शास्त्रसार समुच्चय मूल (आचार्य माघनन्दि) | Shastrasaar Samuchchaya Mool (Acharya Maghanandi)

शास्त्रसार समुच्चय मूल (संस्कृत सूत्र)

आचार्य माघनन्दि

आचार्य माघनन्दि कृत शास्त्रसार समुच्चय के सभी मूल सूत्र: आरम्भ का मंगल श्लोक और चारों अनुयोग (प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग) के सूत्र, क्रमांक सहित।

पाठ संलग्न पुस्तक के अनुसार है: शास्त्रसार समुच्चय, हिन्दी टीका आचार्य देशभूषण जी। हिन्दी टीका और टीका में उद्धृत प्राकृत, संस्कृत, कन्नड़ पद्य यहाँ नहीं लिए; वे नीचे की पीडीएफ में हैं। पाठ जैसा छपा वैसा ही रखा है; क्रमांकों की बातें अंत की टिप्पणी में हैं।

श्री मन्नम्रामरस्तोमं प्राप्तानंतचतुष्टयं ॥
नत्वा जिनाधिपं वक्ष्ये शास्त्रसारसमुच्चयं ॥

प्रथमानुयोग

अथ त्रिविधः कालः ॥१॥

द्विविधः ॥२॥

षड्विधोवा ॥३॥

दशविधकल्पद्रुमा . ॥४॥

चतुर्दश कुलकरा :, इति ॥५॥

षोडशभावना : ॥१६॥

चतुर्विशतिस्तीर्थंकराः ॥७॥

चतुस्त्रिशदतिशया ॥६॥

पंच महाकल्याणानि ॥९॥

घातिचतुष्टयाष्टादशदोषरहिताः ॥१०॥

समवशरणैकादश भूमयः ॥११॥

द्वादश गणाः ॥१२॥

अष्ट महाप्रातिहार्याणि ॥१३॥

अनंत चतुष्टयमिति

द्वादश चक्रवर्तिन :-

सप्तांगानि ॥१६॥

चतुर्दश रत्नानि ॥१७॥

नव निधयः ॥१८॥

दशांगभोगानि ॥१९॥

नव बलदेवाः ॥२०॥

वासुदेव प्रतिवासुदेवनारदाश्चेति ॥२१॥

एकादश रूद्राः ॥२२॥

करणानुयोग

अथ त्रिविधो लोकः ॥१॥

सप्त नरकाः ॥२॥

एकोनपंचाशत् पटलानि ॥३॥

चतुरुत्तर षड शत नव सहस्र श्रेणि वद्धानि ॥४॥

त्र्यशीतिलशनवतिसहस्रत्रिशतत्र्यूनपंचाशत्प्रकीर्णकाः ॥५॥

चतुरशीतिलक्षविलानि ॥६॥

चतुर्विधदुःखमिति ॥७॥

जम्बूद्वीपलवणसमुद्राद्यसंख्यातपद्वीसमुद्राः ॥१॥

तत्रार्द्धद्वितीयद्वीपसमुद्रौमनुष्यक्षेत्रम् ॥२॥

पंच दश कर्मभूमयः ॥३॥

त्रिशद्भोगभूमयः ॥४॥

षण्णवति कुभोगभूमयः ॥५॥

पंच मन्दारगिरयः ॥६॥

जम्बूवृक्षाश्च ॥७॥

शाल्मलयोपि ॥८॥

चतुस्त्रिशद्वर्ष धर पर्वताः ॥९॥

त्रिंशत्युत्तरशत सरोवराः ॥१०॥

सप्ततिर्महानद्यः ॥११॥

विंशतिर्नाभिनगाः ॥१२॥

विंशतिर्यमकगिरयः ॥१३॥

सहस्रकनकगिरयः ॥१४॥

चत्वारिंशत् दिग्गज पर्वताः ॥१५॥

शतं वक्षार पर्वताः ॥१६॥

षष्ठि विभंगानद्यः ॥१७॥

षष्ठ्युत्तरशतं विदेहजनपदाः ॥१८॥

सप्तत्यधिकशतविजयार्धपर्वताः ॥१९॥

वृषभगिरयश्चोति ॥२०॥

देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥

भवनवासिनो दशविधाः ॥२॥

अष्टविधव्यन्तराः ॥३॥

पञ्चविधज्योतिष्काः ॥४॥

“त्रिषष्ठि पटलानि” ॥१०॥

“षोडशोत्तराष्टशतसप्तसहस्रश्रेणिवद्धानि” ॥११॥

