विरताविरत गुणस्थान: दान, दान के भेद, विधि और फल (गाथा 489 से 599)
अभय पयाणं पढमं विदियं तह होइ सत्थ दाणं च ।
तइयं ओसह दाणं आहारदाणं चउत्थं च ॥489॥
गाथार्थ: दान के चार भेद है पहला अभयदान, दूसरा शास्त्रदान, तीसरा औषधदान और चौथा आहार दान ।
सव्वेसिं जीवाणं अभयं जो देइ मरणभीरुणं ।
सो णिब्भओ तिलोए उत्तस्सो होइ सव्वेसिं ॥490॥
गाथार्थ: जो जीव अपने मरने से भयभीत हो रहे है ऐसे समस्त जीवों को जो अभयदान देता है वह पुरुष तीनो लोकों में निर्भय होता है और सब मनुष्यों मे उत्कृष्ट होता है ।
सुयदाणेण प लब्भइ मइ सुइ णाणं च ओहिमणणाणं ।
बुद्धितवेणय सहियं पच्छा वर केवलं णाणं ॥491॥
गाथार्थ: जो पुरुष शास्त्रदान देता है, जिनागम को पढ़ाता है वह पुरुष मति ज्ञान श्रुतज्ञान दोनों को पूर्ण रुप से प्राप्त करता है, बुद्धि और तपश्चरण के साथ साथ अवधि ज्ञान और मनः पर्यय ज्ञान को प्राप्त करता है ।
ओसहदाणेण णरो अतुलिम बलपरक्कमोमहासत्तो ।
वाहि विमुक्क सरीरो चिराउ सो होइ तेयठ्ठो ॥492॥
गाथार्थ: जो पुरुष औषध दान देता है वह अतुलित वा सर्वोत्कृष्ट बल और पराक्रम को धारण करता है महाशक्ति को धारण करता है, वह चिरायु होता है, तेजस्वी होता है और उसका शरीर समस्त रोग व्याधियों से रहित होता है।
दाणस्साहारं फलं को सक्कइ वण्णिऊण भुवणयले ।
दिण्णेण जेण भोओ लब्भंति मणिच्छियासव्वे ॥493॥
गाथार्थ: इन तीनों लोकों मे आहार दान के फल को वर्णन करने के लिये भला कौन समर्थ है ।
दायारो वि य पत्तं दाण विसेसो तहा विहाणं च ।
एए चउ अहियारा णायव्वा होंति भव्वेण ॥494॥
गाथार्थ: भव्य जीवों को सबसे पहले दान देने के चार अधिकार समझ लेने चाहिये । दाता, पात्र, दान, देने योग्य द्रव्य और देनें की विधि ये चार अधिकार है ।
दान देने वाले को दाता कहते है जिसको दान दिया जाता है वह पात्र कहलाता है, दान में जो द्रव्य दिया जाता है वह दान विशेष है और दान देने के नियमों को विधि कहते है ।
दायारो उवसंतो मणवय काएण संजुओ दच्छो ।
दाणे कयउच्छाहो पयडय वर छग्गुणो अमये ॥495॥
गाथार्थ: जो भव्य जीव शांत परिणामों को धारण करता है, जो मन वचन काय से दान देने में लगा हो अत्यन्त चतुर हो, दान देने में जिसका उत्साह हो, जो मद वा अभिमान रहित हो और दातां के छह गुणों से सुशोभित हो ऐसा भव्य जीव दात गिना जाता है ।
भत्ती तुठ्ठी य खमा सद्धा सत्तं च लोहपरिचाओ ।
विउणाण तक्काले सत्तगुणा होंति दायारे ॥496॥
गाथार्थ: जिनको दान देना है उनमें जिसकी भक्ति हो, दान दने में जिसको संतोष हो, क्षमा को धारण करने वाला हो, देव शास्त्र गुरु में वा पात्र में श्रद्धा रखता हो, दान देने की शक्ति रखता हो, जिसके लोभ का त्याग हो और दान देने में क्या क्या करना चाहिये इस बात का जिसको पूरा ज्ञान हो वही उत्तम दाता कहलाता है ।
तिविहं भणंति पत्तं मज्झिम तह उत्तमं जहण्णं च ।
उत्तम पत्तं साहू मज्झिमपत्तं च सावया भणिया ॥497॥
गाथार्थ: पात्र तीन प्रकार के है उत्तम पात्र मध्यम पात्र और जघन्य पात्र । इनमें उत्तम पात्र रत्नत्रय को धारण करने वाले निर्ग्रन्थ मुनि है मध्यम पात्र अणुव्रती श्रावक हे और जघन्य पात्र अविरत सम्यग्दृष्टि पुरुष है । ऐसा शास्त्रों मे निरूपण किया है। इसलिये भव्य जिवों को इन पात्रों के भेद और विशेषता समझकर भक्ति पूर्वक दान देना चाहिये ।
अविरइ सम्मादिट्ठी जहण्ण पत्तं तु अक्खियं समये ।
णाउण पत्तविसेसं दिज्जइ दाणाइ भत्तीए ॥498॥
गाथार्थ: पात्र तीन प्रकार के है उत्तम पात्र मध्यम पात्र और जघन्य पात्र । इनमें उत्तम पात्र रत्नत्रय को धारण करने वाले निर्ग्रन्थ मुनि है मध्यम पात्र अणुव्रती श्रावक हे और जघन्य पात्र अविरत सम्यग्दृष्टि पुरुष है । ऐसा शास्त्रों मे निरूपण किया है। इसलिये भव्य जिवों को इन पात्रों के भेद और विशेषता समझकर भक्ति पूर्वक दान देना चाहिये ।
मिच्छादट्ठी दुरिसो दाणं जो देइ उत्तमे पत्ते ।
सो पावइ वर भोए फुड उत्तम भोय भूमीसु ॥499॥
गाथार्थ: यदि कोई मिथ्यादृष्टी पुरुष किसी उत्तमपात्र को दान देता है तो वह पुरुष उत्तम भोगभूमि के उत्तम भोगों को प्राप्त होता है।
मज्झिम पत्ते मज्झिम भोयभूमीसु पावए भोए ।
पावइ जहण्ण भोए जहण्ण पत्तस्स पाणेण ॥500॥
गाथार्थ: यदि मिथ्या दृष्टि पुरुष किसी मध्यम पात्र को दान देता है तो वह मध्यम भोग भूमि के भोगों को प्राप्त होता है और यदि वही मिथ्या दृष्टि पुरुष किसी जघन्य पात्र को दान देता है तो वह जघन्य भोग भूमि में जन्म लेकर वहां के भोगों का अनुभव करता है ।
उत्तम छित्ते बीयं फलइ जहा लक्ख कोडि गुण्णेंहि ।
दाणं डत्तम पत्ते फलइ तहा किमिच्छ भणिएण ॥501॥
गाथार्थ: जिस प्रकार उत्तम पृथ्वीपर बोया हुआ बीज लाखों गुणा या करोडों गुणा फलता है उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया हुआ दान इच्छानुसार फलको देता है ।
समादिट्ठी पुरिसो उत्तम पुरिसस्स दिण्ण दाणेण ।
उववज्जइ दिव लोए हवइ स महड्ढिओ देओ ॥502॥
गाथार्थ: यदि कोई सम्यग्दृष्टी पुरुष उत्तम पात्र को दान देता है तो वह स्वर्ग लोक में जाकर महा ऋद्धियों को महा विभूतियों को धारण करने वाला उत्तम देव होता है।
जह णीरं उच्छुगयं कालं परिणवइ अमिय रूवेण ।
तह दाणं वर पत्ते फलेइ भोएहिं विविहे हिं ॥503॥
गाथार्थ: जिस प्रकार ईख के खेत में दिया हुआ पानी अपने समय पर अमृतरुप ( मीठे रसरुप ) परिणत हो जाता है उसी प्रकार उत्तम पात्र को दिया हुआ दान अपने समय पर अनेक प्रकार के भोगों से फलत है।
उतमरयणं खु जहा उत्तम पुरिसासियं च वहुमुल्लं ।
तह उत्तम पत्तगयं दाणं णिउणेहि णायत्वं ॥504॥
गाथार्थ: जिस प्रकार कोई उत्तम रत्न किसी उत्तम पुरुष के आश्रय से बहूमुल्य माना जाता है उसी प्रकार किसी उत्तम पात्र को दिया हुआ दान विद्वान् लोगों के द्वारा सर्वोत्तम माना जाता है ऐसा समझना चाहिये ।
किंचिवि वेयमयं पत्तं किंचिवि पत्तं तवोभयं परमं ।
तं पत्तं संसारे तारकयं होइ णियमेण ॥505॥
