भावसंग्रह मूल गाथा (आचार्य देवसेन) | Bhav Sangrah Mool Gatha (Acharya Devsen)

भावसंग्रह मूल गाथा

आचार्य देवसेन

आचार्य देवसेन कृत भावसंग्रह की प्राकृत मूल गाथाएँ 1 से 701, क्रम से। ग्रंथ में जीव के भावों का वर्णन चौदह गुणस्थानों के क्रम से है; ग्रंथ की विषयसूची के अनुसार विषयवार भाग इसी पोस्ट में अपने शीर्षक के साथ हैं। पाठ संलग्न ग्रंथ (धर्मरत्न पं. लालाराम शास्त्री कृत हिन्दी भाषा टीका सहित) के अनुसार है; यहाँ केवल प्राकृत मूल गाथाएँ हैं, संस्कृत छाया और हिन्दी अर्थ ग्रंथ में देखें। जहाँ छपाई की भूल लगी, वहाँ पाठ नहीं बदला, उस भाग के नीचे टिप्पणी दी।

संबंधित: तत्त्वसार (आचार्य देवसेन) · दर्शनसार (आचार्य देवसेन) · आराधनासार · आलाप पद्धति · लघु नयचक्र

स्रोत: Bhav Sangrah Devsain.pdf

Bhav Sangrah Devsain.pdf (30504 KB)

गाथाएँ और हर गाथा का अर्थ साथ में: भावसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ (आचार्य देवसेन) | Bhav Sangrah Gatha Evam Gatharth (Acharya Devsen)


मंगलाचरण, जीव और भावों के भेद, गुणस्थानों के नाम (गाथा 1 से 11)

पणमिय सुरसेणणुयं मुणिगणहरवंदियं महावीरं ।
वोच्छामि भावसंगह मिणमो भव्वप्पवोहट्ठं ॥1॥

जीवस्स हुंति भावा जीवा पुण दुविह भेयसंजुत्ता ।
मुक्ता पुण संसारी, मुक्ता सिद्धा णिरवलेवा ॥2॥

लोयग्गसिहरवासी केवलणाणेण मुणिय तइलोया ।
असरीरा गइरहिया सुणिच्चला सुद्धभावट्ठा ॥3॥

जे संसारी जीवा चउगइपज्जायपरिणया णिच्चं ।
ते परिणामे गिणहदि सुहासुहे कम्मसंगहणे ॥ ४ ॥4॥

भावेण कुणइ पावं पुण्णं भावेण तहय मुक्खं वा ।
इयमंतर णाऊणं जं लेयं तं समायरहं ॥5॥

सेवो सुद्धो भावो तस्सुवलंभोय होइ गुणठाणे ।
पणदहपमादरहिए सयलवि चारित्तजुत्तस्स ॥6॥

सेसा जे बे भावा सुहासुहा पुण्णपाव संजयणया ।
ते पंचभाव मिस्सा होंति गुणट्ठाणमासेज्ज ॥7॥

अउदइउ परिणामउ खय उवसमिउ तहा उवसमो खइओ ।
एए पंच पहाणा भावा जीवाण होंति जियलोए ॥8॥

तेचिय पज्जाय गया चउदहगुणठाण णामगा भणिया ।
लहिऊण उदय उवसम खयउवमस खउ हु कम्मण्स ॥ ९ ॥9॥

मिच्छो सासण मिस्सो अविरियसम्मो य देसबिरदो य ।
विरओ पमत्त इयरो अपुव्व अणियत्ति सुहमो य ॥10॥

उवसन्त खीणमोहो सजोइकेवलिजिणो अजोगी य ।
ए चउदस गुणठाणा कमेण सिद्धा य णायव्वा ॥11॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 4: ‘गिणहदि’ छपा है; ‘गिण्हदि’ होना चाहिए (छाया: ‘गृह्णन्ति’)
  • गाथा 5: ‘लेयं’ छपा है; ‘सेयं’ होना चाहिए (छाया: ‘यच्छ्रेयस्’)
  • गाथा 7: ‘संजयणया’ छपा है; ‘संजणया’ होना चाहिए (छाया: ‘संजनकौ’)
  • गाथा 9: ‘खयउवमस’ छपा है; ‘खयउवसम’ होना चाहिए (छाया: ‘क्षयोपशमं’); ‘कम्मण्स’ छपा है; ‘कम्मस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘कर्मणः’)

मिथ्यात्व गुणस्थान: लक्षण, भेद, विपरीत मिथ्यात्व (जल शुद्धि, मांस व श्राद्ध, गोयोनि वंदना के दोष) (गाथा 12 से 62)

मिच्छत्तस्सुदएण य जीवे सम्भवइ उदइयो भावो ।
तेण य मिच्छादिट्ठी ठाणं पावेइ सो तइया ॥12॥

मिच्छत्तरस पउत्तो जीवो विवरीय दंसणो होई ।
ण मुणइ हियंच अहियं पित्तज्जुरजुओ जहा पुरिसो ॥13॥

कडुवं मण्णइ महुरं महुरं पि य तं भणेइ अइ कडुयं ।
तह मिच्छत्तपउत्तो उत्तमधम्मं ण रोचेई ॥14॥

जइ कणय मज्ज कोद्दव महुरामोहेण मोहियो संतो ।
ण मुणय कज्जाकज्ज मिच्छादिट्ठी तहा जीवो ॥15॥

तं पि हु पंचपयारं बियरो एयंतविणयसंजुत्तं ।
संसय अण्णाणगयं विवरीओ होइ पुण बंभो ॥ १६ ॥16॥

मण्णइ जलेण सुद्धि तित्ति मंसेण पिसरवग्गस्स ।
पसुकयवहेण सग्गं धम्मं गोजोणिफासेण ॥17॥

जइ जलण्हाणपउत्ता जीवा मुच्चेइ णिययपावेण ।
तो तत्थ वसिय जलयरा सव्वे पावंति दिवलोयं ॥18॥

जं कम्मं दिढवद्धं जीव पएसेहि तिविहजोएण ।
तं जलफासणिमित्ते कह फहहि तिथण्हाणेण ॥19॥

मलिणो देहो णिच्चं देही पुण णिम्मलो सया रूवी ।
को इह जलेण सुज्झइ तम्हा ण्हाणेण णहि सुद्धी ॥20॥

सुज्झइ जीवो तवसा इंदियखल णिग्गहेण परमेण ।
रयणतयसंजुत्तो जह कणयं अग्गिजोएण ॥21॥

ण्हाणाओ चिय सुद्धिं जीवा इच्छंति जडत्तेण ।
भमिहिंति ते वराया चउरासी जोणि लक्खाइ ॥22॥

जे तियरमणासत्ता विसयपमत्ता कसायरसविसिया ।
एहंता वि ते ण शुद्धा गिहवावारेसु वंट्टता ॥23॥

सवस्सेण ण लित्ता मायापउरा य जायणसीला ।
किं कुणइ तेसु ण्हाणां अब्भंतर गहिय पावाणाम् ॥24॥

वयणियमसीलजुत्ता णिहय कसाया दयावहाजइणो
ण्हाणरहिया वि पुरिसा बभंचारी सया सुद्धा ॥25॥

मंसेण पियरबगो पीणिज्जइ एरिसो सुई जेंसि ।
लेहि मसेसं गोत्रं हणिऊण य भक्खियं णियमा ॥26॥

जे कयकम्मपउत्ता सुयण हिंडंती चउगई घोरे ।
संसारे गिण्हंता संबंधा सयल जीयेंहि ॥27॥

तिरियगई उवण्णा संपत्ता मच्छयाई जे जम्मं ।
हरिऊण अवरपक्खे तेसि मसेंहिं विविहेंहिं ॥28॥

कुणइ सराहं कोई पियरे संसारतारणत्थेण ।
सो तेसि मंसाणि य तेसिं णामेण खावेइ ॥29॥

बंकेण जह सताओ हरिणो हणिऊण तण्णिमित्तेण ।
पइ ऊण सोत्तियाणं दिण्णो खद्धोसयं चैव ॥30॥

मांसासिणो ण पत्तं मंसं ण हु होइ उत्तमं दाणं ।
कह सो तिप्पइ पियरो परमुहगसियाइं भुंजंतो ॥31॥

अण्णम्मि भुंजमाणे अण्णो जइ धाइएत्थ पच्चक्खं ।
तो सग्गम्मि वसंता पिवरा तिंत्ति खु पावति ॥32॥

जइ दुत्तदिण्णदाणे पियरा तिप्पंति चउगइ गया वि ।
तो जप्णहोमण्हाणं जव तव वेयाइं अकियत्था ॥33॥

कयपावो णरय गओ णिज्जय पुत्तेण पियरु सग्गम्मि ।
पिंडं दाऊण फुडं ण्हाइ य तिथ्थाइं भणिऊण ॥34॥

जइ एवं तो पियरो सग्गं पत्तो वि जाइ णरयम्भि ।
पुत्तेण कए दोसे बंभं हच्चाइगरुएण ॥35॥

अण्णकए गुण दोसे अण्णो जइ जाइ सग्ग णरयम्मि ।
जो कणइ पुण्ण पावं तस्सफलं सो ण वेएइ ॥36॥

णहु वेयइ तस्य फलं कत्ता पुरेसो हु पुण्ण पावस्स ।
जइ तो कह ते सिद्धा भूयग्गामा हु चत्तारि ॥37॥

जो कुणइ पुण्णपावं सो चिय भुंजेइणत्थि संदेहो ।
सग्गं वा णरयं वा अप्पाणो णेइ अप्पाणं ॥38॥

एवं भणंति केई जल थल गिरीसिहर अग्गिकुहरेसु ।
चहुविह भूयग्गामे वसइ हरी णत्थि संदेहो ॥39॥

सव्वगओ जइ विण्हू णिवसइ देहम्मि सव्व देहिणं ।
तो रुक्खाइहण्ण सो णिहओ होइ णियमेण ॥40॥

किडिकुम्म मच्छरूवं पडिमं काऊण विंणहु भणिऊण ।
अच्चेयणम्मि पुज्जइ गंधक्खयधूवदिवेंहि ॥ ४१ ॥41॥

जो पुण चेयणवंतो विण्हू पच्चक्ख मच्छ किडिरुवो ।
सो हणिऊण य खद्धो दिण्णो पियण्णा पावेंहि ॥42॥

जइ देवो हणिऊणं मंसं गणिऊण गम्मए सग्गं ।
तो णरयं गंतव्वं अवरेणिह केण पावेण ॥43॥

हृणिऊण पोढछेलं गम्मइ सग्गस्स एस वेयत्थो ।
तो सूणारा सव्वे सग्गं णियमेण गच्छंति ॥44॥

सव्वगओ जइ विण्हू छागसरीरम्मि किं ण सो अत्थि ।
जं णिताणो वहियो चडप्फडंतो निरूस्सासो ॥45॥

अण्णं इयणि सुणिज्जइ सत्थे हरिवंभरुद्दभत्ताणं ।
सव्वेसु जीवरासिसु अंगे बेवा हु णिवसंति ॥46॥

सव्वेसु जीवरासिसु ए ए णिवसंति पंच ठाणेसु ।
जइ तो किं पसु वहणे ण मारिया होंति ते सव्वे ॥47॥

देवे वहिऊण गुण लब्भइ जइइत्थ उत्तमा केई ।
तो रुक्ख वंदणया अवरे पारद्धिया सव्वे ॥48॥

वंदइ गोजोणि सया तुण्डं परिहरइ भणिवि अपवित्तं ।
बिवरीयाभिणिवेसो एसो फुडु होई मिच्छोवि ॥49॥

पावेण तिरियजम्मे उव्वण्णा तिणयरी पसू गावी ।
अविवेया विट्ठासी सा कह देवत्तणं पत्ता ॥50॥

अहवा एसो धम्मो विट्ठं भक्खंतया वि णमणीया ।
तो किं वज्झइ दुज्झइ ताडिज्जय दीहदंडेन ॥51॥

सुरही लोयस्सागे वक्खाणय एस देवि पच्चक्खा ।
सव्वे देवा अंगे इमिए णिवसंति णियमेण ॥52॥

पुण रवि गोसवजण्णे मंसं भक्खंति सा वि मारित्ता ।
तस्सेव वहेण फुडं ण मारिया होंति ते देवा ॥53॥

सोत्ति य गव्वुब्बुढा मंसं भक्खंति रमिहि महिलाओ ।
अपवित्ताइं अशुद्धादेहच्छिद्दाइ वंदंति ॥54॥

हो सोत्तियो भणिज्जइ णारीकडिसोत्त वज्जिओ जेण ।
जो तु रमणासत्तो ण सोत्तिओ सो जडो होई ॥55॥

अहवा पसिद्धिवयणं सोत्त सेवए जेण ।
मुत्तप्पवहणदारं सोत्तियओ तेण सो उत्तो ।। ५६ ॥56॥

इय विवरीयं उत्तं मिच्छत्तं पावकारणं विसमं ।
तेण पउत्तो जीवो णरय गई जाइ णियमेण ॥57॥

अवि सहइ तत्थ दुक्खं सक्करपमुहणयविवरेसु ।
कह सो सग्गं पावइ णिहय पसू खद्धपलगासो ॥ ५८ ॥58॥

जइ कहव तत्थ णिग्गइ उप्पज्जइ पुणु वि तिरियजोणिसु ।
मारियइ सोत्तिएहिं णित्ताणो पुण वि जण्णम्मि ॥59॥

णियभासाए जंपइ में मंतो कहइ आसि मे रइयं ।
एवं वेयबिहाणें संपत्ता दुग्गई तेण ॥60॥

इय विलवंतो हण्णइ गलयं मुहनासरंध रुंधिता ।
भविखयइ सोत्तिएहिं विहिण बहुवेय वंतेहिं ॥61॥

अस विवरीयं कहियं मिच्छत पावनारणं विसमं ।
जो परिहरइ मणुस्सो सो पावइ उत्तमं ठाण ॥62॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 15: ‘मुणय’ छपा है; ‘मुणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘जानाति’)
  • गाथा 16: ‘बियरो’ छपा है; ‘विवरीयं’ होना चाहिए (छाया: ‘विपरीतं’)
  • गाथा 17: ‘पिसरवग्गस्स’ छपा है; ‘पियरवग्गस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘पितृवर्गस्य’)
  • गाथा 19: ‘फहहि’ छपा है; ‘फुट्टइ/फिट्टइ’ होना चाहिए (छाया: ‘स्फुटति’); ‘तिथण्हाणेण’ छपा है; ‘तित्थण्हाणेण’ होना चाहिए (छाया: ‘तीर्थस्नानेन’)
  • गाथा 41: ‘विंणहु’ छपा है; ‘विण्हु’ होना चाहिए (छाया: ‘विष्णु’)। ‘धूवदिवेंहि’ छपा है; ‘धूवदीवेहिं’ होना चाहिए (छाया: ‘धूपदीपैः’)।
  • गाथा 43: ‘गणिऊण’ छपा है; ‘गसिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘ग्रसित्वा’)
  • गाथा 44: ‘हृणिऊण’ छपा है; ‘हणिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘हत्वा’)
  • गाथा 54: ‘अशुद्धा’ छपा है; ‘असुद्धा’ होना चाहिए (छाया: ‘अशुद्धानि’)
  • गाथा 55: ‘हो’ छपा है; ‘सो’ होना चाहिए (छाया: ‘स’)
  • गाथा 56: ‘सोत्त सेवए’ छपा है; ‘सोत्तं णारीण सेवए’ होना चाहिए (छाया: ‘स्रोतो नारिणां सेव्यते’)
  • गाथा 58: ‘सक्करपमुहणयविवरेसु’ छपा है; ‘सक्करपमुहणरयविवरेसु’ होना चाहिए (छाया: ‘शर्कराप्रमुखनरकविवरेषु’)
  • गाथा 61: ‘भविखयइ’ छपा है; ‘भक्खियइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भक्ष्यते’)
  • गाथा 62: ‘पावनारणं’ छपा है; ‘पावकारणं’ होना चाहिए (छाया: ‘पापकारणं’)

मिथ्यात्व गुणस्थान: एकांत, वैनयिक, संशय मिथ्यात्व; सपरिग्रह मोक्ष, स्त्री मुक्ति, कवलाहार निषेध (गाथा 63 से 115)

एयंतमिच्छदिट्ठि वुद्धो एयंत णय समालंवो ।
एयंते खणियत्तं मण्णइ जं लोय मज्झम्मि ॥63॥

जइ खणियत्तो जीवो तरिहि भवे कस्य कम्मसंबन्धो ।
सम्बन्ध विण ण घडई देहग्गहणम् पुणे तस्स ॥64॥

तवयरणं वयधरणं चीवरगहणं च सीसमुंडलयं ।
सत्तहडियासु भिक्खा खणियत्ते णेव सभवई ॥65॥

णाणं जइ खणभंसी कह सो वालतववसियं मुणइ ।
तह बहिरगआ संतो कह आवइ पुणवि णियगेहं ॥66॥

जइ चेयणा अणिच्चा तो किं चिरजाय वाहि समराई ।
वहराइ वि मिचाइ वि कह जाणइ दिट्ठमित्ताइं ॥67॥

पत्त पडियं ण दूसइ खाइ पलं पियइ मज्जु णिल्लज्जो ।
इच्छइ सग्गग्गमणं मोक्खग्गमणं च पावेण ॥68॥

असिऊण मंसगासं मज्जं पविऊणगम्मए सग्गं ।
जइ एवं तो सुंडय पारद्धिय चेव गच्छन्ति ॥69॥

इम एयंतविणडिओ बुद्धो ण मुणेइ वत्थुसब्भावं ।
अण्णाणी कयपावो सो दुग्गइ जाय णियमेण ।। ७० ॥70॥

णिच्चाणिच्चं दव्वं सव्वं इह अत्थि लोयमज्झम्मि ।
पज्जाऐण अणिज्चं णिच्चं फुडु होइ दव्वेण ॥71॥

इय एयंतं कहियं मिच्छतं गुरुयपापसंजणयं ।
एत्तो उड्ढं वोच्छं वेणइयं णाम मिच्छत्तं ॥72॥

वेणइयमिच्छादिट्ठी हवइ फुडं तापसो हु अण्णाणी ।
णिग्गुणजणम्मि विणओ पउं जमाणो हु गयविवेओ ॥73॥

विणयादो इह मोक्खं किज्जइ पुणु तेण गद्दहाईणं ।
अमुणिय गुणगुणेण य विणयं मिच्छत्तं णडियेण ॥74॥

जक्खय णायाईणं दुग्गाखंधाइ अण्णदेवाणं ।
जो णवइ धम्महेउं जो विय हेडू च सो मिच्चो ॥ ७५ ॥75॥

पुत्तत्थ माउसत्थं कुणइ जणो देवि चण्डियाविणयं ।
मारइ छेलयसत्थं पुज्जइ कुलाइं मज्जेण ॥76॥

णवि हाइ तत्थ पुण्णं किज्जंति णिकिट्ठरुद्द सब्भावा ।
णय पुत्ताइं दाउं सक्का ते सत्तिहिणां जे ॥77॥

जइ ते होंती समत्था कत्थ गया पंडवाइया पुरिसा ।
कत्थगया चक्केसा हलहरणारायणा कत्थ ॥78॥

जइ देवयं देइ सुयं तो किं रुद्देण सेविया गउरी ।
दिव्वं वरिस सहस्सं पुत्तत्थं तारयभएण ॥79॥

तम्हा सयमेव सुओ हवेइ मिठणण रइपउत्ताणं ।
अण्णाण मूढलोओ बाहिज्जइ धुत्तमणुएहिं ॥80॥

संते आउसि जीवइ मरणं गलयम्मि ण त्थ संदेहो ।
णव रक्खइ कीवि तहिं संतं सोसेइ ण हु कोई ॥ ८१ ॥81॥

जइ सव्व देवयाओ मणुयं रक्खंति पुज्जियाओ य ।
तो किं सो दहवयणो ण रक्खिओ विज्जसहस्सेण ॥82॥

इय णाउं परमप्पा अट्ठारसदोसवज्जिओ देवो ।
पणविज्जइ भत्तीए जइ लब्भइ च इच्छियं वत्थुं ॥83॥

वेणइयं मिच्छतं कहिये भव्वाण वज्जणट्ठं तु ।
एत्तो उड्ढ वोच्छं मिच्छतं संसयं णाम ॥ ८४ ॥84॥

संसय मिच्छादिट्ठी णियमा सो होई जत्थ सग्गंथो ।
णिग्गंथो वा सिज्झइ कंबलगहणेण सेवडओ ॥85॥

दंडं दुद्धिय चेलं अण्णं सव्वं पि धम्म उवयरणं ।
मण्णइ मोक्खणिमित्तं गंथे लुद्धो समायरइ ॥86॥

इत्थी गिहत्थवग्गे तम्हि भवे चेव अत्थि णिव्वाणं ।
कवलाहारं च जिणे णिद्दा तण्हा य संसइओ ॥87॥

जइ सग्गन्थो मुक्खं तित्थयरो किं मुंचहि णियरज्जे ।
रयण णिहाणेहि समं किं णिवसइ णिज्जरे रण्णो ॥ ८८ ॥88॥

रयण णिहाणं छंडइ सो किं गिण्हेहि कंवली खण्डं ।
दुद्धिय दंडंच पडं गिहत्थजोग्गं पि जं किं पि ॥89॥

गेहे गेहे भिक्खं पत्तं गहिऊण जाइए किं सो ।
किं तस्स रयणविट्ठी घरे घरे णिवडिया तत्थ ॥90॥

ण हु एवं जं उत्तं संसयमिच्छत्तरसियचित्तेण ।
णिग्गंथ मोक्खमग्गो किंचण वहिरंतण चएण ।। ९१ ॥91॥

