भावसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ (आचार्य देवसेन) | Bhav Sangrah Gatha Evam Gatharth (Acharya Devsen)

भावसंग्रह गाथा एवं गाथार्थ

आचार्य देवसेन

आचार्य देवसेन कृत भावसंग्रह की प्राकृत मूल गाथाएँ 1 से 701, हर गाथा के नीचे उसका अर्थ, ग्रंथ के विषय अनुसार भाग नीचे अलग उत्तरों में। अर्थ संलग्न ग्रंथ (पं. लालाराम शास्त्री की हिन्दी टीका) में हर गाथा के बाद छपे “अर्थ” से ज्यों का त्यों लिया है; संस्कृत छाया और भावार्थ नहीं लिए, वे नीचे की पीडीएफ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।

केवल मूल गाथाएँ (छपाई की टिप्पणियों सहित): भावसंग्रह मूल गाथा (आचार्य देवसेन) | Bhav Sangrah Mool Gatha (Acharya Devsen)

अनुक्रमणिका

क्र. भाग गाथा
1 मंगलाचरण, जीव और भावों के भेद, गुणस्थानों के नाम 1 से 11
2 मिथ्यात्व गुणस्थान: लक्षण, भेद, विपरीत मिथ्यात्व (जल शुद्धि, मांस व श्राद्ध, गोयोनि वंदना के दोष) 12 से 62
3 मिथ्यात्व गुणस्थान: एकांत, वैनयिक, संशय मिथ्यात्व; सपरिग्रह मोक्ष, स्त्री मुक्ति, कवलाहार निषेध 63 से 115
4 मिथ्यात्व गुणस्थान: जिनकल्पी स्थविरकल्पी, श्वेताम्बरों की उत्पत्ति, अज्ञान मिथ्यात्व, चार्वाक व सांख्य मत का निराकरण 116 से 194
5 सासादन व मिश्र गुणस्थान; ब्रह्मा, विष्णु, महादेव के कार्य और उनका निराकरण 195 से 258
6 अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान: सम्यग्दर्शन, परमात्मा, जीव आदि तत्त्व 259 से 349
7 विरताविरत गुणस्थान: बारह व्रत, पंचम गुणस्थान के ध्यान 350 से 398
8 विरताविरत गुणस्थान: पुण्य के भेद, फल, कारण और पूजा की विधि 399 से 488
9 विरताविरत गुणस्थान: दान, दान के भेद, विधि और फल 489 से 599
10 प्रमत्त संयत से अयोग केवली गुणस्थान, अन्तिम मंगल, भावसंग्रह पढ़ने का फल, प्रशस्ति 600 से 701

स्रोत: Bhav Sangrah Devsain.pdf

Bhav Sangrah Devsain.pdf (30504 KB)

मंगलाचरण, जीव और भावों के भेद, गुणस्थानों के नाम (गाथा 1 से 11)

पणमिय सुरसेणणुयं मुणिगणहरवंदियं महावीरं ।
वोच्छामि भावसंगह मिणमो भव्वप्पवोहट्ठं ॥1॥

गाथार्थ: जो महावीर स्वामी आचार्य श्री देवसेन के द्वारा वन्दनीय हैं तथा मुनि और गणधर देवों के द्वारा वन्दनीय हैं ऐसे श्री महावीर स्वामी को नमस्कार कर मैं (आचार्य श्रीदेवसेन) भव्यजीवोंको आत्मज्ञान प्राप्त करनेके लिये इस भाव संग्रह ग्रंथकी रचना करता हूँ ।


जीवस्स हुंति भावा जीवा पुण दुविह भेयसंजुत्ता ।
मुक्ता पुण संसारी, मुक्ता सिद्धा णिरवलेवा ॥2॥

गाथार्थ: भाव सब जीवों के ही होते है अन्य अजीवादिक पदार्थोंके भाव नहीं होते । तथा समस्त जीवों के दो भेद है : - एक मुक्त और दूसरे संसारी । जो जीव राग द्वेष मोह आदि समस्त विकारोंसे रहित हैं और समस्त कर्मोंसे रहित हैं ऐसे सिद्ध परमेष्ठी को मुक्त जीव कहते हैं ।


लोयग्गसिहरवासी केवलणाणेण मुणिय तइलोया ।
असरीरा गइरहिया सुणिच्चला सुद्धभावट्ठा ॥3॥

गाथार्थ: वे सिद्ध परमेष्ठी वा मुक्त जीव लोक शिखरपर विराजमान हैं । अपने केवलज्ञान के द्वारा तीनों लोकों को एक ही सयममे साक्षात् देखते और जानते हैं । तथा वे सिद्ध परमेष्ठी शरीर रहित हैं, चारों गतियों के परिभ्रमणसे रहित हैं, चारो गतियो में से किसी गतिमें भी नहीं है, अत्यन्त निश्चल हैं और अपने आत्मा के शुद्ध भावों में सदा लीन रहते हैं ।


जे संसारी जीवा चउगइपज्जायपरिणया णिच्चं ।
ते परिणामे गिणहदि सुहासुहे कम्मसंगहणे ॥4॥

गाथार्थ: जो जीव सदा काल चारों गतियों की पर्यायों में परिणत होते रहते हैं ऐसे जीवों को संसारी जीव कहते हैं । तथा ऐसे संसारी जीव कर्मोंका का संग्रह करने के लिए शुभ अशुभ दोनों प्रकारके कर्मों को ग्रहण करते रहते है ।


4॥

भावेण कुणइ पावं पुण्णं भावेण तहय मुक्खं वा ।
इयमंतर णाऊणं जं लेयं तं समायरहं ॥5॥

गाथार्थ: यह जीव अपने ही परिणामों से पाप उपार्जन करता है, अपने ही परिणामों से पुण्य उपार्जन करता है और अपने ही परिणामों से मोक्ष प्राप्त करता है। इस प्रकार अपने ही परिणामों में इतना भारी अन्तर समझकर हे भव्यजीव ! आत्मा के जो परिणाम आत्माका कल्याण करनेवाले हों उन्हीं परिणामों का तू आश्रय ले ।


सेवो सुद्धो भावो तस्सुवलंभोय होइ गुणठाणे ।
पणदहपमादरहिए सयलवि चारित्तजुत्तस्स ॥6॥

गाथार्थ: इन तीनों प्रकारके भावों में शुद्ध भाव ही सेव्य है, धारण करने योग्य है । तथा उस शुद्ध माव की प्राप्ति सकल चारित्र को धारण करने वाले महामुनियों के पन्द्रह प्रमादों से रहित ऐसे सातवें अप्रमत्त गुणस्थान में होती है ।


सेसा जे बे भावा सुहासुहा पुण्णपाव संजयणया ।
ते पंचभाव मिस्सा होंति गुणट्ठाणमासेज्ज ॥7॥

गाथार्थ: शुद्धभावों को छोडकर शेष जो शुभ अशुभ भाव है वे दोनों ही पुण्य पापों को उत्पन्न करनेवाले है। तथा वे दोनों ही शुभ अशुभ भाव, औदयिक आदि पांचों भावों से मिलकर गुणस्थानों के आश्रयसे रहते है ।


अउदइउ परिणामउ खय उवसमिउ तहा उवसमो खइओ ।
एए पंच पहाणा भावा जीवाण होंति जियलोए ॥8॥

गाथार्थ: औदयिक, पारिणामिक, क्षायोपशमिक, औपशमिक और क्षायिक ये पांच भाव समस्त जीवों के प्रधान वा मुख्य भाव कहलाते है।


तेचिय पज्जाय गया चउदहगुणठाण णामगा भणिया ।
लहिऊण उदय उवसम खयउवमस खउ हु कम्मण्स ॥9॥

गाथार्थ: वे शुभ अशुभ और शुद्धभाव ही कर्मों के उदय होने पर उपशम होने पर, क्षयोपशम होने पर, वा क्षय होनेपर अनेक प्रकारकी पर्यायों को प्राप्त होजाते है और उन भावों की वे पर्यायें ही चौदह गुणस्थानों के नामसे कही जाती है ।


9॥

मिच्छो सासण मिस्सो अविरियसम्मो य देसबिरदो य ।
विरओ पमत्त इयरो अपुव्व अणियत्ति सुहमो य ॥10॥

गाथार्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान १ सासादन गुणस्थान २ मिश्रगुणस्थान ३ अविरत सम्म्हग्दृष्टि गुणस्थान ४ देशविरत अथवा विरत विरत गुणस्थान ५ प्रमत्त विरत ६ इतर अर्थात् अप्रमत्त विरत ७ अपूर्व करण गुणस्थान ८ अनिवृत्तिकरण गुणस्थान । ९ सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान १० उपशान्तमोह गुणस्थान ११ क्षीणमोह गुणस्थान १२ सयोगि केवली गुणस्थान १३ अयोगि केवली गुणस्थान १४ ये अनुक्रमसे चौदह गुणस्थान कहलाते है । जो जीव समस्त कर्मों को नष्ट कर इनसे पार हो जाते है उनको सिद्ध वा मुक्त समझना चाहिये ।


उवसन्त खीणमोहो सजोइकेवलिजिणो अजोगी य ।
ए चउदस गुणठाणा कमेण सिद्धा य णायव्वा ॥11॥

गाथार्थ: मिथ्यात्व गुणस्थान १ सासादन गुणस्थान २ मिश्रगुणस्थान ३ अविरत सम्ह्ग्दृष्टि गुणस्थान ४ देशविरत अथवा विरत विरत गुणस्थान ५ प्रमत्त विरत ६ इतर अर्थात् अप्रमत्त विरत ७ अपूर्व करण गुणस्थान ८ अनिवृत्तिकरण गुणस्थान । ९ सूक्ष्म सांपराय गुणस्थान १० उपशान्तमोह गुणस्थान ११ क्षीणमोह गुणस्थान १२ सयोगि केवली गुणस्थान १३ अयोगि केवली गुणस्थान १४ ये अनुक्रमसे चौदह गुणस्थान कहलाते है । जो जीव समस्त कर्मों को नष्ट कर इनसे पार हो जाते है उनको सिद्ध वा मुक्त समझना चाहिये ।

मिथ्यात्व गुणस्थान: लक्षण, भेद, विपरीत मिथ्यात्व (जल शुद्धि, मांस व श्राद्ध, गोयोनि वंदना के दोष) (गाथा 12 से 62)

मिच्छत्तस्सुदएण य जीवे सम्भवइ उदइयो भावो ।
तेण य मिच्छादिट्ठी ठाणं पावेइ सो तइया ॥12॥

गाथार्थ: मिथ्यात्व कर्मके उदय से इस जीवके औदयिकभाव प्रगट होते है । तथा मिथ्यात्व कर्म के उदय होनेसे प्रगट हुए औदयिक भावों से इस जीवके मिथ्यादृष्टि गुणस्थान होता है ।


मिच्छत्तरस पउत्तो जीवो विवरीय दंसणो होई ।
ण मुणइ हियंच अहियं पित्तज्जुरजुओ जहा पुरिसो ॥13॥

गाथार्थ: उस मिथ्यात्व कर्म के उदय होने से यह जीव विपरीत दृष्टी हो जाता है और पित्तज्वर वाले पुरुष के समान अपने हित अहित को नहीं जान सकता ।


कडुवं मण्णइ महुरं महुरं पि य तं भणेइ अइ कडुयं ।
तह मिच्छत्तपउत्तो उत्तमधम्मं ण रोचेई ॥14॥

गाथार्थ: जिस प्रकार पित्तज्वर वाला पुरुष कडवे पदार्थ को मीठा कहता है और मीठे पदार्थ को कडवा कहता है, इसी प्रकार मिथ्यात्व में प्रवृत्त हुआ यह जीव उत्तम धर्म में रुचि नहीं कर सकता ।


जइ कणय मज्ज कोद्दव महुरामोहेण मोहियो संतो ।
ण मुणय कज्जाकज्ज मिच्छादिट्ठी तहा जीवो ॥15॥

गाथार्थ: जिस प्रकार धतूरा मद्य और कोदों की मधुरता के मोह से मोहित हुआ यह जीव कार्य अकार्य को नहीं जानता, अपना हित नहीं पहचानता उसी प्रकार मिथ्यादृष्टी जीव भी मिथ्यात्व कर्म के उदय से अपना हित अहित वा कार्य अकार्य नहीं जान सकता। विपरीत श्रद्धान होने के कारण वह अपने आत्मा का स्वरूप अथवा समस्त तत्त्वों का स्वरूप विपरीत ही समझता है और इसीलिये वह अपने आत्मा का अहित ही करता रहता है।


तं पि हु पंचपयारं बियरो एयंतविणयसंजुत्तं ।
संसय अण्णाणगयं विवरीओ होइ पुण बंभो ॥16॥

गाथार्थ: वह मिथ्यात्व पांच प्रकार है - विपरीत मिथ्यात्व, एकान्त मिथ्यात्व, विनय मिथ्यात्व, संशय मिथ्यात्व, अज्ञानगत वा अज्ञान मिथ्यात्व । इन पांचो प्रयार के मिथ्यात्वों में से ब्राह्म मत विपरीत मिथ्यात्व है ।


16॥

मण्णइ जलेण सुद्धि तित्ति मंसेण पिसरवग्गस्स ।
पसुकयवहेण सग्गं धम्मं गोजोणिफासेण ॥17॥

गाथार्थ: जो लोग जल स्नान से आत्माकी शुद्धि मानते हैं, मांस भक्षण से पितृवर्ग की तृप्ति मानते है, पशुओं का वध करने वा पशुओं का होम करने से स्वर्ग की प्राप्ति मानते हैं और गाय की योनि का स्पर्श करने से धर्म की प्राप्ति मानते हैं, इन सब में धर्म की विपरीतता किस प्रकार है वह सब आगे दिखलावेंगे ।


जइ जलण्हाणपउत्ता जीवा मुच्चेइ णिययपावेण ।
तो तत्थ वसिय जलयरा सव्वे पावंति दिवलोयं ॥18॥

गाथार्थ: यदि जल स्नान करने से ही वे जीव अपने पापोंसे छूट जाते हों तो जल में ही निवास करने वाले समस्त जलचर जीवों को स्वर्ग की प्राप्ति अवश्य हो जानी चाहिये ।


जं कम्मं दिढवद्धं जीव पएसेहि तिविहजोएण ।
तं जलफासणिमित्ते कह फहहि तिथण्हाणेण ॥19॥

गाथार्थ: जो कर्म मन वचन काय के योग से जीव के प्रदेशों के साथ दृढतासे बंधे हुए है वे कर्म तीर्थ-स्नान करने मात्र से केवल जल का स्पर्श करने से कैसे छूट सकते हैं ?


मलिणो देहो णिच्चं देही पुण णिम्मलो सया रूवी ।
को इह जलेण सुज्झइ तम्हा ण्हाणेण णहि सुद्धी ॥20॥

गाथार्थ: यह शरीर मल मूत्र से भरा हुआ है, रजोवीर्य से उत्पन्न हुआ है और रुधिर मांस आदि घृणित वस्तुमय है । इसलिये वह सदा मलिन ही रहता है । तथा इस शरीर में रहने वाला आत्मा सदा निर्मल रहता है और वह सदा अरूपी ही रहता है । ऐसी अवस्था में विचार करना चाहिये कि इस तीर्थ जल से किसकी शुद्धि होती है । आत्मा अरूपी है, इसलिये उसकी शुद्धि तो हो नहीं सकती तथा रुधिर मांस मय यह सरीर सदा अशुद्ध ही रहता है इसलिये वह भी शुद्धि नहीं हो सकता । इस प्रकार जल से आत्मा की शुद्धि कभी नहीं हो सकती ।


सुज्झइ जीवो तवसा इंदियखल णिग्गहेण परमेण ।
रयणतयसंजुत्तो जह कणयं अग्गिजोएण ॥21॥

गाथार्थ: जिस प्रकार अग्नि के संयोग से सोना शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार यह रत्नत्रय से सुशोभित होने वाला आत्मा तपश्चरण से तथा इन दृष्ट इंद्रियों का परम निग्रह करने से ही शुद्ध होता है ।


ण्हाणाओ चिय सुद्धिं जीवा इच्छंति जडत्तेण ।
भमिहिंति ते वराया चउरासी जोणि लक्खाइ ॥22॥

गाथार्थ: जो जीव अपनी जड बुद्धिके कारण स्नान करनेमात्र से ही आत्मा की शुद्धि मानते है वे तुच्छ पुरुष चौरासीलाख योनियों में परिभ्रमण करते रहते है ।


जे तियरमणासत्ता विसयपमत्ता कसायरसविसिया ।
एहंता वि ते ण शुद्धा गिहवावारेसु वंट्टता ॥23॥

गाथार्थ: जो जीव स्त्रियों के भोगो में सदा आसक्त रहते है, विषय भोगों मे लगे रहते है और जो क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कषायों के वशीभूत रहते है ऐसे घर के व्यायार में लगे रहनेवाले पुरुष स्नान करने मात्रसे कभी शुद्ध नही हो सकते ।


सवस्सेण ण लित्ता मायापउरा य जायणसीला ।
किं कुणइ तेसु ण्हाणां अब्भंतर गहिय पावाणाम् ॥24॥

गाथार्थ: जिनको समस्त पदार्थों का दान दे दिया जाय तो भी जो कभीं तृप्त न हो, जो सदा काल अनेक प्रकार कीं मायाचारी करते रहते हो, जो सदा याचना करते रहते हो और जिन्होंने अपने आत्मामे अनेक पापों का संग्रह कर रक्खा हो ऐसे जीवों की शुद्धि के लिये भला स्नान क्या कर सकता है अर्थात् कुछ भी नहीं ।


वयणियमसीलजुत्ता णिहय कसाया दयावहाजइणो
ण्हाणरहिया वि पुरिसा बभंचारी सया सुद्धा ॥25॥

गाथार्थ: जो मुनि पंच महा व्रत धारण करते हैं समिती गुप्ति आदि के समस्त नियम पालन करते हैं पूर्ण शीलव्रतों का पालन करते हैं, जिन्होंनें अपनें समस्त कषाय नष्ट कर दिये हैं जो सदा काल समस्त जीवों की दया पालन करनें मे तत्पर रहते हैं और पूर्ण रीति से बिना किसी प्रकार का दोष लगाये पूर्ण ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं ऐसे पुरुष बिना स्नान किये ही सदा शुद्ध रहते हैं ।


मंसेण पियरबगो पीणिज्जइ एरिसो सुई जेंसि ।
लेहि मसेसं गोत्रं हणिऊण य भक्खियं णियमा ॥26॥

गाथार्थ: जिन ब्राह्मणों के वेद और स्मृतियों में मांस भक्षण करने से पितर लोग तृप्त होते हैं ऐसा लिखा है तथा जो लोग
उन वेद और स्मृतियों को मानते हैं और उसके अनुसार चलते हैं । उनको समझना चाहिये कि वे लोग नियमसे अपने ही घरके बा गोत्रके समस्त जीवों को मारकर खा जाते हैं ।


जे कयकम्मपउत्ता सुयण हिंडंती चउगई घोरे ।
संसारे गिण्हंता संबंधा सयल जीयेंहि ॥27॥

गाथार्थ: जो अपने माता पिता भाई-वन्धु आदि मरकर अपने कर्मोंके उदय के अनुसार चारों गतियों में परिभ्रमण करते फिरते हैं और इस प्रकार इस संसार मे परिभ्रमण करते हुए समस्त जीवों के साथ यथा योग्य संबंध ग्रहण करते रहते हैं । उनमेसे वे माता-पिता के जीव तिर्यञ्च गति में भी उत्पन्न होते हैं, हिरण, बकरा, मत्स्य आदि योनि में भी उत्पन्न होते हैं तथा पूर्व जन्म की उन्हीकी संतान श्राद्धपक्षमें उन्ही माता-पिताओं के जीव को इस संसारसे पार करनेके लिए श्राद्ध करते हैं और उस श्रद्धा मे उन्ही के जीवोंको जो मरकर बकरा, मत्स्य, हिरण आदि की योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं मारकर खिलाते हैं और स्वय खाते है । इस प्रकार श्राद्ध करनेवाले वे लोग अपने माता-पिताओं को स्वर्ग मे पहुँचाने के लिये वा तारनेंके लिये श्राद्ध करते हैं उस श्राद्धमे वे लोग उन्ही माता-पिताओं के जीवों को मारकर उसका मांस उन्ही के नामसे खाते हैं वह कितने आश्चर्य की बात है ?


तिरियगई उवण्णा संपत्ता मच्छयाई जे जम्मं ।
हरिऊण अवरपक्खे तेसि मसेंहिं विविहेंहिं ॥28॥

गाथार्थ: जो अपने माता पिता भाई-बन्धु आदि मरकर अपने कर्मोंके उदय के अनुसार चारों गतियों में परिभ्रमण करते फिरते हैं और इस प्रकार इस संसार मे परिभ्रमण करते हुए समस्त जीवों के साथ यथा योग्य संबंध ग्रहण करते रहते हैं । उनमेसे वे माता-पिता के जीव तिर्यञ्च गति में भी उत्पन्न होते हैं, हिरण, बकरा, मत्स्य आदि योनि में भी उत्पन्न होते हैं तथा पूर्व जन्म की उन्हीकी संतान श्राद्धपक्षमें उन्ही माता-पिताओं के जीव को इस संसारसे पार करनेके लिए श्राद्ध करते हैं और उस श्रद्धा मे उन्ही के जीवोंको जो मरकर बकरा, मत्स्य, हिरण आदि की योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं मारकर खिलाते हैं और स्वय खाते है । इस प्रकार श्राद्ध करनेवाले वे लोग अपने माता-पिताओं को स्वर्ग मे पहुँचाने के लिये वा तारनेंके लिये श्राद्ध करते हैं उस श्राद्धमे वे लोग उन्ही माता-पिताओं के जीवों को मारकर उसका मांस उन्ही के नामसे खाते हैं वह कितने आश्चर्य की बात है ?


कुणइ सराहं कोई पियरे संसारतारणत्थेण ।
सो तेसि मंसाणि य तेसिं णामेण खावेइ ॥29॥

गाथार्थ: जो अपने माता पिता भाई-वन्धु आदि मरकर अपने कर्मोंके उदय के अनुसार चारों गतियों में परिभ्रमण करते फिरते हैं और इस प्रकार इस संसार मे परिभ्रमण करते हुए समस्त जीवों के साथ यथा योग्य संबंध ग्रहण करते रहते हैं। उनमेसे वे माता-पिता के जीव तिर्यञ्च गति में भी उत्पन्न होते हैं, हिरण, बकरा, मत्स्य आदि योनि में भी उत्पन्न होते हैं तथा पूर्व जन्म की उन्हीकी संतान श्राद्धपक्षमें उन्ही माता-पिताओं के जीव को इस संसारसे पार करनेके लिए श्राद्ध करते हैं और उस श्रद्धा मे उन्ही के जीवोंको जो मरकर बकरा, मत्स्य, हिरण आदि की योनियोंमें उत्पन्न हुए हैं मारकर खिलाते हैं और स्वय खाते है। इस प्रकार श्राद्ध करनेवाले वे लोग अपने माता-पिताओं को स्वर्ग मे पहुँचाने के लिये वा तारनेंके लिये श्राद्ध करते हैं उस श्राद्धमे वे लोग उन्ही माता-पिताओं के जीवों को मारकर उसका मांस उन्ही के नामसे खाते हैं वह कितने आश्चर्य की बात है ?


बंकेण जह सताओ हरिणो हणिऊण तण्णिमित्तेण ।
पइ ऊण सोत्तियाणं दिण्णो खद्धोसयं चैव ॥30॥

गाथार्थ: जिस प्रकार एक बकनें अपने पिता के श्राद्ध मे अपनें ही पिता के जीव हरिण को मारकर श्रोत्रियों को खिलाया था और स्वयं भी खाया था ।


मांसासिणो ण पत्तं मंसं ण हु होइ उत्तमं दाणं ।
कह सो तिप्पइ पियरो परमुहगसियाइं भुंजंतो ॥31॥

गाथार्थ: पहली बात तो यह है कि मांस खाने वाले पुरुष कभी भी दान देने के पात्र नही माने जा सकते । दूसरी बात यह है कि मांस का दान देना कभी भी दान नहीं कहला सकता । फिर भला उसको उत्तम दान तो कह ही कैसे सकते है ? तीसरी बात यह है कि दूसरे के मुखमें ग्रास देकर भोजन कराने से पितरों की तृप्ति कैसे हो सकती है ? अर्थात् कभी नही हो सकती ।


अण्णम्मि भुंजमाणे अण्णो जइ धाइएत्थ पच्चक्खं ।
तो सग्गम्मि वसंता पिवरा तिंत्ति खु पावति ॥32॥

गाथार्थ: इस लोकमें यदि किसी एक को भोजन कराने से दूसरा मनुष्य तृप्त हो जाता हो, तब ही स्वर्ग में रहने वाले पितर लोग भी तृप्त हो सकते है ।


जइ दुत्तदिण्णदाणे पियरा तिप्पंति चउगइ गया वि ।
तो जप्णहोमण्हाणं जव तव वेयाइं अकियत्था ॥33॥

गाथार्थ: जो पितर लोग मरकर अपने २ कर्मके अनुसार चारों गतियों में से किसी एक गति में प्राप्त हो चुके है वे यदि पुत्रके द्वारा दिये हुए दानसे ही तृप्त हो जायं तो फिर यज्ञ, होम, स्नान जप-तप वेद आदि सब व्यर्थ हो जाते है ।


कयपावो णरय गओ णिज्जय पुत्तेण पियरु सग्गम्मि ।
पिंडं दाऊण फुडं ण्हाइ य तिथ्थाइं भणिऊण ॥34॥

गाथार्थ: जो माता पिता अपने अनेक पाप करने के कारण नरक योनि में उत्पन्न हुए थे वे माता पिता के जीव यदि पुत्र के द्वारा पिण्डदान देने से वा तीर्थस्नान करने से स्वर्गमें जा सकते है तो फिर जो माता पिता पुण्य कर्म करने के कारण स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे वे माता पिताके जीव यदि उसके पुत्रके द्वारा कोई ब्रह्महत्या आदि महा पाप किये जाते है तो उस पुत्रके उस दोष से उस पापसे वे स्वर्गमें उत्पन्न हुए माता पिताके जीव नरक में भी जा सकते है ।


जइ एवं तो पियरो सग्गं पत्तो वि जाइ णरयम्भि ।
पुत्तेण कए दोसे बंभं हच्चाइगरुएण ॥35॥

गाथार्थ: जो माता पिता अपने अनेक पाप करने के कारण नरक योनि में उत्पन्न हुए थे वे माता पिता के जीव यदि पुत्र के द्वारा पिण्डदान देने से वा तीर्थस्नान करने से स्वर्गमें जा सकते है तो फिर जो माता पिता पुण्य कर्म करने के कारण स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे वे माता पिताके जीव यदि उसके पुत्रके द्वारा कोई ब्रह्महत्या आदि महा पाप किये जाते है तो उस पुत्रके उस दोष से उस पापसे वे स्वर्गमें उत्पन्न हुए माता पिताके जीव नरक में भी जा सकते है ।


अण्णकए गुण दोसे अण्णो जइ जाइ सग्ग णरयम्मि ।
जो कणइ पुण्ण पावं तस्सफलं सो ण वेएइ ॥36॥

गाथार्थ: यदि किसी एक पुरुषके गुण वा दोष से कोई दूसरा जीव स्वर्ग नरक जाता है तो फिर कहना चाहिये कि जो पुरुष स्वयं पुण्य वा पाप करता है उसका फल उसको नहीं मिल सकता। वह भी किसी दूसरे को मिल सकता है ।


णहु वेयइ तस्य फलं कत्ता पुरेसो हु पुण्ण पावस्स ।
जइ तो कह ते सिद्धा भूयग्गामा हु चत्तारि ॥37॥

गाथार्थ: जो पुरुष पुण्य करता है वा पाप करता है यदि उसका फल उसको नहीं मिलता तो फिर मनुष्य तिर्यञ्च देव नारकी इन चार प्रकार के जीवों की सिद्धि कैसे हो सकगी ?


जो कुणइ पुण्णपावं सो चिय भुंजेइणत्थि संदेहो ।
सग्गं वा णरयं वा अप्पाणो णेइ अप्पाणं ॥38॥

गाथार्थ: जो जीव जैसा पुण्य वा पाप करता है उसका फल वही भोगता है इसमे किसी प्रकार का संदेह नही है । इस प्रकार यह आत्मा अपने आत्माके द्वारा अपने ही आत्मा को स्वर्ग वा नरक मे ले जाता है ।


एवं भणंति केई जल थल गिरीसिहर अग्गिकुहरेसु ।
चहुविह भूयग्गामे वसइ हरी णत्थि संदेहो ॥39॥

गाथार्थ: कोई कोई मतवाले ऐसा कहते हैं कि जलमे स्थलमे पर्वतों के शिखरपर अग्नि मे गुफा वा छिद्रों में तथा सव प्रकार के जीवों में भगवान् हरि रहते हैं इसमें किसी प्रकार का संदेह नही है । लिखा भी है :-


सव्वगओ जइ विण्हू णिवसइ देहम्मि सव्व देहिणं ।
तो रुक्खाइहण्ण सो णिहओ होइ णियमेण ॥40॥

गाथार्थ: यदि विष्णु समस्त संसार मे व्याप्त है तो विष्णु समस्त संसारी जीवों में भी रहता हैं, और यदि वह विष्णु समस्त संसारी जीवों मे रहता है तो फिर किसी वृक्ष को काटनेंसे वह विष्णु भी काटा गया ऐसा समझना चाहिये । लिखा भी है ।


किडिकुम्म मच्छरूवं पडिमं काऊण विंणहु भणिऊण ।
अच्चेयणम्मि पुज्जइ गंधक्खयधूवदिवेंहि ॥41॥

गाथार्थ: सूअर कच्छप मत्स्य इन सबकी प्रतिमा बनाकर और विष्णु मानकर गंध, अक्षय, दीप, धूप आदी से उस अचेतन प्रतिमा कीं पूजा करते हैं । फिर भला मत्स्य, कच्छप, सूअर आदि चैंतन्य जीवोंमें प्रत्यक्ष विष्णु विद्यमान है फिर भी उन मत्स्यादिक को और उनमें रहनेवाले भगवान् विष्णु को मारकर वे पापी अपने पितरों को खाने के लिये देते हैं । यह कैसी विपरित और आश्चर्य की बात है ।


41॥

जो पुण चेयणवंतो विण्हू पच्चक्ख मच्छ किडिरुवो ।
सो हणिऊण य खद्धो दिण्णो पियण्णा पावेंहि ॥42॥

गाथार्थ: सूअर कच्छप मत्स्य इन सबकी प्रतिमा बनाकर और विष्णु मानकर गंध, अक्षय, दीप, धूप आदी से उस अचेतन प्रतिमा कीं पूजा करते हैं । फिर भला मत्स्य, कच्छप, सुअर आदि चैंतन्य जीवोंमें प्रत्यक्ष विष्णु विद्यमान है फिर भी उन मत्स्यादिक को और उनमें रहनेवाले भगवान् विष्णु को मारकर वे पापी अपने पितरों को खाने के लिये देते हैं । यह कैसी विपरित और आश्चर्य की बात है ।


जइ देवो हणिऊणं मंसं गणिऊण गम्मए सग्गं ।
तो णरयं गंतव्वं अवरेणिह केण पावेण ॥43॥

गाथार्थ: यदि अपने देवको ही मारकर और उसका मांस खाकर यह जीव स्वर्ग में जाता है तो फिर अन्य ऐसे कौन से पाप हैं जिनसे यह जीव नरक जायगा ।


हृणिऊण पोढछेलं गम्मइ सग्गस्स एस वेयत्थो ।
तो सूणारा सव्वे सग्गं णियमेण गच्छंति ॥44॥

गाथार्थ: यदि वेदका अर्थ यही है कि मोटाताजी बकरा मारकर खा जाने से यह जीव स्वर्ग में चला जाता है तो फिर संसार में जितने पाप कर्म करने वाले है वे अवश्य ही स्वर्ग में चले जायेंगे ।


सव्वगओ जइ विण्हू छागसरीरम्मि किं ण सो अत्थि ।
जं णिताणो वहियो चडप्फडंतो निरूस्सासो ॥45॥

गाथार्थ: यदि विष्णु सर्व व्यापक है तो क्या वह उस मोटे ताजे बकरे के शरीर में नहीं है ? अवश्य है । फिर भी श्रोत्रिय लोग जिस बकरे का कोई रक्षक नहीं है, जो तडफ रहा है और श्वासें छोड रहा है ऐसे उस बकरे को मार ही डालते है । यह कितनीं विपरीत बात है । लिखा भी है-


अण्णं इयणि सुणिज्जइ सत्थे हरिवंभरुद्दभत्ताणं ।
सव्वेसु जीवरासिसु अंगे बेवा हु णिवसंति ॥46॥

गाथार्थ: इन के मत में यह भी लिखा है कि ब्रह्मा विष्णु महादेव समस्त जीवों के अंगों में निवास करते है यथा -


सव्वेसु जीवरासिसु ए ए णिवसंति पंच ठाणेसु ।
जइ तो किं पसु वहणे ण मारिया होंति ते सव्वे ॥47॥

गाथार्थ: इस संसार मे रहनेवाले समस्त ससारी जीवों के नाभि कंठ तालु ललाट और नासिका इन पांचो स्थानो में ब्रह्मा विष्णू महेश्वर रहते हैं फिर भला किसी भी प्राणी से मारने से उनकी मान्यतानुसार इन ब्रह्मा विष्णु महेश का भी घात अवश्य हो जाता है । इस प्रकार किसी भी जीव की हिंसा करने से इन देवों की भी हिंसा अवश्य होती है ।


देवे वहिऊण गुण लब्भइ जइइत्थ उत्तमा केई ।
तो रुक्ख वंदणया अवरे पारद्धिया सव्वे ॥48॥

गाथार्थ: इस संसार में यदि उत्तम पुरुष देवों को मारकर ही गुण प्राप्त करना चाहते हैं, स्वर्गादिक की प्राप्ति करना चाहते हैं तो वे सब लोग हत्यारे पारघी हैं जो लोग वृक्षों की वंदना करके भी प्रसन्न होते हैं अर्थात् वृक्ष वा पोधों तक को नही तोडते ऐसे लोगों को छोडकर शेष जीवों को मारनेंवाले सब पारघी हैं । लिखा भी है-


वंदइ गोजोणि सया तुण्डं परिहरइ भणिवि अपवित्तं ।
बिवरीयाभिणिवेसो एसो फुडु होई मिच्छोवि ॥49॥

गाथार्थ: जो लोग गायके मुखको अपवित्र कहकर छोड देते है और उनकी योनि की वंदना करते है यह उनका विपरीत श्रद्धान है इसीको प्रगट वा साक्षात् मिथ्यात्व कहते है ।


पावेण तिरियजम्मे उव्वण्णा तिणयरी पसू गावी ।
अविवेया विट्ठासी सा कह देवत्तणं पत्ता ॥50॥

गाथार्थ: जो गाय अपने पाप कर्मके उदयसे तिर्यञ्च योनि मे पशुपर्याय में उत्पन्न हुई है जो पशु कहलाती है, घास मुस खाती है जो विवेक रहित है, हित-अहित का कुछ विचार नहीं कर सकती और विष्टा भी भक्षण करती है ऐसी गाय भला देवता कैसे हो सकती है अर्थात् कभी नहीं हो सकती ।


अहवा एसो धम्मो विट्ठं भक्खंतया वि णमणीया ।
तो किं वज्झइ दुज्झइ ताडिज्जय दीहदंडेन ॥51॥

गाथार्थ: यदि आप लोगों ने यही मान लिया है कि गाय चाहे भिष्टाभक्षण करती रहे तथापि वह बन्दनीय है तो फिर उसे क्यों बांधते हो, क्यों दुहते हो ओंर बडी लकडी लेकर क्यों उसे मारते हो ।


सुरही लोयस्सागे वक्खाणय एस देवि पच्चक्खा ।
सव्वे देवा अंगे इमिए णिवसंति णियमेण ॥52॥

गाथार्थ: जो लोग सब लोगों के सामने यह कहते है कि यह गाय प्रत्यक्ष देवता है इसके शरीर में नियम रूपसे सब देवता निवास करते है । ऐसा कहते हुए भी वे लोग गवोत्सव यज्ञ में वा गो यज्ञमें उसी गाय को मारकर उसका मांस खा जाते है । क्या उस गायके मारने से समस्त देवों का वध नहीं हो जाता ! अवश्य हो जाता है ।


पुण रवि गोसवजण्णे मंसं भक्खंति सा वि मारित्ता ।
तस्सेव वहेण फुडं ण मारिया होंति ते देवा ॥53॥

गाथार्थ: जो लोग सब लोगों के सामने यह कहते है कि यह गाय प्रत्यक्ष देवता है इसके शरीर में नियम रूपसे सब देवता निवास करते है । ऐसा कहते हुए भी वे लोग गवोत्सव यज्ञ में वा गो यज्ञमें उसी गाय को मारकर उसका मांस खा जाते है । क्या उस गायके मारने से समस्त देवों का वध नहीं हो जाता ! अवश्य हो जाता है ।


सोत्ति य गव्वुब्बुढा मंसं भक्खंति रमिहि महिलाओ ।
अपवित्ताइं अशुद्धादेहच्छिद्दाइ वंदंति ॥54॥

गाथार्थ: अपने अभिमानसे मदोन्मत्त हुए ये श्रोत्रिय लोग मांस भक्षण करते है, स्त्रियोंके साथ संभोग करते है तथा गोयोनि ऐसे अपवित्र ओंर अशुद्ध ऐसे शरीर के छिद्रों की वदना करते है ।


हो सोत्तियो भणिज्जइ णारीकडिसोत्त वज्जिओ जेण ।
जो तु रमणासत्तो ण सोत्तिओ सो जडो होई ॥55॥

गाथार्थ: जिस मदापुरुषने स्त्री के कटिभाग के स्रोतका सर्वथा त्याग कर दिया है अर्थात् जो कभी स्त्री सेवन नहीं करता, सदाकाल ब्रह्मचारी रहता है उसको श्रोत्रिय कहते है । जो पुरुष स्त्री सेवन करने में आसक्त रहता है वह कभी श्रोत्रिय नहीं हो सकता उसे जड कहना चाहिए ।


अहवा पसिद्धिवयणं सोत्त सेवए जेण ।
मुत्तप्पवहणदारं सोत्तियओ तेण सो उत्तो ॥56॥

गाथार्थ: आज कल श्रोत्रियों के लिये प्रसिद्ध बात यह देखी जा रही हैं कि जो पुरुष स्त्रियों के स्त्रोतका सेवन करता है वही श्रोत्रिय माना जाता है ।


56॥

इय विवरीयं उत्तं मिच्छत्तं पावकारणं विसमं ।
तेण पउत्तो जीवो णरय गई जाइ णियमेण ॥57॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो मिथ्यात्व महा पापका कारण है और अत्यन्त विषम है एसे विपरित मिथ्यात्वका स्वरूप कहा । जो पुरुष इस विपरित मिथ्यात्वमें प्रवृत्त होता है वह नियमसे मरकर नरक में जाता है ।


अवि सहइ तत्थ दुक्खं सक्करपमुहणयविवरेसु ।
कह सो सग्गं पावइ णिहय पसू खद्धपलगासो ॥58॥

गाथार्थ: नरक में जाकर वह प्राणी रत्नप्रभा, शर्करा प्रभा आदि सातों नरकों की भूमियों मे वा किसीं एक भूमि अत्यन्त महा दुःख सहन करता है सो ठीक ही है । क्योंकि जो पशुओं को मारता है और उनका मांस भक्षण करता है उसको स्वर्ग की प्राप्ति भला कैसे हो सकती है ? अर्थात् कभी नही हो सकती । उसको तो नियमसे नरक की प्राप्ति होगी ।


58॥

जइ कहव तत्थ णिग्गइ उप्पज्जइ पुणु वि तिरियजोणिसु ।
मारियइ सोत्तिएहिं णित्ताणो पुण वि जण्णम्मि ॥59॥

गाथार्थ: यदि किसी प्रकार वहां से निकलता भी है तो फिर उसी तिर्यञ्च योनि मे उत्पन्न होता है और अन्य श्रोत्रियों के द्वारा यज्ञ में मारा जाता है वहां पर उसकी कोई रक्षा नही कर सकता ।


णियभासाए जंपइ में मंतो कहइ आसि मे रइयं ।
एवं वेयबिहाणें संपत्ता दुग्गई तेण ॥60॥

गाथार्थ: जब वह श्रोत्रियों के द्वारा मारा जाता है तब वह अपनी भाषा मे शब्द कहता है अर्थात् वह कहता है कि यह सब मेरा ही बनाया हुआ है मैंने ही पहले किसी यज्ञ में पशुओं को मारा था इसलिये ऐसे ही यज्ञ में अब मैं मारा जाता हूँ । इस प्रकार वेद के कहे अनुसार वह जीव अनेक प्रकार की दुर्गतियों मे प्राप्त होता है और फिर फिर मर कर नरक जाता है ।
इस प्रकार वह इस संसार मे महा दु:ख भोगता रहता है ।


इय विलवंतो हण्णइ गलयं मुहनासरंध रुंधिता ।
भविखयइ सोत्तिएहिं विहिण बहुवेय वंतेहिं ॥61॥

गाथार्थ: इस प्रकार अनेक वेदों को जाननेंवाले श्रोत्रिय लोग उस पशु के नाक और मुख के छिद्रों को बंद कर देते हैं और फिर जो पशु विलाप करता है और उसके मुख नाक के छिद्रों से रुधिर निकलता है ऐसे उस पशु को वे लोग कथित की विधि के अनुसार मार कर खा जाते हैं ।


अस विवरीयं कहियं मिच्छत पावनारणं विसमं ।
जो परिहरइ मणुस्सो सो पावइ उत्तमं ठाण ॥62॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो यह विपरित मिथ्यात्व महा पाप का कारण है और अत्यन्त विषम है उसका स्वरूप कहा । जो मनुष्य इस विपरित मिथ्यात्व का सर्वथा त्याग कर देता है वही जीव स्वर्गादिक के उत्तम स्थान प्राप्त कर सकता है ।

मिथ्यात्व गुणस्थान: एकांत, वैनयिक, संशय मिथ्यात्व; सपरिग्रह मोक्ष, स्त्री मुक्ति, कवलाहार निषेध (गाथा 63 से 115)

एयंतमिच्छदिट्ठि वुद्धो एयंत णय समालंवो ।
एयंते खणियत्तं मण्णइ जं लोय मज्झम्मि ॥63॥

गाथार्थ: एकान्त वादी बुद्धो है वह केवल एकांत नयको मानता है तथा संसार में जितनें पदार्थ है उन सबको एकांत नयसे क्षणिक मानता है।


जइ खणियत्तो जीवो तरिहि भवे कस्य कम्मसंबन्धो ।
सम्बन्ध विण ण घडई देहग्गहणम् पुणे तस्स ॥64॥

गाथार्थ: यदि यह जीव क्षणिक है एक ही क्षण रहकर नष्ट हो जाता है तो फिर कर्म का संबंध किसको होगा और कौन उसका फल भोगेगा । तथा बिना कर्मों के संबंध के यह जीव आगे के शरीर को किस प्रकार धारण कर सकेगा ।


तवयरणं वयधरणं चीवरगहणं च सीसमुंडलयं ।
सत्तहडियासु भिक्खा खणियत्ते णेव सभवई ॥65॥

गाथार्थ: यदि जीव को क्षणिक माना जायगा तो फिर तपश्चरण करना कभी संभव नहीं हो सकता है, न व्रत धारण करना संभव हो सकता है, न वस्त्र धारण करना संभव हो सकता है, न मस्तक मुंडाना संभव हो सकता है और न सात घरोंमें भिक्षा मांगना संभव हो सकता है।


णाणं जइ खणभंसी कह सो वालतववसियं मुणइ ।
तह बहिरगआ संतो कह आवइ पुणवि णियगेहं ॥66॥

गाथार्थ: यदि ज्ञानको क्षणिक माना जाय, ज्ञान भी दूसरे क्षण में नष्ट हो जाता है ऐसा माना जाय तो वह अपने बालकपने में किये हुए कामों को कैसे जान सकेगा, और यदि उसका ज्ञान दूसरे ही क्षण में नष्ट हो जाता है तो फिर घर से निकल कर बाहर गया हुआ जीव फिर लौटकर अपने घर कैसे आ सकेगा ?


जइ चेयणा अणिच्चा तो किं चिरजाय वाहि समराई ।
वहराइ वि मिचाइ वि कह जाणइ दिट्ठमित्ताइं ॥67॥

गाथार्थ: यदि आत्मा की चैतन्य शक्ति भी अनित्य वा क्षणिक है तो यह जीव अपने शरीर में उत्पन्न हुई चिरकाल की व्याधि का स्मरण कैसे करलेता है तथा देखने मात्रसे ही अपने शत्रु वा मित्रों को कैसे पहिचान लेता है ।


पत्त पडियं ण दूसइ खाइ पलं पियइ मज्जु णिल्लज्जो ।
इच्छइ सग्गग्गमणं मोक्खग्गमणं च पावेण ॥68॥

गाथार्थ: क्षणिकवादी लोग अपने पात्र में (वर्तन में) आये हुए भक्ष्य अभक्ष्य आदि पदार्थों में कोई दोष नहीं मानते । वे लोग निर्लज्ज होकर मांस भी खाते हैं और मद्य भी पीते है । तथा इस प्रकार महा पाप करते हुए भी उस पापके फलसे स्वर्ग प्राप्त होजाने की वा मोक्ष प्राप्त हो जाने की इच्छा करते है । परन्तु ऐसे पापों से स्वर्ग वा मोंक्षकी प्राप्ति होना सर्वथा असंभव है ।


असिऊण मंसगासं मज्जं पविऊणगम्मए सग्गं ।
जइ एवं तो सुंडय पारद्धिय चेव गच्छन्ति ॥69॥

गाथार्थ: यदि मांस भक्षण करने से वा मद्य पीनेसे ही वे जीव स्वर्ग चले जाते हों तो संसार मे मद्य पीने वाले और मांस भक्षण करने वाले हत्यारे पारधी आदि सबको स्वर्ग की प्राप्ति हो जानी चाहिये । परन्तु ऐसा होना सर्वथा असंभव है । मांस और मद्य दोनों ही अत्यन्त निन्द्य और घृणति पदार्थ है तथा इनका सेवन करने वाले निन्द्य कहे जाते हैं । फिर भला उनको स्वर्ग की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? कभी नहीं हो सकती ।


इम एयंतविणडिओ बुद्धो ण मुणेइ वत्थुसब्भावं ।
अण्णाणी कयपावो सो दुग्गइ जाय णियमेण ॥70॥

गाथार्थ: इस प्रकार एकान्त मिथ्यात्व को मानता हुआ जीव वस्तुका स्वभाव नही समझता । वह अत्यन्त अज्ञानी है और इसी लिये अपने किये हुए पापों के कारण नियमसे दुर्गति की प्राप्त होता है ।


70॥

णिच्चाणिच्चं दव्वं सव्वं इह अत्थि लोयमज्झम्मि ।
पज्जाऐण अणिज्चं णिच्चं फुडु होइ दव्वेण ॥71॥

गाथार्थ: इस लोकाकंश में जितने द्रव्य भरे हुए है वे सब नित्य भी है और अनित्य भी है । पर्यायार्थिक नयसे वे सब द्रव्य अनित्य है अर्थात् उनकी पर्यायें सदा बदलती रहती है इसलिये अनित्य है और द्रव्यार्थिक नयसे वे सब द्रव्य नित्य है ।


इय एयंतं कहियं मिच्छतं गुरुयपापसंजणयं ।
एत्तो उड्ढं वोच्छं वेणइयं णाम मिच्छत्तं ॥72॥

गाथार्थ: इस प्रकार महापाप उत्पन्न करनेवाले एकान्त मिथ्यात्वका स्वरुप कहा । अब आगे वैनयिक नामके मिथ्यात्व का स्वरुप कहते हैं ।


वेणइयमिच्छादिट्ठी हवइ फुडं तापसो हु अण्णाणी ।
णिग्गुणजणम्मि विणओ पउं जमाणो हु गयविवेओ ॥73॥

गाथार्थ: नैनयिक मिथ्यादृष्टी तापसी होते हैं वे अज्ञानी होते हैं और रहित होते हैं तथा निर्गुण लोगों को भी विनय किया करते हैं ।


विणयादो इह मोक्खं किज्जइ पुणु तेण गद्दहाईणं ।
अमुणिय गुणगुणेण य विणयं मिच्छत्तं णडियेण ॥74॥

गाथार्थ: जो लोग गुण अवगुण को नहीं जानते ऐसे मिथ्यादृष्टी नटों को समझना चाहिये कि यदि विनय करने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है तो उनको गधा चांडाल आदि सबका विनय करनी चाहिये। परन्तु वे लोग उनका विनय नहीं करते ।


जक्खय णायाईणं दुग्गाखंधाइ अण्णदेवाणं ।
जो णवइ धम्महेउं जो विय हेडू च सो मिच्चो ॥75॥

गाथार्थ: जो लोग धर्म समझकर यक्ष नाग आदि अन्य देवों को नमस्कार करते हैं उसका कारण भी मिथ्यात्व ही सयझना चाहिये ।


75॥

पुत्तत्थ माउसत्थं कुणइ जणो देवि चण्डियाविणयं ।
मारइ छेलयसत्थं पुज्जइ कुलाइं मज्जेण ॥76॥

गाथार्थ: बहुतसे लोग पुत्र उत्पन्न होनेके लिये वा अपना आयु बढाने के लिये चण्डी मुण्डी आदी देवी देवताओं की विनय करते है, उनके सामनें बकरे आदि का वध करते है तथा मद्य से अपने कुलकी पूजा करते है ।


णवि हाइ तत्थ पुण्णं किज्जंति णिकिट्ठरुद्द सब्भावा ।
णय पुत्ताइं दाउं सक्का ते सत्तिहिणां जे ॥77॥

गाथार्थ: चण्डी मुण्डी आदि देवता आदर्श देवता नहीं हैं और उनके स्वभाव कूर है इसलिये उनकी विनय करने से वा उनकी पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति कभी नही हो सकती । इसके सिवाय वे सब चण्डी मुण्डी आदि देवता पुत्र देनें के लिए वा आयु बढाने के लिये कभी समर्थ नहीं हो सकतें । क्योंकि वे सब शक्ती से हीन है ।


जइ ते होंती समत्था कत्थ गया पंडवाइया पुरिसा ।
कत्थगया चक्केसा हलहरणारायणा कत्थ ॥78॥

गाथार्थ: यदि वे चण्डी मुण्डी आदी देवता पुत्र देने वा आयु वढाने के लिये समर्थ होते तो फिर पाण्डव आदि महा पुरुष कहां चले गये, चक्रवर्ती कहां चले गये तथा नारायण प्रति नारायण हलधर आदि सब कहां चले गये ।


जइ देवयं देइ सुयं तो किं रुद्देण सेविया गउरी ।
दिव्वं वरिस सहस्सं पुत्तत्थं तारयभएण ॥79॥

गाथार्थ: यदि देव लोग किसी को पुत्र दे सकते होते तो फिर महादेवजी तारक के भयसे पुत्र उत्पन्न करने के लिये दिव्य सहस्त्र वर्ष तक पार्वती सम्पर्क क्यों करते रहते ।


तम्हा सयमेव सुओ हवेइ मिठणण रइपउत्ताणं ।
अण्णाण मूढलोओ बाहिज्जइ धुत्तमणुएहिं ॥80॥

गाथार्थ: इससे सिद्ध होता है रति कर्म में प्रवृत्त होनेवाले स्त्री पुरुषों के अपने आप पुत्र उत्पन्न हो जाता है । तथापि धूर्त लोग अज्ञानी मूर्ख लोकों को चंडी मुंडी आदि देवताओं का विनय करने के लिये वाधित करते रहते है ।


संते आउसि जीवइ मरणं गलयम्मि ण त्थ संदेहो ।
णव रक्खइ कीवि तहिं संतं सोसेइ ण हु कोई ॥81॥

गाथार्थ: जब तक आयु कर्म बना रहता है तबतक यह जीव जीवित रहता है तथा आयु कर्म पूर्ण हो जाता है, खिर जाता वा नष्ट हो जाता है तब यह जीव मर जाता है । इसमे किसी प्रकार का संदेह नहीं है । जिस समय आयु कर्म पूर्ण हो जाता है उस समय कोई भी देव उस जीव की रक्षा नहीं कर सकता । इसीं प्रकार जब तक आयु कर्म रहता है तबतक उस आयु कर्म को कोई भी देह नष्ट नहीं कर सकता ।


81॥

जइ सव्व देवयाओ मणुयं रक्खंति पुज्जियाओ य ।
तो किं सो दहवयणो ण रक्खिओ विज्जसहस्सेण ॥82॥

गाथार्थ: यदि पूजा वा वंदना किये हुए समस्त देवता मनुष्यों की रक्षा कर सकते है तो फिर रावण के पास हजारों विद्याएँ थीं, फिर उन विद्याके अधिपति देवताओं ने उस रावण की रक्षा क्यों नहों की ? रावण के पास जो चक्र था उसकी भी एक हजार देवता रक्षा करते थे, परंतु आयु पूर्ण होने पर उसी चक्र से वह रावण मारा गया । इससे सिद्ध होता है कि कोई देव न किसी की रक्षा कर सकता है और न किसी को मार सकता है ।


इय णाउं परमप्पा अट्ठारसदोसवज्जिओ देवो ।
पणविज्जइ भत्तीए जइ लब्भइ च इच्छियं वत्थुं ॥83॥

गाथार्थ: यही समझकर अठारह दोषों से रहित जो अरहंत परमात्मा है उन्हीं को भक्ति पूर्वक नमस्कार करना चाहिये । भगवान् अरहंत देवको नमस्कार करने से समस्त इच्छित पदार्थों की प्राप्ति होती है ।


वेणइयं मिच्छतं कहिये भव्वाण वज्जणट्ठं तु ।
एत्तो उड्ढ वोच्छं मिच्छतं संसयं णाम ॥84॥

गाथार्थ: इस प्रकार अत्यन्त संक्षेप से वैनयिक मिथ्यात्व का स्वरूप कहा। इन सब मिथ्यात्वों का स्वरूप भव्य जीवों को त्याग करने के लिये कहा है । भव्य जीवों को इन समस्त मिथ्यात्वों का त्याग कर देना चाहिये । अब आगे सशय मिथ्यात्व का स्वरूप कहते है।


84॥

संसय मिच्छादिट्ठी णियमा सो होई जत्थ सग्गंथो ।
णिग्गंथो वा सिज्झइ कंबलगहणेण सेवडओ ॥85॥

गाथार्थ: संशय मिथ्यादृष्टी श्वेतपट होते है जिन के मन में यह संशय नियम से बना ही रहता है कि मोक्षकी प्राप्ति निर्ग्रंथ लिंग से दिगम्बर अवस्था से ) होती है अथवा सग्रंथलिंग से (परिग्रह सहित अवस्था से) इसीलीये ये लोग वस्त्र कंवल आदि बहुत सा परिग्रह रखते है।


दंडं दुद्धिय चेलं अण्णं सव्वं पि धम्म उवयरणं ।
मण्णइ मोक्खणिमित्तं गंथे लुद्धो समायरइ ॥86॥

गाथार्थ: वे जो लोग परिग्रह में बहुत ममत्व रखते है, दंड कुंडी वस्त्र आदि अपने काम आने वाले समस्त पदार्थों को मोक्ष के कारण भूत धर्मोपकरण मानते हैं, इसके सिवाय अपने गृहस्थ धर्म में रहती हुई स्त्री मोक्ष प्राप्त कर लेती है अरहंत भगवान् के निद्रा तंद्रा भी होती है। इस प्रकार की मान्यता वास्तविक धर्म के विरुद्ध है।


इत्थी गिहत्थवग्गे तम्हि भवे चेव अत्थि णिव्वाणं ।
कवलाहारं च जिणे णिद्दा तण्हा य संसइओ ॥87॥

गाथार्थ: वे जो लोग परिग्रह में बहुत ममत्व रखते है, दंड कुंडी वस्त्र आदि अपने काम आने वाले समस्त पदार्थों को मोक्ष के कारण भूत धर्मोपकरण मानते हैं, इसके सिवाय अपने गृहस्थ धर्म में रहती हुई स्त्री मोक्ष प्राप्त कर लेती है अरहंत भगवान् के निद्रा तंद्रा भी होती है । इस प्रकार की मान्यता वास्तविक धर्म के विरुद्ध है ।


जइ सग्गन्थो मुक्खं तित्थयरो किं मुंचहि णियरज्जे ।
रयण णिहाणेहि समं किं णिवसइ णिज्जरे रण्णो ॥88॥

गाथार्थ: यदि परिग्रहों के रखते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है तो फिर तीर्थंङ्करों को अपना राज्य छोडने की क्या आवश्यकता थी, अनेक प्रकार रत्न तथा निधियों के छोडने की भी क्या आवश्यकता थी और फिर सबको छोडकर निर्जन वनमें जाने की क्या आवश्यकता थी।


88॥

रयण णिहाणं छंडइ सो किं गिण्हेहि कंवली खण्डं ।
दुद्धिय दंडंच पडं गिहत्थजोग्गं पि जं किं पि ॥89॥

गाथार्थ: यदि परिग्रह रखते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती तो तीर्थंकर रत्न और निधियों को छोडकर अन्य परिग्रह क्यों ग्रहण करते है ?