गाथार्थ: अन्य प्रकार से पात्रों के और भी दो भेद है। एक तो थोडे वा बहुत वेद को जानने वाले को वेदमय पात्र और दूसरे थोडा बहुत परमोत्कृष्ट तपश्चरण करने वाले को तपोमय पात्र ऐसे पात्र के दो भेद है, ये दोनों प्रकार के पात्र नियम पूर्वक संसार से पार कर देने वाले होते है ।
वेओ किल सिद्धंतो तस्सट्ठा णवपयत्थ छद्दव्वं ।
गुण मग्गणठाणाविय जीवट्ठाणाणि सव्वाणि ॥506॥
गाथार्थ: वेद शब्द का अर्थ सिद्धांत शास्त्र है, जो पुरुष सिद्धांत शास्त्रों को तथा उसके अर्थ को जानता है, नौ पदार्थों के स्वरुप को छहों द्रव्यों के स्वरुप को जानता है, समस्त गुणस्थान, मार्गणा स्थान और जीवस्थानों को जानता है, पममात्माके स्वरुप को जानता है, जीवों का स्वभाव कर्मों का स्वभाव और कर्म विशिष्ट जीव्रो का स्वभाव जानता है तथा इन सबका स्वरुप विशेष रीति से जानता है उसको वेदमय पात्र कहते है ।
परमप्पयस्स रूवं जीव कम्माण उहय सब्भावं ।
जो जाणइ सविसेसं वेयमयं होइ तं पत्तं ॥507॥
गाथार्थ: वेद शब्द का अर्थ सिद्धांत शास्त्र है, जो पुरुष सिद्धांत शास्त्रों को तथा उसके अर्थ को जानता है, नौ पदार्थों के स्वरुप को छहों द्रव्यों के स्वरुप को जानता है, समस्त गुणस्थान, मार्गणा स्थान और जीवस्थानों को जानता है, पममात्माके स्वरुप को जानता है, जीवों का स्वभाव कर्मों का स्वभाव और कर्म विशिष्ट जीवो का स्वभाव जानता है तथा इन सबका स्वरुप विशेष रीति से जानता है उसको वेदमय पात्र कहते है ।
वहिरब्भंतर तवसा कालो परिखवइ जिणोवएसेण ।
दिढ बंभचेर णाणी पत्तं तु तवोमयं भणियं ॥508॥
गाथार्थ: जो पुरुष भगवान् जिनेन्द्र देव के कहे हुए बाह्य और अभ्यंतर तपश्चरण के द्वारा अपना समय व्यतीत करता है तथा जो अपने ब्रह्मचर्य व्रत को दृढता के साथ पालन करता है और सम्यग्ज्ञान को धारण करता हे उसको तपोमय पात्र कहते है । इस प्रकार वेदमय और तपोमय दो प्रकार के पात्र वतलाये । आगे उदाहरण देकर पात्रदान का फल वतलाते है ।
जह णावा णिच्छिदा गुणमइया विविह रयण परिपुण्णा ।
तारइ पारावारे वहु जलयर संकडे भीमे ॥509॥
गाथार्थ: जिस प्रकार अनेक प्रकार के रत्नों से भरी हुई और नाव में होने वाले अनेक गुणों को धारण करने वाली बिना छिद्रवाली नाव अनेक जलचर जीवों से भरे हुए और अत्यंत भयानक एसे समुद्र से पार कर देती है उसी प्रकार अधिक अधिक गुणों से सुशोभित होने वाला पात्र जो जन्म जरा मरण रूपी विकट जलचर जीवों से भरा हुआ है और जिसमें हजारों दुःखरूपी भंवर पड रहे है ऐसे इस संसार समुद्र से भव्य जीवों को पार कर देता है । इस प्रकार संक्षेप से पात्रों का स्वरूप बतलाया ।
तह संसार समुद्दे जाइ जरामरण जलयरा किण्णे ।
दुक्ख सहस्सावत्ते तारेइ गुणाहियं पत्तं ॥510॥
गाथार्थ: जिस प्रकार अनेक प्रकार के रत्नों से भरी हुई और नाव में होने वाले अनेक गुणों को धारण करने वाली बिना छिद्रवाली नाव अनेक जलचर जीवों से भरे हुए और अत्यंत भयानक ऐसे समुद्र से पार कर देती है उसी प्रकार अधिक अधिक गुणों से सुशोभित होने वाला पात्र जो जन्म जरा मरण रूपी विकट जलचर जीवों से भरा हुआ है और जिसमें हजारों दुःखरूपी भंवर पड रहे है ऐसे इस संसार समुद्र से भव्य जीवों को पार कर देता है । इस प्रकार संक्षेप से पात्रों का स्वरूप बतलाया ।
कुच्छिगयं जस्सउणं जीरइ तवझाणवंभ चरिएहिं ।
सो पत्तो णित्थारइ अप्पाणं चेव दायारं ॥511॥
गाथार्थ: जिसका जो अन्न पेटमें पहुंचने पर तपश्चरण ध्यान और ब्रह्मचर्य रादि के द्वारा सुखपूर्वक जीर्ण हो जाय पच जाय वही अन्न पात्र को भीं ससार से पार कर देता है और दान देने वाले दाता को भी संसार से पार कर देंता है ।
एरिस पत्तम्मि वरे दिज्जइ आहारदाणमणवज्जं ।
पासुय सुद्धं अमलं जोग्गं मणदेह सुक्खयरं ॥512॥
गाथार्थ: इस प्रकार कहे हुए उत्तम पात्रों को निरन्तर आहार दान देना चाहिये। वह आहार निर्दोष ही प्रासुक हो, शुद्ध हो, निर्मल हो, योग्य हो और मन तथा शरीर को सुख देने वाला हो।
कालस्स य अणुरूवं रोयारोयत्तणं च णाऊणं ।
दायव्वं जह जोग्गं आहारं गेहवंतेण ॥513॥
गाथार्थ: गृहस्थों को यथा योग्य ऐसा आहार दान देना चाहिये जो समय वा ऋतुओं के अनुकूल हो, तथा जिसमे रोग वा नीरोगता का भी विचार हो ।
पत्तस्सेस सहावी जं दिण्णं दायगेण भत्तीए ।
तं कर पत्ते सोहिय गहियव्वं विगइरायेण ॥514॥
गाथार्थ: पात्रका भी यह स्वभाव होना चाहिए कि दाता ने जो भक्तिपूर्वक दान दिया है उसको कर पात्र में लेना चाहिये और उसको शोधकर बिना किसी राग द्वष के ग्रहण कर लेना चाहिये ।
दायारेण पुणो विय अप्पाणो सुक्ख मिच्छमाणेण ।
देयं उत्तम दाणं विहिणा वरणीय सत्तीए ॥515॥
गाथार्थ: जो दाम देने वाला दाता अपने आत्मा को सुख पहुँचना चाहता है उसको विधि पूर्वक ऊपर कही हुई शक्ति के अनुसार उत्तम दान देना चाहिये ।
जो पुण हंतइ धण कणइ मुनिहिं कुभोयणु देइ ।
जम्मि जम्मिदालिददहण पुठ्ठि ण तहो छंडेइ ॥516॥
गाथार्थ: जो पुरुष अन्न धन आदि के होते हुए भी मुनियों को कुभोजन देता है उसकी पीठ को दरिद्रता अनेक जन्मों तक भी नहीं छोडती अर्थात् वह अनेक जन्म तक दरिद्री बना रहता है ।
देहो पाणा रुवं विज्जा धम्मं तवो सुहं मोक्खं ।
सव्वं दिण्णं णियमा हवेइ आहारदाणेण ॥517॥
गाथार्थ: शरीर, प्राण, रुप, विद्या, धर्म, तप, सुख और मोक्ष ये सब आहार के ऊपर निर्भर है। इस लिये जो भव्य पुरुष यतियों को आहार दान देता है वह नियम से शरीर, प्राण, रुप, विद्या, धर्म, तप, सुख मोक्ष आदि सबका दान देता है ऐसा समझना चाहिये।
भुक्खं समा णहु वाही अण्णसमाणं य ओसहं णत्थि ।
तम्हा अहार दाणे आरोगत्तं हवे दिण्णं ॥518॥
गाथार्थ: इस संसार में भूख के समान अन्य कोई व्याधि नहीं है और अन्न के समान कोई औषधि नहीं है। इस लिये जो भव्य आहार दान देता है वह पुरुष आरोग्य दान भी देता है ऐसा अवश्य समझना चाहिये।
आहार मओ देहो आहारेण विणा पडेइ णियमेण ।
तम्हा जेणाहारो दिण्णो देहो हवे तेण ॥519॥
