अष्टमं पर्व (भाग 1/2)
शंभवं संभवध्वंसधातारं शंभवं जिनम्।
संभवध्वंसिनं वन्दे संभवत्सातसागरम् ॥१॥
अर्थ: उन संभवनाथ प्रभु को नमस्कार है, जो सुख के दाता और पाप के विध्वंसक हैं, जो संसार से पार उतारने वाले हैं, सुख के सागर हैं ॥१॥
शृणु श्रेणिक लोकानां महती मूढता मता।
ईदृशः कथ्यते कर्णः कर्णोजः कथ्यते जनैः ॥२॥
कर्णजाहं गतत्वेन वचसा जन्मसंभवे।
मात्रन्वये समाख्यातः कर्णः श्रीकर्षणोद्यतः ॥३॥
सुराधाकर्णकण्डूयाक्षणे भूपात्समाददे।
बालकं तेन तत्रापि स कर्णः कथितो जनैः ॥४॥
यदि कर्णस्य चोत्पत्तिः कर्णात्संजायते लघुः।
अतोऽन्येषां कथं जन्म न संबोभूयते भुवि ॥५॥
कर्णतो नासिकायाश्च मानवानां कथंचन।
न दृष्टं न श्रुतं जन्म कर्णस्य च कथं भवेत् ॥६॥
अर्थ (श्लोक 2 से 6): यहाँ गणधर प्रभु कहते हैं कि हे श्रेणिक, लोग बड़े मूर्ख हैं, जो इस तरह से पैदा हुए कर्ण की कान से उत्पत्ति बताते हैं। उसके जन्म की बात लोगों में कानों-कान चली थी, इसलिए तो माता के कुल में उस सुन्दराकृति का कर्ण नाम पड़ा और चंपानगरी में राजा भानु ने जिस समय अपनी रानी को इसे सौंपा उस समय वह कान खुजाती थी, अतएव वहाँ भी कान खुजाने के निमित्त से भानु नरेश ने उसका कर्ण नाम रख दिया। दूसरी बात यह है कि जो लोग जबर्दस्ती कर्ण की कान से ही उत्पत्ति बताते हैं उन्हें इस बात पर भी तो विचार करना चाहिये कि यदि कान से ही कर्ण की उत्पत्ति हुई हो तो अब भी पृथ्वी पर कान, आँख, नाक वगैरह से मनुष्यों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती। दूसरी बात यह है कि जब आज तक कान वगैरह से कभी मनुष्यों की उत्पत्ति न तो सुनी गई और न देखी ही गई तब फिर कान से कर्ण की उत्पत्ति कैसे हो गई ? ॥२-६॥
कर्णतो जन्म कालेन नोपनीपद्यते नृणाम्।
गोशृङ्गतो भवेद् दुग्धं न कदाचिज्जगत्त्रये ॥७॥
वन्ध्यातः सुतसंभूतिः शिलातः सस्यसंभवः।
गगनात्कुसुमोत्पत्तिः शशाच्च शृङ्गसंभवः ॥८॥
पृदाकुवक्त्रतः शुद्धा संपनीपद्यते सुधा।
एतत्सर्वं यथा न स्यात्कर्णात्कर्णोद्भवस्तथा ॥९॥
व्योमाब्जसौरभाख्यानसदृशः कर्णसंभवः।
ततः कर्णस्य संभूतिः शुद्धा विज्ञायतां त्वया ॥१०॥
अर्थ (श्लोक 7 से 10): यह बात उचित नहीं जान पड़ती। देखो, जिस तरह गाय के सींग से कभी भी दूध नहीं निकल सकता उसी तरह से तीन काल में भी कान से कभी मनुष्य पैदा नहीं हो सकता और भी सुनिए, जिस प्रकार बाँझ स्त्री से पुत्र, पत्थर पर अन्न, आकाश में फूल और गधे के मस्तक में सींग, साँप के मुँह से अमृत की उत्पत्ति होना असम्भव है उसी प्रकार कान से कर्ण की उत्पत्ति होना और कहना भी असम्भव हैं। यदि ऐसा सम्भव होता तो दुनिया विवाह वगैरह की झंझटों में कभी न फँसती, किन्तु कान से कर्ण जैसे पुत्रों की उत्पत्ति करके ही पुत्र वाली बन जाती। राजन्, कान से कर्ण की उत्पत्ति बताना, यह सब आकाश के फूल की सुन्दरता का ही वर्णन है! इसमें कुछ भी सार और सत्य अंश नहीं है। अतः हमने जैसी कर्ण की उत्पत्ति पहले बताई है वही सत्य है और सार है। तुम वैसा ही विश्वास करो ॥७-१०॥
सूर्यसेवनतः कुन्त्या जातः पुत्रस्तु कर्णवाक्।
तन्मृषात्र नरस्त्रीणां कुतः सूर्येण संगमः ॥११॥
भानुना पालितो यस्मात्तस्मात्सूर्यसुतोऽप्ययम्।
नन्दगोपसुतः कृष्णो यथा गोपाल उच्यते ॥१२॥
अर्थ (श्लोक 11 से 12): सूरज के समागम से कुन्ती के कान द्वारा कर्ण की उत्पत्ति होना निरी झूठी बात है। भली मनुष्यनी के साथ सूरज का समागम ही कैसे हो सकता है। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि फिर कर्ण को सूर्यसुत क्यों कहते हैं? इसका उत्तर यह है कि चंपानगरी के राजा भानु ने इसका पालन-पोषण किया था और भानु का दूसरा नाम सूरज भी है, इसलिए सूर्यसुत नाम से इसकी प्रसिद्धि हो गई। जिस तरह कि नंद गोप नामक ग्वाल के यहाँ पालन-पोषण होने के कारण लोग कृष्ण नारायण को भी गोपाल कह कर पुकारते हैं ॥११-१२॥
अथ पाण्डवभूपानां कौरवाणां विशेषतः।
यथाशास्त्रं यथालोकमुत्पत्तिः कथ्यते तथा ॥१३॥
एकदान्धकवृष्टिश्च तनयैर्नयपेशलैः।
सार्धं विचारयामास कुन्त्याः पाणिप्रपीडनम् ॥१४॥
यद्यन्येभ्यः प्रदीयेत कुन्ती स्याद्दोषदूषिता।
तादृशीं तां परिज्ञाय न ग्रहिष्यन्ति चापरे ॥१५॥
अर्थ (श्लोक 13 से 15): अब कौरव-पाण्डवों की शास्त्र और लोक के अनुसार विस्तार से उत्पत्ति बताई जाती है। सुनिए, एक समय अंधकवृष्टि ने नय-नीति के ज्ञाता अपने पुत्रों के साथ कुन्ती के विवाह सम्बन्ध में विचार किया। उस समय यह बात उपस्थित हुई कि यदि पाण्डु के सिवा दूसरे को कुन्ती दी जायेगी तो वह व्यभिचारिणी कही जायेगी और एक बात यह भी है कि उसे ऐसा सुनकर कोई दूसरा ग्रहण भी नहीं करेगा ॥१३-१५॥
पटवे पाण्डवे पुत्री प्रदेयातः शुभाप्तये।
इति मन्त्रिणमाकृत्य तत्र ते निश्चयं व्यधुः ॥१६॥
धृतराष्ट्रान्ववायाय व्यासाय वरप्राभृतैः।
दूतं संप्रेषयामास सलेखं मुखरं क्षमम् ॥१७॥
स गत्वा क्रमतः प्राप्य सदः कौरवभूपतेः।
दौवारिकेण संदिष्टो ददर्श दूरतो नृपम् ॥१८॥
मृगेन्द्रासनमारूढं हसन्तमिव भूमिपान्।
सोत्कर्षं भावयन्तं वा चलच्चामरवीजनैः ॥१९॥
भूषयन्तं नभोभागं सदातपनिवारणैः।
भानोर्निश्चिद्रमालोकं कुर्वन्तं वा तिरस्कृतम् ॥२०॥
अर्थ (श्लोक 16 से 20): इसलिए अच्छा इसी में है कि पाण्डु को ही कन्या दी जाय। विचार कर अन्त में उन्होंने पाण्डु को ही पुत्री देने का निश्चय किया और उसी समय वर के योग्य भेंट तथा पत्र देकर एक विज्ञ और सहनशील दूत को व्यास के पास रवाना किया। वह थोड़े ही समय में कौरवों के राजा व्यास की सभा में पहुँचा। वहाँ द्वारपाल की आज्ञा से भीतर जाकर दूर से उसने राजा का दर्शन किया। राजा सिंहासन पर विराजे थे। जान पड़ता था कि मानी वे और-और राजाओं को हँस रहे है, या अपने उत्कर्ष की भावना करते हैं। उनके ऊपर जो चमर ढुलते थे उनसे वे आकाश के कुछ हिस्से को विभूषित करते थे। उनके ऊपर छत्र लगा हुआ था। वह सूरज के प्रकाश को उनके ऊपर नहीं आने देता था, वह सूरज का तिरस्कार करता था ॥१६-२०॥
भान्तं प्राभृतलक्षैश्च निधानैरिव दर्शितैः।
भूमिदेव्याः समुद्भासिभूषणैरिव भूषणैः ॥२१॥
अर्थ: उनके आगे देश-विदेश के राजा लोगों द्वारा भेजी हुई भेंटों के ढेर के ढेर लगे हुए थे, जिनसे
जगत्पतेर्जगज्ज्येष्ठं कुण्डलैः कर्णसंगतैः ।
मण्डितं चन्द्रसूर्याणां मण्डलैरिब संनुतम् ॥२२॥
नानामागधवन्देन वादिना यशसः श्रुतेः ।
ब्रुवाणेन यशो राज्ञो दिशान्तस्थितदिग्गजान् ॥२३॥
क्षरन्तं वाक्षरैः क्षिप्रं सुधाराशिं रसोद्गमम् ।
वीक्षणैर्वीक्षयन्तं च कटाक्षक्षेपदीक्षितैः ॥२४॥
गृह्णन्तमिव स्वात्मीयाञ्जनान्यदृच्छया स्थितान् ।
हसन्तमिव हास्येन शत्रून्सेवांसमागतान् ॥२५॥
अर्थ (श्लोक 21 से 25): उनकी अपूर्व ही शोभा हो रही थी। वे ढेर ऐसे जान पड़ते थे कि मानो राजा लोगों द्वारा दिखाने के लिये भेजे गये उनके खजाने ही हैं या पृथ्वी देवी के सुन्दर भूषणों के जैसे वे राजा के अपूर्व भूषण ही रखे हैं। राजा व्यास सारे संसार में उत्कृष्ट थे। वे कानों में मनोहर कुंडल पहिने हुए थे। जान पड़ता था मानो वे चाँद और सूरज के दो मण्डल ही हैं और वे कुंडलों का रूप धर कर इनकी सेवा ही करते हैं एवं जैसे वादी शास्त्र के यश को गाते हैं वैसे ही भाँति-भाँति के मागधों द्वारा उनके यश दिग्गजों तक पहुँचाए जा रहे थे, मानो वे उन मागधों के द्वारा उनकी वाणी से अमृत की बरसा करवा रहे थे। वे कटाक्ष-पात की दीक्षा से दीक्षित नेत्रों के द्वारा रसीली गंभीर दृष्टि से लोगों की ओर देखते थे, जान पड़ता था कि वे उन्हें अपने बन्धुओं की भाँति अपनाते हैं। वे सेवा में आये हुए शत्रुओं को मनचाही दृष्टि से हँस से रहे थे ॥२१-२५॥
बिभ्रतं पाणिपद्मेन कृपाणं कृपणान्यरान् ।
भीषयन्तं मुदा दानं ददतं स्वमहोन्नतिम् ॥२६॥
दर्शयन्तं महोद्योगं युक्तैर्वाक्यैर्विचारणाम् ।
कुर्वाणं किंचिकीर्षुश्चेति विस्मयकरं नृणाम् ॥२७॥