गेहे गेहे भिक्खं पत्तं गहिऊण जाइए किं सो ।
किं तस्स रयणविट्ठी घरे घरे णिवडिया तत्थ ॥90॥

गाथार्थ: जिन तीर्थंकरों ने मोक्ष की प्राप्ति के लिये समस्त राज्य का त्याग कर मुनि अवस्था धारण की वे ही तीर्थङ्कर मुनि होकर भी फिर हाथ में पात्र लेकर घर घर भोजन मांगने के लिये क्यों जाते हैं? क्या रत्नवृष्टि भी घर घर बरसी थी ।


ण हु एवं जं उत्तं संसयमिच्छत्तरसियचित्तेण ।
णिग्गंथ मोक्खमग्गो किंचण वहिरंतण चएण ॥91॥

गाथार्थ: जिसका हृदय संशय मिथ्यात्व के रस से रसिक हो रहा है उसका यह सब ऊपर कहा हुआ मत ठीक नहीं है । क्योंकि मोक्षका मार्ग निर्ग्रन्थ अवस्था ही है । जिसमें वस्त्र दंड आदि समस्त बाह्य परिग्रहों का भी त्याग हो जाता है । ऐसी वीतराग निर्गन्थ अवस्था ही मोक्ष का मार्ग है । सग्रन्थ अवस्था मोक्ष का मार्ग कभी नहीं है ।


91॥

जइ तप्पइ उग्गतवं मासे मासे य पारणं कुणइ ।
तइ वि ण सिज्झइ इथी कुच्छियलिंगस्स दोसेण ॥92॥

गाथार्थ: स्त्री लिंग कुत्सित लिंग है अर्थात् स्त्री का शरीर वा स्त्री की पर्याय निन्द्य है । इसलिये चाहे कोई स्त्री उग्रसे उग्र तपश्चरण करती रहे और चाहे प्रत्येक महीनेका उपवास कर प्रत्येक महीने के अन्त में पारणा करती रहे तथापि स्त्री को मोक्ष की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती ।


92॥

मायापमायपउरा पडिमासं तेसु होइ पक्खलणं ।
णिच्चं जो णस्साओ पुण दाड्ढंणत्थि चित्तस्स ॥93॥

गाथार्थ: स्त्री को मोक्षकी प्राप्ति क्यों नहीं होती इसका कारण यह है कि स्त्रियों मे मायाचार की मात्रा अधिक होती है तथा प्रमाद भी अधिक होता है । इसके सिवाय प्रत्येक महीनेमें उनके रजका स्खलन होता रहता है, योनिमे रजःस्राब होता रहता है और इसलिये उनका चित्त कभी भी स्थिर नही रह सकता ।


93॥

सुहमापज्जत्ताणं मणुआणं जोणिणा हि कक्खेसु ।
उपत्ती होइ सआ अण्णो सु य तणुपएसेसु ॥94॥

गाथार्थ: स्त्रियों की योनि में, नाभि में, कांख में तथा और भी कितने ही शरीर के प्रदेशों मे सदा काल सूक्ष्म अपर्याप्तक मनुष्यों की उत्पत्ति होती रहती है।


94॥

ण हु अत्थि तेण तेंसि इत्थिणं दुविह संजमोद्धरणं ।
संजमधरणेण विणा ण हु मोक्खो तेण जम्मेण ॥95॥

गाथार्थ: संयम दो प्रकारका होता है एक प्राणिसंयम और दूसरा इन्द्रिय सयम । त्रसत स्थावर समस्त जीवों की रक्षा करना किसी भी जीव का घान न करना प्राणिसंयम है और समस्त इन्द्रियों को वशमें रखना इन्द्रिय संयम है । ये दोनों प्रकार के संयम पूर्ण रूप से स्त्रियों के नही पल सकते । क्योंकि मन वचन काय क्रत कारित अनुमोदना से समस्त प्राणियों की हिंसा का त्याग होना चाहिये परंतु उसके शरीर से सम्मूर्च्छन मनुष्यों की हिंसा होती है इसलिये पूर्ण संयम उनसे कभी नही हो पल सकता है । तथा विना संयम के मोक्ष की प्राप्ति नही हो सकती । इसलिये स्त्रियों को उसी जन्म में उसी स्त्री पर्याय मे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती । स्त्रियां अपने योग्य आर्यिका के व्रत धारण कर स्त्री लिंग को छेद कर देव हो सकती है और फिर वहां से आकर मनुष्य पर्याय में उत्तम मनुष्य हो सकती है और फिर तपश्चरण कर उस मनुष्य पर्याय से मोक्ष जा सकती है । सीता का जीव वा अन्य कितनी ही स्त्रियों के जीव इसी प्रकार मोक्ष प्राप्त करेंगे ।


अहवा एयं वयणं तेसिं जीवो ण होइ किं जोवो ।
किं णत्थि णाणदंसण ववओगो चेयणा तस्स ॥96॥

गाथार्थ: कदाचित् कोई यह प्रश्न करते हो कि क्या स्त्रियों का जीव जीव नहीं है ? क्या उन स्त्रियों को ज्ञान दर्शन नहीं है ? अथवा उनके क्या उपयोग नही है अथवा चेतना नहीं है ? स्त्रियों के क्या नहीं है जिससे कि वे मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती ।


96॥

जइ एवं तो इत्थि धीवरि कल्लालि वेसअईणं ।
सव्वेसिमत्थि जीवो सयलाओ तरिहि सिज्झति ॥97॥

गाथार्थ: यदि शंकाकार इस प्रकार कहते हो तो इसका उत्तर यह है कि यदि मनुष्यों के समान ही स्त्रियोंका जीव है तो धीवरी वेश्याएं आदि महा हिंसा करने वाली स्त्रियों के भी जीव है इसलिये वे समस्त स्त्रियां भी मोक्ष प्राप्त कर लेगी ।


तम्हा इत्थी पज्जय पडुच्च जीवस्स पयडि दोसेण ।
जाओ अमब्ब कालो तम्हा तेंसि ण णिव्वाणं ॥98॥

गाथार्थ: अतएव स्त्री पर्याय को लेकर प्रकृति के दोषसे जीवका अभव्यकाल प्राप्त हो जाता है इसलिये स्त्री को मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती ।


अइ उच्चमसंहणणो उत्तमपुरिसो कुलग्गओ संतो ।
मोक्खस्स होइ जुग्गो णिग्गंथो धरिय जिणलिंगो ॥99॥

गाथार्थ: जिस पुरुष का उत्तम संहनन हो, जो उत्तम पुरु हो सत्कुलमें उत्पन्न हुआ हो, वह पुरुष जिन लिंग निर्ग्रन्थ अवस्था को धारण कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है ।


गिहलिंगे वट्टं तो गिहत्थवावार गहियतिथजोओ ।
अत्तरउद्दारूढो मोक्खं ण लहेहि कुलजो वि ॥100॥

गाथार्थ: जो मनुष्य उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ है वह भीजब तक गृहस्थ लिंग में रहता है, अर्थात् गृहस्थी मे रहना है । गृहस्थी के ब्यापार में मन वचन काय तीनों योगों को लगता रहता है तथा अर्तध्यान और रौद्रध्यान में लगा रहता है तबतक वह उत्तम पुरुष भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता ।


वज्झब्भंतरगथे वट्टंतो इंदियत्थपरिकलिओ ।
जइवि हु दंसणवंतो तहा वि ण सिज्झेइ तम्हि भवे ॥101॥

गाथार्थ: जो सद्गृहस्थ उत्तम पुरुष शुद्ध सम्यग्दर्शन सहित हो तथापि वह यदि वाह्य आभ्यंतर परिग्रहों को धारण करता है और इन्द्रियों के विषयों का सेवन करता है तो वह उस भव में उस अवस्था से कभी मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता ।


जइ गिहवंतो सिज्झइ अगहिय णिग्गंथलिंग सग्गंथो ।
तो किं सो तित्थयरो णिस्संगो तवइ एगागी ॥102॥

गाथार्थ: यदि गृहस्थ अवस्था में ही बिना निर्ग्रंथ लिंग धारण किये सग्रंथ अवस्था मे ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है तो फिर तीर्थंकर देव समस्त परिग्रहों का त्याग कर अकेले एकांत स्थान में जाकर तपश्चरण क्यों करते है ।


केवलभुत्ती अरुहे कहिया जा सेवडेण तहिं तेण ।
सा णत्थि तस्स णूणं णिहयमणो परमजोईणं ॥103॥

गाथार्थ: श्वेतपट लोग कहते है कि भगवान् अरहंत देव समवशरण में विराजमान होते हुए भी कवलाहार करते है अर्थात् आहार को हाथसे उठाकर मुंहमें देकर भोजन करते है । परन्तु ऐसी मान्यता तर्कसंगत नहीं है । क्योंकि भगवान् अरहत्तदेव परम योगी है । उनका मन भी नष्ट हो गया है, केवल द्रव्य मन है जो बिना भाव मनके कुछ काम नही करता । इसके सिवाय यह भी समझने की बात है कि अरहन्त भगवानके मोहनीय कर्म का सर्वथा अभाव हो गया है तथा बिना मोहनीय कर्म के उदय के वेदनीय कर्म कुछ काम नहीं कर सकता । इसलिये भगवान् अरहन्त देव के न क्षुधा पिपासा आदि दोष है और न वे कवलाहार करते है ।


गुत्तित्तजुत्तस्स य इन्दियवावाररहियचितस्स ।
भाविदियमुक्खस्स य जीवस्स य णिक्कलं झाणं ॥104॥

गाथार्थ: जो निर्ग्रन्थ मुनि मन, वच, काय के समस्त व्यापारों को रोककर मनोगुप्ति वचनगुप्ति कायगुप्ति इन तीनों गुप्तियों का पालन करते है तथा जिनका चित्त इन्द्रियों के व्यापार से सर्वथा रहित होता है और जिनके भावेन्द्रिय की मुख्यता रहती है ऐसे योगी पुरुषों के निश्चल ध्यान होता है ।


झाणेण तेण तस्स हु जीव मणस्साण समरसीयरणं ।
समरसभावेण पुणो संवित्ती होइ णियमेण ॥105॥

गाथार्थ: उस ध्यान के द्वारा उन योगि का आत्मा और मन दोनों एक रुप हो जाते है, दोनों समान रसरुप परिणत हो जाते है तथा उस समरसी भावसे उन योगी के नियमसे संवित्तीं हो जाती है ।


संवित्तीए वि तहा तण्हा णिद्दा य छुहा य तस्स णस्संति ।
णट्ठेसु तेसु पुरिसो खवयस्सेणिं समारुहइ ॥106॥

गाथार्थ: जब यह आत्मा निश्चल ध्यानके द्वारा अपने आत्मा में लीन हो जाता है उस समय उस योगी के तन्द्रा, निद्रा, क्षुधा पिपासा आदि सब नष्ट हो जाते है तथा तन्द्रा,निद्रा, क्षुधा आदि के नष्ट होने से फिर वह योगी क्षपक श्रेणी में आरुढ हो जाता है ।


खवएसु य आरुढो णिद्दाईकारणं तु जो मोहो ।
जाइ खयं णिस्सेसो तक्खीणे केवलं णाणं ॥107॥

गाथार्थ: जब वह योगी अपने निश्चल ध्यान के द्वारा क्षपक श्रेणीमें आरूढ हो जाता हैं तब उसका निद्रा तन्द्रा क्षुधा आदिका कारण मोहनीय कर्म सर्वथा पूर्ण रुपसे नष्ट हो जाता है । और उस मोहनीय कर्म के सर्वथा नष्ट होने से उस महा योगी के केवल ज्ञान प्रगट हो जाता है ।


तं पुण केवल णाणं दसट्ठदोसाण हवइ णासम्मि ।
ते दोसा पुण तस्सहु छुहाइया णत्थि केवलिणो ॥108॥

गाथार्थ: यह केवल ज्ञान क्षुधा पिपासा आदि अठारह दोषोंके नाश होंने पर ही होता है । इसलिये उन केवली भगवान् के वे क्षुधा, तृषा आदि अठारह दोष कभी नहीं होते ।


जइ संति तस्स दोसा केत्तियमित्ता छुहाइ जे भणिया ।
ण हवइ सो परमप्पा अणंतविरिओ हु सो अहवा ॥109॥

गाथार्थ: यदि उन केवली भगवान् के क्षुधा तृषा आदि दोष थोडे से भी माने जायेंगे तो फिर वे भगवान् न तो परमात्मा हो सकते है और न वे अनन्तवीर्य को धारण करनेवाले कहे जा सकते हैं ।


णोकम्मकम्महारो कवलाहारो य लेप्पहारो य ।
उज्जमणो विय कमसो आहारो छव्विहो णेओ ॥110॥

गाथार्थ: नोकर्म अहार, कर्माहार, कवलाहार लेपाहार, ओजाहार और मानसिक आहार इस प्रकार अहारके छह भेद हैं ।


णोकम्मकम्महारो जीवाणं होइ चउगइगयाणं ।
कवलाहारो णरयसु रुक्खेसु य लेप्पमाहारो ॥111॥

गाथार्थ: इन छह प्रकारके अहारो में से नौकर्माहार और कर्माहार चारों गतियों मे परिभ्रमण करनेवाले समस्त जीवों के होते है, कवलाहार मनुष्य तथा पशुओं के होता है और वृक्षों के लेपाहार होता है ।


पक्खीणुज्ज्जाहारो अंडयमज्झेसु वट्टमाणाणं ।
देवेसु मणाहारो चउव्विहो णत्थि केवलिणो ॥112॥

गाथार्थ: अंडे के भीतर रहने वाले पक्षियों के ओजाहार होता है और देवों के मानसिक अहार होता है । इस प्रकार छहों प्रकार के आहार की व्यवस्था है । इनमे से चार प्रकार का अहार केवली भगवानके नहीं होता ।


णोकम्मकम्महारो उवयारेण तस्य आयमे भणिओ ।
ण हु णिच्छयेण सो विहु स बीयराओ परो जम्हा ॥113॥

गाथार्थ: यद्यपि केवली भगवान् के नो कर्म आहार और कर्म आहार आगम मे बतलाया है परंतु वह भी उपवार से बतलाया है । निश्चय नय से देखा जाय तो वह भी नहीं है । इसका भी कारण यह है कि केवली भगवान् परम वीतरागी है । इसलिये उनके आहार की कल्पना हो ही नहीं सकती है ।


जो जेमइ सो सोवइ सुत्तो अण्णे विविसयमणुहवइ ।
विसए अणुहवमाणो स वीयराओ कहं णाणी ॥114॥

गाथार्थ: जो पुरुष कवलाहार करता है वह सोता भी है, जो सोता है वह पुरुष अन्य अनेक इन्द्रियोंके विषयों का अनुभव करता है तथा जो इन्द्रियों के विषयों का अनुभव करता है वह बीतराग और सर्वज्ञ कैसे हो सकता है ?


तम्हा कवलाहारो केवलिणो णत्थि दोहिं वि णएहिं ।
मण्णंति य आहारं जेते मिच्छाय अण्णाणी ॥115॥

गाथार्थ: इसलिये यह सिन्द्धात निश्चित रुप से सिद्ध है कि केवली भगवान् के निश्चय नय और व्यवहार नय दोनों नयों से कवलाहार नहीं है । फिर भी केवली भगवान् के कवलाहार मानना अज्ञानता ही है ।

मिथ्यात्व गुणस्थान: जिनकल्पी स्थविरकल्पी, श्वेताम्बरों की उत्पत्ति, अज्ञान मिथ्यात्व, चार्वाक व सांख्य मत का निराकरण (गाथा 116 से 194)

अण्णं जं इय उत्तं संसयमिच्छत्तकलियभावेण ।
अम्हं त्ति थविरकप्पो कंवलगहणेण ण हु दोसो ॥116॥

गाथार्थ: जिन के परिणाम संशय मिथ्यात्व से भरे हुए है वे कहते है कि हम तो स्थविर कल्पी है, इसलिये हमको कंवल ग्रहण करने में कोई दोष नहीं लगता ।


कंवली वत्थं दुद्धिय दंडं कणयं च रयणभंडाइं ।
सग्गग्गमणणिमित्तं मोक्खस्स य होइ णिब्भंत्तं ॥117॥

गाथार्थ: ऐसा कहा जाता है कि कंवल, वस्त्र, कुंडी, दंड सोना रत्नों के वर्तन ये सब स्वर्ग मोक्ष के कारण है इसमें किसी प्रकार की भ्रांन्ति नहीं है ।


ण उ होइ थविरकप्पो गिहत्थकप्पो हवेइ फुडु ऐसो ।
इय सो धुत्तेहिं कओ थविरवकप्पस्स भग्गेहिं ॥118॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि कंवल दंड वस्त्र कुंडी सोना रत्नों के वर्तन रखना आदि स्थविर कल्प नहीं है किंतु यह तो गृहस्थ कल्प है । इस गृहस्थकल्प को स्थविर कल्प मानने की कल्पना स्थविर कल्प से च्युत लोगों ने की है ।


118॥

दुविहो जिणेंहि कहिओ जिणकप्पो तह य थविर कप्पो य ।
सो जिणकप्पो उत्तो उत्तमसंहणणधारिस्स ॥119॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेन्द्रदेवने जिन कल्प और स्थविर कल्प ऐसे दोनों प्रकार के मार्ग दिखलाये है। इनमें से जो उत्तम संहनन को धारण करनेवाले महा मुनि है वे जिन कल्पी मुनि कहलाते है।


जत्थ ण कटयभग्गो पाए णयणम्मि रय पविट्ठम्मि ।
फेडंति सयं मुणिणो परावहारे य तुण्हिक्का ॥120॥

गाथार्थ: यदि जिनकल्पी महा मुनियों के पैर में कांटा लग जाता है अथवा नेत्रों मे धूलि पड जाती है तो वे महा मुनि अपने हाथ से न कांटा निकालते है और न अपने हाथ से नेत्रों से धुलि निकालते है । यदि अन्य कोई दूसरा मनुष्य उस कांटे को वा धुलि को निकालता है तो वे चुप रहते है ।


120॥

जल वरिसणवा याई गमणे भग्गे य जम्म छम्मासं ।
अच्छंति णिराहारा काओस्सग्गेण छम्मासं ॥121॥

गाथार्थ: जब वर्षा ऋतु आ जाती है और मुनियों का गमन करना बंद हो जाता है उस समय वे जिन कल्पी महा मुनि छह महीने तक निराहार रहते है और छह महीनें तक कार्योत्सर्ग धारण कर किसी एक हीं स्थानपर खडे रहते है ।


एयारसंगधारी एआई धम्मसुक्कझाणी य ।
चत्तासेस कसाया मोण वई कंदरावासी ॥122॥

गाथार्थ: वे जिन कल्पी महामुनि ग्यारह अंग के पाठी होते है, धर्मध्यान वा शुक्लध्यान मे लीन रहते है, समस्त कषायों के त्यागी होते है मौनव्रत को धारण करनेवाले होते है और पर्वतों की गुफा कंदराओ में रहते है ।


बहिरंतरगंथचुवा णिण्णेहा णिप्पिहा य जइवइणो ।
जिण इव विहरंति सदा ते जिणकप्पे ठिया सवणा ॥123॥

गाथार्थ: वे जिन कल्पी महा मुनि बाह्य आभ्यंतर समस्त परिग्रहों के त्यागी होते है, स्नेह रहित परम बीतराग होते है और समस्त इच्छाओं से सर्वथा रहित होते है । ऐसे वे यतीश्वर महामुनि भगवान् जिनेन्द्र देव के समान सदा काल विहार करते रहते है । इसलिये वे जिन कल्पी मुनि कहलाते है ।


थविरकप्पो वि कहिओ अणयाराणं जिणेण सो एसो ।
पंचच्चेलच्चाओ अंकिचणत्तं च पडिलिहणं ॥124॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेंद्र देव ने मुनियों के लिये स्थविर कल्पी मुनियों का भी स्वरूप कहा है। जो मुनि पांचो प्रकार के वस्त्रों का सर्वथा त्याग कर देते है अकिचन व्रत धारण करते है और पीछी रखते हैं ऐसे मुनि स्थविर कल्पी कहलाते हैं।


पंचमहव्वयधरणं ठिदिभोयण एयभत्त करपत्तो ।
भत्तिभरेण य दत्तं काले य अजायणे भिक्ख ॥125॥

गाथार्थ: वे स्थविर कल्पी मुनि पांचों महाव्रतों को धारण करते है, खडे होकर आहार लेते है, दिन में एक ही वार आहार लेते है, कर पात्र में ही आहार लेते है, तथा विना याचना किये भवित पूर्वक जो कोई समय पर दे देता है वही भिक्षा भोजन कर लेते है । वे मुनि वाह्य और आभ्यंतर दोनों प्रकारके तपश्चरण करने मे सदा उद्यमी रहते है, छह आवश्यकों प्रतिदिन निरंतर पालन करते है, पृथ्वीपर शयन करते है मस्तक दाढी मूछ के बालों का लोंच करते है और जिनेंद्रदेव के समान ही माने जाते है ।


दुविहतवे उज्जमणं छव्विह आवासएहिं अणवरयं ।
खिदिसयणं सिरलोओ जिणवर पडिरूव पडिगहणं ॥126॥

गाथार्थ: वे स्थविर कल्पी मुनि पांचों महाव्रतों को धारण करते है, खडे होकर आहार लेते है, दिन में एक ही वार आहार लेते है, कर पात्र में ही आहार लेते है, तथा विना याचना किये भवित पूर्वक जो कोई समय पर दे देता है वही भिक्षा भोजन कर लेते है । वे मुनि वाह्य और आभ्यंतर दोनों प्रकारके तपश्चरण करने मे सदा उद्यमी रहते है, छह आवश्यकों प्रतिदिन निरंतर पालन करते है, पृथ्वीपर शयन करते है मस्तक दाढी मूछ के बालों का लोंच करते है और जिनेंद्रदेव के समान ही माने जाते है ।


संहणणस्स गुणेण य दुस्समकालस्स तव पहावेण ।
पुर णयर गामवासी थविरे कप्पे ठिया जाया ॥127॥

गाथार्थ: इस दुषम कालमे शरीर कें संहनन बलवान नहीं होते, इसलिये वे मुनि किसी नगर गांव वा किसी पुर में रहते हैं और अपने तपश्चरण के प्रभावसे स्थविर कल्पी कहलाते हैं ।


उवयरण तं गहियं जेण ण भंगो हवे चरियस्य ।
गहियं पुत्थयदाणम् जोग्गं जस्स तं तेण ॥128॥

गाथार्थ: वे मुनि अपने उपकरण भी ऐसे रखते है जिनसे किसी प्रकार के चारित्र का भग न होता हो । तथा वे मुनि अपनी २ योग्यता के अनुसार किसी के द्वारा दिये हुए शास्त्र वा पुस्तक भी ग्रहण कर लेंते है ।


समुदाएण विहारो धम्मस्स पहावणं ससत्तीए ।
भवियाणं धम्मसवणं सिस्साणं य पालणं गहणं ॥129॥

गाथार्थ: इस पंचम काल में वे स्थविर कल्पी मुनि समुदाय रूप से विहार करते है, अपनी शक्ती के अनुसार धर्म की प्रभावना करते है, भव्य जीवों को धर्म का उपदेश देते है तथा शिष्यों को ग्रहण करते है और उनका पालन करते है ।


संहणणं अइण्णिच्चं कालो सो दुस्समो मणो चवलो ।
तह वि हु धीरा पुरिसा महव्वयभरधरण-उच्छहिया ॥130॥

गाथार्थ: यह काल दुःषम है इस काल में शरीर के संहनन अत्यन्त नीच होते है और मन अत्यन्त चंचल रहता है तथापि धीर वीर पुरुष महाव्रतों का भार धारण करनें में अत्यन्त उत्साहित रहते है, यह भी एक आश्चर्य की बात है ।


वरिससहस्सेण हु पुरा जं कम्मं हणइ तेण काएण ।
ते संपइ वरिसेण हु णिज्जरयइ हीणसंहणणो ॥131॥

गाथार्थ: पहले समय में जिन कर्मों को मुनिलोग अपने शरीर से हजार वर्ष मे नष्ट करते थे उन्ही कर्मों को आज कल के स्थविर कल्पो मुनि अपने हीन सहनन से ही एक वर्ष में हीं क्षय कर डाल सकते है ।


एव पुविहो कप्पो परम जिणंदेहिं अक्खियो णूणं ।
अण्णो पासंडिकओ गिहकप्पो गंथपरि कलिओ ॥132॥

गाथार्थ: इस प्रकार भगवान् जिनेन्द्र देव ने जिन कल्प और स्थविर कल्प ऐसे दो प्रकार के मुनि बतलाये है । इन दो प्रकार के मुनियों के सिवाय जो वस्त्र आदि परिग्रहों से परिपूर्ण गृहस्थ कल्पकी कल्पना की है वह पाखंडियों ने की है, ऐसे गृहस्थ कल्प की कल्पना भगवान् जिनेंद्र देव ने नहीं बतलाई है ।


दुद्धरतवस्स भग्गा परिसह विसएहिं पीडिया जे य ।
यो गिहकप्पो लोए स थविरकप्पो कओ तेहिं ॥133॥

गाथार्थ: जो मुनि मुनि होंकर भी दुर्धर तपश्चरण धारण करने में असमर्थ हो गये थे और इसलिये जो तपश्चरण से भ्रष्ट हो गये थे तथा जो परिषह सहन करने मे दुःखका अनुभव करते थे, दुखी होते थे ऐसे उन लोगोंने गृहस्थ कल्पको ही स्थविरकल्प मान लिया है ।


णिग्गंथो जिणवसहो णिग्गंथं पवयणं कयं तेण ।
तस्साणुमग्गलग्गा सव्वे णिग्गंथमहरिसिणो ॥134॥

गाथार्थ: भगवान् ऋषभ देव दीक्षा धारण कर निर्ग्रंथ मुनि हुए थे तथा केवल केवल ज्ञान प्राप्त करने के अनन्तर उन्होंने मुनियों का स्वरुप निर्ग्रन्थ ही बतलाया था। अपनी दिव्यध्वनी में मुनियों की निर्ग्रन्थ अवस्था ही बतलाई थी जो शास्त्रों मे आज तक विद्यमान है। उन्ही शास्त्रों के अनुसार वर्तमानके निर्ग्रन्थ मुनि भी उसी मार्ग के अनुसार निर्ग्रन्थ होते चलें आ रहे है।


जे पुण भूसिय गंथादूसियणिग्गंथलिगवयभट्ठा ।
तेहि सगंथं लिंगं पायडियं तित्थणाहस्स ॥135॥

गाथार्थ: जो लोग मुनि होकर भी परिग्रहसे सुशोभित रहते है, जिन्होंने पवित्र निर्गन्थ लिंगको दूषित कर रक्खा है तथा जो निर्ग्रंथ लिंगसे और अपने मुनिव्रत से भ्रष्ट हो गये है ऐसे लोगों ने तीर्थंकर पर देव के इस निर्ग्रंथ लिंग को भी सग्रन्थ लिंग प्रगट कर रक्खा है ।


135॥

जं जं सयमादरियं तं तं णिरूयायमेण अलिएण ।
लोए वक्खणित्ता अण्णाणी वन्चिआ तेंहि ॥136॥

गाथार्थ: ऐसे लोग जिन २ आचरणों को स्वयं पालन करते है उन्ही आचरणों को अपने बताये हुए मिथ्या आगमों से निरूपण करते हैं तथा संसार में वे लोग उसी प्रकार व्याख्यान कर अज्ञानी लोगों को ठगते है। यह एक दुःख की बात है।


136॥

छत्तीसे वरिससये विक्कमरायस्स मरणपत्तस्स ।
सोरट्ठे उप्पण्णो सेवडसंघो हु वलहीए ॥137॥

गाथार्थ: राजा विक्रम के मरने के एकसौ छत्तीस वर्ष बाद सोरठदेश के वलभी नगर में श्वेतपट संघ की उत्पत्ति हुई थी। उसकी कथा इस प्रकार है।


असि उज्जेणिणवरे आइरिओ भद्दवाहुणामेण ।
जाणिय सुणिमित्तधरो भणिओ संघोणिओ तेण ॥138॥

गाथार्थ: उज्जयिनी नगरी में भद्रबाहु नामके आचार्य थे । वे निमित्तशास्त्रको जानते थे । उन्होने अपने निमित्त शास्त्रसे जानकर अपने संघ से कहा था कि -


138॥

हो हइ इह दुब्भिक्खं बारह वरसाणि जाम पुण्णाणि ।
देसतराइ गच्छइ णियणिय संघेण संजुत्ता ॥139॥

गाथार्थ: इस देशमे बारह वर्ष तक दुर्भिक्ष पडेगा । इसलिये आप लोग अपने दोन संवके साथ दूसरे देशों मे चले जाओ ।


सोऊण इयं वयणम् णाणादेसेहिं गणहरा सव्वे ।
णिय णिय संघ पउत्ता विहरीआ जत्थ सुब्भिक्खं ॥140॥

गाथार्थ: आचार्य श्री भद्रबाहु से इन वचनों को सुन कर समस्त गणधर व आचार्य अपने २ संघको लेकर जहां २ सुभिक्ष था सुकाल था उन २ देशों के लिये विहार कर गये ।


140॥

एक्कं पुण सन्ति णामो संपत्तो वलहि णाम णएरीए ।
बहुसीससंपउत्तो विसए सोरट्ठए रम्मे ॥141॥

गाथार्थ: उन आचार्यों में एक शांति चन्द्र नाम के आचार्य थे, वे आचार्य अपने अनेक शिष्यों के साथ मनोहर सोरठ देश के वल्भी नाम के नगर मे विहार करते हुए पहुंचे ।


तत्थ वि गयस्स जायं दुब्भिक्खं दारुणं महाघोरं ।
जत्थ वियारिय उयरं खद्धो रंकेहि कूरत्ति ॥142॥

गाथार्थ: जब वे आचार्य शांति चन्द्र अपने संघ सहित वल्भी नगर मे पहुंचे तब वहां भी महा भयानक महा दुःखदायी दुर्भिक्ष पडा तथा ऐसा दुर्भिक्ष पडा कि क्रूर निर्धन भिक्षुक आदि दूसरों के पेट को विदीर्ण कर उसमे का खाया हुआ अन्न खा जाते थे ।


तं लहिऊण णिमित्तं गृहीयं सव्वेहि कंवली दंडं ।
दुद्धियपत्तं च तहा पावरणं सेयवत्थं च ॥143॥

गाथार्थ: इसी निमित्त को लेकर उन आचार्य शांति चन्द्र के समस्त संघने कंवल दंड कुंडी और ओढने के लिये सफेद वस्त्र धारन कर लिया।


चत्तं रिसि-आयरणं गहिया भिक्खा य दीणवित्तीए ।
उवविसिय जाइऊणं भुत्त वसहीसु इच्छाए ॥144॥

गाथार्थ: इस प्रकार उन आचार्य शांति चन्द्रके संघने मुनियों के आचरण सब छोड दिये और वे दीनवृत्तिसे घरघरभिक्षा मांगकर अपनी अपनी वसतिका मे लाने लग तथा अपनीं वसतीका में बैठकर इच्छानुसार भोजन करने लगे ।


एवं वट्टंताणं कित्तिय कालम्मि चावि परियलिए ।
संजायं सुभिक्खं जंपइ ता संति आंइरिओ ॥145॥

गाथार्थ: इस प्रकार उन शान्तिचद्र आचार्यके संघने अपना कितना ही समय व्यतीत किया । कुछ समय के अनन्तर वहां पर भी सुभिक्ष हो गया । तब आचार्य शान्तिचन्द्रने अपने संघसे कहा ।


आवाहिऊण संघं भणियं छंडेय कुत्थियायरणं ।
णिंदिय गरहिय गिण्हइ पुणरवि चरियं मुंणिदाणं ॥146॥

गाथार्थ: आचार्य शान्तिचन्द्रने अपने समस्त संघ को बुलाकर उनसे कहा कि अब इस देशमें भी सुभिक्ष होगया है । इसलिये अब इन कुत्सित आचरणों को छोडो । अब तक जो ये कुत्सित आचारण किये हैं उनकी निन्दा करो और फिरसे मुनि दीक्षा लेकर मुनियों के शास्त्रोक्त आचरण पालन करो ।


तं वयणं सोऊणं उत्तं सीसेण तत्थ पढमेण ।
को सक्कइ धारेउं एयं अइदुद्धरायरणम् ॥147॥

गाथार्थ: आचार्य शान्तिचन्द्र के इन वचनों को सुनकर उनके मुख्य शिष्य जिनचन्द्रने कहा कि अब ऐसे इन अत्यन्त कठिन दुर्धर आचरणों को कौन धारण कर सकता है ।


उबवासो य अलाभे अण्णे दुसहाइं अन्तराइ ।
एयट्ठाणमचेलं अज्जायण वंभचेरं च ॥148॥

गाथार्थ: यदि चर्या मे किसी दिन आहार न मिला तो उस दिन उपवास करना पडेगा, इसकें सिवाय चर्या के अनेक कठिन कठिन अंतराय है । विना मांगे किसी भी एक ही स्थान पर आहार लेना पडेगा । नग्न व्रत धारण करना पडेगा, ब्रह्मचर्य पालन करना पडेगा, भूमिपर शयन करना पडेगा, दों दो महिने बाद केशों का लोच करना पडेगा, यह केशों का लोच अत्यन्त असह्य होता है और अत्यंत असह्य ऐसी बाईस परिषह सहन करनी पडेगी ।


भूमीसयनं लोचो वे वे मासेहिं असहणिज्जो हु ।
वावीस परीसहाइं असहणिज्जाइं णिच्चंपि ॥149॥

गाथार्थ: यदि चर्या मे किसी दिन आहार न मिला तो उस दिन उपवास करना पडेगा, इसकें सिवाय चर्या के अनेक कठिन कठिन अंतराय है । विना मांगे किसी भी एक ही स्थान पर आहार लेना पडेगा । नग्न व्रत धारण करना पडेगा, ब्रह्मचर्य पालन करना पडेगा, भूमिपर शयन करना पडेगा, दों दो महिने बाद केशों का लोच करना पडेगा, यह केशों का लोच अत्यन्त असह्य होता है और अत्यंत असह्य ऐसी बाईस परिषह सहन करनी पडेगी ।


जं पुण संपइ गहियं एय अम्हेहि किंपि आयरणं ।
इह लोए सुक्खयरं ण छंडिमो हु तुस्समे काले ॥150॥

गाथार्थ: उन जिनचंद्र शिष्यने इतना कहकर फिर उन आचार्य शांतिचन्द्र से कहा कि हम लोगों नें इस समय जो कुछ आचरण ग्रहण कर रक्खा है इस लोक मे वहीं सुखकर है । इसलिये हम सव इस दुःषम काल में इन धारण किये हुए आचरणों को छोड नहीं सकते ।


ता संतिणां पउत्तं चरियपभट्ठेहिं जीवियं लोए ।
एयं ण हु सुंदरियं दूसणयं जैणमग्गस्स ॥151॥

गाथार्थ: अपने मुख्य शिष्य जिनचन्द्र की बात सुन कर आचार्य शांतिचन्द्र नें फिर भी कहा है कि जो लोग अपने चारित्र से भ्रष्ट हो जाते है, इस लोक मे उनका जीवित रहना निदनीय है, सुदर वा शोभा युक्त नहीं है । ऐसा आचरण जैन मार्ग को दूषित करने वाला है, निदनीय है ।


णिग्गंत्थं पव्वयणं जिणवरणाहेण अक्खियं परमं ।
तं छंडिऊण अण्णं पवत्तमाणेण मिच्छत्तं ॥152॥

गाथार्थ: आचार्य शांतिचन्द्र नें उस प्रथम शिष्य जिनचन्द्र से कहा कि भगवान् जिनेन्द्र देव ने मोक्ष का सर्वोत्कृष्ट मार्ग निर्ग्रंथ मार्ग ही बतलाया है । ऐसे इस निर्ग्रंथ मार्ग को छोडकर जो अन्य किसी भी मार्ग की प्रवृत्ति करता है तो उसका वह मिथ्यात्व कहलाता है ।


ता रुसिऊण पहओ सीसे सीसेण दीहदंडेण ।
थविरो घाएण मुओ जाओ सो विंतरो देवो ॥153॥

गाथार्थ: आचार्य शांतिचन्द्रकी यह बात सुनकर उनका मुख्य शिष्य जिनचन्द्र बहुत ही क्रोधित हुआ और क्रोधित होकर उसने आचार्य शांतिचन्द्रके मस्तक पर एक दीर्घ दण्ड मारा । उस दीर्घ दण्ड के घातसे वे आचार्य शांतिचन्द्र मर गये और मरकर व्यंतर देव हुए ।


इयरो संघाइवइ पयडिय पासंड सेवडो जाओ ।
अक्खइ लोए धम्मं सग्गत्थे अत्थि णिव्वाणं ॥154॥

गाथार्थ: तदन्तर उस जिनचन्द्रनें अपने को संघाधिपति घोषित किया अर्थात् वह स्वयं संघाधिपति बन गया और उसने यह श्वेतांबरों का मत चलाया उसने लोगोंसे कहा कि परिग्रह सहित होनेपर भी मोक्ष मार्गरुप धर्म की सिद्धी होती है तथा परिग्रह सहित होनेपर भी मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है ।


सत्थाइं विरइयाइं णियणियपासंडगहियसरिसाइं ।
वक्खाणि ऊण लोए पवित्तिओ तारिसायरणो ॥155॥

गाथार्थ: तदनन्तर उस जिनचन्द्रने अपने अपने जो पाखण्ड ग्रहण कर लिये थे तथा जिन जिन आचरणों को उसने धारण कर लिया था उन्ही के समान आचरणों को कहने वाले शास्त्रों की रचना कर ली । तथा वैसे ही आचरण पालन करनेका वह उपदेश देता था ।


णिग्गंथं दूसित्ता णिंदित्ता अप्पणां पसंसित्ता ।
जीवेइ मूढलोए कयमामं गहिह बहुदव्वं ॥156॥

गाथार्थ: इस प्रकार उनने निर्ग्रन्थ लिंग को दूषित किया उसकी निन्दा की और अपनी प्रशंसा की । इस प्रकार बहुतसे द्रव्यों को ग्रहण करते हुए जीवित रहते हैं ।


इयरांवितर देवो संती लग्गो उपद्दवं काउं ।
जप्पइ मा मिच्छत्तं गच्छह लहिऊण जिणधम्मं ॥157॥

गाथार्थ: इधर आचार्य शांतिचन्द्रका जीव जो व्यंतर देव हुआ था वह अनेक प्रकारके उपद्रव करने लगा और कहने लगा कि तुम लोग जिनधर्मको धारण करके मिथ्यात्व को ग्रहण मत करो ।


भीएहिं तस्स पुआ अट्ठविहा सयलदव्वसंपुण्णा ।
जा जिणचन्दे रइया सा अज्जवि दिण्णिया तस्स ॥158॥

गाथार्थ: व्यन्तरदेवकी यह बात सुनकर और उसके किये हुए उपद्रवों को देखकर जिनचन्द्रने समस्त आठों द्रव्यों से उसकी पूजा की । वह पूजा इन श्वेतांबरों में आज तक की जाती है ।


अज्जवि सा वलिपूआ पढमयरं विंति तस्स णामेण ।
सो कुलदेवो उत्तो सेवउसंघस्स पूज्जो सो ॥159॥

गाथार्थ: जिनचन्द्रने जिस प्रकार उस व्यन्तरदेव की पूजा की थी उसी प्रकार सबसे पहले आज तक उसीके नामसे पूजा की जाती है । श्वेतांबर संघ आज तक उसको कुलदेवता मानकर उसकी पूजा करता है ।


इय उप्पत्ती कहिया सेवउयाणं च मग्गभट्टाणं ।
एतो उड्ढं वोच्छं णिसुय अण्णाणमिच्छतं ॥160॥

गाथार्थ: इस प्रकार निर्ग्रन्थ मार्ग से च्युत श्वेतपट लोगों की उत्पत्ति वतलाई ।
अव इसके आगे अज्ञान मिथ्यात्व का स्वरुप कहते है उसे सुनो ।


मसय पूरण रिसिणा उप्पणो पासणाह तित्थम्मि ।
सिरि वीर समवसरणो अगहिय झुणिणा णियत्तेण ॥161॥

गाथार्थ: भगवान् पार्श्वनाथ के समय में मस्करीपूरण नाम के एक मुनि थे । वे भगवान् महावीर स्वामी के समवसरण में आये थे परंतु गणधर न होने से दिव्य ध्वनी हो नहीं रही थी । जब इन्द्र गौतम को ले आया था तथा आते ही गौतम ने दीक्षा धारण कर ली तथा उसे ज्ञान मनःपर्याय अवधि ज्ञान हो गया था उसी समय गणधरके स द्भाव होने से भगवान् की दिव्य ध्वनी खिरने लगी थी । यह सब देखकर वह मस्करीं पूरण मुनि बाहर निकल आया था । मस्करी पूरण ने भगवान् की दिव्य ध्वनी सुनी नहीं थी । वह पहले ही समवसरण से बाहर निकल आया था ।


वहिणिग्गएण उत्तं मज्झं एयारसंगधारिस्स ।
णिग्गइ झुणी ण अरुहो विणिग्गया सा ससी सस्स ॥162॥

गाथार्थ: समवशरण के बाहर आकर उस मस्करी पूरण ने लोगों से कहा कि देखो मैं ग्यारह अंगों का पांठी था, मैं समवशरण में बैठा रहा तथापि भगवान् महावीर स्वामी की दिव्य ध्वनी प्रगट नहीं हुई। जब उनके शिष्य गौतम आगये तब वह दिव्य ध्वनी प्रगट होने लगी।


ण मुणइ जिणकहियसुयं संपइ दिक्खा य गहिय गोयमओ ।
विप्पो वेयब्भासी तम्हा मोक्खं ण णाणाओ ॥163॥

गाथार्थ: वह गौतम ऋषि भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए शास्त्रों को नहीं जानता । वह तो वेद शास्त्रों का अभ्यास करने वाला है । उसने आकर दीक्षा लेली थी । इसीलिये भगवान् की वाणी खिरने लगी थी । इससे सिद्ध होता है कि मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से नहीं होती अज्ञान मे ही होती है । यदि ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती तो ग्यारह अंग के जानकर ऐसे मेरे होते हुए दिव्यध्वनि अवश्य प्रकट होनी चाहिये थी । मेरे होते हुए दिव्यध्वनि प्रगट नहीं हुई । इससे जान पडता है कि मोक्ष की प्राप्ति अज्ञान से होती है ज्ञान से नहीं ।


अण्णाणाओ मोक्खं एवं लोयाण पयडमाणो हु ।
देवो ण अत्थि कोई सुण्णं झाएह इच्छाए ॥164॥

गाथार्थ: वह मस्करी पूरण समवशरण के बाहर आकर कहने लगा कि मोक्ष की प्राप्ति अज्ञानता से होती है ज्ञान से नहीं होती । इस संसार में देव कोई नहीं है । प्रत्येक जीवको अपनी इच्छा के अनुसार शून्य का ही ध्यान करना चाहिये इस प्रकार मस्करी पूरण ने प्रकट कर अज्ञान मिथ्यात्व को प्रकट किया ।


एवं पंचपयारं मिच्छत्तं सुग्गइणिवारणयं ।
दुक्खसहस्सावासं परिहरियव्वं पयत्तेण ॥165॥

गाथार्थ: इस प्रकार विपरीत मिथ्यात्व, एकांत मिथ्यात्व, वैनयिक मिथ्यात्व, संशय मिथ्यात्व और अज्ञान मिथ्यात्व ये पांचों मिथ्यात्व शुभ गति के निवारण करनेवाले तथा हजारों प्रकार के दुःख देनेवाले है । इसलिये भव्य जीवो को प्रयत्न पूर्वक इनका त्याग कर देना चाहिये ।


मिच्छत्तेणाच्छण्णो अणाइ कालं चउग्गईभुवणे ।
भमिओ दुक्खक्कं तो जीवो देायइ गिण्हंतो ॥166॥

गाथार्थ: मिथ्यात्व से आक्रांत हुआ यह जीव अनादि काल से चारों गतियों में अनेक प्रकार के शरीर धारण करता हुआ और अनेक प्रकार के दुःखो को भोगता हुआ इस संसार में परिभ्रमण कर रहा है ।


एइंदियाइपहुइ जावय पंचक्खविविहजोणीसु ।
भमिहइ भविस्सयाले पुणरवि मिच्छत्तपच्छइओ ॥167॥

गाथार्थ: एकेन्द्रिय से लेकर पंचेद्रियतक चौरासी लाख योनियां है । उन सब मे यह जीव मिथ्यात्व के कारण ही परिभ्रमण करता रहता है अनादि काल से आज तक परिभ्रमण करता रहा है और फिर भी मिथ्यात्व का सेवन करता है इसलिये भविष्य काल में अनंत काल तक परिभ्रमण करता ही रहेगा ।


अत्तरउद्दारुढो विसमे काऊण विविहपावाइं ।
अवियाणंतो धम्मं उपज्जइ तिरियणरएसु ॥168॥

गाथार्थ: मिथ्यात्व कर्मके उदय होने से ये जीव सदाकाल आर्तध्यान और रौद्रध्यान करते रहते है और इस प्रकार अनेक प्रकार के महा भयानक पाप उपार्जन करते रहते है । ऐसे लोग धर्म का स्वरुप समझते नही और इसीलिये वे जीव मरकर नरक गति वा तिर्यंच गति में जाकर जन्म लेते है ।


अहवा जह कहव पुणो पावइ मणुयत्तणं च संसारे ।
जु असमिला संजोए लहइण देसोकुलं आऊ ॥169॥

गाथार्थ: यदि किसी प्रकार इस संसार में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य योनि भी प्राप्त हो जाती है तो अशुभ कर्मों के उदय होने से श्रेष्ठ देश, श्रेष्ठ कुल और उत्तम आयु प्राप्त नहीं होती ।


पउरं आरोपत्तं इंदियपुण्णत्तण जोव्वणियं ।
सुन्दररुवं लच्छी अच्छइ दुक्खेण तप्यंतो ॥170॥

गाथार्थ: इस प्रकार क्षुद्र मनुष्य होकर भी वह अनेक प्रकार के दुःखों मे दुःखी होता हुआ अपनी अधिक आरोग्यता की प्रार्थना करता रहता है, इन्द्रियों की पूर्णता की प्रार्थना करता रहता है, यौवन की प्रार्थना करता रहता है और सुन्दर रुप और लक्ष्मी की प्रार्थना करता रहता है ।


जइ कह वि हु एयाइं पावइं सव्वाइं तो ण पावेई ।
धम्मं जिणेण कहियं कुच्छियगुरुमग्गलग्गाओ ॥171॥

गाथार्थ: यदि किसी प्रकार वह जीव उत्तम देश, उत्तम कुल, उत्तम आयु, आरोग्य शरीर इन्द्रियों की पूर्णता, यौवन और सुन्दर रूप भी प्राप्त कर लेता है तो भी कुत्सित वा मिथ्यादृष्टियों के मार्ग में लगा हुआ वह जीव भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहें हुए धर्म को प्राप्त नहीं कर सकता है ।


कउलायरिओ अक्खइ अत्थि ण जीवो हु कस्स तं पावं ।
पुण्णं वा कस्स भवे को गच्छइ णरय सग्गं वा ॥172॥

गाथार्थ: कौलाचार्य कहते है कि इस संसार में जीव ही कोई नहीं है। जब जीव कोई है ही नहीं तो फिर किसको पाप लगता है, किसको पुण्य लगता है कौन नरक जाता है और कौन स्वर्ग में जाता है।


जइगुडधादइ जोए पिठरे जाएइ मज्जिरा सत्ती ।
तह पंच भूय जोए चेयणसत्ती समुब्भवई ॥173॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी थाली वा पात्र में गुड और धाय के फूल मिलाकर रख देने से उसमें मद्य की शक्ति उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार पृथ्वी जल तेज वायु आदि पंच भूत मिल जाने से चैतन्य शक्ति उत्पन्न हो जाती है ।


गब्भाई मरणंतं जीवो अत्थित्ति तं पुणो मरण ।
पंचभूयाण णासे पच्छा जीवत्तणं णत्थि ॥174॥

गाथार्थ: इस प्रकार पंच भूतों से मिलकर चैतन्य शक्ति उत्पन्न होनें के कारण गर्भ से मरण तक जीवकी सत्ता रहती है । तदनंतर जव वह जीव मर जाता है तव पंच भूतों का भी नाश हो जाता है इसलिये फिर जीव की सत्ता सर्वथा नष्ट हो जाती है । फिर जीव नहीं रहता ।


तम्हा इंदिय सुक्खं भुंज्जिइ अप्पणाइं इच्छाए ।
खज्जइ पिज्जइ मज्जं मंसं सेविज्ज परमहिला ॥175॥

गाथार्थ: जब इस संसार मे जीव कोई पदार्थ है ही नही और इसलिये स्वर्ग नरक भी नहीं है तो फिर अपनी इच्छानुसार खूब इंद्रियों के सुखों को भोगो, खूब मांस खाओ, खूब मद्य पीओ, और खूब स्त्रियोंका सेवन करो । ऐसा करनें से कोई किसी को पाप नही लगता । क्योंकि वह जीव ही कोई पदार्थ नही है ।


जो इंदियाइं दंडइ बिसया परिहरइ खवइ णियदेहं ।
सो अप्पाणं वंचइ गहिओ भूएंहि पुव्वुद्धो ॥176॥

गाथार्थ: जीव का अभाव सिद्ध कर वह चार्वाक फिर कहता है कि को पुरुष अपनी इन्द्रियों का निग्रह करता है, इन्द्रियों के विषयों के सेवन का त्याग करता है और अपने शरीर को व्यर्थ कृश करता है वह दुर्बुद्धि मुर्ख पुरुष अपने आत्मा को ठगता है । समझना चाहिये की ऐसा पुरुष अनेक भूतों द्वारा घेर रक्खा है इसलिये वह सुखों का अनुभव नहीं करता । लिखा भी है -


176॥

संखो पुणु मणइ इयं जीवो अत्थित्ति किरियपरिहीणो ।
देहम्मि णिवसमाणो ण लिप्पए पुण्णपावेंहि ॥177॥

गाथार्थ: सांख्यमत वाला कहता है कि जीव तो है परंतु वह क्रिया रहित है इसलिये वह शरीर मे निवास करता हुआ भी पुण्य वा पापों से लिप्त नही होता ।


छिज्जइ भिज्जइ पयडी पयडी परिभमइ दीहसंसारे
पयडी करेइ कम्मं पयडी भुंजेइ सुह दुक्खं ॥178॥

गाथार्थ: प्रकृति ही छिन्न भिन्न होती रहती है और प्रकृति ही इस संसार समुद्र में परिभ्रमण करती है । प्रकृति ही पुण्य पाप रूप कर्म उपार्जन करती है और प्रकृति ही सुख दुःख का अनुभव करती है ।


जीवो सया अकत्ता मुत्ता ण हु होइ पुण्ण पावस्स ।
इय पयडिऊण लोए गहिया वहिणी सधूया वि ॥179॥

गाथार्थ: यह जीव वा पुरुव सदा काल अकर्ता रहता है न वह पुण्य करता है और न पाप करता है। इसीं मान्यतानुसार पाप के फल का भोक्ता भी नहीं है। इस प्रकार प्रगट करता हुआ तो अपनी वहिन और बेटी को भीं ग्रहण कर लेता है।


179॥

एए विसयासत्ता कग्गुम्मुत्ता य जीवदयरहिया ।
परतियधणहरणरया अगहिय धम्मा दुरायारा ॥180॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि ऐसे लोग सदा काल विषयों में आसक्त रहते है, काम सेवन के लिये उन्मत्त रहते है, जीवों की दया पालन नहीं करते, परस्त्री और पर धन हरण करने में सदा लगे रहते है, अत्यंत दुराचारी है और यथार्थ धर्म का स्वरूप कभी स्वीकार नहीं करते ।


ण मुणंति सयं धम्मं अनुणिय तच्चत्थयार पब्भट्टा ।
पउरकसाया माई कह अण्णेसिं फुडं विंत्ति ॥181॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है जो सांख्य लोग स्वयं धर्म का स्वरूप नहीं जानते न तत्त्वों का अर्थ वा स्वरूप समझते है वे स्वय सदाचार से भ्रष्ट होते है क्रोध मान माया लोभ इन चारों कषायों की तीव्रता को धारण करते है अत्यंत मायाचारी होते है फिर न मालूम वे दूसरों के लिय धर्म का उपदेश कैसे देते है ।


रंडा मुंडा थंडी सुंडी दिक्खिदा धम्मदारा ।
सीसे कंता कामासत्ता कामिया सवियारा ।।
मज्जं मसं मिट्ठं भक्खं भक्खियं जीवसोक्खं च ।
कउले धम्मे विसयेमोम्मे तं जिहो सग्गसेक्खं ॥182॥

गाथार्थ: जो स्त्री विधवा हो, मस्तक मुडाये हो, चंडी वा मद्य पीने वाली हो, दीक्षित हो, किसी की धर्मपत्नी हो, शिष्या हो, कांता हो, काम सेवन की लालसा रखती हो, कामासक्त हो, अनेक प्रकार के विकार वाली हो, उसे सबको सेवन कर लेना चाहिये, खूब मद्य पीना चाहिये, खूब मांस खाना चाहिये, सब प्रकार से सुख देना चाहिये, ऐसा सांख्य मत वाले कहते है । इस प्रकार सांख्य मत विषयों के सेवन से भरपूर मनोहर है और वे लोग उसीसे स्वर्ग मोक्ष की प्राप्ति मानते है।


182॥

रत्ता मत्ता कंतासत्ता दूसिया धम्ममग्गा ।
हुट्ठा कट्ठाधिट्ठा झुट्ठाणिंदि जो मोक्खमग्गा
अक्खे सुक्खे अग्गेदुक्खे णिब्भरं दिण्णचित्ता ।
णेरइयाणं दुक्खट्ठाणं तस्स सिस्सा पउत्ता ॥183॥

गाथार्थ: सांख्य मतवाले रक्त पी पी कर उन्मत्त हो जाते है, स्त्रियों में सदा आसक्त रहते है, धर्म के समस्त मार्गों को दूषित करते रहते है, दुष्ट होते है, दुःखदायक होते है, घृष्ट होते है, मिथ्यावादी होते है, मोक्ष मार्ग की निंदा करते रहते है, वे लोग इन्द्रियों को सुखी बनाते रहते है । परंतु आगे के लिये वे लोग बिना किसी संदेह के महा दुःख भोगने के लिये दत्त चित्त रहते है । तथा इसीलिये उस सांख्य मत को मानने वाले उनके समस्त शिष्य नरक के महा दुःख के स्थानों को प्राप्त होते है ।


मज्जे धम्मो जीव हिंसाइं धम्मो ।
राई देवो दोसी देवो माया सुण्णं पि देवो
रत्ता मत्ता कंतासत्ता जे गुरु तेवि य पुज्जा ।
हा हा कट्ठ णट्ठो लोओ अहमहं कुणंतो ॥184॥

गाथार्थ: सांख्य लोग कहते है कि मद्य पीने मे भी धर्म है, मांस खाने में भी धर्म है, जीवों की हिंसा करने मे भी धर्म है, राग करनेवाला भी देव है द्वेष करनेवाला भी देव है, माया रहित भी देव है, जो गुरु रक्त मांस आदि के सेवन करने में मदोन्मत्त है और स्त्रियों मे आसक्त है ऐसे गुरु भी पूज्य माने जाते है इस प्ररार सांख्य लोग कहते है। इस पर आचार्य कहते है कि यह बडे दुःख की बात है। इन सांख्य मतवालो ने महा अनर्थ करते हुए समस्त लोक को नष्ट कर दिया।


धुया मायर वहिणी अण्णावि पुत्तत्थिणि
आयतिय वासवयणु पयडे वि विप्पे ।
जइ रगिय कामाउरेण वेयगव्वे उप्पण्णदप्पे
वं भणि छिंपिणि डोंवि नडिय बरुडि रज्जइ चम्मारि
कबले समइ समागमेइ तह भुत्ति य परणारि ॥185॥