जइ तप्पइ उग्गतवं मासे मासे य पारणं कुणइ ।
तइ वि ण सिज्झइ इथी कुच्छियलिंगस्स दोसेण ॥ ९२ ॥92॥

मायापमायपउरा पडिमासं तेसु होइ पक्खलणं ।
णिच्चं जो णस्साओ पुण दाड्ढंणत्थि चित्तस्स ॥ ९३ ॥93॥

सुहमापज्जत्ताणं मणुआणं जोणिणा हि कक्खेसु ।
उपत्ती होइ सआ अण्णो सु य तणुपएसेसु ॥ ९४ ॥94॥

ण हु अत्थि तेण तेंसि इत्थिणं दुविह संजमोद्धरणं ।
संजमधरणेण विणा ण हु मोक्खो तेण जम्मेण ॥95॥

अहवा एयं वयणं तेसिं जीवो ण होइ किं जोवो ।
किं णत्थि णाणदंसण ववओगो चेयणा तस्स ॥ ९६ ॥96॥

जइ एवं तो इत्थि धीवरि कल्लालि वेसअईणं ।
सव्वेसिमत्थि जीवो सयलाओ तरिहि सिज्झति ॥97॥

तम्हा इत्थी पज्जय पडुच्च जीवस्स पयडि दोसेण ।
जाओ अमब्ब कालो तम्हा तेंसि ण णिव्वाणं ॥98॥

अइ उच्चमसंहणणो उत्तमपुरिसो कुलग्गओ संतो ।
मोक्खस्स होइ जुग्गो णिग्गंथो धरिय जिणलिंगो ॥99॥

गिहलिंगे वट्टं तो गिहत्थवावार गहियतिथजोओ ।
अत्तरउद्दारूढो मोक्खं ण लहेहि कुलजो वि ॥100॥

वज्झब्भंतरगथे वट्टंतो इंदियत्थपरिकलिओ ।
जइवि हु दंसणवंतो तहा वि ण सिज्झेइ तम्हि भवे ॥101॥

जइ गिहवंतो सिज्झइ अगहिय णिग्गंथलिंग सग्गंथो ।
तो किं सो तित्थयरो णिस्संगो तवइ एगागी ॥102॥

केवलभुत्ती अरुहे कहिया जा सेवडेण तहिं तेण ।
सा णत्थि तस्स णूणं णिहयमणो परमजोईणं ॥103॥

गुत्तित्तजुत्तस्स य इन्दियवावाररहियचितस्स ।
भाविदियमुक्खस्स य जीवस्स य णिक्कलं झाणं ॥104॥

झाणेण तेण तस्स हु जीव मणस्साण समरसीयरणं ।
समरसभावेण पुणो संवित्ती होइ णियमेण ॥105॥

संवित्तीए वि तहा तण्हा णिद्दा य छुहा य तस्स णस्संति ।
णट्ठेसु तेसु पुरिसो खवयस्सेणिं समारुहइ ॥106॥

खवएसु य आरुढो णिद्दाईकारणं तु जो मोहो ।
जाइ खयं णिस्सेसो तक्खीणे केवलं णाणं ॥107॥

तं पुण केवल णाणं दसट्ठदोसाण हवइ णासम्मि ।
ते दोसा पुण तस्सहु छुहाइया णत्थि केवलिणो ॥108॥

जइ संति तस्स दोसा केत्तियमित्ता छुहाइ जे भणिया ।
ण हवइ सो परमप्पा अणंतविरिओ हु सो अहवा ॥109॥

णोकम्मकम्महारो कवलाहारो य लेप्पहारो य ।
उज्जमणो विय कमसो आहारो छव्विहो णेओ ॥110॥

णोकम्मकम्महारो जीवाणं होइ चउगइगयाणं ।
कवलाहारो णरयसु रुक्खेसु य लेप्पमाहारो ॥111॥

पक्खीणुज्ज्जाहारो अंडयमज्झेसु वट्टमाणाणं ।
देवेसु मणाहारो चउव्विहो णत्थि केवलिणो ॥112॥

णोकम्मकम्महारो उवयारेण तस्य आयमे भणिओ ।
ण हु णिच्छयेण सो विहु स बीयराओ परो जम्हा ॥113॥

जो जेमइ सो सोवइ सुत्तो अण्णे विविसयमणुहवइ ।
विसए अणुहवमाणो स वीयराओ कहं णाणी ॥114॥

तम्हा कवलाहारो केवलिणो णत्थि दोहिं वि णएहिं ।
मण्णंति य आहारं जेते मिच्छाय अण्णाणी ॥115॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 65: ‘सभवई’ छपा है; ‘संभवई’ होना चाहिए (छाया: ‘सम्भवति’)
  • गाथा 67: ‘मिचाइ’ छपा है; ‘मित्ताइं’ होना चाहिए (छाया: ‘मित्राण्यपि’)
  • गाथा 71: ‘अणिज्चं’ छपा है; ‘अणिच्चं’ होना चाहिए (छाया: ‘अनित्यं’)
  • गाथा 75: ‘मिच्चो’ छपा है; ‘मिच्छो’ होना चाहिए (छाया: ‘मिथ्यात्वम्’)
  • गाथा 77: ‘हाइ’ छपा है; ‘होइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भवति’)
  • गाथा 80: ‘मिठणण’ छपा है; ‘मिहुणाण’ होना चाहिए (छाया: ‘मिथुनानां’)
  • गाथा 81: ‘ण त्थ’ छपा है; ‘णत्थि’ होना चाहिए (छाया: ‘नास्ति’)। ‘कीवि’ छपा है; ‘कोवि’ होना चाहिए (छाया: ‘कोपि’)।
  • गाथा 84: ‘कहिये’ छपा है; ‘कहियं’ होना चाहिए (छाया: ‘कथितं’)
  • गाथा 88: ‘रण्णो’ छपा है; ‘रण्णे’ होना चाहिए (छाया: ‘अरण्ये’)
  • गाथा 91: ‘वहिरंतण’ छपा है; ‘वहिरंतर’ होना चाहिए (छाया: ‘बाह्यान्तर’)
  • गाथा 92: ‘इथी’ छपा है; ‘इत्थी’ होना चाहिए (छाया: ‘स्त्री’)
  • गाथा 93: ‘जो णस्साओ’ छपा है; ‘जोणिस्साओ’ होना चाहिए (छाया: ‘योनिस्रावः’)
  • गाथा 94: ‘अण्णो सु’ छपा है; ‘अण्णेसु’ होना चाहिए (छाया: ‘अन्येषु’)
  • गाथा 96: ‘जोवो’ छपा है; ‘जीवो’ होना चाहिए (छाया: ‘जीवः’)। ‘ववओगो’ छपा है; ‘उवओगो’ होना चाहिए (छाया: ‘उपयोगः’)।
  • गाथा 98: ‘अमब्ब’ छपा है; ‘अभव्व’ होना चाहिए (छाया: ‘अभव्य’)
  • गाथा 99: ‘उच्चमसंहणणो’ छपा है; ‘उत्तमसंहणणो’ होना चाहिए (छाया: ‘अत्युत्तमसंहननः’)
  • गाथा 100: ‘गहियतिथजोओ’ छपा है; ‘गहियतिजोओ’ होना चाहिए (छाया: ‘गृहीतत्रियोगः’)
  • गाथा 101: ‘वज्झब्भंतरगथे’ छपा है; ‘वज्झब्भंतरगंथे’ होना चाहिए (छाया: ‘वाह्याभ्यन्तरग्रन्थे’)
  • गाथा 103: ‘केवलभुत्ती’ छपा है; ‘कवलभुत्ती’ होना चाहिए (छाया: ‘कवलभुक्तीः’)
  • गाथा 104: ‘गुत्तित्तजुत्तस्स’ छपा है; ‘गुत्तित्तयजुत्तस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘गुप्तित्रययुक्तस्य’)
  • गाथा 111: ‘णरयसु’ छपा है; ‘णरपसु’ होना चाहिए (छाया: ‘नरपशूनां’)
  • गाथा 112: ‘पक्खीणुज्ज्जाहारो’ छपा है; ‘पक्खीणुज्जाहारो’ होना चाहिए (छाया: ‘पक्षिणामोज आहारः’)
  • गाथा 113: ‘तस्य’ छपा है; ‘तस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘तस्य’)

मिथ्यात्व गुणस्थान: जिनकल्पी स्थविरकल्पी, श्वेताम्बरों की उत्पत्ति, अज्ञान मिथ्यात्व, चार्वाक व सांख्य मत का निराकरण (गाथा 116 से 194)

अण्णं जं इय उत्तं संसयमिच्छत्तकलियभावेण ।
अम्हं त्ति थविरकप्पो कंवलगहणेण ण हु दोसो ॥116॥

कंवली वत्थं दुद्धिय दंडं कणयं च रयणभंडाइं ।
सग्गग्गमणणिमित्तं मोक्खस्स य होइ णिब्भंत्तं ॥117॥

ण उ होइ थविरकप्पो गिहत्थकप्पो हवेइ फुडु ऐसो ।
इय सो धुत्तेहिं कओ थविरवकप्पस्स भग्गेहिं ।। ११८ ॥118॥

दुविहो जिणेंहि कहिओ जिणकप्पो तह य थविर कप्पो य ।
सो जिणकप्पो उत्तो उत्तमसंहणणधारिस्स ॥119॥

जत्थ ण कटयभग्गो पाए णयणम्मि रय पविट्ठम्मि ।
फेडंति सयं मुणिणो परावहारे य तुण्हिक्का ॥ १२० ॥120॥

जल वरिसणवा याई गमणे भग्गे य जम्म छम्मासं ।
अच्छंति णिराहारा काओस्सग्गेण छम्मासं ॥121॥

एयारसंगधारी एआई धम्मसुक्कझाणी य ।
चत्तासेस कसाया मोण वई कंदरावासी ॥122॥

बहिरंतरगंथचुवा णिण्णेहा णिप्पिहा य जइवइणो ।
जिण इव विहरंति सदा ते जिणकप्पे ठिया सवणा ॥123॥

थविरकप्पो वि कहिओ अणयाराणं जिणेण सो एसो ।
पंचच्चेलच्चाओ अंकिचणत्तं च पडिलिहणं ॥124॥

पंचमहव्वयधरणं ठिदिभोयण एयभत्त करपत्तो ।
भत्तिभरेण य दत्तं काले य अजायणे भिक्ख ॥125॥

दुविहतवे उज्जमणं छव्विह आवासएहिं अणवरयं ।
खिदिसयणं सिरलोओ जिणवर पडिरूव पडिगहणं ॥126॥

संहणणस्स गुणेण य दुस्समकालस्स तव पहावेण ।
पुर णयर गामवासी थविरे कप्पे ठिया जाया ॥127॥

उवयरण तं गहियं जेण ण भंगो हवे चरियस्य ।
गहियं पुत्थयदाणम् जोग्गं जस्स तं तेण ॥128॥

समुदाएण विहारो धम्मस्स पहावणं ससत्तीए ।
भवियाणं धम्मसवणं सिस्साणं य पालणं गहणं ॥129॥

संहणणं अइण्णिच्चं कालो सो दुस्समो मणो चवलो ।
तह वि हु धीरा पुरिसा महव्वयभरधरण-उच्छहिया ॥130॥

वरिससहस्सेण हु पुरा जं कम्मं हणइ तेण काएण ।
ते संपइ वरिसेण हु णिज्जरयइ हीणसंहणणो ॥131॥

एव पुविहो कप्पो परम जिणंदेहिं अक्खियो णूणं ।
अण्णो पासंडिकओ गिहकप्पो गंथपरि कलिओ ॥132॥

दुद्धरतवस्स भग्गा परिसह विसएहिं पीडिया जे य ।
यो गिहकप्पो लोए स थविरकप्पो कओ तेहिं ॥133॥

णिग्गंथो जिणवसहो णिग्गंथं पवयणं कयं तेण ।
तस्साणुमग्गलग्गा सव्वे णिग्गंथमहरिसिणो ॥134॥

जे पुण भूसिय गंथादूसियणिग्गंथलिगवयभट्ठा ।
तेहि सगंथं लिंगं पायडियं तित्थणाहस्स ॥ १३५ ॥135॥

जं जं सयमादरियं तं तं णिरूयायमेण अलिएण ।
लोए वक्खणित्ता अण्णाणी वन्चिआ तेंहि ॥ १३६ ॥136॥

छत्तीसे वरिससये विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स ।
सोरट्ठे उप्पण्णो सेवडसंघो हु वलहीए ॥137॥

असि उज्जेणिणवरे आइरिओ भद्दवाहुणामेण ।
जाणिय सुणिमित्तधरो भणिओ संघोणिओ तेण ॥ १३८ ॥138॥

हो हइ इह दुब्भिक्खं बारह वरसाणि जाम पुण्णाणि ।
देसतराइ गच्छइ णियणिय संघेण संजुत्ता ॥139॥

सोऊण इयं वयणम् णाणादेसेहिं गणहरा सव्वे ।
णिय णिय संघ पउत्ता विहरीआ जत्थ सुब्भिक्खं ॥ १४० ॥140॥

एक्कं पुण सन्ति णामो संपत्तो वलहि णाम णएरीए ।
बहुसीससंपउत्तो विसए सोरट्ठए रम्मे ॥141॥

तत्थ वि गयस्स जायं दुब्भिक्खं दारुणं महाघोरं ।
जत्थ वियारिय उयरं खद्धो रंकेहि कूरत्ति ॥142॥

तं लहिऊण णिमित्तं गृहीयं सव्वेहि कंवली दंडं ।
दुद्धियपत्तं च तहा पावरणं सेयवत्थं च ॥143॥

चत्तं रिसि-आयरणं गहिया भिक्खा य दीणवित्तीए ।
उवविसिय जाइऊणं भुत्त वसहीसु इच्छाए ॥144॥

एवं वट्टंताणं कित्तिय कालम्मि चावि परियलिए ।
संजायं सुभिक्खं जंपइ ता संति आंइरिओ ॥145॥

आवाहिऊण संघं भणियं छंडेय कुत्थियायरणं ।
णिंदिय गरहिय गिण्हइ पुणरवि चरियं मुंणिदाणं ॥146॥

तं वयणं सोऊणं उत्तं सीसेण तत्थ पढमेण ।
को सक्कइ धारेउं एयं अइदुद्धरायरणम् ॥147॥

उबवासो य अलाभे अण्णे दुसहाइं अन्तराइ ।
एयट्ठाणमचेलं अज्जायण वंभचेरं च ॥148॥

भूमीसयनं लोचो वे वे मासेहिं असहणिज्जो हु ।
वावीस परीसहाइं असहणिज्जाइं णिच्चंपि ॥149॥

जं पुण संपइ गहियं एय अम्हेहि किंपि आयरणं ।
इह लोए सुक्खयरं ण छंडिमो हु तुस्समे काले ॥150॥

ता संतिणां पउत्तं चरियपभट्ठेहिं जीवियं लोए ।
एयं ण हु सुंदरियं दूसणयं जैणमग्गस्स ॥151॥

णिग्गंत्थं पव्वयणं जिणवरणाहेण अक्खियं परमं ।
तं छंडिऊण अण्णं पवत्तमाणेण मिच्छत्तं ॥152॥

ता रुसिऊण पहओ सीसे सीसेण दीहदंडेण ।
थविरो घाएण मुओ जाओ सो विंतरो देवो ॥153॥

इयरो संघाइवइ पयडिय पासंड सेवडो जाओ ।
अक्खइ लोए धम्मं सग्गत्थे अत्थि णिव्वाणं ॥154॥

सत्थाइं विरइयाइं णियणियपासंडगहियसरिसाइं ।
वक्खाणि ऊण लोए पवित्तिओ तारिसायरणो ॥155॥

णिग्गंथं दूसित्ता णिंदित्ता अप्पणां पसंसित्ता ।
जीवेइ मूढलोए कयमामं गहिह बहुदव्वं ॥156॥

इयरांवितर देवो संती लग्गो उपद्दवं काउं ।
जप्पइ मा मिच्छत्तं गच्छह लहिऊण जिणधम्मं ॥157॥

भीएहिं तस्स पुआ अट्ठविहा सयलदव्वसंपुण्णा ।
जा जिणचन्दे रइया सा अज्जवि दिण्णिया तस्स ॥158॥

अज्जवि सा वलिपूआ पढमयरं विंति तस्स णामेण ।
सो कुलदेवो उत्तो सेवउसंघस्स पूज्जो सो ॥159॥

इय उप्पत्ती कहिया सेवउयाणं च मग्गभट्टाणं ।
एतो उड्ढं वोच्छं णिसुय अण्णाणमिच्छतं ॥160॥

मसय पूरण रिसिणा उप्पणो पासणाह तित्थम्मि ।
सिरि वीर समवसरणो अगहिय झुणिणा णियत्तेण ॥161॥

वहिणिग्गएण उत्तं मज्झं एयारसंगधारिस्स ।
णिग्गइ झुणी ण अरुहो विणिग्गया सा ससी सस्स ॥162॥

ण मुणइ जिणकहियसुयं संपइ दिक्खा य गहिय गोयमओ ।
विप्पो वेयब्भासी तम्हा मोक्खं ण णाणाओ ॥163॥

अण्णाणाओ मोक्खं एवं लोयाण पयडमाणो हु ।
देवो ण अत्थि कोई सुण्णं झाएह इच्छाए ॥164॥

एवं पंचपयारं मिच्छत्तं सुग्गइणिवारणयं ।
दुक्खसहस्सावासं परिहरियव्वं पयत्तेण ॥165॥

मिच्छत्तेणाच्छण्णो अणाइ कालं चउग्गईभुवणे ।
भमिओ दुक्खक्कं तो जीवो देायइ गिण्हंतो ॥166॥

एइंदियाइपहुइ जावय पंचक्खविविहजोणीसु ।
भमिहइ भविस्सयाले पुणरवि मिच्छत्तपच्छइओ ॥167॥

अत्तरउद्दारुढो विसमे काऊण विविहपावाइं ।
अवियाणंतो धम्मं उपज्जइ तिरियणरएसु ॥168॥

अहवा जह कहव पुणो पावइ मणुयत्तणं च संसारे ।
जु असमिला संजोए लहइण देसोकुलं आऊ ॥169॥

पउरं आरोपत्तं इंदियपुण्णत्तण जोव्वणियं ।
सुन्दररुवं लच्छी अच्छइ दुक्खेण तप्यंतो ॥170॥

जइ कह वि हु एयाइं पावइं सव्वाइं तो ण पावेई ।
धम्मं जिणेण कहियं कुच्छियगुरुमग्गलग्गाओ ॥171॥

कउलायरिओ अक्खइ अत्थि ण जीवो हु कस्स तं पावं ।
पुण्णं वा कस्स भवे को गच्छइ णरय सग्गं वा ॥172॥

जइगुडधादइ जोए पिठरे जाएइ मज्जिरा सत्ती ।
तह पंच भूय जोए चेयणसत्ती समुब्भवई ॥173॥

गब्भाई मरणंतं जीवो अत्थित्ति तं पुणो मरण ।
पंचभूयाण णासे पच्छा जीवत्तणं णत्थि ॥174॥

तम्हा इंदिय सुक्खं भुंज्जिइ अप्पणाइं इच्छाए ।
खज्जइ पिज्जइ मज्जं मंसं सेविज्ज परमहिला ॥175॥

जो इंदियाइं दंडइ बिसया परिहरइ खवइ णियदेहं ।
सो अप्पाणं वंचइ गहिओ भूएंहि पुव्वुद्धो ॥ १७६ ॥176॥

संखो पुणु मणइ इयं जीवो अत्थित्ति किरियपरिहीणो ।
देहम्मि णिवसमाणो ण लिप्पए पुण्णपावेंहि ॥177॥

छिज्जइ भिज्जइ पयडी पयडी परिभमइ दीहसंसारे
पयडी करेइ कम्मं पयडी भुंजेइ सुह दुक्खं ॥178॥

जीवो सया अकत्ता मुत्ता ण हु होइ पुण्ण पावस्स ।
इय पयडिऊण लोए गहिया वहिणी सधूया वि ॥ १७९ ॥179॥

एए विसयासत्ता कग्गुम्मुत्ता य जीवदयरहिया ।
परतियधणहरणरया अगहिय धम्मा दुरायारा ॥180॥

ण मुणंति सयं धम्मं अनुणिय तच्चत्थयार पब्भट्टा ।
पउरकसाया माई कह अण्णेसिं फुडं विंत्ति ॥181॥

रंडा मुंडा थंडी सुंडी दिक्खिदा धम्मदारा ।
सीसे कंता कामासत्ता कामिया सवियारा ।।
मज्जं मसं मिट्ठं भक्खं भक्खियं जीवसोक्खं च ।
कउले धम्मे विसयेमोम्मे तं जिहो सग्गसेक्खं ।। १८२ ॥182॥

रत्ता मत्ता कंतासत्ता दूसिया धम्ममग्गा ।
हुट्ठा कट्ठाधिट्ठा झुट्ठाणिंदि जो मोक्खमग्गा
अक्खे सुक्खे अग्गेदुक्खे णिब्भरं दिण्णचित्ता ।
णेरइयाणं दुक्खट्ठाणं तस्स सिस्सा पउत्ता ॥183॥

मज्जे धम्मो जीव हिंसाइं धम्मो ।
राई देवो दोसी देवो माया सुण्णं पि देवो
रत्ता मत्ता कंतासत्ता जे गुरु तेवि य पुज्जा ।
हा हा कट्ठ णट्ठो लोओ अहमहं कुणंतो ॥184॥

धुया मायर वहिणी अण्णावि पुत्तत्थिणि
आयतिय वासवयणु पयडे वि विप्पे ।
जइ रगिय कामाउरेण वेयगव्वे उप्पण्णदप्पे
वं भणि छिंपिणि डोंवि नडिय बरुडि रज्जइ चम्मारि
कबले समइ समागमेइ तह भुत्ति य परणारि ॥185॥

