर्थ: हे जीव! तब तक स्पर्श और रसना इन्द्रियों का स्वाद ग्रहण कर ले, जब तक मुट्ठी से मर्म का भेदन नहीं किया गया है। जिस प्रकार शंख की सीपी को सुख तभी तक है जब तक वह फूटी नहीं है, उसी प्रकार जब तक यह शरीर शिथिल नहीं हुआ, तभी तक इन्द्रियों का सुख है।
पत्तिय तोडहि तडतडाइ णाइं पइट्ठा उट्टु।
एव ण जाणहि मोहिया को तोडइ को तुट्टु ॥159॥
अर्थ: तुम सहसा पत्तियों को ऐसे तड़-तड़ाकर तोड़ रहे हो मानो ऊँट ने ही प्रवेश किया हो। तुम यह नहीं जानते हो कि मोह के अधीन होकर कौन तोड़ता है और कौन टूटता है?
पत्तिय पाणिउ दब्भ तिल सव्वइं जाणि सवण्णु।
जं पुणु मोक्खहं जाइवउ तं कारणु कुइ अण्णु ॥160॥
अर्थ: पत्ती, पानी, दाभ, तिल, इन सबको अपने समान ही समझो (जैसे प्राण तुममें हैं वैसे ही इनमें हैं)। जो यदि मुक्ति को प्राप्त करना चाहते हो, तो उसका कारण (निश्चय रत्नत्रय) तो कोई अन्य है।
पत्तिय तोडि म जोइया फलहिं जि हत्थु म वाहि।
जसु कारणि तोडेहि तुहुं सो सिउ एत्थु चडाहि ॥161॥
अर्थ: हे जोगी! पत्ते मत तोड़ो और फलों को भी हाथ मत लगाओ। जिस कारण से तुम उनको तोड़ते हो (भगवान् शिव को चढ़ाने के लिए) सो वह शिव यहाँ (घट में विराजमान है) है। अतः यहीं चढ़ा दे।
देवलु पाहणु तित्थजलु पोत्थइं सव्वइं कव्वु।
वत्थुजु दीसइ कुसुमियउ इंधणु होसइ सव्वु ॥162॥
अर्थ: देवालय (मन्दिर) में पाषाण (पत्थर) है, तीर्थ में जल और सभी शास्त्रों में काव्य है। जो वस्तु अभी विकसित, खिली हुई दिखती है, वह सब ईंधन हो जाएगी।
तित्थइं तित्थ भमंतयहं किं णेहा फल हूव।
बाहिरु सुद्धउ पाणियहं अब्भिंतरु किम हूव ॥163॥
अर्थ: एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ में भ्रमण करते हुए स्नेह करने का फल क्या हुआ? बाहर से तो पानी शुद्ध कर लिया, लेकिन भीतर में क्या हुआ?
तित्थइं तित्थ भमेहि वढ धोयउ चम्मु जलेण।
एहु मणु किम धोएसि तुहुं मइलउ पावमलेण ॥164॥
अर्थ: हे मूर्ख! तुमने एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ में भ्रमण किया है और शरीर के चमड़े को जल से धोया है। किन्तु जो मन पाप रूपी मल से मैला है, उसे किस प्रकार धोएगा?
जोइय हियडइ जासु पर एक्कु ण णिवसइ देउ।
जम्मणमरणविवज्जियउ किम पावइ परलोउ ॥165॥
अर्थ: हे जोगी! जिसके हृदय में जन्म-मरण से रहित एक देव निवास नहीं करता, वह परलोक (उत्तम गति) कैसे प्राप्त कर सकता है?
एक्कु सुवेयइ अण्णु ण वेयइ।
तासु चरिउ णउ जाणहिं देवइं ॥
जो अणुहवइ सो जि परियाणइ।
पुच्छंतहं समित्ति को आणइ ॥166॥
अर्थ: एक (परमतत्त्व) को भली-भाँति जानता है, अन्य कुछ नहीं जानता। ऐसे (तत्त्वज्ञानी का) व्यक्ति का चारित्र देव भी नहीं जानते। वास्तव में तो जो अनुभव करता है, वही जानता है। पूछने वालों की तृप्ति कौन कर सकता है?