गाथार्थ: यदि पुत्र की इच्छा करनेवाली पुत्री माता बहिन आदि कोई भी आवे तो ब्राम्हणों को व्यास के वचन ही प्रगट कर दिखाने चाहिये । जिस प्रकार वेद ज्ञान से उत्पन्न हुए अभिमान से मदोन्मत्त कामसक्त ब्राम्हण ने ब्राम्हणी, भंगिन नटिनी धोबिन चमारिन कंजरिन आदि सब के साथ रमण किया था उसी प्रकार सांख्य मत मे अपने पास आई हुई परस्त्री का सेवन करना चाहिये । ऐसा सांख्य मत है । इसके सिवाय सांख्य मत में यहां तक लिखा है कि -


अण्णाण धम्मलग्गो जीवो दुक्खाण पूरिओ होइ ।
चउगइ गईहिंणिवडइ संसारे भमिहि हिडंतो ॥186॥

गाथार्थ: इस प्रकार सांख्य मत को माननेवाले अज्ञान धर्म में लगे हुये जीव अनेक महा दुःखो से पूरित हो जाते है। तथा चारों गतियों मे परिभ्रमण करते हुए दीर्घ कालतक ससार में पडे हुए महा दुःख भोगा करता है -


जइ पाहाण नरंदे लग्गो पुरिसो हु तरिणी तोये ।
वुड्डइ विगयाधारो णिवडइ महण्णवावत्ते ॥187॥

गाथार्थ: जिस प्रकार पाषाण की नाव में बैठा हुआ पुरुष विना किसी आधार के नदीं के पानी में डूब जाते है उसी प्रकार अज्ञान धर्म में लगे हुए जीव इस संसार रुपी महा समुद्र मे पडकर अनंत कालतक परिभ्रमण करते रहते है ।


गुच्छियगुरुकयसेवा विविहावइपउरदुक्खआवत्ते ।
तह पणिमज्जइ पुरिसो संसार महोवही भीमे ॥188॥

गाथार्थ: जिस प्रकार कुत्सित वा नीचगुरु की सेवा करने से अनेक प्रकार के दुःखरुपी समुद्र में पड जाता है उसी प्रकार कुगुरु की सेवा करने से यह पुरुष भी इस संसार रुपी महा भयानक समुद्र में पडकर अनंत काल के लिये डूव जाता है ।


वयभट्ठ कुंठ रुद्देहिं णिट्ठुर णिक्किट्ठदुट्ठचिट्ठेहिं ।
अप्पाणं णासिभो अण्णेवि य णासिओ लोओ ॥189॥

गाथार्थ: जितने कुगुरु है वे सब व्रतों से भ्रष्ट है अत्यंत क्रूर परिणामों को धारण करनेवाले हैं अत्यंत निष्ठूर हैं निकृष्ट है, और दुष्ट चेष्टाओं का करने वाले है । इसलिये ऐसे कुगुरु अपने आत्मा का भी नाश करते है और अन्य अनेक जीवों का भी नाश करते है ।


इय अण्णाणी पुरिसा कुच्छियगुरुकहियमग्गसंलग्गा ।
पावंति णरय तिरयं णाणा दुहसंकडं भीमं ॥190॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो पुरुष निकृष्ट कुगुरुओं के द्वारा कहे हुए मिथ्या मार्ग में लगे रहते है वे पुरुष नरक वा तीर्यंच योनि में पडकर अत्यंत भयानक ऐसे अनेक प्रकार के महा दुःख भोगा करते है ।


एवं णाऊण फुडं सेविज्जइ उत्तमो गुरु कोई ।
वहिरंतरगंथचुओ तिरियणवंतो सुणाणी य ॥191॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि इस प्रकार कुगुरुओं के कहे अनुसार महा दुःख भोगने पडते है। ऐसा समझ कर ऐसे उत्तम गुरु की सेवा करनी चाहिये जो बाह्य आभ्यंतर दोनों प्रकार के परिग्रहों से रहित हों स्वयं तरनेवाला और भव्य जीवों को तारनेवाला हो, और सम्यग्ज्ञान को धारण करनेवाला हो।


जइ जाय लिंगधारी विसयविरत्तो य णिहयसकसाओ ।
पालयदिढवंवओ सो पावइ उत्तमं सोक्खं ॥192॥

गाथार्थ: जो गुरु जात लिंगधारी हो अर्थात् जिस प्रकार उत्पन्न होता है उसी प्रकार समस्त परिग्रहों से रहित नग्न अवस्था को धारण करनेवाला हो, इन्द्रियों के समस्त विषयों से विरक्त हो, जिसने अपनी समस्त कषायें नष्ट कर दी हों और जो ब्रह्मचर्य व्रत को पूर्ण रीति से दृढता के साथ पालन करता हो, ऐसे परमगुरु की सेवा करने से ही यह जीव निराकुल सुख की प्राप्ति कर सकता है ।


192॥

ते कहिय धम्म लग्गा पुरिसा डहिऊण सकयपावाइं ।
पावंति मोक्खं सोक्ख केई विलसंति सग्गेसु ॥193॥

गाथार्थ: जो पुरुष ऐसे निर्ग्रंथ परम गुरु के कहे हुए धर्म का सेवन करते है वे पुरुष अपने समस्त पापों को नाश कर मोक्ष के अनंत सुख प्राप्त करते है तथा उनमे से कितने पुरुष स्वर्ग के सुख भोगते है ।


एवं मिच्छदिट्ठि ट्ठाणं कहिय मया समासेग ।
एत्तो उड्ढं वोच्छ विदियं पुण सासणं णामं ॥194॥

गाथार्थ: इस प्रकार अत्यंत संक्षेप से मिथ्यात्व गुणस्थान का स्वरूप कहा । अब आगे दूसरे सासादन नाम के गुणस्थान का स्वरूप कहते है ।
इस प्रकार मिथ्यात्व गुणस्थान का स्वरूप वा मिथ्यात्व गुणस्थान में होनेवाले परिणामों का स्वरूप कहा ।
अब आगे सासादन गुणस्थान का स्वरूप कहते है ।

सासादन व मिश्र गुणस्थान; ब्रह्मा, विष्णु, महादेव के कार्य और उनका निराकरण (गाथा 195 से 258)

एयदरस्स उदये अणंतवधिस्स संवरायस्स ।
समयाइ छविलित्ति य एसो कालो समुद्दिट्ठो ॥195॥

गाथार्थ: किसी भव्य जीव के काल लब्धि के निमित्त से प्रथम उपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति होती है । उस उपशम सम्यक्त्व का काल अंत मूहूर्त है । जब उस अतर्मूहूर्त काल के समाप्त होनेमें कम से कम एक समय और अधिक म अधिक छह आवली शेष रह जाती है तब अनन्तानुबंधी क्रोध मान माया लोभ मे से किसी एक प्रकृति का उदय हो जाता है । उस प्रकृति के उदय होने से सम्यग्दर्शन छूट जाता है परन्तु मिथ्यात्व प्रकृति का उपशम होने से मिथ्यात्व गुणस्थान नही होता । उपशम सम्यक्त्व की स्थिती में जितना काल शेष रहा है उसके समाप्त होने पर मिथ्यात्व का उदय होता है और उस समय वह मिथ्यात्व गुणस्थान में पहुँच जाता है । सम्यग्दर्शन के छूट जाने के अनंतर से लेकर जबतक मिथ्यात्व गुणस्थान प्राप्त होता है तब तक का इस सासादन गुणस्थान का काल है और वह कम से कम एक समय है और अधिक से अधिक छह आवली है ।


एयम्मिगुणट्ठाणे कालो णत्थित्ति तित्तिओ जम्हा ।
तम्हा वित्थाणे ण हि संखेओ तेण सो उत्तो ॥196॥

गाथार्थ: इस दूसरे सासादन गुणस्थान का कुछ समय वा काल नहीं है। ऊपर जितना बतलाया है केवल उतना ही काल है इसीलिये इस गुणस्थान का स्वरूप विस्तार से नहीं कहा है अत्यंत संक्षेप से ही उसका स्वरूप कहा है।


परिणामिय भावगयं विदियं सासायणं गुणट्ठाणं ।
सम्मत्त सिहर पडियं अपत्त मिच्छत भूमितलं ॥197॥

गाथार्थ: जिस प्रकार कोई पुरुष किसी पर्वत से गिरता है और जब तक पृथ्वीपर नही आजाता तवतक वह न तो पर्वतपर माना जाता है और न पृथ्वी पर किंतु मध्य में माना जाता है । इसी प्रकार जिस जीवके उपशम सम्यग्दर्शन छूट गया है और मिथ्यात्व गुण स्थान प्राप्त नहीं हुआ है तब तक उसके सासादन गुणस्थान कहलाता है । इस दूसरे गुणस्थान मे पारिणामिक भाव माने जाते हैं ।


सम्मामिच्छुदएण य सम्मिस्सं णाम होइ गुणठाणं ।
खयउवसमभावगयं अंतरजाई समुद्दिट्ठं ॥198॥

गाथार्थ: दर्शन मोहनीय की तीन प्रकृतियां है:- मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति । इनमें से सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति के उदय से मिश्रगुण स्थान होता है । इसमें क्षायोपशमिक भाव होते है । तथा वे परिणाम सम्यक्त्व और मिथ्यात्व इन दोनों से संम्मिलित रूप होते है।


वडवाए उप्पण्णो खेरण जइ हवइ इत्थ वेसरओ ।
तह तं सम्मिस्स गुणं अगहिय गिह सयल संजमणं ॥199॥

गाथार्थ: जिस प्रकार खच्चर जाति का गधा घोडी से उत्पन्न होता है परंतु गधे से होता है घोडा से नहीं होता । घोडी गधा दोनों से उत्पन्न होने वाला एक तीसरी जाति का जीव है । इसी प्रकार इस तीसरे मिश्रगुणस्थान में सम्यक्त्व और मिथ्यात्व दोनों से मिले हुए एक तीसरी जाति के परिणाम होते है । इस तीसरे गुणस्थान में रहनें वाले जीव न तो गृहस्थों का एक देश संयम धारण कर सकते है और न सकल संयम धारण कर सकते है ।


तत्थ ण वंधइ आउं कुणइ ण कालो हु तेण भावेण ।
सम्मं वा मिच्छं वा पडिवज्जिय मरइ णियमेण ॥200॥

गाथार्थ: इस तीसरे गुणस्थान में रहने वाला जीव न तो आयु का बंध कर सकता है और न मर सकता है । तीसरे गुणस्थान के भावों से ये दोनों बाते नहीं कर सकता । वह जीव या तों सम्यग्दर्शन धारण कर मर सकता है अथवा मिथ्यात्व गुणस्थान मे जाकर मर सकता है ।


अट्टरउद्दं झायइ देवा सव्वे वि हुंति णमणीया ।
धम्मासव्वे पवरा गुणाणं किं पि ण विणिए इ ॥201॥

गाथार्थ: इस तीसरे गुणस्थान मे रहनेवाले जीव के आर्तध्यान और रौद्रध्यान होता है अर्थात् वह इन्हीं दोनों का चितवन करता रहता है। इसके सिवाय वह समझता है कि संसार मे जितने देव है वे सब नमस्कार करने योग्य है और जितने धर्म है वे सब उत्तम है । इस प्रकार समझता हुआ वह जीव गुण वा अवगुण किसी को नही जानता, इस देव में अवगुण है इसमें गुण है इस बात को वह नहीं समझता वह सब को समान समझता है ।


अत्थि जिणयमि कहियं वेए कहियं च हरिपुराणे य ।
सइवागमेण कहित तच्चं कविलेण कहियं च ॥202॥

गाथार्थ: वह तीसरे गुणस्थान वाला जीव जिनेन्द्रदेव नें भी कहा है शैवो के आगम में भी कहा है और कपिल ने भी कहा है । इन सबके कहे हुए तत्त्व ठीक है, ऐसा समझकर वह सबको मानता है । इसके सिवाय वह समझता है कि ब्रह्मा तीनों लोकों को उत्पन्न करता है, कृष्ण ऊपर से ही स्पर्शकर उन तीनों लोकों का पालन करता है और महादेव उन समस्त तीनों लोकों का प्रलय कर सब वा संहार वा नाश कर देता है । इसके सिवाय वह चंडी मुंडी महालक्ष्मी आदि सब देव देवि योंकी पूजा करता है, पितरों को तृप्त करने के लिये श्राद्ध करता है, अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये अन्य प्रकार के ढोंग करता है । ऐसे ऐसे अनेक प्रकार के भाव इस तीसरे गुणस्थान में होते हैं ।


वंभो करेइ तिजयं किण्हो पालेइ उवरि छुहिऊण ।
रुद्दो संहरइ पुणो पलयं काऊण णिस्सेसं ॥203॥

गाथार्थ: वह तीसरे गुणस्थान वाला जोव जिनेन्द्रदेव नें भी कहा है शंवो के आगम में भी कहा है और कपिल ने भी कहा है । इन सबके कहे हुए तत्त्व ठीक है, ऐसा समझकर वह सबको मानता है । इसके सिवाय वह समझता है कि ब्रह्मा तीनों लोकों को उत्पन्न करता है, कृष्ण ऊपर से ही स्पर्शकर उन तीनों लोकों का पालन करता है और महादेव उन समस्त तीनों लोकों का प्रलय कर सब वा संहार वा नाश कर देता है । इसके सिवाय वह चंडी मुंडी महालक्ष्मी आदि सब देव देवि योंकी पूजा करता है, पितरों को तृप्त करने के लिये श्राद्ध करता है, अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिये अन्य प्रकार के ढोंग करता है । ऐसे ऐसे अनेक प्रकार के भाव इस तीसरे गुणस्थान में होते हैं ।


जइ वंभो कुणइ जयं तो किं सग्गिंदरज्ज कज्जेण ।
चइऊण वंभ लोयं उग्गतवं तवइणरलोए ॥204॥

गाथार्थ: यदि ब्रह्मा तीनों लोकों को उत्पन्न करता है तो फिर वह स्वर्ग के इन्द्रका राज्य लेने के लिये ब्रह्म लोक को छोडकर और मनुष्य लोक मे आकर घोर तपश्चरण क्यों करता है ?


जरउद्दसेय अंडय सव्वे एयाइं भूयगामाइं ।
णारय णर तिरिय सुरा णिबंदियं वणिसुद्दपहुईया ॥205॥

गाथार्थ: मनुष्य पशु के शरीर पर जो मांस की जाली आती है उसको जरायु कहते है, ऐसी जरायुसहित जो उत्पन्न होते है उनको जरायुज कहते है । पृथ्वीपर जो घास आदि उत्पन्न होते है उनको उद्भिज्ज कहते है अंडों से उत्पन्न होने वाले अंडज कहलाते है जो ब्रह्मा इन सब जीवों को उत्पन्न करता है, नारकी मनुष्य पशुपक्षी देव ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रों को उत्पन्न करता है, चांडाल, डोंब, धीवर, धोबी, कलार, छीपी, हाथी, घोडा, गाय, भैंस, गधा, व्याघ्र, सुअर, सिंह, हरिण आदि समस्त जीवो को उत्पन्न करता है, अनेक कुलों को उत्पन्न करता है, अनेक जातियों को उत्पन्न करता है, अनेक योनियों को उत्पन्न करता है, समस्त जीवों को आयु वैभव आदि उत्पन्न करता है, अनेक प्रकार के रूप उत्पन्न करता है, पर्वत नदी सागर द्वीप गांव नगर बाग बगीचा पृथ्वी आकाश आदि समस्त पदार्थों को समस्त जीवों को चितवन करने मात्र ही आधे क्षण मे ही सबको उत्पन्न कर लेता है ऐसा वह ब्रह्मा केवल स्वर्ग का राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण क्यों करता है ? व्यर्थ ही अपने शरीर को क्यों संतप्त करता है ? वह तो तीनों लोकों के उत्पन्न करने मे समर्थ है फिर भला वह अपने लिये राज्य उत्पन्न क्यों नहीं करलेता है । जिस प्रकार उसने तीनों लोक उत्पन्न किया है उसी प्रकार उसको एक स्वर्ग और उत्पन्न कर लेना चाहिये और स्वयं उसका राज्य करना चाहिये । उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखते हुए भी दूसरे राज्य को छीनने के लिये तपश्चरण करना कितने आश्चर्य और विडंबना की बात है । इससे सिद्ध होता है कि यह जगत् ब्रह्मा वा अन्य किसी का का बनाया हुआ नहीं है किंतु स्वय सिद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । इसका कर्ता कोई नहीं है ।


चंडाल डूंब धविरा वरुडा कल्लालछिप्पिया चेव ।
हय गय गोमहिसि खरा वग्घ किडी सीह हरिणाइं ॥206॥

गाथार्थ: मनुष्य पशु के शरीर पर जो मांस की जाली आती है उसको जरायु कहते है, ऐसी जरायसहित जो उत्पन्न होते है उनको जरायुज कहते है । पृथ्वीपर जो घास आदि उत्पन्न होते है उनको उद्भिज्ज कहते है अंडों से उत्पन्न होने वाले अंडज कहलाते है जो ब्रह्मा इन सब जीवों को उत्पन्न करता है, नारकी मनुष्य पशुपक्षी देव ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रों को उत्पन्न करता है, चांडाल, डोंब, धीवर, धोबी, कलार, छीपी, हाथी, घोडा, गाय, भैंस, गधा, व्याघ्र, सुअर, सिंह, हरिण आदि समस्त जीवो को उत्पन्न करता है, अनेक कुलों को उत्पन्न करता है, अनेक जातियों को उत्पन्न करता है, अनेक योनियों को उत्पन्न करता है, समस्त जीवों को आयु वैभव आदि उत्पन्न करता है, अनेक प्रकार के रूप उत्पन्न करता है, पर्वत नदी सागर द्वीप गांव नगर बाग बगीचा पृथ्वी आकाश आदि समस्त पदार्थों को समस्त जीवों को चितवन करने मात्र ही आधे क्षण मे ही सबको उत्पन्न कर लेता है ऐसा वह ब्रह्मा केवल स्वर्ग का राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण क्यों करता है ? व्यर्थ ही अपने शरीर को क्यों संतप्त करता है ? वह तो तीनों लोकों के उत्पन्न करने मे समर्थ है फिर भला वह अपने लिये राज्य उत्पन्न क्यों नहीं करलेता है । जिस प्रकार उसने तीनों लोक उत्पन्न किया है उसी प्रकार उसको एक स्वर्ग और उत्पन्न कर लेना चाहिये और स्वयं उसका राज्य करना चाहिये । उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखते हुए भी दूसरे राज्य को छीनने के लिये तपश्चरण करना कितने आश्चर्य और विडंबना की बात है । इससे सिद्ध होता है कि यह जगत् ब्रह्मा वा अन्य किसी का का बनाया हुआ नहीं है किंतु स्वय सिद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । इसका कर्ता कोई नहीं है ।


206॥

णाणा कुलाइं जाई णाणा जोणी य आउ विहवाइं ।
णाणा देह गवाइं वण्णा रूवाइं विविहाइं ॥207॥

गाथार्थ: मनुष्य पशु के शरीर पर जो मांस की जाली आती है उसको जरायु कहते है, ऐसी जरायसहित जो उत्पन्न होते है उनको जरायुज कहते है । पृथ्वीपर जो घास आदि उत्पन्न होते है उनको उद्भिज्ज कहते है अंडों से उत्पन्न होने वाले अंडज कहलाते है जो ब्रह्मा इन सब जीवों को उत्पन्न करता है, नारकी मनुष्य पशुपक्षी देव ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रों को उत्पन्न करता है, चांडाल, डोंब, धीवर, धोबी, कलार, छीपी, हाथी, घोडा, गाय, भैंस, गधा, व्याघ्र, सुअर, सिंह, हरिण आदि समस्त जीवो को उत्पन्न करता है, अनेक कुलों को उत्पन्न करता है, अनेक जातियों को उत्पन्न करता है, अनेक योनियों को उत्पन्न करता है, समस्त जीवों को आयु वैभव आदि उत्पन्न करता है, अनेक प्रकार के रूप उत्पन्न करता है, पर्वत नदी सागर द्वीप गांव नगर बाग बगीचा पृथ्वी आकाश आदि समस्त पदार्थों को समस्त जीवों को चितवन करने मात्र ही आधे क्षण मे ही सबको उत्पन्न कर लेता है ऐसा वह ब्रह्मा केवल स्वर्ग का राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण क्यों करता है ? व्यर्थ ही अपने शरीर को क्यों संतप्त करता है ? वह तो तीनों लोकों के उत्पन्न करने मे समर्थ है फिर भला वह अपने लिये राज्य उत्पन्न क्यों नहीं करलेता है । जिस प्रकार उसने तीनों लोक उत्पन्न किया है उसी प्रकार उसको एक स्वर्ग और उत्पन्न कर लेना चाहिये और स्वयं उसका राज्य करना चाहिये । उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखते हुए भी दूसरे राज्य को छीनने के लिये तपश्चरण करना कितने आश्चर्य और विडंबना की वात है । इससे सिद्ध होता है कि यह जगत् ब्रह्मा वा अन्य किसी का का बनाया हुआ नहीं है किंतु स्वय सिद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । इसका कर्ता कोई नहीं है ।


गिरि सरि सायर दीवो गामा रामाइं धरणि आयासं ।
जो कुणइ खणद्धेणं चिंत्तियमित्तेण सव्वाइं ॥208॥

गाथार्थ: मनुष्य पशु के शरीर पर जो मांस की जाली आती है उसको जरायु कहते है, ऐसी जरायसहित जो उत्पन्न होते है उनको जरायुज कहते है । पृथ्वीपर जो घास आदि उत्पन्न होते है उनको उद्भिज्ज कहते है अंडों से उत्पन्न होने वाले अंडज कहलाते है जो ब्रह्मा इन सब जीवों को उत्पन्न करता है, नारकी मनुष्य पशुपक्षी देव ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रों को उत्पन्न करता है, चांडाल, डोंब, धीवर, धोबी, कलार, छीपी, हाथी, घोडा, गाय, भैंस, गधा, व्याघ्र, सुअर, सिंह, हरिण आदि समस्त जीवो को उत्पन्न करता है, अनेक कुलों को उत्पन्न करता है, अनेक जातियों को उत्पन्न करता है, अनेक योनियों को उत्पन्न करता है, समस्त जीवों को आयु वैभव आदि उत्पन्न करता है, अनेक प्रकार के रूप उत्पन्न करता है, पर्वत नदी सागर द्वीप गांव नगर बाग बगीचा पृथ्वी आकाश आदि समस्त पदार्थों को समस्त जीवों को चितवन करने मात्र ही आधे क्षण मे ही सबको उत्पन्न कर लेता है ऐसा वह ब्रह्मा केवल स्वर्ग का राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण क्यों करता है ? व्यर्थ ही अपने शरीर को क्यों संतप्त करता है ? वह तो तीनों लोकों के उत्पन्न करने मे समर्थ है फिर भला वह अपने लिये राज्य उत्पन्न क्यों नहीं करलेता है । जिस प्रकार उसने तीनों लोक उत्पन्न किया है उसी प्रकार उसको एक स्वर्ग और उत्पन्न कर लेना चाहिये और स्वयं उसका राज्य करना चाहिये । उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखते हुए भी दूसरे राज्य को छीनने के लिये तपश्चरण करना कितने आश्चर्य और विडंबना की बात है । इससे सिद्ध होता है कि यह जगत् ब्रह्मा वा अन्य किसी का का बनाया हुआ नहीं है किंतु स्वय सिद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । इसका कर्ता कोई नहीं है ।


किं सो रज्यणिमित्तं तवसा तावेइ णिच्च णियदेहं ।
तिहुवण करण समत्थो किं ण कुणइ अप्पणो रज्जं ॥209॥

गाथार्थ: मनुष्य पशु के शरीर पर जो मांस की जाली आती है उसको जरायु कहते है, ऐसी जरायसहित जो उत्पन्न होते है उनको जरायुज कहते है । पृथ्वीपर जो घास आदि उत्पन्न होते है उनको उद्भिज्ज कहते है अंडों से उत्पन्न होने वाले अंडज कहलाते है जो ब्रह्मा इन सब जीवों को उत्पन्न करता है, नारकी मनुष्य पशुपक्षी देव ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रों को उत्पन्न करता है, चांडाल, डोंब, धीवर, धोबी, कलार, छीपी, हाथी, घोडा, गाय, भैंस, गधा, व्याघ्र, सुअर, सिंह, हरिण आदि समस्त जीवो को उत्पन्न करता है, अनेक कुलों को उत्पन्न करता है, अनेक जातियों को उत्पन्न करता है, अनेक योनियों को उत्पन्न करता है, समस्त जीवों को आयु वैभव आदि उत्पन्न करता है, अनेक प्रकार के रूप उत्पन्न करता है, पर्वत नदी सागर द्वीप गांव नगर बाग बगीचा पृथ्वी आकाश आदि समस्त पदार्थों को समस्त जीवों को चितवन करने मात्र ही आधे क्षण मे ही सबको उत्पन्न कर लेता है ऐसा वह ब्रह्मा केवल स्वर्ग का राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण क्यों करता है ? व्यर्थ ही अपने शरीर को क्यों संतप्त करता है ? वह तो तीनों लोकों के उत्पन्न करने मे समर्थ है फिर भला वह अपने लिये राज्य उत्पन्न क्यों नहीं करलेता है । जिस प्रकार उसने तीनों लोक उत्पन्न किया है उसी प्रकार उसको एक स्वर्ग और उत्पन्न कर लेना चाहिये और स्वयं उसका राज्य करना चाहिये । उत्पन्न करने की सामर्थ्य रखते हुए भी दूसरे राज्य को छीनने के लिये तपश्चरण करना कितने आश्चर्य और विडंबना की बात है । इससे सिद्ध होता है कि यह जगत् ब्रह्मा वा अन्य किसी का का बनाया हुआ नहीं है किंतु स्वय सिद्ध अनादि काल से चला आ रहा है । इसका कर्ता कोई नहीं है ।


अच्छरतिलोत्तमाए णट्टं दट्ठूण रायरस रसिओ ।
तवभट्टो चउवयणो जाओ सो मयणबस चित्तो ॥210॥

गाथार्थ: जब वह ब्रह्मा स्वर्गका राज्य लेने के लिये घोर तपश्चरण कर रहा था तब इन्द्र को भी अपने राज्य की चिंता हुई और उसका तपश्चरण भ्रष्ट करने के लिये तिलोत्तमा नाम की अप्सरा भेजी । वह तिलोत्तमा उस ब्रह्मा के सामनें आकर नृत्य करने लगी : जिसका मन कामसेवन के लिये आसक्त हो रहा है और राग के रससे रसिक हो है ऐसा वह ब्रह्मा उस नृत्य को देखता देखता अपने तपश्चरण से भ्रष्ट हो गया और नृत्य देखने के लिये उसने अपने चार मुख बना लिये ।


छंडिय णियवड्डत्तं पहुत्तणं देव वत्तणं तवोचरियं ।
कामाउरो अलज्जो लग्गो मग्गेण सो तिस्स ॥211॥

गाथार्थ: इस प्रकार उस ब्रह्माने अपना वडप्पन छोड दिया, अपना प्रभुत्व छोड दिया, अपना देवपना छोड दिया और अपना तपश्चरण छोड दिया, कामासक्त होकर जिस मार्ग से वह तिलोत्तमा चलने लगी उसी मार्ग से उसके पीछे पीछे चलनें लगा ।


हसिओ सुरेंहि कुद्धो खरसीसो भक्खिउं पउत्तो सो ।
संकरकरकंडियसिरो विरहपलित्तो णियत्तो य ॥212॥

गाथार्थ: ब्रह्मा की इस कामासक्ति को देखकर देवलोग सब हसनें लगे तब ब्रह्मानें क्रोधित होकर अपने गधे वाले मुख से उन देवों को भक्षण करनेंका उद्यम किया । यह देखकर देव लोग सब महादेव की शरण मे गये तब महादेव नें अपने हाथ से उस ब्रम्हा का ऊपर का गधेका मस्तक काट डाला । इस प्रकार जब उस ब्रम्हाका ऊपर का मस्तक कट गया तब वह ब्रम्हा उस तिलोतमा के बिरह से संतप्त होकर पीछे लौट आया ।


पविसेवि णिज्जणांवणं पिच्छिरिछी विरहगओ तत्थ ।
सेवइ कामासत्तो तिलोत्तमा चित्ति धरिऊणं ॥213॥

गाथार्थ: तदनंतर वह ब्रम्हा तिलोत्तमा के विरह से संतप्त होकर एक निर्जन वनमें चला गया । यहां पर उसने एक रीछिनी देखी । और उस रीछिनी को अपने मनमें तिलोत्तमा मानकर कामदेव के वशीभूत होकर उस रीछिनी के साथ संभोग करनें लगा ।


213॥

तस्सुप्पण्णो पुत्तो जंबउ णामेण लोय विक्खाओ ।
रिच्छापई जाओ भिच्चो सो रामदेवस्त ॥214॥

गाथार्थ: जब ब्रम्हानें उस रीछिनी के साथ संभोग किया तब उस रीछिनी से एक पुत्र हुआ उसका नाम जंबू था । जो जंबू के नाम से संसार में प्रसिद्ध है । वह जंबू समस्त रीछों का अधिपति था और रामचंद्रका सेवक था ।


जो कुणइ जयमसेसं सो किं एक्का वि तारिसी महिला ।
सक्कइ ण विरइऊणं सेवइ णिग्घिणो रिच्छी ॥215॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि देखो जो ब्रम्हा समस्त जगत् को उत्पन्न कर सकता है वह क्या एक तिलोत्तमा ऐसी स्त्री नहीं बना सकता था । फिर क्यों उसने अत्यंत घृणित रीछिनी का सेवन किया ?


जो तिलोत्तम जो तिलोत्तम णियवि णच्चंति,
बम्मह सरजरजरिउ चत्तणियमु चउवयणु जायउ ।
बणि णिवसइ परिभट्ठतउ रमइ रिच्छि सुरयाण रायउ
सो बिरंचि कह संभवइ तयलोयउ कत्तारु ।
जो अप्पाण उत्तरइ फेडउ विरह वियारु ॥216॥

गाथार्थ: जो ब्रह्मा नृत्य करती हुई तिलोत्तमा को देखकर कामदेव के वशीभूत होकर जर्जरित होगया था । उसने अपने सब नियम वा तपश्चरणों को त्याग कर दिया था और उस तिलोत्तमा मे आसक्त होकर अपने चार मुख बना लिये थे अपने तपश्चरण से भ्रष्ट होकर तथा वनमें जाकर रीछिनी से संभोग करने लगा था वह ब्रह्मा तीनों लोकों को उत्पन्न करने वाला कैसे कहा जा सकता है। जो ब्रह्मा अपने आत्मा का भी उद्धार नहीं कर सकता और इस प्रकार विरह अवस्था को प्रगट करता है यह ब्रम्हा कभी देव नहीं हो सकता ।


णत्थि धरा आपासं पवणाणल तोय जोय ससि सूरा ।
जइ तो कत्थ ठिदेणं बंभो रइयं तिलो ओत्ति ॥217॥

गाथार्थ: यदि ब्रम्हाने इन तीनों को बनाया तो उसके पहले न पृथ्वी थी, न आकाश था, न वायु थी, अग्नि थी, न जल था, न प्रकाश था न चंद्रमा था न सूर्य था तो फिर यह भी तो बतलाना चाहिये कि उस ब्रम्हा ने कहां बैठकर यह तीनों लोक बनाये ।


कत्तित्तं पुण दुविहं वत्थुअ कत्तित्त तह य विक्किरियं ।
घडपड गिहाइं पढमं विक्किरियं देवया रइयं ॥218॥

गाथार्थ: कर्तापन दो प्रकार है एक तो यथार्थ कर्तापन और दूसरा वैक्रियिक । घट पट घर को बनाना यथार्थ कर्तापन है और जो देवों के द्वारा बनाया जाता है वह वैक्रियिक कहलाता है ।


जइ तो वत्थब्भूओ रइओ लोओ विरंचिणा तिविहो ।
तो तस्स कारणाइं कत्थुव लद्धाइं दव्वाइं ॥219॥

गाथार्थ: यदि उस ब्रम्हा ने यथार्थ रूप से तीनों लोकों को बनाया है तो यह वताना चाहिये कि ब्रम्हा ने तीनों लोकों को बनाने के कारण भत द्रव्य कहां से प्राप्त किये ।


जइ विबिकरिओ रइओ विज्जाथामेण तेणवंभेण ।
कइ थाइ दीहकालं अवत्थुभूओ अणिज्चेत्ति ॥220॥

गाथार्थ: यदि उस ब्रम्हा ने अपनी विद्या से वैक्रियिक रूप तीनो लोक बनाया है तो वह तीनो लोक अधिक कालतक नहीं ठहर सकता । क्योंकि जो पदार्थ विक्रिया से बने हुए होते है वे अवस्तु भूत होते हैं और अनित्य होते है इसलिये वे अधिक काल तक कभी नहीं ठहर सकते ।


220॥

तम्हा ण होइ कतबंभो सिरछेय विनडण पत्तो ।
छलिओ तिलोत्तमाए सामण्पुरि सुब्ब असमत्थो ॥221॥

गाथार्थ: इसलिये कहना चाहिये कि इस लोक का कर्ता ब्रह्मा कभी नहीं हो सकता । भला विचार करने की बात है कि जिसका मस्तक छेदा गया जिसको तिलोमत्ता ने ठग लिया ऐसा वह ब्रह्मा सामान्य पुरुष के समान तीनों लोकों के बनाने में असमर्थ है । जिस प्रकार सामान्य पुरुष बिना सामग्री आदि के कोई कार्य नहीं कर सकता ।


221॥

जो पर महिलेा कज्जे छंडइ वहुत्तणं तओ णियमं ।
सण हवइ परमप्पा कह देवो हवइ पुज्जो य ॥222॥

गाथार्थ: विचार करने की वात है कि जिस ने एक पर स्त्री के लिय अपना बडप्पन छोड दिया, अपना तपश्चरण छोड दिया, और अपने सब नियम छोड दिये वह परमात्मा कैसे हो सकता है अर्थात् कभी नहीं हो सकता तथा जब वह परमात्मा ही नहीं हो सकता है तब वह पूज्य देव भी किस प्रकार हो सकता है, अर्थात् कभी नहीं हो सकता ।


सुपरिक्खिऊण तम्हा सुगवेसह को वि परम बंभाणो ।
दह अट्ठदोस रहिओ वीयराओ परणाणि ॥223॥

गाथार्थ: इसलिये अच्छी तरह परीक्षा कर किसी ऐव परमब्रहम् ब्रम्हा को ढूंढना चाहिये कि जो अठारह दोषों से रहित हो, बीतराग हो और सर्वोत्कृष्ट ज्ञानीसर्वज्ञ हो ।


किण्हो जइ धरइ जयं सूवरूरवेण दाढअग्गेण ।
तासो कहिं ठवइ पए कुम्मे कुम्मो वि कहिं ठाई ॥224॥

गाथार्थ: यदि कृष्ण इन तीन लोंको का धारण करते है तथा सूअर का रुप धारण कर अपनीं दाढ के अग्रभाग पर रखकर इस जगत् को उठाये हुए है तो फिर बताना चाहिये कि वे सूअर का रुप धारण किये हुए कृष्ण स्वयं कहां ठहरे हुए है ? यदि कहो कि वे कछवाके ऊपर ठहरे हुए है तो फिर यह बताना चाहिये कि वह कच्छप कहां ठहरा हुआ है ।


अह छुहिऊण तउअरो तिजयं पालेइ महुमहो णिच्चं ।
किं सो तिजय वहित्थो तिजयवहित्थेण कि जाओ ॥225॥

गाथार्थ: यदि कृष्ण उस सूअर को छूकर सदाकाल इस तीनों लोकों का पालन करता है तो क्या वह कृष्ण तीनों लोकों से बाहर है ?अथवा क्या वह तीनों लोक तीनों लोकों के बाहर बनाया गया है ?


जइ या दहरइ पुत्तो रामो णिवसेइ दंडरइणम्मि ।
लंकाहि वेण छलिओ हरिया भज्जा पवंचेण ॥226॥

गाथार्थ: और भी देखो राजा दशरथ के पुत्र रामचन्द्र जब दंडकारण्य ( दंडकवन ) में निवास करते थे तव लंकाके अधिपति रावण ने अपनी मायाचारी कर रामचन्द्र को ठग लिया था और उनकी स्त्री सीता को हर ले गया था ।


226॥

विरहेण रुवइ विलवइ पडेइ उट्ठ इ णियइ सोएह ।
णउ पुणइ केन णाया पुच्छइ वणसावया मूढो ॥227॥

गाथार्थ: उस समय वे रामचन्द्र सीता के विरह से रोते थे, तडफते थे, गिर पडते थे फिर उठते थे, चारों ओर देखते थे, सोते थे, तथा ज्ञान रहित वे रामचंद्र वन के पशुओं के वच्चों से पूछते थे कि क्या तुमने कहीं सीता देखी है । इस प्रकार ईश्वर होकर भी रामचन्द्र को सीता की कुछ खबर नहीं थी ।


जइ उवरत्थं तिजयं ता सो किं तत्थ वाणरा रिच्छा ।
मेलाविऊण उवहि वंधहि सेलेंहिं सेउत्ति ॥228॥

गाथार्थ: यदि वे विष्णू वा रामचन्द्र तीनों जगत् के ऊपर विराजमान है सब के ईश्वर है तो फिर उन्होंने रीछ और वंदरों को इकट्ठा कर पत्थरों से समुद्रका पुल क्यों बनवाया था ?


किं पट्ठवेइ दूवं जंपइ किं सामभेयदंडाइं ।
अलहंतो किं जुज्जइ कोवं काऊण सत्थेंहि ॥229॥

गाथार्थ: इसके सिवाय उसने रावण के पास दूत क्यों भेजा ? साम दाम दंड भेद के अनुसार बातचीत क्यों की तथा इस प्रकार भी जब सीता नहीं मिली तो फिर क्रोध कर शस्त्रों के द्वारा रावण से क्यों लडे ।


कि दहवयणो सीया गहिऊण उवर बहिरे थक्को ।
जं हेलाइं ण तरइ रिउ हणिउं आणिउ भज्जा ॥230॥

गाथार्थ: क्या सीता को लेकर रावग कहीं तीनों लोकों के बाहर जाकर ठहरा था जो ईश्वर और तीनों लोकों के पालन करने वाले होकर भी सहज रीति से रावण को न मार सका और अपनी स्त्री सीता को न ला सका ।


जइ तिजयपालणत्थे संजाया तस्स एरिसी सत्ती ।
तो किं तिजयं दड्ढं हरेण सं पिच्छमाणस्स ॥231॥

गाथार्थ: यदि विष्णु भगवान् में तीनों लोकों को पालन करनें की शक्ति है तो फिर उनके देखते देखते ही महादेव नें तीनों लोकों को क्यों जला डाला ?


जो ण जाणइ जो ण जाणइ हरिय णियभज्ज ।
पुच्छइ वणसावयइं अह मुणेइ आणउं ण सक्कइ ।
बंधेइ सायरु गिरिहिं पेसिऊण तहिं पवरभिच्चइं
तासु उवीर णारायणहो किमु तिहुवणु णिवसेइं ।
जो वारवइ विणासियहो रक्खहु णा हि तरेइ ॥232॥

गाथार्थ: जो रामचन्द्र ईश्वर होकर भी अपनी स्त्री को हरण करने वाले को भीं नहीं जानते और बन में रहने वाले पशुओं के बच्चों से पूछते है तदनंतर यदि वे जान भी लेते है तो भी वे अपनी स्त्री को ला नही सकते । तथा पत्थरों से समुद्र का पुल बनवाते है और अनेक सेवकों को भजते है । क्या एसे नारायण के ऊपर ही यह तीनों लोक ठहरा हुआ है जो अपने शत्रु को भी नहीं मार सकते और अपनी स्त्री की रक्षा नहीं कर सकते । नारायण भला तीनों लोकों की रक्षा कैसे कर सकते है । अर्थात् कभी नहीं कर सकते ।


जो देओ होऊणं माणुस मत्तेंहि पंडुपुत्तेंहि ।
सारइ बोलाइत्तो जुज्झे जेउं कओतेंहि ॥233॥

गाथार्थ: जो नारायण ईश्वर होकर भी साधारण मनुष्य पांडवों के सारथी बने और इस प्रकार उन्होंने युद्ध मे पांडवों को जिताया ।


तम्हा ण होइ कत्ता किण्हो लोयस्स तविह भेयस्स ।
मरिऊण वार वारं दहावयारेंहि अवयरइ ॥234॥

गाथार्थ: इन सब बातों से यह सिद्ध होता है कि कृष्ण न तो तीनों लोकों के कर्ता है न उसके पालन करने वाले है । वे तो बार बार मरकर अवतार धारण किया करते है तथा अनुक्रमसे दश अवतार धारण करते है ।


एवं मणंति केई असरींरो णिक्कलो हरीं सिद्धो ।
अवयरइ यच्चलोए देसं गिण्हेइ इच्छाए ॥235॥

गाथार्थ: इस विषय में कोई कोई लोग यह कहते है कि विष्णु वा कृष्ण शरीर रहित है, सव दोषों से रहित है और सिद्ध है ऐसे वे कृष्ण मनुष्य लोक मे आकर अपनी इच्छानुसार शरीर को ग्रहण करते है ।


जइ तुप्पं णवणीयं णवणीयं पुणवि होइजइ दुद्धं ।
तो सिद्धिगओ जीवो पुणरवि देहाइं गिण्हेइ ॥236॥

गाथार्थ: यदि घी बदल कर फिर भी मक्खन बन जाय और मक्खन बदल कर फिर दूध बनजाय तो समझना चाहिये कि सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुए जीव भी फिरसे शरीर धारण कर सकते है ।


रद्धो कूरो पुणरवि खित्ते खित्तो य होइ अंकूरो ।
जइ तो मोक्खं पत्ता जीवा पुण इंति संसारे ॥237॥

गाथार्थ: यदि रंधा हुआ धान्य खेत मे बोने से अंकुर वृक्ष रुप हो सकता है तो समझना चाहिये कि मोक्ष मे प्राप्त हुए जीव भी फिर संसार में जा सकते है ।


जइ णिक्कलो महप्पा विण्हू णिस्सेसकम्ममलचत्तो ।
किं कारण मप्पाणं संसारे पुणे वि पाडेइ ॥238॥

गाथार्थ: यदि वे विष्णु वास्तव मे शरीर रहित है महात्मा है और समस्त कर्ममल कलंक से रहित है तो फिर किस कारण से अपने आत्मा को फिर से ससार मे गिराते है वा संसार में परिभ्रमन कराते है ।


अहवा जइ कलसहिओ लोयव्वावार दिण्णणियचित्तो ।
तो संसारी णियमा परमप्पा हवइ ण हु विण्हू ॥239॥

गाथार्थ: अथवा यदि विष्णु वास्तव में शरीर सहित है और उनका चित्त लोक के व्यापार मे लगा रहता है तों फिर कहना चाहिये कि वह विष्णु नियम से संसारी है वह परमात्मा कभी नहीं हो सकता ।


इय जाणिऊण णूणं णवणव दोसेहिं वज्जिओ विण्हू ।
सो अक्खइ परमप्पा अणंतणाणि अराई य ॥240॥

गाथार्थ: ये ऊपर लिखी सब बाते समझ कर कहना चाहिये कि जो विष्णु अठारह दोषों से रहित है अनंत ज्ञानी है और वीतराग है वही परमात्मा हो सकता है। इन गुणों के बिना कोई भी परमात्मा नहीं हो सकता ।


एवं भणंति केई रुद्दो संहरइ तिहुवणं सयलं ।
चित्तामित्तेण फुडं णर णायरतिरियसुरसहियं ॥241॥

गाथार्थ: कोई कोई लोग ऐसा कहते है कि महादेव मनुष्य तिर्यच देव नारकी आदि समस्त जीवों सहित इन समस्त तीनों लोकों को चितवन करने मात्र से ही शरण भरमें सहार कर डालते है ।


णट्ठे असेसलोए पच्छा सो कत्थ चिट्ठदे रुद्दो ।
इक्को तमंधयारो गोरी गंगा गया कत्थ ॥242॥

गाथार्थ: जब महादेव समस्त लोक का संहार कर डालते है तो फिर समस्त लोक के नष्ट हो जानेपर वे महादेव स्वयं कहां ठहरते है ? फिर तो एक महा अंधकार ही रह जाता होगा तथा उस समय गौरी और गंगा कहां चली गई होगी । कुछ तो समझना चाहिये ।


जो डहइ एयगामं पावी लोऐंहि वुच्चदे सो हु ।
जो पुण डहइ तिलोयं सो कह देवत्तणं पत्तो ॥243॥

गाथार्थ: इस संसार में जो कोई पुरुष किसी एक छोटे से गांव को भी जला देता है वह इस संसार में महा पापी कहलाता है । फिर भला जो तीनों लोकों को जला डालता है वह महादेव देव कैसे हो सकता है उसे तो महा पापीयों से भी बढकर महापापी समझना चाहिये ।


243॥

जो हणइ एय गाव विप्पो वा सोवि इत्थ लोएहिं ।
गो बभहच्चयारी पभणिज्जइ पावकारी सो ॥244॥

गाथार्थ: देखो इस संसार में जो पुरूष किसी एक गाय को मार डालता है अथवा किसी एक ब्राह्मण को मार डालता है वह गाय की हत्या करनेवाला और ब्रह्महत्या करनेवाला तो महापापी गिना जाता है


244॥

जो पुण गोणारि पमुहे वाले बुड्डे असंखलोयत्थे ।
संहारेइ असेसं तस्सेव हि किं भणिस्सामो ॥245॥

गाथार्थ: फिर भला जो महादेव देव कहलाकर भी असंख्यात लोकों मे रहनेवाले गाय स्त्रियां बालक वृद्ध आदि समस्त जीवों का संहार कर डालता है उसे क्या कहना चाहिये ? वह तो महा पापियों से भी बढकर महा पापी हो सकता है ।


अहवा जइ भणइ इयं सो देवो तस्स ण हु पावं ।
तो बंम्ह सीसछेए बंभहच्चा कहं जाया ॥246॥

गाथार्थ: यदि कदाचित् कोई यह कहे कि महादेव देव है सब से बड देव है इसलिये तीनों लोकों का नाश करने पर भी उनको हत्या का पाप नहीं लगता । परंतु ऐसा कहना भी सर्वथा मिथ्या है । क्योंकि जब महादेवजी को इतनी प्रबल हत्या करने पर भी पाप नहीं लगता तो फिर जब उन्होंने ब्रह्मा के मस्तकपर का गधे का मस्तक काट डाला था उस समय उसको ब्रह्म हत्या का पाप कैसे लग गया था ?


किं हट्ट मुंडमाला कंधे परिवहइ धूल धूसरिओ ।
परिभमिओ तित्थाइं णरह कवालम्मि भुजंतो ॥247॥

गाथार्थ: उस ब्रह्म हत्या के पाप को नाश करने के लिये उसने अपने गले में हड्डियों की माला और मुंडमाला डाली थी, अपना शरीर धूलि से घूसरित कर लिया था और मनुष्य के कपाल मे भोजन करता हुआ समस्त तीर्थों में परिभ्रमण करने लगा था ।


तह वि ण सा बंभहच्चा किट्टइ रुद्दस्स जामतागामे ।
वसिओ पलासणणामे ता विप्पो णियवलट्टेण ॥248॥

गाथार्थ: इस प्रकार उस महादेवने अनेक तीर्थों मे परिभ्रमण किया तथापि उस महादेव की ब्रह्म हत्या छूट नहीं सकी थी । जब वह महादेव इस प्रकार परिभ्रमण करताहुआ पलाश नाम के एक गांव में पहुंचा तब उस गांव में उपवास किये हुए एक ब्राह्मण को उसी के एक बैल ने अपने सीगों मार डाला था । इस ब्रह्म हत्या के पाप से वह सफेद बैल उसी समय काला हो गया था । तदनंतर वह बैल अपना ब्रह्म हत्या का पाप दूर करने के लिये बनारस नगरी में पहुंचा । वह बैल भी पलाश गांव का था और वहीं पर महादेव पहुँच गया था । इसलिये उस कृत्य को देखकर महादेव भी उस बैल के पीछे पीछे बनारस मे जा पहुंचा था । बनारस जाकर उन दोनों ने गंगा जल में प्रवेश किया तब कहीं जाकर वे दोनों ही ब्रह्म हत्या से मुक्त हुए । तथा ब्रह्म हत्या के कारण महादेव के हाथ मे जो कपाल लग गया जो चिपक गया था वह भी उस समय गंगा जल मे गिर पडा ।


णिहओ सिंगेण मुओ वसहो सेओ वि कसणु संजाओ ।
वाणारसिं च पत्तो रुद्दोवि य तस्स मग्गेण ॥249॥

गाथार्थ: इस प्रकार उस महादेवने अनेक तीर्थों मे परिभ्रमण किया तथापि उस महादेव की ब्रह्म हत्या छूट नहीं सकी थी । जब वह महादेव इस प्रकार परिभ्रमण करताहुआ पलाश नाम के एक गांव में पहुंचा तब उस गांव में उपवास किये हुए एक ब्राह्मण को उसी के एक बैल ने अपने सीगों मार डाला था । इस ब्रह्म हत्या के पाप से वह सफेद बैल उसी समय काला हो गया था । तदनंतर वह बैल अपना ब्रह्म हत्या का पाप दूर करने के लिये बनारस नगरी में पहुंचा । वह बैल भी पलाश गांव का था और वहीं पर महादेव पहुँच गया था । इसलिये उस कृत्य को देखकर महादेव भी उस बैल के पीछे पीछे बनारस मे जा पहुंचा था । बनारस जाकर उन दोनों ने गंगा जल में प्रवेश किया तब कहीं जाकर वे दोनों ही ब्रह्म हत्या से मुक्त हुए । तथा ब्रह्म हत्या के कारण महादेव के हाथ मे जो कपाल लग गया जो चिपक गया था वह भी उस समय गंगा जल मे गिर पडा ।


गंगाजलं पविट्ठा चत्ता ते दोवि बंभहच्चाए ।
रुद्दस्स करय लग्गो लहयं पडियं कवालोत्ति ॥250॥

गाथार्थ: इस प्रकार उस महादेवने अनेक तीर्थों मे परिभ्रमण किया तथापि उस महादेव की ब्रह्म हत्या छूट नहीं सकी थी । जब वह महादेव इस प्रकार परिभ्रमण करताहुआ पलाश नाम के एक गांव में पहुंचा तब उस गांव में उपवास किये हुए एक ब्राह्मण को उसी के एक बैल ने अपने सीगों मार डाला था । इस ब्रह्म हत्या के पाप से वह सफेद बैल उसी समय काला हो गया था । तदनंतर वह बैल अपना ब्रह्म हत्या का पाप दूर करने के लिये बनारस नगरी में पहुंचा । वह बैल भी पलाश गांव का था और वहीं पर महादेव पहुँच गया था । इसलिये उस कृत्य को देखकर महादेव भी उस बैल के पीछे पीछे बनारस मे जा पहुंचा था । बनारस जाकर उन दोनों ने गंगा जल में प्रवेश किया तब कहीं जाकर वे दोनों ही ब्रह्म हत्या से मुक्त हुए । तथा ब्रह्म हत्या के कारण महादेव के हाथ मे जो कपाल लग गया जो चिपक गया था वह भी उस समय गंगा जल मे गिर पडा ।


जस्स गुरू सुरहिसुओ गं तोएण फिट्टए हच्चा ।
सो देवो अण्णस्स य फेडइ कह संचियं पावं ॥251॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि देखो जिस महादेव ने अपनी ब्रह्म हत्या दूर करने के लियें बेल को तो गुरु बनाया और गंगा के जल से उसकी ब्रह्म हत्या दूर हुई वह महादेव अन्य संसारी जीवों के चिर काल से संचित हुए पापों को कैसे दूर कर सकते है ? अर्थात् कभी दूर नहीं कर सकते ।


251॥

जो ण तरइ णियपावं गहियवओ अप्पणस्स फेडेउं ।
असमत्थो सो णूणं कत्तित्त विणासणे रुद्दो ॥252॥

गाथार्थ: जो महादेव व्रतों को ग्रहण करके भी अपने आत्मा के भी अपने पापों का नाश नहीं कर सकता वह महादेव इस ब्रह्मा के बनाये हुए लोक का विनाश भी नहीं कर सकता ।


णो बंभा कुणइ जयं किण्हो ण धरेइ हरइ ण उ रुद्दो ।
एसो सहावसिद्धो णिच्चो दव्वेहिं संछण्णो ॥253॥

गाथार्थ: न तो इस जगत् को ब्रम्हाने बनाया है, न कृष्ण वा विष्णु इसको धारण करता है और न महादेव इसका संहार करते है। यह जगत् स्वभाव से ही सिद्ध है, अनादि है, और अनिधन है तथा जिवादिक द्रव्यों से भरा हुआ है।


भमइ णग्गउ भमइ णग्गउ वसहि सुमसाणि ।
णर रुंडसिर मंडयउ णरकवालि भिक्खाइं भुंजेइ ।
सह कारिउ गउरियहिंदुक्खभारु अप्पहो णिउंज्जइ ।
जो बभणेहं सिर कमले खुडिए न फेडइ दोसु ।
सो इसरू कह अवहरइ तिहुवणु करइ असेसु ॥254॥

गाथार्थ: जो महादेव नग्न होकर पर्वतोंपर घूमता फिरता है श्मशान में रहता है, मनुष्यों के रुंड मुंडो से अपने मस्तक की शोभा वढाता है, मनुष्य के कपाल में भिक्षा भोजन करता है, पार्वती को सदा साथ रखता है, अपने आत्मा को सदाकाल अनेक दुःखो के समूह मे डालता रहता है, जिसने ब्रह्मा का मस्तक काट डाला और फिर उस हत्या से लगी हुई ब्रह्महत्या के महापाप को दूर नहीं कर सका वह महादेव भला ईश्वर कैसे हो सकता है और किस प्रकार इन समस्त तीनों लोकों का नाश कर सकता है । अर्थात् कभी नहीं कर सकता ।


उत्तरंतउ उत्तरंतउ पवर सुरसरिहिं ।
पारासुर चलिउ मणुमुएलज्जकेवह णदिणि ।
आलिंकिय तपहेउ वरिवाल जाउ तावसुमहामुणि
भारउ पुणु हुउ दो वहिं केसग्गह पव्वेण ।
जिणु मल्लिवि के केण जगिणिवडय चवल मणेण ॥255॥

गाथार्थ: पराशर मुनि गंगा के पार होने के लिये गंगा नदी के किनारे पहुँचे वहां पर मल्लाह की लडकी नाव चला रही थी इसलिये वे पाराशर ऋषी उसी को आलिंगन करने लगे ।


अण्णाणि य रइयाइ एत्थ पुराणाइं अघडमाणाइं ।
सिद्धंतेहिं अजुत्तं पुव्वावरदोससंकिण्णं ॥256॥

गाथार्थ: और भी ऐसे बहुत से पुराण बने हुए है जो कभी संभव नहीं हो सकते, तथा जो सिद्धांत के सर्वथा विरुद्ध है, और पूर्वापर अनेक दोषों से भरे हुए है।


एए उत्ते देवो सव्वे सद्दहइ जो पुराणेहिं ।
अरिहंता परिचाए सम्मा मिच्छोत्ति णायव्वो ॥257॥

गाथार्थ: जो पुरुष वीतराग सर्वज्ञ भगवान् अरहंत देवको छोडकर ऊपर लिखे इन समस्त देवों का श्रद्धान करता है तथा पुराणों में कहे हुए अन्य समस्त देवो का श्रद्धान करता है उसे सम्यग्मिथ्या दृष्टी तीसरे गुण स्थान वाला समझना चाहिये ।


एसो सम्मामिच्छो परिहरियव्वो हवेइ णियमेणः ।
एत्तो अविरइ सम्मो कहिज्जमाणो णिसामेह ॥258॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो तीसरे सम्यग्मिथ्यादृष्टीं गुणस्थान का स्वरुप कहा है उसका सर्वथा त्याग नियम पूर्वक कर देना चाहिये । अब इसके आगे चौथे अविरत सम्यग्दृष्टीं नाम के गुणस्थान का स्वरुप कहते है, उसे सुनो ।

अविरत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान: सम्यग्दर्शन, परमात्मा, जीव आदि तत्त्व (गाथा 259 से 349)

हवइ चउत्थं ठाण अविरइ सम्मेत्ति णामत्रं भणियं ।
तत्थहु खइओ भावो खय उवसमिओ समोवेव ॥259॥

गाथार्थ: चौथे गुणस्थान का नाम अविरत सम्यग्दष्टी है । इस गुणस्थान में क्षायिक भाव होते है, क्षायोपशमिक भाव होते है और औपशमिक भाव होते है ।


एए तिण्णि वि भावा दंसणमोहं पडुच्च भणिआ हु ।
चारित्तं णत्थि जदो अविरिय-अंतेसु ठाणेसु ॥260॥

