पुरुषार्थसिद्ध्युपाय (जिनप्रवचनरहस्यकोष) श्लोक एवं अर्थ
श्रीमद् अमृतचन्द्राचार्यदेव, हिन्दी अन्वयार्थ एवं टीका सहित
पुरुषार्थसिद्ध्युपाय के सभी २२६ संस्कृत मूल श्लोक, हर श्लोक के साथ अन्वयार्थ, टीका और भावार्थ, ग्रन्थ के आरम्भ से अन्त तक पूरा पाठ। पाठ भगवान् श्री कुन्दकुन्द कहान जैन शास्त्रमाला (पुष्प १११, श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़); पं. टोडरमलजी कृत ढूँढारी टीका (पं. दौलतरामजी द्वारा पूर्ण) के गुजराती भाषान्तर का हिन्दी रूपान्तर, रूपान्तरकार वैद्य गंभीरचन्द जैन से ज्यों का त्यों लिया है; श्लोकों का पाठ श्लोक पाठ PDF से भी मिलाया है। पाद टिप्पणियाँ भी साथ में हैं। अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ा।
केवल मूल श्लोक: पुरुषार्थसिद्ध्युपाय मूल श्लोक (आचार्य अमृतचन्द्र) | Purusharthsiddhyupay Mool Shlok (Acharya Amritchandra)
पूर्ण ग्रन्थ (PDF): पुरुषार्थसिद्ध्युपाय (आचार्य अमृतचन्द्र), हिन्दी अन्वयार्थ एवं टीका सहित | Purusharthsiddhyupay (Acharya Amritchandra)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/58940, t.me/jainegranth/58215
अनुक्रमणिका:
१. श्लोक १ से ४४
२. श्लोक ४५ से १२८
३. श्लोक १२९ से १९२
४. श्लोक १९३ से २२६
ॐ
श्री जिनाय नमः
श्रीमद्-अमृतचंद्राचार्यदेव विरचित
पुरुषार्थसिद्धयुपाय
आचार्यकल्प श्री पं० टोडरमलजी कृत भाषा-वचनिका का
हिन्दी रूपान्तर
मङ्गलाचरण (दोहा)
परम पुरुष निज अर्थको, साधि हुए गुणवृन्द ।
आनन्दामृत-चन्द्रको, वन्दत हूँ सुखकन्द ॥१॥
वानी बिन वैन न बने, वैन बिना बिन नैन ।
नैन बिना ना वान बन, नमों वानि बिन वैन ॥२॥
गुरु उर भावै आप-पर, तारक वारक पाप ।
सुरगुरु गावै आप-पर हारक वाच कलाप ॥३॥
मैं नमों गगन जैन जिन, ज्ञान ध्यान धन लीन ।
मैन मान बिन दानधन, ऐन हीन तन छीन ॥४॥
भावार्थ : जो परमपुरुष निजसुखस्वरूप प्रयोजनको साधकर शुद्ध गुणसमूहरूप हुए, उन आनन्दामृतचन्द्रको (जिनेन्द्रदेवको) मैं - जो (द्रव्यदृष्टिसे) सुखकन्द हूँ वह - वन्दना करता हूँ ॥१॥ वाणी बिना वचन नहीं हो सकते और वचनोंके बिना नयोंका कथन संभव नहीं है, नयोंके कथन बिना (वस्तुस्वरूपका वर्णन करनेवाली) स्याद्वादरूप वाणी नहीं बन सकती, किन्तु हे जिनेन्द्रदेव ! आपकी वाणी स्याद्वादरूप होती हुई भी निरक्षरी है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ ॥२॥ सुरगुरु (बृहस्पति) अपने और दूसरोंके मनको हरनेवाले वचनों द्वारा अपना और परका कल्याण करनेवाले एवं पापोंका नाश करनेवाले जिन गुरुओंकी स्तुति करते हैं, वे गुरु मेरे हृदयमें वास करें ॥३॥ मैं जिनमुद्रा धारक जैन नग्न दिगम्बर मुनिको नमस्कार करता हूँ कि जो ज्ञान - ध्यानरूपी धन - स्वरूपमें लीन हैं, काम, मान (घमण्ड, कर्तृत्व, ममत्व) से रहित, मेघ समान धर्मोपदेशकी वृष्टि करनेवाले, पाप रहित और क्षीणकाय हैं, अर्थात् कषाय और काया क्षीण हैं तथा ज्ञानस्वरूपमे अत्यन्त पुष्ट हैं ॥४॥
(कवित्त सवैया मनहरण ३१ वर्ण)
कोई नर निश्चयसे आत्माको शुद्ध मान,
हुआ है स्वच्छन्द न पिछाने निज शुद्धता ।
कोई व्यवहार दान तप शीलभावको ही,
आत्माका हित मान छोड़ै नहीं मूढ़ता ॥
कोई व्यवहारनय - निश्चयके मारगको,
भिन्न भिन्न जानकर करत निज उद्धता ।
जाने जब निश्चयके भेद व्यवहार सब,
कारणको उपचार माने तब बुद्धता ॥५॥
(दोहा)
श्रीगुरु परम दयालु हो, दिया सत्य उपदेश ।
ज्ञानी माने जानकर, ठानत मूढ़ कलेश ॥६॥
अब ग्रन्थकर्ता श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव मङ्गलाचरणके निमित्त अपने इष्टदेवको स्मरण करके, इस जीवका प्रयोजन सिद्ध होनेमें कारणभूत, निश्चय और व्यवहार मोक्षमार्गकी एकतारूप उपदेश जिसमें है, ऐसे ग्रन्थका आरम्भ करते हैं ।
सूत्रावतार
(आर्या छन्द)
तज्जयति परं ज्योतिः समं समस्तैरनन्तपर्यायैः ।
दर्पणतल इव सकला प्रतिफलति पदार्थमालिका यत्र ॥१॥
अन्वयार्थ : (यत्र) जिसमें (दर्पणतल इव) दर्पणके तलकी तरह (सकला) समस्त (पदार्थमालिका) पदार्थोंका समूह (समस्तैरनन्तपर्यायैः समं) अतीत, अनागत और वर्तमान कालकी समस्त अनन्त पर्यायों सहित (प्रतिफलति) प्रतिबिम्बित होता है, (तत् ) वह (परं ज्योतिः) सर्वोत्कृष्ट शुद्ध चेतनारूप प्रकाश (जयति) जयवन्त वर्तो ।
टीका : तत् परंज्योतिः जयति - वह परम ज्योति - सर्वोत्कृष्ट शुद्धचेतनाका प्रकाश जयवन्त वर्तता है । वह कैसा है ? यत्र सकला पदार्थमालिका प्रतिफलति - जिस शुद्धचेतना प्रकाशमें समस्त ही जीवादि पदार्थोंका समूह प्रतिबिम्बित होता है । किस प्रकार ? समस्तैः अनन्तपर्यायैः समं - अपनी समस्त अनन्त पर्यायों सहित प्रतिबिम्बित होता है ।
भावार्थ : शुद्धचेतनाप्रकाशकी कोई ऐसी ही महिमा है, कि उसमें, जितने भी पदार्थ हैं वह सभी अपने आकार सहित प्रतिभासमान होते हैं । किस प्रकार ? दर्पणतल इव - जिस प्रकार दर्पणके ऊपरके भागमें घटपटादि प्रतिबिम्बित होते हैं । यहाँ दर्पणका दृष्टान्त दिया है उसका प्रयोजन यह जानना कि दर्पणको ऐसी इच्छा नहीं है कि मैं इन पदार्थोंको प्रतिबिम्बित करूँ । जिस प्रकार लोहेकी सुई लोहचुम्बकके पास स्वयं ही जाती है, वैसे दर्पण अपना स्वरूप छोड़कर पदार्थोंका प्रतिबिम्बित करनेके लिये उनके पास नहीं जाता और वे पदार्थ भी अपना स्वरूप छोड़कर उस दर्पणमें प्रवेश नहीं कर जाते । जैसे कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुषसे कहे कि हमारा यह काम करो ही करो, तैसे वे पदार्थ अपनेको प्रतिबिम्बित करवानेके लिये दर्पणसे प्रार्थना भी नहीं करते । सहज ही ऐसा सम्बन्ध है कि जैसा उन पदार्थोंका आकार होता है वैसा ही आकाररूप वे दर्पणमें प्रतिबिम्बित होते हैं । प्रतिबिम्बित होने पर दर्पण ऐसा नहीं मानता कि यह पदार्थ मेरे लिये भले हैं, उपकारी हैं, राग करने योग्य हैं, अथवा बुरे हैं और द्वेष करने योग्य हैं; वह तो सभी पदार्थोंके प्रति समानभावसे प्रवर्तन करता है । जिस प्रकार दर्पणमें कितने ही घटपटादि पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं उसी प्रकार ज्ञानरूपी दर्पणमें समस्त जीवादि पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं । ऐसा कोई द्रव्य या पर्याय नहीं है जो ज्ञानमें न आया हो । ऐसी शुद्धचैतन्य परम ज्योति की सर्वोत्कृष्ट महिमा स्तुति करने योग्य है ।
यहां कोई प्रश्न करे, कि यहाँ गुणका स्तवन तो किया किन्तु किसी पदार्थका नाम नहीं लिया - उसका कारण क्या ? प्रथम पदार्थका नाम लेना चाहिए, पश्चात् गुण का वर्णन करना चाहिए । उसका उत्तर : यहां आचार्यने अपनी परीक्षाप्रधानता प्रकट की है । भक्त दो प्रकारके होते हैं - एक आज्ञाप्रधानी और दूसरे परीक्षाप्रधानी । जो जीव परम्परा मार्गसे चले आए, जैसे-तैसे देव-गुरुका उपदेश प्रमाण करके विनयादि क्रियारूप प्रवर्तन करते हैं उन्हें आज्ञाप्रधानी कहते हैं और जो अपने सम्यग्ज्ञान द्वारा प्रथम स्तुति करने योग्य गुणका निश्चय करते हैं, पश्चात् जिनमें वह गुण होता है उनके प्रति विनयादि क्रियारूप प्रवर्तन करते हैं, उन्हें परीक्षाप्रधानी करते हैं । क्योंकि कोई पद, वेश अथवा स्थान पूज्य नहीं है, गुण पूज्य है इसलिये यहाँ शुद्धचेतना प्रकाशरूप गुण स्तुति करने योग्य है, ऐसा आचार्यने निश्चय किया । जिसमें ऐसा गुण हो वह सहज ही स्तुति करने योग्य हुआ । कारण कि गुण द्रव्याश्रित है, द्रव्यसे भिन्न नहीं, ऐसे विचार पूर्वक निश्चय करें तो ऐसा गुण प्रकट रूपसे अरिहन्त और सिद्धमें होता है । इस प्रकार अपने इष्टदेवका स्तवन किया ॥१॥
अब इष्ट आगमका स्तवन करते हैं -
परमागमस्य जीवं निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुरविधानम् ।
सकलनय विलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥२॥
* पाठान्त बीजं ।
अन्वयार्थ : (निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुरविधानम् ) जन्मान्ध पुरुषोंके हस्ति - विधानका निषेध करनेवाला, (सकलनय विलसितानाम् ) समस्त नयोंसे प्रकाशित वस्तु स्वभावका (विरोधमथनं) विरोध दूर करनेवाला (परमागमस्य) उत्कृष्ट जैन सिद्धान्तका (जीवं) जीवभूत (अनेकान्तम् ) अनेकान्तको - एक पक्ष रहित स्याद्वादको मैं अमृतचन्द्रसूरि नमस्कार करता हूँ ।
टीका : अहं अनेकान्त नमामि - मैं ग्रन्थकर्ता, अनेकान्त - एक पक्ष रहित स्याद्वादको नमस्कार करता हूँ । यहाँ कोई प्रश्न करे कि जिनागमको नमस्काकर करना चाहिये था, उसके बदले स्याद्वाद को नमस्कार किया, उसका कारण क्या ? उसका उत्तर : जिस स्याद्वादको हमने नमस्कार किया, वह कैसा है ? परमागमस्य जीवं उत्कृष्ट जैन सिद्धान्तका जीवभूत है ।
भावार्थ : जैसे शरीर जीव सहित कार्यकारी है, जीव रहित मृतक शरीर किसी कामका नहीं वैसे ही जैन सिद्धान्त भी वचनात्मक है, वचन क्रमवर्ती है । वह जो कथन करता है वह एक नयकी प्रधानतासे करता है परन्तु जैन सिद्धान्त सर्वत्र स्याद्वादसे व्याप्त है । जहाँ एक नयकी प्रधानता है वहाँ दूसरा नय सापेक्ष है, इसलिये जैन सिद्धान्त इस जीवको कार्यकारी है । अन्यमतका सिद्धान्त एक पक्षसे दूषित है, स्याद्वाद रहित है, अतः कार्यकारी नहीं है । जो जैन शास्त्रोंके उपदेशको भी अपने अज्ञानसे स्याद्वाद रहित श्रद्धान करते हैं उन्हें विपरीत फल मिलता है । इसलिए स्याद्वाद परमागम का जीवभूत है । उसे नमस्कार करता हूँ ।
कैसा है स्याद्वाद ? निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुरविधानम् जन्मान्ध पुरुषोंका हस्ति-विधान जिसने दूर कर दिया है, ऐसा है । जिस प्रकार अनेक जन्मान्ध पुरुष मिले, उन्होंने एक हाथीके अनेक अंग अपनी स्पर्शनेन्द्रियसे अलग अलग जाने । आँखोंके बिना, पूर्ण सर्वांग हाथीको न जाननेसे, हाथीका स्वरूप अनेक प्रकार कहकर (एक अंगको ही सर्वांग मानकर) परस्पर वाद करने लगे । तब आँख वाले पुरुषने हाथीका यथार्थ निर्णय करके उनकी भिन्न-भिन्न कल्पनाको दूर कर दिया । उसी प्रकार अज्ञानी एक वस्तुके अनेक अंगोंको अपनी बुद्धिसे जुदे-जुदे अन्य-अन्य रीतिसे निश्चय करता है । सम्यग्ज्ञान बिना सर्वांग (सम्पूर्ण) वस्तुको न जाननेसे एकान्तरूप वस्तु मानकर परस्पर वाद करता है । वहाँ स्याद्वाद विद्याके बलसे सम्यग्ज्ञानी यथार्थरूपेण वस्तुका निर्णय करके उसकी भिन्न भिन्न कल्पना दूर कर देता है । उसका उदाहरण -
सांख्यमती वस्तुको नित्य ही मानता है, बौद्धमती क्षणिक ही मानता है । स्याद्वादी कहता है कि जो वस्तु सर्वथा नित्य ही हो तो अनेक अवस्थाओंका पलटना किस प्रकार बन सकता है ? जो वस्तुको सर्वथा क्षणिक मान लें तो जो वस्तु पहले देखी थी वह यही है ऐसा प्रत्यभिज्ञान किस प्रकार हो सकता है ? अतः कथंचित् द्रव्यकी अपेक्षासे वस्तु नित्य है और पर्याय की अपेक्षासे क्षणिक है । इस भाँति जब स्याद्वादसे सर्वांग वस्तुका निर्णय करनेमें आता है तब एकान्त श्रद्धाका निषेध हो जाता है । पुनः कैसा है स्याद्वाद ? सकल नय विलसितानां विरोधमथनं समस्त नयोंसे प्रकाशित जो वस्तु-स्वभाव, उसके विरोधको दूर करता है ।
भावार्थ : नय-विवक्षासे वस्तुमें अनेक स्वभाव हैं और उनमें परस्पर विरोध है । जैसे कि अस्ति और नास्तिका प्रतिपक्षीपना है परन्तु जब स्याद्वादसे स्थापन करें तो सर्व विरोध दूर हो जाता है । किस प्रकार ? एक ही पदार्थ कथंचित् स्वचतुष्टयकी अपेक्षासे अस्तिरूप है, कथंचित् परचतुष्टयकी अपेक्षासे नास्तिरूप है । कथंचित् समुदायकी अपेक्षासे एकरूप है, कथंचित् गुण - पर्यायकी अपेक्षासे अनेकरूप है । कथंचित् संज्ञा, संख्या, लक्षण और प्रयोजनकी अपेक्षासे गुण - पर्यायादि अनेक - भेदरूप है । कथंचित् सत्की अपेक्षासे अभेदरूप है । कथंचित् द्रव्य अपेक्षासे नित्य है, कथंचित् पर्याय अपेक्षासे अनित्य है । इसप्रकार स्याद्वाद सर्व विरोधको दूर करता है । स्यात् अर्थात् कथंचित् नय - अपेक्षासे वाद अर्थात् वस्तु-स्वभावका कथन, इसे स्याद्वाद कहते हैं, इसीको नमस्कार किया है ॥२॥
आगे आचार्य ग्रन्थ करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं -
लोकत्रयैकनेत्रं निरूप्य परमागमं प्रयत्नेन ।
अस्माभिरुपोद्ध्रियते विदुषां पुरुषार्थसिद्ध्युपायोऽयम् ॥३॥
अन्वयार्थ : (लोकत्रयैकनेत्रं) तीन लोक सम्बन्धी पदार्थोंको प्रकाशित करनेमें अद्वितीय नेत्र (परमागमं) उत्कृष्ट जैनागमको (प्रयत्नेन) अनेक प्रकारके उपायोंसे (निरूप्य) जानकर अर्थात् परम्परा जैन सिद्धान्तोंके निरूपण पूर्वक (अस्माभिः) हमारे द्वारा (विदुषां) विद्वानों के लिये (अयं) यह (पुरुषार्थसिद्ध्युपायः) पुरुषार्थसिद्धि-उपाय नामक ग्रन्थ (उपोद्ध्रियते) उद्धार करनेमें आता है । टीका : अस्माभिः विदुषां अयं पुरुषार्थसिद्ध्युपायः उपोद्ध्रियते - मैं ग्रन्थकर्ता ज्ञानी जीवोंके लिए यह पुरुषार्थसिद्ध-उपाय नामक ग्रन्थ अथवा चैतन्य पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेका उपाय प्रकट करता हूँ । किं कृत्वा - क्या करके ? प्रयत्नेन - अनेक प्रकारसे उद्यम करके सावधानी पूर्वक - परमागमं निरूप्य - परम्परासे जैन सिद्धान्तका विचार करके ।
भावार्थ : जिस प्रकार केवली, श्रुतकेवली और आचार्योंके उपदेशकी परम्परा है उसका विचार करके मैं उपदेश देता हूँ । स्वमतिसे कल्पित रचना नहीं करता हूँ । कैसा है परमागम ? लोकत्रयैकनेत्रं - तीन लोकमें त्रिलोक सम्बन्धी पदार्थोंको बतानेके लिये अद्वितीय नेत्र है ॥३॥
इस ग्रन्थके प्रारम्भमें वक्ता, श्रोता और ग्रन्थका वर्णन करना चाहिए ऐसी परम्परा है ।
इसलिये प्रथम ही वक्ताका लक्षण कहते हैं -
मुख्योपचार विवरण निरस्तदुस्तरविनेय दुर्बोधाः ।
व्यवहार निश्चयज्ञाः प्रवर्तयन्ते जगति तीर्थम् ॥४॥
अन्वयार्थ : (मुख्योपचार विवरण निरस्त दुस्तर विनेय दुर्बोधाः) मुख्य और उपचार कथनके विवेचनसे प्रकटरूपेण शिष्योंका दुर्निवार अज्ञानभाव जिन्होंने नष्ट कर दिया है तथा (व्यवहारनिश्चयज्ञाः) जो व्यवहारनय और निश्चयनयके ज्ञाता हैं, ऐसे आचार्य (जगति) जगतमें (तीर्थ) धर्मतीर्थका (प्रवर्तयन्ते) प्रवर्तन कराते हैं ।
टीका : व्यवहार निश्चयज्ञाः जगति तीर्थं प्रवर्तयन्ते - व्यवहार और निश्चयके जाननेवाले आचार्य इस लोकमें धर्मतीर्थका प्रवर्तन कराते हैं । कैसे हैं आचार्य ? मुख्योपचार विवरण निरस्त दुस्तर विनेय दुर्बोधाः - मुख्य और उपचार कथनसे शिष्यके अपार अज्ञानभावको जिन्होंने नाश किया है, ऐसे हैं ।
भावार्थ : उपदेशदाता आचार्यमें अनेक गुण चाहिए । परन्तु व्यवहार और निश्चयका ज्ञान मुख्यरूपसे चाहिए । किसलिए ? जीवोंको अनादिसे अज्ञानभाव है, वह मुख्य (निश्चय) कथन और उपचार (व्यवहार) कथनके जाननेसे दूर होता है । वहाँ मुख्य कथन तो निश्चयनयके आधीन है, वही बताते हैं । स्वाश्रितो निश्चयः जो अपने ही आश्रयसे हो उसको निश्चय कहते हैं । जिस द्रव्यके अस्तित्वमें जो भाव पाये जावें, उस द्रव्यमें उनका ही स्थापन करना, तथा परमाणुमात्र भी अन्य क्लपना न करनेका नाम स्वाश्रित है । उसका जो कथन है उसीको मुख्य कथन कहते हैं । (मुख्य-निश्चय) इसको जाननेसे अनादि शरीरादि परद्रव्यमें एकत्व श्रद्धानरूप अज्ञानभावका अभाव होता है, भेदविज्ञानकी प्राप्ति होती है, सर्व परद्रव्यसे भिन्न अपने शुद्ध चैतन्यस्वरूपका अनुभव होता है । वहाँ परमानन्द दशामें मग्न होकर केवल दशाको प्राप्त होता है । जो अज्ञानी इसको जाने बिना धर्ममें प्रवृत्ति करते हैं, वे शरीराश्रित क्रियाकाण्डको उपादेय जानकर, संसारका कारण जो शुभोपयोग उसे ही मुक्तिका कारण मानकर, स्वरूपसे भ्रष्ट होते हुए संसारमें भ्रमण करते हैं । इसलिए मुख्य (निश्चय) कथनका ज्ञान अवश्य होना चाहिए । और वह निश्चयनयके आधीन है इसलिए उपदेशदाता निश्चयनयका ज्ञाता होना चाहिए । कारण कि स्वयं ही न जाने तो शिष्योंको कैसे समझा सकता है ?
