पाण्डव पुराण (आचार्य शुभचन्द्र), हिन्दी अनुवाद सहित | Pandav Puran (Acharya Shubhachandra)

पाण्डव पुराण (आचार्य शुभचन्द्र), हिन्दी अनुवाद सहित

रचयिता: आचार्य शुभचन्द्र भट्टारक
हिन्दी अनुवाद: पं॰ घनश्यामदास न्यायतीर्थ
प्रकाशक: जैन विद्यापीठ, सागर (म॰ प्र॰)
संस्करण: २०१७ (आवृत्ति ११००)

कौरव-पाण्डवों की उत्पत्ति, लाक्षागृह, द्यूतक्रीडा, वनवास और महाभारत युद्ध, अन्त में पाण्डवों की जिनदीक्षा, युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन का मोक्ष तथा नकुल-सहदेव की सर्वार्थसिद्धि। २५ पर्व।

Pandav Puran by Acharya Shubhachandra: the Jain telling of the Pandavas in 25 parvas, ending with their Jin diksha and moksha, with Hindi translation by Pt. Ghanshyamdas Nyayatirth.


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हर श्लोक अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

प्रथम पर्व

पाण्डव पुराण


सिद्धं सिद्धार्थसर्वस्वं सिद्धिदं सिद्धसत्पदम्। प्रमाणनयसंसिद्धं सर्वज्ञं नौमि सिद्धये ॥१॥

अर्थ: श्री सिद्ध भगवान् को प्रणाम है जो सिद्धि के दाता और भण्डार हैं, जिनके सभी कार्य सिद्ध हो चुके हैं तथा जो प्रमाण-नय से प्रसिद्ध और सर्वज्ञ हैं। वे मेरे लिए सिद्धि प्रदान करें-मुझे सिद्धि दें ॥१॥


वृषभं वृषभं भान्तं वृषभाङ्कं वृषोन्नतम्। जगत्सृष्टिविधातारं वन्दे ब्रह्माणमादिमम् ॥२॥

अर्थ: श्री आदिनाथ प्रभु को नमस्कार है, जो धर्म से सुशोभित और धर्म-तीर्थ के चलाने वाले हैं तथा जो बैल के चिह्न से युक्त और कर्मभूमि के आरम्भ में सभी व्यवस्था बताने के कारण आदि ब्रह्मा हैं। वे मेरे इस कार्य की ठीक व्यवस्था करें ॥२॥


चन्द्राभं चन्द्रशोभाढ्यं चन्द्रार्च्यं चन्द्रसंयुतम्। चन्द्रप्रभं सदाचन्द्रमीडे सच्चन्द्रलाञ्छनम् ॥३॥

अर्थ: चन्द्रमा की कान्ति के समान ही जिनके शरीर की कान्ति-आभा है, जो चन्द्रमा के चिह्न से युक्त और चन्द्र द्वारा पूज्य-स्तुत्य हैं, उन सदाचन्द्र चन्द्रप्रभ भगवान् का मैं स्तवन करता हूँ ॥३॥


शान्तिं शान्तेर्विधातारं सुशान्तं शान्तकिल्बिषम्। नंनमीमि निरस्ताघं मृगाङ्कं षोडशं जिनम् ॥४॥

अर्थ: शान्तिस्वरूप और शान्ति के विधाता सोलहवें तीर्थंकर श्रीशान्तिनाथ जिनेन्द्र की मैं स्तुति करता हूँ। वे स्वयं निष्पाप हैं और भव्य जीवों के कर्म-शत्रुओं को शान्त करने वाले हैं तथा जिनके चरण-कमलों में हिरण का चिह्न है, वे शान्तिनाथ प्रभु मुझे शान्ति दें ॥४॥


नेमिर्धर्मरथे नेमिः शास्तु शंसितशासनः। जगज्जगत्त्रयीनाथो निर्जितानङ्गसम्मदः ॥५॥

अर्थ: श्री नेमिनाथ भगवान् को मैं स्मरण करता हूँ जो धर्मरूप रथ की नेमि (धुरा) हैं, तीन लोक के स्वामी और कामदेव के मद को चकनाचूर करने वाले हैं तथा जिनके शासन की सभी सत्पुरुष प्रशंसा करते हैं-कीर्ति गाते हैं ॥५॥


वर्धमानो महावीरो वीरः सन्मतिनामभाक्। स पातु भगवान्विश्वं येन बाल्ये जितः स्मरः ॥६॥

अर्थ: जो बालपन में ही कामदेव पर विजय-लाभ कर महावीर, अतिवीर, वीर और सन्मति आदि नामों से प्रसिद्ध हुए, वे अन्तिम तीर्थंकर वर्द्धमानस्वामी मेरी रक्षा करें ॥६॥


गौतमो गोतमो गीष्पा गणेशो गणनायकः। गिरां गणनतो नित्यं भातु भाभारभूषितः ॥७॥

अर्थ: चार ज्ञानों के धारक गौतम नाम गणधर को नमस्कार है, जो संघ के अधिपति होने से गणनायक और गणेश कहे जाते हैं तथा दिव्यवाणी द्वारा हमेशा तत्त्वों की गणना करते रहने के कारण विद्वान् लोग जिन्हें वाचस्पति कहते हैं, वे प्रतिभा के पुंज मुझे प्रतिभा प्रदान करें ॥७॥


युधिष्ठिरं कर्मशत्रुयुधि स्थिरं स्थिरात्मकम्।
दधे धर्मार्थसंसिद्धं मानसे महितं मुदा ॥८॥

अर्थ: जो कर्म-शत्रुओं के साथ लड़ाई में स्थिर बने रहकर आत्मस्वरूप में स्थिर (लीन) हो चुके हैं, वे परम पूज्य युधिष्ठिर मेरे मनमन्दिर में विराजे और धर्म, अर्थ की सिद्धि में मेरी सहायता करें ॥८॥


भीमं महामुनिं भीमं पापारिक्षयकारणे।
संसारासातशान्त्यर्थं दधे हृदि धृतोन्नतिम् ॥९॥

अर्थ: उन भीम महामुनि को मैं याद करता हूँ, जो कर्म-शत्रुओं को जीतने में भीम-भयंकर योद्धा-धीर-वीर और तेज वाले हैं, वे मेरे पापकर्मों को हरें ॥९॥


अर्जुनस्य प्रसिद्धस्य विशुद्धस्य जितात्मनः।
स्मरामि स्मरमुक्तस्य स्मररूपस्य सुस्मृतेः ॥१०॥

अर्थ: जो कामदेव से रहित और कामदेव की तरह सुन्दर रूप वाले हैं, संसार-प्रसिद्ध और विशुद्ध परिणामी हैं, वे आत्मसंयमी अर्जुन मुनि मेरे हृदय में निवास करें ॥१०॥


नकुलो वै सदा देवैः सेवितः शुद्धशासनः।
सहदेवो बली कौल्यो मलनाशी विभाति च ॥११॥

अर्थ: देवतागण जिनकी सदा सेवा करते हैं तथा जिनका शासन निर्दोष है, वे नकुल और कुल के कलंक को दूर करने वाले सहदेव भी मेरे हृदय में विराजें ॥११॥


भद्रबाहुर्महाभद्रो महाबाहुर्महातपाः।
स जीयात्सकलं येन श्रुतं ज्ञातं कलौ विदा ॥१२॥

अर्थ: उन भद्रबाहु श्रुतकेवली की जय हो, जो महान् तपस्वी और कल्याण के पुंज हैं और संसारी दीन-दुखी जीवों को सहारा देने के कारण जिन्हें महाबाहु कहते हैं तथा जो इसी कलिकाल में ज्ञानरूपी नौका पर सवार हो-श्रुतज्ञान सागर से पार हुए हैं, वे मुझे ज्ञान-दान दें ॥१२॥


विशाखो विश्रुता शाखा सुशाखो यस्य पातु माम्।
स भूतले मिलन्मौलिहस्तभूलोकसंस्तुतः ॥१३॥

अर्थ: जिनकी शिष्य-परम्परा संसार-प्रसिद्ध है और जिन्हें सारा संसार हाथ जोड़ नमस्कार करता है, वे स्वामी कार्तिकेय मुनि मेरी सहायता करें ॥१३॥


कुन्दकुन्दो गणी येनोर्ज्ययन्तगिरिमस्तके।
सोऽवताद्वादिता ब्राह्मी पाषाणघटिता कलौ ॥१४॥

अर्थ: उन कुन्दकुन्द स्वामी की जय हो, जिन्होंने गिरनार पर्वत के शिखर पर पत्थर की बनी हुई ब्राह्मी देवी से यह साक्षी दिलवाई कि “दिगम्बर धर्म पहले का है ॥१४॥”


समन्तभद्रो भद्रार्थो भातु भारतभूषणः।
देवागमेन येनात्र व्यक्तो देवागमः कृतः ॥१५॥

अर्थ: देवागम के जैसा महत्त्व वाला स्तोत्र बनाकर जिन्होंने देव-आप्त विषय के सिद्धान्त को खूब ही माँज डाला, सन्देह रहित कर दिया तथा जिनके सभी काम कल्याणरूप हैं, वे भारत-भूषण समन्तभद्र स्वामी सारे संसार को सुखी करें ॥१५॥


पूज्यपादः सदा पूज्यपादः पूज्यैः पुनातु माम्।
व्याकरणार्णवो येन तीर्णो विस्तीर्णसद्गुणः ॥१६॥

अर्थ: पूज्य पुरुष भी जिनके पादों-चरणों को पूजते हैं और इसी कारण जिनका ‘पूज्यपाद’ नाम सार्थक है तथा जो न्याय-व्याकरण आदि अनेक शास्त्रों के पूर्ण ज्ञाता हुए हैं और जिनके उत्तम गुण पृथिवी पर निर्मल चाँदनी की भाँति प्रकाशित हो रहे हैं, उन जगत्पूज्य पूज्यपाद स्वामी की जय हो ॥१६॥


अकलङ्कोऽकलङ्कः स कलौ कलयतु श्रुतम्। पादेन ताडिता येन मायादेवी घटस्थिता ॥१७॥

अर्थ: वे कलंक-रहित अकलंकदेव मुझे ज्ञानदान दें, जिन्होंने घड़े में बैठी हुई मायादेवी को बात ही बात में चुप कर दिया, हरा दिया और संसार में जैनधर्म की ध्वजा फहरा कर प्रभावना की ॥१७॥


जिनसेनयतिर्जीयाज्जिनसेनः कृतं वरम्। पुराणपुरुषाख्यार्थपुराणं येन धीमता ॥१८॥

अर्थ: उन जिनसेन यति की जय हो, जो वास्तव में जिनसेन हैं अर्थात् सम्यग्दृष्टि आदि में मुख्य हैं तथा सरस्वती के मन्दिर हैं और जिन्होंने पुण्य-पुरुषों के चरितों को गूँथकर अथाह पुराण-समुद्र को जन्म दिया ॥१८॥


गुणभद्रभदन्तोऽत्र भगवान्भातु भूतले। पुराणाद्रौ प्रकाशार्थं येन सूर्यायितं लघु ॥१९॥

तत्पुराणार्थमालोक्य धृत्वा सारस्वतं श्रुतम्। मानसे पाण्डवानां हि पुराणं भारतं ब्रुवे ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 19 से 20): वे गुणभद्र भदन्त मेरी सहायता करें, जो पुराण-रूप पहाड़ पर प्रकाश डालने के लिए सूरज के तुल्य हैं। उनके पुराण को देखकर तथा अन्य संसार-प्रसिद्ध कथा के आधार पर यह पाण्डव-पुराण नाम ग्रन्थ लिखा जाता है। इसका दूसरा नाम भारत या महाभारत है ॥१९-२०॥


पुराणाब्धिः क्व गम्भीरः क्व मेऽत्र धिषणा लघु। अतोऽतिसाहसं मन्ये सर्वझर्झरदायकम् ॥२१॥

अर्थ: इतना भारी गहरा यह पुराण-समुद्र कहाँ ? और इसकी थाह लेने को सर्वथा असमर्थ मेरी तुच्छ बुद्धि कहाँ? इन दोनों की कुछ भी बराबरी नहीं, तो भी इस ग्रन्थराज के कहने का मैंने जो साहस किया है, वह मेरा अति साहस है ॥२१॥


जिनसेनादयोऽभूवन्कवयः शास्त्रपारगाः। तदङ्घ्रिस्मरणानन्दात्करिष्ये तत्कथां पराम् ॥२२॥

अर्थ: इसे देखकर लोग हँसेंगे तो सही, परन्तु फिर भी शास्त्र-पारंगत पुराने जिनसेन आदि महाकवियों का स्मरण करने से मुझे जो पुण्य-लाभ हुआ है, उसके बल से मैं इस ग्रन्थ-समुद्र में अवगाहन करता हूँ, इसके लिखने का साहस करता हूँ ॥२२॥


यथा मूको विवक्षुः सन्याति हास्यं जगतत्रये। तथा शास्त्रं विवक्षुः सन् लोकेऽहं हास्यभाजनम् ॥२३॥

यथा जिगमिषुः पङ्गुर्मेरुमूर्धानमुन्नतम्। विहस्यते जनैः शास्त्रं चिकीर्षुश्चाहमञ्जसा ॥२४॥

यतेऽहं च तथाप्यत्र शास्त्रं कर्तुमशक्तितः। क्षीणा धेनुर्यथा वत्सं पाति दुग्धप्रदानतः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 23 से 25): जिस तरह बोलने की इच्छा करने वाले गूंगे और भारी ऊँचे सुमेरु पर्वत पर चढ़ जाने की इच्छा करने वाले पंगु पुरुष की लोग हँसी उड़ाते हैं, उसी तरह इस अति साहस के लिए वे मेरी भी हँसी उड़ावें तो यह कोई नई बात नहीं अथवा जैसे एक दुबली-पतली गाय भी दूध पिलाकर अपने बछड़े को पालने का भरसक प्रयत्न करती है, वैसे ही यद्यपि मैं अल्पज्ञ हूँ तो भी अपनी शक्ति के अनुसार इसके लिखने का प्रयत्न करता हूँ ॥२३-२५॥


पूर्वाचार्यकृतार्थस्य प्रकाशनविधौ यते। ब्रध्नप्रकाशितं ह्यर्थं दीपः किं न प्रकाशयेत् ॥२६॥

अर्थ: इस ग्रन्थ में जो कुछ भी लिखा जायेगा उसमें यद्यपि पुराने महर्षियों की कृति से कोई नयापन न होगा तो भी इसकी उपादेयता में कमी न आयेगी क्योंकि दीपक सूरज के द्वारा प्रकाशित पदार्थों को ही प्रकाशित करता है और तब भी वह उपादेय होता है ॥२६॥


वक्राकूतास्तु बहवः कवयोऽन्ये स्वभावतः।
स्वल्पा यथा पलाशाद्या आम्राद्याश्च त्रिविष्टपे ॥२७॥

सन्ति सन्तः कियन्तोऽत्र काव्यदूषणवारकाः।
स्वर्णं मलं यथा नित्यं शोधयन्ति धनञ्जयाः ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 27 से 28): यद्यपि संसार में पलाश आदि के निःसार और निरर्थक वृक्षों के समान खोटे स्वभाव वाले कवि बहुत हैं और आम आदि उत्तम वृक्षों के समान उत्तम स्वभाव वाले कम, तो भी कितने ही सत्पुरुष अब तक मौजूद हैं जो सोने में से मैल को साफ करने वाली आग की भाँति कविता के दोषों को छोड़कर उसके गुणों पर ही दृष्टि देते है और उसका आदर करते हैं ॥२७-२८॥


असन्तश्च स्वभावेन परार्थं दूषयन्त्यहो।
दिवान्धा द्वादशात्मानं यथा दूषणदूषिताः ॥२९॥

वह्नयो दाहका नूनं तृषादुःखानिवारकाः।
पयोधराः शीतलास्तद्वत् सन्तः सन्ति च भूतले ॥३०॥

यथा मत्ता न जानन्ति हेयाहेयविवेचनम्।
तथा खलाः खलं लोकं कुर्वन्ति खलु केवलम् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 29 से 31): परन्तु असत्पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे सूरज को दोष देने वाले उल्लू पक्षी की तरह दूसरों की कृति को दोष-ही-दोष दिया करते हैं-उन्हें गुण तो सूझते ही नहीं क्योंकि उनका स्वभाव ही उस आग की तरह है जो जलाकर दाह पैदा करती है और सत्पुरुषों का स्वभाव उन मेघों के समान होता है जो निरपेक्ष भाव से लोगों को ठंडा और मीठा जल पिलाकर उनकी प्यास को बुझा देते हैं ॥२९-३०॥ दुष्ट पुरुष मद वाले पुरुष के समान होते हैं। वे कभी हेय-उपादेय और हित-अहित का विचार ही नहीं करते किन्तु अपने दुष्ट स्वभाव से सारे संसार को दुष्ट बना डालने की चेष्टा में लगे रहते हैं ॥३१॥


पयोधरा धरां धृत्या धरन्त्यम्बुप्रदानतः।
सज्जनास्तु जनान्सर्वास्तथा सत्तथ्यशिक्षया ॥३२॥

सर्पो विषकणं दत्ते सुधां चामृतदीधितिः।
खलोऽसाताय कल्पेत सज्जनस्तु हिताप्तये ॥३३॥

खलेतरस्वभावोऽयं ज्ञातव्यो ज्ञानकोविदैः।
अलं तेन विचारेण वयं लघु हितैषिणः ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 32 से 34): सज्जन पुरुष समय पर बरसने वाले मेघों के समान होते हैं। वे अपने अमूल्य और उदार उपदेशों के द्वारा लोगों को हित की ओर झुकाने की चेष्टा कर उन्हें सुखी बनाने में लगे रहते हैं ॥३२॥ तथा जिस तरह सांप विष और चन्द्रमा अमृत देता है उसी तरह दुष्ट लोग संसार को दुख और सज्जन लोग सुख देते हैं ॥३३॥ इस प्रकार सुजन और दुर्जन के स्वभाव का जो यह विचार किया गया है। इस पर पाठक ध्यान देंगे और इससे वे बहुत लाभ उठावेंगे ॥३४॥


षड्विधाख्यायते व्याख्या व्याख्यातैस्तत्र मङ्गलम्।
निमित्तं कारणं कर्ताभिधानं मानमेव च ॥३५॥

अर्थ: आचार्यों का मत है कि हर एक कथा में नीचे लिखी छह बातें अवश्य ही होनी चाहिए क्योंकि इनके बिना कथा की कुछ भी कीमत नहीं ॥३५॥


इतिहाससमुद्रेऽस्मिन्मङ्गलं गदितं पुरा।
यज्जिनेन्द्रगुणस्तोत्रं मलक्षालनयोगतः ॥३६॥

अर्थ: १. मंगल-जिनेन्द्रदेव के गुण-गान को मंगल कहते है, कारण मंगल का जो मल-गालन-पाप विनाशन-रूप-अर्थ है वह उसमें मौजूद है क्योंकि इस मंगल से भव्य जीवों का कर्म-मल धुल जाता है। यह मंगल इस इतिहास-समुद्र की आदि में किया जा चुका है ॥३६॥


यन्निमित्तमुपादाय मीयते शास्त्रसंचयः ।
तन्निमित्तं मतं मान्यैः पापपङ्कनिवारकम् ॥३७॥

अर्थ: २. निमित्त-ग्रन्थ के रचे जाने का निमित्त पाप का विनाश माना गया है और वह इस इतिहास में मौजूद है क्योंकि इसको बनाने से मेरे और सुनने से श्रोताओं के पाप-कर्म हलके होंगे ॥३७॥ ३. कारण-ग्रन्थ-रचना का कारण भव्य जीवों के चित्त का समाधान हो जाना गया। वह भी इस ग्रन्थ में विद्यमान है क्योंकि यह कथा प्रसिद्ध श्रोता श्रेणिक राजा के प्रश्न करने पर उनके चित्त के समाधान करने को श्री महावीर प्रभु ने कही थी ॥३७॥


कारणं कृतिभिः प्रोक्तं भव्यवृन्दं समुद्धृतम् ।
यथात्र श्रुतिसंधानः श्रेणिकः श्रेयसे श्रुतः ॥३८॥

अर्थ: ४. कर्ता-इस ग्रन्थ के मूलकर्ता तो तीर्थंकर भगवान् है और उत्तर-कर्ता गौतम स्वामी तथा विष्णुनन्दि, अपराजित, गोवर्द्धन, भद्रबाहु आदि श्रुतकेवली और ऋषि-गण हैं ॥३८॥


कर्ता श्रुतौ श्रुतस्तत्र मूलकर्ता जिनेश्वरः ।
गौतमोऽप्युत्तरः कर्ता कृतिनां संमतो मुदा ॥३९॥

अर्थ: ५. अभिधान-इस ग्रन्थ का नाम पाण्डव-पुराण है क्योंकि इसमें पुराण पुरुषों की कथा कही गई है, इस लिए तो यह पुराण है और वे पुराण-पुरुष पाण्डव हैं, इसलिए इसका नाम पाण्डव-पुराण पड़ा है ॥३९॥


उत्तरोत्तरकर्तारो विष्णुनन्द्यपराजिताः ।
गोवर्धनो भद्रबाहुर्बहवोऽन्ये तदादयः ॥४०॥

अर्थ: ६. संख्या-अर्थतः तो इसकी संख्या अनंत है, पर अक्षर-रचना के हिसाब से संख्यात ही है ॥४०॥


नाम्ना पुराणमर्थाढ्यं पाण्डवानां सुपण्डितैः ।
मतं पाण्डुपुराणाख्यं पुरुपौरुषसंगतम् ॥४१॥

संख्यया चार्थतोऽनन्तं संख्याताक्षरसंख्यया ।
संख्यातं क्षिप्रमाख्यातं पुराणं पूर्वसूरिभिः ॥४२॥

षोढा संधा पुराणस्य ज्ञात्वा व्याख्येयमञ्जसा ।
पञ्चधा तत्पुनः प्रोक्तं द्रव्यक्षेत्रादिभेदतः ॥४३॥

इति सर्वं समालोच्य पुराणं प्रोच्यते बुधैः ।
वक्ता श्रोता कथास्तत्र विचार्याश्चारुलक्षणाः ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 41 से 44): इन छह बातों का विचार कर ही पुराणकार को पुराण की रचना करनी चाहिए। इसी नियम के अनुसार यहाँ इन पर विचार किया गया है। पर ध्यान रहे कि ये बातें द्रव्य, क्षेत्र, तीर्थ, काल और भाव के भेद से पाँच ही हैं। यह सब विचार कर ही पुराणकार अपने पुराण को आरम्भ करते हैं और श्रोताओं के मनोविनोद के लिए उसकी आदि में वक्ता, श्रोता और कथा का भी विचार कर लेते हैं। उसी के अनुसार यहाँ भी वक्ता आदि के स्वरूप पर विचार किया जाता है ॥४१-४४॥


वक्ता व्यक्तं वदेद्वाक्यं वाग्मी धीमान् धृतिकरः ।
शुद्धाशयो महाप्राज्ञो व्यक्तलोकस्थितिः पटुः ॥४५॥

प्राप्तशास्त्रार्थसर्वज्ञः प्रास्ताशः प्रशमाङ्कितः ।
जितेन्द्रियो जितात्मा च सौम्यमूर्तिः सुदृक् शुभः ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 45 से 46): वक्ता-उपदेश देने वाला-वह अच्छा है जो शुद्ध और साफ बोलने वाला, व्याख्याता, धीर-वीर, बुद्धिमान् और साफ-स्वच्छ अभिप्रायों वाला हो, जिसे लोक व्यवहार का पूरा-पूरा ज्ञान हो, जो चतुर हो, पूरा विद्वान् और शास्त्रों के रहस्य की जानने वाला हो, निस्पृह तथा मंद कषायों वाला हो, जिसकी इंद्रियाँ वश में हों और जो आत्म-संयमी हो, शान्त-मूर्ति, सुन्दर एवं मनोहर नेत्रों वाला और देखने


तीर्थतत्त्वार्थविज्ञानी षण्मतार्थविचक्षणः।
नैयायिकः स्वान्यमतवादिसेवितशासनः ॥४७॥

सब्रतो व्रतिभिः सेव्यो जिनशासनवत्सलः।
लक्षणैर्लक्षितो दक्षः सुपक्षः क्षितिपैः स्तुतः ॥४८॥

सदा दृष्टोत्तरः श्रीमान्सुकुलो विपुलाशयः।
सुदेशजः सुजातिश्च प्रतिभाभरभूषणः ॥४९॥

विशिष्टोऽनिष्टनिर्मुक्तः सम्यग्दृष्टिः सुमृष्टवाक्।
सर्वैष्टस्पष्टगमको गरिष्ठो हृष्टमानसः ॥५०॥

वादीशो वादिवारेण वन्दितः कविशेखरः।
परनिन्दातिगः शास्ता गुरुः सच्छीलसागरः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 45 से 51): में प्यारा लगता हो, जिसे संसार-समुद्र से पार करने वाले तत्त्वों का पूरा-पूरा ज्ञान हो, जो छहों मत और न्याय का पूर्ण विद्वान् हो, जिसके मत को सभी मानते हों, जो स्वयं व्रतों का धारक और व्रती पुरुषों द्वारा मान्य हो, जिन आगम का प्रेमी, चतुर और उत्तम लक्षणों वाला हो, राजा लोग जिसका सत्कार करते हों, जिसका पक्ष समर्थ शक्ति वाला हो, जो प्रश्नों का पहले से ही उत्तर जानने वाला, सुन्दर और कुलीन हो, अपने देश और अपनी जाति का हो, प्रतिभा वाला, शिष्टाचारी और अनिष्ट-आपत्ति वगैरह से रहित हो, सम्यग्दृष्टि और मीठा बोलने वाला हो, सबको प्यारा और खूब समझाने वाला हो, गौरवशाली और प्रसन्न चित्त हो, वादियों का स्वामी और उनके ऊपर अपना प्रभाव डालने वाला हो, जो कवियों में उत्तम और दूसरों की निंदा नहीं करने वाला हो और शील का सागर, गुरु और शास्ता हो ॥४५-५१॥


श्रोता प्रशस्यते शीललीलालङ्कृतविग्रहः।
सद्भिः सुदर्शनः श्रीमान्नानालक्षणलक्षितः ॥५२॥

दाता भोक्ता व्रताधिष्ठो विशिष्टजनजीवनः।
पूर्णाक्षः पूर्णचेतस्को हेयादेयार्थदृक् शुचिः ॥५३॥

शुश्रूषाश्रवणाधारो ग्रहणे धारणे स्मृतौ।
ऊहापोहार्थविज्ञानी सदाचाररतश्च सः ॥५४॥

सत्कलाकुशलः कौल्यो गुर्वाज्ञाप्रतिपालकः।
विवेकी विनयी विद्वांस्तत्त्वविद्विमलाशयः ॥५५॥

सावधानो विधानज्ञो विबुधो बन्धुरः सुधीः।
दयादत्तिप्रधानश्च जिनधर्मप्रभावकः ॥५६॥

सदाचारो विचारज्ञो धर्मज्ञो धर्मसाधनः।
क्रियाग्रणीः सुगीर्मान्यो महतां मानवर्जितः ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 52 से 57): श्रोता-उपदेश सुनने वाला-वह अच्छा है जो शील से विभूषित और सम्यक्त्व से युक्त हो, सुन्दर हो, दाता हो, भोक्ता और नाना लक्षणों वाला हो, व्रतों का धारक, धर्मात्मा पुरुषों को आश्रय देन वाला और परिपूर्ण इंद्रियों वाला हो, उदार और पवित्र चित्त हो, हेय-उपादेय का जानने वाला हो, शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण और स्मरण इनमें प्रवीण हो, तर्क-वितर्क के द्वारा हर एक पदार्थ का विचार करने वाला हो, तत्त्वज्ञानी और तत्त्व-चर्चा का प्रेमी हो, कुलीन, प्रवीण और गुरु की आज्ञा का पालक हो एवं विवेकी और विनयी हो, स्वच्छ अभिप्रायों वाला हो, सावधान और क्रियाकांड का पूरा-पूरा जानकार हो, सुन्दर और सम्यग्ज्ञानी हो, दयालु और दया कर दीन-दुखी और भूखे जीवों को दान देने वाला हो, जैनधर्म की प्रभावना करने वाला, सदाचारी, विचार वाला और धर्मज्ञ तथा धर्मात्मा हो, हर एक क्रिया आदि चारित्र के पालने में अगुआ हो, मीठा बोलने वाला हो, जिसको सत्पुरुष मानते हों और जो अभिमान रहित-सरल स्वभाव वाला हो ॥५२-५७॥


शुभाशुभादिभेदेन श्रोतारो बहवो मताः।
हंसधेनुसमाः श्रेष्ठा मृच्छुकाभाश्च मध्यमाः ॥५८॥

मार्जारजशिलासर्पकङ्कच्छिद्रघटैः समाः।
चालिनीदंशमहिषजलौकाभाश्च तेऽधमाः ॥५९॥

असच्छ्रोतरि निर्णाशमुक्तं शास्त्रं भजेद्यथा।
जर्जरे चामपात्रे वा पयः क्षिप्तं कियत्स्थिति ॥६०॥

सद्ग्रे कथितं शास्त्रं गुरुणा सार्थकं भवेत्।
सुभूमौ पतितं बीजं फलवज्जायते यथा ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 58 से 61): उस श्रोता के शुभ, अशुभ आदि बहुत भेद हैं। हंस, गाय आदि के स्वभाव समान श्रोता उत्तम हैं। मिट्टी, तोता आदि के स्वभाव-समान श्रोता मध्यम तथा बिल्ली, बकरा, शिला, साँप, कौआ, छेद वाला घड़ा, चलिनी, डाँस, भैंसा और जोंक (गोंच) के स्वभाव-समान श्रोता अधम हैं। असत् श्रोताओं को उपदेश देना-शास्त्र सुनाना-व्यर्थ है क्योंकि जैसे टूटे-फूटे घड़े में पानी नहीं ठहरता वैसे ही उनके हृदय पर उपदेश का कुछ भी असर नहीं होता और सत् श्रोताओं को दिया हुआ उपदेश उपजाऊ भूमि में बोये हुए बीज की भाँति कई गुणा फलता है ॥५८-६१॥


कथा वाक्यप्रबन्धार्था सत्कथा विकथा च सा।
द्विधा प्रोक्ता सुकथ्यन्ते यत्र तत्त्वानि सा कथा ॥६२॥

व्रतध्यानतपोदानसंयमादिप्ररूपिका।
पुण्यपापफलावाप्तिः सत्कथा कथ्यते जिनैः ॥६३॥

विचित्राणि चरित्राणि चरमाङ्गादिदेहिनाम्।
कथ्यन्ते सत्कथा सद्भिर्यत्र धर्मार्थवर्धिनी ॥६४॥

अर्थ (श्लोक 62 से 64): कथा-वाक्यों की रचना के द्वारा किसी पदार्थ के वर्णन करने को कथा कहते हैं। कथा के दो भेद हैं, एक सत्कथा और दूसरी विकथा। सत्कथा वह है जिसमें व्रत, ध्यान, तप, दान और संयम आदि तथा पुण्य-पाप का फल और चरम शरीरी आदि पुरुषों के विचित्र चरितों का वर्णन हो। सत्कथा को कहने या सुनने से धर्म-अर्थ की वृद्धि होती है, सुख मिलता है। उसके चार भेद हैं। उनको भी सुनिए ॥६२-६४॥


द्रव्यं क्षेत्रं तथा तीर्थं संवेगो जायते यथा।
सत्कथा सोच्यते शास्त्रे संवेगार्थप्रवर्धिनी ॥६५॥

वृषो वृषफलं यत्र वर्ण्यते विबुधैर्नरैः।
निर्वेगाय सुवेगेन कथा निर्वेजिनी मता ॥६६॥

स्वतत्त्वानि व्यवस्थाप्य परतत्त्वविनाशिनी।
ऊहापोहार्थविज्ञानं सा कथा कथिता जिनैः ॥६७॥

सम्यक्त्वगुणसंपूर्णा बोधवृत्तसमन्विता।
नानागुणसमाकीर्णा सा कथा गुणवर्धिनी ॥६८॥

वशिष्टवेदसद्व्यासद्वैपायनसमुद्भवा।
कल्पनाकल्पिता प्रोक्ता विकथा पङ्कवर्द्धिनी ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 65 से 69): जिस कथा से राग भाव घटकर संवेग की वृद्धि हो वह संवेगिनी कथा है। जिसमें धर्म तथा धर्म के फल का और वैराग्य का कथन हो वह निर्वेजिनी कथा है तथा जिसमें तर्क-वितर्क के द्वारा स्याद्वाद-कथंचित् मत का मंडन और दूसरे कपोल-कल्पित मिथ्या मतों का खण्डन किया गया हो वह आक्षेपिनी कथा है। इसको कहने या सुनने से ज्ञान का विकास होता है और जिसमें रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र) का निरूपण और मिथ्यात्व आदि का खण्डन किया गया हो वह विक्षेपिनी कथा है। इन गुणों की खान कथा के कहने या सुनने से गुणों की वृद्धि होती है। विकथा-खोटी कथा वह है जो मिथ्यात्वियों-व्यास आदि झूठे लोगों की गढ़ी हुई कपोल-कल्पित बातों से भरी हुई हो। विकथा के कहने या सुनने से पाप बंध और पुण्य क्षीण होता हैं। हर एक सत्कथा के


द्रव्यं क्षेत्रं तथा तीर्थं कालो भावस्तथा फलम्।
प्रकृतं सप्त चाङ्गान्याहुरमूनि कथामुखे ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 65 से 70): आरम्भ में जिन सात अंगों का होना अतीव उपयोगी और आवश्यक है वे ये है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, तीर्थ, फल और प्रकृत। इसी नियम को लेकर यहाँ सब कुछ लिखा गया है। अब इस पवित्र पुराण का आरम्भ किया जाता है ॥६५-७०॥


इत्याख्याय कथासारं पुराणं पावनं परम्।
पुराणपुरुषाणां हि प्रोच्यते भारताभिधम् ॥७१॥

अथ जम्बूमति द्वीपे विस्तीर्णे विबुधैर्जनैः।
भारतं सस्यमाभाति भारतीभरभूषितम् ॥७२॥

धैर्यवर्यार्यखण्डेऽस्मिन्नार्यखण्डे सुमण्डिते।
अखण्डाखण्डलाकारैर्जनैर्जीवनदायिभिः ॥७३॥

विदेहविषयो भाति विशिष्टैर्देहसद्गुणैः।
विदेहा यत्र जायन्ते नरा नार्यश्च नित्यशः ॥७४॥

विदेहा यत्र जायन्ते धन्या ध्यानाग्नियोगतः।
तपसातो जनैर्योग्यैर्विदेहो विषयो मतः ॥७५॥

अर्थ (श्लोक 71 से 75): जम्बूद्वीप एक प्रसिद्ध और सुन्दर द्वीप है। वह सत्पुरुषों का निवास और सम्पत्ति का खजाना है। उसमें भरत नाम एक पवित्र और मनोहर क्षेत्र है। वह भारती-सरस्वती से विभूषित अतिशय शोभा वाला है। इसके छह खण्ड है। उनमें एक आर्यखण्ड हैं। वह धीर-वीर और इन्द्र जैसी विभूति वाले परोपकारी आर्य पुरुषों का निवास है। वहाँ के आर्य पुरुष अभयदान देने वाले और धर्मात्मा हैं। आर्यखण्ड में विदेह नाम एक मनोहर देश है। वह भी सुन्दर और उत्तम गुणों से युक्त नर-नारियों से विभूषित है। वहाँ के नर-नारियों की किसी भी बात की कमी नहीं है। वे हमेशा अमन-चैन से अपना समय बिताते हैं। वहाँ से लोग सदा काल विदेह (मुक्त) होते हैं। वहाँ के पुण्य-पुरुष ध्यानाग्नि और कठिन तपस्या के द्वारा कर्म-ईंधन को जलाकर विदेह-मुक्ति अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं और जान पड़ता है कि इसलिए इस देश का नाम विदेह पड़ा है ॥७१-७५॥


कुण्डाख्यं मण्डनं भूमेः पत्तनं तत्र राजते।
सत्तमैः सकलैः पूर्णं राजराजपुरोपमम् ॥७६॥

सिद्धार्थःसिद्धसर्वार्थः सिद्धसाध्यः सुसिद्धिभाक्।
नाथवंशोद्भवो नाथो भूनाथः पाति तत्पुरम् ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 76 से 77): विदेह देश में पृथ्वी का भूषण कुंडलपुर नाम एक सुन्दर नगर है। उसमें जो उत्तम-उत्तम पुरुष निवास करते हैं उनसे वह ऐसा जान पड़ता है कि मानो वह इन्द्र आदि देवता-गण का निवास-स्थान अमरावती ही है। कुंडलपुर के राजा सिद्धार्थ थे। वे नाथवंशी थे। उनके सभी मनोरथ सफल थे-उन्हें किसी भी बात की कमी न थी। उनकी रानी का नाम त्रिशलादेवी था। वे नदी की तुलना करती थीं ॥७६-७७॥


चेटकाद्रिसमुत्पन्ना सिद्धार्थार्णवगाहिनी।
तटिनीव नरेशस्य प्रियाभूत्प्रियकारिणी ॥७८॥

विशुद्धकुलसंपन्ना गुणखानिर्गुणाकरा।
सकला कुशला कार्ये त्रिशला या सुशोभते ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 78 से 79): जिस भाँति नदी पहाड़ से निकल समुद्र में जाकर गिरती है उसी भाँति वे भी चेटक-रूप पहाड़ से उत्पन्न हो सिद्धार्थ समुद्र में जाकर मिल गई थीं। नदी समुद्र की प्रिया होती है, वे सिद्धार्थ समुद्र की प्यारी थीं और इसी कारण लोग उन्हें प्रियकारिणी भी कहते थे। वे उच्च कुल में पैदा हुई थीं। उत्तम गुणों की खान और भण्डार थीं। वे सभी कलाओं में प्रवीण और हर एक काम में चतुर थीं। भगवान्


सेविता दिव्यकन्याभिर्धनदैर्धनसंचयैः। उपासिता सदा देवैः षण्मासान्या च पूर्वतः ॥८०॥

सा सुप्ता शयने शान्ता मातङ्गं गां हरिं रमाम्। दाम्नी चन्द्रं दिवानाथं मीनौ कुम्भं सरोवरम् ॥८१॥

वार्द्धिं सिंहासनं व्योमयानं भूमिगृहं पुनः। रत्नौघमग्निममैक्षिष्ट स्वप्नान्षोडश चेत्यमून ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 78 से 82): महावीर छह महीने बाद उनके गर्भ में आने वाले थे, पर इसके पहले ही से छप्पन देवकुमारियाँ उनकी सेवा-उपासना-करती थीं तथा कुबेर आदि देवता-गण भी भाँति-भाँति की दिव्य वस्तुएँ ला-लाकर उनकी उपासना करते थे। एक समय त्रिशलादेवी अपने शयनागार में पलंग पर सुख की नींद में सोई हुई थीं। रात का पिछला पहर था। इस समय उन्होंने सोलह स्वप्नों को देखा। वे स्वप्न ये थे। हाथी, बैल, सिंह, लक्ष्मी, भाला युगल, चंद्रमा, सूरज, मछली-युगल, कलश, तालाब, समुद्र, सिंहासन, व्योमयान (देवों का विमान), भूमिगृह (धरणेन्द्र का विमान), रत्नराशि और अग्नि ॥७८-८२॥


प्रबुद्धा नाथतो नूनं तत्फलानि निशम्य च। पुष्पकात्प्रच्युतं देवं सा दधे गर्भपङ्कजे ॥८३॥

आषाढे सितषष्ठ्यां च हस्तभे हस्तिगामिनी। सुहस्ता हस्तिसंरूढैः सुरैः संप्राप्तपूजना ॥८४॥

अर्थ (श्लोक 83 से 84): प्रातःकाल महारानी ने इन स्वप्नों का फल सिद्धार्थ महाराज से पूछा। उन्होंने उनका फल कहकर रानी को सन्तुष्ट किया। इसी समय कोमल हाथ-पाँव वाली और गजगामिनी त्रिशलादेवी ने स्वर्ग के पुष्पक विमान से चयकर आये हुए एक भाग्यवान् देव को अपने गर्भ-कमल में धारण किया। इस दिन आषाढ़ सुदी छट और हस्त नक्षत्र था। इसके बाद वीरप्रभु का गर्भोत्सव करने के लिए इन्द्र वगैरह देवता-गण गजों तथा अन्य-अन्य वाहनों पर सवार हो-हो कर स्वर्ग से कुंडलपुर आये और उन्होंने वहाँ भगवान् का खूब गर्भोत्सव मनाया तथा भगवान् की माता की भारी भक्ति से पूजा की ॥८३-८४॥


जज्ञे सा सुसुतं चैत्रे त्रयोदश्यां सितेऽहनि। चतुर्दश्यां सुतो लेभे मेरौ स्नानं सुरेन्द्रतः ॥८५॥

वर्धमानाख्यया ख्यातः क्षितौ क्षिप्तरिपूत्करः। त्रिंशद्वर्षं कुमारत्वे सातं सिवे स शुद्धधीः ॥८६॥

किंचिद्धेतुं हितं वाञ्छन् हेतुं वैराग्यसंततेः। वीक्ष्य दक्षः स आचख्यौ वैराग्यं स्वस्य सज्जनान् ॥८७॥

अर्थ (श्लोक 85 से 87): धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हुए तब चैत सुदी तेरस के दिन त्रिशलादेवी ने भगवान् वीर प्रभु को जन्म दिया, जैसे पूर्व दिशा सूरज को जन्म देती है। उससे दशों दिशायें उज्ज्वल हो गई तथा सारे संसार में आनंद-मंगल छा गया। चौदस के दिन बड़ी भारी विभूति के साथ इन्द्र आदि देवता-गण स्वर्ग से कुंडलपुर आये और यहाँ से भगवान् को सुमेरु पर्वत पर ले गये। सुमेरु पर उन्होंने भगवान् का बड़े भारी ठाट-बाट के साथ अभिषेक किया और शत्रुओं के दल पर विजय-लाभ करने वाले वीरप्रभु का वर्द्धमान नाम रख उन्हें दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये। तीस वर्ष की अवस्था तक तो भगवान् गृहस्थ अवस्था में रहे, पर बाद में किसी वैराग्य के कारण को पाकर वे विरक्त हो गये और उन्होंने अपने विरक्त होने का समाचार अपने कुटुम्बी भाई-बन्धुओं को कह सुनाया। इसके बाद भगवान् को विरक्त हुए जान कर अपना नियोग पूरा करने को पाँचवें ब्रह्म स्वर्ग से लौकान्तिक देव उनकी सेवा में आ पहुँचे और वे उनके वैराग्य की प्रशंसा तथा भक्ति कर चले गये ॥८५-८७॥


तदा लौकान्तिका देवाः पञ्चमात्समुपागताः।
स्तुत्वा निर्वेदितं तं ते निर्वेदाय गताः पुनः ॥८८॥

सुरेन्द्राः सह संप्राप्य ज्ञात्वा वैराग्यमञ्जसा।
जिनस्य जनितानन्दा नेमुस्तं नतमस्तकाः ॥८९॥

संस्नाप्य भूषणैर्भक्त्या विभूष्य भूषणं भुवः।
सुरास्ते भक्तितो भेजुर्वैराग्यार्थं जिनेश्वरम् ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 88 से 90): पीछे थोड़ी ही देर में इन्द्र आदि देवतागण आये और उन्होंने प्रभु को भक्तिभाव से नमस्कार किया-उनकी स्तुति और पूजा की। इस समय प्रजा असीम आमोद-प्रमोद में मस्त थी। बाद इन्द्र ने भगवान् को स्नान करा कर दिव्य-वस्त्र और आभूषण पहनाये और भक्ति-भाव से नम्र हो उन सबने भूतल-भूषण भगवान् की फिर पूजा-स्तुति की तथा मुक्त कंठ से उनके वैराग्य और विचारों की प्रशंसा की ॥८८-९०॥


नानारूपान्वितां चित्रां चित्रकूटैर्विचित्रिताम्।
चन्द्रप्रभां सुशिबिकामारुह्य पुरतो ययौ ॥९१॥

मार्गे कृष्णदशम्यां च हस्ते मे वनसंस्थितः।
षष्ठेन त्वपराह्णे च प्राव्राजीज्जिनसत्तमः ॥९२॥

मनःपर्ययसद्बोधो दीक्षातस्तत्क्षणे क्षणी।
पारणाप्राप्तसंमानो विजहाराखिलां महीम् ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 91 से 93): इसके बाद वे भाँति-भाँति के चित्रों से चित्र-विचित्र और रंग-बिरंगी तरह-तरह की कलशियों से विभूषित चन्द्रप्रभा नाम एक सुन्दर पालकी में श्री वीरप्रभु की विराजमान कर नगर से बाहर उद्यान की ओर ले गये। वहाँ लोकोत्तम वीर भगवान् ने अगहन वदी दसमी के दिन, हस्त नक्षत्र में, षष्ठ योग के बाद, दोपहर के समय, जिन दीक्षा धारण की और उसी समय वे चार ज्ञान के धारक हो गये। उन्हें मनःपर्यय ज्ञान हो गया। इसके बाद वीरप्रभु ने सभी देशों में विहार कर बारह वर्ष घोर तप किया। वे जहाँ जहाँ जाते थे वहाँ उन्हें लोग बड़ी भक्ति से पारणा कराते थे ॥९१-९३॥


जिनो द्वादश वर्षाणि तपस्तप्त्वा दुरुत्तरम्।
प्रपेदे जृम्भिकाग्रामं जृम्भाजुम्भणवर्जितः ॥९४॥

ऋजुकूलासरित्तीरे ऋजुकूले किलाकुले।
शालैः शालद्रुमाकीर्णे शिलापट्टे जिनोऽविशत् ॥९५॥

वैशाखदशमीघस्रेऽपराह्ने षष्ठसंश्रितः।
हस्ताश्रिते सिते पक्षे क्षपकश्रेणिमाश्रितः ॥९६॥

विघातिघातिकर्माणि घातयित्वा घनानि सः।
प्रपेदे केवलं बोधं बोधिताखिलविष्टपम् ॥९७॥

अर्थ (श्लोक 94 से 97): आलस और विषय-वासना तो उनके पास तक न फटक पाते थे। विहार करते-करते कुछ दिनों के बाद भगवान् जंभिका नामक एक गाँव में आये। उसमें बहने वाली ऋजुकूला नाम नदी के किनारे ताल का एक घना जंगल था। भगवान् उस जंगल में एक वृक्ष के नीचे रक्खी हुई पवित्र शिला पर ध्यानस्थ हो गये। इसके बाद भगवान् वैशाख सुदी दसमी के दिन, दोपहर के समय, षष्ठयोग और हस्त नक्षत्र में, क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए और अन्तर्मुहूर्त काल में ही उन्होंने दुष्ट घाति-कर्मों की सैंतालीस, आयुकर्म की तीन और नामकर्म की तेरह-कुल तिरेसठ कर्म-प्रकृतियों का नाशकर सब पदार्थों और उनकी अनंत पर्यायों को एक साथ हमेशा जानने वाले केवलज्ञान को प्राप्त किया ॥९४-९७॥


भगवानथ संप्राप दिव्यं वैभारभूधरम्।
तत्र शोभासमाकीर्णः समवसृतिशोभितः ॥९८॥

अर्थ: इसके बाद वीर भगवान् सारे संसार में धर्म का उपदेश करते हुए विपुलाचल पर्वत पर आये।


छत्राशोकमहाघोषसिंहासनसमाश्रितः। चामरैः पुष्पवृष्ट्या च भामण्डलदिवाकरैः ॥९९॥

दुन्दुभीनां सहस्रेण रेजे रञ्जितशासनः। गौतमादिगणाधीशैः सुरानीतैः स सेवितः ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 98 से 100): इस समय समवसरण उनके साथ ही था। उसकी विभूति का कोई ठिकाना न था। छत्र, चमर, सिंहासन, भामण्डल, (शरीर की कान्ति का पूर), फूलों की बरसा, अशोकवृक्ष, दिव्यध्वनि और हजारों दुंदुभि बाजों का शब्द इन आठ प्रातिहार्यों से वह और भी सुशोभित था। उसमें आने-जाने वाले लोगों के कोलाहल शब्द से दशों दिशायें गूंज रही थीं और देवता-गण द्वारा ले आये गये गौतम आदि गणधर भी वहाँ भगवान् की सेवा में उपस्थित थे। तात्पर्य यह कि उस वक्त की शोभा अपूर्व थी ॥९८-१००॥


अथास्ति मगधो देशो मागधैर्गीतसद्गुणः। मागधैर्देववृन्दैश्च सेव्यः स्वर्लोकवत्सदा ॥१०१॥

राजगृहपुरं तत्र राजते स्वःपुरोपमम्। राजद्राजेन्द्रसद्गेहशोभाभाभारभूषणम् ॥१०२॥

श्रेणिको भूपतिस्तत्र शुभश्रेणिगुणाकरः। महामनाश्च सद्दृष्टिः प्रतापपरमेश्वरः ॥१०३॥

चेलनाचित्तचौरेण तेन तत्र स्थितं जिनम्। ज्ञात्वा जग्मे यथापूर्वं भरतेन सुचेता ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 101 से 104): मगध उत्तम गुणों से भरपूर और एक मनोहर देश है। धर्मात्मा और सत्पुरुषों का वह निवास है, अतः ऐसा जान पड़ता है कि देवता-गण का निवास-स्थान स्वर्गलोक ही है। उसमें राजगृह नामक एक सुन्दर नगर है। राजगृह में भारी विशाल और मनोहर राज-मन्दिर बने हुए हैं, जिनसे वह ऐसा जान पड़ता है मानो इन्द्र का पुर ही है। श्रेणिक वहाँ के राजा थे। वे उत्तम श्रेणी के पुरुष थे, गुणों के भण्डार और सम्यग्दृष्टि थे। उदार-चित्त थे, प्रतापी और भारी ऐश्वर्य वाले थे। उनकी महारानी का नाम चेलिनी था। चेलिनी पर वे बहुत लाड़-प्यार करते थे। एक दिन उनके पास यह खबर आई कि विपुलाचल पर्वत पर वीर प्रभु आये है। इस शुभ समाचार से वे बहुत प्रसन्न हुए और उसी वक्त वीर प्रभु की वन्दना को गये, जिस भाँति आदिनाथ प्रभु के शुभ आगमन को सुन कर उनकी वन्दना को उदार आशय भरत चक्रवर्ती गये थे ॥१०१-१०४॥


घटद्घोटकसंघातैर्महादन्तसुदन्तिभिः। नानार्थरथसार्थैश्च नृत्यत्पादातिसद्व्रजैः ॥१०५॥

वदद्वादित्रनिर्घोषैः संसिद्धैर्मागधस्तवैः। श्रेणिकः सत्यसंधानः प्रपेदे जिनसंनिधिम् ॥१०६॥

दन्तावलात्समुत्तीर्य विवेश जिनसंसदम्। मुक्तचामरछत्रादिचिह्नः श्रेणिकभूपतिः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 105 से 107): इस समय चार प्रकार की सेना या यों कि चतुरंगी सेना महाराज के साथ-साथ थी। सजे-धजे घोड़े, सुन्दर लम्बे मोटे दाँतों वाले हाथी, भाँति-भाँति की वस्तुओं से सजे हुए रथ और मनोहारी नृत्य करते हुए पयादे थे। भाँति-भाँति के बाजों की ध्वनि से सब दिशायें गूंज रही थीं। बन्दीजन महाराज के यश को गाते जा रहे थे। सारांश यह कि उस समय का दृश्य अपूर्व ही था। थोड़े ही समय में महाराज वीर प्रभु के पास पहुँचे और वहाँ वे हाथी पर से उतर पड़े एवं छत्र, चमर आदि राज-चिह्नों को वहीं छोड़कर उनकी सभा में पहुँचे ॥१०५-१०७॥


जिनं मृगारिपीठस्थं छत्रत्रयमहाछदम्। चतुरास्यं महाशस्यं विशेष्यं त्रिजगत्पतिम् ॥१०८॥

अर्थ: वहाँ जाकर उन्होंने तीन लोक के नाथ वीर प्रभु को एक मनोहर सिंहासन पर विराजे हुए देखा।


नतामरनराधीशमीशानं शंसितव्रतम्। नत्वाभ्यर्च्य स्तुतिं कर्तुं प्रारेभे स इलापतिः ॥१०९॥

स्तुत्यं स्तोतारमात्मानं स्तुतिं स्तुतिफलं पुनः। नृपो ज्ञात्वा समारभे स्तुतिं वीरजिनेशिनः ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 108 से 110): उनके शिर पर छत्र-त्रय सुशोभित थे। वे और-और देवों से भिन्न वीतराग रूप में थे और वहाँ सभी सभ्यगण उनकी और उनके तपश्चरण आदि कर्तव्यों की पुनः-पुनः प्रशंसा करते थे एवं राजा-महाराजा और देवता गण उन्हें नमस्कार कर उनके चरणों की धूलि को अपने मस्तक पर चढ़ते थे, उनकी पूजा-वन्दना करते थे। वीर प्रभु को देखकर महाराज ने उनकी वन्दना की और भक्तिभाव से उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद स्तुत्य (स्तुति योग्य), स्तोता (स्तुति-कर्ता), स्तुति (गुण-गान) और उसका फल इन चारों बातों को जान कर उन्होंने स्तुति करना आरम्भ किया ॥१०८-११०॥


भगवन् देवदेवेश विभो भुवनसत्यते। त्वां स्तोतुं कः क्षमो दक्षः शक्तः शक्रसमोऽपि च ॥१११॥

चिद्रूपं चित्तनिर्मुक्तं विभुं चेन्द्रियवर्जितम्। निर्मलं निर्मलाकारं गन्धज्ञं गन्धवर्जितम् ॥११२॥

अरूपं रूपवेत्तारं नीरसं रसविस्तृतम्। रसज्ञं ज्ञातसर्वस्वं त्वां स्तवीमि जगत्पतिम् ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 111 से 113): हे तीन लोक के स्वामी! और देवों के देव वीरप्रभु! आपके गुण अपार है, अतएव उनको गाने के लिए इन्द्र जैसा भारी शक्ति वाला भी जब असमर्थ है तब मुझ जैसे मन्द बुद्धियों की तो ताकत ही क्या है जो आपके गुणों का गान कर सके परन्तु तो भी आपकी भक्ति के वश हो मैं आपके गुणों का कुछ गान करता हूँ। देवाधिदेव भगवान्! आप चित्त रहित होकर भी चैतन्य-स्वरूप हैं, इन्द्रियों से रहित और विभु हैं, कर्म-मल रहित निर्मल हैं। रूप, रस, गंध आदि से रहित होकर भी उनके जानने वाले हैं ॥१११-११३॥


बाल्ये रतिपतिः क्षिप्तः क्षिप्रं क्षेमंकरेण भोः। त्वया लोकितलोकेन विपुलाचलपालिना ॥११४॥

अर्थ: सभी पदार्थों को हमेशा जानने वाले सर्वज्ञ हैं। तीन लोक के पति हैं। हे वीर प्रभु! मैं आपकी वन्दना कर आपको नमस्कार करता हूँ। इस विपुलाचल को सुशोभित कर आपने यहाँ लोक अलोक प्रकाशित किया है, अतः आप जीव मात्र को पाप से बचाने वाले एक रक्षक हैं ॥११४॥


बाल्यक्रीडाविधौ देव नागीभूतात्सपर्वणः। त्वं निर्जित्य जितारातिर्वीरं त्वं समुपाश्रितः ॥११५॥

अर्थ: हे प्रभु! मैं आपकी कहाँ तक तारीफ करूँ, आपने बालपन में ही तो काम जैसे वीर को वश में कर लिया और खेल-कूद के वक्त सांपों का भेष बना-बनाकर जो देवता-गण आपके पास आये थे उन्हें तथा और-और शत्रुओं को जीत कर आपने अपने ‘वीर’ नाम को सार्थक कर दिखाया ॥११५॥


बालखेलासमारूढं नभःस्था वीक्ष्य योगिनः। द्वापराकूरनाशेन सन्मतिं त्वां च तुष्टुवुः ॥११६॥

अर्थ: हे भगवन्! एक दिन आप खेल रहे थे और इसी समय वहाँ आकाशगामी कोई योगीजन आ निकले। उन्होंने आपको खेलते हुए देखा और देखते ही उनका एक भारी सन्देह दूर हो गया, जो उनके हृदय में कीले की भाँति चुभ रहा था। इसी कारण उन्होंने आपको सन्मति कहा और आपकी भारी भक्ति की-पूजा-प्रशंसा की ॥११६॥


शंकरस्त्वां समावीक्ष्य योगस्थं योगिनं जगौ।
कृतोपसर्गो निश्चाल्यं महावीर इति स्फुटम् ॥११७॥


वर्धमानमहाज्ञानो वर्धमानो भवान्मतः।
स्तुत्वेति तं नरेन्द्र भक्त्योपाविशन्नरसंसदि ॥११८॥


तावता भगवान्वीरो व्याजहार परां गिरम्।
ताल्वोष्ठकण्ठचलनामुक्तामक्षरवर्जिताम् ॥११९॥


राजन् धर्मे मतिं धत्स्व धर्मो द्वेधा दयामयः।
अनगारसहागार भेदेन भेदमाश्रितः ॥१२०॥

नैर्ग्रन्थ्यमृषिसद्ग्रन्थं नैर्ग्रन्थ्यं परमं तपः।
नैर्ग्रन्थ्यं परमं ध्यानं नैग्रन्थ्यं ध्येयमेव च ॥१२१॥

नैर्ग्रन्थ्यं परमं ज्ञानं नैर्ग्रन्थ्यं परमो गुणः।
नैर्ग्रन्थ्यं प्रथमं प्रोक्तं ज्ञेयं सन्मुनिगोचरम् ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 120 से 122): वे कहने लगे कि राजन्! धर्म में जी लगाओ। धर्म दया को कहते है। इस दयाधर्म के दो भेद है, एक मुनिधर्म और दूसरा श्रावकधर्म। पहले धर्म में तिल-तुष मात्र भी, परिग्रह नहीं होता। उसमें निर्ग्रन्थता ही प्रधान है। निर्ग्रन्थता-ममता-भाव का अभाव ही मुनियों का सर्वस्व है। वही दुर्द्धर तप है। वही उत्तम ध्यान है। निर्मल-ज्ञान और उत्तम गुण भी वही है। उसके बिना मुनि मुनि ही नहीं कहला सकता और इसलिए मुनिधर्म में उसे पहला स्थान मिला है। पर इसका धारण करना बहुत कठिन है ॥१२०-१२२॥


श्राद्धश्रेयः श्रुतं शीलतपोदानसुभावनैः।
नाकं साकं सुखैर्दत्ते चतुर्धा सुधृतं ध्रुवम् ॥१२३॥

शीलं च सत्स्वभावोऽत्र शीलं च व्रतरक्षणम्।
ब्रह्मचर्यात्मकं शीलं शीलं सद्गुणपालनम् ॥१२४॥

तपस्तपनमेवात्र देहस्येन्द्रियदर्पिणः।
इन्द्रियार्थनिवृत्तेस्तत्षोढा बाह्यं तथान्तरम् ॥१२५॥

दानं दत्तिस्त्रिधा पात्रे स्वस्य शुद्ध्या चतुर्विधम्।
भोगभूमिफलाधारं तदाहारादिभेदगम् ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): इसी तरह मुनि-अवस्था में आप एक दिन ध्यानस्थ थे। उस समय आपके ऊपर शंकर की दृष्टि जा पड़ी। उसने क्रोध में आ आपको भारी उपसर्ग किया, पर वह आपको रंच मात्र भी न चला सका। तब उसने आपको महावीर कहा और आप की खूब स्तुति की। आप का ज्ञान-चंद्र पूर्ण वृद्धिंगत है, इसलिए आप वर्द्धमान हैं। इस भाँति पूर्ण भक्तिभाव से भगवान् का स्तवन कर श्रेणिक महाराज जाकर मनुष्यों के कोठे में बैठ गये ॥१९७-१९८॥ अब श्रावकधर्म को सुनिए। इसके शील, तप, दान और भावना ये चार भेद हैं। इसकी पालने से स्वर्ग-सुख मिलता है। शील ब्रह्मचर्य को कहते हैं। यह आत्मा का सच्चा स्वभाव है। इसके द्वारा और-और व्रतों की रक्षा होती है। बहुत क्या कहा जावे, इसके होने पर और-और गुण बिना परिश्रम ही प्राप्त हो जाते है। इस कारण इसे अवश्य पालना चाहिए। तप-इन्द्रियाँ को उनके विषयों से हटाकर वश में करने को या यों कि शरीर को वश में कर लेने को तप कहते हैं। वह बाह्य और अभ्यन्तर भेद से छः-छः प्रकार का है। दान-मन-वचन-काय की शुद्धि-पूर्वक उत्तम, मध्यम और जघन्य पात्र के अर्थ-धन खर्च करने को दान कहते हैं। इसके आहार, औषध, शास्त्र और अभय ये चार भेद हैं। इसका फल भोगभूमि है। पर इतना विशेष है कि जैसे उत्तम आदि पात्रों के लिए दान दिया जायेगा वैसा ही उत्तम आदि भोगभूमिरूप फल भी मिलेगा ॥१२३-१२६॥


भावनं जिनधर्मस्य चिद्रूपस्य निजात्मनः।
स्वहृदः शुद्धता चाथ भावना साभिधीयते ॥१२७॥

इति धर्मस्य सर्वस्वं श्रुत्वा भूपो जिनोदितम्।
द्रङ्गं जिगमिषुर्द्राक् स ननाम जिनपुङ्गवम् ॥१२८॥

पुरं नृपो जगामाशु सेवितो नरनायकैः।
सुरेशैः सेवितः स्वामी वीरश्च परनीवृतम् ॥१२९॥

रेमे भूपः सुचेलिन्या चलच्चारुसुचेतसा।
जिनश्चेतनया चित्ते चिन्त्यमानस्वभावया ॥१३०॥

ददौ दानं स निःस्वेभ्यः सातसिद्ध्यर्थमञ्जसा।
वीरोऽपि ध्वनिना धौव्यं वृषं सत्सातसिद्धये ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 127 से 131): भावना-जिनधर्म के मनन और चैतन्य-स्वरूप आत्मा की या यों कि हृदय की शुद्धि का नाम भावना है। भावना से आत्म-बल बढ़ता है। इस भाँति प्रभु ने धर्म का उपदेश किया। जिसको सुन कर भव्यजीव बहुत सुखी हुए। इसके बाद महाराज को नगर जाने की इच्छा हुई और वे प्रभु को प्रणाम कर वापस चले आये। बाद में नरेन्द्रों और देवताओं द्वारा सेवित वीरप्रभु ने भी और-और देशों में धर्म का उपदेश करने के लिए वहाँ से विहार किया। कुछ काल बाद महाराज अपने नगर को जा पहुँचे और वहाँ वे चेलिनी के साथ आमोद-प्रमोद से काल बिताने लगे। चेलिनी रानी बड़े उदार दिल की थी। वह चंचल स्वभाव वाली और स्वभाव से ही हमेशा वीरप्रभु का ध्यान किया करती थी। इधर दीन-दुखी जीवों को सुखी बनाने के लिए महाराज हमेशा दान देते थे और उधर संसार-ताप से संतप्त जीवों को शान्ति पहुँचाने के लिए वीरप्रभु अपनी दिव्यवाणी के द्वारा धर्म का उपदेश करते थे। धीरे-धीरे वीरप्रभु ने बहुत से आर्य देशों में विहार किया और सब जगह धर्म का उपदेश कर संसार ताप से संतप्त जीवों का ताप बुझाया-उन्हें शान्ति दी ॥१२७-१३१॥


वर्धमानोऽथ सद्देशे कोशले कुरुजाङ्गले।
अङ्गे वङ्गे कलिङ्गे च काश्मीरे कौङ्कणे तथा ॥१३२॥

महाराष्ट्रे च सौराष्ट्रे भेदपाटे सुभोटके।
मालवे मालवे देशे कर्णाटे कर्णकोशले ॥१३३॥

पराभीरे सुगम्भीरे विराटे विजहार च।
बोधयन्बुधसन्द्राशिं जिनः सद्धर्मदेशनैः ॥१३४॥

अर्थ (श्लोक 132 से 134): वीर भगवान् ने जिन-जिन आर्य देशों में विहार किया था वे ये हैं कौशल, कुरुजांगल, अंग, वंग, कलिंग-कश्मीर, कोंकण, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, भेदपाट, सुभोटक, मालवा, कर्नाट, कर्णकौशल, पराभीर, सुगंभीर और विराट ॥१३२-१३४॥


पुनः स मगधे देशे प्रतिबोधनपण्डितः।
वैभारं भूषयामास भास्वांश्चोदयपर्वतम् ॥१३५॥

अर्थ: इसके बाद मगधदेश को प्रतिबोधने के लिए भगवान् दोबारा विपुलाचल पर्वत पर आये और वहाँ वे ऐसे शोभित हुए मानो पूर्व दिशा में उदयाचल पर सूरज का उदय ही हुआ है ॥१३५॥


वनपालो जिनेशस्य विभूतिं वाक्पथातिगाम्।
वीक्ष्य विस्मयमापन्नो जगाम राजमन्दिरम् ॥१३६॥

नृपं सिंहासनासीनं प्रकीर्णाकीर्णसद्भुजम्।
छत्रव्रातगतादित्यतापं पापविवर्जितम् ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 136 से 137): कुछ समय बाद इधर-उधर घूमता-फिरता वनपाल वहाँ आया और वीरप्रभु की वचन-अगोचर विभूति को देखकर अचम्भे में पड़ गया। वह सोचने लगा। कि यह क्या बात है! थोड़ी ही देर में वह सब बातें समझ गया और सब ऋतुओं के फल-फूल लेकर इस शुभ समाचार के साथ राजमंदिर पहुँचा। वहाँ पुण्यवान् महाराज एक मनोहर सिंहासन पर विराजे थे और देश-विदेशों से आई हुई


नानानीवृत्समायातात्प्राभृते दत्तलोचनम्। मागधव्रातसंगीतगणद्गुणकदम्बकम् ॥१३८॥

कृपाणकरकौलीनराजन्यशतसंस्तुतम्। सूर्यचन्द्राभसौरूप्यकुण्डलाभ्यां सुशोभितम् ॥१३९॥

मुकुटस्य मयूखेन लिखितं स्वं नभस्तले। हसन्तं हारिहारस्य किरणेन पराञ्जनान् ॥१४०॥

कटकाङ्गदकेयूरकान्त्या कृन्तिततामसम्। दन्तज्योत्स्नासमूहेन कलयन्तं च भूत लम् ॥१४१॥

दौवारिकनिर्देशेन वनपालो महीभुजम्। वीक्ष्य नत्वा च विज्ञप्तिं चर्करीति स्म सस्मयः ॥१४२॥

अर्थ (श्लोक 136 से 142): भेंटों की देख-भाल करते थे। उनके ऊपर एक अपूर्व छत्र लगा हुआ था, जो धूप की बाधा को दूर करता था। उनकी लम्बी और मजबूत भुजाएँ उनके पराक्रम को कहती थीं। गाथक-गण संगीत द्वारा उनका गुणगान करते थे। सैकड़ों कुलीन राजा-महाराजा हाथ में तलवार ले-ले सेवा में उपस्थित हो उनका यश गाते थे। उनके दोनों कुण्डल ऐसे जान पड़ते थे मानों वे चाँद और सूरज ही हैं। उनके मुकुट की किरणें सब ओर फैल रही थीं और ऐसी जान पड़ती थीं मानों महाराज उनके द्वारा आकाश-पट पर अपना चित्र ही लिख रहे हैं। उनके मनोहर हार की कान्ति सब ओर विस्तृत हो रही थी, जान पड़ता था कि वह सब लोगों की हँसी उड़ा रही है। अपने कड़े, अँगद और बाजूबंदों की कान्ति द्वारा वे अँधेरे को दूर करते थे और दाँतों की उज्ज्वल किरण से पृथ्वी-तल को उज्ज्वल करते थे। इतने में द्वारपाल की आज्ञा से वनपाल भीतर आया और सब ऋतुओं के फल-फूल महाराज को भेंट कर तथा उन्हें नमस्कार कर हर्ष के साथ बोला ॥१३६-१४२॥


राजंस्त्रिजगतां नाथो नाथान्वयसमुद्भवः। भूषयामास वैभारं भूषयन्तं भुवस्तलम् ॥१४३॥

यत्प्रभावान्महाव्याघ्री निघ्नचित्ता सविघ्निका। पस्पर्श सौरभेयीणां सन्तानं स्वसुतेच्छया ॥१४४॥

महागजगजारीणां शावकाः सुखलिप्सया। रम्यारामेषु चान्योन्यं रमन्ते यत्प्रभावतः ॥१४५॥

नागनाकुलवृन्द्वानि ददते स्वहितेच्छया। स्वस्वस्थाने स्थितिं मुक्तवैरा यस्य समागमात् ॥१४६॥

मार्जारमूषका मत्ताः क्रीडन्ति क्रीडनोद्यताः। परस्परं प्रभावेण बान्धवा इव यस्य च ॥१४७॥

पद्माकराः सदाशुष्का जाताः संजीवनान्विताः। मरालकोककादम्बकलरावा यतो जिनात् ॥१४८॥

शुष्काः शालाः समाकीर्णाः फलपुष्पसुपल्लवैः। फलभारभराकीर्णा नमन्तीव जिनेशिनम् ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 143 से 149): हे देवों के देव! आज वन में विपुलाचल पर्वत पर वीरप्रभु आये हैं। वे नाथवंश के दीपक हैं, पृथ्वी के तिलक और स्वामी हैं। राजन्! यह सब उन्हीं का माहात्म्य है जो आज वन में क्रूर-चित्त और जीवों को महान् संकट में डालने वाली व्याघ्री भी अपने बच्चे की चाह से गाय के बछड़े पर प्रेम करती है तथा सिंह और हाथी के बच्चे अपने जातीय वैर-विरोध को भूल कर सुख की इच्छा से एक जगह खेलते हैं। साँप और नौला हित की इच्छा से एक दूसरे को अपने पास स्थान देते है-एक जगह किलोलें करते हैं। बिल्ली और चूहा भाई-बन्धुओं की तरह साथ-साथ खेलने को तैयार हैं तथा यह उन्हीं महात्मा का प्रभाव है कि जो ताल-तलैयाँ बरसों से सूखी पड़ी थीं, वे आज जल से लबालब भर गई हैं और कोक, हंस आदि पक्षी उन पर कलरव शब्द करते हैं तथा बहुत दिनों के सूखे हुए ताल वृक्ष भी आज फल-फूल और पत्तों से लहलहा उठे हैं, फल-फूलों के भार से पृथ्वी तक नीचे झुक गये


अकालकल्पिताकल्पफलपुष्पभरान्विताः। महीरुहा महेऽमान्या मीयन्ते स्म जिनेशिनः ॥१५०॥

इति तस्य प्रभावं भो! नानाकालसमुद्भवैः। फलैः पुष्पैरहं वीक्ष्य प्राभृतं कृतवांस्तव ॥१५१॥

अर्थ (श्लोक 143 से 151): हैं। जान पड़ता है कि वे पृथ्वी तक नीचे झुककर भगवान् को नमस्कार ही करते हैं। इसके सिवा राजन् ! यह जो और-और सब अकाल में ही फल-पुष्प आ गये हैं इससे जान पड़ता है कि ये सब वृक्ष अपने आपको अहमहेन्द्र मान फल-पुष्प ले-ले कर प्रभु की सेवा और भक्ति करने को ही उपस्थित हुए हैं। महाराज ! सब ऋतुओं के फल-पुष्पों को एक साथ आया देखकर पहले तो मुझे अचंभा हुआ, पर पीछे उन प्रभु का माहात्म्य जान सब ऋतुओं के फल-फूलों को लेकर मैं आपकी सेवा में आया हूँ ॥१४३-१५१॥


इत्यानन्दभराद्भूपः पुलकाङ्कितविग्रहः। श्रुत्वा तद्वचनं रम्यं जहर्ष हर्षनिस्वनः ॥१५२॥

दत्त्वा तस्मै भुवनपतये सारवित्तं स भक्त्या
गत्वा सप्तोत्तरसुविधिना सत्यदानि प्रहृष्टः।
नत्वा तस्यां दिशि जिनपदाम्भोजयुग्मं प्रपेदे
स्थानं नानानृपगणयुतस्तत्पदं वन्दनेच्छुः ॥१५३॥

वीरो विश्वगुणाश्रितो गुणगणा वीरं श्रिताः सिद्धये
वीरेणैव विधीयते व्रतचयः स्वस्त्यस्तु वीराय च।
वीराद्धर्त्तत एव धर्मनिचयो वीरस्य सिद्धिव्र्वरा
वीरे पाति जगत्रयं जितमिदं संजायते निश्चितम् ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 152 से 154): इस शुभ समाचार को सुनकर महाराज के हर्ष का कुछ पार न रहा। उनके रोमाञ्च हो आये और मुँह प्रसन्न हो उठा। इस समय महाराज ने संदेशा लाने वाले वनपाल को खूब धन-सम्पत्ति दी उसे मालामाल कर दिया और आप सिंहासन को छोड़ जिस दिशा में वीरप्रभु थे उस ओर को सात पग आगे गये तथा वहाँ से उन्होंने अनेक राजाओं के साथ-साथ वीरप्रभु को विनीत भाव से नमस्कार किया। बाद वे अपने स्थान पर आ बैठे। इस वक्त वीरप्रभु की वन्दना के लिए वे बहुत ही उत्सुक हो रहे थे। वीरप्रभु गुणों के आश्रय हैं, उनको गुणों ने इस अभिप्राय से अपना आश्रय बनाया कि जिसमें वे (गुण) सारे संसार में प्रसिद्ध हो जायें। वीरप्रभु ने ही व्रतों का उपदेश किया है और उन्होंने ही धर्म-तीर्थ को चलाया है तथा वे सिद्धि के स्वामी और संसार भर के रक्षक हैं एवं संसारी जीवों के मोह-मद को उतारने वाले हैं। उन वीरप्रभु के लिए स्वस्ति हो ॥१५२-१५४॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में जिनवंदना के उत्साह का वर्णन करने वाला पहला पर्व समाप्त हुआ ॥१॥

द्वितीयं पर्व (भाग 1/2)

नौमि वीरं महावीरं विजिताखिलवैरिणम्। भवपायोधिसंप्राप्तपारं परमपावनम् ॥१॥

अर्थ: उन परम पवित्र और महावीर वीरप्रभु को नमस्कार है जो सम्पूर्ण वैरिओं पर विजय-लाभ कर संसार-समुद्र को पार कर चुके हैं ॥१॥


अथानन्दभरेणैवानन्दभेरीं स नादिनीम्। दापयामास दानेन नन्दिताखिलविष्टपः ॥२॥

श्रुत्वानन्देन भेरीं तां लोका यात्रार्थसिद्धये। सज्जाः संनाहसंबद्धा संबोभुवति ते स्म वै ॥३॥

सादिनो मोदतो मङ्क्षु पर्याणं घोटकेषु च। रोपयन्ति स्म रागेण चलच्चामरचारुषु ॥४॥

दन्तिनो दन्तघातेन दारयन्तश्च दिग्गजान्। समर्थकुथसंबद्धाश्चेक्रीयन्ते स्म तज्जनैः ॥५॥

रथिनो रथचक्रेण चक्रेणालंकृतेन च। वाजिवारनिबद्धेन संभेजू राजमन्दिरम् ॥६॥

याप्ययानस्थिताः केचित्सौरभेयाश्रिताः परे। क्रमेलकसमारूढाः संप्रापुस्तद्गृहाङ्गणम् ॥७॥

खड्गखेटकसद्हस्ताः कुन्तकोटिकराः परे। केचिच्छक्तिसमासक्ताः पत्तयस्तं प्रपेदिरे ॥८॥

नर्तक्यो नर्तनोद्युक्ता नटपटकपूरिताः। नरीनृत्यति सद्द्वक्त्रास्तत्पुरः सस्मयाः पराः ॥९॥

इत्थं समग्रसामग्र्या संगतोऽद्भुतविक्रमः। रेजे राजा रमाधीशो राजराज इवापरः ॥१०॥

निर्भयेनाभयेनापि वारिषेणसुतेन च। चेलिन्या सह संतस्थे जिनं वन्दितुमीश्वरः ॥११॥

दन्तावलाद्गलोपेतः संप्राप्य जिनसंनिधिम्। समुत्तीर्य सुवेगेन विवेश समवसृतिम् ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 2 से 12): इसके बाद हर्ष से गद्गद् हो महाराज ने संसार को आनंद देने वाली आनंद भेरी बजवाई और दान देकर सभी प्रजा की अमन-चैन में कर दिया। भेरी के शब्द को सुनते ही अपने-अपने मनोरथों की सिद्धि की इच्छा से सब लोग वस्त्र, आभूषण, गहने-गाँठे पहिन कर यात्रा के लिए तैयार हुए। सईसों ने हर्षित होकर हलती-चलती हुई सुन्दर किसवार वाले घोड़ों पर मनोहर पलाण रखे। महावतों ने दंत-प्रहार से दिग्गजों को भी डराने वाले सुन्दर हाथियों पर मनोहर झूलें डाले। सारथी-गण मनोहर पहियों वाले रथों में सुन्दर-सुन्दर घोड़ों की जोतकर उन्हें राज मन्दिर में ले आये और पियादे-गण कोई पालकी पर, कोई बैलों पर और कोई ऊँटों पर सवार हो-हो कर सब राजबाड़े के चौक में आ उपस्थित हुए। उनके हाथों में ढाल, तलवार, माला और शक्ति आदि कई एक हथियार थे और चाँद जैसे सुन्दर मुँह वाले, गर्वयुक्त नर्तकी-गण नटों को साथ लिये हुए नृत्य करने को तैयार हो-होकर आये तथा महाराज के आगे नृत्य करने लगे। इस भाँति महाराज को सभी सामग्री सुलभ थी। उनका पराक्रम अद्भुत था और वे लक्ष्मी के स्वामी थे। अतः जान पड़ता था कि वे दूसरे कुबेर ही हैं। कारण कुबेर भी अद्भुत पराक्रमी और लक्ष्मी का पति होता है। इस तरह सज-धज कर तैयार हो, वे निर्भय अभयकुमार और पवित्र वारिषेणकुमार को साथ लेकर वीरप्रभु की वन्दना की गये। इस समय उनके साथ जिनभक्त चेलिनी भी थी। जब उद्यान पास आ गया तब वे हाथी पर से उतर पड़े एवं जल्दी से वीरप्रभु के समवसरण में जा पहुँचे ॥२-१२॥


दर्शं दर्शं दयाधीशं नामं नामं स तत्पदम्।
स्थायं स्थायं स्थिरं स्थाने शुश्राव श्रेयसः श्रुतिम् ॥१३॥

अर्थ: वहाँ उन्होंने वीरप्रभु को जी भर देखकर बार-बार नमस्कार किया। बाद सबके सब अपने योग्य स्थान में जा स्थिर-चित्त हो बैठ गये और सबने ध्यान देकर धर्म का उपदेश सुना ॥१३॥


समुत्थाय ततो राजा गोतमं गौतमं गुरुम्।
गुणाग्रण्यं प्रवन्द्यासावाचष्टे स्म धराधवः ॥१४॥

भगवन्नमितानेकनराधिप महामुने।
आलोकं लोकिताथस्ते ज्ञानालोको विलोकते ॥१५॥

अगम्यं न हि किंचित्ते वस्तुजालं महामते।
त्वज्ज्ञानाब्धौ जगत्सर्वं जलबिन्दूयते यते ॥१६॥

त्वदायत्ता सदा विद्या सर्वलोकप्रदीपिका।
यस्यां सर्वं जगन्नाथ नित्यशो गोष्पदायते ॥१७॥

ऋद्धयो वृद्धिसंबद्धा महर्षेश्च तवाधिप।
बीजबुद्धिं प्रपन्नस्य मनःपर्यययोगिनः ॥१८॥

पदानुसारिता तेऽद्य परमावधिवेदिनः।
सर्वार्थवेदिनी विद्या शोभते गगनेऽर्कवत् ॥१९॥

सर्वौषधिसमृद्धस्य पररोगापहारिणः।
परोपकारिता ते क्व सर्ववाचामगोचरा ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 14 से 20): इसके बाद महाराज खड़े हुए और उन्होंने ज्ञानी गण-नायक गौतम गुरु की वन्दना कर उनका यों गुण-गान आरम्भ किया। भगवन्! आप महाभूति हैं। राजा-महाराजा सभी आपकी पूजा-स्तुति करते हैं। आपके ज्ञान-रूप आलोक में सभी पदार्थ एक साथ झलकते है, दीख पड़ते हैं। प्रभो आपके लिए कोई भी वस्तु अगम्य नहीं है क्योंकि आपका ज्ञान तो एक बड़े भारी समुद्र के बराबर है और यह सारा संसार उसमें एक बूँद की तरह है। हे नाथ! आपके पास वह उत्तम विद्या है जो सारे संसार पर अपना प्रकाश डालती है, उसमें यह सारा संसार हमेशा गाय के खुर के बराबर झलकता है तथा हे महर्षि! आप बहुत-सी वृद्धिंगत ऋद्धियों के धारक हैं, बीज ऋद्धि से युक्त और मनःपर्ययज्ञानी हैं, पादानुसारिणी ऋद्धि वाले और परमावधिज्ञान के धारक हैं। आप में सभी पदार्थों को जानने वाली विद्या है जो निर्मल आकाश में सूरज की भाँति शोभा पाती है। सभी जीवों के सभी रोगों को दूर करने वाली सर्वौषधिऋद्धि के आप स्वामी हैं और इसलिए कहा जाता है कि आपकी परोपकारिता वचनातीत है ॥१४-२०॥


चारणर्द्धया चरच्चारो विहायसि भवान्महान्।
अवतो जीववृन्दानि क्व न ते परमा दया ॥२१॥

अक्षीणर्द्धिपदप्राप्तेरियत्ता न च विद्यते।
ऋद्धीनां तव ताराणां प्रमाणं गगने यथा ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 21 से 22): आप चारणऋद्धि के बल से आकाश में चलते हैं और मार्ग के जीव-जन्तुओं की पीड़ा बचाते हैं, अतः आप परम दयालु-दया-स्तंभ हैं। इसके सिवा अक्षीण ऋद्धि भी आपको है। बहुत कहाँ तक कहें, आकाश के तारों की भाँति आपकी ऋद्धियों की कुछ गिनती नहीं है ॥२१-२२॥


द्वापरो द्वापरे काले मम क्व व्यवतिष्ठते।
त्वत्प्रसादात्किमाध्मातो वह्निः शोध्यं न शोधयेत् ॥२३॥

त्वमद्य परमो नाथस्त्वमद्य परमो गुरुः।
त्वमद्य शरणं देव त्वमद्य परमो मुनिः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 23 से 24): कृपासिन्धु भगवन्! मुझे एक सन्देह है और साथ ही आशा तथा विश्वास है कि वह आपके प्रसाद से अब मेरे हृदय से निकल जायेगा, उसे अब मेरे हृदय में स्थान नहीं मिलेगा, जिस तरह जलती हुई आग से हर एक चीज का मैल निकल जाता है और उसमें फिर उसे स्थान नहीं पाता क्योंकि प्रभो! इस संसार में आप ही उत्तम हैं, सबके गुरु और आश्रय हैं, महामुनि, सर्वज्ञ-पुत्र और सर्वज्ञ शिष्य हैं।


सर्वज्ञपुत्र सर्वज्ञदेश्य सर्वज्ञवत्सल। त्वत्तः सर्वं बुभुत्सेऽहं नानालोकहितावहम् ॥२५॥

प्रसीद पुरुषश्रेष्ठ दयां कुरु दयापर। चरितं श्रोतुमिच्छामि पाण्डवानां कुरूद्भवम् ॥२६॥

पाण्डवाः कौरवाः ख्याताः क्षितौ क्षितिपसेविताः। कस्मिन्वंशे समुत्पन्ना वदेति च विदांवर ॥२७॥

कुर्वन्वयसमुत्पत्तिर्युगे कस्मिन्नजायत। के के नराश्च संजातास्तदृंशे वसुधातले ॥२८॥

के के तीर्थकरास्तीर्थ्याः सुतीर्थपथपण्डिताः। के के च चक्रिणो वंशे कुरूणां गुणगौरवे ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 23 से 29): हे सर्वज्ञ! आपसे मैं बहुत कुछ जानना चाहता हूँ और उससे और लोगों का भी हित होगा क्योंकि वह सबके लिए उपयोगी है। हे पुरुषोत्तम! प्रसन्न हो कर मुझ पर दया करो। दयानिधे! मैं कुरुवंश के दीपक पाण्डवों का चरित सुनना चाहता हूँ। सुना जाता है कि पाण्डव लोग कौरव थे और बहुत से राजा महाराजा उनके सेवक थे। इसमें मुझे यह सन्देह है कि वे कौन से वंश में पैदा हुए ? कुरुवंश किस युग में हुआ या चला ? इसके सिवा गुण और गौरव के धारक कुरुवंश में पृथ्वी पर कौन-कौन से प्रसिद्ध पुरुषों ने जन्म पाया ? और उस वंश में धर्म-तीर्थ के प्रवर्तक और जगत्-पूज्य कौन-कौन तीर्थंकर और चक्रवर्ती उत्पन्न हुए ? ॥२३-२९॥


नाथात्र श्रूयते शास्त्रे परकीये कथान्तरम्। तद्वन्ध्यासुतसौन्दर्यवर्णनाभं विभाति मे ॥३०॥

तथा हि शांतनो राजा युद्धार्थं क्वापि यातवान्। तत्र स्थितः स्वकामिन्या रजःकालं विवेद सः ॥३१॥

स्वरेतो रतिदानाय निषिच्य ताम्रभाजने। समुद्र्य तत्स भूमीशो बबन्ध श्येनकन्धरे ॥३२॥

स पत्री प्रेषितस्तेन स्वजायां प्रति सत्वरम्। अटन्नपि समायासीद्गङ्गोपरि सुलीलया ॥३३॥

तत्रान्यः श्येनको मार्गे दृष्ट्वा तं पत्रिणं रुषा। आयान्तं पातयामास छित्त्वा सुयुध्य ताम्रकम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 30 से 34): नाथ! अन्यमत के शास्त्रों में जो पाण्डवों का चरित पाया जाता हैं वह तो सर्वथा बांझ स्त्री के पुत्र की सुन्दरता का वर्णन है, मिथ्या है। उसमें कुछ भी सार नहीं है। सुनिए। काशी का शांतनु राजा कहीं युद्ध के लिए गया था। वहाँ उसे अपनी प्रिया के ऋतु समय की याद हो आई और उसने उसे रतिदान देने के लिए अपना वीर्य भेजने का विचार किया। उसने एक ताँबे का बर्तन मंगाया और उसमें वीर्य रखकर उसके मुँह पर अपने नाम की मुहर लगा दी तथा उसको एक श्येन पक्षी के गले में बाँधकर अपनी प्रिया के पास ले जाने के लिए पक्षी को काशी भेज दिया वह लीला मात्र में ही मार्ग को तय कर गंगा नदी के तट पर जा पहुँचा। उसे देखकर उस पर एक दूसरा श्येन पक्षी झपट पड़ा। दोनों की आपस में खूब छेड़-छाड़ हुई और परस्पर की नूँचा-नूँच में वह वर्तन उस पक्षी के गले से छूटकर गंगा में जा पड़ा और टूट-फूट गया ॥३०-३४॥


मत्सीमुखेऽपतत्तच्च रेतः स्थितिमाप च। पुनस्तज्जठरे गर्भो बभूव तत ऊर्जितः ॥३५॥

स्त्रीत्वं गतस्तदा भ्रूणः पूर्णे मासि कदाचन। मात्सिकेन च सा मत्सी दृष्टा लब्धा विदारिता ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): उसमें जो वीर्य था वह दैवयोग से एक मछली के उदर में चला गया, एवं उसके उदर में ठहर कर वह गर्भ के रूप में परिणत हो गया। तात्पर्य यह कि उस वीर्य से एक मछली गर्भवती हो गई। गर्भ के नौ महीने पूरे हो ही चुके थे कि दैवयोग से उस मछली पर एक दिन किसी धीवर की दृष्टि पड़


ततस्तज्जठरात्तूर्णं निर्गता मत्स्यगन्धिका।
मत्स्यगन्धाख्यया ख्याता नारी पूतिकलेवरा ॥३७॥

दौर्गन्ध्याद्धीवरेणैषा गङ्गाकूले निवासिता।
द्रोणीवाहनकृत्येन जीविता यौवनोन्नता ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 35 से 38): गई। उसने उसे पकड़ कर चीर डाला। उस वक्त उसके गर्भ से एक लड़की हुई जो कि संसार में मत्स्यगंधा के नाम से प्रसिद्ध है। मत्स्यगंधा के शरीर से बदबू बहुत आती थी। इस कारण उस धीवर ने उसे नदी के तट पर ही वसा दिया था। वह वहीं रहती थी और नौका चला-चलाकर अपनी उदर पूर्ति किया करती थी। धीरे-धीरे वह युवती हुई ॥३५-३८॥


कदाचिदृषिणा पाराशरेण नावि संस्थिता।
सा संगं संगिता भेजे भ्रूणं कर्मवशाल्लघु ॥३९॥

तेन योजनगन्धा सा दीर्घेणानेहसा कृता।
सुतं व्यासाभिधं जज्ञे रूपिणं नयकोविदम् ॥४०॥

जन्मान्तरतस्तूर्णं व्यासो वेदाङ्गपारगः।
जनकान्तिकमापासौ तपोऽर्थं तपसावृतः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 39 से 41): दैवयोग से एक दिन नौका में जाते हुए पाराशर ऋषि के साथ उसका समागम हो गया। उसने व्यास जैसे सुन्दर और वेद-वेदांग के ज्ञाता पुत्र को जन्म दिया। व्यास बालकपन में ही तप तपने के लिए अपने पिता पाराशर ऋषि के पास चले गये ॥३९-४१॥


शान्तनेन सुशान्तेन दृष्ट्वा योजनगन्धिका।
उपयेमे सुतौ लेभे सा चित्रं च विचित्रकम् ॥४२॥

शान्तनोश्च सुवीर्येण जाता सा सुततामगात्।
पुनर्विवाह्या सा तेन सुता जाया कथं कृता ॥४३॥

तौ च चित्रविचित्राख्यौ प्राप्तपाणिप्रपीडनौ।
मृते तातेऽथ संप्राप्तराज्यौ तौ मृतिमापतुः ॥४४॥

राज्यस्थित्यर्थमानीतो व्यासो योजनगन्धया।
राज्यस्य स्थितये तेन गर्ह्यं कर्म समावृतम् ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 42 से 45): एक दिन शांत-चित्त शांतनु राजा की दृष्टि उस मत्स्यगंधा के ऊपर जा पड़ी और वह उसके ऊपर निछावर हो गया तथा मोह के वश होकर उसने उसके साथ विवाह कर लिया। कुछ काल बाद शांतनु के सम्बन्ध से उसके दो पुत्र पैदा हुए। एक चित्र और दूसरा विचित्र। चित्र का ब्याह अंबा और विचित्र का ब्याह अंबिका के साथ हुआ। इन दोनों की अंबालिका नामक एक दासी थी। दैवयोग से थोड़े ही समय में शांतनु राजा का परलोक हो गया और चित्र-विचित्र दोनों भाई राज-पाट के मालिक हुए। काल की गति विकराल है। उस पर किसी का जोर नहीं चलता। वह दुष्ट कुछ ही काल में चित्र-विचित्र को भी निगल गया। इनके कोई सन्तान न थी, अतः राज-पाट सब सूना हो गया। तब मत्स्यगंधा ने राज-काज चलाने के लिए व्यास को बुलाया। वे आये और राज-पाट का सम्बन्ध पाकर उन्होंने भारी-भारी कुकर्म किये ॥४२-४५॥


धृतराष्ट्रस्य चोत्पत्तिरन्धस्य व्यासतः कथम्।
पाण्डोः कुष्ठाभिभूतस्य चोत्पत्तिस्तत एव हि ॥४६॥

अर्थ: वे कहने लगे कि गन्धिके ! मेरी बात सुनो जो सभी के हित की है। वह यह कि यदि तुम्हारी दोनों वधुएँ और उनकी दासी मेरे आगे ही लज्जा छोड़कर नंगी निकल जायें तो वे अवश्य ही गर्भवती होगी या यों कि वे गर्भधारण करेंगी। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। तुम मेरी बात पर विश्वास रखकर ऐसा करो। गन्धिका ने वैसा ही किया और तीनों गर्भवती हो गई। धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हुए तब अंबा और अंबिका ने धृतराष्ट्र, अन्धक और कुष्ठ रोगी पाण्डु को जन्म दिया तथा अंबालिका ने


विदुरस्य पुनस्तस्मादुत्पत्तिः श्रूयते प्रभो। चित्रस्य च विचित्रस्य भार्यासु रक्तमानसात् ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): विदुर को पैदा किया। भगवन्! अब कहिए कि जो यह सुना जाता है कि अंबा-अंबिका में आसक्त-चित्त व्यास से इनकी उत्पत्ति हुई, यह कहाँ तक सत्य हैं ? ॥४६-४७॥


गान्धारी गदिता साध्वी शतसंख्यैरजैः समम्। विवाह्य मारितैः पित्रा यदुवंशोद्भवेन च ॥४८॥

ते स्तभा मृतिमापन्ना भूतीभूतास्तया समम्। भोगसंयोगरङ्गाढ्या जातास्तत्कथमुच्यताम् ॥४९॥

ततस्तस्यां सुगर्भाणामुत्पत्तिः श्रूयते कथम्। देवैर्मनुष्यनारीणां संगमः किमु जायते ॥५०॥

गर्भोत्पत्तिस्ततस्तस्याः संजाताकर्ण्यते प्रभो। अपूर्णे मासि गर्भाणां तेषां पातः समाभवत् ॥५१॥

पतन्तस्ते पुनर्गर्भाः कर्पासे विनियोजिताः। रक्षितास्ते पुनः पूर्णे मासि पूर्णत्वमागताः ॥५२॥

दुर्योधनादयो जाताः कौरवास्ते महोन्नताः। गान्धार्या धृतराष्ट्रेण पुनर्विवाहमङ्गलम् ॥५३॥

गोलकेन समं भाति चैतत्खपुष्पवर्णनम्। एनं पुराणपन्थानं कथं लोका हि मन्वते ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 48 से 54): गांधारी का सौ अज आदि राजाओं के साथ विवाह हुआ और फिर भी उसे सती कहा है, यह कहाँ तक ठीक है? तथा सुना जाता है कि अज आदि को उनके पिता यदुवंशी राजा भोजक-वृष्टि ने मार डाला तब वे मरकर भूत हुए और भूतपर्याय में ही उन्होंने गांधारी के साथ समागम किया। यह भी एक विचित्र बात है और प्रश्न उठता है कि क्या मनुष्यनी के साथ देव भी समागम करते हैं ? भारी अचम्भे की बात तो यह कि भूतों के समागम से उसने गर्भ भी धारण किया, पर उसका वह गर्भ अधूरे दिनों का ही गिर पड़ा। बाद वह कपास में रखकर बढ़ाया गया और नौ महीने पूरे हो चुकने पर उससे दुर्योधन आदि कौरवों की उत्पत्ति हुई ? इसके बाद गांधारी का गोलक (विधवा से उत्पन्न हुए जार-पुत्र) धृतराष्ट्र के साथ पुनर्विवाह हो गया। हे देव! यह सब कथा आकाश के फूल की प्रशंसा की भाँति निष्फल-व्यर्थ है। इसके कहने या सुनने से कुछ भी लाभ की आशा नहीं। पर न जाने लोग फिर भी ऐसी मनगढ़न्त कथा पर कैसे विश्वास करते हैं ॥४८-५४॥


पाण्डुना गोलकेनापि श्वेतकुष्ठेन कुष्ठिना। कुन्ती मद्री च संप्राप्ता विवाहवरमङ्गलम् ॥५५॥

एकदा वरनारीभ्यां पाण्डुराखण्डलोपमः। मृगयायां मृगादीनां मारणाय वनेऽगमत् ॥५६॥

ते सज्जनाः सदा सन्तः सर्वजीवदयापराः। मृगयायां मृगान्घ्नन्ति चैतत्किं सांप्रतं प्रभो ॥५७॥

मृगीभूय वने तत्र तापसद्वन्द्वमुत्तमम्। सुरतक्रीडनासक्तं जघान पाण्डुपण्डितः ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 55 से 58): सफेद कुष्ठ वाले और गोलक पाण्डु का विवाह कुन्ती और माद्री के साथ हुआ बताया जाता है। एक दिन इन्द्र के जैसी शोभा का धारक पाण्डु राजा अपनी दोनों भार्याओं को साथ लेकर वन में शिकार के लिए गया और उसने हिरण जैसे गरीब और मूक पशुओं को मारने का इरादा किया। हे प्रभो! यह बात बड़ी खटकती हैं कि कौरव लोग भारी दयालु और सज्जन थे, फिर भी वे दीन-हीन पशुओं को वध करने का इरादा करें यह उनका काम कहाँ तक उचित है ? उसी वन में दो तपस्वी मृग का रूप धर कर मैथुन-क्रिया में आसक्त चित्त हो रहे थे। इतने में बाण-विद्या-विशारद पाण्डु ने उन पर बाण छोड़ा। यहाँ यह शंका होती है कि क्या मनुष्य भी मृग का रूप बना सकते हैं? और एक धर्मात्मा


मृगत्वे हि मनुष्याणां योग्यता जायते कथम्।
मृगादिमारणं राज्ञो धार्मिकस्य कथं भवेत् ॥५९॥

बाणेनापि मृगो विद्धो नृपेण मृतिमाप च।
सुरती तत्स्त्रिया दत्तः शापो राज्ञ इति ध्रुवम् ॥६०॥

मन्नाथवत्तवापि स्याद्युवतीसंगमक्षणे।
मृतिः कष्टेति संलब्धशापी भूपो बभूव च ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 55 से 61): राजा मृग जैसे मूक पशुओं पर बाण चलाकर उन्हें दुख दे, यह कहाँ तक उचित कर्तव्य है ? उस बाण के द्वारा वेधा जाकर जब मृग मारा गया तब मृगी बहुत ही दुखी हुई और मैथुन-क्रिया में आसक्त-चित्त उस मृगी ने राजा को यह शाप दिया कि मेरे पति की तरह तुम भी अपनी प्रिया के साथ समागम करते समय ही काल के मुँह में जाओगे-मरोगे। इस शाप को सुनकर राजा को बहुत दुख हुआ और उसने उसी वक्त प्रतिज्ञा की कि मैं आज से जन्म भर स्त्री के साथ समागम ही नहीं करूँगा ॥५५-६१॥


कुन्त्या कर्णेन संलब्धः कर्णः किं सूर्यसंगतः।
नराः कर्णोद्भवा नाथ नेक्षिताश्च क्षितौ क्वचित् ॥६२॥

ततः कुन्ती सुधर्मेण सुरतासक्तमानसा।
दधे गर्भं ततो लेभे युधिष्ठिरतनूद्भवम् ॥६३॥

वायुना जभिता कुन्ती लेभे भीमं भयातिगम्।
मघोना मैथुनं प्राप्तार्जुनं चार्जुनसत्प्रभम् ॥६४॥

माद्री सन्मुद्रया युक्ता याश्विनेयसुरश्रिता।
नकुलं सहदेवं च सा लेभे सद्गुणौ सुतौ ॥६५॥

कुण्डाश्च पाण्डवाः स्वामिन् संबोभुवति भूतले।
कथं सत्पुरुषाणां च समुत्पत्तिर्वेदृशी ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 62 से 66): भगवन् ! और भी सुना जाता है कि सूरज के सम्बन्ध से कुन्ती ने अपने कर्ण द्वारा कर्ण को जन्म दिया, पर आज तक कहीं कान से पैदा हुए मनुष्य देखने में नहीं आये। तब कहिए यह कहाँ तक सम्भव बात है ? इसके बाद कुन्ती का सुधर्म के साथ समागम हुआ जिससे उसे गर्भ रहा और उसने युधिष्ठिर जैसे योद्धा पुत्र को जन्म दिया एवं कुन्ती ने वायु के समागम से निर्भय भीम और इन्द्र के समागम से अर्जुन (चाँदी) के समान प्रभा वाले अर्जुन को पैदा किया ॥६२-६४॥ इसी प्रकार रूप-श्री से युक्त माद्री ने भी आश्विनेय सुर के सम्बन्ध से नकुल और सहदेव को जन्म दिया। ये दोनों उत्तम गुणों के भण्डार थे। इन सबको किसी भी बात की कमी न थी। हे प्रभो ! इस कहानी से जान पड़ता है कि पाण्डव लोग कुंड थे-सधवा से उत्पन्न हुए जार-पुत्र थे। अब बताइए कि ऐसे सत्पुरुषों की इस भाँति उत्पत्ति क्यों हुई ? यह बात सच्ची है या मिथ्या ? ॥६५-६६॥


भीमो महाबली बुद्धः प्रज्ञापारमितः कथम्।
दशमान्यन्नमाभुङ्क्ते स्वल्पाहारो महान्यतः ॥६७॥

गङ्गायाः सरितो जातो गाङ्गेयः कथमुच्यते।
यदि नद्या मनुष्याणामुत्पत्तिः किं नराम्बया ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 67 से 68): भीम भारी बलवान्, समझदार और बुद्धि का सागर था तथा वास्तव में उसका आहार भी बहुत कम था, पर न जाने लोग क्यों कहते है कि भीम दस मानी अन्न रोज खाता था और भी सुनते हैं कि गांगेय ऋषि गंगानदी से पैदा हुए ? परन्तु हे नाथ ! यहाँ यह तर्क उठता है कि नदियों से यदि मनुष्यों की उत्पत्ति होने लगे तो फिर कोई विवाह ही क्यों करेगा और घर-गृहस्थी के झंझट में ही काहे को फँसेगा ॥६७-६८॥


द्रौपदी रूपभूषाढ्या साध्वी शीलव्रतान्विता। पञ्चापि पाण्डवान्भ्रातॄन्कथं सेवेत सेवनी ॥६९॥

यदा युधिष्ठिरासक्ता सान्यान्सर्वांश्च पाण्डवान्। देवरान्सुतसंतुल्यान्कथं भुङ्क्ते पुनः शुभा ॥७०॥

यदान्यपाण्डवासक्ता पुनर्ज्येष्ठं युधिष्ठिरम्। पितृप्रायं कथं नित्यं भुङ्क्ते साधो विडम्बना ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 69 से 71): कहते हैं कि द्रौपदी बहुत ही सुन्दरी थी, सती थी, शील को अखण्ड पालती थी परन्तु फिर भी वह पाँचों पाण्डवों को भोगती थी। हे नाथ! कहिए कि जब वह सती थी तो उसके पाँच पति कैसे हो सकते हैं ? और कदाचित् हों भी तो ऐसी हालत में वह सती कहाँ रही ? यह बात परस्पर विरुद्ध है। दूसरी बात यह कि जब वह युधिष्ठिर के साथ कामासक्त होती थी उस समय और-और पाण्डव उसके देवर हुए, जो पुत्र के बराबर होते हैं। फिर वह उनके साथ कैसे रमती थी ? जब वह और-और पाण्डवों के साथ काम-क्रीड़ा करती थी उस वक्त युधिष्ठिर उसके जेठ हुए, जो कि पिता से कम नहीं होता। ऐसी हालत में वह युधिष्ठिर को कैसे भोग सकती थी। यह सब बड़े ही अचंभे की कहानी है ॥६९-७१॥


एतत्सर्वं मुने भाति सिकतापीड़नोपमम्। तैलार्थं च घृतार्थं वा यथा सलिलमन्थनम् ॥७२॥

शिलायां वापनं बीजारोहणार्थं वरं न हि। तथा परपुराणार्थो नाथ नार्थी भवेल्लघु ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 72 से 73): हे भगवन्! इस कथा को कहकर या सुनकर कुछ भी फल की इच्छा करना बालू को पेलकर तेल और जल को बिलोकर घी की इच्छा करना है। तात्पर्य यह कि जैसे बालू को तेल के लिए पेलना और पानी को घी के लिए बिलोना व्यर्थ है वैसे ही यह कहानी भी व्यर्थ का वाग्जाल है। इसमें कुछ भी सार और सच्चाई नहीं। तब इसको कहने या सुनने से फल की आशा ही क्या हो सकती है या यों कि जिस तरह फल की आशा कर शिला पर बीज बोना किसी काम का नहीं उसी तरह मनोरथ-सिद्धि की लालसा से ऐसी कथा बताने वाले पुराण को कहना या सुनना भी किसी प्रयोजन का नहीं ॥७२-७३॥


गाङ्गेयस्य च माहात्म्यं गाङ्गेयसमसत्प्रभम्। द्रोणाचार्यबलाख्यानं ख्याहि भीमपराक्रमम् ॥७४॥

हरिवंशसमुत्पत्तिं द्वारावतीनिवेशनम्। हरेर्नेमेर्बलाख्यानं जरासन्धविनाशनम् ॥७५॥

कुरूणां पाण्डुपुत्राणां वैरं वैरस्य कारणम्। विदेशगमनं पाण्डुपुत्राणां पुनरागमम् ॥७६॥

द्रौपदीहरणं चैवावाचीदिङ्मधुरास्थितिम्। विष्णोश्च मरणे तेषामागमं नेमिसंनिधौ ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 74 से 77): हे प्रभो! मेरे हृदय में कुछ और भी सन्देह उठ रहे हैं, अतः आपसे निवेदन है कि आप नीचे लिखी बातों को समझा कर उन्हें दूर कीजिए और संसार का हित कीजिए। १. गंगा के जल के समान-स्वच्छ गांगेय ऋषि का माहात्म्य, २. द्रोणाचार्य का पराक्रम, ३. भीम का पराक्रम, ४. हरिवंश की उत्पत्ति, ५. द्वारिकापुरी की रचना, ६. कृष्ण और नेमिनाथ का बल, ७. जरासंध का सत्तानाश, ८. कौरव और पाण्डवों का वैर, ९. तथा उनके वैर का कारण, १०. पाण्डवों का विदेश जाना और फिर वापस लौटना, ११. द्रौपदी का हरण, १२. उत्तर मथुरा की हालत, १३. कृष्ण का मरण होने पर पाण्डवों का


अटनं झटिति प्रायः पूर्वसर्वभवोद्भवम्। वर्णनं द्रौपदीपञ्चभर्तृलाञ्छनकालिकाम् ॥७८॥

दीक्षणं पाण्डुपुत्राणां शत्रुंजयसमागम्। परीषहजयाख्यानं त्रयाणां केवलोद्गमम् ॥७९॥

निर्वाणार्थपथप्राप्तिं पञ्चानुत्तरवासिताम्। द्वयोरेतत्समाख्याहि सर्वं सार्व शिवोद्यत ॥८०॥

इतीमां नृपतेः प्रश्नमालां संशीतिनाशिनीम्। सर्वजीवहितोद्युक्तां श्रुत्वा प्रोवाच सद्गणी ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 74 से 81): नेमिनाथ स्वामी के पास आना, १४. पाण्डवों के पूर्वभव, १५. द्रौपदी का पंच भरतारीपने का कलंक, १६. पाण्डवों की दीक्षा, १७. पाण्डवों का शत्रुंजय पर्वत पर जाना, १८. वहाँ घोर परीषहों का सहना, १९. तीन पाण्डवों को केवलज्ञान होना और उनका मोक्ष जाना, २०. दो पाण्डवों का पंच अनुत्तर में अहमिन्द्र पद पाना। हे देव! इन प्रश्नों के समाधान को सुनकर सभी जीव सुखी होंगे, अतः हे सबके हितैषी और सबके हित के लिए तैयार रहने वाले प्रभो! आप इनका शीघ्र ही समाधान कीजिए क्योंकि आपको छोड़कर और कोई भी इन प्रश्नों को हल नहीं कर सकता। इस प्रकार वीरप्रभु की सभा में श्रेणिक महाराज ने बहुत से प्रश्न किये। उनके प्रश्न संदेह को मिटाने वाले और सबके हितकारी हैं ॥७४-८१॥


तद्भाषाजलदो भव्यसस्यानिसिञ्चंश्च नर्तयन्। जजृम्भे जिततापात्तिः परमः शिष्यबर्हिणः ॥८२॥

तद्दन्तज्योत्स्नया सर्वान्सभ्यान्सच्छुभसंगतान्। क्षालयन्स चकास्ति स्म क्षालिताशेषकिल्विषः ॥८३॥

तेजसा सोऽपरं पीठं कुर्वन्सत्तेजसा वृतः। चकासे चेतनारूढः प्ररूढगुणसंपदः ॥८४॥

समीपस्थाः सुशिष्याश्च श्रुत्वा तं प्रश्नमुत्तमम्। हर्षोत्कण्ठितसर्वाङ्गा अजायन्ताप्तसत्क्षणाः ॥८५॥

अभाषन्त तदा सर्व ऋषयः सुरसत्तमाः। तत्पुराणं प्रसिद्धार्थमिच्छन्तः श्रोतुमञ्जसा ॥८६॥

अर्थ (श्लोक 82 से 86): इसके बाद जब गौतम गुरु उत्तर में बोलने लगे तब संसार-ताप को दूर करने वाली उनकी दिव्यवाणी को सुनकर भव्य पुरुषों को बहुत आनंद हुआ, वे हर्ष से गद्गद् हो गये, जैसे सूरज के ताप को मिटाने वाले मेघों का निमित्त पाकर अन्न के खेत हरे-भरे हो जाते हैं। इसी तरह मेघ के शब्द को सुनकर मयूर की तरह शिष्य-गण भी उनकी वाणी को सुनकर नाचने लग गये। तात्पर्य यह कि उन्हें बहुत ही हर्ष हुआ। उस समय गौतम भगवान् के दाँतों की स्वच्छ किरणें जाकर सभी सभाजनों के ऊपर पड़ती थीं, अतः ऐसा जान पड़ता था कि वे स्वभाव से ही पवित्र-चित्त सभासदों को और भी पवित्र बना देने के लिए स्नान ही करा रही हैं। गौतम प्रभु निष्पाप पवित्र आत्मा थे, तेजस्वी थे, उनका तेज चारों ओर फैल रहा था। वे अपने तेज से घिरे हुए अपूर्व ही शोभा को धारण कर रहे थे। वे आत्म-स्वरूप में लीन और गुणों के भण्डार थे। गौतम गुरु के चारों तरफ जो और-और शिष्य-गण विराजे थे वे श्रेणिक राजा के प्रश्नों को सुनकर बहुत ही हर्षित हुए, कारण पाण्डवों के चरित को सुनने का उन्हें अच्छा मौका आ मिला था तथा वहाँ जो देवतों द्वारा पूजे जाने वाले और-और ऋषि-गण बैठे थे वे महाराज के प्रश्नों को सुनकर कहने लगे कि प्रसिद्ध पाण्डव पुराण को सुनने की हमारी बहुत दिनों से इच्छा थी, आशा है कि वह अब पूरी हो जायेगी ॥८२-८६॥


राजन्मगधनीवृत्य नाशिताशेषशात्रवः। सद्दृष्टे मिष्टवाक्यौघ भविष्यत्तीर्थकारक ॥८७॥

अनुयोगः कृतो यस्तु त्वया सद्दृष्टिचेतसा। सोऽस्माकं प्रीतिदः पुण्यपाकोद्भूतिसुकारकः ॥८८॥

अस्माकं मतमेतद्धि पुराणार्थोद्यतात्मनाम्। यत्पुराणनराणां भो पुराणं श्रूयते शुभम् ॥८९॥

अस्माकं संशयध्वान्तध्वंसाद् ब्रध्नायसे नृप। गुणगौरवदानेन गुरूणां त्वं गुरूयसे ॥९०॥

हितकृच्च हितार्थानां प्रश्नात्वं सर्वदेहिनाम्। मिथ्यारोगविनाशेन सदा वैद्यायसे स्फुटम् ॥९१॥

पाण्डवानां पुराणार्थं श्रोतुकामा वयं पुरा। स एव भवता पृष्टः केषां हर्षाय नो भवेत् ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 87 से 92): राजन्! आपने मगध देश के बहुत से शत्रुओं की जीत लिया है, आप सम्यग्दर्शन से युक्त और मिष्टभाषी हैं तथा भावी तीर्थंकर हैं। आपके प्रश्नों को सुनकर हमें बहुत खुशी हुई और हमारे पुण्योदय की भी उद्भूति हुई। हमारी बहुत इच्छा थी कि हम पुराण-पुरुषों के पुराण को सुने और वह पुराण आज हम सुन रहे हैं। इसके सिवा और क्या खुशी की बात होगी। राजन्! आपने हमारे सन्देह रूप अँधेरे को हटा दिया, इसलिए आप सूरज हैं, आपने हमारे गुणों को गौरव दिया, अतः आप गुरु से भी गुरु हैं, अपने हित चाहने वाले पुरुषों के हित का प्रश्न किया, इसलिए आप हितैषी हैं और जीवों के मिथ्यात्व-रोग को दूर करते हैं, इसलिए परोपकारी सच्चे वैद्य हैं। जिनधर्म में कहा है कि पुराणों को सुनने से आत्मा का कल्याण होता है ॥८७-९२॥


पुराणश्रवणाश्रेयः श्रूयते जिनशासने। त्वत्तस्तच्छ्रवणं नूनं भविता भवनाशनम् ॥९३॥

भरताद्याः पुरा जाता भारते भरतेश्वराः। पुराणश्रवणात्प्राप्ता देशावधिमहाविदम् ॥९४॥

विष्णुर्नेमिसभायां च पुराणं पुण्यदेहिनाम्। आकर्ण्याशु बबन्धात्र तीर्थकृत्त्वं सुतीर्थकृत् ॥९५॥

त्वमपि प्राप्य वीरेशं निशम्यागमसत्कथाम्। भवितात्र महापद्मः प्रथमस्तीर्थनायकः ॥९६॥

अत एव पुराणार्थं पावनं त्वत्प्रसादतः। श्रोष्यामः सिद्धये सत्यं गुणिसङ्गाद् गुणो भवेत् ॥९७॥

अगण्यगुणगौरत्वं वात्सल्यं जिनशासने। साधार्मिकमहास्नेहो विद्यते भूपते त्वयि ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 93 से 98): इस समय लोग इस पुराण को आपके निमित्त से सुन ही रहे हैं। तब यही कहना होगा कि हमारा कल्याण करने वाले हैं-संसार की सत्ता नाश करने वाले हैं। इस भारत वर्ष में पहले भरत आदि बहुत से इसके स्वामी हो गये हैं। उन्होंने पुराण को सुनकर देशावधि नाम महान् ज्ञान को पाया था। कृष्ण नारायण ने नेमिनाथ भगवान् की सभा में पुराण पुरुषों के चरित को सुनकर उसी समय तीर्थंकर नामकर्म को बाँधा था, जिसके प्रभाव से वे धर्म-तीर्थ को चलाने वाले तीर्थंकर भगवान् होंगे और उसी तरह आप भी आज वीरप्रभु की सभा में आगम में कही हुई सत्कथाओं को सुन रहे हैं, अतएव आप भी आगे उत्सर्पिणी काल में महापद्म नाम प्रथम तीर्थंकर होंगे। यह सब पुराण पुरुषों की कथा कहने या सुनने का ही प्रभाव है। राजन्! अब देखो कि हम भी तुम्हारे निमित्त से इस पवित्र पुराण को सुनते हैं और आशा है कि हमारे मनोरथ की भी सिद्धि होगी। सच है गुणी पुरुषों की संगति से गुणों का लाभ होता ही है। राजन्! आपमें अगणित गुण है और वे सभी-के-सभी गौरव-युक्त हैं। जिनागम में आपका अटूट प्रेम है। आप धर्मात्मा और धर्मात्माओं के साथ गाय-बछड़े की भाँति प्रीति रखने वाले


त्वत्समो न गुणी भूपो दृष्टो नैव च दृश्यते।
गुणज्ञता जगत्पूज्या गुणी सर्वत्र मान्यते ॥९९॥

इति प्रशंसयामासुर्भू shoot: इति प्रशंसयामासुर्भूूपालं ते महर्षयः।
मणिवद् गुणतो मान्यो महतां लघुरप्यहो ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 93 से 100): हैं। आपके समान गुणों राजा न तो देखा और न इस समय देख ही पड़ता है। सच है गुणज्ञता को सभी पूजते हैं और गुणी का सब जगह आदर होता है। इस प्रकार उन महर्षियों ने महाराज की खूब ही प्रशंसा की। सच है मणियों के समागम से सूत की तरह गुणों के निमित्त से छोटा-सा पुरुष भी बड़े-बड़े महात्माओं द्वारा गण्य-मान्य हो जाता है ॥९३-१००॥


ततो गम्भीरया वाचा वाग्मी विद्वज्जनैर्नुतः।
गौतमो गणभृद्गम्यो जगाद जगतां गुरुः ॥१०१॥

साधु साधु त्वया पृष्टं श्रेणिक श्रुतिकोविद।
व्याख्यास्यामि क्षितौ ख्यातं यत्पृष्टं तत्समासतः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 101 से 102): इसके बाद विद्वानों द्वारा पूजे जाने वाले और जगत् के गुरु वाचस्पति गौतम गणधर अपनी गंभीर ध्वनि से कहने लगे कि श्रेणिक महाराज ! तुमने बहुत अच्छी शंका पूछी। हे शास्त्र-विशारद ! तुमने जो संसार-प्रसिद्ध बात पूछी है उसको अब हम थोड़े में कहते हैं। तुम सावधान चित्त हो कर सुनो ॥१०१-१०२॥


भरतेऽत्र महीपाल भोगभूमिस्थितिक्षये।
पल्यस्य चाष्टमे भागे तृतीयस्याप्यनेहसः ॥१०३॥

उद्भूते मनवो जाताश्चतुर्दश दिगीश्वराः।
अनेककुलकर्तारः कलाकलापकोविदाः ॥१०४॥

प्रतिश्रुतप्रथमस्तत्र सन्मतिर्द्वितीयो मतः।
क्षेमंकरः क्षेमधरः सीम्नः करधरौ स्मृतौ ॥१०५॥

विपुलाद्वाहनश्चक्षुष्मान्यशस्यभिचन्द्रकः।
चन्द्राभो मरुदेवश्च प्रसेनजित्त्रयोदशः ॥१०६॥

चतुर्दशस्तु नाभीश एते कुलकरा मताः।
हा मा धिक्कारदण्डैश्च स्वपदापन्निवारकाः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 103 से 107): इस भरत क्षेत्र में पहले भोगभूमि थी और कल्पवृक्षों के निमित्त से लोगों का मन चाहे आराम से काल गुजरता था। पर धीरे-धीरे जब भोग-भूमि का क्षय आने लगा और तीसरे काल का पल्य का कुल आठवाँ भाग काल बाकी रह गया तब चौदह कुलकर उत्पन्न हुए। वे दिगीश्वर थे अर्थात् यद्यपि तेरह कुलकरों का राजा-प्रजा का कुछ भी सम्बन्ध न था, पर तो भी लोगों में वे मुख्य गिने जाते थे। वे बहुत-सी कला-चतुराईयों को जानते थे और उन्होंने अनेक कुलों की व्यवस्था की थी। उनके नाम थे-प्रतिश्रुत, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमधर, सीमंकर, सीमंधर, विपुलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित् तथा नाभिराज। इन्होंने हा, मा और धिक् इन तीन दंडों को नियत किया था और इन्हीं के द्वारा लोगों पर हिंसक जन्तुओं आदि के निमित्त से जो आपत्तियाँ आती थीं उन्हें ये दूर करते थे ॥१०३-१०७॥


नाभिना मरुदेवी च संप्राप्ता पाणिपीड़नम्।
तदेन्द्रेण सुवासार्थमयोध्यापूरस्तयोः कृता ॥१०८॥

इन्द्राज्ञया जिनेशेऽत्रावतरिष्यति वर्षणम्।
षण्मासे किन्नरेशानो रत्नानां विदधे वरम् ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 108 से 109): चौदहवें कुलकर नाभिराजा का ब्याह मरुदेवी के साथ हुआ। इसी समय से इनके रहने के लिए इन्द्र ने आकर अयोध्या नगरी की रचना की और कुबेर को आज्ञा की कि यहाँ पर भगवान् आदिनाथ जन्म लेंगे, इसलिए तुम अभी से यहाँ रत्नों की बरसा करो। इन्द्र की आज्ञा को शिरोधार्य कर कुबेर


सर्वार्थसिद्धितो देवश्च्युत आषाढकृष्णके। द्वितीयायां तदा गर्भे दधे देवीसुशोधिते ॥११०॥

षट्पञ्चाशत्कुमारीभिः सेव्यमाना मुहुर्मुहुः। गर्भेण शुशुभे सापि मणिनाकरभूमिवत् ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 108 से 111): ने वहाँ बराबर पंद्रह महीने रत्नों की बरसा की तथा देवियों ने आकर गर्भशोधन आदि क्रियाएँ कीं। इसी समय सर्वार्थसिद्धि नाम विमान से एक देव चयकर आषाढ़ वदि दोज के दिन मरुदेवी के गर्भ में आया। भगवान् को गर्भ में धारण किये हुए मरुदेवी ऐसी जान पड़ती थी मानों रत्नों को भीतर रखने वाली पृथिवी ही है। तात्पर्य यह कि वह उस वक्त रत्नों की खानि की तरह शोभती थी। भगवान् की माता मरुदेवी की छप्पन देवकुमारियाँ सदा काल सेवा करती थीं। उनका काल अमन-चैन के साथ बीतता था। जब आसानी से नौ महीने पूरे हो गये तब उन्होंने चैत सुदि नौमी के दिन भगवान् आदिनाथ प्रभु को जन्म दिया, जैसे सीप अमूल्य मोतियों को पैदा करती है। आदिनाथ प्रभु का जन्म सबको शुभ-कल्याण का निमित्त हुआ ॥१०८-१११॥