गाथार्थ: इस गुणस्थान में जो तीनों प्रकार के भाव बतलाये है वे दर्शन मोहनीय के क्षय, क्षयोपशम और उपशम को लेकर बतलाये है। इसका भी कारण यह है कि पहले गुणस्थान से लेकर चौथे गुणस्थान तक चारित्र का सर्वथा अभाव रहता है।


णो इंदिएसु विरओ णो जीवेथावरे तसे वावि ।
जो सद्दहइ जिणुत्तं अविरइ सम्मोत्ति णायव्वो ॥261॥

गाथार्थ: इस गुणस्थान में रहने वाला जीव न तो इन्द्रियों से विरक्त रहता है न त्रस स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग करता है। वह भगवान् जिनेंद्र देव के कहे हुए वचनों पर गाढ श्रद्धान करता है। इस प्रकार उसके यथार्थ देव शास्त्र गुरु के श्रद्धान करने को अथवा जीवादिक तत्त्वों के यथार्थ श्रद्धान करने को चौथा अविरत सम्यग्दृष्टी गुणस्थान कहते है।


हिंसा रहिए धम्मे अट्ठारह दोस वज्जिए देवे ।
णिग्गंथे पव्वयणो सद्दहणं होइ सम्मत्तं ॥262॥

गाथार्थ: धर्म वही है जो हिंसा से सर्वथा रहित हो, देव वही है जो अठारह दोषों से रहित हो, और गुरू वा मुनि वे ही है जो वाह्य अभ्यतर परिग्रहों से रहित सर्वथा निर्ग्रन्थ हो। इस प्रकार देव शास्त्र गुरु का यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है।


संवेओ णिव्वेओ णिद्दा गरुहाइं उवसमो भत्ती ।
वच्छल्लं अनुकंपा अट्ठगुणा होंति सम्मत्ते ॥263॥

गाथार्थ: संवेग निर्वेद निंदा गर्हा उपशम भक्ति वात्सल्य अनुकंपा ये सम्यग्दर्शन के आठ गुण होते है । संसार के दुःखों से भयभीत होने तथा धर्म मे अनुराग होना संवेग है, संसार शरीर और भोगों से विरक्तता धारण करना निर्वेद है, अपने किये हुए पापों की निंदा अपने आप करना निंदा है, गुरु के समीप जाकर अपने दोषों का निराकरण करना गर्हा है । कोधादिक पच्चीसों कषायों का त्याग करना उपशम है, दर्शन ज्ञान चारित्र और तप का वा इनको धारण करनेवालों का विनय करना भक्ति है, व्रतों के धारण करने में अनुराग धारण करना वा व्रतियों में अनुराग धारण करना वात्सल्य है, त्रस स्थावर इन छहों प्रकार के जीवों की रक्षा करना उनपर दया धारण करना अनूकंपा है । सम्यग्दर्शन के ये आठ गुण कहलाते है । सम्यग्दर्शन के उत्पन्न होने पर ये आठ गुण अवश्य प्रगट हो जाते है । जिसके ये गुण प्रगट न हो, समझना चाहिये उसके सम्यग्दर्शन भी नहीं है ।


दुविहं त्तं पुण भणियं अहवा तिविहं कहंति आयरिया ।
अण्णाय अधिगमे वा सद्दहणं जं पयत्थाणं ॥264॥

गाथार्थ: आचार्यों ने उस सम्यग्दर्शन के दो भेद बतलाये है अथवा तीन भेद बतलाये है। भगवान् जिनेंद्र देव के कहे हुए पदार्थों का जो श्रद्धान भगवान् की आज्ञा प्रमाण कर लिया जाता है उसको आज्ञा सम्यक्त्व कहते है और किसी के उपदेश द्वारा जो पदार्थों का श्रद्धान किया जाता है उसको अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते है। इसके सिवाय सम्यग्दर्शन के निसर्गज और अधिगमज ये भी दो भेद है। जो सम्यग्दर्शन बिना किसी उपदेश के प्रगट हो जाता है उसको निसर्गज सम्यग्दर्शन कहते है और जो सम्यग्दर्शन किसी के उपदेश से प्रगट होता है उसको अधिगमज कहते है। इस प्रकार निमित्त कारण के भेद से दो भेद हो जाते है।


खयउवसमं च खाइयं उवसम सम्मत्तपुणु च उद्दिट्ठं ।
अविरइ विरयाण पि य विरयाविरयाण ते हुंति ॥265॥

गाथार्थ: क्षायिक क्षायोपशमिक और औपशमिक ये तीन सम्यग्दर्शन के भेद है। ये तीनों प्रकार के सम्यग्दर्शन अविरत सम्यग्दृष्टी विरताविरत और विरत इन सबके होते है।


कोह चउक्कं पढमं अणंत बंधीणिणामयं भणियं ।
सम्मतं मिच्छत्तं सम्मा मिच्छत्तयं तिण्णि ॥266॥

गाथार्थ: अनन्तानुबंधी क्रोध मान माया लोभ ये चारित्र मोहनीय की चार प्रकृतियां तथा मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व ये तीन दर्शन मोहनीय की प्रकृतियां ये सात प्रकृतियां सम्यग्दर्शन को घात करने वाली है । इन सातों प्रकृतियों के उपशम होने से उपशम सम्यग्दर्शन होता है तथा इन्हीं सातों प्रकृतियों के अत्यंत क्षय होने से क्षायिक सम्यग्दर्शन प्रगट होता है । यह क्षायिक सम्यग्दर्शन अचल है अर्थात् फिर कभी नष्ट नहीं होता सदा अनंतानंत कालतक विद्यमान रहता है तथा अत्यंत निर्मल है और अत्यंत शुद्ध है ।


एएसिं सत्तएहं उवसम करणेण उवसमं भणियं ।
खयओ खइयं जायं अचलत्तं णिम्मलं सुद्धं ॥267॥

गाथार्थ: अनन्तानुबंधी क्रोध मान माया लोभ ये चारित्र मोहनीय की चार प्रकृतियां तथा मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व ये तीन दर्शन मोहनीय की प्रकृतियां ये सात प्रकृतियां सम्यग्दर्शन को घात करने वाली है । इन सातों प्रकृतियों के उपशम होने से उपशम सम्यग्दर्शन होता है तथा इन्हीं सातों प्रकृतियों के अत्यंत क्षय होने से क्षायिक सम्यग्दर्शन प्रगट होता है । यह क्षायिक सम्यग्दर्शन अचल है अर्थात् फिर कभी नष्ट नहीं होता सदा अनंतानंत कालतक विद्यमान रहता है तथा अत्यंत निर्मल है और अत्यंत शुद्ध है ।


उदयाभाओ जत्थ य पयडीणं ताण सव्ववादीणं ।
छण्णाण उवसमो विय उदओ सम्मत्तं पयडोए ॥268॥

गाथार्थ: सम्यग्दर्शन को घात करने वाली सात प्रकृतियां जो ऊपर बतलाई है उन में से अनंतानुबंधी क्रोध मान माया लोभ और मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व ये छह प्रकृतियां सर्वघाती है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व नाम की एक प्रकृति देश घाती है । ऊपर लिखी छह प्रकृतियां सम्यग्दर्शन को घात करने वाली है इसलिये वे सर्वघाती कहलाती है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व नामकी प्रकृति सम्यग्दर्शन का घात नहीं करती किंतु उसमे चल मलिन और अगाढ इन दोषों को उत्पन्न कर देती है । परिणामों मे चंचलता होने को चल दोष कहते है, मलिनता होने को मलिन कहते है और अत्यंतगाढ श्रद्धान नहीं होना अगाढ दोष है । जब ऊपर लिखी हुई सर्वघाती छह प्रकृतियों का उदयाभावी क्षय हो जाता है अर्थात् छहों प्रकृतियों का उदय नहीं रहता तथा आगे उदय होने वाली इन्हीं छह प्रकृतियों के उपशम होने से और देश घाती सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने से क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । ऐसा भगवान् बीतराग सर्वज्ञ देवने कहा है । जिस प्रकार किसी बर्तन मे मिट्टी मिला पानी रक्खा हो तथा उसमे फिटकरी डाल दी जाय तो उसकी मिट्टी नीचे बैठ जाती है पानी निर्मल हो जाता है । इसी प्रकार जिस जीव के ऊपर लिखी हुई सातों प्रकृतियों का उपशम हो जाता है उसके औपशमिक सम्यग्दर्शन हो जाता है परन्तु जिस प्रकार हवा चलने पर वह निर्मल पानी फिर गदला हो जाता है उसी प्रकार अन्तर्मुहूर्त के अनंतर ही उन सातों प्रकृतियों का उदय हो जाता है और वह औपशमिक सम्यग्दर्शन नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार जिस बर्तन का पानी निर्मल होगया है मिट्टी पूर्ण रूप से नीचे बैठ गई है उसका पानी यदि किसी दूसरे बर्तन मे लेलिया जाय तो उस निर्मल पानी में थोडा सा भी गदलापन नहीं रहता वह पानी पूर्ण रूप से निर्मल हो जाता है इसी प्रकार क्षायिक सम्यग्दर्शन पूर्ण रूप से निर्मल होता है । उसमें फिर कभी भी गदलापन वा अशुद्धता नहीं आती । जिस गंदले पानी की अधिकतर मिट्टी नीचे बैठ गई है और थोडासा गदलापन उस पानी में रहगया है उसी पानी को दूसरे बर्तन मे लेलिया जाय तो उसमें थोडा गदलापन रहताही है इसी प्रकार क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन अत्यंत निर्मल और शुद्ध नहीं होता किंतु उसमें चल मलिन अगाढ दोष रहते है । सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने से ये दोष हो जाते है । तथापि इस क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन के प्रगट हो जानेपर सदाकाल कर्मों का क्षय होता ही रहता है । अन्य सम्यग्दर्शनों के समान यह सम्यग्दर्शन भी कर्मों के क्षय होने का कारण है ।


268॥

खय उवसमं पउत्तं सम्मत्तं परम वीयराएंहि ।
उवसमिय पंक सरिसं णिच्चं कम्मक्खवण हेउं ॥269॥

गाथार्थ: सम्यग्दर्शन को घात करने वाली सात प्रकृतियां जो ऊपर वतलाई है उन में से अनंतानुबंधी क्रोध मान माया लोभ और मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व ये छह प्रकृतियां सर्वघाती है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व नाम की एक प्रकृति देश घाती है । ऊपर लिखी छह प्रकृतियां सम्यग्दर्शन को घात करने वाली है इसलिये वे सर्वघाती कहलाती है और सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व नामकी प्रकृति सम्यग्दर्शन का घात नहीं करती किंतु उसमे चल मलिन और अगाढ इन दोषों को उत्पन्न कर देती है । परिणामों मे चंचलता होने को चल दोष कहते है, मलिनता होने को मलिन कहते है और अत्यंतगाढ श्रद्धान नहीं होना अगाढ दोष है । जब ऊपर लिखी हुई सर्वघाती छह प्रकृतियों का उदयाभावी क्षय हो जाता है अर्थात् छहों प्रकृतियों का उदय नहीं रहता तथा आगे उदय होने वाली इन्हीं छह प्रकृतियों के उपशम होने से और देश घाती सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने से क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । ऐसा भगवान् वीतराग सर्वज्ञ देवने कहा है । जिस प्रकार किसी वर्तन मे मिट्टी मिला पानी रक्खा हो तथा उसमे फिटकरी डाल दी जाय तो उसकी मिट्टी नीचे बैठ जाती है पानी निर्मल हो जाता है । इसी प्रकार जिस जीव के ऊपर लिखी हुई सातों प्रकृतियों का उपशम हो जाता है उसके औपशमिक सम्यग्दर्शन हो जाता है परन्तु जिस प्रकार हवा चलने पर वह निर्मल पानी फिर गदला हो जाता है उसी प्रकार अन्तर्मुहूर्त के अनंतर ही उन सातों प्रकृतियों का उदय हो जाता है और वह औपशमिक सम्यग्दर्शन नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार जिस वर्तन का पानी निर्मल होगया है मिट्टी पूर्ण रूप से नीचे बैठ गई है उसका पानी यदि किसी दूसरे बर्तन मे लेलिया जाय तो उस निर्मल पानी में थोडा सा भी गदलापन नहीं रहता वह पानी पूर्ण रूप से निर्मल हो जाता है इसी प्रकार क्षायिक सम्यग्दर्शन पूर्ण रूप से निर्मल होता है । उसमें फिर कभी भी गदलापन वा अशुद्धता नहीं आती । जिस गंदले पानी की अधिकतर मिट्टी नीचे बैठ गई है और थोडासा गदलापन उस पानी में रहगया है उसी पानी को दूसरे वर्तन मे लेलिया जाय तो उसमें थोडा गदलापन रहताही है इसी प्रकार क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन अत्यंत निर्मल और शुद्ध नहीं होता किंतु उसमें चल मलिन अगाढ दोष रहते है । सम्यक् प्रकृति मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने से ये दोष हो जाते है । तथापि इस क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन के प्रगट हो जानेपर सदाकाल कर्मों का क्षय होता ही रहता है । अन्य सम्यग्दर्शनों के समान यह सम्यग्दर्शन भी कर्मों के क्षय होने का कारण है ।


जो ण हि मण्णइ एयं खय उवसम भावजो य सम्मत्तं ।
सो अण्णाणी मूढो तेण ण णायं समयसारं ॥270॥

गाथार्थ: जो पुरुष इस क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन से उत्पन्न होने वाले परिणामों को नही मानता, समझना चाहिये कि वह अज्ञानी और मूर्ख है, तथा वह पुरुष आत्मा के स्वरूप को भी नहीं जानता । इस का भी कारण यह है कि सिद्धांत सूत्रों में अथवा उमास्वामी कृत तत्त्वार्थ सूत्र में वा उसकी समस्त टीकाओं में जीवो के प्रधान भाव पांच प्रकार के बतलाये है । औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक औदयिक और पारिणामिक ये पांच भाव बतलाये है । इसलिये क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन के विना पांचों भावों की पूर्ति ही नहीं हो सकती । इसलिये क्षायोपशमिक भाव और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन मानना अत्यावश्यक है ।


जम्हा पंच पहाणा भावा अत्थित्ति सुत्त णिद्दिट्ठा ।
तम्हा खय उवसमिए भावे जायं तु तं जाणे ॥271॥

गाथार्थ: जो पुरुष इस क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन से उत्पन्न होने वाले परिणामों को नही मानता, समझना चाहिये कि वह अज्ञानी और मूर्ख है, तथा वह पुरुष आत्मा के स्वरूप को भी नहीं जानता । इस का भी कारण यह है कि सिद्धांत सूत्रों में अथवा उमास्वामी कृत तत्त्वार्थ सूत्र में वा उसकी समस्त टीकाओं में जीवो के प्रधान भाव पांच प्रकार के बतलाये है । औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक औदयिक और पारिणामिक ये पांच भाव बतलाये है । इसलिये क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन के बिना पांचों भावों की पूर्ति ही नहीं हो सकती । इसलिये क्षायोपशमिक भाव और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन मानना अत्यावश्यक है ।


तं सम्मत्तं उत्तं जत्थ पयत्थाण होइ सद्दहणं ।
परमप्पह कहियाणं परवप्पा दोसपरिचित्तो ॥272॥

गाथार्थ: परम परमात्मा वीतराग सर्वज्ञ देव श्रीजिनेंद्र देव है उनके कहे हुए समस्त तत्त्वों का श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन कहलाता है । वह परमात्मा वा श्रीजिनेंद्रदेव समस्त दोषों से रहित ही होते है ।


272॥

दोसा छुहाइ भणिया अट्ठारस होंति तिविह लोयम्मि ।
सामाण्णा सयल जणे तेसि अहावेण परमप्पा ॥273॥

गाथार्थ: ये कहे हुए क्षुधादिक अठारह दोष सामान्य रीति से तीना लोकों के समस्त जीवों में रहते है । जब इन समस्त दोषों का नाश हो जाता है तभी यह जीव परमात्मा हो सकता है ।


सो पुण दुविहो भणिओ सयलो तह णिक्कलोत्ति णायव्वो ।
सयलो अरुह सरूवो सिद्धो पुण णिक्कलो भणिओ ॥274॥

गाथार्थ: वह परमात्मा दो प्रकार का है । एक सकल परमात्मा और दूसरा निकल परमात्मा । यहा पर कल शद्व का अर्थ शरीर है जो शरीर सहित हो ऐसे अरहंत भगवान् को सकल परमात्मा कहते है तथा शरीर रहित सिद्ध भगवान् को निकल परमात्मा कहते है ।


जस्स ण गोरी गंगा कावालं णेव विसहरो कंठे ।
ण य दप्पो कंदप्पो सो अरुहो भण्णए रुद्दो ॥275॥

गाथार्थ: जिसने साथ न गौरी गंगा पार्वती है न गग्डा है न हाथ मे कपाल है न कण्ठ में सर्प है न जिनको अभिमान है और न जो कामासक्त है ऐसे भगवान् अरहंत देव को ही महादेव कहना चाहिये ।


जस्स ण गया ण चक्कं णो संखो णेय गोविसंघाओ ।
णवयरइ दहवयारे सो अरुहो भण्णए विण्हू ॥276॥

गाथार्थ: जिनके हाथ में न गदा है, न चक्र है, न शंख है, न जिनके साथ अनेक गोपियों क समुदाय हे और न जो दश अवतार लेते है ऐसे भगवान् अरहंत देव को ही विष्णु समझना चाहिये ।


ण तिलोत्तमाय छलिओ णय वयभट्ठो ण चउमुहो जादो ।
ण य रिच्छीए रत्तो सो अरुहो वुच्चए बंभो ॥277॥

गाथार्थ: जो भगवान् न तो तिलोत्तमा के द्वारा ठगे जाते है न, अपने तपश्चरण से कभी भ्रष्ट होते है न कामसक्त होकर चार मुख वनाते है और न रीछिनी के साथ कामासक्त होते है ऐसे वे अरहंत देव ही ब्रह्मा कहलाते है ।


तेणुत्त णवपयत्था अण्णे पंचत्थिकाय छद्दव्वा ।
आणाए अधिगमेण य सद्दहमाणस्स सम्मत्तं ॥278॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेंद्र देव ने नौ पदार्थ वतलाये है पांच अस्तिकाय वतलाये हैं और छह द्रव्य वतलाये है इन समस्त पदार्थों को जो भगवान् की आज्ञा प्रमाण श्रद्धान करता है अथवा इन सवका स्वरूप जानकर श्रद्धान करता है उस श्रद्धान को सम्यग्दर्शन कहते हैं ।


संकाइदोसरहियं णिस्संकाईगुणज्जुअं परमं ।
कम्मणिज्जरणहेउं तं सुद्धं होइ सम्मत्तं ॥279॥

गाथार्थ: जो सम्यग्दर्शन शंका आदि आठ दोषों से रहित होता है और निःशंकित आदि आठ गुणों से सुशोभित होता है उसको परम शुद्ध सम्यग्दर्शन कहते है । ऐसा परम शुद्ध सम्यग्दर्शन कर्मों की निर्जरा का कारण होता है ।


रामगिहे णिस्संको चोरो णामेण अंजणो भणिओ ।
चंपाए णिक्कंखा वणिधूवाणंतमइणामा ॥280॥

गाथार्थ: राजगृह नगर मे एक अंजन नाम का चोर था वह निशंकित अंग मे प्रसिद्ध हुआ हैं। तथा चंपापुर नगर में एक सेठ की पुत्री अनंतमती थी वह निःकांक्षित अग मे प्रसिद्ध हुई हे।


णिव्विदिगिछो राया उद्दायणो णाम रउरहे णयरे ।
रेवइ महुराणयरे अमूढ दिट्ठी मुणेयव्वा ॥281॥

गाथार्थ: रौरव वा रुद्रवर नगर का उद्दायन नाम का राजा निर्विचिकित्सा अंग में प्रसिद्ध हुआ है और मथुरा नगर मे रेवती रानी अमूढदृष्टि अंग में प्रसिद्ध हुई है ।


ठिदिकरणगुणपउत्तो मगहा णयरन्मि बारिसेणो हु ।
हत्थिणिपुरम्मिणयरे वच्छल्लं बिरहुणा रइयं ॥282॥

गाथार्थ: मगध नगर में बारिषेण नाम का राजपुत्र स्थिति करण अंग मे प्रसिद्ध हुआ है। हस्तिनापुर नगर में विष्णुकुमार मुनि वात्सल्य अंग में प्रसिद्ध हुए है।


282॥

उवगूहणगुण जुत्तो जिणदत्तोणाम तामलित्तिणयरीए ।
वज्ज कुमारेणकया पहावणा चेव महुराए ॥283॥

गाथार्थ: ताम्रलिप्त नगर का रहने वाला सेठ जिनदत्त उपगूहन अंग मे प्रसिद्ध हुआ है और मथुरा नगर में वज्रकुमार मुनि ने जैन धर्म की प्रभावना कराकर प्रमावना अंग में प्रसिद्ध पाई थी इन सब महापुरुषों की सुन्दर कथाएं अन्य शास्त्रों से जान लेनी चाहिये ।


एरिस गुण अट्ठ जुयं सम्मत्तं जो धरेइ विढचित्तो ।
सो हवइ सम्मदिट्ठी सद्दहवाणोपयत्थाणं ॥284॥

गाथार्थ: इस प्रकार ऊपर जो सम्यग्दर्शन के आठ गुण बतलाये है उनके साथ चित्त की दृढता पूर्वक सम्यग्दर्शन धारन करता हुआ भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए पदार्थों का श्रद्धान करता है वह जीव सम्यग्दृष्टी कहलाता है । आगे नौ पदार्थों के नाम कहते है ।


ते पुण जीवा जीवा पुण्णं पावो य आसवो य तहा ।
संवर णिज्जरणां पि य बंधो मोक्खो य णाव होंति ॥285॥

गाथार्थ: जीव अजीव आस्रव बंध संवर निर्जरा मोक्ष पुण्य पाप ये नौ पदार्थ हैं ।


285॥

जीवो अणाइ णिच्चो उवओग संजुदो देहमित्तो य ।
कत्ता भोत्ता चेत्ता ण हु मुत्तो सहाव उड्ढगई ॥286॥

गाथार्थ: यह जीव अनादि है, अनिधन है, उपयोग स्वरूप है शरीर के प्रमाण के समान है, कर्ता है भोक्ता है चेतना सहित है अमूर्त है और स्वभाव से ही ऊर्ध्व गमन करने वाला है।


पाणचउक्कपउत्तो जीवस्सइ जो हु जीविओ पुव्वं ।
जीवेइ वट्टमाणं जीवत्तगुण समावण्णो ॥287॥

गाथार्थ: इन्द्रिय, बल, आयु और श्वासोच्छ्वास ये चार प्राण कहलाते है ये चारों प्राण बाह्य प्राण है और इस संसारी जीव के चारों प्राण रहते है । जो जीव पहले जीवित था अब जीवित है और आगे जीवित रहेगा वह जीव कहलाता है । इस प्रकार जो ऊपर लिखे चारों प्राणों से जीवित रहता है वह जीवत्वगुण सहित जीव कहलाता है ।


पज्जाएणवि तस्स हु दिट्ठा आवत्ति देहगहणम्भि ।
अधुवतं पुण दिट्ठं देहस्स विणासणे तस्म ॥288॥

गाथार्थ: यह संसारी जीव अनेक पर्यायें धारण करता रहता है उसी के समान उसका आकार होजाता है । इस जीव में संकोच विस्तार होने की शक्ति है । जैसे दीपक घडे में रख दिया जाय तो उसका प्रकाश उतना तथा उसे ही कमरे में रखने पर बढ कर उस कमरे के समान हो जाता है । इसी प्रकार जीव छोटा शरीर धारण करता है तब संकुचित होकर छोटे आकार वाला उसी छोटे शरीर के समान हो जाता है और जब बडा शरीर धारण करता है तो विस्तृत होकर उस बडे शरीर के समान हो जाता है । यद्यपि जीव नित्य है कभी नष्ट नहीं होता तथापि शरीत के नाश होने से तथा दूसरा शरीर धारण कर लेने से वह अनित्य कहा जाता है इसके सिवाय इतना और समझ लेना चाहिये कि ऊपर जो चार प्राण बतलाये है उनके दस भेद हो जाते है क्योंकि स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु और कर्ण ये पांच इन्द्रियों के भेद है तथा आयु और श्वासोच्छवास को मिला कर दश भेद हो जाते है । इनमे से एकेन्द्रिय जीव के स्पर्शन इन्द्रिय कायबल आयु और श्वासोच्छवास ये चार प्राण होते है । दो इन्द्रिय जीव के स्पर्शन रसना ये दो इन्द्रियां तथा कायबल वचनबल और आयु श्वासोच्छवास ये छह प्राण होते है । तेइन्द्रिय जीव के स्पर्शन रसना घ्राण ये तीन इन्द्रियां कायबल वचनबल आयु श्वासोच्छवास ये सात प्राण होते है चौइन्द्रिय जीव के एक चक्षु इन्द्रिय और अधिक होती है इस लिये आठ प्राण होते है । असैनी पंचेन्द्रिय जीव के पांचों इन्द्रियां कायबल वचनबल आयु श्वासोच्छवास ये नौ प्राण होते है तथा सैनी पंचेन्द्रिय जीव के दशों प्राण होते है । मन सहित जीवों को सैनी कहते है और मन रहित जीवों को असैनी कहते है । यह सब जीवों का स्वरूप व्यवहार नय से बतलाया है । निश्चय नय से जिसके ज्ञानदर्शनरूप चेतना गुण हो उसको जीव कहते है । यह चेतना गुण संसारी मुक्त दोनों प्रकार के जीवों मे रहता है ।


सायारो अणयारो उवओगो दुविह भेय संजुत्तो ।
सायारो अट्ठविहो चउप्पयारो अणायारो ॥289॥

गाथार्थ: आत्मा के ज्ञान दर्शनरूप भावों को उपयोग कहते है। उस उपयोग के दो भेद है एक साकार उपयोग दूसरा अनाकार उपयोग। साकार उपयोग के आठ भेद है और अनाकार उपयोग के चार भेद है।


मइ सुइ उवहि विहंगा अण्णाण जुदाणि तिण्ण णाणाणि ।
सम्मणाणाणि पुणो केवल दट्ठाणि पंचेव ॥290॥

गाथार्थ: कुमति ज्ञान कुश्रुत ज्ञान और कुअवधि ज्ञान वा विभंगावधि ज्ञान ये तीनों ज्ञान मिथ्या ज्ञान कहलाते है । तथा भगवान् जिनेंद्र देव ने सम्यग्ज्ञान के पांच भेद बतलाये है ।


मइणाणं सुयणाणं उवही मणपज्जय च केवलयं ।
तिण्णिसया छत्तीसा मई सुयं पुण वारसंगगयं ॥291॥

गाथार्थ: मति ज्ञान श्रुत ज्ञान अवधि ज्ञान मनः पर्यय ज्ञान और केवल ज्ञान ये पांच ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाते हैं इनमे से मति ज्ञान के तीन सौ छत्तीस भेद हैं तथा श्रुत ज्ञान के बारह अंग कहलाते हैं।


देसावहि परमावहि सव्वावहि अवहि होइ तिब्भेया ।
भव गुण कारणभूया णायव्वा होइ णियमेण ॥292॥

गाथार्थ: देशावधि परमावधि और सर्वावधि इस प्रकार तीन प्रकार का अवधिज्ञान होता है । इनमे उत्तरोत्तर जानने की शक्ति अधिक होती है । देशावधि के और परमावधिके उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य ये तीन तींन भेद है । सर्वावधि का कोई भेद नहीं है । देशावधि के वर्धमान हीयमान अवस्थिस अनवस्थित अनुगामी अननुगामी अप्रनिपाति प्रतिपाति इस प्रकार आठ भेद होते है । सर्वावधि के अवस्थित अनुगामी अननु - ओर अप्रतिपातो ये चार भेद होते है ।


मणपज्जयं च दुविहं रिउ विउलमइ तहेवाणायव्वं ।
केवलणाणां एक्कं सव्वत्थ पयासयंणिच्चं ॥293॥

गाथार्थ: मनः पर्ययज्ञान के दो भेद है । एक ऋजुमनि और दूसरा विपुलमति । जो दूसरे के मन में ठहरे हुए सूक्ष्म वा स्थूल पदार्थों को प्रत्यक्ष जाने उसको मनःपर्यय ज्ञान कहते है । जो सरल मन में ठहरे हुए पदार्थों को जाने वह ऋजुमति है और जो कुकील मन में ठररे हुए पदार्थो को भी जान ले वह विपुलमति है ।

ऋजुमति से विपुलमति अधिक और अधिक शुद्ध है । केवल ज्ञान एक है । वह नित्य है अनंत काल तक रहता है और लोक अलोक सब को प्रकाशित करता है सब को जो जानता है ।


एसो अट्ठपयारो णाणुवओगो हु होइ सायारो ।
जक्खु अचक्खू ओही केवलसहिओ अणायारो ॥294॥

गाथार्थ: इस प्रकार ज्ञानोपयोग के आठ भेद है और वह ज्ञानोपयोग साकार है । अनाकार वा आकार रहित उपयोग के चार भेद है अनाकार उपयोग दर्शन को कहते है । दर्शन के चार भेद है । चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन, अवधि दर्शन और केवल दर्शन । किसी पदार्थ को चक्षुओं से देखनें को चक्षुदर्शन कहते है । चक्षु के सिवाय अन्य इन्द्रियों से देखना अचक्षुदर्शन है अवधि ज्ञान के साथ अवधि ज्ञान से पहले होने वाले दर्शन को अवधि दर्शन कहते है और केवल ज्ञान के साथ होने वाले दर्शन को केवल दर्शन कहते है । इस प्रकार उपयोग के बारह भेद बतलाये ।


जम्हि भवे जे देहं तम्हि भवे तप्पमाणओ अप्पा ।
संहार वित्थर गुणो केवलणाणीहि उद्दिट्ठो ॥295॥

गाथार्थ: इस संसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह आत्मा अनेक योनियों मे अनेक प्रकार के छोटे बडे शरीर धारण करता है। जिस भाव में जैसा छोटा या बडा शरीर धारण करता है उस शरीर के प्रमाण के समान ही आत्मा का आकार हो जाता है। इसका कारण यह है कि इस आत्मा में संकोच और विस्तार होने की शक्ति है। इसलिये छोटे शरीर में जाता है तो संकुचित होकर छोटा आकार हो जाता है और बडे शरीर में बडा हो जाता है ।


जो कत्ता सो भुत्ता ववहार गुणेण सोइ कम्मस्स ।
ण हु णिच्छएण भणिओ कत्ता भोत्ता य कम्माणं ॥296॥

गाथार्थ: यह जीव व्यवहार नय से ज्ञानावरणादि कर्मों का कर्ता है और यही आत्मा अपने आप किये हुए उन कर्मो के फलका भोक्ता है। निश्चय नय से न तो वह कर्मो का कर्ता है और न उन के फलका भोक्ता है। निश्चय नय से वह अपने शुद्ध स्वभावों का कर्ता है और उन्हीं शुद्ध स्वभावोंका भोक्ता है।


कम्ममलछाइओवि य ण मुयइ सो चेयण गुणं किं पि ।
जोणी लक्खगओ वि य जहि कणय कद्दमे खित्तं ॥297॥

गाथार्थ: यह संसारी आत्मा चौरासी लाख योनियों मे परिभ्रमण करता हुआ कर्म रूपी मलसे आच्छादित हो रहा है इसलिये जिस प्रकार कीचड मे पडा हुआ सोना जाना नहीं जा सकता उसी प्रकार यह संसारी आत्मा अपने शुद्ध चेतना के स्वरूप को भी नहीं जानता है ।


सुहमो अमुत्तित्तिवंत्तो वण्णगंधाइफासपरिहीणो ।
पुग्गलमज्झिगओ वि य णय मिल्लइ णिययसब्भावं ॥298॥

गाथार्थ: यह आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है अमूर्त है वर्ण रसगंध स्पर्श इन पुद्गलोंके चारों गुणों से रहित है। यद्यपि वह पुद्गलमय शरीर में रहता है पुद्गलमय ज्ञानावरणादि कर्मों से मिला हुआ है तथापि वह अपने स्वभाव को कभी नहीं छोडता है।


सब्भावे णुड्ढगई विदिसं परिहरिय गइ चउक्केण ।
गच्छेइ कम्मजुत्तो सुद्धो पुण रिज्जुगइ जाई ॥299॥

गाथार्थ: इस जीव का स्वभाव स्वभाव से ही ऊर्ध्व गमन करना है। परंतु जो कर्म सहित जीव है वे विग्रह गति में चारों विदिशाओं को छोडकर शेष छहों दिशाओं में गमन करते है। तथा जो शुद्ध जीव है वे ऋजुगति से ऊर्ध्व गमन ही करते है।


पाणि विमुत्ता लंगलि बंकगई होइ तह य पुण तइया ।
कम्माण काय जुत्तो दो तण्णि य कुणइ बंकाइ ॥300॥

गाथार्थ: पाणिमुक्ता, लांगलिका और गोमूत्रिका इस प्रकार वक्र गति के तीन भेद है । विग्रह गति में इस जीव के कार्मण शरीर रहता है केवल कार्मण शरीर को धारण करनेवाले जीव एक दो वा तीन मोड लेते है ।


तइए समए गिण्हइ चिरकयकम्मोदएण सो देहं ।
सुरणर णारदयाणं तिरियाणं चेव लेसवसो ॥301॥

गाथार्थ: अपनी अपनी लेश्याओं के निमित्त से देव मनुष्य तिर्यंच देव आदि गतियों में अपने चिरकाल से उपार्जित किये कर्मों के उदय से जैसा शरीर धारण करना है वह शरीर पहले ही समय में वा दूसरे समय में वा तीसरे समय में अथवा चौथे समय में धारण कर लेता है।


सुह दुक्खं भुंजंतो हिडदि जोणीसु सयसहस्सेसु ।
एयंदिय वियलिंदिय सयलिंदिय पज्ज पज्जत्तो ॥302॥

गाथार्थ: यह ससारी जीव इस प्रकार एकेन्द्रिय दोइन्द्रिय तेइन्द्रिय चौइन्द्रिय पंचेन्द्रिय पर्याप्तक अपर्याप्तक आदि चौरासी लाख योनियों मे परिभ्रमण करता हुआ अनेक प्रकार के सुख और दुःख भोगता रहता है।


होंति अजीव दुविहा रूवा रूवा य रूवि चउ भेया ।
खंधंच तहा देसो खंधपदेसो य परमाणू ॥303॥

गाथार्थ: अजीव पदार्थों के दो भेद है एक रूपी और दूसरा अरूपी उनमें रूपी पदार्थ एक पुद्गल है शेष सब अरूपी है । रूपी पुग्दल द्रव्य के भी दो भेद है एक परमाण और दूसरा स्कंध । स्कंध के फिर तीन भेद होते है । स्कंध, स्कंध देश और स्कंधप्रदेश । पुद्गलका सबसे छोटा भाग परमाण कहलाता है, उसके फिर टुकडे नहीं होते । वह इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता है । वह एक प्रदेशी ही कहलाता है उसमे और प्रदेश नहीं होते । वही एक प्रदेश, आदि है वही मध्य है और वही अंत है । उसमे एक रस रहता है एक गंध रहता है एक वर्ण रहता है और दो स्पर्श रहते है । वह अत्यंत सूक्ष्म होता है और अन्य स्कंधादिकों का कारण भूत होता है । अनंतानंत परमाणु मिलकर जब बंधरूप परिणत हो जाते है तब उसको स्कंध कहते है । स्कंध के आधे भागको देश कहते है और देश के आधे भागको प्रदेश कहते है । जिसको पकड सके कहीं रख सके फेंकसके इस प्रकार काम में आनेवाले पृथ्वी जल वायु अग्नि आदि सब स्कंध पुद्गल है बहुत से ऐसे भी स्कंध है जो सूक्ष्म होते है पकडने में नहीं आते परंतु अनंत परमाणुओं के समूह से बने होते है ।


णिहिला वपं च खंधा तस्स य अद्धं च वुच्चदे देसो ।
अद्धद्धं च पदेसो अविभागीहोद परमाणु ॥304॥

गाथार्थ: समस्त परमाणुओं का पिंड स्कंध कहलाता है उसका आधा देश कहलाता है, उसका भी आधा प्रदेश कहलाता है और जिसका फिर विभाग न हो सके ऐसे सबसे छोटे भाग को परमाणु कहते है ।


धम्माधम्मागासा अरूविणो होंति तह य पुण कालो ।
गइ ठाण कारणावथ उग्गाहण वत्तणा कमसो ॥305॥

गाथार्थ: धर्म अधर्म आकाश और काल ये पदार्थ अरूपी हैं और इसीलिये ये अमूर्त है । इनमेंसे धर्म द्रव्य जीव पुद्गलों की गति में कारण है, अधर्म द्रव्य जीव पुद्गलों की स्थिति में कारण है, आकाश द्रव्य समस्त द्रव्यों को अवकाश देने में कारण है और काल द्रव्य द्रव्यों की पर्याय बदलने में कारण है ।


जीवाण पुग्गलाणं गइप्पव त्ताण कारण धम्मो ।
जह मच्छाणं तोयं थिरभूया णेवसो णेई ॥306॥

गाथार्थ: गमन करने की शक्ति जीव और पुद्गल इन दोनों पदार्थों में है । जिस प्रकार गमन करनें की शक्ति मछली में है तथापि वह बिना पानी के गमन नही कर सकती । उसकी गति में पानी सहायक है उसी प्रकार गमन करने में प्रवृत्त होनेवाले जीव पुद्गलों को धर्म द्रव्य सहायक होता है धर्म द्रव्य एक अमूर्त पदार्थ है और वह वह समस्त लोकाकाश में व्याप्त होकर भरा हुआ हे । वह आकाश के समान एक अखंड द्रव्य हे और मछलियों को पानी के समान जीव पुद्गलों को गमन करनें में सहायक होता हे । परंतु जो जीव पुद्गल ठहरे हुए हैं उनको न तो चलाता है न चलने की प्रेरणा करता है । यदि वे चलते हैं तो सहायक हो जाता हैं ।


ठिदी कारणं अधम्मो विसामठाणं च होइ नइ छाया ।
यहियाणं रुक्खस्स य गच्छंतं णेव सो धरई ॥307॥

गाथार्थ: धर्म द्रव्य के समान ही अधर्म द्रव्य है अरूपी और समस्त लोकाकाश मे व्याप्त है । वह जीव जो पुद्गलों को ठहरने में सहायक होता है । जिस प्रकार गमन करते हुए पथिकों के लिये विश्राम स्थान में ठहरने के लिये वृक्ष की छाया सहायक होती है उसी प्रकार जो जीव पुद्गल गमन करते हुए ठहर जाते हैं । वा ठहरे हुए उनको ठहरनें मे अधर्म द्रव्य सहायक हो जाता है । जिस प्रकार छाया गमन करने वाले पथिक को रोकतीं नहीं उसी प्रकार अधर्म द्रव्य भी गमन करने वाले जीव पुद्गलों को रोकता नहीं ।


सव्वेसिं दव्वाणं अवयासं देइ तं तु आयासं ।
तं पुणु दुविहं भणियं लोयालोयं च जिणसमए ॥308॥

गाथार्थ: जो जीव अजीव आदि समस्त पदार्थों को अवकाश देने मे समर्थ है उसको आकाश कहते है । भगवान् श्री जिनेन्द्र देव ने उसके दो भेद बतलाये हैं एक लोकाकाश और दूसरा अलोकाकाश।


वत्तणगुण जुत्ताणं दव्वाणं होइ कारणं कालो ।
सो दुविह भेय भिण्णो परमत्थो होइ ववहारो ॥309॥

गाथार्थ: जो जीवादिक द्रव्य प्रति समय परिवर्तन स्वरूप होते है उनके उस परिवर्तन में काल द्रव्य कारण है। उस काल के दो भेद है एक परार्थ काल और दूसरा व्यवहार काल।


परमत्थो कालाण लोयपदेसु हि संठिया णिच्चं ।
एक्केक्के एक्केक्का अपएसा रयण रासिव्व ॥310॥

गाथार्थ: काल के जो अणु है उनको परमार्थ काल कहते है । वे कालाणु लोकाकाश के एक एक प्रदेश पर एक एक कालाणु ठहरा हुआ है । इसलिये लोकाकाश के जितने प्रदेश है उतने ही कालाणु है वे आपसमे मिलते नहीं है किंतु रत्नों की राशिके समान अलग अलग ही रहते है। इन्ही कालाणुओं को परमार्थ काल कहते है । इन्हीं कालाणुओं से व्यवहार काल प्रगट होता है । पुद्गल का एक परमाणु जितने समय मे एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक पहुंचता है उतनी देर को एक समय कहते है।


वट्टण कालो समओ पुग्गलपरमाणु वाण संजाओ ।
ववहारस्स य मुक्खो उप्पणो तीद भावी स ॥311॥

गाथार्थ: वर्तना काल जो मुख्य काल है । उस से व्यवहार काल उत्पन्न हो जाता है । कालाणु अणु रूप है इसलिये उससे उत्पन्न हुआ व्यवहार काल भी सबसे छोटा समय रुपी ही होता है । तथा वह व्यवहार काल पुद्गल परमाणुओं के निमित्त से होता है । अर्थात् एक पुद्गल का परमाणु जितनी देर में एक कालाणु से दूसरे कालाणु तक जाता है तथा मंद गति से जाता है तब एक एक समय होता है । ऐसे समय अनंतानंत बीत गये और आगे अनंतानंत समय होंगे । इस प्रकार भूत वर्तमान और भविष्य के भेद से उस व्यवहार काल के तीन भेद हो जाते है ।


तेसिं पि य समयाणं संखारहियाण आवली होई ।
संखेज्जा वलि गुणिओ उस्सासो होइ जिणदिट्ठो ॥312॥

गाथार्थ: असंख्यात समयों की एक आवली होती है तथा सख्यात आवलियों का एक उच्छवास होता है ऐसा भगवान् जिनेंद्रदेव ने कहा है ।


सत्तु स्सासे थोओ सत्त त्थोएहि होइ लअ इक्को ।
अट्ठत्तीसद्ध लवा णाली वेणालिया मुहुत्तं तु ॥313॥

गाथार्थ: सात उच्छवासों का एक स्तोक होता है। सात स्तोकों का एक लव होता है। साडे अडतीस लवों की एक नाली है और दो नालियों का एक मुहूर्त होता है।


तीस मुहुत्तो दिवसो पणदह दिवसेहि होइ पक्खं तु ।
विहि पक्खेहि य मासो रिउ एक्का वेसि मासेहिं ॥314॥

गाथार्थ: तीस मुहुर्त का एक दिन होता है, पंद्रह दिन का एक पक्ष होता है दो पक्ष का एक महीना होता है और दो महीने की एक ऋतु होती है ।


रिउ तिय भूयं अयणं अयण जुवलेण होइ वरिसोक्को ।
इय ववहारो उत्तो कमेण विद्धि गओ विविहो ॥315॥

गाथार्थ: तीन ऋतु का एक अयन होता है और दो अयनों का एक वर्ष होता है । इस प्रकार अनुक्रम से वृद्धि को प्राप्त हुआ अनेंक प्रकार का व्यवहार काल कहा है ।


एयं तु दव्वछक्कं जिणेहि पंचत्थिकाइयं भणियं ।
वज्जिय कायं कालो कालस्स पएसयं णत्थि ॥316॥

गाथार्थ: इस प्रकार भगवान् जिनेन्द्रदेव ने छह द्रव्यों का स्वरुप कहा है । इन छहों द्रव्यों मे से काल को छोडकर शेष पांच द्रव्य अस्तिकाय कहलाते है । जिनकी सत्ता हो उनको अस्ति कहते है और जो काय वा शरीर के समान अनेंक प्रदेश वाले हो उसको काय कहते है । जीव पुद्गल धर्म अधर्म आकाश ये पांचों द्रव्य बहु प्रदेशी है इसलिये अस्तिकाय कहलाते है । काल के प्रदेश नहीं है वह एक ही प्रदेश है इसलिय उसको अस्तिकाय नहीं कहते है ।


जं पुण रुपी दव्वं गंधरफास वण्ण संजुत्तं ।
लहि ऊण जीवं ठिठ्ठा कारणयं कम्मबंधस्स ॥317॥

गाथार्थ: स्पर्श रस गंध वर्ण इन चारों गुणों सहित जो रूपी पुद्गल द्रव्य है वह जीव मे रहनेवाले शुभ अशुभ भावों को पाकर कर्म बंध का कारण हो जाता है ।


सम्मत्तसुदवएहि य कसाय उवसमण गुणसमाउत्तो ।
जो जीवो सो पुण्णं पावं विवरिय दोसाओ ॥318॥

गाथार्थ: जब यह जीव सम्यग्दर्शन को धारण कर लेता है, भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए शास्त्रों को जान लेता है, व्रतों को धारण कर लेता है और जिसकी कषायें सब शांत हो जाती है उस समय वह जीव पुण्यरूप कहलाता है अर्थात् ऊपर लिखे सब कारणों से पुण्य कर्म की प्राप्ति होती है तथा उसके विपरीत हिंसा आदि पाप करना मिथ्यात्व धारण करना मिथ्या शास्त्रों का अध्ययन करना आदि पाप कहलाते है आठ कर्मों मे से साता वेदनीय, शुभ नाम, ऊंच गोत्र, और शुभ आयु ये पुण्य कर्म है तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, असाता वेदनीय, अशुभ नाम, अशुभ आयु और नीच गोत्र ये पाप कर्म है । इस प्रकार संक्षेप से पुण्य पाप का स्वरुप कहा ।


गिरि णिग्गउ णइवाहो पविसइ सरम्मि जहाणवरयं ।
लहिऊण जीव चिठ्ठा तह कम्मं भावि आवसई ॥319॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी नदी का प्रवाह किसी पर्वत से निकलता है और वह किसी सरोवर में निरंतर प्रवेश करता रहता है, उसी प्रकार जीव के शुभ अशुभ परिणामों को पाकर आगामी काल के लिये कर्मों का आस्रव होता रहता है ।


आसवइ सुहेण सुहं असुहं आसवइ असुह जोएण ।
जइ णइजलं तलाए समलं वा णिम्मलं विसई ॥320॥

गाथार्थ: कर्मों का आस्रव मन वचन काय इन तीनों योगों से होता है । अशुभ योगो से अशुभ कर्मों का आस्रव होता है और शुभ योगों से शुभ कर्मो का आस्रव होता है । मन वचन काय की प्रवृत्ति को योग कहते है । जो प्रवृत्ति सम्यक्त्व रुप होती है व्रत चारित्र रुप होती है वह शुभ प्रवृत्ती कहलाती है इसी को शुभ योग कहते है । शुभ योगों से पुण्य कर्मों का आस्रव होता है तथा जो प्रवृत्ति हिंसा झूठ चोरी कुशील परिग्रह रूप होती है, राग द्वेष मोह रूप होती है वह अशुभ प्रवृत्ति कहलाती है इसी को अशुभ योग कहते है, और ऐसे अशुभ योगों से पाप कर्मों का आस्रव होता है ।


आसवइ जं तु कम्मंण वय काएहि रायदोसेहिं ।
ते संवरइ णिरुत्तं तिगुत्तिगुत्तो णिरालंवो ॥321॥

गाथार्थ: रागद्वेष पूर्वक होने वाली मन वचन काय की क्रियाओं से जिन कर्मों का आस्रव होता है वे कर्म उन मन वचन काय की क्रियाओं को रोक देने से फिर नहीं आते । इस का भी कारण यह है कि कर्मों के आने के लिये मन वचन काय की क्रियाएं ही कारण होंती है यदि वे क्रियाएं सर्वथा रोक दी जायं तो फिर उन कर्मों के आने के लिये कारण वा आलंबन ही नहीं रहता है । बिना आलवन वा कारण के वे कर्म आही नहीं सकते । इसी को संवर कहते है । वह संवर तीनों प्रकार की गुप्तियों से होता है । मन की क्रिया को सर्वथा रोक देना मनो गुप्ति, वचन गुप्ति और काय की क्रिया को सर्वथा रोक देना काय गुप्ति है ।


जा संकप्पवियप्पो ता कम्मं असुइ सुह य दायारं ।
लद्धे सुद्ध सहावे सुसंवरो उहयकम्मस्स ॥322॥

गाथार्थ: इस जीव में जब तक सकल्प विकल्प होता है तब तक शुभ कर्म वा अशुभ कर्म आते ही रहते है । शुभ संकल्पों से शुभ कर्म आते है और अशुभ संकल्प से अशुभ कर्म आते है । जब दोनों प्रकार के के संकल्प विकल्प नष्ट हो जाते है तब शुभ अशुभ दोनों प्रकार के कर्मो का संवर हो जाता है ।


णट्ठे मणसंकप्पे इंदियवावारवज्जिए जीवे ।
लद्धे सुद्ध सहावे उभयस्स य संवरो होई ॥323॥

गाथार्थ: जिस जीव के मन के समस्त संकल्प विकल्प नष्ट हो जाते है, समस्त इंद्रियों के व्यापार नष्ट हो जाते है तथा आत्मा का शुद्ध स्वभाव प्रगट हो जाता है तब दोनों प्रकार के शुभ अशुभ कर्मों का संवर हो जाता है। इस प्रकार संक्षेप मे संवर का स्वरूप कहा।


जीव कम्माण उहयं अण्णोण्णं जो पएस पवेसो हु ।
जो निणवेरहिं बंधो भणिओ इय विगयमोहेहिं ॥324॥

गाथार्थ: जीव के प्रदेश और कर्म के प्रदेश दोनों ही जब एक दूसरे के साथ परस्पर मिल जाते है उस को मोह रहित भगवान् जिनेंद्रदेव बंध कहते है ।


जीवपएसेक्केक्के कम्मपएसा हु अंतपरिहीणा ।
होंति घणा णिविभूया सो बंधो होइ णायव्वो ॥325॥

गाथार्थ: जीव के एक एक प्रदेश के साथ अनंतानंत कर्मवर्गणाए बंधी हुई है और वे सब वर्गणाएं घनीभूत अंधकार के समान इकठ्ठी होकर आत्मा के प्रदेशों के साथ बंधी है । इस प्रकार जो आत्मा और कर्मों के प्रदेश परस्पर मिले हुए है उसको बंध समझना चाहिये ।


अत्थि हु अणाइभूया बधो जीवस्स विविह कम्मेण ।
तस्सोदएण जायइ भावो पुण रायदोसमओ ॥326॥

गाथार्थ: इस संसारी जीव के साथ अनेक प्रकार के कर्मो का बंध अनादि काल से लगा हुआ है जब उन कर्मों का उदय होता है तब इस जीव के परिणाम राग द्वेष रुप हो जाते है । तब राग द्वेष रूप परिणामों के निमित्त से फिर अनेक अन्य पुद्गल कर्म वर्गणाएं जीव के साथ कर्म बंध रूप परिणत हो जाती है । जिस प्रकार घी के चिकने वर्तन पर धूल आ आ कर चिपक जाती है इसी प्रकार राग द्वेष परिणामों के होते ही मन वचन काय की क्रियाओं के द्वारा फिर अनेक प्रकार के कर्मों का बंध हो जाता है । इस प्रकार पूर्व संचित कर्मों के उदय से राग द्वेष रुप परिणाम होते है और राग द्वेष रूप परिणामों से फिर कर्मों का बंध होता है । यह परंपरा मोक्ष प्राप्त होने तक बराबर चलती रहती है ।


भावेण तेण पुणरवि अण्णो बहु पुग्गला हु गग्गंति ।
जह तुप्पियपत्तस्स य णिविडा रेणुव्व लग्गंति ॥327॥

गाथार्थ: इस संसारी जीव के साथ अनेक प्रकार के कर्मो का बंध अनादि काल से लगा हुआ है जब उन कर्मों का उदय होता है तब इस जीव के परिणाम राग द्वेष रुप हो जाते है । तब राग द्वेष रूप परिणामों के निमित्त से फिर अनेक अन्य पुद्गल कर्म वर्गणाएं जीव के साथ कर्म बंध रूप परिणत हो जाती है । जिस प्रकार घी के चिकने वर्तन पर धूल आ आ कर चिपक जाती है इसी प्रकार राग द्वेष परिणामों के होते ही मन वचन काय की क्रियाओं के द्वारा फिर अनेक प्रकार के कर्मों का बंध हो जाता है । इस प्रकार पूर्व संचित कर्मों के उदय से राग द्वेष रुप परिणाम होते है और राग द्वेष रूप परिणामों से फिर कर्मों का बंध होता है । यह परंपरा मोक्ष प्राप्त होने तक बराबर चलती रहती है ।


एक्कसमएण बद्धं कम्मं जीवेण सत्तभेयेहिं ।
परिणवइ आयु कम्मं भूयाउ सेसेण ॥328॥

गाथार्थ: जीव के साथ प्रत्येक समय मे बंधे हुए कर्म सात भेदों मे बंट जाते है । ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय मोहनीय नाम गोत्र अंतराय इन सातों कर्मों में बट जाते है । आयु कर्म का बंध त्रिभाग में अर्थात् आयु के दो भाग बीत जाने पर होता है तथा उस समय भी आयु कर्म का बंध हो अथवा और भी आगे हो वा अंत समय में हो । जब आयु कर्म का बंध हो जाता है तब उसको भी भाग मिलने लगता है । इस प्रकार कर्मों का बंटवारा होता है ।


सो बंधो चउभेओ णायव्वो होइ सुत्तणिद्दिट्ठो ।
पयडि ट्ठिदि अणुभागो पएसबंधो पुरा कहिओ ॥329॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेन्द्रदेव के हुए सिद्धांत शास्त्रों में वह बंध चार प्रकार का कहा है । तथा प्रकृतिबघ स्थितिबंध अनुभाग बंध और प्रदेश बंध ये बंध के चार भेद है ।


णाणाण दंसणाणं आवरण वेयणीय मोहणियं ।
आउस्स णाम गोदं अंतरायाणि षयडीओ ॥330॥

गाथार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय ये आठ प्रकृतिबंध के भेद है ।


णाणावरणं कम्मं पंचविहं होइ सुत्तणिद्दिट्ठं ।
जह पडिमोवरि खित्तं छायणयं होइ कप्पडयं ॥331॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी प्रतिमा के ऊपर कपडे का आच्छादन डाल देने से प्रतिमा ढक जाती है उसी प्रकार जो आत्मा के ज्ञान गुण को ढक लेता है उसको ज्ञानावरण कर्म कहते है । उस ज्ञानावरण कर्म के पांच भेद है । मतिज्ञानावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधि ज्ञानावरण, मनः पर्यय ज्ञानावरण, और केवल ज्ञानावरण । ऐसा सिद्धांत सूत्र में कहा है ।


दंसण आवरणं पुण जइ पडिहारो विणिवइ वारम्मि ।
तं णवविहं पउत्तं फुडत्थवाएहिं सुत्तम्मि ॥332॥

गाथार्थ: जिस प्रकार प्रतिहार वा द्वारपाल द्वारपर बैठा रहता और राजा के दर्शन नहीं होने देता । जाने वालों को द्वारपर रोक देता है उसी प्रकार जो आत्मा के दर्शन गुण को प्रकट न होने दे, उसको ढकले, उसकों दर्शनावरण कर्म कहते है । उस दर्शना वरण कर्म के नौ भेद है । इस प्रकार स्पष्टवादी भगवान् जिनेंद्रदेव ने अपने सिद्धांत सूत्रों में कहा है । चक्षुदर्शनावरण, अचक्षुदर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण, केवदर्शनावरण, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, और स्त्यान गृद्धि ये नौ भेद दर्शनावरण के है ।


मोहेइ मोहणीयं जह मइरा अहव कोद्दमा पुरिसं ।
तह अडवीस विभिण्णं णायव्वं जिणुवएसेण ॥333॥

गाथार्थ: जिस प्रकार मद्य पुरुषों को मोहित कर देता है, अथवा कोदों पुरुषों को मोहित कर देता है उसी प्रकार जीवों को जो मोहित कर देता है उसको मोहनीय कर्म कहते है । उस मोंहनीय के अट्ठाईस भेद भगवान् जिनेन्द्रदेव ने कहे है । मोहनीय के दो भेद है दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । दर्शन मोहनीय के तीन भेद है । मिथ्यात्व सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकृति मिथ्यात्व । चारित्र मोहनीय के पच्चीस भेद है । अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ, संज्वलन क्रोध मान माया लोभ । हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद, नपुंसक वेद । इस प्रकार मोहनीय कर्म के अठ्ठाईस भेद है ।


महुलित्त खग्ग सरिसं दुविहं पुण होइ वेयणीयं तु ।
सायासाय विभिण्णं सुह दुक्खं देइ जीवस्स ॥334॥

गाथार्थ: जिस प्रकार शहदलपेटी तलवार की धार चाट लेने पर मीठी लगती है परंतु जीभ कट जाने से दुःख अधिक होता है उसी प्रकार जो कर्म जीवों को सुख दुःख देता है उसको वेदनीय कर्म कहते है । उसके दो भेद है साता वेदनीय और असाता वेदनीय । साता वेदनीय जीवों को सुख देता है और असाता वेदनीय दुःख देता है ।