गाथार्थ: यह शरीर आहार मय है अन्न का कीडा है । यदि इसको आहार न मिले तो नियम से शिथिल होकर गिर पडता है । इस लिये जिसने ऐसे शरीर के लिये आहार दिया उसने उस शरीर को ही दिया ऐसा समझना चाहिये ।
ता देहो ता पाणा ता रुवं ताम णाण विण्णाणं ।
जामा हारो पविसइ देहे जीवाण सुक्खयरो ॥520॥
गाथार्थ: इस संसार मे जब तक जीवों को सुख देने वाला आहार इस शरीर में रहता है तब तक ही यह शरीर है तब तक ही प्राण रहते है तबतक ही रुप रहता है, तबतक ही ज्ञान रहता है और तब तक ही विज्ञान रहता है । विना आहार के ये सब नष्ट हो जाते है ।
आहारसणे देहो देहेण तवो तवेण रय सडणं ।
रय णासेण य णाणं णाणे मुक्खो जिणोभणई ॥521॥
गाथार्थ: आहार ग्रहण करने से शरीर की स्थिति रहती है, शरीर की स्थिती रहने से तपश्चरण होता है, तपश्चरण से ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्मों का नाश होता है, ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्मों के नाश होने से ज्ञान की प्राप्ति होती है और ज्ञान की प्राप्ति होने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा भगवान् जिनेंद्रदेव ने कहा है ।
चउविहदाणं उत्तं जे तं सयलमवि होइ इह दिण्णं ।
सविसेसं दिण्णेणय इक्केणाहारदाणेण ॥522॥
गाथार्थ: जो पुरुष विशेष रीति से एक आहार दान को ही देता है वह उस एक आहार दान से ही समस्त चारों दान दिये, ऐसा समझा जाता है ।
भुक्खा कय मरणभयं णांसइ जीवाण तेण तं अभयं ।
सो एव हणइ वाही उसहं फुडअत्थितेण आहारो ॥523॥
गाथार्थ: देखो भूख की पीडा अधिक होनें से मरने का भय होता है इसलिये आहार दान देने से अभयदान की भी प्राप्ति होती है । तथा भूख ही सबसे प्रबल व्याधि है । और वह आहार दान से नष्ट होती है । इसलिए आहार दान देने से ही औषध दान समझना चाहिये ।
523॥
आयाराई सत्थं आहारबलेण पढइ णिस्सेसं ।
तम्हा तं सुयदाणं दिण्णं आहारदाणेण ॥524॥
गाथार्थ: इस आहार के ही वलसे आचार आदि समस्त शास्त्रों का पठन पाठन होता है इसलिये एक आहार दान देने से ही शास्त्र दान का भी फल मिल जाता है । इस प्रकार एक आहार दान से चारों के फल मिल जाते है ।
हय गयगो दाणाइं धरणीरय कणय आण दाणाइं ।
तित्ति ण कुणंति सया जह तित्ति कुणइ आहारो ॥525॥
गाथार्थ: घोडा हाथी और गायों का दान, पृथ्वी, रत्न, अन्न, वाहन आदि का दान देने से दान लेने वालों को उतनी तृप्ति नहीं होती जितनी तृप्ति सदाकाल आहार दान देने से होती है ।
जह रयणाण वइरं सेलेसु य उत्तमो जहा मेरू ।
तह दाणाणं पवरो आहारो होइ णायव्वो ॥526॥
गाथार्थ: जिस प्रकार समस्त रत्नों में वज्र रत्न उत्तम है, और समस्त पर्वतों में मेरु पर्वत उत्तम है उसी प्रकार समस्त दानों में आहादान सबसे उत्तम है ऐसा समझना चाहिये ।
सो दायव्वो पत्ते विहाण जुत्तेण सा विही एसा ।
पडिगह मुच्चट्ठाणं पादोदय अच्चणं पणामं च ॥527॥
गाथार्थ: वह आहार दान पात्र को ही देना चाहिये और विधिपूर्वक ही देना चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है ! प्रतिग्रह उच्चस्थान, पादोदक, अर्चन, प्रणाम, मन शुद्धि, बचन शुद्धि काय और आहार शुद्धि इस प्रकार नवधा (नौ प्रकार) भक्ति पूर्वक आहार देना चाहिये ।
जब मुनि अपने समय पर वा श्रावकों के घर भोजन बन जाने के समय पर चर्या के लिये निकलते है तब वे प्रायः श्रावकों के घर के सामने होकर निकलते है । जिससमय मुनि अपने घर के सामने आवें उस समय श्रावक को कहना चाहिये कि हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु तिष्ठ तिष्ठ
आहार जलं शुद्धं वर्तते अर्थात् हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु इस प्रकार तीनवार हाथ जोडकर मस्तक झुकाकर नमस्कार करना चाहिये कि महाराज यहां ठहरिये ठहरिये आहार जल शुद्ध है । इतना कहने पर जब वे खडे होजांय तो तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिये और फिर कहना चाहिये कि महाराज घर पधारिये । इतना कहकर उस श्रावक को आगे चलना चाहिये । इसको प्रतिग्रह कहते है । घर जाकर उनको किसी ऊंचे स्थान पर पाटा या कुरसी पर बिठाना चाहिये । महाराज इस पर विराजो ऐसा कहकर बिठाना चाहिये । इसको उच्चस्थान कहते है । तदनंदतर प्रासुक गर्म जल से किसी थाली में उनके पैर धोने चाहिये और चरणोदक को मस्तक पर एक अर्घ्य देकर उन मुनि की पूजा करनी चाहिये इसको अर्चन कहते है । इसके अनन्तर कहना चाहिये कि महाराज मेरा मन शुद्ध है वचन शुद्ध है शरीर शुद्ध है और आहार शुद्ध है । आप चौका में पधारिये । इतने कहने पर वे चौका में चले जाते है । मुनि खडे होकर आहार लेते है इसलिये उनको खडे होने के लिए एक पाटा बिछा रखना चाहिये जो हिले नहीं तथा उसके सामने किसी छोटी सी ऊंची चौकी पर या छोटी मेजपर एक बडा भगोना या तसला रखाना चाहिये जिसमे थोडी सूखी घास रक्खी हो यदि आहार लेते समय हाथ से पानी गिरे तो उसी में गिरे और घास रखने से इधर उधर छींटे नहीं जाते यह नवधा भक्ति है और यथा योग्य सब ही पात्रों के लिये होती है ।
मणवयण कायसुद्धी एसणसुद्धी य परम कायव्वा ।
होइ फुडं आयरणं णवव्विहं पुव्व कम्मेण ॥528॥
गाथार्थ: वह आहार दान पात्र को ही देना चाहिये और विधिपूर्वक ही देना चाहिये । उसकी विधि इस प्रकार है ! प्रतिग्रह उच्चस्थान, पादोदक, अर्चन, प्रणाम, मन शुद्धि, बचन शुद्धि काय और आहार शुद्धि इस प्रकार नवधा (नौ प्रकार) भक्ति पूर्वक आहार देना चाहिये ।
जब मुनि अपने समय पर वा श्रावकों के घर भोजन बन जाने के समय पर चर्या के लिये निकलते है तब वे प्रायः श्रावकों के घर के सामने होकर निकलते है । जिससमय मुनि अपने घर के सामने आवें उस समय श्रावक को कहना चाहिये कि हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु तिष्ठ तिष्ठ