नवमासेष्वतीतेषु सा सूते स्म सुतं शुभम्। चैत्रकृष्णानवम्यां तु शुक्तिका मौक्तिकं यथा ॥११२॥

जातमात्रः सुरेन्द्राणां कम्पयामास सज्जिनः। विष्टराणि न को वेत्ति महतां चरितं भुवि ॥११३॥

तज्जन्मक्षणसंक्षुब्धाः क्षणेन जिष्णवोऽखिलाः। आगत्य जन्मकल्याणं विदधुर्धृतिमागताः ॥११४॥

इन्द्र ऐरावणारूढो नानासुरसमन्वितः। स्थित्वा नाभ्यालयद्वारि वरिष्टारिष्टसद्मनि ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 112 से 115): भगवान् का जन्म होते ही देवताओं के सिंहासन हिल गये-उनके वहाँ हल-चल मच गई। सच है सत्पुरुषों के चरित की सभी को सूचना मिल जाती है। इसके बाद अवधिज्ञान द्वारा भगवान् का जन्म जानकर देवता-गण उसी वक्त स्वर्ग से चलकर थोड़ी ही देर में अयोध्या नगरी में आ पहुँचे। वहाँ आकर सभी देवता-गण और ऐरावत हाथी पर चढ़ा हुआ इन्द्र तो नाभिराजा के महल के द्वार पर खड़ा रह गया और सुन्दर रूप की सीमा मानिनी इन्द्राणी को उसने मनोहर प्रसूति-गृह में भगवान् को ले आने के लिए भेजा ॥११२-११५॥


शचीं शुचिसमाकारां प्रेषयामास मानिताम्। जिनं गुणघनं कम्पं समानेतुं स्वभक्तितः ॥११६॥

जिष्णुजाया गता तत्र प्रच्छन्नाङ्गी जिनेश्वरम्। शयनीये समालोक्य निजामासहितं नता ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 116 से 117): भक्तिभाव से भरी हुई इन्द्राणी गुप्तरूप से भीतर गई और वहाँ उसने गुणों के भण्डार और मनोहर आदिनाथ प्रभु को एक अनोखी शय्या पर लेटे हुए देखा। उसने माता-सहित उन्हें नमस्कार किया। उत्तम और इष्ट गुणों के पुंज भगवान् को देखकर इन्द्राणी का हृदय बहुत ही सन्तुष्ट हुआ। हर्ष के मारे उसका सारा शरीर रोमांचित हो गया ॥११६-११७॥


तुष्टाव तुष्टिसंपुष्टा विशिष्टेष्टगुणं जिनम्। सा शची हर्षपूर्णाङ्गी गुणगौरवसन्मतिः ॥११८॥

जिनाम्बां संनियोज्याशु शाम्बरीनिद्रया तदा। शिशुं मायामयं चान्यं मुक्त्वा जग्राह तं जिनम् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 118 से 119): उसने भगवान् के गुणों के गौरव को अच्छी तरह समझा इसके बाद वह भगवान् की माता को माया की नींद में सुलाकर और उनके पास माया-मय बालक को लिटाकर आप प्रभु को लेकर बाहर


सुदुर्लभं तदासाद्य तद्गात्रस्पर्शमाशु सा।
जहर्ष हृष्टचेतस्का तदाननविलोकनात् ॥१२०॥

विडौजसः करेऽधात्तं बिडौजःप्राणवल्लभा।
प्राचीवोदयशैलस्य शृङ्गे बालार्कमुत्तमम् ॥१२१॥

ततः सुरैः समं श्रीमान्सुरेन्द्रः शिशुसंयुतः।
अगान्मेरुगिरेः शृङ्गं नानावाद्यकृतोत्सवः ॥१२२॥

पाण्डुके पाण्डुकाया सा बिडौजा बहुभिः सुरैः।
शिलायां विष्टरे बालं रोपयामास तं मुदा ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 118 से 123): चली आई। इस वक्त भगवान् के शरीर का अत्यन्त दुर्लभ स्पर्श कर और उनके मुख कमल का दर्शन कर इन्द्राणी को असीम हर्ष हुआ। उसने भगवान् को बाहर लाकर इन्द्र के हाथों में सौंप दिया। उस वक्त प्रभु ऐसे जान पड़े मानों पूर्व दिशा में उदयाचल पर उदय को प्राप्त हुए सूरज ही हैं। इसके बाद श्रीमान् सुरेन्द्र देवता-गण के साथ-साथ बालक प्रभु को लेकर गाजे-बाजे के साथ खूब उत्सव करता हुआ सुमेरु पर्वत के शिखर पर जा पहुँचा। वहाँ पाण्डुकवन की पाण्डुक शिला पर-जो अनादि कालीन सिंहासन है बहुत से देवों के साथ-साथ इन्द्र ने आदि प्रभु को विराजमान किया ॥११८-१२३॥


ततः क्षीराब्धितः क्षुब्धादानीतार्जुनसत्कुटैः।
सहस्रसंख्यैः सजलैः शक्रो ह्यस्नापयज्जिनम् ॥१२४॥

स्नापयित्वा जिनं स्तुत्वा कृत्वा भूषणभूषितम्।
योजयामास तं भक्त्या वृत्रहा वृषभाख्यया ॥१२५॥

समाप्य जन्मकल्याणं समारोप्य गजोत्तमे।
शतयज्वा यजन्बालमाजगाम पुरं वरम् ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 124 से 126): इसके बाद देवता-गण जल लाने को क्षीरसागर गये, जिससे उसमें हलचल मच गई। वहाँ से वे सोने के एक हजार कलश भर कर लाये। उन कलशों के द्वारा इन्द्र ने भगवान् को स्नान कराया और उन्हें दिव्य वस्त्राभूषण पहना कर उनकी भारी भक्ति-स्तुति की और प्रभु का ऋषभ नाम रक्खा। इस प्रकार जन्म कल्याणक को पूराकर सुरेन्द्र प्रभु को गजोत्तम ऐरावत हाथी पर सवार कर उनकी पूजा-भक्ति करता हुआ अयोध्या पुरी में ले आया ॥१२४-१२६॥


नाभिपार्श्वस्थितां चार्वीं मरुदेवीं महादराम्।
ददर्श मघवा मानी मायानिद्रावियोजिताम् ॥१२७॥

नत्वा नाभिं ददौ तस्यै बालं बालार्कसंनिभम्।
कथां स कथयामास मेरुजां नामजां पुनः ॥१२८॥

ननाट नाटकैर्नाट्यं नटीनटशतोत्कटः।
विकटं सुघटं शक्रः शचीभिः सहितः सुखी ॥१२९॥

निवेद्य रक्षणे रक्षान् समक्षं जिनपस्य वै।
शतयज्वा ययौ नाकं गृहीत्वाज्ञां नरेशिनः ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 127 से 130): वहाँ आकर उसने माया-निद्रा से रहित मरुदेवी को-जो कि नाभिराजा के पास बैठी हुईं थीं-बड़ी भारी आदर की दृष्टि से देखा और नाभिराजा को नमस्कार कर बाल-सूरज श्री आदिप्रभु को माता की गोद में दे दिया। इसके बाद उसने सुमेरु पर्वत की सारी कथा कह सुनाई और भगवान् का जो नाम रक्खा था वह भी बताया। इसके बाद सैकड़ों नटी-नटों से भी उत्तम नृत्य करने वाले इन्द्र ने आनन्द में आकर इंद्राणी के साथ-साथ खूब ही नृत्य किया और प्रभु की सेवा-सँभाल करने को चतुर-चतुर देवताओं को वहीं छोड़कर, नाभिराजा की आज्ञा लेकर वह स्वर्ग चला गया ॥१२७-१३०॥


ववृधे वृद्धिसंपन्नः समृद्धो बोधनत्रयैः।
विबुधैः सेव्यपादोऽसौ कुमारत्वं समासदत् ॥१३१॥

अर्थ: भगवान् के चरण कमलों की देवता-गण हमेशा भारी भक्ति से सेवा करते थे। प्रभु तीन ज्ञान


क्रमेण यौवनोद्भासी भासिताखिलदिक्च्चयः।
वृषभो वृषभो भाति भूरिभव्यपरिष्कृतः ॥१३२॥

इन्द्रेण नाभिभूपेन यशस्वत्या सुनन्दया।
जिनेशः कारयामास सबुधः पाणिपीडनम् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 131 से 133): के स्वामी थे। धीरे-धीरे कुछ समय बीत जाने पर प्रभु ने कुमार अवस्था में पैर रखा और क्रम से जब वे यौवन अवस्था में आये उस समय उनके तेज से दशों दिशाएँ प्रकाश-मय हो गई। भगवान् का जीवन धर्ममय था, अतः वे हमेशा भव्य जीवों से घिरे रहते थे। कुछ समय के बाद प्रभु ने इन्द्र और नाभिराजा की प्रेरणा से यशस्वती और सुनंदा के साथ ब्याह किया ॥१३१-१३३॥


कल्पवृक्षक्षये क्षीणास्तावता सकलाः प्रजाः।
अभ्येत्य नाभिभूपालं पूत्कुर्वन्ति स्म सस्मयाः ॥१३४॥

राजन् राजन्वतीं कुर्वन्वसुधां वसुधातले।
क्षीणाः क्षुधा समाक्रान्ता वयं भोज्यं विना प्रभो ॥१३५॥

कल्पवृक्षाः क्षयं क्षिप्रं संयाता जनकोपमाः।
इदानीं तदभावे हि किं विधास्याम उत्सुकाः ॥१३६॥

अर्थ (श्लोक 134 से 136): प्रभु का समय बड़े सुख से बीतने लगा। इसी समय प्रजा पर भारी कष्ट आकर उपस्थित हुआ। धीरे-धीरे सब कल्पवृक्ष नष्ट हो गये। यह देख लोगों को बहुत अचंभा हुआ और वे जीविका के बिना दुखी होकर नाभिराजा के पास आये तथा उनसे निवेदन करने लगे कि राजन्! हम लोग खाने-पीने के बिना बहुत दुखी हो रहे हैं। देखिए, हमारे शरीर कितने कृश हो गये हैं और हमारे हृदय में एक भारी हलचल-सी मच रही है। इसलिए हम सब आपसे विनती करते हैं कि आप हमारे दुखों को दूर कर हमें सुखी बनाइए। हे नाथ! जो कल्पवृक्ष हमें पिता की भाँति पालते-पोसते थे, वे न जाने क्यों हमारे देखते-देखते ही बिला गये। उनके बिना अब हम लोग बहुत ही दुखी हो रहे हैं-हमें जीविका का कुछ भी उपाय नहीं सूझता ॥१३४-१३६॥


निशम्य मतिमान्वाचं कृपणां कृपणात्मनां।
नाभिः संप्रेषयामास नाभिजं तान्सुशिक्षितान् ॥१३७॥

अभ्येत्य नाभिजं भक्त्या विज्ञप्तिं युक्तिसंगताम्।
चक्रुः क्षुधाभराक्रान्ता नम्रा नम्रमुखा नराः ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 137 से 138): उन दीन-दुखी जीवों की पुकार को सुनकर बुद्धिशाली नाभिराजा ने उन्हें बहुत कुछ समझाया-बुझाया और बाद आदिनाथ भगवान् के पास भेज दिया। भूख के मारे वे मुरझा रहे थे, शर्म के मार से उनके मस्तक नीचे को झुक गये थे। वहाँ से चलकर वे भगवान् के पास आये और भगवान् को उन्होंने अपनी सारी कहानी कह सुनाई ॥१३७-१३८॥


देव देवेशसंस्तुत्य त्वद्गर्भोत्सवसंक्षणे।
क्षणेन त्रिदशैः कॢप्ता हेमवृष्टिः सुवृष्टिवत् ॥१३९॥

तया न विद्यते विद्वन् दारिद्र्यं क्व गतं नृणाम्।
इदानीं च क्षुधा नाथ यथा याति तथा कुरु ॥१४०॥

त्वदाज्ञापालकाः पुण्याः सुपर्वाणः सुपावनाः।
अतः किं दुर्लभं देव वर्तते तव सांप्रतम् ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 139 से 141): उन्होंने कहा कि हे देव! हे देवेश और संस्तुत्य! आपके गर्भोत्सव के समय देवताओं ने मूसलाधार जल की बरसा की भाँति रत्नों की बरसा की थी, जिससे उस वक्त हम लोगों को अपनी दरिद्रता का कुछ भान न हुआ था। वह अब न जाने कहाँ चली गई। हे नाथ! इस समय आप कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हमारी भूख भाग जाये और हम सब सुखी हो जायें। प्रभो! पुण्यात्मा और


सति त्वयि मरिष्यामस्तव देव कृपा कथं । अतः पाहि पवित्रास्मान्क्षुधार्त्तान् क्षीणविग्रहान् ॥१४२॥

तेषां दीनं वचः श्रुत्वा दयावान्भगवानभूत् । दीनान्दृष्ट्वा हि कस्यात्र दया नो जायते लघु ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 139 से 143): पवित्र देवता-गण भी जब आपकी आज्ञा को मानते हैं-शिरोधार्य करते हैं तब फिर इस वक्त आपको दुर्लभ ही क्या है। यदि आप चाहें तो एक क्षण में ही हमें धन-दौलत से सुखी बना सकते हैं। देव ! यदि आपके होते हुए भी हम लोग मर गये तो आपकी दयालुता कहाँ रहेगी! इसलिए हे पवित्र ! आप हमारी रक्षा करो, हमें बचाओ। भूख के मारे हम लोगों के शरीर बहुत कृश हो गये हैं-प्राण निकलते हैं। उनके दीन वचनों को सुनकर प्रभु का हृदय दया से भर आया। सच है गरीबों को देखकर सभी को दया आ जाती है ॥१३९-१४३॥


उवाच वृषभो धीमान्कृपया कृपणान्प्रति । महीरुहा महीपृष्ठे मह्यन्ते महितैर्गुणैः ॥१४४॥

ते भोज्याः खल्वभोज्याश्च वर्तन्ते विविधा द्रुमाः । तत्र तान्प्रथमान्भोज्यानाद्रियन्ते नरोत्तमाः ॥१४५॥

वृक्षा वल्ल्यस्तृणान्येव सुवनस्पतयोऽखिलाः । भोज्याभोज्यादिभेदेन भिद्यन्ते विबुधा जनाः ॥१४६॥

रसाला लाङ्गलीवृक्षा जम्बीरा जम्बवस्तथा । राजादनाश्च खर्जूराः पनसाः कदलीद्रुमाः ॥१४७॥

मातुलिङ्गा मधूकाश्च नारङ्गाः क्रमुकास्तथा । तिन्दुकाश्च कपित्थाश्च बदर्यश्चाञ्चिणीद्रवः ॥१४८॥

भल्लातक्यश्च चार्वाद्या भोज्या ज्ञेयाश्च श्रीफलाः । वल्ल्यस्तु गोस्तनीमुख्याः कुष्माण्ड्यश्च चिर्भटाः ॥१४९॥

इत्याद्या बहवो वल्ल्यो भोज्याश्चान्याः पराः स्मृताः । व्रीहयः शालयो मुद्गा राजमाषाश्च माषकाः ॥१५०॥

गोधूमाः सर्षपाश्चैलास्तिलाः श्यामाककङ्गवः । कोद्रवाश्च मसूराश्च वल्लाश्च हरिमन्थकाः ॥१५१॥

यवा धानास्त्रिपुटका आढकाश्च कुलत्थकाः । वेणवा वनमुद्गाश्च नीवारप्रमुखा इमे ॥१५२॥

धान्यभेदाः सदा भोज्या भोजने क्षुद्धिहानये । पचनं भाण्डभेदाश्च दर्शितास्तेन धीमता ॥१५३॥

अर्थ (श्लोक 144 से 153): इसके उत्तर में तीन ज्ञान के धारक प्रभु ने कहा कि पृथ्वी पर अनेक जाति के वृक्ष हैं और उनमें अनेक प्रकार के गुण हैं। तुम लोग उनको उपयोग में लाओ। वृक्षों में कुछ तो खाने के काम के हैं और कुछ नहीं भी हैं। इसलिए तुम लोग पहले उन वृक्षों का आदर करो जो तुम्हारे खाने के काम के हैं और ऐसा ही उत्तम पुरुष करते हैं। देखो, वृक्ष, बेल और तृण ये तीन वनस्पतियाँ है और इन्हीं के खाने योग्य और न खाने योग्य ऐसे दो भेद हैं। वृक्षों में नीचे लिखे वृक्ष आदि खाने के योग्य हैं। उनके नाम सुनो-आम, नालिकेर, नीबू, जाँबू, केला, बिजौरा, मधुपुष्प, नारंगी, कमरख, तेंदू, कैथ, बेर, आँवला, चारोली, श्रीफल इत्यादि वृक्ष, दाख, कुष्मांडी और चिर्भटा इत्यादि लताएँ, व्रीहि, शालि, मूँग, राजमाष, उड़द, गेहूँ, सरसों, कोदों, मसूर, चना, जौ, धान, तुअर इत्यादि अन्न-भूख को दूर करने के लिए इन चीजों को काम में लाना चाहिए। अन्न के भेदों को समझा कर प्रभु ने उनके पकाने की विधि बताई और मिट्टी आदि के बर्तनों से काम लेना बताकर उनके भेद बताये ॥१४४-१५३॥


असिर्मषी कृषिर्विद्या वाणिज्यं पशुपालनम् । एवं षट्कर्मसंघातं वृषभस्तानुपादिशत् ॥१५४॥

अर्थ: असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और पशुपालन इन छह कार्यों का भी भगवान् ने उपदेश


भरतादिसुपुत्राणां शतैकं शास्ति शिक्षया। स ब्राह्मीसुन्दरीपुत्र्यौ लेभे लब्धकलगुणे ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 154 से 155): किया। इसके बाद प्रभु ने भरत आदि अपने एक सौ एक पुत्रों को शिक्षा दी और ब्राह्मी, सुन्दरी इन दोनों पुत्रियों की भाँति-भाँति की कलाएँ सिखाई ॥१५४-१५५॥


सुमुहूर्तेऽथ शक्रेण नाभिदेवं वरासने। संरोप्य स्थापयामास राज्ये प्राज्ये प्रजाहिते ॥१५६॥

ततो देवश्च देवेशं देशस्थापनहेतवे। आदिदेश विदां मान्यो विदेह इव भारते ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 156 से 157): इसके बाद शुभ मुहूर्त में इन्द्र के साथ-साथ नाभिराजा ने प्रभु को प्रजा के हित के लिए उत्तम राज-सिंहासन पर बैठाकर उनका राज्याभिषेक किया। राज-पाट को सँभालते ही विद्वानों द्वारा पूजे जाने वाले प्रभु ने इन्द्र को आज्ञा दी कि तुम विदेह की भाँति यहाँ भी देशों की रचना करो ॥१५६-१५७॥


नीवृतः कोशलाद्याश्च निर्मितास्तेन धीमता। ग्रामो वृत्यावृतो रम्यपुरं शालेन संवृतम् ॥१५८॥

नद्यद्रिवेष्टितं खेटं कर्वटं पर्वतैर्वृतम्। ग्रामपञ्चशतोपेतं मटम्बं मण्डितं जनैः ॥१५९॥

पत्तनं बहुरत्नानां योनीभूतं महोन्नतम्। सिन्धुसागरवेलाभियुतं द्रोणं मतं जनैः ॥१६०॥

वाहनं पर्वतारूढमेवं भेदाः प्रतिष्ठिताः। वर्णास्त्रयो वरास्तेन क्षत्रिया वैश्यसञ्ज्ञकाः ॥१६१॥

अर्थ (श्लोक 158 से 161): प्रभु की आज्ञा पाते ही इन्द्र ने कौशल आदि देशों की रचना की और उनकी नीचे लिखे माफिक व्यवस्था की। उसका वर्णन सुनिए। जिसके चारों ओर बाड़ हो वह गाँव और जिसके सब ओर कोट फिरा हो वह पुर है। नदी और पहाड़ के बीच में जो हो उसे खेट तथा चारों ओर से पर्वतों के द्वारा घिरे हुए को कर्वट कहते हैं। जिससे पाँच सौ गाँव लगते हैं उसे मटंब और जिसमें रत्नों की खानें हों उसे पत्तन कहते हैं। जो समुद्र के किनारे से भिड़ा हो। वह द्रोण और जो पर्वत के ऊपर हो वह वाहन है ॥१५८-१६१॥


शूद्रा अशुचिसंपन्नाः स्थापिताः सद्भिद्या इमे। एवं च निर्मिते वर्णे क्षात्रभेदमतः शृणु ॥१६२॥

क्षत्रियाणां सुगोत्राणि व्यधायिषत वेधसा। चत्वारि चतुरेणैव राजस्थितिसुसिद्धये ॥१६३॥

सुवागिक्ष्वाकुराद्यस्तु द्वितीयः कौरवो मतः। हरिवंशस्तृतीयस्तु चतुर्थो नाथनामभाक् ॥१६४॥

कौरवे कौरवे वंशे राजानौ रम्यलक्षणौ। प्रवरौ सोमश्रेयांसौ स्थापितौ वृषभेशिना ॥१६५॥

अर्थ (श्लोक 162 से 165): इसके सिवा प्रभु ने तीन वर्णों की व्यवस्था की। वे वर्ण है-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जिनका आचरण गिरा हुआ था उन्हें भगवान् ने शूद्र कहा तथा उत्तम आचरण वालों को उनके कम-बढ़ आचरण को लेकर वैश्य और क्षत्रिय कहा। इस प्रकार की वर्ण-व्यवस्था करके प्रभु ने जो क्षत्रियों के भेद किये थे उन्हें सुनिए। वे चार हैं। मिष्टभाषी इक्ष्वाकु, कौरव, हरिवंश और नाथवंश। इसके सिवा प्रभु ने संसार-प्रसिद्ध कौरववंश में उत्तम लक्षणों के धारक दो श्रेष्ठ राजाओं की स्थापना की। उनके नाम थे सोम और श्रेयांस ॥१६२-१६५॥


अथ नीवृन्महाख्यातः कुरुजाङ्गलनामभाक्। नानारम्यगुणोपेतो भाति भूमण्डले भृशम् ॥१६६॥

अर्थ: कुरुजांगल नाम एक प्रसिद्ध देश है। वह भूमण्डल का भूषण और उत्तम गुणों का भण्डार है। वहाँ की जमीन में एक अपूर्व गुण है। वह यह कि उसमें बिना बोये-जोते ही धान्य पैदा होता है। उस धान्य द्वारा लोगों को भारी सुख होता है। अतएव कहा जाता है कि वह उत्तम गुणों का खजाना


भूगुणैर्बहुभूमीशोऽनन्तशर्मप्रदायकैः । अकृष्टपच्यधान्यौघैर्धत्ते यः सुगुणान्भृशम् ॥१६७॥

यत्र क्षेत्राणि धान्यौघैः कालत्रयसमुद्भवैः । भृतानि भान्ति भूभर्तुः कोष्ठागाराणि वा भृशम् ॥१६८॥

कुलीनाः सफला रम्या भोगानां साधनं शुभाः । यत्रारण्यश्रियो रेजू रामा इव महीपतेः ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 166 से 169): है। वहाँ के खेतों में तीनों ऋतुओं के उत्पन्न हुए अन्न के ढेर के ढेर लगे रहते हैं, जिनसे वे खेत ऐसे देख पड़ते हैं मानो अन्न से भरपूर राजा के कोठे ही हैं। वहाँ के वन की श्री (शोभा) एक महारानी के साथ तुलना करती है। महारानी कुलीन और सुन्दरी होती है वह भी कुलीन (पृथ्वी में मिली हुई) और सुन्दरी है। महारानी सफला (बाल-बच्चों वाली) और शुभ होती हैं वह भी सफला (फलों वाली) और शुभ-अच्छे फल देने वाली है। महारानी राजा के भोगों को साधती है वह सभी लोगों के भोगों को साधती है, उन्हें फल देती है ॥१६६-१६९॥


ग्रामाः कुक्कुटसंपात्या रम्या रम्यैर्जनैर्भृताः । राजन्ते स्म महाधामश्रेणिलक्षा महोत्कटाः ॥१७०॥

सरांसि सर्वसंतापहारीण्यमृतसंचयैः । स्वच्छानि यत्र शोभन्ते ध्यानानीव महामुनेः ॥१७१॥

अर्थ (श्लोक 170 से 171): वहाँ के गाँव बिल्कुल पास-पास है। वे इतने कि एक गाँव से दूसरे गाँव में मुर्गा उड़कर जा सकता है। उनमें बड़े-बड़े सत्पुरुषों का निवास है और बड़ी ऊँची तथा मन को मोहने वाली महलों की लाखों कतारें बनी हुई हैं। वहाँ के तालाब अपने अमृत जैसे मीठे और स्वच्छ जल से लोगों के संताप को दूर करते हैं। वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो मुनिजनों के ध्यान ही हैं। कारण ध्यान भी तो संसार-ताप को हरता है और निर्मल होता है ॥१७०-१७१॥


शालय पक्वसंवेद्याः स्वकालस्थायिनो वराः । फलप्रदा विराजन्ते यत्र कर्मोदया इव ॥१७२॥

प्रजायन्ते जना यत्र नाकात्पाकाद् वृषस्य वै । त्यागिनस्त्यक्तदुष्टत्वमात्सर्यामर्षभावकाः ॥१७३॥

आह्वयन्ते वने वृक्षा सफलाः फलदायिनः । ददत्यध्वजनानां ये फलानि फलकाङ्क्षिणाम् ॥१७४॥

नराः सुरसमाकारा वृक्षाः फलभरोन्नताः । कल्पानोकहसादृश्या यत्र भान्ति शुभालयाः ॥१७५॥

लावण्येन सुरूपेण कलया ध्वनिना पुनः । यत्रत्यास्तर्जयन्त्येव योषितः सुरयोषितः ॥१७६॥

नगरोपान्तदेशेषु कृता धान्यसुराशयः । भान्तीव यत्र गिरयः सूरविश्रामहेतवे ॥१७७॥

अर्थ (श्लोक 172 से 177): वहाँ के धान्य कर्मों के उदय की तरह नियत समय पर अपना फल देते हैं। वहाँ कभी अकाल नहीं पड़ने पाता। पुण्य के उदय से वहाँ स्वर्ग के देव आकर जन्म लेते है और वे भव्य दुष्टता, मात्सर्य, क्रोध आदि भावों से रहित त्यागी सरीखे होते हैं एवं वहाँ के वन में फले हुए वृक्ष, पक्षियों के द्वारा कल-कल शब्द करके पथिक लोगों को बुलाते हैं और जो जैसे फलों को चाहते है उन्हें वैसे फल देते है। अतः उन वृक्षों को कल्पवृक्ष भी कह सकते है। वहाँ के सभी मनुष्य सुन्दर है तथा सभी वृक्ष फलों से लदे हुए है, जिससे वे कल्पवृक्षों की समता करते है। वहाँ के जिनालय भारी-भारी ऊँचे हैं, मनोहर और धर्म के दाता हैं। वहाँ की स्त्रियाँ अपने रूप-लावण्य, कला और सुर से देवांगनाओं को भी जीतती है, उन्हें नीचा दिखाती हैं, लजा देती हैं। वहाँ के नगरों के पास में अन्न की बड़ी-बड़ी ढेरियाँ लगी रहती हैं। वे ऐसी जान पड़ती हैं मानों सूरज को विश्राम देने के लिए पहाड़ ही खड़े किये गये है


रम्यारामप्रदेशेषु द्रोणेपर्वतमस्तके। पत्तने नगरे यत्र भान्ति प्रसादपङ्क्तयः ॥१७८॥

गम्भीराणि मनोज्ञानि सरसान्यत्र भान्ति वै। तृष्णाघ्नानि सपद्मानि चेतांसीव सरांसि च ॥१७९॥

अर्थ (श्लोक 178 से 179): वहाँ के बगीचों, द्रोणों, पत्तनों, वाहनों और नगरों में महलों की मनोहर कतारें बनी हुई हैं। वहाँ के तालाब चित्त के साथ तुलना करते हैं क्योंकि चित्त गंभीर और मनोज्ञ (मन से जानने वाला) होता है वे भी गहरे और मनोज्ञ-सुन्दर है। चित्त सरस (रसों को जानने वाला) और तृष्णा को घातने वाला होता है वे भी सरस-मीठे जल वाले और प्यास को बुझाने वाले हैं एवं चित्त सपद्म (कमलाकार) होता है और वे कमलों वाले हैं ॥१७८-१७९॥


सपद्मा मदनोद्दीप्तास्तिलकाढ्याः फलावहाः। सपुष्पा यत्र राजन्ते रामा आरामका इव ॥१८०॥

अर्थ: वहाँ के बगीचे स्त्रियों के तुल्य हैं। स्त्रियाँ सुन्दर, काम की उद्दीपक और तिलक लगाए होती हैं वे भी सुन्दर, काम के उत्तेजक और तिलक के वृक्षों से युक्त हैं। स्त्रियाँ सपुष्पा (रजोधर्म वाली) और सफला (बाल-बच्चों वाली) होती है वे भी फल और पुष्पों वाले है। तात्पर्य यह कि वे बहुत ही मनोहर और सुखदाता हैं ॥१८०॥


क्षेत्रेषु व्रीहयो यत्र फलभारेण सन्नताः। कुर्वाणाः पथिकानां वा प्राघूर्णाय नतिं बभुः ॥१८१॥

देशानामाधिपत्यं यो दधान इव संबभौ। विभूत्या चामरैर्गेहैः सदातपनिवारणैः ॥१८२॥

कुरुभूमिसमत्वेन कुरुजाङ्गलनामभाक्। कुरुते कर्मनैपुण्यं यः कलाकाण्डसंविदाम् ॥१८३॥

अर्थ (श्लोक 181 से 183): वहाँ के खेतों में जो धान्य फल के भार से नम गये है वह ऐसे जान पड़ते है मानों अपने पास बुलाने के लिए पथिक लोगों को नमस्कार ही करते हैं। इससे अधिक उनकी और क्या तारीफ की जाये। वह देश अपनी विभूति और आताप को दूर करने वाले महलों की कतारों से ऐसा जान पड़ता है मानों सब देशों का अधिपति ही है। उसकी भूमि देवकुरु, उत्तरकुरु भोगभूमि के जैसी है और इसलिए उसे कुरुजांगल कहते हैं। इस देश को देखने से भारत के कला-कोविदों की चतुराई का चित्र हृदय पर खिंचे बिना नहीं रहता। सारांश यह कि वह देश सब तरह से सुन्दर और सम्पत्ति का खजाना है ॥१८१-१८३॥


हस्तिनागपुरं तत्र हस्तिसंहतिसंगतम्। हन्त्यहङ्कारकारित्वमहितानां च यत्सदा ॥१८४॥

यत्र प्राकारकूटेषु धृतमुक्ताफलानि वा। तारा रेजुः प्ररथ्यायां हेमकुम्भायते विधुः ॥१८५॥

अर्थ (श्लोक 184 से 185): कुरुजांगल देश में हाथियों के समूह से भरपूर एक हस्तिनागपुर नाम नगर है। वह दुष्ट, अभिमानी पुरुषों के घमंड को एक मिनट में ही चकनाचूर कर देता है। वहाँ के कोट के कंगूरों पर आकर तारागण ऐसे जान पड़ने लगते है मानो जड़े हुए मुक्ताफल ही हैं और कोट के दरवाजों पर जो गुमटियाँ बनी हुई है उन पर आकर वाद सोने के कलश-सा देख पड़ने लगता है ॥१८४-१८५॥


यत्खातिका विषाकीर्णा मणियुक्ता भयावहा। सेवागतेन शेषेण यथा मुक्ता निचोलिका ॥१८६॥

अर्थ: विष-जल से भरी हुई और मणियों से जड़ी हुई वहाँ की खाई ऐसी जान पड़ती है मानो नगर की सेवा को आये हुए शेषनाग द्वारा छोड़ी हुई भयावती काँचुलि ही है। कारण वह भी विष से परिपूर्ण और मणियों के जैसी जड़ी हुई चित्र-विचित्र छोटे-छोटे दानों वाली होती है। वहाँ जो


सतां यद्द्विशिखा ब्रूते मार्गं रोहावरोहणैः।
स्वर्गस्याधोगतेर्नित्यं स्फीता सद्भूमिका वरा ॥१८७॥

अर्थ (श्लोक 186 से 187): सत्पुरुषों की अटारियाँ बनी हुई हैं, उनकी भूमि बहुत ही मनोहर है और उनमें जो सत्पुरुष रहते हैं उनके चढ़ने और उतरने से वे ऐसी मालूम पड़ती हैं मानों नरक और स्वर्ग को जाने का रास्ता ही बताती है ॥१८६-१८७॥


यत्रत्यजिनसद्मानि भव्यानाकार्य केवलम्।
केतुहस्तेन वादित्रनादेनाहुर्बुधोत्तमाः ॥१८८॥

यथास्माकं महोच्चत्वं तथा पुण्यवतां नृणाम्।
शृङ्गाग्रलग्नसद्दण्डकिङ्किणीनादतः स्फुटम् ॥१८९॥

दानिनो धनिनो लोका ज्ञानिनो जितमत्सराः।
परर्द्धिमहिमोपेता यत्र तिष्ठन्ति वत्सलाः ॥१९०॥

भङ्गो यत्र कचेष्वेव चापल्यं वरयोषिताम्।
नेत्रे याच्ञा सतां यत्र पाणिग्रहणयुक्तिषु ॥१९१॥

मृदङ्गे ताडनं यत्र मदनत्वमनोकुहे।
पतनं वृक्षपर्णेषु लोपः क्विप्प्रत्यये पुनः ॥१९२॥

स्पर्धा दानोद्भवा यत्र कामिचेतोऽपहारता।
चौर्यं स्त्रीषु ततो भीतिः कामिनां कामवासिनाम् ॥१९३॥

पुष्पाणां हरणं यत्र निम्नत्वं नाभिमण्डले।
प्रस्तरे विरसत्वं च नान्यत्र कुत्रचिद्भुवि ॥१९४॥

अर्थ (श्लोक 188 से 194): वहाँ के जिनालय बहुत ऊँचे हैं। उनके शिखरों में ध्वजाएँ लगी हुई हैं और उनमें हमेशा ही बाजे बजा करते हैं, जिससे ऐसा जान पड़ता है कि वे ध्वजारूप हाथों और बाजों के शब्दों के द्वारा भव्य जीवों को ही बुलाते हैं और शिखरों के ऊपरी भाग में लगे हुए दण्डों की घंटियों के झुन-झुन शब्दों के द्वारा उनसे यही कहते हैं कि हे भव्यजनो ! पुण्य का संचय करो, उसके प्रभाव से तुम लोग हमारे बराबर ऊँचे-उन्नत हो जाओगे। वहाँ के सभी लोग दानी है, धनी और ज्ञानी है तथा मान-मत्सर से रहित और उत्तम ऋद्धियों से युक्त हैं। वे महिमाशाली हैं और एक दूसरे से गाय-बछड़े की तरह प्रीति रखने वाले हैं। वहाँ भंग (टेढ़ापन) केवल बालों में है, नर-नारियों में नहीं है। चंचलता उत्तम स्त्रियों में ही है और किसी में नहीं है। नेत्र ही नवीन वधू के मुख देखने को याचना करते हैं और कोई माँगता-भिखारी नहीं है। केवल मृदंग ही वहाँ ताड़े जाते हैं परन्तु अपराध करके कोई ताड़ना नहीं पाता। वहाँ मदन जाति के वृक्ष तो है, पर मदन-कामदेव का बोलबाला नहीं है। केवल वृक्षों से पत्तों का पतन होता है परन्तु उत्तम अवस्था से नीचे कोई नहीं गिरता। वहाँ के सत्पुरुषों में दान देने के लिए तो चढ़ा-ऊपरी देख पड़ती है, पर और-और कामों में नहीं। कामी पुरुषों के चित्त को तो स्त्रियाँ चुराती हैं परन्तु इसके सिवा वहाँ और चोरी नहीं होती, वहाँ चोर-लवाड़ पुरुष ही नहीं है एवं कामी पुरुष ही केवल स्त्रियों से डरते हैं और किसी को वहाँ-डर-भय नहीं है। पुष्प ही वृक्षों पर से हरे जाते हैं, इसके सिवा कोई किसी को चीज को नहीं हरता। वहाँ यदि नीचता (गहराई) है तो नाभिमण्डल में है, पुरुष कोई भी नीच नहीं है। वहाँ केवल व्याकरण-शास्त्र में तो क्विप प्रत्यय का लोप-विनाश सुना जाता है, पर और कहीं भी विनाश शब्द का प्रयोग नहीं होता। वहाँ के पत्थर तो अवश्य नीरस है, पर पुरुष कोई भी नीरस-रूखे स्वभाव वाले नहीं हैं। वहाँ सभी पुरुष ज्ञानी हैं, कोई मूर्ख नहीं है। वहाँ की सभी स्त्रियाँ शीलवती हैं, कोई दुःशीला नहीं है। वहाँ के वृक्ष हमेशा


नरा ज्ञानविहीना न नाशीला योषितः क्वचित् । वृक्षाः फलातिगा नैव वर्तन्ते यत्र भासुराः ॥१९५॥

अर्थ (श्लोक 188 से 195): फलों से लदे रहते हैं। तात्पर्य यह कि वह देश सब तरह शोभा का स्थान है। उसका कोट बहुत मनोहर और सारे संसार को वश में करने वाला है ॥१८८-१९५॥


सेवते यत्र भोगीन्द्रो हारिप्राकारसंमिषात् । भयादिति जगत्सर्वं वशीकृतमनेन वा ॥१९६॥

त्रिवर्गफलसंभूतां भूतिं भुञ्जन्ति यत्र च । धनाकीर्णा जना धीराः शर्मशाखिफलावहाः ॥१९७॥

शोकं पङ्कसमुद्भूतं नालोकन्ते स्म ते क्वचित् । दानादिकर्मनिर्णाशिदुरिता यत्र संशुभाः ॥१९८॥

यत्खातिका महानीलसरोजश्रेणिलोचनैः। ईक्षते गृहसंचारशोभां नेत्रविकाशिकाम् ॥१९९॥

पण्यवीथीकृतोत्तुङ्गरत्नराशावितस्ततः। पर्यटन्त्यत्र संप्राप्त्यै प्रचुरं च परीक्षणम् ॥२००॥

दधद्धीरो जनो वैश्यो रेजे दीधितिमण्डितः। मेराविव सुनक्षत्रगणो गुणविभूषितः ॥२०१॥

जिनचैत्यमहापूजां नित्याष्टाह्निकसंज्ञिकाम्। कुर्वते शर्मणे यत्र लोका मङ्गलसिद्धये ॥२०२॥

अर्थ (श्लोक 196 से 202): जान पड़ता है कि भय के मारे कोट का रूप धर कर शेष नाग ही उसकी सेवा करता है। वहाँ के सभी धन वाले धीर-वीर हैं। उन्हें पुण्य का पूर्ण फल प्राप्त है। वे हमेशा धर्म, अर्थ और काम का यथायोग्य सेवन करते हैं और उनके फल को भोगते हैं। वे दान, पूजा आदि सत्कर्मों के द्वारा पापकर्मों का नाश किया करते हैं। अतः पाप-कर्मों के उदय से होने वाले रोग-शोक उनके पास ही नहीं फटक पाते। उनके सभी काम शुभ होते हैं और वे हमेशा अमन-चैन से रहा करते हैं। वहाँ की खाई में नीले कमलों की बहुत-सी कतारें हैं और वे कमल फूले हुए हैं। जान पड़ता है कि वह खाई एकदम अपने बहुत से नेत्रों को खोलकर अपने मध्यभाग की शोभा को ही देख रही है। उसके मध्यभाग में जो वहाँ के महलों की परछाई आकर पड़ती है उससे उसकी अपूर्व शोभा देखने के ही योग्य है। उसको देखने से नेत्र खिल उठते हैं। वहाँ के बाजार में रत्नों की बहुत-सी राशियाँ लगी हुई हैं। अतः रत्नों को खरीदने के लिए वहाँ रुपया आदि मूल धन ले-लेकर बहुत से व्यापारी लोग आते हैं और रत्नों की जाँच करते हुए इधर से उधर डोलते फिरते देखे जाते हैं। उस समय रत्नों में उनका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है और उन पर जो रत्नों की किरणें आकर पड़ती हैं उससे वे बहुत ही शोभा पाते हैं, जिस तरह अपने तेज से विभूषित तारागण सुमेरु के इधर-उधर घूमते-फिरते सुशोभित होते हैं। वहाँ के लोग कल्याण और मंगल की सिद्धि के लिए जिनेन्द्र भगवान् की नित्य और अठाई के दिनों में पूजा किया करते हैं और कुदेवों से वे दूर रहते हैं ॥१९६-२०२॥


दीपा यत्र प्रजायन्ते मङ्गलार्थं गृहे निशि। योषिन्मुखमहाचन्द्रप्रकाशे ध्वान्तनाशिनि ॥२०३॥

यत्रापणौ सुताम्बूलपङ्के लग्ना जना अपि। मदोद्धता न गन्तुं वै शक्नुवन्ति क्षणं स्थिताः ॥२०४॥

अर्थ (श्लोक 203 से 204): वहाँ की स्त्रियों के मुँह चाँद के समतुल्य हैं और वे ही रात में अँधेरे को हटा देते हैं, अतएव वहाँ रात में जो दीपक जलाये जाते हैं वे केवल मंगल के लिए ही जलाये जाते हैं, अँधेरा हटा ने को नहीं! वहाँ की नर-नारियाँ पान खाने की भारी शौकीन हैं, इसलिए वहाँ के बाजारों में पानों की पीकों से इतना भारी कीचड़ मच जाता है कि उसमें यदि कोई मदोन्मत्त हाथी भी आकर फँस जाये


योषिच्चरणसंलग्नमृगनाभिसुगन्धतः। आगताः षट्पदा यत्र फूत्कुर्वन्तीति वादिनः ॥२०५॥

भोः कामिनः शुभं सारं वधूचरणपङ्कजम्। वयं यथा तथा यूयं सेवध्वं च सुखाप्तये ॥२०६॥

अर्थ (श्लोक 203 से 206): तो उसका वहाँ से निकलना कठिन पड़ जाता है। वहाँ की स्त्रियाँ अपने पाँवों में खूब ही कस्तूरी लगाती हैं जिसकी खुशबू से उनके पास भौरों के समुदाय के समुदाय उड़े हुए चले आते हैं और वे पुकार-पुकार कर कामीजनों को कहते हैं कि जिस तरह हम लोग स्त्रियों के शुभ और सार चरण-कमलों की सेवा करते हैं यदि सुख चाहते हो तो तुम भी हमारी तरह उनके चरण-कमलों की सेवा करो ॥२०३-२०६॥


तत्राथ वृषभेशेन कुरुवंशविभूषणौ। नरेन्द्रौ स्थापितौ यत्र सोमश्रेयांसौ तौ वरो ॥२०७॥

तत्र सोमस्य सोमास्या लसल्लक्ष्मीमती सती। लक्ष्मीमती प्रिया चासीत्प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥२०८॥

योल्लसत्पदविन्यासालङ्कारपरिभूषिता। गूढार्था सद्गुणा रम्या त्यक्तदोषेव भारती ॥२०९॥

मञ्जूषेव समस्तस्यालङ्कारस्य स्फुरत्प्रभा। सच्छवेः सगुणस्यापि या भाति भुवनत्रये ॥२१०॥

स्फुरत्कुण्डलकेयूरतारहारा समुद्रिका। समेखला शुभाकारा शोभते योपमातिगा ॥२११॥

चन्द्रानना कुरङ्गाक्षी चन्द्रखण्डललाटिका। पक्वश्रीफलसंछन्नपयोधरा बभौ च या ॥२१२॥

नितम्बिनीगणानां या सीमां कर्तुं विनिर्मिता। वेधसा विधिवत्सर्वां सामग्रीमनुभूय वै ॥२१३॥

अर्थ (श्लोक 207 से 213): वहाँ आदिनाथ प्रभु ने दो राजों की स्थापना की। वे दोनों कुरुवंश के भूषण थे, उत्तम पुरुष और भाई-भाई थे। उनके नाम थे सोमप्रभ और श्रेयांस। सोमप्रभ की रानी का नाम लक्ष्मीमती था। वह चाँद जैसे सुन्दर मुँह वाली और सुन्दरता की सीमा थी, सती थी। वह सोमप्रभ महाराज को प्राणों से भी कहीं अधिक प्यारी थी। लोग उसको सरस्वती की उपमा देते थे क्योंकि जिस तरह सरस्वती में मनोहर पदों का विन्यास होता है और अलंकार आदि होते हैं उसी तरह वह भी मनोहर पादों का विन्यास करती हुई चलती थी और भाँति-भाँति के अलंकार-गहने-गाँठे से विभूषित थी। सरस्वती में गूढ़ अर्थ और उत्तम-उत्तम गुण होते हैं वह भी गूढ़ अभिप्राय वाली थी और उसमें भी अनेक उत्तम-उत्तम गुण थे। सरस्वती निर्दोष और लोगों को रमाने वाली होती है वह भी दोष-रहित और लोगों को सुख देने वाली थी। तात्पर्य यह कि वह गुणों-सूतों से गोये गये और मनोहर गहनों की चमकती हुई पिटारी-सी जान पड़ती थी क्योंकि उसका शरीर बहुत सुन्दर और चमकीला था। उसमें बहुत से गुण और भूषण थे। उसके कुण्डल और केयूरों की अद्भुत ही शोभा थी। उसके गले का हार मन को मोहने वाला था। उसके हाथों की अंगुलियों में सुन्दर अँगूठियों और कमर में मनोहर करधनी थी। बहुत क्या कहा जावे वह उपमा रहित थी। उसको किसी भी वस्तु की उपमा नहीं दी जा सकती थी। उसका मुँह चन्द्र के जैसा और नेत्र मृग के जैसे थे। मस्तक आधे चाँद की तरह था तथा पके हुए नारियल के समान स्थूल और सुन्दर उसके कुच थे। सारांश यह कि उसकी शोभा सब तरह से बढ़ी-चढ़ी हुई थी। उसको देखकर ऐसा भान होता था कि मानों ब्रह्मा ने पहले संसार की रचना कर खूब ही अनुभव किया और पीछे से इसकी रचना कर स्त्रियों की सुन्दरता की सीमा ही बाँध दी है। सोमप्रभ और लक्ष्मीमती के बड़े


तयोः सुतः सदा श्रीमाञ्छत्रुपक्षक्षयंकरः।
जयाभिधो जयश्रीकः साक्षाज्जय इवापरः ॥२१४॥

अर्थ (श्लोक 207 से 214): पुत्र का नाम जय था। वह रूपशाली और शत्रुदल का घातक था, विजय-लक्ष्मी का पति था। अधिक क्या कहा जाये वह साक्षात् जय की मूर्ति ही था ॥२०७-२१४॥


अथ श्रीवृषभो भाति वसुधां वसुधां बुधः।
सुधामयीं प्रकुर्वाणो नानानीतिसमन्विताम् ॥२१५॥

सुनासीराज्ञया नृत्यं निर्मितुं नटपैटकैः।
नीलाञ्जसा समायासीज्जिनाग्रे सह सद्गुणा ॥२१६॥

अर्थ (श्लोक 215 से 216): भगवान् आदिनाथ इस समय पृथ्वीतल पर नीति का प्रचार कर रहे थे। उन्होंने रत्न आदि धन की खान पृथ्वी को सुधामयी बना दिया था, उसमें सब जगह सुख फैला दिया था। वे प्रजा का शासन करते हुए अपूर्व शोभा पाते थे। एक समय इन्द्र की आज्ञा से गंधर्व-सहित नीलांजना नाम की एक गुणवती अप्सरा आई और प्रभु के आगे नृत्य करने लगी ॥२१५-२१६॥

द्वितीयं पर्व (भाग 2/2)

नृत्यन्ती सा जिनस्याग्रे हावभावविचक्षणा।
चञ्चला चञ्चलेवाभाद्गगने गुणगुण्ठिता ॥२१७॥

वीणावंशविनोदेन तरला ताललास्यगा।
काकलीकलनासक्ता ननर्त लेखनर्तकी ॥२१८॥

तदा सभ्याः शुभाकारां नटन्तीं तां निरीक्ष्य च।
चित्रिता इव संभेजुः कामवस्थां वचोऽतिगाम् ॥२१९॥

तत्क्षणे क्षणदेवासीद्दृद्या सायुषः क्षये।
लास्यं विलयमापन्नं वृक्षवन्मूलसंक्षये ॥२२०॥

अर्थ (श्लोक 217 से 220): वह बड़ी चतुराई से हाव-भाव दिखाती थी तथा बिजली की भाँति चंचल थी। कभी आकाश में जाती और कभी पृथ्वी पर आती थी एवं उसमें बहुत से गुण थे। वह वीणा और बांसुरी के विनोद से चंचल होती हुई ताल के अनुसार नृत्य करती थी और कभी-कभी सुन्दर आलाप भी लेती थी। इस प्रकार उस देवांगना ने खूब ही नाच किया। जिसको देखकर वहाँ बैठे हुए सभी सभासद चित्र में लिखे से रह गये। उनकी एक ऐसी विचित्र हालत हो गई कि जिसका कहना वचनों से बाहर है। दैवयोग से नृत्य करते करते ही उसी वक्त उस नीलांजना की आयु पूरी हो गई और वह देखते देखते ही अदृश्य हो गई और नाच भी उसी समय बन्द हो गया, जैसे जड़ों के उखड़ जाने पर वृक्ष हो जाता है ॥२१७-२२०॥


ज्ञात्वा जिनेश्वरस्तस्या विपत्तिं विपदातिगः।
निर्वेदं वेदयन्दिव्यं विवेदे जगतः स्थितिम् ॥२२१॥

आजवंजवजीवानां जीवनं हि विनश्वरम्।
जीवनं हस्तगं यद्वत् दृष्टनष्टं क्षणान्तरे ॥२२२॥

अहो केऽत्र भवे जीवाः स्थास्नवो विहितागसः।
दृश्यन्ते जलदा यद्वत्कथमत्र स्थितौ मतिः ॥२२३॥

इत्यालोच्य चिरं चित्ते चैतन्यगतचेतनः।
राज्ये निवेशयामास भरतं भरताधिपम् ॥२२४॥

अर्थ (श्लोक 221 से 224): उसके मरण को और-और सभासद तो न जान पाया, पर प्रभु जान गये इसके बाद विपत्ति रहित, निर्भय परिणामी प्रभु संसार से विरक्त होकर उसकी स्थिति पर यों विचार करने लगे कि संसारी जीवों का जीवन चुल्लू के जल की भाँति धीरे-धीरे बिखर जाने वाला है। फिर आश्चर्य है कि मेघों की तरह विला जाने वाले इस जीवन पर पाप-कर्म के अधीन हो ये जीव क्यों नित्यता का विश्वास करते हैं और हमेशा उसकी अपनी सम्पत्ति समझकर संसार-समुद्र में गोते लगाया करते हैं। इस प्रकार सोच विचार कर आत्मा का अनुभव करने वाले उन प्रभु ने भरत को बुला उन्हें भारतवर्ष का राज दिया, वली बाहुबली को मनोरम पोदनपुर का राज-पाट संभलाया तथा अपने और-और पुत्रों को और-


सुरम्ये पोदने बाहुबलिनं बलशालिनम्।
सोऽस्थापयत्तथा शेषान्सुतान्नीवृति नीवृति ॥२२५॥

संस्नाप्य स सुरैर्नीतो याप्ययानेन युक्तिमान्।
वनं भूषणभारेण भूषितो भरतादिभिः ॥२२६॥

वटाधःस्थितिमासाद्य नवम्यां चैत्रकृष्णके।
दिदीक्षे कृतकेशादिलुञ्चनो भगवान्जिनः ॥२२७॥

अर्थ (श्लोक 221 से 227): और देशों का अधिपति बना आप निश्चिन्त हो गये। इसी समय देवता-गण आये और प्रभु को स्नान-भूषण से सजाकर, पालकी में सवार कर वन को ले चले। इस वक्त भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित आदि प्रभु के साथ भरत आदि हजारों राजा भी थे। जंगल में जा प्रभु को उन्होंने वहाँ एक बड़ के वृक्ष के नीचे विराजमान किया। इसके बाद प्रभु ने केशलोंच आदि क्रियाओं को करके चैत वदी नौमी के दिन जैनेश्वरी दीक्षा धारण की ॥२२१-२२७॥


षण्मासान्स स्थितो योगे योगी विक्षिप्तकल्मषः।
उद्भीभूतो महाभूतसेवितः प्रोषधावृतः ॥२२८॥

संहृत्य स निजं योगं योगे पूर्णे विनिर्ययौ।
अनाश्वान्विश्वसंदृश्यो विश्वलोकनमस्कृतः ॥२२९॥

न्यादस्यापि विधिं लोका अजानानाः कथंचन।
दृष्ट्वा तं हर्षिणश्चक्रुर्जिनपादनमस्कृतिम् ॥२३०॥

विहरन्तं परं ज्येष्ठं द्रङ्गे द्रङ्गे च नीवृति।
गृहे गृहे क्रमेणाशु दिवमुडुनाथवत् ॥२३१॥

जनास्तं वाजिनं वर्यं दन्तिनं दशनोन्नतम्।
कन्यामन्नं च वसनं मणिं मुक्ताफलं फलम् ॥२३२॥

भूषणं दूषणातीतमासनं शयनान्वितम्।
कुसुमानि सुगन्धीनि ढौकयन्ति स्म तत्पुरः ॥२३३॥

षण्मासान्मौनसंपन्नः कृतेर्यापथवीक्षणः।
क्षणेन विहरन्नाप हस्तिनापुरान्तिकम् ॥२३४॥

अर्थ (श्लोक 228 से 234): इसके बाद उन निष्पाप प्रभु ने छह महीने के लिए योग धारण किया और उपवासों से युक्त तथा संसार द्वारा सेवित वे प्रभु उस वक्त तेजो-मय हो गये। उनका तेज सब ओर फैल गया। भगवान् तेज के पुंज और संसार के लिए दर्शनीय थे। जब योग का समय समाप्त हुआ तब प्रभु ने वहाँ से चल कर बहुत से देशों में, नगर-नगर में, घर-घर बिहार किया, जैसे एक-एक तारागण के पास चन्द्रमा विहार करता है परन्तु उन्हें कहीं भी पारणा करने का योग न मिला। मिले कहाँ से, उस वक्त सारे संसार में कोई आहार देने की विधि ही न जानता था। जहाँ-जहाँ प्रभु जाते थे वहाँ-वहाँ के लोग हर्ष के भरे दौड़-दौड़कर उनके पैरों पर पड़ जाते थे तथा कई लोग प्रभु को भेंट करने की उत्तम-उत्तम चीजें-घोड़ा, हाथी, रत्न वगैरह लाते थे, कन्या, अन्न और वस्त्र ले-लेकर प्रभु के आगे आते थे एवं कोई निर्दोष भूषण, आसन, शयन और सुगन्धित पुष्प ला-लाकर उनके सम्मुख रखते थे। इस तरह प्रभु ने मौन धर कर ईर्यापथ शुद्धि से छह महीने तक विहार किया, पर कही भी उन्हें आहार का योग न मिल सका। इसके बाद वे विहार करते हस्तिनापुर आये ॥२२८-२३४॥


अथ श्रेयान् श्रियोपेतः पुरेशो निशि निश्चलम्।
सुप्तः शय्यातले श्रीमान्ददर्श स्वप्नसंचयम् ॥२३५॥

सुराद्रिं कल्पवृक्षं च हिमांशुं च दिवाकरम्।
पारावारं सुगम्भीरं जजागार विलोक्य सः ॥२३६॥

अर्थ (श्लोक 235 से 236): हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस थे। वे बड़े भाग्यशाली थे। रात का समय था। वे निःशंक हो शय्या पर सुख से सोये हुए थे। उस वक्त उन्होंने स्वप्न में सुमेरु पर्वत, कल्पवृक्ष, चाँद, सूरज तथा गहरा समुद्र देखा। स्वप्न देखने के बाद वे जागे और उन्होंने सब स्वप्नों को जैसा का वैसा सोमप्रभ


सोमप्रभाय तत्सर्वं स निवेदयति स्म हि।
सोऽवोचन्मेरुतस्तुङ्गः कल्पद्रोः कल्पदायकः ॥२३७॥

हिमांशोर्जगदाह्लादी भास्करात्स प्रतापवान्।
अकूपारात्पराद्दृष्टपारः कोऽपि महान्नरः ॥२३८॥

समटिष्यति सुस्पष्टमावयोर्वेश्मनि स्फुटम्।
तावता मध्यदिवसे समाट् स च तद्गृहे ॥२३९॥

अर्थ (श्लोक 235 से 239): महाराज से कह सुनाया। सोमप्रभ ने उत्तर में कहा कि सुमेरु को देखने से ऊँचा, कल्पवृक्ष को देखने से उसी के समान दाता, चन्द्रमा के देखने से उसके समान ही संसार को शान्ति देने वाला और सूरज को देखने से प्रतापी एवं समुद्र को देखने से संसार-समुद्र से पार जाने वाला कोई महान् पुरुष नियम से आज अपने घर आयेगा। इसके बाद दो पहर के समय सचमुच ही प्रभु उनके घर आ पहुँचे ॥२३५-२३९॥


तद्दर्शनसमानन्दाज्जातपूर्वभवस्मृतिः।
श्रेयान्सोमप्रभेणामा पपात जिनपद्युगम् ॥२४०॥

विधिना विधिवद्भाधे तृतीयादिवसे स च।
मधुरेक्षुरसेनास्य कारयामास पारणम् ॥२४१॥

तत्क्षणेक्षणसंदीप्ता रत्नवृष्टिर्गृहाङ्गणे।
बभूव तस्यागाद्देवो वनं मौनी महामनाः ॥२४२॥

जिनः सहस्रवर्षान्ते फाल्गुनैकादशीदिने।
कृष्णपक्षेऽथ संप्राप्तकेवलज्ञानमद्भुतम् ॥२४३॥

अर्थ (श्लोक 240 से 243): प्रभु को देखते ही श्रेयांस को बहुत हर्ष हुआ। उन्हें अपने पिछले भव की याद हो आई। उन्हें यह भी स्मरण हो आया कि दिगम्बर मुनियों को किस विधि से आहार दिया जाता है। फिर क्या था, वे सोमप्रभ सहित प्रभु के चरणों में पड़ गये और उन्होंने वैशाख सुदी तीज के दिन प्रभु को साँट के मधुर रस का आहार दिया। भगवान् को आहार देने के प्रभाव से उनके यहाँ रत्नों की बरसा हुई। आहार लेकर मौनी और महामना प्रभु वहाँ से वन को चले गये और घोर तप तपने लगे। इसके बाद एक हजार वर्ष में प्रभु को केवलज्ञान प्राप्त हुआ-वे केवली हो गये ॥२४०-२४३॥


चक्रोत्पत्त्या नरेन्द्रोऽसौ भरतो भारतं खलु।
संसाधयितुमुद्युक्तो बभूव बलमण्डितः ॥२४४॥

जयं च कौरवाधीशमाहूयास्थापयत्तराम।
स सेनानीपदे रत्नं सहस्रसुररक्षितम् ॥२४५॥

स चक्री सैन्यचक्रेण सहस्रषष्टिवर्षर्णैः।
संसाध्य भारतं क्षेत्रं विनीतामाजगाम च ॥२४६॥

जयो मेघेश्वरांल्लेखान्जित्वा मेघस्वराभिधाम्।
लब्ध्वान्भरताधीशाद्राज्ये गजपुरे स्थितः ॥२४७॥

अर्थ (श्लोक 244 से 247): इधर भरत महाराज की आयुधशाला में चक्ररत्न की उत्पत्ति हुई और वे बहुत-सी सेना को साथ लेकर भारतवर्ष को अधीन करने के लिए तैयार हुए। उस समय भरत ने कौरव कुलदीपक जय को बुलाया और उन्हें सेनापति का पद दिया। चक्रवर्ती के चौदह रत्नों में से सेनापति एक रत्न है। इस रत्न की हजार देव रक्षा करते हैं। इसके बाद भरत चक्रवर्ती ने दिग्विजय करना आरम्भ किया और साठ हजार वर्ष में सारे भरत-क्षेत्र को अपने अधीन कर लिया एवं दिग्विजय का अन्त होने पर वे वापस अयोध्या नगरी में आ पहुँचे। सेनापति जय ने मेघेश्वर देवताओं को बड़ी बहादुरी से जीता था, जिससे प्रसन्न होकर चक्रवर्ती ने उनका नाम भी मेघेश्वर रख दिया। इसके बाद जय अपने राज्य गजपुर में आये और वहाँ अमन-चैन से रहने लगे। उन मेघेश्वर जय की जय हो, जो शुद्धमना हैं,


मेघस्वरः शुद्धमना मनोहरो जीयान्महाशत्रुजये कृतोद्यमः ।
नीत्या निरस्तदुरितो जयनामधेयः सच्चक्रवर्तिहृदयाम्बुजसप्तसप्तिः ॥२४८॥

जित्वा मेघसुरान्सुरेन्द्रसमतां भेजे स भव्योत्तमः
हत्वा वैरिगणान्गुणेन सुगुणी दीप्त्याऽजयाख्यो जयी।
सेनानीमणिरुत्तमो नरसुरैः संसेव्यपादाम्बुजो
धर्मस्यैव विजृम्भितेन भुवने मान्यो जनो जायते ॥२४९॥

अर्थ (श्लोक 244 से 249): मनोहर रूप की राशि हैं, बड़े-बड़े प्रचंड शत्रुओं पर विजय-लाभ करने को उद्यत हैं। जिन्होंने राज-नीति के द्वारा वैरियाें के समूह के समूह नष्ट-भ्रष्ट कर दिये और जो चक्रवर्ती के हृदय को प्रफुल्लित करने के लिए सूरज हैं एवं जिन्होंने मेघेश्वर को जीतकर सुरेन्द्र की समता की और अपने अखण्ड पराक्रम से वैरियाें पर विजय पाई। जो सच्चे गुणों के भण्डार और तेज के पुंज हैं। जयशील होने के कारण से ही जिन्हें जय कहते हैं। जो सेनापति-रत्न हैं तथा देवता-गण और महान् पुरुष जिनकी सेवा करते हैं।
यहाँ ग्रन्थकार कहते है कि संसार में धर्म के फल से ही पुरुष गण्य-मान्य होते हैं पूज्य तथा उत्तम-उत्तम पद पाते हैं। इस कारण जीवमात्र का पहला कर्तव्य है कि वह हमेशा धर्म का ध्यान रखे ॥२४४-२४९॥

तृतीयं पर्व (भाग 1/2)

जिनं नौमि जितारातिं वृषभं वृषलाञ्छनम्। वृषभं वृषदातारं वृषार्थिजनसेवितम् ॥१॥

अर्थ: उन आदिनाथ प्रभु को नमस्कार है जो बैल के चिह्न से युक्त हैं, धर्ममय और धर्म के दाता हैं तथा धर्म के अर्थी पुरुष जिनकी सेवा करते हैं और जो वैरियों पर विजय-लाभ कर चुके हैं ॥१॥


अथ सोमप्रभस्यान्ये सुताश्च विजयादयः। गुणैर्विजज्ञिरे रम्याश्चतुर्दशमनूपमाः ॥२॥

तैः पञ्चदशभिः पुत्रै रेजे राजा सुराजवत्। अन्यदा कामभोगेषु विरक्तोऽभूद्विशांपतिः ॥३॥

विभज्य राज्यं संयोज्य धुर्ये शौर्योर्जिते जये। गत्वा स वृषभस्यान्ते दीक्षित्वा मोक्षमन्वभूत् ॥४॥

अर्थ (श्लोक 2 से 4): सेनापति जय के सिवा सोमप्रभ महाराज के विजय आदि चौदह पुत्र और थे। वे सब के सब गुणों के भण्डार और मनोहर रूप वाले थे। वे ऐसे से जान पड़ते थे मानों चौदह कुलकर ही हैं। इन पंद्रह पुत्रों के द्वारा श्रीमान् सोमप्रभ महाराज इन्द्र जैसे सुशोभित थे। एक समय किसी निमित्त को पाकर वे संसार, भोग आदि से विरत हो गये। उन्होंने अपना सारा राज-पाट अपने पुत्रों को सौंपकर शूरवीर जय को उन सबका मुखिया बना दिया। इसके बाद वे ऋषभप्रभु के पास गये और उनसे दीक्षा लेकर दिगम्बर हो गये एवं कुछ काल में कर्मजाल को तोड़कर वे मोक्ष-महल में जा विराजे ॥२-४॥


नृपत्वं श्रेयसा सार्धमन्वभूत्स यथा पुरा। एकदा स विहारार्थं बाह्योद्यानं गतो घनम् ॥५॥

तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य शीलगुप्तं ननाम सः। शृण्वन्धर्मं स्थितेऽस्मिन् नागयुग्मेन तत्र च ॥६॥

प्रत्याविशत्पुरीं तुष्टो विशिष्टवृषवर्धितः। कदाचित्स घनारम्भे प्रचण्डवज्रपातः ॥७॥

मृतः शान्तिं समापन्नो नागो नागामरोऽजनि। अन्यदा गजमारुह्य तद्वनं पुनराप सः ॥८॥

सार्धं श्रुतवतीं नागीं धर्मं राजात्र चात्मना। दृष्ट्वा काकोदरेणाथ कृतकोपं विजातिना ॥९॥

जघानेन्दीवरेणासौ जम्पती तौ धिगित्यरम्। नश्यन्तौ पत्तयः काष्ठैर्लोष्ठैरघ्नन्समं तदा ॥१०॥

दुश्चरित्राय को नात्र राजकोपे हि कुप्यति। वेदनाकुलधीर्मृत्वा नागः स निर्जरोऽभवत् ॥११॥

अर्थ (श्लोक 5 से 11): इधर जय अपने चाचा श्रेयांस के साथ-साथ पहले की भाँति ही राजसुख भोगने लगे। एक दिन वे विहार के लिए एक घने जंगल में गये। उन्होंने वहाँ बैठे हुए एक मुनि को देख नमस्कार किया। मुनि का नाम शीलगुप्त था। जय ने एक नाग और नागिनी के साथ-साथ उनसे धर्म का उपदेश सुना। धर्म को सुनकर उनका चित्त बहुत संतुष्ट हुआ। इसके बाद वे नगर को चले आये। बर्षा ऋतु का आरम्भ ही था कि उस समय अकस्मात् वज्रपात के द्वारा वह नाग शान्त-चित्त से मरकर नागकुमार जाति का देव हुआ। इसके बाद एक दिन हाथी पर सवार हो जय महाराज फिर दुबारा उसी वन में गये। वहाँ जाकर उन्होंने उसी नागिनी को, जिसने कि उनके साथ-साथ पहले धर्म का उपदेश सुना था, एक नीच जाति के काकोदर (साँप) के साथ क्रीड़ा करते हुए देखा। इस पर उन्हें बहुत क्रोध आया। उन्होंने क्रीड़ा-कमल के द्वारा उन दोनों को मारा तथा धिक्कार दिया। राजा को मारते देख इधर-उधर से आ-आकर उनके सभी सिपाहियों ने भी उन्हें लकड़ी, पत्थर आदि के द्वारा मारना शुरू किया। सच है राजा का कोप होने पर नीच चरित वालों पर सभी कोप करते हैं। कोई भी उनकी तारीफ नहीं करता। मार


तदा बभूव गङ्गायां कालीति जलदेवता।
पश्चात्तापहता सापि धर्मं ध्यात्वा स्वमानसे ॥१२॥

स्वनागस्य प्रिया भूत्वा राज्ञः स्वमृतिमाह च।
जातकोपोऽमरो हन्तुं जयं तद्गृहमासदत् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 5 से 13): से काकोदर बहुत ही व्याकुल हुआ और निर्जरा सहित मर कर गंगा नदी में काली नाम की जलदेवता हुआ और यह नागिनी भी पछताती हुई तथा अपने मन में धर्म का चिन्तन करती हुई मरी और अपने नाग की, जो कि नागकुमार देव हुआ था, प्रिया हुई। उसने नागकुमार से जय के द्वारा हुई अपनी मौत का सारा हाल कहा, जिसको सुन कर नागकुमार को बहुत क्रोध आया और वह उसी वक्त जय की मारने की इच्छा से उनके महल में पहुँचा ॥५-१३॥


सहन्ते न ननु स्त्रीणां तिर्यञ्चोऽपि पराभवम्।
जयो रात्रौ वसन्गेहे श्रीमत्याः कौतुकं प्रिये ॥१४॥

शृण्वेकं दृष्टमित्याख्यत्तन्नाग्यखिलचेष्टितम्।
अहं कुतः कुतो धर्मः संसर्गादस्य सोऽभवत् ॥१५॥

ममेह सिद्धिपर्यन्तो नान्यत्सत्सङ्गमाद्धितम्।
ध्यात्वेति मुक्तकोपोऽसौ कृतज्ञो जयमुत्तमम् ॥१६॥

रत्नैः संपूज्य स्वस्यापि प्रपञ्चं न्यगदत्सुरः।
स्मर्तव्योऽहं स्वकार्येऽपीत्युक्त्वा स्वगृहमासदत् ॥१७॥

जयोऽपि चक्रिणा सार्धमाक्रम्य क्रमतो दिशः।
विक्रमी क्रमणं मुक्त्वा संयमीव शमं श्रितः ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 14 से 18): सच है पशु भी अपनी स्त्री के तिरस्कार की नहीं सह सकता, उसे भी क्रोध हो आता है। रात का समय था और जय अपनी प्रिया लक्ष्मीमती के साथ महल में बातचीत कर रहे थे। वे कर रहे- प्रिये! मैंने आज एक बड़ा कौतुक देखा है, उसे सुनो। इतनी बातचीत के बाद उन्होंने उस नागिनी की सारी कथा लक्ष्मीमती को कह सुनाई। जय की बात सुनकर वह देव सोचने लगा कि कहाँ तो मैं एक पशु था और कहाँ यह धर्म जिसके प्रभाव से देव हो गया। यदि विचार से देखा जाये तो कहना होगा कि मोक्ष की सिद्धि तक इस संसार में सत्संग के सिवा कोई दूसरा हितैषी नहीं है। इस विचार के साथ ही क्रोध उसके हृदय से निकल कर भाग गया और वह बिल्कुल शांत-चित्त हो गया। इसके बाद कृतज्ञ और महापुरुष जय की उस देव ने रत्नों के द्वारा खूब पूजा की और उनको अपनी सारी कथा कह सुनाई। इसके सिवा उसने महाराज से निवेदन किया कि राजन्! काम पड़ने पर मुझे याद करना। मैं उसी वक्त आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा। इतना कहकर वह देव अपने स्थान को चला गया। इधर चक्रवर्ती के साथ-साथ जयकुमार जब सभी दिशाओं को वश कर चुके-उन पर विजय पा चुके तब उन्होंने आक्रमण करना छोड़ दिया और वे एकदम संयमी मुनि की तरह शान्त-चित्त हो समता भाव धारण कर अमन-चैन से अपना समय बिताने लगे ॥१४-१८॥


अथ काश्यभिधो देशो विकाशी विष्टपेऽखिले।
भोगभूमिक्षयाद्भोगभूमिः साक्षादिवाभवत् ॥१९॥

वाराणसी पुरी तत्रामानैः सौधैरिवाहसत्।
स्वर्विमानानि संजित्य शुभां तामामरीं पुरीम् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 19 से 20): काशी नाम का एक मनोहर देश है। वह सारे संसार में प्रसिद्ध है। जान पड़ता है कि मानों भोगभूमि सब जगह से नष्ट होकर यहीं आ गई है। वह साक्षात् भोगभूमि ही है। काशी में एक बनारस नगरी है। वह विशाल और स्वच्छ महलों का स्थान है। उसके भवन स्वर्ग के विमानों से भी बढ़े-चढ़े हैं। जान पड़ता है कि वह महलों की विशालता और स्वच्छता से स्वर्ग के विमानों को जीत कर


तत्पतिः कम्पितारातिरकंपनो बभूव च।
पूर्वोपार्जितपुण्यस्य वर्धनं रक्षणं श्रियः ॥२१॥

तत्प्रिया सुप्रभादेवी सुप्रभा हिमगोरिव।
प्रभाकुमुदखण्डानि दधती विपुलश्रिया ॥२२॥

सहस्रं तत्सुता जाताः स्फुरन्तश्चांशवो रवेः।
हेमाङ्गदसुकेतुश्रीसुकान्ताद्या इवोन्नताः ॥२३॥

तयोः सुलोचनालक्ष्मीवत्यौ पुत्र्यौ बभूवतुः।
हिमवत्पद्मयोर्गङ्गासिन्धू वानु ततः शुभे ॥२४॥

सुलोचना परा पुत्री सुलोचना कलागुणैः।
मनोरमा यथा लक्ष्मीश्चन्द्रिकेव जगत्प्रिया ॥२५॥

सुमत्याख्याभवत्तस्या धात्री सर्वगुणान् कलाः।
अवर्धयन्निशा शुक्ला रेखायाः शशिनो यथा ॥२६॥

रम्भास्तम्भोरुकत्वेन सा रम्भा भाषिता बुधैः।
तिलोत्तमसमूहेन तिलोत्तमैव सा मता ॥२७॥

भ्राजिष्णुकैशभारेण सुकेशी कथिता जनैः।
परमैश्वर्ययोगेन सेन्द्राणीसमतां गता ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 19 से 28): अमरावती की हंसी उड़ाती है। वहाँ के राजा अकंपन थे। उनके तेज के मारे शत्रुगण थर-थर काँपते थे। वे पूर्वोपार्जित पुण्यकर्म को बढ़ाते थे, उसकी रक्षा भी करते थे। उनकी प्रिया का नाम सुप्रभा देवी था। सुप्रभा देवी के शरीर की प्रभा चाँद के तुल्य थी। वह अपनी विपुल श्री के द्वारा कुमुद के फूलों की प्रभा को धारण करती थी। अकंपन और सुप्रभा के हजार पुत्र थे और वे सबके सब सूरज की भाँति तेज वाले थे, उन्नतिशाली थे। उनके नाम थे-हेमांगद, सुकेत, श्रीसुकांत इत्यादि। इनके सिवा उनके सुलोचना और लक्ष्मीमती ये दो पुत्रियाँ थीं। ये दोनों हिमवत और पद्मद्रह से उत्पन्न हुई गंगा और सिंधु की समता करती थीं तथा उनसे भी श्रेष्ठ थीं। बड़ी पुत्री सुलोचना वास्तव में सुलोचना-सुन्दर नेत्रों वाली ही थी। कला और गुणों के द्वारा मन को मोहने वाली चंद्रमा की शोभा के समान थी क्योंकि उसमें भी नाना कलाएँ और गुण थे। अतएव वह संसार भर की प्यारी थी-उसे सभी प्रेमदृष्टि से देखते थे। सुमति नाम की उसकी एक धाय थी, जो उसके गुण और कलाओं को बढ़ाने की हमेशा ही चेष्टा किया करती थी। जैसे उजेली रात चाँद की कला को सदा ही बढ़ाती रहती है। इसकी जाँघें रंभा-केले के समान थीं, अतः लोग इसे रंभा कहते थे। देवांगना-गण इसे देवांगना ही मानता था। इसका केश-पास भारी सुशोभित था, इसलिए लोग इसे सुकेशी कहा करते थे। बहुत क्या कहें, अपने ऐश्वर्य के द्वारा वह इन्द्राणी के जैसी देख पड़ती थी ॥१९-२८॥


फाल्गुनेऽष्टाह्निकायां सा संपूज्य जिनपुङ्गवान्।
कृतोपवासा तन्वङ्गी शेषां दातुं नृपं गता ॥२९॥

सोऽपि तां तत्करां दृष्ट्वोत्थाय तद्दत्तशेषिकाम्।
कृताञ्जलिः समाधाय न्यधत्त शिरसि स्वयम् ॥३०॥

उपवासपरिक्षीणा पुत्रि त्वं पारणाकृते।
सदनं याहि वेगेनेति तां सोऽपि व्यसर्जयत् ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 29 से 31): फाल्गुन को अठाई का समय था। उस वक्त सुलोचना ने बड़ी भक्ति से जिनदेव की पूजा की और व्रत लिया। व्रत-उपवास से उसका शरीर कृश हो गया था। पूजा-पाठ पूराकर वह प्रभु की आसिका देने के लिए राजा के पास पहुँची। राजा उसके हाथों में आसिका को देखकर उठा और दोनों हाथों की अंजलि बनाकर उसने आसिका को बड़े भक्तिभाव से लिया तथा लेकर अपने मस्तक पर चढ़ाया। इसके बाद राजा ने कहा कि पुत्री! उपवास से तेरा शरीर बहुत मुरझा रहा है, इसलिए तू जल्दी से महल को जा और पारणा कर ले ॥२९-३१॥


संपूर्णयौवनां बालां वीक्ष्य भूपः स्वमन्त्रिणः।
पराञ्श्रुतार्थसिद्धार्थसर्वार्थसुमतिश्रुतीन् ॥३२॥

आहूयेति समापृच्छत्कस्मै देयेति कन्यका।
श्रुतार्थः प्राह भूपेशात्र भारतस्य मण्डनम् ॥३३॥

भरतस्य सुतो धीमानर्ककीर्तिर्वरो मतः।
कुलं रूपं वयो विद्यावृत्तं श्रीः पौरुषादिकम् ॥३४॥

यद्वरेषु विलोक्येत तत्सर्वं तत्र पिण्डितं।
सिद्धार्थोऽत्रावदत्सर्वमस्तु किं च कनीयसः ॥३५॥

ज्यायसा सह संबंधं नेच्छन्ति विबुधा जनाः।
प्रभञ्जनो रथचरो बलिर्वज्रायुधस्तथा ॥३६॥

मेघस्वरो भूमिभुजस्तथान्ये सन्ति भूमिपाः।
तेषु यत्राशयो वोऽस्ति तस्मै कन्येति दीयताम् ॥३७॥

अर्थ (श्लोक 32 से 37): इतना कहकर राजा ने उसे तो विदाकर दिया, पर आप स्वयं इस सोच-विचार में उलझ गया कि सुलोचना अब युवती हो गई है, इसका विवाह कर देना चाहिए। इस प्रश्न को जब वह स्वयं हल न कर सका तब उसने श्रुतार्थ, सिद्धार्थ, सर्वार्थ और सुमति इन चारों मंत्रियों को बुलाया और उनके सामने यह प्रश्न रक्खा कि सुलोचना किसे देना चाहिए। इस प्रश्न को सुनकर श्रुतार्थ बोला कि भारतभूषण भरत चक्रवर्ती का अर्ककीर्ति नाम जो पुत्र है वह इस कन्या के लिए एक उत्तम वर है क्योंकि कुल, रूप, अवस्था, विद्या, चरित्र, धन और पुरुषार्थ आदि जो-जो वर में देखने की बातें हैं वे सब उसमें पाई जाती हैं। श्रुतार्थ की इस सम्मति को सुनकर सिद्धार्थ कहने लगा कि आपकी कही हुई सब बातें अर्ककीर्ति में हैं यह तो ठीक है, परन्तु सामान्य पुरुष का एक बड़े पुरुष के साथ सम्बन्ध होना उचित नहीं जान पड़ता। इसको विद्वान् लोग आदर की दृष्टि से नहीं देखते। राजन्! आपकी बराबरी वाले प्रभंजन, रथचर, बलि, वज्रायुध तथा मेघेश्वर भूमिभुज आदि बहुत से और-और राजा हैं। उनमें जिसकी आप उचित समझें उसको कन्या दें ॥३२-३७॥


सर्वार्थः सिद्धसर्वार्थः श्रुत्वोवाच वचो वरम्।
भूगोचरेण संबन्धः स नः पूर्वं हि विद्यते ॥३८॥

विद्याधरेण सम्बन्धोऽपूर्वोऽस्त्वस्याः सुखप्रदः।
श्रुत्वेति सुमतिः प्राह युक्तमेतन्न सांप्रतम् ॥३९॥

स्वयंवरविधिः कार्यः किंतु सर्वसुखावहः।
श्रुत्वेत्यकम्पनो धीमान्वरमाह निवेद्य च ॥४०॥

सुप्रभाया इदं कार्यं तथा हेमाङ्गदस्य च।
समानेतुं महीपालानादिदेश वचोहरान् ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 38 से 41): सिद्धार्थ की सम्मति को सुनकर सिद्ध-साधक सर्वार्थ नाम मंत्री ने कहा कि राजन्! भूमिगोचरों के साथ तो पहले से ही सम्बन्ध होता चला आता है, पर विद्याधरों के साथ अब तक कोई सम्बन्ध नहीं हुआ। अतः मेरी सम्मति है कि आप किसी योग्य विद्याधर के साथ ही इस सम्बन्ध को स्थिर कीजिए। इस अपूर्व सम्बन्ध से हम सबको और कन्या को बहुत ही सुख प्राप्त होगा। सबकी सम्मति सुनकर पीछे से सुमति मंत्री बोला कि मेरी सम्मति है कि और-और बातों की अपेक्षा इस वक्त स्वयंवर-विधि करना ही ठीक होगा और उससे सबको सुख-शान्ति भी मिलेगी। सुमति की इस सम्मति को सुनकर बुद्धिमान् अकंपन ने कहा कि बहुत अच्छा स्वयंवर ही होना चाहिए। इस समय अकंपन ने सुप्रभा और हेमांगद की भी सम्मति ली और स्वयंवर करना ही निश्चित किया। इसके बाद अकंपन ने सब राजाओं के पास पत्र दे-देकर दूत भेजे और स्वयंवर में आने के लिए उनसे आग्रह किया ॥३८-४१॥


तदा ज्ञात्वा सुसंबंधं विचित्राङ्गदसंज्ञकः। सौधर्मादागतो देवोऽकम्पनं प्रत्यभाषत ॥४२॥

स्वयंवरविधिं तस्या वीक्षितुं वयमागताः। इत्युक्त्वोपपुरे भागे ब्रह्मस्थानोत्तरे पुरे ॥४३॥

प्राङ्मुखं सर्वतोभद्रं प्रासादं बहुभूमिकम्। विधाय विधिवद्धीमांस्तं परीत्य विशुद्धदृक् ॥४४॥

मुदा निष्पादयमास स्वयंवरसुमण्डपम्। ततो महीभृतः सर्वे त्रिसमुद्रान्तरस्थिताः ॥४५॥

तल्लेखार्थं परिज्ञाय प्रापुर्वाणारसीं पुरीम्। स्वोचितेषु नृपास्तत्र स्थानेषु स्थितिभाजिनः ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 42 से 46): जयकुमार और सुलोचना के भावी शुभ सम्बन्ध को जानकर इसी समय पहले स्वर्ग से एक देव आया। उसका नाम था चित्रांगद। वह अकंपन के पास आ कहने लगा कि मैं सुलोचना के स्वयंवर को देखने की इच्छा से यहाँ आया हूँ। यह कह कर उस देव ने नगर के पास में ही जो एक ब्रह्म स्थान बना हुआ था, उससे उत्तर की ओर पूर्व मुख वाला बहुत विशाल सर्वतोभद्र नामक महल बनाया और उसके चारों ओर सुन्दर स्वयंवर मंडप की-जैसी होनी चाहिए रचना की। वह देव सम्यग्दृष्टि था, बुद्धिमान् और शुद्ध-चित्त था। उसने जितना कुछ काम किया था वह सब हर्ष के साथ और उत्तम रीति से किया था। तात्पर्य यह कि उसने स्वयंवर की अपूर्व और विधिपूर्वक रचना की थी। दूत-गण गये और जाकर उन्होंने राजाओं-महाराजाओं को अकंपन के पत्र दिये। राज-गण पत्र के द्वारा अकंपन राजा के भीतरी भाव को समझकर स्वयंवर के लिए आये। प्रायः तीन समुद्र के भीतर-भीतर के सभी राजा-गण बनारस में आ उपस्थित हुए, एवं समय पर स्वयंवर मंडप में अपने-अपने योग्य स्थानों पर आ विराजे ॥४२-४६॥


सुलोचनाथ सिद्धार्चां चर्चयित्वा समग्रहीत्। सिद्धशेषां कृतस्नाना कृतनेपथ्यमण्डना ॥४७॥

रथे महेन्द्रदत्ताख्यः कञ्चुकी तां समाययौ। आरोप्य मण्डपे कन्यां रूपेण जितसद्रतिम् ॥४८॥

तदा पुरात्समागत्त्य कृती जितपुरंदरः। सुप्रभासहितो राजा सोऽस्थान्मण्डपसंनिधिम् ॥४९॥

समस्तकटकं सम्यक् संनाह्य सानुजो बली। हेमाङ्गदः समायासीत्प्रीत्या च परितो मुदा ॥५०॥

स्थित्वा महेन्द्रदत्तोऽपि रत्नमालाधरो रथे। सुलोचनामुवाचेति दर्शयन्खगनायकान् ॥५१॥

कन्येऽयं च नमेः पुत्रो दक्षिणश्रेणिनायकः। सुनमी रोचते तुभ्यं व्रियतां व्रियतामिति ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 47 से 52): उधर सुलोचना ने स्नान आदि से निपट कर सुन्दर-सुन्दर वस्त्र और गहने गाँठे पहिने तथा सिद्ध परमात्मा की पूजा कर उनकी आसिका को मस्तक पर चढ़ाया। इसके बाद महेन्द्रदत्त नाम कंचुकी उसे रथ में बैठाकर स्वयंवर मंडप में लाया। सुलोचना अपने रूप से रति को भी नीचा दिखाती थी। इस समय सुप्रभा देवी-सहित अकंपन महाराज भी वहाँ आये और वे एक ओर स्वयंवर मंडप के पास में ही बैठ गये। जान पड़ता था कि इन्द्राणी को साथ लेकर इन्द्र ही स्वर्ग से स्वयंवर देखने को आया है। इनके सिवा चतुरंगी सेना और छोटे भाइयों को साथ लेकर हेमांगद भी वहाँ आ पहुँचा। हेमांगद का स्वच्छ हृदय प्रीति और प्रमोद से खूब भर रहा था। थोड़ी ही देर में सुलोचना का रथ मंडप में आ पहुँचा। कंचुकी ने रथ को रोका। सुलोचना रथ से उतरकर मंडप में आई। इसके बाद जब सुलोचना वरमाल हाथ में ले पतिवरण को चली तब कंचुकी ने उन विद्याधर राजाओं को दिखाकर सुलोचना से कहा कि पुत्री! यह नमि का पुत्र सुनमि है। यह दक्षिण श्रेणी का


अयं सुविनमी राजोत्तरश्रेणिखगाधिपः। सुनमेः संततिश्चान्ये खगास्तेन निदर्शिताः ॥५३॥

कञ्चुकी दर्शयंन्नेवं दर्शयामास भूमिपम्। अर्काभमर्ककीर्त्याख्यं चक्रिपुत्रं स्फुरद्गुणम् ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 47 से 54): राजा है। यदि तुम चाहो तो इसे वरो। यह सुनमि का पुत्र सुवन है। यह उत्तर श्रेणी का राजा है। इस तरह उसने क्रमशः सभी विद्याधरों का सुलोचना को परिचय कराया। इसी प्रकार और-और सभी राजाओं, महाराजाओं का परिचय देता हुआ वह सूरज की प्रभा के समान प्रभा वाले भरत चक्रवर्ती के पुत्र, गुणों के भण्डार कुमार अर्ककीर्ति के पास पहुँचा। वहाँ जा उसने सुलोचना को उनका परिचय दिया ॥४७-५४॥


साथ मुक्त्वार्ककीर्त्यादीनजेया जयमागता। मुक्त्वाखिलानद्रुमांश्चूतं वसन्ते कोकिला यथा ॥५५॥

तत्र रक्तं मनो मत्वा तस्याः प्रोवाच कञ्चुकी। जयोऽयं जगति ख्यातः सोमप्रभसुतः शुभः ॥५६॥

अस्य रूपं कथं वर्ण्यं यदेतदतिमन्मथम्। स आदर्शोऽर्पणीयः किं हस्तः कङ्कणलोकने ॥५७॥

उत्तरे भरते देवाञ्जित्वा मेघकुमारकान्। कृतोऽनेन मृगेन्द्रादो जिततन्मेघसुस्वनः ॥५८॥

चक्रिणा स्वभुजाभ्यां हि बबन्धे वीरपट्टकम्। चक्रे मेघेश्वराख्यास्य हृष्ट्वा सेनापतीकृते ॥५९॥

तदा जन्मान्तरस्नेहाद् दृष्ट्वा तं सुन्दराकृतिम्। कुन्दाभांस्तद्गुणांश्श्रुत्वा मुमुदे सा च मानिनी ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 55 से 60): पर वह अर्ककीर्ति आदि सभी राजाओं को छोड़ती हुई अन्त में किसी से भी नहीं जीते जाने वाले जयकुमार के पास पहुँची जिस तरह कोयल वसन्त ऋतु में और-और सभी वृक्षों को छोड़कर आम के पेड़ पर जा पहुँचती है। सुलोचना को जय में आसक्त-चित्त देख कंचुकी बोला कि पुत्री! ये जगत् प्रसिद्ध जय महाराज हैं। सोमप्रभ महाराज के पुत्र हैं। इनका सौंदर्य वचनातीत है। कामदेव के सौंदर्य से भी बढ़ा-चढ़ा है। देखती तो हो, हाथ के कंकण को दर्पण की जरूरत ही क्या है। उत्तर भारतवर्ष में इन्होंने मेघेश्वर देवों को जीतकर जो सिंहनाद किया था। वह मेघेश्वर देवताओं के शब्द को भी जीतता था। उस समय खुश होकर भरत चक्री ने अपने दोनों हाथों से इनके सिर पर ‘वीर-पदक’ बाँधा था और इनका मेघेश्वर नाम रखा था। इतना सुनकर पूर्वभव के प्रेम से वह मानिनी उस सुन्दर कृति और कुन्द के समान स्वच्छ गुणों वाले जय को देखकर और उनकी तारीफ सुनकर बहुत ही हर्षित हुई ॥५५-६०॥


समुत्क्षिप्य रथाद्देशा कन्या कञ्चुकिनः करात्। रत्नमालां समादाय चिक्षेप तत्सुकन्धरे ॥६१॥

तदा च सर्वतूर्याणामुदतिष्ठन्महास्वरः। कन्यासामान्यमुत्साहं दिक्कन्याः श्रावयन्निव ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 61 से 62): उसने वरमाला जय के गले में डाल दी। उस समय होने वाले बाजों के महान् शब्द से दशों दिशायें गूंज उठीं। जान पड़ता था कि बाजों का शब्द कन्या के अपूर्व उत्साह को दिक्कन्याओं तक पहुँचा रहा है उन्हें सुना रहा है ॥६१-६२॥


साधु साधु कृतं सर्वे कन्ययाघोषयन्निति। साधवो वीक्ष्य योग्यत्वं साधुकारं वदन्त्यहो ॥६३॥

अर्थ: सब लोग एकदम घोषणा करने लगे कि कन्या ने बहुत ही अच्छा किया जो जय को वरा एवं साधुजन उसकी पुरुष-परीक्षा की योग्यता को देखकर उसे साधुवाद देने लगे परन्तु अर्ककीर्ति के


तदा दुर्मर्षणः कश्चिदर्ककीर्त्यनुजीवकः।
कोपादुद्दीपयन्भूपान्राह सर्वासहिष्णुकः ॥६४॥

अकम्पनो वृथा युष्मान्नाहूयासज्जयेज्जये।
कन्यां विधित्सुर्वो दीर्घां पराभूतिं युगावधिम् ॥६५॥

इत्युक्त्वा चक्रिणः पुत्रं सब्रीडं प्राप्य चाब्रवीत्।
तत्त्वां स्वगेहमानाय्य कृतं दौष्टयमनेन च ॥६६॥

त्वं हि चक्रिसुतः श्रीमाञ्जयोऽयं तव सेवकः।
त्वां हित्वास्मै ददे कन्यानेन दौष्टयं महत्कृतम् ॥६७॥

इत्यसन्धुक्ष्यद् भर्तुर्वचोवातैः क्रुधानलम्।
मामधिक्षिप्य कन्येयं दत्तानेन दुरात्मना ॥६८॥

वीरपट्टस्तदा सोढश्चक्रिणो भयतो मया।
मालां सहे कथं चाद्य सर्वसौभाग्यहारिणीम् ॥६९॥

इति निर्मुक्तमर्यादो हेयादेयविमूढधीः।
सोऽविचार्याचलद्योद्धुं कल्पान्तजलदोपमः ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 63 से 70): खोटी सम्मति देने वाले एक कर्मचारी से यह सब बातें न सही गईं और उसने अर्ककीर्ति को भड़काकर कहा कि महाराज ! अकंपन यदि जय को ही कन्या देना चाहते थे तो उन्होंने हम सबको व्यर्थ ही यहाँ बुलाकर हमारा तिरस्कार क्यों किया, जो संसार में युगों तक व्यापक रहेगा। यह सुनकर अर्ककीर्ति कुछ लज्जित हुए। उन्होंने अपना मस्तक नीचा कर लिया। यह देख उस कर्मचारी ने और भी जोश की आग फूँकना शुरू किया। वह बोला अकंपन ने आपको अपने घर बुलाकर आपके साथ में बड़ी भारी दुष्टता की है। विचारिए तो सही कि कहाँ तो आप चक्रवर्ती के पुत्र श्रीमान् और कहाँ यह जय आपका सेवक। इस बात का अकंपन ने कुछ भी सोच-विचार न किया और आपके होते हुए भी आपको छोड़कर इस सेवक को कन्या दे दी। अकंपन ने आपके साथ दुष्टता ही नहीं की, किन्तु भारी नीचता भी की है, जो कि अक्षम्य है। इस प्रकार भड़काने वाली वचन-रूप-वायु के द्वारा अर्ककीर्ति की क्रोधाग्नि खूब ही धधक उठी। वह बोला कि इस दुष्टात्मा ने मेरे होते हुए भी मुझे छोड़कर मेरे सेवक को कन्या दी, यह बड़ा भारी अपराध किया। इसे इसका फल अवश्य ही चखाना चाहिए। उस वक्त तो पिताजी के भय से मैंने जय को ‘वीर-पदक’ का प्रदान करना सह लिया था। पर इस समय सभी सौभाग्य को हरने वाली इस माला की क्षति को मैं क्यों कर सह सकता हूँ। क्रोध के वश हो जाने के कारण अर्ककीर्ति ने इस तरह सभी मान-मर्यादा तोड़ दी-हेय-उपादेय का ज्ञान उसके हृदय से कूचकर गया और वह एकदम युद्ध करने को तैयार हो गया। जान पड़ता था कि मानों प्रलयकाल का मेघ ही उमड़ रहा है क्योंकि प्रलयकाल का मेघ भी हेय-उपादेय रहित और मर्यादा रहित होता है ॥६३-७०॥


अनवद्यमतिर्मन्त्री मन्त्रिलक्षणलक्षितः।
न्याय्यं पथ्यं वचो वक्तुमर्ककीर्तिं प्रचक्रमे ॥७१॥

धर्मतीर्थं भवद्वंशाद्दानतीर्थं कुरूद्भवात्।
तव तस्यापि सम्बन्धो वर्तते स्वामिभृत्ययोः ॥७२॥

अन्ययोषाभिलाषस्य पौर्व्यं त्वं मा कृथा वृथा।
अवश्यमेषाप्यानीता न भार्या ते भविष्यति ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 71 से 73): इसके बाद अनवद्यमति मंत्री ने, जो कि मंत्री के सभी लक्षणों से युक्त था, अर्ककीर्ति को न्याय-युक्त और हितकर वचनों द्वारा समझाना शुरू किया। राजन् ! आपके वंश से धर्म-तीर्थ चला और जय के वंश से दान-तीर्थ। इस अपेक्षा से तो आप और जय बराबर ही है। दूसरी बात यह कि आपका और जय का स्वामी-भृत्य का घनिष्ट सम्बन्ध है। अतएव आपको अपना कुछ भी पराभव नहीं समझना


यशः स्थास्नु प्रतापाढ्यं जयस्य स्याद्यथा दिनम् ।
मलीमसापकीर्तिस्ते स्थायिन्यत्र निशेव वै ॥७४॥

मा मंस्थाः साधनं सर्वं ममैतदिति वे बुधः ।
भूपाला बहवोऽप्यत्र सन्ति तत्पक्षगामिनः ॥७५॥

दुःप्रापं तत्त्वया पुम्भिः पुरुषार्थत्रयं महत् ।
अर्जितं न्यायमुल्लङ्घ्य वृथा तत्किं विनाशयेः ॥७६॥

भूभुजां सन्ति कन्यादिरत्नान्यन्यानि भूतले ।
तानि सर्वाणि रत्नैश्चानयामि तेऽद्य निश्चितम् ॥७७॥

स्वयंवरविधौ नैव नियमोऽयं विवाह्यते ।
मान्यो नायं लघुः किंतु कन्येष्टो यो वरः स च ॥७८॥

इति न्याय्यं वचस्तस्य हृदये न स्थितिं व्यधात् ।
यद्वत्पयःकणो मुक्तो युक्त्या सन्नलिनीदले ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 71 से 79): चाहिए। राजन् ! पहले तो पराई स्त्री की चाह करना ही अनुचित है और दूसरे यदि लड़-भिड़कर जबरदस्ती सुलोचना लाई भी जायेगी तो निश्चय है कि वह आपकी भार्या न होगी, भले ही अपने प्राण खो बैठे। उस वक्त प्रताप-पूर्ण जय का यश संसार में दिन की तरह हमेशा स्थित रहेगा और रात की तरह संसार भर में आपकी अपकीर्ति फैल जायेगी। राजन् ! जल्दी मत कीजिए, अभी युद्ध के लिए तैयारी मत कीजिए। यह मत समझिए कि मैं ही बलवान् हूँ और मेरे पास ही सब साधन है किन्तु उधर अकंपन के पक्ष में भी बहुत से राजा हैं और उनके पास में काफी साधन भी है। राजन् ! धर्म, अर्थ, काम इन तीनों पुरुषार्थों की प्राप्ति होना पुरुषों के लिए कोई आसान बात नहीं है परन्तु इन तीनों को आप साध चुके हैं और बहुत आसानी से। पर अब न्याय को लाँघकर उनका व्यर्थ ही सत्यानाश मत कीजिए। देखिए, संसार में बहुत से राजा हैं और उनके यहाँ बहुत से कन्यारत्न है। मैं निश्चय से कहता हूँ कि उन कन्यारत्नों को ला-लाकर आपके भण्डार में जमा कर दूँगा। इस बात में आप बिल्कुल ही संदेह न करें। यह स्वयंवर-विधि है। इसमें यह नियम नहीं है कि मान्य पुरुष के गले में ही वरमाला डाली जाये और गरीब के गले में न डाली जाये किन्तु कन्या के ऊपर ही सब बात निर्भर है। वह जिसे चाहे पसंद करे। तात्पर्य यह कि जिसको कन्या पसंद करेगी वही उसका वर होगा। इस प्रकार न्याय-पूर्ण वचनों के द्वारा मंत्री ने बहुत कुछ समझाया बुझाया, पर अर्ककीर्ति के हृदय पर उसका कुछ भी असर न पड़ा, जिस तरह कि अनेक युक्तियों से कमलिनी के पत्ते पर डाला हुआ जल का एक कण भी नहीं ठहरता ॥७१-७९॥


एवमुल्लङ्घ्य मन्त्रीशं दुर्गृहार्त्तो महाकुधीः ।
स्वसेनपं समाहूय प्रत्यासन्नपराभवः ॥८०॥

सर्वेषां च महीपानां प्रकथ्य रणनिश्चयम् ।
भेरीं संदापयामास जगतत्रयभयावहाम् ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 80 से 81): उस कुबुद्धि, हठी और तिरस्कार के पात्र राजा ने मंत्री की इस अमूल्य सम्मति की कुछ भी परवाह न की और सेनापति को बुलाकर अपने पक्ष के तमाम राजाओं से लड़ाई के दृढ़ निश्चय को कह सुनाया एवं सब कुछ ठीक-ठाक करके उस दुराग्रही ने थोड़ी ही देर में तीन लोक को डरा देने वाली रणभेरी बजवा दी ॥८०-८१॥


भेरीरवं समाकर्ण्य नृपाः सर्वे रणोत्सुकाः ।
नटद्भटकरास्फोटचटुलारावनिष्ठुराः ॥८२॥

अर्थ: भेरी के शब्द को सुनकर सभी राज-गण युद्ध के लिए उत्सुक हो उठे और चलते हुए भटों के हाथों के चंचल शब्दों के द्वारा अपनी निष्ठुरता दिखलाने लगे। सब सेना तैयार होकर क्रम से चलने


नागाः समन्तात्सन्नद्धाश्चेलुः प्रागचलोपमाः ।
संग्रामाब्धेस्तरङ्गाभास्तुरङ्गास्तु सगर्वकाः ॥८३॥

चक्रचीत्कारसंचारा रथाश्चेलुः सवाजिनः ।
चण्डकोदण्डकुन्तासिकरास्तदनु पत्तयः ॥८४॥

गजं विजयघोषाख्यमर्ककीर्तिः सुकीर्तिमान् ।
समारुह्य चचालासावकम्पननृपं प्रति ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 82 से 85): लगी। सबसे आगे पर्वत के बराबर ऊँचे और सजे हुए हाथी चले जाते थे। हाथियों के पीछे युद्ध-समुद्र की तरंगों की तरह चंचल और पलाण आदि से सुशोभित घोड़े चलते थे। घोड़ों के पीछे चीत्कार शब्द करते हुए रथ और उनके बाद पयादे-गण चलते थे। पयादों के हाथों में भाँति-भाँति के हथियार थे। किसी के हाथ में दंड था, कोई धनुष और कोई भाला लिये था एवं किसी के हाथ में तलवार थी। इस प्रकार सेना के साथ अर्ककीर्ति विजयघोष नाम हाथी पर सवार होकर अकंपन महाराज पर जा चढ़ा ॥८२-८५॥


श्रुत्वा वार्तामिमां भूप आलोच्य सचिवैःसह।
अर्ककीर्तिं समदिक्षद् दूतं स प्राप्य तं जगौ ॥८६॥

त्वार्ककीर्ते किं युक्तमेवं सीमातिलङ्घनम्।
प्रसीद चक्रिपुत्र त्वं तन्मा कार्षीर्मृषागमम् ॥८७॥

इत्युक्तमप्यशान्तं तं ज्ञात्वा प्रत्येत्य तत्तथा।
आशु चाजीगमत्सर्वं दूतोऽकम्पनभूपतिम् ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 86 से 88): अकंपन ने जब इस समाचार को सुना तब मंत्रियों से सलाह कर अर्ककीर्ति के पास एक दूत भेजा। दूत ने जाकर अर्ककीर्ति से कहा कि कुमार! इस तरह मान-मर्यादा को लाँघना आपकी शोभा नहीं देता। हे चक्रिपुत्र! आप रंज को छोड़कर प्रसन्न होइए, व्यर्थ का झगड़ा मत छेड़िए। जहाँ तक बन सका दूत ने बहुत कुछ नम्र निवेदन किया, पर जब अर्ककीर्ति पर उसका कुछ भी असर न हुआ तब वह लाचार हो वापस लौट आया और उसने जैसा का तैसा सब हाल अकंपन महाराज को सुना दिया ॥८६-८८॥


शृङ्खलालिङ्गितोद्युक्तमिदानीमिव वानरम्।
बद्ध्वाऽनेष्ये कुमारं तं परदाराभिलाषिणम् ॥८९॥

इत्युक्त्वा स जयो मेघकुमारविजयार्जितम्।
मेघघोषाभिधां भेरीं दापयामास सत्वरम् ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 89 से 90): वह सब सुनकर जय ने कहा कि कोई फिकर की बात नहीं, मैं उस परस्त्री-लंपट को साँकल से पकड़ने के लिए तैयार हुए बन्दर की भाँति एक मिनट में ही बाँध दूँगा। इसके बाद जय ने वह मेघघोषा नाम भेरी बजवाई, जिसको कि उन्होंने मेघकुमार को जीतकर प्राप्त किया था। तात्पर्य यह कि इधर से जयकुमार ने भी युद्ध की घोषणा कर दी ॥८९-९०॥


तच्छब्दाकर्णनात्सर्वे घूर्णितार्णवसंनिभाः।
दन्तावला मदेनेवोद्घूर्णाश्चेलुर्मदद्विपाः॥९१॥

खनन्तः कुं स्वनन्तश्च वायुवेगाः सुवाजिनः।
पूर्णसर्वायुधा रथाः प्रनृत्यद्ध्वजबाहवः॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): भेरी के शब्द को सुनते ही जयकुमार की सेना भी चल पड़ी। लहराते हुए समुद्र की भाँति मत वाले हाथी चलते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानों मद से घूमते हैं एवं पृथ्वी को अपनी टापों के द्वारा खोदते और हींसते हुए वायु के वेग की भाँति चंचल शीघ्रगामी घोड़े और सभी हथियारों से भरपूर रथ-समूह चलने लगे। रथों के ऊपर ध्वजाएँ फहराती थीं, जिनसे ऐसा जान पड़ता था कि मानों वे और-और मनुष्यों को युद्ध के लिए ही बुलाती हैं। इसी तरह पयादेगण भी आमोद-प्रमोद के साथ युद्धस्थान


पदातयः परं प्रीत्या पेतुस्तत्संयुगं प्रति।
योषितोऽप्यभटायन्त तत्र का वर्णना परा ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 91 से 93): में पहुँच ने को उद्यत हो गये। इस समय वहाँ की स्त्रियाँ भी भटों का काम करती थीं ॥९१-९३॥


अकम्पोऽकम्पनोऽरातिं संयुगे कम्पयन् ययौ।
सूर्यमित्रः सुकेतुश्च जयवर्माथ श्रीधरः ॥९४॥

देवकीर्तिश्च मुकुटबद्धा जग्मुर्जयं प्रति।
नाथसोमान्वयाश्चान्ये भूपास्तं परिवव्रिरे ॥९५॥

मेघप्रभोऽर्धविद्येशैर्विद्याधीशस्तमासदत्।
विरच्य मकरव्यूहं रेजे मेघस्वरस्तदा ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 94 से 96): वहाँ का और क्या वर्णन किया जा सकता है एवं अपनी सेना को साथ लेकर स्वयं अकंप और वैरियों को थर-थर कँपाने वाले अकंपन भी युद्धस्थल में शत्रु से जा भिड़े। इसी समय सूर्यमित्र, सुकेतु, जयवर्मा, श्रीधर और देवकीर्ति आदि मुकुटबद्ध राजा तथा और-और नाथवंशी, सोमवंशी राजा जय से आ मिले। इनके सिवा अर्द्ध विद्येशों को साथ लेकर मेघप्रभ नाम विद्याधर भी जय की सहायता को आया। तात्पर्य यह कि जय का पक्ष भी बहुत प्रबल था। इस वक्त मेघेश्वर (जय) ने मकरव्यूह रचा, जिससे उनकी अपूर्व ही शोभा हो गई ॥९४-९६॥


चक्रव्यूहं विरच्याशु सोऽर्ककीर्तिर्जयत्यलम्।
सुनमिप्रमुखाः खेटास्तार्क्ष्यव्यूहमरीरचन् ॥९७॥

अष्टचन्द्राः खगाश्चक्रिपुत्रं च परिवव्रिरे।
ततो भटा भटैः सार्धं योयुध्यन्ते रणाङ्गणे ॥९८॥

अर्थ (श्लोक 97 से 98): यह देख अर्ककीर्ति ने चक्रव्यूह की रचना की और जय के मकरव्यूह को भेद डाला। इसके बाद सुनमि आदि विद्याधरों ने, जो अर्ककीर्ति के पक्ष में थे, तार्क्ष्यव्यूह की रचना की। इसी समय अष्टचंद्र आदि विद्याधर लोग भी अर्ककीर्ति की ओर आ पहुँचे। रणस्थल में एक दूसरे योद्धाओं के साथ प्रचंड युद्ध होने लगा ॥९७-९८॥


विपक्षहृदयं भित्त्वा शरास्तेषां विशन्ति च।
दण्डादण्डि भटा भेजुः खड्गाखड्गि कचाकचि ॥९९॥

कुन्ताकुन्ति तयोर्युद्धं गदागदि शराशरि।
मुशलामुशलि क्षिप्रं हलाहलि शिलाशिलि ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 99 से 100): दोनों ओर के बाण शत्रुओं के हृदय को भेदने लगे। योद्धाओं में दंडों, तलवारों, भालों, गदों, शरों, मूशलों, हलों और शिलाओं के द्वारा तथा एक दूसरे के वालों की खेंचातानी के द्वारा खूब ही घमासान युद्ध हुआ ॥९९-१००॥


विशिखाश्चार्ककीर्तीनां ज्वलज्वालाशिखोपमाः।
जयानां योधमुख्यानां बिभिदुहृर्दयानि वै ॥१०१॥

विलोक्य स्वबलं क्षिप्तं स तदा सानुजो जयः।
वज्रकाण्डं धनुर्नात्वा समारभे महाहवम् ॥१०२॥

वादिनेव जयेनोच्चैः क्षिप्रं कीर्तिं जिघृक्षुणा।
प्रतिपक्षः प्रतिक्षिप्तः शस्त्रैः शास्त्रैर्जिगीषुणा ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 101 से 103): इधर अर्ककीर्ति ने जलती हुई आग की शिखा के समान तीक्ष्ण बाणों के द्वारा शत्रुदल के वीरों के हृदयों को छेद-भेद डाला, जिसको देखकर जयकुमार ने अपने छोटे भाइयों को साथ ले वज्रकांड धनुष के द्वारा भीषण युद्ध किया और थोड़ी-सी देर में ही शत्रुदल के वीरों को शस्त्र-प्रहार द्वारा तहस-नहस कर दिया, जिस तरह कीर्ति और विजय का अभिलाषी वादी शास्त्र की युक्तियों द्वारा प्रतिवादी को परास्त कर देता है। इसके बाद आकाश में जाकर जय के पक्ष के विद्याधरों ने शत्रुपक्ष के


खेचराः खेचरान्क्षिप्तं क्षिपन्ति गगने गताः। विद्यियुद्धग्रहग्रस्ता भेजुः संगरसंगरम् ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 101 से 104): विद्याधरों का खूब ही तिरस्कार किया और वे विद्यायुद्ध के अभिमान से हमेशा के लिए युद्ध की प्रतिज्ञा करने लगे ॥१०१-१०४॥


समवेगैः समं मुक्तैर्बाणैर्गगनभूचरैः। अभूदन्योन्यमुखलग्नैः स्थितं कतिपयक्षणान् ॥१०५॥

सानुजोऽथ जयस्तावदाविःकृत्य यमाकृतिम्। हयमारुह्य पञ्चास्यमिव योद्धुं समुद्ययौ ॥१०६॥

जयन्तं ते जयं वीक्ष्य समं पेतुः रणोद्यताः। सर्वेऽपि युद्धशौण्डीरा अभ्यग्नि शलभा यथा ॥१०७॥

लङ्घयित्वा गजानीकं कुमारो जयमारुणत्। विजयार्धगजाधीशं जय आरुह्य युद्धवान् ॥१०८॥

अरिंजयाख्यमारुह्य रथं श्वेताश्वयोजितम्। गृहीत्वा वज्रकाण्डं च दत्तं यच्चक्रिणा द्वयम् ॥१०९॥

बन्दिवृन्देन संस्तुत्यः समुत्थाप्य महाध्वजम्। अर्ककीर्तिर्जयं लेभे जयलक्ष्मीसमुत्सुकः ॥११०॥

जयो ज्यास्फालनं कृत्वा कृतान्तसमविक्रमः। गजानां भीषणस्तस्थौ दिशामप्याहरन्मदम् ॥१११॥

जयोऽपि शरसंघातैरर्ककीर्तिं गतप्रभम्। चक्रे घनाघनः सूर्य यथा विगतरश्मिकम् ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 105 से 112): उन्होंने कहा कि हम हमेशा तुम लोगों से युद्ध करने को तैयार हैं, कभी पीछा पैर देने वाले नहीं। इस वक्त नीचे से भूमिगोचरी और ऊपर से विद्याधर लोग बराबर बल से बाणों को छोड़ रहे थे, जिससे कि वे बीच में ही एक दूसरे के मुँह से टकरा कर रह जाते थे, किसी को हानि नहीं पहुँचा पाते थे। उनके विद्याबल का यह एक नमूना है। इसके बाद जयकुमार ने भाइयों सहित यम का रूप बनाया और वे सबके सब घोड़ों पर चढ़कर सिंह की तरह शत्रुदल के साथ युद्ध करने लगे। इस समय जय की जीत होने लगी, जिसको देखकर और-और सभी युद्ध कुशल वीर उन पर एकदम टूट पड़े, जिस तरह से आग पर पतंगे एकदम आ गिरते हैं। इसके बाद हाथियों की सेना को लाँघकर अर्ककीर्ति ने जय के ऊपर आक्रमण किया। जय ने भी विजयार्द्ध नाम के गजोत्तम पर सवार हो उसके साथ युद्ध आरंभ किया-कुछ भी उठा न रखा। चक्रवर्ती ने अर्ककीर्ति को दो वस्तुएँ दी थीं, एक वज्रकांड धनुष और दूसरा सफेद घोड़ों वाला रथ। इस समय अर्ककीर्ति ने इन दोनों से काम लिया। जयलक्ष्मी को पाने के लिए उत्सुक अर्ककीर्ति के कुछ विजय चिह्न दिखने लगे-उसने विजय की ध्वजा-सी फहरा दी। यह देख बन्दीजन आकर उसकी स्तुति करने लगे। अर्ककीर्ति की विजय होती देख यम के तुल्य पराक्रमी जय ने वज्रकांड धनुष द्वारा बात की बात ने दिग्गजों के मद को नष्टकर बाणों के समूह द्वारा अर्ककीर्ति को प्रभा रहित कर दिया, जिस तरह मेघमाला सूरज को तेज रहित कर देती है ॥१०५-११२॥


अच्छैत्सीच्छत्रमस्त्राणि ध्वजं च दुर्जयो जयः। अर्ककीर्तेर्महौद्धत्यं हतवान्हतकोविदः ॥११३॥

अर्थ: जय ने अर्ककर्ति के शस्त्र, ध्वजा, छत्र, चमर आदि सभी राजचिह्न भेद डाले और साथ में ही उसकी उद्धतता का भी इलाज कर दिया ॥११३॥


अष्टचन्द्रास्तदागत्य जयस्येष्टं निवारयन्। भुजबल्यादयोऽभीयुर्योद्धुं हेमाङ्गदं रुषा ॥११४॥

अर्थ: यह देखकर अष्टचंद्र वगैरह राजे रणकोविद जय के इष्ट का विघात करने को तैयार हुए परन्तु


सभ्रातरं हरिव्यूहं हरिव्यूहा इवापरे। सानुजोऽनन्तसेनोऽपि प्राप मेघस्वरानुजान् ॥११५॥

अन्योन्यं च तयोर्भूपाः कोपकम्पितविग्रहाः। अभिपेतुर्जयो योद्धुं संनद्धो रोषमानसः ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 114 से 116): वे उसका बाल भी बाँका न कर सके। उधर भुजबली आदि राजा हेमांगद के साथ लड़ने को तैयार हुए। वे ऐसे जान पड़ते थे मानों सिंहों का समूह ही है और हेमांगद के भाई वगैरह जो सिंह की तरह लड़ने को तैयार थे, उनसे लड़ने को आये एवं अपने छोटे भाइयों को साथ लिए हुए अनंतसेन आया और जय के भाइयों के साथ आ भिड़ा। दोनों पक्ष के राजाओं में खूब ही लड़ाई हुई। क्रोध के मारे दोनों पक्ष के राजा काँपते थे। यह सब हाल देखकर जय को खूब ही रोष आया और वह एकदम उन पर टूट पड़ा ॥११४-११६॥


मित्रनागसुरो ज्ञात्वा विष्टराकम्पतो जयम्। नागपाशं शरं चार्धचन्द्रं दत्त्वा गतोऽप्यसौ ॥११७॥

अर्थ: जय के पुण्य प्रताप से इसी समय उस नागकुमार का, जिसका कि पहले जिक्र आ चुका है, आसन डगमगाने लगा, जिससे उसने जय के संकट को जान लिया। वह उसी वक्त आया और जय को नागपाश और अर्धचन्द्र शर देकर चला गया ॥११७॥


कौरवो बाणमादाय वज्रकाण्डे न्ययोजयत्। रथानथाष्टचन्द्राणां ससारथीनभस्मयत् ॥११८॥

छिन्नदन्तकरो हस्तीव यमो वा हृतायुधः। भग्नमानः कुमारोऽस्थाद्धिक्कष्टं चेष्टितं विधेः ॥११९॥

विधिज्ञो विधिवत्पुत्रं चक्रिणः समजीग्रहत्। तस्याप्यासीदवस्थेयमुन्मार्गः कं न पीडयेत् ॥१२०॥

पतद्भास्करसंकाशमर्ककीर्तिं गतायुधम्। स्वरथे स्थापयित्वा स आरुरोह द्विपं स्वयम् ॥१२१॥

विपक्षखचरान्भूपात्रागपाशेन पाशितान्। नियन्त्र्य निर्जितारातिः संयस्थात्सिंहविक्रमः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 118 से 122): फिर क्या था, बाण को पाते ही जय ने उसको वज्रकांड धनुष्य पर चढ़ाया और अष्टचन्द्र आदि को रथ सहित भस्म कर दिया। यह देख कुमार का अभिमान नष्ट हो गया, जिस तरह दाँत और सूँड़ के कट जाने पर हाथी और हथियार छिन जाने पर यम निर्मद हो जाता है। ग्रन्थकार कहते हैं कि कर्म की चेष्टा बड़ी कष्ट-मय होती है। इसके बाद विधि के ज्ञाता जय ने सरलता के साथ अर्ककीर्ति को पकड़ लिया। देखो, जो अर्ककीर्ति एक भारी गणमान्य पुरुष था उसी की आज यह हालत हो गई। सच है, मार्ग को छोड़कर जो औंधे रास्ते से जाता है वह अवश्य ही दुखी होता है। इसके बाद अस्त होते हुए सूरज के समान प्रभा रहित अर्ककीर्ति को जय ने रथ में बैठा कर आप स्वयं हाथी पर सवार हुआ। अर्ककीर्ति के सिवा जय ने उसके अनुयायी और-और विद्याधरों को भी नागपाश से बाँध लिया था। इस प्रकार शत्रुओं पर विजय लाभकर सिंह के समान पराक्रमी राजा जय बड़ा सुखी हुआ ॥११८-१२२॥


इति प्राप्तजये तस्मिन्वृष्टिः सुमनसां दिवः। पपात सुरसंघेभ्यो जयारावविमिश्रिता ॥१२३॥

रणावनिं स आलोक्य कारयामास सर्वतः। मृतानां प्रेतसंस्कारं जीवतां जीवनक्रियाम् ॥१२४॥

अर्थ (श्लोक 123 से 124): जब देवताओं को जय के जीत की खबर लगी तब उन्होंने आकाश से फूलों की बर्षा की और जयध्वनि से दशों दिशाओं को शब्दमय कर दिया। इसके बाद जय ने रणस्थल का निरीक्षण किया


जयोऽप्यकम्पनेनामा प्राविशत्सर्वसंपदाम्।
पुरीं पुरजनाकीर्णां लसत्केतनशोभिताम् ॥१२५॥

रक्षितान्धृतभूपालान्कुमारं च नियोगिभिः।
आश्वास्याश्वासकुशलैर्यथास्थानमवापयत् ॥१२६॥

विनाशो विश्वविघ्नानां जिनादिति ववन्दिरे।
संपूज्य स्तुतिभिः स्तुत्वा जिनं ते स्वस्थितिं गताः ॥१२७॥

विद्याधरधराधीशान् विपाशीकृत्य कृत्यवित्।
विश्वान्विश्वासयामास तद्योग्यैः समुदीरितैः ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 123 से 128): और मरे हुए वीरों की दग्ध क्रिया तथा जीते हुओं की जीवन क्रिया अर्थात् औषधि वगैरह का प्रबंध किया। यह सब किये बाद जय अकंपन महाराज के साथ-साथ काशी आये। काशी मनुष्यों से भरपूर और लहलहाती हुई ध्वजाओं से सुशोभित थी और भाँति-भाँति की सम्पत्ति से सजाई गई थी, जान पड़ता था कि जय की जीत की खुशी में नगरी ने अपनी काया ही पलट डाली है। वहाँ पहुँच कर जय ने पकड़े हुए राजाओं और अर्ककीर्ति को चतुर पुरुषों के द्वारा आश्वासन दिलवाकर उन्हें उनके योग्य स्थान पर ठहराया। इसके बाद जय वगैरह ने यह समझ कर कि सब विघ्न बाधाओं का नाश जिनेन्द्र देव के प्रसाद से ही होता है, उनकी पूजा-वन्दना की और भाँति-भाँति की स्तुतियों द्वारा उनकी स्तुति की। बाद सबके सब अपने-अपने स्थान को चले गये। वहाँ जाकर जय और अकंपन ने पकड़े हुए राजाओं और विद्याधरों को छोड़ दिया और योग्य मीठे वचनों द्वारा उनके हृदयों में विश्वास करा दिया कि तुम लोग किसी भी तरह की चिन्ता मत करो ॥१२३-१२८॥


अकम्पनजयौ नत्वा कुमारं विहितस्तुती।
अभाषेतां भृशं भक्त्या भव्यौ भद्रमनोरथौ ॥१२९॥

अस्मद्वंशौ च युष्माभिर्विहितौ वर्धितौ सदा।
न यास्यतः क्षयं त्वत्तो यतो वः सेवका वयम् ॥१३०॥

सुतबन्धुपदातीनामपराधाशतान्यपि।
महात्मानः क्षमन्ते हि तेषां तद्धि विभूषणम् ॥१३१॥

अपराधः कृतोऽस्माभिरेकोऽयमविवेकिभिः।
बन्धुभूत्या वयं वस्तत्कुमार क्षन्तुमर्हसि ॥१३२॥