अण्णाण धम्मलग्गो जीवो दुक्खाण पूरिओ होइ ।
चउगइ गईहिंणिवडइ संसारे भमिहि हिडंतो ॥186॥

जइ पाहाण नरंदे लग्गो पुरिसो हु तरिणी तोये ।
वुड्डइ विगयाधारो णिवडइ महण्णवावत्ते ॥187॥

गुच्छियगुरुकयसेवा विविहावइपउरदुक्खआवत्ते ।
तह पणिमज्जइ पुरिसो संसार महोवही भीमे ॥188॥

वयभट्ठ कुंठ रुद्देहिं णिट्ठुर णिक्किट्ठदुट्ठचिट्ठेहिं ।
अप्पाणं णासिभो अण्णेवि य णासिओ लोओ ॥189॥

इय अण्णाणी पुरिसा कुच्छियगुरुकहियमग्गसंलग्गा ।
पावंति णरय तिरयं णाणा दुहसंकडं भीमं ॥190॥

एवं णाऊण फुडं सेविज्जइ उत्तमो गुरु कोई ।
वहिरंतरगंथचुओ तिरियणवंतो सुणाणी य ॥191॥

जइ जाय लिंगधारी विसयविरत्तो य णिहयसकसाओ ।
पालयदिढवंवओ सो पावइ उत्तमं सोक्खं ॥ १९२ ॥192॥

ते कहिय धम्म लग्गा पुरिसा डहिऊण सकयपावाइं ।
पावंति मोक्खं सोक्ख केई विलसंति सग्गेसु ॥193॥

एवं मिच्छदिट्ठि ट्ठाणं कहिय मया समासेग ।
एत्तो उड्ढं वोच्छ विदियं पुण सासणं णामं ॥194॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 117: ‘कंवली’ छपा है; ‘कंवलं’ होना चाहिए (छाया: ‘कम्बलं’)
  • गाथा 118: ‘थविरवकप्पस्स’ छपा है; ‘थविरकप्पस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘स्थविरकल्पस्य’); ‘ऐसो’ छपा है; ‘एसो’ होना चाहिए (छाया: ‘एषः’)
  • गाथा 120: ‘कटयभग्गो’ छपा है; ‘कंटयलग्गो’ होना चाहिए (छाया: ‘कंटकलग्नं’)
  • गाथा 124: ‘अंकिचणत्तं’ छपा है; ‘अकिंचणत्तं’ होना चाहिए (छाया: ‘अकिंचनत्वं’)
  • गाथा 128: ‘चरियस्य’ छपा है; ‘चरियस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘चर्यायाः’)
  • गाथा 132: ‘पुविहो’ छपा है; ‘दुविहो’ होना चाहिए (छाया: ‘द्विविधः’)
  • गाथा 135: ‘लिगवयभट्ठा’ छपा है; ‘लिंगवयभट्ठा’ होना चाहिए (छाया: ‘लिंग-व्रतभ्रष्टाः’)
  • गाथा 136: ‘णिरूयायमेण’ छपा है; ‘णिरायमेण’ होना चाहिए (छाया: ‘निरागमेन’); ‘वक्खणित्ता’ छपा है; ‘वक्खाणित्ता’ होना चाहिए (छाया: ‘व्याख्याय’)
  • गाथा 138: ‘असि’ छपा है; ‘आसि’ होना चाहिए (छाया: ‘आसिद्’)
  • गाथा 139: ‘देसतराइ’ छपा है; ‘देसंतराइ’ होना चाहिए (छाया: ‘देशान्तराणि’)
  • गाथा 143: ‘गृहीयं’ छपा है; ‘गहियं’ होना चाहिए (छाया: ‘गृहीतं’)
  • गाथा 145: ‘आंइरिओ’ छपा है; ‘आइरिओ’ होना चाहिए (छाया: ‘आचार्यः’)
  • गाथा 146: ‘मुंणिदाणं’ छपा है; ‘मुणिंदाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘मुनिन्द्राणाम्’)
  • गाथा 150: ‘तुस्समे’ छपा है; ‘दुस्समे’ होना चाहिए (छाया: ‘दुःषमे’)
  • गाथा 151: ‘संतिणां’ छपा है; ‘संतिणा’ होना चाहिए (छाया: ‘शान्तिना’)
  • गाथा 152: ‘णिग्गंत्थं’ छपा है; ‘णिग्गंथं’ होना चाहिए (छाया: ‘निर्ग्रन्थं’)
  • गाथा 154: ‘सग्गत्थे’ छपा है; ‘सग्गंथे’ होना चाहिए (छाया: ‘सग्रन्थे’)
  • गाथा 156: ‘अप्पणां’ छपा है; ‘अप्पाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘आत्मानं’); ‘गहिह’ छपा है; ‘गहिय’ होना चाहिए (छाया: ‘गृहीत्वा’)
  • गाथा 157: ‘इयरांवितर’ छपा है; ‘इयरो वितर’ होना चाहिए (छाया: ‘इतरो व्यन्तर’)
  • गाथा 161: ‘मसय’ छपा है; ‘मसयरि’ होना चाहिए (छाया: ‘मस्करि’)
  • गाथा 166: ‘देायइ’ छपा है; ‘देहाइं’ होना चाहिए (छाया: ‘देहान’)
  • गाथा 170: ‘आरोपत्तं’ छपा है; ‘आरोयत्तं’ होना चाहिए (छाया: ‘आरोग्यत्व’)
  • गाथा 171: ‘पावइं’ छपा है; ‘पावइ’ होना चाहिए (छाया: ‘प्राप्नोति’)
  • गाथा 173: ‘जइगुडधादइ’ छपा है; ‘जह गुडधादइ’ होना चाहिए (छाया: ‘यथा गुडधातकी’)
  • गाथा 175: ‘भुंज्जिइ’ छपा है; ‘भुंजिज्जइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भुज्यतां’)
  • गाथा 176: ‘पुव्वुद्धो’ छपा है; ‘दुब्बुद्धी’ होना चाहिए (छाया: ‘दुर्बुद्धीः’)
  • गाथा 177: ‘मणइ’ छपा है; ‘भणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भणति’)
  • गाथा 179: ‘मुत्ता’ छपा है; ‘भुत्ता’ होना चाहिए (छाया: ‘भोक्ता’)
  • गाथा 181: ‘अनुणिय’ छपा है; ‘अमुणिय’ होना चाहिए (छाया: ‘अज्ञात’)
  • गाथा 182: ‘सग्गसेक्खं’ छपा है; ‘सग्गमोक्खं’ होना चाहिए (छाया: ‘स्वर्गमोक्षौ’); ‘विसयेमोम्मे’ छपा है; ‘विसये रम्मे’ होना चाहिए (छाया: ‘विषये रम्ये’)
  • गाथा 185: ‘रगिय’ छपा है; ‘रमिय’ होना चाहिए (छाया: ‘रमिता’)
  • गाथा 187: ‘पाहाण नरंदे’ छपा है; ‘पाहाणतरंडे’ होना चाहिए (छाया: ‘पाषाणतरण्डे’)
  • गाथा 188: ‘गुच्छिय’ छपा है; ‘कुच्छिय’ होना चाहिए (छाया: ‘कुत्सित’)
  • गाथा 192: ‘पालयदिढवंवओ’ छपा है; ‘पालयदिढबंभवओ’ होना चाहिए (छाया: ‘पालितदृढब्रह्मव्रतः’)
  • गाथा 194: ‘समासेग’ छपा है; ‘समासेण’ होना चाहिए (छाया: ‘समासेन’)

सासादन व मिश्र गुणस्थान; ब्रह्मा, विष्णु, महादेव के कार्य और उनका निराकरण (गाथा 195 से 258)

एयदरस्स उदये अणंतवधिस्स संवरायस्स ।
समयाइ छविलित्ति य एसो कालो समुद्दिट्ठो ॥195॥

एयम्मिगुणट्ठाणे कालो णत्थित्ति तित्तिओ जम्हा ।
तम्हा वित्थाणे ण हि संखेओ तेण सो उत्तो ॥196॥

परिणामिय भावगयं विदियं सासायणं गुणट्ठाणं ।
सम्मत्त सिहर पडियं अपत्त मिच्छत भूमितलं ॥197॥

सम्मामिच्छुदएण य सम्मिस्सं णाम होइ गुणठाणं ।
खयउवसमभावगयं अंतरजाई समुद्दिट्ठं ॥198॥

वडवाए उप्पण्णो खेरण जइ हवइ इत्थ वेसरओ ।
तह तं सम्मिस्स गुणं अगहिय गिह सयल संजमणं ॥199॥

तत्थ ण वंधइ आउं कुणइ ण कालो हु तेण भावेण ।
सम्मं वा मिच्छं वा पडिवज्जिय मरइ णियमेण ॥200॥

अट्टरउद्दं झायइ देवा सव्वे वि हुंति णमणीया ।
धम्मासव्वे पवरा गुणाणं किं पि ण विणिए इ ॥201॥

अत्थि जिणयमि कहियं वेए कहियं च हरिपुराणे य ।
सइवागमेण कहित तच्चं कविलेण कहियं च ॥202॥

वंभो करेइ तिजयं किण्हो पालेइ उवरि छुहिऊण ।
रुद्दो संहरइ पुणो पलयं काऊण णिस्सेसं ॥203॥

जइ वंभो कुणइ जयं तो किं सग्गिंदरज्ज कज्जेण ।
चइऊण वंभ लोयं उग्गतवं तवइणरलोए ॥204॥

जरउद्दसेय अंडय सव्वे एयाइं भूयगामाइं ।
णारय णर तिरिय सुरा णिबंदियं वणिसुद्दपहुईया ॥205॥

चंडाल डूंब धविरा वरुडा कल्लालछिप्पिया चेव ।
हय गय गोमहिसि खरा वग्घ किडी सीह हरिणाइं ॥ २०६ ॥206॥

णाणा कुलाइं जाई णाणा जोणी य आउ विहवाइं ।
णाणा देह गवाइं वण्णा रूवाइं विविहाइं ॥207॥

गिरि सरि सायर दीवो गामा रामाइं धरणि आयासं ।
जो कुणइ खणद्धेणं चिंत्तियमित्तेण सव्वाइं ॥208॥

किं सो रज्यणिमित्तं तवसा तावेइ णिच्च णियदेहं ।
तिहुवण करण समत्थो किं ण कुणइ अप्पणो रज्जं ॥209॥

अच्छरतिलोत्तमाए णट्टं दट्ठूण रायरस रसिओ ।
तवभट्टो चउवयणो जाओ सो मयणबस चित्तो ॥210॥

छंडिय णियवड्डत्तं पहुत्तणं देव वत्तणं तवोचरियं ।
कामाउरो अलज्जो लग्गो मग्गेण सो तिस्स ॥211॥

हसिओ सुरेंहि कुद्धो खरसीसो भक्खिउं पउत्तो सो ।
संकरकरकंडियसिरो विरहपलित्तो णियत्तो य ॥212॥

पविसेवि णिज्जणांवणं पिच्छिरिछी विरहगओ तत्थ ।
सेवइ कामासत्तो तिलोत्तमा चित्ति धरिऊणं ॥ २१३ ॥213॥

तस्सुप्पण्णो पुत्तो जंबउ णामेण लोय विक्खाओ ।
रिच्छापई जाओ भिच्चो सो रामदेवस्त ॥214॥

जो कुणइ जयमसेसं सो किं एक्का वि तारिसी महिला ।
सक्कइ ण विरइऊणं सेवइ णिग्घिणो रिच्छी ॥215॥

जो तिलोत्तम जो तिलोत्तम णियवि णच्चंति,
बम्मह सरजरजरिउ चत्तणियमु चउवयणु जायउ ।
बणि णिवसइ परिभट्ठतउ रमइ रिच्छि सुरयाण रायउ
सो बिरंचि कह संभवइ तयलोयउ कत्तारु ।
जो अप्पाण उत्तरइ फेडउ विरह वियारु ॥216॥

णत्थि धरा आपासं पवणाणल तोय जोय ससि सूरा ।
जइ तो कत्थ ठिदेणं बंभो रइयं तिलो ओत्ति ॥217॥

कत्तित्तं पुण दुविहं वत्थुअ कत्तित्त तह य विक्किरियं ।
घडपड गिहाइं पढमं विक्किरियं देवया रइयं ॥218॥

जइ तो वत्थब्भूओ रइओ लोओ विरंचिणा तिविहो ।
तो तस्स कारणाइं कत्थुव लद्धाइं दव्वाइं ॥219॥

जइ विबिकरिओ रइओ विज्जाथामेण तेणवंभेण ।
कइ थाइ दीहकालं अवत्थुभूओ अणिज्चेत्ति ।। २२० ॥220॥

तम्हा ण होइ कतबंभो सिरछेय विनडण पत्तो ।
छलिओ तिलोत्तमाए सामण्पुरि सुब्ब असमत्थो ॥ २२१ ॥221॥

जो पर महिलेा कज्जे छंडइ वहुत्तणं तओ णियमं ।
सण हवइ परमप्पा कह देवो हवइ पुज्जो य ॥222॥

सुपरिक्खिऊण तम्हा सुगवेसह को वि परम बंभाणो ।
दह अट्ठदोस रहिओ वीयराओ परणाणि ॥223॥

किण्हो जइ धरइ जयं सूवरूरवेण दाढअग्गेण ।
तासो कहिं ठवइ पए कुम्मे कुम्मो वि कहिं ठाई ॥224॥

अह छुहिऊण तउअरो तिजयं पालेइ महुमहो णिच्चं ।
किं सो तिजय वहित्थो तिजयवहित्थेण कि जाओ ॥225॥

जइ या दहरइ पुत्तो रामो णिवसेइ दंडरइणम्मि ।
लंकाहि वेण छलिओ हरिया भज्जा पवंचेण ॥ २२६ ॥226॥

विरहेण रुवइ विलवइ पडेइ उट्ठ इ णियइ सोएह ।
णउ पुणइ केन णाया पुच्छइ वणसावया मूढो ॥227॥

जइ उवरत्थं तिजयं ता सो किं तत्थ वाणरा रिच्छा ।
मेलाविऊण उवहि वंधहि सेलेंहिं सेउत्ति ॥228॥

किं पट्ठवेइ दूवं जंपइ किं सामभेयदंडाइं ।
अलहंतो किं जुज्जइ कोवं काऊण सत्थेंहि ॥229॥

कि दहवयणो सीया गहिऊण उवर बहिरे थक्को ।
जं हेलाइं ण तरइ रिउ हणिउं आणिउ भज्जा ॥230॥

जइ तिजयपालणत्थे संजाया तस्स एरिसी सत्ती ।
तो किं तिजयं दड्ढं हरेण सं पिच्छमाणस्स ॥231॥

जो ण जाणइ जो ण जाणइ हरिय णियभज्ज ।
पुच्छइ वणसावयइं अह मुणेइ आणउं ण सक्कइ ।
बंधेइ सायरु गिरिहिं पेसिऊण तहिं पवरभिच्चइं
तासु उवीर णारायणहो किमु तिहुवणु णिवसेइं ।
जो वारवइ विणासियहो रक्खहु णा हि तरेइ ॥232॥

जो देओ होऊणं माणुस मत्तेंहि पंडुपुत्तेंहि ।
सारइ बोलाइत्तो जुज्झे जेउं कओतेंहि ॥233॥

तम्हा ण होइ कत्ता किण्हो लोयस्स तविह भेयस्स ।
मरिऊण वार वारं दहावयारेंहि अवयरइ ॥234॥

एवं मणंति केई असरींरो णिक्कलो हरीं सिद्धो ।
अवयरइ यच्चलोए देसं गिण्हेइ इच्छाए ॥235॥

जइ तुप्पं णवणीयं णवणीयं पुणवि होइजइ दुद्धं ।
तो सिद्धिगओ जीवो पुणरवि देहाइं गिण्हेइ ॥236॥

रद्धो कूरो पुणरवि खित्ते खित्तो य होइ अंकूरो ।
जइ तो मोक्खं पत्ता जीवा पुण इंति संसारे ॥237॥

जइ णिक्कलो महप्पा विण्हू णिस्सेसकम्ममलचत्तो ।
किं कारण मप्पाणं संसारे पुणे वि पाडेइ ॥238॥

अहवा जइ कलसहिओ लोयव्वावार दिण्णणियचित्तो ।
तो संसारी णियमा परमप्पा हवइ ण हु विण्हू ॥239॥

इय जाणिऊण णूणं णवणव दोसेहिं वज्जिओ विण्हू ।
सो अक्खइ परमप्पा अणंतणाणि अराई य ॥240॥

एवं भणंति केई रुद्दो संहरइ तिहुवणं सयलं ।
चित्तामित्तेण फुडं णर णायरतिरियसुरसहियं ॥241॥

णट्ठे असेसलोए पच्छा सो कत्थ चिट्ठदे रुद्दो ।
इक्को तमंधयारो गोरी गंगा गया कत्थ ॥242॥

जो डहइ एयगामं पावी लोऐंहि वुच्चदे सो हु ।
जो पुण डहइ तिलोयं सो कह देवत्तणं पत्तो ॥ २४३ ॥243॥

जो हणइ एय गाव विप्पो वा सोवि इत्थ लोएहिं ।
गो बभहच्चयारी पभणिज्जइ पावकारी सो ॥ २४४ ॥244॥

जो पुण गोणारि पमुहे वाले बुड्डे असंखलोयत्थे ।
संहारेइ असेसं तस्सेव हि किं भणिस्सामो ॥245॥

अहवा जइ भणइ इयं सो देवो तस्स ण हु पावं ।
तो बंम्ह सीसछेए बंभहच्चा कहं जाया ॥246॥

किं हट्ट मुंडमाला कंधे परिवहइ धूल धूसरिओ ।
परिभमिओ तित्थाइं णरह कवालम्मि भुजंतो ॥247॥

तह वि ण सा बंभहच्चा किट्टइ रुद्दस्स जामतागामे ।
वसिओ पलासणणामे ता विप्पो णियवलट्टेण ॥248॥

णिहओ सिंगेण मुओ वसहो सेओ वि कसणु संजाओ ।
वाणारसिं च पत्तो रुद्दोवि य तस्स मग्गेण ॥249॥

गंगाजलं पविट्ठा चत्ता ते दोवि बंभहच्चाए ।
रुद्दस्स करय लग्गो लहयं पडियं कवालोत्ति ॥250॥

जस्स गुरू सुरहिसुओ गं तोएण फिट्टए हच्चा ।
सो देवो अण्णस्स य फेडइ कह संचियं पावं ॥ २५१ ॥251॥

जो ण तरइ णियपावं गहियवओ अप्पणस्स फेडेउं ।
असमत्थो सो णूणं कत्तित्त विणासणे रुद्दो ॥252॥

णो बंभा कुणइ जयं किण्हो ण धरेइ हरइ ण उ रुद्दो ।
एसो सहावसिद्धो णिच्चो दव्वेहिं संछण्णो ॥253॥

भमइ णग्गउ भमइ णग्गउ वसहि सुमसाणि ।
णर रुंडसिर मंडयउ णरकवालि भिक्खाइं भुंजेइ ।
सह कारिउ गउरियहिंदुक्खभारु अप्पहो णिउंज्जइ ।
जो बभणेहं सिर कमले खुडिए न फेडइ दोसु ।
सो इसरू कह अवहरइ तिहुवणु करइ असेसु ॥254॥

उत्तरंतउ उत्तरंतउ पवर सुरसरिहिं ।
पारासुर चलिउ मणुमुएलज्जकेवह णदिणि ।
आलिंकिय तपहेउ वरिवाल जाउ तावसुमहामुणि
भारउ पुणु हुउ दो वहिं केसग्गह पव्वेण ।
जिणु मल्लिवि के केण जगिणिवडय चवल मणेण ॥255॥

अण्णाणि य रइयाइ एत्थ पुराणाइं अघडमाणाइं ।
सिद्धंतेहिं अजुत्तं पुव्वावरदोससंकिण्णं ॥256॥

एए उत्ते देवो सव्वे सद्दहइ जो पुराणेहिं ।
अरिहंता परिचाए सम्मा मिच्छोत्ति णायव्वो ॥257॥