जं लिहिउ ण पुच्छिउ कहण जाइ,
कहियउ कासु वि णउ चित्ति ठाइ।
अह गुरुउवएसें चित्ति ठाइ,
तं तेम धरंतह कहिमि ठाइ ॥167॥
अर्थ: जो किसी प्रकार लिखा, पूछा तथा कहा नहीं जाता और किसी प्रकार उसे कहा भी जाए, तो वह किसी के चित्त में नहीं ठहरता। यदि गुरु उपदेश देते हैं, तो ही चित्त में ठहरता है। फिर, धारण करने वाले कहीं भी स्थित हों।
कड्ढइ सरिजलु जलहिविपिल्लउ।
जाणु पवाणु पवणपडिपिल्लिउ ॥
बोहु विबोहु तेम संघट्टइ।
अवर हि उत्तउ ता णु पयट्टइ ॥168॥
अर्थ: समुद्र के द्वारा विपरीत दिशा में प्रेरित होने से नदी का जल खिंचता है तथा बड़े-बड़े भारी जहाज भी पवन से प्रेरित होकर चल पड़ते हैं। इसी प्रकार जब बोध और विबोध का संघर्ष होता है, तब अन्य बात ही प्रवृत्त हो जाती है।
अंबरि विविहु सद्दु जो सुम्मइ।
तहिं पइसरहुं ण वुच्चइ दुम्मइ ॥
मणु पंचहिं सिहु अत्थवण जाइ।
मूढा परमतत्तु फुडु तिहिं जि ठाइ ॥169॥
अर्थ: आकाश में जो तरह-तरह के शब्द सुनाई पड़ते हैं, वहाँ प्रवेश कर दुर्मति कुछ नहीं बोलता। जब मन पाँचों इन्द्रियों सहित विलीन हो जाता है, तब हे मूढ़! वह परमतत्त्व स्पष्ट रूप से वहीं ही रहता है।
अखइ णिरामइ परमगइ अज्ज वि लउ ण लहंति।
भग्गी मणहं ण भंतडी तिम दिवहडा गणंति ॥170॥
अर्थ: मन की भ्रान्ति नहीं मिटने से वही दिन गिनने पड़ते हैं जिनमें मन विलय को प्राप्त नहीं है, और इसीलिए अक्षय, निरामय, परमगति आज भी उपलब्ध नहीं है।
सहजअवत्थहिं करहुलउ जोइय जंतउ वारि।
अखइ णिरामइ पेसियउ सइं होसइ संहारि ॥171॥
अर्थ: हे जोगी! सहज अवस्था में (प्रवेश करते हुए) जाते हुए इस मन रूपी ऊँट को रोको। अक्षय, निरामय में प्रविष्ट होने पर मन का अपने आप संहार हो जाएगा अर्थात् एक बार विलीन होने पर उसका अस्तित्व नहीं रहेगा।
अखइ णिरामइ परमगइ मणु घल्लेप्पिणु मिल्लि।
तुट्टेसइ मा भंति करि आवागमणहं वेल्लि ॥172॥
अर्थ: अक्षय, निरामय, परमगति में मन को फेंक कर छोड़ दे। आवागमन की बेल टूट जाएगी, इसमें भ्रान्ति मत कर।
एम्वइ अप्पा झाइयइ अविचलु चित्तु धरेवि।
सिद्धिमहापुरि जाइयइ अट्ठ वि कम्म हणेवि ॥173॥
अर्थ: इस प्रकार चित्त को निश्चल कर आत्मा का ध्यान किया जाता है। आठों कर्मों का नाश करके ही सिद्ध-महापुरी मुक्ति को गमन किया जाता है।
अक्खरचडिया मसिमिलिया पाढंता गय खीण।
एक्क ण जाणी परम कला कहिं उग्गउ कहिं लीण ॥174॥
अर्थ: स्याही से लिखे हुए अक्षरों में अंकित ग्रन्थों को पढ़ते-पढ़ते हम क्षीण हो गये, लेकिन एक इस परमकला को नहीं जान पाए कि यह मन कहाँ से उत्पन्न होता है और कहाँ विलीन हो जाता है।
वे भंजेविणु एक्कु किउ मणहं णु चारिय विल्लि।
तहि गुरुवहि हउं सिस्सिणी अण्णहि करमि ण लल्लि ॥175॥