तथा पराश्रितो व्यवहारः जो परद्रव्यके आश्रित हो उसे व्यवहार करते हैं । किंचित् मात्र कारण पाकर अन्य द्रव्यका भाव अन्य द्रव्यमें स्थापन करे उसे पराश्रित कहते हैं । उसीके कथनको उपचार-कथन कहते हैं । इसे जानकर शरीरादिके साथ सम्बन्धरूप संसार दशा है उसका ज्ञान करके, संसारके कारण जो आस्रव - बन्ध हैं उन्हें पहिचान कर, मुक्त होनेके उपाय जो संवर - निर्जरा हैं उनमें प्रवर्तन करे । अज्ञानी इन्हें जाने बिना शुद्धोपयोगी होनेकी इच्छा करता है, वह पहले ही व्यवहार-साधनको छोड़कर पापाचरणमें लीन होकर, नरकादिके दुःख - संकटोंमें जा गिरता है । इसलिए उपचारकथनका भी ज्ञान होना चाहिए । और वह व्यवहारनयके आधीन है अतः उपदेशदाताको व्यवहारका भी ज्ञान होना आवश्यक है । इस भाँति दोनों नयोंके ज्ञाता आचार्य धर्मतीर्थके प्रवर्तक होते हैं, अन्य नहीं ॥४॥
आगे कहते हैं कि आचार्य दोनों नयोंका उपदेश किस प्रकार करते हैं -
निश्चयमिह भूतार्थं व्यवहारं वर्णयन्त्यभूतार्थम् ।
भूतार्थबोधविमुखः प्रायः सर्वोऽपि संसारः ॥५॥
अन्वयार्थ : (इह) इस ग्रन्थमें (निश्चयं) निश्चयनयको (भूतार्थं) भूतार्थ और (व्यवहारं) व्यवहारनयको (अभूतार्थं) अभूतार्थ (वर्णयन्ति) वर्णन करते हैं । (प्रायः) प्रायः (भूतार्थबोध विमुखः) भूतार्थ अर्थात् निश्चयनयके ज्ञानसे विरुद्ध जो अभिप्राय है, वह (सर्वोऽपि) समस्त ही (संसारः) संसारस्वरूप है ।
टीका : इह निश्चयं भूतार्थं व्यवहारं अभूतार्थं वर्णयन्ति आचार्य इन दोनों नयोंमें निश्चयनयको भूतार्थ कहते हैं और व्यवहारनयको अभूतार्थ कहते हैं ।
भावार्थ : भूतार्थ नाम सत्यार्थका है । भूत अर्थात् जो पदार्थमें पाया जावे, और अर्थ अर्थात् भाव । उनको जो प्रकाशित करे तथा अन्य किसी प्रकारकी कल्पना न करे उससे भूतार्थ कहते हैं । जिस प्रकार कि सत्यवादी सत्य ही कहता है, कल्पना करके कुछ भी नहीं कहता । वहीं यहाँ बताया जाता है । यद्यपि जीव और पुद्गलका अनादि कालसे एकक्षेत्रावगाह सम्बन्ध है और दोनों मिले हुए जैसे दिखाई पड़ते हैं तो भी निश्चयनय आत्मद्रव्यको शरीरादि परद्रव्योंसे भिन्न ही प्रकाशित करता है । यही भिन्नता मुक्तदशामें प्रकट होती है । इसलिए निश्चयनय सत्यार्थ है ।
अभूतार्थ नाम असत्यार्थका है । अभूत अर्थात् जो पदार्थमें न पाया जावे और, अर्थ भूतार्थ भाव । उनको जो अनेक प्रकारकी कल्पना करके प्रकाशित करे उसे अभूतार्थ कहते हैं । जैसे कोई असत्यवादी पुरुष जरासे भी कारणका बहाना - छल पाकर अनेक कल्पना करके असदृशको भी सदृश कर दिखाता है । उसीको बताते हैं । जैसे यद्यपि जीव और पुद्गलककी सत्ता भिन्न है, स्वभाव भिन्न है, प्रदेश भिन्न है, तथापि एकक्षेत्रावगाह सम्बन्धका छल (बहाना) पाकर आत्मद्रव्यको शरीरादिक परद्रव्यसे एकत्वरूप कहता है । मुक्त दशामें प्रकट भिन्नता होती है । तब व्यवहारनय स्वयं ही भिन्न-भिन्न प्रकाशित करनेको तैयार होता है । अतः व्यवहारनय असत्यार्थ है । प्रायः भूतार्थ बोध विमुखः सर्वोऽपि संसारः अतिशयपने सत्यार्थ जो निश्चयनय है उसके परिज्ञानसे विपरीत जो परिणाम (अभिप्राय) है वह समस्त संसारस्वरूप ही है ।
भावार्थ : इस आत्माका परिणाम निश्चयनयके श्रद्धानसे विमुख होकर, शरीरादिक परद्रव्योंके साथ एकत्व श्रद्धानरूप होकर प्रवर्तन करे उसीका नाम संसार है । इससे जुदा संसार नामका कोई पदार्थ नहीं है । इसलिए जो जीव संसारसे मुक्त होनेके इच्छुक हैं उन्हें शुद्धनयके* सन्मुख रहना योग्य है । इसीको उदाहरण देकर समझाते हैं । जिस प्रकार बहुत पुरुष कीचड़के संयोगसे जिसकी निर्मलता आच्छादित हो गई है, ऐसे गंदले जलको ही पीते हैं । और कोई अपने हाथसे कतकफल (निर्मली) डालकर कीचड़ और जलको अलग - अलग करता है । वहाँ निर्मल जलका स्वभाव ऐसा प्रकट होता है जिसमें अपना पुरुषाकार प्रतिभासित होता है, उसी निर्मल जलका वह आस्वादन करता है । उसी प्रकार बहुतसे अज्ञानी जीव कर्मके संयोगसे जिसका ज्ञानस्वभाव ढँक गया है ऐसे अशुद्ध आत्माका अनुभव करते हैं । कुछ ज्ञानी जीव अपनी बुद्धिसे शुद्धनिश्चयनयके स्वरूपको जानकर कर्म और आत्माको भिन्न-भिन्न करते हैं तब निर्मल आत्माका स्वभाव ऐसा प्रगट होता है जिसमें अपने चैतन्यपुरुषका आकार प्रतिभासित हो जाता है । इस प्रकार वह निर्मल आत्माका स्वानुभवरूप आस्वादन करते हैं । अतः शुद्धनय कतकफल समान है, उसीके श्रद्धानसे सर्वसिद्धि होती है ॥५॥
*शुद्धनयका विषय - त्रैकालिक पूर्णरूप अपना निश्चय परमात्मा ।
आगे कहते हैं कि यदि एक निश्चयनयके श्रद्धानसे ही सर्व सिद्धी होती है तो फिर आचार्य व्यवहारनयका उपदेश क्यों करते हैं ? उसका उत्तर - अर्थ इस गाथामें कहा है ॥५॥
अब जो श्रोता गाथामें कथित अर्थके उपदेशको अंगीकार करने योग्य नहीं हैं उनका कथन करते हैं -
अबुधस्य बोधनार्थं मुनीश्वराः देशयन्त्यभूतार्थम् ।
व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ॥६॥
अन्वयार्थ : (मुनीश्वराः) ग्रन्थकर्ता आचार्य (अबुधस्य) अज्ञानी जीवोंको (बोधनार्थं) ज्ञान उत्पन्न करनेके लिये (अभूतार्थं) व्यवहारनयका (देशयन्ति) उपदेश करते हैं और (यः) जो जीव (केवलं) केवल (व्यवहारम् एव) व्यवहारनयको ही (अवैति) जानता है (तस्य) उसको - उस मिथ्यादृष्टि जीवके लिये (देशना) उपदेश (नास्ति) नहीं है ।
टीका : मुनीश्वराः अबुधस्य बोधनार्थं अभूतार्थं देशयन्ति - मुनीश्वर अर्थात् आचार्य अज्ञानी जीवोंको ज्ञान उत्पन्न करनेके लिये अभूतार्थ ऐसा जो व्यवहारनय उसका उपदेश करते हैं ।
भावार्थ : अनादिका अज्ञानी जीव व्यवहारनयके उपदेश बिना समझ नहीं सकता इसलिये आचार्य महाराज व्यवहारनयके द्वारा उसको समझाते हैं । वही यहाँ बता रहे हैं । जैसे किसी मलेच्छको एक ब्राह्मणने स्वस्ति शब्द कहकर आशीर्वाद दिया, तो उसे उसके अर्थका कुछ बोध नहीं हुआ और वह ब्राह्मणकी तरफ ताकता रहा । वहाँ एक दुभाषिया उससे म्लेच्छ भाषामें बोला कि यह ब्राह्मण कहता है कि तेरा कल्याण हो, तब आनन्दित होकर उस म्लेच्छने आशीर्वाद अंगीकार किया । ठीक इसी प्रकार आचार्यने अज्ञानी जीवको आत्मा शब्द कहकर उपदेश दिया तब वह कुछ नहीं समझा और आचार्यकी तरफ देखता रह गया । तब निश्चय और व्यवहारनयके ज्ञाता आचार्यने व्यवहारनयके द्वारा भेद उत्पन्न करके (गुण-गुणी आदि विवक्षा-भेद द्वारा) उसे बताया कि - जो यह देखनेवाला, जाननेवाला और आचरण करनेवाला पदार्थ है वही आत्मा है, तब सहज परमानन्द दशाको प्राप्त होकर वह आत्माको निजस्वरूपमें अंगीकार करता है । इस प्रकार यह सद्भूतव्यवहारनयका उदाहरण दिया ।
आगे असद्भूतव्यवहारनयका उदाहरण देते हैं । जैसे घृतसे संयुक्त मिट्टीके घड़ेको व्यवहारसे घीका घड़ा कहते हैं । यहाँ कोई पुरुष जन्मसे ही उसको घीका घड़ा जानता है । जब कोई पुरुष घृता घड़ा कहकर उसे समझाता है तभी वह समझता है और यदि उससे मिट्टीका घड़ा कहकर संबोधन किया जाय तो वह किसी दूसरे कोरे घड़ेको समझ बैठता है - घीके घड़ेको नहीं । निश्चयसे विचार किया जाय तो घड़ा मिट्टीका ही है परन्तु उसको समझानेके लिये घृततका घड़ा कहकर ही संबोधन करना पड़ता है । उसी प्रकार यह चैतन्यस्वरूप आत्मा कर्मजनित पर्यायसे संयुक्त है । उसे व्यवहारसे देव, मनुष्य इत्यादि नामसे कहते हैं । अज्ञानी जीव अनादिसे उस आत्माको देव, मनुष्य इत्यादि स्वरूप ही जानता है । जब कोई उसे देव, मनुष्य वगैरह नामसे संबोधित करके समझावे तभी समझ पाता है और यदि आत्माका नाम चैतन्यस्वरूप कहे तो अन्य किसी परमब्रह्म परमेश्वरको समझ बैठता है । निश्चयसे विचार करें तो आत्मा चैतन्यस्वरूप ही है परन्तु अज्ञानीको समझानेके लिये आचार्यदेव गति, जाति आदिके भेद द्वारा जीवका निरूपण करते हैं । इस तरह अज्ञानी जीवोंको ज्ञान उत्पन्न करानेके लिये आचार्य महाराज व्यवहारका उपदेश करते हैं । केवलं व्यवहारं एव अवैति तस्य देशना नास्ति - जो जीव केवल व्यवहार ही का श्रद्धान करता है उसके लिये उपदेश नहीं है ।
भावार्थ : निश्चयनयके श्रद्धान बिना केवल व्यवहारमार्गसे ही प्रवर्त्तन करनेवाले मिथ्यादृष्टियोंके लिये उपदेश देना निष्फल है ॥६॥
आगे केवल व्यवहारनयके श्रद्धान होनेका कारण बताते हैं -
माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीत सिंहस्य ।
व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य ॥७॥
अन्वयार्थ : (यथा) जिस प्रकार (अनवगीत सिंहस्य) सिंहको सर्वथा न जाननेवाले पुरुषके लिये (माणवकः) बिलाव (एव) ही (सिंहः) सिंहरूप (भवति) होता है, (हि) निश्चयसे (तथा) उसी प्रकार (अनिश्चयज्ञस्य) निश्चयनयके स्वरूपसे अपरिचित पुरुषके लिये (व्यवहारः) व्यवहार (एव) ही (निश्चयतां) निश्चयपनेको (याति) प्राप्त होता है ।
टीका : यथा हि अनवगीतसिंहस्य माणवक एव सिंहो भवति - जिस प्रकार निश्चयसे (वास्तवमें) जिसने सिंहको नहीं जाना है उसके लिये बिलाव ही सिंहरूप होता है । तथा अनिश्चयज्ञस्य व्यवहारः एव निश्चयतां याति - उसी प्रकार जिसने निश्चयका स्वरूप नहीं जाना है उसको व्यवहार ही निश्चयरूप हो जाता है अर्थात् वह व्यवहारको ही निश्चय मान बैठता है ।
भावार्थ : जैसे बालक सिंहको न पहचानता हुआ बिलावको ही सिंह मान लेता है उसी प्रकार अज्ञानी जव निश्चयके स्वरूपको न पहचानता हुआ व्यवहारको ही निश्चय मान लेता है । उसका स्पष्टीकरण करते हैं । जो जीव अपने शुद्धचैतन्यरूप आत्माके श्रद्धान, ज्ञान, आचरणरूप मोक्षमार्गो नहीं पहचानता, वह जीव व्यवहारदर्शन, ज्ञान, चारित्रका साधन करके अपनेको मोक्षका अधिकारी मानता है । अर्हन्तदेव, निर्ग्रन्थ गुरु, दयाधर्मका श्रद्धान करके अपने आपको सम्यग्दृष्टि मानता है, और किंचित् जिनवाणीको जानकर अपनेको ज्ञानी मानता है, महाव्रतादि क्रियाका साधन करके अपनेको चारित्रवान मानता है । इस प्रकार वह शुभोपयोगमें सन्तुष्ट होकर, शुद्धोपयोगरूप मोक्षमार्गमें प्रमादी है इसलिये केवल व्यवहारनयका अवलम्बी हुआ है अतः उसे उपदेश देना निष्फल है । यहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसा श्रोता भी उपदेशके योग्य नहीं है तो फिर कैसे गुण-संयुक्त श्रोता चाहिये ? इसका उत्तर आगे देते हैं ।
व्यवहारनिश्चयौ यः प्रबुध्यतत्त्वेन भवति मध्यस्थः ।
प्राप्नोति देशनायाः स एव फलमविकलं शिष्यः ॥८॥
अन्वयार्थ : (यः) जो जीव (व्यवहारनिश्चयौ) व्यवहारनय और निश्चयनयको (तत्त्वेन) वस्तुस्वरूपमें (प्रबुध्य) यथार्थरूपसे जानकर (मध्यस्थः) मध्यस्थ (भवति) होता है अर्थात् निश्चयनय और व्यवहारनयके पक्षपात रहित होता है (सः) वह (एव) ही (शिष्यः) शिष्य (देशनायाः) उपदेशका (अविकलं) सम्पूर्ण (फलं) फल (प्राप्नोति) प्राप्त करता है ।
टीका : यः व्यवहारनिश्चयौ तत्त्वेन प्रबुध्य मध्यस्थः भवति - जो जीव व्यवहारनय और निश्चयनयके स्वरूपको यथार्थरूपसे जानकर पक्षपात रहित होता है स एव शिष्यः देशनायाः अविकलं फलं प्राप्नोति - वही शिष्य उपदेशका सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है ।
भावार्थ : श्रोतामें अनेक गुण होने चाहिये परन्तु व्यवहार और निश्चयको जानकर एक पक्षका हठाग्रहीरूप न होनेका गुण मुख्यरूपसे होना चाहिये । कहा भी है -
जइ जिणमयं पवज्जह ता मा व्यवहार णिच्छए मुअह ।
एकेण विणा छिज्जइ तित्थं, अण्णेण पुण तच्चं ॥
(पं० प्रवर आशाधरजी कृत अनगार धर्मामृत प्र० अ० पृष्ठ १८)
अर्थ : यदि तू जिनमतमें प्रवर्त्तन करता है तो व्यवहार और निश्चयको मत छोड़ । यदि निश्चयका पक्षपाती होकर व्यवहारको छोड़ेगा तो रत्नत्रयस्वरूप धर्मतीर्थका अभाव होगा । और यदि व्यवहारका पक्षपाती होकर निश्चयको छोड़ेगा तो शुद्ध तत्त्वस्वरूपका अनुभव नहीं होगा । अतः पहले व्यवहार - निश्चयको भले प्रकार जानकर पश्चात् यथायोग्य इनका अंगीकार करना, पक्षपात न करना, यही उत्तम श्रोताका लक्षण है ।
प्रश्न : जो निश्चय - व्यवहारको जाननेरूप गुण वक्ताके बतलाये थे वे ही श्रोताके भी बतला दिये तो इसमें विशेषता क्या हुई ? उत्तर : जो गुण आधिक्यतारूपसे वक्तामें होवें वही गुण हीनतारूपसे - थोड़े अंशोंमें - श्रोतामें भी होना चाहिये । इस प्रकार वक्ता और श्रोताका वर्णन किया ॥८॥
भूमिका समाप्त
*
ग्रन्थ प्रारम्भ
अब ग्रन्थका वर्णन करते हैं । इस ग्रन्थमें पुरुषके अर्थकी सिद्धिका उपाय बतायेंगे । अतः प्रथम ही पुरुषका स्वरूप कहते हैं ।
अस्ति पुरुषश्चिदात्मा विवर्जितः स्पर्शगन्धरसवर्णैः ।
गुणपर्ययसमवेतः समाहितः समुदयव्ययध्रौव्यैः ॥९॥
अन्वयार्थ : (पुरुषः) पुरुष अर्थात् आत्मा (चिदात्मा) चेतनास्वरूप (अस्ति) है, (स्पर्शरसगन्धवर्णैः) स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णसे (विवर्जितः) रहित है, (गुणपर्ययसमवेतः) गुण और पर्याय सहित है, तथा (समुदयव्ययध्रौव्यैः) उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य (समाहितः) युक्त है ।
टीका : पुरुषः चिदात्मा अस्ति - पुरुष है वह चैतन्यस्वरूप है ।