सुलोचनेति का वार्ता सर्वस्वं नस्तवैव तत्।
चेन्निषिद्धस्त्वया पूर्वं क्रियते किं स्वयंवरः ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 129 से 133): इसके बाद भव्य और सरलचित्त जय और अकंपन ने अर्ककीर्ति कुमार की स्तुति कर उन्हें नमस्कार किया और कहा कि कुमार! हमारे कुलों को आपने ही बढ़ाया, पाला तथा पोषा है। फिर ये कुल आपके ही द्वारा कैसे नष्ट हो सकते थे। इसलिए ऐसा हुआ। वास्तव में आपकी हार नहीं हुई। हम सब लोग तो आपके ही सेवक हैं और एक बात यह कि सुत, बंधु तथा सिपाही वगैरह से चाहे सौ अपराध ही क्यों न हो जायें, महापुरुष सभी माफ कर देते हैं क्योंकि वास्तव में उत्तम पुरुषों का क्षमा ही भूषण है। कुमार! हम अविवेकियों से आपका एक अपराध हो गया है, पर हम आपके सेवक हैं, इसलिए आप हमें क्षमा प्रदान कर दें। हमारी यही अभ्यर्थना है। प्रभो! एक सुलोचना की तो बात ही क्या हैं, यह सर्वस्व ही आपका है और हम भी आपके हैं। यदि आपको सुलोचना की चाह ही थी तो पहले से ही स्वयंवर विधि को रोक देना चाहिए था ॥१२९-१३३॥


त्वमग्निनेव केनापि पापिना विश्वजीवकः।
उष्णीकृतोऽसि प्रत्यस्माञ् शीतीभव सुवारिवत् ॥१३४॥

अर्थ: पर वास्तव में ऐसा भाव आपका न था क्योंकि आप तो विश्व के पालक हैं किन्तु किसी दुष्ट पुरुष ने आपको आग की तरह भड़का दिया और उसी से यह सब ऐसा हुआ है। अस्तु, अब आपसे


इति प्रसाद्य संतोष्य समारोप्य महाद्विपम्।
अर्ककीर्तिं पुरस्कृत्य भेजे खेचरभूचरैः ॥१३५॥

सर्वार्थसंपदं दत्त्वाक्षमलामर्ककीर्तये।
स तं विसर्जयामास लक्ष्मीमत्यपराभिधाम् ॥१३६॥

अपरांश्च नराधीशान्संतोष्य गजवाजिभिः।
प्रेषयामास ते सर्वे जग्मुः स्वं स्वं पुरं प्रति ॥१३७॥

तदा नागासुरो भूत्वा समेत्य समपादयत्।
सुलोचनाविवाहं च जयेन सुजयेशिना ॥१३८॥

अर्थ (श्लोक 134 से 138): यही नम्र प्रार्थना है कि आप हमारे ऊपर ठंडे जल की भाँति ही ठंडे हो जाइए। इसके बाद अकंपन ने अर्ककीर्ति को बहुत सम्पति दी और लक्ष्मीमती नाम पुत्री का उसके साथ ब्याह कर दिया। इस तरह अकंपन बड़े आदर के साथ अर्ककीर्ति को सन्तुष्ट कर और हाथी पर चढ़ा बहुत से राजाओं महाराजाओं सहित उसके देश को रवाना कर दिया एवं और-और राजाओं को भी हाथी घोड़े आदि की भेंट द्वारा सन्तुष्ट कर उन्हें विदा दी। वे भी सब अपने-अपने नगर को चले गये। इसके बाद बड़े भारी ठाट-बाट के साथ वह नागकुमार आया और उसने जयशील जयकुमार के साथ भली-भाँति सुलोचना का विवाह करवाया। देखो, यह सब पुण्य का ही माहात्म्य है जो देवता-गण भी सेवा में आकर उपस्थित हो जाते हैं ॥१३४-१३८॥


जयोऽकम्पनभूपेनालोच्य रत्नाद्युपायनैः।
सुमुखाख्यं नरं प्रीत्यै चक्रेशं प्रत्यजीगमत् ॥१३९॥

गत्वासौ प्राभृतं मुक्त्वा प्रणम्य निभृताञ्जलिः।
चक्रेशं चर्करीति स्म विज्ञप्तिं विनयान्वितः ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 139 से 140): इसके बाद जय ने अकंपन की सम्मति से रत्न आदि भेंट देकर सुमुख नाम एक दूत को चक्रवर्ती के पास भेजा। वह गया और चक्रवर्ती के सामने रत्न आदि भेंट रखकर तथा उन्हें हाथ जोड़ प्रणाम कर नम्रता-पूर्वक बोला ॥१३९-१४०॥


अकंपनो भयाद्देवं विज्ञप्तिं कुरुते प्रभो।
स्वयंवरविधानेन तस्मै तां प्रददौ मुदा ॥१४१॥

तत्रागत्य कुमारोऽपि सर्वं प्रागनुमन्य तत्।
केनापि कोपितः क्रुद्धः संगरं विदधे ध्रुवम् ॥१४२॥

विज्ञातमेव देवेन सर्वं चावधिचक्षुषा।
कर्तव्यं क्रियतां यन्नो वधः क्लेशोऽर्थसंहतिः ॥१४३॥

इति प्रश्रयिणीं वाणीं निगद्य सुमुखः स्थितः।
उवाच वचनं चक्री परचक्रभयंकरः ॥१४४॥

अकंपनैः किमित्येवमुक्त्वा संप्रहितो भवान्।
पुरुषेभ्यो निर्विशेषास्ते सर्वज्येष्ठाश्च सांप्रतम् ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 141 से 145): प्रभो! अकंपन महाराज आपके डर से आपको यह जताना चाहते है कि मैंने स्वयंवर विधि करके जयकुमार को अपनी सुलोचना नाम कन्या दी है। स्वयंवर में आने की कुमार ने भी कृपा की थी और जब कन्या ने जय के गले में वरमाला डाली तब उन्होंने अपनी सम्मति भी प्रगट की थी। पर पीछे से न जाने किसी पापी ने कुमार के कान भर दिये, जिससे वे क्रुद्ध हो गये और उन्होंने युद्ध छेड़ दिया। वह सब हाल श्रीमान् ने अवधिज्ञान-चक्षु के द्वारा प्रत्यक्ष ही देखा है। हे प्रभो! अब जो कर्तव्य हो सो कीजिए, जिसमें हमारी अर्थ-क्षति न हो और हमें क्लेश भी न पहुँचे, एवं हम मारे न जाए। इस प्रकार दीनता भरे वचनों द्वारा नम्र निवेदन कर चुकने पर दूत तो एक ओर बैठ गया और परचक्र को भय देने वाले चक्रवर्ती ने उत्तर में यों कहना शुरू किया कि अकंपन ने ऐसे नम्र वचनों को लेकर तुम्हें व्यर्थ ही भेजा क्योंकि वे बड़े हैं, अतएव मेरे लिए आदिनाथ प्रभु से कम नहीं हैं।


मोक्षमार्गस्य पुरवो गुरवो दानसंततेः।
श्रेयांसश्चक्रवर्तित्वे यथेहास्म्यहमग्रणीः ॥१४६॥

स्वयंवरविधातारो नाभाविष्यंस्त्वकम्पनाः।
कः प्रवर्तयितान्योऽस्य मार्गस्य यदि निश्चितम् ॥१४७॥

पथः पुरातनान्येऽत्र भोगभूमितिरोहितान्।
कुर्वते नूतनान्सन्तः पूज्याः सद्भिस्त एव हि ॥१४८॥

अकीर्तिमर्ककीर्तिर्मे कीर्तनीयामकीर्तिषु।
अकार्षीदायुगं चेह मधुव्रतमलीमसाम् ॥१४९॥

संतोष्येति स विश्वेशः सुमुखं प्राहिणोत्स च।
गत्वा तयोः पदं नत्वा सर्वं पूर्वमचीकथत् ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 141 से 150): जिस तरह आदिनाथ प्रभु मोक्षमार्ग के प्रवर्तक गुरु हैं, दान की प्रवृत्ति करने वाले श्रेयांस राजा है तथा चक्रवर्तीपने का मैं अगुआ हूँ उसी तरह वे भी तो स्वयंवर-विधि के विधाता है-चलाने वाले हैं। यदि आज वे न होते तो स्वयंवर-विधि को कौन चलाता, यह बात तो निश्चित ही हैं। यहाँ भोगभूमि होने से जो पुराने मार्ग लुप्तप्राय हो गये थे उनको जिन सत्पुरुषों ने फिर से प्रचलित किया है, उनमें नयापन डाला है वे सारे संसार के पूज्य हैं। ऐसे पुण्य प्रसंग पर अर्ककीर्ति ने जो वहाँ अन्याय से लड़ाई की उससे उसने युग-पर्यन्त के लिए मेरे यश में धब्बा लगा दिया, अपयशी पुरुषों में मेरी गिनती करवा दी। इस प्रकार चक्रवर्ती ने दूत को समझा-बुझाकर वापस लौटा दिया। उसने वापस आकर अकंपन और जय को नमस्कार कर चक्रवर्ती के जैसे के तैसे वचन उन्हें कह सुनाये ॥१४१-१५०॥


सुलोचनाजयौ तत्र चिक्रीडतुश्चिरं सुखम्।
पुनस्तौ स्वपुरं गन्तुमीहेते जननोदितौ ॥१५१॥

अकम्पनं निवेद्यासौ पूजितो गजवाजिभिः।
अनुगङ्गं जगामाशु वृतः श्वशुरबांधवैः ॥१५२॥

तत्र गङ्गानदीतीरे संस्थाप्य वरवाहिनीम्।
आप्तैः कतिपयैः सार्धं प्रत्ययोध्यां ययौ जयः ॥१५३॥

अर्थ (श्लोक 151 से 153): इस प्रकार चक्रवर्ती का उत्तर सुन वे बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद कुछ काल तक जयकुमार और सुलोचना ने वहीं सुख से निवास कर बाद अपने नगर को जाने की इच्छा की और अकंपन महाराज को अपनी इच्छा कह सुनाई। अकंपन ने हाथी घोड़ों आदि से खूब सम्मान कर उन्हें विदा किया और साथ में हेमांगद आदि राजाओं को भेजा। सुर और बन्धुवर्ग से घिरे हुए दोनों दम्पति गंगातट पर आये। वहाँ आकर उन्होंने सब सेना को तो वहीं ठहरा दिया और आप कितने ही उत्तम पुरुषों को साथ लेकर अयोध्या नगरी को गये ॥१५१-१५३॥


अर्ककीर्त्यादिभिर्भूपैस्तस्य संमुखमागतैः।
सहायोध्यां विवेशासौ मघवेवामरीं पुरीम् ॥१५४॥

मध्येसभं सभानाथं नत्वासौ चक्रवर्तिनम्।
निर्दिष्टभूतलेऽतिष्ठज्जयो जयविराजितः ॥१५५॥

ऊचे स चक्रिणा तूर्णं वधूर्विधुमुखी किमु।
नानीता तां वयं द्रष्टुं वर्तामहे समुत्सुकाः ॥१५६॥

अकम्पनेन नाहूतास्त्वद्विवाहोत्सवे नवे।
वयं युक्तमिदं किं भोः सनाभिभ्यो बहिःकृताः ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 154 से 157): वहाँ नगरी से बाहर आकर अर्ककीर्ति आदि ने उनकी खूब अगवानी की और उन्हें वे नगरी में लाये। जिस समय जय ने अर्ककीर्ति आदि के साथ-साथ नगरी में प्रवेश किया उस समय ऐसा भान होता था कि बहुत से देवताओं के साथ-साथ इन्द्र ही अमरावती में प्रवेश कर रहा है। वे सीधे राजसभा में गये और सभानायक चक्रवर्ती को नमस्कार कर उनके दिखाये हुए स्थान पर जा बैठे। चक्रवर्ती ने कहा कि जय, तुम चन्द्रवदनी वधू को यहाँ क्यों नहीं लाये। हम उसके देखने को बहुत ही उत्सुक हैं। क्या करें, अकंपन ने तो इस बिल्कुल नये विवाह-महोत्सव में हमें निमंत्रण ही नहीं


अहं त्वत्पितृस्थानीयो मां पुरस्कृत्य कन्यका।
त्वयासौ परिणेतव्या त्वं तद्विस्मृतवानसि ॥१५८॥

इत्यपूर्ववचोवादैस्तर्पितश्चक्रवर्तिना।
लब्धमानो महामानं तं प्रणम्य जयो ययौ ॥१५९॥

अर्थ (श्लोक 154 से 159): दिया। बताओ तो सही क्या यह बात ठीक है। क्या उन्होंने इस लोगों को बन्धुओं से बाहर कर दिया है। अस्तु जो हो, परन्तु तुम्हारे लिए तो मैं पिता के तुल्य हूँ, तुम्हें तो मुझे अगुआ बना कर ही अपना विवाह करना था, पर तुम भी हमें भूल गये, तुमने भी तो निमंत्रण नहीं दिया। इस प्रकार की अपूर्व-अपूर्व बातें कह कर चक्रवर्ती ने उन्हें सन्तुष्ट किया और उनका योग्य आव-आदर किया। इसके बाद जय महामना चक्रवर्ती को नमस्कार कर वापस लौट आये ॥१५४-१५९॥


समारुह्य गजं सद्यः स गङ्गातटमासदत्।
ईप्सुर्मनःप्रियां द्रष्टुं स्वप्राणेभ्यो गरीयसीम् ॥१६०॥

शुष्कवृक्षस्य शाखाग्रे संमुखीभूय भास्वतः।
ब्रुवन्तं ध्वांक्षमावीक्ष्य कान्ताया भयचिन्तया ॥१६१॥

मूर्च्छितः स समाश्वास्य तद्योग्यवरवस्तुभिः।
सुरदेवेन मा भैषीर्भार्यायामिति सान्वितः ॥१६२॥

प्रमाणीकृत्य तद्वाक्यमतीर्थेनोदयद्गजम्।
उत्पुष्करं स्फुरद्दन्तं तरन्तं मकराकृतिम् ॥१६३॥

दन्तिनं वीक्ष्य पूर्वोक्ता सरुषाः संगमेऽग्रहीत्।
कालीदेवी स्वदेशस्थः क्षुद्रोऽपि महतां बली ॥१६४॥

अर्थ (श्लोक 160 से 164): हाथी पर सवार हो शीघ्र ही गंगातट पर जा पहुँचे। वे प्राणों से भी कहीं अधिक प्यारी सुलोचना को देखने के लिए उत्सुक हो रहे थे। इतने में ही उन्होंने सूखे वृक्ष की डाली पर सूरज की ओर मुँह किये बैठे हुए एक कौवे की बोली सुनी। उसे सुनते ही उन्हें अपनी प्रिया के सम्बन्ध में कोई भारी अनिष्ट की शंका हुई और मूर्च्छा आ गई। वे बेहोश हो गये। उनकी यह दशा देख उसी नागकुमार ने आकर शीतल-सुगन्धित वस्तुओं के उपचार से उन्हें सचेत किया और कहा कि आप सुलोचना की चिन्ता न करें, वह सब तरह से सुखी है। जय ने उसके वचनों पर विश्वास कर शीघ्रता के कारण बिना घाट के ही ऊभट मार्ग द्वारा हाथी को गंगा में उतार दिया। हाथी के दाँत सुन्दर और चमकीले थे। वह जल में सूँड उठाए ऐसा भान होता था मानो तैरता हुआ मगर ही है। पाठक भूले न होंगे कि काकोदर मरकर गंगा में कालीदेवी हुआ था। धीरे-धीरे जब वह हाथी बीच धार में पहुँचा तब उस कालीदेवी ने उसे रोक दिया, जिससे वह आगे जाने को असमर्थ हो गया। सच है अपने स्थान पर निर्बल भी बल दिखाने लग जाता है ॥१६०-१६४॥


गजराजं निमज्जन्तं दृष्ट्वा हेमाङ्गदादयः।
तटस्थिताः सहापेतुः ससंभ्रमं महाह्रदम् ॥१६५॥

सुलोचनार्हतो गोत्रं समाधाय स्वमानसे।
त्यक्ताहारशरीरादिरुपसर्गावसानकम् ॥१६६॥

प्राविशद्बहुभिः सार्धं गङ्गां गङ्गेव देवताम्।
ज्ञात्वाथासनकम्पेन गङ्गाकूटाधिवासिनी ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 165 से 167): ज्यों ही हाथी को काली ने पकड़ा, त्यों ही वह जल में डूबने लगा। उसको डूबता हुआ देखकर हेमांगद आदि जो गंगातट पर खड़े थे, शीघ्र ही गंगा में कूद पड़े। उधर सुलोचना भी आहार, शरीर आदि से ममता भाव को छोड़कर सभी उपद्रवों को दूर करने वाले “णमो अरहंताणं” मंत्र का जाप करने लगी और बहुत से सखी जनों के साथ-साथ वह भी गंगा के भीतर उतर पड़ी। इसी गंगातट पर एक गंगा नाम देवी रहती थी। सहसा आसन के कम्पायमान होने से सब हाल जानकर


तानानयत्तटं सर्वान्नागत्य खलकालिकाम्। संतर्ज्य जयमासञ्ज्य जये पुण्याज्जयो भवेत् ॥१६८॥

अर्थ (श्लोक 165 से 168): वह उसी वक्त वहाँ आई और गंगा से सबको सही सलामत निकाल कर उसने किनारे पर पहुँचा दिया एवं उसने दुष्ट काली को खूब ही ताड़ना दी और उसे जयकुमार के पास लाई। सच है पुण्य-योग से सब जगह जीत ही जीत होती है ॥१६५-१६८॥


गङ्गातीरे विकृत्याशु सदनं सर्वसंपदा। रत्नपीठे समाधायापूजयत्सा सुलोचनाम् ॥१६९॥

अवरुद्धामरेशस्य त्वया दत्तनमस्कृतेः। त्वत्प्रसादादहं जज्ञे प्रिया गङ्गाधिदेवता ॥१७०॥

अर्थ (श्लोक 169 से 170): इसके बाद गंगादेवी ने नदी के तट पर सभी सम्पत्ति से भरपूर एक मनोहर महल बनाया और उसमें एक मनोहर सिंहासन पर सुलोचना को बैठाकर उसने उसकी बड़ी भक्ति से सेवा-पूजा की। इसके बाद वह बोली कि वसन्ततिलक नाम उद्यान में जब मुझे साँप ने काट खाया था तब आपने मुझे नमस्कार मंत्र दिया था। अतः आपकी ही कृपा से मैं यहाँ गंगा की अधिष्ठात्री और सौधर्म इन्द्र की नियोगिनी देवी हुई हूँ ॥१६९-१७०॥


जयस्तदुक्तमाकर्ण्य किमित्याह सुलोचना। उपविन्ध्याद्रिभूपोऽभूद्विन्ध्यपुर्यां तु तद्ध्वजः ॥१७१॥

प्रियङ्गुश्रीः प्रिया तस्य विन्ध्यश्रीश्च तयोः सुता। तत्पिता तां गुणान्सर्वाञ्शिक्षयितुं मां समर्पयत् ॥१७२॥

मया सह मयि स्नेहात्क्रीडन्ती सैकदाहिना। वसन्ततिलकोद्याने दष्टादायि मया तदा ॥१७३॥

नमस्कारमहामन्त्रो भावयन्त्यत्र सा मृता। जातेयं स्नेहिनी देवी मयि धर्मानुरागतः ॥१७४॥

जय आकर्ण्य तत्सर्वं गङ्गादेवीं विसर्ज्य च। सपताकं निजावासं प्राविशत्सप्रियः प्रिये ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 171 से 175): देवी! यह सब आपके दिये हुए मंत्र से ही हुआ है, अतः मैं आपकी चिर कृतज्ञ हूँ। यह सब सुन जयकुमार ने सुलोचना को कहा कि प्रिये! इसकी सारी कहानी कहो। उत्तर में सुलोचना ने यों कहना आरम्भ किया कि विंध्याचल पर्वत पर एक विंध्यपुरी नाम नगरी है। वहाँ विंध्यध्वज राजा राज्य करते हैं। उनकी रानी का नाम प्रियंगुश्री है। उनके एक विंध्यश्री नाम कन्या थी। विंध्यध्वज ने उस कन्या को सभी गुण-सम्पन्न बनाने के लिए मेरे पास भेज दिया। मेरा उस पर और उसका मुझ पर पूरा स्नेह था। एक दिन हम दोनों वसंततिलक नाम उद्यान में क्रीड़ा कर रही थीं। दैवयोग से इतने में उसे एक साँप ने काट खाया और वह उसी वक्त बेहोश हो गई। उस वक्त मैंने उसे नमस्कार मंत्र दिया तथा उसका माहात्म्य भी समझा दिया। बाद कुछ देर में वह उस मंत्र का जाप करती हुई मर गई और यहाँ आकर यह गंगादेवी हुई। इसने उसी धर्मानुराग से मुझ पर यह स्नेह दिखाया है। यह सब कहानी सुनकर जय ने गंगादेवी को विदा कर आप फहराती हुई ध्वजाओं वाले उसके बनाए हुए मनोहर महल में गये ॥१७१-१७५॥


नीत्वा निशां स तत्रैव प्रातरुत्थाय ब्रध्नवत्। अनुगङ्गं प्रयान् प्रेम्णा संप्राप स्वपुरं परम् ॥१७६॥

अर्थ: वहाँ रात पूरी कर सबेरे वे सूरज की तरह उठे और गंगा के किनारे-किनारे चलकर शीघ्र ही हस्तिनागपुर आ पहुँचे। हस्तिनागपुर अपनी सुन्दर सामग्री से मनुष्य-सा जान पड़ता था। मनुष्य के


पताकाचलहस्ताढ्यं हेमकुम्भास्यशोभनम्। महातोरणवक्षस्कं गवाक्षाक्षीणचक्षुषम् ॥१७७॥

हटदृधटितस्वङ्गलीकटीतटसमाश्रितम्। शातकुम्भमहास्तम्भसत्पादं रत्नसन्नखम् ॥१७८॥

पुरं नरमिवालोक्य सल्लीलालीविलोकितम्। सुलोचनायुतो भेजे जयो जय इवापरः ॥१७९॥

विवेश पत्तनं पत्न्या पुरुपुत्र इवापरः। निश्च्छद्म सुखसद्भामाध्यासीत्स्वसदनं जयः ॥१८०॥

सुलोचनामुखाम्भोजभ्रमरो भ्रातृभिः सह। पालयन्निखिलां क्षोणीं रेजेऽसौ सुरराडिव ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 176 से 181): हाथ होते हैं, इसके उड़ती हुई पताकाएँ ही हाथ थीं। मनुष्य के मुख होता है, इसके सुवर्ण कलश ही सुन्दर मुख था। पुरुष के वक्षःस्थल होता है, इसके बड़े-बड़े तोरण ही वक्षःस्थल जैसे थे। मनुष्य के नेत्र होते हैं, उसके झरोखे ही नेत्र थे। मनुष्य के कटिभाग, पैर और नख होते हैं, उसके भी गुमटियों के नीचे की गहराई-सी जो होती है वह कटिभाग और खंभे पाँव तथा उनमें जड़े हुए रत्न ही नख थे एवं मनुष्य के स्त्री होती है, उसके भी सत्पुरुषों की संख्यारूपी स्त्री थी। बहुत क्या कहें, इस नगर की अपूर्व ही शोभा थी। सब तरह से सजे-धजे हस्तिनागपुर को देखकर जय महाराज बहुत ही सन्तुष्ट हुए। वे सुलोचना सहित वहाँ ऐसे शोभते थे मानों जय का अवतार ही है। जय ने नगर में उसी तरह प्रवेश किया, जिस तरह कि चक्रवर्ती अयोध्या नगरी में प्रवेश करता है एवं वहाँ वे सच्चे सुखों को देने वाली अपनी प्रिया के साथ-साथ सुख से सुन्दर महलों में निवास करने लगे। सुलोचना के मुख-कमल के भ्रमर के जैसे जय अपने छोटे भाइयों सहित पृथ्वी का पालन करते हुए इन्द्र के जैसे शोभते थे ॥१७६-१८१॥


प्रासादमेकदारुह्य गच्छन्तौ खगदम्पती। दृष्ट्वा प्रभावती मेऽहो क्वेति जल्पनमुमूर्च्छ सः ॥१८२॥

तथा कलरवद्वन्द्वं वीक्ष्य जातिस्मरान्विता। हो मे रतिवरेत्युक्त्वा सापि मूर्च्छमुपागमत् ॥१८३॥

हिमचन्दनसंमिश्रवाभिस्तन्मूर्च्छनासुखम्। अवारयत्यरीवारस्तमो वा रत्नदीधितिः ॥१८४॥

अर्थ (श्लोक 182 से 184): एक दिन जय महाराज ने महल के ऊपर से एक कबूतरों के जोड़े को देखा और उसे देखते ही, “मेरी प्रभावती कहाँ है” यह कहकर वे बेहोश हो गये तथा मीठी-मीठी ध्वनि करने वाले उन कबूतरों को देखकर सुलोचना को भी जातिस्मरण हो आया एवं वह भी हा, “मेरा रतिवर कहाँ है” यह कह मूर्च्छित हो गई। उस समय सभी कुटुम्ब-परिवार के लोग इकट्ठे हो गये और उन्होंने चंदन आदि शीतल वस्तुओं के उपचार द्वारा उनकी मूर्च्छा को दूर किया, जिस तरह रत्नों की ज्योति अँधेरे को दूरकर देती है ॥१८२-१८४॥


प्रबुद्धौ तौ स्मयाक्रान्तौ दृष्ट्वा लोकान्सुविह्वलान्। विदित्वा पूर्वजन्मानि सोऽभाणीत्स्वप्रियां प्रति ॥१८५॥

प्रिये जन्मान्तरावाप्तं वृत्तान्तं विश्वमावयोः। व्यावर्णयेदमदः शान्तं कुरु कौतुकसंगतम् ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 185 से 186): वे दोनों जब सचेत हुए तब उन्हें अपने परिवार के लोगों की, विह्वलता देखकर बहुत ही अचंभा हुआ और साथ ही पिछले भवों का स्मरण हो आया। जय ने सुलोचना से कहा कि प्रिये! अपने पिछले जन्मों का सारा हाल सुनाकर इन सबके कौतुक को मिटाओ। अपने प्रियतम की आज्ञा पाकर वह मिष्टभाषिणी यों कहने लगी ॥१८५-१८६॥


साज्ञापिता प्रियेणेति बभाषे कलभाषिणी। इह जम्बूमति द्वीपे पुष्कलावत्यभिख्यया ॥१८७॥

प्राग्विदेहे श्रुते देशे मृणालादिवती पुरी। सुकेतुस्तत्र भूपालो वैश्येशो रतिकर्मकः ॥१८८॥

कनकश्रीः प्रिया तस्य भवदेवः सुतस्तयोः। श्रीदत्तश्चापरस्तत्र वणिक् तस्यातिवल्लभा ॥१८९॥

विमलश्रीस्तयोः ख्याता रतिवेगा सुता सती। तथान्योऽशोकदेवाख्यो जिनदत्ताप्रियो वणिक् ॥१९०॥

सुकान्तस्तनयो जातस्तयोर्धर्मार्थमानसः। भवदेवविवाहार्थं रतिवेगा च याचिता ॥१९१॥

पितृभ्यां तत्पितृभ्यां च तथेत्यङ्गीकृतं तदा। भवदेवस्य दुर्वृत्त्या दुर्मुखाख्याप्यजायत ॥१९२॥

अर्थ (श्लोक 187 से 192): “जम्बूद्वीप के पूर्व-विदेह में एक पुष्कलावती देश है। उसमें मृणालवती नाम पुरी है। वहाँ के राजा सुकेतु थे। इसी नगरी में एक रतिवर्मा नाम सेठ रहते थे। उनकी स्त्री का नाम कनकश्री और पुत्र का नाम भवदेव था। यहाँ श्रीदत्त नाम एक वैश्य और थे। उनकी स्त्री का नाम विमलश्री और पुत्री का नाम रतिवेगा था। वह सती थी एवं अशोकदेव नाम एक तीसरे सेठ और यहीं रहते थे। उनकी स्त्री का नाम जिनदत्ता और पुत्र का नाम सुकान्त था। वह हमेशा धर्म-कर्म में लगा रहता था। एक बार भवदेव के माता-पिता ने उसके लिए रतिवेगा के माता-पिता से उसकी याचना की और उन्हें इस काम में सफलता भी प्राप्त हुई। भवदेव का चाल-चलन खराब था, इसलिए लोग उसे दुर्मुख भी कहा करते थे ॥१८७-१९२॥


व्यापारार्थमटन्देशान्तरे स स्वजिघृक्षुकः। श्रीदत्तेनेति संप्रोक्तो विवाहविधये स्फुटम् ॥१९३॥

अटाट्यसे वणिग्जायै विवाहस्य च का गतिः। द्वादशाब्दावधिं कृत्वेति स देशान्तरं ययौ ॥१९४॥

अर्थ (श्लोक 193 से 194): एक समय धन कमाने की इच्छा से जब भवदेव दूसरे देश को जा रहा था तब श्रीदत्त ने उससे विवाह के सम्बन्ध में कहा कि अब इस समय तो आप व्यापार के लिए जा रहे है, पर यह तो बताइए कि विवाह कब तक रुका रहेगा। इस पर वह बारह वर्ष की प्रतिज्ञा करके परदेश को चला गया ॥१९३-१९४॥


तन्मर्यादात्यये तस्याः पितृभ्यां परमोत्सवैः। सुकान्ताय समादायि रतिवेगा रतिप्रदा ॥१९५॥

देशान्तरात्समागत्य तद्वार्ताश्रवणाद्भृशम्। दुर्मुखे कुपिते भीत्वा तदानीं तद्वधूवरम् ॥१९६॥

वने धान्यकमालाख्ये प्राप्य सर्पसरोवरम्। स्थितस्य शक्तिषेणस्य व्रजित्वा शरणं ययौ ॥१९७॥

अर्थ (श्लोक 195 से 197): वह कह गया कि यदि मैं बारह वर्ष में पीछा न आऊँ तो इस कन्या का ब्याह तुम दूसरे के साथ में कर देना। दैवयोग से ऐसा ही हुआ। धीरे-धीरे बारह वर्ष पूरे हो गये, पर वह वापस न आया। आखिर रतिवेगा के पिता श्रीदत्त ने बड़े भारी ठाट-बाट के साथ अपनी कन्या का ब्याह अशोक के सुकांत नाम पुत्र के साथ कर दिया। रतिवेगा साक्षात् रति ही थी। इसके बाद जब भवदेव परदेश से घर आया और उसने रतिवेगा के ब्याह की चर्चा सुनी तब वह बहुत क्रुद्ध हुआ। उसने सुकान्त तथा रतिवेगा को मार डालने का निश्चय किया। जिसको सुनकर डर के मारे सुकान्त रतिवेगा को साथ लेकर वन में चला गया। वहाँ सरोवर पर शक्तिषेण नाम का एक राजा ठहरा हुआ था। वे उसकी शरण में गये। पीछे से दुर्मुख भी उन्हें मारने के लिए वहीं आ पहुँचा। पर वहाँ जब उसका कुछ भी


दुर्मुखोऽनुगतस्तत्र बद्धवैरो वधूवरम्।
हन्तुं श्रीशक्तिषेणस्य नृपस्य निवृत्तो भयात् ॥१९८॥

शक्तिषेणं दद्दानं दृष्ट्वा संभाव्य भावनाम्।
वधूवरं सुखेनास्थाच्चारणाय सुभावतः ॥१९९॥

कदाचिद्भवदेवेन निर्दग्धं च वधूवरम्।
दुर्मुखाख्यः खलो ध्वस्तः कदाचित्तन्महाभटैः ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 195 से 200): वश न चला तब वह शक्तिषेण राजा के भय से वापस लौट आया। दैवयोग से इसी समय शक्तिषेण के डेरे पर चारण मुनि आहार के लिए आये और शक्तिषेण ने उन्हें शुद्ध भावों से आहार दिया तथा उनकी खूब पूजा-भक्ति की। यह देखकर वे दोनों दम्पती बहुत आनन्दित हुए और बारह भावनाओं का चिंतन करते हुए सुख से वहीं पर रहने लगे। इसके बाद मौका पाकर उन दोनों दम्पती को भवदेव ने आग लगाकर जला डाला और मौका मिलने पर शक्तिषेण के भटों ने उसे भी मार डाला ॥१९५-२००॥


अथात्र पुण्डरीकिण्यां प्रजापालो महीपतिः।
श्रेष्ठो कुबेरमित्राख्यस्तस्यासीद्राजवल्लभः ॥२०१॥

द्वात्रिंशद्धनवत्याद्याः प्रियास्तस्याभवन्वरः।
तद्गेहेऽभूद्रतिवरः कपोतस्तु सुकान्तकः ॥२०२॥

रतिवेगाचरी जाता रतिषेणा कपोतिका।
पारापतद्वयं तत्र तिष्ठत्तद्गृहसंभवात् ॥२०३॥

तण्डुलादींश्चरच्चित्रं सुखं भेजे भवार्थदम्।
कदाचिच्छ्रेष्ठिनो गेहे चारणद्वयमागमत् ॥२०४॥

आगतं तद्युगं वीक्ष्य दम्पती तौ मुदा हृदा।
तदास्थापयतां भावादाहारार्थं कृतोद्यमौ ॥२०५॥

कपोतमिथुनं तावज्जङ्घाचारणयोर्द्वयम्।
विलोक्य परिस्पृश्यात्र पक्षैस्तत्पदमानमत् ॥२०६॥

तद्दृष्टमात्रविज्ञातप्राग्भवं तत्समीपताम्।
प्राप्तं कपोतमिथुनं तद्दानं पूर्वजं स्मरत् ॥२०७॥

तत्र दानानुमोदेन समुपार्ज्य वृषं वरम्।
भिक्षायै तौ कपोतौ च ग्रामान्तरमुपागतौ ॥२०८॥

भवदेवचरेणानुबद्धवैरेण पापिना।
मार्जारिणोत्थकोपेन मारितौ तौ कदाचन ॥२०९॥

अर्थ (श्लोक 201 से 209): पूर्वविदेह की पुण्डरीकनी नगरी में-जिस समय का यह जिक्र है उस समय प्रजापाल राजा राज्य करता था और वहीं पर एक कुबेरमित्र नाम सेठ रहता था। सेठ पर राजा की पूरी कृपादृष्टि थी। सेठ की बत्तीस स्त्रियाँ थीं। उनमें धनवती मुख्य थी। सेठ के घर पर सुकान्त का जीव रतिवर नाम कबूतर और रतिवेगा का जीव रतिषेणा नाम उसकी कबूतरी हुई। वे दोनों सेठ के घर में बिखरे हुए चावलों को चुग कर सांसारिक विचित्र सुखों का अनुभव करते हुए सुख-चैन से अपना काल बिताते थे। एक समय सेठ के घर आहार के लिए दो चारण मुनि आये। उन्हें देखकर उन दम्पती का हृदय हर्ष से गद्गद् हो उठा और उन्होंने शुद्ध भावों से मुनि को आहार के लिए पड़गाहा तथा बड़ी भक्ति से आहार दिया। उस समय उन कबूतरों की दृष्टि भी उन मुनियों के ऊपर पड़ी। उन्होंने मुनियों के चरण-कमलों का दर्शन कर उन्हें नमस्कार किया। मुनियों को देखते ही उन दोनों को अपने पिछले भवों का स्मरण हो आया। उन्हें पहले भव के मुनि दान की याद हो आई, जो कि शक्तिषेण राजा ने दिया था। मुनियों के पास आकर उन्होंने मुनिदान की खूब अनुमोदना की और उसके प्रभाव से पुण्यबन्ध किया। एक दिन दाना चुगने के लिए वे कपोत-दम्पती किसी दूसरे गाँव गये हुए थे। वहाँ उनका शत्रु पापी भवदेव का जीव बिलाव हुआ था। वह इन्हें देखते ही क्रोध में आ मारकर खा गया ॥२०१-२०९॥


तद्देशविजयस्यार्धदक्षिणश्रेणिसंश्रिते । गान्धारविषये शीरवत्यभून्नगरी परा ॥२१०॥

तच्छास्तादित्यगत्याख्यस्तस्यासीच्च शशिप्रभा। सुदेवी तत्सुतः पारापतो हिरण्यवर्मकः ॥२११॥

अर्थ (श्लोक 210 से 211): वहीं विजयार्द्ध की दक्षिण श्रेणी में एक गांधार देश है। उसमें शीरवती नाम नगरी है। वहाँ का राजा आदित्यगति था। आदित्यगति की स्त्री का नाम शशिप्रभा था उसके गर्भ से वह कबूतर हिरण्यवर्मा नाम पुत्र हुआ ॥२१०-२११॥

तृतीयं पर्व (भाग 2/2)

तस्मिन्नेवोत्तरश्रेण्यां गौरीदेशेऽभवत्पुरे । राजा भोगपुरे वायुरथो विद्याधराधिपः ॥२१२॥

तस्य स्वयं प्रभा राज्ञ्या रतिषेणा प्रभावती। जाता यौवनसंक्रान्तां दृष्ट्वा कन्यां प्रभावतीम् ॥२१३॥

कस्मै देयेयमित्याख्यत्खगेशो मन्त्रिणस्तदा। सर्वे संमन्त्र्य मन्त्रीशाः स्वयंवरविधिं जगुः ॥२१४॥

आकारिताः क्षणात्खेटा अटिता मण्डपे परे। कन्यार्थिनस्तयाकस्माद्वव्रे न निमित्ततः ॥२१५॥

अर्थ (श्लोक 212 से 215): वहीं विजयार्द्ध की उत्तर श्रेणी में एक गौरी देश है। उसमें भोगपुर नाम नगर है। वहाँ का वायुरथ विद्याधर राजा था। उसकी रानी का नाम स्वयंप्रभा था। उसके गर्भ से वह रतिषेणा नाम कबूतरी प्रभावती नाम पुत्री हुई। एक दिन राजा ने देखा कि प्रभावती युवती हो गई हैं, उसका किसी योग्य वर के साथ ब्याह कर देना चाहिए। इस प्रश्न को हल करने के लिए उसने मंत्रियों को बुलाया और उनसे पूछा कि प्रभावती किसे देना चाहिए। सब मंत्रियों ने विचार करके कहा कि महाराज! सबकी सम्मति है कि स्वयंवर-विधि करनी चाहिए। राजा ने उनकी इस सम्मति को स्वीकार किया और उसके अनुसार कार्य आरम्भ कर दिया। देश-विदेश से विद्याधर राजा बुलाये गये और जो-जो कन्या के अर्थी थे वे सब आकर वहाँ उपस्थित हो गये। स्वयंवर के समय सब स्वयंवर मंडप में आकर अपने योग्य स्थानों पर बैठे। प्रभावती वरमाला ले पतिवरण को मंडप में आई, पर उसने किसी को भी न वरा-पसंद न किया ॥२१२-२१५॥


पितृभ्यां तत्समालोक्य सा पृष्टावीवदत्स्फुटम्। यो जयेद् गतियुद्धे मां मालां तस्य गले व्यधाम् ॥२१६॥

पुनः स्वयंवरारम्भे रभराभस्यरञ्जिता। सिद्धकूटजिनागारात्पुरो मालामपातयत् ॥२१७॥

त्रिःपरीत्य महामेरोरस्पृष्टां भूतलं खगाः। ग्रहीतुमक्षमास्तां हि त्रपायुक्ता गृहं ययुः ॥२१८॥

ततो हिरण्यवर्मागाद्गतिसंगरसंगवित्। निर्जिता तेन तत्कण्ठे मालामारोपयच्च सा ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 216 से 219): यह देख उसके माता-पिता ने उससे पूछा कि पुत्री यह क्या बात है ? कन्या ने उत्तर में कहा कि जो कोई मुझे गति-युद्ध में जीत लेगा मैं उसी के गले में वरमाला डालूँगी। इसके बाद दूसरे दिन फिर स्वयंवर हुआ। उस समय प्रभावती ने सिद्धकूट चैत्यालय के शिखर पर से माला नीचे को डाली। पर किसी ने भी वहाँ बने हुए मेरु की तीन प्रदक्षिणा देकर उस माला को बीच ही में न ले पाया। तब सब लज्जित हो अपने-अपने घर को चले गये। इसके बाद हिरण्यवर्मा आया। वह गतियुद्ध में बहुत ही प्रवीण था। उसने मेरु की तीन परिक्रमा देकर बीच ही में माला की हाथों में ले लिया। यह देख प्रभावती ने बड़ी खुशी से उसके कंठ में वरमाला पहना दी। इसके बाद


विवाहविधिना कन्यामुपयेमे खगात्मजः। सिद्धकूटालये प्राप्तकल्याणपरमोत्सवः ॥२२०॥

अर्थ (श्लोक 216 से 220): हिरण्यवर्मा ने सिद्धकूट चैत्यालय में जाकर भगवान् के स्तवन आदि कल्याणकारी उत्सव के साथ विधिपूर्वक प्रभावती का पाणिग्रहण किया ॥२१६-२२०॥


काले गच्छति कस्मिंश्चित्कपोतद्वयवीक्षणात्। ज्ञातप्राग्भवसंबन्धा विरक्ताभूत्प्रभावती ॥२२१॥

प्रभावत्या परिपृष्टः परमौषधिचारणः। स्वपूर्वभवसंबंधं श्रुत्वैतदाह योगिराट् ॥२२२॥

वधूवरादिसंबन्धं श्रुत्वा श्रीमुनिपुङ्गवात्। परस्परमहास्नेहावभूतां तौ खगीखगौ ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 221 से 223): इसके कुछ दिनों बाद एक दिन प्रभावती ने एक कबूतरों के जोड़े को उड़ते देखा। उसे देखते ही उसे अपने पिछले भवों की याद हो आई और उसके परिणाम विरक्त हो गये। उस समय प्रभावती ने एक चारण मुनि से पूछा कि प्रभो! मेरे पिछले भवों की कथा कहिए। मुनि ने उत्तर में पीछे लिखी हुई वधू-वर आदि की सभी कथा कह दी। उसे सुनकर प्रभावती और हिरण्यवर्मा में गाढ़ प्रीति उत्पन्न हो गई ॥२२१-२२३॥


अथादित्यगतिर्वीक्ष्य विशरारुं सुवारिदम्। राज्ये हिरण्यवर्माणं स्थापयित्वाग्रहीत्तपः ॥२२४॥

राज्यं प्राज्यं प्रकुर्वाणः खेचरश्चरणोज्ज्वलः। कुतश्चिद्विरतः स्वर्णवर्मणेऽदान्निजं पदम् ॥२२५॥

ततोऽवतीर्य भूभागं श्रीपुरं प्राप्य सद्गुरोः। श्रीपालात्संयमं लेभे विलुब्धो बुधसेवितः ॥२२६॥

तन्मात्रा गुणवत्यास्तु दीक्षां प्राप्ता प्रभावती। तन्वती तनुसंतापं तपसा श्रुतचेतसा ॥२२७॥

विहरन्तौ ततौ प्राप्तौ पुरीं च पुण्डरीकिणीम्। श्रेष्ठिवध्वा प्रभावत्यार्यिकाथ ददृशे क्वचित् ॥२२८॥

इयं केति तदा पृष्टा गणिनी प्रियदत्तया। मम चित्ते परा प्रीतिरस्या उपरि तत्कथम् ॥२२९॥

किं न स्मरसि कापोतयुगं तत्र भवद्गृहे। रतिषेणाहमित्येतच्छ्रुत्वा सा विस्मितावदत् ॥२३०॥

अर्थ (श्लोक 224 से 230): एक दिन आदित्यगति नष्ट होते हुए बादलों को देखकर विरक्त हो गया और हिरण्यवर्मा को राज्य देकर उसने जिनदीक्षा धारण कर ली। हिरण्यवर्मा ने बड़ी उत्तमता के साथ बहुत दिनों तक राज्य किया, परन्तु कुछ काल बाद किसी निमित्त को पा वह भी विरक्त हो गया। उसने अपने पुत्र स्वर्णवर्मा को राज्य देकर आप स्वयं पैदल श्रीपुर आ श्रीपाल नाम मुनि से दीक्षित हो गया। वह बड़ा निर्लोभी था, देवता-गण उसकी सेवा करते थे। अपने स्वामी को प्रव्रजित देख प्रभावती ने भी गुणवती नाम आर्यिका से जिनदीक्षा ले ली और कायक्लेश तप तथा शास्त्र-चिन्तन के द्वारा वह शरीर को सुखाने लगी। कुछ समय बाद हिरण्यवर्मा और प्रभावती दोनों ने वहाँ से विहार किया और विहार करते-करते वे पुंडरीकनी नगरी में आये। वहाँ प्रभावती को देखकर प्रियदत्ता सेठानी ने संघ की गणिनी से पूछा कि यह कौन है और इसके ऊपर जो मेरे हृदय में प्रबल स्नेह हो आया है इसका क्या कारण है ? यह सुनकर प्रभावती ने कहा कि क्या तुम्हें अपने घर में रहने वाले उस कपोत-युगल की याद नहीं है। मैं वही तो हूँ जी तुम्हारे घर में रतिषेणा नाम कबूतरी थी। यह सुनकर सेठानी बोली कि और वह रतिवर कहाँ है ? प्रभावती ने कहा कि वह भी मरकर विद्याधरों का ईश्वर हुआ था। अब मुनि होकर विहार करता हुआ यहीं आया है ॥२२४-२३०॥


क्वासौ रतिवरोऽद्येति सोऽपि विद्याधरेश्वरः।
मुनिर्हिरण्यवर्मात्रागतोऽस्तीति च सावदत् ॥२३१॥

प्रियदत्ता मुनिं नत्वा प्रभावत्युपदेशतः।
अदीक्षत क्षमापन्ना विरक्तेः फलमीदृशम् ॥२३२॥

मुनिर्हिरण्यवर्माथ कदाचिच्चितिभूतले।
अहानि सप्त संगीर्य समस्थात्प्रतिमास्थितः ॥२३३॥

दास्याश्च प्रियदत्तायास्तद्गिरेः प्राक्तनं भवम्।
स मार्जारचरोऽश्रौषीद्विद्युच्चौरः प्रदुष्टधीः ॥२३४॥

विभङ्गावधिना ज्ञात्वा प्रतिमायोगमास्थितम्।
तं च प्रभावतीं नीत्वा चितिकायां स चाक्षिपत् ॥२३५॥

तौ तत्राग्निसमुत्पन्नान्सोढ्वा शुद्धौ परीषहान्।
हित्वा प्राणांगतौ नाकं विकस्वरमुखाम्बुजौ ॥२३६॥

अर्थ (श्लोक 231 से 236): उसका नाम है हिरण्यवर्मा। प्रियदत्ता ने मुनि के पास जाकर उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वह भी प्रभावती के उपदेश से आर्यिका हो गई। वह बड़ी क्षमा गुण की धारक थी। सच है वैराग्य का फल ही ऐसा है। इसके बाद एक दिन हिरण्यवर्मा मुनि ने सात दिन के लिए मसान भूमि में ध्यान लगाया। इधर उस मार्जार के जीव दुष्ट-बुद्धि विद्युच्चोर ने प्रियदत्ता की दासी के मुँह से उन मुनिराज के पिछले भवों का हाल सुन रक्खा था। अतः विभंगावधि ज्ञान से उन्हें ध्यानस्थ जानकर वह वहाँ आया और उसने हिरण्यवर्मा तथा प्रभावती को एक साथ जलती हुई चिता में झोंक दिया। उस समय आग की कठिन परीषह को शुद्ध भावों से सहकर वे दोनों मरे और पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में देव हुए ॥२३१-२३६॥


स्वर्णवर्माथ तं ज्ञात्वा विद्युच्चोरस्य मारणम्।
करिष्यामीति तज्ज्ञात्वावधिबोधेन तौ सुरौ ॥२३७॥

रूपं संयमिनोर्लात्वागत्याबोधयतां सुतम्।
प्रदायाभरणं तस्मै दिव्यरूपौ गतौ दिवि ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 237 से 238): यह बात जब स्वर्णवर्मा के कान में पड़ी तब उसने विद्युच्चोर को मार डालने का निश्चय किया परन्तु अवधिज्ञान द्वारा स्वर्णवर्मा के इस विचार को जानकर मुनि का रूप बना वे दोनों देव आये और उन्होंने पुत्र को समझा-बुझा कर शांत कर दिया। इसके बाद दिव्यरूप धारी स्वर्णवर्मा को दिव्य वस्त्र-आभूषण वगैरह भेंट कर वे स्वर्ग को चले गये ॥२३७-२३८॥


लोकयन्तौ ततो लोकान्स्वर्गिणौ भीमयोगिनम्।
वीक्ष्य प्राष्टां च तौ धर्मं शर्मधर्मार्थसाधनम् ॥२३९॥

धर्मो जीवदयाः धर्मः सत्यवाक् संयमस्थितिः।
धर्मस्तद्वचनं श्रुत्वा मुनिरित्येवमब्रवीत् ॥२४०॥

हेतुना केन सद्दीक्षा गृहीता वद वेदवित्।
सोऽवोचत्पुण्डरीकिण्यां भीमोऽहं दुर्गते कुले ॥२४१॥

अर्थ (श्लोक 239 से 241): एक दिन उन देवों ने भीम महामुनि को देखकर, उन्हें नमस्कार कर उनसे धर्म का उपदेश सुना। मुनि ने कहा कि यह धर्म दया, सत्य और संयम-मय है। इससे जीवों का कल्याण होता है और उन्हें इससे मन चाहे पदार्थों की प्राप्ति होती है। इस पर देव ने कहा कि हे वेद के ज्ञाता! यह कहिए कि आपके दीक्षित हो जाने में क्या कारण है। इसके उत्तर में मुनि ने कहा कि मैं पुण्डरीकनी नगरी में एक दरिद्र कुल में पैदा हुआ था। मेरा नाम भीम है। एक समय मौका पाकर मैंने एक मुनिराज से आठ मूलगुणों और व्रतों को ग्रहण किया तथा घर जाकर यह सब हाल पिताजी को कह सुनाया। वे मुझसे बहुत ही नाराज हुए। उन्होंने मुझे बहुत कुछ समझाया, पर मैंने उनकी एक बात न मानी क्योंकि मुझे जातिस्मरण द्वारा अपने पिछले भव मालूम हो चुके थे। मैं विरक्त हो दीक्षित हो गया-


एकदा मुनितो मत्वा वृषं मूलगुणाष्टकम्।
व्रतं चाग्रहिषं पित्रे कथितं तन्मयाखिलम् ॥२४२॥

श्रुत्वा पिता क्रुधाक्रान्तो बोधितो बहुहेतुना।
दिदीक्षे च मया क्षिप्रं जातजातिस्मरात्मना ॥२४३॥

अहं पूर्वभवेऽभूवं भवदेवो वणिक्सुतः।
बद्धवैरो निहन्तारं रतिवेगसुकान्तयोः ॥२४४॥

पारापतभवेऽप्याखुभुजा तद्युगलं हतम्।
विद्युच्चौरत्वमासाद्य हतौ तौ खगदम्पती ॥२४५॥

तदघोदयविघ्नात्मा निरये दुःखपूरिते।
अपतं तन्महादुःखं पापात्किं न जायते ॥२४६॥

ततोऽहं निर्गतो भीमो भीमोऽभूवं भवं भ्रमन्।
श्रुत्वा सुरौ कथां तस्य प्रबुद्धौ शुद्धमानसौ ॥२४७॥

अर्थ (श्लोक 239 से 247): दिगम्बर साधु बन गया। मैं, अपने पहले भव में भवदेव नाम वैश्य-पुत्र था। इस भव में मैंने वैर-विरोध के कारण रतिवेग और सुकान्त को मार डाला था। इसके बाद मरकर जब वे कबूतर हुए तब मैं मार्जार हुआ और मार्जार के भव में भी मैंने उन्हें मार खाया। इसके बाद वे हिरण्यवर्मा और प्रभावती हुए तथा मैं विद्युच्चोर हुआ। इस बार भी मैंने उन्हें जलती हुई आग में डाल कर जला डाला था। उस पाप महापाप के कारण मैं दुखों के स्थान नरक में जा पड़ा और वहाँ मुझे बड़े भारी दुख भोगने पड़े। सच है पाप से जीवों को सभी दुख सहने पड़ते हैं। नरक से निकल कर मुझे संसार में जो चक्कर लगाना पड़ा है उसके भय से मेरा आत्मा अब भी अत्यन्त भयभीत हो रहा है। इस विचित्र कथा को सुन उन देवों को सब बातों का ज्ञान हो गया। वे संसार को बहुत ही बुरा समझने लगे। इसके बाद राग-रंग में मस्त और साता-वेदनीय-रूप सागर में गोते लगाने वाले वे देव स्वर्ग को चले गये ॥२३९-२४७॥


गतौ तौ त्रिदशावासे सातसागरसाधकौ।
देवदेवीसमासङ्गरङ्गगाढाङ्गसंगतौ ॥२४८॥

अथासौ पुण्डरीकिण्यां भीमो भयविमुक्तधीः।
भावयन्भावनां भव्यो भवभ्रमणभीतधीः ॥२४९॥

अधःकरणसत्कृत्या प्रापूर्वकरणोद्यतः।
कृत्वानिवृत्तिकरणं कृन्तति स्म स्वकिल्बिषम् ॥२५०॥

क्षायिकं दर्शनं लब्ध्वा चारित्रं क्षायिकं पुनः।
विघ्नौघघनसद्वायुर्घातिसंघातघातकृत् ॥२५१॥

लब्ध्वा केवलसञ्ज्ञानमघातिक्षयतोऽगमत्।
भीमो भीतिविमुक्तात्मा मोक्षं सौख्यमयं परम् ॥२५२॥

अर्थ (श्लोक 248 से 252): उनके चले जाने बाद निर्भय, परन्तु फिर भी संसार से भयभीत भीम महामुनि ने बारह भावनाओं का चिन्तन कर और अधःकरण, अपूर्वकरण तथा अनिवृत्तिकरण परिणामों के द्वारा पाप-कर्मों को हल्का कर क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायिक-चारित्र प्राप्त किया एवं विघ्न बाधा-रूप मेघों को उड़ाने के लिए वायु के समान और घाति-कर्मों के घातक उन महामुनि ने केवलज्ञान प्राप्त कर तथा कुछ समय बाद अघाति कर्मों की भी घात कर वे मोक्ष के अनंत सुख के भोक्ता हो गये ॥२४८-२५२॥


आवामपि तदा नाथ वन्दनायै गतौ लघु।
इदं श्रुत्वा गतौ वीक्ष्य त्रिदिवं त्रिदशाञ्चितम् ॥२५३॥

आवां ततः समुत्पन्नौ भारते भरताग्रणीः।
सोमात्मजो भवाञ्जज्ञे जयो जयविराजितः ॥२५४॥

अर्थ (श्लोक 253 से 254): यहाँ सुलोचना जयकुमार को याद दिलाती है कि हे नाथ! उस समय हम भी उन महामुनि की वन्दना को गये थे और वन्दना कर वापस स्वर्ग को चले गये थे। इसके बाद स्वर्ग से चयकर हम लोग इस भरत क्षेत्र में पैदा हुए हैं। आप भरत चक्रवर्ती के सेनापति और सोमप्रभ राजा के पुत्र हुए,


अकम्पितः कृपोपेतः कम्पितारातिमण्डलः ।
कम्प्रः कम्पं परं प्रीत्या हापयन्भात्यकम्पनः ॥२५५॥

तत उत्पत्तिमात्मीयां प्रतीही परमेश्वर।
भवान्प्रभावतीं खेटामुक्त्वा मूर्च्छामुपागतः ॥२५६॥

पारापतभवोत्पन्नं रतिवेगं स्वपक्षिणम्।
स्मृत्वा चोक्त्वा गता मूर्च्छामहं हृच्छिदाविदा ॥२५७॥

एवं क्रीडाकरौ कम्प्रौ व्रीडावारविराजितौ।
दम्पतित्वमितावावां जातौ जातिस्मरान्वितौ ॥२५८॥

इहागताविति व्यक्तं सा प्रोवाच सुलोचना।
जयोऽतुषत्प्रियावाक्यात्कः स्त्रीवाचा न तुष्यति ॥२५९॥

एवं सुखेन भुञ्जानौ भोगं कालं विनिन्यतुः।
विद्याधरभवावाप्तनानाविद्यासमाश्रितौ ॥२६०॥

अर्थ (श्लोक 253 से 260): एवं जयलक्ष्मी के भी पति हुए और मैं महाराज अकंपन की पुत्री हुई, जिनके भय से शत्रु लोग काँपते हैं, जो परम दयालु हैं, सुन्दर रूप वाले हैं तथा जो दूसरों से नष्ट न होने वाले प्रजा के कष्टों को प्रीति से दूर करने वाले हैं। नाथ! यही कारण है कि आज कबूतरों के जोड़े को देखकर आप तो ‘हा प्रभावती’ कहकर मूर्छित हो गये और मैं उसी भव के अपने स्वामी रतिवेग को याद कर ‘हा रतिवेग’ कह मूर्छित हो गई। इस प्रकार यहाँ हम क्रीड़ा करने वाले सुन्दर और लज्जाशील दम्पती हुए है और निमित्त पाकर इस समय हमें जाति-स्मरण भी हो गया है।’ इस प्रकार सुलोचना ने पूर्व भव की सब बातें कह सुनाई, जिन्हें सुनकर जयकुमार को बड़ा सन्तोष हुआ। सच है स्त्री के वचनों से कौन प्रसन्न नहीं होता। इसके बाद वे मन चाहे भोगों को भोगते हुए सुख-चैन से काल बिताने लगे। इनके पास विद्याधर के भव में प्राप्त की हुई बहुत-सी विद्यायें थीं, जिनके प्रभाव से वे मेरु और कुलाचलों पर जहाँ चाहते जाकर क्रीड़ा करते थे और सांसारिक सुखों का स्वाद लेते थे ॥२५३-२६०॥


विद्याप्रभावतस्तौ द्वौ मेरौ च कुलपर्वते।
विहरन्तौ सुभेजाते सातं संसारसारजम् ॥२६१॥


कैलासशैलजे रम्ये वने मेघस्वरो गतः।
तदा सुलोचनाभ्यर्णादसौ किंचिदपासतत ॥२६२॥

तदेन्द्रेण सभामध्ये जयस्य शीलशंसनम्।
तत्प्रियायाश्च संचक्रे तच्छुश्राव रविप्रभः ॥२६३॥

असहिष्णुः सुरो देवीं काञ्चनाख्यामजीगमत्।
सा तं प्राप्य समाचख्यौ क्षेत्रेऽस्मिन्भारते वरे ॥२६४॥

विजयार्द्धोत्तरश्रेण्यां पुरे रत्नपुरेऽप्यभूत्।
राजा पिङ्गलगन्धारो भामिनी तस्य सुप्रभा ॥२६५॥

अर्थ (श्लोक 262 से 265): एक बार जयकुमार क्रीड़ा के लिए कैलाश पर्वत के मनोहर वन में गये और वहाँ सुलोचना को एक स्थान पर छोड़कर स्वयं कुछ दूर निकल गये। दैवयोग से इसी समय इन्द्र ने अपनी सभा में जयकुमार के शीलव्रत की बड़ी बड़ाई की और सुलोचना के पातिव्रत्य को सराहा। इन्द्र के द्वारा की गई उनकी वह प्रशंसा रविप्रभ नाम एक देव से न सही गई और उसने उसी समय कांचना नाम की एक अप्सरा की जय के पास भेजा। वह जय के पास आकर कहने लगी-इसी भरतक्षेत्र के विजयार्द्ध की उत्तर श्रेणी में एक रत्नपुर नाम नगर है। वहाँ का राजा पिंगलगंधार है। उसकी रानी का नाम सुप्रभा है और पुत्री का नाम विद्युत्प्रभा है। मैं वही विद्युत्प्रभा हूँ। मेरा ब्याह राजा नमि के साथ में हुआ था। एक दिन मैंने पुण्ययोग से मेरु के नन्दन वन में आपको क्रीड़ा करते हुए देखा। तभी से मैं आपके लिए बहुत उत्सुक हूँ। मेरे चित्त पर आपका चित्र खिच गया है। दुर्भाग्य से इतने दिनों


विद्युत्प्रभा तयोःपुत्री नमेर्भार्याभवं पुनः।
त्वां मेरुनन्दने वीक्ष्य क्रीडन्तं सोत्सुकाप्यहम् ॥२६६॥

अर्थ (श्लोक 261 से 266): तक आपके दर्शन का मौका न मिला। पुण्य के उदय से आज फिर आपके दर्शन हो गये। अतः हे जय! मुझे स्वीकार कर मेरे साथ मनचाहे सुख भोगो॥२६१-२६६॥


ततः प्रभृति मच्चित्ते त्वमभूर्लिखिताकृतिः।
दैवतस्त्वं च दृष्टोऽसि मां धारय सुखाप्तये ॥२६७॥

तद्दुष्टचेष्टितं दृष्ट्वा मा मंस्थाः पापमीदृशम्।
पराङ्गनापरित्यागव्रतं स्वीकृतवानहम् ॥२६८॥

निर्भत्सिता महीशेन साभूत्कोपनकम्पिता।
उपात्तराक्षसीवेषा तं समुद्धृत्य गत्वरी ॥२६९॥

पुष्पावचयसंसक्तसुलोचनाभितर्जिता।
भीता सा काञ्चना तस्याः शीलमाहात्म्यतो गता ॥२७०॥

अदृश्यतां सुराः शीलवत्या यान्ति भयं ननु।
गत्वा सा स्वामिनं नत्वा चक्रे तच्छीलशंसनम् ॥२७१॥

अर्थ (श्लोक 267 से 271): विद्युत्प्रभा की इस प्रकार दुष्ट चेष्टा देखकर जय ने कहा कि तुम ऐसा पाप मत विचारो, मैं परस्त्री का त्यागी हूँ। तुम यहाँ से अभी चली जाओ। इस प्रकार जय ने उसे खूब डाटा-डपटा। यह देख विद्युत्प्रभा को बड़ा क्रोध आया। वह राक्षसी का रूप बना जय पर उपद्रव करने लगी परन्तु उस दुष्टा का जब जय पर कुछ वश न चला तब वह वहाँ से भाग कर सुलोचना के पास पहुँची। सुलोचना ने भी उसे खूब फटकारा। अन्त में वह उसके शील के माहात्म्य से डरकर क्षणभर में अदृश्य हो गई। देखा, शील-व्रतधारियों से देव भी डरते हैं। स्वर्ग में जाकर उसने स्वामी को नमस्कार किया और जयकुमार तथा सुलोचना के शील की बड़ी प्रशंसा की॥२६७-२७१॥


रविप्रभः समागत्य विस्मयान्नावुभौ नतः।
समाख्याय स्ववृत्तान्तं युवाभ्यां क्षम्यतामिति ॥२७२॥

अर्थ: सुनकर रविप्रभ को बड़ा आश्चर्य हुआ। इसके बाद उसने स्वयं आकर बड़े विनय से उन दम्पती को नमस्कार किया और उन्हें अपना सारा हाल कह सुनाया और कहा कि आपका मैं अपराधी हूँ। आप मुझे क्षमा करें। इसके बाद वह उन दम्पती को रत्नाभरण और दिव्यवस्त्र भेंट कर स्वर्ग को चला गया। इधर जयकुमार भी अपनी कान्ता के साथ-साथ नगर को चले आये॥२७२॥


संपूज्य वस्त्रसद्रत्नैः स्वर्गलोकं समासदत्।
विहृत्य कान्तारण्ये पुरं निवृत्य सोऽगमत् ॥२७३॥

बभूव नमितानेकनृपवृन्दो महोदयः।
अन्यदा स समुत्पन्नबोधिर्मेघस्वरो नृपः ॥२७४॥

आदिनाथं समासाद्य वन्दित्वा श्रुतवान्वृषम्।
विरक्तो भवभोगेष्वनन्तवीर्यं सुतं धृतम् ॥२७५॥

शिवंकरमहादेव्या अभ्यषिञ्चन्निजे पदे।
सर्वसंगं परित्यज्य संयमं बहुभिर्नृपैः ॥२७६॥

अर्थ (श्लोक 273 से 276): एक बार अनेक राजाओं द्वारा सेवित जयकुमार का संसार की विचित्र गति पर ध्यान गया, संसार की अनित्यता का उनकी बुद्धि पर चित्र खिच गया। उन्होंने आदिनाथ प्रभु के पास जाकर ध्यानपूर्वक धर्म का उपदेश सुना तथा संसार-देह-भोगों से विरक्त होकर शिवंकर महादेवी के साथ-साथ अपने अनंतवीर्य नाम पुत्र का राज्याभिषेक कर उन्हें अपने पद पर बैठाया और स्वयं सब परिग्रह को छोड़कर बहुत से राजाओं के साथ-साथ दिगम्बर हो गये। इसके बाद थोड़े ही दिनों में सात ऋद्धियाँ तथा मनःपर्ययज्ञान लाभ कर वे आदिनाथ भगवान् के इकहत्तरवें गणधर हुए। क्रम से घातिकर्मों के नाश से उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हो गया॥२७३-२७६॥


अग्रहीत्सिद्धसप्तर्द्धिंश्चतुर्ज्ञानविराजितः । अभूद्गणधरो भर्तुरेकसप्ततिसंख्यिकः ॥२७७॥

सुलोचना वियोगार्ता विरक्ता च सुभद्रया। चक्रिपत्न्या समं ब्राह्मीसमीपे व्रतमग्रहीत् ॥२७८॥

अर्थ (श्लोक 277 से 278): इधर पति-वियोग से पीड़ित सुलोचना ने भी विरक्त होकर सुभद्रा नाम भरत की पत्नी के साथ-साथ ब्राह्मी आर्या के पास आर्यिका के व्रत ग्रहण कर लिये और तप कर वह अच्युत स्वर्ग के अनुत्तर विमान में देव हो गई ॥२७७-२७८॥


कृत्वा तपो विमानेऽनुत्तरेऽभूत्साच्युतेऽमरः। ततः श्रीवृषभश्रेष्ठो विहृत्य निवृतोऽखिलान् ॥२७९॥

धर्मोपदेशदानेन सिञ्चन्भव्यजनावलीम्। कैलासशिखरं प्राप्य चतुर्दशदिनानि वै ॥२८०॥

मुक्तसंगसमायोगो निरस्ताखिलयोगकः। माघकृष्णचतुर्दश्यां भगवान्भास्करोदये ॥२८१॥

पल्यङ्कासनसंरूढप्राङ्मुखः क्षिप्तकल्मषः। शरीरत्रितयापाये जगाम पदमव्ययम् ॥२८२॥

तदा सुरासुराः सर्वे निर्वाणपरमोत्सवम्। चक्रुः सुकृतकर्माणि कुर्वन्तः सिद्धिसिद्धये ॥२८३॥

अर्थ (श्लोक 279 से 283): इसके बाद ऋषभप्रभु ने सम्पूर्ण देशों में विहार कर धर्म का उपदेश किया और धीरे-धीरे सब जगह की भव्यजन-रूप वनश्रेणी को सींचकर कैलाश पर्वत पर पहुँचे। वहाँ प्रभु ने चौदह दिन तक मुक्ति का कारण योग धारण कर योगनिरोध किया और माघवदी चौदस को प्रातःकाल, पूर्व मुख कर निष्पाप आदिप्रभु पद्मासन से औदारिक शरीर छोड़कर अव्यय मोक्षपद को प्राप्त हो गये। उस समय सब सुर-असुरों ने आकर प्रभु का निर्वाण महोत्सव मनाया और सिद्धि लाभ की इच्छा से पुण्य-बंध किया। इसके बाद जय भी अघाति कर्मों का नाश कर कल्याण-मय मोक्ष-अवस्था के भोक्ता हो गये ॥२७९-२८३॥


जयोऽपि प्राप्तकैवल्यबोधनो घातियातनात्। अघातिक्षयतः प्राप शिवस्थानं शिवोन्नतम् ॥२८४॥

जयो जयतु जित्वरो जगति जैनशास्त्रार्थवित् घनाघनसमः सदा सकलवैरदावानले।
मनोमलविशोधनो विपुलशुद्धिसंपादकः। सुकौरवशिरोमणिः सुभगभव्यवारस्तुतः ॥२८५॥

इति वृषभजिनेशे प्राप्तनिर्वाणदेशे सुघटितसुघटार्थे प्रोद्धृतप्राणिसार्थे।
भरतभवनभोगी शुद्धसंवेगयोगी भरतनरपपालो यातु मोक्षं दयालुः ॥२८६॥

अर्थ (श्लोक 284 से 286): उन जय की जय हो जो संसार के विजेता और सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता हैं, शत्रु-रूप आग को बुझाने के लिए मेघ हैं, मनोमल को शोधने वाले और विपुल शुद्धि के सम्पादक हैं तथा जो कौरवों के शिरोमणि हैं और सब भव्य-जन जिन की स्तुति करते हैं। इस प्रकार तत्त्वों के स्वरूप को बताकर और अनन्त जीवों को संसार से पार कर भगवान् आदिनाथ निर्वाण को चले गये। अब भवभोगी और शुद्ध संवेगयोगी दयालु भरत महाराज मोक्ष-अवस्था लाभ करें ॥२८४-२८६॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचंद्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में जयकुमार सुलोचना की कथा वर्णन करने वाला तीसरा पर्व समाप्त हुआ ॥३॥

चतुर्थ पर्व (भाग 1/2)

प्रथमं पृथुजीवानां प्रथमानमहोदयम्।
प्रथमं पृथुतां प्राप्तं पप्रथे तद्गुणैर्जिनम् ॥१॥

अर्थ: उन आदिनाथ प्रभु के गुणों का मैं स्मरण करता हूँ जो पुराणपुरुषों में उत्तम है, जिनका अभ्युदय संसार-प्रसिद्ध है और जो उत्तम अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं ॥१॥


अथ जज्ञे क्रमाद्राजानन्तवीर्यात्कुरुर्महान्।
कुरुवंशनभश्चन्द्रः कुरुचन्द्रस्ततोऽजनि ॥२॥

तस्माच्छुभंकरः श्रीमान्धृतिकारी धृतिकरः।
एवं नृपेष्वतीतेषु बहुसंख्येष्वनुक्रमात् ॥३॥

धृतदेवस्ततो जज्ञे गङ्गदेवो गुणाकरः।
धृतिमित्रादयश्चान्ये राजानो बहवोऽभवन् ॥४॥

धृतिक्षेमोऽक्षयीख्यातः सुव्रतश्च ततः परः।
व्रातमन्दरनामाथ श्रीचन्द्रः कुलचन्द्रमाः ॥५॥

सुप्रतिष्ठादयो भूपा बहवः स्वर्गगामिनः।
भ्रमघोषस्ततो जज्ञे हरिघोषो हरिध्वजः ॥६॥

रविघोषो महावीर्य्यः पृथ्वीनाथः परः पृथुः।
गजवाहनभूपाद्या व्यतीयुः शतशो नृपाः ॥७॥

विजयाख्योऽभवत्तस्मात्सनत्कुमारभूपतिः।
सुकुमारस्ततो जातस्तस्माद्वीरकुमारकः ॥८॥

विश्वो वैश्वानरस्तस्माद्विश्वध्वजो महीपतिः।
बृहत्केतुः सुकेतुत्वं गतो नृपतिसंहतौ ॥९॥

अथ श्रीविश्वसेनस्य सुतः शान्तिजिनो महान्।
चरितं तस्य संक्षिप्य वक्ष्ये क्षेमंकरं सताम् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 2 से 10): जय के बाद आकाश में चन्द्रमा की भाँति कुरुवंश में अनन्तवीर्य राजा हुआ। इसके बाद कुरुचंद्र, शुभंकर, धीरवीर धृतिकर, धृतिदेव और गुणों का पुंज गुणदेव राजा हुआ। इनके बाद धृतिमित्र आदि और-और बहुत से राजाओं ने अपने जन्म से कुरुवंश को अलंकृत किया। बाद सुप्रतिष्ठ आदि कई एक स्वर्गगामी पुण्यवान् राजा हुए। अनंतर भ्रमघोष, हरिघोष, हरिध्वज, रविघोष, महावीर्य, पृथ्वीनाथ पृथु, गजवाहन आदि सैकड़ों राजाओं के हो चुकने पर विजय नरेश हुए। यह संसार-प्रसिद्ध और जयश्री के पति थे। इनके बाद सनत्कुमार, सुकुमार, वीरकुमार, विश्व, वैश्वनर, विश्वध्वज और ध्वजा के जैसा वृहत्केतु आदि बहुत से कर्मवीर राजाओं ने इस वंश में जन्म लिया। बाद विश्वसेन महाराज ने इस वंश का मुख उज्ज्वल किया। इन्हीं के यहाँ परमपूज्य सोलहवें तीर्थंकर श्रीशान्तिनाथ भगवान् का जन्म हुआ है। अब थोड़े में श्री शान्तिनाथ प्रभु का चरित लिखा जाता है। यह सत्पुरुषों को सच्चा मार्ग सुझाने वाला और परम पवित्र है। उसे सुनिए ॥२-१०॥


मध्ये भरतमाभाति विजयार्धो महाचलः।
तदवाच्यां पुरं श्रेण्यां रथनूपुरसंज्ञकम् ॥११॥

ज्वलनादिजटी तस्य पतिर्विद्याधराग्रणीः।
वायुवेगाभवत्तस्य वायुवेगा सुभामिनी ॥१२॥

अर्ककीर्तिस्तयोः सूनुः स्वकीर्त्या व्याप्तविष्टपः।
स्वयंप्रभा सुता चासील्लक्ष्मीरिव सुशोभया ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 11 से 13): भरतक्षेत्र के बीच में एक विजयार्द्ध पर्वत है। इसकी दक्षिण श्रेणी में रथनूपुर नगर है। वहाँ का राजा ज्वलनजटी था। वह विद्याधरों का अगुआ और सब गुण-सम्पन्न था। उसकी रानी का नाम वायुवेगा था। वह वायु के वेग की तरह चंचल और सुन्दरी थी। ज्वलनजटी और वायुवेगा के एक पुत्र था। उसका नाम अर्ककीर्ति था। वह भी संसार-प्रसिद्ध था-उसकी कीर्ति सारे संसार में व्याप्त थी तथा इनके स्वयंप्रभा नामक एक पुत्री भी थी जो अपनी शोभा से लक्ष्मी की बराबरी करती थी ॥११-१३॥


अथान्येद्युर्जगन्नन्दनाभिनन्दनयोगिनौ । मनोहरवने ज्ञात्वा स्थितौ स वन्दितुं गतः ॥१४॥

वन्दित्वा धर्ममाकर्ण्य सम्यग्दर्शनमाददे । चारणौ स पुनर्नत्वा प्रत्येत्य प्राविशत्पुरम् ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 14 से 15): एक दिन राजा को खबर लगी कि वन में जगन्नंदन और अभिनंदन नाम दो मुनीश्वर आये हैं। खबर पाते ही वह उनकी वन्दना के लिए वन में गया। वहाँ पहुँच कर उसने मुनीश्वरों की वन्दना की और उनसे धर्म का उपदेश सुना तथा सम्यग्दर्शन ग्रहण किया। उसके साथ स्वयंप्रभा ने भी धर्म धारण किया। इसके बाद ज्वलनजटी मुनीश्वरों को नमस्कार कर नगर को वापस लौट आया ॥१४-१५॥


स्वयंप्रभा समादाय धर्मं तत्रैकदा मुदा । पर्वोपवासिनी क्षीणा जिनानभ्यर्च्य भक्तितः ॥१६॥

तत्पादद्वन्द्वसंश्लिष्टपुष्पशेषां समर्पयत् । पित्रे स तां समावीक्ष्य यौवनोन्नतिशालिनीम् ॥१७॥

कस्मै देया सुचिन्त्येति प्राह्वयन्मन्त्रिणोऽखिलान् । प्रस्तुतार्थे नृपेणोक्ते सुश्रुतः प्राह सुश्रुती । १८॥

अर्थ (श्लोक 16 से 18): इसके बाद एक बार पर्व के दिनों में स्वयंप्रभा ने बड़े आनन्द के साथ उपवास किया। यद्यपि उपवास से उसका शरीर कृश हो गया था तो भी उसकी शोभा अपूर्व थी। स्वयंप्रभा ने जिनेन्द्र देव की बड़ी भक्ति से पूजा की और उनके चरण कमलों की शेषा लाकर अपने पिता को प्रदान की। पिता ने उसे भक्ति के साथ मस्तक पर चढ़ाया। उस समय स्वयंप्रभा के पिता ज्वलनजटी ने देखा कि अब कन्या युवती हो गई है, इसका किसी उत्तम वर के साथ विवाह कर देना योग्य है। इसके बाद ही उसके मन में प्रश्न उठा कि स्वयंप्रभा जैसी सुन्दरी कन्या किसे दी जानी चाहिए। इस प्रश्न को जब वह स्वयं हल न कर सका तब उसने अपने मंत्रिवर्ग को बुलाया और उनसे कन्या देने के सम्बन्ध में सलाह पूछी। इस पर शास्त्रज्ञ सुश्रुत नाम मंत्री ने कहा ॥१६-१८॥


अथोत्तरमहाश्रेण्यामलकापुरि भूपतिः । बर्हिग्रीवः प्रिया नीलाञ्जना तस्य तयोः सुताः ॥१९॥

अश्वग्रीवो नीलकण्ठो वज्रकण्ठो महाबलः । अश्वग्रीवस्य कनकचित्रादेवी तयोः सुताः ॥२०॥

शतानि पञ्च परमा मन्यस्य हरिमश्रुकः । शतबिन्दुनिमित्तज्ञस्त्रिखण्डभरतेशितुः ॥२१॥

तस्मै संपूर्णराज्याय कन्या देया सुखाप्तये । सुश्रुतोक्तं श्रुतं श्रुत्वा बभाषे च बहुश्रुतः ॥२२॥

अर्थ (श्लोक 19 से 22): महाराज ! इसी विजयार्द्ध की उत्तर श्रेणी में एक अलकापुरी नाम नगरी है। वहाँ का राजा मयूरग्रीव है। उसकी रानी का नाम नीलांजना है। उनके कई एक पुत्र हैं। वे सब महान् बली हैं। उनके नाम अश्वग्रीव, नीलकंठ और वज्रकंठ इत्यादि हैं। अश्वग्रीव की स्त्री का नाम कनकचित्रा है। अश्वग्रीव और कनकचित्रा के पाँच सौ पुत्र हैं। अश्वग्रीव का हरिमश्रुक नाम मंत्री और शतबिन्दु नामक निमित्तक है। वह तीन खण्ड पृथ्वी का स्वामी है। मेरी सम्मति है कि आप अश्वग्रीव जैसे विस्तृत राज्य वाले राजा को कन्या दें, तो कन्या को सुख होगा और आपको भी शान्ति मिलेगी। सुश्रुत की बातों को सुनकर बहुश्रुत नाम मंत्री ने कहा ॥१९-२२॥


युक्तमुक्तं पुनः किंत्वश्वग्रीवश्च वयोऽधिकः । तस्मै दत्ता सुता नित्यं यतः स्याद्भोगवर्जिता ॥२३॥

अर्थ: तुम्हारा कहना ठीक हैं परन्तु अश्वग्रीव की अवस्था अधिक है, अतएव यदि उसे कन्या दी जायेगी तो सम्भव है कि वह भोगों से वंचित रह जाये अर्थात् हमेशा सौभाग्यवती न रहे-वैधव्य जैसे


तदुक्तम् -
आभिजात्यमरोगित्वं वयः शीलं श्रुतं वपुः।
लक्ष्मीः पक्षः परीवारो वरे नव गुणाः स्मृताः ॥२४॥

ततोऽन्यं वरमन्विष्य कथयामि नराधिप।
येन स्पष्टसुदृष्टेन शिष्टास्तिष्ठन्ति पुष्टये ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 23 से 25): महान् संकट में पड़ जाय। देखो! वर में ये नौ गुण तो अवश्य ही होने चाहिए। उच्च जाति, नीरोगता, योग्य आयु, शील, शास्त्र का ज्ञान, सुन्दर सुडौल शरीर, धन-दौलत, पक्ष और कुटुम्ब। अश्वग्रीव में इनमें की बहुत-सी बातें नहीं है, इसलिए यह स्वयंप्रभा के योग्य नहीं है। दूसरा और कोई वर खोजा जाना चाहिए। कारण, स्पष्ट देख-भालकर ही सत्पुरुष सन्तुष्ट होते हैं और अपनी कन्या प्रदान करते है ॥२३-२५॥


पुरे खवल्लभे सिंहरथो मेघपुरे नृपः।
कुशेशयरथश्चित्रपुरेऽरिंजयभूपतिः ॥२६॥

अश्वद्रङ्गे हेमरथो रत्नपुरे धनंजयः।
एतेष्वन्यतमायेयं देया कन्या शुभावहा ॥२७॥

श्रुत्वा वचः शुभं तस्य प्रोवाच श्रुतसागरः।
कन्यावरो वरः कश्चित्कथ्यते श्रूयतां लघु ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 26 से 28): सुश्रुत ने फिर कहा कि महाराज! और देखिए, गगनवल्लभ पुर में सिंहरथ, मेघपुर में पद्मरथ, चित्रपुर में अरिंजय, अश्वपुर में हेमरथ, रत्नपुर में धनंजय इत्यादि बहुत से राजा है। इनमें से जो आपकी पसंद पड़े उसे पुण्यवती और सौभाग्यशालिनी प्रभावती को दीजिए। यह सुनकर श्रुतसागर नाम मंत्री ने कहा कि महाराज! स्वयंप्रभा के योग्य घर मैं बताता हूँ, सुनिए ॥२६-२८॥


द्रङ्गे सुरेन्द्रकान्तारे उदक्श्रेणिनिवासिनि।
मेघवाहनभूपस्य प्रियासीन्मेघमालिनी ॥२९॥

विद्युत्प्रभस्तयोः पुत्रो ज्योतिर्माला परा सुता।
सिद्धकूटं गतो मेघवाहनस्तत्र दृष्टवान् ॥३०॥

चारणं वरधर्माख्यं नत्वा स श्रुतवान्वृषम्।
स्वसूनोः प्राक्तने पृष्टे भवे प्रोवाच चारणः ॥३१॥

प्राग्विदेहेऽस्ति विषयो द्वीपेऽत्र वत्सकावती।
प्रभाकरी पुरी राज्ञो नन्दनस्य च नन्दनः ॥३२॥

वीरो विजयभद्राख्यो जयसेनास्य वल्लभा।
अन्यदा स पतद्वीक्ष्य फलं च विपिने गतः ॥३३॥

वैराग्यं स्वं गुरुं प्राप्य पिहितास्रवसंज्ञकम्।
चतुःसहस्रभूपालैः संयमं संयमी ययौ ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 29 से 34): इसी विजयार्द्ध की उत्तर श्रेणी में सुरेन्द्रकान्त नगर है। वहाँ के राजा का नाम मेघवाहन है। उसकी रानी का नाम मेघमालिनी है। उनके विद्युत्प्रभ नाम पुत्र और ज्योतिर्माला नाम एक कन्या है। एक दिन मेघवाहन सिद्धकूट चैत्यालय गया और वहाँ उसने एक चारण मुनि को देखा। उनका नाम वरधर्म था। उन्हें नमस्कार कर उसने उनसे धर्म का उपदेश सुना और अपने पुत्र विद्युत्प्रभ के पिछले भवों का हाल पूछा। मुनिराज ने कहा कि-“जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह में एक वत्सकावती देश है। उसमें प्रभापुरी नाम नगरी है। वहाँ का राजा नंदन था। उसके पुत्र का नाम विजयभद्र था। वह वीर और प्रतापी था। उसकी भार्या का नाम जयसेना था। एक दिन विजयभद्र क्रीड़ा के लिए उद्यान में गया और वहाँ एक फल को पेड़ से नीचे पड़ता हुआ देखकर वह विरक्त हो गया तथा पिहितास्रव मुनि के पास जा, चार हजार राजाओं के साथ-साथ उसने जैनेन्द्री दीक्षा धारण कर ली-वह दिगम्बर यति हो गया एवं वह कुछ काल में मरकर शान्त भावों के प्रभाव से माहेन्द्र स्वर्ग के चक्रक नाम विमान में देव हुआ। वहाँ


मृत्वा माहेन्द्रकल्पेऽगाद्विमाने चक्रके ततः।
सप्तसागरमाजीव्य च्युत्वा त्वत्सुततां गतः ॥३५॥

प्रयास्यति स निर्वाणमिति तत्र गतेन तत्।
मया श्रुतं ततस्तस्मै देया कन्या प्रयत्नतः ॥३६॥

ज्योतिर्मालां ग्रहीष्यामस्तत्पुत्रीमर्ककीर्तये।
इति श्रुत्वा वचस्तस्य सुमतिः सचिवोऽवदत् ॥३७॥

कन्याया याचकाः सन्ति खगाः सर्वे सहस्त्रशः।
कन्यायां ते प्रदत्तायामस्मै यास्यन्ति वैरिताम् ॥३८॥

श्रेयान्स्वयंवरस्तस्मादित्युकत्वा विरराम सः।
अनुमन्य तदेवाशु सर्वे ते तेन प्रेषिताः ॥३९॥

संभिन्नश्रोत्तृनामानं पुराणार्थप्रवेदिनम्।
अप्राक्षीत्स समाहूय स्वयंप्रभायै वरं परम् ॥४०॥

सोऽवोचच्छृणु शास्त्रेऽत्र श्रुतं तत्कथ्यते मया।
सुरम्यविषये ख्याते पोदनाख्ये पुरे परे ॥४१॥

नृपः प्रजापतिस्तस्य जाया भद्रा मृगावती।
भद्रायां विजयो जज्ञे मृगावत्यास्त्रिपृष्ठकः ॥४२॥

भवितारौ बलकृष्णौ श्रेयस्तीर्थे महाबलौ।
हत्वाश्वग्रीवशत्रुं चाद्यौ त्रिखण्डपति च तौ ॥४३॥

त्रिपृष्ठस्तु भवं भ्रान्त्वा भावी तीर्थकरोऽन्तिमः।
अतः कन्या त्रिपृष्ठाय देया त्रिखण्डभोगिने ॥४४॥

कन्या तस्य मनो हृत्वा भूयात्कल्याणभागिनी।
भवतो भवितानेन सर्वविद्याधरेशिता ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 29 से 45): उसकी सात सागर की आयु हुई। वह वहाँ से चयकर अब यह तेरा पुत्र विद्युत्प्रभ हुआ है और यह थोड़े ही समय में मोक्ष जायेगा।" मैं भी उस समय वहीं पर था। पिहितास्रव मुनि के मुख से यह हाल मैंने स्वयं सुना है। अतः मेरी सम्मति है कि उसे ही कन्या देना योग्य है और ज्योतिर्माला नाम की जो उसकी पुत्री है वह अपने कुमार अर्ककीर्ति के योग्य है। इसलिए उसे हम अर्ककीर्ति के निमित्त ले लेंगे। श्रुतसागर के इन वचनों को सुनकर सुमति मंत्री ने कहा कि राजन्! स्वयंप्रभा को प्रायः सभी विद्याधर चाहते हैं। इसलिए अपनी खुशी से किसी एक को दे देने पर वे बड़ा वैर-विरोध खड़ा करेंगे, अतः स्वयंवर करना सबसे उत्तम और ठीक होगा। यह कह कर सुमति चुप हो गया। राजा ने उसकी बात स्वीकार कर मंत्री वर्ग को विदा किया। इसके बाद राजा ने संभिन्नश्रोतृ नाम एक पौराणिक को बुलाकर उससे पूछा कि पंडितजी स्वयंप्रभा का वर कौन होगा। यह सुन पौराणिक ने कहा कि मैं शास्त्र के आधार से जो कुछ कहता हूँ उसे आप ध्यान से सुनिए। सुरम्य देश में एक पोदनपुर नगर है। उसका राजा प्रजापति है। उसकी दो रानियाँ हैं। एक भद्रा और दूसरी मृगावती। भद्रा के पुत्र का नाम विजय और मृगावती के पुत्र का नाम त्रिपृष्ठ है। वे दोनों ग्यारहवें तीर्थंकर के तीर्थ में, नारायण और बलभद्र होने वाले हैं। वे महान् बली और अश्वग्रीव को मारकर तीन खण्ड के पति होने वाले है एवं त्रिपृष्ठ संसार परिभ्रमण कर अन्तिम तीर्थंकर होगा। अतः तीन खण्ड के भोक्ता त्रिपृष्ठ को ही कन्या देनी चाहिए। यह कन्या उसके मन को मोह कर कल्याण की भगिनी बनेगी और उसके निमित्त से आप सब विद्याधरों के स्वामी बनेंगे ॥२९-४५॥


इति तस्य वचो धृत्वा चित्तेऽसौ तमपूजयत्।
इन्द्राख्यदूतमाहूय लेखप्राभृतसंयुतम् ॥४६॥

अर्थ: पौराणिक के इन वचनों को सुनकर राजा ने उसका खूब सत्कार किया और उसके वचनों पर निश्चय कर लिया। इसके बाद राजा ने उसी समय इन्द्र नाम दूत को बुलाया और उसे पत्र तथा भेंट


प्राहिणोच्छिक्षया युक्तं भूपः प्रजापतिं प्रति ।
जयगुप्तात्पुरा ज्ञातं निमित्तज्ञाच्चिरात्स्फुटम् ॥४७॥

स्वयंप्रभापतिर्भावी त्रिपृष्ठ इति भूभुजा।
दूतोऽथ राजसदनं स प्रविष्टः सभालये ॥४८॥

योग्यासने स्थितस्तस्मै दत्तवान्वरप्राभृतम्।
दूतः प्रोवाच विनयान्नृपं प्रति कृतादरः ॥४९॥

स्वयंप्रभाख्यया लक्ष्म्या त्रिपृष्ठो व्रियतामिति ।
शुश्राव सकलं वृत्तं वाचयित्वा च वाचिकम् ॥५०॥

प्रतिप्राभृतकं दत्त्वा तं प्रपूज्य वचोहरम्।
तथेति प्रतिपद्यासौ विससर्ज प्रजापतिः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 46 से 51): दे तथा सब बातें समझा कर प्रजापति महाराज के पास भेजा क्योंकि जयगुप्त नामक निमित्तज्ञानी से वह पहले ही सुन चुका था कि स्वयंप्रभा का वर त्रिपृष्ठ नारायण होगा। दूत राजमहल के सभा भवन में पहुँचा और वर के लिए जो भेंट ले गया था, उसे उसने प्रजापति महाराज के सामने रख दी तथा उनके हाथ में पत्र देकर विनय-पूर्वक कहा कि देव ! ज्वलनजटी महाराज की इच्छा है कि उनकी स्वयंप्रभा नाम लक्ष्मी के जैसी कन्या को त्रिपृष्ठ ग्रहण करें। इसके बाद पत्र के द्वारा पूरा हाल जान कर प्रजापति ने दूत का खूब आदर-सत्कार किया और बदले की भेंट देकर उससे कहा कि “जैसी तुम्हारे महाराज की इच्छा है वैसा ही होगा" ॥४६-५१॥


गत्वा स सत्वरं दूतो रथनूपुरभूमिपम्।
प्रणम्य सर्वकार्यस्य सिद्धिं युक्त्या व्यजिज्ञपत् ॥५२॥

विभूत्या नगरं प्राप्तं विद्येशं स प्रजापतिः।
गत्वा सम्मुखमानीयास्थापयद्योग्यमण्डपे ॥५३॥

विवाहोचितकार्येण ददौ तस्मै स्वयंप्रभाम्।
सिंहाहितार्क्ष्यविद्याश्च खगः साधयितुं ददौ ॥५४॥

अश्वग्रीवपुरेऽभूवन्नुत्पातास्त्रिविधाः परे।
अभूतपूर्वांस्तान्दृष्ट्वा जना भीतिमगुस्तदा ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 52 से 55): दूत वहाँ से विदा होकर वापस रथनूपुर आया और उसने सारी कार्यसिद्धि को बड़ी युक्ति के साथ महाराज को कह सुनाया ॥५२॥ इसके बाद बड़ी भारी विभूति और ठाटबाट के साथ ज्वलनजटी स्वयंप्रभा को लेकर पोदनपुर पहुँचे। उनका आना जानकर प्रजापति अगवानी के लिए नगर के बाहर आये और बड़े आदर के साथ ज्वलनजटी को नगर में ले गये। वहीं उन्होंने एक सुन्दर सुहावने मंडप में उन्हें ठहराया। इसके बाद ज्वलनजटी ने विवाह की सब विधि यथायोग्य समाप्त कर त्रिपृष्ठ के लिए कन्या प्रदान की और साथ ही सिंहविद्या, नागविद्या तथा तार्क्ष्यविद्या ये तीन विद्यायें दीं। इसी समय उत्तर श्रेणी की अलकापुरी में जहाँ पर अश्वग्रीव रहता था, तीन भाँति के उपद्रव हुए। दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष। पहले कभी नहीं हुए ऐसे इन अपूर्व उपद्रवों को देखकर वहाँ के लोग बहुत ही व्याकुल हुए। उस समय अन्वग्रीव ने शतबिन्दु निमित्तज्ञानी को बुलाया और उससे पूछा कि बताओ, इन उपद्रवों का फल क्या है ? शतबिन्दु ने कहा ॥५३-५५॥


शतबिन्दुं निमित्तज्ञमश्वग्रीवः समाह्वयत्।
किमेतदिति संपृष्टे स ब्रूते स्म च तत्फलम् ॥५६॥


सिन्धुदेशे हतो येन मृगारिः सत्पराक्रमः।
येनाहारि हठात्त्वां च प्राभृतं प्रति प्रेषितम् ॥५७॥

अर्थ: जिसने सिंधुदेश में सिंह को मारकर अपना पराक्रम दिखाया, जिसने आपके पास आती हुई भेंट को जबरदस्ती रास्ते में ही छीन लिया और ज्वलनजटी खगेश्वर की स्वयंप्रभा नाम कन्या को जिस धीरवीर ने वरा उसके द्वारा आपको क्षोभ प्राप्त होगा-आप दुखी होंगे। इसलिए आप उसे


स्वयं प्रभाभिधं रत्नं येनादायि खगेश्वरात् । ततस्ते क्षोभनं नूनं भविता चेक्ष्यतां स हि ॥५८॥

सोऽवादीन्मन्त्रिणस्तूर्णं युष्माभिः स समीक्ष्यताम् । विषाङ्कुरवदुच्छेद्यः सोऽन्यथा दुःखकृत्खलः ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 58 से 59): खोजकर पहले से ही अपना प्रबन्ध कर उसके नाश का यत्न कीजिए। यह सुन अश्वग्रीव ने उसी समय मंत्रियों को आज्ञा दी कि तुम लोग उस शत्रु की जल्दी खोज करो और विष के अंकुर की तरह उसे जड़ से उखाड़कर फेंक दो, नहीं तो वह पीछे बहुत दुख देगा ॥५८-५९॥


सर्वमन्विष्य तत्रापि निगूढैः प्रेषितैर्जनैः । शतबिन्दूक्तमाचिन्त्य तन्मृगारिवधादिकम् ॥६०॥

त्रिपृष्ठो नाम दर्पिष्ठः स परीक्ष्यः क्षितौ महान् । इत्युक्तं च महादूतौ चिन्तागतिमनोगती ॥६१॥

त्रिपृष्ठं प्रेषयामासाश्वग्रीवो भयसंयुतः । तौ गत्वा नृपतिं नत्वा दत्त्वा प्राभृतपूर्वकम् ॥६२॥

निवेद्यागमनं युक्त्या प्रोचतुर्विनयान्वितौ । खगेश्वरेण भूप त्वमधुना ज्ञापितोऽस्यहो ॥६३॥

एष्याम्यहं रथावर्ताद्रिं ममानु भवानिति । त्वां नेतुमागतावावामारोप्याज्ञां स्वमूर्धनि ॥६४॥

आगन्तव्यं त्वयेत्युक्ते जगाद सोऽपि कोपतः । उष्ट्रग्रीवाः खरग्रीवा अश्वग्रीवा नराः क्वचित् ॥६५॥

न दृष्टा इत्युक्तं तावूचतुः खगनायकम् । अवमन्तुं सर्वलोकाभ्यर्च्य युक्तं न ते द्रुतम् ॥६६॥

इत्युक्ते सोऽवदत्स्वामी खगेट् ते पक्षसंयुतः । एष्याम्यहं न तं द्रष्टुमित्यब्रूतां च तौ नृपम् ॥६७॥

वक्तुं दर्पादिदं युक्तं नादृष्ट्वा चक्रनायकम् । यत्कोपान्न स्थितैर्देहे कौ कश्च स्थातुमर्हति ॥६८॥

निशम्येति तयोर्वाक्यमवादीत्स भवत्पतिः । चक्री ते कुम्भकारः किं घटकृत्कारुकाग्रणीः ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 60 से 69): मंत्रियों की सलाह से गूढ़चर लोग पोदनपुर भेजे गये। वहाँ उन्होंने तलाश किया और शतबिन्दु की बताई हुई सिंहवध आदि बातों पर से यह निश्चय किया कि आत्माभिमानी यह त्रिपृष्ठ ही हमारे महाराज का शत्रु है। इसी के निमित्त से सब उपद्रव हो रहे हैं। इतना पता लेकर वे वापस आये और उन्होंने राजा को अपने दिल का सब हाल कह सुनाया, जिसे सुन अश्वग्रीव और भी भयभीत हुआ। उसने त्रिपृष्ठ के पास चिंतागति और मनोगति नामक दो दूतों को भेजा। वे दोनों त्रिपृष्ठ के पास पहुँचे तथा उन्हें भेंट दे, नमस्कार कर बड़े आदर के साथ बोले कि राजन्! विद्याधरों के अधिपति अश्वग्रीव ने आपके लिए यह आज्ञा की है कि मैं रथावर्त पर्वत पर आता हूँ और आप भी वहाँ आकर मुझसे मिलें। इसलिए हम लोग आपको लेने के लिए आये हैं। कृपाकर आप चलिए। इस पर त्रिपृष्ठ ने क्रोध भरे शब्दों में कहा कि मैंने आज तक उष्ट्रग्रीव, खरग्रीव और अश्वग्रीव वाले मनुष्य कहीं नहीं देखे, फिर यह घोड़े कैसी गर्दन वाला मनुष्य कहाँ से आया। त्रिपृष्ठ की व्यंग्योक्ति सुनकर दूतों ने कहा कि यह आपका ख्याल गलत है। एक विद्याधरों के स्वामी और सारे संसार द्वारा पूजे जाने वाले पुरुषोत्तम के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करना आपको शोभा नहीं देता। इस पर त्रिपृष्ठ ने कहा कि यदि तुम्हारा स्वामी आकाश में चलने वाला विद्याधर है तो वह पक्ष-युक्त पक्षी होगा, उसको देखने के लिए मुझे अवकाश नहीं-मैं नहीं आ सकता। इसके उत्तर में दूतों ने कहा कि हमारा स्वामी चक्रनायक है। उन्हें देखे बिना अभिमान में भूल कर ऐसी ऊँटपटाँग बातें बकना ठीक नहीं है। उनके कोप से शरीर में रहना तक कठिन हो जाता है तब पृथ्वी पर तो रह ही कौन सकता है। दूतों के ऐसे


किं प्रेष्यं तस्य चेत्युक्ते तौ सक्रोधाववोचताम्।
चक्रिभोग्यमिदं कन्यारत्नं किं तेऽद्य जीर्यति ॥७०॥

ज्वलनादिजटी कोऽसौ कः प्रजापतिनामभाक्।
क्रुद्धे चक्रिणि चेत्युक्त्वा गतौ दूतौ ततः क्रुधा ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 60 से 71): कठोर वचनों को सुनकर त्रिपृष्ठ ने कहा कि यदि तुम्हारा स्वामी चक्रनायक है तो वह घड़ा बनाने वाला कारीगरों का अगुआ कुम्हार है। उसके लिए क्या तो भेजा जाये और क्या उससे मेल-मिलाप किया जाय। यह सुन दूतों ने क्रोध भरे शब्दों में कहा कि जिस कन्यारत्न को आपने अपना भोग्य पदार्थ बना लिया है वह क्या आपको पच जायेगा? नहीं, कभी नहीं। ज्वलनजटी और प्रजापति कौन खेत का मूली हैं और चक्रवर्ती के क्रोध के आगे वे क्या कर सकते हैं ॥६०-७१॥


प्राप्याश्वग्रीवमानम्यकुण्ठौ भूपविचेष्टितम्।
प्रोचतुस्तत्खगेट् श्रुत्वा स्फालयामास दुन्दुभिम् ॥७२॥

जगद्व्यापिनमाकर्ण्य भेरीनादं जगुर्नृपाः।
क्रुद्धे चक्रिणि कस्तिष्ठेद्भूभौ भीतिभरापहः ॥७३॥

अर्थ (श्लोक 72 से 73): इतना कहकर वे दोनों कुबुद्धि दूत वापस लौट आये और अश्वग्रीव के पास आ, उसे नमस्कार कर उन्होंने त्रिपृष्ठ ने जो कुछ कहा था वह सब ज्यों का त्यों कह सुनाया, जिसे सुनकर अश्वग्रीव के क्रोध का पारा बहुत ही चढ़ गया और उसने रणभेरी बजवा दी। संसार भर में फैलने वाले भेरी के शब्द को सुनकर सभी राजा-गण अश्वग्रीव की सेवा में आ उपस्थित हुए क्योंकि चक्रवर्ती के क्रोध के मारे सभी भयभीत हो डर के भार से दब जाते हैं। पृथ्वी पर कोई भी सुख-चैन से नहीं रह सकता ॥७२-७३॥


रथावर्तमगाच्चक्री चतुरङ्गबलैस्तदा।
जजृम्भिरे ककुब्दाहा उल्कापाताश्चचाल भूः ॥७४॥

विदित्वात्तसुतौ तत्र प्रतीयतुः प्रजापतेः।
सेनयोरुभयोस्तत्र सङ्गरः समभून्महान् ॥७५॥

हयग्रीवमगात्कोपात्त्रिपृष्ठो युद्धसन्नधीः।
हयकण्ठोऽपि तं पूर्ववैराद्योद्धुं समुद्यतः ॥७६॥

समाच्छदयतः सेनां तौ बाणैर्बलिनौ बलात्।
सामान्यशस्त्रयुद्धेन जेतुं तावितरेतरम् ॥७७॥

आरेभाते क्षमौ तौ च विद्यायुद्धं बलोद्धतौ।
चिरं युध्द्वाश्वग्रीवस्तु व्यर्थविद्याबलः क्रुधा ॥७८॥

अभ्यरि क्षिप्तवांश्चक्रं तदेवायाय केशवः।
तेनाश्वग्रीवसद्ग्रीवामच्छिनद्गलतो बली ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 74 से 79): इसके बाद अश्वग्रीव चतुरंगसेना के साथ रथावर्त पर्वत की ओर रवाना हुआ। इस समय दशों दिशायें आग उगलने लगीं। उल्कापात होने लगा और पृथ्वी काँपने लगी। अश्वग्रीव को आया जान प्रजापति के दोनों पुत्र भी आ पहुँचे। दोनों ओर की सेना में बढ़ा भयंकर युद्ध हुआ। यह देख त्रिपृष्ठ को बहुत क्रोध आया। यह आग बबूला हो गया और अश्वग्रीव पर स्वयं ही जा चढ़ा। उधर से अश्वग्रीव भी पहले जन्म के वैर के कारण लड़ने को तैयार ही था। दोनों ने खूब बाणों की बरसा की, जिससे सारी सेना बिल्कुल बाणमय देख पड़ने लगी। इस तरह उन दानों में सामान्य शस्त्रों द्वारा बहुत ही युद्ध हुआ, पर जब एक दूसरे को कोई भी न जीत सका तब उन शक्तिशालियों ने विद्यायुद्ध करना आरम्भ किया। विद्यायुद्ध करते हुए भी बहुत देर हो गई और अश्वग्रीव का विद्याबल व्यर्थ जाने लगा। तब क्रोध में आकर अश्वग्रीव ने वैरी पर चक्र चलाया। चक्र तीन प्रदक्षिणा कर दैवयोग से त्रिपृष्ठ के हाथ में आ गया। अन्त में उस बली त्रिपृष्ठ ने उसी चक्र के द्वारा अश्वग्रीव की गर्दन


त्रिपृष्ठविजयौ जातौ भरतार्धपती परौ। खेचरैर्व्यन्तरैर्भू पैर्मागधैः कृतपूजनौ ॥८०॥

रथनूपुरनाथाय द्वयोः श्रेण्योरवातरत्। प्रभुत्वं किं न जायेत महदाश्रयतोऽच्युतः ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 74 से 81): काट कर उसे धराशायी बना दिया। इस प्रकार विजय और त्रिपृष्ठ आधे भरतक्षेत्र के अधिपति हुए और विद्याबल, राजा-महाराजा, व्यंतर और मागध सभी उनकी सेवा करने लगे। इसके बाद त्रिपृष्ठ ने ज्वलनजटी को दोनों श्रेणियों का स्वामी बना दिया। सच है बड़े पुरुषों के आश्रय से सभी प्रभुता प्राप्त हो जाती है, कुछ दुर्लभ नहीं रह जाता ॥७४-८१॥


खड्गः शङ्खो धनुश्चक्रं दण्डः शक्तिर्गदाभवन्। सप्त रत्नानि सद्विष्णो रक्षितानि मरुद्गणैः ॥८२॥

रत्नमाला गदा दीप्यद्रामस्य मुशलं हलम्। चत्वारीमानि रत्नानि जज्ञिरे भाविनिर्वृतेः ॥८३॥

अर्थ (श्लोक 82 से 83): इसके बाद पूर्व पुण्य के उदय से त्रिपृष्ठ नारायण को खड्ग, शंख, धनुष, चक्र, दंड, शक्ति, गदा ये सात रत्न और विजय बलभद्र को रत्नमाला, गदा, मुशल और हल ये चार रत्न प्राप्त हुए। इन रत्नों की हजारों देवता-गण सेवा करते हैं ॥८२-८३॥


सहस्रद्व्यष्टदेव्यस्तु विष्णोः स्वयंप्रभादयः। रामस्याष्टसहस्राणिशीलरूपगुणान्विताः ॥८४॥

अर्थ: त्रिपृष्ठ की सोलह हजार रानियाँ थीं, उनमें से पट्टरानी का सौभाग्य स्वयंप्रभा को ही प्राप्त था। विजय की आठ हजार रानियाँ थीं। वे सभी शीलवती, रूपवती और गुणों की खान थीं ॥८४॥


प्रजापतिः सुतां ज्योतिर्मालां दत्त्वार्ककीर्तये। प्राप प्रीतिं परां युक्त्या विवाहेन महोत्सवैः ॥८५॥

अर्थ: इसके बाद प्रजापति राजा ने भी अपनी ज्योतिर्माला नाम पुत्री का विवाह बड़े भारी ठाट-बाट से ज्वलनजटी के पुत्र अर्ककीर्ति के साथ कर दिया। इससे दोनों राजाओं में परस्पर खूब गाढ़ी प्रीति हो गई। अर्ककीर्ति और ज्योतिर्माला के अमिततेज नाम का पुत्र और सुतारा नाम की पुत्री हुई। इसी भाँति त्रिपृष्ठ और स्वयंप्रभा के भी श्रीविजय और विजयभद्र नाम दो पुत्र तथा ज्योतिःप्रभा नाम एक कन्या हुई ॥८५॥


तयोरमिततेजास्तुक् सुतारा च सुताभवत्। विष्णोः श्रीविजयः पुत्रः परो विजयभद्रकः ॥८६॥

सुता ज्योतिःप्रभा नाम्नी स्वयंप्रभासमुद्भवा। प्रजापतिर्भवाद्भीतो गत्वाथ पिहितास्रवम् ॥८७॥

आदाज्जैनेश्वरीं दीक्षां क्रमान्मोक्षं समासदत्। तच्छ्रुत्वा खेचरेन्द्रोऽपि राज्यं न्यस्यार्ककीर्तये ॥८८॥

जगन्नन्दनसामीप्ये दीक्षामाप जगन्नुताम्। सोऽगमत्परमं ध्यानं ततश्च परमं पदम् ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 86 से 89): इसके बाद किसी निमित्त को पाकर प्रजापति संसार-विषयभोगों से उदास हो गये और पिहितास्रव मुनि के पास जैनेन्द्री दीक्षा धारण कर तथा तप के द्वारा कर्मों का नाश कर मोक्षधाम को चले गये। यह सुन ज्वलनजटी भी अर्ककीर्ति पर राज-भार डाल कर जगत्-नंदन मुनि के पास दिगम्बरी दीक्षा ले परम ध्यान के प्रभाव से परम पद के स्वामी हो गये ॥८६-८९॥


ज्योतिःप्रभा कदाचिच्च त्रिपृष्ठस्य सुता परा। स्वयंवरविधानेन वव्रे चामिततेजसम् ॥९०॥

अर्थ: इसके बाद जब ज्योतिःप्रभा का स्वयंवर रचा गया तब उसने अमिततेज को वरा, उसके गले में वरमाला डाली और अर्ककीर्ति की पुत्री सुतारा ने अपने स्वयंवर में श्रीविजय पर आसक्त हो उसके


खगपुत्री सुतारा सुस्वयंवरविधानतः। स्वयं रागवती वव्रे वरं श्रीविजयं वरम् ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 90 से 91): गले में वरमाला डाली। स्वयंवर के बाद दोनों का परस्पर में खूब धूमधाम के साथ विवाह महोत्सव किया गया ॥९०-९१॥


भुक्त्वा चिरं महाराज्यं विष्णुश्चायुःक्षये गतः। सप्तमं भूतलं राज्यं बलःश्रीविजये न्यधात् ॥९२॥

न्यस्य विजयभद्राय यौवराज्यं हलायुधः। चक्रिशोकाकुलो गत्वा स्वर्णकुम्भसमीपताम् ॥९३॥

सहस्रैः सप्तभिर्भूपैर्ययौ संयममुत्तमम्। निर्मूल्य घातिकर्माणि केवल्यासीत्परोदयः ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 92 से 94): इसके बाद बहुत दिन तक राज-सुख भोग आयु का अन्त होने पर नारायण मरकर सातवें नरक गया और विजय बलभद्र ने श्रीविजय को राज-पद देकर विजयभद्र को युवराज बनाया तथा वह स्वयं भाई के शोक से व्याकुल हो स्वर्ण कुंभ मुनि के पास दीक्षित हो गया। उसके साथ में सात हजार राजाओं ने भी संयम को ग्रहण किया एवं थोड़े ही समय में घातिया कर्मों को नाशकर वह परमोदय का धारक केवली हो गया ॥९२-९४॥


अर्ककीर्तिस्तदाकर्ण्य संस्थाप्यामिततेजसम्। राज्ये विपुलमत्याख्यचारणादग्रहीत्तपः ॥९५॥

अर्थ: यह सुन अर्ककीर्ति भी अमिततेज को राज-भार सौंपकर विपुलमति मुनिराज के चरणों में तपस्वी हो गया। इसके बाद अमिततेज और अर्ककीर्ति ने बहुत काल तक अविकल राज-सुख भोगा। उन्हें कोई बात की चिन्ता न हुई ॥९५॥


नष्टकर्मा गतो मुक्तिं तयोरविकले परे। शर्मणामिततेजःश्रीविजयाख्यनृपालयोः ॥९६॥

गच्छति प्रचुरे काले कश्चित्पोदनपत्तने। साशीर्वादः समागत्य प्रोवाच नृपतिं प्रति ॥९७॥

सावधानो धराधीश भूत्वा मद्बचनं शृणु। सप्तमेऽह्नि तरां मूर्ध्नि पोदनाधिपतेरिति ॥९८॥

पतिष्यति महावज्रमुपायस्तत्र चिन्त्यताम्। इत्याकर्ण्य तदा प्राह युवराजो महाक्रुधा ॥९९॥

पतिता तव शीर्षे किं वद कोविद वै तदा। श्रुत्वावादीन्निमित्तज्ञ इति भूपेश मूर्धनि ॥१००॥

पतिता रत्नवृष्टिर्मे महाभिषेकपूर्वकम्। साहंकारं निशम्यैतत्त्स राजा विस्मयी जगौ ॥१०१॥

भद्रात्र स्थीयतां तावच्छृणु त्वं किंचिदुच्यते। किं गुरुः ख्याहि किं गोत्रः किं शास्त्रः किं निमित्तकः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 96 से 102): एक दिन पोदनपुर के नरेश की सभा में एक नया मनुष्य आया और राजा को आशीर्वाद देकर बोला कि राजन्! मेरी बात जरा ध्यान से सुनिए। आज से सातवें दिन आपके पोदनपुर के राजा के मस्तक पर महावज्र की बरसा होगी, इसलिए उससे बचने का कुछ उपाय कीजिए। यह सुन क्रोध में आ विजयभद्र युवराज ने कहा कि पंडितजी! यह तो बताओ कि उस समय तुम्हारे मस्तक पर काहे की बरसा होगी। इस पर उस निमित्तज्ञानी ने अहंकार भरे शब्दों में कहा कि महाराज! सुनिए-उस समय मेरे मस्तक पर अभिषेक पूर्वक रत्नों की बरसा होगी। उसके इन वचनों को सुन श्रीविजय को बड़ा अचंभा हुआ। उन्होंने कहा कि भद्र! यहाँ आओ, बैठो, मेरी बात सुनो। बताओ कि तुम्हारा गुरु कौन हैं और कौन गोत्र में तुम्हारा जन्म हुआ है ? तुमने कौन-कौन शास्त्र पढ़े या देखे हैं और किस निमित्त से तुमने यह बात जानी है ? तुम्हारा नाम क्या हैं ? ॥९६-१०२॥


किमाख्यः किं निमित्तोऽयमादेशः कथ्यतामिति। स जगौ कुण्डले द्रङ्गे राजा सिंहरथो महान् ॥१०३॥

पुरोधाः सुरगुर्वाख्यः शिष्यस्तस्य विशारदः। तदन्तेवासिना दीक्षां गृहीत्वा हलिना समम् ॥१०४॥

मयाष्टाङ्गनिमित्तान्यधीतानि च श्रुतानि च। तानि कानीति संप्रश्नेऽन्तरीक्षं भौममङ्गगम् ॥१०५॥

लक्षणं व्यञ्जनं छिन्नं स्वरः स्वप्नोऽष्टधेति च। तल्लक्षणानि भेदांश्च प्रोच्याहं क्षुत्तृषाकुलः ॥१०६॥

मुक्तदीक्षः सदादुःखी पद्मिनीखेटमाययौ। मातुलस्तत्र मे सोमशर्मा चन्द्राननां सुताम् ॥१०७॥

हिरण्यलोमासंजातां तस्याहं परिणीतवान्। वित्तोपार्जनमुन्मुच्य निमित्ताभ्यासरञ्जितः ॥१०८॥

मां निरीक्ष्य प्रिया खिन्ना तातदत्तवसुक्षयात्। भोजनावसरेऽन्येद्युर्वित्तमेतत्त्वयार्जितम् ॥१०९॥

मद्वराटकवृन्दं चेत्यमत्रे रोषतोऽक्षिपत्। वज्रपातस्तदा मूर्ध्नि पोदनेशस्य निश्चितम् ॥११०॥

रञ्जितस्फटिके तत्र तपनाभीषुसंनिधिम्। भार्याक्षिप्तकराक्षालजलधारां च पश्यता ॥१११॥

निश्चित्यात्मयथालाभं तोषाभिषवपूर्वकम्। अयं चामोघजिह्वाख्यस्तवादेशो मया कृतः ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 103 से 112): इनके उत्तर में उस निमित्तज्ञ ने कहा कि कुण्डलपुर नाम नगर में सिंहरथ नाम राजा है। उसके पुरोहित का नाम सुरगुरु है। उसका मैं शिष्य हूँ। मैंने विजय बलभद्र के साथ दीक्षा लेकर अष्टांग निमित्त-शास्त्रों को पढ़ा है। अन्तरिक्ष, भौम, अंग, लक्षण, व्यंजन, छिन्न, स्वर और स्वप्न। इनके लक्षण और भेद मुझे सब मालूम हैं। कुछ समय बाद भूख से व्याकुल हो मैंने दीक्षा छोड़ दी और हमेशा दुखी होकर इधर-उधर घूमने-फिरने लगा। कुछ काल बाद मैं पद्मिनी खेट नाम नगर में आया। वहाँ सोमशर्मा नाम मेरा मामा रहता था। उसकी स्त्री का नाम हिरण्यलोमा था। उसके चंद्रानना नाम की एक कन्या थी। उस कन्या का मेरे मामा ने मेरे साथ विवाह कर दिया और साथ में कुछ धन भी दिया। तब तो मैंने सब चिन्ता छोड़ दी और धन कमाने आदि बातों पर कुछ भी ध्यान न दे निमित्त-शास्त्र के अध्ययन में अपना मन लगाया। धीरे-धीरे मेरे मामा का दिया हुआ जब सब धन खर्च हो चुका तब मेरी स्त्री बहुत खिन्न हुई और एक दिन भोजन के समय उसने क्रोध भरे शब्दों में मुझसे कहा कि क्या यह धन तुम्हीं ने कमाया था। यह कहकर उसने क्रोध के साथ निमित्त ज्ञान की बातें जानने के उपयोग में आने वाली कोड़ियों को मेरे सामने फेंक दीं, जो वहीं पड़ी थीं। उनसे मैंने यह निश्चय किया कि पोदनपुर के नरेश के मस्तक पर वज्रपात होगा और जो भोजन करने की स्फटिक की थाली में प्रतिबिम्बित मेरी मूर्ति पर सूरज की किरणें पड़ रही थीं तथा उसी समय मेरी मूर्ति पर मेरी स्त्री ने हाथ धोने के जल की जो धारा डाल दी थी उससे मैंने यह जाना कि मुझे अभिषेक पूर्वक राज-लाभ होगा। मेरा नाम अमोघजिह्व है। मैंने ऊपर कहे हुए निमित्त से जानकर ही आपको सूचना दी है। दूसरा और कोई कारण नहीं ॥१०३-११२॥


श्रुत्वेति तं विसर्ज्यासौ भूपश्चिन्तासमाकुलः। आहूय मन्त्रिणोऽपृच्छद्वृत्तमेतद्भयावहम् ॥११३॥

अर्थ: यह सुन राजा ने उसे तो विदा कर दिया और बाद कुछ सोच-विचार कर मंत्रियों को बुलाया। उनसे उसने कहा कि एक बड़ा भयंकर समाचार है और वह यह है कि आज से सातवें दिन पोदनपुर के राजा के ऊपर वज्रपात होगा ॥११३॥


श्रुत्वैतत्सुमतिः प्राह त्वां समुद्रजलान्तरे।
संस्थाप्य लोहमञ्जूषामध्ये मुञ्चे च रक्षितुम् ॥११४॥

सुबुद्धिरिति तच्छ्रुत्वा बभाषे तत्र संभयम्।
मत्स्यजं विजयार्द्धस्य निदधामो गुहान्तरे ॥११५॥

तदाकर्ण्य वचोऽवादीत्सचिवो बुद्धिसागरः।
अर्थाख्यानं प्रसिद्धार्थं कथ्यमानं निशम्यताम् ॥११६॥

अर्थ (श्लोक 114 से 116): यह सुन सुमति मंत्री बोला कि इसके लिए कोई चिन्ता करने की बात नहीं है। आपको हम एक लोहे के सन्दूक में बन्द करके समुद्र के भीतर छोड़ देंगे, इससे आपकी रक्षा हो जायेगी। इस पर सुबुद्धि ने कहा कि समुद्र में तो मगर मच्छ के निगल जाने का भय है, इसलिए वहाँ न छोड़कर आपको विजयार्द्ध की गुफा में हम लोग छिपा देंगे। उनकी ये बातें सुनकर बुद्धिसागर मंत्री बोला कि मैं एक प्रसिद्ध कहानी कहता हूँ, उसे सुनिए ॥११४-११६॥


परिव्राट् सोमनामा च वसन्सिंहपुरे खलः।
वादार्थी जिनदासेन निर्जितो मृृतिमाप च ॥११७॥

बभूव महिषो भारचिरवाहवशीकृतः।
उपेक्षितो विशक्तिश्च जातजातिस्मृतिस्तदा ॥११८॥

बद्धवैरो मृतोऽप्यासीच्छ्मशाने राक्षसः खलः।
कुम्भभीमौ नृपौ तत्र कुंभस्य पाचकः पटुः ॥११९॥

दत्ते सुसंस्कृते खाद्ये भूपस्तत्स्वादलोलुपः।
ब्रूते स्मेदं त्वया तेनानेतव्यं च तथा कृतम् ॥१२०॥

रसायनादिपाकाख्यस्तद्भोग्यं पिशितं सदा।
दत्तेस्म चैकदा कुम्भभूपाय नरमांसके॥१२१॥

लोका ज्ञात्वेति संचिन्त्य दुष्टोऽयं नरभक्षकः।
निःकाश्यो नगरात्तूर्णं स त्यक्तः सचिवादिभिः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 117 से 122): सिंहपुर में एक दुष्ट तपस्वी रहता था। उसका नाम सोम था। वह वाद-विवाद का बहुत प्रेमी था। एक दिन शास्त्रार्थ में उसे जिनदास ने जीत लिया, जिससे वह बहुत लज्जित और दुखी हुआ तथा खोटे परिणाम से मरकर भैंसा हुआ। उसका स्वामी उस पर बिल्कुल दया नहीं करता था किन्तु उसे हमेशा ही बोझा ढोने के काम में लगाये रखता था। बोझा ढोने के कारण वह धीरे-धीरे दुबला हो गया। उस समय उसे अपने पहले भवों की याद हो आई और वह वहाँ से भी वैर बाँधकर मरा और मसान भूमि में दुष्ट राक्षस हुआ। सिंहपुर में दो राजा थे, एक भीम और दूसरा कुंभ। कुंभ का रसोइया बहुत ही चतुर था। लोग उसको रसायन पाक नाम से पुकारते थे। वह हमेशा राजा को मांस पकाकर खाने के लिए देता था। एक दिन उसने राजा की मनुष्य का मांस पकाकर खिलाया। वह राजा को बहुत स्वादिष्ट मालूम पड़ा। राजा लोलुपता के वश हो रसोइया से बोला कि तुझे रोज ऐसा ही अच्छा मांस पकाना चाहिए। रसोइया जी हाँ, हुजूर कहकर उस दिन से मनुष्य का मांस पका-पकाकर राजा को खिलाने लगा। जब यह बात शहर के लोगों को मालूम पड़ी कि यह दुष्ट राजा मनुष्य-भक्षक है तब उन्होंने एकता करके उसे नगर से बाहर निकाल दिया। मंत्री वगैरह ने भी उस दुष्ट का साथ न दिया ॥११७-१२२॥