अर्थ: जिसने दो को मिटाकर एक कर दिया और मन की बेल को आगे नहीं बढ़ने दिया, उस गुरु की मैं शिष्या हूँ; अन्य की लालसा नहीं करती।
अग्गइं पच्छइं दहदिहहिं जहिं जोवउं तहिं सोइ।
ता महु फिट्टिय भंतडी अवसु ण पुच्छइ कोइ ॥176॥
अर्थ: आगे-पीछे, दशों दिशाओं में, जहाँ मैं देखता हूँ वहीं वह है। इसलिए अब मेरी भ्रान्ति मिट गई है। किसी से पूछना आवश्यक नहीं रहा।
दोहा 177 से 220
जिम लोणु विलिज्जइ पाणियहं तिम जइ चित्तु विलिज्ज।
समरसि हूवइ जीवडा काइं समाहि करिज्ज ॥177॥
अर्थ: जैसे नमक पानी में विलीन हो जाता है, उसी प्रकार यदि चित्त (निज शुद्धात्मा में) विलीन हो जाए तो जीव समरस हो गया। समाधि में (इसके सिवाय) क्या किया जाता है? समरसता ही समाधि है।
जइ एक्कहि पावीसि पिउ अक्किय कोडि करीसु।
णं अंगुलि पय पयडणइं जिम सव्वंगइ सीसु ॥178॥
अर्थ: यदि एक प्रिय को प्राप्त कर लूँ तो अपूर्व कौतुक करूँगी। निश्चय से पैर की एक अँगुली के प्रकट हो जाने पर सिर तक सर्वांग प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार प्रिय के प्रकट होते ही वीतराग निर्विकल्प समाधि प्रकट हो जाएगी।
तित्थइं तित्थ भमंतयहं संताविज्जइ देहु।
अप्पे अप्पा झाइयइ णिव्वाणह पउ देहु ॥179॥
अर्थ: एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ तक भ्रमण करने से केवल शरीर को सन्ताप पहुँचता है। आत्मा में आत्मा का ध्यान करके मोक्ष-मार्ग में आगे बढ़ना चाहिए।
जो पइं जोइउं जोइया तित्थइं तित्थ भमेइ।
सो सिउ पइं सिहुं हिंडियउ लहिवि ण सक्किउ तोइ ॥180॥
अर्थ: हे योगी! जिसे देखने के लिए तुम तीर्थों तीर्थ भ्रमण करते हैं, वह शिव भी तुम्हारे साथ भ्रमण करता है; फिर भी तुम उसे नहीं पा सके।
मूढा जोवइ देवलइं लोयहिँ जाइं कियाइं।
देह ण पिच्छइ अप्पणिय जहिँ सिउ संतु ठियाइं ॥181॥
अर्थ: लोगों के द्वारा बनवाये देवालयों में तो लोग देव का दर्शन करते हैं, उनको खोजते हैं, किन्तु देह रूपी देवालय में विराजमान शिव-सत्ता को नहीं खोज पाते हैं।
वामिय किय अरु दाहिणिय मज्झइ हवइ णिराम।
तहिं गामडा जु जोगवइ अवर वसावइ गाम ॥182॥
अर्थ: बायीं ओर और दाहिनी ओर गाँव बसाया, किन्तु बीच में सूना ही रखा। इसलिए हे योगी! वहाँ पर एक गाँव अन्य बसाइए।
देव तुहारी चिंत महु मज्झणपसरवियालि।
तुहु अच्छेसहु जाइ सुउ परम णिरामय पालि ॥183॥
अर्थ: हे देव! मुझे तुम्हारी चिन्ता है। जब मध्यान्ह के प्रसार का अन्त हो जाएगा, तब तुम वहाँ जाकर सो जाना। फिर, यह पाली सूनी हो जाएगी।
तुट्टइ बुद्धि तडत्ति जहिं मणु अंथवणहं जाइ।
सो सामिय उवएसु कहि अण्णहिं देवहिं काइं ॥184॥
अर्थ: जिससे बुद्धि तड़ककर टूट जाए और मन भी अस्त हो जाए; हे स्वामी! ऐसा उपदेश कहिए। अन्य देवों से क्या है?