अर्थ (श्लोक 26 से 27): उनके हाथ में एक तीखी तलवार थी, जिसे देखकर लोभी पुरुष भयभीत होते थे। वे हर्ष के साथ दान देते थे, लोगों को अपनी नम्रता दिखाते थे। वे महान् उद्योगी थे और हर एक बात पर युक्ति द्वारा विचार करते थे। उनका हृदय बड़ा गंभीर था। वे जब तक किसी काम को कर न गुजरते थे तब तक कोई भी उनकी बात की जान न पाता था कि इस समय महाराज क्या करना चाहते हैं। उनके कार्यों को देखकर सब अचम्भा करके रह जाते थे ॥२६-२७॥
इति दौवारिकेणासौ दर्शितं भूभुजां पतिम् ।
मुक्त्वा ननाम दूतेशः सपायनमुपायनम् ॥२८॥
नाथ सूरिपुरीनाथोऽन्धकवृष्णिरुदीरितः ।
शास्ति सर्वां प्रजां यद्वन्मरुत्वान्सुरपद्धतिम् ॥२९॥
अर्थ (श्लोक 28 से 29): दूत ने आगे बढ़कर, द्वारपाल द्वारा दिखाये हुए पृथ्वीपतियों के पति व्यास महाराज के आगे भेंट रखी और उन्हें नमस्कार किया। इसके बाद वह बोला कि राजन्, सूरीपुर के राजा अंधकवृष्टि को सब कोई जानता है। वे देवताओं पर इन्द्र की तरह सुख-पूर्वक अपनी प्रजा पर शासन करते हैं। प्रभो! उन्होंने मुझे आपके पास भेजा है। वे चाहते हैं कि आपके राजकुमार पाण्डु के साथ मेरी पुत्री कुन्ती का ब्याह हो ॥२८-२९॥
तेनाहं प्रेषितोऽभ्यर्थ्य तूर्णं ते पाण्डुना सह ।
सोत्सवं स्नेहयुक्तेन कुन्त्या विवाहमिच्छता ॥३०॥
श्रुत्वा भूपो वचः प्राह युक्तं कोऽत्र न वाञ्छति ।
मुद्रिका मणिना योगं यान्ती केन निवार्यते ॥३१॥
अर्थ: दूत के इन वचनों को सुनकर राजा ने कहा कि जो बात युक्त है उसे कौन नहीं चाहेगा। भला, अँगूठी और मणि का संयोग किस बुद्धिमान् को पसंद नहीं पड़ेगा। व्यासजी को तो पहले ही से
तत्रासक्तं सुतं जानन्पुनः प्रोवाच भूपतिः। यत्र सूरीपुरेशस्य मनस्तत्रोद्यता वयम् ॥३२॥
इति सर्वसमक्षं हि सत्यंकारं व्यधान्नृपः। तयोर्विवाहसिद्ध्यर्थं क्षणेन क्षणसंगतः ॥३३॥
अर्थ (श्लोक 30 से 33): मालूम था कि कुन्ती को पाण्डु चाहता है। उन्होंने दूत से कहा कि जैसी सूरीपुर के ईश अंधकवृष्टि की मनसा है वैसी ही हमारी भी है, उनकी इच्छा के अनुसार हम तैयार हैं। व्यास ने इसी समय पाण्डु और कुन्ती के ब्याह की सिद्धि के लिये बड़ा भारी महोत्सव किया और सब सभासदों के आगे प्रतिज्ञा की कि पाण्डु के लिए मुझे कुन्ती लेना स्वीकार है ॥३०-३३॥
ततो दूतं स संमान्य वस्त्रैराभरणैस्तथा। निर्णय्य लग्नदिवसं प्राहिणोत्प्राभृतैः समम् ॥३४॥
अर्थ: इसके बाद नाना प्रकार के वस्त्र और आभूषणों के द्वारा उन्होंने दूत का खूब आदर किया और लग्न-दिन का निर्णय करके भेंट सहित उसे सूरीपुर को रवाना कर दिया।
अथ पाण्डुकुमारोऽसौ विवाहाय विनिर्ययौ। नानालङ्करणोपेतो नानाभूपालवेष्टितः ॥३५॥
अर्थ (श्लोक 34 से 35): इसके बाद पाण्डुकुमार विवाह के लिए सूरीपुर जाने को हस्तिनापुर से निकला। वह नाना प्रकार के बहुमूल्य गहने पहिने था और उसके साथ कितने ही राजागण थे ॥३४-३५॥
पाण्डुः पाण्डुरछत्रेणाखण्डाखण्डलसत्प्रभः। वदद्वाद्यसुनादाढ्यो वीजितस्तु प्रकीर्णकैः ॥३६॥
अर्थ: उसके सिर पर सफेद छत्र लगा हुआ था, जिससे कि वह इन्द्र के जैसा शोभता था। उसके आगे-आगे नाना प्रकार के बाजे बजते जाते थे, जिनसे सभी दिशाएँ शब्दमय हो रही थीं। प्रकीर्णक-जन उसके ऊपर चमर ढोरते थे, जिससे वह ऐसा जान पड़ता था मानों सारी पृथ्वी पर एक वही श्रेष्ठ पुरुष हैं, चमर उसकी इस उत्तमता को ही जता रहे हैं ॥३६॥
धरामुपरि कुर्वाणस्तुरंगमखुरोत्थितैः। रजोभी रञ्जयञ्लोकान् रेजे राजा सुराजवत् ॥३७॥
पप्रथे प्रथिमानं स रथैः सारथिसंयुतैः। सार्थैः समर्थतां नीतैर्मन्दिरैरिव जङ्गमैः ॥३८॥
दन्तिनो दन्तघातेन घातयन्तो धराधरान्। सार्धं नेतुं तदा नेदुर्नार्दयन्तो हि दिग्गजान् ॥३९॥
मित्राणि छत्रछन्नानि मित्रमण्डलभानि च। मोदान्मुमुदिरे तेन सार्थगामित्वसद्धिया ॥४०॥
अर्थ (श्लोक 37 से 40): पाण्डु के घोड़ों की टापों से जो धूल उड़कर लोगों को धूसरित कर रही थी उससे जान पड़ता था कि वह लोगों को जान-बूझकर धूल से रंजित कर विवाह के आनंद को प्रकट कर रही है। इस समय वह इन्द्र के जैसा शोभता था, इन्द्र से किसी भी बात में कम न था। इस समय पाण्डु के साथ जो सजे हुए और सारथियों-सहित रथ-समूह जा रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानों जंगम मन्दिर ही है और वे चलने योग्य हो गये है। दाँतों के प्रहार से पहाड़ों को भी गिरा देने वाले और अपनी ध्वनि से दिशाओं को प्रतिध्वनित करने वाले हाथी चिंघाड़ रहे थे। छत्ता लगाये हुए मित्र मण्डल-जो मित्र (सूरज) मण्डल की तरह सुशोभित था साथ जाने की खुशी से हर्षित हो रहा था ॥३७-४०॥
आनकाः कामुका नेदुरिवाच्छादनछादिताः। कराङ्गुलिप्रिया बाढं गाढालिङ्गनतत्पराः ॥४१॥
अर्थ: नगाड़े-रूप कामी पुरुष यद्यपि वस्त्र वगैरह से प्रच्छन्न थे, उनके सब ओर कपड़े की झालर लगी थी पर तो भी वे अँगुली-रूपी प्रिया के गाढ़ आलिंगन से शब्द कर रहे थे। तात्पर्य यह कि प्रिया
नेतुर्नटगणा नित्यं नटीभिः पटवस्तदा।
रम्भानृत्यं समुत्साहे कोपान्निरसितुं यथा ॥४२॥
अर्थ (श्लोक 41 से 42): के आलिंगन की खुशी में उनसे चुप न रहा गया और इसीलिए वे शब्द कर रहे थे एवं चतुर नट-गण अपनी नटियों के साथ-साथ उनके आगे-आगे नृत्य कर रहे थे। जान पड़ता था कि मानों वे उत्साह में आ कोप से देवांगनाओं के नाच को ही नीचा दिखा रहे हैं ॥४१-४२॥
जग्रन्थुर्गन्धर्वगीतानि गन्धर्वा गर्वगुण्ठिताः।
विवाहसमये जेतुं हाहातुम्बरनारदान् ॥४३॥
मङ्गलानि सुकामिन्यो गायन्ति स्म शुभस्वनैः।
विवाहगमने तस्य जेतुं देवाङ्गना इव ॥४४॥
मात्रा मङ्गलकर्तव्यं सिद्धशेषां समाश्रितः।
नीतोऽसौ निर्जगामाशु विवाहार्थं कृतोत्सवः ॥४५॥
अर्थ (श्लोक 43 से 45): इसी समय हा हा, तुम्बर नारदों की जीतने के लिये अभिमान से भरे हुए गंधर्व-गण विवाह के समय गाने की उत्तम-उत्तम गीत गूंथ रहे थे। पाण्डु को जाते समय सौभाग्यवती स्त्रियाँ मनोहर स्वरों में मंगल पाठ पढ़ रही थीं, मानो वे देवांगनाओं को जीतने की ही कोशिश करती थीं। इसके बाद पाण्डु की माता सुभद्रा ने पाण्डु की मंगल आरती उतारी और उसे सिद्ध भगवान् की आसिका दी। इस प्रकार के उत्सव-पूर्वक पाण्डु विवाह के लिए हस्तिनापुर से सूरीपुर को चला ॥४३-४५॥
मार्गे कश्चिदुवाचेदं पश्य भूप प्रियामिव।
शालिनीं कमलाकीर्णां नदन्तीं च नदीं पराम् ॥४६॥
विलोकय धराधीशमचलं त्वामिवोन्नतम्।
सवंशं पार्थिवोपेतं सत्यादाश्रितसद्गुणम् ॥४७॥
नाथ नृत्यन्ति मार्गेऽस्मिन्विवाहोत्सविनो मुदा।
मयूरीभिर्मयूराश्च सुनटीभिर्यथा नटाः ॥४८॥
महीरुहा महाच्छायाः सफलाः पल्लवादिभिः।
प्राघुर्ण्यं कुर्वते तेऽद्य भवन्तो वा समुन्नताः ॥४९॥
कोलं पश्य महापङ्कमग्नं मलकुलाविलम्।
तमोमूर्तिं वनान्तस्थं विपक्षमिव तेऽधुना ॥५०॥
अर्थ (श्लोक 46 से 50): रास्ते में पाण्डु को उसके सेवकजन प्रकृति की शोभा दिखाते जाते थे कि कुमार देखिए, यह कमलों से पूर्ण और शब्द करती हुई नदी सुन्दर प्रिया की तरह कैसी मनोहर देख पड़ती है क्योंकि प्रिया भी कमलों के भूषण पहनती है और मीठी बात करती है। इधर देखिए, यह अचल धराधीश (पहाड़) आपके समान ही उन्नत वंश (बाँस और दूसरे पक्ष में वंश) वाला है, राजाओं से युक्त है क्योंकि शत्रुओं के भय के मारे राजा-गण यहीं आश्रय पाते हैं। इसके उत्तम पाद (नीचा भाग और चरण) हैं और इसमें उत्तम-उत्तम गुण हैं। तात्पर्य यह कि यह आपसे किसी भी बात में कम नहीं है। नाथ और भी देखिए कि मार्ग में विवाह का उत्सव मनाने के लिए हर्षित मयूरगण अपनी-अपनी मयूरी के साथ कैसा सुन्दर नृत्य कर रहे हैं। जान पड़ता है कि नटियों के साथ-साथ उत्तम नर-गण ही नाच रहे हैं और सघन छाया वाले ये वृक्ष फल और पत्तों के भार से पीड़ित हो रहे हैं, अतएव आपको पाहुनगत करके अपना भार हलका करना चाहते हैं, जान पड़ता है, ये इसलिए आपको फल और छाया वगैरह दे रहे हैं। सो ठीक ही है कि अपनी बराबरी वाले की सभी पाहुनगत करते हैं। ये जब आप जैसे ही उन्नत और फल-फूलों वाले हैं फिर आपका स्वागत क्यों न करें। ये सुअर देखो, कीचड़ में कैसे लोट रहे हैं, मिट्टी से बिल्कुल ही लथपथ हो रहे हैं और वन में रहने वाली अँधेरे की खासी मूर्ति सी देख पड़ते हैं। राजन्! ये आपके शत्रु ही आपके प्रताप से यहाँ आ छिपे हैं। इस तरह देवताओं, विमानों
एवं पश्यन्कुमारोऽसौ मार्गान्स्वर्गानिवापरान्। सबुधान्सविमानान्सतिलोत्तमांश्चचाल सः ॥५१॥