कदाचित्पाचकं हत्वा साधयित्वा स राक्षसम्।
पूर्वोक्तं भक्षयामास प्रजा बभ्राम तत्पुरम् ॥१२३॥

अर्थ: केवल उसके साथ एक मात्र रसोइया रह गया। दुष्ट राजा ने एक दिन उसे भी मारकर खा डाला। अब वह पहले कहे हुए राक्षस की आराधना कर उसकी सहायता से प्रजा के लोगों को मार-मारकर खाने लगा और नगर के बाहर घूमने लगा। उस समय लोग बहुत ही भयभीत हुए। उन्होंने


संत्रस्ताः सकलाः पौराः संत्यज्य तत्पुरं तदा।
कुम्भकारकटं कृत्वा पुरं तत्रेति संस्थितिम् ॥१२४॥

व्यधुर्भीता नरं चैकं तथा च शकटौदनम्।
खादान्यमानवानां हि रक्षणं कुरु राक्षस ॥१२५॥

अर्थ (श्लोक 123 से 125): सिंहपुर में रहना ही छोड़ दिया और कुंभकारपुर नामक पुर को बसाकर वे वहाँ रहने लगे। उन्होंने दुखी हो कहा कि हे राक्षस! तू प्रति दिन एक आदमी और एक गाड़ी अन्न ले लिया कर परन्तु और-और मनुष्यों पर तो दयादृष्टि कर ॥१२३-१२५॥


तत्रैव वाडवश्चण्डकौशिकस्तत्प्रिया परा।
सोमश्रीर्भूतमाराध्य मौण्ड्यकौशिकसत्सुतम् ॥१२६॥

लेभे कुम्भस्य भोज्याय दातुं तं शकटस्थितम्।
नीयमानं च कुम्भेन सह वीक्ष्य च खादितुम् ॥१२७॥

दण्डहस्तैस्तदा भूताः कुम्भं निर्भर्त्स्य तं बिले।
क्षिप्तं शयुर्जगालाशु द्विजं कर्मविपाकतः ॥१२८॥

अर्थ (श्लोक 126 से 128): वहीं पर एक चंडकौशिक नाम वाड़व (जाति) रहता था। उसकी स्त्री का नाम सोमश्री था। सोमश्री के भूतों की सेवा-उपासना के प्रभाव से मौड्यकौशिक नाम पुत्र हुआ था। क्रमशः राक्षस के पास जाने की मौड्यकौशिक की भी बारी आई। प्रतिदिन की तरह अन्न की गाड़ी के साथ वह भेजा गया। वह कुंभ के पास पहुँचा। उसे देखकर कुंभ उसको खाने के लिए झपटा। तब भूतों से न रहा गया। वे कुंभ पर टूट पड़े और उन्होंने कुंभ की डंडों, लातों और हाथों से खूब खबर ली और उसे ले जाकर एक अजगर के बिल में डाल दिया। अजगर उसे एक क्षण में ही निगल गया। जबकि कर्म के निमित्त से ही सब कुछ होता है ॥१२६-१२८॥


विजयार्धगुहायां हि कथं निक्षिप्यते नृपः।
श्रुत्वा तद्वचनं पथ्यं जगाद मतिसागरः ॥१२९॥

वज्रपातस्तु भूपस्य प्रोक्तो नैमित्तिकेन न।
किंतु पोदननाथस्य चातोऽन्यः क्षिप्यतामिति ॥१३०॥

सर्वे शशंसुस्तद्बुद्धिं युक्तां युक्तिविशारदाः।
मन्त्रिणः प्रतिबिम्बं तु कृत्वा भौपं नृपासने ॥१३१॥

निवेश्य सकला नेमुः पोदनाधीशसद्धिया।
नरेशोऽस्थात्परित्यज्य राज्यं प्रारब्धपूजनः ॥१३२॥

दद्दानं जिनागारे शान्तिकर्मकृतोत्सवः।
सप्तमेऽह्नि पपाताशु वज्रं बिम्बस्य मूर्धनि ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 129 से 133): तब बताओ कि राजा को विजयार्द्ध की गुफा में डालने से भी क्या लाभ होगा। मेरी सम्मति है कि जैसा कर्म का उदय होगा वैसा तो होकर ही रहेगा फिर ऊट पटांग उपायों को काम में लाने से फल ही क्या? यह सुन मतिसागर ने हितकर वचनों में कहा कि निमित्तज्ञानी ने वज्रपात का होना पोदनपुर के राजा के ऊपर बताया है, किसी खास के ऊपर तो बताया ही नहीं है। तब दुख और रंज की कोई बात ही नहीं है। सात दिन के लिए किसी और व्यक्ति को राजा बनाकर सिंहासन पर बैठा दिया जाना चाहिए। यह सुन युक्ति-विशारद सभी मंत्रियों ने मतिसागर की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इसके बाद सबकी सम्मति से राज-सिंहासन पर राजा के प्रतिबिंब की स्थापना कर दी गई। सबने ‘‘यही पोदनपुर का स्वामी है’’ इस बुद्धि से उसे नमस्कार किया और उसकी आज्ञा शिरोधार्य की। उधर राजा श्रीविजय ने राज-काज छोड़-छाड़कर प्रभु की सेवा-भक्ति में मन लगाया। वे गरीबी को दान देने लगे और मन्दिरों में शान्ति का देने वाला शान्ति महोत्सव करने लगे। धीरे-धीरे सातवां दिन आया और निमित्तज्ञानी के कहे अनुसार राजा के प्रतिबिम्ब पर वज्रपात हुआ ॥१२९-१३३॥


तस्मिन्नुपद्रवे नष्टे सहर्षाः पुरवासिनः।
नानानकैर्नटीनाट्यैर्नराश्चक्रुर्महोत्सवम् ॥१३४॥

नैमित्तिकाय ग्रामाणां पद्मिनीखेटसंयुतम्।
शतं प्रपूज्य वस्त्राद्यैर्ददुर्दीप्तमहोत्सवाः ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 134 से 135): जब सब उपद्रव शान्त हो चुका तब शहर के लोगों ने भाँति-भाँति के बाजों और नटी नटों के नृत्य-गान के द्वारा खूब महोत्सव किया और उस निमित्तज्ञानी को पद्मिनीखेट सहित सौ गाँव भेंट देकर वस्त्र-आभूषणों से उसका खूब आदर सत्कार किया ॥१३४-१३५॥


शातकुम्भमयैः कुम्भैरभिषिच्य महीपतिम्।
समारोप्यासनेऽमात्याः सुराज्ये प्रत्यतिष्ठपन् ॥१३६॥

एकदा मातुरादाय विद्यामाकाशगामिनीम्।
सुतारया समं ज्योतिर्वनं रन्तुं जगाम सः ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 136 से 137): इसके बाद मंत्रियों ने सोने के कलशों से अभिषेक कर श्रीविजय को धूमधाम के साथ फिर राज-सिंहासन पर विराजमान कर दिया। उन्हें फिर अपना राजा बना लिया। एक दिन अपनी माता स्वयंप्रभा से आकाशगामिनी विद्या लेकर वह सुतारा सहित ज्योतिर्वन में क्रीड़ा करने को गये ॥१३६-१३७॥


यथेष्टमिष्टसंश्लिष्टश्चिक्रीड कान्तया नृपः।
अथो चमरचञ्चाख्यपुर्यामिन्द्राशनिः पतिः ॥१३८॥

आसुरीशः सुतस्तस्याशनिघोषः सुघोषवान्।
संसाध्य भ्रामरीं विद्यां पुरं गच्छन्यदृच्छया ॥१३९॥

सुतारां लक्षणैर्लक्ष्यां वीक्ष्य तां लातुमुद्यतः।
मायामृगं महीशस्य रन्तुं स प्राहिणोच्छलात् ॥१४०॥

तं वीक्ष्य सुतारा तारा नृत्यन्तं संजगौ पतिम्।
रमण त्वं मृगं रम्यं रमणाय समानय ॥१४१॥

तदा भूपे मृगं लातुं प्रयात्यशनिघोषकः।
नृरूपं समादाय जगौ तस्याः पुरःस्थितः ॥१४२॥

एहि यावः पुरं यावत्प्रयात्यस्तं दिवाकरः।
इत्युक्त्वा तां विमाने स संरोप्यगान्नभस्तले ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 138 से 143): वहाँ उन्होंने सुतारा के साथ खूब मनचाही क्रीड़ा की। चमरचंचा पुरी का राजा इन्द्राशनि था। उसका अशनिघोष नामक एक पुत्र था। वह सूरज पर्यन्त का स्वामी था और बड़ा मीठा बोलने वाला था। वह भ्रामरीविद्या को साध कर वन से अपने शहर को वापस लौटा जा रहा था। इतने में उसकी दृष्टि नाना लक्षणों से युक्त सुतारा रानी पर जा पड़ी। उसे देखकर उसका मन ललचा गया और वह उसे ले जाने के लिए उद्यत हो गया। उसने छल से राजा के सन्मुख एक माया-मय मृग छोड़ा। वह नृत्य करता हुआ बहुत ही मनोहर जान पड़ता था। उसे देखकर मनोरमा सुतारा ने पतिदेव से कहा कि हे प्रिय ! आप इस सुन्दर हिरण को दिल बहलाने के लिए पकड़ लाइए। सुतारा के कहने पर राजा तो मृग को पकड़ लाने के लिए चला गया और इधर अशनिघोष ने राजा का रूप धर कर सुतारा के पास आकर कहा कि प्रिये ! आओ कुछ जल्दी है, अतएव सूर्यास्त के पहले-पहले हम नगर को पहुँच जाएँ। इतना कहकर वह सुतारा को विमान में बैठाकर आकाश मार्ग से ले चला ॥१३८-१४३॥


रूपं सोऽदर्शयद्गत्वाऽन्तरे कामी सुखी निजम्।
कोऽयं किं रूपमालोक्य विह्वला सेति चाजनि ॥१४४॥

निवृत्तो भूपतिर्मायामृगे याते स्थितोऽपराम्।
तदुक्तवरवेतालीं सुतारारूपधारिणीम् ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 144 से 145): कुछ दूर पहुँचकर उस कामी ने अपना वास्तव रूप प्रगट किया, जिसको देखकर सुतारा बड़ी चिन्तित हुई। वह सोचने लगी कि यह कौन है ? उधर जब वह माया-मय मृग राजा के हाथ न आया और बहुत दूर निकल गया तब श्रीविजय वापस लौटकर उसी स्थान पर आये, जहाँ वे सुतारा को छोड़


दष्टा कुर्कुटनागेन स्थिताहमितिभाषिणीम्।
प्रिययाणामिवालोक्य व्याकुलात्मा नृपोऽजनि ॥१४६॥

मन्त्रौषधमणिप्रायैर्ज्ञातवान्विषमं विषम्।
मर्तुं तया समं भूपश्चितौ तां समरोपयत् ॥१४७॥

सूर्यकान्तसमुद्भूतवह्निनाज्वालयत्ताम्।
तत्र झम्पां प्रकर्तु स आरुरोह समाकुलः ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 144 से 148): गये थे। वहाँ उन्होंने बैताली विद्या को सुतारा के रूप में बैठी हुई देखा, जो अशनिघोष की आज्ञा से वहाँ सुतारा का रूप धर कर बैठी थी और यह कह रही थी कि मुझे कुक्कर नाम सर्प ने काट खाया है। उसे देखकर मालूम पड़ता था मानो वह मर रही है। उसे इस दशा में देखकर श्रीविजय बड़े व्याकुल हुए। उन्होंने मणि, मंत्र, औषध आदि के बहुत से उपचार किये पर जब कुछ भी फल न हुआ तब समझा कि यह विष बड़ा विषम और प्राणों को हरने वाला है। इसका उतरना बहुत ही कठिन है। अन्त में वह भी उसके साथ मरने को तैयार हो गये। उन्होंने चिता बनाकर उस पर सुतारा को रख दिया और सूर्यकान्त मणि से आग जलाकर चिता को सुलगा दिया। इसके बाद वह स्वयं आकुल हो चिता में कूदने के लिए पैर रखने को ही थे ॥१४४-१४८॥


तावता खचरौ क्षिप्रं खादायातौ नृपान्तिकम्।
विच्छेदिनीं परां विद्यां मुक्त्वा चिच्छेद तां खगः ॥१४९॥

वामपादेन चैकेन ताडिता स्थातुमक्षमा।
स्वरूपं प्रकटीकृत्य सागमत्क्वाप्यदृश्यताम् ॥१५०॥

अर्थ (श्लोक 149 से 150): इतने में आकाश से उनके पास दो विद्याधर आ पहुँचे, और उन्होंने विच्छेदिनी विद्या के द्वारा उस वैताली विद्या को नष्टकर अपने बायें पैर से उसके एक जोर की ठोकर लगाई, जिसे न सह कर वह अपना वास्तविक रूप प्रगट कर उसी समय अदृश्य हो गई ॥१४९-१५०॥


एतच्छ्रीविजयो दृष्ट्वा विस्मयव्याप्तमानसः।
किमेतत्खेचरौ प्राह प्राहतुस्तौ च तत्कथाम् ॥१५१॥

अर्थ: यह देख श्रीविजय को बहुत ही अचंभा हुआ। उन्होंने विद्याधरों से पूछा कि यह बात क्या है? उन्होंने उसकी कथा इस भाँति कहना प्रारंभ की ॥१५१॥


भरते खचरावासे दक्षिणश्रेणिवासिनि।
ज्योतिःप्रभे पुरे भूमीट् संभिन्नोऽहं मम प्रिया ॥१५२॥

सुप्रिया सर्वकल्याणी सुतो दीपशिखः सुखी।
रथनूपुरनाथेन गत्वा स्वामिनाप्यहम् ॥१५३॥

तलान्तशिखरोद्याने विहृत्य व्याहृतः क्षणात्।
खे गच्छन्व्योमयानं हि गच्छद्वीक्ष्य परं महत् ॥१५४॥

शुश्रावेति श्रुतिं क्व मे भूपः श्रीविजयो जयी।
रथनूपुरनाथ त्वं मां पाहि परमेश्वर ॥१५५॥

गत्वाहं तत्र चाख्यं कस्त्वममूं कां हरस्यहो।
इत्युक्ते सोऽगदीत्क्रोधाद्दिग्धेशोऽशनिघोषकः ॥१५६॥

अर्थ (श्लोक 152 से 156): भरतक्षेत्र के विजयार्द्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में एक ज्योतिःप्रभपुर नाम नगर है। वहाँ का मैं राजा हूँ। मेरा नाम संभिन्न है। मेरी प्यारी स्त्री का नाम सर्वकल्याणी है और यह दीपशिख नाम मेरा सुखी और सुकुमार पुत्र है। रथनूपुर के राजा अमिततेज हमारे स्वामी हैं। मैं उनके साथ-साथ शिखरतल उद्यान में क्रीड़ा करने के लिए गया था। वहाँ से लौटकर आकाश-मार्ग से जाते हुए मैंने एक बड़ा भारी विमान जाते देखा और यह आर्तवाणी सुनी कि मेरा स्वामी जयी श्रीविजय नरेश कहाँ है ? हे रथनूपुर के स्वामी अमिततेज ! तुम मेरी रक्षा करो। यहाँ आकर अपना प्रभाव दिखाओ। यह सुन मैं उस विमान के पास गया और उसमें बैठे हुए व्यक्ति को नमस्कार कर मैंने पूछा कि तुम


सोऽहं चमरचञ्च्वेशो बलादेनां हरामि भोः। भवतोरस्ति शक्तिश्चेदिमां मोचयतं ध्रुवम् ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 152 से 157): कौन हो और यह कौन है? जिसे तुम बलात् लिये जाते हो। यह सुन अशनिघोष क्रुद्ध हो बोला कि मेरा नाम अशनिघोष है, मैं विद्याधर हूँ और चमरचंच्व पुर का राजा हूँ। यह सुतारा है और इसे मैं जबरदस्ती हरे लिये जाता हूँ। यदि तुममें शक्ति हो तो तुम दोनों इसे छुड़ाने का प्रयत्न करो ॥१५२-१५७॥


श्रुत्वेति मत्प्रभोरेषानुजानेनाद्य नीयते। कथं गच्छामि हन्त्येनमिति योद्धुं समुद्यतः ॥१५८॥

मां संवीक्ष्य सुताराख्यद्युद्धं त्वं मा कृथा वृथा। याहि ज्योतिर्वने भूपं स्थितं पोदननायकम् ॥१५९॥

मदवस्थां समाख्याहि प्रेषितोऽहं तयेति च। इयं त्वच्छत्रुसंदिष्टदेवतेत्यादराहतः ॥१६०॥

ततः श्रुत्वेति भूमिशोऽगदीत्खेचर सत्वरम्। इदं वृत्तं समाख्याहि गत्वा पोदनपत्तने ॥१६१॥

जनन्यनुजबन्धूनामित्युक्तेऽसौ खगेश्वरः। प्राहिणोत्पोदनं सद्यः पुत्रं दीपशिखं तदा ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 158 से 162): सुनकर मैंने सोचा कि यह मेरे स्वामी की बहिन है और इसे यह हरे लिये जाता है। ऐसे समय मेरा चुप रहना ठीक नहीं है। इसे मारकर मैं इसकी रक्षा अवश्य करूँगा। इतना सोचकर मैं युद्ध को तैयार हो गया। मुझे युद्ध के लिए उद्यत देख सुतारा बोली कि तुम युद्ध मत छेड़ो किन्तु ज्योतिर्वन में पोदनपुर-नायक मेरे पति श्रीविजय हैं, उनके पास जाकर उनसे मेरा सब हाल कह दो। अतः मैं सुतारा का भेजा हुआ यहाँ आपके पास आया हूँ और जो यहाँ सुतारा बैठी थी वह सुतारा न थी किन्तु अशनिघोष की सिखाई हुई वैताली विद्या उसके रूप में थी। इसलिए वह मेरी ताड़ना से भाग गई है। यह सुन राजा ने उस विद्याधर से कहा कि, कृपाकर तुम पोदनपुर जाकर वहाँ मेरी माता, छोटे भाई और बन्धुओं से यह सब समाचार कह दो। राजा के कहने से विद्याधर ने उसी समय अपने पुत्र दीपशिख को जो उसी के साथ था, शीघ्र ही पोदनपुर भेज दिया ॥१५८-१६२॥


पोदनेऽपि बहूत्पातजृम्भणं समजायत। तद्वीक्ष्यामोघजिह्वाख्यो जयगुप्तश्च पृच्छितः ॥१६३॥

भूपतेर्भयमुत्पन्नं किंचित्तदपि निर्गतम्। इदानीं कुशलालापी कश्चिदायास्यति स्फुटम् ॥१६४॥

स्वस्था भवत भीतिं मा यातेति संजगौ गिरा। स्वयंप्रभादयस्तुष्टा यावत्तिष्ठन्ति तद्गिरा ॥१६५॥

तावता नभसो दीपशिखः संभूष्य भूतलम्। स्वयंप्रभां प्रणम्यासौ सुतस्याचीकथत्कथाम् ॥१६६॥

क्षेमी श्रीविजयो भीतिर्भवद्भिर्मुच्यतामिति। तद्वृत्तं सर्वमाख्यातं सुताराहरणादिकम् ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 163 से 167): उधर पोदनपुर में भी इस समय बड़े उपद्रव हो रहे थे। उनको देखकर वहाँ अमोघजिह्व और जयगुप्त नामक निमित्तज्ञानियों से पूछा गया कि इन उपद्रवों का क्या फल है ? उन्होंने कहा कि श्रीविजय नरेश पर कोई आपत्ति आई थी परन्तु वह अब कुछ दूर हो गई है तथा अभी थोड़ी देर में ही कोई उनकी कुशल-बात लेकर यहाँ आयेगा। तुम स्वस्थ हो, भय मत करो। निमित्तज्ञानी के इन वचनों को सुनकर स्वयंप्रभा आदि सब सन्तुष्ट होकर पहले की भाँति ही अपने काम-काज करने लगे। इतने में ही आकाश से दीपशिख पृथ्वीतल पर आया और उसने स्वयंप्रभा को प्रणाम कर उससे विजयनरेश की सब कथा कह कर कहा कि श्रीविजय नरेश कुशल हैं, आप लोग किसी प्रकार की चिन्ता न करें। इसके बाद दीपशिख ने सुतारा के हरे जाने आदि का सब हाल कहा, जिसको सुनकर स्वयंप्रभा


तदाकर्णनमात्रेण दावदग्धलतोपमा।
निर्वाणासक्तदीपस्य विगताभा शिखा यथा ॥१६८॥

घनध्वानश्रुतेर्हंसी शोकिनीव स्वयंप्रभा।
तदानीं निर्गता रङ्गच्चतुरङ्गबलोद्धता ॥१६९॥

सखगा ससुता याता वनं तां वीक्ष्य दूरतः।
आयान्तीं स समागत्यानमत्सानुजमातरम् ॥१७०॥

अर्थ (श्लोक 163 से 170): दावानल से जली हुई बेल के समान मुरझा गई अथवा बुझते हुए दीये की प्रभा रहित शिखा के समान तेजहीन हो गई, या यों कहिए कि जिस तरह मेघ की ध्वनि को सुनकर हंसिनी शोक में डूब जाती है उसी तरह वह भी पुत्रवधू के हरे जाने को सुनकर बहुत शोकाकुल हुई। इसके बाद ही वह विद्याधरों तथा पुत्रों को साथ लेकर चतुरंग सेना-सहित उसी वन में पहुँची जहाँ श्रीविजय थे। अपनी माता स्वयंप्रभा को आती हुई देखकर उसके पास आ श्रीविजय ने उसे छोटे भाइयों-सहित नमस्कार किया ॥१६३-१७०॥


सा सदुःखितं संवीक्ष्य प्रोवाचोत्तिष्ठ पत्तनम्।
यावः श्रीविजयाद्यास्ते संययुः स्वपुरं तदा ॥१७१॥

अर्थ: दुःखिनी माता ने पुत्र को देखकर कहा कि उठो, वत्स उठो, घर को चलो और शोक छोड़ो। माता की आज्ञा से श्रीविजय आदि सब नगर को लौट आये ॥१७१॥


तत्र पुत्रं सुखासीनं सुताराहरणादिकम्।
सापृच्छत्सोऽब्रवीन्मातः संभिन्नाख्यः खगोऽप्ययम् ॥१७२॥

उपकारकरो धीमान्सेवकोऽमिततेजसः।
अनेन यत्कृतं तत्को गदितुं भुवि संक्षमः ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 172 से 173): वहाँ आकर जब पुत्र शान्तचित्त हुआ तब स्वयंप्रभा ने उससे सुतारा के हरे जाने का सारा हाल पूछा। श्रीविजय ने माता से सबका सब हाल जैसा का तैसा कहकर कहा कि माता ! यह संभिन्न विद्याधर हम लोगों का बड़ा उपकारी है। यह बुद्धिमान् अमिततेज का सेवक है। इसने हमारे साथ जो कुछ उपकार किया है वह वचनातीत है ॥१७२-१७३॥


मात्रा समं सुसंमन्त्र्यानुजं पोदनरक्षणे।
मुक्त्वा ययौ विमानेन नगरं रथ्नूपुरम् ॥१७४॥

अर्थ: इसके बाद श्रीविजय, माता और अपने छोटे भाई विजयभद्र से सलाहकर तथा विजयभद्र को पोदनपुर की रक्षा के लिए छोड़कर माता के साथ विमान में बैठ रथ्नूपुर पहुँचे ॥१७४॥


ज्ञात्वाथामिततेजाश्च स्वसारं ससुतां पितुः।
गत्वा संमुखमानीयास्थापयत्स्वपुरे स्थिरम् ॥१७५॥

अर्थ: पुत्र-सहित अपनी बुआ को आया जान कर अमिततेज अगवानी के लिए नगर के बाहर आया और उन्हें ले जाकर उसने एक उत्तम स्थान में ठहराया ॥१७५॥


प्राघुर्णकविधिं प्राप्ता प्राह दम्भोलिघोषजम्।
वृत्तं श्रुत्वा खगो दूतं मारीचं प्राहिणोद्द्विषम् ॥१७६॥

स गत्वाशनिघोषस्य जातां दुष्टां खलां गिरम्।
निशम्यागत्य निर्वेद्य सुस्थितामिततेजसे ॥१७७॥

संमन्त्र्य मन्त्रिभिः सत्रं तमुच्छेत्तुं समुद्यतः।
निजाम्नायसमायातविद्यात्रयं स संददे ॥१७८॥

अर्थ (श्लोक 176 से 178): इसके बाद स्वयंप्रभा ने अमिततेज के पास आकर उससे अशनिघोष का सारा हाल कहा। उसे सुनकर अमिततेज ने अशनिघोष के पास अपना दूत भेजा। दूत का नाम मरीचि था। वह अशनिघोष के पास पहुँचा। अशनिघोष ने उसे निष्ठुर और कर्कश वचन कहकर फटकारा। दूत ने वापस आकर अशनिघोष के जैसे के तैसे वचन अमिततेज से कहे। इसके बाद अमिततेज ने मंत्रियों से सलाहकर


भूषाय युद्धवीर्य्यस्त्रवारणे बंधमोचनम्।
रश्मिवेगसुवेगादिसुतैः पञ्चशतैः समम् ॥१७९॥

पोदनेशं च संप्रेष्य शत्रोरुपरि ज्यायसा।
सहस्ररश्मिना सार्धं ह्रीमन्तं खचरो गतः ॥१८०॥

विद्याछेदनसंयुक्तं महाज्वालाह्वयं परम्।
संजयन्तांघ्रिमूले स विद्यां साधयितुं स्थितः ॥१८१॥

अर्थ (श्लोक 176 से 181): अशनिघोष का नाश करने का संकल्प किया और श्रीविजय को युद्धवीर्य, अस्त्रवारण और बंधमोचन ये तीन विद्यायें जो उसकी परम्परा से चली आ रही थीं, देकर तथा रस्मिवेग, सुवेग आदि पुत्रों को साथ भेजकर उसे शत्रु के साथ युद्ध करने को भेजा और स्वयं सहस्र नाम अपने बड़े पुत्र को साथ ले ह्रीमंत पर्वत पर गया और वहाँ संजयंत मुनि के चरणों में बैठकर अन्य विद्याओं को नष्ट करने वाली महाज्वाला नाम की विद्या सिद्ध करने लगा ॥१७६-१८१॥


दुष्टेनाशनिघोषेण श्रुत्वा श्रीविजयागमम्।
रश्मिवेगादिभिः शत्रुयुद्ध्याय प्रेषिताश्च ते ॥१८२॥

सुघोषः शतघोषोऽथ सहस्रादिसुघोषकः।
भूपेन खचरैः सत्रं सर्वे भङ्गं समापिताः ॥१८३॥

अर्थ (श्लोक 182 से 183): इधर दुष्ट अशनिघोष ने श्रीविजय को आया सुनकर रस्मिवेग आदि के साथ युद्ध करने को सुघोष, शतघोष और सहस्रघोष आदि अपने पुत्रों को भेजा। वे सब श्रीविजय के विद्याधरों के साथ लड़ाई में मारे गये ॥१८२-१८३॥


आसुरेय इमं श्रुत्वा क्रुद्धो युद्धार्थमीयिवान्।
युद्धे श्रीविजयो बाणानेनं कर्तुं द्विधामुचत् ॥१८४॥

भ्रामरीविद्यया बाणाद् द्विरूपः सोऽप्यजायत।
द्विगुणत्वं गतोऽप्येवं पुनस्तैस्तेन खण्डितः ॥१८५॥

वज्रघोषमयो जातः संग्रामः समगात्तदा।
सर्वसाधितविद्योऽसौ रथनूपूरभूपतिः ॥१८६॥

महाज्वालाप्रभावेन युद्ध्वा मासार्धमेव च।
नष्टविद्यो ननाशाशु वज्रघोषः परंतपः ॥१८७॥

नाभेयाद्रौ स्थितं देवं विजयाख्यजिनेश्वरम्।
गत्वा भीत्वा सभायां स स्थितस्तावन्नृपादयाः ॥१८८॥

अनुगत्वा विलोक्याशु मानस्तम्भं गलन्मदाः।
जिनं प्रदक्षिणीकृत्य प्रणेमुर्मूर्धपाणयः ॥१८९॥

अर्थ (श्लोक 184 से 189): यह सुन अशनिघोष को बहुत क्रोध आया। तब वह स्वयं युद्ध के लिए आ चढ़ा। दोनों में घमासान युद्ध होने लगा। युद्धभूमि कोलाहल से पूर्ण हो गई। वैरी के शरीर को खण्ड-खण्ड करने के लिए श्रीविजय जो बाण छोड़ता था, उन्हें अशनिघोष भ्रामरीविद्या के बल से नष्टकर अपने दूने रूप बनाता जाता था। इसी तरह ज्यों-ज्यों श्रीविजय बाणों के द्वारा उसके शरीर को खण्ड-खण्ड करता जाता था त्यों-त्यों वह अपने रूपों को अनेक बनाता जाता था। थोड़ी ही देर में सारा युद्धस्थल अशनिघोष-मय देख पड़ने लगा। उधर से सब विद्याओं का स्वामी रथनूपुर का अधिपति अमिततेज भी महाज्वाला विद्या को सिद्ध कर युद्धस्थल में आ पहुँचा और पंद्रह दिन बराबर युद्ध कर उसने महाज्वाला के प्रभाव से अशनिघोष की सारी विद्याएँ नष्टकर दीं। तब अशनिघोष बहुत ही लज्जित हुआ और वहाँ से भागकर वह भय के मारे कैलाश पर्वत पर विजय भगवान् की सभा में जा छिपा। उसके पीछे-पीछे और-और राजगण भी उसके पकड़ने को वहाँ जा पहुँचे। पर वे सब मानस्तंभों को देखते ही मान-रहित ही शान्तचित्त हो गये, उनका जो कुछ वैर-विरोध था वह सब मिट गया। उन्होंने भगवान् की तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें नमस्कार किया और सबके सब एक साथ बैठ गये।


मुक्तवैरास्तदा सर्वे तत्रासिषत ते समम्।
तदासुरी समागत्य सुतारां द्रुतमानयत् ॥१९०॥

मत्पुत्रस्यापराधं भो युवां क्षन्तुं समर्हतम्।
साभाष्येत्यार्पयत्तां श्रीविजयामिततेजसोः ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 184 से 191): इसी समय वहाँ अशनिघोष की माता आसुरी भी साथ में सुतारा को लेकर आ गई। वह उनसे बोली कि मेरे पुत्र का जो अपराध हुआ है उसे आप दोनों ही क्षमा करो। इतना कहकर उसने श्रीविजय और अमिततेज को सुतारा सौंप दी ॥१८४-१९१॥


ततः खगपतिपृष्ठं धर्मं प्रोवाच तीर्थराट्।
सम्यक्त्वव्रततत्त्वार्थं श्रुत्वा भूपोऽब्रवीदिति ॥१९२॥

सुतारा मेऽनुजानेन हृता वै केन हेतुना।
इति पृष्टो विशिष्टः सोऽवादीद्देवो नृपं प्रति ॥१९३॥

भरते मागधे देशेऽचलग्रामे निवासभृत्।
अग्निलास्त्रीपतिर्विप्रो विदितो धरणीजटः ॥१९४॥

तत्सुताविन्द्रभूत्यग्निभूतौ जातौ मनोहरौ।
दासेरः कपिलस्तस्य वेदाध्ययनसक्तधीः ॥१९५॥

तं वेदार्थविदं मत्वा विप्रो हि निरजीगमत्।
विषण्णः कपिलस्तस्माद्ययौ रत्नपुरं परम् ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 192 से 196): इसके बाद अमिततेज के पूछने पर विजय भगवान् धर्म का उपदेश करने लगे। उन्होंने सम्यग्दर्शन व्रत और तत्त्वों का व्याख्यान किया। उसे सुनकर अमिततेज ने पूछा कि भगवन्! यह बताइए कि अशनिघोष ने मेरी बहिन सुतारा को क्यों हरा ? इसके उत्तर में भगवान् बोले कि मैं इसका कारण बताता हूँ, तुम ध्यान देकर सुनो। भरतक्षेत्र के मगधदेश में अचलग्राम नामक एक गाँव है। वहाँ एक धरणीधर नाम ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री का नाम अग्निला था। उसके इन्द्रभूति और अग्निभूति नाम दो पुत्र हुए। वे बहुत सुन्दर थे। इनके सिवाय धरणीधर के एक दासी पुत्र भी था। उसका नाम था कपिल। वह हमेशा वेद के पढ़ने में लगा रहता था। थोड़े ही समय में वह वेद का अच्छा जानकार पण्डित हो गया। उसे ऐसा देखकर ईर्ष्या से धरणीधर ने घर से निकाल दिया। पिता के इस बर्ताव से वह बहुत खेदखिन्न हुआ। घर से निकल कर थोड़े ही दिनों में वह रत्नपुर पहुँचा ॥१९२-१९६॥


वेदाध्ययनयुक्ताय सत्यभामां च सत्यकिः।
विप्रो जम्बूद्भवां पुत्रीं विधिनास्मै समर्पयत् ॥१९७॥

तं राजपूजितं स्वाढ्यं श्रुत्वा च धरणीजटः।
निःस्वत्वहानयेऽयासीद्दुःखी कपिलसंनिधिम् ॥१९८॥

अर्थ (श्लोक 197 से 198): वहाँ एक सत्यकि नाम ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री का नाम जाम्बू था। उसके एक सत्यभामा नाम पुत्री थी। एक दिन कपिल को देखकर सत्यकि ने सोचा कि यह लड़का वेद का पाठी अच्छा विद्वान् है। इसके साथ कन्या ब्याह देना योग्य और शास्त्र के अनुकूल है। इसके बाद उसने कपिल के साथ विधि-पूर्वक सत्यभामा का विवाह कर दिया। कपिल वहाँ रहकर थोड़े ही दिनों में खूब धनी हो गया। राजा की ओर से भी उसकी पूछताछ होने लगी। जब धरणीधर ने सुना कि कपिल खूब धनाढ्य और राज्यमान हो गया है तब वह दरिद्री दरिद्रता नष्ट करने के लिए उसके पास रत्नपुर आया ॥१९७-१९८॥


कपिलो दूरतो वीक्ष्य समुत्थायानमत्तकम्।
जनकोऽयं जनान्वक्ति मम सोऽपि तथावदत् ॥१९९॥

अर्थ: कपिल ने उसे दूर से आता देख उठकर नमस्कार किया और लोगों में ऐसी प्रसिद्धि कर दी कि


धनवस्त्रादिकं लात्वा तुष्टोऽसौ निःस्वनाशतः।
एकदा सत्यभामा तं पूजयित्वा धनादिभिः ॥२००॥

भक्त्या परोक्षतोऽप्राक्षीत्पुत्रोऽयं वा न ते वद।
समादाय धनं विप्रः प्रकथ्य तद्विचेष्टितम् ॥२०१॥

अगाद्देशान्तरं शीघ्रं धनं किं न करोति वै।
अथ सा शरणं श्रान्ता गता श्रीषेणभूपतेः ॥२०२॥

अर्थ (श्लोक 199 से 202): यह मेरा पिता है। धरणीधर ने भी लोगों से यही कहा कि यह मेरा प्रिय पुत्र है। कपिल ने धरणीधर को धन, वस्त्र, आभूषण आदि खूब सम्पत्ति दी जिससे उसकी दरिद्रता दूर हो गई और वह एक भला मानस बन गया। एक दिन सत्यभामा ने धन, वस्त्र आदि से धरणीधर का खूब आदर सत्कार कर भक्तिभाव दिखाते हुए एकान्त में पूछा कि कपिलजी क्या सचमुच ही ये आपके पुत्र हैं? धरणीधर लोभ के वश कपिल की सारी कथा सत्यभामा को सुना कर उसी समय दूसरे देश को रवाना हो गया। सच है धन मनुष्य से क्या-क्या काम नहीं करा लेता ॥१९९-२०२॥


स्त्री सिंहनन्दिता यस्य नन्दिता चापरा प्रिया।
इन्द्रोपेन्द्राख्यया ख्यातौ तयोः पुत्रौ महाप्रभौ ॥२०३॥

अर्थ: रथनूपुर का राजा श्रीषेण था। उसकी दो रानियाँ थीं। एक सिंहनंदिता और दूसरी आनंदिता। उसके इन्द्र और उपेंद्र नाम दो पुत्र थे ॥२०३॥


सत्यभामा नृपस्याग्रे वृत्तं भर्तृसमुद्भवम्।
अवीवदन्नृपो ज्ञात्वा नगरात्तं निराकरोत् ॥२०४॥

श्रीषेणोऽपि कदाचिच्च चारणद्वन्द्वमागतम्।
ननामामितगत्याख्यारिंजय्याख्यं स्ववेश्मनि ॥२०५॥

ताभ्यां दत्त्वान्नदानं स समुपार्ज्य महाशुभम्।
देवीभ्यामनुमोदेन दानस्य सत्यभामया ॥२०६॥

अर्थ (श्लोक 204 से 206): पति के ऐसे चरित को सुनकर सत्यभामा श्रीषेण की शरण में आई और उसने महाराज से अपने पति का सारा हाल जैसा सुना था कह दिया, जिसको सुनकर राजा ने कपिल को शहर बाहर निकाल देने की आज्ञा दे दी। एक दिन श्रीषेण के यहाँ दो चारण मुनि आये। उनके नाम अमितगति और अरिंजय थे। उनको राजा ने पड़गाहा और नमस्कार आदि कर विधि-पूर्वक आहार दिया, जिससे राजा को अतिशय पुण्य-लाभ हुआ। श्रीषेण की दोनों रानियों और सत्यभामा ने दान की अनुमोदना की, जिसके प्रभाव से उन्होंने राजा के साथ-साथ उत्तम भोगभूमि की तीन पल्य की आयु का बंध किया ॥२०४-२०६॥


भोगभूम्याः परं चायुरवापुस्ते शुभाः शुभम्।
कौशाम्ब्यामथ विख्यातो महाबलमहीपतिः ॥२०७॥

श्रीमती वल्लभा तस्य श्रीकान्ता तत्सुता शुभा।
इन्द्रसेनाय तां भूपो विवाहविधये ददौ ॥२०८॥

सामान्यवनिता तत्र तया सार्धं समागता।
सोपेन्द्रसेनं संलुब्धा जाता कर्मविपाकतः ॥२०९॥

इन्द्रस्तथात्वमाकर्ण्य क्रुद्धो युद्धाय नद्धवान्।
उद्यानवर्तिनोर्युद्धं तयोराकर्ण्य भूमिपः ॥२१०॥

अर्थ (श्लोक 207 से 210): कौशाम्बी का राजा महाबल था। उसकी रानी का नाम श्रीमती था। उसके एक श्रीकान्ता नाम की पुत्री थी। महाबल ने श्रीकान्ता का विवाह इन्द्रसेन के साथ कर दिया था और श्रीकान्ता के साथ इन्द्र को एक दासी प्रदान की थी। दैवयोग से वह दासी उपेन्द्रसेन पर आसक्त हो गई। यह बात जब इन्द्रसेन के कानों पहुँची तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह उपेन्द्र के साथ युद्ध करने को तैयार हो गया। दोनों भाई-भाई में युद्ध की तैयारी सुनकर श्रीषेण उनकी लड़ाई निपटाने के लिए उनके पास गया। उन्हें बहुत कुछ समझाया, पर वह सफल न हुआ। तब उसे बहुत ग्लानि हुई और अपना कहना


तन्निवारयितुं नैव शक्तो निर्वेद्यमानसः।
आज्ञोल्लंघनदुःखेनाघ्राय पद्मं विषाविलम् ॥२११॥

मृतिं ययौ तदा देव्यौ सत्यभामा च तन्मृतेः।
विधाय तद्विधिं साध्व्यः समीयुर्विगतासुताम् ॥२१२॥

अर्थ (श्लोक 207 से 212): न मानने के कारण दुख से उसने स्वयं विष का फूल सूँघकर आत्महत्या कर ली। श्रीषेण की यह दशा देख दोनों रानियों और सत्यभामा ने भी विषफूल सूँघकर आत्मघात कर लिया ॥२०७-२१२॥


धातकीखण्डपूर्वार्धकुरूषूत्तरगेषु च।
तदा तौ दम्पती भूपोऽभूतां च सिंहनन्दिता ॥२१३॥

अनिन्दिता बभूवार्यः सत्यभामा च भामिनी।
सर्वेऽपि ते सुखं तस्थुस्तत्र भोगभरान्विताः ॥२१४॥

अर्थ (श्लोक 213 से 214): श्रीषेण और रानी सिंहनंदिता का जीव मरकर धातकीखण्ड द्वीप की उत्तरकुरु नाम उत्तम भोगभूमि में युगल उत्पन्न हुए एवं अनिंदिता और सत्यभामा के जीव भी युगल उत्पन्न हुए। इनमें अनिंदिता का जीव तो स्त्रीलिंग छेद कर पुरुष हुआ था और सत्यभामा उसकी स्त्री हुई थी ॥२१३-२१४॥


तत्र पल्यत्रयं भुक्त्वा भोगान्भोगार्थिनो मृताः।
श्रीषेणस्तत्र सौधर्मे विमाने श्रीप्रभोऽभवत् ॥२१५॥

विद्युत्प्रभा तथा सिंहनन्दितासीत्तदङ्गना।
अनिन्दिताभवद्देवो विमाने विमलप्रभः ॥२१६॥

शुक्लप्रभाभिधा देवी ब्राह्मणी विमलप्रभे।
पञ्चपल्योपमायुष्काःशर्मासेदुः समुन्नताः ॥२१७॥

श्रीषेणः प्रच्युतस्तस्मादर्ककीर्तिसुतो भवान्।
जाता ज्योतिःप्रभा कान्ता या पूर्वं सिंहनन्दिता ॥२१८॥

अनिन्दिताचरो देवोऽजनि श्रीविजयो महान्।
सत्यभामा सुतारासीत्कपिलः प्राक्तनः खलः ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 215 से 219): उनकी आयु तीन पल्य की थी। वे सबके सब वहाँ कल्पवृक्षों के सुख भोगते थे और सुखचैन से अपना समय बिताते थे। आयु पूरी होने पर मरकर शेष पुण्य के प्रभाव से वे देव गति में गये। श्रीषेण का जीव सौधर्म स्वर्ग में श्रीप्रभ नाम देव हुआ और सिंहनंदिता का जीव उसकी विद्युतप्रभा नाम देवी हुई एवं अनिंदिता का जीव विमलप्रभ विमान में भवदेव नाम देव और सत्यभामा का जीव उसी विमान में शुक्लप्रभा नाम उसकी देवी हुई। उनकी आयु पाँच पल्य की थी। आयु-पर्यन्त स्वर्ग के सुखों को भोगकर वे वहाँ से चयकर श्रीषेण का जीव तो तुम अमिततेज हुए हो और सिंहनंदिता का जीव ज्योतिःप्रभा नाम तुम्हारी कान्ता हुई है एवं अनिंदिता का जीव श्रीविजय और सत्यभामा का जीव सुतारा हुई है ॥२१५-२१९॥


बभ्राम भवकान्तारं पापात्किं जायते शुभम्।
वने स भूतरमण ऐरावतीसरित्तटे ॥२२०॥

तापसाश्रमसंवासिकौशिकात्समजायत।
सुतश्चपलवेगाया मृगशृङ्गोऽपि तापसः ॥२२१॥

अर्थ (श्लोक 220 से 221): उधर उस दुष्ट कपिल के जीव ने बहुत काल तक संसार परिभ्रमण कर अनन्त दुख उठाये। सच है पाप से जीवों को घोरातिघोर दुख उठाने पड़ते हैं। भूतरमण वन में ऐरावती नदी के किनारे तापसियों का एक आश्रम था। उसमें एक कौशिक नाम तापस रहता था। उसकी स्त्री का नाम चपलवेगा था। कपिल का जीव उसके वहाँ मृगशृंग नाम पुत्र हुआ। वह भी तापस हो गया ॥२२०-२२१॥


दृष्ट्वा चपलवेगस्य विभूतिं खेचरेशितुः।
निदानमकरोन्मूढोऽशनिघोषस्ततच्युतः ॥२२२॥

अर्थ: एक दिन मृगशृंग ने चपलवेग नाम विद्याधरों के राजा की विभूति को देखकर यह निदान किया


जातोऽयं स्नेहतस्तारां सुतारां चाग्रहीद् हठात्।
भवे त्वं पञ्चमे भावी चक्रवर्ती जिनेश्वरः ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 222 से 223): कि अगले भव में मैं इसके यहाँ पुत्र-जन्म धारण करूँ। राजन्! निदान के प्रभाव से वह मृगशृंग ही चपलवेग के यहाँ यह अशनिघोष नाम पुत्र हुआ है। इसको हित-अहित का कुछ भी विचार नहीं है। उसी स्नेह के वशीभूत हो इसने सुन्दरी सुतारा को हरा था ॥२२२-२२३॥


श्रुत्वेत्यशनिघोषाख्यो जनन्यस्य स्वयंप्रभा।
सुताराप्रमुखाश्चान्ये जगृहुः संयमं परम् ॥२२४॥

अर्थ: अमिततेज! तुम इस भव से पाँचवें भव में चक्रवर्ती, तीर्थंकर और कामदेव इन तीन पदों के धारी महात्मा होओगे। यह कथा सुनकर अशनिघोष, स्वयंप्रभा और सुतारा आदि तथा और बहुत से सत्पुरुष उस समय संयम धारण कर साधु हो गये ॥२२४॥

चतुर्थ पर्व (भाग 2/2)

प्रवन्द्य ते जिनं जग्मुश्चक्रवर्तिसुतादयः।
स्वं स्वं पुरं पताकाढ्यं विद्येशामिततेजसा ॥२२५॥

पर्वसु प्रोषधं कुर्वन्नर्ककीर्तिसुतः शुभः।
प्रायश्चित्तं चरन्योग्यं पूजया पूजयञ्जिनम् ॥२२६॥

दद्दानं सुपात्रेभ्यः शृण्वन्धर्मकथां पराम्।
निर्दोषं निर्मलं शान्तं सम्यक्त्वं श्रितवाञ्शमी ॥२२७॥

अर्थ (श्लोक 225 से 227): इसके बाद भगवान् को नमस्कार कर श्रीविजय आदि सब अमिततेज के साथ ध्वजा, तोरणों से सुसज्जित अपने-अपने नगरों को चले आये। नगर में आकर अमिततेज ने धर्म-साधन में अधिक मन लगाया। वे पर्व के दिनों में उपवास करते अपने किये हुए अपराधों का प्रायश्चित लेते, भगवान् की पूजा और स्तुति में दत्तचित्त रहते, पात्रों को दान देते तथा हमेशा धर्मकथा में लीन रहते। ऐसा करते-करते उन्हें निर्मल और निर्दोष सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हो गई थी ॥२२५-२२७॥


प्रजानां पितृत्वयाता संयमीव शमं श्रितः।
धर्म्यं प्रावर्तयत्कर्म लोकद्वयहितोद्यतः ॥२२८॥

प्रज्ञप्तिः स्तम्भनी वह्निजलयोः कामरूपिणी।
विश्वप्रकाशिका विद्या प्राप्त्यतीघातकामिनी ॥२२९॥

आकाशगामिनी चान्योत्पातिनी च वशंकरा।
आवेशनी शत्रुदमा तथा प्रस्थापनी परा ॥२३०॥

आवर्तनी प्रहरणी प्रमोहिनी विपाटिनी।
संक्रामणी संग्रहणी भञ्जनी च प्रवर्तनी ॥२३१॥

प्रहापनी प्रमादिन्या प्रभावती पलायिनी।
निक्षेपणी च चाण्डाली शबरी च परा स्मृता ॥२३२॥

गौरी खट्वाङ्गिका श्रीमद्गुण्या च शतसंकुला।
मातङ्गी रोहिणी ख्याता कूष्माण्डी वरवेगिका ॥२३३॥

महावेगा मनोवेगा चण्डवेगा लघूकरी।
पर्णलघ्वी च चपलवेगा वेगावती मता ॥२३४॥

अर्थ (श्लोक 228 से 234): वे बड़े मंदकषायी और प्रेम से पिता की तरह प्रजा का पालन करते थे, मुनियों की भाँति शान्तचित्त और धर्म-कर्म में लीन तथा उभय लोक सम्बन्धी हित के इच्छुक थे। वे बहुत-सी विद्याओं के भण्डार थे, जो कुल और जाति के निमित्त से उन्हें प्राप्त हुई थीं। उनके नाम सुनिए। प्रज्ञप्ति, आग और जल को थांभने वाली स्तंभिनी, कामरूपिणी, विश्वप्रकाशिका, अप्रतिघात-कामिनी, आकाशगामिनी, उत्पन्तिनी, वशंकरी, आवेशिनी, शत्रुदमा, प्रस्थापनी, आवर्तनी, प्रहरणी, प्रमोहनी, विपाटिनी, संक्रामणी, संग्रणी, भंजनी, प्रवर्तिनी, प्रतापनी, प्रभावती, पलायिनी, निक्षेपणी, चांडाली, शवरी, गौरी, खट्वांगिका, श्रीमद्गुणी, शतसंकुला, मातंगी, रोहिणी, कुष्मांडी, वरवेगिका, महावेगा, मनोवेगा, चंडवेगा, लघुकरी, पर्णलघ्वी, चपलवेगा, वेगावती, महाज्वाला, शीतवैतालिका,


महाज्वालाभिधा शीतोष्णादिवैतालिके मते। सर्वविद्यासमुच्छेदा तथा बन्धप्रमोचनी ॥२३५॥

प्रहारावरणी युद्धवीर्या च भ्रामरी खगम्। भोगिन्याद्याः श्रिता विद्याः कुलजातिप्रसाधिताः ॥२३६॥

तासां श्रेण्योर्द्वयोश्चाधिपत्येन विदितो भुवि। भुञ्जन्भोगान्कदाचिच्च दत्वा दानं मुनीशिने ॥२३७॥

प्रापद्दमवराख्यायाश्चर्यपञ्चकमम्बरे। चारणायान्यदामिततेजःश्रीविजयौ वने ॥२३८॥

अर्थ (श्लोक 228 से 238): उष्णतालिका, सर्वविद्या-समुच्छेदा, बंधप्रमोचिनी, प्रहारावरणी, युद्धवीर्या, चामरी और योगिनी इत्यादि। वे इन विद्याओं और दोनों श्रेणियों के स्वामी थे एवं संसार-प्रसिद्ध थे। पुण्य के उदय से उन्हें भोग-विलास की सब सामग्री यथेष्ट प्राप्त थी। एक दिन पुण्य-योग से उनके यहाँ दमवर नाम चारण मुनि आहार को आये। अमिततेज ने उन्हें विधि-पूर्वक आहार-दान दिया, जिसके प्रभाव से उनके यहाँ पंचाश्चर्य की वर्षा हुई ॥२२८-२३८॥


सुरदेवगुरू दृष्ट्वा नत्वा च मुनिपुङ्गवौ। श्रुत्वा धर्मं ततोऽप्राक्षीत्सुतः श्रीविजयी नतः ॥२३९॥

आत्मनो भवसंबंधं पितुश्च भगवान्मुनिः। श्रुत्वा प्राह भवांस्तस्य पितुश्च विश्वनन्दिनः ॥२४०॥

अर्थ (श्लोक 239 से 240): एक समय अमिततेज और श्रीविजय दोनों वन में विहार के लिए गये हुए थे। वहाँ उन्होंने सुरगुरु और देवगुरु नाम दो महर्षियों को देखा। दोनों ने मुनियों को भक्तिभाव से नमस्कार कर उनसे धर्म का उपदेश सुना। इसके बाद श्रीविजय ने उनसे नम्रता भरे शब्दों में पूछा कि प्रभो! मेरी और मेरे पिता की पूर्वभव को कथा कहिए। मुनिराज ने श्रीविजय के पूर्वभवों का और त्रिपृष्ट नारायण के विश्वनन्दि के भव से लेकर कई एक भवों का वर्णन किया ॥२३९-२४०॥


तन्माहात्म्यं निशम्यासौ तत्पदाप्तनिदानकः। भूचरैः खचरैः सेव्यौ भेजतुस्तौ सुखामृतम् ॥२४१॥

अर्थ: श्रीविजय ने पिता के माहात्म्य को सुनकर उनके पद की प्राप्ति का निदान बाँधा। बाद खेचरों और भूचरों द्वारा सेवित वे दोनों अपने-अपने नगर को चले आये और वहाँ सुखामृत का पान करते हुए सुख से काल बिताने लगे ॥२४१॥


पार्श्वे विपुलविमलमत्योः श्रुत्वा मुनीशयोः। मासमात्रं महीनाथावायुर्धर्मदयोद्यतौ ॥२४२॥

दत्त्वार्कतेजसे खेटः श्रीदत्ताय महीपतिः। राज्यमाष्टाह्निकीं पूजां कृत्वा नन्दनपार्श्वगे ॥२४३॥

चन्दने मुनिसंगेन प्रायोपगमनोद्यतौ। वने संन्यस्य स्वप्राणान्विससर्जतुरुत्तमान् ॥२४४॥

अर्थ (श्लोक 242 से 244): एक बार इन दोनों ने विपुलमति और विमलमति नाम मुनीश्वरों के मुख-कमल से यह सुना कि उनकी आयु अब केवल एक ही महीने की शेष रह गई है। यह सुन वे और भी श्रद्धाभक्ति के साथ तन-मन से धर्मपालन करने लगे। इसके बाद अमिततेज ने अर्कतेज को और श्रीविजय ने श्रीदत्त को राज-पाट सौंपकर भक्ति से अष्टाह्निक पूजा की और दोनों नंदनवन के पास के चंदनवन में गये। वहाँ उन्होंने मुनियों के समागम में प्रायोपगमन नाम संन्यास धारण किया और शान्त परिणामों से प्राणों का त्याग कर वे स्वर्ग में देव हुए ॥२४२-२४४॥


कल्पे त्रयोदशे नन्द्यावर्तेऽभूद्रविचूलकः। खगः श्रीविजयोऽप्यत्र स्वस्तिके मणिचूलकः ॥२४५॥

अर्थ: अमिततेज का जीव तेरहवें स्वर्ग के नंद्यावर्त विमान में रविचूलक और श्रीविजय का जीव


विंशतिं सागरान्भुक्त्वा जीवितं तौ ततो मृतौ।
द्वीपेऽत्र प्राग्विदेहाख्ये सद्वत्सकावतीति च ॥२४६॥

देशे प्रभावतीपुर्याः पत्युः स्तिमितसागरात्।
वसुंधर्यां सुतो जज्ञे रविचूलोऽपराजितः ॥२४७॥

स्वस्तिकाद्विच्युतो देवो मणिचूलोऽप्यभूत्सुतः।
श्रीमाननन्तवीर्याख्यो देव्यामनुमतौ ततः ॥२४८॥

नित्योदयौ जगन्नेत्रकमलाकरभास्करौ।
पद्मानन्दकरौ तौ च रेजतुः प्राप्तयौवनौ ॥२४९॥

भूपः कुतश्चिदासाद्य वैराग्यमात्मजौ तकौ।
तदैव स समाहूय राज्ये संस्थाप्य निर्गतः ॥२५०॥

स्वयंप्रभजिनस्यान्ते प्रायासीत्संयमं नृपः।
धरणेन्द्रर्द्धिमलोक्य तत्प्राप्तिनिदानवान् ॥२५१॥

अर्थ (श्लोक 245 से 251): उसी स्वर्ग के स्वस्तिक विमान में मणिचूलक नाम देव हुआ। वहाँ उनकी बीस सागर की आयु हुई। आयुपर्यन्त सुख भोगकर वे वहाँ से चयकर इसी जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी में स्तिमितसागर राजा के यहाँ पुत्र हुए। स्तिमितसागर की दो रानियाँ थीं, एक वसुंधरा और दूसरी अनुमति। इनमें से वसुंधरा के गर्भ से रविचूलक का जीव अपराजित और अनुमति के गर्भ से मणिचूलक का जीव अनंतवीर्य पुत्र हुआ। वे दोनों जगत् के नेत्र-कमलों को प्रफुल्लित करने वाले और सदाकाल ही उदित रहने वाले सूरज थे, लक्ष्मी को आनन्द देने वाले और धीर-वीर थे। जब वे दोनों युवा हुए तब स्तिमितसागर किसी कारणवश संसार-भोगों से विरक्त हो, पुत्रों पर राज-भार डाल, वन में जा स्वयंप्रभ गुरु के पास दीक्षित हो गया। दैवयोग से एक दिन स्तिमितसागर ने धरणेन्द्र की विभूति देखी और उसके पाने का निदान किया। निदान के प्रभाव से वह मरकर धरणेन्द्र ही हुआ। ग्रन्थकार कहते हैं कि आत्मिक सुख को नष्ट करने वाले निदान बंध को धिक्कार है ॥२४५-२५१॥


मृत्वा धरणेशितां प्राप सुखघ्नं धिग्निदानकम्।
अपराजितभूपालोऽनन्तवीर्यो महामनाः ॥२५२॥

इन्द्रप्रतीन्द्रवत्तौ च दधतुश्च वसुंधराम्।
एकदा बर्बरी ख्याता नटी चान्या चिलातिका ॥२५३॥

प्राभृतीकृत्य केनापि प्रेषिते ते सुखावहे।
भूपौ तौ भूरिभूमीशभूषितप्रान्तभूतलौ ॥२५४॥

तयोर्नृत्यं स्थितौ द्रष्टुमायासीन्नारदस्तदा।
नृत्यासंगात्कुमाराभ्यां न दृष्टः स विधेः सुतः ॥२५५॥

अर्थ (श्लोक 252 से 255): इधर अपराजित और अनंतवीर्य पृथ्वी का भरण-पोषण करते हुए इन्द्र और प्रतीन्द्र के जैसे सुशोभित होते थे। एक दिन उनकी सेवा में किसी राजा ने बर्बरी और चिलातिका नाम की दो नर्तकी भेजीं। वे बहुत ही मनोहारी सुखदाई नृत्य करती थीं। उनका नृत्य देखने को और-और बहुत से राजाओं के साथ वे दोनों भाई भी नाट्यशाला में बैठे हुए थे। उस समय उनकी अपूर्व ही शोभा थी। दैवयोग से उसी समय उन्हें देखने को वहाँ नारद आये परन्तु अपराजित और अनन्तवीर्य का उपयोग नृत्य की ओर लग रहा था, इसलिए उन्होंने नारद को न देख पाया ॥२५२-२५५॥


जाज्वलत्कोपसंतप्तः शुचिचण्डांशुवत्तपन्।
दमितारिसभां प्राप्य नारदो देहिदुःखदः ॥२५६॥

अर्थ: इससे अपना अपमान समझ नारद जल-भुनकर आग-बबूला हो गये और उसी समय कुँवार मास के सूरज की तरह तपते हुए जीवों का अनिष्ट करने वाले नारद दमतारि प्रतिनारायण के नगर में पहुँचे। दमतारि सिंहासन पर विराजमान था। बहुत से सभ्यगण उसकी सेवा में उपस्थित थे। वह


तत्र विष्टरसन्निष्ठं विशिष्टं शिष्टसेवितम् ।
गरिष्ठमिष्टसंदिष्टसेवं तं वीक्ष्य खाङ्गणात् ॥२५७॥

अवतीर्याशिषं दत्वा स्थिते तस्मिन्खगाधिपः।
तमभ्युत्थाननत्याद्यैः संमान्यास्थापयत्सदे ॥२५८॥

दमितारिरवोचत्तं भवन्तो भक्तवत्सलाः।
भव्या भवभ्रमं भेत्तुं भान्तो भूतविभूतयः ॥२५९॥

किं कार्यं हेतुना केनागमनं ब्रूत वः प्रभो।
इत्याकर्ण्य वचोऽवादीन्नारदः शृणु खेचर ॥२६०॥

त्वदर्थं सारभूतानि वस्तून्यालोकयन्भ्रमन्।
दृष्ट्वा च नर्तकीयुग्मं रम्भोर्वशीसमं महत् ॥२६१॥

अस्थानस्थं भवद्योग्यमनिष्टं सोढुमक्षमः।
आयातोऽहं कथं सोढः पादे चूडामणिः स्थितः ॥२६२॥

खगापराजितानन्तवीर्यगेहे न शोभते।
तच्छोभते भवद्गेहे रङ्गान्यालयवन्मणिः ॥२६३॥

अर्थ (श्लोक 256 से 263): महापुरुष बहुत गौरव-युक्त था। मनोरथ की सिद्धि की लालसा से सभी जन आ-आ कर उसकी उपासना-सेवा करते थे। उसको देखकर नारदजी आकाश से पृथ्वीतल पर उतरे और दमतारि को शुभ आशीर्वाद देकर सभामण्डप में आ खड़े हुए। उन्हें देखते ही राजा सिंहासन छोड़कर उठ खड़ा हुआ और उसने नमस्कार कर उन्हें बड़े आव-आदर के साथ मनोहर सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद दमतारि बोला, महाराज! आप भक्तों पर प्रेम की दृष्टि से देखने वाले भव्योत्तम हैं, संसार-परिभ्रमण को मिटाने वाले और जीवों को विभूति देकर सुखी करने वाले हैं, एवं आप सब तरह सुशोभित हैं। कहिए कि आज आपका यहाँ पधारना कैसे हुआ। यह सुन नारदजी बोले, राजन्! सुनिए। मैं हमेशा आपके योग्य सारभूत और उत्तम पदार्थों की खोज में इधर-उधर घूमा करता हूँ। मैंने कल रंभा और उर्वशी के समान दो नर्तकियों को प्रभाकरीपुरी के राजा अपराजित और अनंतवीर्य की सभा में नृत्य करते हुए देखा और इसी समाचार को लेकर मैं आपके पास आया हूँ। कारण वे दोनों आपके ही योग्य हैं। अतः मुझसे यह अनिष्ट सहन नहीं हुआ और मैं शीघ्र ही यहाँ चला आया हूँ। सभी मानते हैं कि शिरोधार्य चूड़ामणि रत्न यदि पैर में पहिन लिया जाए तो किसी को भी सहन न होगा। राजन्! जिस तरह अमूल्य मणि रंक-दरिद्री पुरुष के यहाँ शोभा नहीं पाता, वह राजाओं, रईसों, साहूकारों के यहाँ ही शोभित होता है उसी तरह वे नर्तकी भी अपराजित और अनंतवीर्य के यहाँ शोभा नहीं पाती, वे आप जैसे महापुरुष के यहाँ ही शोभा पावेगी ॥२५६-२६३॥


श्रुत्वासौ प्राहिणोद्दूतं सोपहारं स्फुरद्गुणम्।
गत्वा दूतः प्रभाकर्या वीक्ष्य तौ नरपुङ्गवौ ॥२६४॥

मुक्त्वोपायनमाचख्यौ युवां पाति खगाधिराट् ।
श्रीमत्ा तेन देवेन प्रेषितोऽहं युवां प्रति ॥२६५॥

याचितं नर्तकीयुग्मं दातव्यं प्रीतये ततः।
निशम्येदं तकौ दूतं प्रहित्याहूय मन्त्रिणः ॥२६६॥

अर्थ (श्लोक 264 से 266): यह सुन दमतारि ने उसी समय कुछ भेंट देकर दूत को अपराजित और अनंतवीर्य के पास भेजा, जो बहुत ही चतुर और समयोचित कार्यों में कुशल था। प्रभाकरीपुरी में पहुँचकर उसने उन पुरुषोत्तमों को सभामंडप में बैठे हुए देखा और उनके आगे भेंट रखकर उन्हें नमस्कार किया तथा कहा कि राजन्! आप महानुभावों के लिए दमतारि प्रतिनारायण ने कुशल का संदेशा भेजा है तथा मुझे आपके पास भेजकर आपसे उन दो नर्तकियों की याचना की है जो कि आपके पास हैं। कृपाकर आप उन दोनों-वर्बरी और चिलातिका-नर्तकियों को उन्हें दे दीजिए। इससे परस्पर में बहुत ही


किं कार्यमिति पृच्छन्तौ स्थितौ तत्पुण्ययोगतः ।
तृतीयभवविद्याश्च संप्राप्ताः स्वं निरूप्य च ॥२६७॥

विपक्षक्षयसंलक्ष्याः स्थितास्तत्कार्यकारिकाः ।
विधाय मन्त्रिणं तत्र नर्तकीवेषधारिणौ ॥२६८॥

निर्गतौ सह दूतेन तौ प्राप्तौ शिवमन्दिरम् ।
विधीयमानं तन्नृत्यं नृपो वीक्ष्य स्फुरद्गुणम् ॥२६९॥

विस्मितः शिक्षितुं ताभ्यां समदात्कनकश्रियम् ।
तामादाय यथायोग्यं गीतनृत्तकलाविदम् ॥२७०॥

अनन्तवीर्यसंरक्तां चक्रतुस्ते सुभाविनीम् ।
तद्रक्तां तां समादाय नर्तक्यौ जग्मतुर्दिवि ॥२७१॥

अर्थ (श्लोक 264 से 271): गाढ़ी प्रीति हो जायेगी। यह सुन उन दोनों ने दूत को तो बाहर भेज दिया और मंत्रियों को भीतर बुलाकर उनसे पूछा कि इस समय क्या कर्तव्य है? इतने में पुण्ययोग से अमिततेज के भव में जो-जो विद्यायें प्राप्त थीं वे सब आकर अपराजित से कहने लगीं कि हम शत्रु को तहस-नहस करने के लिए समर्थ हैं। आप किसी भी तरह की चिन्ता न करें। इतना कह-कर वे विद्याएँ अपराजित का काम करने को उद्यत हो गईं। तब वे दोनों भाई प्रभाकरी राजधानी की रक्षा के लिए मंत्री को नियत कर तथा स्वयं नर्तकियों का रूप बनाकर दूत के साथ-साथ वहाँ से शिवमन्दिरपुर को चल पड़े और थोड़ी ही देर में वहाँ जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने दमतारि के सामने बहुत ही उत्तम नृत्य किया, जिसको देखकर उसे बहुत अचम्भा हुआ। खुश होकर उसने नृत्यकला सीखने के लिए अपनी कनकश्री पुत्री को उनके साथ कर दिया-उन्हें सौंप दिया। वे नर्तकी-रूपधारी कनकश्री को ले गये और उन्होंने उसे यथायोग्य नृत्य गीत आदि बहुत-सी कलायें सिखा दीं। दैवयोग से वह कन्या अनंतवीर्य पर आसक्त हो गई। तब वे दोनों उसे लेकर आकाश में चले गये ॥२६४-२७१॥


श्रुत्वाथ खेचरो वार्तां प्रेषयामास सद्भटान् ।
बलिना तेन युद्धेन भङ्गं नीताः क्षणान्तरे ॥२७२॥

प्रेषितांश्च पुनर्भग्नान्वीक्ष्योत्तस्थौ खगो युधि ।
नर्तक्योर्न प्रभावोऽयं चिन्तयन्निति निष्ठुरम् ॥२७३॥

संप्राप्तविद्योऽसौ युयुधे युद्धविक्रमी ।
अनन्तवीर्यमालोक्य चिरं युद्ध्वा खगाधिपः ॥२७४॥

मुमोच चक्रमाक्रम्य चक्रिचक्रभयप्रदम् ।
तं परीत्य स्थितं हस्ते तेन सोऽपि खगो हतः ॥२७५॥

ततः खगाः समागत्य सर्वे नेमुस्त्रिखण्डपौ ।
खचरैः सह संपत्त्या चेलतुस्तौ प्रभाकरीम् ॥२७६॥

अर्थ (श्लोक 272 से 276): यह सब समाचार सुनकर दमतारि ने बहुत से योद्धाओं को भेजा परन्तु अपराजित ने उन्हें एक मिनट में ही मार भगाया। तब क्रुद्ध होकर दमतारि ने और-और सुभटों को भेजने की योजना की, पर वे भी अपराजित के सामने न ठहर सके। आखिर वह स्वयं ही युद्ध करने को तैयार हुआ और सोचने लगा कि यह नर्तकियों का प्रभाव नहीं है किन्तु कुछ छल है। इसके बाद पूर्वभव की प्राप्त हुई विद्याओं के द्वारा अपराजित ने दमतारि के साथ खूब ही घमासान युद्ध किया तथा दमतारि के साथ अनंतवीर्य का भी बहुत देर तक युद्ध हुआ। आखिर में क्रुद्ध हो दमतारि ने चक्रियों को भी डरा देने वाला चक्र लिया और उसे अनंतवीर्य पर चलाया। पुण्ययोग से वह अनंतवीये की प्रदक्षिणा देकर उसके हाथ में आ पहुँचा और उसी के द्वारा अनंतवीर्य ने दमतारि का काम तमाम कर दिया, उसे मार डाला। उस समय सभी विद्याधर आये और उन तीन खण्ड के स्वामियों को प्रणाम करने लगे। इसके बाद विद्याधरों और अतुल सम्पत्ति सहित वे प्रभाकरी पुरी को वापस लौटे। मार्ग में


गच्छन्तौ मार्गतो दृष्ट्वा जिनं कीर्तिंधराह्वयम्। नत्वा श्रुत्वा च सद्धर्मं कनकश्रीभवान्तरान् ॥२७७॥

अर्थ (श्लोक 272 से 277): आते हुए उन्होंने कीर्तिधर नाम जिन भगवान् को देखा और उन्हें नमस्कार कर उनसे धर्म का उपदेश सुना तथा कनकश्री के भवों को भी पूछा ॥२७२-२७७॥


श्रुतवन्तौ निशम्यासौ प्राव्राजीद्रागमुक्तधीः। तां प्रशस्य जिनं नत्वा निर्गतौ समवसृतेः ॥२७८॥

बुधजनन्नतपादौ दीप्यदाप्तप्रमोदौ निहतरिपुविवादौ मुक्तसर्वापवादौ।
प्रतिगतविविषादौ लब्धधर्मप्रसादौ कृतसुकृतनिनादौ जग्मतुस्तां नृपौ तौ ॥२७९॥

जित्वाजय्यं जगामाजिगमिषुबलिनं शत्रुपक्षं क्षणेन
यः सद्भिर्व्यापराज्जितमिति सुभगं नामधेयं स जीयात्।
हत्वा वीर्यं सुवीर्याद्दमितरिपुपतेः शौर्यधुर्योऽप्यनन्त-
वीर्यो भाति प्रभावाद्वृषविशदमतेः सर्वशक्तिप्रदेष्टुः ॥२८०॥

अर्थ (श्लोक 278 से 280): अपने पूर्वभवों को सुन कनकश्री विरक्त हो गई और उसने आर्यिका के व्रत ग्रहण कर लिये। इसके बाद वे दोनों कनकश्री की प्रशंसा और भगवान् की वन्दना कर समवसरण से बाहर आये और प्रभाकरी पुरी को रवाना हुए। अपराजित और अनंतवीर्य की देवता-गण आ-आकर सेवा करते थे। उनके चरणों में नमते थे। वे हमेशा आमोद-प्रमोद से रहते थे, कभी खेदखिन्न नहीं होते थे। उनका कोई भी वैरी नहीं रहा था। वे सर्वथा निंदा आदि अपवादों से रहित थे, उनका कोई निंदक न था एवं वे विषाद-रहित और धर्म के फल को प्राप्त कर चुके थे तथा पुण्य का पटह पीटते थे कि देखी पुण्य का ऐसा फल मिलता है। जिसने बड़े बलवान सेना वाले अजेय शत्रुओं पर भी क्षणभर में विजय-लाभ कर अपना अपराजित नाम सार्थक कर दिखाया वह अपराजित बलदेव जयवन्त हो और जिसने अपने वीर्य से दमतारि प्रतिनारायण के वीर्य को नष्ट कर दिया और जो शूरवीरों में श्रेष्ठ है, सभी शक्तियों को दिखाने वाले और धर्म-मय वह अनंतवीर्य प्रतिनारायण सर्वज्ञ के प्रभाव से सुशोभित हो ॥२७८-२८०॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में श्री शान्तिनाथ के छह भवों का वर्णन करने वाला चौथा पर्व समाप्त हुआ ॥४॥

पञ्चमं पर्व

अजितं जितकर्म्मारिमपराजितमर्थतः। जितजेयं यजे युक्त्या विराजितजनार्चितम् ॥१॥

अर्थ: उन अजितनाथ प्रभु की मैं विधिपूर्वक वन्दना-स्तुति करता हूँ जो कामदेव को जीतने वाले और अपराजित-किसी से नहीं जीते जाने वाले हैं तथा जीत ने योग्य सभी शत्रुओं पर जो विजय-लाभ कर चुके हैं और महान् पुरुष जिनकी पूजा-स्तुति करते हैं ॥१॥


त्रिखण्डस्याधिपत्यं च विधाय विविधैः सुखैः। केशवः प्राविशत्प्रान्ते पापाद्रत्नप्रभावनिम् ॥२॥

बलोऽप्यनन्तसेनाय राज्यं दत्त्वा यशोधरात्। प्राव्राज्य तृतीयं बोधं प्राप्य संन्यस्य मासकम् ॥३॥

अच्युताधीश्वरो जज्ञेऽनन्तवीर्यस्तु नारकः। धरणेन्द्रात्पितुः प्राप्य सम्यक्त्वं दृढमानसः ॥४॥

संख्यातवर्षसंजीवी प्रच्युत्य प्रासदद्भवम्। भरतेऽस्मिन्खेचराद्र्युदक्च्छ्रेणौ व्योमवल्लभे ॥५॥

मेघवाहनराजासीत्तत्प्रिया मेघमालिनी। तत्सुतो मेघनादाख्यः सोऽभूच्छ्रेणीद्वयाधिपः ॥६॥

अर्थ (श्लोक 2 से 6): इसके बाद तीन खण्ड के राज-पाट को पाकर अनंतवीर्य ने सब प्रकार के सुखों को अमन-चैन से भोगा और आयु का अन्त होने पर वह पाप के फल से रत्नप्रभा नाम नरक की पहली पृथिवी में नारकी हुआ तथा अपराजित अजितसेन को राज-काज सँभालकर यशोधर मुनि के पास दिगम्बर हो गया और अवधिज्ञानरूपी निधि को प्राप्त कर उसने एक महीने के लिए संन्यास धारण कर लिया, जिसके प्रभाव से वह अच्युत स्वर्ग का स्वामी इन्द्र हुआ और वह अनंतवीर्य का जीव जो कि पहले नरक में नारकी हुआ था, पूर्वभव के पिता धरणेन्द्र के सम्बोधने से सम्यग्दृष्टि हो गया। उसने मन की चपलता को छोड़कर धर्म पर अटल विश्वास जमाया और संख्यात वर्ष की आयु को पूरी कर वहाँ से निकला और फिर इसी मध्यलोक में आ गया। इसी भरतक्षेत्र के विजयार्द्ध की उत्तरश्रेणी में एक व्योमवल्लभ नामक नगर है। वहाँ का राजा मेघवाहन था। उसकी रानी का मेघमालिनी नाम था। वह अनंतवीर्य का जीव नरक से आकर उनके यहाँ मेघनाद नामक दोनों श्रेणियों का स्वामी पुत्ररत्न पैदा हुआ ॥२-६॥


प्रज्ञप्तिं साधयन्विद्यां मन्दरे नन्दने वने। दरीदृष्टोऽच्युतेशेन बोधितो लब्धबोधकः ॥७॥

प्राव्राज्य नन्दनाख्याद्रौ प्रतिमायोगमासदत्। अश्वग्रीवानुजो भ्रान्त्वा सुकण्ठोऽभूद्भवार्णवे ॥८॥

असुरत्वं समापन्नो वीक्ष्यैनं मुनिमुत्तमम्। व्यधत्त बहुधा क्रोधादुपसर्गं न सोऽचलत् ॥९॥

अर्थ (श्लोक 7 से 9): एक समय वह सुमेरु के नंदनवन में गया और वहाँ प्रज्ञप्ति विद्या को साधने लगा। इतने में उसके ऊपर उसके पूर्वभव के बड़े भाई अच्युत इन्द्र की दृष्टि पड़ी। तब प्रेम के वश हो वह आया और उसने मेघनाद को खूब समझाया। पुण्ययोग से उसके समझाने से वह समझ गया और दीक्षित हो नंदन नामक पर्वत पर प्रतिमायोग लगाकर ध्यानस्थ हो गया। पाठकों को अभी अश्वग्रीव की कथा भूली न होगी। उसका छोटा भाई सुकंठ संसार-समुद्र में चक्कर लगा कर असुर जाति का देव हुआ था। दैवयोग से वह वहाँ से निकला और मेघनाद मुनि को ध्यानस्थ देख उसे बड़ा क्रोध आया। उसने मुनि पर घोरातिघोर उपसर्ग किये। पर वह रंचमात्र भी उन्हें न डिगा सका। इस समय मुनि ने उपसर्गों


सोढोपसर्गः संन्यस्य सोऽच्युतेऽगात्प्रतीन्द्रताम्। मघोना सह संप्राप सातमच्युतसंभवम् ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): को समता भाव से सहा जिससे वह अच्युत स्वर्ग में जा प्रतीन्द्र हो गया और वहाँ पूर्व भव के बड़े भाई इन्द्र के साथ सोलहवें स्वर्ग के अपूर्व सुख भोगने लगा ॥७-१०॥


प्रच्युत्याच्युतनाथः प्राग्द्वीपेऽत्र प्राग्विदेहके। देशे च मङ्गलावत्यां नगरे रत्नसंचये ॥११॥

राज्ञ्यां कनकमालायां राज्ञः क्षेमंकरस्य च। वज्रायुधाभिधो धीमानौरस्योऽभूत्सुलक्षणः ॥१२॥

आधानप्रीतिसुप्रीतिधृतिमोदक्रियान्वितः। वदनेन्दुप्रभाजालसंध्वस्ततिमिरोत्करः ॥१३॥

नवं वयो दधानोऽसौ राज्यलक्ष्म्या परिष्कृतः। प्रतीन्द्रस्तत्सुतो जज्ञे सहस्रायुधसंज्ञकः ॥१४॥

अर्थ (श्लोक 11 से 14): वहाँ की आयु को पूरी कर पहले वहाँ से इन्द्र चया और जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह के मंगलावती देश में रत्नसंचयपुर के राजा क्षेमंकर की रानी कनकमाला के गर्भ से वज्रायुध नाम उत्तम लक्षणों वाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह आधान, प्रीति, सुप्रीति, वृत्ति और मोद इत्यादि क्रियाओं से युक्त था। उसका मुख-चन्द्र अपनी प्रभा के द्वारा अंधेरे को दूर करता था। नवीन अवस्था में ही उसका ब्याह राजलक्ष्मी नाम राजपुत्री के साथ हो गया तथा अनंतवीर्य का जीव जो प्रतीन्द्र था, वहाँ से चया और वज्रायुध तथा राजलक्ष्मी के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम रखा गया सहस्रायुध ॥११-१४॥


श्रीषेणा भामिनी तस्य साक्षाच्छ्रीरिव शालिनी। शान्त्यन्तकनकः सूनुस्तयोः सुकनकच्छविः ॥१५॥

पुत्रपौत्रादिभिः क्षेमंकरो राज्यकरोऽप्यभात्। एकदेशानकल्पेशो वज्रायुधसुदर्शनम् ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 15 से 16): सहस्रायुध की भामिनी का नाम श्रीषेणा था। वह साक्षात् लक्ष्मी ही थी, सुन्दर-रूप लावण्य वाली थी। सहस्रायुध और श्रीषेणा के कनकशान्ति नाम पुत्र हुआ। वह तपे हुए सोने की कान्ति के समान कान्ति वाला था। इस प्रकार पुत्र-पौत्र आदि के साथ क्षेमंकर राजा सुखचैन से राज सुख भोगता था ॥१५-१६॥


स्तुवन्सदसि संतस्थौ गुणाधारं स्फुरद्गुणम्। अक्षमस्तस्तवं सोढुं लेखो विचित्रचूलकः ॥१७॥

वज्रायुधं बुधः प्राप्य कृतरूपविपर्ययः। यथोचितं महीनाथं वादकण्डूययावदत् ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 17 से 18): एक दिन दूसरे स्वर्ग के इन्द्र ने अपनी सभा में वज्रायुध के दृढ़ सम्यक्त्व की खूब ही प्रशंसा की और कहा कि वज्रायुध गुणों का आधार है। सम्यक्त्व के निमित्त से उसके सभी गुणों का विकास हो गया है। पर यह प्रशंसा विचित्रचूलक नामक एक देव से न सही गई और वह पंडित का भेष बनाकर वज्रायुध के पास पहुँचा और वाद की इच्छा से वह उससे कहने लगा ॥१७-१८॥


राजन् जीवादितत्त्वानां विद्वानसि विचारणे। ब्रूहि पर्यायिणो भिन्नः पर्यायः किं विपर्ययः ॥१९॥

चेद्भिन्नः शून्यतावाप्तिरभावाच्च तयोर्ध्रुवम्। एकत्वसंगरेऽप्येतन्न युक्तिघटनामटेत् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 19 से 20): राजन्! सुना है कि आप जीवादि तत्त्वों के विचार में बड़े पण्डित हैं। कहिए कि जीव आदि से पर्याय भिन्न होती है या अभिन्न? यदि भिन्न होती है तब तो पर्याय निराधार और पर्यायी कूटस्थ ठहरता है, ये दोनों ही बातें नहीं बन सकती और शून्यवाद आकर उपस्थित होता है। कहो कि जीव आदि से पर्याय अभिन्न होती है तो यह पर्याय है और यह पर्यायी (जीवादि) है, यह भेद व्यवहार ही सर्वथा मिट जाता है ॥१९-२०॥


जीवो वा पर्ययो वा स्यादन्योन्यागोचरत्वतः।
चेदस्तु द्रव्यमेकं ते पर्याया बहवो मताः ॥२१॥

एकात्मकं जगत्सर्वमित्येवं संसृतेः क्षितिः।
पुण्यपापफलावाप्तिः कथं संजायते नृणाम् ॥२२॥

बन्धनाभाव एव स्यान्मोक्षाभावो भवेन्ननु।
नित्ये च क्षणिके चाथ भवेदर्थक्रियाच्युतिः ॥२३॥

तदभावे न सत्त्वं स्यात्सत्त्वाभावे न वस्तुता।
कल्पनामात्रमत्रैवं जीवादीनां तु मा कथा ॥२४॥

तदोक्तमिति तच्छ्रुत्वा नृपो वज्रायुधोऽभ्यधात्।
शृणु सौगत सुस्वान्ते मतिं कृत्वाथ मद्द्वचः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 21 से 25): जबकि एक का दूसरे में समावेश नहीं होता, तब जीव आदि अथवा पर्याय दो में से एक को ही मानना योग्य है। यदि इस पर यह कि द्रव्य तो एक ही है, केवल उसकी पर्यायें अनेक देख पड़ती तो आपके कहने से सारा संसार एक रूप ही हो जायेगा और जो यह नाना रूप देख पड़ता है वह कुछ भी बनेगा एवं लोगों को पुण्य-पाप का फल भी नहीं मिलेगा और बन्ध भी न होगा तथा उसके अभाव में मोक्ष भी नहीं बन सकेगा एवं यह प्रश्न उठता है कि वह द्रव्य नित्य है या क्षणिक? इन दोनों पक्षों में ही वस्तु में अर्थक्रिया नहीं बनेगी और अर्थक्रिया के अभाव में वस्तु की सत्ता के अभाव से वस्तु कुछ भी नहीं ठहरेगी। इसलिए जीव आदि पदार्थों की केवलमात्र कल्पना है। राजन्! ऐसी झूठी कपोलकल्पित बातों में आप मत फँसो। इनमें कुछ भी तत्त्व नहीं है। उसके इन वचनों की सुनकर वज्रायुध ने कहा कि विद्वान्! सुनिए, जरा मेरे वचनों पर ध्यान दीजिए ॥२१-२५॥


क्षणिकैकान्तपक्षेऽन्यपक्षे चैतद्वि दूषणम्।
सर्वथाभेदवादस्तु निरस्यो भेदवादवत् ॥२६॥

स्याद्वादं वदतां पुंसां पुण्यपापास्रवो भवेत्।
ततो बन्धस्य संसिद्धिस्तदभावे शिवं भवेत् ॥२७॥

एवं सिद्धः सुनिर्णीतासंभवद्बाधकत्वतः।
स्याद्वादः सर्वदा सर्ववस्तूनां विशदात्मकः ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 26 से 28): क्षणिक एकान्त और नित्य एकान्त पक्ष में ये दोष आते हैं। इसी तरह सर्वथा भेदवाद और सर्वथा अभेदवाद में दोष देख पड़ते हैं। पर स्याद्वादमत को मानने वालों के यहाँ ये दोष नहीं आते। उनके यहाँ पुण्य-पाप का आस्रव होकर बंध होता है और फिर बंध के अभाव से मोक्ष अवस्था प्राप्त होती है। यदि इस पर यह पूछा जाये कि स्याद्वाद की सिद्धि कैसे होती है तो यह उत्तर दिया जायेगा कि स्याद्वाद के सम्बन्ध में निर्णय करके देखा जा चुका है, कोई भी बाधक उसके विषय में उपस्थित नहीं होता क्योंकि यह स्याद्वाद हमेशा ही सब पदार्थों में मौजूद रहता है ॥२६-२८॥


एवं पराजितो लेखः संख्याप्य निजवृत्तकम्।
संपूज्य वस्त्रदानाद्यैस्तमगाद् द्वितीयां दिवम् ॥२९॥

लब्धबोधिरथो क्षेमंकरः क्षेमंकरो भुवि।
प्राप्तलौकान्तिकस्तोत्रः प्रव्रज्यायै समुद्यतः ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 29 से 30): राजा के इस प्रकार के उत्तर को सुनकर वह देव हार मान गया और अपनी वहाँ आने की कहानी को सुनाकर तथा दिव्य वस्त्र-आभूषणों द्वारा वज्रायुध की पूजा कर स्वर्ग को चला गया। इसके बाद पृथ्वी की रक्षा करने वाला क्षेमंकर राजा प्रतिबोध को प्राप्त हुआ और बारह भावनाओं पर विचार करने लगा। इतने में पाँचवें ब्रह्म स्वर्ग से लौकान्तिक देव आये और उन्होंने क्षेमंकर राजा के वैराग्य की खूब तारीफ की तथा भक्ति-स्तुति की ॥२९-३०॥


राज्ये वज्रायुधं न्यस्य दिदीक्षे वनसंगतः। कालेन प्राप्तकैवल्यो बभासे तीर्थराड्विभुः ॥३१॥

अथ वज्रायुधो धीमान्धृतराज्यधुरो ध्रुवम्। मधौ मधुरसल्लापे वनं रन्तुं गतो नृपः ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 31 से 32): इसके बाद क्षेमंकर ने वज्रायुध को बुलाया और उस पर राज-भार डाल कर आप वन में जाकर दिगम्बर हो गया। थोड़े ही समय में उसे केवलज्ञान लाभ हो गया। उस समय वह विभु तीर्थंकर भगवान् खूब ही सुशोभित होते थे। इसके बाद वसन्त का समय आया और कामदेव का प्रभाव बढ़ने लगा। तब बुद्धिमान् वज्रायुध राजा वन-क्रीड़ा को गया ॥३१-३२॥


स्वदेवीभिः स्वयं रन्त्वा सुदर्शनजलाशये। जलक्रीडां प्रकुर्वाणे तस्मिंस्तं शिलयाप्यधात् ॥३३॥

कश्चिद्विद्याधरो दुष्टो नागपाशेन तं नृपम्। अबध्नात्तत्क्षणं चक्रे शिलां स शतखण्डताम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): वहाँ वह अपनी रानियों के साथ सुदर्शन नाम के सरोवर में जल-क्रीड़ा कर रहा था। इसी समय किसी दुष्ट विद्याधर ने उसके ऊपर एक पत्थर की शिला डाल दी और आकर उसे नागपांश द्वारा बाँध लिया। परन्तु उस बली ने हाथ से ही उस शिला के उसी समय खण्ड-खण्ड कर दिये और नागपाश को भी नष्टकर दिया ॥३३-३४॥


हस्तेन नागपाशं च विपाशीकृतवांस्तदा। एष पूर्वभवः शत्रुविद्युद्दंष्ट्रः पलायितः ॥३५॥

भूपोऽपि सह देवीभिः प्रविश्य स्वपुरं स्थितः। धर्मेण तस्य चोत्पन्नं रत्नं सुनिधिभिः समम् ॥३६॥

चक्रवर्तिश्रियं भेजे स भोगव्याप्तमानसः। षट्खण्डमण्डितां पाति पृथ्वीं तस्मिन्नरेश्वरे ॥३७॥

विजयार्द्धद्रयपाक्श्रेण्यां पत्तने शिवमन्दिरे। मेघवाहनभूपोऽस्य विमलाख्या प्रिया शुभा ॥३८॥

पुत्री कनकमालेति तयोर्विवाहपूर्वकम्। प्रिया कनकशान्तेश्च सा जाता सुखदायिनी ॥३९॥

स्तोकसारपुरेशस्य जयसेनाप्रियापतेः। सुता वसन्तसेनाख्या समुद्रसेनभूपतेः ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 35 से 40): तब पूर्वभव का वैरी वह विद्युद्दंष्ट्र चुपके से भाग गया और राजा अपनी देवियों के साथ-साथ नगर को चला आया तथा वहाँ सुख से रहने लगा। कुछ काल में धर्म के प्रभाव से उसके यहाँ निधियों सहित चक्ररत्न की उत्पत्ति हुई और वह चक्रवर्ती की लक्ष्मी को सुख-चैन से भोगने लगा। उसका मन हमेशा भोगों से भरपूर रहता था। जिस समय वज्रायुध छहों खण्ड का निर्विघ्न राज्य करता था। उस समय विजयार्द्ध की दक्षिण श्रेणी में शिवमन्दिर नाम नगर का विमलवाहन नाम राजा था। उसकी प्रिया का नाम विमला था। वह शुभ लक्षणों वाली थी। उसके कनकमाला नाम एक पुत्री हुई। वह कनकशान्ति के साथ में ब्याह दी गई। स्तोकसारपुर के राजा समुद्रसेन और उसकी रानी जयसेना के एक वसन्तसेना नाम की कन्या थी। वह भी कनकशान्ति के साथ ब्याही गई ॥३५-४०॥


बभूवास्य प्रिया ताभ्यां सुखी कनकशान्तिभाक्। कदाचिद्वनखेलार्थं कुमारो वनितासखः ॥४१॥

अर्थ: इन दोनों भार्याओं को पाकर कनकशान्ति अमनचैन से सांसारिक सुख भोगने लगा। एक दिन कनकशान्ति कुमार अपनी दोनों भार्याओं को साथ लेकर क्रीड़ा के लिए वन में गया था ॥४१॥


वनं गतः समद्राक्षीन्मुनिं च विमलप्रभम्। नत्वा तद्वदनाच्छ्रुत्वा वृषं वैराग्यमानसः ॥४२॥

अर्थ: वहाँ उसने विमलप्रभ नाम मुनीश्वर को देखा और उन्हें नमस्कार कर उनसे धर्म का उपदेश


दिदीक्षे तत्क्षणे राज्ञ्यौ विमलागणिनीं श्रिते।
अदीक्षेतां तपोयुक्ते युक्तं तत्कुलयोषिताम् ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 42 से 43): सुना एवं धर्म को सुनकर उसका मन वैराग्य से लिप्त हो गया और उसी समय उसने जैनेन्द्री दीक्षा धारण कर ली। अपने पति को दीक्षित हुआ देखकर कनकमाला और वसन्तसेना भी विमला नाम आर्यिका से जिनदीक्षा लेकर तप करने लगी। ग्रन्थकार कहते हैं कि कुलवती स्त्रियों को ऐसा ही करना चाहिए ॥४२-४३॥


सिद्धाचलस्थितो योगी प्रतिमायोगधारकः।
सोढ्वा खगोपसर्गान्स प्राप्तकेवलबोधनः ॥४४॥

अर्थ: एक दिन कनकशान्ति योगी सिद्धाचल पर ध्यान लगाये हुए था। वहाँ उसे विद्याधरों ने बड़े उपसर्ग किये। पर वह उन उपसर्गों से रंचमात्र भी न टला, जिससे उसे केवलज्ञान हो गया-वह केवली हो गया ॥४४॥


चक्री केवलमालोक्य नप्तुर्निर्विण्णमानसः।
सहस्रायुधपुत्राय राज्यं दत्त्वा विनिर्गतः ॥४५॥

श्रीक्षेमंकरमर्हन्तं प्राप्य दीक्षां समग्रहीत्।
योगी सिद्धगिरौ वर्षं प्रतिमायोगमाश्रितः ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 45 से 46): अपने पोते को केवलज्ञान हुआ देखकर वज्रायुध चक्रवर्ती भी संसार-देह-भोगों से विरक्त हो गया और सहस्रायुध को राज-पाट सौंपकर, घर से निकल, क्षेमंकर भगवान् के पास जा दीक्षित हो गया-उसने दीक्षा ले ली और सिद्धाचल पर एक वर्ष के लिए प्रतिमायोग धारण कर वह ध्यानस्थ हो गया ॥४५-४६॥


वल्मीकाश्रितपादान्त आकण्ठारूढसल्लतः।
अश्वग्रीवसुतौ रत्नकण्ठरत्नायुधौ भवान् ॥४७॥

भ्रान्त्वा भूत्वा सुरौ चातिबलमहाबलौ पुनः।
तमभ्येत्योपसर्गं तौ कर्तुकामा विघातनम् ॥४८॥

रम्भातिलोत्तमाभ्यां तौ तर्जितौ प्रपलायितौ।
तौ तं गत्वा यतिं नत्वा समभ्यर्च्य दिवं गतौ ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 47 से 49): इस समय वज्रायुध के पैरों तक साँपों ने बामी बना ली थी और कंठ तक उसे बेलों ने वेढ़ लिया था। उधर अश्वग्रीव के रत्नकंठ और रत्नायुध दो पुत्र संसार में परिभ्रमण कर अतिबल और महाबल नामक दो असुर हुए थे। वे वज्रायुध के पास आये और उसे बड़ा कष्ट देने लगे एवं रंभा और तिलोत्तमा का रूप बना-बनाकर उसका ध्यान से मन चलाने को उद्यत हुए परन्तु वह ध्यान से बिल्कुल ही नहीं चला। यह देख वे चुप-चाप भाग गये। इसके बाद वे प्रकट होकर वज्रायुध के पास आये और उसकी पूजा-भक्ति एवं उसे नमस्कार कर स्वर्ग को चले गये ॥४७-४९॥


स सहस्रायुधः पुत्रे राज्यं शान्तबलिन्यथ।
किंचिद्धेतोः समारोप्य दिदीक्षे पिहितास्रवात् ॥५०॥

अर्थ: इधर कोई वैराग्य का निमित्त पा सहस्रायुध भी विरक्त हो गया और शान्तबली को राज-पाट सँभला कर उसने पिहितास्रव मुनि से जिनदीक्षा ले ली-वह भी दिगम्बर बन गया ॥५०॥


योगावसाने संप्राप्य वैभाराद्रिमसूंस्ततौ।
अत्याक्तां च सुदीक्षेष्टौ वरिष्ठौ क्लिष्टनिग्रहौ ॥५१॥

ऊर्ध्वग्रैवेयकाधोविमाने सौमनसे च तौ।
एकोनत्रिंशदब्ध्यायुर्धरौ जातौ सुरोत्तमौ ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 51 से 52): इसके बाद ध्यान समाप्त होने पर वज्रायुध और सहस्रायुध दोनों साथ-साथ विपुलाचल पर्वत पर आये और शान्त परिणामों से उन्होंने प्राणों का त्याग किया, जिससे वे निष्पाप ऊर्ध्व ग्रैवेयक के


मृत्वा वज्रायुधः श्रीमान् द्वीपेऽत्र प्राग्विदेहके । देशे च पुष्कलावत्यां पुर्य्यस्ति पुण्डरीकिणी ॥५३॥

पतिर्घनरथस्तस्याः प्रिया तस्य मनोहरा । तयोर्मेघरथः सूनुर्जातो जातमहोत्सवः ॥५४॥

अर्थ (श्लोक 51 से 54): सौमनस नाम अधो विमान में उनतीस सागर की आयु वाले हँसमुख उत्तम देव हुए एवं आयुपर्यन्त वहाँ के सुखों को भोग कर वज्रायुध का जीव चया और जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिनी नगरी में घनरथ नाम राजा की मनोहरा नाम रानी के गर्भ से मेघरथ नाम पुत्र हुआ ॥५१-५४॥


अहमिन्द्रः परस्तस्य सूनुर्द्दृढरथाह्वयः । मनोरमाभवो जातो ववृधाते च तौ सुतौ ॥५५॥

अर्थ: मेघरथ के जन्म-समय घनरथ ने बड़ा भारी महोत्सव किया एवं घनरथ राजा की मनोरमा रानी के गर्भ से सहस्रायुध का जीव जो अहमिन्द्र था, वह दृढ़रथ नाम पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५५॥


जनको ज्येष्ठपुत्रस्य प्रियमित्रामनोरमे । वल्लभे विदधेऽन्यस्य सुमतिं चित्तवल्लभाम् ॥५६॥

आत्मजः प्रियमित्रायां समभून्नन्दिवर्धनः । वरसेनः सुमत्यां च सूनुर्द्दृढरथस्य च ॥५७॥

एवं स्वपुत्रपौत्राद्यैर्युतो घनरथो नृपः । रेजे मेरुरिवात्यर्थं ताराचन्द्रदिवाकरैः ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 56 से 58): दोनों क्रम-क्रम से बढ़ने लगे। जब वे युवा हुए तब घनरथ ने उनका विवाह महोत्सव किया। मेघरथ का ब्याह प्रियमित्र और मनोरमा के साथ हुआ और दृढ़रथ का मनमोहिनी सुमति के साथ कुछ काल में मेघरथ की प्रियमित्र नाम की भार्या ने नन्दिवर्द्धन नामक पुत्र को जन्म दिया और दृढ़रथ की सुमति नाम की भार्या ने वरसेन नामक पुत्र को इस प्रकार पुत्र, पौत्र आदि सम्पत्ति से घनरथ ऐसा जान पड़ता था। मानों तारा-गण, चाँद और सूरज से युक्त सुमेरु पर्वत ही है ॥५६-५८॥


देवो घनरथो मुक्त्वा राज्यं मेघरथे सुते । दिदीक्षे प्राप्तकल्याणः स्वयमेव स्वयंगुरुः ॥५९॥

उच्छेद्य घातिकर्माणि स प्राप केवलोद्गमम् । अथ मेघरथो देवरमणोद्यानमाविशत् ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 59 से 60): एक समय घनरथ ने किसी कारण से उदास हो मेघरथ को राज-पाट सौंप कर जैनेन्द्री दीक्षा धारण कर ली। उसके दीक्षा समय लौकान्तिक देव आये तथा और-और देवतागण ने आकर उसका दीक्षा-कल्याणक किया। वह अपना आप ही गुरु था-तीर्थंकर था। उसने थोड़ी ही देर में घाति कर्मों को घात कर केवलज्ञान-निधि प्राप्त कर ली-वह केवली हो गया ॥५९-६०॥


स्वदेवीभिर्विहृत्यास्थाच्चन्द्रकान्तशिलातले । खेचरः कश्चन व्योम्नि गच्छंस्तस्योपरि स्थितः ॥६१॥

अर्थ: इसके बाद एक समय मेघरथ राजा देवरमण नाम उद्यान में अपनी रानियों को साथ लेकर क्रीड़ा करने को गया था। वहाँ जाकर वह एक चंद्रकान्त शिला पर बैठ गया। इतने में आकाशमार्ग से जाता हुआ एक विद्याधर वहाँ से आ निकला ॥६१॥


निरुद्धव्योमयानः सन् पश्यन्भूपं शिलास्थितम् । तमुत्थापयितुं रोषात्तदधः संप्रविष्टवान् ॥६२॥

अर्थ: वहाँ उसका विमान रुक गया। उस वक्त उसने शिला पर बैठे हुए मेघरथ को देखा और देखते ही वह क्रोध से लाल पीला हो गया तथा शिला-सहित राजा को उठाने के लिये विद्याबल से वह उस शिला के नीचे घुस गया ॥६२॥


नृपोऽङ्गुष्ठाग्रदेशेन ज्ञात्वा तं तां न्यपीडयत्।
खगः शिलाभराक्रान्तस्तत्सोढुमक्षमोऽरुदत् ॥६३॥

अर्थ: यह बात राजा को भी मालूम पड़ गई और उसने उस शिला को अपने पाँव के अँगूठे के अग्रभाग से कुछ दवा दिया। तब वह विद्याधर उस शिला के भार को सहने के लिए असमर्थ हो चिल्लाने लगा ॥६३॥


तदा तत्खेचरी श्रुत्वा क्रन्दनं स्वपतेः परम्।
श्रीमेघरथमाश्रित्य भर्तृभिक्षामयाचत ॥६४॥

अर्थ: उस वक्त उसकी रोने की आवाज को उसकी स्त्री ने सुना और वह उसी समय मेघरथ की शरण में आयी तथा पति के जीवन की भिक्षा माँगने लगी ॥६४॥


उत्थापितक्रमः पृष्टः कान्तया प्रियमित्रया।
किमेतदिति संप्राह विजयार्धालके पुरे ॥६५॥

अर्थ: मेघरथ ने तब शिलापर से अपने बल को बिल्कुल हटा लिया। यह देखकर प्रियमित्रा ने मेधरथ को पूछा कि प्रिय! यह क्या बात है ॥६५॥


विद्युद्दंष्ट्रपतेर्भार्याऽनिलवेगा सुतस्तयोः।
नृपः सिंहरथो देवं वन्दित्वामितवाहनम् ॥६६॥

अर्थ: उत्तर में मेघरथ ने कहा कि विजयार्द्ध पर्वत पर एक अलकपुर है। उसका राजा है विद्युद्दंष्ट्र और रानी है अनिलवेगा। उन दोनों का पुत्र यह सिंहरथ हैं। यह विमलवाहन मुनि की वन्दना को गया था ॥६६॥


अटन्ममोपरि प्रेक्ष्य विमानं गतरंहसम्।
दिशो विलोक्य मां प्रेक्ष्य स्वदर्पात्कोपकम्पितः ॥६७॥

अस्माञ्शिलातलेनामा प्रोत्थापयितुमुद्यतः।
पीडितोऽयं यदङ्गुष्ठेनैवाप्तास्य मनोरमा ॥६८॥

अर्थ (श्लोक 67 से 68): अब वहाँ से वापस घर को जा रहा है। अभी थोड़ी देर पहले इसका विमान आपसे आप ही यहाँ रुक गया था। तब इसने इधर-उधर देख भाल की और मुझे देखकर गर्व से क्रोध किया तथा आग बबूला हो मुझ-सहित शिला उठाने के लिए यह इस शिला के नीचे घुस गया। मुझे मालूम होते ही मैंने उसी वक्त इस शिला को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। तब भार को न सह सकने के कारण यह चिल्लाया। जिसको सुन इसके जीवन की भिक्षा के लिए यह इसकी मनोरमा नाम स्त्री आई है। इस प्रकार सब हाल कहकर तथा उस विद्याधर को संतोष दिलाकर उन्होंने उसे वहाँ से रवाना किया ॥६७-६८॥


इत्यन्योन्यं स संतोष्य प्रेषितस्तेन खेचरः।
कदाचित्स नृपो दत्त्वा दानं दमवरेशिने ॥६९॥

चारणाय समापासौ पञ्चाश्चर्यं चरंस्तपः।
आष्टाह्निकविधिं भक्त्या विधाय प्रोषधं श्रितः ॥७०॥

प्रतिमायोगतो ध्यायन्नरात्रौ ध्यानं स्थितोऽद्रिवत्।
ईशानेन्द्रः परिज्ञायैतन्मरुत्सदसि स्थितः ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 69 से 71): एक समय मेघरथ राजा ने दमवर नाम चारणमुनि को आहार दिया, जिसके प्रभाव से उसके यहाँ देवताओं ने पाँच अचम्भे की बातें कीं। यह राजा हमेशा शक्ति-अनुसार तप करता था। अष्टाह्निक पर्व आया। राजा ने विधिपूर्वक भगवान् की पूजा वगैरह से खूब ही उत्सव किया और प्रोषधोपवास व्रत लिया तथा रात के वक्त प्रतिमायोग धर कर वह मेरु की तरह अचल हो ध्यानस्थ हो गया ॥६९-७१॥


तवाद्य परमं धैर्यं नमस्तुभ्यं चिदात्मने।
आत्मध्यानरतायैवं संसारासातभीमुषे ॥७२॥

इति स्तुतिरवं श्रुत्वा सुराः शतमुखं जगुः।
कः स्तुतो देव इत्युक्ते प्रोवाच स सुरान्प्रति ॥७३॥

नृपो मेघरथः शुद्धदृष्टिः प्रतिमया स्थितः।
पूज्यः पूज्यगुणो ज्ञानी मयास्तीति नमस्कृतः ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 72 से 74): इसी समय ईशान इन्द्र अपनी सभा में बैठा था। उसने वहाँ से मेघरथ को ध्यानस्थ देखा और उसकी स्तुति करना आरम्भ की कि आज आपका परम धैर्य है। इसलिए सारे संसार की असाता को मिटाने वाले आत्मध्यान में लीन और चिदात्मा-आपको मेरा प्रणाम है। यह सुन देवताओं ने इन्द्र को कहा कि हे देव! आप किसकी स्तुति कर रहे हैं। यह सुन इन्द्र ने उत्तर में कहा कि शुद्ध सम्यग्दृष्टि मेघरथ राजा प्रतिमायोग में लीन हो रहा है। वह ज्ञानी उत्तम गुणों का भण्डार होने से पूज्य है। इसलिए मैंने उसे नमस्कार किया है ॥७२-७४॥


अतिरूपासुरूपाख्ये तदुक्तं सोढुमक्षमे।
आगते विभ्रमैर्भावैर्विलासैर्गीतनर्तनैः ॥७५॥

भावैः प्रजल्पनैश्चान्यैर्न तं चालयितुं क्षमा।
विद्युल्लताइव देवाद्रिं यथा निश्चलमुत्तमम् ॥७६॥

ऐशानोक्तं दृढं मत्वा नत्वा ते स्थानमीयतुः।
एकदैशानकल्पेशः सदोमध्ये व्यवर्णयत् ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 75 से 77): इन्द्र की यह बात अतिरूपा और सुरूपा नाम की दो देवियों से न सही गई और वे उसी वक्त मेघरथ के पास पहुँचीं। वहाँ उन्होंने विभ्रम, हाव-भाव, विलास, गीत-नृत्य आदि भाँति-भाँति की चेष्टाएँ कीं, पर वे उसे चला न सकीं, जिस तरह अचल और उत्तम मेरु बिजली के द्वारा रंचमात्र भी नहीं चलता। तब उन्हें इन्द्र की बातों पर पक्का विश्वास हो गया और वे मेघरथ को नमस्कार कर अपने स्थान को चली आई ॥७५-७७॥


रूपं च प्रियमित्रायाः समाकर्ण्य समागते।
रतिषेणारतीदेव्यौ साक्षात्तद्रूपमीक्षितुम् ॥७८॥

मज्जनावसरे ते तां गन्धतैलाक्तदेहिकाम्।
निर्भूषणां विवसनां निरूप्यावोचतां वचः ॥७९॥

शृङ्गारसहितायास्तु कीदृग्रूपं भविष्यति।
ततः कन्याकृतिं कृत्वा चतुरे चतुरं वचः ॥८०॥

अवोचतां तके देवि त्वद्रूपं द्रष्टुमागते।
सा संकल्पितकल्पाढ्या गन्धपुष्पोपशोभिता ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 78 से 81): इसी तरह एक दिन सभा में ईशान इन्द्र ने प्रियमित्रा के रूप की प्रशंसा की। जिसको सुनकर रतिषेण और रति नाम की दो देवियाँ साक्षात् उसके रूप को देखने के लिए आई और स्नान के समय में सुगन्धित तैल आदि से मले गये भूषण-वस्त्र रहित उसके सुन्दर शरीर को देखकर वे कहने लगीं कि जब इस समय इसका रूप ऐसा सुन्दर है तब श्रृंगार आदि करने पर कैसा सुन्दर होगा। इसके बाद उन्होंने कन्या का रूप बनाया और वे चतुराई से कहने लगीं कि देवी! हम तुम्हारा रूप देखने को आई हैं। इसके बाद रानी ने अपने वस्त्र-आभूषण वगैरह पहिने और सुगन्धित पुष्प वगैरह गूंथे ॥७८-८१॥


ताभ्यां वीक्ष्य निजं शीर्षं धूनितं सैक्ष्य तज्जगौ।
किमेतदिति ते देव्यावूचतुश्चतुरे शृणु ॥८२॥

यद्रूपं वर्णितं तथ्यमीशानेशेन तत्तथा।
यत्स्नानसमये दृष्टं तदिदानीं न विद्यते ॥८३॥

अर्थ (श्लोक 82 से 83): उस समय उसका रूप देखकर वे देवियों अपना माथा पीटने लगीं। यह देख उनसे रानी ने पूछा कि यह बात क्या है? वे कहने लगीं कि चतुरे! सुनो, ईशान इन्द्र ने तुम्हारे रूप की जैसी प्रशंसा की थी वह वैसा ही है परन्तु स्नान के वक्त जो शोभा थी वह इस वक्त नहीं है ॥८२-८३॥


इत्युदीर्य निगीर्य स्वं ते देव्यौ दिवमीयतुः।
क्षणक्षयात्स्वरूपस्य विरक्ताश्वासिता प्रिया ॥८४॥

सहदीक्षेति वाक्येन नृपेण विरतात्मना।
अथैकदा समुद्यानं मनोहरमगात्नृपः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 84 से 85): इतना कह कर वे देवियों तो अपने स्थान को चली आई और इधर रानी को अपने रूप को क्षणक्षयी जान कर वैराग्य हो आया, तब उसे राजा ने आश्वासन दिया और कहा कि हम तुम दोनों साथ-साथ ही दीक्षा लेंगे क्योंकि मेरा दिल भी उदास हो रहा है। एक दिन राजा मनोहर नाम उद्यान को गया। वहाँ उसने अपने पिता घनरथ नाम प्रभु के दर्शन किये और उन्हें नमस्कार किया ॥८४-८५॥


स्वगुरुं जिनमानम्य स्थितं सिंहासने स्थितः।
अप्राक्षीच्छ्रेयसे श्रेयः संस्कृतं क्रियया कृती ॥८६॥

अवादीद्देवदेवैशो राजदेव विदां वर।
श्रावकाध्ययनप्रोक्तामष्टोत्तरशतक्रियाम् ॥८७॥

त्रिपंचाशत् क्रियास्तत्र गर्भान्वयसमाह्वयाः।
गर्भाधानादिनिर्वाणपर्यन्तविधिवेदिकाः ॥८८॥

दीक्षान्वयक्रियाश्चाष्टचत्वारिंशदुदीरिताः।
सुदीक्षादिनिवृत्त्यन्तनिर्वाणपदसाधिकाः ॥८९॥

अर्थ (श्लोक 86 से 89): वे एक मनोहर सिंहासन पर विराजे हुए बहुत ही सुशोभित होते थे। राजा बैठ गया और उस कृती ने कल्याण की वाञ्छा से पूछा कि भगवन् ! क्रिया-संस्कार से क्या लाभ है? इस पर प्रभु ने उत्तर दिया कि राजन् ! सुनिए। श्रावकाध्ययन में जो १०८ क्रियायें बताई हैं उनमें से ५३ क्रियायें तो गर्भान्वय नाम से पुकारी जाती हैं और वे गर्भ से लेकर मरण तक की विधि को बताती हैं। ४८ क्रियायें दीक्षान्वय नाम से पुकारी जाती हैं और वे दीक्षा से लेकर निर्वाण तक की साधने वाली हैं और सात कर्तृन्वय क्रियायें हैं ॥८६-८९॥


कर्त्रन्वयक्रियाः सप्त सत्सिद्धान्तवचोवहाः।
सुदृक्स्वरूपमेतासां विधानं फलमप्यदः ॥९०॥

अर्थ: वे सिद्धान्त को बताती हैं। इन क्रियाओं से आत्मा का बल बढ़ता है, उसमें नये-नये संस्कार पैदा होते हैं, जिनसे अच्छी-अच्छी भावनायें पैदा होती हैं ॥९०॥


श्रुत्वा श्राद्धस्य सद्धर्मं घनं घनरथोदितम्।
नत्वा मेघरथोऽवोचद्दृढरथोऽनुजमुन्नसम् ॥९१॥

गृहाण राज्यमेतद्धि स्थास्यामि तपसे वनम्।
इत्युक्ते सोऽवदद्वाक्यं तित्यक्षुः क्षिप्रतः क्षितिम् ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): इस तरह घनरथ प्रभु के कहे हुए क्रियाओं के विधान-स्वरूप और फल को तथा श्रावकधर्म को सुनकर वह आत्म-दृष्टि विरक्त हो गया और अपने छोटे भाई दृढ़रथ से उसने कहा कि तुम राज-पाट को संभालो, मैं अब तपों को तपूँगा ॥९१-९२॥


भो राज्ये यस्त्वया दृष्टो दोषोऽदर्शि मयापि सः।
गृहीत्वा त्यज्यते यच्च प्राक्तस्याग्रहणं वरम् ॥९३॥

प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम्।
विमुखे सुमुखे तस्मिन्निति राजा स्वसूनवे ॥९४॥

अर्थ (श्लोक 93 से 94): इस पर शीघ्र ही परिग्रह को छोड़ने की चाह रखने वाला दृढ़रथ कहने लगा कि भाई! राज-काज में आपको जो-जो दोष देख पड़ते हैं, उनकी मैं भी तो देख रहा हूँ। इससे मैं यह सोचता हूँ कि पहले ग्रहण कर पीछे छोड़ने की अपेक्षा पहले से ग्रहण ही न करूँ, यही अच्छा है। कारण कि कीचड़ लगा कर धोने की अपेक्षा उसको पहले से नहीं लगाना ही बुद्धिमान् लोग अच्छा मानते हैं। इस तरह की बातचीत से अपने हँसमुख छोटे भाई को राज से विरक्त जान कर मेघरथ ने मेघसेन नाम अपने पुत्र को बुलाया और उसे राज-पाट सँभला दिया ॥९३-९४॥


मेघसेनाय राज्यं स दत्त्वा सप्तसहस्रकैः। भूपैश्च सानुजो जज्ञे संयमी संयमोद्यतः ॥९५॥

एकादशाङ्गविद्वीरो भावनाः षोडशात्मिकाः। भावयन्नर्थकृत्तीर्थकृत्त्वं कर्म बबन्ध सः ॥९६॥

दृढो दृढरथेनामा नभस्तिलकभूभृति। अत्याक्षीन्मासमात्रं स शरीराहारकिल्बिषम् ॥९७॥

तौ प्राणान्ते गतप्राणौ प्रपेदातेऽहमिन्द्रताम्। सर्वार्थसिद्धिसद्धाम्नि शुक्ललेश्यौ स्फुरत्प्रभौ ॥९८॥

त्रयस्त्रिंशत्समुद्रायुर्जीविनौ श्वासमाश्रितौ। सार्धषोडशभिर्मासैः संगतामृतवल्भनौ ॥९९॥

त्रयस्त्रिंशत्सहस्त्राब्दैर्निःप्रवीचारसत्सुखौ। लोकनाडीस्थितप्रेङ्खद्योग्यद्रव्यावधीक्षणौ ॥१००॥

तावत्सद्विक्रियौ तौ द्वौ रेजतुर्हस्तमुच्छ्रितौ। अनन्तरभवप्राप्यमोक्षलक्ष्मीसमागमौ ॥१०१॥

अर्थ (श्लोक 95 से 101): इसके बाद वह सात हजार राजाओं और अपने छोटे भाई सहित दिगम्बर हो गया, उसने संयम को ग्रहण कर लिया और थोड़े ही समय में वह द्वादशांग का परिगामी श्रुतकेवली हो गया। उसने सोलह कारण भावनाओं को भाकर तीर्थंकर नाम कर्म का बंध किया एवं वह दृढ, दृढरथ के साथ-साथ नभस्तिलक पर्वत पर गया और वहाँ दोनों ने शरीर-आहार आदि से ममता भाव को त्याग कर एक महीने के लिए संन्यास धारण किया तथा अन्त समय में प्राणों को त्यागकर वे सर्वार्थसिद्धि नाम विमान में अहमिन्द्र हुए। वहाँ उनका शरीर स्फटिक के समान स्वच्छ और स्फुरायमान प्रभा वाला हुआ। तैंतीस सागर की उनकी आयु हुई। साढ़े सोलह महीने में वे श्वासोच्छ्वास लेते थे और मनचाहा अमृत का आहार करते थे, सो भी तैंतीस हजार वर्ष बीत चुकने पर एक बार। उनके मैथुन-क्रिया स्त्री-संभोग रहित उत्तम सुख था और लोकनाड़ी के भीतर सब जगह अपने योग्य द्रव्य को विषय करने वाला उनके अवधिज्ञान था, जिसके द्वारा वे लोक भर की बातों को जानते थे तथा उनके विहार करने की विक्रिया-शक्ति भी उतनी ही थी। एक हाथ का ऊँचा उनका शरीर था और इस भव के बाद मनुष्य का भव पाकर उसी से वे मोक्ष जाने वाले थे ॥९५-१०१॥


अथ जम्बूमति द्वीपे भरते कुरुजाङ्गले। हस्तिनागपुरे राजा विश्वसेनो विदां वरः ॥१०२॥

अर्थ: जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में एक कुरुजांगल नामक देश है, उसमें हस्तनापुर नाम का नगर है। वहाँ का राजा विश्वसेन था। वह बड़ा चतुर था, नीति का ज्ञाता था ॥१०२॥


ऐरावती प्रिया तस्य तरत्तारा सुलोचना। श्रीह्रीधृत्यादिदेवीभ्यो दिव्यलावण्यधारिणी ॥१०३॥

अर्थ: उसकी रानी का नाम था ऐरादेवी। वह बहुत सुन्दरी और सुन्दर नेत्रों वाली थी तथा श्री, ह्री, धृति आदि देवियों से भी उसका पहला नम्बर था। वह रूपलावण्य की एक सीमा ही थी ॥१०३॥


शयाना शयने रात्रौ स्वप्नानैक्षिष्ट षोडश। विशन्तं वदने तुङ्गं दन्तिनं साप्यजागरीत् ॥१०४॥

तदा मेघरथो देवो दिवश्च्युत्वा तमिस्रके। नभस्ये सप्तमीद्यस्रे तत्कुक्षिक्षेत्रमासदत् ॥१०५॥

अर्थ (श्लोक 104 से 105): रात का वक्त था और वह शय्या पर सुख की नींद में सोई हुई थी। उस वक्त उसने सोलह स्वप्नों और मुँह में प्रवेश करते हुए एक उन्नत हाथी को देखा। इस समय मेघरथ का जीव जो अहमिंद्र था वह सर्वार्थसिद्धि से चयकर उसके गर्भ में आया। उस दिन भादों वदी सातें थी ॥१०४-१०५॥


उन्निद्रा सा समुन्मुद्रा नेपथ्यार्पितविग्रहा।
दत्तदानकरा भासा कल्पवल्लीव जङ्गमा ॥१०६॥

नत्वा नाथं स्वनाथात्तमाना मान्या सुमानिनी।
पृष्ट्वा मत्वा सुस्वप्नानां फलानि मुमुदे मुहुः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 106 से 107): इसके बाद वह जगी और शय्या से उठी तथा प्रभात की क्रियाओं से निपटकर और वस्त्र-आभूषण वगैरह पहनकर हर्षित होती हुई पतिदेव के पास गई। उस समय उसने बहुत दान किया, जिससे कि उसके हाथों की अपूर्व ही शोभा थी। वह उस वक्त चलती हुई कल्पवेल-सी जान पड़ती थी। स्वामी ने उसे आदर के साथ आधे सिंहासन पर बैठाया और उसका बहुत आदर किया। इसके बाद उस मानिनी रानी ने स्वामी से अपने रात वाले स्वप्नों का फल पूछा ॥१०६-१०७॥


तदा चतुर्विधा बुद्ध्वा नाकेशा नाकिभिः समं।
स्वर्गावतारकल्याणं संप्राप्य समवर्तयन् ॥१०८॥

अर्थ: उत्तर में स्वामी ने कहा कि इन स्वप्नों से जान पड़ता है कि तुम्हारे गर्भ से संसार का उद्धारक कोई महात्मा जन्म लेगा। यह सुनकर वह बहुत ही हर्षित हुई। इसके बाद अवधिज्ञान द्वारा भगवान् को गर्भ में आया जान चतुरंग सेना सहित इन्द्रगण आये और प्रभु का स्वर्गावतरण-कल्याण बड़ी धूमधाम के साथ कर अपने-अपने स्थान को चले गये ॥१०८॥


वर्धमाने तदा भ्रूणे वर्धमानमहोदया।
दयावती दयांचक्रे दानं सा दीप्तदेहिका ॥१०९॥

मासान्पञ्चदशायातमणिवृष्ट्याप्तपूजना।
ज्येष्ठे कृष्णचतुर्दश्यां सासूत सुतमुत्तमम् ॥११०॥

अर्थ (श्लोक 109 से 110): इसके बाद रानी का ज्यों-ज्यों गर्भ वृद्धिंगत होता जाता था त्यों-त्यों उसका प्रभाव बढ़ता जाता था, शरीर दीप्त होता जाता था और वह दया वाली दया और दान में रक्त होती जाती थी। उसकी देवता-गण पन्द्रह महीने से रत्नों की बरसा द्वारा सेवा उपासना कर रहे थे। उस देवी ने जेठ वदी चौदस के दिन उत्तम सुत रत्न को जन्म दिया ॥१०९-११०॥


तज्जन्मतो महाशंखभेरीभारातिघण्टिकाः।
स्वरा जजृम्भिरे देवसद्मसु जन्मसूचकाः ॥१११॥

अर्थ: प्रभु का जन्म होते ही देवों के यहाँ आपसे आप बिना बजाये महाशंख, भेरी सिंहनाद, घंटा आदि बाजों के शब्द हुए, जिनसे उन्हें भगवान् के जन्म की सूचना मिल गई ॥१११॥