एसो सम्मामिच्छो परिहरियव्वो हवेइ णियमेणः ।
एत्तो अविरइ सम्मो कहिज्जमाणो णिसामेह ॥258॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 195: ‘अणंतवधिस्स’ छपा है; ‘अणंताणुबंधिस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘अनन्तानुबन्धिनः’); ‘छविलित्ति’ छपा है; ‘छावलित्ति’ होना चाहिए (छाया: ‘षडावलानि’)
  • गाथा 199: ‘खेरण’ छपा है; ‘खरेण’ होना चाहिए (छाया: ‘खरेण’)
  • गाथा 201: ‘विणिए इ’ छपा है; ‘वियाणेइ’ होना चाहिए (छाया: ‘विजनाति’)
  • गाथा 202: ‘जिणयमि’ छपा है; ‘जिणागमि’ होना चाहिए (छाया: ‘जिनागमे’)
  • गाथा 206: ‘धविरा’ छपा है; ‘धीवरा’ होना चाहिए (छाया: ‘धीवर’)
  • गाथा 207: ‘गवाइं’ छपा है; ‘गयाइं’ होना चाहिए (छाया: ‘देहगतान्’)
  • गाथा 209: ‘रज्यणिमित्तं’ छपा है; ‘रज्जणिमित्तं’ होना चाहिए (छाया: ‘ज्यनिमित्तं’)
  • गाथा 213: ‘णिज्जणांवणं’ छपा है; ‘णिज्जणवणं’ होना चाहिए (छाया: ‘निर्जनवनं’)
  • गाथा 214: ‘रामदेवस्त’ छपा है; ‘रामदेवस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘रामदेवस्य’)
  • गाथा 217: ‘आपासं’ छपा है; ‘आयासं’ होना चाहिए (छाया: ‘आकाशं’)
  • गाथा 219: ‘वत्थब्भूओ’ छपा है; ‘वत्थुब्भूओ’ होना चाहिए (छाया: ‘वस्तुभूतो’)
  • गाथा 220: ‘अणिज्चेत्ति’ छपा है; ‘अणिच्चेत्ति’ होना चाहिए (छाया: ‘अनित्य इति’)
  • गाथा 221: ‘कतबंभो’ छपा है; ‘कत्ता बंभो’ होना चाहिए (छाया: ‘कर्ता ब्रह्मा’); ‘सामण्पुरि’ छपा है; ‘सामण्णपुरि’ होना चाहिए (छाया: ‘सामान्य पुरुष’)
  • गाथा 222: ‘महिलेा’ छपा है; ‘महिला’ होना चाहिए (छाया: ‘महिला’)
  • गाथा 224: ‘सूवरूरवेण’ छपा है; ‘सूवररूवेण’ होना चाहिए (छाया: ‘शूकररूपेण’)
  • गाथा 226: ‘दहरइ’ छपा है; ‘दहरह’ होना चाहिए (छाया: ‘दशरथ’)
  • गाथा 227: ‘सोएह’ छपा है; ‘सोएइ’ होना चाहिए (छाया: ‘स्वपिति’); ‘पुणइ’ छपा है; ‘मुणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘मनुते’)
  • गाथा 232: ‘उवीर’ छपा है; ‘उवरि’ होना चाहिए (छाया: ‘उपरि’)
  • गाथा 233: ‘सारइ’ छपा है; ‘सारहि’ होना चाहिए (छाया: ‘सारथिं’)
  • गाथा 234: ‘तविह’ छपा है; ‘तिविह’ होना चाहिए (छाया: ‘त्रिविध’)
  • गाथा 235: ‘मणंति’ छपा है; ‘भणंति’ होना चाहिए (छाया: ‘भणन्ति’); ‘असरींरो’ छपा है; ‘असरीरो’ होना चाहिए (छाया: ‘अशरीरो’); ‘हरीं’ छपा है; ‘हरी’ होना चाहिए (छाया: ‘हरिः’); ‘यच्चलोए’ छपा है; ‘मच्चलोए’ होना चाहिए (छाया: ‘मर्त्यलोके’); ‘देसं’ छपा है; ‘देहं’ होना चाहिए (छाया: ‘देहं’)
  • गाथा 238: ‘पुणे वि’ छपा है; ‘पुणो वि’ होना चाहिए (छाया: ‘पुनरपि’)
  • गाथा 241: ‘चित्तामित्तेण’ छपा है; ‘चिंतामित्तेण’ होना चाहिए (छाया: ‘चिन्तामात्रेण’); ‘णायर’ छपा है; ‘णारय’ होना चाहिए (छाया: ‘नारक’)
  • गाथा 243: ‘लोऐंहि’ छपा है; ‘लोएहिं’ होना चाहिए (छाया: ‘लोकैः’)
  • गाथा 244: ‘बभहच्चयारी’ छपा है; ‘बंभहच्चयारी’ होना चाहिए (छाया: ‘ब्रह्महत्याकरो’)
  • गाथा 248: ‘किट्टइ’ छपा है; ‘फिट्टइ’ होना चाहिए (छाया: ‘स्फिटति’)
  • गाथा 251: ‘गं तोएण’ छपा है; ‘गंगातोएण’ होना चाहिए (छाया: ‘गंगातोयेन’)
  • गाथा 258: ‘णियमेणः’ छपा है; ‘णियमेण’ होना चाहिए (छाया: ‘नियमेन’)

अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान: सम्यग्दर्शन, परमात्मा, जीव आदि तत्त्व (गाथा 259 से 349)

हवइ चउत्थं ठाण अविरइ सम्मेत्ति णामत्रं भणियं ।
तत्थहु खइओ भावो खय उवसमिओ समोवेव ॥259॥

एए तिण्णि वि भावा दंसणमोहं पडुच्च भणिआ हु ।
चारित्तं णत्थि जदो अविरिय-अंतेसु ठाणेसु ॥260॥

णो इंदिएसु विरओ णो जीवेथावरे तसे वावि ।
जो सद्दहइ जिणुत्तं अविरइ सम्मोत्ति णायव्वो ॥261॥

हिंसा रहिए धम्मे अट्ठारह दोस वज्जिए देवे ।
णिग्गंथे पव्वयणो सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥262॥

संवेओ णिव्वेओ णिद्दा गरुहाइं उवसमो भत्ती ।
वच्छल्लं अनुकंपा अट्ठगुणा होंति सम्मत्ते ॥263॥

दुविहं त्तं पुण भणियं अहवा तिविहं कहंति आयरिया ।
अण्णाय अधिगमे वा सद्दहणं जं पयत्थाणं ॥264॥

खयउवसमं च खाइयं उवसम सम्मत्तपुणु च उद्दिट्ठं ।
अविरइ विरयाण पि य विरयाविरयाण ते हुंति ॥265॥

कोह चउक्कं पढमं अणंत बंधीणिणामयं भणियं ।
सम्मतं मिच्छत्तं सम्मा मिच्छत्तयं तिण्णि ॥266॥

एएसिं सत्तएहं उवसम करणेण उवसमं भणियं ।
खयओ खइयं जायं अचलत्तं णिम्मलं सुद्धं ॥267॥

उदयाभाओ जत्थ य पयडीणं ताण सव्ववादीणं ।
छण्णाण उवसमो विय उदओ सम्मत्तं पयडोए ॥ २६८ ॥268॥

खय उवसमं पउत्तं सम्मत्तं परम वीयराएंहि ।
उवसमिय पंक सरिसं णिच्चं कम्मक्खवण हेउं ॥269॥

जो ण हि मण्णइ एयं खय उवसम भावजो य सम्मत्तं ।
सो अण्णाणी मूढो तेण ण णायं समयसारं ॥270॥

जम्हा पंच पहाणा भावा अत्थित्ति सुत्त णिद्दिट्ठा ।
तम्हा खय उवसमिए भावे जायं तु तं जाणे ॥271॥

तं सम्मत्तं उत्तं जत्थ पयत्थाण होइ सद्दहणं ।
परमप्पह कहियाणं परवप्पा दोसपरिचित्तो ॥ २७२ ॥272॥

दोसा छुहाइ भणिया अट्ठारस होंति तिविह लोयम्मि ।
सामाण्णा सयल जणे तेसि अहावेण परमप्पा ॥273॥

सो पुण दुविहो भणिओ सयलो तह णिक्कलोत्ति णायव्वो ।
सयलो अरुह सरूवो सिद्धो पुण णिक्कलो भणिओ ॥274॥

जस्स ण गोरी गंगा कावालं णेव विसहरो कंठे ।
ण य दप्पो कंदप्पो सो अरुहो भण्णए रुद्दो ॥275॥

जस्स ण गया ण चक्कं णो संखो णेय गोविसंघाओ ।
णवयरइ दहवयारे सो अरुहो भण्णए विण्हू ॥276॥

ण तिलोत्तमाय छलिओ णय वयभट्ठो ण चउमुहो जादो ।
ण य रिच्छीए रत्तो सो अरुहो वुच्चए बंभो ॥277॥

तेणुत्त णवपयत्था अण्णे पंचत्थिकाय छद्दव्वा ।
आणाए अधिगमेण य सद्दहमाणस्स सम्मत्तं ॥278॥

संकाइदोसरहियं णिस्संकाईगुणज्जुअं परमं ।
कम्मणिज्जरणहेउं तं सुद्धं होइ सम्मत्तं ॥279॥

रामगिहे णिस्संको चोरो णामेण अंजणो भणिओ ।
चंपाए णिक्कंखा वणिधूवाणंतमइणामा ॥280॥

णिव्विदिगिछो राया उद्दायणो णाम रउरहे णयरे ।
रेवइ महुराणयरे अमूढ दिट्ठी मुणेयव्वा ॥281॥

ठिदिकरणगुणपउत्तो मगहा णयरन्मि बारिसेणो हु ।
हत्थिणिपुरम्मिणयरे वच्छल्लं बिरहुणा रइयं ॥ २८२ ॥282॥

उवगूहणगुण जुत्तो जिणदत्तोणाम तामलित्तिणयरीए ।
वज्ज कुमारेणकया पहावणा चेव महुराए ॥283॥

एरिस गुण अट्ठ जुयं सम्मत्तं जो धरेइ विढचित्तो ।
सो हवइ सम्मदिट्ठी सद्दहवाणोपयत्थाणं ॥284॥

ते पुण जीवा जीवा पुण्णं पावो य आसवो य तहा ।
संवर णिज्जरणां पि य बंधो मोक्खो य णाव होंति ॥ २८५ ॥285॥

जीवो अणाइ णिच्चो उवओग संजुदो देहमित्तो य ।
कत्ता भोत्ता चेत्ता ण हु मुत्तो सहाव उड्ढगई ॥286॥

पाणचउक्कपउत्तो जीवस्सइ जो हु जीविओ पुव्वं ।
जीवेइ वट्टमाणं जीवत्तगुण समावण्णो ॥287॥

पज्जाएणवि तस्स हु दिट्ठा आवत्ति देहगहणम्भि ।
अधुवतं पुण दिट्ठं देहस्स विणासणे तस्म ॥288॥

सायारो अणयारो उवओगो दुविह भेय संजुत्तो ।
सायारो अट्ठविहो चउप्पयारो अणायारो ॥289॥

मइ सुइ उवहि विहंगा अण्णाण जुदाणि तिण्ण णाणाणि ।
सम्मणाणाणि पुणो केवल दट्ठाणि पंचेव ॥290॥

मइणाणं सुयणाणं उवही मणपज्जय च केवलयं ।
तिण्णिसया छत्तीसा मई सुयं पुण वारसंगगयं ॥291॥

देसावहि परमावहि सव्वावहि अवहि होइ तिब्भेया ।
भव गुण कारणभूया णायव्वा होइ णियमेण ॥292॥

मणपज्जयं च दुविहं रिउ विउलमइ तहेवाणायव्वं ।
केवलणाणां एक्कं सव्वत्थ पयासयंणिच्चं ॥293॥

एसो अट्ठपयारो णाणुवओगो हु होइ सायारो ।
जक्खु अचक्खू ओही केवलसहिओ अणायारो ॥294॥

जम्हि भवे जे देहं तम्हि भवे तप्पमाणओ अप्पा ।
संहार वित्थर गुणो केवलणाणीहि उद्दिट्ठो ॥295॥

जो कत्ता सो भुत्ता ववहार गुणेण सोइ कम्मस्स ।
ण हु णिच्छएण भणिओ कत्ता भोत्ता य कम्माणं ॥296॥

कम्ममलछाइओवि य ण मुयइ सो चेयण गुणं किं पि ।
जोणी लक्खगओ वि य जहि कणय कद्दमे खित्तं ॥297॥

सुहमो अमुत्तित्तिवंत्तो वण्णगंधाइफासपरिहीणो ।
पुग्गलमज्झिगओ वि य णय मिल्लइ णिययसब्भावं ॥298॥

सब्भावे णुड्ढगई विदिसं परिहरिय गइ चउक्केण ।
गच्छेइ कम्मजुत्तो सुद्धो पुण रिज्जुगइ जाई ॥299॥

पाणि विमुत्ता लंगलि बंकगई होइ तह य पुण तइया ।
कम्माण काय जुत्तो दो तण्णि य कुणइ बंकाइ ॥300॥

तइए समए गिण्हइ चिरकयकम्मोदएण सो देहं ।
सुरणर णारदयाणं तिरियाणं चेव लेसवसो ॥301॥

सुह दुक्खं भुंजंतो हिडदि जोणीसु सयसहस्सेसु ।
एयंदिय वियलिंदिय सयलिंदिय पज्ज पज्जत्तो ॥302॥

होंति अजीव दुविहा रूवा रूवा य रूवि चउ भेया ।
खंधंच तहा देसो खंधपदेसो य परमाणू ॥303॥

णिहिला वपं च खंधा तस्स य अद्धं च वुच्चदे देसो ।
अद्धद्धं च पदेसो अविभागीहोद परमाणु ॥304॥

धम्माधम्मागासा अरूविणो होंति तह य पुण कालो ।
गइ ठाण कारणावथ उग्गाहण वत्तणा कमसो ॥305॥

जीवाण पुग्गलाणं गइप्पव त्ताण कारण धम्मो ।
जह मच्छाणं तोयं थिरभूया णेवसो णेई ॥306॥

ठिदी कारणं अधम्मो विसामठाणं च होइ नइ छाया ।
यहियाणं रुक्खस्स य गच्छंतं णेव सो धरई ॥307॥

सव्वेसिं दव्वाणं अवयासं देइ तं तु आयासं ।
तं पुणु दुविहं भणियं लोयालोयं च जिणसमए ॥308॥

वत्तणगुण जुत्ताणं दव्वाणं होइ कारणं कालो ।
सो दुविह भेय भिण्णो परमत्थो होइ ववहारो ॥309॥

परमत्थो कालाण लोयपदेसु हि संठिया णिच्चं ।
एक्केक्के एक्केक्का अपएसा रयण रासिव्व ॥310॥

वट्टण कालो समओ पुग्गलपरमाणु वाण संजाओ ।
ववहारस्स य मुक्खो उप्पणो तीद भावी स ॥311॥

तेसिं पि य समयाणं संखारहियाण आवली होई ।
संखेज्जा वलि गुणिओ उस्सासो होइ जिणदिट्ठो ॥312॥

सत्तु स्सासे थोओ सत्त त्थोएहि होइ लअ इक्को ।
अट्ठत्तीसद्ध लवा णाली वेणालिया मुहुत्तं तु ॥313॥

तीस मुहुत्तो दिवसो पणदह दिवसेहि होइ पक्खं तु ।
विहि पक्खेहि य मासो रिउ एक्का वेसि मासेहिं ॥314॥

रिउ तिय भूयं अयणं अयण जुवलेण होइ वरिसोक्को ।
इय ववहारो उत्तो कमेण विद्धि गओ विविहो ॥315॥

एयं तु दव्वछक्कं जिणेहि पंचत्थिकाइयं भणियं ।
वज्जिय कायं कालो कालस्स पएसयं णत्थि ॥316॥

जं पुण रुपी दव्वं गंधरफास वण्ण संजुत्तं ।
लहि ऊण जीवं ठिठ्ठा कारणयं कम्मबंधस्स ॥317॥

सम्मत्तसुदवएहि य कसाय उवसमण गुणसमाउत्तो ।
जो जीवो सो पुण्णं पावं विवरिय दोसाओ ॥318॥

गिरि णिग्गउ णइवाहो पविसइ सरम्मि जहाणवरयं ।
लहिऊण जीव चिठ्ठा तह कम्मं भावि आवसई ॥319॥

आसवइ सुहेण सुहं असुहं आसवइ असुह जोएण ।
जइ णइजलं तलाए समलं वा णिम्मलं विसई ॥320॥

आसवइ जं तु कम्मंण वय काएहि रायदोसेहिं ।
ते संवरइ णिरुत्तं तिगुत्तिगुत्तो णिरालंवो ॥321॥

जा संकप्पवियप्पो ता कम्मं असुइ सुह य दायारं ।
लद्धे सुद्ध सहावे सुसंवरो उहयकम्मस्स ॥322॥

णट्ठे मणसंकप्पे इंदियवावारवज्जिए जीवे ।
लद्धे सुद्ध सहावे उभयस्स य संवरो होई ॥323॥

जीव कम्माण उहयं अण्णोण्णं जो पएस पवेसो हु ।
जो निणवेरहिं बंधो भणिओ इय विगयमोहेहिं ॥324॥

जीवपएसेक्केक्के कम्मपएसा हु अंतपरिहीणा ।
होंति घणा णिविभूया सो बंधो होइ णायव्वो ॥325॥

अत्थि हु अणाइभूया बधो जीवस्स विविह कम्मेण ।
तस्सोदएण जायइ भावो पुण रायदोसमओ ॥326॥

भावेण तेण पुणरवि अण्णो बहु पुग्गला हु गग्गंति ।
जह तुप्पियपत्तस्स य णिविडा रेणुव्व लग्गंति ॥327॥

एक्कसमएण बद्धं कम्मं जीवेण सत्तभेयेहिं ।
परिणवइ आयु कम्मं भूयाउ सेसेण ॥328॥

सो बंधो चउभेओ णायव्वो होइ सुत्तणिद्दिट्ठो ।
पयडि ट्ठिदि अणुभागो पएसबंधो पुरा कहिओ ॥329॥

णाणाण दंसणाणं आवरण वेयणीय मोहणियं ।
आउस्स णाम गोदं अंतरायाणि षयडीओ ॥330॥

णाणावरणं कम्मं पंचविहं होइ सुत्तणिद्दिट्ठं ।
जह पडिमोवरि खित्तं छायणयं होइ कप्पडयं ॥331॥

दंसण आवरणं पुण जइ पडिहारो विणिवइ वारम्मि ।
तं णवविहं पउत्तं फुडत्थवाएहिं सुत्तम्मि ॥332॥

मोहेइ मोहणीयं जह मइरा अहव कोद्दमा पुरिसं ।
तह अडवीस विभिण्णं णायव्वं जिणुवएसेण ॥333॥

महुलित्त खग्ग सरिसं दुविहं पुण होइ वेयणीयं तु ।
सायासाय विभिण्णं सुह दुक्खं देइ जीवस्स ॥334॥

आऊ चउप्पयारं सुर णारय मणुय तिरिय गइवद्धं ।
हडिखित्त पुरिस तुल्लं जीवे भवधारण समत्थं ॥335॥

चित्तपडंवविचित्तं णाणा णामेहिं बत्तणं णामं ।
तेणवइ संखगुणियं गइ जाइ सरीर आईहिं ॥336॥

गोदं कुलाल सरिसं णिच्चुच्च कुलेसु पायणे दच्छ् ।
घड रंजणाइ करणे कुंभयकारो जहा णिउणो ॥337॥

जइ भंडयारि पुरिसो धणं णिवारेइ रायणा दिण्णं ।
तह अंतराय कम्मं णिवारणं कुणइ लद्धीणं ॥338॥

तं पंचभेद उत्तं दाणे लाहे य भोइ उवभोए ।
तह वीरि एण भणियं अंतरायं जिणिंदेहिं ॥339॥

एसो पयडीवंधो अणुभागो होइ तस्स सत्तीए ।
अणुभवणं चं तीवे तिव्वं मंदे मंदाणु रूवेण ॥340॥

एहं खलु पठमाणं उक्स्सं अंतराइयस्सेव ।
सं कोडाकोडो सायरणामाण मे व ठिदी ॥341॥

म हस्स सत्तरी खलु वीसं पुण होइ णाम गोत्तस्स ।
तेतीस सागराणां उवभाओ आउसस्सेव ॥342॥

बारसय वेयणीए णामा गोदे य अट्ठ य मुहुत्ता ।
भिण्ण मुहुत्तं तु ठिदी सेसाणां सावि पंचण्ह ॥343॥

पुव्व कय कम्म सडणं णिज्जरा सा पुणो हवे दुविहा ।
पढमा विवायाया विदिया अविवाय जाया थ ॥344॥

कालेणउवाएण पच्चंति जहा वणप्फई फलाइं ।
तह कालेण तवेण य पच्चंति कयाइ कम्माइ ॥345॥

णिस्सेस कम्म मुक्को सो मुक्खो जिणवरेंहि पण्णत्तो ।
रायद्दोसाभावे सहाव थक्कस्स जीवस्स ॥346॥

सो पुण दुविहो भणिओ एक्कदेसो य सव्वमोक्खो य ।
देसो चउघाइखए सव्वो णिस्सेस णासम्मि ॥347॥

णए सत्तपयारा जिणदिठ्ठा भासिया मए तच्चा ।
सद्दहइ जो हु जीवो सम्माइट्ठी हवे सो हु ॥348॥

