दीपावली (वीर निर्वाण महोत्सव): सभी ग्रंथों से संकलन | Deepawali (Veer Nirvan Mahotsav): Sabhi Granthon Se Sankalan

ग्रंथ एवं स्रोत: तिलोयपण्णत्ती · हरिवंशपुराण · निर्वाण भक्ति (आचार्य पूज्यपाद) · जयधवला (कसायपाहुड टीका) · आलापपद्धति (आचार्य देवसेन) · दीपावली पूजन, कवि राजमल पवैया · प्रमाण लेख, प्रो. अनेकांत कुमार जैन · चतुर्दशी या अमावस्या? · तत्त्वार्थसूत्र


१. भगवान महावीर का निर्वाण: तिथि, समय, स्थान

  • तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), गाथा १/१२१९ (गाथा क्रमांक इस लेख अनुसार)

    कत्तिय-किण्हे चोद्दसि, पज्जूसे सादि-णाम-णक्खत्ते।
    पावाए णयरीए, एक्को वीरेसरो सिद्धो॥

    अर्थ: वीर जिनेश्वर कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी के प्रत्यूषकाल में स्वाति नक्षत्र के रहते पावानगरी से अकेले ही सिद्ध हुए।

  • निर्वाण भक्ति, आंचलिका (आचार्य पूज्यपाद) (पढ़ें)

    अवसप्पिणीए चउत्थ समयस्स पच्छिमे भाए, अट्ठमासहीणे वासचउक्कमि सेसकालम्मि पावाए णयरीए कत्तिए मसस्स किण्हचउदसिए रत्तिए सादीए णक्खते, पच्चूसे भगवदो महदि महावीरो वड्ढमाणो सिद्धिं गदो।

    अर्थ: अवसर्पिणी के चतुर्थ काल के पिछले भाग में साढ़े तीन माह कम चार वर्ष शेष रहते, पावानगरी में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में, स्वाति नक्षत्र में, प्रत्यूषकाल में भगवान महति महावीर वर्धमान सिद्धि को प्राप्त हुए। (रात्रि की समाप्ति और दिन के आगमन के बीच का काल प्रत्यूषकाल कहलाता है।)

  • जयधवला टीका (कसायपाहुड) (पढ़ें)

    कत्तियमास किण्ह पक्ख चौदस दिवस केवलणाणेण सह एत्थ गमिय परिणिव्वुओ वड्ढमाणो। अमावसीए परिणिव्वाण पूजा सयल देविहिं कया।

    अर्थ: कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को भगवान वर्धमान निर्वाण को प्राप्त हुए और अमावस्या को समस्त देवों ने निर्वाण पूजा की।

ध्यान दें: चतुर्दशी का प्रत्यूषकाल, यानी चतुर्दशी की समाप्ति और अमावस्या का आरम्भ। इसलिए शास्त्रों में दोनों तिथियों के प्रमाण मिलते हैं; नक्षत्र (स्वाति) दोनों में एक ही है। विस्तार: वीर निर्वाण चतुर्दशी को या अमावस्या को?


२. दीपमालिका का उद्गम: हरिवंशपुराण

  • हरिवंशपुराण (आचार्य जिनसेन, पुन्नाट संघ), सर्ग ६६, श्लोक १५ से २१, पृष्ठ ८०५ से ८०६ (ग्रंथ · उद्धरण)

    जिनेंद्रवीरोऽपि विबोध्य संततं, समन्ततो भव्यसमूहसन्ततिम्।
    प्रपद्य पावानगरीं गरीयसीं, मनोहरोद्यानवने तदीयके॥
    चतुर्थकालेऽर्धचतुर्थमासवै-र्विहीनताविश्चतुरब्दशेषके।
    स कार्तिके स्वातिषु कृष्णभूतसु-प्रभातसन्ध्यासमये स्वभावतः॥
    अघातिकर्माणि निरुद्धयोगको, विधूय घातीन्धनवद् विबंधनः।
    विबन्धनस्थानमवाप शंकरो, निरन्तरायोरूसुखानुबन्धनम्॥
    स पञ्चकल्याणमहामहेश्वरः, प्रसिद्धनिर्वाणमहे चतुर्विधैः।
    शरीरपूजाविधिना विधानतः, सुरैः समभ्यर्च्यत सिद्धशासनः॥
    ज्वलत्प्रदीपालिकया प्रवृद्धया, सुरासुरैर्दीपितया प्रदीप्तया।
    तदा स्म पावानगरी समन्ततः, प्रदीपिताकाशतला प्रकाशते॥
    तथैव च श्रेणिकपूर्वभूभुजः, प्रकृत्य कल्याणमहं सहप्रजाः।
    प्रजग्मुरिन्द्राश्च सुरैर्यथायथं, प्रभुचमाना जिनबोधिमर्थिनः॥
    ततस्तु लोकः प्रतिवर्षमादरात्, प्रसिद्धदीपालिकयात्र भारते।
    समुद्यतः पूजयितुं जिनेश्वरं, जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिभाक्॥