आऊ चउप्पयारं सुर णारय मणुय तिरिय गइवद्धं ।
हडिखित्त पुरिस तुल्लं जीवे भवधारण समत्थं ॥335॥

गाथार्थ: जिस प्रकार जिसका पांव ( पैर ) काठ मे फंसा हुआ है वह काठ उस पुरुष को कहीं जाने नही देता, वहीं रोख रखता है इसी प्रकार जो कर्म एक ही शरीर में रोक रखे उसको आयु कर्म कहते है उसके चार भेद है देवायु, नरकायु, मनुष्य आयु और तिर्यंच आयू । यह आयु कर्म ही भव धारणा कराता हरता है ।


चित्तपडंवविचित्तं णाणा णामेहिं बत्तणं णामं ।
तेणवइ संखगुणियं गइ जाइ सरीर आईहिं ॥336॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी वस्त्रपर अनेक प्रकार के चित्र बनाते है उसी प्रकार जो गति जाति शरीर आदी अनेक नामों कों जो बनावे उसको नाम कर्म कहते है । उसके तिरानवे भेद है । देवगति, नरक, गति, मनुष्यगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रिय जाति, दोइन्द्रिय जाति, तेइन्द्रिय जाति, चौइन्द्रिय जाति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, औदारिक शरीरांगोपांग, वैक्रियक शरीरांगोपांग, आहारकशरीरांगोपांग, स्थान निर्माण प्रमाण निर्माण, आहारक शरीर बंधन आदि पांचों शरीरों के पांच बंधन, औदारिकशरीर संचात आदि पांचों शरीरों के पांच सांवत, समचतुरस्रसंस्थान, न्यग्रोध परिमंडल संस्थान, स्वातिक संस्थान, कुबज्जक संस्थान, वामन संस्थान, हुंडक संस्थान, वज्र वृषभ नाराच संहनन, वज्र नाराच संहनन, नाराच संहनन, अर्द्ध नाराच संहनन, कीलक संहनन, असंप्राप्तासृपाटक संहनन, कर्कश, मृदु, गुरु, लघु स्निग्ध, रूक्ष, शीत, उष्ण ये आठ स्पर्श, तिक्त, कटुक कषाय, आम्ल, मधुर ये पांच रस, सुरभि, असुरभि, दो गंध कृष्ण, नील, रक्त, पीत, शुल्क ये पांच वर्ण नरक गत्यानु पूर्वी तिर्यग्गत्यानुपूर्वी मनुष्यगत्यानुपूर्वी देव गत्यानूपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, विहायोगति, प्रत्येक शरीर, सादारण, त्रस, स्थावर, सभेग, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर शुभ, अशुभ, सूक्ष्म, वादर पर्याप्तक, अपर्याप्तक, स्थिर, अस्थिर, आदेय, अनोदय यशस्कीर्ति, अयशकिर्ति तीर्थंकरत्व ये तिरानवें प्रकृतियां नाम कर्म की है ।


गोदं कुलाल सरिसं णिच्चुच्च कुलेसु पायणे दच्छ् ।
घड रंजणाइ करणे कुंभयकारो जहा णिउणो ॥337॥

गाथार्थ: जिस प्रकार कुंभार छोटे वा बडे घडे बनाने में निपुण होता है उसी प्रकार जो ऊंच गोत्र मे उत्पन्न करे वह ऊंच गोत्र है और नीच कुल में उत्पन्न करे वह नीच गोत्र है। गोत्र कर्म के ये दो भेद है।


जइ भंडयारि पुरिसो धणं णिवारेइ रायणा दिण्णं ।
तह अंतराय कम्मं णिवारणं कुणइ लद्धीणं ॥338॥

गाथार्थ: जिस प्रकार राजा के दिये हुए धन को भंडारी(खजांची) पुरुष देने नहीं देता उसी प्रकार अंतराय कर्म पांचो लब्धियों को प्राप्त नहीं होने देता, देने से निवारण कर देता है । उस अंतराय कर्म के पांच भेद है । दानांतराय लाभांतराय भोगान्तराय उपभोगांतराय और वीर्यातराय । इस प्रकार भगवान् जिनेंद्रदेव ने अंतराय कर्म के पांच भेद बतलाये है । इस प्रकार आठ कर्मो के एकसो अडतालीस भेद होते है ।


तं पंचभेद उत्तं दाणे लाहे य भोइ उवभोए ।
तह वीरि एण भणियं अंतरायं जिणिंदेहिं ॥339॥

गाथार्थ: जिस प्रकार राजा के दिये हुए धन को भंडारी(खजांची) पुरुष देने नहीं देता उसी प्रकार अंतराय कर्म पांचो लब्धियों को प्राप्त नहीं होने देता, देने से निवारण कर देता है । उस अंतराय कर्म के पांच भेद है । दानांतराय लाभांतराय भोगान्तराय उपभोगांतराय और वीर्यातराय । इस प्रकार भगवान् जिनेंद्रदेव ने अंतराय कर्म के पांच भेद बतलाये है । इस प्रकार आठ कर्मों के एकसो अडतालीस भेद होते है ।


एसो पयडीवंधो अणुभागो होइ तस्स सत्तीए ।
अणुभवणं चं तीवे तिव्वं मंदे मंदाणु रूवेण ॥340॥

गाथार्थ: इस प्रकार प्रकृति बध का स्वरूप कहा । इन प्रकृति बंध कर्मों मे जो फल देने की शक्ति है उसको अनुभाग बंध कहते है । यदि उन कर्मों में तीव् फल देने की शक्ति है तो उसका अनुभव वा उदय तीवृता के साथ होता है और यदि मंद फल देने की शक्ति है तो उसका अनुभव वा फल मंदता के साथ होता है ।


एहं खलु पठमाणं उक्स्सं अंतराइयस्सेव ।
सं कोडाकोडो सायरणामाण मे व ठिदी ॥341॥

गाथार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अंतराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोडाकोडी सागर प्रमाण है मोहनीय कर्म की स्थिति सत्तर कोडाकोडी सागर प्रमाण है, नाम गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोडाकोडी सागर है और आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर है ।


म हस्स सत्तरी खलु वीसं पुण होइ णाम गोत्तस्स ।
तेतीस सागराणां उवभाओ आउसस्सेव ॥342॥

गाथार्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अंतराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोडाकोडी सागर प्रमाण है मोहनीय कर्म की स्थिति सत्तर कोडाकोडी सागर प्रमाण है, नाम गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोडाकोडी सागर है और आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर है ।


बारसय वेयणीए णामा गोदे य अट्ठ य मुहुत्ता ।
भिण्ण मुहुत्तं तु ठिदी सेसाणां सावि पंचण्ह ॥343॥

गाथार्थ: वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहुर्त है, नाम और गोत्र की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त है और शेष पांचों कर्मों की जघन्य स्थिति अंतमुंहुर्त है । इस प्रकार स्थिति बंधका स्वरुप कहा ।


पुव्व कय कम्म सडणं णिज्जरा सा पुणो हवे दुविहा ।
पढमा विवायाया विदिया अविवाय जाया थ ॥344॥

गाथार्थ: पहले संचित हुए कर्मों का सडना है छूटना है आत्मा से उनका संबंध हट जाना है उसको निर्जरा कहते है । उस निर्जरा के दो भेद है । एक विपाकजा और दुसरी अविपाकजा ।


कालेणउवाएण पच्चंति जहा वणप्फई फलाइं ।
तह कालेण तवेण य पच्चंति कयाइ कम्माइ ॥345॥

गाथार्थ: जिस प्रकार वनस्पति के आम आदि फल एक तो अपने समय के अनुसार पकते है और दुसरे पाल में देकर वा अन्य किसी उपाय से पकालिये जाते है उसी प्रकार जो कर्म अपनें समय के अनुसार स्थितिबंध पूर्ण होने पर अपना फल देकर खिर जाते है नष्ट हो जाते है उसको विपाकजा निर्जरा कहते है । विपाक का अर्थ फल देना है । फल देकर जो कर्म खिरते है उसको विपाक निर्जरा कहते है । तथा जो कर्म बिना फल दिये तपश्चरण के द्वारा नष्ट कर दिये जाते है वह अविपाक निर्जरा कहलाती है । इस प्रकार निर्जरा के दो भेद है ।


णिस्सेस कम्म मुक्को सो मुक्खो जिणवरेंहि पण्णत्तो ।
रायद्दोसाभावे सहाव थक्कस्स जीवस्स ॥346॥

गाथार्थ: जो जीव राग द्वेष का सर्वथा नाश कर देता है और अपने शुद्ध स्वभाव में स्थिर हो जाता है उस समय जो समस्त कर्मों का सर्वथा नाश हो जाता है उसको भगवान् जिनेद्रदेव मोक्ष कहते है । मोक्ष शब्द का अर्थ छूटना है । यह आत्मा जो अनादि काल से कर्मों से बंधा हुआ है वह जब राग द्वेष के अभाव होने पर और शुद्ध स्वभाव में बीन होनें पर समस्त कर्मों से छूट जाता है तब उसको मुक्त जीव कहते है । मुक्त होने पर कर्मों के साथ साथ शरीर भी नष्ट हो जाता है ।


सो पुण दुविहो भणिओ एक्कदेसो य सव्वमोक्खो य ।
देसो चउघाइखए सव्वो णिस्सेस णासम्मि ॥347॥

गाथार्थ: वह मोक्ष दो प्रकार है । एक देश और सर्वदेश । चारों घातिया कर्मों का नाश हो जाना एक देश मोक्ष है और समस्त कर्मों का नाश हो जाना सर्वदेश मोक्ष है ।


णए सत्तपयारा जिणदिठ्ठा भासिया मए तच्चा ।
सद्दहइ जो हु जीवो सम्माइट्ठी हवे सो हु ॥348॥

गाथार्थ: इस प्रकार भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहें हुए सात तत्त्वों का स्वरुप अत्यंत संक्षेप से मैनें कहा। जो जीव इन सातों तत्त्वों का श्रद्धान करता है वही सम्यग्दृष्टी पुरुष है।


अविरय सम्मादिठ्ठी एसो उत्तो मया समासेण ।
एत्तो उड्ढं वोच्छ समासदो देस विरदो य ॥349॥

गाथार्थ: इस प्रकार मैंने अत्यंत संक्षेप से अविरत सम्यग्दृष्टी नाम के चौथे गुणस्थान का स्वरुप कहा। अब इससे आगे संक्षेप से ही देश विरत अथवा बिरताविरत नाम के पांचवे गुणस्थान का स्वरुप कहते है।

विरताविरत गुणस्थान: बारह व्रत, पंचम गुणस्थान के ध्यान (गाथा 350 से 398)

पंचमयं गुणठाणं विरयाविरउत्ति णामयं भणियं ।
तत्थवि खय उवसमिओ खाइओ उवसमो चेव ॥350॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेंद्रदेव ने पांचवे गुणस्थान का नाम विरताविरत वतलाया है । तथा उसमे औपशमिक क्षायिक और क्षायोपशमिक भाव होते है ।


जो तसवहाउ विरओ णो विरओ तह य थावरवहाओ ।
एक्क समयम्मि जीवो विरयाविरउत्ति जिणु कहई ॥351॥

गाथार्थ: जो जीव त्रस जीवों की हिंसा त्याग कर देता है और स्थावर जीवों की हिंसा का त्याग नहीं करता वह जीव एक ही समयमें विरत और अविरत वा विरताविरत कहलाता है ऐसा भगवान् जिनेंद्रदेव ने कहा है।


इलयाइथावराणं अत्थिपवित्तित्ति विरदि इयराणं ।
मूलगुणठ्ठ पउत्तो बारह वयभूसिओ हु देसनई ॥352॥

गाथार्थ: पांचवे गुण स्थान मे रहने वाले विरताविरत जीवों की प्रवृत्ति पृथ्वी जल अग्नि वायु वनस्पति आदि स्थावर जीवों के घात करने मे होती है इसलिये वह इन स्थावर जीवों के घात का त्याग नहीं कर सकता, शेष त्रस जीवों के घात का त्याग कर देता है इसलिये एक देश यति अथवा विरताविरत श्रावक कहलाता है वह श्रावक आठों मूलगुणों को धारण करता है और बारह व्रतों से विभूषित रहता है । मद्य का त्याग, मास का त्याग, शहद का त्याग, रात्रिभोजन का त्याग, बडफल, पीपलफल, गूलर, पाकर फल, अंजीर फल इन पांचों उंदंबरो का त्याग, प्रतिदिन प्रातः काल पंच परमेष्ठी को नमस्कार करना, जीवों की दया पालन करना और पानी छान कर पीना ये आठ मूल गुण कहलाते है । श्रावकों के लिये इनका पालन करना अत्यावश्यक है ।


हिंसाविरई सच्चं अद्दत्तपरिवज्जणं च थूलवयं ।
परमहिलापरिहारो परिदमाणं परिग्गहस्सेव ॥353॥

गाथार्थ: त्रस जीवों की हिंसा का त्याग करना, सत्य बोलना, बिना दिये हुए पदार्थ को कभी ग्रहण न करना, परस्त्री सेवन त्याग और परिग्रह का परिमाण करना ये पांच अणुवृत कहलाते है ।


दिसिविदिसि पच्चखाणं अणत्थदंडाण होइ परिहारो ।
भोओपभोयसंखा ए एह गुणव्वया तिण्णि ॥354॥

गाथार्थ: दिशा विदिशाओं में आने जाने का नियम धारण कर उनकी सीमा नियत कर शेष हिशा विदिशा में आने जाने त्याग करना, पांचो प्रकार के अनर्थ दंडों का त्याग करना, भोगोपभोग पदार्थों की संख्या नियत कर शेष भोगोप भोग पदार्थों का त्याग कर देना ये तीन गुण व्रत कहलाते है ।


देवे थुवइ तियाले पव्वे पव्वे सुपोसहोवासं ।
अति हीण संविभागो मरणंते कुणइ सल्लिहणं ॥355॥

गाथार्थ: प्राप्तः काल मध्यण काल संध्याकाल इन तीनो समय में पंचमेंष्ठी की स्तुति करना, प्रत्येंक महीने की दो अष्टमी दो चतुर्दशी इन चारों पर्वों में प्रोषधपवास करना, प्रति दिन अतिथियों को दान देना और सल्लेखना धारण करना ये चार शिक्षावृत कहलाते है । इस प्रकार पांच अणुवृत तीन गुणवृत और चार शिक्षावृत ये बारह अणुवृत कहलाते है । देश वृती श्रावक को आठ मूलगुण और ये बारह वृत अवश्य धारण करने चाहिये । इन बारह व्रतों को उत्तर गुण भी कहते है ।


महुमज्जमंस विरई चाओ पुण उयंवराण पंचण्हं ।
अट्ठेदे मूलगुणा हवंति फुडु देश विरयम्मि ॥356॥

गाथार्थ: मद्य मांस मधु का त्याग और पांच उदंबरों का त्याग ये देशविरतियों के आठ मूलगुण कहलाते है ।


अट्टरउद्दं झाणं भद्दं अत्थित्ति तम्हि गुणठाणे ।
वहु आरंभपरिग्गह जुत्तस्स य णत्थि तं धम्मं ॥357॥

गाथार्थ: इस पांचवे गुणस्थान मे अर्त्तध्यान रौद्रध्यान और भद्रध्यान ये तीन प्रकार मे ध्यान होते है इस गुणस्थान वाले जीव के बहुतसा आरंभ होता है और बहुतसा ही परिग्रह होता है इसलिये इस गुणस्थान में धर्मध्यान नहीं होता ।


धम्मेद्रएण जीवो असुहं परि चयइ सुहगई लेई ।
कालेण सुक्ख मिल्लइ इंदियवल कारणं जाणि ॥358॥

गाथार्थ: धर्म सेवन करने से इस जीव के अशुभ परिणाम और अशुभ गतियां आदि नष्ट हो जाती है । और शुभ गति प्राप्त होती है । तथा समयानुसार इन्द्रियों को बल देने वाला सुख प्राप्त होता है ।


इठ विओए अट्टं उप्पजइ तह अणिठ्ठसंजोए ।
रोय पकोवे तइयं णियाण करणे चउत्थं तु ॥359॥

गाथार्थ: किसी इष्ट पदार्थ के वियोग होने पर उसके संयोग का चितवन करना पहला आर्तध्यान है । किसी अनिष्ट पदार्थ के संयोग होने पर उसके वियोग होने का बार बार चितवन करना दूसरा आर्तध्यान है । किसी रोग के प्रकोप होने पर उसको दूर करने के लिये बार बार चितवन करना तीसरा आर्तध्यान है और निदान करना चौथा आर्तध्यान कहलाता है ।


अट्टज्झाण पउत्तो बंधइ पावं णिरंतरं जीवो ।
मरिएण य तिरियगई को विणरो जाइ तज्झाणे ॥360॥

गाथार्थ: इस आर्तध्यान के करने से यह जीव निरंतर पाप कर्मों का बंध करता रहता है। तथा कोई कोई मनुष्य इस आर्तध्यान के करने से तिर्यंच गति को प्राप्त होता है।


रुद्दं कसाय सहियं जीवो संभवइ हिंसयाणंदं ।
मोसाणंदं विदियं थेयाणंदं पुणो तइयं ॥361॥

गाथार्थ: जिनजीव की कषाये अत्यन्त तीव्र होती है उसके रौद्रध्यान होता है । उस रौद्रध्यान के चार भेद है । हिंसा में आनन्द मानना हिंसानन्द रौद्रध्यान है । झूठ बोलने मे आनंद मानना मृषानंद आर्तध्यान है । चोरी मे आनन्द मानना स्तेयानंद नाशक तीसरा आर्तध्यान है । तथा बहुतसे परिग्रह की रक्षा में आनंद मानना रक्षणानंद वा परिग्रहानंद नाम का चौथा आर्तध्यान है । इस रौद्रध्यान का चिंतवन करने से यह जीव नरक का पात्र होता है ।


हवइ चउत्थं झाणं रुद्दं णामेण रक्खणाणंदं ।
जस्स य माहप्पेण य णरयगई भायणो जीवो ॥362॥

गाथार्थ: जिनजीव की कषाये अत्यन्त तीव्र होती है उसके रौद्रध्यान होता है। उस रौद्रध्यान के चार भेद है। हिंसा में आनन्द मानना हिंसानन्द रौद्रध्यान है। झूठ बोलने मे आनंद मानना मृषानंद आर्तध्यान है। चोरी मे आनन्द मानना स्तेयानंद नाशक तीसरा आर्तध्यान है। तथा बहुतसे परिग्रह की रक्षा में आनंद मानना रक्षणानंद वा परिग्रहानंद नाम का चौथा आर्तध्यान है। इस रौद्रध्यान का चिंतवन करने से यह जीव नरक का पात्र होता है।


गिहवाबाररयाणं गेहीणं इंदियत्थ परि कलियं ।
अट्टज्झाण जायइ रुद्दं वा मोह छण्णाणं ॥363॥

गाथार्थ: जो गृहस्थ घर के व्यापार में लगे रहते है और इन्द्रियों के विषयभूतपदार्थों मे संकल्प विकल्प करते रहते है उनके आर्तध्यान होता है तथा जिनके मोहनीय कर्म का तीव्र उदय होता है उनके रौद्रध्यान होता है ।


झाणेंहि तेंहि पाव उप्पण्णं तं खवइ भद्दझाणेण ।
जीवो उवसप जुत्तो देस जई णाणसंपण्णो ॥364॥

गाथार्थ: इन आर्तध्यान और रौद्रध्यान से जो पाप उत्पन्न होता है उसको यह उपशम परिणामों को धारण करने वाला और सम्यग्ज्ञान का धारण करने वाला देश व्रती श्रावक अपने भद्रध्यान से नाश कर देता है।


भद्दस्स लक्खणं पुण धम्मं चिंतेइ भोयपरिमुक्को ।
चिंतिय धम्मं सेवइ पुणरवि भोए जहिच्छाए ॥365॥

गाथार्थ: जो जीव भोगों का त्याग करता धर्म का चितवन करता है, और धर्म का चिंतवन करता हुआ भी फिर भी अपनी इच्छानुसार भोगों का सेवन करता उसके भद्रध्यान समझना चाहिये ।


धम्मज्झाणं भणियं आणापायाविवाय विचयं च ।
संठाणं विचयं तह कहिय झाणं समासेण ॥366॥

गाथार्थ: आज्ञा विचय, अपाय विचय, विपाक विचय और संस्थान विचय ये चार अत्यंत सक्षेप से धर्मध्यान के भेद है ।


छद्दव्वणवपयत्था सत्तवि तच्चाइं जिणावरएण्ण ।
चिथइ विसय विरत्तो आणा विचयं तु तं भणियं ॥367॥

गाथार्थ: जो मनुष्य इन्द्रियों के विषयों से विरक्त होकर भगवान् की आज्ञा प्रमाण छह द्रव्य, नौ पदार्थ और सात तत्त्वों का चितवन करता है उसको आज्ञा विचय नाम का पहला धर्मध्यान कहते है ।


असुह कम्मस्स णाणो सुहस्स वा हवेइ केणुवाएण ।
इय चिंतंतस्स हवे अपाय विचयं परं झाणं ॥368॥

गाथार्थ: अपाय शब्द का अर्थ नाश है । इन अशुभ कर्मों का नाश किस उपाय से होगा अथवा शुभ कर्मों का आस्रव किस उपाय से होगा इस प्रकार जो जीव चितवन करता है उसका वह ध्यान अपाय विजय नाम का दूसरा उत्तम धर्मध्यान कहलाता है ।


असुह सुहस्स विवाओ चिंतइ जीवाण चउगइययाणं ।
विवाविचयं झाणं भणियं तं जिणवरिंदेहिं ॥369॥

गाथार्थ: चारों गतियों मे परिभ्रमण करने वाले जीवों के शुभ कर्मों के उदय को तथा अशुभ कर्मों के उदय को जो चिंतवन करता है उसका वह ध्यान विपाकविचय कहलाता है । ये जीव अपनें अपने शुभ अशुभ कर्मों के उदय से ही सुख दुःख भोगते है ऐसा चिंतवन करना और इन दुखी जीवों का दुःख किस प्रकार दूर हो, ये श्रेष्ठ मार्ग में किस प्रकार लगें इस प्रकार का चिंतवन करना अपाय विचय नाम का तीसरा धर्मध्यान है ।


अह उड्ढतिरिय लोए चिंतेइ सपज्जयं ससंठाणं ।
विचयं संठाणस्स य भणियं झाणं समासेण ॥370॥

गाथार्थ: संस्थान आकार को कहते है । लोक के तीन भाग है अधो लोक, मध्य लोक, वा तिर्यग्लोक और ऊर्ध्वलोक इनका चितवन करना तथा इनमे भरे हुए पदार्थों का उनकी पर्यायों का उन सबके आकारों का चितवन करना अत्यन्त संक्षेप से संस्थान विचय नाम का चौथा धर्मध्यान कहलाता है ।


मुक्खं धम्मज्झाणं उत्तं तु पमायविरहिए ठाणे ।
देस विरए पमत्ते उवयारेणेव णायव्वं ॥371॥

गाथार्थ: यह धर्मध्यान मुख्यता से प्रमादरहित सातवें गुणस्थान मे होंता है तथा देश विरत पांचवे गुणस्थान मे और प्रमत्त संयत छठे गुण स्थान में भी यह धर्मध्यान उपचार से होता है । ऐसा समझना चाहिये ।


दहलक्खण संजुत्तो अहवा धम्मोति वण्णिओ सुत्ते ।
चिंता जा तस्स हवे भणियं तं धम्मझाणुत्ति ॥372॥

गाथार्थ: अथवा सिद्धांत सूत्रों में उत्तमक्षमा आदि दश प्रकार का धर्म बतलाया है उन दशों प्रकार के धर्मों का चितवन करना भी धर्म्यकहलाता है ।


अहवा वत्थुसहावो धम्मं वत्थ् पुणो न सो अप्पा ।
झायंताण कहियं धम्मझाण मुणिदेहिं ॥373॥

गाथार्थ: वस्तु के स्वभाव को धर्म कहते है तथा वस्तुओं मे वा पदार्थों में मुख्य वस्तु वा मुख्य पदार्थ आत्मा है । इसलिये उस आत्मा का ध्यान करना तथा जिसके शुद्ध स्वरुप का ध्यान करना धर्म्यध्यान है । ऐसा जिनेंद्रदेव नें कहा है ।


तं फुडु दुविहं भणियं सालंवं तह पुणो अणालंवं ।
सालंवं पंचण्हं परमेंठ्ठीणं सरुवं तु ॥374॥

गाथार्थ: वह धर्म्यध्यान दो प्रकार है एक आलंवन सहित और दूसरा आलंवन रहित । इन दोनों में से पंच परमेष्ठी के स्वरूप का चितवन करना है उसको सालंत्र ध्यान कहते है ।


हरिरइय समवसरणो अट्ठमहापाडिहेर संजुत्तो ।
सियकिरणविप्फुरंतो झायव्वो अरुहपरमेष्ठी ॥375॥

गाथार्थ: जो इन्द्र के द्वारा बनाये हुए समवशरण में विराजमान है तथा आठ महा प्रतिहार्यों से सुशोभित है और जो अपनी प्रभाकी श्वेत किरणों से देदीप्यमान हो रहें है ऐसे भगवान् जिनेंद्रदेव को अरहंत परमेंष्ठी का ध्यान करना चाहिये ।


णट्ठट्ठ कम्मबंधो अट्ठगुणट्ठो य लोयसिहरत्थो ।
सुद्धो णिच्चो सुहमो झायव्वो सिद्धपरमेष्ठी ॥376॥

गाथार्थ: जिन के आठों कर्म सर्वथा नष्ट हो गये है, जो सम्यक्त्व आदि आठ गुणों से सुशोभित है, लोक शिखर पर विराजमान है, जिनका आत्मा अत्यंत शुद्ध है, नित्य है, और सूक्ष्म है ऐसा आत्मा सिद्ध परमेष्ठी का ध्यान करना चाहिये ।


छत्तीस गुणसमग्गो णिच्चं आयरइ पच आयारो ।
सिस्साणुग्गह कुसलो भणिओ सो सूरिपरमेट्ठी ॥377॥

गाथार्थ: जो छत्तीस गुणों से सुशोभित हों जो ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, वीर्याचार, तप आचार इन पांचों आचारों का प्रतिदिन पालन करते है तथा जो शिष्यों के अनुग्रह करने में अत्यंत कुशल होते है उनको आचार्य परमेंष्ठी कहते है ।


अज्झावयगुण जुत्तो धम्मोवदेसयारि चरियट्ठो ।
णिस्सेसागम कुसलो परमेट्ठी पाठओ झाओ ॥378॥

गाथार्थ: जो मुनि अध्यापन कार्य मे शिष्यों को पढाने में अत्यंत निपुण है जो सदा काल धर्मोपदेश देते रहते है जो अपने चारित्र में स्थिर रहते है और जो समस्त आगम में कुशल होते है अथवा जो द्वादशांग के पाठी होते है उनको उपाध्याय परमेष्ठी कहते है, ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी का ध्यान करना चाहिये ।


उग्गतवतविय गत्तो तियाल जोएण गमिय अहरत्तो ।
साहिय मोक्खस्स पओ झाओ सो साहु परमेट्ठी ॥379॥

गाथार्थ: जो प्रतिदिन तीव्र तपश्चरण करते है प्रतिदिन त्रिकाल योग धारण करते है और सदा काल मोक्ष मार्ग को सिद्ध करते रहते है उनको साधु परमेष्ठी कहते है । ऐसे साधु परमेष्ठी ध्यान करने योग्य है ।


एवं तं सालवं धम्मज्झाणं हवेइ नियमेण ।
झायंताणं जायइ विणिज्जरा असुहकम्माणं ॥380॥

गाथार्थ: ऊपर लिखे इन पांचों परमेष्ठियों का ध्यान करना नियम पूर्वक आलंबन सहित धर्म्यध्यान कहलाता है। इन पांचों परमेष्ठियों का ध्यान करने से अशुभ कर्मों की विशेष निर्जरा होती है।


ज पुणु वि निरालंबं तं झाणं गयपमाय गुणठाणे ।
चत्तेगहस्स जायइ धरियं जिणलिंगरुवस्स ॥381॥

गाथार्थ: जो गृहस्थ अवस्थाको छोडकर जिनलिंग धारण कर लेता है । अर्थात् दीक्षा लेकर निर्ग्रंथ मुनि हो जाता है और जो मुनि होकर भी अप्रमत्त नाम के सातवें गुणस्थान मे पहुंच जाता है तव उसीके निरालंब ध्यान होता है । गृहस्थ अवस्था में निरालंब ध्यान कभी नहीं हो सकता ।


जो भणइ को वि एवं अत्थि गिहत्थाण णिच्चलं झाणं ।
सुद्धं च णिरालंबं ण मुणइ सो आयमो जइणो ॥382॥

गाथार्थ: यदि कोई पुरुष यह कहे कि गृहस्थों के भी निश्चल, निरालंब और शुद्ध ध्यान होता है तो समझना चाहिये कि इस प्रकार कहनें वाला पुरुष मुनियों के शास्त्रों को ही नहीं मानता है ।


कहियाणि दिठ्ठिवाए पडुच्च गुणठाण जाणि झाणाणि ।
तम्हा स देस विरओ मुक्खं धम्मं ण झाएई ॥383॥

गाथार्थ: दृष्टिवाद नाम के बारहवे अंग मे गुणस्थान को लेकर ही ध्यान का स्वरुप बतलाया है जिससे सिद्ध होता है कि देशविरती गृहस्थ मुख्य धर्म्यध्यान का ध्यान नहीं कर सकता ।


किं जं सो गिहवंतो वहिरतरगंथपरमिओ णिच्चं ।
वहु आरंभपउत्तो कह झायइ सुद्धपप्पाणं ॥384॥

गाथार्थ: गृहस्थों के मुख्य धर्म्यध्यान न होनें का कारण यह है कि गृहस्थों के सदाकाल बाह्य आभ्यंतर परिग्रह परिमित रूप मे रहते हैं तथा आरंभ भी अनेक प्रकार के बहुत से होते है इसलिय वह शुद्ध आत्मा का ध्यान कभी नहीं कर सकता ।


घर बाबारा केई करणीया अत्थि ते ण ते सव्वे ।
झाणठ्ठियस्स पुरओ चिठ्ठंति णिमीलियच्छिस्स ॥385॥

गाथार्थ: गृहस्थों को घर के कितने ही व्यापार करने पडते है। जब वह गृहस्थ अपनें नेत्रों को बंद कर ध्यान करने बैठता है तब उसके सामने घर के करने योग्य सब व्यापार आ जाते है।


अह ढिकुलियां झाणं झायइ अहवा स सोवए झाणी ।
सोवंतो झायव्वं ण ठाइ चित्तम्मि वियलम्मि ॥386॥

गाथार्थ: जो कोई गृहस्थ शुद्ध आत्मा का ध्यान करना चाहता है तो उसका वह ध्यान ढेंकी के समान होता है । जिस प्रकार ढेंकी धान कूटने मे लगी रहती है परंतु उससे उसका कोई लाभ नहीं होता उसको तो परिश्रग मात्र ही होता है इसी प्रकार गृहस्थों का निरालंब ध्यान वा शुद्ध आस्मा का ध्यान परिश्रम मात्र होता है। अथवा शुद्ध आत्मा का ध्यान करने वाला वह गृहस्थ उस ध्यान के वहाने सो जाता है । जब वह सो जाता है तब उसके व्याकुल चित्त में वह ध्यान करते योग्य शुद्ध आत्मा कभी नहीं ठहर सकता । इस प्रकार किसी भी गृहस्थ के शुद्ध आत्मा का निश्चल ध्यान कभी नही हों सकता ।


झाणाणं संताणं अहवा जाएइ तस्स झाणस्स ।
आलंवण रहियस्स य ण ठाइ चित्तं थिरं जम्हा ॥387॥

गाथार्थ: अथवा यदि वह सोता नहीं तो उसके ध्यानों की संतानरुप परंपरा चलती रहती है। इसका भी कारण यह है कि निरालंब ध्यान करनेवाले गृहस्थ का चित्त कभी भी स्थिर नहीं रह सकता।


तम्हा सो सालंवं झायउ झाणं पि गिहवई णिच्चं ।
पंच परमेट्ठिरूवं अहवा मंतक्खरं तेसि ॥388॥

गाथार्थ: इसलिये गृहस्थों को सदा काल आलंवन सहित ध्यान धारण करना चाहिये । या तो उसे पंच परमेष्ठी का ध्यान करना चाहिये अथवा पंच परमेष्ठी के वाचक मंत्रों का ध्यान करना चाहिये ।


जइ मणइ को वि एवं गिहवावारेसु वट्टमाणो वि ।
पुण्णे अम्ह ण कज्जं जं संसारे सुवाडेई ॥389॥

गाथार्थ: कदाचित् कोई गृहस्थ यह कहे कि यद्यपि हम गृहस्थ व्यापारों में लगे रहते है तथापि हमे सावलंब ध्यान कर पुण्य उपाजन करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि पुण्य उपार्जन करने से भी तो इस जीव को संसार में ही पडना पडेगा ।


मेहुणसण्णारूढो मारइ णवलक्ख सुहम जीवांई ।
इय जिणवरेंहि भणियं वज्झंतरणिग्गंथरूवेंहि ॥390॥

गाथार्थ: आचार्य कहते है कि देखो जो पुरुष मंथुन संज्ञा को धारण करता है अपनी स्त्री का सेवन करता है वह गृहस्थ नौ लाख सूक्ष्म जीवों का घात करता है । ऐसा बाह्य अभ्यंतर परिग्रह रहित भगवान् जिनेंद्रदेवने कहा है ।


गेहे वदृंतस्स य वावारसयाइं सया कुणंतस्स ।
आसवइ कम्म मसुहं अद्द रउद्दे पवत्तस्स ॥391॥

गाथार्थ: जो पुरुष घरमें रहता है और सदाकाल गृहस्थी के सैकडों व्यापार करता रहता है वह आर्तध्यान और रौद्रध्यान मे भी अपनी प्रवृत्ति करता रहता है इसलिये उसके सदा काल अशुभ कर्मों का ही आस्रव होता रहता है ।


जइ गिरिणई तलाए अणवरयं पविसए सलिल परिपुण्णं ।
मण वयतणु जोएंहि पविसइ असुहेंहि तह पावं ॥392॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी पर्वत से निकलती हुई नदी का पानी किसी जल म भरे हुए तालाब मे निरंतर पडता रहता है उसी प्रकार गृहस्थी के व्यापार में लगे हुए पुरुष के अशुभ मन वचन काय इन तीनों अशुभ योगों द्वारा निरंतर पाप कार्यों का आस्रव होता है ।


जाम ण छंडइ गेहं ताम ण परिहरइ इंतयं पावं ।
पावं अपरिहरंतो हेओ पुण्णस्स मा चयउ ॥393॥

गाथार्थ: इस प्रकार ये गृहस्थ लोग जब तक घर का त्याग नहीं करते गृहस्थ धर्म को छोड कर मुनि धर्म धारण नहीं करते तब तक उनसे ये पाप छूट नहीं सकते । इसलिये जो गृहस्थ पापों को नहीं छोडना चाहते उनको कम से कम पुण्य के कारणों को तो नहीं छोडना चाहिये ।


सा मुक्क पुण्णहेउं पावस्सासवं अपरिहरतो य ।
बज्झइ ऊवेण णरो सो दुग्गइ जाइ मरिउणं ॥394॥

गाथार्थ: जो गृहस्थ पाप रुप आस्त्रवों का त्याग नहीं कर सकते अर्थात् गृहस्थ धर्म छोड नही सकते उनको पुण्य के कारणों का त्याग कभी नहीं करना चाहिये । क्योंकि जी मनुष्य सदाकाल पापों का बंध करता रहता है वह मनुष्य मर कर करकादिक दुर्गति को ही प्राप्त होता है ।


पुण्णस्स कारणाइं पुरिसो परिहरउ जेण णियचित्तं ।
विसय कसाय पउत्त णिग्गहियं हयपमाएण ॥395॥

गाथार्थ: जिस पुरुष ने अपने समस्त प्रमाद नष्ट कर दिये है तथा इन्द्रियों के विषय और कषाये में लगे हुए अपने चित्तको जिसने सर्वथा अपने बशमें कर लिया है ऐसा पुरुष अपने पुण्य के कारणों का त्याग कर सकता है ।


गिहवावारत्तो गहियं जिणलिंग रहियपसपाओ ।
पुण्णस्स कारणांइं परिहरउ सया वि सो पुरिसो ॥396॥

गाथार्थ: जिस पुरुष ने गृहस्थ के समस्त व्यापारों का त्याग कर दिया है जिसने भगवान् जिनेन्द्रदेव का निर्ग्रंथ लिंग धारण कर लिया है तथा निर्ग्रंथ लिंग धारण करने के अनंतर जिसने अपने समस्त प्रमादों का त्याग कर दिया है । ऐसे पुरुष को ही सदा के लिये पुण्य के कारणों का त्याग करना उचित है, अन्यथा नहीं ।


असुहस्स कारणेंहि य कम्म छक्केहि णिच्चं वट्टतो ।
पुण्णस्स कारणाइं बंधस्स भयेण णिच्छंतो ॥397॥

गाथार्थ: यह गृहस्थ अशुभ कर्मों के आने के कारण ऐसे असिमसि कृषि वाणिज्य आदि छहो कर्मों मे लगा रहता है अर्थात् इन छहों कर्मो के द्वारा सदा काल अशुभ कर्मो का आस्रव करता रहता है तथापि जों केवल कर्मबध के भय से पुण्य के कारणों को करने की इच्छा नहीं करता, कहना चाहिये कि वह पुरुष भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहे हुए नौ पदार्थों के स्वरुप को भी नहीं मानता, तथा वह पुरुष अपने को सज्जन पुरुषों के मध्य में हंसी का स्थान बनाता है ।


ण मुणइ इय जो पुरिसो जिण कहिय पयत्थ णवसरूवं तु ।
अप्पाणं सुयण मज्झे हासस्स य ठाणयं कुणइ ॥398॥

गाथार्थ: यह गृहस्थ अशुभ कर्मों के आने के कारण ऐसे असिमसि कृषि वाणिज्य आदि छहो कर्मों मे लगा रहता है अर्थात् इन छहों कर्मो के द्वारा सदा काल अशुभ कर्मो का आस्रव करता रहता है तथापि जों केवल कर्मबध के भय से पुण्य के कारणों को करने की इच्छा नहीं करता, कहना चाहिये कि वह पुरुष भगवान् जिनेन्द्रदेव के कहे हुए नौ पदार्थों के स्वरुप को भी नहीं मानता, तथा वह पुरुष अपने को सज्जन पुरुषों के मध्य में हंसी का स्थान बनाता है ।

विरताविरत गुणस्थान: पुण्य के भेद, फल, कारण और पूजा की विधि (गाथा 399 से 488)

पुण्णं पुव्वायरिया दुविहं अक्खंति सुत्तउत्तीए ।
मिच्छ पउत्तेण कयं विवरियं सम्म जुत्तेण ॥399॥

गाथार्थ: पूर्वाचार्यों ने अपनें सिद्धांत सूत्रों के अनुसार उस पुण्य के दो भेद बतलाये है । एक तों मिथ्यादृष्टी पुरुष के द्वारा किया हुआ पुण्य और दूसरा इसके विपरीत सम्यग्दृष्टी के द्वारा किया हुआ पुण्य ।


मिच्छादिट्ठीपुण्णं फलइ कुदेवेसु कुणर तिरिएसु ।
कुच्छिय भोग धरासु य कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥400॥

गाथार्थ: मिथ्या दृष्टी पुरुष प्रायः कुत्सित पात्रों को दान देता है इसलिये वह पुरुष उस कुत्सित दान के फल से कुदेवों मे उत्पन्न होता है, कुमनुष्यों में उत्पन्न होता है, नीचे तिर्यंचों में उत्पन्न होता है, और कुभोग भूमियों मे उत्पन्न होता है ।


जइ वि सुजायं बीयं ववसाय पउत्तओ बिजइ कसओ ।
कुच्छिय खेत्ते ण फलइ तं बीय जह तहा दाणं ॥401॥

गाथार्थ: यद्यपि किसान किसी उत्तम जाति के बीज को विधिपूर्वक (भूमि को अच्छी तरह जोत कर) बोता है तथापि कुत्सित खेत में बोने से उस पर फल नहीं लगते इसी प्रकार कुत्सित पात्रों को दान देने से उसका कुछ भी फल नहीं मिलता है ।


जइ फलइ कह वि दाणं कुच्छिय जाईहिं कुच्छिय सरीरं ।
कुच्छिय भोए दाउं पुणरवि पाडेइ संसारे ॥402॥

गाथार्थ: यदि किसी प्रकार कुत्सित पात्रों को दिये हुए दान का फल मिलता भी है तो कुत्सित जाति मे उत्पन्न होना, कुत्सित शरीर धारण करना और कुत्सित भोगोपभोगों का प्राप्त होना आदि कुत्सित रूप ही फल मिलता है तथा कुत्सित पात्रों को दिया हुआ वह दान जीवको चतुर्गति रूप इस संसार में ही परिभ्रमण करता रहता है ।


संसार चक्कवाले परिब्भमंतो हु जोणि लक्खाइं ।
पावइ विविहे दुक्खे बिरयंतो विविह कम्माइं ॥403॥

गाथार्थ: कुपात्रों को दान देनें वाला पुरुष चौरासी लाख योनियों मे भरे हुए इस संसार चक्र में परिभ्रमण करता हुआ अनेक प्रकार के कर्मों का उपार्जन करता रहता है और उन अशुभ कर्मों के फल से अनेक प्रकार के दुःखों को भोगता रहता है । इस प्रकार मिथ्य दृष्टियों के द्वारा किय हुए पुण्य का स्वरुप और उसका फल कहा ।


सम्मादिट्ठी पुण्णं ण होइ संसारकारणं णियमा ।
मोक्खस्स होइ हेउं जइ वि णियाणं ण सो कुणइ ॥404॥

गाथार्थ: सम्यग्दृष्टी के द्वारा किया हुआ पुण्य संसार का कारण कभी नहीं होता यह नियम है । यदि सम्यग्दृष्टी पुरुष के द्वारा किये हुए पुण्य में निदान न किया जाय तो वह पुण्य नियम से मोक्ष का ही कारण होता है ।


अकइयणियाणसम्मो पुण्णं काऊण णाणचरणट्ठो ।
उप्पज्जइ दिवलोए सुहपरिणामो सुलेसो वि ॥405॥

गाथार्थ: जिस सम्यग्दृष्टी पुरुष के शुभ परिणाम है, शुभ लेश्याएं है तथा जो सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र को धारण करता है, ऐसा सम्यग्दृष्टी पुरूष यदि निदान नहीं करता है तो वह पुरूष मरकर स्वर्ग लोक में ही उत्पन्न होता है ।


अंतरमुहुत्तमज्झे देहं चइऊण माणुसं कुणिमं ।
गिण्हइ उत्तमदेहं सुचरिय कम्माणु भावेण ॥406॥

गाथार्थ: ऊपर लिखा हुआ सम्यग्दृष्टी पुरूष अपने पुण्य कार्य के प्रभाव से इस घृणित मनुष्य शरीर का त्याग कर अंतर्मुहूर्त में ही स्वर्ग में जाकर उत्तम शरीर प्राप्त कर लेता है ।


चम्मं रुहिरं मंसं मेज्जा अट्ठि च तह वसा सुक्कं ।
सिम्मं पित्तं अंतं मुत्तपुरीसं च रोमाणि ॥407॥

गाथार्थ: चर्म ( चमडा ) रुधि, मांस, मेदा, हड्डी, चर्बी, शुक्र, ( वीर्य ) कफ, पित्त, आंतें, मल, मूत्र, रोम, नख, दांत, शिरा, (नाडी नसें) नारु, लार, पसीना, नेत्रों की टिमिकार, आलस्य, निद्रा, तंद्रा और बुढापा ये सब देवों के शरीर में कभी नहीं होते ।


णह दंत सिरण्हारु लाला सेउयं च णिमिस आलस्सं ।
णिद्दा तण्हा य जरा अंगे देवाण ण हि अत्थि ॥408॥

गाथार्थ: चर्म ( चमडा ) रुधि, मांस, मेदा, हड्डी, चर्बी, शुक्र, ( वीर्य ) कफ, पित्त, आंतें, मल, मूत्र, रोम, नख, दांत, शिरा, (नाडी नसें) नारु, लार, परीना, नेत्रों को टिमिकार, आलस्य, निद्रा, तंद्रा और बुढापा ये सब देवों के शरीर में कभी नहीं होते ।


सुइ अमलो वरवण्णो देहो सुह फास गंधसंपण्णो ।
बाल रवि तेयसरिसो चारुसरूवो सदा तरुणो ॥409॥

गाथार्थ: देवों का शरीर पुण्य कर्म के उदय से अत्यंत पवित्र होता है, अत्यंत निर्मल होता है, अत्यंत सुंदर वर्ण होता है, उनके शरीर का स्पर्श गंध अत्यंत शुभ होता है, उगते हुए सुर्य के तेज के समान उनका तेज होता है, उनका शरीर अत्यंत सुंदर और सदा काल तरूण अवस्था को धारण करता है, अणिमा महिमा लघिमा प्राप्ति प्राकाम्य ईशत्व वशित्व कामरूप इन आठों गुणों से सुशोभित रहता है । अत्यंत उत्तम पुद्गलों से बना होता है । सब प्रकार से पूर्ण होता है । अत्यंत मनोहर होता है और अपनी स्थिती के अनुसार नियत समय पर हृदय से उत्पन्न हुए अमृत से परिपुष्ट होता है । देवों को ऐसा उत्तम शरीर पुण्य कर्म के उदय से ही प्राप्त होता है । ऊपर जो अणिमा महिमा आदि देवों के, शरीर के गुण बतलाये है उनका अर्थ इस प्रकार है । छोटे से छोटे शरीर को बना लेने की शक्ति होना अणिमा है, मेरु पर्वत से भी बडा शरीर बनाने की शक्ति होना महिमा है, वायु से भी हलका शरीर बनाने की शक्ति होना लघिमा है, पृथ्वी पर ठहर कर भी अपनी उंगली के अग्रभाग से मेंरु पर्वत के शिखर को भी स्पर्श करने की शक्ति होना प्राप्ति है, जल में भूमि के समान गमन करने की शक्ति होना तथा भूमि मे जल के समान डूबना उछलना आदि की शक्ति होना प्राकाम्य है, तीनों लोकों की प्रभुता प्राप्त कर लेने की शक्ति होना ईशित्व है, समस्त जीवों को वश करने की शक्ति होना वशित्व है, तथा एक साथ अनेक रूप धारण कर लेने की अनेक शरीर बना लेने की शक्ति होना कामरूपत्व है । इस प्रकार देवों के शरीर में आठ ऋद्दियां होती है ।


अणिमा महिमा लहिमा पावइ पागम्म तइ य ईसत्तं ।
वसयत्त कामरूवं एत्तियाई गुणो हि संजुत्तो ॥410॥

गाथार्थ: देवों का शरीर पुण्य कर्म के उदय से अत्यंत पवित्र होता है, अत्यंत निर्मल होता है, अत्यंत सुंदर वर्ण होता है, उनके शरीर का स्पर्श गंध अत्यंत शुभ होता है, उगते हुए सुर्य के तेज के समान उनका तेज होता है, उनका शरीर अत्यंत सुंदर और सदा काल तरूण अवस्था को धारण करता है, अणिमा महिमा लघिमा प्राप्ति प्राकाम्य ईशत्व वशित्व कामरूप इन आठों गुणों से सुशोभित रहता है । अत्यंत उत्तम पुद्गलों से बना होता है । सब प्रकार से पूर्ण होता है । अत्यंत मनोहर होता है और अपनी स्थिती के अनुसार नियत समय पर हृदय से उत्पन्न हुए अमृत से परिपुष्ट होता है । देवों को ऐसा उत्तम शरीर पुण्य कर्म के उदय से ही प्राप्त होता है । ऊपर जो अणिमा महिमा आदि देवों के, शरीर के गुण बतलाये है उनका अर्थ इस प्रकार है । छोटे से छोटे शरीर को बना लेने की शक्ति होना अणिमा है, मेरु पर्वत से भी बडा शरीर बनाने की शक्ति होना महिमा है, वायु से भी हलका शरीर बनाने की शक्ति होना लघिमा है, पृथ्वी पर ठहर कर भी अपनी उंगली के अग्रभाग से मेंरु पर्वत के शिखर को भी स्पर्श करने की शक्ति होना प्राप्ति है, जल में भूमि के समान गमन करने की शक्ति होना तथा भूमि मे जल के समान डूबना उछलना आदि की शक्ति होना प्राकाम्य है, तीनों लोकों की प्रभुता प्राप्त कर लेने की शक्ति होना ईशित्व है, समस्त जीवों को वश करने की शक्ति होना वशित्व है, तथा एक साथ अनेक रूप धारण कर लेने की अनेक शरीर बना लेने की शक्ति होना कामरूपत्व है । इस प्रकार देवों के शरीर में आठ ऋद्धियां होती है ।


देवाण होइ देहो अइउत्तमेण पुग्गलेण संपुण्णो ।
सहजाहरण णिउत्तो अइरम्मो होइ पुण्णेण ॥411॥

गाथार्थ: देवों का शरीर पुण्य कर्म के उदय से अत्यंत पवित्र होता है, अत्यंत निर्मल होता है, अत्यंत सुंदर वर्ण होता है, उनके शरीर का स्पर्श गंध अत्यंत शुभ होता है, उगते हुए सुर्य के तेज के समान उनका तेज होता है, उनका शरीर अत्यंत सुंदर और सदा काल तरूण अवस्था को धारण करता है, अणिमा महिमा लघिमा प्राप्ति प्राकाम्य ईशत्व वशित्व कामरूप इन आठों गुणों से सुशोभित रहता है । अत्यंत उत्तम पुद्गलों से बना होता है । सब प्रकार से पूर्ण होता है । अत्यंत मनोहर होता है और अपनी स्थिती के अनुसार नियत समय पर हृदय से उत्पन्न हुए अमृत से परिपुष्ट होता है । देवों को ऐसा उत्तम शरीर पुण्य कर्म के उदय से ही प्राप्त होता है । ऊपर जो अणिमा महिमा आदि देवों के, शरीर के गुण बतलाये है उनका अर्थ इस प्रकार है । छोटे से छोटे शरीर को बना लेने की शक्ति होना अणिमा है, मेरु पर्वत से भी बडा शरीर बनाने की शक्ति होना महिमा है, वायु से भी हलका शरीर बनाने की शक्ति होना लघिमा है, पृथ्वी पर ठहर कर भी अपनी उंगली के अग्रभाग से मेंरु पर्वत के शिखर को भी स्पर्श करने की शक्ति होना प्राप्ति है, जल में भूमि के समान गमन करने की शक्ति होना तथा भूमि मे जल के समान डूबना उछलना आदि की शक्ति होना प्राकाम्य है, तीनों लोकों की प्रभुता प्राप्त कर लेने की शक्ति होना ईशित्व है, समस्न जीवों को वश करने की शक्ति होना वशित्व है, तथा एक साथ अनेक रूप धारण कर लेने की अनेक शरीर बना लेने की शक्ति होना कामरूपत्व है । इस प्रकार देवों के शरीर में आठ ऋद्दियां होती है ।


उप्पण्णो कणयमए कायक्कंतिहिं भासिये भवणे ।
पेच्छंतो रयणमयं पासायं कणय वित्तिल्लं ॥412॥

गाथार्थ: इस प्रकार अपने पुण्य कर्म के उदय से वह जीव स्वर्ग ने अपने शरीर की कांति से सुशोभित होने वाले सुवर्णमय भवन में वह देव उत्पन्न होता है। वहां पर वह सुवर्ण की कांति से सुशोभित ऐसे रत्नमय भवनों को देखता है।


अणुकूलं परियणयं तरलियणयणं च अच्छराणिवहं ।
पिच्छंतो णमिय सिरं सिर कइय करंजली देवे ॥413॥

गाथार्थ: वहां पर वह अपनें परिजनों को अपने अनुकूल देखता है, जिनके सुंदर नेत्र अत्यंत चंचल है, ऐसी अप्सराओं के समूह के देखता है तथा जिन के मस्तक नम्रीभूत हो रहे है और जिन्होंने अपने हाथ जोड कर अपने मस्तक पर रख लिये है, ऐसे देवों को देखता है ।


णिसुणंतो थोत्तसए सुर वर सत्थेणविरइए ललिए ।
तुं वुरु गाइयगीए वीणासद्देण सुइसुहए ॥414॥

गाथार्थ: इसके सिवाय वह उत्पन्न हुआ देव अनेक उत्तम देवों के द्वारा बनाये हुए सैंकडों सुंदर स्तोत्रों को सुनता है तथा कानां को सुख देने वाले और तुंवर जाति के देवों के द्वारा वीणा के साथ गाये हुए गीतों को सुनता है ।


चितइ किं एवड्ढं मज्झ पउत्तं इमं पि किं जायं ।
किं ओ लग्गइ एसो अमरगणो विणयसंपण्णो ॥415॥

गाथार्थ: तदनंतर वह उत्पन्न हुआ देव अपने मन में चितवन करता है कि क्या यह सब मेरा प्रभुत्व है अथवा यह सब क्या है ? अथवा ऐसा मालूम होता है कि विनय को धारण करने वाले ये सब देव गण है ।


कोहं इह कस्सावोकेण विहाणेण इयं गहं पत्तो ।
तविओ को उग्गतबो केरिसियं संजमं विहियं ॥416॥

गाथार्थ: तदनंतर वह देव फिर चितवन करता है कि मै कौन हूँ ? मै इस भवन मे क्यों आ गया और किस प्रकार आ गया । मैने ऐसा कौनसा उग्र तपश्चरण धारण किया था अथवा कौनसा संयम पालन किया था जिससे कि मै यहां आकर उत्पन्न हुआ हूँ ।


किं दाणं मे दिण्णो केरिसपत्ताण काय सु भत्तीए ।
जेणाहं कयपुरण्णो उप्पण्णो देवलोयम्मि ॥417॥

गाथार्थ: वह देव फिर भी चितवन करता है कि क्या मैंने पहले भवमें दान दिया था और दान भी दिया था तो कैसे पात्रको दिया था और किस उत्तम भक्ति से दिया था। जिससे मैं पुण्य उपार्जन कर इस देव लोक में आकर उत्पन्न हुआ हूं।


इय चिंततो पसरइ ओहीणाणं तु भवसहावेण ।
जाणइ सो आइयभव विहियं धम्मप्पहावं च ॥418॥

गाथार्थ: इस प्रकार चिंतवन करता हुआ वह देव अपने साथ उत्पन्न हुए भवप्रत्यय अवधि ज्ञान को फैलाता है और उस अवधि ज्ञान से वह अपने पहले भवको जान लेता है तथा पहले भवमे उसने जो धर्म प्रभावना की थी जिससे कि वह देव हुआ था, उसको भी जान लेता है ।


पुणरवि तमेव धम्मं मणसा सद्दहइ सम्मदिट्ठी सो ।
वंदेइ जिणावराणं णंदिसर पहुइ सव्वाइं ॥419॥

गाथार्थ: तदनंतर वह सम्यग्दृटी देव फिर भी अपने मन में उसी धर्म का श्रद्धान करता है और पंच मेरु नंदीश्वरद्वीप आदि के अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना करता है, उनमें विराजमान जित प्रतिमाओं की वंदना करना है और विदेह क्षेत्र के जिनेन्द्रदेव की भी वंदना करता है ।


इह बहुकालं सग्गे भोगं भुंजंतु विविह रमणीयं ।
चइऊण आउस खए उप्पज्जइ मच्च लोयम्मि ॥420॥

गाथार्थ: इस प्रकार वह जीव स्वर्ग से जाकर वहुत काल तक अनेक प्रकार के सुन्दर भोगों का अनुभव करता है । तदनंतर आयु पूर्ण होने पर वहां से च्युत होता है और इस मनुष्य लोक मे आकर जन्म लेता है ।


उत्तम कुले महंतो बहुजण णमणीय संपयापउरे ।
होऊण अहियरूवो बल जोव्वण रिद्धिसंपुण्णो ॥421॥

गाथार्थ: मनुष्य लोक में भी आकर वह बहुत महत्त्व शाली उत्तम कुल में उत्पन्न होता है तथा ऐसे कुल में उत्पन्न होता है जिसको बहुत से लोग मानते है नमस्कार करते है और जिसमे बहुतसी संपदा होतीं है । इसके सिवाय उसका बहुत सुन्दर रुप होता है और वह बल ऋद्धि योवन आदि से परिपूर्ण होता है ।


तत्थवि विविहे भोए णरखेत्तभवे अणोवमे परमे ।
भुंज्जित्ता णिविण्णो संजमयं तेव गिण्हेई ॥422॥

