प्राचीन जैनाचार्यों का परिचय

प्राचीन जैन आचार्यों के परिचय का संकलन ।
आपके पास जिस किसी भी आचार्य के कर्तृत्व, व्यक्तित्व की जानकारी हो उसे प्रेषित करें।

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आ. कुन्दकुन्द देव

परिचय

दिगम्बर जैन आम्नाय में श्री कुन्दकुन्दाचार्य का नाम श्री गणधरदेव के पश्चात् लिया जाता है अर्थात् गणधरदेव के समान ही इनका आदर किया जाता है और इन्हें अत्यन्त प्रामाणिक माना जाता है।

यथा-

मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगल कुन्दकुन्दाद्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलं।।
यह मंगल श्लोक शास्त्र स्वाध्याय के प्रारम्भ में तथा दीपावली के बही पूजन व विवाह आदि के मंगल प्रसंग पर भी लिखा जाता है। ऐसे आचार्य के विषय में जैनेन्द्रसिद्धान्त कोश के लेखक लिखते हैं-
आप अत्यन्त वीतरागी तथा अध्यात्मवृत्ति के साधु थे।आप अध्यात्म विषय में इतने गहरे उतर चुके थे कि आपके एक-एक शब्द की गहनता को स्पर्श करना आज के तुच्छ बुद्धि व्यक्तियों की शक्ति के बाहर है। आपके अनेक नाम प्रसिद्ध हैं तथा आपके जीवन में कुछ ऋद्धियों व चमत्कारिक घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। अध्यात्म प्रधानी होने पर भी आप सर्व विषयों के पारगामी थे और इसीलिए आपने सर्व विषय पर ग्रन्थ रचे हैं। आज के कुछ विद्वान इनके सम्बन्ध में कल्पना करते हैं कि इन्हें करणानुयोग व गणित आदि विषयों का ज्ञान था, पर ऐसा मानना उनका भ्रम है क्योंकि करणानुयोग के मूलभूत व सर्वप्रथम ग्रन्थ षट्खण्डागम पर आपने एक परिकर्म नाम की टीका लिखी थी, यह बात सिद्ध हो चुकी है। यह टीका आज उपलब्ध नहीं है।
इनके आध्यात्मिक ग्रन्थों को पढ़कर अज्ञानीजन उनके अभिप्राय की गहनता को स्पर्श न करने के कारण अपने को एकदम शुद्ध-बुद्ध व जीवन्मुक्त मानकर स्वच्छन्दाचारी बन जाते हैं परन्तु ये स्वयं महान चारित्रवान थे। भले ही अज्ञानी जगत उन्हें न देख सके पर उन्होंने अपने शास्त्रों में सर्वत्र व्यवहार व निश्चयनयों के साथ-साथ कथन किया है। जहाँ वे व्यवहार को हेय बताते हैं वहीं उसकी कथंचित् उपादेयता बताए बिना नहीं रहते। क्यों न अच्छा हो कि अज्ञानीजन उनके शास्त्रों को पढ़कर संकुचित एकांतदृष्टि अपनाने की बजाय व्यापक अनेकांत दृष्टि अपनाएँ।
यहाँ पर उनके नाम, उनका श्वेताम्बरों के साथ वाद, विदेहगमन, ऋद्धि प्राप्ति, उनकी रचनायें, उनके गुरु, उनका जन्मस्थान और इनका समय-इन आठ विषयों का किंचित् दिग्दर्शन कराया जाता है।

नाम

मूलनंदि संघ की पट्टावली में पाँच नामों का उल्लेख है-

आचार्य: कुन्दकुन्दाख्यो वक्रग्रीवो महामति:।
एलाचार्यो गृद्धपिच्छ: पद्मनंदीति तन्नुति:।।
कुन्दकुन्द, वक्रग्रीव, एलाचार्य, गृद्धपिच्छ और पद्मनंदि। मोक्षपाहुड़ की टीका की समाप्ति में भी ये पाँच नाम दिए गए हैं तथा देवसेनाचार्य, जयसेनाचार्य आदि ने भी इन्हें पद्मनंदी नाम से कहा है। इनके नामों की सार्थकता के विषय में पं. जिनदास फड़कुले ने मूलाचार की प्रस्तावना में कहा है-इनका कुन्दकुन्द यह नाम कोण्डकुण्ड नगर में रहवासी होने से प्रसिद्ध है। इनका दीक्षा नाम पद्मनंदी है। विदेह क्षेत्र में मनुष्यों की ऊँचाई ५०० धनुष और इनकी वहाँ पर साढ़े तीन हाथ होने से इन्हें समवशरण में चक्रवर्ती ने अपनी हथेली पर रखकर पूछा-प्रभो! नराकृति का यह प्राणी कौन है ? भगवान ने कहा-भरतक्षेत्र के यह चारण- ऋद्धिधारक महातपस्वी पद्मनंदि नामक मुनि हैं, इत्यादि। इसलिए उन्होंने उनका नाम एलाचार्य रख दिया। विदेहक्षेत्र से लौटते समय इनकी पिच्छी गिर जाने से गृद्धपिच्छ लेना पड़ा अत: गृद्धपिच्छ कहाये और अकाल में स्वाध्याय करने से इनकी ग्रीवा टेढ़ी हो गई तब ये वक्रग्रीव कहलाये। पुन: सुकाल में स्वाध्याय से ग्रीवा ठीक हो गई थी; इत्यादि।
सरस्वती की पाषाण प्रतिमा को बुलवा दिया
पद्मनंदि गुरुर्जातो बलात्कारगणाग्रणी:, पाषाणघटिता येन वादिता श्री सरस्वती।
ऊर्जयंतगिरौ तेन गच्छ: सारस्वतोऽभवत्, अतस्तस्मै मुनीन्द्राय नम: श्री पद्मनंदिने।।
बलात्कार गणाग्रणी श्री पद्मनन्दी गुरु हुए, जिन्होंने ऊर्जयन्त गिरि पर पाषाण निर्मित सरस्वती की मूर्ति को बुलवा दिया था। उससे सारस्वत गच्छ हुआ अत: उन पद्मनंदी मुनीन्द्र को नमस्कार हो। पांडवपुराण में भी कहा है-
कुन्दकुन्दगणी येनोर्जयंतगिरिमस्तके,
सोऽवदात् वादिता ब्राह्मी पाषाणघटिता कलौ।

जिन्होंने कलिकाल में ऊर्जयन्त गिरि के मस्तक पर पाषाण निर्मित ब्राह्मी की मूर्ति को बुलवा दिया। कवि वृन्दावन ने भी कहा है-

संघ सहित श्री कुन्दकुन्दगुरु, वंदन हेतु गये गिरनार।

वाद परयो तहं संशयमति सों, साक्षी बदी अंबिकाकार।।
‘‘सत्यपंथ निर्ग्रंथ दिगम्बर’’ कही सुरी तहं प्रगट पुकार।

सो गुरुदेव बसो उर मेरे, विघन हरण मंगल करतार।।

अर्थात् वहाँ पर पर्वत की पहले वंदना करने का विवाद आने पर श्री कुंदकुंददेव ने अपना चमत्कार दिखलाया और पर्वत पर विराजमान ब्राह्मी ( सरस्वती ) की मूर्ति ने कहा कि - सत्यपंथ निर्ग्रन्थ दिगम्बर ऐसी प्रसिद्धि है।

विदेह गमन

देवसेनकृत दर्शनसार ग्रंथ सभी को प्रामाणिक है। उसमें कहा है कि-

जइ पउमणंदिणाहो सीमंधरसामिदिव्वणाणेण।
ण विबोहइ तो समणा कहं सुमग्गं पयासंति।।४३।।

यदि श्री पद्मनंदिनाथ सीमंधर स्वामी द्वारा प्राप्त दिव्यज्ञान से बोध न देते तो श्रमण सच्चे मार्ग को कैसे जानते ? पंचास्तिकाय टीका के प्रारम्भ में श्री जयसेनाचार्य ने भी कहा है-

प्रसिद्धकथान्यायेन पूर्वविदेहं गत्वा वीतरागसर्वज्ञसीमंधरस्वामितीर्थंकरपरमदेवं दृष्ट्वा च तन्मुखकमलविनिर्गतदिव्यवर्ण… पुरप्यागतै: श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवै:।

श्री श्रुतसागर सूरि ने भी षट्प्राभृत की प्रत्येक अध्याय की समाप्ति में -

पूर्व विदेह पुण्डरीकिणीनगर वंदित सीमंधरापरनाम स्वयंप्रभजिनेन तच्छ्रुतसम्बोधित भारतवर्ष भव्यजनेन।

इत्यादि रूप से विदेहगमन की बात कही है।

ऋद्धिप्राप्ति

श्री नेमिचन्द्र ज्योतिषाचार्य ने तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा नामक पुस्तक भाग ४ के अन्त में बहुत-सी प्रशस्तियाँ दी हैं। उनमें देखिए-

श्री पद्मनन्दीत्यनवद्यनामा, ह्याचार्यशब्दोत्तरकोण्डकुन्द:।

द्वितीयमासीदभिधानमुद्यच्चरित्र-सम्जातसुचारणद्र्धि:।
वंद्योविभुम्र्भुवि न वैâरिह कौण्डकुन्द:, कुन्दप्रभाप्रणयिकीर्ति-विभूषिताश:।
यश्चारुचारण-कराम्बुजचंचरीक-श्चक्रे श्रुतस्य भरते प्रयत: प्रतिष्ठाम्।
श्री कोण्डकुन्दादिमुनीश्वराख्यस्सत्संयमादुद्गतचारणद्र्धि:।
…चरित्रसजातसुचारणद्र्धि:।।४।।

तद्वंशाकाशदिनमणि-सीमंधरवचनामृतपान-संतुष्टचित्त-श्रीकुन्दकुन्दाचार्याणाम्।।५।।

इन पांचों प्रशस्तियों में श्री कुन्दकुन्द के चारणऋद्धि का कथन है तथा जैनेन्द्रसिद्धान्त कोश-२ में शिलालेख नं. ६२, ६४, ६६, ६७, २५४, २६१, पृ. २६३-२६६ कुन्दकुन्दाचार्य वायु द्वारा गमन कर सकते थे उपरोक्त सभी लेखों से यही घोषित होता है।

जैन शिलालेख संग्रह-(पृ. १९७-१९८)

रजोभिरस्पष्टतमत्वमन्तबह्यापि संव्यजयिर्तुयतीश: रज: पदं भूमितलं विहाय, चचार मन्ये चतुरंगुल स:।

यतीश्वर श्री कुन्दकुन्ददेव रज:स्थान को और भूमितल को छोड़कर चार अंगुल ऊँचे आकाश में चलते थे। उसके द्वारा मैं यों समझता हूँ कि वह अन्दर में और बाहर में रज से अत्यन्त अस्पष्टपने को व्यक्त करते थे।

हरी नं. २१ ग्राम हेग्गरे में एक मन्दिर के पाषाण पर लेख-

स्वस्ति श्री वर्धमानस्य शासने।
श्री कुन्दकुन्दनामाभूत् चतुरंगुलचारण।

श्री वर्धमान स्वामी के शासन में प्रसिद्ध श्रीकुन्दकुन्दाचार्य भूमि से चार अंगुल ऊपर चलते थे।

ष. प्रा.। मो. प्रशत्ति। पृ. ३९३ नामपंचकविराजितेन चतुरंगुलाकाशगमनर्द्धिना नाम पंचक विराजित (श्रीकुन्दकुन्दाचार्य) ने चतुरंगुल आकाशगमन ऋद्धि द्वारा विदेह क्षेत्र के पुण्डरीकिणी नगर में स्थित श्री सीमंधरप्रभु की वंदना की थी।

भद्रबाहु चरित्र में राजा चन्द्रगुप्त के सोलह स्वप्नों का फल कहते हुए आचार्य ने कहा है कि पंचमकाल में चारणऋद्धि आदि ऋद्धियां प्राप्त नहीं होती। अत: यहां शंका होना स्वाभाविक है किन्तु वह ऋद्धि निषेध कथन सामान्य समझना चाहिए। इसका अभिप्राय यही है कि ‘‘पंचमकाल में ऋद्धि प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है तथा पंचमकाल के प्रारम्भ में दुर्लभ नहीं है, आगे अभाव है, ऐसा भी अर्थ समझा जा सकता है। यही बात पं. जिनराज फड़कुले ने मूलाचार की प्रस्तावना में लिखी है।

ये तो हुई इनके मुनि जीवन की विशेषताएं, अब आप इनके ग्रन्थों को देखिए-

ग्रन्थ रचनाएं

कुन्दकुन्दाचार्य ने समयसार आदि ८४ पाहुड़ रचे, जिनमें १२ पाहुड़ ही उपलब्ध हैं। इस सम्बन्ध में सर्व विद्वान एकमत हैं परन्तु इन्होंने षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम तीन खण्डों पर भी एक १२००० श्लोक प्रमाण परिकर्म नाम की टीका लिखी थी, ऐसा श्रुतावतार में इन्द्रनंदि आचार्य ने स्पष्ट उल्लेख किया है। इस ग्रन्थ का निर्णय करना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि इसके आधार पर ही आगे उनके काल सम्बन्धी निर्णय करने में सहायता मिलती है-

एवं द्विविधो द्रव्य भावपुस्तकगत: समागच्छत्।

गुरुपरिपाट्या ज्ञात: सिद्धान्त: कोण्डकुण्डपुरे।।१६०।।
श्री पद्मपंदिमुनिना सोऽपि द्वादशसहस्रपरिमाण:।

ग्रन्थपरिकर्मकर्ता षट्खण्डाद्यत्रिखण्डस्य।।१६१।।

इस प्रकार द्रव्य व भाव दोनों प्रकार के श्रुतज्ञान को प्राप्त करके गुरु परिपाटी से आये हुए सिद्धान्त को जानकर श्री पद्मनंदि मुनि ने कोण्डकुण्डपुर ग्राम में १२००० श्लोक प्रमाण परिकर्म नाम की षट्खण्डागम के प्रथम तीन खण्डों की व्याख्या की। इनकी प्रधान रचनायें निम्न हैं-

षट्खण्डागम के प्रथम तीन खण्डों पर परिकर्म नाम की टीका-

  • समयसार,
  • प्रवचनसार,
  • नियमसार,
  • अष्टपाहुड़,
  • पंचास्तिकाय,
  • रयणसार

इत्यादि ८४ पाहुड़, मूलाचार, दशभक्ति, कुरलकाव्य ।

मूलाचार श्री कुन्दकुन्द देव की ही रचना है। कुन्दकुन्द व वट्टकेर एक ही हैं। ऐसा मूलाचार प्रदीप में पं. जिनदास ने स्पष्ट किया है। जैनेन्द्र सिद्धांत कोशकार भी कुन्दकुन्द का एक नाम वट्टकेर मानते हैं और मूलाचार इन्हीं की कृति मानते हैं तथा मूलाचार सटीक का हिन्दी अनुवाद करते समय मैंने भी पूर्णतया इस कृति को श्री कुन्दकुन्द देव की ही निर्णय किया है। कुरलकाव्य के विषय में भी बहुत से विद्वान इन्हीं की कृति है, ऐसा मानते ही हैं। इन ग्रन्थों में रयणसार, मूलाचार मुनिधर्म का वर्णन करता है। अष्टपाहुड़ के चारित्रपाहुड़ में संक्षेप से श्रावकधर्म वर्णित है। कुरलकाव्य नीति का अनूठा ग्रन्थ है और परिकर्म टीका में सिद्धान्त कथन होगा। दश भक्तियां, सिद्ध, श्रुत, आचार्य आदि की उत्कृष्ट भक्ति का ज्वलंत उदाहरण है। शेष सभी ग्रन्थ मुनियों के सरागचारित्र और निर्विकल्प समाधिरूप वीतरागचारित्र के प्रतिपादक ही हैं।

गुरु

गुरु के विषय में कुछ मतभेद हैं, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि भद्रबाहु श्रुतकेवली इनके परम्परा गुरु थे। कुमारनन्दि आचार्य शिक्षागुरु हो सकते हैं किन्तु अनेक प्रशस्तियों से यह स्पष्ट है कि इनके दीक्षागुरु ‘‘श्री जिनचन्द्र’’ आचार्यथे।

जन्मस्थान

इसमें भी मतभेद हैं-जैनेन्द्र सि. कोश मे कहा है-
कुरलकाव्य। प्र. २१। पं. गोविन्दाय शास्त्री दक्षिणादेशे मलये हेम-ग्रामे मुनिमहात्मासीत्। एलाचार्यो नाम्नो द्रविड़ गणधीश्वरो श्रीमान्। यह श्लोक हस्तलिखित मन्त्र ग्रन्थ में से लेकर लिखा गया है, जिससे ज्ञात होता है कि महात्मा एलाचार्य दक्षिण देश के मलय प्रान्त में हेमग्राम के निवासी थे और द्रविड़ संघ के अधिपति थे। मद्रास प्रेजीडेन्सी के मलया प्रदेश में पोन्नूर गाँव को ही प्राचीन काल में हेमग्राम कहते थे और सम्भवत: वही कुन्दकुन्दपुर है। इसी के पास नीलगिरि पहाड़ पर श्री एलाचार्य की चरणपादुका बनी हुई हैं।
पं. नेमिचन्द्र जी भी लिखते हैं-कुन्दकुन्द के जीवन परिचय के सम्बन्ध में विद्वानों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया है कि ये दक्षिण भारत के निवासी थे। इनके पिता का नाम कर्मण्डु और माता का नाम श्रीमती था। इनका जन्म कौण्डकुन्दपुर नामक ग्राम में हुआ था। इस गाँव का दूसरा नाम कुरमरई भी कहा गया है।