    सार: भगवान महावीर पावानगरी के मनोहर उद्यान में पधारे। चतुर्थ काल के तीन वर्ष साढ़े आठ मास शेष रहते, कार्तिक मास में स्वाति नक्षत्र में, प्रभात सन्ध्या के समय योग निरोध कर अघाति कर्मों का नाश कर निर्वाण को प्राप्त हुए। चारों निकाय के देवों ने निर्वाण कल्याणक की पूजा की। सुर असुरों द्वारा जलाई गई देदीप्यमान दीपकों की पंक्ति से पावानगरी का आकाश सब ओर से जगमगा उठा। श्रेणिक आदि राजाओं ने भी प्रजा सहित कल्याणक मनाया। तभी से भरत क्षेत्र के लोग प्रतिवर्ष आदरपूर्वक प्रसिद्ध “दीपालिका” द्वारा जिनेन्द्र की पूजा करने लगे।


३. “दीपोत्सव” नाम के प्रमाण

  • आलापपद्धति (आचार्य देवसेन), भूत नैगम नय का उदाहरण (पढ़ें)

    अतीते वर्तमानारोपणं यत्र स भूतनैगमो। यथा, अद्य दीपोत्सवदिने श्रीवर्धमानस्वामी मोक्षं गतः।

    अर्थ: अतीत की क्रिया में वर्तमान का आरोप करना भूत नैगम नय है, जैसे: “आज दीपोत्सव के दिन श्री वर्धमान स्वामी मोक्ष गए।” यानी न्याय ग्रंथ में भी दीपोत्सव और वीर निर्वाण का सम्बन्ध उदाहरण के रूप में प्रसिद्ध है।

  • चउप्पन्नमहापुरिसचरिय (आचार्य शीलांक, श्वेताम्बर परम्परा), गाथा ७८९ के बाद (पढ़ें)

    एवं सुरगणपहासमुज्ज्यं तम्मि दिणे सयलं महिमण्डलं दटठूण तह च्चेय कीरमाणे जणवएण “दीवोसवो” त्ति पसिद्धिं गओ।

    अर्थ: उस दिन देवों की प्रभा से समस्त पृथ्वी को प्रकाशित देखकर जनपद ने भी वैसा ही किया, और यह दिन “दीपोत्सव” नाम से प्रसिद्ध हुआ।


४. गौतम गणधर का केवलज्ञान

  • दीपावली पूजन, जयमाला (कवि राजमल पवैया) (पढ़ें)

    इसी दिवस गौतम स्वामी को, सन्ध्या केवलज्ञान हुआ।
    केवलज्ञान लक्ष्मी पाई, पद सर्वज्ञ महान् हुआ॥
    प्रभु के ग्यारह गणधर में थे, प्रमुख श्री गौतम स्वामी।
    क्षपकश्रेणि चढ़ शुक्लध्यान, से हुए देव अन्तर्यामी॥
    देवों ने अति हर्षित होकर, रत्न-ज्योति का किया प्रकाश।
    हुई दीपमाला द्विगुणित, आनन्द हुआ छाया उल्लास॥

    भाव: प्रातः भगवान का निर्वाण, सन्ध्या को गौतम स्वामी को केवलज्ञान। इसलिए दीपावली की असली “लक्ष्मी” केवलज्ञान लक्ष्मी है और असली “दीप” ज्ञान का दीप।


५. वीर निर्वाण संवत्: भारत का सबसे प्राचीन संवत्

  • कल्पसूत्र (श्वेताम्बर आगम), सूत्र ११६ (पढ़ें)

    बीए दिवसे कत्तिय सुद्धपडिवयाए… तेणं तं दिवसं नूयणवरिसारम्भदिवसतत्तेण पसिद्धं जायं।

    अर्थ: निर्वाण के दूसरे दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, नववर्ष के आरम्भ दिवस के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