चतुरशीतिलक्षैकोननवतिसहस्रैकशतचतुश्चत्वारिंशत् प्रकीर्णकानि ॥१२॥

चतुरशीतिलक्षसप्तनवतिसहस्त्रत्रयोविंशतिविमानानि ॥१३॥

ब्रह्मलोकान्तालयाश्चतुर्विशतिलौकान्तिकाः ॥१४॥

अणिमाद्यष्टगुणाः ॥१५॥

इति माघनन्द्याचार्य विरचित शास्त्रसारसमुच्चये करणानुयोगवर्णनो द्वितीयपरिच्छेदः ।

चरणानुयोग

पंच लब्धयः ॥१॥

करणं त्रिविधम् ॥२॥

त्रिविधम् ॥४॥

दशविधं वा ॥५॥

तत्र वेदकसम्यक्त्वस्य पंचविंशतिमलानि ॥६॥

अष्टांगानि ॥७॥

अष्ट गुणाः ॥८॥

पंचातिचाराः ॥९॥

एकादश निलयाः ॥१०॥

त्रिविधो निर्वेगः ॥११॥

सप्त व्यसनानि ॥१२॥

शल्यत्रयम् ॥१३॥

अष्टौ मूलगुणाः ॥१४॥

पञ्चाणुव्रतानि ॥१५॥

गुणव्रत त्रयम् ॥१६॥

शिक्षाव्रतानि चत्वारि ॥१७॥

सप्त शीलानि ॥१८॥

व्रतशीलेषु पंच पंचातिचाराः ॥१९॥

मौनं सप्तस्थानम् ॥२०॥

अन्तरायं च ॥२१॥

श्रावक धर्मश्चतुर्विध ॥२२॥

जैनाश्रमाश्च ॥२३॥

ब्रह्मचारिणः पञ्चविधा ॥२४॥

आर्यषट् कर्माणि ॥२५॥

तत्रेज्या दशविधाः ॥२६॥

अर्थानि षट्कर्माणि ॥२७॥

दत्तीश्चतुर्विधाः ॥२८॥

क्षत्रिया द्विविधाः ॥२६॥

भिक्षुश्चतुर्विध ॥३०॥

यतयो द्विविधाः ॥३१॥

मुनयस्त्रिविधाः ॥३२॥

ऋषयश्चतुर्विधाः ॥३३॥

तत्र राजर्षयो द्विविधा. ॥३४॥

ब्रह्मर्षि द्विविध ॥३५॥

मरणं द्वित्रिचतुःपंचविधवा ॥३६॥

पंचातिचाराः ॥३७॥

द्वादशानुप्रेक्षाः ॥३८॥

यतिधर्मो दशविधः ॥३९॥

अष्टाविंशतिर्मूलगुणाः ॥४०॥

गुप्तित्रयम् ॥४२॥

अष्टौ प्रवचनमातृकाः ॥४३॥

चतुस्त्रिंशदुत्तरगुणा ॥४४॥

द्वाविशत् परिषहाः ॥४५॥

द्वादशविधंतपः ॥४६॥

दशविधं प्रायश्चित्तानि ॥४७॥

आलोचनञ्च ॥४८॥

चतुर्विध विनयः ॥४९॥

दशविधानि वैयावृत्यानि ॥५०॥

पंचविध स्वाध्यायः ॥५१॥

द्विविधो व्युत्सर्गः ॥५२॥

ध्यानं चतुर्विधम् ॥५३॥

आर्तञ्च ॥५४॥

रौद्रमपिचतुर्विधञ्च ॥५५॥

धर्मध्यानं दशविधम् ॥५६॥

शुक्लध्यानं चतुर्विधम् ॥५७॥

अष्टौ ऋद्धय ॥५८॥

बुद्धिरष्टादश भेदा ॥५९॥

क्रियाऋद्धिर्द्विविधा ॥६०॥

विक्रियैकादशविधा ॥६१॥

तपः सप्तविधम् ॥६२॥

बलस्त्रिधा ॥६३॥

भेषजमष्टधा ॥६४॥

अक्षीणऋद्धिर्द्विविधा ॥६६॥

पंचविधानिर्ग्रन्थाः ॥६७॥

आचारश्च ॥६८॥

सप्त परमस्थानानि ॥७०॥

द्रव्यानुयोग

अथ षड् द्रव्याणि ॥१॥

पंचास्तिकायाः ॥२॥

सप्ततत्त्वानि ॥३॥

नद पदार्थः ॥४॥

चतुर्विधो न्यास ॥५॥

द्विविधं प्रमाणोम् ॥६॥

पच सज्ज्ञानि ॥७॥

त्रीणिकुज्ञानानि ॥८॥

मतिज्ञानं त्रिशतषट्त्रिशद्भेदम् ॥९॥

द्विविधं श्रुतम् ॥१०॥

चतुर्दश प्रकीर्णकानि ॥१२॥

त्रिविधमवधिज्ञानम् ॥१३॥

द्विविधो मनःपर्ययश्च ॥१४॥

नव नयाः ॥१५॥

सप्तभङ्गी ॥१६॥

पंच भावाः ॥१७॥

औपशमिको द्विविधः ॥१८॥

क्षायिको नवविध ॥१९॥