भावार्थ : (पुरु) उत्तम चेतना गुणमें (सेते) स्वामी होकर प्रवर्त्तन करे उसको पुरुष कहते हैं । ज्ञान, दर्शन, चेतनाके नाथको पुरुष कहते हैं । यही चेतना अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और असम्भव इन तीन दोषोंसे रहित इस आत्माका असाधारण लक्षण है । अव्याप्ति दोष उसे कहते हैं कि जिसको जिसका लक्षण कहा गया हो वह उसके किसी लक्ष्यमें हो और किसी लक्ष्यमें न हो । परन्तु कोई आत्मा चेतना रहित नहीं है । यदि आत्माका लक्षण रागादि कहें तो अव्याप्ति दूषण लगता है क्योंकि रागादिक संसारी जीवोंमें हैं, (परन्तु) सिद्ध जीवोंमें नहीं है । जो लक्षण लक्ष्यमें हो और अलक्ष्यमें भी हो उसे अतिव्याप्ति दूषण कहते हैं । परन्तु चेतना जीव पदार्थके अलावा किसी अन्य पदार्थमें नहीं पाई जाती । यदि आत्माका लक्षण अमूर्त्तत्व कहें तो अतिव्याप्ति दूषण लगता है । कारण कि जिस तरह आत्मा अमूर्तिक है उसी तरह धर्म, अधर्म, आकाश और काल भी अमूर्तिक हैं । तथा जो प्रमाणमें न आये उसे असम्भव कहते हैं । चेतना, जीव पदार्थमें, प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रमाणसे जानी जाती है । यदि आत्माका लक्षण जड़पना कहें तो असम्भव दोष लगता है, कारण कि यह प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधित है । इस प्रकार तीनों दोष रहित आत्माका चेतन लक्षण दो प्रकार है । एक ज्ञानचेतना और दूसरी दर्शनचेतना । जो पदार्थोंको साकाररूप विशेषतासे जाने उसे ज्ञानचेतना कहते हैं । जो पदार्थोंको निराकाररूप सामान्यतासे देखे उसे दर्शनचेतना कहते हैं । यही चेतना परिणामोंकी अपेक्षासे तीन प्रकारकी है । जब यह चेतना शुद्ध ज्ञानस्वभावरूपसे परिणमन करती है तब ज्ञानचेतना, जब रागादि कार्यरूपसे परिणमन करती है तब कर्मचेतना, और जब हर्ष-शोकादि वेदनरूप कर्मके फलरूप परिणमन करती है तब कर्मफलचेतना कही जाती है । इस प्रकार चेतना अनेक स्वांग करती है फिर भी चेतनाका अभाव कभी नहीं होता । इस भाँति चेतना लक्षणसे विराजमान जीव नामक पदार्थको पुरुष कहते हैं । पुनः कैसा है पुरुष ? स्पर्श रस गन्ध वर्णैः विवर्जितः - स्पर्श, रस और पांच प्रकारका वर्ण, ऐसे जो पुद्गलोंके लक्षण हैं, उनसे रहित अमूर्तिक है । इस विशेषणसे पुद्गल द्रव्यसे भिन्नता प्रगट की । कारण कि यह आत्मा अनादिकालसे सम्बन्धरूप जो पुद्गल द्रव्य है उसमें अहङ्कार - ममकाररूप प्रवर्त्तन करता है । जो अपने चैतन्य पुरुषको अमूर्तिक जाने तो द्रव्यकर्म, नोकर्म, धन-धान्यादि पुद्गल द्रव्यमें अहंकार - ममकार न करे ।
पुनः कैसा है पुरुष ? गुणपर्ययसमवेतः - गुण - पर्यायोंसे विराजमान है अर्थात् द्रव्य है वह गुण - पर्यायमय है अतः आत्मा भी गुण - पर्यायों सहित विराजमान है । वहां गुणका लक्षण सहभूत है । सह अर्थात् द्रव्यके साथ, भू अर्थात् सत्ता । द्रव्यमें जो सदाकाल पाया जावे उसे गुण कहते हैं । आत्मामें गुण दो प्रकारके हैं । ज्ञान - दर्शनादि असाधारण गुण हैं वह अन्य द्रव्यमें नहीं पाये जाते । अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्वादि साधारण गुण हैं जो अन्य द्रव्योंमें भी पाये जाते हैं । पर्यायका लक्षण क्रमवर्त्ती है । जो द्रव्यमें अनुक्रमसे उत्पन्न हो, कदाचित् - कोई वार हो उसे पर्याय कहते हैं । आत्मामें पर्याय दो प्रकारकी हैं । जो नर - नारकादि आकाररूप अथवा सिद्धके आकाररूप पर्याय है उसे व्यंजनपर्याय कहते हैं । ज्ञानादि गुणोंका भी स्वभाव अथवा विभावरूप परिणमन है वह छह प्रकारसे हानि-वृद्धिरूप है उसे अर्थपर्याय कहते हैं । इन गुण - पर्यायोंसे आत्माकी तादात्मक एकता है । इस विशेषणसे आत्माका विशेष्य जाना जा सकता है ।
पुनः कैसा है पुरुष ? समुदयव्ययध्रौव्यैः समाहितः - उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यसे संयुक्त है । नवीन अर्थपर्याय और व्यंजनपर्यायका उत्पन्न होना वह उत्पाद, पूर्व पर्यायका नाश होना वह व्यय और गुण-अपेक्षा अथवा द्रव्य-अपेक्षासे शाश्वत रहना वह ध्रौव्य है । जिस प्रकार सोना कुण्डल पर्यायसे उत्पन्न होता है, कंकण पर्यायसे नष्ट होता है तथा पीतादिककी अपेक्षा अथवा स्वर्णत्वकी अपेक्षा सभी अवस्थाओंमें शाश्वत है । इस विशेषणसे आत्माका अस्तित्व प्रगट किया ॥९॥
प्रश्न : ऐसे चैतन्य पुरुषके अशुद्धता किस प्रकारसे हुई जिसके कारण इसे अपने अर्थकी सिद्धि करनी पड़े ? इसका उत्तर आगे कहते हैं ।
परिणममानो नित्यं ज्ञानविवर्त्तैरनादिसन्तत्या ।
परिणामानां स्वेषां स भवति कर्ता च भोक्ता च ॥१०॥
अन्वयार्थ : (सः) वह चैतन्य आत्मा (अनादिसन्तत्या) अनादिकी परिपाटीसे (नित्यं) निरन्तर (ज्ञानविवर्त्तैः) ज्ञानादि गुणोंके विकाररूप रागादि परिणामोंसे (परिणममानः) परिणमन करता हुआ (स्वेषां) अपने (परिणामानां) रागादि परिणामोंका (कर्ता च भोक्ता च) कर्ता और भोक्ता भी (भवति) होता है ।
टीका : अनादि सन्तत्या नित्यं ज्ञानविवर्त्तैः परिणममानः स्वेषां परिणमानां कर्ता च भोक्ता च भवति - वह चैतन्य पुरुष अनादिकी परिपाटीसे सदा ज्ञान - चारित्र रहित जो रागादिक परिणाम उनसे परिणमन करता हुआ उन स्वयंके रागादि परिणामोंका कर्ता तथा भोक्ता भी है ।
भावार्थ : इस आत्माके अशुद्धता नई उत्पन्न नहीं हुई है । अनादिकालसे सन्तानरूपसे द्रव्यकर्मसे रागादि होते हैं, फिर उन्हीं रागादिसे द्रव्यकर्मका बन्ध होता है । स्वर्णकीटिकावत् अनादिसे सम्बन्ध है । उस सम्बन्धके कारण इस जीवको अपने ज्ञानस्वभावका बोध नहीं है इसलिये उदयागत कर्मपर्यायमें इष्ट - अनिष्ट भावसे राग, द्वेष, मोहरूप परिणमन कर रहा है । यद्यपि इन परिणामोंके होनेमें द्रव्यकर्म कारण हैं, तथापि यह परिणाम चेतनामय हैं इसलिये इन परिणामोंका व्याप्य - व्यापकभावसे आत्मा ही कर्ता है । भाव्य - भावकभावसे आत्मा ही भोक्ता है । अब व्याप्य-व्यापकभावका स्वरूप कहते हैं । जो नियमसे सहचारी हो उसे व्याप्ति कहते हैं । जिस प्रकार धुआं और अग्निमें साहचर्य है अर्थात् जहां धुआं होता है वहां अग्नि होती ही है अग्निके बिना धुआं नहीं होता । उसी प्रकार रागादिभाव और आत्मामें सहचारीपना है । जहां रागादि होते हैं वहां आत्मा होता ही है आत्माके बिना रागादि नहीं होते । इस व्याप्ति क्रियामें जो कर्म है उसे व्याप्य कहते हैं और आत्मा कर्ता है उसे व्यापक कहते हैं । इस प्रकार जहां व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध हो वहीं कर्ता - कर्म सम्बन्ध सम्भव है, अन्य स्थानमें सम्भव नहीं । इसी प्रकार जो जो भाव अनुभवन करने योग्य हों उन्हें भाव्य, तथा अनुभव करनेवाले पदार्थको भावुक कहते हैं । ऐसा भाव्य-भावक सम्बन्ध जहां हो वहीं भोक्ता - भोग्य सम्बन्ध सम्भवित है, अन्य स्थान पर नहीं ॥१०॥
इस प्रकार इस अशुद्ध आत्माके अर्थ - सिद्धि कब होती है और अर्थ - सिद्धि किसे कहते हैं वह आगे बतलाते हैं -
सर्वविवर्त्तोत्तीर्णं यदा स चैतन्यमचलमाप्नोति ।
भवति तदा कृतकृत्यः सम्यक्पुरुषार्थसिद्धिमापन्न ॥११॥
अन्वयार्थ : (यदा) जब (सः) उपर्युक्त अशुद्ध आत्मा (सर्वविवर्त्तोत्तीर्णं) सर्व विभावोंसे पार होकर (अचलं) अपने निष्क्रिय (चैतन्यं) चैतन्यस्वरूपको (आप्नोति) प्राप्त होता है (तदा) तब यह आत्मा उस (सम्यक्पुरुषार्थसिद्धिम् ) सम्यक् प्रकारसे पुरुषार्थके प्रयोजनकी सिद्धिको (आपन्नः) प्राप्त होता हुआ (कृतकृत्यः) कृतकृत्य (भवति) होता है ।
टीका : स यदा सर्वविवर्त्तोत्तीर्णं चैतन्यमचलमाप्राप्नोति तदा कृतकृत्यः भवति - रागादि भावोंसे लिप्त वही आत्मा जब सर्व विभावोंसे पार होकर अपने चैतन्यस्वरूप आत्माको निःशंकतापूर्वक प्राप्त होता है तब वही आत्मा कृतकृत्य होता है । कैसा है यह आत्मा ? सम्यक्पुरुषार्थसिद्धिमापन्न - सम्यक् प्रकारसे पुरुषार्थकी सिद्धिको प्राप्त हुआ है ।
भावार्थ : जब यह आत्मा स्व - पर भेदविज्ञानसे शरीरादिक पर द्रव्यको भिन्न जाने तब यह भला - इष्ट, यह बुरा - अनिष्ट ऐसी बुद्धिका त्याग कर देता है । कारण कि जो कुछ भी भला - बुरा होता है वह सब अपने परिणामोंसे ही होता है, पर द्रव्यके करनेसे भला - बुरा नहीं होता इसलिये सर्व परद्रव्योंमें राग - द्वेष भावोंका त्याग कर देता है । जो अवशतासे (पुरुषार्थकी निर्बलतासे) रागादि उत्पन्न होता है उसके नाशके लिये अनुभव - अभ्यासमें उद्यमशील रहता है । ऐसा करते - करते जब सर्व विभावभावोंका नाश हो जाता है और अक्षुब्ध समुद्रवत् शुद्धात्मस्वरूपमें लवणवत् परिणाम लीन हो जाता है, ध्याताध्येयका विकल्प भी नहीं रहता, ऐसा भी नहीं जानता कि मैं शुद्धात्मास्वरूपका ध्यान कर रहा हूँ, स्वयं ही तादात्म्यवृत्तिसे शुद्धात्मस्वरूप होकर निष्कम्प परिणमन करता है, उस समय इस आत्माने जो कुछ करना था वह कर लिया, अब कुछ करना शेष नहीं रहा इसलिये इसको कृतकृत्य कहते हैं । इसी अवस्थाको पुरुषार्थकी सिद्धि कहते हैं । पुरुषका जो अर्थ अर्थात् प्रयोजनरूप कार्य उसकी सिद्धि जो होनी थी वह हो गई । इस अवस्थाको जो प्राप्त हुआ उस आत्माको कृतकृत्य कहते हैं ॥११॥
आगे पुरुषार्थसिद्धिका उपाय कहना चाहते हैं, वहाँ प्रथम ही परद्रव्यके सम्बन्धका कारण कहते हैं । जिसके जानने पर क्या उपाय करना होता है वह कहते हैं -
जीवकृतं परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये ।
स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ॥१२॥
अन्वयार्थ : (जीवकृतं) जीवके किये हुए (परिणामं) रागादि परिणामोंका (निमित्तमात्रं) निमित्तमात्र (प्रपद्य) पाकर (पुनः) फिर (अन्ये पुद्गलाः) जीवसे भिन्न अन्य पुद्गल स्कन्ध (अत्र) आत्मामें (स्वयमेव) अपने आप ही (कर्मभावेन) ज्ञानावरणादि कर्मरूप (परिणमन्ते) परिणमन कर जाते हैं ।
टीका : जीवकृतं परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनः अन्ये पुद्गलः स्वयमेव कर्मभावेन परिणमन्ते - जीवके किये हुए रागादि परिणामोंका निमित्तमात्र पाकर नवीन अन्य पुद्गल स्कन्ध स्वयमेव ज्ञानावरणादि कर्मरूप होकर परिणमन करते हैं ।
भावार्थ : जब जीव राग-द्वेष-मोहभावसे परिणमन करता है तब उन भावोंका निमित्त पाकर पुद्गल द्रव्य स्वयं ही कर्मरूप अवस्थाको धारण करता है । विशेष इतना है कि यदि आत्मा देव-गुरु-धर्मादिक प्रशस्त रागरूप परिणमन करे तो शुभकर्मका बन्ध होता है । (और इसके विपरीत अप्रशस्त राग-द्वेष-मोहरूप परिणमन करे तो अशुभ कर्मका बन्ध होता है । )
प्रश्न : जीवके भाव अति सूक्ष्मरूप हैं उनका ज्ञान जड़ कर्मको कैसे होता है ? और ज्ञान हुए बिना पुण्य-पापरूप होकर कैसे परिणमन कर जाते हैं ?
उत्तर : जिस प्रकार मन्त्रसाधक पुरुष बैठा-बैठा गुप्तरूपसे मन्त्र जपता है और उसके किये बिना ही उस मन्त्रके निमित्तसे किसीको पीड़ा उत्पन्न होती है, किसीका मरण होता है, किसीका भला होता है, कोई विडम्बनारूप परिणमन करता है, - ऐसी उस मन्त्रमें शक्ति है । उसका निमित्त पाकर चेतन - अचेतन पदार्थ स्वयं ही अनेक अवस्थायें धारण करते हैं । उसी प्रकार अज्ञानी जीव अपने अन्तरंगमें विभावभावरूप परिणमन करता है । उन भावोंका निमित्त पाकर इसके बिना किये ही कोई पुद्गल पुण्य-प्रकृतिरूप परिणमन करते हैं और कोई पाप-प्रकृतिरूप परिणमन करते हैं, ऐसी इसके भावोंमें शक्ति है । इसके भावोंका निमित्त पाकर पुद्गल स्वयं ही अने अवस्थायें धारण करता है, ऐसा ही निमित्त - नैमित्तिक सम्बन्ध है ॥१२॥
प्रश्न : इस जीवके जो विभावभाव होते हैं वे स्वयंसे ही होते हैं या उनका भी कोई निमित्तकारण है ? इसका उत्तर आगे कहते हैं ।
परिणममानस्य चितश्चिदात्मकैः स्वयमपि स्वकैर्भावैः ।
भवति हि निमित्तमात्रं पौद्गलिकं कर्म तस्यापि ॥१३॥
अन्वयार्थ : (हि) निश्चयसे (स्वकैः) अपने (चिदात्मकैः) चेतनास्वरूप (भावैः) रागादि परिणामोंसे (स्वयमपि) स्वयं ही (परिणममानस्य) परिणमन करते हुए (तस्य चित अपि) पूर्वोक्त आत्माके भी (पौद्गलिकं) पुद्गल सम्बन्धी (कर्म) ज्ञानावरणादिं द्रव्यकर्म (निमित्तमात्रं) निमित्तमात्र (भवति) होता है ।
टीका : हि चिदात्मकैः स्वकैर्भावैः परिणममानस्य तस्य चित्त अपि पौद्गलिकं कर्म निमित्तमात्रं भवति - निश्चयसे चैतन्यस्वरूप अपने रागादि परिणामरूपसे परिणमन किये हुए उस पूर्वोक्त आत्माके भी पौद्गलिक ज्ञानावरणादि कर्म निमित्तमात्र होते हैं ।
भावार्थ : इस जीवके रागादि विभावभाव अपने आप ही (स्वद्रव्यके आलम्बनसे) नहीं होता । यदि आप ही से हो तो वह भी ज्ञान - दर्शनकी तरह स्वभावभाव हो जाय और स्वभावभाव होने पर उसका भी कभी नाश नहीं हो सकता । इसलिये वे भाव औपाधिक हैं, अन्य निमित्तसे होते हैं और वे निमित्त ज्ञानावरणादि कर्मोंको जानना । जिस-जिस प्रकार द्रव्यकर्म उदयावस्थाको प्राप्त होता है उसी-उसी प्रकार विभावभावरूप परिणमन करता है ।
प्रश्न : पुद्गलमें ऐसी कौनसी शक्ति है कि जो चैतन्यकको विभावभावरूप परिणमन करवा देती है ?