समय

आचार्य कुन्दकुन्द के समय में भी मतभेद हैं फिर भी डा. ए.एन उपाध्याय ने इनको ई. सन् प्रथम शताब्दी का माना है। कुछ भी हो, ये आचार्यश्री भद्रबाहु आचार्य के अनंतर ही हुए हैं यह निश्चित है क्योंकि इन्होंने प्रवचनसार और अष्टपाहुड़ में सवस्त्रमुक्ति और स्त्रीमुक्ति का अच्छा खण्डन किया है।
नन्दिसंघ की पट्टावली में लिखा है कि कुन्दकुन्द वि. सं. ४९ में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। ४४ वर्ष की अवस्था में उन्हें आचार्य पद मिला। ५१ वर्ष १० महीने तक वे उस पर प्रतिष्ठित रहे। उनकी आयु ९५ वर्ष १० महीने और १५ दिन की थी।
आपने आचार्यश्री कुन्दकुन्ददेव का संक्षिप्त जीवनपरिचय देखा है। इन्होंने अपने साधु जीवन में जितने ग्रन्थ लिखे हैं, उससे सहज ही यह अनुमान हो जाता है कि इनके साधु जीवन का बहुभाग लेखन कार्य में ही बीता है और लेखन कार्य जंगल में विचरण करते हुए मुनि कर नहीं सकते। बरसात, आंधी, पानी, हवा आदि में लिखे गए पेजों की या ताड़पत्रों की सुरक्षा असम्भव है। इससे यही निर्णय होता है कि आचार्य मन्दिर, मठ, धर्मशाला, वसतिका आदि स्थानों पर ही रहते होंगे।
कुछ लोग कह देते हैं कि कुन्दकुन्ददेव अकेले ही आचार्य थे, यह बात भी निराधार है। पहले तो वे संघ के नायक महान आचार्य गिरनार पर्वत पर संघ सहित ही पहुँचे थे। दूसरी बात गुर्वावली में श्री गुप्तिगुप्त, भद्रबाहु आदि से लेकर १०२ आचार्यों की पट्टावली दी है। उसमें इन्हें पाँचवें पट्ट पर लिया है।

यथा-

  • श्री गुप्तिगुप्त,
  • भद्रबाहु,
  • माघनन्दी,
  • जिनचन्द्र,
  • कुन्दकुन्द,
  • उमास्वामी आदि।

इससे स्पष्ट है कि जिनचन्द्र आचार्य ने इन्हें अपना पट्ट दिया।

पश्चात् इन्होंने उमास्वामी को अपने पट्ट का आचार्य बनाया। यही बात नंदिसंघ की पट्टावली के आचार्यों की नामावली में है।

यथा- ४. जिनचन्द्र, ५. कुन्दकुन्दाचार्य, ६. उमास्वामी।

इन उदाहरणों से सर्वथा स्पष्ट है कि ये महान संघ के आचार्य थे। दूसरी बात यह भी है कि इन्होंने स्वयं अपने मूलाचार में माभूद् मे सत्तु एगागी अर्थात् मेरा शत्रु भी एकाकी न रहे, ऐसा कहकर पंचमकाल में एकाकी रहने का मुनियों के लिए निषेध किया है। इनके आदर्श जीवन व आदेश से आज के आत्महितैषियों को अपना श्रद्धान व जीवन उज्ज्वल बनाना चाहिए।

आ. कुन्दकुन्द का काल निर्धारण

१.परम्परागत मत:—

नंदिसंघ की पट्टावली के अनुसार कुन्दकुन्दाचार्य विक्रम संवत् ४९ अर्थात् ईसा से १०८ वर्ष पूर्व पट्ट पर बैठे। पट्टावली की विभिन्न प्रतियों में कहीं कहीं अन्तर भी है। डॉ. हार्नले द्वारा इण्डियन एंटीक्वेरी, वाल्यूम २१ में प्रकाशित तीन दिगम्बर पट्टावलियों में से ’‘इ’’ में समय वि. स. १४९ अर्थात् ई. पूर्व ८ दिया गयाा है। विद्वज्जन बोधक में किसी श्लोक के आधार पर कुन्दकुन्दाचार्य एवं गृद्ध पिच्छाचार्य उमास्वामी को समकालीन बतलाकर वि.सं. २०० अर्थात् ईस्वी सन् १४३ बतलाया है। किन्तु जैन परम्परागत मत ईसा से १०८ वर्ष पूर्व का है।

२.श्री पं. नाथूराम प्रेमी का मत :— जैन हितैषी भाग १० में कई दशक पूर्व प्रेमी जी का मत इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार पर आधारित प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने कुन्दकुन्दाचार्य को विक्रम की तीसरी शताब्दी के अन्तिम चरण, अर्थात् ईसा की प्राय: द्वितीय शताब्दी के पूर्वार्ध में बतलाया था। यह अनुमान इस बात पर भी आधारित था कि ऊर्जयन्तगिरि पर कुन्दकुन्दाचार्य का श्वेताम्बर आम्नाय से कथित विवाद हुआ था। यह सुत्त पाहुड़ से भी ज्ञात है कि जैन परम्परा में श्वेताम्बर—दिगम्बर भेद हो गया था और इसका समय देवसेन के दर्शनसार के अनुसार विक्रम संवत् १३६ अर्थात् ८१ ई. में हुआ होगा। प्रेमीजी ने १३६ को शक संवत् मानकर २७१ विक्रम संवत् निर्धारित किया जिससे कुन्दकुन्दाचार्य का समय ईस्वी सन् २१४ उनके मत में स्पष्ट हुआ। यह मत बाद में सुधारा भी गया था।

३. डॉ. पाठक का मत :— जैन सिद्धान्त प्रकाशिनी संस्था से प्रकाशित समयप्राभृत की भूमिका में डॉ. के. वी पाठक के मतानुसार कुन्दकुन्दाचार्य वि.सं. ५८५ अर्थात् ईस्वी सन ५२८ में हुए । इस मत की पुष्टि में उन्होंने शक ७१९ एवं शक ७२४ के ताम्रपत्रों का उल्लेख किया था। जिसमें अभिप्राय यह था कि कोण्डकोन्दान्वय के तोरणाचार्य नाम के मुनि इस देश में शाल्मली नामक ग्राम में आकर रहे और उनके शिष्य पुष्पनन्दि और शिष्य के शिष्य प्रभाचन्द्र हुए।

४.डॉ. ए. चक्रवर्ती का मत- यह मत पंचास्तिकाय की प्रस्तावना में प्रोपेसर हार्नले द्वारा सम्पादित नन्दि संघ की पट्टावलियों के आधार पर निर्णीत किया गया है जिसमें कुन्दकुन्दाचार्य को ईसा की प्रथम शताब्दी का विद्वान् माना गया है। प्रो. चक्रवर्ती ने इस तथ्य का आलम्ब लिया है कि कुन्दकुन्दाचार्य द्रविड़ संघ के थे जिसका आधार मंत्रलक्षण पुस्तक का एक श्लोक है।तदनुसार उनका नाम एलाचार्य था जिन्होंने विश्वप्रसिद्ध तमिल ग्रंथ कुरल की १० और १० ही श्लोकों में प्रत्येक समन्वित विषय पर श्लोक लिखकर अपने शिष्य तरुवल्लुवर को दिया, जिन्होंने उसे मदुरासंघ को भेंट कर दिया। यथा :—

‘‘दक्षिण देशे मलये हेम ग्रामे मुनिर्महात्मासीत्।
एलाचार्यो नामा द्रविलगणाधीशो धीमान्।।

एलाचार्य का दूसरा नाम एलाल सिंध था। एलालसिंह को तिरूवल्लुवर का साहित्यिक संरक्षक भी माना जाता है। निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो तिरूकुरल में अनेक तथ्य जैनधर्म के हैं तथा बारह वर्ष के दुष्काल को देखते हुए वर्षाकाल एवं कृषि की महिमा की ओर संकेत करने वाले हैं। यह ग्रन्थ विश्व व्यापक दृष्टि से लिखा गया जिसमें दश की समाप्ति पर एक हुए होंगे, अन्यथा मंगलकार क्यों लिखता :—

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दाद्यो जैन धर्मोेस्तु मंगलं।।

हो भी सकता है कि यह मंगल तदनुसार उमास्वामी कृत हो क्योंकि यह संस्कृत में है और प्रत्यक्ष रूप से उनके गुरु हेतु ही है। दसार्हा पद्धति विश्व के लिये विगत दो हजार वर्षों में अत्यन्त सिद्ध हुई और सम्पूर्ण विश्व ने उसे तत्काल अपनाया होगा। जैसे ही वह दक्षिण के जैन संघ से बाहर आई होगी और हो सकता है वह प्रथम समुद्री रास्ते से चीन में पहुची हो। इस संबंध में हम आगे लिखेंगे।

एलाचार्य और कुन्दकुन्द क एकरूपता कुरल को ईसा की प्रथम शताब्दी में होना इंगित करती है क्योंकि कुरल तो दक्षिण के शिलप्पदिकारम् एव मणिमेखल से भी प्राचीन है। इससे चक्रवर्ती ने डॉ.पाठक के मत का निराकरण किया है क्योंकि स्कन्द और मुमार एकार्थक हैं। ईसा की प्रथम सदी में पल्लव नरेश संभवत: जैन धर्म के पालक अथवा संरक्षक कुन्दकुन्दाचार्य ने प्राकृत ग्रंथ रचे हों।

५. पं. जुगल किशोर मुख्तार का मत:— यह मत रत्नकरंडश्रावकाचार, (बम्बई) में प्रकाशित ’’समन्तभद्र’’ नामक निबन्ध में उन्होंने लिखा है। उनके अनुसार कुन्दकुन्दाचार्य के काल का प्रारम्भ वीर निर्माण सं. ७०३ या ७१३ अथवा ईस्वी सन् १७७ या, १८७ होता है। उन्होंने कुन्दकुन्द के एलाचार्य नाम को अमान्य किया है और शिवमृगेश वर्मा के साथ पल्लव नरेश शिवस्कद वर्मा कमे समीकरण को उचित बतलाया है। कुन्दकुन्दाचार्य को उन्होंने द्वितीय भद्रबाहु का शिष्य स्वीकार तो किया पर उनका समय विं. सं. ४ अथवा ईसा पूर्व ५३ नहीं माना है।

६. डॉ. ए. एन. उपाध्ये का मत :— डॉ. उपाध्ये ने जिन बातों को विचारणीय रखा है, क्रमश: इस प्रकार है :—

(अ) श्वेताम्बर—दिगम्बर भेद होने के पश्चात् कुन्दकुन्दाचार्य हुए।

(ब) कुन्दकुन्द, भद्रबाहु के शिष्य थे।

(स) इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार के अनुसार दोनों सिद्धान्त गं्रथों का ज्ञान गुरु परम्परा से कुन्दकुन्दपुर में पद्मनन्दि को प्राप्त हुआ और उन्होंने षट् खण्डागम के आद्य तीन खण्डों पर परिकर्म नामक ग्रंथ लिखा।

(द) जयसेन एवं बालचन्द्र की टीकाओं उल्लेखानुसार कुन्दकुन्दचार्य शिवकुमार महाराज के समकालीन थे।

(इ) कुन्दकुन्दाचार्य तमिलग्रंथ तिरूकुरल के रचयिता थे।

उपर्युक्त के गम्भीर परिशीलन के पश्चात् डॉ. ए. एन. उपाध्ये, श्री प्रेमी जी, श्रीमुख्तारजी, डॉ. हीरालााल जैन तथा पंं. कैलाशचन्द्र, सिद्धान्त शास्त्री ने यह मान्यता दी कि कुन्दकुन्दचार्य का समय विक्रम की तीसरी शताब्दी का पूर्वार्ध अथवा ईसा की दूसरी शताब्दी का उत्तरार्ध समुचित है।

अब हम दसार्हा पद्धति पर आधारित उस समय की अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति का अवलोकन करें , जिसके बिना षट्खंडागम गंथों पर विशद् व्याख्या का लेखन अंक संदृष्टियोें एवं अर्थ संदृष्टियों के बिना ग्राह्य होना अत्यन्त कठिन हो सकता था। धवला टीका में तो मुख्यत: अँक संदृष्टियों का आलम्बन लिया गया है, और उसी प्रकार तिलोयपण्णत्ती ग्रंथ में भी उनका बाहुल्य है। महाबन्ध में वाक्यांशों के आगे शून्य रखते हुए अभिप्राय प्रदर्शित किया गया है कि उनके द्वारा पूर्ण का अर्थ ग्रहण कर लिया जावे। यह भी उल्लेखनीय है कि अंक संदृष्टियों और अर्थ संदृष्टियों का उपयोग मुख्यत: सिद्धान्त ग्रंथ की दक्षिण भारत में प्राप्य धवलादि टीकाओं में उपलब्ध है, जिसका पूर्ण रूप केशवचंद वर्णी कृत गोम्मटसारादि की कर्णाटिकी वृत्ति में देखने योग्य है।

अखिल विश्व में ईसा से अनेक वर्ष पूर्व से संख्याएँ लिखने की अनेक विधियाँ थी किन्तु शून्य का उपयोग करते हुए किसी अंक के आगे उसे रखने पर प्राप्त उसका मूल्य देने वाली दशमलव पद्धति कहीं भी नहीं थीं। यहाँ दो वस्तुओं की ओर ध्यान देना है। एक तो शून्य के चिन्ह का बिन्दी रूप में उपयोग और उसे किसी अँक के आगे रख देने पर उसका मान प्राप्त करना। इसी प्रकार संख्याओं के लेखन की विधि के आविष्कारक का नाम आज तक कोई ज्ञात नहीं कर सका है, जैसा कि तिरूकुरल के रचयिता का नाम। यह तथ्य भी ध्यान में रखने योग्य है कि ऐसी लेखन पद्धति की उस आविष्कारक को आवश्यकता रही होगी, और उस प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व के पूर्व यह लेखन प्रणाली विश्व में कहीं भी प्रचलित न थी। शून्य द्वारा वाक्यांशों को पूरा करने का अभिप्राय एवं उपयोग केवल भूतबलि आचार्य के महाबंध में देखने में आया है। उस समय तक बिन्दी द्वारा ऐसा उपयोग विश्व के किसी भी भाग में देखने में नहीं आया है। इस समय का निर्धारण प्रोपेसर डॉ. ए. एन. सिंह २ ने लगभग ईसा से २०० वर्ष पूर्व का आंकलित किया है, जिसे उन्होंने भारत में निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित किया है :—

  1. The earliest palaeographic record of the use of the place value system belongs to the close of the sixth century, A.D.

  2. The earliest use place-value principle with the word numerals belongs to the second or the third century A.D. it occurs in the Agnipurana, the Bakhshali Manuscript and the Paulisa siddhanta.

  3. the earliest use of the place Value principle with the letter nunerals is found in the works of Bhaskara- I about the beginning of the sixth century A.D.

  4. the earliest use of the place-value system in a marhematical work occurs in the Bakhshali Manuscript about 200 A.D. (?) It occurs in the Aryabhatiya composed in the 499 A.D., and in all later works without exception.

  5. References to the place-value system are found in literature from about 100 B.C Three references ranging from tje second to the fourth century A.D. are found in the puranas.