अविरय सम्मादिठ्ठी एसो उत्तो मया समासेण ।
एत्तो उड्ढं वोच्छ समासदो देस विरदो य ॥349॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 259: ‘णामत्रं’ छपा है; ‘णामयं’ होना चाहिए (छाया: ‘नामकं’)
  • गाथा 262: ‘पव्वयणो’ छपा है; ‘पव्वयणे’ होना चाहिए (छाया: ‘प्रवचने’)
  • गाथा 263: ‘णिद्दा’ छपा है; ‘णिंदा’ होना चाहिए (छाया: ‘निंदा’)
  • गाथा 264: ‘त्तं’ छपा है; ‘तं’ होना चाहिए (छाया: ‘तत्’); ‘अण्णाय’ छपा है; ‘आणाय’ होना चाहिए (छाया: ‘आज्ञया’)
  • गाथा 267: ‘सत्तएहं’ छपा है; ‘सत्तण्हं’ होना चाहिए (छाया: ‘सप्तानाम्’)
  • गाथा 268: ‘सव्ववादीणं’ छपा है; ‘सव्वघादीणं’ होना चाहिए (छाया: ‘सर्वघातिनीनाम्’); ‘पयडोए’ छपा है; ‘पयडीए’ होना चाहिए (छाया: ‘प्रकृतेः’)
  • गाथा 272: ‘परवप्पा’ छपा है; ‘परमप्पा’ होना चाहिए (छाया: ‘परमात्मा’); ‘दोसपरिचित्तो’ छपा है; ‘दोसपरिचत्तो’ होना चाहिए (छाया: ‘दोष परित्यक्तः’)
  • गाथा 280: ‘रामगिहे’ छपा है; ‘रायगिहे’ होना चाहिए (छाया: ‘राजगृहे’); ‘धूवा’ छपा है; ‘धूया’ होना चाहिए (छाया: ‘सुता’)
  • गाथा 282: ‘णयरन्मि’ छपा है; ‘णयरम्मि’ होना चाहिए (छाया: ‘नगरे’); ‘बिरहुणा’ छपा है; ‘विण्हुणा’ होना चाहिए (छाया: ‘विष्णुना’)
  • गाथा 285: ‘णाव’ छपा है; ‘णव’ होना चाहिए (छाया: ‘नव’)
  • गाथा 287: ‘जीवस्सइ’ छपा है; ‘जीविस्सइ’ होना चाहिए (छाया: ‘जीविष्यति’)
  • गाथा 288: ‘गहणम्भि’ छपा है; ‘गहणम्मि’ होना चाहिए (छाया: ‘ग्रहणे’); ‘अधुवतं’ छपा है; ‘अधुवत्तं’ होना चाहिए (छाया: ‘अध्रुवत्वं’)
  • गाथा 293: ‘केवलणाणां’ छपा है; ‘केवलणाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘केवलज्ञानं’)
  • गाथा 294: ‘जक्खु’ छपा है; ‘चक्खु’ होना चाहिए (छाया: ‘चक्षुः’)
  • गाथा 296: ‘सोइ’ छपा है; ‘होइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भवति’)
  • गाथा 298: ‘अमुत्तित्तिवंत्तो’ छपा है; ‘अमुत्तिवंतो’ होना चाहिए (छाया: ‘अमूर्तिमान्’)
  • गाथा 300: ‘तण्णि’ छपा है; ‘तिण्णि’ होना चाहिए (छाया: ‘त्रीणि’)
  • गाथा 301: ‘णारदयाणं’ छपा है; ‘णारयाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘नारकाणां’)
  • गाथा 302: ‘हिडदि’ छपा है; ‘हिंडदि’ होना चाहिए (छाया: ‘हिण्डते’)
  • गाथा 304: ‘होद’ छपा है; ‘होइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भवति’)
  • गाथा 307: ‘नइ’ छपा है; ‘जह’ होना चाहिए (छाया: ‘यथा’)। ‘यहियाणं’ छपा है; ‘पहियाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘पथिकानां’)।
  • गाथा 310: ‘कालाण’ छपा है; ‘कालाणू’ होना चाहिए (छाया: ‘कालाणवः’)
  • गाथा 317: ‘गंधरफास’ छपा है; ‘गंधरसफास’ होना चाहिए (छाया: ‘गंधरसस्पर्श’)
  • गाथा 319: ‘आवसई’ छपा है; ‘आसवई’ होना चाहिए (छाया: ‘आस्रवति’)
  • गाथा 321: ‘कम्मंण’ छपा है; ‘कम्मं मण’ होना चाहिए (छाया: ‘कर्म मनोवचन’)
  • गाथा 322: ‘असुइ’ छपा है; ‘असुह’ होना चाहिए (छाया: ‘अशुभशुभदात्’)
  • गाथा 324: ‘निणवेरहिं’ छपा है; ‘जिणवरेहिं’ होना चाहिए (छाया: ‘जिनवरैः’)
  • गाथा 325: ‘णिविभूया’ छपा है; ‘णिविडभूया’ होना चाहिए (छाया: ‘निविडभूताः’)
  • गाथा 326: ‘बधो’ छपा है; ‘बंधो’ होना चाहिए (छाया: ‘बन्धो’)
  • गाथा 327: ‘गग्गंति’ छपा है; ‘लग्गंति’ होना चाहिए (छाया: ‘लगन्ति’)
  • गाथा 330: ‘षयडीओ’ छपा है; ‘पयडीओ’ होना चाहिए (छाया: ‘प्रकृतयः’)
  • गाथा 333: ‘कोद्दमा’ छपा है; ‘कोद्दवा’ होना चाहिए (छाया: ‘कोद्रवं’)
  • गाथा 337: ‘दच्छ्’ छपा है; ‘दच्छं’ होना चाहिए (छाया: ‘दक्षम्’)
  • गाथा 339: ‘भोइ’ छपा है; ‘भोए’ होना चाहिए (छाया: ‘भोगे’)
  • गाथा 340: ‘चं तीवे’ छपा है; ‘जं तिव्वे’ होना चाहिए (छाया: ‘यत् तीव्रे’)
  • गाथा 341: ‘उक्स्सं’ छपा है; ‘उक्कस्सं’ होना चाहिए (छाया: ‘मुत्कृष्ट’); ‘सं कोडाकोडो’ छपा है; ‘तीसं कोडाकोडी’ होना चाहिए (छाया: ‘त्रिंशत्कोटाकोटि’)
  • गाथा 342: ‘म हस्स’ छपा है; ‘मोहस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘मोहस्य’); ‘उवभाओ’ छपा है; ‘उवमाओ’ होना चाहिए (छाया: ‘उपमा’)
  • गाथा 344: ‘विवायाया’ छपा है; ‘विवायजाया’ होना चाहिए (छाया: ‘विपाक जाता’); ‘थ’ छपा है; ‘य’ होना चाहिए (छाया: ‘च’)
  • गाथा 348: ‘णए’ छपा है; ‘एए’ होना चाहिए (छाया: ‘एतानि’)

विरताविरत गुणस्थान: बारह व्रत, पंचम गुणस्थान के ध्यान (गाथा 350 से 398)

पंचमयं गुणठाणं विरयाविरउत्ति णामयं भणियं ।
तत्थवि खय उवसमिओ खाइओ उवसमो चेव ॥350॥

जो तसवहाउ विरओ णो विरओ तह य थावरवहाओ ।
एक्क समयम्मि जीवो विरयाविरउत्ति जिणु कहई ॥351॥

इलयाइथावराणं अत्थिपवित्तित्ति विरदि इयराणं ।
मूलगुणठ्ठ पउत्तो बारह वयभूसिओ हु देसनई ॥352॥

हिंसाविरई सच्चं अद्दत्तपरिवज्जणं च थूलवयं ।
परमहिलापरिहारो परिदमाणं परिग्गहस्सेव ॥353॥

दिसिविदिसि पच्चखाणं अणत्थदंडाण होइ परिहारो ।
भोओपभोयसंखा ए एह गुणव्वया तिण्णि ॥354॥

देवे थुवइ तियाले पव्वे पव्वे सुपोसहोवासं ।
अति हीण संविभागो मरणंते कुणइ सल्लिहणं ॥355॥

महुमज्जमंस विरई चाओ पुण उयंवराण पंचण्हं ।
अट्ठेदे मूलगुणा हवंति फुडु देश विरयम्मि ॥356॥

अट्टरउद्दं झाणं भद्दं अत्थित्ति तम्हि गुणठाणे ।
वहु आरंभपरिग्गह जुत्तस्स य णत्थि तं धम्मं ॥357॥

धम्मेद्रएण जीवो असुहं परि चयइ सुहगई लेई ।
कालेण सुक्ख मिल्लइ इंदियवल कारणं जाणि ॥358॥

इठ विओए अट्टं उप्पजइ तह अणिठ्ठसंजोए ।
रोय पकोवे तइयं णियाण करणे चउत्थं तु ॥359॥

अट्टज्झाण पउत्तो बंधइ पावं णिरंतरं जीवो ।
मरिएण य तिरियगई को विणरो जाइ तज्झाणे ॥360॥

रुद्दं कसाय सहियं जीवो संभवइ हिंसयाणंदं ।
मोसाणंदं विदियं थेयाणंदं पुणो तइयं ॥361॥

हवइ चउत्थं झाणं रुद्दं णामेण रक्खणाणंदं ।
जस्स य माहप्पेण य णरयगई भायणो जीवो ॥362॥

गिहवाबाररयाणं गेहीणं इंदियत्थ परि कलियं ।
अट्टज्झाण जायइ रुद्दं वा मोह छण्णाणं ॥363॥

झाणेंहि तेंहि पाव उप्पण्णं तं खवइ भद्दझाणेण ।
जीवो उवसप जुत्तो देस जई णाणसंपण्णो ॥364॥

भद्दस्स लक्खणं पुण धम्मं चिंतेइ भोयपरिमुक्को ।
चिंतिय धम्मं सेवइ पुणरवि भोए जहिच्छाए ॥365॥

धम्मज्झाणं भणियं आणापायाविवाय विचयं च ।
संठाणं विचयं तह कहिय झाणं समासेण ॥366॥

छद्दव्वणवपयत्था सत्तवि तच्चाइं जिणावरएण्ण ।
चिथइ विसय विरत्तो आणा विचयं तु तं भणियं ॥367॥

असुह कम्मस्स णाणो सुहस्स वा हवेइ केणुवाएण ।
इय चिंतंतस्स हवे अपाय विचयं परं झाणं ॥368॥

असुह सुहस्स विवाओ चिंतइ जीवाण चउगइययाणं ।
विवाविचयं झाणं भणियं तं जिणवरिंदेहिं ॥369॥

अह उड्ढतिरिय लोए चिंतेइ सपज्जयं ससंठाणं ।
विचयं संठाणस्स य भणियं झाणं समासेण ॥370॥

मुक्खं धम्मज्झाणं उत्तं तु पमायविरहिए ठाणे ।
देस विरए पमत्ते उवयारेणेव णायव्वं ॥371॥

दहलक्खण संजुत्तो अहवा धम्मोति वण्णिओ सुत्ते ।
चिंता जा तस्स हवे भणियं तं धम्मझाणुत्ति ॥372॥

अहवा वत्थुसहावो धम्मं वत्थ् पुणो न सो अप्पा ।
झायंताण कहियं धम्मझाण मुणिदेहिं ॥373॥

तं फुडु दुविहं भणियं सालंवं तह पुणो अणालंवं ।
सालंवं पंचण्हं परमेंठ्ठीणं सरुवं तु ॥374॥

हरिरइय समवसरणो अट्ठमहापाडिहेर संजुत्तो ।
सियकिरणविप्फुरंतो झायव्वो अरुहपरमेष्ठी ॥375॥

णट्ठट्ठ कम्मबंधो अट्ठगुणट्ठो य लोयसिहरत्थो ।
सुद्धो णिच्चो सुहमो झायव्वो सिद्धपरमेष्ठी ॥376॥

छत्तीस गुणसमग्गो णिच्चं आयरइ पच आयारो ।
सिस्साणुग्गह कुसलो भणिओ सो सूरिपरमेट्ठी ॥377॥

अज्झावयगुण जुत्तो धम्मोवदेसयारि चरियट्ठो ।
णिस्सेसागम कुसलो परमेट्ठी पाठओ झाओ ॥378॥

उग्गतवतविय गत्तो तियाल जोएण गमिय अहरत्तो ।
साहिय मोक्खस्स पओ झाओ सो साहु परमेट्ठी ॥379॥

एवं तं सालवं धम्मज्झाणं हवेइ नियमेण ।
झायंताणं जायइ विणिज्जरा असुहकम्माणं ॥380॥

ज पुणु वि निरालंबं तं झाणं गयपमाय गुणठाणे ।
चत्तेगहस्स जायइ धरियं जिणलिंगरुवस्स ॥381॥

जो भणइ को वि एवं अत्थि गिहत्थाण णिच्चलं झाणं ।
सुद्धं च णिरालंबं ण मुणइ सो आयमो जइणो ॥382॥

कहियाणि दिठ्ठिवाए पडुच्च गुणठाण जाणि झाणाणि ।
तम्हा स देस विरओ मुक्खं धम्मं ण झाएई ॥383॥

किं जं सो गिहवंतो वहिरतरगंथपरमिओ णिच्चं ।
वहु आरंभपउत्तो कह झायइ सुद्धपप्पाणं ॥384॥

घर बाबारा केई करणीया अत्थि ते ण ते सव्वे ।
झाणठ्ठियस्स पुरओ चिठ्ठंति णिमीलियच्छिस्स ॥385॥

अह ढिकुलियां झाणं झायइ अहवा स सोवए झाणी ।
सोवंतो झायव्वं ण ठाइ चित्तम्मि वियलम्मि ॥386॥

झाणाणं संताणं अहवा जाएइ तस्स झाणस्स ।
आलंवण रहियस्स य ण ठाइ चित्तं थिरं जम्हा ॥387॥

तम्हा सो सालंवं झायउ झाणं पि गिहवई णिच्चं ।
पंच परमेट्ठिरूवं अहवा मंतक्खरं तेसि ॥388॥

जइ मणइ को वि एवं गिहवावारेसु वट्टमाणो वि ।
पुण्णे अम्ह ण कज्जं जं संसारे सुवाडेई ॥389॥

मेहुणसण्णारूढो मारइ णवलक्ख सुहम जीवांई ।
इय जिणवरेंहि भणियं वज्झंतरणिग्गंथरूवेंहि ॥390॥

गेहे वदृंतस्स य वावारसयाइं सया कुणंतस्स ।
आसवइ कम्म मसुहं अद्द रउद्दे पवत्तस्स ॥391॥

जइ गिरिणई तलाए अणवरयं पविसए सलिल परिपुण्णं ।
मण वयतणु जोएंहि पविसइ असुहेंहि तह पावं ॥392॥

जाम ण छंडइ गेहं ताम ण परिहरइ इंतयं पावं ।
पावं अपरिहरंतो हेओ पुण्णस्स मा चयउ ॥393॥

सा मुक्क पुण्णहेउं पावस्सासवं अपरिहरतो य ।
बज्झइ ऊवेण णरो सो दुग्गइ जाइ मरिउणं ॥394॥

पुण्णस्स कारणाइं पुरिसो परिहरउ जेण णियचित्तं ।
विसय कसाय पउत्त णिग्गहियं हयपमाएण ॥395॥

गिहवावारत्तो गहियं जिणलिंग रहियपसपाओ ।
पुण्णस्स कारणांइं परिहरउ सया वि सो पुरिसो ॥396॥

असुहस्स कारणेंहि य कम्म छक्केहि णिच्चं वट्टतो ।
पुण्णस्स कारणाइं बंधस्स भयेण णिच्छंतो ॥397॥

ण मुणइ इय जो पुरिसो जिण कहिय पयत्थ णवसरूवं तु ।
अप्पाणं सुयण मज्झे हासस्स य ठाणयं कुणइ ॥398॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 352: ‘देसनई’ छपा है; ‘देसजई’ होना चाहिए (छाया: ‘देशयतिः’)
  • गाथा 353: ‘परिदमाणं’ छपा है; ‘परिमाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘परिमाणं’)
  • गाथा 354: ‘ए एह’ छपा है; ‘एए हु’ होना चाहिए (छाया: ‘एतानि हि’)
  • गाथा 358: ‘धम्मेद्रएण’ छपा है; ‘धम्मोदएण’ होना चाहिए (छाया: ‘धर्मोदयेन’)
  • गाथा 360: ‘मरिएण’ छपा है; ‘मरिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘मृत्वा’)
  • गाथा 364: ‘उवसप’ छपा है; ‘उवसम’ होना चाहिए (छाया: ‘उपशम’)
  • गाथा 367: ‘जिणावरएण्ण’ छपा है; ‘जिणवराणाए’ होना चाहिए (छाया: ‘जिनवराज्ञया’); ‘चिथइ’ छपा है; ‘चिंतइ’ होना चाहिए (छाया: ‘चिन्तयति’)
  • गाथा 368: ‘णाणो’ छपा है; ‘णासो’ होना चाहिए (छाया: ‘नाशः’)
  • गाथा 369: ‘चउगइययाणं’ छपा है; ‘चउगइगयाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘चतुर्गति गतानाम्’); ‘विवाविचयं’ छपा है; ‘विवायविचयं’ होना चाहिए (छाया: ‘विपाक विचयं’)
  • गाथा 373: ‘वत्थ्’ छपा है; ‘वत्थु’ होना चाहिए (छाया: ‘वस्तु’)
  • गाथा 374: ‘परमेंठ्ठीणं’ छपा है; ‘परमेट्ठीणं’ होना चाहिए (छाया: ‘परमेष्ठिनां’)
  • गाथा 375: ‘परमेष्ठी’ छपा है; ‘परमेट्ठी’ होना चाहिए (छाया: ‘परमेष्ठी’)
  • गाथा 377: ‘पच’ छपा है; ‘पंच’ होना चाहिए (छाया: ‘पंचाचारम्’)
  • गाथा 380: ‘सालवं’ छपा है; ‘सालंवं’ होना चाहिए (छाया: ‘सालम्बं’)
  • गाथा 381: ‘चत्तेगहस्स’ छपा है; ‘चत्तगेहस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘त्यक्त गृहस्य’)
  • गाथा 384: ‘परमिओ’ छपा है; ‘परिमिओ’ होना चाहिए (छाया: ‘परिमितो’); ‘सुद्धपप्पाणं’ छपा है; ‘सुद्धमप्पाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘शुद्धमात्मानम्’)
  • गाथा 389: ‘मणइ’ छपा है; ‘भणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘भणति’)
  • गाथा 391: ‘वदृंतस्स’ छपा है; ‘वट्टंतस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘वर्तमानस्य’)
  • गाथा 394: ‘सा मुक्क’ छपा है; ‘मा मुक्क’ होना चाहिए (छाया: ‘मा त्यज’); ‘ऊवेण’ छपा है; ‘पावेण’ होना चाहिए (छाया: ‘पापेन’)
  • गाथा 396: ‘गिहवावारत्तो’ छपा है; ‘गिहवावारविरत्तो’ होना चाहिए (छाया: ‘गृहव्यापारविरक्तो’); ‘रहियपसपाओ’ छपा है; ‘रहियसपमाओ’ होना चाहिए (छाया: ‘रहितस्वप्रमादः’)

विरताविरत गुणस्थान: पुण्य के भेद, फल, कारण और पूजा की विधि (गाथा 399 से 488)

पुण्णं पुव्वायरिया दुविहं अक्खंति सुत्तउत्तीए ।
मिच्छ पउत्तेण कयं विवरियं सम्म जुत्तेण ॥399॥

मिच्छादिट्ठीपुण्णं फलइ कुदेवेसु कुणर तिरिएसु ।
कुच्छिय भोग धरासु य कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥400॥

जइ वि सुजायं बीयं ववसाय पउत्तओ बिजइ कसओ ।
कुच्छिय खेत्ते ण फलइ तं बीय जह तहा दाणं ॥401॥

जइ फलइ कह वि दाणं कुच्छिय जाईहिं कुच्छिय सरीरं ।
कुच्छिय भोए दाउं पुणरवि पाडेइ संसारे ॥402॥

संसार चक्कवाले परिब्भमंतो हु जोणि लक्खाइं ।
पावइ विविहे दुक्खे बिरयंतो विविह कम्माइं ॥403॥

सम्मादिट्ठी पुण्णं ण होइ संसारकारणं णियमा ।
मोक्खस्स होइ हेउं जइ वि णियाणं ण सो कुणइ ॥404॥

अकइयणियाणसम्मो पुण्णं काऊण णाणचरणट्ठो ।
उप्पज्जइ दिवलोए सुहपरिणामो सुलेसो वि ॥405॥

अंतरमुहुत्तमज्झे देहं चइऊण माणुसं कुणिमं ।
गिण्हइ उत्तमदेहं सुचरिय कम्माणु भावेण ॥406॥

चम्मं रुहिरं मंसं मेज्जा अट्ठि च तह वसा सुक्कं ।
सिम्मं पित्तं अंतं मुत्तपुरीसं च रोमाणि ॥407॥

णह दंत सिरण्हारु लाला सेउयं च णिमिस आलस्सं ।
णिद्दा तण्हा य जरा अंगे देवाण ण हि अत्थि ॥408॥

सुइ अमलो वरवण्णो देहो सुह फास गंधसंपण्णो ।
बाल रवि तेयसरिसो चारुसरूवो सदा तरुणो ॥409॥

अणिमा महिमा लहिमा पावइ पागम्म तइ य ईसत्तं ।
वसयत्त कामरूवं एत्तियाई गुणो हि संजुत्तो ॥410॥

देवाण होइ देहो अइउत्तमेण पुग्गलेण संपुण्णो ।
सहजाहरण णिउत्तो अइरम्मो होइ पुण्णेण ॥411॥

उप्पण्णो कणयमए कायक्कंतिहिं भासिये भवणे ।
पेच्छंतो रयणमयं पासायं कणय वित्तिल्लं ॥412॥

अणुकूलं परियणयं तरलियणयणं च अच्छराणिवहं ।
पिच्छंतो णमिय सिरं सिर कइय करंजली देवे ॥413॥

णिसुणंतो थोत्तसए सुर वर सत्थेणविरइए ललिए ।
तुं वुरु गाइयगीए वीणासद्देण सुइसुहए ॥414॥

चितइ किं एवड्ढं मज्झ पउत्तं इमं पि किं जायं ।
किं ओ लग्गइ एसो अमरगणो विणयसंपण्णो ॥415॥

कोहं इह कस्सावोकेण विहाणेण इयं गहं पत्तो ।
तविओ को उग्गतबो केरिसियं संजमं विहियं ॥416॥

किं दाणं मे दिण्णो केरिसपत्ताण काय सु भत्तीए ।
जेणाहं कयपुरण्णो उप्पण्णो देवलोयम्मि ॥417॥

इय चिंततो पसरइ ओहीणाणं तु भवसहावेण ।
जाणइ सो आइयभव विहियं धम्मप्पहावं च ॥418॥

पुणरवि तमेव धम्मं मणसा सद्दहइ सम्मदिट्ठी सो ।
वंदेइ जिणावराणं णंदिसर पहुइ सव्वाइं ॥419॥

इह बहुकालं सग्गे भोगं भुंजंतु विविह रमणीयं ।
चइऊण आउस खए उप्पज्जइ मच्च लोयम्मि ॥420॥

उत्तम कुले महंतो बहुजण णमणीय संपयापउरे ।
होऊण अहियरूवो बल जोव्वण रिद्धिसंपुण्णो ॥421॥