प्रीत्या प्रेत्याप्रमाणास्ते सुपर्वाणाः सजिष्णुकाः।
मन्दिरात्सुन्दरं देवं गृहीत्वा मन्दरं ययुः ॥११२॥

वृषा वृषार्थी संस्थाप्य जिनं तत्र महाघटैः।
संस्नाप्य स्तुतिभिः स्तुत्वा गेहे मात्रे समर्पयत् ॥११३॥

अर्थ (श्लोक 112 से 113): खबर पाते ही हर्ष से भरे हुए देवता-गण सहित इन्द्र-गण आये और विश्वसेन महाराज के महल से सुन्दर रूप वाले प्रभु को लेकर सुमेरु पर्वत पर गये। वहाँ धर्म के प्रेमी इन्द्र ने प्रभु को सिंहासन पर विराजमान कर सुवर्ण के कलशों से उनका अभिषेक किया, एवं बड़ी भक्ति से उनकी प्रशंसा-स्तुति की। वहाँ से वापस आकर इन्द्र ने प्रभु को उनकी माता की गोद में दिया॥११२-११३॥


लक्षवर्षसमायुष्कः शान्तीशो यौवनोन्नतः।
चत्वारिंशत्सुचापोच्चाचलाङ्गो वरलक्षणः ॥११४॥

अथो दृढरथस्तस्माद्यशस्वत्यां च्युतोऽजनि।
विश्वसेनात्सुतश्चक्रायुधो भूरिनरैः स्तुतः ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 114 से 115): प्रभु की आयु एक लाख वर्ष की थी। उनका नाम शान्तिनाथ था। उनका शरीर चालीस धनुष ऊँचा था, अचल था, उत्तम लक्षणों वाला था तथा यौवन से उन्नत था। इसके बाद दृढ़रथ सर्वार्थसिद्धि से चयकर उसी विश्वसेन राजा की यशस्वती रानी के गर्भ से चक्रायुध नाम पुत्र हुआ ॥११४-११५॥


कुलशीलकलारूपवयःसौभाग्यभूषिताः । तत्पिता कन्यकास्तेन यौवने समयोजयत् ॥११६॥

पितृदत्तमहाराज्यो जिनो रेजे जितार्कभः । कालेन जातचक्रेशो जितषट्खण्डभूमिपः ॥११७॥

शस्त्रगेहेऽभवच्चक्रच्छत्रदण्डास्यः पराः । तस्य लक्ष्मीगृहे चर्म चूडारत्नं च काकिणी ॥११८॥

पुरोधोगृहसेनास्थपतयो हास्तिने पुरे । विजयार्धे कनकन्यागजाश्वा बोभुवत्यपि ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 116 से 119): चक्रायुध की बहुत से पुरुष सेवा करते थे। उसकी स्तुति करते थे। इसके बाद विश्वसेन राजा ने कुल, शील, कला, रूप और अवस्था, सौभाग्य आदि से विभूषित बहुत-सी कन्याओं के साथ शान्तिनाथ प्रभु का ब्याह किया और उन्हें राज-पद दे दिया। इस समय प्रभु सूरज की सभा को भी जीतते थे। इसके कुछ काल बाद उनकी आयुधशाला में चक्ररत्न पैदा हुआ, जिसके द्वारा उन्होंने छह खण्डों पर विजय किया, सभी राजाओं को जीत लिया एवं उनके शस्त्रगृह में चक्र, छत्र, दंड, असि और लक्ष्मीगृह में चर्म, चूड़ामणि काकिणी तथा हस्तिनागपुर में पुरोहित, गृहपति, सेनापति, स्थपति तथा विजयार्द्ध में कन्या, हाथी और घोड़ा ये १४ रत्न उत्पन्न हुए ॥११६-११९॥


एवं राज्यं प्रकुर्वाणो दर्पणे दर्पदर्पितः । छायाद्वयं विलोक्यागाद्विरक्तिं रतिमुक्तधीः ॥ १२०॥

अर्थ: इस प्रकार की अतुल विभूति को पाकर शान्तिनाथ प्रभु ने बहुत काल तक सुख-चैन से राज किया। एक दिन प्रभु खूब ही अभिमान से भरे हुए, दर्पण में अपना मुँह देख रहे थे। उस वक्त उन्होंने अपनी मूर्ति को पहले किसी और रूप में और फिर बाद में किसी और ही रूप में देखा। तब इसी निमित्त से वे संसार से उदास हो गये और उनका जो विषयों में राग था वह उनसे कोसों दूर भाग गया ॥१२०॥


प्राप्तलौकान्तिकस्तोत्रः कृतदेवाभिषेचनः । नानालङ्कारसंभासी शिबिकामवस्थितः ॥ १२१॥

सहस्राम्रवनावासी शोभनीयशिलास्थितः । पञ्चमुष्टिभिरल्लुञ्च्य कचाञ्ज्येष्ठस्य तामसे ॥ १२२॥

अर्थ (श्लोक 121 से 122): इतने में स्वर्ग से लौकान्तिक देव आये और उन्होंने प्रभु का स्तोत्र करके अपना नियोग पूरा किया। इसके बाद देवता-गण के साथ-साथ इन्द्र वगैरह आये और प्रभु का अभिषेक कर उन्होंने उन्हें भाँति-भाँति के वस्त्र-आभूषण पहनाये तथा पालकी में बैठा कर वे उन्हें सहस्राम्रवन में ले गये और वहाँ एक शिला पर विराजमान किया। इस समय प्रभु ने पंचमुष्टि केशलोंच किया तथा वस्त्र आभूषण वगैरह सब उतार कर, उनसे ममत्व छोड़ वे दिगम्बर हो गये ॥१२१-१२२॥


चतुर्दश्यामपराह्णेऽभून्मुनिः षष्ठोपवासभृत् । चक्रायुधादिसद्राजसहस्रैः सह संयमी ॥१२३॥

अर्थ: इस दिन जेठ वदी चौदस थी और दोपहर का समय था। इसी दिन प्रभु के साथ-साथ चक्रायुध आदि हजारों और-और राजाओं ने भी संयम को धारण किया ॥१२३॥


मनःपर्ययबोधेन पारणे मंदिरं परम् । प्रविष्टाय सुमित्रेण तस्मै ददेऽन्नमुत्तमम् ॥१२४॥

अर्थ: इस समय प्रभु ने दो दिनों के उपवास के बाद आहार लेने की प्रतिज्ञा की। दीक्षा लेते ही प्रभु को मनःपर्ययज्ञान हो गया और वे चार ज्ञान के धारी हो गये। इसके बाद पारणा के लिए वे शिवमन्दिरपुर गये और वहाँ उन्हें सुमित्र राजा ने शुद्ध आहार दिया ॥१२४॥


कदाचित्पूर्वसंप्रोक्तवनमासाद्य भ्रातृभिः । षष्ठोपवासभृत्तस्थौ प्राङ्मुखो ध्यानसन्मुखः ॥१२५॥

षोडशाब्दसुछद्मस्थ्यमुक्तः केवलमाप सः । पौषेऽथ धवले पक्षे दशम्यां च दिनात्यये ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 125 से 126): एक दिन सहस्राभुवन में भाइयों सहित छह उपवासों को एक साथ करने वाले वे प्रभु पूर्व दिशा को मुँह कर ध्यानस्थ हो गये। प्रभु सोलह वर्ष तक छद्मस्थ अर्थात् अल्पज्ञानी रहे। बाद उन्हें पौष सुदी दसमी के दिन साम के समय केवलज्ञान हो गया ॥१२५-१२६॥


चक्रायुधादयस्तस्य षट्त्रिंशद्गणपा बभुः । द्विषड्भिश्च सभासभ्यैः समवस्सृतिसंस्थितैः ॥१२७॥

विजहार महीं रम्यां स सुरासुरसंस्तुतः । मासमात्रावशेषायुः सम्मेदाद्रिं समाश्रितः ॥१२८॥

ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां सिद्धिस्यानमगाज्जिनः । चक्रायुधादयो धीरा हत्वा कर्मकदम्बकम् ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 127 से 129): भगवान् के चक्रायुध आदि छत्तीस गणधर हुए। उनके समवसरण में बारह सभायें थीं और वे सब सभ्यों से भरपूर थीं। इसके बाद सुर-असुरों द्वारा सेवित उन प्रभु ने पृथ्वीतल पर विहार किया। जब उनकी एक महीने की आयु शेष रह गई तब वे सम्मेदशिखर पर पहुँचे और जेठ वदी चौदस के दिन सिद्ध-स्थान में जा विराजे तथा चक्रायुध आदि धीर-वीर नौ हजार मुनिगण, कर्मसमूह को नाश कर निर्वाण को प्राप्त हुए ॥१२७-१२९॥


ध्यायन्तस्तद्गुणांस्तूर्णं जग्मुः स्वं स्थानमुत्तमाः । नराश्च तद्गुणासक्ता आसेदुः स्वस्वपत्तनम् ॥१३०॥

अर्थ: इस वक्त सुर-असुरों ने आकर सबका निर्वाण महोत्सव किया तथा प्रभु के गुणों का स्मरण कर वे सब अपने-अपने स्थान को चले गये एवं वहाँ और-और महापुरुष जो महोत्सव में शामिल हुए थे, वे भी प्रभु के गुणों का स्मरण करते हुए अपने-अपने नगरों को गये ॥१३०॥


इति जिनवरवंशे कौरवेऽभाज्जिनेशः सुरपतिशतसेव्यश्चक्रिव्रातार्च्यपादः ।
गुणगणसगुणार्च्यो ध्वस्तकामादिशत्रुः वरविजयसमाट् चक्ररत्नः सुतीर्थेट् ॥१३१॥

अर्थ: इस तरह आदि जिनवर के द्वारा स्थापित कौरव-वंश में इन्द्रों द्वारा पूज्य श्री शान्तिनाथ प्रभु का जन्म हुआ। शान्तिनाथ प्रभु के चरण-कमलों में चक्रवर्ती भी आकर नमस्कार करते हैं। वे गुणों के भण्डार और गुणवालों के द्वारा पूजे जाने वाले हैं, काम आदि शत्रुओं के नाशक और विजय लक्ष्मी के पति हैं, चक्ररत्न के स्वामी हैं, धर्मतीर्थ के प्रवर्तक तीर्थंकर हैं ॥१३१॥


यद्रूपेण मनोहरेण जगतां नाथाः सुमोहं गताः
कीर्तिस्फूर्तिसुमूर्तिपूर्तिसदनं यो नीतिविद्यालयः।
शान्तीशो वरनाथचक्रपदवीं प्राप्तो मनोभूपद-
स्तीर्थेशो वरसार्थतीर्थकरणे दक्षः सुपक्षोऽवतात् ॥१३२॥

अर्थ: उनके सुन्दर रूप को देखकर जगत् पति भी मोहित हो जाते हैं। वे कीर्ति, स्फूर्ति, सुमूर्ति के सदन हैं, एवं नीति-विद्या के आलय हैं, चक्रवर्ती हैं, कामदेव हैं और उत्तम एवं सार्थ तीर्थ के चलाने के कारण तीर्थंकर हैं। तात्पर्य यह कि वे दक्ष तीन पदवी के धारक हैं तथा जिनका पक्ष सच्चा और हितैषी है। वे शान्ति के स्वामी शान्तिनाथ प्रभु मेरी रक्षा करें ॥१३२॥


शान्तिः शान्तिकरः सुदृष्टिसदनं शान्तिं श्रिताः शान्तिना
सन्तः सारशिवं शिवार्थजनकं तस्मै नमः शान्तये।
शान्तेः सातशतं सुसुप्तिहरणं शान्तेः शुभाः सद्गुणाः
शान्तौ स्वान्तमिदं सृजामि सततं शान्ते सुखं मे सृज ॥१३३॥

अर्थ: शान्तिनाथ प्रभु शान्ति के कर्ता और शान्ति के स्थान हैं। उनके निमित्त से सत्पुरुष शान्ति को पाते हैं। वे मोक्ष के दाता और स्वयं मोक्षमार्ग पर चलने वाले हैं। उनके निमित्त से जीवों को सैकड़ों सुख मिलते हैं, उनके मोह का नाश होता है और उन्हें उत्तम उत्तम गुण प्राप्त होते हैं। उन शान्तिनाथ प्रभु के लिए मेरा नमस्कार है। मैं उन शान्तिनाथ स्वामी को अपने मनोमन्दिर में विराजमान करता हूँ। वे मुझे सुख दें ॥१३३॥

षष्ठं पर्व

कुन्थुं कुन्थादिजीवानां कुन्थनान्मुक्तमानसम्।
सुपथ्यं भव्यजीवानां वन्दे सत्यपथातिनाम् ॥१॥

अथ शान्तिसुतः श्रीमान्नारायणसमाह्वयः।
शान्तिवर्धनसंज्ञस्तु शान्तिचन्द्रस्ततोऽभवत् ॥२॥

अर्थ (श्लोक 1 से 2): कुंथुनाथ भगवान् को प्रणाम है, जो कुंथु आदि जीवों की रक्षा करने वाले और भव्य-जीवों को उत्तम मार्ग में लगाने वाले है, उनके हितैषी हैं। शान्तिनाथ प्रभु के बाद कुरुवंश में उनका पुत्र श्रीमान् नारायण नाम राजा हुआ। इसके बाद शान्तिवर्द्धन और उसका पुत्र शान्तिचन्द्र नाम राजा हुआ ॥१-२॥


चन्द्रचिह्नः कुरुश्चेति कुरुवंशसमुद्भवाः।
एवं बहुष्वतीतेषु शूरसेनो नृपोऽभवत् ॥३॥

यस्मिन्राज्यं प्रकुर्वाणेऽभूवन्नानासुनीतयः।
ईतयः क्वापि संनष्टा घस्रे तारागणा इव ॥४॥

अर्थ (श्लोक 3 से 4): इनके बाद चन्द्रचिह्न और कुरु राजा ने इस वंश को आभारी किया एवं इन राजाओं के बाद इस वंश में और-और बहुत से राजा हुए। इसके बाद सूरसेन नाम एक प्रतापी राजा ने इसकी शोभा बढ़ाई। उसके समय सब जगह नीति से काम लिया जाता था। कहीं भी किसी को ईति-भीति नहीं सताती थी। तात्पर्य यह कि वहाँ ईति-भीति नहीं थी, जैसे दिन में तारा-गण नहीं होते ॥३-४॥


स शूरः शूरताधीशः शूरसहस्रसंयुतः।
सूराभः केवलो यस्य रसोऽभूच्छूरसंश्रितः ॥५॥

यत्प्रतापात्यरे भूपा हित्वा पत्तनसज्जनान्।
दरीषु दरसंदीप्ताः शेरते शयनातिगाः ॥६॥

अर्थ (श्लोक 5 से 6): वह शूर था, शूरवीरों का स्वामी था। उसकी हजारों शूरवीर सेवा करते थे। उसके शरीर की आभा सूरज की प्रभा से कम न थी। उसका इतना बढ़ा-चढ़ा पराक्रम था कि बड़े-बड़े शूरवीर भी आकर उसका आश्रय लेते थे। उसके प्रताप से शत्रु राजा अपने-अपने नगरों को छोड़कर वन में जा छिपते थे और वहाँ वे शय्या के बिना ही गुफाओं के अँधेरे में सोते थे ॥५-६॥


श्रीकान्ता कामिनी तस्य श्रीवत्कान्ता गुणाब्धितः।
जाता भ्रातृन्दुसद्वक्त्रा जगदानन्ददायिनी ॥७॥

तारागणो गुणाकृष्टश्चक्षुस्तारापराजितः।
यस्या नखमिषान्नूनं सेवते शिवसिद्धये ॥८॥

अर्थ (श्लोक 7 से 8): उसकी भार्या का नाम था श्रीकान्ता। उसका शरीर लक्ष्मी के शरीर जैसा था। वह लक्ष्मी के साथ तुलना करती थी। लक्ष्मी समुद्र से पैदा हुई है। वह गुणों के समुद्र से पैदा हुई थी। लक्ष्मी का अपने भाई चाँद के समान मुख था। इसका भी चाँद जैसा मुख था। लक्ष्मी सारे संसार को आनंद देती है। यह भी जगत् भर को आनंद देने वाली थी। श्रीकान्ता के नख बड़े सुन्दर थे, जान पड़ता था कि मानों इसके नेत्रों के तारों द्वारा जीते गये और इसके गुणों द्वारा खींचे गये तारा-गण ही हैं और सुखी होने की इच्छा से वे नखों के छल से इसकी सेवा करते हैं ॥७-८॥


यद्वक्त्रचन्द्रमावीक्ष्य पद्मा सद्भातिगा सदा।
जलेषु शेरते यस्माद्विरोधश्चन्द्रपद्मयोः ॥९॥

अर्थ: इसके मुख-रूपी चन्द्रमा को देखकर कमल बहुत ही लज्जित हुए, अतएव वे छाया आदि के बिना ही जल में रहने लगे तथा जान पड़ता है कि इसी से चन्द्रमा और कमलों में परस्पर विरोध हो गया है। इसके गले में चमकीला और मनोहर हार पड़ा हुआ था, जो कुचों के बीच से लटकता


यद्वक्षोजमहाकुम्भौ सेवते हि निधीच्छया।
स्फुरन्मनोहरो हारो नागवन्नागमार्थिनौ ॥१०॥

यत्सेवावधिसंबद्धाः श्रियादयोऽमरयोषितः।
कुर्वन्ति सर्वकार्याणि पुण्यात्किं हि दुरासदम् ॥११॥

धनधाराधरो धीरो धनदो हि यदङ्गणे।
जलवद्रत्नधारां च वर्षतीति महाद्भुतम् ॥१२॥

रत्नधाराधरत्वेन वसुधाख्यां गता धरा।
यत्र गर्भोत्सवे तत्किं यन्नाभूत्प्रमदावहम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 9 से 13): था। जान पड़ता था कि जैसे पूर्व भव के रागभाव के कारण निधि की इच्छा से साँप धन के खजाने पर बैठ जाता है उसी तरह से यह हार भी निधि-शोभा की इच्छा से इन कुचरूपी महान् कुंभों की सेवा करता है। श्री आदि देवियाँ हमेशा ही श्रीकान्ता की सेवा में उपस्थित रहा करती थीं और उसके सभी काम-काज करती थीं। सच है कि पुण्य के योग से कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। अचम्भे की बात तो यह है कि धीर-वीर और धन का मेघ-कुबेर उसके आँगन में जल की तरह रत्नों की बरसा करता था। उस समय रत्नों की बरसा से सारी पृथ्वी में धन-ही-धन हो गया था। कहीं भी कोई दरिद्री न था और पृथ्वी का वसुधा नाम सफल हो गया था। प्रभु के गर्भोत्सव के समय ऐसा कोई भी काम न हुआ जो जीवों को प्रमोद का देने वाला न हो ॥९-१३॥


सैकदा षोडशस्वप्नान्निशापश्चिमयामके।
सुप्ताथ शयनेऽद्राक्षीन्नृपपत्नी नृपालिका ॥१४॥

विदित्वा वाद्यनादेन प्रातः साऽन्तःसुखावहा।
कृतनित्यक्रिया स्नात्वा मिलन्मङ्गलमण्डना ॥१५॥

स्वसेवापरसंसक्ता द्योतयन्ती सदोनभः।
विद्युतल्लतेव चाद्राक्षीद्भूपं जीमूतवत्स्थितम् ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): एक दिन श्रीकान्ता सुख की नींद में सोई हुई थी। रात का पिछला पहर था। उस समय उस देवी ने सोलह स्वप्नों को देखा। मनुष्यों को पालने-पोषने वाली वह सबेरे भाँति-भाँति के बाजों की आवाज को सुनकर सेज से उठी। इस समय उसके हृदय में बड़ा हर्ष हो रहा था। उसने प्रभात की नित्य क्रियाएँ कीं, स्नान किया तथा वस्त्र, मंगल-रूप आभूषण आदि पहने और सभा में पहुँची। उस समय सभा ऐसी शोभने लगी जैसा कि बिजली से आकाश सुशोभित होता है ॥१४-१६॥


नृपासनार्धमासीना नत्वा तत्पादपङ्कजम्।
व्यज्ञासीत्स्वप्नसंघातमघविघ्नौघघातकम् ॥१७॥

विदित्वा तत्फलं भूपोऽवधिवीक्षणतः क्षणात्।
क्रमशः क्रमसंभावि फलं तेषामवर्णयत् ॥१८॥

अर्थ (श्लोक 17 से 18): वहाँ वह राजा को नमस्कार कर आधे सिंहासन पर जाकर बैठ गई और विघ्न-बाधाओं को हरने वाले उन स्वप्नों को उसने जैसा का तैसा राजा से कह दिया] उन्हें सुनकर राजा ने अवधिज्ञान द्वारा उनका फल जान लिया और क्रम से होने वाले उनके फल को रानी से कह दिया ॥१७-१८॥


श्रुत्वा वचोंऽशुना स्पृष्टा तत्स्फुरद्वदनाम्बुजा।
अब्जिनीवास्त्रसंसर्शादतुषच्चोष्णदीधितेः ॥१९॥

श्रावणे बहुले पक्षे दशम्यां संदधे च्युतम्।
सर्वार्थसिद्धितो देवं देवीगर्भे सुशोधिते ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 19 से 20): उस समय राजा के वचन-रूप किरणों के स्पर्श से रानी का मुख-कमल खिल उठा, जिस तरह सूरज की किरणों के संसर्ग से कमल खिल जाते हैं। इसके बाद सावन वदी दसमी के दिन रानी ने सर्वार्थसिद्धि से चयकर आये हुए एक देव को देवियों द्वारा शोधे हुए अपने गर्भ में धारण किया ॥१९-२०॥


बिडौजा जडतामुक्तो ज्ञात्वा तद्गर्भसंभवम्।
समाट्य घटनान्निष्ठस्तत्कल्याणं तदाकरोत् ॥२१॥

सा मुक्ताफलवद्गर्भं शुक्तिकैव समुज्ज्वला।
दधती धाम संदीप्ता द्योतते स्म स्मयावहा ॥२२॥

दीप्तदेवीगणैः सेव्या सेव्यार्थफलदायिनी।
पृश्नता गूढकाव्याद्यै रेजे सा रत्नखानिवत् ॥२३॥

अर्थ (श्लोक 21 से 23): प्रभु के गर्भ-समय को जानकर देवताओं-सहित ज्ञानी इन्द्र आया और उसने गर्भोत्सव की खूब ही धूम मचाई-चहल-पहल की। मुक्ताफल को धारण करने वाली निर्मल सीप की तरह श्रीकान्ता प्रभु को गर्भ में लिये हुए बड़ी शोभा पाती थी। उस समय उसका शरीर तेज-मय हो गया था परन्तु उसको गर्व रंचमात्र भी न थी। सुन्दरी देवांगनाएँ उसकी हमेशा सेवा करती थीं और वह सेवा के फल को देती थी अर्थात् उसकी सेवा से उन्हें स्वयमेव ही फल मिलता था ॥२१-२३॥


सारः कः संसृतौ देवि सुखं किं चाभिधीयते।
शर्माशर्मकरं किं हि वदाद्याक्षरतः पृथक् ॥२४॥

यतो जना घना नित्यं जंजन्यन्ते भवावनौ।
ततोऽद्य गर्भभावेन तद्धि दुःखकरं नृणाम् ॥२५॥

सुर्यात्का जायते लोके का स्थिता विदुषां मुखे।
अर्जुनः कीदृशः का स्याद्गङ्गा भागीरथीति च ॥२६॥

अर्थ (श्लोक 24 से 26): देवियाँ उससे काव्यों का गूढ़-गूढ़ अर्थ पूछती थीं कि देवी! संसार में सार क्या है? सुख किसे कहते हैं? और जीवों को सुख-दुख देने वाला कौन है? एक बात यह है कि इन प्रश्नों के ऐसे उत्तर बताइये, जिनका कि पहला अक्षर ही भिन्न-भिन्न हो और सब अक्षर एक ही हों। रानी ने उत्तर दिया कि संसार में धर्म सार है। शर्म-कल्याण को सुख कहते हैं और अपने शुभ-अशुभ भावों से इकट्ठे किये हुए पुण्य-पाप कर्म ही जीवों को सुख-दुख देते हैं। कर्म के निमित्त से वे बंधते और जन्म लेते हैं। कर्म के बड़े संकट को सहते हैं एवं कर्म के निमित्त से ही जीवों को सांसारिक सुख होता है। इसके बाद फिर भी देवियों ने पूछा कि देवी! सूर्य से क्या उत्पन्न होता है? विद्वानों के मुँह में क्या रहता है? अर्जुन किसे कहते हैं? और गंगा किसे कहते हैं? रानी ने उत्तर में कहा भागीरथी। तात्पर्य यह कि सूरज से भा-आभा उत्पन्न होती है। विद्वानों के मुँह में गी-वाणी-सरस्वती रहती है। अर्जुन रथी को कहते हैं और गंगा भागीरथी को कहते हैं ॥२४-२६॥


एवं प्रश्नोत्तरेऽसूत सा सुतं प्राग्यथा रविम्।
नवमे मासि वैशाखे शुक्लपक्षादिमे दिने ॥२७॥

मेघवाहनमुख्यास्ते समागत्य सुरासुराः।
नयन्ति स्म जिनं मेरुमूर्धानं चोर्ध्वगामिनः ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 27 से 28): इस तरह प्रभु की माता का दिल बहलाने के लिए देवियाँ प्रश्न करती थीं और माता उत्तर देती थी। इसके बाद जब नौ महीना पूरे हो गये तब उस देवी ने वैशाख सुदी पड़वा के दिन पुत्ररत्न को जन्म दिया, जिस भाँति पूरब दिशा सूरज को जन्म देती है। प्रभु का जन्म जानकर इसी समय स्वर्ग से इन्द्र आदि देवता-गण आये और वे आकाशगामी प्रभु को सुमेरु पर्वत की शिखर पर ले गये ॥२७-२८॥


पीठे संस्थाप्य संपठ्य सत्पाठं पठनोधताः।
क्षीराब्धिवारिभिर्देवा अभ्यषिञ्चञ्जिनोत्तमम् ॥२९॥

संज्ञया कुन्थुमाज्ञाय समानीय पुरे सुराः।
पित्रोः समर्पयामासुर्मघवप्रमुखाः सुराः ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 29 से 30): वहाँ उन्हें सिंहासन पर विराजमान कर और भाँति-भाँति के उत्तम पाठों को पढ़कर उनकी स्तुति की और क्षीरसागर का जल लाकर उनका अभिषेक किया। उनका कुंथुनाथ नाम रखा। इसके बाद वे उन्हें वापस नगर को ले आये और उनके माता-पिता को सौंप दिया ॥२९-३०॥


यौवने वर्धमानः स वर्धमानगुणोदयः। पञ्चत्रिंशद्धनुःकायो निष्टप्ताष्टापदद्युतिः ॥३१॥

स्फुरत्पञ्चसहस्रोनलक्षसंवत्सरस्थितिः। प्राप्तराज्यपदो भोगान्भुञ्जन् भद्रभरावहः ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 31 से 32): क्रम-क्रम से बढ़कर प्रभु ने यौवन-अवस्था में पैर रक्खा। इस समय प्रभु के सभी गुण वृद्धिंगत थे। उनके शरीर की ऊँचाई पैंतीस धनुष थी। उनकी कान्ति तपाये हुए सोने सरीखी थी। प्रभु की आयु पाँच हजार वर्ष कम एक लाख वर्ष की थी। कुछ काल बाद प्रभु का राज्याभिषेक हुआ और नीति से प्रजा-पालन करते हुए वे राज-सुख भोगने लगे ॥३१-३२॥


चक्रलक्ष्मीं समासाद्य समभूच्चक्रलाञ्छनः। स्मृतपूर्वभवज्ञानो व्यरंसीद्भवतः स च ॥३३॥

ज्ञात्वा लौकान्तिका देवास्तादृशं तं स्तवस्तवैः। स्तुत्वा दीक्षोद्यतं नत्वा समगुः पञ्चमीं दिवम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): इसके बाद उनकी आयुधशाला में चक्र रत्न की उत्पत्ति हुई, जिसको पाकर वे छहों खण्ड के राजा चक्रवर्ती हो गये। एक दिन उन्हें अपने पिछले भव की याद हो आई और वे संसार से विरक्त हो गये। यह जान पाँचवें ब्रह्मस्वर्ग से लौकान्तिक देव आये और संसार से उदास-चित्त प्रभु की उन्होंने स्तुति की। इसके बाद प्रभु को दीक्षा लेने को तैयार देख वे प्रभु की स्तुति पूजा कर अपने स्थान को चले गये ॥३३-३४॥


पुत्रे नियुक्तराज्योऽसौ विजयाशिबिकां श्रितः। देवेन्द्रैः सह संप्राप्तसहेतुकवनं वरम् ॥३५॥

जन्मनो दिवसे षष्ठोपवासी तत्र भूमिपैः। सहस्रैर्लुञ्चनोद्युक्तैरयासीत्संयमं विभुः ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): इसके बाद प्रभु अपने पुत्र को राज-पाट संभला कर विजया नाम पालकी में सवार हो देवेन्द्रों के साथ-साथ सहेतुक वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने केशलोंच कर हजारों राजाओं के साथ-साथ संयम को धारण किया और उसी दिन से उन्होंने छह दिन के बाद आहार लेने की हमेशा के लिए प्रतिज्ञा की ॥३५-३६॥


तत्पुरे धर्ममित्राख्यः पारणाह्नि ददौ मुदा। तस्मै च पायसं सोऽतः प्रापदाश्चर्यपञ्चकम् ॥३७॥

नीत्वा षोडश वर्षाणि छाद्मस्थ्येन सहेतुके। वने षष्ठोपवासी स तिलकद्रुममूलगः ॥३८॥

चैत्रज्योत्स्नापराह्णे च तृतीयायां समुद्यमी। घातिकर्मक्षयं कृत्वा कैवल्यमुदपादयत् ॥३९॥

अर्थ (श्लोक 37 से 39): वहीं हस्तिनागपुर में धर्ममित्र नाम एक श्रावक रहता था। उसने पारणा के दिन प्रभु को खीर का आहार दिया, जिससे उसके घर पाँच अचम्भे की बातें हुई एवं प्रभु सहेतुक वन में सोलह वर्ष छद्मस्थ-अवस्था में रहे। बाद तिलक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उन उद्यमशील प्रभु ने घातिकर्मों का नाशकर चैत सुदी तीज के दिन शाम के समय केवल-ज्ञान लाभ किया ॥३७-३९॥


सुरासुरनरैः पूज्यः समवसृतिसंस्थितः। स्वयंभ्वाद्यैर्गणेशैश्च पञ्चत्रिंशद्भिरेडितः ॥४०॥

सुपूर्वसंविदः सप्तशतान्यस्य यतीश्वराः। शिष्याः शतैकपञ्चाशत्त्रिपञ्चाशत्सहस्रकाः ॥४१॥

अर्थ (श्लोक 40 से 41): इस समय कुबेर ने आकर प्रभु के समवसरण की रचना की और सुर-असुर तथा मनुष्य गण आ-आकर उनकी वन्दना-स्तुति करने लगे। प्रभु की सेवा में स्वयम्भू आदि पैंतीस गणधर उपस्थित थे। उनके समवसरण में सात सौ यतीश्वर और तिरेपन हजार एक सौ पचास शिष्य थे ॥४०-४१॥


तृतीयावगमास्तस्य पञ्चवर्गशतानि वै।
त्रयस्त्रिंशच्छतं तस्य केवलाः केवलक्षणाः ॥४२॥

विक्रियार्द्धिसमृद्ध्याढ्याः खद्वयैकेन्द्रियोक्तयः।
चतुर्थज्ञानिनोऽभूवन्खनभस्त्रित्रिसंख्यकाः ॥४३॥

वादिनो वादजेतारः पञ्चाशत्द्विसहस्रकाः।
सर्वे षष्टिसहस्त्राणि तस्याभूवन्यतीश्वराः ॥४४॥

खपञ्चाग्निनभाःषट्कभाविन्द्याद्यार्यिकाः शुभाः।
लक्षद्वयं च श्राद्धानां त्रिलक्षाः श्राविका मताः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 42 से 45): दो हजार पाँच सौ अवधि-ज्ञानी और तैंतीस हजार केवलज्ञानी थे। पाँच हजार एक सौ विक्रिया ऋद्धि के धारक और मनःपर्यय ज्ञानी तैंतीस सौ थे एवं वाद-विजेता वादी दो हजार पचास थे। सब मिला कर कुल साठ हजार यतीश्वर थे तथा ६० हजार तीन सौ पचास आर्यिकाएँ थीं। दो लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं ॥४२-४५॥


असंख्या देवदेव्यस्तु तिर्यञ्चः संख्यान्विताः।
एवं संघेन देवेशो विजहाराखिलां क्षितिम् ॥४६॥

मासमुक्तक्रियः प्राप सम्मेदाद्रिं सहस्रकैः।
मुनिभिः समगान्मुक्तिं क्षीणकर्मा यतीश्वरः ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 46 से 47): इसी तरह असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यात तिर्यंच थे। इस प्रकार संघ-सहित प्रभु ने सब पृथ्वीतल पर विहार किया। अन्त में विहार करते-करते वे हजारों मुनियों सहित सम्मेदाचल पर पहुँचे। वहाँ प्रभु ने एक महीने तक योगनिरोध किया और सम्पूर्ण शेष कर्मों को नाश कर वे मोक्ष-स्थान को चले गये। प्रभु के साथ-साथ और-और बहुत से मुनि भी मोक्ष-अवस्था को प्राप्त हुए ॥४६-४७॥


वैशाखे शुक्लपक्षस्यादिमे घस्रे जिने गते।
सिद्धिं ज्ञात्वा जिनं सिद्धमापुरुत्कण्ठिताः सुराः ॥४८॥

कुर्वाणास्ते सुनिर्वाणपूजां गीर्वाणनायकाः।
नामं नाममगुः स्वर्गं स्तावं स्तावं गुणान्विभोः ॥४९॥

अर्थ (श्लोक 48 से 49): उस दिन वैशाख सुदी पड़वा थी। प्रभु का निर्वाण जान उत्कंठित हुए बहुत से देव आये। उन्होंने प्रभु का खूब निर्वाण-महोत्सव मनाया और प्रभु को नमस्कार किया। इसके बाद प्रभु के गुणों को स्मरण करते हुए इन्द्र आदि सभी देवता-गण वहाँ से स्वर्ग को चले गये ॥४८-४९॥


आसीद्यः प्राग्विदेहे नृपमुकुटतटीघृष्टपादारविन्दो
दक्षो वै सिंहपूर्वो रथ इति नृपतिः सिद्धसर्वार्थसिद्धिः।
कुन्थुः कुन्थाख्यजीवप्रमुखसुखदयादायको नायकस्तात्
चक्री तीर्थंकरोऽसौ वरगुणमतये कामदेवो वरो वः ॥५०॥

अर्थ: जो पहले, पूर्व विदेह में राजाओं के मुकुटों के तट से स्पर्शित हैं चरणकमल जिसके ऐसा वैभवशाली सिंहरथ नाम राजा था और वहाँ से फिर सर्वार्थसिद्धि को गया एवं सर्वार्थसिद्धि विमान से चयकर जो कुंथु आदि जीवों की दया के पालक और उनको सुख देने वाले कुंथुनाथ प्रभु हुए। कुंथुनाथ प्रभु चक्रवर्ती, तीर्थंकर और कामदेव इन तीन पदों के धारक हुए वे हमें उत्तम-उत्तम गुणों का दान दें और हमारी पुष्टि करें ॥५०॥ जो पाप-रूपी वैरियों पर विजय-लाभ करने वाले हैं, कामदेव को मथ कर चकनाचूर करने वाले हैं, एवं जो पृथ्वीतल पर धर्म का प्रचार करने वाले और तीन लोक द्वारा पूजे जाने वाले हैं, वे


पुष्यत्पापारिकुन्थुवरमथनमितो मीनकेतोः सुकेतो
धर्ता धर्मे धरित्रीं त्रिभुवनमहितः कुन्थुनाथः सुनाथः।
कुन्थ्वादीनां दयाढ्यो वरपथपथिकस्तीर्थराट् चक्रराजः
शुभ्रत्सौभाग्यभर्ता भववनदहनः पातु पापात्स युष्मान् ॥५१॥

अर्थ: कुंथुनाथ भगवान् तुम्हारी रक्षा करें। जो कुंथु आदि जीवों की दया से भरपूर है, उत्तम मार्ग के पथिक और तीर्थंकर हैं, चक्रवर्ती हैं और पुण्य के भण्डार को भरने वाले हैं तथा संसार-रूप वन को जला देने वाले हैं वे प्रभु सबको सुख दें ॥५१॥

सप्तम पर्व (भाग 1/2)

अरं विजितकर्त्मारिं सारचक्रेशचर्चितम्। सारं सर्वगुणाधारं नौमि तीर्थकरं वरम् ॥१॥

अर्थ: मैं उन अर जिन को नमस्कार करता हूँ जो कर्म-शत्रुओं पर विजय-लाभ करने वाले हैं, चक्रवर्ती आदि जिन की पूजा करते हैं, जो सभी गुणों के आधार और सार हैं तथा जो तीर्थंकर हैं सारे संसार से उत्कृष्ट हैं ॥१॥


एवं भूपेष्वतीतेषु तत्र राजा सुदर्शनः। सुदर्शनः प्रिया तस्य मित्रसेनाभवत्सती ॥२॥

अर्थ: इस तरह और-और बहुत से राजाओं के हो चुकने पर कुरुवंश में एक सुन्दराकृति सुदर्शन नाम राजा हुआ। उसकी प्रिया का नाम था मित्रसेना। वह सती थी। श्री आदि देवियाँ उसकी सेवा करती थीं। उसके निमित्त से पृथ्वी पर धन की धारा पड़ती थी ॥२॥


वसुधारादिभिर्मान्या दृष्टषोडशस्वप्निका। फाल्गुने सा तृतीयायां सिते गर्भं दधे शुभम् ॥३॥

स्वर्गावतारकल्याणं सुपर्वाणश्चतुर्विधाः। कुर्वाणाः परमोत्साहं नत्वा तत्पितरौ ययुः ॥४॥

अर्थ (श्लोक 3 से 4): एक दिन उसने सोलह स्वप्नों को देखा और फाल्गुन सुदी तीज के दिन गर्भ को धारण किया। उसका गर्भ संसार के लिए शुभ था, कल्याण का दाता था। उसी समय प्रभु का स्वर्गावतरण कल्याणक करने को चार निकाय के देवता-गण आये। परम उत्साह से उन्होंने उत्सव किया ॥३-४॥


अदभ्रभ्रूणसंभारा भारत्यक्ता नृपप्रिया। मार्गशीर्षे सितेऽसूत चतुर्दश्यां सुतं परम् ॥५॥

अर्थ: इसके बाद प्रभु के माता-पिता को नमस्कार कर वे स्वर्ग-स्थान को चले गये। यद्यपि उस निर्मल गर्भ का बहुत भार था तो भी मित्रसेना को यह भार कुछ भी न जान पड़ता था। इसके बाद गर्भ के दिन पूरे हो जाने पर अगहन सुदी चौदस के दिन उसने पुत्ररत्न को जन्म दिया ॥५॥


त्रिविधावगमोद्भासी जिनः संस्नापितः सुरैः। मेरौ प्राप्तारसन्नामा संप्राप्तो यौवनं क्रमात् ॥६॥

त्रिंशच्चापतनूत्सेधश्चारुचामीकरद्युतिः। चतुर्भिरधिकाशीतिसहस्राब्दायुरूर्जितः ॥७॥

स कन्यानां सहस्रैश्च पाणिपीडनमाप्तवान्। प्राप्तराज्योदयो धीमान् सुरकोटिनमस्कृतः ॥८॥

अर्थ (श्लोक 6 से 8): जन्म से ही प्रभु तीन ज्ञान के धारक थे। वे तीर्थंकर थे। इसी समय स्वर्ग से इन्द्र आदि देवता-गण आये और प्रभु को सुमेरु पर्वत पर ले गये। वहाँ उन्होंने प्रभु को सुवर्ण के कलशों से स्नान कराया और उनका अर नाम रखा। क्रम-क्रम से कुछ काल बाद प्रभु युवा-अवस्था को प्राप्त हुए। उनका शरीर तीस धनुष ऊँचा था, तपाये हुए सोने की सी कान्ति वाला था। उनकी आयु चौरासी हजार वर्ष की थी। प्रभु का हजारों कन्याओं के साथ ब्याह हुआ। इसके कुछ काल बाद वे राजा हुए। देवता-गण हमेशा आ-आकर नमस्कार करते थे ॥६-८॥


चक्ररत्ने समुत्पन्ने चक्रे चक्रेश्वरो नतान्। नृपतीन् ननु द्वात्रिंशत्सहस्रसंख्यकान्कृती ॥९॥

अर्थ: कुछ समय बाद उनकी आयुधशाला में चक्र-रत्न उत्पन्न हुआ, जिसके द्वारा अर जिन ने बत्तीस हजार राजाओं को अपने अधीन किया, उन्हें नमाया। वे अर चक्रवर्ती पुण्यात्मा और कृतकृत्य थे।


अष्टादशसुकोटीनां घोटकानां घटाश्रितः। चतुर्भिरधिकाशीतिसुलक्षानेकपाधिपः ॥१०॥

तावतां रथवृन्दानां पप्रथे नाथतां पृथुम् । द्वात्रिंशतां सहस्राणां देशानां प्रभूतामितः ॥११॥

अर्थ (श्लोक 9 से 11): उनके यह अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी लाख हाथी तथा चौरासी लाख ही रथ थे। वे इतनी विभूति के स्वामी थे। इसके सिवा वे बत्तीस हजार देशों के स्वामी थे ॥९-११॥


षण्णवतिसहस्राणां नारीणां भोगभोजकः । द्वासप्ततिसहस्राणि पुराणि पाति पावनः ॥१२॥

नवाग्रनवतिद्रोणसहस्रप्रभुतां गतः । पत्तनान्यष्टचत्वारिंशत्सहस्राणि चास्य वै ॥१३॥

खेटानां च सहस्राणि षोडशैवाभवन्विभोः । कोटिषण्णवतिग्रामाग्रण्यं स गतवान्महान् ॥१४॥

षट्पञ्चाशत्समुद्रान्तर्द्वीपपालनतत्परः । चतुर्दशसहस्राणां वाहनानां हि रक्षकः ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 12 से 15): छियानवें हजार स्त्रियों के भोक्ता थे, बहत्तर हजार पुरों के रक्षक थे एवं निन्यानवें हजार द्रोण और अड़तालीस हजार पत्तनों के वे मालिक थे। उन प्रभु के सोलह हजार खेट और छियानवें हजार गाँव थे एवं वे चौदह हजार वाहनों और समुद्रपर्यन्त द्वीपों का पालन करते थे ॥१२-१५॥


द्वात्रिंशत्सुसहस्राणां नाटकानां निरीक्षकः । स्थालीनां कोटिसंख्यानां भाजनानां च भाजनम् ॥१६॥

त्रिकोटिगोकुलैः कोटिहलैः सोऽभूत्परिग्रही। कुक्षिवासाः शतान्यस्य सप्ताभूवन्नरेशितुः ॥१७॥

घना दुर्गाटवी तस्य सहस्राण्यष्टसप्ततिः । अष्टादशसहस्रोक्तम्लेच्छराजनतस्य च ॥१८॥

निधयो नव तस्यासन् रत्नानि च चतुर्दश । चक्रिणश्चरणत्राणे पादुके विषमोचिके ॥१९॥

अभेद्याख्यं तनुत्राणं रथश्चास्याजितंजयः । वज्रकाण्डं धनुः प्रोक्तममोघाख्याः शराः स्मृताः ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 16 से 20): वे बत्तीस हजार नाटकों को देखते थे। उनके यहाँ एक करोड़ थालियाँ, तीन करोड़ गायें और एक करोड़ हल थे। सात सौ कुक्षिवास और अठत्तर सौ अटवी-दुर्ग थे। उनको अठारह हजार म्लेच्छ राजा नमस्कार करते थे। उनके यहाँ नौ निधियाँ और चौदह रत्न थे। उनके चरणों की रक्षा करने वाली उनके यहाँ दो खड़ाऊँ थीं जो विष-विकार को दूर करती थीं। चक्रवर्ती का अभेद्य नाम कवच और अजितंजय नाम रथ था। वज्रकांड नाम धनुष और अमोघ नाम शर थे ॥१६-२०॥


शक्तिस्तु वज्रतुण्डाख्या कुन्तः सिंहाटको मतः । असिरत्नं सुनन्दाख्यं खेटं भूतमुखं मतम् ॥२१॥

चक्रं सुदर्शनं चण्डवेगो दण्डः सुदण्डकृत् । वज्रमयं चर्मरत्नं चिन्तामणिस्तु काकिणी ॥२२॥

पवनंजयनामाश्वो हस्ती विजयपर्वतः । आनन्दिन्यो महाभेर्यो द्वादशेति जिनेशितुः ॥२३॥

तावन्तस्तस्य विजयघोषाख्याः पटहा मताः । एवमृद्ध्या समृद्धः स व्यरंसीत्तु कदाचन ॥२४॥

अरविन्दकुमाराय दत्त्वा राज्यं स्वसूनवे । लौकान्तिकसुरोद्दिष्टपथः सत्यपदेशकः ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 21 से 25): उनके वज्रतुंडा नाम शक्ति और सिंहाटक नाम भाला था। सुनंदा नाम तलवार और भूतमुख नाम खेट-ढाल थी। सुदर्शन नाम चक्र और चंडवेग नाम दंड था, जो दुष्ट प्रजा को दंड देता था। वज्रमयी चर्मरत्न, चिंतामणि और काकिणी रत्न थे। पवनंजय नाम घोड़ा और विजय-पर्वत नाम हाथी था एवं उनके यहाँ आनंद देने वाली बारह भेरियाँ थीं और बारह विजयघोष नाम नगाड़े थे। इस प्रकार की ऋद्धि वाले प्रभु एक दिन किसी वैराग्य के निमित्त को पाकर विरक्त हो गये और उन्होंने अरविंदकुमार को सारा राज-पाट सौंप दिया। इसी समय अपना नियोग पूरा करने को लौकान्तिक देव आये और उन्होंने प्रभु के आगे मार्ग का निर्देश किया ॥२१-२५॥


वैजयन्त्याख्यशिबिकां प्राप्य त्रिदशवेष्टितः। सहेतुकवने वन्यवृत्तिः षष्ठोपवासभृत् ॥२६॥

दशम्यां मार्गशीर्षस्य शुक्ले सहस्रभूमिपैः। प्राव्राजीद्राजतः पूज्यो देवानामदेवराट् ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 26 से 27): इसके बाद सच्चे मार्ग को बताने वाले वे प्रभु वैजयन्ती नाम पालकी में सवार हो देवता-गण के साथ-साथ सहेतुक वन में गये। वहाँ उन्होंने वन्यवृत्ति अर्थात् दिगम्बर मुद्रा धारण की। तात्पर्य यह कि अगहन सुदी दसमी के दिन हजारों राजाओं-सहित वे देवताओं द्वारा सेवित और इंद्र के स्वामी प्रभु दीक्षित हो गये और उन्होंने छह उपवासों के बाद आहार लेने की प्रतिज्ञा की ॥२६-२७॥


चतुर्बुद्धिधरो धीमान्यारणाह्न्यपराजितात्। नृपाच्चक्रपुरे प्राप पारणं परमोद्यतः ॥२८॥

संवाह्य षोडशाब्दून्स छाद्मस्थ्येन सुछद्मगः। जघान घातिसंघातं व्यधो विघ्नघ्न इत्यरः ॥२९॥

कार्तिके द्वादशीघस्रे सिते चूततरोरधः। षष्ठोपवासतो बोधं पञ्चमं स समासदत् ॥३०॥

अर्थ (श्लोक 28 से 30): बाद चार ज्ञान के धारक उन बुद्धिमान् स्वामी ने पारणा के दिन चक्रपुर में अपराजित राजा के यहाँ पारणा किया। प्रभु ने सोलह वर्ष छद्मस्थावस्था में बिताये। बाद घाति कर्मों को घातकर निष्पाप और विघ्नबाधा से रहित वे प्रभु, आम के वृक्ष के नीचे बैठे हुए कार्तिक सुदी बारस के दिन षष्ठोपवास के प्रभाव से केवलज्ञानी हुए ॥२८-३०॥


तदा सुरासुराश्चक्रुः सेवां ज्ञानोद्गमे वराः। समवसृतिसंस्थस्य जिनारस्यारिघातिनः ॥३१॥

चैत्रकृष्णान्तघस्रे स सम्मेदे मासमात्रकम्। मुक्तक्रियः सहस्रेण मुनीनां मुक्तिमाप्तवान् ॥३२॥

निर्वाणं च प्रकुर्वाणाः सुपर्वाणः सुरावगाः। कल्याणं कल्पनामुक्ता मुमुचुस्तस्य पाप्मनः ॥३३॥

अर्थ (श्लोक 31 से 33): उस समय सुर-असुर सभी आये और उन्होंने भगवान् के पंचम ज्ञान की पूजा की और घातिकर्मों के अरि-वैरी अर जिन का समवसरण रचा। इसके बाद सम्मेदशिखर पर योगनिरोध कर हजारों मुनियों-सहित वे चैत वदी अमावस के दिन मोक्ष-महल में जा विराजे। इस समय देवता-गण आये और उन्होंने मीठे-मीठे शब्दों द्वारा प्रभु का गुण-गान किया और विकल्प जालों को छोड़कर निर्द्वन्द्व हो उनका निर्वाण महोत्सव मनाया-जिससे उनकी आत्मा पवित्र हो गई, उनका पाप-मल हल्का हो गया ॥३१-३३॥


जीयाज्जिनारो विगतारिवारः सुरेन्द्रवृन्दारकवन्द्यपादः।
किरन्कलारः सुसभाजनेशो वृषं वृषात्मा वृषभो गरिष्ठः ॥३४॥

योऽभूद् भूपोऽद्भूतात्मा धनपतिशुभवाक् प्राङ्मुनीनां पतिश्च
पश्चाज्ज्यायाञ्जितात्मा जयजितविधुरः संजयन्ते विमाने।
देवानामाधिपत्यं गत इह सुपतिर्धर्मिणां धर्मराजः
सोऽव्याद्युष्माञ्जिनेन्द्रो निखिलनरपतिः कामदेवो वरारः ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 34 से 35): उन अर जिन की जय हो जो वैरियों के समूह को जीतने वाले है, जिनके चरण-कमलों की सुरेन्द्रों के समूह भी पूजा करते हैं, जो सब विद्याओं के भण्डार हैं, जो भव्य जीवों को धर्म का उपदेश करते है और जो धर्म-मय और धर्म से सुशोभित परमात्मा हैं। जो महात्मा पहले धनपति नाम राजा थे वह बाद मुनियों में श्रेष्ठ मुनीश्वर हुए और आत्म-संयम तथा शत्रुओं पर विजय पाने के प्रभाव से संजयंत विमान में देवतों के अधिपति अहमिन्द्र हुए। वहाँ से चयकर भरतक्षेत्र में धर्मात्माओं के पति धर्मराज-तीर्थंकर हुए! अर जिन तीर्थंकर, सम्पूर्ण मनुष्यों के स्वामी चक्रवर्ती और कामदेव थे। तात्पर्य यह कि वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती और कामदेव इन तीन पदों के धारक थे। वे तुम्हारी रक्षा करें ॥३४-३५॥


अरनाथसुतः श्रीमानरविन्दो नृपो मतः। सुचारुश्च ततः शूरो भूपः पद्मरथो रथी ॥३६॥

ततो मेघरथस्तस्य जाया पद्मावती श्रुता। विष्णुपद्मरथौ पुत्रौ तयोरास्तां महाबलौ ॥३७॥

व्यघो मेघरथो धीमान्प्राब्राजीद्विष्णुना सह। पश्चात्पद्मरथो राज्यमलंचक्रे कृपाङ्कुरः ॥३८॥

अर्थ (श्लोक 36 से 38): अरनाथ प्रभु के बाद अरविंद नाम उनका पुत्र राजा हुआ। उसके बाद शूर, पद्मरथ और रथी राज-पाट के भोक्ता राजा हुए। रथी के बाद उसका मेघरथ नाम पुत्र राजा हुआ। उसकी प्रिया का नाम पद्मावती था। पद्मावती के गर्भ से विष्णु और पद्मरथ नाम दो पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों महान् बली थे। एक समय निष्पाप और बुद्धिमान् मेघरथ राजा किसी निमित्त को पाकर विष्णु नाम पुत्र-सहित दिगम्बर हो गया। उसके पीछे दयालु पद्मरथ कुरुजांगल देश के हस्तिनागपुर का राजा हुआ, उसने हस्तिनागपुर के राज-सिंहासन को अलंकृत किया ॥३६-३८॥


अवन्तीविषये रम्योज्जयिन्यां भूपतिर्महान्। श्रीवर्मा मंत्रिणस्तस्य चत्वारः प्रथमो बली ॥३९॥

बृहस्पतिश्च प्रह्लादो नमुचिर्वादकोविदाः। वाडवा वादकण्डूयाविडम्बितमनोरथाः ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 39 से 40): इसी समय अवन्ती देश में उज्जैनी नगरी का श्रीवर्मा नाम राजा था और उसके चार मंत्री थे। उनके नाम क्रम से बलि, बृहस्पति, प्रल्हाद और नमुचि थे। वे वाद-विवाद करने में बहुत कुशल थे। उनकी जाति वाड़व थी। वाद की इच्छा से उनका दिल हमेशा ही डावाडोल रहा करता था ॥३९-४०॥


एकदाकम्पनस्तत्रागत्य संघैः स्थितो वने। वादे निवारितास्तेन भाविज्ञानेन सङ्घपाः ॥४१॥

तद्वन्दनार्थं गच्छन्तं संघं वीक्ष्य नृपो जगौ। किमर्थं याति लोकोऽयं वन्दनार्थं मुनेरिति ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 41 से 42): एक दिन उज्जैनी में अकंपन-आचार्य आये। उनके साथ और सौ मुनि थे। वे सब वहाँ आकर वन में ठहरे। भविष्य के ज्ञाता अकंपन मुनि ने उसी वक्त सब मुनियों को वादविवाद करने के लिए मनाकर दिया। मुनियों को आया जान सभी नगरवासी उनकी वन्दना को वन में आये। उन्हें जाते हुए देखकर राजा ने कहा कि ये लोग कहाँ जाते हैं? इसके उत्तर में मंत्रियों ने कहा कि ये सब लोग मुनीश्वरों की वन्दना को जा रहे हैं। यह सुन राजा के हृदय में भी भक्ति का संचार हो आया और वह भी उसी समय वन्दना के लिए चला ॥४१-४२॥


मन्त्रिभिर्भूपतिर्भक्त्या वन्दितुं तान् गतस्तदा। वन्दितैस्तैर्नरेन्द्रेण नाशीर्दत्ता शुभप्रदा ॥४३॥

अर्थ: वन में जाकर उसने मुनियों की वन्दना की। पर मुनियों ने बदले में राजा को शुभाशीर्वाद न दिया। यह देख राजा से मंत्रियों ने कहा कि राजन् निश्चय से ये लोग कोरे बैल हैं, इनमें कुछ भी ज्ञान नहीं है। इसके बाद वे सब वहाँ से राजा के साथ-साथ चले आये। दैवयोग मार्ग में आते हुए उन्हें एक श्रुतसागर नाम बाल मुनि देख पड़े। उन्हें देखकर मंत्रियों ने हँसी उड़ाते हुए कहा कि राजन्,


बलीवर्दा इमे नूनमित्युक्त्वा मन्त्रिणो गताः।
नृपै मार्गे मुनिं बालं ददृशुः श्रुतसागरम् ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 43 से 44): यह एक युवा बैल है ॥४३-४४॥


अनड्वांस्तरुणश्चायमित्याकर्ण्य निराकृताः।
मुनिना ते सुवादेन सोऽपि गत्वागदीद्गुरुम् ॥४५॥

अर्थ: यह सुन मुनि ने मंत्रियों के साथ बहुत विवाद किया और उन्हें हरा दिया, जिससे वे बहुत ही लजाये। इसके बाद मुनि अपने स्थान को चले आये और वहाँ उन्होंने जैसा का तैसा सब हाल गुरुवर्य को कह सुनाया ॥४५॥


गुरुणाकथि भो वत्स वादस्थाने स्थितिं कुरु।
निशायामन्यथा घातः संघस्य भविता लघु ॥४६॥

अर्थ: इस पर गुरुवर्य ने कहा कि वत्स! तुम जाओ और जहाँ वाद-विवाद हुआ है वहीं जाकर रात भर ठहरो, नहीं तो सब संघ की आपत्ति में पड़ना पड़ेगा॥४६॥


तथा तेन कृते रात्रौ ते खला हन्तुमुद्यताः।
गच्छन्तः पथि तं वीक्ष्य प्रहर्तुं सायुधाः स्थिताः ॥४७॥

पुरदेवतया तेऽत्र स्तम्भितास्त्रस्तचेतसः।
उत्खातोद्भूतखड्गेन कुर्वन्तस्तोरणश्रियम् ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 47 से 48): गुरु की इस आज्ञा को शिरोधार्य कर श्रुतसागर गये और जहाँ वाद-विवाद हुआ था वहीं पहुँचे। रात के वक्त वे दुष्ट उन्हें मारने को चले। वे जा रहे थे इतने में मार्ग में वाद के स्थल पर उन्हें सहसा वे ही मुनि देख पड़े। उन्हें देखते ही उन दुष्टों के क्रोध का पारा चढ़ गया और वे हथियारों द्वारा उन्हें मारने को तैयार हो गये। उन्होंने मुनि के ऊपर ज्यों ही हथियार छोड़ें त्यों ही पुर देवता ने आकर उन्हें बीच में ही रोक दिया, उनके हथियार कील दिये। तब वे बहुत घबड़ाये। उनका चित्त बहुत ही व्याकुल हुआ और अचंभे की बात यह हुई कि उन्होंने जो मुनि को मारने के लिए उन पर तलवारें उठाई थीं उनसे उन मुनि के ऊपर तोरण जैसी अपूर्व शोभा हो गई। सबेरा हुआ। राजा को खबर लगी। राजा ने वहाँ आकर उन्हें दुष्कृत्य में प्रवृत्ति करने के कारण कीले हुए खंभे से खड़े देखे ॥४७-४८॥


प्रभाते वीक्ष्य भूपेन ते तथा पुरतोऽखिलाः।
चक्रीवत्सु समारोप्य मुण्डयित्वा च मस्तकान् ॥४९॥

निष्कासितास्ततः पद्मरथं नागपुरे गताः।
विनीता रक्षिता राज्ञा दत्त्वा मन्त्रिपदं महत् ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 49 से 50): राजा बहुत बिगड़ा। उसने उनका सिर मुड़ाकर गधे पर चढ़ा शहर से बाहर निकलवा दिया। वहाँ से वे राजा पद्मरथ के पास हस्तिनापुर गये और उन्होंने पद्मरथ के साथ बहुत नम्रता का व्यवहार किया, जिससे उसने उन्हें अपना मंत्री बना लिया और उनकी सब तरह रक्षा की ॥४९-५०॥


प्रत्यन्तवासिसंक्षोभे समुद्भूतमहाभये।
सचिवो विविधोपायैस्तं रिपुं समजीग्रहत् ॥५१॥

तुष्टेन तेन संदिष्टमिष्टं संयाच्यतामिति।
सप्तघस्रमहं कर्तुं राज्यमिच्छामि सद्बलिः ॥५२॥

अर्थ (श्लोक 51 से 52): इसके बाद एक समय पद्मरथ के एक शत्रु राजा ने उसे बहुत ही डर दिखाया जिससे पद्मरथ बड़ा भयभीत हुआ और प्रजा में भी कोलाहल मच गया। उस वक्त बलि मंत्री ने नाना युक्तियों द्वारा शत्रु को पकड़ लिया। इससे राजा पद्मरथ उस पर बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसने उसे आज्ञा की कि इस समय तुम जो जी चाहे माँगो। इस पर बलि ने कहा कि महाराज, मैं सात दिन के लिए आपका राज्य चाहता हूँ ॥५१-५२॥


आहेति मोहतस्तेन तथाभ्युपगतं मुदा। दत्तराज्यो बलिर्दत्ते स्म दानं दानवो यथा ॥५३॥

अकम्पनोऽथ योगीन्द्रो योगिभिर्य्योगजुष्टये। वर्षायोगं च जग्राह वारयन्मुनिमण्डलीम् ॥५४॥

अभिवादं न वक्तव्यं भवद्भिर्वादिभिः सह। अन्यथानर्थसंपातो भविता भवतामिति ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 53 से 55): राजा तो उस पर मोहित हो ही चुका था, अतः उसने सात दिन के लिए उसे राज्य देना स्वीकार कर लिया। इसके बाद एक समय विहार करते-करते अकंपन आचार्य सात सौ मुनियों के संघ-सहित वहाँ आ गये और योग की सिद्धि के लिए उन्होंने वर्षाऋतु में भी वहीं रहना स्वीकार किया तथा उन्होंने सब योगियों से यह भी कह दिया कि आप लोग वादियों से वाद-विवाद नहीं करना, नहीं तो बड़ा-भारी संताप भोगना पड़ेगा ॥५३-५५॥


बलिर्बलेन तं रुष्टो वृत्या संवृत्य यागिभिः। यज्ञेन तापनं चक्रे तेषां धूम्रध्वजात्मना ॥५६॥

अर्थ: मुनियों के आने की खबर बलि को मालूम हुई तब वह राजा के पास गया और उसने पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उससे सात दिन के लिए राज्य माँगा। राजा ने भी उसे सात दिन को राजा बना दिया। राज्य पाकर बलि कुबेर की तरह खूब ही धन लुटाने लगा और उसने जाकर सात सौ मुनियों-सहित अकंपनाचार्य को सेना के द्वारा वेढ़ लिया। कारण, वह उन साधुओं पर पहले से ही रुष्ट था। वह अग्निमय यज्ञ करवा कर उन्हें संताप देने लगा ॥५६॥


विष्णुर्ज्ञात्वोपसर्गं तं गत्वा पद्मरथं नृपम्। वीतरागासने रूढमगदीदीरणान्वितः ॥५७॥

राज्येऽभिवन्दिते पूज्ये त्वया स्थितेन दुर्जयः। मन्त्री नियम्यते नैव कथं कथय कोविद ॥५८॥

भूपतिः प्राह सप्ताहो राज्यं दत्तं मयाधुना। न निवारयितुं शक्यो भवद्भिर्वार्यतामिति ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 57 से 59): यह खबर जब विष्णुकुमार मुनि को लगी तब वे चलकर उदासीन भाव को धारण करने वाले पद्मरथ राजा के पास आये और उससे उन्होंने प्रेरणा कर कहा कि सत्पुरुषों द्वारा वन्दित और पूजित इस राज्य-पद पर स्थित होकर भी आप इस दुर्जन मंत्री को अन्याय से क्यों नहीं रोकते। हे कोविद! मेरे इस प्रश्न का आप जल्दी से उत्तर दीजिए। राजा ने उत्तर में कहा कि मैं सात दिन के लिए बलि को राज-पाट दे चुका हूँ। इसलिए अब मैं उसको रोक नहीं सकता। हाँ! यदि आप रोक सकते हैं तो भले ही रोक दीजिए ॥५७-५९॥


न विदन्ति खलाः क्षिप्रमखिलं न्यायचेष्टितम्। खलत्वं त्वयि संप्राप्तं यतः पूज्येष्वनादरः ॥६०॥

अर्थ: इसके उत्तर में विष्णुकुमार ने कहा कि दुष्ट पुरुष जल्दी से न्याय के रहस्य को नहीं पहिचान सकते। राजन्! न जाने तुम में यह खलता कहाँ से आ गई, जो तुम पूज्य पुरुषों का अनादर होते हुए भी नहीं चेतते ॥६०॥


निषेत्स्याम्यहमेनं वै पापिष्ठं पटुतातिगम्। इति वामनको भूत्वा यागभूमिं स आसदत् ॥६१॥

अर्थ: इसमें सन्देह नहीं कि मैं तो इस पापिष्ट और चतुराई-विमूढ़ पुरुष को इस अन्याय से रोकूँगा ही। इतनी बातचीत के बाद विष्णुकुमार ने वामन का रूप बनाया और वे उसी वक्त यज्ञभूमि में पहुँचे। वहाँ उस वामन ने अपने को ब्राह्मण वर्ण का बतलाया। वह कहने लगा कि मैं वेद-वेदांग


विप्राकारधरो धीरोऽभ्यधाद्वाचं बलिं प्रति।
वेदार्थविद् द्विजश्चाहं त्वं दाता वाञ्छितार्थदः ॥६२॥

अर्थ (श्लोक 61 से 62): का पारगामी द्विज हूँ, वेद के अर्थ को खूब समझता हूँ और आप मनोरथ को सिद्ध करने वाले दाता हैं। अतः मुझे भी कुछ दान दीजिए ॥६१-६२॥


सोऽभाणीत्सबलो विप्रो यत्तुभ्यं रोचते लघु।
याचस्व वाञ्छितं वित्तं पात्रे दत्तं सुखाय हि ॥६३॥

विष्णुर्वाचमुवाचेति देयं मे चरणैस्त्रिभिः।
प्रमितं भूतलं मत्वा सर्वेऽवोचन्महादराः ॥६४॥

स्तोकं किं याचितं विप्र यतो दाता महाबलिः।
बहुनालं करे वारि दीयतां विष्णुर्जगौ ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 63 से 65): यह सुन वह बलि राजा बोला कि जो तुम्हारा जी चाहे सो तुम माँग लो। मैं अवश्य दूँगा क्योंकि पात्र में द्रव्य देने से बदले में सुख मिलता है॥६३॥ इस पर विष्णु ने कहा कि मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए। इस पर वहाँ जितने लोग बैठे थे सब-के-सब बोल उठे कि विप्र! तुमने इतनी थोड़ी-सी याचना क्यों की। देखो, यह बलि राजा तो कुबेर की तरह महान् दानी राजा है। फिर आपकी यह तनिक-सी याचना कुछ ठीक-सी नहीं मालूम पड़ती। विष्णु बोला कि राजन्! बहुत बातचीत से कोई लाभ नहीं। बस, आप तो अब संकल्प-धारा छोड़िए ॥६४-६५॥


तथा कृते मुनिर्विष्णुर्विष्टपं वेष्टितुं हृदा।
विक्रियार्द्धिप्रभावेनाकार्षीद्रूपं समुन्नतम् ॥६६॥

अर्थ: इसके बाद तीन पग पृथ्वी का संकल्प हुआ और संकल्प के बाद ही विष्णुकुमार ने सारे संसार को घेरने के लिए विक्रियाऋद्धि के द्वारा बड़ा भारी रूप बना लिया॥६६॥


पादं प्रसार्य पादैकं दीर्घाङ्गो मेरुमूर्धनि।
द्वितीयं मानुषाद्रौ च ददौ दीप्ततपाः पदम् ॥६७॥

तदा सुरासुराः प्राहुः सवीणा नारदादयः।
संगीतीगीतनोद्युक्ताः पादौ संहर संहर ॥६८॥

सद्यः प्रसादयामासुर्मुनिं चामरचामराः।
तुष्टा घोषासुघोषाख्ये महाघोषां वरस्वराम् ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 67 से 69): इसके बाद उसने पाँव फैलाकर एक पाँव को सुमेरु के शिखर पर रक्खा और दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर रक्खा। उस समय सुर-असुर और नारद आदि सभी वीणा ले-ले कर संगीत द्वारा उनका यशोगान करने को उद्यत हुए। वे कहने लगे कि विभो! अब पाँव खींच लो, पाँव खींच लो एवं चामर जाति के देवताओं ने वीणा बजाकर मुनि को प्रसन्न किया। उन्होंने सन्तुष्ट होकर विद्याधर राजाओं को घोषा, सुघोषा, महाघोषा और घोषवती आदि वीणाएँ दीं ॥६७-६९॥


वीणां घोषवतीं चान्यां ददुः खगनरेणिनाम्।
तथा त्वं याचितो विप्रवरेणापि ममाधुना ॥७०॥

चरणस्य तृतीयस्य नावकाश इति ब्रुवन्।
बद्ध्वा बली बलिं विष्णुर्बद्धे कोपसंगतः ॥७१॥

तदुद्विष्टो निराकार्षीदुपसर्गं निसर्गतः।
बलिर्बलिमुनीनां च कुर्वन् रक्षाविधिं वरम् ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 70 से 72): राजन्! इसी प्रकार आपने भी मुझे प्रसन्न होकर तीन पग पृथ्वी दी थी। अब बताइए कि मैं तीसरा पग किधर से नापूँ। तात्पर्य यह कि अब आप मेरे तीसरे पग को भी अवकाश दीजिये। कारण, अब यहाँ कहीं पैर रखने को अवकाश नहीं सूझता। इतना कहकर क्रोध में आ बलशाली विष्णुकुमार ने राजा बलि को बाँध लिया वह जो मुनियों को उपद्रव कर रहा था उसको एक मिनट में अनायास ही वारण कर दिया और योगियों की रक्षा कर ली। बाद उस बली बलि राजा ने भी


निषेध्याधर्ममात्मीयं वृषं जग्राह ग्राहितः। बलिर्विष्णुर्जगामाशु स्थानं धर्मप्रभावकः ॥७३॥

क्रमेण विक्रमी पद्मनाभो महादिपद्मकः। सुपद्मश्च ततः कीर्तिः सुकीर्तिर्वसुकीर्तिवाक् ॥७४॥

वासुकिश्च व्यतीतेषु भूपेष्वेवं च भूरिषु। शान्तनुः शान्तियुक्तात्मा कौरवः कौरवाग्रणीः ॥७५॥

सबकी तत्प्रिया प्रीता सीता वा रामभूभुजः। पराशरमहीशस्तु तयोः सूनुरभूद्बली ॥७६॥

अथ रत्नपुरे जह्नुर्जिष्णुर्विद्याधराधिपः। तस्य पुत्री पवित्राङ्गी गङ्गाऽभूद्गुणगौरवा ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 70 से 77): मुनियों की रक्षा की और अधर्म को रोककर उत्तम रीति से धर्म को धारण किया, जो कि उसके योग्य था। इसके बाद संसार में धर्म के प्रभाव को फैलाने वाले वह विष्णुकुमार मुनि अपने स्थान को चले गए। पद्मरथ राजा के बाद क्रम से पद्मनाभ, महापद्म, सुपद्म और कीर्ति, सुकीर्ति, वसुकीर्ति, वासुकि आदि बहुत से राजा हुए। इसके बाद शांतनु नाम राजा हुआ, जो शक्ति वाला और कौरवों में अगुआ था, पृथ्वी को सुखी करने वाला था। उसकी प्रिया का नाम था सबकी। वह रामचन्द्र की सीता की भाँति सती थी। उसके गर्भ से शांतनु राजा के पारासर नाम एक पुत्र पैदा हुआ, जो बहुत बली था। रत्नपुर में जयी जन्हु नाम एक राजा था। वह विद्याधर था। उसके गंगा नाम की एक पुत्री थी। वह पवित्र शरीर वाली और गुणों की खान थी ॥७०-७७॥


सत्यवाणिनिमित्तज्ञवचसा जह्नुना सुता। पराशराय सा प्रीत्या वितीर्णा विधिवद्वधूवम् ॥७८॥

हर्षत्तां स समासाद्य सुन्दरे मन्दिरे महान्। रेमे कामं सुकप्ताङ्गो मनोजमहिमश्रितः ॥७९॥

सा सुतं सुभगं लेभे गाङ्गेयं गुरुसंनिभम्। स क्रमेणाक्रमन्विद्यां ववृधे बालचन्द्रवत् ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 77 से 80): एक समय जन्हु ने सत्यवाणी नाम किसी निमित्तज्ञानी से उसके विवाह के सम्बन्ध में पूछा और उसके कहे अनुसार गंगा का ब्याह पारासर के साथ में कर दिया। गंगा जैसी पत्नी को पाकर पारासर को बहुत ही हर्ष हुआ। वह मनोहर शरीर वाला तथा काम की महिमा से भरपूर राजकुमार उसके साथ-साथ सुन्दर-सुन्दर महलों में मनचाही क्रीड़ा करने लगा। कुछ काल बाद उसके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम रक्खा गया गांगेय। वह बृहस्पति के तुल्य था। धीरे-धीरे वह दोज के चाँद की तरह बढ़ने लगा और क्रम-क्रम से उसने सभी विद्याएँ सीख ली ॥७७-८०॥


अध्यगीष्ट धनुर्वेदं शरव्यच्छेदनेोद्यतः। चारणश्रमणाल्लेभे दयाधर्मं स सातदम् ॥८१॥

नृपोऽथ सूनवे तस्मै यौवराज्यपदं ददौ। योग्यं सुतं वा शिष्यं वा नयन्ति गुरवः श्रियम् ॥८२॥

अर्थ (श्लोक 81 से 82): वह धनुषविद्या में बहुत निपुण था और चाहे जैसा ही निशाना क्यों न हो, एक मिनट में ही छेद डालता था। एक दिन पुण्ययोग से उसने एक चारणमुनि के मुख से धर्म का उपदेश सुना और सभी सुख देने वाले दया धर्म को यथाशक्ति ग्रहण भी किया। इसके बाद पारासर राजा ने उसे युवराज बना दिया। सच है कि योग्य पुत्र को पिता और योग्य शिष्य को गुरु अपनी सारी सम्पत्ति दे डालता है, तब युवराज पद की तो बात ही क्या है ॥८१-८२॥


अन्यदा यमुनातीरे रममाणो मनोहराम्। ईक्षांचक्रे चकोराक्षीं कन्यां नावि निषेदुषीम् ॥८३॥

अर्थ: एक समय पारासर यमुना नदी के किनारे क्रीड़ा के लिए गया था। वहाँ उसने नौका में बैठी


स तद्रूपेण भूपालो हृतचेता जगाविति।
कासि त्वं कस्य तनया तामेत्य मदनोत्सुकः ॥८४॥

सा जगाद नरेन्द्राहं यमुनातातवासिनः।
नौतन्त्राधिपतेः पुत्री कन्या गुणवतीति च ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 83 से 85): हुई चकोर जैसे सुन्दर नेत्रों वाली एक मनोरमा कन्या को देखा। उसको देखते ही पारासर का मन मोहित हो गया, वह उस पर निछावर हो गया और कामासक्त हो वह उसके पास जाकर कहने लगा कि तुम कौन हो ? किसकी पुत्री हो ? वह बोली कि राजन्! मैं यहीं गंगातट पर निवास करने वाले मल्लाहों के अधिपति की पुत्री हूँ और मेरा नाम है गुणवती ॥८३-८५॥


पित्राज्ञया तरीं तूर्णं वाहयाम्यहमम्भसि।
भवेत्कन्या कुलीनानां पित्रादेशवशंवदा ॥८६॥

तदर्थी तत्पितुः पार्श्वे क्षणेन क्षितिपो ययौ।
स्वागतक्रिययानन्द्य धीवरेण स मानितः ॥८७॥

भूपोऽभाषिष्ट शिष्टं तमिष्टं मे सहचारिणी।
सुता गुणवती तेऽद्य भूयाच्छ्रुत्वेति स जगौ ॥८८॥

अर्थ (श्लोक 86 से 88): मैं अपने पिता की आज्ञा से हमेशा यहाँ नौका चलाया करती हूँ क्योंकि कुलीन कन्याएँ कभी माता-पिता के प्रतिकूल नहीं होतीं। यह सुन पारासर राजा कन्या की चाह वश वह उसी समय उसके पिता के पास गया। पारासर को आता देख धीवर ने उसका बड़ा आव-आदर के साथ स्वागत किया, जिससे पारासर को बहुत ही खुशी हुई। इसके बाद राजा ने उस शिष्टाचारी को अपना मनोरथ कह सुनाया कि तुम्हारी गुणवती पुत्री को मैं अपनी सहचारिणी बनाना चाहता हूँ॥८६-८८॥


परं पतिं वरामेनां न तुभ्यं दातुमुत्सहे।
गाङ्गेयो नन्दनस्तेऽस्ति राज्यार्हः सपराक्रमः ॥८९॥

अर्थ: यह सुन धीवर ने कहा-राजन्! इस पतिवरा कन्या के देने को तुम्हारे लिए मेरा उत्साह नहीं होता। कारण, तुम्हारे राज-पाट को सँभालने के लिए गांगेय नाम एक पराक्रमी पुत्र मौजूद है॥८९॥


सति तस्मिन्सुराज्यार्हे मत्युत्थास्तनयः कथम्।
भावी राज्यधरस्तेनानयालं कथया विभो ॥९०॥

अर्थ: तब आप ही बताइये कि मेरी कन्या से जो सन्तान होगी वह गांगेय के होते हुए क्या कभी राज-पाट को भोग सकेगी ? अतः राजन्! आप इस सम्बन्ध की बातचीत ही मत छेड़िए ॥९०॥


इत्थं युक्त्या निषिद्धः स म्लानवक्त्रो गृहं ययौ।
वैवर्ण्यमुखमालोक्य गाङ्गेयः पितुराकुलः ॥९१॥

अर्थ: इस प्रकार उस धीवर ने जब युक्ति से कन्या देने का निषेध किया तो राजा का मुँह मुरझा गया-चेहरा उतर गया और आखिर वह अपने घर को चला आया। अपने पिता का मुरझाया हुआ चेहरा देखकर गांगेय बहुत व्याकुल हुआ ॥९१॥


विनयातिक्रमः किं मे किमाज्ञासङ्घि केनचित्।
किं वा सस्मार मे मातुर्येन्मे श्याममुखः पिता ॥९२॥

एवं विमृश्य पप्रच्छ सोऽमात्यं विजने जयी।
ततो निःशेषमाज्ञाय सोऽगमन्नौपतेर्गृहम् ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 92 से 93): वह सोचने लगा कि क्या मैंने इनका कुछ अविनय किया है ? या और किसी ने इनकी आज्ञा भंग की है ? या इन्हें मेरी माता का स्मरण हो आया है ? क्यों इनका मुँह काला-सा देख पड़ता है। इस प्रकार के ऊहापोह के बाद जब वह कुछ भी निश्चय न कर सका तब उस जयी ने एकान्त में मंत्री से पूछा कि आज महाराज का मुँह मलिन क्यों हो रहा है ? इसके उत्तर में मंत्री ने गांगेय को सारा कच्चा हाल कह सुनाया ॥९२-९३॥


जगौ गाङ्गेय इत्येतद्धीवरं धीवरो ध्रुवम्। भूपं निराकृथा यत्तत्सुष्ठु नानुष्ठितं त्वया ॥९४॥

अभाणीन्नौपतिः प्रीतः कुमार शृणु कारणम्। सोन्धकूपे क्षिपेत्पुत्रीं सापत्येयं ददीत यः ॥९५॥

त्वं नृरत्न सपत्नोऽसि येषां तेषां शिवं कुतः। जाग्रत्यसहने सिंहे सुखायन्ते कियन्मृगाः ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 94 से 96): तब गांगेय उसी वक्त उस धीवर के घर गया और धीवर को कहने लगा कि तुमने जो राजा का अनादर किया। यह अच्छा नहीं किया। उत्तर में वह धीवर बोला कि कुमार इसका कारण सुनिए। वह यह कि जो सौत का पुत्र होते हुए भी अपनी कन्या देता है वह अपनी प्राणों से प्यारी पुत्री को अँधेरे कुँए में ही ढकेल देता है। हे नररत्न ! जिसके तुम सरीखे सौत-पुत्र मौजूद हो, तुम्हीं कहो कि मेरी कन्या के पुत्र को कैसे सुख हो सकता है ? क्या सिंह के होते हुए मृग-गण भी सुखी हो सकते हैं? ॥९४-९६॥


कुमार मम दौहित्रो यस्तु भावी कथंचन। दूरे महोदयस्तस्य समीपे विपदः पुनः ॥९७॥

त्वां समुत्सृज्य राज्यश्रीर्ननु किं वृणुते परम्। हित्वा वार्द्धिं महासिन्धुः प्रसरः किं प्रसर्पति ॥९८॥

मातामह जगादैवं गाङ्गेयस्ते महान्भ्रमः। भिदेलिमा हि प्रकृतिः कुरुवंशान्यवंशयोः ॥९९॥

भवेत्स्वभावो न ह्येकः कलहंसबकोटयोः। गङ्गातो मे महामाता नाम्ना गुणवती सती ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 97 से 100): कुमार ! मेरी पुत्री की भावी सन्तान किसी तरह भी राज्य को नहीं भोग सकेगी किन्तु उल्टी आपत्ति में फँस जायेगी। क्योंकि तुम्हें छोड़कर राजलक्ष्मी दूसरे के पास नहीं जा सकती, वह दूसरे को पसंद नहीं कर सकती जैसे कि समुद्र को छोड़कर नदियों तालाब में गिरना पसंद नहीं करतीं। इस पर गांगेय ने अपने भावी मातामह को यों समझाना आरम्भ किया कि यह केवल मात्र आपका भ्रम है क्योंकि और-और वंशों से इस कुरुवंश का निराला ही स्वभाव है। बताइए कि कहीं हंस और बगुले का भी एक स्वभाव हो सकता है और भी सुनिए कि मैं गुणवती सती को अपनी माता से भी कहीं अधिक आदर की दृष्टि से देखूँगा ॥९७-१००॥


एकां शृणु प्रतिज्ञां मे बाहुमुत्क्षिप्य जल्पतः। गुणवत्यास्तनूजस्य राज्यं नान्यस्य कस्यचित् ॥१०१॥

आह वै धीवरः स्वामिन् भवितारस्तवात्मजाः। न तेऽन्यस्य सहिष्यन्ते राज्यमूर्जिततेजसः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 101 से 102): इसके बाद गांगेय ने हाथ उठाकर कहा कि मैं प्रतिज्ञा करता हूँ “जो गुणवती का पुत्र होगा उसे ही राज्य मिलेगा किसी दूसरे को नहीं मिलेगा” इसके अनंतर धीवर ने कहा- “हे स्वामिन्, आपके जो उत्कृष्ट तेजस्वी पुत्र होंगे वे अन्य की राज्य प्राप्ति सहन नहीं करेंगे” ॥१०१-१०२॥


गाङ्गेयस्तद्वचः श्रुत्वा जगाद विशदाशयः। एतामपि तवेदानीं चिन्तां व्यपनयाम्यहम् ॥१०३॥

शृणु त्वं व्योम्नि शृण्वन्तु सिद्धगन्धर्वखेचराः। आजन्मतो मयोपात्तं ब्रह्मचर्यमतः परम् ॥१०४॥

अर्थ (श्लोक 103 से 104): अतः फिर भी वही प्रश्न खड़ा होता है कि गुणवती की सन्तान राज्य से वंचित ही रह जायेगी। यह सुनते ही गांगेय उसके अभिप्राय को ताड़ गया और कहने लगा कि तुम्हारी इस चिन्ता को भी मैं अभी-अभी मिटाये देता हूँ। यहाँ तुम और आकाश में सिद्ध, गंधर्व, विद्याधर वगैरह सभी सुनो कि आज से मैं जन्म भर के लिए ब्रह्मचारी होता हूँ, ब्रह्मचर्य लेता हूँ ॥१०३-१०४॥


ततो दुहितरं कुर्वन्नाहूयोत्सङ्गसंगिनीम्। धीवरो धीधनो धृत्या जगाद जाह्नवीसुतम् ॥१०५॥

गुणग्रामैकवास्तव्यो नास्त्येव त्वत्समः पुमान्। पितुरर्थे कृथाः सद्यो यद्ब्रह्मव्रतधारणम् ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 105 से 106): इतनी बातचीत के बाद धीवर ने कन्या को बुलाया और अपनी गोद में बैठा लिया। इसके बाद उस बुद्धिशाली ने गांगेय से कहा कि तुमने जो पिता के मनोरथ को साधने के लिये ब्रह्मचर्य व्रत लिया है इससे जान पड़ता है कि संसार में तुम बड़े गुणवान् हो। दूसरे मैं तुमसे एक कहानी कहता हूँ। उसे तुम सावधान चित्त हो सुनो ॥१०५-१०६॥


वृत्तान्तमेकमाख्यामि कुमाराकर्णय ध्रुवम्। एकदा यमुनाकूले विश्रामाय समागमम् ॥१०७॥

अशोकानोकहतले सश्रीकामुज्झितां वराम्। केनापि पापिनाद्राक्षं तदात्वजातबालिकाम् ॥१०८॥

अपत्यमनपत्योऽहं स्पृहयालुरहर्निशम्। सुरूपां तामूपादातुं प्रवृत्तोऽस्मि सविस्मयः ॥१०९॥

अर्थ (श्लोक 107 से 109): एक दिन मैं विश्राम के अर्थ यमुना नदी के तट पर गया था। वहाँ मैंने अशोक वृक्ष के नीचे सुन्दर रूप वाली तथा उसी समय की पैदा हुई और किसी पापी द्वारा वहाँ छोड़ दी गई एक कन्या को देखा। मेरे कोई सन्तान न थी, इसलिए मैं हमेशा सन्तान की स्पृहा में लगा रहता था। मैं उस सुरूपा कन्या को लेने के लिये कुछ अचम्भे के साथ प्रवृत्त हुआ ॥१०७-१०९॥


तदा सरस्वती व्योम्नि प्रोल्ललासेति सत्वरम्। अस्ति स्वस्तिमये रत्नपुरे रत्नाङ्गदो नृपः ॥११०॥

तस्य रत्नवतीकुक्षिजातेयं सुतरां सुता। खेचरेणापहृत्यात्र विमुक्ता पितृवैरिणा ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 110 से 111): तब आकाशवाणी हुई कि रत्नपुर के राजा रत्नांगद की रानी रत्नवती के गर्भ से यह कन्या उत्पन्न हुई और इसे यहाँ रत्नांगद के वैरी किसी खेचर-विद्याधर ने लाकर डाल दी है ॥११०-१११॥


इत्थं श्रुत्वानपत्यायाः प्रियायास्तामुपानयम्। गुणवत्याख्यया वृद्धा सेयं कृत्रिमपुत्रिका ॥११२॥

अर्थ: यह सुन मैंने निःशंक भाव से उसे उठा लिया और लाकर अपनी निःसन्तान प्रिया की गोद में दे दी तथा उसका नाम गुणवती रख दिया ॥११२॥


तदिदानीमुपादास्त्वं मत्सुतां तातहेतवे। इत्युक्तस्तां समादाय जगाम निजपत्तने ॥११३॥

विवाहविधिना पित्रे स भक्त्या तामयोजयत्। तामाप्य स सुखी भूतो निःस्वो निधिमिवाद्भुतम् ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 113 से 114): वह मेरे यहाँ पलकर सयानी हो गई। वही यह मेरी पुत्री है। तुम मेरी इस पुत्री को अपने पिता शांतनु राजा के लिए ग्रहण करो। इसके बाद गांगेय गुणवती को लेकर अपने नगर को लौट आया और वहाँ उसने विधिपूर्वक उसका अपने पिता के साथ ब्याह कर दिया। गुणवती पत्नी को पाकर शांतनु बड़ा सुखी हुआ, जैसे कि गरीब पुरुष भारी खजाने को पाकर सुखी होता है ॥११३-११४॥


तस्याः पराभिधा ख्याता गन्धैर्योजनगन्धिका। तयोः सुतो वराभ्यासो व्यासोऽभूद्व्यसनातिगः ॥११५॥

अर्थ: गुणवती को गंधिका और योजनगंधिका भी कहते हैं। कुछ काल बाद उसके गर्भ से खोटी आदतों से रहित और उत्तम अभ्यास करने वाला एक व्यास नाम पुत्र पैदा हुआ ॥११५॥


पापह्रासनधर्मालोः सभासभ्येश्वरस्थितेः। सुभद्रा भामिनी तस्य सुभद्रा भद्रभावका ॥११६॥

अर्थ: वह पाप को घटाने वाला धर्मात्मा था। सबका स्वामी था। उसकी भामिनी का नाम था


सुतास्त्रयः पुनर्व्याससुभद्रयोः शुभाकराः। धृतराष्ट्रस्तथा पाण्डुर्विदुरस्ते बलोद्धताः ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 116 से 117): सुभद्रा। वह बड़ी भद्र थी। उसके गर्भ से तीन पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम थे क्रम से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर। ये तीनों बहुत ही सुन्दर थे। बड़े बली और बल से उद्धत थे ॥११६-११७॥


भरते हरिवर्षाख्ये देशे भोगपुरे बभौ। भोगेन निर्जितं भोगिपुरं येन महात्विषा ॥११८॥

अथादिदेवनिर्णीतो हरिवंशकुलो महान्। नृपः प्रभञ्जनस्तत्र समासीत्सुखसागरः ॥११९॥

मृकण्डूस्तत्प्रिया रूपलावण्यभरभूषिता। पीनस्तनी सुजघना शचीवेन्द्रस्य संबभौ ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 118 से 120): भरतक्षेत्र के हरिवर्ष नाम देश में एक भोगपुर नाम नगर है। वह अतिशय शोभाशाली है। उसमें सभी भोग-सामग्री मौजूद है, जिससे वह इन्द्र आदि देवता-गण के स्वर्ग-स्थान को भी जीतता है। आदिनाथ प्रभु द्वारा स्थापित हरिवंश का प्रभंजन नाम का वहाँ राजा था। उसे सभी सुख प्राप्त थे। वह सुख का सागर था। उसकी प्रिया का नाम था मृकंडू। वह रूपवती, लावण्यवती और भाँति-भाँति के भूषणों से विभूषित थी। उसके गोल और कठिन स्तन थे तथा केले के खंभे की तरह सुन्दर जांघें थीं। अधिक कहाँ तक कहा जावे वह इन्द्र की शची से किसी भी बात में कम न थी ॥११८-१२०॥


कौशाम्ब्यामथ यः श्रेष्ठी सुमुखः सुमुखी धनी। वीरदत्तप्रियायाश्च हर्ता द्रव्यादिवञ्चनैः ॥१२१॥

वनमालाभिधानायाः स काले मुनिदानतः। प्रभञ्जनसुतः सिंहकेतुरासीज्जितार्कभः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 121 से 122): कौशाम्बी नगरी में एक सेठ रहता था। उसका नाम था सुमुख। वह सुन्दर मुख वाला और धनी था। उसने किसी वक्त धन-दौलत के लोभ में आ वनमाला नाम वीरदत्त की स्त्री को हर लिया था। एक समय उसने मुनि को आहार दान दिया, जिसके प्रभाव से वह मरकर प्रभंजन राजा के यहाँ सिंहकेतु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ। वह अपने तेज से सूरज को भी जीतता था ॥१२१-१२२॥


तत्रैव शीलनगरे वज्रघोषो महीपतिः। सुप्रभा वनिता तस्य मनोनयननन्दिनी ॥१२३॥

वनमालाचरा जाता तयोः पुत्री सुरूपिणी। विद्युन्मालाभिधा सिंहकेतुना च विवाहिता ॥१२४॥

वीरदत्तचरेणैव चित्राङ्गदसुरेण तौ। वैराद्धृतौ वने क्रीडां कुर्वाणौ कर्मयोगतः ॥१२५॥

सूर्यप्रभेण देवेन तन्मित्रेण निवारितः। हन्तुकामः स निक्षिप्य चम्पायास्तौ गतौ वने ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 123 से 126): उसी हरिवर्ष देश के शीलनगर में वज्रघोष नाम एक राजा था। उसकी प्रिया का नाम था सुप्रभा। उसके गर्भ से वनमाला का जीव विद्युत्प्रभा नाम पुत्री उत्पन्न हुई। वह सुन्दर रूप वाली और मन तथा नेत्रों को आनंद देने वाली थी। कुछ काल बाद उसका विवाह सिंहकेतु के साथ हो गया। उधर वह वीरदत्त मरकर चित्रांगद नाम देव हुआ। एक दिन सिंहकेतु और विद्युत्प्रभा दोनों वन में क्रीड़ा कर रहे थे। उन दम्पती को उस चित्रांगद नाम देव ने हर लिया। वह उन दोनों को मारना ही चाहता था कि उसके मित्र सूर्यप्रभ देव ने उसे मारने से रोक दिया और वह मान भी गया। तात्पर्य यह कि उसने उन्हें मारा नहीं किन्तु चम्पानगरी के वन में छोड़ दिया ॥१२३-१२६॥


तद्भूपे चन्द्रकीर्त्याख्ये विपुत्रे च मृते सति। कृताभिषेकौ तौ तत्र दन्तिना राज्यमापतुः ॥१२७॥

अर्थ: फिर वे दोनों देव स्वर्ग को चले गये। दैवयोग से इसी समय चंपानगरी का चंद्रकीर्ति नाम राजा


सिंहकेतुः स्ववृत्तान्तमाख्यच्च पुरतस्तदा।
लोकानामथ लोकैश्च हर्षितः संप्रपूजितः ॥१२८॥

मृकण्ड्वास्तनयोऽयं वै मार्कण्डेय इति श्रुतः।
सुतो हरिगिरिर्हेमगिरिर्वसुगिरिस्ततः ॥१२९॥

तदन्वये गतेऽप्येवं सूरवीरौ महीपती।
अथ सूरो नराधीशो वल्लभा सुरसुन्दरी ॥१३०॥

तस्यासीत्सुरसुन्दर्याः सौन्दर्येण समा सदा।
तयोरन्धकवृष्ट्याख्यस्तनयो नयमार्गवित् ॥१३१॥

अर्थ (श्लोक 127 से 131): मर गया था। उसके कोई भी सन्तान न थी। अतः राजा के निश्चय के लिए हाथी छोड़ा गया। हाथी वन में आया और उसने इन दम्पती का अभिषेक किया। इन्हें वहाँ का राज-पद मिल गया। उस समय सिंहकेतु ने अपना सारा हाल वहाँ के लोगों से कहा, जिसको सुनकर वे बहुत हर्षित हुए और उन्होंने सिंहकेतु की खूब पूजा-स्तुति की तथा मृकंडू का पुत्र होने से उन्होंने उसका मार्कण्डेय नाम प्रसिद्ध किया। इसके बाद हरिगिरि, हेमगिरि, वसुगिरि आदि राजाओं की वंशपरम्परा चली। उसके बाद सूर और वीर ये दो भाई-भाई राजा हुए। सूर की रानी का नाम सुरसुन्दरी था। वह अपनी सुन्दरता से देवांगनाओं की समता करती थी। कुछ काल बाद सूर और सुरसुन्दरी के अन्धकवृष्टि नाम नीति का ज्ञाता एक पुत्र पैदा हुआ ॥१२७-१३१॥


तस्य भद्रा परा पत्नी सुभद्रा भद्रता गता।
चन्द्रवक्त्रा सुवक्षोजा वीक्षितक्षिप्तसज्जना ॥१३२॥

तयोः शुभाः सदा ख्यातास्तनया नयिनो दश।
विशाला भालसच्छोभा दशधर्मा इवाभवन् ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 132 से 133): उसकी भार्या का नाम था भद्रा। वह बड़ी भद्र थी और कल्याण के मार्ग पर चलने वाली थी। उसका मुख चाँद के जैसा था। कुच मनोहर थे। दृष्टि चंचल थी, जिसके लोगों पर पड़ते ही उनका दिल चंचल हो उठता था। अन्धकवृष्टि के भद्रा के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी नीति के ज्ञाता थे। प्रसिद्ध और उत्तम पुरुष थे। उनका मस्तक विशाल और सुन्दर था। बहुत क्या कहें वे दसधर्म से देख पड़ते थे ॥१३२-१३३॥


समुद्रविजयश्चाद्यस्ततः स्तिमितसागरः।
हिमवांस्तृतीयस्तुर्यो विजयो विजयोऽचलः ॥१३४॥

धारणः पूरणाभिख्यः सुमुखश्चाभिनन्दनः।
दशमो वसुदेवाख्यो वसुदेवमहाबलः ॥१३५॥

सुता कुन्ती कलाक्रान्ता कुचकुम्भमभाभरा।
पूर्णचन्द्राभवदना नितम्बौन्नत्यधारिणी ॥१३६॥

करग्राहिकटिः कान्त्या सदा कृन्तिततामसा।
विकटाक्षसुधाधारा जित्वरी सुरयोषिताम् ॥१३७॥

अर्थ (श्लोक 134 से 137): उनके क्रम से नाम थे-समुद्रविजय, स्तिमितसागर, हिमवत्, विजय, अचल, धारण, पूरण, सुवीर, अभिनंदन और वसुदेव। वसुदेव वास्तव में वसुदेव-धनदेव ही था, महाबलि और सुभट था एवं अंधकवृष्टि के दो पुत्रियाँ हुई। एक कुन्ती और दूसरी मद्री। कुन्ती नाना कलाओं में निपुण और कुचरूपी कुंभो के भार से नम्र थी। पूरे चाँद के समान सुन्दर उसका मुख था और उन्नत नितम्ब थे तथा कमर बिल्कुल पतली थी। वह अपने शरीर की कान्ति के द्वारा हमेशा अंधेरे को दूर करती थी। अपनी कटाक्ष रूप सुधा धारा से देवांगनाओं को भी जीतती थी ॥१३४-१३७॥


द्वितीया तत्सुता मद्री मुद्रितानङ्गसदृशा।
कटाक्षाक्षिप्तविबुधा बुधसान्निध्यधारिणी ॥१३८॥

अर्थ: मद्री भी मूर्तिमान् अनंग-कामदेव की समता करती थी। जान पड़ता था कि अनंग ने यह


समुद्रविजयादीनां प्रियाः प्रीतिरसा मिथः।
कथ्यन्ते क्रमतो नूनं शृणु श्रेणिक सांप्रतम् ॥१३९॥

अर्थ (श्लोक 138 से 139): शरीर ही धारण कर लिया है। वह अपने कटाक्षों से देवों और पंडितों को भी जीतती थी एवं देवताओं की बराबरी करती थी। यहाँ गणधर प्रभु कहते हैं कि श्रेणिक! अब हम क्रम से समुद्रविजय आदि की परस्पर में प्रीति रखने वाली प्रियाओं के नाम कहते हैं। सो तुम सुनो ॥१३८-१३९॥


शिवादेवी शिवाकारा धृतिधात्री धृतिस्वरा।
स्वयंप्रभा प्रभाभारा सुनीता नीतमानसा ॥१४०॥

सीता सीतासमाकारा प्रियवाक्प्रियभाषिणी।
प्रभावती प्रभाभूषा कलिङ्गी कनकोज्ज्वला ॥१४१॥

अर्थ (श्लोक 140 से 141): सुख को खान शिवादेवी, गंभीर स्वर वाली धृतिधात्री, सुन्दर प्रभा वाली स्वयंप्रभा, नीति से चलने वाली सुनीता, सीता के समान ही सुन्दराकृति सीता, मीठे वचन बोलने वाली प्रियंवाक, प्रभारूप भूषण वाली प्रभावती, सोने की तरह उज्ज्वल कलिंगी, सुन्दर प्रभा वाली सुप्रभा ये क्रम से नौ स्त्रियों के नाम हैं ॥१४०-१४१॥


सुप्रभा सुप्रभा चेति नवानां क्रमशः प्रियाः।
मथुरायां सुवीरस्य प्रिया पद्मावती प्रिया ॥१४२॥

सुतो भोजकवृष्ट्याख्यस्तयोस्तस्य वरानना।
सुमतिः प्रेयसी जज्ञे सुमतिः सुमनास्तयोः ॥१४३॥

उग्रसेनमहासेनदेवसेनाभिधास्त्रयः।
जजृम्भिरे जनान्दा नन्दनानन्ददायिनः ॥१४४॥

तत्सुता गुणगान्धारी गान्धारी धृतिधारिका।
पूर्णचन्द्रानना नम्रा पटुपीनपयोधरा ॥१४५॥

उग्रसेनादिभूपानां पत्न्यः पद्मावती शुभा।
महासेना परा देवी देवसेना मुदावहा ॥१४६॥

अर्थ (श्लोक 142 से 146): समुद्रविजय आदि का सुवीर नाम एक भाई मथुरा में रहता था। उसकी प्रिया का नाम था पद्मावती। सुवीर और पद्मावती के भोजकवृष्टि नाम एक पुत्र था। उसकी प्रेयसी का नाम सुमति था। वह सुन्दर मुख वाली और उत्तम ज्ञान वाली थी। उसका मन बहुत निर्मल था। भोजकवृष्टि के सुमति प्रिया के गर्भ से उग्रसेन, महासेन और देवसेन नाम तीन पुत्र उत्पन्न हुए। वे लोगों को आनंद देने वाले और अपनी बहन को खुश करने वाले थे। उनकी बहन का नाम था गांधारी। वह बड़ी धीरवीर और गुणों की खान थी। पूरे चाँद के समान सुन्दर उसका मुख था। वह नम्र और चतुरा थी, गोल और कठोर कुचों वाली थी। उग्रसेन आदि की स्त्रियों के क्रम से पद्मावती, महासेना और देवसेना ये नाम थे। ये तीनों ही हँसमुखी थीं ॥१४२-१४६॥


अथ राजगृहे राजा राजराजविराजितः।
राजते राजशार्दूलो बृहद्रथसमाह्वयः ॥१४७॥

भामिनी श्रीमती तस्य श्रीमती श्रीरिवापरा।
तयोः सुतः सुतीव्रांशुर्जरासंधो नरेश्वरः ॥१४८॥

त्रिखण्डभरताधीशो नराधीशैः सुसेवितः।
नवमः प्रतिवैकुण्ठो विकुण्ठः शठशातने ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 147 से 149): राजगृह का राजा वृहद्रथ था। वह इन्द्र जैसा सुशोभित था। उसकी सभा में बड़े-बड़े राजा महाराजा उपस्थित रहते थे। वह राज-सिंह था। उसकी भामिनी का नाम था श्रीमती। वह बहुत ही सुन्दरी थी। जान पड़ता था कि वह दूसरी लक्ष्मी ही है। वृहद्रथ और श्रीमती के एक जरासंध नाम पुत्र हुआ। वह भी बहुत प्रतापी और तेजस्वी था तथा भरतक्षेत्र के तीन खण्डों का स्वामी था। राजाओं के राजा भी उसकी सेवा करते थे। वह प्रतिनारायण था। शठों की शठता का वह बहुत अच्छा इलाज करता था ॥१४७-१४९॥


धृतराष्ट्रेण राष्ट्राणां राज्ञा कुन्ती सकुन्तला।
पाण्डवे याचिता तोषाद्विवाहार्थमन्यदा ॥१५०॥

कुन्ती पित्रा सुतैः सार्धं विमृश्य हृदि संदधे।
पाण्डुदोषाय नो देया पाण्डवे चेति निश्चितम् ॥१५१॥

बहुशः प्रार्थितोऽप्येवं न ददौ तां हि यादवः।
सरावः कौरवो मौनं तदा ध्यात्वा हृदि स्थितः ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 150 से 152): एक समय व्यास ने कुन्ती के पिता अंधकवृष्टि से पाण्डु के लिए सुकेशी कुन्ती की याचना की। तब अंधकवृष्टि ने इस पर अपने पुत्रों के साथ एकान्त में विचार किया और यह निश्चय किया कि पाण्डु को कुष्ठ रोग है, इसलिए उसे कन्या देना योग्य नहीं। इसके बाद पहले की भाँति व्यास ने कुन्ती के सम्बन्ध में अंधकवृष्टि से बार-बार प्रार्थना की परन्तु उसे सफलता प्राप्त न हुई। तात्पर्य यह कि अंधकवृष्टि ने पाण्डु के लिए कुन्ती का देना स्वीकार न किया। आखिर व्यास अपने चित्त में धीरज धर कर चुप रह गया ॥१५०-१५२॥


भूपस्तद्रूपसंसक्तः पाण्डुराखण्डलोपमः।
न मेने मानसे श्रीमान् कामः स्वास्थ्यं रतिं विना ॥१५३॥

पाण्डुः पाण्डुत्वमापन्नस्तां स्मरन्मानसे महान्।
ज्वरीव विह्वलो वेगवान्भूद्भूतवेशवत् ॥१५४॥

तद्वियोगाशनिध्वस्तः शालवद् ध्वंससन्मुखः।
पाण्डुराजो रराजासौ न भस्मवच्च पाण्डुरः ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 153 से 155): उधर इन्द्र जैसी विभूति का धारक पाण्डु राजा कुन्ती के रूप पर निछावर हो चुका था। उसके बिना उसे एक मिनट भी चैन न थी, जैसे कि रति के बिना कामदेव को कल नहीं पड़ती। पाण्डुता का स्थान पाण्डु राजा कुन्ती का स्मरण करता-करता ज्वर वाले पुरुष की तरह विह्वल और भूतग्रस्त पुरुष की भाँति अस्थिर-चित्त हो गया था। कुन्ती के वियोग से उसका शरीर झुलस सा गया था, जैसे वज्रपात से शालवृक्ष झुलस जाता है परन्तु तो भी उसके भस्म की भाँति पाण्डु के शरीर की अपूर्व ही शोभा थी ॥१५३-१५५॥


अन्यदा पाण्डुरः पाण्डुर्वने रन्तुं लतागृहे।
प्राप्योपहारशय्याढ्ये मुद्रिकां दृष्टवानगात् ॥१५६॥

अगृह्नान्मुद्रिकां यावत्तावत्कश्चित्खगेश्वरः।
पश्यन्नितस्ततोऽयासीत्पाण्डुस्तं पृष्टवानिति ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 156 से 157): एक दिन पाण्डु वन में क्रीड़ा के लिए गया और वहाँ वह फूलों के उपहार की शय्या वाले लतामंडप में क्रीड़ा करने लगा। इतने में वहाँ पड़ी हुई उसे एक अँगूठी देख पड़ी। वह उसके पास गया और उसने उसे उठा लिया। इसी समय इधर-उधर कुछ देखते फिरते हुए किसी विद्याधर पर पाण्डु की दृष्टि जा पड़ी ॥१५६-१५७॥


किं विलोक्यं त्वयालोक्य कल्पते लोककल्पन।
तदेति खेचरोऽवोचल्लोकिता मुद्रिका मया ॥१५८॥

प्रदर्श्य पाण्डुना सापि बभाषे खेचराधिपम्।
भवतां महतां मान्य मुद्रिकावीक्षणं किमु ॥१५९॥

अनु चात्र खगाधीश मुद्रिका विस्मृता कथम्।
अलीलपद्वियच्चारी विचारचतुरक्षणः ॥१६०॥

अर्थ (श्लोक 158 से 160): उसे देखकर पाण्डु ने पूछा कि भाई, तुम क्या खोजते फिरते हो ? उत्तर में विद्याधर ने कहा कि मैं मेरी अंगूठी खोजता हूँ। यह सुन पाण्डु ने उसे अंगूठी दिखा कर कहा कि महान् पुरुषों द्वारा मान्य और विद्याधरों के अधिपति! आप अंगूठी खोजने का कष्ट काहे को उठाते हैं, आपकी अँगूठी तो यह है। हे खगपति! कहिए कि आपकी यह अँगूठी खो कैसे गई थी ? इस पर विचारशील


विजयार्धधरावासी वज्रमाली वियच्चरः।
प्रियासखः सुखं रन्तुमत्रायासं वने घने ॥१६१॥

रन्त्वात्र गच्छता छिद्रान्मुद्रिका पतिता करात्।
विस्मृत्य गगने वेगाद्गतेन च मया स्मृता ॥१६२॥

तामिष्टां द्रष्टुकामेन परावृत्त्यागतं मया।
अकाण्डे पाण्डुराख्यच्चानया का क्रियते क्रिया ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 158 से 163): विद्याधर बोला कि मैं विजयार्द्ध पर्वत का निवासी वज्रमाली नाम विद्याधर हूँ। मैं अपनी प्राणप्यारी के साथ इस सघन वन में सुख-क्रीड़ा करने को आया था और क्रीड़ाकर जब यहाँ से वापस लौटा उस समय भूल से विमान के किसी छिद्र द्वारा मेरी यह अँगूठी गिर गई। मुझे इसकी खबर न पड़ी और मैं वेग से विमान लिये चला गया। पीछे जब कुछ देर में याद आई तब उस प्राणप्यारी अँगूठी को खोजने के लिए मैं लौटकर यहाँ आया हूँ। उसकी बात पूरी ही न हो पाई थी कि बीच में ही पाण्डु बोल उठा कि इसके द्वारा आप कौन-सा काम साधते हैं ॥१५८-१६३॥


खग आख्यत्तदाख्यानं मुद्रेयं कामरूपिणी।
यथेष्टरूपदा रम्या निरूप्या रूपदायिनी ॥१६४॥

मित्रैवं चेत्त्वया देया साह्नानि कानिचित्करे।
स्थीयतां स्थायिनी पश्चात्सिद्धे कार्ये तु दास्यते ॥१६५॥

अर्थ (श्लोक 164 से 165): विद्याधर ने कहा कि यह अँगूठी मनचाही वस्तु देने वाली है। इसके द्वारा जैसा रूप चाहें बना सकते है। यह यथेष्ट रूप को देने वाली है। यह सुन पाण्डु कहने लगा कि मित्र! यदि यह ऐसी है तो कुछ दिनों के लिए मुझे दे दीजिए। मैं इसे हमेशा अपने हाथ की अँगुली में पहनूँगा और पीछे कार्य सिद्ध हो जाने पर आपकी वापस दे दूँगा ॥१६४-१६५॥


प्रार्थितो वज्रमाली तां परकार्यकरो वरः।
अदात्तस्मै यतोऽप्रार्थ्यो मेघो दत्ते जलं महान् ॥१६६॥

अर्थ: इस तरह की प्रार्थना करने पर उस परोपकारी वज्रमाली विद्याधर ने पाण्डु को वह अँगूठी दे दी। उसने विचारा कि जड़ मेघ तो बिना याचना के ही दूसरों को मीठा-ठंडा-जल पिलाते हैं और मैं चेतन होकर यदि याचना करने पर भी अँगूठी न दूँ तो मैं जड़ मेघों से भी गया बीता हो जाऊँगा ॥१६६॥


कौरवः करसंक्रान्तमुद्रिकः सूर्यपत्तनम्।
सूरभूपकृतावासं कदाचिदगमत्त्वरा ॥१६७॥

ततोऽदृश्यवपू रात्रौ प्रविश्यान्तःपुरान्तरे।
कुन्तीनिकेतनं सोऽगात्तद्रूपं हृदि संवहन् ॥१६८॥

तत्रासनसमारूढा गूढाङ्गी दृढसद्रतिः।
कुन्ती कुन्तीव कामस्य किरत्कोमलकायिका ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 167 से 169): अँगूठी को उँगली में पहिन कर वह सूरीपुर को चला गया, जहाँ कि सूर राजा रहता था। वहाँ रात के वक्त उसने अँगूठी के प्रभाव से अदृश्य रूप बनाकर अन्तःपुर के रनवास में प्रवेश किया तथा कुन्ती के रूप की मन ही मन कल्पना करता हुआ वह उसके महल में पहुँचा। कुन्ती आसन पर बैठी हुई थी। सुन्दर वस्त्र पहिने थी। उसका शरीर सुडौल, कोमल और रूप लावण्य वाला था। वह कामदेव की रति के समान ही देख पड़ती थी ॥१६७-१६९॥


दोर्दण्डेन विदण्ड्यासौ मदनं मदनातुरा।
धत्ते हृदि मदोन्मादमोदिनी मन्दमानसा ॥१७०॥

अर्थ: उसने कामदेव को अपने भुजारूप दंडों से विशेष दंड वाला कर दिया था, अतएव काम के जोर से वह मदनातुर हो रही थी, उसके हृदय में कामदेव बस गया था। यह मद के उन्माद से विलक्षण ही विनोद करती थी। उसका मन बहुत गंभीर था। सारांश यह है कि यह सब बातें उसमें थीं, पर वह इनको अपने गहरे मन के सिवा किसी के कर्ण-कुहर में नहीं जाने देती थी ॥१७०॥


यस्याः पीनपयोवाहभाराद्भारनितम्बतः ।
मध्येकटि कृशा चाभून्मध्यस्थः को न सीदति ॥१७१॥

अर्थ: उसके गोल और कठिन कुचों के भार और भारी नितम्बों के भार से उसकी कमर बिल्कुल पतली हो गई थी। ठीक ही है कि चाहे कोई भी हो, जो मध्यस्थ होता है उसे तकलीफ सहनी ही पड़ती है ॥१७१॥


अनङ्गो युगपज्जित्वा जगज्जिष्णुर्भ्रमन्स्थिरम् ।
स्थितो यस्यास्तने नो चेत्तत्स्पर्शात्प्रगटः स किम् ॥१७२॥

अर्थ: जयशील अनंग-कामदेव जब सारे संसार को एकदम जीत चुका और उसे कहीं भी रहने को जगह न रही तब घूमता फिरता वह इसके पास आया और इसके कुचों में स्थिर हो गया। यदि ऐसा नहीं हो तो फिर कुचों के स्पर्श से वह प्रकट क्यों हो आता है ॥१७२॥


यस्याश्च जघनं घ्रात्वा मदनो जीवनं दधे ।
पद्मावत्पद्मसंचारी तद्रसः षट्पदो यथा ॥१७३॥

चित्रं चित्ररसाप्येषा विचित्राकारधारिणी ।
विचित्रमृगनेत्राभा नरनेत्रैणबन्धिका ॥१७४॥

विनानया क्षणः क्षीणः क्षीयते मे कथं द्रुतम् ।
इत्याध्याय बभूवासौ प्रकटाङ्गो गलन्मदः ॥१७५॥

निरूप्य तं निशानाथावदनं सदनं रुचः ।
कुन्ती कम्पितगाढाङ्गी चकम्पे सपयोधरा ॥१७६॥

यल्ललाटे निविष्टः किमष्टमीमृगलाञ्छनः ।
यन्मूर्ध्वन्ययं धम्मिलाख्यः कामवह्निशिखा ननु ॥१७७॥

यत्कपोललसद्भित्तौ कामोऽचित्रीयत स्फुटम् ।
अन्यथा वीक्ष्य तौ योषाकाममुद्दीपयेत्कथम् ॥१७८॥

अर्थ (श्लोक 173 से 178): ऐसी प्रसिद्धि है कि महादेव ने काम को जला डाला था परन्तु काम फिर भी लोगों को पीड़ा देता है। अतः यहाँ यह प्रश्न उठता है कि वह जीवित कैसे हो गया ? इसके उत्तर में कवि उत्प्रेक्षा करता है कि कुन्ती के जघन-स्थल को सूंघकर कामदेव जीवित हो गया है, जैसे कमलों पर उड़ने वाला भौंरा उनके रस को पीकर होश में आ जाता है। यह अचम्भे की बात है कि चित्र के जैसी लिखी हुई होकर भी वह विचित्र आकारों को धारण करती थी। उसके नेत्र चित्र में लिखे हुए हरिण के नेत्रों कैसी आभा वाले थे परन्तु फिर भी वे मनुष्य के नेत्र रूप हरिणों को बाँध लेते थे। यह सब देख-कर पाण्डु ने सोचा कि इसके बिना मैं अब अपना व्यर्थ ही समय खो रहा हूँ और वह एकदम मानमद छोड़कर प्रकट हो गया। इस समय चंद्र जैसे मुँह वाले और कान्ति के सदन पाण्डु को देखकर कुन्ती का दृढ़ शरीर कुचों-सहित काँप गया। वह उसकी सुन्दरता देखकर विचार करने लगी कि इसका ललाट ही इतना कान्तिशाली है या इसमें अष्टमी का आधा चाँद खचित हो रहा है। इसके शिर पर यह केश-पास है या काम-अग्नि की शिखा है। इसके सुन्दर कपोल-रूप भीतों में


यस्य वक्षःस्थले लक्ष्मी रमते हारसंमिषात् ।
नो चेत्तद्धृदयं वीक्ष्य लक्ष्मीवान्ना कथं भवेत् ॥१७९॥

यद्भूजौ भोज्यनारीणां भुजङ्गाविव पाशकौ ।
ययोर्लोकनतो लोके बद्धा इव कथं स्त्रियः ॥१८०॥

यस्यास्ये वाक्सदा शेते इन्दिरा हृत्सुमन्दिरे ।
सुषमा वपुषि स्थास्याम्यहं कुत्रास्य भागतः ॥१८१॥

किं सूरः किं शशी किंवा मधवा दर्पदर्पितः ।
कन्दर्पः सर्पनाथः किमेष किं किन्नरीपतिः ॥१८२॥

ध्यायन्तीति हृदा दध्यौ किमर्थमयमाटितः। मद्धाम्नि सीमसंपन्ने दुर्लङ्घ्ये विघ्नपातिनी ॥१८३॥

साह साहससंपन्ना साहसिन् सहसा स्वयम्। मत्सद्म छद्मना केन प्रविष्टस्त्वं ककः कथम् ॥१८४॥

निशम्येति श्रमी चोक्तं परिरम्भणजृम्भणः। उवाच वचनं वाग्मी विदितार्थः कृतार्थवित् ॥१८५॥

सुश्रोणि श्रोतुमिच्छा चेत् स्वच्छं गच्छ मनोमलात्। वदामि विदिते वीरे वराहे त्वां पतिंवरे ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 173 से 186): कामदेव ही चित्रित हो रहा है क्योंकि यदि ऐसा नहीं हो तो इसके कपोलों को देखकर स्त्रियों का काम उद्दीप्त क्यों हो जाता है। इसके वक्षःस्थल में हार के छल से लक्ष्मी ही रमती है, क्रीड़ा करती है। यदि ऐसा नहीं हो तो फिर इसके हृदय को पाकर अर्थात् इसके मन में स्थान पाकर पुरुष लक्ष्मी वाले क्यों हो जाते हैं। इसकी दोनों भुजाएँ भोग ने योग्य स्त्रियों को बाँधने के लिये मानों दो पाश ही हैं। ऐसा न हो तो फिर उन भुजाओं को देखकर स्त्रियाँ बँधी सी क्यों हो जाती हैं। कुन्ती विचारती है कि इसके मुँह में तो सरस्वती रहती है-सोती है, हृदय-मन्दिर में लक्ष्मी निवास करती है तथा शरीर में शोभा रहती है। अब मैं इसके किस भाग में रहूँगी-स्थान पाऊँगी। तात्पर्य यह कि इसके सभी स्थान तो और-और ने घेर लिये हैं, अब मुझे कहाँ जगह मिलेगी, मैं कहाँ रहूँगी। यह सूरज है कि चाँद हैं, इन्द्र है या घमंडी काम है, धरणेन्द्र है कि किन्नर देव है। यह सीमा युक्त, दुर्लघ्य और विघ्न-बाधाओं से रहित मेरे मन्दिरों कैसे और किस लिये आया है। इतना सोच विचार कर उसने साहस के साथ कहा कि हे साहसशाली! आप कौन हैं और किस कपट से मेरे महल में आये हैं। कुन्ती के इन वचनों को सुनकर उसके आलिंगन के लिये जंभाई लेता हुआ श्रमी, वाग्मी, तत्त्वज्ञ और कृतज्ञ पाण्डु बोला कि हे सुश्रोणि! यदि तुम्हें सुनने की इच्छा हो तो मन के मैल को दूर कर सुनो। पतिंवरे, प्रसिद्धे और वीरे! मैं तुमको सब हाल सुनता हूँ। जरा ध्यान देकर सुनो ॥१७३-१८६॥


कुरुजाङ्गलसद्देशहस्तिनागनरेशिनः। धृतराष्ट्रस्य भ्राताहं क्षितौ ख्यातः शमी क्षमी ॥१८७॥

अर्थ: कुरुजांगल देश में एक हस्तिनागपुर नाम नगर है। वहाँ धृतराष्ट्र राजा रहते हैं। मैं उनका छोटा भाई हूँ। मुझे सब कोई जानते हैं। मैं समता-भाव को और क्षमा को धारण करने वाला हूँ ॥१८७॥


स पाण्डुपण्डितो विद्धि स्वपाण्डुगण्डमण्डलः। अखण्डिताज्ञ ऐश्वर्येनाखण्डलप्रतिमोऽप्यहम् ॥१८८॥

अर्थ: लोग मुझे पाण्डु पण्डित कहते हैं क्योंकि मेरे में संसार भर की पाण्डुता आकर इकट्ठी हो गई है। मेरी आज्ञा को कोई लाँघ नहीं सकता और ऐश्वर्य में दखल नहीं दे सकता ॥१८८॥


चित्तं योगीव प्रद्युम्नो रतिं रामां च कामराट्। स्मरन्स्मरातुरश्चाये त्वां त्वदधीनचेतनः ॥१८९॥

सा जगौ तच्छ्रुतं श्रुत्वा नाथाहमविवाहिता। इत्थं जाते जने याति सापवादापकीर्तिताम् ॥१९०॥

अर्थ (श्लोक 189 से 190): अतः मैं इन्द्र के तुल्य हूँ और जिस तरह योगी जन आत्मा का, कामदेव रति का और कामी पुरुष स्त्री का स्मरण करते हैं उसी तरह तुम्हारा स्मरण करता हुआ, कामातुर हो मैं तुम्हारे पास आया हूँ। मेरा मन बिल्कुल तुम्हारे अधीन हो चुका है, वह अब मेरे वश में नहीं है। पाण्डु के इन वचनों को गौर के साथ सुन चुकने पर वह बोली कि राजन्! मैं अभी बिना ब्याही हूँ। अतः यदि इस समय यह कार्य होगा तो लोगों में बहुत अफवाह उड़ेगी और बड़ी बदनामी होगी ॥१८९-१९०॥


पितृवाक्यं विना वीरा किं वृणोति स्वयंवरम्। नायुक्तमिति वक्तव्यं वक्तव्यं सर्वसंगतम् ॥१९१॥

सोऽवादीद्वेदनाविष्टो मदनस्य तु कामिनी। त्वन्नामाक्षरसन्मन्त्राकृष्टोऽत्रागतवानहम् ॥१९२॥

कामाज्ञाल्लङ्घनाद्भीरु भीतिर्बिभिद्यते मनः। तद्भीत्या मरणावाप्तिः कामिनां पीडितात्मनाम् ॥१९३॥