अष्टादशविध क्षायोपशमिकः ॥२०॥

औदयिकमेकविंशतिर्भेदः ॥२१॥

पारिणामिकस्त्रिविध : ॥२२॥

गुणजीवमार्गणस्थानानि प्रत्येकं चतुर्दशः ॥२३॥

द्विविधमेकेन्द्रियम् ॥२४॥

विकलत्रयम् ॥१५॥

पंचेन्द्रिया द्विविधाः ॥२६॥

षट् पर्याप्तयः ॥२७॥

दश प्राणाः ॥२८॥

चतुरस्त्रः सज्ञाः ॥२९॥

गतिश्चतुर्विधा ॥३०॥

पंचेन्द्रियाणि ॥३१॥

षड् जीवनिकायाः ॥३२॥

त्रिविधो योगः ॥३३॥

पंचदशविधाः ॥३४॥

वेदस्त्रिविधः ॥३५॥

नवविधो वा ॥३६॥

चतुःकषायाः ॥३७॥

अष्टज्ञानानि ॥३८॥

सप्त संयमाः ॥३९॥

चत्वारि दर्शनानि ॥४०॥

षड्लेश्याः ॥४१॥

द्विविधं भव्यत्वं ॥४२॥

षड्विधा सम्यक्त्वमार्गणा ॥४३॥

द्विविध संज्ञित्वम् ॥४४॥

आहारोपपोगश्चेति ॥४५॥

उपयोगश्चेति ॥४७॥

पुद्गलाकाशकालद्रव्यास्रवाश्च प्रत्येकं द्विविधाः ॥४८॥

बंधहेतवः पंचविधाः ॥४८॥

बंधश्चतुर्विधः ॥४९॥

अष्ट कर्माणि ॥५०॥

ज्ञानावरणीयं पंचविधम् ॥५१॥

दर्शनावरणोयं नवविधम ॥५२॥

वेदनीयं द्विविधम् ॥५३॥

मोहनीयमष्ट विशंति विधम् ॥५४॥

आयुष्यं चतुर्विधं ॥५५॥

द्विचत्वारिंशद्विधं नाम ॥५६॥

द्विविघं गोत्रम् ॥५७॥

पंचविधमन्तरायम् ॥५८॥

पुण्यं द्विविधम् ॥५९॥

पापं च द्विविधम् ॥६०॥

संवरश्च ॥६१॥

एकादश निर्जराः ॥६२॥

त्रिविधो मोक्ष हेतुः ॥६३॥

द्विविधो मोक्षः ॥६४॥

द्वादश सिद्धस्यानुयोगद्वाराणि ॥६५॥

अष्टौ सिद्धगुणाः ॥६६॥


टिप्पणी (सूत्र क्रमांक): सूत्र पाठ और अंक जैसे पुस्तक में छपे वैसे ही रखे हैं। क्रम में ये बातें दिखीं:

  1. प्रथमानुयोग: “षोडशभावना :” के साथ अंक १६ और “चतुस्त्रिशदतिशया” के साथ अंक ६ छपा है, क्रम के हिसाब से ये ६ और ८ होने चाहिए। “पंच महाकल्याणानि” का अंक स्कैन में साफ नहीं पढ़ा गया, क्रम से ९ लिखा। “अनंत चतुष्टयमिति” और “द्वादश चक्रवर्तिन :” के साथ अंक नहीं छपा (क्रम से १४, १५)।
  2. करणानुयोग: देवों वाले भाग में सूत्र ४ के बाद अगला अंक १० छपा है, ५ से ९ अंक वाले सूत्र पुस्तक में नहीं मिले।
  3. चरणानुयोग: अंक ३, ४१, ६५, ६९ वाले सूत्र पुस्तक में नहीं मिले। “क्षत्रिया द्विविधाः” के साथ अंक २६ छपा है (क्रम से २९)। “बुद्धिरष्टादश भेदा” का अंक स्कैन में साफ नहीं, क्रम से ५९ लिखा।
  4. द्रव्यानुयोग: अंक ११ और ४६ वाले सूत्र नहीं मिले। “विकलत्रयम्” के साथ अंक १५ छपा है (क्रम से २५)। अंक ४८ दो सूत्रों पर छपा है। “मतिज्ञानं त्रिशतषट्त्रिशद्भेदम्” का अंक स्कैन में साफ नहीं, क्रम से ९ लिखा।

स्रोत: Shastrasaar Samuchchaya.pdf

Shastrasaar Samuchchaya.pdf (21538 KB)

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