उत्तर : जिस प्रकार किसी मनुष्यके सिर पर मन्त्र पढ़ी हुई धूल डाली हो तो उस धूलके निमित्तसे वह पुरुष स्वयंको भूलकर नाना प्रकारकी विपरीत चेष्टायें करता है । मन्त्रके निमित्तसे उस धूलमें ऐसी शक्ति हो जाती है कि वह बुद्धिमान पुरुषको विपरीत *परिणमन करवा देती है । उसी प्रकार इस आत्माके प्रदेशोंमें रागादिके निमित्तसे बँधे हुए पुद्गलोंके निमित्तसे यह आत्मा स्वयंको भूलकर नाना प्रकारके विपरीत भावरूप परिणमन करता है । इसके विभावभावोंके निमित्तसे पुद्गलमें ऐसी शक्ति हो जाती है कि वह चैतन्य पुरुषको विपरीत परिणमन करवा देता है । इस भाँति भावकर्मसे द्रव्यकर्म और द्रव्यकर्मसे भावकर्म होता है, इसे ही संसार कहते हैं ॥१३॥
* प्रत्येक द्रव्य स्वद्रव्य - क्षेत्र - काल और भावसे है, परद्रव्यादिका उसमें सदा अभाव ही है इसलिये कोई किसीको परिणमन नहीं करवा सकता, तो भी जीवके उस प्रकारके परिणमन करनेकी योग्यताके कालमें बाह्यमे किस सामग्रीको निमित्त बनानेमें आया था उसका ज्ञान करवानेके लिए असद्भुत व्यवहारनयसे निमित्तको कर्ता कहा जाता है । व्यवहार कथनकी रीति ऐसी ही है इस प्रकार जानना चाहिए ।
आगे इस संसारका मूल कारण बताते हैं जिसका नाश होने पर पुरुषार्थसिद्धिका उपाय बनता है :
एवमयं कर्मकृतैर्भावैरसमाहितोऽपि युक्त इव ।
प्रतिभाति बालिशानां प्रतिभासः स खलु भवबीजम् ॥१४॥
अन्वयार्थ : (एवं) इस प्रकार (अयं) यह आत्मा (कर्मकृतैः) कर्मकृत (भावैः) रागादि अथवा शरीरादि भावोंसे (असमाहितोऽपि) संयुक्त न होने पर भी (बालिशानांः) अज्ञानी जीवोंको (युक्तः इव) संयुक्त जैसा (प्रतिभाति) प्रतिभासित होता है और (सः प्रतिभासः) वह प्रतिभास ही (खलु) निश्चयसे (भवबीजं) संसारका बीजरूप है ।
टीका : स एवं अयं कर्मकृतैर्भावैः असमाहितः अपि बालिशानां युक्तः इव प्रतिभाति - इस प्रकार यह आत्मा कर्मद्वारा किये हुए नाना प्रकारके भावोंसे संयुक्त नहीं है तो भी अज्ञानी जीवोंको अपने अज्ञानसे आत्मा कर्मजनित भावोंसे संयुक्त जैसा प्रतिभासित होता है ।
भावार्थ : पहले ऐसा कहा गया है कि पुद्गलकर्मका कारणभूत रागादिभाव है और रागादिभावका कारण पुद्गलकर्म है, इसलिये वह आत्मा निजस्वभावभावकी अपेक्षा कर्मजनित नाना प्रकारके भावोंसे भिन्न ही चैतन्यमात्र वस्तु है ।
जिस प्रकार लाल फूलके निमित्तसे स्फटिक लाल रंगरूप परिणमन करता है परन्तु वह लाल रंग स्फटिकका निजभाव नहीं है । स्फटिक तो स्वच्छतारूप अपने श्वेतवर्णसे ही विराजमान है । लाल रंग है वह तो स्वरूपमें प्रवेश किये बिना ऊपर-ऊपर ही झलक मात्र दिखाई पड़ता है । वहाँ रत्नका पारखी जौहरी तो ऐसे ही जानता है परन्तु अपारखी (अपरीक्षक) पुरुषको सत्यरूप (वास्तवमें) वह स्फटिकमणि ही रक्तमणिवत् लाल रंगके स्वरूप प्रतिभासित होती है । उसी प्रकार कर्म निमित्तसे आत्मा रागादिरूप परिणमन करता है, वह रागादि आत्माका निजभाव नहीं है, आत्मा तो अपने स्वच्छतारूप चैतन्यगुणमें विराजमान है । रागादि है वह तो स्वरूपमें प्रवेश किये बिना ऊपर ही ऊपर झलक मात्र दिखाई देता है । वहाँ ज्ञानी स्वरूपका परीक्षक तो ऐसे ही जानता है । किन्तु अपरीक्षक (अपारखी) पुरुषोंको सत्यरूप अर्थात् वास्तवमें वह आत्मा पुद्गल कर्मवत् रागादिस्वरूप ही प्रतिभासित होता है ।
प्रश्न : आपने ही तो रागादिभावोंको जीवकृत कहा था अब यहाँ उन्हें कर्मकृत कैसे कहते हो ? उत्तर : रागादिभाव चेतनारूप हैं अतः उनका कर्ता जीव ही है परन्तु यहाँ श्रद्धान करवानेके निमित्त मूलभूत जीवके शुद्धस्वभावकी अपेक्षासे रागादिभाव कर्मके निमित्तसे होते हैं इसलिये कर्मकृत कहा है । जैसे किसी मनुष्यको भूत (व्यंतर) लगा हो तो वह मनुष्य उस भूतके निमित्तसे नाना प्रकारकी विपरीत चेष्टायें करता है । उन चेष्टाओंका कर्ता तो वह मनुष्य ही है परन्तु वह चेष्टायें मनुष्यका निजभाव नहीं हैं इसलिये उन्हें भूतकृत कहते हैं । उसी प्रकार यह जीव कर्मके निमित्तसे नाना प्रकार विपरीत भावोंरूप परिणमन करता है, उन भावोंका कर्ता तो जीव ही है परन्तु वह जीवके निजभाव नहीं हैं अतः उन भावोंको कर्मकृत कहते हैं । अथवा कर्मकृत जो नाना प्रकारकी पर्याय, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, कर्म, नोकर्म, देव - नारक - मनुष्य - तिर्यञ्चशरीर, संहनन, संस्थानादि भेद अथवा पुत्र, मित्र, मकान, धन, धान्यादि भेद - इन समस्तसे शुद्धात्मा प्रत्यक्ष भिन्न ही है । जिस प्रकार कोई मनुष्य अज्ञानी गुरुके कहनेसे एकान्त झोंपड़ीमें बैठकर भैंसका ध्यान करने लगा, अपने भैंसेके समान विशाल शरीरवाला चिन्तवन करने लगा और आकाश जितना ऊँचा सींगवाला अपनेको मानकर सोचने लगा कि मैं इस झोंपड़ीसे बाहर कैसे निकलूँगा । यदि वह अपनेको भैंसा न माने तो मनुष्य स्वरूप तो स्वयं है ही । उसी प्रकार यह जीव मोहके निमित्तसे अपनेको वर्णादिक स्वरूप मानकर देवादि पर्यायोंमें अपनत्व मानता है । यदि न माने तो अमूर्तिक शुद्धात्मा तो आप बना ही बैठा है ।
इस प्रकार यह आत्मा कर्मजनित रागादिकभाव अथवा वर्णादिकभावसे सदाकाल भिन्न है । तदुक्तम् - वर्णाद्या वा राग मोहादयो वा । भिन्ना भावाः सर्व एवास्य पुंसः* ॥ तो भी अज्ञानी जीवोंको आत्मा कर्मजनित भावोंसे संयुक्त प्रतिभासित होता है । खलु सः प्रतिभासः भवबीजम् । - निश्चयसे यह प्रतिभास ही संसारका बीजभूत है ।
* यह पुरुष (आत्मा) शुद्धनयसे तो वर्णादि, रागादि अथवा मोहादि सभी भावोंसे भिन्न है ।
भावार्थ : जैसे समस्त वृक्षोंका मूलभूत बीज है, वैसे ही अनन्त संसारका मूलकारण कर्मजनित भावोंको अपना मानना है । इस प्रकार अशुद्धताका कारण बताया है ॥१४॥
आगे पुरुषार्थ सिद्धिका उपाय बताते हैं -
विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यग्व्यवस्य निजतत्त्वम् ।
यत्तस्मादविचलनं स एव पुरुषार्थसिद्ध्युपायोऽयम् ॥१५॥
अन्वयार्थ : (विपरीताभिनिवेशं) विपरीत श्रद्धानका (निरस्य) नाश करके (निजतत्त्वम् ) निजस्वरूपको (सम्यक्) यथार्थरूपसे (व्यवस्य) जानकर (यत् ) जो (तस्मात् ) अपने उस स्वरूपमेंसे (अविचलनं) भ्रष्ट न होना (स एव) वही (अयं) इस (पुरुषार्थसिद्ध्युपायः) पुरुषार्थसिद्धिका उपाय है ।
टीका : यत् विपरीताभिनिवेशं निरस्य सम्यक् निजतत्त्वं व्यवस्य तत् तस्मात् अविचलनं स एव अयं पुरुषार्थसिद्ध्युपायः । - जो विपरीत श्रद्धानका नाश करके यथार्थरूपसे निजस्वरूपको जानकर फिर अपने उस स्वरूपसे भ्रष्ट न होना, वही पुरुषार्थकी सिद्धि होनेका उपाय है ।
भावार्थ : पहले जो कहा था कि संसारकी बीजभूत कर्मजनित पर्यायको आत्मरूपसे - अपनेरूप जाननेका नाम ही विपरीत श्रद्धान है और उसका मूलसे विनाश करना ही सम्यग्दर्शन है । कर्मजनित पर्यायसे भिन्न शुद्धचैतन्यस्वरूपको यथार्थतया जानना सम्यग्ज्ञान है और कर्मजनित पर्यायोंसे उदासीन होकर स्वरूपमें अकम्प - स्थिर रहना सम्यक्चारित्र है । इन तीन भावोंका समुदाय ही उस जीवके कार्य सिद्ध होनेका उपाय है । दूसरा कोई उपाय सर्वथा नहीं है ॥१५॥
जो इस उपायमें लगते हैं अब उनका वर्णन करते हैं :
अनुसरतां पदमेतत् करम्बिताचारनित्यनिरभिमुखा ।
एकान्तविरतिरूपा भवति मुनीनामलौकिकी वृत्तिः ॥१६॥
अन्वयार्थ : (एतत् पदम् अनुसरतां) इस रत्नत्रयरूप पदवीका अनुसरण करनेवाले अर्थात् इस पदवीको प्राप्त हुए (मुनीनां) मुनियोंकी (वृत्तिः) वृत्ति (करम्बिताचारनित्यनिरभिमुखा) पापक्रिया मिश्रित आचारोंसे सर्वथा पराडमुख तथा (एकान्तविरतिरूपा) परद्रव्योंसे सर्वथा उदासीनरूप और (अलौकिकी) लोकसे विलक्षण प्रकारकी (भवति) होती है ।
टीका : एतत्पदं अनुसरतां मुनीनां वृत्तिः अलौकिकी भवति । - इस रत्नत्रयरूप पदवीको प्राप्त हुए महा मुनियोंकी रीति लौकिक रीतिसे मिलती नहीं है । वही कहते हैं । लोक पापक्रियाओंमें आसक्त होकर प्रवर्त्तन करता है, मुनि पापक्रियाओंका चिन्तवन भी नहीं करते । लोक अनेक प्रकारसे शरीरकी सँभाल और पोषण करता है परन्तु मुनिराज अनेक प्रकारसे शरीरको परीषह उत्पन्न करके उन्हें सहन करते हैं । और लोकको इन्द्रिय - विषय अत्यन्त मिष्ट लगते हैं जबकि मुनिराज विषयोंको हलाहल विष समान जानते हैं ।
लोकको अपने पास जन - समुदाय रुचिकर लगता है जबकि मुनिराज दूसरोंका संयोग होने पर खेद मानते हैं । लोकको बस्ती सुहावनी लगती है किन्तु मुनिको निर्जन स्थान ही प्रिय लगता है । कहाँ तक कहें ? महामुनिकी रीति लौकिक रीतिसे विरुद्ध होती है । कैसी है मुनियोंकी प्रवृत्ति ? करम्बिताचार नित्यनिरभिमुखा - पापक्रिया सहित आचारसे पराङ्मुख है । जिस प्रकार श्रावकका आचार पापक्रियासे मिश्रित है वैसे मुनीश्वरोंके आचारमें पापका मिश्रण नहीं है । अथवा करम्बित अर्थात् कर्मजनितभाव मिश्रित आचरणसे पराङ्मुख हैं, केवल निजस्वरूपका अनुभव करते हैं इसलिये एकान्तविरतिरूपा अर्थात् सर्वथा पापक्रियाके त्यागी हैं अथवा एक निजस्भावके अनुभवसे सर्वथा परद्रव्योंसे उदासीन स्वरूप हैं । रत्नत्रयके धारक महामुनियोंकी ऐसी ही प्रवृत्ति होती है ॥१६॥
उपदेश देनेका क्रम
बहुशः समस्तविरतिं प्रदर्शितां यो न जातु गृह्णाति ।
तस्यैक देशविरतिः कथनीयानेन बीजेन ॥१७॥
अन्वयार्थ : (यः) यो जीव (बहुशः) बारबार (प्रदर्शितां) बताने पर भी (समस्त विरतिं) सकलपापरहित मुनिवृत्तिको (जातु) कदाचित् (न गृह्णाति) ग्रहण न करे तो (तस्य) उसको (एकदेशविरतिः) एक देश पापक्रिया रहित गृहस्थाचार (अनेन बीजेन) इस हेतुसे (कथनीया) कथन करना अर्थात् समझाना चाहिये ।
टीका : यः बहुशः प्रदर्शितां समस्तविरतिं न जातु गृह्णाति तस्य एकदेशविरतिः अनेन बीजेन कथनीया । - जो जीव अनेकबार उपदेश देने पर भी सकल पापरहित महाव्रतकी क्रियाको कदाचित् ग्रहण न करे तो उस जीवको एकदेश पापरहित श्रावकक्रिया इस तरह बतावे ।
भावार्थ : जो जीव उपदेश श्रवण करनेमें रुचिवान हो उसे प्रथम ही बारबार मुनिधर्मका उपदेश देना चाहिये । और यदि वह जीव मुनिपद अंगीकार न करे तो बादमें उसे श्रावकधर्मका उपदेश देना योग्य है ॥१७॥
श्रावकधर्मके उपदेशकी रीति आगे बताते हैं उसी रीतिसे उपदेश देना चाहिये । जो इस अनुक्रमको छोड़कर उपदेश देता है उस उपदेशदाताकी निन्दा करते हैं :
यो यतिधर्ममकथयन्नुपदिशति गृहस्थधर्ममल्पमतिः ।
तस्य भगवत्प्रवचने प्रदर्शितं निग्रहस्थानम् ॥१८॥
अन्वयार्थ : (यः) जो (अल्पमतिः) तुच्छबुद्धि उपदेशक (यतिधर्मं) मुनिधर्मका (अकथयन्) कथन न करके (गृहस्थधर्मं) श्रावकधर्मका (उपदेशाति) उपदेश देता है (तस्य) उस उपदेशकको (भगवत्प्रवचने) भगवानके सिद्धान्तमें (निग्रहस्थानं) दण्ड देनेका स्थान (प्रदर्शितं) बताया है ।
टीका : यः अल्पमतिः यतिधर्मं अकथयन् गृहस्थधर्मं उपदिशति तस्य भगवत्प्रवचने निग्रहस्थानं प्रदर्शितं । - जो तुच्छबुद्धिवाला उपदेशक मुनिधर्मका उपदेश न देकर, गृहस्थधर्मका उपदेश देता है, उसे भगवानके सिद्धान्तमें दण्डका स्थान बताया है ।
भावार्थ : जो उपदेशक पहले यतीश्वरके धर्मका तो उपदेश न सुनावे अपितु प्रथम ही श्रावकधर्मका व्याख्यान करे तो उस उपदेशकको जिनमतमें प्रायश्चितरूप दण्डका पात्र कहा गया है ॥१८॥
आगे उसको दण्ड देनेका कारण कहते हैं :
अक्रमकथनेन यतः प्रोत्साहमानोऽतिदूरमपि शिष्यः ।
अपदेऽपि सम्प्रतृप्तः प्रतारितो भवति तेन दुर्मतिना ॥१९॥
अन्वयार्थ : (यतः) जिस कारणसे (तेन) उस (दुर्मतिना) दुर्बुद्धिके (अक्रमकथनेन) क्रमभंग कथनरूप उपदेश करनेसे (अतिदूरं) अत्यन्त दूर अर्थात् अत्याधिक (प्रोत्सहमानोऽपि) उत्साहवान होने पर भी (शिष्यः) शिष्य (अपदे अपि) तुच्छ स्थानमें ही (संप्रतृप्तः) सन्तुष्ट होकर (प्रतारितः भवति) ठगाया जाता है ।
टीका : यतः तेन दुर्मतिना अक्रमकथनेन शिष्यः प्रतारितो भवति । - जिस कारणसे उस मन्दबुद्धिवाले उपदेशक द्वारा अनुक्रमको छोड़कर कथन करनेसे सुननेवाला शिष्य ठगाया जाता है । पहले ही श्रावक धर्मका उपदेश सुनकर शिष्य क्यों ठगाया जाता है उसका कारण कहते हैं । कैसा है शिष्य ? अतिदूरं प्रोत्साहमानो अपि अपदेऽपि सम्प्रतृप्तः । अत्यन्त दूर तक जानेके लिये उत्साहित हुआ था तो भी अपद जो तुच्छ स्थान उसमें ही संतुष्ट हुआ है । इस शिष्यके अन्तरंगमें इतना अधिक उत्साह उत्पन्न हुआ था कि यदि प्रथम ही मुनिधर्म सुना होता तो मुनिपदवी ही अंगीकार करता । परन्तु उपदेशदाताने उसको प्रथम ही श्रावकधर्मका उपदेश दिया अतः उसने उसे ही अंगीकर कर लिया । फलतः मुनिधर्मसे वंचित ही रह गया । इस वास्ते उस उपदेशदाताको इस विधानके लिये दण्ड देना योग्य है ॥१९॥
*
श्रावकधर्म - व्याख्यान
जो जीव मुनिधर्मका भार उठानेमें असमर्थ हैं उनके लिये आचार्य आगे श्रावकधर्मका व्याख्यान करते हैं । वहाँ श्रावकको धर्मसाधनमें क्या करना चाहिये उसका व्याख्यान किया जा रहा है ।
एवं सम्यग्दर्शनबोधचरित्रत्रयात्मको नित्यम् ।
तस्यापि मोक्षमार्गो भवति निषेव्यो यथाशक्ति ॥२०॥
अन्वयार्थ : (एवं) इस प्रकार (तस्यापि) उस गृहस्थको भी (यथाशक्ति) अपनी शक्ति अनुसार (सम्यग्दर्शनबोधचरित्रत्रयात्मकः) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीन भेदरूप (मोक्षमार्गः) मुक्तिका मार्ग (नित्यं) सर्वदा (निषेव्यः) सेवन करना योग्य (भवति) है ।