  6. The use of a symbol for zero is found in Pingalal’s Chandahsutra as early as 200 B.C.

उपर्यक्त तथ्यों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने मत बनाया है:— " The reader will observe that the literary and non-mathematical works give much earlier instances of the use of the place-value system Than The mathematical works. This is exactly what one should expect. The system when invented must have for some time been used for writing big numbers. In Europe and in Arabia it is still possible to find m55, copies of works using the old numerals of a mixture of old numerals with the new place value numerals, but in India absolubly no trace of any such work exists. In Europe the first definite traces of the place-value numerals are found in the lentn and eleventn contusues but came into general use in mathematical text book in to seventeenth century… As the literary evidence also takes us to that period, we may be certain that the place-value system was Known in India about 200 B.C. Tharefore we shall not be much in ettok it wo 200 B.C. as the probable date of invention of the place-value system and zero in India.
डॉ. सिह का यह अनुमान हमें महाबन्ध की लेखन शैली और षट्खण्डागम के तीन खंडों रचित पर परिकर्म नामक गंथ की ओर आकर्षित है जो दक्षिण भारत में लेखन रूप में प्रकट हुए। उसके पूर्व आचार्य धरसेन ने यह ज्ञान आचार्य पुष्पदंत एवं भूतबलि को मौखिक रूप से दिया था, तथा लेखन हेतु प्रेरित करने के पूर्व उक्त आचार्यों को हीनाक्षरी और धनाक्षरी विद्यादेवियों की सिद्धि करने हेतु परीक्षा भी ली थी। यह भी तथ्य है कि शक संवत् और विक्रम संवत् का झमेला प्राय: १३५ वर्ष का अन्तर डाल रहा है। अत:यदि हम ईसा से प्राय: १०० या २०० वर्ष पूर्व षट्खण्डागम गं्रथों की रचाना और उन पर बाद में परिकर्म ग्रंथ लिख जाना निश्चित करते हैं तो कुन्दकुन्द का समय स्वाभाविक रूप से ईसा की पूर्व की प्रथम शताब्दी में निर्धारित कर सकते हैं जैसा कि प्रोपेसर ए.चक्रवर्ती का भी अभिमत है।
अब हम दर्साहा पद्वति सम्बन्धी अभिमत पाश्चात्य गणित इतिहासकारों की ओर से प्रस्तुत करेंगे। चूँकि यदि माना जाय कि यह पद्धति दक्षिण भारत मेें कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा अथवा उनके गुरु द्वारा ईसा की की पूर्व की प्रथम शताब्दी के लगभग आविष्कृत हुई होगी, तो उसे सिद्धान्त गंथों से बाहर जाने में कई वर्ष तो अवश्य ही लगे होंगे। दूसरी बात ‘‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’’ के अनुसार उस समय की सही आवश्यकता केवल कुन्दकुन्दाचार्य को परिकर्म लेखन में अनुभूत हुई होगी, जबकि विश्व में वह अन्यत्र कीं भी उपलब्ध नहीं थी। स्थानार्हा तो रही भी होगा पर इसमें शून्य का प्रयोग कहीं भी उपलब्ध नहीं है। शून्य का प्रथम उपयोग वाक्यांशों के आगे रखकर का विचार अगले ही क्षण आचार्य कुन्दकुन्द को दसार्हा पद्धति की ओर ले गया हो तो आश्चर्य नहीं क्योंकि द्रव्यप्रमाणानुगम में संख्याओं के लेखन हेतु नवीन पद्धति का होना नितान्त आवश्यक अनुभूत होना अस्वाभाविक नहीं है। लगभग वही समय फलित ज्योतिष के उदय का माना जाता है। नवग्रहों के पुनर्चक्रों में भ्रमण नव के पश्चात् एक के आगे शून्य रखकर आगे बढ़ने के विचार को उत्पन्न करने में भी सहायक रहा होगा। फलित ज्योतिष भी कर्म सिद्धान्त के एक अंग के रूप में ही तो विकसित हुआ होगा, और आचार्य भद्रबाहु भी अष्टांग महानिमित्त में कुशल थे ही। यहाँ प्रसंग ज्ञान का ही नहीं वरन् उसका लेखन रूप अवतरण से है जिसे आचार्य पुष्पदंत, भूतबलि एवं कुन्दकुन्द ने निबद्ध कर लिखा। और वह लेखन गणित रूप में अनेक स्थानों पर करना था।
यह भी समुचित नहीं होगा कि हम किसी बड़ी द्यटना के लिए जो युग और इतिहास तथा समाज को क्रांतिकारी ढँग से बदल दें, उसके समय का निर्धारण केवल भारत के तथा कथित विवादास्पद एवं संभ्रम उत्पादक साहित्य के आधार पर ही करें और युग परिवर्तनकारी घटना से उत्पन्न विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के लेखबद्ध साहित्य से तुलना करने से वंचित रह जायें। इस संबंध में लेखक की महावीराचार्य कृत गणितसार संग्रह पुस्तक में विस्तृत प्रस्तावना को अवश्य ही देख लिया जाये जहाँ विश्व के सभ्यता के केन्द्रों में हुई वद्र्धमान महावीरकालीन एवं उनके पश्चात् हुई विश्व की गणित—विज्ञान क्रान्ति का थोड़ा—सा उल्लेख किया गया है। हम चाहते हैं कि अब इस कुन्दकुन्द द्विसहास्राब्दि समापन पर विश्व इतिहास की मुख्यत: गणित विज्ञान में हुई ईस्वी पूर्व के लगभग की क्रांतिपूर्ण घटनाओं की उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने का एक महान् प्रयास हो जाये। परिकर्म के उद्धरण साक्षी है कि वह लिखा गया और कालवश लुप्त हो गया, पर उसके उद्धरण उसके लेखन पद्धति की गहराई की ओर इंगित करते हैं और दसार्हा पद्वति के उनमें हुए निश्चिित उपयोग की सम्भावना को भी व्यक्त करते हैं जैसा धवला टीका से प्रकट है। अब हम विवेचन से परे होकर, पाश्चात्य गणित इतिहास कारों के शोधपूर्ण वाक्य प्रस्तुत करते हैं। सर्वप्रथम हम दक्षिण भारत से लगे हुए समुद्री किनारे के देशों और कान्फ्ूयशस के चीन की ओर चलें जहाँ के हाल के ग्रंथ ‘‘साइंस एण्ड सिविलिजेशन इन चाइना’’ के खंड १,२,३, दृष्टव्य हैं।

(1) (10) Two different things are involved here, though so closely connected. place-value could and did exist without any symbol for zero, as in chind from the late thou on wards. but the heo symbol. as part of the numeral system, never existed, and could not have come into being without place value. It seems to be established that place-value was known to, and used by the author of the paulisa (heewefueMe) Siddhanta in the early years of the 5th century, and centainly by the time of Aryabhta and Varahanihira (C.500) And this was the decimal place-value of earlier China, not the sexage-simal place-value of earlier Babylonia. It may be very significant that the older literary Indian references simply. use the word sunya (MetvÙe) ‘emptiness’ just as if they were describing the empty spaces on Chinese counting-boards. The earliest zero symbol used in computatio, the dot (bindu), occurs in the Bakhshali MSS but this cannot now be dated earlier than the—10th century (Renou filliozat (1), Vol.2 p.p.175,679; Cajori (2) pp. 85,89, (3) p.77. Better evidence for the use of the dot comes from the—6th centud poem Vasavadatta (JeemeJeoòee) of Subandhu (Renou filliozat (1) p. 703.) This remains the earliest reference. The dot is still used in the Sarda (Meejoe) script of Kashmir."

(2) (10): " From the tables in which ancient Indian numerals have been assembled’ it can be seen that from the time of king Asoka onwards (3rd century) there was steady development of forms akin to ‘Hindu-Arabic three integers are written on just the same way as the Chinese; some of the ancient systems’ also have a x for 4 (cf. Table 22, cols. I Jg) " But in nearly al of themh there were separate symbols (containing no ‘place-value component’)I for 10 and multiples of 10, 20, 30, 40, 100 etc. and so long as any such practice prevailed place-value arithmetic could not exist. While the first epigraphic evidence for the zero in India is, as has just been mentioned, of the late ± 9th century,j It has been discovered about two hendred years earlier in Indo-China and other parts of south-east Asia. this fact may be of much sinificance. The literary and epigraphic evidence for the antiquity of place-value in India has been conflicting. While the former pointed to a date well befor 500 A.D. for the development of place-value and the zero concept,k it was never entirely convincing because of the certain chronology of indian history and the difficulty of dating documents. Kage (1) in his critical examination of the dated inscriptions, could not take place-value back before the 8th century at the earliest. But Coede’s (2) has shown that indo-Chinese inscriptions use place-value much earlier ( Cambodia ± 604, Champa ± 609, java ±732). They employed a system of 'symbolic words, i.e name of things which were universally known to be associated with a given numerical value" Thus, in an inscription at Phnom Bayan in Cambodia for ±604, the 526th year of the Sake era was expressed as the year (designated by) the (five) arrows, the (two) Asvins, and the (six) tastes b Now it is soon after this period that first incription appear showing the zero (simultaneously in Cambodia and Sumatra ±683; and on Banka Island±686). The 605 the year of the Saka era is represented as.

using a dot (bindu), and the 608th as±showing the modern zero itself.e The Indian numerals without the zero, and encumbered with separate signs for the multiples of ten, were no improvement at all on the Greek abd Hebrew alphabetical scripts. Yet Indo-China would seen at first sight a rather unlikely place fot such a revolutionary discovery as that of the essential liberating element.
उपर्युक्त सीधा हमें कुन्दकुन्द के अंशदानों की ओर से दक्षिण भारत से लगे देशों में यह पद्वति पहँुचने का इशारा करती हैं। और भी आगे देखिए—जो प्रश्न अब उपस्थित किया गया है— (3) (II) : Coede’s does not believe that the south-east Asiab inceriptions indicate an east Asian origin for the symbolie word system (as Kaye had hinted might be possible), but rather that the Hinduising settlers of south east Asia already had symbolic words and the old numerals when they first went there or at any rate were soon followed by them. d For so good, but we so are free to consider the possibility (or even probability)that the written zero symbol, and the more reliable calculations which it pernitted really originated in the eastern zone of Hindu culture where it met the southern zone of the culture of the Chinese e

(4) he=. (11-12) What ideographic stimulus could it have received at that in that interface? Could it have adopted an encircled vacancy from the empty blanks left for zeros on the Chinese country boards? The essential points is that the Chinese had possessed, long before the time of the sun Tzu Suan Ching (late 3rd century) a fundamentally decimal place-value system.a It may be, then, that the emptiness’ of Taoist mysticism,b no less than the void of indian philo-sophy, contributed to the invention of a symbol for Sunya,e i.e the zero. d it would seen, indeed, that the finding of the first appearance of the zero in dated inscription on the borderline of the Indian and chinese culture areas can hardly be a coincidence.

और फिर शून्य ने इस प्रकार विश्व को इस पद्वति की लपेट में ले लिया। नोट करें कि अपनी—अपनी देश की लेखन पद्धति में उस समय जबकि इस पद्धति का आविष्कार हो चुका था। निस्सन्देह सिद्धान्त ग्रंथों की परिकर्मादि टीकाओं का अब प्राप्त न होना इस बात साक्षी है कि किसी विध्वंसकारी शक्ति ने इस साहित्य को ईष्र्या, द्वेषवश नष्ट किया होगा जिसके इतिहास में अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। उन्हें छिपाकर लिखा गया और छिपाकर संरक्षित रखने में कहीं कोई त्रुटि रह गई जो धवला टीका लिखे जाने के पश्चात् हो सकती है। इस प्रकार ईसा से पूर्व कुन्दकुन्द आचार्य एवं आचार्य पुष्पदन्त एवं भूतबलि को ले जाने हेतु न केवल तिरूकुरल विषयक रचना है, न केवल शिवस्वंद की समकालीनता है, न केवल विक्रम एवं शक संवत् का संभ्रम है, न केवल इन्द्रनन्दि का श्रुतावतार है, वरन् डॉ.ए.एन.सिंह का गणितीय सिद्धान्त का आधार है कि यह आविष्कार संभवत: किसी भारतीय ऋषि मंडल द्वारा ईसा से प्राय: २०० वर्ष पूर्व हुआ। उपर्युक्त विवरण से और भी स्पष्ट है कि यह आविष्कार दक्षिण भारत में ही हुआ और वह षट्खंडागम के परिकर्म के लेखन से संबंधित था तथा षट्खंडागम विषयक अनेक गणितीय राशि सिद्धान्त अद्र्धच्छेदादिगणन अनन्तों के गणित आदि से संबन्धित था, तथा उसमें जो बल था वह साधारण, अप्रतिम एवं अद्वितीय था। और भी अनेक गणितीय तथ्य उपरोक्त की पुष्टि हेतु लिखे जा सकते हैं। किन्तु केवल उपरोक्त संकेत ही आशा है, इतिहासकारों की। विश्व की इस महान् घटना के आविष्कारक का नाम और समय निर्धारण की ओर पुन: षट्खंडागम परिकर्मादि टीकाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रयत्नशील होने हेतु आकृष्ट करेंगे।
यह भी आशा है कि कुन्दकुन्दाचार्य का द्विसहस्राब्दी समारोह उसके प्रेरक पू.आचार्य श्री विद्यासागर एवं आचार्य श्री विद्यानन्द जी महाराज के आशीर्वाद से उपरोक्त ऐतिहासिक नई संभावनाओं को विश्व के भारतीय विज्ञान—केन्द्रों तक ले जा सकेगा।
अर्हत् वचन के पूर्वांको में लेखक द्वारा प्रस्तुत दसार्हा पद्धति, ब्राह्मी लिपि, हीनाक्षर एवं घनाक्षरी, नाभिकीय रसायन पर लेखों के संदर्भ में यह लेख एक ओर कड़ी अज्ञात आविष्कारों की शृंखला से जोड़ता है। सम्राट चन्दगुप्त मौर्य और वीर सम्राट विक्रमादित्य पर भी अनेक विवादास्पद मत विभिन्न इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत किये हैं। एस. आर.गोयल द्वारा चाणक्य और कौटिल्य को अलग सिद्ध किया जाना भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है।५ वे बतलाते हैं कि उन्हें विश्वास है कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य का प्रधानमंत्री चाणक्य जैन था, और कौटिल्य किोई अन्य व्यक्ति था। जिसने अर्थशास्त्र की रचना की थी। ऐसे सभी नवीन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में आचार्य कुन्दकुन्द का समय निर्धारण करने हेतु एक बार हमें पुन: दक्षिण के अभी तक अप्रकाशित ग्रंथ, अभिलेख आदि, गणितीय अंतदृष्टि के सहारे देखना होंगे।

सन्दर्भ

१. वैलाश चन्द्र जैन, शास्त्री, कुन्दकुन्द प्राभृत संग्रह, शोलापुर १९६०, पृ.—१४

२. B.B. Dutt & A.N. Singh History of Hindu Mathematies, Bombay, 1962, P-86.

३. गणितसार संग्रह—आ. महावीर, संपादन एवं अनुवाद प्रो.लक्ष्मीचन्द्र जैन, (हिन्दी संस्करण)१९६३

४. J. Needham & W. Ling Science & Civilization in China,3-vol, 1954.

५. S.R. Goyal The Riddle of Canakya and Kautilya Sinasa (efpe%eemee) jaipur, 1 No. 3-4 PP. 32-51 & S.R. Goyal, A Religions History of Ancient India, Vol-1, 1984 pp. 207-208.

—लक्ष्मीचंद्र जैन

निदेशक, आचार्य श्री विद्यासागर शोध संस्थान,

ण्/० सूर्या एम्पोरियम, ५५४, सराफा, जबलपुर (म.प्र.)

अर्हत् वचन अंक-३ जुलाई ९१ पृ. ३३-४१
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आ. अकलंकदेव

जैन दर्शन में अकलंकदेव एक प्रखर तार्किक और महान दार्शनिक आचार्य हुए हैं। बौद्धदर्शन में जो स्थान धर्मकीर्ति को प्राप्त है, जैन दर्शन में वही स्थान अकलंकदेव का है। इनके द्वारा रचित प्राय: सभी ग्रन्थ जैनदर्शन और जैन न्यायविषयक हैं। श्री अकलंकदेव के सम्बन्ध में श्रवणबेलगोला के अभिलेखों में अनेक स्थान पर स्मरण आया है।
अभिलेख संख्या ४७ में लिखा है-

षट्तर्केष्वकलंकदेव विबुध: साक्षादयं भूतले।
अर्थात् अकलंकदेव षट्दर्शन और तर्वâशास्त्र में इस पृथ्वी पर साक्षात् वृहस्पति देव थे।

अभिलेख नं. १०८ में पूज्यपाद के पश्चात् अकलंकदेव का स्मरण किया गया है-

‘‘तत: परं शास्त्रविदां मुनीनामग्रे, सरोऽभूदकलंकसूरि:।
मिथ्यान्धकार स्थगिताखिलार्था:, प्रकाशिता यस्य वचोमयूखै:।।’’

इनके बाद शास्त्रज्ञानी महामुनियों के अग्रणी श्री अकलंकदेव हुए जिनकी वचनरूपी किरणों के द्वारा मिथ्या अंधकार से ढके हुए अखिल पदार्थ प्रकाशित हुए हैं।
इनका जीवन परिचय, समय, गुरु परम्परा और इनके द्वारा रचित ग्रन्थ इन चार बातों को संक्षेप से यहां दिखाया जाएगा-
जीवन परिचय-तत्त्वार्थवार्तिक के प्रथम अध्याय के अंत में जो प्रशस्ति है उसके आधार से ये ‘‘लघुहव्वनृपति’’ के पुत्र प्रतीत होते हैं। यथा-

‘‘जीयाच्चिरम कलंकब्रह्मा लघुहव्वनृपतिवरतनय:।
अनवरतनिखिलजननुतविध: प्रशस्तजनहृदय:।।’’