आहार जलं शुद्धं वर्तते अर्थात् हे स्वामिन् नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु इस प्रकार तीनवार हाथ जोडकर मस्तक झुकाकर नमस्कार करना चाहिये कि महाराज यहां ठहरिये ठहरिये आहार जल शुद्ध है । इतना कहने पर जब वे खडे होजांय तो तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिये और फिर कहना चाहिये कि महाराज घर पधारिये । इतना कहकर उस श्रावक को आगे चलना चाहिये । इसको प्रतिग्रह कहते है । घर जाकर उनको किसी ऊंचे स्थान पर पाटा या कुरसीं पर बिठाना चाहिये । महाराज इस पर विराजो ऐसा कहकर बिठाना चाहिये । इसको उच्चस्थान कहते है । तदनंदतर प्रासुक गर्म जल से किसी थाली में उनके पैर धोने चाहिये और चरणोदक को मस्तक पर एक अर्घ्य देकर उन मुनि की पूजा करनी चाहिये इसको अर्चन कहते है । इसके अनन्तर कहना चाहिये कि महाराज मेरा मन शुद्ध है वचन शुद्ध है शरीर शुद्ध है और आहार शुद्ध है । आप चौका में पधारिये । इतने कहने पर वे चौका में चले जाते है । मुनि खडे होकर आहार लेते है इसलिये उनको खडे होने के लिए एक पाटा बिछा रखना चाहिये जो हिले नहीं तथा उसके सामने किसी छोटी सी ऊंची चौकी पर या छोटी मेजपर एक बडा भगोना या तसला रखाना चाहिये जिसमे थोडी सूखी घास रक्खी हो यदि आहार लेते समय हाथ से पानी गिरे तो उसी में गिरे और घास रखने से इधर उधर छींटे नहीं जाते यह नवधा भक्ति है और यथा योग्य सब ही पात्रों के लिये होती है ।
एवं विहिणा जुत्तं देयं दाणं तिसुद्ध भत्तीए ।
वज्जिय कुच्छियपत्तं तह य अपत्तं च णिस्सारं ॥529॥
गाथार्थ: इस प्रकार नवधा भक्ति पूर्वक तथा मन वचन काय की शुद्धता पूर्वक पात्रों को दान देना चाहिये, तथा कुत्सित पात्र वा कुपात्र और अपात्र इन दोनों का कभी दान नहीं देना चाहिये । क्योंकि इन दोनों को दान देना निःसार है ।
जं रयणत्तय रहियं मिच्छमय कहियधम्म अणुलग्गं ।
जइ विहु तवइ सुघोरं तहावितं कुच्छियं पत्तं ॥530॥
गाथार्थ: जो पुरुष रत्नत्रय से रहित है और मिथ्या मत मे कहे हुए धर्म मे लीन रहता है ऐसा पुरुष चाहे जितना घोर तपश्चहरण करे तथापि वह कुत्सित पात्र वा कुपात्र ही कहलाता है।
जस्स ण तवो ण चरणं ण चावि जस्सत्थि वर गुणो कोई ।
तं जाणेह अपत्तं अफलं दाणं कयं तस्स ॥531॥
गाथार्थ: जो न तो तपश्चरण करता है, न किसी प्रकार का चारित्र पालन करता है और न उसमें कोई अन्य श्रेष्ठ गुण है ऐसा पुरुष अपात्र कहलाता है ऐसे अपात्र को दान देना सर्वथा व्यर्थ है। उसका कोई फल नहीं होता है।
ऊसर खित्ते वीयं सुक्खे रुक्खे य णीर अहिसेओ ।
जह तह दाणमपत्ते दिण्णं खु णिरत्थयं होई ॥532॥
गाथार्थ: जिस प्रकार ऊसर पृथ्वीपर बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है और सूके हुए वृक्ष में पानी देना व्यर्थ जाता है उसी प्रकार अपात्र को दिया हुआ दान सर्वथा व्यर्थ जाता है ।
532॥
कुच्छिय पत्ते किंचि वि फलइ कुदेवेसु कुणरतिरिएसु ।
कुच्छिय भोयधरासु य लवणंवुहि कालउवहीसु ॥533॥
गाथार्थ: कुत्सित पात्रों को दिये हुए दान का कुत्सित ही फल मिलता है और वह उस कुपात्र दान के फलसे कुदेवों में उत्पन्न होता है, कुमनुष्यों में उत्पन्न होता है खोटे तिर्यंचों में उत्पन्न होता है और लवणोदधि तथा कालोदधि समुद्र में होने वाली कुभोग भूमियों में उत्पन्न होता है ।
लवणे अडयालीसा काल समद्दे य तित्तियाचे व ।
अंतरदीवा भणिया कुभोग भूमीय विक्खाया ॥534॥
गाथार्थ: लवणोदधि समुद्र में अडतालीस अंतर्द्वीप है और कालोदधि समुद्र में भी अडतालीस अंतर्द्वीप है । इस प्रकार इन छियानवें अंतर्द्वीपों मे कुभोग भूमियां है ।
534॥
उप्पज्जंति मणुस्सा कुपत्तदाणेण तत्थभूमीसु ।
जुवलेण गेहरहिया णाग्गा तरुमूलिणिवसंति ॥535॥
गाथार्थ: जो मनुष्य कुपात्रों को दान देता है वह मनुष्य इन कुभोग भूमियों मे मनुष्य होकर उत्पन्न होता है । वहां पर सब मनुष्य युगलिया (स्त्री पुरुष दोनों साथ साथ) उत्पन्न होते है, उनके रहने के लिये घर नहीं होते वृक्षों के नीचे रहा करते है और नग्न रहते है ।
535॥
पल्लोवम आउस्सा वत्थाहरणेहि वज्जिया णिच्चं ।
तरुपल्लव पुप्फरसं फलाण रसं चेव भक्खंति ॥536॥
गाथार्थ: इन मनुष्यों की आयु एक पल्य की होती है तथा ये लोग सदा काल वस्त्राभरण से रहित होते है और वृक्षों के पत्ते, फूलों का रस और फलों का रस भक्षण करते रहते है।
दीवे कहिं पि मणु या सक्कर गुड खंड सण्णिहा भूमी ।
भक्खंति पुट्ठि जणया अइसरसा पुव्व कम्मेण ॥537॥
गाथार्थ: किसी किसी द्वीप की भूमि गुड शक्कर और खांड के समान मीठी होती है, पौष्टिक होती है और अत्यन्त सरस होती है । इसलिये उन द्वीपों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य अपने पूर्व कर्म के उदय से उसी भूमि की मिट्टी को खाकर रहते है ।
केई गय सीह मुहा केई हरि महिस कवि कोल मुहा ।
केई आवरिस मुहा केई पुण एय पाया य ॥538॥
गाथार्थ: उन द्वीपों में रहने वाले मनुष्यों मे कितने ही मनुष्यों के मुख हाथी के मुख के समान होते है कितने मनुष्यों के मुख सिह के मुख के समान होते है, कितने ही भैंसा के से मुखवाले होते है कितने ही सूअर के से मुखवाले होते है और कितने ही मनुष्य बंदर के से मुख वाले होते है और कितने ही मनुष्य दर्पण के समान मुखवाले होते है । इसके सिवास कितने ही मनुष्य एक पैर वाले होते है । तथा -
ससमुक्कलि कण्णाविय कण्णद्यावरण दीह कण्णा य ।
लांगूलधरा अपरे अपरे मणुया अभासा य ॥539॥
गाथार्थ: उन मनुष्यों मे से कितने ही मनुष्य खरगोश केसे कान वाले होते है, कितने ही पूरी के से कान वाले होते है कितने ही मनुष्यों के चौडे कान होते है और कितने ही मनुष्यों के लम्बे कान होते है । इनके सिवाय कितने ही मनुष्यों के पूंछ होती है ओर कितने मनुष्य किसी भी प्रकार की भाषा नहीं बोलते ।
ए ए णरा पसिद्धा तिरिया वि हवंति कुभोय भूमीसु ।
मणुसुतर वाहिरेसु अ असंख दीवेसु ते होंति ॥540॥
गाथार्थ: इन सव कुभोग भूमियों में मनुष्य ही होते है, तथा इनके सिवाय मानुषोत्तर पर्वत के बाहर असंख्यात द्वीपों में होनें वाली कुभोग भूमियों तिर्यंच भी होते है ।
सव्वे मंद कसाया सव्वे णिस्सेस बाहि परिहीणा ।