अर्थ (श्लोक 191 से 193): दूसरी बात यह कि पिता की आज्ञा के बिना वीरा और कुलवती कन्याएँ अपने आप किसी को अपना वर भी नहीं बनातीं। इसलिए आप इस अयुक्त बात को न कह कर जो सर्व-सम्मत हो वही बात कहिए। इस पर काम की पीड़ा से पीड़ित पाण्डु ने उत्तर में कहा कि कामिनि, तुम्हारे नाम के ‘कुन्ती’ इन दो अक्षरों के मंत्र द्वारा खींचा गया तो मैं यहाँ तक आया हूँ और यदि इस समय काम की आज्ञा को लाँघू तो हे भीरु! मुझे बहुत डर लगता है कि काम न जाने मुझे आज्ञा भंग की क्या सजा देगा ॥१९१-१९३॥


मद्वचो हृदये धत्स्व त्रपावलीं च कर्तय। लोकापवादतो भीता मा भूद्भूतार्थवेदिनी ॥१९४॥

अर्थ: यह मेरे हृदय को जर्जरित किये डालता है। कामदेव के भय से काम से पीड़ित हुए पुरुषों की मृत्यु तक हो जाती है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। इसलिए तुम मेरे वचनों को अपने हृदय में स्थान दो और वहाँ से लज्जा-रूपी बेल की जड़ को उखाड़ दो। वास्तव बात को जानने वाली होकर भी तुम लोकापवाद का भय करती हो ॥१९४॥


कामदन्तावलः काममुन्मदिष्णुर्मदोद्धतः। सन्नीतिदन्तिपातारमुल्लङ्घ्य स्वेच्छया व्रजेत् ॥१९५॥

तावत्रपालता लोके तावद्धर्ममहीरुहः। तावच्छास्त्रज्ञता यावत्कामदन्ती न कुप्यति ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 195 से 196): देवी, मदोन्मत्त काम-रूपी हाथी मद से उद्धत होकर नीति-रूप अंकुश को नहीं मानता और स्वच्छन्द हो इधर-उधर जहाँ उसका मन चाहता-घूमता है और भी सुनो कि तभी तक लोक-लाज रहती है, तभी तक धर्म-वृक्ष हराभरा रहता है और तभी तक शास्त्रज्ञान रहता है जब तक कि काम-रूप हाथी कोप नहीं करता, उद्धत नहीं होता ॥१९५-१९६॥


स्वदेहं देहि वा हस्ते मृत्युं मे सुकरे कुरु। वदने वदनं धत्स्व कामिनामीदृशी गतिः ॥१९७॥

मनो देहि वचो देहि देहं देहि दयानिधे। दत्तं विना न संतुष्टिर्यतोऽर्थी दानतः सुखी ॥१९८॥

यदीत्थं रोचते तुभ्यं माररोचिष्णुसन्मते। मदनोन्मादनक्रीडां कुरु क्रीडाक्रियोद्यते ॥१९९॥

अर्थ (श्लोक 197 से 199): बस, अब बहुत बातचीत से कोई लाभ नहीं किन्तु अन्तिम बात यह है कि या तो अपने शरीर को मेरे हाथ में दे दो या मेरी मृत्यु को अपने हाथ में ले लो। देवी, तुम डरो मत, आलिंगन दो। यहाँ ग्रन्थकार कहते हैं कि देखो, कामी पुरुषों की ऐसी गति होती है। वे योग्य-अयोग्य का कुछ भी विचार नहीं करते-उनके हृदय से विवेक कूच कर जाता है। पाण्डु कहता है कि दयाधर्म को पालने वाली देवी, अब देर मत करो किन्तु जल्दी से मन दो, वचन दो और काम भी दे डालो क्योंकि तुम्हारे दिये हुए दान के बिना अब मुझे कल नहीं पड़ती, सन्तोष नहीं होता। क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि अर्थी पुरुष दान से ही सुखी होते हैं। काम से रुचि रखने वाली और उत्तम बुद्धि वाली देवी, यदि तुम्हें मेरा यह कहना रुचता हो तो तुम जल्दी से काम के मद को दूर करने वाली क्रीड़ा करो ॥१९७-१९९॥


दातारं प्रति कामार्थी याति दाता तदर्थिने ।
दत्ते यतः कृती याच्ञाभङ्गो न शोभते भुवि ॥२००॥

घूर्णिते घूर्णनं मुक्त्वा प्राघूर्णकविधिं भज।
प्राघूर्णकोऽस्म्यहं देवि याच्ञाभङ्गं विधेहि मा ॥२०१॥

आकर्णाभ्यर्णमर्यादं मारश्चापं च ताडयेत् ।
पञ्चबाणैर्नरं नारी संताड्य ताडनोद्यतः ॥२०२॥

तावत्त्रपा कुलं तावत्तावद्भीतिः परा स्थितिः ।
तावत्पिता जनस्तावद्यावन्मारो न कुप्यति ॥२०३॥

अर्थ (श्लोक 200 से 203): देखो, इच्छा वाला पुरुष दाता के पास जाता है और दाता उसकी इच्छा को पूरी करता है। इसमें यही एक कारण है कि याचना भंग करना संसार में शोभा नहीं पाता-इसे लोग अच्छा नहीं कहते। हे घूर्णिते ! अब तो तुम आलस को छोड़ दो और मेरी प्राघूर्णक विधि-पाहुनगत करो क्योंकि मैं तुम्हारा प्राघूर्णक-पाहुना हूँ। देखो, अब मेरी याचना को भंग मत करो। कामदेव बहुत ही निष्ठुर है, वह हमेशा ही नर-नारियों को दुख देने के लिये तैयार रहता है और अपने धनुष को कान तक खींचकर पाँच बाणों द्वारा उन्हें दुख दिया करता है और इसीलिये यह कहा जाता है कि तभी तक लाज और कुल रहता है, तभी तक भय और मर्यादा रहती है तथा तभी तक माता-पिता और परिवार की आन रहती है जब तक कि कामदेव कोप नहीं करता ॥२००-२०३॥


त्रपाजवनिकां भित्त्वा तौ प्रमत्तौ मदातुरौ ।
चेष्टेते चेष्टया युक्तौ वियुक्तौ कालतोऽखिलात् ॥२०४॥

अर्थ: इतनी बात-चीत के बाद उन दोनों ने मदातुर होकर, लाज-रूपी परदे को छेद-भेद डाला और बहुत काल के वियोग के कारण उस समय सारी काम चेष्टायें कीं ॥२०४॥


स तस्याः कण्ठमुद्ग्राहं गृहीत्वा चुम्बनोद्यतः ।
वदनाम्बुजमारोप्य यथा पद्मं मधुव्रतः ॥२०५॥

इन्दिन्दिर इवोन्मत्तः पद्माघ्राणनमात्रतः ।
तस्या आस्यं समाघ्राय लब्धपूर्व्वं तुतोष सः ॥२०६॥

तद्वस्त्राकुञ्चनं कुर्वन्प्रसारणपरायणः ।
भेजे भोगं भुजाभ्यां स समालिङ्ग्य मुहुर्मुहुः ॥२०७॥

कुचकुम्भौ करौ तस्यास्तस्य नागाविवोन्नतौ ।
सेवेते स्म यथा रक्तौ निधी लब्धसुखौ खलु ॥२०८॥

स वक्षोजवने तस्या रेमे रामापरायणः ।
वियोगतार्क्ष्यसंभीतो यथाऽहिश्चन्दने वने ॥२०९॥

अर्थ (श्लोक 205 से 209): पाण्डु ने कुन्ती के गले में हाथ डाल दिया और जिस तरह कमल को भौंरा चूमता है उसी तरह-उसके मुँह पर अपना मुँह रखकर वह उसका चुम्बन लेने लगा। वह कमल की गंध को सूंघ लेने मात्र से उन्मत्त हुए भौंरे की तरह उसके अपूर्व मुँह की गंध को सूंघकर बड़ा सन्तुष्ट हुआ-उन्मत्त सा हो गया। वह उसके वस्त्र को कभी सिकोड़ देता और कभी फैला देता। इस तरह दोनों भुजाओं से उसका बार-बार आलिंगन कर वह उसके साथ भोग-क्रीड़ा करने लगा। हाथी के कुंभस्थल की तरह ऊँचे उसके दोनों कुच-रूप कुंभों पर पाण्डु के दोनों हाथ ऐसे जान पड़ते थे मानों वे निधि के लोभी सुखी और आसक्त दो पुरुष ही इन कुंभों की सेवा करते हैं। वियोग-रूपी गरुड़ से डरा हुआ और स्त्री में दत्तचित्त वह उसके कुच-रूप वन में क्रीड़ा करने लगा, जैसे गरुड़ से डरा हुआ साँप चंदन-वन में क्रीड़ा करता हैं। वह कभी उछलता, कभी चुम्बन लेता, कभी हास-विलास और कभी और-और क्रीड़ायें करता था। वे दोनों एक दूसरे के ऊपर आसक्त होकर बहुत ही प्रसन्न हुए और एक ऐसे विचित्र भाव को प्राप्त हो गये, जो कि वचनों से बाहर है। उन दोनों ने एक दूसरे का


वल्गनैश्चुम्बनैर्हासैर्विलासैः क्रीडनैस्तैः। तौ भावं भेजतुर्भक्तौ कमपि प्रीतमानसौ ॥२१०॥

कियत्कालं समालिङ्ग्यालिङ्गनैः स्पर्शनैः सुखम्। वदना घ्राणनोद्युक्तौ तौ लभेतां सुजृम्भणौ ॥२११॥

एवं कामसुखेनासौ प्रीणयित्वाथ प्रेयसीम्। पिप्रिये प्रीणितः प्राज्ञः प्रियया को न तुष्यति ॥२१२॥

इत्थं प्रच्छन्नदेहोऽसावस्वस्थः प्रतिवासरम्। ममागत्य तया साकं निःशङ्कः स्थितिमातनोत् ॥२१३॥

अर्थ (श्लोक 205 से 213): आलिंगन और स्पर्शन करके कुछ काल तक सुख का अनुभव किया। वे परस्पर में एक दूसरे के मुंह को सूँघते थे और जँभाई लेते थे। इस प्रकार काम-सुख से प्यारी प्रेयसी को प्रसन्न कर वह पाण्डु पण्डित स्वयं भी खूब प्रसन्न हुआ। ठीक ही है, प्रिया से किसे संतोष नहीं होता। इस तरह अदृश्य-रूप को बनाकर वह अपवित्र हमेशा ही कुन्ती के यहाँ आता-जाता रहा और निःशंक होकर उसके साथ काम-क्रीड़ा करता रहा ॥२०५-२१३॥


धात्र्या दृष्ट्यान्यदा दृष्टः स कुन्त्या कृतसंगमः। कोऽयं कस्मात्समायातः किमर्थमिति चिन्तितम् ॥२१४॥

अर्थ: एक दिन दैवयोग से कुन्ती के साथ बैठे हुए उसे कुन्ती की धाय ने प्रत्यक्ष आँखों देख लिया और वह मन ही मन सोचने लगी कि यह कौन है? कहाँ से और किसलिये यहाँ आता है? ॥२१४॥

सप्तम पर्व (भाग 2/2)

गते तस्मिन्समाचष्टे विशिष्टा स्पष्टलोचना। धात्री धृतिविनिर्मुक्ता कुन्तीं कुन्ताग्रमानसा ॥२१५॥

पुत्रि चित्रमिदं ब्रूहि चलच्चेतोविदारणम्। कोऽयं कुतः समायाति प्रतिघस्रं तव गृहे ॥२१६॥

इति पृष्टा महाकष्टादनिष्टस्वान्तधारिणी। आचख्यौ सा चलच्चक्षुश्चञ्चला चलदेहिका ॥२१७॥

समाकर्ण्य कर्णाभ्यां कृतिं मे विकृताकृतिम्। कर्मणा कलितः कामी कुरुते किं न दुष्करम् ॥२१८॥

कर्मणा कलिताः के के न नष्टाः क्लिष्टमानसाः। नानानीतिसमायुक्ता यथा प्राग्रावणादयः ॥२१९॥

अघटं घटयत्येव सुघटं घटनातिगम्। कर्मेदं घटयत्येवाचिन्तितं चतुरैर्जनैः ॥२२०॥

अर्थ (श्लोक 215 से 220): इसके बाद जब वह चला गया तब कुछ बनावटी-सी नाराजगी को दिखाकर, अधीर हो, उस धाय ने व्यग्र मन से कुन्ती को पूछा कि पुत्री, एक अचम्भे की बात है, जो मेरे चित्त को चंचल और विदीर्ण करे डालती है। कह तो सही, यह कौन है? और हर दिन कहाँ से तेरे पास आता है? यह सुनकर कुन्ती के मन में बड़ी घबराहट हुई। उसकी नेत्र चंचल हो गये। शरीर बिल्कुल अचल हो गया। उसमें लहू का संचार बन्द हो गया। वह कुछ लड़खड़ाती हुई जुबान से, बड़े कष्ट के साध, बोली कि माता! तुम मेरी इस खोटी कृति को कान देकर सुनो। मैं तुमसे जैसी की तैसी बात कहे देती हूँ। बात यह है कि कर्म के वश होकर कामी पुरुष चाहे जैसे दुष्कृत्यों को भी कर डालते हैं। देखो, कर्म के अधीन होकर किस-किस ने कष्ट नहीं उठाया और कौन-कौन नष्ट-भ्रष्ट नहीं हुए। रावण आदि तो नीति के अच्छे ज्ञाता थे परन्तु कर्म के झकोरे से वे भी न बचे-उनको भी आपत्ति का सामना करना पड़ा। माता, कर्म के निमित्त से नहीं होने वाली घटना तो हो जाती है और होने वाली आसान से आसान भी घटना दूर चली जाती है। कर्म के सम्बन्ध में कहाँ तक कहा जावे, इनके निमित्त से वे-वे काम हो जाते हैं, जिनका बड़े-बड़े महात्मा और चतुर पुरुषों ने भी कभी स्वप्न में विचार नहीं किया ॥२१५-२२०॥


धात्रि संध्यावसानेऽयमकस्मादागतः पुमान्।
मत्सांनिध्यं विधेर्योगाद्विधिः किं न करोति हि ॥२२१॥

अर्थ: माता, एक दिन संध्या के बाद अकस्मात् ही कर्म का प्रेरा यह पुरुष मेरे पास आया। ठीक ही है, कि कर्म क्या-क्या नहीं करता ॥२२१॥


एजिता जयनिर्मुक्ता निर्गता खलकर्मणा।
जितानेनाजितस्वान्ताहं सुभोगार्थदर्शिना ॥२२२॥

कुरुजाङ्गलदेशेशो व्यासराजसुतोऽप्ययम्।
मद्रूपाकर्णनासक्तः पाण्डुरापाण्डरद्युतिः ॥२२३॥

मुद्रया रूपमुन्मुद्र्य लब्धयोद्यानमन्दिरे।
आयासीदत्र सांनिध्ये मम भोगार्थमानसः ॥२२४॥

अर्थ (श्लोक 222 से 224): मेरी और इसकी परस्पर में बातचीत हुई। उस समय मैं कर्म की प्रेरी हुई अचल चित्त वाली होकर भी इस भोगार्थदर्शी महान् पुरुष के द्वारा जीती गई। तात्पर्य यह कि बातचीत में उसने मुझे अपनी ओर झुका लिया, पर मैं उसे अपनी ओर न झुका सकी। यह कुरुदेश के राजा व्यास का पुत्र है। इसे पाण्डु पण्डित कहते हैं। इसकी आकृति-द्युति बिल्कुल पाण्डु (सफेद) है, जान पड़ता है कि इसलिए इसका नाम पाण्डु पड़ा है। यह मेरे रूप को सुनकर मुझ पर बड़ा आसक्त चित्त था। इतने में उद्यान-मन्दिर में इसे वज्रमाली विद्याधर द्वारा एक इच्छित रूप देने वाली अंगूठी मिल गई। उस अँगूठी के प्रभाव से अदृश्य रूप बनाकर, मेरे साथ रमने की इच्छा से, यह मेरे पास आया था ॥२२२-२२४॥


प्राह धात्री धराकम्पं कम्पयन्तीं निजां तनूम्।
विरूपकमिदं पुत्रि किं कृतं कामचेतसा ॥२२५॥

बाला वृद्धा प्रबुद्धा च विकलाङ्गी सयौवना।
युवतिर्नरतो वर्ज्याऽन्यथानिष्टसमागमः ॥२२६॥

अर्थ (श्लोक 225 से 226): कुन्ती के ऐसे वचनों को सुनते ही धाय का सारा शरीर काँप उठा और शरीर-कम्प के सम्बन्ध से पृथ्वी भी हिल गई। वह बोली के प्यारी पुत्री, दुष्ट काम के वश हो तुमने यह क्या विरूप कर डाला है। देखो, नीति के विद्वानों ने कैसी अच्छी शिक्षा दी है कि स्त्री चाहे बाला हो चाहे वृद्धा, लिखी पढ़ी हो चाहे निरी अपढ़, अंग-हीन हो चाहे युवती और, कैसी ही सुन्दरी क्यों न हो उसे पुरुष से हमेशा दूर ही रहना चाहिए। नहीं तो कभी न कभी अवश्य ही अनिष्ट होगा ॥२२५-२२६॥


बाले बलेन संभुक्तानेनेति मनुजाः किमु।
वेत्स्यन्ति कथयिष्यन्त्यन्या दुःकर्म ही कृतम् ॥२२७॥

अनेन कर्मणा कन्ये कुलं कुवलयोज्वलम्।
निःकलंङ्कं तवाद्यापि सकलङ्कं भविष्यति ॥२२८॥

यदि वेत्स्यन्ति वेगेनेदं विदो जनकादयः।
विरूपकं तदा काम्ये किं कार्यं च भविष्यति ॥२२९॥

अर्थ (श्लोक 227 से 229): बाले! भला इस बात को लोग क्या जानेंगे कि इस पुरुष ने ही कन्या के साथ जबरदस्ती की है और कन्या सर्वथा निर्दोष है। वे तो यही कहेंगे कि कन्या ने यह बहुत बुरा काम किया है। इसके सिवा इस दुष्कर्म से कमल की तरह स्वच्छ और कलंक-रहित तुम्हारे कुल में भी तो कलंक लग जायेगा और यह तो बताओ कि जब इस दुष्कृत्य को पिता वगैरह विचारशील पुरुष सुन पायेंगे तब तुम्हारी और मेरी दोनों की ही क्या दशा होगी ? ॥२२७-२२९॥


समङ्गमेजया जाता जातनिःश्वासभाजिनी।
सगद्गदस्वरा प्राह कुन्ती कुञ्चितविग्रहा ॥२३०॥

अर्थ: यह सुनते ही कुन्ती का शरीर काँपने लगा और देखते ही देखते सिकुड़ गया, एवं उसकी


उपमातर्महामातर्युक्तसर्वार्थकोविदे।
करवाणि किमद्याहं कथं कथय कामदे ॥२३१॥

वाचं यच्छ कुरु स्वच्छं सच्छीलच्छलितात्मिकाम्।
अनिच्छन्तीं हि मां छिद्रं वत्से गच्छ दयां मयि ॥२३२॥

ऋते मृतेर्न चेयर्ति ममार्तिः कृन्तकीर्तिका।
आत्मनोऽतो मृतिं तूर्णं कीर्तयिष्यामि सत्वरम् ॥२३३॥

मृत्यून्मुखं मुखं वीक्ष्य धात्री तस्या धृतात्मिका।
जगाद जगदानन्दं ददती सदया द्रुतम् ॥२३४॥

भयं मा भज भोगाढ्ये स्वास्थ्यं गच्छ मनोहरे।
यथा ते स्वास्थ्यसंपत्तिः करवाणि तथाप्यहम् ॥२३५॥

समाश्वास्येति तां धात्री विधात्री धृतिसाधनम्।
धाम्नि धामसमृद्धीप्तां धारयन्ती स्थितिं व्यधात् ॥२३६॥

अर्थ (श्लोक 230 से 236): कान्ति वगैरह सब ही विदा हो गई। वह बड़ी डरी और निसासें छोड़ने लगी तथा गद्गद् हो दीन स्वर में कहने लगी कि माता, तुमने मुझे पाला और पोषा है, अतः तुम माता से भी बढ़ कर मेरी महा माता हो और सभी योग्य-अयोग्य बातों को जानती-समझती हो। इसलिए मेरे ऊपर कृपा कर तुम इस वक्त मुझे मेरा कर्तव्य बताओ। इसी में मेरी भलाई है। तुम सभी तरह मेरे मनोरथों को पूरा करने के लिए समर्थ हो, अतः इस समय अब तुम मेरे छल-प्रपंच को मत देखी किन्तु मेरे दुःशील को पवित्र करो-सुधारो और दया का परिचय दो। माता, मरने के सिवाय अब और तरह मेरी पीड़ा नहीं जा सकती, इसलिए अब मैं शीघ्र ही अपने प्राण पखेरुओं को उड़ा देने की कोशिश करूँगी। कुंती के ऐसे भारी दुख भरे शब्दों को सुनकर धीरा और सभी को आनंद देने वाली वह धाय बोली कि मनमोहनी प्यारी पुत्री, तुम कुछ भी भय और चिन्ता मत करो, दिली मैल को धो डालो तथा भरोसा कर लो कि जिस उपाय से तुम्हारी भलाई होगी मैं वही उपाय सोच निकालूँगी। तुम्हें इस सम्बन्ध में तनिक भी चिन्ता नहीं करना चाहिए। तुम तो सुख के साथ अपना समय बिताओ। धाय धैर्य देने में बहुत ही दक्ष थी। उसने उक्त प्रकार कुंती को खूब साहस दिया और आप स्वयं राज-महल में रहकर अपना समय बिताने लगी ॥२३०-२३६॥


दोषस्याच्छादनं धात्री तस्या सर्वत्र बुद्धितः।
कुर्वन्ती समयं किंचिन्निन्याय नयकोविदा ॥२३७॥

अथ तद्योगतस्तस्या भ्रूणभावो बभूव च।
ववृधे क्रमतो भ्रूणो विविधभ्रान्तिभासतैः ॥२३८॥

कठिनं जठरं तस्यास्त्रिवलीभङ्गवर्जितम्।
गर्भस्य प्रथमं चिह्नं कुर्वन्प्रकटमुद्बभौ ॥२३९॥

लपनं पाण्डिमोपेतं सन्निष्ठीवननिष्ठुरम्।
तुच्छजल्पनसंकल्पमभूत्तस्याः शुभेक्षणम् ॥२४०॥

स्तनकुम्भौ कञ्चुकाख्यसमाच्छादनच्छादितौ।
तत्प्रभावाद्धिरण्याभौ तस्या रेजतुरुन्नतौ ॥२४१॥

अर्थ (श्लोक 237 से 241): इसके बाद नय-नीति को जानने वाली उस धाय ने कुंती के दोषों को जहाँ तक बन सका बहुत दिनों तक छिपाया। धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में पाण्डु के सम्बन्ध से कुन्ती गर्भवती हो गई और धीरे-धीरे उसका गर्भ वृद्धिंगत होने लगा। इस समय गर्भ को देखकर लोगों को भाँति-भाँति की भ्रांति होती थी और वह गर्भ भी अपूर्व शोभा पाता था। गर्भ के प्रभाव से कुछ ही काल में कुन्ती का उदर कड़ा पड़ गया और त्रिवली मिट गई। इस तरह उसके गर्भ का पहला चिह्न प्रकट दीख पड़ने लगा। उसका मुँह पीला पड़ गया। थूक अधिक आने लगा। बोल-चाल कम हो गया एवं उसके नेत्र सुन्दर-सुहावने देख पड़ने लगे। साड़ी के आँचल से प्रच्छन्न (ढके हुए) कुच-कुंभ उन्नत और सोने की आभा जैसे पीले हो गये


सपल्लवा यथा वल्ली संचिता सलिलोत्करैः । तथा सा गर्भभारेण स्तनभारोद्धुरा बभौ ॥२४२॥

अर्थ (श्लोक 238 से 242): एवं जिस तरह जल से सींची गई वेल, फूल और पत्तों द्वारा शोभा पाने लगती है उसी तरह गर्भ-भार से कुचों के भार को वहन करने वाली कुन्ती भी शोभा पाती थी ॥२३८-२४२॥


भ्रूणभारश्रमश्रान्तां कुन्तीं वीक्ष्य कदाचन । जनकौ खेदितस्वान्तौ तां धात्रीं प्रति चाहतुः ॥२४३॥

निष्ठुरे दुष्टतानिष्ठे कनिष्ठेऽनिष्टसंगते। अनिष्टमीदृशं कुन्त्याः कारितं केन च त्वया ॥२४४॥

अर्थ (श्लोक 243 से 244): एक दिन दैवयोग से गर्भ-भार के श्रम से थकी हुई कुन्ती को उसके माता-पिता ने देख लिया। देखकर वे बड़े चिन्तित हुए। धाय से वे बोले कि क्योंरी तू बड़ी दुष्ट है, तुझे नाम मात्र दया नहीं। हे नीच और अनिष्टों को पैदा करने वाली, तूने कुन्ती से यह अनिष्ट किस पुरुष के समागम से करवाया ॥२४३-२४४॥


कुलं प्रविपुलं कुल्यः कल्मषीकुर्वते ध्रुवम् । सुता वध्वश्च निःशङ्का विटसंसर्गदोषतः ॥२४५॥

समर्पिता सदा चेयं तव रक्षणहेतवे। दक्षे रक्षा त्वयेदृक्षा समक्षं विहिता लघु ॥२४६॥

यद्घोषतो नरेन्द्राणां सदस्सु वयमाकुलाः। अधोमुखा भविष्यामो मषीमार्जितदेहकाः ॥२४७॥

अर्थ (श्लोक 245 से 247): क्या तू नहीं जानती कि पुत्री और पुत्र-वधू ये दोनों चाहे कितने ही ऊँचे कुल की क्यों न हों यदि स्वतंत्र रहेंगी तो जार-संसर्ग द्वारा पवित्र से भी पवित्र कुल में कलंक लगा देंगी और इसी विचार से ही हमने रक्षा के लिए इसे तेरे सुपुर्द किया था। पर तूने ऐसी रक्षा की, जो प्रकट ही दीख पड़ती है। यह इतनी बड़ी गलती हुई है कि इसके सम्बन्ध से राजाओं महाराजाओं की सभा में हमें नीचा मुँह करना पड़ेगा और लाज के मारे हमारे शरीर पर स्याही फिर जायेगी एवं इससे हमें बहुत दुख उठाना पड़ेगा ॥२४५-२४७॥


नदी च पातयेत्कूलं नारी पातयते कुलम्। स्त्री नदीवदिदं सत्यं रससंस्कारसंगिनी ॥२४८॥

अर्थ: नीति के विद्वानों ने कहा है कि स्त्री नदी के तुल्य होती है, कारण कि रस-संस्कार (जलप्रवाह) के द्वारा जिस तरह नदी अपने किनारों को गिरा देती है उसी तरह, शृंगारादि रस और संस्कारों के द्वारा स्त्री भी अपने कुल को दाग लगा देती है ॥२४८॥


नागानां च नखीनां च नारीणां दुष्टचेतसाम् । विश्वासो नैव कर्तव्यो रक्षितानां महाजनैः ॥२४९॥

स्त्रियःसदा न विश्वास्यास्ता उन्मत्ता विशेषतः । नाग्यः खादन्ति कोपेन यद्वत्किं खेदिताः पुनः ॥२५०॥

आत्मजा रक्षणे दत्ता त्वां त्वया चेदृशं कृतम् । दुग्धरक्षाविधौ यद्वन्मार्जारी च पिबेत्पयः ॥२५१॥

अर्थ (श्लोक 249 से 251): इसलिए चाहे वे बड़े-बड़े पुरुषों के द्वारा ही रक्षित क्यों न हों, पर तो भी नागिन, नख वाले पशुपक्षी, नारी और दुष्ट पुरुष इनका भूलकर भी भरोसा नहीं करना चाहिए और इसलिए कहा जाता है कि पुरुषों को स्त्री का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए और जब वह कामासक्त हो तब तो उसकी छाँव भी अपने ऊपर नहीं पड़ने देना चाहिए। जरा सोच कर तो देख कि स्वभाव से ही लोगों को सताने वाली नागिन कष्ट दिये जाने पर कभी विश्वास करने योग्य हो सकती है ? अरी दुष्टा ! अब तू ही विचार कि हमने तो, पुत्री को रक्षा के लिए तेरे सुपुर्द किया था और तूने बिना विचारे ही


इत्थमुक्ते दराक्रान्ता विक्रान्तिकृतिवर्जिता।
सकम्पा स्वे दिला धात्री गतच्छाया जगाविति ॥२५२॥

अशरण्यशरण्यस्त्वं यादवान्वयपालक।
कृपां कृत्वावधानेन विज्ञाप्यं श्रूयतां त्वया ॥२५३॥

अर्थ (श्लोक 249 से 253): बिल्ली वाली कहावत कर दिखाई। वह यह कि यदि बिल्ली को रक्षा के लिए दूध सौंप दिया जाये तो वह रक्षा की जगह स्वयं ही उसे भक्षण कर जायेगी। सो ही तूने किया। यह तेरा कृत्य सर्वथा अक्षम्य है। कुन्ती के माता-पिता के ऐसे डाट-डपट भरे शब्द को सुनकर धाय बड़ी भयभीत हुई। उसे कुछ भी उपाय न सूझ पड़। उसका सारा शरीर थरथर काँपने लगा और पसीने से बिल्कुल ही तर हो गया। उसके मुँह की सारी चमक-दमक नष्ट हो गई। वह जैसे-तैसे बोली कि राजन्, आप अशरणों के लिये शरण है, यादव कुल के पालक हैं, दयालु और धर्मात्मा हैं। कृपाकर सावधान चित्त हो मेरी एक प्रार्थना सुन लीजिये ॥२४९-२५३॥


कुन्त्या दोषो न राजेन्द्र न दोषो मम जातुचित्।
केवलं कर्मणो दोषस्तन्नरः किं न नाटयेत् ॥२५४॥

कुरुजाङ्गलदेशस्य स्वामी कौरववंशजः।
पाण्डुराखण्डलाकारोऽखण्डितान्वयपालकः ॥२५५॥

अर्थ (श्लोक 254 से 255): राजेन्द्र! इसमें न तो कुन्ती का अपराध है और न मेरा ही किन्तु अपराध है पूर्वभव में किये हुए कर्म का। पूर्वकृत कर्म जीवों को नट की तरह जैसा चाहते नचाते हैं। महाराज सुनिए। कुरुजांगल देश में पाण्डु नाम एक राजा है। वह कौरव-वंशी और इन्द्र के जैसी विभूति का धारक है और अखण्ड रीति से अपने कुल की रक्षा करता है ॥२५४-२५५॥


कुन्तीप्रार्थनसँलुब्धः क्षुब्धस्तद्रूपचक्षुषा।
विश्रब्धः सोऽनया रन्तुं स्तब्धः कामविकारतः ॥२५६॥

कदाचित्कुन्तिकावेश्म प्रविष्टो विष्टपोन्नतः।
करे स मुद्रिकां कृत्वा नानारूपविकारिणीम् ॥२५७॥

मन्मुक्तैकयका साकं कन्यया करपीडनम्।
चक्रे क्रौरवराजेन्द्रो रहस्युरसि दत्तया ॥२५८॥

प्रतिघस्रं तया सार्धं स रेमे रमणीयतां।
गतो दृष्टो मया पृष्टा सा ब्रूते स्म यथातथम् ॥२५९॥

अर्थ (श्लोक 256 से 259): एक बार वह कुन्ती के रूप पर आसक्त हो गया और उसके बिना बड़ा क्षोभ को प्राप्त हुआ। उसके पिता ने कुन्ती के लिये आपसे बहुत बार प्रार्थना की, पर आपने उस पर जब कुछ भी ध्यान नहीं दिया तब वह स्वयं ही कुन्ती से प्रार्थना करने और उसके साथ रमने का उपाय सोचने लगा। कारण, उसके हृदय में कुन्ती के निमित्त से हमेशा ही कामअग्नि धधका करती थी। दैवयोग से इसी बीच में एक दिन वन में उसकी वज्रमाली विद्याधर से भेंट हो गई और उसके द्वारा भाँति-भाँति के रूप को देने वाली एक अँगूठी भी मिल गई। अँगूठी को हाथ में पहनकर वह वहाँ से चला और सूरीपुर पहुँचा। वहाँ रात के वक्त उसने अदृश्य रूप बनाया और वह कुन्ती के महल में पहुँच गया। उस समय कुन्ती वहाँ अकेली ही थी। उसके पास न तो मैं थी और न दूसरी कोई दासी वगैरह थी। ऐसी हालत में एकान्त पाकर वह सुन्दराकृति कौरव-वंशी राजा हृदय में बसने वाली कुन्ती के साथ गांधर्व ब्याह कर उसके साथ प्रति दिन रमने लगा ॥२५६-२५९॥


एतावत्कालपर्यन्तं रक्षिताच्छादिता मया।
अतः प्रभृति नो जाने यद्युक्तं तद्विधेहि भोः ॥२६०॥

अर्थ: एक दिन एकाएक उसे मैंने कुन्ती के महल में देख लिया और कुन्ती से उसका सब हाल पूछा। उस समय कुन्ती ने उसका जो हाल मुझे कहा था वह मैंने जैसा का तैसा आपको सुना दिया है। राजन्! इतने दिनों तक तो मैंने पुत्री की भरसक रक्षा की और उसके इस दोष को भी प्रकट नहीं होने दिया परन्तु अब मेरे वश की बात नहीं रही। अतः इस सम्बन्ध में अब आप जैसा उचित समझें वैसा करें ॥२६०॥


निशम्य दम्पती तौ च विमृश्येति स्वमानसे । आच्छाद्यतामयं दोष इति तावूचतुः स्वयम् ॥२६१॥

आच्छादिता तथाप्येषा किंवदन्ती क्षितौ गता । तैलबिन्दुर्यथा मुक्तस्तोये विस्तीर्णतां व्रजेत् ॥२६२॥

अर्थ (श्लोक 261 से 262): धाय के इन वचनों को सुन उन दम्पती ने परस्पर में विचार किया और उत्तर में यह कहा कि तू इस दोष को गुप्त रख, देख, कहीं यह प्रकट न हो जाय। इसके बाद उस धाय ने कन्या के इस दोष को दबाने का खूब प्रयत्न किया, पर उसे कुछ भी सफलता न हुई। लोगों के कानोंकान सब जगह वह फैल ही गई, जिस तरह जल में छोड़ी हुई तेल की बूंद सब जल में फैल जाती है ॥२६१-२६२॥


अथ सा सुषुवे पुत्रमुद्यन्मित्रसमप्रभम् । पूर्णे मासे महाशोभं शुम्भद्भाभारभूषणम् ॥२६३॥

तदा पुरे जना ज्ञात्वा सुतं जातं सविस्मयाः । राजभीत्या व्यधुर्वार्तां कर्णे कर्णे च तस्य हि ॥२६४॥

अर्थ (श्लोक 263 से 264): इसके बाद धीरे-धीरे जब नौ महीना पूरे हो गये तब कुन्ती ने पुत्र को जन्म दिया। पुत्र बाल सूरज की प्रभा की तरह प्रभा वाला था। उसके शरीर की बड़ी शोभा थी। वह कान्ति के पूर से विभूषित था। पुत्र का जन्म होते ही सूरीपुर में सब जगह उसकी खबर फैल गई परन्तु राजा के डर के मारे कोई भी खुले मन से इस बात को न कह सका। सब गुपचुप कानोंकान एक दूसरे को कहते थे ॥२६३-२६४॥


कुन्तीपिता तदा ज्ञात्वा किंवदन्तीं सुतस्य च । कर्णजाहं गतां चक्रे कर्णाख्यं तं जनस्य च ॥२६५॥

संमन्त्र्य मन्त्रिभिः सार्धं मञ्जूषास्थमकारयत् । अर्कभं कुण्डलोपेतं सरत्नकवचं नृपः ॥२६६॥

कर्णाख्याक्षरसद्गर्भपत्रोपेतं सवित्तकम् । मुमोच सूर्यतनयाप्रवाहे वहनत्वरे ॥२६७॥

कालिन्दीसरित्संनिष्ठा पुरी चम्पापुरी परा । सौधाग्रलग्नसद्धेमकुम्भा भाभायते च या ॥२६८॥

अर्थ (श्लोक 265 से 268): धीरे-धीरे यह किंवदन्ती कुन्ती के पिता के कान में भी जा पड़ी और उन्हें यह मालूम हो गया कि सबने इस बात को जान लिया है। उन्होंने जन्म की बात कानोंकान सब जगह फैलने के कारण उस पुत्र का नाम कर्ण रख दिया तथा मंत्रियों की सलाह से उसे कुंडल वगैरह भूषण और रत्न-खचित कवच पहनाकर एक सन्दूक में बन्द कर दिया और उसी में कर्ण नाम लिखकर एक पत्र तथा कुछ द्रव्य भी रख दिया। इसके बाद उस सन्दूक को तेजी से बहते हुए यमुना नदी के प्रवाह में छुड़वा दिया। यमुना नदी के बिल्कुल किनारे चम्पापुरी नाम की एक नगरी है। उसके महलों के ऊपरी भाग में सोने के सुन्दर कलश लगे हुए हैं, जिनसे वह बहुत सुशोभित है ॥२६५-२६८॥


या केतुहस्तवारेणाह्वयन्तीव सुरासुरान् । नरावतारमुत्कृष्टं वाञ्छतः स्वच्छमानसान् ॥२६९॥

अर्थ: वहाँ के मन्दिरों पर ध्वजायें फहराती हैं, जिनसे ऐसा भान होता है कि मानो ध्वजा-रूप हाथों के इशारे से नगरी उत्तम नर-जन्म को चाहने वाले और शुद्धमना सुर-असुरों को बुलाती है।


पातालवाहिनीसूरतनया परिखाभवत्। यस्याः कृष्णेव संछेत्तुं रुषा पातालवासिनः ॥२७०॥

अर्थ (श्लोक 269 से 270): चम्पानगरी के चारों ओर जो खाई है, वह ऐसी जान पड़ती है कि मानो यह पाताल लोक में बहने वाली यमुना नदी ही है और पाताल-वासियों पर रुष्ट होकर वह यहाँ आ गई है ॥२६९-२७०॥


विशिखासख्यसंपन्नो हिमांशुर्यत्र वर्तते। विश्रान्तः स्थितिसिद्ध्यर्थं महान् हि महतः सखा ॥२७१॥

यस्याः शृङ्गाग्रसंभिन्नश्चन्द्रो धत्ते सुरन्ध्रतः। रन्ध्रं रश्मिकलापाढ्यो निश्छिद्रोऽपि प्रभासुरः ॥२७२॥

यत्प्रासादशिखोत्तम्भिरत्नकुम्भाः सुतामसम्। नैशं च मानसं घ्नन्ति मध्यस्था जिनसत्तमाः ॥२७३॥

अर्थ (श्लोक 271 से 273): यद्यपि चाँद रश्मियों के समुदाय से भरपूर है, भासुर और छिद्र-रहित है परन्तु तो भी वहाँ के ऊँचे शिखरों वाले मन्दिरों से घिस जाने के कारण वह छिद्र वाला-सा देख पड़ता है। वहाँ के मन्दिरों के शिखर बड़े ऊँचे हैं, इसलिए उनके साथ चन्द्रमा की मित्रता हो गई और इसी कारण वह अब विश्राम के लिये वहाँ आकर ठहरता है। ठीक ही है कि बड़ों के साथ ही बड़ों की मित्रता हो पाती है। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ के मंदिर-महल बड़े-बड़े ऊँचे हैं ॥२७१-२७३॥


श्रीवासुपूज्यसद्गर्भसूतिकल्याणपावनी। योपान्तवनसद्दीक्षाज्ञाननिर्वाणभाजिनी ॥२७४॥

अङ्गदेशाङ्गतां प्राप्ता नानाद्विजगणसंगिनी। अगण्यपुण्यसंगीर्णा रम्भोरूभीरुभासुरा ॥२७५॥

भामिनीभासुरास्येन छिन्दन्तीव हिमांशुना। तामसं या सदा भाति सदोद्योतोन्मुखी खलु ॥२७६॥

दानिनो यत्र सद्धानं दत्त्वा दानार्थमञ्जसा। पात्रेभ्यो रत्नसद्धर्षं लभन्ते लाभभासुराः ॥२७७॥

अर्थ (श्लोक 274 से 277): वहाँ वासुपूज्य प्रभु के गर्भ और जन्म ये दो कल्याणक हुए है, अतः वह पुरी पवित्र है। इसके सिवा उसके पास के वन में दीक्षा ले केवलज्ञान लाभकर कई भव्यजीव मोक्ष-महल में जा विराजे हैं। वह नगरी अंगदेश में है और उसमें भाँति-भाँति के पुरुषों का निवास है। वह अगणित गुणों वाली और केले के थंभ के समान सुन्दर जाँघों वाली स्त्रियों से भासुर है, एवं स्त्रियों के भासुर मुख-चंद्र के द्वारा अँधेरे को दूरकर हमेशा ही उद्योत-रूप रहा करती है। वहाँ के दानी पुरुष हमेशा ही पात्रों को दान देते हैं और लाभ के निमित्त से प्रकाशरूप होकर रत्न और हर्ष को पाते हैं ॥२७४-२७७॥


तत्पतिः पालितोनेकसविवेकजनोत्करः। प्रतापपातितागण्यवैगुण्यजनसंश्रयः ॥२७८॥

भानुर्नाम्ना गुणैर्भानुर्ब्रध्नभानुसमद्युतिः। शत्रुदारुक्षये चित्रभानुर्भानुः प्रतापतः ॥२७९॥

भानुर्भानुः क्षयं याति तमित्रायां कदाचन। नायं दीप्त्या प्रतापेन सदोद्द्योतितदिङ्मुखः ॥२८०॥

अर्थ (श्लोक 278 से 280): ऐसी अपूर्व नगरी का पालक राजा था भानु। वह हमेशा विवेकी और शिष्टजनों की रक्षा करता था और दुष्टों का निग्रह करता था। उसके प्रताप से डरकर जो लोग उदासीन हो जाते थे उन विरक्त पुरुषों का वह आश्रय था। उसमें बहुत गुण थे, अतः वह उनसे भानु के जैसी सुशोभित था। सूरज की किरणों जैसी उसके शरीर की कान्ति थी। वह शत्रु-रूप ईंधन को जला डालने को अग्नि था और प्रताप में सूरज के जैसा था। उसमें सूरज से भी यह विशेषता थी कि सूरज का तो रात में अस्तित्व नहीं रहता और यह कभी प्रताप और दीप्ति से हीन नहीं होता था, हमेशा ही उदित रहता था-दसों दिशाओं को तेजोमय बनाये रखता था। वह इतना बड़ा दानी था कि उसके दिये दान को


यद्दानतो जनास्तूर्णं कल्पवृक्षं विसस्मरुः। चिन्तामणौ मतिं तेनुः कामधेनौ न नाप्यहो ॥२८१॥

वेत्ता शास्त्रविदां मान्यो योद्धा युद्धविदां मतः। योऽभूत्प्रतापपारीणः शत्रुदर्पसुशातनः ॥२८२॥

अर्थ (श्लोक 278 से 282): पाकर लोग कल्पवृक्षों को भी भूल जाते थे एवं इसके होते हुए वे न तो चिंतामणि को याद करते थे और न कामधेनु की ही। वह बड़ा ज्ञानी था। बड़े-बड़े शास्त्रज्ञ भी उसे विद्वान् मानते थे। वह युद्धकला में कुशल योद्धा था, प्रतापशाली और शत्रु-पक्ष का विध्वंसक था ॥२७८-२८२॥


तत्पत्नी प्रेमसंपूर्णा राधा याराध्य देवतां। लब्धालक्ष्मीरिवानन्ददायिनी सुखदा शुभा ॥२८३॥

अर्थ: उसकी प्रिया का नाम था राधा। राधा के लिए भानु ने देवताओं की आराधना की थी। तब कहीं वह उसे मिली थी। वह भी प्रेम की अन्तिम सीमा ही थी। लोग उसे लक्ष्मी की उपमा देते थे। कारण कि जैसे लक्ष्मी लोगों को आनंद देकर सुखी बनाती है वैसे ही वह भी प्रजा को आनंद देकर सुखी करती थी। तात्पर्य यह कि उसकी कृपा से प्रजा का समय सुख-चैन से बीतता था। लक्ष्मी को लोग शुभ मानते हैं। वह भी शुभ थी, उसके दर्शन से लोगों के अभीष्ट की सिद्धि होती थी ॥२८३॥


यस्या रूपं गुणा यस्या यस्याः सौभाग्यमुन्नतम्। यस्या दीप्तिरिदं सर्वं विदुषा केन वर्ण्यते ॥२८४॥

नृपस्य हृदये लग्ना वाग्देवीव विराजते। सालङ्कारा सुरीतिज्ञा निर्दोषा या गुणान्विता ॥२८५॥

अर्थ (श्लोक 284 से 285): सच तो यह है कि उसके रूप-लावण्य, कान्ति-कला, गुण-चतुराई और अटूट सौभाग्य की कोई विद्वान् तारीफ ही नहीं कर सकता है। वह भानु के हृदय से लगी हुई सरस्वती-सी जान पड़ती थी क्योंकि सरस्वती में अलंकार वगैरह होते हैं, वह भी अलंकार-भूषण वगैरह पहिने थी। सरस्वती सुरीतियाँ बताती है, वह भी अपनी चाल-ढाल से लोगों को सुरीतियाँ बताती थी। सरस्वती निर्दोष और गुणवती होती है, वह भी दोषरहित और गुणों से युक्त थी ॥२८४-२८५॥


या रम्भेव परा रम्भा रम्भास्तम्भोरुभासिनी। रंभ्यते शुभाभोगभोगैर्विभ्रमवीक्षणा ॥२८६॥

पतिसंपत्तिसंपन्ना विपत्तिविमुखोन्मुखा। अरातिसंततित्यक्ता यानपत्यैव केवलम् ॥२८७॥

अर्थ (श्लोक 286 से 287): सरस्वती लोगों के हृदय-मन्दिर में रहती है, वह भी राजा के हृदय-मंदिर में निवास करती थी। वह रंभा के जैसी सुन्दर थी, यही नहीं किन्तु उससे भी बढ़कर सुन्दर थी। उसकी जाँघें केले के थंभे के जैसी सुन्दर थीं। उसकी दृष्टि लोगों के मन में विभ्रम पैदा करती थी। वह भोगों से पूर्ण और मन को मोहित करने वाली होने के कारण इन्द्र की इन्द्राणी जैसी शोभती थी। वह बड़ी सम्पत्तिशालिनी थी। विपत्ति उसके पास भी न फटकती थी। यह सब कुछ होने पर भी दैवदुर्विपाक से उसके कोई सन्तान नहीं थी ॥२८६-२८७॥


अथैकदा धराधीशो दैवज्ञं दैववेदकम्। समाहूय तमप्राक्षीत्सुतो मे भविता न वा ॥२८८॥

सोऽप्यष्टाङ्गनिमित्तज्ञो विचार्य निजचेतसि। प्रोवाच वचनं वाग्मी श्रुत्वेति नृपतेर्वचः ॥२८९॥

अर्थ (श्लोक 288 से 289): एक दिन राजा ने एक निमित्तज्ञानी को बुलाया और पूछा कि मेरे यहाँ पुत्र पैदा होगा या नहीं? इस प्रश्न को सुनकर अष्टांग-निमित्त के पंडित और वाग्मी उस निमित्तज्ञानी ने सोचकर कहा कि हे सूरज के जैसे प्रतापशाली और प्रजा-पालक महाराज, मैं निमित्त-ज्ञान से आपके इस प्रश्न का


भानुमान्भानुरद्य त्वं भानो मद्द्वचनं स्फुटम्।
समाकर्णय शब्देन निमित्तेन वदाम्यहम् ॥२९०॥

यदा ते यमुनातीरे मञ्जूषार्भकसङ्गतिः।
ततस्ते भविता नूनं तनूजो जनितादरः ॥२९१॥

अर्थ (श्लोक 288 से 291): उत्तर देता हूँ, उसे सावधान चित्त होकर सुनिए। यमुना नदी के किनारे तुम्हें एक संदूक मिलेगी। उसमें से एक सुन्दर बालक निकलेगा, जो सारे संसार द्वारा मान्य होगा ॥२८८-२९१॥


सार्भका साथ मञ्जूषा वहन्ती यमुनाजले।
चम्पाभ्यर्णतटे टंक्ये टीकते स्म कदाचन ॥२९२॥

अर्थ: इसके बाद कुछ काल बीत चुकने पर ऐसा ही हुआ और एक सन्दूक यमुना नदी के प्रवाह में बहती हुई किनारे आकर लगी ॥२९२॥


तामागतां तटे श्रुत्वा नृपोऽनैषीत्स्वसेवकैः।
तां दृष्ट्वाथ समुद्घाट्य ददर्शार्भकमद्भुतम् ॥२९३॥

तमङ्के स समारोप्य प्रति राधामवीवदत्।
नैमित्तिकवचश्चित्ते चिन्तयंश्चतुरोचितम् ॥२९४॥

राधे शुद्धविधानज्ञे समृद्धे बुद्धिपारगे।
गृहाणेमं सुतं सारं रूपनिर्जितभास्करम् ॥२९५॥

अर्थ (श्लोक 293 से 295): सन्दूक को बहकर आने का समाचार सुनकर बहुत से नौकर-चाकरों को साथ ले राजा वहाँ आया और उसने सन्दूक को जल से बाहर निकलवाया। इसके बाद उसे खोलकर देखने पर उसमें एक अद्भुत बालक पड़ा हुआ मिला। उसे उठाकर राजा ने अपनी गोद में ले लिया और निमित्तज्ञानी के वचनों पर गहरी दृष्टि से विचार कर वह रानी से बोला कि प्रिय राधे, तुम शुद्ध विचारों को अपने हृदय में स्थान देती हो, समृद्ध और बुद्धि के पारंगत हो, अतः अपने तेज से सूरज को भी लज्जित करने वाले इस अतीव मनोहर बालक को ग्रहण करो, गोद में लो ॥२९३-२९५॥


निशम्येति वचस्तस्य कर्णकण्डूयने रता।
जग्राह भर्तृवाक्येन सुतं सोत्कण्ठताशया ॥२९६॥

अर्थ: स्वामी के इन वचनों को सुनकर रानी बड़ी प्रसन्न हुई। उसने बड़े हर्ष के साथ उस बालक को अपनी गोद में ले लिया ॥२९६॥


कर्णकण्डूयनं तस्याः सुतसंग्रहणक्षणे।
वीक्ष्य बालस्य कर्णाख्यां व्यधात्तत्रापि भूपतिः ॥२९७॥

ववृधे बालकस्तत्र कलया शोभया श्रिया।
कौमुद्या तामसातीतः कुमुदो बालचन्द्रवत् ॥२९८॥

अर्थ (श्लोक 297 से 298): उसे लेते समय रानी अपने कानों को खुजा रही थी, अतएव राजा ने उसका कर्ण नाम प्रसिद्ध किया। राजा भानु के यहाँ कर्ण कला, शोभा, लक्ष्मी, आदि से सब प्रकार बढ़ने लगा। उसका तामस-अज्ञान नष्ट होकर वह सारी पृथ्वी को आनन्द देने लगा। जैसे दोज का चाँद बढ़कर और धीरे-धीरे तामस-अँधेरे को नष्ट कर लोगों को आनंद देने लगता है ॥२९७-२९८॥


इति शुभपरिपाकात्प्राप्तसौभाग्यभारः सकलविबुधसेव्यो दिव्यदेहः सुदीव्यन्।
विदितसकलशास्त्रो लक्षणैर्लक्षिताङ्गः श्रुतिमतिरितिभायात्कर्णनामा कुमारः ॥२९९॥

अर्थ: पुण्योदय से जिसे ऐसा सौभाग्य प्राप्त है, सारे देवता-गण जिसकी सेवा करते हैं और जिसका शरीर दिव्य है, जो सकल शास्त्रों का ज्ञाता है, जिसकी शास्त्र के विषय में हमेशा ही शुभमति रहती है वह कर्ण सारे संसार में सुशोभित हो ॥२९९॥


शास्त्राकर्णनकोविदः किल कलाकीर्तीश्वरः कान्तिमान्।
कारुण्याङ्कसमाकुलो कलकृपासंकीर्णचेता यथा
कुन्त्याः कोमलकामिनीसुखकरः कम्रः कनीयान्कृती
कानीनः कमलाकरोऽसुपङ्कजे पुत्रः श्रियाऽभाद्रविः ॥३००॥

अर्थ: जो शास्त्र-श्रवण में दक्ष है, कला और कीर्ति का स्वामी है, कान्ति-शाली और करुणा-भाव से पूरित है, जिसका चित्त हमेशा ही दया से भीगा रहता है, जो कुन्ती का पुत्र तथा-कोमल कामिनी-जनों को सुख देने वाला है, मनोहर और सुकृती है, लक्ष्मी का स्थान और प्राणी-रूप कमलों को विकसित करने के लिए सूरज है वह कर्ण अपनी श्री-कान्ति से सुशोभित हो ॥३००॥

अष्टमं पर्व (भाग 1/2)

शंभवं संभवध्वंसधातारं शंभवं जिनम्।
संभवध्वंसिनं वन्दे संभवत्सातसागरम् ॥१॥

अर्थ: उन संभवनाथ प्रभु को नमस्कार है, जो सुख के दाता और पाप के विध्वंसक हैं, जो संसार से पार उतारने वाले हैं, सुख के सागर हैं ॥१॥


शृणु श्रेणिक लोकानां महती मूढता मता।
ईदृशः कथ्यते कर्णः कर्णोजः कथ्यते जनैः ॥२॥

कर्णजाहं गतत्वेन वचसा जन्मसंभवे।
मात्रन्वये समाख्यातः कर्णः श्रीकर्षणोद्यतः ॥३॥

सुराधाकर्णकण्डूयाक्षणे भूपात्समाददे।
बालकं तेन तत्रापि स कर्णः कथितो जनैः ॥४॥

यदि कर्णस्य चोत्पत्तिः कर्णात्संजायते लघुः।
अतोऽन्येषां कथं जन्म न संबोभूयते भुवि ॥५॥

कर्णतो नासिकायाश्च मानवानां कथंचन।
न दृष्टं न श्रुतं जन्म कर्णस्य च कथं भवेत् ॥६॥

अर्थ (श्लोक 2 से 6): यहाँ गणधर प्रभु कहते हैं कि हे श्रेणिक, लोग बड़े मूर्ख हैं, जो इस तरह से पैदा हुए कर्ण की कान से उत्पत्ति बताते हैं। उसके जन्म की बात लोगों में कानों-कान चली थी, इसलिए तो माता के कुल में उस सुन्दराकृति का कर्ण नाम पड़ा और चंपानगरी में राजा भानु ने जिस समय अपनी रानी को इसे सौंपा उस समय वह कान खुजाती थी, अतएव वहाँ भी कान खुजाने के निमित्त से भानु नरेश ने उसका कर्ण नाम रख दिया। दूसरी बात यह है कि जो लोग जबर्दस्ती कर्ण की कान से ही उत्पत्ति बताते हैं उन्हें इस बात पर भी तो विचार करना चाहिये कि यदि कान से ही कर्ण की उत्पत्ति हुई हो तो अब भी पृथ्वी पर कान, आँख, नाक वगैरह से मनुष्यों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती। दूसरी बात यह है कि जब आज तक कान वगैरह से कभी मनुष्यों की उत्पत्ति न तो सुनी गई और न देखी ही गई तब फिर कान से कर्ण की उत्पत्ति कैसे हो गई ? ॥२-६॥


कर्णतो जन्म कालेन नोपनीपद्यते नृणाम्।
गोशृङ्गतो भवेद् दुग्धं न कदाचिज्जगत्त्रये ॥७॥

वन्ध्यातः सुतसंभूतिः शिलातः सस्यसंभवः।
गगनात्कुसुमोत्पत्तिः शशाच्च शृङ्गसंभवः ॥८॥

पृदाकुवक्त्रतः शुद्धा संपनीपद्यते सुधा।
एतत्सर्वं यथा न स्यात्कर्णात्कर्णोद्भवस्तथा ॥९॥

व्योमाब्जसौरभाख्यानसदृशः कर्णसंभवः।
ततः कर्णस्य संभूतिः शुद्धा विज्ञायतां त्वया ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): यह बात उचित नहीं जान पड़ती। देखो, जिस तरह गाय के सींग से कभी भी दूध नहीं निकल सकता उसी तरह से तीन काल में भी कान से कभी मनुष्य पैदा नहीं हो सकता और भी सुनिए, जिस प्रकार बाँझ स्त्री से पुत्र, पत्थर पर अन्न, आकाश में फूल और गधे के मस्तक में सींग, साँप के मुँह से अमृत की उत्पत्ति होना असम्भव है उसी प्रकार कान से कर्ण की उत्पत्ति होना और कहना भी असम्भव हैं। यदि ऐसा सम्भव होता तो दुनिया विवाह वगैरह की झंझटों में कभी न फँसती, किन्तु कान से कर्ण जैसे पुत्रों की उत्पत्ति करके ही पुत्र वाली बन जाती। राजन्, कान से कर्ण की उत्पत्ति बताना, यह सब आकाश के फूल की सुन्दरता का ही वर्णन है! इसमें कुछ भी सार और सत्य अंश नहीं है। अतः हमने जैसी कर्ण की उत्पत्ति पहले बताई है वही सत्य है और सार है। तुम वैसा ही विश्वास करो ॥७-१०॥


सूर्यसेवनतः कुन्त्या जातः पुत्रस्तु कर्णवाक्।
तन्मृषात्र नरस्त्रीणां कुतः सूर्येण संगमः ॥११॥

भानुना पालितो यस्मात्तस्मात्सूर्यसुतोऽप्ययम्।
नन्दगोपसुतः कृष्णो यथा गोपाल उच्यते ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 11 से 12): सूरज के समागम से कुन्ती के कान द्वारा कर्ण की उत्पत्ति होना निरी झूठी बात है। भली मनुष्यनी के साथ सूरज का समागम ही कैसे हो सकता है। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि फिर कर्ण को सूर्यसुत क्यों कहते हैं? इसका उत्तर यह है कि चंपानगरी के राजा भानु ने इसका पालन-पोषण किया था और भानु का दूसरा नाम सूरज भी है, इसलिए सूर्यसुत नाम से इसकी प्रसिद्धि हो गई। जिस तरह कि नंद गोप नामक ग्वाल के यहाँ पालन-पोषण होने के कारण लोग कृष्ण नारायण को भी गोपाल कह कर पुकारते हैं ॥११-१२॥


अथ पाण्डवभूपानां कौरवाणां विशेषतः।
यथाशास्त्रं यथालोकमुत्पत्तिः कथ्यते तथा ॥१३॥

एकदान्धकवृष्टिश्च तनयैर्नयपेशलैः।
सार्धं विचारयामास कुन्त्याः पाणिप्रपीडनम् ॥१४॥

यद्यन्येभ्यः प्रदीयेत कुन्ती स्याद्दोषदूषिता।
तादृशीं तां परिज्ञाय न ग्रहिष्यन्ति चापरे ॥१५॥

अर्थ (श्लोक 13 से 15): अब कौरव-पाण्डवों की शास्त्र और लोक के अनुसार विस्तार से उत्पत्ति बताई जाती है। सुनिए, एक समय अंधकवृष्टि ने नय-नीति के ज्ञाता अपने पुत्रों के साथ कुन्ती के विवाह सम्बन्ध में विचार किया। उस समय यह बात उपस्थित हुई कि यदि पाण्डु के सिवा दूसरे को कुन्ती दी जायेगी तो वह व्यभिचारिणी कही जायेगी और एक बात यह भी है कि उसे ऐसा सुनकर कोई दूसरा ग्रहण भी नहीं करेगा ॥१३-१५॥


पटवे पाण्डवे पुत्री प्रदेयातः शुभाप्तये।
इति मन्त्रिणमाकृत्य तत्र ते निश्चयं व्यधुः ॥१६॥

धृतराष्ट्रान्ववायाय व्यासाय वरप्राभृतैः।
दूतं संप्रेषयामास सलेखं मुखरं क्षमम् ॥१७॥

स गत्वा क्रमतः प्राप्य सदः कौरवभूपतेः।
दौवारिकेण संदिष्टो ददर्श दूरतो नृपम् ॥१८॥

मृगेन्द्रासनमारूढं हसन्तमिव भूमिपान्।
सोत्कर्षं भावयन्तं वा चलच्चामरवीजनैः ॥१९॥

भूषयन्तं नभोभागं सदातपनिवारणैः।
भानोर्निश्चिद्रमालोकं कुर्वन्तं वा तिरस्कृतम् ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 16 से 20): इसलिए अच्छा इसी में है कि पाण्डु को ही कन्या दी जाय। विचार कर अन्त में उन्होंने पाण्डु को ही पुत्री देने का निश्चय किया और उसी समय वर के योग्य भेंट तथा पत्र देकर एक विज्ञ और सहनशील दूत को व्यास के पास रवाना किया। वह थोड़े ही समय में कौरवों के राजा व्यास की सभा में पहुँचा। वहाँ द्वारपाल की आज्ञा से भीतर जाकर दूर से उसने राजा का दर्शन किया। राजा सिंहासन पर विराजे थे। जान पड़ता था कि मानी वे और-और राजाओं को हँस रहे है, या अपने उत्कर्ष की भावना करते हैं। उनके ऊपर जो चमर ढुलते थे उनसे वे आकाश के कुछ हिस्से को विभूषित करते थे। उनके ऊपर छत्र लगा हुआ था। वह सूरज के प्रकाश को उनके ऊपर नहीं आने देता था, वह सूरज का तिरस्कार करता था ॥१६-२०॥


भान्तं प्राभृतलक्षैश्च निधानैरिव दर्शितैः।
भूमिदेव्याः समुद्भासिभूषणैरिव भूषणैः ॥२१॥

अर्थ: उनके आगे देश-विदेश के राजा लोगों द्वारा भेजी हुई भेंटों के ढेर के ढेर लगे हुए थे, जिनसे


जगत्पतेर्जगज्ज्येष्ठं कुण्डलैः कर्णसंगतैः ।
मण्डितं चन्द्रसूर्याणां मण्डलैरिब संनुतम् ॥२२॥

नानामागधवन्देन वादिना यशसः श्रुतेः ।
ब्रुवाणेन यशो राज्ञो दिशान्तस्थितदिग्गजान् ॥२३॥

क्षरन्तं वाक्षरैः क्षिप्रं सुधाराशिं रसोद्गमम् ।
वीक्षणैर्वीक्षयन्तं च कटाक्षक्षेपदीक्षितैः ॥२४॥

गृह्णन्तमिव स्वात्मीयाञ्जनान्यदृच्छया स्थितान् ।
हसन्तमिव हास्येन शत्रून्सेवांसमागतान् ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 21 से 25): उनकी अपूर्व ही शोभा हो रही थी। वे ढेर ऐसे जान पड़ते थे कि मानो राजा लोगों द्वारा दिखाने के लिये भेजे गये उनके खजाने ही हैं या पृथ्वी देवी के सुन्दर भूषणों के जैसे वे राजा के अपूर्व भूषण ही रखे हैं। राजा व्यास सारे संसार में उत्कृष्ट थे। वे कानों में मनोहर कुंडल पहिने हुए थे। जान पड़ता था मानो वे चाँद और सूरज के दो मण्डल ही हैं और वे कुंडलों का रूप धर कर इनकी सेवा ही करते हैं एवं जैसे वादी शास्त्र के यश को गाते हैं वैसे ही भाँति-भाँति के मागधों द्वारा उनके यश दिग्गजों तक पहुँचाए जा रहे थे, मानो वे उन मागधों के द्वारा उनकी वाणी से अमृत की बरसा करवा रहे थे। वे कटाक्ष-पात की दीक्षा से दीक्षित नेत्रों के द्वारा रसीली गंभीर दृष्टि से लोगों की ओर देखते थे, जान पड़ता था कि वे उन्हें अपने बन्धुओं की भाँति अपनाते हैं। वे सेवा में आये हुए शत्रुओं को मनचाही दृष्टि से हँस से रहे थे ॥२१-२५॥


बिभ्रतं पाणिपद्मेन कृपाणं कृपणान्यरान् ।
भीषयन्तं मुदा दानं ददतं स्वमहोन्नतिम् ॥२६॥

दर्शयन्तं महोद्योगं युक्तैर्वाक्यैर्विचारणाम् ।
कुर्वाणं किंचिकीर्षुश्चेति विस्मयकरं नृणाम् ॥२७॥

अर्थ (श्लोक 26 से 27): उनके हाथ में एक तीखी तलवार थी, जिसे देखकर लोभी पुरुष भयभीत होते थे। वे हर्ष के साथ दान देते थे, लोगों को अपनी नम्रता दिखाते थे। वे महान् उद्योगी थे और हर एक बात पर युक्ति द्वारा विचार करते थे। उनका हृदय बड़ा गंभीर था। वे जब तक किसी काम को कर न गुजरते थे तब तक कोई भी उनकी बात की जान न पाता था कि इस समय महाराज क्या करना चाहते हैं। उनके कार्यों को देखकर सब अचम्भा करके रह जाते थे ॥२६-२७॥


इति दौवारिकेणासौ दर्शितं भूभुजां पतिम् ।
मुक्त्वा ननाम दूतेशः सपायनमुपायनम् ॥२८॥

नाथ सूरिपुरीनाथोऽन्धकवृष्णिरुदीरितः ।
शास्ति सर्वां प्रजां यद्वन्मरुत्वान्सुरपद्धतिम् ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 28 से 29): दूत ने आगे बढ़कर, द्वारपाल द्वारा दिखाये हुए पृथ्वीपतियों के पति व्यास महाराज के आगे भेंट रखी और उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वह बोला कि राजन्, सूरीपुर के राजा अंधकवृष्टि को सब कोई जानता है। वे देवताओं पर इन्द्र की तरह सुख-पूर्वक अपनी प्रजा पर शासन करते हैं। प्रभो! उन्होंने मुझे आपके पास भेजा है। वे चाहते हैं कि आपके राजकुमार पाण्डु के साथ मेरी पुत्री कुन्ती का ब्याह हो ॥२८-२९॥


तेनाहं प्रेषितोऽभ्यर्थ्य तूर्णं ते पाण्डुना सह ।
सोत्सवं स्नेहयुक्तेन कुन्त्या विवाहमिच्छता ॥३०॥


श्रुत्वा भूपो वचः प्राह युक्तं कोऽत्र न वाञ्छति ।
मुद्रिका मणिना योगं यान्ती केन निवार्यते ॥३१॥

अर्थ: दूत के इन वचनों को सुनकर राजा ने कहा कि जो बात युक्त है उसे कौन नहीं चाहेगा। भला, अँगूठी और मणि का संयोग किस बुद्धिमान् को पसंद नहीं पड़ेगा। व्यासजी को तो पहले ही से


तत्रासक्तं सुतं जानन्पुनः प्रोवाच भूपतिः। यत्र सूरीपुरेशस्य मनस्तत्रोद्यता वयम् ॥३२॥

इति सर्वसमक्षं हि सत्यंकारं व्यधान्नृपः। तयोर्विवाहसिद्ध्यर्थं क्षणेन क्षणसंगतः ॥३३॥

अर्थ (श्लोक 30 से 33): मालूम था कि कुन्ती को पाण्डु चाहता है। उन्होंने दूत से कहा कि जैसी सूरीपुर के ईश अंधकवृष्टि की मनसा है वैसी ही हमारी भी है, उनकी इच्छा के अनुसार हम तैयार हैं। व्यास ने इसी समय पाण्डु और कुन्ती के ब्याह की सिद्धि के लिये बड़ा भारी महोत्सव किया और सब सभासदों के आगे प्रतिज्ञा की कि पाण्डु के लिए मुझे कुन्ती लेना स्वीकार है ॥३०-३३॥


ततो दूतं स संमान्य वस्त्रैराभरणैस्तथा। निर्णय्य लग्नदिवसं प्राहिणोत्प्राभृतैः समम् ॥३४॥

अर्थ: इसके बाद नाना प्रकार के वस्त्र और आभूषणों के द्वारा उन्होंने दूत का खूब आदर किया और लग्न-दिन का निर्णय करके भेंट सहित उसे सूरीपुर को रवाना कर दिया।


अथ पाण्डुकुमारोऽसौ विवाहाय विनिर्ययौ। नानालङ्करणोपेतो नानाभूपालवेष्टितः ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 34 से 35): इसके बाद पाण्डुकुमार विवाह के लिए सूरीपुर जाने को हस्तिनापुर से निकला। वह नाना प्रकार के बहुमूल्य गहने पहिने था और उसके साथ कितने ही राजागण थे ॥३४-३५॥


पाण्डुः पाण्डुरछत्रेणाखण्डाखण्डलसत्प्रभः। वदद्वाद्यसुनादाढ्यो वीजितस्तु प्रकीर्णकैः ॥३६॥

अर्थ: उसके सिर पर सफेद छत्र लगा हुआ था, जिससे कि वह इन्द्र के जैसा शोभता था। उसके आगे-आगे नाना प्रकार के बाजे बजते जाते थे, जिनसे सभी दिशाएँ शब्दमय हो रही थीं। प्रकीर्णक-जन उसके ऊपर चमर ढोरते थे, जिससे वह ऐसा जान पड़ता था मानों सारी पृथ्वी पर एक वही श्रेष्ठ पुरुष हैं, चमर उसकी इस उत्तमता को ही जता रहे हैं ॥३६॥


धरामुपरि कुर्वाणस्तुरंगमखुरोत्थितैः। रजोभी रञ्जयञ्लोकान् रेजे राजा सुराजवत् ॥३७॥

पप्रथे प्रथिमानं स रथैः सारथिसंयुतैः। सार्थैः समर्थतां नीतैर्मन्दिरैरिव जङ्गमैः ॥३८॥

दन्तिनो दन्तघातेन घातयन्तो धराधरान्। सार्धं नेतुं तदा नेदुर्नार्दयन्तो हि दिग्गजान् ॥३९॥

मित्राणि छत्रछन्नानि मित्रमण्डलभानि च। मोदान्मुमुदिरे तेन सार्थगामित्वसद्धिया ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 37 से 40): पाण्डु के घोड़ों की टापों से जो धूल उड़कर लोगों को धूसरित कर रही थी उससे जान पड़ता था कि वह लोगों को जान-बूझकर धूल से रंजित कर विवाह के आनंद को प्रकट कर रही है। इस समय वह इन्द्र के जैसा शोभता था, इन्द्र से किसी भी बात में कम न था। इस समय पाण्डु के साथ जो सजे हुए और सारथियों-सहित रथ-समूह जा रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानों जंगम मन्दिर ही है और वे चलने योग्य हो गये है। दाँतों के प्रहार से पहाड़ों को भी गिरा देने वाले और अपनी ध्वनि से दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाले हाथी चिंघाड़ रहे थे। छत्ता लगाये हुए मित्र मण्डल-जो मित्र (सूरज) मण्डल की तरह सुशोभित था साथ जाने की खुशी से हर्षित हो रहा था ॥३७-४०॥


आनकाः कामुका नेदुरिवाच्छादनछादिताः। कराङ्गुलिप्रिया बाढं गाढालिङ्गनतत्पराः ॥४१॥

अर्थ: नगाड़े-रूप कामी पुरुष यद्यपि वस्त्र वगैरह से प्रच्छन्न थे, उनके सब ओर कपड़े की झालर लगी थी पर तो भी वे अँगुली-रूपी प्रिया के गाढ़ आलिंगन से शब्द कर रहे थे। तात्पर्य यह कि प्रिया


नेतुर्नटगणा नित्यं नटीभिः पटवस्तदा।
रम्भानृत्यं समुत्साहे कोपान्निरसितुं यथा ॥४२॥

अर्थ (श्लोक 41 से 42): के आलिंगन की खुशी में उनसे चुप न रहा गया और इसीलिए वे शब्द कर रहे थे एवं चतुर नट-गण अपनी नटियों के साथ-साथ उनके आगे-आगे नृत्य कर रहे थे। जान पड़ता था कि मानों वे उत्साह में आ कोप से देवांगनाओं के नाच को ही नीचा दिखा रहे हैं ॥४१-४२॥


जग्रन्थुर्गन्धर्वगीतानि गन्धर्वा गर्वगुण्ठिताः।
विवाहसमये जेतुं हाहातुम्बरनारदान् ॥४३॥

मङ्गलानि सुकामिन्यो गायन्ति स्म शुभस्वनैः।
विवाहगमने तस्य जेतुं देवाङ्गना इव ॥४४॥

मात्रा मङ्गलकर्तव्यं सिद्धशेषां समाश्रितः।
नीतोऽसौ निर्जगामाशु विवाहार्थं कृतोत्सवः ॥४५॥

अर्थ (श्लोक 43 से 45): इसी समय हा हा, तुम्बर नारदों की जीतने के लिये अभिमान से भरे हुए गंधर्व-गण विवाह के समय गाने की उत्तम-उत्तम गीत गूंथ रहे थे। पाण्डु को जाते समय सौभाग्यवती स्त्रियाँ मनोहर स्वरों में मंगल पाठ पढ़ रही थीं, मानो वे देवांगनाओं को जीतने की ही कोशिश करती थीं। इसके बाद पाण्डु की माता सुभद्रा ने पाण्डु की मंगल आरती उतारी और उसे सिद्ध भगवान् की आसिका दी। इस प्रकार के उत्सव-पूर्वक पाण्डु विवाह के लिए हस्तिनापुर से सूरीपुर को चला ॥४३-४५॥


मार्गे कश्चिदुवाचेदं पश्य भूप प्रियामिव।
शालिनीं कमलाकीर्णां नदन्तीं च नदीं पराम् ॥४६॥

विलोकय धराधीशमचलं त्वामिवोन्नतम्।
सवंशं पार्थिवोपेतं सत्यादाश्रितसद्गुणम् ॥४७॥

नाथ नृत्यन्ति मार्गेऽस्मिन्विवाहोत्सविनो मुदा।
मयूरीभिर्मयूराश्च सुनटीभिर्यथा नटाः ॥४८॥

महीरुहा महाच्छायाः सफलाः पल्लवादिभिः।
प्राघुर्ण्यं कुर्वते तेऽद्य भवन्तो वा समुन्नताः ॥४९॥

कोलं पश्य महापङ्कमग्नं मलकुलाविलम्।
तमोमूर्तिं वनान्तस्थं विपक्षमिव तेऽधुना ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 46 से 50): रास्ते में पाण्डु को उसके सेवकजन प्रकृति की शोभा दिखाते जाते थे कि कुमार देखिए, यह कमलों से पूर्ण और शब्द करती हुई नदी सुन्दर प्रिया की तरह कैसी मनोहर देख पड़ती है क्योंकि प्रिया भी कमलों के भूषण पहनती है और मीठी बात करती है। इधर देखिए, यह अचल धराधीश (पहाड़) आपके समान ही उन्नत वंश (बाँस और दूसरे पक्ष में वंश) वाला है, राजाओं से युक्त है क्योंकि शत्रुओं के भय के मारे राजा-गण यहीं आश्रय पाते हैं। इसके उत्तम पाद (नीचा भाग और चरण) हैं और इसमें उत्तम-उत्तम गुण हैं। तात्पर्य यह कि यह आपसे किसी भी बात में कम नहीं है। नाथ और भी देखिए कि मार्ग में विवाह का उत्सव मनाने के लिए हर्षित मयूरगण अपनी-अपनी मयूरी के साथ कैसा सुन्दर नृत्य कर रहे हैं। जान पड़ता है कि नटियों के साथ-साथ उत्तम नर-गण ही नाच रहे हैं और सघन छाया वाले ये वृक्ष फल और पत्तों के भार से पीड़ित हो रहे हैं, अतएव आपको पाहुनगत करके अपना भार हलका करना चाहते हैं, जान पड़ता है, ये इसलिए आपको फल और छाया वगैरह दे रहे हैं। सो ठीक ही है कि अपनी बराबरी वाले की सभी पाहुनगत करते हैं। ये जब आप जैसे ही उन्नत और फल-फूलों वाले हैं फिर आपका स्वागत क्यों न करें। ये सुअर देखो, कीचड़ में कैसे लोट रहे हैं, मिट्टी से बिल्कुल ही लथपथ हो रहे हैं और वन में रहने वाली अँधेरे की खासी मूर्ति सी देख पड़ते हैं। राजन्! ये आपके शत्रु ही आपके प्रताप से यहाँ आ छिपे हैं। इस तरह देवताओं, विमानों


एवं पश्यन्कुमारोऽसौ मार्गान्स्वर्गानिवापरान्। सबुधान्सविमानान्सतिलोत्तमांश्चचाल सः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 46 से 51): और तिलोत्तमा से भरे पूरे स्वर्ग की भाँति विद्वानों, विमानों और नरनारियों से भरपूर मार्ग को देखता-भालता, दिल बहलाता पाण्डुकुमार थोड़े ही समय में सारे रास्ते को तय कर सूरीपुर जा पहुँचा ॥४६-५१॥


आगच्छन्तं परिज्ञाय कौरवं यादवेश्वरः। सम्मुखं सन्मुखीभूतविविधैर्वेगात्समागमत् ॥५२॥

अथ तौ च समाश्लिष्य मिलितौ नम्रमस्तकौ। कुशलालापसंबद्धौ चेलतुः स्वां पुरीं प्रति ॥५३॥

या तोरणमहापादा नम्रकेतुसुबाहुका। नटन्तीव महानाट्या मातरिश्वनटादृता ॥५४॥

शातकुम्भमहाकुम्भशुम्भच्छोभाभिराजिता। क्वचिन्मङ्गलसद्गीतिपूर्णपूर्णस्तनी वरा ॥५५॥

रङ्गरङ्गावलीपूर्णस्वस्तिका च क्वचित्क्वचित्। स्वस्तिसम्पूर्णसत्तूर्णनरराजविराजिता ॥५६॥

याह्वयन्तीव भूपालान्प्रासादोद्भूतसद्ग्रवैः। गायन्तीव सदा गानं कामिनीगीतसंगमात् ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 52 से 57): कौरववंशी पाण्डु को आया सुनकर यादवेश्वर राजा अंधकवृष्टि उसकी अगवानी के लिये शहर से बाहर आया और सामने आकर उससे मिला। वहाँ उन दोनों ने एक दूसरे का सत्कार किया और परस्पर में भेंट की, एवं आपस में कुशल-समाचार पूछा। इसके बाद वे दोनों पुरी के भीतर आये। पुरी में जो तोरण बँधे हुए थे वे उसके पाँव थे और मनोहर ध्वजाएँ उसके हाथ थे। पुरी के ये हाथ-पाँव हवा से खूब हिल रहे थे, जिससे ऐसा भान होता था कि यह पुरी नहीं है किन्तु नटी है और वह हवा रूप नट के द्वारा आदर की गई नाच ही करती है। इस पुरी के सब मन्दिरों पर सोने के सुन्दर कलश चढ़े हुए थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था कि मानों वे पुरीरूपी नटी के उन्नत कुच ही हैं। उसमें कहीं-कहीं भाँति-भाँति के रंग के साथिया पुरे हुए थे और स्वस्ति कल्याण- से परिपूर्ण राजागण निवास करते थे। यहाँ के महलों पर बैठी हुई नारियों मंगल-गीत गाती थीं, जिनसे ऐसा भान होता था मानों वह नारियों के शब्दों द्वारा और-और राजाओं को ही बुला रही है ॥५२-५७॥


हसन्तीव सदा नाकं द्वारबद्धसुमाल्यकैः। चन्द्रकान्तोपला यत्राकाण्डे चन्द्रांशुपीडिताः ॥५८॥

मुञ्चन्ति जलसंघातान्नाटयन्तः शिखावलान्। कुर्वन्तो जनतानन्दं मेघा इव गृहस्थिताः ॥५९॥

प्रतिबिम्बं समालोक्य यत्र स्फटिकभित्तिषु। सपत्नीदरतो नार्यो घ्नन्त्यस्तद्धसिता जनैः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 58 से 60): इसके दरवाजों पर बँधी हुई मालाओं से ऐसा जान पड़ता था मानों वह स्वर्ग लोक को ही हँसती है। यहाँ पर दीवालों में चन्द्रकान्त मणियाँ जड़ी हुई थीं और उन पर आकर चंद की चाँदनी पड़ती थी, जिससे वे असमय में जल बरसाती थीं और मयूरों को नाचने के लिये उत्साहित करती थीं, एवं प्रजागण को भी आनंद देती थीं। इस समय लोगों को ऐसा ख्याल होता था कि ये चंद्रकान्त नहीं हैं किन्तु घरेलू मेघ ही हैं। यहाँ की भीतें स्फटिक की बनी हुई थीं, अतः उनमें अपने प्रतिबिम्ब को देखकर स्त्रियों को ऐसा भ्रम हो जाता था कि क्या यह हमारी सौत तो नहीं आ गई है। वे यह सोच पति के पास से हट जाती थीं और पति-गण इसी पर से उनकी खूब हँसी उड़ाते थे ॥५८-६०॥


हरिन्मणिदृषद्वद्धां कं वीक्ष्य मृगशावकाः। तृणादनधिया यान्तो विलक्ष्याः सन्ति यत्र च ॥६१॥

धनेन धनदं धीरास्तर्जयन्त्यन्यथा कथम्। जिनजन्मोत्सवे यत्र श्रीदो रत्नानि वर्षति ॥६२॥

एवं तौ तां पुरीं प्राप्य यादवेशो जनाश्रये। शुभ्रस्तम्भमहाशोभे कौरवं चावतारयेत् ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 61 से 63): यहाँ की भूमि में सब जगह हरित् मणियाँ खची हुई थीं, जिनको देखकर विचारे मृगों के बच्चे तृण चरने के विचार से आते तो दौड़कर के, पर जाते थे हताश होकर। यहाँ के धीर पुरुष अपने धन से कुबेर को भी तिरस्कृत करते थे, अन्यथा जिनेन्द्रदेव के जन्मोत्सव के समय कुबेर वहाँ रत्नों की बरसा ही काहे को करता। ऐसी सुन्दर पुरी में उन दोनों ने प्रवेश किया। वहाँ ले जाकर अंधकवृष्टि ने खूब सजे हुए एक मनोहर मंडप में पाण्डुकुमार को ठहराया और उसकी खूब पाहुनगत की ॥६१-६३॥


सुमुहूर्ते शुभे लग्ने विवाहविधिकोविदैः। महाभुजां स्त्रजोद्दीप्तां वेदीं निन्ये स सोत्सवः ॥६४॥

सौदार्यं च समाधुर्यं कान्तिकान्तं गुणाकरम्। वव्रे च कौरवं कुन्ती सुकाव्यमिव भारती ॥६५॥

अर्थ (श्लोक 64 से 65): इसके बाद शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न में राजाओं की विवाह विधि के जानकार पुरोहित के द्वारा बड़े ठाट-बाट के साथ पाण्डुकुमार फूल-मालाओं से सजी हुई वेदी के पास लाये गये। वहाँ उदारचित्त, मिष्टभाषी, गुणाकर तथा कान्तिशाली पाण्डुकुमार को कुन्ती देवी ने अपना वर पसंद किया, जैसे भारती (वाणी) काव्य को पसंद करती है ॥६४-६५॥


मद्री कुन्तीमहास्नेहाज्जनकाद्यैः समादृता। कौरवं सोत्सवं वव्रे रामं सीतेव सद्गुणा ॥६६॥

बहुभिः पूजितः पाण्डुरखण्डैर्वस्त्रभूषणैः। दन्तावलै रथैरश्वैः सुवर्णैः शस्त्रसंचयैः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 66 से 67): इसके सिवा माता-पिता आदि द्वारा सत्कृत मद्री ने भी बड़े स्नेह से कुन्ती के साथ-ही-साथ कुमार को अपना पति बनाया, जिस तरह सब गुण-सम्पन्न सीता सती ने राम को अपना पति बनाया था। इस समय पाण्डुकुमार की सबने पूजा की। किसी ने अखण्ड वस्त्र और कीमती गहने पहनाये, किसी ने हाथी, किसी ने रथ, किसी ने घोड़ा और किसी ने सोना-चाँदी एवं भाँति-भाँति के हथियार दिये। कहने का तात्पर्य यह है कि पाण्डु का लोगों ने सब तरह से बड़ा आदर-सत्कार किया, किसी ने किसी भी बात को उठा न रक्खा ॥६६-६७॥


ततः कन्याद्वयं लात्वा संभोगो भोगिवद्ययौ। पुरं नागपुरं श्रीकं कुमारः कौरवाग्रणीः ॥६८॥

प्रविशन्पुरनारीभिः पुरं पाण्डुः प्रवीक्षितः। मुक्तनिःशेषकार्याभिर्भार्याभिर्निजकर्मणि ॥६९॥

काचित्पृच्छति भो भद्रे क्व पाण्डुः क्व च गच्छति। भूत्या च कीदृशा सम्यक्प्रविष्टः पत्तनं शुभम् ॥७०॥

अर्थ (श्लोक 68 से 70): इसके बाद मद्री और कुन्ती दोनों कन्याओं को लिवाकर कौरवों का अगुआ और भोगी पाण्डुकुमार इन्द्र की तरह सब तरह से सुशोभित हस्तिनापुर को चला आया। वहाँ जब उसने नगर में प्रवेश किया तब वहाँ के सब कार्यकुशल नरनारीगण अपने-अपने काम-काज छोड़कर पाण्डुकुमार को देखने के लिये आये। इस समय पाण्डु की अपार विभूति को देखकर एक स्त्री दूसरी स्त्री को पूछती है कि भद्रे, पाण्डु कहाँ है और कहाँ जाता है ? देखो तो सही, उसने कैसी विभूति के साथ नगर में प्रवेश किया है। यह सुन कोई और ही स्त्री बोल उठी कि शुभगे और मंगलमूर्ति देवी, तुम इधर


काचिज्जगाद सुभगे एह्येहि शुभमङ्गले।
तं द्रष्टुं कौतुकं तेऽद्य यदि त्वां दर्शयाम्यहम् ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 68 से 71): जल्दी आओ, मैं तुम्हें पाण्डु का दर्शन कराये देती हूँ और तुम्हें जो पाण्डु के देखने का कौतुक हो रहा हैं उसे अभी मिटाये देती हूँ ॥६८-७१॥


काचिच्च मज्जने सक्ता श्रुत्वा यान्तं महीपतिम्।
दधाव धावनं मुक्त्वाऽर्धवस्त्रपरिधानका ॥७२॥

काचिद्भोजनवेलायां स्थिता भोजनभाजने।
पाण्डोः समटनं श्रुत्वा मुक्त्वा तन्निर्गता गृहात् ॥७३॥

रुदन्तं स्वार्भकं हित्वा काचिदन्यार्भकं हठात्।
अयासीच्च समादाय विचारपरिवर्जिता ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 72 से 74): कोई स्त्री स्नान कर रही थी, इतने में ही उसने पाडु महीपति के शुभागमन को सुना और वह स्नान करना छोड़ आधा ही कपड़ा पहने बाहर चली आई-उसे कुछ भी सुध-बुध न रही एवं कोई भोजन की थाली पर जीमने को बैठी ही थी कि उसने राजा के आने का समाचार सुना और वह भोजन को छोड़कर एकदम बाहर निकल आई। किसी स्त्री ने जब पाण्डु के आगमन को सुना तब वह एकदम विचार-विमूढ़ हो गई और रोते हुए अपने बालक को छोड़ किसी दूसरे के बालक को गोद में उठाकर बाहर निकल पड़ी ॥७२-७४॥


काचिच्च दर्पणे वक्त्रं लोकयन्ती लसद्द्युति।
यान्ती प्रवृद्धहस्तेव सादर्शा दृश्यते जनैः ॥७५॥

वल्भमानं पतिं हित्वा प्रागल्भ्यादभ्रविभ्रमा।
बभ्राम वीक्षितुं काचित्तं पुरीं ग्रथिलेव च ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 75 से 76): कोई स्त्री दर्पण में मुँह देख रही थी, वह दर्पण लिये ही घर के बाहर आ गई। उसको दर्पण लिये हुए देखकर लोगों को भ्रम होता था कि कहीं इसका हाथ ही तो ऐसा नहीं है। कोई स्त्री पति को जीमता छोड़कर भागी, पर उसे कहीं राजा न देख पड़ा-मेघ की नश्वरता की तरह उसे राजा का भ्रम-सा हो गया, तब वह राजा को देखने की इच्छा से इधर-उधर दौड़ती फिरने लगी ॥७५-७६॥


अलङ्कारविधौ सक्ता सालङ्कारकरण्डकान्।
हित्वा गतेर्भयाद्द्रष्टुं काचित्तमचलत्तदा ॥७७॥

कण्ठस्य भूषणं कट्यां कण्ठे च श्रोणिभूषणम्।
दधाव दधती काचित्क्वो विवेको हि कामिनाम् ॥७८॥

कज्जलेनापरा भाले तिलकं तिलकेन च।
अञ्जनं नेत्रयोः काचित्कुर्वाणा पथि निर्गता ॥७९॥

अर्थ (श्लोक 77 से 79): कोई स्त्री आभूषण पहिन रही थी। वह राजा को देखने के लिये इतनी उत्सुक हो उठी कि उसे अपने गहने-गाँठे के सन्दूक को रखने की भी सुध न रहीं-वह उसे जहाँ का तहाँ पड़ा छोड़कर बाहर आ गई एवं कोई स्त्री जल्दी में गले का हार कमर में और कमर का सूत्र (करधनी) गले में पहिन कर बेसुध-सी हुई बाहर आ खड़ी हुई। किसी ने राजा के देखने की लालसा से चित्तभंग होकर भाल पर काजल का तिलक और आँखों में कुंकुम का कज्जल आँज लिया। ठीक है कि कामी मनुष्यों को कुछ भी विवेक नहीं रहता ॥७७-७९॥


प्रकटस्तनकुम्भाभा विपरीतात्तकञ्चुका।
हसितागात्परैः काचित्क्वा लज्जा कामिनां किल ॥८०॥

अर्थ: कोई भामिनी जो कपड़ा पहिन रही थी, उल्टी कंचुकी पहिन कर कुच निकाले हुए ही पाण्डु को देखने के लिये बाहर आ गई। उसे देख लोगों ने उसकी खूब ही हँसी उड़ाई। ठीक ही है कि कामी जनों की लाज कूच कर जाती है। कोई स्थूलकाय स्त्री गाड़ी में बैठी हुई किसी दूसरी स्त्री को


काचिज्जगाद सवृद्धा स्थूला च शकटावहा।
सखि मां वीक्षितुं लात्वा त्वं याहि गमनोत्सुका ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 80 से 81): कहती है कि सखी, तुम जाने को बहुत ही उत्सुक देख.पड़ती हो, जरा ठहरो और मुझे भी देखने को साथ ले चलो ॥८०-८१॥


भ्रूणभारपरिश्रष्टा विसंभ्रमा भ्रमातिगा।
बभ्राम भ्रान्तितः काचित् स्त्रीणां हि गतिरीदृशी ॥८२॥

अलब्धमार्गा गच्छन्ती परा मार्गविरोधिकाम्।
प्रत्युवाच सुपन्थानं देहि देहीति भाषिणी ॥८३॥

तरुणीं तरुणी काचित्यातयन्ती पुरःस्थिताम्।
चचाल चलचित्तापि चञ्चला जलवीचिवत् ॥८४॥

बभाण भामिनी काचित् दृष्ट्वा तं नृपनन्दनम्।
ताभ्यां युतं ततं श्रीभिरिति हर्षसमाकुला ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 82 से 85): गर्भ-भार से थकी हुई कोई स्त्री भ्रम हो जाने से चक्कर खाने लगी और बेहोश सी हुई इधर-उधर घूमती, गिरती, पड़ती फिरने लगी। सच है कि स्त्रियों की ऐसी ही गति होती है। वे किसी भी बात पर विचार नहीं करती। कोई स्त्री मार्ग न मिलने पर मार्ग रोकने वाली स्त्रियों को मीठे-मीठे शब्दों में कहती है कि सखी, रास्ता छोड़ दो, मुझे तो महाराज दीखते ही नहीं एवं कोई तरुणी मार्ग देने के लिए आगे वाली तरुणी स्त्रियों से कहती है, पर वे हटती नहीं, तब वह उन्हें गिरा कर चंचल-चित्त होती हुई, जल को तरंगों की तरह शरीर को भी चंचल बनाकर, फुर्ती से उनके आगे निकल जाती है एवं कुन्ती और मद्री से युक्त और लक्ष्मी से परिणीत पाण्डु को देखकर हर्षित हुई कोई स्त्री कहती है कि सखी, अगणित लक्षणों वाले और सफेद छत्र द्वारा पहचाने जाने वाले पाण्डु ने इन दोनों सुन्दरियों को किस पुण्य के उदय से पाया है ॥८२-८५॥


सखि केनात्र पुण्येनैताभ्यां योगं समाप च।
पाण्डुः पाण्डुरछत्रेण लक्षितो लक्ष्यलक्षणः ॥८६॥

लक्ष्मीकान्तिकलापाभ्यामाभ्यां योगेन रञ्जितः।
अयं चायोविपाकेन समाप्नोति परां श्रियम् ॥८७॥

आभ्यां द्वाभ्यां सखि ब्रूहि किं कृतं सुकृतं द्रुतम्।
पूर्वजन्मनि येनायं वरो लब्धो विचक्षणः ॥८८॥

दत्तं दानं सुपात्रेभ्यस्तपस्तप्तं सुदुःकरम्।
किं वाभ्यां भक्तिभारेण सेवितः श्रीगुरुर्महान् ॥८९॥

चैत्यालयेऽथवा बाले वर्यया च सपर्यया।
चेकीयितो जिनो देव आभ्यां सभ्यसमक्षकम् ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 86 से 90): लक्ष्मी और कान्ति के समूह-रूप इन दोनों के योग से रंजित पाण्डु जो कुछ भी सुख-लाभ कर सका है वह सब पुण्य का ही परिणाम है और सखी, यह भी तो बताओ कि इन दोनों ने भी पूर्वभव में कौन-सा अपूर्व पुण्य कमाया था, जिसके फल से इन्होंने ऐसा इन्द्र जैसी विभूति-वाला और विचक्षण योग्य वर पाया है। इन्होंने सुपात्र के लिये दान दिया है या घोर तपस्या की है, बड़े भक्तिभाव से श्रीगुरु की सेवा की है या जिन चैत्यालय में जा जिनेन्द्रदेव की पूजा की है अथवा शुभ इच्छा से इन्होंने उत्तम पुरुषों की सेवा-शुश्रूषा की हैं ॥८६-९०॥


अहार्याचर्यचर्या च चरिताभ्यां शुभेच्छया।
अन्यथा कथमीदृक्षं मृगाक्षं वरमाप्नुयात् ॥९१॥

अखण्डमण्डलं ग्लौवत्पाण्डोश्छत्रं सुपाण्डुरम्।
पिण्डीकृतं यशोवृन्दमिव संशोभते शुभम् ॥९२॥

अर्थ (श्लोक 91 से 92): इन उत्तम कामों में से इन्होंने अवश्य ही कोई काम किया है, नहीं तो इन्हें ऐसा योग्य वर कभी भी नहीं मिल सकता था। पूर्ण चंद्र की तरह स्वच्छ और मंडालाकार पाण्डु का छत्र ऐसा जान पड़ता


अनेन पाण्डुनाखण्डखण्डं नीताश्च दस्यवः।
शस्त्रसंघातघातेन घातिनाद्य सुघस्मराः ॥९३॥

इत्थं संस्तूयमानोऽसौ जनैः प्राभृतहस्तकैः।
सुन्दरं मन्दिरं प्राप पाण्डुः प्रबलशासनः ॥९४॥

तयोः स्वमन्दिराभ्यर्णमाकीर्णे पूर्णसंपदा।
निकेतने सुकेत्वाढ्ये ददौ वासाय भूपतिः ॥९५॥

ताभ्यां भोगान्यरान्भूपो बुभुजे भोगवित्सदा।
गरीयः सुकृतं यस्य किं तस्य स्यादुरासदम् ॥९६॥

अर्थ (श्लोक 91 से 96): है कि मानो पिंडरूप में इकट्ठा हुआ उसका यश ही है और छत्र के बहाने से उसकी शोभा बढ़ाता है। इस महोदय राजा ने शस्त्रों के तीव्र प्रहार द्वारा पापिष्ट बैरियों के खण्ड-खण्ड कर दिये है। इसके समान बली राजा और कोई नहीं है। इस तरह से भेंट दे-देकर लोगों ने पाण्डु की खूब स्तुति-भक्ति की। इसके बाद कुछ देर में प्रबल प्रतापी पाण्डुकुमार तो अपने सुन्दर महल में चला गया और उन दोनों पुत्रवधुओं का, व्यास ने अपने मंदिर के पास ही, पूर्ण सम्पत्तिशाली और ध्वजाओं से सुशोभित एक महल में निवास कराया। बाद वह भोगी पाण्डु पंडित भी उन दोनों प्रियायों के साथ सुख से रमता हुआ वहीं रहने लगा। सच है कि जिसका पुण्य प्रबल होता है उसे किसी भी बात की कमी नहीं रहती ॥९१-९६॥


सुकुन्तीस्तनसंस्पर्शात्तदास्याब्जसुपानतः।
तस्याभून्महती प्रीतिः प्रेम्णो वस्त्विष्टमानसम् ॥९७॥

तद्वक्त्राब्जाद्रसामोदं संहरन्नासृपन्नृपः।
चञ्चरीक इवाम्भोजान्मारसेवा न तृप्तये ॥९८॥

कटाक्षवीक्षणै रम्यैः स्मितैश्च कलभाषणैः।
बबन्ध सा मनस्तस्य स्वस्मिन्नत्यन्तसुन्दरैः ॥९९॥

मनस्विनी मनोऽबध्नात्कामपाशायिते लघु।
कण्ठे बाहुलते तस्य गाढमासज्य कामिनी ॥१००॥

स्पर्शं च कोमले पाणौ सौगन्ध्यं च मुखाम्बुजे।
शब्दमल्पिते तस्या देहे रूपं न्यरूपयत् ॥१०१॥

तर्पयामास निःशेषं सोऽक्षग्रामं विशेषवित्।
प्रेप्सोरैन्द्रियिकं सातं गतिर्नार्तः पराङ्गिनः ॥१०२॥

अर्थ (श्लोक 97 से 102): कुन्ती के कुचों के स्पर्श से और उसके मुख-कमल के पान से पाण्डु को बड़ी प्रसन्नता हुई, जैसे मनचाही चीज को पाकर प्रेमी पुरुषों को प्रीति होती है। उसके सुगंधित मुख कमल को सूंघकर पाण्डु को तृप्ति ही नहीं होती थी, जिस तरह कि कमल की सुगन्ध से भौंरे तृप्त नहीं होते। सच है कि काम सेवन से किसी को भी सन्तोष नहीं होता। कुन्ती ने कटाक्षमय दृष्टिपात से, मनोहर मुस्कान से, मीठी बोल-चाल से और अपने सौंदर्य से उसका मन बिल्कुल अपनी तरफ खींच लिया, अपने में बाँध लिया। उस मनस्विनी ने उसके मन को अपने अनुपम सौंदर्य से और काम के पास की तरह अपनी दोनों भुजाओं से उसके गले को खूब मजबूत बाँध लिया। वह उसे अपने प्राण ही समझ ने लगी। पाण्डु ने भी उसके साथ कामसुख भोगते-भोगते उसके कोमल हाथों में स्पर्श का, मुख-कमल में सुगन्ध का, बोल-चाल में मनोहर शब्दों का और उसके शरीर में मनोहर रूप का जैसा कुछ अनुभव किया और जैसा इन्द्रियों के सुखों को भोगा वह सब उसके लिये अपूर्व ही था। ठीक ही है कि इन्द्रिय-सुख की वाञ्छा रखने वाले जीवों को स्त्री के सिवा और कोई गति ही नहीं है ॥९७-१०२॥


तद्वध्वमृतमासाद्य रोगीव दिव्यभेषजम्।
सेवमानः स कालेऽभूत्सुखी निर्मदनज्वरः ॥१०३॥

अर्थ: अपनी नव वधू की रूप-सुधा का पानकर-दिव्य औषधि को पीकर रोगी की तरह-पाण्डु


कदाचित्सदनोद्याने रेमेऽसौ युवतीयुतः।
कदाचिद्बहिरुद्याने वल्लीवेश्मविराजिते ॥१०४॥

क्रीडाद्रौ स कदाचिच्चाक्रीडयत्कामिनीद्वयम्।
कदाचिद्विजहाराशु नदीपुलिनभूमिषु ॥१०५॥

दीर्घिकासु कदाचित्स ताभ्यां चक्रीड वारिभिः।
कदाचिद्गेन्दुकक्रीडां चकार क्रीडितप्रियः ॥१०६॥

एवं तथाविधैर्भोगैर्जिनेन्द्रमहिमोत्सवैः।
सत्पात्रदानतो निन्ये कालस्तेषां महान्किल ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 103 से 107): थोड़े ही काल में पूर्ण सुखी हो गया, उसका मदन-ज्वर उतर गया। वह उनके साथ कभी महल के बगीचे में और कभी वेलों से छाये हुए मंडप वाले वन के प्रदेश में क्रीड़ा करता था एवं कभी उनके साथ-ही-साथ वह क्रीड़ापर्वत पर जाता और वहाँ मन-चाही क्रीड़ा करता था। कभी-कभी नदियों में जा सिकता-स्थल में विहार करता था और कभी उनके साथ बावड़ियों के जल में तथा हिंडोलों में मन को बहलाता था। इस प्रकार भाँति-भाँति के भोगों, जिनेन्द्रदेव के महिमा वाले उत्सवों और पात्रदान आदि क्रियाओं द्वारा उसने बहुत काल बिताया ॥१०३-१०७॥


अथ भोजकटवृष्णोश्च सुता सच्छीलशालिनी।
गान्धारी गुणगांधारी बुधबोधितमानसा ॥१०८॥

या जिगाय निशानाथं वक्त्रेण नेत्रतो मृगीम्।
रतिं रूपेण गत्या च दन्तावलवधूं सदा ॥१०९॥

धृतराष्ट्रेण गान्धारी विवाहविधिना वृता।
यशस्वतीव पुरुणा शतपुत्रा भविष्यति ॥११०॥

अथो कुमुद्वती नाम देवकक्षितिपात्मजा।
विदुषा विदुरेणापि प्रेमतः पर्यणीयत ॥१११॥

अथैकदा मुदा सुप्ता शयनीये निशान्तिमे।
यामे ददर्श सुस्वप्नानिति कुन्ती सुमानसा ॥११२॥

अर्थ (श्लोक 108 से 112): भोजकवृष्टि राजा की एक पुत्री थी। उसका नाम था गांधारी। वह शीलवती थी, गुणों की खान थी और उसने अच्छे-अच्छे विद्वानों से शिक्षा पाई थी। वह अपने मुख से चाँद को और नेत्रों से मृगी को जीतती थी तथा रूप से रति को भी नीचा दिखाती थी। अपनी मंद गति से वह हथिनी को लजाती थी। वह धृतराष्ट्र के साथ में विवाही गई थी। उसका विवाह आर्षविधि से हुआ था और ऋषभ प्रभु के निमित्त से जैसे यशस्वती के सौ पुत्र हुए थे उसी तरह इसके भी सौ पुत्र-होने वाले थे। इसके बाद कुमुद्वती नाम देवक राजा की पुत्री के साथ प्रेम से विद्वान् विदुर का पाणिग्रहण हुआ। एक दिन रात के पिछले पहर कुन्ती अपनी शय्या पर सुख की नींद सोई हुई थी। उस समय उस शुद्धमना ने कई एक शुभ स्वप्नों को देखा। उनका हाल सुनिए ॥१०८-११२॥


मातङ्गं मदसंलिप्तगण्डमुद्दण्डसत्करम्।
वार्द्धिं गम्भीरनादाढ्यं जलकल्लोलशालिनम् ॥११३॥

जैवातृकं सज्योत्स्नं च जगदानन्ददायकम्।
कल्पवृक्षं चतुःशाखं ददतं चार्थिने धनम् ॥११४॥

प्रबुद्धा वीक्ष्य सुस्वप्नान्गता पाण्डुं सुमण्डिता।
मण्डनैर्वरवस्त्रैश्च कुन्ती सत्कुन्तलावहा ॥११५॥

अर्थ (श्लोक 113 से 115): पहले स्वप्न में उसने मद से जिसके कपोल झर रहे हैं और सूँड की जो इधर-उधर घुमा रहा है, ऐसा हाथी देखा। दूसरे में कल्लोलों से सुशोभित और शब्द करता समुद्र देखा। तीसरे में प्रकाशमय और संसार को सुख देने वाला पूर्ण चाँद देखा एवं चौथे स्वप्न में उसने चार डालों वाला और अर्थियों को धन देने वाला कल्पवृक्ष देखा। इन स्वप्नों को देख चुकने पर जब सबेरा हुआ तब वह जागी और प्रभात-काल की क्रियाओं से निपटकर उसने सुन्दर वस्त्र और भूषण पहिने। इसके बाद वह सुकेशी अपने स्वामी पाण्डु के पास पहुँची ॥११३-११५॥


नत्वार्द्धासनमारूढा पृच्छन्ती स्वप्नजं फलम्।
तेनोचे गजतः पुत्रो भविता ते वरानने ॥११६॥

सागरादतिगम्भीरो गभीरधिषणोधरः।
हिमांशोर्जगदानन्दं दास्यतीति स्फुटं प्रिये ॥११७॥

कल्पशाखिफलं विद्धि सुतस्ते वाञ्छितार्थदः।
चतस्रो वीक्षिताः शाखास्त्वया तत्र सुशोभनाः ॥११८॥

तद्भ्रातरस्तु चत्वारो भवितारः सुजित्‍वराः।
एवं श्रुत्वा सती कुन्ती मुमुदे मुग्धमानसा ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 116 से 119): पाण्डु ने उसका यथायोग्य आदर किया और उसे अपने आधे सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद, कुन्ती ने पाण्डु को स्वप्नों का सब हाल सुनाकर उनका फल पूछा। उत्तर में पाण्डु ने कहा कि सुन्दरी, ध्यान देकर सुनो। तुमने जो हाथी देखा है उसका तो यह फल है कि तुम्हारे पुत्र का जन्म होगा, समुद्र देखने से वह बड़ा गंभीर होगी, चाँद देखने से वह जगत भर की आनंददायी होगा और अन्त में तुमने जो कल्पवृक्ष देखा है उसका फल यह है कि वह दानी होगा, उससे जो कोई जो कुछ भी याचना करेगा उसे वह वही देगा और चार शाखायें देखने का यह फल है कि उसके चार भाई और होंगे। वे पाँचों भाई सुन्दर रूप वाले और विजयी होंगे। इस प्रकार अपने स्वप्नों का फल सुनकर मुग्ध मन वाली सती कुन्ती बहुत हर्षित हुई ॥११६-११९॥


अच्युताद्विच्युतं देवं सा दधे गर्भपङ्कजे।
पुण्यतः किं दुरापं स्यात्सुतोत्पत्त्यादिकं सदा ॥१२०॥

ववृधेऽथ क्रमाद्गर्भस्तस्या हर्षकरो नृणाम्।
विपक्षपक्षक्षेपिष्ठः स्वजनानन्ददायकः ॥१२१॥

अर्थ (श्लोक 120 से 121): इसके कुछ समय बाद अच्युत स्वर्ग से एक भाग्यशाली देव चया और उसको अपने गर्भ-कमल में धारण कर कुन्ती गर्भवती हुई। सच तो यह है कि पुण्य के योग से जीवों को पुत्र आदि कोई भी सामग्री दुर्लभ नहीं रह जाती। धीरे-धीरे उसका वह गर्भ बढ़ने लगा और लोगों को आनंद देने लगा। उसका वह गर्भ शत्रुपक्ष का घातक और स्वजनों को आनंद देने वाला था ॥१२०-१२१॥


वीक्ष्याथ पाण्डुरां पाण्डुः सभ्रूणां भ्रूभ्रमावहाम्।
मुमुदे तां यथा खानिं रत्नरञ्जितभूमिकाम् ॥१२२॥

त्रिवलीभङ्गभावेन या वक्तीव सुगर्भतः।
अरीणां भङ्ग एवात्र भविता नान्यथा गतिः ॥१२३॥

मृत्सादनसमीहातस्तस्या गर्भे स्थितः पुमान्।
भूमिं भोक्ष्यति सर्वां च साधयित्वाखिलान्नृपान् ॥१२४॥

अर्थ (श्लोक 122 से 124): पाण्डुर शरीर-वाली और चंचल भौंहें वाली गर्भवती कुन्ती को देखकर पाण्डु के हर्ष का पार न रहा। वह उस समय ऐसी मालूम पड़ती थी मानों रत्नों से रञ्जित भूमि वाली खान ही है क्योंकि वह रत्न-जड़ित बहुत से गहने पहिने थी और उनके रत्नों की ज्योति पृथ्वी पर पड़ती थी। गर्भ के निमित्त से उसके पेट की त्रिबली मिट गई थी। जान पड़ता था कि उस त्रिबली भंग से वह यही जनाती थी कि इस गर्भ से बैरियों का भंग अवश्यंभावी है। इसके सिवाय उनकी और कोई भी गति नहीं हो सकती। कुन्ती की उत्तम मिट्टी खाने की इच्छा होती थी, जिससे जाना जाता था। कि इसके गर्भ में जो पुरुष स्थित है वह सारी पृथ्वी को भोगेगा और सम्पूर्ण राजाओं महाराजाओं को अपने अधीन करेगा ॥१२२-१२४॥


उन्नतौ तत्कुचौ नूनं कृष्णचूचुकसंयुतौ।
वदतः स्वजनौन्नत्यं कृष्णतां परपक्षके ॥१२५॥

अर्थ: उसके कुच उन्नत हो गये थे और साथ में ही उनके चूचक काले पड़ गये थे। जिनसे ऐसा भान


निष्ठीवनं मुखे तस्या व्यक्तीवेति जनान्प्रति।
निष्ठां न यास्यति क्वापि वैरीवर्गः सुगर्भतः ॥१२६॥

अर्थ (श्लोक 125 से 126): होता था कि मानों वे अपने, स्वजन बन्धुओं की उन्नति और शत्रुपक्ष की कालिमा को ही जनाते हैं। उसके मुँह में थूँक बहुत आता था, उससे जाना जाता था कि वह लोगों को यही जनाती है कि इस गर्भस्थ बालक के मारे शत्रु-गण मारे-मारे फिरेंगे-कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलेगी ॥१२५-१२६॥


एवं सुगर्भचिह्नेनालङ्कृतेः शयनासने।
भोजने भूषणे वाण्यां तस्याः प्रीतिर्न चाभवत् ॥१२७॥

जिनार्चनविधौ तस्या धर्मे धर्मफलेऽपि च।
प्रीतिर्दोहदभावेन संपनीपद्यते स्म वै ॥१२८॥

जिनार्चनं विधत्ते सा सव्रता व्रतवत्सला।
युधि स्थितान्महाशत्रून् हन्मीति सदोहदा ॥१२९॥

संपूर्णदोहदाप्येवं पूर्णे मासि सुतोत्तमम्।
सुषुवे सा समीचीनं यथा च सुमनोरथम् ॥१३०॥

विस्तीर्णनयनाब्जोऽसौ वक्त्रचन्द्रसमप्रभः।
सनयस्तनयस्तस्या राजराजकुलोद्गमः ॥१३१॥

उत्पत्तिसमये तस्य निशान्तस्थं सुतामसम्।
विलयं क्वापि संयातं यथा सूर्योद्गमे भुवि ॥१३२॥

सा शर्वरीव सौम्येन सुतसोमेन व्यद्युतत्।
दीप्तिता दिवसस्येवासीत्पितुर्बालभानुना ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 127 से 133): इस प्रकार के गर्भ-चिह्नों से अलंकृत कुन्ती देवी की अलंकार, भोजन, भूषण, वाणी आदि किसी भी बात में प्रीति नहीं रह गई परन्तु जिनेन्द्रदेव की पूजा तथा और-और धर्म एवं धर्म के फल में उसे दोहद रूप से भीति अवश्य होती थी। वह जिनेन्द्रदेव की पूजा करती थी, व्रत करती थी और व्रती पुरुषों में वात्सल्य रखती थी। उसे एक बार यह दोहला हुआ था कि मैं युद्ध में बड़े-बड़े शत्रुओं का संहार करूँ। इस तरह से उसको और-और भी बहुत से दोहले उत्पन्न हुए। इस प्रकार धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हो गये तब उस पुण्यवती ने-जैसा उसका मनोरथ था वैसे ही-उत्तम पुत्र को जन्म दिया। उसके जो पुत्र हुआ उसके नेत्र-कमल खूब विस्तीर्ण थे, मुख चन्द्र के जैसा था। वह नीति का ज्ञाता और राजकुल का अभ्युदय था। बहुत क्या कहें उसकी अपूर्व शोभा थी। जिस समय पुत्र का जन्म हुआ उस समय अँधेरा न जाने कहाँ बिला गया, जैसे सूरज का उदय होते वह बिला जाता है और जिस तरह रात की शोभा चाँद से होती है उसी तरह पुत्र-जन्म के समय पुत्र के द्वारा कुन्ती की भी अपूर्व शोभा हो गई थी, वह अपूर्व द्युति को धारण करती थी या यों कहिए कि उस समय वह पाण्डु के तेज-रूप सूरज के द्वारा दिन की दीप्ति-सी शोभित होती थी ॥१२७-१३३॥


तदानन्दमहाभेर्यो दध्वनुः कोणकोटिभिः।
प्रहता ध्वनदम्भोधिगम्भीरं नृपसद्मनि ॥१३४॥

पटत्पटहझल्लर्यः पणवाः शंखकाहलाः।
ताला वीणा मृदंगाश्च प्रमोदादिव दध्वनुः ॥१३५॥

अर्थ (श्लोक 134 से 135): उस समय डंडों के सिरों से ताड़ी हुई महान् आनंद भेरी बज रही थी और उसके शब्द से राज-महल गूंज रहा था। जान पड़ता था मानों मेघ ही गरज रहा है। इसके सिवा उस समय नगाड़े, झालर, शंख, काहल, वीणा, मृदंग आदि बाजों की भी ध्वनि हो रही थी। इन का शब्द सुनकर ऐसा भान होता था कि मानों ये सब बाजे अपने आप ही खुशी से बज रहे हैं और संसार को कुन्ती के पुत्र-जन्म की सूचना करते हैं ॥१३४-१३५॥


नृत्यं जिताप्सरोनाट्यमारभ्यत महालयैः। यकाभिः सुरनर्तक्यो हेलया निर्जिता द्रुतम् ॥१३६॥

तदा रेजुः पुरे वीथ्यश्चन्दनाम्भश्छटाश्रिताः। कृताभिर्वरशोभाभिर्हसन्त्यो वा दिवःश्रियम् ॥१३७॥

गृहे गृहे पुरे रेजू रत्नतोरणमण्डपाः। रत्नचूर्णैर्बभुर्भूमौ रत्नावल्‍यः सुरङ्गिताः ॥१३८॥

महोदरा महाकुम्भाः स्वर्णा रेजुर्गृहे गृहे। उत्तम्भिता नभोभागे भानवो वा समागताः ॥१३९॥

अर्थ (श्लोक 136 से 139): इस समय अच्छी-अच्छी नर्तकियों की भी लीलामात्र में जीतने वालीं नटियों ने लय के साथ महान् नृत्य शुरू किया। पुर की गली-गली में चंदन के जल की छटा देख पड़ने लगी। अधिक क्या कहा जावे पुर की यहाँ तक शोभा और सजावट की गई थी कि जिससे ऐसा भान होता था कि मानों वह स्वर्ग की शोभा और सजावट को हँस ही रहा है। घर-घर में रत्नों के तोरण बाँधे गये थे और उत्सव के लिये मंडप सजाये गये थे एवं रत्नों के चूर्ण द्वारा भूमि में नाना रंग की रत्नावली पूरी गई थी, जो अपूर्व ही शोभा पाती थी। वहाँ घरों के ऊपर सोने के बड़े-बड़े कलश चढ़े हुए थे और वे मकान आकाश तक ऊँचे चले गये थे, अतः ऐसी प्रतीति होती थी कि मानों इन मकानों पर आकर सूरज ही तो नहीं स्थित हो गये हैं ॥१३६-१३९॥


श्रुत्वा पुत्रप्रसूतिं स नृपमेघो ववर्ष च। दानधारां सुलोकानां यथेष्टमिष्टवृष्टिवत् ॥१४०॥

कौरवाब्धेरसौ बालो हिमद्युतिः समुद्ययौ। पुरे सान्तःपुरे मोदमित्युत्पाद्य महामनाः ॥१४१॥

बन्धुता युधि संस्थैर्या युधिष्ठिरं तमाह्वयत्। गर्भस्थे धर्महेतुत्वात्तस्मिंस्तं धर्मनन्दनम् ॥१४२॥

बन्धुताकौरवानन्दं स तन्वन्कौरवाग्रणीः। वैरिवंशतमो धुन्वन्ववृधे बालचन्द्रमाः ॥१४३॥

असौ स्तनन्ध्यस्तन्यं मातर्गण्डूषितं यशः। समुद्गिरन्नभजन्दिक्षु यथा दीप्त्या च दिद्युते ॥१४४॥

हसितैः सस्मितैर्मुग्धै रिङ्गणैर्मणिकुट्टिमे। मन्मनाभाषणैः प्रीतिं पित्रोः सममजीजनत् ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 140 से 145): पाण्डुरूप मेघ ने जब पुत्र-जन्म के समाचार को सुना तब लोगों की इच्छा के अनुसार उसने धारासार बरसा की तरह खूब ही दान की बरसा की। उत्तम जनों को खूब दान दिया और उनका उचित आदर किया। वह बालक कौरव वंश-रूप समुद्र को वृद्धिंगत करने के लिये चाँद के समान हुआ। चाँद जैसे समुद्र को वृद्धिंगत करता है उस महामना ने भी उसी तरह अन्तःपुर सहित सारे पुर में आनंद ही आनंद फैला दिया, सबको वृद्धिंगत कर दिया। इसके उत्पन्न होने पर बन्धुवर्ग को लड़ाई में स्थिर होने की भावना हुई। इसलिए उन्होंने इसका नाम युधिष्ठिर रक्खा और यह जब से गर्भ में आया तभी से लोगों को धर्म-साधन का निमित्त बना, इसलिए उन्होंने इसका धर्मराज या धर्मनन्दन नाम भी रखा। इसने अपने जन्म से ही कौरववंश को आनंद दिया, अतः यह कौरवाग्रणी कहलाया। शत्रु वंश-रूप अँधेरे को वह हटाने वाला था, इसलिए इसे लोगों ने बाल-चंद्र कहा। माता का दूध पीते समय जो दूध उसके मुँह से बाहर आ छलकता था उससे उज्ज्वलता को धारण किये हुए शरीर और शरीर की स्वाभाविक उज्ज्वल कान्ति से जो दसों-दिशाएँ व्याप्त हो रही थीं उससे उसकी अपूर्व ही शोभा थी। वह अपनी मुस्कान तथा मणि-जटित भूमि में लटपटाते हुए चलने और मन ही मन भाषण से माता-पिता को हमेशा ही प्रसन्न करता रहता था ॥१४०-१४५॥


वृद्धौ तस्याभवद्वृद्धिर्गुणानां सहजन्मना।
सोन्दर्यात्तस्य ते नूनं तद्वृद्ध्यनुविधायिनः ॥१४६॥

अर्थ: इन सब बातों के सिवा उसकी वृद्धि के साथ-ही-साथ उसमें स्वाभाविक गुण भी बढ़ते जाते थे। मानों वे उसके सौंदर्य पर मोहित होकर ही उसकी वृद्धि के अनुयायी बने थे ॥१४६॥


अन्नाशनसुचौलोपनयनादीन्क्रियाविधीन्।
अनुक्रमाद्विधानज्ञो जनकोऽस्य व्यजीजनत् ॥१४७॥

अर्थ: उसका पिता क्रिया-विधान का अच्छा ज्ञाता था, अतः उसने बालक की अन्नाशन, सुचौल, उपनयन आदि सभी क्रियाएँ कीं ॥१४७॥


ततः क्रमेण संलङ्घ्य लङ्घिताखिलदिग्यशाः।
बाल्यकौमारकावस्थां यौवनस्थो बभूव सः ॥१४८॥

सैव वाणी कला सैव विद्या सा द्युतिरेव सा।
शीलं तदेव विज्ञानं सर्वमस्य तदेव तत् ॥१४९॥

तस्य मूर्द्धा समुत्तुङ्गो मौलिरप्यंशुनिर्मलः।
सचूलिक इवादीन्द्रकूटो भृशं समद्युतत् ॥१५०॥

मुखमस्य सुखालोकं शशाङ्कपरिमण्डलम्।
अधः कुर्वद्राजेदमखण्डपरिमण्डलम् ॥१५१॥

कर्णौ कुण्डलशोभाढ्यौ कपोलौ दर्पणोज्ज्वलौ।
नयने सूक्ष्मदर्शित्वाद्दीप्रे तस्य बभूवतुः ॥१५२॥

नासा वंशसमाभासीत्सद्गन्धग्रहणक्षमा।
विलसद्विद्रुमाकारौ तस्योष्ठौ रेजतुस्तराम् ॥१५३॥

ललिते भ्रूलते तस्य लीलां बभ्रतुरुन्नताम्।
कामेन वैजयन्त्यौ वा समुत्क्षिप्ते जगज्जये ॥१५४॥