सयलीकरणु ण जाणियउ पाणियपसण्णह भेउ।
अप्पापरहु ण मेलियउ गंगडु पुज्जइ देउ ॥185॥
अर्थ: जो क्षुद्र देव को पूजता है, वह न तो सकलीकरण जानता है तथा न जल की निर्मलता का रहस्य पहचानता है और न आत्मा एवं पर (भावों) का मेल समझता है।
अप्पापरहं ण मेलियउ आवागमणु ण भग्गु।
तुस कंडंतहं कालु गउ तंदुलु हत्थि ण लग्गु ॥186॥
अर्थ: वास्तव में न तो आत्मा और पर का आज तक मेल हो सका और न आवागमन ही समाप्त हुआ। अभी तक का समय तुष कूटते ही बिताया है, क्योंकि एक भी चावल का दाना हाथ नहीं लगा।
देहादेवलि सिउ वसइ तुहु देवलइं णिएहि।
हासउ महु मणि अत्थि इहु सिद्धें भिक्ख भमेहि ॥187॥
अर्थ: देहरूपी मन्दिर (देवालय) में शिव निवास करता है, किन्तु तुम मन्दिरों में उसे खोजते हो। मुझे मन-ही-मन हँसी आती है कि तुम सिद्ध भगवान् से भीख माँगने के लिए भटक रहे हो।
वणि देवलि तित्थइं भमहि आयासो वि णियंतु।
अम्मिय विहडिय मेडिया पसुलोगडा भमंतु ॥188॥
अर्थ: वन में, देवालय में, तीर्थों में इसने भ्रमण किया। यहाँ तक कि आकाश में भी देखा। अहो! घूमते हुए इसकी भेंट भेड़िये आदि पशुओं से भी हुई।
वे छंडेविणु पंथडा विच्चे जाइ अलक्खु।
तहो फल बेयहु किंपि णउ जइ सो पावइ लक्खु ॥189॥
अर्थ: बिना किसी लक्ष्य के इस जीव ने दोनों मार्गों को छोड़कर बीच के मार्ग से गमन किया है, किन्तु उन दोनों का फल कुछ भी नहीं है जो वह लक्ष्य को प्राप्त कर सके।
जोइय विसमी जोयगइ मणु वारणह ण जाइ।
इंदियविसय जि सुक्खडा तित्थइ बलि-बलि जाइ ॥190॥
अर्थ: हे जोगी! योगवृत्ति विषम है। क्योंकि मन रोका नहीं जाता है। इन्द्रियों के विषयों के जो सुख हैं, उन पर ही बलिदान हो जाता है, बार बार उनकी तरफ ही जाता है।
बद्धउ तिहुयणु परिभमइ मुक्कउ पउ वि ण देइ।
दिक्खु ण जोइय करहुलउ विवरेरउ पउ देइ ॥191॥
अर्थ: जो कर्मों से बँधा हुआ है, वही तीन लोक में भ्रमण करता है और जो मुक्त है वह अचल हो गया है, एक पग भी इधर-उधर नहीं देता। हे जोगी! ऊँट को देखो न! वह विपरीत पग धरता है।
संतु ण दीसइ तत्तु ण वि संसारेहिं भमंतु।
खंधावारिउ जिउ भमइ अवराडइहिं रहंतु ॥192॥
अर्थ: संसार में घूमते हुए न कोई सन्त दिखता है और न कोई तत्त्व। जीव इन्द्रियों की फौज सहित पर की रक्षा में लगा रहता है।
उव्वस वसिया जो करइ वसिया करइ जु सुण्णु।
बलि किज्जउ तसु जोइयहि जासु ण पाउ ण पुण्णु ॥193॥
अर्थ: हे जोगी! जो उजाड़ को बसाता है और बसे हुए को उजाड़ता है, उसकी बलिहारी है; क्योंकि उसके न पाप है और न पुण्य।