  • वडली शिलालेख (अजमेर, राजस्थान): पुरातत्ववेत्ता डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा १९१२ में खोजा गया, इस पर “८४ वीर संवत” अंकित है, यानी वीर निर्वाण के ८४वें वर्ष का लेख। अभी अजमेर के राजपूताना संग्रहालय में सुरक्षित। (पढ़ें · जैनों का नववर्ष)


६. निर्वाण लाडू: विद्वानों के मत

  • जैनों का नववर्ष लेख अनुसार: प्रातः चढ़ाया जाने वाला लाडू भगवान के समवशरण का प्रतीक माना जाता है।
  • पं. कैलाशचंद्र जैन शास्त्री, बीकानेर (महावीर निर्वाण दिवस: क्या? क्यों? कैसे?): लाडू चढ़ाना भट्टारकों द्वारा चलाई गई परम्परा है, मूल आगम में इसका प्रमाण नहीं मिलता। मिठास और स्निग्धता के कारण चींटी आदि जीवों की हिंसा की सम्भावना रहती है; इच्छा हो तो लाडू के स्थान पर गोला (गट) प्रयोग किया जा सकता है।
  • पहले से लाडू बनाकर रखना उचित है? इस प्रश्न पर फोरम पर चर्चा: निर्वाण लाड़ू के संबंध में

७. परमार्थ दीपावली: वीतरागता का पर्व

  • डॉ. वीरसागर जैन, दीपावली वीतरागता का पर्व है:

    स्व-पर भेदविज्ञान के द्वारा सम्यग्ज्ञानी बनकर केवलज्ञानी बन जाना ही वास्तविक दीपावली मनाना है।

  • भजन: अबके ऐसी दिवाली मनाऊँ (पढ़ें, स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७२)

    ज्ञान-रतन के दीप में, तप का तेल पवित्र भराऊँ।
    अनुभव ज्योति जगा के, मिथ्या अन्धकार बिनसाऊँ॥
    अष्ट करम का फोड़ फटाका, विजयी जिन कहलाऊँ।
    शुद्ध बुद्ध सुखकन्द मनोहर, शील स्वभाव लखाऊँ॥

    भाव: बाहर का दीया नहीं, ज्ञान का दीया; बाहर का पटाखा नहीं, आठ कर्मों का पटाखा; बाहर की लक्ष्मी नहीं, निज अनुभूति रूपी महालक्ष्मी।


८. पूजन पंक्तियां (मूल पाठ, स्रोत सहित)

(क) महावीर निर्वाण पूजन (मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज; स्रोत: श्री जिनवाणी, पूजन-पाठ संग्रह; महावीर निर्वाण पूजन | Mahavir Nirvan Pujan)

स्थापना:

महावीर भगवान् को, मन मंदिर में धार।
कर नमोऽस्तु निर्वाण का, कर लें हम त्यौहार॥

मोक्ष कल्याणक अर्घ्य:

कार्तिक कृष्ण अमास को, मोक्ष गए अतिवीर।
दीवाली त्यौहार हो, पावापुर के तीर॥
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्ण-अमावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय
अर्घ्य…।

जयमाला से:

संध्या को अनुबद्ध रूप में, प्रथम शिष्य गौतम गणधर ।
बने केवली अतः दिवाली, भक्त मनाते हैं घर-घर॥
सोलह दीपक चौंषठ ज्योति, जला रोशनी करते हैं।
ज्ञानलक्ष्मी मोक्षलक्ष्मी, पूजा खोजा करते हैं॥५॥
घर आँगन को रोशन करने, दीप जलाते शहर नगर।
आतम घट को रोशन करने, प्रेम बाँटते घर-बाहर॥
…॥६॥

(ख) दीपावली पूजन (कवि राजमल पवैया; स्रोत: बृहज्जिनवाणी संग्रह, पर्व पूजन खण्ड, पृष्ठ ४१६ से ४२१; दीपावली पूजन (कवि राजमल पवैया) | Deepawali Pujan (Kavi Rajmal Pavaiya))

नैवेद्य:

आत्मशक्ति परिपूर्ण शुद्ध, नैवेद्य भाव उर में धर लूँ ।
चिर-अतृप्ति का रोग नाश कर, सहज तृप्त निज पद वर लूँ ।।टेक।।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णामावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री वर्द्धमान-जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

दीप:

पूर्ण ज्ञान कैवल्य प्राप्ति हित, ज्ञानदीप ज्योतित कर लूँ ।
मिथ्या-भ्रम-तम-मोह नाश कर, निज सम्यक्त्व प्राप्त कर लूँ ।।टेक।।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णामावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री वर्द्धमान-जिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

अन्तिम दोहा:

दीपमालिका पर्व पर, महावीर उर धार ।
भाव सहित जो पूजते, पाते सौख्य अपार ।।

(ग) श्री गौतम गणधर पूजन (श्री राजमल जी पवैया; श्री गौतम स्वामी पूजन | Shree Gautam Swami Pujan)

कार्तिक कृष्ण अमावस्या को कर्म घातिया करके क्षय ।
सायंकाल समय में पाई केवलज्ञान लक्ष्मी जय ॥
ज्ञान लक्ष्मी तुमने पाई और वीर प्रभु ने निर्वाण ।
दीपमालिका पर्व विश्व में तभी हुआ प्रारम्भ महान् ॥

(घ) श्री पावापुर निर्वाण क्षेत्र पूजन (श्री राजमल जी पवैया; श्री पावापुर निर्वाण क्षेत्र पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Pavapur Nirvan Kshetr Pujan (Rajmal Pavaiya))

स्थापना:

श्री पावापुर तीर्थक्षेत्र को भक्तिभाव से करूँ प्रणाम ।
जल मन्दिर में महावीरस्वामी के चरणकमल अभिराम । ।
इसी भूमि से मोक्ष प्राप्त कर परम सिद्धपुरी का धाम ।
विनयसहित पूजन करता हूँ पाऊँ निजस्वरुप विश्राम । ।

दीप:

ज्योतिर्मय दीप प्रकाश नूतन लाया हूँ ।
अज्ञान मोह का नाश करने आया हूँ । ।पावापुर ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री पावापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीप नि ।

(ङ) निर्वाणकाण्ड भाषा (श्री भैया भगवतीदास जी; स्रोत: करलो जिनवर की पूजन, पंडित सदासुख ग्रन्थमाला अजमेर, पृष्ठ ४०९ से ४१०; निर्वाणकांड भाषा | NirvanKand Bhasha)

चौपाई २:

चरम तीर्थंकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामी महावीर।
शिखर समेद जिनेसुर बीस, भाव सहित बन्दौं निशदीस ॥(2)

भाव: मंदिर विधि में निर्वाणकाण्ड पढ़कर ही निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है (नीचे भाग ९ देखें)।


९. दीपावली पूजन विधि

(मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज; स्रोत: श्री जिनवाणी, पूजन-पाठ संग्रह; दीपावली पूजन विधि | Deepavali Pujan Vidhi)

मंदिर में (प्रातः):

प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्नानादि करके पवित्र
वस्त्र पहिनकर जिनेन्द्र देव के मन्दिर में परिवार के साथ पहुँचकर
जिनेन्द्र देव की वन्दना करनी चाहिए। तदुपरान्त थाली में अथवा
मूलनायक की वेदी पर सोलह दीपक चार-चार बाती वाले जलाना
चाहिए तथा भगवान् महावीर स्वामी की पूजन, निर्वाणकाण्ड
पढ़ने के पश्चात् महावीर स्वामी के मोक्षकल्याणक का अर्घ्य
बोलकर निर्वाण लाडू अर्घ्य सहित चढ़ाना चाहिए।

घर पर (सायं, गोधूली बेला), सोलह दीपक चौंसठ ज्योति:

सामने वाली चौकी पर सोलह दीपक जो कि सोलहकारण भावना
के प्रतीक हैं। (इन्हीं सोलहकारण भावनाओं को भाकर तीर्थंकरप्रकृति
का बंध भगवान् महावीर स्वामी ने किया था, इसी के प्रतीक
स्वरूप सोलह दीपक चार-चार ज्योतियों वाले जलाए जाते हैं।
(१६x४=६४) यह ६४ का अंक चौंसठ ऋद्धि का प्रतीक है।
भगवान् महावीर चौंषठ ऋद्धियों से युक्त थे इन्हीं के प्रतीक स्वरूप
यह चौंषठ ज्योति जलायी जाती हैं। अतः सोलह दीपक चौंषठ
बातियों से जलाकर दीपकों में शुद्ध देशी घी उपयुक्त होता है।

जाप्य मंत्र:

जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं चतुःषष्टि ऋद्धिभ्यो नमः ।