अर्थ (श्लोक 46 से 51): और तिलोत्तमा से भरे पूरे स्वर्ग की भाँति विद्वानों, विमानों और नरनारियों से भरपूर मार्ग को देखता-भालता, दिल बहलाता पाण्डुकुमार थोड़े ही समय में सारे रास्ते को तय कर सूरीपुर जा पहुँचा ॥४६-५१॥
आगच्छन्तं परिज्ञाय कौरवं यादवेश्वरः। सम्मुखं सन्मुखीभूतविविधैर्वेगात्समागमत् ॥५२॥
अथ तौ च समाश्लिष्य मिलितौ नम्रमस्तकौ। कुशलालापसंबद्धौ चेलतुः स्वां पुरीं प्रति ॥५३॥
या तोरणमहापादा नम्रकेतुसुबाहुका। नटन्तीव महानाट्या मातरिश्वनटादृता ॥५४॥
शातकुम्भमहाकुम्भशुम्भच्छोभाभिराजिता। क्वचिन्मङ्गलसद्गीतिपूर्णपूर्णस्तनी वरा ॥५५॥
रङ्गरङ्गावलीपूर्णस्वस्तिका च क्वचित्क्वचित्। स्वस्तिसम्पूर्णसत्तूर्णनरराजविराजिता ॥५६॥
याह्वयन्तीव भूपालान्प्रासादोद्भूतसद्ग्रवैः। गायन्तीव सदा गानं कामिनीगीतसंगमात् ॥५७॥
अर्थ (श्लोक 52 से 57): कौरववंशी पाण्डु को आया सुनकर यादवेश्वर राजा अंधकवृष्टि उसकी अगवानी के लिये शहर से बाहर आया और सामने आकर उससे मिला। वहाँ उन दोनों ने एक दूसरे का सत्कार किया और परस्पर में भेंट की, एवं आपस में कुशल-समाचार पूछा। इसके बाद वे दोनों पुरी के भीतर आये। पुरी में जो तोरण बँधे हुए थे वे उसके पाँव थे और मनोहर ध्वजाएँ उसके हाथ थे। पुरी के ये हाथ-पाँव हवा से खूब हिल रहे थे, जिससे ऐसा भान होता था कि यह पुरी नहीं है किन्तु नटी है और वह हवा रूप नट के द्वारा आदर की गई नाच ही करती है। इस पुरी के सब मन्दिरों पर सोने के सुन्दर कलश चढ़े हुए थे, जिससे ऐसा जान पड़ता था कि मानों वे पुरीरूपी नटी के उन्नत कुच ही हैं। उसमें कहीं-कहीं भाँति-भाँति के रंग के साथिया पुरे हुए थे और स्वस्ति कल्याण- से परिपूर्ण राजागण निवास करते थे। यहाँ के महलों पर बैठी हुई नारियों मंगल-गीत गाती थीं, जिनसे ऐसा भान होता था मानों वह नारियों के शब्दों द्वारा और-और राजाओं को ही बुला रही है ॥५२-५७॥
हसन्तीव सदा नाकं द्वारबद्धसुमाल्यकैः। चन्द्रकान्तोपला यत्राकाण्डे चन्द्रांशुपीडिताः ॥५८॥
मुञ्चन्ति जलसंघातान्नाटयन्तः शिखावलान्। कुर्वन्तो जनतानन्दं मेघा इव गृहस्थिताः ॥५९॥
प्रतिबिम्बं समालोक्य यत्र स्फटिकभित्तिषु। सपत्नीदरतो नार्यो घ्नन्त्यस्तद्धसिता जनैः ॥६०॥
अर्थ (श्लोक 58 से 60): इसके दरवाजों पर बँधी हुई मालाओं से ऐसा जान पड़ता था मानों वह स्वर्ग लोक को ही हँसती है। यहाँ पर दीवालों में चन्द्रकान्त मणियाँ जड़ी हुई थीं और उन पर आकर चंद की चाँदनी पड़ती थी, जिससे वे असमय में जल बरसाती थीं और मयूरों को नाचने के लिये उत्साहित करती थीं, एवं प्रजागण को भी आनंद देती थीं। इस समय लोगों को ऐसा ख्याल होता था कि ये चंद्रकान्त नहीं हैं किन्तु घरेलू मेघ ही हैं। यहाँ की भीतें स्फटिक की बनी हुई थीं, अतः उनमें अपने प्रतिबिम्ब को देखकर स्त्रियों को ऐसा भ्रम हो जाता था कि क्या यह हमारी सौत तो नहीं आ गई है। वे यह सोच पति के पास से हट जाती थीं और पति-गण इसी पर से उनकी खूब हँसी उड़ाते थे ॥५८-६०॥
हरिन्मणिदृषद्वद्धां कं वीक्ष्य मृगशावकाः। तृणादनधिया यान्तो विलक्ष्याः सन्ति यत्र च ॥६१॥
धनेन धनदं धीरास्तर्जयन्त्यन्यथा कथम्। जिनजन्मोत्सवे यत्र श्रीदो रत्नानि वर्षति ॥६२॥
एवं तौ तां पुरीं प्राप्य यादवेशो जनाश्रये। शुभ्रस्तम्भमहाशोभे कौरवं चावतारयेत् ॥६३॥
अर्थ (श्लोक 61 से 63): यहाँ की भूमि में सब जगह हरित् मणियाँ खची हुई थीं, जिनको देखकर विचारे मृगों के बच्चे तृण चरने के विचार से आते तो दौड़कर के, पर जाते थे हताश होकर। यहाँ के धीर पुरुष अपने धन से कुबेर को भी तिरस्कृत करते थे, अन्यथा जिनेन्द्रदेव के जन्मोत्सव के समय कुबेर वहाँ रत्नों की बरसा ही काहे को करता। ऐसी सुन्दर पुरी में उन दोनों ने प्रवेश किया। वहाँ ले जाकर अंधकवृष्टि ने खूब सजे हुए एक मनोहर मंडप में पाण्डुकुमार को ठहराया और उसकी खूब पाहुनगत की ॥६१-६३॥
सुमुहूर्ते शुभे लग्ने विवाहविधिकोविदैः। महाभुजां स्त्रजोद्दीप्तां वेदीं निन्ये स सोत्सवः ॥६४॥
सौदार्यं च समाधुर्यं कान्तिकान्तं गुणाकरम्। वव्रे च कौरवं कुन्ती सुकाव्यमिव भारती ॥६५॥
अर्थ (श्लोक 64 से 65): इसके बाद शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न में राजाओं की विवाह विधि के जानकार पुरोहित के द्वारा बड़े ठाट-बाट के साथ पाण्डुकुमार फूल-मालाओं से सजी हुई वेदी के पास लाये गये। वहाँ उदारचित्त, मिष्टभाषी, गुणाकर तथा कान्तिशाली पाण्डुकुमार को कुन्ती देवी ने अपना वर पसंद किया, जैसे भारती (वाणी) काव्य को पसंद करती है ॥६४-६५॥
मद्री कुन्तीमहास्नेहाज्जनकाद्यैः समादृता। कौरवं सोत्सवं वव्रे रामं सीतेव सद्गुणा ॥६६॥
बहुभिः पूजितः पाण्डुरखण्डैर्वस्त्रभूषणैः। दन्तावलै रथैरश्वैः सुवर्णैः शस्त्रसंचयैः ॥६७॥
अर्थ (श्लोक 66 से 67): इसके सिवा माता-पिता आदि द्वारा सत्कृत मद्री ने भी बड़े स्नेह से कुन्ती के साथ-ही-साथ कुमार को अपना पति बनाया, जिस तरह सब गुण-सम्पन्न सीता सती ने राम को अपना पति बनाया था। इस समय पाण्डुकुमार की सबने पूजा की। किसी ने अखण्ड वस्त्र और कीमती गहने पहनाये, किसी ने हाथी, किसी ने रथ, किसी ने घोड़ा और किसी ने सोना-चाँदी एवं भाँति-भाँति के हथियार दिये। कहने का तात्पर्य यह है कि पाण्डु का लोगों ने सब तरह से बड़ा आदर-सत्कार किया, किसी ने किसी भी बात को उठा न रक्खा ॥६६-६७॥
ततः कन्याद्वयं लात्वा संभोगो भोगिवद्ययौ। पुरं नागपुरं श्रीकं कुमारः कौरवाग्रणीः ॥६८॥
प्रविशन्पुरनारीभिः पुरं पाण्डुः प्रवीक्षितः। मुक्तनिःशेषकार्याभिर्भार्याभिर्निजकर्मणि ॥६९॥
काचित्पृच्छति भो भद्रे क्व पाण्डुः क्व च गच्छति। भूत्या च कीदृशा सम्यक्प्रविष्टः पत्तनं शुभम् ॥७०॥
अर्थ (श्लोक 68 से 70): इसके बाद मद्री और कुन्ती दोनों कन्याओं को लिवाकर कौरवों का अगुआ और भोगी पाण्डुकुमार इन्द्र की तरह सब तरह से सुशोभित हस्तिनापुर को चला आया। वहाँ जब उसने नगर में प्रवेश किया तब वहाँ के सब कार्यकुशल नरनारीगण अपने-अपने काम-काज छोड़कर पाण्डुकुमार को देखने के लिये आये। इस समय पाण्डु की अपार विभूति को देखकर एक स्त्री दूसरी स्त्री को पूछती है कि भद्रे, पाण्डु कहाँ है और कहाँ जाता है ? देखो तो सही, उसने कैसी विभूति के साथ नगर में प्रवेश किया है। यह सुन कोई और ही स्त्री बोल उठी कि शुभगे और मंगलमूर्ति देवी, तुम इधर
काचिज्जगाद सुभगे एह्येहि शुभमङ्गले।
तं द्रष्टुं कौतुकं तेऽद्य यदि त्वां दर्शयाम्यहम् ॥७१॥
अर्थ (श्लोक 68 से 71): जल्दी आओ, मैं तुम्हें पाण्डु का दर्शन कराये देती हूँ और तुम्हें जो पाण्डु के देखने का कौतुक हो रहा हैं उसे अभी मिटाये देती हूँ ॥६८-७१॥
काचिच्च मज्जने सक्ता श्रुत्वा यान्तं महीपतिम्।
दधाव धावनं मुक्त्वाऽर्धवस्त्रपरिधानका ॥७२॥
काचिद्भोजनवेलायां स्थिता भोजनभाजने।
पाण्डोः समटनं श्रुत्वा मुक्त्वा तन्निर्गता गृहात् ॥७३॥
रुदन्तं स्वार्भकं हित्वा काचिदन्यार्भकं हठात्।
अयासीच्च समादाय विचारपरिवर्जिता ॥७४॥
अर्थ (श्लोक 72 से 74): कोई स्त्री स्नान कर रही थी, इतने में ही उसने पाडु महीपति के शुभागमन को सुना और वह स्नान करना छोड़ आधा ही कपड़ा पहने बाहर चली आई-उसे कुछ भी सुध-बुध न रही एवं कोई भोजन की थाली पर जीमने को बैठी ही थी कि उसने राजा के आने का समाचार सुना और वह भोजन को छोड़कर एकदम बाहर निकल आई। किसी स्त्री ने जब पाण्डु के आगमन को सुना तब वह एकदम विचार-विमूढ़ हो गई और रोते हुए अपने बालक को छोड़ किसी दूसरे के बालक को गोद में उठाकर बाहर निकल पड़ी ॥७२-७४॥
काचिच्च दर्पणे वक्त्रं लोकयन्ती लसद्द्युति।
यान्ती प्रवृद्धहस्तेव सादर्शा दृश्यते जनैः ॥७५॥
वल्भमानं पतिं हित्वा प्रागल्भ्यादभ्रविभ्रमा।
बभ्राम वीक्षितुं काचित्तं पुरीं ग्रथिलेव च ॥७६॥
अर्थ (श्लोक 75 से 76): कोई स्त्री दर्पण में मुँह देख रही थी, वह दर्पण लिये ही घर के बाहर आ गई। उसको दर्पण लिये हुए देखकर लोगों को भ्रम होता था कि कहीं इसका हाथ ही तो ऐसा नहीं है। कोई स्त्री पति को जीमता छोड़कर भागी, पर उसे कहीं राजा न देख पड़ा-मेघ की नश्वरता की तरह उसे राजा का भ्रम-सा हो गया, तब वह राजा को देखने की इच्छा से इधर-उधर दौड़ती फिरने लगी ॥७५-७६॥