लघुहव्वनृपति के श्रेष्ठ पुत्र श्री अकलंक ब्रह्मा चिरकाल तक जयशील होवें, जिनको हमेशा सभी जन नमस्कार करते थे और जो प्रशस्तजनों के हृदय के अतिशय प्रिय हैं।
ये कौन थे ? किस देश के थे ? यह कुछ पता नहीं चल पाया है। हो सकता है ये दक्षिण देश के राजा रहे हों। श्री नेमिचन्द्रकृत आराधना कथाकोष में इन्हें मंत्रीपुत्र कहा है। यथा-
मान्यखेट के राजा शुभतुंग के मन्त्री का नाम पुरुषोत्तम था, उनकी पत्नी पद्मावती थीं। इनके दो पुत्र थे-अकलंक और निकलंक। एक दिन आष्टान्हिक पर्व में पुरुषोत्तम मंत्री ने चित्रगुप्त मुनिराज के समीप आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया और उसी समय विनोद में दोनों पुत्रों को भी व्रत दिला दिया।
जब दोनों पुत्र युवा हुए तब पिता के द्वारा विवाह की चर्चा आने पर विवाह करने से इंकार कर दिया। यद्यपि पिता ने बहुत समझाया कि तुम दोनों को व्रत विनोद में दिलाया था तथा वह आठ दिन के लिए ही था किन्तु इन युवकों ने यही उत्तर दिया कि-पिताजी व्रत ग्रहण में विनोद कैसा ? और हमारे लिए आठ दिन की मर्यादा नहीं की थी।
पुन: ये दोनों बाल ब्रह्मचर्य के पालन में दृढ़प्रतिज्ञ हो गए और धर्माराधना में तथा विद्याध्ययन में तत्पर हो गए। ये बौद्ध शास्त्रों के अध्ययन हेतु ‘‘महाबोधि’’ स्थान में बौद्ध धर्माचार्य के पास पढ़ने लगे। एक दिन बौद्ध गुरु पढ़ाते-पढ़ाते कुछ विषय को नहीं समझा सके तो वे चिन्तित हो बाहर चले गए। वह प्रकरण सप्त- भंगी का था, अकलंक ने समय पाकर उसे देखा, वहां कुछ पाठ समझकर उसे शुद्ध कर दिया। वापस आने पर गुरु को शंका हो गई कि यहां कोई विद्यार्थी जैनधर्मी अवश्य है। उसकी परीक्षा की जाने पर ये अकलंक-निकलंक पकड़े गए। इन्हें जेल में डाल दिया गया। उस समय रात्रि में धर्म की शरण लेकर ये दोनों वहां से भाग निकले। प्रात: इनकी खोज शुरू हुई। नंगी तलवार हाथ में लिए घुड़सवार दौड़ाए गए।
जब भागते हुए इन्हें आहट मिली, तब निकलंक ने भाई से कहा-भाई! आप एकपाठी हैं अत: आपके द्वारा जैनशासन की विशेष प्रभावना हो सकती है अत: आप इस तालाब के कमलपत्र में छिपकर अपनी रक्षा कीजिए। इतना कहकर वे अत्यधिक वेग से भागने लगे। इधर अकलंक ने कोई उपाय न देख अपनी रक्षा कमलपत्र में छिपकर की और निकलंक के साथ एक धोबी भी भागा। तब ये दोनों मारे गए।
कुछ दिन बाद एक घटना हुई वह ऐसी है कि-
रत्नसंचयपुर के राजा हिमशीतल की रानी मदनसुन्दरी ने फाल्गुन की आष्टान्हिका में रथयात्रा महोत्सव कराना चाहा। उस समय बौद्धों के प्रधान आचार्य संघश्री ने राजा के पास आकर कहा कि जब कोई जैन मेरे से शास्त्रार्थ करके विजय प्राप्त कर सकेगा तभी यह जैन रथ निकल सकेगा अन्यथा नहीं। महाराज ने यह बात रानी से कह दी। रानी अत्यधिक चिंतित हो जिनमन्दिर में गई और वहां मुनियों को नमस्कार कर बोली-प्रभो! आप में से कोई भी इस बौद्ध गुरु से शास्त्रार्थ करके उसे पराजित कर मेरा रथ निकलवाइये। मुनि बोले-रानी! हम लोगों में एक भी ऐसा विद्वान नहीं है। हाँ, मान्यखेटपुर में ऐसे विद्वान मिल सकते हैं। रानी बोली-गुरुवर! अब मान्यखेटपुर से विद्वान आने का समय कहाँ है ? वह चिंतित हो जिनेन्द्रदेव के समक्ष पहुँची और प्रार्थना करते हुए बोली-भगवन्! यदि इस समय जैनशासन की रक्षा नहीं होगी तो मेरा जीना किस काम का ? अत: अब मैं चतुराहार का त्याग कर आपकी ही शरण लेती हूँ। ऐसा कहकर उसने कायोत्सर्ग धारण कर लिया।
उसके निश्चल ध्यान के प्रभाव से पद्मावती देवी का आसन कंपित हुआ। उसने जाकर कहा-देवि! तुम चिन्ता छोड़ो, उठो, कल ही निकलंक देव आयेंगे जो कि तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण करने के लिए कल्पवृक्ष होंगे। रानी ने घर आकर यत्र-तत्र किंकर दौड़ाए। अकलंकदेव बगीचे में अशोकवृक्ष के नीचे ठहरे हैं सुनकर वहां पहुँची। भक्तिभाव से उनकी पूजा की और अश्रु गिराते हुए अपनी विपदा कह सुनाई। अकलंकदेव ने उसे आश्वासन दिया और वहां आये। राज्यसभा में शास्त्रार्थ शुरू हुआ। प्रथम दिन ही संघश्री घबड़ा गया और उसने अपने इष्टदेव की आराधना करके तारादेवी को शास्त्रार्थ करने के लिए घट में उतारा।
छह महीने तक शास्त्रार्थ चलता रहा किन्तु तारादेवी भी अकलंकदेव को पराजित नहीं कर सकी। अंत में अकलंक को चिंतातुर देख चक्रेश्वरी देवी ने उन्हें उपाय बतलाया। प्रात: अकलंकदेव ने देवी से समुचित प्रत्युत्तर न मिलने से परदे के अन्दर घुसकर घड़े को लात मारी जिससे वह देवी पराजित हो भाग गई और अकलंकदेव के साथ-साथ जैनशासन की विजय हो गई। रानी के द्वारा कराई जाने वाली रथयात्रा बड़े धूमधाम से निकली और जैनधर्म की महती प्रभावना हुई। श्री मल्लिषेण प्रशस्ति में इनके विषय में विशेष श्लोक पाए जाते हैं। यथा-

तारा येन विनिर्जिता घटकुटीगूढ़ावतारा समं।

बौद्धैर्यो धृतपीठपीडितकुदृग्देवात्तसेवांजलि:।।
प्रायश्चित्तमिवांघ्रिवारिजरजस्नानं च यस्याचरत्।
दोषाणां सुगतस्स कस्य विषयो देवाकलंक: कृती।।२०।।
चूर्णि ‘‘यस्येदमात्मनोऽनन्यसामान्यनिरवद्यविद्या-विभवोपवर्णनमाकण्र्यते।’’
राजन्साहसतुंग संति वहव: श्वेतातपत्रा नृपा:
किन्तु त्वत्सदृशा रणे विजयिनस्त्यागोन्नता दुर्लभा:।
त्वद्वत्संति बुधा न संति कवयो वादीश्वरा वाग्मिनो,

नानाशास्त्रविचारचातुरधिय: काले कलौ मद्विधा:।।२१।।

आगे २३ वें श्लोक में कहते हैं-

नाहंकारवशीकृतेन मनसा न द्वेषिणा केवलं,

नैरात्म्यं प्रतिपद्य नश्यति जने कारुण्यबुद्ध्या मया।
राज्ञ: श्रीहिमशीतलस्य सदसि प्रायो विदग्धात्मनो

बौद्धौघान् सकलान् विजित्य सुगत: पादेन विस्फोटित:१।।

अर्थात् महाराज हिमशीतल की सभा में मैंने सर्व बौद्ध विद्वानों को पराजित कर सुगत को पैर से ठुकराया। यह न तो मैंने अभिमान के वश होकर किया, न किसी प्रकार के द्वेष भाव से किन्तु नास्तिक बनकर नष्ट होते हुए जनों पर मुझे बड़ी दया आई इसलिए मुझे बाध्य होकर ऐसा करना पड़ा है।
इस प्रकार से संक्षेप में इनका जीवन परिचय दिया गया है।
समय-डॉ. महेन्द्र कुमार न्यायाचार्य ने इनका समय ईस्वी सन् की ८वीं शती सिद्ध किया है। पं. वैâलाशचन्द्र जी शास्त्री ने इनका समय ईस्वी सन् ६२०-६८० तक निश्चित किया है किन्तु महेन्द्रकुमार जी न्या. के अनुसार यह समय ई. सन् ७२०-७८० आता है।
गुरुपरम्परा-देवकीर्ति की पट्टावली में श्री कुन्दकुन्ददेव के पट्ट पर उमास्वामी अपरनाम गृद्धपिच्छ आचार्य हुए। उनके पट्ट पर श्री पूज्यपाद हुए पुन: उनके पट्ट पर श्रीअकलंकदेव हुए।

‘‘अजनिष्टाकलंक यज्जिनशासनमादित:।
अकलंक बभौ येन सोऽकलंको महामति:।।१०।।’’

‘‘श्रुतमुनि-पट्टावली’’ में इन्हें पूज्यपाद स्वामी के पट्ट३ पर आचार्य माना है। इसके संघ भेद की चर्चा की है।
इनके द्वारा रचित ग्रन्थ-
इनके द्वारा रचित स्वतन्त्र ग्रन्थ चार हैं और टीका ग्रन्थ दो हैं-
१. लघीस्त्रय (स्वोपज्ञविवृति सहित),
२. न्यायविनिश्चय (सवृत्ति),
३. सिद्धिविनिश्चय (सवृत्ति),
४. प्रमाण संग्रह (सवृत्ति)।

टीका ग्रन्थ-
१. तत्त्वार्थवार्तिक (सभाष्य),
२. अष्टशती (देवागम विवृत्ति)।
लघीयस्त्रय-इस ग्रन्थ में प्रमाण प्रवेश, नय प्रवेश और निक्षेप प्रवेश ये तीन प्रकरण हैं। ७८ कारिकायें हैं, मुद्रित प्रति में ७७ ही हैं। श्री अकलंकदेव ने इस पर संक्षिप्त विवृत्ति भी लिखी है, जिसे स्वोपज्ञविवृत्ति कहते हैं। श्री प्रभाचन्द्राचार्य ने इसी ग्रन्थ पर ‘‘न्याय कुमुदचन्द्र’’ नाम से व्याख्या रची है जो कि न्याय का एक अनूठा ग्रन्थ है।
न्यायविनिश्चय-इस ग्रन्थ में प्रत्यक्ष, अनुमान और प्रवचन ये तीन प्रस्ताव हैं। कारिकायें ४८० हैं।
इनकी विस्तृत टीका श्री वादिराजसूरि ने की है। यह ग्रन्थ ज्ञानपीठ काशी द्वारा प्रकाशित हो चुका है।
सिद्धि विनिश्चय-इस ग्रन्थ में १२ प्रस्ताव हैं। इसकी टीका श्री अनन्तवीर्यसूरि ने की है। यह भी ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है।
प्रमाण संग्रह-इसमें ९ प्रस्ताव हैं और ८७ कारिकाएं हैं। यह ग्रन्थ ‘‘अकलंक ग्रन्थत्रय’’ में सिंधी ग्रन्थमाला से प्रकाशित हो चुका है। इस ग्रन्थ की प्रशंसा में धनंजय कवि ने नाममाला में एक पद्य लिखा है-

प्रमाणमकलंकस्य, पूज्यपादस्य लक्षणम्।
धनंजयकवे: काव्यं रत्नत्रयमपश्चिमम्।।

अकलंकदेव का प्रमाण, पूज्यपाद का व्याकरण और धनंजय कवि का काव्य ये अपश्चिम-सर्वोत्कृष्ट रत्नत्रय-तीन रत्न हैं।
वास्तव में जैन न्याय को अकलंक की सबसे बड़ी देन है, इनके द्वारा की गई प्रमाण व्यवस्था दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायों के आचार्यों को मान्य रही है।
तत्त्वार्थवार्तिक-यह ग्रन्थ श्री उमास्वामी आचार्य के तत्त्वार्थसूत्र की टीकारूप है। तत्त्वार्थसूत्र के प्रत्येक सूत्र पर वार्तिकरूप में व्याख्या लिखे जाने के कारण इसका ‘‘तत्त्वार्थवार्तिक’’ यह सार्थक नाम श्री भट्टाकलंकदेव ने ही दिया। इस ग्रन्थ की विशेषता यही है कि इसमें तत्त्वार्थसूत्र के सूत्रों पर वार्तिक रचकर उन वार्तिकों पर भी भाष्य लिखा गया है अत: यह ग्रन्थ अतीव प्रांजल और सरल प्रतीत होता है।
अष्टशती-श्री स्वामी समन्तभद्र द्वारा रचित आप्तमीमांसा की यह भाष्यरूप टीका है। इस वृत्ति का प्रमाण ८०० श्लोक प्रमाण है अत: इसका ‘‘अष्टशती’’ यह नाम सार्थक है।
जैनदर्शन अनेकांतवादी दर्शन है। आचार्य समन्तभद्र अनेकांतवाद के सबसे बड़े व्यवस्थापक हैं। उन्होंने श्री उमास्वामी के तत्त्वार्थसूत्र के मंगलाचरण ‘‘मोक्षमार्गस्य नेतारं’’ आदि को लेकर आप्त-सच्चे देव की मीमांसा करते हुए ११५ कारिकाओं द्वारा स्याद्वाद की प्रक्रिया को दर्शाया है। उस पर श्री भट्टाकलंकदेव ने ‘‘अष्टशती’’ नाम से भाष्य बनाया है और इस भाष्य को वेष्टित करके श्री विद्यानन्द आचार्य ने ८००० श्लोक प्रमाणरूप से ‘‘अष्टसहस्री’’ नाम का सार्थक टीका ग्रन्थ तैयार किया और इसे ‘‘कष्टसहस्री’’ नाम भी दिया है। जैन दर्शन का यह सर्वोपरि ग्रन्थ है। मैंने पूर्वाचार्यों और अपने दीक्षा, शिक्षा आदि गुरुओं के प्रसाद से इस ‘‘अष्टसहस्री’’ ग्रन्थ का हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है जिसके तीनों खण्ड ‘‘वीर ज्ञानोदय ग्रन्थमाला’’ से प्रकाशित हो चुके हैं।

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आ. अमृतचंद्र देव

आध्यात्मिक ग्रन्थों के टीकाकारों में श्री अमृतचंद्रसूरि का सर्वप्रथम स्थान है। यदि अमृतचंद्रसूरि न होते तो आचार्य श्री कुंदकुंद देव के रहस्य को समझना कठिन हो जाता अत: कुंदकुंद देव के व्याख्याता के रूप में अमृतचंद्रसूरि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनके मौलिक ग्रन्थ भी अपने आप में अतीव विशेषता लिए हुए हैं। निश्चयत: इन आचार्य की विद्वत्ता, वाग्मिता और प्रांजल शैली अप्रतिम है। आध्यात्मिक विद्वानों में कुंदकुंद देव के पश्चात् यदि आदरपूर्वक किसी का नाम लिया जा सकता है तो वे अमृतचंद्रसूरि हैं।

इनका जीवन परिचय, समय और इनकी रचनाओं पर यहां किंचित् प्रकाश डाला जा रहा है-

जीवन परिचय-इनका परिचय किसी भी कृति में प्राप्त नहीं होता है पर कुछ ऐसे संकेत अवश्य मिलते हैं जिनसे इनके व्यक्तित्व का निश्चय किया जा सकता है। पं. आशाधर ने इनका उल्लेख ‘‘ठक्कुर पद’’ के साथ किया है-‘‘ऐतच्च विस्तरेण ठक्कुरामृतचंद्रसूरिविरचित समयसारटीकायां दृष्टव्यम्।’’

यहां ‘‘ठक्कुर’’ शब्द विचारणीय है। ‘‘ठक्कुर’’ शब्द का प्रयोग प्राय: जागीरदार या जमींदार के लिए प्रयुक्त होता है। यह पद क्षत्रिय और ब्राह्मण इन दोनों के लिए समानरूप से प्रयुक्त होता है अत: यह नहीं कहा जा सकता कि अमृतचंद्रसूरि क्षत्रिय थे या ब्राह्मण पर इतना निश्चय अवश्य है कि वे किसी सम्माननीय कुल के व्यक्ति रहे थे। संस्कृत और प्राकृत इन दोनों ही भाषाओं पर इनका पूर्ण अधिकार था। ये मूलसंघ के आचार्य थे।

समय विचार-डॉ. उपाध्ये ने इनका समय ईस्वी सन् की १० वीं शताब्दी के लगभग माना है। पट्टावली में अमृतचंद्र के पट्टारोहण का समय वि.सं. ९६२ दिया है, जो ठीक प्रतीत होता है। डॉ. नेमिचंद्र ज्योतिषाचार्य भी इनका समय ई. सन् की १०वीं शताब्दी का अन्तिम भाग ही मानते हैं।

रचनायें-टीका ग्रन्थ-१. समयसार टीका, २. प्रवचनसार टीका, ३. पंचास्तिकाय टीका।
मौलिक ग्रन्थ-४. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, ५. तत्त्वार्थसार, ६. समयसार कलश।