तत्थवि विविहे भोए णरखेत्तभवे अणोवमे परमे ।
भुंज्जित्ता णिविण्णो संजमयं तेव गिण्हेई ॥422॥

लद्धं जइ चरम तणु चिरकय पुण्णेण सिज्झए णियमा ।
पाविय केवल णाणं जह खाइय संजमं सुद्धं ॥423॥

तम्हा सम्मादिट्ठी पुण्णं मोक्खस्स कारणं हवई ।
इय णाऊण गिहत्थो पुण्णं चायरउ जत्तेण ॥424॥

पुण्णस्स कारणं फुडु पढमं ता हवइ देवपूया य ।
कायव्वा भत्तीए सावयवग्गेण परमाय ॥425॥

फासुय जलेण ण्हाइय णिवसिय वत्थाइ गंपि तं ठाणं ।
इरियावहं च सोहिय उवविसियं पडिमआसेण ॥426॥

पुज्जाउवयरणाइ य पासे सण्णिहिय मंतपुव्वेण ।
ण्हाणेणं ण्हाइत्ता आचमणं कुणउ मंतेण ॥427॥

आसणठाणं किच्चा सम्मत्तपुव्व तु झाइए अप्पा ।
सिखि मंडल मज्झत्थं जालामयजलियणियदेहं ॥428॥

पावेण सह संदेह झाणो डज्झंतयं खु चिंततो ।
बंधउ संतीमुद्दा पंच परमेट्ठिणामाय ॥429॥

अमयक्खरे णिवेसउ पंचसु ठाणेसु सिरसि धरिऊण ।
सा मुद्दा पुणु चिंतउ धाराहिं सवदयं अमयं ॥430॥

पावेण सह सरीरं बड्ढं जं आसि झाण जळणेण ।
तं जायं जं छारं पक्खालउ तेण मंतेण ॥431॥

पडिदिवसं जं पावं पुरिसो आसवइ तिविह जोऐण ।
तं णिद्दहइ णिरुत्तं तेण ज्झाणेण संजुत्तो ॥432॥

जं सुद्धो तं अप्पा सकायरहिओ य कुणइ णहु किं पि ।
तेण पुणो णियदेहं पुण्णाण्णवं चिंतए झाणी ॥433॥

उट्ठाविऊण देह संपुण्णं कोडि चंद संकासं ।
पच्छा सयली करण कुणओ परमेट्ठिमंतेण ॥434॥

अहवा खिप्पउ साहा णिस्सेउ करंगुलीहिं वामेंहि ।
पाए णाही हियए मुहे य सीसे य ठविऊणं ॥435॥

अंगे णासं किच्चा इंदो हं कप्पिऊण णियकाए ।
कंकण सेहर मुद्दो कुणओ जण्णोपवीयं च ॥436॥

पीढं मेरुं कप्पिय तस्सोवरि ठाविऊण जिणपडिमा ।
पच्चक्खं अरहंत चित्ते भावेउ भावेण ॥437॥

कलस चउक्कं ठाविय चउसु वि कोणेसु णीरपरिपुण्णं ।
घय दुद्ध दहिय भरियं णव सयदलछण्णमुहकमलं ॥438॥

आवाहिऊण देवे सुरवइ सिहिकाल णेरिए वरुणे ।
पवणे जक्खे ससूली सपियसवाहणे ससत्थे य ॥439॥

दाऊण पुज्जदव्व वलि चरुयं तह य जण्णभायं च ।
सव्वेसिं मंते हि य बीयक्खर णाम जुत्तेहिं ॥440॥

उच्चारिऊण मंते अहिसेयं कुणउ देवदेवस्स ।
णीर घय खीर दहियं खिवउ अणुक्कमेण जिणसीसे ॥441॥

ण्हवणं काऊण पुणो अमलं गंधोदयं च वंदित्ता ।
सवलहणं च जिणिंदे कुणऊ कस्सीर मलएहिं ॥442॥

आलिहउ सिद्धचक्कं पट्टे पव्वेहिं णिरुसुगंधेहिं ।
गुरु उवएसेण फुडं संपएणं सव्वमंतेहिं ॥443॥

सोल दल कमल मज्झे अरिहं विलिहे इबिदुकलसहियं ।
बंभेण वेढइत्ता उवरिं पुणु माय बीएण ॥444॥

सोलस सरेहि वेढउ देह वियप्पेण अट्ठ वग्गा वि ।
अट्ठेहि दलेहिं सुपयं अरिहंताणं णमो सहियं ॥445॥

मायाए तं एवं तिउणं वेढेह अंकुसारूढं ।
कुणह धरामंडलयं बाहिरयं सिद्धचक्कस्स ॥446॥

इय संखेवं कहियं जो पूयइ गंध दीव धूवेहिं ।
कुसुमेहि जवइ णिच्चं सो हणइ पुराणयं पावं ॥447॥

जो पुणु वड्डद्धारो सव्वो भणिओ हु सिद्धचक्कस्स ।
सो एइ ण उद्धिरिओ इण्हि सामग्गि ण हु तस्स ॥448॥

जइ पुज्जइ को वि णरो उद्धारित्ता गुरुवएसेण ।
अट्ठ दल विउण तिउणं चउग्गुणं वाहिरे कंजे ॥449॥

मज्झे अरिहं देवं पंचपरमेट्ठिमंतसंजुत्तं ।
लहि ऊण कण्णियाए अट्ठदले अट्ठदेवीओ ॥450॥

सोलह दलेसु सोलह विज्जा देवीउ मंतसहियाओ ।
चउवीसं पत्ते सु य जक्खा जक्खी य चउवीसं ॥451॥

वत्तीसा अमरिंदा लिहेह वत्तीस कंज पत्तेसु ।
णिय णिय मंत पउत्ता गणहर वलयेण वेढेइ ॥452॥

सत्तपयारा रेहा सत्त वि विलिहेह वज्जसंजुता ।
चउरंसो चउ दारा कुणह पयत्तेण जुत्तीए ॥453॥

एवं जंतुद्धारं इत्थं मइ अक्खियं समासेण ।
सेसं किंपि विहाणं णायव्वं गुरु पसाएण ॥454॥

अट्ठ विह अच्चणाए पुज्जेयव्वं इमं खु णियमेण ।
दव्वेहिं सुअंधेहि य लिहियव्वं अइपवित्तेहिं ॥455॥

जो पुज्जइ अणवरयं पावं णिद्दहइ आसिभव वद्धं ।
पडिदिणकयं च विहुणइ बंधइ पउराई पुण्णाइं ॥456॥

इह लोए पुण मंता सव्वे सिज्झंति पढिय मित्तेण ।
विज्जाओ सव्वाओ हवंति फुडु साणुकूलाओ ॥457॥

गह भूय डायणीओ सव्वे णस्संति तस्स णामेण ।
णिव्विसयरणं पयडइ सुसिद्ध चक्कप्पहावेण ॥458॥

वसियरणं आइट्ठी थंभं णेहं च संति कम्माणि ।
नानाजराणां हरणं कुणेइ तं झाणजोएण ॥459॥

पहरंति ण तस्स रिउणा सत्तू मित्तत्तणं च उवयादि ।
पुज्जा हवेइ लोए सुवल्लहो णरवरिंदाण ॥460॥

किं वहुणा उत्तेण य मोक्खं सोक्खं च लब्भई जेण ।
केत्तिय मेत्तं एयं सुसाहियं सिद्ध चक्केण ॥461॥

अहवा जइ असमत्थो पुज्जइ परमेट्ठिपंचकं ।
तं पायडं खु लोए इच्छिय फलदायगं परमं ॥462॥

सिररेह भिण्ण सुण्णं चंदकला विंदुएण संजुत्तं ।
मत्ताहिय उवरगयं सुवेढियं कामबीएण ॥463॥

वामदिसाइणयारं मयार सविसग्ग दाहिणे भाए ।
बहि अट्ठ पत्र कमलं तिउणं वेढेइ मायाए ॥464॥

पणमंति मुत्तिमेगे अरहंत पयं दलेसु सेसेसु ।
धरणीमंडल मज्झे झाएह सुरच्चियं चक्कं ॥465॥

अह एउणवण्णासे कोट्ठे काऊण विउलरेहाहिं ।
अइरोइ अक्खराइं कमेण विण्णिसहं सव्वाइं ॥466॥

ता णिसदं जहयारं मज्झिम ठाणेसु ठाइ जुत्तीए ।
वेढइ वीएण पुणो दलमंडल उयरमज्झत्थं ॥467॥

एए जंतुद्धारे पुज्जइ परट्ठिपंच अहिहाणे ।
इच्छइ फलदायारो पावघणपडलहंतारो ॥468॥

अट्ठविहच्चण काउं पुव्व पउत्तम्मि ठावियं पडिमा ।
पुज्जेह तग्गयमणो विविहहि पुज्जाहिं भत्तीए ॥469॥

पसमइ रयं असेसं जिणपयकमलेसु दिण्ण जलधारा ।
भिंगारणाल णिग्गइ भमंतभिंगेहिं कव्बुरिया ॥470॥

चंदणसुअन्ध ले ओ चिणवर चरणेसु जो कुणि भविओ ।
लहइ तणूविक्कि रिय सहावसुयंधयं अमलं ॥471॥

पुण्णाण पुञ्जे हि य अक्खए पुञ्जेहि देवपयपुरओ ।
लब्भंति णावणिहाणे सुअक्खए चक्कवत्तित्तं ॥472॥

अलि चुंविएहिं पुज्जइ जिणपयकमलं च जाइमल्लीहिं ।
सो हवइ सुरवरिंदो रमेइ सुरतरुवर वणेहिं ॥473॥

दहिखीर सप्पि संभव उतम चरुरगहि पुज्जए जो हु।
जिणवरपाय पओरुह सो पावइ उत्तमे भोए ॥474॥

कप्पूर तेल्ल पयलिय मंद मरुपहयणडिदीवेहिं।
पुज्जइ जिण पय पोमं ससि सूरवि सम तणुं लहई ॥475॥

सिल्लारस अयरु मिस्सिय णिग्गइ धूवेंहि बहल धूमेंहि ।
धूवइ जो जिण चरणेस लहई सुहवत्तणं तिजए ॥476॥

पक्केंहि रसड्ढ समुज्जलेंहि जिणचरणपुरओ ।
णाणा फलेंहि पावइ पुरिसो हिय इच्छियं सुफलं ॥477॥

इयं अठ्ठभेय अच्चण काऊं पुण जवइ मूलविज्जा य ।
जा जत्थ जहा उत्ता सयं च अठ्ठोत्तरं जावा ॥478॥

किच्चा काउस्सग्गं देवं झाएह समवसरणत्थं ।
लद्धट्ठ पाडिहेरं णवकेवल लद्धि संपुण्णं ॥479॥

णठ्ठ चउ घाइ कम्मं केवल णाणेण मुणिय तियलोयं ।
परमेठ्ठी अरिहंतं परमत्थं परम झाणत्थं ॥480॥

झाणं झाऊण पुणो मज्झाणिय वंदणत्थ काऊण ।
उवसंहरिय विसज्जे जे पुव्वावाहिया देवा ॥481॥

एण विहाणेण पुडं पुज्जा जो कुणइ भत्ति संजुत्तो ।
सो डहइ णियं पावं बंधइ पुण्णं तिजय खोहं ॥482॥

उप्पज्जइ दिवलोए भुंजइ भोए मणिच्छिए इठ्ठे ।
बहुकालं चविय पुणो उत्तम मणुयत्तणं लहई ॥483॥

होऊण चक्क वट्टी चउदह रयणेहि णव णिहाणेहिं ।
पालिय छक्खंडधरा भुंजिय भोए णिरुगरिठ्ठा ॥484॥

संपत्त वोहि लाहो रज्जं परिहरिय भविय णिग्गंथो ।
लहिऊण सयलसंजम धरिऊण महव्वया पंच ॥485॥

लहिऊण सुक्कझाणं उप्पाइय केवलं वरं णाणं ।
सिज्झेइ णट्ठकम्मो अहिसेयं लहिय मेरुम्मि ॥486॥

इय णाउण विसेसं पुण्णं आयरइ कारणे तस्स ।
पावहणं जाम सयलं संजमयं अप्पमत्तं च ॥487॥

भावह अणुव्वयाइं पालह सीलं च कुणह उववासं ।
पव्वे पव्वे णियमं दिज्जह अणवरय दाणाइं ॥488॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 410: ‘तइ य’ छपा है; ‘तह य’ होना चाहिए (छाया: ‘तथा च’)
  • गाथा 415: ‘चितइ’ छपा है; ‘चिंतइ’ होना चाहिए (छाया: ‘चिन्तयति’)
  • गाथा 417: ‘कयपुरण्णो’ छपा है; ‘कयपुण्णो’ होना चाहिए (छाया: ‘कृतपुण्य’)
  • गाथा 418: ‘चिंततो’ छपा है; ‘चिंतंतो’ होना चाहिए (छाया: ‘चिन्तयन्’)
  • गाथा 419: ‘जिणावराणं’ छपा है; ‘जिणवराणं’ होना चाहिए (छाया: ‘जिनवरान्’)
  • गाथा 422: ‘तेव’ छपा है; ‘चेव’ होना चाहिए (छाया: ‘चैव’)
  • गाथा 426: ‘पडिमआसेण’ छपा है; ‘पडिमआसणेण’ होना चाहिए (छाया: ‘प्रतिमासनेन’)
  • गाथा 429: ‘चिंततो’ छपा है; ‘चिंतंतो’ होना चाहिए (छाया: ‘चिन्तयन्’)
  • गाथा 431: ‘बड्ढं’ छपा है; ‘दड्ढं’ होना चाहिए (छाया: ‘पग्धं’ अर्थात् ‘दग्धं’)
  • गाथा 432: ‘जोऐण’ छपा है; ‘जोएण’ होना चाहिए (छाया: ‘योगेन’)
  • गाथा 443: ‘पव्वेहिं’ छपा है; ‘दव्वेहिं’ होना चाहिए (छाया: ‘द्रव्यैः’)
  • गाथा 444: ‘बिदु’ छपा है; ‘बिंदु’ होना चाहिए (छाया: ‘विंदु’)
  • गाथा 450: ‘लहि ऊण’ छपा है; ‘लिहिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘लिखित्वा’)
  • गाथा 464: ‘पत्र’ छपा है; ‘पत्त’ होना चाहिए (छाया: ‘अष्टपत्रकमलं’)
  • गाथा 468: ‘परट्ठिपंच’ छपा है; ‘परमेट्ठिपंच’ होना चाहिए (छाया: ‘परमेष्ठिपंचाभिधानान्’)
  • गाथा 471: ‘चिणवर’ छपा है; ‘जिणवर’ होना चाहिए (छाया: ‘जिणवर’); ‘कुणि’ छपा है; ‘कुणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘करोति’)
  • गाथा 472: ‘णावणिहाणे’ छपा है; ‘णवणिहाणे’ होना चाहिए (छाया: ‘नव निधानानि’)
  • गाथा 476: ‘चरणेस’ छपा है; ‘चरणेसु’ होना चाहिए (छाया: ‘जिनचरणेषु’)
  • गाथा 482: ‘पुडं’ छपा है; ‘फुडं’ होना चाहिए (छाया: ‘स्फुटं’)

विरताविरत गुणस्थान: दान, दान के भेद, विधि और फल (गाथा 489 से 599)

अभय पयाणं पढमं विदियं तह होइ सत्थ दाणं च ।
तइयं ओसह दाणं आहारदाणं चउत्थं च ॥489॥

सव्वेसिं जीवाणं अभयं जो देइ मरणभीरुणं ।
सो णिब्भओ तिलोए उत्तस्सो होइ सव्वेसिं ॥490॥

सुयदाणेण प लब्भइ मइ सुइ णाणं च ओहिमणणाणं ।
बुद्धितवेणय सहियं पच्छा वर केवलं णाणं ॥491॥

ओसहदाणेण णरो अतुलिम बलपरक्कमोमहासत्तो ।
वाहि विमुक्क सरीरो चिराउ सो होइ तेयठ्ठो ॥492॥

दाणस्साहारं फलं को सक्कइ वण्णिऊण भुवणयले ।
दिण्णेण जेण भोओ लब्भंति मणिच्छियासव्वे ॥493॥

दायारो वि य पत्तं दाण विसेसो तहा विहाणं च ।
एए चउ अहियारा णायव्वा होंति भव्वेण ॥494॥

दायारो उवसंतो मणवय काएण संजुओ दच्छो ।
दाणे कयउच्छाहो पयडय वर छग्गुणो अमये ॥495॥

भत्ती तुठ्ठी य खमा सद्धा सत्तं च लोहपरिचाओ ।
विउणाण तक्काले सत्तगुणा होंति दायारे ॥496॥

तिविहं भणंति पत्तं मज्झिम तह उत्तमं जहण्णं च ।
उत्तम पत्तं साहू मज्झिमपत्तं च सावया भणिया ॥497॥

अविरइ सम्मादिट्ठी जहण्ण पत्तं तु अक्खियं समये ।
णाउण पत्तविसेसं दिज्जइ दाणाइ भत्तीए ॥498॥

मिच्छादट्ठी दुरिसो दाणं जो देइ उत्तमे पत्ते ।
सो पावइ वर भोए फुड उत्तम भोय भूमीसु ॥499॥

मज्झिम पत्ते मज्झिम भोयभूमीसु पावए भोए ।
पावइ जहण्ण भोए जहण्ण पत्तस्स पाणेण ॥500॥

उत्तम छित्ते बीयं फलइ जहा लक्ख कोडि गुण्णेंहि ।
दाणं डत्तम पत्ते फलइ तहा किमिच्छ भणिएण ॥501॥

समादिट्ठी पुरिसो उत्तम पुरिसस्स दिण्ण दाणेण ।
उववज्जइ दिव लोए हवइ स महड्ढिओ देओ ॥502॥

जह णीरं उच्छुगयं कालं परिणवइ अमिय रूवेण ।
तह दाणं वर पत्ते फलेइ भोएहिं विविहे हिं ॥503॥

उतमरयणं खु जहा उत्तम पुरिसासियं च वहुमुल्लं ।
तह उत्तम पत्तगयं दाणं णिउणेहि णायत्वं ॥504॥

किंचिवि वेयमयं पत्तं किंचिवि पत्तं तवोभयं परमं ।
तं पत्तं संसारे तारकयं होइ णियमेण ॥505॥

वेओ किल सिद्धंतो तस्सट्ठा णवपयत्थ छद्दव्वं ।
गुण मग्गणठाणाविय जीवट्ठाणाणि सव्वाणि ॥506॥

परमप्पयस्स रूवं जीव कम्माण उहय सब्भावं ।
जो जाणइ सविसेसं वेयमयं होइ तं पत्तं ॥507॥

वहिरब्भंतर तवसा कालो परिखवइ जिणोवएसेण ।
दिढ बंभचेर णाणी पत्तं तु तवोमयं भणियं ॥508॥

जह णावा णिच्छिदा गुणमइया विविह रयण परिपुण्णा ।
तारइ पारावारे वहु जलयर संकडे भीमे ॥509॥

तह संसार समुद्दे जाइ जरामरण जलयरा किण्णे ।
दुक्ख सहस्सावत्ते तारेइ गुणाहियं पत्तं ॥510॥

कुच्छिगयं जस्सउणं जीरइ तवझाणवंभ चरिएहिं ।
सो पत्तो णित्थारइ अप्पाणं चेव दायारं ॥511॥

एरिस पत्तम्मि वरे दिज्जइ आहारदाणमणवज्जं ।
पासुय सुद्धं अमलं जोग्गं मणदेह सुक्खयरं ॥512॥

कालस्स य अणुरूवं रोयारोयत्तणं च णाऊणं ।
दायव्वं जह जोग्गं आहारं गेहवंतेण ॥513॥

पत्तस्सेस सहावी जं दिण्णं दायगेण भत्तीए ।
तं कर पत्ते सोहिय गहियव्वं विगइरायेण ॥514॥

दायारेण पुणो विय अप्पाणो सुक्ख मिच्छमाणेण ।
देयं उत्तम दाणं विहिणा वरणीय सत्तीए ॥515॥

जो पुण हंतइ धण कणइ मुनिहिं कुभोयणु देइ ।
जम्मि जम्मिदालिददहण पुठ्ठि ण तहो छंडेइ ॥516॥

देहो पाणा रुवं विज्जा धम्मं तवो सुहं मोक्खं ।
सव्वं दिण्णं णियमा हवेइ आहारदाणेण ॥517॥

भुक्खं समा णहु वाही अण्णसमाणं य ओसहं णत्थि ।
तम्हा अहार दाणे आरोगत्तं हवे दिण्णं ॥518॥

आहार मओ देहो आहारेण विणा पडेइ णियमेण ।
तम्हा जेणाहारो दिण्णो देहो हवे तेण ॥519॥

ता देहो ता पाणा ता रुवं ताम णाण विण्णाणं ।
जामा हारो पविसइ देहे जीवाण सुक्खयरो ॥520॥

आहारसणे देहो देहेण तवो तवेण रय सडणं ।
रय णासेण य णाणं णाणे मुक्खो जिणोभणई ॥521॥

चउविहदाणं उत्तं जे तं सयलमवि होइ इह दिण्णं ।
सविसेसं दिण्णेणय इक्केणाहारदाणेण ॥522॥

भुक्खा कय मरणभयं णांसइ जीवाण तेण तं अभयं ।
सो एव हणइ वाही उसहं फुडअत्थितेण आहारो ॥ ५२३ ॥523॥

आयाराई सत्थं आहारबलेण पढइ णिस्सेसं ।
तम्हा तं सुयदाणं दिण्णं आहारदाणेण ॥524॥

हय गयगो दाणाइं धरणीरय कणय आण दाणाइं ।
तित्ति ण कुणंति सया जह तित्ति कुणइ आहारो ॥525॥