अलङ्कारविधौ सक्ता सालङ्कारकरण्डकान्।
हित्वा गतेर्भयाद्द्रष्टुं काचित्तमचलत्तदा ॥७७॥
कण्ठस्य भूषणं कट्यां कण्ठे च श्रोणिभूषणम्।
दधाव दधती काचित्क्वो विवेको हि कामिनाम् ॥७८॥
कज्जलेनापरा भाले तिलकं तिलकेन च।
अञ्जनं नेत्रयोः काचित्कुर्वाणा पथि निर्गता ॥७९॥
अर्थ (श्लोक 77 से 79): कोई स्त्री आभूषण पहिन रही थी। वह राजा को देखने के लिये इतनी उत्सुक हो उठी कि उसे अपने गहने-गाँठे के सन्दूक को रखने की भी सुध न रहीं-वह उसे जहाँ का तहाँ पड़ा छोड़कर बाहर आ गई एवं कोई स्त्री जल्दी में गले का हार कमर में और कमर का सूत्र (करधनी) गले में पहिन कर बेसुध-सी हुई बाहर आ खड़ी हुई। किसी ने राजा के देखने की लालसा से चित्तभंग होकर भाल पर काजल का तिलक और आँखों में कुंकुम का कज्जल आँज लिया। ठीक है कि कामी मनुष्यों को कुछ भी विवेक नहीं रहता ॥७७-७९॥
प्रकटस्तनकुम्भाभा विपरीतात्तकञ्चुका।
हसितागात्परैः काचित्क्वा लज्जा कामिनां किल ॥८०॥
अर्थ: कोई भामिनी जो कपड़ा पहिन रही थी, उल्टी कंचुकी पहिन कर कुच निकाले हुए ही पाण्डु को देखने के लिये बाहर आ गई। उसे देख लोगों ने उसकी खूब ही हँसी उड़ाई। ठीक ही है कि कामी जनों की लाज कूच कर जाती है। कोई स्थूलकाय स्त्री गाड़ी में बैठी हुई किसी दूसरी स्त्री को
काचिज्जगाद सवृद्धा स्थूला च शकटावहा।
सखि मां वीक्षितुं लात्वा त्वं याहि गमनोत्सुका ॥८१॥
अर्थ (श्लोक 80 से 81): कहती है कि सखी, तुम जाने को बहुत ही उत्सुक देख.पड़ती हो, जरा ठहरो और मुझे भी देखने को साथ ले चलो ॥८०-८१॥
भ्रूणभारपरिश्रष्टा विसंभ्रमा भ्रमातिगा।
बभ्राम भ्रान्तितः काचित् स्त्रीणां हि गतिरीदृशी ॥८२॥
अलब्धमार्गा गच्छन्ती परा मार्गविरोधिकाम्।
प्रत्युवाच सुपन्थानं देहि देहीति भाषिणी ॥८३॥
तरुणीं तरुणी काचित्यातयन्ती पुरःस्थिताम्।
चचाल चलचित्तापि चञ्चला जलवीचिवत् ॥८४॥
बभाण भामिनी काचित् दृष्ट्वा तं नृपनन्दनम्।
ताभ्यां युतं ततं श्रीभिरिति हर्षसमाकुला ॥८५॥
अर्थ (श्लोक 82 से 85): गर्भ-भार से थकी हुई कोई स्त्री भ्रम हो जाने से चक्कर खाने लगी और बेहोश सी हुई इधर-उधर घूमती, गिरती, पड़ती फिरने लगी। सच है कि स्त्रियों की ऐसी ही गति होती है। वे किसी भी बात पर विचार नहीं करती। कोई स्त्री मार्ग न मिलने पर मार्ग रोकने वाली स्त्रियों को मीठे-मीठे शब्दों में कहती है कि सखी, रास्ता छोड़ दो, मुझे तो महाराज दीखते ही नहीं एवं कोई तरुणी मार्ग देने के लिए आगे वाली तरुणी स्त्रियों से कहती है, पर वे हटती नहीं, तब वह उन्हें गिरा कर चंचल-चित्त होती हुई, जल को तरंगों की तरह शरीर को भी चंचल बनाकर, फुर्ती से उनके आगे निकल जाती है एवं कुन्ती और मद्री से युक्त और लक्ष्मी से परिणीत पाण्डु को देखकर हर्षित हुई कोई स्त्री कहती है कि सखी, अगणित लक्षणों वाले और सफेद छत्र द्वारा पहचाने जाने वाले पाण्डु ने इन दोनों सुन्दरियों को किस पुण्य के उदय से पाया है ॥८२-८५॥
सखि केनात्र पुण्येनैताभ्यां योगं समाप च।
पाण्डुः पाण्डुरछत्रेण लक्षितो लक्ष्यलक्षणः ॥८६॥
लक्ष्मीकान्तिकलापाभ्यामाभ्यां योगेन रञ्जितः।
अयं चायोविपाकेन समाप्नोति परां श्रियम् ॥८७॥
आभ्यां द्वाभ्यां सखि ब्रूहि किं कृतं सुकृतं द्रुतम्।
पूर्वजन्मनि येनायं वरो लब्धो विचक्षणः ॥८८॥
दत्तं दानं सुपात्रेभ्यस्तपस्तप्तं सुदुःकरम्।
किं वाभ्यां भक्तिभारेण सेवितः श्रीगुरुर्महान् ॥८९॥
चैत्यालयेऽथवा बाले वर्यया च सपर्यया।
चेकीयितो जिनो देव आभ्यां सभ्यसमक्षकम् ॥९०॥
अर्थ (श्लोक 86 से 90): लक्ष्मी और कान्ति के समूह-रूप इन दोनों के योग से रंजित पाण्डु जो कुछ भी सुख-लाभ कर सका है वह सब पुण्य का ही परिणाम है और सखी, यह भी तो बताओ कि इन दोनों ने भी पूर्वभव में कौन-सा अपूर्व पुण्य कमाया था, जिसके फल से इन्होंने ऐसा इन्द्र जैसी विभूति-वाला और विचक्षण योग्य वर पाया है। इन्होंने सुपात्र के लिये दान दिया है या घोर तपस्या की है, बड़े भक्तिभाव से श्रीगुरु की सेवा की है या जिन चैत्यालय में जा जिनेन्द्रदेव की पूजा की है अथवा शुभ इच्छा से इन्होंने उत्तम पुरुषों की सेवा-शुश्रूषा की हैं ॥८६-९०॥
अहार्याचर्यचर्या च चरिताभ्यां शुभेच्छया।
अन्यथा कथमीदृक्षं मृगाक्षं वरमाप्नुयात् ॥९१॥
अखण्डमण्डलं ग्लौवत्पाण्डोश्छत्रं सुपाण्डुरम्।
पिण्डीकृतं यशोवृन्दमिव संशोभते शुभम् ॥९२॥
अर्थ (श्लोक 91 से 92): इन उत्तम कामों में से इन्होंने अवश्य ही कोई काम किया है, नहीं तो इन्हें ऐसा योग्य वर कभी भी नहीं मिल सकता था। पूर्ण चंद्र की तरह स्वच्छ और मंडालाकार पाण्डु का छत्र ऐसा जान पड़ता
अनेन पाण्डुनाखण्डखण्डं नीताश्च दस्यवः।
शस्त्रसंघातघातेन घातिनाद्य सुघस्मराः ॥९३॥
इत्थं संस्तूयमानोऽसौ जनैः प्राभृतहस्तकैः।
सुन्दरं मन्दिरं प्राप पाण्डुः प्रबलशासनः ॥९४॥
तयोः स्वमन्दिराभ्यर्णमाकीर्णे पूर्णसंपदा।
निकेतने सुकेत्वाढ्ये ददौ वासाय भूपतिः ॥९५॥
ताभ्यां भोगान्यरान्भूपो बुभुजे भोगवित्सदा।
गरीयः सुकृतं यस्य किं तस्य स्यादुरासदम् ॥९६॥
अर्थ (श्लोक 91 से 96): है कि मानो पिंडरूप में इकट्ठा हुआ उसका यश ही है और छत्र के बहाने से उसकी शोभा बढ़ाता है। इस महोदय राजा ने शस्त्रों के तीव्र प्रहार द्वारा पापिष्ट बैरियों के खण्ड-खण्ड कर दिये है। इसके समान बली राजा और कोई नहीं है। इस तरह से भेंट दे-देकर लोगों ने पाण्डु की खूब स्तुति-भक्ति की। इसके बाद कुछ देर में प्रबल प्रतापी पाण्डुकुमार तो अपने सुन्दर महल में चला गया और उन दोनों पुत्रवधुओं का, व्यास ने अपने मंदिर के पास ही, पूर्ण सम्पत्तिशाली और ध्वजाओं से सुशोभित एक महल में निवास कराया। बाद वह भोगी पाण्डु पंडित भी उन दोनों प्रियायों के साथ सुख से रमता हुआ वहीं रहने लगा। सच है कि जिसका पुण्य प्रबल होता है उसे किसी भी बात की कमी नहीं रहती ॥९१-९६॥
सुकुन्तीस्तनसंस्पर्शात्तदास्याब्जसुपानतः।
तस्याभून्महती प्रीतिः प्रेम्णो वस्त्विष्टमानसम् ॥९७॥
तद्वक्त्राब्जाद्रसामोदं संहरन्नासृपन्नृपः।
चञ्चरीक इवाम्भोजान्मारसेवा न तृप्तये ॥९८॥
कटाक्षवीक्षणै रम्यैः स्मितैश्च कलभाषणैः।
बबन्ध सा मनस्तस्य स्वस्मिन्नत्यन्तसुन्दरैः ॥९९॥
मनस्विनी मनोऽबध्नात्कामपाशायिते लघु।
कण्ठे बाहुलते तस्य गाढमासज्य कामिनी ॥१००॥
स्पर्शं च कोमले पाणौ सौगन्ध्यं च मुखाम्बुजे।
शब्दमल्पिते तस्या देहे रूपं न्यरूपयत् ॥१०१॥
तर्पयामास निःशेषं सोऽक्षग्रामं विशेषवित्।
प्रेप्सोरैन्द्रियिकं सातं गतिर्नार्तः पराङ्गिनः ॥१०२॥
अर्थ (श्लोक 97 से 102): कुन्ती के कुचों के स्पर्श से और उसके मुख-कमल के पान से पाण्डु को बड़ी प्रसन्नता हुई, जैसे मनचाही चीज को पाकर प्रेमी पुरुषों को प्रीति होती है। उसके सुगंधित मुख कमल को सूंघकर पाण्डु को तृप्ति ही नहीं होती थी, जिस तरह कि कमल की सुगन्ध से भौंरे तृप्त नहीं होते। सच है कि काम सेवन से किसी को भी सन्तोष नहीं होता। कुन्ती ने कटाक्षमय दृष्टिपात से, मनोहर मुस्कान से, मीठी बोल-चाल से और अपने सौंदर्य से उसका मन बिल्कुल अपनी तरफ खींच लिया, अपने में बाँध लिया। उस मनस्विनी ने उसके मन को अपने अनुपम सौंदर्य से और काम के पास की तरह अपनी दोनों भुजाओं से उसके गले को खूब मजबूत बाँध लिया। वह उसे अपने प्राण ही समझ ने लगी। पाण्डु ने भी उसके साथ कामसुख भोगते-भोगते उसके कोमल हाथों में स्पर्श का, मुख-कमल में सुगन्ध का, बोल-चाल में मनोहर शब्दों का और उसके शरीर में मनोहर रूप का जैसा कुछ अनुभव किया और जैसा इन्द्रियों के सुखों को भोगा वह सब उसके लिये अपूर्व ही था। ठीक ही है कि इन्द्रिय-सुख की वाञ्छा रखने वाले जीवों को स्त्री के सिवा और कोई गति ही नहीं है ॥९७-१०२॥
तद्वध्वमृतमासाद्य रोगीव दिव्यभेषजम्।
सेवमानः स कालेऽभूत्सुखी निर्मदनज्वरः ॥१०३॥
अर्थ: अपनी नव वधू की रूप-सुधा का पानकर-दिव्य औषधि को पीकर रोगी की तरह-पाण्डु
कदाचित्सदनोद्याने रेमेऽसौ युवतीयुतः।
कदाचिद्बहिरुद्याने वल्लीवेश्मविराजिते ॥१०४॥
क्रीडाद्रौ स कदाचिच्चाक्रीडयत्कामिनीद्वयम्।
कदाचिद्विजहाराशु नदीपुलिनभूमिषु ॥१०५॥