टीका : तस्य अपि यथाशक्ति एवं मोक्षमार्गः निषेव्य भवति । - उस गृहस्थको भी अपनी शक्ति अनुसार, जिसका वर्णन आगे किया जा रहा है, ऐसे मोक्षमार्गका सेवन करना योग्य है ।
भावार्थ : मुनिके तो मोक्षमार्गका सेवन सम्पूर्ण रूपसे होता है और गृहस्थको भी अपनी शक्ति-प्रमाण मोक्षमार्गका थोड़ा-बहुत सेवन करना चाहिये । कारण कि धर्मका कोई दूसरा अंग नहीं है जिसका सेवन करनेसे अपना भला हो सके । कैसा है मोक्षमार्ग? सम्यग्दर्शनबोधचरित्रत्रयात्मकः - सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्रका त्रिक जिसका स्वरूप है । भिन्न-भिन्न तीन मोक्षमार्ग नहीं हैं । तीनों मिलकर मोक्षमार्ग है ॥२०॥
इन तीनोंमें प्रथम किसको अंगीकार करना चाहिये वह कहते हैं :
तत्रादौ सम्यक्त्वं समुपाश्रयणीयमखिलयत्नेन ।
तस्मिन् सत्येव यतो भवति ज्ञानं चरित्रं च ॥२१॥
अन्वयार्थ : (तत्रादौ) इन तीनोंमें प्रथम (अखिलयत्नेन) समस्त प्रकार सावधानतापूर्वक यत्नसे (सम्यक्त्वं) सम्यग्दर्शनको (समुपाश्रेणीयम् ) भले प्रकार अंगीकार करना चाहिये (यतः) क्योंकि (तस्मिन् सति एव) उसके होने पर ही (ज्ञानं) सम्यग्ज्ञान (च) और (चारित्रं) सम्यक्चारित्र (भवति) होता है ।
टीका : तत्र आदौ अखिलयत्नेन सम्यक्त्वं समुपाश्रयणीयम् । इन तीनोंमें प्रथम ही समस्त उपायोंसे, जिस प्रकार भी बन सके वैसे, सम्यग्दर्शन अंगीकार करना चाहिये । इसके प्राप्त होने पर अवश्य ही मोक्षपद प्राप्त होता है । और इसके बिना सर्वथा मोक्ष नहीं होता । यह स्वरूपकी प्राप्तिका अद्वितीय कारण है । अतः इसके अंगीकार करनेमें किंचित् मात्र भी प्रमाद नहीं करना । मृत्युका वरण करके भी इसे प्राप्त करनेका प्रयत्न अवश्य करना । बहुत कहाँ तक कहें ? इस जीवके भला होनेका उपाय सम्यग्दर्शन समान अन्य कोई नहीं । इसलिये उसे अवश्य अंगीकार करना । इसे ही प्रथम अंगीकार करनेका क्या कारण है वह बताते हैं । यतः तस्मिन् सति एव ज्ञानं च चारित्रं च भवति । - उस सम्यग्दर्शनके होने पर ही सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र होता है ।
भावार्थ : सम्यक्त्व बिना ग्यारह अंग तक पढ़ ले तो भी अज्ञानी ही कहा जाता है । फिर महाव्रतोंका साधन करके अन्तिम ग्रैवेयक तकके बन्धयोग्य विशुद्ध परिणाम करे तो भी वह असंयमी ही कहलाता है । तथा सम्यक्त्वसहित जितना भी जानपना होवे उस सभीका नाम सम्यग्ज्ञान है और जो थोड़ा भी त्यागरूप प्रवर्तन करे तो उसे सम्यक्चारित्र कहा जाता है । जिस प्रकार अंक सहित शून्य हो तो वह प्रमाणमें आता है किन्तु अंक बिना शून्य तो शून्य ही है । उसी प्रकार सम्यक्त्वके बिना ज्ञान और चारित्र व्यर्थ ही हैं । अतः पहले सम्यक्त्व अंगीकार करके पश्चात् अन्य साधन करना चाहिये ॥२१॥
इस प्रकार जो सम्यक्त्वका लक्षण जाने तो उसे अंगीकार करे । इसलिये (प्रथम ही) उस सम्यक्त्वका लक्षण कहते हैं ।
जीवाजीवादीनां तत्त्वार्थानां सदैव कर्त्तव्यम् ।
श्रद्धानं विपरीताभिनिवेश विविक्तमात्मरूपं तत् ॥२२॥
अन्वयार्थ : (जीवाजीवादीनां) जीव - अजीवादि (तत्त्वार्थानां) तत्त्वार्थोंका (विपरीताभिनिवेशविविक्तं) विपरीत अभिनिवेश (आग्रह) रहित अर्थात् अन्यको अन्यरूप समझने रूप जो मिथ्याज्ञान है उससे रहित (श्रद्धानं) श्रद्धान् अर्थात् दृढ़विश्वास (सदैव) निरन्तर ही (कर्त्तव्यं) करना चाहिये । कारण कि (तत् ) वह श्रद्धान ही (आत्मरूपं) आत्माका स्वरूप है ।
टीका : जीवाजीवादीनां तत्त्वार्थानां श्रद्धानं सदैव कर्त्तव्यं । - जीव, अजीव आदि जो तत्त्वार्थ - तत्त्व अर्थात् जिसका जैसा कुछ निजभाव है वैसा ही होना वह, और उस तत्त्वसे संयुक्त जो अर्थ अर्थात् पदार्थ वही तत्त्वार्थ - उसका श्रद्धान अर्थात् ऐसे ही है अन्य प्रकारसे नहीं है ऐसा प्रतीतभाव ही सदा कर्त्तव्य है । कैसा श्रद्धान करना योग्य है ? विपरीताभिनिवेशविविक्तं अर्थात् अन्यको अन्यरूप माननेरूप मिथ्यात्वसे रहित श्रद्धान करना । तत् आत्मरूपं अस्ति - वही श्रद्धान आत्माका स्वरूप है । जो श्रद्धान क्षायिक सम्यग्दृष्टिके उत्पन्न होता है वही सिद्ध अवस्था तक रहता है । इसलिये वह उपाधिभाव नहीं है, आत्माका निजभाव है ।
भावार्थ : तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शनका लक्षण है । वह तत्त्वार्थश्रद्धान दो प्रकारका है । एक सामान्यरूप, एक विशेषरूप । जो परभावोंसे भिन्न अपने चैतन्यस्वरूपको आपरूपसे श्रद्धान करे उसे सामान्य तत्त्वार्थश्रद्धान कहते हैं । यह श्रद्धान तो नारकी, तिर्यंचादि सर्व सम्यग्दृष्टि जीवोंकके होता है । और जीव - अजीवादि सात तत्त्वोंके विशेषण जानकर अर्थात् उनके भेदोंको जानकर श्रद्धान करे उसे विशेष तत्त्वार्थश्रद्धान कहते हैं । यह श्रद्धान मनुष्य, देवादि विशेष बुद्धिवान जीवोंके होता है । परन्तु राजमार्ग (मुख्यमार्ग) की अपेक्षा साततत्त्वोंको जाना वही सम्यक्त्वका - सम्यक्श्रद्धाका कारण है । कारण कि यदि तत्त्वोंको जाने नहीं तो श्रद्धान किसका करे ? इसलिये सात तत्त्वोंका वर्णन संक्षेपमें करते हैं ।
१. जीवतत्त्व : प्रथम ही जीवतत्त्व चेतना लक्षणसे विराजमान (वह) शुद्ध, अशुद्ध और मिश्रके भेदसे तीन प्रकारका है । वहाँ (१) शुद्ध जीवतत्त्व - जिन जीवोंके सर्व गुण - पर्याय अपने निजभावरूप परिणमन करते हैं अर्थात् जिनके केवलज्ञानादि गुण शुद्ध परिणति - पर्यायसे विराजमान हुए हैं उन्हें शुद्ध जीव कहते हैं ।
(२) अशुद्ध जीवतत्त्व : जिन जीवोंके सर्व गुण - पर्याय विकारभावको प्राप्त हो रहे हैं, ज्ञानादि गुण आवरणसे आच्छादित हो रहे हैं, उनमेंसे जो थोड़े - बहुत प्रगटरूप हैं वह विपरीत परिणमन कर रहे हैं और जिनकी परिणति रागादिरूप परिणमन कर रही है उन मिथ्यादृष्टि जीवोंको अशुद्ध जीव कहते हैं ।
(३) मिश्रजीव : जिन जीवोंके सम्यक्त्वादि गुणोंकी कुछ शक्ति शुद्ध हो गई है अथवा उनमें भी कुछ मलिनता शेष रह गई है अर्थात् कोई ज्ञानादि गुणोंकी कुछ शक्ति शुद्ध हो गई है तथा शेष सब अशुद्ध रह गई है । कुछ गुण अशुद्ध ही हो रहे हैं, ऐसी तो गुणोंकी दशा हुई है और जिनकी परिणति शुद्धाशुद्धरूप परिणमन कर रही है उन जीवोंको शुद्धाशुद्धस्वरूप मिश्र कहते हैं । इस भाँति जीवतत्त्व तीन प्रकारका है ।
२. अजीवतत्त्व : जो चेतनागुणसे रहित हैं वह पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश काल (कालाणुरूप) पाँच प्रकारके हैं । उनमें (१) पुद्गलद्रव्य - स्पर्श, रस, गन्ध, वर्णसंयुक्त अणु तथा स्कन्धके भेदसे दो प्रकारके हैं । उनमें जो एकाकी - अविभागी परमाणु है उसे अणु कहते हैं । अनेक अणु मिलकर स्कन्धरूप होने पर स्कन्ध कहलाता है । अथवा पुद्गल द्रव्यके छह भेद हैं । (१) स्थूलस्थूल - काष्ठ पाषाणादि जो छेदे - भेदे जाने पर बादमें मिलें नहीं उन्हें स्थूलस्थूल पुद्गल कहते हैं । (२) स्थूल - जो जल, दूध, तेल आदि द्रव पदार्थोंकी तरह छिन्नभिन्न होने पर फिर तुरन्त ही मिल सकें उन्हें स्थूल कहते हैं । (३) स्थूलसूक्ष्म - आपात, चांदनी, अन्धकारादि जो आँखसे दिखाई पड़ें किन्तु पकड़नेमें न आवें उन्हें स्थूलसूक्ष्म कहते हैं । (४) सूक्ष्मस्थूल - जो शब्द, गन्धादि आँखसे दिखाई न पड़ें किन्तु अन्य इन्द्रियोंसे ज्ञानमें आवें उन्हें सूक्ष्मस्थूल कहते हैं । (५) सूक्ष्म - जो कार्मण स्कन्धादिक बहुत परमाणुओंके स्कन्ध हैं परन्तु इन्द्रियगम्य नहीं हैं उन्हें सूक्ष्म कहते हैं । (६) सूक्ष्मसूक्ष्म - अति सूक्ष्म स्कन्ध अथवा परमाणुको सूक्ष्मसूक्ष्म कहते हैं । इस प्रकार इस लोकमें प्रचुर प्रसार इस पुद्गल द्रव्यका ही है ।
(२) धर्मद्रव्य : जीव और पुद्गलोंको गति करनेमें सहकारी गुणसंयुक्त लोकप्रमाण एक द्रव्य है ।
(३) अधर्मद्रव्य : जीव और पुद्गलोंको गतिपूर्वक स्थिति करनेमें सहकारीगुणसंयुक्त लोकप्रमाण एक द्रव्य है ।
(४) आकाशद्रव्य : सर्व द्रव्योंको अवगाहनहेतुत्वलक्षणसंयुक्त लोकालोक-प्रमाण एक द्रव्य है । जिसमें सब द्रव्यें पाई जावें उसे लोक और जहाँ केवल एक आकाश ही है उसे अलोक कहते हैं । दोनोंकी सत्ता भिन्न नहीं है अतः एक ही द्रव्य है ।
(५) कालद्रव्य : सर्व द्रव्योंको वर्तनाहेतुत्वलक्षणसंयुक्त लोकके एक-एक प्रदेश पर स्थित एक-एक प्रदेश मात्र असंख्यात द्रव्य हैं । उनके परिणामके निमित्तसे समय, आवली आदि व्यवहारकाल है । इस प्रकार जीव सहित छह द्रव्य जानना । कालके बहु प्रदेश नहीं है अतः कालके बिना शेष पाँच द्रव्योंको पंचास्तिकाय कहते हैं । इसमें जीवतत्त्व और पुद्गल - अजीवतत्त्वके परस्पर सम्बन्धसे अन्य पाँच तत्त्व होते हैं ।
३. आस्रवतत्त्व : जीवके रागादि परिणामोंसे योगद्वारा आनेवाले पुद्गलके आगमनको आस्रवतत्त्व कहते हैं ।
४. बन्धतत्त्व : जीवकी अशुद्धताके निमित्तसे आये हुए पुद्गलोंका ज्ञानावरणादिरूप अपनी स्थिति और रससंयुक्त आत्मप्रदेशोंके साथ सम्बन्धरूप होनेको बन्धतत्त्व कहते हैं ।
५. संवरतत्त्व : जीवके रागादि परिणामके अभावसे पुद्गलोंके न आनेको संवरतत्त्व कहते हैं ।
६. निर्जरातत्त्व : जीवके शुद्धोपयोगके बलसे पूर्वमें बँधे हुए कर्मोंके एकदेश नाश होनेको संवरपूर्वक निर्जरा कहते हैं । कर्मके फलको भोगने पर जो उनकी निर्जरा की जाती है वह निर्जरा मोक्षके लिये कारणभूत नहीं है ।
७. मोक्षतत्त्व : सर्वथा कर्मके नाश होने पर जीवके निजभाव प्रगट होनेको मोक्षतत्त्व कहते हैं । यह सात तत्त्वार्थ जानना । पुण्य - पाप तत्त्व है वह आस्रवतत्त्वके भेद हैं इसलिये अलग नहीं कहे गए । इस प्रकार यह तत्त्वार्थका श्रद्धान है वही सम्यग्दर्शनका लक्षण कहा है ।
प्रश्न : इस लक्षणमें अव्याप्तिदोष आता है । किस प्रकार ? जिस समय सम्यग्दृष्टि विषय - कषायकी तीव्रतारूप परिणमन करता है तब ऐसा श्रद्धान कैसे रह सकता है ? लक्षण तो वह है जो लक्ष्यमें सर्वथा सदाकाल पाया जावे ।
उत्तर : जीवके दो भाव हैं । एक श्रद्धानरूप है, दूसरा परिणमनरूप है । श्रद्धानरूप तो सम्यक्त्वका लक्षण है और परिणामरूप चारित्रका लक्षण है । सम्यग्दृष्टि विषय - कषायके परिणमनरूप हुआ है, श्रद्धानमें प्रतीत यथावत् है । जिस प्रकार गुमाश्ता साहूकारका चाकर है । उसके अन्तरङ्गमें ऐसी प्रतीति है कि यह सभी कुछ सेठका कार्य है, मेरा घर तो भिन्न ही है । परिणामोंसे तो सेठके कार्यमें प्रवर्तन करता है और उस सेठके कार्यको मेरा - मेरा भी कहता है, नफा - नुकशान होने पर हर्ष - शोक भी करता है और उस प्रतीतिको बारबार सँभालता भी नहीं है । परन्तु जिस समय उस सेठका और अपना हिसाब करता है तब जैसी प्रतीति अन्तरङ्गमें थी वैसी प्रगट करता है । सेठके कार्यमें प्रवर्तन करते समय वह प्रतीति शक्तिरूप रहती है । कदाचित् वह सेठके धनकी चोरी करके उसे अपना जाने तो उसे अपराधी कहते हैं । फिर वह गुमाश्ता सेठकी नौकरीको पराधीन दुःखदायक मानता है परन्तु अपने स्वयंके धनके बल - बिना आजीविकाके वशवर्त्ती होकर उसके काममें प्रवर्तन करता है । वैसे ही ज्ञानी कर्मके उदयको भोगता है ।
इसके अन्तरङ्गमें ऐसी प्रतीति है कि यह सब दिखावा मात्र भेष है, मेरा स्वरूप तो उन सबसे भिन्न ही है, परिणामोंके द्वारा औदयिक भावोंमें परिणमन करता है और उदयके सम्बन्धके वश मेरा - मेरा भी कहता है, इष्ट - अनिष्टमें हर्ष - विषाद भी करता है और अपनी उस प्रतीतिको बारबार सँभालता भी नहीं है । परन्तु जिस समय उस कर्म और अपने स्वरूपका विचार करता है तब जैसी प्रतीति अन्तरङ्गमें थी वैसी ही प्रगट करता है । फिर उस कर्मके उदयमें वह प्रतीति शक्तिरूप रहती है, यदि कदाचित् कभी भी उस कर्मके उदयको श्रद्धानमें अपना जाने तो उसे मिथ्यात्वी कहते हैं ।
पुनः वह ज्ञानी कर्मके उदयको पराधीन दुःख जानता है परन्तु अपने शुद्धोपयोगके बल - बिना पूर्वबद्ध कर्मके वश होकर कर्मके औदयिक भावोंमें प्रवर्तन करता है । इस प्रकार सम्यक्त्वीके तत्त्वार्थश्रद्धान सम्यग्दर्शन परिणमनरूप तो निर्बाधरूपसे निरन्तर ही है परन्तु ज्ञानोपयोग अपेक्षासे देखा जावे तो सामान्यरूप अथवा विशेषरूप, शक्ति अवस्थामें अथवा व्यक्त अवस्थामें (-सम्यक्रूप परिणमन तो) सदाकाल होता ही है ।
प्रश्न : भले ही इस लक्षणमें अव्याप्ति दोष नहीं है पर्नतु अतिव्याप्ति दोष तो लगता है । कारण कि द्रव्यलिंगी मुनि जिनप्रणीत सात तत्त्वोंको ही मानता है अन्य मतके कल्पित तत्त्वोंको नहीं मानता । लक्षण तो ऐसे होना चाहिये जो लक्ष्यके अलावा अन्य स्थानमें न पाया जावे ।
उत्तर : द्रव्यलिंगी मुनि जिनप्रणीत तत्त्वको ही मानता है परन्तु विपरीताभिनिवेशसे संयुक्त मानता है, शरीराश्रित क्रियाकाण्डको अपनी जानता है इससे अजीवतत्त्वमें जीवतत्त्वका श्रद्धान करता है । पुनः आस्रव - बन्धरूप जो शील* संयमादिकरूप परिणाम हैं उन्हें संवर - निर्जरारूप मानकर मोक्षका कारण मानता है । द्रव्यलिंगी पापसे तो विरक्त हुआ है परन्तु पुण्यमें उपादेय बुद्धिसे परिणमन करता है इसलिये उसे तत्त्वार्थश्रद्धान नहीं है । इस भाँति (विपरीत अभिप्रायरहित) तत्त्वार्थश्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन अंगीकार करना चाहिये ॥२२॥
* शील = शुभभावरूप व्यवहार ब्रह्मचर्यादि ।
सम्यक्त्वके आठ अङ्गोंका वर्णन -
१ - निःशङ्कित अङ्ग
सकलमनेकान्तात्मकमिदयुक्तं वस्तुजातमखिलज्ञैः ।
किमु सत्यमसत्यं वा न जातु शंकेति कर्त्तव्या ॥२३॥