जह रयणाण वइरं सेलेसु य उत्तमो जहा मेरू ।
तह दाणाणं पवरो आहारो होइ णायव्वो ॥526॥

सो दायव्वो पत्ते विहाण जुत्तेण सा विही एसा ।
पडिगह मुच्चट्ठाणं पादोदय अच्चणं पणामं च ॥527॥

मणवयण कायसुद्धी एसणसुद्धी य परम कायव्वा ।
होइ फुडं आयरणं णवव्विहं पुव्व कम्मेण ॥528॥

एवं विहिणा जुत्तं देयं दाणं तिसुद्ध भत्तीए ।
वज्जिय कुच्छियपत्तं तह य अपत्तं च णिस्सारं ॥529॥

जं रयणत्तय रहियं मिच्छमय कहियधम्म अणुलग्गं ।
जइ विहु तवइ सुघोरं तहावितं कुच्छियं पत्तं ॥530॥

जस्स ण तवो ण चरणं ण चावि जस्सत्थि वर गुणो कोई ।
तं जाणेह अपत्तं अफलं दाणं कयं तस्स ॥531॥

ऊसर खित्ते वीयं सुक्खे रुक्खे य णीर अहिसेओ ।
जह तह दाणमपत्ते दिण्णं खु णिरत्थयं होई ॥ ५३२ ॥532॥

कुच्छिय पत्ते किंचि वि फलइ कुदेवेसु कुणरतिरिएसु ।
कुच्छिय भोयधरासु य लवणंवुहि कालउवहीसु ॥533॥

लवणे अडयालीसा काल समद्दे य तित्तियाचे व ।
अंतरदीवा भणिया कुभोग भूमीय विक्खाया ।। ५३४ ॥534॥

उप्पज्जंति मणुस्सा कुपत्तदाणेण तत्थभूमीसु ।
जुवलेण गेहरहिया णाग्गा तरुमूलिणिवसंति ॥ ५३५ ॥535॥

पल्लोवम आउस्सा वत्थाहरणेहि वज्जिया णिच्चं ।
तरुपल्लव पुप्फरसं फलाण रसं चेव भक्खंति ॥536॥

दीवे कहिं पि मणु या सक्कर गुड खंड सण्णिहा भूमी ।
भक्खंति पुट्ठि जणया अइसरसा पुव्व कम्मेण ॥537॥

केई गय सीह मुहा केई हरि महिस कवि कोल मुहा ।
केई आवरिस मुहा केई पुण एय पाया य ॥538॥

ससमुक्कलि कण्णाविय कण्णद्यावरण दीह कण्णा य ।
लांगूलधरा अपरे अपरे मणुया अभासा य ॥539॥

ए ए णरा पसिद्धा तिरिया वि हवंति कुभोय भूमीसु ।
मणुसुतर वाहिरेसु अ असंख दीवेसु ते होंति ॥540॥

सव्वे मंद कसाया सव्वे णिस्सेस बाहि परिहीणा ।
मरिऊण विंतरा विहु जोइसु भवणेसु जायंति ॥541॥

तत्थ चुया पुण संता तिरियणरा पुण हवंति ते सव्वे ।
काऊण तत्थ पावं पुणोवि णिरयापहा होंति ॥542॥

चंडालभिल्ल छिपिय डोंव य कल्लाल एव माईणि ।
दीसंति रिद्धि पत्ता कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥543॥

केई पुण गय तुरया गेहेरायाण उण्णई पत्ता ।
दिस्सति मच्च लोए कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥544॥

केई पुण बिव लोए उववण्णा वाहणतणेण ते मणुया ।
सोसंति जाइ दुक्खं पिच्छिय रिद्धी सुदेवाणं ॥545॥

णाऊण तस्स दोसं सम्माणह मा कया विसविणम्मि ।
परिहरह सया दूरं वुहियाण वि सविस सप्पं व ॥546॥

पत्थर मया वि दोणी पत्थर मप्पाणयं च बोलेई ।
जह तह कुच्छिय पत्तं संसारे चेव बोलेई ॥547॥

णावा जह सच्छिद्दा परमप्पाणं च उवहि सलिलम्मि ।
बो लेइ तह कुपत्तं संसारमहोवही भीमे ॥548॥

लोहमए कुतरंडे लग्गो पुरिसो हु तारिणी वाहे ।
वुड्ढइ जह तह वुड्ढइ कुपत्त सम्माणओ पुरिसो ॥549॥

णलहंति फलं गरुयं कुच्छिय पहुवित्त सेविया पुरिसा ।
जह तह कुच्छिय पत्ते दिण्णा दाणा मुणेयव्वा ॥550॥

णत्थि वय सील संजम झाणं तव नियम वंभचेरं व ।
एमेव भणइ पत्तं अप्पाणं लोय मज्झम्मि ॥551॥

मय कोह लोह गहिओ उड्डिय हत्थोय जायणा सीलो ।
गिह वावारासत्तो जो सो पत्तो कहं हवइ ॥552॥

हिंसाइदोस जुत्तो अत्तरउद्देहिं गमिय अहरत्तो ।
क्रय विक्किय वट्टंतो इंदिय विसएसु लोहिल्लो ॥553॥

उत्तम पत्तं णिंदिय गुरुठाणे अप्पयं पकुव्वंतो ।
होउ पावेण गुरू वुड्डइ पुण कुगइ उवहिम्मि ॥554॥

जो बोलइ अप्पाणं संसार महण्णवम्मि ।
सो अण्णं कह तारइ तस्सणुमग्गे जणे लग्गं ॥ ५५५ ॥555॥

एवं पत्तविसेसं णाऊणं देह दाणमणवरयं ।
णिय जीव सग्गमोक्खं इच्छयमो पयत्तेण ॥556॥

लहिऊण संपया जो देइणदाणाइं मोह संछण्णो ।
सो अप्पाणं अप्पे बंचेइ य णत्थि संदेहो ॥557॥

णय देइ णेय भुंजइ अत्थं णिखणेइ लोहसंछण्णो ।
सो तणकय पुरिसो इव रक्खइ सस्सं परस्सत्थे ॥558॥

किविणेण संचयधणं ण होइ उवयारियं जहा तस्स ।
महुयरि इव संचियमहु हरंति अण्णे सपाणेंहि ॥559॥

कस्स थिरा इह लच्छि कस्स थिरं जुव्वणं धणं जीवं ।
इय मुणिऊण सुपुरिसा दिंति सुपत्तेसु दाणाइं ॥560॥

दुक्खेण लहइ वित्तं वित्ते लद्धे वि दुल्लहं चित्तं ।
लद्धे चित्ते वित्ते सुदुल्लहो पत्तलंभो व ॥561॥

चित्त वित्तं पत्तं तिडिअ वि पावेइ कहवि जइ पुरिसो ।
तोर लहइ अनुकूलं सयनं पुत्तं कलतं च ॥562॥

पडिकूल माइ काऊं विग्ध कुव्वंति धम्म दाणस्स ।
उवएसंति पुबुद्धि दुग्गइगम कारया असुहा ॥563॥

सो कह सयणो भण्णइ विग्घं जो कुणइ धम्मदाणस्स ।
दाऊण पाव बुद्धी हाडइ दुक्खायरे णरए ॥564॥

सो सयणो सो बंधू सो मित्तो जो सहिज्जओ धम्मे ।
जो धम्म विग्घयारी सो सत्तू णत्थि संदेहो ॥565॥

ते धण्णा लोयत तेहिं णिरुद्धाइं कुगई गमणाणि ।
वित्त पत्तं चित्तं पाविवि जहि दिण्ण दाणाइं ॥566॥

मुणिभोयणेण दव्वं जस्स गयं जुव्वणं च तवयरणे ।
सण्णासेण य जीवं जस्स गयं किं गयं तस्स ॥567॥

जह जह वड्ढइ लच्छी तह तह दाणाइं देह पत्तेसु ।
अहवा हीयइ जह जह देह विसेसेण तह तह यं ॥568॥

जेहि ण दिण्णं दाणं ण चावि पुज्जा किया जिणिंदस्स ।
ते हीणदीण दुग्गय भिक्खंण लहंति जायंता ॥569॥

पर पेसणाइ णिच्च करंति भतीए लह य णिय देहं ।
पूरंति ण णियय घरे परवस गासेण जीवंति ॥570॥

खंधेण वहंति णरं गासत्थं दीह पंथ समसंता ।
तं चेव विण्णवंता मुहकय कर विणय संजुत्ता ॥571॥

पहु तुम्ह समं जायं कोमल अंण्णाइ सुट्ठु, सुहियाइं ।
हय मुह पियाइं काऊं मलंति पाया सहत्थेहिं ॥572॥

रक्खंति गोगवाइं छेलयखर तुरय छेत खलिहाणं ।
वुण्णंति कप्प डाइं घडंति पिडउल्लयाइं च ॥573॥

धावंति सत्थहत्था उण्हं च गणंति तह य सीयाइं ।
तुरय मुह फेण सित्ता रयलित्ता गलियपासेसा ॥574॥

पिच्छिय पर महिलाओ घणथण मय णयण चंद वयणाइं ।
ताडेइ णियंसीसं झूरइ हिययम्मि दीण मुहो ॥575॥

पर संपया णिएऊं पमणइ हा किं मया ण दिण्णाइं ।
दाणाइं पर पत्ते उत्तमम भत्ती य जुत्तण ॥576॥

एवं णाऊण फुडं लोहो उवसानिऊण णियचित्ते ।
णिय वित्ताणुस्सारं दिज्जइ दाणं सुपत्तेसु ॥577॥

जं उप्पज्जइ दव्वं तं कायव्वं च बुद्धिवंत्तेण ।
छहृणायगयं सव्वं पढमो भावो हि धम्मस्स ॥578॥

बीओ भावो गेहे दायव्वो कुडंव पोसणत्थेण ।
तइओ भावो भोए चउत्थओ सयण वग्गम्मि ॥579॥

सेसा जे वे भावा ठायव्वा होंति ते वि पुरिसेण ।
पूज्जा महिमा कज्जे अहवा कालावकालस्स ॥580॥

अहवा णियं विढत्तं कस्स वि मा देहि होइ लोहिल्लो ।
सो को थि कुण उवाऊ जह तं दव्वं समं जाइ ॥581॥

तं दव्वं जाइ समं जं खीणं पुज्ज महिम दाणेंहि ।
जं पुण धरा णिहत्ते णठ्टे त्ते जाणि णियमेण ॥582॥

सइ ठाणाओ मुल्लह अहवा भूसेहि णिज्जए तं पि ।
अह भाओ अह पुत्तो चोरो तं लेई अह राओ ॥583॥

अहवा तरुणी महिला जायइ अण्णेण जार पुरिसेण ।
सह तं गिण्हिय दव्वं अण्णं देसंतर दुठ्ठा ॥584॥

इय जाणिऊण णूणं देह सुपत्तेसु चहुविहं दाणं ।
जह कय पावेण सया मुच्चेह लिप्पेद् सुपुण्णेण ॥585॥

पुण्णेण कुलं विउलं कित्ती पुण्णेण भमइ तियलोए ।
पुण्णेण रूपमतुलं सोहागं जोवणं तेयं ॥586॥

पुण्णवलेणुब वज्जइ कहयवि पुरिसो य भोय भूमीसु ।
भुंजेइ तत्थभोए दह कप्पतरुब्भवे हिव्वे ॥587॥

गिह तरुवर बरगेहे भोयण रुक्खाय भोयणे सरिसे ।
कणयमय भायणाणिय भायण रुक्खा पयच्छन्ति ॥588॥

वत्थंगा वर वेत्थे कुसुमंगा दिंति कुसुम मालाये ।
दिंति सुयंध विलेवण विलेवणंगा महारुक्खा ॥589॥

तूरंगा बर तूरे मज्जंगादिंति सरस मज्जाइं ।
आहारणंगा दिंतिय आहरणे कणममणि जडिए ॥590॥

दयणिदिणं ससि सूरा जह तह दीवंति जोइसारुक्खा ।
पायव दसप्पयारा चिंतिययं दिंति मणुयाणं ॥591॥

जरसोय वाहि वेअण कासं सासं च जिंभणं छिक्का ।
ए ए अण्णे दोसा णहवंति हु भोय भूमीसू ॥592॥

सव्वे भोए दिव्वे भुंजित्ता आउसाव साणम्मि ।
सम्मादिट्ठी मणुया कप्पा वासेसु जायंति ॥593॥

जे पुणु मिच्छादिट्ठी विंतर भवने सुजोइसाहोंति ।
जम्हा मंद कसाया तम्हा देवेसु जायंति ॥594॥

केई समवसरणगया जोइस भावेण सुवितरा देवा ।
कहिऊण सम्मदंसण तत्थ चुया हुंति वा पुरिसा ॥595॥

लहिऊण देस संजम सयल वा होइ सुरोत्तमो सरगे ।
भोत्तूण सुहे रम्मे पुणोवि अवयरइ मणुयत्ते ॥596॥

तत्थवि सुहाइं भुत्तं दिक्खा गहिऊण भविय णिग्गंथो ।
सुक्कज्झाणं पाविय कम्म हणिऊण सिज्झेई ॥597॥

सिद्धंसरूवरूवं कम्म रहियं च होइ झाणेण ।
सिद्धावासी य णरो ण हवइ संसारिओ जीवो ॥598॥

पंचमयं गुणठाणं एथ कहिय मया समासेण ।
एत्तो उड्ढं वोच्छं पमत्तविरयं तु छमयं ॥599॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 491: ‘प’ छपा है; ‘य’ होना चाहिए (छाया: ‘च’)
  • गाथा 492: ‘अतुलिम’ छपा है; ‘अतुलिय’ होना चाहिए (छाया: ‘अतुलित’)
  • गाथा 495: ‘अमये’ छपा है; ‘अभओ’ होना चाहिए (छाया: ‘अभयः’)
  • गाथा 496: ‘विउणाण’ छपा है; ‘विण्णाणं’ होना चाहिए (छाया: ‘विज्ञानं’)
  • गाथा 499: ‘मिच्छादट्ठी दुरिसो’ छपा है; ‘मिच्छादिट्ठी पुरिसो’ होना चाहिए (छाया: ‘मिथ्यादृष्टिः पुरुषो’)
  • गाथा 500: ‘पाणेण’ छपा है; ‘दाणेण’ होना चाहिए (छाया: ‘दानेन’)
  • गाथा 501: ‘डत्तम’ छपा है; ‘उत्तम’ होना चाहिए (छाया: ‘उत्तमपात्रे’)
  • गाथा 504: ‘णायत्वं’ छपा है; ‘णायव्वं’ होना चाहिए (छाया: ‘ज्ञातव्यम्’)
  • गाथा 505: ‘तवोभयं’ छपा है; ‘तवोमयं’ होना चाहिए (छाया: ‘तपोमयं’)
  • गाथा 514: ‘सहावी’ छपा है; ‘सहावो’ होना चाहिए (छाया: ‘स्वभावो’)
  • गाथा 523: ‘णांसइ’ छपा है; ‘णासइ’ होना चाहिए (छाया: ‘नाशयति’)
  • गाथा 525: ‘आण’ छपा है; ‘जाण’ होना चाहिए (छाया: ‘यान’)
  • गाथा 534: ‘समद्दे’ छपा है; ‘समुद्दे’ होना चाहिए (छाया: ‘समुद्रे’)
  • गाथा 535: ‘णाग्गा’ छपा है; ‘णग्गा’ होना चाहिए (छाया: ‘नग्नाः’)
  • गाथा 538: ‘आवरिस’ छपा है; ‘आदरिस’ होना चाहिए (छाया: ‘आदर्श’)
  • गाथा 544: ‘दिस्सति’ छपा है; ‘दिस्संति’ होना चाहिए (छाया: ‘दृश्यन्ते’)
  • गाथा 545: ‘बिव लोए’ छपा है; ‘दिव लोए’ होना चाहिए (छाया: ‘स्वर्गलोके’)
  • गाथा 553: ‘क्रय’ छपा है; ‘कय’ होना चाहिए (छाया: ‘क्रय’)
  • गाथा 555: ‘संसार महण्णवम्मि’ छपा है; ‘संसार महण्णवम्मि गरुए’ होना चाहिए (छाया: ‘संसारमहार्णवे गुरुके’)
  • गाथा 562: ‘तिडिअ वि’ छपा है; ‘तिण्णि वि’ होना चाहिए (छाया: ‘त्रीण्यपि’); ‘तोर लहइ’ छपा है; ‘तो ण लहइ’ होना चाहिए (छाया: ‘तर्हि न लभते’)
  • गाथा 563: ‘विग्ध’ छपा है; ‘विग्घ’ होना चाहिए (छाया: ‘विघ्न’); ‘पुबुद्धि’ छपा है; ‘दुब्बुद्धि’ होना चाहिए (छाया: ‘दुर्बुद्धि’)
  • गाथा 564: ‘हाडइ’ छपा है; ‘पाडइ’ होना चाहिए (छाया: ‘पातयति’)
  • गाथा 566: ‘लोयत तेहिं’ छपा है; ‘लोयत्तए तेहिं’ होना चाहिए (छाया: ‘लोक त्रये तैः’)
  • गाथा 570: ‘लह य’ छपा है; ‘तह य’ होना चाहिए (छाया: ‘तथा च’)
  • गाथा 572: ‘अंण्णाइ’ छपा है; ‘अंगाइं’ होना चाहिए (छाया: ‘कोमलांगानि’)
  • गाथा 574: ‘उण्हं च गणंति’ छपा है; ‘उण्हं ण गणंति’ होना चाहिए (छाया: ‘उष्णं न गणयन्ति’); ‘गलियपासेसा’ छपा है; ‘गलियपसेया’ होना चाहिए (छाया: ‘गलित प्रस्वेदाः’)
  • गाथा 576: ‘उत्तमम’ छपा है; ‘उत्तम’ होना चाहिए (छाया: ‘उत्तम’); ‘जुत्तण’ छपा है; ‘जुत्तेण’ होना चाहिए (छाया: ‘युक्तेन’)
  • गाथा 577: ‘उवसानिऊण’ छपा है; ‘उवसामिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘उपशम्य’)
  • गाथा 578: ‘छहृणायगयं’ छपा है; ‘छब्भायगयं’ होना चाहिए (छाया: ‘षड्भागगतं’)
  • गाथा 581: ‘को थि’ छपा है; ‘को वि’ होना चाहिए (छाया: ‘कमपि’)
  • गाथा 582: ‘णठ्टे त्ते’ छपा है; ‘णट्ठं तं’ होना चाहिए (छाया: ‘नष्टं तत्’)
  • गाथा 583: ‘मुल्लह’ छपा है; ‘भुल्लइ’ होना चाहिए (छाया: ‘विस्मरति’)। ‘भूसेहि’ छपा है; ‘मूसेहि’ होना चाहिए (छाया: ‘मूषकैः’)
  • गाथा 585: ‘चहुविहं’ छपा है; ‘चउविहं’ होना चाहिए (छाया: ‘चतुर्विधं’); ‘लिप्पेद्’ छपा है; ‘लिप्पेइ’ होना चाहिए (छाया: ‘लिप्येत’)
  • गाथा 587: ‘हिव्वे’ छपा है; ‘दिव्वे’ होना चाहिए (छाया: ‘दिव्यान्’)
  • गाथा 589: ‘वेत्थे’ छपा है; ‘वत्थे’ होना चाहिए (छाया: ‘वस्त्राणि’)
  • गाथा 590: ‘आहारणंगा’ छपा है; ‘आहरणंगा’ होना चाहिए (छाया: ‘आभरणांगा’); ‘कणममणि’ छपा है; ‘कणयमणि’ होना चाहिए (छाया: ‘कनकमणि’)
  • गाथा 591: ‘दयणिदिणं’ छपा है; ‘रयणिदिणं’ होना चाहिए (छाया: ‘रजमी दिनयोः’ अर्थात् रजनी-दिनयोः)
  • गाथा 595: ‘कहिऊण’ छपा है; ‘गहिऊण’ होना चाहिए (छाया: ‘गृहीत्वा’)
  • गाथा 599: ‘छमयं’ छपा है; ‘छट्ठमयं’ होना चाहिए (छाया: ‘षष्ठमकम्’)

प्रमत्त संयत से अयोग केवली गुणस्थान, अन्तिम मंगल, भावसंग्रह पढ़ने का फल, प्रशस्ति (गाथा 600 से 701)

इत्थेव तिण्णि भावा खय उव समाइ होंति गुणठाणे ।
पणदह हुंति पमाया पमत्त विरओ हवे तम्हा ॥600॥

वत्ताबत्त पमाए जो णिवसइ पमत्तसंजदो होइ ।
सयल गुण सील कलिओ महव्वई चित्तलायरणो ॥601॥

विकहा तहय कसाया इंदियणिद्दा तहय पणओ य ।
चउ चउ पण मेगेगे हुंति पमाया हु पण्णरसा ॥602॥

झायइ धम्मज्झाणं अट्टं पि य णो कसाय उदयाओ ।
सज्झाय भावणाए उवसामइ पुणु वि झाणम्मि ॥603॥

तज्झाण जाय कम्मं खवेइ आवासएहिं परिपुण्णो ।
णिंदण गरहण जुत्तो पडिक्कमण किरियाहिं ॥604॥

जाव पमाए वट्टइ जावथिरं थाइ णिच्चल झाणं ।
णिदण गहण जुत्तो आवसइ कुणइ ता भिक्खू ॥605॥

छट्ठ मए गुणठाणे वदृंतो परिहरेइ छावासं ।
जो साहु सोण मुणई परमायम सार संदोहं ॥606॥

अहव मुणंतो छंडइ सव्वावासाइं सुत्तबद्धाइं ।
तो तेण होइ चत्तो सुआयमो जिणवादस्स ॥607॥