कम्मु पुराइउ जो खवइ अहिणव पेसु ण देइ।
अणुदिणु झायइ देउ जिणु सो परमप्पउ होइ ॥194॥
अर्थ: जो पुराने कर्म को खपाता है और नये कर्मों को आने से रोक देता है। तथा प्रतिदिन जिनवर का ही ध्यान करता है, वही परमात्मा होता है।
विसया सेवइ जो वि परु बहुला पाउ करेइ।
गच्छइ णरयहँ पाहुणउ कम्मु सहाउ लएइ ॥195॥
अर्थ: जो विषयों का सेवन करके बहुत पाप करता है, वह कर्म की सहायता से नरक का पाहुना बनकर वहाँ जाता है।
कुहिएण पूरिएण य छिद्देण य खारमुत्तगंधेण।
संताविज्जइ लोओ जह सुणहो चम्मखंडेण ॥196॥
अर्थ: क्षारयुक्त मूत्र की गन्ध से पूरित तथा घृणित छेद लोक को सन्तापित करता है; जैसे चमड़े का टुकड़ा कुत्ते को पीड़ित करता है।
देखंताहं वि मूढ वढ रमियइं सुक्खु ण होइ।
अम्मिए मुत्तहं छिद्दु लहु तो वि ण विणडइ कोइ ॥197॥
अर्थ: हे मोहित मूर्ख। देखने तथा रमण करने से सुख नहीं होता है। अहो! छोटा-सा मूत्र का छेद होने पर भी कोई उसे नष्ट नहीं करता है, सब उससे मूत्र-त्याग करते हैं।
जिणवरु झायहि जीव तुहु विसयकसायहं खोइ।
दुक्खु ण देक्खहि कहिं मि वढ अजरामरु पउ होइ ॥198॥
अर्थ: हे जीव! तू विषय-कषाय को खोकर जिनेन्द्रदेव का ध्यान कर। हे मूर्ख! उससे फिर कभी दुःख नहीं देखना पड़ता है और अजर-अमर पद की प्राप्ति होती है।
विसयकसाय चएवि वढ अप्पहं मणु वि धरेहि।
चूरिवि चउगइ णित्तुलउ परमप्पउ पावेहि ॥199॥
अर्थ: हे मूर्ख! विषय-कषाय को छोड़ कर आत्मा में मन को लगा कर चारों गति का नाश कर अतुल परमपद को प्राप्त करो।
इंदियपसरु णिवारि वढ मण जाणहि परमत्थु।
अप्पा मेल्लिवि णाणमउ अवरु विडावइ सत्थु ॥200॥
अर्थ: हे मूर्ख! इन्द्रियों के फैलाव में जाते हुए मन को रोक कर परमार्थ को जानो। ज्ञानमय आत्मा को छोड़कर अन्य शास्त्र कल्पित हैं।
विसया चिंति म जीव तुहु विसय ण भल्ला होंति।
सेवंताहं वि महुर वढ पच्छइं दुक्खइं दिंति ॥201॥
अर्थ: हे जीव! तू विषयों की चिन्ता मत कर। विषय कभी भी भले नहीं होते। हे मूर्ख! सेवन करते समय तो विषय मधुर लगते हैं, लेकिन पीछे दुःख देते हैं।
विसयकसायहं रंजियउ अप्पहिं चित्तु ण देइ।
बंधिवि दुक्कियकम्मडा चिरु संसारु भमेइ ॥202॥
अर्थ: विषय-कषायों में रंजायमान होकर यह जीव अपने स्वरूप में ध्यान नहीं लगाता है। इसलिए दुष्कृत कर्मों को बन्ध कर चिरकाल तक संसार में घूमता है।
इंदियविसय चएवि वढ करि मोहहं परिचाउ।
अणुदिणु झावहि परमपउ तो एहउ ववसाउ ॥203॥
