भगवान महावीर के प्रथम और मुख्य गणधर इन्द्रभूति गौतम। कार्तिक कृष्ण अमावस्या की प्रातः भगवान महावीर का निर्वाण हुआ और उसी दिन सन्ध्या को गौतम स्वामी को केवलज्ञान हुआ। दीपावली इन्हीं दो कल्याणकारी घटनाओं का पर्व है।
नीचे की सब पंक्तियाँ फोरम पर पहले से उपलब्ध रचनाओं से ज्यों की त्यों ली हैं, स्रोत हर खण्ड के साथ है।
१. परिचय
श्री गौतम स्वामी पूजन, श्री राजमल जी पवैया, जयमाला
मगध देश के गौतमपुर वासी वसुभूति ब्राह्मण पुत्र ।
माँ पृथ्वी के लाल लाड़ले इन्द्रभूति तुम ज्येष्ठ सुपुत्र ॥
अग्निभूति अरु वायुभूति लघु भ्राता द्वय उत्तम विद्वान् ।
शिष्य पाँच सौ साथ आपके चौदह विद्या ज्ञान निधान ॥
भाव: गौतमपुर (मगध) के वसुभूति ब्राह्मण और माता पृथ्वी के ज्येष्ठ पुत्र। दो छोटे भाई अग्निभूति और वायुभूति, पाँच सौ शिष्य, चौदह विद्याओं के ज्ञाता।
२. छियासठ दिन दिव्यध्वनि नहीं खिरी
वही जयमाला
शुभ वैशाख शुक्ल दशमी को हुआ वीर को केवलज्ञान ।
समवशरण की रचना करके हुआ इन्द्र को हर्ष महान् ॥
छियासठ दिन हो गए दिव्यध्वनि खिरी नहीं प्रभु की यह ज्ञान।
अवधिज्ञान से लखा इन्द्र ने “गणधर की है कमी प्रधान”॥
इन्द्रभूति गौतम पहले गणधर होंगे यह जान लिया ।
वृद्ध ब्राह्मण वेश बना, गौतम के गृह प्रस्थान किया ॥
भाव: वैशाख शुक्ल दशमी को भगवान को केवलज्ञान हुआ, पर छियासठ दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी क्योंकि गणधर नहीं थे। इन्द्र वृद्ध ब्राह्मण के वेश में इन्द्रभूति के पास गए।
३. मानस्तम्भ देखते ही मान गल गया
श्री गौतम स्वामी पूजन, अर्घ्य
श्रावण कृष्ण एकम के दिन समवशरण में तुम आए ।
मानस्तम्भ देखते ही तो मान मोह अघ गल पाए ॥
महावीर के दर्शन करते, ही मिथ्यात्व हुआ चकचूर ।
रत्नत्रय पाते ही दिव्यध्वनि का लाभ लिया भरपूर ॥
वही जयमाला
समवशरण की सीमा में जाते ही हुआ गलित अभिमान ।
प्रभु दर्शन करते ही पाया सम्यक्दर्शन सम्यक्ज्ञान ॥
तत्क्षण सम्यक्चारित धारा मुनि बन गणधर पद पाया।
अष्ट ऋद्धियाँ प्रगट हो गईं ज्ञान मन:पर्यय छाया ॥
श्री गौतम गणधर स्तुति, ब्र. श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
बाह्य ज्ञान तो था बहुतेरा, अनुयायी शिष्यों का घेरा।
जग प्रसिद्धि बहु पाई थी, लेश न शान्ति मन आई थी।
आत्मज्ञान बिन इन्द्रियज्ञान, हमने भी समझा अज्ञान॥१॥
भाव: श्रावण कृष्ण एकम को समवशरण में आते ही अभिमान गल गया, सम्यग्दर्शन हुआ, मुनि दीक्षा ली और प्रथम गणधर बने। उसी दिन से भगवान की दिव्यध्वनि खिरने लगी। बहुत विद्या होते हुए भी आत्मज्ञान के बिना शान्ति नहीं थी, यही इस प्रसंग की सीख है।
४. द्वादशांग की रचना और ग्यारह गणधर
वही जयमाला
ओंकार ध्वनि मेघ गर्जना सम होती है गुणशाली ।
द्वादशांग वाणी तुमने अंतर्मुहूर्त में रच डाली ॥
इन्द्रभूति, श्री अग्निभूति, श्री वायुभूति, शुचिदत्त महान् ।
श्री सुधर्म, माण्डव्य, मौर्यसुत, श्री अकम्य अति ही विद्वान् ॥
अचल और मेदार्य प्रभास यही ग्यारह गणधर गुणवान ।
महावीर के प्रथम शिष्य तुम हुए मुख्य गणधर भगवान् ॥
तीस वर्ष रह समवशरण में गूंथा श्री जिनवाणी को ।
देश-देश में कर विहार फैलाया श्री जिनवाणी को ॥
५. केवलज्ञान: दीपावली की सन्ध्या
श्री गौतम स्वामी पूजन, अर्घ्य
कार्तिक कृष्ण अमावस्या को कर्म घातिया करके क्षय ।
सायंकाल समय में पाई केवलज्ञान लक्ष्मी जय ॥
ज्ञानावरण दर्शनावरणी मोहनीय का करके अंत।
अंतराय का सर्वनाश कर तुमने पाया पद भगवंत ॥
वही जयमाला
कार्तिक कृष्ण अमावस प्रातः महावीर निर्वाण हुआ ।
संध्याकाल तुम्हें भी, पावापुर में केवलज्ञान हुआ ॥
ज्ञान लक्ष्मी तुमने पाई और वीर प्रभु ने निर्वाण ।
दीपमालिका पर्व विश्व में तभी हुआ प्रारम्भ महान् ॥
भाव: प्रातः भगवान का निर्वाण, सन्ध्या को गौतम स्वामी को केवलज्ञान। इसलिए दीपावली की असली “लक्ष्मी” केवलज्ञान लक्ष्मी है। दीपावली के सब ग्रंथ प्रमाण एक जगह: दीपावली संकलन
६. निर्वाण
श्री गौतम स्वामी पूजन, अर्घ्य
विचरण करके दुखी जगत् के जीवों का कल्याण किया।
अन्तिम शुक्लध्यान के द्वारा योगों का अवसान किया ॥
देव बानवे वर्ष अवस्था में तुमने निर्वाण लिया।
क्षेत्र गुणावा करके पावन सिद्ध स्वरूप महान् लिया ॥
गौतम गणधर की भक्ति
- श्री गौतम स्वामी पूजन (श्री राजमल जी पवैया)
- श्री गौतम गणधर स्तुति (ब्र. श्री रवीन्द्र जी आत्मन्)
- दीपावली पूजन (कवि राजमल पवैया)
मंगलं भगवान् वीरो, मंगलं गौतमो गणी ।
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