गाथार्थ: उस मनुष्य लोक में भी उत्पन्न होकर वह जीव मनुष्य क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले सर्वोत्कृष्ट अनुभव तथा अनेक प्रकार के भोगों का अनुपम करता है और फिर संसार शरीर भोगों से विरक्त होकर संयम धारण कर लेता है ।


लद्धं जइ चरम तणु चिरकय पुण्णेण सिज्झए णियमा ।
पाविय केवल णाणं जह खाइय संजमं सुद्धं ॥423॥

गाथार्थ: यदि वह जीव अपने चिर काल के संचित किये हुए पुण्य कर्म के उदय से चरम शरीरी हुआ तो वह जीव यथाख्यात नाम के शुद्ध चारित्र को धारण कर तथा केवल ज्ञान को पाकर नियम से सिद्ध अवस्था प्राप्त कर लेता है ।


तम्हा सम्मादिट्ठी पुण्णं मोक्खस्स कारणं हवई ।
इय णाऊण गिहत्थो पुण्णं चायरउ जत्तेण ॥424॥

गाथार्थ: इस ऊपर लिखे कथन से यह सिद्ध होता है कि सम्यग्दृष्टी का पुण्य मोक्ष कारण होता है यही समझ कर गृहस्थों को यत्नपूर्वक पुण्य का उपार्जन करते रहना चाहिये ।


पुण्णस्स कारणं फुडु पढमं ता हवइ देवपूया य ।
कायव्वा भत्तीए सावयवग्गेण परमाय ॥425॥

गाथार्थ: पुण्य के कारणों में सबसे प्रथम भगवान् जिनेंद्रदेव की पूजा करना है, इस लिये समस्त श्रावकों को परम भक्ति पूर्वक भगवान् जिनेंद्रदेव की पूजा करना चाहिये ।


फासुय जलेण ण्हाइय णिवसिय वत्थाइ गंपि तं ठाणं ।
इरियावहं च सोहिय उवविसियं पडिमआसेण ॥426॥

गाथार्थ: पूजा करने वाले गृहस्थ को सबसे पहले प्रासुक जल से स्नान करना चाहिये शुद्ध वस्त्र पहनाना चाहिये फिर पूजा करने के स्सान पर जाना चाहिये तथा जाते समय ईयापथ शुद्धि से जाना चाहिये और वहां जाकर पद्मासन से बैठना चाहिये ।


पुज्जाउवयरणाइ य पासे सण्णिहिय मंतपुव्वेण ।
ण्हाणेणं ण्हाइत्ता आचमणं कुणउ मंतेण ॥427॥

गाथार्थ: तदनंतर पूजा के समस्त उपकरण अपने पास रखना चाहिये फिर मंत्र स्नान करना चाहिये और फिर मंत्र पूर्वक आचमन करना चाहिये ।


आसणठाणं किच्चा सम्मत्तपुव्व तु झाइए अप्पा ।
सिखि मंडल मज्झत्थं जालामयजलियणियदेहं ॥428॥

गाथार्थ: अग्नि मंडल के मध्य में अपना आसन लगा कर बैठे और फिर सम्यक् रीति से परमात्मा का ध्यान करे । उस ध्यान मे अग्निमंडल से निकलती हुई सौ ज्वालाओं से अपना शरीर जल रहा है ऐसा चितवन करना चाहिये ।


पावेण सह संदेह झाणो डज्झंतयं खु चिंततो ।
बंधउ संतीमुद्दा पंच परमेट्ठिणामाय ॥429॥

गाथार्थ: उस ध्यान में " मेंरा शरीर मेरे पापों के साथ जल रहा है " ऐसा चिंतवन करना चाहिये और फिर पांचों परमेष्ठिओं की वाचक ऐसी शांत मुद्रा बनानी चाहिये ।


अमयक्खरे णिवेसउ पंचसु ठाणेसु सिरसि धरिऊण ।
सा मुद्दा पुणु चिंतउ धाराहिं सवदयं अमयं ॥430॥

गाथार्थ: उस गुरु मुद्रा को मस्तक पर रख कर पांचों स्थानों मे अमृताक्षरों का निवेश करो । जिसकी धारा से अमृत झर रहा है इस प्रकार उस गुरु मुद्रा को फिर चितवन करो ।


पावेण सह सरीरं बड्ढं जं आसि झाण जळणेण ।
तं जायं जं छारं पक्खालउ तेण मंतेण ॥431॥

गाथार्थ: उस ध्यान की ज्वाला से जो पापों के साथ शरीर जल गया था और उससे जो क्षार वा राख उत्पन्न हुई थी उसको उसी मंत्र से धो डालो ।


पडिदिवसं जं पावं पुरिसो आसवइ तिविह जोऐण ।
तं णिद्दहइ णिरुत्तं तेण ज्झाणेण संजुत्तो ॥432॥

गाथार्थ: यह पुरुष अपने मन वचन काय तीनों योगों से जो प्रति दिन पाप कर्मों का आस्रव करता है उस आस्रव से आने वाले समस्त पाप कर्मों को वह पुरुष ऊपर लिखे अनुसार ध्यान धारण कर शीघ्र ही नाश कर देता है ।


जं सुद्धो तं अप्पा सकायरहिओ य कुणइ णहु किं पि ।
तेण पुणो णियदेहं पुण्णाण्णवं चिंतए झाणी ॥433॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो अपनी आत्मा अपने शरीर से रहित होकर अत्यंत शुद्ध हो चुका है वह कुछ भी कार्य नहीं कर सकता इसलिये उस ध्यान करने वाले पुरुष को अपना शरीर एक पुण्य के समुद्र रूप चितवन करना चाहिये ।


उट्ठाविऊण देह संपुण्णं कोडि चंद संकासं ।
पच्छा सयली करण कुणओ परमेट्ठिमंतेण ॥434॥

गाथार्थ: तदनंतर करोडों चन्द्रमाओं के समान निर्मल और देदीप्यमान अपने शरीर को चितवन करता हुआ तथा शरीर को पूर्ण रूप से चितवन करता हुआ उस ध्यान से उठ बैठना चाहिये और फिर पंच परमेष्ठी वाचक मंत्रों से उस पुरुष को सकली करण करना चाहिये । सकली करण की विधि पहले लिख चुके है ।


अहवा खिप्पउ साहा णिस्सेउ करंगुलीहिं वामेंहि ।
पाए णाही हियए मुहे य सीसे य ठविऊणं ॥435॥

गाथार्थ: अथवा दशों दिशाओं में सरसों स्थापन करना चाहिये तथा बायें हाथ की अंगुलियों से करन्यास करना चाहिये अर्थात् पैरों में नाभि मे हृदय में मुख में और मस्तक पर बांये हाथ की उंगलियों को रख कर पाचों स्थानों मे पंच परमेष्ठी की स्थापना करना चाहिये । यदि साहा के स्थान में सेहा पाठ है तो सरसों के स्थान में शेषाक्षत लेना चाहिये । यह सब विधि तथा आगे लिखा अंग न्यास सब पोछे सकली करण में लिखा है ।


अंगे णासं किच्चा इंदो हं कप्पिऊण णियकाए ।
कंकण सेहर मुद्दो कुणओ जण्णोपवीयं च ॥436॥

गाथार्थ: तदनंतर अंगन्यास करना चाहिये । फिर अपने शरीर में ’ मैं इन्द्र हूँ ’ ऐसी कल्पना करनी चाहिये और कंकण मुकुट मुद्रिका और यज्ञोपवीत पहनना चाहिये ।


पीढं मेरुं कप्पिय तस्सोवरि ठाविऊण जिणपडिमा ।
पच्चक्खं अरहंत चित्ते भावेउ भावेण ॥437॥

गाथार्थ: तदनतर स्थापन किये हुए सिंहासन में मेरु पर्वत की कल्पना करनी चाहिये, उस सिंहासन पर भगवान् जिनेंद्रदेव की प्रतिमा विराजमान करना चाहिये और फिर अपने चित्त मे अपने निर्मल भावों से य साक्षात् भगवान् अरहंत देव है ऐसी भावना करनी चाहिये ।


कलस चउक्कं ठाविय चउसु वि कोणेसु णीरपरिपुण्णं ।
घय दुद्ध दहिय भरियं णव सयदलछण्णमुहकमलं ॥438॥

गाथार्थ: तदनंतर चारों कोनों में जल से भरे हुए चार कलश करने चाहिये तथा मध्य मे पूर्ण कलश स्थापन करना चाहिये । इनके सिवाय घी दूध दही इनसे भरे हुए कलश भी स्थापन करने चाहिये । इन सब कलशों के मुख पर नवीन सौ दल वाले कमल रखने चाहिये ।


आवाहिऊण देवे सुरवइ सिहिकाल णेरिए वरुणे ।
पवणे जक्खे ससूली सपियसवाहणे ससत्थे य ॥439॥

गाथार्थ: तदनंतर इन्द्र अग्नि यम नैऋत वरुण पवन कुबेर ईशान धरणीन्द्र और चन्द्र इन दश दिक्पालों की स्थापना कर अर्घ्य चढाना चाहिये। इन दशों दिक्पालों को उनकी पत्नी वाहन और शस्त्रों सहित स्थापना करनी चाहिये।


दाऊण पुज्जदव्व वलि चरुयं तह य जण्णभायं च ।
सव्वेसिं मंते हि य बीयक्खर णाम जुत्तेहिं ॥440॥

गाथार्थ: इन सब दिक्पालों को पूजा द्रव्य बलि नैवेद्य यज्ञभाग देना चाहिये । सबका बीजाक्षर सहित अलग अलग नाम लेकर मंत्र पूर्वक आहवानन स्थापन सन्निधीकरण कर यज्ञ भाग पूजा द्रव्य और नैवेद्य देना चाहिये । इनके स्थापन करने आदि के मत्र ये है । ओं ह्रीं आं क्रौं प्रशस्त वर्ण सर्व लक्षण संपूर्ण स्वायध वाहन यवती सचिह्न सहित इन्द्र देव अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ओं आं क्रों ह्रीं इन्द्र देवाय इद्रं अर्घ्यं पाद्यं गंधं पुष्पं दीपं धूपं चरुं बलि स्वस्तिकं अक्षतं यज्ञभागं च यजामहे यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतामिति स्वाहा । यह मंत्र पढ कर अलग अलग देवों को स्थापन करना चाहिये । इन्द्र को पूर्व दिशा में स्थापन कर बांई ओर से आठों दिशाओं मे आठ देव अधो दिशामे धरणीन्द्र ऊर्ध्व दिशा में चन्द्र को स्थापन करना चाहिये । शेष विधि अभिषेक पाठ मे से कर लेनी चाहिये ।


उच्चारिऊण मंते अहिसेयं कुणउ देवदेवस्स ।
णीर घय खीर दहियं खिवउ अणुक्कमेण जिणसीसे ॥441॥

गाथार्थ: तदनंतर देवाधिदेव भगवान् अरहंत देव का अभिषेक करना चाहिये। वह अभिषेक अनुक्रम से जल घी दूध दही आदि पदार्थों से मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान् के मस्तक परसे करना चाहिये।


ण्हवणं काऊण पुणो अमलं गंधोदयं च वंदित्ता ।
सवलहणं च जिणिंदे कुणऊ कस्सीर मलएहिं ॥442॥

गाथार्थ: इस प्रकार अभिषेक कर निर्मल गंधोदक की वंदना करनी चाहिये और फिर काश्मीर केसर तथा चंदन आदि से भगवान् का उद्वर्तन करना चाहिये । अभिषेक के अनन्तर चन्दन केसर आदि द्रव्यों की धूप बना कर उससे प्रतिमा का उवटन करना चाहिये । फिर कोण कलशों मे तथा पूर्ण कलश से अभिषेक करना चाहिये । यह विधि अत्यंत संक्षेप से कही है । इसकी पूर्ण विधि अभिषेक पाठ से जान लेनी चाहिये ।


आलिहउ सिद्धचक्कं पट्टे पव्वेहिं णिरुसुगंधेहिं ।
गुरु उवएसेण फुडं संपएणं सव्वमंतेहिं ॥443॥

गाथार्थ: तदनंतर किसी वस्त्र पर या किसी थाली में वा किसी पाट पर अत्यंत सुगंधित द्रव्यों से सिद्ध चक्र का मंत्र लिखना चाहिये । तथा गुरु के उपदेश के अनुसार उसे स्पष्ट रीति से सर्व मंत्रों से पूर्ण रूप देकर लिखना चाहिये ।


सोल दल कमल मज्झे अरिहं विलिहे इबिदुकलसहियं ।
बंभेण वेढइत्ता उवरिं पुणु माय बीएण ॥444॥

गाथार्थ: एक सोलह दल का कमल बनाना चाहिये इसके मध्य में कर्णिका पर विंदु और कला सहित र्हं लिखना चाहिये । फिर उसको ब्रह्न स्वरों से वेष्टित करना चाहिये ।
अर्थात् उससे चारों ओर सोलह स्वर लिखना चाहिये । फिर उन सबको माया बीज से वेष्टित करना चाहिये अर्थात् तीन रेखाओं से वेष्टित करना चाहियें । तदनंतर सोलह दल का कमल बनाना चाहिये जिसमें आठ दल हों और आठ वर्ग हों । आठों वर्गों में सोलह स्वर तथा कवर्ग चवर्ग आदि अक्षर हों तथा आठों दलों मे ’ अर्हद्भ्यो नमः ’ लिखना चाहिये । इन सबको तीन माया रेखाओं से वेष्टित करना चाहिये । ऊपर की ओर अंकुश से आरुद्ध करना चाहिये । तथा फिर चारों ओर बाहर धरा मंडल बना देना चाहिये ।


सोलस सरेहि वेढउ देह वियप्पेण अट्ठ वग्गा वि ।
अट्ठेहि दलेहिं सुपयं अरिहंताणं णमो सहियं ॥445॥

गाथार्थ: एक सोलह दल का कमल बनाना चाहिये इसके मध्य में कर्णिका पर विंदु और कला सहित र्हँ लिखना चाहिये । फिर उसको ब्रह्न स्वरों से वेष्टित करना चाहिये ।
अर्थात् उससे चारों ओर सोलह स्वर लिखना चाहिये । फिर उन सबको माया बीज से वेष्टित करना चाहिये अर्थात् तीन रेखाओं से वेष्टित करना चाहियें । तदनंतर सोलह दल का कमल बनाना चाहिये जिसमें आठ दल हों और आठ वर्ग हों । आठों वर्गों में सोलह स्वर तथा कवर्ग चवर्ग आदि अक्षर हों तथा आठों दलों मे ’ अर्हद्भ्यो नमः ’ लिखना चाहिये । इन सबको तीन माया रेखाओं से वेष्टित करना चाहिये । ऊपर की ओर अंकुश से आरुद्ध करना चाहिये । तथा फिर चारों ओर बाहर धरा मंडल बना देना चाहिये ।


मायाए तं एवं तिउणं वेढेह अंकुसारूढं ।
कुणह धरामंडलयं बाहिरयं सिद्धचक्कस्स ॥446॥

गाथार्थ: एक सोलह दल का कमल बनाना चाहिये इसके मध्य में कर्णिका पर बिंदु और कला सहित र्हं लिखना चाहिये । फिर उसको व्रह्न स्वरों से वेष्टित करना चाहिये ।

अर्थात् उससे चारों ओर सोल्ह स्वर लिखना चाहिये । फिर उन सबको माया बीज से वेष्टित करना चाहिये अर्थात् तीन रेखाओं से वेष्टित करना चाहियें । तदनंतर सोलह दल का कमल बनाना चाहिये जिसमें आठ दल हों और आठ वर्ग हों । आठों वर्गों में सोलह स्वर तथा कवर्ग चवर्ग आदि अक्षर हों तथा आठों दलों मे ’ अर्हद्भ्यो नमः ’ लिखना चाहिये । इन सबको तीन माया रेखाओं से वेष्टित करना चाहिये । ऊपर की ओर अंकुश से आरुद्ध करना चाहिये । तथा फिर चारों ओर बाहर धरा मंडल बना देना चाहिये ।


इय संखेवं कहियं जो पूयइ गंध दीव धूवेहिं ।
कुसुमेहि जवइ णिच्चं सो हणइ पुराणयं पावं ॥447॥

गाथार्थ: इस प्रकार संक्षेप से सिद्ध चक्र का विधान कहा । जो पुरुष गंध दीप धूप और फूलों से इस यंत्र की पूजा करता है तथा नित्य इसका जप करता है वह पुरुष अपने संचित किये हुए समस्त पापों का नाश कर देता है।


जो पुणु वड्डद्धारो सव्वो भणिओ हु सिद्धचक्कस्स ।
सो एइ ण उद्धिरिओ इण्हि सामग्गि ण हु तस्स ॥448॥

गाथार्थ: इसके सिवाय एक सिद्ध चक्र का वृहत् उद्धार और भी है, महा उद्धार वा महा पूजा है जो अन्य शास्त्रो में कही है परंतु उसका उद्धार वा महा सिद्ध चक्र पूजा इस समय नहीं करना चाहिये । क्योंकि इस समय उसकी पूर्ण सामग्री प्राप्त नहीं होती ।


जइ पुज्जइ को वि णरो उद्धारित्ता गुरुवएसेण ।
अट्ठ दल विउण तिउणं चउग्गुणं वाहिरे कंजे ॥449॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में गाथा 449 से 453 का अलग अर्थ नहीं छपा; इनका संयुक्त विवेचन संलग्न पीडीएफ में है)


मज्झे अरिहं देवं पंचपरमेट्ठिमंतसंजुत्तं ।
लहि ऊण कण्णियाए अट्ठदले अट्ठदेवीओ ॥450॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में गाथा 449 से 453 का अलग अर्थ नहीं छपा; इनका संयुक्त विवेचन संलग्न पीडीएफ में है)


सोलह दलेसु सोलह विज्जा देवीउ मंतसहियाओ ।
चउवीसं पत्ते सु य जक्खा जक्खी य चउवीसं ॥451॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में गाथा 449 से 453 का अलग अर्थ नहीं छपा; इनका संयुक्त विवेचन संलग्न पीडीएफ में है)


वत्तीसा अमरिंदा लिहेह वत्तीस कंज पत्तेसु ।
णिय णिय मंत पउत्ता गणहर वलयेण वेढेइ ॥452॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में गाथा 449 से 453 का अलग अर्थ नहीं छपा; इनका संयुक्त विवेचन संलग्न पीडीएफ में है)


सत्तपयारा रेहा सत्त वि विलिहेह वज्जसंजुता ।
चउरंसो चउ दारा कुणह पयत्तेण जुत्तीए ॥453॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में गाथा 449 से 453 का अलग अर्थ नहीं छपा; इनका संयुक्त विवेचन संलग्न पीडीएफ में है)


एवं जंतुद्धारं इत्थं मइ अक्खियं समासेण ।
सेसं किंपि विहाणं णायव्वं गुरु पसाएण ॥454॥

गाथार्थ: इस प्रकार मैंने यह यंत्रोद्धार का स्वरुप अत्यंत संक्षेप से कहा है । इसका शेष विधान वा विस्तार गुरुओं के प्रसाद से जान लेना चाहिये ।


अट्ठ विह अच्चणाए पुज्जेयव्वं इमं खु णियमेण ।
दव्वेहिं सुअंधेहि य लिहियव्वं अइपवित्तेहिं ॥455॥

गाथार्थ: इन यंत्रों को पवित्र धातुओं पर अत्यंत पवित्र और सुगंधित द्रव्यों से लिखना चाहिये । तदनंतर नियमपूर्वक आठों द्रव्यों से प्रति दिन पूजा करना चाहिये ।


जो पुज्जइ अणवरयं पावं णिद्दहइ आसिभव वद्धं ।
पडिदिणकयं च विहुणइ बंधइ पउराई पुण्णाइं ॥456॥

गाथार्थ: जो पुरुष इन यंत्रों की प्रतिदिन पूजा करता है वह अपने पूर्व भवों में संचित किये हुए समस्त पापों को जला देता है नष्ट कर देता है। तथा प्रति दिन के पापों को भी नष्ट कर देता हे। इसके साथ ही वह बहुत अधिक मात्रा मे पुण्य कर्मों का संचय करता है।


इह लोए पुण मंता सव्वे सिज्झंति पढिय मित्तेण ।
विज्जाओ सव्वाओ हवंति फुडु साणुकूलाओ ॥457॥

गाथार्थ: इसके पठन करने मात्र से पाठ करने में इस लोक में भी समस्त मंत्र सिद्ध हो जाता है तथा जितनी विद्याएं है वे सब स्पष्ट रीति से अपने अनुकूल हो जातीं है ।


गह भूय डायणीओ सव्वे णस्संति तस्स णामेण ।
णिव्विसयरणं पयडइ सुसिद्ध चक्कप्पहावेण ॥458॥

गाथार्थ: ग्रहभूत डाकिनी पिशाच्च आदि सिद्ध चक्र का नाम लेने से ही सब नष्ट हो जाते है । तथा इसी सिद्ध चक्र के प्रभाव से समस्त प्रकार के विघ्न दूर हो जाते है । निर्विषीकरण प्रकट हो जाता है ।


वसियरणं आइट्ठी थंभं णेहं च संति कम्माणि ।
नानाजराणां हरणं कुणेइ तं झाणजोएण ॥459॥

गाथार्थ: इन यंत्र मंत्रों का ध्यान करने से वशीकरण आकर्षण स्तंभन शांति कर्म स्नेह आदि सब मंत्र सिद्ध हो जाते है । इन्हीं मंत्रों का ध्यान करने से वशीकरण हो जाता है जिसको आकर्षण करना चाहो वह आर्कषित हो जाता है जिसका स्तंभन करना चाहो इसका स्तंभन हो जाता है रुक जाता है जिसको शांत करना चाहो वह शांत हो जाता है बुढापा दूर हो जाता है तथा और भी अनेक प्रकार के लाभ हो जाते है ।


पहरंति ण तस्स रिउणा सत्तू मित्तत्तणं च उवयादि ।
पुज्जा हवेइ लोए सुवल्लहो णरवरिंदाण ॥460॥

गाथार्थ: इस यंत्र मंत्र का ध्यान करने वाले पुरुष को उसका कोई भी शत्रु मार नहीं सकता, उसके सब शत्रु मित्र के समान हो जाते है, संसार मे उसकी पूजा प्रतिष्ठा होती है और वह पुरुष राजा महाराजाओं का तथा इन्द्रों का भी प्रिय वा वल्लभ होता है।


किं वहुणा उत्तेण य मोक्खं सोक्खं च लब्भई जेण ।
केत्तिय मेत्तं एयं सुसाहियं सिद्ध चक्केण ॥461॥

गाथार्थ: अथवा बहुत कहने से क्या ? जिस सिद्ध चक्र के प्रताप से इस मनुष्य को मोक्ष के अनंत सुख प्राप्त होते है फिर भला ये संसारिक लाभ उसके सामने क्या पदार्थ है अर्थात् कुछ भी नहीं ।


अहवा जइ असमत्थो पुज्जइ परमेट्ठिपंचकं ।
तं पायडं खु लोए इच्छिय फलदायगं परमं ॥462॥

गाथार्थ: अथवा जो कोई पुरुष इन मंत्रों के बनाने में वा पूजा अर्चा करने में असमर्थ हो तो उसको पंच परमेष्ठी चक्र की पूजा करनी चाहिये। वह पंच परमेष्ठी चक्र भी इस लोक में सर्वोत्कृष्ट इच्छानुसार फलको देने वाला है।


सिररेह भिण्ण सुण्णं चंदकला विंदुएण संजुत्तं ।
मत्ताहिय उवरगयं सुवेढियं कामबीएण ॥463॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में अर्थ नहीं छपा; टिप्पणी के अनुसार यन्त्र न मिलने से अर्थ नहीं किया गया)


वामदिसाइणयारं मयार सविसग्ग दाहिणे भाए ।
बहि अट्ठ पत्र कमलं तिउणं वेढेइ मायाए ॥464॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में अर्थ नहीं छपा; टिप्पणी के अनुसार यन्त्र न मिलने से अर्थ नहीं किया गया)


पणमंति मुत्तिमेगे अरहंत पयं दलेसु सेसेसु ।
धरणीमंडल मज्झे झाएह सुरच्चियं चक्कं ॥465॥

गाथार्थ: (इस संस्करण में अर्थ नहीं छपा; टिप्पणी के अनुसार यन्त्र न मिलने से अर्थ नहीं किया गया)


अह एउणवण्णासे कोट्ठे काऊण विउलरेहाहिं ।
अइरोइ अक्खराइं कमेण विण्णिसहं सव्वाइं ॥466॥

गाथार्थ: अथवा अनेक रेखाओं से एक उनचास कोठे का यन्त्र वनाना चाहिये । मध्य में पंच परमेष्ठी का नाम देना चाहिये । तथा फिर अनुक्रम से अम्ल वर्यू आम्ल वर्यू इस प्रकार समस्त अक्षरों के मन्त्र लिखना चाहिय । जैसा कि यन्त्र में लिखा है । फिर तीन रेखाओं से घरा मण्डल लिखना चाहिये । इस प्रकार यन्त्र वनता है ।


ता णिसदं जहयारं मज्झिम ठाणेसु ठाइ जुत्तीए ।
वेढइ वीएण पुणो दलमंडल उयरमज्झत्थं ॥467॥

गाथार्थ: अथवा अनेक रेखाओं से एक उनचास कोठे का यन्त्र वनाना चाहिये । मध्य में पंच परमेष्ठी का नाम देना चाहिये । तथा फिर अनुक्रम से अम्ल वर्यू आम्ल वर्यू इस प्रकार समस्त अक्षरों के मन्त्र लिखना चाहिय । जैसा कि यन्त्र में लिखा है । फिर तीन रेखाओं से घरा मण्डल लिखना चाहिये । इस प्रकार यन्त्र वनता है ।


एए जंतुद्धारे पुज्जइ परट्ठिपंच अहिहाणे ।
इच्छइ फलदायारो पावघणपडलहंतारो ॥468॥

गाथार्थ: ये यंत्रोद्धार पंच परमेंष्ठी वाचक है इनकी पूजा करने से इच्छानुसार फल की प्राप्ति होती है, तथा पापरुपी घने बादलों के समूह सब नष्ट हो जाते है । इसलिये इन यंत्रों के द्वारा पंच परमेंष्ठीं की पूजा प्रति दिन करनी चाहिये ।


अट्ठविहच्चण काउं पुव्व पउत्तम्मि ठावियं पडिमा ।
पुज्जेह तग्गयमणो विविहहि पुज्जाहिं भत्तीए ॥469॥

गाथार्थ: इस प्रकार अष्ट द्रव्य से यंत्रों के द्वारा पंच परमेष्ठी की पूजा करके पहले अभिषेक के लिये विराजमान की हुई प्रतिमा में अपना मन लगाकर भक्ति पूर्वक अनेक प्रकार के द्रव्यों से अभिषेक बाद उन प्रतिमाओं की पूजा करनी चाहिये ।


पसमइ रयं असेसं जिणपयकमलेसु दिण्ण जलधारा ।
भिंगारणाल णिग्गइ भमंतभिंगेहिं कव्बुरिया ॥470॥

गाथार्थ: सबसे पहले जल की धारा देकर भगवान् की पूजा करनी चाहिये । वह जल की धारा शृंगार ( झारी ) की नाल से निकलनी चाहिये तथा वह जल इतना सुगंधित होना चाहिये कि उस पर भ्रमर आजाय और जल धारा के चारों ओर घूमते हुए उन भ्रमरों से वह जल की धारा अनेक रंग की दिखाई देने लगे ऐसी जल की धारा भगवान् के चरण कमलों पर पडनी चाहिये । इस प्रकार जल की धारा से भगवान् की पूजा करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते है अथवा ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्म शांत हो जाते है ।


चंदणसुअन्ध ले ओ चिणवर चरणेसु जो कुणि भविओ ।
लहइ तणूविक्कि रिय सहावसुयंधयं अमलं ॥471॥

गाथार्थ: जो भव्य पुरुष भगवान् जिनेन्द्र देव के चरण कमलों पर जिन प्रतिमा के चरण कमलों पर ) सुगंधित चन्दन का लेप करता है उसको स्वर्ग में जाकर अत्यन्त निर्मल और स्वभाव से ही सुगंधित वैक्रियिक शरीर प्राप्त होता है ।


पुण्णाण पुञ्जे हि य अक्खए पुञ्जेहि देवपयपुरओ ।
लब्भंति णावणिहाणे सुअक्खए चक्कवत्तित्तं ॥472॥

गाथार्थ: जो भव्य जीव भगवान् जिनेंद्रदेव के सामने पूर्ण अक्षतों के पुंज चढाता है अक्षतों से भगवान् की पूजा करता है वह पुरुष चक्रवर्ती का पद पाकर अक्षय रूप नव निधियों को प्राप्त करता है । चक्रवर्ती को जो निधियां प्राप्त होती है उनमें से चाहे जितना सामान निकाला जाय निकलता ही जाता है कम नहीं होता ।


अलि चुंविएहिं पुज्जइ जिणपयकमलं च जाइमल्लीहिं ।
सो हवइ सुरवरिंदो रमेइ सुरतरुवर वणेहिं ॥473॥

गाथार्थ: जो भव्य पुरुष भगवान् जिनेंद्रदेव के चरण कमलों की जिन पर भ्रमर धूम रहे है ऐसे चमेली मोगरा आदि उत्तम पुष्पों से पूजा करता है वह स्वर्ग में जाकर अनेक देवों का इन्द्र होता है और वह वहां पर चिरकालतक स्वर्ग में होने वाले कल्प वृक्षों के वनों में (बगीचों मे) क्रीडा किया करता है ।


दहिखीर सप्पि संभव उतम चरुरगहि पुज्जए जो हु।
जिणवरपाय पओरुह सो पावइ उत्तमे भोए ॥474॥

गाथार्थ: जो भव्य पुरुष दही दूध घी आदि में बने हुए उत्तम नैवेद्य से भगवान् जिनेंद्रदेव के चरण कमलों की पूजा करता है उसे उत्तमोत्तप भोगों की प्राप्ति होती है।


कप्पूर तेल्ल पयलिय मंद मरुपहयणडिदीवेहिं।
पुज्जइ जिण पय पोमं ससि सूरवि सम तणुं लहई ॥475॥

गाथार्थ: जो दीपक कपूर घी तेल आदि से प्रज्वलित हो रहा है औ मन्द मन्द बायु से नाच सा रहा है ऐसे दीपक से जो भव्य पुरुष भगवान् जिनेन्द्र दंव के चरण कमलों की पूजा करता है वह पुरुष सूर्य चन्द्रमा के समान तेजस्वी शरीर को धारण करता है ।


सिल्लारस अयरु मिस्सिय णिग्गइ धूवेंहि बहल धूमेंहि ।
धूवइ जो जिण चरणेस लहई सुहवत्तणं तिजए ॥476॥

गाथार्थ: जिससे बहुत भारी धूंआं निकल रहा है और जो शिलारस ( शिलाजीत ) अगुरु चंदन आदि सुगंधित द्रव्यों से बनी हुई है ऐसी धूप अग्नि में खेकर भगवान् जिनेन्द्रदेव के चरण कमलों को धूपित करता है वह तीनों लोकों में उत्तम पद को प्राप्त होता है। धूप को अग्नि में खेना चाहिये और उससे निकला हु धूंआं दायें हाथ से भगवान् की ओर करना चाहिये ।


पक्केंहि रसड्ढ समुज्जलेंहि जिणचरणपुरओ ।
णाणा फलेंहि पावइ पुरिसो हिय इच्छियं सुफलं ॥477॥

गाथार्थ: जो भव्य पुरुष अत्यंत उज्वल रससे भरपूर ऐसे अनेक प्रकार के पके फलों से भगवान् जिनेन्द्र देव के चरण कमलों के सामने समर्पण कर पूजा करता है वह अपने हृदय अनुकूल उत्तम फलों को प्राप्त होता है।


इयं अठ्ठभेय अच्चण काऊं पुण जवइ मूलविज्जा य ।
जा जत्थ जहा उत्ता सयं च अठ्ठोत्तरं जावा ॥478॥

गाथार्थ: इस प्रकार अष्ट द्रव्यों से भगवान् जिनेन्द्रदेव की पूजा करनी चाहिये तदनंतर मूल मन्त्र का जप करना चाहिये । जिस पूजा में जो मूल मन्त्र बतलाया है उसी मन्त्र को एक सौ आठ बार जपना चाहिये ।


किच्चा काउस्सग्गं देवं झाएह समवसरणत्थं ।
लद्धट्ठ पाडिहेरं णवकेवल लद्धि संपुण्णं ॥479॥

गाथार्थ: तदनन्तर कायोत्सर्ग कर भगवान् जिनेन्द्र देव का ध्यान करना चाहिये । आगे किस रुप से ध्यान करना चाहिये सो बतलाते है। भगवान् समवसरण में विराजमान है आठों प्राति हार्यों से सुशोभित है यथा नी केवल लब्धियों से परिपूर्ण है । अशोक बृक्ष का होना देवों के द्वारा पुष्प बृष्टी का होना, देवों के द्वारा बाजे बजना, सिहासन, समर, छत्र भामंडल का होना दिव्य ध्वनी का होना ये आठ प्राति हार्य कहलाते है । अनन्त दर्शन अनन्त ज्ञान क्षायिक ज्ञान क्षायिक लाभ क्षायिक भोग क्षायिक उपभोग क्षायिक वीर्य क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक चारित्र ये नौं लब्धियां कहलाती हैं ।


णठ्ठ चउ घाइ कम्मं केवल णाणेण मुणिय तियलोयं ।
परमेठ्ठी अरिहंतं परमत्थं परम झाणत्थं ॥480॥

गाथार्थ: जिनके चारों घातिया कर्म नष्ट हो गये है जो अपने केवल ज्ञान से तीनो लोकों कों प्रत्यक्ष जानते है जो अरहंत पद में विराजमान है, परम परमेंष्ठी है परमात्मा है और परम वा सर्वोत्कृष्ट ध्यान में लीन है । ऐसे भगवान् अरहंत देव का ध्यान करना चाहिये ।


झाणं झाऊण पुणो मज्झाणिय वंदणत्थ काऊण ।
उवसंहरिय विसज्जे जे पुव्वावाहिया देवा ॥481॥

गाथार्थ: इस प्रकार अरहंत भगवान् का ध्यान कर माध्यान्हिक वंदना करनी चाहिये । तदनतर उपसंहार कर पहले आव्हान किये हुए देवों का विसर्जन करना चाहिये ।


एण विहाणेण पुडं पुज्जा जो कुणइ भत्ति संजुत्तो ।
सो डहइ णियं पावं बंधइ पुण्णं तिजय खोहं ॥482॥

गाथार्थ: इस प्रकार जो भव्य पुरुष भक्ति सहित ऊपर लिखी विधि के अनुसार भगवान् जिनेन्द्र देव की पूजा करता है वह अपने समस्त पापों को नाश कर देता है तथा तीनो लोकों को क्षोभ उत्पन्न करने वाले पुण्य का बंध करता है ।


उप्पज्जइ दिवलोए भुंजइ भोए मणिच्छिए इठ्ठे ।
बहुकालं चविय पुणो उत्तम मणुयत्तणं लहई ॥483॥

गाथार्थ: तदनंतर आयु पूर्ण होनें पर वह स्वर्गलोक मे उत्पन्न होता है, वहां पर अपने मन की इच्छानुसार अनेक प्रकार के इष्ट भोगों का अनुभव करता है तथा चिरकाल तक उन भोगो का अनुभव करता रहता है । आयु पूर्ण होनेपर वहां से च्युत होता है और मनुष्य लोक मे आकर उत्तम मनुष्य का शरीर प्राप्त करता है ।


होऊण चक्क वट्टी चउदह रयणेहि णव णिहाणेहिं ।
पालिय छक्खंडधरा भुंजिय भोए णिरुगरिठ्ठा ॥484॥

गाथार्थ: उत्तम मनुष्य शरीर को पाकर वह चक्रवर्ती पद प्राप्त करता है चौदह रत्न और नौ निधियों को प्राप्त करता है छहों खंड पृथ्वी का पालन करता है और उत्तमोत्तम भोगों का अणुभव करता है ।


संपत्त वोहि लाहो रज्जं परिहरिय भविय णिग्गंथो ।
लहिऊण सयलसंजम धरिऊण महव्वया पंच ॥485॥

गाथार्थ: तदनंतर वह संसार शरीर और भोगों से विरक्त होकर रत्नत्रय को धारण करता है. राज्य का त्याग कर दीक्षा लेकर निर्ग्रन्थ अवस्था धारण करता है सकल संयम को धारण करता है और पंच महाव्रतों को धारण करता है ।


लहिऊण सुक्कझाणं उप्पाइय केवलं वरं णाणं ।
सिज्झेइ णट्ठकम्मो अहिसेयं लहिय मेरुम्मि ॥486॥

गाथार्थ: पंच महाव्रत धारण कर वह शुक्ल ध्यान को धारण करता है चारों घातिया कर्मों को नाश कर मोक्ष प्राप्त करता है। यदि वह फिर स्वर्ग में उत्पन्न हुआ तो वहां से आकर तीर्थंकर होकर मेरु पर्वत पर अपना अभिषेक कराता है और फिर तपश्चरण कर केवल ज्ञान प्राप्त कर अनेक जीवों को मोक्षमार्ग में लगाकर मोक्ष प्राप्त करता है।


इय णाउण विसेसं पुण्णं आयरइ कारणे तस्स ।
पावहणं जाम सयलं संजमयं अप्पमत्तं च ॥487॥

गाथार्थ: यह सब पुण्य की विशेष महिमा समझकर जबतक सकल संयम प्राप्त न हो जाय तब तक समस्त पापों को नाश करने वाले और मोक्ष के कारण भूत ऐसे विशष पुण्य का उपार्जन करते रहना चाहिय।


भावह अणुव्वयाइं पालह सीलं च कुणह उववासं ।
पव्वे पव्वे णियमं दिज्जह अणवरय दाणाइं ॥488॥

गाथार्थ: ऐसे विशेष पुण्य को उपार्जन करने के लिये अगुव्रतों को पालन करना चाहिये, गुणव्रत शिक्षाव्रत रूप शीलों का पालन करना चाहिये । प्रत्येक पर्व के दिन उपवास करना चाहिय और नियम पूर्वक निरन्तर दान देना चाहिये ।

विरताविरत गुणस्थान: दान, दान के भेद, विधि और फल (गाथा 489 से 599)

अभय पयाणं पढमं विदियं तह होइ सत्थ दाणं च ।
तइयं ओसह दाणं आहारदाणं चउत्थं च ॥489॥

गाथार्थ: दान के चार भेद है पहला अभयदान, दूसरा शास्त्रदान, तीसरा औषधदान और चौथा आहार दान ।


सव्वेसिं जीवाणं अभयं जो देइ मरणभीरुणं ।
सो णिब्भओ तिलोए उत्तस्सो होइ सव्वेसिं ॥490॥

गाथार्थ: जो जीव अपने मरने से भयभीत हो रहे है ऐसे समस्त जीवों को जो अभयदान देता है वह पुरुष तीनो लोकों में निर्भय होता है और सब मनुष्यों मे उत्कृष्ट होता है ।


सुयदाणेण प लब्भइ मइ सुइ णाणं च ओहिमणणाणं ।
बुद्धितवेणय सहियं पच्छा वर केवलं णाणं ॥491॥

गाथार्थ: जो पुरुष शास्त्रदान देता है, जिनागम को पढ़ाता है वह पुरुष मति ज्ञान श्रुतज्ञान दोनों को पूर्ण रुप से प्राप्त करता है, बुद्धि और तपश्चरण के साथ साथ अवधि ज्ञान और मनः पर्यय ज्ञान को प्राप्त करता है ।


ओसहदाणेण णरो अतुलिम बलपरक्कमोमहासत्तो ।
वाहि विमुक्क सरीरो चिराउ सो होइ तेयठ्ठो ॥492॥

गाथार्थ: जो पुरुष औषध दान देता है वह अतुलित वा सर्वोत्कृष्ट बल और पराक्रम को धारण करता है महाशक्ति को धारण करता है, वह चिरायु होता है, तेजस्वी होता है और उसका शरीर समस्त रोग व्याधियों से रहित होता है।


दाणस्साहारं फलं को सक्कइ वण्णिऊण भुवणयले ।
दिण्णेण जेण भोओ लब्भंति मणिच्छियासव्वे ॥493॥

गाथार्थ: इन तीनों लोकों मे आहार दान के फल को वर्णन करने के लिये भला कौन समर्थ है ।


दायारो वि य पत्तं दाण विसेसो तहा विहाणं च ।
एए चउ अहियारा णायव्वा होंति भव्वेण ॥494॥

गाथार्थ: भव्य जीवों को सबसे पहले दान देने के चार अधिकार समझ लेने चाहिये । दाता, पात्र, दान, देने योग्य द्रव्य और देनें की विधि ये चार अधिकार है ।
दान देने वाले को दाता कहते है जिसको दान दिया जाता है वह पात्र कहलाता है, दान में जो द्रव्य दिया जाता है वह दान विशेष है और दान देने के नियमों को विधि कहते है ।


दायारो उवसंतो मणवय काएण संजुओ दच्छो ।
दाणे कयउच्छाहो पयडय वर छग्गुणो अमये ॥495॥

गाथार्थ: जो भव्य जीव शांत परिणामों को धारण करता है, जो मन वचन काय से दान देने में लगा हो अत्यन्त चतुर हो, दान देने में जिसका उत्साह हो, जो मद वा अभिमान रहित हो और दातां के छह गुणों से सुशोभित हो ऐसा भव्य जीव दात गिना जाता है ।


भत्ती तुठ्ठी य खमा सद्धा सत्तं च लोहपरिचाओ ।
विउणाण तक्काले सत्तगुणा होंति दायारे ॥496॥

गाथार्थ: जिनको दान देना है उनमें जिसकी भक्ति हो, दान दने में जिसको संतोष हो, क्षमा को धारण करने वाला हो, देव शास्त्र गुरु में वा पात्र में श्रद्धा रखता हो, दान देने की शक्ति रखता हो, जिसके लोभ का त्याग हो और दान देने में क्या क्या करना चाहिये इस बात का जिसको पूरा ज्ञान हो वही उत्तम दाता कहलाता है ।


तिविहं भणंति पत्तं मज्झिम तह उत्तमं जहण्णं च ।
उत्तम पत्तं साहू मज्झिमपत्तं च सावया भणिया ॥497॥

गाथार्थ: पात्र तीन प्रकार के है उत्तम पात्र मध्यम पात्र और जघन्य पात्र । इनमें उत्तम पात्र रत्नत्रय को धारण करने वाले निर्ग्रन्थ मुनि है मध्यम पात्र अणुव्रती श्रावक हे और जघन्य पात्र अविरत सम्यग्दृष्टि पुरुष है । ऐसा शास्त्रों मे निरूपण किया है। इसलिये भव्य जिवों को इन पात्रों के भेद और विशेषता समझकर भक्ति पूर्वक दान देना चाहिये ।


अविरइ सम्मादिट्ठी जहण्ण पत्तं तु अक्खियं समये ।
णाउण पत्तविसेसं दिज्जइ दाणाइ भत्तीए ॥498॥

गाथार्थ: पात्र तीन प्रकार के है उत्तम पात्र मध्यम पात्र और जघन्य पात्र । इनमें उत्तम पात्र रत्नत्रय को धारण करने वाले निर्ग्रन्थ मुनि है मध्यम पात्र अणुव्रती श्रावक हे और जघन्य पात्र अविरत सम्यग्दृष्टि पुरुष है । ऐसा शास्त्रों मे निरूपण किया है। इसलिये भव्य जिवों को इन पात्रों के भेद और विशेषता समझकर भक्ति पूर्वक दान देना चाहिये ।


मिच्छादट्ठी दुरिसो दाणं जो देइ उत्तमे पत्ते ।
सो पावइ वर भोए फुड उत्तम भोय भूमीसु ॥499॥

गाथार्थ: यदि कोई मिथ्यादृष्टी पुरुष किसी उत्तमपात्र को दान देता है तो वह पुरुष उत्तम भोगभूमि के उत्तम भोगों को प्राप्त होता है।


मज्झिम पत्ते मज्झिम भोयभूमीसु पावए भोए ।
पावइ जहण्ण भोए जहण्ण पत्तस्स पाणेण ॥500॥

गाथार्थ: यदि मिथ्या दृष्टि पुरुष किसी मध्यम पात्र को दान देता है तो वह मध्यम भोग भूमि के भोगों को प्राप्त होता है और यदि वही मिथ्या दृष्टि पुरुष किसी जघन्य पात्र को दान देता है तो वह जघन्य भोग भूमि में जन्म लेकर वहां के भोगों का अनुभव करता है ।


उत्तम छित्ते बीयं फलइ जहा लक्ख कोडि गुण्णेंहि ।
दाणं डत्तम पत्ते फलइ तहा किमिच्छ भणिएण ॥501॥

गाथार्थ: जिस प्रकार उत्तम पृथ्वीपर बोया हुआ बीज लाखों गुणा या करोडों गुणा फलता है उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया हुआ दान इच्छानुसार फलको देता है ।


समादिट्ठी पुरिसो उत्तम पुरिसस्स दिण्ण दाणेण ।
उववज्जइ दिव लोए हवइ स महड्ढिओ देओ ॥502॥

गाथार्थ: यदि कोई सम्यग्दृष्टी पुरुष उत्तम पात्र को दान देता है तो वह स्वर्ग लोक में जाकर महा ऋद्धियों को महा विभूतियों को धारण करने वाला उत्तम देव होता है।


जह णीरं उच्छुगयं कालं परिणवइ अमिय रूवेण ।
तह दाणं वर पत्ते फलेइ भोएहिं विविहे हिं ॥503॥

गाथार्थ: जिस प्रकार ईख के खेत में दिया हुआ पानी अपने समय पर अमृतरुप ( मीठे रसरुप ) परिणत हो जाता है उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया हुआ दान अपने समय पर अनेक प्रकार के भोगों से फलत है।


उतमरयणं खु जहा उत्तम पुरिसासियं च वहुमुल्लं ।
तह उत्तम पत्तगयं दाणं णिउणेहि णायत्वं ॥504॥

गाथार्थ: जिस प्रकार कोई उत्तम रत्न किसी उत्तम पुरुष के आश्रय से बहूमुल्य माना जाता है उसी प्रकार किसी उत्तम पात्र को दिया हुआ दान विद्वान् लोगों के द्वारा सर्वोत्तम माना जाता है ऐसा समझना चाहिये ।


किंचिवि वेयमयं पत्तं किंचिवि पत्तं तवोभयं परमं ।
तं पत्तं संसारे तारकयं होइ णियमेण ॥505॥

गाथार्थ: अन्य प्रकार से पात्रों के और भी दो भेद है। एक तो थोडे वा बहुत वेद को जानने वाले को वेदमय पात्र और दूसरे थोडा बहुत परमोत्कृष्ट तपश्चरण करने वाले को तपोमय पात्र ऐसे पात्र के दो भेद है, ये दोनों प्रकार के पात्र नियम पूर्वक संसार से पार कर देने वाले होते है ।


वेओ किल सिद्धंतो तस्सट्ठा णवपयत्थ छद्दव्वं ।
गुण मग्गणठाणाविय जीवट्ठाणाणि सव्वाणि ॥506॥

गाथार्थ: वेद शब्द का अर्थ सिद्धांत शास्त्र है, जो पुरुष सिद्धांत शास्त्रों को तथा उसके अर्थ को जानता है, नौ पदार्थों के स्वरुप को छहों द्रव्यों के स्वरुप को जानता है, समस्त गुणस्थान, मार्गणा स्थान और जीवस्थानों को जानता है, पममात्माके स्वरुप को जानता है, जीवों का स्वभाव कर्मों का स्वभाव और कर्म विशिष्ट जीव्रो का स्वभाव जानता है तथा इन सबका स्वरुप विशेष रीति से जानता है उसको वेदमय पात्र कहते है ।


परमप्पयस्स रूवं जीव कम्माण उहय सब्भावं ।
जो जाणइ सविसेसं वेयमयं होइ तं पत्तं ॥507॥

गाथार्थ: वेद शब्द का अर्थ सिद्धांत शास्त्र है, जो पुरुष सिद्धांत शास्त्रों को तथा उसके अर्थ को जानता है, नौ पदार्थों के स्वरुप को छहों द्रव्यों के स्वरुप को जानता है, समस्त गुणस्थान, मार्गणा स्थान और जीवस्थानों को जानता है, पममात्माके स्वरुप को जानता है, जीवों का स्वभाव कर्मों का स्वभाव और कर्म विशिष्ट जीवो का स्वभाव जानता है तथा इन सबका स्वरुप विशेष रीति से जानता है उसको वेदमय पात्र कहते है ।


वहिरब्भंतर तवसा कालो परिखवइ जिणोवएसेण ।
दिढ बंभचेर णाणी पत्तं तु तवोमयं भणियं ॥508॥

गाथार्थ: जो पुरुष भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए बाह्य और अभ्यंतर तपश्चरण के द्वारा अपना समय व्यतीत करता है तथा जो अपने ब्रह्मचर्य व्रत को दृढता के साथ पालन करता है और सम्यग्ज्ञान को धारण करता हे उसको तपोमय पात्र कहते है । इस प्रकार वेदमय और तपोमय दो प्रकार के पात्र वतलाये । आगे उदाहरण देकर पात्रदान का फल वतलाते है ।


जह णावा णिच्छिदा गुणमइया विविह रयण परिपुण्णा ।
तारइ पारावारे वहु जलयर संकडे भीमे ॥509॥

गाथार्थ: जिस प्रकार अनेक प्रकार के रत्नों से भरी हुई और नाव में होने वाले अनेक गुणों को धारण करने वाली बिना छिद्रवाली नाव अनेक जलचर जीवों से भरे हुए और अत्यंत भयानक एसे समुद्र से पार कर देती है उसी प्रकार अधिक अधिक गुणों से सुशोभित होने वाला पात्र जो जन्म जरा मरण रूपी विकट जलचर जीवों से भरा हुआ है और जिसमें हजारों दुःखरूपी भंवर पड रहे है ऐसे इस संसार समुद्र से भव्य जीवों को पार कर देता है । इस प्रकार संक्षेप से पात्रों का स्वरूप बतलाया ।


तह संसार समुद्दे जाइ जरामरण जलयरा किण्णे ।
दुक्ख सहस्सावत्ते तारेइ गुणाहियं पत्तं ॥510॥

गाथार्थ: जिस प्रकार अनेक प्रकार के रत्नों से भरी हुई और नाव में होने वाले अनेक गुणों को धारण करने वाली बिना छिद्रवाली नाव अनेक जलचर जीवों से भरे हुए और अत्यंत भयानक ऐसे समुद्र से पार कर देती है उसी प्रकार अधिक अधिक गुणों से सुशोभित होने वाला पात्र जो जन्म जरा मरण रूपी विकट जलचर जीवों से भरा हुआ है और जिसमें हजारों दुःखरूपी भंवर पड रहे है ऐसे इस संसार समुद्र से भव्य जीवों को पार कर देता है । इस प्रकार संक्षेप से पात्रों का स्वरूप बतलाया ।


कुच्छिगयं जस्सउणं जीरइ तवझाणवंभ चरिएहिं ।
सो पत्तो णित्थारइ अप्पाणं चेव दायारं ॥511॥

गाथार्थ: जिसका जो अन्न पेटमें पहुंचने पर तपश्चरण ध्यान और ब्रह्मचर्य रादि के द्वारा सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय पच जाय वही अन्न पात्र को भीं ससार से पार कर देता है और दान देने वाले दाता को भी संसार से पार कर देंता है ।


एरिस पत्तम्मि वरे दिज्जइ आहारदाणमणवज्जं ।
पासुय सुद्धं अमलं जोग्गं मणदेह सुक्खयरं ॥512॥

गाथार्थ: इस प्रकार कहे हुए उत्तम पात्रों को निरन्तर आहार दान देना चाहिये। वह आहार निर्दोष ही प्रासुक हो, शुद्ध हो, निर्मल हो, योग्य हो और मन तथा शरीर को सुख देने वाला हो।


कालस्स य अणुरूवं रोयारोयत्तणं च णाऊणं ।
दायव्वं जह जोग्गं आहारं गेहवंतेण ॥513॥

गाथार्थ: गृहस्थों को यथा योग्य ऐसा आहार दान देना चाहिये जो समय वा ऋतुओं के अनुकूल हो, तथा जिसमे रोग वा नीरोगता का भी विचार हो ।


पत्तस्सेस सहावी जं दिण्णं दायगेण भत्तीए ।
तं कर पत्ते सोहिय गहियव्वं विगइरायेण ॥514॥

गाथार्थ: पात्रका भी यह स्वभाव होना चाहिए कि दाता ने जो भक्तिपूर्वक दान दिया है उसको कर पात्र में लेना चाहिये और उसको शोधकर बिना किसी राग द्वष के ग्रहण कर लेना चाहिये ।


दायारेण पुणो विय अप्पाणो सुक्ख मिच्छमाणेण ।
देयं उत्तम दाणं विहिणा वरणीय सत्तीए ॥515॥

गाथार्थ: जो दाम देने वाला दाता अपने आत्मा को सुख पहुँचना चाहता है उसको विधि पूर्वक ऊपर कही हुई शक्ति के अनुसार उत्तम दान देना चाहिये ।


जो पुण हंतइ धण कणइ मुनिहिं कुभोयणु देइ ।
जम्मि जम्मिदालिददहण पुठ्ठि ण तहो छंडेइ ॥516॥

गाथार्थ: जो पुरुष अन्न धन आदि के होते हुए भी मुनियों को कुभोजन देता है उसकी पीठ को दरिद्रता अनेक जन्मों तक भी नहीं छोडती अर्थात् वह अनेक जन्म तक दरिद्री बना रहता है ।


देहो पाणा रुवं विज्जा धम्मं तवो सुहं मोक्खं ।
सव्वं दिण्णं णियमा हवेइ आहारदाणेण ॥517॥

गाथार्थ: शरीर, प्राण, रुप, विद्या, धर्म, तप, सुख और मोक्ष ये सब आहार के ऊपर निर्भर है। इस लिये जो भव्य पुरुष यतियों को आहार दान देता है वह नियम से शरीर, प्राण, रुप, विद्या, धर्म, तप, सुख मोक्ष आदि सबका दान देता है ऐसा समझना चाहिये।


भुक्खं समा णहु वाही अण्णसमाणं य ओसहं णत्थि ।
तम्हा अहार दाणे आरोगत्तं हवे दिण्णं ॥518॥

गाथार्थ: इस संसार में भूख के समान अन्य कोई व्याधि नहीं है और अन्न के समान कोई औषधि नहीं है। इस लिये जो भव्य आहार दान देता है वह पुरुष आरोग्य दान भी देता है ऐसा अवश्य समझना चाहिये।


आहार मओ देहो आहारेण विणा पडेइ णियमेण ।
तम्हा जेणाहारो दिण्णो देहो हवे तेण ॥519॥

गाथार्थ: यह शरीर आहार मय है अन्न का कीडा है । यदि इसको आहार न मिले तो नियम से शिथिल होकर गिर पडता है । इस लिये जिसने ऐसे शरीर के लिये आहार दिया उसने उस शरीर को ही दिया ऐसा समझना चाहिये ।


ता देहो ता पाणा ता रुवं ताम णाण विण्णाणं ।
जामा हारो पविसइ देहे जीवाण सुक्खयरो ॥520॥

गाथार्थ: इस संसार मे जब तक जीवों को सुख देने वाला आहार इस शरीर में रहता है तब तक ही यह शरीर है तब तक ही प्राण रहते है तबतक ही रुप रहता है, तबतक ही ज्ञान रहता है और तब तक ही विज्ञान रहता है । विना आहार के ये सब नष्ट हो जाते है ।


आहारसणे देहो देहेण तवो तवेण रय सडणं ।
रय णासेण य णाणं णाणे मुक्खो जिणोभणई ॥521॥

गाथार्थ: आहार ग्रहण करने से शरीर की स्थिति रहती है, शरीर की स्थिती रहने से तपश्चरण होता है, तपश्चरण से ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्मों का नाश होता है, ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्मों के नाश होने से ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान की प्राप्ति होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा भगवान् जिनेंद्रदेव ने कहा है ।


चउविहदाणं उत्तं जे तं सयलमवि होइ इह दिण्णं ।
सविसेसं दिण्णेणय इक्केणाहारदाणेण ॥522॥

गाथार्थ: जो पुरुष विशेष रीति से एक आहार दान को ही देता है वह उस एक आहार दान से ही समस्त चारों दान दिये, ऐसा समझा जाता है ।


भुक्खा कय मरणभयं णांसइ जीवाण तेण तं अभयं ।
सो एव हणइ वाही उसहं फुडअत्थितेण आहारो ॥523॥