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आचार्य श्री उमास्वामी



परिचय

तत्त्वार्थसूत्र ग्रन्थ के रचयिता आचार्य श्री उमास्वामी हैं । इनको उमास्वाति भी कहते हैं । इनका अपरनाम गृद्धपिच्छाचार्य है । धवलाकार ने इनका नामोल्लेख करते हुए कहा है कि-

तह गिद्धपिंछाइरियप्पयासिदतच्चत्थसुत्तेवि ।

उसी प्रकार से गृद्धपिच्छाचार्य के द्वारा प्रकाशित तत्त्वार्थसूत्र में भी कहा है ।

इनके इस नाम का समर्थन श्री विद्यानन्द आचार्य ने भी किया है । यथा-

एतेन गृद्धपिच्छाचार्यपर्यंतमुनिसूत्रेण व्यभिचारता निरस्ता ।

इस कथन से गृद्धपिच्छाचार्य पर्यंत मुनियों के सूत्रों से व्यभिचार दोष का निराकरण हो जाता है।

तत्त्वार्थसूत्र के किसी टीकाकार ने भी निम्न पद्य मे तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता का नाम गृद्धपिच्छाचार्य दिया है-

तत्त्वार्थसूत्रकर्तारं गृद्धपिच्छोपलक्षितम् ।
वंदे गणीन्द्रसं जातमुमास्वामिमुनीश्वरम् ।।

गृद्धपिच्छ इस नाम से उपलक्षित, तत्त्वार्थसूत्र के कर्तागण के नाथ उमास्वामी मुनीश्वर की मैं वन्दना करता हूँ ।

श्री वादिराज ने भी इनके गृद्धपिच्छ नाम का उल्लेख किया है-

अतुच्छगुणसंपातं गृद्धपिच्छं नतो स्मिऽतम् ।
पक्षीकुर्वन्ति यं भव्या निर्वाणयोत्पतिष्णव:।।

आकाश में उड़ने की इच्छा करने वाले पक्षी जिस प्रकार अपने पंखों का सहारा लेते हैं, उसी प्रकार मोक्षनगर को जाने के लिए भव्य लोग जिस मुनीश्वर का सहारा लेते हैं, उस महामना, अगणित गुणों के भण्डार स्वरूप गृद्धपिच्छ नामक मुनि महाराज के लिए मेरा सविनय नमस्कार हो ।

श्रवणबेलगोला के एक अभिलेख में गृद्धपिच्छ नाम की सार्थकता और कुन्दकुन्द के वंश में उनकी उत्पत्ति बतलाते हुए उनका उमास्वाति नाम भी दिया है । यथा-

अभूदुमास्वातिमुनि: पवित्रे, वंशे तदीये सकलार्थवेदी ।

सूत्रीकृतं येन जिन प्रणीतं, शास्त्रार्थतार्थजातं मुनिपुंगवेन ।।
स प्राणि संरक्षण सावधानो, बभार योगी किल गृद्धपिक्षान् ।

तदा प्रभृत्येव बुधा यमाहुराचार्य, शब्दोत्तर गृद्धपिच्छम् ।।

आचार्य कुन्दकुन्द के पवित्र वंश में सकलार्थ के ज्ञाता उमास्वाति मुनीश्वर हुए, जिन्होंने जिनप्रणीत द्वादशांगवाणी को सूत्रों में निबद्ध किया। इन आचार्य ने प्राणिरक्षा के हेतु गृद्धपिच्छों को धारण किया, इसी कारण वे गृद्धपिच्छाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए । इस प्रमाण में गृद्धपिच्छाचार्य को सकलार्थवेदी कहकर श्रुतकेवली सदृश भी कहा है। इससे उनका आगम सम्बन्धी सातिशय ज्ञान प्रकट होता है।

इस प्रकार दिगम्बर साहित्य और अभिलेखों का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि तत्त्वार्थसूत्र के रचयिता गृद्धपिच्छाचार्य, अपरनाम उमास्वामि या उमास्वाति हैं ।

समय निर्धारण और गुरु शिष्य परम्परा-नन्दि संघ की पट्टावली और श्रवणबेलगोला के अभिलेखों से यह प्रमाणित होता है कि ये गृद्धपिच्छाचार्य कुन्दकुन्द के अन्वय में हुए हैं। नन्दिसंघ की पट्टावली विक्रम के राज्याभिषेक से प्रारम्भ होती है । वह निम्न प्रकार है-

  1. भद्रबाहु द्वितीय (४)
  2. गुप्तिगुप्त (२६)
  3. माघनन्दि (३६)
  4. जिनचन्द्र (४०)
  5. कुन्दकुन्दाचार्य (४९)
  6. उमास्वामि (१०१)
  7. लोहाचार्य (१४२)

अर्थात नन्दिसंघ की पट्टावली में बताया है कि उमास्वामी वि. सं. १०१ में आचार्यपद पर आसीन हुए, वे ४० वर्ष आठ महीने आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे। उनकी आयु ८४ वर्ष की थी और विक्रम सं. १४२ में उनके पट्ट पर लोहाचार्य द्वितीय प्रतिष्ठित हुए । प्रो. हार्नले, डॉ. पिटर्सन और डॉ. सतीशचन्द्र ने इस पट्टावली के आधार पर उमास्वाति को ईसा की प्रथम शताब्दी का विद्वान माना है ।

‘‘किन्तु स्वयं नेमिचन्द्र ज्योतिषाचार्य ने इन्हें ईस्वी सन् की द्वितीय शताब्दी का अनुमानित किया है ।’’

कुछ भी हो ये आचार्य श्री कुन्दकुन्द के शिष्य थे । यह बात अनेक प्रशस्तियों से स्पष्ट है । यथा-

तस्मादभूद्योगिकुलप्रदीपो, बलाकपिच्छ: स तपोमहद्र्धि:।
यदंगसंस्पर्शनमात्रतोऽपि, वायुव्र्विषादोनमृतीचकार ।।१३।।

इन योगी महाराज की परम्परा में प्रदीपस्वरूप महद्र्धिशाली तपस्वी बलाकपिच्छ हुए। इनके शरीर के स्पर्शमात्र से पवित्र हुई वायु भी उस समय लोगों के विष आदि को अमृत कर देती थी ।

विरुदावलि में भी कुन्दकुन्द के पट्ट पर उमास्वाति को माना है ।

दशाध्यायसमाक्षिप्तजैनागमतत्त्वार्थ-सूत्रसमूह-श्रीमदुमास्वातिदेवानाम् ।।३।।

इन सभी उद्धरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री कुन्दकुन्द के पट्ट पर ही ये उमास्वामि आचार्य हुए हैं और इन्होंने अपना आचार्य पद बलाकपिच्छ या लोहाचार्य को सौंपा है ।
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आचार्य श्रीगुणधरदेव का विशेष परिचय



श्रुतधर आचार्यों की परम्परा में सर्वप्रथम आचार्य कौन हैं ? ऐसा प्रश्न होने पर इतिहासकारों ने बड़े आदर से महान आचार्यश्री गुणधर देव का नाम लिया है। श्रीगुणधर और धरसेन ये दोनों आचार्य श्रुत के प्रतिष्ठापकरूप से प्रसिद्ध हुए हैं फिर भी गुणधरदेव, धरसेनाचार्य की अपेक्षा अधिक ज्ञानी थे और लगभग उनके दो सौ वर्ष पूर्व हो चुके हैं ऐसा विद्वानों का अभिमत है अतएव आचार्य गुणधर को दिगम्बर परम्परा में लिखितरूप से प्राप्त श्रुत का प्रथम श्रुतकार माना जा सकता है। धरसेनाचार्य ने किसी ग्रन्थ की रचना नहीं की, जब कि गुणधराचार्य ने पेज्जदोसपाहुड ग्रन्थकी रचना की है।

आचार्य का समय

ये गुणधराचार्य किनके शिष्य थे इत्यादि रूप से इनका परिचय यद्यपि आज उपलब्ध नहीं है तो भी उनकी महान कृति से ही उनकी महानता जानी जाती है।
यथा-

गुणधरधरसेनान्वयगुर्वो: पूर्वापरक्रमोऽस्माभि:।
न ज्ञायते तदन्वयकथकागममुनिजनाभावात्।।५१।।

गुणधर और धरसेन की पूर्वापर गुरु परम्परा हमें ज्ञात नहीं है क्योंकि इसका वृत्तांत न तो हमें किसी आगम में मिला और न किसी मुनि ने ही बतलाया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन्द्रनंदि आचार्य के समय तक आचार्य गुणधर और धरसेन का गुरु शिष्य परम्परा का अस्तित्व स्मृति के गर्भ में विलीन हो चुका था फिर भी इतना स्पष्ट है कि श्री अर्हद्बलि आचार्य द्वारा स्थापित संघों में गुणधर संघ का नाम आया है। नंदिसंघ की प्राकृत पट्टावली में अर्हद्बलि का समय वीर नि.सं. ५५६ अथवा वि. सं. ९५ है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि गुणधर देव अर्हद्बलि के पूर्ववर्ती हैं पर कितने पूर्ववर्ती हैं, यह निर्णयात्मकरूप से नहीं कहा जा सकता। यदि गुणधर की परम्परा को ख्याति प्राप्त करने में सौ वर्ष का समय मान लिया जाए तो षट्खंडागम के प्रवचनकर्ता धरसेनाचार्य से कसायपाहुड के प्रणेता गुणधराचार्य का समय लगभग दो सौ वर्ष पूर्व सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार आचार्य गुणधर का समय विक्रम पूर्व प्रथम शताब्दी सिद्ध होता है।

कषायपाहुड़ ग्रन्थ रचना

भगवान महावीर की दिव्यध्वनि को सुनकर श्री गौतमस्वामी ने उसे द्वादशांगरूप से निबद्ध किया। यह द्वादशांग श्रुत अंतिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहु आचार्य तक पूर्णरूप से विद्यमान रहा पुन: धीरे-धीरे ह्रास होते हुए अंग और पूर्व के एकदेशरूप ही रह गया तब श्रुतरक्षा की भावना से पे्ररित हो कुछ आचार्यों ने उसे ग्रन्थरूप से निबद्ध किया।

श्रीगुणधराचार्य को पाँचवे ज्ञानप्रवाद पूर्व की दशवीं वस्तु के तीसरे पेज्जदोसपाहुड का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त था जबकि षट्खण्डागम आदि ग्रन्थों के प्रणेताओं को उक्त ग्रन्थों की उत्पत्ति के आधारभूत महाकम्मपयडिपाहुड का आंशिक ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस प्रकार से गुणधराचार्य ने कसायपाहुड़ जिसका अपरनाम पेज्जदोसपाहुड भी है, उसकी रचना की है। १६००० पद प्रमाण कसायपाहुड़ के विषय को संक्षेप से एक सौ अस्सी गाथाओं में ही उपसंहृत कर दिया है। पेज्ज नाम प्रेयस् या राग का है और दोस नाम द्वेष का है। यत: क्रोधादि चारों कषायों में माया, लोभ को रागरूप से और क्रोध, मान को द्वेषरूप से, ऐसे ही नव नोकषायों का विभाजन भी राग और द्वेषरूप में किया है अत: प्रस्तुत ग्रन्थ का मूल नाम पेज्जदोसपाहुड है और उत्तर नाम कसायपाहुड है। कषायों की विभिन्न अवस्थाओं का एवं इनसे छूटने का विस्तृत विवेचन इस ग्रन्थ में किया गया है अर्थात् किस कषाय के अभाव से सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति होती है, किस कषाय के क्षयोपशम आदि से देशसंयम और सकलसंयम की प्राप्ति होती है, यह बतला करके कषायों की उपशमना और क्षपणा का विधान किया गया है। तात्पर्य यही है कि इस ग्रन्थ में कषायों की विविध जातियां बतला करके उनके दूर करने का मार्ग बतलाया गया है।

इस ग्रन्थ की रचना गाथासूत्रों में की गई है। आचार्य गुणधरदेव स्वयं कहते हैं-

वोच्छामि सुत्तगाहा जपिगाहा जम्मि अत्थम्मि

जिस अर्थाधिकार में जितनी-जितनी सूत्र गाथायें प्रतिबद्ध हैं, उन्हें मैं कहूँगा।
इस ग्रन्थ में कुल २३३ गाथायें हैं, जिन्हें कसायपाहुड सुत्त की प्रस्तावना में पं. हीरालाल जी ने श्रीगुणधराचार्य रचित ही माना है अर्थात् ५३ गाथाओं में विवाद होकर भी गुणधराचार्य रचित ही निर्णय मान्य होता है।

‘‘इस प्रकार के उपसंहृत एवं गाथासूत्र निबद्ध द्वादशांग जैन वाङ्मय के भीतर अनुसंधान करने पर यह ज्ञात हुआ है कि कसायपाहुड ही सर्वप्रथम निबद्ध हुआ है। इससे प्राचीन अन्य कोई रचना अभी तक उपलब्ध नहीं है।’’
अत: श्री गुणधराचार्य दिगम्बराचार्य की परम्परा में प्रथम सूत्रकार माने जाते हैं।

ग्रन्थ की महत्ता

आचार्य इन्द्रनंदि ने अपने श्रुतावतार में कहा है कि कसायपाहुड ग्रन्थ पर आचार्य यतिवृषभ ने ६,००० श्लोक प्रमाण चूर्णिसूत्र रचे हैं।

उच्चारणाचार्य ने १२,००० श्लोक प्रमाण में उच्चारणावृत्ति रची है। शामकुन्डाचार्य ने ४८,००० श्लोक प्रमाण में पद्धतिनाम से व्याख्या रची है। तुम्बलूराचार्य ने ८४,००० श्लोक प्रमाण में चूड़ामणि टीका रची है और आचार्यश्री वीरसेन तथा जिनसेन ने ६०,००० श्लोक प्रमाण में जयधवला नाम से टीका लिखी है। उपलब्ध जैन वाङ्मय में से कसायपाहुड पर ही सबसे अधिक व्याख्यायें और टीकायें रची गई हैं। यदि उक्त समस्त टीकाओं के परिमाण को सामने रखकर मात्र २३३ गाथाओं वाले कसायपाहुड को देखा जाए तो वह दो लाख प्रमाण से भी ऊपर सिद्ध होता है। वर्तमान में मूल गाथाएँ यतिवृषभाचार्यकृत चूर्णिसूत्र और जयधवला टीका ही उपलब्ध है, बाकी टीकाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

चूर्णिसूत्रकार ने और जयधवलाकार ने तो इनकी गाथाओं को बीजपदरूप और अनंतार्थगर्भी कहा है। ‘‘कसायपाहुड की किसी-किसी गाथा के एक-एक पद को लेकर एक-एक अधिकार का रचा जाना तथा तीन गाथाओं का पांच अधिकारों में निबद्ध होना ही गाथाओं की गम्भीरता और अनंत अर्थगर्भिता को सूचित करता है। वेदक अधिकार की जो जंसंकामेदिय’’ (गाथांक ६२) गाथा के द्वारा चारों प्रकार के बंध, चारों प्रकार के संक्रमण, चारों प्रकार के उदय, चारों प्रकार की उदीरणा और चारों प्रकार के सत्व सम्बन्धी अल्पबहुत्व की सूचना निश्चयत: उसके गांभीर्य और अनन्तार्थगर्भित्व की साक्षी है। यदि इन गाथा सूत्रों में अंतर्निहित अनंत अर्थ को चूर्णिकार व्यक्त न करते, तो आज उनका अर्थबोध होना असम्भव था।

इस ग्रंथ का भगवान महावीर स्वामी से सीधा सम्बन्ध है। देखिए-स्वयं जयधवलाकार प्रस्तुत ग्रंथ के गाथासूत्रों और चूर्णिसूत्रों को किस श्रद्धा और भक्ति से देखते हैं, यह उन्हीं के शब्दों में देखिए। एक स्थल पर शिष्य के द्वारा यह शंका किए जाने पर कि यह वैâसे जाना ? इसके उत्तर में वीरसेनाचार्य कहते हैं-

एदम्हादो विउलगिरिमत्थ यत्थवड्ढमाणादिवायरादो विणिग्गमिय गोदमलोहज्जजंबुसामियादि आइरियपरंपराए आगंतूण गुणहराइरियं पाविय गाहासरूवेण परिणमिय अज्जमंखुणागहत्थी हितो जसिवसहमुहणयिय चुण्णिसुत्तायारेण परिणमिद दिव्वज्झुणिकिरणादो णव्वदे।

अर्थात् विपुलाचल के शिखर पर विराजमान वर्धमान दिवाकर से प्रकट होकर गौतम, लोहार्य (सुधर्मा स्वामी) और जम्बूस्वामी आदि की आचार्य परम्परा से आकर और गुणधराचार्य को प्राप्त होकर गाथास्वरूप से परिणत हो पुन: आर्यमंक्षु और नागहस्ति द्वारा यतिवृषभ को प्राप्त होकर और उनके मुख- कमल से चूर्णिसूत्र के आकार से परिणत दिव्यध्वनिरूप किरण से जानते हैं।