दीर्घिकासु कदाचित्स ताभ्यां चक्रीड वारिभिः।
कदाचिद्गेन्दुकक्रीडां चकार क्रीडितप्रियः ॥१०६॥
एवं तथाविधैर्भोगैर्जिनेन्द्रमहिमोत्सवैः।
सत्पात्रदानतो निन्ये कालस्तेषां महान्किल ॥१०७॥
अर्थ (श्लोक 103 से 107): थोड़े ही काल में पूर्ण सुखी हो गया, उसका मदन-ज्वर उतर गया। वह उनके साथ कभी महल के बगीचे में और कभी वेलों से छाये हुए मंडप वाले वन के प्रदेश में क्रीड़ा करता था एवं कभी उनके साथ-ही-साथ वह क्रीड़ापर्वत पर जाता और वहाँ मन-चाही क्रीड़ा करता था। कभी-कभी नदियों में जा सिकता-स्थल में विहार करता था और कभी उनके साथ बावड़ियों के जल में तथा हिंडोलों में मन को बहलाता था। इस प्रकार भाँति-भाँति के भोगों, जिनेन्द्रदेव के महिमा वाले उत्सवों और पात्रदान आदि क्रियाओं द्वारा उसने बहुत काल बिताया ॥१०३-१०७॥
अथ भोजकटवृष्णोश्च सुता सच्छीलशालिनी।
गान्धारी गुणगांधारी बुधबोधितमानसा ॥१०८॥
या जिगाय निशानाथं वक्त्रेण नेत्रतो मृगीम्।
रतिं रूपेण गत्या च दन्तावलवधूं सदा ॥१०९॥
धृतराष्ट्रेण गान्धारी विवाहविधिना वृता।
यशस्वतीव पुरुणा शतपुत्रा भविष्यति ॥११०॥
अथो कुमुद्वती नाम देवकक्षितिपात्मजा।
विदुषा विदुरेणापि प्रेमतः पर्यणीयत ॥१११॥
अथैकदा मुदा सुप्ता शयनीये निशान्तिमे।
यामे ददर्श सुस्वप्नानिति कुन्ती सुमानसा ॥११२॥
अर्थ (श्लोक 108 से 112): भोजकवृष्टि राजा की एक पुत्री थी। उसका नाम था गांधारी। वह शीलवती थी, गुणों की खान थी और उसने अच्छे-अच्छे विद्वानों से शिक्षा पाई थी। वह अपने मुख से चाँद को और नेत्रों से मृगी को जीतती थी तथा रूप से रति को भी नीचा दिखाती थी। अपनी मंद गति से वह हथिनी को लजाती थी। वह धृतराष्ट्र के साथ में विवाही गई थी। उसका विवाह आर्षविधि से हुआ था और ऋषभ प्रभु के निमित्त से जैसे यशस्वती के सौ पुत्र हुए थे उसी तरह इसके भी सौ पुत्र-होने वाले थे। इसके बाद कुमुद्वती नाम देवक राजा की पुत्री के साथ प्रेम से विद्वान् विदुर का पाणिग्रहण हुआ। एक दिन रात के पिछले पहर कुन्ती अपनी शय्या पर सुख की नींद सोई हुई थी। उस समय उस शुद्धमना ने कई एक शुभ स्वप्नों को देखा। उनका हाल सुनिए ॥१०८-११२॥
मातङ्गं मदसंलिप्तगण्डमुद्दण्डसत्करम्।
वार्द्धिं गम्भीरनादाढ्यं जलकल्लोलशालिनम् ॥११३॥
जैवातृकं सज्योत्स्नं च जगदानन्ददायकम्।
कल्पवृक्षं चतुःशाखं ददतं चार्थिने धनम् ॥११४॥
प्रबुद्धा वीक्ष्य सुस्वप्नान्गता पाण्डुं सुमण्डिता।
मण्डनैर्वरवस्त्रैश्च कुन्ती सत्कुन्तलावहा ॥११५॥
अर्थ (श्लोक 113 से 115): पहले स्वप्न में उसने मद से जिसके कपोल झर रहे हैं और सूँड की जो इधर-उधर घुमा रहा है, ऐसा हाथी देखा। दूसरे में कल्लोलों से सुशोभित और शब्द करता समुद्र देखा। तीसरे में प्रकाशमय और संसार को सुख देने वाला पूर्ण चाँद देखा एवं चौथे स्वप्न में उसने चार डालों वाला और अर्थियों को धन देने वाला कल्पवृक्ष देखा। इन स्वप्नों को देख चुकने पर जब सबेरा हुआ तब वह जागी और प्रभात-काल की क्रियाओं से निपटकर उसने सुन्दर वस्त्र और भूषण पहिने। इसके बाद वह सुकेशी अपने स्वामी पाण्डु के पास पहुँची ॥११३-११५॥
नत्वार्द्धासनमारूढा पृच्छन्ती स्वप्नजं फलम्।
तेनोचे गजतः पुत्रो भविता ते वरानने ॥११६॥
सागरादतिगम्भीरो गभीरधिषणोधरः।
हिमांशोर्जगदानन्दं दास्यतीति स्फुटं प्रिये ॥११७॥
कल्पशाखिफलं विद्धि सुतस्ते वाञ्छितार्थदः।
चतस्रो वीक्षिताः शाखास्त्वया तत्र सुशोभनाः ॥११८॥
तद्भ्रातरस्तु चत्वारो भवितारः सुजित्वराः।
एवं श्रुत्वा सती कुन्ती मुमुदे मुग्धमानसा ॥११९॥
अर्थ (श्लोक 116 से 119): पाण्डु ने उसका यथायोग्य आदर किया और उसे अपने आधे सिंहासन पर बैठाया। इसके बाद, कुन्ती ने पाण्डु को स्वप्नों का सब हाल सुनाकर उनका फल पूछा। उत्तर में पाण्डु ने कहा कि सुन्दरी, ध्यान देकर सुनो। तुमने जो हाथी देखा है उसका तो यह फल है कि तुम्हारे पुत्र का जन्म होगा, समुद्र देखने से वह बड़ा गंभीर होगी, चाँद देखने से वह जगत भर की आनंददायी होगा और अन्त में तुमने जो कल्पवृक्ष देखा है उसका फल यह है कि वह दानी होगा, उससे जो कोई जो कुछ भी याचना करेगा उसे वह वही देगा और चार शाखायें देखने का यह फल है कि उसके चार भाई और होंगे। वे पाँचों भाई सुन्दर रूप वाले और विजयी होंगे। इस प्रकार अपने स्वप्नों का फल सुनकर मुग्ध मन वाली सती कुन्ती बहुत हर्षित हुई ॥११६-११९॥
अच्युताद्विच्युतं देवं सा दधे गर्भपङ्कजे।
पुण्यतः किं दुरापं स्यात्सुतोत्पत्त्यादिकं सदा ॥१२०॥
ववृधेऽथ क्रमाद्गर्भस्तस्या हर्षकरो नृणाम्।
विपक्षपक्षक्षेपिष्ठः स्वजनानन्ददायकः ॥१२१॥
अर्थ (श्लोक 120 से 121): इसके कुछ समय बाद अच्युत स्वर्ग से एक भाग्यशाली देव चया और उसको अपने गर्भ-कमल में धारण कर कुन्ती गर्भवती हुई। सच तो यह है कि पुण्य के योग से जीवों को पुत्र आदि कोई भी सामग्री दुर्लभ नहीं रह जाती। धीरे-धीरे उसका वह गर्भ बढ़ने लगा और लोगों को आनंद देने लगा। उसका वह गर्भ शत्रुपक्ष का घातक और स्वजनों को आनंद देने वाला था ॥१२०-१२१॥
वीक्ष्याथ पाण्डुरां पाण्डुः सभ्रूणां भ्रूभ्रमावहाम्।
मुमुदे तां यथा खानिं रत्नरञ्जितभूमिकाम् ॥१२२॥
त्रिवलीभङ्गभावेन या वक्तीव सुगर्भतः।
अरीणां भङ्ग एवात्र भविता नान्यथा गतिः ॥१२३॥
मृत्सादनसमीहातस्तस्या गर्भे स्थितः पुमान्।
भूमिं भोक्ष्यति सर्वां च साधयित्वाखिलान्नृपान् ॥१२४॥
अर्थ (श्लोक 122 से 124): पाण्डुर शरीर-वाली और चंचल भौंहें वाली गर्भवती कुन्ती को देखकर पाण्डु के हर्ष का पार न रहा। वह उस समय ऐसी मालूम पड़ती थी मानों रत्नों से रञ्जित भूमि वाली खान ही है क्योंकि वह रत्न-जड़ित बहुत से गहने पहिने थी और उनके रत्नों की ज्योति पृथ्वी पर पड़ती थी। गर्भ के निमित्त से उसके पेट की त्रिबली मिट गई थी। जान पड़ता था कि उस त्रिबली भंग से वह यही जनाती थी कि इस गर्भ से बैरियों का भंग अवश्यंभावी है। इसके सिवाय उनकी और कोई भी गति नहीं हो सकती। कुन्ती की उत्तम मिट्टी खाने की इच्छा होती थी, जिससे जाना जाता था। कि इसके गर्भ में जो पुरुष स्थित है वह सारी पृथ्वी को भोगेगा और सम्पूर्ण राजाओं महाराजाओं को अपने अधीन करेगा ॥१२२-१२४॥
उन्नतौ तत्कुचौ नूनं कृष्णचूचुकसंयुतौ।
वदतः स्वजनौन्नत्यं कृष्णतां परपक्षके ॥१२५॥
अर्थ: उसके कुच उन्नत हो गये थे और साथ में ही उनके चूचक काले पड़ गये थे। जिनसे ऐसा भान
निष्ठीवनं मुखे तस्या व्यक्तीवेति जनान्प्रति।
निष्ठां न यास्यति क्वापि वैरीवर्गः सुगर्भतः ॥१२६॥
अर्थ (श्लोक 125 से 126): होता था कि मानों वे अपने, स्वजन बन्धुओं की उन्नति और शत्रुपक्ष की कालिमा को ही जनाते हैं। उसके मुँह में थूँक बहुत आता था, उससे जाना जाता था कि वह लोगों को यही जनाती है कि इस गर्भस्थ बालक के मारे शत्रु-गण मारे-मारे फिरेंगे-कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलेगी ॥१२५-१२६॥
एवं सुगर्भचिह्नेनालङ्कृतेः शयनासने।
भोजने भूषणे वाण्यां तस्याः प्रीतिर्न चाभवत् ॥१२७॥
जिनार्चनविधौ तस्या धर्मे धर्मफलेऽपि च।
प्रीतिर्दोहदभावेन संपनीपद्यते स्म वै ॥१२८॥
जिनार्चनं विधत्ते सा सव्रता व्रतवत्सला।
युधि स्थितान्महाशत्रून् हन्मीति सदोहदा ॥१२९॥
संपूर्णदोहदाप्येवं पूर्णे मासि सुतोत्तमम्।
सुषुवे सा समीचीनं यथा च सुमनोरथम् ॥१३०॥
विस्तीर्णनयनाब्जोऽसौ वक्त्रचन्द्रसमप्रभः।
सनयस्तनयस्तस्या राजराजकुलोद्गमः ॥१३१॥
उत्पत्तिसमये तस्य निशान्तस्थं सुतामसम्।
विलयं क्वापि संयातं यथा सूर्योद्गमे भुवि ॥१३२॥
सा शर्वरीव सौम्येन सुतसोमेन व्यद्युतत्।
दीप्तिता दिवसस्येवासीत्पितुर्बालभानुना ॥१३३॥