मरिऊण विंतरा विहु जोइसु भवणेसु जायंति ॥541॥
गाथार्थ: ये सब मनुष्य और तिर्यन्च मंद कषायी होते है और सबके संपूर्ण व्याधियों से रहित होते है । वे सब मरकर कितने व्यंतर देवो में उत्पन्न होते है, और कितने ही ज्योतिषी और भवन वासी देवों में उत्पन्न होते है ।
तत्थ चुया पुण संता तिरियणरा पुण हवंति ते सव्वे ।
काऊण तत्थ पावं पुणोवि णिरयापहा होंति ॥542॥
गाथार्थ: कुपात्र दान देने वाले मनुष्य जो मरकर कुभोग भूमि में उत्पन्न होते है और वहां से आकर भवन वासी व्यंतर ज्योतिषियों में उत्पन्न होते है वहां की भी आयु पूर्णकर वे फिर मनुष्य वा तिर्यच होते है और वहां भी अनेक प्रकार के पापकर नरकमे जाकर पडते है ।
चंडालभिल्ल छिपिय डोंव य कल्लाल एव माईणि ।
दीसंति रिद्धि पत्ता कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥543॥
गाथार्थ: वर्तमान में जो चांडाल भील छीपी डोम कलाल आदि निम्न श्रेणी के लोग धन और विभूती आदि से परिपूर्ण दिखाई देते है वे सब कुत्सित पात्रों को दान देने से ही बनी होते है ।
केई पुण गय तुरया गेहेरायाण उण्णई पत्ता ।
दिस्सति मच्च लोए कुच्छिय पत्तस्स दाणेण ॥544॥
गाथार्थ: इस मनुष्य लोक मे राजाओं के घर जो कितने ही हाथी घोडे आदि उन्नति को प्राप्त हुए दिखाई देते है बहुत सुखी दिखाई देते है वह सब कुपात्र दान देने का फल समझना चाहिये ।
केई पुण बिव लोए उववण्णा वाहणतणेण ते मणुया ।
सोसंति जाइ दुक्खं पिच्छिय रिद्धी सुदेवाणं ॥545॥
गाथार्थ: कुपात्रों को दान देने वालों मे से कितने ही मनुष्य स्वर्गलोक में भी उत्पन्न होते है परन्तु वहां पर वे वाहन रूपसे उत्पन्न होते है अन्य बडे देवों के वाहन बनकर रहते है । इसलिये वे बडे देवों की ऋद्धियों को देखकर अपनी वाहन रूप जाति के दुःख का शोक करते रहते है ।
णाऊण तस्स दोसं सम्माणह मा कया विसविणम्मि ।
परिहरह सया दूरं वुहियाण वि सविस सप्पं व ॥546॥
गाथार्थ: कुपात्रों को दान देने में अनेक प्रकार के दोष होते है उन सबको समझकर स्वप्न में भी उनका सन्मान नहीं करना चाहिये, तथा कभा किसी अवस्था में भी उनका सन्मान नहीं करना चाहिये । विषधर सर्प के समान कुपात्रों का त्याग तो दूर से ही कर देना चाहिये ।
पत्थर मया वि दोणी पत्थर मप्पाणयं च बोलेई ।
जह तह कुच्छिय पत्तं संसारे चेव बोलेई ॥547॥
गाथार्थ: जिस प्रकार पत्थर की वनी हुई और पत्थरों से भरो हुई नाव उन पत्थरों कों भी डुबो देती है और स्वयं भी डूब जाती है उसी प्रकार कुपात्र भी संसार समुद्र में डूब जाता है और दूसरों को भी डुबा देता है ।
णावा जह सच्छिद्दा परमप्पाणं च उवहि सलिलम्मि ।
बो लेइ तह कुपत्तं संसारमहोवही भीमे ॥548॥
गाथार्थ: जिस प्रकार छिद्र सहित नाव समुद्र के जल मे अपने आप डूब जाती है उसी प्रकार कुपात्र भी इस संसार रूपी भयानक महा समुद्र मे अपने आप डूब जाता है ।
लोहमए कुतरंडे लग्गो पुरिसो हु तारिणी वाहे ।
वुड्ढइ जह तह वुड्ढइ कुपत्त सम्माणओ पुरिसो ॥549॥
गाथार्थ: जिस प्रकार लोहे की बनी नाव में अवश्य डूब जाता है उसी प्रकार कुपात्रों का सन्मान करने वाला पुरुष भी इस संसार रूपी समुद्र मे अवश्य डूबता है।
णलहंति फलं गरुयं कुच्छिय पहुवित्त सेविया पुरिसा ।
जह तह कुच्छिय पत्ते दिण्णा दाणा मुणेयव्वा ॥550॥
गाथार्थ: जिस प्रकार किसी कुत्सित स्वामी के आश्रित रहने वाले सेवक पुरुष को उसकी सेवा का अच्छा श्रेष्ठ फल नहीं मिलता उसी प्रकार कुत्सित पात्रों को दिया हुआ दान समझना चाहिये ।
णत्थि वय सील संजम झाणं तव नियम वंभचेरं व ।
एमेव भणइ पत्तं अप्पाणं लोय मज्झम्मि ॥551॥
गाथार्थ: जो न तो व्रतों को पालन करते है न शीलों को पालन करते है, जिनके न संयम है न ध्यान है जो न किसी प्रकार का तपश्चकरते हैं न किसी नियम का पालन करते है और न ब्रह्मचर्य का पालन करते है ऐसे लोग भी इस लोक मे अपने को पात्र कहते है ।
मय कोह लोह गहिओ उड्डिय हत्थोय जायणा सीलो ।
गिह वावारासत्तो जो सो पत्तो कहं हवइ ॥552॥
गाथार्थ: भला विचार करने की बात है कि जो झूठमूठ ही अपने वडप्पन का अभिमान करते है जो क्रोधी है लोभी है हाथ उठाकर सर्वत्र मागते मांगते फिरते है और जो गृहस्थी के व्यापार मे सदा लगे रहते है ऐसे लोग पात्र कैसे हो सकते है अर्थात् कभी नहीं हो सकते ।
हिंसाइदोस जुत्तो अत्तरउद्देहिं गमिय अहरत्तो ।
क्रय विक्किय वट्टंतो इंदिय विसएसु लोहिल्लो ॥553॥
गाथार्थ: जो पुरुष हिंपा झूठ चोरी आदि पापों मे लगा रहता है, रातदिन आर्तध्यान अथवा रौद्र ध्यान में लगा रहता है, संसार भर के सामानों को खरीदने और बेचने में लगा रहता है, और इद्रियों के विषयों मे अत्यन्त लोलुपता धारण करता है, इसके सिवाय जो उत्तम पात्रों की सदा निन्दा करता रहता है और गुरुओं के स्थान मे अपनी आत्मा को नियुक्त करता है अर्थात् अपने आप स्वयं गुरु बन बैठता है। इस प्रकार जो अपने ही पापों से अपने को गुरु मानता है वह मनुष्य नरक निगोद रूपी कुगतियों के समुद्र में अवश्य डूब जाता है।
उत्तम पत्तं णिंदिय गुरुठाणे अप्पयं पकुव्वंतो ।
होउ पावेण गुरू वुड्डइ पुण कुगइ उवहिम्मि ॥554॥
गाथार्थ: जो पुरुष हिंसा झूठ चोरी आदि पापों मे लगा रहता है, रातदिन आर्तध्यान अथवा रौद्र ध्यान में लगा रहता है, संसार भर के सामानों को खरीदने और बेचने में लगा रहता है, और इद्रियों के विषयों मे अत्यन्त लोलुपता धारण करता है, इसके सिवाय जो उत्तम पात्रों की सदा निन्दा करता रहता है और गुरुओं के स्थान मे अपनी आत्मा को नियुक्त करता है अर्थात् अपने आप स्वयं गुरु बन बैठता है। इस प्रकार जो अपने ही पापों से अपने को गुरु मानता है वह मनुष्य नरक निगोद रूपी कुगतियों के समुद्र में अवश्य डूब जाता है।
जो बोलइ अप्पाणं संसार महण्णवम्मि ।
सो अण्णं कह तारइ तस्सणुमग्गे जणे लग्गं ॥555॥