अर्थ: हे मूर्ख! इन्द्रियों के विषयों को छोड़कर मोह को भी छोड़। आत्मा-परमात्मा का निशि-दिन ध्यान करने से ही यह कारज हो सकता है।
णिज्जियसासो णिप्फंदलोयणो मुक्कसयलवावारो।
एयाइं अवत्थ गओ सो जोयउ णत्थि संदेहो ॥204॥
अर्थ: व्यवहार में श्वास को जीत लिया, नेत्र निश्चल हो गए, सभी व्यापार छूट जाने पर जो अवस्था होती है, वह ‘योग’ है - इसमें कोई सन्देह नहीं है।
तुट्टे मणवावारे भग्गे तह रायरोससब्भावे।
परमप्पयम्मि अप्पे परिट्ठिए होइ णिव्वाणं ॥205॥
अर्थ: मन का व्यापार छूट जाने पर और राग-द्वेष के सद्भाव की समाप्ति होने पर परम पद में स्थित होते ही अतीन्द्रिय ज्ञान-परमानन्द मय जो (अविचल) अवस्था है, वही निर्वाण है।
विसया सेवहि जीव तुहु छंडिवि अप्पसहाउ।
अण्णइं दुग्गइं जाइसिहि तं एहउ ववसाउ ॥206॥
अर्थ: हे जीव! तुम आत्म-स्वभाव को छोड़कर विषयों का सेवन करते हो। इसलिए अन्य गति में दुर्गति को प्राप्त होगे। यह ऐसा ही व्यापार है।
मंतु ण तंतु ण धेउ ण धारणु।
ण वि उच्छासह किज्जइ कारणु ॥
एमइ परमसुक्खु मुणि सुव्वइ।
एही गलगल कासु ण रुच्चइ ॥207॥
अर्थ: जहाँ न मन्त्र, न तन्त्र, न ध्येय, न धारण, न उच्छ्वास का कोई साधन है, वही मुनि परमसुख में सोता है। क्योंकि गड़बड़ किसी को नहीं रुचती है।
उववासविसेस करेवि बहु एहु वि संवरु होइ।
इच्छइ किं बहु वित्थरेण मा पुच्छिज्जइ कोइ ॥208॥
अर्थ: विशेष रूप से आत्म-साधन पूर्वक उपवास करने से संवर (आते हुए कर्म रुकते हैं) होता है। बहुल विस्तार से इच्छा करने से क्या लाभ है? किसी से कुछ भी मत पूछ।
तउ करि दहविहु धम्मु करि जिणभासिउ सुपसिद्धु।
कम्महं णिज्जर एहु जिय फुडु अक्खिउ मइं तुज्झु ॥209॥
अर्थ: हे जीव! तपपूर्वक जिनेन्द्र भगवान् द्वारा कहे हुए अत्यन्त प्रसिद्ध दश प्रकार के (लक्षण रूप) धर्मों का पालन कर, जिससे कर्मों की निर्जरा हो। यह मैंने तुझे स्पष्ट बता दिया है।
दहविहु जिणवरभासियउ धम्मु अहिंसासारु।
अहो जिय भावहि एक्कमणु जिम तोडहि संसारु ॥210॥
अर्थ: हे जीव! जिनवर द्वारा कहा गया दश प्रकार का धर्म, जिसमें अहिंसा सार है, उस धर्म की एकाग्र मन से भावना भाओ, जिससे इस संसार को तोड़ सको।
भवि भवि दंसणु मलरहिउ भवि भवि करउं समाहि।
भवि भवि रिसि गुरु होइ महु णिहय मणुब्भववाहि ॥211॥
अर्थ: भव-भव में मलरहित सम्यग्दर्शन होवे, भव-भव में समाधि करूँ और भव-भव में मानसिक व्याधियों को दूर या नष्ट करने वाले ऋषि मेरे गुरु होवें।
अणुपेहा बारह वि जिय भाविवि एक्कमणेण।
रामसीहु मुणि इम भणइ सिवपुरि पावहि जेण ॥212॥
