दीपावली (वीर निर्वाण महोत्सव) | पूजन, पाठ, भजन, लेख: सम्पूर्ण सामग्री एक जगह | Deepawali (Veer Nirvan Mahotsav) | Pujan, Path, Bhajan, Lekh: Sampurn Samagri Ek Jagah

अनुक्रमणिका

दीपावली (वीर निर्वाण महोत्सव) से जुड़ी फोरम की सारी सामग्री एक ही जगह: पूजन, विधि, पाठ, आरती, भजन, गौतम गणधर, लेख, ग्रंथ, बच्चों के लिए सामग्री और भगवान महावीर का सर्वोदय तीर्थ। हर विषय इसी थ्रेड की एक अलग पोस्ट में है, ऊपर की सूची से सीधे पहुँचें। :diya_lamp:

Deepawali (Veer Nirvan Mahotsav): all forum content in one place, pujan, vidhi, path, aarti, bhajan, Gautam Gandhar, articles, granth and kids content.


1. दीपावली क्या है: वीर निर्वाण महोत्सव

हरिवंशपुराण (सर्ग ६६) के अनुसार कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की प्रभात सन्ध्या में, स्वाति नक्षत्र में, भगवान महावीर पावानगरी से निर्वाण को प्राप्त हुए। देवों ने दीपकों की पंक्ति से पावानगरी को जगमगा दिया, तभी से भरत क्षेत्र में प्रतिवर्ष दीपालिका से जिनेन्द्र की पूजा होती है। ग्रंथों के मूल प्रमाण पहली कड़ी में हैं।

खोज: Dipawali

2. दीपावली पूजन विधि

घर और मन्दिर में दीपावली के दिन पूजन कैसे करें, क्या करें और क्या न करें।

3. पूजन

निर्वाण दिवस पर पढ़ी जाने वाली पूजन: दीपावली पूजन, पावापुर व निर्वाण क्षेत्र पूजन, गौतम स्वामी पूजन।

4. विधान

निर्वाण पर्व पर किया जाने वाला विधान।

5. पाठ, भक्ति एवं स्तोत्र

निर्वाणकाण्ड, निर्वाणभक्ति, महावीराष्टक और महावीर स्तुतियाँ।

6. आरती

भगवान महावीर की आरती।

7. भजन

निर्वाण और दीपावली के भजन, फिर भगवान महावीर के भजन।

8. गौतम गणधर

दीपावली की सन्ध्या को केवलज्ञान पाने वाले भगवान महावीर के प्रथम गणधर।

9. लेख एवं प्रवचन

दीपावली, वीर निर्वाण संवत् और निर्वाण लाडू पर विद्वानों के लेख और प्रवचन।

10. ग्रंथ एवं चरित्र

भगवान महावीर का जीवन, उपदेश और निर्वाणभूमियाँ।

11. बच्चों के लिए

दीपावली क्विज, प्रश्नोत्तरी, गीत और पहेली।

12. भगवान महावीर एवं सर्वोदय तीर्थ

भगवान महावीर का शासन (उनका उपदेश) ही “सर्वोदय तीर्थ” कहलाता है। दोनों ग्रंथ PDF सहित, और उनका सार, एक ही जगह।

:paperclip: सर्वोदय तीर्थ के ग्रंथ (PDF सहित):

सार

आचार्य समन्तभद्र ने युक्त्यनुशासन में भगवान महावीर की स्तुति करते हुए उनके शासन को “सर्वोदय तीर्थ” कहा है:

सर्वान्तवत्तद्गुणमुख्यकल्पं सर्वान्तशून्यं च मिथोऽनपेक्षम्।
सर्वापदामन्तकरं निरन्तं सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव॥ ६१॥

पं. जुगलकिशोर मुख़्तार ‘युगवीर’ इसका भाव इस प्रकार बताते हैं:

  1. शब्द का अर्थ: “सर्व” यानी सब और पूर्ण, “उदय” यानी ऊपर उठना या विकास, और “तीर्थ” वह जिसके निमित्त से संसार सागर को पार किया जाए। जो आगम वाक्य आत्मा के पूर्ण विकास में और सब जीवों के विकास में सहायक है, वही सर्वोदय तीर्थ है।
  2. अनेकान्त ही इसका आधार: यह शासन वस्तु के सभी धर्मों (सामान्य और विशेष, द्रव्य और पर्याय, एक और अनेक) को मुख्य और गौण की अपेक्षा से साथ रखता है, इसलिए इसमें कोई विरोध नहीं। जो मत किसी एक धर्म का सर्वथा एकान्त पकड़ते हैं, वे सर्वोदय तीर्थ नहीं हो सकते।
  3. सब दुःखों का अन्त करने वाला: यह शासन किसी मिथ्यादर्शन से खण्डित नहीं होता और सब प्राणियों के अभ्युदय का कारण है।
  4. विकास कैसे होता है: आत्मा का उदय यानी उसके ज्ञान, दर्शन, सुख आदि गुणों का विकास, जो अज्ञान आदि दोषों और ज्ञानावरणादि कर्मों के नाश बिना नहीं होता। यहाँ तीर्थ (जिनवाणी) निमित्त कारण है और सम्यग्दर्शन आदि आत्मगुण उपादान कारण हैं।
  5. धर्मतीर्थ: यह सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय का हेतु है, इसलिए इसे धर्मतीर्थ कहते हैं और भगवान महावीर धर्मतीर्थ के कर्ता (प्रवर्तक) कहलाते हैं।

डॉ. भारिल्ल के ग्रंथ का सार (संक्षेप में):

  • प्रथम खण्ड: महावीर ने नया धर्म नहीं चलाया, सनातन वस्तुस्वभाव का उद्घाटन किया (पृ. 3)। मारीचि, त्रिपृष्ठ, सिंह, प्रियमित्र चक्रवर्ती, नन्द राजा आदि पूर्व भवों से होकर (पृ. 26 से 39) कुण्डलपुर में जन्म, तीस वर्ष में दिगम्बर दीक्षा, बयालीस वर्ष में ऋजुकूला तट पर केवलज्ञान, 66 दिन पश्चात् गौतम गणधर के आने पर दिव्यध्वनि, और कार्तिक अमावस्या को पावापुर से निर्वाण (पृ. 42 से 74)।
  • द्वितीय खण्ड, सर्वोदय तीर्थ: उनकी वाणी ही तीर्थ है, जिसमें कण कण की स्वतन्त्रता है; कोई द्रव्य किसी का कर्ता नहीं (पृ. 79)। छह द्रव्य, सात तत्त्व, देव शास्त्र गुरु, भेदविज्ञान और आत्मानुभूति, अनेकान्त और स्याद्वाद, प्रमाण और नय, और सम्यक्चारित्र: जिस प्रकार रागादि मिटें वही आचरण चारित्र है (पृ. 80 से 169)।
  • उपसंहार और अहिंसा: दुःख का कारण भीतर के मोह राग द्वेष हैं (पृ. 170); रागादि भावों का न होना ही अहिंसा है, और अन्तिम सन्देश: आत्मा को जानकर स्वयं भगवान् बनो (पृ. 177 से 187)।

पूरा सार, खण्ड क्रम से पृष्ठ अंकों सहित: तीर्थंकर महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, सार

भगवान महावीर पर और ग्रंथ:

स्रोत: सार पं. युगवीर जी की पुस्तक “महावीर का सर्वोदय तीर्थ” (वीर सेवा मन्दिर) के “सर्वोदय तीर्थ” अध्याय से; भारिल्ल जी के ग्रंथ का सार उसी ग्रंथ के पाठ से।