गाथार्थ: इस प्रकार अपने को गुरु मानने वाला पुरुष इस संसार रूपी महा भयानक समुद्र में अपने आत्मा को डुबा देता है। वह मिथ्या गुरु उस मिथ्या गुरु के पीछे पीछे लगे हुए मनुष्य को भला पार कैसे कर सकता है अर्थात् ऐसे गुरु के पीछे जो मनुष्य लगता है वह भी उसके साथ साथ अवश्य डूबता है।
555॥
एवं पत्तविसेसं णाऊणं देह दाणमणवरयं ।
णिय जीव सग्गमोक्खं इच्छयमो पयत्तेण ॥556॥
गाथार्थ: जो पुरुष अपने आत्मा को स्वर्ग मोक्ष में पहुँचाना चाहते है उनको चाहिये कि वे ऊपर लिये अनुसार पात्र अपात्रों के भेदों को अच्छी तरह समझ कर प्रयत्न पूर्वक सदाकाल उत्तम पात्रों को दान देते रहे।
लहिऊण संपया जो देइणदाणाइं मोह संछण्णो ।
सो अप्पाणं अप्पे बंचेइ य णत्थि संदेहो ॥557॥
गाथार्थ: जो पुरुष धन संपदा पाकर भी उसमे अत्यन्त मोह करता है और पात्रों को भी जान नहीं देता वह अपने ही आत्मा के द्वारा अपने ही आत्मा को ठगता है इसमे किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।
णय देइ णेय भुंजइ अत्थं णिखणेइ लोहसंछण्णो ।
सो तणकय पुरिसो इव रक्खइ सस्सं परस्सत्थे ॥558॥
गाथार्थ: जो धनी पुरुष न तो किसी को दान देता है न अपने भोगोपभोगों मे धन को लगाता है केवल तीव्र लोभ में पडकर उसकी रक्षा करता रहता है वह पुरुष घास-फुस के बने हुए पुरुषाकार पुतले के समान केवल दूसरों के लिये खेतों की रक्षा करता है ।
किविणेण संचयधणं ण होइ उवयारियं जहा तस्स ।
महुयरि इव संचियमहु हरंति अण्णे सपाणेंहि ॥559॥
गाथार्थ: जिस प्रकार मधुमक्खी अपने छत्ते मे मधु वा शहद को इकठ्ठा करती है परन्तु वह स्वयं उसका उपभोग नहीं करती । इसलिये दूसरे मनुष्य आकर उस छत्ते को तोडकर उसका इकठ्ठा किया हुआ शहद भी ले जाते है और सैंकडों हजारों मक्खियों को मार भी जाते है इसी प्रकार जो कृपण मनुष्य केवल धन को इकठ्ठा करता रहता है उसका धन उसके काम में कभी नहीं आता । वह दूसरे के ही काम आता है ।
कस्स थिरा इह लच्छि कस्स थिरं जुव्वणं धणं जीवं ।
इय मुणिऊण सुपुरिसा दिंति सुपत्तेसु दाणाइं ॥560॥
गाथार्थ: इस संसार मे लक्ष्मी किसके यहां स्थिर रही है, यौवन किसका स्थिर रहा है, धन किसका स्थिर रहा है और अर्थात् लक्ष्मी यौवन धन जीवन कभी किसी का स्थिर नहीं रहता । यही समझकर श्रेष्ठ पुरुषों को श्रेष्ठ पात्रों को सदा काल दान देते रहना चाहिये ।
दुक्खेण लहइ वित्तं वित्ते लद्धे वि दुल्लहं चित्तं ।
लद्धे चित्ते वित्ते सुदुल्लहो पत्तलंभो व ॥561॥
गाथार्थ: इस संसार मे धन की प्राप्ति बडे दुःख से होती है यदि कदाचित किसी भाग्य विशेष से धन की प्राप्ति हो भी जाय तो चित्त मे दान देने की उत्सुकता होना अत्यन्त कठीन है । कदाचित चित्त में दान देने की उत्सुकता भी प्राप्त हो जाय और धन भी प्राप्त हो जाय तो दान देने के लिये किसी पात्रका लाभ होना अत्यन्त कठीन है ।
चित्त वित्तं पत्तं तिडिअ वि पावेइ कहवि जइ पुरिसो ।
तोर लहइ अनुकूलं सयनं पुत्तं कलतं च ॥562॥
गाथार्थ: यदि किसी शुभ कर्म के उदय से धन भी मिल जाय, चित्तमें दान देने की उत्सुकता भी प्राप्त हो जाय और पात्र मिलने का भी संयोग प्राप्त हो जाय तो दान देने के लिये अपने स्वजन परिजन पुत्र स्त्री आदि अपनें अनुकूल नही होते है ।
पडिकूल माइ काऊं विग्ध कुव्वंति धम्म दाणस्स ।
उवएसंति पुबुद्धि दुग्गइगम कारया असुहा ॥563॥
गाथार्थ: यदि स्त्री पुत्र स्वजन आदि अपने प्रतिकूल हो जाते है तो फिर वे लोग धर्मस्थानों मे दान देने मे विघ्न करते है। तथा नरकादिक दुर्गतियों के कारण भूत और अत्यन्त अशुभ दुर्बुद्धि का उपदेश देते है।
सो कह सयणो भण्णइ विग्घं जो कुणइ धम्मदाणस्स ।
दाऊण पाव बुद्धी हाडइ दुक्खायरे णरए ॥564॥
गाथार्थ: विचार करने की बात है कि स्वजन होकर भी जो धर्म कार्यों में दिये हुए दान का निषेध करता है और पाप रुप बुद्धि का उपदेश देकर अनेक दुःखों से भरे हुए नरक में डालना चाहता है वह अपना स्वजन कैसे हो सकता है ।
सो सयणो सो बंधू सो मित्तो जो सहिज्जओ धम्मे ।
जो धम्म विग्घयारी सो सत्तू णत्थि संदेहो ॥565॥
गाथार्थ: इस संसार में जो पुरुष अपने धर्म का पालन करनें मे सहायक होता है उसीको स्वजन समझना चाहिये उसीको बन्धु समझना चाहिये और उसीको मित्र समझना चाहिये । जो पुरुष धर्मकार्यों में विघ्न करता है धर्म पालन करने मे विघ्न करता है वह पुरुष शत्रु ही है इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ।
ते धण्णा लोयत तेहिं णिरुद्धाइं कुगई गमणाणि ।
वित्त पत्तं चित्तं पाविवि जहि दिण्ण दाणाइं ॥566॥
गाथार्थ: जिन पुरुषों को यथेष्ट धन का प्राप्ति हुई है चित्तमे दान दान देने की बुद्धि प्राप्त हुई है और सुपात्रों का लाभ भी प्राप्त हुआ है । इन तीनो संयोगो को पाकर जो सुपात्रों को दान देते रहते है वे पुरूष तीनो लोकों में धन्य समझे जाते है और ऐसे ही नरकादिक दुर्गतियों को सदा के लिये रोक देते है ।
मुणिभोयणेण दव्वं जस्स गयं जुव्वणं च तवयरणे ।
सण्णासेण य जीवं जस्स गयं किं गयं तस्स ॥567॥
गाथार्थ: जिस महापुरूष का धन मुनियों के भोजन कराने मे चला गया जिसकी युवावस्था तपश्चरण करने में चली गई और जिसका जीव सन्यास ( समाधिमरण ) धारण कर चला गया उसका क्या गया ? अर्थात् उसका तो कुछ भी नही गया ।
जह जह वड्ढइ लच्छी तह तह दाणाइं देह पत्तेसु ।
अहवा हीयइ जह जह देह विसेसेण तह तह यं ॥568॥
गाथार्थ: इसलिये श्रावकों का उचित है कि यह धन जितना जितना बढता जाय उतना उतना हीं सुपात्रों को अधिक दान देता जाय । यदि कदाचित धन घटता जाय तो जितना जितना घटता जाय उतना उतना ही विशेष रूपसे अधिक दान देता जाय ।
जेहि ण दिण्णं दाणं ण चावि पुज्जा किया जिणिंदस्स ।
ते हीणदीण दुग्गय भिक्खंण लहंति जायंता ॥569॥
गाथार्थ: जो पुरुष न तो कभी भगवान् जिनेन्द्र देव की पूजा करते है और न कभी सुपात्रों को दान देते है वे पुरुष अत्यन्त दीन हीन हो जाते है उनकी अवस्था अत्यन्त दुर्गति रूप में परिणत हो जाती है और मांगने पर भी उनको भीख नहीं मिलती ।
पर पेसणाइ णिच्च करंति भतीए लह य णिय देहं ।