आयमचाए चत्तो परमप्पा होइ तेण पुरिसेण ।
परमप्पय चायेण य मिच्छत्तं पोसियं होइ ॥608॥

एवं णाऊण सया जावण पावेहि णिच्चलं झाणं ।
मण संकप्प विमुक्कं तावासय कुणह वयसहियं ॥609॥

आवासयाइ कम्मं विज्जावच्चं च दाण पूजाइं ।
जं कुणइ समदिट्ठी तं सव्वं णिज्जर णिमित्तं ॥610॥

जस्सण णहगामित्तं पायविलेवो ण ओसही लेवो ।
सो नावाइ समुद्दं तरेइ किमिच्छ भणिएण ॥611॥

जा संकप्पो चित्ते सुहासुहो भोयणाइ किरियाओ ।
ताकुणउसोविकिरियं पडीकमणाईय णिस्सेसं ॥612॥

एसो पमत्त विरओ साहु मए कहिउ समासेण ।
एत्तो उड्ढं बोच्छं अप्पमत्तो णिसामेह ॥613॥

णठ्ठासेसपमाओं वय गुणसीलेहिं मंडिओ णाणी ।
अणुव समुओ अखवओ झाणणिलीणोहु अप्पमत्तो सो ॥614॥

पुवुत्ता जे भावा हवंति णिण्णेव तत्थ नायव्वा ।
मुक्खं धम्मज्झाणं हवेइ णियमेण इत्थेव ॥615॥

झायारो पुण झाणं झेयं तहवफलं च तस्सेव ।
ए ए चउ अहियारा णायव्वा होंति णियमेण ॥616॥

आहारासणणिद्दा विजओ तह इंदियाण पंचण्हं ।
बावीस परि सहाणं कोहाईणं कसायाणं ॥617॥

णिस्संगो णिम्मोहो णिग्गय बावार करण सुतड्ढो ।
दिढकाओ थिरचित्तो एरिसओ होइ झायारो ॥618॥

चित्तणिरोहे झाणं चहुवियभेयं च तं मुणेयव्वं ।
पिडत्थं च पयत्थं रुवत्थं रुववज्जियं चेव ॥619॥

पिंडो वुच्चइ देहो तस्स मज्झठ्ठिओ हु णियअप्पा ।
झाइज्जइ अइसुद्धो विप्फुरिओ सेय किरणठ्ठो ॥620॥

देहत्थो झाइज्जइ देहस्संबंध विरहिओ णिच्चं ।
णिम्मल तेय फुरंतो गयणतले सूर विंवेव ॥621॥

जीवप्पदेसपचयं पुरिसायारं हि णिययदेहत्थं ।
अमलगुणं झायंतं झाणं पिंडत्थ अभिहाणं ॥622॥

यारिसओ देहत्थो झाइज्जइ देह बाहिरे तह य ।
अप्पा सुद्ध सहावो तं रुवत्थं फुडं झाणं ॥623॥

रूवत्थं पुण दुविहं सगयं तह परगयं च णायव्वं ।
तं परगयं भणिज्जइ झाइज्जइ जत्थ पंच परमेठ्ठी ॥624॥

सगयं तं रूवत्थं झाइज्जइ जत्थ अप्पणो अप्पा ।
णियदेहस्स बहित्थो फुरंत रवितेय संकासो ॥625॥

देवच्चणा बिहाणं जं कहियं तं देसविरयठाणम्मि ।
होइ पयत्थं झाणं कहियं तं बरजिणंदेहिं ॥626॥

एक पय मक्खरं वा जवियइ जं पंचगुरुवसंबंध ।
तं पिय होइ पयत्थ झाणं कम्माण णिद्दहणं ॥627॥

णीय चिंतइ देहत्थं देह वहित्थं ण चिंतए किं पि ।
ण सगय परगयरूवं तं गयरूवं णिरालेवं ॥628॥

जत्थ ण करणं चिंता अक्खर रूवं ण धारणा धेयं ।
ण य वावारो कोई चित्तस्सय तं णिरालेबं ॥629॥

इंदिय विसय वियारा जत्थ खयं जंति राय दोसं च ।
मण धावारा सव्वे तं गयारूवं मुणेयव्वं ॥630॥

धेयं तिविह पयारं अक्खररूवं तह अरूवंच ।
रुवं परमेट्ठिगयं अक्खरयं तेसि मुच्चारं ॥631॥

गयरुवं जंझेयं जिणेहिं भणियं पि तं णिरालंबं ।
सुण्णं पि तं ण सुण्णं जम्हा रयणत्तयाइण्णं ॥632॥

झाणस्स फलं तिविहं कहंति वर जोइणो विगयमोहा ।
इह भव पर लोय भवं सव्वं कम्मक्खए तइयं ॥633॥

झाणस्स य सत्तीए जायंति अइसयाणि विविहाणी ।
दूरालोयण पहुई झाणे आएस करणं च ॥634॥

मइसुइ ओहीणाणं मणपज्जय केवलं तहा णाणं ।
रिद्धीओ सव्वाओ जइपूजा इह फलं झाणे ॥635॥

सक्काई इंदत्तं अहमिंदत्तं च सग्गलोयम्मि ।
लोयंति य देवत्तं तं परभवगयफलं झाणे ॥636॥

तणुपंचस्सय णामो सिद्धसरुवस्स चेव उप्पत्ती ।
तिहुयण पहुत्त लाहो लाहो य अणंत विरियस्स ॥637॥

अठ्ठगुणाणं लद्धी लोयं सिहरग्गखेतसंवासो ।
तइय फलं कहिय मिणं जिणवरचंदेहि झाणस्स ॥638॥

एवं धम्मज्झाणं कहियं अपमत्त गुण समासेण ।
सालंब मणालंब तं मुक्खं इत्थं णायव्वं ॥639॥

एदम्हि गुणट्ठाणो अत्थि आवासयाण परिहारो ।
झाण मणम्मि थिरत्तं णिरंतरं अत्थितं जम्हा ॥640॥

सत्तमयं गुणठाणं कहियं अपमत्त णाम संजुत्तं ।
एत्तो अप्पुव्वणामं वुच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥641॥

बं दुब्भेय पऊत्तं खवयं उवसामियं च णायव्वं ।
खवए खवओ भावो उवसमए होइ उवसमओ ॥642॥

खवएसु उबसमेसु य अपुव्वणामेसु हवइ तिपयारं ।
सुक्कज्झाणं णियमा पुहुत्त सवियक्क सवियारं ॥643॥

पज्जायं च गुणं वा जम्हा दव्वाण मुणइ भेएण ।
तह्मा पुहुत्तणामं भणियं झाणं मुणिदेहिं ॥644॥

भणियं सुयं वियक्कं वट्टइ सह तेण तंखु अणवरयं ।
तम्हा तस्स वियक्कं सवियारं पुण भणिस्सामो ॥645॥

जोएहिं तीहिं वियरइ अक्खर अत्थेसु तेण सवियारं ।
पढमं सुक्कज्झाण अतिक्ख परसोवमं भणियं ॥646॥

जह चिरकालो लग्गइ अतिक्ख परसेण रुकव विच्छेए ।
तह कम्माण य हण्णे चिरकालो पढम सुक्कम्मि ॥647॥

खइएण उवसमेण य कम्माणं जं अउव्व परिणाओ ।
तम्हा तं गुणठाणं अपुव्वणामं तु तं भणियं ॥648॥

जह तं अपुव्वणामं अणियट्टी तह य होई णायव्वं ।
उवसम खाइय भावं हवेइ फुडु तम्हि ठाणम्मि ॥649॥

सुक्कं तत्थ पउत्तं जिणेहिं पुव्वुत्त लक्खणं झाणं ।
णत्थि णियत्ती पुनरवि जम्हा अणियट्टि तं तम्हा ॥650॥

हुंति अणियट्टिणो ते पडिसमयं जस्स एक परिणामं ।
बिमलयर झाण हुअवह सिहाहिं णिद्दड्ढ कम्म वण ॥651॥

जह अणियट्टि पउत्तं खाइय उवसमिय सेढि संजुत्तं ।
तह सुहमसंपराये दुब्भेयं होइ जिण कहियं ॥652॥

तत्थेव हि दो भावा झाणं पुणु तिविह भेय तं सुक्कं ।
लोह कसाए सेसे समलत्तं होइ चित्तस्स ॥653॥

जह कोसुं भय वत्थं होइ सया सुहुमराग स जुत्तं ।
एवं सुहम कसाओ सुहम सरावोत्ति णिद्दिठ्ठो ॥654॥

जो उवसमइ कसाए मोहासंबंधि पयडिवूहं च ।
उवसामओत्ति भणिओ खवओ णाम ण सो लहइ ॥655॥

सुक्कज्झाणं पढमं भावो पुण तत्थ उवसमो भणिओ ।
मोहोदयाउ कोई पडिऊण य जाइ मिच्छत्तं ॥656॥

कोई पमायरहियं ठाणं आसिज्ज पुणवि आरुहइ।
चरम सरीरो जीवो खवयसेढीं च रय हरणे ॥657॥

कालं काउं कोई तत्थय उवसामगे मुणट्ठाणे ।
सुक्कज्झाणं झाइय उववज्जइ सव्वसिद्धोए ॥658॥

हेट्ठट्ठिओ हु चेट्ठइ पंको सर पाणियम्मि जह सरइ ।
तह मोहो तम्मि गुणे हेउं लहि ऊण उल्ललई ॥659॥

जो खवयसेढि रूढो ण होइ उवसामिओत्ति सो जीवो ।
मोहक्खयंकुणंतो उत्तो खवओ जिणिंदेहि ॥660॥

णिस्सेसमोह खीणे खीण कसायं तु णाम गुणठाणं ।
पावइ जीवो णूणं खाइयभावेण संजुत्तो ॥661॥

जह सुद्ध फलिय भायणि खितं णीरं खु णिम्मलं सुद्धं ।
तह णिम्मल परिणामो खीण कसाओ मुणेयव्वो ॥662॥

सुक्कज्झाणं वीयं भणियं सवियक्क एक्क अवियारं ।
माणिक्क सिहाचवलम् अत्थि तहिं णत्थि संदेहो ॥663॥

होऊण खीण मोहो हणिऊण य मोह विडविवित्थारं ।
घाइत्तयं च छाइय द्विचवभ समएसु झाणेण ॥664॥

घाइचउक्कविणासे उप्पज्ज सयल बिमल केवलयं ।
लोया लोय पयासं णाणं णिरुपद्दवं णिच्चं ॥665॥

आवरणाण विणासे दंसण णाणाणि अंतरहियाणि ।
पावइ मोह विणासे अणंत सुक्खं च परमप्पा ॥666॥

विग्घ विणासे पावइ अणंतरहियं च वीरियं परमं ।
उच्चइ सजोइकेवलि तइय ज्झाणेण सो तइया ॥667॥

सुद्धोखाइयभावो अवियप्पो णिच्चलो जिणिंदस्स ।
अत्थि तया तं झाणं सुहुम किरिया अपडिवाई ॥668॥

परिफंदो अइसुहमो जीव पसायेण अत्थि तवकाले ।
तेणाणू आइद्दा आसविय पुणो विविहडंति ॥669॥

जे णत्थि राय दोसो तेण ण वंधोहु अत्थि केवलिणो ।
जह सुक्क कुड्डु लग्गा वालू झडियंति तह कम्मं ॥670॥

ईहा रहिया किरिया गुण वि सव्वे वि खाइया तस्स ।
सुक्खं सहावजायं कमकरण विवज्जियं णाणं ॥671॥

णाणेणं तेण जाणइ कालत्तय वट्टिए तिहुवणत्थे ।
भावे समे य विसमे सच्चेयणा चेयणे सव्वे ॥672॥

एक्कं एक्कम्मि खणे अणंतपज्जायगुण समाइण्णं ।
जाणइ जह तह जाणइ सव्वइं दव्वाइं समयम्मि ॥673॥

जाणंतो पिच्छंतो कालत्तयवट्टियाइं दव्वाइं ।
उत्तो सो सव्वण्हू परमप्पा परम जोइहि ॥674॥

तित्थयरत्तं पत्ता जे ते पावंति समव सरणाइं ।
सक्केण कयविहूई पंचक्कल्लाण पुज्जाय ॥675॥

सम्मुग्घाई किरिया णाणं तह दंसणं च सुक्खं च ।
सव्वेसिं सामण्णं अरहंताणं च इयराणं ॥676॥

जेंसि आयु समाणं णामं गोदं च वेयणीयं च ।
ते अकय समुग्धाया सेसा य कयंति समुग्घायं ॥677॥

अंतर मुहुत्त कालो हवइ जहण्णो वि उत्तमो तेसिं ।
गयवरिसूणा कोडी पुव्वाणं हवइ णियमेण ॥678॥

पच्छा अजोइकेवलि हवइ जिणो अघाइ कम्महणमाणो ।
लहु पंचक्खर कालो हवइ फुडं तम्मि गुण ठाणे ॥679॥

परमोदालिय कायं सिढिलं होऊण गलइ तक्काले ।
थक्कइ सुद्ध सुहावो घण णिविड पएस परमप्पा ॥680॥

णट्ठा किरिय पवित्ती सुक्कज्झाणं च तत्थ णिद्दिट्ठं ।
खाइय भावो सुद्धो णिरंजणो बीयराओ य ॥681॥

झाणं सजोइ केवलि जह तह अझोइस्स णत्थि परमत्थे ।
उवयारेण पउत्तं भूयत्थणय विवक्खाए ॥682॥

झाणं तह झायारो झेयवियप्पा य होंति मणसहिए ।
तं णत्थि केवलि दुगे तम्हा झाणं ण संभवइ ॥683॥

मणसहियाणं झाणं मणो विकम्माण कायजोयाओ ।
तत्थ वियप्पो जायइ सुहासुहो कम्म उदाएण ॥684॥

असुहे असुहं झाणं सुहझाणं होइ सुहोपजोगेण ।
सुद्धे सुद्धं कहियं सासवाणासवं दुविहं ॥685॥

पढमं बीयं तइयं सासवयं होइ इय जिणो भणइ ।
विगयासवं चउत्थं झाणं कहियं सभासेण ॥686॥

णठ्ठट्ठ पयडिबंधो चणमसरीरेण होइ किंचूणो ।
उड्ढं गमणसहावो समएणिक्केण पावेइ ॥687॥

लोयग्ग सिहर खत्ते जावं तणुपवण उवरिय भायं ।
गच्छइ ताम अथक्को धम्मत्थित्तेण आयासो ॥688॥

तत्तोपरंण गच्छइ अच्छइ कालं तु अन्तपरिहीणं ।
जम्हा अलोय खित्ते धम्मद्दव्वं णं तं अत्थि ॥689॥

जो जत्थ कम्ममुक्को जल थल अयास पव्वए णयरे ।
सो रिजुगई पवण्णो माणुस क्षेत्ताउ उप्पधइ ॥690॥

पणयालसहसहस्सा माणुस खेत्तं तु होइ परिमाणं ।
सिद्धाणां आवासो तित्तिय मित्तम्मि आयासे ॥691॥

सव्वे उवरिं सरिसा बिसमाहिट्ठम्मि णिच्चलपएसा ।
अवगाहणाय जम्हा उक्कस्स जहण्णिया दिठ्ठा ॥692॥

एगोवि अणंताणं सिद्धो सिद्धाण देइ अवगासं ।
जम्हा सुहमत्तगुणो अवगाह गुणो पुणो तेसिं ॥693॥

सम्मत्तणाणदंसण बीरिय सुहमं तहेव अवगहणं ।
अगुरु लहुअब्बवाहं अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ॥694॥

जाणइ पिच्छइ सपलं लोयालोयं च एक्कहेलाए ।
सुक्खं सहाव जायं अणोवमं अंतपरिहीणं ॥695॥

रवि मेरु चंदसायरगयणाईयं तु णत्थि जह लोए ।
उवमाणं सिद्धाणं णत्थि तहा सुक्खसंघाए ॥696॥

चलणं वलणं चिंता करणीयं किं पिणत्थि सिद्धाणं ।
जम्हा अइंदियत्तं कम्माभावे समुप्पण्णं ॥697॥

णट्ठट्ठ कम्मबंधण जाइ जारामरण विप्पमुक्काणं ।
अट्ठवरिट्ठगुणाणं णमोणमो सव्व सिद्धाणं ॥698॥

जिणवर सासण मतुलं जयउ चिरं सूरि सपर उवयारी ।
पाढय सांहूवि तहा जयंतु भव्वा वि भुवणयले ॥699॥

जो पढइ सुणइ अक्खइ अण्णेसिं भाव संगहं सुत्तं ।
सहृणइ णियय कम्मं कमेण सिद्धालयं जाइ ॥700॥

सिरिविमलसेण गणहर सिस्सो णामेण देवसेणोत्ति ।
अवुह जण वोहणत्थं तेणेयं विरइयं सुत्तं ॥701॥


टिप्पणी (पाठ ग्रंथ में जैसा छपा है वैसा ही रखा है):

  • गाथा 605: ‘जावथिरं’ छपा है; ‘जाव ण थिरं’ होना चाहिए (छाया: ‘यावन्न स्थिरं’)। ‘गहण’ छपा है; ‘गरहण’ होना चाहिए (छाया: ‘गर्हण’)
  • गाथा 606: ‘वदृंतो’ छपा है; ‘वट्टंतो’ होना चाहिए (छाया: ‘वर्तमानः’)
  • गाथा 614: ‘अणुव समुओ’ छपा है; ‘अणुवसमओ’ होना चाहिए (छाया: ‘अनुपशमको’)
  • गाथा 615: ‘णिण्णेव’ छपा है; ‘तिण्णेव’ होना चाहिए (छाया: ‘त्रय एव’)
  • गाथा 619: ‘चहुवियभेयं’ छपा है; ‘चउविहभेयं’ होना चाहिए (छाया: ‘चतुर्विध भेद’)
  • गाथा 628: ‘णीय’ छपा है; ‘णय’ होना चाहिए (छाया: ‘नच’)
  • गाथा 630: ‘मण धावारा’ छपा है; ‘मण वावारा’ होना चाहिए (छाया: ‘मनो व्यापाराः’); ‘गयारूवं’ छपा है; ‘गयरूवं’ होना चाहिए (छाया: ‘तद्‌गतरूवं’)
  • गाथा 637: ‘णामो’ छपा है; ‘णासो’ होना चाहिए (छाया: ‘नाशः’)
  • गाथा 642: ‘बं’ छपा है; ‘तं’ होना चाहिए (छाया: ‘तद्द्विभेद’)
  • गाथा 647: ‘रुकव’ छपा है; ‘रुक्ख’ होना चाहिए (छाया: ‘वृक्षविच्छेदे’)
  • गाथा 648: ‘परिणाओ’ छपा है; ‘परिणामो’ होना चाहिए (छाया: ‘परिणामः’)
  • गाथा 654: ‘सरावोत्ति’ छपा है; ‘सरागोत्ति’ होना चाहिए (छाया: ‘सराग इति’)
  • गाथा 658: ‘मुणट्ठाणे’ छपा है; ‘गुणट्ठाणे’ होना चाहिए (छाया: ‘गुणस्थाने’)
  • गाथा 664: ‘छाइय द्विचवभ’ छपा है; ‘घाइय द्विचरम’ होना चाहिए (छाया: ‘घातयित्वा द्विचरम’)
  • गाथा 665: ‘उप्पज्ज’ छपा है; ‘उप्पज्जइ’ होना चाहिए (छाया: ‘उत्पद्यते’)
  • गाथा 669: ‘पसायेण’ छपा है; ‘पएसाण’ होना चाहिए (छाया: ‘जीवप्रदेशानाम्’); ‘तवकाले’ छपा है; ‘तक्काले’ होना चाहिए (छाया: ‘तत्काले’)
  • गाथा 677: ‘समुग्धाया’ छपा है; ‘समुग्घाया’ होना चाहिए (छाया: ‘समुद्घाताः’)
  • गाथा 682: ‘अझोइस्स’ छपा है; ‘अजोइस्स’ होना चाहिए (छाया: ‘अयोगिनः’)
  • गाथा 684: ‘उदाएण’ छपा है; ‘उदएण’ होना चाहिए (छाया: ‘कर्मोदयेन’)
  • गाथा 686: ‘सभासेण’ छपा है; ‘समासेण’ होना चाहिए (छाया: ‘समासेन’)
  • गाथा 687: ‘चणमसरीरेण’ छपा है; ‘चरमसरीरेण’ होना चाहिए (छाया: ‘चरम शरीरेण’)
  • गाथा 688: ‘खत्ते’ छपा है; ‘खेत्ते’ होना चाहिए (छाया: ‘क्षेत्र’)
  • गाथा 690: ‘क्षेत्ताउ उप्पधइ’ छपा है; ‘खेत्ताउ उप्पज्जइ’ होना चाहिए (छाया: ‘मनुष्य क्षेत्रतः उत्पद्यते’)
  • गाथा 695: ‘सपलं’ छपा है; ‘सयलं’ होना चाहिए (छाया: ‘सकलं’)
  • गाथा 698: ‘जारामरण’ छपा है; ‘जरामरण’ होना चाहिए (छाया: ‘जातिजरा मरण’)
  • गाथा 699: ‘सांहूवि’ छपा है; ‘साहूवि’ होना चाहिए (छाया: ‘साधु रपि’)
  • गाथा 700: ‘सहृणइ’ छपा है; ‘स हणइ’ होना चाहिए (छाया: ‘सन्ति’)

खोज: Bhav Sangrah Mul Gatha

गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z
अनुयोग सूची: अनुयोग अनुसार ग्रन्थ (अ से ज्ञ)
भावसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ (आचार्य देवसेन) | Bhav Sangrah Gatha Evam Gatharth (Acharya Devsen)
गाथा सूची - अकारादि क्रम (अ से ज्ञ) | Gatha Suchi A to Z