‘‘पाठक स्वयं अनुभव करेंगे कि जो दिव्यध्वनि भगवान महावीर से प्रगट हुई है वही गौतमादि के द्वारा प्रसारित होती हुई गुणधराचार्य को प्राप्त हुई और फिर उनके द्वारा गाथारूप से परिणत होकर आचार्य परम्परा द्वारा आर्यमंक्षु और नागहस्ति को प्राप्त होकर उनके द्वारा यतिवृषभ को प्राप्त हुई और फिर वही दिव्यध्वनि चूर्णिसूत्रों में निर्दिष्ट प्रत्येक बात दिव्यध्वनिरूप ही है। इसमें किसी प्रकार के संदेह या शंका की कुछ भी गुंजाइश नहीं है। अस्तु! कसायपाहुड और उसके चूर्णिसूत्रों में जिस ढंग से वस्तुतत्त्व का निरूपण किया गया है, उसी से वह सर्वज्ञ कथित है’’ यह सिद्ध होता है।

इस उपर्युक्त प्रकरण से आचार्य परम्परा और श्रुत परम्परा का अविच्छेद भी जाना जाता है।

जयधवलाकार तो इस कषायपाहुड के ऊपर रचे गए चूर्णिसूत्रों को षट्खण्डागम सूत्रों के सदृश सूत्र- रूप और प्रमाण मानते हैं। देखिए-किसी स्थल पर चूर्णिकार यतिवृषभ और षट्खंडागम के कर्ता भूतबलि के मत में कुछ अन्तर होने पर श्री वीरसेनाचार्य कहते हैं कि

एदेसिं दोण्हमुवदेसाणं मज्झे सच्चेणेक्केणेव होदव्वं। तत्थ सच्चत्तणेगदरणिण्णओ णत्थि त्ति दोण्हं पि संगहो कायव्वो।

इन दोनों उपदेशों में से सत्य तो एक ही होना चाहिए किन्तु किसी एक की सत्यता का निर्णय आज केवली या श्रुतकेवली के न होने से सम्भव नहीं है अतएव दोनों का ही संग्रह करना चाहिए।

श्री वीरसेनाचार्य ने भगवान की दिव्यध्वनि को सूत्र कहा है पुन: श्रीगणधरदेव और गणधरदेव के वचनों को भी सूत्र सम कहकर प्रमाणता दी है तथा सूत्र के लक्षण के बाद प्रश्न होता है कि-

‘‘इस वचन से ये गाथाएँ सूत्र नहीं हैं क्योंकि गणधर, प्रत्येक बुद्ध, श्रुतकेवली और अभिन्न दशपूर्वी के वचन सूत्र माने गए हैं किन्तु भट्टारक गणधरादि नहीं हैं तो आचार्य कहते हैं कि नहीं, गुणधर भट्टारक की गाथाएँ निर्दोष, अल्पाक्षर एवं सहेतुक होने से सूत्र के समान हैं अत: इन्हें सूत्र ही माना गया है।’’ ऐसे ही कई स्थलों पर जयधवला में उल्लेख है।

इन सभी बातों से आचार्य गुणधर देव कितने महान थे और उनका यह कसायपाहुड ग्रन्थ कितना महान है, इसका बोध सहज ही हो जाता है।

महत्त्वपूर्ण गाथा-

उपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति का पूरा वर्णन करके सम्यक्त्व के लक्षण को बतलाते हुए श्रीगुणधरदेव कहते हैं

सम्माइट्ठी जीवो पवयणं णियमसा दु उवइट्ठं।।

सद्दहदि असब्भावं अजाणमाणो गुरुणिओगा।।१०७।।

अर्थ-सम्यग्दृष्टि जीव सर्वज्ञ के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का तो नियम से श्रद्धान करता ही है किन्तु कदाचित् अज्ञानवश सद्भूत अर्थ को स्वयं नहीं जानता हुआ गुरु के नियोग से असद्भूत अर्थ का भी श्रद्धान कर लेता है।

यह गाथा किसी ग्रंथ में इसी रूप में अथवा कहीं पर किंचित् परिवर्तित रूप में कई ग्रन्थों में आती है। लब्धिसार में गाथा का पूर्वार्ध बदला हुआ है और उत्तरार्ध यही है। वहां पर अजाणमाणो गुरुणिओगा का अर्थ टीकाकर ने ऐसा किया है कि गुरु यदि विस्मरण से, दुष्ट अभिप्राय से अथवा ज्ञान से कुछ गलत अर्थ भी कह रहे हैं और शिष्य गुरु के वचन पर श्रद्धान कर रहा है तो वह सम्यग्दृष्टि ही है, मिथ्यादृष्टि नहीं है। पुन: आगे गाथा में कहते हैं कि यदि किसी अन्य आचार्य ने सूत्र से सही अर्थ को दिखा दिया है और फिर वह पूर्व के हठ को नहीं छोड़ता है तो वह उसी समय से मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

इस उपर्युक्त गाथा से गुरु के वचन का महत्त्व दिख रहा है तथा पुनरपि अन्य गुरु के द्वारा आगम पंक्ति दिखाए जाने पर भी यदि कोई दुराग्रह को नहीं छोड़ता है तो वास्तव में अपने सम्यक्त्वरत्न को छोड़ देता है अत: आचार्यों के वचनों पर हमें दृढ़ श्रद्धान होना चाहिए क्योंकि आज हमारे सामने केवली या श्रुतकेवली नहीं हैं। वर्तमान के उपलब्ध प्रामाणिक ग्रन्थ ही उनकी वाणीरूप होने से श्रद्धान करने योग्य हैं और सर्वथा मान्य हैं तथा पूर्व में आचार्य ग्रन्थों को गुरुमुख से ही पढ़ते थे पुन: उस पर टीका या भाष्य आदि लिखते थे, यह भी स्पष्ट दिख रहा है।

गुणधर देव के इस इतिहास से हमें यह समझना है कि ये आचार्य विक्रम पूर्व की प्रथम शताब्दी में हुए हैं अत: ये षट्खण्डागम के उपदेष्टा श्री धरसेनाचार्य व कुन्दकुन्दाचार्य आदि से प्रथम हुए हैं। इनका ग्रन्थ कसायपाहुड महान सूत्र ग्रन्थ है जो कि चूर्णिसूत्र व हिन्दी सहित वीर सेवा मन्दिरसे छप चुका है और जयधवला टीका भी (मथुरा संघ से) कई भागों में छप चुकी है। जयधवला टीका के अध्ययन से इस ग्रन्थ के रहस्य को कुछ समझ सकते हैं एवं उपर्युक्त गाथा नं. १०७ को यदि पाठकगण हृदय में अंकित कर लेंगे तथा उसके अनुरूप आचार्यों की वाणी पर पूर्ण श्रद्धान करेंगे तो अवश्य ही इस सम्यग्दर्शन के बल पर संसार समुद्र को पार कर लेंगे।

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आचार्य श्रीजयसेन स्वामी

परिचय

श्री कुंदकुंददेव के समयसार आदि ग्रंथों के द्वितीय टीकाकार श्री जयसेनाचार्य भी एक प्रसिद्ध आचार्य हैं। इन्होंने समयसार की टीका में श्री अमृतचन्द्रसूरि के नाम का भी उल्लेख किया है और उनकी टीका के कई एक कलशकाव्यों को भी यथास्थान उद्धृकृत किया है अत: यह पूर्णतया निश्चित है कि श्री जयसेनाचार्य के सामने श्री अमृतचन्द्रसूरि की आत्मख्याति टीका आदि टीकायें विद्यमान थीं फिर भी शैली और अर्थ की दृष्टि से इनकी तात्पर्यवृत्ति टीकायें श्रीअमृतचन्द्रसूरि की अपेक्षा भिन्न हैं।

श्री जयसेनाचार्य पंचास्तिकाय ग्रंथ की टीका के प्रारंभ में लिखते हैं कि-

अथ श्री कुमारनंदिसिद्धान्तदेवशिष्यै: प्रसिद्धकथान्यायेन पूर्वविदेहं गत्वा वीतरागसर्वज्ञ-सीमंधरस्वामि-तीर्थंकरपरमदेवं दृष्टवा तन्मुखकमलविनिर्गतदिव्यवाणीश्रवणावधारितपदार्थाच्छुद्धात्मतत्त्वादिसारार्थं गृहीत्वा पुनरप्यागतै: श्रीमत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवै: पद्मनंद्याद्यपराभिधेयैरन्तस्तत्त्वबहिस्तत्त्वगौणमुख्यप्रतिपत्त्यर्थं अथवा शिवकुमारमहाराजादिसंक्षेपरुचिशिष्यप्रतिबोधनार्थं विरचिते पंचास्तिकायप्राभृतशास्त्रे यथाक्रमेणाधिकारशुद्धिपूर्ववंâ तात्पर्यार्थव्याख्यानं कथ्यते।

श्री जयसेनाचार्य के इन शब्दों से यह स्पष्ट है कि श्री कुमारनंदि सिद्धान्तदेव के शिष्य श्रीमत् कुन्दकुन्दाचार्य जिनके पद्मनंदि, एलाचार्य, वक्रग्रीव नाम भी प्रसिद्ध हैं वे विदेहक्षेत्र में गए थे। वहाँ सर्वज्ञ सीमंधरस्वामी के श्रीमुख से शुद्धात्मतत्त्व का सार ग्रहण करके वापस भरतक्षेत्र में आकर शिवकुमार नामक किन्हीं भव्य शिष्य को आदि लेकर अन्य शिष्यों को समझाने के लिए इस पंचास्तिकाय प्राभृत शास्त्र की रचना की है। उस ग्रन्थ की तात्पर्यवृत्ति टीका मैं लिख रहा हूँ।

आचार्य श्री जयसेनस्वामी श्री अमृतचन्द्रसूरि के समान कुन्दकुन्द के ग्रन्थों के टीकाकार हुए हैं। समयसार की टीका में इन्होंने अमृतचन्द्र के नाम का उल्लेख किया है इससे यह ज्ञात होता है कि जयसेन स्वामी ने अमृतचन्द्रसूरि की टीका का आधार लेकर ही किया है।

प्रवचनसार टीका के अंत में प्रशस्ति में आचार्य श्री जयसेन स्वामी ने गुरुपरम्परा का परिचय निम्न प्रकार से लिखा है-

तत: श्री सोमसेनोऽभूद्गणी गुणगणाश्रय:।

तद्विनेयोस्ति यस्तस्मै जयसेनतपोभृते।।
शीघ्रं बभूव मालुसाधु: सदा धर्मरतो वदान्य:।
सूनुस्तत: साधुमहीपतिर्यस्तस्मादयं चारुभटस्तनूज:।।
य: संततं सर्वविद: सपर्यामार्यक्रमाराधनया करोति।

स श्रेयसे प्राभृतनामग्रन्थपुष्टात् पितुर्भक्तिविलोपभीरु:।।

अर्थात् मूलसंघ के निग्र्रन्थ तपस्वी वीरसेनाचार्य हुए। उनके शिष्य अनेक गुणों के धारी आचार्य सोमसेन हुए और उनके शिष्य आचार्य जयसेन हुए। सदा धर्म में रत प्रसिद्ध मालु नाम के साधु हुए हैं। उनका पुत्र साधु महीपति हुआ है, उनसे यह चारुभट नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ है जो सर्वज्ञ की पूजा तथा गुरुचरणों की सदा सेवा करता है। उस चारुभट अर्थात् जयसेनाचार्य ने अपने पिता की भक्ति के विलोप होने से भयभीत हो इस प्राभृत नामक ग्रन्थ की टीका की है।

इसके आगे भी इन्होंने कहा है-

श्रीमान् त्रिभुवनचन्द्र गुरु को नमस्कार करता हूँ जो आत्मा के भावरूपी जल को बढ़ाने के लिए चन्द्रमा के तुल्य हैं और कामदेव नामक प्रबल महापर्वत के सैकड़ों टुकड़े करने वाले हैं।

इस प्रशस्ति में श्री जयसेनाचार्य ने स्वयं अपने शब्दों में यह स्पष्ट किया है कि उनके गुरु का नाम सोमसेन तथा दादागुरु का नाम वीरसेन था। इन्होंने त्रिभुवनचन्द्र गुरु को भी नमस्कार किया है किन्तु प्रशस्ति से यह ज्ञात नहीं हो पाता है कि ये त्रिभुवनचन्द्र कौन हैं ? इतना स्पष्ट है कि जयसेनाचार्य गण के हैं। अन्य किसी टीका में जयसेनाचार्य ने अपना कोई परिचय नहीं दिया है।

श्री जयसेनाचार्य का काल

इनकी टीकाओं में उद्धृत श्लोकों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि इन्होंने द्रव्यसंग्रह, तत्त्वानुशासन, चारित्रसार, त्रिलोकसार और लोकविभाग आदि ग्रन्थों का उद्धरण देकर अपनी टीकाओं में प्रयुक्त किया है। चारित्रसार के रचयिता चामुण्डराय हैं और इन्हीं के समकालीन आचार्य श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने त्रिलोकसार की रचना की है। चामुण्डराय ने अपना चामुण्डपुराण शक संवत् ९०० (ईसवी सन् ९७८) में समाप्त किया है अत: निश्चित है कि जयसेन ईसवी सन् ९७८ के पश्चात् ही हुए हैं। उनके समय की यह सीमा पूर्वार्ध सीमा के रूप में मानी जा सकती है।

जयसेन ने पंचास्तिकाय की टीका (पृष्ठ ८) में वीरनन्दि के आचारसार ग्रन्थ के दो पद्य उद्धृत किए हैं। कर्नाटक कवि चारिते के अनुसार इन वीरनन्दि ने अपने आचारसार पर एक कन्नड़ टीका शक संवत् १०७६ (ईसवी सन् ११५४) में लिखी है अत: जयसेन ईस्वी सन् ११५४ के पश्चात् ही हुए होंगे।

डॉ. ए. एन उपाध्ये ने लिखा है कि नयकीर्ति के शिष्य बालचन्द्र ने कुन्दकुन्द के तीनों प्राभृतों पर कन्नड़ में टीका लिखी है और उनकी टीका का मूल आधार जयसेन की टीकाएँ हैं। इनकी टीका का रचनाकाल ईस्वी सन् की ११वीं शताब्दी का उत्तरार्ध या १२वीं शताब्दी का पूर्वार्ध माना जा सकता है।

कुल मिलाकर श्री जयसेन स्वामी ने साहित्य जगत में अपना अपूर्व योगदान दिया है और आज की दिग्भ्रमित जनता का सन्मार्ग निर्देशन किया है।

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आचार्य श्री धरसेन स्वामी का विशेष परिचय

भगवान महावीर स्वामी ने भावश्रुत का उपदेश दिया अत: वे अर्थकर्ता हैं। उसी काल में चार ज्ञान से युक्त गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ने बारह अंग और चौदह पूर्वरूप ग्रन्थों की एक ही मुहूत्र्त में क्रम से रचना की है। उन गौतमस्वामी ने भी दोनों प्रकार का श्रुतज्ञान लोहार्य को दिया। लोहार्य ने भी जम्बूस्वामी को दिया। परिपाटी क्रम से ये तीनों ही सकलश्रुत के धारण करने वाले कहे गए हैं और यदि परिपाटी क्रम की अपेक्षा न की जाए तो उस समय संख्यात हजार सकलश्रुत के धारी हुए। गौतमस्वामी, लोहार्य और जम्बूस्वामी ये तीनों निर्वाण को प्राप्त हुए। इसके बाद विष्णु, नंदिमित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु ये पाँचों ही आचार्य, परिपाटी क्रम से चौदह पूर्व के धारी हुए। तदनन्तर विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जयाचार्य, नागाचार्य, सिद्धान्त, स्थविर, धृतिसेन, विजयाचार्य, बुद्धिल और गंगदेव ये ग्यारह ही महापुरुष परिपाटी क्रम से ग्यारह अंग, दशपूर्व के धारक और शेष चार पूर्वों के एकदेश के धारक हुए।

इसके बाद नक्षत्राचार्य, जयपाल, पांडुस्वामी, धु्रवसेन, कंसाचार्य ये पांचों ही आचार्य परिपाटी क्रम से सम्पूर्ण ग्यारह अंगों के और चौदह पूर्वों के एकदेश के धारक हुए।

तदनंतर सुभद्र, यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य, ये चारों ही आचार्य संपूर्ण आचारांग के धारक और शेष अंग तथा पूर्वों के एकदेश के धारक हुए। इसके बाद सभी अंग और पूर्वों का एक देश ज्ञान आचार्य परम्परा से आता हुआ धरसेन आचार्य को प्राप्त हुआ।

सौराष्ट (गुजरात-काठियावाड़) देश के गिरिनगर नाम के नगर की चन्द्रगुफा में रहने वाले अष्टांग महानिमित्त के पारगामी, प्रवचनवत्सल और आगे अंग श्रुत का विच्छेद हो जाएगा, इस प्रकार उत्पन्न हो गया है भय जिनको, ऐसे उन धरसेनाचार्य से महामहिमा (पंचवर्षीय साधु सम्मेलन) में सम्मिलित हुए दक्षिणापथ के (दक्षिण देश के निवासी) आचार्यों के पास एक लेख भेजा। लेख में लिखे गए धरसेनाचार्य के वचनों को अच्छी तरह समझकर उन आचार्यों ने शास्त्र के अर्थ को ग्रहण और धारण करने में समर्थ, नाना प्रकार की उज्ज्वल और निर्मल विनय से विभूषित अंग वाले, शीलरूपी माला के धारक, गुरुओं द्वारा प्रेषण (भेजने) रूपी भोजन से तृप्त हुए , देश, कुल और जाति से शुद्ध अर्थात् उत्तम कुल और उत्तम जाति में उत्पन्न हुए, समस्त कलाओं में पारंगत और तीन बार पूछा है आचार्यों को जिन्होंने, ऐसे दो साधुओं को आन्ध्र देश में बहने वाली वेणानदी के तट से भेजा।