अर्थ (श्लोक 148 से 154): धीरे-धीरे दसों-दिशाओं में उसका यश व्याप्त हो गया। उसने क्रम से बाल-काल को लांघकर युवावस्था में पैर रक्खा। पर इस समय भी उसकी वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान सभी बातें वैसी की वैसी स्वाभाविक ही रहीं-उसे रंचमात्र भी मद वगैरह न हुआ। उसके मस्तक पर उन्नत और निर्मल मणियों से जड़ा हुआ मुकुट ऐसा जान पड़ता था मानो शिखर-सहित सुमेरु का शिखर ही है। उसका मुँह देखने में बहुत ही प्यारा लगता था और वह चाँद के मण्डल को भी ल जाता था। क्योंकि चाँद तो कभी कभी घट भी जाता है पर वह तो हमेशा ही एक-सा रहता था। उसके कान कुंडलों से सुशोभित थे, कपोल दर्पण की तरह निर्मल थे और नेत्र सूक्ष्मदर्शी और मनोहर थे। उसकी नाक सुन्दर सुगंध को ग्रहण करने में समर्थ और चम्पे के समान शोभाशाली थी। सुन्दर बिंबाफल के समान सुन्दर उसके ओठ थे। उसकी सुन्दर भौंहें बड़ी चंचल थीं। जान पड़ता था कि मानों तीनों लोकों को वश में लाने के लिये कामदेव की ध्वजाएँ ही फहरा रहीं हैं। उसके कंठ की हार वगैरह से अद्भुत ही शोभा थी ॥१४८-१५४॥


कण्ठोऽस्य कण्ठिकाहारभूषणैर्भूषितो व्यभात्।
स्वर्णाद्रिशिखरं यद्वज्ज्योत्स्नया परिवेष्टितम् ॥१५५॥

वक्षस्स्थलं च विपुलं सहारं तस्य भात्यरम्।
सनिर्झरं यथा क्ष्माभृत्तटं सुघटसङ्कटं ॥१५६॥

भुजस्तम्भौ महास्तम्भाविव तस्य जगद्धृतेः।
रेजतुर्हस्तिहस्ताभौ जयलक्ष्म्याः सुलक्षितौ ॥१५७॥

अर्थ (श्लोक 155 से 157): अतः उसका कंठ ऐसा शोभता था जैसा कि ज्योत्स्ना से घिरा हुआ सुमेरु शोभता है। उसका वक्षःस्थल बड़ा विस्तृत था और उसमें सुन्दर हार पड़ा हुआ था। जान पड़ता था कि वह पहाड़ ही है और उसमें जो हार पड़ा हुआ है वह हार नहीं किन्तु झरना वह रहा है। उसकी भुजाएँ महान् स्तंभ सरीखी थीं। वे संसार को पालने वाली थीं, हाथी की सूँड के तुल्य थीं और उनमें जयलक्ष्मी का


तस्य हस्ततलं रेजे खाङ्गणं वा महोडुभिः। मीनकूर्मगदाशङ्खचक्रतोरणलक्षणैः ॥१५८॥

अर्थ (श्लोक 155 से 158): निवास था। उसका हस्ततल नक्षत्र, मीन, कूर्म, गदा, शंख, चक्र, तोरण आदि लक्षणों के द्वारा आकाश के आँगन-सा देख पड़ता था ॥१५५-१५८॥


कटकाङ्गदकेयूरमुद्रिकाद्यैर्विभूषणैः। व्यद्योतिष्टास्य सत्कायः सुभूषाकल्पवृक्षवत् ॥१५९॥

स नाभिकूपिकां दधे लावण्यरसवाहिनीं। रसत्सरससंपृक्तां श्रोणिं योषामिवापरम् ॥१६०॥

सघनं जघनं तस्य दुकूलकुलसंकुलं। रेजे यथा नदीकूलं फेनिलं जलराजितम् ॥१६१॥

बभारोरू वरौ सोऽत्र पीवरौ कनकद्युती। कामेन कल्पितौ स्तम्भौ स्वावासस्थितये यथा ॥१६२॥

अर्थ (श्लोक 159 से 162): उसका सुन्दर शरीर कटक, अंगद, केयूर और अँगूठी आदि भूषणों के द्वारा दीप्त हो रहा था, जैसे कि भूषणों के द्वारा कल्पवृक्ष सुशोभित होता है। उसकी नाभि बावड़ी के तुल्य थी, उसमें लावण्य-रूप जल भरा था। उसकी कटि में करधनी सुशोभित थी और वह दूसरी स्त्री-सी जान पड़ती थी। जिस तरह से फेन वाले जल से भरा हुआ नदी का किनारा शोभता है उसी तरह रेशमी वस्त्रों से व्याप्त उसके सघन जघन शोभते थे। उसके स्थूल उरुस्थल सोने को द्युति के समान पीले थे और वे ऐसे मालूम होते थे कि मानों अपने ठहरने के लिये कामदेव ने दो स्तंभ ही खड़े किये हैं ॥१५९-१६२॥


जङ्घे अघघनाघातघस्मरे लङ्घिके जगत्। अस्य रेजतुरुन्निद्रे कामस्य शरधी इव ॥१६३॥

क्रमौ च क्रमतः कम्प्रौ विक्रमाक्रान्तसंक्रमौ। जगन्नतौ स्तुतौ तस्य भातः स्म कौरवेशिनः ॥१६४॥

नखा नक्षत्रसंकाशाः क्षत्रसेव्या बभुर्भृशम्। दर्पणा इव संन्यस्तास्तस्य रूपनिरीक्षणे ॥१६५॥

अनौपम्यं महारूपं तस्य वर्णयितुं क्षमः। कः क्षितौ क्षितिपालानामीशितुः कौरवेशिनः ॥१६६॥

अर्थ (श्लोक 163 से 166): उसकी जंघाएँ पापसमूह का विनाश कर संसार को लाँघ जाने के लिये समर्थ थीं। वे उनिन्द्र थीं, अतएव ऐसी जान पड़ती थीं मानों काम के बाण रखने के ये तूणीर-तरकस ही हैं। पराक्रमशाली उसके चरणों को प्रवेश करने में कहीं रुकावट न होती थी, अतएव सब कोई उन्हें नमस्कार करते थे। वह क्षत्रियों द्वारा सेव्य था और उसके नख नक्षत्रों के समान थे, मानों वे रूप देखने के लिये दर्पण ही बनाये गये थे। उसका रूप उपमा रहित था। उस कौरवेश राजाओं के राजा के रूप का वर्णन करने को संसार में कोई भी समर्थ नहीं है ॥१६३-१६६॥


ततः कुन्ती सुतं भीममसौष्ट सौष्ठवान्वितम्। युधिष्ठिरसमं शिष्टं विशिष्टं गुणगौरवैः ॥१६७॥

यस्माद्भीतिर्भवेद्भूमावरीणां रणशालिनाम्। तस्मादाख्यायि लोकेन स भीमो भीमदर्शनः ॥१६८॥

महाकायो महाकान्तिर्महावीर्यो महागुणः। महामना महारूपी भीमोऽभाद्भूमिभूषणः ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 167 से 169): इसके बाद कुन्ती ने भीम को जन्म दिया। भीम युधिष्ठिर के तुल्य ही शिष्ट था, गुणों के गौरव से विशिष्ट था, सुन्दर था। उससे बड़े-बड़े रणशाली वैरी भी डरते थे। इसलिए लोग उसे दृष्टिभयंकर-भीम कहते थे। कल्पवृक्ष के बहाने से स्वप्न में वायु ने उसे कुन्ती को दिया था, इसलिए लोग उसे मरुत्तनय कहते हैं। उसकी महान् भुजाएँ थीं, शरीर लम्बा-चौड़ा सुन्दर था, कान्तिशाली था। वह


ततो धनंजयो जज्ञे धनंजयो महौजसा। धनं जयं च संप्राप्तः शत्रुदारुधनंजयः ॥१७०॥

अर्थ (श्लोक 167 से 170): गुणों का पुंज था, महामना, रूपशाली और पृथ्वी का भूषण था। इसके बाद कुन्ती ने धनंजय (आग) सरीखे धनंजय को जन्म दिया। वह महान् तेज वाला और धन एवं जय को प्राप्त था ॥१६७-१७०॥


अर्जुनोऽर्जुनसंकाशो सद्भिसर्जनसज्जनः। अर्जको यशसां लोके तस्याभूत्तृतीयः सुतः ॥१७१॥

स्वप्ने संदर्शनान्मात्रा पुरुहूतस्य सज्जनैः। सर्वैः स गदितः शक्रसूनुर्नाम्नेति निश्चितम् ॥१७२॥

यस्य रूपं गुणा यस्य यस्य तेजश्च यद्यशः। बलं यस्य कथं वर्ण्यं यदि जिह्वाशतं भवेत् ॥१७३॥

अर्थ (श्लोक 171 से 173): शत्रु-रूप काठ को जलाने के लिये जो धनंजय-अग्नि के समान था। इसका दूसरा नाम अर्जुन था। वह इसलिए पड़ा था कि उसके शरीर की कान्ति अर्जुन (चाँदी) के समान थी। वह दुष्टों के निग्रह करने में दक्ष था, यश को संचय करने वाला था। उसकी माता ने स्वप्न में इन्द्र को देखा था। इसलिए सत्पुरुष उसे शक्रसूनु कहते थे। यदि किसी के सौ जीभें भी हो जायें, तब भी वह उसके रूप, गुण, तेज, यश और बल को नहीं कह सकता ॥१७१-१७३॥


ततो मद्री समुद्राढ्या नकुलं कुलकारिणम्। लेभे च जनितानन्दं कुर्वाणम रिसंक्षयम् ॥१७४॥

सहदेवं महादेवं सा सूते स्म सविस्मया। सह देवैः प्रकुर्वाणं क्रीडां संक्रीडनोद्यतम् ॥१७५॥

एवं पञ्चसुतैः पाण्डुः प्रचण्डो वैरिखण्डनः। सातं ततान सङ्गेहो यथा पञ्चभिरिन्द्रियैः ॥१७६॥

कुन्ती सुतवती सत्या मद्री समृद्धयान्विता। पाण्डुः प्रचण्डः संभुङ्क्ते पञ्चभिस्तनुजैः सुखम् ॥१७७॥

अर्थ (श्लोक 174 से 177): इसके बाद समुद्र की तरह गंभीर मद्री ने कुल को उज्ज्वल करने वाले नकुल को जन्म दिया और देवताओं के साथ क्रीड़ा करने वाले महान् बली सहदेव को उत्पन्न किया। इस प्रकार बैरियों को खण्डन करने वाला और प्रचंड तेज का, धारक पाण्डु पाँच पुत्रों के साथ सुख भोगने लगा। जिस तरह नीरोग मनुष्य अपनी पाँचों इन्द्रियों से सुख भोगता है। इस प्रकार सब गुण सम्पन्न सुतों वाली कुन्ती, सुंदर मुद्रा को धारण करने वाली तथा सज्जनों की रक्षक मद्री तथा प्रचंड बली पाण्डु ये तीनों अपने पाँचों श्रेष्ठ पुत्रों के साथ-साथ आनंदपूर्वक सांसारिक सुखों को भोगते थे ॥१७४-१७७॥


धृतराष्ट्रप्रिया प्रीता परमप्रेमपूरिता। गान्धारी बन्धुभिः सार्धं ववृधे धृतिधारिणी ॥१७८॥

गान्धारीवक्त्रनलिनचञ्चरीकेण चेतसा। धृतराष्ट्रश्च नो लेभे रतिं चान्यत्र तां विना ॥१७९॥

गान्धार्या स समं तेने सातं संसारसम्भवम्। कामिनः कामिनीं मुक्त्वा लभन्ते शं न हि क्वचित् ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 178 से 180): उधर परम प्रीति को प्राप्त हुई धृतराष्ट्र की प्रिया गांधारी अपने बन्धुवर्ग के साथ-साथ सुख भोग रही थी। वह धैर्य की खान थी। धृतराष्ट्र गांधारी के मुख-कमल के साथ भौंरे की तरह क्रीड़ा किया करता था। गांधारी के बिना उसे कहीं भी चैन न पड़ती थी। वह उसके साथ सब सांसारिक सुखों को भोगता था और ठीक ही है कि कामिनीजन को छोड़कर कामी-पुरुष और जगह कहीं सुख नहीं पाते हैं ॥१७८-१८०॥


गान्धारी रमयामास भर्तारं भर्तृभक्तिका। हास्यैः कटाक्षविक्षेपैर्विनोदैर्मदनप्रियैः ॥१८१॥

अर्थ: गांधारी पतिभक्ता साध्वी थी,अतः वह भी हास्य, कटाक्ष और विनोद के द्वारा धृतराष्ट्र को


रेमाते दम्पती दीप्तौ स्फुरद्रससमन्वितौ।
विद्युद्घनाघनौ यद्वद्रेजाते जनरञ्जकौ ॥१८२॥

गान्धारीं च कदाचित्स क्रीडामुख्यैश्च क्रीडनैः।
महाभोगैर्वराभोगैः क्रीडयामास सक्रियः ॥१८३॥

गान्धार्यथ शुभं गर्भं दधौ धर्मानुभावतः।
तत्किं न लभते पुण्याद्यल्लोके हि दुरासदम् ॥१८४॥

अर्थ (श्लोक 181 से 184): खूब रमाती थी एवं वे दोनों दम्पति विनोद के साथ क्रीड़ा किया करते थे और सुशोभित होते थे, जिस तरह कि मन को मोहने वाले बिजली और मेघ सुशोभित होते हैं। एक समय उस सदाचारी ने गांधारी के साथ महाभोग, वराभोग आदि क्रीड़ायें कीं। उस समय पुण्ययोग से गांधारी ने गर्भ धारण किया। नीति के पंडितों ने कहा है कि संसार में ऐसी कौन-सी दुर्लभ वस्तु है जो पुण्य योग्य से प्राप्त नहीं होती ॥१८१-१८४॥


पूर्णे मासेऽथ सुषुवे सुतं सा सुखसंगता।
जनयित्री जनान्दं परमप्रीतिदायिका ॥१८५॥

पुरन्ध्रिकास्तदाशीर्भिर्नन्दयन्ति स्म तामिति।
सुषूध्व सुसुतानां हि शतं शतसुखानि वा ॥१८६॥

दुःखेन योध्यते यस्माद् दुर्योधन इतीरितः।
स सुतः स्वजनैः शीघ्रं संपन्नपरमोदयः ॥१८७॥

पितुः सुतसमुद्भूतिसूचकाय नराय च।
अदेयं न किमप्यासीच्छत्रसिंहासनादृते ॥१८८॥

निगडाकलिताँल्लोकान्पञ्जरस्थांश्च पक्षिणः।
बन्दिसद्मस्थिताञ्शत्रून्मुमोच नृपतिस्तदा ॥१८९॥

वाद्यवादनभेदेन विदितो जननोत्सवः।
तस्य प्रशस्यतां नीतः सुनीतेः सातवारिधेः ॥१९०॥

अर्थ (श्लोक 185 से 190): धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हुए तब उस सुखशालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, जिससे लोगों को बड़ा भारी हर्ष हुआ। वे परम प्रीति को प्राप्त हुए और ऐसे उत्तम पुत्र को जन्म देने के उपलक्ष्य में पुरंध्री जन उसे आशीर्वाद देने लगीं कि हे देवी ! तुम लोकोपकारी ऐसे ही सैकड़ों पुत्रों को पैदा करो। वह पुत्र शत्रुओं के साथ बड़ी भयंकरता से युद्ध करने वाला था। उसके द्वारा बैरियों को बड़ा दुख होता था, इसलिए उसे लोग दुर्योधन कहते थे। वह अपने स्वजनों के साथ-साथ शीघ्र ही परमोदय को प्राप्त हो गया। इस समय पुत्र-जन्म का समाचार लेकर जो पुरुष, राजा के पास आया राजा ने उसे अपने छत्र-सिंहासन आदि राज-चिह्नों को छोड़कर और कुछ भी देने की कसर न की। इसके सिवा राजा ने उस समय कैद में पड़े हुए कैदियों को, पिंजरे में बँधे हुए पक्षियों को तथा जेलखाने में पड़े हुए शत्रुओं को छोड़ दिया-उन्हें मुक्त कर दिया। उस समय जो भाँति-भाँति के बाजे बजे उनसे उस सुनीति वाले और सुख के सागर का जन्म-उत्सव.सभी को ज्ञात हो गया ॥१८५-१९०॥


वर्धमानो बुधो युद्धे दुर्योध्यो युद्धधारिभिः।
दुर्योधनोऽवधीद्धैर्यात्परान्योद्धॄन्महायोधान् ॥१९१॥

ततः क्रमेण गान्धारी सुतं दुःशासनाभिधम्।
असौष्ट स्पष्टताविष्टं वरिष्ठं शुभचेष्टितम् ॥१९२॥

अर्थ (श्लोक 191 से 192): वह वर्द्धमान था और विद्वान् था, युद्ध में बड़े से बड़े बैरियों द्वारा भी जीता न जा सकता था। उसने बड़ी शूरवीरता से भी युद्ध करने वाले कई एक शत्रुओं को प्राण-रहित कर दिया था। इसके बाद गांधारी ने दुःशासन नाम दूसरे पुत्र को जन्म दिया। वह भी स्पष्टवक्ता और सर्वश्रेष्ठ था। उसकी जितनी कुछ चेष्टा थी वह सब शुभ कार्यों के लिये थी। वह खोटे काम में कभी हाथ न डालता था ॥१९१-१९२॥


ततो दुर्धर्षणो धीमान्सुतो दुर्मर्षणस्ततः ।
रणश्रान्तः समाघश्च विदः सर्वसहोऽपि च ॥१९३॥

अनुविन्दः सुभीमश्च सुबाहुश्च दुःसहः ।
दुःशलश्च सुगात्रश्च दुःकर्णो दुःश्रवास्तथा ॥१९४॥

वरवंशोऽवकीर्णश्च दीर्घदर्शी सुलोचनः ।
उपचित्रो विचित्रश्च चारुचित्रः शरासनः ॥१९५॥

दुर्मदो दुःप्रगाहश्च युयुत्सुर्विकटाभिधः ।
ऊर्णनाभः सुनाभश्च तदा नन्दोपनन्दकौ ॥१९६॥

चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विमोचनः ।
अयोबाहुर्महाबाहुः श्रुतवान्पद्मलोचनः ॥१९७॥

भीमबाहुर्भीमबलः सुषेणः पण्डितस्तथा ।
श्रुतायुधः सुवीर्यश्च दण्डधारो महोदरः ॥१९८॥

चित्रायुधो निषङ्गी च पाशो वृन्दारकस्तथा ।
शत्रुंजयः शत्रुसहः सत्यसंधः सुदुःसहः ॥१९९॥

सुदर्शनश्चित्रसेनः सेनानी दुःपराजयः ।
पराजितः कुण्डशायी विशालाक्षो जयस्तथा ॥२००॥

दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ।
आदित्यकेतुर्बर्ह्माशी निबन्धो विप्रियोद्यपि ॥२०१॥

कवची रणशौण्डश्च कुण्डधारी धनुर्धरः ।
उग्ररथो भीमरथः शूरबाहुरलोलुपः ॥२०२॥

अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाभिधः ।
अनाधृष्टः कुण्डभेदी विराजी दीर्घलोचनः ॥२०३॥

प्रथमश्च प्रमाथी च दीर्घालापश्च वीर्यवान् ।
दीर्घबाहुर्महावक्षा दृढवक्षाः सुलक्षणः ॥२०४॥

कनकः काञ्चनश्चैव सुध्वजः सुभुजोऽरजः ।
एवं शतं सुतानां हि तयोर्जातमनुक्रमात् ॥२०५॥

अर्थ (श्लोक 193 से 205): इसके बाद गांधारी ने अट्ठानवे और-और पुत्रों को पैदा किया। उनके नाम सुनिए दुर्द्धर्षण, दुर्मर्षण, रणश्रान्त, समाघ, विंद, सर्वसह, अनुविंद, सुभीम, सुवन्हि, दुःसह, दुसल, सुगात्र, दुःकर्ण, दुःश्रव, वरवंश, अवकीर्ण, दीर्घदर्शी, सुलोचन, उपचित्र, विचित्र, चारुचित्र, शरासन, दुर्मद, दुःप्रगाह, युयुत्सु, विकट, ऊर्णनाभ, सुनांभ, नंद, उपनंद, चित्रवाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोवाहु, महाबाहु, श्रुतवान, पद्मलोचन, भीमबाहु, भीमवल, सुषेण, पंडित, श्रुतायुध, सुवीर्य, दंडधर, महोदर, चित्रायुध, निःषंगी, पाश, वृंदारक, शत्रुंजय, शत्रुसह, सत्यसंध, सुदुःसह, सुदर्शन, चित्रसेन, सेनानी, दुःपराजय, पराजित, कुंडशायी, विशालाक्ष, जय, दृढ़हस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्चस्, आदित्यकेतु, वर्ह्माशी, निबन्ध, प्रियोदी, कवची, रणशौंड, कुंडधार, धनुर्धर, उग्ररथ, भीमरथ, शूरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृष्टरथ, अनादृष्ट, कुंडभेदी, विराजी, दीर्घलोचन, प्रथम, प्रमाथी, दीर्घालाप, वीर्यवान, दीर्घबाहु, महावक्ष, सुलक्षण, विलक्षण, कनक, कांचन, सुध्वज, सुभज और अरज ॥१९३-२०५॥


वर्धमानाः सुताः सर्वे वर्धमानयशोलताः ।
शोभन्ते शोभनाकाराः शस्त्रशास्त्रविशारदाः ॥२०६॥

पाण्डवाः कौरवाश्चैवं वर्धन्ते स्म यथा यथा ।
तथा तथा विवर्धन्ते संपदो मोददायकाः ॥२०७॥

गाङ्गेयेन सुगाङ्गेयतेजसामलचक्षुषा ।
पितामहेन तेषां हि शीललीलाविलासिना ॥२०८॥

रक्षिताः शिक्षिताः सर्वे परां वृद्धिमवापतुः ।
वृद्धेन पालिताः के हि न यान्ति परमोदयम् ॥२०९॥

अर्थ (श्लोक 206 से 209): ये सभी पुत्र वर्द्धमान और इनका यश सब जगह फैल रहा था तथा हमेशा बढ़ता ही जाता था। ये सबके सब शस्त्र और शास्त्र आदि भाँति-भाँति की कलाओं में निपुण और सुन्दर थे। इस प्रकार ज्यों-ज्यों पाण्डव और कौरव वृद्धिंगत होते जाते थे, त्यों-त्यों आनंद देने वाली उनके सम्पत्ति भी बढ़ती जाती थी। दिव्यचक्षु के धारक, सुवर्ण के समान कान्ति वाले एवं ब्रह्मचारी गांगेय (भीष्म पितामह) इन सब पाण्डवों और कौरवों की रक्षा करते थे तथा इन्हें शिक्षा देते थे। धीरे-धीरे ये सब पूर्ण समृद्धिशाली हो गये ॥२०६-२०९॥


द्रोणाख्येन द्विजेशेन पालिताः परमोदयाः। भेजुर्वृद्धिं शुभाकाराः पाण्डवाः कौरवाः पुनः ॥२१०॥

द्रोणायितं च द्रोणेन धनुर्वेदसरित्पतेः। तरणे च शरण्येन कारुण्यपण्यवाहिना ॥२११॥

द्रोणस्तु सर्वपुत्राणां चापविद्यामशिक्षयत्। ते तस्य विनयं चक्रुर्विद्या विनयतो यतः ॥२१२॥

अर्थ (श्लोक 210 से 212): सच है कि वृद्ध के द्वारा पाला-पोषा जाकर कौन परमोदय को नहीं प्राप्त होता एवं इन परमोदय के धारकों को द्रोणाचार्य द्विजेश ने भी पाला-पोषा, जिससे ये सुन्दराकृति कौरव और पाण्डव परम वृद्धि को प्राप्त हुए। द्रोण बड़े दयालु थे, शरण-योग्य थे, आश्रितों को अपनाते थे, अतः उन्होंने धनुष विद्या-रूप समुद्र को पार करने के लिये इन्हें द्रोणी (नौका) का काम दिया और थोड़े ही समय में इन सबको धनुषविद्या में निपुण कर दिया। ये सब द्रोणाचार्य का खूब आदर और विनय करते थे क्योंकि विद्या विनय से ही प्राप्त होती है ॥२१०-२१२॥


सार्जवायार्जुनायासौ व्यपेताय विकर्मतः। कार्मुकीं कार्मुकीं विद्यां पितृव्यः समुपादिशत् ॥२१३॥

शब्दवेधिमहाविद्यां द्रोणात्पार्थः समासदत्। गुरोर्विनीतेः किं न स्याद्विनयो हि सुकामसूः ॥२१४॥

प्रचण्डाखण्डकोदण्डलक्षणं लक्ष्यलक्षणम्। वेध्यवेधकभावेनाशिक्षयद् गुरुतः स च ॥२१५॥

पार्थो व्यर्थीकृताशेषचापविद्याविशारदः। रराज राज्यरङ्गेऽस्मिन्नभसीव निशापतिः ॥२१६॥

अर्थ (श्लोक 213 से 216): अर्जुन सरलचित्त था, विनयी और पाप-कर्मों से रहित था अर्थात् वह हमेशा शुभ क्रियाओं में ही लगा रहता था। अतः पितृव्य तुल्य और धनुषविद्या-विशारद द्रोण ने प्रसन्न होकर उसे धनुष-विद्या की खूब शिक्षा दी। इसके सिवा द्रोण ने उसे शब्दवेधी महाविद्या भी सिखा दी। अर्जुन को पार्थ भी कहते हैं। पार्थ ने जो कुछ भी गुरु से विद्या पाई थी वह सब उसके विनय का फल था। नीतिकार कहते हैं कि गुरु के विनय से क्या-क्या नहीं होता, विनय मनोभिलषित पदार्थों की देने वाला है, लोगों के सभी मनोरथों को साधता है। इस प्रकार अर्जुन ने गुरु द्रोण से, विनय के बल, प्रचंड और अखण्ड धनुषरूप लक्षण के द्वारा, लक्ष्य (निशाना) वेध करने को, वेध्य-वेधक भाव से अर्थात् लक्ष्य का बार-बार वेध करने से सीख लिया, जिसके द्वारा वह सारे जगत के धनुष-विद्या के पंडितों को नीचा दिखाकर, आकाश में चाँद की तरह, राज्यरूप आँगन में सुशोभित होने लगा ॥२१३-२१६॥


एवं तेषां महान्कालो लिप्सूनां सातमूल्बणम्। व्यतीतः सुसुखानां हि वत्सरोऽपि क्षणायते ॥२१७॥

इति सुपाण्डुरखण्डसुपण्डितः सुघटघोटकटङ्कितसद्भटः।
घटयति स्म घटां वरदन्तिनां प्रकटसङ्कटसाध्वसहारिणीम् ॥२१८॥

अर्थ (श्लोक 217 से 218): इस प्रकार सुख-सागर में निमग्न हुए उन पाण्डवों और कौरवों का काल बीत गया, पर उसका उन्हें कुछ भी भान न हुआ। ठीक ही है कि सुखी जीवों का एक वर्ष भी क्षण की तरह बीत जाता है। इस तरह पाण्डु सुख से अपना समय बिताता था। उसका कोई शत्रु न था और उसके पक्ष में बड़े-बड़े वीर थे। स्वयं उसके पुत्र ही अद्वितीय योद्धा थे। इसके सिवा वह विद्वान् था, अतः उसके पास बुद्धिबल भी था ॥२१७-२१८॥

अष्टमं पर्व (भाग 2/2)

युद्धे यो जितवान् रिपूञ्जनमनोह्लादी जनालङ्कृतो
दुर्वारारिविघातनैकसुकृतिः श्रीधर्मराजात्मजः।
भीमो भीतिहरो विपक्षतिमिरश्रीभानुमान्भास्वरः
पार्थः स्वार्थकरः समर्थमहितो भानुप्रभाभासुरः ॥२१९॥

अतुलविपुललीलालक्षिता लक्षणाङ्गाः सकलबलविलासालङ्कृता निर्मलास्ते ।
चटुलकमलताराहारिहारावतंसा जिनवरपदलीनाः कौरवा वै जयन्तु ॥२२०॥

अर्थ (श्लोक 219 से 220): उसके पुत्र युधिष्ठिर आदि युद्ध में शत्रुओं को एक क्षण भी नहीं ठहरने देते थे, वे सभी अद्वितीय वीर थे। उनको देखकर लोगों के दिल खुश होते थे और उनसे वे विभूषित होते थे। चाहे कैसा ही दुर्निवार वैरी क्यों न हो उसे वे अपने सामने टिकने ही न देते थे और बैरियों पर विजय पाने को ही अपना परम कर्तव्य जानते थे। भीम बड़ा भयंकर योध्धा था। लोगों की भीति को दूर करता था। शत्रु-रूप अंधेरे को दूर करने के लिये वह सूरज था, तेजस्वी था। इसी प्रकार पार्थ भी उत्तम कार्यों को करने वाला और समर्थ पुरुषों द्वारा पूजा जाने वाला था, दीप्तिशाली था। वह पार्थ-अर्जुन सदा ही सुशोभित हो। उन कौरवों की विजय हो जो अतुल और विपुल लीला से लक्षित हैं, जिनके शरीर में नाना लक्षण हैं, जो सम्पूर्ण बल के विलास से अलंकृत-विभूषित है, निर्मल हैं, मनोहारी हार से जिनका कंठ विभूषित है, चंचल तथा कमल की तरह जिनके नेत्र है और जो जिन भगवान् के चरण-कमलों में लीन हैं ॥२१९-२२०॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचन्द्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में पाण्डव-कौरवों की उत्पत्ति का वर्णन करने वाला आठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८॥

नवमं पर्व (भाग 1/2)

अभिनन्दनमानन्ददायकं दरदारकम्। विशदप्रमदोदारं दधामि हृदये जिनम् ॥१॥

अर्थ: उन अभिनन्दन प्रभु को मैं अपने मनमन्दिर में विराजमान करता हूँ जो आनंद के दाता और भय के घातक हैं। जिनकी आत्मा निर्मल और कषाय रहित हैं और जो उदार हैं-सबको एक दृष्टि से देखते हैं ॥१॥


अथैकदा नृपः पाण्डुः पाण्डुरातपवारणः। वनं जिगमिषू रन्तुं दापयामास दुन्दुभिम् ॥२॥

घटद्घोटकसंघातैश्चलच्चामरचारुभिः। द्वादशात्माश्वसंकाशैश्चञ्चलैरचलन्नृपः ॥३॥

दन्तावला बलोपेता दन्तदारितपर्वताः। पर्वता इव तस्याग्रे नदन्ति स्म महाजवाः ॥४॥

रथा व्यर्थीकृताशेषपादाः सत्यादसङ्कुलाः। वव्रे च महीपालं रन्तुं जिगमिषुं वनम् ॥५॥

पत्तयो विस्फुटाटोपाः सकोपघनगर्र्जिताः। समारोपितकोदण्डाश्चण्डास्तत्पुरतो ययुः ॥६॥

अर्थ (श्लोक 2 से 6): एक समय सफेद छत्र से सुशोभित पाण्डु को क्रीड़ा के लिये वन में जाने की इच्छा हुई। तब उसने भेरी बजवाई। भेरी के शब्द को सुनकर चारों प्रकार की सेना तैयार हो गई। सूरज के घोड़ों से भी सुन्दर, चलते हुए चमर-किसवार वाले चंचल घोड़े सजाये गये। दाँतों के प्रहार से पर्वतों को भी हिला देने वाले तथा उन्हीं के बराबर ऊँचे बलवान् हाथी तैयार किये गये। वे महायुद्ध के जैसे देख पड़ते थे। सुन्दर पहियों से सजे हुए और लोगों के पाँवों को विफल कर देने वाले रथ इधर-उधर से तैयार हो-होकर आये एवं मेघ की तरह गर्जने वाले और भयंकर दिखावे वाले प्रचंड पयादे-गण धनुष ले-लेकर उपस्थित हुए ॥२-६॥


नृपाज्ञया तदा मद्री विनिद्रनयनोत्पला। पूर्णचन्द्रानना रम्या समुद्रा मुद्रिकान्विता ॥७॥

अहस्करं हिसन्तीव कर्णभूषणतो ध्रुवम्। सुदन्तज्योत्स्नया कृत्स्नं क्षिपन्तीव निशाकरम् ॥८॥

कटाक्षबाणक्षेपेण भिन्दन्ती मानसं नृणाम्। स्तनभारभराक्रान्ता चेले सा शिबिकाश्रिता ॥९॥

वनं समाट विटपिसुघाटघटितं स्फुटम्। पाण्डवानां पिता प्रीत्या मद्रीमुद्रितमानसः ॥१०॥

अर्थ (श्लोक 7 से 10): इत्यादि शोभा से युक्त पाण्डु वन को चला। उसकी आज्ञा से मद्री देवी भी उसके साथ-साथ चली। वह अद्वितीय सुन्दरी थी। उसके नेत्र कमल से खिले हुए थे। पूरे चाँद के जैसा मन को मोहने वाला उसका मुँह था। उसकी मूर्ति देखने योग्य थी। उसके हाथ की अँगुली में एक सुन्दर अँगूठी थी। उसे वह हमेशा ही पहिने रहा करती थी। वह अपने कर्णफूलों की कान्ति से सूरज की और दाँतों की प्रभा से चाँद की हँसी उड़ाती थी और कटाक्ष-बाणों के पात से मनुष्यों के मन को मोहती थी। कुचों के भार से उसकी अपूर्व ही शोभा थी। इसके थोड़ी देर बाद पाण्डु भाँति-भाँति के वृक्षों से सघन वन में पहुँचा और वहाँ मद्री के समागम से उसका मन खूब प्रसन्न हुआ ॥७-१०॥


यत्र सालद्रुमाः साराः सरलाश्च क्वचित् क्वचित्। सहकारद्रुमा मञ्जुमञ्जर्यामोदमोदिताः ॥११॥

अर्थ: वहाँ उसने देखा कि कहीं ऊँचे तालवृक्ष, कहीं सरल सरस के वृक्ष खड़े हुए हैं। कहीं सुन्दर मंजरियों की सुगन्ध से मन को मोहित करने वाले आम के वृक्ष लह-लहा रहे हैं। कहीं अशोकवृक्ष


अशोकाः शोकसंनप्ता भामिनीपादताडिताः । बकुलाः सफला योषामधुगण्डूषसिञ्चिताः ॥१२॥

आलिङ्गिताः कुरबका भीरुभिर्विकसन्ति च। भ्रमरा भ्रमरीवृन्दैर्गायन्ति मदनेशितुः ॥१३॥

यशो जगज्जयेनेव संभवं सुमहीपतेः। सुरासुरासुरीनारीसुरीसंघस्य पालिनः ॥१४॥

कोकिलाः कलनिःस्वाना अनुकुर्वन्ति गर्विताः। कामिनीनां स्वरांस्तन्त्रीयन्त्रितान्काममन्त्रिणः ॥१५॥

कामिनीकलगीतानि श्रूयन्ते च पदे पदे। किंनरीनादजेतृणि सरसानि रसोत्करैः ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 11 से 16): कामनियों के पाँवों की ताड़ना को पाकर हरे भरे हो रहे हैं। कहीं स्त्रियों के कुल्लों से सींचे जाकर वकुलवृक्ष फल रहे हैं। कहीं नारियों के संगम को पाकर कुरुवक जाति के वृक्ष विकसित हो रहे हैं। कहीं भौंरियों के साथ-साथ भौंरे कामदेव के यश को गा रहे हैं, जिसे काम ने तीन लोक को जीत करके पाया है। कहीं कोयलें मधुर-मधुर शब्द कर रही हैं, जाना जाता है कि वे गर्व को प्राप्त हुई कामनियों के काम-तंत्री के तार से परिष्कृत किये गये स्वरों की नकल ही उतार रही है। कहीं पद-पद पर कामनियाँ मधुर गीत गा रहीं हैं। कहीं अपनी तरल तरंगों के शब्द द्वारा किंनरियों के नाद को भी जीत लेने वाले तालाब देख पड़ते हैं ॥११-१६॥


रंम्यते स्म भूपालो वने तत्र प्रियासखः। नृत्यानि पक्ष्मलाक्षीणां प्रेक्षमाणः पदे पदे ॥१७॥

स तां च रमयामास रम्यैर्भोगै रतोद्भवैः। हासै रसैर्विलासैश्च क्रीडयालिङ्गनादिभिः ॥१८॥

क्वचिच्चन्दननिर्यासरैर्गुरुद्रवमर्दनैः। सुगन्धिचूर्णनिक्षेपैः क्वचित्कान्तनिरीक्षणैः ॥१९॥

स सुखं शुभगालापैः कलापैः स्त्रीजनस्य च। रममाणस्तदा लेभे न तृप्तिं तृष्णायान्वितः ॥२०॥

अर्थ (श्लोक 17 से 20): ऐसे मनोहर वन में मद्री रानी के साथ-साथ पद-पद पर भामनियों की नृत्य-कला को देखते हुए पाण्डु ने बड़े सुख-चैन से समय बिताया और वहाँ क्रीड़ा की एवं उसने मनोहर भोगों और रति-क्रीड़ा से उत्पन्न हुए हास, रस, विलासों के द्वारा मद्री को खूब रमाया, उसके साथ खूब ही क्रीड़ा की। इसके सिवा उसने चन्दन के रस से, अगुरुद्रव के मर्दन से, सुगंध द्रव्य के निक्षेप से, स्त्रियों के कटाक्षमय निरीक्षणों से तथा उनके सुन्दर आलापों से अपने चित्त को बहुत ही बहलाया परन्तु उसे कहीं भी सन्तोष न हुआ-उसकी विषय-तृष्णा बढ़ती ही गई ॥१७-२०॥


जलक्रीडारतः क्वापि वापिकायां स्त्रिया समम्। स चन्दनजलोद्गच्छत्पृषद्भिः कुसुमैरिव ॥२१॥

आकण्ठं च जले मग्नो नृप उद्भासिसन्मुखः। स्वर्भानुरिव स्त्रीवक्त्रचन्द्रं गिलितुमागमत् ॥२२॥

भूपः संक्रीड्य क्रीडार्तो विहर्तुं पुनरुद्ययौ। प्रतानिनीपरान्देशान्त्सुलोके लोकनोद्यतः ॥२३॥

लतामण्डपमासाद्य क्वचिन्मधुकरस्वरैः। वृतं वर्तुलसंकाशं तस्थौ स्थिरमनाः स्थिरः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 21 से 24): कहीं वह बावड़ियों में जाकर स्त्रियों के साथ फूलों के तुल्य कोमल और सुगन्धित चन्दन के जल की उछलती हुई बूँदों से क्रीड़ा करता था और कंठ तक पानी में जब बैठ जाता था तब ऐसा जान पड़ने लगता था मानों स्त्रियों के मुखरूप चाँद को ग्रसने के लिए राहु ही आ गया है। कुछ देर में जब वह क्रीड़ा करता-करता थक गया तब उसने वहाँ से चलने की इच्छा की। वहाँ से चलकर उसने बहुत से लता-मंडपों को देखा। एक लता-मंडप में वह स्थिर-चित्त होकर बैठा भी। वह लता-


स तत्र मण्डपे वल्ल्याः पुष्पशय्यामकारयत्। तत्र मद्र्या समं श्रीमांस्तस्थौ भोगार्थलालसः ॥२५॥

रममाणः स्त्रिया सक्तः समासक्तमुखाम्बुजः। घनपीनस्तनाभोगां स भोगी बुभुजे च ताम् ॥२६॥

स भोगभरनिर्भिन्नः संभिन्नमदनज्वरः। तावता मृगमैक्षिष्ट क्रीडन्तमुपमण्डपम् ॥२७॥

हरिणीभोगसंलुब्धं कुरङ्गं वीक्ष्य तत्क्षणात्। स च कोदण्डसंधानं शरेण समकल्पयत् ॥२८॥

अर्थ (श्लोक 21 से 28): मंडप गोल था और भौंरों के सुन्दर शब्दों से गूँज रहा था। उस लता-मंडप में उसने एक फूलों की शय्या बनवाई और वह कामासक्त है मद्री-सहित उस पर बैठ गया। वह मद्री में इतना आसक्तचित्त हो गया कि उसके मुख-कमल पर से अपना मुख-कमल हटाना ही न चाहता था। उसने स्थूल और कठोर कुचों वाली मद्री के साथ वहाँ भी खूब कामक्रीड़ा की। इससे उसका मदन-ज्वर उतर गया। इसी समय में उसने मंडप के पास ही क्रीड़ा करते हुए एक हिरण को देखा। वह अपनी हिरणी के साथ काम-क्रीड़ा कर रहा था। उसे देखते ही राजा ने धनुष पर बाण चढ़ाया और उसके ऊपर छोड़ दिया ॥२१-२८॥


जघान शरघातेन चापमुक्तेन भूमिपः। कुरङ्गं मारसंसक्तं कुरङ्गीलुब्धमानसम् ॥२९॥

पपात पृथिवीपीठे रटन्संकटसंगतः। ममार स च धिग्भोगान्लुब्धस्य गतिरीदृशी ॥३०॥

ततो नभोऽङ्गणाद्दैवो जजृम्भे ध्वनिरित्यरम्। भूपाल तव नो युक्तमीदृशं कर्म दुःखदम् ॥३१॥

निरपराधिनो भूपा मृगान्घ्नन्ति वनस्थितान्। यदि रक्षां करिष्यन्ति तदान्ये केऽत्र भूतले ॥३२॥

अर्थ (श्लोक 29 से 32): हिरण उस समय कामासक्त हो रहा था। बाण के लगते ही वह चिल्लाकर जमीन पर गिर पड़ा। उसे बड़ी वेदना हुई। वह मर गया। ग्रन्थकार कहते हैं कि इन भोगों को धिक्कार है, जिनके कारण लुब्धकों की ऐसी गति होती है। इसी समय आकाशवाणी हुई कि “भूपाल! ऐसा दुखदाई काम करना तुम्हें उचित नहीं था। विचारिये कि यदि इन निरपराधी मूक और वन में रहने वाले हिरणों को राजा ही मारने लगे तो फिर संसार में उनकी दूसरा कौन रक्षा करेगा ॥२९-३२॥


सापराधा अपि प्राज्ञैर्न हन्तव्या मृगादयः। जेघ्नीयन्ते स्म दैवेन यतो निरपराधिनः ॥३३॥

सतां प्रपालका भूपा असतां च निवारकाः। इत्युक्तिं युक्तितस्तूर्णं विफलां कुरुषे कथम् ॥३४॥

अर्थ (श्लोक 33 से 34): बुद्धिमानों को तो इन्हें अपराध करने पर भी नहीं मारना चाहिए, तब फिर निरपराधियों की तो बात ही क्या है। निरपराधियों को दैव के सिवा और कोई नहीं मारता है। राजन्, यह प्रसिद्ध ही है कि राजा लोग शिष्टों को पालते हैं और दुष्टों का निग्रह करते हैं। यह ठीक है परन्तु न जाने आप इस युक्ति-युक्त बात को भी क्यों विफल कर रहे हैं ॥३३-३४॥


मृगोऽयं न परान्हन्ति न स्वं चोरयति स्वयम्। परकीयं न चात्येव सस्यं वा रक्षितं नृणाम् ॥३५॥

ये नृपाः कृपयोन्मुक्तास्तूंघ्नन्ति बृहतः पशून्। निरपराधिनो नूनं तेऽद्य यास्यन्ति कां गतिम् ॥३६॥

अर्थ (श्लोक 35 से 36): भला देखिए तो सही कि ये गरीब हिरण न तो किसी को मारते हैं, न किसी का धन चुराते है तथा न किसी के रखे हुए अन्न और घास को ही खाते हैं। फिर भी इनके साथ में राजा लोग निर्दयता करें और इन्हें मारें यह उनका कार्य बड़ा निंद्य है। इस अपराध से परलोक में उनकी क्या


पिपीलिकास्तनौ लग्नास्तन्व्योऽपि यदि दुःखदाः । जानद्भिरिति बाणेन कथं जेघ्नीयते मृगः ॥३७॥

मृगयामृगघातेन मृग्यं पापं हि केवलम्। अतो हिंसा न कर्तव्या हिंसा सर्वत्र दुःखदा ॥३८॥

ये हिंसातः समिच्छन्ति वृषं वृषविवर्जिताः। ते गोश्रृंगात्पयः पूर्णमग्नितः कमलोद्गमम् ॥३९॥

विषाच्च जीवितं जीव्यादहिवक्त्रात्परां सुधाम्। अस्तं प्राप्ताद्रवेर्घस्रं शिलातः सस्यसंभवम् ॥४०॥

अर्थ (श्लोक 35 से 40): गति होगी, वे कहाँ जाएँगे ? जरा-सा चींटी के काटने पर अपने शरीर में जो वेदना होती है उसे जानते हुए भी आपने इस गरीब मृग को मार डाला, यह कहाँ तक उचित था। राजन्! ऐसे जीवों के घात से केवल पाप ही होता है। इसलिए हिंसा तो भूलकर भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि हिंसा सर्वत्र दुख ही देती है और जो अधर्मी हिंसा में भी धर्म मानते हैं वे गाय के सींग से दूध या आग से कमल की उत्पत्ति चाहते हैं, विष खाकर जीना और साँप के मुँह से अमृत चाहते हैं, एवं वे डूबते हुए सूरज से दिन की और शिला पर बीज बोकर अन्न की आशा करते हैं ॥३५-४०॥


इत्थं विज्ञाय भूपेन दया कार्या सुखावहा। कृपया प्राप्यते पारः संसारजलधेर्यतः ॥४१॥

इत्युक्तियुक्तिसंपत्तिं समाकर्ण्य कृपापरः। विरराम भवाद्भोगाद्देहेतो भङ्गुरात्नृपः ॥४२॥

मुधा बुधा न कुर्वन्ति किल्बिषं कामवाञ्छया। ततः केवलकालुष्याद् व्रजन्ति च दुर्गतिम् ॥४३॥

अर्थ (श्लोक 41 से 43): यह जानकर राजा लोगों को दया करना चाहिए। दया सुख को देने वाली है और दया से जीव संसार-समुद्र को पार कर जाते हैं। इस प्रकार आकाशवाणी सुनकर वह दयालु राजा क्षणभंगुर शरीर-भव-भोगों से बड़ा विरक्त हुआ। वह सोचने लगा कि काम की वाञ्छा से विद्वान् लोग व्यर्थ पाप नहीं करते क्योंकि पाप से आत्मा की केवल दुर्गति ही होती है ॥४१-४३॥


मुधा प्राणिवधेनाहो किं साध्यं मे सुखार्थिनः। किं राज्येन च सज्जन्तुघातोत्थकिल्बिषात्मना ॥४४॥

त्वयैव विषयार्थं हि प्राप्तं दुःखमनेकशः। विषयामिषदोषोऽयं प्रत्यक्षं किं न चेक्ष्यते ॥४५॥

इदं सर्वं त्वया भुक्तपूर्वं जन्तो ह्यनेकशः। पूर्वं तदेव स्वोच्छिष्टं को भुनक्ति सुधीर्भुवि ॥४६॥

अर्थ (श्लोक 44 से 46): मैं सुख को चाहता हूँ, फिर अचम्भे की बात है कि व्यर्थ ही प्राणियों के घात में क्यों प्रवृत्ति करता हूँ। इससे मुझे कुछ लाभ नहीं और न इससे मेरे उद्देश्य की ही सिद्धि होती है और जिस राज्य में जीवों के घात से पाप ही पाप होता है उस राज्य से भी मुझे क्या मिलना है। सच तो यह है कि जीवों को संसार में जितने कुछ दुख होते है वे सब विषय-कषायों को पुष्ट करने के लिये होते हैं। अतः यह सब विषय-रूप मांस खाने का ही दोष है। हे जीव, इसकी तू प्रत्यक्ष ही क्यों नहीं देख लेता। आत्मन्! तूने यह राज-काज पहले भी बहुत बार भोगा है और फिर भी तू उसी को भोगता है। विचार करके तो देख कि भला कोई बुद्धिमान् अपनी जूठन को भी दोबारा खाता है? ॥४४-४६॥


विषयैर्भृज्यमानैर्हि न तृप्तिं यान्ति देहिनः। स्वकायमथनोद्भूते रतिस्तत्र कथं नृणाम् ॥४७॥

अर्थ: एक बात यह भी है कि यह जीव विषयों को चाहे जितना ही क्यों न भोगे, पर इनसे इसे कभी संतोष नहीं हो सकता। विचारने की बात है कि शरीरों के परस्पर घिसने से जीव को भला सुख ही क्या हो सकता हैं। भोग भोगते समय विषयों से सुख के जैसा भान होता जान पड़ता है परन्तु अन्त


भुज्यमानाः सुखायन्ते विषया दुःखदायिनः। अन्ते स्वर्णफलानीव मिष्टान्यादौ स्वहान्यथ ॥४८॥

अर्थ (श्लोक 47 से 48): में दुख ही होता है, जैसे धतूरा खाने में मीठा सा मालूम होता है, पर उससे अन्त में हानि ही हानि होती है ॥४७-४८॥


नश्यन्ति विषयाः स्थित्वा चिरं नूनं यदि स्वयम्। हीयन्ते न कथं सद्भिस्त्यक्ता मुक्तिकरा यतः ॥४९॥

सुरासुरनरेन्द्राणां तृप्तिर्नो विषयैः क्वचित्। नरदेहसमुद्भूतैः कथं तृप्यन्ति ते नराः ॥५०॥

अर्थ (श्लोक 49 से 50): इसके सिवाय यह सब विषय अनित्य हैं। कुछ काल ठहर कर अन्त में सब नष्ट हो जाते हैं। तब उत्तम पुरुषों को उचित है कि वे इन्हें पहले से ही छोड़ दें क्योंकि इनके त्याग से और तो क्या मुक्ति भी मिल जाती है। विचारने की बात है कि इन विषयों से जब सुर-असुर आदि किसी को भी संतोष न हुआ तब मनुष्य-भव में प्राप्त हुए जरा से विषयों में तो इस जीव को संतोष ही कैसे हो सकता है। यह समझ में नहीं आता ॥४९-५०॥


यः सागरसुपानीयैर्वाडवस्तृप्तिमुन्नताम्। इयर्ति स्म न किं याति तृणाग्रबिन्दुतः स च ॥५१॥

पूर्वं भुक्तास्त्वयानन्तकालं ते तैश्च पूर्यताम्। इदानीमात्मसौख्येन तृप्तोऽहमस्मि सस्मयः ॥५२॥

रागोऽधिस्त्रि निजान्प्राणान्हन्ति राज्यं च रागिणः। दुर्नयाः किं न कुर्वन्ति स्वकृत्यं भोगभागिनः ॥५३॥

अर्थ (श्लोक 51 से 53): भला, सोचिए कि जो बड़वानल सागर के अनन्त जल से भी सन्तुष्ट नहीं हुआ वह तिनके के अग्रभाग में लगे हुए जल-कण से तृप्त ही क्या होगा। हे आत्मन्! तूने पहले अनंत काल तक इन भोगों को भोगा, पर तुझे तृप्ति नहीं हुई। अब तो इनसे संतुष्ट हो। इस समय मैं तो आत्म-सुख से सुखी हूँ, मुझे सन्तोष है और आत्मा के सच्चे सुख का अभिमान हैं। अब मुझे इस स्त्री-प्रेम से कुछ प्रयोजन नहीं। स्त्री के ऊपर अनुराग करके रागी पुरुष और तो क्या अपने प्राणों को भी खो बैठते है तथा राज-काज को भूल जाते हैं। सच है कि भोगों के अधीन हो मिथ्यात्वी जीव सभी अकृत्यों की अपने कृत्य बना लेते हैं ॥५१-५३॥


वक्त्रं श्लेष्माकरं स्त्रीणां दूषिकादूषिते पुनः। नेत्रे नासापुटं पूतिगन्धद्रव्यभरावहम् ॥५४॥

ईदृशे वदने मूढाश्चन्द्रबुद्धिं प्रकुर्वते। तिमिराक्षनराः किं न रज्यन्ति शुक्तिकापुटे ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 54 से 55): देखो, स्त्रियों का मुँह तो श्लेष्म (खकार वगैरह) का खजाना है, नेत्र कीचड़ जैसे घिनावने मैल के स्थान हैं, नाक घृणा को पैदा करने वाले दुर्गन्धित द्रव्य का भण्डार है। दुख है कि इस प्रकार के नारी के मुख को मूढ़ लोग चन्द्रमा कहते हैं, उसमें चाँद की बुद्धि करते हैं और है भी ठीक कि जिस पुरुष को रतौंध हो जाती है उसे सीप भी चाँदी-सी देख पड़ने लगती है ॥५४-५५॥


बालभारवहे मूढा धम्मिल्ले योषितामिति। प्रकीर्णकप्रकृत्याता मोमुह्यन्ते मदावहाः ॥५६॥

मांसपिण्डे कुचे स्त्रीणां सुधाकुम्भं नरा इति। रारज्यन्ते यथा काकाः पिशिते पिशिताशनाः ॥५७॥

अर्थ (श्लोक 56 से 57): मूर्ख लोग स्त्री के बालों को बड़ी-बड़ी सुंदर उपमाएँ देते है और मदोन्मत्त होकर उन पर मोहित होते हैं एवं मांसपिंड-रूप उनके कुचों को वे अमृत के घड़े कहते हैं और उनमें मांस-भक्षी कौओं की तरह अनुरक्त होते हैं और तो क्या कामीजन स्त्रियों के सघन जघनों में भी सुख मान कर


सुघने जघने स्त्रीणां सुखायन्ते च कामिनः। रक्ता विड्विनिवहे किं न यतन्ते सूकरा भुवि ॥५८॥

अर्थ (श्लोक 56 से 58): उनमें अनुरक्त होते हैं, जैसे विष्टा खाने वाला सूअर विष्टा में अनुरक्त रहता है और सुख मानता है ॥५६-५८॥


कीदृशं किं कियत्कुत्र जातं नारीभवं सुखम्। इत्यूहेन स्थितं सर्वं कर्दमक्षालनं यथा ॥५९॥

सप्तधातुमये काये स्वपाये बहुमायके। रारज्यन्ते कथं स्त्रीणां रामान्धा रङ्कवत्सदा ॥६०॥

निवारितापि जन्तूनां दुःफला धीः प्रवर्तते। अकृत्येऽपि न कृत्ये हि यत्नेन यतते सताम् ॥६१॥

अर्थ (श्लोक 59 से 61): इसलिए हे आत्मन्! तू जरा सा विचार तो कर कि इस जग में जीव को स्त्री-संग से कहाँ ? कैसा? और कितना सुख मिला है। इस विचार से तेरा चित्त अवश्य ही शान्त होगा, जैसे कि निर्मली आदि के निमित्त से मैला जल निर्मल हो जाता है। पहले स्त्री के इस शरीर को ही तो देख, यह सात धातुओं का पिंड है, नष्ट होने वाला और माया-जाल का स्थान है। फिर भी तू रागान्ध होकर इस पर अनुराग करता है, जैसे एक दरिद्री पुरुष मिली हुई निधि को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी समझता है। यह कैसा मोह है जो निवारण करते-करते भी खोटे कामों में जीवों की बुद्धि बड़ी जल्दी लग जाती है और अच्छे कामों में लगाये भी नहीं लगती ॥५९-६१॥


विषयत्वं विजानाति पङ्कहेतुं सतां मतिः। तथापि तत्र वर्तेत धिङ्मोहस्य विचेष्टितम् ॥६२॥

मोमुह्यन्ते नरा मोहात्सीमन्तिन्याः शरीरके। असद्वस्तुनि सद्बुद्ध्या प्रतार्यन्ते हताशयाः ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 62 से 63): अचम्भे की बात तो यह है कि सज्जनों की मति विषयों को पाप के हेतु जानती हुई भी उनमें प्रवृत्ति करती है। मोह की इस प्रबल चेष्टा को धिक्कार है। इस मोह से ही जीव अपने आपको भूल जाते हैं और स्त्री के घिनावने शरीर में मोहित हो जाते हैं। जिनके अभिप्राय खोटे हैं, मोहित है, वे असद्वस्तु में सद्बुद्धि करके ठगे जाते हैं ॥६२-६३॥


दशाननादिभूपानां स्त्रीनिमित्तं हि केवलम्। मरणं राज्यनिर्णाशिश्चासीद्दुर्गतिरुत्तरा ॥६४॥

क्व यामः किं वयं कुर्मः क्व तिष्ठामः कुतः सुखम्। कुतो लभ्या मया लक्ष्मीः कः सेव्यो नृपतिः पुनः ॥६५॥

का स्त्री स्वरूपसौभाग्या किं भोग्यं भोगभूतये। को रसो रसनास्वाद्यः किं वस्तु मम कार्यकृत् ॥६६॥

हनिष्यामि कदा शत्रुं मोहेनेति महीयसा। चिन्तन्ति दुर्मतिं नीता विकल्पव्रातवञ्चिताः ॥६७॥

अर्थ (श्लोक 64 से 67): देखो, रावण आदि ने केवल परस्त्री को हरण करने-रूप अपने खोटे अभिप्राय ही से अपना राज खोया और परलोक में दुर्गति पाई। मोह के निमित्त से जब जीव मोहित होता है तब उसके हृदय पर दुर्मति अपना असर जमा लेती है और वह भाँति-भाँति के विकल्प-जालों में पड़ जाता है। वह विचारता है कि कहाँ जाऊँ और क्या करूँ ? कहाँ ठहरूँ ? मुझे सुख कहाँ मिलेगा ? मैं लक्ष्मी कहाँ से प्राप्त कर सकूँगा ? इसके लिए मुझे किस लक्ष्मी के लाल राजा महाराजा की सेवा करनी पड़ेगी? स्वरूप सौभाग्य वाली स्त्री कैसी होती है और मेरा भोग्य क्या है ? भोग, विभूति मैं कैसे भोग सकूँगा? रसना इन्द्रिय का विषय रस क्या ही अच्छी चीज है। और-और इन्द्रियों के विषय भी मनोहर है। मेरे मनोरथ को कौन सी वस्तु सिद्ध करेगी, मैं शत्रु को कब मारूँगा ॥६४-६७॥


एणः क्षीणः क्षणेनायं स्वैणीप्राणप्रियो मया। हतात्मना हतो हन्त करिष्ये किमहं शुभम् ॥६८॥

चिन्तयन्निति दुश्चिन्तश्चिन्त्यचेतनमुक्तधीः। यावदास्ते समासीनो दिशां पश्यन्विशांपतिः ॥६९॥

अर्थ (श्लोक 68 से 69): पाण्डु सोचता है कि मुझ हतात्मा ने इस विचारी मृगी के प्राण-प्यारे हिरण को एक क्षण में ही धराशायी कर दिया, यह बहुत ही बुरा काम किया। अब मैं आगे कौन-सा शुभ कार्य करूँ, जिसके द्वारा इस पाप से मेरा पिंड छूट सके। पाण्डु इस प्रकार विचार करता-करता बेहोश हो गया, उसे अपनी कुछ भी सुधबुध न रही। कुछ काल बाद जब उसे कुछ चेत आया तब इधर-उधर भ्रमिष्ट-सा देखने लगा ॥६८-६९॥


तावता सुव्रतो योगी व्रतव्रातविराजितः। इद्धावधिपरिज्ञातनानालोकस्थितिः स्थिरः ॥७०॥

गुप्तिगुप्तः सुगुप्तात्मा समितिस्थितिसंगतिः। षट्सुजीवनिकायानां पालकः परमोदयः ॥७१॥

चिदात्मचिन्तनासक्तो विमुक्तो भवभोगतः। अनुप्रेक्षाक्षणासक्तो निर्विपक्षः समक्षधीः ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 70 से 72): इतने ही में उसे एक योगी के पवित्र दर्शन हुए। उनका नाम था सुव्रत। वे व्रतों से युक्त थे, दीप्त अवधिज्ञान से तमाम लोक की परिस्थिति को जानते थे, स्थिर-चित्त थे, गुप्ति-समिति को पालने वाले आत्म-संयमी थे, छह काय के जीवों के प्रतिपालक और परमोदय को प्राप्त थे, हमेशा ही आत्मचिंतन में लगे रहने वाले और संसार-देह-भोगों से विरक्त थे, बारह भावनाओं में लीन और शत्रु-रहित थे, प्रत्यक्ष बुद्धिशाली और अखण्ड लक्षणों से लक्षित थे ॥७०-७२॥


अक्षूणलक्षणैलक्ष्यः क्षपणाक्षीणविग्रहः। निर्जिताक्षः क्षमाकांक्षी सुपक्षोऽक्षयसौख्यभाक् ॥७३॥

दुर्लक्ष्यः स्त्रीकटाक्षेण क्षान्त्या क्षोणीं क्षिपन्नपि। मोक्षाक्षयसुक्षेत्रस्य कांक्षकः क्षिप्तकल्मषः ॥७४॥

अर्थ (श्लोक 73 से 74): उनका शरीर उपवास आदि कायक्लेश से क्षीण हो गया था। वे जितेन्द्रिय और क्षमा के भण्डार थे। उनका पक्ष उत्तम था। वे अक्षय सुख के भोक्ता थे। स्त्रियों के कटाक्ष-बाणों के वे कभी लक्ष्य नहीं होते थे। लोग कहते हैं कि पृथिवी में बड़ी भारी क्षमा है परन्तु उनमें उससे भी कहीं बढ़कर क्षमा थी। उन्होंने अपने क्षमागुण से पृथिवी को नीचा दिखा दिया था। मोक्ष-रूप अक्षय-क्षेत्र की उन्हें सदा आकांक्षा रहती थी। उन्होंने पापों पर विजय पा ली थी ॥७३-७४॥


क्षणे क्षणे क्षयं कुर्वन्कर्मणां क्षपिताक्षकः। दक्षः क्षेमंकरोऽक्षोभ्याक्षीणो रक्षाक्षराढ्यवाक् ॥७५॥

अक्षेमक्षेपको मङ्क्षु साक्षाद्भिक्षुः क्षितीशनुत्। क्षप्यपक्षक्षयोद्युक्तो दीक्षितः क्षणलक्षणः ॥७६॥

ईदृक्षस्तु क्षितीशेन वीक्षितः क्षणदाक्षये। पूषेव पुष्टिमाप्तेन धराक्षिप्तशस्त्रकेन च ॥७७॥

अर्थ (श्लोक 75 से 77): प्रतिक्षण कर्मों को क्षीण करते हुए उन्होंने इन्द्रियों को बिल्कुल ही क्षीण कर डाला था। वे दक्ष थे, क्षेमंकर और क्षोभ-रहित थे। उनके वचन पाप को हरने वाले थे। वे साक्षात् भिक्षु थे। बड़े-बड़े राजा महाराजा भी उनके पैरों पड़ते थे। वे दीक्षित थे, कर्म-शत्रुओं को नष्ट करने के लिये सदा उद्यत रहते थे और बड़े उत्साही थे। इस समय रात बीत चुकी थी और सूरज के उदय का समय था, अतः वे अपने शरीर के तेज से ऐसे जान पड़ते थे मानों कि सूरज ही हैं ॥७५-७७॥


चतुर्विधेन संघेन युक्तस्य च महामुनेः। पादपद्मं ननामाशु प्रचण्डः पाण्डुपण्डितः ॥७८॥

अर्थ: इसके सिवाय वे चार प्रकार के संघ से युक्त थे। उन्हें देखते ही पाण्डु उनके चरण कमलों में


धर्मवृद्ध्याशिषाशास्य संयमी नृपसत्तमम्। धराधीशं धरायां च निविष्टं पुरतो जगौ ॥७९॥

राजन्संसारकान्तारे संसरन्ति शरीरिणः। न लभन्ते स्थितिं क्वापि परां पयोरघट्टवत् ॥८०॥

वृषो वृषार्थिभिः सेव्यः स तत्र द्विविधो मतः। अनगारसुसागारभेदेन भवभङ्गकृत् ॥८१॥

अर्थ (श्लोक 78 से 81): पड़ गया और नमस्कार कर अपने योग्य स्थान में बैठा। मुनि ने धर्मवृद्धि देकर राजाओं के राजा पाण्डु से कहा कि राजन्! इस संसार-वन में जीव हमेशा ही चक्कर लगाया करते है; कहीं कभी भी स्थिर नहीं हो पाते, जैसे अरहट की घड़ी कभी भी ठहर नहीं पाती-हमेशा ही चला करती है। इसलिए जो पुण्य के अर्थी है उन्हें सदा धर्म-सेवन करना चाहिए। धर्म के दो भेद है। एक मुनिधर्म और दूसरा श्रावकधर्म। धर्म से संसार-परिभ्रमण छूट जाता है ॥७८-८१॥


महाव्रतानि पञ्चैव गुप्तयस्त्रिविधाः स्मृताः। सत्यः समितयः पञ्च यतिधर्म इति स्फुटम् ॥८२॥

प्राणिनां तत्र षण्णां च रक्षणं मनसा तथा। वचसा वपुषाख्यातं प्रथमं स्यान्महाव्रतम् ॥८३॥

असत्यं वचनं क्वापि न वक्तव्यं शुभार्थिभिः। हितं मितं च द्वितीयं वक्तव्यं स्यान्महाव्रतम् ॥८४॥

अदत्तं परकीयं च न ग्राह्यं वस्तु सद्धिया। तृतीयव्रतयुक्तेन यतोऽनर्थः परार्थतः ॥८५॥

देवमानुषसंतैर्यक्कृत्रिमाश्च स्त्रियो मताः। चतुर्थास्ते निवृत्त्या चतुर्थं तन्महाव्रतम् ॥८६॥

दशबाह्योपधेश्चान्तश्चतुर्दशपरिग्रहात्। निवृत्तिः क्रियते या तत्पञ्चमं स्यान्महाव्रतम् ॥८७॥

रौद्रार्त्तसुरताहारपरलोकविकल्पनम्। यच्चेतसि न चिन्त्येत मनोगुप्तिस्तु सा मता ॥८८॥

स्त्रीकथादिविभेदेन विकथा वाग्विचक्षणैः। उक्ता ततो निवृत्त्या सा वचोगुप्तिरिष्यते ॥८९॥

चित्रादिकर्मणा कायो विकृतिं याति न क्वचित्। कायगुप्तिस्तु सा ख्याता क्षिप्तदुःकर्मशत्रुभिः ॥९०॥

अर्थ (श्लोक 82 से 90): पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति यह तेरह प्रकार का यतिधर्म है। छह काय के जीवों की मन, वचन और काय से रक्षा करना अहिंसामहाव्रत है। असत्य वचन न बोलकर हित-मित वचन बोलना सत्यमहाव्रत है। अनर्थकारी अदत्त द्रव्य को ग्रहण नहीं करना अचौर्यमहाव्रत है। देवता, मनुष्यनी, तिर्यञ्चनी और चित्र की स्त्री इन चारों के त्याग को ब्रह्मचर्यमहाव्रत कहते हैं। चौदह प्रकार के अन्तरंग और दस प्रकार के बाह्य परिग्रह का त्याग करना परिग्रहत्याग महाव्रत है। रौद्र, पीड़ा, रति, आहार और इस लोक परलोक का विकल्प मन में न उठाना मनोगुप्ति है। चार प्रकार की विकथा का न करना वचन-गुप्ति है। चित्र आदि की क्रियाओं द्वारा काय में विकार न होने देना कायगुप्ति है ॥८२-९०॥


सूर्योदये पथि क्षुणे वीक्षिते जन्तुमर्दिते। युगमात्रं गतिर्या तु सेर्यासमितिरुच्यते ॥९१॥

कर्कशादिविभेदेन दशधा वचनं स्मृतम्। तन्निवृत्तिः क्षितौ ख्याता भाषासमितिरुच्यते ॥९२॥

षट्चत्वारिंशता दोषैर्मुक्तो न्यादपरिग्रहः। विधीयते मुनीन्द्रैर्या सैषणासमितिर्मता ॥९३॥

अर्थ (श्लोक 91 से 93): जब सूरज निकल आये और मार्ग में लोग आने-जाने लगें तब चार हाथ पृथ्वी शोधकर, जीव जन्तुओं की दया करते हुए चलना ईर्यासमिति है। कर्कश आदि दस प्रकार के वचनों का त्याग करना भाषासमिति है। छियालीस दोषों को टालकर निर्दोष आहार लेने को एषणासमिति कहते हैं। पीछी,


आदानं क्षेपणं यद्वोपधीनां संविधीयते। सन्मार्ज्य वीक्ष्य सादाननिक्षेपसमितिर्मता ॥९४॥

श्लेष्ममूत्रमलादीनां क्षेपणं यद्विधीयते। निर्जन्तुके प्रदेशे च सा प्रतिष्ठापना भवेत् ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 91 से 95): कमण्डलु आदि उपकरणों को देख-सोधकर उठाना-धरना आदान-निक्षेपणसमिति है। खकार, मल, मूत्र वगैरह को जीव-जन्तु रहित प्रदेश में क्षेपना प्रतिष्ठापना समिति है ॥९१-९५॥


एवं विस्तरतो वाग्मी यतिधर्ममुवाच च। तथैवोपासकाचारं चरतां तं च नाकिताम् ॥९६॥

पुनर्योगी जगौ राजंस्तस्मिन्धर्मे रतिं कुरु। यतः स्वर्गसुखावाप्तिनिर्वाणं क्रमतो भवेत् ॥९७॥

किंचायुस्तव सुस्वल्पं त्रयोदशदिनावधि। सावधानो विधानज्ञो विधेहि विधिवद्वृषम् ॥९८॥

विशुद्ध्या धिया धत्ते धर्मं यो विधिवद् ध्रुवम्। धृतियुक्तः सुधीः प्रोक्तो विशुद्धः सोऽवधारितः ॥९९॥

अर्थ (श्लोक 96 से 99): इस प्रकार उन वाग्मी मुनि ने विस्तार से यतिधर्म को कहा और इसी तरह श्रावकधर्म को भी बताया और कहा कि यतिधर्म से मोक्ष और श्रावक धर्म से स्वर्ग मिलता है। अतः राजन्! तुम इस धर्म में मन लगाओ क्योंकि धर्म से ही स्वर्गसुख की प्राप्ति होती है और क्रम से मोक्ष भी मिलता है। अब तुम्हारी आयु केवल तेरह दिन की शेष रह गई है, इसलिए तुम सावधान हो जाओ। तुम तो सब जानते समझते हो, चतुर हो, इसलिए बहुत जल्दी विधिपूर्वक धर्म को धारण करो। देखो, विशुद्ध परिणामों से जो विधिपूर्वक धर्म को धारण करता है वह धैर्यशाली और बुद्धिमान् अपने आत्मा को निर्मल बना लेता है ॥९६-९९॥


निशम्येति यतेर्वाचं चलचेताश्चलात्मकः। चञ्चूर्यमाणोऽसातेन पाण्डुरासीद्भयातुरः ॥१००॥

क्षणं क्षणिकमावीक्ष्य जीवितं जीवनोत्सुकम्। नृपः स्वसंपदं मेने क्षणिकां ह्रादिनीमिव ॥१०१॥

ततश्चित्ते समालम्ब्य स्थैर्यं स्थिरमना मुनिम्। नत्वा स्तुत्वा चचालासौ चालयन्नचलां चिरम् ॥१०२॥

पाण्डुस्तु पाण्डुराकारः समाट सदनं निजम्। पापभीतिः परां प्रीतिं कुर्वञ्छ्रेयसि संमतः ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 100 से 103): इस प्रकार मुनि के वचनों को सुनकर चंचल-चित्त पाण्डु असाता के कारण संसार से बहुत डरा और अनन्त जीवन के लिए उत्सुक हो उसने क्षणिक जीवन पर कुछ काल विचार किया। वह सम्पत्ति को बिजली की तरह चंचल समझने लगा। इसके बाद स्थिर-चित्त से मुनि को नमस्कार कर तथा उनकी स्तुति कर वह वहाँ से अपने नगर को चला आया। वह पाप से बहुत ही डर गया था और इसलिए उसके हृदय में मोक्ष से पूरी-पूरी प्रीति हो गई थी ॥१००-१०३॥


धृतराष्ट्रादयस्तेन समाहूताः स्वमन्दिरे। ततः स मुनिवक्त्रोत्थं वृत्तान्तं समचीकथत् ॥१०४॥

निशम्य ते महादुःखा रुरुदुर्हृदि ताडिताः। असिनेव हता हन्त विलापमुखराननाः ॥१०५॥

मुमूर्च्छुर्मङ्गलातीता बाष्पप्लावितलोचनाः। कुन्त्यादयोऽखिला बाला मुक्ताश्चेतनया यथा ॥१०६॥

अर्थ (श्लोक 104 से 106): उसने धृतराष्ट्र वगैरह को अपने महल में बुलाया और मुनि के मुख-कमल से सुना हुआ सारा का सारा हाल जैसा का तैसा कहा। पाण्डु के कहे हुए इस सब हाल को सुन कुन्ती वगैरह तो इस प्रकार रोने लगी मानों उनके ऊपर वज्र ही टूट पड़ा है, उनके हृदय दहल गये। वे विलाप करने लगीं। उनकी आँखों से अनवरत आँसुओं की धारा बह निकली। सभी दुखमय हो गईं। उन्हें मूर्च्छा आ गई।


शीतोपचारतो लब्धचेतनाश्चिन्तयाकुलाः।
इतिकर्तव्यतामूढा गूढासातसमन्विताः ॥१०७॥

अर्थ (श्लोक 104 से 107): इसके बाद वे ऐसी देखने लगीं मानों उनमें से चेतना विदा ही ले गई हो। शीतोपचार वगैरह उपाय किये जाने पर उनमें चेतना आई परन्तु उनकी चिन्ता तब भी न गई और उसके मारे वे किंकर्तव्य विमूढ़-सी रह गई। तात्पर्य यह है कि उस समय वे असाता के सागर में डूब गई थीं ॥१०४-१०७॥


ततः पाण्डुरभाषीत्तान्समाश्वास्य वचोभरैः।
श्रूयतामवधानेन भवद्भिर्वचनं मम ॥१०८॥

संसारे सरतां पुंसां जननं मरणं तथा।
संबोभोति च किं दुःखं मरणे समुपस्थिते ॥१०९॥

भूभारं भरतो मुक्त्वा जित्वा जेयाञ्जयोद्धुरः।
कालेन कलितः सोऽपि कालोऽयं बलवानिह ॥११०॥

जयो जयञ्जनान्युक्त्या मेघेश्वरसुरानपि।
सोऽपि कालकलातीतो मुक्त्वा प्राणाञ्शिवं ययौ ॥१११॥

अर्थ (श्लोक 108 से 111): इसके बाद पाण्डु ने उन्हें आश्वासन देकर कहा कि तुम सब सावधान हो मेरे वचन सुनो। इस संसार-चक्र में चक्कर लगाने वाले ये जीव हमेशा ही जन्म-मरण किया करते हैं। तब उत्पन्न होने और मरण करने में तुम दुख क्यों करती हो। यह क्या कोई नई बात है। देखो कि जिस भरत चक्रवर्ती ने तमाम भूमण्डल को अपने बाहुबल से जीतकर भोगा वह भी जब काल से न बचा और उसका सेनापति-रत्न जयकुमार जिसने सारे संसार को जीतकर मेघेश्वर देवताओं पर भी विजय पाई-काल वली की कलाओं द्वारा अपने प्राणों का त्यागकर शिव को गया तब हमारी तुम्हारी तो बात ही क्या है ॥१०८-१११॥


कुरुः कवलयन्सर्वं कुरुवंशनभोमणिः।
कवलीकृत्य कालेन कलितः सोऽपि कर्मणा ॥११२॥

संसरन्तः सदा सन्तः संसारेऽसातसागरे।
सनातना न दृश्यन्तेऽप्येवं शोकेन तत्र किम् ॥११३॥

के के गता न संभुज्य भुवं भोगहताशयाः।
कास्था ममात्र भोगादौ निःशेषविगतायुषः ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 112 से 114): यहाँ तो काल ही बली है, उसके आगे किसी की भी नहीं चलती और भी देखो कि जिस कुरुवंश-शिरोमणि कुरु राजा ने सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश किया, पर काल-शत्रु ने उसका भी ग्रास कर लिया, उससे वह भी न बच सका। सच बात तो यह हैं कि इस असाता-रूप संसार में चक्कर लगाता हुआ कोई भी सत्पुरुष सनातन नहीं देख पड़ता, फिर व्यर्थ शोक करने से लाभ क्या हो। बताओ तो सही कि इस पृथ्वी को भोगकर कौन-कौन नहीं चले गये और यहाँ किस-किस का हृदय भोगों से हताश नहीं हुआ। अब जबकि मेरी बिल्कुल ही थोड़ी-सी आयु रह गई हैं तब मैं भोगों का क्यों विश्वास करूँ, मुझे तो उनका छोड़ना ही उचित जान पड़ता हैं ॥११२-११४॥


इन्दिरामन्दिराण्युग्र सुन्दराणि सुदन्तिनः।
सुदत्य इन्दुवदनाश्चन्दनादीनि वीतयः ॥११५॥

सर्वमेतद्विनिश्चेयं निश्चयेन चलात्मकम्।
कात्र स्थितमतिः प्रातस्तृणाग्रलग्नबिन्दुवत् ॥११६॥

एवं संबोध्य बोधात्मा बुद्धः संशुद्धमानसः।
बुधांस्तान्संदधे धर्मे बुद्धिं धीधनवर्धितः ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 115 से 117): लक्ष्मी, महल, चन्द्रवदनी स्त्रियाँ, हाथी और घोड़े वगैरह ये सब निश्चय से चंचल-अस्थिर हैं। भला, सबेरे के वक्त तिनकों के आगे के भाग में जो ओस की बूँदें लगी रहती हैं उनमें कौन मूढ़ स्थिरता की बुद्धि करेगा। इस प्रकार सबको समझा बुझाकर ज्ञानी पाण्डु पंडित ने शुद्ध मन हो, धन


जिनपूजनसंसक्तस्ततः श्रीजिनपुङ्गवान्। पाण्डुः संपूजयामास भक्तिनिर्भरमानसः ॥११८॥

अष्टधार्चनमादायापूजयत्पापभीतधीः। जिनान्संगीतनृत्याद्यैः कृत्वा क्षणभरं क्षणात् ॥११९॥

सधर्मिभ्यो ददद्वित्तं चतुर्धा दानतत्परः। संतोष्य सर्वतः सर्वानभवद्भवभेदकः ॥१२०॥

अर्थ (श्लोक 115 से 120): वगैरह से बुद्धि को हटाकर धर्म में चित्त लगाया। उस समय पाण्डु ने भक्तिभाव से जिन भगवान् की पूजा की और पाप से भयभीत हो जिनपूजा के साथ-साथ खूब नृत्य-गान आदि उत्सव किया, साधर्मी जनों को चार प्रकार का दान दिया, दीन-दुखी जीवों को संतुष्ट किया और अन्य सबको भी यथायोग्य संतुष्ट कर वह भव भेदने के लिए तैयार हुआ ॥११५-१२०॥


समाहूय सुतान्पञ्च धर्मपुत्रादिकांस्तदा। दत्तराज्यभराक्रान्तान्धृतराष्ट्राय सोऽर्पयत् ॥१२१॥

पालनीयाः सुता मेऽद्य त्वत्पुत्रसुधिया त्वया। युधिष्ठिरादयो नूनं कुरुवंशं सुरक्षता ॥१२२॥

कुन्त्याः सोऽदाच्छुभां शिक्षां पुत्रपालनहेतवे। निर्विण्णो भवभोगेषु परलोकहितोद्यतः ॥१२३॥

अर्थ (श्लोक 121 से 123): इसके बाद उसने अपने युधिष्ठिर आदि पाँचों पुत्रों को बुलाया और उन्हें राजभार से विभूषित कर तथा धृतराष्ट्र के हवाले कर धृतराष्ट्र से कहा कि भाई, तुम इन मेरे पुत्रों को अपने पुत्र ही समझकर इनका पालन-पोषण करना। आपसे अधिक कहने सुनने की आवश्यकता नहीं है, आप कुरुवंश के रक्षक हैं। इसके बाद उसने पुत्रों के पालन-पोषण के सम्बन्ध में कुन्ती को भी उचित शिक्षा दी और वह संसार-देह-भोगों से बिल्कुल ही उदास हो परलोक साधन के लिए तैयार हो गया ॥१२१-१२३॥


युधिष्ठिरादिसूनूनां रुदतामतिमोहिनाम्। स्वराज्यस्थितये शिक्षां ददौ पाण्डुरखण्डवाक् ॥१२४॥

कुरुजान् गोत्रिणो वंश्यान्क्षान्त्वा पाण्डुः क्षमापयन्। निर्ययौ गेहतो हित्वा गेहस्नेहपरिग्रहान् ॥१२५॥

इयाय जाह्नवतीरमजिह्यब्रह्मवेदकः। तत्र स प्रासुके देशे संन्यस्यास्थात्स्थिरव्रतः ॥१२६॥

यावज्जीवं कृताहारशरीरत्यागसंगतः। वीरशय्यां समारुक्षदमूढो गुरुसाक्षिकम् ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 124 से 127): इस समय मोह के वश ही युधिष्ठिर आदि सभी रोने लगे। पाण्डु ने उन्हें भी अपने राज्य को यथावत् पालने के सम्बन्ध में समझाया। इसके बाद उस चतुर ने अपने कुटुंब के सब लोगों से क्षमा माँगी और अपनी ओर से सबको क्षमा किया तथा परिग्रह वगैरह की छोड़कर, घर से बाहर हो, वह वन की ओर चल दिया। वह आत्म-वेदी गंगा-तट पर गया और वहाँ एक प्रासुक प्रदेश में संन्यास धारण कर स्थिरता के साथ बैठ गया। उसने आजन्म के लिए आहार, शरीर आदि का त्यागकर ज्ञानी गुरु के निकट वीरशय्या स्वीकार की ॥१२४-१२७॥


आरुह्याराधनानावं भवाब्धिं तर्तुमिच्छुकः। सर्वसत्त्वेषु समतां भावयन्भावतत्परः ॥१२८॥

मैत्रीं सर्वत्र जीवेषु प्रमोदं गुणिषु व्यधात्। माध्यस्थ्यं विपरीतेषु कृपां क्लिष्टेषु भूपतिः ॥१२९॥

अर्थ (श्लोक 128 से 129): इस वक्त वह आराधना-रूप नौका पर चढ़कर संसार-समुद्र को पार करने की इच्छा रखता था। वह सब जीवों पर हमेशा समताभाव रखता था, सब जीवों से मैत्री रखता था, गुणी पुरुषों को देखकर बड़ा आनन्दित होता था और विपरीत आचरण करने वाले पर मध्यस्थ-उदासीन रहता था। वह दीन-दुखी जीवों पर दया करता था। उसका मन बिल्कुल स्वच्छ था। उसने प्रायोपगमन संन्यास


प्रायोपगमनं कृत्वा वीरः स्वपरगोचरान्। उपकाराञ्शरीरेऽसौ नैच्छत्स्वच्छसुमानसः ॥१३०॥

अर्थ (श्लोक 128 से 130): धारण किया। वह अपने शरीर की किसी के द्वारा या अपने आप सेवा-टहल नहीं चाहता था ॥१२८-१३०॥


तीव्रं तपस्यतस्तस्य तनुत्वमगमत्तनुः। तस्यावर्धिष्ट सद्भावो ध्यायतः परमेष्ठिनः ॥१३१॥

सोपवासस्य गात्राणां परं शिथिलताजनि। न कृतायाः प्रतिज्ञाया व्रतं हि महतामिदम् ॥१३२॥

रसक्षयादभूत्कार्श्यं तस्य देहे शरद्धने। यथा स मांसनिर्मुक्तदेहः सुर इवाबभौ ॥१३३॥

अर्थ (श्लोक 131 से 133): घोर तप करने से उसका शरीर बड़ा कृश हो गया था। पंच परमेष्ठी का सदा काल ध्यान करने से उसका हृदय उत्तम-उत्तम भावों का स्थान हो गया था। उपवास आदि द्वारा उसका शरीर ही कृश हुआ था, पर की हुई प्रतिज्ञा एक भी शिथिल न हुई थी और ऐसा ही होना भी चाहिए क्योंकि वास्तव में उत्तम पुरुषों का व्रत वही है जो कभी भंग न हो। तप के बल से शरद्ऋतु के मेघों की तरह उसका स्वच्छ और सफेद शरीर कृश हो गया था, अतः वह ऐसा देख पड़ता था मानों मांस आदि से रहित स्वच्छ शरीर वाला सुर ही है ॥१३१-१३३॥


त्वगस्थीभूतकायोऽसौ व्यजेष्ट यत्परीषहान्। व्यक्तं महाबलं तस्य तदासीद्ध्यानयोगतः ॥१३४॥

मूर्ध्नि सिद्धाञ्जिनांश्चित्ते मुखे साधूंस्त्वचक्षुषि। दधौ स परमात्मानं सद्ध्यानी ध्यानयोगतः ॥१३५॥

अश्रौषीच्छ्रवणे मन्त्रं जिह्वया स तमापठत्। चेतोगर्भगृहे हन्त निधायाशु निरञ्जनम् ॥१३६॥

अर्थ (श्लोक 134 से 136): उसके शरीर में केवल चर्म और हड्डी रह गई थी, मांस नाम मात्र को भी न था। दुर्द्धर परीषहों को सहने से उसका आत्मबल प्रकट हो गया था। सच पूछो तो यह सब ध्यान का ही प्रभाव था। वह ध्यानी ध्यान के बल से हमेशा मस्तक पर सिद्धों को, मन में, जिनों को, मुँह में साधुओं को, नेत्रों में परमात्मा को धारण किये रहता था। कानों से मंत्रों को सुनता था और जीभ से उन्हें बोलता था। वह अपने मनोगृह में सदा निरंजन अर्हन्तदेव को विराजमान किये रखता था ॥१३४-१३६॥


असेः कोशादिवान्यत्वं कायाज्जीवस्य चिन्तयन्। चिन्तितात्मा निजान्प्राणानौज्झत्स मन्त्रवेदकः ॥१३७॥

देहभारमथो मुक्त्वा लघूभूत इवोन्नतः। स धर्मी कल्पसौधर्मं प्राग्दृष्टमिव चागमत् ॥१३८॥

तत्रोपपादशय्यायामुदपादि महोदयः। निरभ्रे गगने सोऽपि तडित्वानिव सोद्यमः ॥१३९॥

नवयौवनसंपूर्णः सर्वलक्षणलक्षितः। सुप्तोत्थित इवाभाति स तथान्तर्मुहूर्तः ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 137 से 140): जिस तरह म्यान से तलवार जुदी होती है, उसी तरह वह शरीर से आत्मा को जुदा समझता था। ऐसी अवस्था में ही उस मंत्र-वेदी ने अपने प्राणी का त्याग किया। वह देह-भार से हल्का हो, धर्म के फल से सौधर्म स्वर्ग में गया। वहाँ उसने मेघ-रहित आकाश में बिजली की तरह, एक अन्तर्मुहूर्त में, नवयौवन परिपूर्ण, सब लक्षणों से लक्षित शरीर धारण कर उपपादशय्या में सोते से उठ-बैठने के जैसा जन्म धारण किया ॥१३७-१४०॥


केयूरकुण्डलोपेतो मुकुटाङ्गदभूषणः। सदंशुकधरः स्रग्वी समभूत्स घनद्युतिः ॥१४१॥

अर्थ: वह केयूर, कुंडल, मुकुट और अंगद आदि भूषणों से विभूषित था, दिव्य वस्त्र पहिने था,


तदा कल्पद्रुमैर्मुक्ता पुष्पवृष्टिरवापतत्। तथा दुन्दुभयो नेदुर्नादान्संरुद्धदिक्तटान् ॥१४२॥

सुगन्धः शीतलो वायुर्वावाम्बुकणानकिरन्। दिक्षु व्यापारयन्दृष्टिं ततोऽसौ वलितां दधौ ॥१४३॥

किमेतत्परमाश्चर्यं कोऽस्मि के मां नमन्त्यहो। नरीनृत्यति का एता इत्यासीद्विस्मितः क्षणम् ॥१४४॥

अर्थ (श्लोक 141 से 144): सुन्दर-सुंदर मालायें उसके गले में पड़ी हुई थीं। उसके शरीर की कान्ति दिव्य थी। उस समय उस पर कल्प-वृक्षों ने दिव्य फूलों की बरसा की। दुंदुभि बाजे बजे, जिनके शब्द से दिशाओं के तट गूंज उठे। सुगन्धित शीतल वायु जलकणों को फेंकती हुई बही, जिसके सम्बन्ध से इधर-उधर सब दिशाओं में दृष्टि फैलाता हुआ वह बल को प्राप्त हुआ और सोचने लगा कि यह सब क्या है ? स्वप्न तो नहीं है ? मैं कौन हूँ ? और मुझे जो ये आ-आकर नमस्कार करते हैं, कौन हैं ? ये नृत्य करने वाली स्त्रियाँ कौन हैं ? इस प्रकार विचार कर वह क्षणभर चकित-सा रह गया ॥१४१-१४४॥


आयातोऽस्मि कुतः किं वा स्थानमेतत्प्रसीदति। मनो ममाश्रमः कोऽयं शय्यातलमिदं किमु ॥१४५॥

इति संध्यायतरस्तस्यावधिबोधः समुद्ययौ। तेनाबुद्धामरः सर्वं क्षणात्पाण्डवादिवृत्तकम् ॥१४६॥

अये तपःफलं दिव्यमयं लोकोऽमरालयः। प्रणामिन इमे देवा विमानमिदमुन्नतम् ॥१४७॥

अर्थ (श्लोक 145 से 147): वह फिर विचार करने लगा कि मैं कहाँ से आया हूँ ? और यह कौन स्थान है ? इसको देखकर मेरा मन बहुत ही प्रसन्न हो रहा है, यह क्या बात है ? यह किसका आश्रय है ? और यह शय्या कैसी है ? उसके मन में इस प्रकार की उथल-पुथल हो ही रही थी कि उसे उसी समय अवधिज्ञान हो गया, जिसके द्वारा उसने पाण्डवों का सब हाल जान लिया और यह भी जान लिया कि मुझे यह तप का फल मिला है, यह दिव्य है। यह देवताओं का स्थान स्वर्ग है। ये जो-नमस्कार करते हैं देव हैं और यह देवताओं का विमान है ॥१४५-१४७॥


देव्यो मञ्जुगिरश्चैता मणिभूषणभूषिताः। एता अप्सरसः स्फारं स्फुरन्ति स्फुटनाटकाः ॥१४८॥

गायन्ति कलगीतानि मन्द्रोऽयं मुरजध्वनिः। इति निश्चितवान्सर्वं भवप्रत्ययतोऽवधेः ॥१४९॥

अर्थ (श्लोक 148 से 149): मधुर बोलने वाली ये देवियाँ हैं, जो मधुर-मधुर गीत गाती और नाचती हैं। ये मणियों के भूषणों से विभूषित अप्सरायें हैं। सारांश यह कि उसने अवधिज्ञान से अपनी सब शंकाओं का आप ही समाधान कर लिया। अहा ! यह सुन्दर ध्वनि वाली मद्री है। मद्री भी उसी जगह देवी हुई थी यह बात आगे यहीं स्पष्ट हो जायेगी ॥१४८-१४९॥


ततो नियोगिनो नम्रा अमर्त्या मौलिपाणयः। ते तं विज्ञप्तिमुन्निद्राश्चरीक्रति कृतोन्नतिम् ॥१५०॥

भजस्व प्रथमं नाथ सज्जं मज्जनमुत्तमम्। यतोऽर्चां श्रीजिनेन्द्राणां विधेहि विधिना बुध ॥१५१॥

इदं दैवं बलं देव वीक्षस्व क्षणसंकुलम्। प्रेक्षागृहं च वीक्षस्व ततः संप्रेक्ष्यमुद्ध्वजम् ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 150 से 152): इसके बाद आज्ञाकारी, नम्र और प्रफुल्ल-चित्त देवता-गण हाथ जोड़ नमस्कार कर उस उन्नत देव से बोले कि प्रभो ! पहले स्नान करके तैयार होइए और विधिपूर्वक जिनेन्द्रदेव की भक्तिभाव से पूजा कीजिए। देव ! देखिए यह देवताओं का समुदाय आप जैसे स्वामी को पाकर आज कैसा उत्सव मना रहा है। यह सब आपकी सेना के देव है। यह फहराती हुई ध्वजाओं से विभूषित नृत्यगृह है।


विलोक्यामराधीश नर्तकीर्नृत्यसंगताः।
सभासा भूषणाभासा देवीर्देवाद्य सत्कुरु ॥१५३॥

देवत्वस्य फलं चैतत्संप्राप्तं हि त्वयाधुना।
इति तद्वचसा सर्वमेतत्तूर्णं व्यधाद् बुधः ॥१५४॥

इति सातं भजन्भोगान्भेजेऽसौ सुरभूभवान्।
भव्यो भक्तिं जिनेन्द्राणां तन्वानः सुखसंश्रितः ॥१५५॥

अर्थ (श्लोक 150 से 155): इसे भी देखिये, यह देखने के ही योग्य है। प्रभो, यह देखो, ये भाँति-भाँति के आभूषणों से सुशोभित नर्तकियाँ कैसा सुन्दर नाच कर रही हैं। हे अमरेश्वर ! आप इस समय इस विभूति के स्वामी हुए हैं और यह सब आपने देवत्व का फल पाया हैं। इसलिए अब आप चलिए और योग्य क्रियाओं को कीजिए। उनके कहने से उस देव ने जो अपने कर्तव्य-कर्म थे वे सब किये। इस प्रकार वह सुखी देव कल्पवृक्षों से उत्पन्न हुए भोगों को भोगता हुआ सुख-चैन से अपना समय बिताने लगा। वह भव्य हमेशा भक्तिभाव से सुख-पूर्वक जिनदेव की पूजा-उपासना किया करता था ॥१५०-१५५॥


अथ मद्री ध्वस्तस्नेहाद्विरक्ता भवभोगतः।
भर्त्रा साकं सुसंन्यासे मतिं तेने सुमानसा ॥१५६॥

कुन्त्याः सुतौ समर्प्यासौ वेश्मभारं विशेषतः।
संन्यासं कर्तुकामासौ वारितापि विनिर्गता ॥१५७॥

गङ्गातटे स्थितिं तेने संन्यास्याहारपानकम्।
सा दृष्टिज्ञानचारित्रतपआराधनां व्यधात् ॥१५८॥

तपःप्रभावतस्तस्याश्चक्षुषी लयमागते।
भीते इव क्षुधादोषाद्भीतानामीदृशी गतिः ॥१५९॥

अङ्गं भङ्गं गतं तस्याः स्तिमितेन्द्रियसंश्रयः।
असवोऽपि गताः सार्धं धवेन धवलात्मना ॥१६०॥

तत्रैव प्रथमे कल्पे सोदपादि शुभाश्रयात्।
पुण्यं पचेलिमं चेद्धि का वार्ता नाकसन्निधेः ॥१६१॥

अर्थ (श्लोक 156 से 161): इधर मद्री भी प्यारे पति के स्नेह से संसार-देह-भोगों से विरक्त हो गई और उसने शुद्ध मन से पतिदेव के साथ ही साथ संन्यास ग्रहण करने की इच्छा की। अपने विचारों के अनुसार वह नकुल-सहदेव इन दोनों पुत्रों तथा कुन्ती को राजभार और घर-गृहस्थी का भार सौंपकर संन्यास धारण करने के लिये-मना करने पर भी-घर से निकल पड़ी और गंगा किनारे पहुँची। वहाँ उसने आहारपान का त्यागकर संन्यास को ग्रहण कर लिया। उसने दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप इन चार आराधनाओं की आराधना की। तप के तेज से उसके दोनों नेत्र बिल्कुल भीतर को घुस गये थे, जान पड़ता था कि मानों भूख के भय से ही ऐसे हो गये हैं। ठीक ही है, कायरों की ऐसी ही गति होती है। उसका अंगभंग हो गया था, इन्द्रियाँ श्री-रहित हो गई थीं। अन्त समय उसके प्राण अपने पतिदेव पाण्डु के साथ ही उड़ गये और उसी प्रथम स्वर्ग में वह सौंदर्य आदि शुभ गुणों की खान देवी हुई। सच है, जब पुण्य का उदय होता है तब सब कुछ आ मिलता है, फिर स्वर्ग मिलने की तो बात ही क्या है ॥१५६-१६१॥


अथ कुन्ती शुचाक्रान्ता ज्ञात्वा मृत्युं महेशिनः।
विलपल्लपना तत्र गत्वा सा विललाप च ॥१६२॥

लुञ्चयन्ती निजान्केशांस्त्रोटयन्ती निजोरसः।
मणिमुक्ताफलोपेतं हारं हाटकसंभवम् ॥१६३॥

अर्थ (श्लोक 162 से 163): इधर-शोक से पीड़ित कुन्ती ने जब पाण्डु की मृत्यु का हाल सुना तब वह बहुत ही विलाप करने लगी। उसके मुँह से आहें पर आहें निकलने लगीं। वह बिल्कुल ही बेचैन हो गई। इसके बाद वह गंगा-तट पर गई और वहाँ विलाप करती हुई अपने बालों को लोंच-लोंच कर फेंकने लगी।


कङ्कणं करघातेन कृन्तन्ती करत: शुचा।
विललापेति दुःखार्ता कर्तव्यरहिता च सा ॥१६४॥

अर्थ (श्लोक 162 से 164): उरःस्थल में पड़े हुए मणि-मुक्ताफलों से जड़े सोने के हार को तोड़कर फेंकने लगी। हाथों को इधर-उधर फटकाने के कारण उसके कंकण टूट गये। वह शोक से अत्यन्त विह्वल हो गई। इस तरह दुख से पीड़ित होने के कारण उसे कुछ भी अपना कर्तव्य न सूझ पड़ने लगा ॥१६२-१६४॥


हा नाथ हा प्रियाधार हा कौरवनभोंशुमन्।
हा हर्तः सर्वदुःखानां हा कर्तः शुभकर्मणाम् ॥१६५॥

अर्थ: वह किंकर्तव्य विमूढ़-सी हो गई। वह विलाप करने लगी कि हा नाथ! हा प्रिय! हा जीवनाधार! और हा कौरव-वंश-रूप आकाश के सूर्य! तुम मुझे छोड़कर कहाँ चले गये। अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जीऊँगी। हा सब दुखों को हरने वाले और शुभ कार्यों को करने वाले वीर, तुम मेरे दुखों को क्यों नहीं हरते और अपनी अब वीरता क्यों नहीं दिखाते ॥१६५॥


हा वीरवक्त्रशुभ्रांशो सर्व श्रोतृसुभावन।
कुण्डलोद्भासिसत्कर्णाभ्यर्णस्वर्णसमद्युते ॥१६६॥

स्वरसंक्षिप्तसद्वीणानाद पाथोदनादभृत्।
हा कम्बुकण्ठ सत्कण्ठसमुत्कण्ठितकोकिल ॥१६७॥

अर्थ (श्लोक 166 से 167): हा चाँद जैसे मुँह वाले और सबको सुहावने, तुम मेरे संतप्त हृदय को शान्ति क्यों नहीं देते। हा कुंडलों द्वारा विभूषित कानों वाले और सोने के जैसी कान्ति के धारक, आप अब मेरे चित्त को प्रसन्न क्यों नहीं करते। हा अपने स्वर से उत्तम से उत्तम वीणा के स्वर को भी नीचा दिखाने वाले, मेघ के समान गंभीर नाद करने वाले, शंख के जैसे कंठ वाले और कोयल के जैसे स्वर वाले, अब आप मुझे दर्शन क्यों नहीं देते और अपने सुन्दर स्वर को क्यों नहीं सुनाते ? ॥१६६-१६७॥


विकुण्ठीकृतदुर्वारवैर्युत्कण्ठ सुमण्डन।
विस्तीर्णवक्षसा व्याप्तजगत्कीर्तनकीर्तिभृत् ॥१६८॥

दुःखिनीं मां विहायाशु हारिणीं क्व गतो भवान्।
दास्यते त्वां विहायाद्य मह्यं को मानमुत्तमम् ॥१६९॥

अर्थ (श्लोक 168 से 169): हे दुर्वार बैरियों को भी कुंठित कर उनके कण्ठ के भूषण बनने वाले, विस्तृत वक्षस्थल से जगत् भर में अपनी कीर्ति को विस्तृत करने वाले, आप मुझ दुखियों के दुख को दूर कर मेरे कंठ के भूषण क्यों नहीं होते और अपनी कीर्ति की गंध मुझ तक क्यों नहीं आने देते। प्रभो! आप मुझ दुखी को छोड़कर कहाँ चले गये! आपके बिना अब संसार में मुझे कौन मान देगा-मेरा कौन आदर करेगा-मुझे कौन आदर की दृष्टि से देखेगा ॥१६८-१६९॥


त्वया विनाद्य सर्वत्र शून्यं वेश्म न शोभते।
अहं कर्तव्यतामूढा गूढदुःखा त्वया विना ॥१७०॥

अद्य मे मस्तकेऽपप्तन्नभो निर्भिन्नसंभ्रमम्।
अद्याऽङ्गुष्ठे स दुष्टेऽत्र मुक्तो वह्निः सुदाहकः ॥१७१॥

करवाणि किमत्राहो त्वदृतेऽमृतवत्सल।
ज्वलते निखिलो देहो मदीयो मदनाहतः ॥१७२॥

अर्थ (श्लोक 170 से 172): नाथ, तुम्हारे बिना यह महल सूना हो गया है, अब शोभा नहीं पाता। भला, इसे एक वार तो फिर सुशोभित कर दीजिए। स्वामिन्! तुम्हारे बिना मैं अत्यन्त दुखी हो गई हूँ। मुझे कुछ कर्तव्य ही नहीं सूझ पड़ता। मुझे ऐसा भान होता है कि मानों आज आकाश को भेदकर मेरे मस्तक पर वज्र ही आ पड़ा है। मेरे शरीर पर दुष्ट जलाने वाली आग ही छोड़ दी गई है। मुझे बड़ा खेद है ॥१७०-१७२॥


यत्र तत्र गता नाथ न लेभे रतिमुत्तमाम्। प्रसीद पुरुषश्रेष्ठैकदा च देहि सद्वचः ॥१७३॥

त्वां विना वल्लभान्नं वाञ्छा मदीयापि न विद्यते। राज्यं प्राज्यं विमुच्याशु किं कृतं त्वयका विभो ॥१७४॥

दुरवस्थेदृशी केन प्रापिताहं महाप्रिय। पवित्रास्तव पुत्रास्ते किं करिष्यन्ति त्वां विना ॥१७५॥

अर्थ (श्लोक 173 से 175): नाथ! बताइए कि तुम्हारे बिना अब में यहाँ क्या करूँ, कैसे अपना समय बिताऊँ। हे अमृतवत्सल! तुम्हारे बिना काम से पीड़ित हुआ मेरा शरीर जला जाता है। मैं कहीं भी जाती हूँ, पर मुझे जरा भी सुख-शान्ति नहीं मिलती। इसलिए हे पुरुषोत्तम, मुझ पर प्रसन्न होकर मुझसे एक बार प्रेम भरे शब्दों में बोलिए। तुम्हारे बिना न तो मुझे भोजन रुचता है और न पानी ही। प्रभो! ऐसे उत्तम और सब तरह से परिपूर्ण राज्य को छोड़कर तुमने यह क्या किया। महाप्रिय! तुमने मुझे ऐसी दुखमय अवस्था को ही क्यों दिखाया। देखिए तो, तुम्हारे बिना तुम्हारे ये पवित्र पुत्र क्या करेंगे, किससे शिक्षा पायेंगे और किसके पास जाकर प्रसन्न होंगे ॥१७३-१७५॥


निराधारा धराधीश धारयामि कथं धृतिम्। वल्ली विटपिनं वेगाद्विहायास्ते कथं विभो ॥१७६॥

शुभाकर कथं शोभां लभेय वल्लभाधुना। त्वां विना च यथा नाथ निशानाथादृते तमी ॥१७७॥

विरसां त्वां विना देव मानयन्ति न जातुचित्। जना मां सुरसैर्मुक्तां सरसीमिव सद्वसाम् ॥१७८॥

विनेशेना वरा नारी रतिं न लभते क्वचित्। मणिना हि विनिर्मुक्ता यथा हारलता विभो ॥१७९॥

एवं तस्यां रुदन्त्यां हि रुरुदुः कौरवा नृपाः। युधिष्ठिरादयः क्षिप्रमिति बाष्पाविलाननाः ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 176 से 180): धराधीश! मैं आपके बिना धीरज कैसे धरूँगी। भला, कहीं वृक्ष के बिना बेल निराधार रह सकती है। शुभांकर! जरा सोचिए तो, कि तुम्हारे बिना अब यह आपकी वल्लभा शोभा कैसे पायेगी। क्या चाँद के बिना भी कहीं रात की शोभा होती है। देव, तुम्हारे बिना मुझ विरस-शृंगार आदि विहीन का आदर ही कौन करने चला। क्या कहीं कोई विरस-जल-विहीन-सूखे सरोवर को भी आदर की दृष्टि से देखता है। सच तो यह है कि पति के बिना स्त्री कहीं भी चैन नहीं पाती, जैसे कि मणियों के बिना हारलता सुशोभित नहीं होती। कुन्ती के इस तरह रोने-बिलखने को सुनकर कौरव भी विलाप करने लगे। युधिष्ठिर आदि के मुँह आँसुओं से भीग गये ॥१७६-१८०॥


प्राज्यं राज्यं त्वया मुक्तं राजते न नराधिप। लवणेन विना भुक्तं भोज्यं स्वादकरं न हि ॥१८१॥

त्वया मुक्ता वयं देव कथं शोभां लभामहे। दन्तावला यथा दन्तमुक्ता मान्याः कथं नृपैः ॥१८२॥

अर्थ (श्लोक 181 से 182): वे विलाप करने लगे देव, यह उत्तम राज्य जिसे आपने छोड़ दिया है, अब आपके बिना बिल्कुल शोभा नहीं पाता, जिस तरह कि चाहे कितना ही सुस्वादु भोजन क्यों न हो, पर वह नमक के बिना अच्छा नहीं लगता। देव, जबकि हमें आपने ही छोड़ दिया तब अब हमारी शोभा होना असम्भव ही सा है। क्या कहीं बिना दाँतों के हाथियों की शोभा होना सम्भव हो सकता है और जिस तरह बिना दाँतों के हाथियों की राजा-गण कदर नहीं करते उसी तरह वे हमारी भी इज्जत नहीं करेंगे ॥१८१-१८२॥


त्वया मुक्तमिदं राज्यं न शोभाहेतवे भवेत्। यथा गन्धविनिर्मुक्तं कुसुमं सुषमाहरम् ॥१८३॥

एवं शुचं प्रकुर्वाणान्वारयन्ति स्म तान्बुधाः। इति वाक्येन शोको हि सर्वेषां दुःखदायकः ॥१८४॥

तपःस्था योगिनो भव्या न शोच्या मृतिमागताः। प्रेतां गतिं गताः सन्तो यतः सद्गतिभाजिनः ॥१८५॥

वारयित्वेति ते शोकं सर्वे धर्मसुतादिजम्। कुर्वाणाः कौरवं वंशं प्रोन्नतं विविशुः पुरम् ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 183 से 186): प्रभो ! आपके बिना यह राज्य भी तो हमारी शोभा के लिए नहीं हो सकता, जैसे गंध-रहित पुष्पों से किसी की शोभा नहीं होती, उल्टी और सुषमा चली जाती है। इस तरह शोकातुर कौरवों को विद्वान् लोग समझाने लगे कि आप लोग शोक मत करो। यह शोक जीवों को दुख ही देता है, इससे किसी को भी सुख नहीं मिलता और फिर तपस्वी योगियों की मृत्यु पर शोक करना तो बिल्कुल ही व्यर्थ है। कारण, वे मृत्यु के प्रसाद से परलोक में जा उत्तम गति के उत्तम सुख पाते हैं। इस प्रकार युधिष्ठिर आदि के शोक को वारण कर कौरव-वंश के भूषण वे लोग नगर को वापस चले आये ॥१८३-१८६॥


धृतराष्ट्रो महाराष्ट्रो राष्ट्रे राष्ट्रविरोधिनः। निर्वासयन्नकुर्वाणो राज्यं रेजे महेन्द्रवत् ॥१८७॥

गान्धार्या गन्धसंलुब्धो मधुव्रत इवाभवत्। धृतराष्ट्रो रतो वल्ल्यां सुमनोनिचयप्रियः ॥१८८॥

सुतानां शिक्षयामास स शतं क्षितिपालकः। राजनीतिं सुनीतिं च प्रीतिं पौरजनैः सह ॥१८९॥

प्रचण्डाखण्डकोदण्डपटुपाण्डित्यपण्डिताः। पाण्डवाः संकटातीता विकटास्तत्र रेजिरे ॥१९०॥

गाङ्गेयसंगताः सद्यो गाङ्गेयसमसत्प्रभाः। अगं नगं सुगां चैव पालयन्ति स्म पाण्डवाः ॥१९१॥

अर्थ (श्लोक 187 से 191): इसके बाद इस महान् देश का राजा धृतराष्ट्र देश-द्रोहियों को देश से निकाल कर महेन्द्र की भाँति आनन्द के साथ राज्य करने लगा। वह हमेशा गांधारी के मुख-कमल की गंध में लुब्ध रहता था, जैसे भौंरा कमल की गंध पर लुब्ध रहता है और बेल में जिस भाँति पुष्प-समूह संलग्न रहता है उसी भाँति वह गांधारी में संलग्न रहता था। वह अपने सौ पुत्रों को शिक्षा देता था, उन्हें राजनीति, सुनीति और देश-वत्सलता का पाठ पढ़ाता था एवं प्रचंड और अखण्ड धनुष विद्या के पंडित पाण्डव-गण भी संकट रहित सुख-चैन से वहाँ निवास करते थे। उन्हें किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ न थी। उनके शरीर की सोने की सी आभा थी। उनके साथ में सदा ही गांगेय रहा करते थे। पर्वत, वृक्ष, पृथ्वी आदि सभी के वे पालक थे ॥१८७-१९१॥


द्रोणं विद्रावणे दक्षं विपक्षाणां सुपक्षकाः। धनुर्विद्यार्थमाभेजुः पाण्डवाः पञ्च पावनाः ॥१९२॥

कदाचिद्धृतराष्ट्रोऽपि वनं गन्तुमियाय च। दुन्दुभीनां निनादेन भासयन्निखिला दिशः ॥१९३॥

विपिने विपिनाधीशैः संस्तुतः कौरवाग्रणीः। प्राभृतैः फलपुष्पाणां सेवितः सुखसिद्धये ॥१९४॥

अर्थ (श्लोक 192 से 194): शत्रुओं को त्रास देने में अति प्रवीण द्रोणाचार्य उनके पक्ष में थे और वे पाँचों ही पवित्र पांडव धनुषविद्या में निपुण थे। एक बार धृतराष्ट्र वन-क्रीड़ा को गया। उस समय दुंदुभियों के शब्दों का बड़ा भारी कोलाहल हुआ, जिससे दसों-दिशायें गूंज उठीं। वहाँ उसकी वन के स्वामी भीलों ने खूब स्तुति की और सुख-लाभ की वाञ्छा से उसे फल-पुष्प आदि भेंट किये। वहाँ लोकपालों के अधीश धृतराष्ट्र ने शोक को दूर करने वाले अशोक नाम के एक वृक्ष को देखा। वह ऐसा जान पड़ता


अशोकानोकहाख्यं च शोकशङ्कुनिवारकम्।
लुलोके लोकपालानांमधीशो लोकपालवत् ॥१९५॥

तत्र स स्फाटिकीं स्पष्टां निर्मलां मुकुरेन्दुवत्।
शिलामैक्षिष्ट राजेशो वरां सिद्धशिलामिव ॥१९६॥

अर्थ (श्लोक 192 से 196): था मानो दूसरा लोकपाल ही है। वहाँ पर उसकी दृष्टि एक स्फटिक की-दर्पण के जैसी निर्मल शिला पर पड़ी। वह सिद्धशिला-सी देख पड़ती थी ॥१९२-१९६॥


यदन्तर्भासितानेकानोकहाभोग आबभौ।
स भित्तौ लिखितश्चित्रं चित्रव्यूह इवामलः ॥१९७॥

तत्रोपरिस्थितं धीरं निर्मलं गुणसंगमम्।
विपुलं बोधसंपन्नं विशुद्धं चिन्मयं परम् ॥१९८॥

मुनीन्द्रं महितं मान्यैः संगसंसर्गदूरगम्।
सोऽनमद्वीक्ष्य शुद्धं वा सिद्धं सिद्धशिलोपरि ॥१९९॥

दत्ताशिषा मुनीन्द्रेण नृपोऽवादि स्थिरस्थितः।
राजन् संसारकान्तारे भ्रमतां न सुखं क्वचित् ॥२००॥

अर्थ (श्लोक 197 से 200): उसके मध्यभाग में जाकर बहुत से वृक्षों का प्रतिभास पड़ता था और वह भींत में लिखे हुए निर्मल चित्रों का भ्रम कराता था। उसके ऊपर एक मुनीन्द्र विराजे हुए थे। वे धीर थे, निर्मल थे, गुणों के भण्डार थे, विपुल ज्ञान वाले थे, विशुद्ध और चैतन्यमूर्ति थे। बड़े-बड़े गण्य-मान्य पुरुष उनकी वन्दना स्तुति करते थे। वे परिग्रह के संसर्ग से रहित थे। उनके पास तिल-तुष मात्र भी परिग्रह न था। वे सिद्धशिला पर बैठे हुए सिद्ध भगवान् से जान पड़ते थे। राजा ने देखते ही उन्हें नमस्कार किया और उन्होंने राजा को धर्मवृद्धि दी। इसके बाद राजा स्थिर चित्त हो बैठ गया। मुनि बोले कि राजन्! देखिए इस संसार-वन में भटकते हुए जीवों को कहीं भी सुख-साता नहीं मिलती-उन्हें हमेशा जन्म-मरण के चक्कर में ही पड़ा रहना पड़ता है ॥१९७-२००॥


यथाब्धौ जलकल्लोला लीयन्ते संभवन्ति च।
म्रियन्ते च तथा जीवा जायन्ते जगतीतले ॥२०१॥

क्वचित्सौख्यं क्वचिद्दुःखं बोबुध्यन्ते विबुद्धयः।
संसारे सर्वदा दुःखं विद्धि विद्वन्महीपते ॥२०२॥

भवे धावन्ति सज्जीवाः साताय सततोद्यताः।
तन्नाप्नुवन्ति तोयाय मृगा वा मृगतृष्णया ॥२०३॥

बन्धो न बन्धुरं किंचिद्विद्धि संपद्धरादिकम्।
योयुध्यन्ते तदर्थं हि बुधा अपि मुधोद्यताः ॥२०४॥

स्पर्शनैन्द्रियसंगलुब्धाः क्षुब्धा बोधविवर्जिताः।
न लभन्ते परं शर्म मातङ्गा इव सद्घने ॥२०५॥

अर्थ (श्लोक 201 से 205): जिस तरह समुद्र में कल्लोलें उठती और विनशती रहती हैं, उसी तरह संसार में जीव भी मरते और जन्मते रहते हैं परन्तु जो जीव अज्ञानी हैं वे मोह के वश हो कहीं सुख और कहीं दुख की कल्पना कर लेते हैं। पर सचमुच ऐसा नहीं है किन्तु संसार में तो सब जगह दुख ही दुख है-सुख का लेश भी कहीं नहीं है। हे विद्वान् राजन्! तुम विचार कर तो देखो कि जगत् के जीव हमेशा ही सुख-साता के लिए दौड़ते फिरते रहते हैं और हमेशा ही उसके लिए उद्यम भी किया करते हैं परन्तु वे कहीं भी सुख नहीं पाते, जिस तरह मरीचिका को देखकर विचारा मृग जल की आशा से दौड़ता फिरता रहता है, पर वह कहीं भी जल नहीं पाता। यह किसका प्रभाव है? मोह ही का है न? राजन्! यह सम्पत्ति वगैरह कोई भी चीज जीवों को सुख देने वाली नहीं है। जिसके लिए ये जीव व्यर्थ ही लड़ते और झगड़ते हैं। अज्ञानी जीव स्पर्शन इन्द्रिय के वश हो बड़े कष्टों की प्राप्त होते हैं। उससे उन्हें सुख नहीं मिलता, जिस तरह वन में कागज की हथिनी को देख, स्पर्शन इन्द्रिय के वश हो, हाथी, गड्ढे में


रसनेन्द्रियलाम्पट्याद्रसास्वादनतत्पराः। विपत्तिं यान्ति जीवा वा बडिशेन यथा झषाः ॥२०६॥

घ्राणेन गन्धमाघ्राय विदग्धा इव बन्धुरम्। इयर्तीव मृतिं मत्ता द्विरेफाः सरसीरुहे ॥२०७॥

अर्थ (श्लोक 201 से 207): पड़ जाता है और उसे सुख नहीं मिलता। इसी तरह रसना इन्द्रिय की लंपटता से भाँति-भाँति के स्वादों को चखकर जीव सुखी होना चाहते है परन्तु सुखी न होकर वे उल्टे काँटे के मांस को निगल जाने वाली मछली की तरह दुखी ही होते हैं और तो क्या कभी-कभी अपने प्राणों को भी खो बैठते हैं। बहुत से भोले-भोले अज्ञानी पुरुष मनोहर सुगन्ध को सूंघ कर, कमल की गंध से उन्मत्त हो जाने वाले भौंरे की तरह उन्मत्त हो जाते हैं और मर जाते हैं। प्रसिद्ध है कि भौंरा कमल में गंध के लोभ से बैठ जाता है और शाम तक बराबर लुब्ध होकर उसी में बैठा रहता है और आखिर जब कमल सिकुड़ने लगता है तब वह उसी में बैठा रह जाता है और प्राण गवा देता है ॥२०१-२०७॥


प्रतीपदर्शिनीरूपरञ्जिताश्चचक्षुषा नराः। दुःखायन्ते यथा वह्नौ पतङ्गाः पतनोन्मुखाः ॥२०८॥

कर्णेनाकर्णनोत्कीर्णा गीतिसंकीर्णमानसाः। विपद्यन्ते विपत्पूर्णा यथा चाजिनयोनयः ॥२०९॥

निशम्येति नृपोऽपृच्छत्स्वामिन् राज्यं हि कौरवम्। भोक्तारो वा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्राश्च पाण्डवाः ॥२१०॥

अर्थ (श्लोक 208 से 210): इसी तरह गंध के लोलुपी पुरुष भी अपने प्राणों को व्यर्थ ही गवा बैठते हैं। नेत्रों से स्त्री के सुन्दर रूप को देखकर पुरुष लुभा जाते हैं और अन्त में दुख का भार उठाते हैं, जैसे दीपक या आग में पंखी लुभाकर गिरते हैं और जलकर खाक हो जाते हैं। इसी प्रकार कानों से मधुर गीत सुनने की लालसा को प्राप्त होकर मनुष्य विपत्ति के पंजे में जा पड़ते हैं और फिर वहाँ से उन्हें छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है, जैसे हिरण व्याध के गाने से मोहित हो अपने प्राणी को खो बैठते हैं। मुनि का यह पवित्र उपदेश सुनकर धृतराष्ट्र ने पूछा कि स्वामिन्! कौरवों के इस विशाल राज्य को धार्तराष्ट्र-दुर्योधन आदि भोगेंगे या पाण्डव-गण ॥२०८-२१०॥


यद्दृष्टमिष्टमुत्कृष्टं विशिष्टं वस्तु वस्तुतः। विनश्यते विनाशो हि स्वभावो वस्तुनः स्फुटम् ॥२११॥

अश्रौषं श्रवसा शीघ्रं सतः सर्वार्थवेदिनः। पूर्वं पुंसो विपद्यन्ते स्म ते कालेन मानवाः ॥२१२॥

इदानीं ये च दृश्यन्ते दृश्या दृष्टिगता नराः। विपत्स्यन्तेऽत्र कालेन के स्थिराः सन्ति भूतले ॥२१३॥

भाविनो भूतले लोकाः श्रूयन्ते शास्त्रकोविदैः। भविष्यन्ति स्थिरा नो वा ब्रूहि ते च दयां कुरु ॥२१४॥

कीदृशी पाण्डवानां हि भविता स्थितिरुत्तमा। धार्तराष्ट्रा नरेन्द्राः किं भवितारो धरेश्वराः ॥२१५॥

अर्थ (श्लोक 211 से 215): प्रभो! यह तो मैंने कान देकर सुना कि जो कुछ पदार्थ दीख रहे हैं या जो प्यारे, उत्कृष्ट और विशिष्ट है वे सभी नष्ट होंगे, यह बात बिल्कुल सच्ची है क्योंकि वस्तु का स्वभाव ही नाश होना है और यह भी सुना है कि पहले बहुत से सत्पुरुष जो सब पदार्थों के ज्ञाता हो गये हैं वे भी सब काल के ग्रास हुए और जो वर्तमान में सुन्दर-सुन्दर पुरुष देख पड़ रहे हैं वे भी काल के ग्रास बनेंगे। भावार्थ यह है कि इस भूतल पर कोई भी वस्तु या मनुष्य स्थिर नहीं है परन्तु सवाल यह है कि आगे जो महापुरुष होंगे वे स्थिर-अमर होंगे या नहीं ? यह मुझे दया कर बता दीजिए। आगे पांडवों की कैसी स्थिति होने वाली है और क्या आगे धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन आदि राजा होंगे? हे नाथ! आप


नाथ सुव्रत योगीन्द्र योगयोगाङ्गपारग। अगम्यं गम्यते किंचिन्न ते वस्तु विशेषतः ॥२१६॥

अर्थ (श्लोक 211 से 216): सुव्रत हैं, योगींद्र और योग-योगांग के पारंगत है, अतः आपसे कोई भी वस्तु छिपी नहीं-आप सब कुछ जानते हैं ॥२११-२१६॥


मगधः सुबुधो नीवृद्रम्भाभाभारभूषितः। सुपर्वपालितो रेजे नाकलोक इवापरः ॥२१७॥

राजगृहं पुरं तत्र राजराजगृहोन्नतं। धनदामरलोकाढ्यमलकानगरं यथा ॥२१८॥

जरासंधो नरेन्द्राणां मान्यो वैरिमदापहः। नवमः प्रतिविष्णूनां राजते तत्र पत्तने ॥२१९॥