गाथार्थ: देखो भूख की पीडा अधिक होनें से मरने का भय होता है इसलिये आहार दान देने से अभयदान की भी प्राप्ति होती है । तथा भूख ही सबसे प्रबल व्याधि है । और वह आहार दान से नष्ट होती है । इसलिए आहार दान देने से ही औषध दान समझना चाहिये ।


523॥

आयाराई सत्थं आहारबलेण पढइ णिस्सेसं ।
तम्हा तं सुयदाणं दिण्णं आहारदाणेण ॥524॥

गाथार्थ: इस आहार के ही वलसे आचार आदि समस्त शास्त्रों का पठन पाठन होता है इसलिये एक आहार दान देने से ही शास्त्र दान का भी फल मिल जाता है । इस प्रकार एक आहार दान से चारों के फल मिल जाते है ।


हय गयगो दाणाइं धरणीरय कणय आण दाणाइं ।
तित्ति ण कुणंति सया जह तित्ति कुणइ आहारो ॥525॥

गाथार्थ: घोडा हाथी और गायों का दान, पृथ्वी, रत्न, अन्न, वाहन आदि का दान देने से दान लेने वालों को उतनी तृप्ति नहीं होती जितनी तृप्ति सदाकाल आहार दान देने से होती है ।


जह रयणाण वइरं सेलेसु य उत्तमो जहा मेरू ।
तह दाणाणं पवरो आहारो होइ णायव्वो ॥526॥

गाथार्थ: जिस प्रकार समस्त रत्नों में वज्र रत्न उत्तम है, और समस्त पर्वतों में मेरु पर्वत उत्तम है उसी प्रकार समस्त दानों में आहादान सबसे उत्तम है ऐसा समझना चाहिये ।


सो दायव्वो पत्ते विहाण जुत्तेण सा विही एसा ।
पडिगह मुच्चट्ठाणं पादोदय अच्चणं पणामं च ॥527॥

गाथार्थ: वह आहार दान पात्र को ही देना चाहिये और विधिपूर्वक ही देना चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है ! प्रतिग्रह उच्चस्थान, पादोदक, अर्चन, प्रणाम, मन शुद्धि, बचन शुद्धि काय और आहार शुद्धि इस प्रकार नवधा (नौ प्रकार) भक्ति पूर्वक आहार देना चाहिये ।
जब मुनि अपने समय पर वा श्रावकों के घर भोजन बन जाने के समय पर चर्या के लिये निकलते है तब वे प्रायः श्रावकों के घर के सामने होकर निकलते है । जिससमय मुनि अपने घर के सामने आवें उस समय श्रावक को कहना चाहिये कि हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु तिष्ठ तिष्ठ
आहार जलं शुद्धं वर्तते अर्थात् हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु इस प्रकार तीनवार हाथ जोडकर मस्तक झुकाकर नमस्कार करना चाहिये कि महाराज यहां ठहरिये ठहरिये आहार जल शुद्ध है । इतना कहने पर जब वे खडे होजांय तो तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिये और फिर कहना चाहिये कि महाराज घर पधारिये । इतना कहकर उस श्रावक को आगे चलना चाहिये । इसको प्रतिग्रह कहते है । घर जाकर उनको किसी ऊंचे स्थान पर पाटा या कुरसी पर बिठाना चाहिये । महाराज इस पर विराजो ऐसा कहकर बिठाना चाहिये । इसको उच्चस्थान कहते है । तदनंदतर प्रासुक गर्म जल से किसी थाली में उनके पैर धोने चाहिये और चरणोदक को मस्तक पर एक अर्घ्य देकर उन मुनि की पूजा करनी चाहिये इसको अर्चन कहते है । इसके अनन्तर कहना चाहिये कि महाराज मेरा मन शुद्ध है वचन शुद्ध है शरीर शुद्ध है और आहार शुद्ध है । आप चौका में पधारिये । इतने कहने पर वे चौका में चले जाते है । मुनि खडे होकर आहार लेते है इसलिये उनको खडे होने के लिए एक पाटा बिछा रखना चाहिये जो हिले नहीं तथा उसके सामने किसी छोटी सी ऊंची चौकी पर या छोटी मेजपर एक बडा भगोना या तसला रखाना चाहिये जिसमे थोडी सूखी घास रक्खी हो यदि आहार लेते समय हाथ से पानी गिरे तो उसी में गिरे और घास रखने से इधर उधर छींटे नहीं जाते यह नवधा भक्ति है और यथा योग्य सब ही पात्रों के लिये होती है ।


मणवयण कायसुद्धी एसणसुद्धी य परम कायव्वा ।
होइ फुडं आयरणं णवव्विहं पुव्व कम्मेण ॥528॥

गाथार्थ: वह आहार दान पात्र को ही देना चाहिये और विधिपूर्वक ही देना चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है ! प्रतिग्रह उच्चस्थान, पादोदक, अर्चन, प्रणाम, मन शुद्धि, बचन शुद्धि काय और आहार शुद्धि इस प्रकार नवधा (नौ प्रकार) भक्ति पूर्वक आहार देना चाहिये ।
जब मुनि अपने समय पर वा श्रावकों के घर भोजन बन जाने के समय पर चर्या के लिये निकलते है तब वे प्रायः श्रावकों के घर के सामने होकर निकलते है । जिससमय मुनि अपने घर के सामने आवें उस समय श्रावक को कहना चाहिये कि हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु तिष्ठ तिष्ठ
आहार जलं शुद्धं वर्तते अर्थात् हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु इस प्रकार तीनवार हाथ जोडकर मस्तक झुकाकर नमस्कार करना चाहिये कि महाराज यहां ठहरिये ठहरिये आहार जल शुद्ध है । इतना कहने पर जब वे खडे होजांय तो तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिये और फिर कहना चाहिये कि महाराज घर पधारिये । इतना कहकर उस श्रावक को आगे चलना चाहिये । इसको प्रतिग्रह कहते है । घर जाकर उनको किसी ऊंचे स्थान पर पाटा या कुरसीं पर बिठाना चाहिये । महाराज इस पर विराजो ऐसा कहकर बिठाना चाहिये । इसको उच्चस्थान कहते है । तदनंदतर प्रासुक गर्म जल से किसी थाली में उनके पैर धोने चाहिये और चरणोदक को मस्तक पर एक अर्घ्य देकर उन मुनि की पूजा करनी चाहिये इसको अर्चन कहते है । इसके अनन्तर कहना चाहिये कि महाराज मेरा मन शुद्ध है वचन शुद्ध है शरीर शुद्ध है और आहार शुद्ध है । आप चौका में पधारिये । इतने कहने पर वे चौका में चले जाते है । मुनि खडे होकर आहार लेते है इसलिये उनको खडे होने के लिए एक पाटा बिछा रखना चाहिये जो हिले नहीं तथा उसके सामने किसी छोटी सी ऊंची चौकी पर या छोटी मेजपर एक बडा भगोना या तसला रखाना चाहिये जिसमे थोडी सूखी घास रक्खी हो यदि आहार लेते समय हाथ से पानी गिरे तो उसी में गिरे और घास रखने से इधर उधर छींटे नहीं जाते यह नवधा भक्ति है और यथा योग्य सब ही पात्रों के लिये होती है ।


एवं विहिणा जुत्तं देयं दाणं तिसुद्ध भत्तीए ।
वज्जिय कुच्छियपत्तं तह य अपत्तं च णिस्सारं ॥529॥

गाथार्थ: इस प्रकार नवधा भक्ति पूर्वक तथा मन वचन काय की शुद्धता पूर्वक पात्रों को दान देना चाहिये, तथा कुत्सित पात्र वा कुपात्र और अपात्र इन दोनों का कभी दान नहीं देना चाहिये । क्योंकि इन दोनों को दान देना निःसार है ।


जं रयणत्तय रहियं मिच्छमय कहियधम्म अणुलग्गं ।
जइ विहु तवइ सुघोरं तहावितं कुच्छियं पत्तं ॥530॥

गाथार्थ: जो पुरुष रत्नत्रय से रहित है और मिथ्या मत मे कहे हुए धर्म मे लीन रहता है ऐसा पुरुष चाहे जितना घोर तपश्चहरण करे तथापि वह कुत्सित पात्र वा कुपात्र ही कहलाता है।


जस्स ण तवो ण चरणं ण चावि जस्सत्थि वर गुणो कोई ।
तं जाणेह अपत्तं अफलं दाणं कयं तस्स ॥531॥

गाथार्थ: जो न तो तपश्चरण करता है, न किसी प्रकार का चारित्र पालन करता है और न उसमें कोई अन्य श्रेष्ठ गुण है ऐसा पुरुष अपात्र कहलाता है ऐसे अपात्र को दान देना सर्वथा व्यर्थ है। उसका कोई फल नहीं होता है।


ऊसर खित्ते वीयं सुक्खे रुक्खे य णीर अहिसेओ ।
जह तह दाणमपत्ते दिण्णं खु णिरत्थयं होई ॥532॥

गाथार्थ: जिस प्रकार ऊसर पृथ्वीपर बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है और सूके हुए वृक्ष में पानी देना व्यर्थ जाता है उसी प्रकार अपात्र को दिया हुआ दान सर्वथा व्यर्थ जाता है ।


532॥

कुच्छिय पत्ते किंचि वि फलइ कुदेवेसु कुणरतिरिएसु ।
कुच्छिय भोयधरासु य लवणंवुहि कालउवहीसु ॥533॥

गाथार्थ: कुत्सित पात्रों को दिये हुए दान का कुत्सित ही फल मिलता है और वह उस कुपात्र दान के फलसे कुदेवों में उत्पन्न होता है, कुमनुष्यों में उत्पन्न होता है खोटे तिर्यंचों में उत्पन्न होता है और लवणोदधि तथा कालोदधि समुद्र में होने वाली कुभोग भूमियों में उत्पन्न होता है ।


लवणे अडयालीसा काल समद्दे य तित्तियाचे व ।
अंतरदीवा भणिया कुभोग भूमीय विक्खाया ॥534॥

गाथार्थ: लवणोदधि समुद्र में अडतालीस अंतर्द्वीप है और कालोदधि समुद्र में भी अडतालीस अंतर्द्वीप है । इस प्रकार इन छियानवें अंतर्द्वीपों मे कुभोग भूमियां है ।


534॥

उप्पज्जंति मणुस्सा कुपत्तदाणेण तत्थभूमीसु ।
जुवलेण गेहरहिया णाग्गा तरुमूलिणिवसंति ॥535॥

गाथार्थ: जो मनुष्य कुपात्रों को दान देता है वह मनुष्य इन कुभोग भूमियों मे मनुष्य होकर उत्पन्न होता है । वहां पर सब मनुष्य युगलिया (स्त्री पुरुष दोनों साथ साथ) उत्पन्न होते है, उनके रहने के लिये घर नहीं होते वृक्षों के नीचे रहा करते है और नग्न रहते है ।


535॥

पल्लोवम आउस्सा वत्थाहरणेहि वज्जिया णिच्चं ।
तरुपल्लव पुप्फरसं फलाण रसं चेव भक्खंति ॥536॥

गाथार्थ: इन मनुष्यों की आयु एक पल्य की होती है तथा ये लोग सदा काल वस्त्राभरण से रहित होते है और वृक्षों के पत्ते, फूलों का रस और फलों का रस भक्षण करते रहते है।


दीवे कहिं पि मणु या सक्कर गुड खंड सण्णिहा भूमी ।
भक्खंति पुट्ठि जणया अइसरसा पुव्व कम्मेण ॥537॥

गाथार्थ: किसी किसी द्वीप की भूमि गुड शक्कर और खांड के समान मीठी होती है, पौष्टिक होती है और अत्यन्त सरस होती है । इसलिये उन द्वीपों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य अपने पूर्व कर्म के उदय से उसी भूमि की मिट्टी को खाकर रहते है ।


केई गय सीह मुहा केई हरि महिस कवि कोल मुहा ।
केई आवरिस मुहा केई पुण एय पाया य ॥538॥

गाथार्थ: उन द्वीपों में रहने वाले मनुष्यों मे कितने ही मनुष्यों के मुख हाथी के मुख के समान होते है कितने मनुष्यों के मुख सिह के मुख के समान होते है, कितने ही भैंसा के से मुखवाले होते है कितने ही सूअर के से मुखवाले होते है और कितने ही मनुष्य बंदर के से मुख वाले होते है और कितने ही मनुष्य दर्पण के समान मुखवाले होते है । इसके सिवास कितने ही मनुष्य एक पैर वाले होते है । तथा -


ससमुक्कलि कण्णाविय कण्णद्यावरण दीह कण्णा य ।
लांगूलधरा अपरे अपरे मणुया अभासा य ॥539॥

गाथार्थ: उन मनुष्यों मे से कितने ही मनुष्य खरगोश केसे कान वाले होते है, कितने ही पूरी के से कान वाले होते है कितने ही मनुष्यों के चौडे कान होते है और कितने ही मनुष्यों के लम्बे कान होते है । इनके सिवाय कितने ही मनुष्यों के पूंछ होती है ओर कितने मनुष्य किसी भी प्रकार की भाषा नहीं बोलते ।


ए ए णरा पसिद्धा तिरिया वि हवंति कुभोय भूमीसु ।
मणुसुतर वाहिरेसु अ असंख दीवेसु ते होंति ॥540॥

गाथार्थ: इन सव कुभोग भूमियों में मनुष्य ही होते है, तथा इनके सिवाय मानुषोत्तर पर्वत के बाहर असंख्यात द्वीपों में होनें वाली कुभोग भूमियों तिर्यंच भी होते है ।


सव्वे मंद कसाया सव्वे णिस्सेस बाहि परिहीणा ।
मरिऊण विंतरा विहु जोइसु भवणेसु जायंति ॥541॥

गाथार्थ: ये सब मनुष्य और तिर्यन्च मंद कषायी होते है और सबके संपूर्ण व्याधियों से रहित होते है । वे सब मरकर कितने व्यंतर देवो में उत्पन्न होते है, और कितने ही ज्योतिषी और भवन वासी देवों में उत्पन्न होते है ।


तत्थ चुया पुण संता तिरियणरा पुण हवंति ते सव्वे ।
काऊण तत्थ पावं पुणोवि णिरयापहा होंति ॥542॥

गाथार्थ: कुपात्र दान देने वाले मनुष्य जो मरकर कुभोग भूमि में उत्पन्न होते है और वहां से आकर भवन वासी व्यंतर ज्योतिषियों में उत्पन्न होते है वहां की भी आयु पूर्णकर वे फिर मनुष्य वा तिर्यच होते है और वहां भी अनेक प्रकार के पापकर नरकमे जाकर पडते है ।


चंडालभिल्ल छिपिय डोंव य कल्लाल एव माईणि ।
दीसंति रिद्धि पत्ता कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥543॥

गाथार्थ: वर्तमान में जो चांडाल भील छीपी डोम कलाल आदि निम्न श्रेणी के लोग धन और विभूती आदि से परिपूर्ण दिखाई देते है वे सब कुत्सित पात्रों को दान देने से ही बनी होते है ।


केई पुण गय तुरया गेहेरायाण उण्णई पत्ता ।
दिस्सति मच्च लोए कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥544॥

गाथार्थ: इस मनुष्य लोक मे राजाओं के घर जो कितने ही हाथी घोडे आदि उन्नति को प्राप्त हुए दिखाई देते है बहुत सुखी दिखाई देते है वह सब कुपात्र दान देने का फल समझना चाहिये ।


केई पुण बिव लोए उववण्णा वाहणतणेण ते मणुया ।
सोसंति जाइ दुक्खं पिच्छिय रिद्धी सुदेवाणं ॥545॥

गाथार्थ: कुपात्रों को दान देने वालों मे से कितने ही मनुष्य स्वर्गलोक में भी उत्पन्न होते है परन्तु वहां पर वे वाहन रूपसे उत्पन्न होते है अन्य बडे देवों के वाहन बनकर रहते है । इसलिये वे बडे देवों की ऋद्धियों को देखकर अपनी वाहन रूप जाति के दुःख का शोक करते रहते है ।


णाऊण तस्स दोसं सम्माणह मा कया विसविणम्मि ।
परिहरह सया दूरं वुहियाण वि सविस सप्पं व ॥546॥

गाथार्थ: कुपात्रों को दान देने में अनेक प्रकार के दोष होते है उन सबको समझकर स्वप्न में भी उनका सन्मान नहीं करना चाहिये, तथा कभा किसी अवस्था में भी उनका सन्मान नहीं करना चाहिये । विषधर सर्प के समान कुपात्रों का त्याग तो दूर से ही कर देना चाहिये ।


पत्थर मया वि दोणी पत्थर मप्पाणयं च बोलेई ।
जह तह कुच्छिय पत्तं संसारे चेव बोलेई ॥547॥

गाथार्थ: जिस प्रकार पत्थर की वनी हुई और पत्थरों से भरो हुई नाव उन पत्थरों कों भी डुबो देती है और स्वयं भी डूब जाती है उसी प्रकार कुपात्र भी संसार समुद्र में डूब जाता है और दूसरों को भी डुबा देता है ।


णावा जह सच्छिद्दा परमप्पाणं च उवहि सलिलम्मि ।
बो लेइ तह कुपत्तं संसारमहोवही भीमे ॥548॥

गाथार्थ: जिस प्रकार छिद्र सहित नाव समुद्र के जल मे अपने आप डूब जाती है उसी प्रकार कुपात्र भी इस संसार रूपी भयानक महा समुद्र मे अपने आप डूब जाता है ।


लोहमए कुतरंडे लग्गो पुरिसो हु तारिणी वाहे ।
वुड्ढइ जह तह वुड्ढइ कुपत्त सम्माणओ पुरिसो ॥549॥

गाथार्थ: जिस प्रकार लोहे की बनी नाव में अवश्य डूब जाता है उसी प्रकार कुपात्रों का सन्मान करने वाला पुरुष भी इस संसार रूपी समुद्र मे अवश्य डूबता है।


णलहंति फलं गरुयं कुच्छिय पहुवित्त सेविया पुरिसा ।
जह तह कुच्छिय पत्ते दिण्णा दाणा मुणेयव्वा ॥550॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी कुत्सित स्वामी के आश्रित रहने वाले सेवक पुरुष को उसकी सेवा का अच्छा श्रेष्ठ फल नहीं मिलता उसी प्रकार कुत्सित पात्रों को दिया हुआ दान समझना चाहिये ।


णत्थि वय सील संजम झाणं तव नियम वंभचेरं व ।
एमेव भणइ पत्तं अप्पाणं लोय मज्झम्मि ॥551॥

गाथार्थ: जो न तो व्रतों को पालन करते है न शीलों को पालन करते है, जिनके न संयम है न ध्यान है जो न किसी प्रकार का तपश्चकरते हैं न किसी नियम का पालन करते है और न ब्रह्मचर्य का पालन करते है ऐसे लोग भी इस लोक मे अपने को पात्र कहते है ।


मय कोह लोह गहिओ उड्डिय हत्थोय जायणा सीलो ।
गिह वावारासत्तो जो सो पत्तो कहं हवइ ॥552॥

गाथार्थ: भला विचार करने की बात है कि जो झूठमूठ ही अपने वडप्पन का अभिमान करते है जो क्रोधी है लोभी है हाथ उठाकर सर्वत्र मागते मांगते फिरते है और जो गृहस्थी के व्यापार मे सदा लगे रहते है ऐसे लोग पात्र कैसे हो सकते है अर्थात् कभी नहीं हो सकते ।


हिंसाइदोस जुत्तो अत्तरउद्देहिं गमिय अहरत्तो ।
क्रय विक्किय वट्टंतो इंदिय विसएसु लोहिल्लो ॥553॥

गाथार्थ: जो पुरुष हिंपा झूठ चोरी आदि पापों मे लगा रहता है, रातदिन आर्तध्यान अथवा रौद्र ध्यान में लगा रहता है, संसार भर के सामानों को खरीदने और बेचने में लगा रहता है, और इद्रियों के विषयों मे अत्यन्त लोलुपता धारण करता है, इसके सिवाय जो उत्तम पात्रों की सदा निन्दा करता रहता है और गुरुओं के स्थान मे अपनी आत्मा को नियुक्त करता है अर्थात् अपने आप स्वयं गुरु बन बैठता है। इस प्रकार जो अपने ही पापों से अपने को गुरु मानता है वह मनुष्य नरक निगोद रूपी कुगतियों के समुद्र में अवश्य डूब जाता है।


उत्तम पत्तं णिंदिय गुरुठाणे अप्पयं पकुव्वंतो ।
होउ पावेण गुरू वुड्डइ पुण कुगइ उवहिम्मि ॥554॥

गाथार्थ: जो पुरुष हिंसा झूठ चोरी आदि पापों मे लगा रहता है, रातदिन आर्तध्यान अथवा रौद्र ध्यान में लगा रहता है, संसार भर के सामानों को खरीदने और बेचने में लगा रहता है, और इद्रियों के विषयों मे अत्यन्त लोलुपता धारण करता है, इसके सिवाय जो उत्तम पात्रों की सदा निन्दा करता रहता है और गुरुओं के स्थान मे अपनी आत्मा को नियुक्त करता है अर्थात् अपने आप स्वयं गुरु बन बैठता है। इस प्रकार जो अपने ही पापों से अपने को गुरु मानता है वह मनुष्य नरक निगोद रूपी कुगतियों के समुद्र में अवश्य डूब जाता है।


जो बोलइ अप्पाणं संसार महण्णवम्मि ।
सो अण्णं कह तारइ तस्सणुमग्गे जणे लग्गं ॥555॥

गाथार्थ: इस प्रकार अपने को गुरु मानने वाला पुरुष इस संसार रूपी महा भयानक समुद्र में अपने आत्मा को डुबा देता है। वह मिथ्या गुरु उस मिथ्या गुरु के पीछे पीछे लगे हुए मनुष्य को भला पार कैसे कर सकता है अर्थात् ऐसे गुरु के पीछे जो मनुष्य लगता है वह भी उसके साथ साथ अवश्य डूबता है।


555॥

एवं पत्तविसेसं णाऊणं देह दाणमणवरयं ।
णिय जीव सग्गमोक्खं इच्छयमो पयत्तेण ॥556॥

गाथार्थ: जो पुरुष अपने आत्मा को स्वर्ग मोक्ष में पहुँचाना चाहते है उनको चाहिये कि वे ऊपर लिये अनुसार पात्र अपात्रों के भेदों को अच्छी तरह समझ कर प्रयत्न पूर्वक सदाकाल उत्तम पात्रों को दान देते रहे।


लहिऊण संपया जो देइणदाणाइं मोह संछण्णो ।
सो अप्पाणं अप्पे बंचेइ य णत्थि संदेहो ॥557॥

गाथार्थ: जो पुरुष धन संपदा पाकर भी उसमे अत्यन्त मोह करता है और पात्रों को भी जान नहीं देता वह अपने ही आत्मा के द्वारा अपने ही आत्मा को ठगता है इसमे किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।


णय देइ णेय भुंजइ अत्थं णिखणेइ लोहसंछण्णो ।
सो तणकय पुरिसो इव रक्खइ सस्सं परस्सत्थे ॥558॥

गाथार्थ: जो धनी पुरुष न तो किसी को दान देता है न अपने भोगोपभोगों मे धन को लगाता है केवल तीव्र लोभ में पडकर उसकी रक्षा करता रहता है वह पुरुष घास-फुस के बने हुए पुरुषाकार पुतले के समान केवल दूसरों के लिये खेतों की रक्षा करता है ।


किविणेण संचयधणं ण होइ उवयारियं जहा तस्स ।
महुयरि इव संचियमहु हरंति अण्णे सपाणेंहि ॥559॥

गाथार्थ: जिस प्रकार मधुमक्खी अपने छत्ते मे मधु वा शहद को इकठ्ठा करती है परन्तु वह स्वयं उसका उपभोग नहीं करती । इसलिये दूसरे मनुष्य आकर उस छत्ते को तोडकर उसका इकठ्ठा किया हुआ शहद भी ले जाते है और सैंकडों हजारों मक्खियों को मार भी जाते है इसी प्रकार जो कृपण मनुष्य केवल धन को इकठ्ठा करता रहता है उसका धन उसके काम में कभी नहीं आता । वह दूसरे के ही काम आता है ।


कस्स थिरा इह लच्छि कस्स थिरं जुव्वणं धणं जीवं ।
इय मुणिऊण सुपुरिसा दिंति सुपत्तेसु दाणाइं ॥560॥

गाथार्थ: इस संसार मे लक्ष्मी किसके यहां स्थिर रही है, यौवन किसका स्थिर रहा है, धन किसका स्थिर रहा है और अर्थात् लक्ष्मी यौवन धन जीवन कभी किसी का स्थिर नहीं रहता । यही समझकर श्रेष्ठ पुरुषों को श्रेष्ठ पात्रों को सदा काल दान देते रहना चाहिये ।


दुक्खेण लहइ वित्तं वित्ते लद्धे वि दुल्लहं चित्तं ।
लद्धे चित्ते वित्ते सुदुल्लहो पत्तलंभो व ॥561॥

गाथार्थ: इस संसार मे धन की प्राप्ति बडे दुःख से होती है यदि कदाचित किसी भाग्य विशेष से धन की प्राप्ति हो भी जाय तो चित्त मे दान देने की उत्सुकता होना अत्यन्त कठीन है । कदाचित चित्त में दान देने की उत्सुकता भी प्राप्त हो जाय और धन भी प्राप्त हो जाय तो दान देने के लिये किसी पात्रका लाभ होना अत्यन्त कठीन है ।


चित्त वित्तं पत्तं तिडिअ वि पावेइ कहवि जइ पुरिसो ।
तोर लहइ अनुकूलं सयनं पुत्तं कलतं च ॥562॥

गाथार्थ: यदि किसी शुभ कर्म के उदय से धन भी मिल जाय, चित्तमें दान देने की उत्सुकता भी प्राप्त हो जाय और पात्र मिलने का भी संयोग प्राप्त हो जाय तो दान देने के लिये अपने स्वजन परिजन पुत्र स्त्री आदि अपनें अनुकूल नही होते है ।


पडिकूल माइ काऊं विग्ध कुव्वंति धम्म दाणस्स ।
उवएसंति पुबुद्धि दुग्गइगम कारया असुहा ॥563॥

गाथार्थ: यदि स्त्री पुत्र स्वजन आदि अपने प्रतिकूल हो जाते है तो फिर वे लोग धर्मस्थानों मे दान देने मे विघ्न करते है। तथा नरकादिक दुर्गतियों के कारण भूत और अत्यन्त अशुभ दुर्बुद्धि का उपदेश देते है।


सो कह सयणो भण्णइ विग्घं जो कुणइ धम्मदाणस्स ।
दाऊण पाव बुद्धी हाडइ दुक्खायरे णरए ॥564॥

गाथार्थ: विचार करने की बात है कि स्वजन होकर भी जो धर्म कार्यों में दिये हुए दान का निषेध करता है और पाप रुप बुद्धि का उपदेश देकर अनेक दुःखों से भरे हुए नरक में डालना चाहता है वह अपना स्वजन कैसे हो सकता है ।


सो सयणो सो बंधू सो मित्तो जो सहिज्जओ धम्मे ।
जो धम्म विग्घयारी सो सत्तू णत्थि संदेहो ॥565॥

गाथार्थ: इस संसार में जो पुरुष अपने धर्म का पालन करनें मे सहायक होता है उसीको स्वजन समझना चाहिये उसीको बन्धु समझना चाहिये और उसीको मित्र समझना चाहिये । जो पुरुष धर्मकार्यों में विघ्न करता है धर्म पालन करने मे विघ्न करता है वह पुरुष शत्रु ही है इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।


ते धण्णा लोयत तेहिं णिरुद्धाइं कुगई गमणाणि ।
वित्त पत्तं चित्तं पाविवि जहि दिण्ण दाणाइं ॥566॥

गाथार्थ: जिन पुरुषों को यथेष्ट धन का प्राप्ति हुई है चित्तमे दान दान देने की बुद्धि प्राप्त हुई है और सुपात्रों का लाभ भी प्राप्त हुआ है । इन तीनो संयोगो को पाकर जो सुपात्रों को दान देते रहते है वे पुरूष तीनो लोकों में धन्य समझे जाते है और ऐसे ही नरकादिक दुर्गतियों को सदा के लिये रोक देते है ।


मुणिभोयणेण दव्वं जस्स गयं जुव्वणं च तवयरणे ।
सण्णासेण य जीवं जस्स गयं किं गयं तस्स ॥567॥

गाथार्थ: जिस महापुरूष का धन मुनियों के भोजन कराने मे चला गया जिसकी युवावस्था तपश्चरण करने में चली गई और जिसका जीव सन्यास ( समाधिमरण ) धारण कर चला गया उसका क्या गया ? अर्थात् उसका तो कुछ भी नही गया ।


जह जह वड्ढइ लच्छी तह तह दाणाइं देह पत्तेसु ।
अहवा हीयइ जह जह देह विसेसेण तह तह यं ॥568॥

गाथार्थ: इसलिये श्रावकों का उचित है कि यह धन जितना जितना बढता जाय उतना उतना हीं सुपात्रों को अधिक दान देता जाय । यदि कदाचित धन घटता जाय तो जितना जितना घटता जाय उतना उतना ही विशेष रूपसे अधिक दान देता जाय ।


जेहि ण दिण्णं दाणं ण चावि पुज्जा किया जिणिंदस्स ।
ते हीणदीण दुग्गय भिक्खंण लहंति जायंता ॥569॥

गाथार्थ: जो पुरुष न तो कभी भगवान् जिनेन्द्र देव की पूजा करते है और न कभी सुपात्रों को दान देते है वे पुरुष अत्यन्त दीन हीन हो जाते है उनकी अवस्था अत्यन्त दुर्गति रूप में परिणत हो जाती है और मांगने पर भी उनको भीख नहीं मिलती ।


पर पेसणाइ णिच्च करंति भतीए लह य णिय देहं ।
पूरंति ण णियय घरे परवस गासेण जीवंति ॥570॥

गाथार्थ: जिन जीवों ने कभी जिनेन्द्रदेव की पूजन नहीं की है और न कभी पात्रों को दान दिया है ऐसे जीव भक्ति पूर्वक दूसरों का अन्न पीस पीस कर अपना पेट भरते है । तो भी उनको पेट भरने योग्य अन्न अपने घर में नहीं मिलता है । वे पर वश होकर दूसरों के अन्न के टुकडों से ही जीवित रहते है


खंधेण वहंति णरं गासत्थं दीह पंथ समसंता ।
तं चेव विण्णवंता मुहकय कर विणय संजुत्ता ॥571॥

गाथार्थ: जो पुरुष जिन पूजा और पात्र दान नहीं करते वे जीव परलोक में जाकर अन्न के टुकडों के लिए मनुष्यों को अपने कंधों पर रहकर (पालकी डोली पीनस आदि मे बिठाकर) बहुत दूर दूर तक ले जाते है तथा अपने मुख की दीन आकृति बनाकर और हाथ जोडकर उसकी बहुत बडी विनय करते जाते है ।


पहु तुम्ह समं जायं कोमल अंण्णाइ सुट्ठु, सुहियाइं ।
हय मुह पियाइं काऊं मलंति पाया सहत्थेहिं ॥572॥

गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न करने वाले पुरुष परलोक मे अपने हाथ से दूसरों के पैर दाबते फिरते है और मुंह से बडे मधुर शद्बों के द्वारा प्रिय शद्बों के द्वारा कहते जाते है कि हे प्रभो आपके शरीर के अंग बडे ही कोमल है, बडे ही श्रेष्ठ है और बहुत ही सुन्दर है।


रक्खंति गोगवाइं छेलयखर तुरय छेत खलिहाणं ।
वुण्णंति कप्प डाइं घडंति पिडउल्लयाइं च ॥573॥

गाथार्थ: दान पूजा न करने वाले पुरुष परभव में गाय भैंस बकरी गधा घोडा खेत खलिहान आदि की रखवाली करते रहते है और कितने ही लोग खाट पीढी आदि बढई के छोटे छोटे काम किया करते है ।


धावंति सत्थहत्था उण्हं च गणंति तह य सीयाइं ।
तुरय मुह फेण सित्ता रयलित्ता गलियपासेसा ॥574॥

गाथार्थ: दान पूजा न करने वाले कितने ही जीव हाथमे शस्त्र लेकर दौडते है राजा महाराजाओं की सवारी के आगे आगे दौडते है उस समय न तो वे धूप वा गर्मी को गिनते है और न शीत वा ठंडक को गिनते है । उस समय उनका शरीर घोडों के मुख से निकलते हुए फेन से भर जाता है, धूल उनके शरीर पर लिपट जाती है और पसीने की धार बंध जाती है ।


पिच्छिय पर महिलाओ घणथण मय णयण चंद वयणाइं ।
ताडेइ णियंसीसं झूरइ हिययम्मि दीण मुहो ॥575॥

गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न देने वाले पुरुष परभव में जाकर इतने दीन दुखी होते है कि वे लोग जिनके स्तन अत्यन्त कठिन है जिनके नेत्रों मे मद छाया हुआ है और चन्द्रमा के समान जिनका सुन्दर मुख है ऐसी पर स्त्रियों को देखकर अपने मस्तक को धुना करते है और दीन मुख होकर अपने हृदय में रोया करते है । इसके सिवाय दूसरों की संपत्ति को देखकर वें लोग रो रो कर कहते है कि हाय हाय क्या हमनें पहले भव में उत्तम भक्ति पूर्वक उत्तम पात्रों को दान नही दिया था । यदि पहले भव में हमने भी पात्र दान दिया होता तो हमे भी ऐसी संपत्तियां अवश्य प्राप्त होती ।


पर संपया णिएऊं पमणइ हा किं मया ण दिण्णाइं ।
दाणाइं पर पत्ते उत्तमम भत्ती य जुत्तण ॥576॥

गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न देने वाले पुरुष परभव में जाकर इतने दीन दुखी होते है कि वे लोग जिनके स्तन अत्यन्त कठिन है जिनके नेत्रों मे मद छाया हुआ है और चन्द्रमा के समान जिनका सुन्दर मुख है ऐसी पर स्त्रियों को देखकर अपने मस्तक को धुना करते है और दीन मुख होकर अपने हृदय में रोया करते है । इसके सिवाय दूसरों की संपत्ति को देखकर वें लोग रो रो कर कहते है कि हाय हाय क्या हमनें पहले भव में उत्तम भक्ति पूर्वक उत्तम पात्रों को दान नही दिया था । यदि पहले भव में हमने भी पात्र दान दिया होता तो हमे भी ऐसी संपत्तियां अवश्य प्राप्त होती ।


एवं णाऊण फुडं लोहो उवसानिऊण णियचित्ते ।
णिय वित्ताणुस्सारं दिज्जइ दाणं सुपत्तेसु ॥577॥

गाथार्थ: इस प्रकार पात्र दान के फल को जानकर और पात्र दान न देने के फल को जानकर अपनें हृदय मे लोभ को दबाना चाहिये, लोभ नहीं करना चाहिये और अपने धन संपत्ति के अनुसार सुपात्रों को अवश्य दान देना चाहिये ।


जं उप्पज्जइ दव्वं तं कायव्वं च बुद्धिवंत्तेण ।
छहृणायगयं सव्वं पढमो भावो हि धम्मस्स ॥578॥

गाथार्थ: बुद्धिमान् गृहस्थों को उचित है कि वे जितना धन उत्पन्न करें उसके छह भाग करें । उसमे से पहला भाग धर्म के लिये निकाल दे ।


बीओ भावो गेहे दायव्वो कुडंव पोसणत्थेण ।
तइओ भावो भोए चउत्थओ सयण वग्गम्मि ॥579॥

गाथार्थ: दूसरा भाग अपने कुटुम्ब के भरण पोषण के लिये अपने घर वालों को देना चाहिये । तीसरा भाग अपनें भोगों के लिये रखना चाहिये और चौथा भाग अपनें स्वजन परिवार आदि के लिये रखना चाहिये ।


सेसा जे वे भावा ठायव्वा होंति ते वि पुरिसेण ।
पूज्जा महिमा कज्जे अहवा कालावकालस्स ॥580॥

गाथार्थ: इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार चार भाग तो काममे लाने चाहिये । और शेष बचे हुए दो भाग उस पुरुष को जमा रखना चाहिये वे बचे हुए दोनों भाग भगवान् जिनेंद्रदेव की विशेष पूजा करने में लगाना चाहिये अथवा किसी प्रभावना के कार्य में धर्म की महिमा वढाने के कार्य मे लगाना चाहिये । अथवा वे बचे हुए दोनों भाग किसी आपत्ती काल के लिये रख छोडना चाहिये ।


अहवा णियं विढत्तं कस्स वि मा देहि होइ लोहिल्लो ।
सो को थि कुण उवाऊ जह तं दव्वं समं जाइ ॥581॥

गाथार्थ: अथवा प्रत्येक गृहस्थ को अपना द्रव्य किसी को भी नहीं देना चाहिये और अत्यंत लोभी बनकर कोई भी ऐसा उपाय करना चाहिये जिसमे कि वह द्रव्य मरने के बाद भी अपने साथ चला चले ।


तं दव्वं जाइ समं जं खीणं पुज्ज महिम दाणेंहि ।
जं पुण धरा णिहत्ते णठ्टे त्ते जाणि णियमेण ॥582॥

गाथार्थ: जो द्रव्य भगवान् जिनेन्द्रदेवकी पूजा में खर्च होता है, जो द्रव्य धर्म की महिमा बढाने में, धर्म की प्रभावना करनें मे खर्च होता है और जो द्रव्य पात्र-दान में खर्च होता है वही द्रव्य परलोक मे अपने साथ जाता है। तथा जो द्रव्य पृथ्वी मे गाढ कर रख दिया जाता है। उसको नियम पूर्वक नष्ट हुआ समझो।


सइ ठाणाओ मुल्लह अहवा भूसेहि णिज्जए तं पि ।
अह भाओ अह पुत्तो चोरो तं लेई अह राओ ॥583॥

गाथार्थ: जो पुरुष पृथ्वी मे धन गाढ कर रखता है वह या तो स्वयं उस स्थान को भूल जाता है अथवा चुहे उस द्रव्य को लेकर दूसरे स्थान पर रख देते है, अथवा उसे भाई बन्धु ले जाते है अथवा पुत्र ले जाता वा चोर ले जाते है और इनसे भी बच रहता है तो उसे राजा ले लेता है ।


अहवा तरुणी महिला जायइ अण्णेण जार पुरिसेण ।
सह तं गिण्हिय दव्वं अण्णं देसंतर दुठ्ठा ॥584॥

गाथार्थ: अथवा अपनी दुष्ट तरुण स्त्री उस समस्त द्रव्य को लेकर किसी अन्य जार पुरुष के साथ दूर देशांतर को भाग जाती है । इस प्रकार अनेक प्रकार से वह गडा हुआ धन नष्ट हो जाता है ।


इय जाणिऊण णूणं देह सुपत्तेसु चहुविहं दाणं ।
जह कय पावेण सया मुच्चेह लिप्पेद् सुपुण्णेण ॥585॥

गाथार्थ: इस प्रकार निश्चय रीति से समझ कर सुपात्रों के लिये चारों प्रकार का दान देना चाहिये । जिपसे कि किये हुए पापों का नाश हो जाय और श्रेष्ठ पुण्य का उपार्जन हो ।


पुण्णेण कुलं विउलं कित्ती पुण्णेण भमइ तियलोए ।
पुण्णेण रूपमतुलं सोहागं जोवणं तेयं ॥586॥

गाथार्थ: इस संसार में पुण्य के उदय से उत्तम कुल की और बहुत से कुटुम्ब की प्राप्ति होती है, पुण्य के ही उदय से इस मनुष्य की कीर्ति तीनों लोकों में फैल जाती है पुण्य से ही सर्वोत्तम उपमा रहित रूप प्राप्ति होती है, पुण्य से ही सुहाग की प्राप्ति होती है पुण्य से ही युवावस्था प्राप्त होती है और पुण्य से ही तेज की प्राप्ति होती है ।


पुण्णवलेणुब वज्जइ कहयवि पुरिसो य भोय भूमीसु ।
भुंजेइ तत्थभोए दह कप्पतरुब्भवे हिव्वे ॥587॥

गाथार्थ: पुण्य कर्म के उदय से ही यह जीव किसी प्रकार भोग भूमि में भी उत्तम पुरुष उत्पन्न होता है और वहां पर दश प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न हुए दिव्य भोगों का अनुभव करता है ।


गिह तरुवर बरगेहे भोयण रुक्खाय भोयणे सरिसे ।
कणयमय भायणाणिय भायण रुक्खा पयच्छन्ति ॥588॥

गाथार्थ: वहां पर दश प्रकार के कल्पवृक्ष है। उनमें से गृह जाति के कल्पवृक्ष उत्तम उत्तम घर देते है भोजन जाति के वृक्ष सरस भोजन देते है और भाजन जाति के वृक्ष सुवर्णमय पात्र वा बर्तन देते है।


वत्थंगा वर वेत्थे कुसुमंगा दिंति कुसुम मालाये ।
दिंति सुयंध विलेवण विलेवणंगा महारुक्खा ॥589॥

गाथार्थ: वस्त्रांग जाति के वृक्ष अनेक प्रकार के सुन्दर वस्त्र देते है पुष्यांग जाति के वृक्ष पुष्प वा पुष्पो की मालाएं देते है और विलेपनांग जाति के वृक्ष सुगंधित विलेपन उवटन आदि देते है ।


तूरंगा बर तूरे मज्जंगादिंति सरस मज्जाइं ।
आहारणंगा दिंतिय आहरणे कणममणि जडिए ॥590॥

गाथार्थ: वाद्यंग जाति के वृक्ष तुरई आदि अनेक प्रकार के बाजे देते है, मद्यांग जाति के वृक्ष सरस पौष्टिक मद्य ( एक प्रकार का रस जो केवल पौष्टिक होता है ) देते है और आभरणांग जाति के वृक्ष अनेक प्रकार के मणियों से जडे हुए सुवर्णमय आभूषण देते है ।


दयणिदिणं ससि सूरा जह तह दीवंति जोइसारुक्खा ।
पायव दसप्पयारा चिंतिययं दिंति मणुयाणं ॥591॥

गाथार्थ: ज्योतिष जाति के वृक्ष सूर्य चन्द्रमा के समान रात दिन प्रकाश करते रहते है । इस प्रकार भोगभूमियों मे दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते है जो मनुष्यों को चितवन करने मात्र से अपनी इच्छानुसार पदार्थ देते है ।


जरसोय वाहि वेअण कासं सासं च जिंभणं छिक्का ।
ए ए अण्णे दोसा णहवंति हु भोय भूमीसू ॥592॥

गाथार्थ: बुढापा, व्याधि, वेदना, काम, श्वास, जंभाई, छींक आदि कितने ही दोष भोग भूमियों में नहीं होते है ।


सव्वे भोए दिव्वे भुंजित्ता आउसाव साणम्मि ।
सम्मादिट्ठी मणुया कप्पा वासेसु जायंति ॥593॥

गाथार्थ: इन भोग भूमियों मे जो सम्यग्दृष्टि पुरुष उत्पन्न होते है वे सब दीर्घ काल तक वहां के दिव्य भोगों को भोगते रहते है और फिर आयु पूर्ण होने पर वे लोग मर कर कल्प वासी देव होते है ।


जे पुणु मिच्छादिट्ठी विंतर भवने सुजोइसाहोंति ।
जम्हा मंद कसाया तम्हा देवेसु जायंति ॥594॥

गाथार्थ: जो इन भोग भूमियों मे मिथ्या दृष्टि पुरुष उत्पन्न होते है वे वहां के भोगों को भोग कर आयु के अन्त मे भवन वासी व्यन्तर वा दयोतिष्क देवों में उत्पन्न होते है। भोग भूमियों में उत्पन्न होने वाले जीव सब मंद कषाय वाले होते है इसलिये वे मर कर देव ही होते है।


केई समवसरणगया जोइस भावेण सुवितरा देवा ।
कहिऊण सम्मदंसण तत्थ चुया हुंति वा पुरिसा ॥595॥

गाथार्थ: उन भवन वासी व्यन्तर ज्योतिषी देवों में से कितने ही देव भगवान् के समव सरण मे जाकर सम्यग्दर्शन को ग्रहण कर लेते है और फिर वहां से आयु पूर्ण होने पर उत्तम मनुष्य होते है ।


लहिऊण देस संजम सयल वा होइ सुरोत्तमो सरगे ।
भोत्तूण सुहे रम्मे पुणोवि अवयरइ मणुयत्ते ॥596॥

गाथार्थ: मनुष्य होकर वे जीव देश संयम धारण करते है अथवा सकल संयम धारण कर स्वर्गों में उत्तम देव होते होने है । वहां पर वे मनोहर सुखों का अनुभव कर आयु के अन्त में फिर भी मनुष्य भव धारण करते है ।


तत्थवि सुहाइं भुत्तं दिक्खा गहिऊण भविय णिग्गंथो ।
सुक्कज्झाणं पाविय कम्म हणिऊण सिज्झेई ॥597॥

गाथार्थ: उस मनुष्य भव मे भी अनेक प्रकार के सुखों का अनुभव करता हे । तदनन्तर दीक्षा धारण कर निर्गथ अवस्था धारण करता है तथा शुक्ल ध्यान को धारण कर समस्त कर्मों का नाश करता है और अन्त में सिद्ध प्राप्त कर लेता है ।


सिद्धंसरूवरूवं कम्म रहियं च होइ झाणेण ।
सिद्धावासी य णरो ण हवइ संसारिओ जीवो ॥598॥

गाथार्थ: सिद्धों का स्वरूप शुद्ध आत्मस्वरूप होता है तथा शुक्ल ध्यान के द्वारा समस्त कर्मों से रहित हो जाता है । सिद्धस्थान मे रहने वाले समस्त सिद्ध परमेष्ठी जीव फिर कभी भी संसार नहीं आते है ।


पंचमयं गुणठाणं एथ कहिय मया समासेण ।
एत्तो उड्ढं वोच्छं पमत्तविरयं तु छमयं ॥599॥

गाथार्थ: इस प्रकार मैंने अत्यंत संक्षेप से पांचवे गुण स्थान का स्वरूप कहा । अव इस के आगे प्रमत्तविरत नाम के छठे गुणस्थान का स्वरूप कहता हूँ ।

प्रमत्त संयत से अयोग केवली गुणस्थान, अन्तिम मंगल, भावसंग्रह पढ़ने का फल, प्रशस्ति (गाथा 600 से 701)

इत्थेव तिण्णि भावा खय उव समाइ होंति गुणठाणे ।
पणदह हुंति पमाया पमत्त विरओ हवे तम्हा ॥600॥

गाथार्थ: इस प्रमत्त विरत नाम के गुण स्थान मे औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक तीनों प्रकार के भाव होते है, तथा पंद्रह प्रमाद भी इसी गुण स्थान तक होते है इसलिये इस गुण स्थान को प्रमत्त विरत कहते है ।


वत्ताबत्त पमाए जो णिवसइ पमत्तसंजदो होइ ।
सयल गुण सील कलिओ महव्वई चित्तलायरणो ॥601॥

गाथार्थ: जो मुनि अठ्ठाईस मूल गुणों को पालन करते है शील वा उत्तर गुणों को पालन करते है महाव्रतों का पालन करते है ऐसे मुनि अब व्यक्त वा अव्यक्त रूप प्रमाद से निवास करते है तब वे प्रमत्त संयत वा प्रमत्त संयमी मुनी कहलाते है । ऐसे मुनियों का चारित्र अत्यंत शुद्ध नही होता किन्तु अनेक रंगों से बने हुए चित्र के समान होता है ।


विकहा तहय कसाया इंदियणिद्दा तहय पणओ य ।
चउ चउ पण मेगेगे हुंति पमाया हु पण्णरसा ॥602॥

गाथार्थ: चार विकथा चार कषाय पांच इंन्द्रियां निद्रा और प्रणय ये पन्द्रह प्रमाद कहलाते है ।


झायइ धम्मज्झाणं अट्टं पि य णो कसाय उदयाओ ।
सज्झाय भावणाए उवसामइ पुणु वि झाणम्मि ॥603॥

गाथार्थ: छठे गुण स्थान मे रहने वाले मुनि धर्मध्यान का चितवन करते है । तथा नो कषाय के उदय होने से उनके आर्तध्यान भी हो जाता है । तथापि स्वाध्याय और रत्नत्रय की भावना के कारण उसी ध्यान में वे उस आर्तध्यान का उपशम कर देते है ।


तज्झाण जाय कम्मं खवेइ आवासएहिं परिपुण्णो ।
णिंदण गरहण जुत्तो पडिक्कमण किरियाहिं ॥604॥

गाथार्थ: छठे गुण स्थान में रहनें वाले वें मुनि अपने छहों आवश्यकों की पूर्ण रीति से पालन करते है । तथा उन्ही आवश्यकों के द्वारा उस स्वल्प आर्तध्यान से उत्पन्न हुए कर्मो को नाश कर देते है । इसके सिवाय वे मुनि उस आर्तध्यान के कारण अपनी निन्दा करतें रहतें हें और अपनी गर्हा करतें रहते है प्रतिक्रमण करतें रहतें है और अपनी समस्त क्रियाओं का पालन करते रहते है ।


जाव पमाए वट्टइ जावथिरं थाइ णिच्चल झाणं ।
णिदण गहण जुत्तो आवसइ कुणइ ता भिक्खू ॥605॥

गाथार्थ: वे छठे गुणस्थान मे रहने वाले मुनि जबतक प्रमाद सहित रहते है जबतक उनका निश्चल ध्यान अत्यंत स्थिर नहीं होता है तब तक वे मुनि अपनी निन्दा करते रहते है गर्हा करते रहते है और छहों आवश्यकों को पूर्ण रीति से पालन करते रहते है ।


छट्ठ मए गुणठाणे वदृंतो परिहरेइ छावासं ।
जो साहु सोण मुणई परमायम सार संदोहं ॥606॥

गाथार्थ: जो साधु छठे गुणस्थान में रहकर भी छहों आवश्यकों को नहीं करता वह साधु परमागम के सार को नहीं समझता ऐसा समझना चाहिये ।


अहव मुणंतो छंडइ सव्वावासाइं सुत्तबद्धाइं ।
तो तेण होइ चत्तो सुआयमो जिणवादस्स ॥607॥

गाथार्थ: अथवा जो साधु जान बूझ कर सिद्धांत सूत्रों मे कहे हुए आवश्यकों का त्याग कर देता है । छह आवश्यकों को नहीं करता वह साधु भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए आगम का ही त्याग कर देता है ऐसा समझना चाहिये तथा यह बात भी निश्चित है कि जिसने आगम का त्याग कर दिया उसने परमात्मा का भी त्याग कर दिया और परमात्मा का त्याग करनें से वह पुरुष मिथ्यात्व की ही पुष्टि करता है इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।


आयमचाए चत्तो परमप्पा होइ तेण पुरिसेण ।
परमप्पय चायेण य मिच्छत्तं पोसियं होइ ॥608॥

गाथार्थ: अथवा जो साधु जान बूझ कर सिद्धांत सूत्रों मे कहे हुए आवश्यकों का त्याग कर देता है । छह आवश्यकों को नहीं करता वह साधु भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए आगम का ही त्याग कर देता है ऐसा समझना चाहिये तथा यह बात भी निश्चित है कि जिसने आगम का त्याग कर दिया उसने परमात्मा का भी त्याग कर दिया और परमात्मा का त्याग करनें से वह पुरुष मिथ्यात्व की ही पुष्टि करता है इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।


एवं णाऊण सया जावण पावेहि णिच्चलं झाणं ।
मण संकप्प विमुक्कं तावासय कुणह वयसहियं ॥609॥

गाथार्थ: यही समझ कर मुनियों को उचित है कि जवतक मनके संकल्प विकल्पों से रहित होकर निश्चल ध्यान की प्राप्ति नहीं हाती तव तक उनको छहों आवश्यक प्रतिदिन अवश्य करते रहना चाहिये तथा अपनें अन्य समस्त व्रतों का पालन करते रहना चाहिये ।


आवासयाइ कम्मं विज्जावच्चं च दाण पूजाइं ।
जं कुणइ समदिट्ठी तं सव्वं णिज्जर णिमित्तं ॥610॥

गाथार्थ: जो सम्यग्दृष्टी पुरुष प्रतिदिन अपने आवश्यकों का पालन करता है, व्रत नियम आदि का पालन करता है वैयावृत्य करता है, पात्र दान देता है और भगवान् जिनेन्द्र देव की पूजा करता है उस पुरुष का वह सब कार्य कर्मों की निर्जरा का कारण माना जाता है ।


जस्सण णहगामित्तं पायविलेवो ण ओसही लेवो ।
सो नावाइ समुद्दं तरेइ किमिच्छ भणिएण ॥611॥

गाथार्थ: जिनके न तो आकाश गामिनी ऋद्धि है, न पैरों को स्थिर कर आकाश मे चलने की वृद्धि है और न औषधि लेप ऋद्धि है तथापि वह नाव के समान भव्य जीवों को संसार समुद्र से पार कर देता है ।


जा संकप्पो चित्ते सुहासुहो भोयणाइ किरियाओ ।
ताकुणउसोविकिरियं पडीकमणाईय णिस्सेसं ॥612॥

गाथार्थ: इस छठे गुणस्थान मे रहने वाले मुनियों के हृदय मे जबतक शुभ संकल्प वा अशुभ संकल्प विकल्प होते रहते है और जब तक भोजनादिक क्रियाओं की प्रवृत्ति होती रहती है, तब तक उन मुनियों को प्रतिक्रमण आदि समस्त क्रियायें करते रहना चाहिये ।


एसो पमत्त विरओ साहु मए कहिउ समासेण ।
एत्तो उड्ढं बोच्छं अप्पमत्तो णिसामेह ॥613॥

गाथार्थ: इस प्रकार मैंने प्रमत्त विरत नाम के छठे गुण स्थान का स्वरुप अत्यंत संक्षेप से कहा । अब इसके आगे अप्रमत्त विरत नाम के सातवे गुणस्थान का स्वरूप कहता हूँ, उसे सुनो ।


णठ्ठासेसपमाओं वय गुणसीलेहिं मंडिओ णाणी ।
अणुव समुओ अखवओ झाणणिलीणोहु अप्पमत्तो सो ॥614॥

गाथार्थ: जिनके ऊपर लिखे प्रमाद सब नष्ट हो गये है जो व्रत शील गुणों से सुशोभित है जो सम्यग्ज्ञानी है, और ध्यान मे सदा लीन रहते है तथा जो न तो उपशम श्रणी मे चढ रहे है और न क्षपक श्रेणी में चढ रहे है ऐसे मुनि अप्रमत्त कहलाते है ।


पुवुत्ता जे भावा हवंति णिण्णेव तत्थ नायव्वा ।
मुक्खं धम्मज्झाणं हवेइ णियमेण इत्थेव ॥615॥

गाथार्थ: इस सातवे गुणस्थान में पहले कहे हुए औपशमिक भाव क्षायिक भाव और क्षायोपशमिक भाव तीनो भाव होते है । तथा इस गुणस्थान में नियम पूर्वक मुख्य रीति से धर्म ध्यान होता है ।


झायारो पुण झाणं झेयं तहवफलं च तस्सेव ।
ए ए चउ अहियारा णायव्वा होंति णियमेण ॥616॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान मे चार अधिकार बतलाये है ध्यान करने वाला ध्याता, चितवन करने रूप ध्यान, जिसका चितवन किया जाय ऐसा आत्म। ध्येय और उस ध्यान का फल । ये चार अधिकार नियम पूर्वक इस गुण स्थान में होते है ।


आहारासणणिद्दा विजओ तह इंदियाण पंचण्हं ।
बावीस परि सहाणं कोहाईणं कसायाणं ॥617॥

गाथार्थ: जिने आहार का विजय कर लिया है निद्रा का विजय कर लिया है, पांचों इन्द्रि गों का विजय कर लिया है, जो बाईस परिषहों के विजय करने मे समर्थ है, जिसने क्रोधादिक समस्त कषायों का विजय कर लिया है दश प्रकार के बाह्य परिग्रह और चौदह प्रकार अन्तरंग परिग्रहों का सर्वथा त्याग कर दिया है, मोह का सर्वथा त्याग कर दिया है, जिसने अपने समस्त इन्द्रियों के व्यापार का त्याग कर दिया है, जो सिद्धांत सूत्रों का जानकार है, जिसका शरीर अत्यंत दृढ है और जिसका चित्त अत्यन्त स्थिर है, ऐसा साधु ध्यान करने योग्य ध्याता कहलाता है ।


णिस्संगो णिम्मोहो णिग्गय बावार करण सुतड्ढो ।
दिढकाओ थिरचित्तो एरिसओ होइ झायारो ॥618॥