मार्ग में उन दोनों के आते समय श्री धरसेन भट्टारक ने रात्रि के पिछले भाग में स्वप्न देखा कि समस्त लक्षणों से परिपूर्ण, सपेâद वर्ण वाले दो उन्नत बैल उनकी तीन प्रदक्षिणा देकर चरणों में पड़ गए हैं। इस प्रकार के स्वप्न को देखकर संतुष्ट हुए धरसेनाचार्य ने जयउ सुयदेवदा-श्रुतदेवता जयवन्त हों ऐसा वाक्य उच्चारण किया।

उसी दिन दक्षिणापथ से भेजे हुए वे दोनों साधु धरसेनाचार्य को प्राप्त हुए। उसके बाद धरसेनाचार्य की पादवन्दना आदि कृतिकर्म करके और दो दिन बिताकर तीसरे दिन उन दोनों ने धरसेनाचार्य से निवेदन किया कि इस कार्य से हम दोनों आपके पादमूल को प्राप्त हुए हैं। उन दोनों मुनियों के इस प्रकार निवेदन करने पर अच्छा है, कल्याण हो इस प्रकार कहकर धरसेन भट्टारक ने उन दोनों साधुओं को आश्वासन दिया। इसके बाद भगवान धरसेन ने विचार किया कि-

‘‘शैलघन, भग्नघट, सर्प, चालनी, महिष, मेंढा, जोंक, तोता, मिट्टी और मशक के समान श्रोताओं को जो मोह से श्रुत का व्याख्यान करता है, वह मूढ़ दृढ़रूप से ऋद्धि आदि तीनों प्रकार के गौरवों के आधीन होकर विषयों की लोलुपतारूपी विष के वश से मूच्र्छित हो, बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति से भ्रष्ट होकर भव वन में चिरकाल तक परिभ्रमण करता रहता है।’’

इस वचन के अनुसार स्वच्छन्दतापूर्वक आचरण करने वाले श्रोताओं को विद्या देना संसार और भय को ही बढ़ाने वाला है, ऐसा विचार कर शुभ स्वप्न के देखने मात्र से ही यद्यपि उन दोनों साधुओं की विशेषता को जान लिया था तो भी फिर से उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया क्योंकि उत्तम प्रकार से ली गई परीक्षा हृदय में संतोष को उत्पन्न करती है। अनंतर धरसेनाचार्य ने उन दोनों को दो विद्याएँ दीं। उनमें से एक अधिक अक्षर वाली थी और दूसरी हीन अक्षर वाली थी। उनको विद्याएँ देकर यह कहा कि दो दिन का उपवास करके इन विद्याओं को सिद्ध करो। (इन्द्रनंदि आचार्य ने बताया है कि उन दोनों ने गुरु की आज्ञा से नेमिनाथ की निर्वाण स्थली पर जाकर विद्याओं को सिद्ध किया)। जब उनकी विद्याएँ सिद्ध हो गर्इं तो उन्होंने विद्या की अधिष्ठात्री देविकाओं को देखा कि एक देवी के दांत बाहर निकले हुए हैं और दूसरी कानी है। ‘विकृतांग होना देवताओं का स्वभाव नहीं है।’ इस प्रकार विचार कर मंत्र सम्बन्धी-व्याकरण शास्त्र में कुशल उन दोनों ने हीन अक्षर वाली विद्या में अधिक अक्षर मिलाकर और अधिक अक्षर वाली विद्या में से अक्षर निकालकर उस मन्त्र को फिर सिद्ध किया। जिससे वे दोनों विद्या देविकाएँ अपने स्वभाव से सुन्दररूप में दिखलाई पड़ीं (उन्होंने- आज्ञा देवो ऐसा कहा, तब इन मुनियों ने कहा कि मैंने तो गुरु की आज्ञा मात्र से ही मंत्र का अनुष्ठान किया है, मुझे कुछ आवश्यकता नहीं है तब वे देविकाएँ अपने स्थान को चली गर्इं ऐसा श्रुतावतार में वर्णन है)।

तदनन्तर भगवान धरसेन के समक्ष योग्य विनय सहित उन दोनों ने विद्या सिद्धि सम्बन्धी समस्त वृत्तान्त निवेदित कर दिया। बहुत अच्छा ऐसा कहकर संतुष्ट हुए धरसेनाचार्य ने शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और शुभ वार में ग्रन्थ को पढ़ाना प्रारम्भ किया। इस तरह क्रम से व्याख्यान करते हुए धरसेन भगवान से उन दोनों ने आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन पूर्वान्ह काल में विनयपूर्वक ग्रन्थ समाप्त किया। इसलिए सन्तुष्ट हुए भूत जाति के व्यंतर देवों ने उन दोनों में से एक की पुष्प, बलि तथा शंख और सूर्य जाति के वाद्य विशेष के नाद से व्याप्त बड़ी भारी पूजा की। उसे देखकर धरसेन भट्टारक ने उनका भूतबलि यह नाम रखा तथा जिनकी भूतों ने पूजा की है और अस्त-व्यस्त दन्तपंक्ति को दूर करके जिनके दांत समान कर दिए हैं,ऐसे दूसरे का भी श्री धरसेन भट्टारक ने पुष्पदन्त नाम रखा।

तदनन्तर उसी दिन वहां से भेजे गए उन दोनों ने गुरु की आज्ञा अलंघनीय होती है ऐसा विचार कर आते हुए अंकलेश्वर (गुजरात) में वर्षाकाल बिताया। (गुरु ने अपनी अल्प आयु जानकर उन दोनों को वहाँ से विहार कर अन्यत्र चातुर्मास करने की आज्ञा दी और वे दोनों मुनि आषाढ़ सुदी ११ को निकलकर श्रावण वदी ४ को अंकलेश्वर आये, वहाँ पर वर्षायोग स्थापित किया)।

वर्षायोग को समाप्त कर और जिनपािलत को साथ लेकर पुष्पदन्ताचार्य तो वनवासी देश को चले गए और भूतबलि भट्टारक तमिल देश को चले गए। तदनन्तर पुष्पदन्ताचार्य ने जिनपालित को दीक्षा देकर बीस प्ररूपणा गर्भित सत्प्ररूपणा के सूत्र बनाकर और जिनपालित मुनि को पढ़ाकर अनंतर उन्हें भूतबलि आचार्य के पास भेजा। भूतबलि ने जिनपालित के द्वारा दिखाए गए सूत्रों को देखकर और पुष्पदंताचार्य अल्पायु हैं, ऐसा समझकर तथा हम दोनों के बाद महाकर्मप्रकृति प्राभृत का विच्छेद हो जाएगा; इस प्रकार की बुद्धि के उत्पन्न होने से भगवान भूतबलि ने द्रव्यप्रमाणानुगम को आदि लेकर ग्रन्थ रचना की इसलिए इस खण्ड सिद्धान्त (षट्खण्ड सिद्धान्त) की अपेक्षा भूतबलि और पुष्पदन्त आचार्य भी श्रुत के कर्ता कहे जाते हैं। अनुग्रन्थकर्ता गौतम स्वामी हैं और उपग्रन्थकर्ता राग, द्वेष और मोह से रहित भूतबलि, पुष्पदन्त आदि अनेक आचार्य हैं।’’

धरसेनाचार्य का समय

नंदि संघ की प्राकृत पट्टावली में ६८३ वर्ष के अन्दर ही धरसेन को माना है।
यथा-
केवली का काल बासठ वर्ष, श्रुतकेवलियों का १०० वर्ष, दश पूर्वधारियों का १८३ वर्ष, ग्यारह अंगधारियों का १२३ वर्ष, दस, नव व आठ अंगधारी का ९७ वर्ष ऐसे ६२±१००±१८३±१२३±९७·५६५ वर्ष हुए पुन: एक अंगधारियों में अर्हतबलि का २८ वर्ष, माघनंदि का २१ वर्ष, धरसेन का १९ वर्ष, पुष्पदन्त का ३० वर्ष और भूतबलि का २० वर्ष, ऐसे ११८ वर्ष हुए। कुल मिलाकर ५६५±११८·६८३ वर्ष के अन्तर्गत ही धरसेनाचार्य हुए हैं।

इस प्रकार इस पट्टावली और इन्द्रनन्दि के श्रुतावतार के आधार पर भी श्री धरसेन का समय वीर निर्वाण संवत् ६०० अर्थात् ई. सन् ७३ के लगभग आता है।

धरसेन के गुरु

उपर्युक्त पट्टावली के अनुसार इनके गुरु श्री माघनन्दि आचार्य थे अथवा इन्द्रनन्दि आचार्य ने स्पष्ट कह दिया है कि इनकी गुरु परम्परा का हमें ज्ञान नहीं है।

धरसेनाचार्य की रचना

चूँकि श्री धरसेनाचार्य ने अपने पास में पढ़ने के लिए आये हुए दोनों मुनियों को मन्त्र सिद्ध करने का आदेश दिया था अत: ये मन्त्रों के विशेष ज्ञाता थे। इनका बनाया हुआ योनिप्राभृत नाम का एक ग्रन्थ आज भी उपलब्ध है। यह ग्रन्थ ८०० श्लोकों प्रमाण प्राकृत गाथाओं में है। उसका विषय मन्त्र-तन्त्रवाद है, वृहत् टिप्पणिका नामक इन्स्टीट्यूट पूना में है। इस प्रति में ग्रन्थ का नाम तो योनिप्राभृत ही है किन्तु उसके कर्ता का नाम पण्हसवण मुनि पाया जाता है। इस महामुनि ने उसे वूâष्माण्डिनी महादेवी से प्राप्त किया था और अपने शिष्य पुष्पदन्त और भूतबलि के लिए लिखा। इन दो नामों के कथन से इस ग्रन्थ का धरसेन कृत होना बहुत सम्भव जंचता है। प्रज्ञाश्रमणत्व एक ऋद्धि का नाम है उसके धारण करने वाले प्रज्ञाश्रमण कहलाते थे। पूना में उपलब्ध जोणिपाहुड की इस प्रति का लेखन काल सं. १५८२ है अर्थात् वह प्रति चार सौ वर्ष से अधिक प्राचीन है।

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आचार्य श्री पुष्पदन्त और भूतबलि

पुष्पदन्त और भूतबलि का नाम साथ-साथ प्राप्त होता है फिर भी नंदिसंघ की प्राकृत पट्टावली में पुष्पदंत को भूतबलि से ज्येष्ठ माना गया है। धरसेनाचार्य के बाद पुष्पदंत का आचार्य काल ३० वर्ष का बताया है और इनके बाद भूतबलि का २० वर्ष कहा गया है अत: इनका समय धरसेनाचार्य के समय के लगभग ही स्पष्ट है।

यह तो निश्चित ही है कि श्री धरसेनाचार्य ने दो मुनियों को अन्यत्र मुनिसंघ से बुलाकर विद्याध्ययन कराया था। अनंतर शास्त्र समाप्ति के दिन उनकी विनय से सन्तुष्ट हुए भूतजाति के व्यंतर देवों ने उन दोनों में से एक मुनि की पुष्प, बलि तथा शंख और सूर्य जाति के वाद्य विशेषों के नाद से बड़ी भारी पूजा की। उसे देखकर धरसेनाचार्य ने उनका भूतबलि यह नाम रखा और दूसरे मुनि की अस्त-व्यस्त दंतपंक्तियों को ठीक करके उनके दांत समान कर दिए, जिससे गुरु ने उनका पुष्पदंत नाम रखा। इस धवला टीका के कथन से यह बात स्पष्ट है कि इनका पूर्व नाम कुछ और ही होना चाहिए तथा इनका गृहस्थाश्रम का परिचय क्या है यह जिज्ञासा सहज ही होती है।

विबुध श्रीधर के श्रुतावतार में भविष्यवाणी के रूप में पुष्पदंत और भूतबलि आचार्य के जीवन पर अच्छा प्रकाश देखने में आता है।

कथानक

भरतक्षेत्र के वामिदेश-ब्रह्मादेश में वसुन्धरा नाम की नगरी होगी। वहां के राजा नरवाहन और रानी सुरूपा पुत्र न होने से खेदखिन्न होंगे। उस समय सुबुद्धि नाम का सेठ उन्हें पद्मावती की पूजा का उपदेश देगा। तदनुसार देवी की पूजा करने पर राजा को पुत्र लाभ होगा और उस पुत्र का नाम पद्म रखा जाएगा। तदनन्तर राजा सहस्रकूट चैत्यालय का निर्माण कराएगा। इसी समय बसन्त ऋतु में समस्त संघ यहाँ एकत्र होगा और राजा सेठ के साथ जिनपूजा करके रथ चलाएगा। इसी समय राजा अपने मित्र मगध सम्राट को मुनीन्द्र हुआ देख सुबुद्धि सेठ के साथ विरक्त हो दिगम्बरी दीक्षा धारण करेगा। इसी समय एक लेखवाहक वहां आएगा वह जिनदेव को नमस्कार कर मुनियों की तथा परोक्ष में धरसेन गुरुदेव की वन्दना कर लेख समर्पित करेगा। वे मुनि उसे बाचेंगे कि
‘‘गिरिनगर के समीप गुफावासी धरसेन मुनीश्वर अग्रायणीय पूर्व की पंचमवस्तु के चौथे प्राभृतशास्त्र का व्याख्यान आरम्भ करने वाले हैं अत: योग्य दो मुनियों को भेज दो। वे मुनि नरवाहन और सुबुद्धि मुनि को भेज देंगे। धरसेन भट्टारक कुछ दिनों में नरवाहन और सुबुद्धि नाम के मुनियों को पठन, श्रवण और चिंतन कराकर आषाढ़ शुक्ला एकादशी को शास्त्र समाप्त करेंगे। उनमें से एक की भूतजाति के देव बलिविधि करेंगे और दूसरे के चार दाँतों को सुन्दर बना देंगे अतएव भूतबलि के प्रभाव से नरवाहन मुनि का नाम भूतबलि और चार दाँत समान हो जाने से सुबुद्धि मुनि का नाम पुष्पदंत होगा।’’

श्रुतावतार में लिखा है

इन्द्रनंदिकृत श्रुतावतार में यह लिखा है कि इन्होंने ग्रन्थ समाप्त कर गुरु की आज्ञा से वहाँ से विहार कर अंकलेश्वर में वर्षायोग बिताया। वहाँ से निकलकर दक्षिण देश में पहुंचे। वहाँ पर पुष्पदंत मुनि ने करहाटक देश में अपने भानजे जिनपालित को साथ लिया और दैगम्बरी दीक्षा देकर उन्हें साथ लेकर वनवास देश को चले गए तथा भूतबलि मुनि द्रविड़ देश में चले गए। वनवास देश में पुष्पदंताचार्य ने बीसदि सूत्रों की रचना की और जिनपालित को पढ़ाकर तथा उन सूत्रों को उसे देकर भूतबलि मुनि का अभिप्राय जानने के लिए उनके पास भेजा। उन्होंने पुष्पदंताचार्य की अल्पायु जानकर और उन सूत्रों को देखकर बहुत ही सन्तोष प्राप्त किया। पुन: आगे श्रुत का विच्छेद न हो जाए, इस भावना से द्रव्य प्रमाणानुगम को आदि लेकर आगे के सूत्रों की रचना की।

इस प्रकार से भूतबलि आचार्य ने पुष्पदंताचार्य विरचित सूत्रों को मिलाकर पाँच खण्डों के छह हजार सूत्र रचे और तत्पश्चात् महाबन्ध नामक छठे खण्ड की तीस हजार सूत्रग्रंथरूप रचना की। इस तरह षट्खण्डागम की रचना कर उसे ग्रन्थरूप में निबद्ध किया, पुन: ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन उस श्रुत की महान पूजा की। अनंतर भूतबलि ने जिनपालित को षट्खण्डागम सूत्र देकर पुष्पदंत के पास भेजा। अपना सोचा हुआ कार्य पूर्ण हुआ, ऐसा देखकर पुष्पदंताचार्य ने भी श्रुतभक्ति के अनुराग से पुलकित होकर श्रुतपंचमी के दिन चतुर्विध संघ के समक्ष उनकी महान पूजा की।

यह षट्खण्डागम ग्रन्थ महाकर्मप्रकृति प्राभृत का अंश है तथा इसमें उसके अर्थ के साथ-साथ सूत्र भी समाविष्ट हैं। भूतबलि आचार्य ने चतुर्थ वेदनाखंड में जो णमो जिणाणं आदि ४४ मंगलसूत्र दिए हैं, व गौतमस्वामी के मुखकमल से निकले हुए हैं। इससे श्री पुष्पदंत और भूतबलि आचार्य इस महान ग्रन्थ के कर्ता नहीं हैं बल्कि प्ररूपक हैं अत: षट्खंडागम का द्वादशांगवाणी के साथ साक्षात् संबंध है।