अन्वयार्थ : (अखिलज्ञैः) सर्वज्ञदेव द्वारा (उक्तं) कहा गया (इदं) यह (सकलं) समस्त (वस्तुजातं) वस्तुसमूह (अनेकान्तात्मकं) अनेकान्तस्वभावरूप है वह (किमु सत्यं) क्या सत्य है ? (वा असत्यं) अथवा असत्य है (इती) ऐसी (शंका) शंका (जातु) कभी भी (न) नहीं (कर्त्तव्या) करना चाहिये ।
टीका : अखिलज्ञैः इदं सकलं वस्तुजातं अनेकान्तात्मकं उक्तं किमु सत्यं वा असत्यं वा । जातु इति शंका न कर्त्तव्या । सर्वज्ञदेवने यह समस्त जीवादि पदार्थोंका समूह अनेकान्तात्मक अर्थात् अनेक स्वभावसहित कहा है । क्या वह सच्चा है या झूठा ? ऐसी शंका कभी नहीं करना चाहिए ।
भावार्थ : शंका नाम संशयका है । जिन - प्रणीत पदार्थोंमें शंका नहीं करना । इसीको १निःशंकित नामक अंग कहते हैं (कारण कि जिन भगवान अन्यथावादी नहीं हैं । )
१ स्वामी समन्तभद्राचार्यकृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार गा० ११में कहा है कि तत्त्व यही है ऐसे ही है अन्य नहीं है अथवा अन्य रीतिसे नहीं है । ऐसी निष्कम्प तलवारकी तीक्ष्णधारके समान सन्मार्गमें संशय रहित रुचि - विश्वासको निःशकित अंग कहते हैं ।
२ - निःकांक्षित अंग
निःकांक्षा - (विषयोंकी व विषयके साधनोंकी अभिलाषा - आशाको कांक्षा कहते हैं) अर्थात् कर्मके वश, अन्तवाले, उदयमें दुःखमिश्रित और पापका बीजरूप सुखमें अनित्यताका श्रद्धान होना वह निःकांक्षित अंग है । (रत्नकरण्डक श्रावकाचार गाथा - १२)
इह जन्मनि विभवादीन्यमुत्र चक्रित्वकेशवत्वादीन् ।
एकान्तवाददूषित परसमयानपि च नाकांक्षेत् ॥२४॥
अन्वयार्थ : (इह) इस (जन्मनि) लोकमें (विभवादीनि) ऐश्वर्य, सम्पदा आदि, (अमुत्र) परलोकमें (चक्रित्वकेशवत्वादीन्) चक्रवर्त्ती, नारायण आदि पदोंको (च) और (एकान्तवाद - दूषित परसमयान्) एकान्तवादसे दूषित अन्य धर्मोंको (अपि) भी (न आकांक्षेत् ) न चाहे ।
टीका : इह जन्मनि विभवादीनि न आकांक्षेत् - सम्यग्दृष्टि इस लोकमें तो सम्पदा इत्यादि तथा पुत्रादिकको नहीं चाहता च अमुत्र चक्रित्व केशवत्वादीन् न आकांक्षेत् तथा परलोकमें चक्रवर्तीपद, नारायणपद और आदि शब्दसे इन्द्रादिक पदको नहीं चाहता । एकान्तवाददूषितपरसमयान् अपि न आकांक्षेत् वस्तुके एकान्त स्वरूपको कथन करनेके कारण जो दूषित हैं ऐसे अन्य मत हैं उनको भी नहीं चाहता ।
भावार्थ : निःकांक्षित नाम वांछा रहितका है । कारण कि इस लोक सम्बन्धी तथा परलोक सम्बन्धी पुण्यके फलको नहीं चाहता इसलिये सम्यक्त्वी पुण्यके फलरूप इन्द्रियोंके विषयोंको आकुलताका निमित्त होनेसे दुःखरूप ही मानता है । फिर अन्यमती नाना प्रकारकी एकान्तरूप कल्पना करते हैं उन्हें भला जानकर नहीं चाहता है ।
३ - *निर्विचिकित्सा अंग
१.निर्विचिकित्सा अङ्ग - रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रसे पवित्र परन्तु स्वाभाविक अपवित्र शरीरमें (मुनि - धर्मात्माके मलिन शरीरमें) ग्लानि न करके उनके गुणोंमें प्रीति करना निर्जुगुप्सा अंग कहलाता है (रत्नकरण्डक श्रा० गा० १३)
क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु नानाविधेषु भावेषु ।
द्रव्येषु पुरिषादिषु विचिकित्सा नैव करणीया ॥२५॥
अन्वयार्थ : (क्षुत्तृष्णाशीतोष्णप्रभृतिषु) भूख, प्यास, सरदी, गरमी इत्यादि (नानाविधेषु) नाना प्रकारके (भावेषु) भावोंमें और (पुरीषादिषु) विष्टा आदि (द्रव्येषु) पदार्थोंमें (विचिकित्सा) ग्लानि (नैव) नहीं (करणीया) करना चाहिये ।
टीका : क्षुत्तृषा शीतोष्णप्रभृतिषु नाना विधेषु भावेषु द्रव्येषु पुरीषादिषु विचिकित्सा नैव करणीया क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण इत्यादि नाना प्रकारकी दुःखदायक पर्यायोंमें एव अपवित्र विष्टा आदि पदार्थोंमें ग्लानि नहीं करना चाहिए ।
भावार्थ : विचिकित्सा नाम असुहावनेका है अथवा ग्लानिका है, उनसे जो रहित हो उसे निर्विचिकित्सा कहते हैं । पापके उदयसे दुःखदायक भावोंके संयोग होने पर उद्वेगरूप न होना, कारण कि उदयाधीन कार्य अपने वश नहीं है । इस दुःखसे अमूर्तिक आत्माका घात भी नहीं है फिर विष्टादि निन्द्य वस्तुमें ग्लानिरूप न होना, क्योंकि वस्तुका ऐसा ही स्वभाव है । इसमें आत्माको क्या ? अथवा जिस शरीरमें आत्मा निवास करती है उसमें तो सभी वस्तुयें निन्द्य ही हैं ॥२५॥
४ - +अमूढदृष्टि अंग
लोके शास्त्राभासे समयाभासे च देवताभासे ।
नित्यमपि तत्त्वरुचिना कर्त्तव्यममूढदृष्टित्वम् ॥२६॥
अन्वयार्थ : (लोके) लोकमें (शास्त्राभासे) शास्त्राभासमें (समयाभासे) धर्माभासमें (च) और (देवताभासे) देवाभासमें (तत्त्वरुचिना) तत्त्वोंमें रुचिवान सम्यग्दृष्टि पुरुषको (नित्यमपि) सदा ही (अमूढदृष्टित्वं) मूढ़तारहित श्रद्धान (कर्त्तव्यं) करना चाहिए ।
टीका : तत्त्वरुचिना नित्यं अपि अमूढदृष्टित्वं कर्त्तव्यं - तत्त्वश्रद्धान पुरुषको सदैव अमूढ़दृष्टि होना चाहिए । मूढ़दृष्टि यथार्थज्ञानरहितका नाम है, उस रूप श्रद्धान वालेको होना योग्य नहीं । कहाँ होना योग्य नहीं ? वह आगे बतलाते हैं । लोके - लोकमें बहुतसे जीव विपरीत भावमें प्रवर्त्तन करते हों तो भी स्वयंको उनकी तरह (देखादेखीसे) प्रवर्त्तन नहीं करना चाहिए । शास्त्राभासे - शास्त्र जैसा प्रतिभासित होने वाले अन्यवादियों द्वारा रचे गए ग्रन्थोंमें रुचिरूप नहीं प्रवर्त्तन करना चाहिये । समयाभासे - सच्चे मतकी तरह ही प्रतिभासित होने पर अन्यमतमें कोई क्रिया भली जैसी मालूम पड़े तो भी उसे भला जानकर प्रवर्त्तन नहीं करना । अथवा समय अर्थात् पदार्थ सरीखा प्रतिभासित होवे ऐसे अन्यवादियों द्वारा कहे गये कल्पित तत्त्व युक्तियुक्त सा भासित होने पर भी उसमें सत्यबुद्धि नहीं करनी चाहिये । देवताभासे - यद्यपि देव जैसा प्रतिभासित होवे तो भी अरहन्त देवके अलावा अन्य देवोंमें कुछ किंचित् चमत्कारादि देखकर विनयरूप प्रवर्त्तन नहीं करना चाहिए । चकारसे और भी जो गुरु जैसा प्रतिभासित हो ऐसे विषय - कषायसे युक्त लम्पटी वेषधारीके प्रति विनयरूप प्रवर्त्तन नहीं करना चाहिए । इस भाँति यथार्थज्ञानसे भ्रष्ट करनेवाले कारणोंसे पूर्णरूपेण सावधान रहना चाहिये ॥२६॥
+. अमूढ़त्व - दुखदायक खोटे मार्ग अथवा कुत्सित् धर्मोंमें और कुमार्गोंमें रहनेवाले पुरुषोंमें (भले ही वह लौकिकमें प्रख्यात हों) उनमें मनसे भी प्रामाणिकता माने नहीं - कायासे प्रशंसा और वचनसे स्तुति करे नहीं - उसे अमूढ़दृष्टि कहते हैं ॥गा० १४॥
++. समयाभास - यथार्थमें जो पदार्थ तत्त्वार्थ नहीं है परन्तु भ्रमबुद्धिसे वैसे (तत्त्वार्थरूप) दिखाई पड़ने लगें । जैसे कि मिथ्यादृष्टियोंके बनाए शास्त्र यथार्थमें तो शास्त्र नहीं हैं परंतु भ्रमसे शास्त्र जैसे भासित हों वह शास्त्राभास - समयाभास है ।
५ - *उपगूहन अंग
धर्मोऽभिवर्द्धनीयः सदात्मनो मार्दवादिभावनया ।
परदोषनिगूहनमपि विधेयमुपबृंहणगुणार्थम् ॥२७॥
(यह श्लोक इस संस्करण में छपने से रह गया है, इसलिए श्लोक पाठ PDF से लिया है।)
अन्वयार्थ : (उपबृंहणगुणार्थं) उपबृंहण नामक गुणके लिये (मार्दवादिभावनया) मार्दव, क्षमा, सन्तोषादि भावनाओंसे (सदा) निरन्तर (आत्मनो धर्मः) अपने आत्माके धर्मकी अर्थात् शुद्धस्वभावकी (अभिवर्द्धनीयः) वृद्धि करनी चाहिये और (परदोषनिगूहनमपि) दूसरेके दोषोंको गुप्त भी रखना (विधेयम् ) चाहिए (यह भी कर्त्तव्य है) ।
टीका : उपबृंहणं गुणार्थं मार्दवादिभावनया सदा आत्मनः धर्मः अभिवर्द्धनीयः । उपबृंहण नामक गुणके लिए मार्दव अर्थात् कोमल परिणाम तथा आदि शब्दसे क्षमा संतोषादि भावनासे सदा अपने आत्माका निजस्वभाव प्रगटरूपसे बढ़ाना परदोषनिगूहनमपि विधेयम् अन्य जीवका जो कोई निन्दायोग्य दोष हो उसे प्रगट न करके दाब देना उचित है ।
भावार्थ : उपबृंहणका अर्थ बढ़ाना है अतः अपने आत्माका धर्म बढ़ाना । पुनः इस अंगका अपरनाम उपगूहन भी है, इस अपेक्षासे दूसरेके दोषोंको छिपाना योग्य है क्योंकि उन्हें प्रगट करनेसे उनको दुःख उत्पन्न होता है ॥२७॥
६ - *स्थितिकरण अंग
*. उपगूहनत्व = मोक्षमार्ग स्वयं तो शुद्ध ही है । उसकी अशक्त और अज्ञानी जीवोंके आश्रयसे उत्पन्न हुई निन्दाको दूर करना उपगूहन कहलाता है । (स्वसन्मुखताके बलसे शुद्धिकी वृद्धि करनेको उपबृंहण अङ्ग कहते हैं । ) (रत्नकरण्डक श्रावकाचार गाथा १५)
१. स्थितिकरणत्व - सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्रसे चलायमान होने पर जीवोंको धर्मवत्सल विद्वानों द्वारा स्थिरीभूत करनेको स्थितिकरण अङ्ग कहते हैं । रत्नकरण्डश्रावकाचार (गाथा १६)
कामक्रोधमदादिषु चलयितुमुदितेषु वर्त्मनो न्यायात् ।
श्रुतमात्मनः परस्य च युक्त्या स्थितिकरणमपि कार्यम् ॥२८॥
अन्वयार्थ : (कामक्रोधमदादिषु) काम, क्रोध, मद, लोभादि विकार (न्यायात् वर्त्मनः) न्यायमार्गसे अर्थात् धर्ममार्गसे (चलयितुम् ) विचलित करवानेके लिए (उदितेषु) प्रगट हुआ हो तब (श्रुतं) शास्त्र अनुसार (आत्मनः परस्य च) अपनी और परकी (स्थितिकरणं) स्थिरता (अपि) भी (कार्यम् ) करनी चाहिये ।
टीका : कामक्रोधादिषु न्यायात् वर्त्मनः चलयितुं उदितेषु आत्मनः परस्य च श्रुतं युक्त्वा स्थितिकरणं अपि कायम् । - मैथुनका भाव, क्रोधका, मानका भाव तथा आदि शब्दसे लोभादिका भाव न्यायरूप धर्ममार्गसे भ्रष्ट करनेवाला है, अतः उनके प्रगट होने पर अपनेको तथा अन्य जीवोंको शास्त्रानुसार युक्तिसे धर्ममें स्थिर करना भी श्रद्धावान पुरुषको योग्य है ।
भावार्थ : जो धर्मसे भ्रष्ट हैं उन्हें पुनः धर्ममें स्थापित करना स्थितिकरण है । और धर्मभ्रष्टता कामक्रोधादिके वशीभूत होने पर होती है । इसलिये जो इनके निमित्त से अपने परिणाम भ्रष्ट हों तो स्वयं युक्तिपूर्वक धर्ममें स्थिर होना चाहिये, और अन्य जीव भ्रष्ट हों तो उन्हें भी जैसे बने वैसे धर्ममें दृढ़ करना चाहिए ॥२८॥
७ - वात्सल्य अंग
अनवरतमहिंसायां शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने धर्मे ।
सर्वेष्वपि च सधर्मिषु परमं वात्सल्यमालम्ब्यम् ॥२९॥
अन्वयार्थ : (शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने) मोक्षसुखस्वरूप सम्पदाके कारणभूत (धर्मे) धर्ममें (अहिंसायां) अहिंसामें (च) और (सर्वेष्वपि) सभी (सधर्मिषु) साधर्मीजनोंमें (अनवरतं) निरन्तर (परमं) उत्कृष्ट (वात्सल्यं) वात्सल्य अथवा प्रीतिका (आलम्ब्यम् ) आलम्बन करना चाहिये ।
टीका : शिवसुखलक्ष्मीनिबन्धने अहिंसायां धर्मे सर्वेष्वपि च सधर्मिषु परमंवात्सल्यं अनवरतं आलम्ब्यम् - मोक्षसुखकी सम्पदाके कारणभूत हिंसारहित जिनप्रणीत धर्ममें तथा उस धर्मयुक्त सभी साधर्मियोंमें उत्कृष्ट वात्सल्य निरन्तर रखना चाहिए ।
भावार्थ : गोवत्स जैसी प्रीतिका नाम वात्सल्य है । जैसे बछड़ेकी प्रीतिसे गाय सिंहनीके सन्मुख चली जाती है और विचार करती है कि यदि मेरा भक्षण हो जाय और बछड़ेकी रक्षा हो जाय तो अत्युत्तम है । ऐसी प्रीति धर्म और धर्मात्माओंके प्रति होनी चाहिये, जो तन - मन - धन सर्वस्व खर्च करके अपनी प्रीतिको पाले ॥२९॥
. वात्सल्य - अपने साथके धर्मात्मा जीवोंका सच्चे भावसे कपट रहित यथायोग्य सत्कार करना ।
८ - प्रभावना अंग
आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव ।
दान तपोजिनपूजाविद्यातिशयैश्च जिनधर्मः ॥३०॥
अन्वयार्थ : (सततमेव) निरंतर (रत्नत्रयतेजसा) रत्नत्रयके तेजसे (आत्मा) अपनी आत्माको (प्रभावनीयः) प्रभावनायुक्त करना चाहिए (च) और (दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयैः) दान, तप, जिनपूजन और विद्याके अतिशयसे अर्थात् इनकी वृद्धि करके (जिनधर्मः) जैनधर्मकी प्रभावना करना चाहिए ।
टीका : रत्नत्रयतेजसा सततं एव आत्मा प्रभावनीयः - रत्नत्रयके तेजसे निरंतर अपनी आत्माको प्रभावनासंयुक्त करना चाहिए । और दानतपोजिनपूजा-द्यातिशयैः जिनधर्म प्रभावनीयः - तथा दान, तप, जिनपूजा, विद्या, चमत्कारादिसे जैनधर्मकी *प्रभावना करना चाहिए ।
१ प्रभावना - (सर्वज्ञ वीतरागकथित विवेक पूर्वक) जैसे बने वैसे अज्ञानान्धकारके प्रसारको दूर करके जिन शासनके माहात्म्यका प्रकाश करना प्रभावना कहलाता है (रत्न० श्रावकाचार गा० १८)
भावार्थ : प्रभावना अर्थात् अत्यन्तपने प्रगट करना । अपने आत्माका अतिशय तो रत्नत्रयके प्रताप बढ़नेसे प्रगट होता है और जैनधर्मका अतिशय प्रचुर दया - दानसे उग्रतप करके, बहुत धन खर्च करके भगवानकी पूजा करवाकर, शास्त्राभ्यास करके तथा निर्दोष देवादिके चमत्कारसे (जैन धर्मकी महिमा) प्रगट होता है अतः ऐसा अतिशय प्रगट करना चाहिये । इस प्रकार सम्यक्त्वके आठ अंगोंका वर्णन किया । यह आठ अंग किसी सम्यक्दृष्टिके सम्पूर्ण होते हैं, किसीके थोड़े होते हैं, किसीके गौणरूपसे तथा किसीके मुख्यरूपसे होते हैं । परन्तु सम्यक्त्वकी शोभा तो तभी होती है जब यह आठों अंग सम्पूर्ण मुख्यरूपसे प्रगट प्रत्यक्ष भासित हों । इस भांति सम्यक्त्व अंगीकार करनेके पश्चात् धर्मी गृहस्थको क्या करना चाहिये यह आगे कहेंगे ॥३०॥
इस प्रकार श्रीमद् अमृतचन्द्रसूरि विरचित परुषार्थसिद्धिउपाय, जिसका अपर नाम जिनप्रवचनरहस्यकोष है, में सम्यग्दर्शन वर्णन नामक प्रथम अधिकार समाप्त ।
*
सम्यग्ज्ञान अधिकार
इत्याश्रितसम्यक्त्वैः सम्यग्ज्ञानं निरूप्य यत्नेन ।
आम्नाययुक्तियोगैः समुपास्यं नित्यमात्महितैः ॥३१॥