अर्थ (श्लोक 217 से 219): मुनि बोले-मगध नाम एक देश है। वह पंडितों-बुधों का निवास और रंभाओं-नारियों से विभूषित है, अतः वह बुधों-देवताओं और रंभाओं-देवांगनाओं से विभूषित स्वर्ग-लोक-सा जान पड़ता है। ऐसा जाना जाता है कि मानो वह दूसरा स्वर्गलोक ही है। उसमें एक राजगृह नाम नगर है। वहाँ राजाओं के राजा के ऊँचे महल बने हुए हैं और उसमें धनद-धन को देने वाले दानी और अमर-दीर्घजीवी लोग-निवास करते हैं। अतः वह अमरावती की बराबरी करता है क्योंकि वहाँ भी राजराज-इन्द्र के बड़े ऊँचे महल बने हुए हैं और उसमें भी धनद-कुबेर और अमर रहते हैं। वहाँ का राजा है जरासंध। उसे सभी राजा-गण मानते हैं। वह मान-मत्सर से रहित है, नौवाँ प्रतिनारायण है ॥२१७-२१९॥


तस्य कालिन्दसेनाख्या कालिन्दीव रसावहा। विशाला कमलाकीर्णा विमलाभूत्सुभामिनी ॥२२०॥

भ्रातरः सुतरां तस्य न केनापि पराजिताः। अपराजितमुख्याश्च सन्ति सन्तो महोद्यताः ॥२२१॥

सन्यास्तनयास्तस्य विनयोन्नतमानसाः। सुकाला इव संरेजुस्ते कालयवनादयः ॥२२२॥

इत्थं राजगृहाधीशो राजते राजसिंहवत्। भूचरैः खेचरैः सेव्यो विजितारातिमण्डलः ॥२२३॥

अर्थ (श्लोक 220 से 223): उसकी रानी का नाम है कालिंदसेना। उसका रूप यमुना नदी के जल की तरह नीला-सा है। उसका शरीर विशाल और लक्ष्मी के जैसा शोभा से व्याप्त है। जरासंध के अपराजित आदि कई भाई हैं। वे अपराजित और उद्योगी हैं। कालयवन आदि विनयी उसके पुत्र हैं। वे नीति वाले और सुकाल आदि के समान हैं। इस तरह से वह राजगृह का स्वामी जरासंध राजसिंह सा सुशोभित होता है। भूचर, खेचर आदि सभी उसकी सेवा करते हैं। उसने सारे बैरियों पर विजय पा ली है ॥२२०-२२३॥


विपत्तिस्तस्य सहजा भविता परतोऽथवा। आख्याहि ख्यापने शक्त इति मन्निश्चयाय च ॥२२४॥

निशम्येति वचोऽवादीच्छृणु तेऽद्य मनोगतम्। धृतराष्ट्र धराधीश धृतिं धृत्वा विशुद्धधीः ॥२२५॥

अर्थ (श्लोक 224 से 225): हे प्रभो! इस सम्बन्ध में मैं यह पूछना चाहता हूँ कि जरासंध का मरण सहज ही होगा या किसी वैरी के द्वारा ? भगवन्! कृपा कर आप मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दीजिए, जिससे कि मुझे उक्त बातों का निश्चय हो जाय। आप इनके समझाने को सर्वथा समर्थ है क्योंकि आपके दिव्यज्ञान से कोई भी चीज बाहर नहीं है। यह सुन मुनिराज बोले कि विशुद्ध बुद्धि वाले राजन् धृतराष्ट्र ! मैं तुम्हारे मन की सब बातों को कहे देता हूँ, तुम धीरज के साथ सुनो। इस राज्य के कारण दुर्योधन आदि में और पाण्डवों


दुर्योधनादिभूपानां पाण्डवानां विशेषतः। विरोधः कलहश्चैव भविता राज्यसिद्धये ॥२२६॥

कुरुक्षेत्रे मरिष्यन्ति धृतराष्ट्र सुतास्तव। आहवे विहितानेकवधे संनद्धयोद्धृके ॥२२७॥

अखण्डाखण्डलोल्लासाः पालयिष्यन्ति पाण्डवाः। विश्वम्भरां भयातीतां हस्तिनागपुरे स्थिताः ॥२२८॥

अर्थ (श्लोक 224 से 228): में खूब विरोध होगा और लड़ाई होगी। तुम्हारे पुत्र दुर्योधन आदि कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में मरेंगे वहाँ और भी अनेक योद्धाओं की मृत्यु होगी और पाण्डव-गण निर्भय हो आनन्द के साथ हस्तिनापुर में जा इन्द्र की तरह पृथ्वी का पालन करेंगे ॥२२४-२२८॥

नवमं पर्व (भाग 2/2)

यः पृष्टो मगधाधीशवधो विविधदुःखदः। तमाकर्णय संकृत्यावधानोद्धुरमानसम् ॥२२९॥

तत्र क्षेत्रे विकुण्ठेन वैकुण्ठेन हठात्मना। जरासंधमहीशस्य संगरः संजनिष्यति ॥२३०॥

अवेह्याहितकृत्तस्य मरणं तत ईशितुः। आकर्ण्येति सचिन्तोऽभूद्धृतराष्ट्रः सराष्ट्रकः ॥२३१॥

ज्ञात्वा वृत्तमिदं सर्वं नत्वा योगीन्द्रमुत्तमम्। प्रपेदे पुरमुल्लोलललनालोचनं नृपः ॥२३२॥

अर्थ (श्लोक 229 से 232): और तुमने जो नाना दुखों को देने वाला जरासंध का मरण पूछा है उसे भी ध्यान देकर सुनो। कुरुक्षेत्र में ही कृष्ण नारायण के साथ जरासंध का युद्ध होगा और वहीं कृष्ण के हाथ से उसकी मृत्यु होगी। यह हाल सुन धृतराष्ट्र को बड़ी चिन्ता हुई और उसकी इस चिंता ने सारे देश को भी चिंता में डाल दिया। इसके बाद धृतराष्ट्र योगीन्द्र को नमस्कार कर नगर को चला आया। नगर ललनाओं के चंचल नेत्रों से सुशोभित था और मनुष्यों की रक्षा करता था ॥२२९-२३२॥


श्रुत्वासौ श्रुतिसंमतः श्रुतवरः श्रीमान् श्रियालङ्कृतः
ऐश्वर्यापहतारिवारविकसत्पुण्यः सुगण्यो गुणैः।
धुन्वन्श्रीधृतराष्ट्रनामनृपतिः कामं कलङ्कं कृपा-
संक्रान्तो विरराज कौरवकुलं चिन्वंश्चिरं चारुधीः ॥२३३॥

अर्थ: श्री और गांधारी देवी से विभूषित धृतराष्ट्र इस प्रकार शास्त्र का पवित्र उपदेश सुनकर अपने श्रेष्ठ गुणों के द्वारा काम के कलंक को दूर करने में लगा। उसने अपने ऐश्वर्य से बैरियों का ध्वंस कर दिया था और इसी निमित्त से उसका पुण्य विकसित हो उठा था। वह लोगों में सुगण्य और गुणों का पिटारा था, दया का अवतार था। उसकी बुद्धि बहुत ही सुंदर थी। वह धृतराष्ट्र कौरवों के कुल को बढ़ाता हुआ अत्यन्त शोभा पाता था ॥२३३॥


धर्मोऽयं कुरुते सुधर्ममयनं धर्मेण लक्ष्मीलताम्
लब्ध्वा धर्मकृते चिनोति चरितं सर्वं शिवं धर्मतः।
धर्मस्यापि गुणा भवंति विपुला भूपस्य धर्मे मतिम्
कुर्वन्तं गुरुसत्तमं गुणगुणं हे धर्म तं पालय ॥२३४॥

अर्थ: धर्मराज युधिष्ठिर नीतिमार्ग पर चलते हैं, अतएव धर्म से उन्हें लक्ष्मी प्राप्त है। वह धर्म के लिए ही हमेशा उत्तम-उत्तम आचरणों को करते हैं क्योंकि धर्म से ही जीवों को सब सुख मिलते है। वह विपुल गुणों के भण्डार हैं, धर्म में धर्म-बुद्धि करते हैं और अधर्म से सदा दूर भागते हैं। वह राजाओं में श्रेष्ठ राजा है। अतः हे धर्म, तू उस गुण-गण के धारी की रक्षा कर ॥२३४॥

दशमं पर्व (भाग 1/2)

सुमतिं मतिकर्तारं सुमतिश्रितपङ्कजम्। मतये नौमि निःशेषनम्रामरनरेश्वरम् ॥१॥

अर्थ: उन सुमतिनाथ प्रभु को नमस्कार है जो बुद्धि के दाता और पंडितों द्वारा पूज्य हैं, जिन्हें सम्पूर्ण इन्द्र और नरेन्द्र आकर नमते हैं, वे मुझे सुमति दें ॥१॥


एकदातर्कयत्तर्क्यमुदर्कफलभाङ्नृपः। सवितर्कोऽर्कवद्भासा भूषितो भूभराश्रितः ॥२॥

हंहो मम सुता युद्धशौण्डीराः शुद्धमानसाः। प्रबुधा बुधसंसेव्या बुद्ध्या धिषणसंनिभाः ॥३॥

आर्या जयसमावर्यावार्याः सद्बीर्यसंगताः। धैर्यगाम्भीर्यसंवर्याः सपर्याश्रितसंक्रमाः ॥४॥

दुर्योधनादयो धीरा राज्यभर्त्तार इत्यपि। कृत्वा राज्यस्य चोच्छित्तिं मरिष्यन्ति महाहवे ॥५॥

अर्थ (श्लोक 2 से 5): एक दिन विचारशील, दूरदर्शी, भविष्य को जानने वाले, सूरज की तरह प्रभा से विभूषित और राजाओं से घिरे हुए धृतराष्ट्र ने विचारा कि अहो! मेरे ये दुर्योधन आदि पुत्र युद्ध करने में शूरवीर हैं, शुद्धमना हैं, बुद्धिशाली चतुर हैं, पंडितों द्वारा सेवित हैं, बुद्धि से बृहस्पति के तुल्य हैं, लक्ष्मी के स्वामी हैं, सर्वश्रेष्ठ और वीर्यशाली हैं, धीरज और गम्भीरता से युक्त हैं, संसार भर जिनके चरण-कमल को पूजता है और राज्य के भोक्ता हैं परन्तु ये भी राज्य छोड़कर महायुद्ध में मरेंगे ॥२-५॥


धिगिदं राज्यमुत्तुङ्गं धिक्सुतान्भाविसन्मृतीन्। धिग्जीवितं ममाद्यापि पराकूतविसारिणः ॥६॥

राज्यं रजोनिभं प्राज्यं विषया विषसंनिभाः। चञ्चला चपलेवाश्विन्दिरा च मन्दिरं शुचः ॥७॥

जाया जीवनहारिण्य आत्मजा निगडप्रभाः। काराघटनसंघट्टा घोटका विकटाः खलु ॥८॥

अर्थ (श्लोक 6 से 8): अहो! धिक्कार है ऐसे उन्नत राज्य-पद को और धिक्कार है मरने वाले इन अपवित्र पापात्मा पुत्रों को तथा आत्म-कल्याण नहीं करने वाले मेरे इस जीवन को भी धिक्कार है। देखो, यह उत्तम राज्य धूल के समान है और विषय विष के समान हैं। लक्ष्मी बिजली की तरह चंचल है, शोक का स्थान है। ये स्त्रियाँ जीवन को हरने वाली हैं और पुत्र साँकल के समान है तथा यह घोड़ों की घटा जेलखाने के तुल्य है ॥६-८॥


गजा जन्मजराकारा रथाश्चानर्थकारिणः। पदात्तयो विपत्तीनां पत्तनं संपदापहाः ॥९॥

गोत्रिणः शत्रुसंकाशाः सचिवाः शोकशासनम्। मित्राणि चित्ररूपाणि स्वकार्यकरणानि च ॥१०॥

इत्याध्याय धरित्रीशो विरक्तो भवभोगतः। समाहूय च गाङ्गेयं स्वाकूतमगदीदिति ॥११॥

गाङ्गेय जीवितं गन्तु गगने चन्द्रबिम्बवत्। अतः सुताय संदेयं हेयं राज्यं मया पुनः ॥१२॥

अर्थ (श्लोक 9 से 12): हाथी जन्म-जरा के आकार हैं। ये रथ अनर्थ को करने वाले हैं और प्यादे-गण विपत्ति के निवास हैं, सम्पत्ति को हरने वाले हैं। ये परिवार के लोग शत्रु के तुल्य हैं। मंत्री शोक को देने वाले हैं एवं भाँति-भाँति के रूप को धरने वाले ये मित्र अपने-अपने स्वार्थ के साधक हैं। इस प्रकार धृतराष्ट्र ने संसार-भोगों से विरक्त हो, गांगेय को बुलाकर उससे ये सब बातें कहीं। वह बोला कि गांगेय, जैसे चाँद हमेशा ही आकाश में घूमा करता है उसी तरह यह जीव भी सतत संसार में चक्कर लगाया करता है। अतः मैं अब इस हेय राज्य को पुत्रों के लिए सौंपे देता हूँ। इतना कह कर उसने अपने पुत्रों और पाण्डवों


इत्युक्त्वा स स्वपुत्रेभ्यः पाण्डवेभ्यश्च सत्वरम्।
गाङ्गेयद्रोणसांनिध्ये प्रददौ राज्यसद्भरम् ॥१३॥

अर्थ (श्लोक 9 से 13): को बुलाया और गांगेय तथा द्रोणाचार्य के सामने उन पर राज्य का सब भार डाल दिया ॥९-१३॥


जनन्या सह भूपालो वनमित्वा महागुरुम्।
नत्वा निर्लुञ्च्य सत्केशान्प्राव्राजीद्विनयोद्यतः ॥१४॥

चचार चरणं चारु विचारचरणश्चिरम्।
चेतनं चिन्तयंश्चित्ते निश्चलश्चाचलोपमः ॥१५॥

आगमार्थं पपाठाशु संगमं सह साधुभिः।
जगाम सुमतिः साधुधृतराष्ट्र मुनीश्वरः ॥१६॥

अर्थ (श्लोक 14 से 16): इसके बाद उसने माता सुभद्रा सहित वन में जाकर वहाँ सुव्रत योगीन्द्र को नमस्कार कर तथा केशों का लोंच कर जिनदीक्षा धारण की। वह विचार-चतुर तेरह प्रकार के चारित्र को पालता था और हमेशा पर्वत की तरह अचल होकर चैतन्य-स्वरूप का चिंतन करता था। उसने थोड़े ही समय में समस्त आगम के अर्थ को जान लिया। वह बुद्धिमान् मुनीश्वर हमेशा साधुओं के समागम में रहता था और विहार करता था ॥१४-१६॥


एतस्मिन्नन्तरे राज्यं धृतराष्ट्रसुतैः समम्।
युधिष्ठिराय योधाय श्रीगाङ्गेयः समर्पयत् ॥१७॥

धर्मपुत्रः सुधर्माणं लोकं कुर्वन् रराज च।
पालयन्परमां पृथ्वीं न्यायेन नयकोविदः ॥१८॥

यस्मिन्राज्यं प्रकुर्वाणे चौर इत्यक्षरद्वयम्।
शास्त्रेऽश्रावि न कुत्रापि पत्तने नीवृति स्फुटम् ॥१९॥

भयं न विदितं लोकैर्यस्मिन्शाति धरातलम्।
बिभ्यत्यत्र युवानो हि केवलं कामिनीक्रुधः ॥२०॥

यस्मिन्राज्ये न हरणं लक्ष्मीणां लक्षितात्मनाम्।
हर्ता चेत्केवलो वायुः सौगन्ध्यस्य परस्थितेः ॥२१॥

अर्थ (श्लोक 17 से 21): इधर थोड़े ही दिन बाद गांगेय ने दुर्योधनादि तथा वीर युधिष्ठिर को राज्य दे दिया। युधिष्ठिर न्याय का ज्ञाता था, अतः वह न्याय से पृथ्वी को पालता और धर्म का प्रचार कर लोगों को धर्मात्मा बनाता था। उसके राज्य-काल में चोर ये दो अक्षर केवल शास्त्र में ही सुने जाते थे और कहीं नगर-गाँव में इनका प्रवेश न था। उसके राज्य करते समय किसी को किसी तरह का भय न था, सब निर्भय रहते थे परन्तु युवा पुरुष कामनियों के क्रोध से जरूर डरते थे-वे कभी उन्हें नाराज नहीं करते थे। उसके समय में किसी भाग्यशाली की लक्ष्मी नहीं हरी जाती थी। हाँ, वायु फूलों की सुगंध को अवश्य हरती थी और लोगों के चित्तों को प्रसन्न करती थी ॥१७-२१॥


नान्योन्यमारणं यत्र विद्यते श्रीयुधिष्ठिरे।
मारकस्तु कदाचिच्चेत् समवर्ती विवृत्तमान् ॥२२॥

ददौ दानं सुपात्रेभ्यो धर्मपुत्रः पवित्रवाक्।
विचित्राणि च कार्याणि परेषां विदधाति च ॥२३॥

समर्च्यः सर्वलोकानां वरार्चां श्रीजिनेशिनः।
कुरुते विजयोद्युक्तो वृषार्थं स वृषो नृपः ॥२४॥

अर्थ (श्लोक 22 से 24): उसके शासन-काल में परस्पर में कोई किसी को मारता न था। यदि कोई मारने वाला था तो यम अवश्य था, वह जरूर लोगों को मारता था। वह सुपात्रों के लिये दान देता था और उनसे मधुर शब्दों में बोलता था। वह परोपकारी था, दूसरों के अनेक काम कर देता था। इसके सिवाय वह लोगों को यथायोग्य आदर-सत्कार से संतुष्ट करता था। वह जिनेन्द्रदेव की भक्तिभाव से पूजा-अर्चा करता था। काम, क्रोध आदि छह बैरियों को जीतने के लिये वह सदा उद्यत रहा करता था। वह दया सागर के पार पर पहुँचा हुआ था, परमार्थ का ज्ञाता और क्षमा का भण्डार था। अतः वह योगी सा सुशोभित


षड्वैरिविजयं कुर्वन्कृपासागरपारगः। परमार्थं विजानानः क्षमावान्योगिवद्बभौ ॥२५॥

अर्थ (श्लोक 22 से 25): होता था क्योंकि योगी भी परमार्थ का ज्ञाता और क्षमा का भण्डार होता है ॥२२-२५॥


अथ द्रोणस्तु सर्वेषां पाण्डवानां बलात्मनाम्। धृतराष्ट्रसुतानां च बभूव गुरुसत्तमः ॥२६॥

धनुर्वेदं च सर्वेषां स द्रोणः समशिक्षयत्। बाणनिक्षेपणं लक्ष्यं कोदण्डाकर्षणं तथा ॥२७॥

तत्र पार्थः समर्थस्तु धनुर्वेदं सुसार्थकम्। विवेद द्रोणतः पुण्याद्विद्या याति द्रुतं जने ॥२८॥

धनंजयो भजन् भक्त्या द्रोणाचार्यं समाप च। धनुर्वेदं विनिःशेषं गुरुसेवा हि कामसूः ॥२९॥

अर्थ (श्लोक 26 से 29): द्रोणाचार्य इन सब पाण्डवों और बली दुर्योधनादि के श्रेष्ठ गुरु थे। उन्होंने इन सबके धनुर्वेद, बाण छोड़ना, लक्ष्य बाँधना और धनुष खींचना आदि सिखाया। पर इन सबमें से अर्जुन ने ही सार्थक धनुर्वेद-विद्या सीख पाई क्योंकि वह समर्थ था-योग्य पात्र था और है भी ऐसी ही बात कि पुण्योदय से मनुष्यों को बड़ी जल्दी विद्या आ जाती है। अर्जुन द्रोणाचार्य का बड़ा भक्त था, उनकी वह बहुत सेवा करता था। उस सेवा के प्रभाव से ही वह पूर्ण धनुर्वेद विशारद हो गया। सच है कि गुरु-सेवा सब मनोरथ की साधने वाली होती है ॥२६-२९॥


तद्भक्तितुष्टस्तु स द्रोणस्तस्मै विद्यां समर्पयत्। निःशेषां धनुषो व्यक्तं गुरौ भक्तिस्तु कामदा ॥३०॥

पार्थो व्यर्थीप्रकुर्वाणोऽन्येषां विद्या विदांवरः। रराज तेषु हेमाद्रिः कुलाद्रीणामिवोत्तमः ॥३१॥

अर्थ (श्लोक 30 से 31): अर्जुन की इस निष्कपट सेवा से द्रोणाचार्य अर्जुन पर बहुत प्रसन्न थे और इसलिए उन्होंने उसे पूर्ण धनुष-विद्या सिखा दी थी। सच है कि गुरु-भक्ति मन की आशा को पूरा कर देती है। अर्जुन ने अपनी धनुष-विद्या के बल से और सब की विद्या को विफल कर दिया था, अतः वह उन सबके बीच में ऐसा शोभता था जैसा कुलाचलों के बीच में सुमेरु शोभता है ॥३०-३१॥


कौरवाः पाण्डवाः सर्वे धनुर्वेदं यथायथम्। द्रोणतोऽशिक्षयं क्षिप्रं स्वस्वकर्मानुरूपतः ॥३२॥

क्रीडन्तो लीलया सर्वे रमन्ते च परस्परम्। धनुर्वेदेन विद्वांसो धनुर्विद्याविशारदाः ॥३३॥

दुर्योधनादयः सर्वे तद्राज्यं न हि वीक्षितुम्। क्षमा विरोधिनः सर्वे पाण्डवैः सह चोद्धताः ॥३४॥

वर्धमानविरोधेन वर्धमानमहेर्ष्या। वैरं विशेषतस्तेषां बभूव बहुदुःखदम् ॥३५॥

अर्थ (श्लोक 32 से 35): अर्जुन के सिवाय और-और पाण्डवों तथा कौरवों ने भी द्रोणाचार्य से अपने-अपने क्षयोपशम के अनुसार यथायोग्य धनुर्वेद को सीखा-धनुष-विद्या का अभ्यास किया। वे धनुर्विद्या-विशारद विद्वान् लोग परस्पर में धनुर्वेद के द्वारा क्रीड़ा करते, धनुष-बाण द्वारा लक्ष्यवेध करते हुए दिल बहलाते परन्तु दुर्योधन आदि से पाण्डवों की राज्यवृद्धि न सही गई-वे उनके अभ्युदय को देख देखकर जलने लगे और उनके विरोधी बन गये। वे उनके साथ बड़ी उद्धतता दिखाने लगे। उनमें परस्पर स्पर्धा बढ़ने लगी और साथ ही साथ विरोध भी बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उनमें अतीव दुखदाई वैर हो गया ॥३२-३५॥


गाङ्गेयाद्यैर्गभीरैश्च तद्वैरविनिवृत्तये। अर्धमर्धं ददे ताभ्यां राज्यं विभज्य युक्तितः ॥३६॥

अर्थ: यह देख गांगेय आदि गंभीर पुरुषों ने वैर-विरोध मिटाने के लिए युक्ति से पाण्डवों और


पाण्डवानां प्रचण्डानां कौरवाणां सुराविणाम्।
तथापि ववृधे वैरमेकद्रव्याभिलाषिणाम् ॥३७॥

कौरवा हृदये दुष्टा वाचा मिष्टा निसर्गतः।
पाण्डवान्सकलान्हन्तुमीहन्ते हन्त रोषतः ॥३८॥

तथापि स्नेहहस्तस्ते स्म बाह्यतः प्रीतिमागताः।
रमन्ते रम्यदेशेष्वन्योन्यं कौरवपाण्डवाः ॥३९॥

अर्थ (श्लोक 36 से 39): कौरवों में आधा-आधा राज्य बाँट दिया परन्तु तो भी प्रचंड पाण्डवों और कौरवों में वैर-विरोध बढ़ता ही गया-वह कम न हुआ। कारण, अकेले कौरव ही पूरे राज्य को चाहते थे। कौरव लोग स्वभाव से ही हृदय के दुष्ट और वाणी के मिष्ट थे। वे रोष से भरे सदा ही पाण्डवों को मारने की चेष्टा में लगे रहते थे, पर तो भी बाहर से प्रीति ही दिखाते थे। इन सब बातों के रहते हुए भी सब कौरव-पाण्डव सुन्दर-सुन्दर प्रदेशों में एक साथ क्रीड़ा किया करते थे ॥३६-३९॥


अथैकदा महाभीमो भीमसेनो यदृच्छया।
वने रन्तुं ययौ सर्वैः कौरवैः सह संगतः ॥४०॥

तत्र धूलौ निजात्मानं पिधायोवाच पावनिः।
मां समुद्धरते यस्तु बलिनां स बली मतः ॥४१॥

तच्छ्रुत्वा कौरवाः सर्वे तमुद्धर्तुं समुद्ययुः।
साभिमानाः प्रकुर्वन्तस्तदुद्धरणसंगरम् ॥४२॥

ते तं चालयितुं नैव क्षमा देशेन कौरवाः।
आखुभिः किं प्रचाल्येत बहुभिर्मन्दरो महान् ॥४३॥

विपक्षास्तु विलक्षास्ते मन्दीभूतसुमानसाः।
अस्थेयांसः स्थितिं चक्रुर्निलये समलाननाः ॥४४॥

अर्थ (श्लोक 40 से 44): एक दिन महान् योद्धा भीमसेन अपनी इच्छा से कौरवों के साथ वन में क्रीड़ा करने को गया और वहाँ अपने आपको धूल से पूर कर वह कौरवों से बोला कि जो कोई मुझे इस धूल में से निकाल लेगा वही बलवानों में बली है। यह सुन सबके सब कौरव उसे धूल में से निकालने को तैयार हुए और अभिमान में आकर उसे निकालने की प्रतिज्ञा करने लगे परन्तु वे उसे रंचमात्र भी न चला सके-जोर लगा-लगाकर थक गये। ठीक ही है कि बहुत से चूहे मिलकर सुमेरु को नहीं चला सकते। यह देख उन छुपे हुए शत्रुओं के मन का उत्साह मंद हो गया और उनके मुँह मलिन हो गये। इसके बाद वे वहाँ से वापस घर लौट आये ॥४०-४४॥


अथैकं विपिनं भाति वृक्षलक्षविराजितम्।
शाखाशिखरसंलग्नं पत्रपुष्पफलाञ्चितम् ॥४५॥

यत्राम्राः फलभारेण नम्रा यत्र फलार्थिनः।
परपुष्टनिनादेनाहूयन्ते स्म च सज्जनाः ॥४६॥

कङ्केलिपल्लवाः प्रान्तरक्ता विद्रुमवीरुधः।
हसन्ति युक्तमेतद्धि सादृश्यं हास्यकारणम् ॥४७॥

अर्थ (श्लोक 45 से 47): इसके बाद एक दिन फिर भीमसेन कौरवों के साथ वनक्रीड़ा को गया और एक ऐसे वन में पहुँचा, जो घने वृक्षों से सुशोभित था। जिसका एक-एक वृक्ष डालियों के आगे के भाग में लगे हुए पत्तों, फलों और पुष्पों से युक्त था। वहाँ के मनोहर आम के वृक्ष फलों के भार से नम गये थे और उन पर कोयलें बोलती थीं। अतः जान पड़ता था कि मानों वे कोयलों के शब्दों के बहाने से फलों को चाहने वाले सत्पुरुषों को ही बुलाते हैं। सबेरे की लाल छटा के जैसे उनके जो लाल पत्ते थे वे मूँगा की बेलों को हँसते थे। ठीक ही है कि समानता हँसी ही कराती है ॥४५-४७॥


खर्जूरा जर्जरां जेतुं जरां खर्जूरसत्फलाः।
राजन्ते क्षीरिकां जेतुं फलशोभापहारिणः ॥४८॥

अर्थ: वहाँ के खजूर-वृक्ष ऐसे शोभते थे मानों वे जर्जरा जरा को ही जीत रहे हैं क्योंकि वे जरा से भी


तिन्तिण्यः किङ्किणीरावाः सूक्ष्मपल्लवपावनाः ।
आम्लं रसं समुद्गन्तुं रेजिरे यत्र पावनाः ॥४९॥

कदल्यो यत्र विपुलसुदला विमला बभुः ।
फलानि कल्पवृक्षाणां या जेतुं कदलीफलाः ॥५०॥

यत्रैवामलकीवृक्षाः कषायरससत्फलाः ।
मुनिना निर्जितास्तत्र कषाया इव संस्थिताः ॥५१॥

अर्थ (श्लोक 48 से 51): गये बीते थे अर्थात् जरा तो कुछ दिन मनुष्य को ठहरने भी देती है, पर वे पकते ही फली को गिरा देते थे। वहाँ फल-पुष्प आदि की शोभा से रहित क्षीरवृक्ष थे एवं वहीं घुँघरू के समान शब्द वाले और बिल्कुल छोटे-छोटे पत्तों वाले पवित्र इमली के वृक्ष थे। वहाँ विपुल और सुन्दर पत्तों वाले निर्मल केले के वृक्ष शोभित थे, जो अपने फलों से कल्पवृक्ष के फलों को भी जीतते थे और वहीं कषैले फलों से सुशोभित आँवले के वृक्ष थे, वे ऐसे जान पड़ते थे कि मानों मुनिगण द्वारा जीती गई कषायें ही स्थित हैं ॥४८-५१॥


तत्र ते सकला रन्तुं भीमसेनेन कौरवाः ।
ईयुरायासविन्यासाः खेलायै स्खलितोद्यमाः ॥५२॥

तत्रैकं विपुलं फुल्लं ददर्शामलकीद्रुमम् ।
वायविर्विपुलस्कन्धं सफलं पल्लवाञ्चितम् ॥५३॥

तत्र क्रीडां समारेभे कौरवैः सह पावनिः ।
सर्वगर्वसमाक्रांतैरारोहणावरोहणैः ॥५४॥

कश्चिच्चटति चातुर्यात्कश्चिदुत्तरति स्वयम् ।
धुनोति तं द्रुमं कश्चित्कश्चिदालिङ्गति स्फुटम् ॥५५॥

अर्थ (श्लोक 52 से 55): ऐसे रमणीक वन में पहुँच कर उन सबने खूब क्रीड़ा की। वहाँ भीमसेन ने एक आँवले का वृक्ष देखा। वह खूब फला हुआ था। उसकी डालियाँ बड़ी मोटी थे। वह पत्तों से और फलों से लदा हुआ था। उस पर अभिमानी कौरवों के साथ-साथ बली भीम क्रीड़ा करने लगा-वह उस पर कभी चढ़ता और कभी उतरता था। कोई उस पर चढ़ने का यत्न करता था और फिर चढ़ने को असमर्थ हो स्वयं ही उतर पड़ता था। कोई उसे हिलाता और कोई चढ़ने के लिए उसका आलिंगन करता था, पर डर कर फिर दूर हट जाता था ॥५२-५५॥


हृदा संपीड्य कश्चित्तं कुरुते कम्पनाकुलम् ।
तत्फलापचयं कश्चिद्विदधाति कुरूत्तमः ॥५६॥

चटितुं तं समुत्तुङ्गं न क्षमः कश्चन ध्रुवम् ।
दुर्लङ्घ्यं वीक्ष्य वेगेनारुरोह च सुपावनिः ॥५७॥

समला निर्मलं तं च कौरवाः पावनिं तदा ।
समुत्पातयितुं चेतोविकारं जग्मुरुद्धरम् ॥५८॥

सरावाः कौरवाः सर्वे तमालिङ्ग्य महाद्रुमम् ।
कंपयामासुरौद्धत्यात्समुत्पातयितुं हि तम् ॥५९॥

अर्थ (श्लोक 56 से 59): कोई उसे अपनी छाती के बल खूब हिला डालता था और दूसरा कोई आकर गिरे हुए उसके फलों को बटोरता था। उस पर चढ़ने के लिए यद्यपि उन सबने बड़ी कोशिशें कीं, पर वह बहुत ही ऊँचा था, इसलिए उस पर कोई भी न चढ़ सका-सब हिम्मत हार गये। कौरवों के लिए उस पर चढ़ना कठिन होने पर भी भीमसेन हिम्मत के साथ उस पर अति शीघ्र चढ़ गया। यह देख कौरवों को बहुत बुरा लगा और वे उस पवित्र आत्मा को पेड़ पर से नीचे गिरा देना चाहने लगे-उनके चित्त में द्वेष-बुद्धि-वश भीम को नीचे गिराकर कष्ट देने की इच्छा हुई। उसको गिराने के लिए उन्होंने इकट्ठे होकर जोर के साथ उस महान् वृक्ष को खूब प्रचंडता से हिला डाला परन्तु उस हिलते हुए वृक्ष पर भी वह बली निश्चल ही बैठा रहा-रंच मात्र भी न चला और है भी ठीक कि नदियों का चाहे जैसा ही क्षोभ क्यों


अकम्पो मारुतिस्तत्र कम्पमानद्रुमे स्थितः।
न चकम्पे नदीक्षोभात्किं क्षुभ्यति महार्णवः ॥६०॥

अर्थ (श्लोक 56 से 60): न हो, उससे समुद्र बिल्कुल नहीं चलता ॥५६-६०॥


अवादिक्षत भीमेन ते भवन्तो यदि क्षमाः।
उद्धर्तुं विपुलं वृक्षमुद्धरन्तु धरेश्वराः ॥६१॥

तथापि ते न किं कर्तुं क्षमाः संक्षुभ्यमानसाः।
वराकैश्चाल्यते किं हि स्वल्पतुङ्गोऽपि पर्वतः ॥६२॥

तदाकूतं परिज्ञाय भीमो भवनमासदत्।
एकदा कौरवैः सार्धं भीमस्तं द्रुं पुनर्ययौ ॥६३॥

अर्थ (श्लोक 61 से 63): उनके इस उद्योग को देखकर ऊपर से भीम ने कहा कि यदि आप लोगों में इस विपुल वृक्ष को उखाड़ देने की ताकत हो तो उखाड़िए परन्तु इतना कहने पर भी वे चंचल-चित्त कुछ भी न कर सके-चुप रह गये। सच हैं कि दीन-दुर्बल पुरुष चाहे कितने ही क्यों न हों, पर वे एक थोड़े से ऊँचे पहाड़ को भी नहीं चला सकते। आखिर भीम को उनका खोटा अभिप्राय मालूम पड़ गया और वह अपने घर को चला आया ॥६१-६३॥


आरोहिता हठान्तेऽपि तेन तं द्रुमसत्तमम्।
आक्रम्य स्वभुजाभ्यां च कम्पितस्तरुसत्तमः ॥६४॥

उन्मूल्य मूलतो मानी तरुं कौरवसंयुतम्।
दधाव मूर्ध्नि सच्छत्रं दधान इव शोभते ॥६५॥

धार्तराष्ट्रास्तदा पेतुरुन्मूलिते महाद्रुमे।
केचिदूर्ध्वमुखाः केचिदधोवक्त्रास्तथा पुनः ॥६६॥

अर्थ (श्लोक 64 से 66): इसके बाद एक समय भीम फिर भी कौरवों के साथ उसी वृक्ष के पास गया। अब की बार जैसे तैसे करके कौरव-गण उसके ऊपर तक चढ़ गये। तब भीम ने उस वृक्ष को अपनी छाती के बल हाथों से पकड़ कर खूब ही हिला डाला और बड़े अभिमान के साथ उसे जड़ से उखाड़कर कौरवों सहित सिर पर उठा वह भागा। उस समय ऐसा जान पड़ता था कि मानी वह अपने मस्तक पर छत्र ही लगाये हुए है। भीम की इस दौड़ के मारे कौरव लोग उस वृक्ष पर से नीचे गिर पड़े। कोई ऊपर को मुँह किये सीधा गिरा तो कोई नीचे को मुँह किये उल्टा ॥६४-६६॥


केचिच्छाखां समालम्ब्य पद्भ्यां चाधोमुखस्थिताः।
भुजाभ्यां च खलीकृत्य शाखां तत्र परे स्थिताः ॥६७॥

केचिच्छाखां समाश्रित्य सुप्तास्तत्र महाभयाः।
केचित्तस्थुश्च शाखायामेकहस्तावलम्बिनः ॥६८॥

केचिच्च जठरापीडं भजन्ते स्थितिमत्र च।
मूर्च्छया मूर्च्छिताः केचिज्जना मरणमित्रया ॥६९॥

एवं ते पावनेः पुण्यादिव तस्मात्समाकुलाः।
एवं भीमे प्रकुर्वाणे दुस्स्थीभूते च कौरवे ॥७०॥

हाहारवमुखे तत्र कश्चिद्भीममुवाच च।
पावने पावनात्मा त्वं गम्भीरश्च सहोदरः ॥७१॥

अर्थ (श्लोक 67 से 71): कोई पाँवों से डालियों पर झूमकर सिर की ओर से लटका रहा तो कोई हाथों से डालियों पर झूम कर सीधा ही लटक कर रह गया। कोई डर के मारे शाखा से चिपट कर सोया सा रह गया तो कोई एक हाथ से डाली पकड़े झूमता ही रह गया। कूद पड़ने से किसी के पेट में पीड़ा होने लग गई, तो किसी को मूर्च्छा आ गई, जिससे वह मरण के नजदीक पहुँचने को हो गया। भीम के इस कार्य से वे लोग बड़े दुखी हुए। जान पड़ता था कि मानों भीम के पुण्य के डर से ही वे व्याकुल हो रहे हैं। तब हाथ जोड़ कर बड़ी नम्रता से उनमें से एक ने भीम से प्रार्थना की। भीम, तुम पवित्र आत्मा हो, गंभीर हृदय वाले हो। अतः परिवार के लोगों को तकलीफ पहुँचाना तुम्हें शोभा नहीं देता। इस प्रकार


न युक्तमिति कर्तव्यं तव गोत्रविडम्बनम्। निषिद्ध इति सोऽस्वस्थान्स्वस्थीकृत्य स्थितश्च तान् ॥७२॥

अर्थ (श्लोक 67 से 72): प्रार्थना करने पर भीम उसी समय ठहर गया और उसने घबराये हुए कौरवों को बड़ा आश्वासन दिया-धीरज बँधाया ॥६७-७२॥


तत्प्रपेदे निजं पस्त्यं पौरस्त्योद्भूतशोभनः। भ्रातृभिः सततं रेमे भीमो भूरिबलोद्धुरः ॥७३॥

एकदा कौरवा नीत्वा भीमं पद्माकरं प्रति। मिषाज्जलेऽक्षिपन्क्षिप्रं तं हन्तुं मूढमानसाः ॥७४॥

स बली नाब्रुडन्नीरे उपायैर्बहुभिः कृती। ततार तरणोद्युक्तो जलाशयगतं जलम् ॥७५॥

तं वीक्ष्य कौरवाः क्षुब्धास्तरन्तं गतमत्सराः। किं कर्तव्यमिति स्पष्टं चिन्तयामासुराकुलाः ॥७६॥

अर्थ (श्लोक 73 से 76): इसके बाद वे सब अपने-अपने घरों को आ गये। वहाँ उन सबके साथ भीम जिसकी कि पुरुषार्थ से शोभा थी और जो बड़ा पराक्रमी था, सतत क्रीड़ा करता हुआ आनन्द-चैन से अपना समय बिताने लगा। एक दिन कौरव किसी बहाने से भीम को एक तालाब पर ले गये और वहाँ उन मूर्खों ने मार डालने की इच्छा से उसे पानी में ढकेल दिया परन्तु वह बली पुण्यात्मा पानी में न डूबा-वह तैरना जानता था, अतः अपनी भुजाओं के बल तालाब को पार कर किनारे आ गया। उसको तैर कर पार आया देख कौरव बड़े घबराये-उनका मान गल गया और वे सोचने लगे कि अब क्या करना चाहिए ॥७३-७६॥


अथैकदा महाधीरो जले क्षेप्तुमनास्तकान्। केनापि छद्मना सर्वान्सरस्यां सहसाक्षिपत् ॥७७॥

जलाशये बुडन्ति स्म बुडन्तः करुणस्वरान्। रक्षरेक्षेति वाचालाः प्रापुर्दुःखं हि कौरवाः ॥७८॥

रुरुदुर्विक्रवन्देन जलकल्लोललालिताः। धार्तराष्ट्रा धृतिं नापुर्भीमहस्तेन मर्दिताः ॥७९॥

कथं कथमपि प्रायो दुष्टाः संक्लिष्टमानसाः। निर्गतास्तोयतस्तूर्णं जग्मुर्वेश्म महाभयाः ॥८०॥

अर्थ (श्लोक 77 से 80): इसके बाद कौरवों के पानी में डुबा देने की इच्छा से धीर-वीर भीम भी एक बार उन्हें भुला कर तालाब पर ले आया और उन्हें उसने तालाब में गिरा दिया। उस समय दीन स्वर से बचाओ, रक्षा करो इत्यादि कहते हुए कौरव-गण पानी में डूबने लगे और बड़े दुःखी हुए और जल की तरंगों के सहारे डूबते उतरते हुए दुख के मारे रोने लगे। भीम के हाथों उनकी बड़ी दुर्दशा हुई। अन्त में वे क्लेश सहते हुए पुण्य के उदय से, जैसे-तैसे पानी से बाहर आ गये और बड़े भयभीत हुए अपने-अपने महलों को गये ॥७७-८०॥


दुर्योधनो बुधो धीरान्मन्त्रिणः स्वानुजांस्तथा। समाहूयाकरोन्मन्त्रमिति भीमात्सुभीतधीः ॥८१॥

दुर्जयोऽयं महाभीमः पराञ्जेता महाभुजः। भीमो भीतिप्रदो नूनं संगरे कृतसंगरः ॥८२॥

समर्थो बलसंपन्नः शौर्यशाली सुधीरधीः। वैरिवर्गविनाशार्थमुद्युक्तो युक्तिसंयुतः ॥८३॥

अर्थ (श्लोक 81 से 83): इसके बाद भीम से भयभीत होकर बुद्धिशाली दुर्योधन ने अपने धीर-वीर मंत्रियों और छोटे भाइयों को बुलाकर उनके साथ परामर्श किया कि देखो, भीम बड़ा दुर्जय है, धीर-वीर और शत्रुओं को जीतने वाला है, इसकी भुजाएँ बड़ी बलिष्ठ है, वह भय को देने-वाला और युद्ध की प्रतिज्ञा किये हुए है, सब तरह समर्थ है, बल-सम्पन्न और शौर्यशाली है, उसकी बुद्धि बड़ी गंभीर है, वह बैरियों


अस्मिन्नहो महाभीमे भीमे जीवति जीवितम्।
नास्माकं शतसंख्यानां वर्तते विधिवेदिनाम् ॥८४॥

हन्तव्योऽयं दुरात्माथास्माभिर्विस्मितमानसैः।
येन केनाप्युपायेन छद्मना वा महोत्कटः ॥८५॥

अर्थ (श्लोक 81 से 85): के ध्वंस के लिए हमेशा ही उद्यत है और नाना युक्तियों का ज्ञाता है। बड़े खेद की बात है कि इस महाभीम भीम के जीते रहते हम सौ भाइयों का जीवन व्यर्थ ही है। इसलिए इस महान् उत्कट दुरात्मा को जिस उपाय या कपट से बन पड़े हम लोगों को मार ही डालना चाहिए ॥८१-८५॥


अस्मिन्सति सतां नूनमस्माकं राज्यपालनम्।
भविता नास्ति कर्तव्ये कर्तव्या हि प्रतिक्रिया ॥८६॥

यावन्न वर्धते वैरी तावदुच्छेद्य इत्यलम्।
वर्धितो व्याधिवन्नूनं ध्वंसयत्यखिलं बलम् ॥८७॥

व्याधयो दस्यवो वैरिव्रजा दुष्टाश्च श्वापदाः।
उत्पत्तिमात्रतश्छेद्या दुर्द्दमा भीतिदा यथा ॥८८॥

वर्धमाना इमे नूनं दुःखं ददति दारुणम्।
वृद्धेष्वेतेषु नो सातं शरीरे विषवृद्धिवत् ॥८९॥

समुच्छेद्यः समुच्छेद्यो भीमोऽयं भीतिदायकः।
अन्यथा ज्वलयत्यस्मान्यतो वृद्धोऽत्र वह्निवत् ॥९०॥

इति संमन्त्र्य मन्त्रीशैस्तं हन्तुं स कृतोद्यमः।
दुर्योधनो धराधीशो दुर्ध्यानाहतमानसः ॥९१॥

अर्थ (श्लोक 86 से 91): देखिए तो इसके मारे हम लोगों को कितना भय हो रहा है। इसको मारे बिना हमारे दिल का सन्ताप मिट ही कैसे सकता है। एक बात यह है कि इसके रहते हम लोग राज्य का पालन भी नहीं कर सकेंगे। इसलिए इसका जल्दी ही इलाज कर देना योग्य है क्योंकि वैरी बढ़ न पावें इसके पहले ही उसकी जड़ उखाड़ फेंक देनी चाहिए, नहीं तो वह बढ़कर रोग की तरह बल (ताकत-सेना) का ध्वंस कर देगा जैसा कि कहा है-व्याधि, चोर, शत्रु-समूह, दुष्ट पुरुष, आपत्ति और दुर्दम भीति इनको पैदा होते ही नष्टकर देना चाहिए, नहीं तो ये चढ़ जाने पर दारुण दुख देते हैं, उदाहरण यह कि शरीर में विष चढ़ जाने पर जैसे दुखदाई हो जाता है वैसे ही ये भी बढ़कर जीव को साता नहीं होने देते किन्तु दुखदाई हो जाते हैं। इसलिए इस भयंकर भीम को हमें अति शीघ्र मार डालना चाहिए, नहीं तो यह आग की तरह बढ़कर हमें जला देगा-हमारे कुल का नाश कर देगा। इस प्रकार मंत्रियों के साथ सलाह करके खोटे विचारों वाला दुर्योधन भीम को मारने के लिए उद्यम करने लगा ॥८६-९१॥


अन्यदा पावनिं सुप्तं ज्ञात्वा दुर्योधनो नृपः।
छद्मना बन्धयामास बन्धुबन्धुरस्नेहहा ॥९२॥

नीत्वा तं जाह्नवीतीरममुञ्चत्तज्जले रुषा।
तदा भीमो जगागार सुखसुप्तोत्थितो यथा ॥९३॥

तत्कर्तव्यं परिज्ञाय भीमस्तद्वन्धमाच्छिदत्।
प्रसारितभुजोऽप्यस्थाच्छय्यायामिव तज्जले ॥९४॥

लीलया ललिताङ्गोऽसौ सलिलं पावनिस्तदा।
तस्यास्ततार संतृप्तः शर्मणा विगतश्रमः ॥९५॥

अर्थ (श्लोक 92 से 95): एक समय जबकि भीम सोया हुआ था, उसे सोया जान कर स्नेह-हीन दुर्योधन ने कपट से बाँध लिया और रोष में आकर गंगा के प्रवाह में बहा दिया। भीम उस हालत में भी सुख से सोकर उठने की तरह जाग्रत हुआ। उसने जान लिया कि यह सब दुर्बुद्धि दुर्योधन ही का कर्म है। वह बंधन तोड़ कर, हाथों को फैलाये हुए वैसा ही जल-तल पर पड़ा रहा जैसा शय्या पर सोता था। भावार्थ यह कि वह बिना हाथ-पैर हिलाये ही जल के ऊपर स्थित रहा ॥९२-९५॥


उत्तीर्य तज्जलं जिह्यवर्जितः पावनिस्तदा ।
आजगाम गृहं सार्धं कौरवैर्दुष्टकौरवैः ॥९६॥

मन्त्रयित्वान्यदा तस्य कौरवैर्मारणकृते ।
भेजे मैत्रीं प्रकुर्वाणैः स्पर्धां तेन महौजसा ॥९७॥

एकदा भोजनार्थं स आहूतः कौरवैः कृती ।
आमन्त्रणेन सद्‌भक्त्या पावनिः परमोदयः ॥९८॥

दुर्योधनेन दुष्टेन तस्मै भोजनमध्यगम् ।
ददे हालाहलं तूर्णं तत्कालप्राणहारकम् ॥९९॥

श्रेयसः परिपाकेनासुधायत महाविषम् ।
भुञ्जानस्य तदा भोज्यं तस्य सद्रुचिकारकम् ॥१००॥

अर्थ (श्लोक 96 से 100): इसके बाद वह मनोहर शरीरधारी लीला मात्र में ही गंगा पार कर जल से बाहर निकल आया । पुण्य योग से उसे बिल्कुल ही परिश्रम न हुआ । वह कपट रहित था, अतः जल को पार कर वह उन दुष्ट कौरवों के साथ ही साथ घर आ गया, जो उसे बहाने को गये थे । इसके बाद उस वीर के साथ ईर्ष्या-द्वेष करने वाले कौरवों ने उसको मारने के लिए मंत्री-गण से फिर सलाह की और उन्होंने एक दिन परमोदयशाली भीम को भक्तिभाव से निमंत्रण देकर भोजन के लिए बुलाया । वहाँ दुष्ट दुर्योधन ने उसे तत्काल प्राणहारी हालाहल विष का मिला हुआ भोजन खिला दिया परन्तु पुण्योदय से वह हालाहल विष भी अमृतरूप हो गया और वह भोजन भी उसे बहुत रुचिकर मालूम पड़ा ॥९६-१००॥


तस्य श्रेणिक माहात्म्यं पश्य पुण्यसमुद्भवम् ।
हालाहलमपि प्रान्तकारकं चामृतायत ॥१०१॥

विषं निर्विषतां याति शाकिनीराक्षसादयः ।
प्रभवन्ति न भूतेशा धर्मयुक्तस्य देहिनः ॥१०२॥

रक्तनेत्रो महानागः फणाफूत्कारभीषणः ।
धर्मतो धर्मयुक्तस्य सदा किञ्चुलकायते ॥१०३॥

अर्थ (श्लोक 101 से 103): यहाँ गौतम गुरु कहते है कि श्रेणिक ! देखो पुण्य का माहात्म्य कैसा है कि जिससे प्राणों को हरने वाला विष भी अमृत-तुल्य हो गया और भी देखो कि पुण्यात्मा के पुण्य से विष अमृत हो जाता है और शाकिनी, भूत, राक्षस वगैरह सब दूर भाग जाते हैं । धर्मात्मा के लिए धर्म के प्रभाव से फण की फुंकार से डरावना और क्रोध से लाल नेत्रों वाला महान् साँप काँचली-सा हो जाता है ॥१०१-१०३॥


ज्वलनो ज्वालयन्विश्वं ज्वालाजालसमाकुलः ।
भीषणो दुःखदो धर्मात्सत्वरं सलिलायते ॥१०४॥

शृगालीयति सत्सिंहः स्तभति द्विरदोत्तमः ।
स्थलायते नदीशश्च धर्मतो धर्मिणां सदा ॥१०५॥

महीभुजां महाराज्यं प्राज्यं प्राञ्जलिधारिभिः ।
महीशैर्महितं मान्यं धर्मात्संजायते नृणाम् ॥१०६॥

कुचभारभराक्रान्ता भ्रमद्‌भ्रूनेत्रपङ्कजाः ।
लावण्यरसवारीशा वृषाद्धामा भवन्त्यहो ॥१०७॥

महाकरा महावंशाः कपोलफलपालिनः ।
सुदन्ता भान्ति भूत्याढ्या नरा इव सुवारणाः ॥१०८॥

अर्थ (श्लोक 104 से 108): सारे संसार को जलाने वाली अतएव दुखदाई तीव्र ज्वाला वाली भयंकर आग जल हो जाती है और तो क्या धर्मात्मा जनों के धर्म-बल से बड़े-बड़े हाथियों के समूह को रोकने वाला सिंह, स्याल और समुद्र स्थल हो जाता है तथा धर्म के प्रभाव से मनुष्यों को चक्रवर्ती का-जिन्हें बड़े-बड़े राजा-महाराजा सिर झुकाते हैं-महान् राज्य मिल जाता है । इसी धर्म से लोगों को कुचों के भार से सुहावनी, लावण्य की समुद्र और चंचल भौंह-नेत्र-कमल वाली स्त्रियाँ मिल जाती हैं एवं मनुष्यों की तुलना करने वाले हाथी प्राप्त हो जाते हैं। जैसे मनुष्यों के कर (हाथ) होते हैं वैसे ही वे भी कर (सूँड़) वाले होते हैं ॥१०४-१०८॥


धनराशिस्तथा धान्यराशिर्धर्माच्च जायते। पुत्रवारः पवित्रात्मा सत्रिवर्गश्च सर्गतः ॥१०९॥

सुशिक्षिताः सुगमनाः स्वामिभक्तिपरायणाः। ससंस्कारा भवन्त्यत्र सुभृत्या इव वाजिनः ॥११०॥

रथा रथाङ्गसंगेन चीत्कुर्वन्तो महार्थकाः। अर्थयन्ति समर्थं हि धर्मिणां धृतिधारिणाम् ॥१११॥

हारकुण्डलकेयूरमुद्रिकाकङ्कणादिकम्। वस्त्रताम्बूलकर्पूरं लभन्ते धर्मतो नराः ॥११२॥

गवाक्षाक्षपरिक्षिप्ता रक्षकै रक्षिताः खलु। अक्षयाः सक्षणाः क्षिप्रं लभ्यन्ते धर्मतो गृहाः ॥११३॥

सुकृतस्येति विज्ञाय फलं प्रविपुलं कलम्। कलयन्तु कलाभिज्ञाः सकलं तत्सुनिर्मलाः ॥११४॥

अर्थ (श्लोक 109 से 114): जैसे मनुष्य महान् वंश वाले होते है वैसे ही वे भी महान् वंश (पीठ की रीढ़) वाले होते है। मनुष्य के सुन्दर दाँत होते हैं, उनके भी सुन्दर दाँत होते हैं और मनुष्य भूत-परिवार के लोगों- से परिपूर्ण होते हैं, वे भी भूत-भस्म-पुंजों से सजे होते हैं। मनुष्य सुन्दर कपोल वाले होते हैं, उनके भी कपोल-गंड स्थल सुंदर होते हैं और भी सुनो कि धर्म के प्रभाव से जीवों को इतना ही परिकर नहीं मिलता किन्तु बिना परिश्रम किये ही धन-धान्य, पवित्र और धर्म-अर्थ-काम-रूप त्रिवर्ग-सेवी पुत्र मिलते हैं, शिक्षा पाये हुए, अच्छे मार्ग से चलने-वाले, स्वामी की भक्ति में लीन और अच्छे संस्कारों वाले उत्तम नौकरों की तरह उत्तम-उत्तम घोड़े मिलते हैं एवं उन धीरजधारी, समर्थ, धर्मात्मा पुरुषों को चक्रों के संगम से चीत्कार शब्द करने वाले बहुमूल्य रथ भी स्वयमेव आकर प्राप्त होते हैं। इसी तरह धर्म के प्रभाव से मनुष्यों को हार, कुंडल, केयूर, अँगूठी, कंकण आदि भूषण और सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, तांबूल, कर्पूर आदि की प्राप्ति होती है और सुन्दर-सुन्दर खिड़कियों वाले, पहरेदारों से रक्षित, अक्षय और भाँति-भाँति के उत्सवों से परिपूर्ण महल-मकानों की भी प्राप्ति होती है। देखो, धर्म का ऐसा बड़ा और मनोहर फल मिलता है। इसलिए चतुर पुरुषों को निर्मल चित्त हो धर्म सेवन करना चाहिए और उसके फल का अनुभव लेना चाहिए ॥१०९-११४॥


अथ भीमो भ्रमन्भूमौ निर्भयः कौरवैः समम्। रेमे भुजङ्गसक्रीडाखेलनैः स्खलितात्मभिः ॥११५॥

दर्शयांचक्रिरे भीमं भुजंगेन विषाङ्कुरान्। मुञ्चता कौरवाधीशा विश्वकापट्यपण्डिताः ॥११६॥

तस्य तद्गरलं तूर्णममृताय प्रकल्पितम्। तत्प्रभावात्न बभ्राम तद्देहोऽदग्धवेदनः ॥११७॥

अर्थ (श्लोक 115 से 117): इसके बाद निर्भय हो पृथ्वी पर घूमता फिरता बली भीम साँप के साथ क्रीड़ा करने वाले और चंचल-चित्त कौरवों के साथ इसी तरह का क्रीड़ा-विनोद करता रहा। एक दिन उन मायाचारी कौरवों ने विष-कण उगलते हुए साँप से भीम को कटवा दिया। पर भीम के पुण्य-प्रभाव से उस साँप के विष का उसके शरीर पर कुछ भी असर न हुआ, वह विष उसके लिए अमृत तुल्य हो गया-उसकी उसे रंचमात्र भी वेदना न हुई ॥११५-११७॥


अथैकदा च गाङ्गेयो द्रोणः पाण्डोश्च नन्दनाः। कौरवाः सह संचेलू रन्तुं विपिनमुत्तमम् ॥११८॥

कन्दुकं गुण्ठितं गम्यं मण्डितं हेमतन्तुभिः। भजन्तस्ते रमन्तेऽत्र स्वर्णयष्टिभिरादरात् ॥११९॥

अर्थ (श्लोक 118 से 119): इसके बाद एक दिन गांगेय, द्रोणाचार्य, पाण्डव और कौरव सब मिल कर क्रीड़ा के लिए वन में गये। वहाँ वे सोने के डंडों द्वारा, सोने के तारों से अतीव सुन्दर गुंथी हुई गेंद से खेलने लगे। उस


कन्दुकं चालयन्तस्तेऽन्योन्यं विस्मितमानसाः।
रममाणास्तदा रेजुः सुपर्वाण इवापराः ॥१२०॥

यष्ट्या विशिष्टयाभीष्टो गेन्दुकश्चेन्दुदीपनः।
बभ्राम ताडितो भूमौ भयादिव सुभूभुजाम् ॥१२१॥

यष्टिताडनतोऽपप्तदन्धकूपे विपारके।
अतलस्पर्शगे रम्ये जलयुक्ते स कन्दुकः ॥१२२॥

अर्थ (श्लोक 118 से 122): समय वे ऐसे जान पड़ते थे मानों दूसरे देवता-गण ही हैं और पूर्ण चाँद के जैसी गोल गेंद भी दंडों से ताड़ी गई पृथ्वी पर इधर-उधर ढुलकती हुई ऐसी जान पड़ती थी मानों वह राजा लोगों के भय से ही इधर-उधर भागती फिरती है। इस प्रकार खेलते हुए उनमें से किसी के दंडे से गेंद एक बार बहुत उछली और जाकर एक ऐसे अंधकूप में जा पड़ी जो सीढ़ी रहित था और अथाह एवं रमणीक जल से भरा हुआ था ॥११८-१२२॥


तदा हाहारवाकीर्णा भूपाः कूपतटस्थिताः।
पतितं कन्दुकं वीक्ष्यान्धकूपे पारवर्जिते ॥१२३॥

तदेति भूमिपैः प्रोक्तं नरः कोप्यस्ति शक्तिमान्।
स यः संपतितं कूपे गेन्दुकं चानयत्यहो ॥१२४॥

ब्रुवते स्म सुवाचालाः केचनौचित्यवर्जिताः।
आनयामो वयं वेगादिमं पातालसंस्थितम् ॥१२५॥

कश्चिद्द्वावक्ति वेगेन का वार्त्तास्य महीभुजः।
तथा चानयने क्षिप्रमानयामीह कन्दुकम् ॥१२६॥

लालपीति नृपः कश्चिद्दोर्भ्यामुद्धृत्य चाधुकम्।
आनयाम्यस्य का वार्त्ता पातालहरणे क्षमः ॥१२७॥

अर्थ (श्लोक 123 से 127): उसको उस अगाध अंधकूप में पड़ती हुई देखकर चिल्लाते हुए वे सब लोग उस कुँए पर गये और उन्होंने कहा कि हम लोगों में कोई ऐसा शक्ति वाला भी हैं जो इस कुँए में से गेंद को निकाल लावे। यह सुनकर उनमें से बिना विचारे किसी वाचाल ने कहा कि पाताल में गई हुई इस गेंद को मैं बहुत जल्दी ले आ सकता हूँ। किसी ने कहा कि महाराज, इसकी तो बात ही क्या है मैं इससे भी कठिन काम कर सकता हूँ। यह देख एक राजा बोला कि वाह जबकि मैं पाताल को भी उठा लाने के लिए समर्थ हूँ तब इसके लाने की तो बात ही कितनी सी है। मैं अभी दोनों हाथों से इस कुँए को ही उखाड़ कर गेंद लिए आता हूँ ॥१२३-१२७॥


कश्चिदाह समिच्छा चेत् मरुत्वतो महासनम्।
गृहीत्वा तेन सत्सार्धं नयामि नयतो बलात् ॥१२८॥

पातालमूलतः पान्तं पातालं तं फणीश्वरम्।
पद्मावत्या सहाबध्यानयामि भवतः पुरः ॥१२९॥

इति क्षुब्धजनेष्वेवं वाचालेषु घनेषु च।
चञ्चलेषु न चानेतुं तं कोऽपि नयवान् क्षमः ॥१३०॥

द्रोणो विद्रावणे दक्षो रिपूणां वीक्ष्य तत्क्षणम्।
लोकान्संलोकितास्यांश्चान्योन्यं चञ्चलचक्षुषः ॥१३१॥

कोदण्डदण्डमापीड्य ज्ययाटनप्ररूढया।
रराजास्फालयन्स्फारो विस्फारितनिजेक्षणः ॥१३२॥

अर्थ (श्लोक 128 से 132): एक ने कहा कि इस गेंद की तो बात ही क्या चली, यदि मैं चाहूँ तो अपने बल से इन्द्र को इन्द्रासन सहित ले आ सकता हूँ और पाताल-मूल से पाताल के रक्षक धरणेन्द्र को पद्मावती सहित बाँधकर आपके सामने ले आकर उपस्थित कर सकता हूँ। इस तरह उन वाचाल और चंचल जनों ने बड़ा क्षोभ मचाया परन्तु गेंद को ले आने के लिए कोई भी समर्थ न हुआ। सब उपाय कर करके रह गये। तब चंचल चक्षुओं से वे एक दूसरे के मुँह की ओर देखने लगे। यह देखकर द्रोणाचार्य से न रहा गया-उन्होंने उसी समय धनुष चढ़ाया और भ्रुकुटी चढ़ाकर एक बार उसे पृथ्वी पर फटकारा ॥१२८-१३२॥


मूर्तिमांश्चापधर्मो वा स्थितो द्रोणः समुद्रसः। उत्कर्णान्दिग्गजान्कुर्वन्बधिरीकृतसुश्रुतीन् ॥१३३॥

कोदण्डेन प्रचण्डेनाखण्डेन चण्डरोचिषा। उर्वी च दधता रेजे पुरंदरधनुःश्रिया ॥१३४॥

कोदण्डचण्डनादेन त्रासभीयुर्महागजाः। बभ्रमुर्भीतितो गन्तुं पार्श्वं दिग्दन्तिनामिव ॥१३५॥

गन्धर्वा बन्धनातीता गन्धर्वा गानवर्जिताः। गन्धर्वाः कंपनासक्ता बभूवुश्चापशब्दतः ॥१३६॥

अर्थ (श्लोक 133 से 136): उसके भयानक शब्द की कठोरता से समुद्र में रहने वाले दिग्गज तक बहरे हो गये। इस समय द्रोण ऐसे जान पड़ते थे कि मानो वे मूर्तिमान् धनुर्वेद ही हैं और जब वे उस प्रचंड, अखण्ड और तीव्र तेज वाले धनुष को ऊपर की ओर तानते थे, तब ऐसे देख पड़ते थे कि मानों वे इन्द्रधनुष को ही हाथ में लिये हुए हैं। उनके धनुष के प्रचंड शब्द को सुनकर गजों को बड़ा त्रास हुआ। वे इधर-उधर भागने लगे, जान पड़ता था भय के मारे वे दिग्गजों की शरण में ही भागे जा रहे हैं। गंधर्वों के घोड़े बंधनों को तोड़कर भागे। यह देख गंधर्व-देव काँपने लगे ॥१३३-१३६॥


तदा नागरिकाः सर्वे श्रुत्वा कोदण्डजं स्वरम्। कोऽत्र शत्रुः समायासीद्विचेलुरिति भाषिणः ॥१३७॥

स्थालीकराः सुकामिन्यो निशम्य धनुषः स्वनम्। तत्रत्या विगलद्वस्त्रा बभूवुर्भीतितो न किम् ॥१३८॥

इति चापल्यमुत्पाद्य जनानां चञ्चलात्मनाम्। तं वेध्यं विधिवद्द्रोणो विव्याध संविधाय च ॥१३९॥

शरेण शिरसं द्रोणः समुत्क्षिप्य समानयत्। कन्दुकं कौरवैर्नेतुमशक्यं सकलैरपि ॥१४०॥

अर्थ (श्लोक 137 से 140): नगरवासी लोगों ने उस धनुष के शब्द से यह समझा कि कोई शत्रु ही चढ़कर आ गया है। अतएव वे भी भागने लगे। स्त्रियाँ हाथ में बटलोई लिये अपने भोजन वगैरह के कामों में लगी हुई थीं। इतने में द्रोण के धनुष का शब्द हुआ। उससे वे बड़ी डरीं और डर के मारे उनके वस्त्र तक गिर पड़े। सच है कि डर से क्या नहीं होता-सभी अनहोनी बातें हो जाती हैं। इस तरह स्वयं चंचल लोगों को द्रोण ने और भी चंचल बना दिया। इसके बाद द्रोण ने एक बाण ऐसा मारा कि वह जाकर गेंद में जा छिदा। फिर क्या था, उन्होंने अब एक के बाद एक बाण मारना शुरू किया। वे बाण सिलसिले से बिंधते हुए गेंद से लेकर ऊपर तक एक लम्बी रस्सी के आकार के बन गये। इस प्रकार बड़ी आसानी से वह गेंद निकाल ली गई, जिसे निकालने के लिए कौरव असमर्थ थे ॥१३७-१४०॥


तदा सुरनरा वीक्ष्य तत्कौशल्यमवर्णयन्। किन्नरास्तद्यशोराशिं गायन्ति स्माद्रिकन्दरे ॥१४१॥

ईदृशं शरकौशल्यं न दृष्टं नापि दृश्यते। अतोऽन्यत्रेति भूपालाः शशंसुस्तद्गुणोत्करम् ॥१४२॥

तत्र ते क्षणमास्थाय पाण्डवाः कौरवा नृपाः। अन्योन्यप्रीतिचेतस्का विविशुर्निजपत्तनम् ॥१४३॥

अर्थ (श्लोक 141 से 143): उस समय द्रोण की धनुर्विद्या की कुशलता को देखकर देवता और मनुष्य उसकी बड़ी तारीफ करने लगे, एवं पर्वतों की गुफाओं में बैठ कर किन्नर-गण उसके यश का गान करने लगे। राजा-गण उसके गुणों की प्रशंसा करते हुए कहने लगे कि ऐसी बाण-कुशलता पहले हमने कभी न तो देखी और न इस समय कहीं दीखती है। इसके बाद कुछ काल वहाँ और ठहर कर परस्पर प्रेम-पूर्वक कौरव और पाण्डव अपने नगर को लौट आये ॥१४१-१४३॥


कौरवा अपि भीमस्य पुण्यं शक्तिं निरीक्ष्य च। विलक्षाः क्षान्तिमाभेजुरशक्तानां क्षमा वरा ॥१४४॥

एवं राज्यं प्रकुर्वत्सु तेषु कालो महानातः। अहो तत्र सपुण्यानां महान्कालः क्षणायते ॥१४५॥

अर्थ (श्लोक 144 से 145): कौरव लोग भीम के पुण्य और शक्ति को देखकर जब कुछ न कर सके तब सुतरां शान्त हो गये और है भी ऐसा ही कि असमर्थ पुरुष जब कुछ नहीं कर सकते तब वे क्षमा का आश्रय ले लेते हैं। इस तरह से पाण्डवों और कौरवों को राज्य करते-करते बहुत काल बीत गया, उन्हें वह कुछ भी न जान पड़ा। सच है पुण्यात्मा सत्पुरुषों का महान् काल भी क्षण की तरह गुजर जाता है और उन्हें उसका कुछ भान भी नहीं होता ॥१४४-१४५॥


अथैकदा च द्रोणाय प्रार्थना विहितामुना। गाङ्गेयेन विवाहस्य सिद्ध्यर्थं विधिवेदिना ॥१४६॥

स प्रार्थितो नृपैः सर्वैस्तथेति प्रतिपन्नवान्। ततो विवाहसंक्षोभो गाङ्गेयस्याजनि स्फुटम् ॥१४७॥

ततो गौतमसत्पुत्री साक्षाद्रतिरिवापरा। जनानन्दकरा तेनाभ्यर्थिता द्रोणहेतवे ॥१४८॥

अर्थ (श्लोक 146 से 148): इसके बाद एक समय गांगेय ने तथा और-और राजाओं ने विवाह के सम्बन्ध में द्रोणाचार्य से प्रार्थना की। कहा कि गुरुवर्य! अब आप अपना विवाह कीजिए और सद्गृहस्थ बनिए। द्रोणाचार्य ने उनकी प्रार्थना को उत्तम समझकर स्वीकार कर लिया। गुरु की सम्मति पाकर गांगेय ने उनके विवाह का उत्सव शुरू कर दिया और गौतम के पास जाकर उससे उसकी कन्या की द्रोण के लिए याचना की। कन्या लोगों को आनंद देने वाली और रूप-सौंदर्य की मूर्ति थी। जान पड़ता था कि वह साक्षात् दूसरी रति ही है ॥१४६-१४८॥


तया तस्याथ संजातं विवाहवरमङ्गलम्। नदत्सु वाद्यवृन्देषु गायन्तीषु सुभीरुषु ॥१४९॥

विवाहानन्तरं तौ द्वौ दम्पती दीप्तमन्मथौ। रेमाते रतियोगेन सुरतौ सुरतोत्सवौ ॥१५०॥

ततस्तयोः क्रमात्पुत्रोऽश्वत्थामा नामतोऽभवत्। महाधामा सुधीर्धीरो धर्मभृद्धृतिसेवकः ॥१५१॥

कोदण्डविद्याया सोऽभूत्सर्वधन्विमहेश्वरः। सुप्रेमप्रेरितानन्दो नन्दयन्सकलाञ्जनान् ॥१५२॥

अर्थ (श्लोक 149 से 152): उसके साथ द्रोण का विवाह-मंगल हो गया। विवाह के समय भाँति-भाँति के बाजे और कामिनी-गणों के मंगल-गीतों से बड़ी चहल-पहल रही। तात्पर्य यह कि विवाह के समय खूब ही धूमधाम की गई थी। विवाह के बाद उन दम्पति पर काम ने अपना अधिकार जमाया और वे रति-सुख भोगते हुए आनंद-चैन से अपना समय बिताने लगे और एक दूसरे पर आसक्त चित्त होकर प्रेम से स्वर्ग के सुखों को यहीं भोगने लगे। अनन्तर कुछ काल में उन दम्पती के अश्वत्थामा नाम एक पुत्र पैदा हुआ। वह बुद्धिमान् था, धीर था, धर्मात्मा और व्रती पुरुषों का सेवक था। उसका शरीर तेज का पुंज था। वह धनुष-विद्या में इतना निपुण था कि सब धनुष विद्या-विशारद में महेश्वर-मुखिया गिना जाता था। उसका हृदय हमेशा ही प्रेम से परिपूर्ण और फूला हुआ रहता था, अतएव वह सब लोगों की आनंददायक था ॥१४९-१५२॥


एकदा तेन द्रोणेन भणिता नृपनन्दनाः। पार्थादयः पृथुप्रीताः सुशिष्यीभूतमानसाः ॥१५३॥

अर्थ: एक दिन द्रोणाचार्य ने अपने परम प्रीतिभाजन अर्जुन आदि से कहा कि प्रिय शिष्यो! तुम


अहो शिष्याः सुकर्तव्यं मद्वचो बहुविस्तरम्।
धनुर्विद्याविधौ दीप्तं समस्तविधिपारगम् ॥१५४॥

कृपापारमितो द्रोणो धनुर्विद्याविशारदः।
तद्वाक्यमवकर्ण्याशु विचेलुः कौरवाः स्वयम् ॥१५५॥

पार्थः सार्थः समर्थस्तु तद्वाक्ये स्थितिमादधौ।
गुरुवाक्ये रतानां हि विद्याः स्युः करसंगताः ॥१५६॥

ततो धनंजयस्याशु गुरुणा वर उत्तमः।
अदायीति प्रदातव्या धनुर्विद्या हि ते मया ॥१५७॥

मत्समस्त्वं प्रकर्तव्यः शुद्धया चापविद्यया।
गुरुणेत्युदिते तावत्पार्थः स्वस्थः सुसार्थकः ॥१५८॥

अर्थ (श्लोक 153 से 158): धनुष-विद्या के सम्बन्ध में हमेशा मेरी आज्ञा के अनुसार ही चलना, कभी मेरी आज्ञा से विरुद्ध न होना। द्रोणाचार्य सब विद्याओं में पारंगत, कृपा के सागर तथा धनुष-विद्या के पूर्ण पण्डित थे। तब भी कौरवों ने उनके वचनों की अवज्ञा की और वे स्वतंत्र रहने लगे परन्तु बुद्धिमान् और समर्थ अर्जुन ने उनकी आज्ञा का यथावत् पालन किया और यह उचित ही था क्योंकि विद्या उन्हीं को प्राप्त होती है, जो गुरु के आज्ञा-पालक होते हैं। इस पर प्रसन्न होकर द्रोणाचार्य ने अर्जुन को वर दिया कि मैंने तुम्हें आज पूर्ण धनुष-विद्या दी, तुम शुद्ध, निर्दोष धनुष-विद्या से मेरे समान ही हो जाओगे। इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं। ऐसी मेरी हार्दिक इच्छा है ॥१५३-१५८॥


धनुर्वेदिरतः पार्थः परमार्थविशारदः।
चचार चापचातुर्यं तच्चिन्ताहृतचेतनः ॥१५९॥

घस्रे निशीथिनीकाले भक्तिमान्स धनंजयः।
गुरावगणयन्दुःखं सिषेवे तत्पदाम्बुजम् ॥१६०॥

अर्थ (श्लोक 159 से 160): गुरु के इन वचनों को सुनकर पवित्र-चित्त अर्जुन बड़ा कृतार्थ हुआ और उस परमार्थ के ज्ञाता तथा गुरु को हमेशा अपने हृदय में विराजमान किये रहने वाले अर्जुन ने धनुष-विद्या के अभ्यास में लगे रह कर थोड़े ही दिन में उसमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया ॥१५९-१६०॥


तदान्यदा गुरुद्रोणः पाण्डवैः कौरवैः समम्।
शिक्षयितुं धनुर्वेदं वनमाप सुशिष्यकान् ॥१६१॥

तत्रैकं तुङ्गशाखाढ्यं शाखिनं सुफलान्वितम्।
सपलाशं खगाकीर्णं ददृशुस्ते महोद्धताः ॥१६२॥

शाखामध्यगतं वीक्ष्य द्रोणं काकं सुपक्षिणम्।
द्रोणोऽवादीद्धनुर्वेदी पाण्डवान्कौरवान्प्रति ॥१६३॥

यः पक्षिदक्षिणं चक्षुर्लक्षीकृत्य च विध्यति।
स विद्वान्कार्मुकी दक्षो धनुर्वेदविदग्रणीः ॥१६४॥

निशम्य कौरवाः सर्वे दुर्योधनपुरस्सराः।
विषमं वेधमाज्ञाय तूष्णींत्वमगमंस्तदा ॥१६५॥

केनेदं दक्षिणं चक्षुः क्षणस्थिति च पक्षिणः।
चञ्चलं चञ्चलस्याशु वेध्यं क्व चेति वादिनः ॥१६६॥

अर्थ (श्लोक 161 से 166): इसके बाद एक दिन पाण्डवों और कौरवों सहित द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को धनुष-विद्या सिखाने के लिए वन में गये। वहाँ उन लोगों ने ऊँची डालियों वाले और फल-पत्तों से लदे हुए एक वृक्ष को देखा। उस पर बहुत से पक्षी बैठे हुए थे। उसकी बीच की डाली पर एक कौआ बैठा हुआ था। उसको देखकर धनुर्वेदी द्रोण ने पाण्डवों और कौरवों से कहा कि जो इस कौए की दाहिनी आँख को लक्ष्य-निशाना बनाकर बेधेगा, वही विद्वान् धनुर्धारी, दक्ष और धनुष-विद्या-विशारदों में अगुआ माना जायेगा। यह सुनकर दुर्योधन आदि तो उस निशाने का लगाना कठिन समझ कर चुप रह गये। वे आपस में विचार करने लगे कि प्रथम तो यह कौआ चंचल है और दूसरे इसकी आँख और भी चंचल है-पलमात्र भी एक ओर नहीं ठहरती, फिर इसके इस दाहिने नेत्र को कौन बेध सकता है और कैसे बेध सकता है ॥१६१-१६६॥


पाण्डवान्कौरवान्द्रोणोऽ वादीच्चापविशारदः।
तथास्थांल्लक्ष्यविद्वीक्ष्य गिरा गम्भीररूपया ॥१६७॥

अहं हन्मीति संधानं दधौ धनुषि पत्रिणः।
सपत्नस्य गुणाप्तस्य पत्रिदक्षिणवीक्षणम् ॥१६८॥

तदा धनंजयो धन्वी धनुःसंधानबुद्धिमान्।
सधन्वानं गुरुं नत्वा विज्ञप्तिमिति चाकरोत् ॥१६९॥

विशिखाक्षेपविद्द्रोण सुशाखापक्षिचक्षुषः।
लक्ष्यस्य च क्षमोऽसि त्वं वेधनं कर्तुमुद्यमी ॥१७०॥

विस्मयः कोऽत्र गोत्रेश मित्रस्य दीपदीपनम्।
रसाले तोरणस्यापि बन्धनं यादृशां भवेत् ॥१७१॥

अथवागुरुधूपित्वं मृगनाभिभवस्य च।
तादृशं धन्वसंधानं तातपाद तवाधुना ॥१७२॥

अन्तेवासिनि मादृक्षे सति त्वयि न युज्यते।
ईदृशं कर्म संकर्तुं धनुःसंधानधारिणि ॥१७३॥

ममाज्ञां देहि ताताद्य वेध्यस्य विषमस्य च।
वेधने त्वत्प्रसादेन लब्धविद्यस्य धन्विनः ॥१७४॥

तदा तेन समुद्दिष्टो गरिष्ठो वेध्यवेधने।
कोदण्डं स करे कृत्वा समुत्तस्थे स्थिरक्रियः ॥१७५॥

चापमास्फाल्य चापेशो मौर्वीसंधानमावहन्।
जगर्ज स्फूर्जयद्धृत्समर्जितयशश्चयः ॥१७६॥

सक्षणं क्षणिकं वीक्ष्य पक्षिणो दक्षिणेक्षणम्।
अक्षमं लक्षितं यद्वत्संधे क्षणिकं मतम् ॥१७७॥

अर्थ (श्लोक 167 से 177): उनको इस प्रकार चुप-चाप देखकर चाप विद्या-विशारद और लक्ष्य को भली-भाँति जानने वाले द्रोण गंभीर वाणी द्वारा पाण्डव-कौरवों से बोले कि यदि तुममें से कोई भी इसे बेधने को तैयार नहीं है तो लो मैं ही इसे बेधता हूँ। यह कहकर उसने धनुष पर सपुंख बाण चढ़ाकर ज्यों ही उस कौए की दाहिनी आँख की ओर संधान लगाया-दृष्टि बाँधी त्यों ही उन धनुर्धर गुरु को प्रणाम कर धनुष के संधान में बुद्धिमान् और धनुर्धर धनंजय (अर्जुन) बोल उठा कि हे धनुष-विद्या-विशारद गुरुपुंगव, इस लक्ष्य को बेधने के लिए तुम सर्वथा समर्थ हो, फिर तुम्हारे बेधने में अचम्भा ही क्या हैं। हे तातपाद ! इस समय आपका यह लक्ष्य-बेध करना ऐसा है जैसे सूरज को दीया दिखाना और आम पर बंदनवार बाँधना या कस्तूरी को चंदन की धूप से सुगन्धित करना। भावार्थ यह कि जिस तरह सूरज को दीया दिखाना शोभा नहीं देता उसी तरह यह लक्ष्य-बेध आपको शोभा नहीं देता और एक बात यह भी है कि मुझ सरीखे आपके ही धनुर्धारी विद्यार्थी के उपस्थित रहते आपको यह काम करना युक्त भी तो नहीं मालूम पड़ता। इसलिए प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं आपके प्रसाद से पाई हुई धनुष-विद्या के बल से इस विषम लक्ष्य को भी आसानी से बेध सकूँ। यह सुन द्रोण ने गौरव-शाली अर्जुन को लक्ष्य-बेध करने के लिए आज्ञा दे दी और अर्जुन भी उसी समय हाथ में धनुष लेकर वहाँ जाकर अचल हो बैठ गया, जहाँ से उसे लक्ष्यबेध करना था। इसके बाद धनुष पर डोरी चढ़ाकर उस यशस्वी ने वज्र के शब्द जैसी गर्जना की ॥१६७-१७७॥


चञ्चलं चञ्चलग्रीवं चलन्नेत्रं चलन्मुखम्।
पक्षिणं वीक्ष्य स स्वान्ते दधे लक्ष्याय शेमुषीम् ॥१७८॥

स्वोरुं संस्फालयामास तदधोवीक्षणकृते।
तावताधोमुखं पक्षी लुलोके स्फालनश्रुतेः ॥१७९॥

अर्थ (श्लोक 178 से 179): कौआ बहुत ही चंचल था, वह क्षण-क्षण में गर्दन को इधर से उधर और उधर से इधर मोड़ता था। उसके नेत्र और भी अधिक चंचल हो रहे थे। ऐसी हालत में उसकी दाहिनी आँख को लक्ष्य बनाना बहुत ही कठिन था परन्तु फिर भी अर्जुन ने उसे लक्ष्य बना उसी ओर अपने मन और बुद्धि को लगा दिया। उसने इस इच्छा से कि कौआ मेरी ओर नीचे को देखे, फिर धनुष का शब्द


लोकयन्तमधोवक्त्रं पक्षिणं वीक्ष्य लक्ष्यवित्। जघान दक्षिणं चक्षुस्तस्य बाणेन बाणवित् ॥१८०॥

अर्थ (श्लोक 178 से 180): किया। जिसे सुनकर कौआ उसकी ओर मुँह कर नीचे को देखने लगा ! इतने ही में उस लक्ष्य-बेध के पूर्ण विद्वान् अर्जुन ने अति शीघ्र उसकी दाहिनी आँख को बेध दिया ॥१७८-१८०॥


तत्कुर्वाणं समावीक्ष्य द्रोणदुर्योधनादयः। तं शशंसुरिति स्पष्टं चापविद्याविशारदम् ॥१८१॥

चापविद्याचणाश्चित्रं दृष्टाः पूर्वमनेकशः। धानुष्को नेदृशो दृष्टो वेध्यविद्याविशारदः ॥१८२॥

पारंगतोऽसि वेध्यस्य विद्याया विबुधाग्रणीः। क्व गुणी गुणसंधिज्ञं शशंसुरिति ते तकम् ॥१८३॥

ततस्ते तत्कथां सार्थां कुर्वाणा धृतराष्ट्रजाः। सद्मासेदुश्च सीदन्तो विशदं वीक्ष्य तद्बलम् ॥१८४॥

अर्थ (श्लोक 181 से 184): उसकी इस सफलता को देखकर द्रोणाचार्य और कौरव आदि सभी चापविद्या-विशारद अर्जुन की मुक्तकंठ से प्रशंसा करने लगे। वे बोले कि बहुत से धनुषधारियों को देखा परन्तु ऐसा धनुष-विद्या-निपुण अब तक कोई भी देखने में नहीं आया। अर्जुन, तुम धनुष-विद्या में पारंगत विद्वानों में भी श्रेष्ठ विद्वान् हो। अब और गुणी या गुणग्राही तुमसे बढ़कर कौन होगा। इसके बाद वे सब अर्जुन की इस सार्थक कीर्ति-कहानी को कहते सुनते हुए अपने-अपने घर चले आये परन्तु अर्जुन के इस निर्मल बल को देखकर कौरवों का हृदय बड़ा दुखी हो रहा था ॥१८१-१८४॥


कदाचित्पृथु पार्थेशः समर्थो व्यथयन्नरीन्। शरासनं करे कृत्वा जगाम विपिनं वरम् ॥१८५॥

भ्रमन्भीतिं प्रकुर्वाणो वन्यानां स धनंजयः। श्वापदापदसंभेदी गहनं निरगाल्लघु ॥१८६॥

अर्थ (श्लोक 185 से 186): एक समय शत्रु-विध्वंसक समर्थ अर्जुन धनुष-बाण हाथ में लेकर वन को गया और वहाँ हिंसक सिंह, व्याघ्र आदि जीव-जन्तुओं द्वारा लोगों को जो आपदायें हो रही थीं उन्हें दूर कर, वनचर हिंसक जीवों को डराता हुआ, घूमता फिरता, एक गहन स्थान में पहुँचा। वहाँ उसने सिंह की तरह उन्नत एक कुत्ते का मुँह बाणों से विंधा हुआ देखा ॥१८५-१८६॥


तत्रैकं मृगदंशं स मृगारिमिव सुन्नतम्। शरप्रहारसंरुद्धवदनं वीक्षते स्म च ॥१८७॥


बाणप्रहारसंरुद्धतुण्डः सच्छण्डमानसः। केनाकारि स्वयं श्वायं धनुर्विद्याविदात्मना ॥१८८॥


नरो न दृश्यते कश्चिदत्रास्यास्यप्रहारकृत्। शब्दवेधविदो नान्यो विधातुमीदृशं क्षमः ॥१८९॥


बाणप्रहारसंरुद्धवदनं वीक्ष्य कुक्कुरम्। शरराशिसमाकीर्णतूणं वा स व्यचिन्तयत् ॥१९०॥


अहो द्रोणो महाप्राज्ञो मद्गुरुः प्रकटो भुवि। ध्वनिवेधविधानेन सदा मान्यो धनुष्मताम् ॥१९१॥


शब्दवेधं दुराराध्यं सर्वागोचरसंचरम्। जानाति चेदयं द्रोणो नान्यः कोऽपि श्रुतौ श्रुतः ॥१९२॥

अर्थ: उसको देखकर वह सोचने लगा कि यहाँ इस तरह बाण चलाने वाला कोई मनुष्य तो दीखता ही नहीं, फिर इस प्रचंड कुत्ते का मुँह इस तरह बाणों से किस धनुष विद्या-विशारद ने बेध दिया है। दूसरी बात यह है कि शब्द-वेध जाने बिना कोई ऐसा काम कर भी नहीं सकता और यहाँ शब्द-वेध के ज्ञाता का होना बड़े अचम्भे की बात है क्योंकि शब्द-वेध के कारण ही मेरे गुरु महान् पंडित द्रोण को सभी धनुषविद्या-विशारद मानते हैं और इसी से वे संसार में प्रसिद्ध हैं और यह सुना भी जाता है कि शब्द-वेध बहुत कठिन है, दुराराध्य है-उसको कोई भी नहीं जानता। यदि कोई जानता है तो द्रोण ही जानता है। फिर यहाँ शब्द-वेध का ज्ञाता कहाँ से आया। यदि किसी दूसरे विद्यार्थी


अहं तिष्ठामि तत्पार्श्वे शब्दवेधं सुशिक्षितुम्।
गुरुणाधिष्ठितः प्राज्ञश्चापचञ्चुत्वमागतः ॥१९३॥

तेन प्रसादतो मह्यं धनुर्विद्या सुशब्दिगा।
अदायि क्वापि नान्येभ्योऽन्तेवासिभ्यो विशारदा ॥१९४॥

अर्थ (श्लोक 187 से 194): को द्रोण गुरु ने ही सिखाया हो तो यह भी नहीं हो सकता क्योंकि मैं हमेशा ही उनके पास शब्द-वेध सीखने के लिए उपस्थित रहता हूँ और उन्हीं के आश्रय से मैं धनुषविद्या-विशारद हुआ हूँ, मेरा धनुषविद्या में चंचु-प्रवेश हुआ है एवं प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे शब्दवेध-विद्या सिखाई है और किसी को नहीं सिखाई है ॥१८७-१९४॥


शुनको भाषमाणोऽयं ध्वनिवेधविदा हतः।
केनेति विस्मयः श्रीमान्सस्मार स्मेरमानसः ॥१९५॥

अर्थ: फिर दूसरा कोई शब्द-वेध कुशल यहाँ हो ही कैसे सकता है परन्तु इसमें भी संशय नहीं कि इस कुत्ते को भौंकते वक्त किसी शब्दबेध विशारद ने ही मारा है। बड़े अचम्भे की बात है कि उसका कुछ पता नहीं चलता।


आश्चर्यं धैर्यवीर्यार्यपर्यूपासितशासनः।
वर्यः स्मरन्स्मयेनासौ बभ्राम विपिनं तदा ॥१९६॥

स तं द्रष्टुमनाः शब्दवेधिनं विशिखायुधम्।
लोकयन्निखिलां क्षोणीं बभ्राम विगतश्रमः ॥१९७॥

कन्दरे सुन्दरे देशे निकुञ्जे च शिलोच्चये।
तं पश्यन्नप्रथे पार्थः परार्थसार्थकोविदः ॥१९८॥

अर्थ (श्लोक 195 से 198): इसके बाद वह धीरवीरों को भी शिक्षा देने वाला वीरवर अर्जुन इसी बात का बार-बार स्मरण करता हुआ गर्व के साथ जंगल में घूमने लगा और उस शब्द-वेधी बाण चलाने वाले को देखने की प्रबल इच्छा से वह अनायास ही बड़ी दूर तक घूम आया। उसने पहाड़ों की गुफायें और शिखर देखे, लताओं के सुन्दर मंडप देखे ॥१९५-१९८॥


तावता हस्तसंरुद्धश्वानं वीरं वनेचरम्।
करोत्क्षिप्तशरं तूर्णसंबद्धपार्श्वभागकम् ॥१९९॥

करालास्यं गतालस्यं वेगनिर्जितमारुतम्।
विकटाक्षं च ध्वांक्षाभपक्षभागमधोमुखम् ॥२००॥

काकतुण्डस्वनासाग्रं कोलकेशं च केशिनम्।
ददर्श दारुणं भिल्लं धनुस्कन्धं धनंजयः ॥२०१॥

अर्थ (श्लोक 199 से 201): इतने में उसे एक भील देख पड़ा। वह कंधे पर धनुष लिये था, वीर था, वन में रहने वाला था, बाण छोड़ने में बड़ा चतुर था, उसके नेत्र बड़े भयंकर थे, दोनों पसबाड़े इधर-उधर घूमने के कारण क्षुभित हो रहे थे। वह कमर में तरकस बाँधे था। उसका तरकस बाणों से परिपूर्ण था। उसको आलस लेशमात्र न था। उसका हाथ हमेशा नृत्य-सा करता था और वह अपने वेग की चंचलता से हवा को भी मात करता था। उसका मुँह नीचा था। उसकी नाक का आगे का भाग बाण के अग्र-भाग की तरह बिल्कुल पतला था। उसके बाल बँधे हुए थे। वह भयानक और एक कुत्ते को साथ लिये हुए था ॥१९९-२०१॥


सोऽभाणीत्तं समावीक्ष्य प्रचण्डः पाण्डुनन्दनः।
कस्त्वं सुहृत् क्व संवासी का विद्या त्वयि वर्तते ॥२०२॥

इति पृष्टः समाचष्टे शबरः स स्मयावहः।
दुर्निरीक्ष्यः क्षमामुक्तः कोपारुणितलोचनः ॥२०३॥

अर्थ (श्लोक 202 से 203): उसको देखकर तेजस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुन बोला कि मित्र, तुम कौन हो ? कहाँ रहते हो ? और कौन-सी विद्या जानते हो ? यह सुन क्रोध से लाल नेत्र किये हुए अतएव क्षमा-रहित और


समाकर्ण्य सत्कर्ण व्याकर्णाकृष्टकार्मुकः। अभीभीतिंकरोऽन्येषां परमप्रीतिदायकः ॥२०४॥

शबरोऽहं वनेवासी धनुर्विद्याविशारदः। शरासनशरेणाशु भेत्तुं शक्नोमि देहिनः ॥२०५॥

अर्थ (श्लोक 202 से 205): देखने में भयावना वह भील अहंकार भरे शब्दों में बोला कि सुनिए, धनुषधारियों को भय देने वाला तथा औरों को प्रीति देने वाला मैं एक भील हूँ और इसी वन में बसता हूँ। मैं धनुषकला का पण्डित हूँ। मुझमें धनुष-बाण के द्वारा हर एक प्राणी को बेधने की अपूर्व सामर्थ्य है ॥२०२-२०५॥


शब्दवेधविधौ शुद्धः समृद्धो वेध्यवेधकः। मादृक्षः कोऽपि भूपीठे न लक्ष्यो लक्ष्यहृज्जनैः ॥२०६॥

श्रुत्वेति पिप्रिये पार्थः पराक्रान्तिं सुचापिनः। भिल्लस्य भालभ्रूभङ्गपरिक्षिप्तरात्मनः ॥२०७॥

शब्दवेधिन् त्वया ध्वस्तो मृगदंशो मृगारिमः। बाणेन बलतस्तूर्णं पार्थस्तमित्यबीभणत् ॥२०८॥

सोऽब्रवीच्छृणु सुश्रोतः काममर्त्य सुकामद। कम्राङ्ग कमलाक्षस्त्वं कोमलः कमलालयः ॥२०९॥

कामिनीकमनीयोऽसि करुणावान् क्रियाग्रणीः। कलाकेलिकृतावास समाकर्णय मत्कृतिम् ॥२१०॥

अर्थ (श्लोक 206 से 210): मैं शब्दवेध करने में पूर्ण समर्थ हूँ, मेरे समान लक्ष्य बेध करने वाला पृथ्वी की पीठ पर और कोई नहीं है और तो क्या, मेरी भृकुटि को देखकर ही कई तो प्राण त्याग देते हैं। उस धनुर्धर भील के ऐसे पराक्रम को सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उससे पूछा कि हे शब्दबेध-निपुण, उस सिंह-तुल्य कुत्ते की क्या तुमने ही अपने अपूर्व बाण-विद्या के बल मारा है ? भील बोला-हे सुन्दर श्रोत्रों वाले और काम की मूर्ति, आप मनोरथ सिद्धि के साधक, सुन्दरांग और कमल के जैसे नेत्रों वाले, कमला-लक्ष्मी के आलय, सुन्दर कामियों द्वारा वांछनीय, कर्तव्य-परायण और भाँति-भाँति की कलाओं की केलि के स्थान देख पड़ते है। अतः मैं अपनी कृति को आपसे कहता हूँ ॥२०६-२१०॥


गच्छताथ श्रुतः शब्दः शुनः सुश्रान्तचेतसा। शरेण स हतः शब्दवेधिना शब्दतो मया ॥२११॥

तं शब्दवेधिनं मत्वा विस्मितः कौरवाग्रणीः। अप्राक्षीत्क्षिप्तसंशोभं सलोभं तं वनेचरम् ॥२१२॥

किरात क्व त्वया विद्या लब्धेयं शब्दवेधिनी। विद्यमाना फलं विद्या दत्ते च महती महत् ॥२१३॥

को गुरुर्भवतामस्या विद्यायाः सुगुणाग्रणीः। शब्दविद्याप्रदातारो न दृश्या गुरवः क्वचित् ॥२१४॥

इत्युक्तियुक्तिमाकर्ण्य किरातः किरति स्म च। कृतज्ञः सुकृती वाक्यं विकसद्वक्त्रपङ्कजम् ॥२१५॥

रिपुविद्रावणे दक्षो द्रोणोऽस्ति मम सद्गुरुः। तत्प्रसादान्मया लब्धा विद्या सच्छब्दवेधिनी ॥२१६॥

अर्थ (श्लोक 211 से 216): आप ध्यान देकर सुनिए। वह यह कि मैं शान्तचित्त से कहीं जा रहा था कि इतने में, मैंने उस कुत्ते का भयावह शब्द सुना। सुनकर मुझे कुछ रंजसा हुआ और ऐसी ही अवस्था में मैंने उसका बाण द्वारा काम तमाम कर दिया। भील की इस बात से उसे शब्द-वेधी जान कर कौरवाग्रणी अर्जुन को बहुत अचम्भा हुआ और तब उसने शोभा-विहीन और लोभी उस भील से पूछा कि किरात, बताओ कि तुमने यह शब्दवेधिनी उत्तम विद्या कहाँ से सीखी है ? देखी, यह अक्षरशः सत्य है कि उत्तम विद्या का उत्तम फल मिलता है या यो कहिए कि उत्तम विद्या उत्तम फल देती है। ऐसी उत्तम विद्या की देने वाला कौन अपूर्व पण्डित तुम्हारा गुरु है। इस समय तो शब्द-वेधिनी-विद्या को सिखाने वाले गुरु कहीं दीखते भी नहीं। अर्जुन की ऐसी युक्ति-संगत बातों को सुनकर मुस्कुराता हुआ वह कृतज्ञ


द्रोणस्तु गुणसंधानः सद्गुरुर्मे महामनाः।
ततो विद्या मया लब्धा परेयं शब्दवेधिनी ॥२१७॥

अर्थ (श्लोक 211 से 217): और सुकृती भील बोला कि शत्रु-समूह के ध्वंसक द्रोणाचार्य मेरे सद्गुरु हैं और उन्हीं के प्रसाद से मैंने यह उत्तम विद्या पाई है। इस समय यह विद्या उनके सिवाय और किसी के पास नहीं है। अतः इस विद्या की विधि को बताने वाले मेरे वही गुरु हैं और कोई नहीं ॥२११-२१७॥


शब्धवेधित्वविज्ञानमतो नान्यत्र वर्तते।
अतो गुरुरयं मेऽद्य तद्विद्याविधिनायकः ॥२१८॥

निशम्येति वचस्तस्य पार्थः सार्थमनोरथः।
अचिन्तयदिति स्वान्ते स्वच्छचेताश्च सूक्ष्मधीः ॥२१९॥

परिवारयुतो द्रोणो राजमान्यो विदांवरः।
क्व द्रङ्गरङ्गसंभोगी संगतो वरया गिरा ॥२२०॥

क्व किरातः कृपाहीनो देहिसंघातघातकः।
पाकसत्त्वैः समं युद्धं कुर्वाणो दृश्यते जनैः ॥२२१॥

अनयोर्दुर्धरो योगो दृश्यते पूर्वनस्थयोः।
पूर्वापरसमुद्रस्थकीलिकाहालयोगवत् ॥२२२॥

अर्थ (श्लोक 218 से 222): उसके इन वचनों को सुनकर सफल-मनोरथ, पवित्र-चित्त और सूक्ष्म-बुद्धि अर्जुन मन ही मन सोचने लगा कि कहाँ तो परिवार के साथ नगर में रहने वाले, उत्तम-उत्तम भोगों को भोगने वाले, मिष्टभाषी, राज्यमान्य और विद्वानों में श्रेष्ठ विद्वान् द्रोणाचार्य और कहाँ निर्दय, जीवों का घातक और अति क्रूर जीवों के साथ निडरता से युद्ध करने वाला यह भील। नगर और वन में रहने वाले इन दोनों का समागम होना अत्यन्त विषम है, जैसे कि पूर्व-समुद्र में छोड़ी गई सैल और उत्तर समुद्र में छोड़े गये जुआ का समागम बड़ा कठिन होता है ॥२१८-२२२॥


विचिन्त्येति बभाषासौ किरातं पाण्डुनन्दनः।
क्व दृष्टः स गुरुः शिष्टो गरिष्ठः सुगुणैस्त्वया ॥२२३॥

सोऽवादीत्ककुभः सर्वा बधिरा जनयंस्त्वरा।
अत्र स्तूपे लसद्रूपे मया दृष्टो गुरुर्गुणी ॥२२४॥

तं स्तूपं दर्शयामास पार्थस्य शबरोत्तमः।
वदन्नितिविनीतात्मा विज्ञातगुरुगौरवम् ॥२२५॥

अयं स्तूपः पवित्रात्मा परमो गुरुसंश्रयात्।
लोहधातुर्व्रजेद्यद्वत्स्वर्णतां रसयोगतः ॥२२६॥

नंनमीमि नराधीश प्रबुद्धो गुरुसद्धिया।
इमं प्रविपुलं स्तूपं पावनं पवनावृत्तम् ॥२२७॥

अस्य प्रसादतो लब्धा विद्या सा शब्दवेधिनी।
मयेति मन्यमानोऽहं भजामीमं स्वबुद्धितः ॥२२८॥

परोक्षं विनयं तन्वन् गुरोस्तस्याप्यहर्निशम्।
आसे स्थिरमना स्थेयांश्चिन्तयन्स्वगुरोर्गुणान् ॥२२९॥

अर्थ (श्लोक 223 से 229): इसके बाद अर्जुन ने उस किरात से कहा कि तुमने उत्तम गुणों से शिष्टों में भी गरिष्ठ उन द्रोण गुरु को कहाँ देखा है ? इसके उत्तर में वह बोला कि यहाँ एक रमणीय स्तूप (थंभा) है। उसी स्तूप को द्रौण समझ कर मैंने यह विद्या प्राप्त की है। इतना कह कर वह नम्र और गुण-गौरव का ज्ञाता भील अर्जुन को उस स्तूप के पास ले गया और दिखा कर बोला कि देखो, यही पवित्र-आत्मा द्रोण मेरे परम गुरु हैं। इनके आश्रय से लोहा उसी तरह सोना हो जाता है जिस तरह कि पारस के संयोग से। हे राजन्! मैं हमेशा सबेरे उठते के साथ ही इस विपुल और पावन स्तूप को गुरु-बुद्धि से नमस्कार करता हूँ। इसी के प्रसाद से ही मैंने यह शब्द वेधिनी विद्या पाई है। मैं हमेशा इसकी सेवा भक्ति में लगा रहता हूँ। मैं परोक्ष रूप से द्रोण गुरु की विनय करता हूँ और रातदिन स्थिर चित्त से उन्हीं के गुणों को स्मरण करने में लगा रहता हूँ ॥२२३-२२९॥


दृष्ट्वेमं स्नेहसंयुक्तं चित्तं बोभूयते मम।
गुरुवद्गणनातीतगुणस्य स्वगुरोः स्मरन् ॥२३०॥

गुरुवत्पदविन्यासस्थानस्य सेवनं यके।
कुर्वते ते लभन्तेऽत्र सुखसंदोहमुल्बणम् ॥२३१॥

श्रुत्वेति तद्वचः पार्थस्तं शशंसेति शुद्धवाक्।
सन्तो गुणान्न मुञ्चन्ति दूरीभूतेऽपि सज्जने ॥२३२॥

त्वं महान्महतां मान्यो गुरुभक्तिपरायणः।
गुणाग्रणीरिति स्तुत्वा किरातं सोऽगमत्पुरम् ॥२३३॥

अर्थ (श्लोक 230 से 233): हे राजन्! द्रोण गुरु के संख्यातीत गुणों का चिंतन करता हुआ मैं जिस वक्त इस गुरु-तुल्य स्तूप को देखता हूँ तब मेरा चित्त स्नेह से भर आता है। देखो, कहा है कि जो गुरु-बुद्धि से गुरु के चरणों की स्थापना से पवित्र हुए स्थान की भी सेवा करता है वह भी संसार में मन-चाहे सुखों को पाता है। यह सुनकर पार्थ अपने शुद्ध वचनों द्वारा उसकी प्रशंसा करने लगा और बोला कि चाहे सज्जन पुरुष कितनी ही दूर क्यों न हों पर सत्पुरुष उनके गुणों को ले ही लेते हैं क्योंकि गुणग्रहण करने का सत्पुरुषों का स्वभाव ही होता है। शवरोत्तम, तुम महान् हो, महान् पुरुषों द्वारा मान्य हो एवं गुरु-भक्ति-परायण और गुणवानों में श्रेष्ठ हो ॥२३०-२३३॥


साश्चर्यहृदयो लब्ध्वा गुरुं द्रोणं व्यजिज्ञपत्।
नत्वा स्थित्वा क्षणं तत्र सार्जुनोऽर्जुननामभाक् ॥२३४॥

भो गुरोऽद्य महारण्यं गतेन रिपुघातिना।
किरातो वीक्षितः क्षिप्रं तत्र तूणीरसंगतः ॥२३५॥

कुण्डलीकृतकोदण्डः सेषुधिं सशरासनम्।
तं वीक्ष्य समुवाचाहं कस्त्वं किं वेत्स्यरण्यजः ॥२३६॥

स ब्रूते स्म किरातोऽहं द्रोणाचार्योपदेशतः।
शब्दवेधित्वमापन्नो भ्रमंस्तिष्ठामि सद्बने ॥२३७॥

इत्युक्तिं तस्य चाकर्ण्य द्रोणाहं गतवानिह।
त्वदग्रे कथितुं सर्वमित्यवादीद्धनंजयः ॥२३८॥

स्वामिन्स निष्ठुरो दुष्टो दुरात्मानिष्टचेष्टितः।
निरपराधिनो जीवान्प्रहन्ति हतमानसः ॥२३९॥

स्वामिंस्त्वदुपदेशेन मायावेषेण मायिकः।
जीवराशिं हरन्युद्धं किरातः कुरुते सदा ॥२४०॥

अर्थ (श्लोक 234 से 240): इस प्रकार उस भील की स्तुति कर अर्जुन वहाँ से अपने नगर को चला आया। पर उक्त घटना से उसके हृदय में बड़ी उछल-कूद मच रही थी। अतः वह शीघ्र ही द्रोणाचार्य के पास पहुँचा और उन्हें नमस्कार कर उनके पास बैठ गया। बाद वह बोला कि गुरुवर्य! मैं आज शत्रुओं को नाश करने की इच्छा से वन में गया था वहाँ मुझे तरकस बाँधे हुए एक भील दीख पड़ा। वह कुण्डल के आकार जैसे धनुष को लिये था। उसके हाथ में बाण था। उसको देखकर मैंने पूछा कि मित्र, तुम कौन हो? कहाँ रहते हो ? और कौन-सी विद्या जानते हो ? उसने उत्तर में कहा कि मैं किरात हूँ, यहीं वन में रहता हूँ और द्रोणाचार्य गुरु के उपदेश से मैं शब्द-वेधिनी विद्या को भली-भाँति जानता हूँ। परम पूज्य गुरुवर्य, उसके इस वचनों को सुनकर मैं आपसे कहने के लिए यहाँ आया हूँ। स्वामिन्! वह बड़ा निष्ठुर है, दुष्ट और दुरात्मा है। उसकी सभी चेष्टायें अनिष्ट रूप होती हैं। वह हतबुद्धि सदा ही निरपराधी जीवों को मारा करता हैं। खेद की बात यह है कि वह मायाचारी आपके उपदेश का बहाना करके जीव-राशि के प्राणों को व्यर्थ ही हरता है और घोर पाप करता है ॥२३४-२४०॥


द्रोणः पार्थवचः श्रुत्वा दधौ दुःखं स्वमानसे।
वने वनचरोऽवार्यः कथं पाप्मेति चिन्तयन् ॥२४१॥

अर्थ: पार्थ के इन दुख भरे शब्दों को सुनकर द्रोण को बड़ा भारी खेद हुआ और वह मन ही मन

दशमं पर्व (भाग 2/2)

तद्धारणकृते द्रोणः सपार्थः पृथुमानसः।
ततः स्थानाच्चचालाशु वनं गन्तुं समुद्यतः ॥२४२॥

मायावेषधरो द्रोणः समियाय वनं क्षणात्।
पश्यन्पथिकसंघातं शाबरं सशरासनम् ॥२४३॥

ईक्षाञ्चक्रे चरन्तं तं किरातं पार्थसद्गुरुः।
नमन्तं तं गुरुं शान्तमजानन्तं निजं गुरुम् ॥२४४॥

तावता गुरुणा पृष्टः शबरश्चरणाश्रितः।
निविष्ट इति कस्त्वं हि को गुरुर्भवतः सतः ॥२४५॥

सोऽवोचद्वरवाक्येन प्रीणयन्सार्जुनं गुरुम्।
किरातोऽहं कलाकीर्णो द्रोणो मेऽस्ति गुरुर्महान् ॥२४६॥

यस्य प्रसादतो लब्धा विद्या सर्वार्थसाधनी।
मया पश्याम्यहं तं चेद्भजे तस्य सुशिष्यताम् ॥२४७॥

परोक्षोऽपि मया द्रोणः प्रत्यक्षीकृत्य भक्तितः।
आराध्यते विशुद्धात्मा समृद्धिसिद्धिबुद्धिमान् ॥२४८॥

अर्थ (श्लोक 241 से 248): विचारने लगे कि इस पापात्मा को इस दुष्कृत्य से रोकने का क्या उपाय है ? कुछ सोच कर वह उसको दुष्कृत्य से रोकने के लिए अर्जुन के साथ उसी समय वहाँ से वन को चले और रास्ते में धनुष-बाणधारी भीलों को जाते हुए देखते उसी वन में पहुँचे। वहाँ अतिशीघ्र ही उनकी उस भील से भेंट हो गई। भील ने अति शान्त-चित्त गुरु को नमस्कार किया परन्तु वह जानता न था कि जिसको मैं गुरु मानता हूँ वह द्रोणाचार्य यही हैं और माया-वेष धर कर यहाँ आये हैं। इसके बाद वह गुरु के चरणों में बैठ गया। उस समय द्रोण ने उससे पूछा कि तुम कौन हो ? और तुम्हारा गुरु कौन है ? इसके उत्तर में वह द्रोणाचार्य को प्रसन्न करता हुआ मीठे वचनों में बोला कि-मैं भील हूँ और नाना कलाओं के जानकार महान् पुरुष द्रोणाचार्य मेरे गुरु हैं। उन्हीं के प्रसाद से मैंने यह सब मनोरथों को साधने वाली विद्या पाई है और यदि मुझे उन महान् पुरुष का दर्शन मिले तो मैं अपना बड़ा भारी सौभाग्य मानूँगा। यद्यपि वह विशुद्ध आत्मा और समृद्धि-सिद्धि-बुद्धि से युक्त मुझसे परोक्ष है तो भी इस समय मैं उन्हें भक्ति भाव से प्रत्यक्ष समझ कर ही आराधता हूँ। भक्ति बल से वह हमेशा ही मेरी दृष्टि के सामने रहते है। मैं उन्हें कभी भी नहीं भूलता हूँ ॥२४१-२४८॥


श्रुत्वा द्रोणोऽगदीद्वत्स यदीदानीं च पश्यसि।
साक्षाल्लक्षणसंपूर्णं तर्हि तं किं करिष्यसि ॥२४९॥

समाचख्यौ किरातः स पश्यामि यदि सांप्रतम्।
तत्तस्याहं करिष्यामि दासत्वं दासतो लघुः ॥२५०॥

परोपकारकरणे सामर्थ्यं मम नास्ति च।
मादृशां शक्तिहीनानां पर्याप्तं गुरुसेवया ॥२५१॥

अर्थ (श्लोक 249 से 251): यह सुनकर द्रोण ने कहा कि किरात, यदि इस समय नाना लक्षणों से लक्षित उन द्रोणाचार्य को तुम प्रत्यक्ष देख पाओ तो उनके प्रति तुम कैसा व्यवहार करो ! इसके उत्तर में किरात बोला कि यदि मैं इस समय उन्हें प्रत्यक्ष देखूँ तो मैं अपने को निछावर कर सब प्रकार उनकी सेवा करूँ। मुझ में और कुछ परोपकार करने की सामर्थ्य तो नहीं है, इसलिए मुझ सरीखे शक्ति-हीनों के लिए गुरुसेवा ही पर्याप्त है, बस है ॥२४९-२५१॥


वीक्षितं तं विजानासि साभिज्ञानपरं गुरुम्।
जानामीति वचः प्रोक्ते तेन द्रोण इदं जगौ ॥२५२॥

सोऽहं गुरुस्तवास्मीति द्रोणनामा मनोहरः।
सिद्धविद्यो विदां मान्यः सर्वलोकहितंकरः ॥२५३॥

अर्थ (श्लोक 252 से 253): इस पर द्रोण ने कहा कि तुम द्रोण के कुछ लक्षणों से उसे जानते हो। उत्तर में किरात ने कहा कि हाँ, मैं उन्हें पहचानता हूँ। तब द्रोण बोले कि सारे-संसार का हितैषी, विद्वानों द्वारा मान्य और


निशम्येति वचस्तस्य किरातश्चोत्सवाश्रितः।
साभिज्ञानं गुरुं मत्वा जहर्ष हसिताननः ॥२५४॥

ततोऽष्टाङ्गं क्षितौ क्षिप्रं मिलन्मूर्ध्ना ननाम सः।
गुरुमिष्टे चिरं लब्धे यत्नवान्न हि को भवेत् ॥२५५॥

विनयी विनयोद्युक्तो विनयं विततान सः।
को हि लब्धे गुरौ धीमान्विनयाद्रहितो भवेत् ॥२५६॥

अर्थ (श्लोक 252 से 256): मनोहर मैं ही तुम्हारा गुरु द्रोणाचार्य हूँ। यह सुनकर भील बहुत ही खुश हुआ। उन्हें अपने गुरु जान कर उसका मुख-कमल खिल उठा और उसने द्रोण को पृथ्वी तक मस्तक झुकाकर साष्टांग प्रणाम किया। सो ठीक ही है कि इष्ट वस्तु के चिरकाल से मिलने पर सभी की प्रीति होती है। उस विनयी ने गुरु द्रोणाचार्य का खूब विनय-सत्कार किया। सच है कि गुरु के मिलने पर सभी बुद्धिमान् उनका विनय करते हैं ॥२५२-२५६॥


द्रोणः स्पष्टं समाचष्टे कुशली कुशलं तव।
विद्यते सोऽब्रवीन्नथ त्वत्प्रसादात्कुशल्यहम् ॥२५७॥

शबरं गुरुसंगेन समग्रप्रीतिमानसम्।
स बभाण वचो वाग्मी प्रमाणपथपारगः ॥२५८॥

भो किरात सुकान्तारवासिन् विघ्नौघघातक।
मत्सेवासंविधानज्ञ मदाज्ञाप्रतिपालक ॥२५९॥

त्वत्सदृक्षो मया दृष्टो भुजिष्यो न हि भूतले।
वल्लभश्च समालोक्यो लोकलोकनतत्पर ॥२६०॥

किंचिद्याचयितुं त्वां च समीहेऽहं हितावह।
यदि दास्यसि याचे तद्याच्ञाभङ्गो हि दुःखदः ॥२६१॥

अर्थ (श्लोक 257 से 261): इसके बाद द्रोण ने उस भील से पूछा कि तुम कुशल तो हो न ? वह बोला, कि नाथ, तुम्हारे प्रसाद से मैं कुशल हूँ। मुझे किसी तरह का कष्ट नहीं है। गुरु के समागम से मैं बहुत ही प्रसन्न हूँ। इस पर वह न्याय-मार्ग-पारंगत और वाग्मी द्रोण बोले कि किरात, तुम वनवासी हो, विघ्न-समूह के विघातक हो, मेरी सेवा-विधि के ज्ञाता हो, मेरी आज्ञा के प्रतिपालक हो, तुम्हारे समान इस भूतल पर मैंने आज तक कोई भी विद्यार्थी नहीं देखा है। तुम बड़े ही अच्छे मालूम पड़ते हो। देखो, मैं यहाँ तुमसे एक याचना करने के लिए आया हूँ। यदि तुम देना स्वीकार करो तो याचूँ क्योंकि याचना का भंग बहुत ही दुखदाई होता है ॥२५७-२६१॥


सोऽभाणीद्भयतो भिल्लः कम्प्रः संक्षुब्धमानसः।
स्वामिन्निदं किमुक्तं ह्यहं त्वदाज्ञाप्रपालकः ॥२६२॥

मादृशां शक्तिमुक्तानां संपत्त्यंशासहात्मनाम्।
तत्किमस्ति च यद्देयं न स्याल्लोके भवादृशाम् ॥२६३॥

शृणु सेवक स प्राह तद्देयं विद्यते तव।
दित्सा चेद्देहि मे हस्ते वचो वृणोमि यद्वरम् ॥२६४॥

दित्सामीति च भिल्लेन समुक्ते सोऽब्रवीद् गुरुः।
देहि दक्षिणसद्धस्तादङ्गुष्ठं संछेद्य मूलतः ॥२६५॥

अर्थ (श्लोक 262 से 265): यह सुन भील काँपता हुआ और मन में विस्मय करता हुआ बोला कि स्वामिन्! यह आप क्या कहते है! मैं तो सर्वथा आपकी आज्ञा का पालक हूँ। मुझ शक्तिहीन के पास ऐसी कौन-सी सम्पत्ति है जो आप जैसे पुरुषों के लिए देय न हो। इस पर द्रोण बोले कि सुनो, मैं जो चाहता हूँ वह देय वस्तु तुम्हारे पास है। यदि देने की इच्छा हो तो वचन दो। फिर मैं याचूँ। भील बोला कि मैं सब कुछ आपको देने को तैयार हूँ। आप प्रसन्नता के साथ माँगिए। द्रोण ने कहा कि बस, मैं यही चाहता हूँ कि तुम अपने दाहिने हाथ के अँगूठे को जड़ से काटकर मुझे दे दो ॥२६२-२६५॥


श्रुत्वा स गुरुसद्भक्त्या गुर्वाज्ञाप्रतिपालकः।
तथेति प्रतिपन्नोऽभूत्तद्गुणग्रामरञ्जितः ॥२६६॥

अर्थ: यह सुनकर भक्ति के वश हो गुरु की आज्ञा के प्रतिपालक और उनके गुणों पर मुग्ध उस


विच्छिद्य दक्षिणाङ्गुष्ठं भिल्लस्तस्मै समर्पयत्। अङ्गुष्ठस्य च का वार्ता दत्ते भक्तः स्वजीवितम्॥२६७॥

छिन्नाङ्गुष्ठो न ना यस्माद् ग्रहीष्यति शरासनम्। जीवघातकरं पापमतो न भविता ध्रुवम् ॥२६८॥

पापिने न हि दातव्या विद्या शब्दार्थवेधिनी। विमृश्येति स पार्थाय समग्रां तां समर्पयत् ॥२६९॥

अर्थ (श्लोक 266 से 269): भील ने अपने दाहिने हाथ के अँगूठे को काट कर गुरु को सौंप दिया। सच है कि अँगूठे ही की क्या बात है तो भक्त लोग, भक्ति के वश होकर अपना जीवन भी दे डालते है। उसके अँगूठे को कटवा कर द्रोणाचार्य ने अपने उसी उद्देश्य को जिसके लिए कि उसका अँगूठा कटवाया था, उस भील के सामने कहा कि दाहिने हाथ के अँगूठे के बिना कोई भी धनुष को नहीं चढ़ा सकता, अतः इसके द्वारा जो जीवों के वध से बड़ा भारी पाप होता था वह अब न होगा। इसके बाद उन्होंने यह सोच कर कि पापी पुरुषों के लिए शब्दवेधिनी-विद्या नहीं देना चाहिए, पार्थ को वह विद्या पूर्ण रीति से सिखा दी ॥२६६-२६९॥


ततः पार्थेन स द्रोणः संप्राप्य स्वपुरं परम्। विश्रान्तः सातमाभेजे भुञ्जन्भोगान्सुभावजानन् ॥२७०॥

पाण्डवाः कौरवा वक्त्रमिष्टाश्चान्तर्विरोधिनः। नयन्ति सुखतः कालं तत्र कौटिल्यधारिणः ॥२७१॥

भीमो हेमनिभः सुविघ्नहरणो दत्तं विषं चामृतम् जातं जातमनेकधा च भुजगा गण्डूपदाश्चाभवन्।
जातं यस्य पयः प्रमाणरहितं वै जानुदघ्नं महत् पुण्यस्यैव विजृम्भितेन भविनां किं किं न संपद्यते ॥२७२॥

पार्थः स प्रथमानकीर्तिरतुलॊ व्यर्थीकृतार्थः सार्थः शुद्धमनोरथः शुभपथः स्वार्थे परार्थेऽपि च।
एकार्थेन समर्थतामित इहाभाति प्रसिद्धार्थदृक् मुख्यत्वेन सुधन्विनां गतरिपुर्यो धर्मतो धर्मधीः ॥२७३॥

अर्थ (श्लोक 270 से 273): इसके बाद पार्थ के साथ वह अपने नगर को चले आये और सुख-शान्ति से उत्तम-उत्तम चीजों से उत्पन्न हुए भोगों को भोगने लगे, आनंद-चैन से अपना समय बिताने लगे। इसी तरह भीतर से विरोध रखने वाले पर बाहर से मीठे-मीठे बोलने वाले नाना कला-कुशल कौरव-पाण्डव भी वहीं रहकर सुख से काल बिताने लगे। भीम के शरीर की कान्ति सोने के जैसी थी। बड़े-बड़े विघ्नों का वह निवारक था। उसके लिए विष अमृत और साँप सर्प-कंचुकी के जैसा निःसत्व हो गया था एवं अथाह गंगा का जल भी उसके लिए जाँघों गहरा रह गया था। यह सब पुण्य का ही महत्त्व है। देखो, जिसके पुण्य का जोर होता है उसके लिए सुतरां ही सब अच्छे-अच्छे निमित्त आ मिलते हैं और सम्पत्ति उसका पीछा नहीं छोड़ती। वह अर्जुन संसार से सुशोभित हो जिसकी कीर्ति दिगन्त-व्यापिनी है, जो उपमा-रहित है, अनर्थों को दूर करने वाला और उत्तम अभिप्राय वाला है, जो सत्पथगामी और सब कामों में हमेशा एक मनोरथ से चलता है। अतएव जो समर्थ, धनुर्धरों में मुख्य और धर्म-बुद्धि का धारक है, जो धर्म-धनुष द्वारा बैरियों का ध्वंस कर चुका है, जिसका कोई भी वैरी नहीं है और जो प्रमाण-प्रसिद्ध पदार्थ पर विश्वास करता है ॥२७०-२७३॥ इस प्रकार ब्रह्म० श्रीपाल की सहायता से श्री शुभचंद्र-भट्टारक द्वारा रचे हुए पाण्डवपुराण में अर्थात् महाभारत में भीम के विघ्नों का विनाश, अर्जुन को शब्दवेधिविद्या की प्राप्ति इन विषयों का वर्णन करने वाला दसवां पर्व समाप्त हुआ॥१०॥