षट्खंडागम का रहस्य

यह ग्रन्थ छह खण्डों में विभक्त है, अत: इसे षट्खण्डागम कहते हैं। उनके नाम-जीवट्ठाण, खुद्दाबंध, बंधसामित्तविचय, वेयणा, वग्गणा और महाबंध।

श्री धरसेनाचार्य, पुष्पदंत और भूतबलि के विषय में धवला में अनेक विशेषताएँ उपलब्ध हैं। यथा-

जयउ धरसेणणाहो, जेण महाकम्मपयडिपाहुडसेलो।
बुद्धिसिरेणुद्धरिओ समप्पिओ पुप्फयन्तस्स।।

वे धरसेनस्वामी जयवन्त होवें जिन्होंने महाकर्मप्रकृतिप्राभृतरूपी पर्वत को अपने बुद्धिरूपी मस्तक से उठाकर पुष्पदंत को समर्पित किया है।

पणमामि पुप्फयंतं, दुण्णयंधयाररविं।
भग्गसिवमग्गकंटय मिसिसमिइवइं सया दंतं।।

जो पापों का अन्त करने वाले हैं, कुनयरूपी अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्यतुल्य हैं, जिन्होंने मोक्षमार्ग के विघ्नों को नष्ट कर दिया है, जो ऋषियों की सभा के अधिपति हैं और निरंतर पंचेन्द्रियों का दमन करने वाले हैं, ऐसे पुष्पदंताचार्य को मैं प्रणाम करता हूँ।

यहाँ पर ऋषिसमितिपति विशेषण से ये महान संघ के नेता आचार्य सिद्ध होते हैं। ऐसे ही-

ण चासंबद्धं भूदबलिभडारओ परूवेदि, महाकम्मपयडिपाहुड-अमियवाणेण ओसारिदासेसरागदो-समोहत्तादो।

भूतबलि भट्टारक असंबद्ध कथन नहीं कर सकते क्योंकि महाकर्मप्रकृति प्राभृतरूपी अमृतपान से उनका समस्त राग-द्वेष, मोह दूर हो गया है।

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आचार्यश्री विद्यानन्द

आचार्य श्री विद्यानन्द ऐसे महान तार्विक आचार्य हुए हैं कि जिन्होंने प्रमाण और दर्शन सम्बन्धी ग्रन्थों की रचना करके श्रुत परम्परा को महत्त्वशील बनाया है। इनकी रचनाओं के अवलोकन से यह अवगत होता है कि ये दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रान्त के निवासी थे। इसी प्रदेश को इनकी साधना और कार्यभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है। किंवदिन्तयों के आधार से यह माना जाता है कि इनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस मान्यता की सिद्धि इनके प्रखर पांडित्य और महती विद्वत्ता से भी होती है। इन्होंने वैशेषिक न्याय, मीमांसा, वेदांत आदि दर्शनों का अध्ययन कर लिया था। इन आस्तिक दर्शनों के अतिरिक्त ये दिग्नाग, धर्मकीर्ति और प्रज्ञाकर आदि बौद्ध ग्रन्थों के तलस्पर्शी विद्वान थे।

ये कब हुए हैं ? इनकी गुरुपरम्परा क्या थी ? इनका जीवन वृत्त क्या है ? इत्यादि बातें अनिर्णीत ही हैं। फिर भी विद्वानों ने इनका समय निश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रयत्न किया है।

शक संवत् १३२० के एक अभिलेख१ में कहे गए नन्दिसंघ के मुनियों की नामावलि में विद्यानन्द का नाम आता है, जिससे यह अनुमान होता है कि इन्होंने नन्दिसंघ के किसी आचार्य से दीक्षा ग्रहण की है और महान आचार्य पद को सुशोभित किया है। श्री वादिराज ने (ई. सन् १०५५) अपने ‘‘पाश्र्वनाथ चरित’’ नामक काव्य में इनका स्मरण करते हुए लिखा है-

‘‘ऋजुसूत्रं स्पुरद्रत्नं विद्यानंदस्य विस्मय:।
श्रृण्वतामप्यलंकारं दीप्तिरंगेषु रंगति।।’’

आश्चर्य है कि विद्यानन्द के तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक और अष्टसहस्री जैसे दीप्तिमान अलंकारों को सुनने वालों के भी अंगों में दीप्ति आ जाती है, तो उन्हें धारण करने वालों की बात ही क्या है ?
इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनकी कीर्ति ई. सन् की १० वीं शताब्दी में चारों तरफ फैल रही थी।
पं. दरबारीलाल जी कोठिया ने विद्यानन्द के जीवन और समय पर विशेष विचार किया है-
‘‘विद्यानन्द गंगनरेश शिवमार द्वितीय (ई. सन् ८१०) और राचमल सत्यवाक्य प्रथम (ई. सन् ८१६) के समकालीन हैं और इन्होंने अपनी कृतियां प्राय: इन्हीं के राज्य समय में बनाई हैं। विद्यानन्द और तत्त्वार्थ- श्लोकवार्तिक को शिवमार द्वितीय के और आप्तपरीक्षा, प्रमाणपरीक्षा तथा युक्त्यनुशासनालंकृति ये तीन कृतियां राचमल्ल सत्यवाक्य प्रथम (ई. ८१६-८३०) के राज्यकाल में बनी जान पड़ती हैं। अष्टसहस्री श्लोकवार्तिक के बाद की और आप्तपरीक्षा आदि के पूर्व की रचना है जो करीब ई. ८१०-८१५ में रची प्रतीत होती है तथा पत्रपरीक्षा, श्रीपुर पाश्र्वनाथ स्तोत्र और सत्यशासन परीक्षा ये तीन रचनाएँ ई. सन् ८३०-८४० में रची ज्ञात होती हैं। इससे भी आचार्य विद्यानन्द का समय ई. सन् ७७५-८४० प्रमाणित होता है।’’
अतएव आचार्य विद्यानन्द का समय ई. सन् की नवम् शती है।
इनके गृहस्थ जीवन का तथा दीक्षा गुरु का कोई विशेष परिचय और नाम उपलब्ध नहीं है। इनकी रचनाओं को दो वर्गों में विभक्त किया गया है-
१. स्वतन्त्र ग्रंथ और २. टीकाग्रन्थ
१. स्वतन्त्र ग्रन्थ-१. आप्तपरीक्षा (स्वोपज्ञवृत्ति सहित), २. प्रमाण परीक्षा, ३. पत्र परीक्षा, ४. सत्यशासन परीक्षा, ५. श्रीपुर पाश्र्वनाथ स्तोत्र, ६. विद्यानन्द महोदय।
२. टीका ग्रन्थ-१. अष्टसहस्री, २. श्लोकवार्तिक, ३. युक्त्यानुशासनालंकार।
१. आप्तपरीक्षा ग्रन्थ में १२४ कारिकायें हैं और इन्हीं ग्रन्थकर्ता द्वारा रचित वृत्ति है। इस ग्रन्थ में अर्हंत को मोक्षमार्ग का नेता सिद्ध करते हुए मोक्ष, आत्मा, संवर, निर्जरा आदि के स्वरूप और भेदों का प्रतिपादन किया है। इसमें ईश्वर परीक्षा, कपिल परीक्षा, सुगत परीक्षा, ब्रह्माद्वैत परीक्षा करके अर्हन्त के सर्वज्ञतत्त्व की सिद्धि की है।
२. प्रमाण परीक्षा में प्रमाण का स्वरूप, प्रामाण्य की उत्पत्ति एवं ज्ञप्ति, प्रमाण की संख्या, विषय एवं उसके फल पर विचार किया गया है।
३. पत्र परीक्षा नामक लघुकाय ग्रन्थ में विभिन्न दर्शनों की अपेक्षा ‘पत्र’ के लक्षणों को उद्धृत कर जैन दृष्टिकोण से पत्र का लक्षण दिया गया है तथा प्रतिज्ञा और हेतु इन दो अवयवों को ही अनुमान का अंग बताया है।
४. सत्यशासन परीक्षा की महत्ता के सम्बन्ध में पण्डित महेन्द्र कुमार जी न्यायाचार्य ने लिखा है- ‘‘उनकी यह सत्यशासन परीक्षा ऐसा एक तेजोमय रत्न है जिससे जैन न्याय का आकाश दमदमा उठेगा। यद्यपि इसमें आये हुए पदार्थ पुâटकररूप से उनके अष्टसहस्री आदि ग्रन्थों में खोजे जा सकते हैं पर इतना सुन्दर और व्यवस्थित तथा अनेक नये प्रमेयों का सुरुचिपूर्ण संकलन, जिसे स्वयं विद्यानन्द ने ही किया अन्यत्र मिलना असम्भव है।’’
५. विद्यानन्द महोदय नाम का यह ग्रन्थ आचार्य विद्यानन्द की सर्वप्रथम रचना है। इसके पश्चात् ही इन्होंने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक और अष्टसहस्री आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है। यह ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है पर उसका नामोल्लेख श्लोकवार्तिक आदि ग्रन्थों में मिलता है।
६. श्रीपुर या अंतरिक्ष के पाश्र्वनाथ की स्तुति में कुल ३० पद्य हैं। इस स्तोत्र में दर्शन और काव्य का गंगा यमुनी संगम है। डॉ. नेमिचन्द्र जी ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि-‘‘इस स्तोत्र में सर्वज्ञ सिद्धि, अनेकान्त सिद्धि, भावाभावात्मक वस्तु निरूपण, सप्तभंगीनय, सुनय, निक्षेप, जीवादि पदार्थ, मोक्षमार्ग, वेद की अपौरुषेयता का निराकरण, ईश्वर के जगत कर्तृत्व का खण्डन, सर्वथा क्षणिकत्व और नित्यत्व मीमांसा, कपिलाभिमत पच्चीस तत्त्व समीक्षा, ब्रह्माद्वैत मीमांसा, चार्वाक समीक्षा आदि दार्शनिक विषयों का समावेश किया गया है। भगवान पाश्र्वनाथ को रागद्वेष का विजेता सिद्ध करते हुए, उनकी दिव्य वाणी का जयघोष किया है।’’
७. अष्टसहस्री-जैन न्याय का यह सर्वोत्तम ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ के अध्ययन की महत्ता बतलाते हुए स्वयं श्री विद्यानन्द आचार्य कहते हैं-

‘‘श्रोतव्याष्टसहस्री श्रुतै: किमन्यै: सहस्रसंख्यानै:।
विज्ञायेत ययैव, स्वसमय परसमयसद्भाव:।।’’

हजारों ग्रन्थों के सुनने से क्या प्रयोजन है ? मात्र एक अष्टसहस्री ही सुनना चाहिए क्योंकि इस अष्टसहस्री के द्वारा ही स्वसिद्धान्त और परसिद्धान्त का सद्भाव (स्वरूप) जाना जाता है।
श्री समन्तभद्र स्वामी ने तत्त्वार्थसूत्र महाशास्त्र पर गन्धहस्तिमहाभाष्य नामक भाष्य लिखते समय प्रारम्भ में ‘‘मोक्षमार्गस्य नेतारं’’ इत्यादि मंगलाचरण के ऊपर ११४ कारिकाओं द्वारा आप्त की मीमांसा की है अत: प्रारम्भिक ‘‘देवागम’’ पद को लेकर इस रचना का ‘‘देवागमस्तोत्र’’ यह नाम भी प्रसिद्ध है।
श्रीअकलंकदेव ने इस स्तोत्र पर ८०० श्लोक प्रमाण द्वारा भाष्य रचना की है जिसका नाम ‘अष्टशती’ प्रसिद्ध है।
अष्टशती समेत इस आप्तमीमांसा पर आचार्यश्री विद्यानन्द महोदय ने ८००० श्लोक प्रमाण ‘‘अष्टसहस्री’’ नाम से ‘‘महाभाष्य’’ बनाया है। यह ग्रन्थ न्याय की प्रांजल-भाषा में रचा गया दुरुह और जटिल ग्रंथ है। स्वयं ग्रन्थकार ने इसे ‘‘कष्टसहस्री’’ कहा है-
कष्टसहस्री सिद्धा साष्टसहस्रीयमत्र मे पुष्यात्।
जो कष्टसहस्री सिद्ध है ऐसी यह अष्टसहस्री१ मेरे मनोरथ को पूर्ण करे।
इस ग्रन्थ में एकादश नियोग विधिवाद, भावनावाद और इनका निराकरण तथा तत्त्वोपप्लववाद, संवेदनाद्वैत, चित्राद्वैत, ब्रह्माद्वैत, सर्वज्ञाभाव आदि का निराकरण करके सर्वज्ञत्व सिद्धि, मोक्षतत्त्व और उसके उपाय की सिद्धि का सुन्दर विवेचन है।

प्रत्येक प्रकरण में सप्तभंगी स्याद्वाद का जैसा सुन्दर विवेचन इस ग्रन्थ में है वैसा विवेचन अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।
यह ग्रन्थ दश परिच्छेदों में विभक्त है। प्रथम परिच्छेद सबसे बड़ा है और आधा ग्रन्थ इसी में समाप्त है और आधे में नव परिच्छेद हैं।
८. तत्त्वार्थ श्लोकवार्तिक नाम का ग्रन्थ टीका ग्रन्थों में एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, यह ग्रन्थ उमास्वामी आचार्य के तत्त्वार्थसूत्र पर भाष्यरूप से रचा गया है। पद्यात्मक शैली में है, साथ ही पद्यवार्तिकों पर उन्होंने स्वयं भाष्य अथवा गद्य में व्याख्यान लिखा है। आचार्य महोदय ने इसकी रचना करके कुमारिल, धर्मकीर्ति जैसे प्रसिद्ध ताक्रीकों के द्वारा जैनदर्शन पर किए गए आक्षेपों का उत्तर दिया है। इस ग्रन्थ की समता करने वाला जैनदर्शन में तो क्या अन्य किसी भी दर्शन में एक ग्रन्थ भी नहीं है।
जीव का अन्तिम ध्येय मोक्ष है। बन्धनबद्ध आत्मा को मुक्ति के अतिरिक्त और क्या करना चाहिए, इस ग्रन्थ में मुक्ति के साधनभूत रत्नत्रयमार्ग का सुन्दर और गहन विवेचन किया गया है।
तृतीय अध्याय के प्रथम सूत्र के भाष्य में ‘‘पृथ्वी घूमती है।’’ इस सिद्धान्त का खण्डन करके पृथ्वी को स्थिर सिद्ध किया है। इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि आज से १००० वर्ष पूर्व भी कुछ आम्नायी वैज्ञानिक विचारधारा के अनुसार पृथ्वी को घूमती हुई मानते थे। इसी प्रकार से चतुर्थ अध्याय में ज्योतिर्लोक का बहुत ही स्पष्ट और विस्तृत विवेचन है। इस ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद पं. माणिकचन्द जी न्यायाचार्य ने किया है। ग्रन्थ प्रकाशित हो चुका है। सभी के लिए पठनीय और मननीय है।
९. युक्त्यानुशासनालंकार-यह भी एक टीका ग्रन्थ है। श्री स्वामी समन्तभद्र ने ६४ कारिकाओं में ‘‘युक्त्यानुशासन’’ नाम से यह एक स्तुति रचना की है। इसमें स्वामी ने श्री महावीर भगवान के शासन को ‘‘सर्वोदय’’ शासन सिद्ध किया है। श्री विद्यानन्द आचार्य ने अलंकार स्वरूप ही टीका रचकर ‘‘युक्त्यानुशासनालंकार’’ यह सार्थक नाम दिया है।
स्वामी समन्तभद्र ने अद्वैतवाद, द्वैतवाद, शाश्वतवाद, अशाश्वतवाद, दैववाद, पुरुषार्थवाद, बन्धवाद, मोक्षवाद और बन्धकारण-मोक्षकारणवाद आदि प्रमेयों की समीक्षा करके स्याद्वाद की सिद्धि की है। उसी का विस्तार टीकाकार ने किया है। श्री विद्यानन्द आचार्य के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए डॉ. नेमिचन्द ज्योतिषाचार्य कहते हैं-
अत: हमें विद्यानन्द की ‘‘श्रोताव्याष्टसहस्री श्रुतै: किमन्यै: सहस्रसंख्यानै:। विज्ञायेत ययैव स्वसमयपरसमयसद्भाव:। आदि गर्वोक्ति स्वभावोक्ति प्रतीत होती है।’’

वास्तव में जैसे इनकी अष्टसहस्री ग्रन्थ के प्रश्नोत्तर की शैली अनूठी है, अनुपम है और सभी के लिए पठनीय है, मननीय है, वैसे ही इनके सभी ग्रन्थ न्याय और सिद्धान्त के सूक्ष्म ज्ञान को कराने में सर्वथा सक्षम हैं।

http://hi.encyclopediaofjainism.com/index.php/विद्यानन्द_आचार्य

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Hi Anubhav,
You have good information of jain history. Can you make a flow chart to show timeline of various acharyas from Mahavir to till now? So that, we can get information about influence of one acharya(s) on other acharya(s) on written literature, geographic details, kingdom details etc.
Thanks

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