पृथगाराधनमिष्टं दर्शनसहभाविनोऽपि बोधस्य ।
लक्षणभेदेन यतो नानात्वं सम्भवत्यनयोः ॥३२॥
अन्वयार्थ : (इति) इस प्रकार (आश्रितसम्यक्त्वैः) जिन्होंने सम्यक्त्वका आश्रय लिया है ऐसे (आत्महितैः) आत्महितकारी पुरुषोंको (नित्यं) सदैव (आम्नाययुक्तियोगैः) जिनागमकी परम्परा और युक्ति अर्थात् प्रमाण - नयके अनुयोगसे (निरूप्य) विचार करके (यत्नेन) प्रयत्नपूर्वक (सम्यग्ज्ञानं) सम्यग्ज्ञानका (समुपास्यं) भले प्रकारसे सेवन करना योग्य है, (दर्शनसहभाविनोऽपि) सम्यग्दर्शनके साथ ही उत्पन्न होने पर भी (बोधस्य) सम्यग्ज्ञानका (पृथगाराधनं) जुदा ही आराधन करना (इष्ट) कल्याणकारी है, (यतः) कारण कि (अनयोः) इन दोनोंमें अर्थात् सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानमें (लक्षणभेदेन) लक्षणके भेदसे (नानात्वं) भिन्नता (संभवति) संभव है ।
टीका : इत्याश्रित सम्यक्त्वैः आत्महितैः च यत्नेन सम्यग्ज्ञानं समुपास्यम् । - इस प्रकार जिन्होंने सम्यक्त्व अंगीकार किया है, ऐसे अपने आत्माका हित करनेवाले धर्मात्मा जीवोंको जिस तिस - उचित उपायसे सम्यग्ज्ञानका सेवन करना चाहिए ।
भावार्थ : सम्यक्त्वको अंगीकार करनेके बाद सम्यग्ज्ञानको अंगीकार करना किंकृत्य - किस भांति सेवन करना ? आम्नाययुक्तियोगैः निरूप्य - आम्नाय अर्थात् जिनागमकी परम्परा और युक्ति अर्थात् प्रमाण - नयके अनुयोगसे भले प्रकार उस सम्यग्ज्ञानका विचार - निर्णय करके उसका सेवन करना ।
भावार्थ : जो पदार्थका स्वरूप जिनागमकी परम्परासे मिलता हो उसको प्रमाण और नयसे अपने उपयोगमें ठीक करके यथावत् जाननेको ही सम्यग्ज्ञानका सेवन करना कहा जाता है । उस प्रमाण - नयका स्वरूप किंचिन्मात्र लिखते हैं ।
प्रमाण - नयका संक्षिप्त स्वरूप
प्रमाण सम्यग्ज्ञानको कहते हैं वह प्रत्यक्ष और परोक्षके भेदसे दो प्रकारका है । प्रत्यक्षके भी दो भेद हैं । जो ज्ञान केवल आत्माके ही आधीन होकर अपने विषयप्रमाण विशदतासे स्पष्ट जाने उसे पारमार्थिक प्रत्यक्ष कहते हैं । उसके भी दो भेद हैं । अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान तो एकदेश प्रत्यक्ष हैं और केवलज्ञान सर्व प्रत्यक्ष है तथा जो नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा वर्णादिकको साक्षात् ग्रहण करे अर्थात् जाने उसे सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहते हैं । परमार्थसे यह जानना परोक्ष ही है, कारण कि स्पष्ट जानपना नहीं है । उसका उदाहरणः - जैसे आँखसे किसी वस्तुको सफेद जाना उसमें मलिनताका भी मिश्रण है । अमुक अंश श्वेत है और अमुक मलिन है ऐसा इसे स्पष्ट प्रतिभासित नहीं होता अतः यह व्यवहारमात्र प्रत्यक्ष है, परन्तु आचार्य इसको परोक्ष ही कहते हैं । मतिज्ञान श्रुतज्ञानसे जो जानना होता है वह सभी परोक्ष है ।
परोक्ष प्रमाण : जो ज्ञान अपने विषयको स्पष्ट न जाने उसे परोक्ष प्रमाण कहते हैं । उसके पांच भेद हैं । १ स्मृति, २ प्रत्यभिज्ञान, ३ तर्क, ४ अनुमान, ५ आगम यह पांच भेद जानना ।
१. स्मृति : पूर्वमें जिस पदार्थको जाना था उसे ही याद करके कालान्तरमें जान लेनेको स्मृति कहते हैं ।
२. प्रत्यभिज्ञान : जैसे पहले किसी पुरुषको देखा था फिर बादमें याद किया कि यह तो वही पुरुष है जिसे मैंने पहले देखा था । जो पहलेकी बात याद करके प्रत्यक्ष पदार्थका निश्चय करनेमें आये उसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । जैसे पहले यह सुना था कि नील गाय नामक पशु गाय जैसा होता है वहाँ कदाचित वनमें नील गायको देखा तो यह बात याद आ गई कि गाय जैसा नील गाय होता है ऐसा पहले सुना था वह नील गाय पशु यही है ।
३. तर्क : व्याप्तिके ज्ञानको तर्क कहते हैं । इसके बिना यह नहीं इसे व्याप्ति कहते हैं । जिस तरह अग्निके बिना धुआँ हीं होता, आत्माके बिना चेतना नहीं होती । इस व्याप्तिके ज्ञानको तर्क कहते हैं ।
४. अनुमान : लक्षणके बिना पदार्थका निश्चय किया जाय उसे अनुमान कहते हैं । जैसे किसी पर्वतमेंसे धुआँ निकलता देखकर निश्चय करना कि यहाँ अग्नि है ।
५. आगम : आप्तके वचनके निमित्तसे पदार्थके जाननेको आगम कहते हैं । जैसे शास्त्रसे लोकका स्वरूप जानना । इस तरह परोक्षप्रमाणके पाँच भेद जानना ।
नय
श्रुतज्ञानप्रमाणके अंशको नय कहते हैं । प्रमाणसे जो पदार्थ जाना था उसके एक धर्मको मुख्यतासे अनुभव कराये उसे नय कहते हैं । उसके दो भेद हैं । (द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक) जो द्रव्यको मुख्य करके अनुभव कराये वह द्रव्यार्थिकनय है । उसके तीन भेद हैं ।
१. नैगम : संकल्प मात्रसे पदार्थके ग्रहण करने - जाननेको नैगम कहते हैं । जैसे कठौती बनानेके लिये कोई लकड़ी लेने जा रहा था, उससे किसीने पूछा कि तुम कहाँ जाते हो ? तब उसने उत्तर दिया कि मैं कठौती लेने जाता हूँ । जहाँ वह जा रहा है वहाँ कठौती तो नहीं मिलेगी परन्तु उसके विचारमें है कि मैं लकड़ी लाकर कठौडी बनाऊँगा ।
२. संग्रह : सामान्यरूपसे पदार्थोंके ग्रहणको संग्रहनय कहते हैं । जैसे - छह जातिके समस्त द्रव्य सत्तालक्षण संयुक्त हैं । इन छह द्रव्योंके समूहको द्रव्य संज्ञा द्वारा जानना इस नयका प्रयोजन है ।
३. व्यवहारनय : सामान्यरूपसे जाने हुए द्रव्यके विशेष (भेद) करनेको व्यवहार कहते हैं । जैसे द्रव्यके छह भेद करना । इस प्रकार यह तीन भेद द्रव्यार्थिकनयके बताए हैं ।
पर्यायार्थिकनयके चार भेद हैं । जो वर्तमान पर्यायमात्रको जानता है उसे ऋजुसूत्रनय कहते हैं । (व्याकरणादिके अनुसार शब्दकी अशुद्धताको दूर करना शब्दनय तथा पदार्थमें मुख्यतासे एक अर्थके आरूढ़ करनेको समभिरूढ़नय कहते हैं । जैसे गच्छतीति गौः के अनुसार जो चले वही गौ होती है परन्तु यहाँ बैठी हुईको भी गौ कह देते हैं । तथा जो वर्तमान क्रिया जैसी हो उसीके अनुसार वैसा ही कहना एवंभूतनय है । जैसे चलती हुईको ही गौ कहना, सोती हुई, बैठी हुईको गौ न कहना । इस प्रकार नयके भेद जानना चाहिये । ) इनमें शब्दनय, समभिरूढ़नय तथा एवंभूतनयको शब्दनय कहते हैं । (इस प्रमाण - नयके संयोगको युक्ति कहते हैं । नयप्राणाभ्यां युक्तिः इति वचनात् । यहां पर प्रमाण - नयका थोड़ा-सा कथन इसलिए कर दिया है कि बिना प्रमाण - नयके पदार्थके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं होता । प्रमाणनयैरधिगमः । (त० सूत्रजी अ० १ - ६)
जिस समय आत्माको सम्यग्दर्शन होता है उस समय मतिज्ञान और श्रुतज्ञान तो अवश्य होता ही है परन्तु इस सम्यग्ज्ञानको विशेषरूपसे जुदा आराधन करना योग्य है । किसलिए ? यतः लक्षणभेदेन अनयोः नानात्वं संभवति । कारण कि लक्षण भेदसे इन दोनोंमें भिन्नत्व सम्भव है । सम्यक्त्वका लक्षण यथार्थ श्रद्धान है और इसका (ज्ञानका) लक्षण यथार्थ जानना है इसलिए इसे जुदा कहा ॥३१-३२॥
आगे सम्यक्त्वके बाद ज्ञान कहनेका कारण बताते हैं :
सम्यग्ज्ञानं कार्यं सम्यक्त्वं कारणं वदन्ति जिनाः ।
ज्ञानाराधनमिष्टं सम्यक्त्वानन्तरं तस्मात् ॥३३॥
अन्वयार्थ : (जिनाः) जिनेन्द्रदेव (सम्यग्ज्ञानं) सम्यग्ज्ञानको (कार्यं) कार्य और (सम्यक्त्वं) सम्यक्त्वको (कारणं) कारण (वदन्ति) कहते हैं, (तस्मात् ) इसलिये (सम्यक्त्वानन्तरं) सम्यक्त्वके बाद तुरन्त ही (ज्ञानाराधं) ज्ञानकी आराधना (इष्टम् ) योग्य है ।
टीका : जिनाः सम्यग्ज्ञानं कार्यं सम्यक्त्वं कारणं वदन्ति - जिनदेव सम्यग्ज्ञानको कार्य कहते हैं और सम्यक्त्वको कारण कहते हैं ।
भावार्थ : मतिज्ञान - श्रुतज्ञान पदार्थको तो जानते थे परन्तु सम्यक्त्वके बिना उनकी संज्ञा कुमति और कुश्रुतिज्ञान था । जिस समय सम्यक्त्व हुआ उसी समय उनकी संज्ञा मतिज्ञान - श्रुतज्ञान हुई । अतः ज्ञान तो था परन्तु सम्यक्पना तो सम्यक्त्वसे ही हुआ । इसलिये सम्यक्त्व तो कारणरूप है, सम्यग्ज्ञान कार्यरूप है । तस्मात् सम्यक्त्वानन्तरं ज्ञानाराधनं इष्टम् - इसलिये सम्यक्त्वके बाद ही ज्ञानाराधना योग्य है क्योंकि कारणसे ही कार्य होता है ॥३३॥
प्रश्न : कारण - कार्य तो तब कहा जाये जब आगे - पीछे हो । यह तो दोनों युगपत्त हैं फिर इनमें कारण - कार्यत्व किस तरह संभव है ? इसका उत्तर आगे कहते हैं ।
कारणकार्यविधानं समकालं जायमानयोरपि हि ।
दीपप्रकाशयोरिव सम्यक्त्वज्ञानयोः सुघटम् ॥३४॥
अन्वयार्थ : (हि) निश्चयसे (सम्यक्त्वज्ञानयोः) सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान दोनों (समकालं) एक समयमें (जानमानयोः अपि) उत्पन्न होने पर भी (दीपप्रकाशयोः) दीपक और प्रकाशकी (इव) तरह (कारणकार्यविधानं) कारण और कार्यकी विधि (सुघटम् ) भले प्रकार घटित होती है ।
टीका : हि सम्यक्त्वज्ञानयोः समकालं जानमानयोः अपि कार्यकारणविधानं सुघटम् - निश्चयसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान एक ही समयमें उत्पन्न होते हैं, तो भी उनमें कारण - कार्यका प्रकार यथार्थरूपसे बनता है । किस दृष्टान्तसे ? दीपकप्रकाशयोः इव - जिस प्रकार दीपक और प्रकाश एक ही समयमें प्रगट होते हैं तो भी दीपक प्रकाशका कारण है, प्रकाश कार्य है क्योंकि दीपकसे प्रकाश होता है । उसी प्रकार सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञानका कारण है, सम्यग्ज्ञान कार्य है, क्योंकि सम्यक्त्वसे सम्यग्ज्ञान नाम पाता है ॥३४॥
आगे इस सम्यग्ज्ञानका लक्षण कहते हैं :
कर्त्तव्योऽध्यवसायः सदनेकान्तात्मकेषु तत्त्वेषु ।
संशयविपर्य्ययानध्यवसायविविक्तमात्मरूपं तत् ॥३५॥
अन्वयार्थ : (सदनेकान्तात्मकेषु) प्रशस्त अनेकान्तात्मक अर्थात् अनेक स्वभाववाले (तत्त्वेषु) तत्त्वों अथवा पदार्थोंमें (अध्यवसायः) निर्णय (कर्त्तव्यः) करने योग्य है और (तत् ) सम्यग्ज्ञान (संशयविपर्य्ययानध्यवसायविविक्तं) संशय, विपर्यय और विमोह रहित (आत्मरूपं) आत्माका निजस्वरूप है ।
टीका : सदनेकान्तात्मकेषु तत्त्वेषु अध्यवसायः कर्त्तव्यः - अनेकान्त है स्वभाव जिनका ऐसे पदार्थोंका ज्ञानपूर्वक निर्णय करना योग्य है ।
भावार्थ - पदार्थके स्वरूपको यथार्थ जाननेका नाम सम्यग्ज्ञान है । वह पदार्थ अनेकान्त स्वभावको धारण करते हैं । अनेक = बहुत, अन्त = धर्म । इस प्रकार अपने अनन्तधर्म - स्वभावको धारण करनेवालेका ज्ञान अवश्य करना चाहिए । जो सम्यक् प्रकारसे वस्तुको पहचान ले तो करोड़ों कारण मिलने पर भी अश्रद्धानी न हो । तत् आत्मरूपं वर्तते - यह सम्यग्ज्ञान आत्माका स्वरूप है । क्योंकि जो यह सच्चा ज्ञान उत्पन्न हुआ है वह केवलज्ञानमें मिलकर शाश्वत रहेगा । कैसा है ज्ञान ? संशयविपर्य्याध्यवसाय विविक्तम् - संशय, विपर्यय और विमोह - इन तीन भावोंसे रहित है ।
संशय : विरुद्ध दोतरफा ज्ञानको संशयज्ञान कहते हैं । जैसे रातमें किसीको देखकर सन्देह हुआ कि यह पदार्थ मनुष्य जैसा भी प्रतिभासित होता है और व्यन्तर जैसा भी प्रतिभासित होता है ।
विपर्यय : अन्यथा (विपरीत) रूप एकतरफा ज्ञानको विपर्ययज्ञान कहते हैं जैसे मनुष्यमें व्यन्तरकी प्रतीति कर लेना ।
अन्ध्यवसाय : कुछ है इतना ही जानना हो, विशेष विचार न करे उसे अनध्यवसाय (विमोह) कहते हैं । जैसे गमन करते समय तृणके स्पर्शका ज्ञान होना । इन तीनों भावोंसे रहित यथार्थ ज्ञानको सम्यग्ज्ञान कहते हैं । यहाँ घटपटादि पदार्थोंके विशेष जाननेके निमित्त उद्यमी रहना नहीं बताया अपितु संसार - मोक्षके कारणभूत पदार्थोंको यथार्थ जाननेके लिए उद्यमी रहनेका उपदेश दिया है ।
प्रश्न : सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टिको जानपनेमें समानता होने पर भी एकका ज्ञान सम्यक् और दूसरेका मिथ्या क्यों कहलाता है ।
उत्तर : सम्यग्दृष्टिको मूलभूत जीवादि पदार्थोंका वास्तविक ज्ञान है इसलिए जितने उत्तर पदार्थ (विशेष - पदार्थ) जाननेमें आते हैं उन सबको यथार्थरूपसे साधता है अतः सम्यग्दृष्टिके ज्ञानको सम्यक्रूप कहा जाता हैं उन सबको भी अयथार्थरूपसे साधता है अतः मिथ्यादृष्टिके ज्ञानको मिथ्यारूप कहा गया है ॥३५॥
आगे इस सम्यग्ज्ञानके अष्ट अङ्ग कहते हैं -
ग्रन्थार्थोभयपूर्णं काले विनयेन सोपधानं च ।
बहुमानेन समन्वितमनिह्नवं ज्ञानमाराध्यम् ॥३६॥
अन्वयार्थ : (ग्रन्थार्थोभयपूर्णं) ग्रन्थरूप (शब्दरूप) अर्थरूप और उभय अर्थात् शब्द-अर्थरूप शुद्धतासे परिपूर्ण (काले) कालमें अर्थात् अध्ययनकालमें आराधन करने योग्य (विनयेन) मन, वचन, कायकी शुद्धतारूप विनय (च) और (सोपधानं) धारणा - युक्त (बहुमानेन) अत्यन्त सन्मानसे अर्थात् देव - गुरु - शास्त्रके वन्दन, नमस्कारादि (समन्वितं) सहित तथा (अनिह्नवं) विद्यागुरुको छिपाये बिना (ज्ञानं) ज्ञानकी (आराध्यम् ) आराधना करना योग्य है ।
टीका : ज्ञानं आराध्यम् - श्रद्धावान पुरुषोंको सम्यग्ज्ञान आराधन करने योग्य है । कैसा है ज्ञान ? ग्रन्थार्थोभयपूर्णं - शब्दरूप है, अर्थरूप है और उभयसे पूर्ण है ।
भावार्थ : १. व्यंजनाचार - जहां मात्र शब्दके पाठका ही जानपना हो उसे व्यंजनाचार अंग कहते हैं ।
२. अर्थाचार - जहाँ केवल अर्थमात्रके प्रयोजन सहित जानपना हो उसे अर्थाचार कहते हैं ।
३. उभयाचार - जहाँ शब्द और अर्थ दोनोंमें सम्पूर्ण जानपना हो उसे शब्दार्थ उभयपूर्ण अङ्ग कहते हैं । इस प्रकार यह तीन अंग वर्णन किए । अब ज्ञानकी आराधना कब करे ?