गाथार्थ: जिने आहार का विजय कर लिया है निद्रा का विजय कर लिया है, पांचों इन्द्रियों का विजय कर लिया है, जो बाईस परिषहों के विजय करने मे समर्थ है, जिसने क्रोधादिक समस्त कषायों का विजय कर लिया है दश प्रकार के बाह्य परिग्रह और चौदह प्रकार अन्तरंग परिग्रहों का सर्वथा त्याग कर दिया है, मोह का सर्वथा त्याग कर दिया है, जिसने अपने समस्त इन्द्रियों के व्यापार का त्याग कर दिया है, जो सिद्धांत सूत्रों का जानकार है, जिसका शरीर अत्यंत दृढ है और जिसका चित्त अत्यन्त स्थिर है, ऐसा साधु ध्यान करने योग्य ध्याता कहलाता है ।


चित्तणिरोहे झाणं चहुवियभेयं च तं मुणेयव्वं ।
पिडत्थं च पयत्थं रुवत्थं रुववज्जियं चेव ॥619॥

गाथार्थ: चित्त का निरोध करना ध्यान है अर्थात् चित्त मे अन्य समस्त चितवनों का त्याग कर किसी एक ही पदार्थ का चितवन करना, उस एक पदार्थ के सिवाय अन्य किसी पदार्थ का चितवन न करना ध्यान कहलाता है । उस ध्यान के चार भेद है पिंडस्थ, पदस्थ, रूपस्थ, रूपातीत ।


पिंडो वुच्चइ देहो तस्स मज्झठ्ठिओ हु णियअप्पा ।
झाइज्जइ अइसुद्धो विप्फुरिओ सेय किरणठ्ठो ॥620॥

गाथार्थ: यहां पर पिड शब्द का अर्थ शरीर है, उस शरीर के मध्य में विराजमान अपने आत्मा का ध्यान करना चाहिये । तथा वह अपना आत्मा अत्यंत शुद्ध है, उसमे से सफेद किरणें निकल रही है और वह अत्यन्त दैदीप्यमान हो रहा है ऐसे अपने आत्मा का चितवन करना चाहिये ।


देहत्थो झाइज्जइ देहस्संबंध विरहिओ णिच्चं ।
णिम्मल तेय फुरंतो गयणतले सूर विंवेव ॥621॥

गाथार्थ: वह अपना शुद्ध आत्मा अपने शरीर मे विराजमान है तथापि उसका शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह आत्मा अत्यंत निर्मल है और जिस प्रकार आकाश में सूर्य दैदीप्यमान होता है उसी प्रकार वह आत्मा भी अपने तेज से दैदीप्यमान हो रहा है उस आत्मा के प्रदेशों का प्रचय वा समूह पुरुषाकार है वह प्रदेशों का समूह अपने ही शरीर में ठहरा हुआ है और उसमे अनेक निर्मल गुण भरे हुए है । इस प्रकार जो शरीर मे स्थित अपने आत्मा का ध्यान किया जाता है उसको पिंडस्थ ध्यान कहते है ।


जीवप्पदेसपचयं पुरिसायारं हि णिययदेहत्थं ।
अमलगुणं झायंतं झाणं पिंडत्थ अभिहाणं ॥622॥

गाथार्थ: वह अपना शुद्ध आत्मा अपने शरीर मे विराजमान है तथापि उसका शरीर से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह आत्मा अत्यंत निर्मल है और जिस प्रकार आकाश में सूर्य दैदीप्यमान होता है उसी प्रकार वह आत्मा भी अपने तेज से दैदीप्यमान हो रहा है उस आत्मा के प्रदेशों का प्रचय वा समूह पुरुषाकार है वह प्रदेशों का समूह अपने ही शरीर में ठहरा हुआ है और उसमे अनेक निर्मल गुण भरे हुए है । इस प्रकार जो शरीर मे स्थित अपने आत्मा का ध्यान किया जाता है उसको पिंडस्थ ध्यान कहते है ।


यारिसओ देहत्थो झाइज्जइ देह बाहिरे तह य ।
अप्पा सुद्ध सहावो तं रुवत्थं फुडं झाणं ॥623॥

गाथार्थ: ऊपर लिखे पिडस्थ ध्यान मे अपने ही शरीर में स्थित अपने ही शुद्ध निर्मल और अत्यन्त दैदीप्यमान आत्मा का ध्यान करना बतलाया है उसी प्रकार शरीर के बाहर अपने ही शुद्ध निर्मल अत्यन्त दैदीप्यमान और शुद्ध स्वभाव आत्मा का ध्यान करना रुपस्थ ध्यान कहलाता है ।


रूवत्थं पुण दुविहं सगयं तह परगयं च णायव्वं ।
तं परगयं भणिज्जइ झाइज्जइ जत्थ पंच परमेठ्ठी ॥624॥

गाथार्थ: इस रूपस्थ ध्याल के दो भेद है एक स्वागत आत्मा का ध्यान और दूसरा परगत आत्मा का ध्यान । जहां पर पंच परमेंष्ठी का ध्यान किया जाता है उस ध्यान को परगत रूपस्थ ध्यान कहते है । पंच परमेष्ठी का आत्मा अत्यंत शुद्ध है परन्तु वह अपने आत्मा से भिन्न है इसलिये उसको परगत रूपस्थ ध्यान कहते है ।


सगयं तं रूवत्थं झाइज्जइ जत्थ अप्पणो अप्पा ।
णियदेहस्स बहित्थो फुरंत रवितेय संकासो ॥625॥

गाथार्थ: जो अपना आत्मा सूर्य के तेज के समान अत्यन्त दैदीप्यमान है अत्यंत शुद्ध है निर्मल है ऐसा अपना आत्मा अपने ही आत्मा के द्वारा अपनें शरीर के वाहर ध्यान किया जाता है उसको स्वागत रुपस्थ ध्यान कहते है । इस प्रकार रुपस्थ ध्यान का स्वगत स्वरुप कहा ।


देवच्चणा बिहाणं जं कहियं तं देसविरयठाणम्मि ।
होइ पयत्थं झाणं कहियं तं बरजिणंदेहिं ॥626॥

गाथार्थ: पहले देश विरत वा विरता विरत गुण स्थान के स्वरूप में जो भावना जिनेन्द्रदेव की पुजन करना समवसरण में विराजमान अष्ट प्रतिहार्य सहित अनन्त चतुष्टय सहित भगवान् अरहंत परमेष्ठी का ध्यान करना आदि वतलाया है वह सब पदस्थ ध्यान है ऐसा भगवान् जिनेंद्रदेव ने कहा है ।


एक पय मक्खरं वा जवियइ जं पंचगुरुवसंबंध ।
तं पिय होइ पयत्थ झाणं कम्माण णिद्दहणं ॥627॥

गाथार्थ: पंच परमेष्ठी के बाचक एक पद के मन्त्र का जप करना वा एक अक्षर मन्त्र का जप करना वा अधिक अक्षरों के मंत्र का जप करना भी पदस्थ ध्यान कहलाता है। यह पदस्थ ध्यान कर्मों के नाश करने का साधन है।


णीय चिंतइ देहत्थं देह वहित्थं ण चिंतए किं पि ।
ण सगय परगयरूवं तं गयरूवं णिरालेवं ॥628॥

गाथार्थ: जो न तो शरीर में स्थित शुद्ध आत्मा का चितवन करता न शरीर के बाहर शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है न स्वगत आत्मा का ध्यान करता है और न परगत पंच परमेष्ठी का ध्यान करता है किन्तु विना किसी आलम्बन के किसी पदार्थ का ध्यान करता है अपने चित्त को अन्य समस्त चिनवनों से हटाकर किसी एक पदार्थ में लगता है वह रूपातीत ध्यान कहलाता है ।


जत्थ ण करणं चिंता अक्खर रूवं ण धारणा धेयं ।
ण य वावारो कोई चित्तस्सय तं णिरालेबं ॥629॥

गाथार्थ: जिस ध्यान में किसी विशेष पदार्थ का चितवन नही करना पडता न किसी शद्व बा अक्षर का चितवन करना पडता है, जिसमें न धारणा है न ध्येय है और न जिसमें मन का कोई व्यापार होता है। ऐसे ध्यान को निरावलम्ब ध्यान कहते है।


इंदिय विसय वियारा जत्थ खयं जंति राय दोसं च ।
मण धावारा सव्वे तं गयारूवं मुणेयव्वं ॥630॥

गाथार्थ: जिस ध्यान मे इन्द्रियों के समस्त विकार नाश हो जाते है जिसमें राग द्वेष सब नष्ट हां जाते है और मन के व्यापार सब नष्ट हो जाते है उसको रूपातीत ध्यान कहते है । इस प्रकार रुपातीत ध्यान का स्वरुप है ।


धेयं तिविह पयारं अक्खररूवं तह अरूवंच ।
रुवं परमेट्ठिगयं अक्खरयं तेसि मुच्चारं ॥631॥

गाथार्थ: जिसका ध्यान किया जाता है उसको ध्येय कहते है वह ध्येय तीन प्रकार का है । अक्षर, रुप और अरूपी जो पंच परमेष्ठी का ध्यान करना है तथा उन परमेष्ठी के वाचक अक्षरों का उच्चारण करना है वह अक्षर रुप ध्यान कहलाता है तथा जो रत्नत्रयस्वरूप निरालंब ध्यान किया जाता है जो रत्नत्रय से ओतप्रोत भरा हुआ है और इसीलिये जो शून्य होकर भी शून्य नहीं कहलाता उस ध्यान को भगवान् जिनेन्द्र देव ने रूपातीत ध्येय बतलाया है ।


गयरुवं जंझेयं जिणेहिं भणियं पि तं णिरालंबं ।
सुण्णं पि तं ण सुण्णं जम्हा रयणत्तयाइण्णं ॥632॥

गाथार्थ: जिसका ध्यान किया जाता है उसको ध्येय कहते है वह ध्येय तीन प्रकार का है । अक्षर, रुप और अरूपी जो पंच परमेष्ठी का ध्यान करना है तथा उन परमेष्ठी के वाचक अक्षरों का उच्चारण करना है वह अक्षर रुप ध्यान कहलाता है तथा जो रत्नत्रयस्वरूप निरालंब ध्यान किया जाता है जो रत्नत्रय से ओतप्रोत भरा हुआ है और इसीलिये जो शून्य होकर भी शून्य नहीं कहलाता उस ध्यान को भगवान् जिनेन्द्र देव ने रूपातीत ध्येय बतलाया है ।


झाणस्स फलं तिविहं कहंति वर जोइणो विगयमोहा ।
इह भव पर लोय भवं सव्वं कम्मक्खए तइयं ॥633॥

गाथार्थ: राग द्वेष और मोह रहित परम योगी पुरूषों ने ध्यान का फल तीन प्रकार बतलाया है । पहला इसी भव मे होनेवाला फल, दूसरा परलोक में होनें वाला फल और तींसरा समस्त कर्मों का नाश होना । इस प्रकार ध्यान के फल तीन प्रकार के होते है ।


झाणस्स य सत्तीए जायंति अइसयाणि विविहाणी ।
दूरालोयण पहुई झाणे आएस करणं च ॥634॥

गाथार्थ: ध्यान की शक्ति से अनेक प्रकार के अतिशय प्राप्त हो जाते है, हजारों कोस दूरके पदार्थ देख लेना, दूरके शब्द सुन लेना आदि रूप से इन्द्रिय ज्ञान की वृद्धी हो जाती है तथा आदेश करने की शक्ती प्रगट हो जाती है ।


मइसुइ ओहीणाणं मणपज्जय केवलं तहा णाणं ।
रिद्धीओ सव्वाओ जइपूजा इह फलं झाणे ॥635॥

गाथार्थ: मति ज्ञान श्रुत ज्ञान की वृद्धि वा पूर्णता हो जाती है अवधि ज्ञान मनः पर्यय ज्ञान प्रगट हो जाता है तथा केवल ज्ञान प्रगट हो जाता है, समस्त ऋद्धियां प्राप्त हो जाती है और यति पूजा भी होने लगती है अथवा केवल ज्ञान उत्पन्न होने पर जिन पूजा भी होने लगती है । यह इतना फल तो इसीं लोक में मिल जाता है ।


सक्काई इंदत्तं अहमिंदत्तं च सग्गलोयम्मि ।
लोयंति य देवत्तं तं परभवगयफलं झाणे ॥636॥

गाथार्थ: स्वर्गों मे जाकर इन्द्र पद की प्राप्ति, अहमिन्द्र पद की प्राप्ति होना, और लौकान्तिक पद की प्राप्ति होना आदि ध्यान का परलोक सम्यन्धी फल समझना चाहिये ।


तणुपंचस्सय णामो सिद्धसरुवस्स चेव उप्पत्ती ।
तिहुयण पहुत्त लाहो लाहो य अणंत विरियस्स ॥637॥

गाथार्थ: औदारिक आदि पांचों शरीरों का नाश हो जाना, सिद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाना तीनों लोकों का प्रभुत्व प्राप्त हो जाना, अनन्त वीर्य की प्राप्ति हो जाना सम्यकत्व, ज्ञान, वीर्य, सूक्ष्मत्व अगुरुलघुत्व अव्याबाध दर्शन इन आठ गुणों की प्राप्ति हो जाना और लोक शिखर के अग्रभाग पर जाकर स्थिर हो जाना यह सब ध्यान का तीसरा फल भगवान् जिनेन्द्रदेव ने कहा है ।


अठ्ठगुणाणं लद्धी लोयं सिहरग्गखेतसंवासो ।
तइय फलं कहिय मिणं जिणवरचंदेहि झाणस्स ॥638॥

गाथार्थ: औदारिक आदि पांचों शरीरों का नाश हो जाना, सिद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाना तीनों लोकों का प्रभुत्व प्राप्त हो जाना, अनन्त वीर्य की प्राप्ति हो जाना सम्यकत्व, ज्ञान, वीर्य, सूक्ष्मत्व अगुरुलघुत्व अव्याबाध दर्शन इन आठ गुणों की प्राप्ति हो जाना और लोक शिखर के अग्रभाग पर जाकर स्थिर हो जाना यह सब ध्यान का तीसरा फल भगवान् जिनेन्द्रदेव ने कहा है ।


एवं धम्मज्झाणं कहियं अपमत्त गुण समासेण ।
सालंब मणालंब तं मुक्खं इत्थं णायव्वं ॥639॥

गाथार्थ: इस प्रकार इस सातवे अप्रमत्त गुण स्थान मे होने वाले धर्म ध्यान वा स्वरूप अत्यंत संक्षेप से कहां । इस गुण स्थान में अवलम्बन सहित धर्म ध्यान भी होता है तथा इस गुण स्थान मे दोनों ही ध्यानों की मुख्यता रहती है । ऐसा समझना चाहिये ।


एदम्हि गुणट्ठाणो अत्थि आवासयाण परिहारो ।
झाण मणम्मि थिरत्तं णिरंतरं अत्थितं जम्हा ॥640॥

गाथार्थ: इस सातवे गुण स्थान में छहो आवश्यकताओं की आवश्यकता नहीं होती और इसलिये ध्यान मे लगा हुआ मन निरन्तर अत्यन्त स्थिर हो जाता है ।


सत्तमयं गुणठाणं कहियं अपमत्त णाम संजुत्तं ।
एत्तो अप्पुव्वणामं वुच्छामि जहाणुपुव्वीए ॥641॥

गाथार्थ: इस प्रकार अप्रमत्त संयत नाम के सातवे गुण स्थान का स्वरूप कहा । अब इसके आगे अनुक्रम से होंने वाले अपूर्व करण नाम के अठवें गुण स्थान का स्वरूप कहते है ।


बं दुब्भेय पऊत्तं खवयं उवसामियं च णायव्वं ।
खवए खवओ भावो उवसमए होइ उवसमओ ॥642॥

गाथार्थ: इस आठवे गुण स्थान के दो भेद है एक औपशमिक और दूसरा क्षायिक । क्ष यिक अपूर्व करण में क्षायिक भाव होते है औपशमिक अपूर्व करण में औपशमिक भाव होति है ।


खवएसु उबसमेसु य अपुव्वणामेसु हवइ तिपयारं ।
सुक्कज्झाणं णियमा पुहुत्त सवियक्क सवियारं ॥643॥

गाथार्थ: इस अपूर्व करण नाम के आठवे गुण स्थान मे पहला शुक्ल ध्यान होता है तथा उपशम श्रेणी वाले के और क्षपक श्रेणी वाले के दांनों के ही पहला शुक्ल ध्यान होता है । वह शुक्ल ध्यान नियम से तीन प्रकार होता है । पृथक्त्व, सवितर्क और सवीचार ।


पज्जायं च गुणं वा जम्हा दव्वाण मुणइ भेएण ।
तह्मा पुहुत्तणामं भणियं झाणं मुणिदेहिं ॥644॥

गाथार्थ: ध्यान करने वाले मुनि जिस ध्यान में द्रव्य के पर्यायों को और द्रव्यों के गुणों को पृथक पृथक जानते है उस ध्यान को मुनि राज सर्वज्ञ देव पृथक्त्व नाम का ध्यान कहते है।


भणियं सुयं वियक्कं वट्टइ सह तेण तंखु अणवरयं ।
तम्हा तस्स वियक्कं सवियारं पुण भणिस्सामो ॥645॥

गाथार्थ: वितर्क शब्द का अर्थ श्रुतज्ञान है जो ध्यान सदा काल श्रुत ज्ञान के ही साथ रहे उस ध्यान को सवितर्क ध्यान कहते है ।


जोएहिं तीहिं वियरइ अक्खर अत्थेसु तेण सवियारं ।
पढमं सुक्कज्झाण अतिक्ख परसोवमं भणियं ॥646॥

गाथार्थ: जिस ध्यान में चितवन किये हुए पदार्थ वा उनको करने वाले शब्दों का चितवन मन से वचन से काया से वा क्रम से अदल बदल कर किया जाता हो कभी काय से चितवन किया जाता हो तथा काय को छोडकर मन से वा वचन से चितवन किया जाता हो इस प्रकार जिसमें योग बदलते रहते ही तथा पदार्थ और उनके वाचक शब्द भी बदलते रहते हो उसको सवीचर ध्यान कहते है । योग पदार्थ और शब्दों का बदलना वीचार कहलाता है । तथा वीचार सहित ध्यान को सवीचार ध्यान कहते है यह ध्यान कर्म रूपी वृक्ष को काटने के लिये विनाधार वाले अतीक्षण कुल्हाडे के समान है जो देर से कर्मों का नाश करता है ।


जह चिरकालो लग्गइ अतिक्ख परसेण रुकव विच्छेए ।
तह कम्माण य हण्णे चिरकालो पढम सुक्कम्मि ॥647॥

गाथार्थ: जिस प्रकार किसी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाडी तीक्ष्ण न हो पत्थरी कुल्हाडी हो तो उस वृक्ष के काटने मे बहुत देर लगती है उसो प्रकार इस प्रथम शुक्ल ध्यान में कर्मों का नाश करने मे बहुत देर लगा करतीं है ।


खइएण उवसमेण य कम्माणं जं अउव्व परिणाओ ।
तम्हा तं गुणठाणं अपुव्वणामं तु तं भणियं ॥648॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान मे कर्मों का क्षय होने पर अथवा कर्मों का उपशम होने पर अपूर्व परिणाम होते रहते है जैसे शुद्ध परिणाम पहले कमी नहीं हुए थे वैसे अपूर्व शुद्ध परिणाम होते रहते है इसलिये आचार्यों ने इस गुण स्थान का नाम अपूर्व करण गुणस्थान रक्खा ।


जह तं अपुव्वणामं अणियट्टी तह य होई णायव्वं ।
उवसम खाइय भावं हवेइ फुडु तम्हि ठाणम्मि ॥649॥

गाथार्थ: जिस प्रकार उत्तरोत्तर अपूर्व अपूर्व परिणाम होने के कारण आठवे गुण स्थान का नाम अपूर्व करण गुण स्थान है उसी प्रकार अतिवृत्ति करण नाम का नौवा गुण स्थान समझना चाहिये । इस गुण स्थान में उत्तरोत्तर जो परिणामों की शुद्धता होती जाती है वह शुद्धता बढबी ही जाती है फिर कम नहीं होती । इसलिये इसको अनिवृत्ति करण कहते है जिसमें परिणाम की शुद्धता निवृत्त न हो सके, और बढती ही चल जाय उसको अनिवृत्ति करण कहते है इस गुण स्थान मे भी औपशमिक भाव और क्षायिक भाव दोनों ही होते है । उपशम श्रेणी वाले के उपशम भाव होते है और क्षपक श्रेणी वाले के परिणाम क्षायिक होते है ।


सुक्कं तत्थ पउत्तं जिणेहिं पुव्वुत्त लक्खणं झाणं ।
णत्थि णियत्ती पुनरवि जम्हा अणियट्टि तं तम्हा ॥650॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेन्द्र देव ने इस नौवे गुण स्थान मे भी पहले के अपूर्व करण गुण स्थान मे कहा हुआ पहला शुक्ल ध्यान पृथक्त्व वितर्क वीचार नाम का शुक्ल ध्यान कहा है । इस गुण स्थान में शुद्ध परिणामों की निवृत्ति नहीं होती इसलिये इस गुण स्थान का नाम अनिर्वृत्त करण कहा गया है ।


हुंति अणियट्टिणो ते पडिसमयं जस्स एक परिणामं ।
बिमलयर झाण हुअवह सिहाहिं णिद्दड्ढ कम्म वण ॥651॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान में एक समय में जितने जीव होंगे उन सब के एक समान परिणाम होंगे और वे परिणाम निर्वृत्ति रुप नही होते । इस गुण स्थान मे रहने वाले मुनियों का ध्यान अत्यन्त निर्मल होता है तथा इसलिये उस निर्मल ध्यान रुपी अग्नि की शिखर से कर्म रुपी बन अवश्य जल जाते है । इस गुण स्थान के समय असंख्यात होते है । उन में वे ध्यानी मुनि उत्तरोत्तर समयो मे बढते रहते है । इस गुण स्थान के पहले समय में जितने जीव होंगे उन सबके परिणाम एक से ही होंगे दूसरे समय में भी जितने जीव होंगे उन सब के परिणाम एक से होंगे । इसी प्रकार तीसरे चौथे पांचवे आदि असंख्यात समयों मे समझ लेना चाहिये । इस प्रकार नौवे गुण स्थान का स्वरुप कहा ।


जह अणियट्टि पउत्तं खाइय उवसमिय सेढि संजुत्तं ।
तह सुहमसंपराये दुब्भेयं होइ जिण कहियं ॥652॥

गाथार्थ: जिस प्रकार अनिवृत्ति करण मे क्षपक श्रेणी और उपशम श्रेणी दो प्रकार की श्रेणियां बतलाई है उसी प्रकार इस सूक्ष्म सांपराय नाम के दशवे गुण स्थान मे भी उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी दोनों ही श्रेणियां होतीं है ऐसा भगवान् जिनेन्द्र देव ने कहा है ।


तत्थेव हि दो भावा झाणं पुणु तिविह भेय तं सुक्कं ।
लोह कसाए सेसे समलत्तं होइ चित्तस्स ॥653॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान में भी औपशमिक और क्षायिक दो ही भाव होते है । उपशम श्रेणी वाले के औपशमिक भाव होते है और क्षपक श्रेणी वाले क्षायिक भाव होते है । इसी प्रकार इस गुण स्थान में पहले कहा हुआ पृथक्त्व सवितर्क सवीचार नाम का तीनों भेद वाला प्रथम शुक्ल ध्यान ही होता है इस गुण स्थान मे केवल सूक्ष्म लोभ कषाय होता है इसलिये उनका चित्त कुछ थोडा सा समल वा मल सहित ( अत्यन्त सूक्ष्म अशुद्धता सहित ) होता है ।


जह कोसुं भय वत्थं होइ सया सुहुमराग स जुत्तं ।
एवं सुहम कसाओ सुहम सरावोत्ति णिद्दिठ्ठो ॥654॥

गाथार्थ: जिस प्रकार कसुमल मे रंगे हुए वस्त्रों में (कसुमा के फुलों के रंग मे रंगे हुए वस्त्र में) लाली अत्यन्त सुक्ष्म होती है इसी प्रकार इस दशवे गुण स्थान में लोभ रुपीं कषाय अत्यन्त सूक्ष्म होता है इललिये इस गुण स्थान का नाम सूक्ष्म सांपराय कहा गया है ।


जो उवसमइ कसाए मोहासंबंधि पयडिवूहं च ।
उवसामओत्ति भणिओ खवओ णाम ण सो लहइ ॥655॥

गाथार्थ: जो मुनि मोह की समस्त प्रकृतियों का उपशम कर देते है वे उपशांत कषाय नाम के ग्यारहवें गुणस्थान वर्ती मुनि कहलाते है । ग्यारहवें गुण स्थान वर्ती मुनि क्षपक कभी भी नहीं कहला सकते । क्योंकि जो उपशम श्रेणी मे चढते है और कर्मों का उपशम करते करते ग्यारहवें गुण स्थान तक आ जाते है । वे कर्मों का क्षय नहीं करते । इसलिये वे क्षपक नही कहला सकते । क्षपक वे ही कहलाते है जो क्षपक श्रेणी चढकर कर्मो का क्षय करते जाते है ।


सुक्कज्झाणं पढमं भावो पुण तत्थ उवसमो भणिओ ।
मोहोदयाउ कोई पडिऊण य जाइ मिच्छत्तं ॥656॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान में पहला पृथक्त्व वितर्क वीचार नाम का शुक्ल ध्यान होता है तथा इस गुण स्थान में औपशमिक भाव ही होते है । इस गुण स्थान के अन्त में मोहनीय कर्म की जो समस्त प्रकृतियां उपशांत हो गई थीं वे सब प्रकृतियां उदय मे आ जाती है और फिर वे मुनि इस ग्यारहवें गुण स्थान से गिर जाते है । ग्याहरवें गुण स्थान से गिरने वाले कितने ही मुनि मिथ्यात्व प्रकृति का उदय हो जाने से मिथ्यात्व गुण स्थान में भी आ जाते है ।


कोई पमायरहियं ठाणं आसिज्ज पुणवि आरुहइ।
चरम सरीरो जीवो खवयसेढीं च रय हरणे ॥657॥

गाथार्थ: ग्याहरवें गुण स्थान से गिर कर कितने ही मुनि सातवें गुण स्थान मे अप्रमत्त गुण स्थान मे आ जाते है और सातवें गुण स्थान मे आकर फिर भी श्रेणी चढते है। यदि उन मुनियों मे कोई मुनि चरम शरीरी हुए तो वे मुनि क्षपक श्रेणी मे चढ जाते है तथा क्षपक श्रेणी मे चढ कर वे ज्ञानावरण दर्शना वरण कर्मों का नाश करने के लिये उद्यम करते है।


कालं काउं कोई तत्थय उवसामगे मुणट्ठाणे ।
सुक्कज्झाणं झाइय उववज्जइ सव्वसिद्धोए ॥658॥

गाथार्थ: इसी उपशांत मोह नाम के ग्याहरवें गुण स्थान मे रहने वाले मुनि की यदि आयु पूर्ण हो जाय तो वे शुक्ल ध्यान का ध्यान करते हुए शरीर को छोड देते है और मर कर वे मुनि नियम से सर्वार्थ सिद्धि मे उत्पन्न होते है ।


हेट्ठट्ठिओ हु चेट्ठइ पंको सर पाणियम्मि जह सरइ ।
तह मोहो तम्मि गुणे हेउं लहि ऊण उल्ललई ॥659॥

गाथार्थ: जिस प्रकार शरद् ऋतु में कीचड सव तालाव के पानी नीचें बैठ जाती है तथापि वह वायु आदि का कारण पाकर फिर ऊपर आ जाती है उसी प्रकार आठवें नौवें दशवें ग्याहरवे गुण स्थानों मे जिस मोहनीय कर्म का उपशम किया था तथा ग्याहरवे गुण स्थान में आकर समस्त मोहनीय कर्म का उपशम कर दिया था वही मोहनीय कर्म इस ग्यारहवें गुण स्थान के अन्त समय में कारण पाकर उदय में आ जाता है । जब मोहनीय कर्म का उदय आ जाता है तब वे मुनि ग्यारहवें से गिर कर सातवे गुण स्थान मे आ जाते है यदि उसी समय मिथ्यात्व का उदय हो जाय तो वे मुनि पहले मिथ्यात्व गुण स्थान मे आ जाते है ।


जो खवयसेढि रूढो ण होइ उवसामिओत्ति सो जीवो ।
मोहक्खयंकुणंतो उत्तो खवओ जिणिंदेहि ॥660॥

गाथार्थ: जो मुनि प्रारम्भ से ही क्षपक श्रेणी में चढते है वे मुनि कर्मों का उपशम नहीं करते किन्तु मोहनीय कर्म का क्षय करते जाते है इसलिये वे दशवें गुण स्थान से ग्यारहवें गुण स्थान मे नहीं आते किन्तु दशवे गुण स्थान से बारहवे गुण स्थान में पहुँच जाते है । इसलिये वे मुनि फिर नीचे के गुण स्थानों मे फिर कभी नही आते है । फिर तो बारहवे गुण स्थान के अन्त मे घातिया कर्मों का नाश कर केवल ज्ञान ही प्राप्त करते है ।


णिस्सेसमोह खीणे खीण कसायं तु णाम गुणठाणं ।
पावइ जीवो णूणं खाइयभावेण संजुत्तो ॥661॥

गाथार्थ: जिस समय उन ध्यानी मुनि के समस्त मोहनीय कर्म का क्षय हो जाता है उस समय उन मुनि के क्षीण कषाय नाम का बारहवा गुण स्थान होता है । बारहवे गुण स्थान में उन मुनियों के क्षायिक भाव ही होते है ।


जह सुद्ध फलिय भायणि खितं णीरं खु णिम्मलं सुद्धं ।
तह णिम्मल परिणामो खीण कसाओ मुणेयव्वो ॥662॥

गाथार्थ: जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक मणि के वर्तन मे रक्खा हुआ शुद्ध निर्मल जल सदा शुद्ध निर्मल ही रहता है उसी प्रकार जिसके कषाय सब नष्ट हो चुके है ऐसे क्षीण कषाय गुण स्थान में रहने वाले मुनि के परिणाम सदाकाल निर्मल ही रहते है ।


सुक्कज्झाणं वीयं भणियं सवियक्क एक्क अवियारं ।
माणिक्क सिहाचवलम् अत्थि तहिं णत्थि संदेहो ॥663॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान मे एकत्व वितर्क नाम का दुसरा शुक्ल ध्यान होता है वह ध्यान वितर्क अर्थात् श्रुत ज्ञान सहित होता है किसी एक ही योग से होता है और उसमें वीचार वा संक्रमण नहीं होता वीचार रहित होता है । जिस प्रकार माणिक रत्न की शिखा निश्चल रहती है उसी प्रकार उन मुनो का ध्यान वीचार रहित निश्चल होता है इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ।


होऊण खीण मोहो हणिऊण य मोह विडविवित्थारं ।
घाइत्तयं च छाइय द्विचवभ समएसु झाणेण ॥664॥

गाथार्थ: जिस समय वे ध्यानी मुनि मोहनीय कर्म की समस्त प्रकृतियों का नाश कर बारहवे गुण स्थान मे पहुच जाते है तव वे मुनि वारहवे गुण स्थान के उपान्त्य समय से अपने प्रज्वलित ध्यान के द्वारा ज्ञानावरण दर्शनावरण और अन्नराय कर्म इन तीनों घातियां कर्मों का नाश कर डालते है ।


घाइचउक्कविणासे उप्पज्ज सयल बिमल केवलयं ।
लोया लोय पयासं णाणं णिरुपद्दवं णिच्चं ॥665॥

गाथार्थ: जिस समय घातिया कर्मों का नाश हो जाता है उसीं समय उन भगवान् के पूर्ण निर्मल केवल-ज्ञान प्रगट हो जाता है । वह केवल ज्ञान लोक अलोक सबको एक साथ प्रकाशित करनें वाला होता है, उसमें फिर किसी प्रकार का उपद्रव नहीं होता और वह ज्ञान फिर कभी भी नष्ट नहीं होता अनंतानंत काल तक बना रहता है ।


आवरणाण विणासे दंसण णाणाणि अंतरहियाणि ।
पावइ मोह विणासे अणंत सुक्खं च परमप्पा ॥666॥

गाथार्थ: ज्ञानावरण कर्म के नाश होने से उन परमात्मा स्वरूप भगवान् के अनंत ज्ञान प्रगट हो जाता है, दर्शना वरण कर्म के नाश होने से अनन्त दर्शन प्रगट हो जाता है, मोहनीय कर्म के अत्यन्त नाश होने म अनंत सुख प्राप्त हो जाता है अतराय कर्म का अत्यन्त नाश होने से अनंत वीर्य प्रगट हो जाता है । इस प्रकार वे भगवान् अनंत चतुष्टय को धारण कर सयोगी केवली कहलाते है । उन सयोगी केवली भगवान् के सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नाम तीसरा शुक्ल ध्यान होता है ।


विग्घ विणासे पावइ अणंतरहियं च वीरियं परमं ।
उच्चइ सजोइकेवलि तइय ज्झाणेण सो तइया ॥667॥

गाथार्थ: ज्ञानावरण कर्म के नाश होने से उन परमात्मा स्वरूप भगवान् के अनंत ज्ञान प्रगट हो जाता है, दर्शना वरण कर्म के नाश होने से अनन्त दर्शन प्रगट हो जाता है, मोहनीय कर्म के अत्यन्त नाश होने म अनंत सुख प्राप्त हो जाता है अतराय कर्म का अत्यन्त नाश होने से अनंत वीर्य प्रगट हो जाता है । इस प्रकार वे भगवान् अनंत चतुष्टय को धारण कर सयोगी केवली कहलाते है । उन सयोगी केवली भगवान् के सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नाम तीसरा शुक्ल ध्यान होता है ।


सुद्धोखाइयभावो अवियप्पो णिच्चलो जिणिंदस्स ।
अत्थि तया तं झाणं सुहुम किरिया अपडिवाई ॥668॥

गाथार्थ: तेंरहवें गुण स्थान वर्ती केवली भगवान् जिनेन्द्र देव के शुद्ध क्षायिक भाव होतें है तथा वे भाव विकल्प रहित होते है और निश्चल होते है । इस तेरहवे गुण स्थान में सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति नाम का तीसरा शुक्ल ध्यान होता है ।


परिफंदो अइसुहमो जीव पसायेण अत्थि तवकाले ।
तेणाणू आइद्दा आसविय पुणो विविहडंति ॥669॥

गाथार्थ: इस तेरहवें गुण स्थान मे रहनेवाले भगवान् जिनेन्द्र देव के जीव क प्रदेशों का परिस्पंदन अत्यन्त सूक्ष्म होता है इसी लिये शुभ कर्मों की वर्गणाए आतीं है और उसी समय चली जाती है । उनके आत्मा के प्रदेशों में वे कर्म वर्गणाए ठहरती नहीं है ।


जे णत्थि राय दोसो तेण ण वंधोहु अत्थि केवलिणो ।
जह सुक्क कुड्डु लग्गा वालू झडियंति तह कम्मं ॥670॥

गाथार्थ: उन केवली भगवान् के राग द्वेष कर्म का सर्वथा अभाव हो जाता है इसलिये उनके कर्मों का बंध कभी नही होता । जिस प्रकार सुखी दीवाल पर लगीं हुइ बालू उसी समय झड जाती है । सूखी दीवाल पर बालू ठहरती नहीं उसी प्रकार बिना राग द्वेष के आत्मा के प्रदेशों मे कर्म भी नहीं ठहरते है ।


ईहा रहिया किरिया गुण वि सव्वे वि खाइया तस्स ।
सुक्खं सहावजायं कमकरण विवज्जियं णाणं ॥671॥

गाथार्थ: भगवान् जिनेन्द्र देव की विहार, दिव्य ध्वनी आदि क्रियाएं सब ईहा रहित वा इच्छा रहित होती है । इसका भी कारण यह है कि राग द्वेष के साथ ही उनकी इच्छाए सब नष्ट हो जाती है । इसीलिये उनकी समस्त क्रियाएं इच्छा रहित होती है, उनके समस्त गुण क्षायिक ही होते है उनका सुख स्वात्म जन्य स्वाभाविक ही होता है और उनका ज्ञान इन्द्रियों से रहित और अनुक्रम से रहित होता है ।


णाणेणं तेण जाणइ कालत्तय वट्टिए तिहुवणत्थे ।
भावे समे य विसमे सच्चेयणा चेयणे सव्वे ॥672॥

गाथार्थ: वे भगवान् उस अपने केवल ज्ञान से तीनों लोकों में रहने वाले सयस्त चेतन अचेतन पदार्थों को तथा सम विषम पदार्थो को और भूत भविष्यत् वर्तमान सम्बन्धी उन समस्त दार्थों की अनंतानंत पर्यायों को एक समय में ही जान लेते है ।


एक्कं एक्कम्मि खणे अणंतपज्जायगुण समाइण्णं ।
जाणइ जह तह जाणइ सव्वइं दव्वाइं समयम्मि ॥673॥

गाथार्थ: जिस प्रकार वे भगवान् किसी एक पदार्थ को उसकी अनंतानंत पर्याय और उसके समध्त गुणों कों एक ही समय में जान लेते है उसी प्रकार वे भगवान् एक ही समय मे समस्त द्रव्य उनकी समस्त पर्यायें और उनके समस्त गुण एक ही समय में जान लेते है ।


जाणंतो पिच्छंतो कालत्तयवट्टियाइं दव्वाइं ।
उत्तो सो सव्वण्हू परमप्पा परम जोइहि ॥674॥

गाथार्थ: वे केवली भगवान् सदा काल भूत भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालों में हुए वा होने वाले समस्त पदार्थों को वा पदार्थों की पर्यायों को एक साथ देखते है और एक साथ जानते है। इसलिये परम योगी गणधर देव उनको सर्वज्ञ और परमात्मा कहते है।


तित्थयरत्तं पत्ता जे ते पावंति समव सरणाइं ।
सक्केण कयविहूई पंचक्कल्लाण पुज्जाय ॥675॥

गाथार्थ: उन केवलियों में से जिनके तीर्थंकर प्रकृति का उदय होत है वे इन्द्रों के द्वारा की हुई समवसरण आदि की महा बिभूति को प्राप्त होते है तथा गर्भ कल्याणक जन्म कल्याणक दीक्षा कल्याणक ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक इन पांचों कल्याणकों में होने वाली परमोत्कृष्ट पूजा को प्राप्त होते है ।


सम्मुग्घाई किरिया णाणं तह दंसणं च सुक्खं च ।
सव्वेसिं सामण्णं अरहंताणं च इयराणं ॥676॥

गाथार्थ: जिनके तीर्थंकर प्रकृति का उदय है ऐसे अरहंत केवली तथा जिनके तीर्थकर प्रकृति उदय नहीं है ऐसे सामान्य केवली इन दोनों प्रकार के केवली भगवान् के समुद्धात क्रिया, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत बीर्य ये सब समान होते है इसमे किसी प्रकार का अन्तर नहीं होता ।


जेंसि आयु समाणं णामं गोदं च वेयणीयं च ।
ते अकय समुग्धाया सेसा य कयंति समुग्घायं ॥677॥

गाथार्थ: जिन केवली भगवान् के नाम कर्म गोत्र कर्म और वेदनीय कर्म की स्थिति आयु कर्म के समान होती है वे केवली समुद्धात नहीं करते तथा जिनके नाम गोत्र वेदनीय की स्थिति आयु कर्म से अधिक होती है वे केवली भगवान् नाम गोत्र वेदनीय कर्मों की स्थिति को आयु कर्म की स्थिति के समान करने के लिये समुद्धात करते है ।


अंतर मुहुत्त कालो हवइ जहण्णो वि उत्तमो तेसिं ।
गयवरिसूणा कोडी पुव्वाणं हवइ णियमेण ॥678॥

गाथार्थ: इस तेरहवें गुण स्थान की स्थिति जघन्य अंतर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति जितने वर्ष की आयु में केवल ज्ञान हुआ है उतने वष कम एक करोड पूर्व है ।


पच्छा अजोइकेवलि हवइ जिणो अघाइ कम्महणमाणो ।
लहु पंचक्खर कालो हवइ फुडं तम्मि गुण ठाणे ॥679॥

गाथार्थ: तेरहवे गुण स्थान के अनन्तर चौदहवां गुण स्थान होता है । चौदहवे गुण स्थान का नाम अयोगी केवली है । घातिया कर्मों का नाश कर भगवान् तेरहवें सयोगी केवली गुण स्थान मे आते है और चौदहवे गुण स्थान मे आकर अन्त में अघातिय कर्मो का नाश कर सिद्ध अवस्था प्राप्त करते है । इस गुण स्थान का काल लघु पंचाक्षर उच्चारण मात्र है अर्थात् जितनी देर में अ इ उ ऋ लृ इन पांचों ह्रस्व अक्षरों का उच्चारण होता है उतना काल इस चौदहवे गुण स्थान का काल है ।


परमोदालिय कायं सिढिलं होऊण गलइ तक्काले ।
थक्कइ सुद्ध सुहावो घण णिविड पएस परमप्पा ॥680॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान के अन्त मे उनका वह परमौदारिक शरीर शिथिल होकर गल जाता है । तथा उनके घनीभूत निविड आत्मा के प्रदेश शुद्ध स्वभाव रूप होकर रह जाते है और इस प्रकार वे भगवान् परमात्मा हो जाते है ।


णट्ठा किरिय पवित्ती सुक्कज्झाणं च तत्थ णिद्दिट्ठं ।
खाइय भावो सुद्धो णिरंजणो बीयराओ य ॥681॥

गाथार्थ: इस गुण स्थान मे समस्त क्रियाओं की प्रवुत्ति नष्ट हो जाती है, तथा चौथा व्युपरत क्रिया निवृत्ति नाम का शुक्ल ध्यान होता है । इस गुण स्थान में क्षायिक और शुद्ध भाव होते है और इसीलिये वे भगवान् निरंजन और परम वीतराग हो जाते है ।


झाणं सजोइ केवलि जह तह अझोइस्स णत्थि परमत्थे ।
उवयारेण पउत्तं भूयत्थणय विवक्खाए ॥682॥

गाथार्थ: जिस प्रकार सयोग केवली भगवान् के ध्यान होता है उस प्रकार का ध्यान भी इस गुण स्थान ने नहीं होता । इस गुण स्थान में वास्तव मे ध्यान होता ही नहीं है । इस गुण स्थान में भूतार्थ नय की अपेक्षा से (पूर्वकाल नय की अपेक्षा से) उपचार से ध्यान माना जाता है । कर्मों का नाश बिना ध्यान के नही होता और चौदहवें गुण स्थान में अघातिया कर्मों का नाश होता है । इसलिये उपचार से ध्यान माना जाता है वास्तविक नहीं ।


झाणं तह झायारो झेयवियप्पा य होंति मणसहिए ।
तं णत्थि केवलि दुगे तम्हा झाणं ण संभवइ ॥683॥

गाथार्थ: ध्यान, ध्यान करने वाला ध्याता और ध्यान करने योग्य ध्येय पदार्थों के विकल्प ये सब मन सहित जीवों के होते है। परन्तु वह मन सयोगी केवली तथा अयोगी केवली दोनों गुण स्थान वालों के नहीं है। इसलिये इन तेरहवे और चौदहवे गुण स्थानों में ध्यान नहीं है।


मणसहियाणं झाणं मणो विकम्माण कायजोयाओ ।
तत्थ वियप्पो जायइ सुहासुहो कम्म उदाएण ॥684॥

गाथार्थ: जो जीव मन सहित है उन्ही के ध्यान होता है । तथा मन की प्रवृत्ति कार्मण काय योग से होती है । तथा जहां पर कार्मण काय योग के निमित्त म मन की प्रवृत्ति होती है वहां पर कर्म का उदय होने से शुभ वा अशुभ विकल्प भी उत्पन्न होंते है ।


असुहे असुहं झाणं सुहझाणं होइ सुहोपजोगेण ।
सुद्धे सुद्धं कहियं सासवाणासवं दुविहं ॥685॥

गाथार्थ: जहां पर अशुभ विकल्प वा अशुभोपयोग होता है वहां पर अशुभ ध्यान होता है, जहां पर शुभ विकल्प वा शुभोपयोग होता है वहां पर शुभ ध्यान होता है । तथा जहां पर शुभ अशुभ कोई विकल्प नहीं होता केवल शुद्ध उपयोग होता है वहां पर शुद्ध ध्यान होता है । यह शुद्ध ध्यान दो प्रकार का होता है, जिसमे नास्रव होता रहै ऐसा आस्रव सहित शुक्ल ध्यान और जिसमें आस्रव न हो ऐसा आस्रव रहित शुद्ध ध्यान वा शुक्ल ध्यान ।


पढमं बीयं तइयं सासवयं होइ इय जिणो भणइ ।
विगयासवं चउत्थं झाणं कहियं सभासेण ॥686॥

गाथार्थ: शुक्ल ध्यान के चार भेद है उनमे से पहला शुक्ल ध्यान, दूसरा शुक्ल और तीसरा शुक्ल ध्यान ये तीनों शुक्ल ध्यान आस्त्रव सहित होते है अर्थात् इनमें कर्मों का आस्त्रव होता रहता है और चौथा शुक्ल ध्यान निरास्त्रव है आस्त्रव रहित, उसमें किसी कर्म का आस्त्रव नहीं होता ऐसा भगवान् जिनेन्द्र देव नें कहा है । इस प्रकार संक्षेप से इन ध्यानों का स्वरुप है ।


णठ्ठट्ठ पयडिबंधो चणमसरीरेण होइ किंचूणो ।
उड्ढं गमणसहावो समएणिक्केण पावेइ ॥687॥

गाथार्थ: चौदहवे गुण स्थान के अन्तिम समय मे जब आठों प्रकार का प्रकृतिबंध नष्ट हो जाता है अर्थात् समस्त कर्म नष्ट हो जाते है तब उनकी सिद्ध अवस्था प्राप्त हो जाती है । उस सिद्ध अवस्था में आत्मा का आकार चरम शरीर से कुछ कम होता है । अर्थात् उस आत्मा के आकार का घनफल शरीर के आकार के घनफल से कुछ कम होता है शरीर मे जहां जहां आत्मा के प्रदेश नहीं है ऐसे पेट नासिका के छिद्र कान के छिद्र आदि में आत्मा के प्रदेश वहां भी नहीं इसलिये सिद्धों के आत्मा के आकार के घनफल में उतने स्थान को घनफल कम हो जाता है । इसलिये चरम शरीर के आहार के घनफल से सिद्धों के आत्मा के आकार का घनफल कुछ कम हो जाता है । इसलिये सिद्धों आकार चरम शरीर से कुछ कम बतलाया है । आत्मा का स्वभाव से ही ऊर्ध्व गमन करता है इसलिय कर्म नष्ट होने के अनन्तर एक ही समय में सिद्ध स्थान पर जाकर बिराजमान हो जाता है ।


लोयग्ग सिहर खत्ते जावं तणुपवण उवरिय भायं ।
गच्छइ ताम अथक्को धम्मत्थित्तेण आयासो ॥688॥

गाथार्थ: इस लोक शिखर के ऊपर के क्षेत्र मे तनुवातवल्य के ऊपरी भाग पर जहां तक के वे सिद्ध परमेष्ठी एक ही समय मे पहुँच जाते है।


तत्तोपरंण गच्छइ अच्छइ कालं तु अन्तपरिहीणं ।
जम्हा अलोय खित्ते धम्मद्दव्वं णं तं अत्थि ॥689॥

गाथार्थ: अलोकाकाश में द्रव्य नहीं है । धर्म द्रव्य लोकाकाश में ही है । लोकाकाश और अलोकाकाश का विभाग करने वाले धर्म द्रव्य वा अधर्म द्रव्य ही है । जहां तक धर्म द्रव्य है वही तक जीव वा पुद्गल गमन कर सकते है तथा जहां तक अधर्म द्रव्य है वहां तक ठहर सकते है, बिना धर्म द्रव्य के ठहर सकते है । इसलिये वे सिद्ध परमेष्ठी जहां तक धर्म द्रव्य है वही लोक शिखर के ऊपर भाग तक जाकर ठहर जाते है और फिर वे भगवान् वहां पर अनंतानंत काल तक विराजमान रहते है ।


जो जत्थ कम्ममुक्को जल थल अयास पव्वए णयरे ।
सो रिजुगई पवण्णो माणुस क्षेत्ताउ उप्पधइ ॥690॥

गाथार्थ: सिद्ध परमेष्ठी मनुष्य क्षेत्र से ही उत्पन्न होते है तथा उनकी गति ऋजु गति होती है जिस क्षेत्र में कर्म नष्ट होते है । उसी क्षेत्र की सीध में वे सिद्ध स्थान पर जा कर विराजमान हो जाते है । जल स्थल आकाश पर्वत नगर जहां से भी कर्म मुक्त होंगे उसी की सीध मे सीधे जाकर वे लोक शिखर पर विराजमान हो जायेंगे । मनुष्य क्षेत्र का परिणाम पैंतालीस लाख योजन है । इसलिये पैंतालीस लाख योजन के आकाश में ही सिद्धों का निवास स्थान है जंबूद्वीप की चौडाई एक लाख योजन है उसके चारों ओर लवण समुद्र है उसकी एक ओर की चौडाई दो लाख योजन है । लवण समुद्र के चारों ओर घातकी द्वीप है उसकी चौडाई एक ओर की चार लाख योजन है। घात की द्वीप के चारों ओर कालोद समुद्र है उसकी एक ओर कीं चौडाई आठ लाख योजन है । कालोद समुद्र के चारों ओर पुष्कर द्वीप है उसकी पूरी चौडाई सोलह लाख योजन है । परन्तु पुष्कर द्वीप के ठीक मध्य भाग में मानुषोत्तर पर्वत है तथा मानुषोत्तर पर्वत तक ही मनुष्य क्षेत्र गिना जाता है । इसलिये आधे पुष्कर द्वीप की चौडाई आठ लाख योजन ही समझनी चाहिये । इस प्रकार मानुषोत्तर पर्वत पूर्व भाग से पश्चिम भाग तक वा उत्तर से दक्षिण तक पैंतालीस लाख योजन ही हांते है ।


पणयालसहसहस्सा माणुस खेत्तं तु होइ परिमाणं ।
सिद्धाणां आवासो तित्तिय मित्तम्मि आयासे ॥691॥

गाथार्थ: योजन है । कालोद समुद्र के चारों ओर पुष्कर द्वीप है उसकी पूरी चौडाई सोलह लाख योजन है । परन्तु पुष्कर द्वीप के ठीक मध्य भाग में मानुषोत्तर पर्वत है तथा मानुषोत्तर पर्वत तक ही मनुष्य क्षेत्र गिना जाता है । इसलिये आधे पुष्कर द्वीप की चौडाई आठ लाख योजन ही समझनी चाहिये । इस प्रकार मानुषोत्तर पर्वत पूर्व भाग से पश्चिम भाग तक वा उत्तर से दक्षिण तक पैंतालीस लाख योजन ही होते है ।


सव्वे उवरिं सरिसा बिसमाहिट्ठम्मि णिच्चलपएसा ।
अवगाहणाय जम्हा उक्कस्स जहण्णिया दिठ्ठा ॥692॥

गाथार्थ: उस सिद्ध स्थान में अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठी विराजमान है । उन समस्त सिद्धों का ऊपरी भाग समान होता है तथा नीचे का भाग ऊँचा नीचा रहता है । इसका भी कारण यह है कि सिद्धों की अवगाहना उत्कृष्ट सवा पांच सौ धनुष है और जघन्य अवगाहना साडे तीन अरन्ति है । मुठ्ठी बांधकर एक हाथ की लम्बाई को अरत्नि कहते है जिस आसन से जिस स्वरुप से जैसे शरीर से कर्म मुक्त होते है उसी आसन से उसी रुप से और उसी शरीर के समान उनके आत्माका आकार हो जाता है इसलिये ऊपर का भाग तो सबका समान होता है और नीचे का भाग समान नही होता ।


एगोवि अणंताणं सिद्धो सिद्धाण देइ अवगासं ।
जम्हा सुहमत्तगुणो अवगाह गुणो पुणो तेसिं ॥693॥

गाथार्थ: एक सिद्ध की आत्मा मे अनंतानंत सिद्ध समा जाते हैं । इसका भी कारण यह है कि आत्मा अमूर्त है, इसलिये उनमे सूक्ष्मत्व गुण है । इसके सिवाय उनमें अवगाहनत्व गुण भी है । सूक्ष्म और अवगहनाव गुण के कारण एक सिद्ध मे भी अनंतानंत सिद्ध आ जाते है । दीपक का प्रकाश मूर्त है फिर भी एक आले में अनंत दीपको का प्रकाश समा जाता है फिर सिद्धों का आत्मा तो अमूर्त है इसलिये एक सिद्ध मे भी अनंत सिद्धों का आत्मा आ जाता है ।


सम्मत्तणाणदंसण बीरिय सुहमं तहेव अवगहणं ।
अगुरु लहुअब्बवाहं अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ॥694॥

गाथार्थ: सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन वीर्य सूक्ष्मत्व अवगाहन, अगुरु लघु अव्यावाध ये आठ गुण सिद्धों मे होते है ।


जाणइ पिच्छइ सपलं लोयालोयं च एक्कहेलाए ।
सुक्खं सहाव जायं अणोवमं अंतपरिहीणं ॥695॥

गाथार्थ: वे सिद्ध भगवान् एक ही समय मे समस्त लोकाकाश और समस्त अलोकाकाश को जानते है तथा सबको एक ही साथ एक ही समय मे देखते है। उन समस्त सिद्धों का सुख शुद्ध आत्मा अन्य स्वाभाविक है, संसार के सुख की तथा उनकी कोई उपमा नहीं है और न कभी उन सिद्धो का अन्त होता है। वे सदा काल विराजमान रहते है।


रवि मेरु चंदसायरगयणाईयं तु णत्थि जह लोए ।
उवमाणं सिद्धाणं णत्थि तहा सुक्खसंघाए ॥696॥

गाथार्थ: सूर्य, चन्द्रमा, मेरु पर्वत समुद्र आकाश आदि इस लोक संबधी समस्त पदार्थ सिद्धों के उपमान नहीं हो सकते, अर्थात् संसार मे ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिसकी उपमा सिद्धों को दे सकें । इसी प्रकार उनके अनन्तसुखका भीं कोई उपमान नहीं है ।


चलणं वलणं चिंता करणीयं किं पिणत्थि सिद्धाणं ।
जम्हा अइंदियत्तं कम्माभावे समुप्पण्णं ॥697॥

गाथार्थ: उन सिद्ध परमेष्ठी को न कहीं गमन करना पडता है, न अन्य कोई क्रिया करनी पडती है और न किसी प्रकार की चिंता करनी पडती है । इसका भी कारण यह है कि उनके समस्त कर्मों का अभाव हो गया है इसलिये उनके अतीन्द्रियत्व प्राप्त हो गया है ।


णट्ठट्ठ कम्मबंधण जाइ जारामरण विप्पमुक्काणं ।
अट्ठवरिट्ठगुणाणं णमोणमो सव्व सिद्धाणं ॥698॥

गाथार्थ: जिनके आठों कर्मों का बंधन नष्ट हो गया है, जन्म मरण बुढापा आदि सांसारिक समस्त दोष जिनके नष्ट हो गये है और ऊपर लिखे सर्व श्रेष्ठ आठ गुण प्रगट हो गये है ऐसे सिद्ध परमेष्ठी को मैं श्री देवसेन आचार्य बार बार नमस्कार करता हूँ ।


जिणवर सासण मतुलं जयउ चिरं सूरि सपर उवयारी ।
पाढय सांहूवि तहा जयंतु भव्वा वि भुवणयले ॥699॥

गाथार्थ: संसार में जिसका कोई उपमा नहीं ऐसा यह भगवान् जिनेन्द्र देव का कहा हुआ शासन सदाकाल जयशील रहे । इसी प्रकार अपने आत्मा कल्याण करने वाले और अन्य अनेक भव्य जीवों का कल्याण करने वाले आचार्य परमेष्ठी सदा काल जयशील रहे । इसी प्रकार उपाध्याय परमेष्ठी तथा साधु परमेष्ठी सदा काल जयवंत रहे तथा तीनों लोकों मे रहने वाले भव्य जीव भी सदा जयवंत रहे ।


जो पढइ सुणइ अक्खइ अण्णेसिं भाव संगहं सुत्तं ।
सहृणइ णियय कम्मं कमेण सिद्धालयं जाइ ॥700॥

गाथार्थ: इस प्रकार कहे हुए इस भाव संग्रह के सूत्रों को जो पढता है सुनता है अथवा अन्य भव्यजीवों को सुनाता है वह पुरुष अनुक्रम से से अपने कर्मों को नाश कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त करता है ।


सिरिविमलसेण गणहर सिस्सो णामेण देवसेणोत्ति ।
अवुह जण वोहणत्थं तेणेयं विरइयं सुत्तं ॥701॥

गाथार्थ: श्री विमलसेन गणधर वा आचार्य के शिष्य श्री देवसेन आचार्य ने अज्ञानी लोगों को समझाने के लिये इस भावसंग्रह सूत्र की रचना की है ।