अर्थ (श्लोक 127 से 133): इस प्रकार के गर्भ-चिह्नों से अलंकृत कुन्ती देवी की अलंकार, भोजन, भूषण, वाणी आदि किसी भी बात में प्रीति नहीं रह गई परन्तु जिनेन्द्रदेव की पूजा तथा और-और धर्म एवं धर्म के फल में उसे दोहद रूप से भीति अवश्य होती थी। वह जिनेन्द्रदेव की पूजा करती थी, व्रत करती थी और व्रती पुरुषों में वात्सल्य रखती थी। उसे एक बार यह दोहला हुआ था कि मैं युद्ध में बड़े-बड़े शत्रुओं का संहार करूँ। इस तरह से उसको और-और भी बहुत से दोहले उत्पन्न हुए। इस प्रकार धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हो गये तब उस पुण्यवती ने-जैसा उसका मनोरथ था वैसे ही-उत्तम पुत्र को जन्म दिया। उसके जो पुत्र हुआ उसके नेत्र-कमल खूब विस्तीर्ण थे, मुख चन्द्र के जैसा था। वह नीति का ज्ञाता और राजकुल का अभ्युदय था। बहुत क्या कहें उसकी अपूर्व शोभा थी। जिस समय पुत्र का जन्म हुआ उस समय अँधेरा न जाने कहाँ बिला गया, जैसे सूरज का उदय होते वह बिला जाता है और जिस तरह रात की शोभा चाँद से होती है उसी तरह पुत्र-जन्म के समय पुत्र के द्वारा कुन्ती की भी अपूर्व शोभा हो गई थी, वह अपूर्व द्युति को धारण करती थी या यों कहिए कि उस समय वह पाण्डु के तेज-रूप सूरज के द्वारा दिन की दीप्ति-सी शोभित होती थी ॥१२७-१३३॥
तदानन्दमहाभेर्यो दध्वनुः कोणकोटिभिः।
प्रहता ध्वनदम्भोधिगम्भीरं नृपसद्मनि ॥१३४॥
पटत्पटहझल्लर्यः पणवाः शंखकाहलाः।
ताला वीणा मृदंगाश्च प्रमोदादिव दध्वनुः ॥१३५॥
अर्थ (श्लोक 134 से 135): उस समय डंडों के सिरों से ताड़ी हुई महान् आनंद भेरी बज रही थी और उसके शब्द से राज-महल गूंज रहा था। जान पड़ता था मानों मेघ ही गरज रहा है। इसके सिवा उस समय नगाड़े, झालर, शंख, काहल, वीणा, मृदंग आदि बाजों की भी ध्वनि हो रही थी। इन का शब्द सुनकर ऐसा भान होता था कि मानों ये सब बाजे अपने आप ही खुशी से बज रहे हैं और संसार को कुन्ती के पुत्र-जन्म की सूचना करते हैं ॥१३४-१३५॥
नृत्यं जिताप्सरोनाट्यमारभ्यत महालयैः। यकाभिः सुरनर्तक्यो हेलया निर्जिता द्रुतम् ॥१३६॥
तदा रेजुः पुरे वीथ्यश्चन्दनाम्भश्छटाश्रिताः। कृताभिर्वरशोभाभिर्हसन्त्यो वा दिवःश्रियम् ॥१३७॥
गृहे गृहे पुरे रेजू रत्नतोरणमण्डपाः। रत्नचूर्णैर्बभुर्भूमौ रत्नावल्यः सुरङ्गिताः ॥१३८॥
महोदरा महाकुम्भाः स्वर्णा रेजुर्गृहे गृहे। उत्तम्भिता नभोभागे भानवो वा समागताः ॥१३९॥
अर्थ (श्लोक 136 से 139): इस समय अच्छी-अच्छी नर्तकियों की भी लीलामात्र में जीतने वालीं नटियों ने लय के साथ महान् नृत्य शुरू किया। पुर की गली-गली में चंदन के जल की छटा देख पड़ने लगी। अधिक क्या कहा जावे पुर की यहाँ तक शोभा और सजावट की गई थी कि जिससे ऐसा भान होता था कि मानों वह स्वर्ग की शोभा और सजावट को हँस ही रहा है। घर-घर में रत्नों के तोरण बाँधे गये थे और उत्सव के लिये मंडप सजाये गये थे एवं रत्नों के चूर्ण द्वारा भूमि में नाना रंग की रत्नावली पूरी गई थी, जो अपूर्व ही शोभा पाती थी। वहाँ घरों के ऊपर सोने के बड़े-बड़े कलश चढ़े हुए थे और वे मकान आकाश तक ऊँचे चले गये थे, अतः ऐसी प्रतीति होती थी कि मानों इन मकानों पर आकर सूरज ही तो नहीं स्थित हो गये हैं ॥१३६-१३९॥
श्रुत्वा पुत्रप्रसूतिं स नृपमेघो ववर्ष च। दानधारां सुलोकानां यथेष्टमिष्टवृष्टिवत् ॥१४०॥
कौरवाब्धेरसौ बालो हिमद्युतिः समुद्ययौ। पुरे सान्तःपुरे मोदमित्युत्पाद्य महामनाः ॥१४१॥
बन्धुता युधि संस्थैर्या युधिष्ठिरं तमाह्वयत्। गर्भस्थे धर्महेतुत्वात्तस्मिंस्तं धर्मनन्दनम् ॥१४२॥
बन्धुताकौरवानन्दं स तन्वन्कौरवाग्रणीः। वैरिवंशतमो धुन्वन्ववृधे बालचन्द्रमाः ॥१४३॥
असौ स्तनन्ध्यस्तन्यं मातर्गण्डूषितं यशः। समुद्गिरन्नभजन्दिक्षु यथा दीप्त्या च दिद्युते ॥१४४॥
हसितैः सस्मितैर्मुग्धै रिङ्गणैर्मणिकुट्टिमे। मन्मनाभाषणैः प्रीतिं पित्रोः सममजीजनत् ॥१४५॥
अर्थ (श्लोक 140 से 145): पाण्डुरूप मेघ ने जब पुत्र-जन्म के समाचार को सुना तब लोगों की इच्छा के अनुसार उसने धारासार बरसा की तरह खूब ही दान की बरसा की। उत्तम जनों को खूब दान दिया और उनका उचित आदर किया। वह बालक कौरव वंश-रूप समुद्र को वृद्धिंगत करने के लिये चाँद के समान हुआ। चाँद जैसे समुद्र को वृद्धिंगत करता है उस महामना ने भी उसी तरह अन्तःपुर सहित सारे पुर में आनंद ही आनंद फैला दिया, सबको वृद्धिंगत कर दिया। इसके उत्पन्न होने पर बन्धुवर्ग को लड़ाई में स्थिर होने की भावना हुई। इसलिए उन्होंने इसका नाम युधिष्ठिर रक्खा और यह जब से गर्भ में आया तभी से लोगों को धर्म-साधन का निमित्त बना, इसलिए उन्होंने इसका धर्मराज या धर्मनन्दन नाम भी रखा। इसने अपने जन्म से ही कौरववंश को आनंद दिया, अतः यह कौरवाग्रणी कहलाया। शत्रु वंश-रूप अँधेरे को वह हटाने वाला था, इसलिए इसे लोगों ने बाल-चंद्र कहा। माता का दूध पीते समय जो दूध उसके मुँह से बाहर आ छलकता था उससे उज्ज्वलता को धारण किये हुए शरीर और शरीर की स्वाभाविक उज्ज्वल कान्ति से जो दसों-दिशाएँ व्याप्त हो रही थीं उससे उसकी अपूर्व ही शोभा थी। वह अपनी मुस्कान तथा मणि-जटित भूमि में लटपटाते हुए चलने और मन ही मन भाषण से माता-पिता को हमेशा ही प्रसन्न करता रहता था ॥१४०-१४५॥
वृद्धौ तस्याभवद्वृद्धिर्गुणानां सहजन्मना।
सोन्दर्यात्तस्य ते नूनं तद्वृद्ध्यनुविधायिनः ॥१४६॥
अर्थ: इन सब बातों के सिवा उसकी वृद्धि के साथ-ही-साथ उसमें स्वाभाविक गुण भी बढ़ते जाते थे। मानों वे उसके सौंदर्य पर मोहित होकर ही उसकी वृद्धि के अनुयायी बने थे ॥१४६॥
अन्नाशनसुचौलोपनयनादीन्क्रियाविधीन्।
अनुक्रमाद्विधानज्ञो जनकोऽस्य व्यजीजनत् ॥१४७॥
अर्थ: उसका पिता क्रिया-विधान का अच्छा ज्ञाता था, अतः उसने बालक की अन्नाशन, सुचौल, उपनयन आदि सभी क्रियाएँ कीं ॥१४७॥
ततः क्रमेण संलङ्घ्य लङ्घिताखिलदिग्यशाः।
बाल्यकौमारकावस्थां यौवनस्थो बभूव सः ॥१४८॥
सैव वाणी कला सैव विद्या सा द्युतिरेव सा।
शीलं तदेव विज्ञानं सर्वमस्य तदेव तत् ॥१४९॥
तस्य मूर्द्धा समुत्तुङ्गो मौलिरप्यंशुनिर्मलः।
सचूलिक इवादीन्द्रकूटो भृशं समद्युतत् ॥१५०॥
मुखमस्य सुखालोकं शशाङ्कपरिमण्डलम्।
अधः कुर्वद्राजेदमखण्डपरिमण्डलम् ॥१५१॥
कर्णौ कुण्डलशोभाढ्यौ कपोलौ दर्पणोज्ज्वलौ।
नयने सूक्ष्मदर्शित्वाद्दीप्रे तस्य बभूवतुः ॥१५२॥
नासा वंशसमाभासीत्सद्गन्धग्रहणक्षमा।
विलसद्विद्रुमाकारौ तस्योष्ठौ रेजतुस्तराम् ॥१५३॥
ललिते भ्रूलते तस्य लीलां बभ्रतुरुन्नताम्।
कामेन वैजयन्त्यौ वा समुत्क्षिप्ते जगज्जये ॥१५४॥
अर्थ (श्लोक 148 से 154): धीरे-धीरे दसों-दिशाओं में उसका यश व्याप्त हो गया। उसने क्रम से बाल-काल को लांघकर युवावस्था में पैर रक्खा। पर इस समय भी उसकी वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान सभी बातें वैसी की वैसी स्वाभाविक ही रहीं-उसे रंचमात्र भी मद वगैरह न हुआ। उसके मस्तक पर उन्नत और निर्मल मणियों से जड़ा हुआ मुकुट ऐसा जान पड़ता था मानो शिखर-सहित सुमेरु का शिखर ही है। उसका मुँह देखने में बहुत ही प्यारा लगता था और वह चाँद के मण्डल को भी ल जाता था। क्योंकि चाँद तो कभी कभी घट भी जाता है पर वह तो हमेशा ही एक-सा रहता था। उसके कान कुंडलों से सुशोभित थे, कपोल दर्पण की तरह निर्मल थे और नेत्र सूक्ष्मदर्शी और मनोहर थे। उसकी नाक सुन्दर सुगंध को ग्रहण करने में समर्थ और चम्पे के समान शोभाशाली थी। सुन्दर बिंबाफल के समान सुन्दर उसके ओठ थे। उसकी सुन्दर भौंहें बड़ी चंचल थीं। जान पड़ता था कि मानों तीनों लोकों को वश में लाने के लिये कामदेव की ध्वजाएँ ही फहरा रहीं हैं। उसके कंठ की हार वगैरह से अद्भुत ही शोभा थी ॥१४८-१५४॥
कण्ठोऽस्य कण्ठिकाहारभूषणैर्भूषितो व्यभात्।
स्वर्णाद्रिशिखरं यद्वज्ज्योत्स्नया परिवेष्टितम् ॥१५५॥
वक्षस्स्थलं च विपुलं सहारं तस्य भात्यरम्।
सनिर्झरं यथा क्ष्माभृत्तटं सुघटसङ्कटं ॥१५६॥
भुजस्तम्भौ महास्तम्भाविव तस्य जगद्धृतेः।
रेजतुर्हस्तिहस्ताभौ जयलक्ष्म्याः सुलक्षितौ ॥१५७॥
अर्थ (श्लोक 155 से 157): अतः उसका कंठ ऐसा शोभता था जैसा कि ज्योत्स्ना से घिरा हुआ सुमेरु शोभता है। उसका वक्षःस्थल बड़ा विस्तृत था और उसमें सुन्दर हार पड़ा हुआ था। जान पड़ता था कि वह पहाड़ ही है और उसमें जो हार पड़ा हुआ है वह हार नहीं किन्तु झरना वह रहा है। उसकी भुजाएँ महान् स्तंभ सरीखी थीं। वे संसार को पालने वाली थीं, हाथी की सूँड के तुल्य थीं और उनमें जयलक्ष्मी का
तस्य हस्ततलं रेजे खाङ्गणं वा महोडुभिः। मीनकूर्मगदाशङ्खचक्रतोरणलक्षणैः ॥१५८॥
अर्थ (श्लोक 155 से 158): निवास था। उसका हस्ततल नक्षत्र, मीन, कूर्म, गदा, शंख, चक्र, तोरण आदि लक्षणों के द्वारा आकाश के आँगन-सा देख पड़ता था ॥१५५-१५८॥