पूरंति ण णियय घरे परवस गासेण जीवंति ॥570॥
गाथार्थ: जिन जीवों ने कभी जिनेन्द्रदेव की पूजन नहीं की है और न कभी पात्रों को दान दिया है ऐसे जीव भक्ति पूर्वक दूसरों का अन्न पीस पीस कर अपना पेट भरते है । तो भी उनको पेट भरने योग्य अन्न अपने घर में नहीं मिलता है । वे पर वश होकर दूसरों के अन्न के टुकडों से ही जीवित रहते है
खंधेण वहंति णरं गासत्थं दीह पंथ समसंता ।
तं चेव विण्णवंता मुहकय कर विणय संजुत्ता ॥571॥
गाथार्थ: जो पुरुष जिन पूजा और पात्र दान नहीं करते वे जीव परलोक में जाकर अन्न के टुकडों के लिए मनुष्यों को अपने कंधों पर रहकर (पालकी डोली पीनस आदि मे बिठाकर) बहुत दूर दूर तक ले जाते है तथा अपने मुख की दीन आकृति बनाकर और हाथ जोडकर उसकी बहुत बडी विनय करते जाते है ।
पहु तुम्ह समं जायं कोमल अंण्णाइ सुट्ठु, सुहियाइं ।
हय मुह पियाइं काऊं मलंति पाया सहत्थेहिं ॥572॥
गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न करने वाले पुरुष परलोक मे अपने हाथ से दूसरों के पैर दाबते फिरते है और मुंह से बडे मधुर शद्बों के द्वारा प्रिय शद्बों के द्वारा कहते जाते है कि हे प्रभो आपके शरीर के अंग बडे ही कोमल है, बडे ही श्रेष्ठ है और बहुत ही सुन्दर है।
रक्खंति गोगवाइं छेलयखर तुरय छेत खलिहाणं ।
वुण्णंति कप्प डाइं घडंति पिडउल्लयाइं च ॥573॥
गाथार्थ: दान पूजा न करने वाले पुरुष परभव में गाय भैंस बकरी गधा घोडा खेत खलिहान आदि की रखवाली करते रहते है और कितने ही लोग खाट पीढी आदि बढई के छोटे छोटे काम किया करते है ।
धावंति सत्थहत्था उण्हं च गणंति तह य सीयाइं ।
तुरय मुह फेण सित्ता रयलित्ता गलियपासेसा ॥574॥
गाथार्थ: दान पूजा न करने वाले कितने ही जीव हाथमे शस्त्र लेकर दौडते है राजा महाराजाओं की सवारी के आगे आगे दौडते है उस समय न तो वे धूप वा गर्मी को गिनते है और न शीत वा ठंडक को गिनते है । उस समय उनका शरीर घोडों के मुख से निकलते हुए फेन से भर जाता है, धूल उनके शरीर पर लिपट जाती है और पसीने की धार बंध जाती है ।
पिच्छिय पर महिलाओ घणथण मय णयण चंद वयणाइं ।
ताडेइ णियंसीसं झूरइ हिययम्मि दीण मुहो ॥575॥
गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न देने वाले पुरुष परभव में जाकर इतने दीन दुखी होते है कि वे लोग जिनके स्तन अत्यन्त कठिन है जिनके नेत्रों मे मद छाया हुआ है और चन्द्रमा के समान जिनका सुन्दर मुख है ऐसी पर स्त्रियों को देखकर अपने मस्तक को धुना करते है और दीन मुख होकर अपने हृदय में रोया करते है । इसके सिवाय दूसरों की संपत्ति को देखकर वें लोग रो रो कर कहते है कि हाय हाय क्या हमनें पहले भव में उत्तम भक्ति पूर्वक उत्तम पात्रों को दान नही दिया था । यदि पहले भव में हमने भी पात्र दान दिया होता तो हमे भी ऐसी संपत्तियां अवश्य प्राप्त होती ।
पर संपया णिएऊं पमणइ हा किं मया ण दिण्णाइं ।
दाणाइं पर पत्ते उत्तमम भत्ती य जुत्तण ॥576॥
गाथार्थ: जिन पूजन और पात्र दान न देने वाले पुरुष परभव में जाकर इतने दीन दुखी होते है कि वे लोग जिनके स्तन अत्यन्त कठिन है जिनके नेत्रों मे मद छाया हुआ है और चन्द्रमा के समान जिनका सुन्दर मुख है ऐसी पर स्त्रियों को देखकर अपने मस्तक को धुना करते है और दीन मुख होकर अपने हृदय में रोया करते है । इसके सिवाय दूसरों की संपत्ति को देखकर वें लोग रो रो कर कहते है कि हाय हाय क्या हमनें पहले भव में उत्तम भक्ति पूर्वक उत्तम पात्रों को दान नही दिया था । यदि पहले भव में हमने भी पात्र दान दिया होता तो हमे भी ऐसी संपत्तियां अवश्य प्राप्त होती ।
एवं णाऊण फुडं लोहो उवसानिऊण णियचित्ते ।
णिय वित्ताणुस्सारं दिज्जइ दाणं सुपत्तेसु ॥577॥
गाथार्थ: इस प्रकार पात्र दान के फल को जानकर और पात्र दान न देने के फल को जानकर अपनें हृदय मे लोभ को दबाना चाहिये, लोभ नहीं करना चाहिये और अपने धन संपत्ति के अनुसार सुपात्रों को अवश्य दान देना चाहिये ।
जं उप्पज्जइ दव्वं तं कायव्वं च बुद्धिवंत्तेण ।
छहृणायगयं सव्वं पढमो भावो हि धम्मस्स ॥578॥
गाथार्थ: बुद्धिमान् गृहस्थों को उचित है कि वे जितना धन उत्पन्न करें उसके छह भाग करें । उसमे से पहला भाग धर्म के लिये निकाल दे ।
बीओ भावो गेहे दायव्वो कुडंव पोसणत्थेण ।
तइओ भावो भोए चउत्थओ सयण वग्गम्मि ॥579॥
गाथार्थ: दूसरा भाग अपने कुटुम्ब के भरण पोषण के लिये अपने घर वालों को देना चाहिये । तीसरा भाग अपनें भोगों के लिये रखना चाहिये और चौथा भाग अपनें स्वजन परिवार आदि के लिये रखना चाहिये ।
सेसा जे वे भावा ठायव्वा होंति ते वि पुरिसेण ।
पूज्जा महिमा कज्जे अहवा कालावकालस्स ॥580॥
गाथार्थ: इस प्रकार ऊपर लिखे अनुसार चार भाग तो काममे लाने चाहिये । और शेष बचे हुए दो भाग उस पुरुष को जमा रखना चाहिये वे बचे हुए दोनों भाग भगवान् जिनेंद्रदेव की विशेष पूजा करने में लगाना चाहिये अथवा किसी प्रभावना के कार्य में धर्म की महिमा वढाने के कार्य मे लगाना चाहिये । अथवा वे बचे हुए दोनों भाग किसी आपत्ती काल के लिये रख छोडना चाहिये ।
अहवा णियं विढत्तं कस्स वि मा देहि होइ लोहिल्लो ।
सो को थि कुण उवाऊ जह तं दव्वं समं जाइ ॥581॥
गाथार्थ: अथवा प्रत्येक गृहस्थ को अपना द्रव्य किसी को भी नहीं देना चाहिये और अत्यंत लोभी बनकर कोई भी ऐसा उपाय करना चाहिये जिसमे कि वह द्रव्य मरने के बाद भी अपने साथ चला चले ।
तं दव्वं जाइ समं जं खीणं पुज्ज महिम दाणेंहि ।
जं पुण धरा णिहत्ते णठ्टे त्ते जाणि णियमेण ॥582॥
गाथार्थ: जो द्रव्य भगवान् जिनेन्द्रदेवकी पूजा में खर्च होता है, जो द्रव्य धर्म की महिमा बढाने में, धर्म की प्रभावना करनें मे खर्च होता है और जो द्रव्य पात्र-दान में खर्च होता है वही द्रव्य परलोक मे अपने साथ जाता है। तथा जो द्रव्य पृथ्वी मे गाढ कर रख दिया जाता है। उसको नियम पूर्वक नष्ट हुआ समझो।
सइ ठाणाओ मुल्लह अहवा भूसेहि णिज्जए तं पि ।