तिलक के समय:

मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमोगणी ।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो, जैन धर्मोस्तु मंगलं ॥

नई बही में:

श्रीऋषभाय नमः। श्री महावीर स्वामिने नमः। श्री गौतम
गणधराय नमः। श्री जिन मुखोद्भव सरस्वती देव्यै नमः। श्री
केवलज्ञान लक्ष्मी देव्यै नमः ।

नोट (स्रोत में ही):

नोट-पटाखे कभी न चलाएँ, अनार, फुल्झड़ी, राकेट,
चकरी आदि भी बिल्कुल न छोड़ें। इससे लाखों जीवों का घात
होता है। पर्यावरण दूषित होता है। स्वयं को भी हानि हो जाती है।

खुला प्रश्न: बही खाता, तराजू, गुल्लक पूजे जाएं या नहीं? फोरम पर चर्चा: क्या गुल्लक, बहीखाता आदि पूजना चाहिए? | Kya Gullak, Bahikhata Aadi Pujna Chahiye?


१०. पद एवं भजन

पावापुर भवि वंदो जाय (पं. द्यानतराय जी; स्रोत: द्यानत भजन सौरभ; पावापुर भवि वंदो जाय । Pavapur Bhavi Vando Jaye)

पावापुर भवि वंदो जाय ॥ टेक ॥
परम पूज्य महावीर गये शिव, गौतम ऋषि केवलगुन पाय ॥ १ ॥
सो दिन अब लगि जग सब मानैं, दीवाली सम मंगल काय ॥ २ ॥
कातिक मावस निस तिस जागे, ‘द्यानत’ अदभुत पुन्य उपाय ॥ ३ ॥

अर्थ (स्रोत से):

हे भव्य ! तुम पावापुर में जाकर वंदना करो जहाँ से परमपूज्य भगवान् महावीर का निर्वाण हुआ है और गौतम गणधर को कैवल्य (गुण) की प्राप्ति हुई है।
तब से अब तक उस दिन को सब विशेष मानने लगे हैं। वह दिन मंगल- उत्सव के समान मनाया जाता है, उस दिन दीपावली मनाते हैं जो मंगलकारी है मंगल को करनेवाला है।
द्यानतराय जी कहते हैं कि जो कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि में जागते हैं, आत्मरुचि जागृत करते हैं वे अद्भुत पुण्य के भागी होते हैं।

देखे धन्य घरी, आज पावापुर महावीर (पं. द्यानतराय जी; स्रोत: द्यानत भजन सौरभ; देखे धन्य घरी, आज पावापुर महावीर । Dekhe Dhanya Ghari Aaj Pavapur Mahaveer)

देखे धन्य घरी, आज पावापुर महावीर ॥ टेक ॥
गौतमस्वामि चंदना मेंढ़क , श्रेणिकसुखकर धीर ॥ देखे. ॥ १ ॥
चार ओर भवि कमल विराजैं, भक्ति फूल सुख नीर ॥ देखे. ॥ २।।
‘द्यानत’ तीरथनायक ध्यावै, मिट जावै भव भीर ॥ देखे. ॥ ३ ॥

गौतम स्वामीजी मोहि वानी तनक सुनाई (पं. द्यानतराय जी; स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, भजन १३१; गौतम स्वामीजी मोहि वानी तनक सुनाई | Gautam Swamiji Mohi Vani Tanak Sunai)

गौतम स्वामीजी मोहि वानी तनक सुनाई
जैसी वानी तुमने जानी, तैसी मोहि बताई॥गौतम. ॥१॥
जा वानीतैं श्रेणिक समझ्यो, क्षायक समकित पाई॥गौतम.॥२॥
‘द्यानत’ भूप अनेक तरे हैं, वानी सफल सुहाई॥गौतम.॥३॥

और पूजन/भजन:

  1. दीपावली पूजन (कवि राजमल पवैया) | Deepawali Pujan (Kavi Rajmal Pavaiya)
  2. महावीर निर्वाण पूजन | Mahavir Nirvan Pujan
  3. श्री पावापुर निर्वाण क्षेत्र पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Pavapur Nirvan Kshetr Pujan (Rajmal Pavaiya)
  4. श्री गौतम स्वामी पूजन | Shree Gautam Swami Pujan
  5. दीपावली पूजन विधि | Deepavali Pujan Vidhi
  6. निर्वाणकांड भाषा | NirvanKand Bhasha
  7. श्री वृहत् निर्वाण विधान (कविवर जगतराम जी) | Shri Vrihat Nirvan Vidhan (Kavivar Jagatram Ji)
  8. वीर गये निर्वाण चलिए उत्सव में | Vir Gaye Nirvan Chalie Utsav Men
  9. अबके ऐसी दिवाली मनाऊँ | abke esi diwali manau