कटकाङ्गदकेयूरमुद्रिकाद्यैर्विभूषणैः। व्यद्योतिष्टास्य सत्कायः सुभूषाकल्पवृक्षवत् ॥१५९॥
स नाभिकूपिकां दधे लावण्यरसवाहिनीं। रसत्सरससंपृक्तां श्रोणिं योषामिवापरम् ॥१६०॥
सघनं जघनं तस्य दुकूलकुलसंकुलं। रेजे यथा नदीकूलं फेनिलं जलराजितम् ॥१६१॥
बभारोरू वरौ सोऽत्र पीवरौ कनकद्युती। कामेन कल्पितौ स्तम्भौ स्वावासस्थितये यथा ॥१६२॥
अर्थ (श्लोक 159 से 162): उसका सुन्दर शरीर कटक, अंगद, केयूर और अँगूठी आदि भूषणों के द्वारा दीप्त हो रहा था, जैसे कि भूषणों के द्वारा कल्पवृक्ष सुशोभित होता है। उसकी नाभि बावड़ी के तुल्य थी, उसमें लावण्य-रूप जल भरा था। उसकी कटि में करधनी सुशोभित थी और वह दूसरी स्त्री-सी जान पड़ती थी। जिस तरह से फेन वाले जल से भरा हुआ नदी का किनारा शोभता है उसी तरह रेशमी वस्त्रों से व्याप्त उसके सघन जघन शोभते थे। उसके स्थूल उरुस्थल सोने को द्युति के समान पीले थे और वे ऐसे मालूम होते थे कि मानों अपने ठहरने के लिये कामदेव ने दो स्तंभ ही खड़े किये हैं ॥१५९-१६२॥
जङ्घे अघघनाघातघस्मरे लङ्घिके जगत्। अस्य रेजतुरुन्निद्रे कामस्य शरधी इव ॥१६३॥
क्रमौ च क्रमतः कम्प्रौ विक्रमाक्रान्तसंक्रमौ। जगन्नतौ स्तुतौ तस्य भातः स्म कौरवेशिनः ॥१६४॥
नखा नक्षत्रसंकाशाः क्षत्रसेव्या बभुर्भृशम्। दर्पणा इव संन्यस्तास्तस्य रूपनिरीक्षणे ॥१६५॥
अनौपम्यं महारूपं तस्य वर्णयितुं क्षमः। कः क्षितौ क्षितिपालानामीशितुः कौरवेशिनः ॥१६६॥
अर्थ (श्लोक 163 से 166): उसकी जंघाएँ पापसमूह का विनाश कर संसार को लाँघ जाने के लिये समर्थ थीं। वे उनिन्द्र थीं, अतएव ऐसी जान पड़ती थीं मानों काम के बाण रखने के ये तूणीर-तरकस ही हैं। पराक्रमशाली उसके चरणों को प्रवेश करने में कहीं रुकावट न होती थी, अतएव सब कोई उन्हें नमस्कार करते थे। वह क्षत्रियों द्वारा सेव्य था और उसके नख नक्षत्रों के समान थे, मानों वे रूप देखने के लिये दर्पण ही बनाये गये थे। उसका रूप उपमा रहित था। उस कौरवेश राजाओं के राजा के रूप का वर्णन करने को संसार में कोई भी समर्थ नहीं है ॥१६३-१६६॥
ततः कुन्ती सुतं भीममसौष्ट सौष्ठवान्वितम्। युधिष्ठिरसमं शिष्टं विशिष्टं गुणगौरवैः ॥१६७॥
यस्माद्भीतिर्भवेद्भूमावरीणां रणशालिनाम्। तस्मादाख्यायि लोकेन स भीमो भीमदर्शनः ॥१६८॥
महाकायो महाकान्तिर्महावीर्यो महागुणः। महामना महारूपी भीमोऽभाद्भूमिभूषणः ॥१६९॥
अर्थ (श्लोक 167 से 169): इसके बाद कुन्ती ने भीम को जन्म दिया। भीम युधिष्ठिर के तुल्य ही शिष्ट था, गुणों के गौरव से विशिष्ट था, सुन्दर था। उससे बड़े-बड़े रणशाली वैरी भी डरते थे। इसलिए लोग उसे दृष्टिभयंकर-भीम कहते थे। कल्पवृक्ष के बहाने से स्वप्न में वायु ने उसे कुन्ती को दिया था, इसलिए लोग उसे मरुत्तनय कहते हैं। उसकी महान् भुजाएँ थीं, शरीर लम्बा-चौड़ा सुन्दर था, कान्तिशाली था। वह
ततो धनंजयो जज्ञे धनंजयो महौजसा। धनं जयं च संप्राप्तः शत्रुदारुधनंजयः ॥१७०॥
अर्थ (श्लोक 167 से 170): गुणों का पुंज था, महामना, रूपशाली और पृथ्वी का भूषण था। इसके बाद कुन्ती ने धनंजय (आग) सरीखे धनंजय को जन्म दिया। वह महान् तेज वाला और धन एवं जय को प्राप्त था ॥१६७-१७०॥
अर्जुनोऽर्जुनसंकाशो सद्भिसर्जनसज्जनः। अर्जको यशसां लोके तस्याभूत्तृतीयः सुतः ॥१७१॥
स्वप्ने संदर्शनान्मात्रा पुरुहूतस्य सज्जनैः। सर्वैः स गदितः शक्रसूनुर्नाम्नेति निश्चितम् ॥१७२॥
यस्य रूपं गुणा यस्य यस्य तेजश्च यद्यशः। बलं यस्य कथं वर्ण्यं यदि जिह्वाशतं भवेत् ॥१७३॥
अर्थ (श्लोक 171 से 173): शत्रु-रूप काठ को जलाने के लिये जो धनंजय-अग्नि के समान था। इसका दूसरा नाम अर्जुन था। वह इसलिए पड़ा था कि उसके शरीर की कान्ति अर्जुन (चाँदी) के समान थी। वह दुष्टों के निग्रह करने में दक्ष था, यश को संचय करने वाला था। उसकी माता ने स्वप्न में इन्द्र को देखा था। इसलिए सत्पुरुष उसे शक्रसूनु कहते थे। यदि किसी के सौ जीभें भी हो जायें, तब भी वह उसके रूप, गुण, तेज, यश और बल को नहीं कह सकता ॥१७१-१७३॥
ततो मद्री समुद्राढ्या नकुलं कुलकारिणम्। लेभे च जनितानन्दं कुर्वाणम रिसंक्षयम् ॥१७४॥
सहदेवं महादेवं सा सूते स्म सविस्मया। सह देवैः प्रकुर्वाणं क्रीडां संक्रीडनोद्यतम् ॥१७५॥
एवं पञ्चसुतैः पाण्डुः प्रचण्डो वैरिखण्डनः। सातं ततान सङ्गेहो यथा पञ्चभिरिन्द्रियैः ॥१७६॥
कुन्ती सुतवती सत्या मद्री समृद्धयान्विता। पाण्डुः प्रचण्डः संभुङ्क्ते पञ्चभिस्तनुजैः सुखम् ॥१७७॥
अर्थ (श्लोक 174 से 177): इसके बाद समुद्र की तरह गंभीर मद्री ने कुल को उज्ज्वल करने वाले नकुल को जन्म दिया और देवताओं के साथ क्रीड़ा करने वाले महान् बली सहदेव को उत्पन्न किया। इस प्रकार बैरियों को खण्डन करने वाला और प्रचंड तेज का, धारक पाण्डु पाँच पुत्रों के साथ सुख भोगने लगा। जिस तरह नीरोग मनुष्य अपनी पाँचों इन्द्रियों से सुख भोगता है। इस प्रकार सब गुण सम्पन्न सुतों वाली कुन्ती, सुंदर मुद्रा को धारण करने वाली तथा सज्जनों की रक्षक मद्री तथा प्रचंड बली पाण्डु ये तीनों अपने पाँचों श्रेष्ठ पुत्रों के साथ-साथ आनंदपूर्वक सांसारिक सुखों को भोगते थे ॥१७४-१७७॥
धृतराष्ट्रप्रिया प्रीता परमप्रेमपूरिता। गान्धारी बन्धुभिः सार्धं ववृधे धृतिधारिणी ॥१७८॥
गान्धारीवक्त्रनलिनचञ्चरीकेण चेतसा। धृतराष्ट्रश्च नो लेभे रतिं चान्यत्र तां विना ॥१७९॥
गान्धार्या स समं तेने सातं संसारसम्भवम्। कामिनः कामिनीं मुक्त्वा लभन्ते शं न हि क्वचित् ॥१८०॥
अर्थ (श्लोक 178 से 180): उधर परम प्रीति को प्राप्त हुई धृतराष्ट्र की प्रिया गांधारी अपने बन्धुवर्ग के साथ-साथ सुख भोग रही थी। वह धैर्य की खान थी। धृतराष्ट्र गांधारी के मुख-कमल के साथ भौंरे की तरह क्रीड़ा किया करता था। गांधारी के बिना उसे कहीं भी चैन न पड़ती थी। वह उसके साथ सब सांसारिक सुखों को भोगता था और ठीक ही है कि कामिनीजन को छोड़कर कामी-पुरुष और जगह कहीं सुख नहीं पाते हैं ॥१७८-१८०॥
गान्धारी रमयामास भर्तारं भर्तृभक्तिका। हास्यैः कटाक्षविक्षेपैर्विनोदैर्मदनप्रियैः ॥१८१॥
अर्थ: गांधारी पतिभक्ता साध्वी थी,अतः वह भी हास्य, कटाक्ष और विनोद के द्वारा धृतराष्ट्र को
रेमाते दम्पती दीप्तौ स्फुरद्रससमन्वितौ।
विद्युद्घनाघनौ यद्वद्रेजाते जनरञ्जकौ ॥१८२॥
गान्धारीं च कदाचित्स क्रीडामुख्यैश्च क्रीडनैः।
महाभोगैर्वराभोगैः क्रीडयामास सक्रियः ॥१८३॥
गान्धार्यथ शुभं गर्भं दधौ धर्मानुभावतः।
तत्किं न लभते पुण्याद्यल्लोके हि दुरासदम् ॥१८४॥
अर्थ (श्लोक 181 से 184): खूब रमाती थी एवं वे दोनों दम्पति विनोद के साथ क्रीड़ा किया करते थे और सुशोभित होते थे, जिस तरह कि मन को मोहने वाले बिजली और मेघ सुशोभित होते हैं। एक समय उस सदाचारी ने गांधारी के साथ महाभोग, वराभोग आदि क्रीड़ायें कीं। उस समय पुण्ययोग से गांधारी ने गर्भ धारण किया। नीति के पंडितों ने कहा है कि संसार में ऐसी कौन-सी दुर्लभ वस्तु है जो पुण्य योग्य से प्राप्त नहीं होती ॥१८१-१८४॥
पूर्णे मासेऽथ सुषुवे सुतं सा सुखसंगता।
जनयित्री जनान्दं परमप्रीतिदायिका ॥१८५॥
पुरन्ध्रिकास्तदाशीर्भिर्नन्दयन्ति स्म तामिति।
सुषूध्व सुसुतानां हि शतं शतसुखानि वा ॥१८६॥
दुःखेन योध्यते यस्माद् दुर्योधन इतीरितः।
स सुतः स्वजनैः शीघ्रं संपन्नपरमोदयः ॥१८७॥
पितुः सुतसमुद्भूतिसूचकाय नराय च।
अदेयं न किमप्यासीच्छत्रसिंहासनादृते ॥१८८॥
निगडाकलिताँल्लोकान्पञ्जरस्थांश्च पक्षिणः।
बन्दिसद्मस्थिताञ्शत्रून्मुमोच नृपतिस्तदा ॥१८९॥
वाद्यवादनभेदेन विदितो जननोत्सवः।
तस्य प्रशस्यतां नीतः सुनीतेः सातवारिधेः ॥१९०॥