अह भाओ अह पुत्तो चोरो तं लेई अह राओ ॥583॥
गाथार्थ: जो पुरुष पृथ्वी मे धन गाढ कर रखता है वह या तो स्वयं उस स्थान को भूल जाता है अथवा चुहे उस द्रव्य को लेकर दूसरे स्थान पर रख देते है, अथवा उसे भाई बन्धु ले जाते है अथवा पुत्र ले जाता वा चोर ले जाते है और इनसे भी बच रहता है तो उसे राजा ले लेता है ।
अहवा तरुणी महिला जायइ अण्णेण जार पुरिसेण ।
सह तं गिण्हिय दव्वं अण्णं देसंतर दुठ्ठा ॥584॥
गाथार्थ: अथवा अपनी दुष्ट तरुण स्त्री उस समस्त द्रव्य को लेकर किसी अन्य जार पुरुष के साथ दूर देशांतर को भाग जाती है । इस प्रकार अनेक प्रकार से वह गडा हुआ धन नष्ट हो जाता है ।
इय जाणिऊण णूणं देह सुपत्तेसु चहुविहं दाणं ।
जह कय पावेण सया मुच्चेह लिप्पेद् सुपुण्णेण ॥585॥
गाथार्थ: इस प्रकार निश्चय रीति से समझ कर सुपात्रों के लिये चारों प्रकार का दान देना चाहिये । जिपसे कि किये हुए पापों का नाश हो जाय और श्रेष्ठ पुण्य का उपार्जन हो ।
पुण्णेण कुलं विउलं कित्ती पुण्णेण भमइ तियलोए ।
पुण्णेण रूपमतुलं सोहागं जोवणं तेयं ॥586॥
गाथार्थ: इस संसार में पुण्य के उदय से उत्तम कुल की और बहुत से कुटुम्ब की प्राप्ति होती है, पुण्य के ही उदय से इस मनुष्य की कीर्ति तीनों लोकों में फैल जाती है पुण्य से ही सर्वोत्तम उपमा रहित रूप प्राप्ति होती है, पुण्य से ही सुहाग की प्राप्ति होती है पुण्य से ही युवावस्था प्राप्त होती है और पुण्य से ही तेज की प्राप्ति होती है ।
पुण्णवलेणुब वज्जइ कहयवि पुरिसो य भोय भूमीसु ।
भुंजेइ तत्थभोए दह कप्पतरुब्भवे हिव्वे ॥587॥
गाथार्थ: पुण्य कर्म के उदय से ही यह जीव किसी प्रकार भोग भूमि में भी उत्तम पुरुष उत्पन्न होता है और वहां पर दश प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न हुए दिव्य भोगों का अनुभव करता है ।
गिह तरुवर बरगेहे भोयण रुक्खाय भोयणे सरिसे ।
कणयमय भायणाणिय भायण रुक्खा पयच्छन्ति ॥588॥
गाथार्थ: वहां पर दश प्रकार के कल्पवृक्ष है। उनमें से गृह जाति के कल्पवृक्ष उत्तम उत्तम घर देते है भोजन जाति के वृक्ष सरस भोजन देते है और भाजन जाति के वृक्ष सुवर्णमय पात्र वा बर्तन देते है।
वत्थंगा वर वेत्थे कुसुमंगा दिंति कुसुम मालाये ।
दिंति सुयंध विलेवण विलेवणंगा महारुक्खा ॥589॥
गाथार्थ: वस्त्रांग जाति के वृक्ष अनेक प्रकार के सुन्दर वस्त्र देते है पुष्यांग जाति के वृक्ष पुष्प वा पुष्पो की मालाएं देते है और विलेपनांग जाति के वृक्ष सुगंधित विलेपन उवटन आदि देते है ।
तूरंगा बर तूरे मज्जंगादिंति सरस मज्जाइं ।
आहारणंगा दिंतिय आहरणे कणममणि जडिए ॥590॥
गाथार्थ: वाद्यंग जाति के वृक्ष तुरई आदि अनेक प्रकार के बाजे देते है, मद्यांग जाति के वृक्ष सरस पौष्टिक मद्य ( एक प्रकार का रस जो केवल पौष्टिक होता है ) देते है और आभरणांग जाति के वृक्ष अनेक प्रकार के मणियों से जडे हुए सुवर्णमय आभूषण देते है ।
दयणिदिणं ससि सूरा जह तह दीवंति जोइसारुक्खा ।
पायव दसप्पयारा चिंतिययं दिंति मणुयाणं ॥591॥
गाथार्थ: ज्योतिष जाति के वृक्ष सूर्य चन्द्रमा के समान रात दिन प्रकाश करते रहते है । इस प्रकार भोगभूमियों मे दश प्रकार के कल्पवृक्ष होते है जो मनुष्यों को चितवन करने मात्र से अपनी इच्छानुसार पदार्थ देते है ।
जरसोय वाहि वेअण कासं सासं च जिंभणं छिक्का ।
ए ए अण्णे दोसा णहवंति हु भोय भूमीसू ॥592॥
गाथार्थ: बुढापा, व्याधि, वेदना, काम, श्वास, जंभाई, छींक आदि कितने ही दोष भोग भूमियों में नहीं होते है ।
सव्वे भोए दिव्वे भुंजित्ता आउसाव साणम्मि ।
सम्मादिट्ठी मणुया कप्पा वासेसु जायंति ॥593॥
गाथार्थ: इन भोग भूमियों मे जो सम्यग्दृष्टि पुरुष उत्पन्न होते है वे सब दीर्घ काल तक वहां के दिव्य भोगों को भोगते रहते है और फिर आयु पूर्ण होने पर वे लोग मर कर कल्प वासी देव होते है ।
जे पुणु मिच्छादिट्ठी विंतर भवने सुजोइसाहोंति ।
जम्हा मंद कसाया तम्हा देवेसु जायंति ॥594॥
गाथार्थ: जो इन भोग भूमियों मे मिथ्या दृष्टि पुरुष उत्पन्न होते है वे वहां के भोगों को भोग कर आयु के अन्त मे भवन वासी व्यन्तर वा दयोतिष्क देवों में उत्पन्न होते है। भोग भूमियों में उत्पन्न होने वाले जीव सब मंद कषाय वाले होते है इसलिये वे मर कर देव ही होते है।
केई समवसरणगया जोइस भावेण सुवितरा देवा ।
कहिऊण सम्मदंसण तत्थ चुया हुंति वा पुरिसा ॥595॥
गाथार्थ: उन भवन वासी व्यन्तर ज्योतिषी देवों में से कितने ही देव भगवान् के समव सरण मे जाकर सम्यग्दर्शन को ग्रहण कर लेते है और फिर वहां से आयु पूर्ण होने पर उत्तम मनुष्य होते है ।
लहिऊण देस संजम सयल वा होइ सुरोत्तमो सरगे ।
भोत्तूण सुहे रम्मे पुणोवि अवयरइ मणुयत्ते ॥596॥
गाथार्थ: मनुष्य होकर वे जीव देश संयम धारण करते है अथवा सकल संयम धारण कर स्वर्गों में उत्तम देव होते होने है । वहां पर वे मनोहर सुखों का अनुभव कर आयु के अन्त में फिर भी मनुष्य भव धारण करते है ।
तत्थवि सुहाइं भुत्तं दिक्खा गहिऊण भविय णिग्गंथो ।
सुक्कज्झाणं पाविय कम्म हणिऊण सिज्झेई ॥597॥
गाथार्थ: उस मनुष्य भव मे भी अनेक प्रकार के सुखों का अनुभव करता हे । तदनन्तर दीक्षा धारण कर निर्गथ अवस्था धारण करता है तथा शुक्ल ध्यान को धारण कर समस्त कर्मों का नाश करता है और अन्त में सिद्ध प्राप्त कर लेता है ।
सिद्धंसरूवरूवं कम्म रहियं च होइ झाणेण ।
सिद्धावासी य णरो ण हवइ संसारिओ जीवो ॥598॥
गाथार्थ: सिद्धों का स्वरूप शुद्ध आत्मस्वरूप होता है तथा शुक्ल ध्यान के द्वारा समस्त कर्मों से रहित हो जाता है । सिद्धस्थान मे रहने वाले समस्त सिद्ध परमेष्ठी जीव फिर कभी भी संसार नहीं आते है ।
पंचमयं गुणठाणं एथ कहिय मया समासेण ।
एत्तो उड्ढं वोच्छं पमत्तविरयं तु छमयं ॥599॥
गाथार्थ: इस प्रकार मैंने अत्यंत संक्षेप से पांचवे गुण स्थान का स्वरूप कहा । अव इस के आगे प्रमत्तविरत नाम के छठे गुणस्थान का स्वरूप कहता हूँ ।