११. स्वरूप एवं परिभाषा

  • मोक्ष की परिभाषा: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), सूत्र १०/२ (पढ़ें)

    बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥

    अर्थ: बन्ध के कारणों के अभाव और निर्जरा से समस्त कर्मों का पूर्ण रूप से छूट जाना मोक्ष है।

  • निर्वाण शब्द का अर्थ: (महावीर निर्वाण दिवस: क्या? क्यों? कैसे?)

    निर्वाण का व्युत्पत्ति परक अर्थ है निस्+वान निर् अर्थात् रहित वान अर्थात् शरीर(औदारिक)से रहित अवस्था एवं सिद्ध पद की प्राप्ति। निर्वाण एवं देहावसान, स्वर्गवास एवं देवलोक गमन में बहुत अन्तर है।

  • मुक्ति का स्वरूप: बाबू युगल जी (वीर निर्वाणोत्सव २००४)

    सचमुच मुक्ति परम आनंद अवस्था को कहते हैं जहाँ जिस अवस्था को पहुँचकर जीव अनंत काल तक अपने शुद्धात्म तत्त्व के भीतर भरे हुए अनंत अतीन्द्रिय आनंद का प्रतिसमय रसास्वादन किया करता है।

  • केवलज्ञान: तत्त्वार्थसूत्र, सूत्र १०/१ और १/२९ (पढ़ें)

    मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्च केवलम् ॥
    सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥

    अर्थ: मोहनीय कर्म के क्षय से और फिर ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय कर्म के क्षय से केवलज्ञान प्रगट होता है। केवलज्ञान का विषय सर्व द्रव्य और उनकी सर्व पर्यायें हैं।

  • गौतम गणधर कौन: (श्री गौतम स्वामी पूजन · श्री गौतम गणधर स्तुति)

    जय जय इन्द्रभूति गौतम गणधर स्वामी मुनिवर जय जय ।
    तीर्थंकर श्री महावीर के प्रथम मुख्य गणधर जय जय ॥
    द्वादशाङ्ग श्रुत पूर्ण ज्ञानधारी गौतम स्वामी जय जय ।

  • दीपावली क्यों: दीपावली पूजन विधि (पढ़ें)

    उनके प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम को आपराह्णिक काल में उसी दिन केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी इसी के प्रतीक रूप में कार्तिक वदी अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाता है।

  • धन्य त्रयोदशी (धनतेरस का जैन अर्थ) (पढ़ें)

    धन्य हैं वे लोग जिन्होंने महावीर की अन्तिम दिव्य ध्वनि त्रयोदशी को सुनी थी, धन्य है वह तिथि। इस तिथि का नाम धन्य त्रयोदशी नाम सार्थक हुआ।

  • रूप चतुर्दशी का जैन अर्थ (पढ़ें)

    भग.महावीर ने त्रयोदशी को योग निरोध कर लेने के पश्चात् दिव्यध्वनि तो नही खिरी ध्यानस्थ मुद्रा का दर्शन तो मिला, उनके रूप के दर्शन तो हुए इस कारण से रूप चतुर्दशी का पर्व प्रचलन में आया।

  • सच्ची दीपावली: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’ (पढ़ें, स्रोत: सहज पाठ संग्रह)

    दीप सम्यक्त्व जब परिणति में जले।
    सच्ची दीपावली तेरी तब ही मने।।
    बाह्य दीपक से अन्दर उजाला न हो,
    ज्ञान दीपक से चेतन भवन जगमगे।।


१२. और पढ़ें

  1. दीपावली प्रवचन (पूज्य गुरुदेवश्री कानजीस्वामी)
  2. वीर निर्वाण पर्व, महत्त्वपूर्ण चिन्तनीय तथ्य (बाबू युगल जी)
  3. वीर निर्वाणोत्सव २००४ (बाबू युगल जी)
  4. ज्ञान और आनन्द के महत्त्व को रेखांकित करती है दीपावली
  5. दीपावली क्या करें क्या न करें
  6. दीपावली नहीं, वीर निर्वाण उत्सव