अर्थ (श्लोक 185 से 190): धीरे-धीरे जब गर्भ के दिन पूरे हुए तब उस सुखशालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, जिससे लोगों को बड़ा भारी हर्ष हुआ। वे परम प्रीति को प्राप्त हुए और ऐसे उत्तम पुत्र को जन्म देने के उपलक्ष्य में पुरंध्री जन उसे आशीर्वाद देने लगीं कि हे देवी ! तुम लोकोपकारी ऐसे ही सैकड़ों पुत्रों को पैदा करो। वह पुत्र शत्रुओं के साथ बड़ी भयंकरता से युद्ध करने वाला था। उसके द्वारा बैरियों को बड़ा दुख होता था, इसलिए उसे लोग दुर्योधन कहते थे। वह अपने स्वजनों के साथ-साथ शीघ्र ही परमोदय को प्राप्त हो गया। इस समय पुत्र-जन्म का समाचार लेकर जो पुरुष, राजा के पास आया राजा ने उसे अपने छत्र-सिंहासन आदि राज-चिह्नों को छोड़कर और कुछ भी देने की कसर न की। इसके सिवा राजा ने उस समय कैद में पड़े हुए कैदियों को, पिंजरे में बँधे हुए पक्षियों को तथा जेलखाने में पड़े हुए शत्रुओं को छोड़ दिया-उन्हें मुक्त कर दिया। उस समय जो भाँति-भाँति के बाजे बजे उनसे उस सुनीति वाले और सुख के सागर का जन्म-उत्सव.सभी को ज्ञात हो गया ॥१८५-१९०॥
वर्धमानो बुधो युद्धे दुर्योध्यो युद्धधारिभिः।
दुर्योधनोऽवधीद्धैर्यात्परान्योद्धॄन्महायोधान् ॥१९१॥
ततः क्रमेण गान्धारी सुतं दुःशासनाभिधम्।
असौष्ट स्पष्टताविष्टं वरिष्ठं शुभचेष्टितम् ॥१९२॥
अर्थ (श्लोक 191 से 192): वह वर्द्धमान था और विद्वान् था, युद्ध में बड़े से बड़े बैरियों द्वारा भी जीता न जा सकता था। उसने बड़ी शूरवीरता से भी युद्ध करने वाले कई एक शत्रुओं को प्राण-रहित कर दिया था। इसके बाद गांधारी ने दुःशासन नाम दूसरे पुत्र को जन्म दिया। वह भी स्पष्टवक्ता और सर्वश्रेष्ठ था। उसकी जितनी कुछ चेष्टा थी वह सब शुभ कार्यों के लिये थी। वह खोटे काम में कभी हाथ न डालता था ॥१९१-१९२॥
ततो दुर्धर्षणो धीमान्सुतो दुर्मर्षणस्ततः ।
रणश्रान्तः समाघश्च विदः सर्वसहोऽपि च ॥१९३॥
अनुविन्दः सुभीमश्च सुबाहुश्च दुःसहः ।
दुःशलश्च सुगात्रश्च दुःकर्णो दुःश्रवास्तथा ॥१९४॥
वरवंशोऽवकीर्णश्च दीर्घदर्शी सुलोचनः ।
उपचित्रो विचित्रश्च चारुचित्रः शरासनः ॥१९५॥
दुर्मदो दुःप्रगाहश्च युयुत्सुर्विकटाभिधः ।
ऊर्णनाभः सुनाभश्च तदा नन्दोपनन्दकौ ॥१९६॥
चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विमोचनः ।
अयोबाहुर्महाबाहुः श्रुतवान्पद्मलोचनः ॥१९७॥
भीमबाहुर्भीमबलः सुषेणः पण्डितस्तथा ।
श्रुतायुधः सुवीर्यश्च दण्डधारो महोदरः ॥१९८॥
चित्रायुधो निषङ्गी च पाशो वृन्दारकस्तथा ।
शत्रुंजयः शत्रुसहः सत्यसंधः सुदुःसहः ॥१९९॥
सुदर्शनश्चित्रसेनः सेनानी दुःपराजयः ।
पराजितः कुण्डशायी विशालाक्षो जयस्तथा ॥२००॥
दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ।
आदित्यकेतुर्बर्ह्माशी निबन्धो विप्रियोद्यपि ॥२०१॥
कवची रणशौण्डश्च कुण्डधारी धनुर्धरः ।
उग्ररथो भीमरथः शूरबाहुरलोलुपः ॥२०२॥
अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाभिधः ।
अनाधृष्टः कुण्डभेदी विराजी दीर्घलोचनः ॥२०३॥
प्रथमश्च प्रमाथी च दीर्घालापश्च वीर्यवान् ।
दीर्घबाहुर्महावक्षा दृढवक्षाः सुलक्षणः ॥२०४॥
कनकः काञ्चनश्चैव सुध्वजः सुभुजोऽरजः ।
एवं शतं सुतानां हि तयोर्जातमनुक्रमात् ॥२०५॥
अर्थ (श्लोक 193 से 205): इसके बाद गांधारी ने अट्ठानवे और-और पुत्रों को पैदा किया। उनके नाम सुनिए दुर्द्धर्षण, दुर्मर्षण, रणश्रान्त, समाघ, विंद, सर्वसह, अनुविंद, सुभीम, सुवन्हि, दुःसह, दुसल, सुगात्र, दुःकर्ण, दुःश्रव, वरवंश, अवकीर्ण, दीर्घदर्शी, सुलोचन, उपचित्र, विचित्र, चारुचित्र, शरासन, दुर्मद, दुःप्रगाह, युयुत्सु, विकट, ऊर्णनाभ, सुनांभ, नंद, उपनंद, चित्रवाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, अयोवाहु, महाबाहु, श्रुतवान, पद्मलोचन, भीमबाहु, भीमवल, सुषेण, पंडित, श्रुतायुध, सुवीर्य, दंडधर, महोदर, चित्रायुध, निःषंगी, पाश, वृंदारक, शत्रुंजय, शत्रुसह, सत्यसंध, सुदुःसह, सुदर्शन, चित्रसेन, सेनानी, दुःपराजय, पराजित, कुंडशायी, विशालाक्ष, जय, दृढ़हस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्चस्, आदित्यकेतु, वर्ह्माशी, निबन्ध, प्रियोदी, कवची, रणशौंड, कुंडधार, धनुर्धर, उग्ररथ, भीमरथ, शूरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृष्टरथ, अनादृष्ट, कुंडभेदी, विराजी, दीर्घलोचन, प्रथम, प्रमाथी, दीर्घालाप, वीर्यवान, दीर्घबाहु, महावक्ष, सुलक्षण, विलक्षण, कनक, कांचन, सुध्वज, सुभज और अरज ॥१९३-२०५॥
वर्धमानाः सुताः सर्वे वर्धमानयशोलताः ।
शोभन्ते शोभनाकाराः शस्त्रशास्त्रविशारदाः ॥२०६॥
पाण्डवाः कौरवाश्चैवं वर्धन्ते स्म यथा यथा ।
तथा तथा विवर्धन्ते संपदो मोददायकाः ॥२०७॥
गाङ्गेयेन सुगाङ्गेयतेजसामलचक्षुषा ।
पितामहेन तेषां हि शीललीलाविलासिना ॥२०८॥
रक्षिताः शिक्षिताः सर्वे परां वृद्धिमवापतुः ।
वृद्धेन पालिताः के हि न यान्ति परमोदयम् ॥२०९॥
अर्थ (श्लोक 206 से 209): ये सभी पुत्र वर्द्धमान और इनका यश सब जगह फैल रहा था तथा हमेशा बढ़ता ही जाता था। ये सबके सब शस्त्र और शास्त्र आदि भाँति-भाँति की कलाओं में निपुण और सुन्दर थे। इस प्रकार ज्यों-ज्यों पाण्डव और कौरव वृद्धिंगत होते जाते थे, त्यों-त्यों आनंद देने वाली उनके सम्पत्ति भी बढ़ती जाती थी। दिव्यचक्षु के धारक, सुवर्ण के समान कान्ति वाले एवं ब्रह्मचारी गांगेय (भीष्म पितामह) इन सब पाण्डवों और कौरवों की रक्षा करते थे तथा इन्हें शिक्षा देते थे। धीरे-धीरे ये सब पूर्ण समृद्धिशाली हो गये ॥२०६-२०९॥
द्रोणाख्येन द्विजेशेन पालिताः परमोदयाः। भेजुर्वृद्धिं शुभाकाराः पाण्डवाः कौरवाः पुनः ॥२१०॥
द्रोणायितं च द्रोणेन धनुर्वेदसरित्पतेः। तरणे च शरण्येन कारुण्यपण्यवाहिना ॥२११॥
द्रोणस्तु सर्वपुत्राणां चापविद्यामशिक्षयत्। ते तस्य विनयं चक्रुर्विद्या विनयतो यतः ॥२१२॥
अर्थ (श्लोक 210 से 212): सच है कि वृद्ध के द्वारा पाला-पोषा जाकर कौन परमोदय को नहीं प्राप्त होता एवं इन परमोदय के धारकों को द्रोणाचार्य द्विजेश ने भी पाला-पोषा, जिससे ये सुन्दराकृति कौरव और पाण्डव परम वृद्धि को प्राप्त हुए। द्रोण बड़े दयालु थे, शरण-योग्य थे, आश्रितों को अपनाते थे, अतः उन्होंने धनुष विद्या-रूप समुद्र को पार करने के लिये इन्हें द्रोणी (नौका) का काम दिया और थोड़े ही समय में इन सबको धनुषविद्या में निपुण कर दिया। ये सब द्रोणाचार्य का खूब आदर और विनय करते थे क्योंकि विद्या विनय से ही प्राप्त होती है ॥२१०-२१२॥
सार्जवायार्जुनायासौ व्यपेताय विकर्मतः। कार्मुकीं कार्मुकीं विद्यां पितृव्यः समुपादिशत् ॥२१३॥
शब्दवेधिमहाविद्यां द्रोणात्पार्थः समासदत्। गुरोर्विनीतेः किं न स्याद्विनयो हि सुकामसूः ॥२१४॥
प्रचण्डाखण्डकोदण्डलक्षणं लक्ष्यलक्षणम्। वेध्यवेधकभावेनाशिक्षयद् गुरुतः स च ॥२१५॥
पार्थो व्यर्थीकृताशेषचापविद्याविशारदः। रराज राज्यरङ्गेऽस्मिन्नभसीव निशापतिः ॥२१६॥
अर्थ (श्लोक 213 से 216): अर्जुन सरलचित्त था, विनयी और पाप-कर्मों से रहित था अर्थात् वह हमेशा शुभ क्रियाओं में ही लगा रहता था। अतः पितृव्य तुल्य और धनुषविद्या-विशारद द्रोण ने प्रसन्न होकर उसे धनुष-विद्या की खूब शिक्षा दी। इसके सिवा द्रोण ने उसे शब्दवेधी महाविद्या भी सिखा दी। अर्जुन को पार्थ भी कहते हैं। पार्थ ने जो कुछ भी गुरु से विद्या पाई थी वह सब उसके विनय का फल था। नीतिकार कहते हैं कि गुरु के विनय से क्या-क्या नहीं होता, विनय मनोभिलषित पदार्थों की देने वाला है, लोगों के सभी मनोरथों को साधता है। इस प्रकार अर्जुन ने गुरु द्रोण से, विनय के बल, प्रचंड और अखण्ड धनुषरूप लक्षण के द्वारा, लक्ष्य (निशाना) वेध करने को, वेध्य-वेधक भाव से अर्थात् लक्ष्य का बार-बार वेध करने से सीख लिया, जिसके द्वारा वह सारे जगत के धनुष-विद्या के पंडितों को नीचा दिखाकर, आकाश में चाँद की तरह, राज्यरूप आँगन में सुशोभित होने लगा ॥२१३-२१६॥
एवं तेषां महान्कालो लिप्सूनां सातमूल्बणम्। व्यतीतः सुसुखानां हि वत्सरोऽपि क्षणायते ॥२१७॥
इति सुपाण्डुरखण्डसुपण्डितः सुघटघोटकटङ्कितसद्भटः।
घटयति स्म घटां वरदन्तिनां प्रकटसङ्कटसाध्वसहारिणीम् ॥२१८॥
अर्थ (श्लोक 217 से 218): इस प्रकार सुख-सागर में निमग्न हुए उन पाण्डवों और कौरवों का काल बीत गया, पर उसका उन्हें कुछ भी भान न हुआ। ठीक ही है कि सुखी जीवों का एक वर्ष भी क्षण की तरह बीत जाता है। इस तरह पाण्डु सुख से अपना समय बिताता था। उसका कोई शत्रु न था और उसके पक्ष में बड़े-बड़े वीर थे। स्वयं उसके पुत्र ही अद्वितीय योद्धा थे। इसके सिवा वह विद्वान् था, अतः उसके पास बुद्धिबल भी था ॥२१७-२१८॥