अर्थ: हे जीव! एकाग्र मन से बारह भावनाओं की भावना कर। इससे मुक्ति की प्राप्ति होती है - ऐसा रामसिंह मुनि कहते हैं।
सुण्णं ण होइ सुण्णं दीसइ सुण्णं च तिहुवणे सुण्णं।
अवहरइ पावपुण्णं सुण्णसहावे गओ अप्पा ॥213॥
अर्थ: सब द्रव्यों के अभाव का नाम शून्य नहीं है। यह कहा जाता है कि (शून्यवाद में) वह सामान्य और विशेष भावों से रहित है, किन्तु जो पाप-पुण्य से रहित निर्विकल्प स्वभावी आत्मा है, वह शून्य है।
बेपंथेहिं ण गम्मइ बेमुहसूई ण सिज्जए कंथा।
विण्णि ण हुंति अयाणा इंदियसोक्खं च मोक्खं च ॥214॥
अर्थ: दो रास्तों से (एक साथ) जाना नहीं होता। इसी प्रकार दो मुख वाली सुई से कथरी की सिलाई नहीं होती। हे अज्ञानी! इन्द्रियों का सुख और मोक्ष दोनों एक साथ नहीं हो सकते। दोनों में से कोई एक ही होगा।
उववासह होइ पलेवणा संताविज्जइ देहु।
घरु डज्झइ इंदियतणउ मोक्खहं कारणु एहु ॥215॥
अर्थ: उपवास करने से अग्नि प्रदीप्त होती है जो देह को संतापित करती है। इन्द्रियों का घर उससे जल जाता है जो मोक्ष का कारण है।
अच्छउ भोयणु ताह घरि सिद्धु हरेप्पिणु जेत्थु।
ताह समउ जय कारियइं ता मेलियइ संमत्तु ॥216॥
अर्थ: उस घर का भोजन बना रहे, जहाँ पर सिद्ध का अपहरण या मान्यता न हो अर्थात् उस घर में भोजन नहीं करना चाहिए जो आठों कर्मों से रहित निर्दोष देव को मानता, पूजता न हो। उसके साथ जयकार करने (उसकी जय बोलने) से भी सम्यक्त्व छूट जाता है।
जइ लद्धउ माणिक्कडउ जोइय पुहवि भमंत।
बंधिज्जइ णियकप्पडइं जोइज्जइ एक्कंत ॥217॥
अर्थ: हे जोगी! यदि पृथ्वी पर घूमते हुए माणिक्य प्राप्त हो गया है, तो उसको अपने वस्त्र में लपेट कर (बाँधकर) एकान्त में अवलोकन करना चाहिए।
वादविवादा जे करहिं जाहिं ण फिट्टिय भंति।
जे रत्ता गउपावियइं ते गुप्पंत भमंति ॥218॥
अर्थ: वाद-विवाद करने पर भी जिनकी भ्रान्ति नहीं मिटी और जो अपनी प्रशंसा-बड़ाई करने में लगे हुए हैं, वे भ्रान्त हुए भ्रमण ही करते रहते हैं।
कालहि पवणहि रविससिहि चहु एक्कट्ठइ वासु।
हउं तुहिं पुच्छउं जोइया पहिले कासु विणासु ॥219॥
अर्थ: काल, पवन, सूर्य और चन्द्र इन चारों का एकत्र वास है। हे जोगी! मैं तुमसे पूछता हूँ कि इनमें से पहले किसका विनाश होगा?
ससि पोखइ रवि पज्जलइ पवणु हलोले लेइ।
सत्त रज्जु तमु पिल्लि करि कम्महं कालु गिलेइ ॥220॥
अर्थ: चन्द्रमा पोषण करता है, सूर्य प्रज्वलित करता है, पवन हिलोरें लेता है। किन्तु सात राजूप्रमाण (मध्य लोक तक) अन्धकार को भी पेल कर काल कर्मों को निगल लेता है।