४. कालाचार : काले = जिस काल जिस ज्ञानका विचार चाहिए वही करना (सूर्योदय, सूर्यास्त, मध्याह्न और मध्यरात्रि, इनके पहले और पीछेका मुहूर्त्त सन्ध्याकाल है, इस कालको छोड़कर शेषके चार उत्तम कालोंमें पठन - पाठनादिरूप स्वाध्याय करनेको कालाचार कहते हैं । चारों सन्ध्याकालकी प्रथम तथा अन्तिम दो धड़ीमें तथा दिग्दाह, उल्कापात, वज्रपात, इन्द्रधनुष, सूर्य - चन्द्रग्रहण, तूफान, भूकम्प आदि उत्पातोंके कालमें सिद्धान्त - ग्रन्थोंका पठन-पाठन वर्जित है । हाँ, स्तोत्र - आराधना, धर्म-कथादिकके ग्रन्थ पढ़ सकते हैं । )
५. विनयाचार : तथा किस रीतिसे ज्ञानाराधन करना ? विनयेन = नम्रतायुक्त होना, उद्धत नहीं होना ।
६. उपधानाचार - तथा कैसा ज्ञान आराधना चाहिये ? सोपधानं = धारणा सहित ज्ञानको भूलना नहीं; उपधान सहित ज्ञानका आराधना करना छठा अंग है ।
७. बहुमानाचार - तथा कैसा है ज्ञान ? बहुमानेन समन्वित् = ज्ञानका पुस्तक - शास्त्रका, अथवा पढ़नेवालेका बहुत आदर करना । इन सहित ज्ञानका आराधना करना सप्तम अंग है ।
८. अनिह्नवाचार - तथा कैसा है ज्ञान ? अनिह्नवं = जिस शास्त्र अथवा गुरुसे अपनेको ज्ञान हुआ हो, उसे छिपाना नहीं चाहिए । यह आठ अंग (सम्यग्ज्ञानके विनयके) हैं । इस प्रकार सम्यग्ज्ञान अंगीकार करना ॥३६॥
इति श्रीमद् अमृतचन्द्रसूरि विरचित पुरुषार्थसिद्धि - उपाय जिसका अपरनाम जिनप्रवचनरहस्य कोष है उसमें सम्यग्ज्ञान वर्णन नामका दूसरा अधिकार पूर्ण हुआ ।
*
सम्यक्चारित्र - व्याख्यान
सम्यग्ज्ञान अंगीकार करनेके पश्चात् धर्मात्मा पुरुषोंको क्या करना चाहिए वही कहते हैं ।
विगलितदर्शनमोहैः समञ्जसज्ञानविदिततत्त्वार्थैः ।
नित्यमपि निःप्रकम्पैः सम्यक्चारित्रमालम्ब्यम् ॥३७॥
अन्वयार्थ : (विगलितदर्शनमोहैः) जिन्होंने दर्शनमोहका नाश कर दिया है (समञ्जसज्ञानविदिततत्त्वार्थैः) सम्यग्ज्ञानसे जिन्होंने तत्त्वार्थको जाना है (नित्यमपि निःप्रकम्पैः) जो सदाकाल अकम्प अर्थात् दृढ़चित्तवाले हैं ऐसे पुरुषों द्वारा (सम्यक्चारित्रं) सम्यक्चारित्र (आलम्ब्यम् ) अवलम्बन करने योग्य है ।
टीका : सम्यक्चारित्रं आलम्ब्यम् - सम्यक्चारित्र अंगीकार करना चाहिए । कैसे जीवोंको सम्यक्चारित्र अंगीकार करना चाहिए ? विगलितदर्शनमोहैः - जिनके दर्शनमोहका नाश हुआ है और दर्शनमोहके नाश होनेसे जो तत्त्वश्रद्धानी हुए हैं । तथा कैसे हैं ? समञ्जसज्ञानविदितत्त्वार्थैः - जिन्होंने सम्यग्ज्ञानसे तत्त्वार्थ जाना है । तथा कैसे हैं ? नित्यमपि निःप्रकम्पैः - धारण किए गए आचरणमें निरन्तर निष्कम्प हैं । जो किसी भी प्रकार ग्रहण किए हुए आचरणको नहीं छोड़ते, ऐसे जीवोंको सम्यक्चारित्र अंगीकार करना चाहिए ।
भावार्थ : पहले सम्यग्दर्शन प्राप्त करके सम्यग्ज्ञानी हो, तत्पश्चात् निश्चलवृत्ति धारण करके सम्यक्चारित्र अंगीकार करना चाहिए ॥३७॥
आगे सम्यग्ज्ञानके बाद ही सम्यक्चारित्र अंगीकार करनेका कारण कहते हैं -
न हि सम्यग्व्यपदेशं चरित्रमज्ञानपूर्वकं लभते ।
ज्ञानानन्तरमुक्तं चारित्राराधनं तस्मात् ॥३८॥
अन्वयार्थ : (अज्ञानपूर्वकंचारित्रं) अज्ञान सहित चारित्र (सम्यग्व्यपदेशं) सम्यक् नाम (न हि लभते) प्राप्त नहीं करता (तस्मात् ) इसलिए (ज्ञानानन्तरं) सम्यग्ज्ञानके पश्चात् ही (चारित्राराधानं) चारित्रका आराधन (उक्तम् ) कहा गया है ।
टीका : अज्ञानपूर्वकं चारित्रं सम्यग्व्यपदेशं न हि लभते - जिसके पूर्वमें अज्ञानभाव है ऐसा चारित्र सम्यक् संज्ञाको प्राप्त नहीं होता । प्रथम यदि सम्यग्ज्ञान न हो और पापक्रियाका त्याग करके चारित्रभार धारण करे तो उस चारित्रको सम्यक्त्वता प्राप्त नहीं होती । जैसे बिना औषधिका सेवन करे तो मरण ही हो, उसी प्रकार सम्यग्ज्ञान रहित चारित्रका सेवन करना संसारको बढ़ाता है । जीव रहित मृत शरीरमें इन्द्रियोंके आकार किस कामके ? उसी प्रकार सम्यग्ज्ञान शून्य शरीरके वेष या क्रियाकाण्डके साधनसे शुद्धोपयोगकी प्राप्ति नहीं होती । ‘तस्मात् ज्ञानानन्तरं चारित्राराधनं उक्तम्’ अतः सम्यग्ज्ञानकी प्राप्तिके पश्चात् ही चारित्रका आराधन करना कहा है ॥३८॥
चारित्रका लक्षण
चारित्रं भवति यतः समस्तसावद्ययोगपरिहरणात् ।
सकलकषायविमुक्तं विशदमुदासीनमात्मरूपं तत् ॥३९॥
अन्वयार्थ : (यतः) कारण कि (तत् ) वह (चारित्रं) चारित्र (समस्तसावद्ययोगपरिहरणात् ) समस्त पापयुक्त मन, वचन, कायके योगके त्यागसे (सकलकषायविमुक्तं) सम्पूर्ण कषाय रहित (विशदं) निर्मल (उदासीनं) परपदार्थोंसे विरक्ततारूप और (आत्मरूपं) आत्मस्वरूप (भवति) होता है ।
टीका : यतः समस्त सावद्ययोगपरिहरणात् चारित्रं भवति - समस्त पापसहित मन, वचन, कायके योगको त्याग करनेसे चारित्र होता है । मुनि पहले सामायिक चारित्र अंगीकार करता है तब ऐसी प्रतिज्ञा करता है, अहं सर्वसावद्ययोगविरतोडस्मि - मैं सर्व पापसहित योगोंका त्यागी हूँ । कैसा है चारित्र ? सकलकषायविमुक्तम् - समस्त कषायोंसे रहित है । समस्त कषायोंका अभाव होने पर यथाख्यातचारित्र होता है । तथा कैसा है ? विशदम् - निर्मल है । आत्म - सरोवर कषायरूपी कीचड़से मैला था, कषायके अभाव होने पर सहज ही निर्मलता हो गई । तथा कैसा है ? उदासीनम् - परद्रव्यसे विरक्त स्वरूप है । तत् आत्मरूपं वर्तते - वह चारित्र आत्माका स्वरूप है । कषायरहित जो आत्माका स्वरूप प्रगट हुआ है वही सदाकाल रहेगा, इस अपेक्षासे आत्माका स्वरूप है, नवीन आवरण कभी भी होगा नहीं । सामायिक चारित्रमें सकलचारित्र हुआ परन्तु संज्वलन कषायके सद्भावसे मलिनता नहीं गई, इसलिये जब सकल कषायरहित हुआ तब यथाख्यात नाम पाया, जैसा चारित्रका स्वरूप था वैसा प्रगट हुआ ।
प्रश्न : शुभोपयोगरूप भाव है वह चारित्र है या नहीं ?
उत्तर : शुभोपयोग विशुद्ध परिणामोंसे होता है और विशुद्धता मन्दकषायको कहते हैं इसलिए कषायोंकी हीनताके कारण कथंचित् चारित्र कहलाता है ।
प्रश्न : देव - गुरु - शास्त्र, शील, तप, संयमादिमें अत्यन्त रागरूप प्रवर्तन करते हुए भी उसे मन्दकषाय कैसे कह सकते हैं ?
उत्तर : विष्य - कषायादिकके रागकी अपेक्षा तो वह मन्द कषाय ही है । क्योंकि उनके रागमें क्रोध, मान, माया तो है ही नहीं, अब रहा प्रीतिभावकी अपेक्षा लोभकषाय, किन्तु वह भी सांसारिक प्रयोजनयुक्त नहीं है अतः उसकी भी मन्दता है । यहाँ भी ज्ञानी जीव रागभावसे प्रेरित होता हुआ अशुभ रागको छोड़कर शुभ रागमें प्रवर्तन करता है किन्तु उस शुभरागको उपादेयरूप श्रद्धान नहीं करता अपितु उसे अपने शुद्धोपयोगरूप चारित्रके लिए मलिनताका ही कारण जानता है । अशुभोपयोगमें तो कषायोंकी तीव्रता हुई है अतः वह तो किसी भी प्रकार चारित्र संज्ञाको प्राप्त नहीं हो सकता ॥३९॥
चारित्रके भेद
हिंसातोऽनृतवचनात्स्तेयादब्रह्मतः परिग्रहतः ।
कात्स्न्र्यैकदेशविरतेश्चारित्रं जायते द्विविधम् ॥४०॥
अन्वयार्थ : (हिंसातः) हिंसासे (अनृतवचनात् ) असत्य भाषणसे (स्तेयात् ) चोरीसे (अब्रह्मतः) कुशीलसे और (परिग्रहतः) परिग्रहसे (कात्स्न्र्यैकदेशविरते) सर्वदेश और एकदेश त्यागसे वह (चारित्रं) चारित्र (द्विविधम् ) दो प्रकारका (जायते) होता है ।
टीका : चारित्रं द्विविधं जायते - चारित्र दो प्रकारसे उत्पन्न होता है । किस प्रकारसे ? हिंसातः, अनृतवचनात्, स्तेयान्, अब्रह्मतः, परिग्रहतः कात्स्न्र्यैकदेश-विरतेः - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रहके सर्वदेश तथा एकदेश त्यागसे चारित्रके दो भेद हैं ।
भावार्थ : हिंसादिकका वर्णन आगे किया जा रहा है, इनके सर्वथा त्यागको सकलचारित्र और एकदेश त्यागको देशचारित्र कहते हैं ॥४०॥
आगे इन दोनों प्रकारके चारित्रोंके स्वामीको बताते हैं -
निरतः कात्स्न्र्यनिवृत्तौ भवति यतिः समयसारभूतोऽयम् ।
या त्वेकदेशविरतिर्निरतस्तस्यामुपासको भवति ॥४१॥
अन्वयार्थ : (कात्स्न्र्यनिवृत्तौ) सर्वथा - सर्वदेश त्यागमें (निरतः) लीन (अयं यतिः) यह मुनि (समयसारभूतः) शुद्धोपयोगरूप स्वरूपमें आचरण करनेवाला (भवति) होता है (या तु एकदेशविरतिः) और जो एकदेशविरति है (तस्यां निरतः) उसमें लगा हुआ (उपासकः) उपासक अर्थात् श्रावक (भवति) होता है ।
टीका : कार्त्स्न्यनिवृत्तौ निरतः अयं यतिः भवति - (जिसके अन्तरंगमें तो तीन कषायरहित शुद्धिका बल है तथा) पाँच पापके सर्वथा - सर्वदेश त्यागमें जो जीव लगा है वह मुनि है । अयं समयसारभूतः - यह मुनि शुद्धोपयोगरूप शुद्धात्मस्वरूप ही है । मुनि तो शुद्धोपयोगस्वरूप ही होता है, जो शुभोपयोगरूप भाव है वह भी इस मुनिकी पदवीमें कालिमा समान है । तु एकदेशविरतिः तस्यां निरतः उपासकः भवति - जो पांच पापके कथंचित् एकदेश त्यागमें लगा हुआ जीव है वह श्रावक है ।
आगे कहते हैं कि पाँच पाप एक हिंसा स्वरूप ही है :
आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात्सर्वमेव हिंसैतत् ।
अनृतवचनादिकेवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय ॥४२॥
अन्वयार्थ : (आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात् ) आत्माके शुद्धोपयोगरूप परिणामोंके घात होनेके कारण (एतत्सर्वं) यह सब (हिंसैव) हिंसा ही है । (अनृतवचनादि) असत्य वचनादिकके भेद (केवलं) केवल (शिष्यबोधाय) शिष्योंको समझानेके लिए (उदाहृतम् ) उदाहरणरूप कहे गए हैं ।
टीका : सर्वं एतत हिंसा एव - यह समस्त पाँचों पाप हिंसा ही हैं । किसलिए ? आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात् - आत्माके शुद्धोपयोगरूप परिणामोंके घातके कारण हैं अतः यह सर्व हिंसा ही हैं ।
प्रश्न : यदि हिंसा ही हैं तो अन्य भेद क्यों कहे गए ?
उत्तर : अनृतवचनादि केवलं शिष्यबोधाय उदाहृतम् - अनृतवचनादिके भेद मात्र शिष्यको समझानेके लिए उदाहरणरूपसे कहे गए हैं । जो शिष्य हिंसाके विशेषको न जाने तो उसके लिये हिंसाके उदाहरण अनृतवचनादि कहे गए हैं । हिंसाका एक भेद अनृतवचन है, एक चोरी है - इस भाँति उदाहरणरूप जानना ॥४२॥
आगे हिंसाका स्वरूप कहते हैं :
यत्खलुकषाययोगात्प्राणानां द्रव्यभावरूपाणाम् ।
व्यपरोपणस्य करणं सुनिश्चिता भवति सा हिंसा ॥४३॥
अन्वयार्थ : (कषाययोगात् ) कषायरूपसे परिणमित मन, वचन, कायके योगसे (यत् ) जो (द्रव्यभावरूपाणाम् ) द्रव्य और भावरूप दो प्रकारके (प्राणानां) प्राणोंका (व्यपरोपणस्य करणं) व्यपरोपण करना - घात करना (सा) वह (खलु) निश्चयसे (सुनिश्चिता) भलीभाँति निश्चित की गई (हिंसा) हिंसा (भवति) है ।
टीका : खलु कषाययोगात् यत् द्रव्यभावरूपाणां प्राणानां व्यपरोपणस्यकरणं सा सुनिश्चिता हिंसा भवति - निश्चयसे कषायरूप परिणमित हुए मन, वचन, कायके योगके हेतुसे द्रव्य - भावरूप दो प्रकारके प्राणोंको पीड़न करना - घात करना निश्चयसे हिंसा है ।
भावार्थ : अपने मनमें, वचनमें या शरीरमें क्रोध - कषाय प्रगट होने पर प्रथम तो अपने शुद्धोपयोग भावप्राणका घात हुआ । यह हिंसा तो अपने भावप्राणके व्यपरोपण होनेके कारण पहले ही हो गई, दूसरी हिंसा तो होवे अथवा न भी होवे । पश्चात् कदाचित् तीव्रकषायरूप होने पर अपने दीर्घश्वासादिकसे अथवा हाथ - पैरसे अपने अंगको पीड़ा उत्पन्न करे या अपघात करके मर जाय तो इसमें अपने द्रव्यप्राणके घातरूप हिंसा हुई । अथवा यदि कषायसे अन्य जीवको कुवचन कहा, मर्मभेदी हास्य किया, या ऐसा कार्य किया जिससे उसका अन्तरंग पीड़ित होकर कषायरूप परिणाम हो जायें तो परके भावप्राणके व्यपरोपणसे हिंसा होती है । जहाँ कषायके वशीभूत होकर प्रमादी हुआ, अन्य जीवके शरीरको पीड़ा पहुँचाई, अथवा प्राणनाश किया वहाँ परके द्रव्यप्राणके घातसे हिंसा हुई । इस प्रकार हिंसाका स्वरूप कहा ॥४३॥
आगे हिंसा और अहिंसाका निश्चयसे लक्षण वर्णन करते हैं :
अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति ।
तेषामेवोत्पत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः ॥४४॥
अन्वयार्थ : (खलु) निश्चयसे (रागादीनां) रागादि भावोंका (अप्रादुर्भावः) प्रगट न होना (इति) यही (अहिंसा) अहिंसा (भवति) है और (तेषामेव) उन रागादि भावोंका (उत्पत्तिः) उत्पन्न होना ही (हिंसा) हिंसा (भवति) है, (इति) ऐसा (जिनागमस्य) जैन सिद्धान्तका (संक्षेपः) सार है ।
टीका : खलु रागादीनां अप्रादुर्भावः इति अहिंसा भवति - निश्चयसे रागादि भावोंकी उत्पत्ति न होना ही अहिंसा है ।
भावार्थ : अपने शुद्धोपयोगरूप प्राणोंका घात रागादि भावोंसे होता है इसलिए रागादि भावोंका अभाव होना ही अहिंसा है । आदि शब्दसे द्वेष, मोह, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, शोक, जुगुप्सा, प्रमादादि समस्त विभावभाव जानना चाहिए । इनके लक्षण कहते हैं । अपनेको कोई (पदार्थ) इष्ट जानकर प्रीतिरूप परिणामका होना राग है, अपनेको अनिष्ट जानकर अप्रीतिरूप परिणामका होना द्वेष है, परद्रव्यमें ममत्वरूप परिणाम होना मोह है, मैथुनरूप परिणाम काम है, इसने अनुचित किया ऐसा जानकर परको दुःखदायक परिणाम क्रोध है, दूसरेसे अपनेको बड़ा मानना मान है, मन - वचन - कायमें एकताका अभाव माया है, परद्रव्यके साथ सम्बन्ध करनेकी इच्छारूप परिणाम लोभ है, भली - बुरी चेष्टा देखकर विकसितरूप परिणाम हास्य है, अपनेको दुःखदायक जानकर डररूप परिणाम भय है, अपने इष्टका अभाव होने पर आर्त्तरूप परिणाम शोक है, ग्लानिरूप परिणाम जुगुप्सा है, कल्याणकारी कार्यमें अनादर करना प्रमाद है, - इत्यादि समस्त विभावभाव हिंसाकी पर्याय हैं । इनका न होना ही अहिंसा है । तेषामेव उत्पत्तिः हिंसा - उन रागादिभावोंका उत्पन्न होना ही हिंसा है, इति जिनागमस्य संक्षेपः - ऐसा जैन सिद्धान्तका रहस्य है ।
भावार्थ : जैन सिद्धान्तका विस्तार तो बहुत है परन्तु सर्वका रहस्य संक्षेपमें इतना ही है कि धर्मका लक्षण अहिंसा - रागादिभावोंका अभाव होना वही अहिंसा । इसलिए जैसे बन सके वैसे तथा जितना बन सके उतना (स्वसन्मुखता द्वारा) रागादि भावोंका नाश करना चाहिए । वही अन्य ग्रन्थोंमें कहा है - रागादीणामणुप्पा अहिंसा गत्तति देसिदं समये । ते सिंचे दुप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठं ।
प्रश्न : हिंसाका लक्षण पर जीवके प्राणोंको पीड़ा पहुँचाना क्यों नहीं कहा ?